Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vedmandir Praveshika
Front matter
म्यगीय माई फूलसदर सुन्दरलाल देसाई पडवोकेट 'बदमदाबाद' 1 - भूमिका वेदोऽखिलो धर्ममृरम् जिम हिन्दू-जानिने अपने लोकोत्तर सस्कृति मन्दिरकी आधार गिला भगवान् वेदकी रक्षामें अनन्त बलिदान दिए । वही जाति आज यदि स्वातन्त्र्य-मदमें चक्नाचूर होकर अपनी वैदिक सम्पतिसे हाथ धो बैठे, तो इससे बटकर और लजावी बात क्या होगी। हाँ। यही सम्पत्ति किसी जीती-जागती जातिके अधिकारमें हाती, फिर यह झूठी न ममाती और अवमर पाकर इमसी एक हा झनफारसे विश्वका कोना-कोना मर टालती । पान्तु आर्य हृदयकी भारता और मूढता पर ममार हमता हे । । हमें उप हमोगा मुँह नोड उत्तर अवश्य देना होगा और बता देना होगा कि “पुमान् पुमास परिपातु विसत " (ऋ० ६१७११४) जैसे हमारे स्त्रि धर्म शिक्षणके बिना अपनाये मानवताभिरक्षण अमम्भर है । चैटिक शातल शिक्षाकी रक्षा ग्रेयेक महृदय मानवका मुख्य कर्तव्य है । हमारे प्रात रमरणीय श्रौत मुनियों ने अपने अनुकरणीय यनुरम आम-त्याग-पूर्वक आदर्श आचरणसे सुझा दिया है कि वेद-रक्षाके प्रधान माधन हैं - वेद-मन्दिरों, वैदिक विद्यालयों और पुस्तकालयों की स्थापना, वदिक अनुमधान एव वैदिक प्रन्य- निमाणादि ! युपिरिको वारहतीं शताब्दीमें वेद विद्या विशारद बदामान-प्रवर श्रुतिमिद्ध मुनिन अपने दुर्धर्ष परिश्रमसे बहुतसे वेद मन्दिर स्थापित किए थे। इतना ही नहीं निघण्टु जसे + वेदमन्दिर स्थापनाका प्रामाणिक इतिहास देखा "श्रौतानि चरितामृत प्रवाह ५, तर ७, पृ. ३. ।
२ भूमिका + गम्भीर नदिक प्रन्योका निर्माण भी किया था x। दुर्भाग्यसे भारतमें एक भी वेद-मन्दिर न -बचा । यह अमाव हमारे श्रद्धेयचरण गुरु-वर वेद दर्शनाचार्य महामण्डलेश्वर । स्वामी गङ्गेश्वरानन्दजी महाराजको बहुत अखर रहा था। अवसर हाथ आते ही, इन्होंने अहमदाबादमें एक विशाल वेद-मन्दिर स्थापित कर दिया । पदिक विद्वानोंको हमसे महता प्रसन्नता हुई। पण्डित 'श्रीपाद दामोदर सातरलेवर' ने तो यहाँ तक कहा कि 'श्री स्वामीजीने भारतको एक बडी कमी ही दूर नहीं की, बल्कि विश्वमें मारतीयोंका सिर उनत कर दिखाया । महाराजश्रीने वैदिक प्रचारमें अपना तो पूर्ण जीवन अर्पित किया ही है; हम लोगों पर भी वही अनिवार्य व्रत-पालन रक्खा है। आपके सदुपदेशका ही फल है कि आज अहमदाबाद के ससंगियोंमें वैदिक साहित्यका चिर मुप्त प्रेम जाग उठा है। विशेषत प्रम्बर प्रतिभाशाली वकील भाई फलशङ्कर सुन्दरलाल देमाई (अहमदाबाद) महाराजश्राके चरणोंमें अटूट भक्ति तया श्रोत साहित्यमें अगाध श्रद्धा रखते थे। प्राय नित्य ही वैदिक प्रकाशना मवल्प प्रस्ट किया करते थे। अपने सङ्कल्प कल्प- पादपको अविरउ सफलताक लिए माईने ता० ३-४-१९४५ • मैं अपने एर मझान [म्यु० से० न० १९७७, १९७७/१, १९७७/१/१, १९७७/२, १९७७/३ मारगपुर अहमदाबाद] पर दस्ट-कमेटी बनाते हुए टिखा कि- वेद और दर्शन - x निघण्टु निर्माण देखो इसी पुस्तक पृ१२ ।
भूमिका ३ -- - सम्बन्धी पुस्तकोंके ,लिखाने तथा 'छपाने कार्यमें कथित मकानका पूरा माड़ा व्यय किया जाय तदनन्तर लिखा है कि- 'पुस्तक लेखनादिका कार्य वही व्यक्ति करेगा, जिसे परम पूज्य ब्रह्मनिष्ठ वेददर्शनाचार्य : सद्गुरु श्री १०८ महामण्डलेश्वर श्री गंगेश्वरानन्दजी उस. कार्यके लिए नियुक्त करेंगे- ट्रस्ट-कमेटिके मेम्बर ये हैं-(१) ठाकोरलाल चन्दुलाल ठाकोर :(मुम्बई), (२) देसाई कृष्णलाल छलशङ्कर (अहमदाबाद), (३) देसाई रामप्रसाद नन्दराम (अहमदाबाद) और चौथा मैं । - बहुत खेदसे कहना पड़ता है. कि. मई १९४९ ई० में भाईका देहायमान हो गया -1-थोड़े दिनोंके बाद • महाराजश्रीने भाईके सङ्कल्पको पूरा करनेके लिए न्यायाचार्य, मीमासातीर्थ, शास्त्री योगीन्द्रानन्दको लिखा कि वैदिक शिक्षाकी एक. पुस्तक शीघ्र लिम्वकर तैयार कर लें। उन्होंने पत्र पाते ही कार्य आरम्भ कर दिया और हमारे माहित्यमर्मज्ञ, वेद-विद्या-पारंगत पं० रामस्वरूपजी, (सम्पादक सन्तसमाचार) की- अमुदित मात्रा- शास्त्रीय" श्लोकवर टोका ,पर "श्रुतिमवादिनी" लिखकर तैयार कर ली । हरद्वार-कुम्भमें उक्त टीका-द्वय-सहित "मात्राशास्त्र " को महाराजश्री तथा और कई विद्वानोंने सुना । ममीने मुक्त कंठसे प्रशंसा की। महाराजश्रीकी - आज्ञासे-शास्त्री योगीन्द्रानन्द कुम्भका और आवश्यक सब काम छोड़कर उसे छपानेमें लग गये । माई फूलशङ्कग्ने महाराजश्रीसे कहा था कि मेरे धनसे प्रथम पुस्तक आप अपने गुरु महाराज (योगिराज श्री १०८ रामानन्दजी) के मरणमें प्रकाशित कराएँ । अतः उनके स्मरणमें मात्रा शाख"का.प्रकाशन हुआ। .
१ मूमिका . महाराजश्रीने शास्त्री यागीन्दानन्दो पैदिक एप दार्शनिक अनुसन्धानके लिए नियुक्त कर रखा है। उनका अनुमन्धान चराबर चाल् हि । 'सामयिक आवश्यकतानुसार " वेदमन्दिर- प्रवेशिका" नामयी पुस्तक प्रकाशित की जा रही है । " मात्रा शास्त्र के साथ-ही-साथ इसका भी समलन होता रहा है । इमी प्रशर प्रतिपर्प हिन्दी एप गुजराती महत्त्वकी पुस्तकें प्रकाशित की जायेंगी। पुस्तम-परिचय-प्रस्तुत पुस्तक 'नामसे ही सुव्यक्त है कि वेदरूपी मन्दिर प्रवेश करानेका यह एक मरल पथ है। आगर छोटा होने पर भी यह अपने ध्येय साधनमें नितान्त सफल है । इसमें चार (मोपान) प्रकरण' है । "वेद गौरव" नामक प्रयम मोपानमें वेद-विद्यामी गरिमा और सांगीणनामा सुन्दर निरूपण है । " वदिक रूप रेख " मज्ञक द्वितीय सोपानमें उपलब्ध वैदिक साहित्यके समग्र कलेपर पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। तृतीय "मत्र शिक्षा" सोपानमे सदिताओंके मार्मिक गिक्षाप्रद मन्त्रोंका, प्रामाणिक अर्योंके माथ स्वल्प-सग्रह है । चतुर्य ब्राह्मण शिक्षा" सोपानमें ब्राह्मण वाक्योंका पूर्व-सोपान- जमा सुन्दर मग्रह है। एक महान् कार्यमें व्यात शास्त्री योगीन्द्रानन्दका आनुषंगिक भी यह कार्य हिन्दी जगती एक अच्छी सेवा है। पूर्ण आशा है कि स्वर्गीय आत्माको अपने उस स्थायी स्मारकमे मच्ची शाति मिलेगी। येदमन्दिा, अमायद म० म० स्वामी सर्वानन्दजी आश्विन शु. १ दर्शनरल, दालदार, व्याख्यान-वाचस्पति -- -- । सम्बन् २००७ आभार-प्रदर्शन कुछ लिखना माल-से-सरल कार्य है और कठिन-से-कटिन । उच्च कक्षाके चिन्ताशील विद्वानों के लिए सरल-से-मरल होगा। मुझे तो काफ़ी सोचना पड़ता है; कहीं-कहीं काफ़ीसे भी अधिक । क्या अच्छा होता !!! कि लेखनीसे जो एकवार निकल जाता; किसीके वापसे भी काटे न कटता । किन्तु मेरा लेख मुझे ही कई बार बुरी तरह काटना पड़ता है। कहाँ ? विश्व साहित्यात्मा भगवान् वेद और वहाँ ? मैं । सत्य तो यह है कि परमहंस- परित्राजकाचार्य, उदासीन-प्रवर, वेददर्शनाचार्य, महामण्डलेश्वर स्वा० गंगेश्वरानन्दजी महाराजके सत्परामर्शसे ही 'वेदमन्दिर- प्रवेशिका' बन सकी है। अतः आपका हृदयसे ऋणी हूँ। दर्शननरन, वेढालङ्कार, व्याख्यान-वाचरपति म० म० स्वामी सवानन्दजीका मैं कृतज्ञ हूँ कि आपने भूमिका लिम्बनेमें अमूल्य समय दिया है । सबसे अविक इस स्थानके अपने सुहृद्- घर महृदय प्रबन्धकोंका आभारी हूँ; इन्होंने पूर्ण सुविधाएं मुझे दे रक्ती हैं। माई 'पुरुषोत्तम, .दलमुखराम' जीने मुद्रण- व्यवस्था एवं मम करेक्शनमें तथा भाई ‘अम्बालाल, निर्भयराम' मशरूलेने प्रफके लाने-लेनानेमें बड़ी सहायता की है; इसलिए दोनों भाइयों को माशीचांद धन्यवाद है। मैं उन वैदिक महारथियोंको अवश्य धन्यवाद दूंगा; जिनके लेखोंसे मैंने टाभ उठाया है। वेदमन्दिर, अहमदाबाद श्रौतमुनि-चरण-रेणु आश्विन शु. ३ योगीन्द्र सम्बत् २०.७ 1 .
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विषय-सूची
प्रथम सोपान (वेद-गौरव) पृ० १-३२
वेद-पर्याय शब्दोंका मर्म २-४; मनु-शब्दोंमें वेद ४-६, शिक्षादि
वेदान ७-10; आये पाठ-प्रणालीमें वेद १८-१९; जादि विकार-अटक
२०-२६; साम-अक्षर-गाना-पद्धति २७-२९; 'वेद' सज्ञानहस्य २९-३२ ।
द्वितीय सोपान (वैदिक रूप-रेखा) पृ०३३-१०५
वेद'. शब्द, और उसका अर्थ ३३; वेदोंके. विभाग ३४; वेदोंके
मेद और सम्प्रदाय ३७.1
१. ऋग्वेद ४०-५४
नाम-करण ४०; प्रवेटकी शालाएँ. ४१; ऋग्वेदके ब्राह्मण ४५;
ऋग्वेदके आरण्यक ४७; ऋग्वेदकी उपनिषदे ४१ऋग्वेदके श्रौतसूत्र
५०; ऋग्वेदके गृह्यसूत्र ११; ऋग्अनुकर्माका ५२; बृहदेवता .५३-1
२. यदि ५४-७३:
यजुर्वेदका महत्व ५४; यजुर्वेद मेद ५५ ।
कृष्ण यजुदकी शाखाएँ ५७-६५
(१) तैत्तिरीय शाला ५०-६०; (२) काठफ शाखा ६०-६३;
(३) मैत्राया शापा ३-६४ (४) कपिष्टर श सो ६५
शुभ यजुर्वेदको शास्याएँ ६५-७२
(1) माध्यन्दिनी शासा ६५-६९; (२) कम्य नासा :
यजुर्वेदकी लुप्त शराओंका कुछ मुदित, अवगेर ७२-७३ ।
३. सामवेद
कृष्ण और मान ५३: अग और साम ur, ‘माम' शब्द और
उनका अप ७४; मान महिना.और उसके प्रकार ,.....!
(1)दा सहिता ७६-७७(२) गान-संहिता..४९; आठ विकार
८
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विषय-सूची
सामवेदकी शाखाएँ ८१-९३,
(6) कोयुम-शाखा '८२-८६; (२) राणायनीय-शास्त्रा ८६-८७;
दोनों शाखाओं के ब्राह्मण ८७-८९; (३) जैमिनीय राखा ९५-६
सामवेदके मूत्र-यन्ध ९१-९३ ।
2. अथवेधेद ९४-१०३
'अथर्ववेद' और उसके पर्याय शुन्द १:-१..। .
अथर्ववेदकी शाखाएँ ९८-१००
अयदेवदके उपवेद १०.; अथववेदक ब्राह्मण १.१; अथर्ववेदकी
उपनिषदें १०१; अपवेद के सूत्र-ग्रन्य १०२; अथर्ववेदके परिचिट १०३;
उपलब्घ शाखा-सादित्य १०४-१०५ ।
तृतीय सोपान (मन्त्र-शिक्षा) पृ० १०६-१३०
(१) मन्त्री गुरुः १०%; () स्वस्निाय कामना १०६; (३)
श्रद्धा १०८; (४) ब्रह्मवयं-महिमा १०८ (५) ऋणोद्धार १०९; (६) संगठन
११०; (७) मधुर-जीवन १११; (6) आदर्श जीवन 19 ()
त-निन्दा ११६; (१०) उदारता ११८, (११) पापी केवलारी ११९
(१२) दिव्यराष्ट्रनिर्माण १२०; (१३) गोमाता १११; (४) आन-शोधन
१२४; (१५) उद्बोधन १२५; (१६) तन्त्र-शन १२ ।
चतुर्थ सोपान (ब्राह्मण-शिक्षा) पृ० १३१-१४९
(७) ब्रह्मपयन्वरेण्यता १३१; (3) सत्य १३२; (३) तर १३३.
(३) द-द-द 1३, (५) श्रेष्टतम कृत्तव्य १३ (6) यज्ञ-मेद १३,
(.) यद-यम ९३९; (८) नाथ महायत १३९; (९) साध्याय महिमा
१४. (..) उमंग १४०; (1) थाम प्रश्वाम-गना ४); (११)
शम १४२; (11) दम १४३; (11) विजय-पय १४; (५) पगभव.
पय ४५; (१६) श्री-प्रतिष्टा ; (1) अज्ञानकी वान्छनीयता
१४: (10) वेदान्तकी उपादेयता १४० (१९) वन-वृक्ष-वार १४:
(२.) इन-मार १४८: (81) ऋषि-वन्दना ।
पंक्ति अशुद्ध 4 १८ भोग " १८ ठोक प्रेस-प्रमाद पृष्ट पंक्ति अशुद्ध पृथ २ श्रुति १०७ शीपंक द्वितीय तृतीय ३ १३ विधव विधव १०८ १० साय साय २२ नोद्धत नोदत ११२ २२ पस्मै. परस्मै ५ ७ जग जगत् ११६ ५ साय सायं १५ उन्हों उन्होंने ११७ ७ इयादि इयादि ११७ भोग ७ वेदाँध वेदाश्च १२० व्र १२४ १९ आ २ अनूवाक अनुवाक १२५ ४ सहिताका संहिताका १२९ ११ शाल ५ शील ७ प्रसिद्ध प्रसिद्धि १२९ ठीक २ उपनिषदों उपनिषदोंको २२ प्रादुभूत प्रादुर्भूत १२ ऋ ऋग १३१ ९ ब्रह्मवय ब्रह्मचर्य १४ नहीं, अपितु १३. निमित्तापा निमित्तोपा अधिक ही है ४ १३० ६. श्रोत १३० १३ आ.शि आकाश ६१ १७ सोत्रायणी सौत्रामणी १३१ १५ विश्वम विश्वमें " पदकन्द यदकन्द ११ मुशाभित मुशोमित ३ रोहितानुवन रोहितानुवचन १३२ १८ वाणाका वाणीका ७२ सूत्र- १३३ २१ ऋषि ऋषि २. निमिमे निमित्तमें १३४ 11 चयांदि ब्रह्मचर्यादि १.. १४ गन्धव गन्धर्व "कने करने ५ अग्निष्टोमी अग्निटोमो २ आत्म आम १३९ २४ स्यादौख स्यादौवं ३सालक शाल १४. २ तयत तयत १५ अपमपण अघमर्षण १४१ १. श्रौत्र 4 १३ धाके
श्रोतवंशसमुद्भूतः, श्रोतमार्गस्य रक्षकः ।
भकिपिचिसमुच्येता, श्रीचन्द्रः पातु नः सदा ॥
वेदमन्दिर-प्रवेशिका प्रथम सोपान वेद गौरव उदासीनं सुखासीन, मुपासीनं रमारमम् ।' औदास्यप्रथमाचार्य, कुमार वैधसं भजे ॥१॥ श्रोतवंशसमुद्भत, श्रौतमार्गस्य रक्षकः । भक्तिवित्तिसमुच्चेता, श्रीचन्द्रः पातु नः सदा ।।२।। वैदिक ज्ञान-गग्मिा पर हिन्दू जातिका तो अविचल ध्रद्धा है ही, अजका कल्पना-कुशल प्रगतिशील मानव भी मुग्ध हो चला है । इस दिव्य सन्देश और मौलिक विचार प्रवर्तक वेढके संग्क्षगमें हिन्दुओंके बलिदान ऐतिहासिमोसे छिपे नहीं। वे पर आँच आते देख राजकुमारियोंके कोमल हृदय कॉप उडे । 'को वेदानुरियति ' की विभीपिकाने मठिन कर दिया । कुमारिल जैसे विकराल वैदिक सिंह' गगे और १ कुमारिग्मृन्देिण, हत्यु जिनहस्तिषु । निष्प्रत्यूहमवर्धन्त, श्रुतिशाखा समन्तत. । (कस्यचिप्राचीनको) .
२
पेद मन्दिर प्राशिका
-
नास्तिक दिग्गजों पर टूट पड़े..। उनकी वेद-गर्जनासे दिशाएँ
गूंज उठा। " वेदा विच्छिय वीथीपु रिक्षिध्यन्ते" के
पाशविक अत्याचारोसे वेद-उपासकोंका सून उचला। शूर शिव,
वीर प्रताप और नर-यर बन्दाकी तलमारोने नर-पिशाचोंका सूत्र
खून पिया | अधिक क्या ? हिन्दुओं को प्राणोंसे भी अधिक
अपन वेद प्यारे है । इनकी महत्ता उनके रोम-रोममें रमी है।
सर्व प्रथम सुन्दर, मधुर, मुवच, मुबोध और संक्षिप्त
'वेद' संज्ञा ही चित आकृष्ट किए विना
संज्ञा-सौटव नहीं रहती । 'धक्षरं चतुरक्षा की
मर्यादाका दायित्वपूर्ण निर्वहन देखते ही
बनता है। केवल वेद १३ नाम ही नहीं, सभी 'अति'
आदि पर्याय शब्द एक एक 'सैद्धान्कि महत्ता व्यक्त कर रहे हैं।
जिसका यहाँ दिग्दर्शन कराना अनुचित न होगा ।
'श्रुति!-- कर्ण कुहर-परम्परामें बहती आई है यह
वैदिक अमर धारा' । अत इसका अपरपेयत्वावेदी नाम 'श्रुति'
पड़ा । ' अनुश्रव' समाख्याका मी यही रहस्य है.
पाठादनुश्रूयत इत्यनुश्रवो वेदः" (वाचस्पति)
•.२. महाभाष्य- १११ प्रयोजनाधिक
३. वेद' शब्दका अथ द्वितीय सोपानके भारम्भमें देखो
४.'" वदस्याप्ययन सर्वे, गुर्वध्ययन पूर्वकम् ।
वेदाध्ययनसामान्या-दधुनाऽध्ययनं यथा ।। (सो- या वायाधिकरणे)
(11 सात कौमु का है।
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"शुरु
प्रथम सोपान " - आम्नाय'--'म्ना, अभ्यासे धातुसे निपन्न आम्नाय धाता यथा पूर्वमकल्पयत् " (२० १०।१९०३) का अभ्यास सिद्धान्त अपना कर अपने वाच्य वेदकी नित्यता बता रहा है। 'समाम्नाय ' शब्द भी ऐसा ही है -"आमायसमा-नायशब्दयोर्वेद एव प्रसिद्धेः” (नागेश:) त्रयी- गद्य, पद्य और गीतिमय मन्त्र-समुदायका नाम त्रयी है। चारों वेदोंका समस्त काय तीन प्रकारका ही है। अत: वेदचतुष्टयीको 'त्रयी' नामसे भी पुकारते है। पड्गुरू-शिष्यने लिग्वा है विनियोक्तव्य रूपश्च, त्रिविधः सम्प्रदर्ग्यते । ऋग्यजु सामरूपेण, मन्त्रो वेदचतुष्टये ।। ऋत्पादबद्वा गीत तु, साम गद्य यजुर्मन्त्र । चतुर्ध्वपि वेदेषु, निधव विनियुज्यते ।। (सानु० वृत्ति)* छन्द -सर्व विध कामना भोका पूरक वेद अपने उपासकको इस तरह छपता है कि मृत्यु कमी ढूंढ नहीं सकती 'देवा चै मृत्योविभ्यतस्त्रयो विद्या प्राविशंस्ते छन्दोमिरच्छादयस्तच्छन्दसा छन्दस्त्वम् " मन्त्रा० (३।४।२) स्वाध्यायः -स्व+अध्याय, कुलपरम्परागत पेद ही (सु+आ+अध्याय) विधिपूर्वक अध्ययनीय है। "स्वाध्यायोऽ ध्येतव्य " (ते. आ ॥१५॥७) : लयुशन्दुसरे 'इतिमाहेश्वराणीन्यम्य ' पातनिका निएकालापनादत पृ० १.१ 1 . * !
४
वेद मन्दिर प्रवेशिका
आगम तथा निगमः
-श्रोत्रों में आगमका आना,
मुखसे निगमका निकलना -भारतीयोंकी इस आदान प्रदानात्मक
स्वाध्याय प्रवचनकी पवित्र अविरल शृंखलाके अवद्योतक ' आगम'
और 'निगम' नाम हैं । आगम आस्तिकमूर्धन्य कुमारिलका
सर्वस्व है। मागमपरणश्चाहम्" (लो० वा० उपनम० ७
निगम महर्षि व्यासका कल्पद्रुम है "निगमकल्पतरो गलित
फडम" (भा० ११९१३)
मनु-शब्दों में वेद
वैदिक महत्तासे परिचित मनु हृदयके उद्गारोंको सुनकर
निश्चय हो जाता है कि वेद जैसी पिम्ल, विशाउ, गुरु और गम्भीर
दूसरी वस्तु विश्वमें न हुई है और न होगी
वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं, यथाकालमतन्द्रित ।
तं ह्यस्याहःपरंधर्म, मुपधर्मोऽन्य उच्यते।। (मनु० ४।१४७)
आटस्य डकर यथा समय वेदका नित्य अभ्याम करना चाहिए ।
क्योंकि यही मुग्न्य धर्म है और दृमो वर्म गौण हैं।
पितृदेवमनुष्याणां, वेदश्चक्षु सनातनम् ।
अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमितिस्थिति-।। (१२१९४)
पितर, देव तथा मनुष्योग वेद ही एक सनातन पथ-प्रदर्शक है।
वंदकी गम्भीरताश पता टगाना मानव शक्तिके सर्वथा बाहर है।
यह वास्तविक स्थिति है कि क्मिी पुरपसे वेट रचा नहीं गया;
अपौरुषेय है।
+
प्रथम सोपान
.
।
चातुर्वण्ये त्रयो लोका, श्चत्वारश्चाश्रम. पृथक् ।
मूतं भव्यं भविष्यं च, सर्व वेदात्मसिद्धयति ।। (१११९७)
ब्राह्मणादि चारों वर्ण, तीनों लोक, चारों आश्रम, भूत, भविष्य
और वर्तमान सम्का प्रकाश वेढसे ही है ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपंच, रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते, प्रसूतिर्गुणकर्मत- ।। (१२।९८)
त्रिगुणात्मक मायासे-
-जगतकारण शब्दादि तन्मानाओंकी
सृष्टि भूगदि वेद-शब्दपूर्वक ही होती है।
बिभर्ति सर्वभूतानि, वेदशास्त्रं सनातनम् । -...-
तस्मादेतत्परं मन्ये, यज्जन्तोरस्य साधनम् ।। (१२२९९)
वेदशास्त्र नित्य सर्व प्राणियोंका धारण पोषण करता है। जैसा कि
ग्राह्मणमें कहा है. " हविरग्नौ हूयते सोऽग्निरादित्यमुपसर्पति
तत्सूर्यो गरिममिति -तेनान्नं भवति । अयेह भूतानामुत्पत्ति:
स्थितिश्चेति हविजर्जायते" अर्थात् वेदको ही आज्ञासे आहुति
अग्निमें पड़ती है। उद्दीप्त अग्निदेव अन्तरिक्ष और धुके देवता
विद्युत् तथा सूर्यसे सम्बन्ध स्थापित करता है । जिमसे सूर्यरश्मियां
जल खींचती हैं और विद्युत्को सहायतासे वर्षा होती है। वर्षासे
मन्न, अन्नसे प्राणियोंकी उत्पत्ति स्थिति होती है !, वेदकी ही यह
सत्र महिमा है ।। अत: वेदको मैं सोपरि मानता हूँ। जीवोंके
परम पुस्पार्थ साधन वेट ही है।
सेनापत्यं च राज्यं च, दण्डनेतृत्वमेव च ।
सर्वलोकाधिपत्यं च, वेदशास्त्रविदहति ।। (१२११००)
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६ , वेद मन्दिर-प्रवेशिका सैन्य सञ्चाटन, प्रना-पालन, दण्ड-निमांग और सर्वलोकाविपत्य यदि कोई कर सकता है.तो एक वेद-शाबवेवा ही कर सकता है। सर्वाङ्गीण वेद सर्वाङ्गीण निसर्ग सुन्दर वेटकी सहत सेवाके लिए समप्र शब्दजगतको लालायित देख, शिक्षादि पहले. ही योग्य स्थान रोक चुके हैं: छन्दः पादौ तु वेदस्य, हस्ती कल्पोऽथं पठ्यते । ज्योतिपामयन चा, निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।। शिक्षा व्राण तु वेदस्य, मुखं व्याकरण स्मृतम् । तस्मात्साङ्गमधीत्यैव, ' ब्रह्मलोके महीयते ।। (पा. शिक्षाः ४१, ४२) वस्तुतः शिक्षादिका जन्म इसोटिए था । है अपने उद्देश्य-साधनमें पूर्णतया सफल हैं --"साक्षात्कृतधर्माण रूपयो वभूवुस्तेऽवरेम्यो:- साक्षात्कृतधर्मम्य उपदेशेन मन्त्रान् तम्प्रदुः । उपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे विल्ममहणायेमें अन्य समाम्नासिपुर्वेद वेदानि च" (निरु० ११६५) अर्थात् पढे ऋपि मन्त्र द्धा थे। उन्हों अपने परवती मन्त्र-दर्शन-सामर्थ-हित व्यक्तियों को मन्त्रोंका उपदेश किया । जब मनुर्योकी उपदेश-ग्रहण-शक्ति भी क्षीण हो चली तत्र (विग्रहणाय) वैदिक म्हस्य-ज्ञानके लिए वेदानोंकी रचना हुई । इन अनोंका स्वल्य परिचय देना नितान्त मायन्यक है । अतः मुण्डकोपनिषत्-श्रुत क्रमानुसार दिग्दर्शन कराया जाता है-- १. “शिश, 'कया, व्याण, निक, एन्दी ज्योतिषमिति" (मुग ट. ११) । प्रथम सोपान . . - १. शिक्षा-वर्ण, स्वरादिके उच्चारण-प्रकार-प्रतिपादक अन्य, शिक्षा कहलाते हैं। विभिन्न शाखा सम्बन्धी शिक्षा प्रन्य बहुत हैं । निरुक्तालोचनमें वेदविच्चूडामणि सत्यव्रत सामश्रमीने अपनी देखी तीस शिक्षाओंका उल्लेख किया है :- (१) याज्ञ- चल्क्य शिक्षा, (२) कात्यायनी शि०, (३) वासिष्ठी शि०, (४) पाराशरी शि०, (५) माण्डव्य शि०, (६) अमोवानन्दिन शि०, (७) लवमोचानन्दिनी शि०, (८) माध्यन्दिनीय शि०, (९) लघुमाध्यन्दिनीय शि०, (१०) अमरेशी शि०, (११) कैशवी शि०, (१२) स्वराङ्कुश शि०, (१३) षोडशश्लोकी शि०, (१४) अवमाननिर्णय शि०, (१५) स्वरभक्तिलक्षण शि०, (१६) क्रमसन्धान शि०, (१७) गल्क् शि०, (१८) मन स्वार शिक्ष, (१९) प्रातिशाख्यप्रदीप शि०, (२०) वेदसूत्रपरिभाषा शि०, (२१) यजुर्विधान शि०, (२२) स्वराक शि०, (२३) कम- कारिका शि०, (२४) पाणिनीय शि०, (२५) नारदीय शि०, (२६) गौतमी शि०, (२७) लोमशी शि०, (२८) माण्डूकी शि०, (२९) शौनकी शि०, (३०) आर्थर्वण शि० । एक शिक्षा स्वामी दयान्द सरस्वती कृत व्याख्या सहित छपी है। जिसे पाणिनिमुनि-प्रणीत लिखा गया है। परन्तु उमरावसिंह २ शर्गिल अपनी शुद्ध तथा पूर्ण की हुई प्रतिमें २ शिमला निवासी मुन्दरसिंह मजीठियाके बड़े भाई उमरावसिंह हैं। इन्होंने शिक्षा विषयमें गम्भीर अनुसन्धान किया है। अपनी शुप्रति १९४० ई० में वेददर्शनाचार्य म. म. स्वामी गङ्गेश्वरानन्द महारानका भेंट की दी। महारानीके सगद्गुरुर्थचन्द्र- 'पुम्नकालय' (में यह प्रति मुरक्षित है। T-
वेद मन्दिर प्रवेशिका
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आपिशलिमुनिकृत लिखते हैं. स्वा०..दयानन्दजीको ज्ञात
नहीं था कि यह आपिशलिमुनिकृता शिक्षा है।"
२. कल्प-मन्त्र विनियोगादिपूर्वक यांग-प्रयोगोंका
शंखला-बद्ध निरूपण तथा गांधानादि संस्कारोंका विधान कल्प
प्रन्यों में होता है। ये प्रधानतया तीन प्रकारोंमें विभक्त है
(१) श्रोत सूत्र, (२) गृह्य सूत्र, (३) धर्म सूत्र, । श्रौत सूत्रोंमें
श्रौत यज्ञ-सम्बन्धी मन्त्रादिविनियोग शाखान्तरस्य कर्म-अङ्गीका
संग्रह तथा गृहसूत्रोंमें गर्भाधानादि संस्कारोंका विशद विवेचन
होता है। धर्मसूत्र वर्णाश्रमोपयोगी धर्मों और सामाजिक नियमोंको
बताते हैं । इन सूत्रप्रन्योंका परिचय द्वितीय सोपानमें . सम्बद्ध
शाखाओंके साथ दिया जायगा ।
३. व्ययाकरण - वेदाङ्गोंमें व्याकरणका विशेष स्थान
है । शब्द-साधुत्व और साधु दार-प्रयोग-~-विज्ञान तथा प्रकृति
प्रत्यय विमाग पुरस्सर शब्दार्थ-ज्ञान व्याकरणायत्त है। वैदि
व्याकरण सम्बन्धी प्राचीन से प्राचीन प्रयत्न प्रातिशाख्योंके रूपमें
पाया जाता है । प्रातिशास्त्रका अर्थ है- प्रत्येक वैदिक शाखामें
प्रचटित-शब्द-स्वरूप एवं पाट* प्रमाटिका नियम-बद्ध वर्णन
समय छ: प्रातिशाख्य-ग्रन्थ उपलश्च हैं- (१) ऋक्-प्रतिशाख्य,
* " जरादो नाधिकारोऽस्ति, सम्यक्षाय्मज्ञानतः
प्रातिशाग्यमतो. सेय, सम्यक् पाटस्य सिद्धये ॥"
(शु. यन. प्राति. रव्यटभाष्योपरम)
। इस
- प्रथम सोपान - (२) शुक्लयजुः-प्रातिशाख्य, (३) साम-प्रातिशाख्य, (४) सर्व- प्रातिशाख्य, (५) चतुरध्यायी, (६) तत्तिरं य-प्रातिशाख्य । • १. ऋक्-प्रतिशास्य- इसे पार्षद-सूत्र भी कहते हैं म्हर्षि शौनक प्रणीत है। इसी प्रयः छन्दो बद्ध रचना है। इसमें तीन काण्ड - या अध्याय , है । प्रत्येक अध्याय छ: पटलों में विभक्त है। ऋक् प्रातिशाख्य सर्व-प्रथम १८५७-६९ ई० में रेग्नियर (A. Regnier) ने तीन भागों में प्रकाशित किया था । पश्चात् , जानीमें मैक्समूटर (Max Maller)ने सटिप्पण नागरी लिपिमें मुद्रित कराया। १९३१ ई० में उच्चट- भाष्यसहित ऋग्मेद-प्रातिशाख्यका सम्पादन वैदिक पुरव मङ्गलदेव शास्त्री (M. A. D. Phil. Oxon)ने बड़ी योग्यता और परिश्रमके साथ किया है। २.' शुक्लयजु:--प्रातिशाख्य कात्यायनमुनि प्रणत कहा जाता है । आठ अध्यायोंमें विभक्त है। उचट-माध्य- सहितके कलकत्ता प्रकाशनानुसार सब ७२७ सूत्र हैं। ३. साम-प्रातिशाख्य-महर्षि पुष्प-रचित होनेसे पुष-सूत्र मी इसकी संज्ञा है। 'सामवेद पुर-सूत्र' के नामसे १९०८ ई० में जर्मनीसे आर० सायमनने प्रकाशित किया था सायणमान्य युक्त साम्-प्रातिशाख्यके नामसे भी मुद्रित है। ४. अथर्व-प्रातिशाख्य-सूत्र-वद्ध है। विश्वबन्धु शास्त्रीने बहुतसे हस्त-लायोस सम्पादन किया है। १. इसमें अध्याय विभाग नहीं केवल पटल और सूत्र हैं। 7 .
- -- . १० चंद मन्दिर प्रवेशिका ६. चतुरध्यायी नामक ग्रन्य भी अथर्व-प्रातिशाख्य है। जिसका सम्पादन अमेरिकाके प्रसिद्ध विद्वान् हिटने (W. D. Whitney ) ने किया और अंग्रेजी अनुवाद. भी साथ छपाया था। ६. तैत्तिरीय प्रातिशाख्य-में २४ अध्याय हैं । सूत्रात्मक रचना है। अन्तिम अध्यायोंके अन्तमें इक्के-दुक्के लोक भी हैं और है मार्केके । अन्तिम लोक है - पदक्रमविशेषज्ञो, . वर्णक्रमविचक्षणः .. । स्वरमानाविभावज्ञो, गच्छेदाचार्यसंसदम् ॥ -सभी प्रातिशाख्योंका विषय-विश्लेपण यदि किया जाय तो स्यूल रूपसे सात विमाग किए जा सकते हैं --(१) वर्ण-समाम्नाय%3D स्वरत्र्यञ्जनोंकी गणना तथा उनके उच्चारणादिके नियम । (२) सन्धि अच्, हल:-- विसर्ग आदि । (३) प्राय संज्ञा, अवप्रह -पद-विभाग-नियम और इसके अपवाद । (४) उठात, अनुदान शब्दोंकी गिनती, स्त्ररित मेद तथा आग्व्यात-स्वर । (५) संहित. पाठ और पद-पाठमें भेद-प्रदर्शक नियम, सत्व, .पत्च, दीर्व आदिका विवरण । (६) अथर्व-प्रातिशाग्थ्यमें संहिता-पाठ एवं पद- पाठके अतिरिक्त क्रम पाठके भी नियम बतलाये गये हैं और तैत्तिरीय- प्रातिशाग्न्यमें जटा-पाठके भी नियम निर्दिष्ट हैं । (७) साम्- प्रातिशाख्यमें सामादकी भिन्न-भिन्न प्रकारको गीतियों के प्रश्लेप, विश्लेप, वृद्ध अमृद्ध, गत, अगत, उच्च, नीच, पृष्ट, अकृष्ट संकृयादि उच्चारणठ मेदोका वर्णन मी पाया जाता है। .
क प्रथम सोपान ११ आचार्य पाणिनिका बहुत कुछ प्रयत्न लौकिक भाषा-निय- न्त्रणके लिए है। फिर भी स्वा प्रकरण एवं वैदिकी प्रक्रियाका संकलन वैदिक जगत्में भी कम ख्याति नहीं रखता । वैदिक व्याकरण पर पाश्चात्य विद्वानोंने भी महत्त्वके ग्रन्थ लिखें हैं- जिनमें मैक्डानल (A: A. Macdonell ) की १९१० ई० में जर्मनीसे प्रकाशित चड़ी वैदिक प्रामर बड़े मार्केकी है। ४. निरुक्त वेदका प्रधान अङ्ग है । क्योंकि रिक्ता- ध्ययनके बिना मन्त्रोंका आशय स्पष्ट होता ही नहीं* निरस्तमें वैदिक शब्दोंका सोपपत्ति निर्वचन 'उदात्त ढंगसे किया गया है। प्राचीन कालमें कई निरुस्त थे। इस समय पास्क-निरुक्त प्रचलित है। यह निषण्टुका माथ्य है । इस निघण्टु और निरुक्तकी अटपटी पहेलीमें हमारे कई गण्य मान्य विद्वन् उलझ चुके हैं । जैसे कि मधुमृदन सरस्वतीकी आलोचना सत्यव्रत सामयनीने अपने निरुक्तालोचनमें की है "अनतिप्राचीनाना- माचार्यको वहानामन्यतयः स्वर्गतो विमुक्तो वा ख्यातो मधुसूदनः सरस्वती समग्राहैकं प्रवन्ध प्रस्थानमैद' नामेति तरे लिखित इयते निवण्ट संज्ञाक: पञ्चाव्यात्मको प्रन्थो भगवता यास्वेनैव कृत' इति । तदेतहिवनं तदीयमेतद्विषयक ध्वान्तमेव प्रकटयति। (निरुतागेचन पृ० २२)। मनः इस विषयको विम्पट करने के * "अयापीरमन्तरेण मन्त्रेष्वयंप्रन्ययो न दिदवे "(नि० 11५13) घेद मन्दिर-प्रवेशिका लिए श्रौतमुनि चरितामृतका गवेषणापूर्ण लेख ही उद्धृत किया जाता है- "श्रुतिसिद्ध* मुनि सुजन मुनिके शिष्य थे और युधिष्ठिरकी १२वीं शताब्दीमें हुए हैं । इनके समकालीन यास्क मुनि वेदोंके अद्वितीय पण्डित थे । यास्कको अपनी विद्वत्ता पर पूर्ण . अभिमान था। श्रुतिसिद्ध मुनिको छेडकर' विश्वभर में और कोई "विद्वान् यास्ककी टक्करका न था। श्रुतिसिद्ध मुनि पर यास्ककी अगाध श्रद्धा थी। इसके दो कारण थे। प्रथम यह कि यास्क और श्रुतिसिद्धका लक्ष्यैक्य था। जिस प्रकार यास्क वेद-प्रचारमें दत्तचित था; ठीक उसी तरह उस पवित्र कार्यमें श्रुतिसिद्धका प्रयत्न कम न,था । दूसरा कारण यह था कि यास्कका जहाँ कहीं देद वेदाङ्गोमें कोई विषय सन्देहास्पद होता था; यास्क श्रुतिसिद्ध मुनिसे उसमें अपना सन्देह निवृत्त कर लिया करते थे। जब कभी किसी सन्दिग्धार्थक वैदिक शब्दका अर्थ पूछने यास्क उनके पास जाते तो श्रुतिसिद्धनी अपने एक गुटके में उस शब्दको देख कर यास्कके सन्देहको दूर कर दिया करते थे x प्रख्यात उदामीन सम्प्रदायका ऐतिहासिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। जिसके प्रणेता है - अहमदाबादत्य विशाल वेद-मन्दिर प्रतिष्टारक वेद- दर्शनाचार्य म. म. स्वामी गहेश्वरानन्दजी ।। * उदासीन सम्प्रदायकी सनत्कुमारादि गुरुपरम्परामें चालीस स्थान श्रुतिसिद्ध मुनिका है। ये ही निघण्टुके स्थयिता हैं । पूर्वाधममें इनका नाम कदया था।
प्रथम सोपान - . " . एक दिन मुनिजीसे यास्कने कहा भगवन् ! यदि आप इस पुस्तिकाको मुझे देदें। तो आपका मुझ पर बड़ा ही अनुग्रह होगा । वैसे तो मैं आपका - अब भी ऋणो हूँ। परन्तु इस अद्वितीय पुस्तकका दान कर मुझे अपना ऐसा ऋणी बनाइए कि मैं जन्मजन्मातरमें मी आपके इस . महान्. उपकारसे उमण: न हो सकूँ। आप विश्वास करें! इसमें मेरा. कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं है । मेरा विचार है कि मैं इस पर एक संक्षिप्त भाव्य लिख कर · वेदार्थकी प्राप्तिमें प्रति दिन बढ़ रही अड़चनोंको, दूर कर दूं: । मुनिने यास्ककी ; ओर देख कर कहा -धीमन् ! आप जो कुछ कहते हैं सब यथार्थ है । आपकी- वेदों पर अगाध श्रद्धा देख कर हम आपको यह वेदार्थ-भानु अर्थात् निवण्टु देते हैं। उस पुस्तको नैचण्टुक, नैगम . और . दैवत- ये तीन काण्ड और पांच अध्याय थे। तब यास्कने उस पर निरस्त लिखा इस लेखसे स्पष्ट हो जाता है कि निवण्टु यास्क-निर्मित नहीं; निघण्टुका माथ्य निरुक्तं यास्ककी कृति है । इसके प्रथम अध्यायमें निषण्टु' शब्द निर्वचनपूर्वक विषय-प्रवेश, द्वितीय और तृतीयमें नेण्टक काण्डको व्याख्या, चतुर्थ, . पञ्चम तया पदम अध्यायमें नैगम काण्डका व्याख्यान, तदनन्तर छ: अध्यायोंमें देवता-तत्य प्रकाशन पुरस्सर देवत काण्डकी विशद व्याख्या. है । शेष दो अध्याय परिशिष्ट स्वरूप हैं। प्रथम परिशिष्टमें; आत्म- . 10 '
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वेद मन्दिर-प्रवेशिका
तत्वोपदेश और द्वितीयः परिशिष्ट अध्यायमें परम पुरुषार्थ साधनोंकी,
चर्चा है ।।
(६) छन्दः शास्त्र
-गायत्री आदि छन्दोंका स्वरूप
बताते हैं । इस शास्त्रका मूल स्रोत ऐ० ब्राह्मण १-५, ६ में पाया
जाता है । किन्तु आदिम आचार्य रिझल मुनि माने जाते हैं।
इनके विषयमें प्रसिद्ध है - शेषनागके अवतार थे। एक बार
पृथिवीकी सैर करके पाताल जाते समय इन्हें साक्षात् मृत्यु स्वरूप
भगवान् गरुड़ मिल गये। गरुड़कों झाँसा देनेका मार्ग शीघ्र
निकाल लिया । पिङ्गल नागको ज्ञात था कि गरुड़ वैरिक छन्दोंका
उत्कट जिज्ञासु है; तुरन्त सुत्र-बद्ध भाषामें छन्दोंका सुन्दर
स्वरूप बताते हुए निकट समुद्रकी ओर सरकने लगे। गरुड़
मुग्ध भावसे मुन ही रहा था कि समुद्र में पिगल डुबकी लगा गये.
यो विविधवर्णमाबापस्तारात्सांगरं प्राप्यं ।
गरुड़मवञ्चयदतुलः स हि नागः पिङ्गलोजयति ॥
(पिङ्गटवार्तिककार चन्द्रशेखर)
सम्बत् १९२६ में कलकत्ता-मुद्रत हलायुध वृत्ति-सहित
पिङ्गल सुत्रके माधार पर इसमें आठ अध्याय हैं । जिनमें क्रमश:
१५, १६, ६६, ५३, ४५, ४२, ३४, ३२ सूत्र हैं। प्रथम
अध्यायमें • मकारादि ! संज्ञा, द्वितीयमें 'पाद, तृतीयमें गायत्र्यादि .
* पिङ्गलादिमिराचार्य, यदुक्तं लौकिकं द्विधा ।
मायावविभेदन, च्छन्दस्तदिह कप्यते ॥ (केदारमा)
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प्रथम सोपान छन्दोंके मेद, चतुर्थ में वैदिक आतछन्द, गणछन्द, मात्राउन्द, और अक्षर-छन्द, पञ्चममें यतिवृत्त, “घट तथा सप्तममें लौकिक. छन्द, अटममें गाथा, प्रस्तागदि निरूपित हैं। वैद उन्द प्रायः अक्षर छन्द ही होते हैं। प्रधानतया इनके सात भेद हैं--(१): गायत्री, (२) उष्णिक्. (३) अनुटुम्, (४) बृहती, (३) पंक्ति; (६) बिटुप् , (७) जगती । प्रत्येक आठ आठ प्रकका है। इस प्रकार सब ५६ मेद हो जाते हैं। जिनकी अक्षर-संख्या. निम्नांक्ति चक्र में बताई गई है। - . छन्द-संख्या-चक्र गायत्री उणिक अनुष्टुप् वृहतो पंक्ति त्रिलुप जगती १. आपा २४ २८ ३२ ३६ .४० -४४ -४८. २. देवी २ ३ ३. आमुरी .१५ १. .१३ - १२ ११.१० १.प्राजापत्या ८ १२ - १६ २० २८ ३२ ५. पाजुरी ६ ११ १२. ६. साम्नी १२ १४ .१६ १८.२० २२ २४. आची २७ ३० ३३ ३६, ४८ ५४ ६० ६६ ७२. * अक्षर गगनामें स्वर स्वतन्त्र मार गिना जाता है; म्यंजन स्वर साप मिटकरही अक्षर माना जाता है। मैने:-'मग्निमाले में पार मक्षा है-मग, नी, भी, से ७ ८.बाही वेद मन्दिर प्रवेशिका :- इस चक्रसे स्पष्ट जाना जाता है कि आपी गायत्रीमें २४ अक्षर हैं; आपी उष्णिक्में २८ और लार्षी अनुष्टुप्में ३२ इत्यादि । यदि किसी वैदिक मन्त्रमें नियत छन्द-अक्षर पूरे न हों तो सन्धि-विश्लेषणादिके द्वारा संख्या-पूर्ति की जाती है । जैसे: चाग्नपे' = 'च अग्नये । 'स्वर'का 'सु अर' और 'वरेण्यम्' का रेणियम् । इस भावका सूचक - पिङ्गल-सूत्र है. "इयादि पूरणः” (३२)। इस सूत्रका अर्थ हलायुधके शब्दोंमें है. “यत्र गायत्र्यादौ छन्दस्यक्षरसङ्घया न पूर्यते; तर इयादिभिः पूरयितव्या"। इस उपायसे भी यदि अक्षर-संख्या पूरी न होकर, कम रह जाय तो उस छन्दको विच्छन्द कहते हैं। एक अक्षरन्यूनको निवृत्त और दो अक्षर न्यूनको 'विराट' विशेषण लगाक' बोला जाता है। जैसे :- २३ भक्षरकी गायत्रीको निवृत्त' गायत्री कहते हैं। अधिकाक्षर छन्द, अतिच्छन्द कहलाता है। एक अक्षर अधिक हो तो भूरिक तथा दो अक्षा अधिक हों तो उस छन्द-नामके पूर्व स्वराट् विशेषण लगाकर बोलते हैं। अक्षरकी न्यूनता, अधिकताका यह अर्थ कदापि नहीं कि मन्त्र'दुष्ट या नष्ट हो जाता है। नवा एकेनाझरेण च्छन्दांसि वियन्ति न द्वाभ्याम् " (ऐ० वा० ११६) इसका अर्थ सायण-शब्दोंमें है एकेनाक्षरेण न्यूनेनाधिकेन '* 'आदि शब्दसे 'स्व' यण सवर्णदीप, गुण, वृद्धि आदिका प्रहण होता है।
प्रथम सोपान । वा च्छन्दांसि नैव,नश्यन्ति । तथा च द्वाझामक्षराभ्यां न्यूनाभ्याम- विकाभ्यां वा न नश्यन्ति" । शकरी; आदि अन्य, छन्दोंके विस्तूंत ज्ञानके लिए कात्यायन-प्रणीत सर्वानुक्रम तथा पिङ्गल-सूत्रादि देखना चाहिए। ६. ज्योतिष- वैदिक' क्रियाओंका नियत समय ज्योतिष शास्त्रकी सहायतासे जाना जाता है। ज्योतिषका विषय अगाध महासागर है । इस पर अधिक प्रकाश डालने के लिए विशेष समय और अधिक स्थान, प्रयत्नकी अपेक्षा है। अत: यहाँ अधिक नहीं कहते। अङ्गपरिचयके साथ साथ प्रयोजन भी सामान्यतया कहा ही जा चुका है। परन्तु शुद्धाद्वैतमूलक पुष्टिः मार्ग-प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्यके शब्दोंमें अङ्ग-प्रयोजन ' मनोरम ढंगसे वर्णित है । जिसका उद्दरण-लोम संवरण नहीं कर सकते - पडङ्गानि तथा वेदे, वेदरक्षा फलानि हि स्वरूपतोऽयंतश्चैव, ह्यनुष्ठानात् विधा हि तत् ।। शिक्षा छन्दः स्वरूपे तु, निरुक्तं व्याकृतिस्तथा । अर्थ ज्योतिस्तथा कल्पो, ह्यनुष्ठाने प्रयोजकः ॥ (सर्वनिर्णय प्र० ७२, ७३) अर्थात् शिक्षादि छहों अन्नका सामान्य प्रयोजन है-'वेद-रक्षा' इसके तन प्रकार हैं स्वरूप-रक्षा', 'अर्थरक्षा' और 'अनुष्टान-रक्षा' स्वरूप-रक्षा में शिक्षा तथा उन्दः-शास्त्रका; 'म-रक्षा में रिक्त एवं व्याकरणका; मनुटान-रक्षा' में ज्योतिष
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वेद मन्दिर-प्रवेशिका
और कल्पका उपयोग होता है। यदि शिक्षादि वेद रक्षक न
होते, तो "मों नम : सिद्धम् " का "ओना मासी धम्" बना
डालनेवाले गुस्लोग " अग्निमीले " को कव ज्योंका त्यों छोड़ने
वाले थे? अर्थका अनर्थ और प्रयोगव्यत्यय होकर ही रहता।
इन . अझोंकी कृपासे लाखों वर्ष-पूर्वकी वही वैदिक ;आनुपूर्वी
आज हमारे समक्ष है जिसकी महत्ता विश्वमें छाई हुई है।
आम्रपाठ-प्रणालीमें वेद
:-
सबसे महत्त्वकी बात यह है कि जहाँ अन्य जातियोंका
स्वल्पायु भी साहित्य नष्ट-भ्रष्ट हो चुका है। वहाँ ऋषिपण-प्रचारित
विलक्षण पाठ-प्रणालीसे अनुप्राणित होकर हमारी अनादि वेद-वाणी
अक्षुण्णरुपेण प्रवाहित पाई जाती है। प्रातःस्मरणीय महर्षियोंकी
उस पाठ-प्रथाका परिचय प्राप्त किये बिना पाटकोंको सन्तोष न
होगा। अतः पूर्वनें का यह अगा, धैर्य और दुर्धर्ष परिश्रम संक्षिप्त
शन्दोंमें रखा जाता है :
एक ही ऋक्संहिता पागवण-भेदसे तीन प्रकारको हो जाती
है-(१) निर्मुन संहिता (रुद), (२) प्रतृषण संहिता (योग),
(३) उभय संहिता (योगरूद)।
7 : १..निर्मुज संहिता-वह उच्चारण है जिसमें कम्-
पदोंका सन्धि-विच्छेट नहीं होता-"सन्धेवियन निर्मजं.
यदलि" (अल्माति० ११३३)। जैसे :- " ओयत्रयः
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प्रथम सोपान
संवदन्ते सोमेन सहराज्ञा'" (ऋ० १०१९७१२२)--- यही
संहिता-पाठ कहा जाता है।
२. प्रतृण्ण संहिता-सन्धि-रहित (शुद्ध) ऋक्-
पदोंका उच्चारण प्रतृण्ण संहिता कहलाता है "शद्धाक्षरोचारणं
च प्रवृण्णम् " (ऋक्याति० ११११३)। जैसे :-- " ओषधयः ।
सं । वदन्ते । सोमेन । सह । राजा ।" - इसीका नाम,
पाठ, पद-संहिता भी है।
३. उभय संहिता- 'निर्भुज' और 'प्रतृण्ण'
इन दोनोंका समावेश जिस उच्चारणमें है; इसे 'उभय संहिता',
क्रम संहितादि नाम से पुकारते है - " उभय व्याप्तमुमयमन्तरेण"
(क्याति १११।३)। जैसे :- " ओषधयः सं । संवदन्ते ।
वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह राज्ञा । राज्ञेति गज्ञा ।"
उक्त विविध सहिताएँ ऐतरेयारण्यकमें भी श्रुत हैं.
"यद्धि सन्धि विवर्तयति तन्निर्भुजन्य रूपम्, अथ यच्छुद्धे अक्षर
अभियाहरति तत् प्रणत्य, मन उ योभयमन्तरेणोभयं व्याप्त
भवति " (ऐ० ३॥१॥३) अर्थात् जिस उचारणमें सन्धि मुरक्षित
है, वह निर्भु नका तथा जो सन्धि-रहित (मुद्र) पदोंका उचारण है,
वह प्रतृण्णका स्वास है; और जो दोन.से सम्बन्ध गम्युझर यागे
जटा, म.टादि-रूपमें विकृत हो जावे, उमे उभय संहिता कहते हैं।
मादिक उदाहरणोमि यही (ऋपाका) पूर्वाध यथासम्भव
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पदविरदोऽहतः" (मादिगाब) ।
बंद मन्दिर-ग्रंशिका
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,
विकार-अटक
'कामसंहिताका सहारा लेकर आठ विकार किए जाते हैं -
(१) 'जटा', (२) 'माला', (३) 'शिवा', (४) 'रेखा',
(५) 'ध्वज', (६) 'दण्ड' (७) 'रथ', और (८) 'धन'।
महर्षि व्याडिने विकृतिवल्ली में इनका विस्तृत वर्णन किया है.
“जटा माला शिखा रेखा, ध्वजो दण्डो रथो धनः ।
अष्टौ विकृतयः प्रोक्ताः, क्रमपूर्वा महर्षिभिः ॥"
(वि० ११५),
१. 'जटा - इसमें संहिताके दोनों पद तीन कर
बोले जाते हैं। प्रथम और तृतीय वारमें अनुलोभसे, मध्यमें विलोम
(विपरीतक्रम) से पदोंका उच्चारण होता है । जसे :-
" ओपवयम् सं, समोषधयः, ओषधयस् सम् । सं वदन्ते, वदन्त
सं, संवदन्छे । वदन्ते सोमैन,. सोमेन वदन्ते, वदन्ते सोमेन ।
सोमन.सह, सह सोमेन, सोमेन सह । मृह राज्ञा, राज्ञा सह, सह
राजा यति राक्षा"
२. 'माला'-मालाके दो भेद है.
और 'पुन्पमाला' विस्तार-मरसे केवल क्रममालाका उदाहरण
क्रममाला
१. “क्रमः स्मृतिप्रयोउनः': (ऋझाति. सू. ४110)।
"अनुलोमविलोमाभ्यां, त्रिवार हि पटन्टमम् ।
विटोंमे पदवन्मुन्धिः, अनुलोमे ययासमम् ॥"
२.
प्रथम सोपान कममाला रखा जाता है। इसमें मत्रायके आरम्भिक दो पद मारोह और अन्तमें दो पद अवरोह-क्रमसे बोले जाते हैं ।।. ." ओषधयः स । राज्ञेति राज्ञः। संवदन्ते । राज्ञा सह । वदन्ते सोमेन । सह सोमेन । सोमेन सह । सोमेन वदन्ते । सह राज्ञा । वदन्ते से। राति राज्ञा । समोषधयः ।" ३. शिखा वह 'जटा' शिखा, कहलाती जिसके उत्तरमें क्रम-प्राप्त पदका पाठ हो । जैसे :-- "ओषधयः से, समोषधय, ओषधयः सं-- वदन्ते। सं यदन्ते, वदन्ते सं, तं वदन्ते -- सोमेन । वदन्ते सोमेन, सोमेन वदन्ते, वदन्ते सोमेन सह । सोमेन सह, सह सोमेन, सोमेन सह -राज्ञा । राज्ञा सह, सह गज्ञा । राज्ञेति राज्ञा ॥" ४. रेखा -क्रमश: दो, तीन, चार, पाँच पदोंको +7 । । सह राज्ञा, ३ , , 1. "मयाकमविपर्यासारर्धर्वस्यादितोऽन्ततः । अन्तं चादि नयेदेव मनमालेति गीयते ॥ २. "पदोत्तरी अयमेव, शिसामायोः प्रचक्षते । ३. प्रमाद्वित्रिपनुपपदफममुदाहरेत् । पृपा पृया दिपयस्य देशमाहुः पुनः मात् ।। " .
वेद मन्दिर -प्रोशिका
प्रथमवार अनुक्रम और. द्वितीयवार व्युत्क्रमसे बोलकर अन्तमें
आरम्भके दो पर्दोका वैसा ही उच्चारण करना रेखा है जैसे :-
दो पद-ओषधयः सं । समोपधयः । ओषधयः सं ॥
तीन पद =सं वदन्ते सोमेन । सोमेन वदन्ते सं। सं बदन्ते ।।
चार पद = बदन्ते सोमेन सह राज्ञा ! राज्ञा सह से मेन
वदन्ते । वदन्ते सोमेन ।। सोमेन सह । सह राज्ञा । राज्ञेति राज्ञा ॥
५. ध्वज' -क्रम-पदोंका आरोह और अवरोह साथ
साथ जहाँ होता है; उसे ध्वज कहते हैं । उदाहरणमें उक्त
ऋचाका उत्तरार्ध भी रहेगा । उत्तरार्ध यह है --" यस्मै कृणोति
ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि । ध्वज-उदाहरण:-
"ओषधयः सं । पारयामसीति पारयामसि ।
से बदन्ते । राजन् पारयामसि ।
वदन्ते सोमेन । तं राजन् ।
सोमेन सह । ब्राह्मणस्तं ।
सह राज्ञा | कृणोति ब्राह्मणः ।
राक्षेति 'राज्ञा । यस्मै कृणोति ।
यस्मै कृणोति । राज्ञेति राज्ञा !:::
कृणोति ब्राह्मणः । सह राज्ञा |
.
1
-
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,
१. घूयादादेः क्रम सम्यगन्तादुत्तारयेदि ।
वर्गे च ऋचि वा यत्र पठनं स नः स्मृतः ।।
प्रयम सोपान २३ - - ब्राह्मणस्तं । सोमेन सह । तं राजन् । वदन्तै सोमेन । राजन् पारयामसि । स वदन्ते । - पारयामसीति पारयामसि । ओपधय सं॥" ६. दण्ड-अर्द्धर्चके प्राथमिक दो पदोंका अनुक्रमसे तथा विपरीतक्रमसे उच्चारण। ततः पूर्व-पटका क्रमशः उत्तर-उत्तर पदके साथ जोड़ा बनाकर समुच्चय करते हुए प्राथमिक विपरीत- क्रम जोडेके पूर्व प्रत्येक पर्यायका अन्तिम पद जोड़ते जाना दण्ट- पाठ कहलाता है* | जैसे :- "योषधयः सं समोपायः । ओपपयः सं । सं वदन्ते ॥ वदन्ते समोषधयः । ओपधयः सं। से वदन्ते । वदन्ते सोमेन ॥ सोमेन वदन्ते समोपचय. । ओषधयः स । संवदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह सोमेन वदन्ते समोषधय. । ओपपयः स । संवदन्ते । बदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह राज्ञात राज्ञा सह सोमेन वदन्ते समोषधयः । भोपथय. से । स बदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह राज्ञा ॥ राजेति राज्ञा ।" - *" कममुक्त्वा विषयस्य पुनक्ष्य कममुत्तरम् ! मपंचदिवमुक्तोऽय कादग्दोऽभिधीयते ॥"
वेद मन्दिर-प्रवेशिका
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t
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७. रथ-~ऋचाके पूर्वार्ध और उत्तरार्धका साथ साथ
दण्डकी तरह उच्चारण करना रघ कहलाता है। इसके
'द्विचत्रक', 'त्रिचनक', 'चतुश्चत्रक'-तीन भेद हैं ।
विस्तार-भयसे सब भेदोंको न दिखा कर केवल द्विचत्रक तथा
चतुश्चत्र कका कुछ अंश दिखाया जाता है।
१. द्विचत्रक-~"मओपथयः सं । यस्मै कृणोति ।..
समपधयः । कृणोति यस्मै ।
ओषधय सं । यस्मै कृणोति ।
सं वदन्ते । कृणोति ब्राह्मणः ।
वदन्ते समोषधयः । ब्राह्मणः कृणोति यस्मै ।
ओपधयः सं । यस्मै कृणोति
स वदन्ते । कृणोति ब्राह्मणः ।
बदन्ते सोमेन । ब्राह्मणस्तं ।
सोमेन वदन्ते समोपश्यः । तं ब्रहणः कृणं ति यस्मै ।
मोषधय से । यस्मै कृणाति ।
संवदन्ते । ऋण ति ब्रह्मरण :।
• बदन्ते सोमेन । ब्राह्मणस्न ।
सोमेन सह । तं राजन् ।
सहसोमेन बान्त समापधपः । रास्तं मामणः कृणोति पस्मै ।
ओषधयः । पस्न गति ।
सं यदन्ते ! मागति सामगः ।
x"
पारंपारि पोरया दरपः।"
।
-
प्रथम सोपान . - . वदन्ते सोमेन । ब्राह्मणस्तं ।' सोमेन सह । तं राजन् ।। सह राज्ञा । राजन् पारयामसि । राजेति राज्ञा । पाग्यामसीति पारयामसि ||" ऐसे ही भिन्न भिन्न ऋवाओंके कोई भी दो अर्ध इस 'रथ'-प्रथासे पढ़े जा सकते हैं। (२) चतुश्चक्ररथमें दो अधोके चार चार पदोंका उच्चारण किया जाता है- "ओषधयः से, सोमेन सह । यस्मै कृणोति, तं राजन् । समोपघय:, सह सोमेन । कृणोति यस्मै, राजस्तं । ओषधयः स, सोमेन सह । यस्मै कृणे ति, तं राजन् । सं वदन्ते, सह राजा ! कृणाति ब्राह्मणः, राजन पारय मसि।" इत्यादि प्रथम धन- अन्तसे आदि और मादिसे अन्त तक द्विगुण क्रम-पाठका नाम धन* है- " राजेति राज्ञा | सह राज्ञा ! सोमेन सह । वदन्ते सोमेन । सं वदन्ते । ओपययः । स वदन्ते । वदन्ते सोमेन । सोमेन सह । सह राना । राति राज्ञा ॥" * 'धन' के दो भेद होते हैं। -'घन' और घनवटम । प्रत्येक भेदके दो प्रकार होते हैं-इनमेंसे प्रथम घनका रक्षण है- अन्तात्कम पटेत् मादिपर्यन्तमानयेन् । मादिकमं नयेदन्तं धनमाहुर्मनीषिण. ॥ - - वेद मन्दिर - प्रवेशिका -- , :- " द्वितीय धन- शिवा-पाठके अनन्तर उसका विपरीत पाठ अन्तमें शिखाके पदोंका पाठ ही (द्वितीय) घन' कहलाता है:- ओषधय: से, समोषधयः, ओषधयः स,-वदन्ते । वदन्ते समोषधयः । ओपषयः सं बदन्त, सं वदन्ते, वदन्ते से, सं वदन्ते, -सोमेन | सोमेन वदन्ते से । सं वदन्ते सोमेन ॥ वदन्ते सोमेन, सोमेन वदन्ते, वदन्ते सोमेन,-सह । सह सोमेन वदन्ते । वदन्ते सोमेन सह ॥ सोमेन सह, सह सोमेन, सोमेन सह,-राज्ञा । राज्ञा सह सोमेन । सोमेन सह राज्ञा ॥ सह राज्ञा; राना सह, सह राजा | राजति राज्ञा || सानायके ये आम्रढन इसलिए महपियोंने अपनाये हैं कि इन पाठ- प्रथाओंमें वकर उनकी स्वाध्याय गंगा सदैव ' शुद्ध बनी रहे। कोई प्रक्षिप्त घुमने न पावे । आप पाठ-गालीका यहाँ 'स्वल्प परिचय दिया गया है। विशेप ज्ञानके लिए महर्षि व्याडि-वृत विकृतिबल्ली तथा अन्य चरण-व्यहादि प्रत्योंका अध्ययन करना चाहिए। . , शिखामुन्वा विपर्यस्य, तत्पदानि पुन: पॉन् । मयं धन इति प्रोक, इत्यष्टो विकृती: पठेन् ।।
२७ प्रयम सोपान . जब सामवेदकी ओर हमारा ध्यान जाता है, तब वहाँ की अभेद्य रक्षा-पति देखते ही मुग्ध हो जाते हैं । यहाँ की अक्षर- गणना-पद्धति किसे आश्चर्यमें नहीं डालती? यह पद्धति एक ऐसा सन्देश है जिसमें एक एक मात्रा जकड़ी हुई है। जैसे:-- ३२.3. २ ३३ 3 ३३३ 3 २३ ३3क र २33. १०८४ रेवतीनः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः । क्षुमन्तो याभिर्मदेम ॥१॥ १०८९ आ घ त्वावान् त्मना युक्तः स्तोतृभ्यो घृष्णवीयानः । ऋणोरक्ष न चन्योः ॥२॥ १०८६ आ-यद् दुवः शतकतवा काम जरितॄणाम् । ऋणोरक्ष न शचीभिः ।।३।। (धा० १८।उ०रास्व. ४) (ठी)॥ इस सूक्तके अन्तमें दी हुई कोष्टित संख्या (धा०१८॥ उ०३। त्य० ४) का तथा (ठी) अक्षरका भाव हमें निकालना है। प्रथम मन्त्रमें चिबरहित अक्षर हैं: न: स, स, न्तु:४ -घृ, ण, वि, र-४. तृतीर -य, दु, श, त, क, का, ज, नि,,श, १० द्वितीय · " * पिक-परिचयके लिए द्वितीय सोपानका साम'-प्रकरण द्रस्य है।
२३
वेद मन्दिर प्रवेशिका
पूरे सूक्तमें १८ अक्षर चिह्न रहित हैं। यही 'घा० १८
का अर्थ है । विना चिहके अक्षर 'घारी + कहलाते हैं ।
दूतरी सहलमा ‘उ० २' का अर्थ-पूरे सूक्तमें दो उदात्त
-णो, णो।
तीसरी सहया 'स्व० : ' का तात्पर्य है = पूर्ण सूक्तमें
र र र र
चार स्वरित हैं. -प्रयो:, :, में, ची।
इस स्वर-गणनासे सौवः प्रमाद कहापि नहीं हो सकता।
अब इन गण्तिाहोंको निर्धान्त रखनेके लिए अन्तमें तीनों
अवांकुरोंका बीजाक्षर 'टी' रक्खा गया है।
. इसका रहस्य जाननेके लिए विभाग करें-+ई । उक्त
धारी संख्या १८ को ५ पर भाग देनेसे शेष बचता है. ३१
इस ३ संख्याको व्यक्त करने के लिए तृतीय वाका- '' व्यंजन
+ धारी संख्या मन्त्रके अन्तिम बिह-शून्य अक्षर नहीं गिने
जाते । अतः यहाँ 'जा.', 'म', 'भिः' छोड़कर १८ संख्या होती है।
x वर्ग ५ होते है --क-वर्ग च-वर्ग, द-वर्ग, त-वर्ग प-वर्ग।
जहाँ शेष नहीं यस्ता वहाँके लिए प-वर्ग चुना जाता है।
यदि कहीं पूरे सूक्तमें एक भी उदात्त वर्ण न हो तो 'य', 'र', 'ल',
'श', में से उचित वर्ण छोटा जाता है; और., धारी
मंग्या में से एक पटाकर शेष प्रक्रिया की जाती है। जहाँ सूज मरमें
उदात्त और स्वरित दोनों नहीं होते ही 'ओ' का निर्देश होता है।
उदातकी अमावालस्पामें जर मान धारी सप्ल्या ५ पर पी पट जाती है
'' गरेमाक्षर होता है !
-
1
.
प्रथम सोगन
.
.
~
चुना गया है । 'उ०२' को सूचना तृतीय वर्गके द्वितीय अक्षरसे
दी गई है। शेष 'स्व०१४'का प्रकाशक अपनी स्वर-पंक्तिका
चतुर्थ स्वर 'ई' है।
ऊपर उत्तरार्विक गणितका निर्देश दिखाया गया। पूर्वार्चिकमें
केवल निर्देश-अम भिन्न होता है. --प्रथम 'स्वरित' मध्यमें उदात्त
और अन्तमें धारी संख्या निर्दिष्ट होती है।
यह हमारी अनुपम गणित है। बहुत सी विदेश-मुद्रित
संहितामों में ऊट-पटाँग छप गई है । अपनी कसौटी पर चढ़ा कर
परख लेनी चाहिए।
उक्त संकेतानुवीक्षणकी सहायतासे यदि 'वेद' शब्दका
अन्वीक्षण करें तो ज्ञात होगा कि यह अक्षय सिद्धान्त रत्नोंका
एक महान् रत्नाकर है। इस स्वल्प काय पुस्तिाकामें किसी भी
दिशाकी ओर संकेत मात्र किया जा सकता है-
- 'वेद' शब्द = उ+म+३+द के । उ, म, इ से
ग, यजु, साम---- -इस वेद-त्रयीकी सूचना है और 'द' का
अर्थ है --पर्वत = अचल = अथर्व* । इस प्रकार चारों वेदोंको
व्यञ्जना 'वेद' शब्दमें पाई जाती है।
२-'वेद' शब्दके वा, अ, आ, ई और द भी टुकड़े
सहज में किये जा सकते हैं। वा, अ, आ---ये तीनों वायु,
* पतिवातिकमा तलतिषेधः । (नि. दे. १५॥२॥10)3
पिरमाणोररक्षितयोगप्रतिपादोऽयववेद इत्पर्यः ।
१
वेद मन्दिर प्रवेशिका अग्नि, आदित्य नामोंके आदिम अक्षर होनेसे अग्नि आदि तीन देवोंके प्रतिपादक कहे जा सकते हैं। इन तीनों देवोंकी ई3 सम्पत्तिकाददाता वेद है। वेटोंमें उक्त देवोंकी ही सम्पत्ति निहित है--" अग्ने: ऋग्वेटोवायोर्यजुर्वेट आदित्यात्सामवेदः । " उसी सम्पत्ति विद्या) का दान भगवान् वेद मनुव्योंको कर रहा है। अथवा अग्नि आदि तीनों देवोंमें सम्पत्ति-वितरण कर रहा है अर्थात् वेद एक पीयूष-पूर्ण महानद है । जो अध्यात्मादि त्रिविध अग्नि आदिके क्षेत्रोंमें समकक्षभावसे प्रवाहित होता हुआ प्रत्येक तम-आच्छन्न, मटिन, संतप्त अन्तरात्मामें कान्ति, पावनता, शीतिमामयी लक्ष्मीका निरन्तर प्रदान करता है। मत: 'वेद' नाम सार्थक है। ३ ऊ+अ+2 -इन वेदपद-खण्डोंका अर्थ होता है-कामारि शम्भु :- ऊ= भगवान् शम्भु = विष्णुके पुत्र इ = कामके द-खण्डक हैं। अत: शिवरूप वेद शेयोंका परम आराध्य देव है। वेद शब्दके व+ई+द खण्ड करने पर अर्थ निकलता -व= समुद्रकी (पुत्री) ई-लक्ष्मी द=भाया है जिसकी अर्थात् विष्णु भगवान् । विष्णुरूप वेदं वैगयोंका सर्वस्व ही है। 'वेद' (a++) शब्दका माव है - बलवान, भगवान् की , ई-लक्ष्मी भगवतीका ददाता वेद । शाक्तों को और चाहिए क्यो.? भगवतीके परम पावन शुद्ध स्वरूप- - व- :
प्रथम सोपान : ज्ञानका दाता यदि वेद है तो शक्ति उपासकोंकी अपार श्रद्राका भाजन क्यों न होगा? ६.-सूर्य-उपासकोंके उपास्य देवका सूचक मी 'वेद' -वेद =उ+आई+द । अपनी स्वर-पंक्तिमें 'उ' का पाँचवाँ और आ का दूसरा स्थान है। ५+२७ सप्त स्वर-युक्त ई-साम-लक्ष्मीकेद-दाता अथवा सप्तवर्ण-युक्त ई =प्रभा लक्ष्मीके दाता हैं सूर्य नारायण । अत: सौर भक्तोंकी अटल श्रद्धा वेद पर है -पञ्चदेव-उपासकों में से शेप रहे गाणपत्य । इनकी भी वेद पर श्रद्धा किसीसे कम नहीं। क्योंकि 'वेद' शब्दके व, ईद, टुकड़ों का अर्थ व =मंगल ई-लक्ष्मी ऋद्धि सिद्रिके द-दाता - गणेश हैं। . ८-इस प्रकार आर्य-संस्कृति के आधारस्तम्भसमस्त देवोंके उपासकों की सामूहिक प्रदास्पदताका गौरव एकमात्र वेदको ही है। 'वेद' शब्द इतना ही नहीं बताता, अपि तु पुरुषार्थ चतुथ्य-साधन वेदको सूचना भी देना है.---धर्म-सूचना 'व' खण्ड 'से, अर्थ- बोय : ई. खण्डसे, काम-उगन 'इ' दुकड़ेसे और मोक्ष-अवगमन द ? भागते २ मठी भाँति होता है । अतः व+ई+३+से बने 'वेद । शन्दको धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-चतुष्टय-साधन-प्रतिपादकता में सन्देह-गन्ध तक नहीं रह जातो।। १. २ का भयं फयाप (सन्दस्तो० म.)। कन्यागम्य पर्म है। २. दो अवमाननेका दि' बना है। जिसका अर्थ माम किया जा मकता है। -संसार-नागक ३२ वेद मन्दिर - प्रवेशिय । गवेषक शब्द, अर्थ एवं अनुष्ठानमें से किसी भी दृष्टि कोणको रखकर जब हम गहरा अनुसन्धान करते हैं, तब वेद-गौरव उत्तरोत्तर प्रकट होकर आनन्द-विभोर करता जाता है । इसका कारण मेरी समझमें यह आता है कि अपरिमित दिव्य भूमा परावर परमानन्द महासागर वेदोदरमें भरा हुआ है " वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः १ " जैसे-जैसे इसके निकट सम्पर्क में आता जाता है। वैसे-वैसे उसकी मधुरता व्यक्त होती जाती है -"चरन्यै विन्दते मधु । साक्षात्कार होते ही समस्त भ्रम दुःख दूर हो जाते हैं.-" भिद्यते हृदय- प्रन्थि: ।। फिर भेद कहाँ ? -भिद्येते तासा नामरूपे "। तब भय किसका ? -"अभयं हि वै ब्रह्म भवति"। बस यही मानव-जीवनका चरम लक्ष्य है। जिसकी प्राप्तिका विश्वमें एकमात्र साधन है भगवन् वेद - "शब्दब्रह्मणि निम्यात: पर ब्रह्माधिगच्छति" (मै. आ. ६।२२)। स्तुता मया वरदा वेदमाता, प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् । आयुः प्राणं प्रजां कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसं, मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ॥ (अथर्व, १९१७१११) १. गी• १५।१५। २. ऐतरेय ब्रा० ३३।२। ३. मु. उ. २०१८ । ४. प्रदनो• ६५।.. बृह. उ० ४।४।२५ । वेदमाता पावनी की पावनी स्तुतिके लिए, यत्न योड़ा-सा किया है मानवी हितके लिए । आयु पुत्र प्राण लक्ष्मी कीर्ति गो-धन तेज दे, अन्तमें प्रेरे जनोंको ब्रह्म-दर्शनके लिए। ६ Thame - द्वितीय सोपान वेद की रूप-रेखा 'वेद' शब्द और उसका अर्थ वेदोंमें 'वेद' शद दो प्रकारका उपलब्ध होता है- एक अन्नोदात्त' और दूसरा अद्युात' । अन्तोदात्त 'वेद' शब्दका व्याहार प्रायः दुश-मुटि पिगेप' में होता है। दूसरा आधुदात्त 'वेद' शब्द हमारे पिचारका विषय है। जो ज्ञान, लाम, सत्ता और विचार इन चार अर्थीवाले 'विद्' धातुसे करण- कारकमें 'घन् । प्रत्यय करने पर निपन होता है । जिसका अर्थ है कार्याकार्य-ज्ञानका हेतु, अन्यैकिक आत्म-दर्शन-लाभका प्रधान साधन, विस्तृत कोनि-सत्ताका एकमात्र निमित्त और अद्वैत- विवारक महर्षियोका सर्वस्व शब्द सनुदाय । निन्नाड़ित श्लोकोंसे यह मात्र मुव्यक्त हो जाता है। १ वेर (यतु. २-२१) इत्यादि । २ वेदः (. १-०-५) इत्यादि । ३ कुराके पवाम तिन को मिला दीवसे मरद ऐसी गट रई जानी है कि बैठे हुए दरदरे अगले जानु (घुटने)का भार पारण कर ले। १ वेद मन्दिर-अंशिका . वैत्ति कार्यमकार्य चं, विन्दतेऽनुनमं धनम् । विस्तृति विद्यते कीर्त्या, विन्तेऽद्वैतमहो यतः ॥१॥ अनवद्यं स्वतो मान, ज्ञानविज्ञानशेवधिम् । अनादिनिधनं वेदं, तं 'प्रावैदिका जनाः ॥२॥ वेदोंके विभाग महर्षि आपस्तम्बाटि सूचित करते हैं कि कि प्रधानत्या दो विमाग है.-संहिता और ब्राह्मण । आरण्यक माग ब्राझगके अन्तर्गत है। उपनिषद् प्रन्यों में से अधिकतर उपनिषद मारण्यकों, कुछ ब्राह्मणों और परिगणित महिताओंके अन्तर्भूत हैं । कतिपय विद्वान् मुगमता के लिए वेटोंक चार विभाग कर लेते हैं --(१) संहिता, (२) बालग, (३) मारण्यक और (४) उपनिषद् । १. संहिता- कुछ मन्त्रों का ऐसा समुदाय, जो पायादिक्रमसे द्विजातियोंकी वंश परम्परामें अनादि कालसे चला आता है, २. ब्राह्मण-मन्त्रकी एक संज्ञा ब्रह्म' भी है-एसे मन्त्र ब्रह्मका निर्बवन, विनियोग और कौका विधान, परिवर्धनादि १-"मन्त्रवाणयों वंदनामधेयम्" (आर० श्री. सू. २४ ।१।३१; सन्या. श्री. सू. १।१।७; कात्या० प्रतिक्षा सूत्र )इत्यादि । २-कर्म सापेक्ष देवतादि पदार्याच म्मरण दिडानेवाले वाक्यांकी मन्त्र कहते हैं । मन्त्र-लक्षणादिका विस्तार . सू. २१३२में तथा वृहदेदवा. १२३४में देखना चाहिए । ३ -- "ब्रह्म वै मन्न" (शत. 11:) पद-
३५
द्वितीय सोपान
ब्राह्मणका
करनेवाले वाक्योंको यहाँ ब्राह्मण कहा जाता है। जैसा कि
वाचस्पतिके वचनसे प्रकट है.
नैरुक्त्यं यस्य मन्त्रस्य, विनियोगः प्रयोजनम् ।
प्रतिष्ठानं - विधिश्चैव, ब्राह्मणं तदिहोच्यते ॥
कई पाश्चात्य तथा अर्धपाश्चात्य व्यक्ति ब्राह्मण भागको
वेद नहीं मानना चाहते । उनका पक्ष है
एक ग्रान्त कि ब्राहण भाग वेदका व्याख्यान है; वेद
धारणा और नहीं। संहिता भाग मात्र वेदपदास्पद
उसका निराकरण है। दूसरी बात यह है कि गोपथ
ब्राह्मणादिमें वेद और
साहित्य बताया है --- "एवमिमे सर्वे वेदा निर्मिताः
सकल्पाः सरहस्याः सत्राह्मणाः सोपनिषत्काः" गोप.
पू० २०१०)। दो भिन्न भिन्न पदार्थीका ही साहित्य लोक-दृष्ट है ।
अत: वेदसे ब्राह्मणको पृथक् ही मानना होगा । ऐसे प्रमों का मूल
निटान भाव्यप्रन्योंका अनध्पयन है। भाष्य-वाक्यों में परस्पर
व्याख्यानव्याख्येयभाव रहने पर भी 'भाष्यत्व' समान माना जाता
है। यदि व्याख्येय भाष्यके व्याख्यान अभाज्य नहीं, फिर
व्याख्येय संहितारूप वेदके व्याख्यान वचन ब्राह्मग अवेद कैसे
हो सकते हैं? रही बात दुसरी 'सबाहगा:' की इसका
निगकरण महर्षि पतञ्जलि बहुत पहले कर चुके है-
'समुदायेपु हि वृत्ताः शन्दा अवयवेष्वपि वर्तन्ते"
(महामा० पत्पशाः) अर्थात् सन्इ-वाचक शब्दका अपहार
वेद मन्दिर - प्रतिमा समूह-घटक प्रत्येक एकाईमें भी देखा जाता है जैसे किसी देशके प्रत्येक मागको उस देशके नामसे पुकारते हैं । इसी प्रकार मन्त्र तथा ब्राह्मण-इन दोनोंके समुदायका वाचक वेद शब्द प्रत्येक भागमें प्रयुक्त हो सकता है। जहाँ 'सत्राह्मणाः' कहा गया है, यहाँ वेद शब्दका अर्थ है - केवल संहिता भाग। संहिता और ब्राह्मणका व्यक्तित्व भिन्न भिन्न होनेसे साहित्य-सामञ्जस्य सम्यक् निम जाता है। इसी प्रकार और भी शकाओंके समाधान दूग्दर्शी महर्षियोंने कर दिये हैं । यहाँ उनका उल्लेख विस्तार भयसे नहीं किया जाता। ३. आरण्यका प्राय: वानप्रस्थाश्रमके उपयोगी कृत्य- कलापका रहस्यमय वर्णन करनेवाले, अरण्य-पठनीय वाक्य-राशिकी प्रग्ल्या आरण्यक है । ऐतरेय ब्राह्मण-भाष्यके प्राक्कथनमें सायणा- चार्यने लिखा है - "आरण्यवतरूपं ब्राह्मणम्" अर्थात् वन- वासी वानप्रस्थके यज्ञादि कर्म बतानेवाले ब्राह्मणवाक्य ही 'मारपयक' कहे जाते हैं। आरण्यकका दूसरा नाम रहस्य भी आता है । ४. उपनिषद् -- अध्यात्म, विद्याके गूढ़तम रहस्योंके विशद विवेचनात्मक-वचनोंको उपनिषद् कहते है । जन्म-मरण रोगकी अचूक औषध यदि कहीं है तो भारतीयोंकी इस महानिधिमें है। उपनिषदोंका चरम ध्येय, आत्माकी अपरोक्षानुभूति तक अधिकारीको पहुँचाना है। वेदोंके अन्तिम भाग तथा निर्णीत सिद्धान्तरत्नोंकी मनपा होनेसे उपनिषदकी दूसरी समाख्या 'वेदान्त' है। -- द्वितीय सोपान चार वेद- वेदोंके मेद और सम्प्रदाय -वेद चार है- (१) ऋग्वेद, (२) यजुर्वेद, (३) सामवेद, (४] अथर्ववेद । इन चारों वेदोंको ‘त्रयी' भी कहते हैं । 'यो' शब्द पर पर्याप्त प्रकाश पूर्व सोपानमें डाला जा चुका है। इन वेदोंके दो साम्प्रदाय प्रचलित है एक ब्रह्म-सम्प्रदाय और दूसरा आदित्य सम्प्रदाय । वगहादि पुराणोंमे उपाग्यान मिलता है- कल्पारम्भमें शवासुर उपाधि धारी हयग्रीवके साथ भगर न् विष्णुने घोर युद्ध किया । विजयलक्ष्मी १. ब्रह्म-सम्प्रदाय भगवान् के हाथ लगी। इतना ही नहीं, जो सामान दैत्यने दूसरोंका चुरा रखा था, उसे मी भगवान् टूट ले आये। जिसमें वेद और पृथिवी आदि पे । भगनान्ने पृथिवीको अपने स्थान पर टिका दिया और वेदको ब्रह्माके पास पहुँचाकर सावधान रहनेका अनुरोध किया । ब्रह्माजीने तुरन्त उस वेदकी दो प्रतियाँ कर ली। एक अपने पास न्यावी और दूसरी प्रति भगवान् आदित्यकी अति गुप्त लाइब्रेरी (Library ) में जमा करा दी कि कहीं मुझसे फिर कोई छोन न ले । एक और बुद्धिमत्ताकी गीत ही दमिष्याटिको उत्पन्न करके वेह-अध्यापन- आरम्भ कर दिया। विधिपूर्वक ब्रमासे अध्ययन फरक महर्षि यसिष्टने अपने पुत्र शक्तिको, शक्तिने अपने पुत्र पगमको तमा पराशग्ने अपने नौका-उत्पन्न पुत्र भगान् कृष्णद्वैपायनको पढा घेद मन्दिर - प्रवेशिका दिया। द्वापरका अन्तिम समय था । भगवान् पागंशरने उस एक वेढके चार मेद किये । सब अट् मन्त्र एकत्र कर ऋग्वेद बनाया, यजुर्भन्त्रोंको चुनकर यजुर्वेद, साममन्त्रोंसे सामवेद और शेप विविध विषयोंसे अथर्ववेदका मुद्द्लन किया। इस महान कार्यक उपलक्ष्य में आपको वेदव्यासकी उपाधि मिटी । महर्षि वेदव्यासने चारों वेद पृथक् पृथक् चार गिज्य को पढ़ाये --- पैलको ऋग्वेद, वैशम्पायनको यजुर्वेद, जैमिनिको सामवेद और मुमन्तु को अथर्ववेद । गिग्य-प्रशियोंकी लम्बी परम्परामें चारों वेदोंकी अनन्त शाखाएँ हो गई -- वम यही ब्रह्म-सम्प्रादय है। योगीश्वर यात्रवल्क्यने पहले बहसम्ग्रहायस्थ महर्षि विदग्ध शाकल्यसे अध्ययन करना आरम्म २. आदित्य-सम्प्रदाय किया । परन्तु किसी कारण वश गुम्से खट-पट होगई। वहाँसे चल दिये । पढ़ा-पढ़ाया वहीं आचार्यके सम्मुख ढेर कर दिया कि कहीं गुरु शाप न दे डाले। अब याज्ञवल्क्य अपने मामा आचार्य वैशम्पायनसे पढ़ने लगे। किन्तु वाह रे ! भाग्य! मामासे भी यह विचित्र विद्यार्थी मिड़ पड़ा । वहाँ भी अध्ययन किया हुआ एक एक अक्षर टाल दिया और चल पड़े । अब याज्ञवल्क्यने निश्रय पर लिया कि किसी मनुव्यको गुरु न बनाऊँगा। ऐसा ही हुआ घोग्तर तपस्या की ! भगवान् आदित्यको प्रसन्न कर लिया । १. यह गुमन्तु जमिनि महर्षि पुत्र गुमन्तुम भिम ही होंगे।
-
--
द्वितीय सोपान
सूर्यनारायणने चारों वेद पढ़ा दिये। गुरु-आज्ञासे याज्ञवल्क्यने
बहुत विस्तार किया -यहाँसे आदित्य सम्प्रदाय चला।
एक विरोध-भागवतादि पुगणोंसे पता लगता है कि
आदित्यसे याज्ञवल्क्यने यजुर्वेद ही लिया और स्कन्दपुराणादिसे
सिद्ध होता है कि चारों वेदोंका अध्ययन किया-
“स तयेति प्रतिज्ञाय, प्रविश्यादित्यवाजिनः ।
कर्णेऽपठत्ततो वेदाश्वतुरोपि हि तन्मुखात्।।"
(स्कन्द. पु. नागर.२७८)
आत्मपुराणमें भी ऐसा ही है-
'चतुरोऽध्यापयामास स्थापयित्वा रथे निजे।"
(३७-४०)
और जनकके यहाँ शास्त्रार्थ-विजयी याज्ञवल्क्य अपने एक शिव्यको
सान्यवाके नामसे सम्बोधित करके गो-दल का रहे हैं।
सामप्रपाका अर्थ-साम-अध्ययन करनेवाला है। इससे भी सिद्ध
होता है कि याज्ञवल्क्य चारों वेद पढे ये और पढ़ाते थे।
परिहार-उक्त विरोधका परिहार करना आवश्यक है। जब
वेट एक ही था उस समय उसका नाम था यद-इसमें प्रमाण
आगे यजुर्वेदके प्रकरणमें दिग्वावगे। अतः उस एक वेदको चार
वेद भी कह सकते है और एक भी। यही कारण है कि कहीं
मादित्यसे एक वेटका प्राप्त करना लिखा मिलता है। कहीं
विभाग-फाटीन रिमे चारों वेदोंका पदना पाया जाता है। यह
-
वेद मन्दिर-प्रवेशिका निश्चित है कि याज्ञवल्क्य चतुर्वेदी थे और इनसे ही आदित्य- सम्प्रदायका प्रसार हुआ। १--ऋग्वेद वेदोंके नाम-करणसे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि - .. चारों वेदोंमें मन्त्र तीन प्रकारके आते हैं, नामकरण १-ऋचा, २-साम, ३-यजु:।। १-ऋचा-पादबद्ध ठन्दोयुक्त-पद्यमय मन्त्रोंको ऋचा कहते हैं भड़े ही वहकिसी वेदमें क्यों न पठित हो। ..२-साम--जिन ऋचाओं पर साम (गगविशेष) गाया जाता है, उन्हें साम मन्त्र कहते हैं यद्यपि "गोतिषु सामाख्या इस जैमिन सूत्रमें केवल गान्का नाम ही साम बताया गया है । परन्तु साम शब्दसेगान युक्त मन्त्रका भी बोध हो सकता है। जैसे गोवटादि पदोंकी शक्ति मीमांसक-मत में जातिमें होने पर भी उनसे टक्षणादिके द्वारा व्यक्तिका बोध होता है। वैसे ही वहाँ साम शब्दकी शक्ति तो गानमें ही है वोध गान वाले ऋद मन्त्रोंका भी होगा। इसी लिए कई स्थलोंमें सामका भी मिलता है--प्रगीत मन्धी ३-यजु: = गद्यात्मक मन्त्रोंको यजुर्मन्त्र कहते हैं। अब ऋग्वेद शब्दकी ओर देखें। ऋक् हिता और कबाहरणादिके समुदायका नाम करवेद है। कम बहुल प्रन्यविशेपकी का मंहिता कहा जाता है । ऋग्वेदकी एक समाख्या होत्र भी है क्योंकि यज्ञमें इसके मन्त्रोंका ज्चारण प्राय: होता ही किया करता है। - -- । -
४१
द्वितीय सोपान
महर्षि पतञ्जलिने पस्पशाहिकमें कहा है कि-
-" एकविंशतिधाबाच्यम् "
ऋग्वेदको शाखाएँ : अर्थात् २१ शाग्वाएँ ऋग्वेदकी है ।
चग्णन्यूहमें उन इक्कीस शाखाओंके
पाँच प्रकार बनाये गये हैं. ."एतेषां शाखा: पञ्चविधा मन्ति
शाकला, वा कला, आश्वलायनीया:, शाड्वायनीया, माण्डूके-
याश्चेति " । अर्थात् मवेदियोंकी शाखाएँ पाँच प्रकारको होती
हैं -- (१) शाकट, (२) बाकल, (३) आश्वलायनीय, (४)
शाग्वायनीय और (५) माण्ड्केय ।
१. शाकल शाखाओंके मेद शाकल्य पिके
पाँच शिष्य थे
-(१) मुद्गल, (२) गोखल, (३) वात्स्य, (४)
शालीय, (५) शिशिर इन शिष्योंके मेदसे --शाकल शाखाएँ
पाँच हो गई । विष्णुपुराणमें लिग्वा है-
"देवमित्रस्तु शाकल्यः, संहितां तामधीतवान् ।
चकार संहिताः पञ्च, शिष्येभ्यः प्रददौ च ता.।।
तस्य शिष्यास्तु ये पञ्च, तेषां नामानि मे शृणु ।
मुद्गलो गोखलइचैव, वात्स्य शालीय एवच ।।
शिशिरः पञ्चमश्चासीत्,
"
(२) बाष्कल शाखाओंके मेद-चार है। जमा
कि पुगणों में है-
"चतस्रःसहिताः कृत्वा, बाम्कलो
द्विजसत्तमः ।
शिष्यानव्यापयामास, शुश्रूषाभिरतान् हि तान् ।।
१२ वेद मन्दिर-प्रवेशिका , बोध्यां तु प्रथमा शाखां, द्वितीयामग्निमातरम् । पाराशरी. तृतीयां . तु, याज्ञवल्क्यामथापराम् ॥" ब्रह्मां. पु. पू०.३४ ॥ २६ ॥२७॥ अन्यान्य प्रमाणोंमें बोध्यके स्थान पर बौध्य, अग्निमातरकी जगह अग्निनठर और याज्ञवल्क्यके बदले जातूर्ण्य पाठ मिलता है। अत: गवेषणा शील विद्वान् उक्त चार शाखाओंके नाम इस प्रकार बताते हैं - (१) वौध्यशाखा, (२) अग्निमाटरशाखा, (३)पराशर शाखा और (४) जातूकर्ण्यशाखा । ३. आश्वलायनीयशाखा तथा उसके भेद अज्ञानके गर्भ में हैं । आश्वलायन श्रौत सूत्र तया षड्गुरु-शिव्यके लेखसे' आश्वलायन शाखाका अनुमान मात्र होता है। ४. शांखायन शाखाके मेद चार हैं -(१) शांखायन, (२) कौपितकि, (३) महाकौपीतकि, (४) शाम्बव्य । ५. माण्डुकेय शाखा की मी वही दशा है, जो आश्वलानीय' शाखाकी है। इसी प्रकार नाम मात्र तो बहुतसी शाखाओं प्रशाखामों- के इतस्तत निकल आते हैं । परन्तु उपलब्ध साहित्य थोड़ा ही है। 'उपलब्ध शाखाएँ ऋग्वेदकी केवल दो शाखाएँ उपलब्ध -शाकल और बाकल । ये भी दोनों पृथक् पृथक् नहीं छपी 'शाश्त्यस्य संहितका बाष्कलस्य तथापरा । द्वे सहित समाथिन्य, ब्राह्मणान्येक विति:।।" (मांनुक० उपोद्धात)
४३
देखे जाते हैं।
। द्वितीय सोपान
हैं; अपि तु आजकलकी मुद्रित ऋग्वेद-संहितामें दो प्रकारके विभाग
एक मण्डल, अनुवाक, सूरत और मन्त्रोंका
और दूमा मटक, अध्याय, वर्गादिका विभाग
प्रथम विभाग
वाकल-संहिताका और दूसरा दशाकलका है। परन्तु अनुवाकानुकलगी-
के अनुसार शाकटसे वाकळमें आठ सूक्त अधिक होते हैं। अत
इन देनाका भेद अमी और परीक्षणीय है। सायणभाध्य-सहित ऋग्वेद
संहिता सर्व-प्रथम विदेशों में छपी पश्चाद् भारतमें। अब तो
इसके कई संस्करण निकल चुके है । छपी हुई शाकल
संहितामें आठ अष्टक प्रत्येक अष्टकमें-आठ अध्याय; सब मिलाकर
६४ अध्याय, ८५ अनुवाक १०२८ (मतान्तरमें १०१७)
सूरत, २०२४ वर्ग १०५८९ (मतान्तरमें १०५८० मौर
२०४६७] मन्त्र, १५३८२६ शब्द और ४३२०००
1. सन-प्रपम मैक्समूटर (Max Miller) ने सन् १८४९ से
१८४ तक सलत परिश्रमले सायणमाप्य महित वेदसंहिता प्रचशित
को । फिर एक और जमेन विद्वान् (Theolor Aafrecht)ने
रोमन लिपिमें अमनीसे १८६२-१८६३ में उक्त संहिताका सम्पादन किया।
इधर भारतीय मी जागे और यम्बईसे मैक्समूदर-सम्पादित महिताही प्रति-
रिपि जगदी। मायनरने अभियोग चा दिया भोर परिणाम स्वरुप
भरना नाम उस पर भी पैर दिया । उन् १८९1 में पं. राजाराम
पानी तथा शिवराम शामीने गत परिधनमे उस हितास सम्मा
निचरा ! Max Nfaller ने आना दूसरा गन्धरण भी १८९२१.में
वेद मन्दिर प्रवेशिका सूक्त-संख्या वाप्कलका विवरण इस प्रकार है- मण्डल मन्त्र-संख्या १९१ २००६ ४३ ४२९ ३ १ ६२ ऋपि मधुमन्दादि- गृत्समद विश्वामित्र वामदेव अत्रि भरद्वाज वसिष्ठ ५८ ६८९ ८७ ७२७ ७६५ ८४१ . ७५ १०४ १०३ ११४ १९१ कण्व e ; 6 ११०८ १७५४ मधुच्छन्दादि- त्रित आप्तय दि- २०१७ बाल खिल्य १०४७२ ८० १०२८ १०५५२ निकाला। Vaidic Sarnshodhak mandal Tilak Samarak mandir (Poona) से १९३३ ई० प्रकाशित की है। मुन्दर पद-पाट-महित सायण-माप्य इममें हैं। १. कण्व गोत्रक सय ऋषि 'कान' नामन ही उद्धिखित हुए हैं ।
द्वितीय सोपान ऋग्वेदके ब्राह्मण इस समय ऋग्वेदके दो ब्राह्मण मुद्रित है-एक ऐतरेयब्राह्मण कौपीतकि। कुछ लोग कौषीतकि ब्राह्मणको शाझायन भी कहते हैं। परन्तु यह भिन्न प्रतीत होता है। और दूसरा (१) ऐतरेय ब्राह्मण-महर्षि महीदासकी माताका नाम ईतरा था। महीदासकी ऐतरेय उपाधि थी। ऐतरेय (महीदास) ने इस ब्राह्मणका इतना प्रवचन किया कि उनके नामसे इसकी प्रसिद्ध हो गई । कई विद्वान इस ब्राह्मणका संवन्ध शाकल संहितासे बताते हैं। परन्तु ब्राह्मणके अनुशीलन से ज्ञात होता है अन्यान्य शाखा- संहिताओं के साथ भी इसका सम्पर्क है । यद्यपि मौलिक सिद्धान्त यह है कि एक शाखाकी एक संहिता, एक ब्राह्मण, एक आरण्यक, एक उपनिषत् और श्रौतादिसूत्र होते हैं। इस प्रकार ऐतरेय ब्राह्मणका भी किसी एक ही शाखा-भहितासे जोड़-मेल होना चाहिर । तथापि ऐतरेय ब्राह्मणमें व्याख्यात मन्त्र केवल किसी एक साहिता में नहीं मिलते । अतः कई संहिनामों से सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण आठ पचिकाओंमें विभक्त है। प्रत्येक पदिकामें पाँच पाँच अध्याय हैं। सन मध्याय-४ ० हैं। प्रथमको छ पशिओं में सोमयाग वर्णित है। शेष दो पश्चिकाओंमें राज्या भिषेक । हरिश्चन्द्रादिके उपाख्यान बहुत मनोरम दंगसे दिये गये ।
वेद मन्दिर प्रवेशिका हैं। गोविन्दस्वामी तथा सायणाचार्यके भायोंसे यह ब्राह्मण विभूपित है। किसी समय भारतके दक्षिणी प्रान्तों में इसका प्रचुर प्रचार था-- ऐसा चरणव्यूहसे प्रमाणित होता है- तुङ्गा कृष्णा तथा गोदा, सह्याद्रि शिखरावधि । आ आन्द्रदेशपर्यन्तं, बहवृचश्चाश्वलायनी॥ अर्थ - तुंगभद्रा, कृष्णा और गोदावरी नदी तथा सह्याद्रिकी उपत्यकामोंसे लेकर आन्ध्र प्रान्त पर्यन्त ऋग्वेदी आश्वलायन शाखा वाले ऐतरेय ब्राह्मण-अध्येता ब्राह्मण रहते हैं । आजकल भी इन्हीं प्रान्तोंमें कुछ प्रचार रह गया है। इसका सम्पादन' वम्बई और पूनामें हुआ है। २. कौषीतकि ब्राह्मण -३० अध्यायोंमें विभक्त है। इस पर माधव-पुत्र विनायक-रचित भाग्य है। आप्रेस्ट (Aufrecht) वृहत् सूची मा० १ पृ० १३२के अनुसार बनारस संस्कृत कालेजमें कोपीकि ब्राह्मण पर मिताक्षरा नामकी टीका हस्त लिखित है। इसकी प्रचार भूमि उत्तरी गुजरात प्रान्त थी-- ऐसा महीदास- उद्धृत एक श्लोकसे सिद्ध होता है- 1. प्रो० हाउग (M Haug)ने बम्बईसे १८६३ ई० में इसे प्रथम प्रकाशित किया था परन्तु आउफ्रेस्ट (Theodor Aufrecht ) महोदयने कई उपयोगी मूचियोंके साथ यान नगरसे १८७९६०में प्रकाशित किया है। जिमकी लिपि रोमन है। २. प्रो० लीड्नर (Lindner) ने कौपीतकि ब्रामणका सम्पादन जना नगरसे १८८७ है. मैं किया था ।
४७
द्वितीय सोपान
उत्तरे गुजरे देशे, वेदो बच ईरितः ।
कौषीतकि ब्राह्मणं, शाखा शाड्वायनी स्थिता ।।
(चरणव्यू टी + २)
प्राचीन हस्त-लेखों की रक्षाका श्रेय आज भी इस प्रान्तको ही है।
यद्यपि दोनों ब्राह्मण समान विपयकी चर्चा में व्यापृत है;
किन्तु दृष्टि-कोण विलक्षण है। यदि
दोनोंकी प्रतियोगिता कौपीतकि की रचना-शैली उत्कृष्टतर
है, तो ऐतरेय विषय व्यापकतामें
उन्नततर है। क्योंकि ऐतरेयके अन्तिम दशक-विचारित विषयोंको
कौपितकि छूता तक नहीं । ऐतिहासिक विषय-वर्णनामें तो ऐतरेय
अपना विशिष्ट स्थान रखता है। भारतीय प्राचीन विश्व विद्यालयोंका
मधुर स्मरण दिलाना तथा महत्त्वके मौगोलिक विषयों पर पर्याप्त
प्रकाश डालना ऐतरेय ब्राह्मणका ही काम है । इन दोनों ब्राह्मणों के
अतिरिक्त और भी बाइच ब्राह्मगोंके नाम यत्र तत्र उद्धृत - मिलते
हैं। परन्तु उनका पूर्णतया ज्ञान नहीं ।
ऋग्वेदके आरण्यक
ग्वेदीय मारण्यक प्रन्थों में से दो उपञ्च है--ऐतरेय
और शाखायन ।
१. ऐतरेय आरण्यका
- पाँच कण्डोंमें बेटा है।
कण्डोंको मारण्पक मी कहते हैं। पाँचों कों में प्रश:
वेद मन्दिर प्रवेशिका ५, ७, २, १ और ३ अध्याय हैं। सब मिलाकर १८ अध्याय होते हैं। प्रत्येक अध्यायमें कई खण्ड है। प्रथमके तीन काण्डोंमें महीदास (ऐतीय) का, चौमें आश्चल यनका और पाँचवेमें शौनकका नाम यधिक माता है । सायण-मायके सहित मुद्रित' है। - २. कौपीतकि (शांखायन आरण्यक')—में १५ अध्याय हैं । मत्र अध्यायों में क्रमश : ८. १८, ७, १५, २३, ११, ८, ८, ८, ८, १, २, १ खण्ड हैं। सब ग्वण्डोंका योग = १३७ हैं। यह आरण्यक ऐतरेय आरण्यकसे प्रायः विषय- निरूपणमें मिटता-जुलता है । इसके तीसरे अध्यायसे छठे अव्याय तक कोपीतकि उपनिषद् है । यह विद्वानोंको वहुत प्रिय है । है भी विश्वकी झाँकी - इसमें यदि कहीं विशाल विन्ध्य और हिमाद्रिके उन्नत शिवर, तो कहीं तरङ्गित है परमानन्द महासागर। कहीं विषय मुपुम शय्या पर चिरनदित मानवको जागरण-निदेश, तो कहीं सहज विरक्त सन्वको मधुमय उपदेश । एक ओर है- देवगजका युद्ध भयङ्कर दूसरी ओर अति मृदु ज्ञान-गीत १. मन्यवन मामधनी-द्वारा मुदित मायण-माप्य-महित १८७२.७६ २. महाशय (A, B Keithiने आसिडमे १९०९ ई० . में अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया है।
४९ द्वितीय सोपान ऋग्वेदकी उपनिषदे मुक्तिकोपनिपने जिन १०८ उपनिपटों बहुत महत्व' दिया है। उनमेंसे दसका सम्बन्ध ऋग्वेदसे ठहराया है - (१) ऐतरेय, (२) कौपीतकि, (३) नादविन्दु, (४) आत्मप्रबोध, (५) निर्वाग, (६) मुद्गल, (७) मक्षमालिका (८) त्रिपुग, (९) सौभाग्य, (१०) वढच । इनमेसे भी दो अपनी प्रतिपादत विषय- महनीयताके कारण नितान्त लोक-प्रिय और प्रामाणिक है - ऐतरेय - मोर कौपीतकि । D १. ऐतरेयोपनिषद्'-तीन अध्यायोंका प्रन्थ है । प्रयम अध्यायके प्रथम खण्डमें = सृष्टि निम्पण, द्वितीय खण्डमें - इन्द्रिय-गोलक-निर्देश, तृतीयमें = अन्न ग्राहक प्रागका निरूपण है। द्वितीय अध्यायमें = मनुष्य-शरीरकी उत्पत्ति और तृतीयमें = उपास्य देवका स्वरुप निणय किया गया है । २. कौषीतकि उपनिषद् में - चार अध्याय हैं। प्रथमाध्यायका विषय है- पर्यद-विद्या, द्वितीयका प्राणोपासना, १. सोपनिषदां मध्ये, सारमटोत्तर शतम् । सकृन्ट्रयणमानेण, सांपोपनियन्तनम् ॥ (मु० उ. 110) २. सायण-मान्य और शारादि भान्यो-गहित मुदित है। ३. कोतकि उपनिषद शासायन आरम्पको अन्तिम मागो म्पमें पूनाने मुभित है। आपाय शहर और कायगके माध्य इस पर है। ५. ग्राणम्पी पग सम्बन्धी दिया ।
वेदमन्दिर-प्रवेशिका आध्यात्मिक अग्निहोत्र और विविध उपासनाएँ । चतुर्थाध्यायमें अजातशत्रु तथा गार्ग्यका संवाद सुन्दर ढंगसे दिया गया है। एक और--- ऋग्वेदकी वास्कल उपनिषद् मी उपलब्ध है। इसमें एक उपाख्यान अतीव मनोरञ्जक है -देवराज इन्द्र मेपके रूपमें आकर करव-पुत्र मेवातिथिको स्वर्ग में ले गया। मेधातिथि मार्ग में बोल नहीं सका; स्वर्गमें पहुँचकर कहने टगा तू कौन ?' उत्तर मिला “मैं हूँ विश्वेश्वर देवराज इन्द्र'। 'मुझे यहाँ क्यों ले आया ?' - इस प्रश्नका इन्द्रने उत्तर दिया- 'घोर अन्धकार से मैंने पार किया तुम्हें; मुझे धन्यवाद दो' । वस दोनों शान्त हो गये। - ऋग्वेदके श्रौतसूत्र ऋग्वेदको दो श्रौतसूत्र प्रसिद्ध हैं --आश्वलायन प्रीतमुत्र और शांखायन श्रौतसूत्र। १. आदवलायन श्रीतसूत्र- बारह अध्यायोंमें विभक्त है । ऐतरेय ब्राह्मणसे सम्बद्ध है । इसके रचयिता महर्षि आश्वलायन, कौशिक विश्वामित्रक पुत्र थे । आध्यसायन-श्रौतसूत्र पर ग्यारह मायकारोंका पता चला है (१) नागपण गर्ग, (२) देवत्रात, (३) वियावर, (४) कल्याणी, () दयाशदर, (६) मण्डन भा, (७) मथुगनाय गुक्ल, (८) महादेव, (९) पुल्लम-मुत, (10) पद्गुर-निय, द्वितोय सोपान (११) सिद्धान्ती । इस श्रौतसूत्रका प्रकाशन राजेन्द्रलाल मित्रने १८६४-७४ ई० में पूनासे किया है । २. शांखायन श्रौतसूत्रमें-- अड़तालीस अध्याय हैं । शांखायन ब्राह्मणसे इसका घनिष्ट सम्पर्क है। यन-पद्धतिका निरूपण इसमें बहुत स्पष्ट हैं। विष्णु और नारायणादि कई पण्डितोंके भयोंसे यह सुशोमित है । सर्व-प्रथम इसका सम्पादन हिलेवाण्ड्ट (A. Hillebrandt )ने किया था । ऋग्वेदके गृह्यसूत्र ऋग्वेदीय गृह्यसूत्रोंमें भी आश्वलायन और शाखायन ही उल्लेखनीय हैं । इन गृद्य सूत्रोंमें गभाधान, जातकर्म, चूड़ा, उपनयन, श्राद्धादिका वर्णन अच्छा है। आश्वलायन गृह्यसूत्रमें केवल चार अध्याय हैं और शाखायन गृह्यमें छः। शांखायन पर प्रसिद्ध भाष्य हैं-मुमन्तु, जैमिनि, वैशम्पायन, पैला द्विके । रामचन्द्र नामक एक विद्वानने नैमिषारण्यमें रहकर इस पर भाय लिया है। पहले स्टेन्डलर (A. F. Stanzler)ने दो भागों में इसका प्रकाशन किया था । ऋक्-प्रातिशाख्य ऋम्प्रातिशाख्य सूत्र शौनकके बन ये कहे जाते हैं । यह गौनक आश्वलायनके गुरु थे। इस प्रानिशम्या -३ काण्ट है। प्रत्येक काण्डमें%D६ पटट तथा तीनों कण्होंमें १०३ कण्डिकाएँ चंद मन्दिर-प्रशिका हैं । प्रथम-प्रथम विष्णु पुत्र ने इस पर भाग्य रचा था। तदनन्तर उबटने टमीका संस्करण करके नया भाष्य बना लिया। प्रातिशाख्य सूत्रों की छ.यासे बना हुआ उपलेव नामक संक्षिप्त प्रन्थ मी उपलञ्च है। कुछ लोग इसे प्रातिशाख्य सूत्र-परिशिष्ट कहते हैं । मक-प्रातिशाख्यका सम्पादन' पहले मैक्समूलरने किया था। ऋग-अनुक्रमणी अनुक्रमगीसे मन्त्रोंके छन्द, देवता, ऋपि, विनियोगादि जाने जाते हैं । एक ऋग् अनुवाकानुक्रमणी शौनक-चित और दूसरी कात्यायन-प्रणात सर्वानुक्रमणी उपलब्ध है। पारु-शिष्यने उनपर सम्बत् १२३४में विस्तृत टीका लिम्बी है। टीकाकार अपना वास्तविक नाम निदा कहीं नहीं करता। हॉ! अपने श्रद्धेय छ गुरयोंका नाम अवश्य जप लेता है -~~~(१)विनायक, (२)त्रिशूलान्त, (३) गोविन्द, (४) सूर्य, (५) व्यास और (६) शिवयोगी । हमारे प्रात:स्मरणीय प्राचीन लेग्यक अपने नामको कुछ भी महत्व र १ ऋक्-प्रातिशाख्य--2---Germanमें टिप्पणी के साथ हिन्दी लिपीमै १८५६-६९ईमें धग है। -रेनियर (Regmier) द्वारा १८५७-५९६. में ३ भागों में । युगद्रकिशोर शर्मा-सम्पादित हिन्दी अनुवाद १९०३ ई. में बनारसमे निकला है। 4- पशुपति नाय और पित्तहरण पकवी द्वारा आठ सम्डमि है।
द्वितीय सोपान नहीं देते थे; कितना ही विस्तृत और सारगर्भित साहित्य क्यों न प्रदान कर रहे हों। परन्तु आज-कल तो किसी अन्यको छूकर ही 'महाधुरन्धर सार्वभौमादि अपनी उपावियोंसे तथा अपने कपटादोंकी गुण-गरिमारो ग्रन्थ-कलेवर वृहत्तम बना देते है। ग्-अनुक्रम्णीका ऑक्सफोर्ड संस्करण मेरे सामने है। षड्गुरू-शिष्य रचना वेदार्थ- दीपिका तथा वृत्ति साथ है। मुखपृष्ठ पर लिखा हुआ है- 'Edited by A. A. Macdonell, M. A. Oxford 1886', कात्यायन-प्रणीत तर्वानुक्रमणी शाकल संहिताके ऋपि, देवत, छन्दादि विस्तृत गद्यमें बताती है । गौनक अपनी पद्यात्मक अनु- वाक नुक्रमगामें मण्टल, सूक्त, अन्याय, वर्ग, मन्त्रादिका योगफल बताते चले गये हे। ११ श्लोकोंमे छन्द-सख्या और ४५ श्लोकों में शेष समस्त वक्तव्य समाप्त कर दिया है। कात्यायनने भारम्भमें "श्री गणेशाय नम " ही लिवा है परन्तु शौन महर्षि पूरा ऐतिहासिक मगल कर गये हैं- "सर्व कर्म सफल यत्र तुष्टेऽतुष्टेन किंञ्चित्तमहं नमामि । विनायकं गिरिराजेन्द्रपुनीमहेश्वरप्रियसूनुं वृणाब्धिम् ॥" वृहदेवता महाकवि शौनक-चित बृह्दयता प्रन्यने सम्वेदीय प्रत्येक पि और देवता का वर्णन पौराणिक स्थानों के सहारे कया गया है। दशौनकने शामल शिरीय शाखामे अपने मन्योंका सबन्ध स्वयं कह दिया है- -
५४
पदमन्दिर -प्रशिका
..
ऋग्वेदे शैशिरीयायां, संहितायां यथाक्रमम् ।
प्रमाणमनुवाकानां, सूक्तैः शृणुत शाकला: ॥
(अनुवाकानु० २)
इसी प्रकार ऋग्वेदसे सम्बन्ध रखनेवाले ऋग्विधान, बृद्ध
परि शष्ट आदि अन्य है । परन्तु झीने ई.ने साहित्यका विचार
समयान्तर पर छोड़ते हुए ऋदका विषय यहीं समाप्त करते हैं ।
स्थूल रूपसे ऋग्वेदकी यही रूप-रेखा है।
२-यजुर्वेद
पुरातत्त्व-अन्वेपकोंको दृष्टिमें ऋग्वेढका जितना महत्व है।
उससे कम महत्त्व यजुर्वेदका कर्मठोंकी
यजुर्वेदका महत्त्व दृष्टिमें नहीं । क्योंकि जिस ब्रह्माके पूर्व
मुखसे ग्वेदका आविभाव हुआ, उसीके
दक्षिण मुखसे यजुर्वेदका । इतना ही नहीं, अपितु व्याससे पूर्व
चारों वेदोंका जो एक ही वेद था; उसका नाम था 'यजुर्वेद'।
वायु पुराणमें लिखा है
एक एवासीधनुर्वेद, स्तं चतुर्वा व्यकल्पयत् ।
चातुर्होत्रमभूतस्मि, स्तेन यज्ञभकल्पयत् ।।
आध्वर्यवं यजुभिस्तु, ऋग्भिहीत्रमेव च ।
औदानं सामभिश्चक्रे, ब्रह्मत्वं चाप्यथर्वभिः ॥
ब्रह्मत्वमकोयटे, वैदेनाथर्वणे न तु ।
ननः स ऋचमुद्धृत्य, ऋग्वेद समकल्पयत ॥"
और ब्रह्मा
--
-इन चारों
हितोय सोपान
अर्थात् पहले एक ही यजुट था जिसके चार भेद किये गये।
उम समयसे होता, अध्वर्यु,
उद्गाता
चिजोंके कृत्य-प्रकाशक अशोको पृथक् पृथक् कर दिया गया ।
रुचाओंको पृथक् निकालकर ऋग्वेदके रुपमें एकत्र कर दिया
गया, जिसका सम्बन्ध होतासे है । उद्गानाके सामों को अलग
करके सामवेद नाम रख दिया गया और ब्रह्मा नामक ऋत्विक्
के मागको भिन्न कर अथर्ववेदका स्वम्प दे दिया गया ।
शेष रह गया अध्वर्युका कृत्य । आजकल्के यजुर्वेद में अध्वर्युके
ही कृत्य है; अन. इस यजुर्वेदकी 'आध्वर्यव भी एक समाख्या
है । यज्ञमें भी देखा जाता है कि अध्वर्यु इडा-मक्षणादि-
अवसरों पर होता, उदाता, ब्रह्मादिके भाग देकर शेष अपना
माग खा लेता है । अवयं ही अनुपानाशमें प्रधान ऋत्विक
है। फिर इस अध्वर्युके कर्तव्य-ज्ञानका एकमात्र आधार यजुर्वेद
नहीं; अपि तु अधिक ही है । महत्त्वमें किमीसे कम क्यों होगा ?
।
यजुर्वेदके मेद
यजुर्वेद दो प्रकारका है.
(१) शुक्क और (२) कृष्ण ।
यद्यपि जाबाल संहितामें
'शुक्ला, 'कृष्ण' नाम-निमित्त पूर्वोक्त दो ब्रह्मा और आदित्यके
सम्प्रदायोंका ही नाम कृष्ण और
शुक्र कहा गया है
५६
वेदमन्दिर-प्रवेशिका
ब्रह्मणः सम्प्रदायोऽयं, व्याससन्दर्शितोऽभवत् ।
विभक्तस्यैव वेदस्य, सम्प्रदायो द्विधा मतः ॥
अयातयामसंज्ञोऽयं, कृत्स्नकर्मप्रकाशकः ।
यावद्ब्रह्मप्रकाशको, रविरूपश्च यो मतः ॥
ब्रह्मणः सम्प्रदायस्तु, मिश्रत्वान्न तथा मतः ।
अर्थात् ब्रह्म-सम्प्रदायकी मन्त्र ब्राहण मिश्रित होनेके
कारण यातयाम = तामस वा कृष्ण संज्ञा है। और आदित्य-सम्प्रदाय
रवि जैसा मन्त्र ब्राह्मण दोनोंका स्पष्ट प्रकाशक होनेसे अयातयाम==
सात्विक अथवा शुक्ल संज्ञावाला है।
तथापि यजुर्वेदमें और भी निमित्त होनेके कारण यह शुक्र
कृष्ण व्यवहार यजुर्वेद में ही रह गया। दूसरे निमित्त ये हैं :-
प्रवर्तितः खण्डशस्तै, न सम्यग्बुध्यते नृभिः ।
आध्वर्यवं क्वचिद्वौत्रं, क्वचिदित्यव्यवस्थया ।। :
बुद्विमालिन्यहेतुत्वाद् , यजुः कृष्णमीरितम् ।
याज्ञवल्क्यस्ततःसूर्य-माराध्यास्मादधीतवान् ।।
व्यवस्थित प्रकरणं, यजुः शुक्लं तदीर्यते ।
पौराणको कथामेतां, वेद व्याख्यान आदरात् ।।
(वण्वसंहिता भायोपक्रमः)
अर्थात् कण्व संहिताके प्राकथन भाग्यमें सायणाचार्य शुक्र
कृष्णके पुराण कथित निमित्तको आदर दे रहे हैं। पुराण-कथित
निमित्त यह है-होता और यर्यु आदिक कृत्योंकी अव्यवस्था
द्वितीय पोपान वा मिश्रण होने के कारण यजुः को एक शाग्याको 'कृष्ण' और व्यमस्थित रूपसे (मन्त्र ब्राह्मण पृथक् पृथक् होनेसे) याज्ञाल्ल्य द्वारा प्राप्त दूसरी शाखाको 'शुम' नाम मिग । वैयासिक चरण व्यूह-भाग्यकरने तो और ही कारण बताया है --- "एतत्सपिठं शुक्रिय मव्याने शुलपणन सूर्येश दत्तं तच्छुम्यजुः प्रख्यातमित्यर्थः । वेदोपक्रमणे चतुर्दशीयुक्तपूर्णिमा- पण त् शुक्लयजु", तैत्तिरीयक-वेदोपक्रमणे मोदयिक- पपत्रणादर्थात्कृष्णप्रतिपद्विद्ध-पौर्णमासीग्रहणात् कृष्णयजुरिति वा" अर्थात् याज्ञाल्क्यको शुक्वर्णमाले म पाहके सूर्यन उपदेश किया अन. वाजसनेय स्या न्यायमा उक्ल नाम पड़ा। अथवा वाजसनेयी शाखापाले वेदाध्ययनका आरम्भ चतुर्दशीयुक्तपूर्णिमामे अर्थात् शुक्र पक्षमें किया करते है; अतः वाजसनेया संहितीका ‘शुक्ल यजुः' नाम पडा और तैत्तिरीय शाबावाले कृष्ण प्रतिपदासे मिली हुई पूर्णिमामें अव्ययन आरम्भ करते हैं अतः तैत्तिरीय मंहिताकी सज्ञा कृष्ण यजुः हुई। शतपय तो आदित्यसे प्राप्त होनेके कारण ही 'शुक्ल' नाम रग्वता प्रतीत होता है। "आदित्यानीमानि शुक्लानि यपि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते" (शत० १४।९।४३३) कृष्ण यजुर्वेदकी शाखाएँ चरणव्यूहके मतानुसार कृष्ण यजुर्वेटकी ८५ शाग्वाएँ होती है। महाभा'यमें तो पूरे यजुवेदकी १०१ शाखाएँ और मुक्तिको .
५८
पेदमन्दिर -नरशिका
निपमें* १०९ कही गई हैं । इस समय तो यजुर्वेदकी केवळ
चार झाग्वाएं उपरब्ध हैं। -(१) तैत्तिरीय, (२) कर, (३)
मैत्रायणी और (४) कपिष्टल कट शाखा ।
(१) तैत्तिरीय शाखा
तैत्तिरीय संहिता- इस संहिताका प्रचार गोदावरी
निकटवर्ती दक्षिणी प्रान्तमें है | काण्ड, प्रपाठक और अनुवाकोंमें
विभक्त है । काण्ड =७ प्रपाठक =2 और अनुवाक =६३१ हैं।
मन्त्र संख्या चग्णव्युहके अनुसार = १०१८ है । इसका विषय
विभाग लोगाक्षि स्मृतिमें इस प्रकार है
"तानि काण्डानि वेदस्य, प्रवदामि च स्फुटम् ।
पौरोडाशो याजमानं, हौतारो हौत्रमेव च ।।
पितृमेधश्च कथितो, ब्राह्मणेन च तत्परम् ।
तथवानुब्राह्मणेन, प्राजापत्यानि चोचिरे ।।
तत्काण्डौघविशेषज्ञा, वसिष्ठाद्या महर्षयः ।
तद्विशेष प्रकाशाथै, सम्यगेतद्विविच्यते ॥
* " नवा विक्शतं शाखा यजुयो मारतात्मत्र" (मु० उ० १।१२) ।
यदि मुक्तिकोपनिषद्-उक्त “एकैकस्यास्तु शाखाया एककापनिषन्मता" -
इस नियमने शासा-सख्या मुक्तिकोपनिषद में खोजें तो केवल ५१ ही
होती है । क्योंकि कृष्ण यजुर्वेदकी उपनिषद्-संख्या ३१ और शुक्र
यजुर्वेद-उपनिषत्-मंग्या १९ बताई है । ३२+१९५१
अष्टकादिविमाग मी इसमें है । कहीं कहीं ७ अथक, ४४ प्रल,
६५१ अनुवाक २१९८ मन्त्र और ११.९९६ अक्षर भी लिये गये हैं।
पोराडाशा इपेत्याद्या,
द्वितीय सोगन
अनुवाकास्त्रयोदश ।
तन्हाह्मणं तृतीयस्यां, प्रत्युष्टं पाठकद्वयम् ।।
एवं चतुश्चत्वारिंश, काण्डानां तैत्तिरीयके ।
महाशाखाविशेषेऽस्मिन् , कथिता ब्रह्मवादिभिः॥"
कसिष्टादि महर्षियोंकी परम्पराका यह विषय-विभाग अति
स्पष्ट है।
तैत्तिरीय ब्राह्मण- इसमें तीन फाण्ड' हैं। तीनों
काण्डोंमें - २८ प्रपाठक हैं । प्रथम काण्डमें-७८ अनुवाक और
द्वित्तीयौ -९६ तथा तृतीयमें = १६४ अनुवाक हैं । सबका जोड
३३३८ है। इस पर सायण तथा भभास्करके भाष्य है।
कडकत्ता और पूनासे छप चुका है।
तैत्तिरीय आरण्यक
१० प्रपाठकोंका यह प्रन्य
है। ठमों प्रपाठकोंमें प्रमश: ३२, २०, २१, ४२, १२,
१२, १२, ८, १०, ६१ अनुवाक हैं। सब मनुवाकोंकी
संख्या २३३ है। दशम प्रपाठकमें परिशिष्ट रूपसे ८०
अनुवाक और हैं। सायणने इसे खिल प्रकरण कहा है। नाराययो-
पनिषत् भी यही है।
तैत्तिरीय उपनिषद्-~~तत्तिरीय आरण्यकके सप्तम,
सष्टम, नवम, प्रपाठकोंको तैत्तिरीय उपनिषद् और दशम प्रपाठकके
१. तत्तिरीय ब्राह्माणमें अटक, अध्याय, अनुवाकोंका मी विभाग हैं।
परन्तु भाष्यानुसार फाडादि-विभाग ही है।
-
यंदमन्दिर-प्रथमिका तैत्तिरीय-गृह्यसूत्रः परिशिष्टको नागयण उपनिषद् कहते हैं। सायण शङ्कर आदि याचार्योंके मायोंमे तैत्तिरीय उपनिषद् अटत है। इसके तीन भाग हैं ---(२) शिक्षावल्ली, (२) आनन्दवही, (३) मृगुवहीं । प्रथम वल्ली में स्वर-शिक्षा, सत्येवट, धर्मचर आदि और शेप दो में ब्रह्मविद्याका मर्मस्पशी उपदेश है। तैत्तिरीय श्रौतसूत्र-तैत्तिरीय शाखासे सम्बन्ध रखनेवाले पाँच श्रोतसूत्र हैं--(२) वोधायनीय' (२) आपस्तम्बीय' (३) हिरण्यकेशीय , (१) भारद्वाजीय, (५) वैखानस । सभी मुद्रित हैं । इन पर भाग्य और वृत्ति ग्रन्थोंकी कमी नहीं है । -मभी श्रोत्र सूत्रकारोंने ही गृह्यसूत्र ग्चे है। जिन पर कळवार्य आदि महापण्डितोंके भाष्य हैं (२) काठक शाखा "प्रामे ग्रामे काटकं कालापकं च" ४।३।१०१) इस पतञ्जलि महपिके लेखसे कठ संहिता' प्रतीत होता है कि किसी समय का शाखाका प्रचार भारतके कोने कोनमें था। उत्तर- प्रान्तोंसे इसका सम्बन्ध अमी भी बना हुआ है। कट ब्राह्मण २. १९०४-२० में फैलेट (W. Caland) द्वारा प्रकाशित । ३. दो भागों, गावे (R. Garbe) नं १८८१-१९०३ में प्रकाशित किया है। ४. गोपीनाय और महादयका सरकण । ५. काठक सहिना मयने पहले १९.१ ई० में प्राडर (L. V. Schroeder)ने प्रकाशित की अब स्वायाय मटटमे मी निकटी है। (व्या० म० मा लाग - अग्निविष्णु मारत, पयरस्थानक, पशुबन्ध, वाजपेय, श्रीराजसूय, द्वितोय सोरान नीरमें ही पाये जाते हैं। महर्षि वैशम्पायनके शिष्य महर्षि प्रवर्तित यह कठ सहिता है। तेत्तिरीय सहितायी माँति इसमें भी मन्त्र और ब्राह्मण मिश्रित है । काठक सहितामे पाँच ग्रन्थ (काण्ड ) है। १--इठिमिका, २ ३- ओरिमिका, ४- -याज्या अनुवाफ्याकाण्ड, ५. १. इठिमिका नामक काण्डमें %D१८ स्थानक है। जिनके ये नाम हैं --पुरोडाश, अव्वर, ज्योतिरिक, ग्रह, याजमान, अग्निहोत्र ब्रह्मण, आलोभी, दिशस्थानक, उत्सीदन, -मध्यमिका, -अश्व- - मेचीन-अनुवचन । क्रमशः अग्निवी शका, ध्रुवक्षिति, चमा। २. मध्यमिका-नामक प्रथमे = १२ स्थानक हैं - साचित्र, अपेतवीत, पञ्चचूड, स्वर्ग, दीक्षित, साक्षाति, इषु, धिष्ण्य, वाचस्पति, आयुन्य, दीर्घजिह्वा और पानीपत । ३. ओरिमिका में 3 १० स्थानक है--पुगेटाश- बाह्मण, यजमान-ब्राह्मण, सत्र, एकादशिनी, प्रायश्चित्ति, चातुर्मास्य, सा, सौत्रायणी, पदक्रन्द, हिरण्यगर्भ । ४. याज्यानुवाक्या -तो ओरिमिकाके ही अन्तर्गत * इडिमिका आदि नाम उत्तर पहाडियोंकी भाषामे मिलत-जुलते प्रतीत होते हैं।
६२ वेदमन्दिर -प्रयशिका - ५. अश्वमेधीयानुवचन में १३ अनुवचन हैं- पन्यानुवचन, गणानुवचन, मेषानुवचन, मितानुवचन, जीमृतानुवचन इन्द्रानुवचन, पेत्वानुवचन, रोहितानुवन, सोमानुवचन, नमस्काग्वचन, मलिवन्दानुवचन, शादानुबचन | सब स्थानक= ४०, अनुवचन- १३, अनुवाक = ४३, मन्त्र= ३०९३, मन्त्र और ब्राह्मण मिलकर १८००० हैं । कठ-ब्राह्मण इसका उद्धरण तो कई अन्योंमें माता है परन्तु अभा तक पूर्ण उपलब्ध नहीं हुआ। आरण्यककी भी यही दुर्दशा है। कठउपनिषद्- --कठ उपनिषद् अपने आरण्यकादि परिवारके तितर-बितर हो जाने पर भी केवल उपलब्ध ही नही अपितु अपना विशिष्ट स्थान रखती है । इसमें दो अध्याय हैं । प्रत्यक अध्यायमें = तीन वल्लिया है। छहों वहयों में मन्त्र क्रमश: है = २९, २४, १७, १५, १५, १८ सय= ११८ हैं । इसी उपनिषदमें यम और नाचकेताका प्रसिद्ध संवाद है। इसपर शङ्करादि आचार्योंके माप्य हैं। काठक सुन -श्रौतसूत्र और गृरमूत्र* दोनों टीगाक्षि- प्रगीत हैं । व्यपाल, ब्रमवाटि-कृत भाष्य श्रीनगर (मम्मीर) • पटन मन (W. Caland) दाग मुद्रित है।
द्वितोय सापान
तथा लाहोरसे मुद्रित हो चुके है। इनके सिवा एक लौगाक्षि-
स्मृति भी उक्त शाखासे सम्बन्ध रखती है। जिसमें ४०००
श्लोक हैं।
(३) मैत्रायणी शाखा
मैत्रायणी संहिता-हरिवंशके चौंतीसवे अध्यायमें
टिखा है-
दिवोदासस्य दायादो, ब्रह्मर्षिमित्रयुनूप ।
मैत्रायणी ततः शाखा, मैत्रेयास्तु ततः स्मृताः॥"
अर्थात् मित्रयु कपि-प्रवर्तित संहिता मैत्रायणी है। तैत्तिरीय
संहिताकी अपेक्षा इसमें प्रकरणोंका संगठन अच्छा है। महाराष्ट्र
और गुजगतमें इसका प्रचार पहले भी महार्णव बताता है -
"मयूरादि समारभ्य, यावद् गुर्जरदेशतः ।
व्याप्य वायव्यदेशं वै, शाखा मैत्रायणी स्थिता ॥"
मयर पर्वत- नासिक मण्डलमें मुल्हेर क्षेत्रके समीप है।
इस संहितामें भी ब्राह्मण भाग मिला हुआ है। चार काण्डोंमें
यह विभक्त है।
ग्यारह प्रपाठक है । जिनमें विषय हैं
-दशेपूर्णमाम, अध्वर, प्रह, यजमान-ब्राह्मण, अग्नि उपस्थान,
आधान, पुनराधान, अग्निहोत्र ब्राह्मण, चतुहर्होता, चातुर्मास्य, वाजपेय ।
प्रथम काण्डमें
क्रमश:-
वेदमन्दिर -प्रशिन
द्वितीय काण्डम-१३ प्रपाटक हैं। जिनमें १ से १
तक काम्य इष्टियाँ, पाँचवेंमें = काम्ययशुयाग, पष्ठम = राजसूय
और ७ से १३ तक अग्निचयन कर्म है।
।
तृतीय काण्डमें
१३ प्रपाठक हैं । जिनमें से
५ तक अग्निचयन-ब्राह्मण हैं। ६ योर सातमें = अवगदि-विनि,
८ से ११ तक क्रमश:
यामुर, सक्रान्त, पानीवत् , सौत्राम
हैं । १२ से १६ पक= अश्वमेध वर्णित है।
चतुर्थ काण्डमें- १४ प्रपाठक हैं । प्रथम =
पुगेडाश-ब्राह्मण, द्वितीयमें = गोनामिक, तृतीय और चतुर्थमें -
गनसूय-ब्राह्मण, मे ८ तक = अध्यरादि-विधि, नवममें :
प्रवर्दी तथा शेप-पाँच प्रपाठकों में = याज्यानुवाक्या है।
इस संहिताके कई मुद्रण निकले हैं।
-संहिताके अन्तमें ही मैना-
यणीय आरण्यक अथवा उपनिषद् मुद्रित है । उसके ७ प्रपाटक
हैं। जिनमें क्रमश: ४, ७, ५, ६, २, ३८, ११ खण्ड हैं ।
मैत्रायणी-सूत्र-इन शायासे सम्बन्ध रखनेवाले मानव
प्रोत सूत तथा मानव गृह्यसूत्र प्रसिद्ध है। मनुस्मृति और मानव
गृह्यका परस्पर घनिष्ट सम्पर्क है। वाह-गृहमें बहुत से इस शाखाके
अन्योका निशा है।
मैत्रायणीय आरण्यक
६५
• द्वितोय मोपान
(४) कपिठल कठ शाखा
इन शाखाकी संहिता मात्र १९३२ ई० में लाहौरसे प्रकाशित
हो गई है। इसमें आठ अटक है । प्रत्यक अष्टक आट अध्यायों में
विभक्त है।
"
शुल्ल यजुर्वेदकी शाखाएँ
शुक्लस्य यजुपः पञ्च-दश शाखा ताः
स्मृताः ।.--
- इस कात्यायन मुनिके बचनसे जत होता है कि
शुक युजुर्वेदकी १५ शाखाएँ थीं । परन्तु इस समय दो ही शागर
उपलब्ध है :- (१) माध्यन्दिनी और (२) कण्व ।
(१) माध्यन्दिनी शाखा
मगवान् सूर्यने दिनके मध्यभागमें इसका उपदेश किया था
अत: इसका नाम माध्यन्दिनी पड़ा।
माध्यन्दिनी संहिता वाजसनेयी संहिता भी इसे कहते हैं।
क्यों कि वाजसनिके पुत्र याज्ञवल्क्यने
भगवान् आदित्यसे प्राप्त किया था। इस संहिताके ४० अध्याय,
३०३ अनुष'क, १९७२ काण्डकाएँ १९७६ (मतान्तरमें
१९७१) मन्त्र, ८८८७६ अक्षर और २९६२५ शब्द हैं।
प्रथमके पचीस अध्यायोंमें मत्र-संग्रह है। अन्तके पन्द्रह अध्याय
वेदमन्दिर-प्रवेशिका खिल प्रकरणके नाममे प्रसिद्ध हैं। सोलहवें अध्यायमें शतरुद्री, इकतीसमें पुरुषसूक्त और चालीसमें ईशावास्योपनिषद् है। वाजसनेयी संहिता पर उबट, माधव, आनन्दमट्ट, अनन्तदेव और महीधरके प्रख्यात भाष्य हैं। महीधग्ने उब्बट और माधयके भाष्य देखकर अपना भाष्य वनाना आरम्भमें लिखा है। प्रणम्य लक्ष्मी नृहरिं गणेशं, भाष्यं विलोक्यौव्वटमाधवीयम् । यजुर्मनूनां विलिखामि चार्थ, परोपकाराय निजेक्षणाय ॥" अति प्रसिद्ध शतपथब्राह्मण दो प्रकारका है-१.माध्यन्दिन शान्वा सम्बन्धी और २. कण्व शाखा माध्यन्दिन-शतपथ सम्बन्धी । पहले का नाम माध्यन्दिन ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण है। इसके नामसे ही व्यक्त है कि शत= १०० पथ = अध्याय वाला यह प्रन्य है। काण्ड= १४, प्रनाटक=६८, श्लोक-सान्या २४०० अक्षर- संन्या.७६८००० है । इसमें मचाएँ = १२०००, पन ८००० और ४००० साम सहीत हैं । म्हाभारतके कथानकों जैसे इसमें अनेक कथानक हैं; जिनके सहारे संहिताकी यात्र्या की गई है । सीतागम आदि ऐतिहासिक नाम भी इसमें लाने हैं !.. 3 * पहला गम्करण १८५ नमें वरने निकाय था।' * द्वितीय सोपान १ एकप दिका ७ अध्वर w of w ४ माव्यन्दिन शतपथ-विवरण काण्ड-सङ्ख्या काण्ड-संज्ञा अध्याय प्रपाठक ब्राह्मण कण्डिकाएँ हविर्यज्ञ ९ ३७ ८३७ २ २१ ५४९ ८५९ ४ ग्रहनाम ५ ३९ ६४८ ५ सव २५ ४७१ उपासम्भरण २७ ५३० हस्तिवट ६ ४ १२ ३९८ ८ चिति ४ २७ सञ्चिति ६ ४०२ १० अनरहस्य ६ ४ २६९ ११ अष्टाध्यायी ८ ४ ४२ ४३७ १२ मयम ६ २९ अश्वमेध ८ ४३ ४३२ ७९६ .- ४ ४ ७ बृहदारण्यक -- योग-१४ १४ ४३८ ७६२४ वृहदारण्यक -उक्त शतपयका चेदयाँ काण्ड वृह- दारण्या कहलाता है। इसके आम्भिक तीन अन्यायोंमें -प्रचर्य क्रिय की चर्चा है तथा संहिताके कयाग उदृत हैं। शेष है: मच्यायों में वृहदारण्यकोपनिषद है। पृहदारण्यक उपनिपद- वृथ्टारप्य अन्तिम अपायको हमारक उपनिषद कहते हैं । इस उपनिपद पर वेदमन्दिर प्रवेशिका । दो भाष्य मुद्रित हैं एक द्विवेद गङ्ग संज्ञक गुजरातके नागर ब्राह्मणका जर्मन – मुद्रित ग्रन्धमें छपा है और दूसग वासुदेव भगवत्पाद-चित वेंकटेश्वर कल्याण मुद्रणालय वम्बईसे मुद्रित हुआ है । इस पर शकावाहिके भ.थ्य नहीं हैं; अपि तु कण्व शतपथ ब्राह्मण अन्तर्गत बृहदारण्यकोपनिषत् पर हैं । इसी प्रकार इस संहिताकी मन्त्रोपनिषद् (ईशावास्य) पर भर्तृप्रपंचादिकी व्याख्याएँ है; शङ्कराचार्याटिकी नहीं । माध्यन्दिन-ौत सूत्र- - शुक्ल यजुर्वेदके श्रौतसूत्रोमें कात्यायन मुनि-प्रणात श्रौतसूत्र ही सबसे प्रसिद्ध है । इसमें = २६ शध्याय हैं । आरम्भके अठारह अध्यायोंमें उमी क्रिया-कलाप पर विचार किया गया है, जिसका निरूपण शतपथके प्राथमिक नौ काण्डों में दुआ है। शेप अध्यायोंमें क्रमश:-सौत्रामणी, अश्वमेध, पुरुषमेध, पितृमेध, एकाह, अहोन, सत्र, प्रायश्चित्त और प्रवर्ग पर विचार किया गया है । इस सूत्र ग्रन्थके अनेक भाष्यकार और वृत्तिकार हुए हैं। उनमें - यशोगोपी, पितृभूति कर्क मर्तृप्रज्ञ, श्री अनन्त, गङ्गाधर, गर्ग पद्मनाम, मित्र अग्निहोत्री, याज्ञिकदेव, हरिहर महादेव और विद्याधरके नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। माध्यन्दिन-गृह्य सूत्र -कई गृह्यसूत्र प्रन्यों में पारस्कर- रचित कातीय गृह्यसूत्र ही प्रामाणिक है। जिसका अध्ययन अध्यापन याज्ञिक विद्वानों में विशेषरूपसे पाया जाता है। इसमें काण्ड = ३ हैं। इसकी पद्धति वासुदेव पण्डितकी लिखी हुई है। सूत्रोंपा टीका जयगमने भी की है। शहर गणपति (रामकृष्ण) की टीका तो । - द्वितीय सोपान पाण्डित्य-पूर्ण है । याज्ञवल्क्य स्मृति आदि अनेक धर्म-ग्रन्थ इस गृह्यसूत्र के अनुयायी हैं। शु० यजुर्वेद-प्रातिशाख्य-शुक्ल यजुर्वेदके प्रातिया- ख्यसूत्र और उनकी अनुक्रमणा कात्यायन मुनि-प्रणीत है । इस प्रातिगायके आठ अध्याय है। प्रथममें = सज्ञा और परिभाषा, द्वितीयमें =स्वर और उच्चारण-प्रणली, तृतीय चतुर्थ और पंचममें सैन्यार, पष्टमें = क्रियापदार्थका निर्णय तथा शेप अध्यायोंमें कम नियम दिए गये है। उन्चटने इस पर टीका रची है। अनुक्रमणीमें = %3D पाँच अध्याय है। (२) कण्व शाखा काण्व महर्षि द्वाग प्रचरित शाख का नाम क्ण्व शाखा है। यह क्ण्व म्हर्षि ऋग्वेदके द्रष्टा कण्व संहिता पण्वसे भिन्न, वेधयनके पुत्र और यज्ञ- वल्स्यके शिय है। अपनी नहितामें इन्होंने गुरके पाटका कहीं-कदा अनुम'ण नहीं किया है। जैसे - मयं देनशानी पुरपका उनण 'पुरव' करते है परन्तु काय वैना नहीं करते; अपि तु ऋग्वैदियों जैसा ही उच्चा•ण कते हैं । "एप यः कुरमी राजा ए य: पाबा नि" (कास सं० ११।११) टम श्रुतिका पाठ और-और महिलाओं में भिन्न- मित है। अतः प्रतीत होता है कि महर्षि कण्य कुर पाचट देयके गनेवाले है। इस संहिता में सर १० अयय है। जिनमें १९ अध्याय अनेक प्रकारक कोका निरवण करते है। भन्निम याव ममपिता प्रतिपादक गायोपनिन्द है।
७० घेदमन्दिर -प्रवेशिका कण्व संहिताके अध्यायादि अध्याय अनुवाक मन्त्र अव्याय अनुयाक' मन्त्र १ २ ७ ४ ४९ २२ २३ २४ २६ २६ ४७ द १० ८ ७ ६० ४० ४४ ४५ 3 २२ २२ ८ १४ २८ २९ - १० ४३ . ३ . ७ ३२ ar २१ ८४ ४६ २२ ७ २ १४ ७ ४ ४ ७ ८५ १ २४ ८ २० ७ 60 २७ ४३ ३८ ३९ ४० २० 8 १ १८ २० २० ०१ हितोय सोपान डॉट काण्ड (V. caland) के मतनुनार इन शन परमें १०४ अयाय ४४६ ब्राह्मण काण्व-शतपय नाग और ५८६५ कण्डिक ए हैं। इसके पहले, पांचव और चौदहवें काण्डके दो-दो माा है। विश्व कोशकारने लिया है कि अब तक इसके साढे तेरह काण्ड मिले है जिसमें अया=८५ और ३६० बेमण तपा ४९६५ कण्डिकाएँ हैं। वस्तुत इसका विवरण कण्टिकाएँ कण्डाई १ ३ ५३२ १२४ ६४९ ९७१ ४ काब शतपथका काग्डादि विभाग कण्ड-नाम अध्याय बामण एकपात्कण्ट हवियज्ञ काट ८ 2 ૨ उद्धारि काड २ २२ अवर कण्ड प्रहनान० वाजपेया २ ५ राजसूय० उपसम्मरण २७ हस्तिवट. चिनि० २० २० ८ ३८ ६ ७०० २८९ ८ ८ ५ २९७ २४३ ७ साग्निचिति० वेदमन्दिर-प्रवेशिका १२ १३ १४ अग्निरहस्य अष्टाध्यायी० मयम० अश्वमेध० २८. ३१ २८. ९ २८६ २४१ ३९२ ३०८ १९२ २९६ ८ प्रवगर्य काण्ड वृहदारण्यक. ६ १७ १०४ ४३५ काव-आरण्यक -काण्व शतपथ ब्राह्मणके अन्तिम ६ अध्याय वृहदाण्यक या बृहदारण्यक उपनिषद कड़े जाते हैं। यही वह उपनिषद् है जो कि भिन्न-भिन्न मतावलम्बि, आचार्योंका एक वड़ा अखाड़ा है । इसके ६ अध्यायोंमें क्रमश: ९, ६, १५, ५ ब्राह्मण हैं । सब ४७ ब्राह्मण है। प्रत्येक अवा- न्तर ब्राह्मण कई खण्डों या कण्डिकाओं में विभक्त है। इस बृहदारण्यक पर सायण-माय मी चौखम्बा (बनारस) से मुद्रित हो चुका है । इस शाखाके सूत्रादि उक्त हा है। यजुर्वेदकी लुप्त शाखाओंका कुछ मुद्रित अवशेप शसलिखित-सू आचार्य शाल खत द्वाग लिया गया एक धर्ममूत्र है जिसे याजसनेय शाखायाले मी पढ़ते हैं । श्वेताश्वर शाखा इस शाखाकी केवळ मन्त्रोपनिषद् श्वेत श्यता के नाम प्रख्यात है। इस शाखाके मंग अन्न अनान या अनुपलब्धिके गर्मम है । -
७३
द्वितीय सोपान
मानव शाखा
चरण व्यूहमें मैत्रापणी शाखाके छः
भेदोंमें एक माना शाखा भी बताई गई है। इसका मानव श्रौतसूत्र
तथा मानव गृह्यसूत्र अष्टावक भाष्य-महित गायकवाड़ ओरिएन्टल
सिरीजमें सप चुका है।
वाराह शाखा
-इसका वाराह श्रौत्सूत्र लाहौरसे मुद्रित
हो जा चुका है । वागह गृह्यसूत्र भी मिलता है ।
इस का केवल वैश्वानस कल्प
वैखानस शाखा
मिठता है।
अपस्तम्ब, बोधायन, सत्यापाट, हिरण्यकेशी और भारद्वाज
शाखाओंके भी कल्प देखे जाते है ।
बाघूल
मी कल्य मुलभ है।
- यह शामा केरल देशमें प्रचलित थी । इसका
३-सामवेद
"सामानि यो वेद स वेद तत्वम् " (वृहदेवता ८।१३०)
माम तो श्य मका सर्वस्त्र टहग; नभी तो भगवान्के
वसीयतनामे में विशेष विभूति गिना गया-
कृष्ण और साम
"वेदाना नामवेदोन्मि" (गीता १०।२०)।
है भी मुलकी मधुर स्प्त स्वर-लहरि-
कामोंका एक मात्र रिझाई समबेटा कि यह एक मटौकिक
७४
वेदमन्दिर-प्रवेशिका
पुष्प मी है “ सामवेद एव पुष्पम्" (छो० उ
०१२)।
वनमालीको और चाहिये क्या ? पत्रं पुष्पं ह तो माँगा करता है।
अत उपादेयताके विचारसे साम सबमे अधिक महत्व रखता है |
योर भी :-
“ऋच: साम रसः" (छां० उ० शश२) अर्थात्
नावाओंका
रस है -साम; सामके
ऋग् और साम विना ऋचाएँ नीरस हैं। अधिक क्या ?
पक्षि-स्वरों में भी सामकी मधुरताका स्वन
देखती है साम-विरहिणी ऋचा--- "उभौ वाचो वदति सामगा
इव" "उद्गातेव शकुने साम गायसि" (ऋ० १४३।१,२)
अपने प्रणयो सामके उपासकों से भी कितना प्यार!!! उनकी
रक्षाका मार अपने निजी सैनिकों को सौंप रही है " यूयमूपिम्वय
सामवित्रम् (ऋ० ५,५४,१४) अर्थात देवताओ! मेरे साम मधु-
मधुप विप्रवरोंकी रक्षामें तुम कोई कसर न उठा रक्खी । भारतीय
पति-परायणा पत्नियाँ पति-रक्षाके लिए सूर्याद महानहीको भी जहाँ-
का तहाँ स्तब्ध कर चुकी हैं। उनका सनातन भादर्श यही सती ऋचा
पत्नियाँ ही तो हैं । मुनिए पति-पत्नीका मधुर संवाद
हमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यक्त्यं . . . तायिह सं भवाब प्रजामा
जनयाय" (अथ० १४।२१७१) अर्थात् साम कहता है
में पति और तुम पत्नी; फिर मिलकर प्रजा-उत्पत्तिमें ब्रह्माका हाय
क्यों न बटाएँ । अब वेदोंकी कक्षामें देखें सामका स्थान |
'--"अमोऽ
-ऋचे!
पर उक्त आन्दोग्य-वास्य अमर है। दोने में कोई विरोध नहीं; सारनाच- साम संहिता और उसके प्रकार द्वितीय सोरान "पो अन्तरमणि" इस धातुसे 'मनिन् ' प्रत्यय करनेपर सान शब्द बना। जिसका अर्थ हुआ-पाप- साम शब्द और । नाशक । वृहदारण्यक ने और ही निर्णय- उसका अर्थ शैली अपनाई है “सा च अमश्चेति तत्साम्न. मानन्वम्" (वृ० उ० १।३।२२) और अम:-स्वर -ये दोनों साम है। इससे यह प्रतीत होता है कि गान और ऋनमन्त्र मिलकर साम कहे जाते है । परन्तु जैमिनि-सूत्र तो केवल गानको ही साम कहता है -- "गोनिषु सामाख्या" (जै० सू० २११:३६)। अब इन उक्त दोनों प्रमाणों पर ध्यान देनेसे विपस्ता दूर हो जायगी । भीमसक वेवट जाति यादि धर्मों में ही शटकी शक्ति मानते है चौध लक्षगा आदि वृत्तियोंसे धर्म और धर्नी दोनोंका हो सकता है। मान सदैव उचापर ही गाया जाता है "ऋच्यव्यहं साम गयने " छा० (१॥६॥१) । अन साम शटकी शक्ति तो अन य- लम्य गान धर्ममें ही है, कर शन्द-रम्प ग रूप धर्मीने नहीं; वैध दोनेका हो सकता है। इसलिए निश्चय हुमा कि शक्ति- प्राको दृष्टिमें गते हुए अमिनि पिन सूत्र ग्चा और वैध मार्ग सासाविकका पहना है कि- :--'ममता'यह मठ नाम है। नुन मन-मन्त्रमरना होना चाहिर था।पयोंकि - द्वितोय सोपान जम्वेद में उनका चिन्ह दोका अङ्क है - छन्दोग्यमें इसी भारसे कहा है -'या'। अत सामवेद का प्रम मन्त्र जो कि ऊपर उढाहत हे, ऋग्वेदमे ऐसा लिग्वा है. अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बहिपि । (5० ६।१६।१०) सम्वेदमें उदात्त, अनु त्ति और स्वरितके चिह दिखाए ग्य हैं और चैथा स्वर दिना चिन्हका होता है । इस प्रकार स्वा- चिन्ह विलक्षण होने पर भी उटात्तादि स्वरोंका कोई भेद नहीं । ." या ऋक् तदेव सम" ॥ कि विश्पता अवश्य रह जाती है कि सामवेदमें वही-कहीं वर्णों पर ", 'क' और उ.के चिद मिलत है । उन्का रहस्य यह -- जब दो उदात्त एकत्र हो जाते है तब प्रपम उदात्तके ऊपर ९कका अह लगता है; दूमरा विना चिन्हके ही रहता है। परत इम द्वितीय उदात्तसे परे स्वरित यदि हो तो उस स्वरित पर "ग्कार सहित दोका अङ्क लगेगा जैसे २ अनुदात्तसे पर स्वरित पर भी २' यही चिन्ह रहगा। कितु तय स्वरितके पूर्व अनुदान पर '३क'. यह चिन्ह टगेगा जैसे 'तन्या' (सा. ५२) ३. जब दो उदात्त एकट्टे हो जायें और उनसे परे यदि अनुदात्त हो । सय प्रश्न उदात्त पर 'र३'- यह चिन्द और . र 'ता - कर दूसरा उदात चिद गय रहेगा।
७८
वेद मन्दिर-प्रवेशिका
.
२-गान सहिता
पहले ही कहा जा चुका है कि सामवेद में उन ऋचाओंका
संग्रह मात्र है जिन पर साम गाया जाता है। उन मन्त्रों के ऊपर
महर्पियोंने अनन्तभेद-भिन्न गान व्यक्त किए हैं। जो कि तत्तद्
ऋपिके नामसे प्रसिद्ध है। और वे गाने किसी-किसी संहितामें
छपे हैं।
लौकिक गान
-- साम गान तक पहुँचनेके लिए पहले
लौकिक मानके स्वरों पर थोड़ा ध्यान दे लेना आवश्यक है।
सप्त स्वरास्त्रयो ग्रामा, मूर्छनास्त्वेकविंशतिः ।
ताना एकोनपञ्चाशद् , इत्येतत्स्वरमण्डलम् ।।
यह नारदीय शिक्षा-वचन व्यक्त कर रहा है कि स्वर%D9,
ग्राम= ३, मूर्छना=२१, तान = ४९ हैं। अधिक विस्तार न हो;
अतः हम यहाँ केवल स्वगेको देते हैं। सात स्वरों के नाम भी
नारदीय शिक्षामें दिये हैं-
षड्जश्च ऋषभश्चैव, गान्धारो मध्यमस्तथा ।
पञ्चमो धैवतश्चैव, निषादः सप्तमः स्वर ।'
(नारदीय०,२१५)
अर्थात् षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और .
निषाद--ये स्वर हैं । इन स्वरोंके स्तोम वर्ण हैं।
म, , ध, नि।
1-
सा,
७९ द्वितीय सोपान -उक्त लौकिक गानसे साम गानमें पर्याप्त साम-गाना वैरक्षण्य पाते है। प्रथम तो यहाँ उन पट्जादिकोके नाम ही - प्रथमच द्वितीयश्च, तृतीयोऽथ चतुर्थकः । मन्दः क्रुष्टो ह्यतिस्वार, एतान् कुर्वन्ति सामगा । (नारदीय० १११२) अर्थात् प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, मन्द्र, क्रुष्ट तथा अनिवार- ये माम-गान करनेवालोंके अपने स्वर नाम है। फिर मान-गायकोंको गाना नहीं आता या क्या है ? इनके यहाँ सत्र ौकिक स्वर इधर-उधर हो जाते है - यः सामगानां प्रथमः, स वेणोर्मध्यमः स्वरः । यो द्वितीयस्स गान्धारः, तृतीयस्त्वृपभः स्मृत ।। चतुर्थः षड्ज इत्याहुः, पञ्चमो धैवतो भवेत् । पष्टो निपादो विजेयः, सप्तमः पञ्चम स्मृतः ।। मामोंका प्रथम वेणुका मध्यम' (४) म द्वितीय गान्धार (३) ग उपभ (२)रे चतुर्थ- पट्न (१) सा पचन- निपाट (७) नि धैरत (६) ध पवन (५)प " तृतीय% ॥ D " " सप्तम) अति "
वेद मन्दिर-प्रवेशिका
२-गान सहिता
पहले ही कहा जा चुका है कि सामवेदमें उन ऋचाओंका
संग्रह मात्र है जिन पर साम गाया जाता है। उन मन्त्रों के ऊपर
महर्षियोंने अनन्तभेद-भिन्न गान व्यक्त किए हैं। जो कि तत्तद्
ऋपिके नामसे प्रसिद्ध हैं। और वे माने किसी-किसी संहितामें
छपे हैं।
लौकिक गान
साम गान तक पहुँचनेके लिए पहले
लौकिक गानके स्वरों पर थोड़ा ध्यान दे लेना आवश्यक है।
सप्त स्वरास्त्रयो ग्रामा, मूर्छनास्त्वेकविंशतिः ।
ताना पुकोनपश्चाशद, इत्येतत्स्वरमण्डलम् ।।
यह नारदीय शिक्षा-बचन व्यक्त कर रहा है कि स्वर =७,
प्राम= ३, मूर्छना=२१, तान = ४९ है। अधिक विस्तार न हो;
अत: हम यहाँ केवल स्वगेको देते है। सात स्वरोके नाम भी
नारदीय शिक्षामें दिये है.
पड्जश्च ऋषभश्चैव, गान्धारो मध्यमस्तथा ।
पञ्चमो धैवताचव, निपादः सप्तमः स्वरः ॥
(नारदीय० २१५)
अन् पट् , मरम, गान्धार, मि, मन, धैवन और
पद- ये स्वर है । इन स्वर्गके नोम वर्ण-~मा, रे, ग,
म०,ध, नि।
७९ द्वितोय सोरान साम-गान -उक्त लौकिक गानसे साम गानमें पर्याप्त वैलक्ष्ण्य पाते है। प्रथम तो यहाँ उन पड्जादिकों के नाम ही - यतिस्वार- प्रथमच द्वितीयश्च, तृतीयोऽथ चतुर्थकः । मन्द्रः क्रुष्टो ह्यतिस्वार, एतान् कुर्वन्ति सामगाः ।। (नारदीय० १३१२) अर्थात् प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, मन्द्र, क्रुष्ट तथा - ये माम-गान करनेवालोंके अपने स्वर नाम है। फिर साम-गायकोंको गाना नहीं आता या क्या है ? इनके यहाँ सब लौकिक स्वर इधर-उधर हो जाते है- यः सामगानां प्रथमः, स वेणोर्मध्यमः स्वरः । यो द्वितीयस्स गान्धारः, तृतीयस्त्वृषभः स्मृत ।। चतुर्थः षड्ज इत्याहुः, पञ्चमो धैवतो भवेत् । पष्ठो निषादो विज्ञेयः, सप्तमः पञ्चम. स्मृतः ।। सामगोका प्रथम = वेणुका मध्यम (४) म द्वितीय% गान्धार (३) म तृतीय% उपभ (२) रे चतुर्थः निघाट (७) नि धैवत (६) घ पञ्चम (५) प , , " % 3D पड्ज (१) सा " पठ=" + सप्तम " अतिक ८० वेद मन्दिर - प्रवेशिका स्वर-विस्तार नारदीय शिक्षा और वृहंदवताके अन्तिम श्लोकों में देखाना चाहिए । अष्ट विकार सम गगके साँचे में ढालनेके लिए मन्त्र-वर्गों में किए जानेवाले परिवर्तनों के आठ कारण सोदाहरण निम्नाङ्कित हैं। - . or - ४ क्रमाङ्क निमित लक्षण उदाहरण विकार एकवर्णके स्थान में दूसरा अग्न = 'ओग्नायि।' २ विश्लप सन्धि-विच्छेद वीतये-'यो यतोयारथि ३ विकर्षण लम्या खींचना ये-या २३ यि अभ्यास पुन: पुन: उच्चारण तया२यि, तोया२यि द चिगम एक पटके मध्य में भी गुणाना हव्यदताये-गुणा ठहर जाना नो ह । व्यढातये। ६ स्तोभ+ निरर्थक वर्ण ओ हो वा, हाऊ, हावु आगम अधिक वर्ण वरेण्यम् = वरेणियोम् लोप मन्त्र-वर्णका अनुच्चारण प्रचोदयात् प्रचोऽ१२७१२ दुम् । आ २ । दायो। मा ३४५ । ८ ३ + पो यदधिक किचिद, द्विरुकं यापि दस्यते । स्तोभयं तस्य मन्यन्त, क्रमशः शास्त्राचन्तकाः ।। (सोभानु, परिशिर )
द्वितीय मोशन
3
५र र
गानप्रिय महाशप हमारे प्रथम साम-मन्त्रका गौतम-पर्क मुने।
सत्र विकार-उदाहरण एकत्र है
ओ ग्नाई । आ या ही 5 ३। वो इ तो यो ऽ
२ इ। तोयाऽ २ इ । गृणानोह । व्यदातो याऽ२इ ।
तोयाऽ२इ । नाइ होता साऽइ । त्साs • इ ।
वाऽ २३४ ओहोवा । ही २३४पी ।।१।।
सामवेदकी शाखाएँ
पानधर महामात्यमें दिया है. 'सहवामी मामवेटः"
अर्थात् स मवेदकी एक हजार शाखाएँ है । मयानुक्रमण का भी यही
पक्ष है । कमठा. हम होता गया। हास कारण पर प्रकाश डालते हुए
चाणव्यूहमे गौनकने एक गाथा लिखी है
कुछ उनावले पटैया
पड़ा नादि अनध्याय तिथियों में भी साम पढने लगे । केधर्म
मकर इन्द्रने सन शाखाओंमें आग लगा दी। बहुतसी स्वाहा
हो गई । केरठ सोलह बच रहीं-(१) आमुरायण य, (२)
वामुरायणीय, (३) वार्तान्तवेय, (४) प्राञ्जल, (६) ग्वर्णभेद,
(६) प्राचानयोग्य, (७) ज्ञान्योग्य, (८) गणायन, (९) शान्यायन,
8 मुक्तिकोपनियने सामवेदके १६ उपनिषद्न्योंका उल्लेस भी
१६ शाखाओकी ओर सङ्केत करता है। परन्तु उपनिषदाक नाम शासा
नार्मामे अत्यन्त दिजातीय है।
८२
वेद मन्दिर - प्रवेशिका
(१०) सात्वल, (११) खल्बल, (१२) महाखल्बल, (१३)लङ्गल,
(१४) कौथुम, (१५) गौतम, (१६) जैमिनीय ।
इन्द्र-कोपसे १६ वचों तो काल-कोपमें तेरह पड़ गई।
इस समय तीन ही शाखाएँ उपलब्ध हैं - कौथुम, राणायनाय और
जैमिनीय ।
*
(१) कोथुम-शाखा
यह वही संहिता है। जिसके. मनोहरमन्त्रोसे भगीरथने भगवती
गगाको प्रसन्न कर लिया था। जो आज भी
कौथुम-संहिता उसी प्रसन्नताके साथ अपने चिरातीत
ऐतिहासिक मधुर.गीत गा-गाकर भारतको
ही नहीं, विश्वको आनन्द-विभोर कर रही है। कोथुम-संहिताके
प्रचार-स्थल हैं काशी, कन्नौज, 4 और गुजरात । इसके
प्रधानतया दो भेद हैं. पूर्वाचिक और उत्तीचिक । आरण्यका-
ध्याय पूर्वाचिकका परिशिष्ट है और म्हानाग्नी-आर्चिक मारण्यका-
ध्यायका परिशिष्ट | कुछ विद्वान् मारण्यक,ध्यायको पूरी संहिताका
परिशिष्ट मानते हैं।
* कुछ विद्वान् ‘फौयुम' शब्दका मूल 'कोटम' बताते है ।
क्योंकि इस सहिताक प्रातिशारयकी संज्ञा काम सूत्र, पुष्पसून आदि
आती है । 'कौमुम' शब्दका कोयुम बनना कठिन नहीं। परन्तु दूसरे
विद्वान् 'कौथुम' नाम ही मौलिक मानत है; कोरम नहीं ।
द्वितीय सोपान । - (१) पूर्वाचिक एक ऋचापाले ५८५ सूक्तों का सग्रह है। इसमें उत्तर्चिक पठित सूक्तोंकी योनि ऋचाएँ आनाता है। केवल ६ १ यानि ऋचाओंका पाठ पूर्वाचिकमें नहीं। इस फमीका कारण है। पूर्वार्चिकमें सामयागके प्रात मपनीय गायन सामी योनि मवाओंका अपठ। ६१ सूक्तों पर ग यत्र साम गाया जाता है । इन सूक्तों को प्रथम प्रथम मचाएँ ठाडकर गप सब साम योनि ऋचाएँ पूर्वाचिक में पढी गई हैं। पूर्वाचिकम ६ प्रमाठक है । प्रत्येक प्रपाठकमें २ अर्ध प्रगठक है। दोनों अर्ध प्रप ठोंमें दम दशतियाँ माजाता है। परन्तु अन्तिम प्रपाठकके अर्थ प्रपाठकोंमें केवल नौ दशलियाँ है । प्राय १० मचाओंकी एक दशति होती है। कुछ दशतियोंको इस नियमसे वश्चत रहना पड़ा है। प्रपाठकादि-विवरण प्रपाठक अर्धप्र० दशति विशेषता १० प्र-मार्धकी तृतीय द० मचारे, द्वितीयार्धकी प्रथम, तृतीय द० में ८, पञ्चमम ६, गेपमें १०, १० सन =९६० १ साम- ॥ अपव * एक साम तीन ऋचाआ पर गाया जाता है। प्रथम चाको यानि ऋचा कहत हैं। क्याकि वह एक नियत मचा है। नामम उसी ऋचाकी प्रतीक हाती है। वैसे -वारदन्तीय मामका नत्वा वारवन्त"मित्यादि चा नियत आधार है।
८४
चंद मन्दिर प्रवेशिका
.
२
४
१०
प्रथमार्धकी द्वितीय द० में ८,
द्वितीयाकी पञ्चम द०में ९,
शेपमें १०, १० सब =९७"
१० प्रथमार्धकी तृतीय द० में ९
शेपमें १०, १० सब योग=९९"
१० प्रथमार्धकी चतुर्थ द० में ९,
द्वितीयार्धकी द्वितीय द० में८
और चतुर्थद में ११, नव९८"
१० प्रथमार्धकी प्रथम द० में ८
और चतुर्य द० में ८,
शेपमें
१०, १० सब
प्रथमाधकी द्वितीय द० में१४,
नृतीय और पञ्चममें १२,१२,
हितीयार्ध प्रथम, द्वितीया-
र्धकी द्वितीय द० में १२,
तृतीय द० में १२ चतुर्थमें ८
=3९९"
सम्पूर्ण योग ५८५
(२) उत्तरार्चिक में ९ प्रमाठक हैं । प्रथम पाँच
प्रपाठकों तक दो-दो अर्थ प्रपाठक है; दोष चार प्रचारकों में तीन
तीन अर्थ प्रपाठक हैं । कुछ विद्वान् ११ प्रपटक मानते हैं और
प्रत्येक प्रपाठयामें दो-दो अर्ध प्रगायक । दोनों माम सत्र अर्थ
सत्र
अर्ध प्र० सृत-स० २ 1द्वतीय द्वितीय सोपान प्रगठक २२ ही होते है। अर्ध प्रपाठक खण्डों में विभक्त है। पूर्ण विवरण यह है- "उचार प्रपाटक सुण्ड मल्या प्रयम ६ (द्वितीय प्रथम (द्वितय १९ (प्रथम २२ २३ २४ प्रयम ४ । द्वितीय १४ ५९ प्रम २० द्वितीय २३ ૩૨ प्रपम द्वितय १८ तृतीय प्रपम ४ ४ द्वितीय ३८ १४ 2 तृतीय २१ ४४ ४० ४ प्रथम द्वितीय ४ १९ १८ ६४ तृतीय प्रथम द्वितीय १३ ३३ e तृतीय २७ ९ प्रगठक, २२ अर्थ,ख०%११९, सू०-४००,50%१२२५ ८ ४ वेद मन्दिर-प्रवेशिका उत्तरार्चिको ४०० सूक्तोंमें १३ सुक्त एक-एक ऋचावाले, ६६ सुक्त दो-दो ऋवा मोवाले, २८७ सूक्त तीन-तीन ऋचाओंवाले, ९ सूक चार-चार बाबाले, ४ सूफ पाँच पाँव छचाओंवाले, १० सूक्त छ:-छः ऋचाओंवाले, २ सूक्त सात-सात ऋचाओंबाळे, १ सूक्त आठ ऋवाओंवाला, ३ सूक्त नौ-नौ ऋचाओंवाले, ३ सूक्त दस-दस ऋचाओंवाले और २ सूक बारह बारह ऋचाओंवाले हैं। कुछ प्रन्यों में दो सूक्तों और दो ऋचाओंकी घट-बढ़ भी देखी जानी है। २-राणायनीय शाखा सर्व-प्रथम १८४२ ई० में लाइनसे स्टेवेन्सन (G. Stevenson) ने अंग्रेजी अनुवाद सहित राणा- राणायनीय यनीयका प्रकाशन किया था। भारतमें संहिता मुद्रण न होनेके कारण १९१६ ई० में एक भारतीय विद्वान्ने सत्यव्रत सामश्रमी- मतकी आलोचना करते हुर लिख दिया था-"प्रतीत होता है सत्यवतने महीढासके लेख पर ही निर्भर कर तीन शाखाका मिलना लिख दिया है। यदि राणायनीय महेता तथा जेमिनी शान्वा सहिना, किसीके हों और वह उपमा दे, तो वड़ा लाभ समझा जा सकता है।" इस लेखसे पूर्व केवल राणायनोय संहिता ही मुद्रित न हो चुकी थी; अपितु जैमिनीय संहिताका भी प्रकाशन कैण्ड (W. Caland) द्वारा हो जा चुका था। अब तो स्वाध्याप- द्वितीय मोरान मण्डलसे कई उपयोगी सूचियोंवाली सामवेद संहिता छा चुकी है। जिसमें जैमिनीय संहिताका पाठ-भेद भी दिया हुआ है । और राणायनीयकी बात भी प्रस्तावनामें लिखी है. "वर्तते तावदेषा सामसंहिता राणानीयाना कोथुमानां च । तयोर्मन्त्रभेदो नास्ति केवलं गणनापद्धतिभेद एव । एके प्रपाठक-मर्धप्रपाठक-ठशनिभिः, अन्ये अध्यायः खण्डे. मन्त्रान् गणयन्ति ।" अर्थात् रागायनीय और कौथुमका कोई विशेष भेद नहीं; केवल गणना-पद्धतिका अन्तर है। एकमें प्रपाठकादिकी गिनती है और दूमरीमें अध्यायादिकी। कहीं-कहीं पाट-भेद तथा उच्चारण-भेद भी है । जैसे कौथुनके 'हाउ 'की जगह राणायनोयमें 'हायु' है । कौथुम शाखावाले ऋग्वेदियों जैसा वाजेषु नो' उच्चारण करते हैं किन्तु राणायनीय- शाखावाले 'बाजेषु णो' बोलते हैं । राणायनीयका प्रचार दक्षिण प्रान्तमें है। . . कोथुमीय और राणायनीयके ब्राह्मण दोनों सहिताओंसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मण आठ हैं (१) ताण्ड्य ब्राह्मण (पञ्चविंशः वा०), (२) षड्विंश ब्राह्मण, , २५ प्रपाठक होनेसे ही 'पञ्चविंश' इसका नाम है। यह दो भागों में सायण भाध्यसहित १८७४ ई. में छपा था । के. क्लेम-प्रकाशित १८९३ ई. में ८८ घेद मन्दिर-प्रवेशिका (३) मन्त्रब्राह्मण (४) सामविधान ब्राह्मण, (५) दैवत ब्राह्मण', (६) आर्षेय ब्राह्मण, (७) संहितोपनिषद् वाहाण', (८) वंश ब्राह्मण । ताण्ड्य महाबाह्मण (१) ताण्ड्यत्राह्मण, (२) घड्विंश ब्राह्मण, (३) मन्त्र ब्राह्मण और छान्दोग्य उपनिपद् ये सब मिलकर ताण्ड्य महाब्राह्मण कहे जाते हैं। कुछ लोग त.ण्ड्य ब्राह्मणको ही ताण्ड्य महाब्राह्मण कह देते हैं। ताण्ड्य ब्राहणमें २५ प्रपाठक, ३४७ खण्ड हैं। षड्विंशमें ५ प्रपाठक और पाँचोंमें क्रमश: ७, १०, १२, ७, १० खण्ड है । मन्त्रब्राह्मण दो प्रपाठकों में विभक्त है और टं'नों प्रपाटकों में दो-दो खण्ड हैं। छान्दोग्य उपनिषद्के ८ प्रपाठक मिला कर सब होते हैं । अत: ताण्ड्य महाबाहाणमें ४० प्रपाठक हैं । षड्विंशका पञ्चम प्रपाठक अद्भुत कथाओंका संग्रहात्मक होनेसे अद्भुत ब्राह्मण कहलाता है। (४) सामविधान ब्राह्मण- -इसमें अधिकारमुक्त और अशक्त व्यक्तियोंकी शुद्रिके लिए कृच्छ्रादि प्रायश्चित्त और । ४० प्रपाठक * सत्यात सामश्रमी १८९० ई० । पर्नेल (A.C. Burnell)- सम्पादित सामविधान ना. लण्डनमे १८७३ ई० में, वश ब्रा०+दैवत ब्रा० १८७३ ई.में, आर्षेय वा० १८७६ ई. में, संहिताप. वा. १८७७ ई. में मंगलोरसे पहले निकला था । । प्रो. वेबरने जर्मन-अनुवाद के साथ १८५८ ई० में बर्लिनने प्राक- शित किया ।
द्वितीय सोपान - अग्न्याशान, अग्निवादि तथा साम सविधानका संग्रह है। यह तीन प्रपाटोंमें विभक्त है। प्रथम एवं द्वितीय प्रपाटसमें आठ- आठ खण्ट, तृतायमें नौ खण्ड है। (५) दैवत ब्राह्मण तीन खण्टोंमें विभक्त है। प्रथम खण्डमें २६ कण्टिकाएँ, द्वितीयमें ११ और तृतीयमें २५ है । सब ६२ कण्डिकाएँ हैं। (६) आर्षेय ब्राह्मण -तीन प्रपाठकोंका है। मश. प्रपाठकोंमें २५, २५, २९ खण्ड है। सत्र खण्ड ८२ होते है । सामके ऋषि, गोत्र, छन्द, देवतादि विषय इसमें स्पष्ट प्रतिपादित है। (७) संहितोपनिषद् ब्राह्मण -इसमें केवल एक प्रपाठक है; जिसम ५ एण्ड हैं। (८) वंश ब्राह्मण- सामवेदीय च योकी वंश परम्पराका प्रतिपादक है। तीन खण्डोंमें बेटा है। छान्दोग्य उपनिषद् -- यद्यपि कौथुम शाखा सम्बन्धी सभी ब्राह्मणग्रन्थों को छन्दोग्य ब्राह्मण कहते हैं । तथ पि मन्त्रबाह्मणको विशिष्ट रूपसे छन्दोग्य ब्राह्मण कहा जाता है। इसी छान्दोग्य चाह्मणके अन्तिम आठ प्रपाटक (अध्याय) छान्दोग्य उपनिषद्के नामसे प्रसिद्ध है । ब्रह्म भाव प्रतिपादनमे इसका प्रधान स्थान है। कई आचायोंके भायोंसे विभूषित है।
बेद मन्दिर प्रवेशिका इन दोनों ३-जैमिनीय शाखा जैमिनीय संहिता-कर्नाटक प्रान्तमें विशेष प्रचलित है । लाहौरसे डाक्टर रघुवीर शर्मा-द्वारा स्वर-चिन्ह-रहित जैमिनीय संहिता प्रकाशित की जा चुकी है । अभी हालमें स्वाध्याय-मण्डटसे प्रकाशित सामवेदके अन्तमें इस संहिताका विशेष पाठ मात्र छपा है। यही विशेष पाठ महाशय कालेण्डने रोमन लिपिमें पहले प्रकाशित किया था। कालेण्ड-मतानुमार जैमिनीय संहिताको मन्त्र-संख्या १६८७ है । अर्थात् पूर्वाचिक और आरण्यक- ६४६, शेप १०४१ मन्त्र उत्तगचिकौ हैं। जमिनीय ब्राह्मण- -इसको तटवकार ब्राह्मण भी कहते हैं। क्योंकि जैमिनिके एक शियका नाम तलवकार था। उदारचेता आचार्यन शिष्यका भी नाम स्वयं प्रसिद्ध किया होगा; या कि शिय ही अपने घोर श्रम तथा गादानुगगक कारण आचार्षक समान माननीय बन गया होगा। जैमिनिके उपासक अवश्य तलवकारको भी साथ रखते है. सामाखिलं सकलवेदगुरोर्मुनीन्द्रा- द्वयासादवाप्य मुवि येन सहस्रशाखम् । व्यक्तं समस्तमपि सुन्दरगीतराग, तं जैमिनि तटवकारगुरुं नमामि ॥ कुछ भी हो जैमिनीय ब्राह्मणका प्राचन तलवकाग्ने भी असाधारणतया किया यह मानना पड़ेगा। यह मालण तीन ।
सम्पादक आनन्दध द्रने अग्नि स्वामी-भाष्य-महिव १८७०
द्वितीय सोपान
मागोंमें विभक्त है। तनों में सन १९८२ ग्पण्ड हैं । प्रथम
मागमें ३६०, दूसरेमें ४३७ तथा तृतीयमे ३८५ ख हैं।
जैमिनीय उपनिषद्- इसका ही नाम 'केन' उपनिषद्
है। तम्वकार ब्राह्मणके अन्तर्गत होनसे 'तटवकार उपनिषद' भी
इसे कहते हैं। इसी उपनिषद्म अग्नि और इन्द्र आदि देवोंका गर्न
चूर करनेके लिए यक्ष-रूपमें ब्रह्मका प्रकट होना बताया गया है ।
शङ्कराचार्यादि भारतीय विशिष्ट विद्वानों के इस पर भाग्य मुद्रित हैं।
सामवेदके सूत्र-ग्रन्थ
साम सूत्रों की कमी नहीं । ज्ञात होता है कि और वेदोंकी
अपेक्षा अपने वेद 'साम' को शरीग्में दुबला-पतला देखकर
बालग और सूत्र एक बडी भीड़ बनाकर दौड़ पडे कि कहीं
सामवेदका पलड़ा हल्का न रह जाय । अस्तु, श्रौत सूत्रोंके नाम
- माशक, लान्यायन, द्राह्मायण, अनुपद, पुष्प (कुमुम) आदि।
माशक श्रौतसूत्र-पञ्चविंश ब्राह्मणके आधार पर
रचा गया है। सत्रोंका इममें विशद विवेचन हे । जनक सप्तगा.
यज्ञकी भो इसमें चर्चा हे । वरदराजने इस पर भाष्य किया है।
-इसका भी अवलम्बन पनपिंग
ब्राह्मण ही है। इसमें सोमयागके साधारण नियम, एकाइ और
सत्रोंकी पद्धतियाँ मुन्दर ढगस निरूपित है।
पढ़ें-
लाट्यायन श्रौतसूत्र'
,
*
ई. में निकाला है।
९२
वेद मन्दिर - प्रवेशिका
.
.
द्राह्यायण श्रौतसूत्र -राणायनीय शाखासे अपना
सम्बन्ध रखता है। इसमें १० प्रपाठक हैं । वसिष्ठ सूत्र, भी
इसका नामान्तर है । माध्वस्वापीका इस पर भाष्य है।..
अनुपद श्रौतसूत्र-पञ्चविश ब्राह्मण और पड्विंश
दोनोंसे सम्बन्ध रखता है। सामवेदकी ऐतिहासिक सामग्रीका
यह एक कोश है।
कुसुम श्रौतसूत्रः मन्त्र रुपी कली किस प्रकार
सामरूप पुप्प बन कर विटी - यह बात इस प्रन्थमें मोहक
शब्दोंमें दी हुई है। यही स्यात् कुसुम नामका निमित्त हो ।
गोभिल महर्षिकी कृति इमे बताते हैं । पर दाक्षिणात्य विद्वान्
वररुचिकी रचना मानव र 'फुलुसूत्र' नाम रखते हैं ।
निदानसूत्र इसमें दस प्रपाठक हैं। इसमें उक्थादि
गानकी पर्णलोचना, विभिन्न शाखाओं और वेदाचार्योकी चर्चा
की गई है । सत्यत्रत शर्मा-द्वारा मुद्रित हो चुका है।
जैमिनि-श्रौतसूत्र जैमिनि-ब्राह्मणका यह
श्रोत
सूत्र है।
सामवेदके गृह्यसूत्र
सामवेदीय गृह्यसूत्रों में प्रसिद्ध -गोमिल, खदिर, पितृमेध,
जैमिनीय तथा वाह्यायण गृह्यसूत्र है ।
कौथुम और राणायनीय दोनों
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गोभिल गृह्यसूत्र
४ जे. एन. स्टग्-सम्पादित
९६ द्वितीय सोपान शाखाओंसे सम्पर्क रखता है। चार प्रपाठकों में विभक्त है । इसका परिशिष्ट कात्यायन-प्रणीत है। जिसका नाम है कर्म-प्रदीप । गोभिल गृह्यसूत्र १८८० ई० में म०म० चन्द्रकान्त तालवारने दो भागमें प्रकशित किया था और गोभिल-रिशिष्ट १९०९ ई० मे । सत्यवन सामश्रमीका गो० गृयसूत्र-बंगानुवाद भी कलझनासे छया है। खादिर गृह्यसूत्र-इम्स पर वामनकी श्लोकवद्ध व्याख्या है। रुद्रस्कन्द स्वामीकी वृत्ति भी इस पर है। दाह्यायण तथा खादिर दोनों एक ही ऋषिकी रचनाएँ है-ऐसा भी एकमत है। पितृमेव गृह्यसूत्र -गैतम महर्षिका लिवा बनाया जाता है। इसके टीकाकार अनन्तज्ञानका मत है कि न्याय-सूत्र- कर्ता गौतम महपिसे पितृमेध-कर्ता गौतमका अभेद है। इसके सिवा गौतम रचित एक गौतम- मसूत्र भी है । जैमिनि-गृह्यसूत्र-इनका प्रकाशन सर्व प्रथम १९०६ ई० मे गास्टा (D Gaastra) ने डचभाषामें किया तदनन्तर १९२२ ई० में कैलेण्ड (IY Caland) ने उपयुक्त टिप्पणीके साथ देवनागरी लिपिमे किया । जै मनीय ब्राह्मणसे इसका सम्बन्ध तो नामसे ही व्यक्त है । सामवेदका और भी सूक्ष्म साहित्य प्रकाशित हो चुका है। परन्तु उसका विचार अधिक समय और स्थानकी अपेक्षा करता है । स्थूलरूपसे सामवेदका यही परिचय है।
वेद मन्दिर-प्रवेशिका । - ४. अथर्ववेद टोकोपकारकी दृष्टिसे अधर्ववेदका वेद-पंक्तिमें उच्चतम स्थान है । जिसे वुलर (Buller), मूलर ( Muller)के नामको लम्बी-चौड़ी डॉगै हाँकनेवाले नये पारखी वेद ही नहीं मानते। यदि मानते भी हैं तो कल के किती ईरानी जादूगाका बनाया हुआ कहते हैं। हमारे अपौरुषेयता तथा अनादिमत्ताके समर्थक पण्डित-गण नाक-भौं सिकोड़ देना ही पर्याप्त सम्झ लेते हैं । हाँ! कुछ विद्वान् प्रमाण गक्य बोल देते हैं. "यथा प्रथमः पथस्ते" (ऋ० १२८३।५), "चत्वारि मृङ्गा त्रयो- अस्य पादाः" (*० ४१९८१३) का व्याख्यान निरुक्त- "वेदा एवैते उक्ताः (नि० परि० १७), प्रायः सामाथर्वाणवल्यारो वेदाः" (तापनीय० उ० )। "तापरो ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः (मुं० उ० १।१५), " अथर्वाणं चतुर्थम् " (छान्दो० ३० ७१२।१), "ऋग्वेदी, यजुर्वेद, सामवेदोऽथवांगिरसः” (बृह० उ० ४।१।२) आदि- आदि । आन्तरिक तथा बाह्य परीक्षणसे दूधका दूध और पानीका पानी हो सकता है। किन्तु परीक्षण कड़ाके लिए टेखनी विस्तृत प्राशण चाहती है। यहाँ केवल निर्णयात्मक पहलू ही सामने रखना है। अथववेदका अविकार ज्ञान ध्यान तक ही सीमित नहीं; जादू-टोना, दवा-दारू, यन्त्र-मन्त्र भी सिखा देता है। अतएव
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द्वितीय सोरान
इसके अनेक नाम है-(१) अथर्ववेठ, (२) बमवेद, (३)
अथवा जगवेट, (४) मृग्वनिगवेद, (५) क्षत्रवेद, (६)
भैषज्यवेद आदि ।
(१)
आई.
"
अथर्ववेद' नाम-निमित्त
गोपथ
ब्राह्मग इस विषयमा विशारदीकरण एक रहस्यमय कथाके द्वारा
करता है -कल्पारम्भमें स्वयम्भू ब्रह्मा अकेले थे। मनमें
‘अपने समान दुसरा देव बना लूं'। सकल्प-मिद्धिके लिए
ऐसा घर तर किया कि एक एक रोम कूपसे पसीनेकी मोटी धारा
वह ची। देखते देखते ब्रह्मपुत्र जैसा नद भर गया। ब्रह्माने
ज्योती अपना मुन्दर प्रतिविम्ब उस जल में देवा, त्यों ही तेज
स्वटित होकर जल में मिल गया । तुरन्त जल
'मधुर' और
'क्षार' दो भागोंमें विभक्त हो गया। मधुर जलसे 'भृगु'
महर्षि उत्पन्न हो गये। ब्रह्माजी उसी जलमें छिप गये । भृगु
बड़ी तत्परतासे अपने उत्पादकको खोजने लगे। उनकी व्यग्रता
देख किमीने आकाशवाणी की - "अथ_हे मेतास्वेवाप्स्वन्विच्छ"
(गो० वा० ११४) अर्थात् अब नीचेके इसी जल में खोज ।
जटकी ओर देखते ही भृगु अथर्मा बन गये। अपने समान
आकारवाले अथर्वाक' ब्रह्माने देख, आज्ञा दी- 'प्रजाका
उपादन तथा पारन क्रा'। अब अर्वा प्रजापति बन गये
और दम रप पैदा कर दिए । दसोंने दस और बन ये । इन सब
अपियोंसे दृष्ट मन्त्र समुदायका नाम अथर्वाङ्गिर सहिता पड़ा।
* गो. ब्रा० १४
घेद मन्दिर -प्रवेशिका -- -चलना . . इस कथाका तात्पर्य योग साधनामें प्रतीत होता है। जिसकी और निरुक्तकारको भी गुप्त प्रेरणा है। "अश्र्वागोड थर्वणान्त. । थर्व तिश्चातिकर्मा तत्प्रतिषेधः" (नि० दे० ११।२। ७) अर्थात् 'थर्व' धातुका अर्थ है- इससे निम्पन्न 'अथर्व' उनका भाव होता है. 'न घटना'3 स्थिता । स्थिरता योगि-प्राणों में होती है। इस प्रकार प्राण- साधनाका प्रतिपादक होनेसे चतुर्थवेट अथर्ववेढके नामसे प्रख्यात हुआ। प्राण-साधनाके टिए अर्वद्धक दर्शनीय सूक्त है - २।२८; १.२८, ३०, ७४४५३, ८१,२; १६ आदि । २. 'ब्रह्मवेद' - कतिपय विद्वान् इस नाम करणका कारण, 'ब्रह्म' नामक टक्का विशेष सम्बन्ध होना बताते हैं । अर्थात् जसे-होता' का ऋग्वेदमे 'अध्वर्यु' का यजु- दसे, उद्गाताका मामवेदसे घनिष्ट सम्बन्ध है; बैंस · ब्रह्मा' का अथर्ववेदस अति निकट सम्पर्क व ह्मणोंने स्थापित किया है- "प्रजापतिर्यज्ञमतनुत स ऋचा होत्रमकगेत्, यजुपाध्वर्यवम् , साम्नौदात्रम् , अथर्वागिरोभिर्ब्रह्मत्वम् ” (गोप० ब्रा० ३।२) अन्य वैदिकमनीपी कहते हैं कि 'ब्रह्मा' का च.में वेदोंसे सम्पर्क है; न कि केवल अथर्ववेदसे । अतः उक्त नाम-करणमें ब्रह्मा' का सम्बन्ध निमित्त नहीं; अपितु 'ब्रह्म-तत्व प्रतिपादन' है । स्वयं श्रुति स्फीतरूपते कहती है , . * । बमा सर्वविद्य, सर्व पंदितुमईति" (नि. १८)।
4 द्वितीय सोपान ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बमूव, विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां 'सर्वविद्याप्रतिष्ठा, मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ।।" (मु० उ० १११११) अर्थात् विश्व-स्रष्टा, भुवन-रक्षक समस्त देवों के बावा ब्रह्माजी पहले प्रकट हुए। उन्होंने अपने बड़े पुत्र अथर्वाको निखिल विद्याओं में श्रेष्ठ ब्रह्म विद्या पढ़ाई । अथर्ववेदके २।१; ४११; ५।६; ९।९,१० आदि मूतोंमें ब्रह्म-विद्याका बहुत सुन्दर वर्णन है । ३. अथर्वाङ्गिरोवेद इस संज्ञाका प्रवृत्ति-निमित ओषधि-निरूपण है। क्योंकि अङ्ग = शरीरके रस= सप्त धातुका पिक अपवि-कोश इस वेदमें है "आथर्वणीराङ्किरसी दैवी मर्नुष्यजा उत । ओषधयः प्रजायन्ते यदा त्वं माण जिन्वसि॥" (अथवे० ११।६।१६) हे प्राण ! वायो ! जब तुम (जिन्वसि) वर्षा करोगे; तब महर्षि अथर्वा और अङ्गिरा एवं देव, मनुष्योंसे आविष्कृत ओषधियाँ पैदा होंगी । भृग्वाङ्गिरोवेद- -- इस नामका निमित्त गोपथब्राह्मण- प्रोक्त कथासे सूचित है; जिसकी चर्चा प्रथम नाम-निमिमें हो. चुकी है।
वेदमन्दिर-प्रवेशिका ५. क्षत्रवेद - राज्य-रक्षण और युद्धादि रूप क्षात्र धर्मका निरूपक होनेसे अथर्ववेद क्षत्रवेदके नामसे भी पुकारा जाता है । अथर्वके क्षात्र धर्म-सूचक सूक्त हैं- १।२९, ३१३, ६।९७ आदि। ६. भैषज्यवेद-विविध औषधोंका प्रतिपादन ही इस नामका कारण है । अथर्ववेदमें भैषज्यके लिए द्रष्टव्य सूक्त- २।३, ४१४, ६.१६, २२, ६२, ८३, ९५, ७११६ आदि हैं। - अथर्ववेदकी शाखाएँ महर्षि पतञ्जलिके मतमें अथर्ववेदकी नौ शाखार हैं. "नवधाथर्वणो वेदा" (महामा० पस्पशा०)। इन नौ शाखाओंके नाम विवाद-ग्रस्त हैं । सायणोल्लिखित नाम हैं ----(१) पैप्पलाढा:, (२) तौदाः, (३) मौदाः, (४) शौ-कीया:, (५) जाजला:, (६) जलदाः, (७) ब्रह्मक्दाः, (८) देवदर्शा:, (९) चारणवैद्याः । मुक्तिकोपनिषद्ने पन्द्रह शाग्ख एँ बताई हैं । परन्तु इस समय पैप्पलाद और शौनकीय दो ही प्राप्य हैं। उनमें भी पैप्पलाद- शाखा-मंहिता मुद्रित नीं। पण्टित भगवदत्तने लिम्वा है प्रति पूना भण्डारकर इंस्टाटयूट में सुरक्षित है। महाशय आउफ्रेष्ट * Descriptive Catalogue of the Govt. Collec tion of Mss. Deccan College Poona, 1916, P. 276-77. एक द्वितोय मोपान (Theodor Aufrecht)ने भी अपना १८९६ ई० में प्रकाशित द्वितयभाग सूचीके पृ०२ पर लिखा है- अथर्ववेद संहिता- Paippaladacakha. Bhau Daji 109. Stein * 3 अर्थत् भाऊ दाजी-स्मारक पुस्तकालय (बम्बई) की त्या जम्बूकी सूचीमें पैप्पलादशावा है। शौनकीय संहिता-मुन्द्रित है । इसे सबसे पहले हिटने (W. D. Whutney) महोदयने वलिनसे १८५६ ई० में प्रकाशित किया था। बम्बई आदिसे दमके कई संस्करण सायणभाष्य- सहित निकल चुके है। अंग्रजीमें तो प्रफिथ-अनुवाद है ही; हिन्दी में भी क्षेमकाणदास त्रिवेदीने अनुवाद किया है अभी हालमें पं० मातवलेक ने हिन्दीमें मुन्दर अथर्ववेदका सुबंध मान्य निकाला है। हाँ! इस स्वाध्यायके बहुतसे अर्थ सायणभाप्यमे मेल नहीं खाते । शौनकीय संहिता २० काण्ड, ३६ (मतान्त ३४) प्रपाठक, ७३० (मतान्तरमें ७६०) मूक्त, ५९७७ (मतान्तरमें ६०००,५८४७) मन्त्र है । इस संहिताके लगभग १२०० मन्त्र ऋग्वेद-संहिताके विशेषत, प्रथम, अष्टम और दशन मण्डलमें पाये जाते है । वीव काण्डके प्राय: समप्र मन्त्र ऋग्वेदके ही है। कुछ लोग बीसवे काण्डको परिशिष्ट मानते हैं इन संहिताके एकसे तेरह कण्ट तक XM. A Stein - द्वारा सम्पादित महाराजा जम्बूक्दमीरके । रघुनाथ-मन्दिर-पुस्तकालयकी सूचिमें घेद मन्दिर - प्रनेशिका विष्कलित विषय हैं। जैसे: -ईश्वा-प्रार्थना, प्रेत दिसे-पक्षा, जादु- टोना, सर्प सिंहादिसे-ग्क्षा, मन्तति-रक्षा, गट-रक्षा, विशेष विशेष औषध, मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरणादि प्रयोग, सर्व विध व्यवहार-साफल्यके उपाय, शान्ति आदि-आदि। चौदहवे काण्डमें विवाह पद्धति, पन्द्रहमें अध्यात्म विद्या, दुःस्वप्नादि-मोचन-मन्त्र, सत्त-हमें अभ्युदय-प्रार्थना, अठारहवेमें पितृमेध, उन्नीसवमें यज्ञ, जल, अग्नि, राजा, नक्षत्र, सम्बन्धि मन्त्र और वीसवेंमें इन्द्र-सूक्त हैं । सोलहवें में शान्ति अथर्ववेदके उपवेद चरणव्यूहमें प्रत्येक वेदका एक उपवेद बताया है वेदानामुपवेदाश्चत्वारो भवन्ति । ऋग्वेदस्यायुर्वेद उपवेदो, यजुर्वेदस्य धनुर्वेद उपवेदः, सामवेदस्य गान्धर्व वढो, अथर्ववेदस्यार्थशास्त्रं चेत्याह भगवान् व्यास:"(वं०४)। अर्थात् चारों वेदोंके चार उपवेद होते हैं - ऋग्वेदका 'आयुर्वेद', यजुर्वेदका धनुर्वेद, सामवेदका — गान्धववेद' और अथर्ववेदका 'अर्थशास्त्र' उपवेद हे । परन्तु मुश्रुनाटि, आयुवरको अथर्ववेदका उपबंद बताते हैं. इह खलु आयुनंदो नाम यदुपाङ्ग- मथर्ववेदस्य" (मुश्रुतसूरस्थान, १ अध्यय)। गोपथ ब्राह्मण अथर्ववदके पाँच उपवेद कहता है - - पञ्चवेदान्निरमिमीत सर्पदं, पिशाचवेदम् , अमुग्वेदम्, इतिहासवेदंचेति" (गो० १।१०) इनमेंस केवल इतिहासपुराण ही शेष है । , " - १०१ द्वितोय मोपान । अथर्ववेदका ब्राह्मण 'गोपथ ब्राह्मण' अथर्ववेदका प्रसिद्ध ब्राह्मण है। पूर्व और उत्तर दो भागोंमें विभक्त है । पूर्वभागमें ६ प्रपाठक तथा उत्तर भागमें ६ प्रपाठक हैं । आथर्वण चरणव्यूहसे प्रमाणित होता है कि गोपथमें कभी १०० प्रपाठक थे --"तत्र गोपथः शतप्रपाठक ब्राह्मणमासत् । तस्यावशिटे द्वे ब्राह्मणे पूर्वमुत्तरं चेति " (४१५)। अर्थात् गोपथ पहले १०० प्रपाठकों का ब्राह्मण था। अब पूर्व और उत्तर दो ही ब्राह्मण शेप हैं ।, संहिता-मन्त्रों की व्याख्यारूप गाथाएँ इसमें अधिक आती है। विपाशा-तीर-वति रमणीय वसिष्ठा- धमका मुन्दर वर्णन है । व्याकरण महाभाष्यका प्रसिद्धश्लोक-सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु, सर्वामु च विभक्तियु । वचनेषु च सर्वेषु, यन्नव्येति तदव्ययम् ॥ (व्या.महा.भा. १।११३८) इम ब्रह्मणके पूर्वभाग १।२६ में मिलता है। इस ब्राह्मणका सम्पादन - बड़ी योग्यतासे गास्ट्रा (D. Gaastra) महोदयने 'लेडन' नगरमें १९१९ ई. में किया था। उससे भी पहले हरचन्द्रविद्या भूषणने १८७० ई० में कलकतासे प्रकाशित किया था। क्षेपकरण त्रिवेदोका हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित है। अथर्ववेदीय उपनिषदे मुक्तिकोपनिषद्में ३१ उपनिपर्दे परिगणित हैं। उनमें प्रसिद्ध 'प्रश्न, मुण्टक, माण्डूक्य, नृसिंहतापिनी' ये चार हैं। इनके उद्धाण ब्रह्मसूत्रमें अधिक आते हैं। माण्डूक्यकी गणना कुछ विद्वान् । -- , - १०२ पदमन्दिर-प्रवेशिका अथर्व - उपनिषदोंमें नहीं करते । पैप्पलादोपनिषद्+ भी आउफंख्ट- सूची में है। अथर्ववेदके सूत्रग्रन्थ गोपथ ब्राह्मणके आधार पर पाँच मूत्रग्रन्थ वने हैं- (१) कौशिक (महिता-विधि) सूत्र, (२) वैतानसूत्र, (३) नक्षत्र कल्पसूत्र, (४) अङ्गिरस कल्पसूत्र, (५) शान्ति कल्पसूत्र । १. कौशिकसूत्र - दर्श-पूर्णमास-विधि, मेधा-वर्धन, ब्रह्मचर्य, प्रम-दुर्ग राष्ट्रादि पक्षण, ऐहिक पारलौकिक फल- सम्पादन प्रकार, ऐकमत्यादि विषय के शिकसूत्रमें वर्णित हैं । सन् १८९० में मल्ड ( M. Bloomfield ने जर्मनीसे प्रकाशित किया था । • इसमें होता ब्रह्मा, ब्राह्मणाच्छंसी, अग्नीध्र -इन चारोंके अयनान्त कर्म-कर्तव्य उपदिष्ट हैं । इसके दो संस्करण जर्मनों से निकले हैं - garbe)- द्वारा सम्गदित उपयोगी सूचि और टिप्पणी-पहित. १८७८ ई० में और दूसग काण्ड (W. caland )का २. वैतान सुत्र एक गार्बे (R. जर्मन मनुवाद् । -नक्षत्र-पूजन, महाशान्ति, ३. नक्षत्र कल्पसूत्र नतकर्मादिका निरूपक है । + पैम्पलादीपनिषद् Gov. or. Libr. Madras 52, and Calcutta Sanskrit College.
१०३ द्वितीय सोपान ४. अङ्गिरस कल्पमें • अभि चार (श वधादि) कर्म-प्रयो के समय कर्ता और कारयिताकी आत्प-रक्षा सरणी णित है। -इसमे प्रह उपद्रव शान्तिका शान्ति कल्पसूत्र विधि-विधान है। अथर्व वेदके परिशिष्टादि अर्यवेदके ७०-७४ छोटे छोटे पििशष्ट हैं, जिनमें अर्मवे.ोक्त विविध मात्र, शकुन्न, टोटके, यत्रादिका वर्णन है । इनका सम्पादन जर्मनीमें वालिग और नलिन (G_M Bolling and I v Negelein )ने १९१० ई. में किया है। इनके अतिरिक्त 'बृहत् सर्वानुमसणा* | और चरणव्यूह, अविद प्रातिशास्य पञ्चपटलिकादि अन्य मुद्रित हैं; जिनसे अथर्ववेदके विषय जाने जाते है। अथर्ववेदका यहा स्वल्प परिचय है । अन्तमे कुछ उपलब्ध शाखाओंका साहित्य विवरण (जिपसे ज्ञात होगा कि किस शाखाका कौन अग उपलब्ध है ) देकर द्वितीय सोपानको समाप्त करते है - 'बृहत्सव'नुक्रमणी रामगोपाल शा. प. भगवत्त । सन् १९२२ \Vhitney face भाप्य अंग्रे० अनुवाद - सहित ।। । पञ्चपटलिका (अथर्ववेद तृतीय लक्षण मन्य)-समादक और सम्पादक * सम्पादक x क-अयववद प्रातिशाख्य E-VB Shastri प. भगदत्त ।
२० शासा नामग आरण्यक . १. शाकल० २. अश्वगायन ३. शांखायन उपनिषद् श्रौतसूत्र गृधसून को ऐतरेय आश्वला. अश्वल० शां० शांखायन शांखा० - उपलब्ध शाखा-साहित्य वेद संहिता ऋग्वेद शाटक कोपीतकि. कौषी. ऐतरेय० शाखापन शाखायना बाप्कल यजुर्वेद काठक० मैत्रायणी " " ४. वास्कल - कल० ६. मैत्रायणी कठ० - काठक० वेदमन्दिर -प्रवेशिका " मैत्रायणी -- ७. मानव " मानव० मानव - वाराह ८. वाराह. ९. तैत्तिरीय आपस्तम्ब०) तैतिरीय० तैत्तिरीय. १०. बौधायन० ११. हिरण्यकेशीय. तैत्तिरीय तैत्ति 1 आपस्तम्ब० आप० बौधायन० बोधा. हिरण्यके. हिरपय० " - - - - १२. भारद्वाज भारद्वाज १३. माध्यन्दिन." वानसनेयो ० मध्य शतपथ० मा०बृहदारण्यक बृर,०ईश० कात्यायन० पागशा १४. कम्प क070 फण्यशतपथ० कम्पबृहदारण्यक वृह०,ईश. १५. सान१० वैखानस० वैखा० १३. यपिष्टटकठ० कपिष्टलक्ट. १७. कौथुम० सामवेद कौथुम० ताण्डयमह'० ,साम आ ण्यक छान्दोग्य लाट्या० गोवभि १८. राणायनीय राणायनोय० दाय यण० खादिर० १९. जैमिनीय जैमिनीय० जैमिनीय० केन० अमि० २०. पंचालाद० अर्बपद पैप्पराद पैप्प लाद २१. शौनक - मु०,मा०,प्रश्ना'द० वैनान० कौशिक० " - द्वितीय सापान " जैमि० " शौनक गोपथ १०५
ॐ
तृतीय सोपान
मंत्र-शिक्षा
(१) मन्यो गुरुः
१-यो नो अग्ने अररिवाँ
अघायुररातीवा मर्चयति द्वयेन ।
मन्त्रो गुरुः पुनरस्तु सो अस्मा
अनु मृक्षीष्ट तन्वं द्विरुक्तं ।। (ऋ० १।१४७४)
अर्थ-(अग्ने) हे अग्निरूप परमात्मन् ! (यो अररिवान)
जो दान धर्मका कट्टर विरोधो, (अगतीया) स्वयं अ-दानी,
(अघायु.) पापाचार पुरुष (द्वयन ) मन, वाणी-दोनोंसे (नः
मर्चयति ) हमें कोसता, अपमानित करता रहता है। (मन्त्रः)
भगवान् वेद (अस्ने) उस पापकर्मी मनुष्यका (गुरु: अस्तु)
शिक्षक सुमति दाता हो। (म पुन.) और वह पापिष्ट पुरुष
(द्विरुक्तः) सत्पुरुषोंकी कक्तियोंसे कुमार्ग त्याग कर (तन्वम्)
अपने दूषित शरीरको अधमपण-जपादि-द्वारा (अनुमुक्षीट)
शुद्ध कर ले।
(२) स्वस्ति पथ-कामना
- स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव ।
पुनर्ददतानता जानता सं गमेमहि ।।
(झ० ५।५१११५).
૨
द्वितीय सोपान अर्थ-हे ईश! हम (सूर्याचन्द्रमसाविव) सूर्य चन्द्रकी माँति (स्वस्ति पन्याम्) कल्याण-पथ पर (अनुचरेम) अग्रसा हों। और (पुन ददता) अनन्त दानशील, ( अन्नता) अहिंसक तथा (जानना) सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञस्वरूप तेरे साथ (सगमेमहि) निरन्तर जुडे रहे। ३-~-अग्ने नय सुपथा राये अस्मा- विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मन्जुहुराणमेनो मूयिष्ठा ते नमउक्ति विधेम ॥ (ऋ० १११८९।१) अर्थ - (जग्न) हे सर्माणी परमेश्वर ! (अस्मान्) हम सभोंको (राय) ऐहिक पव पारलौकिक सम्पत् प्राप्त कराने के रिप (गुपया) सुपथ पर (नय) चला । (दर) हे देवाधिदय ! त् हमारे (विश्वानि ) समस्त (वयुनानि विद्वान् ) सइल्पों और पर्नयोंका जानकार है। (अमन्) हमसे (उहुराणम् एन ) अनिष्टकारि पाप पुसको (युयायि) दृः फर। हम (त) तेरी (भूयिष्टाम्) यहुत यती (नमउत्तिम्) स्तुति (विधम) करते हैं। सुनामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदिति सुमणीतिम् । देवी नारं स्वरिनामनागसमस्र- वन्तीमा रुहेमा स्वस्नये ।। (१० १०१६३।१०) यी-(प्रान) मंमार पागवारसे पार करनेवाटी (म्) पृषियी अमी लम्यो गोजी, (दाम्) प्रवाश्यती, (म्) निमल, (गुराम म्) मुग-माधनोंमे भरपूर, (मदितम्) ४ -
१०८
चंदमन्दिर-प्रवेशिका
अग्पण्डित, (मप्रणीतिम्) सुसंघटित, (स्वरित्राम् ) हद डाँडाबाली,
(मनागमम ) निरिछद्र, (अम्वन्तीम् ) न चूनेवाली (देवी नावम्)
दिच्य नौका पर (स्वस्तये) परम पद प्राप्त करनेके लिए
(आल्हेम) हम चढ़ते हैं।
(३) अद्वा
५-श्रद्धां प्रातहवामहे श्रद्धां मव्यन्दिनं परि ।
श्रद्धां सूर्यस्य निमुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः ॥
(ऋ० १०।१५।५)
यर्थ हम (श्रद्धाम् ) श्रद्धादेवीको (प्रातः मध्यन्दिनं) प्रातः
मध्याह्न योर (मूर्यस्य नियि) साय (हयाम ) आवाहन करते
है- (श्रद्ध) हे ग्रंद्ध ! (ह) वेदों तथा वैदिक कर्मोका
(नः श्रद्धालय) दमें श्रद्धालु धना।
(४) ब्रह्मचर्य-महिमा
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्र विरक्षति ।
आचार्यों ब्रह्मचर्येण ह्मचारिणमिच्छते ।।
(अर्व ११११७)
अर्थ-(ब्रह्मचर्येण तपमा) ब्रह्मचर्य रूपी तपाद्वारा
(गजा राष्ट्र विराति) राजा राष्ट्रको बृय रक्षा करता है।
(अप्रचण) ब्रह्मचर्य के प्रभासे ही ग्रह्मचाग (आचार्यः)
थापायं बनकर अन्य प्रलचारियोंके अपनी शरणमें आनेकी
इच्छा करना है। अर्थान् ब्रह्मचय-नियमाम स्थित आवार्यका
दी दिनकर मानिध्य प्रसारियोंको मरता है।
"प्रनवेदनदध्ययना धर्य प्रतवाििभनयमूरतावाद
-प्रायम् " (मायण)-
तृतीय सोपान ७- ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपान्नत । इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरत् ॥ (अधर्व० १११७११९) अर्थ --- (ब्रह्मचर्येण तपसा) ब्रह्मचर्य-तपका ही प्रभाव है। कि (देवा :) देव (मृत्युमुपानत) मृत्युको मार, अमर वन गये । (इन्दो ह) देव-राज इन्द्र भी ( ब्रह्मचर्येणः) ब्रह्मचर्य-साधन से ही (देवेभ्यः) देवोंके लिए (म्वराभरन्) स्वर्गका रक्षण करता है। (५) ऋणोद्धार अनृणा अस्मिन्ननृणाः परस्मिन् तृतोये लोके अनृणाः स्याम । ये देवयानाः पितृयाणाश्च लोकाः सर्वान् पथो अनृणा आ क्षियेम ।। (अर्थ० ६।११७३) अयं-हे ईश! हम (अम्निन् लौरे अनृणा) इस लोकमें ऋणी न रहे, (परस्मिन् अनृतः) परलोकमें भी ऋण मुक्त हों और (तृतीर लारे अनृपाः स्याम ) नाक-पृष्टादि तृतीय लोकमें मो ऋण-रहित हों । (ये देवयानाः पितृयाणा. पलोकाः) जो देव- यान और पिह-यान के लोक हैं, (नन् पयः समृणा: आक्षियेम) उन मय लोकोंमें अनृण होकर हम नियास करें। यहाँ लौतिक वैदिक-दोनों प्राणोंसे मुन होने की प्रार्थना है। लौकिकण प्रमिर दी है। वैदिक ऋण तीन है-'ऋषि- ऋण, देय-प्राण, 'पित ऋण स्वाध्याय से 'पि-का, .
११२
वेदमन्दिर-प्रवेशिका
-
अर्थ (अदिवना) हे अश्विदेवो ! (मज्ञानं नः स्वेभिः)
हमारा ऐकमत्य स्वजनोंके साथ (संज्ञानम् अरपेभिः+) परजनों के
साथ तथा (अस्मामृ) हमारे इस परिवारमें (युवं निग्रच्छतम) बाप
सदा बनाये रखें।
१४- प्रिय मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु ।
प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्रे उतायें ।।
(अथर्व० १९६२)
अर्थ-हे प्रभो! (प्रयं मा कृणु देवेषु) मुझे देवोंका
कृपा-पात्र बना, (प्रिय सर्वस्व पश्यतः) सब तत्वदर्शी ब्राह्मणोंका
प्रेमी बना । (उत शूद्रे उत आर्ये ) क्या मृद ? क्या वैश्य ? सब
प्राणियोंमें मेरा अनन्य प्रेम बढ़ा ।
(७) मधुर जीवन
सहृदय सांमनस्यमद्वेष कृणोमि वः ।
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवानया ।।
(अर्य० ३१३००१)
अर्थ- गृहस्थ-जीवन-पथके पथिको ! (वः सहृदयं मामन्यम्
अद्वेषं वृणामि ) मैं तुम्हारा जीवन महृदयता, सहानुभूति और
निरता पर अवलम्बित करता हूँ। तुम सय (अन्योअन्यम्
अभियंत ) परम्पर यह प्रेम अपनाओ ( अन्नपार जान वत्सम् इव)
जो प्रेम गो का अपने नव-जान यछंद पर होता है।
+ अरणः =ने रण. = शब्दप्रमाण यस्य सोऽवैदिकः परः ।
१. "हय गतिकात्या:" भ्वा० परमे। २. न हन्यते इत्यन्नपा-गौः ।
तृतीय सोपान ११३ शीतल - १६-- अनुव्रतः पितुः पुत्रो माा भवतु समनाः । जाया पत्ये मधुमती वाचं वदतु शान्तिवाम् ।। ( अथर्व० ३३०२) अर्थ- (पुत्र पितु अनुव्रत ) पुत्र पिताका आज्ञाकारी हो (माना समना भवतु) और माताके साथ एक-मत । (जाया पत्ये ) पत्नी पतिले (मधुमती शान्तिवा' वाच वदतु) मधुमय पाणी योले। मा माता मातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा । -सम्यञ्चः सवता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ।। (अथर्व० ३१७०१३) अर्थ--(मा भामा भ्रातर द्विशत् ) न भाई, भाईसे द्वेप करे (उत मा स्वमा स्वमारम् ) और न बहन, बहनसे । भाइयो तथा बहनो! तुम सर (सम्यत्र २ सव्रता भवा) एक-मत और एक- बत हो (भद्रयाचाच यदत) परस्पर भन यापीका प्रयोग करो। १८ -येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथ. । तत्कृण्मो नम वो गृहे सजानं पुरुपेभ्य ।। ( अध० ३३२०१४) गर्थ--(यन ) जिस वेदकी विद्याकै प्रभावसे (देवा न वियन्ति) देवताओं ने विरोध रहता है और (नो विद्वयन "५शभ्याम् इति हमरादात् मारपीया च । २ मार्गद अपन "साविम्"-यादिना दि, ममी" ति माता 1 "दिर भगानी" मदादि, उभयः तिप्रत्यय , तना -
(अथर्व० ३।३०६)
"यु मिप्रगामिश्रणयो" शियम्मात् माहि मुहि मप्पमंदावन
व मन्दिर प्रवेशिका
मियः) नं पारस्पिरिक द्वेष (तत् संज्ञान ) उसी पकता
शिक्षक बेदको (व: गृहे पुरुषेभ्यः कृष्मः ) तुम्हारे घरमे सब
पुरुषोंको एकता-सूत्रमें बाँधने के लिए हम नियत करते हैं।
१९-ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि
यौट संरावयन्तः सधुराश्चरन्तः ।
अन्यो अन्यस्मै वल्गु बदन्त
एत समीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि ।
अर्ध-(ज्यायस्यन्तः) बड़े-छोटेकी मर्यादा पालते हुए
(चिनिनः) उदारचेता बन कर (संराधयन्तः) पारस्परिक कार्य
साधन करते हुए (सधुराः परन्तः) कन्ये-से-कन्धा मिड़ाए चले
चलो (मा दियाष्ट*) साश्यान् ! कहीं बिछुड न जाना । (अन्यो
अन्यस्मै) एक दूसरे से (ल्गु दन्नः) प्रेमालाप करते हुए (एत)
बढ़े चलो। मैं भी (ः) तुम्हें (सीदानान्) एक पथ पर
चलाता और (सननमः कृणामि) तुम्हारे मनोंको मिलाता है।
२०-जिताया अग्रे मधु मे जिह्वामूळे मधूलकम् ।
ममेदह तावसो मम चित्तमुपायसि ।।
२१. -मधुमन्मे निक्रमणं मधुमन्मे परायणम् ।
वाची वदामि मधुमद् मयास मधु संशः।।
(यथर्व० ११५४२,३)
1 "कृवि हिंसाकरणयादव"
देश रप्रन्ययस्व । "लोपचान्दता म्ोः" इति उकारटपः ।
।
"चिन्दिच्यार च" इत्यमरोऽन्दा-
यम । मादच्छान्दमः ।
तृतीय सोपान ११५ अर्थ-हे मधुरते ! (जिह्वाया अग्रे मधु) मेरे जिह्वान मैं तू मधु और (में जिहांमूळे मधूलकम्) मेरी जिवाके मूलमें रसाल-रस वनजी । (मम इद् अहं तो अमः) मेरे जीवन- व्यवहारमें समा जा और (मम चित्तमुपायसि) मेरे मनमें संदा निवास कर; जिससे (मधुमन्मे निक्रमण मधुमन्मे परायणम्) मेरी प्रवृत्ति और निवृत्ति मधुर न जाय । (वाचा मधुमद् वदामि) वाणीसे मधुर चोलूँ तथा (भूयारी मधुमदृश.) वन जाऊं मधु- संदी। २२ --समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि । सम्यञ्चोऽग्नि सपर्यतारा नाभिमिवाभितः॥ (अथर्व० ३१३०१६) अर्थ --एक परिवारके सदस्यो ! (व.) तुम्हारी (समानी प्रग) एक ही पानीय शाला और (मह अन्नभागः) एक ही रसोई हो। में (व समाने योक्ने सह युनज्मि) तुम सबको एक ही स्नेह-बन्धनमें बाँधता है। (अरा नाभिम् अभित इस ) जैसे एक ही चंक-नाभि में बहुत-से अरे जुड़े रहते हैं। वैसे ही (सम्यग.) सर्व मिले-मिलाप (भग्निं सपर्यत + ) प्रभुकी पूजा २३-सबीवीनान् वः समनसंस्कृणोम्ये कुइनुष्टीन्संबननेन सर्वान् । देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायंमातः सौमनसो वो अस्तु ।। (अर्था० ३१३०१७) +सपर पूायाम् । समादित्वा या !
.
,
रनुव्रतामप जायामरोधम् ।। (मा० १०॥३४॥२)
वेद मन्दिर - प्रवेशिका
अर्थ-(सवननेन ) सच्चे सेवा-भाव-पूर्वक (वः सर्वान)
तुम सयको (सध्रीचीनान्) साथ-साथ रहनेवाले, (संमनमः)
सुहृद्, (एकदनुष्टीन् । समान भोजी (कृणोमि) करता हूँ ।
(अमृत रक्षमाणाः देवा. इव) अमृत-रक्षक देवोंके समान
(सायप्रातः) माँझ-सवेरे (वः सौमनसः अस्तु) तुम्हारे मन
नितान्त पवित्र रहें ।
(८) आदर्श जीवन
२४
- सप्त मर्यादाः कवयस्तता-
स्तासामेकामिदम्यहरो गात् ।
आयोह स्कम्भ उपमस्य नीळे
पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ ।। ऋ० १०।९।६)
अर्थ-(कवयः) महपियोंने (सप्त मर्यादाः) सात अस्पृश्य
मर्यादाएँ (ततक्षुः) बनाई हैं । (ताप्ताम् एकाम इत् ) उनसे एक
मर्यादाका भी जो (अभिगात्) स्पर्श करता है; वह (अहुरः)
असुर दुराचारी कहा जाता है। परन्तु जो (धरुणेषु)
धारणीय नियमोमें (तस्थौ ) स्थित रहता है; वह (आयोः ।
स्कम्भः) उच्च जीवनका स्तम्भ आदर्श होता है । ऐसा ही
महापुरुष (पयां विसर्गे) जीवन-धारा-पथोंके पर्यवसान महा
सागर-रूप, (उपमस्य नीळे ) सर्व जैव जगत्-उपनिर्माता जीय
पक्षीके नीड़ = ब्रह्म धाम तक पहुँचता है ।
(९) छ्त निन्दा
न मा मिमेथ न जिहीळ एपा
शिवा सखिभ्य उत मह्यमासीत् ।
अक्षस्याहमेकपरस्य हेतो.
तृतीय सोपान
२६
अर्थ-जुआरी अपनी दुर्मति पर गेता है--(एपा)
यह मेरी स्त्री जो (मा) मुझे (न मिर्मय) कभी भी कष्ट नहीं
पहुँचाती थी, (न निहीळ) न कभी क्रोध ही करती थी,
प्रत्युत (सयिभ्य उत मद्यम्) मेरे मित्रोंके और मेरे लिए
(शिवा असीन् ) सुख-शान्तिका एक साधन थी। परन्तु हा
दैव! (अहम् ) म ( एकररम्य ) एकमात्र ( अवस्य हेतो ) इस
एके कारण अपनी उस (अनुप्रताम् ) पतिपरायणा (जात्रा)
पनीको (अप अरोवम् ) खो बैठा ।
द्वेष्टि श्वधरप जाया रुणद्धि
न नाथितो विन्दते मर्डितारम् ।
अम्बस्येव जस्तो वस्न्यस्य
नाह विन्दामि कितवस्य भोगम् ।।
(२०१०३४१)
अर्थ-(प द्वष्टि) मेरी सास मुझसे द्वेष करने लग
गई है, ( जाया परदि) धर्मपत्नीने अवरोध लगा रया ह।
(न नाधितो न्दित मरितारम् ) मागने पर भी पस कौड़ी तक
देनेवाला नहीं मिलता । (दग्न्यस्य जस्त अपम्य ) भाडेके
यूटे टकी तरह (यम्य भेग न पिन्दाने) अपने मनोनीत
मोगोंसे चञ्चित रह रहा है।
जापा तप्यते किनवम्य हीना
माता पुरम्य चरत. क्वस्वित् ।
ऋणावा विम्यदनमिछमानो
ऽन्येपामस्तमुप नक्तमेति ॥
(20 १०३४९०)
-
वेद मन्दिर - प्रवेशिका अर्थ- (क्तिवस्य हीना जाया तप्यते) जुएवाजकी स्त्री दीन- हीन हो संतप्त रहती है। (कस्वित् परतः पुत्रस्य माता) घर- उधर मारे मारे फिरनेवाले जुआरी पुत्रकी माताके दुःखोंकी तो सीमा ही नहीं रहती । (ऋणाा) कर्जेसे लदा हुआ स्वयं (विभ्यत्) सदा डरता ही रहता है और (धनम् इच्छमान.) धनकी इच्छासे (नक्तम् ) रातके समय (अन्येषाम् अस्तम् उप एति) दूसरोंके घरोंमें चोरी करनेके लिए पहुँचता है। २८ - अक्षर्मा दीव्यः कृषिमित्कृपस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः । तर गावः कितव तत्र जाया तन्मे विचष्टे सवितायमर्यः ।।(ऋ० १०३४।१३) अर्थ-(कितव ) हे कियत! (अक्षमा दीय्यः) जुआ मत खेल (कृषिम इन् कृषत) खेती अवश्य कर; (बहु मन्यमानः वित्ते रमस्व ) अपने थोड़े धनको यहुत समझ, उसमें ही सन्तोष फर । (तत्र ) उस खेती पर (गायः) गौ पलंगी और (तन जाया) उसमें ही पत्नी प्रसन्न रहेगी-य६ (तर) धर्म-रहस्य (मे) मुझसे ( अयं रुपिता) इस सर्प-साक्षी जगद रचयिता (अर्थः) परमेश्वरने (विचष्टे) कहा है। (१०) उदारता २९-तयोतिभिः सचमाना अरिष्टा वृहस्पते मघवानः सुवीराः । ये अश्वदा उत वा सन्ति गोदा ये वस्त्रदाः सुभगास्तेषु रायः ।। (F० १४२१८)
तेरे
तृतीय सोपान
अर्थ - (वृहस्पते) हे वृहस्पते ! (तव ऊतिभिः सचमानाः)
कृपा पात्र सत्पुरुष (अरिटाः मघवानः मुवीरा.) दुःखोंसे
रहित, धनवान् और पुत्रों पौत्रोंवाले होते हैं। (ये अवदाः
गोदाः उत वा ये वस्त्रदाः सन्ति ) जो घोड़ों गौओं और वस्त्रोंका
दान करनेवाले हैं। (तेषु सुभगाः राय.) उनमें सौभाग्य तथा
विभव सदा विहार किया करते है
३० - अनुपूर्ववत्सां घेनुमनड्वाहमुपबर्हणम् ।
वासो हिरण्यं दत्त्वा ते यन्ति दिवमुत्तमाम् ।।
(अथव० ९।५।२९)
अर्थ-जो (अनुपूर्ववत्सां धेनुम) प्रतिवर्ष बछड़ा देने-
वाली गोका, (अनड्वाहम् ) वैलका और ( उपयहण वासः हिरण्यम्)
तकिया, वस्त्र तथा सुवर्णका ( दत्त्वा ) दान करते हैं; (ते
उत्तमा दिवं यन्ति) वे उत्तम दिव्य गतिको पाया करते हैं।
(११) पापी केवलादी
३१ -मोयमन्नं विन्दते अप्रचेताः
सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य ।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं
केवलाघो भवति केवलादी।
(ऋ० १०१११७६)
अर्थ--(भप्रयता) दान-युद्धि-शून्य पुरुप (मोपम्)
निरर्थक ही (अन्नं विन्दन) अन्न सश्चित करता रहता है।
(मन्यं प्रवामि) में सत्य फद्दता है कि (सः) यह व्ययहार
(तस्य) उस एपण मानवका (यप इन्) मरण ही है। क्योंकि
(मायमगम्) यद न तो 'अयंमा' यादि देयोंका और
फले-फूले थोर पर जिमसे (योगक्षेमो नः यसताम) हमारे पमा (केवादी केनायो मवति) कयल अपना ही पेट भरनगाला अर्थ-(प्रान्) हे ब्रह्मन् (राष्ट्रे प्राणो ब्रह्मवर्ची आजायताम्) हमारे रामें तेजस्वी ब्राह्मण उत्पन्न हों (राजन्यः दार इयत्र्योऽति- व्याधी महारया नायनाम्) शूर, धनुर्द्धर, रि-विनाशी और महारथी अप्रिय पैदा हो। (दांगी धेनुः) दुधारी गोय, (घाटा अनट्यान्) वली चेल, (आशु मप्तिः) चपल तुरङ्गम (पुरन्धिः बांपा) कुशल मुडौल बालाएँ उत्पन्न हों। (निः रथेष्टा.) विजेता रथी, (समेयो युवा) सभ्य युवक (अन्य यजमानस्य वीग वायता) इस यजन-शील पुरुषके वीर पुत्र उत्पन्न हो। (निकाने निनामे नः पर्जन्या वस्तु) समय-समय पर देव वर्या करे। (न आपश्यः पलान्यः पच्यन्तम) हमारी खेती ग्ध १२० यंद मन्दिर-प्रवेशिका (नो गयायम) न मित्रोंका ही (पुष्यति) पोषण करता है। निरा पापी होता है। ३२. (१२) दिव्य राष्ट्र-निर्माण- आ ब्रमन्याह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतमा राष्ट्र राजन्यः शूर इपम्पोऽतिव्यांची महारयो जायतां दोग्नी धेनुवोंडानड्वानागुः सप्तिः पुरन्धिर्योपा जिग्णू रथेष्टाः समेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न. ओपधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् । (यजु० २२।२२) और राष्ट्रका योग-क्षम होता रहे।
तृतीय सोपान
१२१
३३ भदमिच्छन्त ऋषयः
स्वविंदस्तंपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे ।
ततो राष्ट्र बलमोजश्च जातं
तदस्मै देवा उप से नमन्तु ।।
(अथर्व० १९।४१।१)
अर्थ-(अग्रे) पहले (मद्रमिन्टन्तः) राष्ट्रका भला
चाहते हुए (स्वर्विदः ऋपर.) सातन्त्र्य-सुख वेत्ता महर्षियोंने
(दरी दीक्षामुपनिषेदुः) महान तप और अनन्त बलिदान किए
(दती राष्ट्र दलमाजदच जातम्) तयं कहीं राष्ट्र, वल और
मोजकी प्राप्ति हुई। (तदम देवा उपमं नमन्तु) इस लिए
देव-तुल्य मनीषियोंका कर्तव्य है कि इस राष्ट्रके सम्मान
पवं रक्षणमे प्राणोंकी बाजी लगा।
(१३) गो माता
३४-आ गावो अग्मन्नुत भद्रमनन्
त्सीदन्तु गोप्ठे रणयन्त्वस्मे ।
प्रजावतीः पुरुरूपा इह स्यु
रिन्द्राय पूर्वीरुषसो दुहानाः॥
(२०-६।२८।१)
अर्थ-(गः) गौर (आ अग्मन् ) हमारे घरमें आने
(ज) और (भद्रम् अन्) हमाग भला करें। (गोष्टे) गो-
गलामें (सीदन्तु) बैठे और (अन्ने रणन्तु) हमें मधुर शब्दोंसे
बुला () इस गोष्टी (पुरुभपा) अनेक रंगीवाली, (प्रजापत्यः)
सन्तान-युक्त (पूती ) यदुन गाएँ (इन्द्रार) स्वासके लिए
(उपमः) मार्य-प्रानः (दुहानाः) दध देती रहें ।
१२२
वेद मन्दिर - प्रवेशिका
३५ - न ता नशन्ति न दभाति तस्करो
नासामामित्रो व्यथिरा धर्षति ।
देवाश्च याभिर्यजते ददाति च
ज्योगिताभिः सचते गोपतिः सह ।।
(ऋ० ६।२८३)
अर्थ-हे परेश ! (ता.) वे गौएँ (न नशन्ति) कमो
नष्ट न हो, (तस्करो न दभाति)न चोर चुरा सके और (न आमिन्नो
व्यथिः) न शत्रु-शस्त्र (आसाम् ) इनका (दधर्षति) कुछ विगाड़
सके । (गोपतिः) गो-स्वामी यजमान (याभिः देवान् यजति)
जिन गौओंके दान से देवोंकी पूजा करता है; (ताभिः सह)
उन गौओंके सहित (ज्योग् इत्) बहुत दिनों तक (सचते)
विराजमान रहे।
३६ - यूयं गावो मेदयथा कृशं चि-
दश्रीरं चित्कृणुथा सुप्रतीकम् ।
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो
बृहद्रो व्य उच्यते सभासु ॥
(६३२८६६)
अर्थ -(गावः) हे गोमाताओ! (यूयं कृशं चिद् आ मेदयथ)
तुम दुबले-पतलेको भी माटा-ताजा बना देती हो और
(अधीर चिद्) फहड़को भी (मुप्रतीकम) दर्शनीय यनाती हो।
(भद्रवाचः) हे मगल नाद-युक्त गोमाताओ ! (गृहं भर कृणुष)
हमारे घयेंको मङ्गलमय बना दो। (सभा) यड़ी-घड़ी
सभाओंमें (यो वृहद्वयः उच्यते ) तुम्हारे दूधसे ही लोर्गोका
सत्कार किया जाता है।
-
हूँ कि ऐसी (अनागाम् ) निष्पाप (अदिति गाम्) अहिंसनीय
गोमाताको (मा वधिz) कोई मत मारने पावे ।
तृतीय सोपान
३७ – प्रजावतीः सूयवसं रिशन्तीः
शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः।
मा वः स्तेन ईशत माघशंसः
परि वो हेती रुद्रस्य वृज्याः ।।
(ऋ०६।२८1७)
अर्थ - हे गोमाताओ! तुम (प्रजावती ) सन्तति-युक्त हो
(सूयवसम् रिशन्ती.) सुन्दर चारा चरती रहो और (सुप्रपाणे
शुदा अप पिरन्तीः) सुन्दर जलाशयोंमें शुद्ध जल पीती रहो ।
(व.) तुम्हें (स्तेन मा ईशत) न चोर चुरासके (मा अघ शसः)
न हिंस्रक मारसके। (व ) तुमको (रद्रस्य हेति.) महाकालकी
भी (परिवृज्याः) छोड़ दे।
३८ -माता रुदाणां दुहिता वसूनां
स्वसादित्यानाममृतम्य नाभिः ।
न नु वोचं चिकितुपे जनाय
मा गामनागामदिति बधिष्ट ।
(२० ८1१०१।१५)
অর্থ
जो गौ (रद्राणा माता) रुद्रोफी माता, (वसूना
दुहिता) वसुओंकी पुत्री, (आदित्याना स्वसा) आदियों को यहन
मार (अमृतस्य नाभि ) अमृत धाराका उद्गम है। (चिकितुषे
जनाय) मनीषी जनों (अनुवयम् ) में सावधान किये देता
तलवार
३९-वचोविदं वाचमुदीरयन्ती
विवाभि(भिरुपतिष्ठमानाम् ।
१२४ बंद मन्दिर-प्राशिका देवी देवेभ्यः पर्ययुपी गा- मा मा वृक्त मत्यों दप्रचेताः ॥ (5० ८।१०१११६). यर्थ- (वयोविदं वाचनुदीरयन्तीम् ) अपने स्वामीके परिचित थाद्वान-शव्दका रम्भा कर उत्तर देनेवाला, (विवाभिः पीमिः उपतिष्टामानाम्) अपनी पूरी सूझ-बूझके साथ-मालिकके समीप आकर खड़ी होजानेवाली ( देवेभ्यः पर आ ईयुगीन ) देवी प्रतियोंके लिए अपनेको जाननेवाली (देवी गाम ) गो माताको (दवचैताः) अल्पबुद्धि (मन्यः) मनुश्य ( मा वृक्त) न मारे । (१४) आत्म-शोधन इयं या परमेष्टिनी वाग्देवी ब्रह्मशंसिता । ययैव ससृजे घोरं तयैव शान्तिरस्तु नः ।। ४१ - इदं यत्परमेष्टिन मंनो वां ब्रह्मशंसितम् । येनेव ससृजे घोरं तेनैव शान्तिरस्तु नः ॥ -इमानि यानि पञ्चेन्द्रियाणि मनःपटानि मे हृदि बनणा शंसितानि । यरेव ससृजे घोरं तैरेव शान्तिरस्तु नः ।। (अथां० १९।६।३-१) अर्थ- (इय का पाटनी प्रमिता वग्देवी) यद जा ब्रह्म- वादिनी, मन्त्र-पूता वाग्देवी है; (यर्थद पार गगने) जिससे घोर महाभारत ग्चे जा चुके । (तव नः शान्तिग्नु) अन उमीसे शान्तिकी प्रार्थना है। (दद सपाटनं करत यां मनः) यह ब्रह्म विचार-परायण, मन्त्र-मम्त जो तुम्हारा मन है। (येनैव मरजे पोरम्) जिससे भरतम विचार प्रकट किए जा चुरे १२५ नृतीय सोगन हैं, (तेनैव न. शान्ति. अस्तु ) यह अय हमें शान्ति दे। (इमानि ) ये (यानि मन षष्टानि पञ्च इन्द्रियाणि) जो पॉच इन्द्रिय और छठा मन-सभी (मे हृदि ग्रह्मणा शमितानि) मेरे हृदयमें मन्त्रोंसे शुद्ध किए गये हैं; (येरेव समूज़े घोरम् ) जिनसे भयडर पाप अनुष्ठिन हो चुके हैं, (तैरेव न गान्ति अस्तु) अय उनसे हमारा फल्याण हो । (१५) उद्बोधन ४३-अम्मन्वती रीयते सं रभव- मुत्तिष्ठत प्र तरता सखायः । अत्रा जहाम ये असन्नशेवाः शिवान्वयमुत्तरेमाभि वाजान् । (R० १०॥५३१८) अर्थ-(मसाय ) मित्रो ! (अवन्वनी रीयत) अनन्त विपत्ति- पापाणले भरी हुई यह संसार नदी मतवाली ठोकर यह रही है । ( उत्तिष्टत) उठो, (सरभध्यम् ) एक दूसरेफा सहारा लेकर (प्रतरत) जोरसे तेरो । तैरनेसे पहले (ये अशेवा अमन् अन जहाम) जो हुवा देनेवाले पदार्थ है; उन्हें इस पार ही छोड़ दें और (शिवान् वाजान् अभि वयम् उत्तरेम ) तरण सहायक साधनोंको आगे रखकर हम सब पार हों। (१६) तत्त्व-दर्शन -नासदासीन्नो सदासीत्तदानी नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् । किमावरीवः कुह कस्य शर्म- न्नम्भ किमासीद् गहनं गमीरम् ॥ 'ऋ० १०११२९६१) " वेद मन्दिर प्रवेशिका अर्थ-- (तदानीम् ) प्रलयकालमें इस जगतका जो मूल था। उसे (नं असद् आसीत् ).न असत् अलीक कह सकते थें और (नो सत्) न सत् । ' अर्थात् सद्, असद - दोनौसे विलक्षण अनिर्वचनीय तत्वं था। (न आसीद् रजः) पातालादि लोक* भी उस समय न थे । (नो व्यंम) न आयाश था और (न परः) न था परेका युलोक। उस समय (किम् ) कौन आवरण (कस्य शर्मन्+) किसको सुख देनेके लिए (कुह) किस आधारम (भावरी.) किस वस्तुको ढंकता ? अर्थात् प्रलयम न आवरणीय था. न थावरण और न उसका प्रयोजन था। (गहन गमीरम् अम्भः किमासीत् ).क्या गहन गम्भीर सलिल था? नहीं. वंछ भी न थांxi * निरुक्त, रज. का अर्थ लोक किया है "लेका रजांस्युच्यन्ते' (नि० ४।१९) + “ मुषां मुटुक्(पा० स० ११३९) इति शर्मणो निमित्त- * वृणोते बलुिगन्ताच्चान्दसी लडि तिपि स्पमेतन् । x उक्त अर्थ सायण-मायके अनुसार किया गया है । मनापियोंका कहना है कि- "अम्भः किमासीद् गहनं गमीरम् इस चरणको छोड शेप मंग्रसे ही आवरण और आवरणीय पूर्ण विश्वका निषेध हो साता है; फिर जलका पृथक् (चतुर्थचरणसे) निषेध करना व्यय है । अत: चौथे पादका अर्थ यो, करना, धादिए - (गहनम् ) दुर्विज्ञेय (गमीरम् ) अगाधं (अम्भः) प्रपञ्च-निदान मायातस्य (किम् ) फैसा (आसीत् ) था? इसी आशयस महर्षि वाल्मीकिर्ने उक्त ऋचा अनुवाद इस प्रकार किया है। नाकाशमामीन दिगन्तमासीद, अघोऽपि नासतल तमासीन् । भूतं न चासीन व संगमांगीदे, आसीसरं केवलमेव वारि ।। (यो. वा. नि. उ. ४८३१८) सतम्या लुक् । अन्य
यर्थ
नृतोय सोपान
१२०
४५-न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि
न राश्या अह आसीत्प्रेकेतः ।
आनीदवातं स्वधया तदेकं
तस्माद्वान्यन्न परः किं चनांस ॥
(ऋ० १०११२९१)
(तर्हि) तय (न मृत्युरासीत् ) न मरना था,
(अमृत न) न जीना, (न रान्या अन प्रोत. आसीन ) न रात्री
और दिनके विभागका ज्ञान ही था । हाँ ! (तद् एकम् ) वह
एक आत्मतत्व (स्वधया) अपनी मायाशक्तिके साथ (अ-वातम्)
माणों पिना ही (आनीत् ) जीवित था। (तस्मादन्यत् ) उससे
भिन्न (ह) निश्चयसे (पर.) सृष्टि परवति जगत् (क्चिन)
कुछ भी (न आ-) न था ।
४६-
तम आसीत्तमसा गूढमये
ऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् ।
तुच्छयेनाभ्वपिहितं यदासीत्
तपसस्तन्महिनाजायतकम् ।।
(ऋ० १०११२९॥३)
अर्थ-- (अग्रे) पहले (तममा गुदम् ) अज्ञान-समसे घिरा
हुआ (तमः) मूलतत्त्व था। (अप्रतम्) अज्ञातावस्थापन्न
(इद सर्वम् ) यह सर्व जगत् र सलिलम्) दूधम मिले पानोकी
' तरह महमें लीन (आ:*) था। (यत्) जो (आभु) भावि-
इति तिलो "लिप्यनस्ते" रितिपयुदासादकाराभावः।
* भा.भस्ते डि तिपि “बहुलमि" ती भावे " हेडयाम्भ्य"
१२८
यद मन्दिर-प्रशिका
भरनशील जगत् (तु ट्यन ) मिथ्या मायासे (अपिहितम् )
आच्छादित, (एकम् ) कारण मात्र स्वरूप (मामात्) था ।
(तन्) रह जगत् (तपस ) 'बहुस्या प्रजायेय'. इस
संकल्पके (महिना) मादाम्यसे (अनारत) प्रादुर्भूत हुआ।
कामस्तदग्रे समवर्ततावि
मनसो रेत प्रथम यदासीत् ।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्
हृदि प्रतीष्या क्वयो मनीषा।।
(२०१०॥२९॥४)
अर्थ-(अंग्रे) प्रारम्ममें (मनमा अधि) माया विलीन
जीवॉक यन्त करणोंमें (यद् रेल ) जो पूर्न कृतम्म जन्य वासना
समूहरूप यीज था (तद) उमके उाद होनेसे ही (कान )
काव्यक्ष परमेम्बके मनमें जगत् मजन-कामना (मम्बस्तु)
उपन्न हुई। (मन) विद्यमान जगक (ब धुन) हेतुभूत
वामना-ममूहको (अति) य-यातमें (कवय ) ग्रान्तदशी
महर्पियोंने अपनी (हटि मन पात्र) ननम्मरा प्रमाद्वारा
(प्रतीय+) दृढस्र (निरवन्दन् ) पता रगाया है।
४८--तिरचीनो विततो रम्मिरेषा-
मच स्विदासीदुरिस्वदासीत् ।
रेतोचा आसन्महिमान आसन्
त्स्वधा अवस्तात्मयति परस्तात् ।
(१०११२९१५)
* मनपामनीपया "गुपा मम्" नि तृतीया लुक ।
+ प्रवच्या-विवाय.
अन्ययम" पीति मा टिका दीप
तृतोप सोपान
यर्थ-(एषाम् ) पूर्वोक्त अविद्या, काम, फौका
(रश्मि.) सूर्य-फिरणों जैसा सर्यंत उत्पन्न कार्य-वर्ग पहले-पहल
(तिदचीनो विततः ) तिरछा अर्थात् मध्यमें पैदा हुआ ?
(म्विन्) अथवा (अमः आसीत् ) नीचे बना था? (स्वित्) या
कि (उपरि) ऊपर (आसीत् ) उत्पन्न हुआ था यह कुछ
नहीं जाना जाता; क्योंकि एक क्षणमें ही मम्पूर्ण विश्व
बन गया था। उसमें दो चर्ग स्पष्ट थे-एकमें (रेतोधा)
वीजभूत काँक धारक- कर्ता और भोक्ता जीव (आसन्)
थे आर दूसरे वर्गमें (महिमान ) महान् आकाशादि भोग्य
पदार्थ (आसन् ) थे। उन दोनों चमि (स्ववा) अन्नादिरूप
भोग्यजगत (अवस्तात् ) निकृष्ट और (प्रयति.) प्रयत्नशाल
भोक्त-वर्ग (परस्तात् ) उत्कृष्ट था ।
४९-को अद्धा वेद क इह प्रवोचत्
कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेना-
ऽथा को वेद यत आबभूव ।।
(ऋ० १०११२९।६)
अर्थ - (को अद्धा वेद) कोन ठोक-ठीक जानता है?
( क इह प्रवोचत् ) कौन इस विषयमें कह सकता है ?
कि (इयं विमृष्टि) यह भूत, भौतिकादि विविध ग्चना
(कुत ) किस उपादानसे और (कुत ) किस निमित्त कारणले
(आजाता) प्रादुभून हो गई । वैवल मानव-शक्तिसे ही परे
यह विषय नहीं, देव गण भी नहीं जान सकते । क्योंकि
(अस्य विसर्जनेन अर्वाक् ) इस सृष्टिके अनन्तर (देवा ) देवगण
१३०
पद मन्दिर-प्रतिमा
५०.
यने हैं। फिर मनुष्योंम मला उसे (को वेद) कोन जान
सकता है? (यतः आवभूव) जिमसे ससार बना ।
- इयं विसर्यित आवमूव
यदि वा दघे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्ष परमे व्योमन्
त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ।।
(ऋ० १०११२९१७)
अर्थ- (इयं विष्टिः) यह विपुल सृष्टि (यतः आवभूव)
जिम अभिन्न निमित्तापादान कारणसे बनी ह; (यदि दधे)
यदि धारण कर रखा है तो उसने (यदि का न) यदि मर्मा
धारण किया है ना उमने । अर्थात् ईश्वर म्वतंत्र है चाहे
यह साष्ट करे या न करे । (यो अस्य अयक्ष.) जो इस
उच्चायव प्रपञ्चका अध्यक्ष (परमे व्योमन्) आ शिवन निर्मट
स्व प्रकार में स्थित है । (अ) प्रिय श्रोताओ! (अदि बंद)
यदि जानता है (यदि वा न) अथवा नहीं ता (स:) वही
परमात्मा ! अन्य कोई नहीं जान मकता है।
ॐ
चतुर्थ सोपान
ब्राह्मण-शिक्षा
१. ब्रह्मचर्य-वरेण्यता
१-तमेवं विद्वांसमेवं चरन्तं
सर्वे वेदा आविशन्ति ।
यथा ह वा अग्निः समिद्धो रोचते ।
एवं ह वै स स्नात्वा रोचते ।
( शत० ११।३।३।७)
अर्थ-(एव विधासम् ) ब्रह्मचय ग्रहयो। जानकार
(एव चरन्तम्) ब्रह्मचर्य-परायण (तम् ) ब्रह्मचारीको (सर्वे वेदा
आविशन्ति) समा वेद अपने तन्वावेशसे सुशामित कर देते
है । ( यया ह) जिस प्रकार (ममिद्ध ) प्रज्वलित (अग्निः)
आग्न ( रोचते) देदीप्यमान होती हैं; (एव ह वै) ठोक उसो
प्रकार (स.) वह ब्रह्मचारी (स्तावा) स्नातकर बन कर
(रोचन ) विश्वम चमाता है ।
x गुरुकुल-वास कालिक अस्नानादि नियमोंको “ अधीत्य स्नायाद्
इत्यादि निदशानुसार सविधि
डान
(graduate) कहलाता है। ,
-
"
रामाप्त
करनवाला
---स्नातक
।
१३२
वेद मन्दिर-प्रवेशिश
२. संत्य
२-द्वयं वै इदं न तृतीयमस्ति
सत्यं चैवानृतं च ।
एतद् ह वं. देवा वेतं चरन्ति
यत्सत्यं तस्मात्ते यशः ।
(शत० ११।१४)
यर्थ - (यं वै इदम् ) दो हो हैं निम्सन्देह ये पाणीके
कर्म-(मन्य च एव अन्नं च) सत्य और झूट। (न.तृतीयमस्ति)
तीसरा कर्म नहीं । (एतद् ह वै देवां व्रत चरन्ति) इमीको ही
देवगण अपना मुख्य व्रत मानते ओर पालते हैं, है ( यत्
सन्यम् ) जो यह सत्य । (तत्मात् ते यशः) बस उसीसे वे यश
पाते हैं।
३- अर्थतन्मूलं वायो यदनृतम् ।
तद्यथा वृक्ष आविर्मूलः शुष्यति
स उद्वर्तते एवमेवानृतं बदनाविमलमात्मानं
करोति स शुष्यति-स उद्वर्तते ।
(ए० प्रा० २।३६)
अर्थ-(अय एतत् मूल दापः) यह मूल है वाणका-
(यद् अनृतम् ) जो 'झूठ' है । (नद् यया वृक्ष आविर्मूल: शुष्यति)
जिम प्रकार नंगी जड़ोंभला वृक्ष सूख जाता है। (स उद्
वर्नते) फिर वह उखड़ जाता है। (एवम् एव अन्नं वदन्)
ऐसे ही मिथ्या-मार्ग पुरुष (आनिमलम् आत्मानं करोति ) अपने
यापका गी जड़ोंका कर लेता है, फिर (स शुधति) यद्द
स्मता और (स उद् वर्नत ) उखड़ कर धराशायी हो जाता है।
१३३ चतुर्थ सोपान ५. अर्घ- ४- यद्वाव पुरुषो मनसा अभिगच्छति तदाचा वदति तत्कर्मणा करोति । (ते० आ० १२३) अर्थ-(यद् वार) जो कुछ भी (पुरुषो मनसा अभिगाउति ) पुरुष मनसे मोचता रहना ह; (ता कमंगा काति) यही मिया रूपमें परिणत कर देता है। -न मनसा अन्तमभिगच्छेन्न वदेन्न कुर्यात् । (ते. वा० १ २) मनुष्यका परम कर्तव्य है कि (न मनसा अनृतम् दाभिगन्छन् न वढेन कुर्यात् ) न मनसे झठ सोचे, न वापीसे चोले और न शरीरसे करे । ३. तप ६ -तपसा देवा देवतामय आयन् । तपसर्पय स्वरन्वन्दिन् । तपसा सपत्नान्प्रणुदामाराती । येनेदं विश्वं परिभूतं यदस्ति । (ते० प्रा० ३।१२।३) • अर्थ-(येन इद विदव परिभूतम् अस्ति) जिस तपने समस्त देव, ऋषि, मनुष्यात्मक विश्वको सर्वतःव्याप्त कर रक्या है। उसी तपके प्रभावसे इन्द्रादिने देवत्व तथा नारदप्रमुख ऋषियोंने स्वर्ग प्राप्त किया है। हम भी तपसे ही अपने अ-दानशील शत्रुओंको (प्रणुदाम) परास्त करेंगे। शतपथ मी यही कहता हे "तपसा · चै लोक जयन्ति 'श. १४॥४॥२७) . T "
पद मन्दिर-प्रवेशिका
.
.४. द-द-द
-त्रयः प्राजापत्या । प्रजापती पितरि
ब्रह्मचर्यम्पुर्देवा मनुध्या असुराः
उपित्वा ब्रह्मचर्य ... ऊचुबवीतु नो भवानिति
तेभ्यो हतदक्षरमुवाच 'द-द-द' इति ।
तदेतदेवधा देवी वागनुबदति स्तनयित्नु-
द द द इति । दाम्यत दत्त दयध्वमिति ।
(शत० १४८२२४)
अर्थ-प्रजापतिके 'देच, मनुत्य और असुर'-तीन
पुन अपने पिता प्रजापतिकी शरणमै कर्तव्य जिज्ञासासे
पहुँचे। :- बर्यादि व्रत-पालन पूर्वक पिताकी सेवा क ने
लगे । पिताको प्रसन्न करके योले- “प्रभो ! हमें कर्तव्य.
उपदेश करें"। प्रमशः प्रत्येकको प्रजापनिने उपदेश दिया
'द' । 'द-द-द' -ये नोन अक्षर प्रजापति के महान्
उपदेश हैं । व्योमके विपुल प्रशस्त उदरमें इन्हींका नाद
भरा हुआ है। मेघ ध्वनि ममय-समय पर जिसकी व्यञ्जना
किया करती है।
प्रथम 'द के अर्थ (दाम्यता में देवोंके लिए आत्मशासनका
फड़ा-अनुशासन है। प्रत्येक उन्नत जीवनय पतनका एक
मात्र कारण है :- विलासिता'। इससे बचाने के लिए
प्रतिक्षण देयी याककी प्रेरणा जागरुक है.
दाम्यत दमन
फरो विलासी इन्द्रियोंका ।
मामाजिक विषमता-जन्य फलहको दूर फग्नेके लिए
मनुप्योंको मुन्दर निर्देश दिया गया-'' (दन) दान
-
-
करती ह- पाय सोपान फगे। सञ्चय करने पापिष्ठ प्रति त्याग वितरणका पाठ पदो। यमुरोंको अनादिनिधना देवी याग मधुर उपदेश "द(दयाम) अनुरो! अकारण येर, रक्त पिपामा तथा हिंसक प्रवृमियोंको रोको । तुम्हारे विकराल विविध आयुधोंकी झनकारों और गर्जनासे ग्ण चण्डी शान्त न होगी। प्रत्युत और मद माती होरर नग्न नृत्य करेगा। इसे मनानेका यस यही मन्त्र है-द( दयश्वम्) दया करो सव जीवों पर। थत पव ५ श्रेष्ठतम कर्तव्य ८- यज्ञो ह वै श्रेष्ठतमं कर्म । तस्मान्मनुष्येभ्यो यज्ञं प्राह ( गो० उ० २।१३) अर्थ-xयकर्म नि सन्देह श्रेष्ठ है सय काँसे । मनुष्योंके लिए यशका महान् उपदेश किया गया है। ६. यज्ञ-भेद ९- सायंप्रात:मौ स्थालीपाको नवश्च यः । बलिश्च पितृयज्ञश्चाष्टका सप्तम पशुः ॥ इति प कमस्था ॥ अग्याघेयमग्निहोन पोर्णमास्यमावास्ये । नवेष्टिश्चातुर्मास्यानि पशुबन्धोऽत्रसप्तमः ॥ इति हवि सस्था । ४ यज्ञ क्सिी देवताके उद्देश्यसे पुरोडाशादि द्रव्यके त्यागका नाम ---"द्रव्य देवता त्याग (का. श्री. सू० १।२०) याग है।
*"सस्था- १३६ वेद मदिर-प्रयशिका अग्निष्टोमोऽत्यग्निष्टोम उक्थ्यः घोडशिमांस्ततः। वाजपेयोऽतिरात्रश्चाप्तोर्यामात्र सप्तमः ॥ इति सोमसंस्था: ॥ (गोपथ० पू० ५।२३) अर्थ-सम्पूर्ण यज्ञ प्रपञ्च इक्कीस भागोंमें विभक्त पाकयश-* संस्थाएँ+७ 'हवियज्ञ-संस्थाएं +७ 'सोम-संस्थाएँ'। +पाकयश-संस्थाएँ - (१) सायप्रातः - होम, स्थालीपाक, (३) नव यज्ञ, (2) बलि वैश्वदेव, (५) पितृयज्ञ, (६) अटका, (७) (पशु) शूलगय । विधा. पाकयज्ञविधाः सप्तेत्यर्थः" (मिताक्षरा गौ० ५० मू० १1८1१.) + पाकयज्ञोका अनुष्ठान स्मात ('गृह्य' 'आवसथ्य 'ओगमन' ) अग्निमें होता है । अत इन्हें स्मार्त कम कहते हैं । सपत्नीक पुरुषके लिए यावज्जीवन अनुष्ठेय हैं। इनकी प्रशसा तैत्तिरीय संहिता (११) में भी है। सायंप्रातः-होम --'औपासनहोम' भी इसे कहते हैं। दधि आदिसे किया जाता है। 'दन्न तण्डुलैरक्षता" (पा. गृ. १८३) सायं प्रधान देवता अग्नि और प्रातः सूर्य; प्रजापति दोनों समय अङ्गदेवता है । स्थालीपाक '-"पवणि भवः स्थालीपाकः पार्वणः" (मिता. गौ• ५० म० ११८१९) अर्थात् प्रत्येक अमावास्यामें पट् पुरुषोंके उद्देश्यसे किया जाता है। यह भी नित्य कर्म है । पाकयज्ञोंका विशद विवेचन सूत्रग्रन्याम है। "कोपीतकिगृ"का उपक्रम ही यहाँसे होता है। -"अथातः पाकयन व्याख्यास्यामः" । "गोतम धर्म सूत्र (१८१९.२०,२१)में ११ संस्थाओं की चर्चा है और उन्नीसमें सूनकी मिनाक्षराम पाक्न्या-विषयक मत-मतान्तर दिमाये है । " सांख्यायन- यसग्रह"मे पाक्योंकी साझोपार पद्धति निरूपित है। , या . , चतुर्थ सोरान १३७ 'हविर्गसंस्थाएं-(.) अग्न्याधेय, (२) अग्निहोत्र, (३) दर्श, (e) पौर्णमास, (6.) आग्रयण, (६) चातुर्मास्त्र, १. हविर्य और मोम-दोनों प्रकार या श्रौत कम रह जाते हैं। २. "अमीन् आधाय पूर्णाश्त्या यजेत्" (गोप० पृ. ५८) भर्यान् पूसाहुति पर्यन्त अग्न्याधान करै । ३. " सायं प्राताग्निहोत्र जुहोति" (त० म० ३।४।१०) अर्थात् सायं प्रातः अग्नि होत्र संफ कम करना चाहिए । इसमें भी देवता दही है, जो स्मात अपान होमम हैं। परन्तु अग्निहोत्र' संज्ञा इस और कमेकी ही है, स्नान की नहीं । ४. दशे (अमावास्या) में होनेवाले 'आग्नेय' और 'ऐन्द्र'- द्वय -ये तीन कम ‘दश' के नामसे प्रसिद्ध हैं और पूर्णमासीमें अनुष्टेय 'आग्नेय', 'अग्निपोनीय', 'उपाशुयाज'-ये तीन कर्म 'पोर्णम स' संज्ञक है । सभी उक्त छः कम मिलकर 'दशपोर्णमाम' कहलाते हैं । यद्यपि गोपथ ब्राह्मग दश और पौर्णमासको पृथक्शाः गिनता प्रतीत होता है, परन्तु दोनोसरी एक कमता निर्णीत है । इम पक्षमें सप्तम हविस्सस्था सौत्रामणी है। ५ आग्रयण (अप्रे नवान्नोत्पत्यनन्तरमयनमाचरण यस्य तदाप्रयणम्) नवसस्येटिका नामान्तर है। चार-चार मासोंके अनन्तर किए जानेके कारण 'वैधदेव', 'वरुणप्रघास', 'चातुर्मास्य' नाम पहा । इसके चार पर्व है 'साक्मेर', शुनासीरीय । इनका अनुष्टान महर्षि आपस्तम्बके शब्दों में स्पष्ट है --"फागुन्या पोर्णमास्या चैत्र्या वा वैवदेवन यजते" (आप० श्री. सू. ८॥२)। "ततश्चतुएं मासेवायाभ्यां श्रदणाया बोदवसाय वरुपप्रघासयजन" (आपः श्री. सू० ८।५।१)। "ततदनुर्पु माठेषु पूवस्मिन् पर्वम्युपकम्य द्वयह साकमेधैर्यजत" (आप० धौ० ० ८९१)। ततो यहे ज्यहे चनुरहेऽधमासे मासि चतुषु वा मासेषु शुनासीरीयेण ६. चातुर्मास्यः १३८ वेद मन्दिर-प्रशिका (७) पशुबन्ध । सोमयागर-स्थाएँ - (१) अग्निष्टोम, (२) अत्यग्निष्टीम, (३) उक्थ्य, (2) पोडशी, (५) बाजपेय, (६) अतिरात्र, (७) आप्तोर्याम. यजते" (आप० श्री. सू० ८.२०११) अर्थात् फागुन-पूर्णिमामै यदि प्रथम पर्व करे तो आपाठ-पूर्णिमामें द्वितीय पर्व, कार्तिक पूर्णिमाम तृतीय । यदि चत्र-पूर्णिमाम वैश्वदेव किया जाय तव तदनुसार पार-चार मायके अनन्तर क्रमश: झोप -अनुष्टान होगा। चातुर्मास्यका अनुष्टान सकृद् भी होता है यावज्जीव भी। यावज्जीव पक्षमें चतुर्थ पर्वका अनुष्टान फाल्गुन चतुर्दशीम और पुर्णिमामे फिर वहीं प्रम जारी रहेगा । सकृत् पक्षमें फागुन-प्रतिपमै चतुध पर्व होगा । १. पशुबन्ध दने निस्ट पशुबन्ध भी कहते हैं उत्तरायणके आरम्भमें छागसे किया जाता है । २ सोमयाग- 'सोम' एक लता है; जिसके रससे निप्पाद्य 'सोमयाग' कहा जाता है । इसके तीन भेद होते हैं -(१) एकाह, (२) अहीन, (३)न । जिस यागमें सोम-रसका अभिपव एक ही दिन होता है, उसे 'एकाह' कहते हैं । जिममें दोसे बारह दिनों तक अभिषय होता है; उसे 'अहीन' और जिस सोमयागा अनुष्टान पक्षमें लेकर सहस सवत्सर तक चालू रहता है, उसे 'सत्र' कहते हैं। यद्यपि सोमयागकी अग्निष्टोम मस्या एक दिपम निपाय है; तथापि सपने अगोंक सहित पाँच दिनमि निष्पन्न होती है । 'संस्था' शब्दका अर्थ यहाँ समाप्ति है । जिस सामसे कर्मकी समाप्ति होती है; उस 'सामके नामपर यह कर्म प्रसिद्ध होता है। जैसे – अग्निष्टोम 'संज्ञक साम जिमकी समाभिमें होता है, उसे अग्निष्टोमसंग्याक सोमयाग करते हैं । जिसकी समाप्ति 'अग्निष्टोम सामने ददकर उक्थ्य सामपर होती है; याग, चतुर्य मोपान , , वापेर और आलोयम सस्थाओं स्वस्य सम्पन होता है । + अग्निमानननिमान् कुर्यादिमात्तु प्रत्यह महत् । अन्यथा प्रत्यवायी स्याद्रीख नरक व्रजेत् ।। १३९ अत्यग्निटोम, ७. यज्ञ-कम १०-अथातो यज्ञक्रम:- अन्यायमग्याचेयात् पूर्णाहुतिः पूर्णाहुतेरग्निहोनमग्निहोनाद् दर्शपूमासी दर्शपर्णमासाम्यां चातुर्मारयानि चातुर्मास्येभ्यो अग्निष्टोमोऽग्निष्टोमाद राजसूयोराजसुयादश्वमेध । (गा० पू० ५/७) अर्थ अर यश प्रम कहा जाता है- मर्य-प्रथम 'अग्न्याधान,' ततः पूर्णाहुति,' फिर 'अग्निहोत,' अग्निहोत्रके पश्चाद् 'दर्शपूर्णमास, ' तदनन्तर 'चातुर्मास्य, तत्पश्चाद् 'अग्निष्टोम' अग्निप्योमके याद 'राजसूय' और राजसूयके अनन्तर 'अश्वमेध' । ८. पाँच महायज्ञ ११.-पञ्चैव महायज्ञा । तान्येव महासनाणि म्तयज्ञो मनुष्ययज पितृयज्ञो देवयज्ञो ब्रह्मयज्ञ इति ॥ '(शत० ११।५।६।) अर्थ-पाँच ही महायज्ञ हैं । वे ही महासत्र कहलाते हैं। वे पाच है- भूत-यज्ञ,-(२) मनुष्य-यज्ञ, (३) पितृ यक्ष, (2).देव-यक्ष. ५) ब्रह्म यज्ञ । गृहमिययोंके लिए इनका नियमपूर्वक विधान किया गया उसे उपध्यमस्थाक कहा जाता है. इसी प्रकार पोडशी और अतिराव सस्थाएँ बनती है । इन चार सस्थाअकि 'उलट फरस शेष तीन _. (यज्ञपा) .
१४०
येद मन्दिर प्रवेशिका
.
१२-~अहरहतेभ्यो बलि हरेत्। तथैतं मूतयज्ञं
समाप्नोति । अहरहर्दद्यादोदपात्रात्; तथतं
मनुष्ययज्ञ समाप्नोति । अहरहः स्वधा कुर्यादो-
दपात्रात्। तथैतं पितृयज्ञं समाप्नोति । अहहः
स्वाहा कुर्यादाकाष्ठात्तथेतं देवयज्ञं समाप्नोति।
(आत० ११।५।६।२)
यर्थ--(१) प्रतिदिन गो मादि प्राणियोंको भोजन
दे-यही भूत-यशका सम्पादन है। (२) हर रोज
(था उदपात्रात) जल-पात्र भार अन्न किसी भूके मनुष्यको
दै-यही मनुष्य-यज्ञका अनुष्ठान है। (३) नित्य प्रति स्वधा-
कार-पूर्वक पितरोंको अन्न-जल दे --यही पितृ-याकी सम्पति
है। (४) नित्यशः स्वाहा-कारपूर्वक देवोंको काप्टपर्यन्त हवि
अर्पित करे-यही देय-या है।
१३-स्वाध्यायो वै ब्रह्मयज्ञः (यात० ११११६३)
थर्थ-(4) अपनी वंश-परम्पग-प्राप्त शाखाका विधि-
पूर्वक आचार्यसे अध्ययन करना ही ब्रह्म यहा कहा जाता है।
९. स्वाध्याय-महिमा
१४- यदि ह वा अप्यभ्यक्तोऽलंकृत सुहितः मुखे
शयाने शयानः स्वाध्यायमधीते । आहेब
स नखाग्रेभ्यस्तप्यते । य एवं विद्वान्
स्वाव्यायमधीते। तस्मात्स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ।।
(दान० १११५/७४)
'टाइरहः सादा फुय दन्नाभावे केनविदागाईवेभ्यः
(पार• गृ• मू. २१)
"
चतुर्य सोपान
१५१
अर्थ अध्ययन-शील यदि तेल मर्दन फरके, यस्त्र
आपणोंसे सज धज कर, (मुहित) यथेष्ट. भोजनसे तृप्त
हाकर, कोमल पुष्प शय्या पर लेटे-लेटे वेदाध्यन करता
है । तो भी वह निसन्देह नख शिख तप करता है। जो
स्वाध्याय करता है। अतः स्वाध्याय अवश्य करना
चाहिए ।
१०. उद्योग
१५-~-नानाश्रान्ताय श्रीरस्ति इति रोहित शुश्रुम ।
पापी नृपद्वरो जन इन्द्र इच्चरत सखा ।।
चरैवेति चरैवेति ।
अर्थ-(राति) हे रोहित* (शुभ्रम ) मुनते हैं कि
(नानाथान्तार श्रीरहित ) पुरपाथ परते करते जो नितान्त
धान्त नहीं हो गया, उसे थाके दर्शन नहीं होते। अथवा
(नना श्रान्ताय श्रीरन्ति) गाढ परिश्रमसे थके हुए पुरुषको
नाना प्रकारको सम्पद् 'मिलता है । (नृपद् वरो जन पापी)
निय मन्धियोंके घर पर हो पड़ा रहनेवाला निखट्टू
पुरुष, पापिष्ठ हो जाता है । (इन्द्र परत इन् ससा ) पग्मामा
पराक्रमी पुरुषका हो मित्र है, (चरैवति चरैवति ) अतः चलते
रहो, चलते रहो।
* एतरेय ब्रा० ३३ । • मे पारयान आता है
वरणदेवकी
उसका नाम रक्खा
कृपासे हरिश्चन्द्र पुन हुआ।
गया 'रोदित
वरुणन मी भेट माँगा। हरिदय द्र टाल-मटाल करने लगे। 'रोहितको
में मेज दिया । वनमें इन्द्रन रोहितको सुन्दर उद्योगका यह
-
पदेश दिया है।
ર
वेद मन्दिर प्रवेशिका
१६-पुष्पिण्यौ चरतो जङ्के भूष्णुरात्मा फलग्रहिः ।
शेरेऽस्य सर्वे पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हताः ।।
चरैवेति ।
अर्थ -- (चरतः) जो पुरुष चटता रहता है, उसको
(बघे पुषिण्यो ) जाँघोंम फूल फूलते हैं, (भूप्मुः आत्मा फलहिः)
और यधिष्णु शरीरमें फल लग जाते हैं। (अस्य) इस
श्रम जीवीके (प्रपथे हताः सर्वे पापमानः )प्रपथकी बाधाएँ विनिष्ट हो
(शेरे) मदाके लिए सो जातो है । इस लिए चलते रहो,
चलते रहो।
१७ - आस्ते भग आसीनस्योर्वस्तिष्ठति तिष्टतः ।
शेते निपद्यमानस्य चरति चरतो भग ।।
चरैवेनि।
- (आमीनस्य भग आम्ने) बैठे हुपका सौभाग्य थैटा
रहता है. (तिष्ठत उच्चस्तिष्टति) म्बईका बडा योर (नियमानस्य
होत ) निवालेका भाग्य भी सोता रहता है। हां! (चरति
वरती भग) चलनेवालेका सौभाग्य चलता ही रहता
अत. चलते रहा, चलते रहो।
१८--कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः।
उत्तिष्टं स्वेता भवति कृतं सम्पद्यते चरन् ।।
चौधतिः।
अर्थ – (शयानो माति कलिः) सोया हुआ पुरुष ई
कलियुग, (संजिहानस्तु द्वापर :) अंगड़ाई लेनवाला द्वापर,
(उत्तित्रता भवनि) उटकर बड़ा हुया मानधप्रेता और
घनुयं सोपान
(परन् सम्पयत पृतम् ) उद्योगी, मत्य युगका अवतार है। अतः
चाते रहो, चलते रहो ।,
१९-
चरन्यै मधु विन्दति चरन्स्वादुमुदुम्बरम् ।
सूर्यस्य पश्य माणं यो न तन्द्रयते चरन् ।।
चग्वेति ।
^
.
अर्थ-(चरन् । म विन्दति) चलता हुआ ही मनुष्य
मधु पाता है, (चरन् सादुम् उदुम्परम् ) चलता हुआ ही अलभ्य
गुलरका फूल पाता और मधुर फल चयता है । (स्यस्य प्रेमाण
१.) हे रोहित ! उस सूर्यको परिश्रम देग (यो न तन्द्रयन चरन्)
निरन्तर चलने पर भी जिसमें तन्द्राका नाम तक नहीं ।
अत चलते रहो, चलते रहा ।
११. श्वासप्रश्वास-गणना
२०F शत शतानि पुरुपः समेनाष्टो शता यन्मितं
तद्वदन्ति । अहोरानाभ्यां पुरुषः समेन
तावत्कृत्व प्राणिति चाप चानिति ।।
(शत० १२।३।२।८)
अर्थ पुस्प सामान्य रूपसे (शत शतानि) १००x१००=
दस हज़ार (भष्टौ शता) आठसो श्वास प्रश्वास लेता है।
( यत् मित तद् वदन्ति ) ठीक ठीक जो गणना की गई है, वही
कहते हैं-कि दिन रातमें प्राणी स्वाभाविक उतनी ही
• (१००.०) धार श्वास लेता और उतनी ही चार प्रवास
फेकता है।
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वेद मन्दिर-प्रवेशिका
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-१२. शम..
२१ --- शमेन शान्ताः शिवमाचरन्ति, शमेन नाकं
मुनयोऽन्वविन्दश्छमो मूतानों दुराधर्ष शमे सर्व
प्रतिष्ठितं तस्माच्छमः परं वदन्ति ।
(त० मा० १०६३)
अर्थ- (शमेन) मनोनिग्रह-पूर्वक शान्त पुरुष शुभ
आचरण करते हैं । शमसे ही नितान्त सुग्वस्वरूप ब्रह्मको
मुनियोंने प्राप्त किया है। मनुष्योका दुर्धर्ष कर्तव्य है
शममें सर्वस्व निहित हैं; अतः शमको सबसे श्रेष्ठ कहते हैं।
१३. दम ,,
२२ -दमेन दान्ता' किल्बिषमवधून्वन्ति
दमेन ब्रह्मचारिणः सुवरगच्छन्
दमो मूतानां दुराधर्ष दमे सर्व प्रतिष्टितं
तस्माद्दमः परं वदन्ति ।। (ले० आ१०॥६३)
अर्थ-दान्त मनुष्य (दमेन ) इन्द्रिय-निग्रहसे अपने
पाप-पुक्षको नष्ट कर डालते हैं। दमसे ब्रह्मचारी म्पर्ग-सुस
पाते हैं । दम मानाका दुःमह कर्म है । दममें सबकुछ है।
इसलिए दमको अत्युनम कहते हैं।
१४. विजय-पथ
२३-चरणं पवित्रं वितत पुराणं, येन पूनस्तरति
दुष्कृतानि । तेन , पवित्रण शुद्धेन पूता, •
अतिपाप्मानमराति तरेम।। (ले० प्रा० ३.१२१३)
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दूसरे मुखमें हवन करें'-ऐसे अभिमानसे अपने दी मुखमें
.
-वे दानों (देव और अमुर):प्रजापतिक पुत्र
परस्पर संर्धा करने लगे। उनमें असुगेंने, 'हम किम
चतुर्य सोपान
अर्थ-आर्यजनोंका पवित्र, परमोदार, चिरन्तन
शाधय आचरण, संसार लिए एक महान आदर्श है। जिसमें
द्वारा पवित्र हुआ मानर प्रचण्ड पापमय अग्नि परीक्षाओं में
यनायाम उत्तीर्ण होजाता है उसी पावन च्छ, आचार-थपर
चलकर ही हम पापमा घोर शत्रु पर विजय प्राप्त कर
सकते हैं । भगवान मनुं तो शुद्ध आचारको कल्पवृक्षसे कम
नहीं मानते-आचारालभते हायुराचाराटीप्सिताः प्रजाः ।
आचागचनमक्षय्यभाचारो हन्यलक्षणम् ॥
(मनु० ४।१५६)
इतना हो नहीं " अ चारश्चैव साधूनां" (२६), "आचार
परमो धमः” (१।१०८) कहकर मनुने आचारको प्रामाणिकता
और 'अनिवार्य कर्तव्यताका बंध कड़ा शासन जारी किया
है । आचाहोन वैदिक धुरन्धर विद्वानको भा पनित बताया
ई-"याचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते” (१।१०९) ।
महर्षि पसिष्ट भी कहते हैं-"आचारहीन न पुनन्ति वेदा"।
१५. पराभव-पथ
२४ ते उमे प्राजापत्या' 'पस्पृघिरे । ततः असरा
अतिमानेनव कस्मिन्नु वय जुह्यामेति स्वेष्वास्येषु
। जुह्वतः चेरुः । ते अतिमानेनैव परांबम्वुः ।
तस्मान्नातिमन्येत ।। पराभवस्य"
(शत० ५।।१।१)
अर्थ
ह्येतन्मुख
यदतिमानः ।
-
१४६ पेद मन्दिर-प्रवेशिका . 71 हवन करते हुए स्वार्थ परायणताका घृणित आचरणं किया। वे उस अति मानके कारण ही परास्त हुए। अतः मानसे सयथा दूर रहना चाहिए । क्योंकि पराभवका एक प्रधान पथ है-यही अतिमान । १६. स्त्री-प्रतिष्ठा : २५-गृहा वै पत्न्य प्रतिष्ठा । तद् गृहेष्वेवैनामे- तत्प्रतिष्ठायांप्रतिष्ठापयति ।। (शत ० ३।३।१।१०) अर्थ -घरोको शोभा-प्रतिष्ठा पन्नीसे ही है । अतः घर में पत्नीकी पूर्ण प्रतिष्टा करनी चाहिए । २६:- स्त्री वा एषा यच्छ्रीः । न वै स्त्रियं नन्ति । (शत० ११४३२) निःसन्देह म्री हो गृह लक्ष्मी है। इसलिंग स्त्रीके कोमल हृदय पर किसी प्रकारका आघांत नहीं आत देना चाहिए। १७. अर्थ-ज्ञानकी वाञ्छनीयता २७. -स्थाणुरयं मारहारः किलामूदधीत्य वेद न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमानुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा। (शाखा आ०१४॥२॥ अर्थ- -गधा है यह येवल भार ढोनेयाला लो अध्ययन करण. मी वेदका अर्थ नहीं जानता । जो अमिा ६, निःसन्देह यह सकल कल्याण माजन होता है। यह अर्थ - जिससे शुळाक, और पृथिवीलोकको कारीगरोंने . बनाया। हे मनीषियो। अपने मनसे विचारकर आचार्यसे पूछो- , चतुर्थ सोराम ब्रह्म-मानके प्रभावसे समस्त. पापोंको भस्मसात् करके शुद्ध हो, निरतिशय सुग्घ (मोक्ष)को ण लेता है। 1 १८. वेदान्तकी उपादेयता २८-ऋचां मूर्धानं यजुपामुत्तमान सामां शिरोऽथर्वणां मुण्डमुण्ड नाधीतेऽधीते वेदमाहुस्तमज्ञ शिर- रिछत्त्वाकुरुते कयन्धम् । (शावा० आ० १४१) अर्थ-ऋर-शाखाओंके मस्तक, यजुः-शाखाओं के उत्तमान, साम-शासाांक शिरोभून, अथ्य शाखाओंके शिवररूप वेदानका जो अध्ययन नहीं करता, शेष वेदका अध्ययन भले ही करता हो; उसे अनभिज्ञ हो कहा करते हैं। क्योंकि उसने भगवान् वेदका शिर काटकर घर पृथक कर डाला है। 15. १९.- वन-वृक्षवाद । २९ -कि स्विंद् विन क उ स धृक्ष आसीद् , यतो । द्यावापृथिवी निष्टतक्षु.। मनीषिणो मनसा तद् , - यदध्यतिष्ठद् भुवनानि -धारयन् ॥ (तै० ब्रा० २२८९) कौन सा वह वन है?.कौन मा वह वृक्ष है ? t -- पृच्छतेदु 1 - अर्थ - सय ।भुवनांका धारणकर्ता और कोन है वह ? - जो अधिष्ठाता है।
१४८
वेद मन्दिर-प्रोशिका
-ब्रह्म वन ब्रह्म स वृक्ष आसीद् , यतो
द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः । मनीषिणो मनसा
विनवीमि वो,ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ।।
(ले० प्रा०२८९)
अर्थ ब्रह्म यह वन है और ब्रह्म हो यह वृक्ष है
जिमसे स्वर्ग और पृथिवी दोनाका बनाया गया है । हे
मनीषिया! मनसे निश्चय परक हो मैं (आचाय) तुमसे
ठोस्टाफ कहता हूँ कि ब्रह्म ही भुवनोंका धारणकर्ता और
अधिष्ठाता है।
२०. ब्रह्म-भाव
३१ - ब्रह्ममेतु माम् । मधुमेतु माम् ।
ब्रह्ममेव मधुमेतु माम् ।
यास्ते सोम प्रजा वत्सोऽभि सो अहम् ।
दुष्प्वमहन्दुरुष्पह । यास्ते सोम
प्राणांस्ताञ्जुहोमि ॥ (ले० आ० १०॥४८)
अर्थ (जान्)
तत्त्व मुझे प्राप्त हो ।
परमानन्दम्प मधु मुझे मिले । ब्रह्म हो तो मधु है- यही
अपण्डे रस उम्तु मुझका सम्प्राप्त हो। (सम) हे परमात्मन्
(त
त या प्रना ) तेरी ना प्रजाई (ता अभि सा अहम् वम )
उम प्रजाम में एक अयोध बालक है। (दुप्मइन् )
परन्नल
* साम---"उमा अनरिया तया मह नमान परमामन् !"
(मायण-मा. त• • 01te)
.
१४९
चतुर्थ सोपान
ससाररूप दु.स्वमरे नाशक ! (दुरुष्यह) दुसश समूठ
उच्छेद कर । हे उमेश! तेरे प्राणमि मैं अपने प्राण होम
करता है।
२१. उपसंहार
३२-नम ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्रपतिभ्यो
मा मामपयो मन्त्रकृतो मन्नपतय ।
परादुर्माऽहम्पीन्मन्त्रकृतो
मन्त्रपतीन्परादाम् ।। (से० आ० ४।१)
मन्त्र-पा, मन्त्रभर्स वद्य वे कपिराज है।
सत्य शब्दोंमें हमारे विश्वा सिरताज हैं।
वे न टालें दूर मेरे स्वान्तसे निज पादको
हे प्रभो ! मैं भी न छो दिव्य, देशिक पादको ।
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तृतीयचतुर्थसोपानस्थमन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक पृष्ट सख्या, मन्त्र प्रतीक पृष्ट-सख्या -- कलि शयाना १४२ १४७ - कामस्तदने कि स्विद् वन' का अद्धा वेद १४७ ल ग गृहा वै पल्यै १४६ अक्षमा दीव्य अग्न्याधेयमग्न्याधेयात् अमियोमोऽत्यग्निष्टोम अग्न्याधेयमग्निहोन अग्न नय मुपथा राये अर्थतन्मूल वचो अनुपूर्ववत्सा अनुव्रत पितु पुत्रो अनृणा अस्मिन्ननृणा अरमन्वती रीयते अहरहमूतेभ्यो था आगाना अग्मनुत आ ब्रह्मन्त्राह्मणा आस्त भग आसीनस्य १३५ १०७ १३२ ११९ ११३ 1१०९ १२५ चरण पविन चरन्वै मधु विन्दति १४४ १४३ - जाया तप्यत निहाया अन मधु ज्यायस्वन्तदिचत्तिमा ११५ ११४ ११४ १४२ तपसा देवा तम आसीत्तमसा तमव विद्वासमेव तवोतिभि सचमाना तिरश्चानो विनता त उमे प्राजाप या प्रय प्रानापया १२७ १३१ ११८ १२८ इ इद यत्परमेनिन इमानि यानि इय या परिमपिना इय वियित म १२४ १०४ १२४ १३० दमेन दान्ता १४४ प्राचा मूथान द्वय वैश १४७ द्वेष्टि श्व 10 येद मन्दिर-अमेशिका ૧૨૨ १२२ यद्वार पुरुषो यस्तित्याज यूय गारो मेदयया यन टवा ने वियति या न अग्रे १२२ ११३ व वचाविद १२३ १२५ १३९ १४२ १२३ १०८ न ता नशन्ति नम ऋषिभ्या न मनसा न मा मिमेय न मयुरासीदमृत न नानाधान्ताय नासदासीन्ना प पञ्चैव महायता पुप्पिण्यो चरता प्रनावती सूयवस प्रिय मा कृणु देवेषु य ग्रह्मचर्येण तपसा देवा ब्रह्मचर्येण तपसा राना ब्रह्ममतु माम् बम वन म मदमि छन्त ऋषय म मधुमन्म निक्रमण माता दाण मा भ्राता म्रातर माघमन्न विन्दत य श शत शतानि पुरुष शमन शाता श्रद्धा प्रातहवामहे स स गरध्व समान न स्वेसि सनीचीनान् व सप्तमर्यादा समानी प्रपा | सभानी व आकृति ११० १०९ १४८ १४८ समानो मन १२३ सहृदय सायप्रातहोंमो मुनामाणा पृथिवीं स्वा वा एपा स्थाणुरय भारहार स्वस्तिपन्यामनु स्वाध्यायो वै ११. ११२ १३५ १०७ १४६ १४६ १४. १४० यदि ह वा अभ्यतो गौतमधर्म सूत्र गो० पू० गोप० पू० संकेत-शब्द-सूची अथ -अथर्ववेद मनु० -मनु-स्मृति आप० श्री० सू० -आपस्तम्ब. मन्त्र ब्रा०-मन्त्र वाह्मण श्रीतसूत्र महा० भाग *-व्याकरण- ऋ०-ऋग्वेद महाभाष्य व्या० महा भा० ऋक् प्राति०-ऋक् प्रातिशाख्य मिता गौ० ध० सू० -मिनाक्षरा पे० प्रा०-ऐतरेय ब्राह्मण कण्य सं०-कय सहिता मुण्ड० उ०-मुण्डक उपनिषत् का० श्री० सू० कात्यायन-श्रौतसूत्र यजु०-यजुर्वेद गो०-भगवद्गीता यो चा० -योगवासिष्ट वंश ब्रा० -श ब्राह्मण } -गोपथ ब्राह्मण-पूर्वाद्ध शत-शतपथ ब्राह्मण चरणव्यू -परण यह शब्दस्तो०-शब्दस्नोम महानिधि डॉ० छान्दोग्य उपनिषत् शावा० आ०-शाद्वायन आरण्यक शु० यजु० प्राति० -शुक यजुः जै० स्सू० -जैमिनि-मूत्र प्रातिशाख्य तापनीय उ०-तापनीय उपनियन् श्लो० वा० -श्लोक वार्तिक (कुमा- ते० आ० -तैत्तिरीय आरण्यक रिल भट) दैवत घ्रा०-दैवत ब्राह्मण सत्या० श्रा०. सू० -सन्याशन नारदीय०-नारदीय शिक्षा नि० सर्वनिर्णय प्र० -सर्वनिर्णय प्रकरण निर (वरभाचार्य) पा०शि०-पाणिनीय शिक्षा सांनु० -मनुक्रम पार० गृ० सू०-पारस्कर यह सूत्र सांत० को०-सबर तत्व कौमुदी प्रश्नो०-प्रश्नोपनिषत् स्कन्द पु० नाग०-स्कन्द पुराण गृह० उ०-वृहदारण्यक उपनिपत नागर सण्ड:-. भा०-श्रीमद भागवत म्तोभानु० -स्तामानुफमणी छां० उ० । 1 प्रोन मूत्र . . । .