Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shree Shawakvavharalankar
Front matter
यह ग्रथ सन १८६७ २५ मे आक्ट मुजर रजिस्टर करके
ग्रथकाने इस्का हक स्वाधीन रखाहै.
१
विज्ञापन. श्रीमंतो धर्माचार्य धर्मशील सशुरुन्योनमः अहो नव्यलोको नमस्कार करो उस आदि पु- रषोत्तम ऋपन्न सर्वकू की जिसने धर्म अर्थ काम र मोक्षका रस्ता बतलाया र प्रजा सुरवसे निर्वाह करसके इसवास्ते अनेक क- लाकौशल पैदा करके प्रजाकू सिरवलाइ जगत- में कुंभार सुथार बुहारादिकोकी कारीगरी दे- रखके निश्चे अनुमान होताहे के यह विद्यासरूमें उसीने सिखलाईहे वह देहधारी उर स्वयंबुझ ज्ञानीथा निराकार ईश्वर विद्या उपदेशक नहीं होसकता इय बात तो न्यायसे उर प्रतक्ष प्र- मांपासेही सिझहे हां अलबत्तें बुद्धि तो मनु- प्योकी उसमें सहाय देणेवाली जरूरहे जेसे विद्यामान अंग्रेजोने एक ए वस्तूका होता हुवा कार्य देखके रेल तार विजली गपरवाणे आदि अनेक कल पेदा करली विचमी पकती हुश् हंमीकी बाफसे ढकणी उबलतीकू देव अग्नि उर पाणी उर वायूके योगसे एसी कुदरत होती हे इतनी बात• विचारतें बाफकू रोकणेका ज्यादा प्रयत्न बढाया तो अनेक किस्मके कार्य अव्यानु योगसें करते चले जातेहे अगर इस बार -- (२) ज्यादा सुक्ष्मबुद्धिसे विचारोगे तो यह कार्यनी उस आदि पुरषकी बनाइ शिल्पकलामेही हे जो कोइ कहेगा की तुमारे आर्यावर्त्तमें यह विद्या कब थी कूठी बात• हम केसें माने उ- तर हे महाशय हमारा देश सर्व विद्याका र धनका नंमारथा देखो हमारा कोणिक असोक चंजराजाका चरित्र उसने बव खेमका चक्रवर्ति बणणकुं दिगविजय करणेकू सातरत्न लोहमश् बणायेथे सो चक्र तो आकासमें स्वत चलताथा इत्यादि इस कलसे काम लेणेकी कारीगरी उस वरखत कायमथी जिसको अढाइ हजार वर्षही नयाहे गजसिंह कुमार चरित्रमे एक सुथारने एसा मोर बणायाथा कलका उसपर बेठणेसे सश्कमो योजन गजसिंह कुमार फिराथा देखो वसुदेव हिंम उससें वसुदेवजीकू बुलाणे राजाने कलमइ हाथी वणाके नेजाथा देखणेमें हार्थीकी तरे उसके पेटमें आदमी लोक बेठेथे इत्यादिक कलकी कारीगरी आर्यावर्तमेथी विमाननी आ- काशमे चलतेथे पद्मचरित्रसे सावितहे जबसे विद्याका पठन पाठन कमपमा तबसें बुछिन्नी मंद होते गई जमाइ दंगोमे बहोत कामिल स्त्र नष्ट भ्रष्ट होगये उर विलायतोवालेन्नी (३) लेगये इसवास्ते यह ग्रंथको जो मेने संग्रह क- राहे सो च्यारोही वर्णके मनुष्योके लिये हित- कारीहे कारण हर किसमका काम जो ज्ञानयुक्त बुझिसे विचारके करणेमें आताहे तो अंतमे उ- सका परमार्थनी ठीक हासिल होताहे इसमे नोकरी राज्य सेवा युझ मातापिता आदिकोसें वर्तावा रुजगार सात प्रकारकी आजिविका व्याज वगेरे सब करके पूरा नफा करके शंसा- रमे धनवान इज्जतदार उर बमा चतुर बजकर अंतमें जीव परमपद साध सकताहे एसा ग्रंथ किसी ने नहीं गपाहे ज्यादा क्या तारीफ लिखू इस ग्रंथकू पटके जो असल करेगा तो निश्चे वह मनुष्य वतोर बालस्टरोके माना जायगा यह ग्रंथ साक्षात्कानून धर्मशास्त्रहे इस अर्थोके प्रकाशक अर्हद् परमेश्वरहे जैनधर्मके कायदा कानून कइएक नमुनेकी वानगी लोकहितार्थ जाहिराकीहे अवलसें लेकर आरखरीतक पढे विगर तृप्तिनी न होगी गृहस्थके धर्म कायदेके श्राझदिनकर आचार दिनकर विवेक विलाश श्राझप्रप्ती श्राफकौमुदी आदि अनेक ग्रंथ के विस्तारके संस्कृत प्राकृत भाषामें वणे हुयेहे लेकिन नाषानिवापी पुरषोके लियेही मेरा एk । (४) रिश्रम जैनधर्ममें सर्व तरेके ग्रंथ मोजूद ज्योतिषवैद्यकादिक परंतु जैनलोक उसकी खोज नही करतेहे नर जो कोइ खोज करे तो उस मदत नहीं मिलतीहे मेने यह ग्रंथ मंबईमें उ पाणे गया तब श्रीमान सावणसुखा बीकानेर वास्तव्य सेठ जुहारमलजी समेर मलजीके मु. नीम पारख माणकचंदजीने मुझे कुछ एव आश्रय दियाहे जिसके सहायसें यह मेर परिश्रम सफल नयाहे इस ग्रंथकी किमत ब- होत वरचा लगणेपरनी बहोत थोमी रस्की, १॥ रुपा देढ जिल्द बंधी समेत ॥ मिलणेका ठिकाणा बीकानेर राजपूताणा बमा उपासरा उ- पाध्याय युक्तिवारिधिः श्रीरामलाल जी गणिः के शिष्य पाक्षेमचंद पेमचंद अमरचंद प्रकाशक विद्याशाला॥
অথ ॥श्री श्रावक व्यवहारालंकारः॥ ॥ श्रीऋपनादिचतुर्विंशतितीर्थकरेन्योनमः ।। श्रीवाण्यायैनमः ॥ अथश्रावकव्यवहारालंकार ग्रंथोयंलोकनापयालिख्यते ॥ सर्वसंपत्करीयासा वाणीकलुपनासिनी रजिसिधिप्रदानित्यं वंदेजि नमुरवोद्भवं ॥१॥ धर्मशीलात्मयालब्धा नवाध्यो च्छेदकारणी लोकलोकोत्तरोशुकिं नौसिनित्यं स- सजुलं ॥शा व्यवहारअलंकारं श्रावकस्यसुखायदै क्रीयते चिसारेण श्राकग्रंथानुसारतः ॥ ३ ॥ अब-पहले गृहस्थ श्रावक च्यार घमी पि- उनी रात रहनेसे उठके मनमें नवकार मंत्रका जाप करता हुवा जिधरका स्वर नाकका चलता होय वोही पवि अपणे विगेनेसे नीचे जमीनपर रखके फेर जतनके साथ निर्जीव शुद्ध जमीनपर काय चिंतासे निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र पहनकर सारे वदनपर हाथ फेरकर आठ पारवनीका कमल अपने नानिचक्रमें मनसे विचारकर एक- सो आठ वेर अथवा ज्यादा सनमेही नवकार मंत्रका जाप करे जिसमें संसार संबंधी कार्य.
(२) सिफिके वास्ते में ही एसा वीज लगाकर पां- चोही परमेष्टीका जाप जपे मुक्तिके वास्ते ए- साही जापजपे फेर सामायकादिक उ आवस्यक करे जिन मंदिर में जाके विधी के साथ चैत्यवं- दनादि करे इसका विस्तार चैत्यवंदनन्नाप्य श्रादिनकरादिक ग्रंथसें जाणना फेर जतनके साथ जिनमूर्तिकी पूजा स्नान तिलकादिक करके अव्यन्नाव संयुक्त करे पूजाका विस्तार श्राविधी पूजापंचाशकादि ग्रंथोसें जाणना फेर उपाश्रय जाके गुरुवंदन करके व्यारस्थान सुणे पञ्चस्काण करे गुरुवंदनकी बिधि गुरुवंदनन्नाप्यसें जाणना पच्चस्काणका निर्णय आगारोका अर्थ पञ्चरवाण नाप्यसे जाणना गृहस्थकू चाहीये पंमित जतीसें हमेसां धर्म सुणे रसीवे क्यूं के विद्या एसी अमोलरव कामधेनुहे सों सवतरेके मनबंछित पूरणे समर्थ हे ऊपर कहे मुजब धर्मक्रिया किया पीछे राजा अपणे राज्यसनामें जावे मंत्री अपणे सुप्रत न्यायसनाका काम देखे व्यापारीवणिक अपणे २ नद्यमका प्रयास करे धर्म विरोध नही आवे इस मुजब धन पैदा करे जैसे राजा धनवानका उर गरीवका अपने खातरीनाले मान्य पुम्पका र सामान्य प्रजा- है
(३)
का उत्तमका उर नीचका पूर्वापर जुवानकू
विचारकर कसूरदारका कसूर जाणकर मध्यस्थ
नावसे इनसाफ करें ज्यादे वातरी न्यायपक्षमें
नही करे इसपर एसा दृष्टांतहे कल्याण कटकपुर
नगरमें वमा न्यायवान एसा यशोवर्मानामे
राजा राज्य करताथा उस राजाने राज मेहेलके
नीचे गरीब लोकोंकी फरियाद सुननेको न्याय
घंटा बंधवाई एक समय राजाकी कुलदेवी
राजाके न्यायकी परिक्षा करणे• तुरत जणी हुई
गायका रूप धारण कर बच्चे समेत राज रास्ते में
वे गई इतनेमें राजाका लमका पूरे जोरसें
घोमा दोमाता हुवा आतेके फेटमें आणेसें वबमा
मारा गया तब वो गाय वझे शब्दसें पुकार
करती हुई रोती २ आंसू वरसाणे लगी तब
किसी आदमीने गायसें कहा इहांतो जो
होणहारथा सो होगया अगर इनसाफ कराये
चाहतीहे तो राजाकी न्यायघंटा बजाकर फरी-
याद कर तब वह गाय उसी मुजब जायकर
सींगोंसें घंटा बजाणे लगी राजा उस वक्त
नोजन करताथा घंटाकी अवाज सुणकर पूग
ये फरीयादी कोण हे नोकरोने देखकर कहा
.
(४) बाहिर आया तब गश्यासें पूबणे लगा तु किसीने सतायाहे क्या वो सताणेवाला कहां मुझे बतला तब गऊ आगे चली राजा उनके पिगमी चला गऊनें मराहुवा बगमा दिखलाया राजा तब लोकोंसें पूरणे लगा ये बबमेकू जि- सने माराहे वो हमारे सामने आवे जब को- इनी आदमी हाजर नहीं नया तब राजाने नियम कीया जब कसूरवार जाहिर होगा तन्नी अन्न जल लूंगा राजाकू लंघन नया तब राजाका लमका हाथ जोम हाजर हुवा कहणे लगा हे स्वामी गुनहगार में हुं इसवास्तेही चाणक्य नीतिमें लिखाहे यतः विनयं राज- पुत्रेभ्यः पंमितेन्यः सुनापितं ॥ अनृतं द्यूतकारेन्यः स्त्रीभ्यःशिक्षेतकैतवं ॥१॥ अर्थ-विनय याने अदवका कुरब कायदा सीवणा होय तो रा- जोंके कुमरोंसें सीवणा वो लक्ष्मीपूत्र गेटे उर वमे सबोके संग बरतावेकी नीतीसें चलतेहे कुलहीन आदमी हुकमत र पेसेके नसेमें किसीकुं कुछ नही नमजतेहे काग जो सिंहा- सणपरनी वैठ जाय तो क्या हंसके गुण जो भीरनीर जुदे करणेके हे वो कब आसकताहे उर सनामै बोलणेके सुनापित सीरवणा होय तो (५) पंमिनोंसें सीखणा अनृत याने झूठ चोरी हरी- फाइ लीवणा होय तो जुवारीसे सीखणा उस- में ये सब अपलक्षण होते हे नर कैतव याने कपटाइ सीखणा होय तो उरतोसें सीरवणा स्त्रीका जन्मही मायावहे उस कुमरनें राजासें सव हकीगत कह सुणाई हे पिताजी जेसा मेरा कपूरहे वेसीही मुझे सजा होणी चाहिये तब राजा कानूनके जाणकार स्मृत्तियोंके पढे ब्राह्मणोसें राजाने पूग तब उन ब्राह्मणोनें कहा हे राजन राजके योग्य तेरे ये एकही लमकाहे इसके वास्ते क्या सजा वतलावें तब राजा वोला हे ब्राह्मणो किसका राज किसका लमका मेंतो सबसे ज्यादा न्यायनीतिकू समझताई उर राजाउँका यही श्रेष्ठधर्महे सोही लिवाहे उर्जन जो वद आदमी प्रजाईं कष्ट देणेवाला नसकू दंम करणा ? सत्जन याने गुणवंत डर अजी चालचलणेवाले पुरषोंकी पूजा सत्कार करणा २ न्यायसें खजानेका धन जमाकरणा३ पक्षपात याने तरफदारी न करणा ४ शत्रु जो राज्यके उस्मन हे ननकू जीतके प्रजाकी हसेसां रक्षा करणी ५ ये राजा लोकोंकू नित्य करणे योग्य पंचमहायज्ञ जांणना सोमनीतिमेंनी
(६)
कहाहे राजाको चाहिये अपणे लमकेने कोई
कसूर कीया होय तो अपराध माफक दंग
करणा इसवास्ते राजपुत्रकी कोई खातरी नही
रावकर शास्त्रोक्त दंग होय सो कहो तबनी
पंमतोनें कुबनी नही बतलाया तब राजा वि-
चारणे लगा जो जीव दुसरे जीवकू हकनाहक
मुख देवे तो जिस मुजब उस जीवने उसरे
जीबकू कष्ट पोहचाया होवे वेसाही कष्ट उस
गरीब फरीयादीके बदले में कसूरदारकू देणा
यही राजाका न्यायहे उर किसीने उपगार
कीया होय तो उसका गुण नही भूलकर उसका
वदला उतारणा ये सब सत्पुरषोंका धर्म हे
जेर राजाकों चाहीये अनाथ दीन मुखी
अबोलकी ज्यादा रक्षा करे क्षत्रीलोकोकी एसी
नीतिहे की जो ऽस्मन शस्त्र मालके नग्न हो-
जावे उसकू मारे नही जो शत्रु संग्राममें नाग
जावे उस नागतेकू मारे नही जो शत्रु मूमे
घास तिणरवा माल लेवे एसे पशुसंझक शत्रुकू
मारे नही जिसने किसीकान्नी विगाम नहि
कियाहे एसे निरपराधीकूनी मारे नही जेसें
राजाकी प्रजा मनुष्यहे उससे अधिक राजाकी
प्रजापग्गे र चोपग्गे वगेरह जिनावरहे इस
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मारणे योग्य नही कारण नागते शत्रूकू राज- पूत मारे नही तो नागते हुये जानवरकू केसें मारे केइ एक मांसाहारी अपणे स्वारथके वास्ते एसा कहतेहे पशुनमें अविनासी आत्मा नही एसें कहणेवाले महामुर्ख निर्दछ र मांसके लालचीहे ज्यांनवरका मायना सोचेतो एसा अर्थ जाहिरा मालम देताहे ज्यांन कहते जीव वर मायने प्रधान याने अच्छा जीव तो फेर अविनासी आत्मा पशु की नही इसबातमें क्या प्रमाणहे खून मनुष्योकेनी शस्त्र लगणेसें निकलताहे उर खून पशुकेनी निकलताहे श- स्त्रकी चोट लगणेसे आदमी पुकार करताहे वेसा ही जानवर करताहे मारके मरसे मनुष्य लागताहे वेसेंही मारके मरसें पशूनी जागताहे अपणे शंतानकी रक्षा मनुप्यनी करताहे वेसेही पशुन्नी करतेहे मरणेपर मनुष्यन्नी पुत्रादिकके वियोगसें रोतेहे एसेंही पशुन्नी रोतेहैं इत्यादिक अनेक प्रत्यक्ष प्रमाणसें मनुष्य जेसीही आत्मा पशु- उमेहे अपणे २ कमोके वश चोराशी लक्षयो- नीमें जीव नटकताहे मरणा कोश्नी नही चा- हता सर्व मतोंमे वही धर्म श्रेष्ठहे की जिसमें सब जीवोंकी दयाहे देखो गीता अहिंसा (ए) परमोधर्मः फेर कृष्ण द्वैपायन व्यासने अवारोंही पुराणोका एसा सार निकालकर कहाहे यत अष्टादशपुराणेषु व्यासस्यवचनद्वयं परोपकाराय पुण्याय पापायपरपीमनं ॥ १॥ अर्थ-तो प्रग- टहीहे तुलसीदास नक्तिमार्गवालेने कहाहे ॥ उहा-दयाधर्मकोमूलहे नरकमूलअनिमांन॥ तुलसीदयानगेमिये जबलगघटमेंप्राण ॥१॥ तुलसीहायगरीवकी कनीननिरफलजाय ॥ मरे वागकेचामसें लोहनमहोजाय ॥२॥ मनुस्मृतिमेंनी आठ कसा लिखेहे जीवों- कों मारणेवाला बताणेवाला मांस खाणेवाला मांस वेचणेवाला मांस खरीदणेवालारांधणेवाला पुरसणेवाला उर खाणेवाला मांसका अर्थनी मनुने एसाही कीयाहे मांस अर्थात् जिसको में खाताई सो कहता वो जीव मुकें खायगा मांस खाणेवाला कठोर र क्रूर मिजाजवाला होजाताहे प्रतक्ष्य प्रमाणसें साबितहे मांस खाणेवाले जिवने जांनवरहे सो सबोकों देखा जावे तो सबके सब वझे निघृण र कठोरहें वेसे घास उर नाज फल फूल खानेवाले जानवर मुष्टस्वनाववाले नही जर बके सीधे नोले होतेहे
(१०)
एसाही मनुष्योंका अहवाल जांणना एसेंड
शेख सश्यदनेनी फारसी नाषाकी करीमा कि-
ताबमें लिखाहे की ज्यांनके मारणेवालोकों खुदा
गुनाह माफ नही करेगा इत्यादिक अनेक
ग्रंथोसें साबितहे के मांस तो विगर ज्यांनवर
मारे होता नही र मारणेवाला गुनहगारहे
जो श्रुति स्मृती पुरान कुरानके वचन सच्चेहें
तब तो जो हाल उन ग्रंथोमें लिखाहे सो
जांनवर मारणेवालोकों मांस नक्षीयोकों गुना-
हकी सजा मिलेहीगीर ये शास्त्र वगेरह नही
मांनते र एसा कहतेहै इसनव मीठा
परनव किण दीवा जन लोकोने परनव मानने
का एक प्रत्यक्ष प्रमाण देखणा जो पापपुन्यका
फल नहीहे तो अंश लूला लंगमा कोठी निर्धन
खाणेकू न मिलणा श्यतो किस कारणसेहे र
राजा सेठ साहूकार ऐशआरामी वगेरह
अनेक सुरवी जीव किस कारणसें देखणेमें आते
हे ये प्रतक्ष प्रमाणसे पापपुन्यका फल जांणकर
अठारे पापस्थानक गोमनेका उद्यम करणा ला-
चारी र पराधीनतासें करणा बमे तोनी पापके
कामकू पापसमझाणा येनी धर्मकी जम्हे केश्यक
• मूर्व ऐसा कहतेहे जबसें राजालोकोने या
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राजा नरत ऋपन (११) धर्मधार लीया तबसे सत्रुलंसें संग्राम करणेकी शक्ति नही रहणेसें राज्य खो बेचतेहे ये कहणा मूर्व मांसाहारीयोका हे देवके पूत्रसे लेकर विक्रमसंवत् वारेसे तक कुमारपाल सिझपुरपाटण प्रमुख अठारे देशके राजातक अनेक दयाधर्मी राजा असंख्यकालसें सूर्यवंसी चंडवंसी इस आर्यावर्त्तादि क्षेत्रोमें राज्य कर्ते नये थे शत्रुनके दलके तोमणेवाले हुये परिशिष्टपर्वादिक ग्रंथोका इतिहास से मालम होगा परम जैनदयाधर्मी चेटक राजा विशाला नगरीका शरणागत पिंजर बिरुद धार- वाला जिसका नाती अशोकचंड इन दोनोके लमाश्मे एक क्रोम अस्सीलारव मनुष्य मारे गये राज्यनीति जबही प्रमाणहे सो अपराधीका निग्रह निरपराधीकी रक्षा करे मांस नही खा- पोसें राज्य जाता हे उर खाणेसें रहताहे ये वात कूट के मुसलमीन दिल्ली के बादस्याह राज्य क्यों खो बेठे टीपू सूलतान आदि तो मां- साहारीही थे ये तो निश्चे जांणना पृथ्वी सदा कुमारीहे अनेक पति हुये अनेक होयगें वीर- नोज्या वसुंधरा इति वचनात फेर एसानी के एकसमय एसीनी आजातीहे सो सूरवी- (१२) रोसें कुठवण नही आता एकसमें कायरनी राजा वनबैठतेहे जेसे अकबरके वालपणेमे हे- मचंद अग्रवाला वणिया बादस्याह दिल्लीका बनगयाथा उर एकसमेका वो हालथा अर्जुनने महानारत कीया एकसमे वोही अर्जुनसे कुछ नही बणपमा ॥ उहा-समेंबीवलवानहे पुरपनहीबलवान ॥ कावांलूंटीगोपिका वहअर्जुनवहवाण ॥ १ ॥ हमारा समजसे तो राज्य जाणेका एसा वरतावा मालम देताहे राजा प्रमादी विषयलं- पट होकर अन्यायसें धन जमा करे निक्षा मांगणेवालोंसें कर लेवे पुष्ट नर विद्यारहित सूरवोंकों राजकाजका अधिकार सोंपें विद्यावान अकलवंत बुजरक पुरपोकी सलाह लेकर काम नही करणेसे हर किमीका विश्वास करणेसें साम दाम दंम नेदसें च्यार प्रकारकी राजनीति नही जाणनेसें खजानेमें धन नहीं रहणेसें अपणे नोकरोकी कदरदानी नहि करणेसें देव गुरु धर्मकी अपमानता करणेसें गरीवोकों स- ताणेसे वहोत मदिरा आदि नसेके पीणेसें इत्यादि कारण राज्य जाणके, इत्यादि कार- गोको विचारकर रोजानें अपने अपराधीलमकेंकू (१३) एसा हुकम दीया तूं इस राजरस्तेमें सोजा आप वो घोमा मंगाकर अपणे चाकरोंकों हुकम दीया तुम इस घोमेपर सवार होकर दोमाता हुवा इस लम्केके ऊपरसें लेजाउँ रा जाका लमका विनयवानथा रस्ते में सोगया लेकिन नोकरोने एसा करणा मंजूर नही करा तव राजा घोमेपर आप असवार हुवा सर्व लोकोने बहोत मना कीया तोनी राजा उस गायका इनसाफ करणे घोमकाणा घोमा ऊग इतने में राज्यकी अधिष्टाश्का देवी लगामपका फूलोंकी वरसात राजापर करी उर कहा हे राजन् में तुह्मारी न्यायबुद्धिकी परीक्षा करी प्राणसेंनी प्यारा एसे लमकेकी स्वातरी नही करते हुये तेने गरीबकी फरीयादी सुणके सच्चा न्याय कीया तूं धर्मराजा हे तूं वहोत कालतक निर्वित्रपणे राज्यकर एसें न्यायकी युक्तिपर दृष्टांत कह्या अब जो राज्यके अधिकारी कामदार वो केसा होणा चाहिये जेसे अन्न- यकुमार चाणाक्य प्रधानकी तरे महाबुद्धिशाली राजाका र प्रजाका दोनोंका हित चाहणे- बाला एसा राज काज करे रुसपतरवाके सच्चेकू झूठग न करे जिस काममें धर्मकू विरोध नहीं t + (१४) आवे कहाहे के फकत राजाके घरमें फायदा करणेवाला कामदार प्रजाका उस्मन होताहे उर फकत प्रजाके घरमें फायदा करणेवाले मुत्सद्दीकू राजा निकाल देताहे इसवास्ते दोनोकों फायदे- बंद प्रधान मिलणा मुसकिलहे वणिक प्रधान अ- थवा अश्वपतिकू मंत्री पदमें स्थापन करणा कारण अश्वपति जातीवालोकू राजन्यवंशता होणेसें सूरवीरता प्रमुख राज्यधर्म अन्याससे तुरत आताहे कारण बीजकी तासीर र सोबतका असर प्रायें रहताही हे छुसरे असपति लोकोमें वर्तमान समयमें प्रायें व्यापारी होणेसे व्यापा- रमें नफे नुकसानकू पहलेहीसें विशेषकरके देश क्षेत्र काल नावका पूर्वापर विचारके कारण बने विचक्षण होतेहे व्यवहारमें कोमीकानी मुखा- यजा नही करतेहे किसी कविने कहा वाण्यो विणजन गेमसी जो स्वर्गापुर जाय लेखा करता रांमसें टका पेसा खाय १ इसवास्ते जिसकू नफे नुकसानका रख- याल हो मृङनापी शत्रुसें सूरवीर संग्राम- सें नहिं हटनेवाला सर्वकला कुशल अनिमान- रहित राजाका नक्त प्रजारक्षक दया धर्म सर्वज्ञ वचनकी आस्तावाला राजाके अश्वपती जाती (१५) वालाही मंत्री करणा ये सूरता तथा व्यवहारी शंक्षाशास्त्रकी निपुणता उर अन्य लोकोमें प्रायें थोमे मिलेंगें वणिक जातिकी इतनी चपलता हम मरुधर गुर्जर कच्छ पंजाबादि देशवालोकी देवीहे एक हिसाब अंग्रेजी पढे पुरुषकों करणा वतलावे वोही हिसाब एक पारसी पढेकू करणा वतलावे उर वोही हिसाब माहाराष्ट्र बंगालादि देशवालोंकों करणा वतलावे वही उक्त वणिक तथा अश्वपतिसें करमा तही वतजावे तो सबसे पहिले अश्वपतादिक महेश्वरी अग्रवाल कहेगा कुछ देरसें अंग्रेजी- वाला कहेगा वाद महाराष्ट्र बंगाल कहेगा सबके पीनी केवल फारसी पढा कहेगा शंका होय तो पातवाण देखें वणिक तथा अश्वपतादिकके. साथही असि ? मसीए ऋषी ३ कर्म संसारमें चलताहे व्यापारी वगेर अन्य वर्णका निर्वाह जर संसारधर्म चलणा उसवारहे व्यापारीतो र वर्णके सारे प्रायें नहीं रह सकतेहे वाकी तो अपणे २ कर्मकर्ता नही होवे तो प्रलयका- लकी मर्यादा हो जातीहे जैनशास्त्रमें मुख्यप- णेकर च्यार संज्ञा करके प्रजाकी स्थिती वांधी हे राज्यकाजके दमपासकोका उग्रकुल संझाहे।
(१६) संसारी गृहस्थियोके षोमस संस्कार करी गृहस्थी गुरू की नोग कुलसंज्ञाहे । राज्यकर्त्ता- के परवारवालोकों राजन्य कुल संज्ञाहे ३ शेष सर्व प्रजा व्यवहार शिल्प कर्मादिकर्ताको भत्रिय संझाहे ४ इन च्यारोंही वर्ण व्यवस्थासें वर्जित सर्व मोह कंचनकामनीके त्यागी निक्षा नोजी वो जती साधू इन च्यारोही वर्णवालो- का संसारसे उधार करणेवाला गुरूहे वणिक व्यापारी लोकोकों चाहीये अच्छा शुध व्यापार करणा जिससे धर्मकू विरोध नही आसके इस बातपर श्राद्धविधीमें एसी गाथा लिखीहे ॥ गाथा ॥ ववहारसुछिदेसाइ विरुच्चाय - चियचरणेहिं तोकुणइ अत्थचिंतं निचाहिंतो निरं धम्मं ॥ अर्थ-याने गृहस्थ श्रावक धन पैदा करणेसंबंधी विचार करे उसमें तीन वात- पर जरूर ध्यान रखना चाहीये एक तो धन वगेरह जमा करणेका साधन जो व्यवहार उसकी निर्दोपता रखणी रुजगार करते वरवत मन वचन काया सीधा रखणा कपट नही क- रणा जिस देसमे रहता होय उस देसमें मांने हुये लोकविरुध कृत्य नही करणा तीसरे उचित कृत्य जरूर करणा इन तीन वातोंका विस्तार (१३) हन आगे करेंगे इन नीन बातोंको दिखने रखता हुवा धनकी चिंता करणी चौथी ये वान दे अपने जो पहले अंगीकार कीया नन नियम मोलोतो बस उनकी संन्ना नकसी हलकेनी हरकत नही लगणे देणा नारने एली चीज थोनी होगी तो धन न निन्द सल्ती होय इताले बुजिन पुलाने सब वरेने यननके साथ धन जमा करणायन चिंता करणेका हुन्न भागम देगा नही दाग मनुष्य मात्रा अनादि कालकी परिगृह संज्ञान अपने कोंने प्रेरणासें जीकरताहे केवची कथित आगम एले नावच व्यापारमें जीवादी प्रवनि किलवाते करावे पूर्वनिचित अनादि संज्ञालें करते हुये यननं बाधा नही आवे एनी आज्ञा जिनागम देताहे खोक जितना बारबों व्यनों से रानविन संसारी कान नाचतारे इसके लाख हिल्ले जो बचन धर्म को तो तोक्य निवणा बासी रहे मनुष्यकी आजीविका ? व्यारार विद्या ३ खेती गाय बकरा बगेरे गुटका पावणा ५ खानद६ सेवा र मिला ये तान उपाय- होतीदे उन्दर्ने वाशिक खोक गशरने वैछ ज्योतनी न्याक- (१७) रणी बेदपाठी प्रमुख अपणी विद्यासें आजी- विका करतेहें जाट कुणवी प्रमुख खेतीसें गो- बाल धनगर राईके राउलोक गाय वगेरेके रक्ष- 'हामं चितारे सुनार सुथारकू यादि लेकर व. होत लोक अपनी कारीगरीसे नोकर चाकर वगेरह मेवासें नर निक्षारी लोक निक्षासें अपणी र आजीविका करतेहैं उसमें घी तेल घांन कपास मृत कपमा तांबा पीतल वगेरह धातृ मोती जबागड़ित रुपीया पेसा मोहर वगेरह किरियाणेके नेदसें अनेक तरेके व्या- पारहे तीनसे माठ नेद किरियाणेकेहे उर अंग्रेजी राज्यकी चीलांनी व्यापारमें अनेक किस्मते इसीवाम्ते श्राविधीकी टीकामें लिखा दे पेटेके नेद गिणना चाहे तव तो व्यापारकी मंक्षाका पार नही यातादे व्याजवट्टानी व्या- पाग्मंदी गिणा जातादे योपध रस रसायण चूर्ण अंजन वास्तु शकुन निमिन सामुजिक धर्म अर्थ काम ज्योतिप तर्क प्रमुम्ब नेदनं ना- नाप्रकारकी विद्यान इनामे एक तो वैद्यक विद्या र यतार पसागपागा ये दोय रुजगार बुग ध्यान होणके कारण विशेष गुणकारी पाणेके नदी कोड धनवान वेमार पमे अथवा एमानी (१ए) दुसरे प्रसंगम पसारीकू वैद्यकू बहोत लान उर मान मिलताहे सोही वात वैद्यकमेंनी जि- खताहे-रोगकाले पिता वैद्य-अर्थात् बेमारी हो- णेपर वैद्यबापसेंनी ज्यादा मालम देताहे रो- गीका मित्र कोण वैद्य राजाका मित्र कोण हांजीहां हजूर सच फरमातेहे एसा कहणे- वाले संसारके पुखसें मरे हुयेका मित्र कोण मुनिराज उर धन खोवेठे हुये आदमीका मित्र कोण ज्योतषी व्यापारमे व्यापार गांधी याने पसारीकाही सरसहे कारण टकेमें रवरी- दी हुई चीज वखत पमने पर सोटकेमें वेचताहे वैद्यकू पसारी लान र मान वहोत मिलताहे इसवास्ते एसा कारण पाया जाताहे जिसकू जिस रुजगारमें ज्यादै लान मिलताहे तो वो जीव वेसा कारण हमेसां चाहताहे सोही बात नीतीमें लिरवीहे योछार सिपाही रणसंग्रामकी चाह ररवताहे वैद्य धनवानके बिमारीके आरा- मीकी चाह रखताहे ब्राह्मणलोक अपणे जजमानकी मरणेकी चाह रखताहे ॥ उहा-नोजगपूवेव्याहविरतर्फे नाइपुबेसून ॥ जैनमुनिसुखशांतापूठे ब्राह्मणपूडेमुंडे ॥ १ ॥ मनमे धन जमाका जोनि केवल इच्छावाला (१०) वैद्य धनवानकी मांदगी चाहतेहे जिनके पास जर कोइनी इटम कला धन पेदा करणे नही दें निकेवल वैद्यपणेकीही आजिविका जाणतेहें नन वैद्योकी एसी बुद्धि प्रायें रहतीहे केइएक जरे हकीम रोगोकी वृद्धिधन लेणकेवास्ते कर देतेहें एसे कुकर्मकर्ता वैद्योकें दया दिलमें कब होसकतीहे केश्यक वैद्य निकेवल स्वार्थीयेही होतेदे सो खाणेकोनी मोहताज साधर्मी अ- नाथ मरणेवाला एसोंकानी धन लेलेतेहैं जो वैद्य मदिरा प्रमुख अन्नक्ष चीज मिली हुई. द- वाई खिला देतेहें अनेक जीवोकों दवाइके काममै लेणको मारणेवाला द्वारिका नगरीका प्रथम धन्वंतरकी तरे नरकका पात्र होताहे जिसके कर्तव्यका वयान विपाकमूत्रमेंदें एसी वैद्यक्रिया नही करणे योग्य हे अब अ धर्मार्थी वैद्यके लक्षाण एसे हानेदं गुमलक्ष आर्य वैद्यक शास्त्रका जांगकार उचित लोन करणेवाला गेगीका कष्ट देखके दिलमे दया लागेवाला मुपात्रोकी विशेष परिचर्या करणेवाला जेसे ऋपन देवका जीव जीवानंद वैद्यके नवमं कोढी माधृका कोढ मिटाया पसा तेसंदी स्वर वैद्य महावीर स्वामीकी कानकी शलाका निकालणे.
- (२१) वाला वैद्य पुन्यक्षेत्रकी बंदगी करणेसें ब्रह्मदेव लोक गया हिंसक उग चोर परस्त्रीवैस्यागामी लौमेबाज दगाबाज एसें अदम्योकों अच्छा कर- सें वो पापी जो पाप करताहे उसका हिस्सा वैद्यकू मिलताहे पुन्यवंतका पुन्यका मिलताहे लेकिन हमारी समजसें तो हम एसा जाणतेहे इस वैद्यकी आजीविकाकू ध्रिग रहे कारण- ध्रिगवैद्यस्यवैद्यत्वं परःखेन खितः ॥ जीवितो नाग्य योगेने मृतोवैद्येनमारितः॥१॥ धिक्कार हो वैद्यकी आजीविकाकू सो पराये पुरवसे पुरवीहे जीवे तब तो कहतेहे हमारी उमर लंबीथी मरणेसें लोक कहतेहें इय वैद्य दवा देताथा सो मार दीया ? जेर फेर एसानीहे ॥ रोगका- ले पितावैद्य मध्यकालेचमित्रवत् ।। स्नानकालेनवेत् शत्रु वैद्यस्यत्रिविधागतिः ॥ १ ॥ रोग जिस वखत रोगीकू शताताहे उसवरवत वैद्य वापसें- नी ज्यादे मालम देताहे उर फायदा होणेके बीच में मित्रकी तरे स्नान रोगके अंतमे करणेके वखत वैद्य कुस्मन मालम देताहे वैद्यका तीन हालहे लेकिन धन्वंतरि जेसे अंग्रेजी माकट- रोका यह हाल नही प्रथमतो इनोका राज्या- धिकार होणेसें सबसे ज्यादे वातरी हुकमत है () PM करतेहे पुसरे मासिक पगार राज्यसें मिलताहे नषधी बणाणी नही पमती पैसानी रईसका लगताहे जो बुलावे फी देवे देसी वैद्योंको तो मूर्व लोग बदनांमीनी देदेतेदे माकतरोके सां- मने चूं नही करते वैद्यक क्रियाके संपूर्ण शास्त्र- का जाणकार होय सो वैद्य संसारमें उत्तम गिणा जाताहे सोही लिवाहे ॥ व्याधेः तत्व परिझानं वेदनायाश्चनिग्रह ॥ एतद्वैद्यस्यवैद्यत्वं नवधनरायुषः ॥ रोगकू जालणा उस रोगकू मिटाणेवाली उषधीका देणा वैद्यपणेकी इतनीही खूबीहे लेकिन वैद्य आयु देणे समर्थ नही रोगी जबही आराम होताहे जब च्या- रोही पायें पूरेही मिलतेहे जेसे रोगकी परि- भाकारक वैद्य वेसीही दवाई जो कनी पूराणी दवा चाहीये उर नई मिले नई चाहीये उर पुराणी मिले अथवा वणाणेमें कसर रहजावे तो दवा अमृतरूपत्नी जहिर होजाती हे तीसरा रोगीका परचारक निगेंदास्तीवाला पूरा हिये कहे मुजब हिफाजत रखे चोथा रोगी वैद्यके कहे मुजव दवा लेवे र पथ्य करे तन्नी पुरस्त होजानाहे इन च्यारोंमैसें एकमेंनी क- सर होगी तो यारामी नही होगीअसाध्य जव चा- - जाणा जावे तो उपचार वैद्यकू करणा अंगीकार- ही न करणा कदास रोगीके स्वजन बहोत आ: ग्रह करे तव असाध्य दशा कहणेवाला दवा देवे तो वैद्यकू दोष नही रोग तीन तरेसे हो- ताहे पूर्वकृत पापके उदरसें वो दवाइसे मिट- नेवाला नही उसका इलाज ध्यान जप पुन्य सुफ की नक्ति प्रमुख धर्महे? उसरें मावापके जो रोग होताहे सो संतानके होताहै अथवा कुष्ट आं- । स्व पुरवणा खाज सीतला वोदरी सुजाक फिरं- गादिक संसर्गीहोताहे इसवास्ते नलशली संस- गंज कहलाताहे । इसका इलाज संसर्गजकाहे नलशली मिटणा मुसकिलहे ३ तीसरा कायक तथा मानसक रोगहे मिथ्या आहार मिथ्या विहारसे वात पित्त कफादिकसे होणेवाले तेसे काम शोक नयसे होणेवाले जिसमें साध्यका इलाज सहज हे कष्ट साध्यका इलाज पुरवें हो- ताहे असाध्य रोग त्याज्यहे देश क्षेत्र काल अवस्था उर अग्निबलकू विचारे फेर अधर्मकू नही प्राप्त होणेवाला इलाज करे ज्योतष निम- तादिक शास्त्रसें आजीविका करणेवाले पुरषकू यथार्थ फलही कहणा चाहीये जो फलित शा- स्त्रमें लिखा होवे नास्तिकादिकोने अपणे क- ( २४ ) ल्पित शास्त्रों में फलादेश ग्रहोका नही मानाहे अनेक कुयुक्तियां लगाकर फला देशकी नास्ति- ता सिझ करीहे हमने प्रत्यक्ष प्रमाणसें केश्यक ज्योतपी देवेहे सो विगर प्रश्न कीये उन आये पुरपकी मनचिंता बात कहतेहे हेमावादमें पंच पक्षीका पढादुवा ज्योतपी अन्नीविद्यमांनहे इस विद्याका पठन पाठन कम होणेसें ज्योत- पीयोकी बात कम मिलती ये दोप शास्त्रोका नही पढा हुवा होवे तो सत्य कहणा मिलताहे सूर्यप्रकप्ती चंप्रझप्ती ज्योतिप करमादिक गणित शास्त्रहे नवाहुसंहिता चूमामणि प्रमुख फलादेशके शास्त्रहे नगवान महावीर सर्व कहतेहे हे गौतम ग्रहादिकोके शुन अशुन्न फल जो में कहताहूं वो मनुप्योके पूर्वकृत पापपुन्यके फल मनुप्योके जांणनेवास्ते इन ग्रहोके निम- त्तसं प्रकास करताहुँ शुन्नाशुन फल ग्रहोका नही किंतु स्वकृत कर्माकाहे निमित्तके आठ अंगदे दिव्य ? नत्पात २ अंतरिक्ष ३ स्वर ४ शकुन ५ स्वप्न ६ सामुडिकादिक नेद करके इन सबोके होणेमें पांच समवाय कारणहे निमित्त कहो चाहे आदिकारण कहो सोही अनेकार्थमें लिखाहे ॥ निमित्तद्देत्वायतन । (२५) प्रत्ययोत्थानकारणै निदानमाहूपायै प्रायूपं- येनलक्ष्यते ॥ १॥ निमित्त ? हेतु आयतन ३ प्रत्यय ४ उत्थान ५ कारण ६ निदान ये सब पर्यायवाचक नामहे जिसकरके होनेवाले अहवाल पहले मालम् होवे उस निमित्तके इतने नाम एकार्थका कहणेवालाहे इन ग्रहोकी क्रूर दशा जव आवे तब अशुन कर्मका उदय आया एसा समजाके अगरे दोसरहित तीर्थ- करकी नक्ति पूजा सुसाधूकी सेवा शील नत तप शुननावनायुक्त जप करे जेसा नवाहू स्वामीने नवग्रह शांतिस्तोत्रमें लिरवाहे उनके वर्ण जेसाही अनाथ दीन दुःखीयोकों दान करे ग्रहोके आमतीये वणके जो पोरषत्री निक्षा- की उगाइ करे उनोंसें सावचेत रहे उरनी जो संसारी कार्य साधनके अनेक शास्त्रहे उसकूँ सुणता उर पढता हुवा हंश जेसी तत्वबुद्धि हेय ज्ञेयपणा करे उपादेयतो सर्वथा प्रकारे आप्तका वचनरूप शास्त्रहे सोही करे नंदी सू- में जिरवाहे मिध्याश्रुत सम्यक दृष्टि वांचे तो सम्यक शास्त्र होके परिणमे उर सम्यक शास्त्र मिथ्या दृष्टी वांचे तो॥ मिथ्यात्वमइपरणमें यमुक्तं नीतौ ॥ उपदेशोहिमूरवाणां प्रकोपायन (२६) शांतये ॥ पयपानझुजंगानां केवलं विषवमनं ॥१॥ मूर्व उपदेशनिश्चे करके क्रोधकेवास्ते होय शांतिकेवास्ते नही जेसें अमृतरूप दूध सांपकू पिलाणेसे निकेवल जहरकूहीवांव एसांजांणना जेनोक्त शास्त्र आचार्योंके रचे सब तरेके मोजुद्दे वणे जहांतक उनकाही परिचय करे तो मि- ध्यात्व नही वधे सब पुरषोकी बुद्धि हंस जेसी नही जेसे कहाहे ॥ कुसंगासंगदोषेण काष्टघंटा विटंबना ॥ अगर सम्यकतत्व जिसकू पहली प्राप्त होगयाहे एसोकी बुद्धि कुसंगसें अस्तव्यस्त नही होती हे जेसे कहाहे ॥ हीयोहोवेहाथ कुशंगीकेतामिलो चंदनभुजंगासाथ कालोना होयकिसनीया ॥ १॥ सुसाधू पंमित चतुरों की संगतही श्रेष्ट हे ॥ कहानहोयसत्संगसे देखोतिलठरतेल जातिवर्णसव मिटगयो पायो नाम फुलेल ॥ १ ॥ अब खेती तीन तरेकी होती हे एक तो वरसाद के जलसें होणेवाली दूसरी कूवा नदी तलाव वगेरोंके जलसें तीसरी दोनोके जलसे होणेवाली गाय भंस ऊं घोमा बकरी वलद हाथी वगेरे जा. नवगेके पालणेस जो आजीविकाकरणी सो पझुरक्षा वृत्ति कहलातीहे वो जानवर बहोत
(२७)
तरेके होतेहे खेती र पशुरक्षा वृत्तिसें आजी-
विका करणा विवेकी पुरुषोके लायक नही
कहाहे हाथीयोके दांतोमें घोमोके खुरोमें राज्य
लक्ष्मीहे बलदोके खंधोपर रखेतोकी लक्ष्मीदे
तरवारकी धारपर सुभटोकी लक्ष्मीहे सजे उर
शिणगारे हुये स्तनोंपर वैश्यायोकी लक्ष्मी रहती
हे कदास कोई सरी आजिविका नही होय
उर खेतीही करणी पमे तो वोणेका समय
बरावर ध्यानमे रखणा तेसेंही पशुरक्षा वृत्ति
करणी पमे तो मनमें बहोत दया रखणी कहाहे
जो करषणी बीज वोणेका समय जमीनका नाग
विचार किसमें केसा पाक आवे एसा विचार
जाणे रस्तेके ऊपर खेत होय सो बगेम देवे
तब लान होताहे धनके वास्ते जो पशुरक्षण
करता होय तो दयाके परिणाम गेमणा नही
खसी करणा नाक बींधना आप जाग्रतपणे
करके विच्छेद वर्जना अब शिल्पकला सो
जातकीहे कुंभार सुतार लुहार चित्रकार नर
वस्त्रकार इन कारीगरोके एकेक पेटेके वीस २
नेद गिणणेसें सो होतेहे र न्यारे कारी-
गरोकी गिणतीसें शिल्पके अनेक नेदहे आचा-
र्यके उपदेशसे होणेवाली शिल्प कहलातीहे
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(२०)
मुख्य पांच शिल्प ऋषन देवके हुक्मसें चलत'
आयाहे आचार्यके उपदेश विगर लोक परं रा.
चलता आया खेती व्यापार सो कर्म कहलाता
हे खेती व्यापार पशुरक्षावृत्ति कर्ममे गिणे
वाकी सब कर्मादिक शिल्पमें आजातेहें पुरषोंक
स्त्रियोंकी कलाने कितनी एक तो विद्यामें कि
तनी एक शिल्पमें श्राजातीहे कर्मोका सामा-
न्यसे चार प्रकारहे बुझिसे काम करणेवाले उत्तम
हाथसें काम करणेवाले मध्यम पगसे करणेवाले
अधम र सिरसें बोजा उगके काम करणेवाले
अधमसे अधम जाणना बुझिसे काम करणेवा
पर दृष्टांत जिरवतेहें चंपा नगरीमें मदननांमे ध.
नसेउका लमकाथा उसने बुद्धिवान आदमीसे
पांचसों रुपे देकर एक बुछिली दोजणे लमते
होय वहां स्वमा रहणा नही जब मित्रोने ये
वात सुणी तो मस्करी करणे लगे बापनेनी
उलंना दीया तब मदन पीठा रुपे लेणेकू शिक्षा
पीजी देणेकू गया तब बुझिवानने कहा तूं जो
एसा कबूल करे जहां दोजणे लमते होय वहां
रखमा रहूंगा तो रुपे पीग देदेताहूं उसने कबूल
करी रुपे पीछे दिये एकदिन रस्तेम दो सिपाड
यापसमे लम्तेथे मदन वहां रखमा रहा था-
(ए) खिर उन दोनोनें मदनकू गवाह बनाया र कहा जो मेरी गवा नही नरेगा तो तेरी खबर खूगा दोनोंने एकांतमे धमकाया मदनने बा- पसें कही इतनेमें तो दोनोंने फरियादकी पो- लिसके अंदर मदनकू गवा लिखाया बापने देवा गेकरेकू ये उष्ट मार मालेंगे घनराकर सही बुद्धिवानके पास गये उसने कहा लारव रुपे लूंगा बचादूंगा तब सचहे मरता क्या नही करता तब वेसाही दिया उस बुझिवानने नसकों सिखाया तूं पागलपणा पहलेहीसे क- रणे लगजा एसेंही कीया करणेसें बचगया एसाही हाल इस वरवतमें बमे अंग्रेजी पढे हुये बाल्स्टरोका देवणे तर सुणणेमे आताहे इसको बुछिका कमाणा कहतेहे इसवजे बुधि- वानीके मुले अनेक दृष्टांत यादहे लिखनेसें ग्रंथ वढजायगा ज्यादे देखणा होय तो अनयकुमार रोहिक वगेरोके चरित्रसें जाणना जिसमें मति झानसंबंधी च्यार बुद्धि होतीहे सो उत्पातकी १ वैनेयकी कामकी ३ पारिणामकी ४ वो अदमी वरखत पमनेपर प्रत्युत्पन्न मति होताहे ग्रागंके तो नालिक में मानेमें मातेने () - मुख्य पांच शिल्प ऋषन देवके हुक्मसें चलता आयाहे आचार्यके उपदेश विगर लोक परंपरासे चलता आया खेती व्यापार सो कर्म कहलाता हे खेती व्यापार पशुरक्षावृत्ति कर्ममे गिणे गये वाकी सब कर्मादिक शिल्पमें आजातेहें पुरषों स्त्रियोंकी कलाई कितनी एक तो विद्यामें कि तनी एक शिल्पमें श्राजातीहे कर्मोका सामा- न्यसे चार प्रकारहे बुद्धिसें काम करणेवाले उत्तम हाथसें काम करणेवाले मध्यम पगसे करणेवाले अधम र सिरसें बोडा उगके काम करणेवाले अधमसे अधम जाणना बुछिसे काम करणेवा पर दृष्टांत लिखतेहें चंपा नगरीमें मदननांमे ध- नसेठका लमकाथा उसने बुझिवान आदमीस पांचसों रुपे देकर एक बुछिली दोजणे लमते होय वहां स्वमा रहणा नही जब मित्रोने ये वात सुणी तो मस्करी करणे लगे बापनेनी उखना दीया तव मदन पीठा रुपे लेणेकू शिक्षा पीजी देणे• गया तब बुझिवानने कहा तूं जो एसा कबूल करे जहां दोजणे लमते होय वहां खना रहूंगा तो रुपे पीग देदेताहूं उसने कबूल करी रूपे पीछे दिये एकदिन रस्तेमें दो सिपा यापलमे लमतेथे मदन वहां रखमा रहा था- । कहा (ए) खिर उन दोनोने सदनकू गवाह बनाया जर जो मेरी गवाइ नही नरेगा तो तेरी खबर लूंगा दोनोंने एकांतमे धमकाया मदनने बा- पसें कही इतने में तो दोनोंने फरियादकी पो- लिसके अंदर मदनकू गवा लिखाया बापने देवा नोकरकू ये उष्ट मार मालेंगें घनराकर जसही बुद्धिवानके पास गये उसने कहा लारव रुपे लूंगा बचादूंगा तब सचहे मरता क्या नही करता तब वेसाही दिया उस बुद्धिवानने उसको सिखाया तूं पागलपणा पहलेहीसे क- रणे लगजा एसेंही कीया करणेसे बचगया एसाही हाल इस वरखतमें बने अंग्रेजी पढे हुये वाल्स्टरोका देखणे उर सुणणेमे आताहे इसको बुद्धिका कमाणा कहतेहे इसवजे बुद्धि- वानीके मुळे अनेक दृष्टांत यादहे लिखनेसें ग्रंथ वढजायगा ज्यादे देखणा होय तो अन्नयकुमार रोहिक वगेरोके चरित्रसें जाणना जिसमें मति ज्ञानसंबंधी च्यार बुद्धि होतीहै सो उत्पातकी १ वैनेयकी कामणकी ३ पारिणामकी ४ वो अदमी वरवत पम्नेपर प्रत्युत्पन्न मति होताहे आगूंके तो नालिक वचन एसें सुणनेमें आतेहे अग्रिम बुध्विणिकजन पिबल बुधिविप्र सदा (३०) सुबुझिसे बमा तुरतबुद्धि तुर्क ? लेकिन कोई अपेक्षा आश्री कोइ इनोंमे किसी क्षेत्र में होवे तो ताजबनही इस वरखत तो बुद्धि उर उद्यम नर संप उर लक्ष्मी साहस उर धैर्य उर शौर्य सर्व आश्री अंग्रेजोकी जितनी तारीफ करें जितनीही थोमीहे एसाहे तनी तो नारतके तीन खमके बादस्याह वणे हुये विजय मंका वजा रहेहें अगले जमानेके इतिहास वाचणेसें खूब निश्चय मालम देताहे इस आर्यावर्त्तवालोमें ये सब बातें पाये जातीथी अगर फेरनी वि- द्याका पठन पाठनकी वृद्धि होजाय तो ऊपर लिम्वी सब वात होणी मुसकिल नही अंगरे- जोन जोजो काम हासिल कीयाहे सो वि- द्यावुछिके उद्यमसेही पायाहे पारलामिन्ट सन्ना जोयाज विद्यमानमे इंगल्सि देशमे लंदन राज- धानीमेढे ये बात नइ नहीहे राजा श्रेणकके राज- गृही नगरीमंनी पांचसे प्रधानोकी कौशलसना जिसमें मुख्य मंत्री राजाका पुत्र नंदानामकी वैस्य जातकी राणीका अंगजात च्यारोंही यु- छिका धगणवाला अनय कुमारथा व्यापार तेसें 1:५वाले लोक हाथसे कमाणेवाले जांणना • चपगमी कामीद वगेरह पगांसे कमा-
(३१)
वाले जांणना वोऊ उगनेवाले वगेरे लोक
सिरसे कमाके खातेहे अव नोकरीली च्यार
तरेकी होतीहे ? राजाकी २ राजोंके अमलदार
लोकोंकी ३ श्रेष्ट साहुकारोंकी ४ चोथे सब
जातिवालोकी राजाकी नोकरी रातदिनपर
वसता नोगणी पमणेके कारण हर किसीसे बण
आणी मुसकिलहे सोही बतलातेहे अगर नोकर
बोले नही तब तो गुंगा कहलाताहे जो खुल्ला
जबाब देता हुवा बोलेतो बकवादी कहलावे जो
नजीक उठा रहे तो धीवा कहलाताहे जो दूर
बेवा रहे तो बुझिहीन कहलाताहे मालक कहे
सो सव सहन करे तो कायर कहलाताहे जो
नही सहे तो कमजात कहलाताहे इसवास्ते
योगी लोकनी जिसकू नही जाणसके एसा
सेवाधर्म परम गहनहे जो अपनी बढोतरीके
नास्ते सिर नीचे झुकावे अपणी आजीविका-
वास्ते प्राणनी देणे तयार होय सुखकेवास्ते
उरवी होय एसे नोकरी करणेवाले आदमी
जेसा कोण मूर्व होगा पराइ नोकरी करणी सो
श्वानवृत्ति जेसीहे एसा केश्यक लोक कहतेहे
लेकिन हम तो जाणतेहे कुत्तेकी वृत्तिसेंनी
लोककला तोल स्वसामंद करता
(३२) डर नोकर तो मस्तक झुका २ कर खुसामद करताहे जब किसीनी तरह गुजरान होता नही दीखे तब नोकरी करकेनी निर्वाह तो करणाही चाहिये लिखाहे बमे श्रीमंतषं तो व्यवहार करणा चाहीये थोमे धनवालोकू खेती करणी उर जब कोइनी उद्यम न मिले तो तब आखिरकू नोकरी करे समऊवार उपगारका जाण जिसमें दातार गुण होय जिसकीही सेवा करणी कानका कच्चा नही होय सूरवीर कीये हुये उपगारका जांण अपणा सत्व ररवणे- वाला गुणपर प्रीति रवणेवाला एसा मालक नोकरकू पुन्यसेंही मिलताहे कठोर क्रूर विसनी लोनी नीच बहोत दिनोका रोगी मूर्व नर अझानी अन्याइ एसें अदमीकी तावेदारी नही करणी जो आदमी विवेकरहित राजाके पाससे धन लेणेकी इच्छा करताहे वो पुरुष पांव प्याद- ल सो योजनकी मजल करणा चाहताहे अ- र्थान् ये वात वमीही मुसकिलहे ।। उहा-नदीनीररमृर्वधन हरकोडहरलेत । बलिहारीनृपकृषकी गुणविनवृंदनदेत ॥१॥ कामंदकीय नीतिमाग्मंनी लिवाहे व य- 1 वृरू पुम्पकी मम्मतीनं चलणेवाला (३३) राजा सत्पुरपोके मानने योग्य होताहे खराब चाल चलणके लोक कली बुरे काम करणेकी सल्लाहनी देवे तोनी राजा माने नही इसी- वास्ते लोकोंमें ये वातकी कहणा वटहे रावणके पास साहूकार प्रधान सल्लाह गीर नहीथा तबही तो लंकाका राज्य उर ज्यांन खो वेग हमारी समऊसें तो इसपर इतनाही कहणा वटहे अन्याईकी जय नही होती मालककू चाहीये नोकरके गुणके माफक उसका आदर- सत्कार करणा क्योंके अ उर बुरे सबोंकों एक जेसे गिणणेसें जो उद्यमी साहसीकहे उन नोकरोका दिल खट्टा होजाताहे सुणतेहेकी महेश्वर राजाका दिवान टीपू सुलताण नोक- रोका बमाही कदरदानथा इसवास्ते दक्षिण प्रांत देशोका मंगलीक राजा वणगयाथा नोक- रोकों चाहीये सो नक्ति उर चतुराश्में सावचेत रहे नक्तिवान होय लेकिन बुद्धिहीन उर का- यर होय तो कोण कामकाहे उर बुद्धिवान सूर- वीर नोकर होय उर नक्त मालकका नही होय तो मालकके क्या कामका इसवास्ते ये तीनोही गुण नोकरमें चाहीये तब राजाके संपत्कालमे उर विपत्कालमें वो नोकरका मलहे ये तीन - (३२) तर नोकर तो मस्तक झुका २ कर खुसामद करताहे जब किसीनी तरह गुजरान होता नही दीखे तब नोकरी करकेनी निर्वाह तो करणाही चाहिये लिखाहे बमे श्रीमंतकू तो व्यवहार करणा चाहीये थोमे धनवालोकू खेती करणी र जब कोइनी उद्यम न मिले तो तब आखिरकू नोकरी करे समऊवार उपगारका जांण जिसमें दातार गुण होय जिसकीही सेवा करणी कानका कच्चा नही होय सूरवीर कीये हुये उपगारका जांण अपणा सत्व ररवणे- वाला गुणपर प्रीति ररवणेवाला एसा मालक नोकरकं पुन्यसेंही मिलताहे कठोर क्रूर विसनी लोनी नीच बहोत दिनोका रोगी मूर्व उर अज्ञानी अन्याइ एसें अदमीकी तावेदारी नही करणी जो आदमी विवेकर हित राजाके पाससे धन लेणेकी इच्छा करताहे वो पुरुप पांव प्याद- ल सो योजनकी मजल करणा चाहताहे अ- न ये बात वमीही मुसकिलहे ॥ उदा-नदीनीग्रमृर्वधन हरकोऽहरलेत । बलिहारीनृपकृषकी गुणविनवृंदनदेत ॥१॥ कामंदकीय नीतिमारमेंनी लिरवाहे वो अ- 1 वष्ठ पुरुपकी मम्मतीले चलणेवाला 1 (३३) राजा सत्पुरपोके मानने योग्य होताहे खराव चाल चलणके लोक कनी बुरे काम करणेकी सल्लाहनी देवे तोनी राजा माने नही इसी- वास्ते लोकोंमें ये बातकी कहणा वटहे रावणके पाल साहूकार प्रधान सल्लाह गीर नहीथा तबही तो लंकाका राज्य उर ज्यांन खो बेठा हमारी समझसे तो इसपर इतनाही कहणा वटहे अन्याईकी जय नही होती मालककू चाहीये नोकरके गुणके माफक उसका आदर- सत्कार करणा क्योंके अउर बुरे सबोंकों एक जेसे गिणणेसें जो उद्यमी साहसीकहे उन नोकरोका दिल खट्टा होजाताहे सुणतेहेकी महेश्वर राजाका दिवान टीपू सुलताण नोक- रोका बमाही कदरदानथा इसवास्ते दक्षिण प्रांत देशोका संमलीक राजा वणगयाथा नोक- रोको चाहीये सो भक्ति उर चतुराइमें सावचेत रहे नक्तिवान होय लेकिन बुझिहीन जर का- यर होय तो कोण कामकाहे उर बुद्धिवान सूर- वीर नोकर होय उर नक्त मालकका नही होय तो मालकके क्या कामका इसवास्ते ये तीनोही गुण नोकरमें चाहीये तब राजाके संपत्कालमे जेर विपत्कालमें वो नोकरका मलहे ये तीन (३४) गुण विगर नोकर नपूंसक जांणना राजाप्रसन्न होय तो चाकरकू मांन र बमाइ देताहे ले- किन चाकर तो राजाकेवास्ते अपणा प्राणजी देदेतेहे नोकरोडूं एसा विचार करणा चाहीये मनुष्य एसा चतुर र साहसीक होताहे सो सांप सिंघ हाथी एसे २ जानवरोंकू वसकर लेताहे तो राजाकू वस करणा क्या बनी बातहे अकलवंतोकों मालक केवाये तरफ बेपणा मा- लकके मूंके तरफ देखणा हाथ जोमणा मालक- की तासीरकों पहचानकर काम करणा नोकरों- को याद रखणा चाहीयेकी दरबारकी सन्नामें वहोत नजीक नही बेठे बहोत दूरनी न बैठे मालकके वरावर आसन नही बेठे ज्यों चान्नी नही बेठे तेसे आगे बहोत नजीक तेसेंही पिठामीनी नही बेठे नजीक बहोत बेठे तो मालक• बुरा लगे दृर बहोत बेठे तो बुधिहीन बजे अगामी नजीक बहोत बेठे तो ऽसरे• बुरा लगे र पिठामी वेठे तो मालककी नजर नही पमे इसवास्ते हमने लिखा उस वजे वेवणा मालक अपना थका होय नृख प्याससे पीमित होय क्रोध होय कोइ काममे रुका हुवा होय उम वखन कोइ अग्ज सरी कराणी होय तो ( ३५) नहि करे उसीमोकेकी बात होय उर नही अरज करणेसें आगे विगाम होणेका काम होय तब बहोत आजीजीसाथ बात वाकव कर देवे जेसे गुमानसिंहवेद प्रधान सुगनकुवर पारवती- जी पमदायतकी लमकीका देहांत होणेसें वी- कानेरके नूपति राठोम सिरदारसिंहजी जव दसराहेकी सवारी तथा नोजन कीया नही तब बमे शोकातुरोंकों हेतुयुक्तियोसें समझाकर राज्यकार्य करवाया पीछे राजा साहिबनें उस प्रधानकी बहोत तारीफ करी अगर मुझे नही समजाता तो उर राजपूतोमें मेरी लघुतांश मालम पमती के बीकानेर महाराज पमदाय- तकी संतानवास्ते दसराहा नही कीया कारण रामचंकी दिगविजय लोकीकमें दसराहेकी मांनतेहे तबहीसे राजालोक दसराहा करणा सरू कराहे राजालोक इस दिनकू वमा मंग- लीक गिणतेहे इसीतरे अपणे मालककू सम- झापा चाहीये इसीतरे राजाकी माता पाटराणी कुमर मुख्य मंत्री राजाका गुरु उर द्वारपाल इनोके संगनी राजाकी तरेही वर्तावा रवणा जेसे कोई अक्कलहीण एसा विचारे इस अंगा- रकू मेने सिलगाश्हे अथवा मेंही खायाहुं सो (३६) मुके ये बालेगी नही एसा समजाके अग्निसे आ संगतपणा करे तो क्या अग्नि बाले विना बोमे तेसेंही विचारे मेने इनको हिकमतसें राजदिखायाहे एसा समऊके जो राजाकी अवज्ञा हुकम अदूली करेगा अंगली राजाके लगावेगा तो राजा विगर सजा दीये नही रहता इसवास्ते जेसे वो प्रसन्न रहे हवे नही एसा चलणा किसी अदमीको राजा बहोत मानता होय तो दिलमें गर्व नही करणा कारण वहोत अहंकार विनासकर देताहे इसपर एसा दृष्टांतहे दिल्लीके बादशाहका वमा वजीर मन- में एसा समजणे लगाके ये रासत मेरेही आ- धारसे चलतीहे ये गर्वकी वात नस वजीरने किसी उमरावके सामने करी वो वात वादशा- इतक पहुची वादशाहने नमकी वजीरायत नारकर एक मोचीके सुप्रतकरदी वो सही करणेकी जगे लोहकी वींधणी जो मोचीयोके जूते सीनेकी होतीहे उसकी करता मतलब राजा जिधर नजर करे उससेही काम लेकर नमकू बधा देताहे केयोको बधाया नर वधातेहे राजाले प्रसन्न होणेस एश्वर्य वधना कोण वनी बातदे सांगेका स्वेत दरियाव अपने कुटंबका (३७) नरण पोपण जीवोंकी प्रतिपालणा र राजाकी महरबानी इतनी चीजें तुरत दरिज दूर कर दे- तीहे विक्रम संवत जगणीससे चोदेकी गदरमें जिनोने बने ५ अंग्रेजोंकी ज्यांन वचाइ वो अन्नी दलज त्यागके वमे ऋधिवंत विद्यमानहे सुखकी चाह करणेवाले एसे अनिमानी लोक राजा वगेरोकी नोकरीकी बेलासक निंदा करो लेकिन राजाकी नोकरी विगर स्वजनका उझार उर शत्रुका संहार होताही नही कुमारपाल राजा नागाथा तब वो सिर ब्राह्मणने सहाय दीयाथा जब वरवत पाके पीग राजा हुवा तब उसी वरवत उस ब्राह्मणकू लाट देशका राजा बनायाथा जित शत्रु राजाका पोलिया एक वरवत राजाके सांपका उपजव दूर कराथा उस राजाके लमका नहीथा अंतमें उस देवराज द्वारपालकू राज्य देकर राजाने जैन दीक्षा ले- कर सिकिपदपाया मंत्रवी नगरसेठ सेनापती वगेरोका सब काम राजाकी नोकरीमें समा जाताहे मंत्री प्रधान वजीर प्रमुखका काम व- होत पापमईहे र फलन्नी कमवाहे वणे जहां- तक श्रावककू वर्जना चाहीये काहे जिस प्रदमीके जो शिकार मान कीमा जाने (३०) समें वो चोरी कन्याविगर रहे नही जेसे प्रनु- दान जोसीकू जोधपूरके राजा मानसिंगजीने कहा एसा कोई आदमी ला सो काम सुप्रत करें लेकिन खावे नही तब अरज करी कललाऊंगा उसरेदिन सोनेकी मबीयांमें सालगराम नामका गंगकी नदीका पत्थर मालके लेगया राजाने कहा प्रनुदान वो अदमी लाया या नही प्रजुदान बोला हाजरहे आप एकांतमे पधारें एकांतमे लेजाकै सालगराम दिखलाया राजा बोला ये क्याहे प्रजुदाननें अरज करी गरीब परवर कल आपने फरमायाथा रखावे नही एसा कामेती- लाणा तव मेंने वहोत तलास कीया सो पेट सबके नजर आया उर पेट होगा सो खाये विगर रहेगा नही आखिरको सालगरामजी एसे मालम दीये सो इनके सामने जो कुछ घरा जावे कुठनी स्दावे नही आपके हुकम मुजव हाजर कीया इस दृष्टांतसें एसा पाया जाताहे सो अपणे २ कसबके सब चोरहे न्या- पवंततो हक्क वाताहे वे हक्क नही खाताहे हक्क खाणेमें वरकतनी वहोनहे इसवास्ते हक खाणेवालाही श्रेष्टहे लेकिन उनियांम आज- कल ड़वा रुजगार फेल गया सच बोलणे- (३ए) वालोंके फाके पमतेहे इसपर कबीरजुलाईका दृष्टांतहे जेसें कबीर जुलाहा प्रायें विवहारीक झु- कम वोलताथा पगमीवणाके बाजारमेवेचणेगया असलीदाम पांचरुपेकहे सबदिन फिरा किसी- ने तीन किसीनेसाढेतीन च्यारसे आगे नहीवढा पूंजीमेंनी घाटा पमे जांण वेचा नही जब म- कानपर आया कवीर संग्रह नही रखताथा लाता तो खाता पूंजी काय मरखताथा दूसरे दिन उस पूंजीकाही सूतलाके वेजावणता रातर्फे नूखा रहा तब किसी पमोलणीने ये वात जांण के शिक्षादी र कहा कवीर तेने एनमोल क्यों वताया सात रुपे कहनेसे पुनियां नफेके संग पघमी विक जाती कवीर उसरे दिन वेसाही कीया तब वोही पघमी बव रुपेमें उसरे दिन विकगइ तब कवीरने घर आके एक उहा कहा।। मुहा-साचेजगपतियायनही शेजगपतीयाय।। पांचरुपेकीपाघमी बवरुपये विकजाय ॥१॥ इस वजेका अब वरतावा हमारे देसवालोनें अपणी पत गमाणे उर ये नव उर परनव वि- गाम्नेकों कर रख्खाहे सच्चा बोलणेका विवहार सबसे उत्तम र वरकत करताहे इस नवमें पेठ परनवमें गुनाहसें वचणा वाजे सहर - L - ।
(४०) दिल्ली लरवणेन आगरा कासी जेपुर आदिके व्यापारी एक रुपेकी चीजके बूटतेही दसरुपे कहतेहें लेणेवाला कहांतक घटायगा क्या ये गुप्त पुन्य नहीहे सिरप दिलराजी करतेहे इहां वरकत नही आगू फल खोटेहे अठहो चाहे सच्चहो लेकिन अंगरेज व्यापारीयोंकी ये सत्य- ता वमीही नारीहे सो अपणे हाफरा तथा सापोंमें जिस चीजका जितना दाम कहतेहै उतनाही लेतेहे चाहेवालक जावे चाहे वह हमारे देशके व्यापारीयोकों ये अक्कल कब आवे- गी श्रावककू चाहीये सर्वथा प्रकारे राजकाज नही बोमसके तो कोटवालीका उहदा जेल अप्सरता सीमापालपणा महापापका कारण स- मऊके निर्दऽ आदमीसे वणे एसाहे वणे ज- दांतक इनोमें त्यागका प्रयत्न करे कारण ऊपर निरवेये हुदेदार पटेल चोधरी किसी आद- मीळू, सुख कमही देता होगा अपराधी सजा देणा तो राजाका धर्मदे लेकिन इन जोकोके सपाटेमें वाजे निरापराधी सुपात्रोंकी. नी पुर्दसा होजातीहे जब वो कसुरदार नही होवे नव नो सजा देणेवाला केसा पापी ठहर- नद्रे हमने कवार मुपात्र नर वेकनृग्दागेकी प (४१) पुर्दसा देवीहे कसूरदार जिसका नाम लेवे वो निरापराधीनी इन ये हुदेदारोंके हाथ सजा- पातेहें इसवास्ते दयावंतको एसे कामोंसें बंच- णा चाहीये राजकाजके सबयहुदे ज्यादे करके फिकरकी जगहे जो कली राज्यका अधिकारी श्रावक होय तो जेसें वस्तपाल तेजपाल विमलमंत्री प्रथ्वीधरकी तरें मुनियांमें अच्छी कीर्ति होय एसे काम चलाणा अन्नी जैपुर राज्याधिपती सवाई रामसिंगजीके सामने वीकानेरका गोला माणकचंद अश्वपतिने जेसी धर्मकर्म र नियम निन्नाया साधर्मीयोको आजीविका सर लगाया इतना राज्यकार्यके कारण थोना वरवत मिलणेपरन्ती जिन पूजा पमावस्यक कीये विगर अन्न जल नही लेताथा जो आदमी पापमझ राज्यका- जकी हुकमत पाकर सुकत नही संचतेहे तो वो अदमी क्या लेजायगें क्योंकी राजाकी महर- बानी नित्य वणी रहेगी एसा जांणकर किसीसे वैर विरोध करणा नही राजा अपणेकू कोइ काम करणा सोंपे तो राजाके पास ऊपराऊ- परी मनुष्य मांगणा चाहीये वणे जहांतक स- म्यग् दृष्टी राजा श्रावकहीकी नोकरी करणी (४२) उचितहे क्योंके ज्ञान दर्शनवाला एसा किसी जैन श्रावगका दासन्नी रहणा श्रेष्टहे उर मि- थ्यात्वपणेकरके मूर्ख एसा राजा चक्रवर्तिकीनी नोकरी करणी अच्छी नही किसीनी तरे निर्वाह नही होता दीखे तब सम्यक्तके पच्चरखाणमें ॥ वित्तीकंतारेणं एसा आगार राख्याहे जिससे वेसोकीनी नोकरी करतां अपनी शक्ति र यु- तीसें स्वधर्मका कष्ट दूर करणा जेसे विजय- पुरनगरमें विजयशेन राजा वमा मिथ्यात्वीथा नस राजाके चंऽदत्तनांमे मंत्रवी बमा विचक्ष- गाथा सत् गुरुके संयोगमें सर्व कथित धर्मकी वाकव कारी होणेसें एसा जिनधर्मपर दृढ श्रमां होगइ सो अन्यकु देवोके वंदन पूजनका निय- म कर लीया एकदिन राजासें कथा नट्ट ब्रा- ह्मणने ये बात कही नब राजा इस वातकी परिक्षा करणे• हुकम दीया हे मंत्री कल ह- मारे जन्ममहोच्छवकी वर्षग्रंथीहे सोदेवकी पूजा करणकुं तुमकू जाणाहोगा पृजापेका सर्व सा- मान उत्तम प्रव्य तुमारे गृहपर नोकर लोक गजरदम लेकर दाजर दायर्ग मंत्रवीने हाथ जोन कहा नथान्तु प्रनान होतेही सामान जी अष्ट व्यादिक हाजर नया देग्ब पमा वस्यक (४३) जब कर चूका तब राजाके हुकम मुजब अब उननोकरोके संग चला विष्णु गृहपर पहुंचा उहां जाकर अंदर प्रवेश करतेही अपणेपास जो कुप्पट्टाथा सो जहां विष्णु र लक्ष्मी वि- राजमांनथे उनोंके दरवाजेपर पदाकरके एक पहरेदारकों वाहिर वेठला दिया उर उसको कहा अंदर कीसीको जाणे मत देणा उहांसें पूजापा योंकायों संग लेकर देवी अष्टादस भुजीके गृहपर पहुंचा वहां अंदर जाके देखतेही दरवाजे दोनो बंध करके एक पहरा नंगी त- लवारका उहां बेठा दिया उर कह्या किसीकू अंदर मत जाणे देणा उहांसे निकलकर विना- यक गजाननके गृह पहुंचा अंदर जाके देखकर सांठगेकी कमव मंगाकर मंदिरमे ढिगकर दीया उहांसे निकलकर रुक गृहपर पहुंचा अंदर जाके देखकर एसी स्तुतिका काव्य पढा ॥ यतः ॥ अकंठस्यकंठेकथंपुष्पमालां ॥ विनानासिकायांक- थंगंधधूपं अकर्णस्यकर्णेकथंगीतनादं ॥ अपादस्य पादेकथंमेप्रणामं ॥१॥ आगे जैन मंदिर गया जिन मंदिरमें प्रवेश करके अंदर देखतेही पंचागप्रणामकर एसी स्तुति पढणे लगा यतः॥ प्रशमरसनिमग्न एता स्तुति पढके (४४) वष्टियुग्मप्रसन्नम् वदनकमलमंकः कामिनीसंग- शून्यं करयुगमपधत्ते शस्त्रसंबंधबंध त्वमसिजग- तदेवो वीतरागस्त्वमेव ॥ १॥ एसा कहकर यतनके साथ निर्जीव जमीनपर शुद्ध जलसें स्ना- नकर केशर चंदन कर्पूर कस्तूरी घसकर चोपमत वस्त्रसें मुख नर नाककी वाफ बंधकर सुदर्शन तिलककरके उत्तरासण धारकर पूजा विधीसें पूजा करणेलगा तब गने हलकारे जो खबर निवेशीयोकू राजा इस वातकी खबर लेणे ने- जेथे ननोने सव अहवाल हजुरमें मालम करदी जव पीठामीसें मंत्री अव्य पूजा विधीसे करच- का नव नावस्तवमें एसें स्तुति करी ॥ त्वाम: व्ययं विनुमचिंत्यमसंख्यमाद्यंब्रह्माणमीश्वरमनंतम नंगकतुं योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेकं झानग्व- रुपममलंप्रवदंतिसंतः ॥ १ ॥ वृष्म्त्वमेव विबुधा- चिनबुकिंवोधात् त्वंगंकरोमिनुवनत्रयशंकरत्वात धातानिधीशिवमार्गबिधविधानान व्यक्तत्वमे- वनगवन्युमपानमोमि ॥ २॥ यावम्सही पाठ कदकर मंदिग्मे निकलका गजाके पास पहुंचा गजाने पूछा क्या तुम देवपूजा कर आये मंत्री वाला जी हजून कोनमे देवकी पूजा की हमने तो मुणी के नंगे गजानं पृठा
(४५)
आना सो
देवकी मंत्री पूजा कर रहा हे तब मंत्री बोला
हजूर आपने कल हुकम दीयाथा देवकी पूजा
कल तुम कर
के
हजूर
जिसमें देव
पनेके लक्षण मिले वहांही पूजा करी कुदेवो
का नाम लेकर आपने कहा नही था तब
राजा बोला तुम किस २ जगे गये क्या क्या
कीया देव कुदेव क्या बात हे सो बतलावो
जब मंत्री बोला स्वामी नंगा वो कहलाता हे
जो की आपके स्कंदपुराणमें लिखा हे जो देव
नाम धरा के ऋषीयोकी स्त्रीयोकू देख कर काम
के वस अंधा होकर नग्न होकर नाचणे लगा
तब तापस लोक एसी कुचेष्टा देखकर क्रोधमें
आकर श्राप दिया अरे पापिष्ट तेरा लिंग टूट
पमे तब लिंग कट कर गिर पमा उस लिंग…
नगमे स्थापन कीया हुवा निर्बुधि लोक केश्यक
गले में पहना करते हे केश्यक पूजते हे इस्से
ज्यादा नंगाफेरकोन होगा सो साक्षात्कार
नघामा जग र लिंग कटा हुवा पूजते हे
स्वामी एसी कामकुचेष्टा कारक को कोण बुधि
वान देव तारन कह सकता हे हे स्वामी मेनें
तो जिसवीतरागकी पूजा करी सो जिसके
कोश्त्तरेका कामकुचेष्टा अथवा नग्न पनेका
(४६ )
निशाननी नहि मूर्तिमें मालमदीया जर नही
उनअर्हत परमेश्वरकू कनी किसीने नग्न देखाथा
जब राजत्यागके योग लिया तब गहनावस्त्रादि-
क सबका मोहत्याग दीयाथा उर नग्न नहीं दी
रखतेथे उनके जीवनचरित्र सुनोगे तब हे राजेंड
सव अज्ञानके पट खुलकर आप्त इश्वरकू जाणो
गे जिसके पास नतो राग मोहकाचिन्ह स्त्री हे
उर नढेपका चिन्ह शस्त्र हे उत्कृष्ट समतारसमे
मन प्रसन्न हे दोनुदृष्टीजिनाकी ध्यान धारे
हुये चोरासीयोगके आसनमें मुख्य जो पद्मा
सनधारे हुये एसेंपुरपही शंशारसमुडके उधार
करणे• नौका समान हे क्योंके जो देव आप
ही कामरूप अग्निकुंभमें जलरहाहे वो अपने
सेवकोकं शांतिपद क्यादेसकताहे जो पत्थरकी
नाव यापहीमबजातीहे वोमरेकू केसेंतारके
पार पोहचावेगी में आपके हुक्ममें पूजाका
सामान लेकर विष्णुके घरगया आगे देखातो
विष्णु अपणीस्त्री• बगलमैलियेहुवे शंशारके
विपयवामनाम प्राप्तथा तव मेने देखा कोइनी
अदमी अपनी स्त्रीसें एसीकुचेष्टाकरताहोय
कदाम अकस्मात किमीकी नजरपम्जावेतो
अदमी स्विमुंचकर पीवालोटजाताहे क्योंकी
(४७) नीतिमें लिवाहे नलाआदमी वाहीहे जोपरा यापमदा ढके इसवास्ते हेराजेंड पूजनीकपुरष होके एसी कुचेष्टा कमौके वसकरनेलगजावे तब मेनें परदा ढकदीया पहरा इसवास्तेविन लाया सो ठेर कोइ भूलके चलाजावेगा तो इनोकी लज्या जावेगी नहांसे देवीकेगृहमें गया तो नहीं एसादेखने में आया वोचमी किसी अदमीका खूनकीयाथा सो उसकामस्तक रखून कारता हुवा हाथमें लेरख्वाथा इसवास्ते स्मृती यो लिवाहेकी रखूनीको गिरतारकरना फेरएसा हालदेखने मेंआया एकआदमी नीचापटक रक्खाथा उसआदमीका लिंग उसदेवीके नगमें लगारख्वाथा उसलिंगकी जोरसे देवीकी जीन बाहिर निकलपमीथी सबहाथोमें नंगे शस्त्र लेर- रवाहे चाणक्य नीतिशास्त्रमें लिखाहेकी ॥श्लोक।। नदीनां च नरवीनां च शृंगीणां शस्त्रपाणिनां विश्वासो नैवकर्तव्य स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥ १ ॥ इसवास्ते क्यानरोसा खुनीका उरनी किसीकू मारमाले इसवास्ते राज्यनीतिके कायदेके माफक केदकर नंगीतलवारका पहरा लगवा दिया अब हजूरके दिलमें आवे सोकरे मेंतो कायदेकी कारवाई करणेवालाई उहांसे आगे गजाननके (४७) गृहमें गया तों हाथी वेठा देवा मेने विचारा इनोके लायक पूजा चरणेकेवास्ते सांठगेकी कम बसे ज्यादे क्यानेटधरूं कारण लोकीककहना वटनीहे के देवजेसीही पूजा. लेकिन एक बमीही ताजवकीवाततो येदेखी के इतनामोटाहाथी जिसकेचढणेको चूहा ये विचारा केसेंजवासकता होगा कोश्कहेगाकी येचूहानी बलवानथा तो क्या विनायकसेंनी ज्यादे बलवानथा या कम कारण प्रत्यक्षमें देखतेदे मनुष्यकू उगनेवाले जानवर मनुष्यसे वलवानहोतेहैं जब गजानन से बलवानथा तवतो नंदरमेंनी निर्वल गजानन उहरा दुसरे हेराजेंड आपने कनीगणेशपुरा पनी मुना होगा जिसमें विनायककी नत्पत्ति इसनरमं लिखीदे पार्वती नमा एकदिन पीजी करके यंगकामल ऊतारकर एकमेलका पुतलावना कर नसमें ज्यांन मालदी जबबो हाथजोमकहने जगा हे माना क्या हुकमहे नवपार्वतीबोली में नानकग्नी न पढ़ागदे किमी अंदग्मनयाने देना पार्वती नग्नहोंके स्नानकग्नेलगी इतने नांगधग मद्यमें मम्न एमा मद्देश्वरयाया नन्ग- कदान जमकं गेका तब दोनोके याप ममे :: आंगन माने त्रिशूलमं नमका सिर काट -- (ए) माला जर अंदर चलागया पार्वती ललितहोकर वस्त्रसे अंग ढककर क्रोधमें आके त्रटककर बोली तुम एसें अचानक एकाएक केसें आगये मेने । पहरा बिठलायाथा उसके रहते आप केसें आये महेश्वर बोला में उसकू मार आया सुणतें ही पार्वती हाय २ कर रोणे लगी उर रुजकू कहा तूं सुळे मुं मत दिखला तब लाचार रुख हाथ जोमके बहोत अरजी ओर आजीजीसें कहणे लगा हे सुंदरी तेरा वियोग पुःखसे में महावित तेरे दासके तरफ जरा कृपाकटाक्ष- कर जो अज्ञानपणेसें अपराध हुवा सो माफ कर मैंने नही जाणा के ये तेरा पुत्रहे एसा कहकर पार्वतीकू प्रसन्न करणेकू नाचणे लगा तब नवानी बोली मेरे पुत्रकों जीता कर नही तो तेरेसें मेरे काम नही तब महादेव तीन लोक ढूंढ लीया लेकिन उसके सिरका पता नही मिला तब देवी के कहणेसें किसी हाथीका कटा हुवा मस्तक लगाकर जीता कीया इति गणेशोत्पत्ति । रखेर हे राजेंज टुक जरासी वातपर उक्त देवोके चरित्रसें आप तो बुद्धिवांनहे क्या अद्भुत कहा- नी पूजनीक गणेश जर महेश्वरकीहे बमा ताजब एक डर सुणो जब पार्वतीका विवाह .
(५१)
हुवा धर्मकी प्राप्ति राजाकू करदी इसी तरे जो
कनी अपणा निर्वाह किसी सम्यक दृष्टिवंत
समकितीके घर थोममें होता दीखे तो बणे
जहांतक धर्ममें हरजाणा पोहचाणेवाला मिथ्या
त्वीकी नोकरी नहि करे अब निक्षासें आजी-
विका किसतरे जीव करतेहें सो कहतेहें निक्षा
मांगणा गृहस्थीकू किसीनी तरे योग्य नहीं
लेकिन आफत् काल वहोत बुरा होताहे सोही
कबीरके लमकेने कहाहे ॥ नूरवसें कामनी काम
तज देतहे नूरखसें पुरष तज देत नारी जूरवसें
व्याव नर यज्ञ रहजातहे नूरवसे रहे कन्याकु-
मारी नूरवसें पुरपका तेज घटजातहे भूखसे
दमीकी बुहारी कहतकबीर कमालका बालका
वेदवेदांगसे नूरख न्यारी ॥१॥ इसवास्ते इसके
वस लाचारीसें नीख मांगणी किसी कारणसे
पमती हे प्रथम तो इस कामकू श्रावक आदरेही
नही ये निक्षा सोना धातू वगेरह अनाज वस्त्र
इत्यादिक चीजोकी अनेक तरेकीहे वो निक्षुक
तीन तरेकेहें उसमें सर्वसंग परिग्रहके त्यागी
मुनिराजकी जो निक्षाहे सो धर्मकेवास्ते काया
रक्षणार्थहे आहार ? वस्त्र २ काष्टपात्र ३ उष:
धीपादि निक्षा उचितहे मुनिराजकू ये नि-
(५३) स्वाणेवाला नित्त परधर सोणेवाला इन तीनोका जीवतव्य वृथाहे मांगके खाणेवाले आदमीमें इतने अवगुण प्राप्त हो जातेहे याने बेफिकर हीया शून्य बहुत खाणेवाला आलसु र बहोत निघालू तेसेंइ निक्षावृत्तिवाले के प्राये तो धन होता नही जो कदास कुछ होजाय तो वो निक्षुक उस व्यका उपनोग नही ले स- कता न निक्षाके धनसें बरकतहे विद्यमांनका- लमें निक्षासें अव्यपात्र श्रीमाल ब्राह्मन इष्टिमें केश्यक आतेहे लेकिन ये लोक सब जन्म (५५) मांगणेवालोंकी बुद्धि केसी होतीहे श्रीहरिना चार्य पांचमें अष्टकमें तीन प्रकारकी निक्षा लि- रखीहे सर्व शंपत्करी १ पौरपानी उर वृत्ति-. निक्षा ३ इसतरे तीन प्रकारकी निक्षा लिखीहे गुरुकी आशामें रहे हुयें धर्म ध्यान वगेरे शुन आचरणमें प्रवृत्तमांन याने जावजीव सर्वआरंनसे निवृत्ती प्राप्त हुये एसे यती साधूकी निक्षा सर्व शंपत्करी कहलातीहे ? अब उसरी पोरषत्री निक्षा कहलातीहे सो ज्ञान र व्रत गुन्नक्रि- यारहित नाममात्र जती जिनके पास शुष्म जतीवेषनी नही धर्मकू कलंक लगे एसी चाल चलणेवाले जो श्रावकका कोईली कांम साधने लायक नही ऐसों पुरषोकी निक्षा पुरषार्थकू नाश करणेवाली पौरपानी कहलातीहे इनके नेद उरनी एसें। खटदर्शनी दस नांमके सामी दंभी गुसांई योगी कबीरी दादू नानकके उदासी निर्मले गरीबदासी रूखम सूरखम अनेक कि- स्मके नेपधारी सवज्ञान र क्रिया करकेहीन विषयलंपट गांजा चिलम चमस फूंकणेवाले व्यर्थ घूमणेवाले धूणीमें लाखों जीवोका धम- साण करके तपसी वजणेवाले जो लष्ट पुष्टपणे नीरव मांगके खातेहे वोनी पौरषनी निक्षा कह- 1 - (५७) उहा-रुजगारकरतोटोटालागे गांठरवायतोवीते।। राघोचेतनयोंकहे मांगरवायसोजीते ॥१॥ कालकुसम्मेनांमरे वांनणवकरीऊंग ॥ वो मांगेसवजातने वेचरजावेलूंठ ॥२॥ जती क्या नांमगुण मतीनसोचेकोय ।। पांचो इंजीवसकरे सञ्चाजतीसोहोय ॥३॥ सच्चाजतीसोहोय विषयरतपाझपटीया ।। करेपानसिणगार रखेनोगणकूलटियां कहेरामऋघिसार झानविन विगमीमत्ती ॥ खायहरामीमाल नहीवेसच्चाजती ॥५॥ जंगम अरु योगी सरस रस नोगी सन्यासी समाजीवण लोकनकू उगेहे सिरकू मुंमवाय मारे किसीकोनकाजसारे पेट निजनरणकाज द्वार । नगेहे नस्मी केश्यक धरे मट्टीके तिलककरे झूठेकदारही मिथ्यामत लगेहे ऋफिसारत्या- गधार सुधजतीगुरुसंनार एसे नेवनगतमे कुमतिपंथजगेहे ॥ १॥ इसवास्ते जो जो मूर्ख साधूनांम धराके साधूपणाकी क्रिया करके रहित शरीरमें पुष्ट होकर दीन होकर नीख मांग पेट भरतेहे उ- नोका पुरषार्थ नासकू प्राप्त होजाताहे उन एसें रखधारीयोंको चाहीये सो अपणे कुलकू लंबन - (५ए). कथंचित् सातुकर्पणे आयव्ययेनृभृगेहे निक्षायां तु कदाचन ॥ १ ॥ पूरी लक्ष्मी व्यापारमेहें वो लक्ष्मी थोमी कर्षाणमेहे राजद्वारमें आवंद उर खरच दोनोंहे उर फेर नीखसेती कनी लक्ष्मी होतीही नही निकेवल पेट नराश होतीहे इसवास्ते मनुस्मृतीके चौथे अध्यायमें इसवजे आजिविका करणी लिखीहे ऋत ? अमृत २ मृत ३ प्रमृत ४ र सत्यानृत ५ इतनी तरे आजिविका करणी लेकिन नीचकी सेवा करके पेट नराइ नही करणी बजारमे विखरे हुये दाणे चुगणा सो ऋत कहलाताहे उर विगर मांगे जो मिले सो अमृत कहलाताहे ये अमृत निक्षा मनूकी लिखी हुइ प्रायें जैन जतीयोंमें दिखतीहे कारण जती लोग गृहस्थके घर जातेहे तब याचना नही करतेहे गृहस्थ पात्रमें अपनी इच्छा माफक अर्पण करतेहे सच्चहे परमहंसव- त्तिवालेनी मांगते नही सच्ची उर पूरी परम- हंसगतितो तीर्थकर जिन कल्पवालोकेंही च्छद- मस्थ नावमें होतीहे उर मांगणेसे मिले सो मृत कहलाताहे खेतीसें जो मिलताहे सो अ- मृत कहलाताहे र व्यापारसे जो प्राप्त होवे सो सत्यानृत कहलाता लक्ष्मी नही तो विष्णु- .
-- - (ए) कथंचित् सातुकर्षणे आयव्ययेनृभृगेहे निक्षायां तु कदाचन ॥ १ ॥ पूरी लक्ष्मी व्यापारमेहें वो लक्ष्मी थोमी कर्षाणमेहे राजद्वारमें आवंद उर खरच दोनोंहे उर फेर नीरवसेती कनी लक्ष्मी होतीही नहीं निकेवल पेट नराश् होतीहे इसवास्ते मनुस्मृतीके चोथे अध्यायमें इसवजे आजिविका करणी लिखीहे ऋत ? अमृत मृत ३ प्रमृत ४ उर सत्यानृत ५ इतनी तरे आजिविका करणी लेकिन नीचकी सेवा करके पेट नराइ नही करणी बजारमे विरवरे हुये दाणे चुगणा सो ऋत कहलाताहे उर विगर मांगे जो मिले सो अमृत कहलाताहे ये अमृत निक्षा मनूकी लिखी हुई प्रायें जैन जतीयोंमें दिखती कारण जती लोग गृहस्थके घर जातेहे तब याचना नही करतेहे गृहस्थ पात्रमें अपनी श्च्छा माफक अर्पण करतेहे सञ्चहे परमहंसक- त्तिवालेनी मांगते नहीहे सच्ची उर पूरी परम- हंसगतितो तीर्थकर जिन कल्पवालोही च्छद- मस्थ नावमें होती उर मांगणेसे मिले सो मृत कहलाताहे खेतीसें जो मिलताहे सो अ- मृत कहलाताहे उर व्यापारसे जो प्राप्त होवे सो सत्यानृत कहलाताहे लक्ष्मी नही तो विष्णु- -- मालम कर देतीहे व्यापारके अंदर विवहारकी शुद्धि अव्य ? क्षेत्र २ काल ३ उर नाव इन नेदोसे च्यार प्रकारकीहे जिसमें अव्यसे तो पनरे कर्मादानका कारण एसा किरियाणा सब तरेसें श्रावककू गेमणा चाहीये धर्मकू पीमा करणेवाला उर लोकमें अपयस पैदा करणेवाला एसा जो किरियाणा बहोत मुनाफा मिलता होय तोजी पुन्यार्थी पुरपोकू गृहण नहीं करणा चाहीये तयार कीया हुवा सूत वस्त्र नगदी सोना रत्न धातू वगैरे जो निर्दोष किरियाणाहे सो विवेकी आचरे जितना व्यापारमें आरंन पाप कम होय तेसा हमेसां चलणा कनी काल- कुसमयमें उसरी तरे निर्वाह नहि होता दीखे तो बहोत आरंन एसा व्यापार तेसेंही कठोर कर्मनी करे तोनी कठोर कर्म करणेकी मनमें इच्छा नही रखणी एसाही प्रसंग आ पमे तो करणा पमे तब आत्माकी साक्षी तथा गीतार्थ गुरूके सामने उस बातकी निंदा करणी तेसेंही मनमें लज्जा रखकरकेही एसा काम करणा सिद्धांतमें नाव श्रावकके लक्षणमें कहाहे सु- श्रावक तीन आरंन वर्जे उस विगर निर्वाह नही होता होय तो मनमे तीन आरंजकी (६३) वो शास्त्रोमें लिखे हुये बोमणा नावसे व्यापारके बहोत नेदहे भत्री जातिके व्यापारी तथा राजा इनोसें थोमानी कीया व्यापारमें नफा पाणा मुसकिलहे अपणे हाथसें दीया हुवा । पीछे मांगणा मुसकिल होताहे मर रखणा पमताहे जो देणेका व्यापार समझाते इनहीहे लेकिन सरकार अंग्रेज जो कुब साहूकारोसें लेणदेण करतेहें उसमें हरजाणा नही करतेहे अ- दालत व्याजकी निगरी रुपे सश्कमेसें ज्यादे नही देसकतीहे इमानदार क्षत्री तथा रइससे ले- णेदेणेका विवहार उनोकी पेवप्रतिति जाणके क- रणा शस्त्रधारी वेश्मांनोकू कदापि उधार नही देणा जंगल जाटन जेमीये चोरस्तेमे साह रांधमकदिय न मिये मयां होय कुराह ? श्रेष्टवणिये व्यापारीकू चाहिये सो क्षत्रिय व्या- पारी तथा ब्राह्मण व्यापारी शस्त्रधारी दिवाल- रखोरोसें उधार लेनदेन न करे फेर मांगणेसें जो वैर विरोध पीनेसे करे एसेकू उधार नहि देणा उधार देणेसें माल खरीदकर रखनेसें वरखत आणेसे निश्चे तो मुनाफाही मिलताहे कदास असली रकम वसूलायतमें तोटा जाण पके तो तुरत वस्तु बेचदेणा चाहिये, कदास व्यापारमें -- (६५) फूसका अंत अपार गिरवीपर व्याजके रुपे ज्यादे होगये होय तो उस स्पीकू नोटिस देकर जताकर मुद्दत जो नोटसमें लिखे वो वीतनेपर च्यार मोतबर गवाह रखकर वेच देणा चाहीये नोटिसकी नकल पास रखणी चाहिये उधारमें जो नुकसाणी पोहचतीहे उसपर दृष्टांत कहतेहे जिन दत्तनांमें एक सेठ जिसके एक वे समऊ लमकाथा मुग्धयाने नोलाथा बापके प्रताप लीलालहिर करताथा अच्छे कुलकी कन्यासें उस मुग्धकी सादी करदी सेठ जस मुग्ध लमकेकू इस तरेकी सीखदी हेबेटा सबजगे जीनकुं दांतोका पमदा रखणा ? किसीकू व्याजवास्ते रुपे उधार देणा तो पीठी उघराश नही करणी बंधनमें पनी हुइ उरतकूही त्रास देणा ३ मीगही नोजन करणा ५ सुखसें नींद लेणी ६ मुलक २ मे घर करणा 3 वेस्याके जाणा तो प्रनात समय जाणा ७ जुआ खेलणा तो अपणे शृंगारित चित्रशालीमे वेलणा ए बासी नही खाणा ताजाही खाणा १० गयामेंही जाणा ग- यामेंही पीग आणा ११ मिठाइ खाणेका व्यसन परजाय तो हलवाश्के घरपर जाके खाणा १२ दरिल अवस्था आ जाय तो खाटु उर मकराणे (६७) जहां प्रीति उर आदर दीवे उहांही जीमणा जहां प्रीति नर आदरहे निश्चे समकाणा वोही जोजन मीमहे ॥ उहा-वारिवोलावणवेसणो वीमोअरुबहुमान ॥ जीणघरपांचववानही सोघरजांणमसान॥१॥ आवनदीश्रादरनही नहीनयणामेनेह ॥ जिणधरकदीयनजाश्ये जोकंचनवरसेमेह॥२॥ आवकरेादरकरे दिखमेधरेसनेह ॥ तिणसज्जनघरजाइये जोपत्थरवरसेमेह ॥३॥ अथवा जब नूरख लगे तब नोजन करणा सो मीग लगताहे विगर पचे खाणेसे रोगो- त्पत्ति वैद्यक वचनहे सुखसें सोणा मतलब जिस जगे किसीनीतरे कष्टउपजवकी शंका नही होय उहांही रहणा सो सुखसे नीजा आवे लोकीकमेंनी सात मुख कहतेहे पहली सुरव निरोगी काया जा मुख घरमे हुय माया तीजामुख सुथानवासा चोथा सुख राजमे हुयपासा पांचमा सुख कुलवंती नारी ठा सुखपुत्र आज्ञाकारी सातमा मुख धर्ममे मति शास्त्र सुकृत गुरुपंमित यती इतना मिले स्वर्गमे वास ये सातोंही पुण्यप्रकास ? अथवा जब
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(७१) ने क्या मांगू में निक्षुक नही मेरे पुरषार्थसें कमाणेसे में च्यार टकेमें राजा नोज हूं राजा बमे आश्चर्यमें आकर एवालसें पूजणे लगा ज्यार टकेमें तूं राजा नोज किस तरेसेहे सो मुले वतला एवाल कहणेलगा देख च्यार रुपे महीना कमाता हूं रुपयाकू किसी २ देसमें टका कहतेहे सो एक रुपयाको नाज एकमण आताहे जिससे मेरी स्त्री शंतानादिका उदर- पोषण करताहूं दूध उर घी वलीता उर कंवल विगनेकी टटी ये सब एवमसे मिलताहे एक रुपया स्त्री पुत्र पूत्री उर मेरे वस्त्र सीवाइ रंगाइ धोती वरतण खरचमें लगाताहूं पाव रुपया ति- वारवार पाव रुपया व्याह खरचका न्यारा रख- ताहूं पावरुपयामें पाहुणा मिजमांन स्वजन संबंधीयोका अलायदा रखताहूं पाव रुपया शरीरमें रोगादिकके इलाज वैद्यके वास्ते जुदा धरताहूं दो आने कुलधर्मके गुरुनके दांन नि- मित्त अलायदे धरताहूं दो आने देव तथा मं- दिर धर्मशाला दीनपुरखीयोके दांन देनेवास्ते ररवताहूं वारे आणा खजानेमें जमा इसवास्ते मेरे किसी बातपर (७१) नं क्या मांगू में भिक्षुक नही मेरे पुरपार्थसें कमाणेसें में च्यार टकेमें राजा नोज हूं राजा बमे आश्चर्यमें आकर एवालसें पूरणे लगा घ्यार टकेमें तूं राजा नोज किस तरेसेहे सो मुझे वतला एवाल कहणेलगा देख च्यार रुपे महीना कमाता हूं रुपयाकू किसी २ देसमें टका कहतेहे सो एक रुपयाको नाज एकमण आताहे जिससे मेरी स्त्री शंतानादिका उदर- पोषण करताहूं दूध उर धी वलीता उर कंवल विगनेकी टटी ये सब एवझसे मिलताहे एक रुपया स्त्री पुत्र पूत्री उर मेरे वस्त्र सीवाश्रंगार धोती वरतण खरचमें लगाताहूं पाव रुपया ति- वारवार पाव रुपया व्याह खरचका न्यारा रख- ताई पावरुपयामें पाहुणा मिजमांन स्वजन संबंधीयोका अलायदा रखताहूं पाव रुपया शरीरमें रोगादिकके इलाज वैद्यके वास्ते जुदा धरताहूं दो आने कुलधर्मके गुरुके दांन नि- मित्त अलायदे धरताहूं दो आने देव तथा मं- दिर धर्मशाला दीनमुखीयोके दान देनेवास्ते रखताहूं वारे आणा खजानेमें जमा करताहूं इसवास्ते मेरे किसी वातकी कमी नही में क्या ' बातपर तेरेपाससे व्यर्थ दान लूं तब राजा (७५) करी लेकिन किसीनेनी नही बतलाया तब राजाने निकाल दीया सो मारे आपदाके यहां आयेहे तूं कुछ जाणताहे तो क्तला इतना सुनतेही जंगली बोला इस वातका क्या में वतासकताहूं उन मुत्सद्दीयोनें खूब निश्चयसें पूग सच्च वतादेगा जंगली बोला सच्च वताउंगा तिलनरका फरक नही जंगली मनमें विचारणे लगा वो सवार निश्चे राजा नोजथा लेकिन अब राजाका जो हुकमहे वोही करणा चाही- ये तव मुत्सद्दीवमी आजीजसे पूजणेलगे वतला च्यार टकेमें राजा नोज कोणहे जंगली बोला कोटि सोइनये दे तो राजाकू तुमारी कही वात समझा देताहूं जब नुमारा राजा कहदेवे तब ले लेऊंगा तुम वणिक हो सुतलवी जातहो किसी कविने कहाहे ॥ उहा-वमोपकमोवाणीयो तातोलीजेतोम ॥ जोधीरजसूंकांमले लेवेकंठमरोम ॥ १ ॥ वाण्यांथारीवांण कोश्नीनरजाणेनही ॥ पाणीपीवेगण सेंधागटकाकरे ॥२॥ इसवास्ते प्रतिझा करो तो राजाके सामने अव्य धराके फेर राजा नोज च्यार टकेमें पेस करूंगा सचहे ॥ मुत्तलबरी मनुहारने तजी मावे (७५) करी लेकिन किसीनेनी नही बतलाया तब राजाने निकाल दीया सो मारे आपदाके इहां आयेहे तूं कुछ जाणताहे तो वतला इतना सुनतेही जंगली बोला इस वातका क्या में वतासकताहूं उन मुत्सद्दीयोनें खूब निश्चयसें पूग सच्च वतादेगा जंगली बोला सच्च वताउंगा तिलनरका फरक नही जंगली मनमें विचारणे लगा वो सवार निश्चे राजा नोजथा लेकिन अब राजाका जो हुकमहे वोही करणा चाही- ये तव मुत्सद्दीवमी आजीजसें पूजणेलगे वतला च्यार टकेमें राजा नोज कोण जंगली बोला कोटि सोश्नये दे तो राजाकू तुमारी कही वात समझा देताहूं जब तुमारा राजा कहदेवे तब ले लेऊंगा तुम वणिक हो मुतलवी जातहो किसी कविने कहाहे॥ उहा-वमोपकमोवाणीयो तातोलीजेतोम ॥ जोधीरजतूंकांमले लेवेकंठमरोम ॥ १ ॥ वाएयांथारीवांण कोश्नीनरजाणेनही ॥ पाणीपीवेगण सेंबूधागटकाकरे ॥२॥ इसवास्ते प्रतिज्ञा करो तो राजाके सामने अव्य धराके फेर राजा नोज च्यार टकेमें पेस करूंगा सचहे ॥ मुतलबरी मनुहारने तजी मावे (७७) जाणा सतलब पहले पहरमे धर्मकृत्य करके व्याख्यान लुणके दांन देकर फेर नोजनकर उकानपर जाणा गुमास्तोके कांसकी तदारक करणी रवरच आवंदका आंकमा साफररववाणा उधार किसी साहूकार में होय तो वादे सुजब मंगा लेणा नोकरोको नोकरी सुजब इनाम इकराम आंकमा वधणेपर देणा फेर गया ढले जब घरपर आणा जो मालक अपणे घरका काम नहीं देखता सिरप गुमास्तोके नरोसे गेम देताहे उसका घर विगल जाताहे के हमने विगमे देखेहे ११ मीठाई खानेका विसन पमजाय तो हलवाईके घरपर जाके रखाणा मतलब जब हलवाईके घरपर प्रांणी जाताहे तो किसीनी तरे उसकी मिगइ खाणेकू जी नही चाहता किसी में तो हजारों मरवीयां मरी हुए किसीमें सकोगे र चिमटीयां मरी हु किसीमें ऊंदर गिलेरी आदि अनेक जीवोके रसोकू गणबूणके मिठाइ वणाताहे न पाणीकू बाणताहे नवरतणोकी शुझिहे पोंगणे उर ग- गणेके वस्त्रनी महाअशुद्ध उर मलीन रहते उर ते बोकरोके दिसा फराकतके हाथत्नी ज्यों त्यों योंही लगा देतीहे बोकरे योही सूततेहे (७३) तरीही होतीहे व्यापार करतां धननही उधारमें आवे तोअपणे मनमें धर्मखाते करणा इसवास्ते विवेकीकू चाहीये सो साधर्मीके साथही व्या- पार करणा म्लेच्छ अनार्योकी उधार नही आवे तो धर्मखाते गिणनेका रस्ता जैनागममें नहीं इसवास्ते जसपरसें ममता उतारकर निकेवल मनसें त्यागही करणा उर त्याग कीया पीछे कदास देदेवे तो धर्मवास्ते श्रीसंघकू सोंप देणा तेसेइ अव्य अथवा शस्त्र आयुध वगेरे को चीज खोइ जाय तो जर पीग आणेका संभव नही होवे तो उसकानी साग करणा वो सि- राय देणा कदास जो नवो सरावे उर चुराणे- वाला चोर अथवा उसरा जिसकू मिले सो उस चीजसे पापकर्म करे तो गृहस्थनी पापका जागी होय सागसे न होय इतना लानहे वि. वेकी पुरष पापके अनुबंधकारी अनादिरूप श- रीर घर कुटंब अव्य शस्त्र वगेरे चीजोका अं- तमें त्याग करणा नही करे तो उन चीजोसें होती हुई पाप क्रियासें नवोनव बुरे फल भोगणे पझे इस वातकी साक्षी श्रीनगवती सूत्रमेंहे पांचमें शतक बढ़े उद्देशेमें सिकारीने हिरण १ वाणसे २ धनुषकी (७१) विचारमेंही रहे आखिरकों निन्नायही दिया पुरपोंकों चाहीये अपणी करी प्रतिझा एसी निनावे किसी राजपूतके घरके अंदर नीमका दरख तथा उसके नीचे वो राजपूत जब वेठता तब एक क्या उसपर वीटकर देता वो धनु- षवांण मंगाता वो काग देखतेही उमजाता एक दिन उसने अपणी कन्यासें कहा में जब सम- सेरलाकहूं तब तीरकबाण लादेणा इसीवजे कनओने वीटकी संकेत मुजब राजपूत बोला समसेरला कनने विचारा समसेरसें तो में मरता नही निचिंत वेगारहा जो बांणलगा त्योही राजपूत बोला अरे इष्ट अब तो मरा तब पमते २ कला बोला ॥ उहा-वचनपलट्टासोमरा कागामरामजाण ॥ नांमलियासमसेरका लाईतीरकबाण॥१॥ सो जुबान कहके पलटणेवाला मराहुआ- ही जब अपणेसे पार नही पड़े तो एसा बाऊ उठगणाही नही कदास कोई कारण यो- गसें रुपे वादेपर नही पोहचसके तो किस्त करकेनी करजा उतार देणा एसा नही करे तो फेर पत जाते रहवीहे जहांतक वणे करजदार होणाही नही कारण सुणणा आवाज देणा (७३) तरीही होतीहै व्यापार करतांधननही उधारमें आवे तो अपणे मनमें धर्मखाते करणा इसवास्ते विवेकीकू चाहीये सो साधर्मीके साथही व्या- पार करणा म्लेच्छ अनार्योंकी उधार नही आवे तो धर्मरवाते गिणनेका रस्ता जैनागममें नहीं इसवास्ते उसपरसें ममता उतारकर निकेवल मनसें त्यागही करणा र त्याग कीया पीने कदास देदेवे तो धर्मवास्ते श्रीसंधकू सोंप देणा तेसें। अव्य अथवा शस्त्र आयुध वगेरे को चीज खोइ जाय तो जर पीग आणेका संन्नव नही होवे तो उसकाजी त्याग करणा वो सि- राय देणा कदास जो नवो सरावे उर चुराणे- वाला चोर अथवा फुसरा जिसकू मिले सो जस चीजसें पापकर्म करे तो गृहस्थनी पापका भागी होय त्यागसे न होय इतना लानहे वि. वेकी पुरष पापके अनुबंधकारी अनादिरूप श- रीर घर कुटंब अव्य शस्त्र वगेरे चीजोका अं- तमें त्याग करणा नही करे तो उन चीजोसें होती हुई पाप क्रियासें नवोन्नव बुरे फल नोगणे पमे इस वातकी साक्षी श्रीनगवती सूत्रमेहे पांचमें शतक बढ़े उद्देशेमें सिकारीने हिरण मारा तब जिस धनुपसें ? वाणसे २ धनुषकी (७३) तरीही होतीहे व्यापार करतां धननही उधार में आवे तो अपणे मनमें धर्मखाते करणा इसवास्ते विवेकीकू चाहीये सो साधर्मीके साथही व्या- पार करणा म्लेच्छ अनार्योकी उधार नही आवे तो धर्मरवाते गिणनेका रस्ता जैनागममें नहीहै इसवास्ते उसपरसें ममता उतारकर निकेवल मनसें त्यागही करणा उर त्याग कीया पीने कदास देदेवे तो धर्मवास्ते श्रीसंधर्व सोंप देणा तेसेंइ अव्य अथवा शस्त्र आयुध वगेरे कोश चीज खोइ जाय तो जर पीग आणेका संभव नही होवे तो उसकाजी त्याग करणा वो सि- जो नवो सरावे उर चुराणे- वाला चोर अथवा उसरा जिसकू मिले सो उस चीजसें पापकर्म करे तो गृहस्थनी पापका नागी होय त्यागसे न होय इतना लानहे वि. वेकी पुरष पापके अनुबंधकारी अनादिरूप श- रीर घर कुटंब अव्य शस्त्र वगेरे चीजोका अं- । तमें त्याग करणा नही करे तो उन चीजोसें होती हुई पाप क्रियासें नवोनव वुरे फल जोगणे पमे इस वातकी साक्षी श्रीनगवती सूत्रमेहे पांचमें शतक बढ़े उद्देशेमें सिकारीने हिरण मारा तब जिस धनुषसें ? वाणसे २ धनुषकी राय देणा कदास ( नए) 'जनादि कृत्य कर आताहुं तुम जितने बेठो. सेठ तो नोजन करणे गया उस वरवत सेवका पाणी लाणेवाला बेल र चूनेके घरट पीसणेवाला नेसेकूनी खानपानकी बुट्टी मिली कारण श्राव- ककू चाहीये सो अपणे इलाकेमें जो जानवर होवे उसके चारे पाणीकी खबर लिये विगर आप भोजन करे तो जीवघातका अतीचार लगे उस वखत वो बेल र पामा आपसमें बातां करणेलगे वैल बोला ले मित्र अब हम तो
(63)
तीन दिन विताया कहे मुजब वैल मरगया तब
सेठ उस राजपूतकू संग लेकर राजाकेपास जा-
कर नजर नोगवरकर राजाके हुकम मुजब
वैठगया राजाने कुशल क्षेमकी बात पूजीर बो-
खा सेठ बहोत दिनोंसें आये कुछ कार्य होय सो
कहो तब सेठ बोला गरीब परवर नोकरी करके
मालककी वंदगी वजाकर हक्क खाणेवाला मेरा
चूना पीसणेवाला जेसा नेसा ताकतदारहे
जेसा हजुरका माल मलीदा चरणेवाला वृथा
पुष्ट पाट हाथी में ताकत नही अगर लमतके मु.
काबलेमें दोनोंकों दंगल में निमाये जाय तो
आपका हस्ती नाग बूटे राजा हसकर बोला
क्या सेव नंग खाईहे ये वात किसीके समऊमें
कब आसकतीहे सेठ बोला न माने तो हाथो.
तालीका परचा देख लीजीये तब राजा बोला
कुछ सरत करोगे सेठ बोला हजार रुपेकी मु-
करर ठहराकर दोनोकों लाये नेसेंकू देखतेही
हाथी नाग गया तीन वरवत लाये लेकिन हाथी
तो तीनही वेर नागगया सेठकू हजार रुपे
दियेगये और पामा मरगया राजा बोला हा-
थीसें धेसत खाके असा मरगया तब सेठने उस
राजपूतसे सब वात राजासें कहलाइ राजा
(ए) हके दिल में जो कुरान मजहबका धर्मकायदा वैठगयाहे सो इह व्यापारनीति तथा राजनी- तिकू वाधा पोहचाकर सिरफ इतना जालम- पणा जरूर यह जानताहे जो हजरत मह- म्मदका हुकम नही माने उसकुफरकू कतल करणा इसवास्ते एसी अक्कलवाला अपणी प्र- जाकू अपणी हितकारणी केसें वणाकर केसें वादस्याही करसकताहे कारण इस नरतक्षेत्रमें तरे २ के फिरकेहे उनोमें अपणी २ मताध्यक्ष- की बात सब मानतेहे सिद्धांत मत तो एकहे सो धोकलसिंह जाणता नही एकदिन राजा धोकलसिंहकों बुलाके कहा तुमारे हाथ खरच- केवास्ते में 3 हजार रुपेका आवंदका खरचा निकालदेताई ये लाख रूपे तुमलो इसके आठ आनीके व्याजसें बव हजार सालीयाना होगा तब मनमें तो कसमसाया लेकिन वापकी वे अदवी नहि करणी तब बोला हजूर कल ह- जूरकी खिदमतमें उस्ताद मौलवीसाहबकू ने- जताहूं जो फरमावे सो जनहीसे फरमां देवे राजा समऊ गया लेकिन बोला अच्छा इसरे दिन मोल वीसाहब आकर कहणेलगे गरीब परवर आपने ये वझे आजावकी वात माहाराज (ए?) रासतसे आवे उसकू अपणे राज्यमे खातरक- रके वसाउं पहलेही वर्षमें जब रुपे उधार देणेबाले साहूकार नहीं मिले तब तो कर्षाण लोक जमीन नही वोयसके तब तो सरकार में हासल वहोत कम वेग दशलाखकी आवंद साहूकारोके माल ताल जगात वगेरेके वेवतेथे जिसमेंसें कुलम पैदास आठ लारवकी हुश् रवरच सिपाश्योकी तनखा घोमे हाथी वगे रोका सब लगणेपर उधार कोइ देणेवाला नही रहणेसें असवाव जो विका सो सब रामार्स- हने लीया यूंकरते चोथे वर्षमें सब शस्त्र हाथी घोमे विकणेपर सब रश्यत नागके रामसिंहके ताबे हुइ लाचार मोलवीसाहब उर धोंकलासंह अपणी जमीन वेची सोनी रामसिंहने खरीद करली मोलवीसाहब मक्काकू तसरीफ लेगये तदपीके धोकलसीहकू अपणेपास रखा राजा तीर्थोसें पीने आकर देखा तो रामसिंह चोगुणी समृधिसें राज्यकर रहाहे धोकलसिंह बजरवा- णा हुआ तब राजाने कहा वेटा ये क्या हुवा तब धोकलसिंह बोला हे पूज्य मोलवीसाहिब- के कहणेमाफक कुरानसरीफके कायदेपर चला तोनी खुदाने मेरे तरफ कुबनी रखयाल नही (ए) खबरदी रुमके वादशाहकी फोज आरहीहे तब वादशाह सब मोल वियोसें कही मोलवी बोले हजूर आप क्यों मरतेहे मके सरीफको जाताहोगा वह बात वजीरने सुणी तब अपणी सब फोजको हुकम दिया तुम सब चुपचाप इहांसे जाकर आठ कोसके फासलेपर जाव सो जब बुलाउँ तनी हाजर होणा वजीरने वाद- शाहसें अरजकी गरीबपर हुकमकी तामील व- जाइ गइ बादशाह बोला अच्छा कीया रूमका बादशाह पंजाबमें आ पहुंचा सवारोने खबरदी बादशाह मोलवीयोसें पूग मोलवीयोने कहा खाजेकी जारत जाताहोगा आखिरकों दिल्ली- के एक मजलपर मेरा दिया र दिल्लीके बादशाहकू कहला नेजा तीन दिनमें किल्ला रखाली करो या मोरचे मजबूत करो ये सुणतेही वादशाहके बक्के बूटगये उर घबराकर मोलवी- योसें कहा जूलम हुवा अब क्या करणा तब मोलबी बोले गरीव परवर क्यों धनरातेहें हम अनी समझा देतेहे एसा कहकर बमे खलीतो में कुरान सरीफको माल रूम सुरत्राणपास पहुंचे वादशाह कुरब कायदेसें विठलाये कुसल क्षेम- की वात चीत पूजकर पूग हजूरका आणा केसें (ए) खवरदी रूमके वादशाहकी फोज आरही हे तब वादशाह सब मोल वियोसें कही मोलवी बोले हजूर आप क्यों मरतेहे मके सरीफको जाताहोगा वह बात वजीरने सुणी तब अपणी सव फोजको हुकम दिया तुम सब चुपचाप इहांसे जाकर आठ कोसके फासलेपर जाव सो जब बुलाई तनी हाजर होणा वजीरने वाद- शाहसें अरजकी गरीबपर हुकमकी तामील व- जाइ गइ बादशाह बोला अच्छा कीया रूमका बादशाह पंजाबमें आ पहुंचा सवारोने खबरदी बादशाह मोलवीयोसें पूग मोलवीयोने कहा खाजेकी जारत जाताहोगा आखिरकों दिल्ली- के एक मजलपर मेरा दिया उर दिल्लीके बादशाहकू कहला नेजा तीन दिनमें किल्ला रवाली करो या मोरचे मजबूत करो ये सुणतेही वादशाहके बक्के बूटगये उर घबराकर मोलवी- योसें कहा जूलम हुवा अब क्या करणा तब मोलबी बोले गरीव परवर क्यों धनरातेहें हम अनी समझा देतेहे एसा कहकर बमे खलीतो में कुरान सरीफको माल रूम सुरत्राणपास पहुंचे वादशाह कुरब कायदेसे विवलाये कुसल क्षेम- की वात चीत पूबकर पूग हजूरका आणा केसें (एए) खबरदी रूमके वादशाहकी फोज आरहीहे तब वादशाह सब मोलवियोसें कही मोलवी बोले हजूर आप क्यों मरतेहे मके सरीफको जाताहोगा वह बात वजीरने मुणी तब अपणी सब फोजको हुकम दिया तुम सब चुपचाप इहांसे जाकर आव कोसके फासलेपर जाव सो जब बुलाई तन्नी हाजर होणा वजीरने वाद- शाहसें अरजकी गरीबपर हुकमकी तामील व- जाइ गइ बादशाह बोला अच्छा कीया रूमका बादशाह पंजाबमें आ पहुंचा सवारोने खबरदी बादशाह मोलवीयोसें पूजा मोलवीयोने कहा खाजेकी जारत जाताहोगा आखिरकों दिल्ली- के एक मजलपर मेरा दिया उर दिल्ली के बादशाहकं कहला नेजा तीन सि.दिलम (ए) खुदाकों जो करणा होगा सो करेगा इस वजे राजाने जब वात कही तव धोकलसिंहने पूग फेर हजूर रियासत गई या रही राजा बोला तब मोलवीयोकी वात मुणके वादस्याह बना : फिकर बंध होकर वजीरकू बुलाया उर आंखो- : सें पाणी टपकाता हुवा मोलवीयोकी हकीगत कह सुणाई तब वजीर बोला हजूर जापनाह कुरान सरीफका कायदा राजकाजमें क्या दखल करसकताहे ये राजनीति शास्त्रही जुदाहे जिसमें साम दाम दंग नेदादिक अनेक बल बल र वहाउरीहे खेर इन पढत मूरोंकी वातपर फेर ज्यादे अमल मत- करणा बादस्याहने तोबा खाश् तब वजीर बादस्याहकू दिलासा देकर कहा हजूर दिलमें धीरज रखीये जो कुछ सिपाहहे उसहीसे लमें, क्या आपने नहीं सुणाहे रणजीतसिंह सिख पांच घोमेका सूबेदारथा सो अपणी ब- हाउरीसें पंजाब हत्थेका बादस्याह होगयाथा उसीवरवत रूम सूलतानकू लिखनेजा आप तीनदिन ठहरें फेर मुकाबला करेंगें एक सवार फोजके तरफ नेजा आठ पहरमें फोज आकर रूमको घेर लिया एसा हाल देव रूमनें कहला (ए) खुदाकों जो करणा होगा सो करेगा इस वजे राजाने जब वात कही तव धोकलसिंहने पूग फेर हजूर रियासत गई या रही राजा बोला तब मोलवीयोकी वात सुणके वादस्याह बमा फिकर बंध होकर वजीरकू बुलाया उर आंखो- से पाणी टपकाता हुवा मोलवीयोकी हकीगत कह सुणाई तब वजीर बोला हजूर जापनाह कुरान सरीफका कायदा राजकाजमें क्या दखल करसकताहे ये राजनीति शास्त्रही जुदाहे जिसमें साम दाम दंम नेदादिक अनेक बल बल उर वहाउरीहे खेर इन पढत मूर्योकी वातपर फेर ज्यादे अमल मत- करणा बादस्याहने तोबा खाइ तब वजीर बादस्याहकू दिलासा देकर कहा हजूर दिलमें धीरज रखीये जो कुछ सिपाहहे उसहीसे लमेंगें क्या आपने नही सुणाहे रणजीतसिंह सिख पांच घोमेका सूबेदारथा सो अपणी ब- हापुरीसें पंजाब हत्थेका बादस्याह होगयाथा उसीवरखत रूम सूलतानकू लिरवनेजा आप तीनदिन ठहरें फेर मुकाबला करेंगें एक सवार फोजके तरफ नेजा आ पहरमें फोज आकर रूमको घेर लिया एसा हाल देख रूमनें कहला ९ (एए) संपदा स्थिर नही रहे तो विपदा क्या थिर रहतीहे जो लक्ष्मीकू श्रीकृष्ण प्रेमसें गोदी में बेगताथा एसी जो लक्ष्मी समुनके उर कृष्णके ही जब नही रही तो उमाउ बेकूबोके पास कब रहसकतीहे पूर्वनवके पापके उदयसें जो कन्नी आगे जेसी नाग्यवानी नहि आवे तोनी मनमें धीरज रखवणी क्योंके आपदारूप स- मुझमें मूबतेकू धीरज हेसो जिहाजहे सब दिन एक सरीखे नहि रहते इस जगतमें सदा सुखी कोणहे लक्ष्मी जब जगतसेवजीकेही स्थिर नही रही दो र किसके रहेगी प्रेमनी स्थिर कब रहताहे मोतके वश कोण नहीहे उर वि- षयाशक्त कोण नहीहे इसवास्ते विपदमे सं- तोष रखना जो कनी ज्यादा फिकर करे तो इस नवमें रोगोत्पत्ती परनवमें बुरीगती होती तरे के उपाय करणेसेंनी जब अपणी तकदीर नही खुले तो किसी श्रीमंत नाग्यवानका सहारा लेणा कारणके लक्कमके सहारेसें लोहनी पाणीमें तिरणे लगताहे एक नाग्यवानके सधर मुनीमथा वो जब मरगया तो उसका बेटा निर्धन होगया तब सेठ उसकुँ नोकरी रक्वे नही लेकिन कनी २ बुटकर काम करणा सो (एए) संपदा स्थिर नही रहे तो विपदा क्या थिर रहतीहे जो लक्ष्मीकू श्रीकृष्ण प्रेमसें गोदी में बेगताथा एसी जो लक्ष्मी समुडके उर कृष्णके ही जब नही रही तो उमाउ बेकूबोके पास कब रहसकतीहे पूर्वनवके पापके उदयसें जो कनी आगे जेसी नाग्यवानी नहि आवे तोनी मनमें धीरज रख्खणी क्योंके आपदारूप स- मुझमें मूबतेकू धीरज हेसो जिहाजहे सब दिन एक सरीखे नहि रहते इस जगतमें सदा सुखी कोणहे लक्ष्मी जब जगतसेठजीकेही स्थिर नही रही दो र किसके रहेगी प्रेमनी स्थिर कब रहताहे मोतके वश कोण नहीहे उर वि- षयाशक्त कोण नहीहे इसवास्ते विपदमे सं- तोष रखना जो कनी ज्यादा फिकर करे तो इस नवमें रोगोत्पत्ती पर नवमें बुरीगती होती तरे २ के उपाय करणेसेंनी जब अपणी तकदीर नही खुले तो किसी श्रीमंत नाग्यवानका सहारा लेणा कारणके लक्कमके सहारेसें लोहनी पाणीमें तिरणे लगताहे एक नाग्यवानके सधर मुनीमथा वो जब मरगया तो उसका बेटा निर्धन होगया तब सेठ उसकू नोकरी रक्वे नही लेकिन कनी २ बुटकर काम करणा सो (एए) संपदा स्थिर नही रहे तो विपदा क्या थिर रहतीहे जो लक्ष्मीकू श्रीकृष्ण प्रेमसें गोदी में बेवाताथा एसी जो लक्ष्मी समुडके उर कृष्णके ही जब नही रही तो उमाउ बेकूबोके पास कब रहसकतीहे पूर्वनवके पापके उदयसें जो कनी आगे जेसी नाग्यवानी नहि आवे तोनी मनमें धीरज रखवणी क्योंके आपदारूप स- मुझमें मूबतेकू धीरज हेसो जिहाजहे सब दिन एक सरीरवे नहि रहते इस जगतमें सदा सुखी कोणहे लक्ष्मी जब जगतसेठजीकेही स्थिर नही रही तो उर किसके रहेगी प्रेमनी स्थिर कब रहताहे मोतके वश कोण नहीहे उर वि- षयाशक्त कोण नहीहे इसवास्ते विपदमे सं- तोष रखना जो कनी ज्यादा फिकर करे तो इस नवमें रोगोत्पत्ती परनवमें बुरीगती होती तरे के उपाय करणेसेंनी जब अपणी तकदीर नही खुले तो किसी श्रीमंत नाग्यवानका सहारा लेणा कारणके लक्कमके सहारेसें लोहनी पाणीमें तिरणे लगताहे एक नाग्यवानके वास्त- मुनीमथा वो जब मरगया तो उससें काम निर्धन होगया तब सेठ उसकू गति तथा पं- नही लेकिन कनी २ बुटकर रुपकू आजीजीसे (११) पुरप सो आपदा आणेसे दीन नही होय लक्ष्मी संपदासे गई न करे पराया उरख देख उरखी होवे आपमें संकट पमे तो सीदावे नही उस पुरषकू नमस्कारहे समर्थावान होकर पराया पुरषोंका कीया हुवा उपञवसहे धन- वान होकर गई नही करे पंमित होकर विनय- वान होय यह तीनों पुरष पृथ्वीमें अलंकार समानहे विवेकी वहीहे जो कोश्के संग क्लेश नही करे तथापि बने अदम्योसें तो भूलचूक- केली कनी क्लेश नही करणा कहाहे जिसकू खासीका विकार होय उसकू चोरी नही करणा जिसकू बहोत नींद आती होय वो जारी नही करणा जिसकू रोगहे वो मी आदि रसऊपर आसक्त नही होणा जुवान वसरवणा पथ्यमें रहणेसें रोग मिटही जाताहे धनवान होकर किसीसें वैरविरोध नही करणा नंमारी राजा गुरु तपस्वी पक्षपाती ताकतवर क्रूर उर नीच इनोके संग वाद विवाद नही करणा कनी किसी बड़े आदमीसें धन जमीनादिकवास्ते असरचा पगया होय तो विनय बुद्धिसें काम निकाल लेणा चाहीये चाणाक्यनीति तथा पं- चाख्यानमे लिरवाहे उत्तम पुरुपकू आजीजीसे (१०३) रखणेवाले एसे आदम्योके पास में हमेसां रह- ताहुं विवेकी आदमी उधारकी उगराइ पण कोमलता रारवकर करणा उनियामें निंदा नही होय जेसे करणा एसा नही करे तो देणदार- की चतुराइ लाज वगेरेका लोप होय उस्से अपणा धर्म तथा धनकी प्रतिष्ठाकी नुकसाणी होणा संनवहे इसवास्ते लंघन वगेरे न करणा नही कराणा लंघन करणे उर कराणेवाला अं गरेजी राज्यके कायदेसें सजावार हे जो कि- सीको नोजनादिकमे अंतराय देगा वो जीव कृष्णके कुमर ढंढण ऋषिकी तरे नोजनकी अंतराय पावे सर्व पुरषोकू तथा वणियेवू चा- हिये सो संप तथा च्यारजनोकी सलाहसें काम करणा चाहीये सब काम साधनके साम दाम दंम नेद एसे च्यार नेदहे जिसमेंनी सा- मसें सर्वत्र कार्यसिद्धीहे वाकी उपाय सामके जोमेके नहीहे करमा जेर करूर अदमीनी मीठी जुवानसें वस होजाताहे लेणदेणमें जूलसें जो कनी ऊगमा पमजावे तो निकम्मा विवाद नही करणा तब पांच पंच चतुर लोकीकमें प्रतिष्टावंत जो कहे सो मंजूर करणा उन पं- चोका कहा न माने तो ऊगमा मिटे नही अं- 1 (१०७) कीया एसा अव्य जो निरवद्य उसकी मिगइ जुजीये सीधा ले आवेगा सो वेवके खालेंगे साधोंके उपदेशसें बमे लान होगा स्नान करणे- का मंदिर करवाणेका मूर्तिपूजामें एकांत पापहे इसवास्ते इस बातका जावज्जीव त्याग साध कराय देगा अपणेको धर्मी जाणके बड़े आदमी जो ढूंढक धर्मीहे सो धनकी मदत देंगे खेर वो वणिक् तो वेस्याके गया उर ढूंढक पंथी ऋषि- जीके थानक गया समयसार नाटक ग्रंथमे लिवाहे दया दान र पूजादिक विषय कषा- यादिक इन दोनोंका एक क्षेत्रहे इन दोनोंके मन परणाम आश्री दोनोंकी करणी अंतमे ए- कसीहे कारण ज्ञानीको नोग सोतो निर्जराका हेतुहे अज्ञानीको भोग सोतो बंध फल देतुहे ये अचरिजकी बात हिये नहि आवे पूजे कोइ- यक शिष्य गुरु समजावे ? अब वो वेस्याके गया उसने मनमें विचारा धिक् मेरी बुद्धि सो में सब जन्म इनही कुकर्मोंके करणेमें खोया धन्यहे वो सो धर्म करणीके वास्ते गयाहे ए- सा विरक्त नावना नावता हुवा वेस्याके संग रातभर रहकर प्रनातसमें निकला रस्तेमें संवे- गधर्मी स्वेतांवरी साधू मिले जिनके मुखसे que se (१०७) कीया एसा अव्य जो निरवय उसकी मिगइ नुजीये सीधा ले आवेगा सो बेठके खालेंगे साधोंके उपदेशसें बमे लान होगा स्नान करणे- का मंदिर करवाणेका मूर्तिपूजामें एकांत पापहे इसवास्ते इस बातका जावज्जीव त्याग साध कराय देगा अपणेको धर्मी जाणके बड़े आदमी जो ढूंढक धर्मीहे सो धनकी मदत देंगे खेर वो वणिक् तो वेस्याके गया उर ढूंढक पंथी ऋषि- जीके थानक गया समयसार नाटक ग्रंथमे लिवाहे दया दान र पूजादिक विषय कषा- यादिक इन दोनोंका एक क्षेत्रहे इन दोनोंके मन परणास आश्री दोनोंकी करणी अंतमे ए- कसीहे कारण झानीको नोग सोतो निर्जराका हेतुहे अझानीको जोग सोतो बंध फल देतुहे ये अचरिजकी बात हिये नहि आवे पूजे कोइ- यक शिष्य गुरु समजावे ? अब वो वेस्याके गया उसने मनमें विचारा धिक् मेरी बुद्धि सो में सब जन्म इनही कुकर्मोंके करणेमें खोया धन्यहे वो सो धर्म करणीके वास्ते गयाहे ए. सा विरक्त नावना नावता हुवा वेस्याके संग रातनर रहकर प्रनातसमें निकला रस्तेमें संवे गधर्मी स्वेतांवरी साधू मिले जिनके मुखर (१०ए) ताहे निरख तोनकर वे मुमार मोल वधायकर अयोग्यरीते व्याज वधायकर रुसपत देकर अथवा लेकर ड्रग मासूल कर्पणोसें धोखा- बाजी करके खोटा नाकल घसाहुवा रुपया पेसा देकर कोई खरीदता होय अथवा वेचता होय उसका नंग करके पराया ग्राहकोकू नरमाय कर नमूना एक बतावे माल उसरा देणा नही जहां लेणेवालेकू बराबर दीखे नही एसी जगे कपमा वेचे नही लिखणे पढणेमें फेरफार करणा नही इत्यादिक उगाइ धोरखाबाजी कनी करणा नही इस नवमें सरकारसे दंग परनवमें स्वर्ग मोक्षके सुरखमें हानी पहुंचतीहे कोश्यक मूर्ख एसा कहतेहे कूम कपटविना कमाइ होती नही आजिविका तो कर्मके आधीनहे लेकिन व्यव- हार शुद्ध रररवे तो उलटे ग्राहक ज्यादे आवे मुनाफा ज्यादा होय इसपर एक दृष्टांतहे एक सुंदरपुर नगरमें हेलानामका सेठ रहताथा उसके चार लमका हुवा उरनी उसके परिवार ज्यादाथा तब वो सेठ ग्राहक जब आता तब लमकोकू समझा रखाथा उसवास्ते गाली देणेके वहाणेसें त्रिपुष्कर पंचपुष्कर एसा शब्द कहकर रखोटी तराजु क्ट वापरकर लोकोकू उगताथा (१00) ताहे निरख तोमकर वे मुमार मोल वधायकर अयोग्यरीते व्याज वधायकर रुसपत देकर अथवा लेकर जूठा मासूल कर्पणोसें धोखा- बाजी करके वोटा नाकल घसाहुवा रुपया पेसा देकर कोई खरीदता होय अथवा वेचता होय उसका नंग करके पराया ग्राहकोकू नरमाय कर नमूना एक बतावे माल मुसरा देणा नही जहां लेणेवालेकू बराबर दीवे नही एसी जगे कपमा वेचे नही लिखणे पढणेमें फेरफार करणा नही इत्यादिक उगाइ धोरखाबाजी कनी करणा नही इस नवमें सरकारसे दम परन्नवमें स्वर्ग मोक्षके सुखमें हानी पहुंचतीहे कोश्यक सूर्य एसा कहतेहे कूम कपटविना कमाइ होती नही आजिविका तो कर्मके आधीनहे लेकिन व्यव- हार शुभ रत्वे तो उलटे ग्राहक ज्यादे आवे मुनाफा ज्यादा होय इसपर एक दृष्टांतहे एक सुंदरपुर नगरमें हेलानामका सेठ रहताथा उसके चार लमका हुवा उरनी उसके परिवार ज्यादाथा तब वो सेठ ग्राहक जब आता तब लमकोकू समझा रखाथा उसवास्ते गाली देणेके वहाणेसें त्रिपुष्कर पंचपुष्कर एसा शब्द कहकर खोटी तराजु वट वापरकर लोकोकू उगताथा
करता
(१११)
सेठकू लायकर कांउला दीया एसा देखकर
सेवकू हक्क कमाणेपर आस्ताआई शुद्ध व्यापार
हुवा
सेठ बमा धनवान होगया श्रावक
धर्ममें अगवाणी नया उसका नाम लेणेसें सब
विघ्न टलगया तब जिहाजोके चलावणेवालोकू
आदि ले सब मनुष्य हेलाहेलो नाम पुकारणे
लगा विचारवानोकू सब पापोके काम गेमणा
उसमेंनी अपणा मालक दोस्त अपणेपर विश्वा-
स रखणेवाला देव गुरु वृद्ध तथा बालक
इनोके संग वेर विरोध करणा नही इनोकी
धरवट वाणी नही जमाखाणा उनकी हत्या
करणे जेसीहे कछी गवा देणेवाला बहोत दि-
नोतक
गुस्सा
रखणेवाला विश्वासघाती र
कीये उपगारीका उपगार लोपणेवाला कृतन्न ए
च्यारोही कर्मचंमाल उर पांचमा जातिचंमाल
जाणना विश्वासघातपर विसेमिराका दृष्टांत
हे विसाला नगरीमें नंदराजा नानुमती राणी
जनोका
पुत्र विजयपाल र बहुश्रुतनामे मं-
त्रीथा नंदराजा नानुमती राणीपर आसक्त
होणेसें सन्नामेंनी राणीकू पासही रखताथा
शास्त्रोमें लिवाहे राजाका वैद्य उर गुरु तथा
मंत्री ये लोक राजाकू प्रसन्न रखणेकू मीठी ५
-
(१९३) राजाके सामने हमेसां वांचे जो वाक्य यथार्थ आवे उसका विस्तार करे बाकी अवशेशकू क- विताका दरवल मानता हुवा वांचके सुणावे एकदिन कथामें मांस वाणेका निषेध अधि- कार सात्वकी आया व्यास बोला यःपुमान तिलतुष प्रमाणं पललंजुक्ते साधो अवन्यां कुंनी- पाके पचति अर्थात् जो तिल तुसनर मांस खाताहे वो मनुष्य कुंजीपाक नर्क नीचेकी पृ- थ्वीमें पकताहे ये बात सुणके राजा चमक उठा एसी व्याख्या राजाने कन्नी बझे व्याससे नही सुणीथी राजा बोला अहो व्यासजीके पुत्र एसा अर्थ आपने सुणाया ये अर्थ झूठाहे क्या व्यासजीसें आप ज्यादे पंमितहो अगर आपका कहा अर्थ सच्चाहे तब तो बेदमे जो यझोमें नानातरेके पशुकों होमके मांस खाणेकी विधी लिवीरे उस मुजब असंक्षा जीवोका पुरोमासा अर्थात् यज्ञ कीये वाद वचा जो मांस सो तुमारा वमेरा तथा अनेक राजा- उने खाया उर खातेहें क्या वो सब नरक गये होंयगे वेदके वचन कनी जूठे होसकतेहे जोकी नगवान ब्रह्माजीने प्रकास कराहे जिस यज्ञोकी तारीफ वेद व्यासजीने पुराणोमें गा- राजाके सामने हमेसां वांचे जो वाक्य यथार्थ आवे उसका विस्तार करे बाकी अवशेशकू क- विताका दरवाल मानता हुवा बांचके मुणात्रे एकदिन कयामें मांस खाणेका निषेध अधि- कार सात्वकी आया व्यास बोला यःयुमान तिलतुप प्रमाणं पलखनुक्ते साधो अवन्या कुंनी- पाके पचति अर्थात् जो तिल तुसनर मांस खाताहे वो मनुष्य कुंनीपाक नर्क नीचेकी पृ- ध्वीमें पकताहे ये बात सुणके राजा चमक उगा एसी व्याख्या राजाने कनी बड़े व्यासस नही सुणीथी राजा बोला अहो व्यासजीके पुत्र एसा अर्थ आपने सुणाया ये अर्थ वादे क्या व्यासजीसे आप ज्यादे पंमितहो अगर आपका कहा अर्थ सचाहे तब तो वेदमे जो यझोमें नानातरेके पशुउँको होमके मांस खाणेकी विधी लिखीहे उस मुजब असंक्षा जीवोका पुरोमासा अर्थात् यज्ञ कीये वाद वचा जो मांस सो तुमारा बनेरा तथा अनेक राजा- उनै खाया र खातेहै क्या वो तद नरक गये होयगे वेदके वचन कनी ड्र होना जोकी नगवान ब्रह्माजीने प्रकार का हिस यज्ञोकी तारीफ वेद (११५) दान करे उर एक आदमी एक जीवकों मरतेकू वचावे तो कृष्ण कहतेहे हे अर्जुन अहिंसा बरावर कोई धर्म नही राजा स्वार्थीये सच मार्ग कनी नही वतासकतेहे एसा कह व्यास घरकू आया राजाने पेटीये जर रुपये बंधकर लिये चंद दिनमें व्यास घरकू आये तब व्यास- पा रोणेलगी व्यासने पूग क्या नया व्यास- पने सब हकीगत कह सुणाश् व्यासका लमका बोला आप केसी कथा हमेसा वांचतेहे सो राजा सच्चे अर्थकू रूग कहणेलगा व्यास बोला कल सुवे राज महलमे आजाणा देख केसाक राजाकू समझाताहूं खेर फजर होतेही व्या- सजी राजापास जाके आसीर्वाद दिया राजा नमस्कार कर सत्कार कर पूग कुशल क्षेमहे व्यासने कहा अन्नदाता कुशल क्षेमतो हजूरकी सु निजरसेंही रहसकतीहे राजा बोला महा- राज कथा इतनेतक तो आपके पुत्रसें सुणी लेकिन लोकोमें मेने एसा सुणाथाके व्यास- जीका पुत्र बना पंमितहे सो तो कुछ नही व्यास बोला गरीबपर पंगताईका घर दूरहे कलियुगके पंमतहे आप तो कल्पवृक्ष कामधेनु साक्षात ईश्वररूपहो एसा सुणकर राजा प्रसन्न ( १९५) दान करे उर एक आदमी एक जीवकों मरतेकू वचावे तो कृष्ण कहतेहे हे अर्जुन अहिंसा बराबर कोई धर्म नही राजा स्वार्थीये सच मार्ग कजी नही वतासकतेहे एसा कह व्यास घरकू आया राजाने पेटीये उर रुपये बंधकर लिये चंद दिनमें व्यास घरकू आये तब व्यास- ण रोणेलगी व्यासने पूग क्या नया व्यास- एणने सब हकीगत कह सुणाइ व्यासका लमका बोला आप केसी कथा हमेसां वांचतेहे सो राजा सच्चे अर्थकू का कहणेलगा व्यास बोला कल सुबे राज महलमे आजाणा देख केसाक राजाकू समजाताहूं खेर फजर होतेही व्या- सजी राजापास जाके आसीर्वाद दिया राजा नमस्कार कर सत्कार कर पूग कुशल क्षेमहे व्यासने कहा अन्नदाता कुशल क्षेमतो हजूरकी सु निजरसेंही रहसक्तीहे राजा बोला महा- राज कथा इतनेतक तो आपके पुत्रसें सुणी लेकिन लोकोमें मेने एसा सुणाथाके व्यास- जीका पुत्र बमा पंमितहे सो तो कुछ नही व्यास बोला गरीबपर पंगताईका घर दूरहे कलियुगके पंमतहे आप तो कल्पवृक्ष कामधेनु साक्षात ईश्वररूपहो एसा सुणकर राजा प्रसन्न - (११७) व्यासजीसें पूग आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी उर मेरी चतुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर झाट व्यासजी अपणे लमकेका हाथ पकड़के अपणे घर ले आये बेटा बोला बाबा तुमने बमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या उर बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसें राजी रहे वेसे करणा तबही कुछ देताहे इस दृष्टांत मुजब जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगड़ जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाकू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा मुजबही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वांचता हुवा उसमें एसा लिखा हुवा वांचा के जो वैद्य रोगीके मन मुजब खाणेपीणेकी आझा देदेवे ( १९७) व्यासजीसें पूबा आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी र मेरी चतुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर ऊट व्यासजी अपणे लमकेका हाथ पकड़के अपणे घर ले आये बेटा बोला बाबा तुमने बमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या जर बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसें राजी रहे वेसें करणा तबही कुछ देताहे इस दृष्टांत मुजब जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगड़ जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाकू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा मुजवही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वांचता हुवा उसमें एसा लिवा वैद्य रोगीके मन मुजब । ।
(१९७) व्यासजीसें पूग आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी जर मेरी चतुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर झाट व्यासजी अपणे लमकेका हाथ पकमके अपणे घर ले आये बेटा बोला बाबा तुमने बमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या उर बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसें राजी रहे वेसें करणा तबही कुछ देताहे इस दृष्टांत मुजब जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगम जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाकू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा मुजबही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वाचता हुवा उसमें एसा लिखा हुवा वैद्य रोगीके मन मुजब (११७) व्यासजीसें पूग आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी र मेरी चनुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर झाट व्यासजी अपणे लमकेका हाथ पकनके अपणे घर ले आये वेटा बोला बाबा तुमने बमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या उर बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसें राजी रहे वेसें करणा तबही कुछ देताहे इस दृष्टांत मुजव जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगम जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाकू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा मुजबही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वाचता हुवा उसमें एसा लिखा हुवा वांचा के जो वैद्य रोगीके मन मुजब खाणेपीणेकी आज्ञा देदेवे , . ( १९७). व्यासजीसें पूग आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी उर मेरी चतुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर झाट व्यासजी अपणे लम्केका हाथ पकड़के अपणे घर ले आये बेटा बोला बाबा तुमने बमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या उर बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसें राजी रहे वेसे करणा तबही कुछ देताहे इस दृष्टांत मुजब जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगम जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाळू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा मुजबही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वांचता एसा लिखा हुवा वांचा के जो वैद्य रोगीके मन मुजब खाणेपीणेकी आझा देदेवे हुवा उसमें (१९७). व्यासजीसें पूग आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी उर मेरी चतुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर अट व्यासजी अपणे लमकेका हाथ पकमके अपणे घर ले आये बेटा बोला बाबा तुमने बमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या उर बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसें राजी रहे वेसें करणा तबही कुछ देताहे इस दृष्टांत मुजब जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगम जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाकू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा मुजबही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वांचता हुवा उसमें एसा लिखा हुवा वांचा के जो वैद्य रोगीके मन मुजब खाणेपीणेकी आज्ञा देदेवे ( १९७) व्यासजी से पूग आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी उर मेरी चनुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर झाट व्यासजी अपणे लमकेका हाथ पकरके अपणे घर ले आये वेटा वीला वावा तुमने वमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या उर बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसें राजी रहे वेसें करणा तबही कुछ देताहे इस दृष्टांत मुजब जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगम जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाकू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा मुजबही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वाचता एसा लिखा हुवा वांचा के जो वैद्य रोगीके मन मुजव खाणेपीणेकी आज्ञा देदेवे हुवा उसमें ( १९७), व्यासजीसें पूग आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी उर मेरी चतुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर ऊट व्यासजी अपणे लमकेका हाथ पकनके अपणे घर ले आये बेटा बोला बाबा तुमने बमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या उर बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसे राजी रहे वेसे करणा तबही कुन देताहे इस दृष्टांत मुजब जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगम जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाकू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा मुजवही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वाचता हुवा उसमें एसा लिखा हुवा वांचा के जो वैद्य रोगीके मन मुजब खाणेपीणेकी आज्ञा देदेवे (११६) होकर कथा वाचणेका हुकम दीया इतनमें व्यासपुरनी आ पहुंचा व्यासजी वोही तिल- नुसनर मांस खानेवाला नर्क जाताहे एसा अर्थ करा राजा बोला क्या में नर्क जाउंगा व्यास बोला आप तो स्वर्ग बेतुंठ पधारोगे राजा बोला में मांस खाताह व्यास बोले धर्मावतार पुराणका रहस्य आप विनारो जो निजनुमानर मांस खाये सो नर्क जाये आप न्या विज़नुमना बाने, गना बोला नही २ से अपने निन नन व्याम बोले है भमति आपनो शिवलोक गिधा गांकी व्यास महाराजने तो मिलनुमना ग्वाणवाल है नर्क निम्बाई अधर्मग्लान नहीं लिया गजाममनदाका व्यार मोनिका यार पदीय मादिगा यामीक - 21 fifff मई ना पटनी | २. व नकदी में मनाया। दीनी मम एक • AEविवाद ::::RAT ar 27 १ व्यासजीसें पूग आपके पुत्र क्या कहतेहे व्या- सजी बोले हजूर अलंकार देकर आपकी उर मेरी चतुराश्की तारीफ करताहे एसा कहकर ऊट व्यास जी अपणे लम्केका हाथ पकड़के अपणे घर ले आये बेटा बोला बाबा तुमने बमा अन्याय कीया क्या राजा नर्क नही जायगा मांसाहारी निश्चे नर्क जाताहे आपने स्वर्ग जाणा केसे वतलाया तब व्यासजी बोले अरे नाइ अपणे हिसाबसें नर्क जावे तो क्या र बेटा संसारमें जन्ममरण करे तो क्या अपणे तो आजीविका तयार करणी कथा सुणनेवाला जेसें राजी रहे वेसें करणा तबही कुछ देताहे इस दृष्टांत मुजब जो धर्मगुरु होकर सच्ची बात नही कहे तो राजाका धर्म बिगम जाताहे इसीतरे जो राजाका वैद्य खुसामदीसें राजाकू कुपथ्यसे मना करे नही उनके मन मुजब हांहा करे उसपर दृष्टांत एक ब्राह्मण वैद्यका हे एक राजाके पास एक ब्राह्मण वैद्य नोकरथा वो राजाकी इच्छा. मुजबही हमेसां पथ्य व- ताया करता राजा एकदिन नीतिशास्त्र वाचता हुवा उसमें एसा लिखा हुवा वांचा के जो वैद्य रोगीके मन मुजब खाणेपीणेकी आझा देदेवे - ,
(१९०)
वो वैद्य निषेधितहे चाहीये वैद्यकों सो देश
काल अवस्था ताकत रोगकी रोगीकी तथा
उपके अनुयाही पथ्य बतलाने, राजा इस
बानती परिक्षा करणे वैद्यसें पूरी वैद्यजी मुझे
सब सागो गणता माग अच्या मालाम
देवाहे चेय बोलां हां नजर सबहे गोजन
नागविलास ग्रंथो लिखादे तृतहि सामनाया
अधीन गाहं मोगव गागोहा मलिक ना
चिका वान का कनी होणेमे दाद मा.
(११ए) चूरे जेसा बमा विदरूप दीखताहे म्लेच्छ अ- नार्योका खांणापीनाहे इस वेंगणकू बहुत बीज होणेसें जैनधर्मवाले अन्नक्ष कहतेहे उर पुरा- गोमें व्यासजीने लिखाहे जो प्राणी वेंगण रखायाहे र उ महीने में आदमी मरजावे अगर एक बीजन्नी जो पेटमें रहजावे तो प्राणी नर्क जाताहे तब राजा बोला वैद्यजी हमने जब वेंगणकू अच्छा कहा तब तो आपनेनी अच्छा काहा उर मेने बुरा कहा तब बुरा कहा ये क्या हालहे तब वैद्य बोला गरीबपरवर नोकर आ- पके क्या वेंगण चंदजीके बापके आप राजी रहो हमकू तो वेसाही कहणा जरूरहे ॥ उहा-जाटकहेसुणजाटनी इसीगांवमेरहणा ॥ उंगविलाश्लेगया हांजी २ कहणा ॥१॥ सो हमकू तो वेसा कहणा जरूरहे एसा खुसामंदीया वैद्य राजाके रोगका वढाणेवाला होताहे एसा विचार मंत्री राजाकू कहणेलगा महाराज सन्नामें राणीसाहिबकू पास रवणा वाजिवनही क्योंके नीतिमे लिखाहे अति नि- कट विनाशाय अतिदूरेतिनिष्कलः सेव्यतांमध्य नागेन राजावन्दिगुरौस्त्रियः ॥ १॥ राजा अग्नि गुरु जर स्त्री ए च्यार बहोत न- अर्थ ॥
(१२०) जीक होय तो बिनाश कर्ताह उर बहोत दुर रहे तो बरावर फल देते नही इसवास्ते म- बने इनोसे काम लेणा चाहीये इसगास्ते रा- गीती एनसबीर निनायकर पारामें रखिये तब नंदराजा एक नमवीर विनायतर सारदा नंदनगा में ग्राम गुम दिसलाई तव शारदा- का अपला माण नोलाई रा. मन केवल तो इसमें नदी गला का मन [r f] आमा बाजा जी का 7 महान मामाली तन मनीन 44 ग म मा विचारा काम १ लादकर पाय साना पीनामा कम पा नि अ पास at 4frifi • पकने पाई पाक की ना. . , M Mywr ज न हिनाया नम यंदाने समयकदाद माने एक नई निदाई की वो भनेर दान नाम- खोकर आदमीका दिल पिघलाकर दगाबाजीसे मनुष्योंका प्राण लेताहे इसवास्ते पेस्तर तूं मेरी गोदमें सोजा पीउली रात्रिकों में सोलंगा तब राजकुमार उस बंदरकी गोदमें सो रहा वाघने अनेक उलबल कीये लेकिन वंदरने राजकुमार- कू नीचे माला नही जब पिरली रात्री आइ तब राजपुत्रकी गोदमे बंदर सूता बहोत स- मझाया हे कुमार देख एसा नही होजाय जो बाघकी दया लाके मुङो तूं नीचे पटकदे में तेरे सरणागतहूं मेरे प्राण तेरे हाथहे एसा समऊकर कुमरके गोदमें वानर सोरहा इतनेमें वाघ आकर बहोत आजीजी करणेलगा हे कुमर में बहोत जूरवाहूं तुझे बमा पुन्य होगा ये बंदर तेरे क्या लगताहे उर इसकू तुं मुझे देदेगा तो तेरेनी प्राण बचजायगें तब कुमर अपनी ज्यांनकी रक्षावास्ते बंदरकू नीचे माल- दिया तब बंदर वाघके मूमे गिराये स्वरूप देख के वाघ हसणे लगा तब बंदर वाधके मूमेसें निकलकर रोणे लगा तब वाघ बंदरकू रोणेका कारण पूछा तब बंदर बोला जो कोश आदमी अपनी जाती गेमकर पराइ जातिपर आसक्त होतेहे जण मूल्की क्या गती हो- (१२२) यगी एसा कदकर शरमिंद राजकुमरकू पाग- सकर दिया तब राजपुत्र विसे मिरा २ एसा पुकारणे लगा एसा टुये बाद नंदराजा पिगमी खबर करणेकं असवार नेजा आगे घोमा इकेला किना देखा उसके गोके खोज करते ५ हमा निसाना दुवा मिला राजाने बहीन 5- पागागा लेकिन कुमर अचा दुवा नहीं या शारदानंदन याद पाया जो इस (१२३) गम स्नानके पापसें बूटता नही एसा सुणकर उसरा अक्षर से गेमदीया मित्रकू मारणेवाला कृतघ्नी इच्छा करणेवाला कृतघ्त्री र विश्वास- घाती चोर ये च्यारोंही जहांतक सूर्य चंझमाहे उहांतक नर्कमें रहेगें तब कुमर तीसरा अक्षर मि कहणा जोम दीया राजन तूं अपणे लम्केका कल्याण चाहताहे तो सुपात्रोंकों दान दे का- रण गृहस्थ दांन देणेसें शुद्ध होताहे एसा वचन सुण कुंवर चोथा अक्षर रा गेमदिया तब अलग होकर कुंवर वाध उर बंदरका सर्व वृ- तांत सुणाया तब राजा पमदेमें रहा शारदा- नंदनकू पूजणेलगा हे बाला बनमे जो बीती बात सो तुझे क्या खबर सो तेने सब हकी- गत श्लोकोमे बनाकर कहकर मेरे पुत्रकू अच्छा कर दिया तब पंमित बोला हे राजन जिनेश्वर देव सजुरूके प्रतापसें मेरे जीघाग्रपर सरस्व- तीहे जिस्सें जेसें मेने नानुमती राणीके जां- घका तिल जाएया तेसें। यह बातनी जाण- ताहूं तब पीने दोनोंकी मुलाखांत नइ दोनोंके आनंद नया इसवास्ते विश्वासघात करणा नही इस लोकमे पाप दो प्रकारकाहे एक तो गुप्त उर उसरा जाहिर वो गनेका पापनी दो
(१२४)
तरेकाहे एक बोटा र एक बमा खोटी तराजु
बट माप वगेरह रखाणा ये गेटा गुप्त पाप उर
विचामधान करणा यह गुप्त महापापहे प्रगट
पापका दो प्रकार एक तो कुलाचारसे करणा
..
समाधान एसाहे जो अन्याइ अधर्मी सुखी दिखतेहे उर धर्मी उरखी दिखतेहे ये सब पूर्व- कृत पुन्यपापका फलहे इस नवका उनोके नहि जांणना श्रीधर्म घोपसूरजीने कहाहे पुण्यानु बंधिपुन्य ? पापानु बंधिपुन्य २ पुण्यानु बंधि- पाप ३ पापानु बंधिपाप ४ इसतरेसें पूर्वकृत कर्मके मुखदुवके च्यार दहे जो जीव जैन धर्मकी विराधना नही करतेहे वो जीव नरत- चक्रवर्त्तिकी तरह निरुपम सुख पातेहे वो जीव पुण्यानुबंधवाले कहातेहे जो जीव पूर्वजन्ममें अझानसें कष्ट करे वो जीव कोणिक राजाकी तरे बहोत ऋछि निरोग शरीरवाला होताहे पापकर केनी धर्म करे नही उर पापकर्ममें रक्त होय वो पापानुबंधिपुन्य जांणना जो जीव पापके उद- यसें दखली र पुखीहो करकेनी लेसमात्र दयाधर्म होणेसें अमक मुनिकी तरे जैनधर्म पाताहे वो पुण्यानुबंधिपाप जाणना ३ उर जो जीव काल शोकरिकश्चमाल कसाईकी तरे क्रूर- कर्म करणेवाला अधर्मी निर्दश करे हुये पापका परतावा नही करणेवाला ज्यों ज्यों सुखी होता जाय त्यों त्यों ज्यादा २ पापकर्म करताजाय वो पापानुबंधि पाप कहलाताहे पुन्यानुबंधिपुन्यसें स 4
( १२६)
बाहरकी शुद्धि उर अंतरंग शुम्बिनी पातेहे
पानीमानी शनि जिसने नदि पाउरा
मनुष्यजन्मको सिकार जो जीत पहली अछे
नाम मकाम सुरु करे र पीसे शुन
पनि जाणे पूरा माम करे नदी को
(१२०) आदमी मूर्वताइसें मित्रकू कपटसें धर्मकू सुखसे विद्याकू क्रूर र कठोरताइसें स्त्रीकू वस करणा चाहे तेसें सरकू तकलीप देकर आप सुख- की चाह करे उसकू मूर्व जांणना विवेकी लो- कोंको चाहीये सो ज्यों अपणेपर लोक प्रीति करे तेसें चलणा क्योंके इंडीयां जीतनेसें वि- नयगुण पैदा होताहे उर विनयसें अ २ गुण पैदा होतेहे तब सब लोक उस गुणोके पि- बगमी प्रीति रखतेहे उर लोकोके अनुरागसें सर्व संपत्ति पैदा होतीहे चतुर पुरपकों चा- हिये अपणे घरके धनका नफा नुकसान कीया हुवा संग्रह वगेरह बात कोश्के आगे नही कहणी क्योंके चतुर आदमी स्त्री आहार पुण्य धन गुण पुराचार मर्म र मंत्र ये आठ चीज अपणी जीपाके रखणी कोइ अजाण अदमी ऊपर लिखी आठ वातोंमेसें पूजे तो झूठ तो नही बोलणा लेकिन एसा कहणा तुमारे इस बातसें क्या मतलब है एसा उत्तर नापासुम- तिसें देणा राजा गुरु वगेरे बमे आदमी इन- मेंकी बात पूरे तो सच २ जेसा होय वेसा कहदेणा क्योंके मित्रोके साथ सच बोलणा उरतके साथ मीठा बोलणा उस्मन साथ डूठ १२० ) लेकिन मीठा बोलणा र अपणे मालक्के साग ननोको अच्छा लगे एसा सच बोलणा सय बोलणा ये मनुष्य बझा आधार कार- गके मा वोलाणे निधास पैदा होताहे इस- पर एक अष्टांतहे दिल्ली शहरमें एक मोहन- सिंहनामा पार रमाथा वो आमा सत्य- (१२ए) पमणेसें राजापर उपगार नहि करसके उर राजाका दोस्त राजासें ज्यादा शक्तिवान होय तो वो राजासें इर्षासे वैर विरोधकर बेठताहे इसवास्ते राजाका दोस्त मध्यम शक्तिवाला होणा चाहीये मित्र एसा होताहे सो आपदा- कू दूर कर विषमवरखतपर सहाय करताहे जिस वखतमें सगा नाश उर बाप र कोश्नी स्वजन काम नही देसक्ताहे रामचंडजी क- हतेहे हे लक्ष्मण अपणेसें बमा र समर्थकी साथ प्रीति रवणी मुले रुच तीनही कारण उसके घर जब आप जावे तब तो अपणा कुब आदरसत्कार होता नही अगर वो जब अपणे मकानपर आवे तब उसकी सब तरेसें हाजरी नरणी पमे उर धन खरच करणा पमे एसाहे तथापि जब कोई बमा काम आय पमे तो बमे अदमी विगर सुधरतानी नही रनी हरतरेके फायदेहे क्योंके यातो आप समर्थावान होणा या समर्थकू हाथमें रखणा नही तो कार्य सा- धनका दुसरा रस्ता नहीहे बड़े आदम्योकों चाहीये सो हलके आदमीके संगनी दोस्ती करणा कोई काम एसा आय गिरताहे सो ह- लका आदमीसेही निकलणेका होताहे पंचा- (१२०) लेकिन मीठा बोलणा र अपणे माजकके साय नोको अच्छा लगे एसा सब बोलणा सा बोलणा ये मनुष्यकं बना आधारहे कार- प मच गोलाणसें विश्वास पैदा होताहे इस- पर एक दृष्टांतहे दिल्ली शहर में एक मोहन- सिंहनामका पारस रहताशा वो बमा सत्य- (१२ए) यमणेसें राजापर उपगार नहि करसके उर राजाका दोस्त राजासें ज्यादा शक्तिवान होय तो वो राजासें इसे बैर विरोधकर बेपताहे इसवास्ते राजाका दोस्त मध्यम शक्तिवाला होणा चाहीये मित्र एसा होताहे सो आपदा- कू दूर कर विषमवरखतपर सहाय करताहे जिस वरखतमें सगा नाइ र बाप र कोश्नी स्वजन काम नही देसकताहे रामचंद्रजी क- हतेहे हे लक्ष्मण अपणेसें बमा उर समर्थकी साथ प्रीति रवणी मुले रुच तीनही कारण उसके घर जब आप जावे तब तो अपणा कुब आदरसत्कार होता नही अगर वो जब अपणे मकानपर आवे तब उसकी सब तरेसें हाजरी भरणी पमे उर धन खरच करणा पमे एसाहे तथापि जब कोई वमा कांम आय पके तो बड़े अदमी विगर सुधरतानी नही उरनी हरतरेके फायदेहे क्योंके यातो आप समर्थावान होणा या समर्थकू हाथमें रवणा नही तो कार्य सा- धनका उसरा रस्ता नहीहे बमे आदम्योकों चाहीये सो हलके आदमीके संगनी दोस्ती करणा कोई काम एसा आय गिरताहे सो ह- लका आदमीसही निकलणेका होताहे पंचा-
(१३०)
ख्यानमें जिग्या, जंगल में बंधनमे पके हुरे
कनुतरीके बंधन ऊंदाने सुमागे सुईका का
नलगारमं पणे नही मिना शुरू मनसे नार
भाको मन्मान वीको प्रेममं नोक
गादान में इमो लोक चतगईगं पर
-
५
1
(१३१) नही अगर विश्वास रक्वे तो धनकी हानी नही रक्खे तो अनर्थ होय विश्वासवाला या अविश्वासवालाहो लेकिन एसा मित्र विरला होगा सो अपणी बुपाकर सोपी चीजपर लान नही करे बमे सेठ साहूकारोंकी बुद्धि अस्त- विस्त होजातीहे पराइ जमा जब अपणे घरमें आपमे तो मनमें कहतेहैं हे इष्टदेव ये घरवट धरणेवाला मरजावे तो तु प्रसाद चढाउंगा जरूरसें धन अनर्थकी जमहे लेकिन जेसें अग्नि विगर तेसे धन विगर गृहस्थका काम चलता नही इसवास्ते चतुर पुरषोंकों चाहीये सो अ- निकी तरे धनका जाबता करे एक धनेश्वर सेठ अपणा सब धन माल वेचकर आठ रत्न एक क्रोममें खरीद कीया किसीकू खबर नही पने इसतरेसें अपणे मित्रकू सोंप दीया पीछे आप धन कमाणेकू परदेश गया वहां बहोत दिन हा अंतमे बेमारीके वस मरणे लगा तब लो- कोनें पूग कुछ समाचार अपणे बेटोसें कहणा होय तो कहदो तब सेठ बोला इहां जो मेने होत धन कमाया सो तो लोकोमें उधार तेणाहे सो तो पुत्रोंकों मिलणा मुसकिलहे ले- केन् एक क्रोमके आठ रत्न मेरे मित्र के पासहे
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(१३३) पालमें होगा जब चोर माल लेकर चले गये सेठ अपणी वस्तीमें आया एकदिन वे सब चोर बहोतसा मालताल लेकर आये तब से उन चोरोकू बोला हमारे रुपये लार्ड चोर बोले हमने कब रुपे लीयेथे आरिवरकों लमते २ स- रकारमें गये हाकम पूजणे लगा कोइ गवा साक्षीहे सेठ बोला एक मीनीहे चोर बोले सरकार वणीया सरासर झूठाहे जंगलकी लो- कमीकों मीनी बतलाताहे इतना सुणतेही हा- किम समऊगया के वणिया सच्चाहे लेकिन बमा धूर्तहे उसी वरवत सेठके सब रुपे दिलवा दिये गवाही एसा काम देताहे किसी में जमा विगर गवा धरदी गश्हो र वो बदलगया होय तो धरवट निकालणेकी चनुराइ वेस्या जेसी करणी वो दृष्टांत एसाहे एक पारीक ब्रा- मनके पास दस हजार मोहरेंथी वो किसीका विश्वास करे नही उस गांवके बाहिर एक जोगीकी झूपमीथी वो बावा वमानेक जर पेसा नही ररवताथा किसीने रोटी लायदी तो वा- यली नही तो किसीके घर जाता नहीथा अलख २ जपताथा न किसीके पाससे कुछ मांगता को रुपया देता तो लेता नहीथा एक
मो पनाम कणा
लले एसा कहकर सेन
मागगा मई का निता नही होता
griने भनागनके पुनीको ये बात
दीनानाने ना मिलनयम प्रम
मन मानसा अगदान होगा
मी दोन मिया नोनी जान
ri for if गांपा
मानद सकिन
मागई। नाति
नदीमा पानीमा
-
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(१३३) पासमें होगा जब चोर माल लेकर चले गये सेठ अपणी वस्तीमें आया एकदिन वे सब चोर बहोतसा मालताल लेकर आये तब से उन चोरोकू बोला हमारे रुपये ला चोर बोले हमने कब रुपे लीयेथे आस्विरकों लमते २ स- रकारमें गये हाकम पूणे लगा कोइ गवा साक्षीहे सेठ बोला एक मीनीहे चोर बोले सरकार वणीया सरासर झूठाहे जंगलकी लों- कमीकों मीनी बतलाताहे इतना सुणतेही हा- किम समऊगया के वणिया सच्चाहे लेकिन बमा धूर्तहे उसी वरवत सेउके सब रुपे दिलवा दिये गवाही एसा काम देताहे किसीमें जमा विगर गवा धरदी गश्हो उर वो बदलगया होय तो धरवट निकालणेकी चतुराश् वेस्या जेसी करणी वो दृष्टांत एसाहे एक पारीक ब्रा- मनके पास दस हजार मोहरेंथी वो किसीका विश्वास करे नही उस गांवके बाहिर एक जोगीकी झुपमीथी वो बावा वकानेक र पेसा नही रखताथा किसीने रोटी लायदी तो खा- यली नही तो किसीके घर जाता नहीथा अलख २ जपताथा न किसीके पाससे कुछ मांगता को रुपया देता तो लेता नहीथा एक (१३४) संगोटी उर तुंबा चिमटा रखताथा उस ब्राम- पाकोनीनाणेकी जरूरी नइ मनमें विचारणे गा गियोकं सौ पुगा तो पाजायगे कारण व्यात साजनमें पहली नो भरणेवाला मांगे नही निकाले गाद वणिया देता नही य निगांगे मरा रहे । ST-नीनियमिपुजविसनास ॥
(१३५) में क्या करूं इसके लालचसें कोई मुझे मार जायगा इस बखेमेको दूर रख ज्यों ज्यों ब्रा- हमण बहोतही नम्रतासे पांव पकमके आजीजी करणेलगा नियामें आमे हाथही धी गिरताहे तब जोगी बोला उस आलेमें इस थेलीकों रखके तालाबंध करके कूची तेरेपास लेजा किसीसे कहणा मत तब वो ब्राह्मण खुस हो- कर इसी तरेसें धरके चलधरा थोमे दिनवाद योगीने थेली निकालकर विचारणे लगा एक ३ मोहरके अगर पच्चीस २ रुपे वटेगे तो अढाइ लाख होगा होते धन तकलीप पाणा ये वे अक्कलीहे इसवातका कोई गवा साक्षी तो है- नही यह धन तो मेरा हो चूका एसा विचार- कर जागी अब गृहस्थोसें कहणेनगा बाबा एक जोगी यानी लटका हासिल कीयाहे पत: वाके तो देखें जन लोकोके पाससे एक काम- साही पेसा मंगाके बावाजी कुछ जंगलकी प- त्ती में घरके अंगीठीमें पहले मोहर धर दीया करे उंमा हुये वाद वो मोहर निकालकर उन गृहस्थोके हाथ विकवाणा सरू करा बावा बोले खो बच्चा एक मठ तो बनवा माले नाम रहजा- यगा अब तो बावेकू रसाणी किमीयागर जाण-
(१३०)
ता उसने सब हकीगत कही वेस्या बोली मत
धवग में मोरे पीठी दिला देती लेकिन
जिसनखत उदां जाके बेठं उस वखत तुम
जम गोगी मोहर मांग लेगा फोरन देदेगा
एगा पर योगेन्या पांचसात संदुकोमें पत्थरोको
नातके खाक लगाकर बंधकर उसका बीजक
acोपे आमरेका बनाया पर जमान
गदाणा मोटो माया धोरे एसी नगदायतकी
नही उर आपकी नेकनांमी उनियामें मसहूरहे सो जरोसा जांणके ये क्रोम रुपयेका सामान तो इस संजुकोमेंहे सो सबमें खोल के दि- खाती हूं एसा कहकर पेसतर लाख दस एक- का जो सामानकी गहणोकी संदूक खोजके दिखाणे लगी देखतेही बावाजी तो दंग होगये जर मनमें विचारणे लगे अनी दिनदसा जागी अब इस मालमेंनी मेरे बहोत सामाल हाथ लगेगा कीमती नग निकालकर हलके जमवा दूंगा कमसेकम वीस लाखका इसटेट तो मेरा होचूका इतने में तो वो ब्राह्मन आकर बोला वावाजी आजके वर्ष पेस्तर जो मेने जोपमी में दस हजार मोहरे आपकेपास रक्वीथी सो दीजीये बावाजीने विचारा जो में नामुकर जाउंगा तो ये सेठको धनमें मनचिंता केसे पेस होगा तब बोला हां नाइ लेजा ऊट ऊ- उके वो थेली दस हजारकी लाके देदी उर बोला ले ना तेरी संन्नाल ले ब्राह्मण गिणकर थेली कबजे करी इतनेमें तो दोमती आयकर दासी बोली वधायजे ५ सेठगपीजी साहिब सेवसाहिबकी सवारी घरपर आयगड् इतना सुणतेही वेस्या एकदम हसती २ ऊपकेसे वो
(१३०)
IT उमने सा हकीगत कही वेस्या बोजी मत
T) में मोहरें पीजी दिखा देती लेकिन
में निमान उदां जाके बेहूं उस बखत तुम
गोणी मोहरें मांग लेगा फोरन देदेगा
मा. पाक में पत्थरोको
iii
... गार नहर काजी
in IT पिता नागारमान
(१३ए) नही तर आपकी नेकनांमी नियामें मसहूरहे सो जरोसा जांणके ये क्रोम रुपयेका सामान तो इस संजुकोमेहे सो सबमें खोल के दि- खाती हूं एसा कहकर पेसतर लाख दस एक- का जो सामानकी गहणोकी संदूक खोलके दिवाणे लगी देखतेही बावाजी तो दंग होगये तर मनमें विचारणे लगे अनी दिनदसा जागी अब इस मालमेंनी मेरे बहोत सामाल हाथ लगेगा कीमती नग निकालकर हलके जमवा दूंगा कमसेकम वीस लाखका इसटेट तो मेरा होचूका इतनेमें तो वो ब्राह्मन आकर बोला बावाजी आजके जवर्ष पेस्तर जो मेने झोपमी में दस हजार मोहरे आपकेपास रक्वीथी सो दीजीये बावाजीने विचारा जो में नामुकर जाउंगा तो ये सेठको धनमें मनचिंता केसें पेस होगा तब बोला हां ना लेजा ऊट ऊ- के वो थेली दस हजारकी लाके देदी उर बोला ले ना तेरी संभाल ले ब्राह्मण गिणकर थेली कबजे करी इतने में तो दोमती आयकर दासी बोली वधायजे ५ सेवाणीजी साहिब सेवसाहिबकी सवारी घरपर आयगई इतना सुणतेही वेस्या एकदम हसती २ ऊपकेसे वो
(१३०)
तब उसने सब हकीगत कही बेस्या बोली मत
घबरा में मोहरें पीजी दिला ती जोकिन
में जिससत उहां जाके बेठू उस वसन तुम
इस गोगी मोहर मांग जेणा फोरन देगा
एसा दिया पांगसात संको में पत्थरोकी
मालीक लगाकर मर SARI मक
-. (१३) नही उर आपकी नेकनांमी उनियामें मसहूरहे सो नरोसा जांणके ये क्रोम रुपयेका सामान. तो इस संजुकोमेंहे सो सबमें खोल के दि- खाती हूं एसा कहकर पेसतर लाख दस एक- का जो सामानकी गहणोकी संदूक खोलके दिखाणे लगी देखतेही बावाजी तो दंग होगये र मनमें विचारणे लगे अठी दिनदसा जागी अब इस मालमेंनी मेरे बहोत सामाल हाथ लगेगा कीमती नग निकालकर हलके जमवा दूंगा कमसेकम वीस लाखका इसटेट तो मेरा होचूका इतनेमें तो वो ब्राह्मन आकर बोला बावाजी आजके वर्ष पेस्तर जो मेने जोपमीमें दस हजार मोहरे आपकेपास रक्वीथी सो दीजीये बावाजीने विचारा जो में नामुकर जाउंगा तो ये सेवको धनमें मनचिंता केसें पेस होगा तब बोला हां नाइ लेजा झट ऊ- उके वो थेली दस हजारकी लाके देदी र बोला ले ना तेरी संन्नाल ले ब्राह्मण गिणकर थेली कबजे करी इतने में तो दोमती आयकर दासी बोली वधायजे ५ सेवाणीजी साहिब सेठसाहिबकी सवारी घरपर आयगा इतना सुणतेही वेस्या एकदम हसती २
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(१४१) विधाताका कोप होताहे तब रसायण जूवा फाटका अंजनसिद्धि जेर यक्षणीकी गुफामें प्रवेश करणेकी बुद्धि होतीहे जो अदमी मंदि- रकी धर्मकी सच्ची या झूठी सोगन खातेहे उ- सका बोधवीज जाते रहताहे उर अनंत शं- शार रुलताहे किसीकी जमानत नही देणी कारण जमानतनी एक आपदाहे ये पांच चीज आपदाका कारणहे घरमें दलजी होकर दो उरत रस्तेपर खेत जमानत देणी गवाही नर- एपी र दो तरेकी खेती विवेक पुरषोंको चाही- ये सो वणे जहांतक जहां रहता होय उहां ही व्यापार करणा जिस्से स्वजनोसें विगहा नही होवे धर्मनी अली तरेसें वण आताहे जो आजीविका नही होती दीखे तब तो परदेस जाणेकी तकलीप उठगवे कृष्ण कहतेहे हे अ- र्जुन दलजी रोगी मूर्ख मुसाफर उर हमेसां पराइ नोकरी करणेवाला ये जीतन्नी मरे जैसे- हैं एसा समजणा जो परदेस जाणेकी जरूरी होय तो आप अथवा अपणे लमकोंसें परदेसमें व्यापार नही करवाणा अपणे परीक्षावंत खा- तरीदार मूनीमसें व्यापार चलाणा को कारण योगसे परदेस जाणा पमे तो हा-
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(१४३) ब्राह्मण अंधा गाय पूज्य गुरु आदि राजा गर्न- वंती स्त्री र सिरपर बोजा उगया हुवा आ- दमी इतनोकों पहली रस्ता देकर पीने आप जाणा कचा अन्न पक्का अन्न पूजणेयोग्य मंत्रका मंगल नांव दीया गया एसा उबटणा स्नानका पाणी खून उर मराहुवा कलेवर थूक श्लेष्म विष्टा मूत जलती हुइ अग्नि साप मनुष्य शस्त्र इतनी चीजों कोइ वखतनी उल्लांधणी नही विवेकी पुरप नदीके किनारे तक गाय बांधनेके विकाणेतक वम वगेरेके दररवततक तलाव सरो- वर कूआ वीचा वगेरे आवे उहांतक मित्रा- दिकोकों पोहचाणे सावणा चाहीये अपणा नला चाहणेवाले शर रातर्फे दरखतके नीचे रहणा नही अजाण अदमी के संग अथवा गो- लेके दासके संग रस्ते चलणा नही दो पहरका तथा आधी रातका रस्ते चलणा नही लेकिन रेल तथा अग्निवोट टालकर क्रूर अदमी रख- वाली करणेवाला चुगल सिल्पी अर्थात् कारीगर अयोग्य मित्र इनोकेसंग बहोत वातचीत नहि करणी वे वखत इनोके संग आणा जाणानी नही 1. रस्ते चलते चाहे जितना थकेला चढजाय तो- जी नेसा गधा- गाय इनोपर नदि चढणा हा-
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(१४५) - रत आणेकी जगह मसाण सूनवाम बजार अ- थवा बिलका या सूका घास विखरा होय जहां जाते हुये बहोत तकलीप होय जहां कचरा मालते होय अकूरमा खारी जमीन दर- खतके शिरवरपर पहामकी ढूंकपर नदी उर कूवेके कांठेपर जहां राख कोयला बाल खोपरी वगेरे पमी होय इतना ठिकाणोमें ज्यादे खमा नही रहणा बहोत महनतनी होय तोची जो- काम करणा होय सो करणाही अगर तकली- पसें मरेगा तो पुरुषार्थका फल जो धर्म अर्थ- काम ये तीनोंही मिलसकता नही जो अदमी आमंबर रहित होताहे उसका अनादर हो- ताहे इसवास्ते बुद्धिवानोंकू जरूर आनंबर र- खणा परदेस जाणेसें अपनी इऊत माफक आमंबर अपणे धर्मकी नेष्टा रखणी इस वातोंसें बमाइ बहुमान र मनमें विचारे हुये कामकी सिद्धी परदेसमें बहोत लान होय तोनी ज्यादे नही रहणा कारण पिगमी मकानकी व्यवस्था विगम जातीहे काम सिजीकेवास्ते पंचपरमेष्टीका ध्यान तथा गौतमका नाम लेणा कितनेक चीजे देव गुरु तथा ज्ञानकेवास्ते काम आवे एसी तरेकी रखणी क्योंके धर्ममें धन बगाणेसें ध- (१५६) मही सफलता होतीरे धर्मके सात क्षेत्रो में धन जमाने मनोरथ करणा जोकी पन पेदा करते आता हरणा पमे उसकी निवृतिके वास्ते - आमी जानिये सोनित बमे २ मनो- ... हा मनुगकी बुद्धि जेसी inter मोग सही तरेकी काम कर- सामानामा गश येती. ॥ गन पावसात FEE M १४७) ब्राह्मण एक रजपूत एक वणिया एक सुनार ए च्यारजणे आपसमे दोस्तथे वो च्यारोंही धन कमाणे परदेस चले रातकू एक उद्यानमें रहे उस जगे रातर्फे दरखतके सोनेका पोरसा ल- टकता देखा च्यारों से एक बोला धनहे तब स्वर्णं पोरसा बोला धन अनर्थका मूलहे तब तीनोनें तो उसका लालच जोम दिया लेकिन सुनार बोला नीचे गिर तब स्वर्णपुरष नीचे गिरा तब सुनार उसकी अंगली काटली वाकीके स्वर्णपोरसेंको खड्डेमै मालदिया पीछे उन च्यार- जणोंमेंसें दो अदमी खानपान लाणेकों गांममें गये नर दोजणे बाहिर रहे तब गांममें गये सो जहर मिलाके खानपांन लाये मनमें वि- चारा वो दोनों इसके खाणेसें मरजायगें तब पोरसा अपणे दोनोंके रहजायगा उधर उन दोनोने विचार कीया वो जब सहरमेंसें आवेगें तब उनोको तलवारसें मारमालेगें तब ये पोरसा अपणे दोनोंके रहजायगा आखिरकों उन दो- नोंकों उनोने शस्त्रसें मार दिया उर वो दोज- पोनें उनोकों मारके मिठाइ खाइ सो वानी दोनु मरगये ये पापऋधि कहलातीहे इसवास्ते हमेसां देव अरिहंतका पूजन अन्नदान वगेरह
(१४६)
नी माता होती है धर्मके सात क्षेनोम भन
समान मनोग्य का जोकी धन पैदा करते
कममा परे उसकी निवृत्तिके वास्ते
को पानी में नादिये सो नित्त बमे २ मनो-
(१४७) ब्राह्मण एक रजपूत एक वणिया एक सुनार ए च्यारजणे आपसमे दोस्तथे वो च्यारोंही धन कमाणे परदेस चले रातकू एक उद्यानमें रहे उस जगे रातर्फे दरखतके सोनेका पोरसा ल- टकता देखा च्यारों से एक बोला धनहे तब स्वर्ण पोरसा बोला धन अनर्थका मूलहे तब तीनोनें तो उसका लालच गेम दिया लेकिन्द सुनार बोला नीचे गिर तब स्वर्णपुरष नीचे गिरा तब सुनार उसकी अंगली काटली वाकीके स्वर्णपोरसेंको खड्डेमै मानदिया पीछे उन च्यार- जणोंमेंसें दो अदमी खानपान लाणेकों गांममें गये उर दोजणे बाहिर रहे तब गांममें गये सो जहर मिलाके खानपांन लाये मनमें वि- चारा वो दोनों इसके खाणेसें मरजायगें तब पोरसा अपणे दोनोंके रहजायगा उधर उन दोनोने विचार कीया वो जब सहरमेंसें आवेगें तब उनोकों तलवारसें मारमालेगें तब ये पोरसा अपणे दोनोंके रहजायगा आखिरकों उन दो. नोंकों उनोने शस्त्रसे मार दिया उर वो दोज- पोनें ननोकों मारके मिठाइ खाइ सो वानी दोनु मरगये ये पापऋछि कहलातीहे इसवास्ते हमेसां देव अरिहंतका पूजन अन्नदान वगेरह
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(१४ए) ताही जाताहे जीवण मल नाहटेके अफीमके फाटकेमें नगद असी हजार रुपे पासमें होगये तब मोहनलाल गोल ने कहा अब जीवणमल फाटकेका सट्टा बोमकर जेपुरमें सराफी उकान करले सो लखपती जेसा रुजगार खरच चलता रहेगा जीवणमल बोला लाख रुपया होणसे फाटका गेमूंगा आरिवरकों यह हाल हुवा सो वो सब धन वरवाद होकर हजारो रुपेका क- रजदार होकर आखिरकों वरवाद होगया ये बात मेने प्रतक्ष देखी जो अदमी आस्याका दास नया वो जगतका दास होजाताहे उर जिसनें तृष्णा आसा जीतली उसने जगत् जीतलिया गृहस्थोंकों चाहीये सो धर्म अर्थ काम इन तीनोंकों आपसमें बाधा नही पोहचे एसा सेवन करणा अपणे २ वरखतपर सब क्र- रणा निकेवल विषयसुखमें मग्न एसा कोण आदमीहे सो आपदामें नही पमताहे विषय मग्न आदमीके धनकी धर्मकी शरीरकी लोक लाजकी नुकशानी होतीहे धर्म र काम दो- तोको गेमके जो कष्ट करके धन पैदा करतेहें वो धन धुसरेही नोगतेहें जेसे सिंह हाथीकू -मारकर फकत पापकाही नागी होताहे अर्थ (१४०) पुण्य तथा कोई वखत पर संघ पूजा साधर्मी वात्सला वगेरह धर्मकाम करके लक्ष्मीळू सुक- नार्थमें लगाणा हमेमा थोमा २ पुन्य करणाही महीये योमा होय तो थोमेमेस थोमाही गाणा भर्मके काममें ढील नही करणी जाग्य- पानकी ऽपया न करणी च्य पैदा करणका जयम मेमां का वणिया वेश्या कविन चोप्रामण इनने यादी जिमदिन । नदीमने i दिन निकला मानत योमी 'मा प्रमाण नही मानाव्यनि- माको पदमी यांनी संपदा नियादी प्राणी अभी सामान ले जाका देती (१४ए) ताही जाताहे जीवण मल नाहटेके अफीमके फाटकेमें नगद असी हजार रुपे पासमें होगये तब मोहनलाल गोल ने कहा अब जीवणमल फाटकेका सट्टा बोमकर जेपुरमें सराफी जुकान करले सो लखपती जेसा रुजगार खरच चलता रहेगा जीवणमल बोला लाख रुपया होणेसें फाटका गेमूंगा आखिरकों यह हाल हुवा सो वो सब धन वरवाद होकर हजारो रुपेका क- रजदार होकर आखिरकों वरवाद होगया ये बात मेने प्रतक्ष देवीहे जो अदमी आस्याका दास नया वो जगतका दास होजाताहे ठर जिसनें तृष्णा आसा जीतली उसने जगत् जीतलिया गृहस्थोंकों चाहीये सो धर्म अर्थ काम इन तीनोंकों आपसमें बाधा नही पोहचे एसा सेवन करणा अपणे २ वरखतपर सब क- रणा निकेवल विषयसुखमें मग्न एसा कोण आदमीहे सो आपदामें नही पमताहे विषय मग्न आदमीके धनकी धर्मकी शरीरकी लोक लाजकी नुकशानी होतीहे धर्म र काम दो- नोकों गेमके जो कष्ट करके धन पैदा करते. वो धन सरेही नोगते. जेसे सिंह हाथीकू मारकर फकत पापकाही नागी होताहे अर्थ (१५०) उर काम इन दोनोंकों बोमके जो फकत मर्म- ही सेवन करतेहैं वो साभू मुनिराजकाही भर्महे गृहस्थका नही गृहस्थोकंनी नाही सो धर्मकं बाधा उपजायकर अर्थ उर काम सेवन नही करणा जैसे खत वोणे रसे हुगे बीजोको जो जाट खाजाताहे एसे प्राणी पुरपत अंन में गाण नही होता, जो आर- मी परतीक नगा र इरा बोका मुगल जोगे वोही गुण दलातादेमंद मान विगाम नाम न करताहे को REPोमाना: भामा बागा पो नमेन लाईन (१५१) रकू उरख देकर धन जमा करे वो कंजूस कृपण कहलाताहे योग्य ठिकाणे खरच नही करे वानी कृपण कहलाताहे इसमें क्षणिक विषयासुरखमें आसक उर मूल नक्षक ये दोनोंही धन खो- वालेहे इय दोनोंही पीछे पतातेहे कृपणकी जमा पराइ कहलातीहे राजा नाइबंध या जमीन या चोर वगैरे लोक कंजूसका धन रखा- तेहें उसका धन धर्ममें अथवा काममें लगता नहीहै जिसके धनके नाश्बंध मालक होय चोर खूटे किसीनी बलसें राजा ले लेवे अंगा- रमें जल जावे जलमें डूबजाय जमीनमें रह- जाय खोटी चाल चलणमें उमादेवे एसा जो धन बहोतोके ताबे में रहेहुयेकू धिकार हो जेसें माल जादी उरत अपणे पुत्रको लाम लमावते हुये पतिकू हसतीहे तेसे मोत शरीरके रक्षककू हसतीहे जमीनहे सो धनके रक्षककू हसतीदे कामियोका जमा कीया हुवा धान मरवीयोका जमा कीया हुवा सहत कंजूसका जमा कीया हुवा धन ये तीनोही पराये काममें आतेहे इसवास्ते गृहस्थकू चाहीये सो धर्म अर्थ उर कांम इन तीनोंकों बाधा मही पोहचावे जो कर्मयोगमें बाधा पमे तो इस मुजब हिफाजत पर करणा कामकी जो गवाई नहीं मिले तो धर्म- की र धनकी रक्षा करणी कारण इन दोनो. की रक्षा करणेवानो विषयसुख मिलनी सर्फ शादेमंड अर्थर कांम दोनोंकी जोगमा नही मिले नो धर्म तो जरूरही करणा कारण भनकी जम मर्मती करनीख मांगकरकेती अपणी या लाता लोग र स्वागतो मन विचारणाके में सनसनी मनगम पापकरके इन तीनोका . ft.th वामकी अमर पक्षी मीनी मिलनी बनकी आय हो। 5*31 urte allir CFT - Fullt scorpiofr itu हा मानना -r (१५३) लेकिन वखत पम्नेपर सत्पुरष दोनोंकों तिनखे बराबर गिणतेहे ? यशका फेलाव करणा होय २ दोस्ती करणी होय ३ अपणी प्यारी स्त्रीके वास्ते कुछ काम होय ४ अपणे निर्धननाश्बं- धुठकों सहाय करणा होय ५ धर्मकाम करणा होय ६ विवाह करणा होय ७ पुस्मनका क्षय करणा होय 6 अथवा कोई संकट आगया होय इत्यादिक काममें स्याणे आदमी धन ख- रच करणेकी गिणती रखते नहीहे चतुर आद- मीका एक बदामनी अगर खोटे रस्ते चला जाय तो हजार रुपया गया एसा समऊतेहे वो अदमी अच्छे रस्ते आतेहे एसा आदमी अगर क्रोमो रुपया खुल्ले हाथसें खरच करे तोजी धन रखूटता नही इसपर एक दृष्टांतहे एक सेठके बेटकी बहू नइ परणी हुईथी उसने एकदिन अपणे सुसरेकू चराकके अंदरसे नीचे गिरे हुये तेलके बुंदसें अपणी जूती चुपमते दे- खकर दिलमें विचारणे लगीके मेरा सुसरा कं- जूसहे यह बमी कसरहे तब उसने पारख करणेकू एसा वाहना कीया के मेरा सिर रख- ताहे एसा कहती हुइ रोणे लगी तब सेठ ब- होतही इलाज करवाया लेकिन जांणकर करे +- Hin
(१५७)
जिसका फायदा केसें होय तब बटु बोली ऐसे
मेरा सिर बहोतसीवेर उखा करदे आखिरकी
वधिया मोतीयोंको पीसके लेप करणेसे मिट
जाताद ये बात मुणतेही रोउ बमा प्रसन्न हो.
कर मे भिया मोती मंगाकर पीराणेकी rur.
-- (१५५) थिर होगइ लक्ष्मीकी एसी बात सुणके सेठने विचार कीया कदास मेरा व्रतमें नंगन पर्ने एसें मरसें नगर गेम बाहिर चलागया इतनेमें विना पुत्र नगरीका राजा मरगया उसके पिगमी मंत्रीयोने पाट हस्तीकी शुंभमे अनिषेक कलस दीया जिसपर माले वोही राजा आखिरकों उसने विद्यापति सेठका अभिषेक कीया तब देवतोंने आकासवाणी करी हे सेठ यह राज्य तो नुों करणाही होगा तब सेठ राज्य सिंहा- सणपर ऋषन देव अरिहंतकी मूर्तिकू बेवायकर आप राजकाज चलाया अनुक्रमसें पांचमें नव सोक्ष गया न्यायसें धन कमाणेवालेका कोई संक नही रखताहे जगे २ तारीफ होतीदे प्राये करके नुकशान नही होताहे सुख समा- घि दिन २ बढते जातीहै इसवास्ते न्यायवंत- पणेका धन दोनों नवमें सुखदाईहे धर्मी पुरष शुद्ध चलणसें धीरजसें वर्तावा करतेहै लेकिन पापी अदमी कुकर्मी होणेसें सब जगे शंकासे वर्तावा रखताहे इसपर दृष्टांतहे देव उर यश ये दोय नांमके से बहुत प्रीतिसें साथ फि- रतेथे कोइ सहरमें रस्तेमें पमा हुवा रत्नसें जमा हुवा कुंछल उन दोनोने देवा देव तो
(१५६)
आवकथा सवारले पराया धन का नियम
होणेसे पीछा घिरा यशजी उसके संग पीग
विरा लेकिन मन में विचारणे लगा पभी नीज
उगाने त्या दोगहे तब देव सेउकी नजर
चुहायकर मुम्ल उठा लीया फेर मनाना-
पोखगा मेरा मित्र देवले सो भन्ग जिसमें
मी निलो नता गुणहे रोकिन् केइगक ति
गोगा। इनमें पके आधीपती देगा ll
विवार राममे जमकलक पानसे बहोत कि-
Frift गा अनुकमसे दोन अwdl
(१५७) तेजी आइसो देवसेउके मालमें चोगुणा लान होगया अन्यायके धनका एसा हाल देखकर श्रावक व्रत यशनेन्नी अंगीकार करा इस तरेसें न्यायसें कमाया धनका अगर दांननी लीया जाय तो लेणेवालेके बहोत वढोतरी होती इसपर दृष्टांतहे चंपा नगरी में सोमनामे राजा था उसने अच्छे पर्वपर दांन करणेकू बहोत धन जमा कीया तद पीछे अपणे प्रधानको पूग अहो मंत्री दाम लेणेवाला सुपात्र चाहीये तब मंत्री बोला इस नगरीमें एक ब्राह्मणहे लेकिन है स्वामी न्यायोपार्जित धन मिलणा मुसकिलहे तेसेंइ सुधमनवाला जर योग्य उर गुणवान एसा पात्र ये दोनोका योग मिलना तो बहो- तही कठणहे तब सोमराजा न्यायसे धन कमाणेकी इच्छासें वेष बदलकर कोई नहीं पहचाणे इस मुजब वणियेकी उकानपर जाके मजूरी करके आठ मोहरे कमाइ पर्व आणेसें सब विप्रोको निहुंता दीया उस सुपात्रकों न- हुंता देणे मंत्रीकू नेजा तब वो ब्राह्मण बोला हे मंत्रवी जो ब्राह्मन लोनके वश राजासें दांन ले वो तमित्रा घोर नर्कमें पम्के पुखी होय राजाका दांन सहतमें जहर मिला जेसा हे वरख-
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(१५७) तेजी आइ सो देवसेवके मालमें चोगुणा लान होगया अन्यायके धनका एसा हाल देवकर श्रावक व्रत यशनेन्नी अंगीकार करा इस तरेसें न्यायसें कमाया धनका अगर दांनन्नी लीया जाय तो लेणेवालेके बहोत वढोतरी होती हे इसपर दृष्टांतहे चंपा नगरी में सोमनामे राजा था उसनें अच्छे पर्वपर दान करणेकू बहोत धन जमा कीया तद पीछे अपणे प्रधानको पूग अहो मंत्री दाम लेणेवाला सुपात्र चाहीये तब मंत्री बोला इस नगरीमें एक ब्राह्मणहे लेकिन है स्वामी न्यायोपार्जित धन मिलणा मुसकिलहे तेसेंइ सुधमनवाला र योग्य उर गुणवान एसा पात्र ये दोनोका योग मिलना तो बहो- तही कठणहे तब सोमराजा न्यायसें धन- कमाणेकी इच्छासें वेष बदलकर कोई नहीं पहचाणे इस मुजब वणियेकी उकानपर जाके मजूरी करके आठ मोहरे कमाइ पर्व आणेसें सब विप्रोको निहुंता दीया उस सुपात्रकों न- हुंता देणे मंत्रीकू नेजा तब वो ब्राह्मण बोला मंत्रवी जो ब्राह्मन लोनके वश राजासें दान ले वो तमिस्त्रा घोर नर्कमें पम्के पुखी होय राजाका दांन सहतमें जहर मिला जेसा हे वरव- १४
माया इसमास्ने परामा पन का नियम
माणसे पीधा निराशनी उसके संग पाग
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मानों की नजर
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(१५७) तेजी आई सो देवसेठके मालमें चोगुणा लान होगया अन्यायके धनका एसा हाल देखकर श्रावक व्रत यशनेनी अंगीकार करा इस तरेसें न्यायसें कमाया धनका अगर दांनन्नी लीया जाय तो लेणेवालेके बहोत वढोतरी होती इसपर दृष्टांतहे चंपा नगरीमें सोमनामे राजा था उसने अच्छे पर्वपर दान करणेकू बहोत धन जमा कीया तद पीछे अपणे प्रधानको पूग अहो मंत्री दान लेणेवाला सुपात्र चाहीये तब मंत्री बोला इस नगरी में एक ब्राह्मणहे लेकिन हे स्वामी न्यायोपार्जित धन मिलणा मुसकिलहे तेसेंइ सुधमनवाला उर योग्य उर गुणवान एसा पात्र ये दोनोका योग मिलना तो बहो- तही कवणहे तब सोमराजा न्यायसें धन कमाणेकी इच्छासें वेष बदलकर कोई नही पहचाणे इस मुजब वणियेकी उकानपर जाके मजूरी करके आठ मोहरे कमाइ पर्व आणेसें सब विप्रोको निहुँता दीया उस सुपात्रकों न- हुंता देणे मंत्रीकू नेजा तब वो ब्राह्मण बोला हे मंत्रवी जो ब्राह्मन लोनके वश राजासें दान ले वो तमित्रा घोर नर्कमें परके पुखी होय राजाका दांन सहतमें जहर मिला जेसा हे वरख- .
(१५)
तपर वाहे गुजका मांस खाये सो श्रेधलेकिन
राजापास दान नदिलोणा गकर्तपास दान
ar
गाम दिसा समान जकेपास दोन
अपामार दिसा रामान राजापास दान
गा सोश मार हिसा समान (HI
teriar sir पुगतान सास्ते में
4:"ffffff मंत्री बोला हे मा.
आनि प्रालियागता किया
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.infinit आमा
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(१५ए) चार नंग होतेहैं जिसमें पहला नेद एसें हे यह पुण्यानुबंधि पुण्यका कारण होणेसें उत्कृष्ट देवतापणा युगलियोमें मनुष्यजन्म र सम्यक्त वगेरेका लान होताहे अंतमें मोक्षसुख होताहे जेसे धन्नासार्थवाहने घीका दांन देणेसें साधू उको तेरमे नवमें ऋषनदेव तीर्थकर हुवा शान लिना क्षीरके दांनसें हुवा २ न्यायसें पेदा कीया धन उर कुपात्रोंको देणा ये दूसरा नंगहे यह पुण्यानुबंधि पुण्यका रण होणेसें इससे कोई २ नवमें देखता लान विषयसुखका हो- ताहे तोजी अंतमें फल कम्वे लगतेहें इस जगे लाख ब्राह्मनोकों जीमाणेवाले ब्राह्मनकी तरे को दृष्टांत एसाहे एक ब्राह्मन हमेसां ब्राह्मनोकों जीमाते २ लाख ब्राह्मन जीमाया र विषय- सुख नोगता हुवा मरके नजजातीका सेचनक नामका हाथी हुवा उर उसही जगे ब्राह्मणो- कों जीमाये वाद जो अन्न वचता सो एक ग- रीब दलजी ब्राह्मन सुपात्रोंकों दान देदेता वो गरीब ब्राह्मन उहांसें मरके सो धर्म देवलोक गया उहांका सुख नोगके आयुष्य पूर्णकर श्रे- णिक राजाके नंदिखेण नामका पूत्र हुवा उसकू देख सेचनक हाथीकू जातिस्मरण झान हुधा
(१५७)
नपर नारे पुलका मांस खा सो श्रेषजेकिन
हापाम दांन नदिनणा चकापास दान
Errस हिसा समान धाजपा दोन
गाजार हिसा समान राजापाल दान
मामो मार दिसा समान एसा
मनिया पुराणोता विनई सना में
१. मा. मंत्री बोला, सा.
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(१५ए) चार जंग होतेहैं जिसमें पहला नेद एसें हे यह पुण्यानुबंधि पुण्यका कारण होणेसें उत्कृष्ट देवतापणा युगलियोमें मनुष्यजन्म उर सम्यक्त वगेरेका लान होताहे अंतमें मोक्षसुख होताहे जेसे धन्नासार्थवाहने घीका दान देणेसे साधू उको तेरमे नवमें ऋषनदेव तीर्थकर हुवा शान लिनड क्षीरके दांनसें हुवा ५ न्यायसें पेदा कीया धन उर कुपात्रोंको देणा ये दूसरा नंगहे यह पुण्यानुबंधि पुण्यका कारण होणेसें इससे कोइ २ नवमें देखता लान विषयसुखका हो- ताहे तोजी अंतमें फल कमवे लगतेहें इस जगे लाख ब्राह्मनोकों जीमाणेवाले ब्राह्मनकी तरे वो दृष्टांत एसाहे एक ब्राह्मन हमेसां ब्राह्मनोकों जीमाते २ लाख ब्राह्मन जीमाया र विषय- सुख नोगता हुवा मरके नजजातीका सेचनक नामका हाथी हुवा उर उसही जगे ब्राह्मणो- कों जीमाये वाद जो अन्न वचता सो एक ग- रीब दलजी ब्राह्मन सुपात्रोंकों दान देदेता वो गरीब ब्राह्मन उहांसें मरके सो धर्म देवलोक गया उहांका सुख नोगके आयुष्य पूर्णकर श्रे- णिक राजाके नंदिरवेण नामका पूत्र हुवा उसकू देख सेचनक हाथीकू जातिस्मरण झान हुवा *77*TIES कर jिमा किन समान दिने frare it Out FR Fight lift- देगा इनार हिंसा ममान Ark üm ift ITTIF ATT 5*1tif 13897 स्मृमियों -tr jarif राजननलीमा की सोना म. भान नामानि शानि धनका दाना उगाने उसमें दो नही इत्यादिक निनो सन मंत्री - जाकेपास माया गजा उमनिजासन दीपा पगधोकर पिनगमें पता की वो आउ मोहर दक्षिणा के कोई नही हो इस मुजद - गम दान दिया दुसरे ग्राममा इस सपर देख मनमें गुस्से हुये राजाने इसई कोऽ सार पदार्थ देदीया पीसे राजा बहोतसा धन दुसरे ग्राह्मनोको देदेकर खुस कीया राजका दीया धन उस विनोके योमे दिनों में खुट गया सब बाहानोके लेकिन वो आउ मोहरे तो रसाते खरचते जन्मनर उस बामणके अस्पट होगया जेसे खेतमें बीजवादि होय तेसें न्या- यसै पेदा कीया धन उर सुपात्र दांन इसके (१५ए) चार जंग होतेहैं जिसमें पहला नेद एसें हे यह पुण्यानुबंधि पुण्यका कारण होणेसें उत्कृष्ट देवतापणा युगलियोमें मनुष्यजन्म उर सम्यक्त वगेरेका लान होताहे अंतमें मोक्षसुख होताहे जेसे धन्नासार्थवाहने घीका दान देणेसें साधू डको तेरमे नवमें ऋषनदेव तीर्थकर हुवा शा; बिना क्षीरके दांनसें हुवा २ न्यायसें पेदा कीया धन उर कुपात्रोंको देणा ये दूसरा नंगहे यह पुण्यानुबंधि पुण्यका कारण होणेसें इससे कोई २ नवमें देखता लान विषयसुखका हो- ताहे तोनी अंतमें फल कमवे लगतेहें इस जगे लाख ब्राह्मनोकों जीमाणेवाले ब्राह्मनकी तरे वो दृष्टांत एसाहे एक ब्राह्मन हमेसां ब्राह्मनोकों जीमाते २ लाख ब्राह्मन जीमाया र विषय- सुख नोगता हुवा मरके नजजातीका सेचनक नामका हाथी हुवा र सही जगे ब्राह्मणो- कों जीमाये वाद जो अन्न वचता सो एक ग- रीब दलजी ब्राह्मन सुपात्रोंकों दान देदेता वो गरीब ब्राह्मन उहांसें मरके सो धर्म देवलोक गया उहांका सुख नोगके आयुष्य पूर्णकर श्रे- णिक राजाके नंदिखेण नामका पूत्र हुवा उसकू देख सेचनक हाथीकू जातिस्मरण ज्ञान हुधा
HIT Knter मोल
CTISITEET Ti-ITT 165-17sas
CX1974 AT PT for Art
are RFIT FIT FLUFTTEET TA
देणाको हार EिAT THIS THE
Turint - figurat 1442 su
राजनही मानी जो सा.
सातानि आजका
धनका देगा माने में
नही इत्याविनोसें ममसर मंजीग.
जाकेपास साया राना मनिवासना
घोकर विनय पूना करी पो आउ मोहर
संगण तरीके को नहीं देखे इस मुब म.
जमि दान दिया दुसरे बाप इस स्वरूप
देख मनमें गुस्से दुषे राजाने इसकं कोई सार
पदार्य देदीया पीसे राजा बहोतसा धन
उसरे बालनोको देदेकर खुस कीया राजका
दीया धन उस विप्रोके योमे दिनोंमें स्फूट गया
(१५ए) चार जंग होतेहैं जिसमें पहला नेद एसें हे यह पुण्यानुबंधि पुण्यका कारण होणेसें उत्कृष्ट देवतापणा युगलियोमें मनुष्यजन्म र सम्यक्त वगेरेका लान होताहे अंतमें मोक्षसुख होताहे जेसे धन्नासार्थवाहने घीका दान देणेसें साधू उको तेरमे नवमें ऋषनदेव तीर्थकर हुवा शा; बिना क्षीरके दांनसें हुवा २ न्यायसें पेदा कीया धन र कुपात्रोंको देणा ये दूसरा जंगहे यह पुण्यानुबंधि पुण्यका कारण होणेसें इससे कोइ २ नवमें देखता लान विषयसुखका हो- ताहे तोनी अंतमें फल कमवे लगतेहें इस जगे लाख ब्राह्मनोकों जीमाणेवाले ब्राह्मनकी तरे वो दृष्टांत एसाहे एक ब्राह्मन हमेसां ब्राह्मनोकों जीमाते २ लाख ब्राह्मन जीमाया उर विषय: सुख नोगता हुवा मरके नजजातीका सेचनक नामका हाथी हुवा उर उसही जगे बानगेहूँ कों जीमाये वाद जो अन्न वचता सो होतेहें रीब दलद्धी ब्राह्मन सुपात्रोंकों दार जेसे गायकू गरीब ब्राह्मन उहांसें मरके सं अन्यायके क- गया उहांका सुख नोगके उस कर्मसे चमाल णिक राजाके नंदिखेणातमें जन्म लेणा होताहे देख सेचनक हार्समें तेरा पंथीमतके ढूंढक गुरु
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आनलामी आजादा या
धनका दान देगा इसमाने होर
नदी इत्यादि गगनो में समभाग मंत्री
जाकेपास लाया गजा निजामन 4
पगधोकर विनगौ पूजा की आमोहा
दक्षिण तरीके कोई नही देखे इस मुजब म
गदान दिया दुसरे वामपा इस स्वरूप
देख मनमें गुस्से हुये राजाने इस कोड तार
पदार्थ देदीया पीसे राजा बहोतसा धन
दुसरे वाहानोकों देदेकर खुस कीपा राजका
दीया धन उस विनोके थोके दिनों में खुट गया
सर्व ब्राह्मनोके लेकिन वो आठ मोहरे नो
रवाते स्वरचते जन्मानर उस बामणाके अरवट
होगया जेसे खेतमे वीजद्धि होय तेले न्या-
यसै पेदा कीया धन उर सुपात्र दान इसके
(१६१) से खरीदकर क्रोमो सोनइये लगाकर मंदिर बनवाया जिस मंदिरकों तोमणेको उरंगजेब मुसलमीन बादशाह चढा जबके मंदिरकी को- रणीकी रमन्नक देखी तब हाथमें जो गुरजथा सो बूटगया उर कहणेलगा अय परवर दिगार में इस अइमारतको हरगिज नही तोमसकता करवाणेवाले उर कारीगरोकों कहांतक खूबी दीजाय बमे अंगरेज उस मंदिरकी निव देखकर यह कहतेहे अगर सब मुल्कका धन इनाममें दीया जाय तोनी इस जिन मंदिरकी नकल नही कोई बणासकता तो अनेक पापार- नसे अनुचित काम करके जमा कीया धन धर्मखाते नही लगावे तो इस नवमें अपयश उर परनवमें नरक पमणा होताहे जिसपर म- म्मणसेवका दृष्टांत जाणणा ४ अन्यायसें पेदा कीया धन उर कुपात्र दांन यह चोथा नंगहे जिसकरके मनुष्य धिकारणे लायक होतेढ़ें विवेकीयोकू जरूर बोमणा चाहीये जेसे गायकू मारके कनओकू पोपणा जेसे अन्यायके क- माये धनसे श्राप करतेहे उस कर्मसे चमाल निटल एसी हलकी जातमें जन्म लेणा होताहे जेसें विद्यमांनकालमें तेरा पंथीमतके ढूंढक गुरु (1) torren gir pit - म मा अंग दो-af r trul Caraîr SFP at PNA जिमा गाभाग को आगामे न गंदा hi- नने यापोताई ग, कभी मत तकनीतीनो मामीनरसिमर होकरके शात नोंमें बोगका रस दोस) बणा में खनमायदेशास धरूप होना- ताहे उर दूध सापकं पित्राणे में जहर होना ताहे इसीतरे सुपात्र गान न्यारे ५ फल हो. तेहे स्वातिनक्षत्रका जला मापके भूमें गिरणी में व होताहे जर सीपमें गिरणम मोती केले में वन बुद्धिमान विचार देवे चोही स्वाति शेदी जन लेकिन पावके फेरफारसे रे इस विषयपर खरतर गच्ची अपपदेशित आव पहारपर भून कमाकर चोटे जमीन वाहाणा- गावं जातिस्मरणा झांन हु नामका पून दुवा उस आयुध्य पूर्णकर में सो धर्म देवलो न देदेना 64 (१६१) सें खरीदकर क्रोमो सोनइये लगाकर मंदिर बनवाया जिस मंदिरकों तोमणको उरंगजेब मुसलमीन बादशाह चढा जबके मंदिरकी को- रणीकी रमन्नक देखी तब हाथमें जो गुरजथा सो बूटगया उर कहणेलगा अय परवर दिगार में इस अइमारतको हरगिज नही तोमसकता करवाणेवाले उर कारीगरोकों कहांतक खूबी दीजाय बमे अंगरेज उस मंदिरकी विव देखकर यह कहतेहे अगर सब मुल्कका धन इनाममें दीया जाय तोजी इस जिन मंदिरकी नकल नही कोई बणासकता तो अनेक पापारं- नसे अनुचित काम करके जमा कीया धन धर्मरवाते नही लगावे तो इस नवमें अपयश उर परनवमें नरक पमणा होताहे जिसपर म- म्मणसेवका दृष्टांत जाणणा ४ अन्यायसें पेदा कीया धन र कुपात्र दांन, यह चोथा नंगहे जिसकरके मनुष्य धिकारणे लायक होतेहें विवेकीयोकू जरूर बोमणा चाहीये जेसें गायकू मारके कनओकू पोपणा जैसे अन्यायके क- माये धनसें श्राद्ध करतेहे उस कर्मसे चमास निल्ल एसी हलकी जातमें जन्म लेणा होताहे जेसें विद्यमांनकालमें तेरा पंथीमतके ढूंढक गुरु मदीना मान है TER -) को गोरीmiti TAITREE र मनमानी की कि Hi Frier rai बीन मारामाणे महान के पानी मसारमा मात्र जो गित महागुन्ग म सानी नधि लगाने पुन्यनिगालेले चन्यो, 56 सम जिन मंदिरोही की मार मंगात नदि करतेदे न्यायमें उपार्जन कीया न सु. पात्रोको दान दे तो कल्याण होना लेकिन अन्यायसे कमाये धनसें कल्याण चाहतेदे सो कनी होणा नही वो कालकुट जहर खाणे जे. साहे अन्यायसे धन कमाणेवाने गृहस्थ अ- न्याई लगाइखोर अहंकारी र पापकी हो- ताहे जेसे विक्रम संवत तीनसे में रांका सेठका होणेकी कथा श्राविधीमें लिखीहे वेसा अ- न्यायसें धन जमा कीया अंतमे सुखदाइ हो- ताहे साधुका आहार विहार व्यवहार उर बचन ये च्यारोही शुरू होताहे सो दुनिया देखतीहे लेकिन गृहस्थका तो एक व्यवहारही शुद्ध देखतेहे व्यवहार शुद्ध होय तो सब धर्म (१६३) काम सफल होताहे श्रादिनकरमेंनी लिखाहे व्यवहार शुधधर्मका मूलहे कारण व्यवहार शुद्ध होय तब कमाया धन शुद्ध होताहे उर धन शुद्ध होय तब आहार शुद्ध होय अहार शुद्ध होय तब देह शुद्ध होताहे नर देह शुद्ध होय तब धर्मके योग्य होताहे उर धर्मकृत्य सफल होताहे व्यवहार शुद्ध विना सब निर्फ- लहे व्यवहार शुद्ध नही रखे वो अदमी धर्मकी निंदा करातेहें उर धर्मकू निंदा कराणेवाला उर्लन बोधि होताहे इसवास्ते एसे यत्नसें एसा काम करणां जिस्से मूर्वलोक निंदा नही करसके आहार माफक शरीरकी प्रकृति वंध- तीहे जेसे बालक उमरमें घोमा नेसका दूध पीताहे वो तो जलमे अच्छी तरेसें पमे रहतेहे उर गायका दूध पीणेवाले जलसें घोमे दूर रहतेहै तेसें बालक जेसा आहार करताहे वेसाही उसकी प्रकृति होतीहे इसवास्ते विव- हार शुद्ध रखणा तेसेंही देसविरुछ कामकू गेमणा जेसे सिंधदेसमे खेती करणी देश विरु- कहे तेसे लाट जो नरु अच्छका प्रांत देस जिसमें दारू सराप निपजाणानी देसविरुघहे इस मुजब उरनी अनेक देशोंमें अनेक बात- (१) दीर Er . Twiterar Triri मोही Hindi कटे जाने के ri पी. गागे माहाम: in fronál ilit gorrit ift AffiT HVA जो तिमहापुन्यपदे में एक सानी नाम मगात पाने का इस सम जिन विकी i) मा मान नदि करतेने न्याय उपार्जन कीया Tन सु. नक दान दे तो कल्याण होता है लेकिन अन्यायसे कमाये धनसें कल्याण चाहतेहे तो कनी होणा नही वो कालकूट जदर खाणे जे. सादे यान्याय में धन कमाणवाले गृहस्थ अ- न्याई जमाइखोर अहकारी र पापकर्मी हो- ताहे जैसे विक्रम संवत तीनसे में रांका सेवका होकी कथा प्राविधीमें लिखीहे वैसा अ- न्यायसें धन जमा कीया अंतमे सुखदाइ हो- ताहे साधुका याहार विहार व्यवहार उर वचन ये च्यारोही शुद्ध होताहे सो उनिया दरवतीहे लेकिन गृहस्थका तो एक व्यवहारही शुद्ध देखतेहे व्यवहार शुद्ध होय तो सब धर्म -- (१६५) दोय राजाके आपसमें तकरार चालती होय उहां धाम वगेरे पमणेसें रस्ता बंध होय अथवा पार नही पमे एसे बने जंगलमें समी सांऊ वगेरह भयंकर वखतमें - विना सहाय अथवा विनाताकत जाणेसें प्राणकी अथवा ध- नकी हानि होय अथवा उसरा कोई अनर्थ सामने आवे सो काल विरुष कहलाताहे अ- थवा फागण महीनेवाद तिल पीलणा तिलका व्यापार करणा अथवा तिल खाणा वर्षातकी मोसममे चंदलीया वगेरे पत्तोंका साग खाणा जहां बहोत जीवाकुल जमीन होय जसरस्ते गामी गामा असवारी चलाणा एसा बझे जुलम करणा सो काल विरुद्ध कहलाताहे राजविरुष नहि करणा सो इस तरेसें राजा प्रधानादि- कोका गुण निकालणा राजमाने एसा मंत्री वगेरेका आदर सत्कार नहि करणा राजासें वे मुख एसें आदमीकी सोहबत करणी वैरि उस्मनोके ठिकाणे लोनसें जाणा वैरि पुस्मनोके विकाणेसे आये हुये अदमीके संग वर्ताव रख- णा राजाकी महरबानीहे एसा संमऊ राजाके करे हुये काममें फेरफार करणा सहरमें आगे वान जो लोक होवे उनोंसें विपरीत चलणा
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जब नि: दादोता. जो कोई याणा
अना दोष नहाये अब मबा उगुण
ाहिर को उसपर इशांत एमाहे किली गजा
आगे कोई परदेसी नीन म्बोपरी लाया उसकी
पन्तिीने परिक्षा की वो इम मुजब एक सोपरी-
के कानमे मोरा झाला सो मुझसे बाहिर
निकलगया तब पंत लोक बोले अरे इसने
जो जो बात कानोसे सुणा सो सब भूस
वकदीया करतीथी इसवास्ते इस खोपरीकी की-
मत फूटी कोमीहे दूसरी खोपरीके कानमें मोरा
माला वो मोरा दूसरे कानमेस बाहिर निकल
- (१६ए) गया तब पंमित बोले तेने इस काननसे बात सुणी उर उसरेके आगे बाहर निकाल देताथा इसवास्ते इस खोपरीकी किम्मत लाख मोह- रकीहे तीसरी खोपरीके कानमें मोरा झाला सो गलेमें उतरगया इसके जीवने जो कुछ बात सुणी सो पेटमेही रखी इसवास्ते इसकी कीमत हम नही करसकते इसतरे उती बात कहतेहें उनोकी अमोल कीमतहे सीधा सरल आदमीकी मस्करी नहि करणी गुणवान आ- दम्योंसे द्वेषनाव नहि करणा कृतघ्नी नहि होणा बहोत लोकोके संग वैर विरोध रखणेवालोंकी सोहबत नहि करणी लोकोमें पूजा प्रतिष्टा पाये हुये अदमीका माननंग नहि करणा अच्छी चालचलणके आदमीमें कोइ तरेका सं- कट आ पमे तो दिलमें खुस नहि होणा अप- में शक्ति होय उर नले अदमीमें संकट - पझे तो जरूर मदत करणी रीत मर्याद कुलकी तथा देसकी गेमणी नही अपणे घरकी हेसि- यतसे ज्यादे बधिया तथा ज्यादे घटीया वषन्नी नहि पहरणा चाहिये यह सब बाते लोकवि- रुष कहलातीहे इस बातोसें इस लोकमें अपयश होताहे वाचक श्रीउमास्वाति सर्व
sirit rritet apris la of Birisi
पदमनाने का काम बनो
का दो। २ जनजानु that
मेरोदाकी ना
नमा गई) दृषी fulti
Tuflat gur कुशीत पोटाश में राजा
उम साकारकी बेटी रोहणीकी नीहार
देससे निकालादी दुसी होकर गेली अनेक
नवों में जीत कटानका पुरब पाया इमा
राजविरुद काम नही करणा लोककी राम
विशेप करके गुणीजणोकी निंदा की र
आपणणे {से अपणी नारीफ करणी दोनोंही
लोकविमन कहलाताहे खरा या खोटा पराया
उगुण निकालणेसे धनका उर यशका लान हो-
ता नही इतनाही नहीं लेकिन जिसके गुण
प्रकास करे वो एकनया दुस्मन पैदा होताहे
अपणी तारीफ पराइ निंदा वप्त नही रखरखी
हुइ जुवान ४ र अछे कप ५ घर कोषादि
कपाय ए पांच चीज संयम पालपोतं अच्छे -
यम करणेवाले मुनिराजकतनी हरजाना करता
जिस अदमी में अच्छे २ गुणा हे तो विगर कहेगी
जाहिर हुयेविगर रहेगा नही नही जब जूवी
(१६०) बमाईमें क्या फायदाहे आप अपणे मूसे तारी- फ करे उसके मित्र उसकू हसतेहे नाश् निंदा करे एसे आदमीकों बमे आदमीपास नही विवलाते उर उसके मावापनी उसकू बहोत मानते नही अपणी तारीफ उर परनिंदा नवो- नवमें नीच गोत्र कर्मवंधताहे वो कर्म क्रोमों नव होणेसेंनी बूटणा मुसकिल होताहे पराइ निंदा करणी यह बमा पापहे कारण बहोत खेदकी बातहे विगर कीये पापनी पराइ निंदा करणे-- वालेकू खड्डेमें गिराताहे इसपर एक दृष्टांतहे सुग्राम गाममें सुंदर नामका एक सेवथा वो बमा धर्मीथा सो मुसाफर वगेरह लोकोकू नो- जन वस्त्र रहणेका ठिकाणा वगेरह देकर उनके ऊपर उपगार करताथा उसके पमोसमें एक ब्राह्मणी रहतीथी वो सेठकी हमेसां निंदा कीया करे यह सेठ परदेसी मरजाताहे उसकी जमा हजम कर- ऐकू यह वणिया एसा करताहे एकदिन एक कार्पटि अर्थात् सामी प्यासकरके व्याकुल आ- या तब सेव अहीरणके पाससे गम मोल लेकर नसकुँ पिलाइ उसके पीणेसे वो गुसाइ मरग: या कारण उस अहीरणने गरका वरतण उ. करे लोकोकू कहा मुसाफर लोक - (15) 1f -- पानामा भो माग जाती जम RAM RA देस पाणी योगीमा में मेने कीयाSH दया ने वीनार ही है मेर नही र मापमो धानी में नीमकमाने परसथा र नीलाकका मानिसमा खाणकाहे ही इस बानही अता- अब किसके पिच्छामी नि अंतमे यो दत्या उस नियारखोर ब्राह्मणीके लगी उस करके काली कुरुप कोटणी होगा इस मु- जब निंदकका दाल होताहे जो कोई आण- हता अवता दोष चढावे अब सबा गुण जाहिर करे उसपर दृष्टांत एसाहे किसी राजा- कोइ परदेसी तीन खोपरी लाया उसकी तोने परिक्षा करी वो इस मुजब एक खोपरी- कांनमे मोरा माला सो मुमसे बाहिर तब पंत लोक बोले अरे इसने जो जो वात कांनोस सुणा सो सब भूलें वकदीया करतीथी इसवास्ते इस खोपरीकी की- मत फूटी कोमीहे दूसरी खोपरीके कान में मोरा माला वो मोरा दूसरे कानसे बाहिर निकल है - (१६ए) गया तब पंमित बोले तेने इस काननसे बात सुणी उर सरेके आगे बाहर निकाल देताथा इसवास्ते इस खोपरीकी किम्मत लाख मोह- रकीहे तीसरी खोपरीके कानमें मोरा माला सो गलेमें उतरगया इसके जीवने जो कुछ बात सुणी सो पेटमेही रखी इसवास्ते इसकी कीमत हम नही करसकते इसतरे बती बात कहतेहैं उनोकी अमोल कीमतहे सीधा सरल आदमीकी मस्करी नहि करणी गुणवान आ- दम्योंसे द्वेषनाव नहि करणा कृतघ्नी नहि होणा बहोत लोकोके संग वैर विरोध रखणेवालोंकी सोहबत नहि करणी लोकोमें पूजा प्रतिष्टा पाये हुये अदमीका माननंग नहि करणा अच्छी चालचलणके आदमीमें कोइ तरेका सं- कट आ पमे तो दिलमें खुस नहि होणा अप- में शक्ति होय उर जले अदमीमें संकट आ- पने तो जरूर मदत करणी रीत मर्याद कुलकी तथा देसकी गेमणी नही अपणे घरकी हेसि- यतसे ज्यादे बधिया तथा ज्यादे घटीया वेषनी नहि पहरणा चाहिये यह सब बाते लोकवि- रुद्ध कहलातीहे इस बातोसें इस लोकमें अपयश होताहे वाचक श्रीनमास्वाति सर्व (10) 7 शिरोमणीनेहसासननी योकोहो - की 'पानात माने तो - कि किन हो माना करणी गेदोनों गोमगाम जोकोही - पणे उपर प्रीन दोनी सपर्म सानाजी आना र मधमें नि, होता जोकप्रिय आदमी सम्गत के वी. f. का कहने भिन्यात काम करा मन में दया नदि गगता दुरा बनाई गेरोको मारणा बांधणे आदि तकलीपका देणा जुमांकमो की धूप में मालणा सिरके बाल बनी बारीक काग- सीसे सनारणा लीवोंको फोमणा गरमी सममें गलणे मजवतसे तीन र उर मो- "दो वेर जीयोकी सार शंताल नदि रख कर पांणीका गणनेका उपयोग नदि रखाणा अनाज इंधन गोपरी शाम खाण के साग पान फल फूल तपासणो बाच्छी तरे उपयोग नहि रस्वणा सावत सोपारी सारक पर बुहारा वालोल फली वगेरे सानि का मुंभे मान पी नाला बगेर साराका fur पार देवते सोते करने कोई ना सो (न मत (१७१) मूत्र खरवार थूकते कुरला करते जल तथा पां- नका पीक मालते बराबर जतना राखणी धर्म करणीका आदर करणा देवगुरु तथा साधर्मी इनोके संग द्वेष नहि करणा देवके अव्यकू अ- पणे काममें नहि लाणा अधर्मी अदमीकी सो- हबत नहि करणी धर्मी अदमीकी मस्करी नहि करणी कषायका उदय बहोत नहि रवणा बहोत पापकारी चीज लेणी या वेचणी नही कठोर खरकर्म तथा पापम अधिकार श्या- दिकमें नहि प्रवर्तणा ये सब बाबतें धर्मविरुद्ध कहलातीहे यह जो ऊपर लिखी बाबत मि- थ्यात्व वगेरेका वयान अर्थ दीपकामें कीयाहे धर्मी लोक देसविरुध कालविरुद्ध राजविरुध अथवा लोकविरुद्ध आचरण करे तो धर्मकी निंदा होतीहे इसवास्ते इन सब बातोंकों धर्म- विरुधही समझापा अब हितोपदेशमालामें नव प्रकारका चित आचरण लिखाहे वो आचरण केसा कहके सब मनुष्य तो देह इंजीयों धरा- वाले एकसेहीहे जनोमें केश्यक आदमी इस शारमें स्याणे विचक्षण होकर यशवंत कहला- तंहें वो सब जूचित आचरणकीही महिमाहे वो इस मुजबहे अपणे पिता संबंधी? मातासंबंधी (१२) २ नाईमनी ३ जानी जानीसंव- ५ सगेनजनसंबंधी ३ मे ही सनी सदाके रोमाने जो संनी र अन्य दर्शनीसंबंधी ५ ये ना जनता सा मनुष्योंकोंकणा 17 जिापिताकी जन्मि- नवचन कायासें करणी नालियबागी शमशे- वा चाकरकी तरे आपकाउनोका mar दाबणा नृरू अवस्था में उगाणा बेगा देश र माफिक उनोंको नोजन कराणा विगत. * वस्त्र गणा बगेरे वस्तु देणा कोइके कणसे तिरस्कार अपमान नही करणा पूत्र अपणे बा- पके सामने वेगा जेसा शोनापाताहे वेसी शो- नाका सो माहिस्सा उंचे सिंहासण बेवणेसें कनी मिलणेका नही बापके वचन मुमसे निकल तेही उठा लेगा चाहिये जेसे राजतिलक बेठ- के वखत रामचंडजीन पिताका वचन पाल- वनवास पधार गये वेसे सपूतोंकों करणा चाहीये जी हजूर जो हुकम अनी करताई एसी राजवही कबूल करणा लेकिन आनाकानी सिर यू अथवा बहोत देर जगायकरके को त अथवा अधूरा काम गेमदेणा इत्या. दिक राहि करणी उनोकों पसंद मे सब काम करणा अपर्ण| अक्कलस कोइ नेश्वेही करणा विचारया होय तोनी ज- चे तत्नी करणा बुद्धिका पहला गुण की माबापकी टेहल करणी जब वो प्रसन्न तब गुप्त रहस्य सब बतादेतेहें ज्ञानक- * बमेहे उनकी बंदगी नहि करणेसें चाहे ही पुराण उर आगम पढो चाहे कित- अपणी बुधिसे कल्पना करो लेकिन बुछिकी प्रबलता होती नही एक स्थविर जाणताहे सो लाखों जुवान नही हे देखो राजाकू लात मारणेवाला अ: घोके वचनसें पूजाताहे वृझोके वचन काम पमनेपर बहुश्रुत वृक्षकोंही पूरणा कोमुदी में लिखाहे हंसका टोला बंध- के हुयेषू वृद्ध वचनोने बुमाया तेसेंही अभिप्राय पिताके आगे प्रकटपणे कहणा म मना करे सो नही करणा कोइ कसूर पिता करमी जुवान कहे तो तोजी वि- मा नहि बोमणा मर्यादा ओमकर बेतरेका नहि करणा जेसें अन्नयकुमार श्रेणि क जेर चेलणा माताका मनोरथ पूर्ण कीया धारण मनुष्यनी अपनी शक्ति माफक Aroma Prope
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(१७५) उत्तरजेदकरके प्ररूपणाकरके उस धर्ममें स्थापन करदेवे तब तो मावापके उपगारका बदला उतर सकताहे इसी तरे कोइ बमा धनवान अदमी एकाध दलजीकू धन वगेरे देकरके अच्छी अव- स्था वणादेवे उर वो नाग्यवानही बणा रहे तदपीछे वो देणेवाला कर्मयोगसें दलडी हो- जाय उसकू वो अपणा सर्व धनमाल देदेवे तोनी अपणे नाग्यवान बनानेवाले मालकका बदला नही उतारसके लेकिन जो उस माल- ककू केवली कथित जिन धर्ममें बढ करदेवे तन्नी उस मालकको बदला उतरशके कोई पुरष सिद्धांतमें कहे मुजब अमणमाहण धर्माचार्यके पाससें धर्मका एक उत्तम वचन सुणकर मनमें उसका विचार करे मरणकी वरवत तदपी देव- लोकमे देवता होकरके अपणे धर्माचार्यकू काल पमे हुये मुलकसे सुंकालके देसमें लेजाकरके रक्खे बमा विकराल जंगलमेंसे पार उतारे अ- थवा बहोत दिनोंके बेमारीको मिटावे तोनी उस धर्माचार्यके उपगारका बदला नहि उतरे लेकिन जब धर्माचार्य केवलि प्ररूपित धर्मसे भ्रष्ट होजाय उसकू केवलि कथित धर्ममें पीग दृढ करे तनी बदला उतरसके मातापिताकी (301) मनोमाने की जान में मुनानि मान का पासम्म को नया मा-गोन गाणा - गाin arf) र दीनशी नागोरff. स कराये मर्म मनोनिता के अने गमें एग करनाणा कोनी तो मातापिताके उगगारका नार पुत्र नही उतार सकता हिन अपने बो गुरु लोकोंको केनीका कला स. के विषे जो निगर उर उपाय उनके बदला उतारणका नही वाणांग सुबमें जिसाहे तीन अदमीका उपगार ऊतर नही शके एसाहे मावापका १ घणीका २ र धर्माचार्यका ३ कोई अदमी जावजीवतक प्रजातसमें अपने मावापर्क शतपाक सहस्रपाक तेलसेती मालिस करे सुगंध पीजीमसले गंधोदक गरम पाणी वंमा पाणीसे स्नान करावे गहणे पहरावे सुशोनित करे नोजन शास्त्र मुजब रांधकर अठारे जातिके शागयुक्त मन माफक अन्नादिक जीमावे जर यावजीव खंधे उवाये फिरे तोनी मावापके उपगारका बदला पूत्र नहि ऊतार सके लेकिन जब वो पुरष केवली नापित धर्म सुणायकर मनमें बराबर उतरायकर धर्मका मूलजेद उर रक्वे बमा विकरालं जंगलमैसें पोर. दार थवा बहोत दिनोंके बेमारीको मिटावे हो, उस धर्माचार्यके उपगारका बदला नदि। लेकिन जब धर्माचार्य केवलि प्रमपित . भ्रष्ट होजाय उसकू केवलि कथित धर्ममें कि दृढ करे तन्नी बदला उतरसके मातापित (१७५) उत्तरनेदकरके प्ररूपणाकरके उस धर्ममें स्थापन करदेवे तब तो माबापके उपगारका बदला उतर सकताहे इसी तरे कोइ बमा धनवान अदमी एकाध दलजीकू धन वगेरे देकरके अच्छी अव- स्था बणादेवे उर वो नाग्यवानही बणा रहे तदपीजे वो देणेवाला कर्मयोगसें दलजी हो. जाय उसकू वो अपणा सर्व धनमाल देदेवे तोनी अपणेकू नाग्यवान बनानेवाले मालकका बदला नही उतारसके लेकिन जो उस माल- ककू केवली कथित जिन धर्ममें दृढ करदेवे तनी उस मालकका बदला उतरशके कोइ पुरष सिद्धांतमें कहे मुजब अमणमाहण धर्माचार्यके पाससे धर्मका एक उत्तम वचन सुणकर मनमें उसका विचार करे मरणकी वरवत तदपी देव- लोकमे देवता होकरके अपणे धर्माचार्यकू काल पमे हुये मुलकसे सुकालुके देम्स, लेजाकर... गयोंके (११६) सेवा अनकी तेरे हरण किगत भने परकरके दीक्षा देणे जाने मानापोह पक्ष नसूरजीका यांना गणना जर नल कान उत्पन्न या पीछे माचाग नियोग करणे निरवय गृत्तिसे रहेगे मकानपर कुर्मापून का दृष्टांत जाणाना अपणा मानक मियाली सेवकू प्रतिबोध देशवाला उमझा मुनीम जिणदास सेउका दृष्टांत जांणना आपणा धर्माचार्ग धर्म- से भ्रष्ट हुये फेर धर्ममें स्थापन करणोपर शे- लकाचार्यकू पंथक शिप्यका दृष्टांत गणना इत्यादिक पितासंबंधी उचिताचरण कहाहेर इसी तरेही मातासबंधी उचिताचरणहे लेकिन जो कुछ विशेष सो लिखतेहे माता जातकी स्त्री होती हे जर स्त्रीका मीजाज एसा होताहे थोमीसी निकम्मी बावतमें वो अपणा अपमान मानलेतीहे इसवास्ते उसका दिल नही दूरखे सपूतोको चाहीये सो उनकी मरजीमाफक चले वापसेंनी ज्यादा मन माका रखणा जरूर क्योंके वापसे मा ज्यादे पूजनीकहे सो इसतरे जांणना उपाध्याय जो सूत्र अर्थ पढावे उससे दशगुण ज्यादे आचार्यहे उर आचार्यसें सो गुणा अधिक बापहे उर ,वापसे * 4 (१७) हजार गुण अधिक माताहे जानवर जहांतक दूध पीणा होय उहांतकहीं मां मानतेहे अधम पुरष जहांतक स्त्री नहि मिले उहांतकही मा मानतेहे मध्यम पुरष घरका कामकाज उस माताके हाथसें चलता होय उहांतकही माकू मांनतेहे उर उत्तम पुरष तो यावजीव मानतेहे जानवरोकी माता पूत्रकू जीता देखके संतोष पातीहे मध्यम पुरषोकी माता पूत्रकी कमाईसें सुखी होती हे उत्तम पुरषोंकी माता पूत्रका सूरवीरपणाका काम देखके खुस होतीहै उर धर्मात्मा पुरषोंकी माता पूत्रका उत्तम आच रणसे खुस होतीहे । अब नाइ संबंधी चि ताचरण कहतेहे अपणे सगेनाईकू अपणी मां- फक जाणना गेटे नाईकू बमे नाईमाफक गिणना क्योंके बमा नाइ बाप बराबर होताहे जेसें श्रीरामचंजीकू लक्ष्मण खुस रखताथा तेसें शोक माका अथवा सगीमाके नायोंके संग वर्तावा रखणा नायोकी मरजीमाफक च- लाणा नायाकी स्त्री पूत्र वगेरे लोकोंनेनी उचित आचरण ध्यांनमें रखणा जुदा नाव नही दि- खावे मनका अभिप्राय कहे पूछे उनोकू व्यापा- रमें लगावे नायोंसें थोमानी धन व्यापारमें .
३ (107) बुगाके रखे नही जिसकरके अगो गाते नही मनमें दगा रखके भन नहीं विगो किन संकदमें काम आवे इसवास्ते को खत कान आवेगा एसा समकके छिपाके रखने कुर दोप नही ३ टागर खराब संगत में अपणा नाइ धीग होय तो उसको उसका दोस्त होय जिस्सें समझाये आप एकांत में समावि अथ- वा सरेके मिपसे समझाचे काका मामा सु. सरा साला वगेरे लोकोंसें सीखामणा दिरावे आप ज्यादा तिरस्कार नाईका करे नहीज्योंके कदास वेसरम होकर मर्यादा न गेमदेवे लद: यमें प्रीति होय तोनी बहारसे उसकुँ अपणा स्वरूप क्रोधी जेसा देखावे तर जब वो नाइ विनयवान होजावे तब उसके संग पूरे प्रेमसे वात करे इत्यादिक उपरके लिखे मुजब उपाय करणेसैनी जव सुधरे नहि तो इसका स्वना- वही एसाहे एसा तत्वविचारकर उसकी उपेक्षा करे ३ नाईकी स्त्री पूत्र वगेरोके देणे लेणेमें समान दृष्टि रखणी अपणे स्त्री पूत्रकी तरे आ- दर रखकर भरण पोषण करणा र सोकेल. माके नाईके स्त्री पूत्र वगेरोका मान पान उप- चार अपणे स्त्री पुत्रसेनी ज्यादे रवणा कारण (१७ए) उन लोकोकें थोमीसी बातमें दिखमें फरक आताहे उर लोकोमें अपकीर्ति होती हे इसीतरे र लोकोंसेंनी उचिताचरण जिसके जेसा योग्य होय वेसा ध्यांनमें रखणा जेसेंके पैदा करणेवाला ? पाखणेवाला २ विद्याका सिखा- होवाला ३ अन्न वस्त्र देणेवाला ४ र अपणे जीवकू बचाणेवाला ५ ये पांच पिता कहला- तेहे राजाकी स्त्री ? गुरुकी स्त्री सासू ३ उर जन्मदेणेवाली ४ उर धाय माता ५ ये पांच माता कहलातीहे सगा नाई ? संगमे पढणे- वाला मित्र ३ मांदगीमें बंदगी करणेवाला । उर रस्तेमें बातचीत करणेसें हुवा सो मित्र ५ ये पांच नाइ कहलातेहे नाश्योकों चाहीये सो एक एककू अच्छी तरेसें धर्म करणी याद कराणा चाहीये जो पुरष प्रमादरूप अमिसे सिजगे हुये शंशाररूप घरमें मोहरूप नीदमेंसें सूतेषू जगावे वो उसका परम बंधु कहाताहे नायोंकी आपसमें प्रीतिपर नरतका दूत आणेसें ऋषन देवके अवगणवे पूत्र नगवानकू पूबणेगये उनोका दृष्टांत जांणना इसतरे नाईका उचिताचरण जाणना ३ अब नार्याके संग चिताचरण बि- खतेहे मनुष्यकू चहीये सो स्त्रीका अच्छीतरे
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(११) तका अच्छा वस्त्र अच्छा गहना वगैरेहे सो घरकी शोना उर लक्ष्मीकू वधातीहे क्योंके लक्ष्मी मंगलीक काम करणेसे वढतीहे उर च तुराईसें जम्मूलरूप थिर होकर रहतीहे जर इंडीजीतणेसे वसमें रहसकतीहे नाटक उर कांमदेव पेदा करणेवाले चित्र तथा गायन सु: णणेसें प्रायें जरतें व्यभिचारणीयां होजातीहे जेसें वरसातकी हवासे अच्छे एनेकी आव विगमतीहे एसें उरतें विगमतीहे रातकू उरतर्फे बहार राजरस्तेमें अथवा किसीके घर नजाणे देवे कुटनी स्त्री वगेरे कुशीलकी संगत नही करणे देवे देणालेणा सगासंबंधीयोका आदर सत्कार करणा रसोइका काम करणा इत्यादिक घरके काम जरूर करके उनके हवाले करे अ- पणसे अलग एकेली नही रहणे देवे मुनिराज- की तरे कुलवंती उरतोंकों बाहिर फिरणा वा जब नही कोई धर्मसंबंधी कामकेवास्ते नेज- णी होय तो मा बहिन वगेरे सूशील स्त्रीके संगमें जाणेका हुकम देणा उरतोके घरके काम इस तरेकेहे बिगेना वगेरे बिगना समेटणा जाडू देकर मकान साफ करणा पाणी गणणा चूला बरतण वगेरें साफ करणा अनाज साफ N कर - इन कना नोट नास ना जानी नाक SATTA, गाय की दी शिमोगा कणा जोजन पाक गोबर नो नयारी बगाणी जिसकं जेसा हाम एसा पुरसारा करणा नाग्यवानकी स्त्री. यां अगर आप नही हो तो नोकरी दासी 'अथवा सर्पकागरिक निमें दास्ती करवाणा पणे लायक दोग मो आप करणा सास - (१७३) आरव्यान सुणके कुलस्त्रीका रक्षण करणा उर अपणी आत्मासंयमके योगसे हमेसां उद्यममें रखणा स्त्रीकू अपणेसे दूर नहि रखणा स्त्रीकी सार शंनाल नहि लेणेसें बहोत निगेदास्ती करणेसें जब आपसमें सामन होय तब नहि बोलणेसें अहंकारसें र अपमानसें इन पांच कारणोसें प्रेम घटताहे पुरप हमेसां मुसाफरी करता रहे तो स्त्रीका मन उस ऊपरसें उतर जाताहे विनचारणीनी होजातीहे स्त्रीकू क्रोधमें आकर एसा विनाकारण कनी नहि कहणाके में तेरेपर दूसरी परणूंगा कोई कसूर स्त्रीने कीया होय तो एकांतमे एसी हितशिक्षा देवे सो फेर एसा काम नही करे बहोत गुस्सेंमें नरगइ होय तो उसकू समजावे धनका फायदा हुवा होय या नुकसान हुवा होय तो स्त्रीके सामने बात नहि करणी तेसेंइ घरकी गुप्त म- सलत उसके सामने नहि कहे दोय उरतवाले पुरषकू चैन नही रातदिन लमाश्में वीतताहे बमी आपदाका कारणहें राजा या बमा ना- ग्यवानोके दो स्त्री फेरनी निनसकतीहे एक स्त्रीका पतीका प्रेम रामचंड जेसा होताहे ब- होत स्त्रीयोंका पतीका प्रेम कृष्ण जेसा होताहे फरणा चुणना फटकाया कुटणा पासणा बस सीमा कसीमा निकालणालाचतू कनारी गोटे बगेरोके गोसर वालमास चंपा सभी नामा फसणा वाणा गहाणा पोणा गाय दुदणी दही जमागा विलोणा करणा नोजन पाक वगेरे सब तरेकी तयारी बणाणी जिसकूजेसा लायक एसा पुरसारा करणा जाम्यवानकी स्त्री- यां अगर आप नही करे तो नोकरणी दासी अथवा सूर्पकारादिकसें निगें दास्तीसे करवाणा अपणे लायक होय सो आप करणा सासु सुसरा नार नणद जेठ देवर वगेरेका विनय साचवणा इस वजेसें अनेक किसम कुलबर्ट- का कृत्य जांणना जो घरका पति इनकामोमें स्त्रीयोकों नहि लगावे तो उरतें हमेसां उदा- स रहतीहे जर स्त्रीके उदास रहणेसे घरका काम बिगमताहे दुसरे उरतका स्वनाव चपल होताहे सो निकम्भी रहणेसें विगमतीहे स्त्री देखणेसे वातचीत करणेसें उसके गुणकी तारी- फ करणेसे उसके मनमानी चीजोके देणेसें तेर मनमुजब चजणेसें पुरपके ऊपर मजबुत प्रेम जमताहे एसा श्री उमास्वातिवाचक प्रशमरति ग्रंथमे लिखतेहे पुरपोंकू चाहीये सो पिसाचका (१०३) आख्यान सुणके कुलस्त्रीका रक्षण करणा उर अपणी आत्मासंयमके योगसें हमेसां उद्यममें रखणा स्त्रीकू अपणेसें दूर नहि रखणा स्त्रीकी सार शंनाल नहि लेणेसें बहोत निगेदास्ती करणेसें जब आपसमें सामल होय तब नहि बोलणेसें अहंकारसें र अपमानसें इन पांच कारणोसें प्रेम घटताहे पुरप हमेसां मुसाफरी करता रहे तो स्त्रीका मन उस ऊपरसें उतर जाताहे विनचारणीनी होजातीहे स्त्रीकू क्रोधमें आकर एसा विनाकारण कनी नहि कहणाके में तेरेपर दूसरी परणूंगा कोइ कसूर स्त्रीने कीया होय तो एकांतमे एसी हितशिक्षा देवे सो फेर एसा काम नही करे बहोत गुस्सेंमें नरगइ होय तो उसकू समजावे धनका फायदा हुवा होय या नुकसान हुवा होय तो स्त्रीके सामने बात नहि करणी तेसें। घरकी गुप्त म- सलत उसके सामने नहि कहे दोय उरतवाले पुरषषं चैन नही रातदिन लमाश्में वीतताहे बमी आपदाका कारणहें राजा या बमा ना- ग्यवानोके दो स्त्री फेरनी निनसकतीहे एक स्त्रीका पतीका प्रेम रामचंड जेसा होताहे ब- होत स्त्रीयोंका पतीका प्रेम कृष्ण जेसा होताते (50) कोई कारण गोगसें होती पण तो दोनों के तोपर सम :दिरसे उनों में से कितीका बाग वंन्ति नही करणा जो वी अग्रणी शोकका पाग यनित करके मैथुन सेवे उसके चोये अनमें अतीवार खगे उरतो में हमेसां नरमाय- स ररणा कारण बहोत गुस्से में आणेसे प्राण धानतक कर बेउती हे ठर विना नरमायन कार्य, हरजाणा करती जो कनी परकी खी निमितजाय तो वहीतही सम- सादारी के साथ परका काम चलाणा देहने जीवहे उदांतक मजबूत वेली सगी समजणा गृहणीहे सोही घरहे नफा कदणेसें त्री खुरले हाथोसे धन खरचणे जगजातीहे स्त्रीके पेट में टकती नही इसवास्ते नेकसानी वगैरे (१५) कुलकी उर पढी हुइ चतुर र रूपवंत पानी या चित्रनी वह उत्तम स्त्री कहलातीहे समऊ- वार उरत तो घरमें मुकत्यारी करे तो फेरनी केइ बातोसें पुरस्तनीहे लेकिन जिस घरमें प्रायें उरतोका चलण होताहे वो घर मट्टी मिलजाताहे सरकारी दमनी होताहे इसवास्ते चतुरोंकों चाहीये सो विगर विचारे घरमें उर- तोकों मुख्य नही करे जिसपर एसा दृष्टांतहे एक जुलाहे कपमे बूणनेवालेके घरमें स्त्री मु- कत्यारथी वो जुलाहा एकदिन वस्त्र वूणनेके उजारकेवास्ते लकमी लाणेकू जंगलमे गया एक सीसमके दरवतकू काटणेलगा उसका अधि- ष्टायक कोई व्यंतर बोला मतकाट तोनी जुला- हा मरा नही साहसकर काटणेलगा तब इस- का सत्व देखके नूत प्रसन्न होकर बोला वरमां- ग जो मांगेगा सो दूंगा वह जुलाहा स्त्री लंपट- था बोला मेरी उरतसें पूजके वर मांगूगा खेर स्त्रीकू जाके पूग तब वो उरत तुच्छ स्वनावकी- थी इसवास्ते उसके यादमें एसी बात आई ॥ श्लोक ॥ प्रवर्षमानपुरुष स्त्रयाणामुपघातकृत पूर्वोपार्जितमित्राणां दाराणामथवेस्मनाम् ॥१॥ अर्थ-जब पुरषकू लक्ष्मी बहोत मिलजाती (६७४) कोइ कारण योगसें दो स्त्री परणे तो दोनोंक पूत्रोंपर सम दृष्टि रखे उनॉमसें किसीका बारा वंमित नही करणा जो स्त्री अमणी शोकका बारा खंमित करके मैथुन सेवे उसके चोथे व्रतमें अतीचार लगे उरतोसे हमेसां नरमाय- स रवणा कारण बहोत गुस्से में आणेसे प्राण घाततक कर बेउती हे उर विना नरमायस कार्यमें हरजाणा करती हे जो कजी घरकी स्त्री निर्गुणीनी मिलजाय तो बहोतही सम- झादारीके साथ घरका काम चलाणा देहमें जीवहे उहांतक मजबूत वेमी लगी समकाणा हे सोही घरहे नफा कहणेसें स्त्री खुल्ले थोसें धन खरचणे लगजातीहे स्वीके पेटमें बात टिकती नही इसवास्ते नुकसानी वगेरे कोश्नी गुप्त बात उसके सामने कहदेणेसे लो- कोमें कहकर आवरू खोदेतीहे राजसंबंधी बा- तोकें कहणेसें राजदंगनी होजाताहे जिसपर एसा दृष्टांतहे रूमके बादशाहने दिल्लीके बा- फहसें च्यार चीजें मंगवाइ गादीका गधा मनार कुत्ता असलकी कमअसल कमअसलकी जमाल वह दृष्टांतसे जांणना अर्थात् सब उरते ग्रंथमे लिरी नही होती प्रायें होतीहीहे अच्छे (१५) कुलकी उर पढी हुइ चतुर र रूपवंत पद्मनी या चित्रनी वह उत्तम स्त्री कहलातीहे समऊ- वार उरत तो घरमें मुकत्यारी करे तो फेरनी के बातोसें उरस्तनीहे लेकिन जिस घरमें प्रायें उरतोका चलण होताहे वो घर मट्टी मिलजाताहे सरकारी दमनी होताहे इसवास्ते चतुरोंकों चाहीये सो विगर विचारे घरमें उर- तोको मुख्य नही करे जिसपर एसा दृष्टांतहे एक जुलाहे कपमे वूणनेवालेके घरमें स्त्री मु- कत्यारथी वो जुलाहा एकदिन वस्त्र वूणनेके उजारकेवास्ते लकमी लाणेकू जंगलमे गया एक सीसमके दरवतकू काटणेलगा उसका अधि- ष्टायक कोई व्यंतर बोला मतकाट तोनी जुला- हा मरा नही साहसकर काटणेलगा तब इस- का सत्व देखके चूत प्रसन्न होकर बोला वरमां- ग जो मांगेगा सो दूंगा वह जुलाहा स्त्री लंपट- था बोला मेरी उरतसें पूबके वर मांगूगा खेर स्त्रीकू जाके पूजा तब वो उरत तुच्छ स्वनावकी- थी इसवास्ते उसके यादमें एसी बात आई ॥ म्लोक ॥ प्रवर्धमानपुरुष स्त्रयाणामुपधातकृत पूर्वोपार्जितमित्राणां दाराणामथवेस्मनाम् ॥१॥ अर्थ-जब पुरषकू लक्ष्मी बहोत मिल जाती (६७४) कोई कारण योगसे दोस्ती परणे तो दोन पूत्रोंपर सम दृष्टि रखे उनमें से किसीका बा खंमित नही करणा जो स्त्री अमणी शोक बारा खंमित करके मैथुन सेवे उसके चं व्रतमें अतीचार लगे उरतोसे हमेसां नरमा स रवणा कारण बहोत गुस्से में आणेसे प्रा धाततक कर बेचती है उर विना नरमाय कार्यमें हरजाणा करती है जो कनी घर स्त्री निर्गुणीनी मिलजाय तो बहोतही स ऊदारीके साथ घरका काम चलाणा देह जीवहे उहांतक मजबूत वेमी लगी समझा गृहणीहे सोही घरहे नफा कहणेसें स्त्री खुल हाथोसें धन खरचणे लगजातीहे स्त्रीके पेट बात टिकती नही इसवास्ते नुकसानी वगे कोइनी गुप्त बात उसके सामने कहदेणेंसें ले कोमें कहकर आवरू खोदेतीहे राजसंबंधी व तोकें कहणेसें राजदमनी होजाताहे जिसप पसा दृष्टांतहे रूमके बादशाहने दिल्लीके ब फ हसें च्यार चीजें मंगवाइ गादीका गध मनार कुत्ता असलकी कमअसल कमअसल जमाल वह दृष्टांतसे जांणना अर्थात् सब उरते ग्रंथमे जिरी नही होती प्रायें होतीहीहे अच्छे भO AN (१७) एसी स्त्रीके संग अपणी स्त्रीके प्रीति करावणी उरत बेमार पड़े तो उसकी दवा दारु पथ्य वगेरे करे लेकिन उसकू सूगाके बे बजे बोमणा नही तपस्या ऊजमणा दांन देवपूजा तीर्थ यात्रा वगेरे धर्मकृत्यमें उमंग वधाकर धनकी मदत देकर सहाय करणा लेकिन अंतराय नहि करणा कारण स्त्रीके पुन्यमें पुरपका हिस्सा प्रतक्ष प्रमाणसेहे धर्मकृत्य कराणा यही परम नपगारहे उर जब उपगारहे तब तो पुन्यमें नाग निश्चेते ४ अब पूत्रके संबंधमे पिता -सं- बंधी नचिताचरण कहतेहे पिताकू चाहीये सो पुष्टिकारक अन्नादिक ऋतुपथ्य मुजब खिलावे बालकके मनमाफक फिरावे धिरावे तरे के खिलोणे देकर कलाकुशल करे बाबकपणेमें जो शंका करके दूबला सरीर रहे तो वोजवानी में- नी कमजोर होताहे चाणक्य कहताहे पुत्र पांचवर्षका होय जहांतक लाम लमाणा तदपीने धमकीसें पढाणा खाणे पहरणेका लाम रवणा एवं दसवर्ष बाद मारपीटके साथनी हितशिक्षा डर विद्याभ्यास कुलाचार सिरवाणा सोले वर्ष बाद मित्रकी तरे पिताकू वर्ताव पुत्रसें करणा देव गुरु धर्म सुखी स्वजन इनोके संग हमेसां (१६) हे तब पुरप पुराणे दोस्तडू उरतडू उर पुराणे घरकू गोमदेताहे एसा विचार करके स्वादिसे कहा हे पति बमा उखदाइ राज्य लेकर क्या करोगे एसा वर मांगों सो दो हाथोके न्यार तो हाथ हो जावे नेर दो सिर होजावे पेट एकही रहे अगर जब च्यार हाथ होयगा तब पुप्पट मजूरी कमाउँगे इतने ही अपणा घर तो धनसे नरजायगा अहो २ स्त्रीकी स्वार्थता व्यर्थ सर्वस्व स्वोणेका उपाय बताया उसने वे. साही वर मांगा नूतने वेसाही बणादिया गांमके लोकोने उसका एसा विचित्र रूप देख- कर राक्षस जांणके लठी र पच्छरोंसे मारमा- ला जिसमें अपणी अक्कल होय नहि स्याणे मित्रका कहा माने नहि उर अकलहीन स्त्रीके वसमे रहे वो इस जुलाहेकी तरे नास होय इस मुजब दृष्टांत कोश्यक ठिकाणेही वण आ- ताहे बुध्मान स्त्री होय तो उसकी सल्ला ज- रूर लेणा फायदा होताहे इसपर अनुपम देवी जर वस्तुपालका दृष्टांत जांणना अच्छे कुलकी पक्की ऊमरकी कपट करके रहित धर्म करणी करणेमें तत्पर अपणे साधर्मणी उर अपणे स्वजनसंबंधीयोके घरकी बेटी बहू होय (१७) एसी स्त्रीके संग अपणी स्त्रीके प्रीति करावणी जेरत बेमार पो तो उसकी दवा दारु पथ्य वगेरे करे लेकिन उसकू सूगाके बे बजे बोमणा नही तपस्या ऊजमणा दान देवपूजा तीर्थ यात्रा वगेरे धर्मकृत्यमें उमंग वधाकर धनकी मदत देकर सहाय करणा लेकिन अंतराय नहि करणा कारण स्त्रीके पुन्यमें पुरपका हिस्सा प्रतक्ष प्रमाणसेहे धर्मकृत्य कराणा यही परम नपगारहे उर जब उपगारहे तब तो पुन्यमें नाग निश्चेदे ४ अब पूत्रके संबंधमे पिता सं- बंधी नचिताचरण कहतेहे पिताकू चाहीये सो पुष्टिकारक अन्नादिक ऋतुपथ्य मुजब खिलावे बालकके मनमाफक फिरावे धिरावे तरे के स्दिलोणे देकर कलाकुशल करे बालकपणेमें जो शंका करके दूबला सरीर रहे तो वोजवानीमें- नी कमजोर होताहे चाणक्य कहताहे पुत्र पांचवर्षका होय जहांतक लाम लमाणा तदपीछे धमकीसें पढाणा खाणे पहरणेका लाम रखणा एवं दसवर्ष बाद मारपीटके साथनी हितशिक्षा उर विद्यान्यास कुलाचार सिखाणा सोले वर्ष बाद मित्रकी तरे पिताकू वर्ताव पुत्रसे करणा देव गुरु धर्म सुखी स्वजन इनोके संग हमे (366) परिचय कराणा कारणा अच्छे मनुप्योके संग दोस्ती कराणेसें बल्कलचीरीकीतरे हमेसा धर्मकी वासना बगी रहतीहे उत्तम जातिके फुलवंत सुशीलके संग दोस्ती करणेसें कदास धन नही मिले नाग्ययोगसें लेकिन आवता हुवा अनर्थ तो जरूरही टलजाताहे क्योंके अ- नार्य देशमें पेदा हुये हुये आज कुमारके अजय कुमारकी मित्रता मुक्तीकेवास्ते हुई जमकेळू अच्छी कुजकी और अच्छे रूपकी अवारे वर्ष, इग्यारे तथा बारे वर्षकी कन्यासें सादी करा- वणी लमकेळू चाहीये सो वीस वर्प उपरांत शं- शारी उत्पत्तिके काममें जयणा करे अनुक्रमसें घरके कामकाजकी मुकत्यारी स्यानसबूरीमा- फक सोंपे जो कदास योग्य कन्या परणावे नही तो उलटी विटंबना होजातीहे कारण दो- नोजणे अनुचित कृत्य करणे जगजावे तो फ- जीता होताहे आपसमे एक के परसन नही पझे तब स्त्री नारके आपसमें विरोध प- मजाताहे धारानगरमें एक कुरूप निर्गुणीके तो बनी रूपवान र गुणवान स्त्री व्याहे गइ र एक रूपवान गुणवानकू विदरूप र निर्गुणी स्त्री व्याहेगइ नवतव्यतासे दोनोंके घरमें चोरोने या (१७ए) खातमाली आगे दोनुं जोमोका संयोग उरस्त नही एसा समऊ उन चोरोने वो रूपवान स्त्री स्- पवान पास सुलायदी कुरूप कुरूपके पास धरदी सूपवंत दोनों दिलमें उदासथे उन दोनोंके तो मनकामना पूरी नई लेकिन विदरूप वणिया प्रनातसमें एसा हाल देखकर राजा नोजसे फरियादकी तब राजा सहरमें ढंढोरा पिटवा- ये काम किसने कीया उर क्यों कीया क- रणेमें क्या फायदा देखा मेरे सामने जाहर होवे तब चोरोने आकर कहा गरीब परवर काग हंशका जोमा जो विधाताने नूखके कर- दीयाथा सो नूल हम चोरलोकोने सुधारदी रत्नसें रत्न मिलादीया यह बात राजा सुणके हुकम दीया यह इनसाफ ठीकहे पुत्रकू हमेसां पेदास खरच करणेका घरकांममें लगाणा जो लायक होय तो घरकी मुकत्यारी सोप देणी क्योंके हमेसां घरके फिकरमें रहणेसें इच्छा चारी तथा मदोन्मत्त नही होताहे बमी तकलीपसे धन कमाणा पमताहे इस बातका जाणकार होजाय तब धन नही ऊमाताहे गटी उमरमें इसमेही प्रतिष्टित इऊतदार कहलाताहे जेसें राजगृही नगरीका प्रशेनजित राजा अपणे (१०) सो खमकोंका इमतियान करता दुवा श्रेणिका योग्य जांण उसकाही राज्य सोपदीया तेसे लम्केके माफक लम्कीका नतीजेका बेटेकी ब- हूका नचिनाचरण जांणना जेसें धन्नासेठ च्या- रों बेटेकी वढूकी परिक्षा करणेळू पहली उकि ताकू पांचशालि चावलोके दाणे दिये उसने फेंकदिये फुसरेकी बहू नोगवती सो उस दा. णोंको खागइ तीसरी रक्षिता यतनसे रख गोगा चोथेकी बहू रोहणी उसने अपणे पीहरके क- पोकों देकर खेतमें वो वादीये उस्से तीसरे वर्ष जाते एककोठार नरगया परीक्षा पूरी तब सुस- रकू दिखलाये तब सेठ फेंकणेवालीकू झाडु बु- हारु करणेका काम सोपा उसरीकू राधणेका काम सोफा तीसरीकू आटा सीधा वगेरे घर विखरीका काम सोपा रोहणीकू गहणा जवा- हिर रुपीया मोहरे वगेरे सोपी इय च्यारो- हीमें जो जो गुणथा वेसाही उनोनें ग्रहस्था- श्रममें उन्नतीकर दिखला बापकू चाहीये पु- त्रकेरूबरू तारीफ नही करे कारण फेर नसकी लायकी उर गुण बढते नही अनिमांनमें आ- जाताहे कदास लमका जूआ या चोरी या रंगीबाजी नसाबाजी पेटीपणा वगेरे कुलक्षणा १ (११) सीखजावे तो उस कामोसें धनका नास बेइ- आती राजदंग होताहे इत्यादिक उर्दसाकी बातोके दृष्टांत सुणावे जो लमका अक्कलवाला जर तकदीरवाला होय तो जरूर विसनोंसें वच जाताहे रोकनकी कूची लमकेकू सौंपे तो आवंद खरच उर शिलक हमेसा संजाल लेवे उसकरके मनोमती नहि होसके गुरूकी तारीफ सामने करणी नाईकी जर दोस्तकी तारीफ पिगमी करणी चाकरकी दासकी गुमास्तेकी तारीफ अच्छा काम करचूके तब करणी स्त्रीकी तारीफ मरे वाद करणी पुत्रकी तारीफ तो बिलकुल करणीही नहीं जो करणी तो पीगमी करणी जबकी बिना तारीफ कीये सरे नही तब लम- केकू राजसना दिखलाणी क्योंके कोइ कर्म- योगसे अणचिंता संकट आपमे तो कायर होके धनराता नहीहै बमे र राजमान्य पुरषोके संग मोहबत करणेसें बहोत फायदाहे जेसेंके धन- वानके कुस्मन बहोत होतेहे हरतरेसें जालला पटकतेहैं इसवास्तै राजवर्गीयोसें. धनका फाय- दा नही होवे तो अनर्थ तो जरूरही मिटा. सकतेहे परदेसकी रीतनांतसें चमकेकू जरूर वाकिफ करदेणा चाहीये क्योंके जब परदेशके (१२) चाल चलणसे वाकवी नही होवे बखत पमणे- पर परदेश जाणा पने तब गोनुजाणके परदे- शके जालसाज अनेक तरेके फंदसै धनक लालच दिखाकर उग लेतेहे तास गंजीफेके खेलसें नोट बणाणकी धोखाबाजीसें जमीन गमाहुवा धन दिखाकर वेस्यायोंको नाग्यवा- नकी स्त्रियां बणाकर मम्म वगेरे मुल्कमें सो नाटोलीके लुच्चे विद्यमानसमेंमें अनेकोंकों उग- तेहे मिरजापुर कासीमें गुंमेलोक कोइतो आ- गूंकी वीतक बात वापदादोका नाम बताकर पहचान निकालकर अपणे मकानमें लेजाकर माल जीनलेतेहे कोई निजूमी कोई हकीम ब णकर पसारीयोसें मिलकर माल उतारतेहे जे- 'पुर आगरे वगेरोमें दलालोका फंदा लुच्चाइकाहे इत्यादिक देसावरी हालतोसे वाकबकर देणा चाहीये इसबजे मातानी पुत्रकेवास्ते पूत्रकी बहुकेवास्ते उचिताचरण करणा अपणी सोकके बेटेका लाम अपणे पूत्रसे ज्यादे रवणा इस बातोसे पुनियामें तारीफ होतीहे पराये जाये- को अपणा करके केवटणा यह बात बमी लाय- क वंदीकीहे पिताके कुलके माताके कुलके तथा स्त्रीके कुलके जो लोक होतेहें वो स्वजन कह- (१९३) लातेहे ननोके संगनी उचिताचरण रखणा अ- पणे घरमें पुत्रजन्म तैसें विवाह सगाइ वगेरे मंगलीक कामोंमें उनोका हमेसां सत्कार करणा तेसेंही जनोंके नुकशान वगेरे पमजावे तो उ- नोंकों अपणेपास रखणा स्वजनोमे संकट आ: पमे तब अथवा उनोके घर उच्चव होवे तब उनोके इहां आप जाणा रोगाग्रस्त अथवा ध; नहीन होजाय तो उनोका उझार करणा मित्र उर स्वजन वोही कहलाताहे जो रोगमें आ- पदामें उकालमें संकट आपमे तब राजद्वारमें उर स्मशानमें जो संग रहे और बेहनही दिखावे सो बंधव कहताहे स्वजनोका उभार करणा वो अपणाही उघार समजणा कारण लक्ष्मी चंचलहे अरटकी घमनालकी तरे नरी उर खा- ली होजातीहे तेसेंही पेसेवाला दखजी र दल- झी तालेवर होजाताहे इसवास्ते जिसकू सहाय आपने कीया होय वरवत पमणेपर जरूर वो अपणी सहाय करताहे स्वजनोकी परपूठ निंदा नही करणी उनोके संग मस्करी वगेरेमेंनी विगर कारण सूका वाद नही करणा कारणके वाद- विवादमें बहोत.दिनोंकी प्रीती तूटजातीहे स्व- जनोके शत्रूके साथ दोस्ती नही करणी 'स्वज- (१९४) नके मित्रोके साथ मित्राइ करणी स्वजन घरमें नही होय र उनकी श्केली स्त्री घरमे होय तो एकेला नहि जाणा स्वजनोके संग उधार- का धंदा देस काल नाव सोचके करणा देवका या गुरुकाया धर्मका काम होय तो उनमें सजनोके संग एक दिल होणा दोस्तीकी जगे तीनकाम नहि करणा वादविवाद उधारपार उनके नही रहणेसें उनकी स्त्रीके संग बात ये तीन बात नही करणी शंशारके काममेंनी जब च्यार आदम्योंका एक दिल होताहे तब अच्छी तरेसें काम सुधरताहे तेसेंही जिन मं- दिर वगेरे धर्मकांममें तो निश्चेही एक दिल हीकाम निर्वाण चढताहे क्योंके धर्म- तो सर्व श्री संघके आधारपरहे स्वज- के संग एकदिल होणेपर पंच अंगुलीयोका दृष्टांतहे पहली अंगूठेकी पासकी अंगली तर्जनी सो लिखणेमें चित्राम करणेमें कोई चीजकू दिखाणेमें चीजोकी तारीफ करणेमें चिमटी ब- जाणेमें अगवाणीहे इसवास्ते अहंकारमें आकर मध्यमा जो बिचली अंगलीहे उसकू पूरणे लगी तेरेमें क्या गुणहे तब मध्यमां बोली मे सब अं- गुनी- योमैं मुख्य९ बमीहूं बीचमें रहती हूं तंत्री .
(१९५) गीत ताल वगेरे कलामें कुशलहूं कामकी जल दीपणा बताणेकू अथवा दोष उल वगेरोका नास करणेकू चिमठी बजातीहूं टचकारासें शिक्षा करती हूं एसें तीसरी अंगली अनामिकाकू पूग तब वो बोली देव गुरु स्थापनाचार्य सा- धर्मीयोकी नवांग पूजा मंगलीक साथिया नं- यावर्त वगेरे करणा जल चंदन वासक्षेप चूर्ण वगेरोका मंत्रणा ये काममे करसकती हूं तब तर्जनी चोथी अंगुलीसें पूजा तब वो बोली में पतली हूं इसवास्ते कान वगेरेकी खाज खुणनी शरीरमें कष्ट आवे तब तकलीप पातीहूं जूत शाकनीके उपवमें कष्टसहके दूर करती हूं जापकी गिणती करणेमें अगवाणीहूं एसा सुण: के च्यारोंही आंगलीयोनें आपसमें दोस्ती करी उर अंगूठेकू पूग तुमारेमें क्या गुणहे तब अं गूग बोला में तुमारा मालकहूं देखो लिखणा चित्रांम कवा ग्रास लेणा चिमठी नरणी चिमठी बजाणी टचकारा करणा मूठी नरणी गांठ देणी हथियार वापरणा दाढी मूंब. समारणा कतरणा कातणा उखेमणा लोच करणा पीजणा वूणना धोणा कूटणा दलणा पुरसणा कांटा निकालणा गाय दूहणी जापकी गिणती करणी बाल अ- (१७) साचवणेमें मंद आदर दिखावे लेकिन साधूक कोइ उसरा अनादर करे तो तुरत जहां जाय करके सहाय को वो श्रावक नाइ जेसा जाण- ना २ जो श्रावक साधूठेको खजनसेनी ज्यादे गिणे उर कोई कामकाजमें साधू सला नही पूरे तो अहंकार से क्रोध करे वह भावक मित्र जेसा जांणना ३ जो गृहस्थ अहंकारी साधू- उका ग्ल विन हमेसां देखा करे उर उनोका जो कसूर प्रमादसे होजावे वो हमेसां जाहिर कीया करे उर उन जती साधूनंको तिणखे जेसा गिणा करे वो श्रावक शोक जेसा जांणना निंदक लोकोंहे सो जो कुछ जिन मंदिर जैन हीजना निंदा करते होय तो यथा, , मिटाणा चाहीये जेसें कुंभारके नवमें हजार आदमीका कीया हुवा उपजव कीया यात्रा जाते हुये संघकी रक्षा करी मरके सगर चक्रवर्तिका पोता जन्हुकुमार हुवा वह दृष्टांत जाणना धर्माचार्य शिक्षा दे तो तहत्त कहणा धर्माचार्य कोइ तरेका प्रमाद सेवते तो समआणा माहाराज आप यह बात योग्य नही इत्या- शष्योको चाहीये साम- (१एए) ने आणा ऊपणा आसण देणा पग चंपी करणी शूध वस्त्र पात्र अन्न उषधी झानके उपगरण वगेरे समयके उचित विनय उपचारनक्तिसे कर- णा हृदयमें प्रीति रवणी आप परदेशमें होय तो गुरुका सम्यक्त दानके उपगारकू हमेसां याद करे अब सहर वस्तीके लोकोंसें नचिताच- रण लिखतेहें सहरके लोकोंमें कोई संकट आय पमे तो मनमें समऊणा की मेंनी संकटमें पमाहुं एसा विचारणा उच्चवमें होय तो आप- नी उच्छव मांणना क्योंके एक वस्तीमें रहके द्विधा नाव नही रवणा एक धंदेके रुजगार करणेवालो आपसमें कुसंप होय तो निश्च वो लोक संकटमें जा गिरतेहे बमा कोइ काम करणा होय तो बमाइ वधाणेकेवास्ते सब नागरिक लोकोंके संग जाणा जिस्से किसीका दिन नही जुखे इकेले नही जाणा कोई कामकी गुप्त मसलत करी होय तो बाहिर प्रकाश नही करणी किसीकी चुगली नहि करणी सब बरा- बरीके होय तोन्नी मुसलमीनोकी तरे एककू अगवाणी करके आप उनके पिगमी रहणा लेकिन राजाके हुकम मुजब मंत्रवी परीक्षा क- रणेकू एकसेज सबोकों सानेकू दी तब पांचसे
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(२०१) पातेहे तव आपसमें संप उर प्रीति गेम देतेहे जब वस्तीवालोमें संप नही होय तो कितनाही ताकतवर क्यों न होय वगममेंसे निकले हुये सिंघकी तरे जहांतहा अनादर पाताहे इस- वास्ते आपसमें संप रखणा कल्याणकारीहे उ- समेंनी अपणे पक्षमें न्यातीगोतीयोमें तो ज- रूरही चाहिये क्योंके बिलके दूर करदीये जाय तो चावल ऊगते नहीहे इत्यादिक जांणना अपणा नला चाहो तो राजाके देवस्थानके अ- थवा धर्मखातेके अधिकारी देरासरी तथा उ- नोके नीचेके लोकोके संग लेणदेणका विवहार नही करणा क्योंके ये लोक पहले तो मीठी बात बणाकर आसन र पान बीमी देकर न- लाइ दिखातेहे लेकिन वरवत पमणेपर रुपे मां- गणेसें एसा कहतेहे हमने तुमारा वो काम कीया वो काम कीया तिलके फोतरे जितने ज- पकारकू उस वखत पहाम जितना गिणातेहे पहली बात• नूलजातेहे ब्राह्मणमें क्षमा ? मातामें उप. कसवणमे प्रेम ३ र सरकारीय हुदेदारोमें इमानदारी ५ ये बातें प्रायें होणी मुसकिलहे देणा तो दूर रहा लेकिन ज्यादा मांगणेसें कोई ज्यादे तूमत लापटकतेहे क्योंके (२००) मूर्य कुसंपसें आपसमे जमणे लगे एसें कुसंप- वाले लोकोकू संग ले राजाकी मुलाखात कर- ऐकू नही जाणा उर एसोंकी अरजनी नहि करणी प्रतक्ष प्रमाणहे कितनीही नाकात तुच्छ चीज होय लेकिन जब वोही चीज बहोत एकठी होजाय तब वमी ताकतपर होजाती हे देखीये कच्चे घास या सूतके तागे जब सांमल होके रस्सा बनाया जाताहे तब हाथी जेसे ताकतवरकू बांध लेताहे जो अदमी आपसमें एक २ का मर्म उघामे वो वीमे रहे उर पेटमे सापकी तरे मरणांत कष्ट पाते हे ॥ श्लोक ॥ स्पराणिमर्माणि नापतेअधमानराः ते नरावि- जयंयाति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥१॥ किसी दोनो अदम्योके आपसमें ऊगमा होय तो तराजूके पालणे मुजब बराबर रहणा लेकिन अपणे स्वजन संबंधीयोकी खेंच अथवा किसीसें रुस- पतरवाके न्यायसें वेमुख कन्नि नही होणा उप- गारनी सचे इनसाफसे करणा आप समर्थ होकर गरीब लोकोपर मासूल कर तथा राज- दमसें सताणा नही तथा थोमा कसूर किसीने कर लीया होय तो एकदम दंग नहि करणा मासूल तथा राजदंमसें तकलीप जब लोक
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(२०२) धनवानके लागूहे दलीपर कोण नूमत लाताहे इसबजे नागरिक लोकोका नचिताचरण जां- पना अब अन्यदर्शनी नेपधारीका नचिताचरण लिखतेहे अन्यदर्शनी नेपधारी अपणे. घर जी- रखकू आवे तो उनोंकों यथायोग्य दांन देणा उर राजमान्य एसा जो अन्यदर्शनी मकानपर आवे तो विशेष जक्तीकरके दान देणा श्रावकके दिलमें अन्य दर्शनीके नेपकी नती तो नही उर नही उनके गुणोका पक्षपातहे तोनी मका- नपर आये हुयेका आदरमांन करणा गृहस्थका धर्महे मीठा वचन बोलणा आसण देणा जी, मणेकू निमंत्रणा करणी किसकारणसे आणा हुवा सो पूरणा उनोका काम करणा संकटमे पमे हुये जोकोकू बाहिर निकालणा यह बात सर्व धर्मीयोकू सम्मतहे श्रावककू जो उचिता- चरण करणा लिखा उसका मतलब एसाहे जो की उचिताचरण करणेमें कुशल नहीहे वो पुरष लोकोत्तर पुरष जो सर्वक उनकी वाणीका सुक्ष्म बुधिसें गृहण करणा एसा जो जैनधर्म उसमें केसें कुशल होसके इसवास्ते धर्मार्थी लोकोदूं अवस्य नचिताचरण ध्यांनमें लेणा गुणपर प्रीति रखणा दोषोंपर मध्यस्थ नाव रखणा जिन (२०३) वचनपर रुचि राखणी यह सम्यग् बष्टिका ल- क्षणहे समुल मर्यादा गेमता नही पर्वत चलाय मांन होता नही तेसे उत्तम पुरष उचिताचरण बोमते नही इसवास्ते जगजुरु तीर्थ करनी गृ- हस्थपणेमें मातापिताके संबंध उठणा प्रमुख आदर सत्कार करतेहे बमे पुरष आणेसें आदरसें उरणा प्रमुख आचरणा करतेहे तो फिर उनोसें ज्यादा कोणहे सो नचिताचरण नही करे ऊपर खि उचित वचनोसें बहोत गुण पैदा होतेहे जेसें आंबम जिसकी उसादवाले नगशाली सवाल बजतेहे शोलंकी राजपूत वो आंबर मल्लिकार्जु नकू जीतकर चवदे क्रोम मोलका नरे हुये बवटो करी चोदे श नार तोलके एसे सोनेसें भरे हुये बत्तीस घमे सिणगार उरत मर्दोके सजणेके रत्नजमित एक क्रोम जहरकू मिटाणेवाली सीप वगैरे धनमाल चहुआण महाराज कुमारपालके खजानेमें माली तब राजा प्रसन्न होकर राज- पितामह एसा विरुद उर क्रोम अव्य उर चोवीस जातिवंत घोमे एसा इनाम दीया ये सब धन आंबट घर पोहचते रस्तेही या- चकोकों देदीया इसबातकी चुगली किसीने राजासे खाई तब राजा गुस्से में आकर आंबा (२०) नीमकोरे २० बरे कायदेकी सामानगो, साधारण बोलणेमें trji शब्द बोले २२ बेटेके Titi irf मग आप दीन उखी होवे २.नको भार वगेरे मांगणी है तो मग पाई होणेसें दूसरी मी को 24मी पुरषोके मंग हरीकाश्ते Hinी २३ नपा गुम्मा करके उसका .fift मान लोकोंकी करी हुई ' . ..'; सानो आकार लाये २७ अपणी (२०७) समऊ उसके आगे अपणा गुण प्रगट करे ३० शरीर निरोगी रहते हुये वे हमसे दवा खावे ३ए रोगी होकर पथ्यपरे जनहि करे ४० लो- नके वस स्वजनोकू बोमदे ४१ जिस वातोसें दोस्तका दिल खट्टा होजाय एसी बात कहे ४२ फायदेका वखत आवे उस वखत आलस करे ४३ बमा धनवान होकर लगाइ दंगा करे ४४ जोतषीकी जुवानपर नरोसा रखके राज्य मिलणेकी इच्छा करे ४५ मूर्खके संग सल्लाह करणेका आदर रस्के ४६ गरीब अनाथ लो- कोकू तकलीप देणेमें सूरवीरता जाहिर करे ४७ जिसकी एबजा हिरा देखणेमे आवे एसी उरत परप्रीति राखे ४७ गुणके सीखणेमें क्षण- मात्र प्रीति राखे ४ए मुसरोंका जमा कीया हुवा धन जमावे ५० अहंकार रखकर राजा जेसा बपााव करे ५१ लोकोके सामने राजा वगेरोकी जाहिर निंदा करे ५२ मुख आणेसें दीनपणां प्रगट करे ५३ सुख होणेसें आगे होणेवाली खोटी गतिकू नूल जावे ५४ थोमे बचावकेवास्ते ज्यादे खर्च करे ५५ परिक्षा क- रणेकू, जहर खावे ५६ किमियागरीमें धन होमे ५७ खयरोग होगयेवाद फेर रसायण खावे५७ (२०६) जीमणके वखत क्रोध करे २० बरे कायदेकी यासासें धन विखरे २१ साधारण बोलणेमें कठन संस्कृत वगेरेके शब्द बोले २२ बेटेके हाथमें सब धन सोंपके याप दीन ऽस्वी होवे २३ उरतके पक्षके लोकोसें उधार वगेरे मांगणी करे २४ उरतके संग समाइ होणेसे दूसरी सादी करे २५ कामी पुरपोके संग हरीफाइसें धन उमावे २६ लम्केपर गुस्सा करके उसका नुकसान करे २७ मंगत लोकोंकी करी हुई स्तुति सुणके मनमे अहंकार लावे २७ अपणी अहंकार बुझिसे फुसरेका हितकारी वचन नही सुणे २ए हमारी वमी जातिहे एसे अहंकारसें किसीकी नोकरी नहि करे ३० पुरवसें कमाया जावे एसा जो धन सो देकरके काम नोग सेवे ३१ मोल किराया देकर खराब रस्ते जावे ३२ जो राजा लोनी होय र नसके पाससे धन जेणेकी आसा रख्के ३३ हाकम इष्ट अन्याय होय उसके पाससे धनकी आसा रखे ३४ कायस्थ लोकोसे दोस्ती मोहवतकी आसा रस्के ३५ मंत्रबीजाहिल क्रूर कठोर होय उसका मर नही रख्के ३६ कृतघ्नीसें उपगारके बद- मेकी आसा रख्के ३७ जो मूर्ख रसकुँ नहि (२०७) समऊ उसके आगे अपणा गुण प्रगट करे ३७ शरीर निरोगी रहते हुये वे हमसे दवा खावे ३ए रोगी होकर पथ्यपरे जनहि करे ४० लो. नके वस स्वजनोकू बोमदे ४१ जिस वातोसें दोस्तका दिल खट्टा होजाय एसी बात कहे ४२ फायदेका वखत आवे उस वरवत आलस करे ४३ बमा धनवान होकर लगाइ दंगा करे ४४ जोतषीकी जुवानपर नरोसा रखके राज्य मिलणेकी इच्छा करे ४५ मूर्खके संग सल्लाह करणेका आदर रस्के ४६ गरीब अनाथ लो- कोकू तकलीप देणेमें सूरवीरता जाहिर करे ४७ जिसकी एबजा हिरा देखणेमे आवे एसी उरत परप्रीति राखे ४ गुणके सीखणेमें क्षण- मात्र प्रीति राखे ४ए इसरोंका जमा कीया हुवा धन जमावे ५० अहंकार रखकर राजा जेसा बपाव करे ५१ लोकोके सामने राजा वगेरोकी जाहिर निंदा करे ५५ रख आणेसें दीनपणां प्रगट करे ५३ सुख होणेसें आगे होणेवाली खोटी गतिकू नल जावे ५५ थोमे बचावकेवास्ते ज्यादे खर्च करे ५५ परिक्षा क- रणेकू जहर खावे ५६ किमियागरीमें धन होमे ५७ खयरोग होगयेवाद फेर रसायण खावे५७ (२.७) आप अपणे बमाईका अनिमांन रस्के ५५ 'स्से में आकर आत्मघात करणेळू तयार होय ६० नित्त विगरकारण इधर उधर नदकता ६१ शस्त्रोंके प्रहार लगेबाद फेरनी युद्ध देखे ६२ बमोके साथ विरोध करके नुकशानी में जा पमे ६३ थोमा तो धन होय उर आमंबर बना रस्के ६५ में पंमित हूं एसा समझके बहोत बकवाद करे ६५ अषणी सूरवीरता समज किसीका मर नही रख्के ६६ बहोत व्याख्यान करके अगले अदमीकू त्रास उपजावे ६७ हासी करता हुवा मर्मकी जुवान कहे ६० दलजीके हाथमें अपणा घर सोंपे ५५ पैदास तो होय नहि उर धन खर्च करे १० अपणे हक्कमे खरच करणेकू कंजूसपणा करे ७१ तकदीरके जरोते रहकर उद्यम नहि करे १२ आप दलजी हो- कर बात बणाणेमें वरवत गमावे ७३ व्यसनकी उलफतमें गिरके जीमणानी नूलजाय ५४ आप निर्गुणी होकर अपणे कुलकी बहोत ता- रीफ कीया करे ७५ वररा र करमा स्वर होय उर गाणा गावे ७६ रतसें मर कर याचककू दांन नही देवे ७७ रुपणपणा करके उर्दशा जोगे 3G जिस अदमी के प्रगट अवगुण दिखते (एए.) होय.एसे अदमीकी तारीफ करे ए सनाका काम पूरा हुवे नही उर पहली ऊउजावे सो छ दूतयाने हलकारेका काम करे उर संदेसा नूल जावे ७१ खासीका रोग होय उर चोरी करणेकू जावे श मुनियामें नामंबरी उर य- शकी इच्छाके चाहसे नोजनका खरच बहोत रस्के ७३ लोक मेरी तारीफ करेगा इस नरोसे आहार थोमा करे ७४ जो चीज थोमी होय वो चीज बहोत खाणेकी इच्छा करे ए५ कपटी र मीठे वचनोके बोलणेवालेके जाल में जाफसे ७६ कसवणके जारके संग लमाइ करे ७७ दो- जणे कोइ गुप्त सल्ला करते होय उसके बीचमें तीसरा आप जावे ७ राजाकी महरबानी ह- मेसां बणी रहेगी एसा दिलमें जरोसा रख्के नए अन्यायके रस्ते चले और आपणी बढोत- रीकी आसा रख्के ए धन तो पासमे होय नही उर धनसे होणेवाले काम करे ए१ गने- की बात लोकोमें जाहिर करे . ए२ यशकेवास्ते अजाण अदमीका जाम न होय ए३ हितवचन कहणेवालेके संग वैर करे ए। सब जगे नरोसा रखके ए५ लोक व्यवहार नही जाणे ए६ ग्याचक नीरव मंगा होकर गरम जोजन करणे- की टेंम रख्के एमुनिराज होकर क्रिया पा- लणेमें शिथलतता रखके एज कुकर्म करता हुवा सरमावे नही एए उर बोलता हुवा बहोत हसे १०० इसतरेसे सो मूर्व जांणना जिस बा- तोसें अपयश होय एसे सब काम गेमणा इस तरेसें विवेक विलासमें जिन दत्त सूरजीने लिखाहे सन्नामें वगासी हिचकी मकार हासी वगेरे करणा पमे तो मुख ढांककर करणा सजा- में नाक कुचरणा नही उर हाथ मरोमणा नही पालखथी मारणी नही पगलंवा नही करणा निझा विकथा वगेरे खराब चेष्टा नही करणी उत्तम पुरपोका हसणा होठ फुरकाणे मात्र होताहे ज्यादे हसणा अनुचितहे बगल नहि बजाणी अंग बजाणा तिणखा तोमणा हाथसे जमीन खोतरणा नखसें नख अथवा दांतोका घसणा ये वातों नही करणी चारण नाट ब्रा- ह्मण वगेरोके मुस्खसें अपणी तारीफ सुणके मनमे अहंकार नही लाणा र समऊवार अ- दमी अपणी तारीफ करे तो मनमें समकणाकी इतना गुण तो मेरेमेहे लेकिन अनिमांन नही करणा उसरे अदमीके कहे मुजब वचनके अ- निनाय दिलमें धरणा नीच अदमी अपणेकुं (११) हलकी जुवान कहे तो पीग उत्तर हलकी जु- वानसें नहि देणा जो बात वीतगइ या आगे होणेवाली या वर्तमानकालमें जरोसा रवणे योग्य नही होय एसी बातमें एसा नही क- हणा की ये तो सच हे उर एसेंहीहे एसा प्रगट अपणा अभिप्राय नही जाहिर करणा कोइ काम किसीके पाससे कराणा विचारया होय तो उसके सामने किसी दृष्टांतसे अथवा विशेष वचनोसें पहली जताणा चाहीये अपणा विचारया हुवा कामके अनुकूल कोइ वचन कहे तो जरूर * मान लेणा चाहीये जिसका काम अपणेसें नही बणसके उसकू पह- खेहीसे नहिं कहदेणा कूठी दिलासा देकर धक्का नही खिलाणा चतुर पुरषोकू चाहीये सो अपने पुस्मनकोंन्नी कवी जुवान नही कहे अगर किसी मोंकेपर सुणाणा पमे तो मि- सालकरके दुसरेके वहानेसें सुणाणा जो अ- दमी माता पिता रोगी आचार्य पाहुणा नाइ तपस्वी बुढा बालक पुर्बल गरीब आदमी वैद्य अपणी उलाद नायोके कुटंब चाकर बहेन इ- णोके संग लमाइ नही करें वो अदमी तीन ज- गतकू वस करे एक टकी लगाकर सूर्यके सा- A मने नही देखणा तेसे चंड सूर्यका ग्रहण लगे तब कूवेका पाणी उर संज्ञा कीसमें आकास के नही देखणा स्त्रीपुरपका संनोग सिकार जवा- नीमे नरपूर नंगी स्त्री जांनवरोका मेथुन क्रीमा उर कन्याकी योनि तेजमें जलमें हथियारमें मूतमें तेसें रवूनमें अपणी पनिगई नहि देखणी एसें करणसें आयु घटतीहे अच्छे बने उर सु- सील आदमीयोकी वातकुँ काटणा गइ चीजका फिकर करणा किसीकी निझा जंग करणा इ- त्यादिक बातें कनी नहि करणा बहुतोंके साथ वैर विरोध नहि करणां बहुतोकी मत जिधर होय उधरही मति देणी जिस काममें स्वाद नहि एसानी काम समुदायके संग करणा समऊवारोको चाहीये सब शुन्न क्रियामें आ- गेवांन होणा जो आदमी कपटसेंनी निर्लोनी- पणा दिखलावे तो उसमेंनी गुण हासिल हो- ताहे किसी अदमीका नुकसान करणेसें कोश काम सिझ होता होय तो एसा काम बणे ज- हांतक नही करणा सुपात्र अदमीकी इर्ष्या नहि करणी अपणी जातिपर संकट आपमे तो जाति नही बोमणी बहोत आदरसें जातिमें संप होय एसा काम करणा एसा नही करे तो (१३) मान्य पुरषोका मानखमन र अपयश होताहे : अपणी जातिको बोम पराइ जातिमें जो आस- क्त होताहे उसकी कुकर्दम राजाकी तरे मुर्दसा होतीहे जातिमें कलह करणेसें अदमी भ्रष्ट मिलजाताहे तर संपमे रहे तो कमलमें कमल- पीकी तरे बढताहे अपणा दोस्त साधर्मी र जातिमें आगेवान बमा पुत्र जिसके नही होय एसी बहिन इतनोका जरूर पोषण करणा जो पुरष मनमें वपन रख्वा चाहे वो सारथीका कांम पराइ चीज खरीदणी र वेचणी' अपने कुलके अनुचित काम नही करणा महानारत ग्रंथमे लिखाहे मनुष्यकू ब्रह्म मुहुर्तमें उठणा धर्म अर्थका विचार करणा सूर्यकू उदय होते अस्त होते नर किसी वखतनी देखणा नही दिनकू उत्तरकी तरफ रातकू दक्षिणकी तरफ मुं करके दिसा जंगल जाणा अगर कुब हरकत होय तो चाहे जिधर मुखकरके जंगल जाणा आचमनादि करके देवपूजा कर गुरुकू वंदना करके साधू सुपात्रोकों दान देकर भोजन कर- पा, जो भोजन घरमें होय वो पहली देव जिन राजके सामने धरणा फेर नूख जगणेसें जोजन करणा कारण नोजनका कोइ वखत शास्त्रकारोने (२१४) नहि लिवाहे इतना तो जरूरहे एकवार में मकर पहरजरमें उसरा खाणा नहीउर दोपह लांघणा नही अर्थात् पांच घंटा आगले जोज नकू हो चुके तव उसरा खाणा ये मर्यादा हि नकीहे रातकूनोजन सर्वथा मनाहे इसवास दिनके पहले पहरमें नोजन करणा नहीं दोपह वीताणा नही सुपात्रोकों दान देणेकी वि इस मुजबहे सुपात्रकू निमंत्रकर नोजनकी रखत घरपर लाणा अथवा आते मुनिराजकू देख ननोके सामने जाणा वंदना करणा फेर क्षेत्र संवेगका नावितहे या अन्नावितहे काज सुनित हे या पुर्निक्षहे दांन देणेकी वस्तु सुलनहे य उर्खनहे तेसें पात्र आचार्यहे या उपाध्याय गीतार्थ तपस्वी बाल वृद्ध रोगी समर्थहे या असमर्थहे एसा दिलमें विचार करणा र ह- रीफाई बमाइ इर्ष्या प्रीति लजा उर चतुरा उसरे लोक दान देते इसवास्ते मुङोनी वे- साही करणा एसी इच्छा नपगारका बदला ज. तारणेकी इच्छा कपट विलंब अनादर कमवा बो- लणा देकर पिउताणा इत्यादिक दांनके दोषणहे फकत अपणा जीवका नना चाहता हुवा दोष रहित अन्नपान वस्त्र वगेरे वस्तु अपणी अपणे (१५) हाथसें अथवा आप खमा रहके स्त्री वगेरोके पाससे दिलावे जैनमुनिके आहार संबंधी व- यालीस दोषण टालणेके पिंम विशुद्धि वगेरे ग्रंथोसें जांणना दांन दीयां पीजे मुनिराजकू वंदन करके उनोंकों दरवाजेतक पोहचाणे जा- णा मुनिराजका योग नहि होय तो बद्दल वि- गर वृष्टिमाफक साधूठेके आणेकी राह देखणी शुद्ध श्रावक साधूकुं दान दिये विगर कोश्नी चीज नहि खातेहे मुनिराजका निर्वाह उसरी रीतसे होता होय तो अशुद्ध आहार लेणे उर देणेवालेकू हितकारी नही उर कुसमयमें जो निर्वाह नही होवे तो आतुरके दृष्टांतसे अशुद्ध आहार दोनोंकों हितकारीहे भगवती सूत्रके लिखे मुजब रस्ते चलणेसें थके हुये रोगी लोच करे हुये एसे आगम शूध वस्तुका लेणेवाला साधूकू उत्तर पारणेके विषे दांन दीया होय तो उस दांनसें बहोत फल मिलताहे सुपात्र दांनसें देवके तथा मनुष्यादिकोका सुख तथा समृद्धि होतीहे चक्रवर्ति आदि पद मि- लताहे अंतमें थोमे समयमें निर्वाण सुख मि- लताहे अन्नय दांन ? र सुपात्र दान २ अ- नुकंपादान ३ चितदान ४ कीर्तिदान ५ पह-
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(२१७) जीमाणा साधर्मीनी पात्र कहलाताहे साधर्मी वात्सल्यका बमा लान शास्त्रोमें तीर्थकर महा- राजने बयान कीयाहे तेसे सरे निक्षारी लो- को दान देणा निरासकर पीना निकालणा नही कर्मबंध तेसें धर्मकी हीलणा नहि कराणी अपणा मन निर्दय नहि करणा जीमणके ब- खत दरवाजा बंध करणा ये गृहस्थ सत्पुर- पोका लक्षण नही धनवानकू तो निश्चेही अनं- गद्वार होणा क्योंके अपणा पेट कोण नही जरताहे लेकिन बहोत जीवोंकी प्रतिपाल करें पुरष वोही गिणे जाताहे इसतरे दीन उरिव- योंको अनुकंपा दान देकर पी जीमणा जिने- श्वरदेव श्रावककू अनुकंपा दान मना कीया नहीं नगवतीमे श्रावकके वर्णनमें अवंगु अज्वारा लिरवाहे जवसमुअमे मूबते हुये जीवोके समुदा- यकू उखसें हेरान हुये… न्यातकी जातकी तथा धर्मकी तफावत दिल में नदि रखकर 5- व्यसें तो अन्नादिक नावसे सधर्मके रस्ते ल- गाकर यथाशक्ति अनुकंपा करणी तीर्थकर म- हाराज संशारसे विरक्त नावना लाये वाद दीन पुरखीयोके उभार करणे संवत्सरी दान देतेहें एक वर्षतक फेर संजम लेतेहे प्रदेसी ।
(२१६) जीके दो दानोसें मुक्ति उर सुखसंपदा मिल तीहे उर तीन दानोसें फकत सुखसंपदा मि- लतीहे मुपात्रका लक्षण इस तरेसे, उत्तम पात्र साधू जोकी सर्व संगका त्यागी शुध उप- देशक मध्यम पात्र श्रावक साधर्मी उर जय- न्यपान अविरति सम्यकदृष्टी सास्त्रांतरोमें लि- खाहे हजारो मिथ्या दृष्टीसे एक थोमी असा- वाला सम्यक् दृष्टी अच्छाहे उर हजारो संक्षे- प श्रघावंतसें एकवारे व्रतधारी श्रावक श्रेष्ठहे हजारवारे व्रतधारीसे एक मुनिराज श्रेष्ठहे उर हजार मुनिराजोसें एक तत्वज्ञानी श्रेष्टहे त- ज्ञानी जेसा पात्र हुया न होगा सत्पात्र बनी बधा योग्य काल चित एसी देणेकी वस्तु से धर्म साधनकी सामग्री व पुन्यसें प्राप्ति होतीहे नोंचढाणी १ नजर करमी करणी अंतर्वत्ति रवणी { फेर लेणा ४ मोन क- णा ५ देणेमें देरी करणी ६ ये बाते नाकारा करणेका चिन्हहे खमें आनंदके आंसू ? रूं वमे होणा २ बहुमांन ३ प्रियवचन ४ अनुमो- इन ५ ए पांच दानका नूपण कहलाताहे इत्या- देक संक्षेपसें दानविधी कही तेसैइ नोजनकी त साधर्मी आवे तो उसकूनी यथाशक्ति 1 (१७) जीमाणा साधर्मांनी पार कहलाताहे साधर्मी वात्सल्यका बमा लान शास्त्रोमें तीर्थकर महा- राजने बयान कीयाहे तेसे उसरे निक्षारी लो. काकू दान देणा निरासकर पीग निकालणा नही कर्मबंध तेसें धर्मकी हीजणा नहि कराणी अपणा मन निर्दय नहि करणा जीमणके ब- खत दरवाजा बंध करणा ये गृहस्थ सत्पुर- पोका लक्षण नही धनवानकू तो निश्चेही अनं- गद्वार होणा क्योंके अपणा पेट कोण नहीं नरताहे लेकिन बहोत जीवोंकी प्रतिपाल करे पुरप वोही गिणे जाताहे इसतरे दीन इरिव- योंकों अनुकंपा दांन देकर पी जीमणा जिने- श्वरदेव श्रावककू अनुकंपा दांन मना कीया नहीं नगवतीमे श्रावकके वर्णनमें अवंगु अवारा लिखाहे नवसमुअमे मूबते हुये जीवोके समुदा- यकू पुरवसें हेरान हुयेकू न्यातकी जातकी तथा धर्मकी तफावत दिल में नदि रखकर 5- व्यसें तो अन्नादिक नावसे सधर्मके रस्ते ल- गाकर यथाशक्ति अनुकंपा करणी तीर्थकर म- हाराज संशारसे विरक्त नावना लाये वाद दीन उरखीयोके उझार करणेकू संवत्सरी दान देतेहें एक वर्षतक फेर संजम लेतेहे प्रदेसी १ न राजा केसी कुमारके उपदेससे नास्तिक मत त्याग जैनधर्मका उत्कृष्ट श्रावक वणवाद दांन साला दीन हीन पंथी श्रमण माहणोके वास्ते केशी गण धरके उपदेससें कराइ ये अधिकार राजप्रष्णी सूत्रमेंहे विक्रमराजा लोकोका ऋण उतारकर संवत चलाया एसेंही शालिवाहन जैनधर्मरूपी सक चलाया लोकोकी आपदा काटणेसें बमी फलप्राप्ति होतीहे चेलोकी परिक्षा विनयउपरसें मालम पमतीहे सुनटोकी परिक्षा होणेसें मित्रकी परिक्षा आपदाका प्रसं- रंग आणेसें र दानेश्वरीकी परीक्षा काल पम- पर मालम देतीहे हमारे विद्यमांनमें बीकानेर मारवाममें उकाल पमा सं० १ए-५६का जिसमे नग्रसेठ चांद मलढहा वगेरे सवाल गोत्री ते- सेंइ मागा दम्माण। प्रमुख माहेश्वर गोत्रीयोने राजेंद्र गंगासिंह बहाउरकी प्रेरणासे लाखो रुपयेका अनाज कंगालोको दान दीया तेसे दांन बुद्धि ररवणी तेसें माता पिता नाइ बहेन लमका लम्की उरत नोकर रोगी केदी लोक गाय वगेरे जानवरोकू यथायोग्य नोजन कराके पंचपरमेष्टीका ध्यानकर पञ्चरवाणका उपयोग रखकर आपकी तासीरकू माने एसा भोजन } (१ए) करणा आहार पाणी वगेरे वस्तु स्वनावसेंही इष्ट र खराब होय तोनी किसी कू माफ- गत आताहे उसकू साम्य कहतेहे जन्मसें जे- कर जहर खाणेकी टेंम पटकी होय तो उस अदमीकू जहरनी अमृत होजाताहे उर अमृ- तनी अगर कनी नहि खाया होय तो वो ज- हर माफक होताहे इसवास्ते पथ्य चीज नही सदे तोनी खाणा चहीये कुपथ्य चीज सदे तोनी नही खाणा ताकतवर अदमीकू सब चीज हितकारी होतीहे एसा समऊके काल- कूट जहर नहि वाणा जहर शास्त्रका जाण- कारनी कोइ वखत जहर खाणेसें मरजाताहे जेसें के तेरूकी रांग होतीहे गलेके नीचे उतरे सो सब असन कहलाताहे इसवास्ते क्षण नरके सुखकेवास्ते जीनका लालची नहि होणा इस- वास्ते अनक्ष्य अनंतकाय उर बहुत पापकारी बहु बीजबस्तुका खाणा गेमणा क्योंके रोगका मूल रसहे नावप्रकाशमें लिखादे बहुत साग- पात रोगकारीहे अनक्ष अनंत कायका विचार जैन तत्वादर्श नाषाग्रंथसे जांण लेणा पापका मूल लोनहे सुखका मूल स्नेहहे रोगका मूल रसहे इन तीनोका बोमणेवाला सुखी होताहे.
(२०) अपणी अग्नि बलमाफक प्रमाणसर जोजन क. रणा बहोत नोजन करणेसें उलटी दस्त हेजा वगेरे रोग होताहे जीमकर सो कदम टहलणा अध कच्चा अन्न नहि खाणा जीमकर अन्न पचणेकू मावी करवट पावघंटा सोणा अध घंटा चित्ता सोणा ताकत वधणेकू निता लेणा नहीं दिनकू कनी हमेस फिरणे घिरणेकी मेहनत करणेवाला देरी नहि रखतां मलमूत्रका त्याग करणेवाला उरतोसें वचके रहणेवाला एसे पुरषोके रोग नहि होताहे बिलकुल प्रनातसमें सदन त्रिकाल संइयाकी वरवत अथवा रातकू तथा रस्ता चलते नोजन नही करणा नोजन करती वखत अन्नकी निंदा नहि करणी मावे पगपर हाथ नहि रखणा एक हाथमे खाणेकी चीज लेकर दुसरे हाथसें नही खाणा उधामी जगेमें धूपमें अंधारेमे दरखतके नीचे भोजन नहीकरणा नोजन करती वरवत तर्जनी अंगूठेके पास वाली टालनी नहि वस्त्र जर पग धोया वना नंगा होकर मेला वस्त्र पहरकर एक धोती हरकर नीगा वस्त्र लपेटकर अपवित्र शरी- से अतिशय जीनकी लोलपता इत्यादिक प्र. बारसें नोजन नही करणा पगोमें जूता पहरा (२१) हुवा चित्त ठिकाणे रखे विगर केवल जमीनपर अथवा पिलंगपर बेचकर खूणेमे बेवके दक्षिण दिसामे मूं करके तेसें पतले आसनपर बेठके इत्यादिक प्रकारसे भोजन नहि करणा आ- सनपर पग रखकर कुत्तेकी चंमालकी जर नीच अदमीकी जहां नजर पमती होय एसी जगे भोजन नही करणा फूटे वरतणमें मलीन पात्र में अपवित्र वस्तुसे उत्पन्न गर्नहत्या करणेवालाका स्पर्शा हुवा गाय कुत्ता पक्षीयोका सूंघा हुवा जिंस चीजकी खबर नही के ये कहांसें आई है जिस चीजकू आप पहचाणे नही एक वेर राधे हुवेकुं ज्वारा गरम कीया होय ए इत्या- दिक वस्तुका नोजन नहि करणा जीमते वरखत वच २ शब्द वांका तिरग मूं नही करता अपणे इष्टदेवका नाम लेणा उत्तम हाथोसे जीव जय- णासें बणाया गया जीमणा स्वर वहते हुये मौन करके नोजन करणा शरीर वांका तिरळा नहि रवणा खाणेकी सब चीज सूंघके फेर रवाणी जिस्से नजर दोष टलताहे बहोत स्वा; रा बहोत खट्टा बहोत गरमागरम बहोत मा अन्न नही खाणा शाक बहोत नही खाणा बहोत मीठी चीजनी नहि खाणी अत्यंत रु- (१२) चिकारीनी चीज नहि वाणी ज्यादा गरम रस ताकतका नास करेहे बहोत खट्टा इंजियोकी शक्ति तथा वीर्यकू हीन करताहे अतिसय वारा आंखोंकों विकार करेहे बहोत चिकणा गृहणी आंत उठी कला हाजमा बिगामेहे कफकू करवा जेर तीखे रससे जीतणा पित्तकू मीठे खट्टा मंदरससे जीतणा वायूकू चिकणा उर गरम रससे जीतणा अजीर्णादि सन्निपातादि वाकी रोगोकू उपवाससे जीतणा घीके संग करमी वस्तु पहली खावे मीठा रस वगेरे दूध वगेरे बलिष्ट वस्तु नित्य खावे दाहकारी वस्तु नही रखावे बहोत जल नही पीवे खाया हुवा पचे वाद भोजन करे पहली मीठा बीचमे तीखा अंतमे कमवा रस खावे जलदी नहि करता हुवा मीग उर चीकणा रस खावे बीचमे पतला खट्टा उर खारा खावे अंतमे कमवा तीखा रस खावे नोजनकी सरूआतमे जल पीवे तो अग्नि मंद होवे बीचमे पीवे तो रसायण मुजब अंतमे पीवे तो विप माफक नुकशांन करे जीमे बाद एक कुरला मूं साफ करणेकू जरूर पीणा दटके हजीमणा नहीं नोजन करके नीजा हाथ नेत्र रोगी टालके आंख गालके वाये हाथके नही (२२३) लगाणा कल्याणकेवास्ते दोनों गोमोके स्पर्श करणा नोजन करके दो घंटेतक स्त्री संग नहि करणा दोमणा वगैरे खेचल नहि करणा शरीर मर्दन पगचंपी करवाणा नही नार उठाणा बे- सणा अथवा स्नान नोजन करके नहि करणा नोजनकर बेवणा नहि बेवे तो मेदवृधिसे पेट चूतमनारी होजाताहे सुश्रावक निर्वद्य निर्जीव र परित्त मिश्र इससे अपणा निर्वाह करतेहै जीमते बूंद या अनाजका दाणा नही गिरावे मन वचन कायाकी गुप्ती रखके भोजन करे विवेकी देव गुरु नगरका मालक तथा स्वजनमे शंकट पमे तो उती शक्ति नोजन नहि करे सूर्यचंका गृहण लगे तब नोजन करणा नही अजीर्ण नेत्ररोगमें नोजन नहि करणा तावकी सरूआतमे लंघन शक्ति माफक करणा वायूसें थकेलेसें क्रोधसें शोकसें कामसें जो ज्वर चढे अथवा चोटसे उसमे खंघण नहि करणा तीर्थ वंदनमें आठम चोदसकू बमे पर्वके दिन नोजन नही करणा तपस्यासें अनेक कार्य सिद्ध हो- ताहे चक्रवति नारायणनी तपस्यासें देव आ- राधतेहे नोजनकर दांत साफ कर नवकारस मरणकर उठे तथा गुरुकू तथा देवकू चैत्य ब- (२२४) दन विधिसे वांदे गीतार्थसे मुनिसे अथवा सिम पुत्रसें अथवा गीतार्थ श्रावकसे वांचे पूरे पन्य हुवा याद करे धर्मकथा सुणे अथवा कहे मनमें सूत्रार्थ विचारे ये पांच प्रकारका स्वाध्याय करे शास्त्रोका रहस्य विचारणा सांडकुं पापका आ लोचनारूप प्रतिक्रमण सामायक संयुक्त करे फेर जिन मंदिर जाकर आरती धूपादिक करके परमात्मा श्री तीर्थकरोका गुण गावे रात्रीकू च्यारोंही सरण लेकर सब जीवोंकों खमायकर सागारी अणसण लेकर देवगुरुका समरण करे जतनके साथ शयन करे श्रावकके तीन मनो- रथहे सो करे अनित्यादिक वारे नावना नावे पिछली रात्रिका जब नींद उमजाय तब अना- दिकालकी अन्यासरूप उर्जय काम रागकू जीतणेकू स्त्रीके शरीरका अशुचि गलीचपणा विचारे जेसे थूलनप्रस्वामी जंबूस्वामी सुदर्शन सेठ वगेरोने जेसे बुर शील पाला उर मन वस कीया क्रोधादिक कषाय जीतणेकू जो जो उपाय कीया शंसारअसार बमा विषम एसें मनोरथ करणा स्त्रीका शरीर अपवित्र निंद नीक चाममी हाम मीजी आंतरया चरबी रवून है मांस पेसाब विष्टा वगेरे गलीच वस्तुसें जरा (१२५) हुवा इसकू तूं क्या अच्छा समऊताहे अरे जीव विष्टा वगेरे गलीच चीजकू देखके जैसें तूं थू थू करताहे नर नाक चढाताहे तो फिर हे मूर्ख एसे स्त्रीकी सरीरकी क्या इच्ग करताहे विष्टाकी थेली कीमोकी नरी कपटण चपलाइ र कूवसें जो पुरपोकू उगतीहे एसी स्त्रीका हावनाव जर बहारकी सफाइ देख जो मनुष्य मोहके वस उरतकू नोगतेहें उसकरके नरकप्राप्ती होतीहे जरूर काम देव जगत लोककू जीतणे- वालाहे तथापि मनकू संकल्पसें वर्जे तो सह- जमें काम जीतणेमें आताहे जो जीव जगतमें पूज्य होगये वेनी अपणे जेसेही आदमी थे लेकिन क्रोध मांन माया लोनकू त्यागणेका उद्यम कीया तब थोमेही कालमे ईश्वर सिद्ध होगये वाकी सत्पुरप पैदा होणेका कोइ अला- यदा क्षेत्र नहीहे इंजियां वगेरे वस्तु तो मनुष्य- के स्वन्नाव करके प्राप्तहे तेसे साधूपणा मिलणा सहजसें नही लेकिन गुणोकों धारण करणे- वाला साधू कहलाताहे उद्यम करणेसें गुणोकी प्राप्ति होतीहे कोरा उत्तम जातिवाला हुवा तो क्या हुवा रोहीमेके पुष्पकी तरे देखणे मात्र हो. ताहे वनमें पैदा हुये खसवोदार पुष्पकों लोक
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(२२७) वृहत् गच्चरखरतर विटप मुनिश्रावकपतफूल ॥ भट्टारकयुगवरप्रवर ।। कीर्तिसूरिजिनमूल ॥ ५ ॥ शाखाकीर्तिक्षेमकी अतिपसरीनरपूर ॥ अगणित पमफलगुणी प्रगटेपुन्यपमूर ॥६॥ धर्मशीलगुरुमिष्टरस पल्लवकुशलनिधान । रसनातारसकरप्रगट कितलगकरेवरखान ॥७॥ गुरुगुणसरससुधानिधी॥ पानकरणललचाय ॥ शुरसममोमनपीनअति नयो विचक्षणराय॥ ७ ॥ परजपगार विचारकर निजातमअविकार ॥ पाठकपद्धारकरुचिर विरचतगणिःऋछिसाराए। इति श्रीश्रावगव्यवहारालंकारग्रंथ उपाध्याय श्रीरामलालजीयुक्तिवारिधिःकृतसंपूर्ण ॥
॥ अथ नावावगके लक्षण लिख्यते ॥ सतरे लक्षणवाला नावावक होताहे तो संक्षेपसें लिखताहूं १ अनर्थकू पेदा करणेवाली चंचल चित्तवाली गुणगारी नरक जाणेके रस्ते जेसी स्त्रीकू जाणके अपणे जीवका नला चाहता हुवा उसके वशमें नही रहे २ इंडीयांरूप चं- चल घोमे हमेसां उर्गतिके रस्ते दोमतेहे इस- वास्ते शंसारका यथार्थ स्वरूप जाणणेवाला श्रावक सम्यक् ज्ञानकी लगामसें इंडियोकू खोटे रस्ते नही जाणे देणा ३ सब अनर्थका तथा प्रयासका कलेसका कारण र असार ऐसा धनकू जाणकर बुद्धिमान पुरष थोमाही धनका लोन नहि करे ४ संसार आप उरवरूप सुखका फल देणेवाला परिणाम याने आगेनी पुखदाई विटंबनारूप एसा जांण उसमें प्रीति रखके मुरडाणा नही ५ जहर जेसा विषय क्षणमात्र सुख देणेवाला एसा विचार हमेसां करणेवाला संसार प्रपंचसे मरणेवाला सर्व कथित तत्वका जाणकार उन विपयोकी श्च्छा नहि करे ६ तीन आरंन डोमे निर्वाह नहि होता दीखे तानी सर्व जीवपर दया रखता हुवा गुजरान माफक थोमा आरंज करे जर ६ (ए) बिलकुल आरंजसे रहित एसें मुनिजनोकी स्तवना करता रहे 9 गृहस्थावासकू बेमी र फास समान गिणता दिलके ऊपर कर उरक करके रहे उर चारित्र मोहनी कर्म खपाणेके उद्यममें रहे ७ बुद्धिमान पुरष मनमें गुरुनक्ति र धर्मकी श्रद्धा रखकर धर्मकी प्रनावणा प्र- शंसा इत्यादिक करता हुवा निर्मल सम्यक्त पाले ए विवेकसें चलणेवाला धीर पुरप साधा- रण मनुष्योंकू अण समजपणेकर गामरी प्रवाह चलणेवाला समजे ज्ञानशुन्य किसी जाग्यवान… कोइ धर्मादि कर्त्तव्य करता देवे उस मुजब तत्वज्ञानरहित हीया शून्यपणे करतेहे एसा समऊ बुद्धिवंत लोक संझाका त्याग करे १० एक जिनागम स्यादवाद् न्याय टाल दुसरा यथार्थ नही उंर मुसरे शास्त्र मोक्षका रास्ता नही एसा जांणकर सर्वक्रिया अनुष्ठान जिनागमके अनुसार करे ११ अपणे जवकी शक्तिकू नही बिपाता हुवा जेसे संसारके बहोतसे कामकाज करताहे तेसे अपणी हिम्मत नहि हारता हुवा दानशील तपनावना प्रमुख च्यार प्रकारके धर्मकू जेसे आत्माकू पीमा नही होय एसी तरे आदरे १५ चिंतामणी रत्नकी तरे पुर्खन एसी .
(२३०) हितकारी र निरवय धर्म क्रिया पायकर अच्छी तरे आचरणा करता हुवा एसा आपणेकू करते हुवेकू देखके अझानी लोक अपणकू हसे तोनी उनोके हसणेसें मनमें लज्या लाणी नही १३ देह स्थिति रक्षाका मूलकारण धन स्वजन आ- हार उर घर इत्यादिक शंशारगत चीजोके ऊपर रागद्वेप नहि रखता हुवा संसारमें रहे १४ अपणां हित चाहता हुवा मध्यस्थपणेमें रहकर नित्य मनमें समताका विचार रखता हुवा रागद्वेषके वस नहि होणा कदा ग्रहकू सर्वथा बोगदे १५ हमेसां दिलमें सब चीजोकी क्षणभंगुरताका विचारकर धनवान होकरकेनी धर्मकृत्यमें हरकत होय एसा उनोका संबंध नहि रखे १६ संसारसे विरक्त हुवा श्रावक नोग उपन्नोगकी चीजोसें तृप्ति होती नही एसा विचार करता हुवा उरतके आग्रहसें काम नोगसेवें जेसें ज्वरके पीमामें कुटकी चिरायता आदि वारा उब्य दिलमें नहि रुचे तथापि रोग मिटाणेकू प्राणी खाताहे तेसें काम रोगकी शांति करे १७ वेस्या जो कसबण उसकी तरे आशंसा रहित श्रावक आज अथवा कल बोम- दूंगा एसा विचार करता पराई चीजके माफक (२३१) सूखे परणामोसें घरवास पाले एसे ये सतरे गुणोकरके जो युक्त सो जिनागममें नाव श्रावक कहताहे एसा परिणामोवाला नाव श्रावक शुन- कर्मके योगसे जलदी नाव साधूपणा पाताहे इसतरे धर्म रत्नशास्त्रमें लिखाहे ॥ इति श्री श्रावकव्यवहारालंकारग्रंथे नावश्रा- वकलक्षणसंपूर्ण ॥ जैनधर्ममें मं बंधोके पंथवाले कहतेहे दो हजार वर्पका नस्मग्रह वीरप्रनूके जन्मराशिपर बेगथा सो दो हजार वर्पतक जैन धर्मका उदय पूजा सत्कार नही नया वह ग्रह उतरा उर हम प्रगटे सो जैनका उद्योत जया उत्तर नस्मगृह नगवानके रासिपर आ- याथा सो उनोके शंतानोका उदय पूजा सत्का- र कम पमा था जब वह उतरा तब जगवानके शंतान जती साधूनकी पूजा सत्कार जर धर्मो- योत नया खरतर गच्छी श्री जिन चंडसूरिः तपाहीरविजयसूरिः झानविमलसूरिः विजयदां- नसूरि सं १६ से विक्रमके क्रिया उद्धार करा जिनोने अकब्बरसें उपदेस कर जैन तीर्थकी रक्षा करी अमारि उदघोषणा हिंन्दमे फिरवाइ इसवास्ते जिसकू रोग होताहे रोगकी मुदत पोहचणेसें वोही आराम होताहे सो नया (१३२) नगवांनने कहाथा मेरे चेलोंका उदय पूजा सत्कार दो सहस्र वर्पतक नही होगा लेकिन एसा नही कहा के एक गुरु विगरका द्रूपक पंथ ढूंढक होंगे उनोकी पूजा होगी तीनसे तेतीस वर्षका फेर जन्मरासिपर धूम्रकेतु ग्रह वेग उसके प्रताप जैनधर्म• मलीन करणे मूर्तिनिंदक शास्त्रोत्थापक महानिन्नववाईसगोष्टि लवंगचूलियासूत्र में लिखा सो तुम नये ॥ ॥
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नाम. d-४ - नीचे लीखे हुवे पुस्तक हमारे याहां मिलते हैं. हिंदुस्थानी भाषाके ग्रंथ. किंमत. १ करुणा बत्तिसी, दादासाहेबपूजा २ सोळे चाणक्य, शकुनावली स्वरोदय :- ३ मूर्तिममनका सिझमूर्ति विवेकविलास 0-6 ४ पूजामहोदधि-गायनरूप ३७ पूजा धु- ५ श्रावक व्यवहारालंकार १- ग्रंथ छपते हैं. १ श्रीपालचरित्र २ धर्मरत्नसमुच्चय-जिस्में पंचप्रति क्र- मणसूत्र विधि समेत, थुई चैत्य वंदन, ब स्तवन, सिजाय, गेटे स्तवन, पूजा सर्व तपस्या विधि, श्रावकके नि- त्य कर्तव्य इत्यादिक अनेक संग्रहों समेत फेर जीव विचार, नवतत्व, दमक अर्थ समेत उपताहै ५- १- --
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नाम. 0-४ नीचे लीखे हुवे पुस्तक हमारे याहां मिलते हैं. हिंदुस्थानी भाषाके ग्रंथ. किंमत. ? करुणा बत्तिसी, दादासाहेबपूजा २ सोळे चाणक्य, शकुनावली स्वरोदय १-० ३ मूर्तिममनका सिचमूर्ति विवेकविलास 4-5 ४ पूजामहोदधि-गायनरूप ३७ पूजा - ५ श्रावक व्यवहारालंकार ग्रंथ छपते हैं. १ श्रीपालचरित्र र धर्मरत्नसमुच्चय-जिस्में पंचप्रति क्र- मणसूत्र विधि समेत, थुई चैत्य वंदन, बमे स्तवन, सिजाय, गेटे स्तवन, पूजा सर्व तपस्या विधि, श्रावकके नि- त्य कर्तव्य इत्यादिक अनेक संग्रहों समेत फेर जीव विचार, नवतत्व दमक अर्थ समेत उपताहै १-७ A १- ५-2 -
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