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ऋगादिभाष्यभुमिकेन्दुपरागः
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प्रो३म्
ऋगादि-भाष्य-भूमिक-न्दूपरोगे
हितीयोंशः.
....."
बरेली निवासिमहन्तवमर्शशोदासीनरचिता
भाष्यभूमिकेन्दूत्तरभूतः ॥
परीक्षितगत निवासि पं० तुलसीरामस्वामिविरचितः
प्रयागस्थ
सरस्वतीयन्त्रालये मुद्रितः
प्राता विना अन्य कोई न छापे
ICE
10
संवत् १९५० वि०
प्रथम बार १०००
प्रति पुस्तक
ISB
SPROVOHOHOHOHROUPSION
ओ३म्
भूमिका।
मन्त्रब्राह्मणभेदो यो दयादिस्वामिदर्शितः ।
तमेव साधयाम्यत्र खण्डयित्वा तदुक्त्यरीन् ।
महन्त ब्रह्मकुशल बरेली निवासी जी ने जो स्वामिदया० स० जी महाराज
के विरुद्ध अब तक “ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकेन्दु” नामक पुस्तक के दो अंश रूप
वाये हैं जिन में प्रथम अंश का उत्तर तो पण्डित देवदत्त जी शास्त्री पुराणा
कानपुर की वैदिक पाठशाला के मुख्याध्यापक महाशय ने छपवा दिया ।
द्वितीय अंश का उत्सर यह मैं प्रकाशित करता हूं आशा है कि इन दोनों
के अवलोकन से प्रार्यममाज के अधाध्यमिद्धान्तों में जिन लोगों को महन्त जी
से देख से भ्रम पड़ा हो वह दूर हो जावेगा और महन्त जी भी अपने कपोल
मिथ्या प्रक्षेपों और प्रकरणविरुद्ध अर्थों पर पश्चात्ताप कर के इस
द्वारा अपना भी भ्रम दूर करेंगे । इति ॥
मरीक्षितगढ़ जि० मेरठ
तुलसीराम स्वामी
आश्विन ०२ सं०५०
पुग्नक सं०....... . आगन ०.२...... तिथि०.........: 2:31 मुम्कुल ग्रन्थालय.डी. -~.02 ओ३म् अथर्गादिभाष्यभूमिकेन्दूपरागे द्वितीयोंशः। - महन्त जी लिखते हैं कि खामी दयानन्दसरस्वती जी अपनी पुस्तक के पृष्ठ ८२ में लिखते हैं कि स बृहती दिशमनुव्यचलत् । तमितिहासश्च पुराणञ्च गाथा- श्व नाराशंसीश्वानुव्यचलन् । इतिहासस्य च वै सपुराणस्य गाथा- नां च नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद ॥ अथर्व कां० १५ प्रपाठक ३० अ० १ मं० ४ ॥ इम मन्त्र में ब्राह्मणग्रन्थों को इतिहासादि नाम से पुकारा है। तात्पर्य महन्त जी का यह है कि यदि ब्राह्मणग्रन्थ अनादि नहीं हैं तो स्वामी दयानन्द जी के लेखानुसार ही उन के माने हुये अनादि अथर्व में उन का वर्णन क्षों साया ? । उत्तर-इस मन्त्र में इतिहाम पुराणादि सामान्य शब्द हैं ब्राह्मणों के विशेष नाम शतपथ गोपथादि नहीं जैसे वेद में साधारण, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि शब्दों के आने से विशेष देवदत्त यज्ञदत्तादि का ग्रहण नहीं हो सकता अथवा कहीं महन्त शब्द के आने से ब्रह्मकुशल जी का ग्रहण नहीं हो सकता जब तक फि संकेत की सूचना न की जावे ।। महन्त जी को चाहिये कि उपरोक्त मन्त्र से पूर्व मन्त्र का अवलोकन करें जिस से ऋगादि वेदों से ब्राह्मणों का भिन्नत्व सिद्ध है यथाः १-स उत्तमां दिशमनुव्यचलत् । तमृचश्च सामानि च यजूंषि ब्रह्मवानुव्यचलन इत्यादि । मं० ३ ॥ जब कि इस पूर्व मन्त्र में (ऋचश्व) ऋग्वेद (सामानि च) सामवेद (यजूषि) यजुर्वेद (ब्रह्म च) और अथर्ववेद का अनुव्यचलन कह कर अगले मन्त्र में इति- हास पुराणादि का अनुव्यचलन कहा तब ऋगादि वेदों से इतिहासादि संजक साधारण ब्राह्मणों का भिन्नत्य तो स्पष्ट है। यदि ऋग्वेदादि चारों वेदों के अन्त.
NA 14~~~ र्गत इतिहासादिसंशक ब्राह्मणग्रन्थ भी आ चुके तो इन दो मन्त्रों में से तृतीय मन्त्र में ऋगादि का अनुव्य वलन कह कर फिर चतुर्थ मन्त्र में इतिहामादि का भिन्न ग्रहण क्यों आता ? ॥ अतएव स्वामी जी के कथन तथा अथर्ववेद के मन्त्र से ब्राह्मणों की सनातनता ऐसी सिद्ध है जैसी कि- साध्या ऋषयश्च ये-यजुः" कहने से साधारण ऋषिशब्द की सनातनता सिद्ध है न कि याज्ञवल्पयादि की और न कि शतपथ गोपथादि की- २-महन्त जी-यहचोऽध्यगीपत ताः पय आहुतयो देवानामभ- वन्यद्यपि घृताहुतयो,यत्सामानि सोमाहुतयो, यदथर्वाङ्गिरसो मध्वाहुतयो, यहाह्मणानि इतिहासान् पुराणानि कल्पान् गाथा नाराशंसीमेंदाहुतयो देवानामभवन्नित्यादि तै०प्र० २ अनु०९। - मं० २॥ नहन्त जी का भाषार्थ संक्षिप्त, पादबद्ध जो मन्त्र हैं उन का नाम ऋचा है। तिन को ऋषियों ने अध्ययन किया सो दुग्ध के द्रव्य की आहुति देवताओं को हुई और जो यजुर्वेद को अध्ययन किया सो घृत की और जो सामवेद को अध्ययन किया सो सोमरस की और जो अथर्ववेद को अध्ययन किया सो मधु की और जो ब्राह्मण इतिहासादि को अध्ययन किया सो मेद की आहुति हुई अतएव जब तैत्तिरीय में भी ब्राह्मणग्रन्थों का ग्रहण है तौ वागीदयानन्द का कथन ठीक नहीं। उत्तर-बाह ! २ महन्त जी यहां तो बंदतो व्याघात दोष में आ गये-मैं पूछता हूं कि ब्राह्मणों का ग्रहण तो तैत्तिरीय में आया परन्तु ऋग् यजुः साम अथर्व इन चारों से भिन्न आया तब ऋगादि के अन्तर्गत ब्राह्मण कैसे हुये किन्तु महन्त जी के ही मुख से सत्य २ बात निकल गई कि ऋग् यजुः साम अथर्व का पढ़ना मानों देवतों को दुग्ध द्रव्य, घृत, सोम, मधु (शहद) की आहुति देने के समान है और उन से भिन्न ब्राह्मणादि ग्रन्थों का पढ़ना मेदा (मांस) की पाहु. तियों के समान है इस से तो ब्राह्मणों का वेद से भिवत्व और नीचत्व सिद्ध हुभा-सत्य है कि सत्य को कोई कैसा ही छिपावे कभी न कभी सत्य निकल ही पड़ता है।
(३) M vAAN ~ ३-महन्त जी-अरे अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतघह- ग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः । इतिहासः पुराणं विद्या उप- निषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानीति श० कां० १४ अ०५ ब्रा०४ कं० १० इस प्रमाण से ऋग, यजुः, साम, अथर्य, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद् लोक, सूत्र, अनुष्याख्यान, व्याख्यान इन सब को परमेश्वर का श्वास बतलाते हैं । महाशय ! यदि लोक सूत्रादि सब वेद हैं तो अष्टाध्यायी नादि तथा गोप्तम न्याय सूत्रादि तथा नास्तिक श्लोक ऐले २४त्रया वेदस्य कर्तारो भण्ठ धूर्तनिशाधराः” इत्यादि सभी वेद वा ईश्वर का श्वास हुए धन्य हो ! वास्तव में इस कण्डिका के भिन्न २ दो वाक्य हैं यथा-अरे हे मैत्रेयि ! (अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत्) इस सब से बड़े भूत परमेश्वर का श्वास यह कि (ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽर्वाङ्गिरमः) ऋग, यजुः, साम और अथर्व । तथा (इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः संकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्या- नानि एतानि सर्वाणि) ये सब (अस्यैव) मी जीवात्मा के (निःश्वसितानि) श्वास हैं । इस अर्थ में ठीक संगति मिलती है इभी लिये स्वामी जी ने पूर्व वाक्य लिखा जिस में वेदों का वर्णन है उत्तरवाश्म में जीवकत इतिहासादि का वर्णन होने से छोड़ दिया सो ठीक ही था अब यदि महन्त जी के कथनानुसार अर्थ माने तो नास्तिकादिरचित मूत्रबद्धादि समस्त ग्रन्थ ईश्वर के श्वास ठहरेंगे और भक्षितेऽपि लशुने न शान्तो व्याधिः” के अनुमार ऋग्, यजुः, सामादि से इति- हासादि का भिन्न ग्रहण रहने से एकता या सभेद पिर भी नहीं रहा क्योंकि ऋगादि के अन्तर्गत तौ इतिहास प्रादि फिर भी न ठहरे। परमेश्वर के श्वास महन्त जी के अर्थ से भले ही ठहर जायो-साध्य की सिद्धि तथापि नहीं क्योंकि महन्त जी का साध्य ऋगादि से ब्राह्मणों का अभेद अर्थात ऐक्य है । सो नहींहुभा ॥ ४-पृष्ठ ४ से ५ तक महन्त जी लिखते हैं कि स्वामी जी ने ब्राह्मणग्रन्थों के ऋषिकत होने में कोई प्रमाण नहीं दिया । उत्तर-जब कि ब्राह्मणग्रन्थ इतिहासों से भरे पड़े हैं तब- ५-यस्मिन्नदृष्टेपि कतबुद्धिरुपजायते तस्पौरुषेयम् । सारख्या म० ५। सूत्र ५० ।
(४) जिस ग्रन्थकर्ता का नामादि स्पष्ट न भी हो परन्तु ग्रन्थ देखने से कृतबुद्धि, अर्थात् किसी पुरुष का बनाया प्रतीत हो वह ग्रन्थ पौरुषेय अनीश्वरकत जानना चाहिये यह सिद्ध है कि जब बहुत ऋषियों के जीवनचरित्र ब्राह्मणों में आये हैं जैसा कि मुकेशा च भारद्वाजः इत्यादि उपनिषद् तथा जनमेजयो ह वै परीक्षितः" इत्यादि गोपथ से स्पष्ट है कि वह ग्रन्थ सुकेशा और भारद्वाज और परीक्षितपुत्र जनमेजय के पश्चात् रचे गये वा उन का कोई भाग । यदि कही कि मन्त्रसंहिता में भी ऋषियों के नाम हैं सो वहां वे नाम ऋषियों के नहीं किन्तु यौगिकार्थ से अन्य वस्तुओं का अर्थ है । ६-महन्त जी-१मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् । इति यज्ञ परिभापामापस्तम्बः । २-ऐसा ही पाठ शुक्लयजः प्राति० इस से सिद्ध करते हैं कि मन्त्र और ब्राह्मण वेद है। उत्तर-आपस्तम्ब, कात्यायन की ये यज्ञ परिभाषा हैं यह बात तो श्राप स्वयं ही लिखते हैं जब यज्ञपरिभाषासूत्र है तब तो केवल उसी ग्रन्थ में माना जायगा-जैसे पाणिनि मुनि ने अपनी अष्टाध्यायी में वृद्धिरादैच १ । १।१। प्रदेङ्गुणः १ । १।२ इन सूत्रों से श्रा, ऐ, औ की वृद्धि संज्ञा और अ, ए, ओ, की गुणसंज्ञा मानी है तो वह संज्ञा केवल व्याकरण में मानी जाती है, दर्शनशास्त्रों में गुणगुणी शब्दों से अ, ए, ओ का ग्रहण नहीं होता इसी प्रकार आपस्तम्ब कात्यायन ने या परिभाषा में दोनों को वेद माना है न कि सर्वत्र ॥ ७-महन्त जी-मन्त्रब्राह्मणमित्याहुः । इति बौधायनः । मन्त्र और ब्राह्मण इन दोनों का नाम वेद हैं ऐसा बौधायन जी कहते हैं । वाह ! बौधायन जी ने तो इस पाठ में वेद शब्द भी नहीं पढ़ा फिर उन का अर्थ कपोलकल्पित नहीं तो क्या है। और नहीं तो इसी को प्रमाण कोटि में धरघसीटा जिस में वेद पद तक नहीं । -महन्त जी-मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदस्विगुणं यत्र पठ्यते । इति परिशि। , (५) www.N इस प्रमाण से मन्त्रब्राह्मण को वेद सिद्ध करते हैं परन्तु इम का अर्थ यह है कि जहां १ मलसंहिता २ पदपाठ और ३ क्रम इन तीनों का पाठ किया जाय वहां मन्त्र और ब्राह्मण को पारिभाषिकतया (इस्तलाहन) वेद कहते हैं न कि सर्वत्र ॥ ९-महन्त जी-विधिमन्त्रयोरेकार्थ्यमैकशब्द्यात् १ तच्चोद- केषु मन्त्रारव्या २ शेपे ब्राह्मणशब्दः ३ पूर्वमी० सूत्र३०॥३१॥३२॥ इन सूत्रों से कहते हैं कि विधि (ब्राह्मण) और मन्त्र का एक अर्थ है क्योंकि दोनों की “ ऐकशब्दात् " एक वेद संज्ञा है ॥ -तिस अभिधान के उपदेशकों में मन्त्र" यह संज्ञा प्रसिद्ध है। ३-शेष जो है विधिरूप वेदभाग सो ब्राह्मण कहा है इत्यादि- उत्तर-यदि महन्त जी इन सूत्रों का अर्थ अक्षरानुकून म्न और प्रकरणानुकूल करते तो उन्हें ऐसी भ्रान्ति न होती-यया-विधिमन्त्रयोरेकार्यमैकशब्दयात् " यहां महन्त जी ने जो “विधि, शब्द से ब्राह्मण लिया इसमें कोई प्रमाण नहीं दिया । किन्तु महन्त जी के ही लिखे हुवे अगले सूत्र ॥ तच्चोदकेषु मन्त्राख्या , से सिद्ध है कि चोदक, अर्थात् विधि वा विधायक को मन्त्र कहते हैं अतएव पूर्वसूत्र का यह अर्थ हुवा कि « विधिमन्त्रयोरेकार्यम् » विधि और मन्त्र का एक ही अर्थ है अर्थात् जिस को विधि कहते हैं उसी को मन्त्र भी कहते हैं। भला फिर विधि शब्द से ब्राह्मण कैसे लिया ? । १०-तीसरे सूत्र “शेषे ब्राह्मणशब्दः” का अर्थ तौ विलकुल प्रकरणविरुद्ध है क्योंकि शेष का अर्थ विधि नहीं है। विधि तो उपरोक्त लेखानुसार मन्त्र ही को कहते हैं किन्तु शेष" का अर्थ मीमांसाकार जैमिनि जी स्वयं करते हैं यथा- ११-प्रथातः शेषलक्षणम् । मी० अ० ३ पा०१ सू० १ अर्थ-अब शेष का लक्षण करते हैं। यथा- १२-शेषः परार्थत्वात् प० ३ पा० १ सू० २ शेष उस को कहते हैं जो पराया अर्थ करे सो ब्राह्मण पराया अर्थात् वेद का अर्थ बतलाते हैं अतएव वेद से भिन्न हैं। १३-महन्त नी विधिस्तुतिकरं शेषं ब्राह्मणं कथयन्ति हि के अर्थ में क्या चतुराई करते हैं कि विधिस्तुतिकारक वाक्यों को ब्राह्मण कहते हैं हां, हां, ठीक (६) MA- MAmrmanahamanAmANRNM ~~~ - तो हैं विधि ( वेद ) की स्तुति करने वाले वाक्यों को ब्राह्मण कहते हैं अर्थात् ब्राह्मण वेद नहीं किन्तु वेद की अर्थरूप स्तुति करते हैं । १४-आगे पृष्ठ ७ में महन्त जी लिखते हैं- उदितेऽनदिते चैव समयाध्युषिते तथा। सर्वथा वर्तते यज्ञ इतीयं वैदिकी श्रुतिः ॥ यह मनु का शोक लिख कर कहते हैं कि देखो मनुस्मृति में ब्राह्मणों को वेद माना है क्योंकि- स योऽनुदिते जुहोति यथा कुमाराय वा वत्साय वाऽजा- ताय सनं प्रतिदध्यात् तादृक् । तदथ य उदिते जुहोति यथा कुमाराय वा वत्साय वा जाताय स्तनं प्रति दध्यात्ताहक् । इत्यादि ऐतरेय ब्राह्मणे॥ ऐसा पाठ ब्राह्मण में आया है जैसे को मनु जी वैदिकी श्रुति कहते हैं इत्यादि। उत्तर-प्रथम तो जैसा पाठ मनु के श्लोक में है वैसा उक्त ब्राह्मण में भी नहीं फिर ब्राह्मण की ओर संकेत है। यह कैसे माना जाय यदि कहो कि श्राशय मिलता है सो भी नहीं क्योंकि मनु का आशय तो यह है कि सूर्य के उदय हुए वा विना उदय हुए वा समयाध्युषित होने पर सर्वथा यज्ञ करना चाहिये यह वैदिकी श्रुति हैऔर ब्राह्मण का आशय है यह कि जो उदय हुए पर हवन करे वह उत्पन्न हुए लड़के वा बछड़े को दूध पिलाता है और जो विमा उदय हुए हवन करे वह विना उत्पन्न हुए लड़के वा बछड़े को दूध पिलाता है इस का भावार्थ यह हुवा कि विना सूर्योदय के हवन करना ऐसा निष्कल है जैसा विना उत्पन्न हुए लड़के वा बछड़े को दूध पिलाना असम्भव है। अब मनु और ब्रामण में तो विरोध रहा तब मनु ने ब्राह्मण की ओर संकेत करके उसे वेद मामा यह कहां सिद्ध हुवा- १५-द्वितीय, वैदिकी श्रुतिः का तात्पर्य यह भी हो सक्ता है- १६-“प्रयोज। इस सूत्र से प्रयोजन अर्थ में वेद शब्द से प्रत्यय है सब यह अर्थ हुवा कि- - (७) wwwwwwwmnwor wrnN AAIAAARANA ब्राह्मण वेदःप्रयोजनमस्य वैदिक ब्राह्मणं तत्रत्या इयं श्रुतिः वेद है प्रयोजन जिस का ऐसे ब्राह्मण की यह श्रुति है। १७ तृतीय-यदि दुर्जनतोप न्यायानुमार यही मान लें कि मनु ने को ही यहां वेद कहा है तो कात्यायन की यज्ञ परिभाषा के अनुसार गत में केवल कहा है सर्वत्र नहीं-परन्तु यह पक्ष भी सर्वथा निर्वल है क्योंकि- १८-विरोधे वनपेक्ष्यं स्यादसति ह्यनमानम् । जै० म० १ । पा० ३ । सूत्र ३ । के अनुसार यदि कोई विषय ब्राह्मणादि का वेद से विरुद्ध हो तो त्याज्य है और यदि विरोध न हो परन्तु वेद में स्पष्टतया उस का मूल भी न दीख पड़े तब अनुमान करना चाहिये कि ऋषियों ने किसी मन्त्र का किमी प्रकार यह प्राशय समझा होगा अतएव मनु के उक्त वचन का विरोध वेद से नहीं और ब्राह्मण से भी आशय नहीं मिलता तब यही अनुमान करना उचित है कि वेदा. नुकूल है। १९ पृष्ठ ७ सं० (१५) में महन्त जी लिखते हैं कि- वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः । मनु० २ । १६५ सम्पूर्ण वेद पढना चाहिये, भला इस से क्या ब्राह्मण वेद होगये. क्तुतः महन्त जी ने मन्त्र और ब्राह्मण वेद है। इस साध्य को विना प्रमाण के सिद्ध मान कर लिख दिया कि सम्पूर्ण वेद पढ़ना चाहिये उन के पेट में यह बात रक्खी है कि “सम्पूर्ण” कहने से मन्त्र, ब्राह्मण दोनों आगये, वाह ! क्या «सम्पूर्ण का तात्पर्य आद्योपान्त मन्त्रसंहिता नहीं है ? ॥ २०-मागे महन्त जी पृष्ठ ८ में श्रुतिः स्त्री वेद भानायः” इस अमरकोप के प्रमाण से वेद का नाम “साम्राय सिद्ध करके फिर पृष्ठ 6 में- आम्नायः पुन- मन्त्राच. ब्राह्मणानि च । इस कौशिक सूत्र में मन्त्र और ब्राह्मण दोनों को “मानाय” कहा देख कर समझते हैं कि अमरकोष में मानायः" वेद का नाम है और कौशिक सूत्र में मन्त्र, ब्राह्मण दोनों को “आम्नाय कहा तब दोनों वेद हुए-परन्तु अमरकोश के तृतीयकाण्ड, संकीर्णवर्ग, शोक ७ में यह लिखा है कि- “ आमच्छवामथानायः सम्प्रदायः क्षयेक्षिया " इति अर्थात् मानाय सम्प्रदाय (८) ~~~~~~~ wwwwwwwwnnnnnnn को कहते हैं सम्प्रदाय गुरु परम्परा वा रीति भांति वा चालढाल, को कहते हैं जिस से सिद्ध है कि कौशिक सूत्र में माम्नाय शब्द सम्प्रदाय का नाम है वेद का नहीं और द्विजों का सम्प्रदाय वा परम्परा मन्त्र ब्राह्मण दोनों है परन्तु दोनों वेद हैं यह नहीं क्योंकि ऐसा मानने में मीमांसा सूत्र ३१ ० २ पा० ३ २१-पपि वा प्रयोगसामान्मन्त्रोऽभिधानवाची स्यात् । से विरोध पाता है क्योंकि इस में प्रयोगसामर्थ्य से मन्त्र ही वेद नाम का वाची है । अतएव ब्राह्मण वेद नहीं ॥ २२-आम्नायसमानायशब्दौ वेद एव रूढौ इति लघुशब्द- न्दुशेखरे । इस प्रमाण से कहते हैं कि आम्नाय और समानाय वेद ही के वाचक रूढ हैं सो लघुशब्देन्दुखरकर्ता नागेशभट्ट का कथन एक तो उपरोक्त अमरकोष के ही विरुद्ध है क्योंकि उस में आम्नाय शब्द वेद और सम्प्रदाय दोनों अर्थ में है और नागेश कहते हैं कि वेद एवं वेद ही में रूढ हैं। दूसरे नागेश का कथन व्याकरण ही के विरुद्ध है व्याकरण में अइ उण इत्यादि १४ सूत्रों के अन्त में । २३-४ इत्यक्षरसमानायः " ऐसा लिखा है तब क्या नागेश के तब क्या नागेश के कथनानुसार महन्त जी पाणिनिकृत अ इ उ ण प्रादि सूत्रों को भी समानाय कहने से वेद समझेगे ?। २४-पृष्ठ ८ अङ्क (२१) व (२२) और पृष्ठ र अङ्क (२५) का उत्तर हमारे अङ्क २० के अन्तर्गत है। २५-स्वरसंस्कारयोश्छन्दसि नियमः। और- स्यादानाय धर्मित्वाच्छन्दसि नियमः। प्राति०म०१ सूत्र०१४॥ इन सूत्रों से स्वर उदात्तादि तथा संस्कार पादव्यवस्था का वेद में नियमे है सो मन्त्रसंहिता में नियम है ब्राह्मगा में नहीं । २६-पृष्ठ ९ अङ्क २७ व २८ में महन्त जी स्वयं लिखते हैं कि- २७-प्रथाप्युपनार्थी भवन्ति । ओषधे त्रायस्वैनम् । यजुः । म०४ मं० १। स्वधिते मैनहिथंसीः । यजुः । म०४। मं० १
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इत्याह । हिंसन इत्याशङ्क्य समाहितम् । २८॥
यथो एतदुपपन्नार्थी भवन्तीत्यानाय वचनादहिंसा प्रतीयेत ।
निरु. प्र. १ । पा. ५। खं० २ ।
देखो ! इस निरुक्त के प्रमाण में मन्त्रसंहिता के उदाहरण हैं परन्तु भङ्क
२९ में जी-
एषां लोकानां रोहेण सवनानां रोह भानात इति । नि.प्र.
७ पा. ६ खं० ४ । इत उत्तरञ्चैतत्सिद्धान्ते । यथो एतद्रोहात्
इत्येव रोहश्विकीर्षित इति मानायवचनाद्भवति । निरु. म.
७ । पा० ७ । खं० १ ।
लिख कर महन्त जी कहते हैं कि इस निरुक्त में मानाय शब्द से ब्राह्मखों
का ग्रहण किया है।
२७-उत्तर-प्रान्नाय शब्द से ब्राह्मण का ग्रहण किया सो प्रमाणशून्य हुमा,
सम्प्रदायपरक ाम्राय शब्द है वेद परक नहीं ॥
२८-महन्त जी-पृष्ठ १० अङ्क (३०) में लिखते हैं कि-
समानायः समानातः स व्याख्यातव्य इति । निरु० प्र० १
पा. १ । खं० १॥
यहां निरुक्तारम्भ में ही मन्त्रब्राह्मण दोनों का ग्रहण समानाय शब्द से
किया है।
उत्तर-भला! यहां मन्त्र, ब्राह्मण पद नहीं मन्त्र वा ब्राह्मणों का उदाहरण
नहीं फिर- मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ताहरीतको मुख तो है ही फिर उस दश
हाथ लंबी हैड़ बताने वाले को कौन रोक सकता है तद्वत् इतने से मन्त्रब्राह्मण
को वेद मानने वाले को कौन रोक सकता है ? विद्वान् लोग
२-सायणाचार्य का यह कथन कि:-
“मन्त्रब्राह्मणात्मकः शब्दराशिद इति माननीय नहीं कि हमारे संख्या
२१ में लिखे मीमांसासूत्र के विरुद्ध है। जैमिनि से बड़कर सायण नहीं है।
३०-महन्त जी लिखते हैं कि-
(१०) .AAR -- में न श्रुतिविरोधो रागिणां वैराग्याय तसिद्धेः । इस सारव्य सू० ५१ प०६ । के उदाहरण में ब्राह्मण को ही श्रुति हैं- उतर- एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति । यह ऋग्वेदसंहिता भी तो उदाहरण फिर मन्त्र को छोड़ उपनिषद् वा ब्राह्मण का उदाहरण वा प्रत्युदाहरण देना टीकाकारों की मूल है सांख्याचार्य्य कपिल को ब्राह्मणों का वेदत्व अभीष्ट नहीं॥ ३१-मन्त्रवर्णाश्च । ७ वेदान्त सू० ४४ अ० २ पा० ३ के उदाहरण देने वाला भी वेद नहीं पढ़ा यदि पढ़ा होता तो यजुः १०३१ मं०३के उदाहरण टीकाकार- "तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोस्य सर्वा भूतानि” ऐसा प्रशुद्ध पाठ क्यों लिखता किन्तु- "एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि" इस प्रकार यथार्थ पाठ लिखता, बस इस प्रकार के टीकाकारों ने अपनी अज्ञानता से अहिंसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थम्यः" ऐसा ब्राह्मण वाक्य उदाहरण में दे दिया तो टीकाकारों की भूल है व्यासदेव को ब्राह्मणों का वेदत्व अभीष्ट नहीं। यहां तक तो ब्राह्मणों के वेदत्व खगउन का लेख हुवा ॥ ३२--अब आगे पृष्ठ ११ में महन्त जी यह लिखते हैं कि यदि ब्राह्मणों में इतिहास होने से ब्राह्मण वेद नहीं तब तो मन्त्रसंहिता में भी इतिहास होने से वह भी वेद म ठहरेगी इत्यादि- उत्तर-यह लिखने से तो महन्त जी “ मतानुजा - नामक निग्रह स्थान में श्राकर परास्त हुए तथाहि- स्वपक्षदोषाभ्युपगमात्परपक्षदोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा । न्याय- सूत्र २१ प० ५ अपने पक्ष के दोष को स्वीकार करके परपक्ष में भी वही दोष देना, मलानुजा नाम गिग्रहस्थान (पराजयस्थान) है। इससे इतिहास के दोष को ब्राह्मस ग्रन्थों में स्वीकार करके संहिता में भी वही दोष देते हैं तो संहिता में वह दोष ( १९) MA HAAAAA ~ नहीं है यह सिद्ध करना हमारा काम है परन्तु महन्त जी ब्राह्मणों में उक्त दोष स्वीकार करके परास्त हो चुके सो इनका लेख ऐसा ही है जैसा किसी ने कहा था कि मुझे अपनी गई की चिन्ता नहीं परन्तु चचा की रही की चिन्ता है। ऐसे ही महन्त जो सोचते हैं कि ब्राह्मणों की वेदसंज्ञा न रही इसकी कुछ चिन्ता नहीं परन्तु मन्त्र की वेदसंज्ञा हो जावे यह चिन्ता है । अतएव खामी दया० जी ने जो दोष इतिहास का ब्राह्मणों में दिया वही दोष श्राप मन्त्र में देने को उद्यत हुए हैं। भला मन्त्र में इतिहास दोष दे देने से क्या ब्राह्मण निर्दोष हो जायगा ? महामा जी ! मन्त्रसंहिता में इतिहास का लेश भी नहीं है और आप जो पृष्ठ १९ अङ्क ३४ । ३५ । ३६ में केवल इतना लिख कर किः- १-किमिच्छन्ती सरमा । ऋ० मं० १० । सूक्त १०८ २-मोचित्सखायम् ऋ० मं० १० । सूक्त १० । ३-हये जाये मनसा तिष्ठ घोरे । ऋ० मं० १० सूक्त ९५ कहते हैं कि इनमें देवता की कुतिया, यमयमी, उर्वशी अप्सरा आदि का वत्तान्त है परन्तु न तो इन मन्त्रों के टुकड़ों का अर्थ करते हैं न सूक्तों का केवल इतने से टालते हैं कि अर्थ देखना हो तो पं० माधवप्रसाद का हिन्दी ऋग्वेदभाष्य देख लो परन्तु यदि महन्त जी इन मन्त्रों का अर्थ लिखते तो उन के अर्थ की समीक्षा हम भी करते अब वृथा ग्रन्थ बढ़ाना उचित नहीं समझते। ३३-पृष्ठ १२ पं० ४ में महन्त जी स्वयं ही लिखते हैं किः-जो कहा कि स्वामी जी ने जो “य लयायुष जमदग्नेः कश्यपस्य प्रमायुषम्०० यह मन्त्र लिखा है इसका सत्तर क्यों नहीं देते। इस पर महन्त जी कहते हैं कि “इस मन्त्र में तो स्वतः मनुष्यों का नाम नहीं है फिर मंस्कृत रहित साधारण पुरुषों को धोका देने के लिये यह मन्त्र लिखा है सो इसका उत्तर लिखने का हमको कुछ प्रयोजन नहीं, भला ! इसमें स्वामी जी ने धोका क्या दिया प्रत्युत उक्त मन्त्रस्य कश्यपादि पदों से लोगों को ऋषिनाम का धोका होता उससे बचाया है सेो यह आपने भी ऊपर स्वीकार कर लिया है कि "इस मन्त्र में मनुष्यों का नाम नहीं है। फिर व्यर्थ किसी ऋषि को धोकेवाज़ लिखमा ही धोका है।
(१२) www nmhrhar..~rnonvern- इसका उत्तर महन्त - ३४-पृष्ठ १२ पं० १७ में कहते हैं कि कश्यप से कूर्मावतार की सिद्धि होती है परन्तु से हम अवतारों के विषय में दिखायेंगे इति अच्छी बात है जब भाप दिखाइयेगा तबही हम खगहन लिखेंगे ॥ ३५-पृष्ठ १२६० १९ से लिखते हैं कि स्वामी जी ने जो लिखा है कि मन्त्र- संहिता की प्रतीक रखकर ब्राह्मणों में अर्थ किया है । ब्राह्मणों की प्रतीक मन्त्रसंहिता में नहीं। जी कुछ का कुछ देते हैं और न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥ (१) हिरण्यगर्भ इत्येषः (२)मामा हिथंतीदित्येषा (३) यस्मान्न जात इत्येषः । यजुः भ० ३१ मं० ३ ॥ लिखकर कहते हैं कि देखो संहिता में भी १ हिरण्यगर्भः समवर्तताने की प्रतीक है और २४मा मा हिरासीदि० यह यजुः अ० १२ मं० १०२ को, और ३- यस्मान्न जातः यह यजुः ०६ मं०३८ की प्रतीक है। अब इस मन्त्रसंहिता को व्याख्यान मानकर वेद न मानिये इत्यादि- उत्तर-महन्त जी महाराज ! स्वामी जी ने यह लिखा था कि मन्त्र में ब्राह्मण की प्रतीक नहीं सो पाप को ब्राह्मण की प्रतीक दिखलानी थी यह तो मापने मन्त्रों को ही प्रतीक दिखलायी और फिर उमका अर्थ नहीं है जैसा ब्राह्मण में है फिर स्वामी जी का लिखना ही ठीक रहा ॥ ३६-फिर पृष्ठ १३ पं०१३ में लिखते हैं कि ब्राह्मणग्रन्थों में भी इसी प्रकार (इषे स्वोर्जे स्वा) इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ में मिलती है इसके सिवाय अन्य किसी मन्त्र का पता नहीं लगता इत्यादि- उत्तर-पता तो उसको लगे जो अन्य को देखे आप तो कहीं की ईट कहीं का रोड़ा किया। यदि आप चाहें तो ॥ ३-इषे त्वोर्जे. २ प्रत्युष्टयं रक्षः ३ कस्त्वा युनक्ति० ४ महुतमति हविर्धा० ५ देवस्य त्वा सवितुः । ६-पवित्रे स्थौ वैष्ण. ७-शर्मास्यवधूत रक्षो० यजु० भ० १ ० १ । ७। ६ ।९। १०। १२ । १४ इत्यादि ।
(१३) or अनेक मन्त्रों की प्रतीक दिखला दें। एक काम करो महन्त जी! यदि (वृषे त्वोर्ज०) के सिवाय अन्य मन्त्रों की प्रतीक माप को दिखा दी जायें तब तो ब्राह्मणों के वेदत्व साधन का हठ छोड़ दो गे वा नहीं ? ॥ ३७-फिर « उदानिषुर्महीरिति तस्मादुदकमुच्यते लिख कर कहते हैं कि पृथिवी को गलाने से जल का नाम उदक है, यहां संहिता ही में उदक शब्द का अर्थ है तो क्या यह भी वेद नहीं। उत्तर-यहां किसी मन्त्र वा ब्राह्मण के आये हुये ॥ उदक " शब्द का अर्थ नहीं किया जैसे निरुक्त वा ब्राह्मण में आता है अतएव संहिता में यह दोष महीं आ सकता ॥ ३८-फिर पृष्ठ १४ पं० में लिखते हैं कि भाष्यकार पतञ्जलि ने भी तो “अथ शब्दानुशामनम्" इत्यादि अपने वार्तिकों को श्राप ही व्याख्या की है। उत्तर-आप की यह बात ठीक नहीं क्योंकि भाष्यकार ने अपने तथा पाणिनि के सूत्रों की व्याख्या को है परन्तु पाणिनि ने भाष्यकार के वार्तिकों की व्याख्या नहीं की इसी प्रकार संहिता में ब्राह्मणों की व्याख्या नहीं की। ३९-फिर पृष्ठ १४ पं० १० से लिखते हैं कि सांख्याचार्य ने-अथ त्रिविध- दुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः । इस प्रथम सूत्रस्य «अथ" शब्द की व्याख्या अपने आप ही पञ्चमाध्याय के १ सूत्र में की है यथा-(मङ्गलाचरणं शिष्टाचारारक- लदर्शनात्) अर्थात् अथ शब्द मङ्गलाचार के लिये प्रथम सूत्र में पाया है । उत्तर-वाह ! वाह ! क्या सांख्याचार्य अपने ही प्रथ" शब्द का अर्थ करते और अन्य लोग जो प्रो३म् भादि से मङ्गलाचरण करते हैं उन का प्रयोजन नहीं बतलाते !!! ऐसी व्याख्या सांख्याचार्य को तो अभीष्ट न पी यह तो आप का ही अपूर्व पाण्डित्य है ॥ ४०-आप लिखते हैं कि तैत्तिरीय आरण्यक में ब्राह्मण ग्रन्थों के पाठ भी तो भाते हैं। महात्मा जी ! आरण्यक में तो बाते होंगे परन्तु मन्त्रसंहिता में दिखा- इये प्रारण्यक पश्चात् रचित है उस में आने से संहिता में क्या दोष पाया? यह तो वही बात हुई कि-ब्राह्मणः पण्डितः क्षत्रियस्य शूरत्वात् संहिता में दोष दिखाना था कि आरण्यक में दिखाया इस से भाप का क्या इष्ट सिद्ध हुमा ? ॥ ४१-स्वामी जी ने जो महाभाष्य का प्रमाण दिया है कि भाष्यकार ने वैदिक शब्दों के उदाहरण में (अग्निमी०) (शन्नो देवी०) (भग्न प्रायाहि०) (षे वोजे०) ( १४ ) viviro.vo. ~~-~- s संहिता बाप ही उदाहत किये ब्राह्मणवाक्य नहीं तिस पर महन्त जी पृ० १५ में कहते हैं कि वेद के पूर्वभाग के उदाहरण दे दिये ब्रामण उत्तरभाग हैं प्रतएव उन के उदाहरण नहीं दिये-इत्यादि । यह भाप का हेतु . साध्यसमहेत्वाभास » होनेसे अाप को निग्रहग्रहगृहीत करता है क्योंकि ब्राह्मणों का वेदत्व जैसे साध्य है वैसे उत्तरभामस्व भी साध्य है साध्य के समान हेतु को साध्यसमहेस्वाभास कहते हैं अतएव श्राप निग्रह स्थान में गिरे। ४२-महन्त जी-एवं हि श्रूयते वृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्त्रं प्रदिपदोक्तानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम । महाभा भा० । लिख कर कहते हैं कि देखो ! यदि महाभाष्यकार ब्राह्मण को वेद न मानते तो श्रुति शब्द करके ब्राह्मणवाक्य उपरोक्त क्यों लिखते ? ॥ उत्तर-प्रथम तो महन्त जी को यह बताना चाहिये कि उपरोक्त पाठ कौन से ब्राह्मणग्रन्थ का है और यदि बतला देवें तो भी वहां अति शब्द नहीं किन्तु “एवं हि श्रूयते” ऐसा पाठ है जिस का यह अर्थ है कि ऐसा ही सुना नाम है सो इस में श्रुति शब्द न आने से ब्राह्मणग्रन्थ वेद नहीं । ४३-फिर--वेदशब्दा अप्येवं वदन्ति । योग्निष्टोमेन यजते य उचैनमेवं वेद० इत्यादि महाभाष्य प्रा०१॥ लिख कर महन्त जी कहते हैं कि इम का अर्थ यह है कि - वेद के शब्द भी ऐसा कहते हैं यह कह कर पतञ्जलि नी " योग्निष्टोमेन , यह ब्राह्मणवाक्य लिखते हैं- उत्तर--यहां वेदशब्दाः इस का अर्थ यह है कि-"वेदाः शब्द्यन्ते स्तूयन्ते यस्ते वेदशब्दा ब्राह्मणग्रन्थाः" अर्थात् वेदों की अर्थरूप स्तुति करने वाले ब्रा. लणग्रन्थों में ऐसा कहा है। यदि महाभाष्यकार को वेद साक्षात् (खास) अभि. प्रेत होते तो " वेदा अप्येवं वदन्ति , ऐसा पाठ होता अतएव महन्त जी का लिखमा कैसे ठीक हो सकता है कदापि नहीं ॥ ४४-फिर पृष्ठ १६ पं० २६ से स्वामी जी की इस शङ्का पर कि-"यदि ब्राह्मण वेद हैं तो अष्टाध्यायी में , द्वितीया ब्रामणे २।३ । ६० ॥ चतुर्यये बहुलं (१५) . .. ANNNAPAN rrrrrrr~nr M - छन्दसि २।३।६२ । त्यादि सूत्रों में "ब्रामणे कह कर फिर छन्दमि, क्यों कहते इस से ब्राह्मणानन्य छन्द (वेद) नहीं है, महन्त जी लिखते हैं कि- छन्दः । भ० २ सू. १ पिङ्गाले । इस प्रमाण से गायच्यादि मन्त्रों को ही छन्द सजता है ब्राह्मणों में गाय- धादि छन्द नहीं अतएव पाणिनि जी ने ब्राह्मणे" और "छन्दसि, भिन्न २ लिखा है क्योंकि ब्राह्मण विषयक सूत्र छन्द में कैसे कार्य कर सकते इत्यादि । उत्तर-इस से पूर्व पृष्ठ ८ में महन्त जी ने लिखा था कि- स्वरसंस्कारयोच्छ- न्दसि नियमः । प्राति० अर्थ किया था कि स्वर उदात्तादि और संस्कार लोपा- गमादि जैसे मन्त्र में हैं वैसे ब्राह्मण में भी हैं अतएव दोनों ही में अर्थात् (छन्दसि) वेद में नियम है तो जब कि उक्त सूत्र में महन्त जी छन्द का अर्थ वेद कर चुके और अब «छन्दः" इस पिङ्गल सूत्र से मन्त्रसंहिता ही को छन्द कहते हैं तो अपने मुख से श्राप ही भागा पीछा भूल कर मन्त्रसंहितामात्र को वेद सिद्ध कर दिया-सत्य को कहां तक छिपाते अन्त को साधु ठहरे तिस में उदासीन !!! ४५-फिर पृष्ठ १७ अङ्क (४५) में स्वामी जी ने जो- पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु । अष्टा०–४ । ३ । १०५ लिखा है कि ब्राह्मण और कल्प, उक्त सूत्र से पुराणे ( प्राचीन ) ऋषियों के प्रोक्त (बनाये हुए) सिद्ध है ईश्वरकत नहीं तिस पर महन्त जी लिखते हैं कि “याइयवल्क्यादिभ्यः प्रतिषेधस्तुल्यकालत्वात् (महाभाष्य) जिस का अर्थ तो यह हुवा कि याज्ञवल्यादि के बनाये ब्राह्मण कल्पग्रन्थों के वाध्य होते णिनि प्रत्यय न हो क्योंकि यायवल्क्यादि ऋषि पाणिनि जी के समय में थे प्रतएव पुराणे अर्थात् प्राचीन नहीं-महन्त जी का आशय यह है कि जो लोग शतपथब्राह्मण को याचवल्क्य रचित कहते उन का मुख बन्द हुआ। धन्य हो महात्मा ! भाप तो बार २ स्वामीदया० जी की पुष्टि करते हैं स्वामी जी ने तो ब्राह्मणों के अनी- श्वरीय होने में थोड़े ही प्रमाण दिये थे मापने यह महाभाष्य का प्रमाण देकर और भी पुष्ट किया कि पुराणे ऋषियों के बनाये ब्राह्मण करूपवाच्य हों तो तृती- यान्त से णिनि प्रत्यय हो परन्तु याजपवल्पयादि के बनाये ब्राह्मण कल्पवाच्य हों तो न हो क्योंकि यावलक्यादि पुराणे नहीं-इस पाप केही दिये प्रमाण और कपन से ब्राह्मणकल्प दो प्रकार के सिद्ध हुए कुछ ब्राह्मण,कल्प प्राचीन ऋषियों vvvv vr v. www.ravana.... A AANuwww. ६ बनाये हैं और कुछ यासरवल्क्पादि पाणिनि समकालिक ऋषियों के बनाये जादू तो वह जो शिर पै चढ़के बोले ॥ ४६-फिर पष्ठ १८ अङ्क (४६) में कहते हैं कि- छन्दोब्राह्मणानि च तहिषयाणि । अष्टा० । ४ । २ । ६६ इस सूत्र से बन्द भी प्रोक्त प्रत्ययान्त सिद्ध हैं तो संहिता भी वेद न ठहरेंगी इत्यादि- महन्त जी फिर मतानुज्ञानिग्रहस्थान में गिरे अर्थात् ब्राह्मणगत दोष को न हटा कर संहिता में दोष देने लगे परन्तु यह छन्द शब्द भी हमारी अभिप्रेत पार शुद्ध वेदसंहितापरक नहीं किन्तु तैत्तिरीय शाखा परक है उस में भी छन्द हैं अतएव तित्तिरिणा प्रोक्ता तैत्तिरीय शाखा यह निरुक्ति चरितार्थ हुई और वही शाखा जो ऋषिकत हैं और छन्दोबद्ध हैं इस सूत्रस्थ छन्दः शब्द का उदा- हरण हैं, मूल ऋगादिवेद नहीं क्योंकि किसी वृत्तिकर्ता ने इस के उदाहरण में अमुकेन प्रोक्तं, यजुः, साम, ऋक् अथर्व, ऐसा उदाहरण नहीं दिया तब इस सूत्रस्य छन्दः पद का लक्ष्य हमारा अभिप्रेत (संहिता धतुष्टय) वेद नहीं अतएव वह ( संहिता ४) प्रोक्त प्रत्ययान्त उदाहरण में न पाने से उन पर प्रोक्तदोष नहीं पा सकता। ४७-पृष्ठ १८ पं० २४ से लिखते हैं कि- स्वामी जी ने- ब्रह्म ब्राह्मणः । शतपथ कां० १३ अ१ । इस प्रभाग से ब्रह्म और ब्राह्मण शब्द ग्रन्थ के वाची समझे सो यह जाति- वाचक शब्द को ग्रन्यवाचक समझना स्वामी जी का ( साम्राणां पृष्टे को विदा- रानाचष्टे ) इस न्यायानुकूल उन्मत्तालापवत् है। दूसरा दूषण यह देते हैं कि शतपथ में ब्रालहि ब्राह्मणः » ऐसा पाठ है जैसा स्वामी जी ने लिखा वैसा महीं इत्यादि- महन्त जी! आपने ही शतपथ की १३ कण्डिका नहीं देखी वहां हि शब्द नहीं है वै शब्द है जैसा कि स्वामी जी ने लिखा है आपने हि शब्द शतपथ में दूसरे ठिकाने देखा है फिर अपने दृष्टिदोष को स्वामी जी पर लगाते क्यों नहीं डरते हो? *पाठ तो देखिये-जावान पृष्टः के स्थान में यात्राणां पष्टे ऐसा अराह लिखा है। बाह रे ! पारिखत्य'! वै (१७) Arr www.nonvvvvv.. N nyanr~nm minor.mmm । ४८-और स्वामी जी ने जातिपरक को ग्रन्थपरक नहीं समझा यह भाप भी जानते होंगे यदि उन की भूमिका आप ने देखी होगी तो। परन्तु श्राप ने तो देख भाल कर लोगों को भुलाने के लिये सन के पृष्ठ ८७ पं० १० ॥ चतुर्वेदविद्भिर्ब्रह्मभिब्राह्मणैमहर्षिभिः प्रोक्तानि यानि वेद- व्याख्यानानि तानि ब्राह्मणानि ।। अर्थ-उपरोक्त शतपथ के प्रमाण से चतुर्वेदवेत्ता महर्षि ब्राह्मणों का नाम ब्रह्म है बस उन ऋषियों के बनाये होने से ब्राह्मण ग्रन्थों को भी ब्राह्मण कहते हैं अर्थात् ब्रह्म (ब्राह्मण, ऋषिवाचक) शब्द से ब्राह्मण" शब्द बना है जो ग्रन्थों का वाचक है। स्वामी जी का तात्पर्य यह है कि ब्राह्मणग्रन्थों का ब्राह्मण नाम ही उन को ब्रह्मर्षिकत सिद्ध करता है। अतएव पाप का अशुद्ध पाठ (आमाणां पृष्ठे) पाम्रान् पृष्टः, (ऐसा चाहिये) भाप हो पर गिरता है स्वामी जी पर नहीं॥ ४-मागे पृष्ठ २१ अङ्क ४८ में महन्त जी लिखते हैं कि- चत्वारो वेदाः साङ्गाः सरहस्या बहुधा भिन्नाः । एकशत- मध्वर्यशाखाः । सहस्रवमा सामवेदः । एकविंशतिधा बाढव्यं नवधाऽथर्वणो वेद इनि महामाष्ये अ० १ पा० १ । प्रा०१ इस प्रमाण से कि देखो महाभाष्य में १०१ यजुर्वेद की शाखा हैं । १००० सामवेद की। २१ ऋग्वेद की और अथर्व वेद की शाखा हैं और षडङ्ग तथा रहस्यों समेत तो अनेक ही वेद हैं इसी से लिखा है कि (अनन्ता वै वेदाः) इति । उत्तर-महात्मा जी ! ऊपर लिखी ११३० वेदों की शाखा हैं वा मूल वेद ? शाखा और मूल कभी एक हो सकते हैं ? कदापि नहीं, परन्तु हां शाखा बीज में से ही उत्पन्न होती हैं इसी प्रकार मूल बीजरूप (४) संहितात्मक वेदों का विस्तारपूर्वक व्याख्यानरूप १९३० शाखा ऋषियों ने बनाई जैसे बीज लेकर किसान लोग बोते और वृक्षादि को उत्पन्न करते हैं तद्वत् ॥ और परस्पर विरोध देखिये कि यहां तौ (अनन्ता वै वेदाः) कह कर वेदों को अनन्त बतलाते हैं और आगे पृष्ठ २२ में ( लक्षं तु चतुरो वेदाः इति चरणव्यूहे शौनकः ) इस प्रमाण से चारों वेदों के १००००० लक्ष लोक बतलाते हैं ॥ महाशयो! ( अनन्ता ~~RAVINNNN vvv Arr ~~~~ n .." ~~ (१०) वै वेदाः) का समास यह है कि (नास्त्यन्तो नाशो येषां तेऽनन्ता नित्या इत्यर्थः) नहीं है अन्त अर्थात् नाश जिन का सो कहावें अनन्त अर्थात् वेद नित्य हैं। और चरणव्यूह का झोक अशुद्ध भी है (क्योंकि चत्वारो वेदाः) के स्थान में «चतुरो वेदाः यह अशुद्ध है) तथा लाख लोक वेद के हैं भी नहीं प्रतएव मिथ्या भी है। ५०-पृष्ठ २१ अङ्क (४९) में:-ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाजज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिवि श्रितः। अथर्व कां० १८ अनु० ४ मं० २४ कहते हैं कि देखो इस मन्त्र में ৫ায় शब्द ब्राह्मणों का वाचक है सो ऋग, यजुः साम और ( छन्दांसि ) अपर्व तथा (पुराणं) पुराण (ब्राह्मण) ये सब परमेश्वर से उत्पन्न हुये ॥ उत्तर-यहां पुराण शब्द सनातन अर्थ में है और वेदों का विशेषण है यथा- ( ऋचः )-तेषामृग्यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था ॥ जैमिनि सूत्र ३५ अ० २ पा० १. । जिन मन्त्रों में अर्थवश से पाद की व्यवस्था है वे । ( सामानि ) गीतिषु समाख्या। जैमिनि सूत्र ३६ अ० २ पा० १ जिन मन्त्रों से गायन होता है वे और ( यजुषा सह ) शेषे यजुः शब्दः । जै० म० २ पा० सृ० ३७ शेष जो ऋक माम से भिन्न यजुर्वेद । (पुराणं छन्दांसि) सनातन छन्दोबद्ध (चार) वेद हैं सो (सर्वे) मय (उच्छिष्टाउजजिरे) परमेश्वर से उत्पन्न हुये ॥ यहां पुराणं यह एक वचन बहुवचन में आर्ष है । सो इस में तौ « छन्दांसि पद से जो चारों वेदों का विशेषण सिद्ध हुआ कि चारों वेद छन्दोबद्ध हैं। और ब्राह्मण में छन्द नहीं अतएव महन्त जी के प्रमाण से हमारा पक्ष सिद्ध हुवा और महन्त जी परास्त हुवे ॥ ५१-आगे २२ पृष्ठ से अङ्क (५१) में लिखते हैं कि- आहे बुधिय [१]मन्त्र में [२] इति मन्त्रस्य लक्षणम् । नास्त्यस्ति वास्य नास्ये तव्याप्त्यादेरवारणात् ॥ यातिकानां समाल्यानं लक्षणं दोषवर्जितम् । ते नुष्ठा- नस्मारकादी मन्त्रशब्दं [३] प्रयुज्यते (न्यायधिस्तर) अ० २ पा० १ अधि ७ (महन्त जी कृत भाषार्थः) प्राधाम प्रकरण में यह विचारणीय है कि मन्त्र किस का नाम है और ब्राह्मण किस का नाम है सो उन का निर्णय लिखते हैं देखिये (महे बुभियम[४]न्त्र नोट [१] [२] [३] [४] अङ्क जिन के साथ हैं वे शब्द अशुद्ध हैं ।
(१९) hvh. 4~ 1VNIV~ NAM -~~ .. ~~ A.AM में[१] गोपाय य मृषय [२]स्त्रयिवि [३]दाविदुः ) ऋचः सामानि [४] यजुषि । माहि श्री रमृतासताम् । ते० कां०१ प्र० २ अनु०१ मं० २६ है (अहे) हे [२] माहिसितव्य (बुनिय) बुध्र मूल सम्पूर्ण जगत् की आदि अवस्था में उत्पन्न हुवा ऐसा जो है ऋगादिरूप मन्त्र, फिर वह कैसा ऋगादिसूप मन्त्र है कि (यं मन्त्रं ) जिस मन्त्र को ( [६] यि [७] विदाऋषय विदुः) ऋगादि तीनों वेदों के जानने वाले ऋषि लोग जानते हैं। तिस मेरे मन्त्र को (गोपाय) अर्थात् भावी जी अनेक विघ्न हैं तिन से रक्षा करी ॥ पृष्ठ २३ में यह भी लिखते हैं गृहक्षेत्रादि की रक्षा छोड़ मन्त्र की रक्षा क्यों मांगी, उत्तर देते हैं कि सन्मार्गवति पुरुषों को ऋगादि के मन्त्र ही श्री को बढाते हैं । (अहे बुधिय मन्त्र में) यह मन्त्र का लक्षण है । सो इस मन्त्र में मन्त्र का कोई लक्षण नहीं कहा इस से (नास्त्यस्ति) ब्राह्मण भागसे भिन्न मन्त्र है वा मिलित है इत्यादि व्याप्ति प्रादि के प्रभाव से कोई ऐसा लक्षण नहीं जो कि व्याप्ति अतिव्याप्ति इन दोषों से रहित हो”। यहां तक महन्त जी का लेख हुवा- उत्तर-इस बार न्यायविस्तरकार का पाठ और अर्थ करने में खूब ही पा. विडत्य दिखाया है यद्यपि न्यायविस्तर का प्रमाण स्वामी जी को मान्य न था और महन्त जी अपने पुस्तक के प्रथम अंश में यह प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि हम स्वामी जी के मान्य वेद वेदाङ्ग के ही प्रमाण लिखेंगे सो महन्त जी प्रतिज्ञाभङ्ग करके निग्रहस्थान में गिर चुके तथापि उन से न्यायविस्तर का अर्थ नही हुवा कारण कि महन्त जी न्याय नहीं पढ़े तभी तो “व्याप्ति को दोष बताते हैं (दोष तो अव्याप्ति, प्रति व्याप्ति होते हैं) परन्तु इतने पर भी जो कुछ अर्थ उन्हों ने लिखा है उस से उन का क्या अभीष्ट सिद्ध हुवा । यदि कहो कि उन का अभीष्ट यह सिद्ध हुवा कि मन्त्र का लक्षण ब्राहा से भिन्न न हो सकने से ब्राह्मण भी वेद हुवा सो भी नहीं क्योंकि पृष्ठ २३ में वे स्वयं लिखते हैं कि ल्याशिकानां समा. ख्यानं लक्षणं दोषविर्जितम् " याज्ञिकों का समाख्यानरूपी लक्षण है सो दोष से रहित है तब स्वक्षण तो मन्त्र का दोषरहित होगया अर्थात् याजिक लोग जिस को मन्त्र कह कर विनियोग करें वह मन्त्र सो ब्राह्मण का विनियोग किसी यातिक ने नहीं किया अतएव ब्राह्मण मन्त्र नहीं यह महन्त जी के ही कथन से नोट [१] [२] [३] [४] [५] [६] [७] अङ्क जिन के साथ हैं वे शब्द अशुद्ध हैं।
(२०) AA~- ॥ सिद्ध हुवा । इस शुद्ध लक्षण को कोड़ कर जो (१ विहितार्थाभिधायको मन्त्रः ) -(मनमहेतुर्मन्त्रः ) ३- असि पदान्तो मन्त्रः) ये तीन लक्षण स्वयं ही कर के सन में दोष देते है सो उन का लेख अरण्यरोदनवत् निष्प्रयोजन है क्योंकि उक्त ३ लक्षण हमारी ओर से नहीं किये गये प्रतएव उन का लिखना व्यर्थ है। ५२-भागे २४ पृष्ठ में जो-१-ऊरुप्रथस्व० ते०१।६।८।२-अग्निमीडे । ०१।१।१।१॥३-षे त्वा०। यजुः १०१ मं०॥४-अग्न माया हि० सामः २१॥१॥५-मग्नीदग्नीन् तै०६।३।१॥६-प्रधःविदासी० ० २।८।९॥ ७-अम्बे अम्बिके० यजु० २॥३॥८-पृच्छामित्वा० यजुः । २३ । ६१ ॥ -वेदि. माहुः पर० यजु० २३ । ६२ ये नौ उदाहरण मन्त्र के समाख्यानरूप लक्षण के दिये हैं इन में भी ब्राह्मण का कोई नहीं फिर ब्राह्मण मन्त्र कैसे हुये । प्रत. एव ये उदाहरण उन के पक्ष को सिद्ध नहीं करते यदि कहो कि तैत्तिरीय के मन्त्र हैं तो भी तैत्तिरीय कोई ब्राह्मण नहीं क्योंकि उस में अन्य शतपथादि के समान इति ब्राह्मणम् , ऐसा नहीं पाता । यदि कहो कि तैत्तिरीय ब्राह्मण नहीं है तो ब्राह्मण का वेदत्व तो सिद्ध न हुआ परन्तु तैत्तिरीय का वेदत्व सिद्ध हुमा । सो भी नहीं क्योंकि आप के किये लक्षण से मन्त्रत्व सिद्ध हुआ परन्तु यह तो किसी की प्रतिज्ञा नहीं कि जो २ मन्त्र सो २ वेद । क्योंकि हम तो केवल ऋग्, यजुः, साम, अथर्व की चार संहिताओं को ही वेद मानते हैं जिस विषय में मीमांसा के ३ सूत्र हम ने पृष्ठ १८ में भी लिखे हैं । रहे तैत्तिरीय के मन्त्र सो (तित्तिरिवरतन्तुखण्डिकोखाच्छण् । अष्टाध्या० ४ । ३ । १०२ ) इस सूत्र के अनुसार तित्तिरि ऋषि का बनाया है सो कैसे वेद होसक्ता है कदापि नहीं । ५३-पृष्ठ २५ अङ्क (५७) में जो न्यायविस्तरकार का लेख दिया कि ( मन्त्र व ब्राह्मणञ्चेति द्वौ भागौ०) सो न्यायविस्तर का लेख जैमिन्यादि ऋषिकत शास्त्रों के विरुद्ध होने से प्रामाणिक नहीं । ५४ -पृष्ठ २५ अङ्क (५८) में जो न्यायविस्तर के मत से-“हेतु, निर्वचन, निन्दा, प्रशसा, संशय, विधि, परकृति, पुराकल्प और व्यवधारणकल्पना न लक्षणों से युक्त जो हो सो ब्राह्मणग्रन्थ कहा जाता है . ऐसा लिखकर फिर पृष्ठ २६ पं० १० में श्राप ही न्यायविस्तरकत लक्षण में दोष दिखाते हैं कि देखो (इन्दवो वा मुशन्ति हि) इत्यादि मन्त्रों में भी हेत्वादि लक्षण मिलते हैं फिर मन्त्र ब्राह्मण का भेद कैसे सिद्ध हो सक्ता है इत्यादि-.
(२१) ..१ उत्तर-महन्त जी! यह तो पाप ने न्यायविस्तर का खगहन किया मी न्यायविस्तर को हम भी प्रामाणिक नहीं मानते फिर उस के अशुद्ध लक्षण से भी ब्राह्मण का ब्राह्मणत्वरूप साध्य भी सिद्ध न हुआ और हमारे पक्ष में कुछ दूषण नहीं पाया ॥ ५५-अङ्क (५९) और (६०) में जो (इति करणयुक्तो मन्त्रः) और (इत्याह इस वाक्प करके जो बंधा हो सो ब्राह्मण है ) ये लक्षण करके उन में दूषण देते हैं सो व्यर्थ हैं व्योंकि उक्त लक्षण स्वामी दया० जी कृत नहीं । ५६-और अङ्क (६१) में जो ( आख्यायिका रूपं ब्राह्मणम् ) यह अधूरा लक्षण किया है उस का उत्तर हम अपने अत (३२) में दे चुके हैं । इति ॥ ५७- अङ्क (६२) में जो तच्चोदकेषु मन्त्राख्या । शेषे ब्राह्मण शब्दः। ये दो जै० सूत्र लिखे हैं इन का यथार्थ अर्थ हम अपने अङ्क ९ । १० । १९ में देचुके हैं महन्त जी को तो पुनरुक्ति का रोग होगया है । ५८-पृष्ठ २७ पं० २६ । २८ में जो ॥ कर्मचोदनाब्राह्मणानि । ब्राह्मण- शेषोऽर्थवादः । ये दो प्रापस्तम्ब सूत्र लिखे हैं सो ब्राह्मण और अर्थवाद के स्वरूप दिखाये हैं इम से इन को वेदत्व क्या सिद्ध हुमा ? कुछ नहीं । ५-प्रङ्क (६३) में जो सायणकृत ऋग्वेदभाष्यभूमिका का प्रमाण देते हैं कि “प्रतएवाभववेदस्त्रयीति व्यपदेशभाका इसी कारण अर्थात् मन्त्र, ब्राह्मण और अर्थवाद इन ३ भागों से वेद का नाम « त्रयी » पड़ा । और इस की पुष्टि में अमरकोष का प्रमाण भी पृष्ठ २८ पं० १४ में लिखते हैं कि इति वेदास्त्रयस्त्रयी” उत्तर-धन्य हो ! आप अपने साथ सायण को भी क्यों अज्ञानसागर में घसीटते हैं पाप ने जो सायण की पुष्टि अमरकोष के वाक्प से की वह उन लोगों के भुलाने निमित्त है जिन्हों ने अमरकोष का दर्शन नहीं किया । परन्तु आप दिनधौली पण्डितों की भाखों में धूल न फेंकिये। महन्त जी! आप ही कहदें कि आप को यह विदित न था कि अमरकोष के शब्दादि वर्ग लोक ३ में ऐसा पाठ है कि (स्त्रियामृक्तामयजुषी इति वेदास्त्रय स्त्रयो) अर्थात् ऋग, साम और यजुः ये ३ वेद नयी कहाते हैं फिर भाप जानबूझ कर त्रयो” शब्द से मन्त्र, ब्राह्मण और अर्थवाद इन ३ तीन को मिला कर नमी का अर्थ सम्पूर्ण संसार के विरुद्ध अपने स्वार्थ के लिये क्यों करते हैं ।
(२२) ANMAnnrn. ~ Nown vourn ~ ६०-फिर अङ्क (६४) में जो ब्राह्मण प्रौढ, षड्विंश, साम, आर्षेय, देवत' उपनिषद्, संहितोपनिषद्, और वंश ॥ लिखे हैं सो यह ब्राह्मणों की उनके ही मतानुसार संख्यामात्र हुई कुछ उन को वेदत्व को साधक नहीं । यहां तक तो महन्त जी ब्राह्मण का वेदत्व सिद्ध न कर सके अब ६१-अङ्क (६५) में लिखते हैं कि “पारगयकगन्थ भी पूर्ण २ वेद ही हैं इन में कुछ सन्देह नहीं इस में ममुस्मृति का प्रमाण है । यथा- सामध्वनाग्यजुषी नाधीयीत कदाचन । वेदस्याधीत्य वाप्यन्तमारण्यकमधीत्य च ॥ ४ । १२३ ॥ महन्त जी कृत भाषार्थ-(सामध्वनी) सामवेदीय गान के पीछे ऋग् और यजुर्वेद इन को कभी न पड़े। ६२-वक्तव्य-धन्य हो ! ( सामध्यनौ ) का अर्थ साम गाम के पोळे यह अद्भुत है ! वि देत होता है कि महन्त जी अर्थ करने में बड़े निपुण है। महन्त जी ! इस का अर्थ तो सप्तमीविभक्ति के अनुसार यह होता है कि (साम- ध्वनौ) सामवेद की ध्वनि में ( ऋग्यजुषीनाधीयोत ) ऋग्, यजुः को न पड़े। क्योंकि उन के स्वर सामवेद से नहीं मिलते ॥ ६३-आगे पृष्ठ २९ पं० २१ में अन्वय करते हैं कि(ल्वेदस्यान्त्यम् भारण्यकम् अधीत्य ) वेद का अन्त जो प्रारण्यक तिस का अध्ययन कर के भी ऋग् यजुः को न पढ़े ॥ यहां महन्त जी ने स्वार्थवश भविद्वानों को धोका देने के लिये मूल झोकस्य प्रपि, वा और च इन तीन पदों को छोड़ दिया यदि इन को मिला लेते तब यह अन्वय होता कि (वेदस्य अन्तं कोर्थः-वेदान्तमपि वा प्रारण्यकं चा धीत्य ऋग्यजषी नाधीयोत) वेद का अन्त अर्थात् वेदान्त को पढ़ के वा धारययक को पढ़ के ऋग् यजुः न पड़े, किन्तु प्रथम ऋग् यजु, पढ़ कर फिर वेदान्त और भारण्यक पढ़ना चाहिये यह मनु का भाशय है अर्थात् यह भोक प्राचीन कालिक मार्यशिक्षाविभाग (यूनिवर्सिटी) की व्यवस्था का है भार्ययूनिवर्सिटी की पाठ्य पुस्तकों का पाठक्रम किस प्रकार चाहिये कि प्रथम भाग, यजुर्वेद पढ़ कर फिर वेदान्त और भारण्यक पढ़ना चाहिये सो इस से भारण्यक का वेदत्व सिद्ध नहीं हो सकता ॥
( २३ ) ANV~~~HAPA AvmsOrchna ~~~-~- Arvwww nxnnnwar ६४-पूर्व पृष्ठ ( २४ ) में तो नयी पद का संभार भर के विरुद्ध यह अर्थ किया कि मन्त्र, ब्रह्मण, अर्थवाद ये ३ भाग वेद के हैं अतएव वेदों का नाम त्रयौ है अब पृष्ठ ३० पं०११ में अपने कथन के विरुद्ध, वेदों के चार भाग गि. नाते हैं कि मन्त्र, ब्राह्मण, अर्थवाद, और श्रारण्यक, सो कितनी बड़ी भूल है । ६५-अब उपनिषदों को वेद सिद्ध करने का साहस कर के अङ्क (६६) में लिखते हैं कि- ऋगयमादिभ्यः । ४ । ३ । ७३ । और, वेतनादिभ्यो जीवति ४।४।१२॥ इन पाणिनि सूत्रों के गणपाठ में और जीविकोपनिषदावीपम्ये” इस मूल सूत्र में उपनिषद् शब्द पाया है इतने से उपनिषदों को भी सनातन वेदत्व सिद्ध हुआ ॥ वाह ! पाण्डित्य !!! इन सूत्रों में उपनिषद् शब्द मात्र आने से बेदत्व सिद्ध हुआ तब तो पाणिनि सूत्रों में जिसने शब्द आये हैं वे सब वेद ही के नाम हुये-यह अच्छी सिद्धि हुई यूं तो महात्मा जी आप अकेले उपनिषदों को पों वेदत्त सिद्ध करने में परिश्रम करते हैं। सिद्धंतुनित्यशब्दत्वात् नित्याःशब्दाः" इत्यादि महाभाष्य से सब शब्दों की सनातनता तो सिद्ध ही है, फिर तो जो कुछ शब्दमात्र है सब ही वेद सनातन हो जायगा-एक बार ही नानिमट जाइये। फिर तो इतना ग्रन्थ बनाना व्यर्थ था एक ही महाभाष्य के प्रमाण से सब शब्द मात्र को वेदत्व सिद्ध हो जाता ॥ ६६-ईशोपनिषद् में यदि १७ मन्त्र यजुर्वेद के ४० अध्याय के अनुसार ही माने जांय सब तो भिन्नता ही नहीं फिर संहिता से भिन्न उपनिषद् का वेदत्व क्या सिद्ध हुआ और यदि शङ्करभाष्यादि के अनुसार १८ मन्त्र माने तब भेद स्वयं सिद्ध है । तब वेदत्व कहां रहा ? ६७-फिर जो पृष्ठ ३१ में निरुक्त लिखा है कि इत्युपनिषट्को भवति, सो यहां वेद के ब्रह्मज्ञानविषयक मन्त्र को उपनिषद् कर के कहा है किसी ग्रन्थ विशेष को नहीं क्योंकि-द्वासुपर्णा०, यह प्रतीक जो महन्त जी ने लिखा है वह ऋगसंहिता २ । २ । १८ । १। का है किसी उपनिषद् ग्रन्थ का नहीं । अतएव उपनिषद ग्रन्थों को वेदत्व नहीं है । ६८-यदि कहो कि वेदों के ज्ञान, उपासना और कर्म ये ३ काण्ड हैं सो उपनिषद् ग्रन्थों के विना वेद का जानकारख कैसे पूरा होगा इस का उत्तर यह है कि- पं. ५ (२४) www.new AAMANAR MAM Amru. Ann. ... vie NAMANAM तदेजति तन्नजति तरे तहन्तिके तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ यजुः अध्याय ४० मं० ५ इत्यादि मूल वेद में जानकाण्ड का वर्णन है उमौका व्याख्यानरूप उपनि- षद् तथा अन्य शारीरक सूत्रादि हैं । अतएव उपनिषद् वेद नहीं ॥ ६९-फिर पृष्ठ ३२ पं० २ में जो-छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्ती कल्पोग्य पठ्यते । ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ॥१॥ शिक्षाघ्राणन्तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम् ॥ इस प्रमाण से वेद के छः अङ्ग गिनते हैं कि छन्दःशास्त्र वेद के चरण, कल्प-हाथ, ज्योतिष-आंख, निरुक्त-कर्ण, शिक्षा-नाक, मुख-व्याकरण, है इस से भी क्या व्याकरणादि छः अङ्ग वेद हो सक्ते हैं कदापि नहीं । पोंकि ये वेद के अङ्ग अर्थात् वेदार्थ के जान में सहायक हैं न कि साक्षात् वेद ॥ ७०-अङ्क (६) में जो वेदों के उपवेदादि की गणना की है वह भी अमा- साङ्गिक है क्योंकि उस से उपवेद वेद नहीं हो सक्ते ॥ ७१-यदि कहो कि वेदों के उपवेदादि तो सब गिनाये परन्तु उपनिषद्, ब्राह्मण, कल्प, श्रारण्यक श्रादि की गणना नहीं की अतएव ये सब वेद ही हैं। उत्तर-यूं तो जिस २ की गणना न हो वह २ वेद रहा! इससे तो अगणित शब्द समुदाय वेद ही ठहरा । और ब्राह्मणादि की गणना नहीं की यह कहना भी परस्परविरुद्ध है क्योंकि जिस प्रकार ४ वेदों के ४ उपवेद हैं यह आपने ही गिमाया वैसे ही पृष्ठ २८ में सामवेद के ८ ब्राह्मण भी आप ने ही स्वयं गिनाये हैं फिर भाप का लिखमा परस्परविरुद्ध और मिथ्या भी हुआ । ७२-श्राप के भङ्क (७०) का उत्तर अपने (४९) में देचुके हैं। इति ॥
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प्रपमभाग } ८००० विज्ञापन ॥ संस्कृत भाषा प्रथमं पुस्तकम् (संस्कृतग्रेमेटिक समाइमर, अपने श्राप संस्कृत सीखिये। m तथा द्वितीयभाग - कापी बिक चुकी तथा तृतीयभाग ) भजनेन्दु -) शास्त्रार्थ विष्णुगढ़ -)॥ कामिनीकल्पद्रुम ॥) भावशिक्षा ।) ( स्त्रियों को उपयोगी) ऋगादिभाष्यभूमिकेन्दूपरागे प्रपोशः -) द्वितीयोंशः - इसके अतिरिक्त पं० भीमसेन शर्मा जी की समस्त पुस्तकें मेरे पास मिलती हैं और कमीशन उन पर भी मिलता है। कमीशन-४) में ५) की पुस्तकें । ७) में १०) की । २०) में ३०) की । ५०) में १००) की पुस्तकें मिलेंगी। इति ॥ पता-पं० तुलसीराम वा कुट्टनम्नाल खामी परीक्षितगढ़ जिला, मेरठ स्वामी औषधालय॥ १-उबरनभस्म । एक महात्मा साधु की बताई। हमने हजारों रोगियों पर आजमाई है। अद्वितीय दवा है। पुराने हड्डी तक के ज्वर को नाश करती है १०० में ५ श्राराम होते हैं । जाड़ा उवर, नित्य का, तेजरिया, चातुर्थिकादि नये पुराने सब ज्वरों में लाभदायक है । धातु को पुष्टिकारक, बलकारक है मूल्य फो तोला १) २-दुन । । कैसा ही नया पुरावा बाद क्यों न हो ३ दिन में पता भी न पावे. गा । लगती बिलकुल नहीं एक डिबी ॥) श्राराम न करे तो वापिस करदी ॥ ३-दर्द सदर की दवा । किसी प्रकार का अजीर्णादि अन्य दर्द क्यों न हो। एक वार ही खाने से आराम होता है २०० खुराक १) में । ४-डाढ़ पीसने को दवा भी ऐसी ही गुणकारक है प्रति शीशी १) ५-खांसी की दवा १०८ गोली का दाम १) खांसी को घी में आराम लिखा है। ६-प्रसूत की दवा । हजारों वैद्य इसी को वर्तते हैं । १०० में E को आराम होता है। फी बोतल २) ७-अन्य विषगर्भ नारायण तैलादि का हाल लिखने पर बतलाया जायगा- -देशीय साबुन की विधि ५) गुरुदक्षिणा लेकर बतला देंगे। तिल की श्रोट पहाड़ है। पर कुट्टनलाल स्वामी परीक्षितगढ़-जिला मेरठ उत्तकालय
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