Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vidurniti Aur Yaksha Dharmprashanottari
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. (४) भूमिका। ष्टिरके प्रस्नोत्तर युक्तार मुहम्मदपुरमाजरानिवासी पन्दित नन्द- लालनीसे उसकी सरल भाषाटीसा बनवाकर युक्त करदी है । आशा है कि इस पुस्तकको लोग अपने बालकोंको कण्ट फरादेंगे जिसमें सहा नीतिक शोक उपस्थित रहनेसे उनको अपना कर्तव्य आयुष्यमा याद रहे और उसके अनुसार चलकर यह प्रत्येक कार्यमें लाम उटावे । सज्जनों का हितैषी, खेमराज-श्रीकृष्णदास, ॥ श्री ॥ विदुरनीति भापाटीकासमेत प्रारभ्यते। अतःपरं प्रजागरपर्व वैशंपायन उवाच । द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपतिः। विदुरंद्रष्टुमिच्छामि तमिहानय मा चिरम् ॥१॥ भजे सत्यं गुणातीतमनन्तं सदसदात्मकम् । यद्विज्ञापितो द्रुहिणो निगममाविरकोपीत् ॥ १ ॥ अहो विनिर्ममे मन्दो भाषां विदुरनीतिके । कृपा श्रीवासुदेवस्य भक्तः किंकिं न साधयेत् ॥ २ ॥ वैशम्पायनजी महाराज राजा जनमेजयस कहतेहुए-कि हे महाराज! जब कि संजय आज्ञा पाय चलेगये तब पृथ्वीपति अतिधुद्धिमान धृतराष्ट्रजी द्वारपालसे बोले कि हे द्वारपाल ! में विदुरजीको इस समय- (२) विदुरनीति- प्रहितो धृतराष्ट्रेण दूतः क्षत्तारमब्रवीत् । ईश्वरस्त्वां महाराजो महाप्राज्ञ दिदृक्षति ॥२॥ एवमुक्तस्तु विदुरःप्राप्य राजनिवेशनम् । अब्रवीद्धृतरादाय द्वाःस्थं मां प्रति वेदय ॥३॥ द्वाःस्थ उवाच । विदुरोऽयमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् । द्रष्टुमिच्छतिते पादौ किं करोतु प्रशाधि माम्॥४॥ धृतराष्ट्र उवाच । प्रवेशय महाप्रज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् । अहं हि विदुरस्यास्य नाकल्पोजातु दर्शने॥५॥ देखना चाहताहू उनको यहां शीघ्र ही ल्याइये ॥ १ ॥ उस समय धृतराष्ट्रजीकर भेजाहुआ यह दूत विदुरजीसे कहनेगा, हे महाप्राज्ञ ! राजा धृतराष्ट्रजी महाराज इस समय तुमको देखना चाहतेहैं॥२॥ तब इसप्रकार कहेहुए विंदुरजी राजमन्दिरको प्राप्त होकर द्वारपालसे कहने- लगे, हे द्वारपाल! आयेहुर मुझको धृतराष्ट्रजीफे लिये जतादे ॥ ३ ॥ उस समय द्वारपाल जाकर धृतराष्ट्रसे कहनेलमा हे राजेन्द्र ! तुम्हारी आज्ञासे यह पिदुरजी प्राप्त हुएहैं वह तुम्हारे चरणोंको देखना चाहतेहैं वह क्या करे वैसी मुझको आज्ञा कारये ॥ ४॥ तव धृतराष्ट्रजी बोले, + . द्वाःस्थ उवाच। प्रविशांतःपुरं क्षत्तमहाराजस्य धीमतः । नहि ते दर्शनेऽकल्पोजातु राजाऽब्रवीद्धि माम६॥ वैशंपायन उवाच । ततः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् । अब्रवीत्पांजलिस्यिं चिंतयानं नराधिपम् ॥७॥ विदुरोंऽहं महाप्राज्ञ संप्राप्तस्तव शासनात् । यदि किंचन कर्तव्यमयमस्मि प्रशाधि माम्॥८॥ हे द्वारपाल ! दीर्घदशी वडे बुद्धिमान् विदुरजीका यहां प्रवेश कीजिये क्यों कि मैं इन विदुरजी के दर्शनमें कदाचित् भी असमर्थ नहीं हों, अर्थात् इन विदुरजीका दर्शन सबकालमें करसता हो ॥ ५ ॥ उस समय धृतराष्ट्रकी आज्ञा पाय विदुरजीसे द्वारपाल कहताटुआ ! हे क्षत्तः! अर्थात् है शूद्राके विष क्षत्रियसे उत्पन्न हुए वीर श्रेष्टबुद्धिवाले। महाराज धृतराष्ट्रके अन्तःपुरको प्रवेश कीजिये तुम्हारे दर्शनमे राजा कदाचित् भी असमर्थ नहीं हैं क्यों कि ऐसा यह मुद्दासे कहतहुए ॥ ६ ॥ घेशंपायनजी योटे तदनन्तर धृतराष्ट्रके मन्दिरको प्रवेशाकर हाथ जोडेहुए विदुरजी चिंतन करतेहुए नृपति धृतराष्ट्रते वाक्य बोले ॥ ७ ॥ हे महाप्राज्ञ ! मैं पिदर हो तुम्हारी आामे यहाँ प्राप्त हुआ?
विदुरनीति- । धृतराष्ट्र उवाच । संजयो विदुर प्राप्तो गर्हयित्वा च मां गतः । अजातशत्रोः श्वोवाक्यं संभामध्ये स वक्ष्यति९॥ तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञातं वचों मया। तन्मे दहति गात्राणि तदकात्मिजागरम्॥१०॥ जाग्रतो दह्यमानस्य श्रेयो यदनुपश्यसि । तद वहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलोासि ११॥ यदि जो कुछ करनेयोग्य है उसको मुझसे आज्ञा करिये मैं तुम्हारे प्रत्यक्ष यह विद्यमान हूँ ॥ ८॥ उस समय धृतराष्ट्रजी विदुरजीसे कहते हुए । हे विदुरजी ! बुद्धिमान् संजय यहां आया और हमारी निन्दा करके इस समय यहाँसे गया है। कल्ह अजातशत्रु युधिष्ठिरके वाक्यको वह सभाके बीचमें कहेगा ॥९॥ इस समय उस कुल्लीर संजयका वाक्य मैंने विशेषफर नहीं जाना है वह वचन मेरे गात्रोको जलारहा है.और वह ही वचन प्रजागर अर्थात् अनिद्राको करता- हुआ ॥१०॥ हे तात ! जागनाले मुझ जलते एका जो कल्याण तुम देखते ही यह मुझसे कहिये क्यों कि तुम धर्म अर्थ के विपे 5 . भापाटीकासमेता। (५) यतः प्राप्तः संजयः पांडवेभ्यो, न मे यथावन्मनसः प्रशांतिः। सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि, किं वक्ष्यतीत्येव मेऽद्य प्रचिंता॥ १२॥ विदुर उवाच । अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम् । हृतस्वं कामिनं चोरमाविशंति प्रजागराः॥१३॥ कच्चिदेतेमहादोपैन स्पृष्टोऽसि नराधिप । कच्चिच परवित्तेपु गृध्यन्न परितप्यसे ॥ १४ ॥ निपुण हौ ॥ ११ ॥ पांडवोंसे विदा होकर जबसे कि संजय यहां प्राप्त हुआहे तबसे लेकर हमारे मनको यथोचित शान्ति नहीं हुई है और मेरे समस्त इन्द्रियगण अप्रकृति अर्थात् असावधानता प्राप्त होगये हैं न जाने वह सजय. क्या कहेगा यही मुझको इस समय अतिभारी चिन्ता है ॥ १२॥ तब विदुरजी राजा धृतराष्ट्रसे कहनेलंगे कि, जिसका साधन हीन हो गया है ऐसा दुर्बल बलवान्- कर वादविवादको प्राप्त किया गया हो और जिसका धन किसीने छीनलिया हो और जो कामी हो और चोरी करता हो इनको अनिद्रा प्रवेश होवेहै अर्थात् इनको नींद नहीं आवै है ॥ १३ ॥ क्या हे नराधिप । इन महा दोपोंनेतौ तुम नहीं स्पर्शकर लियेही अथवा विदुरनीति- धृतराष्ट्र उवाच । तुमिच्छामि ते धयं परं नःश्रेयसं वचः । अस्मिन् राजर्पिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसंमतः१५॥ विदुर उवाच । राजा लक्षणसंपन्नस्त्रलोक्यस्याधिपो भवेत् । यस्ते प्रेपितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ॥१॥ विपरीततरश्च त्वं भागधेये न संमतः । अर्चिपां प्रक्षयाचैव धर्मात्मा धर्मकोविदः॥२॥ क्या दूसरोंके धनोंमें कांक्षापाले हुएतौ नहीं सतप्त होरहेही ।। १४ ॥ तत्र धृतराष्ट्रजी महाराज विदुरजीसे बोले हे विदुरजी ! तुम्हारे कल्या- णकारक उत्तमधर्मयुक्त वचनोंको मैं सुनना चाहताहौं। कारण कि तुम अकेले ही इस राजविंशके विर्षे पण्डितोंके मान्य हो ॥ १५ ॥ उस समय विदुरजी महाराज धृतराष्ट्रसे कहने लगे हे राजन् ! धृतराष्ट्र लक्षणयुक्तक्षत्रिय तीनों लोकोंका स्वामी होताहै सो प्रार्थनाकरनेयोग्य युधिष्टिरजी तुमने वनको भेजदिये ॥१॥और तुम धर्मात्मा तथा धर्मके जाननेवाले भी हौ तथापि नेत्रदृष्टिके दूरहोनेसे विपरीततर अर्थात् ar F- भापाटीकासमेता। (७) आनृशंस्यादनुक्रोशाद्धर्मात्सत्यात्पराक्रमात् । गुरुत्वात्त्वयि संप्रेक्ष्य वहून् क्लेशांस्तितिक्षते ३॥ दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा । एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥४॥ आत्मज्ञानं समारंभस्तितिक्षा धर्मनित्यता। यमर्थानापकर्पति स वे पंडित उच्यते ॥५॥ निपेवते प्रशस्तानि निंदितानि न सेवते । अनास्तिकः श्रधान एतत्पंडितलक्षणम् ॥१६॥ राज्यलक्षणहीन हो इसीफारण राज्यांशकै विध तुम योग्य नहीं ॥२॥ युधिष्ठिरजी महाराज अक्रूरता, दया, धर्म, सत्य, पराक्रमके कारण तथा तुम्हारे विप गुरुभावके कारणसे जानकरके बहुतसे क्लेशोंकों सहरहेहं ॥ ३ ॥ दुर्योधन, सौवळ, कर्ण और दुःशासन इनके विष राध्यैश्वर्यको रखकर अर्थात् इनके अधीन होकर कैसे ऐश्वर्यको तुम इच्छा करतहो ।। ४ ।। आत्मज्ञान और समारम्ग और तितिक्षा और धर्मनित्यता यह जिसको पुरुषार्थ से नहीं खींचते हैं यह निश्चय ही पण्डित कहा ॥ ५॥ जो कि श्रेष्ट कमोंको सेवन करताहै और नि- न्दित कोकोनहीं सक्न करता है और नास्तिक मी नहीं है और श्रद्धावान् है + विदुरनीति- क्रोधोहर्पश्च दर्पश्च ह्रीस्तंभो मान्यमानिता। यमर्थानापकर्पति स वै पंडित उच्यते ॥ १७ ॥ यस्य कृत्यं न जानंति मंचं वा मंत्रितं परे। कृतमेवास्य जानंति स वेपंडित उच्यते ।। १८॥ यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुणं भयं रतिः। समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पंडित उच्यते ॥ १९॥ यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते । कामादर्थं वृणीते यः स वे पंडित उच्यते ॥२०॥ यह ही पण्डितका लक्षण है ॥ १६ ॥ क्रोध और अहर्ष अर्थात् शोक और हीस्तम्भ अर्थात् निर्लजता और आत्माको मान योग्य मानना यह जिसको अर्थसे नहीं खींचते हैं वह पंडित कहाहै ॥ १७ ॥ जिसके नहीं किये हुए कार्यको और सलाह किये हुए मंत्रको दूसरे जन नहीं जानतेहैं किन्तु जिसके किये हुए ही कार्यको जानतेहैं वह निश्चय ही पंटित कहाहै ॥ १८॥ जिसके कार्यको शीत, उष्ण, भय, मैथुन समृद्धि और असमृद्धि अर्थात् दरिद्रावस्था यह नहीं विघ्न करतेहैं वह निश्चय ही पंडित कहाहै ॥ १९ ॥ जिसकी बुद्धि संसार बत्तिनी हुई भी धर्म और अर्थको साधन करती है और जो कामसे भापाकासमेता। यथाशक्ति चिंकीर्पति यथाशक्ति च कुर्वते । न किंचिदवमन्यते नराः पंडितबुद्धयः॥२१॥ क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति विज्ञाय चार्थं भजते न कामात् । नासंपृष्टो व्युपर्युक्ते पराथें तत्प्रज्ञानं प्रथम पंडितस्य ॥ २२॥ नाप्राप्यमभिवाञ्छति नष्टं नेच्छंति शोचितुम् । आपत्सु च न मुह्यंति नराःपंडितबुद्धयः॥२३॥ अर्थको श्रेष्ट मानताहै वह निश्चय ही पडित कहाहै ॥ २० ॥ जिनकी कि पडितोंके समान पुद्धि है यह नर शक्तिके अनुसार ही कार्य कर- नेकी इच्छा करते हैं और शक्तिके अनुसार ही कार्यको करते हैं और न किसीको किंचिन्मात्र अवमान करते हैं ॥ २१ ॥ जो कि ज्ञानकी दृढताके लिये किसी वाक्यको बहुतकालतक सुनता है फिर सुनकर शीम ही जानलेताहे फिर जानकरके अर्थको सेवन करताहै न कि इच्छासे और नहीं यथावत् पूछा हुआ जो दूसरेके अर्थ न कुछ कहताहै सो यह पडितका प्रथम चिह है ॥ २२ ॥ जिनकी पडितोंके समान बुद्धि है वह नर अप्राप्य पदार्थकी नहीं अभिलापा करते हैं । और नष्ट हुर. यस्तु के शोच करनेको नहीं इच्छा करते हैं ।
' विदुरनीति- निश्चित्य यः प्रक्रमते नांतर्वसति कर्मणः । अवंध्यकालोवश्यात्मास वै पंडित उच्यते॥२४॥ आर्यकर्मणि रज्यंते भूतिकर्माणि कुर्वते । हितं च नाभ्यसूर्यति पंडिता भरतर्षभ ॥ २५ ॥ न हप्यत्यात्मसंमाने नावमानेन तप्यते । गांगोहद इवाक्षोभ्यो यः स पंडित उच्यते॥२६॥ तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम् । उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पंडित उच्यते ॥२७॥ और आपदाभोंके विपें नहीं मोहित होतेहैं ॥ २३ ॥ जो कि निश्चय करके कार्यको करता है और कार्यके मध्यमें नहीं निवृत्त होताहै अर्थात् रिना समाप्त हुए कार्यको नहीं छोडताहै और जिसका समय निष्फल नहीं जाताहै और जो वश्यात्मा अर्थात् जितेन्द्रिय रहताहै वह निश्चय ही पडित कहाहै ॥ २४॥ हे भरतर्षभ ! पडितजन शिष्ट- 'जनोंके योग्य कर्मके विषय अनुरक्त रहतेहैं और ऐश्वर्यके कर्म करते हैं और हित करनेवालेकी निन्दा नहीं करते हैं ॥ २५ ॥ जो कि अपने समान होनेमें नहीं हर्पित होताहै और अपमानकर नहीं सतप्त होताहै किन्तु गंगाजी के इदके समान सम्मान तथा अरमानका कारण होने- पर भी किसी प्रकार नहीं चलायमान होताहै वह पटित कहाहै ॥ ॥ २६ ॥ स प्राणियोंके तत्तको जाननेवाला और सर्व कर्मोकि - - . E भापाटीकासमेता। प्रवृत्तवाक् चित्रकथ उहवान् प्रतिभानवान् ।। आशु ग्रंथस्य वक्ता च यः स पंडित उच्यते॥२८॥ श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा। असंभिन्नार्यमर्यादापंडिताख्यां लभेत सः॥२९॥ अश्रुतश्च समुन्नदो दरिद्रश्च महामनाः । अर्थाश्वाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते युधैः ॥३०॥. योग नाम रचना प्रकारको जाननेवाला और मनुष्यों के मध्यमें उपा- यको जाननेगाला नर पंडित कहाहै ॥ २७ ॥ प्रवृत्तवाक् अर्थात् जिसकी याणी कहने अकुंठिन हो और जो चित्रविचित्र कथाओंके , कहनेगला हो और जो तर्कवाला हो और जो प्रतिभानपान् अर्थात तत्काल ही स्फतिवाला हो यानी जिसको तत्काल ही पूर्ववृत्तकी स्मृति होजाये और जो शीनही शास्त्र के अर्थका कहनेवाला हो यह पंडित कहाहै ॥ २८ ॥ जिसका शास्त्र युद्धिके अनुकूल है और जिसकी बुद्धि शास्त्र के अनुसार हो और जिसने शिष्टजनोंकी मर्यादा नहीं दूर की हो यह पंडित नामको प्रात होताहै ॥ २९ ॥ और जो किशानहीन होकर सर्व कार्यों के करनेमें गर्षिष्ठ है और दरिद्र होकर उदारचित्तपाय है और पिना कर्मफर अफि प्रान करमेकी इछा (१२) विदुरनीति- स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति । मिथ्यांचरति मित्रार्थे यश्चमूढः स उच्यते॥३१॥ अकामान्कामयति यः कामयानान्परित्यजेत् । बलवंतं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मुढचेतसम् ॥ ३२ ॥ अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च । कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम् ।। ३३ ।। संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते। चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ॥ ३४॥ फरताहै वह पंडितोंने मूर्ख कहाहै ॥३० ॥ जो अपने अर्थको त्याग- कर दूसरेके अर्थको सेवन करता है और मित्रके अर्थ मिथ्या आच- रण करताहै वह भी मूढ कहाहै ॥ ३१ ॥ जो कि नहीं चाहनेवा. लोंको चाहताहै और अपने चाहनेवालोंको त्याग देताहै और बलवानसे द्वप करताहै उसको पंडितजन मूढचेता कहतहें ॥ ३२ ॥ जो अमित्रको मित्र करताहे और मित्रसे घेर करताहै अथवा मित्रकी हिंसा करताहे और दुष्कर्मको आरम्भ करताहै उसको पंडित मूढचता करते हैं ॥३॥ हे भरतर्षभ ! जो कि कार्याको व्यर्थ ही विस्तार करता और सब जगह सशय करताहै और मीत्र होनेवाले कार्यम विलम्ब भाषाटीकासमेता। श्राद्धं पितृभ्यो न ददाति देवतानि न चार्चति। सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम् ।। ३५ ॥ अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भापते । अविश्वस्त विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥३६॥ परं क्षिपति दोपेण वर्तमानः स्वयं तथा । यश्च ऋध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः॥३७॥ आत्मनो बलमज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम् । अलभ्यमिच्छन्नैष्कर्म्यान्मूढवुद्धिरिहोच्यते३८॥ फरनाहै यह मूट है ॥ ३४ ॥ जो कि पित्रों के अर्थ श्राद्ध नहीं अर्पण करताहै और देवताओंको नहीं पूजता है और सदैव सहायता करने- वाले मित्रको नहीं प्राप्त होताहै उसको पडित मूढचेता कहते हैं । ॥ ३५ ॥ जो कि विनाहीं बुलाया समामें प्रवेश करनाहै और बिना ही पूछा हुआ बहुभाषण करताहै और अविश्वास में विश्वास करताहै यह अधम नर मुदचंता है ।। ३६ ॥ जो कि स्वयं दोपसे वर्तमान होकर भी दूसरेको दोपयुक्त करता है. और जो आप असमर्थ होकर समर्थके पिप मोध करता है. यह नर अतिमृढ है।॥ २७ ॥ अपने घरको न जानकर धर्म अर्थकर वर्जिन अलभ्यवस्नुको पिना कर्मकर विदुरनीति- अशिष्यं शास्ति यो राजन्यश्च शुन्यमुपासते । कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मुढचेतसम् ॥ ३९ ॥ अर्थ महांतमासाद्य विद्यामेश्वर्यमेव वा । विचरत्यसमुत्रद्धो यः स पंडित उच्यते ॥ ४०॥ एकः संपन्नमनाति वस्ते वासश्च शोभनम् । योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः४१॥ एक पापानि कुरुते फलं भुंक्त महाजनः । भोक्तारो विप्रमुच्यते कर्ता दोपेण लिप्यते ॥४२॥ प्राप्त करना चाहताहै वह इसलोकमें पडितोंने मूद्र बुद्धि कहा॥३८॥ जो कि शिक्षायोग्य नहीं उसको शिक्षा करताहै, और दान्य अर्थात् नहीं सान करनेयोग्यको जो कि सेवन करताहै और जो कि रूपणको सेनन करताहे हे राजन् ! उसको पण्डितजन मूढचेता कहते हैं ।। ३९ ॥ जो कि अत्यन्त धन वा विद्या ऐश्वर्यको पाय मदमत्त न होकर विचरता है यह पण्डित कहाहै ॥ ४० ॥ जो कि मृत्य, पुत्र, कलवादिकों के लिये न बांटकर अफेला ही साद पदार्थको भोजन करता है और अकेला ही सुन्दर वस्त्रोंको पहरताहै उससे अतिक्रूर कौन है अर्थात् कोई नहीं ॥४१॥ हे राजन् ! एक ही पाप करताहे और बहुतजन उन पापोंके फलोंको भोगते हैं। परन्तु भोगनेवाले भापाटीकासमेता। (११) एक हन्यान वा हन्यादिपुर्मुक्तो धनुप्मता। बुदिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्यादाष्ट्रं सराजकम्॥४३॥ एकया द्वे विनिश्चित्य जींश्चतुर्भिर्वशे कुरु । पंच जित्वा विदित्वा पद सप्त हित्वा सुखी भव४४ एक विपरसो हंति शस्त्रेणेकश्च वध्यते । सराष्ट्रं समजं हंति राजानं मंत्रविप्लवः ॥४५ ।। पापोंके दोपसे छूट जाते हैं और पाप करनाला पापोंके दोपसे लिप्त होजाताहे ।। ४२ ॥ धनुपधारीका छोडाहुआ वाण अकेलेको मारे अथवा न मारे परन्तु बुद्धिमान् कर छोटीई अर्थात् अनिष्टके लिये विचारीहई बुद्धि राजासहित देशको नाश करदे है ।। ४३ ॥ हे राजन्! एक बुद्धिसे कार्य और अकार्य इन दोनोंको निश्चय कर साम, दान, दण्ड, भेद इन चारों उपायोंकर मित्र, उदासीन, शत्रु इन ' तीनों को वशमे कीजिये और पांच इन्द्रियोंको जीनकर और अनि.. स्त्रीसग्न, एनसीटा, अहेर येटना, मदिरापान, सोटा वचन कहना, फठोरदण्ड,तया वृथा धनपिन करना इन सानोको न्यागि और सन्धि, पिमह, धीमार, यान, आसन, और आश्रय इन छे गुणोंको जानिरूर मुग्णयुक्त हलिये ॥ ४४ ॥ जो कि पान करता है उसीको विपरम मारसक्ता? और शत्रसे अफेटा ही माराजाना है परन्तु मन्त्र विदुरनीति- एकः स्वादु न झुंजीत एकश्चार्थान्न चिंतयेत् । एको न गच्छेदध्यानं नैकः सुप्तेपु जागृयाव४६॥ एकमेवाद्वितीयं तद्यद्राजन्नावबुध्यसे । सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव॥४७॥ एकः क्षमावतां दोपो द्वितीयो नोपपद्यते । यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥ १८॥ सोऽस्य दोपोन मंतव्यः क्षमा हि परमं बलम् । क्षमागुणो ह्यशक्तानां शक्तानां भूपणं क्षमा॥४९॥ विष्टय अर्थात् मन्त्रका न छिपावना देश, प्रजा, सहित राजाको मार. देता है ।। ४५ ॥ अकेला ही स्वादु पदार्थको न भोजन कर और : अकेला बहुत अोंको न विचार और अकेला मार्गको न चले और बहुतसे सोतेहुओंमें अकेला न जागे ॥ ४६॥ जो कि एक अद्वितीय सन्य है उसको हे राजन् ! तुम नहीं जानतही जो स्वर्गके चढनकी ऐसी सीढी है जैसे कि समुद्रके तैरनेकी नाव ॥ ४७ ॥ क्षमावालों के मध्य एक ही दोप सिद्ध होताहै न कि दूसरा जो कि, इस क्षमायुक्त पुरुपको जन असमर्थ मानतेहैं ॥ ४८ 11 वह इस भमायुक्तका दोप नहीं मानना चाहिये क्यों कि, क्षमा पुरम बल है दूसरा कारण यह 0 भापाटीकासमेता। क्षमा वशीकृतिलोंके क्षमया किंन साध्यते । शांतिखड्गः करे यस्य किं करिप्यति दुर्जनः५०॥ अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति । अक्षमावान्परं दोपैरात्मानं चैव योजयेत् ॥५१॥ एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शांतिरुत्तमा । विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा ।। ५२ ।। द्वाविमो ग्रसते भूमिः सर्पो विलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्॥५३॥ ? कि, असमयोंका क्षमा गुग है समर्थीका भूपण है ॥ ४९ ॥ ससारमे एक क्षमा ही वशीकरण है क्षमासे क्या नहीं सिद्ध होताहै ? किन्तु सब ही सिद्ध होजाताई । जिसके हायमें शान्तिम्प तलवार विद्यमान है उसका दुर्जन क्या करेगा ? अर्थात् दुर्जन उसका कुछभी . नुकसान नहीं करसकेगा ॥५०॥ जिस प्रकार कि तृणरहित स्थानमें गिराहआ अमि स्वयं ही वुझजाताई किसी प्रकार क्षमागाडेके आगे आयाहुआ दुर्जन शान्त होजाताहै और जो कि भमायुक्त नहीं हैं वह अपने उत्तम आत्माको भी दोपोंसे युक्त करदेता है । ५१ ॥ एक ही धर्म परम कल्याणरूप है और एक ही क्षमा उत्तम शान्ति हैं और एक ही रिया परम तृप्ति है और एक ही अहिंसा सुख देने पारी है ॥ १२ ॥ इन दोनोंको पृथियी प्रस लेघहै । जिस प्रकार (१८) विदुरनीवि-. द्वे कर्मणी नरः कुर्वनस्मिल्लोके विरोचते । अब्रुवन् परुपं किंचिदसतोऽनर्चयंस्तथा ॥५॥ द्वाविमौ पुरुपव्याघ्र परप्रत्ययकारिणी । स्त्रियःकामितकामिन्यो लोकःपूजितपूजकः ५५ द्वाविमी कंटकी तीक्ष्णी शरीरपरिशोपिणी। यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः॥५६॥ द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा । गृहस्थश्च निरारंभः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः ॥१७॥ बिलमें शयन करनेवाले जन्तुको सर्प असलेता है । एक तो शत्रु- ओंके साथ नहीं पिरोध करनेगला राजाको और दूसरे प्रदेशमे नहीं रहनेवाला बामणका ।। ५३ ॥ दो कर्म करताहुआ नर इस लोकमें • प्रकाशमान होताहै । एक तो किचिन्मात्र भी कठोरवाक्य नहीं कहताहुआ और दूसरा असजनोंका नहीं सत्कार करताहुआ ॥५४॥ हे पुरुषव्याघ्र ! यह दो जन दूसरेकी प्रतीति करनेराले होतहें एक तो दूसरेके चाहेहएकी इच्छा करनेवाली लिया और दुमरा औरोके पूजितकी पूजा करनेत्राला जन ॥ ५५ ॥ यह दो बडे तीक्ष्ण, दारी- रके सुखानेवाले कण्टक हैं । एक तो वह जो कि निधन होकर मनोरथोंकी कामना करताहै और दूसरा वह जो कि निर्बल होकर क्रोध करता है ।। ५६ ॥ दो पुरुष विपरीन पर्म करके नहीं विराजमान - भापाटीकासमेता। (१९) द्वाविमौ पुरुपौ राजन् स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः । प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान् ॥५८॥ न्यायागतस्य द्रव्यस्य बोदव्यौ द्वावतिक्रमौ । अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चामतिपादनम् ।।५९॥ द्वावभसि निवेष्टव्योगले बद्धा दृढां शिलाम् । धनवंतमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥ ६ ॥ द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमंडलभेदिनौ । परिबाड्योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः॥६॥ होतेहैं । एक तो विना उद्यमपाला गृहस्थ और दूसरा कार्य करनेवाला संन्यासी ॥ १७ ॥ हे राजन् ! यह दो पुरुष स्वर्गके ऊपर विराजमान होतेहैं । एक तौ क्षमायुक्त सामर्थकान् और दूसरा अतिदानी दरिद्र- पुरुष ।। ५८ ॥ न्यागसे प्रान हुर द्रव्यके दो उल्लंघन जाननेयोग्य है एक तौ अपात्रके अर्थ अर्पण करना और दूसरा पात्रके अर्थ न अर्पण करना ॥ ५९ ॥ दो पुरुष गलेमे दृढशिला बांधकर जलमें डुबाने योग्य हैं । एक तो नहीं दान करनेवाला धनमान और दूसरा नहीं तपस्या करनेवाला दरिद्र ॥ ६० ॥ हे पुरुषव्यात्र यह दो पुरुष सूर्य- मण्डलके भेदन करनेवाले अर्थात् मोक्षभागी हैं । एक तो योगयुक्त F (२०) विदुरनीति- त्रयोपाया मनुष्याणां श्रूयंते भरतर्षभ। कनीयान्मध्यमः श्रेष्ठ इति वेदविदो विदुः॥१२॥ विविधाः पुरुपा राजनुत्तमाधममध्यमः। नियोजयेद्यथावत्तास्त्रिविधेप्वेव कर्मसु ॥ ६३ ॥ वय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः। यत्ते समधिगच्छंति यस्य तेतस्य तद्धनम्॥६॥ संन्यासी और दूसरा संग्राममें सन्मुख मराटुआ वीर ॥ ६१ ॥ है भरतर्षभ ! मनुष्योंके तीन उपाय सुने जातेहैं उनमें पहिला श्रेष्ठ, दूसरा मध्यम, तीसरा अधम है, ऐसा वेदवेना कहते हैं जो कि श्रेष्ठ है वह साम है और जो कि मध्यम है वह दान तथा भेद है और जो कि निकृष्ट है वह युद्ध है ॥ ६२ ॥ हे राजन् ! पुरुष भी तीन प्रकार के होतेहैं एक उत्तम दूसरा मध्यम, तीसरा अधम उनको तीनों प्रका- रके कर्मों के वि जो जिसके योग्य है उसमें नियुक्त करे । इस कथ- नसे विदुरजीने यह जनाया कि हे राजन! तुम उपायज्ञ नहीं क्यों कि तुमने अधम शकुन्यादिकोंको उत्तम मत्रियोंके कर्ममें नियुक्त किया है ॥ ६३ ॥ हे राजन् ! सामीके विद्यमान होनेपर तीन अधन रहते है । एक तो स्त्री, दूसरा नौकर, और तीसरा पुत्र; जिस सा- मोके जिस धनको वह स्त्री, नौकर और पुत्र पाते हैं वहै धन और भाषाटीकासमेता। (२१) हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम् । सुहृदश्च परित्यागत्रयो दोपाः क्षयावहाः ॥६५॥ विविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्रयं त्यजेत्६६ वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च भारत। शवोश्च मोक्षणं कृच्छात्रीणि चैकं च तत्समम्६७ वह स्त्री, नौकर और पुत्र उस स्वामीके ही तो हैं भार यह है स्वामीके विद्यमान रहनेपर सामीकी ही आज्ञासे स्त्री, पुत्र और नौकर धनके मालिक हो सक्त हैं न कि सत्तत्र होकर इस कथनसे विदुरजीने यह जनाया कि आप राज्य और अपने पुत्रादिकोंके स्वामी हैं इस कारण आप अपने पुत्रोंसे पाण्डवोंको राज्य दिला सक्ने हो । क्यों कि, आपके विद्यमान रहनेपर पुनादिक राज्यके स्वामी नहीं यह तो तब- राक ही मालिक रह सकते है जबतक कि आप उनसे लेनेकी कांक्षा नहीं करते ॥ ६४ ॥ दूसरेके धनोंका हरण करना, परस्त्रियोंका वटाकारसे दूषित करना, मिरजनोंका त्यागना यह तीनों दोप नाराकारक है ॥६५॥ आत्माके नारा करनेवाला यह नरकका तीन प्रकारका द्वार है एका काम, दूसरा त्रोध, तीसरा लोभ तिससे इन नीनोंको त्याग देथे ॥६६॥ वरदान पाना, राज्य करना, पुत्रजन्म
(२२) .
विदुरनीति- .
भक्तं च भजमानं च तवास्मीति च वादिनम् ।
त्रीनेताञ्छरणं प्राप्तान्विपमेऽपिन संत्यजेत् ६८॥
चत्वारि राज्ञा तु महावलेन,
वान्याहुः पंडितस्तानि विद्यात् ।
अल्पप्रज्ञः सह मंत्रं न कुर्या-
व दीर्घसूत्रै रभसैश्चारणैश्च ।। ६९ ॥
होनी ये तीनों आनन्दके कारण हैं परन्तु शत्रुके कष्टसे छूटना
यह एक ही आनन्द उन तीनोंके समान है । कारण कि उन
तीनोंके विषे इतना हर्ष नहीं होताहे ॥६॥ जो कि अपना मक्त है
और जो कि अपनी सेवा करता है और जो कि मैं तुम्हारा हूँ ऐसा
कहता है इन शरण प्राप्त हुए तीनोंको संकटमें भी न त्यागे ॥६८ ।।
महाबली राजाके त्यागने योग्य जिन चारोंको नीतिवेत्ता कहते हैं
उनको जो कि पण्डित है वह जानता है । एक तो थोडी बुद्धिवा-
लोंके साथ दूसरे दीर्घसूच अर्थात् शीघ्रताके कार्यमें विलम्ब करने-
वालों के साथ तीसरे रमस अर्थात् विचारशून्योंके साय,
अर्थात् वन्दी जनोंके अथवा रणविरोधीके साथ बैठकर राजा सल्लाह
चौथे चारण
भापाटीकासमेता। (२३) चत्वारि ते तात गृहे वसंतु, श्रियाभिजुष्टस्य गृहस्य धर्मे । वृद्धो ज्ञातिरवसन्नः कुलीनः, सखा दरिद्रो भगिनी चानपत्या॥७॥ चत्वार्याह महाराज सायस्कानि बृहस्पतिः । पृच्छते विदर्शवाय तानीमानि निबोध मे॥७॥ देवतानां च संकल्पमनुभावं च धीमताम् । विनयं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम्॥७२॥ न करे ।। ६९ ॥ हे तात ! लदमीसम्पन्न जो आप तिनके गृहस्थध- मनाले घरमै चार निवास करें । एक तौ स्वज्ञातिवृद्ध, दूसरा अप्रसन्न कुलीन, तीसरा दरिद्र सखा, चौथी बिन सन्तानवाली वहनि कारण कि अपने ज्ञातिका वृद्ध कुलधर्मोको उपदेश करताहै । और अवसन्न सजन बालकोंको आचार शिखाता है । और दरिद्र सखा हितकी वार्ता कहता है । और बिन सन्तानपाली बहनि गृहकार्योको भलीप्र- फार कराती है ॥ ७० ॥ हे महाराज ! पूछनाले इन्द्रके अर्थ बृह- स्पतिजी जिन चारोंको शीघ्र फलसाधक कहते हुए उनको मुझसे ध्रयण कारये ॥ ७१ । एक तो देवताओंकी इच्छा, दूसरा बुद्धिमा- नोंका प्रभाव, तीसरा विधासम्पन्नजनोंका विनय, चौथा पापकर्मवा- विदुरनीति-- चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि, भयं प्रयच्छंत्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुतमानमौनं, मानेनाधीतमुत मानयज्ञः ॥ ७३॥ पंचानयो मनुष्येण परिचायाः प्रयत्नतः । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ ।। ७४ ।। पंचैव पूजयल्लोके यशः प्राप्नोति केवलम् । देवान्पिढन्मनुप्यांश्च भिशूनतिथिपंचमान।।७।। लोंका विनाश ॥ ७९ ॥ चार कर्म अभय करनेवाले हैं परन्तु यथावत न किये हुए भयको देते हैं एक तो मानपूर्वक अमिहोत्र, दूसरा मान पूर्वक मौन, तीसरा मानपूर्वक अध्ययन, चौथा मानपूर्वक यज्ञ ।। ॥७३॥ हे भरतर्षभ ! गृह्याग्निवत् मनुष्यको अतियनसे सदा ही अवस्य पांच पूजनेयोग्य हैं। एक पिता, दूसरी माता, तीसरा यज्ञाग्नि, चौथा आत्मा, पाचयाँ गुरु ॥ ७४ । लोकमें जन पांचोंको पूजता हुआ यश पाता है । एक तो देवताओंको, दूसरे पित्रोंको, तीसरे मनुष्योंको, चौथे मिक्षुओको, पांचवे "अतिथियोंको ।।७५ ॥
r भापाटीकासमेता। पंच त्वानुगमिप्यंति यत्रयत्र गमिष्यसि मित्राण्यमित्रामध्यस्था उपजीव्योपजीविनः७५ पंचेंद्रियस्य मर्त्यस्य च्छिद्रं चेदेकमिंद्रियम् । ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञाहतेःपात्रादिवोदकम्।।७७॥ पड् दोपाः पुरुपेणेह हातव्या भूतिमिच्छता । निद्रा तंद्रीभयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।७८॥ पडिमान्पुरुपो जह्याद्भिन्नां नावमिवार्णवे । अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥ ७९ ॥ हे राजन् ! जहाँ २ तुम जाओगे तहां २ पांच जन तुम्हारे पिछाडी चलेंगे । एक मित्र, दूसरे शत्र, तीसरे मध्यस्थ, चौथे उपजीव्य बन्दीआदिक, पाँच उपजीरी सेवक आदिक ।। ७६ ॥ पांच इन्द्रिय- वाले मनुष्यको यदि एक इन्द्रिय छिद्र होवे अर्थात् विषयासक्त होवे तो उसी इन्द्रियके विपयातक होनेसे उस मनुष्यकी बुद्धि भ्रष्ट होजाये है जिसप्रकार कि दृति नाम चर्मके बने हुए मशक नाम पात्रसे जेल वह जाये है ॥७७॥ भूति नाम ऐश्वर्यके चाहनेवाले पुरुषको इस लोकमें छे दोप त्यागने चाहिये एक तो अति सोना, दूसरा निद्राश्रमादिक आलस्यसे युक्त रहना, तीसरा डरना, चौथा क्रोध, पांचाँ आलस्य, छटा दीर्थ सूनना अर्थात् शीघ्रताके कार्यमें देर करना ॥ ७८ ॥ जिसप्रकार कि समुद्र के विये टूटी हुई नावको त्याग !
विदुरनीति- अरक्षितारं राजानं भायाँ चाप्रियवादिनीम् । ग्रामकामं च गोपालं वनकामंच नापितम्॥८॥ पडेव तु गुणाः पुंसा न हातव्याः कदाचन । सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः ॥८॥ अर्थागमो नित्यमरोगिता च, प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च । वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या, पड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥८२॥ देतहे तिसी प्रकार इन छओंको पुरुष न्याग देवै । एक तो अप्र- वका आचार्य, दूसरा नहीं वेदके पढनेपाला ऋविज ॥ ७९ ॥ तीसरा, नहीं रक्षा करने वाला राजा, चौथी अप्रिय बोलनेपाली स्त्री, पांचाँ प्रामकी इच्छा करनेवाला गोपाल, छठा वनकी कामना करने वाला नापित अर्थात् नाई ।। ८० ॥ ये छै गुण कदाचित् भी पुरु- पको नहीं त्यागने चाहिये । एक तो सत्य बोलना, दूसरा दान देना, तीसरा आलस्य युक्त न रहना, चीया अनसूया अर्थात् दूसरेके गुणों के कि दोपका आरोपण न करना, पांचयाँ क्षमा, छठा धैर्य ।। ८१ ॥ हे राजन् ! धनकी प्राप्ति और नित्य ही नोरोग रहमा, और प्रिय-
(२८) विदुरनीति-
पडेते ह्यवमन्यते नित्यं पूर्वोपकारिणम् ।
आचार्य शिक्षिताःशिष्याकृतदाराश्चमातरम् ८७
नारी विगतकामास्तु कृतार्थाश्च प्रयोजकम् ।
नावं निस्तीर्णकांतारा आतुराश्च चिकित्सकम्८८
आरोग्यमानृण्यमविप्रवासा,
सद्भिर्मनुप्यैः सह संप्रयोगः।
स्वप्रत्ययावृत्तिरभीतवासः
पड़ जीवलोकस्य सुखानि राजन् ।।८९॥
तो गोधन, दूसरी सेवा तीसरी खेती, चौथी भार्या, पांचवीं विद्या,
छठी शूद्रसंगति ।। ८६ ॥ पूर्व उपकार करनेपालेको यह छ निरादर
करदतहें । एक तो शिष्यजन शिक्षित होकर पढानेवाले आचार्यका
निरादर करते हैं, दूसरे पुत्र कृतदार अर्थात् स्त्रीको प्राप्त होकर अपने
पालनेवाली माताका निरादर करदेतेहैं || तीसरे कामहीन होकर
जन स्त्रीका निरादर करदेते,और चौथे सैनक कृतार्थ अर्थात् :कृतकार्य
होकर स्वामीका निरादर करदेतेहैं, पांचवें जलसे उतरेदए पथिकजन
नावका निरादर करदेतेहैं, और छठे रोगी जन आरोग्य होनेपर
पेयका निरादर करदेते हैं ।। ८८ || हे राजन् ! रोगका न होना और
भाषाटीकासमेता। इपुर्पणी न संतुष्टः क्रोधनो नित्यशंकितः । परभाग्योपजीवी च पडेते नित्यदुःखिताः९०॥ सप्त दोपाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदयाः। प्रायशो यैविनश्यंति कृतमूलाअपीश्वराः॥ ९॥ स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुप्यं च पंचमम् । महन्च दंडपारुण्यमर्थदूपणमेव च ॥ १२ ॥ . प्रगका न होना और परदेशमें निवास न होना, और सजनों के साथ संगम और अपने अनुकूल जीविका यह छै जीपलोकके सुख है। ॥ ८९॥ यह छै नित्य ही दुःखित रहते हैं । एक तो ा करने- घाला, दूसरा निर्दयी, तीसरा जो कि संतुष्ट न रहता हो, चौथा क्रोध करनेवाला, पांचवा सदा ही शंकायुक्त रहनेपाला, छठा दूसरेकै भाग्यपर जीरने वाला ॥९० ॥ दुःखोंके उत्पन्न करनेवाले सात दोष राजाको सदा ही त्यागने चाहिये । जिन दोपोंसे कृतम् अर्थात् पुष्पहुए. जडवाले सामर्थ्यवान् भी नाशको प्रान होजाते हैं । ॥२१॥ एक तो अति स्त्रीलेपन, दूसरा पाशाओंका खेलना, तीसरा अहेर खेउना, चतुर्थ मदिरापान, पांचवीं वचनकी कठोरता, छठी अति दण्डकी कठोरना, सातवा धनका दूषित करना ॥ ९२ ।। द (२८) विदुरनीति- पडेते ह्यवमन्यते नित्यं पूर्वोपकारिणम् । आचार्य शिक्षिताःशिष्याःकृतदाराश्च मातरम्८७ · नारी विगतकामास्तु कृतार्थाश्च प्रयोजकम् । नावं निस्तीर्णकांतारा आतुराश्च चिकित्सकम्८८ आरोग्यमानृण्यमविप्रवासः, सद्भिर्मनुप्यैः सह संप्रयोगः। स्वप्रत्ययावृत्तिरभीतवासः पड़ जीवलोकस्य सुखानिराजन् ॥८९॥ तो गोधन, दूसरी से तीसरी खेती, चौथी भार्या, पांचवी विद्या, छठी शूद्रसंगति ॥ ८६ ॥ पूर्व उपकार करनेवालेको यह छै निरादर करदेतेहैं । एक तौ शिष्यजन शिक्षित होकर पढानेवाले आचार्यका निरादर करते हैं, दूसरे पुत्र कृतदार अर्थात् स्त्रीको प्राप्त होकर अपने पालनेवाली माताका निरादर करदेते हैं ॥८॥ तीसरे कामहीन होकर जनस्त्रीका निरादर करदेते हैं,और चौथे सैफ कृतार्थ अर्थात् :कृतकार्य होकर स्वामीका निरादर करदेतेहैं, पांचवें जलसे उतरेहुए पथिकजन नावका निरादर करदेतेहैं, और छठे रोगी जन आरोग्य होनेपर पैयका निरादर करदेते हैं ।। ८८ ॥ हे राजन् ! रोगका न होना और भापाटीकासमेता। ईपुर्पणी न संतुष्टः क्रोधनो नित्यशंकितः। परभाग्योपजीवी च पडेते नित्यदुःखिताः९०॥ सप्त दोपाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदयाः। प्रायशो यैविनश्यंति कृतमूलाअपीश्वराः॥ ९१॥ स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुप्यं च पंचमम् । महच दंडपारुप्यमर्थदूपणमेव च ॥ ९२ ॥ ऋगका न होना और परदेशमें निवास न होना, और सजनों के साथ संगम और अपने अनुकूछ जीविका यह छ जीवलोकके सुख हैं । ॥ ८९ ॥ यह ? नित्य ही दुःखित रहते हैं । एक तो ईर्ष्या करने- याला, दूसरा निर्दयी, तीसरा जो कि सतुष्ट न रहता हो, चौया क्रोध करनेवाला, पांच सदा ही शंकायुक्त रहनेवाला, छठा दूसरेकै भाग्यपर जीरने वाला ॥ ९० ॥ दुःखोंके उत्पन्न करनेगले सात दोष रानाको सदा ही त्यागने चाहिये । जिन दोपोंसे कृतमूल अर्थात् पुष्टहुए जइबाले सामर्थ्यवान् भी नाशको प्राप्त होजाते हैं । ॥२१॥ एक तो अति स्त्रीसेवन, दूसरा पाशाओंका खेलना, तीसरा अऔर सेटना, चतुर्य मदिरापान, पांचवीं यचनकी कठोरता, छठी अति दण्डकी कठोरता, साताँ धनका दूषित करना ॥ ९२ ॥ ।
(२८) विदुरनीति-
पडेते हवमन्यते नित्यं पूर्वोपकारिणम् ।
आचार्य शिक्षिता-शिप्याकृतदाराश्चमातरमू८७
नारी विगतकामास्तु कृतार्थाश्च प्रयोजकम्
नावं निस्तीर्णकांताराआतुराश्च चिकित्सकम्८८
आरोग्यमानण्यमविप्रवासः,
सद्भिर्मनुप्यैः सह संप्रयोगः ।
स्वप्रत्ययावृत्तिरभीतवासः
पड् जीवलोकस्य सुखानिराजन् १८९॥
तो गोधन, दूसरी सेवा तीसरी खेती, चौथी भार्या, पांचवी विद्या,
छठी शूद्रसंगति ॥ ८६ ॥ पूर्व उपकार करनेवालेको यह छ निरादर
करदेते हैं । एक तौ शिष्यजन शिक्षित होकर पढानेवाले आचार्यका
निरादर करते है, दूसरे पुत्र कृतदार अर्थात् स्त्रीको प्राप्त होकर अपने
पालनेवाली माताका निरादर करदेते हैं | तीसरे कामहीन होकर
जन स्त्रीका निरादर करदेते,और चौथे सेवक कृतार्थ अर्थात् :कृतकार्य
होकर सामीका निरादर करदेते हैं, पांचवें जलसे उतरेहुए पथिकजन
नावका निरादर करदेते हैं, और छठे रोगी जन आरोग्य होनेपर
घेचका निरादर करदेत है ॥ ८८ ॥ हे राजन् ! रोगका न होना और
-
भापाटीकासमेता। (२९)
ईपुणी न संतुष्टः क्रोधनो नित्यशंकितः ।
परभाग्योपजीवी च पडेते नित्यदुःखिताः९०॥
सप्त दोपाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदयाः।
प्रायशोयेविनश्यंति कृतमूला अपीश्वराः॥९॥
स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुप्यं च पंचमम् ।
महाच दंडपारुप्यमर्थदूपणमेव च ॥ ९२ ॥
भगका न होना और परदेशमें निवास न होना, और सज्जनों के साथ
संगम और अपने अनुकूल जीविका यह छ जीपलोको सुख है ।।
॥ ८९ ।। यह छै नित्य ही दुःखित रहते हैं । एक तो ईर्ष्या करने-
वाला, दूसरा निर्दयी, तीसरा जो कि संतुष्ट न रहता हो, चौया
क्रोध करनेवाला, पांचवाँ सदा ही शंकायुक्त रहनेवाला, छठा दूसरेके
माग्यपर जीपने वाला ॥ ९० ॥ दुःखोंके उत्पन्न करनेवाले सात
दोष राजाको सदा ही त्यागने चाहिये । जिन दोषोंसे कृतम्
अर्थात् पुष्टहुए जडनाले सामर्थ्यवान् भी नाशको प्राप्त होजाते हैं।
॥९१ । एक तो अति स्त्रीसैन, दूसरा पाशाओंका खेलना, तीसरा
अहेर रोउना, चतुर्थ मदिरापान, पांचवीं वचनकी कठोरता, छटी
अति दण्डकी कटोरला, साता धनका पिन करना ॥ ९२ ॥
विदुरनीति-
अष्टौ पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिप्यतः।
ब्राह्मणान्प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणेश्च विरुध्यते ॥१३॥
ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति ।
- रमते निंदया चैपां प्रशंसां नाभिनंदति ॥ ९४॥
नैनान्स्मरति कृत्येपु याचितश्चाभ्यसूयति ।
एतान्दोपानरःप्राज्ञोबुध्येवुद्धा विसर्जयेत्९५॥
नाशको प्रात होनेवाले नरके नाश होनेके पूर्व निमित्त आठ हैं
प्रथम तौ जो कि ब्राह्मणोंसे पैर करताहै, दूसरा जिसने कि ब्राह्मणों के
साथ विरोध किया ।। ९३ | तीसरा जो कि ब्राह्मणोंके धनोंको
ग्रहण करता है, चौधा जो कि ब्राह्मणोके मारनेकी इच्छा करताहै,
'पाचवा जो कि इन ब्राह्मणोंकी निन्दासे आनन्दित रहताहै, छटा जो
कि इन ब्राह्मणोंकी प्रशंसाको नहीं अनुमोदित करताहै ॥ ९४ ॥
सातवाँ जो कि इन ब्राह्मणोंको कार्योंके विप नहीं याद करता है,
आठवाँ जो कि, स्वय ब्राह्मणोंकर याचना फियाहुआ उलटी बाल..
णोंकी निन्दा करताहै । इन दोषोंको पंडितजन जान लबैं और जान-
कर त्याग देथें ॥९॥
-- भापारीकासमेता। (३१) अष्टाविमानि हर्पस्य नवनीतानि भारत । वर्तमानानि दृश्यते तान्येव स्वसुखान्यपि।।९६।। समागमश्च सखिभिर्महांश्चैव धनागमः। पुत्रेण च परिप्वंगःसन्निपातश्च मेथुने ॥ ९७।। समये च प्रियालापः स्वयूथ्येषु समुन्नतिः। अभिप्रेतस्य लाभश्च पूजा च जनसंसदि॥९८ ॥ अपौ गुणाः पुरुपं दीपयंति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च । 'पराक्रमश्चाबहुभापिता च- दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ ९९ ॥ हे मारन ! यह आठ माखनके सदृश सारभूत हर्पके कारण हैं । और . ही आट सदा वर्तमान हुए जिसमे दीदते हैं उसके निजमुखला ।। ९६ ॥ एका ती मित्रों के साथ समागम होना, दूसरा धनका मिटना, तीसरा पुत्र के साथ मिटाप होना, चौथा मैथुनके समय रानियत, पांचवां समय के वि प्रियवार्तालाप छठी स्वजातियों में उन्ननि होनी, सात मनोरथका डाम, आठना मनुष्योंको समामें सत्कार १९७ ॥९८ । आठ गुग पुरुषको प्रकाशमान करते हैं । एक यह : (३२) विदुरनीति- नवद्वारमिदं वेश्म विस्थूण पंचसाक्षिकम् । क्षेत्रज्ञाधिष्ठित विद्वान् यो वेद स परः कविः१००॥ दश धर्म न जानति धृतराष्ट्र निवोध तान् ॥ मत्तःप्रमत्त उन्मत्तःश्रांतःक्रुद्धोबुभुक्षितः०१॥ त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश। तस्मादेतेषु सर्वेपुन प्रसज्जेत पंडितः ॥ १०२ ॥ तो बुद्धि, दूसरी कुलीनता, तीसरा इन्द्रियोंका यशमे करना, चौथा शास्त्रश्रवण, पांचना पराक्रम, छठा थोडा बोलना, सातवां शक्तिके अ. नुसार दान करना, आयी कृतज्ञता अर्थात् किसीका कियाटुआ उप. फार जानना ॥ ९९ ॥ यह शरीररूप तौ नौ दरवाजेवाला घर है. जिसमे अविद्या, काम, कर्म यह तीन धारण करनाले थून हैं और शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध यह पांच साक्षी है, और यह क्षेत्रज्ञ आत्माकर अविष्टित है, इसको जो जानता है यह अत्युत्तम विद्वान् ॥ १०॥ हे धृतराष्ट्रजी! दश जन धर्मको नहीं जानतेहैं उनको आपण करिये । एक तो मदिरादिसे. मतमाया हुआ, दुमरा प्रमत्त अर्थात् विषयासक्त होनेसे असारथान हुआ, तीसरा अपस्मारादिसे उन्मत्त, चौथा मार्गादिश्रमसे थकाहुआ, पाचवा क्रोधी, छठा भूखा ॥ १०१ ॥ सात भागताहुआ जानेवाला, आटवां लोमी, नवा (३३) . भोपाटीकासमेता। अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । पुत्रार्थमपुरेंद्रेण गीतं चैव सुधन्वना ॥ १०३ ॥ यः काममन्यू प्रजहाति राजा, पाचे प्रतिष्ठापयते धनं च। विशेषविच्छतवान् क्षिप्रकारी, तं सर्वलोकः कुरुते प्रमाणम् ॥ १०४॥ जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान्, विज्ञातदोपेपु दधाति दंडम् । जानाति मात्रां च तथा क्षमां च, तं तादृशं श्रीर्जुपते समया ॥ १०५ ॥ भयभीत, दशयां कामी, वह दश यह है तिससे धर्मके जाननेवाला पदित इन दशोंके विधैं नहीं आसक्त होय ॥१०२॥ यहा इस पुरा. तन इतिहासको पूर्वाचार्य कहता हैं जो कि पुत्रके अर्थ असुरेन्द्र सुध- न्याने गान कियाहै ॥ १०॥ जो कि राजा काम और क्रोधको त्यागताहै,और पात्रके विर्षे धनको स्थापित करता है,और विशेष ज्ञान- यान् तथा शास्त्राभ्यासयुक्त है और कार्यको शीघ्रता करताहै उस रा- जाफा सर्व जन प्रमाण करते ह॥१०॥जो कि मनुष्योंका अपनेविष भाषाटीकासमेता। " अनर्थकं विप्रवासं गृहेभ्यः पापैः संधि परदाराभिमर्शम् । दंभं स्तन्यं पेशुनं मद्यपानं, न सेवते यश्च सुखी सदेव ॥ १०८॥ न संरंभेणारभते त्रिवर्ग- माकारितः शंसति तत्त्वमेव । न मित्राथें रोचयते विवाद, नापूजितः कुप्यति चाप्यमूढः ॥१०९॥ समी पराजित होतेहैं ॥ १०७ ॥ जो कि निरर्थक गृहोंसे परदेश निवास नहीं करताहै और पापीदुर्जनों के साथ सलाह नहीं करता है, और पैरस्त्रियोंका बलात्कारमै स्पर्श नहीं करताहै,और कपट तथा चोरी और पिशुनता तथा मदिरापानको नहीं सेवन करताहै यह सदा ही सुखी रहताहै ॥ १.८ ॥ जो कि क्रोधसे युक्त होकर त्रिवर्ग नाम धर्म, अर्थ, कामको नहीं आरम्भ करताहै, और किसीकर किसी विषयमें आहुआ यथोचित तत्त्ववचन कहताहे और मित्रके अर्थ विनाद नहीं इन्छा करताहे और सत्कारको न प्राप्त होकर भी किसी (३६) -विदुरनाति- न योऽभ्यसूयत्यनुकंपते-च, न दुर्वलः प्रातिभाव्यं करोति। नात्याह किंचित् क्षमते विवादं, .. सर्वत्र ताहग्लभते प्रशंसाम् ।। ११० ।। यो नोद्धतं कुरुते जातु वेपं, न पौरुपेणापि विकत्थतेऽन्यान् । न मूच्छितः कटुकान्याह किंचि- प्रियं सदा तं कुरुते जनो हि ॥ १११ ॥ पर नहीं क्रोधित होताहै वह विद्वान् है ॥ १०९ ॥जो किसीको भी नहीं निन्दित करताहै किन्तु सर्वकाल दया ही करतारहता है और आर निर्वत होकर किसीके साथ विरोध नहीं करताहै और किसी किंचिन्मात्र भी नहीं कठोर वचन कहताहै और विवादको शान्त करदेता है तादृश यह पुरुष सब जगह प्रशसा पाताहै ॥ ११०॥ जो कि कदाचित् भी उद्धत अर्थात् भयंकर अथवा अपने अयोग्य घेषको नहीं करताहै,और पुरुषार्थकर औरों को बुरा नहीं कहता है और मूच्छित हुआ भी किसीसे किंविन्मान कटुक वचन नहीं कहताहै उसको - भाषाटीकासमेता। , न वैरमुद्दीपयति प्रशांतं, न दर्पमारोहति नास्तमेति । न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्य, तमार्यशीलं परमाहुरार्याः ॥ ११२ ॥ न स्वे सुखे वै कुरुते प्रह, नान्यस्य दुःखे भवति प्रहृष्टः। दत्त्वा न पश्चात् कुरुते च तापं, स कथ्यते सत्पुरुपार्यशीलः ॥ ११३॥ जन अपना प्रिय करलेतेहैं ॥ १११ ॥ जो कि प्रशान्त नाम निवृत्तहुए धेरको फिर नहीं उठाताहै और न गर्वपर आबद्ध होता है अर्थात् गर्व नहीं करता है और में दुर्गतिको प्राप्त होगयाहै ऐसा मानकर नहीं करनेयोग्य कर्मको नहीं, करनाहै उसको आर्यजन अतिश्रेष्ट कहतेहैं ॥ ११२॥ जो कि अपने सुखके विष हर्पको नहीं करताहै और दुमरेके दुःखके विौं भी हर्षित नहीं होताहै और देकरके पीछे सन्ताप नहीं करता है. वह मंसारमे सजन और रिदुरनीति- देशाचारान्समयान् जातिधर्मान्, बुभूपते यः स-परावरज्ञः। म यत्र तत्राभिगतः सदेव,.. महाजनस्याधिपत्यं करोति ॥ ११ ॥ दंभ मोहं मत्सरं पापकृत्यं, गजदिष्टं पेशनं पूगवैरम् । मत्तोन्मत्तेजनेश्चापि वाद, यःप्रज्ञावान वर्जयेत्स प्रधानः ॥ ११५॥ दानं मोहं दैवत मन्लानि, प्रायश्चित्तान विविधाल्लोकवादान् । आर्यशील कहाजाताहै ॥ ११३ ॥ जो कि देशानुसार ' आचार और ममयानुसार जातिधर्मोको विभूपिन करताहै वह परावरज्ञ अर्थात् विद्वान् और वह जहाँ जाताहै तहा ही महात्माजनोंका आधिपत्य करता है अर्थात् महात्मा जनोंका अधिपति होता है।।११४॥ दम्भ और विषयादिकोंमे मोह तथा ईपी और पापकर्म तथा गजासे घेरभार और चुगली नथा बहुनोस येर यौर मतवाले तथा पागल और दुर्ज- नोंके माय मिसाद इनको जो बुद्धिमान् त्याग देव बह श्रेष्ठ है। ॥ ११५ ॥ दान और मोह अर्थात् प्रीति और देवनकर्म तथा मगल- भाषाटीकासमेता। एतानि यः कुरुते नैत्यकानि, तस्योत्थानं देवता राधयंति ॥ ११६ ॥ समैर्विवाहं कुरुते न हीनः, समैः सख्यं व्यवहारं कथां च । गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति, विपश्चितस्तस्य नयाः सुनीताः॥११७॥ मितं भुक्त संविभज्याश्रितेभ्यो, मितं स्वपित्यमितं कर्म कृत्वा।। ददात्यमिन्नेष्वपि यांचितः सं- 'स्तमात्मवंतं प्रजहत्यनीः ।। ११८॥ कार्य और प्रायश्चित्त तथा तरह के लोकवाट इनसो निन्य ही जो फरना है उमक उद्योगका देवता आराधन करते है ॥ ११६ ॥ जो कि ममानो साथ विवाह और ममानों के माथ ही मित्रता और व्यवहार तथा कथाको करता है और अपनेमे जो कि हीन है उनके साथ नहीं करता है और गुणोम विशेष हुए जनोको सहकार्यमे आगार्ग रख देना है दम पण्डितकी नीति भलीप्रकार प्राप्त की हुई है ।। ११७ ॥ जो कि अपने आचिन खी, पुत्र, नौकर आदिके शिवे (10) विदुरमीति- चिकीर्पित विप्रकृतं च यस्य, नान्ये जनाः कर्म जानंति किंचित् । मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुष्ठितेच, नाल्पोऽप्यस्य च्यवते कश्चिदर्थः ११९ ॥ यः सर्वभूतप्रशमे निविष्टः, सत्यो मृदुर्मानकृच्छुद्धभावः । अतीव स ज्ञायते ज्ञातिमध्ये, महामणिर्जात्य इव प्रसन्नः ॥ १२०॥ बांटकर प्रमाणिक भोजन करता है और और अप्रमाणिक कर्म करके प्रमाणिक ही मोरता है और याचना किया हुआ शत्रुओं के लिये भी दान देताहै उस आत्मवान् पण्डितको अनर्थ त्यागजाते ।। ॥ ११८ ॥ जिस कर्मके कग्नेकी इच्छा हो और जो कि कर्म थोडामा होकर बिगड़ गया हो । उम कर्मको जिसके अन्यजन किचिन्मान - भी नहीं जानते है और जिसका भली प्रकार अनुष्टिन हुआ मन्त्र अर्थात् सलाह गुप्त रहता है उसका अल्पमात्र भी कोई अर्थ नहीं स्वण्डित होताहे ॥ ११९॥ जो कि समस्तप्राणियों के शान्त करनमें प्रदेश रहता है और सत्य होकर ससमयमें वर्नता है और कोगल भापाटीकासमेता। य आत्मनापत्रपते भृशं नः,. स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत । अनंततेजाः सुमनाः समाहितः, स तेजसा सूर्य इवावभासते ॥ १२१॥ बनेजाताः शापदग्धस्य राज्ञः, पांडीः पुत्राः पंच पचंद्रकल्पाः । त्वयैव वाला वर्धिताः शिक्षिताश्व, तवादेशं पालयंत्यांबिकेय ॥ १२२॥ म्यभार होकर भवका सम्मान करना है और शुदभाव सदा रहता है महातियालोके मध्यमे अतीर उत्तम जाना गया है। जिस प्रकार कि उत्तम ग्यानमे उत्पन्न हुआ महामणि अन्यमणियोके मध्य शुद जानाजाता है ॥ १२० ॥ दूसरोंकर अपना दोष न ज्ञान होनेपर भी जो कि केवल आत्मा ही कर किसी दोपसे होताहै अत्यन्त लजित होताहै यह नर ममस्त लोकका गुरु होता है । और जो कि अनन्त- नेजवाला होकर अतिमनम्बी और सावधान रहता है वह तेजकर - मूर्यके समान प्रकाशमान होता है ।।१२१॥ हे आम्विय ! जो कि शापत दग्ध हुए पाण्डुके पास इंद्रके समान बनमें उत्पन्न हुए साचो याला पुत्र तुमने ही बहाये और पढाप है यह तुम्हारी आमाशा !
विदुरलीति- - प्रदायैषामुचितं तात राज्यं; सुखी पुत्रैः सहितो मोदमानः । न देवानां नापि च मानुपाणां, भविष्यसि त्वं तर्कणीयो नरेन्द्र ।। १२३॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजाग- रपर्वणि विदुरनीतिवास्ये चयनि- शोऽध्यायः ॥ ३३॥ [१] पालन कर रहे है ॥ १२२ ॥ इम कारण है नान टनको यथोचिन गज्य देकर-पुत्रोंसहित प्रमोदिन हुए मुखी हानिधे । एमा कान है। नरेन्द्र ! तुम फिर न देवताओंके और न मनुष्योंके शकाकरने योग्य होवोगे॥ १२३ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपणि प्रजागरपर्वविदुरनीतिवारगे श्रीपाटकवंशावतमपण्डित मङ्गलसेनात्मभकाशिरामविरचित भायासिलो त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३॥ [१] पारी शा करनेवाला में पारफोही देगना हाँ। इनकारगम्याकुल और इन दोनों की बुश हो॥१॥ पिदरी ! आ? मुझको युमिक पयोनित शिक्षा कारेंगे । और अजातशत्रु युधि तरफो भी मगरण मेटिन जलाइय र अदीना मन् ! जो कि कोरयों का हिम भोर कन्यागकारक उपाय गान हो वह मुमने कहिये ।।२॥ भाषाकासमेता। धृतराष्ट्र उवाच। जायतो दह्यमानस्य यत्कार्यमनुपश्यसि । तदन्यहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि॥१॥ त्वं मां यथावद्विदुर प्रशाधि, 'प्रज्ञापूर्व सर्वमजातशत्रोः। 'यन्मन्यसे पथ्यमदीनसत्त्व श्रेयस्करं हि तदै कुरूणाम् ॥ २ ॥ पापाशझी पापमेवानुपश्यन, पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाम् । इसके अननरार नगदजी महाराज फिर विदुरमे कहते हुए। है सात ! जागनेवाले मुझ चिन्नामिग जलतेएक करनेयोग्य जिम कर्मको आप देखते ही उसको मुझमे कहिये । क्यो कि, तुम धर्म .
'(४४) 'विदुरनीति- कवे तन्म भूहि सर्व यथाव- न्मनीपितं सर्वमजातशयोः॥३॥ विदुर उवाच ॥ शुभ वा यदि वा पापं वेष्यं वा यदि वा प्रियम् । अपृष्टस्तस्य तद्व्यायस्य नेच्छेत्पराभवम् ॥४॥ तस्माद्वक्ष्यामि ते राजन हितं यत्स्यात्कुरून्प्रति। वचः श्रेयस्करं धयं ब्रुवतस्तन्निबोध मे ॥५॥ मिथ्योपेतानि कर्माणि सिध्येयुर्यानि भारत । अनुपायप्रयुक्तानि मा स्म तेषु मनः कृथाः॥६॥ आत्माकर मे तुमसे पूछता हों । हे कवं ! यह समस्त मुझसे यथावत कहिये, जो कि युधिष्ठिरका वांछित है ॥ ३॥ तब इतना वचन सुन विदुरजी महाराज धृतराष्ट्र जीसे कहने लगे। हे महाराज ! या तो शुभ हो वो अशुभ हो या प्रिय हो अथवा अप्रिय हो वह बिना हुआ भी उससे कह देव जिसका कि पराजय नहीं चाहता हो ॥ ४॥ . तिससे हे राजन् ! तुमसे यह धर्मयुक्त कल्याणकारक वचन कहूँगा जो कि कौरवोंके प्रति हितकारक हो । अब मुझ कहनेवालेसे श्रवण कारये ॥५॥ हे भारत ! जो कि फर्म कपटयुक्त और असत् उपायोंसे भोपाटीकासमेता। (४५) तथैव योगविहितं यत्तु कर्म न सिध्यति । उपाययुक्तं मेधावीन तत्र ग्लपयेन्मनः॥७॥ अनुबंधानपेक्षेत सानुबंधेपु कर्मसु । संप्रचार्य चकुर्वीत न वेगेन समाचरेत् ॥८॥ अनुबंधं च संप्रेक्ष्य विपाकं चैव कर्मणाम् । उत्थानमात्मनश्चैव धीरः कुर्वीत वा न वा.॥९॥ यःप्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धी तथा क्षये। कोशे जनपदे दंडे न स राज्येऽवतिष्ठते ॥१०॥ सयुक्तहुए सिद्ध होतेहै उनमे तुम अपना चित्त कदाचित् भी न करिये॥६॥ जो कि कर्म यत्नमे रचाहुआ और उपायसे युक्त होकर भी न सिद्ध हो तो उसमें बुदिमान् नर चित्तको न बिगाडै ॥ ७ ॥ प्रयोजनयुक्त फों के विप प्रयोजनोंकी ही अपेक्षा कर और विचार करके कर्माको करे और शीघ्रताके साथ कर्माका प्रारम्भ न करे ॥ ८॥ प्रथम तौ प्रयोजन फिर कोका फल तत्पश्चात् अपना उद्यम अर्थात् करनेकी शक्ति इनको देखकर चतुर धीरजन कमीको कर और इनको न देखफर नहीं कर॥९॥जो कि स्थिति और दृद्धि और क्षय और कोश भौर देश तथा दण्ड इनके विधै प्रमाणको नहीं जानता है वह रायके । .
7 (४१) विदुरनीति- यस्त्वतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति ।। युक्तो धर्मार्थयो ने स राज्यमधिगच्छति॥११॥ न राज्य प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसांप्रतम् । - श्रियं ह्यविनयो हति जरारूपमिवोत्तमम् ॥१२॥ भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो बडिशमायसम् ।. लोभाभिपाती असते नानुबंधमवेक्षते ॥ १३ ॥ यच्छंश्यं ग्रसितुं यस्यं ग्रस्तं परिणमेच यत् । हितं.च परिणाम यत्तदायं भूतिमिच्छता ॥१४॥ विये नहीं स्थित रहताहै ।। १० ॥ जो कि धर्म, अर्थ और ज्ञानके विर्षे युक्तहआ इन कहहुए प्रमाणोंको यथावत् जानना है वह राज्यको अधिगत होताहै ॥ ११ ॥ प्रामहुआ गम्य अयोग्यताके साय नहीं घर्तगा बाहिय क्यों कि, अविनय राज्यरक्ष्मीको शीघ्र ही नाश कर देवे है जिस प्रकार कि उत्तम रूपको जरा (वृद्धावस्था ) बिगाड देती है ।। १२॥ जो कि देखनेमे उत्तम हो और परिणाममै थुरा हो ग कर्मफे करनेमें प्रयोजन नहीं देखता है, वह भ्रष्ट होजाना । जिम प्रकार कि उत्तम मक्षणयोग्य पदार्थसे ढकेहुए लोहके चने यदिशको लोमाभिपातीहुई मछली निगल जाती है और उसमें प्रयोजनको नहीं देखती है ॥ १३ ॥ जो कि भोग्य जरने योग्य होप और जो भाषाटीकासमेता। (४७) वनस्पतेरपकानि फलानि प्रचिनोति यः। सनाप्नोति रसं तेभ्योबीजं चास्य विनश्यति१५ यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिंगतं फलम् । फलाइसं स लभते वीजाच्चैव फलं पुनः १६॥ यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि पट्पदः । तदर्थान्मनुप्येभ्य आदद्यादविहिंसया ॥१७॥ पुप्पं घुप्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं न कारयेत् । मालाकार इवारामं न यथांगारकारकः ॥१८॥ कि जवाहुआ परिणामको प्राश हो जाधे और जो कि परिणाममें भी हितकारक हो वह भोग्य ऐश्व चाहनालेको भोजन करनेयोग्य है ।। 112 (जो कि पक्षक नहीं पकरण फलोंको इकहा करता है. यह जन फोंस रसको भी नहीं मान होताहै. और टमका बीज भी नष्ट होजाताहै ।। १५ ॥ जो कि समयपर परिणामको ग्राम (ए गये; फलोंका महण करता है वह उस पाटमै ग्यको प्राप्त होताहै, और सिर म फटके बीजसे पलको प्राप्त होताहे. ॥ १६॥ जिसप्रसार कि अमर फूलोकी रक्षा फग्नाआ मधुको ग्रहण करना है. तिमी प्रकार मनुष्योंम हिलाकर ही अपात मरण की ||१७] जिम प्रकार कि माली बागमें कुल फटोंको ग्रहण करनाहै और वृक्षक जरा मेदन (४८) विदुरनीति- किन्नु मे स्यादिदं कृत्वा किन्तु मे स्यादकुर्वतः। इति कर्माणि संचिंत्य कुर्यादा पुरुषो न वा१९|| अनारभ्या भवेत्यर्थाः केचिन्नित्यं तथाऽगताः। कृतः पुरुपकारो हि भवेधेपु निरर्थकः ॥ २० ॥ प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः । नतं भर्तारमिच्छंति पंढं पतिमिव स्त्रियः ॥२१॥ नहीं करना है तिमी प्रकार राजा भी अपने राज्यमे प्रजाभोंस अधका ग्रहण करे और उन प्रजाओंका नाश न करे । और जिस प्रकार, कि अगारकारक अर्थात् काटजलानेवाला वृक्षके जटको छेदन करताहे. और उसके पत्रपुष्पादिको नहीं ग्रहण करताहै तिस प्रकार राजाको प्रमाका छेदन न करना चाहिये ॥ १८ ॥ इम कर्मको फरके मुझको क्या शुम अशुभ फर होगा अथवा इस कर्मको न करके मुझको क्या शुभ अशुभ फल न होवेगा ऐसा विचारकर कमाको करे और विना विचारे कर्म न करे ॥ १९ ॥ जो कि कोई एक अर्थ किसी प्रकार भी सदेव नहीं प्राप्त होसक्त है वह नहीं आरम्भ करनेयोग्य हैं जैसे कि मबलोसे वैर आदि करना कारण कि ऐसे जिन कार्योक विप जो पुरुषार्थ कियाजाता है वह पुस्पार्थ उन कार्योंके विष निष्फल होजाता है ॥ २० ॥ जिसकी प्रसन्नता भी निष्फल हो और क्रोध भी भापाटीकासमेता। कांश्चिदर्थान्नरः प्राज्ञो लघुमूलान्महाफलान् । क्षिप्रमारभते कर्तु न विनयति तादृशान्॥२२॥ ऋजु पश्यति यः सर्व चक्षुपानुपिवनिव । आसीनमपि तृप्णीकमनुरज्यंति तं प्रजाः॥२३॥ सुपुप्पितः स्यादफलः फलितः स्यादुरारुहः । अपक्का पक्वसंकाशो नतु शीत कहिचित२४॥ निकाल हो उसको लोक अपना सामी करना नहीं इच्छा करतेहै । जिम प्रकार कि स्त्रियाँ नपुसकको पति करना नहीं इन्छा करनी है। ॥ २१ ॥ जिनकी जट तो अल्प हो और फल अधिक हो ऐसे जो कोई एक कार्य है उनके कग्नेको बुद्धिमान नर शीघ्र ही आरम्भ कर किन्तु एम कर्मकि करनेमें विघ्न न करे ॥२२॥ जो कि नेत्रोंसे मानों भव लोकोको पीताहुआ मरलतापूर्वक देवता है वह यदि मौन होकर भी बेटा हो तथापि उमका समस्त प्रजा अनुराग करती है । भाष मह है कि, जो भपनी दृष्टिमात्रमे ही सबको प्रसन्न करना है वह यदि न भी बोले तब भी उसमें प्रजा प्रीति करती है ॥ २३ ॥ जिस प्रकार कि कोई वृक्ष मुन्दर २ फूलोंसे तो युक्त रहताहे परस्तु पलोग युन, नहीं रहना. निमी प्रकार कोई जन केवट वचनादिकोस मोप्रीतिको दिखाते है पर धनादिकों को नही देत और जिस प्रकार विदुरनीति- चक्षुपा मनसा वाचा कर्मणा'च चतुर्विधम् । प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति २५॥ यस्मात्रस्यति भूतानि मृगव्याधान्मृगा इथ । सागरांतामपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते ॥२६॥ -पितपेतामह राज्य प्राप्तवान्स्वेन कर्मणा। वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः॥ २७॥ कि कोई वृक्ष फलोंसे युक्त रहताहै. पर मुखकर चढने योग्य नही होता किन्तु दुःस्वकर चढनेयोग्य होताहे । तिमीप्रकार कोई जन भनादि तो देतेहैं पर सुखाराध्य नहीं होते किन्तु दुरासव्य होतेहैं और जिम प्रकार कि कोई नहीं पकाहुआ फल पकेदएके समान दीसता हुआ कदाचिन् नहीं विशीर्ण होताहै. तिमी प्रकार कोई निर्बलीजन बलीके समान भीतर बाहिरसे शक्तिको दिखाताहुआ नहीं अष्ट होताहे ॥२४॥ जो कि नेत्र,मन, वाणी और कर्म इनसे चारों तरह लोकको प्रसन्न करता है उमपर लोक प्रसन्न होताहै ॥ २५ ॥ जिम प्रकार मृगके सिकारीसे मृग डरतह तिसी प्रकार जिससे प्राणी डरतेह यह समुदपर्यन्त पृथ्वीको पाकर भी भ्रष्ट होजाताहै ॥ २६ ॥ वह अपने पूर्जित कर्ममें पितृ पितामहके राज्यको प्राप्त होकर अनीतिमे स्थित हा नाश करदेता है जिस प्रकार कि पवन बादलों को प्रात होकर नाश (५१). + भापाटीकासमेता। धर्ममाचरतो राज्ञः सद्भिश्चरितमादितः । . वसुधा वसुसंपूर्णा वर्धते.भूतिवर्धनी॥ २८॥ अथ संत्यजतो धर्ममधर्म चानुतिष्टतः । प्रतिसंवेटते भूमिरनौ चर्माहितं यथा ॥२९॥ य एव यनः क्रियते परराष्ट्रविमर्दने । स एवःयनः कर्तव्यः स्वराष्ट्रपरिपालने ॥३०॥ धर्मण राज्यं विदेत धर्मण परिपालयेत्। धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते॥३॥ फरदधे ॥ २७॥ धर्म और शिष्टजनोके आचरण कियेहए. वृत्तोंको भादिम मेवन करतरण राजाका ऐभर्य वढानगी द्रव्योंमे पारंपरिस. ई पृषी बदनी है ॥ २८ ॥ और धर्म के न्यागनेयारे और अधर्मक सन करने वाले राजाकी पृथिवी मंचित हो जानी अर्थात् बाफ- को नहीं देना । जिम प्रकार कि अमिमे ग्वाटुआ चर्म संनिय हो जाना ॥ २९ ॥ जो कि यन्न धैरीफ गम्यके मर्दन करने किया जाना 2 माही यग्न आने गन्धकी रक्षा करने करना चाहिये ।। ॥ २०॥ जय भिम राज्यको प्राप्त होता है तो धर्मम ही रामकी रक्षा यो । कारण कि धर्म है गर जिमी एसी लक्ष्मीको प्रात (५२) विदुरमीति- अप्युन्मत्तात्मलपतो बालाच्च परिजल्पतः । सर्वतः सारमादधादश्मभ्य इव कांचनम् ॥३२॥ सुव्याहृतानि सूक्तानि सुकृतानि ततस्ततः। संचिन्वन्धीर आसीत शिलाहारी शिलं यथा ३३ , गन्धेन गावः पश्यति वेदैः पश्यति ब्राह्मणाः। : चारैः पश्यति राजानश्चक्षुभ्यामितरे जनाः॥३४॥ भूयांसं लभते केशं या गौर्भवति दुर्दहा । अथ या सुदुहा राजन्नेव तां वितुदंत्यपि ॥३५॥ होकर फिर उस लक्ष्मीको नहीं त्यागमक्ता है और न वह लक्ष्मीकर श्यागाजाता है ॥ ३१ ॥ अनर्थवाक्य कहनेवाले उन्मत्त और वृथाब- फतेहुए बालकमै भी सबप्रकारले सारवार्ताको ग्रहण करले जिसप्र- कार कि पत्थरों के मध्यसे खोजकर मुबर्ण ग्रहण कियाजाता है ॥ ३२ ॥ इधर उधरमे भलीप्रकार कहेहुए सुन्दर २ हितकारक वाक्योंको संचय करताहुआ धीरजन स्थित होघे जिस प्रकार कि शिल विननेवाला शिलको एक २ बिनता हुआ स्थित होताह||३३॥ गौ आदि पशु गन्धसे देखते हैं और ब्राह्मण वेदोंकर देखते है और रामा सदेश देनेवाले दूतोंके द्वारा देखते हैं और नेत्रोंसे अन्यान देखते हैं ॥ ३५ ॥ हे राजन् ! जो कि गौ दुःखकर दूहनेयोग्य होये - भापाटीकासमेता। यदतप्तं प्रणमति न तत्संतापयंत्यपि। ... यच स्वयं नतं दारु न तत्संतापयंत्यपि ॥२६॥ एतयोपमया धीरः संत्रमेत बलीयसे। इंद्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे॥ ३७॥ पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मंत्रिबांधवाः। पतयो बांधवाः स्त्रीणांब्राह्मणा वेदवांधवाः॥३८॥ सत्येन रक्ष्यते धर्मों विद्या योगेन रक्ष्यते । मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥ ३९ ॥ पहल करेश पाननी है। और जो कि मुखपूर्वक दुहेजानेवाली होगे है उमको कोई जन नहीं व्यथित करनाहै ॥ ३५ ॥ जो कि नहीं संतप्त कियाटुआ ही नम्र होजाना उसको कोई जन नहीं सतात करताहै जिमप्रकार कि जो काष्ट सय ही नवाहुआ है उसको कोई भी नहीं नवाता है ॥ २६ ॥ इम उपमाफर धीरजन बलवान् के लिये नानाप जो कि बदमान के लिये नयना है यह साक्षात् इंद्रकेलिये नाजाता है । इस कयनसे यह जानागया कि जो बलीके अर्थ नम्र होता है उसपर इंद्र प्रसन्न होकर उसका कल्याण करता है ॥ १७ ॥ पशुओंके रक्षक मेघ है और राजाओंके सहायक मत्री है और स्त्रियों के पाया पति हैं और प्रागों के बान्धर घेद है ॥ ३८॥ सत्यसे विदुरनीति- मानेन रक्ष्यते धान्यमश्वान् रक्षत्यनुक्रमः । अभीक्ष्णदर्शनं गाश्च स्त्रियोक्ष्याः कुचेलतः४०॥ न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति मे मतिः। अंतप्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिप्यते ॥११॥ य ईघुः परवित्तेपु रूपे वीर्य कुलान्वये । "सुखसौभाग्यसत्कारे-तस्य व्याधिरनंतकः॥४२॥ धर्मकी रक्षा होयेहै और अभ्याससे विद्याकी रक्षा हो। और मार्जनो- इतनादि शुदिम रुपकी रक्षा होयैहै और शुभ आचारस कुठकी रक्षा होघेहे ॥ १९ ॥ तोल मापसे धान्य रक्षित रहता है और अनुक्रम नाम चलाना फिराना आदि घोडोंकी रक्षा करना है। और बारबारका ढंग्वना गौओंकी रक्षा करना है और मीन तथा कुन्सिन यन्त्रोंसे पियां धिन रहती है ॥ ४० ॥ मेग विचार तो ऐमा है कि आचारबर्जित जनका कुछ प्रमाण नहीं होताई कारण कि नीचत्रुलमै उत्पन्न हुए जनोंका भी आचार ही कुलसे विशेष होताहे भाव यह है कि जो आचारम भ्रष्ट है उनका कुल यदि उत्तम हो नत्र भी माननीय नहीं। और जो कि आचारसं युक्त है वह यदि नीचकुदमें भी जन्मे हो नत्र भी माननीय है ॥ ११ ॥ जो कि दूसरोंके धनोंमें तथा रूप, वीर्य, कुन्ट, मुख, सौभाग्य, . 1 .
भाषाटीकासमेता। (५५) पकार्यकारणाद्रीत कार्याणां च विवर्जनात्। अकाले मन्त्रभेदाच्च येन मायेन तत्पिबेत्४३॥ विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनो मदः । मदा एतेऽवलिप्तानामेत एव सतां दमाः ॥१४॥ असंतोभ्यर्थिताः सद्भिः कचित्कार्य कदाचन । तावन तस्य सुकृतं किंचित्कार्य कदाचन । मन्यते संतमात्मानमसंतमपि विश्रुतम् ॥ ४२ ॥ माकाग्मं ईया करताहे उमको वह व्याधि विद्यमान रहता है जिसका कि कभी अन्त नहीं होना || ४२ ॥ हे राजन् ! नहीं करने योग्य कार्य करने और कानयोग्य कार्यक त्यागनेंस और असमयमें मंत्र. भेटम अर्थात् कार्यक न मिर होने में पूर्व ही मन्याह के प्रकट होजानेमे भयभान है। और जिसके पान करने मदको माप्त होगाये उसको नही पान करे ।। ४३ ॥ एक विशामद, दूसरा, धनमद,तीसरा पारवार- महाय मद है, गानों के यह सीनों मदई और सजनोंके यह तीनों दम है | भार यह है कि यह तीनों मद गठिीक विप विद्यमान दर अनागको प्रकाशित करते है. और मजनो पिपं विद्यमानइए भनीय मजनताको प्रकाशित करने है ॥ ४५ ॥ पदाचिन् किसी का मानकर अमान प्रार्थना किये जानो पर भसजन चाहे
(५६)..
पिड्रनीति-
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गतिरात्मवतां संतः संत एवं सतां गतिः।
असतां च गतिः संतो न त्वसंतः सतां गतिः४६
जिता सभा वस्त्रवता मिष्टाशा गोमता जिता ।
अध्वा जितो यानवता सर्वं शीलवता जितम४७
शीलं प्रधान पुरुपेतद्यस्येह प्रणश्यति ।
न तस्य जीवितेनाों न धनेन न बंधुभिः ४८॥
कार्य तौ न करसकें पर तब भी सन्ननोंकी प्रार्थनामात्रसे अपने
अमत् आत्माको अन्छा मानते है ॥ ४५ ॥ ज्ञानवान् जनोंकी गति
भाजन होतेह और सम्जन ही सजनोंकी गति होघे है
और असजनोंकी गति भी मजन होते है. परन्तु सम्जनोंकी
गति असनन नहीं होतंह ॥ ४६॥ समा वनवाले परा-
जित होघे है और मिष्ट २ भोजनादिकोंकी आशा गोरखने-
बालमे पराजित होघेहै । और मार्ग मवारीवाले जनसे पराजित होता है
और जो कि शीलवान् है उससे सब पराजित होताहै अर्थात् शील.
वान् सबको जीतलेता है ॥४७॥ पुरुपमें शील प्रधान है यह शील
निमका इसटोकम नष्ट होजाताहै उसका अर्थ न जीवनमे और न.
भाषाटीकासमता। आढयानां मांसपरमं मध्यानां गोरसोतरम । तेलोतरं दरिद्राणां भोजनं भरतर्षभ ॥ १९ ॥ संपन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुंजते सदा । क्षुत्स्वादुतां जनयति सा चोढयेपु सुदुर्लभा९०॥ प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते । जीयंत्यपि हि काष्ठानिदरिद्राणां महीपते॥५॥ अवृत्तिर्भयमंत्यानां मध्यानां मरणाद्यम् । उत्तमानां तु मानामवमानात्परं भयम् ॥५२॥ भनमे न बन्धुओंमे होताहै ॥ ४८ ॥ हे भरतर्षभ ! धनवानोंका मोजन यह होताहे जिसमें माम अधिक हो और मध्यम जनोका भोजन वह होताहै जिममे गोरम नाम दुग्ध, घृत, दध्यादिक, बहन हों और दरिद्रजनोंका भोजन वह होताहे जिसमें नेल अधिक हो । ॥ ४९ ॥ दरिद्रजन मदा केवल अन्नको ही अतिस्वादृपूर्वक भोजन करते है कारण कि क्षुधा उम अन्नो भोजन करनेमे उनको जैमी स्वादुता उत्पन्न कगती है धेसी धनवानोके निपं दुर्लभ होघेहे ॥३०॥ हे महीपते। समारमें बहुधा लक्ष्मीगानोंको भोजन करनेकी शक्ति नहीं होघहै पर दरिद्जनोंके पेट में भोजन कियहुए काठ मी पचजातेहैं ।। ॥५१॥ अधम या दरिंद्रजनोंको जीविकाके न होनेका भय होताहै विदुरनीति- एतान्यनिगृहीतानि व्यापादयितुमप्यलम् । अविधेया इवादांता हयाः पथि कुसारथिम् ६०॥ अनर्थमर्थतः पश्यन्नथं चैवाप्यनर्थतः । इंद्रियैरजितेर्वालः सुदुःखं मन्यते सुखम् ॥ ६॥ धर्मार्थी यः परित्यज्य स्यादिद्रियवशानुगः । श्रीप्राणधनदारभ्यः क्षिप्रं स परिहीयते ॥ १२॥ रथ है और आत्मा सारथि है और इंद्रिय घोडे है उनको वशमे किये हुए इन्द्रियरूपयोटोंकर सावधानहुआ कुशलयुक्त धीरजन इसप्रकार संसारमै विचरता है जिस प्रकार रथी अच्छीतरह यशमें कियेहुए श्रेष्ठ घोडाओंकर मार्गमें चलताहे ।। ५९ ॥ यह नहीं पशमें कियेहुए ही इंद्रियरूप धोडा आरमाके नाश करदनेको समर्थ भी होसते है । जिसप्रकार कि नहीं शिखलाये हुए और नहीं वश कियेहुए घोडे मार्गमे सारथिको पटक देतेहैं ॥ १० ॥ जो कि नहींजीते हुए इंद्रियों से पराजित हो अनर्यको अर्थ कर देखता और अर्थको अनर्य कर देशताहुआ दुःखको सुख मानताहै वह मूर्ख . है ।। ६१ ॥ जो कि धर्म और अर्थ इन दोनोंको त्यागकर इन्द्रियोंके । वंशमें चलता है वह लक्ष्मी और प्राण और धन तथा स्त्रियोंसे शीघ्र भापारीकासमेता। अर्थानामीश्वरो यः स्यादिद्रियाणामनीश्वरः । इंद्रियाणामनैश्वर्यादैश्वर्याद्रश्यते हि सः॥ ६३॥ आत्मनात्मानमन्विच्छेन्मनोबुद्धींद्रियैर्यतेः ।. आत्मा ह्येवात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः॥६४॥ बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनैवात्मात्मना जितः । स एव नियतो बंधुः स एव नियतो रिपुः॥६५॥ क्षुद्राक्षेणेव जालेन झपावपिहितावुरू। कामश्च राजन् क्रोधश्च ती प्रज्ञानं विलुपतः।।६।। ही भ्रष्ट होजाताहे ॥ १२ ॥ जो कि अोंका तो स्वामी है पर इन्द्रियों का साली नहीं है वह इन्द्रियों का सामी न होनेसे ऐश्वर्यसे भष्ट होजाता मात्र यह है कि ऐश्वर्य पाकर जो कि अपने इंद्रियोंको पामें नहीं रखता है यह इसी दोपकर ऐश्वर्यते भ्रष्ट होजाताई ॥६॥ आरमाकर रोकेदुए मनयुद्धि और इंद्रियों से आत्माको अपने वशीभूत फर यह आरमा ही आस्माका बन्धु और आत्मा ही आत्माका शव है ॥१४॥जिस भात्माकर आत्मा जीतागया है उसी आत्माका आरमा बन्धु है और जिस प्रात्माकर आत्मा नहीं जीतागपाहे टसी सात्माका मात्मा है इस कारण आरमा ही अपना निपत गन्धु और आत्मा . ही अपना तियत शन है॥१५॥ जिमप्रकार कि जाटकर फंसे.. .
(६०) .विदुरनीति- एतान्यनिगृहीतानि ब्यापादयितुमप्यलम् । अविधेया इवादांता हयाः पथि कुसारथिम ६०॥ अनर्थमर्थतः पश्यन्नथं चैवाप्यनर्थतः । इंद्रियैरजितेर्वालः सुदुःखं मन्यते सुखम् ॥ ६१॥ धर्माथों यः परित्यज्य स्यादिद्रियवशानुगः। श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्रं स परिहीयते ॥ ६२॥ रथ है. और आत्मा सारथि है और इंद्रिय घोडे है उनको वशमे किये हुए इन्द्रियरुपयोडोंकर सावधानहुआ कुशलयुक्त धीरजन इसप्रकार 'संसारमै विचरता है जिस प्रकार रथी अच्छीतरह वशमें कियेहुए श्रेष्ठ घोडाओंकर मार्गमे चलताहै ॥ ५९ ॥ यह नहीं वशमे कियेहुए ही इंद्रियरूप घोडा आत्माके नाश करदनेको समर्थ भी होसक्तेहं । जिसप्रकार कि नहीं शिखटाये हुए और नहीं घशमें कियटुए घोडे मार्गमे सारथिको पटक देतेहैं ॥ १० ॥ जो कि नहींजीते हुए इंद्रियों से पराजित हो अनर्थको अर्थ कर देखता और अर्थको अनर्थ कर देवताहुआ दुःखको सुख मानताहै वह मूर्ख . है ॥ ११ ॥ जो कि धर्म और अर्थ इन दोनोंको त्यागकर इन्द्रियोंके, वंशमें चलता है यह लक्ष्मी और प्राण और धन तथा स्त्रियोंसे शीघ्र 1 भाषारीकासमेता। अर्थानामीश्वरो यः स्यादिद्रियाणामनीश्वरः। इंद्रियाणामनेश्वर्यादेश्वर्याश्यते हि सः ॥ ६३॥ आत्मनात्मानमन्विच्छेन्मनोबुद्धींद्रियैर्यतैः।- आत्मा ह्येवात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः।।६४॥ बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनैवात्मात्मना जितः स एव नियतो बंधुः स एव नियतो रिपुः॥६५॥ क्षुद्राक्षेणेव जालेन झपावपिहितावुरू । कामश्च राजन् क्रोधश्च तौ प्रज्ञानं विलुपतः॥६६॥ ही भ्रष्ट होजाताहै ।। १२ ॥ जो कि अर्थोका तो स्वामी है पर इन्द्रियोंका स्वामी नहीं है वह इन्द्रियोंका स्वामी न होनेसे ऐश्वर्यसे भष्ट होजाताहै भाव यह है कि ऐश्वर्य पाकर जो कि अपने इन्द्रियोंको पशमें नहीं रखताहे वह इसी दोपकर ऐश्वर्य से भ्रष्ट होजाताई ॥१३॥ आत्माकर रोकेजुए मनबुद्धि और इंद्रियों से आत्माको अपने वशीभूत करे यह आत्मा ही आत्माका वन्धु और आत्मा ही आत्माका शत्रु है ॥६॥जिस आत्माकर आत्मा जीतागया है उसी आत्माका आत्मा बन्धु है और जिस आत्माकर आत्मा नहीं जीतागयाहै उसी आरमाका आस्मा शत्रु है इस कारण आस्मा ही अपना नियत बन्धु और आत्मा ही अपना तियत शत्रु है ॥ १५॥ जिसप्रकार कि जालफर फँसे- (६२) विदुरनीति- समवेक्ष्येह धर्मार्थों संभारान् योऽधिगच्छति । स वै संभृतसंभारः सततं सुखमेधते ॥ ६७ ॥ यः पंचाभ्यंतराञ्शनूनविजित्य मनोमयान । जिंगीपति रिपूनन्यान् रिपवोऽभिभवंति तम्६८॥ दृश्यते हि महात्मानो वध्यमानाः स्वकर्मभिः । इंद्रियाणामनीशत्वादाजानो राज्यविभ्रमैः॥६९॥ असंत्यागात्पापकृतामपापां- स्तुल्यो दंडः स्पृशते मिश्रभावात् । हुए दो महत् मछली थोडस ही छिद्रकर जालको काटदते है तिसी प्रकार हे राजन् ! काम और क्रोध यह दोनों बुद्धिके थोडेसे छिद्रमा. कर महत् ज्ञानको लोप करदेतह ॥ ६६ ॥जो कि यहां धर्म और अयें इन दोनोंको देखकर साधनोंको प्राप्त होताहे वह 'संचितसाध- नोवोला निरन्तर सुख पातारहता है । ६७ ॥ जो कि मन है प्रधान जिनमें ऐसे भीतरके पांचों इंदियरूप शत्रुओंको न जीतकर' अन्य- शत्रुओंको जीतना चाहताहै उसको वह शत्रु ही पराजित करदेरोहे ।। ॥ १८ ॥ जिसप्रकार कि अपने काँस बंधहुए महात्मा जन दीखतेरे : तिमी प्रकार इन्द्रियों के मशम न करनेसे राम्य विमोकर बंधेरे रागालोग दीवतहीदिशापापकर्म करनेवान्दोको त्यागन करनेसे किन्न ।
भाषाटीकासमेता। (६३) शुष्केणाई दह्यते मिश्रभावा- तस्मात्पापैः सह संधिं न कुर्यात् ॥ ७॥ निजानुत्पततः शवपंच पंचप्रयोजनान् । यो मोहान विगृह्णाति तमापद ग्रसते नरम्॥७॥ अनसयार्जयं शौचं संतोपः प्रियवादिता। दमः सत्यमनायासो न भवंति दुरात्मनाम् ७२॥ आत्मज्ञानमनायासस्तितिक्षाधर्मनित्यता। वाक् चैव गुप्ता दानं च नैतान्यंत्येषु भारत ७३॥ टनकमाय मिनिमे अपारियोको भी पापियों के समान टण्ट पर्दा फमा । जिमप्रकार कि सूर्ण इंधन के साथ मिठनम गीला इंधन जल- जाता है। बिमकारण पापियोके साथ मगह न करे ॥ ७० ॥ शम्द, पश, म्प, ग,गंध यह पाच रिचय जिनके ऐसे नहीं शगे बनेरी पान नियमप शगुभोंको जो मोहमे नही रोकमक्ताई गा गरको आपदा प्रमोध है ॥ १ ॥ अनसूया नाम दूसरों के गुणोंगे दो न दगाना और आप नाम कोमा सभार होना और शान भाग परिप राना और गन्नोर और प्रिय योग्ना और दम नाम इन्द्रियोका गेग्ना भोर माय मया अनायाम नाम स्थिरना यह गुण दुरा मांगोंग नही होमेहे ॥ ७ ॥ है भारम ! आग्मान और विदुरनीति- आक्रोशपरिवादाभ्यां विहिंसंत्ययुधा बुधान् । पक्का पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्यते॥७४।- हिंसा पलमसाधूनां राज्ञां दंडविधिर्वलम् । शुश्रूपा तु बलं स्त्रीणां क्षमा गुणवतां बलम्७५ ॥ वासंयमो हि नृपते सुदुष्करतमो मतः । अर्थवच्च विचित्रं च न शक्यं बहुभाषितुम् ७६॥ 1 स्थिरता और सहनशील होना और सदैव धर्मका बनारहना और गुप्तभाषण और दान यह गुण नीचजनोंमें नहीं होतेहैं ॥ ७३ ॥ भाकोश नाम कठोर बोलना और परिवाद नाम निन्दा इन दोनोंसे मूर्वजन पण्डितोंकी हिसा करतेहै । पर कठोर वचन और निन्दा कहनेपाला ही पापको ग्रहण करता है और सहनेवाला उम पापसे छूटजाता है ॥ ७४ ॥ अमाधु नाम दुरात्माओका बल हिमा है और राजाओंका वल दण्डविधि है और स्त्रियोका बल शुश्रूपा है और : गुगपानोंका बल क्षमा है ॥ ७ ॥ हे नृपते! संसारमें वचना रोकना ही अश्यन्न दुष्कर मानागया है जो किषचन अधा युक्त और भासे चिपविचित है यह बहुत बोलनेको नहीं समय होता।।७।। + भाषाटीकासमेता। (६५) अभ्यावहति कल्याण विविध वाक् सुभापिता। सेव दुर्भापिता राजन्ननायोपपद्यते ॥ ७७॥ रोहते सायकैर्विदं वनं परशुना हतम् । वाचादुरुक्तं बीभत्संन संरोहति वाक्क्षतम्।।७८॥ कर्णिनालीकनाराचा निर्हरंति शरीरतः। वाक्शल्यस्तु न निर्हत शक्यों हृदिशयोहि सं७९ वाक्सायका वदनानिष्पतति, येराहतः शोचति राज्यहानि । है राजन् ! सुन्दर प्रकार कही हुई याणी पिपिधकन्यागको प्राप्त करती है । और वह ही वाणी कठोरतापूर्वक कहीहुई अनर्थ के लिये प्राप्त होघेहे ॥ ७७ ॥ बाणोंसे विदीर्ण कियाहुआ शरीर फिर भरआताह और कुल्हाडीसे काटाहुआ धन फिर जमआता है पर याणीसे कठोर कहना रूप भयकर वाणीका घाव फिर नहीं भरता' है॥ ७८ ॥ कर्णी और नालीफ और नाराच संज्ञक लगेहुए. वाणोको फिर मारनेगाला शरीरमै निकालसता है परन्तु पागीए वाण फिर निकालनेको नहीं समर्थ होताहै। क्योंकि वह वाणीरूप वाण मरण- पर्यन्त दयमें ही सोता है ॥ ७९ ॥ वाणासप वाण मुसमे इसप्रकार । ३ (६६) विदुरनीति- परस्य नामर्मसु ते पतंति, .. तान्पंडितो नावसृजेत्परेभ्यः॥ ८० ॥ यस्मै देवाः प्रयच्छंति पुरुपाय पराभवम् । बुद्धिं तस्यापकर्पति सोऽवाचीनानि पश्यति८॥ बुद्धौ कलुपभूतायां विनाशे प्रत्युपस्थिते । अनयो नयसंकाशो 'हृदयानापसर्पति ॥ ८२ ॥ सेयं बुद्धिः परीता ते पुत्राणां भरतर्पम । निकलते हैं जिनकर ताडाहुआ जन रात्रिदिन शोच करताहै और वह दूसरेके मर्मस्थलों के व्यतिरिक्त और जगह नहीं गिरतेहैं किन्तु मर्मस्थलों के विर्ष ही गिरतेहें इसकारण उन वाणीरूप घाणोको पण्टितजन दूसरों के लिये न छोड ॥ ८ ॥ जिस पुरुषपके .. लिये देवता पराजय . देते हैं उसकी बुद्धिको, खींचलेतेहैं यह फिर बुद्धि हरजानेपर नीचकर्माको ही देखताहै ॥ १॥ विनाशके उपस्थिन होनेपर बुद्धि मलीन होजातीहै उस समय नीनिके समान अनीनि उसके हृदयसे नहीं निकलती है । भाव यह है कि जिससमय मिनाशकाल आता है उस समय बुद्धि मन्द होजावहै और बुद्धिकमन्द होनेपर नीति उसके हृदयमें नहीं रहती है किन्तु अनीति स्थित रहती है ॥ ८२ ॥ हे मरतर्षभ ! सो यह ही बुद्धि तुम्हारी मी पुत्र और भापाटीकासमेता। (६७) पांडवानां विरोधेन न चैनानवबुध्यसे ।। ८३ ॥ राजा लक्षणसंपन्नस्त्रैलोक्यस्यापि यो भवेत् । शिष्यस्ते शासिता सोऽस्तु धृतराष्ट्र युधिष्टिर:८४ अतीव सर्वान्पुत्रांस्ते भागधेयपुरस्कृतः तेजसा प्रज्ञया चैव युक्तो धर्मार्थतत्त्ववित्॥८५॥ अनुक्रोशादानृशंस्याद्योऽसौ धर्मभृतां वरः । गौरवात्तव राजेंद्र वहून्केशास्तितिक्षति ॥८६॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥३४॥[२] पाण्डवोंके विरोधसे आकर प्राप्त हुईहै । इसको तुम नहीं जानते हो।। ॥ ८३ ॥ जो कि लक्षणोंसे युक्त होताहै वह ही तीनों लोकोंका राजा होसक्ता है । इस कारण हे धृतराष्ट्रजी ! तुम्हारे शिष्य वद युधिष्ठिरजी पृथिवीके शासन करनेवाले होवे ॥ ८४ ॥ वह युधिष्टिरजी तुम्हारे समस्त पुत्रोंके प्रति राज्यके भागमें मुख्य होयें क्यों कि वह तेज और बुदिस युक्त और धर्म अर्थक तत्तो जाननेवाले हैं ॥ ८५ ॥ है राजेन्द्र । जो कि धर्मधारियों के मध्यमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर है वह दया और अफरता तथा तुम्हारे गौरवसे बहुतसे क्लेशोंको सहम्हेहे ॥ ८६ ॥ इति श्रीमहाभारत उद्योगपणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतियाक्ये श्रीपाट- फशावतस--पण्डितमंगलसैनात्मजकाशिरामविरचितभाषाति- टके चस्त्रिंशोऽध्यायः । ३४ [२] विदुरनीति- धृतराष्ट्र उवाच । बहि भूयो महाबुद्ध धर्मार्थसहितं वचः। शृण्वतो नास्ति मे तृप्तिर्विचित्राणीह भायसे॥॥१॥ विदुर उवाच । सर्वतीर्थेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम् । उभे वेते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते॥२॥ आर्जवं प्रतिपद्यस्व पुत्रेषु सततं विभो।' इह कीर्ति परां प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि॥३॥ इसके अनन्तर धृतराष्ट्रजी महाराज विदुरजीसे फिर कहतेहुए है महाबुद्दे ! धर्म,अर्थ,सहित वचन फिर कहिये क्यों कि तुम्हारे पाक्यके सुनते २ मेरी तृनि नहीं होघे है कारण कि आप विचित्र पचन कहते हो ॥१॥ तव विदुरजी महागन फिर राजा धृतराष्ट्रसे कहनेलगे । हे राजन् ! एक तौ समस्त तीर्थीमे स्नान करना, दूसग समस्त माणियोंमें आर्जव अर्थात् विपमता न करना यह दोनों समान है । पर समस्त तीयोंके स्नानसे समस्त प्राणियोंमें विषमता न करना ही श्रेष्ठ ।२।। इससे हे विभो ! अपने पुत्रोंके वि और पांडवोंमें सदा ही आजी अर्थात् समताको प्राप्त हूजिये । समता करने से इस लोकमें परमर्कात्ति
मापाटीकासमेता।
यावत्कीर्तिमनुप्यस्य पुण्या लोके प्रगीयते ।
तावत्स पुरुपव्याघ्र स्वर्गलोके महीयते ॥४॥
अवाप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् ।
विरोचनस्य संवादं केशिन्यथें सुधन्वना ॥५॥
स्वयंवरे स्थिता कन्या केशिनी नाम नामतः ।
रूपेणाप्रतिमा राजन विशिष्टपतिकाम्यया॥६॥
विरोचनोऽथ देतेयस्तदा तंत्राजगाम ह ।
प्राप्तुमिच्छंस्ततस्तत्र दैत्येंद्र प्राह केशिनी ॥७॥
पाय मरकर स्वर्ग पावोगे ।। ३ ॥ हे पुरपन्याघ्र ! जबतक संसारमें
मनुष्यकी पवित्र कीर्ति गान कीजाती है तबतक यह स्वर्गलोकमें
विराजमान रहताहै ॥ ४॥ यहां पूर्वाचार्य एक पुराना इतिहास कहते हैं
जिसमें फेशिनीके अर्थ सुधन्याके साथ विरोचनका संपाद है ॥ ५ ॥
हे राजन् । श्रेष्ठपतिक पानेकी इन्चासे एक केशिनी नाम कन्या
सयग्में स्थित थी । केसी वह कन्या थी कि जिसके समान रूप
फरके कोई भी न थी ॥ ६॥ उस समय उस स्वयंरके पिप केशि-
नी प्रान करनेकी इन्छागाला विरोचन देतेय आवनाहुआ तदनन्तर
दम स्वयंवरमें काशिनी विरोचन नाम देन्यगजमे कहनेटगी ॥ ७ ॥
(७०) विदुरनीति- केशिन्युवाच। किंब्राह्मणाःस्विच्छ्रेयांसो दितिजाः स्विद्विरोचन। अथ केन स्म पर्यकं सुधन्वा नाधिरोहति ॥८॥ विरोचन उवाच। प्राजापत्यास्तु वै श्रेष्ठा वयं केशिनि सत्तमाः। अस्माकं खल्विमे लोकाःके देवाः के द्विजातयः९ केशिन्युवाच । इहेवावां प्रतीक्षाव उपस्थाने विरोचन । सुधन्वा प्रातरागंता पश्येयं वां समागतौ ॥१०॥ हे विरोचन ! मैं तुमसे पूछतीहूं कि क्या ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं कि देत्य क्या सुधन्वा ब्राह्मण हमारे पर्यकपर नहीं चढसक्ता है किन्तु चढसक्ता है कारण कि वह श्रेष्ठ है और तुम श्रेष्ठ नहीं ॥८॥ तव विरोचन उस कन्यासे कहनेलगा हे केशिनी ! हम प्रजापतिके सन्तान अतीव श्रेष्ठ हैं और हमारे ही यह सर्वलोक हे देवता कौन होतेहैं और ब्राह्मण कौन होतेहैं ॥९॥ तव केशिनी कहनेलगी । हे विरोचन ! यहाँ मेरे समीप मुवन्वाके आगमनमें हम तुम दोनों प्रतीक्षा करतेहैं सुधन्वा प्रातःकाल आयेंगे तब मैं तुम आयेहुए दोनोंको देखूगी ॥ १० ॥ , भापाटीकासमेता.। (७१) विरोचन उवाच । तथा भद्रे करिप्यामि यथा त्वं भीरुभापसे। सुधन्वानं च मां चैव प्रातईप्यासि संगतौ ११॥ विदुर उवाच । अतीतायां च शर्वर्यामुदिते सूर्यमंडले । अथाजगाम तं देशं सुधन्वा राजसत्तम । विरोचनो यत्र विभोकेशिन्या सहितःस्थितः१२ सुधन्वा च समागच्छत्साहादि केशिनी तथा । समागतं द्विजं दृष्ट्वा केशिनी भरतर्षभः । प्रत्युत्थायासनं तस्मै पाद्यमयं ददौ पुनः।।१३॥ तब विरोचन कहताहुआ हे भद्रे ! में तिसीप्रकार करूंगा जिसप्रकार कि हे भीर ! मुझसे कहतीहै । सुधन्वाको और मुझे दोनोंको इकट्ठा हुआ तू प्रातःकाट देरोगी ॥ ११ ॥ पिदुरजी राजा धृतराष्ट्रसे कहते दुए कि हे राजसत्तम ! रात्रिके व्यतीत हो जानेपर सूर्यमंटल उदय- को ग्रामदुप मुधवा उसी देशको आफर प्राप्तहुए जहां कि हे विभो । केशिनीसहित निरोचन स्थित था ॥ १२ ॥ वह सुधन्वा पाहण महादके पुत्र शिरोचन और केशिनीके प्रति भावते हुए.
(७२) विदुरनीति- सुधन्वोवाच। अन्वालमे हिरण्मयं प्राहादे ते वरासनम् । एकत्वमुपसंपन्नी न त्वासेऽहं त्वया सह ॥ १४॥ विरोचन उवाच । तवाहते तु फलकं कूर्च वाप्यथवा वृसी । सुधन्वन्न त्वमोऽसि मया सह समासनम् १५॥ सुधन्वोवाच । पितापुत्री सहासीतां दो, विप्रो क्षत्रियावपि । वृद्धी वैश्यौ च शुद्रौ च न त्वन्यावितरेतरम् १६ हे भरतर्षम ! तब उस आयेहुए ब्राह्मणको दोवकर केशिनी खडी हो उस ब्राह्मण के लिये आसन फिर पाद्य और अर्घ्य देती हुई॥ १३॥उससमय सुधन्वा समीपमें बैटेहुए विरोचनसे कहनैलगे है प्रह्लादके पुत्र ! तुम्हारे सुवर्णमय श्रेष्ठ आसनको हम केवल चरणोंसे स्पर्श ही करमक्ते हैं पर एकताको प्राप्तहुए तुम्हारे साथ बैठ नहीं सक्तह।। १४॥तब इतना वाक्य सुनकर विरोचन सुधन्यास कहने लगे हे सुधन्वन् ! फलक नाम काटका पीदा या कृर्ष वा वृसी नाम कुशमा आसन तुम्हारे योग्य होसताहे तुम हमारे साथ वायर बटनेको नहीं योग्य हौ ११५१ तव सुधन्वा , भापाटीकासमेता। (७३) पिता हि ते समासीनमुपासीतेव मामधः । वालः सुखैधितो गेहेन त्वं किंचन बुध्यसे॥१७॥ विरोचन उवाच। हिरण्यं च गवाश्वं च यद्वित्तमसुरेषु नः । सुधन्वन्विपणे तेन प्रश्नं पृच्छाव ये विदुः॥१८॥ सुधन्वोवाच । हिरण्यं च गवावं च तवैवास्तु विरोचन । प्राणयोस्तु पणं कृत्वा प्रभं.पृच्छाव ये विदुः५९।- बोले हे पिरोचन ! पितापुत्र मिलकर एक जगह बेठसत्ते हैं और दो ब्राह्मण और दो क्षत्रिय और दो वृद्धयेश्य और दो शूद्र भी मिलकर एक जगह बैठ सने हैं परन्तु अन्यजातीय दो परस्पर नहीं बैठ सही।. ॥ १६ ॥ आसनपर बेटेटुए मुझको तुम्हारे पिता महादजी नीचे बैठकर मेर किया करतेहैं तुम वादक हो घरमे सुखक रढे तो अभी सन् असत् कुछ भी नहीं जानते हो ॥ १७ ॥ तव सुधन्वास विरो- चन कहतेहुए। हे सुधन्वन् ! सुवर्ण और गौ घोडा और जो धन हम दैत्योंपर है उसके हारनेका पग किये जानेपर हम 'तुम उनसे प्रश्न पूछे जो कि हमारे तुम्हारे दिगदको जानतह ॥ १८ ॥ तब मुधन्ना बोले, हे विरोचन ! सुर्ण और गौ घोडा सब तुम्हारा - (७४) विदुरनीति- विरोचन उवाच । आवां कुत्र गमिप्यावः प्राणयोर्विपणे कृते । न तु देवेष्वहं स्थाता न मनुष्येषु कहिचित्र२० ॥ सुधन्वोवाच । पितरं ते गमिप्यावःप्राणयोविपणे कृते। पुत्रस्यापि स हेतोहि प्रहादो नानृतं वदेत् ।। २ ।। विदुर उवाच । एवं कृतपणी कुदी तत्राभिजग्मतुस्तदा । विरोचनसुधन्वानी प्रसादो यत्र तिष्ठति ॥२२॥ ही रहो हम तुम दोनों प्राणोंके हारनेका पण करके उनसे प्रभ पूछेगे जो कि हमारे तुम्हारे विवादको जानतेहे ॥ १९ ॥ तब विरोचन कहतेहुए। प्राणों के हारनेका पण कियेजानेपर हम तुम दोनों प्रभ पूंछनेको कहा चलेंगे मैं देवता और मनुष्यों के विष तो कदाचित् भी नहीं स्थित होऊगा ॥२०॥ तब मुधन्वा कहतहुए हे शिरोचन प्राणोंके हारनेका पण कियेजानेपर हम तुम दोनों तुम्हारे पिताके प्रति चलेंगे क्योंकि वह तुम्हारे पिता प्रह्लादजी पुत्रके भी कारण झूठ नहीं कहसक्ते हैं ॥ २१ ॥ विदुरजी कहतेहैं कि इसप्रकार परस्पर किया भापाटीकासमेता। प्रहाद उवाच। इमौतौ संप्रहश्येते याभ्यां न चरितं सह । आशीविपाविव क्रुद्धावेकमार्गाविहागतौ ॥२३॥ किं वै सहैवं चरथो न पुरा चरथः सह । विरोचनैतत पृच्छामि कि ते सख्यं सुधन्वना २४ विरोचन उवाच। न मे सुधन्वना सख्यं प्राणयोर्विपणावहे । प्रहाद तत्त्वं पृच्छामि मा प्रश्नमनृतं वदेः ॥२६॥ हे पण जिन्होंने ऐसे क्रोक्तिहुए विरोचन और सुधन्या उसीसमय तहां जातेहुए जहां कि प्रह्लादजी स्थित थे ॥ २२ ॥ उनको देखि प्रहादजी कहतेहए दो सके समान क्रोधितहुए एकमार्गबाले यह यह दोनों यहां आयेहुए दीखते हैं जिन्होंने कदापि एकजगह गमन नहीं किया ॥ २३ ॥ तुम दोनों इस प्रकार कैसे विचरते हो तुम दोनों तो एकसाथ मिलकर पहिले कभी नहीं विचरेथे है विरोचन ! तुशसे में यह पूछता हो कि क्या तुम्हारी सुधन्वा के साथ मित्रता है।॥ २४ ॥ तय विरोचन कहनेटगा मेरी सुधन्वा के साथ कुछ मी मिनना नहीं है हम दोनों प्राणोके हारनेका पण कर रहे
(७६)
विदुरनीति-
प्रहाद उवाच।
उदकं मधुपर्क वाप्यानयंतु सुधन्वने ।
ब्रह्मन्नभ्यर्चनीयोऽसि श्वेता गौः पीपरी कृता २६
सुधन्वोवाच ।
उदकं मधुपर्क च पधिप्वेवार्पितं मम ।
प्रह्लाद त्वं तु मे तथ्यं प्रश्न प्रवाहि पृच्छतः ।
किं ब्राह्मणाःस्विच्छेयांस उताहो स्विविरोचनः२७
प्रसाद उवाच ।
पुत्र एको मा ब्रह्मस्त्वं च साक्षादिहास्थितः ।
तयोर्विवदतोः प्रश्नं कथमस्मदिधो वदेत् २८ ।।
हे प्रह्लाद ! मैं तुमसे तत्त्व पूछता ही मुझसे आप झूठ प्रश्न न कहिय।।
॥ २५ ॥ तव प्रसादजी बोले तुम सब संवकगण मुधन्वा के लिये
जल और मधुपर्क ल्याइये,हे ब्रमन् ! तुम हमारे पूजनीयही मैंने तुम्हारे
ही अर्थ श्चन गौ पुष्ट की है ॥ २६ ॥ तब सुधन्धा कहलैहुए जल्ट
और मधुपर्क नो मेरा नागमेही अर्पण होगया है अर्थात् छुटगया
हे महाद ! अब मुझ पूछनालेसे मत्य प्रश्न कहिये में पूछता ही। क्या..
वाराण श्रेष्टह, अथवा विरोचन श्रेहे ! ॥ २७ ॥ तब प्रहादी यो
,
है
.
भापारीकासमेता।
(७७)
सुधन्वोवाच ।
गां प्रदद्यास्त्वौरसाय यद्वान्यत्स्यात्प्रियं धनम् ।
द्वयोर्विवदतोस्तथ्यं वाच्यं च मतिमंस्त्वया २९॥
प्रहाद उवाच ।
अथ यो नैव प्रत्यात्सत्यं वा यदि वानृतम् ।
एतत्सुधन्वन्पृच्छामि दुर्विवक्तास्म किं वसेत् ३०
सुधन्वोवाच ।
यां रात्रिमधिविना स्त्री यां चैवाक्षपराजितः ।
यांच भाराभितप्तांगो दुर्विवक्तास्मतां वसेत३१॥
हे ब्राह्मण ! मेरा एक ही पुत्र है और तुम माक्षात् यहां आकर स्थित
हुए हो फिर कहिये तिन झगडनेवाले तुम दोनोंका प्रश्न मेरे सदृश
जन कैसे कहमक्ताहै ॥ २८ ॥ नत्र सुधन्वा प्रह्लाद से कहतेहुए है
श्रेष्ठबुदियाले ! गो और जो अन्य प्रियधन हो वह अपने पुत्रको दीजिय
इम ममय नो अगडनवाले हम दोनोका प्रश्न तुमको सत्य कहना
चाहिये ॥ २९ ॥ तब ग्रहादजी करतेहुए हे मुधन्वन् ! मै तुमसे यह
पूछताही कि जो पूंछनेपालमें सन्य अथका झूट कुछ भी न कहे वह
अन्यायमा किम दुःखको प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ सब मुधन्धा कहने
(७८) विदुरनीति-
नगरे प्रतिरुद्धः सन बहिरे बुभुक्षितः ।
अमित्रान्भूयसः पश्येद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत्॥३२॥
पंच पश्चनृते इति दश हंति गवानृते ।
शतमश्वानृते हंति सहस्रं पुरुपानृते ॥ ३३ ॥
हुए
अधिविना अर्थात् सपत्नीके साथ पतिके गृहमे रहनेवाली स्त्री
जिम रात्रिको वसती है और यूनकर्ममे पराजितहुआ जिस रात्रिको
घसताहे और वोझसे सपायमानहुए अंगोवाला जिस रात्रिको बसता है
उसी रात्रिको अन्यायवक्ता वसताहे । मात्र यह है कि जिस दुःखको
यह प्राप्त होतहें उसीके समान दुःखको अन्यायवक्ता प्राप्त होताई ॥
॥३१॥ वह नगरमें क्षुधर्त होकर रुकाहुआ दरवाजेके वाहिर बहुतसे
शशुओंको देखता है जो कि साक्षी होकर झूठ बोलताहे भार यह है
झूठ बोलनेवाला साक्षी उस दुःखको पाताहै जिस दुखका कि क्षुधात
होकर शत्रुओं के साथ घिराहुआ प्राप्त होताहै ॥ ३२ ॥ पशुमात्रके
अर्थ
झूट कहेजानेपर नर पंचपुरुषोंको नाश करताहै और गौके अर्थ.
झूठ कहजानेपर नर दश पुरुषोंको नाश करताहे और घोडाओके
अर्थ झूठ कहेजाते पर नर सौ पुरुषोंको नाश करताहै । और पुरुषके
अर्थ झूठ कहेजानेपर नर हजार पुरुषोंको नाश करताहै ॥ ३३ ॥
भाषाटीकासमेता। हंति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन् । सर्व भूम्यनृते हंति मा स्म भूम्यनृतं यः ॥ ३४॥ प्रहाद उवाच। मत्तःश्रेयानंगिरा वे सुधन्वा त्वविरोचन । मातास्य श्रेयसी मातुस्तस्मात्त्वं तेन वेजितः३५. विरोचन सुधन्वायं प्राणानामीश्वरस्तव । सुधन्वन्पुनरिच्छामि त्वया दत्तं विरोचनम्३६॥ सुधन्वोवाच । यद्धर्ममवृणीयास्त्वं न कामादनृतं वदीः । सुवर्णरे अर्थ ाठ कहनाटुआ नर उत्पन्न हुए राया अमारी होनेवालों को नाश करताहे और पृथिवी के अर्थ झूट कई जानेपर सबको नारा फरताहै । इसकारण आप पृथियो तुल्य वीके अर्थ इंट मत कहियो।। ॥ ३४॥ तत्र प्रहादती योले ! हे विरोचन ] मुटासे तो श्रेष्ट मुधन्या के पिता अंगिरा है और तुमसे भ्रष्ट मुधन्या है और इनकी माना तुम्हारी मातास श्रेष्ट हे सिससे नुम इन मुधन्याने जीतलिये ॥३५॥ गिरोचन ! अब यह मुधन्या तुम्हारे प्राणों के स्वामी है, चाहे छोड चाहें न छोडे राय इतना रिरोचनमे फल सुधन्यास प्रहादी प्रार्थना करने लगे। हे सुधन्वन् ! तुम फर आण कियेहए विरोचनको फिरंग ना चाहना हो । २६ ॥ इस समय मुथन्या महादजीरी कनटगे N (८०) विदुरनीत- पुनर्ददामि ते पुत्रं तस्मात्प्रहाद दुर्लभम् ॥ ३७॥ एप प्रहाद पुत्रस्ते मया दत्तो विरोचनः। पादप्रक्षालनं कुर्यात्कुमार्याः सन्निधौ मम ॥३८॥ विदुर उवाच । तस्माद्राजेंद्र भूम्यर्थे नानृतं वक्तुमर्हसि । मा गमः ससुतामात्यो नाशं पुत्रार्थमनुवन् ३९॥ न देवा दंडमादाय रक्षति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छंति बुद्धया संविभजति तम् ४० है प्रबाद जो कि तुम धर्मको ही वरनेहुए और कामसे झूठ नहीं कहतेदए तिसकारणसे में तुम्हारे लिये फिर दुर्लभ पुत्र दिये देताई ॥ ॥ ३७॥ हे प्रहाद ! मुझकर दियाहुआ यह तुम्हारा ही पुत्र विरोचन मेरे समीपसे कुमारी केशिनीको वरनेके लिये पादप्रक्षालन करौ हम नहीं वरना चाहतेहैं ॥ ३८ ॥ विदुरजी राजा धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि तिससे है राजेन्द्र ! पृथिवीके अर्थ झूठ कहनेको तुम योग्य नहीं हो पुरोके अर्थ मन्य न कहतहुए तुम पुत्रमन्त्रियों सहित नाशको मत प्राप्त होगौ ॥ ३९ ॥ जिसप्रकार कि दण्ट लेकर पशुपाल पशुओंकी रक्षा करतहै तिस प्रकार देवता दद लेकर मनुष्योंकी नहीं रक्षा करतेहैं , भापाटीकासमेता। (८१) यथा यथा हि पुरुपः कल्याणे कुरुते मनः । तथा तथास्य सर्वार्थाः सिध्यंते नात्र संशयः४१॥ नेनं छंदांसि वृजिनात्तारयंति, मायाविनं मायया वर्तमानम् । नीडं शकुंता इव जातपक्षा- श्छंदांस्येनं प्रजहत्यंतकाले ॥ ४२ ॥ मद्यपानं कलहं पूगवेरं, भापत्योरंतरं ज्ञातिभेदम् । किन्तु जिसकी रक्षा करना चाहतेह उनको बुद्धिकर विभक्त करदेतहैं। ॥४०॥ इमकारण जिम २ प्रकार पुरुष कल्याणमे मन करताहे. तिसीर प्रकार उसके समस्त अर्थ सिद्ध होतेहैं इसमे संशय नहीं है। ॥४१॥ मायाकरके वर्तमान हुए मायानीजनको येद कष्टसे नहीं तारमक्ते है किन्तु उमको अन्तफालके विष त्यागदतेहैं जिसप्रकार जमेदुए परापाले पक्षी नीड नाम पक्षिगृहको त्यागदेतह ॥ ४२ ॥ मदिराका पान और कलर (लदाई और बहनोंसे थैरभाव और पनिषीमा परम पियोग और जातिम पृथक होना और राजा पर और सीपुरका गिद और गे कि अनिदुष्ट मार्ग है यह सब .
(८२) विदुरनीति- राजद्विष्टं स्त्रीपुंसयोर्विवाद, वान्याहुर्यश्व पंथाः प्रदुष्टः ॥ १३ ॥ सामुद्रिकं वणिजं चोरपूर्व, शलाकधृतं च चिकित्सकं च । आरं च मित्रं च कुशीलवं च, नेतान्साक्ष्ये त्वधिकुर्वीत सप्त ॥४४॥ मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं, -मानेनाधीतमुत मानयज्ञः। एतानि चत्वार्यभयंकराणि, भयं प्रयच्छंत्ययथाकृतानि ॥ ४५ ॥ व्यागने योग्य है ऐसा पूर्वाचार्य कहतेहै ॥४३॥ सामुद्रिक नाम हस्तरेखादिकी परीक्षा करनेवाला और वणिक और जो कि पहिले चौर हो और शलाकधूर्त अर्थात् दसरोंका ठगनेवाला और चिकित्सा करनेवाला और शत्रु और मित्र और कुशीला अर्थात् निन्दितशील रखने- वाला इन सातोंको कदाचित् भी साक्ष्य नाम गवाही नहीं नियुक्त करे ॥ ४४ ॥ मानपूर्वक अग्निहोत्र और मानपूर्वक मौन और मानपू- वक अध्ययन और मानपूर्वक यज्ञ यह चारों अभय करनेवाले हैं परन्तुं 4
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मापाटीकासमेता।
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी।
पर्वकारश्च सूची च मित्रधुक्पारदारिकः॥४६॥
भ्रूणहा गुरुतल्पीच यश्च स्यात्पानपोदिजः।
. अतितीक्ष्णश्च काकश्च नास्तिको वेदनिंदकः४७
नुवप्रग्रहणो व्रात्यः कीनाशश्चात्मवानपि ।
रक्षेत्युक्तश्च यो. हिंस्यात्सर्वे ब्रह्महभिः समाः४८॥
यथार नहीं किये हुए भय देतेहे ॥ ४६॥ स्थानको जलानाला और
विष देनेवाला और कुंडाशी अर्थात् भगस जीविका करनेवाला और
मोम बेचनेगला और अन बनानेवाला और चुगल और मित्रस घेर
करनेगला और परस्त्रियोंसे गमन करनाला ॥ ४६ ॥ और गर्भ
गिरानेवाला और गुरुकी शय्यापर स्थित होनेवाला और जो कि
मदिरा पीनेवाला ब्राह्मण है और अतितीक्ष्ण और काक अर्थात
दुःसितको दुःख करनेवाला और नास्तिक तथा वेदनिन्दक ॥ ४७ ॥
और उपप्रग्रहण अर्थात् राजाके दियेहुए अविकारबलसे प्रजास अन्याय
कर धान्यादिका ग्रहण करनेवाला और प्रात्य नाम पतित वा जिसका.
उपनपन नहीं हुआ हो और कीनारा नाम क्रूर और रक्षाकीजिये इस
प्रकार प्राणियों करके कहाहुआ जो समर्थ होकर उन प्राणियोंकी
हिमा करे यह समस्त नान्या करना समान होनहें ॥४८॥
+ - -(८४) विदुरनीति- तृणोल्कया ज्ञायते जातरूपं, वृत्तेन भद्रो व्यवहारेण साधुः। शूरो भयेष्वर्थकृच्छ्रेपु धीरः, कृच्छ्रेप्वापत्सु सुहदश्चारयश्च ॥ १९ ॥ जरा रूपं हरतिहि धेर्यमाशा, मृत्युः प्राणान्धर्मचयीमसया । क्रोधः श्रियं शीलमनार्यसेवा, ह्रियं कामः सर्वमेवाभिमानः ॥५०॥ श्रीमंगलात्प्रभवति प्रागल्भ्यात्संप्रवर्धते । तृणके अंगारसे सुवर्ण पहचाना जाताहै और आचारसे धर्म पहचाना जाताहै और व्यवहारकर माधु जन पहचाना जाताहै और भय होनेपर शूरवीर पहचाना जाता है और अर्थकृच्छू अर्थात् धनके कष्टमे धीर पहचाना जाता है और कष्ट और आपदाओमे मित्र तथा शत्रु पहचाने जातेहें ।। ॥ ४९ ।। जरा नाम वृद्धावस्था रूपको हरलेतीहै और आशा धीरजको हरलेती है और मृत्यु प्राणोंको हरलेताह और असूया ( निन्दा ) धर्म चाको हरलेती है और क्रोध लक्ष्मीको हरलेताहे और अनार्यसेवा अर्थात् असाधुओकी सैना शीलको हरलेती है और काम लजाको : हरलेताहै और अभिमान सबको हरलताहै ॥ ५० ॥ लक्ष्मी शुभकर्मम - र भापारीकासमेता। (८५) दाक्ष्यात कुरुते मूलं संयमात्प्रतितिष्ठति ॥५॥ अष्टौ गुणाः पुरुपं दीपयंति, - प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च । पराकमश्चाबहुभापिता च, दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥५२॥ एतान्गुणांस्तात महानुभावा- नेको गुणः संश्रयते प्रसर । राजा यदा सत्कुरुते मनुप्यं, सर्वान् गुणानेप गुणो विभाति ॥ ५३॥ उत्पन्न होघेहै और प्रगन्भनामे बदनीहे और चतुरतासे अपनी जटको स्थित करनी है और सयम अर्थान् इंद्रियोंके यशमें रखनसे स्थित होजा- "ता है॥५॥आठ गुग पुरुपको प्रकाशमान करने एक तो युद्धि दूसरी फुटीनतातीमग इन्द्रियों का दमनकरना चौया शास्त्राभ्याम पांचवां परा- श्रम घटा बहन बोटना मानां यथाशक्ति दान आठवीं कलाना अर्थात् दगरेके उपकारको जानना||१२|| तान इन बंटे प्रभावपाले आठोंको एक गुणही बटाकार आश्रयकर देना है जो कि प्रभु होकर मनुष्यका मकारम्प गुग सर गुणों मध्यमें विशेष प्रकाशमान होताहै ॥५३॥ - (८६) विदुरनीति- अष्टौ नृपेमानि मनुष्यलोके, स्वर्गस्य लोकस्य निदर्शनानि । चत्वायेंपामन्ववेतानि सनि- श्चत्वारि चेपामनुयांति.संतः ॥५४॥ यज्ञो दानमध्ययनं तपश्च/ चत्वार्यतान्यन्ववेतानि सद्भिः दमः सत्यमार्जवमानृशंस्यं, चत्वार्येतान्यनुयांति संतः ॥५५॥ . इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा घृणा । अलोभइति मार्गोऽयं धर्मस्याटविधः स्मृतः५६॥ हे नृप ! यह अगारी कहेजानेवाले आठ गुण मनुष्यलोकमें स्वर्गलोकके दृष्टान्तहैं इनमें चार तो सजनोंकर सदैव सम्बद रहतेहैं और इनमें चार ऐसेहैं कि जिनके पिछारी सजन चलते ॥ १४ ॥ यज्ञ और दान और अध्ययन और तप यह चार ऐसेहै कि जो सजनोंकर सदैव सम्बद्ध रहतेहैं । और दम अर्थात् इंद्रियोंका दमन करना और सत्य और आर्जव अर्थात् विषमभार न होना और आनुशस्य अर्थत अक्रूरता यह चार ऐसेहें कि जिनके पिछारी स्वयं सजन चलतहैं ॥ ५५ ॥ इच्या नाम यज्ञ करना अध्ययन नाम शास्त्र पढना और दान भापाटीकासमेता। (८७) तत्र पूर्वचतुर्वों दंभार्थमपि सेव्यते । उत्तरश्च चतुर्वगों नामहात्मसु तिष्ठति ॥२७॥ न सा सभा यत्र न संति वृद्धा, न ते वृद्धा ये न वदति धर्मम् । नासी धर्मों यत्र न सत्यमस्ति, न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम् ॥ ५८॥ सत्यं रूपं श्रुतं विद्या कौल्यं शीलं बलं धनम् । शौर्य च चित्रभाप्यं च दशेमे स्वर्गयोनयः५९॥ देना और तप अर्थात् तपस्या करना और सन्य और सहनशील होना और दया और लोभका न होना यह धर्मका आठप्रकारका मार्ग पूर्वा- चार्योने कहाहै ॥ ५६ ॥ तिस आठ प्रकारके धर्मके मार्गमें पूर्वक इज्या अध्ययन दान तप यह चार दम्भके अर्थ अर्थात् पाखण्ड के लिये भी सेवन कियेजाते हैं परन्तु पिछारके सत्य क्षमा दया अलोम यह चार दुरात्माओंके विपैं नहीं स्थिन रहतेहै किन्तु सजनोके ही विर्षे स्थित रहतेहे ॥ १७ ॥ वह सभा नहीं है जिसमें कि वृद्धजन नहीं हो और वह वृद्ध नहीं हैं जो धर्मको न कहतहों और वह धर्म नहीं है जिसमें सत्य न होवे और यह सत्य भी नहीं है जो छलसे युक्त हो ॥ ५८ ॥ सत्य और रूप और शान्नाभ्यास और विद्या और 4 .
(८८) विदुरनीति:- पापं कुर्वन्यापकीर्तिः पापमेवाश्नुते फलम् । पुण्यं कुर्वन्पुण्यकीर्तिः पुण्यमत्यंतमश्नुते ॥६०॥ तस्मात्पापं न कुर्वीत पुरुपः शंसितव्रतः। पापं प्रज्ञा नाशयति क्रियमाणं पुनः पुनः॥६॥ नएप्रज्ञः पापमेव नित्यमारभते नरः । पुण्यं प्रज्ञां वर्धयति क्रियमाणं पुनः पुनः॥१२॥ वृद्धप्रज्ञः पुण्यमेव नित्यमारभते नरः। पुण्यं कुर्वन्पुण्यकीर्तिः पुण्यं स्थानं स्म गच्छति। तस्मात्पुण्यं निपेवेत पुरुपः सुसमाहितः ॥६॥ कुलीनता और शील और वल और धन और शूरता और विचित्र मापण यह दश स्वर्गको योनी है ॥ ५९॥ पाप करताहुआ पुरुष पापकीर्ति होकर पापफलको ही भोगताहे और पुण्य करताहुआ पुरुष पुण्यकीर्ति होकर अत्यन्त पुण्यफलको भोगना ।। ६०॥तिससे प्रशंसा कियेहुए व्रतवाला होकर पुरण पापको कदाचित भी न करे क्यों कि वारंवार कियाहुआ पाप बुद्धिको नाश करदेताह।।६ १॥जिसकी कि बुद्धि नष्ट हो जावेहे वह नर सदा ही पापा आरम्भ करता रहता है और वारंवार कियाहुआ पुष्य बुदिको बढाताहै ॥ ६ ॥ जिसकी चुद्धि बदजातीहै वह पुरुष सदा ही पुण्यका आरम्भ करताहै - भापाटीकासमेता। असूयको दंदशूको निष्ठुरो वैरकृच्छठः। , स कृच्छं महदानोति न चिरात्पापमाचरन्॥६॥ अनुसूयुः कृतप्रज्ञः शोभनान्याचरन्सदा। न कृच्छं महदानोति सर्वत्र च विरोचते ॥६५॥ प्रज्ञामेवागमयति यः प्राज्ञेभ्यः स पंडितः। प्राज्ञो ह्यवाप्य धर्मार्थी शक्नोति सुखमेधितुम् ६६ पुण्य करताहुआ पुण्यकीर्ति होकर पुण्यस्थानको जाताहै तिससे पुरुप सावधान होकर पुण्यका ही सेवन करे ॥ ६३ ॥ जो कि दूसरोके गुणोंमें दोपारोपण करताहै और जो कि ददशूक अर्थात् दूसरों के मर्म स्थलोंका भेदन करताहै और जो कि अप्रिय बोलताहै और जो कि घेर करनेवाला है और जो कि शठ है वह पापका सेवन करने- वाला थोडे ही कालमें शीघ्र ही महत् कष्टको प्राप्त होताहै ॥ ६४ ॥ और जो कि दूसरोंकी निन्दा नहीं करताहै और समस्तकाोंमें जिसने यथोचित बुद्धि की है वह सदा ही शुभकर्म करताहुआ महत्कष्टको नहीं प्राप्त होताहै । और सब जगह प्रकागिन रहताहै ॥६५॥ जो कि पडितजनोस चुद्धिको प्राप्त करताहै वह पंडित है और जो कि पंडित वह धर्म और अर्थको प्राप्त होकर सुख बढानेको समर्थ है ॥६६ ॥ N (९०). विदुरनीति- दिवसेनैव तत्कुर्याद्येन रात्री सुखं वसेत् । अटमासेन तत्कुर्यायेन वर्पाः सुखं वसेत् ॥६॥ पूर्व वयसि तत्कुर्याद्येन वृद्धः सुखं वसेत् । यावजीवेन तत्कुर्यायेन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥१८॥ जीर्णमन्नं प्रशंसंति भार्यां च गतयौवनाम् । शूरं विजितसंग्राम गंतपारं तपस्विनम् ॥ ६९॥ धनेनाधर्मलब्धेन यच्छिद्रमपिधीयते । असंवृतं तद्भवति ततोऽन्यदवदीर्यते ॥ ७० ॥ दिवसभरमें वह कार्य करें जिससे रात्रिमे 'मुखपूर्वक बसे और आठ महीने भरमें यह कार्य कर जिरात वर्षाके : चारमहीना सुखपूर्वक बसै ॥ ६७ ॥ और पूर्व अवस्थामे वह कार्य करें जिससे वृद्ध होकर सुखपूर्वक बसे । और जीवनपर्यन्त वह कर्म करें जिससे मरकर परलोकमे सुखपूर्वक बसे || ६८ ॥ संसारमें जो कि अन्न- भोजन करनेपर पचजाताहै उसकी प्रशंसा करतेहैं। और जिसका यौवन व्यतीत होजाताहै उस स्त्रीकी बुढापेमे प्रशसा करतह और जिसने संग्राम जीतलिया हो उस शूरकी प्रशसा करतेहैं , और गतपार अर्थात् जिसने ईश्वरतत्व प्राप्त करलिया है. उस तपस्वीसी प्रशंसा करतह ॥ ६९ ॥अधर्मसे प्राप्तकिये धनसे जो छिद्र बन्द किया . भापाटीकासमेता। गुरुरात्मवतां शास्ता शास्ता राजा दुरात्मनाम् । अथ प्रच्छन्नपापानांशास्तावैवस्वतो यमः॥७॥ ऋपीणां च नदीनां च कुलानां च महात्मनाम् । प्रभावो नाधिगंतव्यः स्त्रीणां दुश्चरितस्य च७२॥ दिजातिपूजाभिरतो दाता ज्ञातिषु चार्जवी । क्षत्रियः शीलभायाजंश्चिरं पालयते महीम्॥७३॥ सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वंति पुरुपास्त्रयः । शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम्॥७॥ जाताहै वह विना ही मुँदाहुआ रहताहै किन्तु उससे और भी अधिक फटजाताहै ॥ ७० ॥ आत्मवान् नाम चित्तके जीतनेवालोंको शिक्षा करनेवाला गुर है और दुरात्माओंको शिक्षा करनेवाला राजा हैं और गुप्त पापवालोंको दण्ड देनाले सूर्यके पुत्र यमराज हैं ॥७॥ प्रापियोंका और नदियोंका और महात्माजनोंके कुलोंका और स्त्रियों के दुधारितका सामर्थ्य अनन्त होनेसे जाननको समर्थ नहीं होताहै।।७२।। राजन् ! द्विजातियोंकी पूजामे प्रीति रखनेवाला और दान करनेवाला और ज्ञानियों में विषमता न रखनेवाला ऐसा शीलवान् क्षत्रिय बहुत फालतक पृथियीको पालना ।। ७३ ॥ मुवर्ण ही है फूल जिसके ऐसी पृथिवीके मुर्गाप फूलोंको तीन पुरुष सचय करलेतेहै । एक तो भरपीर, दूसरा दियावान् , तीसरा यह जो कि सेवा करना विदुरनीति- बुद्धिश्रेष्ठानि कर्माणि वाहुमध्यानि भारत । तानि जंघाजवन्यानि भारप्रत्यवराणि च ।।७।। दुर्योधनेऽथ शकुनौ मूढे दुःशासने तथा । कणे चेश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि॥७६॥ सगुणेरुपतास्तु पांडवा भरतर्षभ । पितृवत्त्वयि वर्तते तेषु वर्तस्व पुत्रवत् ।। ७७ ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरहितवाक्ये पंचत्रिंशोऽध्यायः॥३५॥ जानता है ।। ७४ ॥ ससारमें कर्म चारप्रकारके हैं तिनमें जो कि बुद्धि- वलसे सिद्ध किये जातेहे वह श्रेष्ठ हैं और जो कि बाहुवलसे सिद्ध किये जाते हैं वह मध्यम है और जो कि कपटादिसे सिद्ध कियेजाते हैं वह अधम है और जो कि भार नाम बलात्कारसे सिद्ध कियेजातेहें वह अति अधम है ॥७५|| दुर्योधन और शकुनि और मूढ दुःशासन और कर्ण इनके विपें ऐश्वर्य रखकर अर्थात् इनके अधीन होकर तुम कैसे ऐसयको चाहते हो||७६॥हे भातर्षभ ! पांडव सर्वगुणोंसे युक्त है और तुम्हारेको पिताके समान मानतेहै तुम भीउनको पुनकी समान मानिये इति श्रीमहाभारत उद्योगपणि प्रजागरपणि विदुरहितवाक्ये . श्रीपाटकवशावतंसपडित्तमंगलसेनात्मजकाशिरामविरचि- तभापातिलके पंचत्रिंशोध्यायः ॥ ३५॥ [३] .
भापाटीकासमेता। विदुर उवाच। अत्रैवोदाहारंतीममितिहासं पुरातनम् । आत्रेयस्य च संवाद साध्यानां चेति नः श्रुतम्। चरंत हंसरूपेण महर्षि शंसितव्रतम् । साध्या देवा महाप्राज्ञ पर्यपृच्छंत वै पुरा ॥२॥ साध्या ऊचुः। साध्या देवा वयमेते मह, दृष्ट्वा भवतं न शक्नुमोऽनुमातुम् । - श्रुतेन धीरो बुद्धिमांस्त्वं मतो ना, काव्यां वाचं वक्तुमर्हस्युदाराम् ॥३॥ इसके अनन्तर फिर पिदुरजी महागज धृतराष्ट्र में कहतेहुए। हे रानन् । यहाँ एक पुरातन इतिहासको कहते जिसमें आत्रेय और सायोका संगद है यह हमने सुना? ॥१॥ परममापसे पिचरने- याले प्रशसितात घटे पंडिन एमे महर्पिसे कभी पहिले साम्यदेवत प्रउनए ॥ २ ॥ साध्यदेव कहने कि महर्षे 1 यह आपके प्रत्यक्ष गद्देदए हम गाप्पदेवता है। आपको देगकर आपके जाननेको नहीं समर्प है. पर मारवटम तुम धार और युमिमान् विदित होती इस . विदुरनीति-- हंस उवाच । एतत्कार्यममराः संश्रुतं मे; धृतिः शमः सत्यधर्मानुवृत्तिः। ग्रंथि विनीय हृदयस्य सर्व, 'प्रियाप्रिये चात्मसमं नयीत ॥४॥ आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः। आकोप्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विदति ॥५॥ कारण विद्वानोंके योग्य उदारवाणी हमारे प्रति कहनेको आप योग्य है ॥३॥ तव इतना वचन सुन परमहंस कहनेलगे । हे देवताओ! यह करना चाहिये जो हमने सुनरक्या है धृति नाम धारणाशक्ति और शम नाम शान्ति और सत्यधर्मका सेवन और हृदयकी देहाभिमानरूप समस्त चिजडधिको दूरकर शरीरके सहित प्रिय अप्रिय इन दोनोंको भी दूर करदेधे । भाव यह है कि जिसप्रकार शरीर असत्य है तिसी प्रकार मिय और अप्रियको भी असत्य जाने ॥ ४॥ किसी फर आप गालीदियारा भी किसीको नहीं गाली दधे । क्यों कि सहनेवालेका मोघ ही गाली दैनालोंको जलादताहे और उसका - मापाटीकासमेता। नाक्रोशी स्यान्नावमानी परस्य, मित्रद्रोही नोत नीचोपसेवी। न चाभिमानी न च हीनवृत्तो, रुक्षां वाचं रुपती वर्जयीत ॥६॥ मर्माण्यस्थीनि हृदयं तथासून्, रूक्षा वाचो निर्दहतीह पुंसाम् । तस्माद्वाचमुपती रूक्षरूपां, धर्मारामो नित्यशो वर्जयीत ।। ७॥ अरुंतुदं परुपं रूक्षवाचं, वाकंटकेवितुदंतं मनुष्यान् । पुण्य उस सहनेगाटेको गिउजाता है ॥ ५ ॥ दूसरेको युग कहनेवाला महोपे और न दुर्गरेका अपमान करनेगला होथे और न मिसे पर फरनगला होगे और न नीचकी सेवा करनेगला होये और न अभिमान करनेादा हो और न आधारम भ्रष्ट होये और पी फटोर याणीको संभाषण करनेमें त्यागये ॥ ६॥ रुगं कटोर यचन पुरवोंक गया और हसी और हृदय तथा प्राणोंको मरम करदनहै । निससे दूगर जादानगर पोररूप हमे वचनोंको धर्माग्मा सदा ही ग्यागदे ॥ ७॥ जो कि दूसरों के मनरयलोंको व्यथित करताहे और भाषाटीकासमंता। (९७) अतिवादं न प्रवदेन वादये,- घोनाहतः प्रतिहन्यान घातयेत् । हतुं च यो नेच्छति पापकं वै, तस्मै देवाः स्पृहयंत्यागताय ॥ ११ ॥ अव्याहृतं व्याहृताच्छ्य आहुः, सत्यं वदेवयाहृतं तद्वितीयम् । प्रियं वदेव्याहृतं तत्तृतीयं, धर्म्य वदेवचाहतं तच्चतुर्थम् ॥ १२॥ तपस्वीकी सेवा की वा चौरकी सेवा कर वह उन्हीके वशको प्राप्त होजाना जिसप्रकार पत्ररंगके वशको प्राप्त होजाताहै । मान यह है कि जिसप्रकार कि श्वेत यन्त्र जिस रंगमें रंगाजाय यह उसी रंगको धारण करदनाहे तिसी प्रकार विद्वान् भी जैसे फी सेवा करताहे घसा ही यह होजाता है ॥ १० ॥ दूसरोंकर कहाहुभा भी जो कि कटोर पचन स्वयं नहीं कहताहे न दूसरोंमे याद कराना और दूसरोंकर ताडा मा भी नहीं मारनाहै औरन दूसरोंसे मरवाता है। और जो पाप फरनेसाल्देको भी नहीं मारना चाहनाहै उम अपने स्थानमें आपे गएकी देवता सयं पूजा फरगहें ॥ ११॥ भाषण करनेसे मौन (९८) -विदुरनीति-- यादृशैः सन्निविशते यादृशांश्चोपसेवते । थाहगिच्छेच्च भवितुं ताहम्भवति पूरुपः ॥ १३॥ यतो यतो निवर्तते ततस्ततो विमुच्यते । निवर्तनादि सर्वतोन वेत्ति दुःखमण्यपि ॥१४॥ न जीयते नानजिगीपतेन्यान्न, वैरकृच्चाप्रतिधातकश्च। निंदाप्रशंसासु समस्वभावो, न.शोचते हप्यति नैव चायम् ॥१५॥ रहना श्रेष्ठ है ऐसा पूर्वीचार्य कहतेहै और वचन कहे पर सत्य कहै. घह द्वितीय है अर्थात् मौन रहनेसे सत्यबोलना श्रेष्ठ है और वचन कहे पर सत्य और प्रिय कहे यह तृतीय है अर्थात् केवल सत्यवोल- नसे सन्य और प्रिय बोलना श्रेष्ठ है । और वचन कहै पर सत्य और प्रिय तथा धर्मयुक्त कहे वह चतुर्थहै अर्थात् सत्य और प्रियबोलनेसे सत्य प्रिय धर्म युक्त बोलना श्रेष्ठ है ॥ १२॥ जैसे मनुष्यों के साथ बैठता उठता है और जैसोफी संवा करताहै और जैसा होना चाहताहै वह पुरुष घेसा ही होजाताहै ॥ १३.|| जहां से निवृत्त होताजा- ताहै तहा २ से ही छूटता चलाजाताहै । इसीप्रकार सत्र जगहसे विवृत्त होजानेमे पुरुष, थोडा भी दुःखा नहीं जानताहै ॥ १४ ॥ न तो आप किसीसे जीताजाताहै न आप - किसीके जीतनकी इच्छा भापाटीकासमेता। भावमिच्छति सर्वस्य नाभावे कुरुते मनः । सत्यवादी मृदुरांतो यः स उत्तमपूरुपः॥१६॥ नानर्थकं सांत्वयति प्रतिज्ञाय ददाति च । रंधे परस्य जानाति यः स मध्यमपूरुपः॥१७॥ दुःशानसस्तूपहतोऽभिशस्तो, नावर्तते मन्युवशात्कृतघ्नः। न कस्यचिन्मित्रमथों दुरात्मा,... कलाश्चैता अधमस्येह पुसः ॥१८॥ फरताहै । और न येर करनेगदा है न किमीको मारनगया है। और निन्दा तथा प्रशंसा दोनोमें जिसका सभार समान रहना और न दुः होनेपर शोच करताहे. और न मुग होनेपर प्रसन्न होता है यह महामाओंका समाय है ॥ १५ ॥ जो कि समालका कायाग चाह- साई और किमी असल्यागर्ने मन नही करना और मत्य बोटना है और फोमासमार और इन्द्रियजिन् है यह उत्तम पुग्प है ॥१६॥ जो कि भनक नाम मिथ्या दामोंगे ही नहीं समझनाहे. किन्तु पर्मी भी गमापारे और दूसरे फेटिय प्रनिता फरके देश और गरेकै दियो जानना पद मायम पुरा है ॥ १७ ॥ घोराना- हि दुःशासन गाटा भी गया और मांग भी गया था परन्तु (१००) विदुरनीति- न श्रदधाति कल्याण परेभ्योऽप्यात्मशंकितः । निराकरोति मित्राणि यो वै सोऽवमपूरुषः १९॥ उत्तमानव सेवेत प्राप्तकाले तु मध्यमान् । अधमांस्तु न सेवेत य इच्छेतिमात्मनः ॥२०॥ प्राप्नोति वे चित्तमसवलेन, नित्योत्थानात्प्रज्ञया पौरुपेण । न त्वेव सम्यग्लभते प्रशंसां, न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम् ॥२१॥ राव मी दुर्मसे नहीं निवृत्त होता है । और क्रोधकै पासे पाइयों के रिसे उपसारको भी मारा करताहै। इससे दुरामा जन किसीमरा भी मित्र नही रोगाहे इन संमारमें अधमपुरपकी यह ही फटा होते. अर्थात् पर ही पहचान होती ॥ १८॥ आरमशक्ति नाम निकास- हीन हुआ जो मरों के दिये कन्यागी नहीं श्रद्धा फरगाहे और मिरजनों को दूर करनाहै यह अधम पुप ॥ १९॥ जो कि अपने फत्पागसी इला फार यह रनमजनोंसी मेग फर और मात- समयपर मापनजनोंकी भी रोग फरो गारन्त नीचजनोंसी सेगन करे ॥ २० ॥ अमजन यगे और निश्पक उपना और पुलिस और पुगी धन सो पाम पर मांगा मसीप्रकार नही पासगाई।
भाषाटीकासमेता। (१०१) म धृतराष्ट्र उवाच। महाकुलेभ्यः स्पृहयंति देवा, धर्मार्थनित्याश्च बहुश्रुताश्च । पृच्छामि त्वां विदुर प्रश्नमेतं, भवंति वै कानि महाकुलानि ॥ २२ विदुर उवाच। तपो दमो ब्रह्म वित्तं वितानाः, पुण्या विवाहाः सततान्नदानम् । येप्वेवेते सप्त गुणा वसंति, सम्यग्वृत्तास्तानि महाकुलानि ॥२३॥ और न महत्कुलमें उत्पन्नहुए सजनोंके आचारको पासक्ता है।॥२१॥ धृतराष्ट्रजी महाराज फिर विदुरजीसे बोले हे विदुरजी 1 : धर्म अर्थ रहतेहैं नित्य जिनके विषै ऐसे बहुशास्त्रसम्पन्न 'हुए देवता भी जिन महाकुलोंकी पूजा करते हैं वह महाकुल कौन हैं तुमसे में यह प्रश्न पूंजा हो ॥ २२ ॥ तब विदुरजी बोले ! तप नाम समाधिमें स्थित रहना और दम नाम इन्द्रियोंका वश करना और ब्रह्म वित्त नाम . वेदाध्ययनाध्यापनादि और वितान नाम यज्ञकर्म और श्रेष्ठ विवाह और
(.१०२) विदुरनीति-
येपां न वृत्तं व्यथते न योनि-
श्चित्तप्रसादेन चरंति धर्मम् ।
ये कीर्तिमिच्छंति कुले विशिष्टां,'
त्यक्तानृतास्तानि महाकुलानि ॥२४ ।।
अनिज्यया कुविवाहेवेंदस्योत्सादनेन च ।
कुलान्यकुलतां यांति धर्मस्यातिक्रमेण च २६॥
देवद्रव्यविनांशेन ब्रह्मस्वहरणेन च ।
कुलान्यकुलतां यांति ब्राह्मणातिक्रमेण च २६ ॥
निरन्तर अन्नदान यह सात गुण जिनमें भलीप्रकार स्थितहुए रहते हैं
वह महाकुल हैं ॥ २३ ॥ जिन्होंका आचार व्यथाको नहीं प्राप्त
होताहै । और न जिन्होंके उत्पन्न करनेवाले पित्रादिक जिनसे व्यथाको
प्राप्त होतेहैं । और जो सदा ही चित्तकी प्रसन्तासे धर्मआचरण
करतेहैं और जो कुछमें विशेषकीत्तिकी इच्छा करतेहैं और जिन्होंने
झूठ त्यागदिया है वह महाकुल है।॥ २४॥ य ईके न करने और
निन्दित विवाहोंसे और वेदके तिरस्कार करनेसे और धर्मके उल्लघनसे
कुल अकुताको प्राप्त होजाते हैं ॥ २५ ॥ देवताओंके धनके नाश
करनेसे और ब्राह्मणों के धन हरनेसे और ब्राह्मणों के उल्लंघन करनेसे
भापाटीकासमेता। '(१०३) ब्राह्मणानां परिभवात्परिवादाच भारत । /कुलान्यकुलतां यांति न्यासापहरणेन च ॥२७॥ कुलानि समुपेतानि गोभिः पुरुपतोऽर्थतः। कुलसंख्यां न गच्छंति यानि हीनानि वृत्ततः२८ वृत्ततस्त्वविहीनानि कुलान्यल्पधनान्यपि । कुलसंख्यां च गच्छंति कर्पति च महद्यशः॥२९॥ वृत्तं यत्नेन संरक्षेवित्तमेति च याति च । अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ३०॥ कुल अकुलताको प्राप्त होजातेहैं ॥ २६ ॥ हे भारत ! ब्राह्मणों के तिरस्कार और निन्दासे और न्यास नाम धरोहरके हरलेनेसे कुल अकुलताको प्राप्त होजातेहैं ॥ २७ ॥ जो कुल कि आचारसे भ्रष्ट हैं वह यदि गाय बैल आदिक पशुओंसे और बहुतसे पुरुषोंसे तथा धनोंसे भी सम्पन्न हों तब भी कुलसंख्याको नहीं प्राप्त होतेहैं अर्थात् उन कुलोंकी कुलोंमें गिनती नहीं होघेहे ॥ २८ ॥ और जो कि कुल आचारसै सम्पन हैं वह यदि थोडे भी धनसे युक्त हों तब मी कुलसंख्याको प्राप्त होतेहैं और महत् कीर्तिको प्राप्त होजातेहैं ॥२९॥ आचारकी यनस रक्षा करे न कि आचारको क्यागिकर धनकी (१०४) विदुरनीति-. गोभिः पशुभिरश्वैश्च कृप्या च सुसमृद्धया। कुलानि न परोहंति यानि हीनानिवृत्ततः॥३॥ मा नः कुले वैरकृत्कश्चिदस्तु, राजामात्यो मा.परस्थापहारी। मित्रद्रोही नैकृतिकोऽनृती वा, पूर्वाशी वा पितृदेवातिथिभ्यः॥३२॥ यश्च नोब्राह्मणान्हन्याद्यश्च नोब्राह्मणान द्विपेत्। न नास समिति गच्छेद्यश्च नो निर्वपेत्कृपिम३३॥ क्योंकि कभी धन आजाताहै और कभी चलाजाताहे जो कि धनसे तो सम्पन और आचारसै भ्रष्ट है वह ही मरेसे भी मराहुआ है ॥ ३० ॥ जो कि कुल आचारसे हीन हैं वह गाय बैल पशु घोड़ा और समृद्र कृषिस फिर नहीं प्रकट होतेहैं ॥ ३१ ॥ हमारे कुलमे कोई भी राजा और मन्त्री घेरका करनेवाला न हो और "हमारे कुलमें कोई भी दूसरों के धनका हानेगाला न होघे और हमारे 'कुलमे कोई भी मित्रका धैर करनेवाला न होवे और कपटी भी न होघे और झूठ बोलनेवाला न होघे और पित, देव और अतिथियोंसे पूर्व भोजन करनेवाला भी न होथे ॥ ३२ ॥ जो कि ब्राह्मगोको मारे यह 1 1 भाषाटीकासमेता। (१०५) तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । सतामेतानि गेहेपु नोच्छियंते कदाचन ॥३४॥ श्रदया परया राजन्नुपनीतानि सत्कृतिम् ।। प्रवृत्तानि महाप्राज्ञ धर्मिणां पुण्यकर्मिणाम्॥३५॥ सूक्ष्मोऽपि भारं नृपते त्यंदनो वै, शक्तो वो? न तथान्ये महीजाः। एवं युक्ता भारसहा भवंति, महाकुलीना न तथान्ये मनुप्याः ॥३६॥ हमारे कुलमें न होये और जो कि ब्राह्मणोंसे घेर कर यह हमारे कुटमें न होये और जो कि युद्धको न जाधै वह हमारे कुटमें न होपे । और जो कि कृषिको त्यागधै वह हमारे कुलमें न होघे ॥ ३३॥ तृण चटाई आदिक और पृथिवी और जल और चौथी प्रिय और सत्य वाणी यह सजनोंके गृहोंमें कदाचित् भी नहीं पृथक होते हैं ॥३४॥ हे राजन् ! हे महाप्राज्ञ ! पुण्यकर्मयाले धर्मात्माओंके यह चारों परम : अदाकर सत्कारको प्रातहुए सदैव प्रवृत्त रहते हैं ॥ १५ ॥ हे नृपते । जिसप्रकार कि छोटासा भी रथ योशके यहनेको समय होताहे तिस प्रकार अन्य पृथिवीसे उत्पन्न होनेवाले वृक्ष मोहके बहनेसो नहीं (१०६), विदुरनीति-:.. न तन्मित्रं यस्य कोपादिभेति, यद्वा मित्रं शंकितेनोपचर्यम् । यस्मिन्मिने पितरीवाश्वसीत, तदै मिचं संगतानीतराणि ॥३७॥ यः कश्चिदप्यसंबद्धो मित्रभावेन वर्तते । स एक्वंधुस्तन्मिनं सागतिस्तत्परायणम्॥३८॥ चलचित्तस्य वे पुंसो वृद्धाननुपसेवतः । पारिप्लवमतेर्नित्यमधवो मित्रसंग्रहः ॥ ३९॥ समर्थ होते हैं इसीप्रकार योग्य महाकुलीन जन जिसप्रकार भारके सहनेवाले होते हैं तिसप्रकार अन्य मनुष्य मारके सहनेवाले नहीं होतेहैं ॥३६॥ जिसके क्रोधसे टरतारहे यह मिन नहीं है और जो कि शंकित चित्तसे सेवा कियाजाता हो वह भी मित्र नहीं है और जिस मित्रकवि पिता समान विश्वास करे वह मित्र है और अन्य संगममात्रके ही मित्र होतहे ।। ३७ ।। जो कि अपने सम्बन्धसे भी वजित हो परमित्रमावकर यः यह ही बन्धुहे और यह ही मित्र है और यह.ही गति है और यह ही आश्रय है ।। २८ ॥ जिसका चित्रा घंचा रहता है और जो कि मित्रोंकी सेना परताहै भोर जिसी : भाषादीकासमेता। (१०७) चलचित्तमनात्मानमिद्रियाणां वशानुगम् । अर्थाः समभिवर्तते हंसाः शुष्कंसरो यथा॥४०॥ अकस्मादेव कुप्यंति प्रसीदत्यनिमित्ततः। शीलमेतदसाधूनांमधं पारिप्लवं यथा ॥११॥ सत्कृताश्च कृतार्थोश्च मित्राणां न भवंति ये।। तान्मृतानपि कव्यादाः कृतघ्नानोपभुजते ॥४२॥ अर्चयेदेव मित्राणि सति वाऽसति वा धने । नानर्थयन्प्रजा नाति मित्राणां सारफल्गुतामु४३ मंद बुद्धि भी चंचल रहती है उसका मित्रसंग्रह अध्रुव अर्थात् निर- र्थक है ॥ ३९ ॥ जिसका चित्त चलायमान रहताहै और जो दुरात्मा है और जो इन्द्रियोंके चश चलताहै उसके अर्थ चारोंतरफ रहतेहैं पर स्पर्श नहीं करतेहैं जिसप्रकार कि सूखे सरोवरके समीप हंस नहीं आकर प्राप्त होते हैं ॥ ४० ॥ जो कि अकस्मात् ही क्रोध करते, और विना ही निमित्त प्रसन्न होजाते, यह असज्जनोंका स्वभावहै वह सदेव चंचल रहताहै जिसप्रकार कि बादल चलायमान रहताहै ।। ॥४१॥ जो कि सत्कार किये हुए तथा कृतार्थ हुए जन मित्रों के हितके लिये नहीं होत, उन मरेहुए कृतघ्नोंको मांस खानेवाले गृध्रा- दिक मी नहीं खातेहे ॥ ४२ ॥ धन होनेपर अथवा न होनेपर सब (१०८) विदुरनीति- संतापाद्धश्यते रूपं संतापादश्यते बलम् । संतापादश्यते ज्ञानं संतापाड्याधिमृच्छति १४ अनवाप्यं च शोकेन शरीर चोपतप्यते । अमित्राश्च प्रहृष्यति मा स्मशोके मनः कृथाः४५ पुनर्नरो मियते जायते च, पुनर्नरो हीयते वर्धते च। पुनर्नरी याचति याच्यते च, 'पुनर्नरःशोचति शोच्यते च ॥४६॥ कालमें मित्रोंका सत्कार करे और लोभी न होकर मित्रोंके सार वा असारफो न जाने माव यह है कि लोभी होकर अपने कार्यके वास्ते ही मित्रता न करे। शासन्ताप करनेसे रूप भ्रष्ट होजाताहै और सन्ताप करनेसे बल भ्रष्ट होजाताहै और सन्ताप करनेसे ज्ञान भ्रष्ट होजाताहै और सन्ताप करनेसे व्याधिको प्राप्त होजाताहै॥ ४४||शोक करके सुखादि नहीं पाकर केवल शरीरमें ही संतप्त होताहे और उस शोक करनेसे शत्रुगण हर्पित होतेहैं इसकारण आप शोकमें मन न कोजिये।।४६॥ संसारमें कमी नरमरजाताहै और कमी फिर उत्पन्न होजाताहै और कमी नर संपदाओंसे हीन होजाताहै और कभी फिर संपदाओंकर वृद्धिको प्राप्त होजाताहे और कभी नर आप दूसरोंसे मांगताहै और कभी फिर आप दूसरोंकर याचना , भाषाटाकास सुखं च दुःखं च भवाभवौ च, लाभालाभौ मरणं जीवितं च । पर्यायशः सर्वमेते स्पृशंति तस्मादीरो न च हृप्येन्न शोचेत् ॥४७॥ चलानि हीमानि पडिंद्रियाणि, तेपां यद्यद्वर्धते यत्र यत्र । ततस्ततः स्रवते बुद्धिरस्य, छिद्रोदकुम्भादिव नित्यमभः ॥१८॥ धृतराष्ट्र उवाच । तनुरुद्धः शिखी राजा मिथ्योपचरितो मया । कियाजाताहे और कभी नर आप दूसरोंको शोचताहे और कभी यह दूसरों- कर शोचा जाता।।४६॥सुख और दुःख और लाभ और अलाभ और गरण और जीवन यह क्रमसे पुरपमात्रको समयरपर स्पर्श करते रहनहें । तिससे धीरजन न तो प्रसन्न होपे और न शोक करे ॥४७॥ “पांच ज्ञानेन्द्रिय और छठा मन यह छै इन्द्रिय पुरुषले अतिचंचल हैं उनमें जो २ इन्द्रिय जिस २ विषयमें वृद्धिको प्राप्त होजाताहै उसी२. पिपसे उसकी युद्धि टपक जाती है जिस प्रकार कि चिदमा जलके कलशसे सदा ही जा टपफजाताहे ।। ४८ ॥ तव धृनराष्ट्र कहतेहुए (११०) 'विदुरनीति- मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनांतं करिष्यति॥४९॥ नित्योद्विग्नमिदं सर्व नित्योदिनमिदं मनः । यत्तत्पदमनुद्विग्नं तन्मे बद महामते ॥५०॥ विदुर उवाच । नान्यत्र विद्यातपसोर्नान्यत्रंद्रियनिग्रहात् । नान्यत्रलोभसंत्यागाच्छांतिपश्यामितेऽनघ ५१ बुद्धया भयं प्रणुदति तपसा विंदते महत् । शुरुशुश्रूपया ज्ञानं शांति योगेन विदति ॥५२॥ है पिदुरजी ! अमिके समान शरीरमे गुप्तसामर्थ्यवाले राजा युधिष्ठिर मैंने कपटसे संपन करे हैं इसकारण , मेरे भन्दपुत्रोंका युद्धसे नाश करदेंगे। ४९ ॥ हे महामते ! यह समस्त चर अचर विश्व निन्य उहिम रहताहै और यह मन भी,नित्य उद्वेगयुक्त रहता है जो कि पद 'रेद्वेगयुक्त न होवे वह मुझसे कहिये ॥ ५० ॥ तब विदुरजी बोले ! अनव ! अर्थात् हे निष्पाप ! विद्या और तपस्याके विना और इन्द्रियोंके रोकनेकै विना और लोभके त्यागनेके विना तुम्हारी 'शान्तिको नहीं देखताहीं ॥ ५९॥ संसारमे जन विचारसे भयको करदेता है । और तपसे महत्त्वको प्राप्त होजाताहै। और गुरुज- .. भापाटीकासमेता। (१११) अनाश्रिता दानपुण्यं वेदपुण्यमनाश्रिताः। रागद्वेपविनिर्मुक्ता विचरंतीह मोक्षिणः ॥५३॥ स्वधीतस्य सुयुद्धस्य सुकृतस्य च कर्मणः । तपसश्च सुतप्तस्य तस्यांते सुखमेधते ॥ ५४॥ स्वास्तीर्णानि शयनानि प्रपन्ना, न वै भिन्ना जातु निद्रा लभंते। न स्त्रीषु राजन् रतिमाप्नुवंति, न मागधैः स्तूयमाना न सूतैः ॥ ५५ ॥ 'नोंकी सेवासे ज्ञानको प्राप्त होताहै । और योगसे शान्तिको प्रात होताहै ॥ १२ ॥ मोक्षकी इच्छा करनेवाले जन दान तो करतेहैं पर। उस दानके पुण्य स्वर्गादिकी नहीं कांक्षा करतेहैं । और चैदका अध्ययनाध्यापन तौ करतेहै पर उसके फलके आश्रय नहीं होतेहैं किन्तु राग और द्वेपसे हीनहुए मनुष्योंका कल्याण करतेहुए इस संसा- रमें विचरतेहैं ॥ ५३॥ जो कि भली प्रकार अध्ययन कियाहै और जो कि भलीप्रकार युद्ध कियाहै और जो कि भली प्रकार पुण्य कियाहै और जो कि मलीप्रकार कर्म कियाहै और जो कि भलीप्रकार तपस्या तपी है इन सबके अन्तमे उस कर्ताको सुख वढनाहै ॥ १४ ॥ हे राजन् ! जातिसे भिन्नहुए जन सुन्दर बिछौनाताली शय्याओंपर है (११२) विदुरनीति- नवे भिन्ना जातु चरति धर्म, न वै सुखं प्राप्नुवंतीह भिन्नाः । न वै भिन्ना गौवं प्राप्नुवंति, नवै भिन्नाः प्रशमं रोचयंति ॥५६॥ न वै तेपां स्वदते पथ्यमुक्तं, योगक्षेमं कल्पते नैव तेपाम् ।। भिन्नानां वै मनुजेंद्र परायणं, : न विद्यते किंचिदन्यद्विनाशात् ॥१७॥ सोतेहुए भी निद्राको कदाचित् नहीं प्राप्त होतेहैं और न स्त्रियोंके विग रतिको प्राप्त होतेहैं । और न मागध और न सूतोंकर स्तुति- कियेहुए आनन्दको प्राप्त होतेहैं ॥ ५५ ॥ और जातिसे भिन्नहुए जन कदाचित् भी धर्म नहीं करसक्तेहैं और न जातिसै भिन्नहुए जन यहां सुख पासतेहैं । और नजातिस मिनहुए जन गौरवको प्राप्त होतेहै । और न जातिसे भिन्नहुए जन शान्तिको रोचतेहैं ॥ १६ ॥ और न उन जातिसै भिन्नहुए जनोंको हितवाक्य अच्छा लगताहै और. न उन जातिसे मिन्नहुए जनोंके योग नाम नहीं प्राप्तहुएका लाभ और क्षेम नाम माप्तहुएकी रक्षाकरना यह दोनों करिपत होतेहैं । हे r भाषाटीकासमेता। (११३) संपन्न गोषु संभाव्यं संभाव्यं ब्राह्मणे तपः। संभाव्यं चापलं स्त्रीपु संभाव्यं ज्ञातितोभयम्५८ तंतवोऽप्यायिता नित्यं तनवो बहुलाः समाः। बहून्बहुत्वादायासान्सहंतीत्युपमा सेताम ॥१९॥ धूमायंते व्यपेतानि ज्वलंति सहितानि च । धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ ॥६० ॥ ब्राह्मणेषु च ये शूराः स्त्रीषु ज्ञातिपु गोपु च । मनुजेन्द्र ! जातिसे भिन्नहुए जनोंका परिणाम विनाशसे पृथक् और कुछ भी नहीं विद्यमान है अर्थात् जातिसे भिन्नहुए जनोंका परिणाम विनाश ही है ॥ १७ ॥ गौओंमें दुग्धादिसंपत्ति होनी चाहिये और ब्राह्मणमें तप होना चाहिये और स्त्रियोंमें चपलता होनी चाहिये और जातिसे भय होना चाहिये ॥ ५८ ॥ परस्पर एकसमान ऐसे सूक्ष्म तन्तु बहुतसै मिलकर दृढ रहते हैं और वह बहुत होनेसे बहुतसे कष्ट सहलेतेहें यह उपमा सजनोंकी है जिसप्रकार कि अल्पबल भी होकर सज्जन बहुतोंके साथ अनेक कष्ट सहलेनैको समर्थ होतेहै ॥ ५९ ॥ हे धृतराष्ट्र और हे भरतर्षभ जिसप्रकार कि आपसमें पृथक् हुए अंगार धुआं करते और मिलकर जलनेलगते, तिसीप्रकार जातिवाले भी जानने चाहिये ॥ १०॥ हे धृतराष्ट्रजी ब्राह्मण और 4 . (११४) 11 विदुरनीति- वृतादिव फलं पक्कं धृतराष्ट्र पतंति ते ॥ ६ ॥ महानप्येकजो,वृक्षो बलवान सुप्रतिष्ठितः। प्रसह्य एव वातेन सस्कंधो मर्दितुं क्षणात् ॥१२॥ अथ ये सहिता वृक्षाः संघशः सुप्रतिष्ठिताः। तेहि शीघ्रतमान्यातान्सहतेन्योन्यसंश्रयात् ६३॥ एवं मनुष्यमप्येकं गुणैरपि समन्वितम् । शक्यं दिपंतो मन्यते वायुद्धममिवेकजम् ॥६॥ अन्योन्यसमुपटंभादन्योन्यापाश्रयेण च । स्त्री और जाति और, गौओंके - वि. पीडाकरनेमें जो शूर अर्थात समर्थ है यह पतित होजाते हैं जिसप्रकार कि डालीसे पकाहुआ फल गिरजाताहै ॥ ११ ॥ मलीप्रकार पुष्टतापूर्वक स्थितहुआ अति वली बदामारी अकेला वृक्ष शाखाओंसहित क्षणमात्रमें ही पवनसे मदित होनेको समर्थ होताहे ॥१२॥ और जो कि वृक्ष पनमें इको मिलेहुए समूहके समूह भैलीप्रकार पुष्टतापूर्वक रोडे दुर्ग है यह परस्पर आश्रयसे अतिशीघ्र घटनेगरे पवनोंको सहटेतेहे ॥१३॥ इसीप्रकार गुणों से युक्तहुए अकेले मनुष्यके नाश करनेको शत्रुजन अपनेयोग्य मानतेहे जिसप्रकार कि पान अकेले जमेहुए वृक्षके सा- डनेको समय होता है ॥ १४ ॥ परस्पर मेलमिलाप होनेसे और .
मापाटीकासमेता। ज्ञातयः संप्रवर्धते सरसीवोत्पलान्युत ।। ६५ ।। अवध्या ब्राह्मणा गावो ज्ञातयः शिशवः स्त्रियः। येयां चान्नानि मुंजीत ये च स्युः शरणागता-६६ न मनुष्ये गुणः कश्चिद्राजन्सधनतामृते । अनातुरत्वाद्रं ते मृतकल्पा हि रोगिणः ॥१७॥ अव्याधिज कटुकं शीपरोगि, पापानुबंध परुपं तीक्ष्णमुष्णम् । सतां पेयं यत्न पिवंत्यसंतो, मन्यु महाराज पिच प्रशाम्य ॥ ६८ ॥ परस्पर एक दूसरेफे आश्रयसे जातिवाले जन इस प्रकार वृद्धिको प्राप्त होतेहैं जिसप्रकार कि तालाबमें कमल मिलकर बढतेहैं ।। ६५ ॥ हे राजन् ! ब्राह्मण, गौ, जाति, वालक और स्त्री यह और जिनका अन्नजेंवे और जो कि शरण प्राप्तहुए हों वह नहीं मारनेयोग्य हैं ।।.६६ ॥ है राजन् ! सधनता और आरोग्यके विना मनुष्यमें और कोई गुण नहीं है किन्तु सधनता और आरोग्य ही गुण है क्यों कि निधन और रोगी जन-जीवते ही मरेके समान होतेहै पर तुम्हारे तौ धन और आरोग्य होनेसे सब प्रकार कल्याण है ।। ६७ ॥ हे महा- (११६) विदुरनीति- रोगार्दिता न फलान्याद्रियंते, न वै लभते विपयेषु तत्त्वम् । दुःखोपेता रोगिणो नित्यमेव, न बुध्यते धनभोगान सौख्यम् ॥ ६९ ॥ पुरा युक्तं नाकरोस्त्वं वचो मे, द्यूते जितां द्रौपदी प्रेक्ष्य राजन् । दुर्योधनं वारयेत्यक्षवत्यां, कितवत्वं पंडिता वर्जयंति ॥ ७० ॥ राज ! आप मन्यु नाम दीनताका पान कीजिये और शान्त हजिये कैसी है दीनता कि विना ही व्याधिसे उत्पन्न होजावेहै। और स्वभावसे अतिकटुक शौर कठोर तथा तीक्ष्ण और गरम है और शिरके रोगकर्ता है और पापके संग्रह करनेवाली है और सजनों के पान करनेयोग्य है और जिसको असजन नहीं पीते है ॥ ६८ ॥ रोगसे पीडित हुए जन सत् असत् कार्यके फलोंको नहीं आदर करतहैं । और विषयों के विर्षे तत्त्व नाम इष्टानिष्टज्ञानको प्राप्त होतेहैं। दुःखसे युक्तहुए तथा रोगीजन सदाही न धनभोगोंका और न सौख्यका अनुभव करतेहैं ॥ १९ ॥ हे राजन् । पहिले जुआमें ३ १११८ विदुरनीति- मेढीभूतः कौरवाणां त्वमय त्वयाधीनं कुरुकुलमाजमीढ। पार्थान्वालान्वनवासप्रतप्तान्, गोपायस्व स्वं यशस्तात रक्षन् ॥ ७३॥ संधत्स्व त्वं कौरव पांडुपुत्र मा तेंतरं रिपवः प्रार्थयतु । सत्ये स्थितास्ते नरदेव सर्वे, दुर्योधनं स्थापय त्वं नरेंद्र ॥ ७४ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरहितवाक्ये पत्रिंशोऽध्यायः॥३६॥[४] एक ही शनु मित्रवाले और एक ही कार्यवाले होकर फौख सुखी और समृद्ध हुए जीवें ॥ ७२ ॥ हे आजमीढ ! तुम अब कौरवोंके मध्यमें मेड होकर स्थित हजिये । हे नात अपनी कौतिकी रक्षा फरते हुए तुम वनवाससे दुःखित ऐसे बालक पाण्डवोंकी रक्षा करिये। ॥७३॥ हे कौरव! पाण्डुपुत्रों के साथ सलाह करलीजिये तुम्हारे ‘अन्तर नाम परस्पर भेद होनेको तुम्हारे शत्रुजन कांक्षा न करें ।
भाषाटीकासमेता। (११९) विदुर उवाच । सप्तदशेमान राजेंद्र मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् । वैचित्रवीर्य पुरुपानाकाशं मुष्टिभितः॥१॥ दानवेंद्रस्य च धनुरनाम्यं नमतोऽब्रवीत् । अथो मरीचिनः पादानग्राह्यान् गृहतस्तथा॥२॥ हे नरदेव! वह पाण्डव समस्त सत्यमें स्थित है हे नरेन्द्र! तुम दुर्योधनको सत्यमें स्थित कीजिये ।।७४ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपगि प्रजागरपर्वणि विदुरहितवाक्ये श्रीपाठकवंशावतंस--पण्डितमंगलसैनात्मजकाशिरामविर- चितभापातिटके पट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ॥ [४] इसके अनन्तर फिर पिदुरजी महाराज राजा धृतराष्ट्रसे कहनेलगे हे राजेन्द्र । हे पैचित्रवीर्य स्वायम्भुव मनु इन सचरह पुरुपौंको मूर्ख बतलातेहुए कैसे वह मूर्ख हैं कि मानों नहीं हननेयोग्य आकाशको मुष्टियोंसे हनतेहैं ॥ १ ॥ भोर दानवेन्द्र नाम मेघसमूहों के इन्द्रका जो कि कालमें दीखनेवाला धनुष है वह नहीं भी नानेयोग्य है पर उसको मानों नाना चाहतेहैं । और मरीचि नाम सूर्यके नहीं महण (१२०) विदुरनीति- यश्चाशिष्य शास्तिं वै यश्च तुष्ये- घश्चातिल भजते दियंतम् । स्त्रियश्च यो रक्षति भद्मश्नुते, यथायाच्यं याचते कत्थते वा ॥३॥ यश्चाभिजातः प्रकरोत्यकार्य, यश्चाबलो बलिंना नित्यवेरी। अश्रद्दधानाय च यो ब्रवीति, यश्चाकाम्यं कामयते नरेंद्र ॥४॥ करनेयोग्य किरणोंको प्रहण करना चाहतेहैं ॥ २ ॥ जो कि नहीं शिक्षा करनेयोग्यको शिक्षा करतेहैं और जो कि निन्दितवृत्तिसे प्रसन्न होतेहैं और जो कि असमयपर शत्रुको सेना करते हैं और जो कि स्त्रियोंकी रक्षा करतेहैं । और उन त्रियोंसे कल्याणको प्राप्त होते, अर्थात् स्त्रियोंकी सेवासे कल्याण पातहैं और जो कि नहीं मांगनेला. यकसे मांगता है और जो कि वृथा ही वकवाद करता है ॥ ३ ॥ और जो कि कुलीन हो नहीं करनेटायफ कर्म करता है । और जो कि निर्बल होकर वलीके साथ सदैव पैर करताहै और जो कि नहीं श्रद्धा एखनवाले के लिये हितवाक्य कहताहै और हे नरेन्द्र भापाटीकासमेता। (१२१.) वध्वाऽवहासं श्वशुरो मन्यते यो, वध्वाऽवसन्नभयो मानकामः। परक्षेत्र निर्वपति यश्च वीजं, स्त्रियं च यः परिवदतेऽतिवेलम् ॥५॥. यश्चापि लब्ध्वा न स्मरामीतिवादी, दत्त्वा च यः कत्थति याच्यमानः। यश्चासतः सत्त्वमुपानयीत, / एतान्नयंति निरयं पाशहस्ताः ॥६॥ जो कि नहीं चाहनेयोग्य पदार्थकी चाहना करता है ॥ ४॥ और जो कि श्वशुर होकर पुत्रवधूके साथ परिहास करना मानताहै और पुनमधूने अपने पिता भाता आदिसे जिसकी कि मय आपदामे दूर करादी है ऐसा जो कि फिर पुरधूके पिता भ्रातादिकसे मान चाह- ताह और जो कि दूसरेके क्षेत्रमें वीज बोता है अर्थात् परस्त्रीके साथ गमन करता है और जो कि स्त्रीसे असमयपर वार्तालाप करता है ॥ और जो कि दूसरेसे टेकर यह कहता है कि में नहीं जानता हो और जो कि किसीकर याचना कियाहुआ दान देकर अपनी बडाई करता है और जो कि अविद्यमानका विद्यमान होना समर्थन ।
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(१२२) 7 विदुरनीति-
यस्मिन् यथा वर्तते.यो मनुष्य-
स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं सं धर्मः ।
मायाचारो मायया वर्तितव्यः,
साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः॥७॥
जरा रूपं हरति हि धेर्यमाशा,
मृत्युः प्राणान्धर्मचर्यामस्या ।
कामो.द्वियं वृत्तमनार्यसेवा,
" क्रोधः श्रियं सर्वमेवाभिमानः ॥८॥
करताहै इनासबको पाश है हाथमे जिनके ऐसे यमराजके दूत नरकों
लेजाते है॥ ६ ॥ जो मनुष्य जिसके विषै जिसप्रकार पर्ने उसके
विप भी उसको उसीप्रकार वर्तना चाहिये यह धर्म है। जो कि
मायाचार अर्थात् कपटी हैं वह कपटताकर ही वर्तना चाहिये और
जो कि साधु है वह साधुभावकर वर्तना चाहिये ॥ ७ ॥ जरा नाम
वृद्धावस्था,रूपको हरटेतीहै और धीरजको आशा हरलेतीहै और
मृत्यु प्राणोंको हरलेताहै और निन्दा धर्मचर्याको हरलेतीहै । और
काम उन्नाको हरलेताहै । और दुर्जनोंकी सेवा आचारको हरलेतीहै ।
क्रोध लक्ष्मीको हरलेताहै और अमिमान सत्रको हरलेताहै ॥ ८ ॥
भापाटीकासमेता।
'धृतराष्ट्र उवाच ।
शतायुरुक्तः पुरुपः सर्ववेदेषु वै यदा।
नाप्नोत्यथ च तत्सर्वमायुः केनेह हेतुना ॥९॥
विदुर उवाच ।
अतिमानोऽतिवादश्च तथाऽत्यागो नराधिप ।
क्रोधश्चात्मविधित्साच मित्रद्रोहश्च तानि पट्१०
एत एवासयस्तीक्ष्णाः कृतंत्याऍपि देहिनाम् ।
एतानि मानवान्नन्ति नं मृत्युभद्रमस्तु ते॥११॥
इतना सुन धृतराष्ट्र महाराज विदुरजीसे फिर बोले हे विदुरजी !जब कि
समस्त वेदोंमें सौ वर्षकी आयुवाला पुरुष कहाहे फिर वह समस्त
आयुको किसकारण नहीं प्राप्त होताहै ॥ ९॥ तब विदुरजी महाराज
कहनेलगे हे नराधिप ! एक तौ अतिमान,दूसरा निष्ठुर बोलना, तीसरा,
अत्याग अर्थात् महापराध चौथा क्रोध, पांचवीं अपने उदरपोपण
फरनेकी इच्छा, छटा मित्रसे घेर करना, यह छे हैं !॥ १० ॥ यह ही
बडी पैनी तलवार हैं जो देहधारियोंकी आयुको काटदेती हैं और यह
ही मनुष्योंको मारदेती हैं इससे हे राजन् ! इन तलवारोंसे तुम्हारा
मृत्यु न हो ऐसा करिये जिससे तुम्हारा कल्याण हो ॥ ११ ॥
(१२४) विदुरनीति- विश्वस्तस्यैति यो दारान् यश्चापि गुरुतल्पगः । वृपलीपतिर्दिजो यश्च पानपश्चैव भारत ॥ १२॥ आदेशकृद्धत्तिहंता दिजानां प्रेपकश्च यः । शरणागतहा चैव सर्वे ब्रह्महणः समाः। एतैः समेत्य कर्तव्यं प्रायश्चित्तमिति-श्रुतिः॥१३॥ गृहीतवाक्यो नयविदान्या, शेपानभोक्ता ह्यविहिंसकश्च । हे मारत ! जो कि अपने पर विश्वास करनेवालेकी त्रियों के प्रतिगमन करताहै और जो कि गुरुकी शय्यापर गमन करताहै और जो कि द्विजाति होकर शूदाका पति होजाता है और मदिरादिका पान करता- है ।। १२ ।। और जो कि ब्राह्मणोंको सबकालमें सर्वकार्य करनेमें आज्ञा करता रहताहै और स्वयं कुछ भी नहीं करताहै और - जो कि ब्राह्मणोंकी वृत्ति हरलेता है और समस्तकार्यमें निमन्त्रणादि देनेदिला- नेके लिये ब्राह्मणोंको ही भेजताहै और जो कि शरण आयेहुएको मारनेवाला है यह सब ब्रह्महत्या करनेवालों के समान हैं इनके साथ संसर्ग करके मनुष्यको अवश्य ही प्रायश्चित्त करना चाहिये ऐसा बंद कहताहै ॥ १३ ॥ जो कि गृहीतवाक्य अर्थात् विद्वान् और नीतिको जाननेवाला और दानी है और अतिथि आदिक भोजन करनेसे पीछे भापाटीकासमेता। (१२५) नानर्थकृत्याकुलितः कृतज्ञः सत्यो मृदुः स्वर्गमुपैति विद्वान् ॥ १४ ॥ सुलभाः पुरुपा राजन्सततं प्रियवादिनः। अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः१५ यो हि धर्म समाश्रित्य हित्वा भर्तुः प्रियाप्रिये । अप्रियाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहायवान् १६ त्यजेत्कुलार्थे पुरुपं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्याथै आत्माथे पृथिवीं त्यजेत१७ बचेहए भन्नका जेंवनेवाला और किसीकी भी नहीं हिंसा करनेवालाहै और अनर्थ कर्मसे नहीं आकुल रहताहै और किये उपकारका जानने वाला है और सत्यबोलनेवाला तथा कोमलस्वभाव है ऐसा विद्वान सर्गको प्राप्त होताहै ॥ १४॥ हे राजन् ! संसारमें निरन्तर प्रिय वाक्य कहनेवाले तो सुलभ है पर जो कि वास्तवमें तौ हितकारक है , और बोलनेमें अप्रिय प्रतीत होताहै ऐसे वाक्यको कहनेवाला और सुननेवाला दुर्लभ है ॥ १५ ॥ जो कि-धर्मको आश्नय कर स्वामीके प्रिय और अप्रिय दोनोंको त्यागि बोलनेमें तौ अप्रिय हो पर वास्तवमै हितकारक हों ऐसे वचन स्वामीसे कहताहै उसीकर राजा सहायवाला होताहै अर्थात् वह राजाका सचा सहायक है ।।१६।। कुलके अर्थ एक -- (१२६) विदुरनीति- आपदर्थे धनं रक्षेदारान् रक्षेद्धनरपि । आत्मानं सततं रक्षेदारैरपि धनरपि ॥ १८॥ यूतमेतत्पुरा कल्पे दृष्ट वैरकरं नृणाम् । तस्माद् द्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान्१९ । उक्तं मया द्यूतकालेऽपि राज-.., नेदं युक्तं वचनं प्रातिपेय। पुरुषको त्यागर्दथै और ग्रामके अर्थ कुलको त्याग और प्रामको देशके अर्थ त्यागदचे और अपने अर्थ पृथिवीको त्यागदेधे भाव यह है जिस पुरुपके रहने से कुछमें दोपआता हो तौउस पुरुषको त्याग देवे और जिस कुलसे यदि प्राममरमें दोप आता हो तो उस कुलको त्यागधे और जिस ग्रामसे देशभरमें दोप आता हो तो उस प्रामको त्यागदेवे और जिस पृथिवीसे अपनेमें दोप आता हो तो उस पृथिवीको त्यागदेवे ।। ॥१७॥ आपदाके लिये धनकी रक्षा कर और स्त्रियोंकी धनोंसे रक्षा करें और आत्माको स्त्री और धन इन दोनोंसे रक्षा करे ॥१८॥ यह जुआ कर्म पहिले कल्पमें भी नरोंके, पैर करानेवाला विद्वानों के देखनेमें आपाया तिससे बुद्धिमान् जन हास्पके लिये भी जुआका न सेवन करे ।। १९ ॥ हे राजन् ! जुआ खेलनेके समय यह जो मैंने योग्य वचन कहाया यह हे चित्रवीर्य ! तुमको नहीं रुचाथा जिस - .
मापाटीकासमेता। (१२७) तदीपचं पथ्यमिवातुरस्य, न रोचते तव वैचित्रवीर्य ॥२०॥ काकैरिमांश्चित्रबन्मियूरा- न्पराजयेथाः पांडवान्धार्तराष्ट्रः । हित्वा सिंहान् कोष्टकान्गृहमानः, प्राप्ते काले शोचिता त्वं नरेंद्र ॥२१॥ यस्तात न क्रुध्यति सर्वकालं, भृत्यस्य भक्तस्य हिते रतस्य । तस्मिन्भृत्या भर्तरि विश्वसंति, न चैनमापत्सु परित्यजंति ॥२२॥ "प्रकार कि रोगीको हितकारक औषध नहीं रुचता है किन्तु कडवा लगताहै ॥ २० ॥ विचित्र पांखयाले मयूररुप इन पांडवोंको काक रूप धार्तराष्ट्र अर्थात् दुर्योधनादिकसे पराजय कराते हो और सिंहोंको छोडकर स्यारोंकी रक्षा करते हो इससे है नरेन्द्र । समय प्राप्त होनेपर तुम शोच करोगे ॥ २१ ॥ हे तात ! जो कि जन अपने हितमें तत्पर हुए सेवा करनेवाले नौकरके लिये सबकाल नहीं क्रोध करताहे न विदुरनीति- न भृत्यानां वृत्तिसंरोधनेन, राज्यं धनं संजिघृक्षेदपूर्वम् । त्यति ह्येनं वंचिता वे विरुद्धा, स्निग्धा ह्यमात्याः परिहीनभोगा॥२३॥ कृत्यानि पूर्व परिसंख्याय सर्वा. ण्यायव्यये चानुरूपां च वृत्तिम् । संगृह्णीयादनुरूपान्सहायान, सहायसाध्यानि हि दुष्कराणि ॥२४॥ उस स्वामी विप नौकर भी विश्वास करते है और वह नौकर उस स्वामीको आपदाओंमें मी नहीं छोडसक्ते हैं।२॥जो नौकर जनोंकी जीविकाके बन्द करनेसे अर्थात् उन नौकरोंको मजूरी आदि न देकर अपूर्व राज्यधन संग्रह करना चाहता है उस स्वामीको मरीसे वंचित हुए नौकर त्यागदेतहें क्यों कि जिनकी कि वृत्ति हीन होजातीहै यह मंत्रीजन कैसे भी प्रिय क्यों न होवे तब भी स्वार्मास विरुद्ध होजातेहैं ॥ २३ ॥ प्रथम साध्यासाध्य निश्रय कर समस्त फाँको संग्रह कर और लाभ और खर्चमें जो अनुकूल हो भापाटीकासमेता। (१६९) अभिप्रायं यो विदित्वा तु भर्तुः, सर्वाणि कार्याणि करोत्यतन्द्री। वक्ता हितानामनुरक्त आर्यः, शक्ति आत्मेव हि सोनुकंप्यः ॥२५॥ वाक्यं तु यो नाद्रियतेऽनुशिष्टः, प्रत्याह यश्चापि नियुज्यमानः । प्रज्ञाभिमानी प्रतिकूलवादी, त्याज्यः स तादृक् त्वरयैव भृत्यः॥२६॥ उस जीविकाको संग्रह करें और अपने अनुकूल सहायकोको भी संग्रह करे क्यों कि दुष्कर कर्म सहायकोंसे ही सिद्ध कियेजाते हैं ॥ २४ ॥ जो कि स्वामीका अभिप्राय जानकर समस्त कार्याको निरालस्य होकर कर्ताहै और हितकारक वचनोंको कहताहै और स्वामीके विर्षे सदैव ही प्रीतियुक्त रहता है और आचरणोंमें श्रेष्ट और अपनी शक्तिको जाननेवाला है यह सेवक आत्माके समान अनुकम्पा करनेयोग्य है ॥ २५ ॥ जो कि आज्ञाकियाडुआ स्वामीके पाक्यका नहीं आदर करताहै और जो कि किसीकार्यमें नियुक्तकियाहुआ भी - !. विदुरनीति-. 6 (१३०) अस्तब्धमक्लीवमदीर्घसूत्र, सानुक्रोशं श्लक्ष्णमहार्यमन्यैः। अरोगजातीयमुदारवाक्यं, दूतं वदंत्यष्टगुणोपपन्नम् ॥ २७ ॥ न विश्वासाजातु परस्य गेहे, गच्छेन्नरश्चेतयानो विकाले । न चत्वरे निशि तिष्ठेन्निगृढो, न राजकाम्यां योपितं प्रार्थयीत ॥२८॥ लौटकर उत्तर देताहै और जो कि अपनी बुद्धिका अभिमान करताहै और जो कि स्वामीके प्रतिकूल कहताहै वह एतादृश सेवक शीघ्र ही स्वामीको त्यागने योग्यहे ॥ २६ ॥ जो कि आठगुणोंसे युक्त हो उसको पण्डितजन दून कहतेहैं । एक तो ढीट न होधै दूसरे अक्लीव अर्थात् असमर्थ न हो तीसरे शीघ्रताके कार्यमे देरकरनेवाला न हो चौथे दयायुक्त हो पांचवें श्लक्ष्ण नाम कोमलस्वभाव हो छठे दूसरोंकर भेदलेने योग्य न हो सातवें रोगजातीय न हो आठवें उदार बोलने- वाला हो ॥ २७ ॥ विश्वाससे जानताहुआ मी कदाचित् नर असमय- पर दूसरेके गृहमे न जावे और रात्रिमे छिपाहुआ आगनमे न खटा - मापाटीकासमेता। -(१३१) न निह्नवं मंगतस्य गच्छे- संसृष्टमंत्रस्य कुसंगतस्य। न च ब्रूयात्राश्वसिमि त्वयीतो, सकारणं व्यपदेशं तु कुर्यात् ॥ २९ ॥ घृणी.राजा पुंश्चलीराजभृत्यः, पुनो भ्राता विधवा वालपुत्रा । . सेनाजीवी चोद्धृतभूतिरेव, व्यवहारेपु वर्जनीयाः स्युरते ॥३०॥ होगे और न राजाकी चाही स्त्रीको कामना करै ॥ २८ ॥ सलाह फरनेको प्रामहुए ऐगे कुसगी राजासी बहुतोशर कोई सटाहके अपनपको न प्राप्त होघे और यह भी न कहै कि ऐमी साहकरनेमें - तुम्हारे विष में नहीं मिगस करताही , किन्तु फारणसहित यहाना परदेव भार यह है कि दरमत्रियोंगरे राजाकी बहतोके साथ की- रई समहमें पूरनेपर भी गोगनकारी पचन न करें और न यह करे कि ऐगी सराह करनेमें तुम्हारे पि में नहीं विराम करनाहीं । किन्तु कुछ बहाना बनाकर दूर नगजा जिसमे फिर साहको न मुगपाना ॥ १९॥ गी नाम रानागन् और राजा और व्यभि- चारणी ली और गजाका दाम और पुत्र और आता और विश्व ।
" (१३० विदुरनीति- अस्तब्धमक्लीयमदीर्घसूत्रं, सानुकोशं श्लक्ष्णमहार्यमन्यः । अरोगजातीयमुदारवाक्यं, दूतं वदंत्यष्टगुणोपपन्नम् ॥ २७ ॥ न विश्वासाजातु परस्य गेहे, गच्छेनर श्वेतयानो विकाले । न चत्वरे निशि तिष्टेनिगूढो, न राजकाम्यां योपितं प्रार्थयीत ॥२८॥ लौटकर उत्तर देदेताहै और जो कि अपनी बुद्धिका अभिमान करताहे और जो कि स्वामी के प्रतिकूल कहनाहे वह एतादृश सेवक शीघ्र ही म्बानीको त्यागने योग्यहै ॥ २६ ॥ जो कि आटगुणों से युक्त हो उसको पण्डितजन दून कहतेहैं । एक तो ढीट न होघे दूसरे अतीय अर्थात् असमर्थ न हो तीसरे शीघ्रताने कार्यमे दरकरनेगला न हो चौथे दयायुक्त हो पाचवें श्लक्ष्ण नाम कोमलस्वभाव हो छठे दूसरोंकर भेदलेने योग्य न हो सातवे रोगजातीय न हो आठवें उदार बोलने- घाला हो ॥ २७ ॥ विश्वासस जानताहुआ भी कदाचित् नर असमय- पर दूसरेके गृहमें न जाये और रात्रिमे छिपाहुआ आंगनमें न बदा .
मापाटीकासमेता। (१३१) न निहवं मंत्रगतस्य गच्छे- संसृष्टमंत्रस्य कुसंगतस्य । न च ब्रूयान्नाश्वसिमि त्वयीतो, सकारणं व्यपदेशं तु कुर्यात् ॥ २९ ॥ . घृणी.राजा पुंश्चली राजभृत्यः, पुत्रो भ्राता विधवा. बालपुत्रा। सेनाजीवी चोद्धृतभूतिरेव, व्यवहारेषु वर्जनीयाः स्युरेते ॥ ३० ॥ होघे और न राजाकी चाहीहुई स्त्रीकी कामना कर ॥ २८ ॥ सलाह फरनेको प्राप्तहुए ऐसे कुसगी राजाकी बहुतोंकर कीहुई सलाहके अपलापको न प्राप्त हो और यह भी न कहै कि ऐसी सलाहकरनेमे तुम्हारे विष में नहीं विश्वास करताही ,किन्तु कारणसहित वहाना करदेवे भाव यह है कि दुष्टमत्रियोगाले राजाकी बहुतोके साथ की- 'हुई सलाहमें पूछनेपर भी कुछ गोपनकारी वचन न कहे और न यह कहै कि ऐसी सलाह करनेमें तुम्हारे विप में नहीं विश्वास करताहौं । किन्तु कुछ बहाना बताकर दूर चला जाये जिससे फिर सलाहको न बुलायाजाय ॥ २९ ।। घृणी नाम लन्नावान् और राजा और व्यभि: चारणी स्त्री और राजाका दास और पुत्र और भाना और विधय - (१३२) विदुरनीति- अष्टौ गुणाः पुरुपं दीपयंति, प्रज्ञा च कौल्यं च श्रुतं दमश्च । पराकमश्च बहुभापिता च, दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ ३१ ॥ एतान्गुणांस्तात महानुभावा- नेको गुणः संश्रयते प्रसा। राजा यदा सत्कुरुते मनुष्यं, सर्वान्गुणानेप गुणो विभर्ति ॥.३२॥ . स्त्री और जिसके पुत्रं बालक हों ऐसी स्त्री और सेनासे जीविका करनेवाला और जिसका कि अधिकार दूर करदियागया हो यह जन व्यवहारोंके विपे बुद्धिमानको सदैव त्यागनेयोग्यहें ॥ ३० ॥ आठ गुण पुरुषको प्रकाशमान करत, एक तो युद्धि, दूसरी कुलीनता, तीसरा शास्त्राभ्यास, चौथा इन्द्रियोका यश रखना, पाचवां पराक्रम छठा बहुत न बोलना, सातवां यथाशक्ति दान, आठवीं कृतज्ञता अर्थात उपकारका जानना ॥ ३१ ॥ हे तात ! इन महत् प्रभाव- वाले गुणोंको एकगुण ही बलात्कारसे आश्रय करता है जो कि प्रभु होकर मनुष्यका सत्कार करतारहता है यह परसत्काररूप गुण सब 14 भापाटीकासमेता। (१३३) गुणा दश स्नानशीलं भजते, वलं रूपं स्वरवर्णप्रशुद्धिः । स्पर्शश्च गंधश्च विशुद्धता च, श्रीः सौकुमार्य प्रवराश्च नार्यः ॥३३॥ गुणाश्च पण्मितभुक्तं भजते, आरोग्यमायुश्च बलं सुखं च । अनाविलं चास्य भवत्यपत्यं, न चैनमाधून इति क्षिपंति ॥३४॥ अकर्मशीलं च महाशनं च, लोकदिष्टं बहुमायं नृशंसम् । गुणोंको धारण करलेता है ॥ ३२ ॥ जो कि स्नानशील है अर्थात् नित्य स्नान करनेवाला है उसको दश गुण सेवा करतेहे एक तो बल, दूसरा रूप, तीसरी स्वरकी शुद्धता और चौथी वर्णोकी शुद्धता, पांचवा स्पर्श, छठा गन्ध, सातवीं विशुद्धता आठवीं कान्ति नवी सुकुमारता दशी उत्तमस्त्रियां ॥ ३३ ॥ प्रमाणका भोजन करनेवा- लेको छ गुण सेवा करतेहैं एक तो आरोग्य दूसरी आयु तीसरा बल चौथा सुख और पांचवा जो कि उसके आरोग्यादि गुणयुक्त सन्तान होघेह और छठा जो कि जन उसको यह बहुत सानेवाला है इस प्रकार नहीं आक्षेप करतेहैं ॥ ३४ ॥ जो किमर्म करनेवाला है और .
(१३४) विदुरनीति- अदेशकालज्ञमनिष्टवेप- मेतान् गृहे न प्रतिवासयेत ॥ ३५ ॥ कदर्यमाकोशकमश्रुतं च, वनौकसं धूर्तममान्यमानिनम् । निधरिणं कृतवैरं कृतघ्न- मेतान्भृशातॊऽपि न जातु याचेत् ॥३६॥ संकिष्टकर्माणमतिप्रमाद, नित्यानृतं चादृढभक्तिकं च । विसृष्टागं पटुमानिनं चाप्ये- तान्न सेवेत नराधमान् पट् ॥ ३७॥ जो कि बहुत भोजन करनेवाला है और जो कि जनोंसे द्वेप रखता और बहुतमायावी है और जो कि क्रूर है और जो कि देशकालका जाननेवाला नहीं है और जिसका वेष उत्तम नहीं हो इनको अपने गृहमें कदाचित् भी न ठहराधे॥३५॥जो कि कृपण है और जो कि निन्दक है और जो कि मूर्व है और जो कि वनमें रहनेवाला है और जो कि धूर्त है और जो कि मानके अयोग्यका मान करता हो और जो कि निर्दय और जिसने अपनेसे घेर किया हो और जो कि उपकारको नाश करता है इन नौ जनोंसे कदाचित् भी न मांगे ॥३६ ॥ संक्लि- टकर्मा अर्थात् आततायी और अतिप्रमादवाला तथा सदा झूठ बोल- भापाटीकासमेता। (१३५) सहायबंधना ह्याः सहायाश्चार्थबंधनाः । अन्योन्यबंधनावेतो विनान्योन्यं न सिध्यतः३८ उत्पाद्य पुत्राननृणांश्च कृत्वा, वृत्तिं च तेभ्योऽनुविधाय कांचित् । स्थाने कुमारीः प्रतिपाद्य सर्वा अरण्यसंस्थोऽथ मुनिर्बुभूपेत् ॥ ३९ ॥ हितं यत्सर्वभूतानामात्मनश्च सुखावहम् । तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये ॥ ४० ॥ नेवाला और अदृढभक्तिबाला और जिसने स्नेहत्यागदिया हो और जो अपनेको चतुर मानताहोइन छ नीच नरोंका कदापिन सेन करे।॥३७॥ सहायकों के बाँधनेवाले धन होते, और धनोंके यांधनेवाले सहायक होतेहैं अर्थात् धनोंसे सहायक प्राप्त होतेहैं और सहायकोंसे धन प्राप्त होताहै यह दोनों एक दूसरेके परस्पर प्राप्त करनेवाले हैं इनमे एक दूसरेके बिना दोनों नहीं सिद्ध होतेहैं ॥ ३८ ॥ पुगेको जन्माय फिर उनको चिना मागके कर फिर उनके लिये कोई जीविका विधान कर और इसीप्रकार समस्त कुमारी पुत्रियों को भी पतियों के स्थानमें स्थित कर पनमें स्थित हुआ मुनि होनेकी इच्छा करे ॥ ३९॥ जो कि समस्त प्राणियोंका हित और अपने सुख देनेाला है उसी कर्मको (१३६) विदुरनीति- वृद्धिः प्रभावस्तेजश्च सत्त्वमुत्थानमेव च । व्यवसायश्च यस्य स्यात्तस्यावृत्तिभयं कुतः४१॥ पश्य दोपान्पांडवैविगहे त्वं, यत्र व्यथेयुरपि देवाः संशकाः। पुरं नित्यमुद्विमवासो, यशःप्रणाशो विपतश्च हर्पः ॥४२॥ भीष्मस्य कोपस्तव चैवंद्रकल्प, द्रोणस्य राज्ञश्च युधिष्ठिरस्य । उत्सादयेल्लोकमिमं प्रवृद्धः, श्वेतो ग्रहस्तियेगिवापतन खे॥४३॥ कर क्यों कि राजाके विषे सर्वार्थ सिद्धिके लिये यह ही मूल है।।४०॥ जिसके बुद्धि और प्रभाव और तेज और सत्त्व नाम वल और उद्यम और निश्चय बनारहता है उसको जीविका भय किसीतरह नहीं होताहै किन्तु उसकी जीविका सदैव बनी रहती है ॥४१॥ हे राजन् !पांड- पोके साथ विग्रह करनेमें वह दोष देखिये जिनके होनेपर घेर इंद्रसहित देवता भी व्यथित होतेहैं । एक तौ पुत्रों के साथ और दूसरा नित्य भय- भीत होकर वास तीसरा कीर्चिका नाश चौथा परियोंको हर्ष ।। ४२॥ हे राजन् ! भीष्मजीका और हे इन्द्र के समान तुम्हारा और द्रोणाचार्य और भापाटीकासमेता। (१३७) तव पुत्रशतं चैव कर्णः पंच च पांडवाः । पृथिवीमनुशासेयुरखिलां सागरांबराम् ॥ ४॥ धार्तराष्ट्रा वनं राजन् व्याघ्राः पांडुसुता मताः। मावनं छिधिसव्यानं मा व्याघ्रानीनशन्वनात्४५ नस्यादनमृते व्याघ्रान् व्याघ्रान स्युते वनम् । वनं हि रक्ष्यते व्याङ्ग्रानानक्षति काननम् ४६॥ न.तथेच्छंति कल्याणान्परेपां वेदितुं गुणान् । यथैपां ज्ञातुमिच्छंति नैर्गुण्यं पापचेतसः॥४७॥ युधिष्टिर राजाका अति बढाहुआ कोध इस समस्त लोकका नाश करस. क्ताहै जिसप्रकार श्वेत नाम धूमकेतु ग्रह आकाशमें तिरछा होकर उदयहुआ समस्त लोकोंका नाश करदेताहै ॥४३॥ तुम्हारे सौ पुत्र और कर्ण और पांचों पांडव यह समस्त समुद्र है वस्त्र जिसके ऐसी सब पृथिवीका नाश करसक्तहें ।। ४४ ।। हे राजन् ! धार्तराष्ट्र अर्थात् दुर्योधनादिक तौ घन हैं और पांडुके पुत्र व्याघ्र हैं सो तुम व्याघ्रमहित वनको मत काटो और वनसे व्याघ्र भी नहीं नाशको प्राप्त होवें ॥ ४५ ॥ व्याघ्रोंसे विना बन नहीं रहताहै और वनके विना व्याघ्र नहीं रहसक्ते हैं क्यों कि, व्याघ्रोंसे बन रक्षित रहता है और वन व्यामोंकी रक्षा करता है ॥ ४६ ॥ पापारमा जन दूसरोंके शुभगुण जाननेको तैसी नहीं (१३८) । विदुरनीति-. अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्वरेत् । न हि धर्मादपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्॥४८॥ यस्यात्मा विरतः पापात्कल्याणे च निवेशितः। तेन सर्वमिदं बुद्धं प्रकृतिविकृतिश्च या ॥ ४९॥ यो धर्ममर्थं कामं च यथाकालं निपेवते । धर्मार्थकामसंयोग सोऽमुत्रे च विदति ॥५०॥ सन्नियच्छति यो वेगमुत्थितं क्रोधहर्पयोः । स श्रियो भाजन राजेन्यश्वापत्सु न मुह्यति५१॥ इच्छा करतेहै जैसी कि दूसरों की निर्गुणता जाननेकी इन्छा करतहैं ।। }} ४७ 1) उत्तम अर्थ सिद्धि के चाहनेला आदिसे ही धर्मका सेवन कर क्यों कि धर्म । अथ नहीं पृथक् होता है जिसप्रकार कि स्वर्गसे अमृत नहीं पृथक् होताहै ॥ ४८ ॥ जिसका आमा पापसे तो रुक हुआ है और शुभकर्ममे निवेशित है उसने यह सब जानलिया है जो कि प्रकृति और विकृति है ॥४९॥ जो कि धर्म और अर्थ और कामको कालके अनुसार सेवन करताहै वह इस लोक और परलोक दोनोंमें धर्म अर्थ और काम इन तीनों के संयोगको प्राप्त होताहै ॥ ५० ॥ जो कि क्रोध और हर्ष इन दोनोंके उठे हुए वेगको रोक - भाषाटीकासमेता। । बलं पंचविध नित्यं पुरुपाणां निबोध मे । यत्तु बाहुवलं नाम कनिष्ट बलमुच्यते ॥५२॥ अमात्यलाभो भद्रं ते द्वितीयं बलमुच्यते । । तृतीयं धनलाभं तु बलमाहुर्मनीषिणः॥५३ ।। | यत्त्वस्य सहजं राजन् पितृपैतामहं बलम् । अभिजातबलं नाम तच्चतुर्थं बलं स्मृतम् ॥५४॥ येन त्वेतानि सर्वाणि संगृहीतानि भारत। यबलानां बलं श्रेष्ठं तत्प्रज्ञावलमुच्यते ॥५॥ लेताहै और जो कि आपदाओंके विप नहीं मोहित होताहै हे राजन् यह ही लक्ष्मीका पात्र होताहै ।। १ ।। पुरुषोंका सदेवसे पांचप्रकार फा बल है उसको मुझसे प्ररण करिये । जो कि बाहुबल है यह सत्र से छोटा बल मुनिजनोंने कहाहै ॥ ५२ ॥ और जो कि उत्तम २ मन्त्रियोंका लाभ है वह दूसरा वल है और जो कि धनका लाम है उसको तीसरा बल पंडित जन कहतेहें इन दोनों बल होनेसे तुम्हारे मंगल होरहाहै ॥ ५३॥ हे राजन् ! जो कि इस जनका पितृपिता- मह सम्बन्धी सहज बल है उसका कुलपल नाम है यह चतुर्थ बल फहाताहै ॥ ५४ ॥ हे भारत ! जिस वलकर यह समस्तबल इकडे " (१४०) विदुरनीति- महते योपकाराय नरस्य प्रभवेन्नरः। तेन वैरं समासज्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत्५६ स्त्रीषु राजपु सपु स्वाध्यायप्रभुशनुपु । भोगेप्वायुपि विश्वासं कः प्राज्ञः कर्तुमर्हति९७ ॥ प्रज्ञाशरेणाभिहतस्य जंतो- श्चिकित्सकाः संति न चौपधानि । न होममन्त्रा न च मंगलानि, नाथर्वणा नाप्यगदाः सुसिद्धाः ॥ ५८॥ कियेहुए हैं और जो समस्तवलोंमें श्रेष्ठ बल है वह बुद्धिबल कहाहै ।। ॥ ५५ ॥ जो कि नर नरके बड़े भारी अपकार करनेके लिये समर्थ होताहे उसके साथ धैर रोपकर ऐसा न विश्वास करें कि मैं उससे दूर हौं वह मेरा क्या करसता है ॥ १६॥ स्त्रियों में और राजाओंमें और समें और स्वाध्याय नाम वेदाभ्यासमें और समर्थमें और शत्रुओंमें और भोगविषयों में और शरीरकी अवस्थामें विश्वास करनेको ऐसा कौन विद्वान् है जो योग्य होसक्ताहै ॥ १७ ॥ बुद्धिरूप वाणकर मारेहुए जन्तुके जिवानेवाले चिकित्सक होते, न औषध होतेहै न होममन्त्र होते, न मंगलकर्म होतेहैं और न अथर्वणवेदके कहेहुए मन्त्र तंत्र यंत्रादि होतेहैं । और न सुन्दर सिद्ध कियेहुए धातुकाष्ठादिमय - -- भाषाटीकासमेता। सर्पश्चाग्निश्च सिंहश्च कुलपुत्रश्च भारत । नावजेया मनुष्येण सर्वे ह्येतेऽतितेजसः॥ ५९॥ अग्निस्तेजो महल्लोके गूढस्तिष्ठति दारुपु । न चोपयुक्ते तदारु यावन्नोद्दीप्यते परैः ॥ ६०॥ स एव खलु दारुभ्यो यदा निर्मथ्य दीप्यते । तदारु च वनं चान्यनिर्दहत्याशु तेजसा ॥६॥ एवमेव कुले जाताः पावकोपमतेजसः । क्षमावतो निराकाराः काप्टेऽग्निरिव शेरते॥२॥ औपथ समूह होतेहैं ॥ १८ ॥ हे भारत ! एक तौ सर्प, दूसरा अमि, तीसरा सिंह, चतुर्थ कुलपुत्र यह मनुष्य कर नहीं तिरस्कार करनेयोग्य हैं क्यों कि यह समस्त अतिनेजस्वी होतह ॥ ॥ ५९ ॥ ससारमें जिस अग्निका बडामारी तेज होताहे वह भमि काष्टोंमें छिपाहुआ स्थित रहताहै, और उस काष्ठको नहीं जलाताहे जबतक कि दूसरोंकर नहीं प्रदीप्त कियाजाता है। ॥३०॥ जब कि काष्ठोंसे मथकर यह अभिप्रदीत कियाजाता है तब उस काष्टको और अन्य धनको अपने तेजसे शीघ्र ही जला देताहे ॥ ३१ ॥ इसीप्रकार उत्तम पुलमें उत्पन्नहुए कुलीन, जन होतेहैं जिनका तेज अभिके समान होताहै और क्षमावान् हुए निश्वे. .
(१४२) विदुरनीति- लताधर्मा त्वं सपुत्रः शालाः पांडुसुता मताः । न लता वर्धते जातु महाद्रुममनाश्रिता ॥ ६३ ॥ वनं राजंस्तव पुत्रोऽबिकेय, सिंहान्वने पांडवांस्तात विद्धि । सिंहविहीनं हि वनं विनश्येत्, सिंहा विनश्येयुते वनेन ॥६४॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥३७॥ [५] टिन होकर सोते रहतेहैं जिमप्रकार कि काष्टमें अमि सोरतारहता है ॥ १२ ॥ हे राजन् ! पुत्रोंसहित आप लताधर्म हैं और पाण्डुके पुत्र शालवृक्ष हैं सो महत् वृक्षको नहीं आश्रितहुई लता कदाचित् भी नहीं बढसक्ती है ॥ ६३ ।। हे राजन् ! हे आंबिकेय तुम्हारे पुत्र वन हैं और उस वनमें पाण्डवोंको हे नात! तुम , सिंह जानिये सिहोंसे निहीन हुआ वन नष्ट होजाताहे और वनके विना सिंह नष्ट होजातेहैं ॥ १४ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये श्रीपाठकवंशावतंस-पंडितमंगलसेनात्मजकाशिरामविरचि. तभापातिल के सतत्रिशोऽध्यायः ॥३७|| [१] भाषाटीकासमेता। (१४३) विदुर उवाच । ऊर्ध्व प्राणा झुत्कामंति यूनः स्थविर आयति । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते॥१॥ पीठं दत्त्वा साधवेऽभ्यागताय, आनीयापः परिनिर्णिज्य पादौ। सुखं पृष्ट्वा प्रतिवेद्यात्मसंस्थां, ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीरः ॥२॥ यस्योदकं मधुपर्क च गांच, न मंत्रवित्प्रतिगृह्णाति गेहे । लोभायादथ कार्पण्यतो वा, तस्यानर्थं जीवितमाहुरार्याः ॥३॥ इसके अनन्तर फिर विदुरजी महाराज कहनेलगे कि हे राजन् ! वृद्धक अपनेप्रति आपते सः तरुणजनके प्राण ऊपरको निकलकर चलनेलगते हैं फिर उस वृद्धका प्रत्युत्थान और प्रणाम करने के पश्चात् उन प्राणोंको फिर प्राप्त होजाताहै ॥ १ ॥ आयेहुए सजनके लिये प्रथम आसन दे और जल लाकर उसके चरणोंको धोय फिर कुशल पूछि तदनन्तर अपनी व्यवस्था जनाय फिर अन्नको शुद्र करके उसके लिये धीरजन देथे ॥ २ ॥ जिसके घरमे वेदघेता अतिथि जल मधु- (१४४) विदुरनीति- चिकित्सकः शल्यकर्तावकीर्णी, स्तेनः क्रूरो मद्यपो भ्रूणहा च । सेनाजीवी श्रुतिविक्रायकश्च, भृशं प्रियोऽप्यतिथिनोंदकाहः॥४॥ अविक्रेयं लवणं पक्वमन्नं, दधि क्षीरं मधु तैलं घृतं च । तिला मांसं फलमूलानि शाकं, रक्तं वास: सर्वगंधा गुडाश्च ।। ५॥ पर्क और वाणीको लोभ वा कृपणतासे नहीं ग्रहण करताहै उसके जीवनको आर्यजन अनर्थ कहतेहें ।। ३॥ चिकित्साकरनेवाला और वाणबनानेवाला और अवकीर्णी अर्थात् जिसका कि ब्रह्मचर्य नष्ट होगया हो और चोर और कर और मदिरापीनेवाला और गर्भपात करनाला और सेनासै जीविका करनेवाला और वेदको बेचनेवाला , ऐसा जल देनेकेयोग्य नहीं है तब भी अतिथि होकर आयाहुआ अत्यन्त प्रिय होना चाहिये ॥ ४ ॥ लवण और पकाहुआ अन्न और दवि और दुग्ध तथा शहद तेल घृत तिल मांस और फल मूल शाक और लालवस्त्र और सवप्रकारके गन्ध और गुड यह नहीं वैचनेयो .
भाषाटीकासमेता। अरोपणो यः समलोष्टाश्मकांचनः, प्रहीणशोको गतसंधिविग्रहः । . निंदाप्रशंसोपरतः प्रियाप्रिये, त्यजन्नुदासीनवदेप भिक्षुकः ॥६॥ ६॥ नीवारमूलेंगुदशाकवृत्तिः सुसंयतात्माग्निकार्येपु.चोद्यः। वने वसन्नतिथिप्वप्रमत्तो धुरंधरः पुण्यकृदेप तापसः ॥७॥ म्यहं ॥ ५॥ जो कि फिसीपर नहीं क्रोध करता है और जिसके एकसमान ही लोहा पत्थर सुवर्ण है और जिसका शोक दूर होगया. और जिसके सलाहकरना तथा विग्रह करना यह दोनों नहीं विद्यमान हैं और जो कि निन्दा और प्रशंसा दोनोंसे पृथक है और जो कि : उदासीनके समान प्रिय और अप्रिय दोनोंके त्यागनेवाला है सो वह ही सन्न्यासी है इस कथनसे यह जनायागया कि जब कि दोपवान् अतिथि पूजनेयोग्य है.तो फिर क्या कहना कि एतादृश गुणवाला अतिथि होतो पूजनेयोग्य ॥ ६ ॥ जिसकी कि वृत्ति नीवार और मूल और इगुदी और शाकस होपैहै और जिसने मनका संयम कियाहै और जो कि अग्निकार्याम उद्यत रहताहै और उनमें ही रहताहै और . - विदुरनीति- अपकृत्य बुद्धिमतो दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेतः। दी! बुद्धिमतोबाहू याभ्यां हिंसति हिंसितः८॥ न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निबंतति ॥ ९॥ अनीपुर्युतदारश्च संविभागी प्रियंवदः । श्लक्ष्णो मधुरवाक् स्त्रीणांन चासांवशगोभवेत्१० पूजनीया महाभागाः पुण्याश्च गृहदीप्तयः । अतिथियोके सरकारमें असावधान नहीं है और पुण्यकरनेवाला है सो वह ही तपस्थी है ॥ ७ ॥ बुद्धिमान्का अपकार करके ऐसा न विश्वास करे कि मैं उससे दूर बसता ही वह मेरा क्या करसक्ता है. क्यों कि • बुद्धिमानकी वाहु दीर्घ होतीहे वह बुद्धिमान दूसरोंकर हिंसा किया- हुआ जिन्हीं बाहुओंसे दूसरोंकी हिसा करदेताहे ॥८॥ जो कि विश्वासके योग्य न होपे उसके वि4 न विश्वास करे और जो विश्वा- सके योग्य होवे उसके विर्ष भी न अतिविश्वास करे कारण कि विश्वास से उत्पन्न हुआ भय जड़को भी काट देता है ॥ ९ ॥ ससारमें जन ईपीकरनेवाला न होवे और गुप्तदार अर्थात् स्त्रियोंका रक्षक हो और संपदाओंके ययात् बाँटनेवाला हो और प्रिय बोलनेवाला हो और लक्ष्ण अर्थात् कोमल स्वभाव हो और त्रियोंके मध्यम मधुर भाषी हो और उन स्त्रियोंके वशवी न होवे ॥ १०॥ स्त्रियां पूजा .
भापाटीकासमेता। (.१४७) स्त्रियाश्रियोगृहस्योक्तास्तस्माद्रश्या विशेषतः११ पितुरंतःपुरं दद्यान्मातुर्दद्यान्महानसम् ।। गोपु चात्मसमं दद्यात्स्वयमेव कृषि व्रजेत् १२ ॥ भृत्यैर्वाणिज्यचारं च पुत्रेः सेवेत च दिजान् । अद्भयोऽग्निब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्१३. करनेयोग्य और बडे भागवाली तथा पुण्यात्मा और गृहका प्रकाश और साक्षात् घरकी लक्ष्मी पूर्वजोंने कही, तिससे स्त्रियों की विशेषकर रक्षा करनी चाहिये ॥११॥ पिताक अधिकारमे अन्तःपुर अर्थात् स्त्रियोंके रहनेका स्थान देदेवे और माताके अधिकारमें रसोईका स्थान देदेये भौर गौ आदि पशुओंकी रक्षा में अपने समान विश्वास कियेहुए जनको नियुक्त करदेवे । और कृषिके अवलोकनमें स्वयं ही प्राप्त होथे ॥ १२॥ और भृत्य नाम नौकर चाकरों के द्वारा वाणिज्य वृत्तिका संबन करे और पुत्रों के द्वारा ब्राह्मणोंका सेवन करे जलोंसे अगि उत्पन्न हुआहै और माझगसे क्षत्रिय उत्पन्न हुआहे और पत्थर लोहा उत्पन्न हुआहे. उन अमि आदिकोंका तेज सबजगह जाताहे पर अपनी अपनी योनि अर्थात् अपनीर उत्पत्तिके स्थानमें जाकर शान्त होजाताहै इस फयनसे यह जानागया कि क्षत्रिय प्राहग विग पदाचित् भी कोप नहीं करताहै किन्तु अपनी उत्पत्तिका स्थान जान (१४८) !.. विदुरनीति-- तेपां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति । नित्यं संतः कुले जाताः पावकोपमतेजस:१४ ॥ क्षमावतो निराकाराः काठेगिरिव शेरते। यस्य मंत्रं न जानंति बाह्याश्चाभ्यंतराश्च ये १५ स राजा सर्वतश्चक्षुश्चिरमैश्वर्यमश्नुते । करिष्यन्न प्रभापेत कृतान्येव तु दर्शयेत् ॥ १६॥ धर्मकामार्थकार्याणि तथा मन्त्रो न भिद्यते । गिरिपृष्ठमुपारुह्य प्रासादं वा रहोगतः ॥ १७ ॥ कर उसके विर्षे शान्त होजाताहै ॥ १३ ॥ उत्तमकुलमें उत्पन्न हुए सजन सदा अग्निके समान तेजवाले रहतेहैं पर क्षमा धारण किये निश्चेष्टितसे हुए सोगते रहतेहै जिसप्रकार कि काठमें अमि निश्चेष्टित हुआ सोचता रहताहै ॥ १४ ॥ जो कि बाहिर रहनेवाले तथा भीतर रहनेवाले मृत्यादि हैं वह जिस गजाकी कीहुई सलाहको नहीं जानते है वह सब तरफ नेत्र रखनेवाला राजा बहुत कालपर्यन्त ऐश्वर्य भोग- ताहै ॥ १५ ॥ कार्यके करनेवाला कार्य होनेसे पूर्व ही उस फार्यको दूसरेसे न कहै किन्तु कियेहुए धर्म, काम, अर्थ सम्बन्धी कार्याको दूसरों के लिये दिखाये ऐसा करनेपर मन्त्र नहीं भेदको प्राप्त होताहे !! ॥ १६ ॥ तिके पृष्ठ वा प्रासाद नाम मन्दिर पर चढकर पाएकान्त भाषाटीकासमेता। (१४९) अरण्ये निःशलाके वा तत्र मन्त्रोऽभिधीयते । नासुहृत्परमं मन्नं भारताहति वेदितुम् ॥ १८॥ अपंडितोवापि सुहृत्पंडितो वाप्यनात्मवान् । नापरीक्ष्य महीपालः कुर्यात्सचिवमात्मनः १९॥ अमात्ये ह्यर्थलिप्सा च मंत्ररक्षणमेव च । कृतानि सर्वकार्याणि यस्य पारिपदा विदुः२०॥ धमें चार्थे च कामे च स राजा राजसत्तमः । गूढमंत्रस्य नृपतेस्तस्य सिद्धिरसंशयम् ॥ २१ ॥ में स्थित हुआ वा तृणोंसे न ढकेहुए वनमें जाकर सलाह करें क्यों कि मन्त्रवेत्ताओंने तिन पूर्वोक्त स्थानोंमे ही बैठकर सलाह करना कहा है ॥ १७ ॥ हे भारत ! जो मित्र नहीं है वह सलाहके नहीं जानने योग्य होताहै अथवा जो मित्र है पर मूर्ख है वह भी सलाहकेजाननेयोग्य नहीं होताहै और जो कि मित्र पंडित है पर चपलयाकू है वह भी सलाहके नहीं जाननेयोग्य होताहै ॥ १८ ॥ पृथिवीकी रक्षा करन- वाला राजा विना परीक्षा करे अपना मन्त्री न करे ॥ १९॥ क्यों कि मंत्री विर्षे ही अयोंके प्राप्त होनेकी इच्छा और मरकी रक्षा होघेहै समामें बैठनेवाले मृत्यादिक जिसके कियेहुए ही धर्म, अर्थ, काम सम्बन्धी कार्योंको जानतेहैं वह राजा राजोंमें उत्तम मानाजाताहै ॥ .
(१५०.) विदुरनीति- -अप्रशस्तानि कार्याणि यो मोहादनुतिष्ठति । स तेपा विपरिभ्रंशाद्धश्यते जीवितादपि ॥२२॥ कर्मणां तु प्रशस्तानामनुष्टानं सुखावहम् । तेपामेवाननुष्ठानं पश्चात्तापकरं मतम् ।। २३ ।। अनधीत्य यथा वेदान्न विप्रः श्राद्धमहति । एवमथुतपाडण्यो न मंत्रं श्रोतुमर्हति ॥२४॥ • स्थानवृद्धिक्षयज्ञस्य पाडण्यविदितात्मनः । अनवज्ञातशीलस्य स्वाधीना पृथिवी नृप।॥२५॥ जिस राजाकी सलाह गुप्त रहती है उस राजाकी सिद्धि निस्संशय होघे है ॥ २०॥ २१ ॥जो कि अशुभ कमौका मोहसे सेक्न करताहै वह उन अशुभ कर्मोके प्रष्ट होनेसे जीवितसे भी भ्रष्ट होजाताहै ।। २२ ।। पूर्वजोंने उत्तम कर्मोका सेवन सुखदायक माना है और उन्ही उत्तम कर्मोका असेवन पश्चात्ताप करनेवाला मानाहै || ॥ २३ ॥ जिसप्रकार कि वेदोंको न पढकर ब्राह्मण श्राद्धके नहीं योग्य होताहै तिसप्रकार जिसन कि सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रयण यह छै गुण नहीं जाने, वह मंत्र सुननेके नहीं योग्य होताहै ॥ २४ ॥ हे नृप । जो कि राज्यकी स्थिति और वृद्धि तथा क्षयके जाननेवाला है और जिसका कि,आत्मा संधि,विग्रह, भापाटीकासमेता। अमोधकोषहर्पस्य स्वयं कृत्वान्यवेक्षिणः । आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुदैव वसुंधरा ॥२६॥ नाममात्रेण तुष्येत च्छत्रेण च महीपतिः । भृत्येभ्यो विसृजेदान्नेकः सर्वहरो भवेत् ॥२७॥ ब्राह्मणं ब्राह्मणो वेद भर्ता वेद स्त्रियं तथा। अमात्यं नृपतिर्वेद राजा राजानमेव च ॥२८॥ नशत्रुर्वशमापन्नो मोक्तव्यो वध्यतां गतः । यान, आसन, धीमान और समानयण इन छै गुणोंके जाननेमे प्र- सिद्ध है और जो कि निन्दितस्वभाव नहीं है उस राजाकी पृथिवी स्वाधीन होतीहै ॥ २५ ॥ जिसका क्रोध होना और हर्ष होना निष्फल नहीं होताहै और जो सयं अपने भृत्यादिकोंके कियेहुए कार्योंके देखनेवाला है और जिसने स्वय ही अपनी दृष्टिमात्रसे अपना खजाना जानाहै उस राजाकी पृथिवी धनोंके देनेपाली होतीहै ॥ २६ ॥ राजा केवल अपने नाममात्रकर तथा छत्रकर ही सन्तुष्ट रहै और अपने हाथसे इकट्ठे किये धनादिकोंको भृत्यादिकोंके लिये यथायोग्य देदेवे और उन समस्त धनादिकोंका भोगनाला' अकेला ही न हो। ॥ २७ ॥ ब्राह्मणवाह्मणको जानताहै भर्ती स्त्रीको जानताहै राजा मंत्रीको जानताहै और गजा राजाको भी जानताहै ॥ २८ ॥ वन्ध- : नको प्राप्त होकर वंशको प्राप्तहुआ शनु नहीं छोडनेयोग्य है किन्तु (१५२) विदुरनीति- न्यग्भूत्वा पर्युपासीत वध्यं हन्याले सति । अहताद्धि भयं तस्माजायते नचिरादिव ॥२९॥ देवतेपु प्रयत्नेन राजसु ब्राह्मणेषु च । नियंतव्यः सदा क्रोधो वृद्धबालातुरेषु च ३० ॥ निरर्थं कलहं प्राज्ञो वर्जयेन्मूढसेवितम् । कीर्ति च लभते लोके न चानर्थेन युज्यते ३१॥ प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः । न तं भर्तारमिच्छंति पंढं पतिमिव स्त्रियः॥३२॥ न बुद्धिर्धनलाभाय न जाडयमसमृद्धये । उस बँधेहुए शत्रुको तिरछा होकर ही सबकालमें देखता रहे और यदि अपना बल होये तो उसको मार भी डरे ॥ २९ ॥ देवता, राजा, ब्राह्मण और वृद्ध तथा बालक और आतुर इनके विर्षे सदेव ही यत्नसे शोध रोकने योग्यहै ।। ३० ॥ जो कि मूर्वोकर सेपन कियाजाता है उस निरर्थक कलहको जो बुद्धिमान है वह त्यागदेताहे वह संसारमै कत्ति पाताहै और अनर्थसे कभी नहीं युक्त होताहै ॥ ॥ ३१॥ जिसकी प्रमन्नता निष्फल होतीहै और क्रोध भी निरर्थक होताहै उस राजाको प्रजा अपना भर्ती करना नहीं चाहतीहै जिस- प्रकार कि स्त्रियां नपुंसकको अपना भर्ती करना नहीं चाहतीहैं ।। ६.१२ ॥ मनुष्यकी बुद्धि धनलामके लिये नहीं होयेहै और न भाषाटीकासमेंता लोकपर्यायवृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः॥३३॥ विद्याशीलवयोवृद्धान् वुद्धिवृद्धाश्च भारत । धनाभिजातवृद्धांश्च नित्यं मूढोऽवमन्यते ॥३॥ अनार्यवृत्तमप्राज्ञमसूयकमधार्मिकम् । अनर्थाः क्षिप्रमायांति वाग्दुष्ट क्रोधनं तथा ३५॥ अविसंवादनं दानं समयस्याव्यतिक्रमः । मूर्खता दरिद्रताके लिये होघेहै किन्तु धनके मिलनेमें और दरिद्रता होनेमें पर्यायवृत्तान्त अर्थात् इसलोकमै जो कि परलोकवाला कर्मफल है . उसको बुद्धिमान् जानताहै और अन्य मूर्य नहीं जानताहै । मात्र यह है । न तो मनुष्यकी घुद्धिसे धन होताहै और न मूर्खतास दरिद्रता किन्तु धन मिलना और दरिद्रता यह दोनों पूर्वकर्मफलके आधीन है ऐसा बुद्धिमान् जन जानताहै न कि मूर्ख ॥ ३३ ॥ हे भारत! जो कि विद्या और शील और अपस्या करके वृद्ध हैं और जो कि बुद्धि करके वृद्ध है और जो कि धन और कुल करके वृद्ध हैं उनका मूद जन सदाही अवमान करता रहताहै।।३४॥ जो कि श्रेष्ठ आचारवाला नहीं है और जो कि मूर्य है और जो कि निन्दक है और जो कि धर्मज्ञ नहीं है और जो कि पचन बोलनेमें दुष्ट है और जो कि मोधस्वभायवाला है उसके अति अनर्थ शीघ्र ही आजातेहे ॥ ३५ ॥ अप्रियवचनवजित दान और मर्यादाकान उल्लंघन करना और मली.
{१५४.) विदुरनीति- आवर्तयंति भूतानिसम्यक् प्रणिहिता च वाक् ३६ अविसंवादको दक्षः कृतज्ञो मतिमानृजुः । अपि संक्षीणकोशोऽपि लभते परिवारणम् ३७॥ धृतिःशमो दमः शोचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा। मित्राणां चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधःश्रिय:३८ असंविभागी दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः। ताङ् नराधिपो लोके वर्जनीयो नराधिप ३९॥ प्रकार सुन्दर कहीहुई वाणी यह माणियोंको अपना बनाते हैं।॥३६॥ जो अप्रियवचनके न बोलनेवाला तथा समस्त कार्यों में चतुर और उप- फारके जाननेवाला तथा बुद्धिमान् और कोमलस्वभाव है वह यदि निर्धन भी हो तब भी मृत्यमित्रादिकोंको प्राप्त होता है अर्थात् ऐसे जनके निधन होनेपर भी बहुतसे मृत्य मित्रादि होजातहैं ॥ १७ ॥ धृतिनाम धैर्य और शम नाम शान्ति और दम नाम इंद्रियों का वशमें करना और कारुण्य नाम दया और मधुरवाक्य और मित्रोंस घेर न करना यह टक्ष्मीके बढानेवाले हैं. ॥ ३८ ॥ हे नरराज । जो कि असंविभागी अर्थात् मृत्यादिकोंके लिये न देकर स्वयं ही भोगता है और जो कि दुष्टचित्त है और उपकारके दूरकरनेवाला और जो कि भापाटीकासमेता। न च रात्री सुखं शेते ससर्प इव वेश्मनि । यः कोपयति निर्दोपं सदोपोऽभ्यंतरं जनम्॥ येपु दुऐपु दोपः स्याद्योगक्षेमस्य भारत । सदा प्रसादनं तेपां देवतानामिवाचरेत् ॥४१॥ येऽर्थाः स्त्रीपु समायुक्ताः प्रमत्तपतितेषु च । ये चानायें समासक्ताः सर्वे ते संशयं गताः॥४२॥ 'यत्र स्त्री यत्र कितवो बालो यत्रानुशासिता। मजति तेऽवशा राजन्नद्यामश्मप्लवा इव ॥४३॥ निलज है तादृश राजा त्यागनेयोग्य होताहै ॥ ३९ ॥ वह रात्रिमें सुखपूर्वक नहीं सोक्ताहै जिसप्रकार कि सर्पवाले घरमे नहीं सोरताहै। जो कि आप दोपयुक्त होकर भी निर्दोप मनुष्य के अन्त:- करणको क्रोध कराताहै ॥ ४० ॥ हे भरतवंशीय ! जिन दुष्टोंके विमैं अपने योग क्षेमका दोप होपे अर्थात् जो कि दुष्ट अपनी आजीविकादिक दूर करसक्ते हों उनकी प्रसनता सदैव देवताओंकी -तरह करे ॥ ४१॥ जो कि धनादिक अर्थ स्त्रियों के विौं वा मतवाले या पतितोंके विर्षे रक्खेहुए हैं और जो कि दुर्जनोंके विौं रखेहैं यह समस्त संशयको प्राप्तहुए जानने अर्थात् कदाचित् ही वह धना- दिक उनसे अपने को मिलते हैं ॥४२॥ हे राजन् ! जहां कि स्त्री वा , (१५६) विदुरनीति- - प्रयोजनेषु ये सक्ता न विशेपेपु भारत । तानह पंडितान्मन्ये विशेपा हि प्रसंगिनः॥४४॥ यं प्रशंसंति कितवा यं प्रशंसंति चारणाः । यं प्रशंसंति बंधक्यो न स जीवति मानवः॥१५॥ हित्वा तान्परमेष्वासान्पांडवानमितौजसः। आहितं भारतैश्वर्यं त्वया दुर्योधने महत् ॥ ४६॥ जहां कि जुएवाज वा जहां कि वालक शिक्षाकरनेवाला , होताहै वह मनुष्य अवश हुए निश्चय ही डूबतेहैं जिस प्रकार कि नदीमें पत्थरकी नाव डूबती है ॥ ४३ ॥ हे भारत ! जो कि जन प्रयोजन- वाले कार्योंमें ही आसक्त रहतेहैं न कि विशेष अर्थात् व्यर्थ कार्योमें उनको में पंडित मानताहों क्यों कि जो कि कारण के बिना ही कार्य करतेहैं यह व्यर्थ हैं ।। ४४ ॥ जुएवाज जिसकी प्रशंसा करतेहैं और दूतजन जिसकी प्रशंसा करतेहें और व्यभिचारिणी त्रियाँ जिसकी . प्रशसा करती हैं वह मनुष्य नहीं जीवता है ॥ ४५ ॥ बडे बडे श्रेष्ठ धनुपपाले और अतुल पराक्रमी ऐसे पाडयोंको त्यागकर हे भारत !
इतना सुन धृतराष्ट्र महाराज विदुरनीस कहते हुए, हे विदुरजी ! मावाकानता तं दृश्यसि परिभ्रष्टं तस्मात्त्वमचिदिए । ऐश्वर्वमदसंमृद वलि लोकत्रयादिव ॥१७॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागापर्वणि विदुरहितवाक्य यात्रिंशोऽध्यायः॥३८॥[६] धृतराष्ट्र उवाच। अनीश्वरोऽयं पुरुषो भवाभव सूत्रप्रोता दारुमग्रीव योपा। 'तुमने महत् ऐश्वर्य दुर्योधन के विष रखदिया है. ॥ १६ ॥ तिसमें तुम • थोडे ही कालमें उसको ऐश्वर्यम अट हमादेवयागे हिमप्रकार कि. ऐदार्य मदस प्रमत्तहुए बटिको तीनों लोकोंम अष्ट दृमा सब जगत् देखता दुभा ॥१७॥ इति श्रीमहाभारले उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवास्य श्रीपाठवेदशावतसाडिनमासनामज-माशिरामविरचित- भापतिलक मात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८॥ (६) + यह पुरस ऐप तथा अनैश्वर्य दोनों में इसप्रकार असमर्थ है, जिस प्रकार कि सतमें बोधी दुई कारकी बनी ती असमर्थ होता है क्योंकि (१५८" विदुरनीति- . धात्रा तु दिष्टस्य वशे कृतोऽयं तस्माद त्वं श्रवणे धृतोऽहम् ॥ १ ॥ विदुर उवाच। अप्राप्तकालं वचनं बृहस्पतिरपि त्रुवन् । लमते बुद्धयवज्ञानमवमानं च भारत ॥२॥ प्रियो भवति दानेन प्रियवादेन चापरः। मंत्रमूलबलेनान्यो यः प्रियः प्रिय एव सः॥३॥ द्वेप्यो न साधुर्भवति न मेधावीन पंडितः । प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव.ह ॥ यह विधाताने माग्यके वशमे पहिलेसे ही करदिया है तिससे आप कहिये में कानमें धरता हौ ॥ १॥ तब विदुरजी महाराज कहनेलगे है भारत ! जिसके कहनेका समय ही विद्यमान नहीं है उस वचनको कहतेहुए साक्षात् वृहस्पतिजी भी बुद्धिकी अवज्ञा और निरादरको प्राप्त होसक्ते हैं ।। २ ।। दूसरा जन दान और प्रिय बोलनेसे प्रिय होसक्ताहै । और दूसरा अन्यजन मन और धनादिबलो प्रिय होतक्ता है पर जो कि प्रिय है वह दान और भियवचन आदिके बिना ही • प्रिय रहताहै ॥ ३ ॥ जो जिसका घेरी होताहै. वह यदि साधु और भाषाटीकासमेता। (१५९) - उक्तं मया जातमागेऽपि राज- न्दुर्योधनं त्यज पुचं त्वमेकम् । तस्य त्यागात्पुत्रशतस्य वृद्धि- रस्यात्यागात्पुत्रशतस्य नाशः॥५॥ न वृद्धिर्वहु मंतव्या या वृद्धिः क्षयमावहेत् । क्षयोऽपि बहु मंतव्यो यः क्षयो वृद्धिमावहेत्॥६॥ नस क्षयो महाराज यःक्षयो वृद्धिमावहेत् । क्षयः स त्विह मंतव्योयं लब्ध्वा बहु नाशयेत् ॥ युद्धिमान् तथा पडित भी हो तब भी उसकी दृष्टि से यह न साधु है न बुद्धिमान है न पंदित है प्रियके विप समम्न कार्य शुभ ही दीखते हैं और परीके वि अग्छ मी कार्य अशुभ दीखते हैं ॥ ४ ॥ हे राजन! जब कि उत्पन्न ही हुआया तभी मैंने आपसे कहाथा कि तुम इस अकेले दुर्योधनको त्याग देवो उसके त्यागनेसे तुम्हारे सौ पुत्रोंकी वृद्धि होयेंगी और उसके न त्यागनेसे तुम्हारे सौ पुत्रोंका नाश होजायगा-1.५ ॥ यह वृद्धि बहुन नहीं माननी चाहिये जो वृद्धि नाशको प्रान फरदेधे है और वह नाश मी नहीं मानना चाहिये जो नाश कि वृद्धिको प्राश फरदः ॥ ६॥ हे महाराज यह नाश नहीं है जो नाश कि पृद्धिको प्राप्त कर यहाँपर वह नाश मानना चाहिये (१६०० विदुरनीति- समृद्धा गुणतः केचिद्भवंति धनतोऽपरे । धनवृद्धान्गुणे_नान्धृतराष्ट्र विवर्जय ॥८॥ धृतराष्ट्र उवाच। सर्व त्वमायतीयुक्तं भापसे प्राज्ञसंमतम् । न चोत्सहे सुतं त्यक्तुं यतो धर्मस्ततो जयः॥ ९॥. विदुर उवाच । अतीवगुणसंपन्नोन जातु विनयान्वितः । सुसूक्ष्ममपि भूतानामुपमर्दमुपेक्षते ॥ १०॥ जिसको पाकर बहुतोको नाश करदेये ॥ ७ ॥ कोई तोगुणोंसे समृद्ध होतेहैं और कोई अन्यधनोंसे जो कि धनोंसे ती समृद्ध है पर गुणोंसे हीन है उनको हे धृतराष्ट्रजी ! आप त्याग दीजिये ॥ ८॥ इतना सुन धृतराष्ट्रजी फिर विदुरजीसे वोले हे विदुरजी | उत्तरकालमें हितकरनेवाला और पदितोंके माननयोग्य पचन आप कहरहेहै . और यह भी मुनरक्खा है कि जहाँ धर्म होताहे तहाँ जय होपैहे पर सब भी में पुरके त्यागर्नको नहीं टरसाह 'करता हो ॥ ९ ॥ तब विदरजी भाषाटीकासमेता। (१६१) परापवादनिरताः परदुःखोदयेषु च । परस्परविरोधे च यतते सततोत्थिताः ॥११॥ सदोपं दर्शनं येषां संवासे सुमहद्भयम् । अर्थादाने महान्दोपः प्रदाने च महद्भयम्॥१२॥ ये वै भेदनशीलास्तु सकामा निस्त्रपाः शठाः। 'ये पापा इति विख्याताः संवासे परिगर्हिताः १३ युक्ताश्चान्यमहादोपेर्ये नरास्तान विवर्जयेत् । निवर्तमाने सौहार्दै प्रीतिर्नीचे प्रणश्यति ॥ १४॥ और जो कि परायी निन्दा और पराये दुःखोंके उदय होनेमें निरत हैं और जो कि निरन्तर उद्यम करतेहुए परस्पर विरोध करानमें ही यल करतेहै ॥ ११ ।। और जिनका दर्शन भी दोपयुक्त है और जिनके साथ.सगद करनेमें भी महत् मय होता है और उन्होंके धनादि सेनेमें तयां उनके लिये देनेमें भी महत् मय होताहै ।। ॥ १२॥ और जो कि परस्पर भेद करानेवाले है और जो कि कामी और निर्जन तथा मूर्ख हैं और जो कि विख्यातपापी है और जो कि साथ पास करनेमें निन्दित है और जो कि नर महादोषोंसे युक्त हैं उनको पंडित जन त्याग देये ॥ १३ ॥ मित्रभार निवृत्त होनेपर नीचजनके वियं प्रीति नष्ट होजाती है और ६ अन्य .
। (११६४). 1. विदुरनीति- मया चापि हितं वाच्यं विद्धि मां त्वद्धितैपिणम् ज्ञातिभिर्विग्रहस्तात न कर्तव्यः शुभार्थिना । सुखानि सहभोज्यानि ज्ञातिभिर्भरतर्पम ॥२३॥ संभोजनं संकथनं संप्रीतिश्च परस्परम् । ज्ञातिभिः सह कार्याणि न विरोधः कदाचन २४ ज्ञातयस्तारयंतीह ज्ञातयो मजयंति च । सुवृत्तास्तारयंतीह दुर्वृत्ता मजयंति च ॥२५॥ सुवृत्तो भव राजेंद्र पांडवान्प्रति मानद । । अधर्पणीयः शरणां तेवतस्त्वं भविष्यसि ॥२६॥ है ।॥ २२ ॥ मेरे कहेटुए वचनको हितकारक जानिये और मुझको अपना हिलेपी समझिये ! है तात! जानिवालों के साथ रोिध कल्याणचाहनेवालेको नहीं करना चाहिये । किन्तु है भरतर्षम! जातिवालों के साथ सुखभोगनेचाहिये ।। २३ ॥ परस्पर भोजन और परस्पर कयन और परस्पर प्रीति यह जातिपालों के साथ यरने चाहिये ! और विरोध कदाचित् भी न करना चाहिये ।। २४ ॥ इस संसारमें जानिवाले ही तारदेतह और जानिवाले ही दुबादेते ! उनमें जो सुन्दर आचारवाट होतह वाह तारदतेह और दुराचारी दुपादेतई ॥ २५ ॥ इससे हे गजेन्द्र पाण्डवों के प्रति श्रेष्ठआधारपाले + .
. भाषाटीकासमेटा। (१६५) श्रीमंतं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति । दिग्धहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विंदति ॥२७॥ पश्चादपि नरश्रेष्ठ तव तापोभविष्यति । तान्वा हतान्सुतान्वापि श्रुत्वा तदनुचिंतय॥२८॥ येन खट्वां समारूढः परितप्येत कर्मणा । आदावेव न तत्कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥२९॥ न कश्चिन्नापनयते पुमानन्यत्र भार्गवात् । हूजिये । हे मानद ! उन पाण्डवोंसे युक्तहुए तुम परियों करके तिर- स्कार करनेयोग्य नहीं होचोगे अर्थात् पाण्डवोंके साथ रहनेमें तुम्हारे पैरी तिरस्कार नहीं करसकेंगे ॥ २६ ॥ सम्पत्तिवाले ज्ञातिको प्राप्त होकर जो ज्ञाति कष्ट पाता है वह सम्पत्तिवाला ज्ञाति उसके पापको प्राप्त होताहै जिसप्रकार कि जिसके हायमें विषका सनाहुआ वाण है उसको मृग प्राप्त होजाताहै ! भाव यह है कि जैसे कि व्याध मृगको मारदेताहे तैसे ही फटपानेवाले ज्ञातिके पापसे सम्पत्तिवाला ज्ञाति पीडित होताहै ॥ २७ ॥ हे नरश्रेष्ठ ! उन पाण्डवोंके हाथ अपने पुत्रोंको मरा सुन उनकी चिन्ता कर तुमको पिछारी सन्ताप होगा ॥ २८ ॥ जिस कर्मकर कि खदापर चढ़ चिन्ताके स्थानमें बैठाहुआ संतप्त होताहे उस कर्मको पहिले ही नाशवान् जीवितके निमित्त न करे।।२९||नीतिशास्त्रके करनेवाले शुक्राचार्यके विना कोई - (१६६) । विदुरनीति- शेपसंप्रतिपत्तिस्तु बुद्धिमत्स्वेव तिष्ठति ॥३०॥ दुर्योधनेन यद्येतत्पापं तेषु पुरा कृतम् । त्वया तत्कुलवृद्धेन प्रत्यानेयं नरेश्वर ॥ ३१ ॥ तांस्त्वं पदे प्रतिष्ठाप्य लोके विगतकल्मपः। भविष्यसि नरश्रेष्ठ पूजनीयो मनीपिणाम् ॥३२॥ सुव्याहृतानि धीराणां फलतः परिचिंत्य यः। अध्यवस्यति कार्येषु चिरं यशसि तिष्ठति३३ ।। असम्यगुपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि । नहीं अनीति करताहै यह वात नहीं किन्तु सव ही अनीति करतहें पर शेप रहेकी सिद्धि बुद्धिमानोंके विपे स्थित रहतीहै । इस कथ- नसे विदुरजीने यह जनाया कि जो आपकी कीहुई अनीति पीतगई तो वीतगई पर इससे आगे अनीतिके न करने में आपको यत्न करना चाहिये ॥३०॥ हे नरेश्वर ! जो कि यह पाप दुर्योधनने उन पाण्ड- वोंके विष पहिले किया है वह पाप तुम कुलवृद्धकर मिटाना चाहिये ॥ ३१ ॥ हे नरश्रेष्ठ ! उन पाण्डवोंको राज्यपदपर बैठाकर निप्पापहुए बुद्धिमानोंके पूजनेयोग्य होवोगे ॥ ३२॥ जो कि धीरजनों के सुन्दर कहेहुए वचनोंको अर्थसे विचार करके कार्यों के विष उत्साह करसाहै, वह बहुतकाल पर्यन्त कीतिमें स्थित रह- ताहै ॥ ३३ ॥ पण्डितोंकर उपदेश कियाइआ ज्ञान व्यर्थ दी भाषाटीकासमेता। (१६७) उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुष्ठितम् ३४॥ पापोदयफलं विद्वान् यो नारभति वर्धते ॥३५॥ यस्तु पूर्वकृतं पापमविमृश्यानुवर्तते ॥ ३६॥ अगाधपके दुर्मेधा विपमे विनिपात्यते ॥ मंत्रभेदस्य पद प्राज्ञोद्वाराणीमानि लक्षयेत् ३७ अर्थसंततिकामश्च रक्षेदेतानि नित्यशः । मदं स्वप्नमविज्ञानमाकारं चात्मसंभवम् ॥३८॥ होजाताहै जब कि जाननेयोग्य होकर मी नहीं जानागया है। और जानाहुआ मी व्यर्थ होजाताहै जब कि नहीं सेवन कियाहे ॥ ३४ ॥ जिसका कि फल पापके उदयकरने वाला है उस फर्मको जो विद्वान् है यह नहीं आरम्भ फरताहै ॥२६॥यह वृद्धिको प्राप्त होताहै । जो कि कियेहुए पापको नही विचारकर पापको ही निरन्तर करतारहता है ॥ ३६॥ यह युयुमि गहरी फीचवारे विपमनरफमें गिराया जाता है मंत्रके भेद होने के द्वार हैं इनको बुद्धिमान जन जानताहे ॥ ३७ ॥ इन मंरके भेद होने के द्वारोंको सदैव ही अर्थ पृद्धिकी इच्छापाला रक्षा की एफ मदिरापान, दूसरी अतिनिद्रा, तीसरा दूसरेके गुत दुतके दिपकी पार्वाफा न जानना, चौथी अपनी नेप्रमुसविकारादि चेष्टा, पांच दुष्ट मन्त्रिपोंके पित्र वितास, एया जो दूत कि चतुर न होघे । ग m (१६८1 विदुरनीति- दुष्टामात्येषु विश्र दूताच्चाकुशलादपि । द्वाराण्येतानि यो ज्ञात्वा संवृणोति सदा नृप ३९. त्रिवर्गाचरणे युक्तः स शत्रूनधितिष्ठति । नवे श्रुतमविज्ञाय वृद्धाननुपसेव्य वा ॥ धर्मार्थी वेदितुं शक्यौ बृहस्पतिसमैरपि ॥४०॥ नटं समुद्रे पतितं नष्टं वाक्यमशृण्वति ॥११॥ अनात्मनि श्रुतं नष्टं नष्टं हुतमनग्निकम् ॥४२॥ मत्या परीक्ष्य मेधावी बुद्ध्या संपाद्य चासकृत। श्रुत्वा दृष्ट्वाथ विज्ञाय प्राज्ञमैत्री समाचरेत्॥४३॥ उससे विश्वास होना ।। ३८ ॥३९|| हे नुप ! इन छै द्वारोंको जान- फर जो सदैव मदतारहताहै वह धर्मार्थकामके सेवन करनेमें युक्तहुआ जन शत्रुओंके ऊपर स्थित होताहै । शास्त्रको न जानकर और वृद्धोंको न सेवनकर वृहस्पतिके समान भी जोंके धर्म और अर्थ यह दोनों जाननेको नहीं समर्थ होतेहैं ॥ ४० ॥ समुद्र में गिराहुअर नष्ट होताहे और नहीं सुननेवाले के विर्षे वाक्य नष्ट होताहै और निर्बु- द्रिके वि शास्त्र नष्ट होताहै और निरमि हवन कियाहुआ नष्ट होताहैli ११ ४११ ४२॥ प्रथम बुद्धिसे परीक्षा कर फिर घुद्धिसे वारंवार उसके तत्वकोंविचारकर और दूसरोंसे सुनकर और दृष्टि देखकर , . भाषाटीकासमेता। (१६९) अकीति विनयो हंति हत्यनर्थ पराक्रमः। हंति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारोहंत्यलक्षणम्॥४४॥ परिच्छदेन क्षेत्रेण वेश्मना परिचर्यया । परीक्षेत कुलं राजन्भोजनाच्छादनेन च ॥४५॥ उपस्थितस्य कामस्य प्रतिवादो न विद्यते । अपि निर्मुक्तदेहस्य कामरक्तस्य किं पुनः॥४६॥ प्राज्ञोपसेविनं वैद्यं धार्मिकं प्रियदर्शनम् । मित्रवंतं सुवाक्यं च सुहृदं परिपालयेत् ॥१७॥ और स्वयं जानकर पण्डितजनोंके साथ मित्रता करे ॥ ४३ ॥ विनय अकीर्तिका नाश करदेवैहै और पराक्रम अनर्थका नाश करदेता है और क्षमा सदेव क्रोधका नाश करदेतीहै । और आचार फुलक्षणका नाश करदेताहै ॥ ४४ ॥ भोगनेयोग्य वस्तु सामग्री और क्षेत्र और गृह और सेवा और भोजन और वन इनसे कुल्लकी परीक्षा करें ॥ ४५ ॥ जब कि निर्मुक्त देह अर्थात् त्यागेहुए देहाभिमान विरक्तकों ही स्वयं प्राप्तहुए अभीष्ट पदार्थका त्याग करदेना नहींहै तो फिर क्या कहनाहे कि जो कामरक्त अर्थात् इच्या करनेवालेको स्वयं प्राप्तहुए अभीष्ट पदार्थका त्याग करना न हो तो ॥ ४६॥ विद्वानोंकी सेवा फरनेवाला और पैच अर्थात् निधागला और धर्मारमा और प्रियदर्शन- "याटा और सुन्दर मिनाया और अच्छे बोलनेवाला ऐसे मित्रसी (१७०) । विदुरनीति- दुष्कुलीनः कुलीनो वा मर्यादा यो न लंघयेत् । धर्मापेक्षी मृदुह्रीमान्स कुलीनशताद्वरः ।। ययोश्चित्तेन वा चित्तं निभृतं निभृतेन वा । समेति प्रज्ञया प्रज्ञा तयोमैत्री नजीर्यति ॥४८॥ दुर्बुद्धिमकृतप्रज्ञ छन्नं कूपं तृणैरिव । विवर्जयीत मेधावी तस्मिन्मेत्री प्रणश्यति॥१९॥ अवलिप्तेषु मूर्खपुरोद्रसाहसिकेषु च । तथैवापेतधर्मपु न मैत्रीमाचरेवुधः॥५०॥ सदैव रक्षा करे ॥ ४७ ॥ दुष्कुलीन हो वा कुलीन हो जो कि मर्या- टाको उल्लंघन न करे और धर्मको चाहनेवाला तथा कोमलस्वभाव और लज्जावान् हो यह सौ 'कुलीनोंसे भी श्रेष्ठ होताहै जिन दोनों के मध्य चित्तसे चित्त और गुप्तमंत्रादिसे गुप्तमंत्रादिक और बुद्धिसे बुद्धि समान मिलती हो उन दोनोंकी मित्रता कदापि नहीं दूर होतीहै॥४८॥ जो कि दुर्बुद्धि है और कियेहुए उपकारको नहीं जानताहै और छल हिमादिकसे इसप्रकार ढका रहताहै जिस प्रकार कि तोंसे कूप, ऐसे जनको बुद्धिमान जन त्यागदेव क्यों कि उसके विपै की हुई मित्रता नष्ट होजातीहै ।। ४९ ॥ जो कि अति गर्विष्ट और मूर्ख तथा क्रोधी और नहीं विचारकर कार्यकरनेवालेहैं और जिन्होंने धर्म त्यागदिया है उनके विष पण्डित जन मित्रता न करे ॥५॥ 1 भाषाटीकासमेता। (-२७१) कृतज्ञं धार्मिकं सत्यमक्षुद्रं दृढभक्तिकम् । जितेंद्रियं स्थितं स्थित्यां मित्रमत्यागि चेप्यते५१ इंद्रियाणामनुत्सर्गो मृत्युनापि विशिष्यते । अत्यथं पुनरुत्सर्गःसादयेदेवतानपि ॥ १२ ॥ मार्दवं सर्वभूतानामनसूया क्षमा धृतिः । आयुप्याणि बुधाः प्राहुमित्राणां चाविमानना५३ अपनीतं सुनीतेन योऽर्थं प्रत्यानिनीपते । मतिमास्थाय सुदृढां तदकापुरुपव्रतम् ॥ ५४॥ जो कि किये उपकारके जाननाला है और धर्मात्मा है और सत्य. बोलनेपाला और क्षुद्रताहीन और दृढ मक्तिवाला है। और जिसने इंद्रिय जीतरक्ख हैं और जोकि मर्यादामें स्थित है और त्याग करनेवाला भी नहीं है ऐसा मित्र सबकर इच्छा कियाजाताहै ॥५१॥ इंदि- योंका विषयोंसे निवृत्त करना मृत्युसे मी विशेप है अर्थात् इन्द्रियोंका सिपयोंसे रोकना मृत्युके कटसे भी अधिक कष्टकारक है। पर जो कि अत्यन्त इन्द्रियोंको विषयों में प्रवृत्त करना है वह देवताओंका भी नाश करदेताहे ॥ १२ ॥ फोमलस्वभाव होना और समस्त प्राणि- योंकी निन्दा न करना और सहनशीउ होना और धैर्य और मित्रोंका अवमान न करना यह समस्त आयुके बढानेवाले है ऐसा पंडित जन कहतेहें ।। १३ ॥ जो कि अन्यायकर नाराहुए धनको अच्छी छ- (१७२) ', विदुरनीति- आयत्यां प्रतिकारशस्तदात्वे दृढनिश्चयः । अतीते कार्यशेषज्ञो नरोऽथैर्न प्रहीयते ॥ ५५ ॥ कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निपेवते । तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत् ॥५६॥ मंगलालंभनं योगः श्रुतमुत्थानमार्जवम् । भूतिमेतानि कुर्वति सतां चाभीक्ष्णदर्शनम् ५७॥ अनिर्वेदः श्रियो मूलं लाभस्य च शुभस्य च । महान्भवत्यनिर्विण्णः सुखं चानंतमश्नुते ॥५८॥ बुद्धिको आश्रय कर न्यायसे फिर लैनेकी इच्छा करताहै सो यह सत्पुरुषोंका व्रत है ।। ५४॥ जो आनेवाले कालके विर्ष करनेयोग्य कार्यके उपायको जानताहे और वर्तमानकालके विर्षे आरम्भकिये कार्यमें जिसका निश्चय हृढ रहता है और व्यतीतकालमें शेप रहे कार्यके जाननेवाला है वह नर धनादिकोंसे कदापि नहीं हीन होताहै ॥१५॥ कर्म और मन और वाणीसे जिसकर्मका सदा ही सेवन करताहै वह' कर्म उसको अपनी तरफ हरण करलेताहै तिससे मनुष्य शुभकर्मका, ही सेवन करे।।५६॥मंगल पदार्थोंका स्पर्श करना और योग नाम चित्तका एकाग्र करना और शास्त्राभ्यास और उद्यम और कोमल स्वभाव रखना और सजनोंका सदैव दर्शन करना यह ऐश्वर्य करतेह।।५७॥ अनिर्वेद अर्थात् उद्यम लक्ष्मीका और लाभका और शुभका भूल है'उद्यम *- . करनेवाला जन धर्म और अर्थ इन दोनोंसे नहीं भ्रष्ट होताहे उस अमीष्ट मुखका सेवन कर और मढनतको न सेवन करे अर्यात सर्यया भोजनादिका त्याग न करे ॥ ६ ॥ जो कि दुःखाते हैं और जो कि मतमाले रहतेहैं और जो कि नास्तिक और आलसी है भाषाटीकासमता। (१७३) नातः श्रीमत्तरं किंचिदन्यत्पथ्यतमं मतम् । , प्रभविष्णोर्यथा तात क्षमा सर्वत्र सर्वदा ॥१९॥ . क्षमेदशक्तः सर्वस्य शक्तिमान्धर्मकारणात् । अर्थानौँ समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता६० यत्सुखं सेवमानोऽपि धर्मार्थाभ्यां न हीयते । कामं तदुपसेवेत न मूढवतमाचरेत् ॥६१ ॥ दुःखातेपु प्रमत्तेषु नास्तिकेवलसेषु च । न श्रीर्वसत्यदांतेषु ये चोत्साहविवर्जिताः ६२॥ करनेवाला ही धनादिकोंसे महान् होजाताहे और अनन्त सुख भोगता है ॥ १८ ॥ हे तात ! समर्थ होनेवालेकी जैसी कि क्षमा सबकाल में और सब जगह हितकारक होघेहै इससे अन्य कुछ भी अत्यन्त सुन्दर और अतीय हिनकारक उपाय कविजनोंने नहीं मानाहै ॥ १९ ॥ असमर्थ तो सबके ही ऊपर क्षमा करे और सामर्थ्यवान् धर्मके कारण भमा करे । और जिसके अर्थ और अनर्थ दोनों समान ही है उसकी भी क्षमा ही सदा हितकारक जाननीं ॥ ६ ॥ जिस सुखक से N (१७६) विदुरनीति- तपो बलं तापसानां ब्रह्म ब्रह्मविदां बलम् । हिंसा वलमसाधूनां क्षमा गुणवतां वलम् ७० ॥ अटी तान्यवतन्नानि आपो मूलं फलं पयः॥ हविवाह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमोपधम् ।। ७१।। न तत्परस्य संदध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः। संग्रहेणेप धर्मः स्यात्कामादन्यः प्रवर्तते ॥७२॥ अक्रोधेन जयेक्रोधमसाधु साधुना जयेत् । जयेत्कदयं दानेन जयेत्सत्येन चानृतम् ।। ७३॥ 'पूर्व देख मुने कहेका अनुसन्धान और विचारकर कार्यका आरम्भ करना इनको हे राजन् ! तुम ऐश्वयका मूल जानिये ॥ १९ ॥ तपस्वियोंका चल तप है और घेदवेत्ताओंका वल वेद है और असाधु- ओका वल हिंसा है और गुणत्रानोंका बल क्षमा है ॥ ७० ॥ जो कि आठ वस्तु व्रतके नाश करनेवाले नहीं होतेहे वह यह हैं एक तौ जल दूसरा मूल तीसरा पाचवा घृत छठी ब्राह्मणकी इच्छा सातवाँ गुरुका वचन आठवा औषध ॥ ७१ ।। जो कि कर्म अपने आत्माको प्रतिकूल हो उस कर्मके करनेको दूसरेको भी न सलाह देधै यह धर्म सग्रहकर होताहै और अन्य धर्म इच्छाने प्रवृत्त होताहै अर्थात् यह धर्म निष्काम है और अन्य धर्म सकामहै ॥७२॥ अक्रोधसै क्रोधको जीत और सत्कर्मसे असत्कर्मको जीते सौर दानसे फल चौथा दूध 1 - भाषार्टीकासमेता। (१७७) स्त्रीधूर्तकेऽलसे भीरौ चंडे पुरुपमानिनि । "चौरे कृतघ्ने विश्वासो न कार्यो न च नास्तिके७४ अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि संप्रवर्धते कीर्तिरायुर्यशोवलम् ॥७५ ।। अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण वा।, . अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेपु मनः कृथाः॥७६ अविद्यः पुरुपः शोच्यः शोच्यं मैथुनमप्रजम् । निराहाराःप्रजाःशोच्या शोच्य राष्ट्रमराजकम्७७ कृपणताको जीते और सत्यसे झूटको जीते ॥ ७३ ॥ स्त्री और धूर्तक ( जुएबाज ) और आलसी और डरपनेवाला और चण्ड नाम अतीत , क्रोधी और अपनेको पुरुप माननेवाला और चौर और उपकारके न मानने- वाला और नास्तिक इनके विष विश्वास नहीं करना चाहिये ||७४|| उत्तमजनोंको प्रणाम करनेका है स्वमार जिसका ऐसे सदैव वृद्ध जनोंकी सेवा करनेवाले जनके चार पदार्थ बढतेहें एक तो कत्ति दूसरा आयु तीसरा धन चतुर्थ बल ।। ७५ ॥ जो कि अर्थ अत्य- 'न्तरेश और धर्मके उल्लघनसे और शत्रुके आगे नम्र होनेसे होतेहों उन अोंके विर्षे हे राजन् ! अपना मन मतकारये ॥ ७६ ॥ जो पुरुष कि विद्याहीन है वह शोचकरनेयोग्यहै । और जो कि मैथुन सन्तानवर्जित है वह शोचकरनेयोग्यहै और जो कि प्रजा मोजन (१७८) विदुरनीति- अध्वा जरा देहवतां पर्वतानां जलं जरा।। असंभोगो.जरा स्त्रीणां वाक्शल्यं मनसोजरा७८ अनानायमला वेदा ब्राह्मणस्यावतं मलम् ७९ ॥ मलं पृथिव्या बाहीकाः पुरुपस्यानृतं मलम् । कौतूहलमला साध्वी विप्रवासमलाः स्त्रियः ८०. सुवर्णस्य मलं.रूप्यं रूप्यस्यापि मलं वपु । ज्ञेयंत्रघुमलं सीसं सीसस्यापि मलं मलम्८१ ॥ न स्वप्नेन जयेन्निद्रां न कामेन जयेत्स्त्रियः । नेधनेन जयेदग्निं न पानेन सुरां जयेत् ॥८२ ॥ वर्जितहुई रहतीहैं अर्थात् भूखी रहतीहें वह शोचने योग्य हैं । और जो कि राज्य राजाहीन है वह शोचनेयोग्य है ॥७॥ देहधा- रियोंका बुढापा मार्ग है और पर्वतोंका बुलापा जल है और स्त्रियोंका बुढापा असंभोग है और मनका बुढापा वाक्शल्य अर्थात् दुर्वचन है।।७८ ॥ वेदोंका मल अनभ्यास है और ब्राह्मणका मल अनाचार है ॥ ७९ ॥ और पृथिवीका मल बाह्रीकदेश है और पुरुषका मल झूठ है और पतिव्रतास्त्रियोंका मल कौतूहल अर्थात् कटाक्षहास्यादि क्रीडा है और सर्व स्त्रियोंका मल परगृहादिकमें वासकरना है ॥ ८ ॥ सुवर्णका मल चांदी और चांदीफा मल रांग जाननेयोग्य है और रांगका मल सीसा और सीसाका भी मल मेल है ॥८॥ निद्रासे 14 भाषाटीकासमेता। (१७९) यस्य दानजितं मित्रंशत्रवो युधि निर्जिताः । अन्नपानजिता दाराः सफलं तस्य जीवितम् ८३ सहस्रिणोऽपि जीवंति जीवंति शतिनस्तथा । धृतराष्ट्र विमुंचेच्छां न कथंचिन्न जीव्यते ॥ ८॥ पत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति पश्यन्न मुह्यति ॥८५॥ राजन्भूयो ब्रवीमि त्वां पुत्रेषु सममाचर । 'जन निद्राको नहीं जीतसक्ताहै और कामसे स्त्रियोंको नहीं जीतसक्ता है और ईंधनसे अनिको नहीं जीतसक्ताहै और मदिरापानसे मदिराको नहीं जीतसक्ता है |८२|| जिसके दानसे जीतेहुए मित्र है और युद्धमें जीतेहुए शत्रु हैं और अन्नपानसे जीतीहुई स्त्रियां हैं उसका जीवन सफल है ॥८॥ हे धृतराष्ट्र जबतक कि मृत्यु नहीं है तबतक हजा- वाले भी जीते, और सौवाले भी जीते हैं इससे इच्छाको त्यागदी- जिये यदि इच्छाको न त्यागोगे तो भी किसीप्रकार तुम्हारा नहीं जीवन होसक्ता है ॥ १४ ॥ जो कि पृथिवीपर धान यव सुवर्ण पशु स्त्रियां हैं वह सर्व इच्छा करनेवाले एकके ही भोगनेको परिपूर्ण नहीं होसक्ती ऐसा देखताहुआ विद्वान् नहीं मोहित होताहै ॥८॥ हे राजन् ! तुमसे फिर हम कहतेहैं कि पुत्रोंके विर्षे समान (१८०) | विदुरनाात-" समता यदि ते राजन् स्वेषु पांडुसुतेषु वा॥८६॥ 'इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणिं विदुरवाक्ये एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥३९॥[७] विदुर उवाच । योऽभ्यर्चितः सद्भिरसज्जमानः, करोत्यर्थ शक्तिमहापयित्वा । क्षिप्रं यशस्तं समुपैति संत- मलं प्रसन्ना हि सुखाय संतः॥१॥ धत्तिये जिससे कि हे राजन् तुम्हारे निजपुत्रोंमें और पांडवोंमें समता होजावे ॥८६॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये श्रीपाठकवंशावतस-पण्डितमंगलसेनात्मजकाशिरामविरचि- तमापातिलके एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥[७] इसके अनन्तर फिर विदुरजी महाराज कहनेलगे हे राजन् ! जो कि सजनोंकर सत्कार कियाहुआ अभिमान रहित जन शक्तिके अनु- सार अर्थ करताहै उस सजनके प्रति कीर्ति शीघ्र ही आकर प्राप्त होजाती है। यदि ऐसे सनम जिसपर प्रसन्न होतेहैं उसके लिये सुख " भापाटीकासमेता। महांतमप्यर्थमधर्मयुक्तं, यः संत्यजत्यनपाकृष्ट एव । सुखं सुदुःखान्यवमुच्य शेते, जीणां त्वचं सर्प इवावमुच्य ॥२॥ अनृते च समुत्को राजगामि च पैशुनम् । गुरोश्वालीकनिबंधः समानि ब्रह्महत्यया ॥३॥ असूयेकपदं मृत्युरतिवादः श्रियो वधः । अशुश्रूपा त्वरा श्लाघाविद्यायाःशववस्त्रयः॥४॥ आलस्यं मदमोही च चापलं गोष्ठिरेव च । स्तब्धता चाभिमानित्वं तथात्यागित्वमेव च । देनेको समर्थ होतेहैं ॥ १॥जो अर्थ फि बडामारी भी है परधर्मसे युक्त नहीं है ऐसे अर्थको जो सजन दूसरोंकर नहीं पराजितहुआ भी त्यागदेताहे वह अति दुःखोंको छोडकर मुखपूर्वक सोवताहै जिस प्रकार कि पुरानी त्वचाको त्यागकर सर्प सुखपूर्वक सोवताहै ॥ २ ॥ ठमें अतीव उत्कर्ष अर्थात् अविकता और राजातक जानेवाली चुगली और गुरुजनोंसे छूटका हठ यह ब्रह्महत्याफे समान हैं ॥ ३ ॥ मृत्युका एक पद निन्दा है और अतिवाद-नाम कठोर वचन लक्ष्मीका नाशक है और असेना और सभ्रम तथा अनभ्यास यह तीन विद्याके 'शत्रु है ।। ४॥ मालस्य और मद मोह और चपलता और गोष्टि और (१८४) विदुरनीति इदं च त्वां सर्वपरं ब्रवीमि, पुण्यं पदं तात महाविशिष्टम् । न जात कामान भयान्न लोभा- धर्म जह्याज्जीवितस्यापि हेतोः ॥ १२॥ नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये, जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः । त्यक्वाऽनित्यं प्रतितिष्ठस्व नित्ये, संतुष्य त्वं तोपपरोहि लाभः ॥ १३॥ महाबलान्पश्य महानुभावान्, प्रशास्य भूमिं धनधान्यपूर्णाम् । हुए ॥ ११॥ हे तात ! सबमें उत्तम और अतीव श्रेष्ठ तथा पुण्य प्राप्त करनेवाला यह वचन में तुमसे कहताहौं न तो कामसे और न भयसे और न लोभसे और न जीवितके कारण कदाचित् भी नहीं धर्मका त्याग करे ॥ १२ ॥ धर्म नित्य है और मुखदुःख दोनों अनित्य हैं और भोगनेवाला जीव नित्य है और इस जीवका हेतु शरीरादि अनित्य है इससे अनित्यको त्यागि नित्यके ऊपर स्थित हूजिये और आप सन्तोष कारये क्यों कि सन्तोष परमलाम है ।। ॥ १३ ॥ हे राजन् ! बडे २ ममाववाले महाबली राजाओंको देखिये 11 भापाटीकासमेता। (१८५) राज्यानि हित्वा विपुलांश्च भोगान्, गतान्नरेन्द्रान् वशमंतकस्य ॥ १४॥ मृतं पुत्रं दुःखपुष्टं मनुष्या, उत्क्षिप्य राजन स्वगृहानिहरति । , तं मुक्तकेशाः करुणं रुदंति चितामध्ये काष्टमिव क्षिपंति ॥ १५॥ अन्योधनं प्रेतगतस्य भुंक्त, वयांसि चामिश्वशरीरधातून् । द्वाभ्यामयं सह गच्छत्यमुत्र, पुण्येन पापेन च वेश्यमानः ॥१६॥ कि जो धनधान्यसे परिपूर्ण हुई पृथि का पालन करके राज्य और विपुल भोगोंको त्यागि फालके वश चलेगये ।। १४ ॥ हे राजन् ! जो कि वटे दुःखोंसे पुष्ट कियाहै ऐसे मृतकपुत्रको उठाकर मनुष्य अपने घरोंसे निकालकर लेजातेहैं और उसको भी 2 मुक्तकेश अर्थात् बाठोंके स्ट छोटेहुए करगापूर्वक रोवते हैं । और चिनामध्यमें काष्टकी समान उसको जलने टिये टालदेते ||१५||यस प्रेतमाव- को प्राप्तहुए मृतकके धनको और हीमोगताहै और उसके शरीरधातु- ओंको पक्षी या अमि मक्षण करताहै केवल यह मृतफ पुण्य और - (१८८) विदुरनीति-'. नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ॥२२॥ प्रज्ञावृद्धं धर्मवृद्धं स्वबंधु,. विद्यावृद्धं वयसा चापि वृद्धम्। कार्याकायें पूजयित्वा प्रसाद्य, यः संपृच्छेन स मुह्येत्कदाचित् ॥ २३॥ धृत्या शिनोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुषा । चक्षुः श्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा२४॥ कामक्रोधरूप बडे २ ग्राहोंवाली नदीके प्रति धैर्यरूप नाव बनाकर जन्म मरण, जरा, व्याधि, शोक, दुःखादिरूप दुर्गम स्थानोंको तरजाइये ॥ २२ ॥ जो कि अपने जातिवाला थुद्धिमें वढाहै अथवा धर्म करनेमें वढाहै अथवा विद्यामें वढाहे वा अवस्था करके बढाहै उससे सत्कार और प्रसन्न कर कार्य और अकार्य दोनोंमें जो कि सलाह पूछताहे वह कदाचित् भी नहीं भ्रष्ट होताहै ॥ २३ ॥ धैर्यसे शिश्न और उदरको जीत और नेत्रसे हाथ और पाँवको जीत मनसे नेत्र और कानको जीते और कर्मसे ,मन और वाणीको जीते भाव यह है कि काम और भूख इन दोनोंको धैर्यसे जीतकर दोपसे रक्षा करे और भलीप्रकार टेखि वस्तुके ग्रहणकरनेकर हाथकी रक्षा करे और दृष्टिसे पवित्र किये स्थलपर पदके रखनेकर पांवकी रक्षा करें और परस्त्री आदिकोंसे निवृत्तिकरनेकर नेत्रकी रक्षा भाषाटीकासमेता। (१८९) नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती, नित्यस्वाध्यायी पतितानवर्जी। सत्यं त्रुवन्गुरवे कर्म कुर्व- न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्मलोकात् ॥ २५ ॥ । अधीत्य वेदान्परिसंतीर्य चाग्नी- निष्ट्वा यज्ञेः पालयित्वा प्रजाश्च । गोब्राह्मणार्थं शस्त्रपूतांतरात्मा, हतः संग्रामे क्षत्रियः स्वर्गमेति ॥२६॥ और निन्दितशन्दोंसे निवृत्तिकरनेकर कानको रक्षा कर और फर्मस मन और पाणी इन दोनोंकी रक्षा करे ॥ २४ ॥ नित्योदको अर्थात सदेव ययाकाल स्नानादि करनेगला और सदेव यज्ञोपवीत धारण फरनेवाटा और सदेय यदके अभ्यास करनेवाला और पतितजनों के अनके त्यागनेवाला और गुरुके डिपे सत्य फहनेवाला और श्रीन स्मान फर्म करनेवाला ऐसा मामग ब्रह्मटोकमे नहीं भ्रष्ट होताहै ।। ॥ २५ ॥ पदोंको पढकर और अमियोंका विस्तार कर और पोंसे देवताओं का पजन फर और प्रजाओंका पाटन कर जो कि गो और प्रामगो अर्थ शस्त्रमे परिरहुए अन्तःकरणयाला क्षत्रिय संग्राममें पथ्य (१९०) विदुरनीति- वैश्योऽधीत्य ब्राह्मणान क्षत्रियांच, धनैः काले संविभज्याश्रितांश्च । त्रेतापूतं धूममाघ्राय पुण्य, प्रेत्यं स्वर्गे दिव्यसुखानि भुक्ते ॥२७॥ ब्रह्म क्षत्रं वैश्यवर्णं च शूद्रः, क्रमेणैतान्न्यायतः पूजयानः । तुष्टेप्वेतेप्पव्यथो दग्धपाप- स्त्यक्त्वा देहं स्वर्गसुखानि भुक्ते ॥२८॥ चातुर्वर्ण्यस्यैप धर्मस्तवोतो, हेतुं चानुअवतो मे निबोध । होताहै वह स्वर्गको प्राप्त होताहै ॥ २६ ॥ वेदोंको पढकर और समय २पर ब्राह्मण और क्षत्रिय और आश्रित जनोंको धन बांट- कर और यज्ञके तीनों अमियोंसे पवित्रहुए पुण्यदायक धूमको सूंघकर पैश्य मरकर स्वर्गमें दिव्यसुखोंको भोगताहै ॥ २७ ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय और धैश्य वर्ण इनकी क्रमानुसार न्यायसे पूजा करनेवाला शूद्र इन ब्राह्मण क्षत्रिय पैश्योंके संतुष्ट होनेपर निष्पाप और व्यथा- हीन होकर शरीर त्यागि स्वर्गसुखोंको भोगताहे ॥ २८॥ हे राजन् ! , भोपाटीकासमेता। क्षात्राद्धर्माद्धीयते पांडुपुत्र- स्तं त्वं राजन् राजधर्मे नियुक्ष्व ॥२९॥ धृतराष्ट्र उवाच । एवमेतद्यथा त्वं मामनुशाससि नित्यदा। ममापि च मतिः सौम्य भवत्येवं यथात्थ माम३० सा तु घुद्धिः कृताप्येवं पांडवान्प्रति मे सदा । दुर्योधनं समासाद्य पुनर्विपरिवर्तते ॥३१॥ न दिएमभ्यतिक्रांतुं शक्यं भूतेन केनचित् । चारोंवोंका यह धर्म मेने तुमसे कहाहै इस चारों वर्गों के धर्मके कहनेका कारण भी मुझसे श्रवण करिये । हे राजन् ! पाण्डुपुत्र युधि- प्टिर महाराज प्रजापालनादिरूप क्षत्रियोंके धर्मसे हीन है इस कारण आप उनको क्षत्रियों के धर्ममें नियुक्त कारये ॥ २९॥ तव धृतराष्ट्रजी इतना वचन सुन फिर विदुरजीसे फहनेलगे । हे विदुरजी। यह ऐसा. ही होना चाहिये जैसा कि सदेय तुम मुझको शिसाते रहते हो और हे सौम्य ! मेरी बुद्धि भी ऐसी ही होजातीहै जैसा कि तुम मुझसे कहते हो ॥ ३० ॥ और वह ही युद्धि इसीप्रकार मुसकर सदैव पहियों के प्रति की मी जातीहै पर दुर्योधनको प्राप्त होकर फिर लौट- जातीहै ॥ ३१॥ सो हे विदुरजी ! प्रारब्ध रहंघन फरनको किसी । (१९२) विदुरनीति- दिएमेव ध्वं मन्ये पौरुपं तु निरर्थकम् ॥ ३२॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाश्ये चत्वारिंशोऽध्यायः॥४०॥ [८] ॥ समाप्तमिदं प्रजागरपर्व ।। प्राणीकर समर्थ नहीं होसक्ताहै इससे प्रारम्धको ही अचल मानताही और पौरुष निरर्थक है ॥ ३२ ॥ गुरुभक्त्यनुभावेन भाषा विदुरनीतिक समपूर्यत तां दृष्ट्वा सन्तो मे सन्तु शंकराः ॥ १॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि . प्रजागरपर्वणि विदुरहितवाक्ये श्रीढाढौलीग्रामस्थ-पाठकदंशावतंस-पंडितमंगलसैनात्म- जकाशिरामविरचितमापातिलके चत्वारिशोऽ- ध्यायः॥ ४०॥ [८] दोहा-सम्बतबहिशरांकशशि, माघ कुहूयुत सोम । विदुरनीतिभापातिलक, मिरचो पद अनुलोम ॥ १ ॥ काशिरामको आज पितु, मंगलसनसमेत । भयो सफल रचि जन्म पह, सद्गुणगणसमुपेत ॥ २॥ जगतमान्य मुम्बापुरी, वेंकटेशयन्त्रेश । मुद्रणहित अर्पण कियो, क्षितियशकरन प्रवेश ॥ ३ ॥ ॥ इति विदुरनीति समाप्त ॥ : । 1 • || श्रीः॥ यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी भापाटीकासमेता प्रारभ्यते। 1 अथारणेयपर्व । जनमेजय उवाच । एवं हतायां भार्यायां प्राप्य केशमनुत्तमम् । प्रतिपद्य ततः कृष्णां किमकुर्वत पांडवाः॥ १॥ नन्या कृष्ण यक्षधर्मप्रश्नोत्तरमालिकाम् ।। अलकरोमि नृगिरा टीकया विशदार्थया ॥ १ ॥ राजा जनमेजय वैशंपायनजीसे कहनेलगे--कि हे ऋपिवयं । जब 'इसप्रकार जयद्रथ करके द्रौपदी हरीगई और घोर क्लेश प्राप्त होगया, तिसके अनंतर द्रौपदीको प्राप्त होकर पांडय क्या करते भये ! ॥१॥ .
- (१९२ विदुरनीति दिष्टमेव वं मन्ये पौरुपं तु निरर्थकम् ॥ ३२॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये चत्वारिंशोऽध्यायः॥४०॥[८] : ॥ समाप्तमिदं प्रजागरपर्व ॥ प्राणीकर समर्थ नहीं होसक्ताहै इससे प्रारब्धको ही अचल मानताही और पौरुप निरर्थक है ॥ ३२ ॥ गुरुभक्त्यनुभावेन भाषा विदुरनीतिके समपूर्यत तां दृष्ट्वा सन्तो मे सन्तु शंकराः ॥ १॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि . प्रजागरपर्वणि विदुरहितवाक्ये श्रीढाढौलीग्रामस्थ-पाठकदंशावतंस-पंडितमंगलसेनात्म- जकाशिरामविरचितमापातिलके चत्वारिंशोऽ- ध्यायः ॥ ४०॥ [८] दोहा-सम्बतवहिशरांकशशि, माघ कुहूयुत सोम । विदुरनीतिमापातिलक, विरचो पद अनुलोम ॥ १॥ काशिरामको आज पितु, मंगलसेनसमेत । भयो सफट रचि जन्म यह, सद्गुणगणसमुपेत ॥ २ ॥ जगतमान्य मुम्बापुरी, वेंकटेशयन्त्रेश । मुद्रणहित अर्पण कियो, क्षितियशकरन प्रवेश ॥३॥ ॥ इति विदुरनीति समाप्त ॥ - ।
(१९६) याधर्मप्रश्नोत्तरी- - हियमाणं तु तं दृष्ट्वा स विप्रः कुरुसत्तम । त्वरितोऽभ्यागमत्तत्र अग्निहोत्रपरीप्सया॥१०॥ अजातशघमासीनं भ्रातृभिः सहितं वने । आगम्य ब्राह्मणस्तूर्णं संतप्तश्चेदमब्रवीत् ॥ ११॥ अरणीसहित मंथं समासक्तं वनस्पती । मृगस्य धर्पमाणस्य विपाणे समसज्जत ॥ १२॥ तमादाय गतो राजंस्त्वरमाणो महामृगः । आश्रमात्त्वरितः शीघ्रं प्लवमानो महाजवः॥१३ तस्य गत्वा पदं राजन्नासाद्य च महामृगम् । कूटता हुवा आश्रमसे दूर चलागया ॥ ९ ॥ हे कुरसत्तम ! इसप्रकार मृगसींगोंमें गयेहुए अमिदडको देखकर वह ब्राह्मण अमिहोत्र करनेकी इच्छासे वहा आया कि ॥ १० ॥ जहां वनमें माताओं समेत राजा युधिष्टिर बैठे थे । दुःखित हुआ वह ब्राह्मण शीघ्र वहां आकर यह वचन कहने लगा कि ॥ ११ ॥ हे राजन् ! अरणियों समेत अमिदंड मैंने एकक्षमें रखा था यह ख— करतेहुए मृगके सींगों में उलझगया ॥ १२ ॥ हे राजन् ! चलतारआ वह महामृग उसको लेकर चला. गया और वडे वेगसे फूदताहुवा वह मृग शीघ्र आश्रमसे दूर चला- गया ॥ १३ ॥ हे पाडू पुत्रो ! उसके पश्चात् जाकर और उस महा- .
भापाटीकासमेता। (१९७) अग्निहोत्रं न लुप्येत तदानयत पांडवाः ॥ १४॥ ब्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा संतप्तोऽथ युधिष्टिरः । धनुरादाय क्ताँतेयः प्रादवद्धातृभिः सह ॥ १५॥ सन्नदा धन्विनः सर्वे पाद्रवन्नरपुंगवाः । ब्राह्मणार्थे यतंतस्ते शीघ्रमन्वगमन्मृगम् ॥ १६॥ कणिनालीकनाराचानुत्सृजतो महारथाः। नाविध्यन्पांडवास्तव पश्यंतो मृगमंतिकात्१७॥ तेपांप्रयतमानानां नादृश्यत महामृगः। अपश्यंतो मृगं शांतादुःखं प्राप्ता मनस्विनः१८॥ मृगको प्राप्त होकर मेरे अरणीसहित अग्निदंटको सादो कि जिससे मंरा अमिहोन लुप्त न हो ॥ १४ ॥ प्रामणरा ऐसा वचन सुनकर राजा युधिष्टिरको वडा कष्ट हुवा और इसके अनंतर यह कुंतीपुर धनुष टेकर मानाओं सहित मृगके पीछे दौडा ॥ १५ ॥ जब कि प्रासगरे ठिये जतन करतहुए ये नगपंगा फपचादि धारण करके धनुष टेकर शीघ्र मृगके पीछे दोई ॥ १६ ॥ सर मुरामारमें टोहाटे और संपूर्णटोवाले उन पागोंको छोडतेर मी यह महारथ पर यहां मृगको समापन दंगके कारण मारने न पाये ॥ १७ ॥ जतन करतहुए भी उन (१९८) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- शीतलच्छायमागम्य न्यग्रोधं गहमे वने । क्षुत्पिपासापरीतांगाः पांडवाः समुपाविशन् १९ तेषां समुपविष्टानां नकुलो दुःखितस्तदा । अब्रवीद्रातरं श्रेष्ठममत्कुरुनंदनम् ॥२०॥ नास्मिन्कुले जातु ममन्न धर्मो, न चालस्यादर्थलोपो बभूव । चीरोंको जब पह महामृग नहीं दीखपडा तब मृगके इंढनेसे पे शांत होगये और मनस्वी ये पांडव महान् कष्टको प्राप्त हुए ॥ १८ ॥ पश्चात् उस गहनवनमें शीतलछायावाले एक बडके वृक्षको छायामें प्राप्त होकर क्षुधा तपासे पीडित अंगोवाले वे पांडव बैठगये ॥ १९॥ जब सपूर्ण यहाँ बैटगये तब दुःखितहया नकुल, कुरुनंदनश्रेष्ठ भाता राजा युधिष्टिरको क्रोधसे कहनेलगा ॥ २० ॥ हे राजन् ! इस हमारे कुलमें आजतक न फमी धर्मका टोप हुवा है और न कभी आटस्पसे अर्थका लोप हुवा है फिर संपूर्ण प्राणियोंमें कभी कोई अनुत्तर अर्थात् 'किसीका कार्य न करना' ऐसे नहीं हुएहें पातु न मापाटीकासमंता: (१९९) अनुत्तराः सर्वभूतेषु भूयः, संप्राप्ताः स्मः संशयं किन्नु राजन्॥२१॥ इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणि आर- णेयपर्वणि मृगान्वेपणे एकादशाधिक- त्रिशतंतमोऽध्यायः॥३११॥ युधिष्ठिर उवाच । नापदामस्ति मर्यादा न निमित्तं न कारणम् । धर्मस्तु विभजत्यर्थमुभयोः पुण्यपापयोः॥१॥ जाने हम कैसे इस सदेहको प्राप्त हुए हैं कि जो ब्राह्मणका कार्य नहीं करसक्ते है ॥ २१ ॥ इति श्रीमहाभारते आरण्यक पणि आरणेयपर्वणि मापाटीकायो मृगान्यपणे एकादशाऽविकत्रिशततमोऽध्यायः ॥३.११॥ [१] ऐसा सुन राजा युधिष्टिर कहनेलगे । कि हे नकुल ! हे प्रात!! आपदाओंकी कोई मर्यादा नहीं है और न कोई निमित्त है न कारण है किंतु प्रारम्धरूप धर्म ही, पुण्य और पाप इन दोनोंके फल- (२००) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- भीम उवाच । प्रातिकाम्यनयत्कृप्णां सभायां प्रेप्यवत्तदा । न मया निहतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशयम्॥२॥ अर्जुन उवाच । वाचस्तीक्ष्णास्थिभेदिन्यः सूतपुत्रेण भापिताः । अतितीवामयाक्षांतास्तेन प्राप्ताःस्म संशयम्३॥ सहदेव उवाच । शकुनिस्त्वां यदाजैपीदक्षयूतेन भारत । समया न हतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशयम्॥४॥ रूप सुखदुःखोको विभाग करदिया करता है ॥ १। यह सुन भीमसेन कहनेलगे। कि हे प्रात: जिस समय दुष्ट दुःशासन द्रोप- दीको दासीके समान फैश पकडकर सभामें लेगया उस समय वह दुष्ट मैने नहीं मारा इसलिये उस अपराधसे हमको यह कष्ट प्राप्त हुआ है ॥ २ ॥ अर्सन कहनेलगे । कि हे प्रातः ! मैं जानताहूँ कि अनितीव्र और अस्थियोंको भेदन करनेाली वाणी कर्णने मुझको कही और मै क्षत्रिय होकर उनको सहगया बदला नहीं लिया इस कारण हमको यह काट प्राप्त हुआ है ॥ ३ ॥ यह सुनकर सहदेव कहनेलगे । कि है भारत ! जन शकुनि, आपको 14 भाषाटीकासमेता। (२०१) 2011 वैशंपायन उवाच । ततो युधिष्ठिरो राजा नकुलं वाक्यमब्रवीत् । आरुह्य वृक्षं माद्रेय निरीक्षस्व दिशो दश ॥५॥ पानीयमंतिके पश्य वृक्षांश्चाप्युदकाश्रितान् । 'एते हि भ्रातरः श्रांतास्तव तात पिपासिताः॥६॥ नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा शीघ्रमारुह्य पादपम् । अब्रवीद्धातरं ज्येष्ठमभिवीक्ष्य समंततः ॥७॥ पश्यामि बहुलान् राजन्वृक्षानुदकसंश्रयान् । पाशोंके जुएसे जीततामया और मैंने उस समय उसे वहां नहीं मारा इसलिये हमको यह संकट प्राप्त हुवा है ॥ ४ ॥ इतनी कथा कहकर फिर पैशंपायनजी राजा जनमेजयसे वोले । हे राजन् ! जन- मैजय ! पश्चात् राजा युधिष्ठिर नकुलको कहनेलगे कि हे माद्रेय ! वृक्षपर चढकर चारों तरफको देख ॥ ५ ॥ कि कहीं नजदीक ऐसे वृक्ष भी दीखते हैं कि जहां जल होवे क्योंकि ये तेरे भ्राता बडे थके हैं और प्यासे हैं ॥ ६ ॥ नकुल 'जो आज्ञा' ऐसे कहकर शीघ्र वृक्षपर चढा और चारों तरफ देखकर बडे भ्राता युधिष्टिरसे कहनेलगा ॥ ७ ॥ हे राजन् ! एक जगह जलानयवाले बहुत वृक्ष ।
(१२०२) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- सारसानांच निर्दादमत्रोदकमसंशयम् ॥८॥ ततोऽब्रवीत्सत्यधृतिः कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः । गच्छ सौम्यततःशीघ्रतणेः पानीयमानय ॥९॥ नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा भ्रातुज्येष्ठस्य शासनात् । प्राइवद्यत्र पानीयं शीघ्रं चैवान्वपद्यत ॥१०॥ स दृष्ट्वा विमलं तोयं सारसैः परिवारितम् । पातुकामस्ततो वाचमंतरिक्षात्स शुश्रुवे ॥ ११॥ यक्ष उवाच । मा तात साहसं कापीमम पूर्वपरिग्रहः । दीखते हैं और सारसोंके शब्द सुनपडते हैं इसलिये जानता हूँ कि वहाँ निश्चय जल होगा ॥८॥ ऐसा वाक्य सुनकर पश्चात् सत्य- धारी कुंतीके पुत्र राजा युधिष्ठिर कहनेलगे कि हे सौम्य ! तुम शीघ्र जाओ और तरकसोंमें जल भरके लेआओ ॥९॥ नकुल 'जो आज्ञा' ऐसे कहकर बडे माता राजा युधिष्टिरकी आज्ञासे शीघ्र वहां प्राप्त हुवा कि जहां जल था।॥१०॥वह नकुल सारसोंसे घिराहुवा यहां स्वच्छ जल देखकर ज्याही पीनेकी इच्छासे चला कि आकाशसे वाणी सुननेमें आई ॥ ११॥ उस आकाशवाणीसे यक्ष कहनेलगा । कि हे तात ! यह जलपानरूप साहस तुम त्याग दो क्यों कि जिससे प्रथम + . . भाषाटीकासमेता। (२०३) प्रश्नानुक्त्वा तु माद्रेय ततः पिव हरस्व च ॥१२॥ अनादृत्य तु तद्वाक्यं नकुलः सुपिपासितः। अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपातह ॥१३॥ चिरायमाणे नकुले कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः। अत्रवीद्धातरं वीरं सहदेवमरिंदमम् ॥ १४ ॥ भ्राता हि चिरयातो नः सहदेव तवाग्रजः। • तथैवानय सोदयं पानीयं च त्वमानय ॥ १५॥ सहदेवस्तथेत्युक्त्वा तां दिशं प्रत्यपधत । ददर्श च हतं भूमी भ्रातरं नकुलं तदा ॥ १६॥ मेरा नियम है इसलिये है माद्रीके पुत्र ! मेरे प्रश्नोंको कहकर जद पीवो और लेजाओ ॥ १२ ॥ तृपासे व्याकुलहुवा नकुलने उस पाणी- फा अनादर करके शीतल जल पानकिया और पान करते ही पृथ्वी- पर गिरपडा ॥ १३ ॥ यहाँ जय गयेहुए नकुलको बहुत देर होगई तब कुंतीका पुत्र राजा युधिष्टिर शत्रुपोंको दमन करनेगाले वीर प्राता सहदेसको कहनेटगे कि ॥१४॥ हे सहदेव ! तुम्हारे बडे भाता नकुल जठलानेको बहुत देरस गयेहें आये नहीं क्या कारण हुया ! इसलिये मुम जामो उनको भी युगाडेते आओ और जल भी लेते आमो ॥ १५॥ सहंदर 'जो आजा' ऐसे कहकर उसी जगह प्रात (२०४) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- 1 भ्रातृशोकाभिसंतप्तस्तृपया च प्रपीडितः । अभिदुद्राव पानीयं ततो वागभ्यभापत ॥ १७॥ मा तात साहसं कापीमम पूर्वपरिवहः । प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं पिवस्वच हरस्व च॥१८॥ अनाहत्य तु तद्वाक्यं सहदेवः पिपासितः । अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपातह ॥१९॥ अथाऽब्रवीत्स विजयं कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः। भ्रातरौ ते परिगती वीभत्सो शत्रुकर्शन ॥२०॥ हुवा और वहां देखता क्या है कि प्राता नकुछ सरेहुए पृीपर पडे हैं॥१६॥ आता नकुलके शोकसे संतप्त और नृपासे पीडित हुवा सहदेव च्यौंही जलपीनके लिये शीघ्रता कर चला कि त्योंही फिर पूर्वके समान वह यक्षमाणी सुनाई पड़ी ॥ १७ ॥ कि हे तात ! साहस मत करो मेरा कियाहा नियमको सुनकर मेरे प्रश्नोंका उत्तर करके जलपान करो और लेजाओ, अर्थात् नहीं तो तुम्हारी भी यही दशा होगी॥१८॥ तपासे पीडितहुए सहदेवने ज्यौही उस वाक्यका अनादर कर जलपान किया कि त्याही वेसुध हो पृञ्चीपर गिरपडा ॥ १९॥ इसके अनतर बुतीपुत्र राजा युधिष्ठिर अर्जुनको कहनेलगे कि है बीमन्सो! हे शत्रु- . भापाटीकासमेता। (२०५) तौ चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय । त्वं हिनस्तात सर्वपांदुःखितानामपाश्रयः॥२१॥ एवमुक्तो गुडाकेशः प्रगृह्य सशरं धनुः । आमुक्तखड्गो मेधावी तत्सरः प्रत्यपद्यत॥२२॥ ततः पुरुपशार्दूलो पानीयहरणे गती। ती ददर्श हतो तत्र भ्रातरौ श्वेतवाहनः ॥२३॥ • प्रसुप्ताविव तो दृष्ट्वा नरसिंहः सुदुःखितः। धनुरुद्यम्य कौतेो व्यलोकयत तद्वनम् ॥२४॥ फरीन ! तुम्हारे माता नाउ और सहदेव जल लानेको गयेथे कि नहीं आये ॥ २० ॥ इसठिये है तात ! तुम उनको लामो तुम्हारा फल्याण हो क्यों कि जिससे हम संग दुःगितोंका आसरा तुम । तो हो ॥ २१॥ में कहामा अर्जुन धनुप याग चटाकर और ग्यान तसार निभाकर टस रोपरको प्राने दुरा ॥२२॥ शि जहां पुरपशाईल नाल और सहदेव जर लानेने गयेथे और वहां देरामा पा है कि नकुल और राहदर दोनों माता मरेहए. पडे है। ॥ २३ ॥ यह मनुष्योंने सिंहरूप कुंतीका पुत्र अर्जन, मुतको समान दोनों भानाभोंको देपर अन्यंत दुःशित हुवा और धनुपपर . (२०६) यक्षधर्मपश्नोत्तरी- नापश्यत्तत्र किंचित्स भूतमस्मिन्महावने । . सव्यसाची ततःश्रांतः पानीयं सोऽभ्यधावत२५ अभिधावंस्ततो वाक्यमंतरिक्षात्स शुश्रुवे । किमासीदसि पानीयं नैतच्छक्यं बलात्त्वया.२६ कौतेय'यदि प्रश्नांस्तान्मयोक्तान्प्रतिपत्स्यसे। । ततः पास्यसि पानीयं हरिष्यसि च भारत२७॥ वारितस्त्वत्रवीत्पार्थो दृश्यमानो निवारय । यावद्राणैर्विनिर्भिन्नः पुन वे वदिप्यसि ॥२८॥ घाण चढाकर उस वनमें इधर उधर देखनेलगा ॥ २४ ॥ जब यह सव्यसाची उस महासनमें ढूंढताहुवा किसी प्राणीमात्रको भी प्राप्त न होतामया तव थका और प्यासा अर्जुन पानी पीने को दौडा ॥२५॥ और तिसके अनंतर दौडतेहुए अर्जुनने आकाशसे यह वाक्य मुंना देखना ! क्या दौटकर जलपीनेको जाते हो यह जल बलसे मिलनेवाला नहीं है|| २६॥ हे कुतीके पुत्र । हे भारत ! जो तुम्हारी जल पीनकी और लेजानेकी इच्छा है तो प्रथम मेरे कहेहुए प्रश्नोंका उत्तर करना। ॥ २७ ॥ ऐसे रोकाहुवा अर्जुन कहनेलगा कि कौन रोकनेवाला है मेरे सन्मुख होकर रोक क्यों कि जिससे मेरे बाणोंसे विदीर्ण अंगों 1 मापाटीकासमेता। (२०७) एवमुक्त्वा ततः पार्थः शरेरस्त्रांनुमंत्रितैः । प्रववर्ष दिशः कृत्स्नाः शब्दवेधं च दर्शयन्२९ ॥ कर्णिनालीकनारांचानुत्सृजन् भरतर्पभ । सत्वमोघानिपून्मुक्त्वा तृष्णयाभिप्रपीडितः३० अनेकैरिपुसंघातरतरिक्षे पह। यक्ष उवाच । किं विधानेन ते पार्थ प्रश्नानुक्त्वा ततः पिव३१॥ अनुक्त्वा च पिबन्प्रश्नान्पीत्वैव न भविष्यसि । एवमुक्तस्ततः पार्थः सव्यसाची धनंजयः ॥३२॥ याला हुवा फिर ऐमे नहीं कहेगा ॥ २८ ॥ फिर अर्जुन ऐसा करकर शब्दबंधको दिखाताहुवा दशदिशाओंमें बाणोंकी दृष्टि कर- नेटगा ॥ २९ ॥ घेशंपायनजी राजा जनमेजयसे कहते हैं कि हे भरतर्षभ ! जब इसप्रकार छोडेहुए वाण अर्जुनके निष्फल होगये तब महाकष्टसे व्याप्तहुवा अर्जुन तृपासे पीडित होगया ॥ ३० ॥ पश्चात जब भनेक याणसमूहोंकी वर्षा आकाशमें करी तब फिर यक्ष कहने. लगा कि हे पार्थ ! इस तेरे वृथाप्रयास क्या होनाहै ? मेरे प्रश्नोंका उत्तर पर और पश्चात् जलपान कर ॥ ३१ ॥ और जो प्रश्नोंका - (२०८), यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी-- अवज्ञायेव तां वाचं पीत्वैव निपपात ह। अथाब्रवीद्भीमसेनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥३३॥ नकुलः सहदेवश्च वीभत्सुश्च परंतप । चिरं गतास्तोयहेतोर्न चागच्छंति भारत ॥३४॥ तांश्चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय । भीमसेनस्तथेत्युक्त्वा तं देशं प्रत्यपद्यत॥३५॥ यत्र ते पुरुषव्याघ्रा भ्रातरोऽस्य निपापिताः।। तान्दृष्ट्वा दुःखितो भीमस्तृपया च प्रपीडितः३६ उत्तर नहीं करके जलपान करेगा तो जलपान करते ही तेरे भाताभोंवाली तेरी भी दशा होगी। ऐसे कहाहुवा पृथाका पुत्र सव्यसाची ( दोनों हाथोंसे बाण चलानेवाला ) अर्जुनने ॥ ३२ ॥ उस वाणीका तिर- स्कार करके ोही जलपान किया कि त्यौंही मूर्छित हो पृथ्वीपर गिरपडा । इसके अनंतर कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिर भीमसेनसे कहने. टगे ॥ ३३॥ कि हे परंतप ! हे भारत ! नकुल सहदेव और अर्जुन जल लानेको गये थे बहुत देर होगई आये नहीं ॥ ३४ ॥ हे प्रातः! तुम्हारा कल्याण हो तुम उन तीनोंको भी ओ और पानी भी लाओ। ऐसे कहेहुए भीमसेन जो आज्ञा' ऐसा कहकर उस सरो- वरको प्राप्तहुए कि जहां इसके पुरुषव्याघ्र प्राता अर्जुनआदि पडेथे भापाटीकासमेता। (२०९) } अमन्यत महाबाहुः कर्म तद्यक्षरक्षसाम् । स चिंतयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य वै ॥३७॥ पास्यामि तावत्पानीयमिति पार्थो वृकोदरः। ततोऽभ्यधावत्पानीयं पिपासुः पुरुपर्पभः॥३८॥ यक्ष उवाच । मां तात साहसं कार्मिम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु कौंतेय ततः पिब हरस्व च३९॥ एवमुक्तस्तदा भीमो यक्षेणामिततेजसा । अनुक्त्वैव तु तान्प्रश्नान्पीत्वैव निपपातह॥४०॥ उनको देखकर मीमसेन दुःखित या और तपासे अत्यंत पीडित हुवा ||३५ ॥ ३६॥ पश्चात् इस महाबाहु भीमसनने विचार किया कि यह किसी यक्ष राक्षसका काम है इसलिये में अवश्य उसके साथ युद्ध करूगा ।। ३७ ॥ परंतु जल तो पीलेताहूँ। ऐसा विचार करके यह पुरुषश्रेष्ट पृथाका पुत्र भीमसेन प्योंही जल पीनेको चला कि यक्ष बोला ॥ ३८ ॥ यक्ष कहनेलगा कि हे तात ! हे कौतेय ! साहस न करना प्रथम मेरा किया नियम सुनना कि मेरे प्रश्नोंको कहकर जल पीवो और लेनाओ ॥ ३९ ॥ अतितेजस्वी यक्षने जब भीमसे- . 2 (२१०) पक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- ततः कुन्तीसुतो राजा प्रचिंत्य पुरुपर्पमः। समुत्थाय महावाहुर्दद्यमानेन चेतसा ॥११॥ व्यपेतजननिर्धाप प्रविवेश महावनम् । रुरुभिश्च वराहश्च पक्षिभिश्च निपेवितम् ॥४२॥ नीलभास्वरवर्णेश्च पादपैरुपशोभितम् । भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्च महायशाः ॥ १३॥ स गच्छन्कानने तस्मिन् हेमजालपरिष्कृतम् । ददर्श तत्सरः श्रीमान्विश्वकर्मकृतं यथा ॥४४॥ नसे ऐसा कहा तब इस यक्षके प्रश्न नहीं कहकर ही इस भीमसेनने जलपान करलिया और जलपान करते ही भीमसेन मी औरों के समान गिरपडा |॥ १० ॥ तदनंतर पुरुषोंमें भ्रष्ट और महाबाहु यह कुंतीका पुत्र राजा युधिष्ठिर दग्ध होतेहुए चित्तसे चिंतन करके उठा और उठकर ॥ ४१ ॥ उस महावनमें प्रविष्ट हुए जो कि मनुष्यों के शब्दोंसे रहिन था और मृग वराह पक्षियोंसे सेवित था ॥ ४२ ॥ और जो कि नीलो देदीप्यमान कांतिवाले वृक्षोंसे शोभित था और अमर तथा पक्षियोंसे शब्दित था ऐसे उस वनमें चलते हुए वह महायशा राजा युधिष्टिर एक सरोवरको देखतेभये कैसा यह सरोवर है कि सुवर्ण सदृश पुष्पोंकी कैसरके जालसे .
भाषाटीकासमेता। (२११) उपेत नलिनीजालैः सिंदुवारैः संवेतसैः । केतकैः करवीरैश्च पिप्पलैश्चैव संवृतम् । श्रमार्तस्तदुपागम्यसरो दृष्ट्वाऽथ विस्मितः॥४॥ । इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणि आरणेय.. पर्वणि नकुलादिपतने द्वादशाधिकविशत- तमोऽध्यायः ॥३१२॥ वैशंपायन उवाच । स ददर्श हतान्भ्रात॒ल्लोकपालानिव च्युतान् । युगांते समनुप्राप्ते शक्रप्रतिमगौरवान् ॥ १॥ पारस्कार कियाहुवा मानों विश्वकर्माको रचा है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ और कमोदिनी, निगुटी, वेत इन्होंसे व्याप्त है । और केतकी, कनेर, पीपल इन्होंसे युक्त है । पश्चात् श्रमसे पीडित हुर राजा युधिष्टिर वहा प्राप्त हुए और उस सरोवरको देखफर अति आश्चर्य करनेलगे ||४|| इति श्रीमहाभारत आरण्यके पगि आरणेयपर्वणि मापाटीकायां नकु- लादिपतने द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥३१२॥ (२) इतनी कया कहकर फिर राजा जनमेजयसे येशंपायनजी कहते हैं कि हे राजन् ! जनमेजय ! वह राजा युधिषि इंद्रनुल्प गौराले उन . (२१२) यक्षधर्मप्रश्नोचरी- विनिकीर्णधनुर्वाणं दृष्ट्वा निहतमर्नुनम् । , भीमसेनं यमौ चैव निर्विचेष्टान्गतायुपः॥२॥ स दीर्घमुष्णं निःश्वस्य शोकवाप्पपरिप्लुतः । तान्दृष्ट्वा पतितान्भ्रातृन्सर्वांश्चितासमन्वितः॥३॥ धर्मपुत्रो महावाहुविललाप सुविस्तरम् । ननु त्वया महाबाहो प्रतिज्ञातं वृकोदर ॥४॥ सुयोधनस्य भेत्स्यामि गदया सक्थिनी रणे । व्यर्थं तदद्य मे सर्व त्वयि वीरे निपातिते॥५॥ हत आताओंको उस कालमें इस प्रकार देखतेभये कि मानों युगांत प्रलयमें.च्युत ( अपने २ लोकोंसे गिरेहुए ) लोकपाल हैं ॥ १ ॥ बिखरे पडे हैं धनुष बाण जिसके ऐसे मार्छत अर्जुनको देखकर और चेष्टारहित तथा गसायु भीमसेन और नकुल सहदेवको देखकर ॥२॥ राजा युधिष्ठिरने लवा स्वास छोडा । पश्चात् शोकबाष्पसे युक्त और चिंतासे व्याप्तहुवा यह धर्मपुत्र महाबाहु राजा युधिष्ठिर पडेहुए संपूर्ण भ्रातामोंको देखकर वारंवार विलाप करनेलगा कि हे महावाहो ! वृकोदर ! • नुमने तो प्रतिज्ञा की थी कि मैं युद्धमें दुर्योधमकी जवाओंको गदासे विदीर्ण करूंगा । इस लिये हे वीर ! तेरे पडनेसे वह सब मेरा विचार निरर्थक होगया || ३ ॥
भापाटीकासमेता। (२१३) महात्मनि महावाहो कुरूणां कीर्तिवर्धने । मनुष्यसंभवा वाचो विधर्मिण्यः प्रतिश्रुताः॥६॥ भवतां दिव्यवाचस्तु ता भवंतु कथं मृपा । देवाश्चापि यदावोन्मूतके त्यां धनंजय ॥ ७॥ सहस्राक्षादनवरः कुन्ति पुत्रस्तवेति वै । उत्तरे पारियाने च जगुर्भूतानि सर्वशः ॥ ८॥ विप्रनष्टां श्रियं चेपामाहर्ता पुनरंजसा। नास्य जेता रणे कश्चिदजेता नेप कस्यचित्९॥ ॥४॥५॥हे महाबाहो ! है अर्जुन! कौरवोंकी कीर्ति बढानेवाले तुशमें प्रतिज्ञा कोई मनुष्ययागी आज असग्य होगई परंतु ॥६॥ मुम्हारी देववाणी तो फैसं असत्य होगी कि जो मूतझमें ही देवना नुशको कहाँभये कि ॥ ७ ॥ हे कुंति ! यह तेरा पुत्र इंद्रसे कुछ फम न होगा क्यों कि जिसने उत्तर पारिया में अर्यात् विध्याघटके पधिम प्रदेशमें सब जगह इसका यश गायाजायगा ॥८॥ जैसे कि नष्टाई भी इन पदोंकी लक्ष्मीको या रि लाकर प्रात करंदंगा और रणमें फोई इसका जीतनेगा न होगा और ऐसा भी कोई न रोगा कि जिसको यह न जीनस के अर्यात् रणमें यह सभीसा जीनन- .
यक्षधर्ममश्नोत्तरी- सोऽयं मृत्युवश यातः कथं जिष्णुमहाबलः। अयं ममाशां संहत्य शेते भूमौ धनंजयः ॥१०॥ आश्रित्य यं वयं नाथं दुःखान्येतानि सेहिम'। रणे प्रमत्तौ वीरौ च सदा शनिबर्हणी ॥ ११॥ कथं रिपुवशं यातौ कुन्तीपुत्रौ महावलौ । . यौ सर्वास्त्राप्रतिहतौ भीमसेनधनंजयौ ॥ १२ ॥ अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम दुईदः । यमौ यदेतौ दृष्ट्वाय पतितौ नावदीर्यते ॥ १३॥ वाला होगा ॥ ९॥ सो यह ऐसा महाबली अर्जुन भी कैसे मृत्युको प्राप्त होगया । अहो यह ऐसा अर्जुन भी मेरी आशाको नष्ट करके कैसे पृथ्वीपर सोगया || १०|| हाय ! हम तो इसीको नाथ मान- कर आश्रित होकर इन दुःखोंको सहते थे । और रणमें सर्वदा शत्रु- ओंको नष्ट करनेवाले प्रमत्त और महावीर ॥ ११ ॥ महाबलवान कुंतीके पुत्र भीमसेन और अर्जुन संपूर्ण शस्त्र अस्त्रोंसे अवध्य होनेपर भी फैसे शत्रुके वश होगये ॥ १२ ॥ हाय ! बुरे हृदयबालेका मेरा हृदय निश्चय वनका है क्यों कि जिससे अव पडेहुए 1 भाषाटीकासमेता। (२१५) 'शास्त्रज्ञा देशकालज्ञास्तपोयुक्ताः क्रियान्विताः । अकृत्वा सदृशं कर्म किं शेवं पुरुपर्षभाः॥१४॥ अविक्षतशरीराश्चाप्यप्रमृपशरासनाः।। असंज्ञा भुवि संगम्य किं शेध्वमपराजिताः१६॥ सानूनिवारेः संसुप्तान्दृष्ट्वा भ्रातृन्महामतिः । सुखं प्रसुप्तान्प्रस्विनःखिन्नः कष्टां दशां गतः १६ एवमेवेदमित्युक्त्वा धर्मात्मा स नरेश्वरः। शोकसागरमध्यस्थो दध्यौ कारणमाकुलः१७॥ इन नकुल सहदेवको देखकर नहीं फटता है |॥ १३ ॥ अहो शास्त्रोंके जाननेवाले देशकालके जाननेगले तपस्वी क्रियाओंसे युक्त ये पुरुष- श्रेष्ट अपने सदृश कर्म नहीं करके क्यों पृथ्वीपर सोगये ॥ १४ ॥ .अहो कहीं न इनके शरीरपर घाव हुवा न कोई धनुप वाण टूटा फिर भी यह अजेय वीर किसकारण संज्ञारहित हुए पृथ्वीपर सोतेहैं।। ॥ १५ ॥ यह महामति राजा युधिष्ठिर सुखपूर्वक सोतेहुए पर्वतकी शिखरोंकी तरह अपने आताओंको देखकर अति दुःखित होनेके कारण इसके शरीरमें पसीने आगये और महाकष्ट दशाको प्राप्तहुए ।। ॥ १६ ॥ नह ऐसा ही होना था' इसप्रकार यह धर्मात्मा राजा (२१६) यक्षधर्ममश्नोत्तरी- इतिकर्तव्यतां चेति देशकालविभागवित् । नामिपेदे महायाहुश्चितयानो महामतिः ॥ १८॥ अथ संस्तभ्य धर्मात्मा तदात्मानं तपःसुतः। एवं विलप्य बहुधा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १९ ॥ बुद्धया विचिंतयामास वीराः केन निपातिताः२० नेपांशस्त्रप्रहारोऽस्ति पदं नेहास्ति कस्यचित् । भूतं महदिदं मन्ये भ्रातरो येन मे हताः ॥२१॥ एकाग्रं चितयिष्यामि पीत्वा वेत्स्यामि वा जलम् युधिष्ठिर कहकर शोकसागरके बीचमे स्थित होकर व्याकुलहुवा कारणको विचारताभया ॥ १७॥ देशकालके विभागको जानता हुधा यह महाबाहु और महामति राजा युधिष्ठिर चिन्तन करताहुया मी 'यह किसका कियाहुना कम है। यह नहीं जानतामया ॥ १८ ॥ पश्चात् ऐसे बहुत प्रकारसे विलाप करके यह धर्मपुत्र धर्मात्मा तपस्वी राजा युधिष्टिर अपने आत्मामें धैर्य धारण करता भया ।। १९ पश्चात् बुद्धिसे चिंतन करनेलगा कि ये धीर किसने गिरादिये ॥२०॥ न इनके शस्त्रका प्रहार है न किसीका यहां स्थान है कोई बड़ा भारी कारण है कि जिससे ये मेरे भाता हत हुए हैं ॥ २१ ॥ जलपान करके एकान्तमें मैं इसको चिंतन करंगा क्यों कि कदाचित दुर्योध- . भापाटीकासमेता। (२१७) स्याच दुर्योधनेनेदमुपांशु विहितं कृतम् ॥२२॥ गांधारराजचरित सततं जिझबुद्धिना। यस्य कार्यमकार्य वा सममेव भवत्युत ॥२३॥ कस्तस्य विश्वसेद्वीरो दुप्कृतेरकृतात्मनः। अथवा पुरुपैयूँढेः प्रयोगोऽयं दुरात्मनः ॥२४॥ भवेदिति महाबुद्धिबहुधा तचिंतयत् । तस्यासीनं विपणेदमुदकं दूपितं यथा ॥ २५ ॥ मृतानामपि चैतेपां विकृतं नेव जायते । मुखवर्णाः प्रसन्ना मे प्रातॄणामित्यचिंतयत्॥२६॥ नने ही एकांनमें यह काम न किया हो ॥ २२ ॥ अथवा जिसके अच्छा और बुरा दोनो कार्य समान हैं ऐसा कुटिल गांधारराज (कुनि ) का काम है ! ॥ २३ ॥ अथ बुरा कर्म करनेवाला और अटतात्मा उस दुर्योधनका कौन विश्वास करे कि कभी दुरा. . माने किसी गूढपुरुषों करके यह प्रयोग कराया हो ॥ २४ ॥ पश्चात यह महाबुद्धि बहुत प्रकारसे चिंतन करताडवा कि कभी यह इस सरोवरका जल ही विषसे दुषित न हो । २५ ।। फिर कहता कि जल तो विषदूषित नहीं क्यों कि जिससे मेरे भावाभों के मुखवर्ण प्रसन्न है (२१८) पक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- एकेकश्चिौधवलानिमान्पुरुषसत्तमान् । कोऽन्यः प्रतिसमासेत कालांतकयमाहते॥२७॥ एतेन व्यवसायेन तत्तोयं व्यवगाढवान् । गाहमानश्च तत्तोयमंतरिक्षात्स शुश्वे ॥२८॥ यक्ष उवाच । अहं बकःशैवलमत्स्यभक्षो; . नीता मया प्रेतवशं तवानुजाः। त्वं पंचमो भविता राजपुत्र, न चेत्प्रश्नान्पृच्छतो व्याकरोपि ॥२९॥ ॥२६॥इन एक एक भी महाबलवान पुरुषसत्तमोंको,कालांतक धर्मराजके विना अन्य कौन युद्धमें सामने खडा होसफताहै ॥ २७ ॥ ऐसा निश्चय करके ज्यौही सरोयरका जलपान करनेको चले कि त्योही आकाशवाणी सुनपडी ॥ २८ ॥ यक्ष कहनेलगा। कि हे राजपुत्र!, मैं सिवाल और मछली खानेवाला बगला हूँ और मैंने ही ये चारों परे छोटे माता प्रेतभावके वशमें प्राप्त किये है इसलिये यदि तुम भी तांचवें मेरे पूछेहुए प्रश्नों का उत्तर न करोगे तो इसी दशाको प्राप्त भाषाटीकासमेता। (२१९) मा तात साहसं कापीमम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुका तु कौंतेय ततः पिव हरस्व च ॥३०॥ युधिष्ठिर उवाच। रुद्राणां वा वसूनां वा मरुतां वा प्रधानभाक् । पृच्छामि को भवान्देवो नैतच्छकुनिना कृतम्३१ हिमवान्पारियात्रश्च विंध्यो मलय एव च । चत्वारः पर्वताः केन पातिता भरितेजसः॥३२॥ अतीव ते महत्कर्म कृतं च बलिनां वर । यान देवा न गंधर्वा नासुराश्च न राक्षसाः॥३३॥ होजाओगे ॥ २९ ॥ हे तात ! हे कौन्तेय ! साहस मत करो मेरे नियमके अनुसार मेरे प्रश्नोंको कहकर फिर जल पीवो और लेजाओ ॥ ३० ॥ ऐसा सुनकर राजा युधिष्ठिर कहनेलगे । कि मैं पूछता हूँ ११ रद्रोंमें अथवा ८ वसुवोंमें अथवा ९ पवनोंमें आप कौन प्रधान देव भगवान क्यों कि जिससे पक्षीका अर्थात् बगलाका यह काम हो नहीं सकता ॥ ३१ ॥ अहो ! हिमवान, पारयात्र विंध्याचल तथा मलयाबल इनके समान वडे तेजस्वी मेरे चारों भ्राता किस प्रकार गिराये ॥ ३२ ॥ हे बलियोंमें श्रेष्ठ ! यह आपने वह , (२२०) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- विपहेरन्महायुद्धे कृतं ते तन्महाद्भुतम् । नतेजानामि यत्कार्यनाभिजानामि कांक्षितम्३४ कौतुहलं महज्जातं साध्वसं चागतं मम । येनाऽस्म्युद्विग्नहृदयः समुत्पन्नशिरोज्वरः॥३५॥ पृच्छामि भगवंस्तस्मात्को भवानिह तिष्ठति । यक्ष, उवाच । यक्षोऽहमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचरः ३६ मयेते निहताः सर्वे भ्रातरस्ते महौजसः। वैशंपायन उवाच । ततस्तामशिवां श्रुत्वा वाचंस परुपाक्षरम् ॥३७॥ वडा भारी काम किया है कि जिसको देव गंधर्व असुर और राक्षस कोई मी महायुद्धमें नहीं करसकते, परंतु आपने जैसे यह कार्य किया और जिस इच्छासे किया है वह मैं नहीं जानता हूँ ॥३३॥३४॥ इस आपकै कार्यसे मेरे वडा आश्चर्य उत्पन्न हुवा है और भी उत्पन्न हुया है इसी लिये उद्विग्रहृदय और शिरपीडावाला हुवा हूँ ॥ ३५॥ इस लिये हे भगवन् ! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप कौन हैं। ऐसे सुनकर यक्ष कहनेलगे कि हे राजन् ! तरा कल्याण हो में जलचर पक्षी नहीं हैं कितु यक्ष है॥३६॥और मैने ही ये तेरे संपूर्ण भापाटीकासमेता। (२२१) यक्षस्य Qवतो राजन्नुपक्रम्य तदा स्थितः । विरूपाक्षं महाकाय यक्षं तालसमुच्छ्रयम्॥ ३८॥ ज्वलनार्कप्रतीकाशमधृष्यं पर्वतोपमम् । वृक्षमाश्रित्य तिष्ठतं ददर्श भरतर्षभः ॥ ३९ ॥ मेघगम्भीरनादेन तर्जयंत महास्वनम् । यक्ष उवाच । इमे ते भातरो राजन्वार्यमाणा मयाऽसकृत् १०॥ महापराक्रमी माता हनन कियेहै । वैशंपायनजी कहते हैं कि हे राजन् ! जनमेनय । तिसके अनंतर उस कहतेहुर यक्षफी यह कटोर अक्षरोंगली अमंगलवाणी मुनरूर राजा युधिष्ठिर सावधानी स्थित हुग और भयंकर हे नेत्र जिसके, वडा हैदार जितका, ताके समान है ऊँचाई जिसकी ॥ १७ ॥ १८ ॥ देदीपमान अमिके सरा, तेनापी, पति के सदस, पक्षको आश्रित करके स्थित होता. हा है ऐसे इम पक्षको देखतामया ॥ ३९ ॥ फेमा यह यक्ष है कि मंघसघश, गंभीर बागीस महा शब्दको सिंहातापा है । पक्ष कह- नगा। कि राजन् ! मैंने ये तेरे माता पारंपार निवारण भी (१२२) यशधर्मप्रश्नोत्तरी- बलात्तोयं जिहीपंतस्ततो वैमृदिता मया। न पेयमुदकं राजन्प्राणानिह परीप्सता ॥४१॥ पार्थ मा साहसं कामिम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु कौंतेय ततः पिव हरस्व च४२॥ युधिष्ठिर उवाच । न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम् । काम नैतत्प्रशंसंति संतो हि पुरुपाः सदा॥१३॥ यदात्मना स्वमात्मानं प्रशसेत्पुरुपर्पभ । किये ॥ ४० ॥ परतु इन्होंने मेरा कहा नहीं माना और ज़बरदस्ती जल लेनेको दौडे इसी लिये मुझसे मर्दित कियेहुए पडेहैं । और हे राजन् ! प्राणोंको चाहतेहुवोंने तुमने भी यह जलपान नहीं करना ॥४१ ।। हे पार्थ ! हे कौंतेय ! तुमने भी वृथा साहस नहीं करना क्यों कि जिससे मेरा नियम है कि मेरे प्रश्नोंका उत्तर करके जल पीयो और लेजाओ ॥ ४२ ॥ ऐसे सुन राजा युधिष्ठिर कहनेलगे । कि हे यक्ष ! यद्यपि में इस आपके पक्ष करनेको इच्छा नहीं करताहूँ क्यों कि संत पुरुष सदा ऐसे पक्षपातको श्लाया नहीं करते हैं ॥१३॥ इस लिये हे पुरुषश्नेष्ठ ! अपना आत्मा करके अपना आ- .
भाषाटीकासमेता। (२२३) यथाप्रझं तु ते प्रश्नान्प्रतिवक्ष्यामि पृच्छ माम् ४४ यक्ष उवाच । किंस्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितश्चराः । कश्चनमस्तं नयति कस्मिंश्च प्रतितिष्ठति॥४५॥ युधिष्ठिर उवाच। ब्रह्मादित्यमुनयति देवास्तस्याभितश्वराः। धर्मश्चास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति॥४६॥ रमाकी में प्रशसा नहीं करता कि मे यथार्थ आपके प्रश्नोंका उत्तर कर ही दूंगा, हां ! आप पूछे अपनी बुद्धिके अनुसार मैं आपके मनोंका उत्तर करूंगा ।। ४४ ॥ अब यहाँसे प्रश्नोत्तरमालिका प्रारंभ है जिसमे यक्षरूप धर्मकरके युधिष्ठिरकेलिये आत्मतत्त्वनिर्णय किया जाता है क्यों कि जिससे आत्मतत्वदर्शी ज्ञानी सहज ही शोरादि- कोंको तरजाता है। यक्ष कहनेलगे । यक्षप्रश्न-सूर्यका उदय कौन फरता है ! १ इसके चारोंतरफ होनेगले कौन हैं? २ इसका अस्त करनेवाला कौन है? ३ और यह सूर्य स्थित किसने है ! | ॥४५॥ युधिष्टिर कहनेटगे । युधिष्टिरकृत उत्तर सूर्यतुल्य जीवको वेद उदय करताहै अर्थात् देहादि अभिमानरूप अज्ञानते दुडाकर ब्रह्म- (२२४) यक्षधर्ममश्नोचरी- । १ यक्ष उवाच। केनस्विच्छोत्रियो भवति केनस्विविंदते महत् । केनस्विदितीयवान्भवतिराजन्केनचयुद्धिमान्४७ युधिष्ठिर उवाच । श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विंदते महत् । धृत्या द्वितीयवान्भवति बुद्धिमान्वृद्धसेवया४८ स्वरूप करताहै १ । उसके चारोंतरफ शम:दम आदि रहतेहै अर्थात् विना शम दम आदिके वेदवेता भी नहीं जानसकता २। इसको अस्त करनेवाला धर्म है अर्थात् इस आत्माको हृदयाकाशमें धर्म ही, प्राप्त करसकता है ३। और यह सत्यमें स्थित है अर्थात् सबका अब- धिभूत जो ब्रह्म है उसीमे यह आस्मा प्रकाशताहै ४ । ॥ ४६॥ फिर यक्ष कहनेलगे य० प्र०-ब्राह्मण श्रोत्रिय किसकरके होता है ११ और ब्रह्मको किसकरके प्राप्त होता है ? २ । और दूसरेवाला किस करके होताहै ? ३ । और हे राजन् ! बुद्धिमान किस करके होना है ! १ ॥ ऐमे सुन राजा युधिष्ठिर फहनेलगे । यु० उ०-वेदके पढनेसे ब्राह्मण श्रोत्रिय होता है। और तपके करनेसे परब्रह्मको प्ति होताहे २ । और धृति करके दूसरेवाला होता है ३ । और भापाटीकासमेता। (२२५) यक्ष उवाच। किं ब्राह्मणानां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव । कश्चैपां मानुपो भावः किमेपामसतामिव॥ १९॥ युधिष्ठिर उवाच । स्वाध्याय एपां देवत्वं तप एपां सतामिव । मरणं मानुपो भावः परिवादोऽसतामिव ॥५०॥ यक्ष उवाच। कि क्षत्रियाणां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव । कश्चैपां मानुपो भावः किमेपामसतामिव ॥५॥ तृसेवा करके बुद्धिमान होता है ||१७||४८॥ फिर यक्ष कहनेलगे। य० प्र०ाह्मणोंके देवत्य क्या है ! १और सत्पुरुषोंका धर्म क्या है।२। और इन्होंके मानुपीभाव क्याहै तथा असद्भाव क्याहे ॥४९॥ युधिष्टिर कहमेलगे । गु० उ०-वेदोंका पढना ब्राह्मणोंका देवत्व है। और तप ही इनका सद्धर्म है । और मरण ही इनका मानुषीभाव है ३ । और दूषण निकालना ही इनके असद्भाव है|९०॥फिर यक्ष कहनेलगे । य.म. क्षत्रियों के देवत्व क्या है ! ११ और इनका यशधर्मप्रश्नोचरी युधिष्ठिर उवाच। इप्वस्त्रमेपां देवत्वं यज्ञ एमां सतामिव । भयं वै मानुपोभावः परित्यागोऽसतामिव॥५२॥ यक्ष उवाच। . . किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजुः । का चेपां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते।॥ ५३॥ युधिष्ठिर उवाच। प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजुः । । श्रेष्ठ धर्म क्या है ? २ । और इनके मनुष्यभार क्या है ! ३ । और इनका असत् आचरण क्या है ! ४ ॥ ११ ॥ राजा युधिष्ठिर कहने । लगे। यु.उ.--बाणविद्या ही क्षत्रियोंका परम देवत है । और यज्ञ करना ही इनका श्रेष्ठ आचरण है २ । भय ही मानुपभान है। और शरणागतोंका त्यागना ही इनका असत्कर्म है ॥५२॥ फिर पक्ष कहनेलगे । २० प्र०- यज्ञसवधी सामवेद क्या है ! १ । और पदसंबंधी यजुर्वेद क्या है १२ । वेदोंमें यज्ञको कौन अंगीकर करता है ! और किसको यड़ उघन करके नहीं पूर्तते हैं ? ||१३|| राजा युधिष्ठिर कहनेटगे । यु. उ...एक प्राण ही यज्ञसबंधी साम है .. ॥ वा। ऋगेका वृणुते यज्ञं तां यज्ञो नातिवर्तते ॥ ५४॥ यक्ष उवाच । किंस्विदावपतां श्रेष्ठं किंस्विनिर्वपतां वरम् ।. .. किंस्वित्प्रतिष्ठमानानां किंस्वित्मसवतां वरम्५५ युधिष्ठिर उवाच। वर्षमावपतां श्रेष्टं वीज निर्वपतां वरम् । गावः प्रतिष्ठमानानां पुनः प्रसवतां वरः॥५६॥ । १। और मन ही यज्ञसबंधी यजुप है २ । एक मन ही यज्ञको अंगीकार करताहै ३ । और यज्ञ ही उसको उल्लंघन करके नहीं वर्तते- ॥ ४ ॥ १४ ॥ फिर यक्ष कहनेटगे । य० प्र०--देवताओंको तृप्त करनेवालोंको उत्तमफल क्या है ! १। और पितरोंको तृप्त करनेवा- लोंको उत्तम फल क्या है! २ । प्रतिष्टा चाहनेवालोंको श्रेष्ठ क्या है? ३ । और संततिवालोंको श्रेष्ठ क्या है ! ४ ॥ ५५ ॥ युधिष्टिर कहने लगे। यु० उ०-देवताओंको तृप्त करनेवालोंको टत्तम फल वृष्टि है १। और पिनरोंको तृप्त करनेगलोंको वीज अर्थात् क्षेत्र आराम आयु संननि आदि उत्तम फल है २ । यहां प्रतिष्ठा चाहनेवालोंको गौ प्रष्ट फल है ३ । और संतति चाहनेवालोंको पुत्र उत्तमकल है ।
(२२८१ यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- यक्ष उवाच। इंद्रियार्थाननुभवन्बुद्धिमाल्लोकपूजितः । संमतः सर्वभूतानामुच्छसन्को नजीवति ॥५॥ युधिष्ठिर उवाच । देवतातिथिभृत्यानां पितृणामात्मनश्च यः । न निर्वपति पंचानामुच्छसन्नस जीवति ॥ ५८॥ यक्ष उवाच । किंस्विद्गुरुतरं मूमेः किंस्विदुच्चतरं च खात् । ।। ५६ ॥ फिर यक्ष कहनेलगे । य० प्र०-विषयोंको अनुभव करता हुवा बुद्धिमान् कौन है ? १ । लोकप्रजित कौन है ? २ | सपूर्ण प्राणियोंको संमत (प्रिय ) कौन है ? ३ । और श्वास लेताहुवा भी मृतक कौन है ? ४॥ १७ ॥ युधिष्ठिर कहनेलगे । यु० उ०-देवता अतिथि और मृत्य ( नौकर ) इनको संतुष्ट करके जो विषयोंको भोगता है वह बुद्धिमान् है १ । जो पित्रीश्वरोंको तृप्त करता है वहीं लोकपूजित है २ । जो संपूर्ण प्राणियोंको आत्मतुत्य देखता है वही सबका प्रिय है ३ । और जो मनुष्य देवता, अतिथि, भृत्य, पित्रीश्वर और आत्मा इन पांचोंको तृप्त नहीं करताहै वही श्वासलेता हुवा भी मृनका है।।५८||फिर गक्ष कहनेलगे। य०प्र०-पृथ्वीसे बड़ा कौन है ।
भापाटीकासमेता। (२२९) किंस्विच्छीघ्रतरं वायोः किंस्विबहुतरं तृणात् ५९ युधिष्ठिर उवाच। माता गुरुतरा भूमेः खात्पितोचतरस्तथा । मनः शीघ्रतरं वाताचिंता बहुतरी तृणात् ॥६०॥ यक्ष उवाच । किंस्वित्सुप्तं न निमिपति किंस्विजातं न चोपति । कस्यस्विद्धृदयं नास्ति किंस्विद्वेगेन वर्धते॥६॥ युधिष्ठिर उवाच । मत्स्यः सुप्तो न निमिपत्यंडं जातं न चोपति । अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते ॥६२॥ और आकाशसे ऊँचा कौन है: २।और वायुसे शीघ्र वेगवाला कौनहे!३। और तृणसे अतितुच्छ क्या है ! ४॥५९॥ युधिष्ठिर कहनेलगे । यु० .उ.--माता पृथ्वीसे बडी है १। और पिता आकाशसे ऊँचा १२१ मन पायुसे शीप्रवेगवाला है ३ । और चिंता तृणसे भी तुन्छ है ॥६॥ फिर यक्ष कहनेलगे । य० प्र-सोयाटुआ कौन नहीं जागता है। और जन्माइवा कौन नहीं चढ़ता है ? २ । हृदय किसके नहीं हैं । और येगसे कौन बढता है ! ४ ॥ ११ ॥ युधिष्ठिर कहने- लगे । यु० उ०--सोयावा मरस्य नहीं जागता अर्थात् अपने (२३०). यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- यक्ष उवाच। किंस्वित्प्रवसतो मित्रं किंस्विन्मित्रं गृहे सतः। आतुरस्य चकिं मित्रं किंस्विन्मित्रं मरिष्यतः ६३ युधिष्ठिर उवाच। सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य मिपमित्रं दानं मित्रं मारिप्यतः६४॥ स्थानको प्राप्त होकर अन्यत्र गमन नहीं करता । अथवा मत्स्य- सदृश यह जीव ब्रह्मको प्राप्त होकर ज्ञाननिद्रामें सोयाहुवा फिर नहीं जागता १.1 जन्माहुवा अंड चलता नहीं अथवा यह ब्रह्मांड चलता नहीं २ । और हृदय पत्थरके नहीं होता अथवा शोक मोह आदिका स्थान हृदय योगीके नहीं होता ३ । और वेगसे बटती है ऐसी नदी है अथवा सुपूप्तिमवस्थाको प्राप्त ऐसे योगीकी चित्त- रूप नदी है ॥ ६२॥ फिर यक्ष कहनेलगे। य० प्र०-प्रवासीका मित्र कौन है ? १ । और गृहस्थका मित्र कौन है १२। रोगीका मित्र कौन है ! ३1 और मरनेवालेका मित्र कौन है ? ४ ॥ ६॥ युधिष्टिर कहनेटगे । यु० उ०-संग, प्रवासालेका मिन है १ । और स्त्री, गृहस्थका मित्र है २ । औपध, रोगीका मित्र है ३ । और दान १
भाषाटीकासमेता।
यक्ष उवाच।
कोऽतिथिः सर्वभूतानां किंस्विद्धर्म सनातनम् ।
अमृतं किंस्विराजेंद्र किंस्वित्सर्वमिदं जगत् ६५
युधिष्ठिर उवाच।
अतिथिः सर्वभूतानामग्निः सोमो गवामृतम् ।
सनातनोऽमृतो धर्मा वायुः सर्वमिदं जगत् ६६॥
यक्ष उवाच ।
किंस्विदेको विचरते जातः को जायते पुनः ।
किंस्विद्धिमस्य भैपज्यं किंस्विदावपनं महत् ६७
मरनेवालेका मित्र है ४ ॥ ६४ ॥ फिर यक्ष कहनेटगे। य० प्र.-
संपूर्ण प्राणियोंका अतिथि कौन है ? १ । और सनातन धर्म कौन
है ! २ । अमृत क्या है ! ३ । और हे राजेन्द्र ! सपूर्ण जगत्म
व्याप्त कौन है !४ ॥ १५ ॥ युधिष्टिर कहनेगे । यु० ३०-संपूर्ण
प्रागियोंका अतिथि ( पूज्य ) अमि है । और गौओंका दुग्ध
अमृग है २ । भोर गौवों की रक्षा यही सनातन धर्म है १ । और
सपूर्ण जगत्में व्याप्त यायु है ४ ॥ ६६ ॥ फिर यक्ष कहनेटगे।
य०प्र०-भकला फोन चिरता है ! १। और जन्मपाकर फिर कौन
(२३२) यक्षधर्मप्रश्नोचरी- युधिष्ठिर उवाच । सूर्य एको विचरते चन्द्रमा जायते पुनः । अग्निहिमस्य भैपज्यं भूमिरावपनं महत् ॥६८॥ यक्ष उवाच । किंस्विदेकपदं धयं किंस्विदेकपदं यशः । . किंस्विदेकपदं स्वयं किंस्विदेकपदं सुखम्॥६९॥ युधिष्टिर उवाच । दाक्ष्यमेकपदं धयं दानमेकपदं यशः । सत्यमेकपदं स्वयं शीलमेकपदं सुखम् ॥ ७० ॥ जन्मता है ? २ । और ठंढीकी औषध क्या है ? ३. और बडा क्षेत्र कौन है ? ४ ॥६॥ युधिष्ठिर कहने ठगे । यु० उ०- सूर्य, अकेला विचरता है १ । चन्द्रमा, अर्थात घटता बढता है २ अग्नि, स्टीफी औषध है ३ । और पृथ्वी, सबके योनेका वडा फिर यक्ष कहनेलगे । य० प्र०-धर्मका मुख्य स्थान कौन है ? १ । और यशका मुख्य स्यान कौन है ? २ । स्वर्गका मुख्य स्थान कौनहै? ३। और मुखका मुख्य स्थान कौन है ? ४ ॥ ६९ ॥ युधिष्ठिर जन्म पाकर फिर जन्मता - भाषाटीकासमेता। (२३३) यक्ष उवाच । किंस्विदात्मा मनुप्यस्य किंस्विदैवकृतः सखा। उपजीवनं किंस्विदस्य किंस्विदस्य परायणम्७१ युधिष्ठिर उवाच । पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या देवकृतः सखा। उपजीवनं च पर्जन्योदानमस्य परायणम्॥७२॥ यक्ष उवाच । धन्यानामुत्तमं किंस्विद्धनानां स्यात्किमुत्तमम् । लाभानामुत्तमं किंस्यात्सुखानांस्यात्किमुत्तमम्।। फहनेलगे । यु० उ०-धर्मका मुख्य स्थान दादय अर्थात् चातुर्य है? और यशका मुख्य स्थान दान है २ । स्वर्गका मुख्य स्थान सन्य है। और मुखका मुख्य स्थान शील है ४॥ ७० ॥ फिर यक्ष कहनेटगे। य० प्र०-मनुष्यका आत्मा कौन है ? १ । और देवका कियाहुवा मनुष्यका मिन कौन है ! २ । मनुष्यका उपजर्जापन कौन है ३ । और मनुष्यका पालन करनेवाला कौन है ? ४ ॥ ७१ ॥ राजा युधि- टिर कहनेगे। यु० उ०-मनुन्यका आमा पुत्र है १ । और देवका कियामा मिनत्री है २ । मनुष्यका उपजीवन मेव है ३ । और मनुष्यका पालन करने वाला दान है ४ ॥ ७२ !! फिर यक्ष कहलगे
यक्षधर्ममश्नोत्तरी-
युधिष्ठिर उवाच ।
धन्यानामुत्तमं दाभ्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् ।
लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा ७४॥
। यक्ष उवाच ।
कश्च धर्मः परोलोके कश्च धर्मः सदाफलः ।
किं.नियम्य न शोचंति कैश्च संधिर्न जीर्यते ७५
युधिष्ठिर उवाच।
आनृशंस्यं परोधर्मवयीधर्मः सदाफलः ।
मनो यम्य न शोचंति संधिः सद्भिन जीर्यते७६॥
य० प्र०-धन्योंमें उत्तम धन्य कौन है ? १ । और धनों में उत्तम
धन कौन है ? २॥ लाभोंमे उत्तम लाभ कौन है ? ३ और मुखोंमें
उत्तम सुख कौन है ? ४ ॥७३॥ युधिष्टिर कहनेलगे । यु० उ०-
धन्यो, उत्तम धन्य यह है जिसके परोपकाररूप चातुर्य है १ ।
धनों में उत्तम धन विद्या है २ । लाभोंमे उत्तम लाम आरोग्य है ।
सुखोंमें उत्तम सुख सतोप है ४ ॥ ७४ । फिर यक्ष कहनेलगे।
२० प्र०-लोकमें श्रेष्ठ धर्म कौन है ? १और सदाफल धर्म कोन
है ! २। किसको वश करके मनुष्य शोच नहीं करता है ? ३१ और
किनके साथ करीहुई मैत्री छूटती नहीं है ? ४ ॥ ७५ ॥ युधिष्ठिर
। भाषाटीकासमेता। यक्ष उवाच । किं नु हित्वा प्रियो भवति किं नु हित्वा न शोचति। किं नु हित्वार्थवान् भवति किं नु हित्वा सुखीभवेत् युधिष्ठिर उवाच। मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति कामं हित्वार्थवान्भवति लोभहित्वासुखीभवेत्७८ यक्ष उवाच । किमर्थं ब्राह्मणे दानं किमर्थं नटनर्तके। कहनेलगे। यु० उ०-अभयदान अर्थात् संन्यास लोकमें श्रेष्ठ धर्म है । और सदा फल देनेवाला धर्म यज्ञ है २ । मनको वश करके 'मनुष्य शोचते नहीं हैं ४ । सज्जनोंकी मैत्री छूटती नहीं है ॥७६ ॥ फिर यक्ष कहनेलगे । य० प्र०-किसके छोडनेसे मनुष्य प्रिय होता है ! १ । और किसके छोडनेसे मनुष्य शोच नहीं करता है ? २ । किसके छोडनेसे मनुष्य अर्थ ( धन ) वान - होता है ! ३ । और किसके छोडनेसे मनुष्य मुखी होताहै ! ४ ॥ ७७ ॥ मानको छोड़कर मनुष्य प्रिय होता है ! १ । और क्रोधको ओडकर मनुष्य शोच नहीं करता है ? २ । काम ( इन्छा ) को छोडकर मनुष्य अर्थवान होता है । और लोभको छोडकर मनुष्य सुखी होता है ।। ७८ ॥ फिर यक्ष कहनेटगा । य० प्र०ब्राह्मगके लिये दान क्यों दियाजाता (२३६) पक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- किमर्थं चैव भृत्येषु किमर्थं चैव राजसु ॥ ७९॥ युधिष्ठिर उवाच । धर्मार्थ ब्राह्मणे दानं यशोथ नटनर्तके। भृत्येपु भरणार्थं वैभवार्थ चैव राजसु ॥ ८॥ - 'यक्ष उवाच । केनविदावृतो लोकः केनस्विन्न प्रकाशते। केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्गं न गच्छति८॥ है ! १। और नट नर्तकके लिये क्यों दियाजाता है ? २ । नौकरोंको किस लिये दियाजाता है १३१ और राजाओंको किस लिये दियाजाता है ? ४ ॥ ७९ ॥ राजायुधिष्ठिर कहनेलगे। यु.--उ०--ब्राह्मणोंको धर्मके लिये दान दियाजाता है । और नट नर्तकोंको यशके लिये दान दियाजाता है। २॥ नौकरोको पोषणके लिये दान दिया- जाता है। और राजाओंको अपने प्रतापके उदयके लिये दान दिया- जाताहै ४॥८॥ फिर यक्ष कहनेलगे । य० प्र०- मनुष्य किससे आयादित रहताहै ? ११ और मनुष्य किससे प्रकाश नहीं करताहै ? २१ मित्रों को किस कारणसे त्यागदेता है । और सर्गको +
.
भापाटीकासमता।
(२३७)
युधिष्ठिर उवाच ।
अज्ञानेनावृतो लोकस्तमसा न प्रकाशते ।
लोभात्त्यजति मित्राणिसंगात्स्वर्ग न गच्छति८२.
यक्ष उवाच ।
मृतः कथं स्यात्पुरुपः कथं राष्ट्रं मृतं भवेत् ।
श्राद्धं मृतं कथं वा स्यात्कथं यज्ञो मृतो भवेत् ।
युधिष्ठिर उवाच ।
मृतो दरिद्रः पुरुपो मृतं राष्ट्रमराजकम् ।
किस कारणसे नहीं जासकता है ! ४ ॥ ८१॥ युधिष्ठिर कहने लगे
यु० उ०--मनुष्य अज्ञानसे आच्छादित ( ढकाहुया ) रहताहे ।।
और तमोगुणसे प्रकाश नहीं करताहै २। मनुष्य लोमसे मित्रोंको
त्याग देता है । और कुसंगसे मनुष्य स्वर्गको नहीं जासकता है
४॥ ८२ ॥ फिर यक्ष कहनेटगे । य० प्र०--मृतकके समान पुरुष
फोन होताहै : ।। और मृतकके समान देश कौन होताहै . २॥
मृतक अर्थात् नहीं कियासा श्राद कौन होता है ? ३ । और मृतक
अर्थात् नहीं कियासा यज्ञ कौन होता ! ४ ॥ ८३ ॥ राजा युधि-
टिर फहनेलगे । यु० उ०-दरिद्र पुल मृतकके समान होता है।
- (२३८) पक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- - . मृतमश्रोत्रियं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः॥८॥ यक्ष उवाच। का दिकिमुदकं प्रोक्तं किमन्नं किं च वैविपम् । श्राद्धस्य कालमाख्याहि ततः पिब हरस्व च८५॥ · . युधिष्टिर उवाच । संतो दिग्जलमाकाशं.गौरनं प्रार्थना विपम् । श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः कथं वायक्षमन्यसे ८६॥ और राजाके विना देश मृतकंके समान होताहै २ । वेदपाठी ब्राह्मणके विना श्राद्ध मृतकके समान होता है ? ३ और दक्षिणाके विना यज्ञ मृतकके समान होता है ४ ॥ ८४ ॥ फिर यक्ष फहनेलगे । य० प्र० दिशाओंमें उत्तम दिशा कौन है ? और जलोंमें उत्तम जल कौन है ! २१ अन्नों में उत्तम अन्न कौन है ? ३॥ और विपोंमें उन विप कौन है । और श्राद्धका उत्तम काल कौन है ! ५। हे राजन् ! इन मेरे प्रश्नोंका उत्तर करके जलपान करो और ले भी जाओ ।। ८५ ॥ युधिष्ठिर कहनेलगे । यु० उ०-संतजन उत्तम दिन अर्थात् शुभमार्ग बतानेवाले हैं ११ उत्तम जल मेघका है २। संपूर्णीका अन्न जीवनरूप गौ है ३॥ याचना उप विप है ।
भापाटीकासमेता। - यक्ष उवाच । तपः किं लक्षणं प्रोक्तं को दमश्च प्रकीर्तितः। क्षमा चका परामोक्ता काच ह्रीः परिकीर्तिता८७ युधिष्ठिर उवाच । तपः स्वधर्मवर्तित्व मनसो दमनं दमः । क्षमा द्वंद्वसहिष्णुत्वं ह्रीरकार्यनिवर्तनम् ॥८८॥ यक्ष उवाच । किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन्कःशमश्च प्रकीर्तितः। दयाचका पराप्रोक्ता किंचार्जवमुदाहृतम् ॥८९॥ श्राद्धका काल वह है कि जब उत्तम ब्राह्मण मिले ५ । हे यक्ष में तो ऐसा मानता हूं और आप कैसा मानते हो यह कहो ।। ८६ ॥ फिर यक्ष कहनेलगे य० प्र०--तप कौन कहाता और दम कौन कहाता है ? २। क्षमा कौन कहाती है ? ३॥ और राजा कौन कहाती है ! ४] ८७ ॥ युधिष्ठिर कहनेलगे। यु० उ० --अपने धर्ममे वर्तना ही तप है १। और मनका विषयोंसे रोकना ही दम है २। शीत उष्ण आदि द्वंद्वोका सहना ही क्षमा है ३। और नहीं करने योग्य कार्यका न करना ही लज्जा है ४ ॥ ८८ || फिर यक्ष कहनेलगे ५० प्र०.. है (२५०) पक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- युधिष्ठिर उवाच। ज्ञानं तत्त्वार्थसंबोधः शमश्चित्तप्रशांतता। दया सर्वसुखैपित्वमार्जवं समचित्तता ॥९॥ यक्ष उवाच । कः शत्रुर्दुर्जयः पुंसां कंश्च व्याधिरनंतकः। कीदृशश्च स्मृतः साधुरसाधुः कीदृशः स्मृतः ९१॥ युधिष्ठिर उवाच । क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनंतकः । सर्वभूतहितः साधुरसाधुनिर्दयः स्मृतः ॥ ९२ ॥ हे राजन् ! ज्ञान कौन कहा है ! ११ और शम कौन कहा है ? २। उत्तम दया कौन कही है ? ३१ और आर्जव ( कोमटता ) कौन कही है ? ४ ॥ ८९ ॥ युधिष्टिर कहनेलगे। यु० उ०-ज्ञानोंमें उत्तम ज्ञान तत्त्वज्ञान है । और चित्तकी शांति ही शम है २ । सपूणोंके सुखकी इच्छा करना दया है । और समचित्तताअर्थात समदर्शीपना ही आर्जव कोमलता है ।।९०॥ फिर. यक्ष कहनेगं ५० प्र०-- पुरुपोंका वटा शत्रु कौन है ? ११ और बड़ी व्याधि कौन है ? २१ साधु कौन कहा है। ३। और असाधु कौन कहा है! ॥ ११ ॥ युधिष्ठिर कहनेन्दगे । यु. ३०--पुरुषोंका क्रोध ही बदा
भाषाटीकासमेता।
(२४१)
1
यक्ष उवाच।
को मोहःप्रोच्यते राजन् कश्चमानः प्रकीर्तितः।
किमालस्यं च विज्ञेयं कश्च शोकः प्रकीर्तितः९३॥
युधिष्ठिर उवाच ।
मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता ।
धर्मनिष्क्रियतालस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते ९४॥
यक्ष उवाच ।
किं स्थैर्यमृपिभिः प्रोक्तं किं च धैर्यमुदाहृतम् ।
शत्रु है । और लोभ ही बड़ी व्यावि है । जो सपूर्ण प्राणियोंका
हितकारी है वही साधु है ३। जो दयारहित है वही असाधु है ४
॥ ९२॥ यक्ष कहनेलगे। य० प्र०-हे राजन् ! मोह कौन कहा है।
१॥
और मान कौन कहा है ? २। आलस्य कौन कहा है ? ३। और
शोक कौन कहा है ४ ॥९३ ॥ युधिष्ठिर कहनेलगे। यु०१०--
धर्मको नहीं जानना ही मोह है १। और अपनेको सबसे श्रेष्ठ जानना
ही मान है २॥ धर्मका आचरण नहीं करना ही आलम्य है । और
अज्ञान ही शोक है ४ ॥९४ ॥ फिर यक्ष कहनेलगे। य० प्र०--
ऋषियोंकी कहीहई स्थिरता कौन है ? ११ और उनकी कहीहुई
(२४२) 'यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- स्नानं च किं परंप्रोक्तंदानंच किमिहोच्यते॥१५॥ ..'.युधिष्ठिर उवाच । स्वधर्म स्थिरता स्थैर्य धेर्यमिद्रियनिग्रहः । नानं मनोमलत्यागो दानं नै भूतरक्षणम् ॥१६॥ !! यक्ष उवाच।. . का पंडितः पुमा यो नास्तिकः कश्च उच्यते। कोमूर्खः कश्चकामःस्यात्कोमत्सरइतिस्मृतः९७ युधिष्ठिर उवाच । धर्मज्ञःपंडितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते । कामः संसारहेतुश्च हत्तापो मत्सरः स्मृतः॥९८॥ धीरता कौनसी है ? स्नानों में उत्तम स्नान फौन कहा है ? और दानोंमें उत्तम दान कौन कहा, है ? ४ ॥ ९५ ॥ युधिष्टिर कहनेलगे । यु०३० -अपने धर्ममें स्थिरता ही स्थिरता है। इंद्रियोंका रोकना ही धीरता है । मनके मलोंका त्याग करना ही उत्तम स्नान है । और प्राणियों की रक्षा और प्राणियों की रक्षा करना ही उत्तम' दान ॥ ९६ ॥ फिर यक्ष कहनेलगे । य० प्र०.- पडित पुरुष कौन जानना ? | नास्निक कौन जानना ? २। और मूर्ख कौन जानना ! ३. काम कौन कहाहै और मत्सर कौन कहाहै : ४॥९॥ युधिष्टिर . an ४ -- भाषाटीकासमेता। (२४३) . यक्ष उवाच। कोऽहंकार इति प्रोक्तः कश्च दंभः प्रकीर्तितः। किं तदेवं परं प्रोक्तं किं तत्पैशुन्यमुच्यते ॥ ९९॥ युधिष्ठिर उवाच । महाज्ञानमहंकारो दंभी धर्मों ध्वजोच्छ्रयः। दैवं दानफलं प्रोक्तं पैशुन्यं परदूपणम् ॥ १०॥ यक्ष उवाच। धर्मश्चार्थश्च कामश्च परस्परविरोधिनः । कहनेलगे । धर्मका जाननेवाला ही पदिन कहा है । और मून ही नास्तिक कहा है ? २ मंसारकी वासना न मिटना ही काम है। और अन्यकी संपत्को देखकर हृदयमे ताप होना ही मत्सर है ४॥९८ फिर पक्ष कहनेलगे। य० प्र०-अहंकार कौन कहा है ? ११ और दंभ कौन कहा है ! । माग्य कौन कहा है ! ३। और पिशुनना (चुगली ) कौन कही है ? ४ ॥ ९९ ॥ राजा युविष्टिर कहनेलगे यु० उ० महाअज्ञान ही अहंकार है १। और ससारमें पुजाने के लिये ही धर्म करना दंभ है २१ पूर्वजन्ममें कियेहुए दानका फल ही देव है । और दूसरों के दूपणोंका कहना ही चुगली है ४ ॥ १० ॥ फिर यक्ष कहनेटगे । य० प्र०-हे राजन् ! धर्म, अर्थ, और काम , . (२४४) क्षधर्मप्रश्नोत्तरी- एपां नित्यविरुद्धानां कथमेकत्र संगमः॥१०१॥ युधिष्टिर उवाच। यदा धर्मश्च भार्या च परस्परवशानुगौ । तदा धर्मार्थकामानांचयाणामपि संगमः।।१०२।। यक्ष उवाच। अक्षयों नरक केन प्राप्यते भरतर्षभ । एतन्मे पृच्छतः प्रश्नं तच्छीघ्रं वक्तुमर्हसि१०३॥ युधिष्ठिर उवाच । ब्राह्मणं स्वयंमाहूय याचमानमकिंचनम् । पश्चान्नास्तीति योव्यात्सोऽक्षयं नरकंबजेत १०४ ये परस्पर विरोधी हैं, इन नित्यविरोधियों का एक जगह संगम कैसे होसकता है ॥ १.१॥ राजा युधिष्ठिर कहनेलगे । गु० उ०.जब कि धर्म और स्त्री आपसमें वशमे होजाते हैं तब धर्म, अर्थ, और काम इन तीनोंका ही सगम होजाता है १॥ १०२॥ फिर यक्ष कहनेलगे है भरतर्षभ हे युधिष्टिर ! कौनसे कर्मके करनेसे मनु- प्यका अक्षय नरकवास होता है ! उत्तहुए के मेरे इस प्रस्नको शीम कहो ॥ १.१॥ राजा युधिष्ठिर कहनेलगे। कि है यक्ष ! याचना ! 4- भापाटीकासमेता। (२४५) वेदेषु धर्मशास्त्रेषु मिथ्या यो वै दिजातिपु । देवेपु पितृधर्मेषु सोऽक्षयं नरकं व्रजेत् ॥ १०५॥ विद्यमाने धने लोभादानभोगविवर्जितः। पश्चान्नास्तीतियोब्रूयात्सोऽक्षयं नरकं व्रजेत् १०६ यक्ष उवाच । राजन्कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन वा। ब्राह्मण्यं केन भवति प्रयूह्येतत्सुनिश्चितम् १०७॥ करतेहुए अकिंचन ब्राह्मणको स्वय ही प्रथम देनेको घुलावे और पश्चात् नटजाय वह अक्षय नरकमें प्राप्त होता है ॥ १०४ ।। और वेद, धर्मशास्त्र, ब्राह्मण, देवता और पितृधर्म इनमें जो मिथ्याबुद्धि करता है वह अक्षयनरकम प्राप्त होता है ॥ १०५ ॥ धन रहनेपर भी जो मनुष्य न तो दान देता है और न आप भोगता है और 'दानदूंगा' ऐमा कहकर पीछे नटजाता है यह अक्षयनरकमे प्राप्त होता है ॥ १०६ ॥ फिर यक्ष कहनेलगे । हे राजन् ! ब्राह्मगत्व, कुलसे होता है ? अथवा आचरणसे होता है ? तथा वेदपढनेसे होता है ? अथवा श्रुतसे होता है ? किससे ब्राह्मणत्व होता है यह मेरे प्रति (१२४६) यक्षधर्मप्रश्नोंत्तरी- युधिष्टिर उवाच । शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायोन चश्रुतम् । . कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशयः॥१०८॥ वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषतः । अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः१०९॥ पठकाः पाठकाश्चैव ये चान्ये शास्त्रचिंतकाः। सर्वे व्यसनिनो मर्खा यःक्रियावान्स पंडित११० चतुर्वेदोऽपि दुर्वृत्तः स शूद्रादतिरिच्यते। निश्चित कहो ॥ १०७ ॥ राजा युधिष्ठिर कहनेलगे । हे यक्ष हे तात ! सुनो ब्राह्मणत्वमें न कुल कारण है और न वेदपाठ और नश्रुत कारण है कितु ब्राह्मणत्वमें एक स्वधर्माचरण ही कारण है इसमें संदेह नहीं ॥ १०८ ॥ पुरुपने स्वधर्माचरणकी रक्षा करनी और ब्राह्मणने विशेष करके ही करनी क्यों कि जिसका वृत्त क्षीण नहीं है वह क्षीण नहीं है और जिसका वृत्त क्षीण है वह क्षीण ही है ।। १०९ ।। हे यक्ष! जो ब्राह्मण पढनवाले हैं जो पढानेवाले हैं और जो शास्त्रके चिंतक हैं पे क्रियारहित होनेसे संपूर्ण व्यसनी और मूर्ख हैं और 'जो क्रियावान् है यह पेंटित है ॥ ११ ॥ चारों वेदोंका पढनवाला भी भाषाटीकासमेता। (२४७) : योऽग्निहोत्रपरो दांतः स ब्राह्मण इति स्मृतः१११ यक्ष उवाच । प्रियवचनवादी किं लभते, विमृशितकार्यकरः किं लभते । बहुमित्रकरः किं लभते, : धर्म रतः किं लभते कथय ॥ ११२॥ युधिष्ठिर उवाच । प्रियवचनवादी प्रियो भवति, विमृशितकार्यकरोऽधिकं जयति । बामग यदि दुष्ट आपग्गगता है तो या गूढमे मी अधिक निकट क्यों कि जिसमे जो अमिहोत्र करता है और इटियोंका दमन करना है यही माहग का ॥ १११॥रि पक्ष फानगे। य०प्र० हे राजन् ! पा. मेरे प्रश्न कहो कि प्रियरचन बोलनाटेको क्या माम होता है ! | और रिचार परके पार करनेटको क्या प्राम तोता है! पण मित्र फग्नेगरेको सामान होता है ! और रानेगको क्या प्रात होता है ! १ ॥ ११२ ॥ रावा दुधीर शर्ग। ३. 20-नियन बोग्नंग संग उनको (२४८) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- बहुमित्रकरः सुखं वसते, यश्च धरतः स गति लभते ॥ ११३॥ यक्ष उवाच। को मोदते किमाश्चर्य कः पंथाः का च वार्तिका। वद मे चतुरः प्रश्नान्मृता जीवंतु बांधवाः११४॥ युधिष्ठिर उवाच । पंचमेऽहनि पष्टे वा शाकं पचति स्वे गृहें। अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते॥११॥ प्रिय होता है १ । और विचारकर काम करनेवालेका अधिक जय होता है २ । बहुत मित्र करनेवाला मुखपूर्वक रहता है ३ । और धर्ममें तत्पर मनुष्य उत्तमगतिको प्राप्त होता है ५॥ ११३३ फिर यक्ष कहनेलगे । य० प्र०-प्रसन्न कौन रहताहै ? १ । और आश्चर्य क्या है ! २ { मार्ग कौन है ? ३ । और धार्ता ( वर्तमान ) कौन है ४। हे राजन् जो! आप इन मेरे प्रश्नोंका उत्तर करदोगे तो तुम्हारे चारों प्राता जिप उठेंगे ॥ ११ ॥ राजा युधिष्ठिर कहनेलगे । हे धारिचर ! जो मनुष्य अपने घरमें पांचवें अथवा छठे दिन शाकपात खाता है परतु वह ऋणी नहीं है और पासी, अर्थात् परदेशवासी ।
(२५०) यक्षधर्ममनोसरी- . मासर्तुदीपरिघट्टनेन, भृतानि कालः पचतीति वार्ता ॥ ११८॥ यक्ष उवाच। । व्याख्याता मे त्वया प्रश्ना याथातथ्यं परंतप । पुरुषंत्विदानीव्याख्याहि यश्चसर्वधनीनरः११९ युधिष्ठिर उवाच। दिवं स्पृशति भूमिं च शब्दः पुण्येन कर्मणा । यावत्स शब्दो भवति तावत्पुरुप उच्यते १२०॥ तुल्ये प्रियाप्रिये यस्य सुखदुःखे तथैव च । काल प्रभु प्राणियोंको इसमे पकाता है और मास ऋतुरूप कड- छीम हिलाता है यही वार्ता अर्थात् वर्तमान है ४ ॥ ११८ ॥ फिर यक्ष कहनेलगं । हे परंतप ! (हे युधिष्ठिर ! ) मेरे प्रश्न तुमने यथा- थतास कहदिये परंतु अब उस पुरुषको कहो कि जो सर्वधनी कहाता है ॥ ११९ ॥ युधिष्टिर कहनेलगे । पुण्यकर्म करके जिसकी कीति- का शब्द जबतक आकाश और भूमिमें व्याप्त रहता है तबतक वह पुरुष मानो जीता है और यही सर्वधनी भी कहाता है ।। १२० ।। जिसके शत्रु मित्र तुल्य है और सुख दुःख तुल्य है और भूत भविष्यन भाषाटीकासमेता। (२५१) अतीतानागते चोभे स वै सर्वधनी नरः॥१२१॥ यक्ष उवाच । व्याख्यातः पुरुपो राजन्यश्च सर्वधनी नरः। तस्मात्त्वमेकं भ्रातृणां यमिच्छसि स जीवतु १२२ युधिष्ठिर उवाच । श्यामो य एव रक्ताक्षो बृहच्छाल इवोत्थितः । व्यूढोरस्को महाबाहुर्नकुलो यक्ष जीवतु॥१२३॥ यक्ष उवाच। प्रियस्ते भीमसेनोऽयमर्जुनो वः परायणम् । सब जिसके तुल्य हैं यह मनुष्य सर्वधनी कहा है ॥ १२१ ।। यक्ष कहनेलगे । तुमने सर्वधनी मनुष्य मी यथार्थ कहदिया इसलिये में प्रसन्न हुया कहताहूं अब तुम जिस एकको चाहो वह तुम्हारा माता जीवित होजाये ॥ १२२ ॥ युधिष्ठिर कहनेलगे । हे यक्ष ! जो आप. प्रसन्नहुए ऐसा कहते हो तो, जो यह श्यामवर्ण रक्त नेत्रोंवाला बडे शालके वृक्षके समान ऊँचा बड़ी छातीपाला और लंबी भुजाओंबाला मेरा माता नकुल है वह जीवित होजाओ ।। १२३ ॥ ऐसे मुन यक्ष फहभेलगे। हे राजन् !यह नी मसेन तुम्हारा प्रिय है और यह अजून । (२५४) यमधर्मप्रश्नोसरी- यथा कुन्ती यथा माद्री विशेपो नास्ति मेतयो। मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु १३२ यक्ष उवाच।. यस्य तेऽर्थाच्च कामाच आनृशंस्यं परं मतम् । तस्मात्ते भ्रातरः सर्वे जीवंतु भरतर्षभ ॥ १३३॥ इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणिआरणेय. पर्वणि यक्षप्रश्ने त्रयोदशाधिकत्रिशत- तमोऽध्यायः ॥३१३॥ हे यक्ष ! मुझको जैसी कुती है पैसी ही माद्री है मेरे दोनोंमें भेदभाव , नहीं है इसलिये दोनों माताओंको सम रखनेकी इच्छासे में यह कह- ता हूँ कि नकुल जांवित होजाओ ॥ १३२ ॥ यक्ष कहनेलगे । हे भरतर्षभ ! ( युधिष्ठिर! ) जिससे अर्थ और कामसे तुम्हारे अविषमता परम समत है इसलिये तुम्हारे संपूर्ण प्राता जीवित होजाओ ॥ १३३॥ इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणि आरणेयपर्वणि यक्षप्रश्ने भाषाटीकायां त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥३१॥[२] -- भाषाटीकासमेता। (२५५) वैशंपायन उवाच । ततस्ते यक्षवचनादुदतिष्ठन्त पांडवाः। क्षुत्पिपासे च सर्वेषांक्षणेन व्यपगच्छताम्॥ १॥ युधिष्ठिर उवाच। . संरस्येकेन पादेन तिष्ठतमपराजितम् । - पृच्छामि को भवान्देवो न मे यक्षो मतो भवान् वसनां वा भवानेको रुद्राणामथवा भवान् । अथवा मरुतां श्रेष्ठो वजी वा त्रिदशेश्वरः॥३॥ अब इतनी कथा कहकर फिर येशपायन ऋषि राजा जनमेज- यस कहनेलगे । कि हे जनमेजय । तिसके अनंतर यक्षके वचनस व सपूर्ण पाटव उठकर खडे होगये और क्षणमात्रमें सपूगोंको भूग्य प्यास दर होगई ॥ १ ॥ राजा युधिष्ठिर कहनेटगे । कि इस सरोवरमें एक पास स्थित होतेहुए आप कौन अजिन देव हो मै आपसे यह पूछता हूँ। क्यो कि जिससे मैने यह निधय किया है कि आप यक्ष नहीं हो ॥ २ ॥ आठ वसुयोममे कोई एक बसु हो अथवा ग्यारह रुद्रों से कोई एक रद्र हो, अथवा उनचास वायुयों से कोई एक (२५६) पक्षधर्मप्रश्नोत्तरी मम हि भ्रातर इमे सहस्रशतयोधिनः । तं योधं न प्रपश्यामि येन सर्वे निपातिताः॥४॥ सुखं प्रतिप्रबुद्धानामिद्रियाण्युपलक्षये । स भवान्सुहृदोऽस्माकमथवा नः पिता भवान्।। यक्ष उवाच । अहं ते जनकस्तात धमों मृदुपराक्रम । त्वां दिक्षुरनुप्राप्तो विद्धि मां भरतर्षभ ॥६॥ वायु हो अथवा देवताओंके राजा इंद्रदेव हो ॥३॥ क्यों कि जिससे ये मेरे भ्राता एक एक सैकटों और हजारहों के साथ युद्ध करनेवाले है और ऐसे एक योद्धाको में किमीको नहीं देखता हूँ कि जो इनको युद्रमें गिगदे इसलिये आप कोई उत्तम देव है कि जिससे मेरे सपूर्ण भाता गिरादिये ॥ ४ ॥ और सुखपूर्वक सो कर उठेहुओंकी तरह जो इनको इद्रियोंकों में देखना हूँ इसलिये यह भी जानता है कि आप हमारे कोई सुहृद हो अथवा पिता (धर्म ) ही हो ॥५॥ ऐसे मुन यक्ष कहनेटगे । हे मृदुपराक्रम ! हे भरतयशियोंमें श्रेष्ठ पुत्र ! (युधिष्ठिर ! ) मैं तुम्हाग पिता धर्म है और तुम्हें देखनेकेलिये स भापाटीकासमेता। (२५७) यशः सत्यं दमः शौचमार्जवं वीरचापलम् । दानं तपो ब्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम ॥७॥ अहिंसा समता शांतिस्तपः शौचममत्सरः । द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रियो ह्यसि सदा ममा • दिष्टया पंचसु रक्तोऽसि दिश्या ते पट्पदी.जिता। के पूर्व मध्यमे द्वे च दे चांते सांपरायिके ॥९॥ आया हूँ ऐसा जानो ॥ ६ ॥ और है पुत्र ! यश, मत्य, इद्रियोंका जीतना, शौच ( शुद्धि ), कोमलता, छज्जा, अचपलना, दान, तप और ब्रह्मचर्य ये दश मेरे शरीर है ॥ ७ ॥ है. राजन् ! जिससे तुम मुझको सदा प्रिय हो इसलिये मैं तुमको धर्मके द्वारा कहता हूँ अहिंसा, समता, शान्ति, तप, शौच और भमन्सरता अर्थात् इन्हीके द्वारा मुझ धर्मको प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥ हे राजन् ! आप पांचोंमें शम, दम, जितेंद्रियता, शीतोष्णकी सहनशीटता, उप- राम, और समाधिस्थिततामे नत्पर हो यह बहुत अच्छा है। और आदि अवस्थाकी अधा और वृषा मन्छ भनस्थाका शोक और मोह, अंत अवस्थाको बुदामरथा और मृत्यु यह पट्पदी भापत्रे, -- पायर्मप्रश्नोत्तरी- धोऽहमिति भद्रं ते जिज्ञासुस्त्वामिहागतः । आनृशंस्येन तुष्टोऽस्मि वरं दास्यामितेऽनधी वरं वृणीष्व राजेंद्र दाता ह्यस्मि तवानघ। ये हि मे पुरुपा भक्ता न तेपामस्ति दुर्गतिः११॥ युधिष्ठिर उवाच। अरणीसहितं यस्य मृगोह्यादाय गच्छति । तस्याग्नयो नलुप्येरन्प्रथमोऽस्तु वरोमम॥१२॥ यक्ष उवाच। अरणीसहितं ह्यस्य ब्राह्मणस्य हृतं मया। जीत ली है यह भी बहुत अच्छा है ॥ ९ ॥ हे अनय ! (युधिष्टिर!) तुम्हारा कल्याण हो मै धर्म हूँ और तुझ धर्मिष्ठकी परीक्षा लेनको आया है इसलिये तुम्हारी समता और दयालुता करके मैं कहता हूँ कि तुझको मैं वर दूंगा ॥ १० ॥ हे राजेन्द! तुम वर मांगो में दूंगा । हे अनय ! जो पुरुष मेरे भक्त हैं उनकी दुर्गति कभी नहीं होती है ॥ ११ ॥ ऐसे सुन युधिष्टिर कहनेलगे । जिस ब्राह्मणका, अरणीसहित अग्नि को लेकर मृग चलागया उसका अग्निहोत्र लुप्त न हो प्रथम वर तो मेरा यही है ॥ १२ ॥ यक्ष कहने प्रसन्ना (२६०) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- भूयश्चाश्वासयामास कौंतेयं सत्यविक्रमम्॥१६॥ यद्यपि स्वेन रूपेण चरिष्यथ महीमिमाम् । नवो विज्ञास्यते कश्चित्रिषु लोकेषु भारत१७॥ वपं त्रयोदशमिदं मत्प्रसादात्कुरूदहाः। विराटनगरे गूढा अविज्ञाताश्चरिष्यथ ॥ १८॥ यद्वः संकल्पितं रूपं मनसा यस्य यादृशम् ।। तादृशं तादृशं सर्वे छन्दतो धारयिष्यथ ।। १९॥ हे राजन् ! जनमेजय ! ऐसे राजा युधिष्ठिरके वचन सुनकर भगवान् धर्म कहनेलगे 'मैं यह भी वर तुम्हें देता हूँ। ऐसा कहकर फिर मत्यविक्रम कुतीकै पुत्र राजा युधिष्टिरको अनेक प्रकारसे आश्वा- सना करातभये और कहनेभये ॥ १६ ॥ हे भारत ! (युविष्टिर!) यद्यपि तुम अपने इनही रूपोंसे त्रिलोकीमे पृथ्वीपर चाहो जहाँ विचरो तुम्हें कोई नहीं जानसकेगा ॥ १७ ॥ तथाऽपि हे कुरु- दह ! इस तेरो वर्ष में तुम गुप्तहुए विराटनगरम वसो मेरे प्रसादसे वहां तुमको कोई नहीं जानसकेगा ॥ १८ ॥ और तुमको जैसा जैसा रूप वांछित हो वैसा वैसा धारण करतेहुए तुम संपूर्ण यथेच्छ , भापाटीकासमेता। (२६१), अरणीसहितं चेदं ब्राह्मणाय प्रयच्छत । जिज्ञासाथ मया ह्येतदाहृतं मृगरूपिणा ॥२०॥ प्रवृणीप्वापरं सौम्य वरमिष्टं ददानि ते। न तृप्यामि नरश्रेष्ठ प्रयच्छन्वे वरांस्तथा॥२१॥ तृतीयं गृह्यतां पुत्र वरमप्रतिमं महत् । त्वं हि मत्प्रभवो राजन् विदुरश्च ममांशजः ॥२२ युधिष्ठिर उवाच। देवदेवो मया दृष्टो भवान्साक्षात्सनातनः । विचरोगे ॥ १९॥ और अरणीसहित यह काष्ठ ब्राह्मणको देदो में मृगरूप धारण करके तुम्हारी परीक्षाके लिये लायाथा ॥ २० ॥ हे नरश्रेष्ठ ! तुम्हारेको वर देताहुवा में तृप्त नहीं होता हूँ इसलिये हे सौम्य ! तुम वांछित और माँगो ॥ २१ ॥ हे पुत्र ! और तीसरा कोई अनुपम और बडा वर मुझसे मांगो क्यों कि जिससे हे राजन् ! तुम मुझसे उत्पन्नहए हो और विदुर भी मेरे अंशसे उत्पन्न हुए हैं ॥ २२ ॥ ऐसे सुन राजा युधिष्टिर कहनेउगे । कि है भगवन् ! आज मेरे धन्य भाग्य है जो कि देवदेव और सनातन आपके दर्शन- .
(२६२) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी- यं ददासि वरं तुष्टस्तं ग्रहीष्याम्यहं पितः॥२३॥ जयेयं लोभमोही चक्रोधं चाहं सदा विभो। दाने तपसि सत्ये च मनो मे सततं भवेत् २४॥ धर्म उवाच । उपपन्नो गुणैरतैः स्वभावेनासि पांडव । भवान्धर्मः पुनश्चैव यथोक्तं ते भविष्यति ॥२५॥ वैशंपायन उवाच । इत्युक्त्वांतर्दधे धर्मो भगवाँल्लोकभावनः । समेताः पांडवाश्चैव सुखसुप्ता मनस्विनः ॥२६॥ हुए इसलिये है पितः! आप प्रसन्न हुए जो घरदेंगे वही में ग्रहण करूंगा ॥ २३ ॥ तथाऽपि हे विभो ! में तीसरा यही वर मांगता हूँ कि लोभ, मोह, और क्रोध इनको सपूर्ण कालमें जीतू । और दान, तप तथा सत्य इनमें मेरा मन निरंतर बनारहे ॥ २४ ॥ ऐसे सुन धर्म कहनेलगे। हे पांडव! इन गुणोंसे तो तुम स्वमावसे ही युक्त हो तथापि मैं भी यह वर तुम्हें देता हूँ कि ये गुण तुममें निरंतर वास करेंगे ॥ २५ ॥ इतनी कथा कहकर फिर पैशंपायन ऋपि राजा जनमेजयसे कहनेलगे । कि हे राजन् ! लोकप्रतिपालक भाषाटीकासमेता। (२६३) उपेत्य चाश्रमं वीराः सर्व एव गंतकमाः। . आरणेयं ददुस्तस्मै ब्राह्मणाय तपस्विने ॥२७॥ इदं समुत्थानसमागतं मह- पितुश्च पुत्रस्य च कीर्तिवर्धनम् । पठन्नरः स्यादिजितेंद्रियो वशी, सपुत्रपौत्रः शतवर्षभाग्भवेत् ॥२८॥ न चाप्यध न सुहृद्विभेदने, परस्वहारे परदारमर्शने। मगवान् धर्म राजा युधिष्टिरको ऐसे वर देकर अतर्थान होगये और मनस्वी शूरवीर संपूर्ण पाडव सुखपूर्वक सोतदुओंके समान उठकार इकडे हो अपने आश्रमको आये और श्रमरहित हुए उस तपस्वी ब्राह्म- णको यह अरणी देतभये ॥ २६ ॥ २७ ॥ यह नकुल आदिकोंका मूळ होकर उठना और धर्म युधिष्टिरका प्रश्नोत्तर करनारूप जो आख्यान है सो मनुष्योंके पठन अगसे पितापुत्रोंकी कीर्तिका बढानेवाला है और जो मनुष्य इसका निन्य पाठ करताहै वह जितें- द्रिय स्वाधीन और पुर पौत्रोंसे युक्तद्या सौ वर्ष पर्यंत सुखको भोगता है ॥ २८॥ जो मनुष्य इम श्रेष्ट आख्याना सदा पाठ
.
(२६४) यक्षधर्मप्रश्नोत्तरी-.
कदर्यभावें न रमेन्मनः सदा,
नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम् ।।२९॥
इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणि आरणेय-
पर्वणि नकुलादिजीवनादिवरप्राप्तौ चतुर्द-
दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥३१॥
करते हैं उनका मन; दूसरोंका धन हरना दूसरोंको त्रियोंसे रमण'
करना कंजमपना इनमें कभी रमण नहीं करता है अर्थात् कभी
नहीं जाता है |॥ २९॥
इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणि आरणेयपर्वणि भाषाटी-
कायां नकुलादिजीनादिवरप्राप्तौ चतुर्दशाऽविकत्रिश-
ततमोऽध्यायः ।। ३१४ ॥
दोहा-यक्ष धर्म प्रश्नोत्तरी, करी मु भाषा माहिं ॥
नंदलाल कहे चूका जो, कह शोध युध ताहिं ॥१॥
क्रय्य पुस्तकें (नीति-ग्रन्थाः)।
नाम.
की... आ.
अफजलुलकानून-अर्थात् ( राजपूनानेकी फौजदारीका
कानून)
अक्षयनीतिसुधाकर-( श्रीमहाराजकुमार श्री १०८
अक्षयसिंहजी वनेडा मेगादप्रणीत ) राजप्रबन्य अर्थात्
किस रीतिसे राजाओंको वर्तमान समयमे नीतिस
वर्ताव करना चाहिये । इत्यादि राजनीतिका अपूर्व
अन्य है। इस समयमें राजकुमारोंको अवश्य पढने
योग्य है.
उद्योगप्रारब्धविचार-भाग्यके भरोसे रहना या उद्यम
कर कीर्नि प्राप्त करना इस विषयमें अनेक श्रुति-स्मृति-
पुराण-न्याय-नीतिके , दृष्टान्तोंसहित सिद्धान्त दर्शाया
है। एक वर यह ग्रन्थ आयन्ततक सबको जरूर
पढना चाहिये । पटते २ बोटी २ फटकने लगेगी।
शीघ्र लीजिये.
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१
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नामा
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(२)
जाहिरात ।
को... आ.
कलाविलास-दुरंगी दुनियाका रंगढग जानना हो,
घड़ी दो वी जी बहलाना हो, चाटाकों, चोरों, .
व्यभिचारियों आदिम बचना हो, अपने धन और
धर्मकी रक्षा करना हो, समारव्यवहारके भेदिये
बनना हो तो इस १५०० कलाओं के भंडारको मी
मंगा देखिये,
कामन्दकीय नीतिसार-(. महामारतान्तर्गत ) विद्या-
गरिधि पं० सालाप्रसादजी मिश्रकृत मापाटीकासमेत
इसमे अच्छे २ नीतिके उपदेश दिखाये हैं।इस संग्राह्य
पुस्तकका दाम भी थोडा रक्खा है
कुण्डलियागिरधरदासकृत-(सामयिक नीति वेदान्त
युक्त ) अबकी बार दुगुनी होगई है
चाणक्यनीति--भापाटीका दोहासहित । इसके देखनेमे
मनुष्य नीतिकी उत्तम बातें जानसक्त हैं, --
ठहरो अर्थात् उपदेशदपंग- इसमे २००० शिक्षित
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. . .... जाहिरात नात. का.स.मा. नासंग्रह-सामयिक श्लोक पटीमासमेत नीब्रिमनोरमा--सटीक-नीतिक लोकोंकी टीका कधि- तोम वर्णित है, वैकनविचाररत्नावली-इसमें नीति और शिक्षा पर- भोपयोगी है..... मानवीकर्तव्यकर्मधर्म-सांप्रतसमयानुसार आचरणसं चलनेकी रीति. राननीविपंचोपाख्यान-भाषा-विष्णुशर्माके पंचत- श्रा भनुवाद विदुरमजागर--छन्दवद्धभाषा--कविता देखने और मनन करने योग्य है. शुक्रनीति-मापाटीकासहित । इसमें-राजा-राजपानी और राजकुमारों के मुख्य धर्मकी रीति और प्रजापा- बनादि सेनारचना तथा गजप्रबन्ध उत्तम प्रकारका है. रेज कागजका स्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीपेटेघर "स्टीम प्रेम-बम्बई. ०-७ .... ....