Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Tibbat Mai Bodh Dharam
Front matter
No text on this page.
तिब्बत में बौद्धधर्म लेखक त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन " आवश्यक सूचना नेपान के शिलालेखों और खान- 'वर्णन से मालूम होता, में वर्तमान था. यही इस लिगे दीपंकरश्रीज्ञान सनों में १-२१, "मनिट मे १६२ वर्षे जोड़ कर पढ़ना चाहिये ।। सोम- पृष्ट-१४ में ७४२६० के स्थान पर ८४५ ई. २८ ३० १२०० पृष्ठ २८ में प्रसिद्ध मंजुश्रीमूलकल्प', पंडित कुमारफलश के साथ मिलकर उल्या किया . ग्रासन N47 प्रकाशक श्री शिवप्रसाद गुप्त, सेवा उपवन, काशी
No text on this page.
तिब्बत में बौद्धधर्म
त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन
प्रकाशक
श्री शिवप्रसाद गुप्त, सेवा उपवन,
काशी
प्रथम संस्करण
१००
मूल्य
२॥
No text on this page.
No text on this page.
कला
म
ची
नी
पारकन्द
कि
किरिया
शिगर
३५
लदाख
लह
रना हल
हन-ले० दिन-रोग
दिपक
गलोक,
शिमला
३०
कैलाश
मानसरोवर
-रडुस
३०
'प्रलमात्रा
पा
सागरा
स्वपना
गोरा
te
१०५
तिब्बत में बौद्धधर्म ईसा से पूर्व तीसरी शताब्दीसे ही बौद्धधर्म भारत की सीमा से बाहर फैलने लगा था। उस वक्त उस के धर्म-दूत न केवल धर्मा और लंका में बल्कि मेसोपोटामिया, मेसीदोनिया और मिश्न तक पहुंच गए थे। इसी समय मध्य- एशिया में बौद्धधर्म ही नहीं फैला, बल्कि परंपरा के अनुसार सम्राट अशोक का एक पुत्र कूचा पास-पास के और प्रदेशों मे अपना राज्य भी कायम करने में सफल हुआ । जनश्रुति तो चीन में बौद्धधर्म का पहुँचना पहले बतलाती है कितु ५६ ई० में खोतन के काश्यप-मातंग द्वारा किए गए धौद्ध ग्रंथों के चीनी अनुवाद तो अव भी प्राप्य हैं। ३७२ ई० में बौद्धधर्म कोरिया में, और ५३८ ई० में जापान में स्थापित हुथा। हिंदू-चीन में भी वह ईसा को तीसरी शताब्दी से पूर्व पहुंच चुका था। इस प्रकार जव कि बौद्धधर्म भारत से दूर दूर देशों में इतना पहले पहुँच चुका था, तो पड़ोसी भोट (तिब्बत ) देश में ५८० ई० से पूर्व वह क्यों न पहुँच सका ? वस्तुत: इस का कारण भोट देश की भौगोलिक स्थिति और बहुत कुछ उसी के कारण सामाजिक विकास की गति का मंद होना है। साधारणतः भोट देश में यस्तियाँ समुद्र तल से दस हजार से १२ हजार फीट पर बस विमा में पारपर्म हुई है। यदि यह कहीं इन से नीची हैं, तो अन्यत्र १४६चार कोट पर भो आप उन्हें देम्बेगे। इतनी उँचाई पर होने के कारण एक तो यहाँ सः यदुत पड़ती है और दूसरे यहाँ के पदाइ पृक्ष-वनस्पवि-शून्य हैं । इस प्रकार यहाँ जीवन- संघर्ष थारंभ से ही मनुष्य के लिए कुछ फटिन रहा है। लेकिन भोट देश- पासियों ने बहुत पहले ही इस को अधिक भीपण न होने देने के लिए जनसंख्या- निरोध की औषधि दृढ निकाली, और सभी भाइयों को एक ही पनी का नियम बना डाला श्रय उतने ही खेत और उतने हो भेड़-यकरियों के गले उन की माने पाली संतति के लिए भी काफी होने लगे। यह अपनी वर्तमान श्रवन्या से संतुष्ट रहने लगे ! उस समय उन फो प्रधान जीविका पशु-पालन थी । यदि परंपरा स्वीकार को जाय, तो कृषि का प्रारंभ (व्य-नि) स्पु-ल्दे-गुड -Zल' (प्राय: ईमयी मन के प्रारंभ ) के समय में हुआ । वस्तुतः यदि बाहर की दुनिया ने दुगम हिमालय की घाटियों को पार कर भोट-न्यासियों को याहा दुनिया का परिचय न कराया होता, तो कौन जानता है कि नियत में अभी तक कोई परिपनन हा होता ? तिब्बत मे चौमधर्म के प्रवेश के बारे में कुछ कहने से पूर्व यहाँ तिव्यत देश के बारे में कुछ कह देना आवश्यक है। तिब्बत देश पूर्व मे पश्रिम तक प्रायः उतना हो लंबा है, जितना कि भारत । उत्तर-दक्षिण इस की चौड़ाई छः-सात सौ मील है। इस के चार भाग है- (१) पभिमी तिब्बत-जिस में लदास, शह-शुद्ध' या गूगे (मान- 'डाक्टर ए. एच० माके, टिस्टिी अब इंडियन टिबेट', भाग २, पृ० ७९ । मोद-भाषा के शब्दों के उच्चारण में इन नियमों का ध्यान रखने पर यह मध्य भोट के उच्चारण के अनुसार हो जायगा।-- (1) जिनने अक्षर-समूह में केवल एक स्वर उच्चारित होता है, उसे एक विभाजक रेखा से अलग किया गया है, वैसे-~यक-शिस् । = z-शि )। (२) स्वर-युक्तपर्ण के पीछे के सरहीन छ म् उमारित नहीं होने सिर्फ उन के पूर्व धाले अ, उ, ओ स्वर, विकृत हो अं, और ओं (जर्मन : 1 और ) यन जाते हैं।
आरम्म-युग [३ सरोवर और लदाख के बीच का प्रदेश), और स्पु-रड्स् (मानसरोवर से पूर्व गचङ तक का प्रदेश) हैं। (२) मध्य तिब्बत--अर्थात् गचङ् (नेपाल, सपु-रङ्स् , वुस्, ल्हो- ख और व्यङ्-थङ् से घिरा प्रदेश, जिस में अफग-रि, ब्क्र-शिस्-ल्हुन्-पो, ब- नम् और स्क्यिद्-रोङ् को वस्तियाँ हैं), वुस् (दुस्-छु नदी को उपत्यका का प्रदेश, जिस में द्गऽ-ल्दन, ल्ह-स, छु-शल् आदि की बस्तियाँ हैं), ल्हो- ख (छु-शल् से नीचे ब्रह्मपुत्र का तटवर्ती प्रदेश, जिस के निचले भाग में कोङ्-पो प्रदेश है ), और कोड्-पो (पूर्व-वाहिनी ब्रह्मपुत्र का अंतिम और उप्णतम भाग,जो कि भोट के राजवंश का ही मूल-स्थान न था, बल्कि वर्तमान दलाई लामा और टशी लामा को भी जन्मभूमि है। यहीं यर्-लुङ बस्ती है, जहाँ स्रोड्-ब्चन-सगम्-पो के पूर्वज रहा करते थे)। (३) पूर्वीय तिव्यत--अर्थात, खम्स् ( पूर्व में चीन के युन्नन् और से-चु-प्रान् प्रांतों तक फैला प्रदेश, जिस में छव्-म्दो और ब्य॑स् के मशहूर मठ स्थापित हुए.), अमन्दो (खम्स् के उत्तर में चीन से मध्य एशिया के वणिक्-पथ के पास तक फैला प्रदेश ) जिस में क्र-शिस्-ख्यिल्, चो-नस्, स्कु-बुम् के प्रसिद्ध मठ स्थापित हुए । महान सुधारक चोड्-व-प भी यहीं की घोड्-ख वस्ती में उत्पन्न हुआ था; कोकोनोर का महान् सरोवर और मंगोलों (३) सभी स्वर हस्व लिखे जाते हैं। आमतौर से उन का उशारण हेद माना के बराबर होता है। किंतु दीर्घ और प्लुत उचारण भी होते हैं। (४) जिन घों के नीचे हलंत का चिद () लगा है, उन के उधारण नहीं करने चाहिए, विशेष कर यदि यह स्वरयुफ वर्ण के पूर्व हो। (५) मयुक्त यों का उचारण होना चाहिए, हां यह प्यान रखना पाहिए, कि- कन, प्रस, मद्रम (६) भोट वर्णमाला के कुछ अक्षरों के मैंने इस प्रकार संरेत का है- ज 17.म.नाम 1. ...
तिम्वत में बौद्धधर्म की यु-गुर् जाति यही पसतो है) और गड् (सम्स से दक्षिण में)। (१) व्यड्-थइ-(चड्-थइ ), यह वह अतिशीतल मैदान है, जो मध्य और पश्चिमीय तिब्बत से चीनी तुर्किस्तान तक फैला हुआ है। १-प्रारंभ-युग ( ५८०-७६३ ई.) सोड्-गचन गस्म्-पो के जन्म (५५७ ई०) से पूर्व भोट देश छोटो-छोटो सर्दारियों में बँटा था । स्रोड्-चन् का जन्म मध्य तिब्वत के उष्णतम प्रदेश कोड-पो में हुआ था । कृषि के साथ सभ्यता का भी प्रारंभ इसी प्रदेश में होना स्वाभाविक था । परंपरा तो बतलाती है, कि घोड्-व्चन का प्रथम पूर्वज कोसलराज प्रसेनजित् ( ई० पृ. पाँचवीं-छठी शताब्दी) का पुत्र था ! जो भी हो, इस में तो शक नहीं कि स्रोङ्-य्चन् का वंश और उस का प्रदेश अधिक उन्नतावस्था में था। यह प्रदेश औरों की अपेक्षा अधिक घना भी वसा था। चाहर के राजाओं और सम्राटों की शान-च-शौकत की कथायें यहाँ पहुँच चुको थी । बाप के मरने के बाद तेरह वर्ष की अवस्था में हो स्रोड्-ड्चन अपने छोटे राज्य का स्वामो बना । किंतु वह उसने पर सतुष्ट रहने वाला कब था ? अपने समकालीन सम्राट हर्षवर्धन की भाँति उसे भो दिग्विजय की सूझी । निडर और कष्ट सहन में पटु अपने भोट योद्धाओं को सगठित कर उस ने एक मुदृढ़ सेना धनाई, और दुयुम (मध्य) और गचड़ के प्रदेशों को अपने अधिकार में कर, उत्तरोत्तर बढ़ते हुए अपने सैन्यवल द्वारा उस ने पश्चिम में गिल्गित, उत्तर में चीनी तुर्किस्तान तक को ही नहीं जीत लिया, बल्कि नेपाल के राजा तथा चौन के सन्नाट को भी कुछ, प्रदेशों के साथ अपनो कन्यायें देने पर वाध्य किया। इस प्रकार विजयो भोट देश का सभ्य दुनिया में प्रवेश हुआ । स्रोड्चन सारे भोट और पार्श्ववर्ती प्रदेशों का सम्राट् बना । इस विशाल साम्राज्य के संचालन के लिए उसे कई बातें करनी पड़ी, जिस में पहिलो बात थी राजधानी को ब्रह्मपुत्र उपत्यका से हटा कर उस के लिए वुस्छु नदी के तट पर लह-स (ल्हासा) नगर का निर्माण करना।
इस के पूर्व जो (4)स (अज-भूमि ) था, वह अब ल्ह-स ( देवभूमि) हो गया। ५८० ई० में नेपालाधिपति अंशुवर्मा की कन्या स्त्रि-चुन् सम्राद् के विवाहार्थ ल्हासा पहुँची। दूसरे वर्ष चीन-राजकन्या कोड्-जो भी राजा- मात्य मगर के साथ ल्हासा आई । इस से पूर्व ही सम्राट ने यह अनुभव किया था, कि इतने बड़े राज्य का संचालन एक लिपि के बिना सुकर नहीं। इसी लिए यह थोन-मि (थोन-गाँव-निवासी) अनु के पुत्र को सोलह साथियों के साथ भारत में विद्याध्ययन के लिए भेज चुका था। नेपाल-राज-कन्या थोन-मि के साथ हो ल्हासा पहुंची। नेपाल-राजकुमारी अपने साथ अक्षोभ्य, मैत्रेय और चंदन की तारा की मृतियाँ ले श्राई । उधर चोन-राजकन्या ने एक पुगतन बुद्ध-प्रतिमा-जो किसी समय भारत से मध्य-एशिया और वहाँ से चीन पहुंची थी-दहेज में पाई । चीन-कुमारी रानी कोड्-जो हुई । उस ने अपनी प्रतिमा को प्रतिष्टित करने के लिए ल्हासा नगर के उत्तरी भाग में र-मोन्छे का मदिर बनवाया । नेपाल- कुमारी रानी नि-चुन के पास इतना धन न था, कि वह अपनी मूर्तियों के लिए मंदिर बनवाती । सम्राट् स्रोड्-चन को जय यह मालूम हुआ, तो उस ने एक जलाशय पटवा कर, ल्हासा नगर के मध्य मे ऽनुल-स्नङ् का सुदर मंदिर बनवाया, जिसे आज कल जो-ग्य कहते हैं। थोन-मि ने राजा के आदेशानुसार भोट-भाषा लिखने के लिए एक लिपि चनाई जो कश्मीर को उस समय को लिपि के समान थी । भोट-भाषा में उतने स्वरों को आवश्यकता न थी, इसलिए उस ने श्र को छोड़ इ-उ-ए-श्रो यह चार स्वर बनाए । श्र को ले कर व्यंजनों की संख्या तीस को। वर्गों के चतुर्थ अक्षर (घ, झइत्यादि) और मूर्धन्य प अनावश्यक होने के कारण छोड़ दिए गए।सा विशेष उच्चारण के लिए च, छ, ज, श, स, 5-इन छः नए अक्षरों का निर्माण करना पड़ा । थोन-मि ने स्वयं भोट-भाषा का प्रथम व्याकरण बनाया। स्रोड्- बचन ने लिपि और व्याकरण श्रादि के सीखने के लिए अपना चार वर्ष का 1 ओवरमिलर, 'यु-स्तोन्', भाग २, पृ० १४३ ।
। तिमा में स्पर्म समय दिया । ल्हासा के लोह-पर्वत (लूचगस.पि.) में उत्कीर्ण यह गुफा श्राज भी दिग्पलाई जाती है, जिस में रह कर नोड्-चुन चार वर्ष तक इस नई लिपियोर व्याकरण का अभ्यास करता रहा। कहने हैं, मिट्टी के बर्तन, पनचको और फरघे का प्रचार भी इसी सम्राट के समय में हुआ । जो भी हो, इम में तो शक नहीं, कि सम्राट् मोद-चन् तिव्यत का एक मुशासक हो न था, बल्कि यह भोट देश के मानवाले साहित्य, धर्म, राजनीति प्रादि सभी का निर्माता था। अपनी दोनों घौद्ध गनियों और अमात्य थान-मि के प्रभाव में यह बौद्ध हुभा । धौद्धधर्म ने श्रय एक अशिक्षित जाति को सुसंस्कन बनाने का अवसर पाया । कला-कौशल, प्राचार- व्यवहार, शिक्षण-अध्ययन सभी के लिए चीनी और भारतीय बौद्ध विद्वानों को खुला अवसर मिला । उन्हों ने बड़ी उदारता में काम लिया। यह कोशिश न की, कि इस प्रशिक्षित जाति के (जिस का न कोई पुराना साहित्य था, न जिस की कोई उन्नत संस्कृति थी)व्यक्तित्व को मिटा कर उसे भारतीय या चोनी बनाने की कोशिश करते । उन्हों ने बहुत सी बातें भोट जाति को दी, किंतु सब का भोटी-करण कर के । बौद्ध-धर्मग्रंथों के अनुवाद करने के लिए भारतीय पडित कुसर (या कुमार ), नेपाली शीलमंजु, कश्मीरी तुन, चीनी भिन्नु महादेव, तथा थोन-मि और उस के शिष्य धर्मकोश एवं, ल्ह-लुड्-छोस्-जे-द्पल नियुक्त हुए। थोन्-मि की पाठ पुस्तकों में से अब कुछ ही बाकी है। शेप पुरान अनु- वाद नही मिलते । कारण, यह है कि श्रारंभ के अनुवाद उतने अच्छे नहीं थे, इस लिए पीछे के सुंदर अनुवादों के सामने उन का प्रचार नहीं हो सका । कहा जाता है, थोन-मि ने 'करडब्यूह-सूत्र', 'रत्नमेष-सूत्र' और 'कर्मशतक' के अनुवाद किए थे। चीनी प्राचार्यों ने विशेषतः गणित और वैद्यक की पुस्तकों के अनुवाद किए । इस काम में भारत, ली ( चीनी तुर्किस्तान ) और चीन तीनों देशों के बौद्ध विद्वानों ने सहयोग दिया था। ली देश के दो भिक्षुओं ने सम्राट की जीवनी भी लिखी थी। वासठ वर्ष के सुदीर्घ और प्रशांत शासन के बाद ६३८ ई० में ८२ वर्ष को अवस्था मे सम्राट् स्रोड्-चन ने ल्हासा के उत्तरवाले फन्-युल प्रदेश के । शांतरक्षित-युग [७ सल-भी स्थान में अपना शरीर छोड़ा । उस की मृत्यु के बाद सम्राज्ञी कोड्-जो की आज्ञा से चीन से आई बुद्ध-मूर्ति भी ऽग्नुल्-स्नङ् में ला कर स्थापित की गई, और आज तक वहीं है। सम्राट् मङ्-स्रोड्-मड्-यचन् (६३८-६५२ ई०)-सम्राट् स्रोड्-चन् को, नेपाली रानो नि-चुन से एक कुमार गुङ्-स्रोड्-गड्-च्चन पैदा हुआ था, किंतु वह पिता के जीवन ही में जाता रहा । पिता के मरने पर चीनी रानी का पुत्र मड्-स्रोङ्-मड्-चन पंद्रह वर्ष की अवस्था में सिंहासन पर बैठा पिता के महान व्यक्तित्व ने इस के काम को यद्यपि ढाँक लिया, तो भी एक बार इसे अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिला । स्रोड्-ब्चन की मृत्यु के बाद, ( यद्यपि नया सम्राट् चीन-राजकन्या का पुत्र था, तो भी) चीनियों ने भोट की शक्ति को निर्बल समझ उन से युद्ध छेड़ा, कितु चीनियों को हारना पड़ा। धार्मिक बातों में इस सम्राद् ने तथा इस के पुत्र दुर्-स्रोड् ( ६५२-७० ई० ) ने अपने पूर्वज का अनुसरण किया । दुर्-स्रोङ् ने चीन-सम्राट् की कन्या वुन्- शिङ्-कोड से व्याह किया था। खि-ल्दे-ग्चुग्-बर्तन (६७०-७४२) अपने पिता दुर्-स्रोङ के बाद राजगद्दी पर बैठा। इस बार भी चीन ने अपने खोए हुए प्रदेशों को छीनना चाहा। गिल्गित के लिए एक खासी लड़ाई छिड़ गई। अब की बार भी चीन को हारना पड़ा । चीन-सम्राट ने अपनी कन्या चिन्-चेङ् (या ग्यिम-क्य ) को भोट-युवराज ऽजद्-छ-ल्ह-पोन के लिए प्रदान किया । जिस यक्त राजकुमार अपनी भावी पत्नी से मिलने जा रहा था, उसी समय किसी आकस्मिक घटना-वश उसका शरीरांत हो गया। अंत में राजकुमारी का सम्राट् ग्चुग्-तन के साथ व्याह हुआ। इस ब्याह के दहेज में भोटराज को हाङ्-हो नदी तटवर्ती चिन्-चु और कु-ए-इ प्रदेश मिले । (ब्लन्-क ) मूलकोप और (डम् ) ज्ञानकुमार ने इस समय कुछ चौद्धग्रंथों के अनुवाद किए, जिन में 'सुवर्ण-प्रभासोत्तम सूत्र' मुख्य था। २-शांतरक्षित-युग (७६३-६८२ ई.) सि-सोड्-लदे-व्चन् (७४२-८५ ई०)-सम्राट् नि-ल्दे-ग्चुग्- ----- " x अमला अन्न wear marriमरद होगर xxxiiमर्थन करना faitert-दमय ननिसमाद ner देशांना पकानड़ाया mitr.rap मरद पार ये दोनों बहनार में पूरे CAMEnginार में न विद्वान ने मनाय था, विशेर- ५iathaमिन ही मानदेवाय या भासमय (162)ोट्टयम के प्रदेश र मी भोट MIN यांन श्रा, डी श्रविकनर नून-पन की पूजा पर ६.१४४४ 24T, 1. धार म कहते हैं। यदि बौद्धयन ने बहुत उदारता in ( Metrn f. उन के कितने ही पृना-प्रकारों में संबंध था) गामी नगी में प्रधानता के लिए संघर्ष जारी रहा । नि-सोड्- TRE, Iri-4 में श्राद्ध-विरोधी मत्रियां का इतना प्रावल्य हो im. TET असगर ग पान वा युद्ध-मृति को हटा कर चीन भेजना Finfrin अमीन के भीतर गाड़ दिया, और मंदिर को फ़साईtitutif it immar दिया । उसी समय दो एक मत्रियों पर कुछ yrrhyt kutifuk पड़ी, ४ा कर उन्हों में मूर्ति नेपाल को सोमा hift II मशुल अपंग गरिय-गट स्थान में भेज दी। hanuो ग गमय अपने पूर्वजों के चरित्रों को पढ़ने का जा (मे अपने पूर्णता की घोडधर्म पर अपार श्रद्धा *. Mill | Meerunी गोज परा फर उन्दै चुपचाप पढ़ना PRIMI, irain its भी पूर्वजों औगी ही बौद्धधर्म पर श्रास्था हो Mahari faatiti धीर गो गधा, कश्मीरी पंदित अनंत कोधर्म- या मारा गंगागागा । फितु घोन्-धर्मी मंत्रियों के विरोध के शांतरक्षित-युग कारण उन्हें मङ्-युल भेज देना पड़ा। पंडित अनंत और चीनी विद्वान् तो मङ्-युल् हो में ठहरे, जहाँ फा तत्कालीन प्रांताधिपति यौद्ध था; किंतु गसल्- स्नड--जो कि आगे चल कर येशेस्-वड्-पो (मानेंद्र ) के नाम से प्रसिद्ध हुआ- -यहाँ में भारत चला गया । महाबोधि (योधगया) के दर्शन के बाद यह नालंदा पहुँचा । वहाँ उस ने प्राचार्य शांतरक्षित के बारे में सुना । कितु आचार्य उस समय वहाँ न थे । नेपाल पहुँचने पर सौभाग्य से उसे प्राचार्य का दर्शन हुश्रा । ज्ञानेंद्र के आग्रह पर प्राचार्य मह-युल् पधारे । कुछ दिनों वहाँ रह कर यह फिर नेपाल लौट गए। हाँ, यह याद रखना चाहिए, कि उस समय मध्यभारत (युक्त-प्रांत, विहार ) से तिब्बत जाने का प्रधान रास्ता नेपाल और स्क्यिद्-रोड (मड्-युल् ) हो कर हो था । ज्ञानेंद्र को प्राचार्य शांतरक्षित के सत्संग से बहुत लाभ हुआ। इस सम्राट के समय में भी चीन ने भोट की तलवार से परीक्षा ली। भोट सेना विजयी हुई । इस विजय की कथा उसी समय एक पापाण-स्तंभ पर लिखो गई, जो अब भी ल्हासा में पोतला के नीचे मौजूद है। अव जानेंद्र मड्-युल से ल्हासा गया। सम्राट् से धर्म-चर्चा हुई। सम्राट् और कितने ही अमात्य बौद्धधर्म को फिर उस के पूर्व-स्थान पर प्रतिष्ठित करना चाहते थे, कितु बलशाली मंत्रो मा-शट स्रोम्-प-स्क्येद् के सामने किसी को हिम्मत नहीं पड़ती थी। अंत में सम्राट और अन्य अमात्यों को राय से मा-शङ् जीवित हो दफन कर दिया गया, और इस प्रकार वोन-धर्म को शक्ति हमेशा के लिए क्षीण हो गई । श्रव सम्राट् की आज्ञा से ज्ञानेंद्र आचार्य शांतरक्षित को बुलाने गया। प्राचार्य के लिए सब से बड़ी दिक्कत भापा को थो; किंतु कश्मीरी पंडित अनंत बहुत वर्षों तक तिब्बत में रहने के कारण भोट-भाषा का अच्छा ज्ञान रखते थे। आचार्य संस्कृत में चोलते थे; और वह उस का उल्था कर दिया करते थे। कहने को आवश्यकता नहीं कि भोट-सम्राट् ने नालंदा के इस अद्भुत विद्वान् का खूब सन्मान किया। ल्हासा पहुँच कर चार मास तक प्राचार्य राजमहल में दश कुशल (शुभकर्म ), श्रठा- रह धातु और द्वादशांग प्रतीत्यसमुत्पाद पर व्याख्यान देते रहे । सम्राट उन का २ निष्पा में बोरथम पड़ा हो अनुरफ शिष्य हो गया। इसी ममय नही की याद मे फर-पाइ म्यान यह गया, लोहितारि ( मर-पोनर) पर बिजली गिगे, और देश में बोरों को पीमागे फैल गई। लोगों ने शोर किया, कि यह याचार्य पं. उपदेश में मय हुए नियत के देवताओं के प्रकोप का फल है। लाचार न्या न रहने हुए भी सम्राट् श्राचार्य का पुछ दिनों के लिए यापस भेजने पर मजबूर हुए। कितने हो समय बाद मम्राट् ने मानेंद्र को धर्म ग्रंथों के संप्रद के लिए चीन, और सह-शि (चीन) भिनु को नाम माथिर्या के माथ आचार्य शांतक्षित को बुलाने के लिए भारत भंगा । मानेंद्र के चीन मे लौटने पर भी जय प्राचार्य नहीं पाए, तो मम्राट ने जानेंद्र को भी रयाना किया। थानार्य शांतरक्षित ४५ पर्प की बुढ़ापे को 'प्रयस्था में भी धर्म प्रचार में उत्तम अवसर को हाथ से कब छोड़ने वाले थे। यह फिर तिव्यन पहुँचे । महापुत्र की उपत्यका के बसम्-यस् ( सम्यं ) में उन का नियास कराया गया। यद्यपि बौद्धधर्म का तिव्यन में प्रदेश प्रायः दो सौ वर्ष पूर्व हुआ था कितु अब तक न कोई भोट-देशीय भिन्तु यना था, और न यहाँ कोई गठ हो स्थापित हुआ था। राजा की इच्छानुमार श्राचार्य ने प्रदापुत्र में प्राय: दो मील उत्तर एक भूमि मठ के निर्माण के लिए चुनी । यही मगधेश्वर महाराज धर्म- पाल (७६९.८०९ ई०) के. घनवाये उड्यंतपुरी (बिहार-शरीफ) महाविहार के नमूने ( ? ) पर घसम्भ्यस् विहार की नींव डाली गई। बिहार का प्रारंभ ७६३ ई०' में हुथा, और समाप्ति७७५ ई० में । मठ के मध्य में सुमेरु की भाँति प्रधान विहार (मंदिर ) बनाया गया, और चारों तरफ चार महाद्वीप और पाठ उप- द्वीपों की भांति भिन्तुओं के रहने के लिए घारह गलिइ (द्वोप) पनाए गए । इन में दस निग्न हैं-(१) सम्स्नासुम-सङ्-गलिइ, (२) व्दुद्-ऽदुल्-संदग-प- ग्लिङ्, (३) नम्-दग-ग्निस्न्यड्-गलिङ् , (४) द्रो->स्व्ये-म-लिड, (५) ऽछल्नगसेर-बड-लिड ; (६) मि-ग्यो-बसम्-गतन-गलिड (७) यदे- । • जयशश ( ७६३ ई.) की जगह पर अमि-शश ग़लती में लिया मालूम दोता है।
शतिरक्षित-युग [११ स्ब्योर-यड्स-पडि-ग्लिङ, (८) द्कोर-मजोद-पे-हर्-गलिग (९) जम- गग्लिङ्; (१०) र्य-गर-ग्लिङ। दो के नामों का पता नहीं । प्रधान विहार के चारों कोनों पर, कुछ हटकर, पको इंटों के लाल नीले श्रादि रंगों वाले चार सुंदर स्तूप बनवाए गए। चक्रवाल की भाँति एक ऊँचे प्राकार से सारा मठ घेर दिया गया और चारों दिशाओं में प्रवेश के लिए चार फाटक लगाए गए। इस विहार के बनाने में घारह वर्ष लगे। जिस समय विहार तैयार हुआ होगा, उस समय यह अद्भुत चीज़ रहो होगी, लेकिन दुर्भाग्यवश, वारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में किसो असावधानो के कारण उस में आग लग गई, जिस से अधिकांश मकान जल गए। फिर र (4) लो-च-बर्दा-ज-प्रगस ने उसो शताब्दी में इस का पुनर्नि- र्माण कराया। यह मठ तिब्बत के अन्य पुराने मठों-श-लु ( स्थापित १०४० ई.), स्नर-थड (स्थापित ११५३ ई०) श्रादि-की भाँति पहाड़ की भुजा पर स्थित न हो कर मध्य-भारत के पुराने मठों को भौति, समतल भूमि पर बना है। विहार-निर्माण प्रारंभ करने के समय ही राजा को इच्छा हुई, कि भोट- देशीय पुरुष भिक्षु-दीक्षा से दीक्षित किए जायें। विहार का कुछ फाम हो जाने पर प्राचार्य ने नालदा से सर्वास्तिवादो भिक्षुओं को बुलवाया। भिनु-नियम के अनुसार भिक्षु बनाना संघ का काम है, कोई एक व्यक्ति भिनु नहीं बना सकता । यद्यपि मध्य-भारत ( युक्त-प्रांत, विहार) से वाहर पाँच भिनु भी होने से कोरम पूरा हो जाता है, तो भी आचार्य ने बारह भिनु बुलाए; और मेष-वर्ष (७६७ ई०) में-(१) ज्ञानेंद्र, (२) दुपल्-द्व्यङस् , (३) (ग्चुङ ) शोलेंद्र-रक्षित, (४) (म) रिन्-छन्-म्छोग् , (५) (ऽखोन ) क्लुफ़ि-द्वङ-पो, (६) (गचङ) देवेंद्ररक्षित, (७) (प-गोर्) वैरोचनरक्षित-यह सात भोट देशीय कुल-पुत्र भिनु वनाए गए। भिक्षु-संघ और भिनु-विहार स्थापित कर प्राचार्य शांतरक्षित ने भोट देश में बौद्धधर्म की नीव दृढ़ कर दी। यहाँ एक और व्यक्ति के विषय में कुछ लिख देना आवश्यक है। तिब्बत के पुरातन भिक्षुओं द्वारा स्थापित परंपरावाले आज कल ब्रिङ्-म-प कहे जाते हैं। यद्यपि यह लोग आचार्य शांतरक्षित को भी अपना नेता मानते हैं, तो भो अधिक श्रेय एक रहस्यपूर्ण व्यक्ति पद्मसंभव १२] तिमात में बौद्धधर्म को देते हैं। इस का कारण, उन का वास्तविकता को अपेक्षा जादू तथा मंत्र में असाधारण अनुराग है। अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है, कि पद्मसंभव शांतरक्षित के अनुगामी भितुओं में एक साधारण भिनु था। स्तन -ऽग्युर मे इम को भिन्नु-नियम-सबंधी कुछ छोटो पुस्तकें भी मिलती हैं। पद्मसंभव राजा इंद्रभूति (इंयोधि ) का पुत्र कहा जाता है, किंतु भारतीय परंपरा, इद्रभूनि को चौरासी सिद्धों में मानती हुई भी, उस के पुत्र पद्म संभव के बारे में कुछ नहीं जानतो । इंद्रभृति श्रादिसिद्ध सरह (७५० ई०) के बाद हुआ था, फिर उस के पुत्र का सम्-यस् बनने के समय तिब्बत पहुँचना भी संभव नहीं । सब बातों पर विचार करने से ज्ञात होता है, कि एक साधारण भिनु पद्मसंभव को पासमान पर चढ़ाने के लिए, पीछे के सिंड्-म-प संप्रदाय वालों ने तरह तरह की अद्भुत कहानियाँ गढ़ों; और इम के लिए मूल- संस्थापक श्राचार्य शांतरक्षित तो पीछे डाल दिए गए, और पद्मसंभव को तिब्वत में युद्ध से भी अधिक पूजा होने लगी। अन्य कार्यों से निवृत्त हो श्राचार्य ने बौद्धग्रंथों के अनुवाद की ओर ध्यान दिया । अभी तक अनुवादों का कोई पक्का निर्धारित नियम नहीं बना था। इसी लिए मालूम होता है, इस समय के बहुत से अनुवाद पीछे अग्राह्य हो गए। प्राचार्य शांतरतित के अनुवाद किए ग्रंथों में दिइनाग-विरचित 'हेतुचक्र' भी है जिसे उन्हों ने लो-च-व धर्मकोप को सहायता से अनुवादित किया था। सौ वर्ष की आयु में (प्रायः ७८० ई० के फरीय ) घोड़े के पैर की चोद से प्राचार्य का देहांत हो गया। विहार के पूर्व की छोटी पहाड़ी पर उन का शरीर एक स्तूप में रखा गया । साढ़े ग्यारह सौ वर्ष तक, मानो यह उसी पहाड़ी टेकरी पर से अपने कार्य को देख रेख कर रहे थे। ३०-३५ वर्ष हुए यह जीर्ण-शीर्ण स्तूप गिर पड़ा, और श्राचार्य का अस्थिमय शरीर नीचे गिर गया। वहां से जमा कर श्राचार्य शांतरक्षित का कपाल और कुछ इड़ियों इस समय प्रधान मंदिर में शोशे के अंदर रक्खी शांतरक्षित-युग प्राचार्य शांतरवित असाधारण दार्शनिक थे, इस का हाल ही में,संस्कृत में प्रकाशित उन के दार्शनिक ग्रंथ 'तत्त्व-संग्रह' से पता लगता है। यह अपने समय के यौद्ध, ब्राह्मण, जैन सभी दर्शनों के प्रगाढ़ विद्वान थे। ऐसे विद्वान् की देश में भी प्रतिष्ठा कम न थी, किंतु यह यह समय था, जब कि भारत से साहस-मय जीवन नष्ट न हुआ था। देश में प्राप्त सम्मान का ख्याल छोड़ ७५ वर्ष की उम्र में हिमालय की दुर्गम घाटियों को पार करने को वह तैयार हो गए, जय उन्हों ने देखा, कि इस प्रकार यह अपने धर्म की सेवा कर सकते हैं। इस त्याग के लिए ही उन का नाम योधिसत्व पड़ा, और आज भी तिव्यत में अधिकांश लोग उन्हें श्राचार्य शांतरक्षित की जगह म्खनन्छेन (महापंडित) घोधिसत्य के नाम से ही ज्यादा जानते हैं। प्राचार्य शांतरक्षित के बाद उन के शिष्य द्पल्-व्यङ्स् ( श्रीघोष ) संघ-नायक बने। स्रोड्-वचन के काल से ही भोट में चीनी बौद्ध विद्वानों को प्रधानता थी, यद्यपि कभी कभी कुछ भारतीय विद्वान भितु भी वहाँ पहुँच जाते थे। सम्राट् खिम्रोड्-ल्दे-चन की गंभीर ज्ञानपिपासा ने उन्हें यौद्धधर्म के मूल-स्रोत भारतवर्ष को श्रोर आकृष्ट किया। प्राचार्य शांतरक्षित के पहुँचने के बाद तो अब भारतीय भितुश्रो की प्रधानता हो गई । किंतु, प्राचार्य के देहांत के बाद महत्वाकांक्षी चीनी भिक्षुओं ने विवाद खड़ा किया, और यह भी एक सिद्धांत की श्राड़ में। उन्हों ने उपदेश देना शुरू किया कि सारे कमों को छोड़ कर परम निष्कर्मण्यता का आश्रय लेना ही बुद्ध- पद की प्राप्ति का एक मात्र साधन है । श्रीघोष इस के विरुद्ध, यथार्थ सिद्धांत का प्रतिपादन करते रहे । धीरे धीरे स्तोन-मुन्-प (अकर्मण्यतावादी या सद्यो- वादी ) सम्प्रदाय का जोर बढ़ने लगा, और शांतरक्षित के अनुयायी चेन्. मिन्-प ( कर्मण्यतावादी, या क्रमिकवादी ) का बल घटने लगा। इस झगड़े से घबड़ा कर ज्ञानेंद्र बसम्-यस् छोड़ दक्षिण ल्हो-बग् में ध्यान और एकांत-चिंतन के लिए चले गए। जब राजा ने कहा, कि सिद्धांत और प्राचार दोनों में सब को प्राचार्य योधिसत्व के सिद्धांत को मानना चाहिए, तो अकर्मण्यता-बादी दल ने कर्मण्यता-यादियों को मार डालने की धमकी देनी १२] तिमत में बौद्धधर्म को देते हैं । इस का कारण, उन का वास्तविकता को अपेक्षा जादू तथा मंत्र में असाधारण अनुराग है । अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है, कि पद्मसंभय शांतरक्षित के अनुगामी भिक्षुओं में एक साधारण भिनु था। स्तनः ग्युर में इस की भिक्षु-नियम-संबंधी कुछ छोटो पुस्तकें भी मिलती हैं। पद्मसंभव राजा इंद्रभूति (इंद्रयोधि ) का पुत्र कहा जाता है, किंतु भारतीय परंपरा, इद्रभूति को चौरासो सिद्धों में मानती हुई भी, उस के पुत्र पद्म संभव के बारे में कुछ नहीं जानती | इंद्रभूति आदि-सिद्ध सरह (७५० ई०) के बाद हुआ था, फिर उस के पुत्र का सम्-यम् बनने के समय तिच्चत पहुँचना भी संभव नही । सव बातों पर विचार करने से ज्ञात होता है, कि एक साधारण भितु पद्मसंभव को आसमान पर चढ़ाने के लिए, पीछे के निड्-म-प संप्रदाय वालों ने तरह तरह की अद्भुत कहानियाँ गढ़ों; और इस के लिए मूल- संस्थापक श्राचार्य शांतरक्षित तो पीछे डाल दिए गए, और पद्मसंभव की तिब्बत में युद्ध से भी अधिक पूजा होने लगी। अन्य कार्यों से निवृत्त हो प्राचार्य ने चौद्धग्रंथों के अनुवाद की ओर ध्यान दिया। अभी तक अनुवादों का कोई पक्का निर्धारित नियम नहीं बना था। इसी लिए मालूम होता है, इस समय के बहुत से अनुवाद पीछे अग्राह्य हो गए । श्राचार्य शांतरक्षित के अनुवाद किए ग्रंथो में दिड्नाग-विरचित 'हेतुचक्र' भी है जिसे उन्हों ने लो-च-ब धर्मकोप की सहायता से अनुवादित किया था। सौ वर्ष की आयु मे (प्रायः ७८० ई० के करीब ) घोड़े के पैर की चोट से आचार्य का देहांत हो गया । विहार के पूर्व की छोटी पहाड़ी पर उन का शरीर एक स्तूप में रक्खा गया। साढ़े ग्यारह सौ वर्ष तक, मानो वह उसी पहाड़ी टेकरी पर से अपने कार्य की देख रेख कर रहे थे। ३०-३५ यर्प हुए यह जीर्ण-शोणे स्तूप गिर पड़ा, और प्राचार्य का अस्थिमय शरीर नीचे गिर गया। वहां से जमा कर आचार्य शांतरक्षित का कपाल और कुछ हड़ियाँ इस समय प्रधान मंदिर में शोशे के अंदर रक्खी गई हैं।
शांतरक्षित-युग प्राचार्य शांतरक्षित असाधारण दार्शनिक थे, इस का हाल ही में,संस्कृत में प्रकाशित उन के दार्शनिक ग्रंथ 'तत्त्व-संग्रह' से पता लगता है। वह अपने समय के बौद्ध, ब्राह्मण, जैन सभी दर्शनों के प्रगाढ़ विद्वान थे। ऐसे विद्वान् को देश में भी प्रतिष्ठा कम न थी, किंतु यह वह समय था, जव कि भारत से साहस-मय जीवन नष्ट न हुआ था। देश में प्राप्त सम्मान का ख्याल छोड़ ७५ वर्ष की उम्न में हिमालय की दुर्गम घाटियों को पार करने को वह तैयार हो गए, जब उन्हों ने देखा, कि इस प्रकार वह अपने धर्म की सेवा कर सकते हैं। इस त्याग के लिए ही उन का नाम बोधिसत्व पड़ा, और आज भी तिब्बत में अधिकांश लोग उन्हें प्राचार्य शांतरक्षित की जगह म्खनन्छेन (महापंडित) बोधिसत्व के नाम से ही ज्यादा जानते हैं। श्राचार्य शांतरक्षित के बाद उन के शिष्य दुपल्-यस् (श्रीघोष ) संघ-नायक बने । स्रोङ्-ब्चन के काल से ही भोट में चोनो बौद्ध विद्वानों की प्रधानता थी, यद्यपि कभी कभी कुछ भारतीय विद्वान भिनु भी वहाँ पहुँच जाते थे। सम्राट् नि-स्रोङ्-ल्दे-ब्चन की गंभीर ज्ञानपिपासा ने उन्हें बौद्धधर्म के मूल-स्रोत भारतवर्ष को ओर आकृष्ट किया। प्राचार्य शांतरक्षित के पहुँचने के बाद तो अब भारतीय भिक्षुओं की प्रधानता हो गई । कितु, प्राचार्य के देहांत के बाद महत्वाकांक्षी चोनी भिक्षुओं ने विवाद खड़ा किया, और यह भी एक सिद्धांत की आड़ में। उन्हों ने उपदेश देना शुरू किया कि सारे कमों को छोड़ कर परम निष्कर्मण्यता का प्राश्रय लेना हो बुद्ध- पद की प्राप्ति का एक मात्र साधन है। श्रीघोष इस के विरुद्ध, यथार्थ सिद्धांत का प्रतिपादन करते रहे । धीरे धीरे स्तोन्-मुन्-प (अकर्मण्यतायादी या सद्यो- वादी) सम्प्रदाय का जोर बढ़ने लगा, और शांतरक्षित के अनुयायो चन्. मिन-प ( कर्मण्यतावादी, या क्रमिकवादी) का बल घटने लगा। इस झगड़े से घबड़ा कर जानेंद्र सम्-यस् छोड़ दक्षिण ल्होत्रम् में ध्यान और एकांत-चिंतन के लिए चले गए। जब राजा ने कहा, कि सिद्धांत और प्राचार दोनों में सब को श्राचार्य बोधिसत्व के सिद्धांत को मानना चाहिए, तो अकर्मण्यता-यादी दल ने फर्मण्यता-वादियों को मार डालने की धमकी देनी १४] शुर पी। न गइम गगः को मिटानेपा आप जानने के लिए गाने मानेंद्र में पास भादमी माशी याराने: प्रान में कार फर दिया, नोमगे पार पर गजा के पाम पाए । गता के पपन पर हों ने पता हमारे भाचार्य ने कहा था, कि गरिपाई पियार रहा हो, गोहमा शिष्य पगलशाल को युनाना । अपने गुरु पो माति आचार्य कमलशील भो नालंदा के एक महान विद्वान थे। शोनक्षित ५०० भोको दार्शनिक ग्रंथ 'नत्यममह' पर उन्हों ने एक गिगापूर्ण पनिका निमी है। यह दोनों प्रय पड़ोदा की गायकया-योरिगटल मोगरा में आप मुफे हैं। अकर्मण्यतान्यादियों नेता धीनी मिनु राम को जब पता लगा, तो उसने अपने पक्ष के प्रमाण में 'ध्यान-यना' नामक मंध लिम कर, महायान मूनों में बहुत मे प्रमाण जमा कर दाने। इसने अपने शियों को भी हम यई शाममार्थ के लिए नयार कर लिया। भावार्य फमलशाल के पहुँचने पर, शास्त्रार्थ का समय नियन हुथा। मम्राट् नेम्वयं मध्याय का आसन ग्रहण किया । दाहिनी ओर अकर्मर यतायादो और उन के नेता ( भितु ) बैठे, घाई और प्राचार्य कमलशील, मानेंद्र, श्रीगोप और दूसरे लोग। सम्राट ने दोनों पक्षों के मुग्मियों के हाथ में पृल की मालाएँ दं दी, और कहा, जो हार यह विजेता को माला दे श्रोर यहाँ में हमेशा के लिए पला जाये। शह ने पहले अपने पक्ष के समर्थन में भाषण दिया, जिस का उत्तर प्राचार्य कमलशील ने दिया । इस के कहने की आवश्यकता नहीं, कि शास्त्रार्थ में दुभापिया में काम लिया जाता था । अकर्मण्यतावादियों की अंत में पराजय हुई। वह प्राचार्य के हाथ में गाला देकर देश से निकल गए। पोछे हराइने धन-लोभ दे कर चार चोनी कसाइयों को भेजा, जिन्हों ने थाचार्य कमलशील को मार डाला । ज्ञानेंद्र ने भी शोकामांत हो निराहार से प्राण त्याग दिए, और सम्राट भी इ९ वर्ष की अवस्था में ( ७४२ ई.) परलोक-गामी हुए। दश यह धोनी शब्द है, जिस का अर्थ भिक्षु है । इस दशहू का असली नाम मारहम नहीं।
१५ - शांतरक्षित-युग इस समय आचार्य विमलमित्र, युद्धगुह्य, शांतिगर्भ, और विशुद्धसिह ने भोट-देशीय लो-चव ( अनुवादक )'-धर्मालोक, (वन-दे) नम्-मखs, (स्गो) रिन छेन-स्दे, नम्-पर-मि-तोग-प और शाक्य-प्रभ को सहायता से कितने ही ग्रंथों के अनुवाद किए । तो भी प्रभो वास्तविक अनुवाद का काल प्रारंभ न हुआ था। मु-नि-चन्-पो (७८५-८६ ई०)-सम्राट् स्त्रि-साङ् वीर थे, किंतु उस से भी अधिक यह धार्मिक थे। उन के विचारों का असर उन की संतान पर पड़ा । जव उन के बाद उन का पुत्र मुनि-चन्-पो गद्दी पर बैठा, तो वह दूसरा ही स्वप्न देखने लगा। उस का पिता और सारा घर धार्मिक शिक्षा, विशेष कर बोधिसत्व-श्रादर्श (अर्थात् दूसरों के हित के लिए तन, मन, धन ही नहीं, हाथ में आई अपनी मुक्ति तक का परित्याग करना) से सराबोर था। तरुण सम्राट् ने अपने आस-पास प्रजा में दरिद्रता देखी; जो दद्धि नहीं थे, उन्हें भी उस ने अपने से अधिक धनी को शान-ब-शौकत तथा अपमान भरे वर्ताव से असंतोप को भट्टी मे जलते देखा। वह सोचने लगा, किस प्रकार इस दुःख का श्रत किया जाये । अंत में उस को समझ में आया कि धन का सम- वितरण ही इस का एक मात्र उपाय है । इस प्रकार ७८५-८६ ई० में उस ने आर्थिक साम्यवाद का प्रयोग करना शुरू किया। किंतु इतने बड़े प्रयोग के लिए देश में क्षेत्र तैयार न था। श्रम के सम-वितरण के बिना कभी भी अर्थ का सम-वितरण सफल नहीं हो सकता। एक बार धन का सम-वितरण हो जाने पर आलसियों से कोई काम लेने वाला न रहा, थोड़े दिनों में खा-पी कर वह फिर फालेमस्त हो गए, और दूसरे मेहनती लोगों के पास फिर संपत्ति जमा होने लगी। सम्राट् ने एक के बाद एक तीन बार तक अर्थ का सम-विभाग किया। तीसरी बार के बाद यह प्रयोग दूर के लोगों को ही नहीं, बल्कि उस 'लो-च-च शब्द लोक और चक्षु दो शब्दों के आदि अक्षरों से मिल कर बना है। चाहे वह लोग लोक के चक्षु न भी हो, किंतु इस में तो शक नहीं कि भारतीय आचायों के लिए जो भोट भाषा से अनभिज्ञ थे-वह अवश्य चक्षु थे - १६ तिमत में धर्म की मां को भी असा हो गया, और इस प्रकार उन्नीस मास के शासन के बाद ही, माता द्वारा दिए गए विप मे, इस महात्मा को मृत्यु हुई। मुनि-बूचन- पो को कुछ लोग पागल कहेंगे, कितु यदि यह पागल था, तो एक पवित्र : श्रादर्श के पीछे। आज-कल जब कि मनन-शील पुरुषों की विचार-धारा संसार को साम्यवाद की ओर ले जा रही है, इस साम्यवाद के शहीद का आदर- पूर्वक स्मरण जरूर होगा। खि-ल्द-यचन्-यो या सद्-न-लेगम् (७८७-८१७ ई.)-मुनि-वचन- पो के बाद उम का भाई ग्नि-ल्द-प्रचन्-पो सिंहासन पर बैठा । इस का भी चौद्धधर्म पर स्नेह अपने पिता और भाई से कम नहीं था । सुदूर पश्चिम बल्तिस्तान के स्कर-दो नगर में इस ने बौद्ध-मदिर बनवाया। अब तक कितने ही ग्रंथो के अनुवाद भोट भाषा में हो चुके थे, किंतु अभी तक अनुवाद के शब्दों और भाषा में किसी खास नियम का पालन नहीं किया जाता था। जिस को जो प्रतिशब्द अच्छा लगा, वह उसी का प्रयोग करता था। अश्ववर्ष ( ७९० या ८०२ ई.) में सम्राट् ने अनुवाद करने वाले भारतीय पडित जिनमित्र, सुरेंद्रयोधि, शीलेंद्रवोधि, दानशोल, बोधिमित्र तथा उन के सहायक भोट विद्वान रत्नरक्षित, धर्मताशोल, ज्ञानसेन (येशेस्-सदे) जयरक्षित, मंजुश्रीवर्म, रमेंद्रशील से कहा कि पहले देवपुत्र ( मेरे ) पिता के समय थाचार्य बोधिसत्व, ज्ञानेंद्र, ज्ञानदेवकोप, ब्राह्मण अनंत श्रादि ने अनु. वाद किए, किंतु उन्हों ने एक ऐसी भाषा का निर्माण किया, जो देश वासियों के समझने लायक नहीं है। चोन, ली, सहारे श्रादि को भाषाओं के अनुवाद से प्रत्यनुवाद किए गए थे, जिन में प्रतिशब्द का कोई नियम नहीं रक्खा गया । इस की वजह से धर्मग्रंथों के समझने में कठिनाई होती है। इस लिए आप लोग अब सीधे संस्कृत से अनुवाद करें, और प्रतिशब्दों की एक तालिका बना लें। अनुवाद का एक नियम हो, जिस का उलंघन न होना चाहिए। पिछले अनुयादों का फिर से संशोधन कर देना चाहिए। इस प्रकार नवों शताब्दी के मध्य से संस्कृत ग्रंथों के नियमबद्ध अनु- शांतरक्षित-युग [१७ वाद भोट भाषा में होने लगे। इन अनुवादों में प्रतिशब्द चुनते समय संस्कृत के धातु-प्रत्ययों का भोट भाषा के धातु-प्रत्ययों से मेल होने का पूरा ख्याल रक्खा गया है, और संस्कृत के हर एक विशेष शब्द के लिए एक एक शब्द नियत कर दिया गया है। उदाहरणार्थ-छोस्-ऽ जिन् (धर्म-धर ), छोस्- स्क्योङ् ( धर्मपाल ) । हाँ, सङ्स्य॑स् (बुद्ध), व्यड्-छुप् (बोधि ) आदि कुछ शब्द जो पिछली दो शताब्दियों में बहुप्रचलित हो गए थे, उन्हों ने वैसा ही रहने दिया। प्रतिशब्दों को चुन कर उन्हों ने पृथक् पुस्तकें बना ली, जो 'व्युत्पत्ति' के नाम से अव भी स्तन्-5 ग्युर् के भीतर मौजूद हैं।। महायान तथा दूसरे सूत्रों का अधिकांश अनुवाद इसी समय का है। इस समय कुछ तंत्र-ग्रंथों के भी अनुवाद हुए थे। इस समय के अनुवादों में नागार्जुन, असंग, वसुबंधु, चंद्रकीर्ति, विनीतदेव, शांतरक्षित, कमलशील आदि के कितने ही गंभीर दर्शन-ग्रंथ भी हैं। जिनमित्र, ये-शेस्-स्दे, धर्मताशील के अतिरिक्त भोट-देशीय आचार्य दुपल-बूचे गम् इस काल के महान अनुवादक हैं । जितना अनुवाद-कार्य ७९०-८४० ई० में हुआ, उतना किसी काल में न हो सका। रल्-प-चन् ( ८१७-८४१ ई०)-बड़े भाई (ग्लङ) दर्-म के रहते भी पिता के मरने के बाद यही राजपद के योग्य समझा गया। यह पिता-पितामह से चले आते चौद्धधर्म के कार्य को चलाता ही नहीं रहा, बल्कि उस के प्रति अपनी भक्ति दिखाने में इस ने अपने पूर्वजों को भी मात करना चाहा । धर्मो- पदेश सुनते वक्त यह अपने शिर के केशों पर रेशमी चादर विछा कर उस पर व्याख्याता को वैठाता था। एक एक भिक्षु की सेवा के लिए इस ने सात सात कुटुंब नियुक्त किए थे । राज-कार्य में भी भितुओं को बहुत अधिकार दे रक्खा था । राजधानी ल्हासा का सारा ही प्रबंध एक भिक्षु के हाथ में था। राजा का तिम्बत में भारतीय ग्रंथों के अनुवाद का काम भारतीय पंडित और भोट- देशीय विद्वान् मिल कर करते थे। भोट-देशीय विद्वान् लो-च-व कहे जाते हैं। इस प्रकार भोट और संस्कृत दोनों मापाओं का गंभीर ज्ञान एकत्रित हो जाने से मोटिया अनुवाद संसार में अद्वितीय है। ३ १.] तिब्बत में पौधर्म पुत्र चड्-मो स्वयं भिन्तु हो गया । वस्तुत: यह अंधी भक्ति मर्यादा को पार कर रही थी। इस ने अयोग्य व्यक्तियों को मिनु बनने की ओर प्रेरित किया। फिर यह सारा दोप राजा और उस के नहास्पद धर्म पर लगने लगा । ग्ल-दर- म (जो राजपद से वंचित कर दिया गया था) और बौद्धधर्म-विरोधी प्रमा- त्यों को यह अच्छा मौका हाथ लगा; खबर उड़ाई गई कि राजा के पादरः भाजन भिन्नु (यन्न्दे ) योन-तन-पल का महारानी डड्-छुलन्म के साथ अनु- चित संबंध है। अंत में पड्यत्रियों ने योन्-तन्-दपल को मार डाला, जिस पर रानी ने श्रात्महत्या कर ली। स्वयं सम्राट भी लोह-पक्षी वर्ष (८५१ ई०) में गलङ्-दर-म कृपापात्र पस्य॑ल्-तो और (चोरे) लेगस्-स्म द्वारा मार डाला गया। इस प्रकार १६२ वर्ष (५८५-६४२ ई.) तक सत्कृत और संमानित हो कर, फिर १०० वर्प (७४२-८४१ ई०) तक असाधारण भक्ति का भाजन रह कर, अव यौद्धधर्म ने भोट देश मे बुरे दिन देखे । ग्लड्-दर्-म (८४१-२ ई०)-भाई की हत्या करा कर ग्लङ्-दर-म सिंहासन पर बैठा। चीनी इतिहास-लेखक' द-म के बारे में लिखते हैं-वह शराय का प्रेमी, खेलों का शौकीन, स्त्री-लंपट, क्रूर, अत्याचारी और कृतन था । यह सब होते हुए भी दर्-म को बौद्धधर्म पर अत्याचार करने का मौका न मिला होता यदि बौद्ध भिक्षुओं ने प्रभुत्व और मान को लिप्सा से प्रेरित हो अपने प्रभाव से अनुचित लाभ उठाना न शुरू किया होता, और रल्-प-चन चौद्धधर्म के प्रति मर्यादित भक्ति दिखलाते हुए अपने राजा के कर्तव्य का भी ध्यान रखता। ग्लड्-दर-म ने अपने भाई के हत्यारे दुपस्य॑ल को मंत्री का पद प्रदान किया। सभी ऊँचे पदों पर यौद्ध-विरोधियों की नियुक्ति हुई। श्रनुवादकों के रहने के मकान और पाठशालायें नष्ट कर दी गई। उस ने श्राज्ञा दी कि भिनु अपने धार्मिक जीवन को छोड़ गृहस्थ बन जाये । जो भिक्षु-वेप को छोड़ने के लिए तैयार न थे, उन्हें घनुष-वाण दे कर शिकारी बनने के लिए मजबूर किया गया। श्राज्ञा उल्लंघन करने वाले कितने ही भिक्षु तलवार के घाट उतारे गए । . 'थङ्-शु', 'एटिविटीज़ अब इंडियन टिबेट,' माग २, पृ० ९२ से उद्धृत ।
शांतरक्षित-युग [१९ जो-खा के मंदिर से हटा कर वुद्ध-मूर्ति यालू के नोचे दवा दी गई। मंदिर का द्वार बंद कर के उस पर शराब पीते हुए भिनुओं की तसवीरें अंकित फर दी गई। ल्हासा के रमोन्छे मंदिर और उसमन्यस् विहार के द्वार भी इसी प्रकार बंद कर दिए गए । उस वक्त अधिकांश पुस्तकें ल्हासा की चट्टानों में छिपा दी गई थीं। (अ) तिङ्-डे-जिन-यस्-पो और (म) रिन्-ईन्- म्छोग मार डाले गए। यामी पंडित और लो-च-ब देश छोड़ कर भाग गए। अत्याचार के मारे बौद्ध भिक्षुओं का रहना असंभव हो गया। उस समय (गचङ्)- रब-गसल् , ( फो-नोड्-प, गयो ) द्गे-ऽब्युझ्, और (स्तोद्- लुङ्-प-स्मर् ) शाक्यमुनि तीन भितु पल-छु-वो-रि के पहाड़ मे एकांत जीवन बिता रहे थे। उन्हों ने ख्यि-र-ध्येद्-प भिन्तु को प्राते देखा । पूछने पर ग्लड्- दर्-म के अत्याचार की घात मालूम हुई। इस पर वह तीनों भिन्तु अपने 'विनय' ग्रंथों को समेट कर, एक खयर पर लाद कर, मड-रिस् (मानसरोवर ) की ओर भाग कर चले गए। वहाँ से वह तुर्किस्तान (होर् ) पहुँचे। वहां उन्हों ने बौद्ध- धर्म का प्रचार करना चाहा, कितु भापा और जाति के भेद के कारण वह उस में सफल न हो सके और यहाँ से दक्षिण को अम्-दो चले गए। बौद्धों ने गलती की थी, और उस का दंड मिलना भी जरूरी था । तो भी इन पौने तीन सौ वर्षों में बौद्धधर्म ने भोट देश को बहुत सेवा की थी। यह संभव नहीं था कि इस थोड़े से अपराध के लिए वह मिटा दिया जाता। अंत में प्रतिक्रिया का रुख बदला। लोग यस्तुतः वर्तमान को ही पूरी तरह जानते हैं । अव वौद्ध अधिकारियों के गुण-दोप तो पोतो हुई वस्तु हो गए थे, लेकिन दर्-म के वर्तमान अत्याचारों को देख रहे थे। अब वह उस ऊबते जारहे थे। उस समय (ल्ह-लुङ) दुपल्-ग्यि-र्दोर्जे नामक एक मिनु येर् पति-ल्हस्बिड-पो पार्यत्य स्थान में ध्यान-रत था। उसने जब यह सब बातें सुनी तो वह अपने को रोक न सका । उस ने भीतर से सफेद और बाहर से काली एक पोस्तीन धारण को; हाथ में लोहे के धनुष-बाण लिए, और फिर वह अपने सफेद घोड़े को स्याही से काला कर, उस पर सवार हो ल्हासा की ओर चल पड़ा। राजा उस समय जो-खङ् के पास स्थापित महास्तंभ (ो-रिङ) पर खुदे लेख ५ भ में बस को पा रहा था मयार ने पोद में उतर कर ना करने के यहाने से गोर का रोमानिशाना मारा, किपर आकर ठोक राजा फग में लगाय पर इम । घोष के साथ कि यदि रिमो पापी गना को मारनाही, मो मे मारना पाहिए, घोड़े पर सवार दो पर निकल भागा। सहामा में शोर मर गया। लेकिन । जनता तो पहले ही गना में गिरणा हो गुपो यो। फिसी ने उन पर पाया । परन्दों ने एक जलाशय में जा कर पाईको स्याही धो, अपनो पोस्नोन का मांद हिम्मा पर कर मे पलना था। अपने ग्यान पर पहुँच बार "अभिधर्मममुगय' (अमंग ), 'प्रभायती (विनय-टोपा), पोर. 'फर्मशतक की भोपियों को ले कर यम्म् को आर. चला गया। मरने या दर-म ने यह शब्द कहे थे-"क्यों न मैं गीन पर्ष पूर्व मारा गया, जिरा में कि मैं इतने पाप और अत्याचार से घर जाता, या तीन वर्ष याद माग जाता जिस में कि मैं यौद्धधर्म को देश से मिटा सकता।' जोद-मुर ( ८४२.९०५ ई.)दना के मरने के बाद उस को घड़ी रानी ने र्भवती होने का बहाना किया, और नय ट्रेंडने पर उसे एक सदका मिला, तो मंत्रियों को दिग्बला कर कहा-'यह मेरा लड़का है। दाँतयाले घणे को देखकर मंत्री जाल समझ गए, और घाल-अच्छा यह जाये अपनी माँ की आज्ञा-पालन करें। इस पर माँ का श्राशा-पालक (युम्-धूर्तन ) हो उस का नाम पड़ गया। छोटी रानी का लड़का शेद-शुस् ( काश्यप) गद्दी का मालिक हुना। यद्यपि यह और इस के पुर दूपल-ऽखोर-य-चन् (९०५.२३ ई०) ने दर-म की भूल को नहीं दुहराया, किंतु थय राजशक्ति क्षीए हो गई थी। इसी समय राज्य के कितने ही भाग स्वतंत्र हो गए। पल-छु-योरि से अपनी पुस्तकें खयर पर लाद कर भाग हुए तीन भिक्षुओं के बारे में मैं पहले कह चुका हूँ । जब वह दक्षिण अभ-दो में रहते थे, वो एनाया कर द्गोङ्स्-क बस्ती के रहने वाले एक तरुण ने उन के पास मा कर प्रव्रज्या पाने की प्रार्थना की। इस पर मिनु ने उसे 'विनय' की एक १ तरिहिटीज अन् इंडियन टिग्रेट', माग २, पृष्ठ १३३ ।
दीपंकर-युग [२१ पुस्तक पढ़ने को दो, और कहा, यदि यह वातें तुम्हें स्वीकार हों, तो हम तुम्हें श्रामणेर बनायेंगे । तरुण ने पढ़ फर इस की प्रार्थना की । इस पर वह श्रामणेर बनाया गया, और नाम (द्गोड्स्-प)रयनगसल् (प्रकाश) पड़ा । पोछे उस ने भिक्षु बनाए जाने को प्रार्थना की, किंतु वहाँ संघ का कोरम पूरा करने के लिए पाँच भिक्षु न थे, कोरम के लिए और दो भिक्षुओं की तलाश करते हुए उसे (ल्ह-लुङ ) द्पल - दो - जे मिला । प्रार्थना किए जाने पर उस ने कहा, मैं ने राजा को मारा है, इस लिए 'पाराजिक अपराध का अपराधी होने से अब मैं भिनु नहीं रहा। फिर ढूँढने पर उसे क्ये-वङ् और ग्यि-वड् दो ह-शङ (चीनो भिक्षु ) मिले । इस प्रकार पंच-गरण संघ बना कर उस ने भिक्षु की दोक्षा पाई। यह रव-गसल प्राचार्य शांतरक्षित को परंपरा का आगे चलाने- वाला पुरुष हुआ । पोछे दुस् प्रदेश के पाँच पुरुष (क्लु-मेस-).छुल्-निम्स्, शेस-रयल्दिङ्-ये-शेस्-योन-तन्, (रग्-शि).छुल्-निम्स्-ऽच्युड्नस्, (4) छुल्-निम्स्-व्लो-प्रोस् और (सुम्-प) ये-शेस्-ब्लो; तथा ग्चङ प्रदेश के पाँच पुरुष-गुर्-मो-( रव-ख-प ) ब्लो-स्तोन्, र्दोर्जे द्वड्फ्युग, (शय्-सगोल्डडिन्छोड्-बचुन् ) शेस्-रच-सेड्-गे, (मङ-रिस् ) जोद-बर्ग्यद, और (फोब्रोड्.) उ-प-दे-द्कर-पो-यह दश व्यक्ति श्रा कर भिनु रब्-ग्सल के शिष्य हुए । इन्हीं दस भिक्षुओं ने लौट कर मध्य तिब्बत में फिर से प्रचार करना शुरू किया। निड्-म-प संप्रदाय के सभी मठ इन्हीं की परंपरा से संबंध रखते हैं। ३-दीपंकर-युग (१०४२-११०२) स्रोड्-चन् के वंश ने लगातार पौने तीन सौ वर्ष तक अपने विस्तृत साम्राज्य को कायम रक्खा । धर्म को असाधारण भक्ति रखते हुए भी इन में सात पोढ़ियों तक शासक और योद्धा को योग्यता बनी रही। ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। भारत में गुप्त-सम्राटों का वंश वीर पैदा करने में मशहूर रहा है, किंतु वह भी दो सौ वर्ष तक हो चला। मुग़ल बादशाह भी पाँच पोढ़ियों तक ही प्रवल रहे । किंतु दर-म के बाद पतन शोघ्रता से होने लगा। पल- .
११] तिखत में परधर्म ऽखार-वचन (मृ०९८३ई०) तक जो कुछ बचा था यह भी उस के बाद जाता रहा। तिब्बत खास ही अनेक टुकड़ों में बँट गया। क्रांति के कारण ऽखोर-व- चन् का दूसरा पुत्र निस्क्यिद्-ल्द-नि-म-मगोन ल्हासा छोड़ने पर मजबूर हुश्रा । वह एक सौ सवारों के साथ पश्चिमी तिव्यत (म्हऽ-रिस् ) की ओर चला गया। यहां अपने विश्वास-पात्र मेवकों को सहायता से उस ने अपने लिए स्थान बना लिया। अश्व-धर्प (९८२ ई० ) में उस ने र-ल में लाल-महल पनवाया। मेप-वर्ष (९८३ ई.) में चे-शो-र्य-रि नामक महल बनवाया। इसी वक्त स्पुद्-रड्स् के शासक द्गे-शेस-ब्चन ने उसे अपनी राजधानी में बुलाया और अपनी कन्या ऽनो-स-ऽयो-स्क्योड़ के साथ अपना राज्य उसे प्रदान किया। नि-म-मगोन ने फिर म्हऽ-रिस्-स्कोर-गसुम् (लदाख, गूगे, और स्पु-रडस्) को अपने अधिकार में कर के एक स्वतंत्र राज्य कायम किया । अंत में राज्य को इस ने अपने तीनों पुत्रों-द्पल्-ग्यि-ल्दे (लदाख ), एक- शिस्-ल्दे-मगोन ( स्पु-रडम् ) और लदै-ग्चुग-गोन (शशुड या गूगे) में बाँट दिया । ल्दे-ग्चुग-मगीन का ज्येष्ठ पुत्र ऽग्योर-लदे राज्य को अपने छोटे भाई स्रोड्-ल्देके हाथ में सौंप कर स्वयं अपने दोनों पुत्रों, नागराज और देवराज के साथ भिन्न हो गया। ग्यारहवों शताब्दी के प्रथम पाद में तिव्यत में चौद्धधर्म में बहुत से विकार पैदा हो गए थे। मितुओं ने धर्म-ग्रंथों का पढ़ना छोड़ दिया था। वह घर्पा- वास के तीन मास तक हो भिक्षु-आचार का पालन करते थे, उस के बाद उस की परवा नहीं करते थे। तांत्रिक लोग मद्य और व्यभिचार को हो परम धर्म- चर्या मानते थे । मठों के अधिकारी चमकीली वेप-भूपा पहिन कर, अपने को स्थविर और अर्हत् प्रकट करते फिरते थे। ऽखोर-ल्दे ( भिन्नु बनने पर इस का नाम ये-शेम्-डोद अर्थात् ज्ञानप्रभ पड़ा) ने स्वयं धर्म ग्रंथों को पढ़ा था, और वह एक विचारल. व्यक्ति था। इस का सो इसी से पता लगता है, कि संत्रों के बुद्ध-यचन होने में उसे बहुत संदेह था।' यह अच्छी तरह समझता था, "वु-स्तोन्', भाग २, पृष्ठ २१२ ।
दीपंकर युग [२९ कि बौद्धधर्म हो उस के पूर्वजों की एक चिरस्थायी कृति है। धर्म के इस हास को हटाने के लिए उस ने सबसे जरूरी बात समझो-धार्मिक ग्रंथों का अध्य- यन । इस के लिए उस ने रिन्छेन्-यसक-पो (९५८-१०५५ ई०), लेगस्पति- शेस-रव आदि इफीस तरुणों को चुन कर कश्मीर पढ़ने के लिए भेजा । मान- सरोवर जैसी ठंडी जगह के रहने वाले इन नौजवानों के लिए कश्मीर भी गर्म था । अंत में दो को छोड़ कर बाकी सब यहीं वीमारी से मर गए। रिन-छन्- ब्सड्-पो ने लौट कर पंडित श्रद्धाकरवर्मा, पद्माकरगुप्त, युद्ध श्रीशांत, बुद्धपाल, और कमलगुप्त आदि की सहायता से कितने ही दर्शन और तंत्र-ग्रंथों के भोट भाषा में अनुवाद किए । 'हस्तवाल-प्रकरण' (आर्यदेव), 'अभिसमयालंकारा- लोक' (हरिभद्र ), वैद्यक अष्टांग-हृदसंहिता' (नागार्जुन), 'चतुर्विपर्यय-कथा' (मातृचेट) 'सप्तगुणपरिवर्णन-कथा' (वसुबंधु ), 'सुमागधावदान' श्रादि ग्रंथों के इन्हीं ने अनुवाद किए । पोछे दीपंकर श्रीज्ञान (९८२-१०५४ ई०) के तिब्बत पहुँचने पर और भी कितने ही ग्रंथों के भाषांतर करने में सहायता की। रिन्-छन्-व्सङ-पो ने गू-गे (शङ-शुङ) स्पि-ति और लदाख में कई सुंदर मंदिर बनवाए, जिन में कई' अब भी मौजूद हैं, और उन में उस समय की भारतीय चित्रकला के सुंदर नमूने पाए जाते हैं। राजभिक्षु ज्ञानप्रभ ने जब देखा, कि उन के भेजे इकोस तरुणों में उन्नीस कश्मीर से जीवित नहीं लौट सके, तो उन्होंने सोचा कि यहाँ से भारत में विद्या- थियों को भेजने के स्थान पर यही अच्छा होगा, कि भारत से हो किसी अच्छे पंडित को यहाँ बुलाया जावे, जो यहाँ श्रा कर सुधार का काम करे । उन्हें यह भी मालूम हुआ, कि विक्रमशिला महाविहार में ऐसे एक पंडित भिक्षु दीपंकर श्रीज्ञान हैं। उन के घुलाने के लिए श्रादमी भेजा गया, किंतु यह न आए। लदाख में सुम्-दा ओर अल-घी के मंदिर, और स्पिति का रह-लुट् मंदिर इन्हीं में से है। इन में सारे ही चिन्न भारतीय चित्रकारों के यनाए है। दसवीनया- रहवीं शताब्दी की चित्रकला के यह सुंदर कौश हैं। सेद है कि रक्षा का कोई प्रबंध न होने से यह नष्ट होते जा रहे है। ।
। १४] तिमा में बोरम दूमरी यार फिर दून भेजने की मैयारी इम के लिए पुष्ट्र माने फा संप्रा फरने जय पर अपने सीमांत प्रदेश में गए हुए थे, उमो समय पड़ोसी राजा ने उन्हें पकड़ लिया। उन के उत्तराधिकारी व्यापून ( योधिप्रम) ने घाहा, कि धन दे कर उन्हें दुक्षा में, किंतु मानप्रम ने कहा, यह धन भारत में फिसी पंडित के बुलाने में सर्च किया जाय । ग्यारहवीं शताब्दी में विक्रमशिला विहार (यर्नमान मुन्तानगंज, जिला, भागलपुर ) उत्तरी भारत में एक बड़ा ही विशाल विद्याकेंद्र या। युव. राज होने की अयस्था में चंद्रगुम विक्रमादित्य चंपा या प्रदेशाधिकारी था। उस यफ मुल्लानगंज को दोनों पहाड़ी टेकरियों पर उसने गुरु मंदिर यनयाए थे, और उसी के नाम पर, यह स्थान विक्रमशिला के नाम में प्रसिद्ध हुआ। पीछे पालवंशीय महाराज धर्मपाल (७६९-८०९ ई.) ने गंगा-नटयर्नी इस मनोरग स्थान पर एक सुंदर विहार यनयाया, यही विक्रमशिला महाविहार हुा । इस बिहार के गुर ही दूर दक्षिण में एक मामत राजा यी गजधानी थी, जिस के यहाँ दीपंकर श्रीमान का जन्म हुआ था। नालंदा, राजगृह विमशिला, पनासन (योधगया) हो नहीं बल्कि सुदूर मुवर्ण द्वीप (मुमात्रा) तक जा कर दीपंकर ने विद्याध्ययन किया। पीछे यह विक्रमशिला के पाठ महापंडितों में एक हो कर वहीं अध्यापन का कार्य करने लगे। यद्यपि पहली यार राजभितु ज्ञानप्रभ के निमन्त्रण को उन्हों ने अस्वीकार कर दिया था, पितु जप राजभितु घोधिप्रभ के भेजे दूतों के गुस से उन्हों ने मानप्रभ के महान त्याग को यात मुनी, तो चलने के लिए उन्हों ने अपनी स्वीकृति दे दी । इस प्रकार १०४२ ई० (जल-अश्व वर्ष ) में यह मड-s-रिस् पहुँचे। भोट देशवासियों ने उन का बड़ा स्वागत किया। पहले मानसरोवर के पश्चिम मे अवस्थित थो-गलिड (शा. शुङ) मठ में रहे । यहाँ उन्हों ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ 'धोधिपथप्रदीप' लिखा। १०४४ मे वह स्पु-रड्गए। यही उन्हें (ऽब्रोम्-स्तोन्) येल्-यऽिव्युङ्-गनम् (१००३-६४ ई०) मिला। यह उन का प्रधान शिष्य था,और तय से अंत तक यह बरा- पर अपने गुरु के साथ रहा। दोपंकर (अतिशा) के अनुयायो (ऽनोम-स्तोन् की शिष्यपरपरा वाले ) व्कऽ दम्-प के नाम से प्रसिद्ध हुए। चोट्-ख-प (१३५७ - --- दीपंकर-युग [२५ १४१९ ई०) का भी इसी कऽ दम्प संप्रदाय से संबंध था और इसी लिए उस के अनुयायी दो-लुगस्प अपने को नवीन बक-दम-प भी कहते हैं। दीपंकर श्रीज्ञान ने अपने जीवन के अंतिम तेरह वर्ष तिब्बत देश में धार्मिक सुधार और ग्रंथानुवाद में बिताए। मड-ऽरिस् से वह ग्चड़ और चुस् प्रदेशों में गए। १०४७ ई० में यह सम्-यस् पहुँचे। उस वक्त वहाँ के पुस्तकभंडार को देख कर वह दंग रह गए। वहां उन्हें कुछ ऐसी पुस्तकें भी देखने को मिली जो भारत के बड़े बड़े विद्यालयों में भी दुर्लभ थीं । १०५० ई० में यह येर्-प गए, और १०५१ ई० ( लोह-शश वर्ष ) में उन्हों ने 'कालचक' पर अपनी टीका लिखो। १०५४ ई० में ७३ वर्ष की अवस्था, में ल्हासा से श्राधे दिन के रास्ते पर स्भे-ध स्थान में, उन का शरीरांत हुआ। अनुवाद करने में उन के प्रधान सहायक (नग्-छो) छुल्-निम्स्-यल घ, रिन-छिन्-व्स-इ-पो, द्गे-वडि-ब्लो-प्रोस् और शाक्य-व्लो-प्रोस् थे । इन के अनुवादित और संशोधित ग्रंथों की संख्या सैकड़ों है । महान दार्शनिक भाव्य (भावविवेक ) के ग्रंथ 'मध्यमकरनप्रदीप' और उस की व्याख्या को इन्हों ने हो ( 1 ) चोन् सेड् और नग-छो के दुभाषिया होते हुए, अनुवा- a दित किया था। पंडित सोमनाथ ( १०२७ ई०)। दीपंकर श्रीज्ञान के भोट पहुँचने से क्षुध पूर्व कश्मीरी पंडित सोमनाथ भोट गए। (ग्य-चो ) सु-वडि-जो-सेर की सहायता से इन्हों ने कालचक्र ज्योतिप' का भोट मापा में अनुवाद किया, और तभी से भोट देश में वृहस्पति चक्र के ६० संवत्सरों का नया क्रम जारी हुथा। साठ संवत्सरों के एक चक्र को भोट भाषा में रव्-ऽव्युङ् (प्रभव ) कहते हैं। यह प्रभव हमारे यहाँ के भी पष्टी संवत्सर-चक्र का आदिम संवत्सर है । लक्ष्मी. फर, दानश्नी चंद्रराहुल, सोमनाथ के साथ ही भोट देश गए थे। दीपंकर श्रीज्ञान के विद्यागुरु सिद्ध महापंडित अवधूतिपा (थद्वययन . 'युर-प-छोस्-ऽभ्युइ', पृष्ठ १५२क, १९८५, २५१५ ।
२६] विमत में बौद्धधर्म या मैत्रीपा भी) थे। इन्हीं के शिप्य वैशाली ( बसाढ, जि० मुजफ्फरपुर ) के रहने वाले कायस्थ पंडित गयाधर थे। यह (ऽयोग-मि) शाक्य येशेस ( मृत्यु १०७४ ई.) के निमंत्रण पर भोट गए । श्रौर पाँच वर्ष रह कर इन्हों ने बहुत से तंत्र-ग्रंथों के भोट भाषा में अनुवाद किए । चलते वक्त ऽब्रोग-मि ने इन्हें पाँच सौ तोला सोना अर्पित किया। यह स्वयं भी हिंदी भाषा के कवि थे, इन के पुत्र तिभ्रूपा एक पहुँचे हुए सिद्ध समझ जाते थे। पंडित गयाधर ने (गिर्य-जो) स-घडिओद्-सर् के साथ 'युद्धकपाल-तंत्र' का अनुवाद किया था, और (गोस् ल खुग-प) ल्ह-ब्चस् के साथ 'वनडाकतंत्र" का। जानप्रभ के समय में होलो-च-ब पद्मरुचि ने स्मृतिज्ञानकोर्ति और सूक्ष्म- दीर्घ दो भारतीय पडितों को अनुवाद के कार्य के लिए बुलाया। लो-चन्ध हैजे से नेपाल में मर गया, और यह लोग भोट में पहुँच गए। इन्हें उस समय भाषा भी न पाती थी । पंडित सूदमदीर्घ तो (रोड्-प ) छोस्-ब्सड के पास रहने लगे, किंतु स्मृतिज्ञानकीर्ति ने किसी का आश्रय ढूँढने की अपेक्षा भेड़ को घरवाही पसंद की। यह मालूम नहीं, कितने वर्षों तक तिब्बत के खानाबदोश ब्यड्-प की भाँति इन्हों ने चॅयरो के बालों के काले तत्रुओं मे रह, ते नग में चरवाही का जीवन व्यतीत किया। स्मृतिज्ञान, मालूम होता है, कोई मस्त मौला ही थे । इस भेड़ को चरवाही में एक फायदा जरूर हुआ, वह यह कि उन्हें भोट भाषा का सुंदर अभ्यास हो गया। स्मृतिम्नान और विभूतिचंद्र (१२०४ ई०) जैसे बहुत थोड़े ही भारतीय पंडित हैं, जिन्होंने विना लोच य की सहायता के भारतीय ग्रंथों का भोट माषा में अनुवाद किया हो । पीछे (स्प्यल-से-चव् ) सोद्-नमस्-र्यल-मछन् के निमंत्रण पर स्मन-लुङ् में जा कर उसे इन्हों ने बौद्ध ग्रंथों को पढ़ाया। फिर खम्स् (पूर्वीय भोट ) में जा कर ऽदन्- क्लोड्-थड में अभिधर्मकोश के अध्ययन के लिए एक विद्यालय स्थापित इस ग्रंथ की मूल संस्कृत प्रति ताल-पत्र पर लेखक को १९३० ई. में श-ल विहार से प्राप्त हुई। ।
दीपंकर-युग [२७ किया। इन्हों ने 'चतुप्पीठ-टीका', 'वचनमुख आदि कितने ही अपने लिखे ग्रंथों का भोट मापा में उल्था किया। शि-व-जेद् (जानप्रभ के भाई ), राजा स्रोइ-ल्दे के पुत्र ल्ह-ल्दे थे। इन के तीन पुत्रों में यड़ा जेद्-ल्दै राजा हुआ, और व्यङ्-छुप्शीद और शि-य-डोद् दोनों छोटे लड़के भिन्नु हो गए । दीपंकर श्रीज्ञान को बुला कर जिस प्रकार व्यह-छुप्-डोद्ने धर्मप्रचार कराया, यह पहले लिखा जा चुका है । राजा डोद्-ल्दे ने पंडित सुनयश्री को बुला कर कितने ही ग्रंथों के अनुवाद कराए । शि-व-डोद् (शांतिप्रभ ) स्वयं अच्छा विद्वान था। इस ने जहाँ सुजन श्रीज्ञान, मंत्रफलश और गुणाकरभद्र से कितनी ही पुस्तकों के अनुवाद कराए वहाँ स्वयं प्राचार्य शांतरक्षित के गंभीर दार्शनिक ग्रंथ 'तत्वसंग्रह' का अनुवाद किया। चे-ल्दै । औद्-ल्दे के बाद उस का पुत्र चेल्दे मानसरोवर प्रांत (शङ्-शुङ् और म्पु-रड्स् ) का शासक हुआ । १०७६ ई० में इस ने एक अच्छा विद्यालय स्थापित किया, और (ोंग ) ब्लो-ल्दन-शेस्- ( १०५९- ११०८) को उसी साल कश्मीर पढ़ने के लिए भेजा । १०९२ ई० तक ोग ने कश्मीर में रह कर पंडित परहितभद्र और भव्यराज से न्याय, तथा ब्रह्मण सज्जन और अमरगोमी आदि से योगाचार के कितने ही ग्रंथों का अध्ययन किया। पंडित भव्यराज अनुपमनगर ( प्रवरपुर = श्रीनगर ? ) के पूर्व ओर चक्रधरपुर सिद्धस्थान में रहते थे। यहीं डॉग ने धर्मकीर्ति के प्रसिद्ध न्याय-ग्रंथ 'प्रमाणवार्तिक" का फिर से भोट भाषा में अनुवाद किया । पंडित परहितभद्र की सहायता से इस ने धर्मकीर्ति के 'प्रमाणविनिश्चय' और 'न्यायविंदु' के अनुवाद भी किए। चेल्दे के बाद उस के पुत्र राजा द्या-ल्दे और पौत्र राजा चक्र शिस्-ल्दे भी डॉग के काम में सहायता करते रहे । कश्मीर में सत्रह वर्ष रह कर डोंग ने भोट में लौट कर चौदह वर्षों तक अपना काम किया । यहाँ । १ 1 प्रथम बार इस का अनुवाद दीपंकर के साथी सुभूतिश्रीशांति और द्गे-वडि-दलो-प्रोस् ने किया था।
२८] गहने हुए उम ने पंडिन अनुनदास, गुगनिमोनि, अमरयंट और पुमारपा के साथ अनुवाद का काम किया। प्रगिस जुधोगलगल्प पा इस ने पंडित कुमारफलश के माथ मिल कर ऊया किया था। पदम् गगन-ग्र्यम् (ग०१११८३०)। १९२६० में यह भारतीय पंडित-मिद्ध मोट देश में आया । यह नेपाल के रास्ते मनम हो कर गलट्-स्कोर पहुंचा था । यहाँ रहते हुए इस ने गुरु ग्रंथों के अनुसार में सहायता पहुँचाई। यह पूरा परिव्राजक था। ११०१६० में यद पीन गया, १११३ ६० में फिर तिव्यत पाया । इम ने शियेद् मंप्रदाय को स्थापना की, जिस फाफि एक मगन भोट देश में अन्दा प्रभाव था। इसी फाल में एक और विद्वान लोन्याय हश्रा,जिम का नाम (प-मयू) मि-म-अगम् (गयिकीर्ति) है। इस का जन्म १०५५६० में हुथा था. अर्थात् उसी वर्ष जिम घर्ष कि महान लो-च-य रिन्-धन यसइ-पो का देहांत हुआ। इस ने कश्मीर में जा कर तेईस वर्ष तक अध्ययन किया। इस ने (आर्यदेव के), 'चतुःशनक शान', (चंद्रकीति के) 'मध्यमकावतार-भाप्य' (पूर्णवर्द्धन की) अभिधर्मकोशटीका 'लक्षणानुसारिणी',(चंद्रकीति फो) मूलमध्यक-गृत्ति 'प्रसन्नपदा' जैसे गंभीर दार्शनिक ग्रंथों के अनुयाद में अपनी मातृभाषा के कोश को पूर्ण किया । फनकवर्मा, तिलकलश श्रादि पंटित इस के सहायक थे । ( मर-ग ) छोम्-क्यि-ब्लो-प्रोम् । यह सिद्ध नारोपा (नाडपाद, मृ. १०४० ई.) का शिष्य था, और तीन बार भारत में जा कर रहा था। इम ने अनुवाद फा काम फम किया, किंतु यह और मि-ल-रम्प (१०४०-११२३ ई०) जैसे इस के शिष्य अपनी विचिन्न चर्या से तिब्बत में चौरामी सिद्धों के यथार्थ प्रतिनिधि थे। मि-ल-रस-प भोट देश का सर्वोत्तम कवि ही नहीं था, बल्कि इस के निस्पृह अकृत्रिम जीवन ने इन आठ शताब्दियों में वहाँ बहुतों के जीवन में भारीप्रभाव डाला है । मरम्प, मिल की परंपरा याले लोग दुक-युद्-प कहे जाते हैं । भोट देश के द्वग्स्-पो,ऽनि-गोड्-प, फग्-युक्-प,ऽनुग-प, स्तम्-लुइ-प और स्कर-म-प इसी दुकर-युद्-प संप्रदाय को शासाएँ हैं। कर-म (स्कर- म) संघराज सकर-म-यक्-सि-छोस्-ऽजिन् ( १२०४-८३) अपने सिद्धत्य के - - स-स्वय-युग कारण मंगोल-सम्राट् का गुरु हुश्रा था। फग्-अव्-पौरऽत्रि-गोड्-प ने कितने हो वर्षों तक मध्य भोट पर शासन किया। ४-स-स्क्य-युग (११०२-१३७६ ई.) ( ऽखोन् ) दुको-Zल् (१०३४-११०२ ई० ) नाम के एक गृहस्थ धर्मा- चार्य ने, ग्चङ् ( चङ्) प्रदेश में १०७३ ई० में स-स्क्य नामक विहार की स्थापना की। यद्यपि इस विहार का आरंभ वहुत छोटे से हुआ, फितु इस ने आगे चल कर बौद्धधर्म की बड़ी सेवा की। इस के संघराजों का प्रभाव भोट देश से बाहर चीन ओर मंगोलिया तक पड़ा। चंगेज खां (चिड्-हिर्- हान् ) के शासन-काल में १२२२ ई० में यहीं के संघराज ने सर्व प्रथम मंगोलिया में बौद्धधर्म का प्रचार किया। (इस्रोन ) द्कोन-1ल ने व-रि-लो-च-ब (मृ० ११११ ई०) को अपना उत्तराधिकारी चुना । व-रि कितने ही समय तक भारत में जा कर वज्रासन (वोधगया) के आचार्य अभयाकरगुम के पास रहा था। अभयाकरगुप्त का जन्म झारखंड (वैद्यनाथ के आसपास का प्रदेश) मे क्षत्रिय पिता और ब्राह्मणी माता से हुआ था । यह शास्त्रों के अच्छे पंडित थे। पोछे इन्हों ने अवधूतिपा के शिष्य सौरिपा से सिद्ध-चर्या की दीक्षा ली। मगधेश्वर रामपाल (१०५७- ११०२) के यह गुरु थे। नालंदा और विक्रमशिला दोनों ही विश्व- विद्यालयों के यह महापंडित माने जाते थे । इन का देहांत ११२५ ई० में हुआ। थ-रि ने अपना उत्तराधिकारी, मठ के संस्थापक दुकोन-मेल के पुत्र कुन्- द्गऽ-स्जिद-पो ( १०९२-११५८) को चुना । उस के बाद उस के पुत्र ग्रग्स्- प-Zल्-म्छन् ( ११४७-१२१६ ई०) विहाराधिपति हुए। यह अच्छे विद्वान् थे। इन्हों ने दिड्नाग के 'न्यायप्रवेश' और 'चंडमहारोपणतंत्र'आदि ग्रंथों के अनुवाद किए। (स्रो-फु) भ्यम्स्-प-द्पल (जन्म ११७३ ई०) इसी काल में हुआ था। यह । १ 'रिन्न्छन्-ऽव्युड्-ग्नस्गतम्', १० ४७ ष ।
३.] तिम्बत में पोस्पर्म काशिराज जयचंद के दीक्षा-गुरु मित्रयोगो' (जगन्मित्रानंद) को ११९८ ई० में भोट ले गया। मित्रयांगी को 'चतुरंगधर्मचर्या' का इस ने अनुयाद किया। १२०० ई० में कश्मीरी पंडित बुद्धश्री को बुला कर उन के साथ इस ने अभिसमयालंकार की टीका 'प्रमाप्रदीप' का अनुपाद किया । इसी के निमंत्रण पर विक्रमशिला के अनिम प्रधान-स्थविर शाक्यश्रीमद भोट देश मे श्राए। शाम्यश्रीभद्र-इन का जन्म कश्मीर में ११२७ ई० में हुआ था। योध- गया, नालंदा, विक्रमशिला उस समय सारे चौद्धजगत् के जीवित केंद्र थे। इसी लिए यह भी मगध की ओर आए । मुखश्री इन के दीक्षा गुरु थे। रविगुप्त, चंद्रगुप्त, विख्यातदेव (छोटे यनासनीय), विनयश्री, अभयकोति और रयिश्रीज्ञान इन के विद्यागुरु थे। अपने समय के यह महा-विद्वान् थे-यह तो इसी में मालूम होता है, कि यह मगध-नरेश के गुरु तथा विक्रम शिला महाविहार के प्रधान नायक थे। मुहम्मद-विन-स्तियार ने जय नालंदा और विक्रमशिला को ध्वस्त कर दिया, तो यह जगत्तला' (वगाल) घले गए । यहाँ कुछ दिन रह कर, और संभवतः उस के भोध्वस्त होने पर जय यह जगत्तला के पंडित विभूतिचंद्र, तथा दानशील, सघश्री (नेपाली), सुगतश्री श्रादि नौ पडितों के साथ नेपाल मे थे, तो वहीं इन्हें ऽयो-फु लो-च-ब मिला। उस की प्रार्थना पर यह १२०० ई० में भोट देश में श्रा कर, दस वर्ष तक रहे। इन्हों ने पुस्तक-अनुवाद का काम नहीं किया; और इन के ग्रंथ भी एकाध ही १ इन का जन्म राद ( पश्चिमी बंगाल) देश का था। सिद्ध तेलोपा के शिष्य ललिनयन से इन्हों ने सिद्धचर्या की दीक्षा ली थी। पोछे उडन्तपुरी विहार के प्रधान हुए । काशीश्वर महाराज जयचंद इन के शिष्य थे ( 'अमुग्-प-छोस्-ऽव्युड्', पृष्ठ १५३ क; 'इंडियन हिस्टारिकल कार्टली', मार्च १९२५, पृ० ४-३०) इसे मगधराज महाराज रामपाल (१०५७-११०२ ई०) ने अपने शासन के सातवें वर्ष ( १०६४ ई.) मे स्थापित किया था ( 'स्तन्-ऽग्युर्', भष्टसाहसिका. टीका के अंत में)। .
स-स्वय-युग [३१ अनूदित हुए हैं, इस से जान पड़ता है, कि महाविद्वान् होते हुए भी, यह लेखनी के धनी न । स-स्क्य में पहुँचने पर तत्कालीन विहाराधिपति प्रग्स-प-र्यल- म्छन् के भतीजे और उत्तराधिकारी, कुन्-द्गऽर्यल-मछन् (११८२-१२५१ ई०) १२२८ ई० में इन के भिनु-शिष्य हुए। 'प्रमाणवातिक' श्रादि कितने ही न्याय के गंभीर ग्रंथों का उन्हों ने इन से अध्ययन किया । व्यड्-छुप्-पल और द्गे वन्दिपल आदि और भी कितने ही शाक्यश्रीभद्र के शिष्य हुए । स-सक्य- संप्रदाय के पीछे इतने प्रभावशाली बनने में उस का विक्रम-शिला के अंतिम प्रधाननायक से संबंध भी कारण हुआ। दस वर्ष रह कर, १२१३ ई० में, शाक्य- श्रीभद्र अपनी जन्मभूमि कश्मीर को लौट गए, जहाँ १२२५ ई० में ९८ वर्प की दीर्घ आयु में इन का देहांत हुश्रा । इन के अनुयायी विभूतिचंद्र, दानशील आदि भोट ही में रह गए, जिनमें विभूति का भोट भापा पर इतना अधिकार हो गया, कि उन्हों ने कितने ही ग्रंथों के अनुवाद बिना किसी लो-च-व की सहा- यता ही के किए। कुन्-द्गऽ-ठल्-म्छ्न, संघराज ( १२१६-५१ ई० ) 1 यह भोट देश के उन चंद धर्माचार्यों में हैं, जिन्हों ने धर्मप्रचार के लिए बहुत भारी काम किया। भोट-देशीय ऐतिहासिकों के मतानुसार चंगेज़खाँ (जन्म११६२ ई०) ११९४ ई० में चीन का सम्राट् हुश्रा । १२०७ ई० में मि-अग् प्रदेश को छोड़ कर सारा भोट उसके अधिकार में चला गया। जिस समय चंगेज देश-विजय कर रहा था, उसी समय स-स्क्य-पंडित कुन्-द्गऽ-यल-मछुन ने धर्म-विजय को ठानी, और उन्होंने १२२२ ई० में मंगोल देश में धर्मप्रचारक भेजे। १२३९ ई० में मंगोल सर्दार छि-ग्य-दो-ती ने मध्यभोट पर चढ़ाई को, और स-स्क्य मठ के पाँच सौ भिक्षुओं को मार डाला । र-स्प्रे और येल-खङ् के मठों को भी इसने जला डाला । १२४३ ई० में संघराज ने अपने दो भतीजों ऽफग्स-प और फ्यग-न को प्रचार के लिए मंगोलिया भेजा। १२४६ ई० में वह स्वयं चीन के मगोल सम्राट् गोतन से मिले, और दूसरे वर्ष सम्राट् के गुरु बने । सम्राट ने १२४८ ई० में भोट देश के वुस् और ग्चङ प्रदेश अपने गुरु को प्रदान किए । भोट देश में धर्माचार्यों के शासन का सूत्रपात इसी समय से हुआ। धर्मप्रचार के १२) हिरनु मेरम फाम में लगे रहने हपमंगोलिया , मल-मद म्यान में, १२५० ई० में, इन का देहांत हा । यह अच्छे पनि और कवि थे। इनकी पुम्नक 'म-समय लेगा। यशद्' को नीति-शिक्षा-पूर्ण गाथाएँ अय भी भोट देश पाट्य विषयों में है। जिग्ग-1, मंगगन ( १२५१-८० ६०)।इन पा जन्म १२३४ ई. में हुआ था । इन के मंगोलिया जाने को यात पदले ही कही जा चुकी है। घया फो मृत्यु के बाद याद संघराज यने । म सम्म विहार में तय मं अप तक यही प्रथा चली आती है, कि घर का ग यहि भिनु धन जाता है, और यही पोये संपराज के पद पर बैठना है। चचा ने ऽफगम्-प की शिक्षा का विशेष ध्यान लगा था। १२५१ ई० में अफगम्स भाषी चीन-सम्राट्, राजकुमार कुबल-शान के गुरु बने । १२६५ ई. तक या चीन और मंगोलिया में ही रहे । १२६९ १० में फिर मंगोलिया गए, और १२८० ई. में उन का देहांत टुथा। म्कर-म-गर-सि-छो-उजिन् (१२०४-८३ ई०)। स-म्क्य के ऽफगस. प का यह समकालीन था। यद्यपि पाहित्य में स-मययों की समानता नहीं कर सकता था, किंतु यह अपने समय का अद्भुत चमलारी सिद्ध समझा जाता था। चीन के मंगोल-सम्राट् मुन्-रो ने इस के सिद्धत्य को परीक्षा लो, और १२५६ ई० में उस ने इसे अपना गुरु बनाया। जिस समय स-स्क्य-प और दुकर-युद्-प सप्रदाय के प्रमुग्प इस प्रकार विद्या, सिद्ध-चर्या, और धर्म प्रचार के जोश में अपने प्रभाव को बढ़ा रहे थे, उसी समय आचार्य शांतरक्षित का अनुयायी, भोट का सब पुराना धार्मिक संप्रदाय सिंड्-म-प नीचे गिरता जा रहा था। इस ने पुराने बोन्- धर्म को भूत-प्रेत-पूजा, जादू-मंतर को अपना कर, उस में और और तरकी को। इस के गुरु लोग मिथ्या-विश्वास-पूर्ण नई नई पुस्तकें बना कर, उन्हें बुद्ध, पद्मसंभव या किसी और पुराने श्राचार्य के नाम से पत्थरों और जमीन से खोद कर निकाल रहे थे। गनेर्-स्तोन ने १११८ ई० में और भिंड- म-धर्माचार्य स-द्वद्द ने १२५६ ई. में, ऐसे हो जाली ग्रंथों को सोद निकाला था।
समक्य-युग [ ३३ स्कर-म-वक्-सि के मरने ( १२८२ ई०) पर, उस के योग्य शिष्यों में से न चुना जा कर, एक छोटा वालक रड्-ऽन्युङ्-दोर्जे (जन्म १२८४ ई० ) उस का अवतार स्वीकार किया गया। इस से पूर्व यद्यपि एकाध ऐसे उदाहरण थे, किंतु अब तो अवतारो लामों की बीमारी सी फैल गई । स्कर-म को देखा- देखी पीछे ऽनि-गुङ्-प, ऽत्रुग-प आदि दुकर-युद्-प निकायों ने इस प्रथा को अपनाया। आगे चल कर चोइ-ख-प के अनुयायियों ने भी अपने दलाई- लामा (1-ब-रिन्-पो-छे ) और टशो लामा ( पण छेन-रिन्-पो-छे ) के चुनावों में ऐसा हो किया; और इस प्रकार आजकल छोटे छोटे मठों से ले कर बड़ो बड़ो जागीरवालो महंतशाहियों के लिए ऐसे हजारों अवतारी लामा तिब्बत में पाए जाते हैं। इस प्रथा के इतने अधिक प्रचार का कारण क्या है ? गद्दीधर के बाल्यकाल में कुछ स्वार्थियों को मठ का सारा प्रबंध अपने हाथ में रखने का मौका मिलता है; और अवतारी लामा के माँ-बाप और संबंधियों के लिए मठ एक घर की संपत्ति सो वन जाता है। लेकिन इस प्रथा के कारण उत्तराधिकार के लिए विद्या और गुण का महत्त्व जाता रहा, और फिर अधिकांश नालायक लोग इन पदों पर पाने लगे। चारहवीं शताब्दी में चौरासी सिद्धों के बहुत से हिंदी दोहों और गीतों के भो भोट भाषा में अनुवाद हुए । इमी समय (शोड्-स्तोन् ) दोर्जे-यल- म्छन ( मृत्यु ११७७ ई० ? ) ने पंडित लक्ष्मीकर को सहायता से 'काव्यादर्श' (दंडो), 'नागानंद' (हर्षवर्द्धन ), और 'वोधिसत्त्वावदानकल्पलता' (क्षेमेंद्र) ग्रंथों के भोट भाषा मे भाषांतर किए। अव मठों के हाथ में शासन का अधिकार आने पर उन्हों ने भी वही करना शुरू किया, जो शासकों में हुआ करता है । १२५२ ई० में स-स्क्यालों ने भोट के तेरह प्रांतों पर अधिकार कर लिया । १२८५ ई० में ऽनि-गोङ् के अधिकारियों ने अपने विरोधी व्य-युल मठ को जला डाला। १२९० ई. में स-स्क्यवालों ने ऽत्रि-गोङ्को लूट लिया। (बु-स्तोन् ) रिन-छन्-अब् (१२९०-१३६४ ई०) । तेरहवीं सदी के अंत के साथ, भारत के यौद्ध केंद्रों में बौद्धधर्म का अंत हो गया। अब भोट देश को ३४ ] तिमत में बौदधर्म सजीव बौद्ध-भारत से विचारों के दानादान का अवसर न रह गया ।भोट में भी अब प्रभावशाली महंतशाहियों की प्रतिद्वंद्विता का समय श्रारंभ हुथा । अब तक जितने भो भारतीय ग्रंथ भोट भाषा में अनूदित हुए थे, उन को क्रम लगा कर इकट्ठा संगृहीत करने का काम नहीं हुआ था, इस लिए सारी अनुवादित पुस्तकों का न किसी को पता था, और न वह एक जगह मिल सकती थी। ऐसे समय ( १२९० ई० ) में (बु-स्तोन् ) रिन छेन-अब् का जन्म हुआ । यह श-लु विहार में जा कर भिनु हुए । यह अपने ही समय के नहीं, बल्कि अाज तक के, भोट देश के अद्वितीय विद्वान हुए। शुरू में स-स्क्य मठ में भी यह अध्यापन का काम करते रहे, जिससे इन्हें वहाँ के विशाल पुस्तकालय को देखने का अवसर मिला । यद्यपि इन्होंने 'कलापधातु-काय' (दुर्गसिंह ), 'त्याद्यन्तप्रकिया' (हर्प कीर्ति ) आदि कुछ थोड़े में ग्रंथों के अनुवाद किए हैं। कितु, इन का दूसरा काम बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इन्हों ने अपने समय तक के सभी अनुवादित ग्रंथों को एकत्रित कर क्रमानुसार दो महान् सग्रहों में जमा किया, यहो स्क-ऽग्युर् ( कन्-जुर् ) और स्तन्-ऽग्युर् ( तन-जुर् ) हैं । इन में सक-ऽग्युर में तो उन ग्रंथों को एकत्रित किया, जिन्हें बुद्ध-वचन कहा जाता है ('स्क' शब्द का अर्थ भोट भाषा में 'वचन' होता है ) 'स्तन्' का अर्थ है शास्त्र, और ऽग्युर' कहते हैं, अनुवाद को । स्तन्-ऽग्युर् में युद्ध- घचन मे भिन्न-आचार्यों के दर्शन, फाव्य, वैद्यक, ज्योतिष, देवता-साधन, और स्क-ऽग्युर्, तथा स्तम्-ऽग्युर् को टोकाएं तथा कितने ही और ग्रंथों की टोकाएं संगृहोत हैं। इन्हों ने इन संग्रहों को अपने ही तत्वावधान में और एक निश्चित क्रम से लिखवा कर अलग अलग वेष्टनों में विभक्त किया। साथ ही ग्रंथों की सूची भी बनाई । यह मूल प्रति अव भी श-लु-विहार में (जो कि ग्याँचो से दो दिन के गस्ते पर है ) मौजूद है। घु-स्तोन् ने स्वयं पचामों प्रथ लिखे, जिन में एक मे भारत और भोट देश मे बौद्धधर्म के इतिहास ( १३२२ ई० में शिसित) का महत्त्वपूर्ण वर्णन है। १३६४ ई. में शलु विहार में इस महान् विद्वान् के देहांत के माथ भोट देश के धार्मिक इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण मंड की समाप्ति होती है। P चोड्-ख-प-युग म-सक्य-युग के अंत मे (यर्-लुङ्) अगस्-प-येल्-म्छन , चंद्रगोमी के 'लोकानंद' नाटक और कालिदास के 'मेघदूत' तथा कुछ और ग्रंथों के अनु- वादक व्यह-छुप-चे-मो (१३०३ ई०) जैसे कुछ और विद्वान् अनुवादक हुए। ५-चोङ-ख-प-युग (१३७६-१६६४) चोड-ख-म । चु-स्तोन् के देहांत के सात वर्षे पूर्व ( १३५७ ई० में) अम्- दो प्रांत के चोङ्-ख ग्राम में एक मेधावी वालक उत्पन्न हुआ जिस का भिनु-नाम यद्यपि ब्लो-सङ्-अगस्-प (सुमतिकीर्ति) है, तो भी वह अधिकतर अपने जन्म- ग्राम के नाम से चोङ्-ख-प ( चोङ्-व-याला) ही कर के प्रसिद्ध है । अम्- दो ल्हासा से महीनों के रास्ते पर मंगोलिया की सीमा के पास एक छोटा सा प्रदेश है । चोड्-ख-प के पूर्व यह प्रदेश अशिक्षित लोगों का ही निवास-स्थान समझा जाता था। सात वर्ष की अवस्था (१३६३ ई०) में यह दोन-रिन्-प का श्रामणेर वना। तब से पंद्रह वर्प को अवस्था तक वहीं अध्ययन करता रहा । तब उसे विशेष अध्ययन के लिए अच्छे श्रध्यापकों को आवश्यकता हुई, और १३७२ ई० में मध्य-भोद में चला पाया। उन्नीस वर्ष की छोटी अवस्था ( १३७६ ई० ) में उस ने अपना प्रथम ग्रंथ लिखा । (रे-म्दऽ-प) गशोन-नु-ब्लो-प्रोस् से इस ने दर्शन-शास्त्र पढ़ा। 'विनय' में इस का गुरु बु-स्तोन् का शिप्य (दुमर- स्तोन् ) 1-म्छो-रिन्-छन् था । चोङ्-ख-प धु-स्तीन के ग्रंथों से बहुत प्रभावित हुआ, और वस्तुतः उस के इतने महान कार्य को संपन्न करने में यु-स्तोन् के कार्य ने बहुत उत्साह प्रदान किया । उस को अफसोस था, कि क्यों न मुझे बु-स्तोन के चरणों में कर अध्ययन करने का सौभाग्य मिला। इस ने स- स्क्य-प, दुक-युद्-प और ( दीपंकर के अनुयायी ) व्कऽ-दम्-प तीनों ही संप्रदायों से बहुत सी यातें सीखीं। इस के अनुयायी अपने को कऽ-दम्प के अंतर्गत मान कर अपने को नवोन कऽ-दम्-प कहते हैं। वस्तुतः जिस प्रकार पकऽ-दम्-प मठ स्वेच्छा से दुगे-लुगस-प (चोड़-ख-प के संभ- दाय ) में परिणत हो गए, उस से उन का यह कहना अयुक्त भी नहीं है। घोड्-स-प के जन्म से दो वर्ष पूर्व ( १३५४ ई० में) फा-मुव् के - तिर दौरा (मि-तु) व्या-सप्तर्गन ( जन्म १३०३६० ) ने सा गाइ प्रदेश पर अधि- कार कर लिया था ! १३४१६० में उसने दुयुग प्रदेश को भी अपने गन में मिला लिया। इस प्रकार चाट्-ग-प के कार्य-शेन में पदार्पण करने के समय मध्य-भोट में एक मुटर शासन स्थापित हो चुका था। किंतु धार्मिक स्थिति यहून बुगे थी। पई पड़े विद्वान् एक एक फर के बल यगे थे। पुराने विद्या केंद्र अपना यमय गो चुके थे। मनभिद-प ( दर्शनषादी) और यक-दम्प यपि थप भी शान और धैराग्य की ज्योति जलाए हुए थे, किंतु यह ज्योति पहाड़ों की गुफाओं और देश के गुमनाम फोनों में छिपी हुई थी। घोड्-य-प में मान और येगग्य, प्रथया प्रमा और मगाधि दोनों उचित मात्रा में मौजूद थीं; और उस से भी अधिक उस में धर्म को धिगदी अयम्भा के गुधारने को लगन धी। यह विद्वान , सुवामा भोर मुलेयफ था, और अपनी और योग्य व्यक्तियों को आकर्षण करने को शशिरता था।इतने अनिका योग्य और कार्य- कुशल शिष्य किमी भी भोट-देशोय थाचार्य को न मिले। धु-मनोन का सारा काम एक अकेले व्यक्ति का था। १३९५ ई. सक घोड्नम-प का विद्यार्थी जीवन रहा। १३९६ ई० में श्रय यह अपने जीयनोद्देश्य-बौद्धधर्म में श्राई युराइयों के दूर करने और विद्या प्रचार--में लग गया। यह सममता था, कि लोगों का मिथ्या- विश्वास हटाया नहीं जा सकता, जय वय कि उन में दर्शन-शाग्र तथा विद्या का प्रभार न किया जाय। उस के इस काम में मंधन-भिद्-प के काम को ले लिया, और इस प्रकार कुछ ही समय मे म्बन्-बिद्-प के सारे मठ द्रो-लुगस् संप्रदाय में शामिल हो गए । १३९६ ई० मे इस ने गहल का महाविद्यालय स्था- पित किया। १४०५ ई० में ल्हासा में संघ-संमेलन के लिए एक विशाल भवन (स्मोन्-लम्न्छन्-पो) बनवाया, थौर उमी वर्ष ल्हासा से दो दिन के रास्ते पर द्गऽ-ल्दन् (गम्दन ) का महाविहार स्थापित किया । उस के शिष्यों में जम्-द्व्यङ्स् ( १३७८-१४४९ ई०)ने १४१६ ई० मे ऽवस-स्पुङ् (डे-पुङ -- धान्यकटक) के महाविहार की स्थापना की । शाक्य-ये-शेस् (जन्म १३८३ ई०) ने १४१९ ई० में सेर महाविहार की स्थापना की । इसी वर्ष चोड -ख-प को गन्दन में मृत्यु हुई । पीछे उस के शिष्य (प्रथम दलाई लामा ) द्गे-ऽदुन्-मुब चोड्-ए-प-युग (१३९१-१४७४ ई.) ने १४४७ ई. में बकशिस्-ल्हुन्-पो (टशोल्हुन्पो) महाविहार स्थापित किया, और (स्मद् ) शेस-रव-दूसङ् ( १३९५-१४५७ ई०) ने समस् प्रदेश में छप्-न्दो ( १४३७ ) के महाविहार की स्थापना की । चोड स्व-प ने जहाँ शास्त्रों के अध्ययन के लिए इतना किया, यहाँ उसने भिव-नियमों के प्रचार के लिए कम काम नहीं किया। इसी काम के लिए तो इस के अनुयायी द्रो-लुगूस-प (भिनु-नियमानुयायी) कहलाए । इस ने मितुओं के प्रधान वस्रों के लिए पोला रंग पसंद किया, और विशेष अवसरों पर पहनी जाने वाली दोपियों का रंग भी पोला रक्खा, जिस से इस के अनुयायो पीलो-टोपीवाले लामा कहे जाते हैं। अवतारों की महामारी से प्रस्त भोद देश में उत्तराधिकारी चुनने में उस ने योग्य शिष्य का नियम बनाया, और आज तक चोड्-ख-प की गहो पर उस का अवतार नही, उस को परंपरा का योग्य पुरुप बैठता है, जिसे कि दुगऽ-ल्दन्-नि-प (गन्दन का गद्दी- नशीन ) कहते हैं। तो भी उस के अनुयायियों ने उस के अन्य मुख्य शिष्यों के उत्तराधिकार के लिए फिर अवतार का ख्याल रखना शुरू किया और आज द्गे-लुगस-संप्रदाय मे अवतारी लामों की संख्या सब से अधिक है। चोड-व-प का शिष्य मखस् गुप् ( १३८५-१४३८ ई० )जो पोछे द्गऽल्द्न् का तीसरा संघराज हुआ-उस के सभी शिष्यों में महाविद्वान् था । इस ने अनेक ग्रंथ लिखे, और अपने गुरु के काम को आगे बढ़ाया। पंडित वनरत्न (१३८४-१४६८ ई०)। पंडित पनरत्न अंतिम भारतीय बौद्ध भिक्षु थे, जिन्हों ने भोट में जा कर अनुवाद और धर्म-प्रचार का काम किया। इन का जन्म पूर्वदेश (बंगाल ? ) के एक राजवंश में हुश्रा था। इन के गुरु का नाम बुद्धपोप था । योस वर्ष की अवस्था में यह सिहल चले गए; और यहाँ प्राचार्य धर्मकीर्ति की शिष्यता में मित्त हुए । छ वर्षों तक वहीं अध्ययन करते रहे । फिर श्रीधान्यकटक होते हुए मगध देश में पाए । यहाँ हरिहर पंडित के पास 'कलाप'व्याकरण पढ़ी । फिर कई जगह विचरते हुए नेपाल पहुंचे। वहाँ t शायद निकायसंग्रह' के फर्ता प्रसिद्ध राजगुरु धर्मकीर्ति ।
तिमत मैं बौद्धधर्म पंडित शीलसागर' के पास कुछ अध्ययन कर १४५३ ई० में भोट देश आए । ल्हामा और यर-लुम् में कितने ही समय सफ रह कर, इन्हों ने कुछ नांत्रिक ग्रंथों के अनुयाद में सहायता को। फिर नेपाल लौट फर शांतिपुरी विहार में ठहरे । दूसरी पार राजा (सि-तु) रय्-वर्तन के निमंत्रण पर फिर भोट देश पाए।भोटराज प्रगम्-प-ऽव्युड्-गनस् के समय में राजधानी म्या में पहुँचे । कितने ही समय रह फर फिर नेपाल लौट गए, और यहाँ १४६८ ई. में इन का देहांत हुआ। इन के द्वारा अनुयादित ग्रंथों में मिडों के कुछ दोहे और गोत भी हैं। (ऽगोम्-यिद्-मट-च) गशीन नुदपल (जन्म १३९२ ई०), (स्तम् ) शेस्रय-रिन्-थेन् (जन्म १४०५ ० ) और शेम्-रय-ग्येल (१४२३ ई०) इन के सहायक लो-च-य थे। (श-नु ) धर्मपालभद्र (जन्म १५२७ ई० )। यही अंतिम विद्वान् लो. घ-व थे । यह चु-स्तीन के प्रसिद्ध श-लु-विहार के भिन्नु थे। इन्हों ने 'अभि धर्मकोश-टीका' (स्थिरमति ), 'ईश्वरफर्तृत्त्वनिराकृति' (नागार्जुन ), 'मजुश्री- शब्दलतण' (भव्यकीर्ति ) श्रादि ग्रंथों के अनुवाद किए। इन से पूर्व इसी श-लु विहार के दूसरे विद्वान् लो-च-च रिन-छन् यसइ ( १४८९-१५६३ ई०) ने भी कुछ ग्रंथों के अनुवाद किए थे। लामा तारानाय (जन्म १३७4 ई०)। असली नाम 1ल-सड्-प कुन्- द्गऽ-स्बि-पो था । यद्यपि इन का अध्ययन वु-स्तोन् या घोड्-ख-प की भाँति गंभीर न था, तो भी यह बहुश्रुत थे। इन्हों ने बहुत सी पुस्तकें लिपी, जिन में भारत में बौद्वधर्म के इतिहास विषय की भी एक है । सर्वप्रथम इसी इतिहास का एक युरोपीय भाषा में अनुवाद होने से तारानाथ का नाम बहुत प्रसिद्ध है। इन के अनुयादित ग्रंथों में श्रनुभूतिम्वरूपाचार्य का 'सारस्वत' भी है, जिस का इन्हों ने कुरुक्षेत्र के पंडित कृष्णभद्र को सहायता से अनुवाद किया था। पंद्रहवी शताब्दी का उत्तरार्द्ध और सोलहवीं शताब्दी भोट देश में भिन्न भिन्न मठों की प्रतिद्वद्विता का समय था। यह प्रतिद्वंद्विता सशस्त्र प्रतिद्वंद्विता 'ऽझुग्-प-पम-कर-पो (जन्म १५२७ ई.)-'होस्-ऽयुद्ध' पृष्ठ 1५५ क ।
- चोद-स-प-युग थी। १४३५ ई० में फग-मुव् मठ वालों ने गचङ् प्रदेश को, रिन्-स्पुट वालों के हाथ से छीन लिया। १४८० ई० में श्य-मर लामा (छोस्-मगम्-ये-शेस्-मृत्यु १५३४ ई० १)ने गचङ की मैना ले कर वुस-प्रदेश पर चढ़ाई को । १४९८ ई० में रिन-छेनू-स्पुड्-पो ने गचङ की सेना लेकर स्नेऽ-जाँ और स्प्यिद्-शङ् पर अधिकार कर लिया। इसी वर्ष गसइ-फु और स्कर-म लामों ने वार्षिक धर्म- संमेलन के समय स-स्क्य-प औरऽनस् स्पुट के भिक्षुओं को अपमानित किया । १५१८ ई० तक जव तक कि ग्चङ् की शक्ति क्षीण न हो गई-ऽवस्- सपुङ् और से-र के भिन्नु धार्षिक पूजा (स्मोन्-लम् छन्-पो) में अपना स्थान प्राप्त न कर सके। १५७५ ई० में रिन्-स्पुइ (ग्चङ्) ने फिर वुस् में था कर लूटमार की । १६०४ ई० में स्कर-म सेना ने स्क्य-शोद् दुर्ग नष्ट कर दिया। १६१० ई० में फिर ग्चड्-सेना ने दुस् पर चढ़ाई को। १६१२ ई० में सुकर-म महंतराज सारे गचङ् का शासक बन बैठा। १६१८ ई० में सेना ने दुस् पर चढ़ाई कर ऽत्रम्-स्पुङ विश्वविद्यालय के हजारों भिक्षुओं को मार डाला। ऊपर के वर्णन से मालूम होगा, कि उस समय भोट देश के मठ, विद्वानों और विरागियों के एकांत-चिंतन के स्थान न हो कर सैनिक अखाड़े वन गए थे। यस्तुतः सोलहवीं, सत्रहवीं शताब्दियों में यह बात भारत और युरोप पर भी ऐसे ही घटती है। भारत में भी इस समय संन्यासियों और पैरागियों के अखाड़े और उन के नागे सैनिक ढंग पर संगटित हो न थे, बल्कि कुंभ और मेलों पर इन की आपस में खूब मारकाट होती थी। युरोप में पोप के मिनुओं को भी उस समय यही दशा थो। चोड्-ख-प के अनुयायियों की प्रशंसा में यह वात पार कहनी पड़ेगो, कि १६४२ ई. तक-जव कि भोट का राज्य उन्हें मंगोल शिष्यों द्वारा अर्पित किया गया- उन्हों ने शासन और राज्य दखल करने का प्रयन नही किया । यह वरावर धर्म-प्रसार और विद्या-प्रचार में लगे रहे । उन के ऽवस-सपुड्, सेर, द्गऽल्दन्, बक्र-शिस्-ल्हुन्-पो, विहारों ने विश्वविद्यालयों का रूप धारण कर लिया था, जिन में कि भोट देश के कोने कोने के ही नहीं, बल्कि सुदूर मंगोलिया और साइबेरिया तक के भिन्नु तिमन में बोर अध्ययनार्थ प्राने लगे थे। इन विश्वविद्यालयों के काम को देख कर धनी, सरीय मभी जनता दिल सोल कर उन को सहायता कर रही थी। इन के छात्रावास प्रदेश प्रदेश के लिए नियत थे, जिनमें कुछ वृनियों भी नियत हो गई थी। अर्थ- होन विद्यार्थी भी इन छात्रायामों में रह कर अच्छी तरह विद्याध्ययन कर सकते थे, और विद्या-समाति पर अपने देश मे जा कर अपनी मातृ-मरा और द्गे लुगस-प-मंप्रदाय के प्रनि अंग ओर आदर का प्रसार करते थे। इसना ही नहीं, द्ग-लुगम् सप्रदाय के नेताओं ने मंगोलिया में म-गयय मंधराज के धर्म प्रचार के कार्य को जारी रपरा । १५७७ ई० में सीमरे दलाई लामा वसोद्- नम्स-H-म्छो धर्म-प्रचागर्थ म्वयं मंगोलिया गए । और मंगोल-सरि अल- तन-हान् ने ( १५७८ ई० में ) उन का म्यागन किया। इस समय तफ दुर्ग- लुगस्प विश्वविद्यालयों के किनने हो मंगोल स्नातक अपने देश में फैल घुफ थे। दूसरं यर्प दलाई लामा ने यहाँ थेग-इन-दोम-ग्योर-गलिट् को स्थापना की। इस यात्रा में उन्हों ने थम्-दो, यसम आदि के महाविहारों का निरीक्षण किया, और कुछ नए विहार स्थापित किए। '८८ ई. में तृतीय दलाई लामा का देहांत हो गया। चतुर्थ दलाई लामा योन-जन मे भयो, १५८९ ई० में, मंगोल-यंश में ही पैदा हुथा। इन बानो ने मगोल-जाति का द्गेलुगुस्-प संप्रदाय से घनिष्ट संबंध स्थापित कर दिया। यही वजह हुई कि जब भोट के राज्यलोलुप मठों ने द्रो-लुगा-प के प्रभाव को बढ़ने देस उन मे भी छेड़खानी शुरू की, तो मगोल वीगे ने उन की रक्षा के लिए अपना रक्त देना निश्चय कर लिया । १६१८ ई० मे गाड्-मैना का ऽत्रस्-स्पुष्ट के हजारों भिक्षुओं को जान से मंगोलों के लिए असह्य हो गया । इस खबर के पाने हो सारे मंगी- लिया में गुड़ के मठवारियों के खिलाफ क्रोध का समुद्र उमड़ पड़ा। उस समय तक मंगोल-वीर गु-लो-ग्वान् ( १५८२-१६५४ ई० ) की कोनि सारे मंगो- लिया में फैल चुकी थी। उस ने मगोल योद्धाओं की एक बड़ी सेना तैयार कर मध्य-तिब्बत की ओर कूच कर दिया। ग्थङ् वालों को मालूम होने पर, यह भी उन से लड़ने के लिए आगे पढ़े । १६२० ई० में येड -थङ -गङ में दोनों मारना, r । चोट-स-प-युग सेनाओं को मुठभेड़ हुई। बहुत से भोटिया सैनिक मारे गए, किंतु उस वर्ष कोई आखिरी फैसला नहीं हुआ। दूसरे वर्ष ( १६२९ ई० में ) फिर वहीं युद्ध हुआ, और ग्पष्टः मैना बुरी तरह से पराजित हुई। तो भी कुछ शर्तो के साथ फिर राज्य दग-अगस्-प के हाथ में ही रहने दिया गया। लेकिन द्गे-लुग्स्-प को दवाने की नीति न बदली । बल्कि दुर्ग-लुग्स-प के इतने प्रवल पक्षपातियों को देख कर विरोधी और भी तेज हो उठे। १६३७ ई० में इस के लिए दंगे-लुग्स् विरोधिनी खल-ख (मंगोल ) जाति को गु-श्री-खान् ने को-को-नोर मील के पास युद्ध करके परास्त किया, और वहाँ से दुस् प्रदेश (ल्हासा-चाले प्रांत ) में श्रा कर, फिर को-को-नोर लौट गया। १६३९ ई० में चौद्ध-विरोधी बोन्-धर्मानुयायी खम्स् के शासक वे-रि से युद्ध हुआ । वह राज्य से वंचित कर फ़ैद कर लिया गया, और दूसरे वर्ष उस के अत्याचारों के लिए उसे मृत्यु-दंड दिया गया। ग्चङ वालों को शरारत अभी कम न हुई थी, इस लिए १६४२ ई० में गु-श्री ने गचड़ पर चढ़ाई करके राजा को पकड़ कर, ग्चङ और कोड -पो प्रदेशों को अपने अधिकार में कर लिया । गु-श्रो-खान् ने सारे विजित राज्य को पंचम दलाई लामा ब्लो-ब्सङ्-र्य-म्छो के चरणों में अर्पण किया, और उन की तरफ से प्रबंध के लिए वह भोट का राजा उद्- घोपित हुआ। इस प्रकार भोट में धर्माचार्यों का दृढ़ शासन स्थापित हो कर अब तक चला जा रहा है। ( र्यल-व ) ब्लो-सडू-N-म्छो (१६१७-८२ ई०)। चौथा दलाई लामा मंगोल जाति का था, यह पहले कह पाए हैं। १६१६ ई० में उस की मृत्यु के वाद, उस का अवतार समझा जानेवाला पाँचवाँ दलाई लामा पैदा हुआ । यह अभी दो वर्ष का ही था, तभी ग्चङ् सेना ने डे-पुड् के हजारों भिनुओं को मारा था। छ वर्ष की अवस्था (१६२२ ई०) में यह ऽवस्-स्पुड् (डे-पुङ्) का नायक उद्घोपित हुआ । जब अवतार से सब काम होने वाला है, तव योग्यता और आयु का विचार करने की क्या आवश्यकता ? १६३८ ई० में बक-शिस्- पण-छेन ( महापंडित) छोस्-क्यि-यल-म्छन् (१५७०-१६६२ ई० ) से इस ने भिनु-दीक्षा ग्रहण की। . ल्हुन्-पो विहार के नायक ६ गिता में शेरन मंगोल-सर्दार ने चोइ-म-प के गद्दीपर गन्दन-टी-पा को गज्यान प्रदान कर, क्यों दलाई लामा को दिया, इस का कारण स्पष्ट है । मंगोलिया में धर्म-प्रचार के लिए तीसरा दलाई लामा गया था, और पीथा दलाई लामा स्वयं गंगोल था, इस प्रकार यह दलाई लामा से ही अधिक परिचित था। भोटिया लोग दलाई लामा की जगह पर येल्-य-रिन-पो-2 (जिन-रन ) शब्द का प्रयोग करते है । दलाई लामा यह गंगोल लोगों का दिया नाम है । मंगोल भाषा में त-ले सागर फो कदने हैं। पदिले को छोड़ पर पानी सभी दलाई लामों के अंत में य-म्छो (सागर) शब्द का प्रयोग होता है, इसी लिए मंगोल लोगों ने त-ले-लामा कहना शुरू किया, जिस फा हो बिगड़ा रूप दलाई लामा है । टशो ( यम-शिस् ) लामा को भोट भाषा में पण-ऐन-रिन्-पो-छे (महापंडित-रब ) करते हैं। पंचम दलाई लामा मुमतिसागर के गुरु पण- ऐन-छोस्-क्यि-यल-मदन से पूर्व यहाँ अयवार की प्रथा न थी। किंतु पचम दलाई के गुरु होने मे, उन फा सन्मान यहुत घढ़ गया; और मृत्यु के वाद उन के लिए भी लोगों ने यवतार की प्रथा सही कर ली। वर्तमान टशी. लामा ( पण-छन् )-छोस्-स्यि-त्रि-म (धर्मसूर्य ) ऊन के पांचवें अवतार हैं। पंचम दलाई लामा मुमतिसागर यद्यपि अवतार समझे जाने के कारण उस पद पर पहुँचे थे, तो भी वह घड़े कार्यपटु शासक थे। इन के शासन के समय में ही १६४४ ई० में मिड-वंश को हटा कर मंचू-सर्दार मुन्-ति-दि-थे-युद्ध चीन का सम्राट बना। दूसरे साल १६४५ ई० में दलाई लामाने पोतला का महाप्रासाद बनवाया । १६५२ ई० में चीन-सम्राट् के निमंत्रण पर वह चीन गए; थोर सम्राट ने उन्हें ता-इ-श्री की पदवो मे विभूपित किया। यह सारी अभ्यर्थना चीन-सम्राट ने शक्तिशाली मंगोल जाति को अपने पक्ष मे करने के लिए की थी, जिन पर दलाई लामा का बहुत अधिक प्रभाव था । १६५४ ई० में गु-श्री-सान् के मरने पर, उस का पुत्र त-यन् सान् ( १६६० ई० ) भोट का राजा बनाया गया। उसके भी मरने पर त-ले-खान्-रत्न भोट का राजा बना । पंचम दलाई लामा को भी धर्म प्रचार को लगन थी। वह चीन से लौटते हुए स्वयं इस के लिए बहुत से प्रदेशों में गए। उन्हों ने एक होनहार भिक्षु ।
। वर्तमान-युग [ ४३ फुन्-छोगस्-ल्हुन्-ग्रुद को संस्कृत पढ़ने के लिए भारत भेजा। इस ने कुरुक्षेत्र के पंडित गोकुलनाथ मिश्र और पंडित बलभद्र की सहायता से रामचंद्र की पाणिनि-व्याकरण को 'प्रक्रियाकौमुदी ( १६५८ ई०) और 'सारस्वत' का ( १६६५ ई०) भोट भाषा में अनुवाद किया। गौतमभारती, ओंकारभारती और उत्तमगिरि नामक रमते साधुओं की सहायता से (१६६४ ई० में ) इस ने एक वैद्यकग्रंथ का भी अनुवाद किया । यही भोट का अंतिम अनुवादक था। १६८२ ई० में पांचवें त-ले-लामा की मृत्यु हुई। ६-वर्तमान-युग (१६६४-) घट्स्-ध्यङ् स्-र्य-म्छो ( १६८३-१७०५ ई०) । पंचम दलाई को मृत्यु के बाद ब्रह्मघोप-सागर उस का अवतार समझा गया। यह बड़ी ही रंगीली तबियत का आदमी था। वस्तुतः यह भिक्षु बनने के लिए नहीं पैदा हुआ था। लेकिन क्या करे ? १७०२ ई० में इस ने भिव्रत तोड़ दिया। लोगों में तहलका मच गया। और इस के फलस्वरूप ल्ह-ब्सड् ने सरकारी सेना को परास्त कर १७०५ ई० में अपने को भोट का राजा उद्घोपित किया। हालत और भी खराब हुई होतो, किंतु जिस वक्त छठौं दलाई ब्रह्मघोप-सागर चीन जा रहा था, रास्ते में कोकोनोर मोल के पास उस की मृत्यु हो गई। इधर एक दूसरे ही व्यक्ति पद्-दुकर्-जिन्-ये-शेस्-य-म्छो (पुंडरीकधर ज्ञान- सागर) को पाँचवे दलाई लामा का असली अवतार बनाने का उपक्रम हो चुका था, किंतु ब्रह्मयोप के मर जाने से इस की जरूरत न रही। १७०८ ई० में स्कल-सड्-ग्य-म्छो पैदा हुए, जो छठे दलाई के अवतार माने गए। ल्ह-सड् के स्वतंत्र राजा बन जाने की सूचना, जय मंगोलिया में पहुँची, तो वहाँ फिर तैयारी होने लगी, और १७१७ ई० में छुङ -गर् (मंगोलों फो पाई शाखा को ) सेना भोट को तरफ रवाना हुई । एक प्रचंड तूझान को भाँति, इस के रास्ते में जो कोई विरोधी प्राया, उस का इस ने सत्यानाश किया। ल्हासा के उत्तर तरफ के मैदान में लह-व्सङ ने इस का सामना किया, और लड़ाई में काम आया । प्रिंट-म-लामों ने ल्ह-यसष्ट्र का पक्ष विमा में योग्धर्म लिया था, इस लिए छुइ-गर सेना ने इन के मटों फो देह-कर जलाया, योर न किया । उन के शम्-ग्यन्-गलिए, --आग और सगिन्-प्रोल- गलिइ मठ लूट लिए गए। गुड्गर के प्रलयकारी कृत्य के चिन-स्वरूप, श्रान भी भोट देश में सैकड़ों पंडहर जगह जगह गई दिखाई देते हैं। इस प्रकार मंगोलों को सहायता से फिर दलाई लामा को गज्य-शतिः प्राप्त हुई । सानयें दलाई लामा मुकल्-यम-य-मया (भद्रसागर ) यई हो विरागी पुरुष थे। ये राज्य कार्य की अपेक्षा शान-ध्यान में अपना सारा समय लगाने थे। इन के काल में १७२७ ई० में एक बार फिर कुछ मंत्रियों ने बतायत को । उस समय (फो-ल-थे-जे) सोद्-जम्म्-मनोव्य॑म्-जिम राजा मि-घड कहते हैं- ने माऽ-रिस और गइ को मेनामों की सहायता में उन्हें परास्त कर दिया। इस मेया के लिए मि-यड् १७२८ ई० में भोट का उपराज पनाया गया। इसी गि-या ने सर्वप्रथम सक-ऽग्युर और स्तन्-ऽग्युर् दोनों महान् ग्रंथ-संग्रहों को लकड़ी पर सुया कर छापा यनवाया, और उसे स्नर्- थड -विहार में रक्खा । इस मशहूर छापे के छपे कितने ही फन-जुर्, सन्-जुर' श्राज दुनिया के पुस्तकालयों में पाए जाते हैं। सातवें दलाई के समय में रोमन कैथोलिक साधु कैचिन फादर्स' ल्हासा में गए, और १७०८ ई० तक ईसाई-धर्म का प्रचार करते रहे । इन से पहले १६२६ ई० में पोतुंगोज जेसुइट् पाद्री अंदा ने तिब्बत मे प्रवेश किया था, किंतु वह ल्हासा या वक-शिस्-ल्हुन्-पो तक नहीं पहुँच सका था। पाठवें दलाई लामा के समय मे कोई प्रसिद्ध घटना नहीं हुई। नवें (११ वर्ष) दसवें (२३ वर्ष), ग्यारहवें (१७ वर्ष), और बारहवें ( २० वर्ष) दलाई . लामा चहुत थोड़ी ही थोड़ी उम्र में मर गए। लोगों का कहना है कि प्रबंधकों ने अधिकार हाथ से न जाने देने के लिए, उन्हें खतम कर दिया। इसके बाद वर्तमान तेरहवें दलाई लामा धुव्-स्तन-ये-म्छो (मुनिशासनसागर जन्म १८७६ ई०) ही दीर्घजीवो हुए । अभी पिछले महीने में हो इन की मृत्यु का Capuchin Fathers वर्तमान युग समाचार प्राप्त हुआ है। १७७९ ई० में तीसरे टशी लामा दपल-लद्न्-ये-शेस् (ज-१७४० ई०) चौन-सम्राट के निमंत्रण पर पैकिन् गए थे; वहाँ इन का घड़ा स्वागत हुआ था, किंतु वहीं चेचक से इन का देहांत हो गया। १८४० ई० में कुछ रोमन कैथोलिक पादरी ल्हासा में दो ढाई मास रहे थे। १९०४ ई० में लाई फर्जन ने कुछ व्यापारिक शतों को मनवाने तथा रूस के प्रभाव को भोट में न पढ़ने देने के लिए सशस्त्र मुहिम भेजी। ल्हासा अंग्रेजों के हाथ में आ गया, किंतु पीछे रूसो और अंग्रेजी सरकारों में समझौता हो गया, जिस से तिव्यत फिर पूर्ववत् रहने दिया गया। बीच में चीन और तिब्धत में मतभेद हो जाने से दलाई लामा को भारत चला आना पड़ा या; किंतु १९१२ ई० में चीन की राज्य-क्रांति के समय मौका मिल गया, और भोट सैनिकों ने चीनी अधिकारियों को भोट से निकाल बाहर किया। दलाई लामा फिर तिब्बत लौट गए थे। पाँचवें दलाई लामा के बाद धार्मिक क्षेत्र में भोट ने कोई विशेष कार्यन किया। डे-पुङ-, सेर श्रादि बड़े बड़े द्गे-लुग्स-प विहार अब भी बड़ी बड़ी शिक्षण-संस्थायें हैं, और कितने ही काम पूर्ववत् चले जाते हैं, तो भी धार्मिकक्षेत्र में नवजीवन की बहुत कमी है।
No text on this page.
परिशिष्ट १-भोटदेशीय संवत्सर-चक (रब्-ऽव्युङ) का प्रारंभ १ रव-ऽन्यु ईस्वी सन् १ १०२७ २ १०८७ ३ ११४७ ४ १२०७ १२६७ ६ १३२७ ७ ८ १४४७ ९ १५०७ १० १५६५ १६२७ १२ १६८७ १३ १८०७ 'आजकल (संवत् १९९० ) में सोलहवें रब्ऽभ्युष्ट का जो कि माघ संवत् १९८३ में भारंभ हुआ था--माता जल-(स्त्री) पक्षी वर्ष चल रहा है। [ क ] २-'भोटदेशीय संवत्सर-चक्र (रब्-व्युङ्) नाग भूमि, भू जल " ४, दा लोह °शश ९ जल २० जल २४] अश्व २५ नाग २७ २८ जल मेप ३३ (स्त्री) (स्त्री) (पुरुष) (स्रो) (पुरुष) (स्त्री) (पुरुष) (सी) । (धुर) (स्रो) (पुरप) मेष वानर पक्षी शूकर मूषक प মুমি लोह लोद अग्नि अमि भूमि (प्रभव) (रिभर) (शुष) (प्रमोद) (प्रजापति ) ( अंगिरा) (श्रीमुख) (भाव) (युवा) (धाना) ( इयर) (धान्य) °मूग ३ अश्व ६ 10. शूफर ११ भूमि लोह अग्नि अग्नि भूमि भूमि लोह (प्रमाथी) (रिक्रम) /- (वृष) (चित्रभानु)/( मुभानु)/(तारण) ( पार्थिव ) ( व्यय) (सर्वजित् ) ( सर्वधारी) (विरोधी) (विकृत) १३/वानर १४. १६ नाग १७ °वृप ११ २१/ वृष""२२ २३ लोद अग्नि भूमि भूमि लोह लोह ( नन्दन ) , (विजय) (जय) (मन्मथ ) / (दुर्मुस) ( हेमलंय ) (विलंय) (विकारो) (शर्वरी) (ब) (शुभकृत् ) २९ शूक्र ३० ३२] भूमि भूमि लोह लोह (शोभन ) ( क्रोधी) (विश्वावसु)/( पराभव) (प्लवग) (कोलक) (सौम्य ) (साधारण) (विरोधकृत् ) (परिधावी)/(प्रभादी) (आनंद) ३७ मूप ३० १० पक्षी ५३ मई ४६ अश्व १७ च्यान १८ अग्नि अग्नि भूमि भूमि लोह अग्नि (राक्षस) (नल) (पिंगल) (कालमुक्त)/(सिद्धार्थ ) (रौद्र) (दुर्मति ) ( दुन्दुभि) (रधिरोद्गारी) ( रस्ताक्षी)/(कोधन ), (क्षय) ५१ मेप ५३ ५५ °शश ५५ ५६ पक्षी ५७ ५९ °वृष ६० 'संवत्सर का नाम बनाने में (लो) शश, ( पुरुष ) नाग आदि वारहों नामों को उन के नीचे के कोष्टंकों के साथ जोड़ दिया जाता है, जैसे-अग्नि (स्त्री) शश, भूमि ( पुरुष ) नाग । (स्त्री) (पुरुष) को कभी छोड़ भी दिया जाता है, और कमी कभी भूमि आदि पाँचों नाम भी छोड़ दिए जाते हैं। * कलो-दर-( जन्म १७१९ ई० ) गसुं-_-म पृष्ठ १६७ । . त, पृष्ठ २०३ख। अधिक मास वाले वर्ष और मास, स-स्क्य-( प्रगस्-प-Zल्-मछन् , ११४६-१२१६ ई.) एक-यु, जल जल ४२ ४५ जल °श्व ४९ ५० ५८ ३-भोटदेशीय मासों के नाम' भोटदेशीय भारतीय संख्या ऋतुओं के अनुसार नाम नाम नाम १ अंत हेमंत माघ २ सर्प आदि ग्रीम फागुण ३' अश्व मध्य १ मेप अंत वैशाख , यानर आदि शरद ज्येष्ठ - ६ पक्षी मध्य आपाइ " अंत श्रावण धूकर आदि দ্বিবিধ भाद्रपद ९ मूषक मध्य आश्विन " घृप अंत कार्तिक " च्याघ आदि हेमंत মাহাব १३ पोप शत 'भोटदेशीय प्रथम मास माघ सुदी प्रतिपद् मे भारंम होता है। माय- गणना अमावस्यांत है, किंतु अधिक मास के एक साय न पड़ने के कारण भारतीय मागों से मिलान नहीं रहता।
-प्रत्येक रथ-ज्युङ् में अधि-मासवाले वर्ष और मास' वर्ष-स्तु मार सरया मोट गाम मारतीय नाम । संपया नाम । ९ ८ ५ १० १० 1 " ९ ३ भूमि-(यो ) सर्प मूचक ६ जल-(पुरुष) यानर । गिरा ९ । दुम-(गो) शूगर युवा १२ " अग्नि-(सी) सर्प ईश्वर लोह-(पुष्प ) नाग विक्रम यातर जल-स्त्री) मेष सुमानु दुम-(सी) पक्ष. पार्धिय शुष २३ भूमि-(पुरप) भूपक सर्दधारी प २५ । लोह-(बी) शश ३ जल-(घी) सर्प विजय नाग अति-(पुरुष) वानर दुर्मुख भूमि-(स्त्री) शूकर विकारी मेष दुम-(पुरप) नाग कोधी मूषक अग्नि-(सी) मैप एवंग पक्षी लोह-( पुरष ) ग साधारण सर्प जल-(स्त्री) वृप प्रमादी द्रुम-(पुरप ) ग्यान भानंद द्रुम-(स्त्री) शश राक्षम ३ ૨ भूमि-(पुर) मत्र कोलमुक्त मेष लोह-(वी) पक्षी दुर्मति जल-(वी) शूकर रधिरोद्गारी ६ ६. अग्नि-( पुरुष ) व्याघ्र स-स्वय ( प्रगम्य-प-य-मछन् १९४६-१२९६ ई.), त, पृष्ट २०३ ५। मोट पंचाग में प्रति तीसरे वर्ष अधिमाय का नियम नहीं है, जैसा कि इस कोटक से मालूम होगा। ६ ४४ २ अश्य ११ च्या ४ १२ क्षय घृष .
५.-भोट सम्राटों का काल सु-स्तो। देय-गोर जम्म जन्म गद्दी जन्म गही गद्दी यूप-गम्-पो अमि- अग्नि-गृप 10 ३ भू-रा अग्नि-प, ८२ भू-ध्यान भू-धा ५५८ मोट-मट्-यूपन् । मनि-धा १२ २७ अग्निका जल-मूषक १३ भू-शश ६२६ ६१९ जल-पक्षी जल-पक्षी लोद-नाग दुम-स ६४५ गरे-पर-पूर्वन् लोद-नाग गल- अलोद-नाग जक-भश्व ५ द्रुम-प दुम-गेप ६१० ७४२ ७४२ -गौर-उपन् को- दुम-गुगलोद-अश्व जल-भश्च दुम-गृप | भू-अध दुम-पलोद नागर १३ ७४२ ७८५ mage HAMARI साफ- भजायात्रा तक-या अग्नि-ध १९ ७६९
No text on this page.
No text on this page.
स ७-जिंङ-म-संप्रदाय को परंपरा युध । सारिपुत्र .राहल नागार्जुन पद एम-रिन छैन 7 () शाक्य नगा (स्तम्-लो) गसोन्-चं -(अ-मे) शु-चिग- (द) शाक्य-योन (लि) ब्लो-प्रोस्-गगो -(गो-य) (ग्लङ्)व्यड्-चुन्)-व्यम् (ग्लम्) व्यड्-छुथ्-र्यल-मह (नि.) स्वोन्-चोन्-ऽबर् (खि-छो)- गूगोन-नु-शाक्य (स-घो)- (शड्-सतोन्) छु किग्स- (स-लु-ये-स्कोर १०४० ई०) (ग्यि) ये-शेस्व-पो (ग (अ-सेइ-स्कोर्) (ल्चे-चुन) शेस्-रद-ऽभ्युट्- (य-दुल्-जिन) द्वा-पयुग्-हल्-खिम्स् (दुष्टोन) एप गपुग्ःशुर-सिगराए -मि)स्गोम-प-सूमोन्-लम् (श्यि-को) एल-इफगुस् म्यङ्-छुल् (मे-छो) म्यहन्दोस् (११७1 ई.) (१०९०-१००1 ई०) (व्य-दुल्) यचोन्-ऽवर् * पु-सूतोन् ( ओयरमिलर) माग २, पृ० १९०। 'वही, पृ० १९६ । 'बही, १० १९७। वही, पृ० १९८ । वही, पृ० १९९। वही, पृ० २०१-२०२। 'वही, प० २०२-२०३। 'वही, पृ. २१०। वही, पृ. २७। 'चही, पृ० २१२। स-स्क्य--, व ३७२ क. "क्लोङ्-दल-गर्मु-s. च-६३ क यही, ६५ क । "गुग-प-छोस् ऽम्यु, ५३ ,ख । "यहो, ५५ ख । 'धु-स्तोन्-( युक्र-शिस्- एहुन्-पो) ४१ ग्य, १४२ क । "सु-स्तोन् (ओवरमिलर ) माग २, पृ० २०३-१० । "सूकोर् , और छो उपविभाग को कहते हैं, जैसे थङ्-स्कोर और स-छो । .hot - 1 ।
No text on this page.
( व्य्-अल् ) योन्-ऽघर (जन्म १०९० ई० )
छोस्-रिय-वड्-मयुग
छोस्-प्रगम्-रिन्-छेन-दुपल्-प्सङ
(दुक-नि-) अगस्-प-शोन-तु
स्गो-फुग्-प (जन्म १०४४ ई.)
रिन्-ऐन-यूसोद्न्नमम्-अगस्
(यु- स्तोन् ) रिन्-छन्-गुम् ( १२९०-१३६४ ई.)
(मान्यतोन् ) ग्य-मुटो-रिन्-ऐन्
(थोड्-ष-प) प्लो-सट्-प्रगस्-प (१३५७-१४१९ ई.)
' क्लोनल्गसु-च , पृष्ठ ५१ क , ६५ फ।
'वही, पृष्ठ १३ क ।
मृत्यु
मा
No text on this page.
१०-स-स्क्य मठ (स्थापित १०७३ ई.) के संघराज संख्या नाम जन्म गही मृत्यु .( योन् )-कोन्-र्यल १०३४ई० २०७३ ११०२ ११०२ (११११) व-रि-लो-धन्य ( स-छेन ) कुन्-द्गऽस्मि-पो जल-वानर भू-व्याघ्र १०९२ ११११११५८ ई. (सूली-पोन् ) सोद्-नम्म्-च-मो जल-इवा जल-ज्यान ११४२ (११५८) १९८२ अग्नि-शश (जे-बचन् ) अगस्-प-य-मान् अमि-भूपक ११४७ (१९८२) १२१६ (स-पण) कुन्-दुगऽ-यल-मछन् जल-ध्यान लोह-यूकर ११८२ (१२१६) १२५१ १२३४ (१२५.) १२८० १२६८ १२८० अफग्य-प-फ्लो-मोस्-र्यल्-मछन् धर्मपालरक्षित (शर-ब ) ऽयम्-दव्यइस्-दोन्-र्यन् दम्-प-सोद्-नम्म-मेल मटन् ૧૨૭૬ १२८८ १३१२ ''जर्नल अन् दि यंगाल एशियाटिक योसाइटी', ( १८८९ ) में भी शरचंद- दास का टेख। स-म्य-य-न्यु, क, ख। "स-क्य-व-, ग, घ,। यदी, छ, ज, त। 'यही, थ, ६, न 'यदी, प, फ ।
११-स-स्क्य-वंशवृक्ष'
(खोन् ) दुकोन्-यल ( १०७३ ई.)
-कुन्-द्गऽ सजिड़-पो (३०९२-११५४)
२--सोट-मस-चे-मो
(११४२-४२)
३-अगस्-प-र्यन्-म्छन्
(११४७-१२१६ ई०)
पल्-ईन्-डोद्
(१३५००१२०३)
४-कुन्-द्गऽ-मेल-महन्
(१३८२-१२५१)
सहस-छ-बसोद्-ग्यन् (११४५.११३८)
५-ऽग्स्य फ्या-न (१२३८-६७) ये-ज्युड् (१२३७-७५) रिन्-प्रग-र्यन् (१२३.७.७
(१२३४-८०)
६--धर्मपालरक्षित (१२६८-८८)
कुन-पर्यन् (१३१०-५८)
(१२९९-१३२७)
८-दम्-म
(ज.१३११)
७-ऽजम्-व्य
(ज.१२७
१०-ब्लो-यन्
(१३३२-५८)
छोस्-र्यन् (ज,१३३२)
थेग-छैन्-छोसनल (अ-१३४९)
'जर्नल
भव दि बंगाल एशियाटिक सोसाइटी' १८८९ और स-सूक्य-क-के मा
पर । यहाँ शियम से नहीं बल्कि संतानम से उत्तराधिकार मिलता है। गही घर मे याद
जाय, इस लिए घर का एक व्यक्ति भिक्षु बना दिया जाता है, और वही संघराज होता है।
कर-मऽदुस्-मख्येन् (39:०-९३)
(कर-म-रह-लदेड् मठ-स्या-११५६)
थ-छ-प
1-फुग-प
दी-जे-रस-प
कर-मनस्-छैन् (१११०)
कर-म-स्योम-बग-यसोद्-दोर्
(११७०-१२४८)
कर-म-यक्-सि-छोस्-ज़िन्
(१२०४-८३)
२८-८८)
-सेट् घलो-रस-दघाट-चोन् (गोदछङ्) मगोन्-पो-दोर्ज
(11८७-१२४९) (११८९-१२५८)
र-लुइ) (समद्-गा)
(स्तो-गा)
वाले रास्ते पर अवस्थित य-दोग-मछो महामरोवर के पास
रस्ता धे-शों के भी पूर्व प्रदपुर-उपायका में।
09
No text on this page.
१३-'कर-म-संघराज संख्या नाम मृत्यु विशेष १०४० ११२३ /१११०ई० में मर -पके पास गया। १५५३ १०७९ 8 १११० ११९३ " नारोपा (विक्रम शिला) मन-च-छोस्-स्यि-को-प्रोस्' मि-ल-रस-म स्गम्-पो-(दग्स्-पो) रुह-जे (क-म-)ऽदुस्-गसुम्-मुख्येन्-प रस्नोन् स्थोम्-नग्-यसोद-दौर' पक्-सि-छोस्- ज़िन्' रड्-ऽव्युट्-दोन्जे रोल्-व-दोर्जे दै-शिन्-गोगम-ध मथोड्-व-दोन-ल्दन् " ११७० १२४८ १२०४ १२८३ ३ १२८४ १३८३ १ १३४० . १३८४ १४१५ १४१६ ६ " १४५५ १५०७ १५०७ १५५४ " द १५५६ १६.१ ९ १६७३ छोस्-भगस्-र्य-मूछो मि-य्स्क्योड्-दो दवड्-फ्युग्-दोजे होस् यि स्-दो- • 'जर्नल भव् दि यंगाल एशियाटिक सोसाइटी' ( १८८९) शिद ५८ (1) और फलोद-दाम-, , पृष्ठ ८ क के आधार पर। दगम-पो मठ १२.ई. में स्थापित किया। में नित मठों को स्थापित किया-गण-मार-सह-सुद ( ११५५६०), मधुर-पुः (११५९६०), पग-पो-गनर-माद (१९४०), यो-यपानम् ( 1) कर-म-रहमदेव ( १८५९ ई. में मगम्-पो के पास गया। तक शिष्य उपराधिकागे होमा दा, पोपे भरतारी राधिकारी . . HTTA
No text on this page.
* छोपंकर से चोद-ख-प तक देखो तिय्यत में चौरासी सिदों को परंपरा,
क्लिोहदल-गमुं-ऽयं पु, पृष्ठ ८० क ।
'जर्नल अव्.दि यंगाल एशियाटिक सोसाइटी', जिल्द १८, माग ।
६ श्री शरचंद्रदास, डा. जार्ज तुम और मर पास ये ने सन् गिनने में कम समा।
५१८
१४७२
१४३१
१४१९
गही
मालिक दगड-ल्दन्-संघराज
से लिए गए।
१५५९
१५०
१५५०
ob
१५५३
ahini
0851
१४९२
१४९१
266
१४६२
१४३८
(१४३)
१४१९ ई.
मृत्यु
No text on this page.
१५-चोङ-ख-प की गद्दी के मालिक दगड-ल्दन्-संघराज नाम जन्म गद्दी मृत्यु १४१९ ई० १४१९ ११३१ ११६२ ११६२ १४७३ १४७२ १५७८ १४९१ १४९० १४९२ १४९८ घोड़-ख-प धर्म रिन्न्छन् मवस् गुम-जे यूलो-प्रोस्-छोस्-स्क्योट (य-सो) छोपर्यन् यूलो-बर्तन মূল্পী-মুণ यूलो-सह-नि-म घेस ऽदर्-मतोन् रिन्-डोद्-प शेमस्य-रोगम-एलो घमोद-प्रगम-प पोस-पापोनर्य-ग्छो (मि-मग ) दरि-यगर पोस-यमोस् সূ ग-दा-टोत प्रगम (अल-गा) दुगेगम पर ত दोनुन मनन-दर ११५३ १५.१ ११५० ४१७८ १५३५ 1९९१ १५३९ 1१९७ १५१८ १५०५ १५५८ . यह नाम कली (जन्म 111९९.) मुख मे हिट गए। पारा पदार गहराम के ऐल में।
नाम गही १५२० १५६८ १५७५ १५२६ १५८२ ऐ-तन्-र्य-ग्यो व्यय-प-ये-हो पल्-ऽन्योर-पर्य-छो दम्-धोम्-( पल-ऽयर ! द्गे-मुन्-पर-मन् सट्रम्-र्यम्-रिन्-टेन १५३२ १५९६ १५४६ १५४६ १६१९ চান্দু-মূখী মারলু-এর ( स्तम्-यम् ) दलो--म्ही दर-दोस्-पल (धुल निम्म् ) छोल्-ऽपेल् प्रगम्-प-र्य-यो (इन्) छोम-विय-गर्यल्-मछन् दुकोन-मटोग-दोस्-डफेट ( कोट्-पो ) प्स्तन्-ऽज़िन्-लेगस्-यशद् १५५५ १५७३ १६२६ १६४३ १९४८ १६५३ १६६२ १६०२ ( द्वगस-पो) यस्तन्-पर्यल-गटन् दुकोन्-मूछोग-छोस्-यसइ द्पर-ल्दन्-यत्-महन् थलो यमुनर्यल-मान ब्लो-मह-दोन्-योद 'यूलो सड्म्-र्थल म्पमम्-पन्न-शिस् यूलो सङ्लोर- कल-कुम्भ-छो ' तो प्रोस-प-छो (बो-नस्) स्.टुल-निमस्-दर- १६१८ १६७५ १६८२ १६८५ - यह नाम को पृष्ट and HR
जन्म
गही
मृत्यु
१६९२
१७०१
(यसम्-ब्लो) म्यिन्-प-र्य-यो
(चो-नस्).पुल-दर
दोन्-योदुनय-हो
पल-ऽप्योर्र्यल-मछन्
दोन्- य-य-ग्छो
(व्य-पल ) द्गेऽदुन्-फुन्-छोगस्
हगवड्-मछोग-दन्
.
.
mousamuharrare
'या नाम हो । जन्म 1.18 ई. ) गk-पट व में लिए गए हैं।
पास पहादुर माप के ग
समय ५७०-६३८ ६७०-७४२ ७४२-८५ १६-बौद्धविद्वान और उनके पाश्रयदाता आदि आश्रयदाता या प्रधान भारतीय पंडित लो-ब-ब (दुभाषिया) व्यक्ति या प्रधान धार्मिक नेता प्रारंभ-युग (५८०-७६३) सोड्-यचन्-स्गम्-पो देवविद्यासिंह थोन्-मि अ-नु-यु शंकर (ब्राह्मण) धर्मकोप शीलमंजु ( नेपाली ) (गट ) महादेव (ह-लुद्द ) दोर्जे-दपल (सि ) ल्दे-ग्चुग्-तन् (युलन्-क ) मूलकोष (हा) ज्ञानकुमार गांतरक्षित-युग (६३-९८२) (नि) घोट्-दे-र्छन् भनत सइ-शि (चीनी) शतिरक्षित मे (चीनी) पद्मसमय गो (चीनी) कमतशील पल्-ग्यि-सेनगे सुरेंद्राकर प्रम ये-शेर-द्वङ्-पो (ली) ज्ञानकुमार शीलधर्म (ही) धर्मकीर्ति (सन-नम् ) दो-जे-यदुद् जोमम् विमलमिन नेम्-मरवऽ-सक्योड ज्ञानगर्भ (लचे) ज्ञानसिद्धि (दश) महायान (चिम् ) शाक्यप्रभ (प-गोर ) रोधनरक्षित समय ७८७-८१७ आश्रयदाता या प्रधान भारतीय पंडित लोन्-व (दुभाषिया) व्यक्ति या प्रधान धार्मिक नेता (थड्-ति ) जयरक्षित कुलुम्विङ्-पो (शुद्-शु) श्रीसिंह (4) मंजुश्री (बि) रुदे-(स्रोट् ). (अपरातक) जिनमित्र (चट् ) देवेंद्र पचन्-पो सुरेंद्रोधि (खड्) कुमुदिक शोलेंद्रयोधि (खोन् ) नागेंद्ररक्षित दानशील लेगस-पडि-ब्लो-मोस् पोधिमित्र (म-आचार्य ) रिन्न्छन्- विद्याकरसिंह (० प्रभ) मूछोग मंजुश्रीवर्म विद्याकरसिद्ध ( घन्-दे) नम्-पर-मि-तोग धर्मश्रीप्रभ गलड-क-तन् सर्वज्ञदेय (प्य ) स्त्रि-जिगम् (4) ख्यि-शेर् धर्माकर सङ्-शि शाक्यसिंह (घड्) लेगस्-प्रय छोस्-फ्यि-स्न-य विद्याकरप्रभ (स्मो) रिन्-टेन्-स्दे बुद्धगुग (पन्-दे ) दपल-यूचेगस् शातिगर्भ ( पन्-दे ) कुलुम्विङ्-पो (कश्मीरी ) जिनमित्र (राष्ट्र ) येल-मन्-अ-प्रसइ (ल्पे ) दिय-युग देवचंद्र पल्-ग्यि-रुहुन्-पो पल-म्यि-व्यम् यसोन्-मि-शेड रनरक्षित धर्मनाशीश মির सर्वज्ञ देव समय शाक्यप्रभ आश्रयदाता या प्रभाग भारतीय पंडित लो-च-र (दुभाषिया) ध्या या प्रधान धार्मिक नेता रजेंदशील (सि ) स-पचन शाक्यसेन दुर्ग-वन्दिपल ज्ञानसिद्ध (पन्-दे ) योन्-तन-दुपल् मुनिवर्म (सन-नम् ) ये शेम-स्दे (घोगरी ) क्लुडि-र्यल-मटन ज्ञानगर्भ ( गोस् ) छोस-प्रय विशुद्धसिंह धर्मालोक प्रज्ञाधर्म बलुधि-दुवइ-पो ये-शेष-दुपर (यन् दे ) नम्-मुख ये दोस्-धम्-शुम् तौग-जिन् (सद ) ये-शेस् ये-शेम्-समिट-पो ये-शेस-मदे देवेन्द्र कुमाररक्षित (ह-लद्) पल्-दोजें तिड्-डे-ऽजिन-सह-पो (म) रिन्-छेन्-मछोग (यह ) रव-गलल् (ग्यो ) द्गे-ऽन्युइ (स्तान लड्-स्मर् ) शाक्यमुनि ख्यि-र-य-प दीपंकर-युग (१-४२-१९०२) श्रद्वारस्वर्म रिन्-टेन्-वसह पो (९५८-१०५५) जनार्दन लेग्म-पति-शेम्-स्य पद्मावरगुप्त (० वर्म) पल्-ऽत्र्योर् सुभापित ( शिद्-मो-) व्यङ्-झुर-मेट्नो शुद्धधीशांति द्गे-वञ्न्लिो-प्रोस् ८४१-४२ (गल) दर्म ये-शेम-डोद् समय आश्रयदाता या प्रधान भारतीय पंडित लो-च-ब (दुभाषिया) व्यक्ति या प्रधान धार्मिक नेता धुद्धपाल (ग्यि-चो) मु-बहु-ौद्-. सेर् (१०२७) कमलगुप्त (म्रो ) शेस-रव-प्रग्स करुणा (ज्ञान ) श्रीभद्र शाक्य-ब्लो-प्रोस् सोमनाथ (पश्मीरी) (लोग-सश्य ) शेस्-रय-यचेंगस् (१०२७) धर्मपाल ( मल-भयो ) ब्लो-प्रोस्-अगस्-प कनकधीमित्र गोन्-अगस् प्रज्ञापाल द्गे-धइ-लेगस-प कुमारकलश छुल-निम्म्-योन-तन् धर्मश्रीवर्म (ोग-मि ) शाक्य-ये-शेस् ( मृत्यु १०७३) प्रेतक स्मृतिझानकीर्ति सूदमदीर्घ पद्मरुचि गंगाधर धर्मश्रीभद्र गयाघर रूह-ल्दे (राजा) सुभापित द-ल्दे (राजा) सुनयश्री (एन् ) दाम प्रग्स मति (पा-१७) उफाग-पडि-दोस्-रम् आरण्यक ( कश्मोरी) तेजोदेव परिहितभद्र प्या-मुई दीकरणीशान रिल्-टेन्-प्स-पो महाजन गपोन्-नु-मयोग कुमारकश (नग-शे) एनिम्म्-पर्यम्-र कृष्णांटित (सेच.) यसोद-नम्म्-पर्यन् शातिमद्र (नेपाली) (-) यीन मुम्-मेट्रो (मृत्यु...)
एम Hig { पी) (ii) मरा भी (मारी) inार จัฐ {ोमेट्सए) mein (ोगम) RTE मार (form } रिमे EिRT friमर ས༣༥ འུ अindi { पानी) ii-ram Tuntutan याधर गुस्सा दुभूनिधी (गति) मगर (फरमाणे) जिय सुननधीशान शिमशेर गुगारगद (मो-गे-दार् ) भारद मंश (ग) पदमागम दीपंपररक्षित ६ ( गा) शानश्री ( नासोद ) होग-पर (10v३.८९) नियर (ग) धूलो-सदर-और-स्थ (१.५९-१२०८) मुमतिशति (पट-पो छोम्-यसो चंद्रराज (योग-मु) तिट्-टे-जिन-यूपद-पो अतुलदार (युम् ) सभीन्-सम्मा मनोरथ (कश्मोरी] परहितभद्र ज्ञानधोमिश्र भव्यराज ( कश्मीरी) समय आश्रयदाता या प्रधान । व्यक्ति मारतीय पंडित लो-च-च (दुभापिया) या प्रधान धार्मिक नेता मुभूतिघोप दुवइ-लदे (राजा) भव्यराज (कश्मीरी) ( डोग ) ब्लो-ल्दन्-शेम्-लू ( १०५९-११०८) यक-शिम्-ल्दै तिलकलश ( मर-प) छोरम्-विय-यड्-फ्युग- द्वइ-फ्युग प्रगस् (राजा) स्थिरपाल (ऽयोग-मि ) शाक्य-ये-शेस् कनकधर्म (कश्मीरी) रिन्-येन्-सङ्पो (९५८-१०५५) जयानंत (ग-म) सेदोर्दील अतुलदास ( क्लोग्-स्क्य ) ग्योन्-नु-ऽयर सुमतिकीर्ति ( सम-सम्युर ) द-पडि-शेस्-रख अमरचंद्र ( मर-प) घोस्-श्यि-यलो-प्रोस् कुमारकलश ( पन्ध्य ) नि-म-प्रगस् ( जन्म धर्मश्रीभद्र १०५५) बुद्धधीशांति नाइपाद (नारोपा मृत्यु १०४०) मैत्रीपाद शांतिभद्र ११०२-1119 -- स-स्क्य-युग (१९०२-१३५६ ) (म-सक्य) वरि. मंजुनी य-रि-को-ए-त्र लोय-व अभयाकरगुप्त (मृत्यु (यन्-दै ) शेय-य-पल ११२५) यज्रपाणि (२०६६) (गदर-रबोर ) यलो-प्रम् युद्धार (ग्नु ) धर्म-ग्रगम् मन्दम्-प (मृत्यु 110) (ये-गद् )ऽयोर-शो-प्रथम (म्पोट-जो ) गमर-य प्रास यमय ศz आप्रयाना या प्रधान भारतीय प्रति मो-पन्ध (सुमारा पक्ति या प्रधान धार्मिकता कोग-विय-दौमन (पोट्ना-मि-भग ) समि सम्प-र्यम-प्रगम् (प्रो-यो ) योग-स्पदपल . (जाम १०५९) पोम्प द्गा (म-पन् ) छोम्र (मह) ये-शेस्-ज्यु-गुलम् (माय) - अर्समय (स्तेद-प) -निमम्-शुरः दुग पनिट-पो गन्स् (११०६.९०) महाराणिक ( ) दो-ज-प्रग्य शून्यनाममाधि (प्पल) कुन-दगड-बाजे अमोपात्र (द-दु ) पर-पो सर्मनधी ( फरार ) रिल्-हेन्-मरस (2) छोस्-स्य (शद ) शेस-रय-दल-म ( मृत्यु १७.) प्रगस्-प-मेल-मटन् (म) लो-च-ब (जन्म १९६०) म्यड्-युद-चुम् (ग) लो-च-ध ( मृत्यु १७०) ( यर-लइ ) अगस्-प-ठल-महन् ११८२-१२१६ (म-क्य) अगस्. साधी प-र्यल-महन् अनंतश्री (सिंहल) धर्मघर कीर्तिचंद्र जगन्मित्रानंद (मिनपा, ११९०) लक्ष्मीकर (गनुयम् ) .दुल्-सिम्स्-शेम्-रय (शोड्-मतोन् ) दो-दर-मइन् (सो-फ) भ्यम्स-पऽिन्दपल ( जन्म १२१६-५१ ११७३) (स-स्वय ) कुन्- बुद्धीज्ञान (१२००) ( चल् ) छोस्-सङ्-पो द्गा-र-मछन् समय आश्रयदाता या प्रधान व्यक्ति भारतीय पंडित लो-च-ब (दुभाषिया) या प्रधान धार्मिक नेता शाश्यत्रीमद्र (म्य-युल) लांच व (१३०१, (११२७-१२२५) विभूतिचंद्र (१२०४) (रोड्-) नम्-यल-दी- (जगत्तल) दानशील ( १२०४ ) () दो-जेदपल् संघनी ( नेपाली, (छ) द्ग-चोम्-ते-ऽ ११:५३. १२०४) १२१६) सुगतश्री ( १२०४) .छुल्-रिझम्म्पर्गल-मलन विनयश्री छुल-निम्म-मेड्नगे धर्मधर ! म्पसम्) अगस्-प-Zल्-मछन् रखश्री वज्रासनपाद निक्लंक सक्य) ऽफगप्प सुधनरक्षित (३३-मर् ) सेड्-ग्यल् मणिभदरक्षित ( य-प्रोग-ग्यि-मर-ए) छोस्-पिय- द्वड्-पो लक्ष्मीश्री (नेपाली) ( ) छोस्-जे-पल ( मृत्यु १२६५) लक्ष्मीकर देवेंद्र रखरक्षित (शोड्-स्तोन् ) दो-जे-गल-महान् लो-प्रोस्-तन्-ए (स्तम् ) शास्य-सह-पो (जन्म पालरक्षित १२६२) (मि-गर)लो-वन्य (मन्यु २८२) १२९०-१३६५ (पु-स्तोन्) रिन्.. कीर्तिचंद्र (शेल दकर) व्या-सुन्- मो-यूलो- डेन गुथ् वर्तन-पोन्-पो (१३०३.४०) धर्मश्रीमद (१) (जो-नह) शेर-फेर (मत्यु:३६१) धर्मधर होमपल्ल मुमनधी (पश्मीर ) भिमा-गर-मान-ऐपन्न--पो १२८०-८६ ( सश्य ) धर्म- समय १२.१७101 . आप पाय भतोय दिन refr. যা ঘ ঘন্না मागिरधी (म्पस ) यसो गोग-पर्शन-प (गप्पाद योमरिय-मान्यो, (दु-गान ) निनौन-सुए मोटाप-युग ( १३०६-१६४४) • ३२.1) लो { sta) पिट्-माइ- A. नरन्न (१३.१५.१४६०) (जन्म १९२) गान-नु-दूपल (सनम् ) मोम-ग्य-रिन्छन्- (जन्म १५०५) घोर-रम-र्यल { गन्म १४२३) (सल) धर्मपालभात (N-T) गिन्-ऐन-पसाट (१४४० १५६३) रिन-टेन-एक-शिम-पर-यसरः १५७५ जन्म तारानाथ (स्तग-ल) कुन-पफ ( १५५५ (पर्यट-पगम्) कुन्- कृष्णमह दुगड-समिट-पो { लामा तारानाथ) (दलाईलामा) यलो- यलभद्र ( कुरक्षेत्र ) फुन योग हुन् मुम् । १६६४) उप-मर्य- गोक्लनाथमिश्र या (क्षेत्र) गौनमभारती ओंकारभारती उमगिरि लो-चय और पडित को एक पंक्ति में रखने में माल का ध्यान नहीं किया गया। को छोड़ कर चाली पडित म्वयं नियत मे गए थे।
-- . १6-तिब्बत में भारतीय ग्रंथों के कुछ प्रधान अनुवादक, उनके सहायक और ग्रंथ काल अनुवादक अनुवादित ग्रंथ ग्रंथकर्ता सहायक, या सम. सामयिक ५ शांतरक्षित-युग (८२३.९०४२) शतिरक्षित धर्मालोक हेतुचक दिष्ट-नाग पासंभव वैरोचन वनमंत्रसंग्रह पल्-ग्यि-सेड्नो ढाकिनीजिहाजालनंत्र विमलमिय (चन्-दे) ज्ञानकुमार चनसत्वमायाजालगुह्म- सर्वादर्शत नम्-मराव-सक्यो सप्तशतिका प्रज्ञा कमलशील पारमिता-टीका रिन्-छन्-पदे प्रज्ञापारमिताहृदयटीका विमलमित्र मुरेद्राकरप्रम नम्-मावऽ सक्यो प्रतीत्यसमुत्पाद-व्याख्या पसुबंधु (लोयामी) शोल धर्म (ली) नम्-मबऽ स्स्योद सुरेंद्रयोधि शाजगर्भ जिनमित्र धर्मकीर्ति संबंध-परोक्षा शतसाहधिका- पारमिता दामादरियामा पारमिता अशापर्म সমাধিযুখি गुनियम पोट्रयाधि - अनुवादक अनुवादिन ग्रंथ प्रेक्षका पहायक, या सम. मामयिक গালাম दास्याम दकोति शाश्यमेन धर्मपाल মনিখান- परिपूछा-सूत्र झानपिद्ध मंगुथ्रीवर्म रत्नेदशील ध-शेय-स्दै युक्तिपष्ठिका-गृति न्याप-यिदु-रीका देवदरक्षित (लोचव) सिवसार (पंचक ) (क-य) पल्-च्चेगम् अभिधर्मकोश এমবির देवचंद्र निधर्मकसून रनरक्षित महाप्युपनि (20) (शष्ट ) ये-दोस्- जिनमित्र समिधर्मसमुच्चय विनीतदेव " घसुबंधु ८१४ अर्मग सुरेद्रयोधि गयशीर्ष-सूत्र-व्यात्या वसुबंधु शोदेंद्रयोधि मध्यमफालेकार-पंचिका कमशील महायानसंप्रद असंग प्रज्ञाव मध्यमकालंकार शांतरक्षित दानशील शिक्षासमुच्चय शातिदेष मुनिर्भ श्रामगेरवारिका नागार्जुन मंधीगर्भ ( • वर्म ) दशभूमिक-व्याख्यान वसुबंधु विजयशील धर्मसंगोति-सुन्न ज्ञानसिद्धि योधिदिनिर्देश शाक्यमेन असाहसिकाप्रज्ञापारमिता ८०० धर्मतापील (लो-च-च) देॉदक्षित (को०) कुमाररक्षित ( लो०) काल अनुवादक सहायक, या सम. अनुवादित ग्रंथ ग्रंथकर्ता सामयिक शाक्यप्रभ धर्मपाल ब्रह्मविशेषचितापरिपृच्छा जिनमिय सुरेंद्रयोधि । सर्वधर्मसमता-विपंचित- शीलेंद्रयोधि J समाधिराज-सूत्र नम्-पर-मि-तोग्-प समाधि-प्रतिकूल (चीनीभाषा से) विद्याकरसिंह ( • सिद्ध) संचयगाथारंचिका युद्धधीज्ञान (ह-गट सय-मो (क-4) दूपल- योग शाक्यसिंह " विद्याकरप्रभ विशुद्धर्मिह जिनमिन दानशील प्रज्ञावर्म ज्ञानगर्भ सर्वज्ञदेव सूत्रालंकार मैत्रेयनाथ सूत्रालंकार-भाष्य असंग मध्यमकनयसारसमासप्रकरण विद्याकरप्रभ अमिधर्मकोश-टीका (स्फुटार्था) यशोमित्र अभिधर्मकोश-भाष्य बुद्धाऽनुस्मृति-टीका हेतुविंदु धर्मकीर्ति घसुबंधु वसुबंधु " मद्धर्याप्रणिधान-टीका अलंकारम्द स्खलितप्रमर्दन आर्यदेव योधिचर्यावतार "शनिदेव विनयप्रश्न सारिका महावैरोचनाऽभियोधि-मूत्र हेतुर्विदु-रीका दिनदेव धर्माकर शीलेंदयोधि प्रज्ञाकरवर्मा विद्याप्रभाकर (?) शुद्धसिद्ध दुपल-ग्यि-महुन्-पो ये-शेस-पनिड्-पो घसट-सक्यो दुपल-यह-म रिन्-छेन्-मछोग* (घोग-र) क्लुडि-र्यल-मट्ठन् विशुद्धसिंह झानगर्म रखच्दपरिपक्षा द्रुमकिन्नरमपनाम रखजारपत्र सूर्यगमरमर * प्रज्ञावर्म ( • गर्भ काल अनुवादक सदार, या गम- सामयिक अनुदिन अंध - सर्वदा (समीरी) । ४. . जिनमिन ( मानि प्रातिमोक्ष-सून-टीमा घादी) +4 गिटार যুগান্ত विनयविमंग-टीका विनय-गूग-सीरा (ट्स ) दरक्षित दीपंकर-पुग ( १८४२-१९०२) सुभाषित मिता মিঃনি १५८-१०५४ रिन्-ठेन- वस-पो मष्टपाहामिका प्रमापारि- হয়ঞ্জ कमलगुप्त अंजीनि.. विमलप्रश्नोत्तररखमाला अमोधरा धर्मश्रीभद्र (राजा). आर्यदेव पमारश्रीज्ञान श्रद्धासम्पर्मा पभाक्रवर्मा शुभशांति जनार्दन गंगाधर ध्यान-पड्-धर्म-व्यवधान-मृत्ति दान- शील अभिधानोत्तर-तंत्र हम्नवाल प्रकरण परमार्थ योधिचित्तमावना भयोग अभिसमयालंकारालोक हरिभद्र अष्टांगहृदय-सहिता सप्तगुणपरिवर्णनकथा चतुर्विपर्ययकथा मागार्जुन वसुध बुद्धभद्र मति-वित्र (मातृदेट) शाहि खुशीशांति धुल-तिम्स-योन-तन् ब्लो-लन्-शेम्-रय अायुर्वेद सुमागधावदान २४२.१०५४ दीपंकरश्रीज्ञान रिन-ऐन-मुट्-पो दुर्गाऽ यलो-ग्रोम् शाक्य-ब्लो-प्रोम् त्रिशरणमातिका वोधिपथप्रदीप समाधिसंवरपरिवर्त বীৰ काल अनुवादक ग्रंथकर्ता सहायक, या सम अनुपादित ग्रंथ सामयिक प्रोम-स्मोन विमलरश्मिविशुद्धप्रभा- धारणी (1) पोन्-गुस्सेड्-नो मध्यमकरसप्रदीप भाव्य ( भाव- विवेक) (नग-यो ) घुल-निम्स्- मध्यमक हृदय पर्यटन मध्यमक वृत्ति गशीन-नु-मछोग शेस-रय-परस् जि-यलो- बुद्धशाति मोस् सुभूतिश्रीशांति फरुणा( ज्ञान )श्रीभद्र श्री कुमार दीपंकरश्रीज्ञान योधिसत्वचर्यावतार कल्याणदेव संस्कार भवलोकितेश्वर-परिपृच्छा- सप्तधर्मक कालचकतंत्र संपुटीतंत्र शेस-रय-अगस् १०२७ सोमनाथ २०७४ मृत्यु (ऽमोग्-मि ) गयाधर शाक्य-ये-शेस् T अमोघवत्र गयाधर प्रज्ञागुम (ग्यि-जो) स-यह-ओद्-मेर् बुद्धकपारयोगिनी-संत्र (गोम्-सुग-प) सह-ब्धस् पनदाकतन (प्रोग्-मि) शाश्य-ये- हेयन्नतंगराज शेस् मुजनधीज्ञान परमादिमहायानापराज गुणाफरमद्र शिव-ओ अनुदिन प te सदार, R. सापित १०१ मा (1) Twो. मी इन-शे यीशान मनोरय भभामा kaar भभिगमन हरिमा, पोपिदि - प्रभारीमा চিঙ্গা मुमनिमोनि ময়মলিখামশাখা লাশ घोधिचितपाइसमा- गारि গ্রাম भाभदाय' तिमद्र महाजन ( पश्मीरी) (नाति यमुर्दा मंजुश्रीम धमधमताधिभगति महापानोरयाणा भग भमोरासपारमि- साधारणी भपादमरण न्यायपिंड प्रमाणधिनिशय भध्यरात्र परहिनमद्र धौर धर्मकीति १०५५ जन्म (प-इ) नि-म- पुण्यामर मुदितश्री सूक्ष्मज्ञान नागार्जुन तिरुकलश कनकदम अपरिमितायुर्मानदयः घारणी युमिटिकापारिया घातकशास्त्र भायंदेव , मध्यमकामतार-भाष्य अभिधर्मपोशटीका (लक्ष- ( पूर्णयर्द्धन ) णानुमारिणी) मूलमध्यमति (प्रस- चंद्रकीर्ति प्रपदा) चंद्रकीर्ति दमुमति अजितश्रीमद्र अष्टाक्षणकथा अश्रधोप काल अनुवादक अनुवादित ग्रंथ ग्रंथकर्ता सहायक, या सम- सामयिक (यो-से-कर, शांतिभद्र ( नेपाली ) विज्ञप्तिमात्रतासिद्धि रत्नाकरशाति शाक्य- " " कुमारकलश मध्यमकालंकारवत्ति चंद्रकुमार महायानविशिका नागार्जुन सुमापिनरलकरंड (महाकवि) हर्ष अनंतश्री ( नेपाली) कार्यकारणभावसिद्धि ज्ञानश्रीमित्र छोस-पिय-शेस्- ( मर-प. ) छोस्-फ्यि- वड्-प्युग स-स्क्य-युग (१९०२-१३७६) पुल्-सिम्स्-ऽव्युङ्-गनस् अलंकदेय विनयसुग्रव्याम्या प्रझाकर जातकमाला हरिमद ११८३. ' ( यर-लुइ-प ) अगस्- धर्मघर प्रतिमामानलक्षण आत्रेय १२.० पर्यल्-महन् फीर्तिचंद्र लोकानंदनाटक चंद्रगोमी अमरकोप अमरसिंह टीका ( कामधेनु) सुभूतिचंद्र १०३ जन्म (खो-फु) म्यम्म्-पडि-जगन्मित्रानंद ( भिन्न- चतुरंगधर्मचर्या मवान्द पल् योगी) शाक्यश्रीभद्र महायानोपदेशगाया शायधीमद शाश्यत्रीमद (यो-पु.) म्यम्स्-पहि- मप्तांगधर्मर्यावतार पल्ट घोधिचिरावरमारण- अभयाकर द्म-चोम् विधि धर्मकीर्ति कुन-दगड-य-मान् प्रमाणशक्षिक- सारित मागानंदनाटक धाइपदेय (गा-मोन् ) दोन- मीयर म्पद मपन् योधिपत्यावदान- " 11२२. शाक्यश्रीमद्र १२२५ द (म्दा.
काल पंधीति " १३०१.८० मद्-दुर धामी (प्लोर्तन-पोन्-पा) कालिदास यनरत स्थिरमति सहाय, या मन- अनुदित ग्रंथ सामपि समीकर चरपलता पाग्यादर्श १२९० (-स्तोत्र ) रिल्भटेन- (पलाप) धातुकाप दुर्गनिह १३१४) स्मार्थतप्ररिया मुमनश्री मवश्लोको আনুষ' मुमनधी (कदमोरी) मेघदूत अभिधर्मसमुशायटीका चोद-ए-प-पुग ( १३५५-१६६४) १३८१. {गोस्) यिद्-यय-ये- १४६८ ग्योन्-नु-पैर (जन्म १३५२) { स्तर) दोस्-रस-रिन्- छैन् (जन्म १४०५) शेस्-स्य्-यस् (जन्म १४२३) (ग) धर्म- अभिधर्मकोशटीका पालभद जन्म १५२७ कासगणित ईसरवर्तस्वनिराकृति नागार्जुन मंशुधीशदलक्षण वृत्ति (Zल-रयम्स्प) कृष्णमा (कुरक्षेत्र) सारस्वतव्याकरण बुन्-गई- বান্ধায় -सन्दि-पो (तारानाय) जन्म १५७५ धर्तमान युग (१६६४-") १६६५ फुन्-योग-हुन्- गोकुलनाथमिश्र (कुरक्षेत्र) प्रक्रियाको मुदी (१६५८) रामचंद्र पुत्र पलभद् सारस्पतच्याकरण अनुभूति- (१६६५) কথাষাৰ गौतमभारती मांकारभारती आयुर्वेदवारसमुच्चय उसमगिरि (१६६४) ' यह सुधी पूर्ण नहीं है। इसमें सिर्फ समकालीन मनुयादों को दिखलाने का प्रथम , किया गया है। तेरहदका लामा मुनि शासनसागर का (अगहन की अमावस्या ) को eminer मग्यकोर्स देव (कलिंगराज अनुभूतिस्परून - mi १८ दिसंबर .
No text on this page.