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Prasad Ke Natako Me Niyativaad

Sharma,padhyakar · 2010/12

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प्रसाद के नाटको मे नियतिवाद
पद्माकर शर्मा
रचना प्रकाशन
इलाहाबाद-१.

प्रसाशक- जान मसगैका रचना "न ५ एमरवाग गर लगवा'-१ प्रयम सस्करण मूय माठ रुपए पावरमा चाम ४७ माजरनार दणमा-२ भूमिका अनेक विनों ने यिति को मात्र भाग्यपरक मानकर प्रसाद के नियति पाद का विवेचन किया है । रितु थी पद्माकर गर्मा ने प्रस्तुत गोप निबन म उत्त मा यता या सन्न करते हुए निष्कप प में नियतिविषयक निम्न निषित पाठ मसातिया (Facets) पालो म प्रसाद नाटक साहित्य मे नियतिवाद का यद्धि-सगत तया प्रमाणपुरस्सर विश्लेपण किया है- (१) प्रतवाद (२) कमवाद (३) नियतिवाद (Determinism) (४) नियति और विश्वकल्याणवाद (५) नियति और नियामक (६) दववाद (७) पूर्वनिर्दिष्टवाद तया (क) सोन्यवाद श्रीगर्मा की दृष्टि में प्रसाद की नियति-सम्बधी धारणा कोई स्थिति पोल प्रत्यय (concept) नहीं है प्रसाद के व्यक्तित्व के विकस के साथ साथ उनको एतषियक धारणा भी विकसित होती रही है । इस विकास के मूल मे उनके व्यापक अध्ययन तथा वयक्तिक अनुमय की झलक प्रतीत होती है। समय है ये स्वभाव से भाग्यवादी रहे हों किंतु विविध गास्त्रों के अनुशीलन द्वारा उहें नियति के प्रोक रूपो के दान हुए हो । यो पाकर की समी स्थापनामो से सहमत होना भले ही समय न भी हो, फिर भी उनके स्वतत्र चितन का प्रपना मूल्य है जिसका मैं स्वागत करता हूँ। अध्यक्ष हिन्दी विभाग रिती विश्वविद्यालय -नगेंद्र

बालाचते व पिता ना निधीवति पोरय
नवायो सत्वविरिव दय विमानपेक्षते ।
-पालवप रितीय सा
लोक ६.

उपक्रम प्रस्तुत गोध निव ध मरे एम० ए० (उत्तराघ) के पाठवें प्रश्न पत्र के स्थान पर लिया गया है । बा० ए० म पागल माहित्य के विद्यार्थी रूप में मरा ध्यान हाही की नियति भावना की धार सर्वाधिय प्राइष्ट हुा । वस्तुत वहा रुझान परमारणीय डा० सहल साहब वो मान प्ररणा पावर इस रूप में पल्लवित-पुष्पित हुअा है। विपय को व्यापक रूप स हत्यगम करने के लिए मुझे पद विद्वानों से भी चर्चा-परिचर्चा करनी पड़ी जिनमें सवश्री बच्चन जी सम्मी नारायण 'सुधातु' तथा हसकुमार तिवारी व नाम उल्लेखनीय हैं। सभी ने इस विषय भी सराहना की और मेरा माग प्रास्त दिया। प्रथम प्रयाय में मैंने "युत्पत्ति और प्रवृत्ति दोना सदों में 'नियति' दा" को सभेप म व्याम्या की है। तत्पश्चात् नियति' में पर्यायवाची । पर विचार करते हुए उनका वर्गीकरण किया है। रस वर्गीकरण प्राधार पर मैंने नियति को तीन प्रथ-त्रमा नियमपद्धति रतनसत्ता और भाग्य-लिए हैं। मी अध्याय म नियतिवाद के सम्बन्ध में कतिपय पाचात्य मता का भी उल्लेख कर पिया है। तिीय अध्याय मे भारतीय वांगमय के माधार पर नियतिवाद के उदद भोर विरास का विहगावनोक्न (ऋग्वेट से मोगवासिष्ठ तक) प्रस्तुत किया है। तृतीर अध्याय म कालसमानुसार प्रसाद के समस्त प्रकाशित नाटको म नियति व स्वरूप का विवेचन विलेपण पिया है । इसे मैंने तीन विदुप्रो- नियति विपया सन्म समीक्षण पोर निष्कप-३ माघार पर यथासाध्य स्पष्ट करने का प्रयास किया है। चनुय प्रत्याय में मैंने प्रसाद के नियतिवाद पर समग्र रूप से विचार दिया है और यह रिवान या प्रयास किया है कि उनकी नियति विषयक परिव पना म विकाम भा है। इस विकास को मैंने नियति की माठ 'भुमार लिया स दाया है। हम गोध निव य म मरी कुछ मौनिय उपलधियाँ भी हैं। नियति के पयायो या गम्बर विवचन सम्भवत सवप्रथम में ही प्रस्तुत घर रहा हूँ। नियतिवाद को अधिकार विगना 1 भाग्यवाद कहकर ही सतोष पर लिया है। धु' कोबारा ने भी इस ध्रम को दोहराया है। यहाँ तद निख पिया गया है कि भाग्यबाट मात्र एक वचारिक प्रवृत्ति है दानिर सिक्षात नहीं (दखिए पृ०४०)। ग मम्वच म डॉ० रामगोपाल शर्मा दिने का गाध प्रवच त्रिीय मतियतिवाद भी उलेखनीय प्रप है किन्तु इसके पान भी नियति या भाग्य का पयाय ही माग है। वस्तुत नियति का एप प्रय भाग्य' भा हा सपना है रितु माग्य ही नही। मैंने नियति' पायों परण माघार पर सशर को तीन भय लिए हैं (देखिये पृ० १५-१६) नियति या यह त्रिविध स्पष्टीवरए इसने पूर्व विसो सभी क्षर द्वारा नहीं किया गया था। प्रसादजी की नियति भावना को मैंन कहीं वही ग्रोक्वासिया की भाग्य सम्ब धी मान्यता का प्राभास दते हुए भी मूलन वनिक मतापित क्मवाद सिद्ध किया है और उसके आगामी विकास को भी आठ मुखाकृतियो द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया है-जाकि मरा अपनी उपलधि है प्रसाद की नियति भूनत ऋतवादी है--मरा स मा यता का समथन धामती महादवा वर्मा न भी किया है ( दखिए पृ० १३३ ) और वह कमवादी है-यह तो प्रसाद जी के निवधा से भी स्पष्ट हा जाता है। अपन इस गोषकाय के अनगत मुम भी नियति नटी के कई प्रयाप भगाने पडे । अभी काय प्रारम्भ हो पिया था पूध जीजाजी नी दवे नाथ ठाकुर का स्वगवाग हा गया मोर मुझ लम्बी यात्रा पर बिहार जागा पण तपश्चात हाम्टर व कमर म पग्निदर का प्रकोप हुमा मौर अधिवा सिवित गामग्री स्वाहा हो गई। वितु मैं भी प्रसाद व नियतिवादी पात्रो की तरह वम क्षेत्र म प्राण पण म जुना ही रहा। अपन इम अध्ययन स मुभ यह प्रतीति २६ है कि नियतिवाद एक अत्यन्त गहन और विस्तृत विषय है। फिर प्रमा? की नियति तो और भी अधिर गुट पौर दुरुह है । मत मैं ता मपनी "क्ति-सीमानाम इस विषय का स्पर मात्र ही कर पाया है। रितु मरा यह मषिचन प्रयाग भी यनि रिसी बसपाहीशी भी निगा दृधि दे सकता मैं स्वयं को उपहन समझगा। अन्त म उन समस्त मगनुभावाका हत्य स भाभार प्रकट करता हूँ जिनरा स्नहना पोग मुभप्रया पयवा परोपस मिला है । परमपूय डॉ. मा-बी का मैं मयत मामारी है विहान भूमिका लिम्बार मुझ माय किया । म गोप निव य व नि* परमगुरव याला जो गर निता मामार पट करत हा भा मशाही रग क्यारि उना गरिमामय पपिल नाम निरप का पति-पति म म्वय ही उपस्थित है। नम मह रहाका महता प्ररणा और गुमागीयों का पम है, ना मात्र एमाधम हाह।

विषय-सूची ६२८ है ३ १६ २२ २४ २७ २६३६ २६ नियतिवाद सद्धातिर विलेपण (१) नियति र कालय (२) नियनि के पयाय (३) निगनि के पर्यापा का वर्गीकरण (१) नियतिवान विषयक कतिपय पाश्चात्यमन (५) भौतिक बिनानौर नियतवाद (६) अस्तित्ववान और नियनिवार (७) हार्डी का नियनिवाट भारतीय नियतिवाद का उमव और विकाम (१) बटिक तवार (२) उपनिषद् साहित्य (३) पौराणिक साहिय (४) महाकाव्य-साहित्य (५) भारतीय दान प्रसाद नाटको मनियतिवाद का स्वरा ११) सजन (२) प्रायश्चित (३) करुणालय (४) रायथी (५) विकास (६) भजातपत्र (७) जनमजय का नागपश (८) पामना (E) स्कदगुप्त (१०) च गुप्त (११) एव पूर (१२) ध्रुवस्वामिनी समाहार चयनिषा ३६ ५११२० ५२ ५५ ७३ ८७ १०४ १२११४०

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नियतिवाद सैद्धातिक विश्लेषण
"नियति' शब्द का अथ
व्युत्पति की दृष्टि से नियम्यते प्रात्मा अनयति नियति र अर्थात्
मात्मा की नियामिका शक्ति नियति है । काव्य प्रपा' के रचयिता
मम्मटाचाय ने भी वाणी को वदना करते हुए नियति' श द को इसी अथ
में व्यवहृत किया है २ जिससे स्पष्ट है कि नियति' नियमो की समष्टि
के रूप में उसे भी स्वीकाय है ।
प्रवृत्ति निमित्त पथ को लक्ष्य में रखते हुए नात होता है कि नियति'
का प्रयोग भाग्य दव अदृष्य भागधेय विधि भवित यता दष्टिकता प्रार ध
फम भोर ईश्वरेच्छा के पर्याय के रूप में भी होता रहा है। अमरकोशकार
न "नियति का प्रयोग इसी रूप में किया है।' सस्कृत के महाकवि माघ
ने भी भासादितस्य तसमा नियतेनियोगात्' के द्वारा नियति' वाद का
प्रयोग भाग्य या दव के प्रप में ही किया है। वाछनीय समझकर नियति
के पर्यायो की पृषक पृथक थारुया नीचे दी जाती है ।
"नियति' के पर्याय
भाग्य व्यक्ति के हिस्से (भाग) मे जो कुछ करना मोर भोगना हाता
है उसे भाग्य रहते हैं। प्रल भाग्य वह भक्ति है जो प्राणी मात्र
(१) पदकल्पद्रम खण्ड २ पृ० १८६
(२) नियतिकृतनियमरहिताम
-काव्यप्रकार उल्लास १, श्लोक १
(३) भाग्य के हो अपर पर्याय देय विधि नियति ईश्वरेच्छा
भक्तिभ्यता और प्रारम्य हैं ।
हिंदी साहित्यकोग रेद्र वर्मा), पृ० ५४०
(४) दय दिट भागषय माग्य स्त्री नियतिविधि
हे तु कारण मोज निदान त्वादिकारणम
-अमरको काग १ श्लोक २८
(५) माप गिपासषय, ४-३४
(६) हिदी साहित्यको (धीरेद्र यर्मा) पृ० ५४०
.

१० प्रसार नाटकाम नियतिवाद भाव प कम वा स्वतत्र प म प्रभावित करती है और उस जिधर चाहे मोड ता है। यह वह प्राग्यक्ति है तो मानव जीवन म घटित होने वाली पटनामाका मचाउन करती है ये व्यक्ति या समाज को प्रभावित करती है जा पूर्व निर्धारित हाता है म पर विमी का वा नही चलता जो अपरि यवनाय है और रिमा विमी का पूर्वज्ञान नहीं होता। इसलिए भाग्य का मध पराम जान से माना जाता है मोर मनुष्य उमक विषय म बुध भी बहन म गवा प्रममय हाता है। उन विश्वन कपनमार भाग्य या गाकि अप भग हिस्मा या सण्ड मान न पर - पर एक और ति स भी विचार किया जा गाना।। वि व वा समस्त वम्तए हम दा स्वरुप महाप्टगोचर होती है एपनि और गगनपान-गर 11 म समष्टि रुप यस्तु मोर वगर पग्ला । 78 7 अमृत स्वरुप है पोर प्याट मृत्यु प। धन पमृत ग मापूरित "म ममण्टि वा एक भाग या मग ही हम प्राप्त होता है। PAT मिनन वार गाग या ा यात है उमी को कुछ लोगा। नागना है। म भनगर ramar दूसरा नाम है । पर गान है। वर गवग्याप मोर सवन है। वाममात पातिया पा मचान और निकाहै। मरिए मनन्य वा समा बाता और पानासोमाभाव हापा म है। पलाम पम म / मार का एमा हा उ म मिलता है। उगम मनगर #T मरमा है मिरिम्मत नमाव भारत और किसान समस्त भौतिक नियम। पर स्थायी और पनत है। माप बदमम्य नि है कि पारण जनरल पाना है।' माय (१) मा पान वान प्रादान मापवान सातादित भाना -५-१६) नियतिवाद सदातिक विश्लेषण भाग्य की महिमा से महाभारत भरा पड़ा है। भाग्य के सम्मुख ययाति पौर घराष्ट्र दानो ही निप्चप्ट हो जाते हैं। भीष्मपितामह का पुरुषाथ भी भाग्य के भागे शिमिल सा दीख पडता है । घमराज तो सवथा भाग्यवादी बने हु" हैं। उनका विश्वास है कि भाग्य ही अन्तिम और चरम सत्ता है । भाग्यहीन पुरप बलवान होने पर भी धन प्राप्त नही कर सकता और जो भाग्यवान है वह वालक और दुबत्र होने पर भी पर्याप्त धन प्राप्त कर लेता है। घृतराष्ट्र भी क्सिी बान के होने या न हाने मे मनुष्य का नही भाग्य का ही हाथ मानते हैं। विधाता सूत में बधी कठपुतली की भांति सवको नचा रहे हैं।' सारा में भाग्यवाद वह वचारिक प्रवृति है जिसके प्रभाव से मानव जीवन म स्वतत्रता को अवास्तविक समझा जाता | इसमे यन तत्र धार्मिक विश्वास का भी पुर है जिसक कारण कभी कभी भाग्य को ही ईश्वरेच्छा मान लिया जाता है । सभी युगो में भाग्यवादी मा यता ने चितन पर पर्याप्त प्रभाव डाना है। दव - 'दव का युत्पत्तिलभ्य अथ है देवता सम्बधी। कोकार के अनुसार दव का तात्पय है देवता सम्बधी देवता का क्यिा हुआ, प्रारध भाग्य प्राति योगवासिष्टकार न भी भाग्य के रूप में दव नाम न विचन दवन विद्यते प्रादि वह कर यत्र तत्र इस शद का प्रयोग किया है। कुछ स्थानो पर पूर्व जम मे किये गये शुभाशुभ कर्मों के मथ म भी दव का प्रयोग मिलता है। वितु प्रमुखत यह र भाग्य के पर्याय स्पम ही सर्वाधिक प्रचलित है। (१) मामागपय प्राप्नोति धन सुयलयानपि भागयया यतस्त्वर्या गो बालश्च विदति । -महाभारत अनु० ५०, म० १६३ पृ०३२३ (२) अनी यरो य पुरुषो भयामवे सूत्रप्रोता दारमपीव योषा पायातु दिष्टस्य दो क्लिाय तस्माद् ववत्व श्रयण घतो हम । -यही उद्यो० प० २६... (३) देवस्यद दय प्रण (तस्यदम प्र० ४-०-१२०) (४) नालदा विशाल गर सागर पृ० ६२० (५) B_L Atreya : The Philosophy of the Yogavashistha P 130 (६) पूष नाम त म सद्द धमिति प्यते ।

१२ प्रसाद के नाटका म नियतिवाद ३ दव अथवा भाग्य की महिमा सवत्र गाई गई है। ब्रह्मववत पुराण म लिया है हिजम कम अशुभ सभी दव के अधीन है। यही नहीं सारा ससार एकमात्र दवाधीन है। इस कारण दव से अधिक और कोई बल नहीं है। मत्स्य पुराण म दव का वरणन विस्तार पूवव किया या है। मनु के यह पूछन पर दिव और पुग्पाप म कौर अप्ठतर है मत्स्य ने कहा कि दव हा पुरपकार स थष्ठ है। अदर --मामा यन प्रहप्ट गर प्रारप भाग्य प्रयवा किस्मत के प्रय म प्रयुक्त होता है, मिनु कपिरान उत्तर की निनावित व्याख्या पा है प्राचीन वापर साग प्राग्गिया के धम रूप अदृष्ट का परमागमा प्रथम स्पा कारण बताते हैं। परप्ट के सम्बन्ध में उसकी दानित पत्सना या विनमरा है। प्रस्तान मणि की भोर म्य को रवाभाविक गति पृपा भीतर रम का नीच से उपर घना' अनि की मपारा उपर उपना वायुपी तिरमा गति अदृष्ट जय बताई जाती है पर पीय भाचार्यों न प्रहए का महङ्गारिता से ईश्वरधा रा ही परमागमा म स्पन्न तथा तत्रय मृधि क्रिया मानी है।" যদি পা দিয়া বা স 3 বিন হিমশিম पपा नियतवार समिता उरता है। बम -म- कोन अथ है, वह जा किया जा वाय रिन्नु माघारग बासवान की मापा म बम बिया र ५ मापन गया है। दन मम का एर विर प्रय है। मनुष्य व वाय र कार पर पर उहता है। यह पत गुन मभ या () frreदि का (न' पु) भाग १० पृ. ६९२ ()| पृ ६९२ ()मागमन ममिमरनियाट रगम । (4 मूत्र-१-१५) (३) सपनिमा पसारितम (५-२-७) ()मय R मारतार न पृ ) " मा १० भाद प्रारघ नियतिवाद सद्धातिक विश्लेषण इन दोनो से भिन भी हो सकता है। दान शुभ कम है किन्तु हिंसा अशुभ । यहाँ क्म का प्रयाग किया और फ्ल दोनो क लिए हुआ है। अत त्रिया से फल अवश्य उत्पन होता है किन्तु शरीर को स्वभाविक कियाए-ग्रास की पलको का उठना-गिरना सास लेना प्रादि-कम की वोटि मे नही पा सक्ती। क्रिया म जव भावना मिल जाती है तभी कम होता है।' कम म विश्वास रखने वाला का मत है कि ससार म कोई राजसी ठाठ-बाट से रहता है और कोई दर दर भटक्ता है इस वषम्य का कारण म ही है, भाग्य नहीं। किसी की वतमान दशा उसके पूवकृत कर्मों के शुभाशुभ फल के कारण ही उदित हाती है। कम विषयक इसी भावना ने भारतीय दान मे कमवाद को जम दिया। कमवाद की उत्पत्ति के विपय में ये पस्तियां अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं कमवाद की प्रथम अनुभूति वदिक यन के विधान में होती है। वदिक विश्वास के अनुसार यदि यन का विधिवत् सपादन दिया जाए तो उससे एक अदृश्य शक्ति उत्पन्न होती है । इसे अष्ट' अथवा अपूव कहते हैं। यही उचित अवसर माने पर यज्ञ के वांछित फल को उत्पन्न करती है। इस प्रकार यज्ञ का फन मनुष्य को अवश्य प्राप्त होता है। इस कम और फल के सम्बध घी सावभौम नियम के रूप में अभिव्यक्ति सवप्रथम ऋग्वेद के 'ऋत के सिद्धा त म मिनती है । २ प्रत क्मवाद का मूल स्रोत ऋग्वदिक ऋतवाद ही है। यमवाद पोर पुनज म का भी अटूट सम्बध है। कमवादी मानते हैं वि यह आवश्यक नहीं कि कम भोग भी वही गरीर परे जिसन कम किया है। कम भाग के लिए वर्ता दूमरा "रीर धारण करता है। यही पुनज म का सिद्धात है। मृत्यु गरीर की प्रानुपगिक स्वाभाविक रिया है । जिसका पम पर कोई प्रभाव नहीं होता। प्रत मवाद को पुनजम से पृथक नहीं किया जा सकता। (१) हिदी विश्व कोष (ना० प्र० स०) भाग २, पृ० ३६८ (२) वही पृ० ३६६ (३) परी, पृ० ३६६ प्रसाद के नाटकों में नियतिवाट 'दव अयवा भाग्य की महिमा सवर गाई गइ है। ब्रह्मववन पुराए म लिखा है कि जम कम अशुभ सभी दव के अधीन हैं। यही नहा सारा ससार एकमात्र दवाधीन है। इस कारण देव से अधिक और वाई बत नही है। मत्स्य पुराण म दव का वणन विस्तार पूर्वक किया गया है। मनु यह पूछने पर कि दव और पुरुषाथ म कौर श्रष्ठतर है मल्य ने कहा कि दव ही पुरुपकार से श्रष्ठ है। अदृष्ट -सामा यत प्रदृष्ट गब्त प्रारघ भाग्य अथवा विस्मत क अथ म प्रयुक्त होता है, नितु वोपिका ने उक्त T की निन्ननिखित व्याम्या की है - प्राचीन वोपिक लोग प्राणियो के धम रूप प्रहप्ट का परमारामा के प्रथम स्पद का कारण बताते हैं । अदृप्ट के सम्बध में उसकी दाानिक पल्पना बड़ी विलक्षण है। अयस्त्रात मणि की आर स्य की रवामाविक गति ३ वृक्षा के भीतर रस का नीचे से उपर चना प्रीत की लपटा का उपर उठना वायु की तिरछी गति अदृप्ट जय बनाई जाती है पर पीछ क प्राचार्यों ने अदृप्ट की सहकारिता से ईश्वर छा से ही परमागमा म स्पटन तथा त जय मृष्टि क्रिया मानी है।' वशेपिका द्वारा किया गया अरष्ट' का उक्त विवचन हिरमिनिम भयान नियतवार से मिलना-जुलता है। कम -कम ग का कोरगत अथ है, वह जो किया जाए वाय माम हत्य भाग्य प्रार घ किन्तु साधारण बोनचाल की भाषा म कम प्रिया व अथ म भी प्रयुक्त होता है । दान म कम T वा एक विशिष्ट प्रय है। मनुष्य के काम से काइ न को पर अवय उत्प हाता है। यह फन गुभ अशुभ या (१) हिदी विय को (नगद धसु) माग १० पृ ६६२ (२) वही पृ ६६२ (.) मणिगमन स पमिसपणमित्यरष्ट पारणम् । (५० सूत्र ५-१-१५) (४) वक्षाभिमपमणित्यदष्टवारितम (वही ५-२-७) ७) बलदेव उपाध्याय मारतीय दान पृ ३ ५ ()माला दाल र सागर पृ २१० ।

नियतिवाद सद्धातिक विलेपण १३ इन दोनो से भिन्न भी हो सकता है। दान शुभ कम है किन्तु हिंसा अशुभ । यहाँ कम का प्रयोग किया और पल दोनो के लिए हुआ है। अत प्रिया से फल अवश्य उत्पन हाता है किन्तु शरीर को स्वभाविक कियाए-आँख की पलका का उठना-गिरना, सास लना मादि-कम की कोटि मे नहीं आ सकती। मिया म जब भावना मिल जाती है तभी कम होता है।' वम में विश्वास रखने वालों का मत है कि संसार में काइ राजसी ठाठ-बाट से रहता है भौर कोई दर दर भटक्ता है, इस वषम्य का कारण कम ही है। भाग्य नही । क्सिो की वतमान दशा उसके पूर्वकृत कर्मों के शुभाशुभ फ्ल के कारण ही उदित होती है। 'क्म विषयक इसी भावना ने भारतीय दशन म कमवाद' को जम रिया। कमवाद की उत्पत्ति के विषय में ये पस्तियाँ भत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं कमवाद की प्रथम अनुभूति घदिक यज्ञ के विधान होती है । वदिक विश्वास के अनुमार यदि यन का विधिवत सपादन किया जाए तो उससे एक महश्य गक्ति उत्पन्न होती है । इसे 'अट अथवा अपूच कहते हैं। यही उचित अवसर प्राने पर यज्ञ के वांछित फर को उत्पन्न करती है। इस प्रकार यज्ञ का फल मनुष्य को प्रवन्य प्राप्त होता है। इस बम और फल के सम्बध की सावभौम नियम के रूप म अभिव्यक्ति सवप्रथम ऋग्वेद के 'ऋत क सिद्धा त म मिलती है। २ मत कमवाद का मूल स्रोत ऋग्वतिक ऋतवाद ही है। यमवाद मोर पुनजम का भी अटूट सम्बध है। वमवादी मानते हैं कि यह प्रावश्यक नहीं कि वम भोग भी वही गरीर र जिसन कम किया है। कम भोग के लिए पर्ता दूसरा शरीर भी धारण करता है। यही पुनगम का मिदात है। मृत्यु दारीर की प्रानुपगिक स्वाभाविक किया है । जिसका पम पर कोई प्रभाव नहीं होना । अत क्मवाद को पुनम म स पृथक नहीं किया जा सकता। (१) हिदी दिव को (ना० प्र० स०) माग २ पृ० ३६८ (२) यही पृ० ३६६ (३) यही, पृ० ३६६ प्रसाद के नाटको में नियतिवार तत्त्व गितको ने सचित त्रियमाण (धतमान) और प्रारक भेट से कम यी ती गतियां बताई हैं। अनेक जमो म सचित किये हुए पुराने पर्म को राषित बम पहते हैं। बहुत समय से सचिन किया हुअा गुभ अथवा पशुभ पम पर्तमान जम मे पुण्य एव पापक रूप सामने भाता है। प्ररपेयं जम मे प्राणियो द्वारा क्म सचय होता रहता है। जो क्रियमाण कम है। उसी को वतमान कम कहते हैं । दहधारी जीव शुभ अथवा अशुभ रूप म पम मे प्रवृत हो जाते हैं । शरीर धारण कर लेने पर काम की प्ररपा से पर्म त्रम पालू हो जाते हैं। प्रारघ कम उसे समझना चाहिए जो सचित में से प्रारम्भ हो गया है। शानी को भी प्रारष कम मवश्य भोगना पड़ता है इसमें कोई समय नहीं। यह निश्चित है कि पूर्व जम में किये गये जितने पच्छ पौर पुरे षम हैं उनक फल पतमान ज म मे सामने पाते हैं। उहें भोगना प्राणियों के लिए मनिवार्य हो जाता है । मनुष्य दवता यक्ष गधर्व पौर नितर सभी कर्म भोग मे परतत्र है। देहधारण करने में भी कम ही मुख्य पारण है। मनुष्य क यतमान सुख-दुख पूर्व जाम क म क ही परिणाम ६। सगे शिद है कि भनेय जमो म सचित जितने कम उनमे से कम एए एर कम पा भोग प्राणिया क सामन समयानुसार प्राता रहता है । दवगण भी इनरो नही यच रारो।' पम पे हद समथर युद्धिवादी मीमासर हुए हैं जिनका कहना मानव जीवन का सबसे वा चमत्कार | उहाने यह प्रतिपादित दिया है कि कम ही वह शक्ति है जिस माग हाता है। बम किया जाता है। भाग्य की ही होती है ही का दूसरा नाम पुरु र भाग्य ला नियतिवाद सद्धातिक विश्लपरा महाभारत में भी कम का महत्त्व अनक स्थला पर उद्घाटित किया गया प्राणी बांधा जाता है और विद्या से उसमा छुटकारा हो जाता है।' कम की पक्ह इतनी गहरी है कि उससे जम जमान्तर में भी छुटकारा नहीं मिलता पूर्व की सृष्टि म प्रत्यक प्राणी ने जो को बम विये हाँग ठीर वे ही कम उसे ( चाहे उसकी इच्छा हो या न हा ) फिर फिर पथा पूवर प्रास होते रहते हैं । शान्ति परम भीष्म युधिष्ठिर से कहत है, हे राजन्, यदि यह देख पई कि किमी व्यक्ति को उसके पाप-कर्मों का फल नहीं मिला, तो समझना चाहिए कि वह फल उसके पुत्रो पोत्रो और प्रपौत्रो को भागना पड़ेगा। वास्तव मे कमवाद भारतीय दानों में अधिकार दशनो का प्रमुख स्वर रहा है। बल्कि साहित्य म मा कमवाद की ही महत्ता गायी गई है, भाग्यवाद अथवा नियतिवा- यहाँ ढूढने पर भा नहीं मिलेगा। हमारे सुधन नियति न मानते थे। उनका यहाँ तक विश्वास था कि जो लोग नियति मानते हैं वे बुद्धिमान नहीं क्याकि एसा विश्वाम रस कर कोई भी साँप के मुह म ना धुमता कि कपाल में जो लिखा है वह अवश्य होगा। उपरोक्त वणनो से सपा हो जाता है कि भारतवर्ष में जहा एक पोर भाग्यवारी भावना का प्रचार प्रसार था वही दूसरी भार बमवार भी यापन रूप स प्रचलित था । यह कमवाद भाययाद म कोमो दूर था। पश्चिम म शिरा काम कारण परमग हीन भाग्यवाद का विकास हुमा भारतीय कम वाद म उस झलक मिलनी भा मुश्किल है। कमश्रा एवं सवथा वजानिक सिद्धान्त रहा है जो साय और कारण की परम्परा को लार चला इसके मपिता देव वरुप का वणन भनेक स्थलो पर किया गया है । अत भारत पासी मूलत कम के पुजारा भौर इनके इस कमवार को भाग्यवाद पदापि नहीं बहा जा सकता। (१) कमणा बध्यते जन्तुविधा तु प्रमुच्यते-महाभारत गात २० २४०७ (२) येषां पे पानि कर्माणि प्राकसष्टयो प्रतिपदिरै तायेव प्रतिपद्यते सपमान पुन पुन । वही २.१-४८ (३) पाप कम त चिति तस्मिन दृश्यते नृपते तस्य पुत्रषु पोत्र प्वपिध सप्त५ । यही १२६-२१ (४) हिन्दी विश्वमगेनाप बयु) भाग पृ. ३३४ प्रसाद के नाटकाम निपतिवाद - विधि -साधारणत इस शाद का प्रयोग किसी काय वा सम्पाटिन करने के ढग राति या प्रणाला है अथ म होता है। गात्रा में विधि 17 घम का उस मामा के रूप म प्रयुक्त होता है जिसका पालन नियमानुसार अवश्य किया जाना चाहिए। कि तु दान म यह ए प्रति नियति भाग्य प्रारध तादीर अदृष्ट और कम के पर्याय के रूप म भी यत्र-तत्र प्रयुक्त होता है ।' विधीयते सुखदु ये अननति विघानि अर्यात 'विधि वह है, जिसके गरा मुख-दु मे का विधान होता है । भागधेय भागवय स तात्पय है भाग्य किस्मत प्रारबध । हिदी विश्व को मे इसकी परिभाषा भागन धीयते सौवा कमरिणयत् कल कर दी गई है। स्पष्ट है कि इस गद का प्रयोग भी भाग्य के अथ म हाता है। प्रारब्ध -- प्रारध का गावि पथ है प्रारम्भ किया हुआ । अर्थात जिस कम का फल भोग प्रारम्भ हा चुका है उसे प्रारध कहत हैं।" किन्तु इस T? का प्रयोग अदृष्ट भाग्य और किस्मत के पर्याय रूप में भी दिया जाता है।६ ललाट रेखा ---साधारणत लनाट 4 अथ मस्तक अथवा माथे स लिया जाता है किन्तु यह नो प्रचलित है rि छठी के दिन भाग्य देवी पावर माथे पर मनुष्य का भाग्य लिख जाती है और उसी के अनुसार ही उस जीवन यापन करना पडता है। टस लिखावट म राई रत्ती भी परिवतन असम्भव है । Tलाट के इमी लेख का लगाट रेखा कहते हैं । इसलिए इस पाट का प्रयाग भाग्य या किस्मत का रिखा नलाट म तिखा होना भाग्य या विस्मत में लिखा हाना के रूप म होता है। (१) हिदी विश्व-कोग (नगदनाय वसु) भाग २१ पृ० ४०७ (२) वही पृ० ४०७ () मालदा विगाल गर सागर पृ० १ १६ (४) हिदी वियोग (नगनाय वसु) माग १६ पृ १५ (५) नाल दा विनाल र सागर पृ० ६१८ (६) हिदी विश्व को (नगेनाम वसु) माग १४ पृ ७३८ (७) नारा विगार म सागर पृ० १२०४ नियतिवाद सदातिक विश्लेषण भवितव्य --भवितव्य का प्रथ है अवश्य होने वाली दान होनहार भाग्य, अदृष्ट इमका गारिक प्रथ है हाने याग्य विन्नु यह भाग्य क अथ में भी प्रयुक्त होता है। यथा अथवा भवितव्यताना द्वाराणि भवति सवत्रा दयिता -दप्टिक का अर्थ होता है भाग्य के भरोस रहन वाला। इसी स दष्टिकता' शादद्भूत हुआ है । प्रत इस T का अप भी भाग्य अथवा प्रारध ही है। दिष्ट -'निष्ट' का अर्थ है नियत अथवा अवश्य होने वाला जता कि निर्दिष्ट प्राति से स्पष्ट है । इस पर का प्रयोग भी निपनि दष्टिकता आदि के प्रयों में दिया जाता है। भाग्याथ भाग्य का तात्पय है भाग्य द्वारा प्र म मिला हुआ। यह भाग्य और भागय से मिलता-जुलता-सा है तथा दव नियति प्रारध विधि भवितव्यता किस्मत नसीव तक्र आदि का पर्यायवाची भावी भावी वा अथ है मानवाला समय, भविष्य में अवश्य हान वाली बात प्रादि । यह शब्द भी भवितव्यता होनी तकदीर भाग्य आदि + प्रयो म प्रयुक्त हाता है। विधाता -विधान बरन वाले उत्पन्न करन बाले अथवा जन्म देने बार को विधाना पहत हैं। यह ब्रह्मा और ईश्वर प्रा. के लिए भी प्रयोग में माना है क्यारि एमा विश्वास किया जाता है कि इन द्वारा ही मृष्टि निमित हुई है कि साधारण बाल चाल थी भाषा म भाग्य अपया इ वरष्टा के लिए भी विधाता का प्रयाग प्रचलित है। अव -इस का प्रिय है वह या निशान रिन्तु यह रा” भान पर सि विधि के नम का मूचर भी है भोर माग्य अथवा विस्मत के भयो म भी प्रयुक्त होता है। (१) हिदी विग्ध कोर (नगनाथ यमु) भाग १६ पृ.६७ (२) मालदा विशाल गाद सागर पृ० ६२१ । (३) मालावते रष्टियत (माप) प्रसाद के नाटको मे नियतिवाद 4 होरी हानी अवश्य होन वाती वात या घटना को क्ह्न हैं। भावी भवित यता होनहार प्राति सके पर्याय हैं । होनहार --स पद का प्रथ भी होनी की तरह उस बात से है जो भटल हो तथा होकर ही रहे। इसका प्रयोग हानी भावी भवितव्यता प्राति के अर्थों म होता है। हठ -वसे इस गद का प्रय जिद दृढ प्रतिज्ञा अथवा टेक से होता है विन्तु भाग्य की प्रटलता के लिए विधि का हठ भाग्य का हठ मादि कह कर अथवा हठ कहकर नियति की दुदमनीयता को दर्शाया जाता है जसा कि हठात् भादि प्रयोगो से भी स्पष्ट है । सयोग -दो या दो से अधिक बातो का एक साथ घटित होना सयोग पहनाता है । किन्तु भाग्य भावी अथवा ईश्वरेच्छा के लिए भी सयोग का प्रयोग बहुधा देखा जाता है काल काल गर उस सम्बन्ध सत्ता को व्यक्त करता है जिसके द्वारा भूत भविष्य और वतमान प्रादि की प्रतीति होती है। इस पर का प्रयोग भी नियति भाग्य और अदृष्ट प्राति के प्रों में होता है। कृतात -वा मीकि गमायग्ग म भाग्य प्राति के प्रथ निधि पाल नियनि भविन पता दव और कृता न आदि का प्रयोग हुग्रा । देव के बाद मर्वाधिक प्रयोग कृतात T का हुआ है । एक उगहरण दगिए वर्षे वा सुविस्तीर्णे यसा वा सुदारणे र व पुष्प वध्वा ताता परिक्पति' मान अत्यधिक विस्तीए ऐवय हा भयकर स भयकर प्रापाद हो फिर भी भाग्य रस्सी की तरह बांध कर पुरुष को सोचता है । ऋत -ऋग्वेद म ऋत T का व्यापकता से प्रयोग हुआ है। वदिक ऋषियो । ऋत काही ससार के नियम चक्र का प्रोर ब्रह्माएट में व्याप्त समस्त व्यवस्था का एक मात्र कारण माना है। ऋत वह प्रखएड नियम विधान है जो मूलत नतिक सिद्धान्तों पर माधारित है । वनित सात्य म वरिणत यह ऋतवारी भावना नियति की अट काय कारण-पर परा वाली विचारधारा से बहुत कुछ मिरती जुलती है । - (९)बालमीकि रामायण ५-७-३ नियतिवाद सदातिय विश्लपरण तकदीर (तकदीर) ~~यह शद भी प्रचुरता स भाग्य प्रारष अदृष्ट, दव विस्मत और मुक्दर प्रादि का पर्यायवाची वनवर प्रयुक्त ह ता है । किस्मत - विस्मन मा प्रय है भाग्य, प्रष्ट पारध तादार मादि। 'स्मित माजमाना विम्मत फूटना स्मित चमकना' प्रादि मुहावरा स भी यह स्पष्ट हो जाता है कि यह गन्द 'भाग्य का ही पर्याय है। मुकद्दर ~~इम पद का प्रयोग भी प्रारघ भाग्य, अदृष्ट किस्मत, तपदीर नसीब भाग्य मादि के लिए किया जाता है । सितारा यो सितारा' क भय हैं तारा, नक्षत्र, मह भादि विन्तु भाग्य, प्रारम्प, तकदीर, नसीब, किस्मत मादि के लिए भी दादा प्रयोग प्रचलिस है जसा कि सितारा चमकना , सितारा बुलन्द होना , परि मुहावरा से स्पष्ट , जो भाग्योदय होने प्रपका अच्छी किस्मत होने के प्रय में प्रयुक्त हाते हैं। वक्त वक्त का कि अप है समय, अवसर मौका जमाना, ऋतु, मौसम माति लेकिन लाक्षयिक रूपम इस शब्द का प्रयोग भी हिंदी शब्द काल की तरह स किया जाता है। इस प्रकार वक्त काल भाग्य स्मित नभीच पानि के लिए इस्तेमाल हाता है। वक्त का क्या ठिकाना' वक्त बुरा है' वा से ३च कर चलो वक्त सव कुर बरा देता है वक्त साथ नहीं दिया', आदि मुटावारा से भी यह स्वर है। जसीन -भाग्य प्रारध किस्मत मुहर आदि के अर्थों म नमीव' का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता है। मुहावरोम भी भाग्य के प्रथम 'नसीब का प्रयोग काफी मात्रा में होता है जम- जमीर म यही वदा । - मादि। M नियति के पर्यायों का वर्गीकरण नियति के उपरोक्त पर्यायवाची दारोगाव्युत्पत्तिपरस और प्रकृतिपरम भषों से सम म विवेचन विग्नपण परन क पचान यह धारणा बनती है कि सभी शलोकी भारमा एव नहीं है। उक्त भिन्न भिगमा भिन्न भिन्न पप में प्रयोग किया जाता है। बुधन निया मथवा फ्ल मूगर है तो कुछ पता का बोध कराते हैं। इमा प्रबार बुध र विसीय देवी सत्ता की मार समेत परत है तो दुध पार पाय-कारण की परम्परा से युक्त माम्य नियम विधान को प्रकट करते हैं। इन पाधारों पर नियति' पर्यायो वा वर्गीकरण इस प्रकार दिया जा सकता है २० प्रमाद के नाटको मे निपतिवाद मिया अथवा फ्ल कबोधक दियता सूचक T" नियम बोधक गत सूचन : भाग्य नियति प्रारब्ध भविरायता भावी अदृष्ट (भाग्य के अय मे) दव विधि सितारा विधाता काल सयोग नियति (चेतन सत्ता) वक्त कम प्ररप्ट (वरोपिक) दप्टिकता होनहार भागधय कृतान्त भाग्या तकीर नसीव किम्मत साट रेखा उपरोक्त गेम से प्रष्ट तथा नियति ऐसे हैं जिनका बहुधा प्रियक प्रयाग होता है। प्रष्ट मुख्यत कर्ता बाधक रूप मे भाग्य का पर्यायवाची वन र प्रयोग में प्राता है किन गपिता न यस T को काय कारग परम्परा सहित नियम वडता के प्रथम प्रयुक्त किया है। इसी प्रभार नियति का कुछ नाग चेतन सता मानत हैं एमा स्वीकार कर लने पर य कर्ता वाचा बन जाता है । नितु जनवादी दानित नियति का प्रयोग प्रवायभावी नियम परम्परा व अथ म करत हैं। निप्प -नियतिवाती भावना को यक्त करन लिए जन अधिक पयात्रा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हमारे देश में यह एक यापर भावना रही है। जाममुदाय म भी नन अधिन का प्रचुरता से प्रयाग होना यही प्रा करता है कि यह भावना मानव मन में काफी गहरी बठ गई है । वामी रामायण म प्रबस ही राक्षम पात्र नियति भाग्य प्रादि का प्रयाग नही करत जिसस कुछ दिगनो न यह निरप निकाला कि । नियतिवाद सदातिन विश्लपण दव सिद्धात पाय मिद्धत हो या भोर राक्षसी ने इस मा यता प्रदान नही की थी। वितु ऐमा बहना साम सत्य नहीं है क्योकि उक्त प्रथम रामलियान दर का यत्र-तत्र प्रयोग किया है। हमारा उद्द"य यहाँ इस वा विवाट म पडना नही मात्र महा सिद्ध करना है जिप्राय लागाम ही नही, राक्षम ममम में भी भाग्यवानी भावना का क्सिी मश मप्रचारप्रवरम था। शादी का सस्कृति से भी अटूट सम्ब ध होता है। एक ही भाव विरोप को व्यक्त करने लिए लोक प्रचलित इसन अधिर TT से यह मकेत भी मिलता है कि हमारा मास्कृतिक पृष्ठभूमि म भी मार नियति नादि अदृश्य शक्तिया का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन सभी के मुख्य रूप से दो विभाग बन गय हैं । बुध जस अन नियति कम मादि-एम पद हैं जो काय कारण का शृखला का लकर चलने वाले মহল নিয়ম ছিল ঔ ঘূৰ , নখ্য পথ ঘুড় শব-ই বর হতে विधाता मादि-ऐसे हैं जो किमी अटल नियम विधान का मा यता कातो स्वीकार नहीं करते दिन किसी पलक्ष्य दिव्य शक्ति की सत्ता अवश्य मानते हैं ITद ये दो विभाग इस बात में प्रत्यक्ष प्रमाण है कि भाग्यवादी तथा नियमवाली दो प्रकार की नियम भावना हमारी संस्कृति में विद्यमान है। यहा पर यह प्रश्न मा विचारणीय है कि इस विश्व में मार लियम' ही है आपका उस 'नियम' का कोई नियामक भी है ? यह प्रश्न जडवादी और मध्यात्मवाददाशनिका के मध्य मत्यात मतभद का विषय रहा है। प्रथम- वा के विचार प्रकृति का पायधारण परम्परा का ता मानत हैं पर उसके पात्र विसा वा मत्ता का अस्तित्व स्वीकार नहीं। द्वितीय वाये विधारमा की मा यता है कि प्रकृति के समस्त नियमा का नियन्ता चतन ईश्वरहा है। समस्त पर्यापयाची प्रवृति और व्युत्पति सम्म भयों परवेषण से मात हाता है वि नियति सभ्य धा यह भावना बाप दान में साथ-साथ परयन्त ही मिल मस्पट पौर जटिल भी है। मभी ये विपय म बना जा सकता है लाग इन एक ही विजय प्रय म प्रयोग न कर परिस्थिति प्रसग और काय-व्यापार को पृषरता ५ पारण भिन्न भिन्न दमों म प्रमाण परत हैं निमसे हम यह मि पनिमार रावन है नियम विषय यह प्रत्यय {Concept) स्थितिमीर नही गनिमील है निरपे नही साप (1) वप चेष्टायने म त दयेन रयते। -या० रा." .

२२ प्रमाद के नाटको म नियतिवाद - है। इसी कारण से हृदयगम करना तथा से सुनिश्चित प्रयवत्ता प्रदान करना कठिन ही नही असम्भव सा जान पड़ता है। फिर भी यह तो का ही जा सकता है कि हमारे देशवासी इम समरन ब्रह्माण्ड के पोछ निचित नियम को मान कर चल और हमारा नियतिवाद वाय कारण की अटूट शृखला को लेकर चला। ग्रीक्वासिया की जो भाग्यवादी करपना है बसी कल्पना हमारे देश में सामा यत नहीं मिलती। भारतीय दान का मुख्य स्वर मवाद हो है प्रधा भाग्यवाद हमारी विचार धारा की परिधि में नही माता। नियति के सम्बध म तथा उसके पर्यायो का लेकर उपर जो विवचन प्रस्तुत किया गया है उसस स तीन प्रकार के प्रथ हमारे सम्मुख स्पष्ट होते हैं (क) किसी सुनिश्चित नियम पति का नाम नियति है। (ख) अखिल ब्रह्मएड मजा यवस्था व्यास है उसके मूल म काई चेतन सत्ता जिम नियति बात है। (ग) भाग्य के प्रथम नियति' का प्रयोग अत्यन्त प्रसिद्ध है । यथा प्राप्तव्यो नियतिवलाषयेण योथ सो वश्य मयति नणाशमो भोथा। भूतानां महित कृते पि हि प्रयत्ने नामाव्य भवति न माविनोस्ति नाग प्रर्या भनुष्य के लिए जो कुछ भी गुभ या अशुभ नियति के बल पर होन वाला है वह होकर ही रहेगा। प्राणी चाहे कितना भी बल प्रयत्न करत जो कुछ नहीं होने वाला नहीं होगा और इसी प्रकार जो होने वाला होगा उसका नाश भी नहा हो सकेगा। माग हम नियति प्रथा नियतिवाद' गो का प्रयोग यपास्यान इन तीना प्रयों मवरग। नियतवाद विपयन यतिपय पाश्चात्य मत जिम प्रकार हमारे यहाँ नियतिवा ] बहुप्रचलित है बस ही पाश्चात्य दान म रिटरमिनि म (Dete minism) T" यापन रूप से प्रयुक्त मा है डिटरमिनिम बनिए नियतवार हात पवाद अवधारणवाट निरिएबाट प्रालि (१) उवामगरसायो ६ । १६५ निपतिवाद सदातिक विश्लेपण २३ ननर का प्रयोग किया जाता है। उक्त पर्याय कम्पम 'नियतवाद' (नियतिवाद नहीं नर का प्रयोग समीचीन जान पड़ता है । नियतवादिया र अनुसार न्यक्ति निश्रित नियमो द्वारा मनुगामिन होता है। बगानुश्म, चरित्र, वातावरण प्रारि का पूरा प्रभाव उस पर पड़ता है और वह समान परिम्पियो म एक समान व्यवहार करता है। परिस्थियां बदल जान पर उस "यवहार म भी परिवतन हो जाता है । जे० बी० वाटसन प्रादि व्यवहारवादी यह मानकर चन है कि निमी मनुष्य के व्यक्ति निर्माण तथा यार-पद्धति पर वातावरण का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। परि किमी का व्यक्ति के पूर्ववर्ती जीवन का पान हा ता उस “यवहार के मम्बध में एक प्रकार से भविष्यवाणी की जा सरती है। यति हतुवाट (Law of Causalsty) क अनुमार काय भरल पर विवा है और उसे किसी भी प्रकार की धा की स्वतयता प्राप्त नहीं है । नियतकारियो की दृष्टि म हतुवाद और इच्या स्वातन्य दा विराधी गद हैं। हाम र मतानुमार व्यक्ति निसा भी काम का स्वतयतापूर्वक नहा कर सकता क्योगि उसक लिए अपनी इच्छा शक्ति का पूरात नियमित परना समय नहा है। स की भांति हम भी नियतवाट का समय था उमर मतानमार मनुष्य न ममी काय अवयभाविना (necessity) वे कठार नियमा का अनुसरण करत हैं और उसे किसी भी प्रकार का स्वातय प्रास नहा है। स्पिनोजा का भी मा यता भी का ससीम मानव स्वनाथ महा माना जा सकता म्दतथ तो वेबर पर है। स्वतः च्या गति पवल धर का धतिय है जो अमाम एव अनन है। दूसरा पार एम भी विचार है जिह अनियतवारी {Indeterminist) पहा गया है। उन मतानमार व्यक्ति जब वोट घनाव अथवा निएम परता है वा वह किमी पूपी याना अथवा अनागत उद्देश्य का दृष्टि म रय कर ऐसा नहीं करता। उसके निणय म सयोग-तत्व का ही प्रमुखता देखी जाता है । जेम्म मार्टीन उक्त मत ये समयमा म स है। । नियरवाद और अनियनवाद व अतिरित एर तामरा महत्वपूण मिद्धान्त भी है जिग प्रारम वियतवाद (Sear terernanism) व नाम म अभिहित रिया गला है । परानू व समय न ही म मिसाल का प्रचलन रहा है । इमर मनुगार अति भल या बुरे के चुनाव में स्वतत्र है। यह रही विषयाको चुनता है जागर उदयारा प म मामजस्य रखत है। न प्रोजन मनुदिप म परतत रिना या प्रयाजन तो मृग पक्तिमा क्रिमी प्रसाद नाटकाम नियातवाद काम में प्रवृत नही होता। चुनाव की स्वत पता होने के कारण ही सत् अमन पाप-पुण्य तथा भले-बुरे का दायित्व उस यक्ति विशप का माना जाता है। प्रसिद्ध जमन दाशनिक काएट के मतानुसार इच्छा स्वातग्य का यावहारिक मूल्य है । "छा की स्वतत्रता ही तो ननिस्ता की प्राव यब मा यता (Postulate) है । बगसा मी मनुष्य की स्वतंत्रता के पपापका म स है । निष्क्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि नियतवाट तथा अनियतवाद दोना म सत्याग निन्ति है । प्रात्म निरणय मयना आत्म यितवाद ारा उक्त दोनो प्रतिवादो म सामजस्य स्थापित किया जा सकता है। यह ना यथाथ के अधिक निकट होगा कि मनुष्य न तो भौतिक वस्तु के समान परत प्ररित (Determined) है और न वह स्व छाचारी (Indetermined) अपितु अपनी प्रात्मा के प्रकाश में उसमे मात्म नियत्रण (Self determination) की क्षमता है। भौतिक विज्ञान और नियतवाद वज्ञानिक दृष्टि के आलोक म यह विचारणीय है कि इस विश्व म काय कारण सिद्धान्त अव्यभिचरित रूप से लागू होता है अथवा कुछ ऐसे भी काय या ऐसी भी घटनाए हैं जिनकी परिणति केवन सयाग को ग्रीडा है ? वज्ञानियो के मतानुसार काय कारण सिद्धान्त और नियनवाद म थोडा मन्तर किया जा सकता है। रात के बाद रिन और दिन के बाद रात पानी है किन्तु रात नि का कारण नही पोर न दिन ही रात का कारण है। फिर भी निन को देखकर हम भविष्यवाणी कर सकते हैं कि दिन के बाद रात अवश्य हागी इसी प्रकार रात के बाद दिन अवश्य होगा। यह तो हुआ नियतवाद (Determinism) किन्तु यदि हम यह कह पृथ्वी के सनमण से दिन और रात हाने हैं तो पृथ्वी का सममग्ण दिन और रात का कारण है--से हम लुवाट (Causahty) अथवा वाय-कारण मिद्धात कह सके हैं। म सम्बघ म हम पुराने भौतिक-गानी यूटन और गनिनियो के बहुना म ऋणी हैं। वे यह मानकर चरन ५ कि यदि विही पारभिक म्पितिया का ज्ञान हा जाय तो किमी पाथ व कण (Particles) के सम्ब प म भविष्यवाणी का जा सकती है। यूटन यात्रिपात (Newtonian Mechanics) के मतानमार हतुवार तथा नियतवाट दाना ही सत्य मान गय । रिन माग चार गमों व सम्ब घम उक्त यानिया में सिद्धान्त से २५ नियतिवाट सदान्तिक विलपरा वाम न चला । उसके स्थान में मास्थिकी मिद्धात (Law of Statistics) या प्रवनन हा भाग चलकर जब मानिक्यूल्स प्राटोस प्रालिका अध्ययन किया जाने लगा तो वे गतिगाली अग्गवीक्षण यत्री द्वारा भी दृष्टिपथ मन पा सके । इसकी व्याख्या के लिए ममा यता सिद्धान्त (Theory of Probabihty) को प्राव यकता पडी। प्रश्न यह था कि क्या हम किसी कण की स्थिति या वेग दोना का एक साय निर्धारण पर मात हैं ? वही वस्तुमा के लिए ता यह भल हो सभव हा नितु घार वग्गा अथवा प्रगना के लिए यह असभव है । देखन के लिए प्रकार अपक्षिन है किन्तु प्रकाश भी ता सूक्ष्म-वणो की घाग का ही रूप है । जब हम विद्युत्मा का परीक्षण करत है ता प्रमाण या प्राश्रय नेत हैं लेविन एमा करने से उस वरण की स्थिति में परिवतन हो जाता है । इसलिए मन स्थिति के स्थान में हम उस परिवर्तित स्प का ही दान कर पाते हैं । इस प्रकार वस्तु निधारण म अनिश्चयात्मकता को स्थिति या पाना अनिवाम हा गया । जेनग (Heisenberg) ने अनिश्चयात्मक्ता या निर्धारण करते हुए कहा है कि प्रकृति म नियतवार नहा भनियनवाट पाया जाता है। यद्यपि भौतिक विनान म तिमी मूक्ष्म कण की स्थिति (Position) और वेग (Velocity) को एक साथ नहीं मापा जा मक्ता किन्तु हम निणय करना हापामि दाना म से एक को चुनें। मनिष की भौतिक रामायनिक प्रक्रिया (Physico-Chemical Process) के परीपण म भी यही बाधा पाएगी। क्यादि ऐमा परन पर मातमिर प्रक्रिया में भी राधा पडेगी। मोतिर विनान किमी मीमा तक मामिया स्वातयका स्वीकार करता है किन्तु पूष स्वतकता सम्भव नहीं। प्राइस्टान न यद्यपि यह माना कि पनियतलाट म सचाई है नितु उसने इसम पूरात विश्वास नहीं किया भोर न ही अपन विश्वास के लिए उमने बाई तक ही प्रस्तुत किया । निप्प -नियतवादी दृष्टिकाण ममथर अपन मत की पुष्टि म त हुए कहा करते हैं वि पर पता हुमा पत्थर यह साच सकता है कि वह स्वतन्त्र है तु वस्नुत वह गुरुत्ववक्ति के नियंत्रण म है। यहां यह स्पष्ट पर दना पाव यर है कि यह प्राचीन तर उस युग स सम्बघ रमता है जय प्राचीन मामाबादी नियतवाद ( Laplacien Determinism ) स्वीकार दिया गया था। जसा ऊपर कहा गया है सन १९०० के लगभग उसरा स्यान मारमय नियतवाद ( Statistical Determinusu ) ने ले लिया २ २६ प्रसार नाटको म नियनियाद जिसम सयाग की प्रधानता है और जा सदानिक रूप से इस वान को स्वीकार कर लना है कि अस्थिरता में अन्तत नियम के विरोध करन की क्षमता है। इस धारणा के अनुसार उक्त घटना म यह सोचा जा सकता है कि ऊपर फ्का जाने वाला पत्थर नीचे न गिरे । मितु यवहार म ऐमा कभी नहीं होता । दानिक और ताकिष्ट से भी यह ता निरथक है । परली बात ( पत्थर की गति ) तो असनिराध और दूसरी बात ( मनुष्य को गनि) सनिग्य है ।' पत्यर चाहे कुछ भी सोच ( यदि उसम साचने की क्ति दलील के लिए ही मान न) हम प्रयोगात्मक रूप से जानते हैं कि उमा लिए पसन्गी या चनाव का प्रश्न ही मना क्यार हमने पत्थर को कभी गुरुवा क्पण क नियम के विपरीत काम करते देखा ही नहीं। मान लीजिए पत्थर साचता भी ता उनन अवय ते निणय र निया होगा कि वह भूमि पर ही गिर। कि तु मनु प क सम्वच ग यह सोचना होगा कि क्या उसा विकास भा यायिक तथा केवन परत प्ररित है ? प्रश्न यह है कि वह मात्र अपनी पवित्र प्रवृतिया स प्ररित हावर काय करणा अथवा विवेक तथा स्वतम रटा शक्ति का प्राय तर प्रगति पथ पर पार' हागा ? यदि मनुष्य या काय पापार क्वन यानिव हा हो तो भावी विकाम की बल्पना ही नही की जा सकती किन्तु हम जानत हैं कि मनुष्य प्रगतिशील है उसके पाम विवा और स्वतत्र इवा शक्ति वा बल है। यह सत्य है कि वह नियमा तथा परि स्थनियो से भी वधा हुआ है रिन्तु वह प्रात्म निणय म स्वतत्र भी है अन्यथा निमा धुरे काय क लिए उनका का दायित्व नहा रहगा और न ही वर मानव विकास की मजिना को पार करता हुमा प्राग ३. सकगा। अस्तित्ववाद और नियतिवाद यूराप के बचचित और प्रयतम दान अस्तित्ववाद में भी नियति ८ सम्ब ध म ध्यानारपद विवेचना है। इसके व्यास्याता की गाद नाता तया जो पान सात्र प्रभृति दानिका के मतानुसार मनुष्य + लिए वज्ञानिक उपपिया का तब तक कोई महत्व नहा जब तक वह अपने मस्तिव या न पचान। विमान रा उपनय सारे वाट सुमीकरण या भावात्मर अमूत दस्तुप्रा वी अभिनाए मानवीय जगत पामाधार भूमि के पिता निरयव ही रह जाती हैं। प्रत अनववाद मानवीय अस्तित्व की ममग्र स्वाति को अत्यन्न प्रावग्य मानता है जो तभा सम्भव है व मनुष्य अपत ग्राप पर टूट विश्वास और प्रास्था रखें। दूसरे (१) सरत नाय मनु'य वा माग्य पृ ४२-४३ - नियतिवाद सतान्ति विश्लेपए समामे अस्तित्ववाद पुरुपायवादी दान है भोर वह यह मानने को कदापि सयार नहीं कि मानव भाग्य अथवा नियति के हाथों को कठपुतली है। भाग्यवाद अथवा नियतिवाद की अपेक्षा अस्तित्ववाद मनुष्य की प्रात्म निणया मिका बुद्धि और स्वतंत्र इच्छाशक्ति पर अधिक बल देता है।' हार्डी का नियतिवाद नियनिवाद (Fatahsm) के विषय में हार्डी का उल्लेख यत्र-तन किया नाना है । प्रा यहाँ उस विषम म दागद वहना अप्रासगिक न होगा। हार्डी के उप यासो म शिल्प वस्तु और चरिन सभी पर नियति कायापक प्रकोप फार माम दि मडिग प्राउड से लेकर जूड दि मा सपथोर तक देसा जा सकता है । यद्यपि ईश्वर जसा किमी पालोकिक सता में उसका विश्वास मह था किन्तु दव (Destiny) तथा सयोग (Chance) को वह पूणत म्वीकार करता था। उसके चरित्रा के लिए *व तथा सयाग ऐसी दूर गतियां हैं जो उनको पहुँच और समझ में बाहर हैं तथा जिनके हाया म घ कठपुतली के समान नाचते रहते हैं। उसने उपायासा म पात्र द्वारा नियति का निर्धारण नहीं हाता अपितु नियति द्वारा पात्र निर्धारित होते हैं। इस विषय मनवीरानी गुह की ये पत्तियां भी द्रटन्य हैं, प्रारम सही हार्डी को धारणा है कि मनुष्य वेवल कम के लिए है कम चाहे छोटा हो - २ १ अस्तित्ववाद इतिहास और भाग्य को ध्यय मुग्यालफत नहीं करता और न सब के लिए सामायतया प्राव यक्ता पूर्ति की स्वतता पर ही जोर देता है यह तो सिफ इतना ही रहता है कि व्यक्ति अपने आप में स्वतप्रतापी अावश्यकता अनुभव करता है इसे मान लेना साहिए यही स्तिस्यवाद की पहली और असली शत है। -पृथ्वीनाय पात्री प्रस्ति यवाद एक पुनरोपण माध्यम परपरी १६६६ पृ. ३५-३६ 2 Character does not determine destiny in his novel but destiny claps character into a straight jacket li kulkerni (Thomas Hardy as a Novelist) BH U Afagazine Oct -Dec 1931

२८
प्रसाद के नाटको म नियतिवाद
है
मथवा बडा मनुष्य के अधीन नहा वरन् वह ही पूरा रूप से उमा अधीन
टम और जड दि मा मक्योर में मानव और पराशक्ति का
द्रष्टव्य है मानो प्रदष्टलिपि के असीम मादेगा म उनकी समस्त रियाए और
प्राणों का प्रश्नवाचक अस्तित्व निगहनि विद्ध है।'
(१) चीयरानी गुटू साहित्य वगन भाग १ पृ० ३६६

भारतीय नियतिवाद का उद्भव और विकास ग्वेद से लेकर वतमान कालीन साहित्य तक भारतीम नियतिवाद की अपनी सुदीप परम्परा रही है। किन्तु प्रतिपाद्य विषय को सीमामा के कारण हम कवल भारतीय-दशन ( योगवासिष्ठकार ) तर ही इसका पर्यवेक्षण कर सके हैं। उन स्थला को अधिक स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है जिनका सम्बन्ध प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में प्रसाद को नियति भावना से हो सकता है । इस विहगावलोकन के माधार वि ये हैं (१) यदिक साहित्य (२) उपनिषद साहित्य (३) पौराणिक सारित्य (४) महाकाय साहित्य (५) भारतीय दमन वदिक साहित्य यदि सूतवाद विश्व के प्राचीनतम प्रथ श्राग्वेद म मृष्टि सम्बधी समस्त घटनामी का संचालन एक एसे भसड नियम द्वारा माना गया है जो मूलत नतिक मिद्धाता पर पाधारित है। ऋग्वेद मे इस नियम वा ऋत' नाम से अभिहित किया गया है। यदिक सपियो ने इस तथ्य का अनुभव कर लिया था कि इस विश्व म भव्यवस्था नाम की कोई भी वस्तु नही है। सभी वस्तुए एक ध्यापक नियम से भावद्ध हैं। इसीलिए कोई भी चीज यहच्छा से प्रवृत नहीं हाता । दिन के अनन्तर रात्रि का आगमन, फिर नित्य प्रात कालीन स्वर्णिम सविता का उदय रात्रि व समय चद्र रनिमिया का माविर्भाव और वृष्टि से पूर्व काले कजरारे मघा की उमह धुमह भादि प्राकृतिक दृश्यों की देसन वाले ऋषिया को मह पूणत विवास हा गया या हि समस्त ब्रह्मांड में कोई सुनिधित पवस्था का निमम अवश्य काम कर रहा है। उसी व्यवस्था को उन्होंने "कृत की संना दी। विश्व म सवप्रथम उत्पन्न होने याला 'ऋत ही है, जिसे अपरिवतनीय नविश्व्यवस्था के नाम से ममिहित किया जाता है। वरुण (1) शत पसायपामिशातपसोध्यजायत-ऋगयर १०-१६०-11 - प्रसाद के नाटकाम नियतिवाद 'ऋत का अधिष्ठाता देव है जो प्रत्येा प्राणी के कर्मों पर दृष्टि रमता है जो प्रत्य त कठोर क्त यनिष्ठ है तथा सभी प्राणिया को उनके कर्मानुसार फ्ल अवश्य देता है। ऋग्वेद के अनुसार ऋत समस्त चीजो का प्रतिस्थ रखता है। मत के कारण ही अग्नि प्र वलित होती है हवा बहती है पानी प्रवहमान होता है और ऋतु चक्र चलता है। सूय चद्र और अय ग्रह -पग्रह भी इमी के कारण गतिवान हैं। ऋत ब्रह्माड की सावभौम सत्ता है मनुप्या में कर्मों का मूनाधार है तथा यष्टि और समष्टि म गक्ति सन्तुलन का कारण भी । इस प्रकार ऋत ही समस्त नियमो की प्राधार मिला है ।। वतिक साहित्यानुशीलन से ऋत सत्य घम और क्म की महत्ता पर पर्यास प्रकाश पडता है । दववाद अथवा भाग्यवाद वदिक साहित्य का स्वर नहीं है। बल्कि ऋपि हाथ पर हाथ धरे बठ रहने की अपेक्षा पुरुषाथ पौर गतिशीलता की महता पर बल देते रहे जसा कि वदिक चरवेतिगान से स्पष्ट है घरध मधुविदति पर स्वादुमुद वरम । सूयस्य पश्चप्रमाणयोन तद्रयते चरन । घरबैति चरवेति । अर्थात् च त्रता हुमा मनष्य ही मधु पाता है चलता हुअा ही स्वादिष्ट फ्ल चखता है। सूर्य का परिश्रम देखो जो नि य चलता हुआ भी आलस्य नहा करता । "सलिए चनत रहो चरते रहो वास्तव म ऋग्वेट की मूल प्रात्मा चर वेनिगान के रूप में दिया गया कम का सदेश हा है क्यानि वरिक ऋषियो ने कम को जीवन का प्रावग्यक प्रग मानकर स्वीकार किया। (1) Swami Satprakasha Nand The Vedic Testimony and its Specially 2 Prabudha Bharat (April 1962) P 175 (२) थी पराराम चतुर्वेदी के मतनानुसार पदिर साहित्य म भाग्यवाद के मप नियति का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। देखिए भारतीय साहित्य (मानीयकों का नियतिवादी सप्रदाय) जुलाई १९५८ पृ ३७ । (3) The Path of Action ( क्मयोग ) is as important according to the Vedas as the path of knowledge In later religious literature we find a tendency eul but in the vidas action 13 accepted as an essential part of life IA C Bose The call of the Vidas Chapter V P 207 भारतीय नियतिवान का भव और विकाम 7 न के अनुसार प्रच्छे काय वा अन्य और बुरे वाय का रापन मिलता है जिसके परिणाम स्वरुप वित्र म वही काद अयवस्था नहा रह जाती । जो जसा बोता है वह वसा ही पाता है। मग प्रतीत होती है कि इसी क्ठार ऋतवादा सिद्धा त न हो माग च नकर क्मवाद का नमरिया । पटिय क्मयोग वदिक ऋतवादी काही विकमित स्प लगता है। वदिव ऋत के अधिष्ठाता देव वरुण हैं और वरुण ही कम दरता के म्प में सवत्र विरयात हैं । यहा नही बनवाद पुनज म का पोपर मा है । यह साम्य दर्शाता है कि ऋतवाद ही भाग चलकर कमवाद में विकसित हुप्रा। डा० ए० सी० बोस का भी यही मत है।' समानोर मे दसन पर भी ऋतवाद विसी दशा म भाग्यवादी नहीं कहा जा सकता। ग्रीक्वामियो न अपने दुखान्त नाटक में जिम अ५ क्रूर और विनाशकारी और ईश्वराधीन भाग्य को चित्रण किया है वह सन्था प्रभारतीय है। वति सारित्य म वही भी उससा विचितमान उलस भी नहीं मिलता। हा वेतो परवर्ती भारतीय साहित्य म अव य उमके दान यन-नत्र होते हैं। उपनिपद् साहित्य उपनिपट साहित्य में भा नियति कम प्रार" प्राटि गाप्रयाग यमन्ना दखन को मिलता है। येना चतरापनिषद्कार न जगन के कारणों को टूटते हुए नियति या उल्नख पियारे - (1) In India however Rita never became forcordına tion) remained Eternal Law and Erenal Justice As a result however of the working of Eternal Justice there could be no escape from the consequences of our deeds, 1 man must cap as he 30W3 So the conception of stern Rita lei to the doctrinc or harma Ibid ( introduction ) P 50-51 (2) Like thc Greck conception of Fate Ruta does not derise its power from the will of the gods but aborc divinita प्रसार के नाटको में नियतिवाद बाल स्वभावो नियतिपदच्छा मुनानि योनि पुरुष इध चिस्या । सयोग एपा न स्यात्मभावादात्मायनो सुखदुख है तो ।' अर्थात् काल स्वभाव नियति यदच्छा भूत और कारणय ये सब पुरुप वी भाति अचित्य हैं (प्रर्थात् नके विषय म कुछ नहीं सोचा जा सकता) नये सयोग के कारण न विप्रा मभाव के कारण अात्मा भी सुख दुख के लिए स्वयं प्रभु नहीं है । कठोपनिष” म कम फ्लभोग वा स्वाकार किया गया है योनिम ये प्रपद्य ते गरीरत्वाय देहिन । स्याणम येनुसयति ययाम ययात्रतम ।२ अर्थात अपन कम और अपने सत्य के अनुसार गरीर प्राप्ति के लिए कुछ देहधारी यानि प्राप्त करते हैं और अय अचन भाव (वृक्ष पत्थर आदि) को प्राप्त होते हैं। ईशापनिपद् म क्म का प्रतिपादन करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि काम करते हुए सौ वप जान की इच्छा करा - कुब नेवेह कर्माणि जिजीवेष छत समा वृहदाररायक उपनिपद् म उद्दालक के पारा अन्तर्यामी ईश्वर की याख्या चाग्न पर मुनि यशवप उस समझाते है य पृथिव्या तिश्रम पृथि य प्रतरो य पृथिवी न वेस्य पृथिवा शरीरे य पृथिवा मन्तग यमयत्यय त मात्मा तों म्यमन ३ -जा पृथ्वी म रहन वाला पृथ्वी के भीतर है जिस पच्ची नही जानना जिसका पथ्वी गरीर है और जो भीतर रहकर पृथ्वी का नियमन करता है वह तुम्हारा पात्मा अन्तयामा अमृत है।' विपातिभूति महानारायणोपनिषट उत्तरताडक पचम अध्याय म ममार मुक्ति पान के उपा" बनाते हुए पुनज म यमपला तथा प्रार ध का सुटर विवेचन But Geeks found in Fate a power which cien the gods coull not withstahd This led to the typical Greek conception of tragedy that man was a helpless victim of Fate India too came near the Greek idea of Predeter mini m But this was in water ages in the Vdias there is no pre determinism Ibid सदभ १२३४ देखिए-कल्याण उपनिषदांक (१९४०) पृ० १२५ ३० p 5061 भारतीय नियतिवाद का उद्भव और विकास किया गया है “निदनीय, अन त जमा म बार बार किये हुए अत्यन्त पुष्ट अनेक प्रकार के विचित्र प्रनत दुषों के वासना समूहा के कारण जीव को शरीर एव प्रात्मा के पृथकरव का नाम नहीं होता अनक प्रकार के विचित्र स्थूल सूक्ष्म, उत्तम-प्रथम मनात शरीरो को धारण करके उन उन गरीरो से विहित (प्रास होन योग्य) विविध विचित्र अनेर शुभ अशुभ प्रार व का भोग करके उन उन कमों के फल की वासना से वासित (लित) मत करण बाला को बार बार उन उन कर्मों पल रूप विषयो म ही प्रवृति होती है। इसी स्थल पर माग चलकर मसार पार करने के प्रनेक उपायो म एक उपाय पूवज म क पुण्यफ्ला को भी बताया गया है अनेक जमा के किये हुए प्रत्यन्त या पुण्यो के फ्लोदय से सम्पूए वेदशास्त्र के सिद्धान्ता का रहस्यरूप सत्यपुरुषा का मग प्राप्त होता है । तब साचार में प्रवृत्ति होती है। सदाचार स सम्पूण पापो का नाश हो जाता है। पाप नाश से अन्त करण प्रत्य त निमल हो जाता है। २ नादवि पनिषद् में प्रारघ कमों की महिमा इन दाम प्रस्तुत की गह है, है महामत निरन्तर प्रयल परके भात्मा में स्वरूप का जानार उसी * वितन म अपना समय यतीन करो। समस्त प्रारकर्मों के भोगो को भोगत हुए तुम्हे उग्नि नहीं होना चाहिए। भात्म मान होन पर भी प्रारब्ध स्वय नही धाडता।'३ अश्युपनिषद् म भगवान प्रादित्य साइति मुनि दो पूर्वज मा कम फल की महिमा समझाते हुए कहते हैं सब कुछ पूर्व जन्म म विय हुए कमी 47 प म उपस्थित है अथवा सब कुछ ईश्वराधीन है। " "वना परापनिषद् म ऋषि इश्वर का ही कम का अधिगता बताते हुए घरते हैं - M (१) बहो पृ. ७२१ (२) वही पृ०७२१ (१) यहो, पृ० ६७० (१) यही पृ०६७ ३ प्रसाद नाटा म नियातवाद एको देव सबभूतेष गूढ सवव्यापी सवभूतातरात्मा । कर्माध्यक्ष सवभूताधिवास साक्षी चेता फेवलो निणण च ।' अथात् एक देवता सारे प्रागिया म छिपा हुआ है जो कि सदमापी है सारे प्राणियो का मन तरात्मा है वो वा अधिपता है सारे प्राणियों म समान रूप से विद्यमान है सवद्रश है अकेला है और निग ण है । पौराणिक साहित्य वेदा तथा उपनिषदो के पश्चात् पुराणो में भी नियतिवादी भावनाए व्यक्त की गई हैं। कम, कम पत्र भाग्य व पाटि की चर्चा स्पम मह भावना पुराणो म अनेक स्थला पर मिलती है । मत्स्यपुराण में पुरपाथ और काल के अतिरिक्त पन प्राप्ति का तनीय फारण भाग्य को माना गया है। मन को समझाते हुए मल्य भगवान कहत हैं दव पुरुषकारच कालच पुरुषोत्तम । प्रयमेत मनुष्यस्य पिण्यित स्यात्फलावहम ।' अर्थात हे पुरुषोतम दव पुस्पाय और काल ये तीना मितकर ही मनप्य फो पन प्रान करते हैं। मनु के यह पूछन पर वि व बडा पयया पुस्पाय मत्स्य भगवान् पहते है स्-मेव कम दवात्य विद्धि देहातराजितम । तस्मात्योरुपमेवेह अष्ठमाहुमनीषिण ।। अर्थात् ग्वज म म क्यि गए क्मों को ही दव समझा । इसलिए बुद्धिमान व्यक्तिया न पौरुप को ही वष्ठ बताया है। भाग्य यति प्रतिकूल हो तो भी पुस्पाथ से उम बदला जा सकता है। प्रतिकूल तया दव पौरुषण विह यते । मगलाचारपताना नित्यमत्यानगासिनाम ।' (१) घेता यरोपनिषद् ६-११ (२) भरस्यपुराण २२१-८ (३)मही २२०-२ (७) यहो २२०-३। - भारताय नियतिवाद का उद्भव और विकास अर्यात नित्य उनतिगाल तया नित्य मालिप माचरण करने वाले यक्ति पुरुषाय द्वारा प्रतिकल दव का भी नष्ट और सकते हैं। मागे मत्स्य भगवान मनु को समझात हैं येयापूव कृत कम सात्विक मनुजोतम । पौरुषेण बिना तेपा केषांचिद श्यते फलम। है मनुजश्रष्ठ, जिनक पूवकृत कम सात्विक है ऐमे कुछ लोगों का विना पुरुषाय किए हुए भी फल प्रालि होते हुए देखा जा सकता है। पुरपाथ की मन त महिमा का बखान मत्स्य भगवान ने भाग और दो श्लोका में इस प्रकार किया है। दृष्टिष्टि समा योगा दश्यते फल सिद्धय । तास्तु काले प्रदश्यते नवा काले कथचन । तस्मात्सदव कतम सघम पौरुष नर । विपतापि यस्मेह परलोके ध्रुव पलम ।' प्रथा कृषि और वृष्टि के योग के समान फन सिद्धि के योग दृष्टिगोचर होते हैं। वे तो (पि और दृषि) बाल पार पल प्रदर्शित करत है सरकाल बनापि नहा। इसलिए मनुष्य को विपत्ति में रहते हुए भी धमयुक्त पुरुषाय सत्व करना चाहिए क्योगिपरला म उसे निश्चित रूप से पल मितगा। स्कन्द पुराण म अधम वृनि वान टेवल नायक दाक्षिरसात्य बाहारा का उल्लेख करते हुए कमविपाक के विषय म कहा गया है - पाण्डाल ठितोभूमावितश्चेत वपाहिमि । तेनामविपाकेन रौरव नरक गत ।" भर्यात वह (देवल ब्राह्मण) भूमि पर धर उधर चाडाला द्वारा धमाटा गया भोर उस बम विपाक के कारण औरष नरक का प्राम हुमा । ब्रह्मपवत पुराण में भगवान श्री कृष्ण नद का पम पल भोग की मनिवायता समझाते है प्रायश्चितेन पुष्पेन न हि या त मानवा । सरिम्मेण पश्येद दानेन योगतोपि वा। -- (१)बहो, २२००४ (२) यही २२०-६, १० (३) पुराण, ५-६४-४२

प्रसाद के नाटकों में नियतिवार
Tमाभच यन् कम विना भोनात च क्षय ।
मोगेन शद्धि माप्नोति ततो मक्तिभवेनणाम ।'
है व य गजा प्रायश्चित और पुण्य स मनुष्य गद्ध नहीं होता और
न ही सब प्रकार के प्रारम्भा (प्रयत्ना)-दान और योग-से ही वह शुद्ध
हाता है शुभ या अशुभ जो भी कम है याग के बिना उनका नाग नही
हाता । योग से गुद्धि प्राप्त होती है उसके बाद मनुष्या की मुक्ति होती है ।
श्रीमद्भागवत म भी कम करने में तथा उसके फल भोगने म मनुष्य को
परतत्र बताया गया है।
भवाय नाय च कम क्तु गोकाय मोहाय सदा भयाय ।
मुखाय दुखाय च देहयोगमव्यक्तदिष्ट जनतापपते ।।
अर्थात् ससार म ज म ते म मृत्यु मे कम करने में गोक मे, मोह म
भय म मुष दुस माति म शरीर प्राप्ति का याग अयक्त और प्रनिनिष्ट है ।
(अर्थात् मनुष्य का किसी बात पर वा नहा ।)
महाकाव्य साहित्य
भारतीय सस्कृति के प्ररय भडार रामायण और महाभारत में भी
अनेर स्थला पर नियति भावना का स्फोट सुन पडता है । प्राटिकवि वाल्मीकि
की पावन पुनीत वाणो नियति का स्तुति गान न गगे मे कर
उठती है-
नियति कारण लोक नियति कम साधनम ।
नियति सवभूताना नियोगेग्विह कारणम ।।
नियति ही ससार म कारण है नियति ही वर्मों का साधन है
और नियति ही समस्त प्राणिया का वायरत करन म प्ररव है ।
लक्ष्मरण का दव की प्राम्य विन स परिचित करात हए भगवान राम
को उक्ति है-हल मरण जिसमा ग्रहण कमपन भोग के अतिरिक्त प्रय
किमी साधन सनहा हा सस्ता उस दव स काई भी मनुष्य सघप नही कर
सक्ता-
(1) ब्रह्मवक्त पुराण कृष्ण-जाम-खा ८५-३६ ४०
(२) धीमद्भागवत ५-१-१३
(३) वाल्मीकि रामायण कि० कां० २५-४

- भारतीय नियतिवार का उद्भव और विकास कश्चिद द धेन सौमित्र यौद्ध मत्सहते पुमान । यस्य न प्रहण किंचित्तमणो याद यत ।' पुन राम भाग्य के सम्मुख वरे से बडे पुरपाथ का यथ बताए हुए कहते हैं ऋषयोध्यप्रतपसो दवेनामि प्रपीडिता । उत्सज्य नियमास्तीवाश्रयते कामम युभि ।। अर्थात् उग्रतपवाले पि भी दव से पीड़ित होकर कठोर नियमो का परित्याग कर काम पोर क्रोध के कारण पतनाभिमुख हा जाने हैं। एक भय स्थल पर राम पुन भाग्य का महात्म्य वरिणत करते हुए लक्ष्मण को समझाते हैं कि भाग्य ही उनके प्रवास मा और मिले हुए राज्य को पुन लोगने का कारण है पृतातस्त्वेव मोमित्र दप्टव्यो मत्प्रवासेन । राज्यस्य च वितीणस्य पुनरेव निवतने ।' बालि वध के पश्चात् व शोकाकुल तारा का विधि विधान की महत्ता का बोध कराते है त्रयो हि लोका विहित विपान नातिम ते वाणा हि तस्य । प्रीति परा प्राप्यसि ता तथव पुनस्तु से प्राप्स्यति यौवराज्यम। मर्थात् तीनो लाक विधि विधान में वशीभूत हैं और उसका अतिक्रमण परने म सवथा असमय । तुमको पुन वसी ही प्रसपता प्राप्त होगी और तुम्गरा पुत्र यौवराय को ग्राम करेगा। इसी प्रकार महाभारत में भी अनेक स्थला पर दव भाग्य पुरुपाय आदि का वर्णन मिलता है। महाभारतकार ने भाग्य र जितनी महिमा गाई है रामायणमार ने उतनी नही। युधिष्ठिर ता सवथा भाग्यवाटी बाहुए हैं । उनका बहना है नाभागषय प्राप्नोति धन सुखलवानपि । मागधयाक्तिस्वर्या गो बालश्च विदति । (१) यही पयो० की., २२-२१ । (२) यही २२-२३॥ (३) यही २२-१५॥ (४) यहो कि कt०, २३४३ । (५) महाभारत, मनु० ५० अध्याय १६३ ।

८ प्रसाद के नाटया मे नियतिवाद - मर्थात् भाग्यहीन पुरुप चाने कितना भी अधिक वन गाली क्यों न है भी वह धन प्राप्ति नही कर सकता विन्तु भाग्यवान मनप्य दुवन पोर अज्ञानी होते हए भी अन प्रकार के धन उपर ध कर सकता है। मृत्यु को सब था दवाधीत मानकर वे कह उठते हैं नाप्राप्तकालो घ्रियते विद्ध शरगतरति । तृणानणापि सपृष्ट प्राप्तकालोन जीवति ।। अर्थान जिस मनप्य का काल (मृत्यु) नहा पाया है वह सहा वाणो से विद होत हुए भी न । मरता वितु काल पा जाने पर तृण के अग्रभाग से स्पा करन पर भी मर जाता है । युधि र के भाग्य सम्बन्धी दढ विश्वास को महाभारतकार न न तोको म भी पत किया है कृतयत्नाफ्लाश्च व द य ते गोनरा । श्रयत्नेन धमाना च द य ते बहवो जना । मदि यलो भवेमत्य स सब फलमाप्तुयान । नानभ्य चोपनम्येत नणा भरतसतम । प्रय न कृतव तोपि दम्य ते हरफला नरा । मागरमायगतरनिमाग चापर सुखी । एक अन्य स्थान पर महाभारतवार की सनी न वडे ही सुपर क्माशी चर्चा की है। यथा यथा कम गुण फलार्थी करोत्यय कम फले निविष्ट । तथा तथाय गुणसप्रयक्त गमागभ कमफल भनषित । ३ प्रर्थात जसे जस का चाहने वाना मनुष्य कमपन म रत हावर म के गुणा का करता है धस वस कम गुणा से प्रेरित होकर वह गुभाशुभ फल कमाल यो भागना है। भगभारत व साय साय यहाँ गीता की नियति विषय मा यतामा का विगावनावर वरना भी अनचित न होगा ! गीताकार ने पद्यपि निमाम कमयाग का मुक्त कठ स प्रामा को है फिर भी दव का विमी पाय सिद्धि के लिए पांचवा और घाव या यारए माना है (१) वही अध्याय १६३ । (२) वही प्रध्याय १६ । () नो०प० २०१२ ।

- भारतीय नियतिवाद का उद्भव और विकास अधिष्ठान तथा पर्ता करण च पृथग्विधम । विविधाक पृथवचेष्टा दव चवात्र पचमम ।। ~अर्थात् अधिन वर्ता विभिन्न इद्रियो विविध चार और पांचवां पारण व मनुष्य का शुभाशुभ कम म प्ररित करने वाला है। गोताकार की यह भी मायता है कि कल्याण करनेवाला व्यक्ति कभी भी दुगति को प्राप्त नहीं होता पाप नवेह नामुत्र विनातत्य विद्यते । ( हि कल्याणकृत्कचिदुर्गात तात गछति । ~६ प्रजुन उस पुरष का न तास लोक मौरन परलायम नाग हाता है क्यानि (हे प्यार) काइ भी गुम कम परनवाला दुगति को प्रास नहीं होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि रामायण महाभारत और गीता में भी व भाग्य कता त और कम के शुभाशुभ फ्ला को ध्यानावपन विवचना भारतीय दशन - वतिक साहित्य स लेकर श्रीमद्भगवद्गीता तक सभेप म नियतिवाद' या शृपावर इतिहाम देखने के पश्चात् अब हम भारतीय दान मे इसकी परम्परा का पयरेक्षा करना है । भारतीय दान म नियतिवार का अध्ययन निम्न निमित प्रम स हा सरता है (१) चार्वाक दान (२) जन दान (३) बौद्ध दान (४) मास्वनि गोपाल (५) पर दान १६) प्रागम दान (७) पावर वेगल (८) मागवासिष्ठ (१) थामद भगवद गीता १८१४ (२) वही ६-४० प्रसाद के नाटको म नियतिवार - इन दानो म प्रथम तीनो नास्तिक दशन कह जाते हैं क्यारिप वे। को नही मानते ।' पडना म सभी प्रास्तिक है क्यादि सभी बता का स्वीकार करते हैं कि तु सास्य वशेपिक और मीमामा दान ईश्वरवाली नहीं । चार्वाक दर्शन यह सवथा भौतिकवादी दान है। चार्वाक के अनुसार पारीर ही मारमा है और ईश्वर नाम का किसी वस्तु का आस्तित्व नहीं है। प्रांखो से जितना दिखलाई पडता है उतना ही ससार है। सत्यता की क्सौटी इद्रिय चरता है अर्थात इद्रियो के द्वारा जिन बाता का अनुभव हम होता है वही वस्तुए सत्य हैं। उनके अतिरिक्त कोई वस्तु है ही नहीं। २ इसस स्पष्ट हो जाता है कि चार्वाक दान नियति भाग्य ईश्वर अथवा अदृष्ट किसी म भी विश्वास नहीं करता। जन दशन जन दान यद्यपि ईश्वर म विश्वास नहा करता और न ही वेदो की मा यता को स्वीकार करता है पर कम और उनने फ्लो भोर पर मटूट विश्वास करता है। जन दान जीव और कम का अनन्त सम्बध वगित घरता है। माचाय कुदकुद का मत है जो जीव इस मसार में स्थित है मर्यात जम मरण के चक्कर में पड़ा हुआ है उसके राग रूप और द्वप रूप परिणाम हात हैं। उन परिणामो से नए कम बघते हैं। कर्मों से गतिया में जाम नना पडता है। ज म तन से गरीर मिलता है गरीर में इद्रियाँ होती हैं और इन्द्रिया स विपया का ग्रहण करता है । फ्लत इष्ट विषया से राग मोर अनिष्ट विपयो स प करता है । इस प्रकार ससार चक्र म पडे - ए जीव के भावो स कम-बध एव उससे राग-द्वप रूप भाव हाते रन्त हैं। यह चक्र अभय सावन का अपेक्षा स अनादि सात है। इस प्रकार जन धम घार पम वादी दशन है जो कि भारतीय परम्परानुकुल भी है। बौद्ध दर्शन जन मतानुसार ही बौद्ध मत भी कम की महता को वरिणत करता है।" बौद्ध लाग भाग्यवार को विवाद या दष्टिक्ता के रूप म मानते हैं और (१) नास्तिको वेद निक (२) बलदेव उपाध्याय मारतीय ददान पृ० ११९ | (३) क्तागच नास्त्री जन धम १४२ । (१) दध पुरातन कम भारतीय नियतिवार का उद्भव और विकास दिट्टि का वणन कई स्थाना पर 'धम्मपद म पाता है। हा. वासुदेव गरण अग्रवाल के अनुमार धम्मपद के अनेक म्याना की तुलना प्रनावद या नियति बाद के दृष्टिकाण से की जा सकती है। (धम्मपर ८१) . बौदा के प्रतीत्य समुत्पार के अनुसार प्रत्येक वस्तु का कोई कारण प्रवन्योता है। म मसार में दुख है और दुख वा कारण है जम ग्रहण जो मवथा तृष्णा जय है। जर मनु तृष्णा छोर नितिप्त हो जाना है ना वहस रा छुटकारा पाता और निर्वाग का अधिकारी वन जाता है। स्पष्ट है कि बौद्ध धम भी कम पर और नियति को मानता है तथा ७ सवाद का मौलिक सिद्धान प्रनिपारित करता है निमका परवी माहिप पर यापक प्रभाव देखने का मिलता है। बोदर का कमवाद उपनिपटी और जन साहित्य से मेल पाता है। जितु जहाँ जन मनावलम्वी यह मानन कि कम अनिवाय है वहाँ यौडा के अनुमार यनि मनप्प तृष्णा का छोटो नो कमपल भोग स यच भी सरा है क्यादि सृष्णा ही कम विपार का एरमात्र कारण है। मक्खलि गौशाल कर मत महाभारत के शान्तिपन म गागाला मत गवि ऋपि नाम से चरिंगत किया गया है। ये पाजीव थे तथा 'प्राजीवक सम्प्रदाय के राम्यापर थे। प्राजीव उह कहा जाता है जो कम को सवा त्याग कर जीविका क लिए भाग्यापनीरीहा। पाणिनी न है मस्करी' तथा इस मत प मानने वाला काटिप्टिवानी प्रथया दरिद कहा है।' मपनि गौशाल का मुग्य उपा था कि मनुष्य को यति मात्र पाना है तो उस का भी कम नहा करना चाहिय । पमहीन हनि स हा चरम पनि मिल सकती है। गौर का मूलमत्र इस प्रकार है (१) यासुदेवारण अग्रवाल भारत सापित्री भाग २ पृ.४५ । (2) The thurd category of thinkers who are mentioned as Daishuka by Panını certainly refer to the followers of thic deterministic philosophy preached by Makha), Cosala who tepudiated the efficacy of harma as a means for improving lot of humun beings -V S Agrawala India As known to Panını P 383 ३ ४२ प्रसाद नाटक। म नियतिवाद माकृत कर्माणि माकृत कार्माणि गाता । नयसी व्यात तु मस्करी परिप्राजक् ।' यदि मो मिलन वाता है तो उमक लिए हाथ पर चलाने की प्राव यकता नही वह कान्ति या पत्राप वट रहने से ही मिल जायेगा भन कम मत करो कम मत करो। स प म गोगाल का यही मदेश था। कम का स्तना घोर विरोध गायद ही भारतीय दान में किसी ने किया हो जितना गोगात ने किया। इसी कारण ये पक्के नियतिवादी कहे जाते हैं । इहोन कहा कि न तो कम ही किसी घटना का कारण है और न श्वर ही अपितु समस्त घटनाए स्वत पटित होती हैं क्योकि वे नियति हैं। नियति हो वह पक्ति है जो समस्त जीवो और पदार्थों को नियत रखती है। गोगान रतने कट्टर नियतिवाद कसे बने इसके पीछ एक बड़ी ही रोचक कथा महाभारत के गातिपद में परिणत की गई है। वस्तुत प्रारम्भ में वे पुरुपायवादी थे किन्तु कितना भी कम करते तो भी पत्र प्राप्ति नहीं होती थी भाग्य साथ न देता या। प्रत म उहोंने दृढ व्रत लिया कि इस बार अपनी पूरी शक्ति लगाकर कम करू गा मौर अवश्य सफलता मेरे पदम चूमेगी। मत अपना सवस्व वेचकर उहोने दो हट्ट रट्ट बल खरीदे और उहें एक रस्सी से बांधकर खत की मोर चल पडे। रास्ते म एक अट बठा हुमा था और वह एकाएक उन बलो को देखकर भडक गया। वह उठकर भागा और दोनो बला के बछडे उसकी गदन म लटक गय । मकि ऋषि विलाप करते हुए उनके पीच पाच भाग पोर उहोंने ये T? हे - मणीयेष्ट्रस्य लम्बेते प्रिय गत्सरोमम । पद्धदि यमेवे हठ नगास्ति पौरुपम । मान जस माता के दो मनके मूलते हैं ठीक यसे ही कट के गदन मे मरे दोनो बछडे भूल रह हैं । ह पूर्वक किया गया कम कभी सफल नहीं हाता भाग्य ही प्रतिम सत्य है। वस्तुत कट ही वह भाग्य है जिसकी ऊवड सावड चाल का कोई ठिकाना नही पता नहीं वह पर भहक जाए। यह ऊट सब के माग घेर कर वठा हुमा है। य दा बछडे नान भोर कम हैं पर भाग्य रूपी ऊर पहें क्व उठा ले जाएगा यह कोई नहीं बता सकता। (१) माप्य ६-१-१५४ । (२) महामारत (नातिपर्ण) १७१-१२ ।

। . भारतीय निमतवाद का उद्भव और विकास उपरोक्त कथा प्रसग से मक्खलि गाल घोर नियतिवादी (भाग्यवादी) सिद्ध होते हैं। यही नहा वे पाजीवको के सुप्रसिद्ध सिद्धान्त नियतिवाद के प्रवतक भी माने जाते हैं। वे बहुत समय तक भगवान महावीर के साथ रहे वितु बाद में मतभेद हो जाने के कारण उनसे पृथक हो गये। भगवती स्त्र तथा भाव यक सूत्र की चूणि म दोनो के पाधक्य का विवरण उपलर है। कहा जाता है कि एक दूसरे से पृथक होने पर ये दोनो सोलह वर्ष तक अपने अपने सिद्धातो का प्रचार करते रह । इस अवधि मे मक्खलि गोपाल की प्रतिष्ठा बेहद बढ गई भोर श्रीवस्ती में उनके भने भनेक अनुयायी हो गए। उहोने अपने भाप को तीयकर भी घोषित कर दिया। विनानी के मतानुसार भगवान महावीर से उनका मोलिन मतभेद नियतिवाद के सम्बध म ही था। जहाँ गोपाल एकात नियतिवादी थे वहां महावीर भनेका तवाद ये समपक थे।' गोगाल की नियतिवारिता के विषय म श्री परशुराम चतुर्वेदी नै माजी धका का नियतिवादी सम्प्रदाय पर अपने एक लेख में लिखा है नियति को चर्चा करते समय मक्खेलि गो गाल का कथन कुछ इस प्रकार का था कि 'जिस प्रकार कोई सूत से भरी रील फेंकने पर बरावर उभरती चली जाती है भोर यह उमकी पूरी लवाई तक एक ही प्रकार से बढती जाती है उसी प्रकार चाहे कोई मूख हो चाहे कोई पहित ही क्या न हो सभी को ठीक एक ही निपम का अनुसरण कर मपने दुख का अन्त करना है मक्सलि गोपाल के इस नियतिवार की धारणा को उनके दक्षिणी भनुयायियों ने कुछ पौर भी विकसित किया। मक्खलि गोशाल के विषय में इतने तथ्यों को प्राप्त करने के पश्चात हमारी यह निश्चित धारणा बनती है कि भारत में भी भाग्यवादी दान का प्रचार प्रसार रहा है जिसके प्रवतक गोगाल स्वयं पे । पाणिनी ने भी जिन चितको का दटिक नाम से उल्लेख किया है वे निश्चित रूप से गोशाल द्वारा प्रचारित नियतिवादी ही हैं जिहाने मनुष्यो के भाग्य सुधारने के लिए पम भी प्रमावोत्पादकता को निसार ठहराया। (१) हैपालाल सहल मुनि श्री हजारीमल स्मति-प्रप (नियति का स्गरूप) पृ० ४१६ (२) परशुराम चतुर्भेको भारतीय साहित्य (लाई १६५८), ५०२६-३०॥

૪૨ प्रसाद के नाटको में नियतिवात माकृत कर्माणि माकृत कार्माणि गातिय । श्रयसो व्यात तु मस्करी परिप्राजक ।' यति मो मिलने वाला है तो उस लिए हाथ पर बनाने की प्राव यकता नही वह नाति या चुपचाप बढ रहने स ही मिन पायेगा मन कम मत करो वम मत करो। सशेप म गोपाल का यही मदेश था। कम का रतना धार विरोघ गायद ही भारतीय दान में किसी न किया हो जितना गोयल ने किया। इसी कारण ये पक्के नियतिवादी कहे जाते हैं । इहाने कहा कि न तो कम ही किसी घटना का कारण है और न श्वर हो अपितु समस्त घटनाए स्वत घटित होती है क्योकि वे नियति हैं। नियति हो वह क्ति है जो समस्त जीवो और पदार्थों को नियत रखती है। गोगाल रतने कट्टर नियतिवाद कसे बने इसके पीछ एक बडी ही रोचक कथा महाभारत के यातिपय म वणित की गई है। वस्तुत प्रारम्भ में वे पुम्पायवादी थे किन्तु कितना भी कम करते तो भी पल प्रति नही होती थी भाग्य साथ न देता था। प्रत म उहोंने दृढ व्रत किया कि इस बार अपना पूरी किन लगाकर कम परू गा भौर अवश्य सफलता मरे कदम चूमेगी। अन अपना सवस्व बचकर उहोन दो ह वट्ट बल खरीदे और उन्हें एक रस्सी स बांधकर सत की मोर चत्र पहे। रास्ते में एक ऊट बठा हुमा था और वह एकाएक उन बता को देखकर भडद गया। वह उठकर भागा भोर दोना बलो के बछडे उसकी गदन म लटक गये । मवि ऋपि विलाप करते हुए उनके पीछ पीछ भाग मोर उहोंने ये शद कहे - मणीगेष्ट्रस्य सम्बेते प्रिय गत्सरोमम । गदि यमेवे हठे नगास्ति पोरयम् । मर्थात् जसे माला के दा मनके मूलते हैं ठीक वसे ही ऊट के गदन म मरे दोनो बछडे भूल रहे हैं। हठ पूवर दिया गया कम कभी सफल नहीं होता भाग्य ही प्रतिम सत्य है । वस्तुत ऊट ही वह भाग्य है जिसकी कवड साबह चाल का दाई ठिकाना नहीं पता नही वह क्व महब जाए। यह ऊट सबवे माग घेर कर वठा हुआ है। य दो बछडे मान और कम हैं पर भाग्य रूपी ऊर न्हें क्व उठा ले जाएगा यह कोई नहीं बता सकता। (1) भाष्य ६-१-१५४॥ (२) महामारत (तपर्य) १७१-१२॥ .

भारतीय नियतवाद का उद्भव मौर विकास उपरोक्त कथा प्रसग से मक्खलि गाल घोर नियतिवादी (भाग्यवादी) सिद्ध होत हैं। यही नहीं वे प्राजीवों के सुप्रसिद्ध सिद्धात नियतिवाद के प्रवता भी माने जाते हैं। वे बहुत समय तक भगवान महावीर के साथ रहे वितु बाद म मतभेद हो जाने के कारण उनमे पृथक हो गये । “भगवती स्त्र तथा आवश्यक सूत्र की चूणि में दोनों के पाथक्य का विवरण उपल ध है। कहा जाता है नि एक दूसरे से पृथक होने पर ये दोनो सोलह वप तक अपने अपने सिद्धातो का प्रचार करते रह 1 इस अवधि में मक्खलि गागाल की प्रतिष्ठा वेहद बढ़ गई और श्रीवस्ती म उनके मन भनेक अनुयायी हो गए। उहोंने अपने माप को तीथकर भी घोषित कर दिया । विताना क मतानुसार भगवान् महावीर से उनका मौलिक मतभेद नियतिवाद के सम्बन्ध महा था। जहाँ गोशाल एकात नियतिवादी थे वही महावीर पनका तवाद के समथक थे। गोशाल की नियतिवारिता के विषय में श्री परशुराम चतुर्वेदी ने माजी का का नियतिवादी सम्प्रदाय नीथक अपने एक लेख में लिखा है नियति को चर्चा करते समय मक्सलि गोगाल का कथन कुछ इस प्रकार का था कि जिस प्रकार कोई सूत से भरी रील फेंकन पर बरावर उभरती चली जाती है भोर यह उमरी पूरी तवाई तक एक ही प्रकार से वरती जाती है उसी प्रकार चाहे कोई मूख हो चाहे कोई पडित ही क्या न हो सभा का ठीक एक ही नियम पा भनुसरण कर अपने दुख का अन्त करना है, मक्सलि गोपाल रस निमतिया की धारणा को उनके दक्षिणी भनुयायिया ने कुछ मोर भी विरसित किया। मक्खलि गोगाल के विषय में इतने तथ्यों का प्राप्त करने के पश्चात् हमारी यह निश्चित धारणा बनती है कि भारत में भी भाग्यवादी दान का प्रचार प्रसार रहा है जिसके प्रवतक गोपाल स्वय थे। पाणिनी ने भी जिन चिन्तको का टिक नाम स उल्लेख किया है, वे निश्चित रूप से पोगाल द्वारा प्रचारित नियतिवादी ही हैं जिहान मनुप्मा के भाग्य मुधारने के लिए बम वी प्रभावोत्पादकता से नि सार ठहराया। (१)हैयालाल सहल मुनि श्री हजारोमल स्मति-प्रय (नियति का गरूप) पृ. ४१६ । (२) परशुराम चतुर्भयो भारतीय साहित्य (जसाई १६५८), पृ. २९-३०॥

प्रसाद काटका म नियतिवाद
पांच अन्य भाग्यवादी सम्प्रदायो का उल्लेख महाभाग्न म मिलता है
जिनकी पुष्टि वासुश्व गरण अग्रवाल ने भी एक लेख म वो है। ये मम्प्रदाय
निम्नलिखित हैं
(क) सक्साम्य (सबको समान समझना)
(ख) अनायास (हाय पर न हिलाना परिश्रम न करना)
(ग) सत्यवार (सत्य बोलना)
(घ) निवेद (कम के प्रति नितात उपेक्षा)
(इ) अविरसा (क्सिी वस्तु प्राप्ति की इच्छा न रखना)
उपरोक्त पुष्ट प्रमाण के प्राधार पर यह निश्चित रूप से कहा जा
सकता है कि हमारे यहाँ अति प्राचीन काल से भाग्यवानी सम्प्रदाया का
प्रस्तित्व रहा है।
किन्तु मानविकी पारिभाषिक काग में डा० नरवणे का क्थन है
भाम्यवाद एक ववारिक प्रवृत्त मात्र है न कि दानिक सिद्धात
मक्खलि गोगाल के भाग्यवादी सम्प्रदाय और महाभारत में गित उपराक्त
सदभ के पानोरम हम श्री नरवणे का यह मत सवथा भ्रामक प्रतीन
होता है।
पडदशन
(१) साम्य -पडना म मय प्रथम सारप दान है जिसन
ध्यात्याता व पिल मुनि न प्रात्मा को निष्क्रिय माना। कपिल ईश्वरवाटी
नहीं थे प्रतिवादी थ। कपिल करते रि पुरुष की समीपता मात्र से
मौर उसके लिए ही पनि म त्रिया उत्पन्न हाती है जिससे विश्व की
वस्तुम्ना का उत्पादन एव विना हाता है। रस सम्बधम गाता का
निम्नलिखित "तार भी उलस्य है
6
(१) आ पामुदेवा गरण अप्रगाल (प्राचीन माग्यवादी दान)
साप्ताहिक भारत रगिगार २२ मई १९६० ई०।
(२) महामारत न० प १७१-२ तथा अशो०१० ३६-१७४।
(३) मानगिकी परिमापिर कोर (सश नपेर) दान सड प ८३।
(४) राहुल साध्यापन दान दिदा ५४२ ।

भारतीय नियतिवाद का उद्भव और विकास न कतत्य न कर्माणि लोक्स्य सजति प्रभु । न कमफलसयोग स्थमायस्तु प्रयतत ।' सारप दान म 'सत्सायवाद का सिद्धात माय है जिसके अनुमार उत्पत्ति से पूर्व भी काय कारण म अवश्यमेव अव्यक्त रूप में विद्यमान रहता है। इस प्रकार काय तथा कारण म दम्नुत अभिरता है । याय को अयत्ता वस्था का ही नाम कारण है और कारण की यक्तावस्था ही काय है। इम प्रकार का कारण का भेद यावहारिक है परन्तु अभेद तात्विक है। इस मिद्धात का परिणामवाद भी कहते हैं। दही म मरसन पहले मे ही है । उस ही विलो कर प्रकट कर दिया जाता है। सिक्ता से तेल नहीं निकाला जा सकता क्योकि उसम तैर ही नहीं वितु तिला स तेल निकाला जाता है क्योकि उनम तेल पहले ही अव्यक्त रूप में पाप्त रहता है। इसी प्रकार वन्तु से वस्त्र तथा स्वरण मे दुगडल माति के निमारण म मा मात्र रूपान्तर होता है वस्तुत कोई नई वस्तु नहा यनती। सारय दान काम और कारण म समवाय सम्बध मानता है जिससे सिद्ध होता है कि चाह जिम कारण स चाह जिस काय की उत्पत्ति नहा होती। (२) बशेपिक ~~वणाद वोषिक मत के सस्थापक थे। य प्रारम यादी थे और महाप्ट को मानते थे। विश्व का नियमन कौन सी गति करता है यह दिखाई नहीं देता प्रत परणाद ने उमे प्रद्दष्ट की मना दी। कणाद वे निए राहुन जो जिसने हैं उन्हें कमफल प्रादि अदृष्ट देता है। यह फ्ल देनेवाला अप्ट सुकृत दुप्पत की वासना या सस्वार है । इसे "श्वर नहा बहा जा सकता।' प्रत कणाद ने ईवर की मता के विरद्ध अदृष्ट की सता स्वीकार की! (२) भीमामा -इमक प्रवतव जमिनी थे। मीमासा म बम भोर पत की गसता प्रपूर्व माध्यम से इस प्रकार मलित कर दी गई है fr उगम विमा पृथक् व्यक्ति का नियन्ता प्रयवा पर दाता प म पावग्य पता हो नहा रह गई। स्त्र द्वारा विहित विधान के अनुसार जब हम विधि पृषक तिमी पम पा पूर्ण मनुष्टान करते हैं तो वह कम स्वत ही अवय, १० थोमदमपाता ५-१४ ॥ (२) मलदेव उपाप्याप भारतीय दान, ३२४ । (राहल सायापन बान दिन ५६३ ।

प्रसाद के नाटको में नियतिवाद फल देगा। वे विहित अनुन्छिा कम हा स्वय फलदाता है । घट के पदा होने के सपूण साधना का जुटा र जब एक कुम्भकार उसकी उत्पत्ति के भनुकूल समस्त यापार करता जाता है तो फिर घडा स्वय ही पदा हो जायेगा। ततुमा का विधि विधान के अनुसार सयोग करते-करते घट स्वय उत्पन हो जायेगा। वेद प्रतिपादित कम तीन प्रकार के माने गये हैं -(क) काम्य कम विसी कामना विशेप के लिए किए जान वाले कम जसे स्वग की कामना के लिए यज्ञानुष्ठान । (ख) प्रतिषिद्ध कम अनय उत्पादक निषिद्ध कम जसे विपरिघ शस्त्र से मारे गय पशु के मास भक्षण का निषध । (ग) नित्य नमितिक क्म, अहेतुक कारणीय कम जस सध्याव दनादि नित्य क्म तथा भवसर विरोप पर किये जाने वाले श्रादादि नमितिक क्म । अनुष्ठान करते ही तुरन्त तो फ्ल मिल नहा जाता फिर फलोत्पति कस होती है ? जसा ऊपर कहा गया है प्रत्येक कम म मीमासको के मतानुसार अपूर्व (पुण्यापुण्य) उत्पन करने की शक्ति रहती है योगादेग फल ताद्ध क्तिद्वारेण सिध्यति । सूक्ष्म पक्रयात्मक या तत फलमेवोपजायत ।। प्रपूव मौर अपूर्व से होता है फल । मत अपूर्व फल तथा कम के बीच की दशा का सूचक है। इसीलिए शराचाय ने अपूव को कम की सूक्ष्मा उतरावस्था या फल की पूर्वावस्था माना है कमणो या सूक्ष्म काचिदुतरायस्था फलस्य था पूर्वागस्थापूर्ण नामास्तीति तक्यत ।। जमिनि यद्यपि विधिविहित यन को ही फनदाता मानते हैं तथापि ब्रह्म सूत्र ने तृतीय भध्याय के रितीय पाद के प्रतिम पनाधिकरण में प्राचाय वाद रायण ईश्वर को कम फल का दाता मानते हैं । परवती मामासका न मा ईश्वर कोयनपति के रूप में स्वाकार कर उसे ही एक प्रकार से कमफ्लताता स्वीकार किया । प्राचीन मोमासा भव य निरीश्वरवादी जान पड़ती है।' कम से (१)मान मिष मीमांसा दान पृ० ३२५ । (२) सत्रगातिक पृ. ३६५। (३) गाकर माप्य ३-२-४ । (४) बलदेग उपाध्याय भारतीय ने पृ० ३६६ ।

भारतीय नियतिवाद का उद्भव और विकास (४) याय -गौतम ने न्याय दान स्थापना की। उनके अनुसार प्रत्येक पाय का कारण होता है। क्म नियामा और कम पन दाता के रूप म गौतम ने ईवर को स्वीकार किया। वै वरते हैं कि मनुष्यो के कर्मों का द्रप्टा और कम फ्ल मयोग कराने वाला बाई न कोई अवश्य है । वह मनध्य नहीं हो सकता, ईश्वर ही हो सकता है। इस दृष्टि से देखने पर याय दान जडवादी दान नहीं रह जाता क्योकि वह काय कारण शृखला को पूरान स्वीकार करता है और उसम भाग्यवाद का वह रूप नही माना जा सकता जिसमे काय कारण परम्परा का प्रभाव है तथा का स्वराचार को लेकर प्रवृत्त होता है। (५) योग -योग दशन के पाल्याता पताल थे। योग दान का मूत्र है ते हला-परितापफ्ला पुण्यापुण्यहेतुरवात् । । अर्थात् पुण्य और पाप से हो सुख दुख प्राप्त होते हैं । पत जलि के अनुसार ईश्वर सृष्टि और प्रलय के अनन्तर पुस्पो के कर्मानुसार उह नतिक विरास के लिए अवसर प्रदान करता है और उस उद्दश्य हेतु प्रकृति-पुरुष में सयोग का नियंत्रण करता है। पुरुष कर्मों के पल अथवा विपाक का सहन करता है किन्तु ईश्वर सब प्रकार के विकारों से रहित होता है। सृष्टि और प्रलय के व्यवस्थापक रूप में योग न ईश्वर को स्वीकार किया है । (६) वेदान्त - इसके सस्थापक वादरायण थे जिहोने जीव को नित्य घेतन एच ब्रह्म का प्रग माना। ये उपनियों से प्रभावित थे और यह मानते थे कि जीव स्वय-कृत कर्मों का फल भोगने म विवा है। फिर भाव यह स्वीकार करते थे कि जीव में कम करने की क्षमता है। तित्वशक्ति परमात्मा स मिली है यह अति सिद्ध है। क्ति ग्रह से बह काय परायण होती है । इस लए पाप पुण्य के विधि निषध फजूल नहीं भोर न जीव को वेवसर दण्ड भागने का वान उठ सकती है। निपत पहा । मक्ता है कि पडदानो म एर दो प्रापवादों म अतिरिक्त प्रय सभी दानों म नियति भी मता का विसी किमी म्प में बीतार किया गया है। जीव को यह मिलने पर (१) योगदर्शन २-१४॥ (२) राहस सहरयाचन निविदान पृ. ६७६ ।

४८ प्रमाद के नाटक में नियतिवार प्रागम दर्शन पाचरात्र गव और गाक्त प्रादि दानो को मागम कहा जाता है। नम * दशन प्रमुख है । म दान म जि को ही ममस्त मृष्टि का नियन्ता और महारक माना जाता है । गिव सवातिमान हैं सवत त्र स्वतन और प्राणिया के सुख दुख का नियामक है। नियनियोजनामधते विशिष्ट कायमगटन के अनमार विश्व के विशिष्ट काय कलापो की योजना निषति भरा होता है। नवागमो का निर्यात पाच वचन म स एव चा मात्र है वही सब कुछ ननी है। उनक अनमार नियति गिव वरूप में समस्त विश्व के कमव की यातना बरती है । गिव में गवा न १ स्प माने जो-वामराव गव भव उद्धव बज्रदेह प्रभ धाता नम विक्रम तया सुप्तभेद-हैं। रहा रूपो को धारण कर गिर विश्व का नियमन परत हैं। गवा का द्धतिक व्याल्या श्री बननव उपाध्याय के म सुनिए मर पर अपरिमित मान कर म जीवो का प्रत्यक्ष करते हैं और अपरिमित प्रभावन मे जीव का पालन करत वह परमस्वतन ए वय वान नया एक कर्ता है। उगी की इच्छाशक्ति से जीवो को एट अनिष्ट, गरीर विषय तथा इ[ य की प्राप्ति हुआ करती है इसीलिए वह स्वतत्र क्र्ता कहलाता है । शवर वेदान वेगात अनुसार बम व धन के कारण है नान स हा मुक्ति प्राप्त होता है। गीता क अनमार नान को अग्नि सब पर्मों का भस्म कर डालती है । टीनानाराव मतानमार राव कर्मा से नात्पय कमपा से है क्योकि Tन की अग्नि म चन और रियमारण कम नो नष्ट हो जाते -- (१) तत्रानो आहनक १ (Oदा साहित्य का बहत इतिहास (स राजबली पाडय) भाग १राण्ड (ल• बरदेव उपाध्याय) ()(क)मणा दया जतुविद्यया तु प्रम यत । (महाभारत nfo २० ५४ -७) (स) ऋते ज्ञानात मत।

भारतीय नियतिवार । उद्भव और विकास ४६ प्रारम नष्ट नहीं हात । प्रा०ध क्मों का तो भोग से हो क्षय हाता है। कायकारण वे सम्बध म वदात भी 'परिणामवाद' वा पमपाती प्रतात होता है जसा कि भात्महत परिणामान (प्र० सू०१-४-२६) से प्रक्ट है । लाक्माय तिरकन अपन भाप्य मे क्मयोग + महत्त्व पा प्रतिपादन किया है । मनुष्य कम किये बिना नहीं रह सकता रितु कम निकाम भाव स विय जान चाहिए जिसस व व धनन्दनु न बनें। जो सघ्याव-नादि नित्य कम करता है, उसका वित्त सस्त्रियमाग होकर विशुद्ध हो जाता है। चित्त पी पिशुद्धि हाने पर वह आत्म साक्षा कार के योग्य हो जाता है। उस स्थिति पर नियति वा उस पर कोई वा नही चलता। वह नित्य गुद्ध बुद्ध रूप में स्थित होकर अपन को पहचानकर ब्रह्मवित् ब्रह्मव भवति ब्रह्मवेता बनकर ब्रह्म ही हा जाता है। मम स्पष्ट है कि कम मनप्प को तभी तक बांध पाते हैं जब तक मनुष्य कामना स यम में प्रवृत्त होता है । योगवामिष्ठ योगवासिष्ठ न नियति और पुग्पाय का बनुत हा मुदर विवचन दिया है । कुछनार दपव्य है - यथास्यन बहात्तत्य सत्ता नियतिष्यते। सा दिनदिनयतव सा यिनैयविनयता ! २-१०~१ । प्राक्सिर्ग हि नियति वय चिनयमक्षयम | प्रनाय सदा माध्यमिति साधत परम। -६२-१। अर्थात मध रामपस स्थित ना यापर हा या सता है उमीना नाम नियति है यही माय कारण के नियम्य और शियामर स्पगे स्थित है। कारणहान पर पाय माय हाना है और वाय हान पर उसमा वाइवारण पाप हाा है। सी नियम का नाम नियति है। वहीं कारण मादिमी नियामकता है और यही काय मादि की नियम्यता मी है। (१) प्रारम्पर नौगादेव क्षय ।

५०
प्रसाद के नाटका मे नियतिवाद
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'द नाम न किचन (११-५-१८) भौर दव न विद्यते ' (११-५-
११) बहर योगवासिष्ठ ने पुरुषाथ की महिमा गाई
यो यो पया प्रयतते स स तत्तत्फल कभान् ।
न तु तूर्णी स्यितेनह केनचित्प्राप्यते फलम ।
इस प्रकार ऋग्वदिक काल से योगवासिष्ठवार तक भारतीय साहित्य और
दशन म नियतिवादी धारा प्रखड और मविछिन्न रूप से प्रवहमान हानी हुई
दृष्टिगोचर होती है।

प्रसाद के नाटको मे नियति' का सरूप नियनि- को मुत्पत उसके पर्याय उसके स्वस्प तथा उसके उदभव और विकास का विवेचन करने के पश्चात् अब हम कालक्रमानुसार प्रसाद के नाटकाम नियति व स्वरूप का अध्ययन करना है। प्रसाद ने अपने सपूण साहित्यिक जीवन म चौदह नाटर पूरे प्रिय मितु इन म मे मनोधम देव प्रकाशित नहीं हो सका । इनके अतिरिक्त 'अग्निमित्र' तथा "द्र नाम नाटका का वै सयोजन मात्र हा कर सके। इस प्रकार उनके समस्त प्रकाशित नाटका की सख्या तेरह ही रह जाती है जिह प्रमा इस प्रकार रखा जा सकता है - (१) सजन (२) प्रायश्चित्त (३) वाणी परिणाय (४) वरुणालय (५) रायश्री (६) विकास (७) ममानानु (6) जनमेजय का नागयन (E) कामना मन १६१०-११ , १६१२ १६१२ १६१३ १६१५ १९२१ १९२३ (११) चद्रगुप्त {१२) एघूट १६२८ १९२८ १६२६ (१३) ध्रुव स्वामिनी उपरोक्त नाटकाम से पल्याणी परिणय को विवेचन का विषय नहीं बनाया गया है, पानि च गुप्त नाटक में इसका समाहार हो जाता है। मन्य सभी नाटको की नियति भावना का विवेचन विपण हम निम्ननिखिन तीन बिन्दुओं के माधार पर वरेंगे- - . प्रसा-4 नाटकाम नियानयाद द्रष्टव्य है अत का जा सकता है कि कमवार के प्रतिरक्त रम नाम्य रचना म प्रसाद का ध्यान दववाद की मार भी गया है । "तुय ह य म चित्रसन जव युद्ध करते करते एकाएर अपन मित्र प्रजन का पहबान लेता है तो युद्ध वद कर देता है। प्रजन उसे बताता है कि वह युद्ध विप्नव म उसे पहचान नहीं सका था इस पर चित्रसेन की यह उक्ति मित्र कुछ नही वह केवल मयोग था। यहां सयोग का मय आकस्मिाता अप्रत्यागित बात मचित्य बात प्राति से है। किन्तु इससे यह भी जान पडता है कि सयोग से अनेक घटनाए घटित होती हैं । वसे सयोग T' साधारण यवहार का श” है किन्तु अप्रत्यागित घटना के भय में प्रयक्त होने के कारण यह भाग्य के समक्ष प्रतीत होता है जिसमे काय-कारण परमरा की अष्टता की प्रतीति भी होती है । पघम पश्य में युधिष्ठर और द्रौपदी चद्रमा के प्राकृतिक सौग्य के विषय म वार्तालाप करते हुए दष्टिगोचर होते हैं । युधिष्ठिर कहते हैं चद्रमा के चारों पार तारागण एकत्रित हो गए हैं जिमि गुभ फल पावें सजना प धनरे। -अर्थात तारागरण चद्रमा के चारो मार ऐसे ही एकत्रित हो गये हैं जसे सनन के चारो ओर शुभ फल । द्रौपती की इस उक्ति म भी कम फ्ल के रूप म वमवाद की छाप दानीय है। माटर अन्त में विद्याधरी-गणा के द्वारा भरत-वाक्य के स्पम धर्म की जो स्तुति की गई है उसम भी यह कहा गया है कि सजन अथवा धर्मानुसार भाचरण करने वाले पक्ति की ही विजय होती है। इससे भी मच्छ कम करने वान व्यक्ति को शुभ पल मिलने का समेत स्पष्ट है। निप्यप मजन प्रसाद को प्रथम नाश्य-कृति है मत इस नाटक म उनका ध्यान घटनामो के सपोजन मोर चरित्र चित्रण ता हो मोमित रह गया है। इसी से इस नाटक म तिमी दाशनिक सिद्धान्त का प्रतिपालन नहीं हो सका है। किन्तु फिर भी तना तो कहा ही जा सकता है कि इसम प्रसाद जी कम-सम्य धी मौर दव विषय दाना प्रकार की मागिक मनुभूतिया से प्रभावित दष्टिगोचर हाते हैं । नकुल तथा सहदेव की प्यास से उत्पन्न दाविपय देख कर युधिरि का ध्यान सा उनके स्वभावत दव की पार जाता है मोर मूम तया पद्रमा क सम्बध म वार्तालाप करत समय द्रौपती का ध्यान पुरुषाय की भोर - प्रसाद के नाटको में नियति का स्वरूप प्राकृष्ट हो होता है। इसी प्रकार क्रण भी इस नाटक मे पुस्पाथ की महिमा का पान नई स्थानों पर भरता है। चित्रसेन ने सयोग गदको प्रयुक्त कर भाग्य का पोर साधारण सा सकेत किया है। किन्तु नाटक का समग्र प्रभाव कम की प्रधानता पर ही बल दता हुप्रा सा प्रतीत हाता है क्योकि करण और द्रौपनी के अतिरिक्त अजुन का चरित्र भी पुरुषायवादिता का सुदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसी पुरपाय के कारण वह दुर्योधन का मुक्त कराने में म सफल होता है और अपनी वीरता तथा कतव्य भावना का प्रदर्शन करने मे भी। प्रायश्चित नियति विषयक सदभ {१) दूसरी (विधायरी) सीधी स रही सही - तिहिंसा को भी भारतवासियों के लिए ईश्वर की क्ष्या समझ। जिस दिन इसका लोप होगा स दिन से तो इनमें भाग्य से दासत्व वग्ना लिखा ही है। -दश्य १ पृ. ७ (चित्राधार), (१)माकागवाणी पहिले अपने लगाये हुए विप-वृक्ष के पन को चख फिर तू उसी साड़ी में जलाया जामगा कि नही इसकी खोज पीछ करना। -दृश्य १ पृ०५२ (३) जयपद्र हाय हाय मुझसे भोर दुप्पम हुमा । -दश्य १,०५३ (४) जय - मन्त्रीवर यया सारे पाप का यही परिणाम हुमा। -'य३ पृ०६३ (५) मत्री महापापो भारत-दुर्भाग्य ने सब कुछ मराया। या मागचप है कि यह भी हो जाय। ०६ प ३ पृ० ८३ (६) जय - मैंने प्राचिन बरन की प्रतीना की है। - प्रमाद नाट्य। म नियतिवाट अथवा नियति विषयक मा यता व विषय म विस्तार स कुन मिलना राभर भी नहीं था क्याकि नाटककार का ध्यान इस कृति म एतिहागिर इतिचा या झाकी प्रस्तुत परन के पीछ अधिक रहा है । फिर भी कर स्थाना पर भाग्य का साधारण अर्थों में प्रयोग हुअा है और कम के विषय म तो स्पष्ट रूप स कई वार मकेत प्रस्तुत किये गए हैं। जयबर न अनेक स्थाना पर स्वय स्वीकार किया है कि उसकी इतनी बुरी दमा उमरे पापा और दुष्कर्मों का ही फ्ल है जिनका बोझ इतना भारी है कि मत्री के उठाए भी नहीं उठ सकता। प्राकाशवाणी के रा भी कमवाद का सुदर उदाहरण प्रस्तुत किया गया है- पहले अपने विप वृक्ष के फन का चख । इस क्थन म कम फ्ल की अनिवायता की स्पष्ट प्रतीति हाती है । कम सिद्धा त के परिपक्ष मे दखने पर इस नाटक की सबसे बडी विगे पता इसका गीपक और जयच द द्वारा वार वार प्रायश्चित की भावना यक्त करना है। हमारे देश म अनादिकाल में यह धारणा याप्त रही है कि अशुभ कम पनो से वचन का एक उपाय यह भी है कि यत्ति प्रायवित करे इसीलिए जयव-जोकि हिंदू समाज के सस्वारा म पला हुमा पात्र है--2 मन म भी रह रहार यहा विचार उठना है कि उसने देश के प्रति जा गद्दारी का है वह एक जघन्य अपराध है जिसके बुरे परिणाम से वह बच नहा सरता। उसके अचतन मन म यह विचार भी घर कर गया है कि पनित पावनी गगा क अतिरिक्त स पाप से उसे कोई भी मुक्ति नहीं दिला सकता और इसीलिए वह अपने समस्त पापो को स्वीकार करता हुमा पतितावनी गगा का नामा चारण करता है तथा उसम बूद कर अपन प्राण त्याग देता है। निवपत हम नाटरमार का यहा कमवाद से प्रभावित हुमा मानते हैं। एक अम बात की ओर भी हमारा ध्यान प्राकृष्ट होता है । तिहास कि जयचद ११६४ई म यमुना के किनारे फिरोजाबाट के पास उडाई म मुरम्मत गोरी से परास्त पिय जान पर हाथी से गिर कर मरा या फिर प्रसाद जो न उस यस प्रकार अपने दुष्कर्मों के विषय म घुट घुट कर पश्चाताप करते हुए और गा म दबवर प्रायश्चित करते हए क्या वित्रित किया है ? हमारी दृष्टि म सके पीछ भय कारणा के साथ साथ उन पर बम मिद्धान का प्रभाव भी एक कारण है। म वगित (१) देवए वही प १५६।

प्रमाद के नाटक म नियति का स्वस्प उपरोक्त तों के आधार पर हम प्रायर्यावत को कमवादी प्रभाव से युक्त नाटक रह सकते हैं। जहा सजन में प्रसाद जी द्वारा प्रकारातर से कम वादिता अभियजित हुई है वहां प्रायश्चित म वह स्पष्ट रूप से मुखरित हो उठी है। करुणालय नियति विपयर सदभ (१) हरिश्चद्र -हे समुद्र के देव, देव प्राका के, मा त हूजिए क्षमा कीजिए दोन को। हाय १.५०१५। (२) नेपथ्य से -चला सदा चलना हो तुमको धेय है खड मत रहो म माग विस्तीर्ण है । हत्य १,१०१६ (२) रोहित -देव प्राप यदि हैं प्रसप्त तो माग्य है प्रमो सदा प्रादेग आपका ध्यान से पालन करता रहे दास वर दीजिये रुक कम पय मे न कभी यह भीत हो हय २ प०२० । - गुन शेष () वमिठ फिर क्या तुम को यह सव स्वीकार है?' जो कुछ होगा भाग्य और निज कम में। हाय ४, पृ० २६॥ (५) गुन शेफ -हे हे करुणा सिघु नियन्ता विय के हे प्रतिपासक तृण बिरूप के सप के हाप प्रमो क्या हम इस तेरी सष्टिये नहीं, दिसाता जो मुझ पर करुणा नहीं। हण्य ५ ५०३१. (६) सुत्रता --रे रे दुष्ट बना है ऋपि रप में मिरावधिर रे नीचे भरे पाटार सू मूल गया दुरव सहा उस बात को।

६० प्रसाद के नाटको म नियतिवाद (७) वसिष्ठ -पाय सुनते साधु सुगोले पय तू पाया पति सुत पिर अपन सोमाय से । दृय प ५३७ (८) विश्वामित्र -गनिय ता का यह स चा राग्य है सब का ही वह पिता न देता दुख है। द (8) विश्वामिन वह प्रकाशमय द व न दता दुप है अस्तु समा तुम गतिहीन हो गये सम स्वर से सब करो स्तवन उस द व का जो परिपालक है इस पूरे विश्व का। ७-३८ (१०) विश्वामित्र जय जय विश्व प्राधार । अगम महिमा मि घु सी है कौन पावे पार । हय ५ प समीक्षण नाटक के प्रारभ म ही जव राजा हरिश्चन्द्र सरयू नदी के किनारे नौका विहार कर रहे होते हैं तो नेपथ्य स देववाणी होती है मिथ्या भाषी या राजा पाखरान है। इसस राजा को अपना वह धचन याद अाता है जो उसन वरण का दिया था। अपने पुत्र की धति दने का वचन याद आते ही राजा वरण का प्रसन्न करन लिए कण स्वर म मा उठना है (१) ऋग्वेद १२४३ ऐतरेय ब्राह्मण ७ ३ नोतिमजरी पृ २०२५ मादि में विस्तार से यह क्या वणित है। हम सभप म इसे यहां इस प्रकार रख सकते है इक्ष्वावा य राजा हरिश्चन्द्र पुत्रगोर मे ध्यान होर नारद के पहन पर यरुण से पुत्र प्राप्ति के लिए प्रायना करते हैं। यरुण उ र इस त पर पुत्र ३ ते हैं कि वह बाद में उस बनि प प म वरुण को समपित कर देगा। राजा वरण को वचन दता है। पुत्र होगा तो प्रापको ही समपित कर दूपा । (यहाँ इसी वचन को चर्चा प्रसाद तीन की है।) -पूरा क्या लिए लिए ज्ञान की गरिमा (बलद व उपाध्याय) सोन का प्यास । । - -- - इदानी प्रसाद के नाटा म नियति का स्वरूप - हे समुद्र के दव देव प्राकारा के गान्त हूजिए क्षमा कीजिए दीन को। यहाँ प्रसाद जी न जिन विशेपणा स वरण को प्राकृत किया है वे वही विशेपण हैं जिनका प्रयाग वरण सम्बधी ऋग्वेद को अचानो म मिलता है। वरुण को भग्वेद म मस का अधिष्ठाता देव माना गया है और समस्त प्राणिया के कमों का नियामकभी। और यहां भी राजा न वरुण सम्बन्धी इस उक्तिम उसे उसी रूप में वगित दिया है। प्रत प्रसाद जी पर नाटक के प्रारम्भ म ही ऋतवादा मा यता की छाप दीस पडती है। रितीय दश्य में रोहित मानन म वठा हुमा विचार मयन म व्यस्त है । उसे वार पर मोघ पा रहा है कि उसने उसके पिता से ऐमा क्रूर वचन क्यो लिपा । अत यह इद्र की स्तुनि करता है। तभी देववाणी सुन परती है चना सा चलना ही तुमयो श्रय है सड मत रहो कम माग विस्तीरण है। इन पक्तिया म वरिप घरवति गान की प्रनिनि स्पष्ट है । ऐतरेय श्राह्मण में इद्र ने हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को सदा चलते रहने की शिक्षा दी है और यहाँ भी हरिश्चन्द्र पुत्र राहित द्वारा इद्र की प्राथना करने पर ही उपरोक्त पक्तियां देववाणी के रूप में सुनाई पड़ती हैं। प्रत दोनो की तुलना स ऋग्वेद का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उपरोक्त उक्ति का चरवेति-गान मे भाव सामजस्य भो देखिए घरवेति परवेति नानाधाताप श्री रस्ति इति रोहित थुम । पापो नपरो जनाद्र इच्चरत सखा । चरवेति घरयेति ह रोहित गुनत है कि श्रम से जो नहीं थका ऐसे पुरुष का श्री मिलती है। वट हुए मामी को पाप धर दबाता है। न्द्र उसी का मित्र है जो वरावर चना रहे । लिए चलते रहो चलते रहा प्रास्ते मग प्रसस्य कायस्तिष्ठति तिष्ठति । ते निपच मानस्य चराति परतो मग । परी घरति बर हुए का भाग्य रठा रहता है सटे हान यान या भाग्य पा हो जाता है पड रन पाने वा नाग्य मोता रहता है और उठकर चलनवाल का भाग्य पल पता है।शलिए चराते रहा, चरत रहा - ६२ प्रसाद के नाटको म नियतिवाद इस प्रकार हम देखते हैं कि 'करुणालय में रोहित का उपरोक्त क्यन पोर वदिक चरवेति गान दोनो में कोई भी अतर प्रतीत नही हाता। प्रसाद ने मानो अक्षरग इसी का अनुवाद यह प्रस्तुत किया है। इस चरवेति गान की प्रात्मा यही है कि नित्य चलते रहो। जसे ठहरा हुमा पानी सड जाता है और बहते पानी म जीवन रहता है उसी प्रकार क्म गूय व्यक्ति भी सडे हुए पानी के समान हैं और क्मशील व्यक्ति म जीवन सचरित होता रत्ना है। गतिगील जन जिस प्रकार वायु मोर सूर्य के प्राण भाडार से जीवन अपनाता रहता है ठीक उसी प्रकार कमरत “यक्ति भी जीवन शक्ति एकनित करता रहता है। पडाव डालने का नाम जिन्दगी नही है। जीवन पथ पर थक कर सो जाना या पालस्य का दास हा जाना ता मूठ के समान है। अत मानव को अपने माग भे सदव बढते रहना चाहिए । ठीक उसा प्रकार जसे सूय और च - मा सदव आकाश को पार करते हुए अपरिमित लोका का परिक्रमण करते रहते हैं और फिर भी कभी थक्ते नहा । नित्य प्रात कान सूय माकर हमम से प्रत्येक के द्वार पर यही अलख जगाता है मरे धम का देखो मैं भी चलता हुअा थकता नहीं । ( रस पालोक में रोहित के उपरोक्त कथन की विवेचना से निश्रितस्परम कहा जा सकता है कि इस नाटक मे प्रसाद जी ने यहां पौराणिक कथा का प्राश्रय लिया है वही वदिक ऋतवाद और भारतीय कमवाद स भी व यापक रूप से प्रभावित हुए हैं । जब रोहित नेपथ्य से देववाणी द्वारा कम माग की विस्तीगता का उपरोक्त घोष सुनता है तो इस्द्र से करबद्ध होकर कहता है कि हे देव मेरे लिए मापकी प्रसन्नता ही माना भाग्य है। कृपा कर मुझ केवल मानीवचन दीजिए कि मैं सदव भापके प्रादगा का पालन ध्यान से करता रहू और इस दास को यह भी वरदान दीजिए- 'एके कम-पप मे न कभी यह भीत हो । यहाँ देव पर इद्र और 'भाग्य' उनकी प्रसनता के पर्याय के रूप मे प्रयुक्त हुआ है जो कि यदिक चरवेति गान को प्रोर पुन हमारा ध्यान भाकृष्ट कर देता है। एके कम पथ मन भी में भी सदव चलत रहने का भाव है भौर इसमे भी घरवेति गान की स्पष्ट ध्वनि मुनी जा सकती है। घमवाद के प्रतिपादन म भी यह पक्ति अत्पन्न साथ है। नेपथ्य के क्यन (१) वासुदेव शरण अग्रवाल चरवति-गान, ना० प्र० प्र० वष ४८ मक १-४ १०५-६।

प्रसाद नाटवा में नियति का स्वरूप म जहाँ कममाग को अत्यन्त विस्तीण बताया गया है वही रोहित का यह क्थन भी कम के प्रति अनुपम प्रास्था का प्रक्टावरण भरता है । कम के सम्बय म हमारे दान में विस्तार से विवेचन मिलता है। मनुष्य को कम पक्ति को ही हमारे यहाँ उसका मरदण्ड माना गया है और इस शक्ति की नाव पर ही मानव जीवन का प्रसाद राडा है। दुल करणे या करना धातु का मेम्टएड ही गक्ल या सक्ना धातु है। अक्ल धातु के जिा लकारो पा हमारे जीवन म पारायण हो पाता है वे ही हमारी गति के स्तम्भ हैं । जीवन के गान्त मु? म जप हम सोचते है तो स्मर कृतो स्मर -अर्थान अपने सकल्प का स्मरण करो और अपन से उनका मिलान करो तो यही निप्प निकलता है कि सकना ही करना है। हमारे दृा मकर पी लिन बाहु में अवनीश हावर हम कम की पोर प्ररित करता है। पक्ति और कम होन जीवा के सकल्प तो कोर कागज की भाति है।' पत्रम दृश्य के पूर्वा । म हा पाठक शुन गफ को यूप में बंधा हुआ पाता है। जब अजीगत शस्त्र उठाकर उससा उध करने लगता है तो गुन गफ ह है करुणा सिधु नियाता विश्व के वह कर विश्व का नियमन करने वाली गति का स्तुति-गान रहता है। यहां वरण (ऋत के देवता) को विश्व नियाता वह पर सम्बोधित किया गया है यही पर ज्योति पथ स्वामी प' भी पाग प्रयुक्त हुमा है जो कि वदिक साहित्य म वरण के नामो म से ही एक है । इस प्रकार प्रस्तुत उक्ति म भी ऋत सम्बधी मा यता का प्रति पादन दृष्टिगोचर होता है। इसी य म सुब्रता मोर वशिष्ठ ने भी भाग्य का साधारण अर्थों में 'दुर्दैवे पौर सौभाग्य कह पर प्रयोग किया है । माम विश्वामित्र भी अपनी गधव विवाहिता पत्नी सुक्ता पौर शुन शेफ का पावर जगनियता ईश्वर को साधुवार देते हैं। भरत वाक्य के रूप म जो सहगान प्रस्तुत किया गया है उससे भी यह ध्वनित होता है कि इस विश्व के पीछ एक नियामिका क्ति है जिसका सभी पात्र मत म स्तवन निप्यप इस नाटक पर प्रमार जी के वदिक अध्ययन की धाप स्पष्ट है। क्यानक भी यदि है और विचारधारा भी यदिक कनवा म प्रचुरमात्रा म प्रभावित (१) वही पृ० २५-२६ ।

प्रसाद वे नाटको म नियतिवाट 1 है। प्रमाद के प्रारभिर दोना नाटको म जहां घटना प्रवाह म दान पक्ष गोग्ग हो गया है वहाँ इसम घटना है सयोजन के साथ माय स्पट स्पस नियनि सम्बची ऋतवादी मा यता या विवेचन भी हुया है। नियनि की इतनी साप तस्वार प्रवट करने वाला प्रमाद का यह पहना ही नाटक है। दगन पक्ष का इतना उभार सनन और प्राय वन म नहीं मिलता। प्रारभ से प्रत तक नाटककार ने इ7 और वरण की स्तुति मुक्ताठ से पाना के मा यम रा की है। दाना ही देवता बदिव मत स सम्बधिर हैं वरूण तो मत के अधिष्ठाता ही मान गए है । वटा म उ ऋण के नाम स भी वरिणत किया गया है। उन। वे नियमों का प्रमार प्रकृति के सर कार्यों में दर्शाया गया दिन और रातम में ऋतग्रा के परिवनन में नदिया के चटाय उतार म ममुट क बार भाम तारो की चमक म तथा भौनिक तथा नतिक समस्त सामारिय नियमा म हा का सत्ता मानी गई है। जव यमी यम को अपने निबाट पनि स्प म वरण करती हुई पुकारती है ता यम वरण का हवाला दता है और करता है यमा वरण के चर अपलक प्राणिया दापो को देखते रहत हैं। १ टम सम्ब म ऋग्वद की यह पवित भी दानीय है ऋतन मिना वरगाव्रता वृधावतस्प या ऋतु वृहतमागाथे । अर्थात हे मित्र और वरण मत को बढाने वार तथा ऋत को स्पा करने वाने माननवाने (तुम दाना न) ऋत के द्वारा वृहत ऋतु (प्रमा) या पाया। इस प्रकार काणाय म जगह जगह वरण और न्द्र का प्रस्तिया चरवतिगान का अनुवाद तथा Tम का महत्तापरक उक्तिया परकर हमारी यह हर मा यता है मि प्रमान जो अपनी नियति भावना के सदभ म तबाद से पूरात प्रभावित हए हैं। वरण विषय विवेचन का सहारा लेकर ही मतवाद करणा नय मा गया है वही कम की महत्ता पर भी -समें काफी कुछ कहा गया है। रोहित अपन ए देव स यही वरदान पाहता है कि वह कभी अपन कम पथ में सनहा । वम माग का प्रयन्त विस्तीण भी कहा गया है। वस्तुत यह नीस नाव पर वररावी छाया काही उरण है। वरप ऋतर देवता ना है तो प्रत्येप्राणी 4 कमानसार उसे गुनाशुभ पन देना भी उ हा के अबान है। व इ7 वाय म पिसा व साय बाइ पक्षपात परत न दी (१)हावे -१०॥ (२) प्रावेद १-२-।

प्रमारनाटका म नियति वा स्वस्प । को उनत व हा मरता है। काई भी काय कितना भी छिपा कर दिया नाय व वरुण की दृपि म प्रोझल नहा हो सकता। इस ब्रह्माट के सचालन तथा नियमन का सूत्र उही के हाथ म है।' इस प्रकार कमवाद मा नाटक मा प्रतिपाद्य वन र प्रस्तुत गया है । पर सवाटा म विव नियता को मानव रयागमय बताया गया है। विश्वामित्र कहते हैं सबका ही वह पिता न दता दुख है ' प्रयवा 'वर प्रयागमय देव न देता दुख है। इसम जात होता है कि प्रसाद समस्त नियम समष्टि को मानव य यागमया मानकर चल हैं। राहित जस पानी का भले ही वह झू र दिसा देता हा पर यह दुख के प्राधिक्यवा उद्भत भ्रम ही कहा जाएगा। वास्तव म गहरी नगि टालन पर पियति सृधि मानव के कल्याण का उद्देश्य ही रखती हर दृशिगावर हामी यही प्रमाद वा मत जान पड़ता है । १० हर व बाहरी में प्रनमार भी मानवता के कल्याण का स्वर भी प्रयात स्प से इसम (वरणालय म ) विद्यमान है। स्परम विश्व कल्याण की भावना यात है। प्रमार | मन म बदिव वलि और हिमात्मक भावना की प्रतिक्रिया स्वरप बुद्ध के कारणावाद को छाया भी इस कृति से परिलक्षित होती है जिसे लवपन से पाला पोसा उसी पुत्रवत् शुन गफ का वध परन को प्रजागत तत्पर हो जाता है विश्वामित्र पली स वियुक्त हो जाते हैं गुनगेफ और रोहित पर भी दुख घटाटाप कम नहीं उमडते इन सब की प्रभा वाविति पणा जनव ही होती है। यही नहा नाटर वरीपद भी 'दरणा वाद' की पार ही सक्त करता है। यह दुप वाद अथवा पगाबाद बौद्ध घम की अहिंसा से प्रभावित है क्याकि इस कृति पर वोघ धम की अहिमा का (१) वासुदेव गरण प्रप्रवान ज्ञान को गरिमा पृ. ५८ । (२) २० हरदेव यारी प्रसाद साहित्य को पृ. (७४) । (३) यरुण को पणालय का नाम दन ५ पौधे सम्भवत प्रसाद जी इस यदिख मा पता से भी प्रभावित दिखाई देते हैं कि हृदय से स्तवन करन पर पदण जसा कर व मी योभूत हो जाता है भायचित परन याल पर पदण दया करते हैं। ये पाप की मानो रस्सा से मांधत और फिर मानो ढोला र देते हैं। जो अनसान II प्रतों को तोड़ते हैं उन पर भी वे समय पड़न पर दया करत हैं। -पदिय देवगन ( मनु० ० भूयात ) पृ० ५४ ।

प्रसाट नाटकाम नियतिवार पर्याप्त प्रभाव परिलक्षित होता है।' माग राय श्री यो चर्चा करते हुए हम दखग मि प्रसाद जी को यह दुखवारिता भी वासाय म उनके वटिक ऋत सम्व धी धारण का ही विवामित स्वरूप है। इस प्रकार प्रसाद की नियति भावना के सदभ में क्ष्णाय एक एतिहासिक स्मारक है । इसम ऋतवार कमवाद मानव कल्याण भाग्य सम्बन्धी कतिपय साधारण सदभ तथा दुखवाद सभी का सुटर उद्घाटन उनकी लखनौ ने किया है। वितु नाटक की मून आत्मा वतिक तवानी ही है। ऋतवाद को समझ विना सम्भवत कोई पाठर नम नाटक को समझने म भी समय न होगा । अन करणालय वह नान का पत्थर है जिस पर प्रप्तान की नयति रूपी मुटर और रहस्यमयी अट्टानिया खरी है । राज्यश्री नियति विपयर सदन (१) सुरमा -विश्वास करो मैं पानीवन क्सिा राजा को विनास मात्रिका वनाती रहू-एसा मरा अन्य क्ह ता भी मैं मान तेन म प्रसमथ हूँ। --पर १ पृ०१-२ (१) शान्तिदेव उतावनी न हो सुरमा परीक्षा दन जा रहा है साथ ही भाग्य की परीक्षा भी लूगा । महारानी रायश्री एक दिन भिक्षा को दान दगी में भी देखूगा कि भाग्य मुझ क्सि पोर खोवता है । ( वही पृ०२) (३) देवगुप्त ता इसस वा । सब प्रोले ही तो समार पप म निकलते हैं किसी का मिल जाना यह तो उमक सौभाग्य की बात है। देखो मिलतीता कौन मात्रय देता। -वही पृ ३ (४) सुरमा है भगवान इतना वहा मौभाग्य ? नही यह मेरे प्रहट का उपहास है। -प्राय ६ पृ० १७ ॥ (१) १० हद व बाहरी प्रसाद साहित्य को पृ० ७४ । मुझ यदि तुम न प्रसाद ने नाटकाम नियति का स्वरूप (५) शातिदेव मैं ससार से अलग किया गया था-विमलिए । पिता ने मुझ भिक्षु सध म समपए रिया था-क्या इसनिये कि मैं धार्मिक जीवन यतीत पर। मेरे लिए उस हृदय में दया या सहानुभूति न थी। जब हृदय कानन की माता लता बलवती हु तो मैं देखता हूँ कि क्मक्षेत्र म मेरे लिए अवशिष्ट नहीं तो मैं क्या कह लोर जाऊँ सघ म नहीं सघ मेरे लिए नहा । अब यही कुटी में रहूगा । तो क्या मैं तपस्वी हाऊगा ? नही अच्छा जो नियति बरावे । प्रोह कसी वाली रात है ? -अब २ दृश्य १ पृ० २३ । - (६) सुरमा कितनी मादक्ता इस प्रासाम है । प्रियतम मुझ अपना स्वरूप विस्मृत होता जा रहा है। मेरे यह सौभाग्य -२ हय ६ पृ०३५ । (७) देवगुप्त मुरमा तुम कितनी मधुर हा-मेरे जीवन की घयतारिका । नेपथ्य से पह तुम्हार दुर्भाग्य में मदग्रह की प्रभा है। -वही पृ० ३६ । (क) नरदत्त कौन न कहा कि महत्वशानी व्यक्तिया ये मौभाग्य अभिनय में धूतता का बहुत हाथ होता है। - २ १०७ पृ. २६ । (६) विषटयोप ~~(सुरमा से मलग) रापवधन-मुरमा तुम्हारे भाग्याप का धूमकेतु भौर मेरे लिए तो सभी पात्र हैं। -मक ३ दस्य १ पृ० ४६ । (१०) मधुकर 'यश्री भी यहा इधर उपर घनी गइ हागी । मुरमा का दुर्भाग्य -यही पृ. ४७॥

प्रसाद कनाटमा म नियतिवार कमत्र म जुटी रहती है जिसस इस नाटक म छमवार की उपस्थिति का भी द्योतन होता है। नाटक पर वौद्ध धम तथा दुसवार का भी पर्याप्त प्रभाव है। राज्यश्री का जीवन दुख और बेना की गाथा है । पति का खोकर देवगुप्त के वदी गृह में अपमानित होकर वह दारुगा दुखा को सहती है। सखी से रहती है सखी प्रोपग्नि दवर तू विप देनी ता कितना उपकार करती। इसी प्रकार दिवाकर मित्र का दुखा का वरुण गाथा सुनाती है दुखो को घाडकर मोर कोई न मुझमे मिला मेरा चिर सहबर प्राय मुझ माता दीजिए । स्त्रियो का पवित्र क्त य पालन करती हुई एम क्षरण मगुर भसार से विलालू । निरय की ज्वाला से यह चिता की ज्वाला प्राण वचावे । अपने भाई हपवधन स भी वह कहती है भाई दुखमय मानव जीवन है। रायथी अनावा अय पात्रो के कथनो म भी दुखवाद की स्पष्ट छाया है। निवाकर मित्र कहता है 'प्राणी दुखा में भगवान के समीप होता अन म समवेत स्वरो म गाया गया गीत दुसवाद की दर मीमासा 1 प्रस्तुा करता है पहरणा कादम्बिना बरसे- द स स जना हुई यह धरणी प्रमुदित हो सरसे । रायनी या यर दुखबाद बौद्धा स अत्यात प्रभावित है। रायश्री स्वय वापाय धारण करती है। वह सभी का क्षमा करती जाती है जो कि बौरी का ही उपदेश है। यही नहीं इस नाटक में बौद्ध भिक्ष सुएनच्वाग भी उपस्थित ही है । प्रो. रामकृष्ण गिनीमुख और डा० नगद्र प्रभृति विनो न भी प्रसाद जी को दुखवाद से और विपत बौद्धो के दुखवाद से प्रभावित माना है। (१)(क) प्रसाद न मालूम होता है भारतीय इतिहास के बौद्ध काल पौर बौद्ध दशन शास्त्र का कुछ अध्ययन किया है जिसका प्रभाव उन पर पड़ा है। उन नाटको मे प्राय एक न एव बौद्ध पात्र रहता है-गौतम प्रख्यात कति और सुएन वाग -प्रो. निलीमस प्रसाद को नाटय पला पृ०६७ (ख) उनके (प्रसाद क) पटरों म बोद्ध और प्राय दमन का सधप पौर सम वय वास्तव में दुखदाद भोर पाना माग का ही सयप और समवय है -० नगेद्र माधुनिक हिदी नाटक पृ० १२ प्रसार के नाटका म नियति का म्वरप उपरोक्त दु खगी अनुभूति से अनुप्रास्गित हाकर ही मभवत राज्यश्री स्यु स वह उठता है प्राह जिननी साम चरनी है वे तो चलकर ही रगी' -अर्थान निश्चित समय से पूर्व अपनी जीवन-लीला समाप्त करने म भी मानव स्वतत्र नहीं है। गहराई से विचार करने पर ऐसा लगता है मानो प्रमाद जी यहाँ मृत्यु की घडी को भी निश्चित मानते हैं । उस पूर्व निश्चित समय पर ही मृत्यु हो सकती है पहले नहीं। दूसरे शब्दो म जीवन और मृत्यु के सम्मुख मनुष्य की स्वतत्र इच्छा शक्ति पराजित हो जाती है। ईश्वर भयवा नियति के हाथा मनुष्य जसे यत्र हो और उसे चलाना या बाद करना भी जस उसी के वाम हो। राज्यश्री की उपरोक्त उक्ति गीताकार की इन प्रसिद्ध पत्तियो का स्मरण करा देती है ईश्वर सयभूताना हृदद रोजुन तिष्ठति । भ्रामपन्सव मूतानि यार ढानि मायया । -ईवर सब प्राणियो व हृदय प्रदा म स्थित रहता है और सब को अपनी माया से यात्रवन घुमाता है । म कमठ तथा दृढ सकल्पो वाली रायधी की एसी उक्ति प्रत्य त महत्त्व पूण प्रतात होती है। निप्वप प्रसाद की राय की उनवी अत्यत महत्वपूण नात्य रचना है जिसम भाग्यवान कमवाद और बौद्ध दुसवाद का मुटर चित्रण हुमा है । भाग्यवादी प म नातिभिन का चरित्र चित्रण वडा ही मुर वन पड़ा है। उस भाग्य का भरोसा है और उस यह भी देखना है कि भाग्य उसे क्सि पोर सींचता है। नियति का भाग्य का पयाय मानगर वह यह उठता है अच्छा जा नियति परावे। सुरमा को भाग्यनित नहा कहा जा सकता क्या केवन एक प्राध स्थाना पर ही सामा य प से उसन सौभाग्य - वो प्रयुक्त किया है । देवगुत नरदत्त मधुकर बमला और सुएननांग पो भी भाग्य चर्चा करत सुना जा सरता है । इन पत्रो को भाग्य पर पूरा-पूरा विन्यास है। वितु रामश्री और मुरमा के परिणाम घमवादी भावनाए स्पष्ट प से दृष्टि गोचर होती हैं। सुरमा को यह उति वि प्रहप्ट भी चाहे ता एमा (१) राज्यको नातिदेव देवगुप्त मधुर प्रौर पमता नाय श्व मौर दुवक भागे नतमस्तक हैं। (डा. हरदद बाहरी प्रसाद साहित्य को पृ. २११) And प्रसादय नाटयाम निपानवा- - मानने को तयार नहीं कि वह मिमी राजा पी पिताम मानिरा बनानी र हम योगवासिष्ठवार की इन पत्तिया की यार ाि दना है प्रत्रक पौरप यल बजयित्येतरा गति सबदु स क्षय प्राप्ती 7 धाचिदुपपद्यते । रायनी का यक्तित्व भी गमग्रम्प मे पर पुरपाथ प्रोर कम को महत्ता की ही छाप छाट जाता क्यारिणा पण गत ए भी उमर चरित्र को प्रसाद न निर्भीकता गाह्म महत्त्वाम। पुरपायता प्रात्मविश्राम अदि सुनहले रगो स रग रिया है । जसा कि हम पहले देस चक है रायश्री के घटना चत्र और पापा पर दुखवाद का व्यापक प्रभाव है । यह ट खवाद भी मूलन मतवादी प्रभाव स ही अोतप्रोत है क्यामि वटिक विवेकवार अयवा ऋतदात का धारा ही माग चलवर बौद्धो के टु खवाट के स्पम परिगत हुइ । स्वय प्रमाद ने टस विषय पर टिप्पणी की है वरुण यायपति राजा मोर विवा पक्ष के पाता थे। महावीर "द्र प्रात्मवाद और मानद के प्रचारक थे सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर विवक व तक म जिस बुद्धिवाद का विकास किया वह दानिका की उस विचारधारा की अभिव्यक्ति कर सका जिसम ससार दु समय माना गया और दु ख स टूटना ही परम पुरुषाथ समझा गया। दुख निवृत्ति दुखवार का ही परिणाम है । प्रसाद के उक्त विवेचन के आधार पर, जिसम दुसवाद का वे विवेकवाद था विकसित रूप मानते हैं हम विवक्वाद (ऋतदाद) कमवाद तथा दुख वाद का परस्पर सम्बध स्थापित कर सकते हैं। यह हम पहल ही देस चके हैं 'द कमवाद भी ऋतथाद का हा स्वाभाविक विकसित स्प है। एस पाठोर म दवन पर रायत्री नाटक पर भी वदिक ऋत की प्रति माया दृष्टिगोचर होती है यद्यपि काणानय की भाति इसम स्पष्ट रूप स उसका प्रतिपादन नहा हो सका है। एमका कारण यह है कि करणा तय का क्याना जहां वेता और पुराणो स सम्बधित है वर्ग रायरी म प्रसाद इतिहामिक कथावृत वी पार उ मुस हा गए हैं। उपरात विवेचना का अाधार कर हम राय 1 को कम प्रधान नाटय रचना ते मानत है जिसका प्राति श्रोत वदव ऋतपाद है। हालांकि (१) योगवासिष्ठ (२) पर प्रसाद काय और क्ला तपाय निवध पृ ५५ ३७ - प्रमाद देनाटकाम नियति का म्वरूप ७३ गान्तिदेव जसा पाथ भाग्यवादी का श्ररणी म प्रा जाता है किन्तु वह भी अपन वम पथ सता दूर भागता हुप्रा नजर नहा पाता। - विशारा नियति-विषयक सदभ (१) विशाख यौवन मुख लिए पाता है यह एर भारी भ्रम है । आशामय भावी मुमा के लिए इस कठोर कमों का सकरन ही कहना होगा। उन्नति के लिए मैं भी पहली दौड लगाने चला है। देवू क्या अदृष्ट म है। पाढा विश्राम घरलू पिर चलूगा। -ग्रा १, दृश्य १ पृ० १२ । (२) विशाख एसा सुदर स्प और वे ऐमा मलिन विधाता की लीला -~वही पृ० १३। (३) सुश्रवा हा सुर्दैव यह हमारे पितृ पितामहा को मूमि थी उसी पर चलन म यह पथना 1 -वही पृ० १६॥ (४) साधु यह सत्य यही सर यस पुण्य घाण है। सत्यम व मयाग यही विरोग है। -१४५०३१, (५) प्रमानद Tय तर सुन भाग कर चित्त उना नहा उपराम हाता मनुष्य पूग घराब ना पाता है। तुभ कभ यापन “यावारिक पक्ष या मनुवरण परना चायि। - (६) प्रमा मत्सम हृदय का विमत बनाता है और हृदय म उच्च वृतियां स्थान पाने लाती है इसलिए ससम बमयाग । मादा बनाना मात्मा की उति का माग स्वच्दमोर मान ररला है । -~वी ०१७ ७४ प्रसाद नारवा में नियतिवाद -- (७) प्रमान जब तक गुट बुद्धि का उन्य नही तर तर स्वाथ प्ररित होकर भी साम करणीय है । तुम्हारा उह य उत्तम होना चाहिए। जो यतव्य है उम निभय होकर क्रा। -वही प० ३७ । (८) च तखा सुना तो वहां ना रह हा दिगास जही भाग्य ले जाय। -यक २१०१ प०४३ । (8) मगगनी क्या इसी तरह राज्य रहगा ? क्या अयाय या घटा नहीं ण्टेगा? क्या आपका रसका प्रतिफन न भागना पड गा ? अव ३ दृग्य १ १०७२ । (१) प्रमान- तुम अपने सननता के प स - क्षमा कर दो। इस पानक को ने जा पर प्रजा व अनुवून राजा बनान की TिHI दो । नुम्भी कम करने के बाद मर ही पथ पर गान पान के लिए पाना होगा । अङ्क ३ हय ५ पृ० ६२ । (११) नरदा किन्तु हुप्रा अव जित ह में कापनोस सजित ह मैं। वही पृ०६३ । समीक्षण नाटक के प्रारम्भ म ही हम नाया विशास को मानसिक र ग पथित दसते हैं। वह माचता है कि जीवन को सुमात्मक कहना एक बनना है वास्तव म यह भनक कर्मों का सबसन मात्र है। यति जीवन का सुखमय बनाना हा ता मनिवायत रन बटोर कर्मों की सघना मझ करनी ही होगी। मैं जो टप उनति की दौड़ प म गा हूँ उसरा परिणाम क्या होगा यह पाहा जानना । विशाख की प्रस्तुत उक्ति व वाता की मोर पाठक का ध्यान भापित करती है। प्रथमत जीवन म वर्मों की अनिवायना की पोर प्रसाद के नाटक म नियति मा स्वरूप ७५ द्वितीयत धर्मों की कठोर प्रकृति की अोर और तृतीयत क्मों के माथ-साथ विपास की अदृष्ट सम्बधी मा यता की और । क्थन वे पूर्वोध म जहाँ वह कम घादी प्रतीत होता है वहा उत्तराध उसकी भाग्य विषयक धारणा को पार सरन सा करता है। अहट यहाँ भविष्य महोन बाली घटना-समष्टि की प्रतक्षता भा बोध कराता है निम जान लने का विशाल उत्सुक है। इस क्थन में तो विशाख को हम पूणत भाग्यवादी नहा कह सक्त। पर आग चलकर च द्रलेखा के यह पूछन पर कि वह यहां गा रहा है जब वह मट कह उठता है, जहाँ भाग्य न जावे तो उसकी माम्यवादिता मुखरित स्पम मार सम्मुख उपस्थित हो जाती है। विशाख के अतिरिक्त नाग सरदार सुश्रवा भिक्षु नरदेव तया चद्रलेखा न भी भाग्य दुर्दैव ईतर की लीला आदि का प्रयोग किया है जो सामा यत भाग्यवादिता को ही प्रकट करते हुए रा जान पड़ते हैं । इस प्रकार सरमरा नजरा स दखन पर नाटक पूर्वाध म भाग्य प्रथवा प्रष्ट की गभियक्ति सी ही लगती है पर बात ऐसी नहीं है । विकास गुरु प्रेमानद ये रगमच पर प्रात ही हमारी यह धारणा एगाएर बनने उगता है । उसका यह क्या पूरी तरह हमार्ग पूर्वमा यता याभवझोर दता है र तक सुख भोगवर चित्त उनम नहा उपराम होता मनुष्य पण पराग्य नहीं पाता है। तुम क्मयोग व व्यावहारिक रूप ही का अनुकरण परना चाहिए। प्रमान को यह शिक्षाप्रद उक्ति विशाख को कम-पथ की महानता का सत सुनाती है। पम पय भी यह जा व्यावहारिक्ता से अनुणित हो। प्रमान- राम वाक्य बहतयाते समय सभवन नाकार का यह मदर प्रसाद नाप स्मृति पटन पर रहा होगा नियतस्यतसायास पमणोनोपुपद्यते गाता म रातम का उपदेश भी दिया है और प्रमानद भा उसी प्रकार पुन दिशामा बहता है सलम हृन्य गे विमल बनाता है इसलिए सततम वमयोग पाप्रा बनाना इस प्रकार प्रमानदारा विास को बमवाद की दो प्रमुख मा यतामों की गिता मिलती है-सलम की पौर बम के व्यावहावि स्वाप की। भव - प्रसाद के नाटवा म नियतिवाद । यह विचारणीय है कि क्मयोग को मनुष्य व्यावहारिप बस बनाए। । सरा समाधान गीताकार यह वह कर दता है Fि कमा म प्रामक्ति नहीं रखनी चाहिए वस्तुत नियाम कम ही वह सत्वम है जिसकी महिमा का गुणगान प्रमानद न इतस्तत किया है। एक अय उक्ति म बम वह सवाम' कम की चर्चा भी करता है किन्तु वह तभी तक करणीय है जब तक शुद्ध बुद्धि का उदय न हा जातक शुद्ध बुद्धि का उदय न हो तब तक स्वाप प्ररित होकर भी सत्वम करणीय - तुम्हारा उद्द न्य उत्तम हाना चाहिए । जो क्त य है उस निभय हाकर करो। स्पष्ट है कि ज्ञान प्राप्ति के पूर्व प्रमान द स्वाथ प्ररित (सकाम) कम करने के पक्ष में भी हैं । कितु उसका वास्तविक सदा निष्काम कम योग का ही है । नाटक म ऐम अनेर उद्धरण हैं जिनम टस बमवाद का अनुपम चित्रण हुआ है । प्रमानद के मुख से नि मृत वाणी मानो प्रसाद की ही वाणी ह जो इस नाटक में कम प्रधानता का सा बार बार सुनाती है। महर्षि व्यास के मतानुसार भी कम ही मनप्य की विशेषता है प्रकाशलक्षण देदा मनुष्य कमलक्षणा (अश्व ४ २०) अर्थात् कम करने से जो प्रकाश जीवन में आता है उसी में मनष्य दव बन जाता है । यस्तुन मनुष्य का लक्षण तो कम ही है जिसका प्रतिपादन इस नाटक मप्रचर मात्रा में हुआ है । प्रमान द हा साघु के रूप में कमवाद का यह उद्घाप पुन परता है यह सत्य यही स्थग यही पुण्यघाप है । तत्वम कमयाग पनी विद वोग है। प्रमानर वा स क्षिा का प्रभाव जहा विशाखये दुवन चरित्र का पुरपार्थी और वमवादी बना देता है वही मत ग नर व भा वम पता की दुहार दना या प्रपन युर वृत्या ३ प्रति नित हाना है रिन्तु दृया अब ति मैं कमफ्तास समित। मैं मी प्रकार राजा नरदव का च सा प्रति प्रासक्त पाकर महारानी उह पाप कृत्या क धुर परिणामा प्रति सचेत बरती हइ रहती है क्या प्रयाय का घडा नहा परगा? क्या प्रापको दसरा प्रतिपल नना मा-- टमस यह सिद्ध हाता है बुरे कर्मों का बुरा पल अवय 'पता है। पर यमनपा मादर है। - प्रसाद के नाटयो म नियति का स्वरूप ចឺម নি प्रसाद जी का यह नाटा पूण स्पन बमवाद प्रभाव से प्रातप्रति है । यद्यपि पहल नायर शिव भाग्य की सत्ता को कई स्थला पर स्वीकार करता है, किन्नु प्राने गुरु प्रमानन्द की कम सम्बधी शिक्षा का उस पर प्रभाव इतना पड़ता है कि वह बाद म कमवादी बन जाता है । नरदेव भी पहल कुकृत्या म पम पर चलवा के प्रति माहासक्त हो जाता है रितु अन्त म वह भी स्वय पर लत्रित होता हुआ वम पन का गुणगान करता है। महारानी द्वारा दुर कर्मों का विध्वमर पल मिलन की अनिवायता का पुरजोर TT म समयन हुपा है। स प्रकार नाटक प्रारम्भ से अन्त तक कमवाद का मुर प्रगीत-सा लगता है। इस नाटक के अधिकार बम सम्बपी सम्भों को देखने पर गीता के रिकाम-क्मयोग का प्रभाव प्रसाद जी पर प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर हाता प्रेमानद न निघाम-बम को ही मत्वम बहा है और उसी को कल्याणकारी सिद्ध विपा है। महारानी वा वह कथन अत्यन्त मह पूण है जिमम बह रहता है कि मयाय का घा' क्या फूटा नहीं । नरदेव के पाप-कृय साधारण नहीं है। हमारे देश का प्रारम्भ से ही यह मायना रही है कि यदि काई प्रत्युत्तट पाप परे ता उसमापन अगोजाम मन मिलकर त्वरितगनि स इसी जम म मिलना है बिभियस्थिमिर्मासस्मिनिदिन प्रत्युत्कट पापपुण्यानामिदैव पलमबनुते। रह जान यो ममित शाह तान मोनों म मिन अथवा तीन दिन म मिल पिर पाप या पुण्य या पीत ही मिलता है। एम'कार व भागो म तपन पर महारानो का उपरोक्त पयन नाटय म पामया' पा गम्भार पजना प्रस्तुत करना जान पहना है। प्रारम्भ म पात्राम मह कम भावना नही दोष पहनी frन्तु प्रमानन का यमसदा धीर वीर सभी का कममाग पर पाद पर देता है। डॉ. हरदेव बाहरी ने भी प्रेमा ना मोर विजय को वमयादी बताते हुए प्रमानद के विषय म लिया है (a) सरसम बतन्य पान और पुण्य का उपदेश दत है नाटक प्राय सभी पात्र उनकी स्निग्ध वाणी से सत्पथ पर चलने लगते है। - (१).हरदेव बाहरी प्रसार-साहित्य- पृ० २८०।

प्रसाद के नाटकों में नियतिवाद इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि इन नाटक में प्रमानद पे कारण प्राय सभी पात्र कमवादी बन जाते हैं । सलम की महिमा जानबर वे अपनी दुबलतामा से मुक्त होते हैं और शुभफ्लाथ सत्पथ पर अग्रसर होत है। मन विकास पूणत कमवादी नाटक सिद्ध हो जाता है । जो लोग प्रमाद जी को पूणत भाग्यवानी मानते हैं उनमा ध्यान हम इस नाटक की मार विपत प्रापित करना चाहते हैं क्योकि हमारी इष्टि मे कम सिद्धात का इतना स्पष्ट विवेचन प्रसाद के किमी दूसरे नाटक में नहीं मिनता। अजातशत्रु नियति विषयक सदथ (१) बिम्बसार भाह जीवन की क्षरणभगुरता देखबर भी मानव क्तिनी गहरी नीव देना चाहता है। प्राकाश के नीले पत्र पर उजवन अक्षरा से लिम मदष्ट क लख जव धीरे धीरे लुत हाने लगते हैं तभी तो मनुष्य प्रभात समझने लगता है मौर जीवन सग्राम में प्रवृत्त होकर भनेक प्रकाड-तात्व करता है। फिर भी प्रकृति उस प्रकार का गुफा में ले जाकर उसका गतिमय रहस्यपूर्ण भाग्य का चिट्ठा समझाने का प्रयत्न करती है किन्तु वह क्व मानता है । मनुष्य व्यय महत्त्व की मात्राक्षा म मरता है अपनी नीची किन्तु सुदृढ परिस्थिति म उसे सतोप नही होता नीच से ऊचे चाना ही चाहता है चाहे फिर गिरे तो भी क्या? -अब १ हय २ पृ २७ । - (२) जीवन अदृष्ट का मादेश मानकर ही मैं आपका अनुगामी हो गया है। विम्वसार क्या अदृष्ट सोच कर मवमएय वनकर तुम भी मेरी तरह बट जाना चाहते हो। जीवन नही महाराज महप्ट ता भरा सहारा है । नियति की डारी पाहबर में निभय कमकूप म र सकता है क्यादि मुझ विश्वास है कि जो हाना है वह तो होगा हो फिर कायर क्या वन-कम स या विरक्त रह । -प्र१ हय ४ पृ० ३६ ।

प्रसाद के नाटवा म नियति का स्वरूप (३) रानी बाल मानव अपनी इच्छाशक्ति से और पौरुप से ही कुछ होता है । जन्मसिद्ध तो कोई भी अधिकार दूसरो के समयन का सहारा चाहना है । विश्व भर म छारे से बडा होना यही प्रत्यक्ष नियम है । तुम इसकी पहेलना क्या करते हो । महत्वाकाक्षा के प्रगत प्रमाड म पूदन को प्रस्तुत हो जामा विरोधी गतियों का दमन करने लिए काल स्वरूप बनो पुरपाय करा इम पृथ्वी पर जिमा तो कुछ होकर जिना नहीं तो मर दूध या अपमान करान का तुम्हें अधिकार नही। -य १ दश्य ८.० ५४ । (४) जीवन दोनो अपने बम के फल भोग रहे हैं - (५) विमटक यम माँ पर कुवन रहो। भाज से प्रतिगाय लना मेरा क्त य और जीयन का लक्ष्य हो गया। मो में प्रतीता करता हूँ कि तर अपमान के भारण इन नया का एक बार अवय सहार करूगा और उना रक्त म रहार स पोल के सिंहासन पर बठकर तरी वाना कर गा। पार्शीवार दो कि इस क्रूर परीक्षा म उतीण होऊ । -वरी ५ (६) मलिका भाग्य में कुछ रिसाव -प्र २ दृश्य ३ प०७३ । (७) वामवी यही सममान के लिए बडे बडे रनिरा ने कई तरह की व्यापाए की हैं पिरमा प्रत्या नियम में प्रपात लगा लिए हैं यह नगे कहा ना साता निमावाद नियम पर है या नियामर पर । मभवन उस हो लोग यवहर रहते हैं। (6) विम्बसार तर ता देवि प्रत्यक मसम्माधिन एना के मूल म यही दवडर है। मच ता यह है कि विश्व भर म स्थान-स्थान पर वारयाचक है, जन म उसे भवर प्रसाद के नाटमा म नियतिवाद - कहते हैं स्थल पर उसे बवडर ते हैं रायम विप्नव रामाज म उ छ - खलता मार धम म पाप कहत हैं। चाह इह नियमा वा अपवार यहा चाह बयडर-यही न? प्रक २ दग्य ६५०८. (९) प्रसेनजिन यदि पाना हा तो म दीघकारायण वो अपना सेनापति वनाऊ और इमी वीर म स्वर्गय सेनापति व युल का प्रकृति देखार अपने कुक्म का प्रायश्चित करू -अब २ द य पृ० १६ (१ ) गौतम हम अपना क्त य करना चाहिए। दूसरो के मनिन कर्मों को विचारन से भी चित्त पर मनिन छाया पडती है । -वही ५० ६४। (११) घाना घायत वाधिना का भय दिखाता है । वर्षा की पहाडी नदी को हाथो से रानना चाता है ? देवत्त इम अवस्था ग नारी क्या नहीं कर सकती। अब तरा अभिशाप मुझ नहा डरा सक्ता । तू अपन वम भोगने के लिए प्रस्तुत हाता। -प्रव है ये १ पृ १०५ (१२) वासवी नाहागा व ता भलिप्य मम है -यही पृ १०५ (१) मा तुम इमलिए नहीं बचाए गए कि फिर भी एम विरता नारी पर वनराकार प्रौर पम्पटना वा अभिनय ग। जीवन सपए मिना है कि पिदले कुकर्मों का प्राय"चत करो। अपन का सुधारो -ग्न ३ "य ३ पृ ११४ (१४) गौतम कुछ नहा । तुम लाग क्तव्य के लिए सत्ता के अधिकारी बनाए गए हो। उसका दुरपयोग न करो। भू महल पर स्नह का वरणाका क्षमा का शासन प्रसाद के नारका में नियति का स्वरूप फलानो । प्राणिमात्र म सानुभूति को विस्तृत करो। टन क्षद विप्लवा से चौर पर अपने कम-पथ से च्युन न हो जाया। -ग्रा ३ हाय ५ पृ० १२५, (१५) माघी वाह री नियति कसे से दृश्य दम्खन में प्राए-कभी बला को चारा देते दन हाय नही थरत थे कभी अपने हाथ से जान का पान तब उठाकर पीन म सराच हाता था कमागील पा वाम एक पर भी महल के बाहर चलने म रोरता था और कभी निलज गरिणका का प्रामोद मनानीत हमा -अब ३ दय ७ प० १२६, समीक्षण प्रथम प्रा के दूमर ही द य म हम विम्बसार को मानसिक विक पा में प्रामात अपन प्राप से बात करते हुए पाते हैं। वह जीवन की क्षरण भगुरता के प्रति यथित मौर चितित है। अटवादी वन वर वर पहता है प्राकाश थे नीर पर पर उ7 अक्षरों स निम हुए लख जब धीरे धीरे लोप हाने उगन तभी ता मनुष्य प्रभात ममभन उगता है । एमसे यह मिद होता है कमि प्रकार प्रकार के गम म बुछ भी दष्टिगोचर नहा होना वस ही प्रदप्ट वी यननिका मैं पीछ क्या है मका पुर पता नहा चलना। जब यह घरपा अधकार हाना है तभी मनुष्य के लिए प्रमान (प्रगन्नता) वा उत्य हाता। मनुष्य अपर विरुद्ध जावा मग्राम म प्रवृत्त हावर अनेक प्रयाण्ड साराध करता है जिसमे क्या १२ उस पर विजय था" ही पा सकता है। "गक विपरात' प्रपनि उस प्रकार की गुफा म 7 जाकर उगवा पतिमय रम्यपण भाग्य का चिट्ठा समभान या प्रयत्न करती है -विन्तु मनुष्य का गमभ म यह मान में रहा मन उस यह स्वाति प्रदान हा पर पाता। विम्बगार प न याया म अदृष्ट और भाग्य समानार्थी म बन गए है यद्यप मान अपने स्थान पर दोना वा पथा पथर महत्व है। अगष्ट जहा प्रधनारपूण मनाना भविष्य है, मनो भाग्य वह ातिमय पौर रहप्यपूण दलायम है जिस प्रति नामा स्त्री मनुष्य को समभाना चाहती है। यहाँ भाग्य में दो विगषण ध्यानारपर है-गानिमय और रहस्यपूण-जिनस प्रमाद का भाग्यसयपी धारणा पर भी पवार पहता है।

८२ प्रसाद के नाटकोम नियतिवाद इसी प्रक के चतुथ दृग्य मे पुन अपने ही म सिम्बसार स्वय को प्रदष्ट आदी मानता है । जोवर से वह कहता है क्या प्रदष्ट सोनकर मवमग्य बन वर तुम भी मेरी तर बठ जाना चा ते हा? प्रत निम्नमार हम पूणन एक भाग्यात्रित पात्र दष्टिगोचर हाता है । जहाँ विघसार भदष्ट में पूरी प्रास्था का परिचय देता है वहां जीवा अदप्ट की सत्ता मानत हुए भी कमवाट वा उद्घोप करता है। उसका यह कथन स नाटक के हा नहीं अपितु प्रसाद के नियतिवाद पर भी अका प्रकाश डालता है नही महाराज प्रत्ष्ट तो मेरा सहारा है । नियति की डारी पकडकर मैं निभय कम कूप म कूद सकता है । क्योकि मुझ विश्वास नै कि जो होना है वह तो होगा ही फिर कायर क्यो वन कम से क्यो विरक्त रहू । वह बिम्बसार को बता देना चाहता है कि प्रदष्ट उसे प्रक्मण्य नहीं बना सकता क्योकि वह उसका प्रतिरोधी न होकर सहायक तत्व है जिसकी सहायता से ही वह कम-क्षेत्र मे निभय अग्रसर होना जाएगा। कुए के तन तक जाने में निए पिस प्रकार रस्सी का अवलम्बन आवश्यक है वसे ही कम क्षत्र म गहराई तक पचने के लिए अदृष्ट जीवन का सहारा है। यति हम बिम्बसार के टम क्थन को प्रसादजी का पात्म वचन स्वीकार पर ल ता वहन की प्रावग्यता नहाती कि प्रमार की नियति म पम विहीनता नराग्य अवसाद अथवा जीवन विरक्ति का कोई स्थान नहीं है। वह तो मानो कर्माग्नि को प्रज्वलित वरन के लिए घत रूप है। इमी पर के आठवें दृश्य म रानी और विरुद्धक का वार्तानाप भी प्रत्य त महत्वपूरण है। अपने पुत्र को निष्क्रियता तथा मानसिक दोबल्म को देखकर रानी उसम प्रागा और पुरुषाय की ज्योति प्रज्वलित करती है दासी की पुत्री हारर भी मैं राजरानी बनी और हठ से मैंने इस पद का ग्रहण किया मौर तुम राजा के पुत्र होकर इतन निस्तेज और डरपोक होग यह कभी मैंन स्वप्न में भी नहीं सोचा था पुस्पाथ करो इस पृथ्वी पर जिग्ना तो कुछ होकर जिया नही तो मेरे दूध का अपमान कराने का तुम्हे कोई अधिकार न।। माता के इन गा का पुत्र विरुद्धव पर चमत्तारपूण प्रभाव पन्ना है । वह मन्त' मानो एकाएक समाप्त हो जाता है वह चारित्रिम दुवलना माना क्षणिक बनकर प्न कमवादी स्वरा के उद्घोप में नुप्त हो जाती है और यह यह उठता है बस मां अब कुछ न को प्राज से प्रतिसाधना मरा पतव्य और जीवन का लक्ष्य होगा। मैं प्रनिता करता हूँ कि तेरे अपमान के - प्रसाद के नाटकों में नियति का स्वरूप कारण इन शाक्या का एक बार सहार करूगा भौर उनके रक्त में नहाकर, इस कौशल के सिंहासन पर वठ कर तेरी वदना करूगा । इस प्रकार रानी की यह पुरुषाय पूरा उक्ति विरुद्धक की कम हीनता मिटाकर उसे पुरुषाथवादी बना देती है। यह भी 'प्रजातात्रु में मवाद के प्रतिपादन का सुदर उदाहरण है। दूसर भक के छठ दृश्य म बिम्बसार को हम पुन नियतिवादी पान के रूप म दसत हैं। वासवी से वह पवन-गति की वचा करते हुए पूछता है 'उसको गति ता सम नहीं ऐसी क्यो ? वासवी इन गेम उत्तर प्रस्तुत करती है, बडे-बडे दाशनिको ने कई तरह की व्याख्याए प्रस्तुत की हैं फिर भी प्रत्येक नियम मे अपवाद लगा दिए है । यह नहीं कहा जा सकता कि अपवाद नियम पर है या नियामक पर। सम्भवत उस हो लाग बदडर कहते हैं। किन्तु विम्बसार के अनुमार हम तो विश्वास है कि नीला पर्ग इसका रहस्य दिपाए है, जितना चाहता है उतना ही प्रक्ट करता है। प्रस्तुत उद्धरणो म पवन की गति का लेकर भाग्य और नियात के सबंध म दाना पात्र अपनी मपनी धारणाए पक्त करते हैं । विम्बसार के अनुसार नियति नीला पर्दा है जो न जान किन किन रहस्या को अपन म समटे है किन्तु वासवी व अनुसार पवन म गति ता है किन्तु वह गति सम नहीं है । यह मसमता ही माना उन नियमा का व्यक्तितम है जिनस मखिल विश्व संचालित है। इसस यह सिद्ध होता है कि नियति तो सदव अपने नियमानुसार काय परती है वितु जब उन नियमा के माग में पाई बाधा मा जाती है तो ववडर मान लगते हैं। मर्यात ववहर यहाँ भाम्य का पर्याय बन जाता है क्योकि यह नियम विधान का शृखला तोडकर उपस्थित हाता है । वसे नियति को वाला नहीं जा सकता किन्तु बदतन का प्रयास करने पर वनडर रूपी भनहोनी घटनाए हात लगती हैं जिनका सटीकरण विभमार इन Tम करता है 'तय तो दवि प्ररपे। भगम्भावित घटना के मूत्र म यही ववडर है। सच तो यह है शिविध भर म स्थान-स्पान पर बात्यावर है जर म उस भवर वहते है स्थल पर उस यवटर पहत हैं रा में विप्लव समाज में उछ सलता मोर धम म पार कहते हैं। चाह रहें नियमा का अपवार पहा पाहे ववार ।

प्रसाद पाटो म नियतिवाद बागवी और पिम्वमार वी उपरोक्त उत्तिम भाग्य और नियी वा प्रयटी करण हुअा है। तृतीय अर क मानव हाय म भी माधा नारा नियति यी चर्चा दानीय है जग यह अपनी दगा विषय की चर्चा मामिप पता में प्रस्तुत करती है। वामवा ने भी एक स्थान पर 'जो होगा वह ता भविष्य गम म है बहार लगभग एसी भावना को व्यक्त किया है। रितीय प्रक के तृतीय हाय म मलिका भाग्य जो कुछ दिखावे कहकर नियति का स्मरण करती है । किन्तु जीवक रानी विरद्धा प्रातिप्रातरिक्त वम की महत्ता को स्थान स्थान पर भगवान गौतम प्रसेनजित मल्लिका और छलना भा वरिणत करते हैं। भगवान गौतम प्रसनजित का वम का सदा दते हुए कहते हैं रन क्षद्र विप्लवा से चौंन कर अपने कम पथ से च्युन न हो जाओ। प्रसनजित भो स्वर्गीय सनापति वधुत को स्मरण करते हुए अपन उन कुकर्मों के प्रति प्रायश्चित की भावना व्यक्त करता है जो उसने किए हैं (मैं) अपा कुकर्मों का प्रायवित करगा। मला भी बुक्मों के प्रायश्चित के लिए विरुद्धक को कहता है जीवन इसलिए मिला है कि पिछन कुार्मों का प्राचिन परो। अपन को मुधारा। छतना भी दवरत का पटकारली हुई उसे कम का स्मरण अब तेरा अभिगाप मुझ नहा डरा सरना । तू अपने कम भोगने के लिए प्रस्तुन हो जा। पाठवें दृश्य (अङ्क २) म गौतम का यह कथन कि दूमर क मनिन कर्मों का विचार भी चित्त को मलिन कर देता है स्पा स्प स यह अभियक्त करता - विक्रिया ही नहा बुर धर्मों का विचार मा भी अतुभ पन या द्यानन करता है। टन उत्तियो से हम पमवार का ही सदा प्रास हाता है। निप्पप -~-प्रमार की यह पाश्य गृष्टि उनकी नियति भावना के सभ म कम मागा न है। क्थापाथना के प्राधार पर हम चा है कि भाग्य और कम दाना वों का साथ प्रतिनिधित्व करन वाल पात्रा की म नाटक में उपस्थित है । जहाँ विम्बसार मागधी वासवी पाटि भाग्यवानी नक्षित हाते हैं वही तीवक रानी विरुद्धव घाना गौतम प्रसन जित पानिपात्र पुरजोर म कमवाद या प्रतिपादन करते हैं । इस प्रकार प्रजातन्त्र म नियति व इन दाना ही पभो म परस्पर देखा जा माना है । रितु हमारी दृष्टि में नाटक की परिणति कमवादी स्वरा म कराती है पात्रा प्रमार के नाटबामनियति का स्वरप ही होती है यद्यपि वीव नोच में भाग्य और निपति का सगीतमय स्वर भी मुपरित हुआ है। यहाँ एक प्रयत महत्वपूण पिदु की ओर हम पाठको का ध्यान प्रापित करना चाहते हैं। प्रसार के भाग्यवादा पाय यद्यपि अहए भाग्य और रहस्य मयी नियति की बातें करत हैं फिर भी वे क्मक्षेत्र म पलायन करते हुए नग दवे जात । उदाहरणाथ हम इस नाटक के पात्र जीवन का नामौलख करना चाहग । नियति भी दोरी परड वर निभय कम कूप म वूद सक्न वाला यह पान अहार वा अपना सगरा मानता है। उस विश्वास है कि जो होना है वह तो होगा ही फिर भी वह बहता र कायर पो बनू कम से पया विरक्त रहें। प्रसाद साहित्य का अवगाहा परने वाल जिन विन्द्गगा का प्रसाद की नियति प्रये भाग्य के रूप में इप्टिगोचित होती है विपत उनसे हमारी प्राथना है कि वे कृपया जीवन की इस उक्ति की साथक्ता पर भवश्य ध्यान दें। वास्तव में प्रसार जी ने नियति प्रष्ट दव भाग्य और पार घ मारियो का यत्र-तत्र प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है पर मूलत उनकी नियति भावना मे भी कम सिद्धान्त का व्यापक प्रभाव है । हम तो पादि कमवाद ही उनकी नियति नटी का मेरुत एड है। डा० सहन का यह वयन भारा सत्य है प्रसाद जी का नियनियाद निष्क्रियता और निचेष्टता की पोर नहा से पाला नि उससे कम परन का प्ररणा मिलती है। वह कोई ऐमा भाग्यवाद या प्रारधवार नही जा पुरपाय के प्रनियल पडता हो । प्रगाट की नियति ग नाटक म जहाँ कम प्रधान होरर मुखरित हर है वहा यह मानार भी चली है कि समस्त मृष्टि सुनिचिन नियमा द्वारा मंचालित है । वाई पूछ गाता है रि जय विश्व म सवत्र नियम पास हैं तो उगम इतना पम्य यया है-7 सुपी भोर कोइ दुवा वमा कर पाता है। प्रमाद जीम वपम्प का नियमावा अपवाद रहा है। वस्तु नियति तो प्रपन नियमागार ही पाय परती पर 11 मानव प्रकृति को आवाज नहीं सुनता मोर पपन दप म उ मत हार उमा माग म बाचार उत्पन्न करता हुमा मवारण तारण्य परता है तो समझना चाहिए कि यह प्रजाति और दुसरा को निमत्रण दे रहा है। (१) पालाल राहत मूल्यापन (प्रसाद नीर नाटकों मनिपति बाद) पृ० १। - १ ८६ प्रसाद मे नाटपो म नियतिवार एक स्थल पर तीवा या है जिना होता है यह सा हगा ही इसे पार यह विसर पाठार मन म उठ समता है रिजर गभी घटनाए पूर्वनिर्धारित हैं तो फिर मानव की स्वतत्र इच्छा शक्ति का क्या मत्व रह नाना है ? म रामम्या या उत्तर हम भाग चल कर रानी प इस वाक्य म प्राप्त हो जाता है मानव अपना या गति से प्रौर पौम्प से हो घुछ हाता है। सभवत इसी।नए जीवा भी कहता है ' वापर क्या यनू कम से क्या विरक्त रह। (२) गौतम प्रजातार पर बौद्ध धम और उमके दुसवाद का प्रभाव भी देखा जा सकना नाटक की परिममाप्ति म बौद्धधम का स्पष्ट प्रभाव है क्याकि सभी व्यक्ति पचाताप प्रकट करते है। गात रस की स्थापना के साथ यह नाटक समाप्त होता है।' घौद्धो का यह प्रभाव नाटर के अनेक स्थनो को सवादी रगो म रग गया है । दो उदाहरण देखें दु (१) पद्मावती --मानवी सृष्टि वरणा के लिए है या ता करता ये निगा हिंसर पशु जगत में क्या कम है ? (प० २४) विश्व भर म यदि कुछ कर सकती है तो वह करणा है जो प्राणीमान म समष्टि रपती है। निष्ठर प्राति सृप्टि पगुमा की विजित हुई इस क्रुणा स । मानव का महत्व जगती पर फला अरुणा परुणा से (प० २९) बौद्धा का यह दुखवाद भी ऋतवाद और कमवाट से भिन नहीं है यह ! हम प्रसाद के नाम रापनी का विवेचन करते समय दख चक हैं। दुखवाद और नियतिवाद में एक सम्बन्ध यह भी है कि दुखी -यवित जव चारा पार से निराम हो जाता है तब वह भाग्य, नियति माति की महिमा गाकर अपन म आत्म सतोप के मुत्रा या अनुसधान करता है जोकि स्वाभाविक भी है। उपरोक्न विवेचन स स्पष्ट है कि अजातशत्रु म यद्यपि नियतिवाद और करणावार का भी रापुर है पर नाटक को प्रत्मा कमवादी और पुरपाथवादी (१) हिंदी साहित्य कोग (स० पोरेट वर्मा) माग २, पृ०६।

प्रसाद नाटका में नियति का स्वरूप जनमेजय का नागगज्ञ - पल्पना है नियति विपायर सदभ (१) मनसा क्या इस विष के गमच पर नागा ने बाई सपृहणीय अभिनय नही विया ? क्या उनका प्रतीत भी वतमान की भांति अधकार पूर्ण था। अव१य १ पृ०६। (२) कृष्ण तिन पदार्थों की शक्ति अप्रकाशित रहती है उड़ लोग जड़ रहते हैं। किन्तु दखो जिर हम जड कहते हैं व जर तिमी विशेष मामा म मिलने हैं। तब उनम एकति उत्पन्न होती है स्पदन होता है जिसे जडता नही कह मक्ते । वास्तव मे सवत्र शुद्ध चेतन है जन्ता कहाँ ? वह तो एव भमात्मक यह पूण सत्य है कि जब स्प मे चतन प्रकाशित होता है। वहा १०१२-१३ । (३) कृष्ण पुष्पाथ परो नडता हटामा। -~वही पृ० १३॥ (४) काश्यप राष्ट्र का भला हुमा यह एक स्वतत्र धम है और ब्राह्मण को भवना एम भिन्न पाप है। दोनो का परिणाम भिन्न है। हम तग कमवादी हैं । पर दानो काही मिलेगा। --मन १ हय पृ०२६ । (५) माणवर मो में जाता हूँ । भाग्य म हा तो फिर तुम्हारे दान करूगा। -- १ दृश्य ४ पृ० ३४ । (३) ऋषि जरत्कारु पाट या लिपि ही सब युद्ध बराती है रममजय मैं तुमवा धमा परता, नितु यमपल तो स्वम समीप पात हैं। उनस भाग पर वाई पच नहीं माता स्मरण रसना मनुष्य प्रकृति का अनुपर भोर निपनि या - - ~ मय ७, पृ० १३-१४॥

प्रसार के नाटम नियति - (७) जनमजय (स्वगत) मनप्य क्या है प्रति या अनुर और नियति या दाग या उगमी श्रीना का उपरग। फिर क्या वह प्रपन का कुछ समझना है ? -प्रक २६१ पृ०४० । (८) नेपथ्य से जीने का अधिकार तुभ क्या क्या इसम मुय पाता है। मानव तून कुछ सोचा क्या पाता क्या जाता है। प्राय अविद्या कम हुअा क्या जीनन स्वा तर कस था। महागय के पट म पहला चित्रकार क्या प्राना है कारण वमन भिन्न कता है कम कम चननता है। खल खेलने पाया है तू फिर क्या रोन जाता है । --वही पृ० ४७ । (8) जनमेजय किन्तु मनुष्य प्रकृति का अनुचर और नियति का दाम है। क्या वह कम म स्वतत्र है? -अक २ दृश्य ३ पृ० ५६ । (१०) उतक अपने कनन के लिए रोन से क्या वह टूट जाएगा? उसके बदल म सुकम करन हाग । सम्राट मनप्य जव तम यह रहस्य नही जानता तभी तक वह नियति का दास बना रहता है। यनि ब्रह्म हत्या पाप है ता अवमेध उमदा प्रायश्विन भी तो है । --11पृ ५६॥ (११) जनमजय वरगा। अब एक दार कम ममुर म बूट पर गा चा' मा पुधहा। मानस्य पर मुभ प्ररमण्य नहीं बना सागा। -वी प ५७ । (१२) जनमेजय यही उनकी भाग्य लिपि है प्रष्ट है । वपुप्मा पौर दिया है भाग्य म है वि अपना प्ररमण्यता पर प्यग्य सुना करें। -वही ५ ५८। - - प्रसार के नाटक में नियति रा स्वरूप EE (१३) व्यास - मायुप्मान तुम्हारे पितामहो ने मुझसे पूछ कर कोई काम नही किया था। और न बिना पूछे मैं उनसे कुछ कहने हो गया था क्योकि वह नियति थी। दम और अहकार से पूण मनुष्य अदृष्ट के क्रीडा कदुक हैं। प्रध नियति कत रख-मद से मत मनुष्यो की कम शक्ति को मनुचरी बनाकर अपना काय कराती है। -सक ३६०१,५०७३ । नियामिका क्ति कृत्रिम स्वाथ मिद्धि में रुकावट उत्पन्न करती है। ऐसे काय कोई जान बूझ कर नहीं करता और न उनका प्रत्यक्ष में कोई बडा कारण लिवलाई पड़ता है उलर पर कोत और विचारशील महापुरुष ही समझते हैं पर वसे रोकना उनके बा की बात नहीं है। क्योकि उनमें विश्व भर के हित का रहस्य है। -~~वही पृ०७४। (१५) पास नियति, क्वत नियति और कुछ नहीं। ब्राह्मणा की उत्तजना से तुमने प्रवमेध करने का जो दढ सा प दिया है उसमें कुछ विघ्न होगा और घम के नाम पर माननक जो बहुत मी हिमा होती माई है बहुत दिना तर में लिए हक जाने को हैं। वही प०७५ (१६) वपुष्टमा वसा भारवय है। व्यक्ति की हत्या जो अनजान म हो गई विधि विहित भागस्य हत्यामों से छुडार जायगी। अगएदनाय वम तिपि तरा क्या उद्यम है बुर समम मनही माता । -प्रद ३ दृष्य २ पु०७८ (१७) वपुष्टमा मेरा चित पचल हो उठा है। भविष्य बुध टेढी रेखा साचता हुभा निमाई देता रहा है। वही १०.५६ - प्रसाद नाटकों में नियतिवाद - - (१८) उत्तव नियति का मोहा प नीचा ऊया होता हुपा पपन स्थान पर पहुँच हा जायेगा। पिता क्या है क्वल कम करते रहना चाहिए। -वही, पृ० २ (१६) सुरमा मैं उस प्रदष्ट गति का य य ह । वह जो मरे साथ है। मुझ से काई वाम कराना चाहता है। -प्रव ३ दय४ प.६८ (२) मणिमाता कुक्म का कभी अचा परिणाम हुआ है -प्रव ३ दय ५ प०६३ (२१) व्यास ब्रह्मचक्र के प्रवतन में क्सी कठोर कमनीयता है । -अब ३ दग्य ६५ ६४ (२२) यास विश्वात्मा सवका त्याग करता है। -वही पृ०६५ (२३) यास सम्राट तुमने एक दिन पछा था कि क्या भविष्य ने । दवा नियति का चक्र। यह ब्रह्मचर प्राप ही अपना काय करता रहता है । मनें कहा था कि यज्ञ म विघ्न होगा। फिर भी तुमने यन किया ही यना का काय हो चका। दालव मृष्टि सल कर चुवी। -पक ३ दृ०८ प०१८ (२४) समवेत-गान म सब म जो सेन रहा अतिसुदर परछाई सा माप दिए गया प्रारर हममें फिर हमको प्राकार दिया। पूर्गानमय करता है जो ग्रहमति से निज सत्ता का तू मैं ही इस चेतन का प्रणव मध्य गुजार किया। -वही प० १०६ - प्रसाद देताटकाम नियति का स्वरूप - समीक्षण नाटक के प्रारम्भ में ही कुकुरवगीय यादवी सुरमा मौर ऋपि जरत्कार की पत्नी मनसा का वालिाप सुनने को मिलता है। मनसा नागजाति की प्रशस्ति गाते हुए कहती है क्या इस विश्व के रगमच पर नागो ने काई स्मृहणीय अभिनय नही किया " यहाँ विश्व के रगमच पर की उक्ति ध्यान देने योग्य है जिससे ध्वनित होता है मानो यह विश्व एव गमव है और जीवारमा उसका चलता फिरता पात्र है। कामायनी में भी प्रसाद ने कहा है विश्व कम रगस्थल है।' लगता है प्रसाद की यह मायता रही होगी कि मनुष्य अपने पूर्वाजित मस्कारा को लेकर मसार में पाता है और तदनुसार अभिनय करके चला जाता है। प्रकारातर से कम-सम्बधी धारणा या ध्यजित हुई लगती है। इमी दश्य में या कृष्ण अजुन को जड और चेतन के विषय में समझाते हुए चेतन की महत्ता प्रतिपादित करते हैं। उनके अनुसार जडता घेतन का ही निपधात्मक स्वरूप है । अत सवत्र शुद्ध चतन है जडता कहाँ ? यह तो एक भ्रमामय पर है ।' कृष्ण को इस उक्ति वा सदेश ऐसा जान पडता है मानो इस विश्व का संचालन करने वाली कोई चेतन सत्ता है नई नहीं। यहाँ पर यह प्राभास भी मिटता है वि पिसे चेतनता की सजा से वे अभिहीत करते हैं वह पुस्पाय और उिसे जडता का नाम देते हैं वह अमरायता' है क्यावि मजन के यह पूछने पर मि मैं क्या कर उनका पाते है पुरुषाय करा जहता हटाया। मन यहाँ कृष्ण प्रजुन को कमवाद का यह संदेशही देते हुए प्रतीत होते हैं कि पुरुपाय दवाधित मालस्य अथवा भरमएयता नहीं। जनमेजय वी राज-सभा में भी कम की चर्चा हम मुनाई देती है। पुरोहित पायर का पथन है कि राष् हित एक स्वतत्र घम है पौर ग्राह्मण की पवना पाप है। हम लोग धमवादी हैं। पर दोना वा ही मिलगा । कम पाई गुम हो या प्राम पर उस पल पल्प मिला है। इस नाटज चे प्रथम मा वा साना हाय प्रत्यात महत्वपूण है । मृगया रोसते समय हरिराये घाम जनमजय द्वारा ऋषि जगताय की हत्या हो जाती है। उन्हें पापत भवस्था म पाता देयार जनमेजय वह उठता है भनय हा गया हाय रे भाग्य, भाए ये मृगया सलवर हृदय बहलाने यहाँ हो १२ प्रसाद ने माटों में निपतिवाद गया ब्रह्म हत्या का महापातक। यहाँ दो शत विचारणीय है- हाय रे भाग्य मौर ब्रह्म हत्या का महापातक-जोमा मनमेजय को भाग्यवादी भोर कमवादी सिद्ध परते हैं। मृत्यु से पूर्व जरत्कार द्वारा कहे गए निम्नलिसित शब्द नाटक के समस्त घटनाक्रम पर मत तक छाए रहते हैं भदष्ट की लिपि ही सब कुछ कराती है जनमेजय मैं तुमको क्षमा करता हू किंतु कमफ्ल तो स्वय समीप पाते हैं उनसे भाग कर कोई बच नही सकता स्मरण रखना मनुष्य प्रवृति का मनुचर और नियनि का दास है। इस कथन मे मुख्यत तीन बातें अत्यन्त महत्वपूव हैं। प्रथमत भद्दष्ट की लिपि पर जो कुछ प्रक्ति है उसी के अनुसार मनुष्य को वाय करना पड़ता है तिीयत कमपलो से काई नही बच सकता है क्यो कि व स्वय कर्ता के पास पहुँच जाते हैं मोर प्रतत मनुष्य प्रकृति का अनुचर और नियति वा दास है। प्रथम और अतिम बिन्दु अवश्य भाग्यवादी कहे जा सकते हैं किन्तु मध्यभाग स्पष्ट सकेत करता है कि म पो से कोई प्रयक प्रयत्न करने पर भी बच नही सक्ता। यहां महाभारतकार की इस प्रसिद्ध उक्ति की पोर हमारा ध्यान चला जाता है यया घेनुसहस्रप बत्सो दिदति मातरम । तथा पूर्वकृत कम परिमनुगछति । (गति पव १८१-१६) जिस प्रकार सहस्रा गाया में भी बछना अपनी माता के पास चला जाता है उसी प्रकार पूधकृत कम कर्ता को पहबान लेते हैं। प्रत जरतार की उक्ति का मध्यभा उक्त श्लोर के उत्तराद्ध का अनुवाद ही कहा जाएगा। इस वि पण से सिद्ध है कि प्रसाद की नियति के सदभ मे जगह जगह उद्धत विया जात वाा यह क्यन यद्यपि नियतिवादी है पर मवाद मे सूय नहीं है अपितु इसस क्सिी सीमा ता कम मा यता की सुदर पुष्टि भी हाती है । मनुष्य प्रकृति का मनुचर मौर नियति का दास है -टस वाक्य पर भी विचार करना यहाँ अत्यावश्यक हो जाता है। इस क्यन का यह प्राशय कदापि नही लेना चाहिए कि मनुष्य भाग्य का गुलाम है। वस्तुत मनुष्य के लिए प्रकृति व नियमो का पालन करना प्राव यर हो जाता है। भयकर मांधी घोर तूगन म बाहर घूमने वाले को कष्ट सहना ही पडेगा । समुद्र को उत्ताल प्रसाद के नाटकों म नियति का स्वरूप तरगो के विपरीत तरने का प्रयास निरयर ही होगा और गहन अधकार में भपनी मांखा का उपयोग चाहने वाले को असफलता ही हाथ लगेगी। इसीलिए प्रमाद ने मनुष्य को प्रकृति का अनुधर कहा। यह तो समष्टि परक पथ पर यक्तिपरक दृष्टिकोण से देखने पर भी हम पाते हैं कि मानव अपने स्वभाव के अधीन ही होता है। इस नाटक म प्रकृति र का सास्यपरख मथ मा ग्राह्य है जसा विं नेपथ्य-गति (पृ० ४७ ) से भलक्ता है। भव नियति' शन पर भी थोडा विचार कर लें। नियति यहाँ काय कारण की उस परम्परा का बोध कराती है जो विश्व का नियमन करती है और जिसके विषय म प्रथम अध्याय म हम बहुत कुछ विचार कर पाए हैं। यहाँ यही यह देना उचित होगा कि यह भाग्य का पर्याय नहीं है। किन्तु जनमेजय द्वारा जहाँ नियति और 'कम-स्वातन्य का प्रश्न उठाया गया है, वहां सभक्त जनमेजय नियति को भाग्य के प्रथम प्रयुक्त कर रहा है। यह उम्रका अपना भय है जरत्कार की उक्ति का नही। इस भालोव मे दसने पर जरवार का उपरोक्त कयन नियतिवादी और कमवादी भावामा का सुदर चित्रण कहा जा सकता है। जरत्कार का यह क्थन बहुत समय तक जनमेजय को उद्वलित करता रहता है। हालांकि वह पि के मरणोपरान्त वही यह स्वीकार करता है सचमुच मनुष्य प्रकृति का अनुचर और नियति का दास है -बिन्तु थोडी ही देर बाद वह स्वप से ही पूछ बैठता है कि यदि ऐसा है तो फिर क्यों मनुष्य ( अपने पापरा पुछ समझता है। ठीक इसी समय नेपथ्य से उसे कमवादी स्वरों म यह गीत सुनाई देता है। माद्य प्रविद्या षम हुमा क्यों जीव स्ववा तव व से था। कारण कम न भिन्न कहीं है कम कम चेतनता है। सल रोलने पाया है तू फिर क्यो रान जाता है । फिर भी जनमजम का विकल्प विकल्प ही रह जाता है। क्या वह (भनुप्य) कम म स्वतत्र है ' वह उतक से पूछता है। उतर द्वारा जनमेजय की समस्या का समाधान इन गेम होता है (Omपते हमनमभव प्रागुण-गोता ३-५ ।

प्रसाद पे नाटकों में नियतिवाद अपने कलक के लिए रोने से क्या वह छूट जाएगा ? उसके बदले में सुकम करने होगे सम्राट, मनुष्य जब यह रहस्य नहीं जानता तभी तर वह नियति का दास बना रहता है। यदि ब्रह्महया पाप है तो अवमेघ उसका प्रायश्चित भी तो है।' यह समझाते हुए उतर जनमेजय वो पुरपाप मोर सलम का पाठ पढाता है तथा पूछता है कि वह ब्रह्महत्या के इस पाप से मुक्त होन वे निमित्त सुक्म (यनादि) क्रेगा या नहीं? उतक के कम-सदा से अत्यत प्रभावित होकर कहा गया जनमेजय का यह क्यन पुन नाटव को क्मवादी रगत प्रदान करता है करूगा पर एक बार कम-समुट म कूट पडूगा चाहे जो कुछ हो । प्रालस्य अब मुझ अकमएप नही बना सकते । तृतीय प्र मे नियतबादी ऋपि यास की उक्तियां हमे सुनने को मिलती हैं । वेव्यास को समझात हुए वे कहते हैं कि सब कुछ पहने नियत रहता है उसे कोई परिवर्तित नही कर कता दभ और अधकार से पूर्ण मनुष्य अदृष्ट शक्ति के क्रीडा कदुक हैं । अघ नियति फतृत्व मद से मत मनुष्यो की कम शक्ति को अनुचरी बनाकर अपना काय करती है। व्यास का यह कथन दर्शाता है कि नियति के सामने मनुष्य की स्वतत्र इच्छा शक्ति का कोई वा नहीं चलता । हम सभी उस विश्व नियामिका शक्ति के हाथो मे उपकरण मात्र हैं। नियति के लिए यहां प्रयुक्त हुमा विशेषण अध' भी विचारणीय है । हमारी दृष्टि में यहाँ यह तात्पय नहीं लेना चाहिए कि नियति के नियम ही अधे हैं अपितु यह कहना मधिक ठीक होगा कि नियति स्वय ही किसी मोर भी न देखकर अत्यन्त कठोरता से अपने नियमो का पालन करती है । क्योंकि व्यास मागे के कथनो में नियति के मानवकल्याणमय स्वरूप का दशन करते हैं। जब जनमेजय उपरोक्त क्थन का तात्पय पूछता है तो वे उसे यह कहकर समभाते हैं उलट फर को शान्त और विचारशील मनुष्य ही समझते हैं पर उसे रोकना उनके वश की बात नहीं है क्योकि उसमें विश्व भर के हित का रहस्य है । प्रत सिद्ध हो जाता है कि यास जिस नियति की चर्चा करते हैं वह प्रकृति की नियामिवा शक्ति है उसकी सत्ता अपरिहाय है और उसके समस्त काय-व्यापारो के पीछ समस्त विश्व हित का रहस्य सन्नि प्रसाद के नाटकाम नियति का स्वरूप इसी मङ्क वे द्वितीय दृश्य मे वपुरमा मोर उतक द्वारा नियति को सता पा स्वीकार करते हुए भी कम की महत्ता का प्रतिपादन हुना है। रानी वपुष्टमा के अनुसार एक व्यक्ति की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए प्रमाय जीव हत्याए करना कहाँ तक उचित है। वह जनमेजय की यन-वलि का विरोध करती हुई रहती है अखडनीय क्मलिपि, तेरा उन्य कुछ समझ में বা শ্বারা भविष्य बुध टती रखा खाचता हुअा रिसाई दे रहा है।' उपम भी कम सम्बधी अपनी दर मा यता का परिचय देता है 'नियति का श्रीडा या नीचा ऊवा हाना हुगा अपन स्थान पर पहुँच ही जाएगा । चिता क्या है ? येवल कम करते रहना चाहिए । विन्तु व्यास के प्रतिम क्थन पुन नियतिवाहिता का प्रतिपादन करते हैं । उनक अनुसार 'सवत्र नियति क्वल नियति है। ब्रह्म-चक्र का प्रवतन कठोर' और कमनीयता लिए हुए है जो आप ही अपना काय करता रहता है। इस प्रकार ऋषि-यास नाटक के प्रारम्भ से प्रत तक पोर नियतिवादी पात्र बने रहते हैं। निष्कप प्रसाद की इस नाम्य-कृति में नियति का सर्वाधिक चर्चा हुई है । पारम्भ से मत तक नाटक पर नियतिवादी छाया अत्यन्त स्पष्ट है । किन्तु इसम प्रसाद पा नियति सम्बधी दृष्टिकोण कम विहीन नहीं रहा है। वस्तुत इस नाटक में प्रसाद दोनों को महता पर हो बल देते हुए चले हैं । यद्यपि बार-चार यह वाक्य कि मनुष्य प्रकृति का अनुचर भोर नियति मा दास है परकर पाठ यह सोचन लगता है कि नाटक पूरान नियतिवादी है। पि जरा मोर वेदव्यास इस नाटक ये ही नहीं प्रसाद वे भी सबसे घरे नियतिवादी पात्र हैं। दोनों के द्वारा नियति का जो विवेचन विलपरा हम नाटक में मुनते हैं उससे प्रसाद की नियति के सम्बप में हमारी धारणाएं बनती है (क) नियति विश्व की नियामिवा शक्ति है, जो पाय-वारण की परम्परा को सेकर चलती हुई इस विश्व का सचालन कर रही है। (स) महर्षि व्यास ना में इस नियति का काई परिवर्तित नहीं कर सकता। सम्म भौर महबारपूण मनुष्य उसके लिए ग्रीडाबर बन जाते हैं। (ग) नियति कठोर भौर बमनीय है । कठोर इसलिए कि वह मपरिवतनीय है मोर यमनीय इसलिए कि वह मानव कल्याण का उदय लर चलती है।

प्रसाद के नाटको म नियतिवाद (घ) नियति पूव नियत है। इसीलिए यद्यपि प्रत्येक मनुष्य उसे नहीं देस सकता किन्तु वेद यास जरो महात्मा पहल से ही उसका प्रत्यशान कर नते हैं। फिर भी उसे परिवर्तित करने का सामध्य उनमें भी नहीं है क्योकि उसम मानव-कल्याण का उद्दय समिलित है । (क) नियति चक्र स्वचालित है प्रयवा उसका कोई सचानक भी है-इस विषय मे व्यास का मत है कि नियति अपने माप ही काय करती रहती है। नियति विषयक उपरोक्त दष्टिकोण स्पष्टत वरिक ऋतवाद से प्रभावित लगता है । वहाँ भी ऋत को अखडनीय अपरिवतनीय कायकारण-परम्परा युक्त और स्वचालित माना गया है । अतवाद की चर्चा करते हुए हम निीय अध्याय म यह देख ही चुके हैं। प्रत निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि प्रसाद की नियति भावना पतिक ऋतवाद के प्रभाव को लकर चली है यद्यपि प्रकारमा तर म वह नए नए प्रभाव ग्रहण करती गई है। अब हमे नाटक के प्रय पात्रा को लकर भी नियति विषय विचार करना है । ऋपि जरत्कारु और वेदयास के अतिरिक्त भगवान श्री कृष्ण जनमेजय और उतक भी नाटक के प्रमुख पात्र हैं। भगवान कृष्ण नाटक के प्रारम्भ में ही प्रजन को कमवाद का सदेश देते हुए जडना को हटावर पुरपाथ करने को प्रेरित करते हैं । उनक भी वार वार जनमेजय से पता है कि उसे ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए कमरत होना चाहिए । वह यह मानने से इकार नहीं करता कि मनुष्य प्रकृति का अनुचर और नियति का दास है किन्तु यह तभी तक है जब ता मनुष्य यह रहस्य नही जान लता कि अपना पाप कम घोने के लिए उसे प्राण पण से सुक्मरत होना चाहिए । उतर का यह तक प्रत्यन्त महत्वपूर्ण है जिससे प्रभावित होकर जनमेजय भी पुरुषार्थी वनकर कमरत होने की प्रतिना कर लता है। नाटक के घटनाकम म यह कमवादी मोड दानीय है। इसी क्मवाद से प्ररित होकर जनमेजय माग या का मायोजन करता है इस प्रकार हम दखते हैं जिनमेजय नियतिवादी पात्र होकर भी कमवादी है । उसकी नियतिवारिता उसे मक्मण्य नहीं बनाती यद्यपि मपने निराशावादी स्वभाव के कारण कही कहा वह निरुत्साह सा दिखाई देना है। नितु हम तो यह देखना है कि मनुष्य प्रकृति का अनुवा और निपति का दास है-मानने वाला यह पात्र भी स्वय को पूणत भाग्यात्रित वहां कर देता है ? ऋषि जरत्कारु भी यह वर्षों से पूर्व कि मनुष्य प्रकृति का मनुचर मोर प्रसाद के नाटका में नियति का स्वरूप नियति का दास है यही कहते हुए देखे जाते हैं, 'कम-फल तो स्वय समीप पाते हैं, उनसे भागकर कोई नहीं बच सकता। वपुष्टमा भी असहनीय कमलिपि का गुणगान करती है । जनमेजय के मानसिक द्वद्ध के समय नेपथ्य या गीन भी जो प्रमाद का प्रात्म वपन मा प्रतीत होता है-क्म का ही सदेश देता है । अन निपति-नटी की लीला प्रधान इस नाम्य रचना में कम धाद भी शुद्ध रूप म यत्र-तत्र उभर पाता है। इसम सदेह नहीं कि नाटक ये घटनाचक्र और ऋपि जरत्कार तपा वेदव्यास क्यनों से नाटक नियतिवादी भविष्य वारिणया का जमघट-सा लगने लगता है और हम सोचने लगते हैं कि नाटक पूणत नियति भावनामा में प्रोतप्रोत है किन्तु पात्रो के मनोविश्लेपए से कमवाद की सुदर पुष्टि होती है । केवल जरत्कारु और व्यास ही नियतिवाद भावनाप्रो के स्रोत दिखाई पड़ते है। वितु डॉ० सहन को तो उनम भी क्मवादिना के दान हाते हैं उनमेजय का नागयज्ञ' में बडे नियतिवादी है किन्तु उनम से काई भी न निश्चष्ट होकर यठता है न कोई निपटता का उपदेश ही देता है। इस प्रकार इन दोनो पानो को भी हम यम का विरोधी नही पात । उपरोक्त विवेचन विश्लेषण के पालोर म देखन पर हम पह सकते हैं कि पद्यपि नियतिवाद की दृष्टि मे जनमजय का नागयत' एक अविस्मरणीय कृति है पोर मय किसी नाटक में प्रसाद का रुझान नियति की धार तना नहा रहा है परतु फिर भी इस नाटक को पाकर हमारी यह पुष्ट धारणा बन जाती है कि प्रमाजी की नियति भावना कम मुगापेभी है कम से विरत नहीं। कामना नियति विषय सर्भ (१) वामना - पिता का मदा सुन रही थी। में उपासना-गृह म जाती है मवीन घरना होने वाली है। -प्रद, हय ३ पृ० १७ 1२) विनाम ऐसी सीधी-सादी जाति पर यदि शासन न दिया तो पुरुषाथ ही क्या । - -वही, पृ. (१)नेरहमासात सहल परम पृ. २७ ६८ प्रसाद पे नाटकों में नियतिवाद - - (३) बिलास भाग्य से प्राजक्त वामना ही (प्रधान) है। परन्तु मेरे कारण शीघ्र इसको पद से हटना होगा। -यही पृ. १८, (४) विलास ईश्वर है और वह सबके कम दखता है। अछ कार्यो का पारितोषिक भोर अपराधा का दड देता है। वह याय करता है मछ को अया और बुर का बुरा। -ग्र दृश्य ५ प० २७, (५) विवेक यह याय और अयाय क्या है ? अपराध और मछ कम क्या है। हम लोग नही जानते। हम खेलते हैं और खल म एक दूसरे के सहायक है । इसम याय का कोई काम नहीं। पिता अपने बच्चा का खेल देखता है फिर कोप क्यों? वही प० २७, (६) विलास पुण्य भी करते हो और पाप भी। विवेक पुण्य क्या है? विलास दूसरा की सहायता करना प्रादि। पाप है दूसरो को कष्ट दना जो तुम लोग - निषिद्ध हैं। - -वही १०२७, (७) विलास इस नियम पूण ससार मे मनियन्त्रित जीवन व्यतीत भरना मूखना नहीं ? नियम अवश्य हैं। ऐसे नीले-नभ में मनन्त उल्का पिंड उनका बम से उदय मोर मस्त होना दिन के बाद नीरव निणीय पक्ष विपक्ष पर ज्योतिष्मती राका और दूहू ऋतुमो का पक और नि स यह शाव के बाद उद्दाम यौवन, तब क्षोभ भरी हुई जरा-ये सब क्या नियम नहीं हैं ? कामना यदि य नियम हैं तो मैं कह सकता हूँ दिम छ नियम नहीं है । ये नियम न होकर "निपति' हो जाते हैं, प्रसफलता को ग्नानि उत्पन्न करते हैं । मक दृश्य १ पृ. ३८, -- प्रमाद के नाटवी मे नियति का स्वरूप ६६ (6) विलास नियमा के भले और बुरे दोनो ही क्त य होते हैं। प्रतिपल भी उन्हीं नियमा म से एक है । कभी-कभा उनका रूप अत्यन्त भयानक होता है । उसस जी घबराता है। परन्तु मनुष्या के कल्याण के लिए उसका उपयोग करना ही पडेगा क्योकि स्वय प्रकृति वसा करती है। देखो, यह सुदर फूल झडकर गिर पहा । जिस मिट्टी से रस खोपकर फूला था उसी म अपना रंग रूप मिला रहा है । परन्तु विश्वभरा इस फूल के प्रत्येक केशर वीज को अलग अलग वृक्ष बना दगी उह सक्डों फूल देगा। -प्रन २,६य १ प०३८३६, (8) विलास मेरी मानसिक अवस्था कसे छाया चित्र खिलाती है। कोई अदृष्ट शक्ति सकत कर रही है मैं इस देश के प्रनिर्दिष्ट भावाश पथ का धूमकेतु है। चलूगा मरी महत्वाकांक्षा ने प्राकार और समय दोनो की सृष्टि कर दी है। उसमे पदार्थों के द्वारा नयी सृष्टि के साथ मे बुहेलिका सागर म विलीन हो जाऊ। -प्रक २ दश्य ४ प०४८५६, (१०) लीला तेरे भाभूषणो की तो दीप भर में धूम है। लालसा - परतु दुर्भाग्य की तो न वहागी। -अब २, दृश्य ६ प०५६ (११) दूसरी ब्याह कर लो रानी। रामना- धुप मूग अपने हाथों से जो विहम्बना मोल ली है उसका प्रतिफल दोन मागेगा। - - भर ३ दृष्य २ पृ०७२ ! - (१२) कामना मेरे दुमाप से। वही, पृ० ७६।

प्रसाद के मारकों में नियतिवाद - - - (१३) माता गुमगा राि पति मरे भाग्य मे यापा। पा ३ दृश्य ५ पृ०६३ ॥ (१४) विवो दूसरे की रक्षा म पाप का विरोध पौर परोपपार म प्राण तक दे देने का साहस रिस भाग्यवान को होता है। मर ३ दृश्य ७ पृ. ६॥ (१५) सभी मेन लो नाप विश्व वा रोन। प्रव ३ दश्य ८ पृ६७। समीक्षण प्रथम प्रक के तृतीय दय में जब कामना मौर विलास वार्तालाप मे सलम होत हैं तभी एक पक्षी बोलता है और कामना घुटने टिका कर सिर झुका लेती है। जब विलास पूछता है कि वह क्या कर रही है तो कामना कहती है पिता का सदा सुन रही थी। मैं उपासना गृह में जाती है क्योरि कोई नवीन घटना होने वाली है। इससे लगता है कि वामना पिता रूपी किसी अलौकिक सत्ता म विश्वास रखती है तथा यह भी व्यजित होता है कि कुछ घटनाए पूर्व निर्दिष्ट होती हैं जिनका पूर्वाभास किसी माध्यम से या-कदा मिल जाता है । यहाँ पक्षी को उस माध्यम रूप में देखा जा सकता है। इमी स्थन पर जव कामना उपासना-ग्रह में चली जाती है तो विलास द्वीपवासिया का दास बनाने की योजना बनाता है और कहता है कि उसका पुरुषाथ किस काम का है यदि वह ऐसी भोनी भानी जाति पर भी अपना गासन स्थापित नहा कर सका। यहां पुरुषाथ की मभिव्य जना और मवादी सकेत स्पष्ट है । पितु जहाँ विनास पुरुषाय की बात करता है वही यह जान वर कि माजवल उपासना गृह का नेतृत्व वामना के ही हाथ म है अपने भाग्य का भी स्मरण करता है भाग्य से भाजक्ल कामना ही (प्रधान) है। परतु मरे वारण गीघ्र इसको पद से हटना होगा । यही विलास की भाग्य पौर पुरुषाय पर दोनों मन स्थितिमो का चित्रण हुमा है।

प्रसाद के माटको मे नियति का स्वरूप १०१ पांचवें दय में जब सामना उपासना गृह का नेतृत्व करती हुई सभी नागरिको से जब यह कहती है कि ये विलास का उपदेश सुने तो कई स्त्री पुरुष इसका विरोध करते हैं । विलास उह सचेत करते हुए कहता है कि यदि ऐसा करोगे तो ईश्वर का प्रकोप होगा। ईश्वर को व्याख्या भी वह प्रस्तुत परता है, 'ईश्वर है और वह सब के कम दखता है। माछ कार्यों का पारितोपिक मोर बुरे कार्यों का दण्ड दता है। वह न्याय करता है अच्छ को पच्छा पोर धुरे को बुरा ।' यहाँ विलास जसा भौतिकवादी पान भी कम फसा भी चर्चा करता हुमा देखा जा सकता है । इसे कहा जा सकता है कि प्रसाद के मन पर इस भारतीय सस्कार की छाया रही होगी कि जो जसा करेगा उसे घसा ही फल भोगना होगा। कमवादी यह विश्वास ऋग्वेद के समय से ही भारत प्रचलित रहा है। यहा पर जब विवक विलास से माय भोर भयाय का तात्पय पूछता है ता उसक क्थन में भी कम शद का प्रयोग द्रष्टव्य है । विवेक का यह बहना पिता का सदा सुनने वाला वाक्य याद दिला दता है। इससे सिद्ध है कि फूल द्वीप के वासी पितारूपी पिसी मानवेतर सत्ता में अटूट विश्वास रसते हैं । विलास तो विदगी होकर भी इसी चर्चा करता है। विवेर जब पाप और पुण्य के विषय में अपनी जिनासा व्यक्त करता है तो विलास इन दोनो की व्यास्या करते हुए उसे समझाता है कि दूसरा की सहायता करना ही पुण्य है और किसी का इष्ट दना हा पाप । विलास के इन विचारों को भी हम मवाद की सजा द सक्त हैं। दूसरे प्रा के प्रथम दय म ही विलास कामना को यह शिक्षा देता है किरा नियमपूरा ससार म मनियत्रित जीवन बिताना मूसता ह । नियमो की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए वह कहता है, नियम अवश्य हैं। ऐसे नीले नम म मनत उल्कापिंड उनवा प्रम मे उदय पोर मस्त होना निके धाद नीरव नितीय पक्ष-पा पर ज्योतिष्मती रावा और बहू "तुमा का पा मोर निस्स देह शव ये वाद उद्दाम यौवन तय क्षोम से भरी हुई जरा ये सब क्या नियम नहीं हैं ? विलास का यह पूरा मवाद यदिक ऋन सम्बपी मायता का अनुवाद-सा लगता ह । ऋत वा एक पर्याय नियम भी ह यह हम रितीत मध्याय में लिस माए हैं। प्रत यहाँ भी प्रसाद पर मृत-सम्बपी प्रभाव सप्टन देखा जा सस्ता है ।

प्रगाव रे माटों में नियरियाद froनामा मशार पनि पे नियम है तो पाय नियम नहीं अपितु नियनि । पौर पगपरनामी नामो उत्पन्न करले याल है। नियति पार पाएगा प्रयोग हमारे ६ष्टि पथ म प्रमादे माप विसी नाटप में नहीं पाया । महो नियम और नियति - विलोम प प प्रयुक्त हुए है। नियति का प्रयोग यहाँ अपरिहार्य दव या भाग्य के प्रथम हुआ है जो दिमी नियम की परवाह किए बिना मधाधुध काय करता है । नियति का यह मय लेने पर यहाँ नियम । - मा तात्यय सुनिश्चित नियम विधान मर्यात काय कारण परम्परा युक्त नियति से ही होगा जो कि ऋत गट के बहुत समीरमा जाता है। प्राग विलास इस नियम परम्परा का प्रकृति सम्ब धी दष्टिकारा प्रस्तुत करता ह । उसकी दरि म प्रकृति मानव-वल्याएभयो है चाहे उसकी नियम परम्परा म कभी कभी प्रत्य त भयानक लगने वाले प्रतिपल भी क्यो न प्रार हाते हो । प्रकृति का जो पुष्प मिट्टी से उत्पन्न होता ह उसी को हम पुन मिट्टी म मिलते हुए दखते हैं। कोई दार धूल म पडे बिलखते पूल को देखकर य, कह सकना ह कि इसकी यह दगा प्रकृति की क्रूरता का यातन कराती ह पर वास्तविकता यह ह कि इसी पुष्प वीज स वमुधरा पुन सहना पुष्पो को जन्म दी। अपने इस प्रकार के विवेचन से विनास यही दर्शाना चाहता ह कि ऊपर से दबने पर प्रकृति के नियम कर लग सकते हैं पर वस्तुत वे समष्टि के स स के लिए हैं दुरा के लिए नहीं। इसी पर वे चतुथ दृश्य में विकास के सम्मुख जब कामना विवाह प्रस्ताव लेर माती है तो विनास असमजग में पड़ जाता है क्योकि वह लालसा की धचलता पर मुग्ध है। अपनी मनादया के प्रति वह यह उठता है मेरी मानमिक सयवस्था कस छायाचित्र खिलाती है। कोई अदृष्ट गन सवेत बर रही हैं। इम स्थल पर विनास मानसिक मतन्द्र म पडार अपने पुरपाय को भूल जाता है तथा अपन भाग्य की विडम्बना पर मात्रय चक्ति होता है। निीय धन के छठ मोर तृतीय द य म गानमा मोर वामना द्वारा दुर्भाग्य तथा वम पन वा मामा य अयो म प्रयोग हुमा है । तृतीय अक के पचम दृश्य में एक माना भी अपने पति को फवारते हुए भाग्य का प्रयोग बात-बार की भाषा म करती है। प्रत म समबेन स्वरों म जो गीत गाया जाता है उसम भी नाना वमों सनिवृत्ति पाकर मुस दुसरे दर से दूर हटवर एक सूत्र में बघ जाने का प्रसाद के नाटको मे नियति का स्वरूप भानवतावादी दृष्टिकोण देखा जा सकता है। इस गति म भी प्राणिक कमवाद मिल जाता है। निष्कप प्रसाद का यह नाटक प्राद्यात प्रतीकात्मक है विपत चित्तवृतियो के विलेपण म ही ध्यान लगा रहता है मत किसी दानिक सिद्धान्त विशेष की पुष्टि इमम नहीं हुई ह। इसीलिए प्रसाद के नियतिवाद के सम्बध म यह महत्वपूण कृति नहीं ह । फिर भी कई स्थला पर क्मवादी और ऋतवादी मत प्राप्त होते हैं। द्वीप के सभी निवासी क्सिी अलौकिर सत्ता म विश्वास रखत हैं। यहां तक कि भौतिकता का प्रतिनिधि पात्र विलास भी ईश्वरवादी है। वह यह भी मानता ह कि समस्त विश्व का संचालन नियमों द्वारा हाता ह नियम क्या है पौर विस प्रकार काय करत हैं इसका यद्यपि उसके द्वारा पून स्पष्टीकरण नही हा सका ह पर जिस प्रकार वह नियम गर की विवेचना करता है, उससे यही मिस होता है कि नियमो को वह ऋतवादी मा यता ये परिपक्ष म राता है। उमन एवं स्थान पर अदष्ट की सत्ता भी स्वीकार की ह वितु वह उसकी तलालीन मानसिक दुबलता का ही परिणाम १ प्र यथा वह भाग्यवादी नहा है। उसका चरित्र विलासिता से प्रातप्रात होते हुए भी एप कमठ वायरत पोर पुग्पार्थी व्यक्ति वा मा चरिय है । डा. बाहरी वह वडा काय वुगल भौर पुरुषार्थी ह उसम अच्छी सगटन पवित ह। अपन पुरपाप को यह अपन मुम्ब से भी चर्चा करता ह । अपनी अदम्य पाक्ति और पुरपायवारिता के कारण ही वह एक बार तो फ़्त हीप पर अपना पागन जमा ही नेताह-चाहे बार में उस वहां से भागना ही क्यों न पडता हो । ईश्वर के विषय में वह वहता है कि वह सबके कम देखता है तथा उहें पर्मानुगार शुभा गुभ फल देता है । उसकी इस उक्ति से यह ध्वनित होता है माना ई-वर पे रूप में यह वरण वो हा मरिमा गा रहा हो जा कि प्रपलव' मयदे पम दगल रहने है। प्रत इस नाटर म प्रकारान्तर से ऋतवादी पालाक म कम मिदात की नीति होती है । मन म यह कहना सय दे प्रधित निकर होगा कि प्रत्यक्ष रूप से यही भी नियति विषयक कम-गम्बधी अथवा ऋतवादी निरपरण नहीं हुपा है के अनुसार (1).हरदेव बाहरी प्रासाद साहित्य होग, पृ. ३८१।

प्रसाद माटवों में नियतिवाद जहाँ इस प्रकार के समेत मिलते हैं ये राम्भवत प्रसाद के हृद्गत मस्तारा के परिणाम स्वरूप ही उपस्थित हुए हैं। स्क दगुप्त -- नियति विषयक सदभ (१) धातुसेन प्रकृति वियागील है । समय पुरुष-स्त्री की गेंद लवर दोनो हाथ से खेलता है । पुलिग और स्त्रीलिंग की समष्टि अभिव्यक्ति की कुजी है । पुरुप उछाल दिया जाता है उत्प्रक्षण होता है । स्त्री प्राक्पण करती है । यही जड प्रकृति का चेतन रहस्य है । -अक १ दृश्य ३ पृ० २४ (२) अनन्तदेवी -अपनी नियति का पथ मैं अपने परो चलूगी । प्रक १ हश्य ४ पृ० २६ (३) अनन्तदवी मूचीभेद्य अधकार में छिपनेवाली रहस्यमयी नियति का प्रजवलित कठोर नियति का नील पावरण उठाकर झांकने वाला -वही पृ २८ (४) भटार -एक दुर्भद्य नारी हृदय म विश्व प्रहेतिका का रहस्य बीज है। पार कितनी सहनगीना स्त्री है ? दखू ? गुप्त-साम्राज्य के भाग्य की कुजी यह विधर घुमाती है। -वही पृ २६ (५) रामा -मूख प्रभागा कौन है ? जो मसार के सबसे पवित्र धम कृतनता को भूल जाता है और भून जाता है कि सबके ऊपर एक अटल अदृष्ट का नियामक सवाक्तिमान है ~प्रब २ हय४ पृ ६३ (५) मातृगुप्त -पोह पाप पक म तिप्त मनुष्य को छुट्टी नहीं । कुक्म उसे जबह कर अपने नागपाश में बांध लेता है। -प्र ३ दृश्य १ पृ० ८३ (७) मातृगुप्त -पोह सोचा था कि स्वता जागेंगे एक बार मार्यावत में गौरव का मूय चमकेगा मोर पुएप कमों से समस्त पाप पर घो जाएग -अक ४ दृत्य पु. ११३ प्रमाद के नाटका म नियति का स्वरूप १०५ (८) चम्मानित -मनुष्य की अदप्ट लिपि वसी ही है जमी अग्नि रेखानों से कृष्ण मघ म विजली की वणमाला एक क्षण मप्र वलित दूसर क्षण म विलीन हाने वाला । भविष्यत् का अनुचर तुच्छ मनुष्य केवल प्रतीत का स्वामी है। -अब ४ दग्य ६ प०१२१२२ (६) स्व दगुप्त -चेतना कहती है रितू राजा है और उत्तर म जस कोइ कहता है कि तू खिलौना है- उसी मिनाही पटपत्र गायी बालक के हाथा का खिलौना -प्रक ४, दय ७५० १२३, (१०) विजया - अदपन इसीलिए उस रात रत्न गृह का बचाया है -प्रक५दल्य १,५०१२६ (११) सरगुप्त - परन्तु इस मसार का कोइ उद्देश्य है मैं कुछ नहीं है उसका अस्त्र हू-परमात्मा का अमाप पत्र हूँ दायापी हलचन ये भीतर कोई शक्ति काय कर रही है पवित्र प्राकृतिक नियम अपनी रक्षा के लिए स्वय सनद्ध हैं । मैं उमा ब्रह्मवझ का एक -ग्रव ५ दश्य २ प०१३७ (१२) देवगना - कुछ करोग वि वम सदा रामर दीन हो दव यो पुरोग। रा रह तुम न भाग्य साता है अाप गिरी तुम्हा मयाराग। -प्रक। दृग्य ३ पृ० १४० समीक्षण प्रथम प्रा ये नृतीय य म धातुमन मातृगुप्त द्वारा साम्राय म परि वता ये विषय म पूर गए प्रन या उत्तर देते हुए कहता है कि इस गति गीत गत म पनि परिपतन , ता इमम रमा प्राश्नय ? वास्तव म परिवतन ही पा नाम तो जीवन है। थरता तो मृगु का पर्याय है। मार विश्व म स्पन ध्यास है ययाति स्त्रिय रिया गीत है। यहाँ गमय पो भाग्य के समक्ष रस म प्रयुत परते हुए पानुमन पहता है 'समय पुग्प और स्त्री की गें लवर दोना हापों से पता है यही जर प्राति या पतन रहम्य है। पागा रा रह गये इस क्यन का विम्ब अत्यन्न स्सप्ट और चौरा देने यारा है । भाग्य माना उस व्यक्ति का ही नाम है ना मनुष्य को गें' की ७ प्रसाद ये नाटको मे नियनियाद - भति अपने दानो हाथो से उछालता पौर नचाता है । भाग्य पा यह मानवी कन रूप और उसके हाथो म मानय वी व दुर स्थिति यह दर्शाती है नि मनुष्य की स्वतत्र इयाक्ति का प्रारध के सम्मुम को या नहीं चरता । ककनीडा सम्ब था ऐमा म्प प्रसार व अन्य नाटमा चिरापार नमजय वा नागयन (पृ०७३ ८२ ) में भी मिलता है । म स्पर के विषय म प्रसाद जी वे भान या चर्चा डा सहन । म सुनिए पिछली बार जर नाथ एयु गिनी स्थित गवनमट क्याटर पर नी मधिलागर जी गुत व यहां चाय पाने गया ता स्योग स मिद्ध बना ममन श्री रायण दास भी वहाँ ५। वाताही वाता म जब प्रसाद जी नियतिवाद पर चर्चा दिली तो रायकृष्ण दास जी ने बताया कि उमर सपाम की निम्नलिखित स्वाई प्रसाद जी का वेत पसद थी नाही के प्रना में यथ दीन कदुक रसता कब काम ? खिना लुटकाता जिस ओर चला जाता दक्षिण या वाम । हम भी कदुक सा हा जान वो जिसने वा अनात तुटवन वो भू पर हर बार हमारी जान सारी वान । ( श्री वचन द्वारा अनुदित ) सिद्ध है कि प्रमा ती की नियति यहा-वहा ग्रीक वामिया के प्रय भाग्य का स्प नकर भी प्रकट हुई है। धातुमन का उपरोक्त क्थन भी एक 'मा ही उदा-रगा है। चतुय दृग्य म विजया अन तरेवी को अत पुर का कठोर मया । का स्मरण कराती है पर अन तन्वा यो सका परवाह कहा ? विजया का वह मर-तार उत्तर देती है अपनी नियति का पथ मैं अपो परा चलूगी अपनी निता रह्न द। अन नवी की यह स्वतन "ठा नक्ति नाटव क घटनाचन को भवभोर कर रख दती है। प्ररना कही जानवानी नारी जाति की घर हाकर भी अनननेवी एमी स्त्री है जो नियति के वशीभून न होमर उस अपना "दानुन वनान व मनावर से प्रातपात है। भटाक भी उसकी न्स प्रवृत्त की प्रगस्ति करता है। प्राह मितनी सासगीना स्त्री है ? दयू गुप्त-साना य क भाग्य की दुजी विधर घुमाती है। भटार वी या उक्ति (१) डा. सहा मूल्याक्न ( प्रसाद जो के नाटका म नियतिवाद) इसी प्रक ?

प्रसाद के नाटकोम पियति वा स्वरप - सिद्ध करती है कि अननदेवी जसो दृढ सकल्प वाली तो चाहे तो भाग्य की मुभी को भी धुमा कर साम्राज्या के इतिहास का परिवर्तित कर सकती है, किन्तु नाटक म ऐमा होता नहीं है। सी य म अत नदवी का प्रपचवुद्धि के विषय में कहा गया यह क्यन भी अत्यात महत्त्वपूर्ण है जो नियति का सुपर विलेपण प्रस्तुत करता है सूचीभेद्य अषकार म दिपनेवाली रहस्यमयी नियति का प्रज्वलित कठोर नियति का नील पावरा उठाकर भाक्न वाला अनन्तद वीक मना मुसार नियति कठोर है रहस्यमयी है अटल और अपरिहाय है तथा अधकार भयी है । कठोर मलिए शिवह अपरिवतनीय है रहस्यमयी इसलिए कि यह अपने आंचल म 'अनागत को छिपाए हुए है अपरिहाय इसलिए कि उसने नियम सुनिश्चित हैं तथा अधकारपूरण इसलिए जिस घोर अधिकार म देखना असम्भव है वस ही 'नियति का पूर्व दान भी सम्भव नहा, यह बात पौर है कि प्रपचबुद्धि जसा दम्भी यक्ति उसे देस सरन का डाग रचता हा।' दूमर पर पांच ह य म नब गवनाग रामा का अभागिन की मना पता ह तो रामा पन्तीह रिप्रभागा ता गवनागह जा यह भूल जाता ह सनक ऊपर एष प्रटन अदृष्ट का नियामर सवाक्तिमान् है । रामा ने यहाँ घनन गत्ता प प म नियति का मुघर निम्न उपस्थित किया है। चौथ अव पमान दृत्य म चिर नियामिना गक्ति वा सा हा मानवाक्त सम्प रवरगुत भी प्रस्तुत करता है। चनना बहती है कि तू राजा है और उत्तर म जस बाद पता है कि तू खिलौना है-उमा बरपायी चाना ये हाया का खिलौना नियनि विपया इहा चर्चामा ५ वीच हम मटार घोर मारगुप्त का यभवानी स्वर भी सुनत हैं। तृतीय पद के प्रथम ह य म बुकर्मो म पग हुए पचति र प्रति माय पी उक्ति है मोह पाप पर म नित मनुष्य रा छुट्टी । राम उम जब कर अपने नागपाश म वांप देता है। 41* यमबाट य इग मिटान्न पर प्राते हैं निगातार यम या दुपम करते रहन ग व शुभाशुभ यमपत्ति या माने पाए म प्रायद्ध पर सन हैं निगपारा पाना माभय हो जाता है। चनुय र तृतीय "य म मात्र गुप्त भी सम्राट के विषय म बाई समाचार न पावर और हा (१) सुसनीय -महकारपिटारमा पहिमितिम यत । श्रीमदभगवद्गीता ३-२७ भटाक प्रसाद ने नाटपाम पिपनियाद कुछ नहीं के कश्मीर पर माममण की सूचना सुनकर पहला है माह माचा था प्रावित मे गौरव का मूय चमकेगा और पुण्य कमों से रामस्त पाप पर घुल जाएगे सुक्मों से दुष्कर्मो का धुन जाना कमवाद की पुष्टि करता है। चतुथ प्रक के छर दृग्य म चम्रपालित अदृष्ट लिपि के पाचत्य पर प्रसार डालता हुना भाग्य की तुलना विद्यत रखाग्रा से करता है। सि प्रार काले क्जरारे मेघा पर दामिनि एक क्षण वा चमत्कृत होकर दूसरे ही क्षण विनीन हो जाती है ठीक बसी हा गति मनुष्य के भाग्य की भी है। न जाने मनुष्य का भाग्य भी किस पण उदय हो जाए और पिस क्षण अस्त । अतिम अक के दूसरे दृश्य में स्क्रगुप्त अपने का ब्रह्मचक्र वा एव पुजा मानकर अपनी स्वतन इ छागक्ति का ईश्वरेच्छा के सम्मुख हीन वतनाता हुआ कह उठता है परतु टस समार का कोई उद्देय है मैं हू उसका प्रस्त्र ह-परमात्मा का प्रमोघ अस्त्र हू । मुझ उसके सकेत पर केवल अत्याचारियों के प्रति प्ररित होना है। किसी स मेरी शत्रुता नही क्यापि मेरी निज की कोई इ छा नही । दायापी हनचन के भीतर कार्य गति काय कर रही है। पवित्र प्राकृतिक नियम अपनी रक्षा करने के लिए स्वय सनद्ध हैं। मैं उसी ब्रह्मचक्र का एक स्वदगुप्त के ये वाक्य कई बातो पर प्रकाश डालते हैं। प्रथमत इस विश्व का कोर्ट उद्देश्य है नितीयत विश्व का नियामक ईबर है जिसक हाथा म वह एक उपकरण मान तृतीयत दर उसे अत्याचारिया का नाश करन की प्ररणा देता है और अतत रह कि प्राकृतिक नियम अपनी रक्षा स्वय वरत हैं। पचम अक के तृतीय दृग्य म दा की विपनावस्था का देख कर देवसेना गीता है कुछ कराग ति वस सदा रावर दीन हा दव को पुरारोग । सा रह तुम न भाग्य माता है अाप किंगडा तुम्हा सवाराग । देवराना की यह सगीत ध्वनि माना प्रमाद की ही इतनी स झकरित हु है। दा दुदगा का दख कर भाग्य के विपरीत कम का यह सदेश पुन नाटक म कमवादी पक्ष का उभारन म सफत हाता है। निपप स्कंदगुप्त म प्रसार का नियति अन वग बदल कर प्रकट - है। नाटय रचना की दष्टि स प्रसाद की यह प्रोट और सवनय कृति FE IT A "मनिए टमका नियनि भावना की माता और भी वर जाती है। - प्रसाद के नाटको मे नियति का स्वरूप १०० इसम नियति नटी का स्वरूप वही भाग्यपरक है ता कहा यम प्रधान यही वह विश्व की नियामिका गति के रुप म चतन सत्ता का भान कराती है तो वही 'पए वनकर अमृतता का पापन । अत कहा जा सकता है कि विपत इन नाटक म प्रसाद की नियति भावना गतिगील है स्थितिशील नही, वसे यह वात प्रसाद की भय नाटय कृतिया पर भी घरित होती है। जहा पर धातुसेव प्रकृति को क्रियाशीलता का वर्णन करते समय (भाग्य) पा विम्ब उस खिलाडी के प म प्रस्तुत करता है जा अपने दोना हाथा म स्त्री पुरुष को क दुव समान उछालता है वहां प्रसाद फी नियति भावना को भाग्यवादी परिवेगाम देखा जा सकता है। जिस प्रकार खिलाड़ी के हाथ की गेंद स्वय म स्वतत्र नही और खिलाडी उसे चाहे जहाँ फॅन सकता है उसी प्रकार वहाँ मानव को दवाधीन प म चित्रित किया गया है। भाग्य सम्बधी प्रसाद की यह धारण ग्रीव वासिया की भाग्यवारियो के समक्ष पहुँच जाती है। क्योकि ठीक इसी प्रकार का चित्र उपस्थित करन वाली उमररय्याम की स्पाई को प्रसाद जी वह पसद करत थे अत अनुमान किया जा सकता है कि उनका दववाद व उस स्प पर भी विश्वास था जिराम मानव की स्वतत्र इच्छाशक्ति भाग्य के सम्मुख निरथ र सिद्ध हो जाती है और भाग्य मनुष्य को चाहे जसे नाच नचा सकता है। प्रन नवी का यह कहना कि वह अपना नियति का पथ स्वय निधारित परगी यह सिद्ध करता है कि समाधारण मनोरन वाला व्यक्ति एक बार तो नियति या चुनौती दे हो सकता है चाहे प्रत म उमको परिणति वही क्या न हो जा प्रनता की हई। किंतु अन तदेवा की यह गर्वोक्ति हमारे सामने रावा का ममाधान प्रस्तुत गहा करती कि क्या वास्तव म नियति या पय मानव म्यय निर्दिष्ट र गस्ता है ? इमा उतर हम यमया दता है। जाम ज मा तर म मनुष्य लगातार सत्तम पर अपनी भावी नियति का स्वामिव प्राप्त कर सरता है। हम नाटा र यमयाना पात्र इटार और मातृगुन इमी धारणा वा प्रतिनिधित्व परन हैं। मातृगुस वा पता है कि पुण्य कमा स पार पर पुन सरत हैं। मनन्त दवी या यह वपन वि प्रपचयुद्धि सूचीभेद्य अधवार को धीरपर रहस्यमया निपनि धे नीत पद व भार पार भाव सरता है सत्य प्रतीत नहीं (१) द्रष्टय्य नघती है नियति मटी-सी पदा कीम-सीकरती। मौजू,५१॥ 1 - प्रसाद के नाटकों में नियतिवाद होता।' नियति के प्रावरण को हटापर भविष्यत् के दान तो नागपा के पात्र वेद यास जसा कोई विरता महापुरुप ही कर सरता है प्रपचयुद्धि जमा अघम और कुचकरी पात्र नहीं । नाटक म अनक स्थलों पर विश्वनियामिमा गति यो नन स्प भी लिया गया है। रामा रातो म सब उपर एर पटन शक्ति का नियामा सब शक्तिमान है और स्वय स्क दगुप्त भा उमे 'वरपर गायी वारस रहार पुकार ता है। एक अन्य स्थान पर यह उस परमात्मा की पना द ता है । यही नहीं उसकी धारणा है पवित्र प्राकृतिक नियम अपनी रक्षा के लिए स्वय सनद्ध है। टसे भी नियति का मानवीकरण ही कहा जाएगा। सरगुप्त ने अपने क्थन में यह महत्वपूरण बात उठाई है कि इस विश्व का कोई उद्देश्य अपश्य है हम यह प्रसाद का उठाया हुअा प्रग्न नगता है। नागयन की विवेचना में हम देस चुके हैं कि प्रसाद ने वदल्यास स क्लवाया है विश्वात्मा सवका कल्याण करता है। स्व दगुप्त का विजया भा प्रष्ट के निए कहती है अद ट न इसीलिए उस रभित रत्नगृह का धचाया है । जिससे यह ध्वनित हाता है कि अदए भी कल्याण कारक है । नियति को यहा सम्भवत इसलिए प्रप्ट कहा गया है कि वह पहन स द टिगोचर नहा होती। अव यह प्रश्न रह जाता है कि क्या यह नाटक पूणत भाग्यवादी नियति वादी अथवा कमवादी है । इस विषय म किसी एक पक्ष की पुष्टि करना कठिन है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि अन तद वी रामा और स्कट गुप्त जहा नियति को मा यता पदान करते हैं धातुसेन जहाँ नियति को भाग्य रूप में ग्रहण करता है चम्पानित और विजया जहाँ अदए की महत्ता स्वीकार करत हैं-वहाँ इन म से कोई भी पान नि चेप्ट हाकर हाथ पर हाथ घरकर नहा वठ जाता। स्व दगुप्त जसा कमवीर पान भी यद्यपि कहता है- चेतना करती है कि तू राजा है और उत्तर मे जसे कोई कहता है कि तू खिलाडी वटपत्र गायी वारक के हाथो का खिनौना -तथापि अन तक वह कम-क्षेत्र म डटा रहता है । क्मवीर के रूप म उसका चरित्र प्रसार के किसी नाटकीय नायक से कम नहीं। इसी प्रकार चक्रपालित अदष्ट निपि के वि (१) तुलनीय कौन उठा सकता है घुघला- पट भविष्य का जीवन मे । प्रमपथिक पृ० ३ ।

प्रसाद के नाटवा मनियति का स्वरूप १११ लग्ग चाचल्य को तो स्वीकार करता है तुच्छ मनुष्य को भविष्यत् का अनु चर तो बताता है वितु देश हित म य म प धा मिलावर न घगुप्त के साथ कमरत भी रहता है। विजया वा क्थन मि वह वीर हुदय है। प्रपचयुद्धि भा गपन उह "य-पय का पार करन म बल का तरह जुना रहता ह । अनन्तर वी का ना कह्ना ही का अपना प्रात महत्वाकाधाया का पूनि म वह क्या क्या नहा करता । भटार और मानृगुत ता यमबाना है ा । नाटर व उत्तराध म द वसना या गीत भी कमवाट का सुटर टाहरण ह मिम नाटकमारी स्वानभूति हो मुखरित हाती 'मी प्रतात हाती है। इस प्रकार सदगुत य सभा पात्र चाह व धारागात हा अथवा अपम अपने अपन कम क्षेत्र म अन्त तक जमा रस्त हैं । यद्यपि यह मत्य है नि यता नियति नटी या गुणागन भी करत मुन जात हैं । अन निप्पपत यह करना ही उपयुक्त हागा वि सगुन भ भी प्रसाद नियतिवादी ता है पर उस नियति मावना म भी प्रामग्यता नहीं पोप है निराणा नहीं मत्वाकाथा है निवृति नहा प्रवृत्ति है, जन्ता नहा स्पन्न ही स्पदन है। PM -०- च द्रगुप्त नियति विपयक सदभ (१) मिहरण -पायावत का भविष्य निसन के लिए कुचक और प्रताडना की लेखनी और ममि प्रस्तुत हो रही है । प्रब १ हय १ पृ०२। (२) प्राम्भीव' -प्रतीत ये मुमा के लिए माच क्या अनागत भविष्य के लिए भय थया मोर वनमान को मैं अपन अनुकूल का ही सू गा फिर चिता किस बात की? वहा पृ० ८॥ (३) मलका -मत्य है महाराज जिम उन्नति यी माम माम्भीर ने यह नीच घम रिया है उसका पल यह है कि माज में यग्निीहू सभव है पल पाप हांग और परमा गांधार की जनता वेगार परणी। प्रब १ दृश्य ८ पृ०४१ । (४) सिरदर मविष्यवाणियो प्राय सस्प हाती हैं। म २ हय १ पृ०६१ ।

११२ प्रसाद के नाटयम नियतियाद (५) च द्रगुप्त - राजकुमारी समय नहीं दतो यह भारतीया के प्रतिपून दर ने मपमा ना का गृता दिया है मा २ हय ३ पृ ७४। (६) पवतश्वर -ग्राह पसा अपमान जिस पवने र न वण ऊचा करके भाग्य स हमी ठठा किया था उसी का रिपार मङ्क ३ हय २ १०१११ । (७) पवतेश्वर परतु दव प्रतिकूल हो तब यया पिया जाय। अङ्क २ हाय ५ पृ.८६ ॥ (८) चाणक्य -मनुष्य अपनी दुबलता से भली भांति परिचित रता है परतु उसे अपने वल से भी अवगत रहना चाहिए । प्रमभव कहार क्सिी काम का करन से पहले कम-क्षेत्र म कांप कर डसडामो मत पौरव । अइ ३ दृष्य २ पृ ११३ । (६) च द्रगुप्र -भविष्य के गभ म बहुत से रहस्य छिपे हैं । वही पृ० ११७॥ (१०) राक्षम काइ भयानक घटना हाने वाला है। अङ्क ३ द य ६ पृ० १४५ ॥ (११) शस्टार -जीवित नद नियति सपाटा सभी प्रबन है। वही पृ १४६ । (१२) च द्रगुप्त -यल्याणी वल्याणी यह क्या ? पत्याणी ~वरी जो होना था। १५४५५। (१) च गुन न जान कौन मरी सपूग मूबी म रिक्त चित् उगा दना है। दय ४ पृ १६४ । (१ ) चद्रगुम जागरण वा अय है कम क्षेत्र म यस्तारण हाना । और कम और क्या है ? जीवन सग्राम वितु भीषण मघप करप भी मैं बुध न हूँ। मरी सत्ता एप कटपुतना-सी है अष्ट्र देय ५ पृ० १६८। (१५) सिंहरण –ता नियति कुछ अदष्ट का सृान कर रही है वही प०१७१। - प्रसाद नाटकाम नियति का स्वरूप (१६) चाणक्य नियति अब उहा दोना का एक दसरे के विपक्ष म खग खाव हुए खड़ा कर रही है । अक्ष४ दाय ६,१०१७४। (१७) चाणक्य वह तो हार रहगा जिस मैंने स्थिर कर लिया है । वतमान भारत की नियति मरे हृदय पर जलद-पटल म बिजली के समान नाच उठनी है वही पृ० १७४। (१८) सिंहरण मनुप्य साधारण धर्मा पशु है विचारशीन होन स मनुष्य होता है और नि स्वाथ कम करने से वही देवता भी हो सकता है। वही पृ० १००। अलका मरा ३य काय है उसकी माधना के लिए प्रकृति प्राप्ट दव या नरपर, बुद्धन दुध अवलम्ब जुराही देगा। वही पृ० १८०। (२०) च द्रगुप्त यापट, खन न करना पद्रगुप्त मरण म भी अधिक भयानर या प्रालिंगन करन व निए प्रस्तुत है अक४ हय पृ० १६० । (२१) राक्षम ~-प्रदृष्ट दव प्रतिहल । प्रद ४ प ११ पृ. २०१ । (२२) चाणक्य --चनय मागर निस्तरग है और नान ज्याति निमल है । ता क्या मरा पम युनान चए अपना निर्मिन नागट उनार पर पर पवा -- प्र४ दन्य ?' पृ० २०८। समीक्षण नाट्य प्रारम्म हात हा हम मिरण का पापस्य 7 बाता मस्त पात हैं । सागर ये यह पूछा पर मि पचनो व दून यहाँ था पाए हैं मिहरण देन यो भायी परिस्थितिया ६ वार म घ हारर पता है कि पार्यावन रा भपिप्प लिपन के लिए बुचत्रो का व्यूह रचा जा रहा है । मिहरण्य कम श्यन स ध्वनित होता है कि भविष्य पूर्व लिमित हाता है। यह पति वाही नहीं देश भयवा जाति का भी हो सकता है।

प्रसाद के नाटको म नियतिवाद अलका से यह सुनकर वि मनुष्य को जीवन और सुप का भी ध्यान रखना चाहिए भाभीक का उत्तर है कि उसे प्रतीत के गुमा यी तनिक भी चिना नही क्योकि उसम वतमान को अपन अनुपून बनाने की क्षमता है। आभीर का यह पौरपत्र गनीय है। उमस उसकी अदम्य इच्दा गति पर सुदर प्रकाश पडता है। मिर दर एनिसारटीज म चागक्य को भविष्यवाणी की चर्चा करत हा कहता है भविष्यवाणियाँ प्राय सत्य हाती है। मिटर की भविष्य' के प्रति यह स्वीकृति उसे किमी मीमा तक नियतिवादी सिद्ध करती है। दूसर अक के मा तासरे और पांचवें दश्य म चन्द्रगुप्त तथा पवने वर प्रतिकून न की चचा करते है। चगुप्त कल्याणी का युद्धकान में भारतिया के प्रतिकून मेघ घटा के घिर गाने के सदभ म और पवत'वर अलगा के सम्मुख अपनी गर्वाक्ति के सदभ म मा दव का स्मरण करते हैं। आग परतेश्वर अपमानित होकर अपने अन्नद द की आग में जलता हुआ आत्महत्या से पूर्व अपना ही बडाई करते हुए कहता है कि वह पवतेश्वर जो भाग्य से हसी ठठा पिया करता था आज एक स्त्री म अपमानित हा गया । प्रत अब वह जीकर क्या करेगा? पवतश्वर का मृत्यु के मुस स बचान के पश्चात् चाणक्य उम समझाता है कि उम किसी काय को अमभव कर टालने स न कम क्षेत्र म खडाना गाभा नहा दता। चाणक्य द्वारा क्म का यह सा द्रष्टय है। इमो अब के दूसरे और नवें दृश्य में क्रमा चन्द्रगस और राक्षस द्वारा भविष्य तथा भविष्य म हाने वाली अशुभ घटना का सातिक प्रयोग हुआ है--जो कि साधारण अर्थो म है । गटार जब अघकूप स बाहर निकल कर नद की सभा में जाता है तो नद प्राश्चय चक्ति हो उठता है । शक्टार कहता है नियति सम्राटो सभी प्रदान है। यहाँ शुद्ध रूप स नियतिवादी यजना हुई है। क्ल्यापी जव मात्मघात कर लेती है तो चद्रगुप्त के मुख स सहसा फूट पता है यह क्या? कल्याणी का उत्तर है वही जो होना था -इसस ज्ञात होता है कि यह पूर्व निर्दिष्ट ही था। एक स्थल पर चन्द्रगुप्त उद्विग्न है कि न जाने कौन उसको सपूण मूची में रिक्तचिह्न लगा देता है । दूसर स्थल पर कम क्षेत्र की महत्ता जानकर प्रसाद के नाटकाम नियति का स्वरूप भी वह स्वयं को एक कठपुतली को मना देता है। यहाँ नायक परिस्थितिया के द्वाद का शिकार है। जहाँ सिंहरण के लिए नियति कुछ अद प्ट खल वा सजा बन जाता है वही चाणक्य बद्रगुप्त और मित्युकस क लिए कहता है कि नियनि उह एक दूमर का प्रतिद्ववना बठी है। यहां पर चाणक्य द्वारा उसकी प्रबल इच्छा पाक्ति का चित्रण नाटक्सार न इन गश में कराया है 'वह ता हावर ही रदेगा जिस मैंने स्थिर बर किया है। सिंगरण गमवादिता का उद्घापर वनकर नि स्वाथ कम का प्रतिपादन परत ए कम द्वारा मनुष्य द वस्र प्राप्त कर सकता है-दम तय्य का उद्घाटन करता है। माग चलकर चौय अर के तरहवें द य में चाणक्य न म कुनाल चर के स्पप द्वारा बढे ही सुदर T 1 में कमवाद का प्रतिपादन रिया है जिसम स्पष्ट है कि प्रमाद जी कम युनान चारा ही निमित भाउ उतरवान का पाय करवात है। यम या यह मानवीकृत रूप जहाँ प्रापपर है वहा ग्राह्य भी निष्कप यद्यपि नादर में मनर पात्र दव 'अदप्ट भाग्य और मविप्य मानि दाता का प्रयोग करत हैं कितु नाटक की मूल प्रात्मा से कमवारिता का स्वर ही प्रस्फुरित होता है। वह तो हामा ही जिस मैन स्थिर कर लिया वतमान भारत की नियति मर हृत्य पर जनदपटन म जिला के समान नाच उठनी है। -चागपय का यह क्यन नाटय म पूर्वनिदिएवारिता का सुटर मृष्टि परन म सफल है। यही नहा चाणक्य का सारा चरित्र नाटर को पुरुषाय' की पार. मप्रपर घरता है। चगुप्त सिंहरण, पवत'वर राक्षस मानि ममी चरित्रा पर इस पुष्पाप पी पाया है । चगुप्न का तो जीवन म 'एर भए भी विथाम नहीं युद्ध मोर क्वल युद्ध । इच्छाशक्ति का वह इतना पका है कि अवसर मा जाने पर भाव की पीठ से ही निविर का नाम ल से । मवमर प्रात ही वह चाणक्य या नद का जन स भी छुहा लाता है। पदगुल जरो पमवीर पात्र यो रसपर प्रमाद न ग नाटर में पूरा सरह स जमवादिता का ममावा पर लिया है । यद्यपि एप-दो स्थानों पर वह कतिपय निराशाप्रद वाक्प भी बालता है पर यह उसके उग हुत्य पा को दूर है जो बल्याणी या मालविका के लिए दग्ध है । पाणक्य का यह कथन भी कम की प्रसाद के नाटको म नियतिवाद घर चुवा महत्ता प्रतिपारित करता है चत य-मागर निस्तरग है और पाप-ज्यानि निमन है। तो क्या मेरा कम बुला सन्चर अपना निमिन भाग" उतार पर ? और ता और नाटक में स्त्री पार कल्याणी, मालविका अलरा प्राति भी अपने अपन कम क्षेत्र म डटे ही रहत हैं । अत च दगुप्त नाटक मूलत क्न वाद का ही उद्घापर है मद्यपि यत्र तर नियतिपरक गला के प्रयोग देखने को मिलते हैं। कहा कही पूवनिर्दिष्ट वाट की भी छाप स्पष्ट है। -.- एकघूट नियति-विपय-सदभ (१) ग्रानद -मैं उन दानिका से माभेट रखता ह जो कहत पाए हैं कि समार दु समय है और दुख के नाम का उपाय सोचना ही पुरपाथ है । -वही पृ २० । (२) पान द -यह जो दुखवाद का पचना सब धर्मो न गाया है उसका क्या रहस्य है ? ३४। () भाड्याना विधाना ने मेरे पावन का नए चक्कर में जुनन वा मरन दिया। वही प ३६ । (४) वनता -मुभ ता यही रिसाट दता है कि सर द सा है सब किन हैं मयका एक एव घू ट प्याम वनी है । अानद -मिन्नु मैं - प का अस्तित्व हा नहा मानता । ~वी पृ० ४०। समीक्षण और निवप प्रसाद जा का यह सिद्धान्तवा । नाटक है सिम ग्रानवादी विचार धारा के दान हात हैं। प्रतीकात्मक गती तथा मानवादा पक्ष की पुष्टि को प्रारही नाटककार का ध्यान लग रहने के कारण नियति विषय कोई तथ्य उद्घाटित नहीं हो सका है । स्त्री और पुरुष नाटक में जमा हृदय और प्रमाद के नाटकाम नियति का स्वरूप - मस्तिष्क पश प्रतिनिधि हैं । प्रानर का विश्व की कामना का मूल रहस्य बताया गया है और दुस के चिन्तन का पाप । नियति विपयर किमी भावना की अभिव्यक्ति नाटक म न होन के कारण हम यही कहेंग कि इस दष्टि स यह नाग्य रचना गौण है । वस प्रकारातर से एक दा स्यला पर बम की ध्वनि सुनाई पनी है। झाइवाल को विधाता पर भास्था है। ध्रुवस्वामिनी नियति विपयर सदभ (१) ध्रुवस्वामिनी ~मर भाग्य विधाना यह वसा इजान' पृ० १२१ (२) सडगधारि --तव तो अदष्ट ही कुमार के जीवन सहायक हागा। -वही पृ० १३ । (1) ध्रुवस्वामिनी हा जीवन में लिए कृता उपत और नामारी होकर विसी अभिमान पूण अात्मविज्ञापन का भार ढाती रहे-यही क्या विधाता का निष्ठुर विधान है। एटकारा नहा ? जीवन नियति के पठिन आग पर चलगा हो तो क्या यह मरा जीवन भी अपना नहीं है ? -वही पृ० २८॥ (४) ध्रुवस्वामिनी नियति न मनात भाव से माना तू तपी हुइ वमुधा वा निति वे निजन स सायकालान तल आकार म मिना दिया जिस वायु विहीन प्रगम उपडा हुद मामों पर बधन हा-प्रगना हा वह रहत रहते यह जीवन असह्य हा गया या । ता भी मम्गी नहीं। मसार कतरिन विधाता व विधान म अपन लिए मुरारत करा - गी -वी पृ० ३२॥ (4) शाराज -गौभाय मोर दुभाग्य मनुष्य की दुरनता 4 नाम हैं । मैं तो पुग्पाय को ही रामा नियामर सममता हू । पुरपाथ ही गौभाग्य या सीव लाता है। -प्रा२ पृ. ३६॥ (६) शराज --भाग्य ने भुपन लिए निर परवा पर दिया है, उन लागा र मन म नर्यात रा ध्यान भोर भी मधिर रहता है । यह नवी दयनीय है। -~-वही, पृ०४०।

११८ प्रगान में 2 rafrn (७) धुरामिणी -- मरे भाग्य 4 मार17 मनमा मा पानीम मरा। -रही ...। (4) गुम - पिया गोपाही का निगिरा भाग्यपि पर पानिमा पसा मान पर सीगर पर। गभी गाचित हा ना नियमी गरी है -यहा प०१५॥ (E) ध्रुवम्मामिनी -~भर दोन मोह शृमतामा का य मिभ्या टाग यो नहा राहगा । तुम्हारा पक्ष दुर्दैव भी नहा । -वही प०५७ ॥ समीक्षण नाटक ये प्रारम्भ म ही जव शिविर मवलिनी ध्वस्वामिनी खडगपारिणी स्त्री स वार्तालाप करना चाहती है और वह गूगी होने का अभिनय करती है ता ध्रुवस्वामिनी भाग्यविधाता वो स्मरण कर अपने दुटिना का कोसती है । यहा भाग्य का सामा य प्रयोग हुआ है। एमी अब मे माग चकर मा भरत्या वरते समय जब सहमा च गुन पार प्रवस्वामिनी को रोक लेना ह ता रामगुप्त की मत्सना में स्वर म बहती है जीवन के लिए न र उपकृत और प्राभारा हावर क्मिी व अभि मानपूरण यात्म पिनापन का भार ढोती र? जीवन की विषम परिस्थितिया संग्रामात ज य दुस से बौखतावर प्रान कर वठती है। जीवन नियति के कठार प्रादगा पर चरेगा ही ? तो क्या यह मेरा जीवन भी अपना नहा है ? नायिका का यह अन्तरात्मर विकल्प प्रभावा पादव है। चगुप्न में प्रति प्राट हा जाना मरे लिए स्वभाविक ही था। रस माक्पण न उसकी जीवन दृष्टि को निरागा गहन गहर म निकालकर माना + तार पर लाकर पा र लिया। उसे नियति भी अब मुसप्र प्रतीत होती है। वह भी अर प्रज्ञात भाव स गम हमानों द्वारा सतत वसुधरा कातिनिज निजन और गातन प्रापा से मिलाती है । उसरा जावन रामगुण व साह वय में रहत रले असह्य बन गया या वितु च गुप्त को पावर वह पावन हाबर बहती है ता भी मर गी नहीं। ससार के कुछ दिन विधाता र विधार म अपन लिए सुररित करा लूगी। यह उसकी जाप्रत प्रात्म-क्ति का पोर स्वन प्रेरित निरिएवाद का ज्वलत उदाहरण है ।

प्रसाद के नाटवा में नियति का स्वरप ध्रवस्वामिनी की यही इच्छा शक्ति और स्वत निर्दिष्टवादी भावना अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है जर वह रामगुप्त के सम्मुख हो चन्द्रगुप्त से बहती है मटक दा इन लोह गसलामा का यह मिथ्या ताग वाइ नहा सगा। तुम्हारा ग्रुद्ध दुव मा नहा। उसका यह उक्ति उत्सक चरित्र म प्रायजनक परिवतन की स्मारिका है। इसस पूर्व वह निराशावाली अधिक पी किन्तु यही उसका उम्य साहम दशनाय है । एर स्थल पर चद्रगुप्त पुरुषार्थी तथा धार वार हार मा भाग्य की मा यता को स्वीकार करता है विधना को स्याही का एक बिन्दु गिरकर भाग्यनिपि पर कालिमा चग दता है। इस पंथन म भाग्य क पटल विधान कोपनि है। रितु नायर का यह कथन परिस्थिति उद्भूत है यह उसका स्वभाव नहा। चद्राप्त और ध्रुवदवी के अतिरिक्त राज नाटर का तीसरा प्रमुख पाय है । यद्यपि वह घूमकतु का दखकर भयभात हा उठा था फिर भी पुरु पार्थी भावनामा वा वह अस प्रतिनिधि है सौभाग्य और दुर्भाग्य मनुष्य पी बरता के भय है । मैं तो पुरपाय को ही सरया नियामक समभता हूँ। पुरपाय ही सौभाग्य का साच जाता है। निवप प्रतिम नाम्य रचना हान व वारण प्रमार दी धूरस्वामिनी भयान म. पूण है। प्रयावामिनी का चरिश दा रमा म चित्रित या है। पूर्वा वह निराशावादी, नियनियादा और जीवन स निराला है उत्तराध म इमर विपराज । उम मा महत्या परन स चरान बचा ता है। इस प्रारम्भिव सयोग म उसकी यह रढ धारणा बनती है कि मनुष्य रचय भी अपने प्रारा का स्वामी नहा । मृत्यु का क्षण नियत हाना होगा तभी तो वह चाह पर मा मर ना सकी।मा धारणा न मम्मवत धरस्वा मिनी का पूर्व निश्विानी ािपि यह नहा चद्रगुप्त का प्रपन सग यर प म दपर पिन प्रति उस माक्पण हा जाता है पार यह यह उनी है मागी नहीं मगार य परिन विधाता व विधान म मापन रिए मुरति परा लगे। नाटय र पूर्वाषम परिस्थितिया पी दामी ध्रुव वा व नगराध भाग म्.. यह गए य प सिद्ध करते हैं कि प्रसा- मूत यमवानी है प्राशावादी हैं मोर मुम्मन इस नाटा म स्वत प्ररित निम्भिवानी । प्रवस्वामिनी में १२० प्रसाद ये नाटवा में नियतिया विषय म बाहरी जी लिखते है वह नियरियातीह ता भी बम प्रति उसकी उत्त जना हलवन पोर पात्रता बनी रहती है। इस नाटक से यह सिद्ध भी होता है मिप्रमार जी की नियनिकरुपना व्यक्तिगत ही नहीं अपितु उसका विस्तार यि व परिधिया तय मा है। ध्रुवस्वामिनी के यह क्यन पर कि क्या उसका प्रपना जीवन भी जमवा नहा है-प्रसाद जी ने चद्रगुप्त के मुस से करवाया है दपि जीवन शिव की सपत्ति है।' ध्रव स्वामिनी के अतिरिक्त गवराज और चगुप्त नाटक के उल्लेसनीय पुग्पाथवादी पार हैं । सकराज के लिए पुरुषाथ ही सौभाग्य को वाचता है और चन्द्रगुप्त यद्यपि विधना की स्याही म विग्वाम रसता हागा वितु वही धीर वीर और क्मनिष्ठ पात्र के रूप म हमस मिलता है । यहाँ नाटक के नाम पर विचार कर लेना भी प्रावश्यक है। ध्रुवस्वा मिनी का प्रथ है वह स्त्री जिसका स्वामी निश्चित हो। वितु नाटक में हम उसे एर पार रामगुप्त की पत्नी के रूप म दसते हैं तो दूसरी ओर चगुप्त की स्नेहाविता प्रमिका रूप में। कहा जा सकता है कि विधि न ता उसे रामगुप्त जसा पति ही दिया-पितु उसने पुरपाय और वमटता से अया यपति को त्यागकर अपनी स्वतत्र इ या गक्ति का परिचय दत हुए चरगुप्त को वरण किया। यहां भी नाटर क्मवादी सिद्ध हाता है। डा० सहल के अनसार जहाँ तर नवस्वामिनी नाटर का सम्ब च है इसमें यत्र तत्र पूर्व निर्दिष्टवाद का स्वर है । पितु यह पूनिर्दिष्टवाद न तो किसी पात्र को निनिय बनाता है और न हतोत्साह ही। इस पूर्वनिप्टिवात से जीवन में एक प्रकार से नए रम का मचार होता है। (१) डॉ हरदेव बाहरी प्रसाद-साहित्य-योग पृ० २०३ । (२) पपाताल सहन मूल्याश्न पृ० ४४ ।

समाहार पिछने प्रयाय म मैन अपने सामर्थ्यानुसार प्रसाद के नाटको पाठ्याधार पर उनकी नियति भावना को उद्घाटित करन का वार प्रयास किया है। अपन निष्कर्मों के ताने वान जोडकर उनकी नाम्य नियनि-नटी के स्वरूप का समग्र विम्ब उपस्थित करने से पूर्व यहां उन सभादिन तथ्या पर विचार कर लेना भाव या समझता हूँ जो उनकी नियतिवादिना की पष्ठ भूमि हा सकते हैं। प्रसाद का सम्पूर्ण जीवन और साहित्य घनीभूत पीडा तथा करुणा पारित हृदय की वह भूव' और मम यथा स्पी 'भाती पात्म क्या है जिसकी सावन को उपहार देखन पर नियति-सम्बधी पई तथ्य प्रकाराम भा सक्त हैं । सत्रह वप की प्रायु स पूर्व ही प्रेरक पिता ममतामयी माता पोर मित्रवत् अग्रज को मृत्यु के वराल गाल का ग्रास होते हुए देखन वाला यौवन के उद्दाम वग म दो दो पत्तिया को सा सपना के लिए खोकर घाट पर ही रह जान वाना प्रालिंगन म पाते प्रात मुस्क्या कर भाग जान चाली क्सिा मनात प्रिया का मुख स्वप्न देखार जाग जाग जाने वाला और प्रतीत भगभ म सोई न जाने कितनी स्मृतिमा का दुर्दिन के ग्रामू म वरसा बरसा जावाला वह पत्तिय कितना वाहन और यथित होगा- कौन जानता है । प्रसाद की गह कोई और होना ता ममवत घबराकर जावन स पलायन कर सेता मथवा निश्यि होर वठ रहता । किन्तु प्रसाद न एसा नहीं दिया । इप बार-बार उन पास पाए पर या तो वे उस चट्टान दही से टकराकर लोट गए अथवा उस सागर-समान व्यक्तित्व म सीपी बनकर तुक-छुप गए पौर प्रगाद स व भपन बनारसी रग म भूमते रहे गाते रहे जीवन भर विप पी पी मर पागज पृष्ठा पर ममृत उडनते रह । वस्तुत विषपान ही तो जीवन की सापकता है पोर इस क्षेषम प्रमाद निराले व्यक्तित्व के धनी ये। हा० नोट ने मारा ठी लिखा है शिव पाविसीम है वे हलाहल को पान पर गए और उसको पचारर फिर भी शिव ही बन रहे उनमा पठ पाहे नीला हो गया हा परन्तु मुग पर वही मानन का शान्त प्रभारी बना रहा । प्रमार व जीवन का प्रादा यही था वे गहरे जीवन १२२ प्रसाद वे माया म नियनिवार द्रष्टा थे । माधुनिक जीवन की विभीपिपराप्रा या उहाने देखा और सहा था, यह जहर उनके प्राणो म एर तीसी जिसमा वन पर समा गया था उसी आत्मा जस पालान्ति ही उटी हो पौर मुभ लगता है कि सम्भवन ४सी भालोटित प्रा मा न उहे नियतिवार को पार उ मुग लिया । यह स्वाभाविक ही है कि जव चारा पार स यातनाए घेर नती हैं ता व्यक्ति भाग्या मुख हा जाता है क्यो।। इसस विसा मामा तक उस मताप मित्रता है । क्या प्राचय है यदि प्रसाद भी इसी तरह नियतिवादी वन हा जीवन के वात्याचा और पारिवारिक विघटन से सतोप पाने के लिए। श्री गुमन जी के यमत मरी इस धारणा की पुष्टि भी कर रते हैं कौटुम्बिक एवं सामाजिव परिस्थितिमा न उ र भाग्यवादी बना दिया था वह अपन का भाग्य की गति पर छाड देते थे। उनकी प्रान सम्बघ म यह भाग्य 4 प्रति अप्रतिराध की भावना ही अ नत उनकी मृत्यु का कारण हुई। २ प्राग चलर मी नियतिवादिता ने उनके मस्तिष्कम पर कर लिया। छोटी छोटी वाती सलकर बडी-बारी समस्याग्रो वा समाधान भी वे इसी आधार पर कर लते थ । डा० सहन न इस विषय म थो से T 1 म कितना कुछ कह निया है रायोप्सी की पहती स्त्री या जब देहात हुआ तो प्रसादनी ने पहा था नियति चन नहीं लन दनी। इसी प्रकार राय साहब बताना रहे थे कि जब उनके पुत्र उत्पन्न हुप्रा और व माथिक कठिना यो स चितित रहन लगता प्रसादजी समाधान स्वर म चोल उट थ- पाप सके भविष्य की क्या पिता करते हैं यह ड़का अपना भाग्य कर पाया है। ईश्वरोपासना म भी उनकी अनन्त मास्था थी। जीवन भोर मरण को व ईश्वराधीन मानकर चलत थे। वह परिष्कृत सनातन धर्मी विचारो के थे। परम्परागत जो पूजा इत्यादि उनके घर में चली माती थी उसरा उहोने वही प्रास्था से निर्वाह किया यदि वे स्वय वठ कर पूजा पाठ नही करते थ। द ईश्वरवादी य और नियति में उनका गम्भीर विश्वास था। वह विश्वास करत थे कि नियति जिधर खीचता 1 जा रही है उधर से हटना असम्भव है । मरणासन्न होने पर भी वह किसी सैनिटोरियम में नहीं गए । (१) हा नगेद्र प्राधुनिक हि दो नाटक पृ०७ । (२) रामनाय सुमन कवि प्रसाद की काय्य सायना, पृ० २६८ । (३) 310 कहैयालाल सहल मूल्यांकन पृ० १८ ।

समाहार १२१ ध कहते थ- 'सनिटोरियम नहीं बचाएगा यदि इश्वर नहीं बचा सकता। इसी प्रकार जब राजयक्ष्मा के कारण लगातार उनका रार तिथिल पड़न लगा और श्री विनोदाकर व्यास आदि उनके अनेक मित्रा ने उह स्थान परिवतन की सलाह दी तो भी दे यही कहते रह जो होना होगा वह यही हागा । एमी अवस्था म अब घर से बाहर जाने में और भी कर होगा। २ उपरोक्त उद्धरणो के आधार पर अपने “यक्तिगत जीवन म प्रमात धोर नियतिवादी सिद्ध होते हैं। उनकी यह नियतिवादिता भूलत उनके जीवन पी विषम परिस्थितिया और वात्याचमा से उद्भूत है : जसा पहले वहा जा चुका है। इस वयक्ति नियतिवादिना का एक और कारण हो सकता है। नाटका म मैंने सवा भाग्य प्रारध सौभाग्य, दुर्भाग्य प्रादि पद पात्रा द्वारा साधारण बान चाल की भाषा में प्रचुर मात्रा म "यवहृत होते देख हैं । इतने अधिक पात्रा द्वारा बार बार सामाय पर्थो म भाग्याटि T का प्रयोग देस पर मरा अनुमान है मि यह सभवत प्रसाद का ज्ञातिगत अचेतन है जिसे जुन शनल कॉन्मियस कहा है। पिनु मा चय पी गत है वि पोर नियतिवादी प्रसाद 1 अपन साहित्यिक जीरन म जिस नियतिवाद का विवेचन विलेपण किया है प्रथम तो वह निरा भाग्यवाद नहीं है मौर यदि है भी तो वह निरागावाट को जाम नहीं देता पपितु सदर कमीलता की भोर उ मुस होन की महती प्रेरणा देता है। उन हर नाटक में कमवार की महत्ता किसी न क्सिी स्प में अवश्य प्रति पारित हुई है । मौर तो और नियतिवाद की दृष्टि स सर्वोतम नाटा नागया' म स्वय को प्रकृति का अनुचर मोर नियति का दास पहनेवाला जनमेजय उतब से कम का गुण गान सुनकर पुरुषाथ का उद्घाप करता है । 'मव एक (१) कृष्ण देव, प्रसाद गौर 'प्रसाद का व्यक्तित्व' ससार साप्ताहिक (प्रसार प्रय) १८ परवरी १९५१ (२) विनोद गार व्यास प्रसाद और उनका साहित्य पृ०३८ । (३) उनकी नियति पना यहुत दुध पयतिर है यह किमी प्रमागत सिलात को प्रतिरूप नहीं। -में मसारे पासपेयोअपार प्रसाद पृ० १०८ ।

१२४ प्रसाद नाटयो मे निवार 7 घार वम-समुद्र में कूद पड गा चाहे जो तुम हो । पारस्य प्रम मुझे प्रामप नहीं बना सकेगा। उतब भी मुक्त कठ से कम की महत्ता प्रतिपारित करता है नियति का ग्रीन कटर नीचा ऊचा होता हुमा अपने स्थान पर पहुँच ही जाएगा । चिन्ता क्या है केवन कम करते रहना चाहिए। यही नही मनुष्य वो प्रकति का अनुचर और नियति या दारा यतान स येवर एक क्षण पहले स्वय जरतार कहता है कमाल तो स्वय समीप भाते हैं। उनस भागवर कोई बच नहा सक्ता। और ता और प्रमा- ये सबसे बड़े नियतिवारी पात्र स्वयं वेद यास भी न ता निप्चष्ट हार बठन हैं और न ही इस प्रकार का उपदे ही देते हैं । अत अपने साहित्यिक जीवन में प्रसार नियति पानी होते हुए भी बड़े से बने कमवाटी पागावादी और प्रास्यावानी नाटककार सिद्ध किए जा सकते हैं । स्वभावत नियतिवादी सिद्धातत कमवादी प्रसाद + नाटका का अध्ययन करते समय मेरे मन में एक बहुत बडा विकल्प उठ खडा हुआ कि अपन यक्तिगत जीवन में इतना कट्टर भाग्यवादी होकर भी यह महान बनाकार अपने साहित्यिव जीवन म ऐसा क्या नहीं वहुत सोचन समभन के पश्चात् मैं इस निष्कप पर पहुंचा है कि जहाँ जीवन की विपरीन परिस्थितियो गौर घात प्रतिधाता न उसे स्वभावत भाग्यवादी बना लिया वहा वेट वेदाग उपनिषद् पुराण रामायण महाभारत और गीता आति के गहन अध्ययन ने मिद्धा न उसे कमवादी बना दिया होगा। स दृष्टि स प्रसार को मैं स्वभावत भाग्यवादी और सिद्धातत कमवादी नाटककार समझता ह क्यारि साहित्य म ता उन्हाने हृदय पर बुद्धि की विजय दिखलाई किन्तु अपने यक्तिगत परिवाम उनकी बुद्धि का वर-बार हृदय स हार खानी पड़ी मैं दावा तो नहा परता पर मुझ नगता है, यही सत्य है और प्रसाद जस मतमु सी कनापार के लिए स्वभाविर भी। ऐसा मान लेने पर मुझ भरे विकल्प का सुपर समाधान भी मिल जाता है । राम पालो म अब मैं अपन निपर्मों सम्बध सूत्र जोडकर प्रसाद के नाटवा म कानसमानुमार नियति का स्वरूप निधारित कर सकन म स्वय को समय पा रहा हूँ (१) डा महैयालाल सहल मूल्याक्न पृ० २७ । (२) प्रसाद का यह नियति सिद्धात साधारण माग्यवाव या प्रारम्पवाद से मिन है। ~प्रा० नन्दुसारे वाजपयी जपशकर प्रमाद पृ० १०७ ।

समाहार १२३ (6) লার (१) सजन प्रमुखत वम एव पुरुषार्थ की प्यजना किन्तु युधिडिर दववादी। (२) प्रायश्चित कमवाद जयचर जसा प्रघम पात्र भी कुकर्मों को धोने के लिए प्रायश्चित करता है। (३) करणालय पूणत ऋतवादी प्रभाव विन्तु क्मवाद मानव कल्याणवाद और करुणावाद भी। (४) राज्यश्री प्रमुखत दुखबाद (तवाद) कमवाद प्रौर पूवनिरिटवाद भी। (५) विशाख कमवाद का सुटर विवेचन प्रमानद निवाम कमयागा, विगास भी उत्तराघ म मवादा। नियतिवादी तथा बमवादी पात्रा में द्वन्द्व, परिणति वमवाद म दुखवाट से भी प्रोतप्रोत । (७) जनमजय का नागयन 'नियति की सवाधिक चर्चा । उसया विश्व निया मिया गति तथा चेतन सत्तापरकरप । मानववाद कमवाद ग्रादि। () कामना प्रतीक वाटी नाटर। प्रकारातर से ऋतवार की ध्वनि । कमवा भी। नियतिवाद और बमबाद वा । फ्मवाद की पुष्टि। एक-आध स्थला पर समय (भाग्य) का ग्रीक दानिया जसा प्रयाग भा। (१०) चन्द्रगुप्त अधिकार पात्रो द्वारा नियति भावना का प्रक्टी करण नितु सभी पुरुपायवादी । पूर्वनिर्धारणवाद की व्यजना। प्रतीकात्मक नाटक । मान दवाद का प्रमुखम्बर (विश्वकल्याणयाद) कम सम्बधी व्यजना। (१२) घुवस्वामिनी पूर्वाधं में नियतिवादिता । उसराधं में स्वत निर्दिष्टयाद । पुरुपाप एव कमवाद भी। उपरात निष्कप विदुषों या तारतम्य स्थापित बरन पर मर दृष्टि-पथ में प्रसाद रे नाटकों की निमति सवधी माठ मुसातियाँ (Facets) एक्दम पष्ट होकर उभर माती है, जो मयट रूप में इस प्रकार रसी पा रापती है (६) स्वदगुत (११) एक्यूट १२१ प्रसाद के नाटकों में नियतिया (१) ऋतवाद (२) कमवाद (३) नियतिवाद (४) नियति और विश्व-वल्याणवाद (५) नियति और नियामक (६) दववाद मथवा प्रारघवाद (७) पूव निर्दिष्टवाद (८) उद्द श्यवान - मृतवाद ऋतवाद के विषय म नितीय अध्याय म विस्तार पूर्वर बहुत-कुछ कहा जा चुका है (देखिए पृ २३) ऋग्वेर म उस अखह नियम पद्धनि यो ऋत' की सना दी गई है जो मूलन नतिक सिद्धाता पर आधारित है और काय पार परम्परा द्वारा इस ब्राह्मण का सचालन कर रही है। विश्व म सब प्रथम उसन होन वाडा ऋत ही है और यही विश्व की घाटी से छोटी वस्तुप्रा से लेकर वडी स वडी चीज का प्रकृतिस्थ रखता है। इसके अधिष्ठाता देव वरुण हैं जो समस्त प्रारिणया के काय व्यापार पर कडी दृष्टि रसते हैं तथा अछ को अच्छा और बुरे को बुरा पन देते हैं । ऋत अपरिहाय नियम-परम्परा है जो विश्व के अग अग में व्याप्त है। प्रसाद जी ने जिस रूप में नियति को सत्ता को स्वीकार किया है वह ऋतवाद + एकदम समक्ष है । यद्यपि यन तत्र नियति का प्रयोग प्रसाद ने भाग्य' के प्रथम भी किया है पर इन स्थलो को छोडर माय सभी स्थाना पर नियति भपरिहाय नियम परम्परा के ही अय में प्रयुक्त हुई है । यह नियम पनि काय कारण परम्परा दो नेवर काय करने वाली एसी प्रखड व्यवस्था के रूप म प्रसाद द्वारा चित्रित हुई है जो सवत्र समरूप से स्थित है तथा छोटे से घार तिना स लेकर उदधि की उत्तान तरगा अनन्त उला पिच तक का नियंत्रण मोर नियमन करती है। प्रसार जी ने अनेक स्पनो पर अपने पात्रा के मुख मे म अनन्त नियम पद्धति का उद्घाटन कर वाया है। कामना म क्लिास का यह ग्यन मरी इस बात की पुष्टि करता है नियम अवस्य हैं। ऐसे नास नभ म अनन्त उत्साडि उनका कम से उप पोर मस्त हाना नि वानीरव निगाय पत विपक्ष पर ज्योति प्मती रावा और कर ऋतुप्रा का चक्र और नि मारह नाव के बाद उद्दाम समाहार १२७ यौवन तब क्षाम भरी हुई जरा-य सव क्या नियम नहीं हैं ? करणालय' का तो समस्त घटना विधान ऋत अधिशाता देव चरण के प्रभाव से प्रोत प्रोत है। ऋत की अनभिज्ञता म इस नाटक की रूपरेखा भी पाठारे मानस पर स्पष्ट हानी लगभग असम्भव है । प्रसाद की नियति के सदभ म प्राचाय न दुवार वाजपयी श्री जगनाथ प्रसाद शर्मा और डा. द्वारिका प्रसाद की ये पक्तिया प्रमा मरी उपरोक्त मा यता वी बहुत दूर तक पुष्टि करत हैं - (4) प्रमादजी को दृष्टि म प्रकृति का नियमन और दिव का मतुलन करने वाली गति नियति है जा मानव अनिवादा की रोकथाम परती है और विश्व का सतुलित विकास करन म महायक होता है। - (ख) नियति को अपने मिद्धात के अनुसार प्रसार ने प्रविन ब्रह्माड की नियन्त्रण कारिवा क्ति वहा । सी प्रथा प्रतिपादन उनके नाटका म भी होता है। २ ३ (ग) प्रमार जी नियनिवार म नियति परमात्मा का एक एमा निया मिवा गक्ति है जो समम्न विश्व का गामन अथवा नियंत्रण करती है मपन निष्पों और उपरोक्त विनो के न उद्धरणा प्राधार पर मरी यह हर मा यता बनती है कि प्रसा? जी की नियति भावना मूलत बवित रा ही प्रभावित है। यद्यपि भाग चलकर ज्यो ज्या प्रमात के जीवन दान का विकास हाता गया त्या त्या उमम २इ प्राय प्रभाव भी मम्मिलित हो गए। प्रसाद जी को नियति भूक्त मतवादी ही है मरी म मा यता की पुट श्रीमती महादेवी वर्मा न भी की है - - (१) प्राचाय म दुलारे वाजपेयो (पामायनी । दानिर निरपण) जयापर प्रसाद जीवन दगान बला और कृतित्य (सं० महावीर अधिरारो) पृ०६॥ (२) जगताप प्रसाद शर्मा प्रसाद पोंग गास्त्रीय अध्ययन पृ० १६५ (1) डा. द्वारिका प्रसार कामापनी माय सस्थति और वान पृ०४३०॥

१२८ प्रसाद के माटषा म नियरिवार पिछली बार जर इनहावाद में श्रीमती मनावी वर्मा ग मिनना हा तो नियति पर चर्चा चल पडी। उहान कहा तिप्रमात जी की नियति वास्तव म त का स्प है वह भाग्यवाद नहीं।' कमवाद रितीय अयाय के प्रतगत में स्पष्ट कर पुवा हू कि दरिद प्रतवाद ने ही प्राग चलकर कमवाद का ज म दिया ( देखिए पृ० २५)। टम ऋत वाट से प्रसादजी मूलत नियति भावना म कमवाद का भी विपद् विचन उपस्थित हुअा है। इसी अध्याय म पोछ दिए गए नाटका की प्रमिक सूची से भी यह सिद्ध हाना है कि उनक समस्त नाटा पर म मवान की गहरी छाप है। टम कमवाद के वनानिक सिद्धान्त न ही उनका नियति भावना म भाग्य के उस स्प को प्रविष्ट नही हान दिया जिसकी कल्पना ग्रीक वासियो न की है और जा काय कारण परम्परा म हीन होर अवा चित्रित पिया गया है। कमवाद की जितनी सुदर यारया हमार देश में नइ है उननी पदाचिन ही अय क्सिी दा म हुई हा। यह कम परम्परा जमा तरवाट यो पर लती है और प्रार व सचित तथा क्रियमाण कर्मों के द्वारा मनुष्या के गुभाशुभ फल प्राति पा समथन करती है। क्मवाद की यह हर मा यता है कि मनुष्यो को अपन कर्मों के अनसार पर मिलता है रस विपय म प्रात सभी दान एकमत है। किन्तु कभी कभी जब हम सननो को कष्ट उठाते हुए तथा टुजनो का सुपी "खत हैं ता इस वषम्य व कारण कम विषयक कारण काय सिद्धात की मा यता म कुछ क्षण के लिए हम मन्देह होन लगता है । कि तु गराचाय ने पपम्यनधण्ये न सापक्षत्वान् नयाद दायति मूत्र के भाष्य म कहा है कि इवर किसी की अपेक्षा करके मृष्टि रचना म प्रवृत्त नहीं होता। वह जीव के मचित तथा मदृष्ट कर्मों का नत्य म रखकर ही वपम्य की मृष्टि करता है-जीवन के कम ही प्रकृत कारण है-इपर तो निमित मात्र है। इस प्रकार कमवाद हमारे दानो का वज्ञानिक सिद्धात है-भाग्यवाद हमार देश का दान नहीं। मोगवासिष्ठकार की उपरोक्त उक्ति जहाँ क्मवाद की सुदर व्याख्या प्रस्तुत करती है वर्ग इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कमवाद का भाग्यवाद से किसी प्रकार का भी सम्बघ वरना भयकर प्रनय होगा। प्रति विनम्रता (१) कहैयालाल सहल मूल्यांकन पृ.४०1 पा पूर्वक कोथ महोन्य के इस कथन को मैं भ्रामक की सना दना चाहूगा कि कम भावना मूलत भाग्यवादी है और भाग्यवार नतिक उन्नति के लिए सामा य जन के हेतु प्रेरक गक्ति का काम नहीं करता। क्योकि हमारे यहाँ षा कमवाद वनानिक है और जमज मातर कम फला को लेकर अग्रसर हाता है। अत उसे किसी प्रकार से भी उम भाग्यवाद की सना नहीं दी जा सस्ती जो अधा और यूर चित्रित किया गया है । पहले कह चुका है कि सज्जन से लकर ध्रुवस्वामिनी तक प्रसार के सभी नाटक कमवाद से प्रोतप्रोत हैं। सजन म यह कमवाद अपनी साधारण सी ध्वनि दकर ही रह जाता है। प्रायश्चित' म यह मजन की अपक्षा कुछ अधिक स्पष्ट हारर पहले आवागवाणी स पर फिर जयचर के द्वारा हमारे सम्मुख उपस्थित होता है। पहले अपन लगाए हुए विप वृक्ष के फल का चस तथा मैंने प्रायश्चित करने की प्रतिना की है। क्यालय म वरुण के स्तुतिगान द्वारा कमवार का प्रभाव अत्यात स्पष्ट है । राहिल "द्र स यहा वरदान माना है कि वह व मपथ म न कभी यह भीत हा। रज्यश्री म भी नायिका का पुग्पाथ कमवाद का ज्वलात उनाहरण प्रस्तुत करना है। सुरमा का चरित्र भी भवानी । पिशाख ग नाटक और नरदत दोना ही पहत नियनि का गुणगान करते हैं पर प्रमागर से मरम्म कमयाग का प्रादा पावर दाना ही कमवादी बन जात है। प्रमानद प्रमाद के व मादा पाना म चिरस्मरणीय है। अनातन' म र म पथ का प्राण-पण स प्रस्त करने में लगा हुआ है। वह नियति की डोरी पार मी कम कप में छलांग नगाने को तत्पर है। नागया म यशपे नाटा नर माद्यान नियनि नटी या प्रप धाया हा है पर कृष्ण प्रजुन को सदेत देते हैं पुरपाय परा जनता हाया। उतर का गम्पूण चरित्र नाटक पर कम की मुदर चित्रकारी पर देता है। उम तो मतना बल है कि नियतिवादी जनमजय भी यमपथ पर पग्रसर होकर ब्रह्महत्या का पाप मिटाने के लिए यणानुप्रान परता है जरताह का पयन है कि कम-फल विमी का पीछा नहीं छोडना । नेपथ्य गोन (1) The conception of harma is essentially fatalistic and fatalism is not for a normal wind a good incentise to moral progress A B Keuh The Religion & Philosophy of the Vida and the Upanishads p 506 - ।

प्रसाद के नाटकम नियतिवाद कामना या - से भी कम कर्म चेतनता है का उद्घोप मुनाई पड़ता है। ग्लिास भी पुरषार्थी है। स्वदगुप्त म अनन्तदेवी प्रपनी नियति या पप स्वयं चलने को उद्यत है। अपने को विश्व नियामन वे हाथ का मितौना समझने वाना स्कद भी प्रत तक वम पथ पर अडिग रूप से डटा रहता है । चनपातित भी दा रक्षाय स्वट के साथ उसके पार्यो म हर क्षण मइयोग देकर अपनी पुरुषाथ प्रियता का प्रमाग देता है । भगक और मातात नो पूणत कमवाती है। च द्रगुप्त म एमा को भी पात्र ना जो पुरुषार्थी की सना पान या अधिकारी न हो। चाणक्य पौरव राजकुमार को कम क्षेत्र म फाप करन नडसनाने क लिए सावधार करता है। व-गुप्त के लिए जागरण का भी प्रय क्षेत्र म अवतरित होना है। परत वर भाग्य से हसी ठा भी पर नेता है और आम्भीक तथा मिरण का जीवन तो तनवार को घार पर बीतता ही है। चाणक्य मभवन प्रमाद का सवस गतिवान पात्र है जो भयवर से भयकर परिस्थितियो म भी विचलित होन का या नप्रियता का भाव भी हृदय नहा जागृत होने देता । चरगुप्त का समग्र प्रभार इसीलिए पुरुपाथ और कम की महता की छाप पाठा पर छाड जाता है। एक्घट म मुस्थत प्रतीक-योजना की पोर प्रसादजी उ मुख रहे हैं। इसीलिए दान पक्ष पुच गियिन मा हो गया है फिर भी कहा वही क्म की ध्वनि दणी जा सकती है। ध्रवस्वामिनी जा कि प्रसाद की प्रतिम नाम्य-कृति है-म भी प्रसाद द्वारा पुरपाथ और स्वत निलिष्टवाद की पुष्टि हुई है। पूर्वाध में नायिका ने परितिया के प्रति अपन को पूणत समर्पित कर रखा है पर उत्तराध म वह अपनी अगम्य इच्छा शक्ति का स्मरणीय उदाहरण प्रस्तुत करती है । मदादिनी का गीत (पृ ३३) भी उसकी पुस्पाथवारिता और सुरड कम- निश का उद्घापक है । गवराज ता पुरुषाथ को ही सवना नियमन समझता है। प्रत प्रमाद का कोई नाटक भी एसा नहीं जिसस कमवाद की प्ररणा ग्रहण न की जा सकती हो । वस्तुत कमवादिना प्रसाद के साहित्य की प्राधार frला की जा सकती हैं। प्राचाय वाजपेयी जा तिसते हैं, प्रमादजी कम माग के विरोधी नहा थ । वे मनन गाल अभय कम का सदेश देते हैं । (१) प्रा. न ददुलारे वाजपेपो (कामायनी का दानिक निरूपण) जय पर प्रसाद जीवन दान क्ला और कृतित्व (स महावीर अधिकारी) प्र०६.

१३१ समाहार नियतिवाद प्रसाद का नियतिवाद यापक कवास पर चित्रित हुभा है। उनकी नियति भावना की प्रथम मुखाकृति ऋतवाद के विवचन म मैंन केवल उमरे एक ही स्वरूप -मर्यात काय-कारण परम्परा जय' नियम बद्धता को ही विवध्य विषय माना है । किन्तु मुझ उसके दो प्रम हप भी दृष्टिगाचर हात हैं । इस प्रकार उनको नियति नटी' को तीन परिवगा मनमा म प्रकार रखना चाहूगा (१) 'नियम के अय म नियति । (२) चेतन सता के रूप म नियति । (३) भाग्य के प्रथम नियति । प्रयम पिदुवा विवेचन पोर हा चुका है अत यहाँ देवल दूमर और तीमर विआ पर ही विचार करना सगत होगा। अनक स्थला पर नियम' अदृष्ट और नियति भो मानवीकृत रूप दकर प्रमाद ने यस विश्व का नियामक किमी वतन सत्ता का विव का क्णधार माना है । विलाम के पता म ईश्वर है और यह सवक कम देखता है। पातित्व यह देखन को उत्सुक है कि भाग्य उस सि ओर खीचता है। अदृष्ट कहे तो भी सुरमा उसकी वात मानने का तयार नहीं । सुरमा इस पद का यत्र हैं और वह यम उमसे कोई काम कराना चाहता है । स्वदगुप्त भी किसी वटपन गायी बालक में हाया का खिलौना है। विजय के म अदृष्ट न ही उस रथित रतगृह यो बचाया है -टन समस्त वाक्यागी से प्रप्ट भाग्य प्राति का भानवीत रूप (क्ता व प म) हमार सम्मुख आता है । अत पात होता है कि प्रसाद को नियतिभावना म चेतन-सत्ता का भी प्रास्तित्व है । प्राचाय न ददुलारे जी भी यस क्यन की सत्यता को स्वीकार करत हैं । नियति को प्रसाद जी सचेतन प्रकृति का वाय क्लाप मानते हैं। सचेतन प्रकृति नियति के रूप म ही सक्रिय हाती है । भाग्य प्रथम भी नियति का प्रयोग प्रसाद न किया है । कामना परलो है पनि य नियम है तो मैं कह सकती है कि य नियम न हाकर नियति बन जाते हैं । प्रसपलना थी तानि उ पग्न परत हैं कामना दारा यही निर्यात का भाग्य के प्रथम प्रयाग द्रष्टव्य है । वितु एस स्थल नाटको में बम हा पाए हैं। । (१) मा० माददुलारे यामपयो नयार प्रसाद पृ० १०३।

प्रसाद के नाटयो म नियतिवाद - नियति और विश्वकल्याणयाद प्रसाद की नियति वा विश्ववल्याणमय प उसे और अति महत्व पा विषय बना दता है । प्रसार जी की यह दृ' मा यता रही रिवि व ये ये सारे कायनाप ग्वि कल्याणाथ ही हो रह हैं । प्रमाद की अनुपम पात्र सृष्टि के उदाहरण नागयज्ञ के वेद यास कहते हैं विश्वात्मा सर का कल्याण करता है । नियति के पीछ भी वे पित्र भर के हित का रहस्य' मानते हैं । करुणालय के विश्वामित्र भी कहते हैं। वह प्रकाशमय देव न दना दुख है।' इस प्रभार प्रसाद की नियति भावना मृजनात्मा है और उमग पिवहित का नभ्य निहित है । उनका विश्वास था कि विश्व नियामिता शक्ति विमी का भी कष्ट नहा देती । वस्तुन यह ठीक भी है। कई बार मनुष्य अपन “यक्तिगत जीवन के उहापाह से घबरार ईश्वर का पूर अथवा निदया साचन लगता है । यह सवथा एकागो विचार धारा ही कही जाएगी। विव निया मिका गति यति तर निदयी अथवा घ्वसात्मक रूप धारण कर लगी तो मनुष्य जीवन म रह ही क्या जाएगा। प्रम पथिय म प्रसाद स्वय लिखते हैं दुख देवकर अपना हा। मत समझो सर दुखी जगत का मा नांदन दा ईश्वर का। गिव समष्टि का नाता “दा उसकी पूरी होती है। नियति' और नियामा पर स्थाना पर प्रसार न नियम और नियामर म पायक्य स्थापित रिया है । वासवी का क्थन है अपवाद नियम पर हैं या नियामर पर जिससे सिद्ध है कि नियम और नियात्मक दो वस्तुए हैं । नियम विश्व का सचालन परन वानी कायकारण परम्परा है और काई टममे भी इतर सत्ता है जो टमका सचालन करती है । प्रसाद विश्व के पीय चेतन सत्ता का माननेवाल क्लाकार य प्रत इस सत्ता रूम म उन्हाने ईश्वर को ही स्वीकार किया। सदगत के मुह से वे कहलवाते हैं मैं कुछ नहा हूँ-परमात्मा का अमोघ अस्त्र हू । इस प्रकार सिद्ध है दि प्रसाद वायवारण परम्परा युक्त इस नियम पद्धति के नियामक रूप में ईश्वर की सत्ता पर प्रास्था रखते थे। (१) तुलनीय There is no error in the Eternal Plan working for the final good of man All things are --Word sy orth समाहार १३३ दववाद अथवा प्रारब्यवाद मुस्पन प्रमार काय-वारण परम्परा का लेबर प्रवृत्त होन वाली नियम पद्धति के पुजारी नियतवाली थे। विन्तु नाटका वा अध्ययन करत ममय कुछ स्थल एम भी पाए जहा मुझ उनकी नियनि का स्वरूप दवाती अथवा भाम्यवादीमा लगा। स्वागत म धातुमन का यह क्यन एसा हा एक स्थल है- समय पुप बी की गेंद पर गना हाथा स खलना + य पत्तियां परत ही मर सम्मुम ग्रीक वामिया के उम 'भाग्य का चित्र प्रा उपस्थित हाता है जिमम मानव का स्वतन्त्र इच्छा शक्ति का काई प्रास्तित्व नही रह जाता। जिम प्रकार एस कुन वाजीगर ला गेट पर उह अपनी इच्छानुसार हाथा से नचाना है वम ही यति समय स्पी भाग्य स्री पुष्प की गेंद तर कदुर पान करता है तो फिर इमसे वरवर और क्या भाग्यवादिता होगी?' प्रमाद जी का उमरण याम लिवित एव या ही स्थाई वह पमत थी-यह जानकर मरी यह धारणा और भो पुष्ट हा गइ दि प्रसार की निर्यात भावना का एक स्वम्प भाग्यवाटी भी है । यहाँ निश्चय ही उन माहित्य म उनका व्यक्ति पण उमर पाया है। स्वगुप्त भी एक स्थान पर म्वय को प्राप्त मत्ता के हाया म विनीना वहार मवाधित करता है । माना उमगी स्वयं की काइ सत्ता ही न हो। यद्यपि स्कद की यह उक्ति क्षणिक भावावा या ही द्योतन करता है तथापि एम प्रकार वा उतिया पीये प्रमाद व पक्तिगत जीवन की भाग्याधितता का मना तो हम मिल ही जाती है । मनर म्बना पर बमवीर पाया ये मुग से न्सी प्रकार की उक्तियां सुनते म्नते मैं इम निरप पर पहुँचा नि प्रमार थी अन्तरात्मा म भाग्य' और पुरपाय पा रन्द्र प्रसाध गति से होता रहा होगा--जिरो उदोने ममय-समय पर पपा पाया म इनस्तत पियर लिया। योगवामिष्टर न माग्य और पुरपाय पाहा इन गाम व्यक्त दिया है (१) तुसनीय As flies to wanton boys are ne to the gods They kill us for their sport Shakespeare King Lear, Act 4 I प्रमाद ये नाटमा म नियतिवार होत हुए द्वौ हुमाविव युध्येते पुरुषायो समासमौ । माक्नत 'चहिक चव गाम्यत्यत्राल्पयीयवान् । अयान पूनम का पुष्पाप (भाग्य) और इस जाम का पुम्पाय कभी समाक्ति और कभी कभी अमम गक्ति होर दो मता की तरह परस्पर युद्ध करते हैं । उनम से जो अल्प पक्तिवाला हाता है वह हार सा जाता है । और मुझ अनभूति होती है कि प्रसाद के मन म चल रह अनल म 'भाग्य स्पी उस मट को मात खानी पडी जो उनक कम रूपी मटक सम्मुख पाया । तभी तो उनके ही नाटक म अतनागरवा नियतिवादी पात्र पुरुपाथवादी और कमवादी बन जाते हैं। विपास का नायक पौर ध्रवस्वामिनी की नायिका मक सुदरतम उठाहरण हैं। प्रत नारका म यन तत्र भाग्यवाद की थणी म पाने वाल माभों के भी हम प्रसाद के नाटका म न तो उन्हें भाग्यवादी कह सकते हैं और न ही उन नाटका को। वस्तुस्थिति यह है कि प्रसार के नाटका म मामा यत नियति उम भाग्य का पर्याय नहीं है जिसे नीर गोगा ने अधा और न र चित्रित किया है । प्रमाद ने इस जीवन को कम रगस्थन कहा है। एपिक्स की तरह उहोने मनष्य का विश्व रगमच पर सवथा भाग्याप्रित पात्र कहकर चिधित नहा क्यिा है । म सम्ब ध म मैं एपिकाम की निम्नलिखित पक्तियां यहाँ उद्घत करना आवश्यक समझना है Remember you are an acto in a drama of such a kind as the author God plea es to make it If short of a short one of long of a long one If it be His pleasure that you should be a poor man a cripple a governor, or a private person see that you act it naturally For this is your busi ness-to act well the part assigned to you to choose it is another & business -Epictetus -याद रखो कि तुम उस नाटक म एक ऐसे अभिनेता हो जसा वर तुम्ह अभिनेता के रूप में रखना चाहते हैं मगर वह तुम्हे निधन पगु गवन र या सामा य व्यक्ति रखना चाह तो भी तुम स्वाभाविक रूप से अपना अभिनय (१) योगवासिष्ठ २५५।

समाहार १३५ करो क्योकि जो अश अभिनय के लिए तुम्ह दिया गया है उसे तुम पूरा करो कौन सा अभिनय तुम्हें मिलेगा, इसके चुनाव का अधिकार तुम्हारा नहीं। -एपिक्टस एपिक्टस की उपरोक्त उक्ति यह दर्शाती है कि मनुष्य ईश्वर के हाथो की कठपुतली है और इस विश्व रगमच पर उसका कोई भी अस्तित्व नहीं है । यह अधा भाग्यवाद है जिसका भारतीय जन जीवन से कोई सम्बध नहीं। हमारे यहाँ प्रार व कर्मों को ही भाग्य की सना दी गइ है कम मिद्धात का यही मूलमत्र है । यही प्रारधवाद प्रमाद के नाटको म इतस्तत बिखरा हुमा पड़ा है इस निराशाजय भाग्यवाद समझना गलत होगा। इस दृष्टि से प्रसाद निराले नियतिवादी हैं उनके अपन निश्चित सिद्धात हैं और उनकी अपनी मौलक दन भी। पश्चिम का कोइ नियतिवाद क्लाकार गायद ही इनकी तुलना मे पा सके । क्योकि पत्रिम मे कमयुक्त 'प्रार थवाद कभी रहा ही नहा और यही कमवाद प्रमाद की नियति भावना का मेरदड है । पाश्चात्य नियनिवादिया म हार्डी का उल्लस प्रमुख रूप से किया जाता है किन्तु हार्डी और प्रमाद की तुलना करने पर दानो में कोई भी साम्य कदाचित ही दीख पडेगा ‘विन्तु प्रसाद जी का नियतिवाद विरयात उपयासकार टामस हार्डी के नियतिवाद से सवथा भिन्न है। हार्डी का नियतिवाद मानव को सिर धुनने के लिए छाड देता है जबकि प्रमाद का कम म जुटा दता है। प्रथम निवृत्ति माग का द्वार वाद पर टता है दूसरा प्रवृति माग का मदान वुहार दता है। पश्चिम मे निरागाजय भाग्यवाद क्यो उद्भूत हुअा मौर हमारे यहाँ कम पधान तथा प्रापाजय नियति भावना क्या प्रचार प्रसार पा गई इसकी बडी ही सु दर और ऐतिहासिक विवेचना स्वय प्रसाद जी ने प्रस्तुत की है- वतमान युग बुद्धिवादी है भापातत उसे दुख को प्रत्यक्ष सत्य मान सना पड़ा है उसके लिए सघप करना अनिवाय-सा है। किन्तु इसमे एक यात मोर भी है। पश्चिम को उपनिवेश बनाने वाले मार्यों ने दखा कि प्रत्येक प्यक्ति के लिए मानवीय भावनाए विशेष परिस्थिति उत्पन्न कर देती है । उन परिस्थितियों से व्यक्ति अपना सामजस्य नहीं कर पाता। कदाचित् दुगम भूभागा में उपनिवगो की खोज म उन लोगो ने अपने को विपरीत दाम - (१) प्रो० राम रामपाल द्विवेदी प्रसाद एव पन्त का तुलनात्मक विवेचन पृ. २७७।

प्रसाद पायपियरिया- ही भाग्म रा त पाया। उा पोगा। औपगमी गति पर ध्यान दने के कारण इस जीवन यो (दही) गमय समभा। और यह उन की मनुप्यता पी पुषार थी मानीया सा14 विए। प्री पोर रामन लोगो को बुद्धिवाद भाग्य से पोर उसय द्वारा उत्पन्न गपूग्ण । ग गपएं करने के लिए अधिर अग्रसर परता रहा । उद गहायता र ति गवद हाने पर भी यक्तित्व के पुरुषाय ये पियाम प लिए मुा प्रयगर का रहा। इमी लिए उनमा बुद्धिवाद उसी दुम भाषाय द्वारा अनुमागित रहा। इसी को साहित्य म उन लागान प्रधानादा। यह भाग्य मा निर्यात की विजय थी। परतु अपन पर म सुपस्थित रहनगार प्रायों के लिए म प्राय या न था । यद्यपि उन एक दन न ससार म मग 'यह बुद्धिवार पोर दस मिटान्त का प्रचार किया जा विशुद्ध दानिर हा रहा । साहि य म उस म्वीकार नहीं दिया गया। हाँ यह एप प्रसार या विाह ही माना गया । भारतीय प्रायों को निराशा न यो। करण रस था उसम दया महानुभूति की कल्पना से अधिक थी रसानुभूति । उहान प्रत्यय भावना म प्रभट निर्विकार प्रानद लो म प्रधिर मस माना । प्रसाद जी की ये पक्तियां जहाँ प्राय पोर पा चात्य नियनि भावना की पृभूमि का स्पष्ट दिग्दान कराती हैं वहीं यह भी सिद्ध कर दनी है दिन पत्तिया यो निखन वाना महान वलापार कभी भी उस अब भाग्य को नाटका म चित्रित नहा करेगा जो निराशा और दुखमय जीवन का रोना धोना सुनाती है । अत प्रसाद जी की नियति भावना भाग्यवानी परिवेश में नहा दखी जानी चाहिए। प्रसाद जी की नियति के मदभ म डा० सहल का यह क्थन प्रथम सत्य है वह विश्व की प्रचण्ड नियामिका शक्ति है और ऐसी नतकी (नट) है जिसका विराट रूप योगवासिष्टधार न हम गिनाया। “म प्रकार का नियतिवाद न भाग्यवाद अथवा दववाद है और न किसी प्रकार के प्रतायन का प्रकार ही। २ १ (१) जयगकर प्रसाद पाय और कला तया अय निबध (स० प्रा० मददुलारे वाजपेपो) पृ ८३-८४ (२) डा हैयालाल सहल कामायनी दशन (नियतिवाद और पामायनी) पृ १३१ ।

पूर्वनिर्दिष्टवाद नाटका म एम ग्रनक स्थल पाए हैं जहाँ पहत से क्सिा नि चत घटना को अपरिहायता का पराध हाता है। राज्यश्री' को नायिका जव दुखवादी स्वरा में प्राह भरती है प्राह जितना सासें चलती है व तो चलपर हा स्कगी ता एसा भान होता है मानो किसी निष्ठुर गणिना ने पहले ही गणना परक उसक जीवन पर सामा वा कडा पहरा लगा दिया हो-एसा प्रतिवध लगा दिया हो जिमम एक निश्चित वाम तक न न तो स मरन का ही अधि पार निया हो और न ही उसके बाद क्षण भर जीन का ही। नागयन जीवक को भी हर विश्वाम है कि जो होना होगा वह तो होगा ही -जो यह सिद्ध करता है मि भविष्य की घटनाए पूर्व निधारित और अनुलघनीय होती हैं। इमी नाटक के प्रमुख पात्र वरयास भी पातदी है और भविष्य क प्रावरण का चीरकर वे सर कुछ जान माने म समर हैं जो होने वाला है तभी ता वे जनमेजय स कहत हैं मम्राट नुमने नुभसे एक दिन पूछा था कि क्या भविष्य है। दवा नियति का चत्र मैंने कहा था कि यन म विघ्न होगा। और वस्तुन विघ्न हुअा भी। चन्द्रगुप्त का चाग्गस्य इम पूवनिर्धारग्गा का सत्रा प्रतिनिधित्वकर्ता है । इसम इतना बन है वि घटनाग्रा की अनिवायता भग करवा सक व ता हार रहेगा जिस मने स्थिर कर लिया है। ध्रुवस्वामिनी में भी "सी स्वत निनिष्टवा ता क दान हात हैं। प्रारम्भ में वह अपने प्रापका परिस्थितिया के सम्मुख समर्पित कर दती है कि तु बाद म उसका पारमयन ममार कुछ दिन विधाता 4 विधान म अपन लिए सुरणित करने या उद्घाप कसा है। यही नहीं - वसना और सदगत का परम्पर प्रम रखत ए भी मना गा क लिए बिर नाना जास्वामिनी व दावरा का एमी स्थिति म म जाना दि वह कामा को न ता रोक ही मके प्रौर दाहीर गावागावा ग्रात्मधान करना और मानविषादी निमम हत्या या धरित ना मा माना पूर्वनिनिष्ट हा था। उपरोक्त तय्याय प्रयाग म प्रमार की नियन व परनिमिट्यार की रूपयाए " मीमा ता पर जाता हैं। उद्श्यवाद -यम नियम का मता का स्वागार पर यह मान लन हैं रि यह विहि नियमा गगचारित है ता गहत ही या प्रश्न उटबिता नहीं १ प्रगान मा fairnt Putraft th| म free भोmarterrum tutn HH• । भो MeritTIमाप्रपामार TERRfri Tir TITHI | B1114 पगार Traf प्रियाना।।rfirmभा प्रयाITTP - प्रतिमा प्रामामा प्रिप मानिnal HE ITI RET Tम 7 उपही य* भाfreगी। पभयापहमार ITIOfrप्रा' पगात या वायगारमा सब ध प कारण प्रपा पाप पहाता गती-प्रालित शियम यातुप उना घटित हान यही नियम हैं। प्रायतिर नियमा म य वन काय हाना रहता है। स मत म अनुमार जगत मपन नियमा -RI मचान है जिस पीद का उद्द य नहीं है। उक्त यप्रथा- निप्याण तथा निर्जीव पदार्थों के परिवतनो को समझान में क्सिी बदर गपत हुपा है रितु मप्रारण तथा सजीव पटायों के विकास को समभाने में इसे असपनता ही मिली है। जीवित पदार्थों में एक प्रकार की स्वत स्फूर्ति तथा प्रात्म क्रिया मिलती है जो किसी यत्र मे दिखाई नहीं देती। जीवित पदार्थों में मामजस्य अनुकूलन आत्म प्ररणा प्राति गा पाये जाते हैं जिनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वर जसी कोई प्ररक पति किसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए इनको सचानित पर है। प्राणवादी इस गक्ति को प्रारणाक्ति अथवा जीवन पक्ति करते हैं नव्योत्वान्तवादी लायड मागत जस दानिक रसे प्ररक शक्ति प्रयवा ईग्वर का नाम दत हैं। हेगन इसे निरपेक्ष चतय सना प्रदान करते हैं । विषण के प्रातोर म यह मानना पड़ता है कि विश्व के विकास के मूल म कोर्ट प्रयोजन अवश्य है । दानमात्र म यह सिद्धात प्रयोजनवाद के नाम से अभिहित किया जाता है। प्रमाद के नाटको में नियति का अध्ययन करते समय मुभ इस तथ्य की रपार अनुभूति ह ह कि प्रसाद जी चतनवादी प्राध्यात्मिक दागनिको के मतानयापी हैं। व इस विश्व के मन मे निश्चित रूप से क्मिी चेतना सत्ता समाहार को स्वीकार करते हैं तथा उनकी यह भी मा पता है कि इस विश्व के पीछे निश्चय ही कोई उद्देश्य सन्निहित है जसा कि स्वत्गुप्त का क्यन है 'परतु इस संसार का पाई उद्दश्य है। इस पृथ्वी को स्वग हाना है, इसी पर देवनाग्रा का निवास होगा विश्व नियता का एसा ही उद्दश्य मुझे वित्ति होता है। फिर उसकी इच्छा क्यो न पूण कर विजया, मैं कुछ नहा है, उमा मनहू-परमात्मा का प्रमोघ अन्त्र है प्रसार नाम्य नियति नटी मम्बधित उपगत अाठा मुखाकृतिया को एक-साथ करपना करने पर पाठकगण उनकी नियति का ममग्र बिम्व ग्रहण कर सकते हैं। अतत प्रसाद की नियति नटी को मैं उस मधुमक्खी स उपमित करना चाहना है जो प्राकृतिक नियमा में प्राबद्ध हाकर दिन म ही वा र निकलती है पूना का ही रस चूसती है जिसने ऋतवाट क्मवार दिव वरयाणवाट दु सवार पूनिलिटवाद उद श्यवाद प्रादि सुवामित पुष्पों का मार-तत्त्व अपने मधुकाप में इक्ट्ठा कर लिया है जो चेतन भी है और चचल भी तथा यदा का मन-पड़ने पर कल्याणी या मालविका का दान भी कर लेती है किन्तु फिर भी वह तुभावनी है क्यादि मधु रस रूप म हम कल्याणकारी फ्ल देती है तथा अपन श्रमजीवी स्वभाव से पुष्पाथ और कम का अनत मदेश भी। 1 उपलब्धि अपनी मा यतामो के प म प्रसाद का नियतिवादिता के सत्भ में कुछ तय्या का स्पष्टीकरण पुन वरना चाहूगा । प्रसाद म प्रषिकात नियति वा निर्माणात्मर तथा प्राशावादी स्वरूप प्रतिपारित हुमा है । विश्व का उद्देश्यमूनक ऋत अथवा नियम ग प्रचालित माननवाले दागनिको मे प्रसाद का प्रमुख स्थान है जिस व नियमा वी नियामिका शक्ति के रप में वतन सत्ता वा बाना पहनावर नित्रित परत है। (२) प्रसार स्वभावत नियनिवानी रहे हैं और उन्होंने इम स्वभाव का प्रारोप उन ऐतिहामिक पात्रा पर भी कर दिया है जिह इतिहास नियतिवादी पात्र व प म चित्रित नहीं करता। (३) में प्रसाद की निपति को मूल भात्मा ऋतात कमवाद को मानता हूँ जिमन अधिकारी का नाटकों पुरुषाप के सतरगी रगा म रग निया (५ ) -- (६) mairiF inn ftགfiir । म पापा जाप में पूर्ण ग furn"पौर माग पसार पापा परापर भागा पास मुझ ही मिमा ॥ प्रारम्भ म भगवान्हा पोर माम पियारी 17 गया। प्रमाको यिनि भयन गतिमासा उगम राम मात्र का भी नही। या पारस्परिप्रया मोर जीवन PATTE विरागहाना गया हयात्यायिनि भासाम भी विराम कृपा है। वाई भी जीया ना नाटामार जीवन । विगुग हार नग चन माता। जीरन म भाग्य और पापाप दाना वा स्थान है-प्रा का पापय वी वात ही पनि वह नाना पा विवरण करता है। हम विषय म माघ का यह लार व रा म निसन याग्य है नारम्बत दविता ना निपीत पौरप गर्यो सत्व विरिव य विगनपे ते । पमाद के नाटमा म यस नत्र दव और पुरपाथ का प्रतिनिधित्व करने या ना पात्र युगन दृष्टिगोचर होता है जिसस अपने अपन स्थान पर दववाद प्रयवा क्मवाद उचित परिपा व म हदयगम हो जाता है क्योकि दा विपरीत वस्तुमा को देखने पर स्वत हो दानो की प्रातियाँ ग्राह्य बन जाती हैं। माटको मे काय मिद्धि के प्रना हेतु रह हैं। कवल नियति ही साधन अथवा बाधक नही । वाल प्रम स्वभाव क्षत्र परिस्थितिया प्रादि सभी का अपने अपने स्थान पर प्रभाव रहा है। वरा दवदादी दव को ही काय का हतु मानन हैं किन्तु जन दानिक सिद्धसेन दिवाकर न एका त वाननाद स्वभाववाद नियतिवाद पृयतवाद पुरपाथवाद आदि की अग माग एका त मान्यता को मिथ्यावाद कहते हए इन सवक ममुदाय का ही काय गाधक माना है काता स वि णियई पुवस्य पुरिसकारणोगा । मिन त चव उ समागमा हाति सम्मत । मगै समभ म प्रसार के नाटया पर भी यह उक्ति चरिनाथ होती है । प्रतिम म्पश नियति विषयक चर्चा करत समय मैंन विश्व में याप्त नियम पद्धति ऋत मिशान Tम पता प्रार। कमों की अपरियता आदि को स्थान स्थान (७) - पर चर्चा की है। किन्तु मैं यह मानकर नहीं चलता कि मर द्वारा विश्व का सपूण सत्य इन पृटा में सिमट कर अभिव्यक्त हा गया है। मुझे लगता है कि वनानिकगण भौतिक विज्ञान की अनन्त उपलधियो क प्राप्यथ निरवर प्रातिशीन तथा प्रयलगील वन रहा, फिर भी इस अन त ब्रह्माण्ड का सत्य वे कभी भी हस्तगत नहा कर सकेंगे। अनागत भविष्य की उपाधियां उन्हें अधिकाधिक उपलधिया के लिए निरनर प्रेरित करती रहेंगी। इसी प्रकार विश्व के भौतिकवादी तथा प्राध्यारिमर दानिव सपूण सत्य के विग्लेपण एवं निरूपए के हेतु विविध ज्ञान पद्धतिया का प्राथय नते रहेंग। सत्य के क्तिन पायामा तक क्तिन समय में और कब व पहुंच पाएग यह निश्चित रूपण नहीं कहा जा सकता। महादेवी जसी क्वयित्रियों और वि व के अनेक कवि तोड दा यह क्षितिज, मैं मा दम्ब तू उस पार क्या है स प्रेरित होकर उस अनत अमीम सत्य के साक्षात्कार के लिए व्यग्र तथा व्याछुत धन रहेंग। ज्या-ज्या वे उम सत्य के निकट पचग त्या-त्या प्रतिम सत्य उनस दूर हाता चला जाएगा। ऐसी विकट स्थिति म मर जसा विद्यार्थी प्रहाय रहस्यमयी और पन पल म अपने परिवा वदतन वानी नियनि का सम्पूण विलपग पर सक- इमको ता स्वप्न म भी कल्पना नहीं का ना मकती। मैंन ता नियति पी इस विशात अट्टानिका के निर्मागाय जमीन नापन के लिए पुत्र प्राधार मूत्र मात्र रम्प हैं । नियति के समम्म रहस्य का उत्पारन नित्रय ही मर वा वा रोग नल। यह विश्व नियमा द्वारा मचारिन है अथवा इसमा प्रवनन यच्छा हा रहा है माज ता इमके मम्ब घम भी यनानिक उहापोह म ग है। इस सम्मघम निम्नलिखित वनानिक दृष्टिकाण पा उद्धन करना अप्रास गिर न हागा ग्रह्माण्डम जो पृय हाता है वह गायट मि इगलिश fr जहां तक हमारा सम्भय है इसका स्वाप ही कुछ ऐसा दिये सरहा । इगये सिया पार चारा नहा है वाई विर प नहा है। प्रन यहाँ तिमी बल प्रयाग बिगी रहस्यमयी भवषण शक्ति या विमी पूर्वनिर्धारित यिनिष्ट साय मानिये मनुगमन या सयात ही पता न ा हाता। प्रकृति में हम जितन भी निएा या सिद्धान्त दयते हैं व मर रमलिए हैं कि हम हर प्रतिमा को विशिष्ट पानानुरमम देशो ये सम्पन्न । गुके हैं। यदि हम रिमी पूरी प्रशिया का प्रसाद नाटयो म तिपतिया (४) करणालय मसरण ३ ग. २०१८ वि० (4) कामना सस्करण ५ रा० २०१८ वि० (६) वामायनी स० २००० कि० (७) काव्य मोर पता तथा भय निग्य मसरण १ ग. १६६६ पिक (८) चगुप्त सस्मरण ४ म० २००० वि० (६) जनमेजय का नागय सस्मरण ७ स. २०१२ वि (१०) ध्वस्वामिनी मस्करण १४ स० २०१५ वि० (११) प्रायश्चित (चित्राधार) सस्करण २ । (१२) प्रम पथिक सस्करण २ । (१३) राज्यश्री सस्करण ३ । (१४) विशाख सस्करण ७ स० २०१३ वि० (१५) स्वगुप्त सस्करण १४ स० २०१८ वि० (१६) सजन (चित्राधार) सस्करण २ । (ख) अय ग्रथ (१) आधुनिक हि दी नाटर डा० नगे द्र सस्करण १ स. १६६ वि० (२) कवि प्रमाद की काय साधना रामनाथ सुमन मसरग ४ । (३) कामायनी दान डा. कहैयालाल सहल एव प्रा० विजय द स्नातक सस्करण १६५३ ई. (४) कामायनी म काय सस्थति और दान डॉ. द्वारिकाप्रसार सस्करण? (५) गीता रहस्य बालगगाधर तिलक सस्करण १६१६ ई. (६) जयशवर प्रसाद मा० न ददुलार वाजपेयी सस्करण ? (७) जयगार प्रसार जीवन दान बला और कृतित्व सम्पादक महावीर अधिकारी सस्वरण १९५५ ई (८) जन धम क नाशच द्रनास्त्री सस्वरण १ (६) दान दिन राहुल साकृत्यायन सस्करण १ (१०) नालदा विशाल T” सागर सस्करण १ । (११) नाटककार प्रसाद और चन्द्रगुप्त बजनाथ विश्वनाथ सस्करण १ । (१२) प्रसाद साहियका डा हरदेव बाहरी ससरण १ म (१३) प्रसाद काव्य विवेचन डा. हरदेव बाहरी, मारण (१४) प्रसाद का काय डा प्रमादर मतरण १ २ १२ वि० (१५) प्रसार को नान्याता प्रोरामकृष्ण गुक्त गितीमुस सस्मरण १ २०१४ वि० पयनिया १४५ (१६) प्रसाद और उनका साहित्य विनोटार व्यास, मस्वरण १,१६४०ई० (१०) प्रमाद एव पत का तुलनात्मक विवेचन प्रो० रामरजपाल रिवेदी सस्करण १ स० २०१४ वि० (१८) प्रसार के नाटको का शास्त्रीय मध्ययन जगनाथ प्रमान शर्मा मस्करण ५, म० २०१७ वि. (१६) प्रमार की नात्याला एव स्कन्दगुप्त समीक्षा रामप्रमाद अग्रवान सस्करण (२०) प्रमाद का नाट्य चिन्तन शिखरचन्द जन सस्करण १ (२१) प्रमात एक अध्ययन प्रो० रामरतन भटनागर सस्करण १। (१२) प्रमात तीन ऐतिहामिक नाटक, राजेश्वर प्रसाद अगर मम्बग्गा । (२३) प्रमाद व तीन नाटक प्रमनारायण टइन सवरण १ (२४) प्रमाद के नाटकीय पात्र जगदीश नारायण सस्करण १ । (२५) प्रसाद की कला गुलाबराय, मस्करण १। (२६) प्रमार और उनक' नाटर वेगरी कुमार सस्करण १ । (२७) भारतीय दर्शन बलदेव उपाध्ययाय सस्करण ४ १६५८ १० (२८) भाग्न सावित्री वामदेव गरण अग्रवाल मकरग ३ (E) मनुष्य का भाग्य ल काम्त द नाप, ( हिदी अनुवाद) ( ) मानविकी पारिभाषिक कार ( माहित्य खड ) सम्पादक डॉ० नगर मस्मरण १९६१ (३१) मीमामा दान मडन मित्र मस्करण १ (३२) मुनि हजारीमल स्मतिपय सम्पादक गोभाच द्र भारिल्ल मस्करण' (३३) मूगाव डॉ कहैया लाल सहन मस्करण १ १६६३ इ. मस्वरए १६५३ इ० (३५) वयि देवशास्त्र अनुवाट डा. सूपकान्त मस्करण १ १९६१ ई० (५६) साहित्य तान चीरानी गुटू मस्करण १९५० ई० (३७) हिन्दी विश्व का सम्पादय नग नाथ वसु सस्करग १९२८ इ० (८) हिन्दी विश्व को ना०प्र० सभा मस्सरण है। (३६) हिली साहित्य का भाग १ और २ सम्पादक धीरद्र वर्मा मम्वरण १ (२०) हिन्दी साहित्य का इतिहास रामचन्द्र शुक्ल सस्करण ८ म २० ६वि (४१) हिली साहित्य या वृहद् तिहास डॉ० राजवती पागहय २०१४ वि० में नियनियार डॉ. रामगोपाल नर्मा रिने सम्बर १,१९६४ (1) जान भी गरिमा र उपाध्याय ममरण १९५६ ६० (३४) विवेचन १ मस्मरण (५२) ीि पाव्य

प्रमा-गालोम गिरि
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Edition 1936
(10) The Religion / X Philosophy of the Veda And
Upanishads AB keith Edition I
F

एक अय महत्वपूर्ण प्रकाशन
डॉ. अमरपाल सिह
कृत
तुलसी-पूर्व राम-साहित्य
राम माहित्य के प्रमुसतम महापवि
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का विपद विवेचन प्रस्तुत करने
वाला शोध ग्रथ
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रचना प्रकाशन
इलाहावाद-१

Prasad Ke Natako Me Niyativaad

Author
Sharma,padhyakar
Title
Prasad Ke Natako Me Niyativaad
File name
Prasad Ke Natako Me Niyativaad
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2010/12
Publisher
Allahabad,rachna Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
515094
Barcode
4990010022747.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
86ZMBu9RLT0
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