Hindi Sahataya Samalayan
Sringar Satak
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जग संजय
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কক্সক্ষত
স্থায় মহিমা ০ অজান্তাহজ: শিশ্ন
তেল ১ , ল ও হল ০ ০, হলে ও গাও যে শু =
আমিই মিলি, হত্যা ও অoি
ফলি। ভুয়াহিতিল
অন্য সব
সানি
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০
অহাৰ কি, ভাং
ভালই লাখ
বালাই, ২০ অ৩
হল মুলা, হিন্দু , মায়া
सर्वाधिकार स्वाधीन ।
সূতত্ব অব ।
मूल्य २ प्रति
বিহী-খা ঘাঙ্কা কা ২২% কাহল স্থীয় ২০ ও আঁকি
पुस्तके एक साथ लेने वालों के ३०% कमीशन मिलेगा।
समर्पण
মা ,
এছু seat
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সুভঃ জুলজি হল
কি অ, অয়ন হুক (ক? ।
Fখল ক অশাল জ ন হবান জ ই মূহ
হাত শ ম গ লাল মাখা মাখ ল হ ক ভাল
হয় ? দুই ভ সুলল ম ঙ্গ যুক্ত সহিনি বা
ই জীৎ যথাৎ হীহুলি কী ভ? কাকা াি ই ভ র নি
হল সৃপ্তি : নানক দুই দল ! স্বামী মা
অন্তবদ্ধ ল ক খ -ইন্স ল ন অ মানুষ স্বত্বয় কখন হ লুক
ভী াঅ সীৰ দাল সাৰ জী যা ই শ ষ কি? এ অদ।
লিল বা অ ল জুম এ হা ।
স্থাবন্ধা স্থল বলে—
সাত লিঙ্গ
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ཚུ་ - ཋག – སྤྱི་ཁ པ - གུ་པའི་ཀུ་དག ཚུ ་
ཡཱཀུ ཁུ ཡུ ༔ ཏུ ག་ ལ་ ཚུ་ ཤུད་ ལོ་ ྋ ༔ ཨ ཀ ཁྱེ༼སf
པ་ཙཤཱ ཀྐ F– ཡུ དུ འུ ས ་ པ ལུ་གུ་ སྤྱི་
पर्याप्त संख्या में निकल बड़: और नहीं तो मेरी मित्र
ཨུ་ཚུ ཏུ ཁུ་བྦེ ཡ ཀ་དུ་ཕུལུ་ ཡེ ས ་ ? -ཚེ ཚེ དུ
ཚཤུ ༔ ཨུ དུ དུའེ་དུ ཚུ སངས་་ ལུ་ ཡས་ པས དེ 7Flq
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སྐབ=ཙུ ཚུལ་ གྱི ལ ་ གླུ་
भूमिका
इस ग्रन्थ का विषय चार खण्डों में विभक्त किया गया है।
ग्रन्थारंभ की प्रार्थना और विषय प्रवेश के बाद रूप खण्ड
रखा गया है जिस में पहले नायिका की परिभाषा और फिर
नायिका की अवस्था अथवा आयु के अनुसार बाला,
वयः सन्धिवती और तरुणी का वर्णन किया गया है। लड़कपन
के अन्त और यौवन के प्रारम्भ की अवस्था को वयःसन्धि
कहते हैं। इस अवस्था में रहस्यमय अस्फुटित यौवन के
चमत्कार के कारण अनेक अंगों में अनेक तरह के परिवर्तन
प्रारम्भ हो जाते हैं। कवि लोग उन्हीं का वर्णन अक्सर
किया करते हैं । तारुण्य में तो सौन्दर्य पूर्ण परिस्फुट रहता
है । उस पमय तो संसार के जितने सौन्दर्यमय पदार्थ हैं वे
सब उस तरुणी नायिका के सौन्दर्य के आगे फीके जंचते हैं।
नख से शिख तक उसके प्रत्येक अंग ही अलौ केक लावण्य
वाले और परम रमणीय जान पड़ते हैं। उन सुघर अङ्गों पर
शृङ्गार
भी कर लिया जाय तो फिर उस छटा का कहना
ही क्या है । इस खण्ड में शृङ्गारिक सौंदर्य का चरम
२ )
उत्कर्ष बताने के लिए इन्हीं लब वर्णनों का समावेश किया
गया है।
इसके बाद भाता
अनुराग-खण्ड । जहाँ सौन्दर्य
विकसित और स्फुट हुअा तहाँ अन्योन्य आसक्ति होना भी
स्वाभाविक है। नायिका की छबि नायक के हृदय में घर
करती है और नायक की छबि नायिका को मुग्ध कर देती
है। इस प्रकार अनुराग उत्पन्न होकर वृद्धि को प्राप्त होता है।
यौवन के रहस्यमय भवन में पदार्पण करते ही अनुराग का
फन्दा गले आ पड़ता है । कुलमर्यादा और लोकलज्जा के
कारण मन की बात मन ही में छिपा कर रखी जाती है, परन्तु
वही बात भीतर ही भीतर अङ्गार के समान मन को जलाया
करती है। एक तो वह बात साफ तौर पर प्रगट ही नहीं
होती और यदि प्रगट भी हो गई तो समाज के बन्धन कुछ
ऐसे जटिल और विचित्र हैं कि ऐसे संयोग की पूर्ति ही नहीं
होने पाती। यदि विधाता की परम कृपा से ऐसे प्रेमियों का
विवाह संस्कार बन जाता है तब तो फिर उनके सौभाग्य का
ठिकाना ही नहीं रहता। पति पत्नी पर सौ जान से न्योछावर
हो जाता है और पत्नी तो पतिमयी ही बन जाती है। यही
सब विषय इस खण्ड में है।
ग-वियोग खण्ड में पति-पत्नी के शृङ्गारमय
भावों को व्यक्त करने की चेष्टा की गई है। विवाह के अनन्तर
कई तरह प्रथम समागम के समय अक्सर नायिका को उलकी साखियाँ के पाठ पढ़ाया करती हैं । यदि नायिका परम अनुरागवती हुई तब तो उसे समागम के समय कुछ ज्ञात ही नहीं होता कि कहाँ क्या हो गया। हाँ अलबत्तः रतान्त चिह्न भले ही दिखाई पड़ें । परन्तु जिनमें अनुराग की इतनी अधिक माना नहीं रहती वे पुरुष की अभूतपूर्व पाशव प्रेरणायें देख कर अवश्य क्षुब्ध हो उठती हैं और लज्जा की प्रबलता के कारण उनका रतिभाव बिलकुल दब जाता है। ऐसी हो नायिका को नवोढ़ा कहते हैं। अनुराग की नवीनता के कारण पति को नवोढ़ा नायिका हो विशेष रुविकर होती । इसलिए वही स्वभावतः मानिनी और स्वाधीनपतिका भी हो सकती है। क्रमशः उसमें भी अनुराग की वृद्धि होती है और तब वह लज्जा और अनुराग को समान रूप से धारण कर के मध्या कहाती है। वह शृङ्गार कर के वासकसज्जा बनती है, पति की उत्कण्ठा में उत्कण्ठिता बनती है और लाज के कारण पति की रति में बाधा देकर पीछे दुःखिता ( कलहान्तरिता ) भी बनती है। जब कभी पति के परदेश- गमन की बात चलती है तब वह अत्यन्त खिन्न और दुःखित बन जाती है। जब पति परदेश चला जाता है या जब वियोगावस्था आ जाती है तब वह प्रत्येक ऋतु ही में विरह ज्वाला से जर्जर हुआ करती है । वह कल्पित दूतों के द्वारा संदेशे भिजवाया करती है। उन्माद में श्राकर न जाने क्या २ क्या किया करती और क्या क्या कहा करती है। दयाई हृदयों को उस पर दया पाती है और उनके द्वारा नायक अथवा पति के पास प्रार्थनाये भी कभी कमी पहुँ बाई जाती हैं। नायक स्वयं ही विरह से विह्वल होकर घर की ओर चल दिया करता है और इस प्रकार पुनः वह विर-अभिलषित सुखद संयोग प्राप्त हो जाता है । विरह के इत्ताप ही में तो प्रेम का खरा सोना चमक उठता है और इसीलिए विरहिणी नायिका जब श्रागत-पतिका बनती तब उसमें अधिकतर रति की भावना लज्जा को परास्त कर देती है और इसीलिए वह बहुधा प्रौढ़ा के समान आचरण करती है। संयम के बाद इच्छानुकूल संयोग ही सन्तानोत्पत्ति का कारण हुआ करता है और संन्तान का मुख देख कर ही गार्हस्थ्य के संयोग- वियोग का सुफल प्राप्त होता है ! यही सब विषय इस खण्ड में कहा गया है। चौथं खण्ड अर्थात् परिशिष्ट खण्ड में कलुषित प्रेम की कथा है। मनुष्य नवीनता का प्रेमी है। एकपत्नो-व्रती बिरले ही हुश्रा करते हैं। अधिकांश में तो मनुष्य अात्मा के सौंदर्य के प्रेमी न होकर शरीर-सौंदर्य के प्रेमी ही हुश्रा करते हैं । जब पत्नी का शरीर सैौदर्य पुरुष को विशेष मुग्ध नहीं करता और पुराना सा जंचने लगता है तब उसका मन-मधुप किसी नये ही पुष्प का पराग प्राप्त करने के लिए लोलुप हो उठता है। यदि वह अपने प्रयत्न में सफल हो गया तो कुछ दिनों में उस
( ५ )
की शरीर-चेष्टाओं इत्यादि ही से उसकी पत्नी को सत्य का
पता चल जाता है। यदि पत्नो परम शोलवती या नवीना हुई
तब तो वह हृदय मलान कर ही रह जाती है, यदि प्रौढ़ा
हुई तो लड़ पड़ती है अथवा अपनी व्यंग्योक्तियो से कपटो
पति की कपट-वार्ताओं के छक्के छुड़ा देती है। यदि हृश्य पर
धर्म और शील की दाल न रही तो वह भी किसी न किसी
ओर दुलक पड़ती है क्योंकि आखिर वह भी तो वासनाओं
से मुक्त नहीं रहती। यौवन की उमंग, पति की उपेक्षा,
विलाली पुरुषों के प्रलोभन और कुटनियों के समान दूतियों के
कुपरामर्श और कुकृत्य ही स्वकीया नायिका को परपुरुष
पर भाटत करके परकीया बना देते हैं। एक बार उस
विषैत्री मादकता का प्रास्वादन कर लेने पर फिर तो वह
नायिका स्वयं ही अपने प्रेमिक के लिए अभिसारिका बनती
है ( अर्थात् संकेत के एकान्त स्थलों पर अंधेरी रात
में भी अकेली पहुँच जाया करती है। वह प्रेमिक जब कभी
दूसरी ही प्रेमिका के फंदे में फंस कर इसे खण्डिता
( अर्थात् आशा की अपूर्ति में निराश हो जानेवाली ) बनाता
है तो भी यह क्षोभ, दुःव या क्रोध के चपेटे खाती हुई फिर
भी उसी कलुषित प्रम की उपासना में रत रहा करती है। वह
वचन विदग्धा बन कर अपनी बात छिपाती है, दूसरों से
प्रतिबोधिता होकर भी अपनी आदत नहीं छोड़ती तथा
एकान्त स्थल में जाकर परपुरुषों को अपनी चेष्टाओं तथा
( ६ )
---
-1
बचनचातुरी से श्राकृष्ट किया करती है और लक्षिता बन
गई (अर्थात् पकड़ गई ) तो सुरत-संगोपना होकर अपनी
बचनचातुरी ले वास्तविक बात का संगोपन (छिपाव )
कर लिया करती है। यदि उन एकान्त संकेत स्थलों पर किसी
ने प्राधिपत्य किया तो वह अत्यंत खिन्न होकर उनकी रक्षा का
भरसक प्रयत्न करती है। इसी प्रकार वह निर्लज्जता धारण
करते हुए मनुष्यों को भ्रष्ट करती हुई कुलटा बन जाती
यदि विलासी पति और परकीया पत्नी का यह जोड़ किसी
प्रकार चलता रहा तो ठीक ही है। अन्यथा यदि कपट प्रबंध
और लज्जा के बंधन फीके जंचे तब तो वह गणिका ही बन
जाती है और उसी में पुरुषों का सर्वस्व स्वाहा हो जाया
करता है। भावों के इसी क्रम के अनुसार इस खण्ड में छन्दों
का ऐसा ही क्रम मिलाया गया है।
यह अंतिम खण्ड अपने समाज की वास्तविकता का
चित्र है और इसलिए यद्यपि इसमें आजकल की रुचि के
अनुसार स्वकीया के सुदर प्रेम की कहानी नहीं है तथापि
इस कलुषित प्रेम का वर्णन भी समाज सुधारको को अनेक
अंशों में लाभप्रद प्रतीत हो सकता है
-बलदेवप्रसाद मिश्र
श्री
शङ्गार-गतक
प्रार्थना-
(१)
आधे अंग भसम सुगंधि सोहै आधे अंग
आधे गरे मुण्ड साहैं आधे सुप्रसून माल ।
স্থা স্বী লালু আ ই স্মালয়া
श्राधे कटि बाघकाल प्राधे पट है विशाल ।
आधे नर रूप आधे ललना ललाम रूप
देखि यह हाल भूले मनमथ हू के ख्याल ।
कवि राजहंस ऐसे एक जीव एक प्रान
एक देह गिरिजा गिरीश सुख दें रसाल ॥
घुघराले बाल। कामदेव । ...
( २ ) प्राक्कथन- (२) रूप रस रंजित धरा के साजबाजन में सब ते प्रथम छबि ही की गाथ गाई है। सोऊ परिपूरन बखानी सुखदानी, सब- विधिन से रूरी कविता ही महँ पाई है। काव्य माहि रस रसहू में है शृंगार रस, ताहू में विभाव ही की महिमा सुहाई है। रुचिर विभाव हू में " राजहंस" सुखसार नायिका नवेली ही नितान्त मन भाई है। रूपखण्ड नायिका- (३) तन सुबरन पै सरस रूप सोहै जेतो तेती ताकी थिति गति सील गुन गायिका। "राजहंस" झलकत जोबन से अंग अंग अंखियाँ बिसाल सुचि प्रेम परिचायिका ॥ कुल बिभुता को दरपन मुख-भाव बन्यो भूषन सरस साजि नैनरस पायिका* । पाखों को अमृत पिलानेवाली।
( ३ )
अलित वसन से बदन दुति दूनी करि
दमकति जाति देखो दामिनी सी नायिका* ॥
-
aderation
(४)
चंचल चाल चितवन चंचल चंबल कैचित तैहू समावति ।
'हंस' जयंद समानम गौन तबौं निज भौन हिये में बनावति॥
डीठि करै जेहि ओर तहैं सुख को सहुँधा बर स्रोत बहावति!
बालहि में तो इतो करती तरुनी बलि काधौं रैली कलावति ।
(५)
बयःसन्धिवती...
चरनन छाँड़ि चंचलाई श्रव नैनन में,
अपनो नाय रही रुचिर गार है ।
"राजहंस" त्योही धीरताई मंजु नैनन की,
चरनन करि रही अपना अधार है ॥
जाय रही सघन जघन, उरजन पर,
कटि को प्रदेस त्यागि गुरुता अपार है।
तापै डीठि डारि मन थिर रहि जाय कैसे,
थिर जब नाहीं ताको तन सुकुमार है ।।
ॐ रूप, शील, गुण, यौवन, प्रेम, कुल, विभुना और भूपण इल
प्रकार पाठ अंगों से पूर्ण स्त्री को नायिका कहते हैं। इस अवस्था में
कमर पतली होने लगती है, स्तन तथा नितम्ब बढ़ने लगते हैं। गमन
मंद होता है । आँखें चंचल होती हैं इत्यादि। नितम्ब प्रदेश ।
।
( ४ )
उरजनि उठनि बिलाकि बनिता की बीर !
काहे धौं तनैने नैन बाँकुरे बनत जात !
"राजहंस' हिय में सनेह को विकास लखि,
काहे धौं अनंग रंग अंग में चढ़त जात ॥
जानि न परत भैह कुटिल बिलोकि काहे,
মুল ল ম মুখীন অব জার!
जुगल नितंब गुरुता की दौर दारि रहे,
कटि धों बिचारी काहे लाजन मरत जात ॥
(७)
जेता गजगौनी को जघन है विसद होत
तेती तेती ताकी कटि पातरी परत जात ।
जेती जेती कटि खीन होति जाति तेते तेते
ताहि देखिबे को दोऊ उरज उठत जात ॥
जेते जेते उठत उरोज उर 'राजहंस'
तेती मुख माहि भाव भंगिमा भरत जात ।
जेतो मुख भाव तेतो जमत हिये मे नेह
जेतो नेह तेतो नैन माँहि प्रगटत जात ॥
(८)
लरि लरिकाई से हटाय ताहि "राजहंस"
जब ते मनोजराज मन में बसत हैं।
( ५ )
तबतें न रैन दिन गहत सिधाई नेकु
उड़त परत हैं अधोरता धरत हैं।
चौंकि चौंकि बोर चौकड़ी भरत मनु
नलिन* कलिल पर और थिरकत हैं।
मेरे जान मैन भयनानि मन नाहिं सखि !
लोचन-कुरंग तुव कानन। भजत हैं।
(६)
अज्ञात यौवना
दुख मैं निज कासों कहीं सजनी!
तन की गति अद्भुत ह
गई री।
नित घाँधरि लंक ढीली परै
थिरता आँखियान ख्वै गई री॥
हिय पै जुग प्राय फफोले उठे
मन की सो ढिठाइहु ध्चै गई री।
हँसतीं घरवारी कहीं जब मैं
नहीं कोऊ उपाय बतै गई री॥
* कमल । + जंगल तथा कान (तक)। जो यौवनागम के समय
शरीर के परिवर्तन का रहस्य नहीं समझ सकती उसे ज्ञात-यौवना कहते
हैं। कमर।
(१०)
प्रस्फुट सौन्दर्यवती तरुणी-
कंज प्रिय लागै इत उत है मधुर चंद
वल्लरी मनोहर प्रसूनहु ललाम है।
हंस कीर कोकिल कपोत हैं कलिला इत
उत "राजहंस' मृग मी अभिराम है
जन मन चि है विषम, एक कहक
अपरहिं अपरहि सुखद निकाम है।
হি হি দ্বিাহি অ আ ক খ
एकहि सबै विधि केतु को धाम है।
*छबि बनिता की रबि लीभमन्द महल,
सोतल जुन्हाई सी महीतल छाजती।
मृदु अकलङ्क है भायंका से मुखार
दामिनी सी बदन की दीपति भ्राजती॥
चरन उषा से धन धन से घरे बह
तारन से तार सारी निलामी विराजती।
इन्द्र धनु रंग ला सुरंग चोल कले चार
नायिका नवेली है गगन सम राजती॥
ॐ यहाँ से प्रकृति के भिन्न भिन्न पदार्थों (गगन, समुद्र, नदी, नगर
पंकज, लता, चिड़ीखाना इत्यादि) तथा नायिका में समानता विविधः
अलंकारों के प्रयोग से दिखाई जाती है। चंद्रमा ।
( ७ )
मिटै रद
(१२)
करें तप सीप परे जल में,
बनिबे को सुकानन के उपमान ।
प्रवाल, पलोटत पाय सदा
बिसराय मनोहरता को गुमान ॥
हँसी मह हीरे निछावरि होत,
सों
मुकताहल मान।
कहाँ रतनाकर चाकर लो,
है कहाँ बनिता सुषमा की खदान ॥
(१३)
जाँधै हैं न रुचिर नवेलो की जुगल ये तो
नदियाँ अनूप संग संग बहि आई हैं।
भंवर बन्यो है तिनसों न नाभि सोहै यह
त्रिवली; नहीं है ये तरं, मन भाई हैं।
रूप रासि नाहिं जलरालि यह 'राजहंस"
बार नहिं यह तौ सेवार स्यामताई है।
कल कल नाद है न यह कलनाद है
सुनद अहै यह तौ न बाल छबि छाई है।
। १४ )
मंजु मकरंदा हू से सुन्दर सोहात गात
केस आगे अलि की अली|| है मौन है गई।
मूगा। कटि पर पड़ी हुई तीन रेखाएं। पराग। || पंक्ति।
(८1)
नूतन पलास पाँति नैनन निहारि हारि,
सलिल की ओर निज देह डारि नै गई।
"राजहंस" सुघर
सरीर की लुनाई पेखि,
पानन की मंजु सुघराई धैों कितै गई ।
कंज-मद-गंजनी मनोज-मन-रंजनी,
सिंगार-सर मोहिं कैसी बाल है उदै भई ॥
(१५)
उन्नत पहारन* से दुसह दरारना से,
गज सुड भारत ले नेकहू न जो नयो।
पन्नग, मतंगा, सिंह, विहंग || , कुरंगन x सों,
"राजहंस" जो न एक छन हू तजोगयो।
बेंत की लपनि+, सरिता के कलनाद नि+,
सुलतिका + रूपेटनि को ठाठ जह है ठयो।
सुन्दरी के सुन्दर शरीर में विहार हेतु,
विरच्यो विरंचि ने प्रमोद बन है नयो ।
ॐ स्तन इत्यादि। + कर्ण-रंध्र, नासिका-रंध्र, नाभि इत्यादि ।
अरू। $ केश । गमन । * कटि। ॥ छन्द १९ के अनुसार
कोई भी अंग। ४ दृग ( नयन ) । + विलास, हावभाव, वाणी
आदि।
१)
(१६)
दन्तन की पंक्ति कैधै कुन्द-कुसुमित-डार,
अधर ललाई कैधै| पल्लव को राग है।
गोरो गात कैथै लोन चम्पा को कुसुम,
"राजहंस' जाँघु कैधों कदली को पृथु भाग है।
कैधों गुलाबास एक फलन में फूलि रह्यो,
कैधों यह मांग पर सोहत सोहाग है।
कैधों यह नारि कैधै कामिजन मानस को,
रुचिर बिलास धाम अनुपम बाग है।
(१७)
भैौर न, केसन की अवली, न कली; यह नैन लली के लखात है।
लाल प्रवाल न, है मधुराधर; पात नहीं, यह कोमल गात है ॥
हैं कुच, 'हंस' प्रसूनन के नहिं मंजुल गुच्छ लु द्वै सरसात है।
फूल सुवास न, है मुंह वासान बेलि, सुया तौ नबेली* सुहात है।
(१८)
राज है मनोज को उरोज रूप के हैं कोषा
अवयव नगर निवासी हैं चटकदार।
सुबरन सरसत घरन घरन तह,
नैनई जहाँ पै हैं बटोहिन के बटपार॥
"राजहंस" रुचिकर जघन सघन पर,
राजि रहे नृप के उतंग अमल अगार ।
नायिका । खजाना। धन और सौंदर्य । डाकू।
.
U
( १० )
काको मन भ्रमत न नागरी गुनागरी के,
तन-नगरी को देखि देखि एतो बिसतार ।
(१६)
"राजहंस" राजहंस का* निवास एक छोर,
एक ओर मोर को कलाप रुचि लै रह्यो।
खंजन के मध्य सुकराज निज वास करि,
कोकिल की ओर अति मोन हचितै रह्यो ।
रुचिर कपोत निज श्रीवहिं मरोरि चारु,
चक्रवाक + संग सैन माना कछु कै रह्यो ।
मेरे जान कामिनी के मिसु कामदेव जू को,
मंजु चिड़ीखाना निज बाँकी छबि दै रह्यो।
२० )
-
जाको मुख देखि दुजराज हार मान सदा
जाको गौ गजराज गरब गरावैरी।
लपि लपि लंक मान मर्दै मृगराजन को
उन्नत उरोज नगराजन नवावैरी ॥
जाको मंद गौन पेखि वारि जात "राजहंस'
मृदु गात फूल राज फीके दरसावैरी।
-
® हंस की सी गल । + मोर की पूछ सा कुसुम-गुम्फित बालों
का जूरा। आँख । नाक । (वचन) मुख। गा । + स्तन।
ऐते राज राज हैं बिराजि रहे जाके अंग तरुनि समाजन न काहे सो हरावैरी॥ २१ ) indi पायन के रंग सरसुति से, बदन गंग, बेनी सीसरंगन कलिन्द कन्यका के राजत अधर रंग, हीरा से दसन संग, जा सुमिती के रंग रंग जमुना के हैं। कारे कारे तारे संग गोरे गोरे कायेन चै लाले लाले मद भरे रंग के झमाके हैं। "राजहंस" एक ही की को कहै त्रिबेनी जू के संगम अनेक अंग माँहिं अबला के हैं। ( २२ ) केसरि मतंग संग संग रहैं "राजहंस', चन्द्र चक्रवाक की मिताई मंजु लेख्यो में। रूपकातिशयोक्ति अलंकार के अनुसार केवल उपमान से हो उपमेय का बोध होता है । अतएव यहाँ पर जो 'केसरी' ( सिंह ) शब्द अाया है उसको 'कमर' इस उपमेय का सूचक समझना चाहिये । ( यही हाल छन्द नं० १९ और १५ का भी है ) इस प्रकार केसरि से कटि; मातंग से जरू; चन्द्र से मुख; और चक्रवाक से स्तन; कीर से नाक और कोकिला से मुख (वचन के कारण ) मृग से नयन तथा चाप से भैह कंज से शरीर तथा शीतकर से प्रानन, पन्नग से लहू तथा मयूर से बालों का कुसुम- ( १२ ) - कीर कोकिला को बंधु भाव सो निवास देख्यो मृगन के सेवी से सुचाप युग पेख्यो मैं ॥ सीतकर संग पाय बिकसत कंज लख्यो पन्नग मयूर एक संग तह देख्यो मैं। भाजि गये नियम नवेली को शरीर त्यागि मंजुल तपोवन सो ताहि अवरेख्यो मैं ॥ ( २३ ) नखशिख- लोटत तिहारे हियरे पै सटकारे तऊ देखत ही औरन के हियरे बिदारे हैं। चारु चन्द चूचन का सहज सुभाव तजि राजहंस' ताकी दुति दूनी निरधारे हैं । छनहूँ न छाँड़त तिहारो जऊ संग तऊ कामिन की प्राखिन से टरत न टारे हैं। ऐरी निरदयिनी फंसाय भरमाय तैने सुहृद बनाय कैसे धारे नाग कारे हैं ।।* गुम्फित जूरा-ऐसा समझना चाहिये । वस्तुतः प्रकृति में इन पदार्थों का पारस्परिक विरोध है, परन्तु नायिका के शरीर में इनकी ( इनके उपमेय की मित्रता ) तथा पारस्परिक सहानुभूति देखी जाती है। अतएव वह (शरीर ) तपोवन तुल्य हुआ। केश वर्णन । यहाँ से पृथक् अंगों का ( केश, मुख इत्यादि वर्णन किया जाता है।
( १३ )
( २४ )
तेरो मुख चन्द सो चकोरन लगत
अरविन्द सा लगत है मलिन्दन* के गन को।
दरपन सम दरसात "राजहंस"
अवदात यह मनहर पीतम के मन को॥
सुबरन गोलक सुवासित सखीन कह
जानि परै लाज को डबा सो गुरुजन को।
प्रखर प्रभाकर समान है लखात यह
ताप पहुँचावन में सौतिन के तन को ।
( २५ )
राका घटै पै बढे यह; सो निसि ही में रहै, यह आठहु याम है।
ताहि मलीन बनावनवारी, बनी मुख की यह कांति ललाम है ।।
जौली रहै यह तौलौं रहै वह, जो यह ना तो हुवै न अराम है।
राका बराकी बनै सम कैले लसै यह तो निसि में जनु घाम है ।
( २६ )
में अखियाँ अंखियान ते नाक तहाँ पै बुलाक सुहाय रही।
जुग ओठन के बिच हीरक से रद की अवली मन भाय रही।
मनु मोतिन पूरित विद्रुम की डिबिया छबि है सरसाय रही।
तह से मुकतान निकारि सुकी दोउ खंजन को तरसाय रही ।।
• भ्रमर । पवित्र । मुखयु ति वर्णन । $ दांत । । मूंगा। :-
( १४ )
देखि परै
भौंहन
( २७ )
*मंजुल भानन में कवि 'हंस' मनोहर नैनन पै अति नीको।
जुग
के बिच लाग्यो सुकेसरि को बर टीको।
मानहु नैनन के पलरे करि डाँड़ी सु भौंहन की अवली को।
टीके को मंझा बनाय मनोभव देत कटाच्छन लेत है। ही को।
( २८ )
कैधों तुव चाकर चतुर अनियारे पैठि
हृदय-पयोधि मन मोती के कढैया हैं।
"राजहंस" कैधों मनसिज के सुहृद बनि
ताकी हुति तीछन कटाछन चलैया हैं ।
कैधों नरधीरता की थाह
लै
कहत कान
कैधों तुव चित चंचलाई दरसैया हैं।
कैधों ये तिहारे छबि वारे बर नैन बाल
रसिक हृदय लाह-चुम्बक बनैया हैं ॥
( २६)
कंजमद गंजन हैं अंजन से रंजन हैं
खंजन उड़ाय धीर भंजन बने अथोर ।
नयन कुरंगन के रंगन को भंग करि
अंगन अनंग को भवन करें ये छिछोर ॥
* तिलक वर्णन + तराजू की डंडी के बीच का डोरा । हृदय
+t कमल। नयन वर्णन
( १५ )
चार।
मीनन के मारक बिदारक बियोगिन के
पारक पलासन के चित्त के
चतुर
"राजहंस" कैसे
क्रूर
कुटिल कटाक्ष वारे
'नाक' ढिग बसे कलानिधि को करे जो फेर॥
प्रवाल प्रभाहर दाखन से अधरान पै हंस करें जो निवास ।
रदक्षता ऐसे मनोहर देखि यही उपजै मन माँहि विसास ।
कि जो तिय लोन भरे तन को रस लेत समै उपजै हिय तास ।
बनाय पियूष नदी तट चूहे बुझावत जात पिया सोपियास ॥
( ३१ )
अध खुले पंकज-बराटक || कहत कोऊ
कोऊ कहै ससि माँहिं संपा+ आय टूटी है।
कोऊ कहै विद्रुम से मोती को प्रकास मंजु
कोऊ कहै पान पै कली की छबि जूटी है ॥
कोऊ कहै मृदु मुसकानि बनिता की यह
पीयुष की धार सी
सुधाधर
सों छूटी हैं।
--
ॐ नासिका, स्वर्ग । + दन्त क्षत । नदी के तीर के कृत्रिम गढ़े
जिनसे पीने को पानी लिया जाता है। वास्तव में दन्तक्षत का वर्णन
शेष तीन खण्डों का है न कि इसका परन्तु नखशिख में प्रसंग वश यहाँ
लिख दिया गया है । || कमल फूल के पीले फल । + बिजली।
x मन्द हँसी वर्णन।
( १६ ) "राजहंस" मेरे मन माहिं यह श्रावै मानों सोभा सिन्धु माहिं सुषमा+ की रासि फूटी है : ( ३२ ) कैधों यह रूप के बटोहिन की बाट मंजु रूप के खजाने उरजन* तक जात है। कैधों यह सीसा सो उदर-बर पार करि बेनी की मनोहर सुछवि छहरात है । कैघों यह मृगमद की बनी लकीर बर कैधों रूप कूप जात सांपिनी लखात है। कैधों यह रोमराजि राजि रही "राजहंस' कैधों मनसिज धनु-डोर सरसात है । ( ३३ ) शृङ्गार- घेरदार घाँघरे पै चूनरी चुनी है चारु उन्नत उरोजन पै कंचुकी कसी रहै। तुम्ब से नितंबन पै मंजु बैन दैन हारी, "राजहंस" मैन ऐन मेखला बसी रहै ॥ हीरन के हार सी सुहावनी दसत पांति, ताके बीच बीच पीक लीक सरसी रहै। r + परम शोभा । स्तन । कस्तूरी। पेट की रोम रेखा का वर्णन है। नाभि किंकिणी, करधनी ।
( १७ )
पायन छराके छोर, हाँधन जड़ाऊ कड़े
हिये हार, बारन पैमालती लसी रहै।
सुन्दर सिंगारन से अंगन सजाय बाल
विविध
दुकूल
नित धारिबो करत है।
'राजहंस' अतर, फुलेल, तेल, फूलन से
चहुँ ओर महक बगारिबो करत है ।
अंजन से नैन, मुख रंजन सा दन्तन की
चौगुनी चमक चारु पारिबो कहत है ।
मोहि निज बारन के भारन सँवारन में
आठों याम पारसी सँभारिबो करत है।
( ३५ )
लम्बे लम्बे सघन कचन* बगराय बाल
पाय उचकाय निज पैंगनि बढ़ावती ।
चन्दहिं दिखाय मुख इत सरसाय सुख
भुजनि उठाय भुज मूलनि दिखावती ॥
उड़ति, परति है परी सी रसरीन थाभि
लंक लचकाय झीनो पट फहरावती।
ॐबाल
फैलाकर
। पिवला, झिल्ली।
२
( १८ ) 'राजहंस' छन छन प्राय छबि दरसाय झुकि झुकि झूलि जन मन है मुलावती ॥ अनुराग खण्ड ( ३६ ) जायक हृदय- सुरूप नदी अवगाहन* हेतु गयो मन 'हंस' जबै तेहि पास । रह्यो थकि चक्रित त्यों चित भो फैसि फाँसनि में उपजी हिय त्रास ॥ बिलोक्यो जबै घटा द्व जल में, तब तो बचिबे की भई कछु श्रास । गयो जब पास भ्रम्यो हद मो, उबरै को कपूर भयो सो विसास ॥ चन्दन चन्द न सीत लखात म कुन्दन कुन्दन मनोहर भावै। * स्नान । स्तन । भँवर, नाभि( घट के सहारे मनुष्य नदी पार कर जाता है परन्तु घटों के पास जाने की इच्छा करते ही मननामि रूप हृद में भ्रम गया ।) $ बचने का विश्वास उड़ गया । मोगरा फूल ।
( १६ ) बीनन हंसन क्वैलिन के बर बैन हियो न कब हरसावें॥ खंजन कंज कुरंगन के दृग फेरि कब सुखना सरसावै॥ अंगन, बैनन, लखे मन भूलि तह रहि जावै॥ नैनन नेकु मेरे मन ! मानि मेरी बात बनिता की लट- नागिनीन माँहिं निज अंगन फंसैयो जनि भूल से फंसे जो जाय तो तरे उतरि आय ताके गोरे गातन में गातन गयो जनि ॥ उबरि उपायन से लालची सुभायन से 'राजहंस' उन्नत उरोजन पै ऐयो जनि । उरजन श्राय भुज मूलन समाय तुम बढ़त बढ़त ताके हाथ परि जैयो जनि । ( ३६ ) छाय गई ब्रजमण्डल में वह होरी मनोहरि गेहन गेहन । औरै भये रंग "हंस" विहंगन बागन बीथिन गेहन देहन ॥ * मोहन रंग चलायो इतै उत बाल उड़ायो गुलाल के मेहन । भीजि गयो उत्त सुन्दरि रंगन, भीजि गये इत श्याम सनेहन ॥ होली वर्णन।
( २० ) ( ४० ) ह गयी रुचिर सपने सी वह “राजहंस" पथ के पथिक कह चित्र सम कैगयी। मंजु छबि दरसाय रूप की सुधा पियाय ताके उर बिरह की बिस बेलि बै गयी । ज्ञान, बुद्धि, धीरज, बिबेक, लाज, सील, सुख सब ही से ताको वह हियरो रितै गयी। अनल की झर सी झरोखे से झपकि झाँकि, झझकि झाटति झुकि अपि मन ले गयी ॥ ( ४१ ) नायिका हृदय- पै * चरावत धेनु निकुजन में जमुना तट अम्ब कदम्ब मझार । हिये बनमाल बिसाल सजे कल मोरपखान सँवारत बार॥ घरे मधुराधर वर बेनु अलापत मंजुल तान मलार । गयो गड़ि औचक ही सजनी ! दृग से मन लां वह नन्दकुमार ॥ ( ४२ ) इतते घर को घनस्याम चले उतते कल बाम चली जल को। इनको मुख चन्द उन्हें दरस्यो उनको तन श्रोप इन्हें झलको ॥ ढिग बाल गयो मन बालम को ललना मन लालन पै ललको। इनको घर देखि पर्यो तहँ 'हंस' उन्हैं जल हूँ तहँई छलको । 8 श्रीकृष्णावलोकन । परस्परावलोकन ।
( २१ )
( ४३ )
कटि तक उन्नत सुछज्जन झरोखे तीर
कर पै कपोल दये झुकि इत ठाढ़ी बाल ।
'राजहंस' ऐसेई झरोखे पर हाथ धरि
ताकि रहे उत से गुवालिनीहिं नंदलाल ॥
तारन के तार बिन तारन के दौरि रहे
दुहुँन के दोऊ श्रोर, है रह्यो यही हवाल !
नैनन से नैन मिलि मन बदलाय, अब
पियत दलाली महँ रूप की सुधा रसाल ॥
.
अनुराग रँग्यो है जऊ मन में
तऊ बालम बाल उदासी रहैं।।
जल जो पै भर्यो निसिद्यौस तऊ
अँखियाँ दुखिया सी पियासी रहैं॥
जऊ बीते अनेकन बासर हैं
तऊ पास हिये कलिका सी रहैं।
+
आँखों की पुतलियाँ ( तारे ) बेतार का तार दे रही हैं।
विरोधालंकार' [अनुरक्त होकर उदासी ( संन्यासी ) रहना; इसी
प्रकार और भी जानिए ] यहाँ विवाह के प्रथम की वियोगावस्था
वर्णित है।
J
( २२ )
बिधि की गति बाम लखा तो सखी!
वे सदा चकई चकवा सी रहैं ।
( ४५ )
दरसन होत ही नयन झाँपि जात आपु
चाहत कहत पै न कहत बनत बात ।
लाज कुल शील के
सुफन्द
में फैस्यो है हीय
जागि जागि भाव मन ही में रहि रहि जात ।।
कवि "राजहंस" कैसे सेजिये सँदेस बेस
हियरो जनाइबे को लागत न कोऊ घात।
आँचहू न बाहर निसारी निसरत, पर
प्रबल अनल ही से भीतर जरत गात ॥
( ४६ )
मनोज बिथा* सो बिथा। मरिबे
हित पायो सखी! नर
तनु हाय।
न क्यों तेहि कानन में जनमी
जह जात गोपाल चरावन गाय ॥
तहाँ बनमालहु
तौ को हरि लेत हिये सों लगाय ।
जु होती सिला तो बजावत बेनु
कब न कब हरि बैठत आय ॥
को
जु होती
मैं
ॐ व्यथा । वृथा।
( २३ ) ( ४७ ) विवाह-वार्ता- पायो संजोग मनोहर कैसो सो बातें सबै सखि नीकी बनीं अति । कै करुना कवि 'हंस' दुहूँ दिसि अनुकूल विरंचि रची मति ॥ प्रासैं पुजी छन एकहिं में, पल एकहि में बदली दुख की गति । आस न जाको हुतो हियरे, दिन चारिहि में अब हहै साई पति ॥ (४८ ) विवाह- को है री इतेक भागवान और भू पै अाजु जैसे सखि साजन उमंग रस रत हैं। कवि "राजहंस" हेरिये री मेरी बीर तिन्हें बाँकी छिटकाय छबि हियरो हरत हैं। लाजन गड़े से चारु चरनन दीन्हें दीठि हिय में सनेह के उछाह उछरत हैं। मेरु चहुँ ओर ससि सूरज समान आजु ललना ललन बर भाँवरे भरत हैं। -
( २४ )
( ४६ )
स्वकीया-
जाय ससुरारि रारि तम की तमारि बनि
"राजहंस"गुरुजन दासी सी बनी रहै।
जेतो सुबरन सुबरन सो सलानो वाको
तेतोई सुगुनवती सीलन सनी रहै ॥
पीतम की प्रतिमा हिये के अरघा में निज
नेह से जमाय दृढ़ मुदित घनी रहै।
सदन सँभारन प्रवीन, अन्नपूरना सी
भामिनी भवन-अधिरानी अवनी : रहै ।।
( ५० )
जेती चन्दमुखी की छिटकिबो करत छबि
तेरो उर पतिप्रेम जागिबो करत है।
जेती सुघराई को निवास तन माँहिं तेतो
गुन
को समूह अनुरागिबो करत है।
"राजहंस' धन्य यह जाकी तन छाँहि देखि
हिय सो कुमति सब भागिबो करत है।
चंचलाई तजि बायई भगति जनाय जाके
निसिदिन श्राय पाय लागिबो करत है।
ॐ सूर्य । गृहकलहरूप अंधकार के लिए सूर्य के
+ अच्छा वर्ण । पृथ्वी पर । $ वायु ( जो सदा-गति है तथा
सभी स्थानों में प्रवेश कर सकती है)
समान बनकर।
( २५ )
पति-मुख
( ५१ )
की
सुवास ही में मोद पावै नित
पति को परस पाय मन उमँगी रहै।
पति बैन सुधा सी दुरावे जाके कानन में
पति अधरारत की कामना जगी रहै ।
"राजहंस' पतिहिं अकेले सरबस मानै
पति प्रतिमा ही जाके दृगनि रंगी रहै ।
पति तन, पति मन, पति धन, पति प्रान,
पति पद ही की हिय लगनि लगी रहै॥
( ५२ )
इत दीपति दीपति है पति की उतहू तिय की छबि छाय रही।
हियरे महँ प्यो * इत बंद उतै ललना तन माहिसमाय रहो ।
इनकी उनपै उनकी इनपै सम प्रीति प्रतीति सुहाय रही।
इत मोहन मोहत मोहिनि को उत मोहिनि है मन भाय रही।
संयोग-वियोग खण्ड
3
नवोढ़ा मुदिता-
छुट्योतन स्वेद, छके दृग 'हंस' प्रसूनन के बिथुरे सब ताग ।
कटे मधुराधर दन्तन से, उपटी नख रेख, छुट्यो अंगराग ॥
प्रिय, पति रतात चिन्ह पाकर भी जो समागम का यथार्थ रूप
न समझ सके उसे मुदिता कहते हैं।
( २६ )
रही यह देखत मैं सब ही कि थकी मम देह, मिट्यो पदराग।
रहीतवसीख सखी! कहँसो रहिगो कित सो बरन्यो अनुराग।
( ५४ )
नवोढ़ा-
भुज बल्लरि * जालन जो पै फंसी
तबहूँ वह बाहिरै जान चहै ।
पिय जो पै रह्यो समुझाय न 'हंस'
तऊ वह नेकहु ज्ञान गहै ।
मुकरै + जितनो तितनी छवि दै
पिय की अभिलासन को उलहै ।
रस भौन में भावते पै नवला नहिं
पारद। सी थिर नेकु रहै ।
+
---
-
।
( ५५ )
ललकि ललकि लाल भेटन चहत जब
लपि लपि बाल तब लंकहि मुरावैरी ।
मधुर सुधाधर की धार से अधर बर
श्राबरनि सुबरन बरनि दुरावैरी ॥
गात जलजात से सुछ नि छनि “राजहंस"
सरस नवल छबि चित्तहिं चुरावैरी ।
लता पिलटती है बढ़ाती है । पति पारा : कपड़े से
( २७ )
सिसकि सिसकि निज अंगन समेटि बाल
"सी' 'सी' करिबे में सुधा-सीसी सी दुरावैरी॥
( ५६ )
बदन सुधाधर जुन्हाई छिटकाय चारु
चाँदिन के पान से प्रयंक पै मढ़त जात* ।
देखि देखि घन उरजन की उठनि बर
बार बार बालम की कामना बढ़त जात ॥
कटि गहि "राजहंस" पिय भुज
भरै
तब
घन से तड़ित। सम बाहिरै कढ़त जात ।
अंगना मरोरि अङ्ग "नाहीं" "नाही" करै जेतो
तेतोई अनंग रिंग पिय के चढ़त जात ॥
( ५७ )
मानिनी-
बैठी परयंक पर गरब गरूर भरी
लाग्यो है मनावन में पति पाय परि परि ।
"राजहंस" मानि रही नेकहू न बाल यह
पायँ निज ऐचि रही दृग लाल करि करि॥
सखिन के सामने कह्यो
पिय 'प्यारी' प्राय
ताको दाव लेति अब गेस हिय भरि भरि।
-
जु
अपलंग पर चंद्रवदन का प्रकाश फैला कर मानों चाँदी के पत्ते मढ़ती
जाती है। बिजली ।। स्त्री I काम का रंग।
( २८ )
जेतो जेतो मधुर वचन है कहत पति
तेती तेती ऐंठत गुमान ही में अरि अरि ॥
( ५८ )
स्वाधीनपतिका-
मान करौं, नहिं हामी भरौं,
न सिंगारन सो निज अंग सजावहुँ ।
डीठि करौं समुहे न कों
न कबों मधुरे निज बोल सुनावहुँ ।
खात है लात न जात कहूँ
मंडरात है पास मैं काह बतावहुँ ।
एते उपाय करौं तबहूँ नित
सौतिन से दस गारियै पावहुँ ॥
( ५६ )
मध्या-
वह सोवत सो बनि कै परयंक में
मौन बन्यो
बन्यो कबका री डस्यो ।
जऊ बैठि गई तह जाय भटू!
तऊ मोहिं अचेतहिं जानि पखो ॥
• सखी + नवोढ़ा उस नई ब्याही हुई स्त्री को कहते हैं जिसमें रति
की इच्छा बहुत ही कम तथा लज्मा अधिक होती है। जिस स्त्री में रति
और लाज प्रायः बराबर हो उसे मध्या कहते हैं और जिसमें रति अधिक
और लज्जा कम हो उसे प्रौढ़ा कहते हैं।
( २१ ॥
।
-
छबि से छकि मैं झुकि कै अधरारस
चाखन को ज्यों बिचार कर्यो ।
तबल हंसि मों तन देखि* छली।
मोहिं बैंचि सुअंक भर्यो ई भर्यो ।
( ६० )
लैकै कर माँहिं तसवीर निज बालम की
ललना पियति हुती रूप की सुधा रसाल ।
मन में मगन होति पुल कति “राजहंस"
नेह की छलाकनि में है रह्यो यही हवाल ॥
एते ही में दबके पदनि पिय आयो तह
देखि यह पास जाय चूमि लयो मृदु गाल।
चौकि परी, झुकि परी, झपि गई बाला वह
तन जल कन मद्य, मुख बनि आयो लाल ।
( ६१ )
उत्कंठिता
हुती अति पीन पयोधर भार
झुकी कटि यद्यपि कोमल खीन ।
सजाय चुकी सुप्रसूनन को
पुट दै तबहूँ परयंक प्रवीन ॥
बढ़ाय प्रकास उड़ाय सुवास
बिकास दये निज नैन कलीन ।
• देरू कर +पति गोद में दबे पैरों से बाला, स्त्री।
गड़ावत डीठि कपाटन पै यह
कामिनि बैठि बजावत बीन ॥
( ६२ )
वासकसज्जा-
-
मधुरी महक गमकै तन से चिकने निज बार सुधारति है।
पहिरै पट पारसी पारसी लै उर कंचुक मंजुल धारति है।
-मलि आनन पै अंगराग अनूप सुरूप सुचारु सँवारति है।
मुख-रंजन से मुख मंजु सजाय नवेली सरीर निहारति है।
कलहान्तरिता
आयो हुतो पिय 'हंस' विदेश से
पौढ्यो निशीथ प्रयंक में जायकै।
मोहिं रिझावन लाग्यो अनेकन
भाव बताय औ बाते बनायकै।
हैं। हूँ "उहूँ, “उहूँ" के जबलों निज
मान जनायो सु अंग दुरायकै।
तौलौं कहा कहैमेरी सखी ! कढ़ि
आई उषा तम
तोम
हटाय
( ६४ )
अवस्यत्पतिका-
काहे बर आभरन बसन बिसारे सबै,
काहे सोच बाढ्यो, काहे छूटि गयो खान पान ।
के॥
( ३१ ) .
मुखन सुनि
काहे रस आल हून सखियाँ सोहात ताहि,
काहे श्राजु मूल्यों गुरुजन हू को सनमान |
काहे घनसार *हार लागत अँगार सम,
काहे छन छन तन हू को बिसरत ध्यान ।
कवि "राजहंस'' हाय हाय हम जानी, तिय
पिय के
पायो परदेस जान ।।
( ६५ )
वियोगिनी वर्षा-
घहराय घिरी घनघोर घटा
जब जामिनि में छिति मण्डल है।।
करके सुधि पीतम की अँगना :
अंगना में गिरी प्रति व्याकुल ह ॥
नभ के जल के परसे चखन सों
येहि भांति बड़े अँसुत्रा चले च्वै ।
मनु स्वाती के बुन्दन ह निकरे
कल सीपिन से मुकताहल द्व॥
( ६६ )
नैनन से नीर की नदी सी निकरन लागै
जब घन घोर घटा बरसि बरसि जात ।
-
* कपूर +यहाँ से १४ छन्दों में विविध ऋतुओं तथा विरह निवेदन
इत्यादि के साथ वियोग की अवस्थाओं का वर्णन किया जाता
स्त्रिी आँगन । चक्षु; आँख । मिाती।
"राजहंस' कमल से कोमल कलित गात नित्यहि जवासा* ऐसो झरसि भरसि जात ॥ उठति हिये में बड़ी हूक अबला के जबै त्रिविध समीर तन परसि परसि जात । पाय बरसाइति की बाल बरसाइति। तिहारे बिन रैनिन में तरसि तरसि जात । ( ६७ ) गरजै बदरा बदराइ घने उत डारें पलासन की लरजै । लरजै लखि कै हिय कामिनि के उत चातक ऊपर से तरजै ॥ तर तन प्राय कै बुन्द जबै तब होत करेज नि में दरजै । दरजैन परी यह देखत हू ये अजौं अति बेगन से गरजै॥ (६८) हेमना- नवल वयस वारी ससि वदनीहिं भौन- माहिं तजि जब ते गयो है परदेस पति । तबते छरि सी वह दिन दिन सूखि सूखि पातरी परत जात बिसराय धृति मति ॥ ठण्ढ ऐसी कठिन है जामें जमि जात जल, जूड़ी सी चढ़त, देह पटन दुरी रहति । ॐ जवासा एक वृक्ष विशेष है जो बरसात का पानी पड़ते ही जल जाता है। वर्षा का शुभ मुहूर्त । हिलती हैं । दराज, दरारें। कपड़ों में छिपी रहती है। -
( ३३. )
एते हू पै अधराति माहिं ह्र उघारि यह
बिजन* डुलाय परयंक परी तरफति ॥
( ६९ )
স্বৰ
ठंढ की तीखी कटाई कटीं
तौ
कुसुमाकर + के दिन लागि हैं।
पातन के अब नूतन पुज
अंगारन से तरु डारन दागि हैं ।
मौन बनी अबलौं तौ सह्यो
तन में तब प्रान कबै अनुरागि हैं।
पाय बसन्त जबै मदमत्त
'कुहू' 'कुहू' क्वैलिया कूकन लागि हैं।
( ७० )
छूटि गये "राजहंस" असन बसन सब
पीरे रंग केरो परिधान $ पहिरायगौ।
नेह।। हीन रूखे केस करिगो जटान सम
अरुनारी अंखियान नसा सी चढ़ायगौ ॥
पंखा । । बसंत । नये नये लाळ पत्ते अगार के समा
वृक्षों की डालियों को दागना प्रारंभ करेंगे। वन
# स्नेह, तेल।
है
( ३४ ) धरनि की धूरि कै गयो भभूति ताके हित एक मिज नाम ही की रटनि रटायगौ। सरस बसन्त माँहिं जाय परदेस पिय बनिता बियोगिनीहि जोगिनी बनायगौ ॥ ( ७१ ) प्रलाप- "राजहंस' ऐसेई बिरह तन तावै तापै काहे तैं ससी पै ताकी प्रायसु गहावैरे। सुधि सो संजोग की हिये के खण्ड कीन्ह्यो तापै त्रिविध *समीर सांग काहे तै चलावैरे ॥ बीर बनि अबला दुखीन को दहन करि लोक परलोक भीति मन में न लावैरे। ऐ रे मनसिज ! + मन ही को काटि काटि काहे ककरे समान कटु कुजस कमावैरे॥ ( ७२ ) छन तौ छपद ! $ सुनि जाहु मेरो दुख बैठि तुम तौ परम प्रीति रीति के जनैया हो । , त्रिविध-शीतल, मंद, सुगन्ध ।। मन में पैदा होनेवाला, काम- । देव। केकड़े के बच्चे माँ का पेट फाड़ कर ही पैदा होते हैं । षट्पद, भ्रमर।
काटत * कठोर काठ ऐसे परतच्छ पै
सनेही नलिनी के अलि ! बन्दो बनि जैया है। ॥
घायल बिरह से, लगाये हरदी। को रंग,
एते सुमनन हूँ मैं चैन के न पैया है।।
नेकु तौ बिलमि जाहु, भाजि कित चले, हाय !
तुमहूँ तो साँवरे, कन्हैया ही के भैया है। ॥
( ७३ )
बिसम बिसैली चंद चाँदनी जगवै गात
कुसुम समूह अंग अंग छेदि डारे हैं।
चन्दन लगाये ते भये जो तन माँहि घाव
देखहु न आज लों ये मिटत हमारे हैं।
कहियो पवन ! घनस्याम सों सँदेसो जाय
जीव निज सबै
काहू
भाँति उर धारे हैं।
देखि दसा दुसह हमारी बहुबार गये
आँसन बहाय, घन घोर घन कारे हैं।
"कोलत काठ कठोर क्यों, रहत कमल में बन्द ।
आई मों मन-मधुप की, इतनी बात पसंद ॥ ( रतन हजारा )।
भ्रमरों की पीठ पर कभी कभी पीले धब्बे पड़ जाया करते हैं। विस्ता
से घायल होकर ही मानो वह हल्दी लगाई गई है । श्यामता के
.
जाते।
( ३६ ) ( ७४ ) *जग से बिराग भयो, घर बनि बैठ्यो बन तन बलहीन एक आसन पर्यो करै ऊरध उसासन से साँस रुकि रुकि जाति, प्रान तन मन वृत्ति नेकु ना धो करै ।। रहै उर अन्तर निरन्तर पिया को ध्यान तनमय होतहि समाधि सी लग्यो करै "राजहंस" ऊधो ! तुम जोग का सिखानो ह्याँ बियोगिनी के जोग तौहमेस ही जग्यो करै।। ( ७५ ) - विरह-निवेदन- प्रात उठि साजत सिङ्गार से सरीर मंजु बसन मनोहर फुलेलन सितै सितै। अति अकुलाति मुरझाति साँझ होत देखि पीरी परि जाति से विभूषन रितै रितै । रहि रहि जाति मनमारि मैनमारी प्यारी रति सुखकारी चारु चाँदनी चितै चितै । * यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, और समाधि, इस प्रकार योग के ८ अंग होते हैं । वियोगावस्था में इन सब का अनुभव हो जाया करता है।
( ३७ )
--
श्रावनी सुनत स्याम ! रावरी महीनन सों
बावरी बनी है बीर * वासर बितै बिते ।
( ७६ )
लाल ! तिहारे बियोग बिथा से
उतारति है पिंजरा वह लाल + को।
ताहि हिये से लगाय कहै
"तुम तौ पहिचानत नीके गुपाल को ॥
देखि चुके है। सबै तौ दसा,
दरसैयो तहाँ अब मेरे हवाल को" ।
यों कहि पंछी उड़ावै अनेकन
देखहु स्याम ! कहा भयो बाल को॥
( ७७ )
जब ते बियोग भयो बाल को तिहारो लाल!
तबते नयन ताके नेक चैन पावैं ना।
रहत बिहाल लाल लाल से अधीर अति
कानन लौ श्रावै जायें अंगन थिरावै ना ॥
जदपि अकेला एक सूधे सो कुरंग बैठ्यो
तदपि दुजेस बढ़ि घटि कल पावै ना।
सखी। + लाल पक्षी। हरिण-कहा जाता है कि चन्द्रमा में
हरिण ही धब्बे का रूप रख कर बैठा है। सो यहाँ स्त्री के मुखचन्द्र पर
तो दो हरिण ( नेत्र ) तड़प रहे हैं। चन्द्र।
( ३८ )
ताके
मुख
पै तौ तरफत हैं कुरंग जुग
देखौ चलि कहूँ छाती छेद करि जावै ना॥
( ७८ )
विरही पति-
कीन्हों धन संग्रह विपुल परदेस में, पै
काहू भाँति सुधि न भुलाई भूली घर की।
तरुनी तिया की वह रुचिर मुगुध छबि
जागि जागि दिन राति हिये माँहि खरकी ।
कवि "राजहंस' मन माहिं जो उचाट भयो
पाती के लिखत छाती अानन्द सो धरकी।
उत परदेस सों पयान कीन्हो ज्योंही पति
इत पतिनी की बर बाई आँखि फरकी।
-
( ७६ )
भागत-पतिका-
बैठ्यो अँगना में पिय आय परदेसन से
"राजहंस" दोऊ हिय हिरकि हिरकि जात।
इत नैन पीतम के ऊपर भ्रमत उठि
उत पट खुलि खुलि भिरकि भिरकि जात ॥
पिय के बिलोकिबे को खिरकीन खिर न *
फिरकी सरिस तिय थिरकि थिरकि जात ।
* खिरकी खिरकीन फिरै फिरकी सी-देव ।
( ३६ )
इत उत चारा चोरी झांकन में ताके हिय.
हारन के मोती मंजु छिरकि छिरकि जात ॥
( ८० )
पहुँची पिय 'हंस' बिदेसन से
अधरातिहि में अपने घर को।
नवला अबला जेहि में थो परी
तेहि सेजरि पै सुखसों सर को ।
इत देखत थी सपने कि पिया
भुज मांहिं भरै न सुनै हर को।
उचकी यह देखत ही बनिता,
छतियाँ है गई, पिय ही फरको ।
( ८१ )
प्रौदा-
पीकर * पकरि परयंक । पै परी प्रवीन
दै कै गल बाँहिं रस रंग लूटि के रही।
दै अधर बिम्बन को
चुम्बन मधुर
"राजहंस"ताके अधर को स्वाद यह ले रही।
रति विपरीत में बिनोद बहु देन हारी
मृदु मुसकाय दृग दृगनि लगै रहो।
छतियान छाती से छुवाय छबिवारी वह
पिय के हिये की सब कामना पुरै रही ॥
प्रिय का कर ( हाथ ) + पलंग
.
( ४० )
-
( ८२ )
गर्मिणी-
आजु परभात छबि औरई लखानी तन
और रंग तरुनी तिया को मन छुवै गयो।
"राजहंस' सफल हिये की चारु भासा भई
ललित मनोरथ को बीज बन ब्वै गयो ।
तपनि मिटावन हृदय सरसावन
अमल जीव धाम सो अनन्द घन च्वै गयो।
आज ही अनूप तेज राखि उर अन्तर
समी के सम साँचाई तिया को तन ह गयो।
( ८३ )
सुरत सुखद सम अति अरसाने अंग
आनन अनूप सोन जूही छबि छावै है।
अमल रसाल सम युगल उरोज पर
अधिक अधिक स्यामताई सरसावै है।
नित "राजहंस" निज रूपहिं बढ़ाय लंक *
तन मन बैन की चपलता हटावै है।
रबि छबिवारी वर ऊषा सी रुचिर
बाल-गरभ समेत प्यारी काको न सुहावै है।
ama
ॐ कमर
( १ ) - ( ८४ ) पुत्रवती- उदित उदयगिरि अवलीन जैसे रबि जैसे राजै सरस कुसुमपुज कोद में । कवि "राजहंस" जैसे सर में सरोज वर जैसे मनहर सुर सुन्दर सरोद में ॥ राजत भरत ज्यो शकुन्तला के अंक रघुराजै ज्यो सुदच्छिना कीभागभरी गोद में । पिय नेहराती तिय-गोद में बिराजि शिशु पागत है ताको मन लाज औ प्रमोद में ॥ - परिशिष्ट खण्ड विलासी पुरुष- फीको लागो जंचन प्रवीन पतिनीको नेह बरबस हियरो उमंग न गहत है। रूप नगरी की गैल गैल अटिबे की रट "राजहंस, ताके उर अन्तर रहत है। भवन अहाते के सुबाहर निसरि काहू चीकने चरम ही में प्रमुद लहत है। लै पुरातन प्रसून पै रहेगी रति नूतन मरंद* मन-मधुप। चहत है। * मकरन्द, पुष्परस । भौरा ।
( ४२ ) ( ८६ ) खण्डिता- जऊ जानती बातें सबै यह बाल, रोस तक प्रगटावती है। निज प्रीतम सौ अंखियान हटाय सदा हँसि बातें बनावती है। सरसीरुह सूघन के मिस, तीखी उसासें हिये की दुरावती है। अबला मुंह धोवन में अपने असुवा जल माँहिं मिलावती है ॥ ( ८७ ) क्यों न रहौ दिन हूँ हूँ में तहाँ सजि साजि जहाँ निज रैनि बितावत । काजर सो रँगि के अपनो मुंह क्यों अब ताहि दिखावन श्रावत ?॥ लाज न लागति है अजहूँ अपराध किये पर बाते बनावत । जिस स्त्री का पति किसी अन्य स्त्रो पर आसक्त हो उसे खण्डिता कहते हैं। कमल । प्रातर्जलेन वदनं परिमार्जयन्ती, बाला विलोचन- जलानि तिरोदधातिए-रसमंजरी । नायिका के कजल की रेख नायक के मुंह पर लगी देख स्त्री ने जान लिया ।
( ४३ )
नागिन * अंक लगायो कहूँ
यह नागिनी-अंक लग्यो है बतावत ।।
( ८८ )
"नयन तिहारे लाल लाल भये कैसे बाल" ?
"लाली तुव नैनन की दौरि इत आई है"।
बात ये विचित्र कैसी" "चित्र चित्रकारी चारु
रावरे सुअंगन की आय इत छाई है" ॥
"तागहीन हार काहे दरसन लागे " "तुव
तागहीन, हारन की कसक समाई है।
“पन्नगी न बनु मान त्यागु प्यारी!" "पन्नगी सी
उपटी हिये की मोहिं डसत सवाई है" ॥
( ८६ )
स्पेक्षिता:-
छिटकि रही है चारु चाँदनी बिमल अाली
ऐसे समै कछु तौ सरस गीत गायो करु ।
इत उत
भ्रमत रहत दिन
रैन पिय
आय इत रीते भौन हिये बिलमायो करु॥
)
* किसी स्त्री (सौत ) को तुमने हृदय से लगाया है, यह बात तुम्हारे
शरीर में पड़ा हुआ (उपटा हुश्रा ) वेणी का चिन्ह (नागिन अंक ) स्पष्ट
ही कह रहा है। + अश्रुबिन्दु । नायिका के हारों के दाग। • जो स्त्री
अपने पति के प्यार से वंचित होगई हो उसे उपेक्षिता कहते हैं।
( ४४ ) को हैं री बनाये बेस प्रावत इतै जो नित हाल तो परोसिन के मोंकहँ सुनायो करु । कवि "राजहंस" जिय हमरो जुड़ायो करु रुचिर नरन की सुचरचा चलायो करु ॥ (१० ) कुपरामर्श- जेतो रूप को गुमान करि रही बढ़ि बढ़ि तेती तुव अभिमान रासि लुटि जावैगी। यह सतरानि बतरानि मुसकानि तुव औचक ही एक छन माँहि छुटि जावैगी ॥ नेह रस बोरि तू तो बौरी बनि गोरी ! निसिद्यौस मनमोहन के संग संग धावैगी। नेकु नन्दलाल के निहारे मन हारि तू तौ ताहि बिन देखे चैन नेकहू न पावैगी ॥ ( १ ) भर्मव्यथा- "राजहंस" बारन सँवारन के मिसु ाली ! ताहि देखि नैनन से सैन करिबो करौं। सलिल भरै की बेर पट कटि से लपेटि गागरि के संग अँग ऊँचे धरिबो करौं। पाय के अकेलो ताहि पथ में सबेरी बेर ताकी गैल रोंकि अरसाय अरिबो करौं । - --
( ४५ )
-
एते ह पै समुझै न मंदमति वारो सखी !
हैं तो मैन * मारी मन माँहि मरिबो करौं ।
( ६२ )
दूती-
सुमन सिंगार करि नाचत निकुज जहँ
गुजरत मंजु चंचरीकगन आय आय ।
बात की झको अनुराग से उमगि जह
कुसुम पराग सुचि लेती हिय लाय लाय॥
"यौवन बहार न बहोरि बहुरैगी" जह
कहि समुझावै कोकिला के वृन्द गाय गाय ।
मान तजि नेकुतौ विलोकु बन पोकु || प्राली !
भैहै जहँ वल्लरी तमाल तरु धाय धाय ॥
( ६३ )
ललित लतान को बनाय कै निकुज मंजु
सुरति तिहारी स्याम करत तिहारे हैं।
जानि अधराति अभिसार+ करिबे के हेतु
तेने अंग अंग आभरन से सिंगारे
देखि कै अकास अब कैसे पै उदास है के
"राजहंस' सकल सिंगार मेटि डारे हैं।
Mhei
* मदन । + यहाँ से विविध इतियों का वर्णन प्रारम्भ होता है।
भ्रमर । हवा । || घर । + प्रिय के पास गमन ।
(४६ )
देखु चन्दमुखी ! घनस्याम सुख हेतु लेत
चन्दहिं छिपाये घन घोर घन कारे हैं।
(६४ )
बन्द करु भूषन सजाइबो छबीली बाल !
कल न परत उत नन्द के नंदन को ।
तू ही ले बिचारि
कहूँ श्राभरन चाहे जात
"राजहंस' मंजु तन सुषमा सदन
को
तोहिं जो सुभाविक मधुरई दई है दईछ
काहेब उतारू भई ताहि मरदन को ।
तेरो तन भूषन की सोभा है बढ़ावत न
भूषन बढ़ावत सुरूप तुव तन को ॥
कहति हुती मैं कि "सजाय राखु गात बीर !"
मेरी सो गभीर बात सुनन लगी तें कब ।
श्राइगो मनाये पर मोहन भवन जब
उलझन लागी जाय भषन बसन तब ॥
सारी सुखकारी जरतारी की किनारी वारी
कारी ते निकारी प्यारी काम नहिं रह्यो जब ॥
मुकुरि गयो है मन-मुकुर तिहारो बाल
मुकुर मुकुर काहे मुकुर • निहारै अब ॥
BALARIA
* विधाता ने ।+ लोट गया। पिय दर्पण, आरसी
( ४७ )
( ६६ )
अभिसारिका*-
नवल + सरीर माँहिं धवल: वसन डारि
पिय के समीप है नवेली संचरत जात ॥
चन्द्रिकान • चरचित चाँदिन सी भीतिन पै
सेतता की मंजु दुति दूनियै भरत जात ॥
सिंधुर | गवनि मन हरनि मयंक + मुखी
चरनि धीर धरि धरनि धरत जात
नलिन बरनि बर गलिन अलिन सन
मलिन मलिन सम चलत करत जात ॥
(६७ )
घहरै घनस्याम निसा घनस्याम
खड़े तरु स्याम तमालन के।
पहिरे पट स्याम सुस्यामलता
बनि बाल चली ढिग लालन के।
मिलि एक भई नहिं जानि परी
जुगुनू सम मे मनि मालन के ।
जो प्रिय के पास संकेत स्थलों में गमन करती है उसे अभिसारिका
कहते हैं । अँधेरी रात को गमन करे सो कृष्णाभिसारिका, उजेली रात
को जाय सो शुक्लाभिसारिका। नये, नूतन । श्वेत । चांदनी से (लँकी
हुई)। ॥ हाथी। + चंद्रमा के समान मुख बाली । पद्मिनी को
सुगन्धि के कारण भौंरे उस के पीछे दौड़ते हैं।
(४८ )
मुह दीपति पैन दुराई दुरी
जऊ जूथ जुरे' अलि अालन के।
(६८)
रह्यो रजनी तम तोम अपार,
न काँकर पायन मैं गड़ि जायें।
चली मन में यह बात बिचारि
मयंकमुखी * निज पेखत पाय ।।
तहाँ मुख की छवि दीपत देखि
ससी भ्रम से अंखियाँ उठि जाय।
इहै धुनि में परि बारहिं बार
झुकै, उझर्के, झपि कै रहि जायें ।
खण्डिता-
( ६६ )
घन घोर घटा घन कज्जल रंग,
घिरौं घहरी फिरि से घहरै ।
दमकै चमकै चल दामिनियाँ सो
छकी छहरी फिरि सों छहरै।
जल से कटि के जो बनी नरियां
सो हुतीं हहरीं फिरि से हहरै ॥
इतनेहु में स्याम की आसै निगाड़ी
ठगी ठहरी फिरि से ठहरै।
चन्द्र के समान दीप्त मुखवाली। कमर । संकेत स्थलपर जाकर
और राह देखकर भी प्रेमिक को न पानेवाली।
(१०० )
गई निसि बीत, मिल्यो नहिं मीत,
गई मन की मन में रहि बात।
रह्यो मन मान
जनावन का
बिपरीत भई वह पूरन घात ॥
छुट्यो अंगराग मिट्यो रसरंग
निरास भयो अँसुवामय गात ।
भयो तन भार पहार अपार
सकात दिखाय पर्यो जलजात * ।।
( १०१ )
मंजुल वंजुल । के कल कुज
बनाय रही मग जवित जाकी।
मारग में भरमें वे सखी !
फैसि फाँसनि में अपरै बनिता की ।।
जब बेर भई
बिगरी गुरु सोचन प्राकृति ताकी।
लाल भई इत प्राची दिसा
उत लाल भई आँखियाँ अबला की ।।
( १०२)
हियरो इमि तोरत जोरि सनेह,
छली नर है कि बन्यो पसु है।
आवन में
ॐ कमल ( मुख)। बेत । पूर्व ।
( ५० बदनाम भई जिहि कारन 'हंस' सु देत न रं हु सो रसु है ।। कुलकानि गई, बर धर्म धंस्यो, सत कर्म नया अथयो जसु है। अब हहै कहा परिणाम हहा हिय पै हमरो न चलै बसु है ।। चेष्टासंगोपना- लखि मोहन की मंडरात पतंग छुट्यो तन स्वेद सुरोम तने। लखि कै यह पूछि उठी सजनी 'नम मा लखि का यह रंग ठने? ॥ सुनते वह बोली किसोरी सुवात दुराइ सबै मनकी अपने । * "सखि ! द्यौसहि में माहि देखि परै नभ माहि नछत्रन वृन्द धने" ॥ ( १०४ ) प्रबोधन- तेरो उतसाह मैं न मारन चहति तैहू देखु तौ घनेरे नभ धन घहराये रहैं। - ॐ दिन में नक्षत्र देखना अशुभ है उसके भय से भी 'सात्विक' । सान स्वेद निकल सकता है और रोम तन सकते हैं।
( ५१ )
उठिबो करत रैन दिन तह मार सोर
मुक पिक चातक चकोर मुंह बाये रहैं ।
पथ है विषम, गांव बाहर, सरित दूरि
मग मॉहि कटकन कुञ्ज लटकाए रहैं।
लैकै घट चली है अकेली, मैं न रोकौं, तोहू
मन में बिचारि ले चवाई इत छाये रहैं।
.
( १८५ )
वचनमिदग्धा-
रस चूपन में परवीन बने मधुलंपट नाम धराय रहे।
निज तान सुनाय सुनाय इमैं तुम दूरहि से तरसाय रहे ॥
बन में यह बेलि फनी इकजी धन कै फल हैं छवि छाय रहे।
*तेहि त्यागन कै मतिमंद मलिन्द ! कहाँ उत हौ अब जाय रहे ! ॥
( १०६ )
लंक्षिता-
तन की गति और की और भई,
जल सीकर आनन पै उनयो।
सुर कम्पित सो मुंह से निकरै
मधुराधर
यह काह भयो।
पै
* वचनविदग्धा परकी या अपने प्रिय पुरुष को मिलिन्द (भ्रमर )
के बहाने संबोधन कर रही है। : जितके रत्तान्त चिह्न देव लांग असल
बात जान जायें, उसे लक्षिता कहते हैं।
--
( ५२ . )
."
पट, कम्वुक देखत जानि परे
झकझोरिन को कहुँ रंग छयो ।
जल लेन गयी जंह, कौन तहाँ
सखि ! यो तुव रूप बनाइ गयो।
( १०७ )
सुरत-संगोपना--
चूल्हे चली जाय ऐसी साँकरी अँधेरी गैल
धारे निज तीरन करीरन के . रूख बीर ।
लाख हू बचायो पैन पाँव बचि पायो
"राजह सः' इन कंटकन मोकह कियो अधीर॥
चलिबा हराम भयो पाँव काम को न रह्यो
व्यथित बिहाल गिलो स्वेद । से सन्यो सरीर ।
रहती परी मैं अधमरी सी, पकरि पायें
काँटे काढि जो न ये घटाय देत मेरी पीर ॥
( १०८ )
अनुशयाना -
खंडहर ढावन की चरचा सुनानी जबै
"राजहंस" तबते बिलाय गयो मृदु हास ।
जो असलियत छिपाना चाहती है उसे सुरत-संगोपना कहते हैं।
यहाँ पर नायिका अपने स्वेद, कंटकित शरीर और नायक की वैसी
उपस्थिति का मनगढंत कारण दे रही है। + पसीना। * अपने संकेतस्थल
को नष्ट होते देख दुःखित होने वाली स्त्री।
इत उत फिरत भ्रमी सी सो भवन माहि देखति अटा सो धाय ताकी ओर ह निरास ॥ देस काल सकलहि भूलि भूलि बारी बनि कहति फिरति जऊ जन है न कोऊ पास । घर ना बनावै ना ढहा खंडहर जूना जाय किन कहा कोऊ प्रेत उत करें वास ॥ ( १०६ ) है इक सो हँसि हेरि करें बतियाँ इक लो निज नेह जुगावति है। इक पै भुजमूल दिखाय तिया इक पै करिहाँ * लचकावत है ॥ दृढ़ चित्तहु तीछे कटाछन छेदि मनोज को पंथ बनावति है । इक को मन लै इक को धन लै इक को तन लै बिनसावति है। जगदुव्यवहार- ( ११० ) उत परकीय पोर पीतम कियो सनाथ इत तिय भौन रस रंग सो सँवरिगो। अरसात गात परभात पति आयो लखि तरुनि के तन में कपट-मान अरिगो॥ कमर।
यह अत्रलेकि पिय हिय की दुराय बात
"राजहंस" जैसेई मनावन में परिगो।
त्योंही मुसकाइबो तिया को मन पार करि
आय नैन बैन अधरान में उतरिगो॥
( १११ )
गणिका-
नित साँझ समै निज देह संवारि
अटा सो छटा छिटकाया करै।
करि सैन दिखाय अनूपम रूप
धनी जन चित्त लुभायो करै
अति आदर की बतियाँ करि 'हंस'
अधीनपना दिखरायो करै
धन गाँठि सौ खाँच मदान्धन को
यह बाल अँगूठो
बतायो करै॥
( ११२
११२ )
कल गान सुनाय सुनाय प्रवीन सुनयन मौन बनाय रही।
रस भाव बतावन में कर की अँगुरी पर चित्त नचाय रही॥
अनुराग तरंगनि में सब के शुचि ज्ञान विवेक डुबाय रही।
अखियाँ अरुझे पग हू गजगामिनि चंचल चाल चलाय रही ॥*
ॐ उसके पैरों में यद्यपि लोगों की आँखें लगी हैं तयारि वह वेश्या
उनको चंचल चाल से चला रही है । ( ाँ बों का बोझ उसे कुछ भी ज्ञात
नहीं होता)
।
सुरमा * सुरमाये कटाक्ष न सा
सुरमा · न कवा रहि खूधे सके।
कुन कोरन छोरन घायल ह
अँखियाँ खरकै फरकै भरकै ।
जिन औचक देखि लियो कबहूँ
तिनके मन औचक ही उचकै ।
लचकै जब लंक निसंकिनि की
तब लाखन के हियरे लचके ।
विषयानन्द--
बरन्यो बनै न बर बनिता रसाल संग
सुषमा सने से जाके सेहत सशल अंग ।
छकि छकि पान करु मधुर मरंद ताके
ऐरे मन-मधुकर करि ज्ञान ध्यान भंग ॥
सेज ही सो काम, कर कण्ठ कल बाम,
मुख मदिरा ललाम आठो याम यहै राखु ढंग।
गंग में कहा है, जोग जंग में कहा है,
साधु संग में कहा है, रघु रुचिर अनंग रंग॥
.
ॐ सुरमा से रंजित । सूरमा, बीर ।
.
शुद्धिपत्र शुद्ध रूप अशुद्ध रूप चल्दघर জাহিদ पृष्ठ पंक्ति समर्पण .. ३ .. भूमिका 35 দুইহি एते or 3 4 ... ... सों करेजो ... oM करे जो दसत ... दसन १ ९ १० ... कहत करत ... झाटति ... ... झटिति एकहि एकहिं ... २३ ... प्रासन श्रासन २३ ७ ... ... हेरियेरी हेरि येरी ... मद्य मय २६ १२ ... ३१ २ ... मूल्यो वियोगिनी वर्षा .. मूल्यो वियोगिनी-वर्षा छवै बदाह .ae ३१ ...८,१३ ३२ बदाइ ( २ ) शुद्ध रूप पृष्ठ पंक्ति ३२ अशुद्ध रूप हेमना छरि कीन्ह्यो ककेर ३२ ... ar हेमन्त छरी कीन्ह्यो केंकरे वै ३४ ... ... १२ ह ... ३६ १० ... ... और रङ्ग औरै रङ्ग ... १४ ... जुरे ४८ २ ... ... ... ... ... लागा लागो नागिन, नागिनी नागिनि १, हिये हिय जुरे भरमें भरमे ११ लटकाए लटकाये लैक लचकावति सँग संग नोट-इन अशुद्धियों के अतिरिक्त और सामान्य अशु. द्धियाँ जो रह गई हैं सो पाठक सुधार लेने की कृपा करें। ... ... aa ... ... -लेखक