Sanmati Library, Jaipur
Shri Panchapratikraman Moolsurtram
Front matter
प्रकाशक:-छोगमल कोचर, प्रेसिडन्ट श्री जैन नव- युवक मित्रमंडल, मु. लोहावट (मारवाड.) मुद्रक-लक्ष्मण भाऊराव कोकाटे, 'हनुमान' प्रेस, ३००, सदाशिव पेठ, पुणे.
॥ प्रस्तावना ॥ 'प्यारे पाठकों। प्रतिक्रमणमूलसूत्रकी लम्बी चौडी प्रस्तावना लिखनेकी आवश्यकता नहीं हे कारण प्रतिकारगसूत्र सदैव श्याम सुबह निस करनेयोग्य क्रिया है पानि धमाजेशामु धर्मपर श्रद्वा रखनेवाले सम्यक्त्व या व्रतधारी महानु- मावोंको प्रतिक्रनण अवश्य करना चाहिये । शास्त्रकारोंने फरमाया है कि भगवान् आदीश्वर और वीरप्रभुके शासनमें साधु साध्वी श्रावक और प्राविकाओंकों प्रत्याख्यानमें दोप लगनेका संभव है जहां दोपका संभव है वहाँ प्रतिक्रमणको परमावश्यकता है दोपलगनेपर प्रतिक्रमण न किया जाय तो आराधिक हो नहीं सक्ता है जो जीव आराधिक नहीं होता है उसे मोक्षको प्राप्ति कभी नही होती है अतएव मोक्षार्थी भव्यजीवोंकों प्रतिक्रमण करनेकी परमावश्यकता है । प्रतिक्रमण के बारेमें एक रोगीका दृष्टान्त । एक न्यायचन्द्रसेठ शरिर आरोग्यता के कारण सदैव पथ्यहीका सेवन फरता था किसी समय मोहप्रेरित लोलुपतासे अपथ्य सेवन करनेसे शरि- रमें रागात्पत्ति हो गई तब सेठजीने सोचा कि किसी विद्वान् परमार्थी निलामी डॉक्टरसे इलाज कराना ठीक है साथमे यहभी सोचा कि डॉक्टरके साथ कंपा- डरकिभी तलास करने कि जरूरी है क्योंकि वहभी अच्छा परमार्थी निलामी दवाइ देनमें कुशल होना चाहिये. तलास करनेपर सेठजी को खातरी हो गह कि अमुक डॉक्टर या कंपोंडर हमारे रोगको चिकत्सा अवश्य कर सकेगा। उपनय-न्यायचन्द्रसेठके स्थान भव्यात्मा है पथ्यसेवनके स्थान ज्ञानादि भाचारका पालन करना है मोहकि प्रेरणासे या लोलुपताके कारण पाके अ- पथ्य सेवनके स्थान अतिचार लगा हो वैमारीके स्थानपर कर्मवन्ध है। डॉक्ट- रके स्थान तीर्थकर भगवान् है कांडपके स्थान आचार्यादि गुरुमहागज है. वह सदेव परमार्थों निलामी कम रांगा चिकत्साकरनेमें फुशल है ऐसी खातरी हो गइ तब । -- (२) (१)वैमार सेठीने सोचा कि डॉक्टरसाहिबके पास जाना तो है किन्तु बमारीका कारण पुछेगा तो क्या कहेंगे वास्ते पेस्तर शरूमें बैमारीके. कारण याद कर लेना ठीक है तब एकाग्रचित्त हो ध्यानकर क्रमशः सब कुपथ्योंको याद कर लिया। उपनय-समायिकाध्ययनमें ध्यानकर अतिचारोंकि आठ गाथाओद्वारा यांचाचारोंमें जो जो अतिचार लगा था उसको ध्यानमें याद कर लिया। (२) बमारसेठजी डॉक्टरकेपास जाके डॉक्टरसाहित्रकी स्तुति गुणकीर्तन आदरसत्कार बहुमानकर बोले कि आपने बहुतसे बैमारीयोंके रोग मिटाया है इत्यादि। उपनय-दूसरे अध्ययनमें लोगस्सद्वारा चौवीस तीर्थकरोके गुण स्तवनादि वहुमान किया। (३)वैमारसेठने सोचा कि डॉक्टरसाहिब तो. दवाइयोंका नकशा दे देमे किन्तु दवाइ देना कंपौंडरके आधिन है वास्ते कंपौंडरसाहेबकाभी आदर सत्कार विनय करना जरूरी है कि वह अच्छी दवाइ देकर हमारे वैमारी को मिटावेगा इस गरजसे कंपौंडरकाभी विनय किया। उपनय-तीसरे अध्ययनमें आचार्य-गुरुमहाराजको द्वादशावर्तन. देकर दो वार वन्दन किया। तब कंपौंडरसाहिवने पुछा कि सेठजी आपके बैमारीका हाल वतलाइये। (४) वैमारसेठजीने इष्टस्मरण सावद्ययोगनिग्रहकर मंगलपूर्वक अपनी वैमारीके हाल क्रमशः बतलाया कि इसइसकारणोंसे अमुक अमुक मंपथ्य सेवन करनेसे हमारे शरिरमे इतने अंश वैमारी पैदा हुइ है अपने हाल सुना के कंपौंडरको और वन्दनकर बोला कि में किसी प्रकारसे आपका अविनय कीया हो तो क्षमा करें क्यों कि में वाल अज्ञानी हुँ परन्तु आप सब हाल जानते है वास्ते क्षमा करो अन्तमें और स्तुति करते हुवे से- उजीने कहा कि आप सब लोग परोपकारी हि होते है वास्ते मे पुनः पुनः नम्रतापूर्वक निवेदन करता हूं कि आप ऐसी दवाइ दें कि शीघ्रता मे आरोग्य वनु । उपनय-चतुर्थ अध्ययनमें दिनभरमें जो लगे हुवे आतिचार प्रगटरूपमें मंगलपूर्वक 'वंदित्तु' से क्रमशः सुनाके दो वार वन्दन दे भन्मुहिमोमि (३) - समाके दो वार वन्दन दे "आयरिय उवज्झाय" तक कहा बाद में भतिचार विशुद्धि की कोसीस करी। (५) वैनारसेठके नम्रतापर कंपौंडरसाहिबने दीर्घटीटसे विचार फरके अच्छी उमदा दवाइ कि पुड किये वान्ध दी, सेठजी उस दवाइको लेके कंपौंडरसाहिवकी औरभी तारीफ विनयभक्ति कर रवाना होने लगे। उपनय-पांचवे अध्ययनमें ज्ञान दर्शन चारित्रविशुद्धिनिमित्त चार लोगस्सरूपी दवाइका ग्रहण कर ध्यान किया। (६) वैमारसेठजी रवाना होने लगे इतनेमे फंपौंडरसाहिब बोले कि सेठजी आपने दवाइ तो ली है किन्तु इस दवाइके सेवनमें कुछ दिन परहन रखना होगा सेठजीने कहा कि बहुत ठीक है अमुक टाइमके लिये में अवश्य परहज रखंगा- उपनय-छ? अध्ययनमें परहजके लिये प्रत्याख्यान है सो नमुफारसी पौरसी इत्यादि प्रत्याख्यान किया । सेठजीकी बैमारी मिटानेमें मौख्य कारण डॉक्टरसाहिबका था वास्ते सेठजी डॉक्टरसाहिबकी बायोल्हासके साथ स्तुति करी. उपनय-"नमोस्तु वर्द्धमानाय" तथा "नमुत्थुणं वरकनक" क भादिसे भगवान् वीरप्रभु या तीर्थकरोंकी स्तुति करी। इस दृष्टान्तसे आप वस्तुची समज गये होगे कि फर्मरूप रोगको निर्मूल फरनेको डॉक्टर कंपीडरकी स्तुतिकर दवा लेनेसे लगे हुवे अतिचाराकी शाघ्रि विशुद्धि होती है वास्ते मोक्षार्थी भाइयोंको अपना नित्य कर्तव्य सामायिक प्रतिक्रमण प्रभुपूजा और पठनपाठन करनेमें उद्यमवन्त हो नरभवको सफल करना चाहिये । कितनेक महानुभाव प्रतिक्रमणके लाभसे अज्ञात है. वह अपना अमूल्य जीवन आलस्य प्रमादमें खो वेठते है वह दुगुना नुकशान उठाते है 'एकतो दिनभरमें जो अतिचार सेवन किया था वह दूसरा पापोंकि विशुद्धिक -समय आलोचना नहीं करता हुवा आलस्य प्रमाद गप्पोसप्पोमें पापकों •पार्जन करते है. उन महानुभावोंके लिये प्रतिक्रमणके लाभके बारेमे यहाँ कुछ उल्लेख करना अनुपयोगी न होगा। प्रतिक्रमण-आवश्यकसूत्रका चतुर्याध्ययन है. प्राचीनप्रन्योंमें मावश्यक (४) शब्दही पाया जाता है. अधुनिक पुस्तको आवश्यकके स्थान प्रतिक्रमण शब्द प्रचलित है. दर अस्सल प्रतिक्रमण आवश्यक सूत्रका चतुर्थाध्ययन है. आवश्यकसूत्र के विभागरूप छे अध्ययन है यथा सामायिकाध्ययन, चतुर्विशतिस्तवाध्ययन, वन्दनाध्ययन, प्रतिक्रमणाध्ययन, कायोत्सर्गाध्ययन.. प्रत्याख्यानाध्ययन. (नन्दीसूत्र.) अधुना प्रतिक्रमणकी आदिमें चैत्यवं- वन्दन अन्तमें स्तवन सज्झाय और कायोत्सर्गादि कितनीक क्रियाएं समया- नुकूल आचायोंने प्रतिक्रमणके साथ जोड दी है. के आवश्यकका क्रम और फल । (१) प्रथम सामायिकाध्ययन-प्रतिक्रमणकी आदिमें इरियावहि. करी जाती है, वह क्षेत्रशुद्धिके लिये है बाद देववन्दन किया जाता है. वह मन्दिरकी क्रिया है मन्दिरमें जाके देववन्दन करनेकी विधि शिथिल होने लगी जब आचायोने प्रतिक्रमणके साथ जोड दी है दर अस्सल. देवसि पडिक्कमण ठाऊं " यहांसे लेके अतिचारकी आठ गाथाओं- का कायोत्सर्ग पारके "नमोअरिहन्तार्ण" कहना वहांतक सामायिकाध्ययन्त. है. सामायिक तीन प्रकारका है श्रुतसामायिक, सम्यक्त्वसामायिक, चारित्र- सामायिक इन तीनो सामायिकसे क्रमशः ज्ञान दर्शन चारित्रकी प्रालि होती है. सामायिकाध्यायनमें ज्ञान दर्शन चारित्र उपलक्षणसे तप और बीर्य इन पाचों आचारोमें अतिचार लगा हो उनका चितवन कीया जाता है यह चितवन रागद्वेषरूपी विकल्पोंकों दूर कर समभाव रखनेसे हो. सकता है. इसी वास्ते ही इस अध्ययन का नाम सामायिक अध्ययन रख्खा गया है, इस अध्ययन का फल क्या है? सामाइएणं भन्ते जीवे किं जणयह? सामाइएणं सावज जोगविरह जणयइ (श्री उत्तराध्ययनसूत्र अध्ययन २९.) भावार्थ-सामायिक करनेसे जीव सावद्ययोगोसे निवृत्ति पाता है यानि पाप मानेके सावध योग है उन्होंसे निवृत्ति होनेसे फिर नये पाप नहीं आते है। १ चारित्रसामायिकके दो भेद है (१) देशचारित्र सामा० (२) सर्व चारित्र सामा (५) - (२) चतुविशतिस्तवाध्ययन-रागद्वेषरूपी विकल्पोंका त्याग कर धमभाव रख्खे वह ही जीव चोवीसतीर्थकरोकी गुणस्तुति कर सक्ते है यह कायोत्सर्ग पारने के बाद लोगरस कहा जाता है इसको चतुर्विंशतिस्तवा- ध्ययन कहते है इस्का फल । चउव्वीसत्थएणं भन्ते जीवे कि जणयह ? चउव्वीसत्थएणं जीवे दसणविसोहि जणय ॥ (श्री उत्त० अध्य० २९.) भावार्थ-चौवसि तीर्थकरोंकी गुणस्तुति करनेसे जीवोंको दर्शनविशु- दि होती है। यानि सम्यक्त्व निर्मल होता है। (३) वन्दनाध्ययन-रागद्वेषरहित समभावोंसे देवकी गुणस्तुति करनेवाला महानुभाव आचार्यमहाराजको द्वादशावर्तनवन्दन करनेयोग्य होता है. लोगस्स करनेके बाद दो वार द्वादशावर्तन वन्दना देना. यह सिराध्ययन है इस्का फल कहेते है- वन्दणएणं भन्ते जीवे किं जणयइ ? बन्दणएणं जीवे नियागोयं कम्म खवेह उच्चागोयं कम्मं निबन्धइ. सोहग्गं च णं अपडिहयं आणाफलं निवत्तइ दाहिण भावं चणं जणयइ । (श्री उत्त० अध्य० २९.) भावार्थ:-गुरुमहाराजको नम्रभावे वन्दन करनेसे नचि गौत्र- कर्मका क्षय और उच्च गौत्रकर्भ का बन्ध करता है. सौभाग्यलक्ष्मिको उपार्जन करे तथा जिसपर आदेश-आज्ञा करे वह सहर्ष स्वीकार कर हाम्रतापूर्वक उस कार्यको करे और दूसरोको आनन्दकारी वचन बोलनोक कब्धिको प्राप्त करे। (४) प्रीतक्रमणाध्ययन, जो रागद्वेषरहित समभावोंसे देवगुरूकी स्तुति स्तवना वन्दन नमस्कार करनेवालाही अपने पापोंका प्रतिक्रमण कर सकेगा. यह वन्दना के अन्तसे "आयरिय उवज्झाय तक प्रतिक्रमण नामका चतुर्थाध्ययन है इसका फल ।- " पडिक्कमणेणं भन्ते जीवे किं जणयह ?
(६) . पडिकमणेणं जीवे वयछिदाणिपिहेइ पिहिय छिद्दे पुण जीवे निरूद्धासवे असवल चरित्ते अहसुपवयण मायासु उवउत्ते अपुहते सुप्पणिहिए विहरद" (श्री उत्त० अध्य० २९.) भावार्थ-प्रतिक्रमण करनेवाले जीवोंके व्रतमें अतिचाररूपी जो छिद्र में जिसके जरिये कर्मरूपी पानी आरहा था उस छिद्रोंको जानके प्रतिक्रमण- रूपी पाटीयासे छिद्रोंको ढोक देनेसे कर्मरूपी पानी आना बन्ध हो गया त- बसे असबला यानि निर्मल चारित्र पालता हुवा अष्टप्रवचनमाताके पालनेमें उपयोगवन्त संयमसमाधिवन्त हो निरतिचार चारित-पालता हुवा विचरें। (५) कायोत्सर्गाध्ययन-रागद्वेषरहित देवगुरुकि स्तुति वन्दनादि समभावसे करनेवाला शुद्धभावोंसे प्रतिक्रमण करेगा वह ही जीव ज्ञान दर्शन चारित्रकी विशुद्धिके लिये कायोत्सर्ग करनेयोग्य होगा." आयरिय उव- ज्झाए" के अन्तसे दो वार वन्दना देनेतक पांचवा अध्ययन है इस्का फल- "काउस्लग्गेणं भन्ते जीवे किं जणयह ? काउस्लग्गेणं जीवे तीय पडुप्पन्न पायाच्छत्तं विसोहेइ विसुद्ध पायच्छि- तेय जीवे निव्वुय हियए अहोरिय भारोव्व भारवहे पसत्य ज्झाणोवगए मुंह सुहेणं विहरइ” (श्रीउत्त० अध्य० २९.) भावार्थ-कायोत्सर्ग करता हुवा जीव भूत और वर्तमानकालमें लगे हुने अतिचारोंके प्रायश्चित्तको विशुद्ध करता है. उस प्रायश्चित्तको विशुद्ध करता हुवा जीव प्रशस्त हृदय शुभभावनाओं जैसे भारको वहनेवाला जीव भारको कम करनेसे सुखी होता है इस माफीक प्रायश्चित्तरूपी पजनको कम करनेखे जीव प्रशस्तध्यान यानि धर्मध्यान शुक्लध्यानमें अपनी आत्माको जोडता हुवा सुखसे विहार करे । (६) प्रयाख्यानाध्ययन-रागद्वेषयागी समभावी देवगुरुभक्ति स्तुति करनेवाले निष्कपटभावसे प्रतिक्रमण कर प्रायश्चित्तरूपी कायोत्सर्ग- करनेवाला होगा वह ही भविष्यके लिये प्रत्याख्यान करनेयोग्य बन सकेगा. नमुक्कारसि आदि तपश्चर्या करने रूप यह छठा अध्ययन है इस्का फल- (७) " पच्चखाणणं भन्ते जीवे कि जणयइ ? पञ्चखाणेर्ण जीवे आसव दाराई निलम्भइ पच्चखाणेणं इच्छानिरोहं जण- यह इच्छानिरोह गएयण जीवे सव्व दव्वेसु विणीय तण्हे सीयलभूए विहरइ" (श्रीउत्त• अध्य० २९) भावार्थ-प्रत्याख्यान करनेसे जीव कर्म आनेके दरवाजेख्य जो भाव है उन्होंका निरोध कर देते है । और भविष्यकी इच्छाकामी निरोध करते है. इच्छाका निरोध करनेसे सर्व द्रव्योंपर जो ममत्वभाव या उस तृष्णाका त्याग करनेसे शितलीभूत हो जाते है अर्थात् प्रत्याख्यान करनेवाले तृष्णास -मुक हो जाते है. यह आवश्यक भगवान् वीरप्रभुके शासनमें निर्विघ्नपणे समात हुवा है इसलिये कमसे कम तीन तथा अधिकसे भधिक १०८ श्लोकोंसे चैत्यक न्दन स्तुति की जाति है. जिस्का फल- थयथुइ मङ्गलणं भन्ते जीवे किं जणयइ ? थयथुइ मङ्ग- लेणं जीवे नाणदसणचरित्त बोहिलामं जणयइ. नाणदसण चरित्त बोहिलाभं संपन्नेयणं जीवे अन्तकिरियं कप्प विम- गोववत्तिगं आराहणं आराहेइ श्रीउत्त० अध्य० २९.) भावार्थ-तीर्थंकरोंके गुण कीर्तन स्तुति करनेसे जीवों ज्ञानदर्शन चारित्र- रूप बोधबीजकी प्राप्ती कर लेते है. ज्ञानादिकी प्राप्ती होनेसे उसी भवमें मोक्ष जाते है या वैमानिक देवके आयुष्य योग्य माराधना करते है वह तीसरे भवमें मोक्ष जाते है पांच प्रकारके प्रतिक्रमण-मिथ्यात्वकाप्रतिक्रमण, मव्रतकाप्रति क्रमण, प्रमादकाप्रतिक्रमण, कषायकाप्रतिक्रमण, अशुभयोगोंका प्रति- क्रमण, इन पांचो प्रकारके प्रतिक्रमणके फरनेसे जीव सदैव निर्मल रहता (श्रीस्थानायोग सूत्र स्थाने ५ वे) दशगुणोंके धारक हो वह महानुभाव प्रतिक्रमणरूप भालोचना कर सक्ते है जातिवन्त, कुलवन्त, विनयवन्त, उपशान्तकषायवन्त, जितेन्द्रिय, ज्ञानवन्त दर्शनवन्त चारित्रवन्त निष्कपटी और प्रायवित्त लेके पश्चात्ताप -न करनेवाला अर्थात् प्रतिक्रमण करनेवालोंमें यह दशगुण सहजही प्रगटो (८) जाते है. (श्रीस्थानायांग सूत्र स्थाने १० वे.) जैसे गृहस्य लोग अपने रहने के मकान सामान्यतः दिनके अन्तमें और रातीके अन्तमें झाडुसे कचरे को दूर कर साफ करते हैविशेषतः पक्ष भन्तम चतुर्मास के अन्तमें और संवत्सरके अन्तमे धोना लिपनादि गा- एसे सुन्दर बनाते है तद्वर धर्मजिज्ञासु दिनके अन्तमें रात्रीके अन्तमें पक्षके अन्तमें चतुर्मासके अन्तमें और संवत्सरके अन्तमें अतिचार रूप कचरेको श्रमार्जनीरूप आलोचनेसे साफ कर मनोमंदीरकों निर्मल सुन्दर बनाते है.. जिससे भविष्यमें माराधिकपदसे अंतर्वासी आत्मामी मकानके माफीक सोमनीय होता है. कितनेक महानुभाव प्रतिक्रमणके सूत्र कण्ठस्थ करलेते है. वह क्रिया- समय तोतेकी माफीक पाठ पढ लेते है किन्तु उन मूलसूत्रोंके अर्थसे अज्ञात होनेसे उतना लाभ नहीं उठा सक्ते है कि जितना अर्थभावार्थः और मतलबको जानकर लाभ उठा सके. शास्त्रकारोंने फरमाया है की- पदसिक्खितं--पद-पदार्थ अच्छी तरहसे पढा हो. ठित-वाचनादि स्वाध्यायासे ठीक स्थिर किया हुवा हो. जित-सारणा वारणा धारणासे अस्खलित हो. मित-पद अक्षर बराबर याद रखा हो. परिजितं-क्रमोत्कम याद रखा हो. नामसम-पढाहुवा ज्ञानको स्वनामवत् याद रखा हो. घोससम-उदात्त अनुदात्त स्वरव्यञ्जन संयुक्त याद रखा हो. भहिणअक्खरं-अक्षरादि हीनतारहित अणाचअक्खरं-अक्षर मात्रादि अधिकपणेरहित अबद्धअक्खरं-उलटपलट अक्षररहित मक्खलियं-अस्खलितपनेसे बोलना अमिलिय अक्खरं-अनमीलन-विरामादि संयुक्त बोलना" अवञ्चामेलियं-पुनहाती आदिरहित बोलना" पडिपुन-अष्ट स्थानोच्चारण संयुक्त कंठोठः विष्पगुफ-बालकोंकी माफीक अस्पष्टतान बोले शुरुवायोवगयं-गुरुमुखसे वाचना ली हो उसी माफीक बोलना .
(१) सेणं तत्य वायणाए-सूत्रार्थकी वाचना-बोलना याद रखा हो पुच्छणाए-शंका होनेपर शब्दार्थादि पुछना. परिभरणाए-पढे हुवे ज्ञानकी पुन:पुनः आवृत्ति करना. धम्मकहाए-उच स्वरसे धकथाका कहना. नो अणुपेहाए-उपर बतलाइ हुइ शुद्धत्ताके साथ मूल सूत्रका उच्चारण करते हुवेभी भावार्थ को नहीं जाननेवालेकी सब क्रियाओंको " अणो. बग दव्यो " उपयोग रहितको द्रव्य क्रिया बतलाइ है. ( श्रीअनुयोगद्वार सूत्र.) इस परम व्याख्यापर पाठकोंको अवश्य ध्यान देना चाहिये कि इतनी शुद्धता पूर्वक शद्वोच्चारण करनेपरभी उपयोग रहितकी सब क्रियाओको व्य किया बतलाइ है. वास्ते स्वल्पही क्रिया क्यों न हो परंतु होना चाहिये उपयोग संयुक्त वहही क्रिया फलदायक होती है. अंतिकमण करनेवाले महानुभावोंको मूलपाठके साथही उस्के भावार्थकोभी कण्ठस्थ करना जरूरी है. कहा है कि " उवभोग भावो" उपयोग है। बह ही भाव क्रिया कर्म निर्जराका हेतु है। प्रतिक्रमण कोइ सामान्य क्रिया नहीं है किन्तु धर्म जिज्ञासुओके लिये परमावश्यक किया है जैसे हिन्दुभाइयोंको सन्ध्या, मुशलमानको निमाज भवश्य क्रिया है इसी माफीक जैनीभाइयोको प्रतिक्रमण यह एक अवश्य किया है। इतनी अवश्य और उपयोगी क्रिया होनेपरभी हमारे कीतनेक जैन भाइयों जो कि प्रमादकी पाशमें फसे हुवे आलस्यके सरदारोंको प्रतिक्रम- गकी तर्फ कितना अनादर भाव है कि सेंकडे दश लोगोंकों भी प्रतिक्रमण मूलपाठरूपही स्यात् कण्ठस्थ होगा. तब भावार्थ के साथीक तो आशाही क्यों करना चाहिये। इस पवित्र क्रियाको अस्तित्व भावमें रखने के लिये कोई ऐसीभी कीताचे छपाइ गइ थी कि राइ देवास प्रतिक्रमण कंठस्थ न होनेवालेभी विधिसहित प्रतिक्रमण किताबोसभी कर सके. परन्तु पांच प्रतिक्रमणकी ऐसी किताब आजतक देखने में नही आहे. कि प्रतिक्रमणसे अज्ञात भाइ उस किताबसे विधिसहित पांच प्रतिक्रमण ।
(१०) . कर सके. हम केइ दिनोंसें इस विचारमें थे कि एक ऐसी किता तैयार करवाइ जावे कि जिस किताबके जरिये हरेक भाइ पांचों प्रतिक्रमण विधिसहित कर सके आजसे दो साल पेश्तर हमने इस कार्यको प्रारंभ किया था परन्तु अच्छे कार्यों में बहुतसे विन्न होनेके नियमसे उस कार्य में चाधाएं आती गइ । तद्यपि हम इस स्थान मुनि श्रीजिनविजयजी और मुनि श्रीतिलकविजयजी महाराजका उपकार मानते है कि आपश्रीने कुछ फॉर्म संशोधन करने में सहायता दि है. शेष रहे हुवे फॉर्म एक सद्गृहस्थ महानुभावने संशोधन कर इस कार्य को संपूर्ण कीया है। इस जगह हम अधिक उपकार उस महाशयजीका मानते है कि इस पुस्तक छानेमें द्रव्यका दान देनेपर भी अपने नामको गुप्त रखा है उस गुप्तरानेश्वरको हम सहल धन्यवाद देते है कि अपनि उदारताका गुप्त परिचय दीया है। दो वर्षोंसे पडे हुवे कार्यको श्रीरत्नप्रभाकरज्ञानपुष्पमाला ऑफीस फलोदीवालोंने अपने हाथ में लेकर इस किताबकी शुद्धि और प्रस्तावनादि कार्यमें सहायता दे कार्यको प्रवृत्तिरूपमें पहुंचा दिया है । वास्ते उस संस्थाकोभी हम धन्यवाद देते है । इस किताबमें पांच प्रतिक्रमणके सिवाय नौस्मरणादि परमोपयोगी स्तोत्र भी मुद्रित करवाये गये है। अन्तमें हम हमारे स्वधर्मी भाइयों से यह निवेदन करते है कि अगर आप को पांचो प्रतिक्रमण कण्ठस्थ नहीं भी आता हो तो इस किताबसे कर अपने दिनमें रात्रीमें पक्षमें चतुर्मासमें और संवत्सर में किये हुवे पापों को आलोचनकर आत्मा को निर्मल बना लिजिये इससे हम हमारे परि- श्रम को सफल समझेंगे एक सूचना और भी कर देते है वह यह है घुफ शोधनेमें कुछ अशुद्धिये रह गई है जिसका शुद्धिपत्र इस किताब के साथ छया दिया है जब यह किताब आपके हस्तगत हो तब पेस्तर आप शुद्धिपत्रसे इसे शुद्ध कर ले तकि प्रतिक्रमण करते समय आपको अच्छा सुविधा रहेगा शान्ति शान्ति शान्ति ॥ प्रेसिडेन्ट श्री जैन नवयुवकमित्रमण्डल } छोगमल कोचर, मु. लोहावट-मारवाड.
शुद्धिपत्रम्- ९ ८ मशुद्धम् शुद्ध पृष्ठम् पङ्क्ती मक्सकय मक्खय ९ नमोत्युणं नमुत्थुणं २३, २६ . निससिएणं नीससिएणं १०,११,१२ ·२२,२०,१४,३० २०,२५,२६, १८,१८,१४,२४, ७,३४,५९ २४, भावत्यककी आवश्यक.की १३ २० सव्वमिच्छोवराए सम्वनिरछोवयाराए१३,१९,२२,२२ १२९,२५,२,१२ मावायानीमेसे जीवायोनिमेसे १४ करनेको फरतेको १५ ८ पाहिणा दाहिना १५ सव्वस सव्वस्स १८ समीद समिइ १० सप्परिआयं सप्परिभाव १३ भरसविहस्स वारसविहस्स २० २५. भपूर्वचंद्र अपूर्वचन्द्रम् २४ २३ उहएणं उहएणं २५ १९ सपरवत्तिमाए सकारवत्तिमाए ३१,३४ २०,२१ कउस्सग्ग काउस्सग ३१ कपभ ३२,३२,४१ १९,२४,१७ दुक्खभो दुक्खसओ ३४ १६ सर्वसाधुभ्य सर्वसाधुभ्यः ३४ भायरिआणं भायरियाणं ३६,३७,६०,६४ २३,९,९ देवसिय देवसिक उधरना ३९,७३ १२,२६. . ८ " १२ अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठम् पनको •खमासमन खमासमण ४० खाइम खाइम, साइम ४१,७५ ६,२२ आठा आठ ४१ २१ माणाए, माणाए माणाए, मायाए अइकारो अइआरो ४९,४९ -सव्वकालिए सनकालिमाए सच्चमिच्छो जो मे अइकारो वधाराए, सम्वधम्माइकमगा- ४९ १५ ए आसायगाए जो मे भइआरो खमासमाणार्ण खमासमणाणं ४९ भैसञ्चे भेसज्जे ५२ २२ -आव आवे 'गिन गिनना २ पुक्खरगरदीवद्वे पुक्खरवरदीवडे ३ शानाशिवं शान्ताऽशिवं ६६ (२) पावति पावंति “सुषांस सुरासं २९ विमलमणंत विमलमणतं ३१. हाके होके ८३ २८" खंडिअं खंडिअं यहां पर संवुद्धा खमासमणके -साथ "अन्मुहिओमि" छपना रह गया है वह कहना चाहिये अट्ट अठ्ठ ९३ साध्वी साध्वी S कुवा कूवा ९४ NA उपर ऊपर २७ .. “भूना भूखा ३ अशुद्धम् -रखा चिल्ह पृष्ठम् पङ्क्तो २४२३ २. यतना की लख २८ R ९९ ૨૬ २७ १६ २७ १०६ -सक्ष्म अलाहदा रखी इंगर मिट्टी विनेले गुणव्वयाण पंदित्त फडतुल ॥२॥ सिक्खावए समाससणो मदर 'सूर्योदयक आभववखंडा दोष पद्वजदुर्जित कृत्य २५ २२ शुद्धम् रखा चील्ह यतना न की लेख सुक्ष्म अलाहदी रखी डांगर मिट्टी विनोले गुगव्वयाणं वंदित्तु कूडतुल ॥२२॥ सिक्खावए खमासमणो मंदर सूर्योदयके भाभवमखंडा दोपं यद्गर्जदूर्जित कृत्यम् भयदवक्त्र प्रेतवजः प्रोद्यत्प्रवन्ध गहुग्गखग्ग पमाणुनेय भुक्खियवसेण २६ २० १११ १०८ १०८ १२३ १२९ १३८ १४३ १५२ १६२ १५ १८ २४ 10 " भयदवक प्रेतवक्तः प्रोद्यल्पबन्ध एहुग्गखग्ग पमाणनेय भुक्खियवसेण १६४ २० १६६ १६७
पृष्ठम् पकौ
अशुद्धम्
शुद्धम्
दारियापत्सपाश्रिते. दारिद्यापत्समाश्रिते १६९
२५
देवसिप्रतिक्रमणविधि पाक्षिकप्रतिक्रमणविधि ८२ से ११२ तक १
लक्ष्मी
लक्ष्मीम्
१७०
ही
ही
१८१.
ही
१८२०
नमोऽक्न्ते नमोऽन्ते
-------
A-..-
श्रीसिद्धाचलजी तीर्थ.
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मोरनार पर्वत पंचमी टॉक.
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धीगिरनार पर्वन नेमिनाथ टोक.
अथ विधि सहित ॥श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र॥ सामायिक लेनेका विधि ( पहिले उंचे आसन पर पुस्तक प्रमुख रखके श्रावक श्राविका, फटासणा, मुहपत्ती, चरपला लेकर शुद्धवस्त्र, जगा पुंजके कटासणे पर बैठके मुह- मत्ती वामहाथमें मुंहके पास रखके जिमणा हाथ थापनाजीके सन्मुख रखक) नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहणं. एसो पंचनमुकारो, सव्व पावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसि, पढम हवह मंगलं॥ (ऐसे एक नवकार गिनके फिर ) पंचिंदिय संवरणो, तह नवविह वंभचेर गुत्तिधरो। चउन्विह फसाय मुक्को, इअ अट्ठारस गुणेहिं संजुत्तो। यंच.महव्वयजुत्तो, पंचविहायार पालणसमत्थी। पंचसमिओ तिमुत्तो छत्तीसगुणो गुरुमज्झ ।। (ऐसे पंचिंदिय कहे, जो आगेसे उस स्थानपर आचार्य प्रमुखकी स्थापना की हुई हो तो वहां पंचिंदिय नहीं कहना, फिर) इच्छामि खमासमणो वंदिउं, जावणिज्जाए निसीहिआए भत्थरण वंदामि.
सामायिक लेनेका विधि. इच्छाकारेण संदिसह भगवन इरिया वहियं पडिकमामि,इच्छं । इच्छामि पडिक्कमिडं, इरिया वहियाए,विराहणाए, गमणागमणे ...पाणकमणे वीयकमणे हरियकमणे, ओसा उत्तिंग पणग दगा मट्टी मकडा संताणा लंकमणे, जे मे जीवादिराहिया, एगिदिया. वेइंदिया, तेइंदिया चरिंदिया पंचिंदिया, अमिहया वत्तिया लेसिया, संवाइया संघट्टिया परियाविया, किलामिया उद्द- विया, ठाणाओठाणं संकासिया जीवियाओ ववरोचिया तस्सा मिच्छामि दुकडं॥ तस्स उत्तरी करणेणं, पायच्छित्तकरणेणं, विसोहीकरणे, विसल्ली करणेणं पावाणं कम्माण निग्घायणटाए ठामि काउस्लग्गं॥ अन्नत्थ उससिएणनीससिएणंखासिएणं छीएणं जंभाइएण, उड्डएणं वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहि अंग संचालहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालहि, सुहुमेहि दिठिसं- चालहिं, एवमाइएहि, आगारोहि,अभग्गो अंविराहिओ, हुज्झमे फाउस्सग्गो. जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुकारेणं न पारेमि तावकार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।। फिर एक लोगस्स वा चार नवकारका काउस्सग्ग करना. पीछे प्रगट लोगस्स कहना सो नीचे नुतात्रिक ) लोगस्स उजोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहते कित्तइस्सं, चउविसपि केवली ।। उसममजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च। परमप्पह सुपासं, जिणंच चंदप्पहं वंदे ॥ १ प्रतिक्रमण वगैरह विधिओंमें जहाँ जहाँ खमासमण देने में आते हैं वहां वहां खडे होकर देने चाहिए. आदेश भी खडे होकर मांगना चाहिए. २ प्रतिक्रमण वगैरह विधिओमें तीन प्रकारकी मुद्रा में रहनेका होता है.
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र. in सुविहि च पुष्पदंत, सीमल सिजंस वासुपुजंचा विमलमणतं च जिणं, धम्म संतिं च बंदामि। कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुब्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिठ्ठनर्मि, पासं तह चद्धमाणं च ।। एवं सए अलिथुआ; विडयरयमला पहीण जरमरणा । चउवासं पि जिणवरा, तिथ्थयरा मे पसीयंतु॥ कित्तिय वैदिय महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा । आरुग्ग वोहिलाभ समाहिवरमुत्तमं दितु ॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइन्चेसु अहियं पयासयरा। सागरचर गंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ (फिर खमासमण देना) इच्छं इच्छामि खमासमणो चंदिडं जावणिजाए निसीहि- आए मथ्थरण वंदासि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामा- यिक मुहपत्ती पडिलेहूं “इच्छं" (ऐसे कहके मुहपत्ती पडिलेहनी. फिर ) इच्छामि खमासमणो दिउं जावणिजाए निसीहिआम मथएण चंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक संदिसाहुँ? " इच्छं" । इच्छामि खमासमणो वैदिउं जावणि- जाए निसीहिआए मथ्यएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक ठाउं ? " इच्छं"। (ऐसे कहके दोनों हाथ जोडकर नीचे मुजवं नवकार गिनना.) नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवज्झायाणं, ममो लोए सव्वसाट्टणं. एसो पंचनमुकारो, सब्व पावप्पणासणो, मंगलाणं च सन्वेसि, पढम हवह मंगलं ॥
राइप्रतिक्रमण विधि. (फिर--इच्छकारि भगवान् पसाय करी सामायिक दंडक सचरावोजी से गुरुको कहना यदि गुरु न हो तो स्वयं हायसे ले लेना.) करोमि भंते सामाइयं, सावज जोग पञ्चवखामि, जावनियम पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करोमि न कारवेमि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं चोसिरामि॥ (फिर) इच्छामि खमासमणो चंदिउँ जावणिजाए निसाहिआए • मत्थएण चंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् वेसणे संदिसाहुं ? " इच्छं।" इच्छामि खमासमणो वंदि जाव- णिजाए निसीहिआए मथ्थरण वंदामि । इच्छाकारेण संदि- सह भगवन् वेसणे ठाउं? "इच्छ." इच्छामि खगासमणो वंदिर जावणिजाग निसीहिआए मत्थपण वदामि । इच्छाकारण. संदिसह भगवन् सज्झाय संदिसाई ?"इच्छं" । इच्छामि खमासमणो वंदिउंजावणिजाए निसीहिआए मथ्थएण चंदामि. इच्छाकारेण संदिसह भगवन् , सम्झाय करूं ?" इच्छं"। ऐसे कह कर दोनों हाथ जोडके तीन नवकार गिनना. ॥ (इति सामायिक लेनेका विधि संपूर्ण.) अथ श्री राइप्रतिक्रमण विधि, (इस प्रकार सामायिक लेकर फिर.) इच्छामिखमासमणो वैदिउंजावणिजाए निसीहियाए मथ्थ- पण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् कुसुमिण दुसुमिण पहिली " योगमुद्रा" दोनों हाथकी दो अंगुलियां इक्ट्ठी करके इस मुद्रा को बैठे बैठे जो क्रिया करने में आती है उस वख्त पर उपयोगमें लेनी. दूसरी " जिनमुद्रा"- खडे हुए दो पैरोके खडे हुए दो पैरोके बीच में अगले भागमें चार अंगुल जगह रखनी और पिछले भागमें उससे कुछ कम सनी, यह मुद्रा खडे खडे काउस्सग्ग वगैरह विधिओमे करनेकी है. बिना काउस्सगा खडं रहे हुए पावसे जिनमुद्रा और हाथसे योगमुद्रा सनी बाहिये.
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र. राइउड्डावणि पायच्छित्त विसोहणथ्थंकाउस्लग्ग करूं.?'इच्छ' । कुसुमिण दुसुमिणराइउड्डावणि पायच्छित्त विसोहणत्थं करेमि काउस्लग्गं ॥ अन्नथ्थ उससिपणं नीससिएणं, खासिएणंछीएणं जंभाइएणं उइदुपणं चायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहु- मेहिं अंगसंचालेहिं सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमहिं दिष्टि- संचालहिं एवमाइहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्तग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि तावकायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।। (चार. लोगस्सका काउत्सग्ग करना लोगस्स न आता हो तो सोलह नवकारका काउस्सग्ग करना. काउस्मग्ग पारके प्रगट लोगस्त कहना वह नीचे भुजब.). लोगस्स उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिण । अरिहंते कित्तइस्सं, चउधीसंपि केवली ॥ १ ॥ उसममजिअं च चंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च ॥ पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पह वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्फदंतं, सीयल सिजंस वासुपुजं च ।। विमलमणतंच जिणं, धम्म संतिं च चंदामि ॥ ३॥ कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुब्वयं नमिजिणं च ।। वंदामि रिठ्ठनेमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा । चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ ५॥ कित्तिय वैदिय महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग बोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमंदितः ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा ।। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७ ॥ (फिर) इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए मथ्थएण चंदामिः (ऐसे कहके चैत्यवंदन करना) ६ चयवंदन. चैत्यवंदन जगचिंतामणि जगनाह, जगगुरु जगरक्षण । जगवंधव जगसत्थवाह, जगभावविअरवण ॥ अट्टावय संठविय रूबकम्मविणासण। चवीसंपि जिणवर जयंतु अप्पडिहयसासण ॥१॥ कम्मभूमिहि कम्मभूमिहिं पढमसंघयाणि । उकोसय सत्तरिसय जिणवराण विहरंतलभ्मइ ।। नवकोडिहिं केवलीण, कांडिसहस्स नवसाहु ग़म्मइ । संपइ जिणवर वीस मुणि विहुँ कोडिहिं वरनाण । समणह कोडिसहस्स दुअथुणिजिअनिच्च विहाणि ॥२॥ जयउ सामी जयउसामी रिसह सत्तजि उर्जित पंहुनेमिजिण । जयउ वीर सच्चरि मंडण, भरुअच्छहिं मुणिसुव्वय । मुहरिपास दुह दुरिअखंडण,अवरविदेहि तित्थयरा। चिहुंदिसि विदिसिजि केवि तीअणागय ।। संपइय वंदुजिण सम्ववि ॥३॥ सत्ताणवइ सहस्सा, लख्खा छप्पन्न अडकोडियों। बत्तीसय वासीआई, तिअलोए चेइए वंदे ॥४॥ पन्नरस कोडि सयाई कोडि वायाल लख्ख अडवन्ना । छत्तीस सहस्स असिआई,सासय विवाई पणमामि ॥५॥ जं किंचि नाम तिन्थं, सग्गे पायालि माणुसे लोए । जाई जिविंवाई, ताई सवाई वंदामि ।। फिर नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ माइगराणं तित्थयराणं, सयंसंवुद्धाणं ॥२॥ घुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरियाणं । पुरिसवरगंधहथ्थीणं ॥३॥ लोमुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहिआणं || लोगपइवाणं, लोगपंजोअगराणं ॥४॥ अभयदयाणं, चख्खुदयाणं, मग्गदयाणं, ॥ .
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र. ७ सरणदयाणं, बोहिदयाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसिआणं, धम्मनायगाणं ।। धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं ॥ ६॥ अप्पडिहय वरनाणदसणधराणं, वियदृछउमाणं ।। ७॥ जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं, तारयाणं, ॥ बुद्धाणं वोहियाणं, मुत्ताणं, मोअगाणं ॥ ८॥ सम्वन्नूर्ण, सव्वदरिसिणं, सिवमयलमरुय । मणंत मक्खकय मन्वावाहमयुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं । ठाणं संपत्ताणं, नमोजिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥ जअ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्तंति णागए काले ॥ संपअ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वदामि ॥ १०॥ जाति चेइआई, उड्ढेअ अहे अतिरिअलोए म । सवाई ताई वंदे इह संतो तत्थ संताई ॥१॥ जावंत केवि साहू, भरहेरवय महाविदेहे अ॥ सन्वेसि तेसिं पणओ, तिविहेण तिदंड विरयाणं ॥१॥ नमोऽर्हत् सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः (फिर) उवस्सग्गहरं पालं, पासं वदामि कम्मघणमुकं । विसहर विसनिन्नासं मंगलकल्लाण आवासं ॥१॥ विसहर फुलिंगमंतं कंठे धारेइ जो सया मणुओ। तस्स गह रोगमारी दुजरा जति उवसामं ॥२॥ चिउ दूरे मंतो, तुज्य पणामो वि बहुफलो हो । नरतिरिपसु वि जीवा पार्वति न दुःख दोगचं ॥३॥ तुह सम्मत्ते लढे चिंतामणि.कप्पपायवभहिए । पावति अविग्घेणं जीवा अयरामरं ठाणं ॥४॥ इअसंथुओ महायस भत्तिभरनिभरेण हियएण । ता देव दिजवोहिं भवे भवे पांसजिणचंद ॥५॥ (फिर) जय वीयराय जगगुरु होउ ममं तुह पभावओ भय । भव निव्वेओ मग्गाणुसारिआ इफल सिद्धि.॥१॥ लोगविरुद्धञ्चाओ गुरुजणपूआ-परस्थकरणं च ।
चैत्यवंदन. सुहगुरुजोगो तवयगलेवणा आभत्रमखंडा ॥२॥ वारिजइ जइवि निआणधणं वायराय तुहसमय । तहवि मम हुज सेवा भवे भवे तुम्ह चलणाणं ॥ ३॥ दुखक्खओ कामक्खो समाहि मरणंच चोहिलामो अ। संपजओ मह एअंतुहनाह पणाम करणेणं ॥ ४॥ सर्व मंगल मांगल्यं सर्व कल्याण कारणं । प्रधानं सर्व धर्माणां जैन जयति शासनं ॥ ५॥ (यहाँ एक एक ख नास मग देकर भगवान इत्यादि एक एक पद कहना चाहिये) भगवानह, आचार्यह, उपाध्यायह, सर्वसाधुहं । इच्छामि- खमासमणो वैदिर जावणिजाए निसीहिआए सस्थएण वंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सज्झाय संदिसाहुं ? "इच्ई" इच्छामि खमासमणो वैदिउंजावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सज्झाय करूं ? "इर्छ" ( ऐसे कहके एक नकार गिनना. फिर भरहेसरकी सज्झाय कहनी. नीचे भरहेसर वाहुवली अभयकुमारो अ ढंढणकुमारो। सिरिओ आणिआउत्तो अंइमुत्तो नागदत्तो अ॥ १॥ मेअज शूलिभदो वयररिसी नंदिसेण लीहगिरि। कयवनोअ.सुकोसल पुंडरिओ केसिकरकंडू ॥२॥ हल्लविहल सुदंसण सालमहासाल सालिभद्दोज । भदो दसन्नभद्दो पसनचंदो जसमद्दो ॥ ३॥ जंबुपहु वंकलो गयसुकुमालो अर्वतिसुकुमालो । धनो इलाइपुत्तो चिलाइयुत्तो अ वाहुमुणी ॥४॥ अजगिरि अजरंक्खिअ अजसुहत्थी उदायगो मणगो। कालयसूरि संबो पंज्जुन्नों मूलदेवो अ॥ ५॥ पभवो विण्हुकुमारों अदकुमारो दढप्पहारी । सिजंस कुरगडू अ सिजभव मेहकुमारो अ॥६॥ एवमाइ महासत्ता दितु सुई गुणगणेहिं संजुत्ता। जेसि.नामम्गहणे पावपबंधा विलयं जति ॥ ७॥ वह मुजब ) .
श्री पंचप्रातक्रमण सूत्र. सुलसा चंदनवाला, मणोरमा मयणरहा दमयंती। नमयासुदरि सीया नंदा भद्दा सुभद्दा य । ८॥ राइम रिसिदत्ता, पउमावइ अंजणा सिरिदेवी । जिट्ठसुजिट्ठ मिगावइ पभावइ चिल्लणादेवी ॥ ९ ॥ बंभी सुंदरी रुप्पिणी रेवड कुंती सिवा जंयतीय। देवइ दोवड धारणि, कलावइ पुष्फला य ॥ १० ॥ पउमावश्य गोरी, गंधारी लक्खमणा सुसीमा य । जंबुवइ सञ्चभामा, रुप्पिणि कन्हमाहिसीओ ॥ ११ ॥ जक्खाय जस्खदिन्ना, भूआ तह चेव भूअदिन्ना य । सेणा वेणा रेणा, भइणीओ शूलिभद्दस्त ॥ १२ ॥ इच्चाइ महासईओ जयंति अकलंक सीलकलिआओ। यजविवाइ जासिं जसपडहो तिहुमणे सयले ॥ १३ ॥ (फिर एक नवकार मंत्र गिनना) नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नसो आयरियाणं नमो उवझायाण नमो लोए सन्यसाहूर्ण एसो पंचनमुकारो सव्व पावप्पणासणो मंगलाणं च सम्वेसिं पढमं हवद मंगल ।। इच्छकार सुहराइ सुखतपशरीर निरावाध सुखसंयमयाना निर्वहो छो जी स्वामी शाता छे जी इच्छकारेण संदिसह भगवान् राइपडिकमणे ठाउं ? इच्छं सव्वस्सवि राइअ दुचिंतिअ दुभासिम दुञ्चिट्ठिा इच्छा- कारेण संदिसह भगवन् ? इच्छं तस्स मिच्छामि दुक्कडं. (फिर नेमोत्थुणं कहना) नमोत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं १ आइगराणं तित्थयराणं सयंसंबुद्धाणंरपुरिमुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिसवर पुंडरिया- ण पुरिलवरगंधहत्थीणं ३लोमुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआर्ण लोगपइवाणं लोगपजोअगराण अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्ग- दयाणं सरंणयाणं वोहिदयाणं ४ धम्मदयाण धम्मदेखि- आणंधम्मनायगाणधम्मसारंहीणं धम्मवरचाउरंतचझवट्टीर्ण ५ अप्पडिहय वरनाणा दंसणधराणं विअछउमाणं ६ जिणाण राइप्रतिक्रमण विधि जावयाणं तिनाणं तारयाण बुद्धाणं वोहिआणं मुत्ताणं मोअ- गाणं ७ सव्वन्नूर्ण सम्वदरिसीणं सिवमयलमरुअमणंत- मक्खयमवावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं- संपचाणं नमोजिणाणं जिअभयाणंटजे अ अईआ सिद्धाजे अ- भविस्सति णागप काले संघइअ वट्टमाणा सव्वे तिविहेण बंदामि १०. करेमिभंते सामइयं सावजंजोगं पञ्चवखामि जावनियम रज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं मणेणं वायापकाएणं न करोमि न कारवमि तस्स भंते पनिमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं बोसिराखि। इच्छामिठामि काउस्सग्गजोमे राइओ अइआरोकओ काइ ओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकर- णिज्जो दुल्झाओ दुधिचिंतिओ अणायारो अणिच्छियचो असावगपाउग्गो नाणे दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिन्हं गुत्तीणं चउन्हं कलायाण पंचन्हमणुब्बयाणं तिन्हं गुण- म्बयाणं चउन्ह सिक्खावयाणं बरसधिहरस साक्ग धम्मरस जे खंडिजविराहि तस्ल मिच्छामि दुबई ।। तस्स उत्तरिकरणेणं पायच्छित्त करणेणं विसोही करणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कमाणं णिग्घायणट्ठाए ठामि काउस्लग्गं। अन्नत्थ उससिपणं निससीएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- रणं उडएणं वायनिसगेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहु- महिं अंग संचालीह.सुझुमेहिं खेलसंचालहिं सुहमेहिं दिठि- संचालहिं एवमाइएहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिओ हुन्ज मे काउस्लग्गो जाच अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारोमि तावकार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥. (एक लोगस्सका काउस्सग करना, न आवे . तो चार नवकार मंत्र 'गिनना. फिर काउस्सग पारके प्रगट लोगस्स कहना वह नीचे मुंजब.) लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। .
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र.
१९
अरिहंते कित्तइस्सं, चवीसपि केवली ॥१॥
उंसभमाजच वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥
सुविहिं च पुप्फदतं. सीयल सिजंस वासुपुजं च ।
विमलमणंतं च जिणं, धम्म संतिं च वदामि ॥३॥
कुंथु अरं च मल्लि, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।
वंदामि रिमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥ ४ ॥
एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा।
चवीसपि जिणवरा, तित्थयरामे पसीयंतु ॥५॥
कित्तिय वंदिय महिया जेए लोगस्स उत्तमा सिद्धा।
आरुग्ग वोहिलाभ, समाहि वर मुत्तमंदितु ॥ ६॥
चंदेस निम्मलयरा, आइञ्चेसु अहियं पयासयरा ।
सागरवर गंभीरा, सिद्धा सिद्धि मम दिसंत ॥७॥
(फिर)
सबलोए अरिहंतचे आणं करमि काउस्सगं वंदणवत्ति
आए पूअणवत्तिआए सकारवत्तिआप सम्माणवत्तिआप वोहि-
लाभवत्तिआए निरुवसम्ग वत्तिआए सद्धाण मेहाए धिइए
धारणाए अणुप्पेहाए वढमाणीए ठामि काउस्सग्गं.
अन्नत्थ उससिएणं निसासिएणं खासिएर्ण छीएणंभाइएणं
उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमहिं अंगर्स-
चालेहिं सुहुमेहि खेलसंचालहिं सुहुमहिं दिहिसंचालहिं एव-
मावहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ हुन्ज मे काउस्सग्गो
जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारोमि तावकार्य
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥
(एक लोगस्सका काउस्सग करना. न आवे तो चार नवकारमंत्र गिनने.
फिर पुक्खरवरदीवढे कहना. वह नीचे मुजत्र.)
पुक्खरवरदीव धायइसंडे अ जंबूदीवे अ।
मरहेरवय विदेहे धम्माइगरे नमसामि ॥१॥
तमतिमिरपडलविद्धंसणस्स सरगणनारदमाहियरल।
सीमांधरस्स वंदे पप्फोडिअमोहजालस्सं ॥२॥
.१२ राइप्रतिक्रमण विधि. जाइ जरा मरण सोग पणासणस्स कल्लाण पुक्खलविसालसुहावहस्स। को देवदाणव नरिंदगणच्चियस्स धम्मस्स सारमुबलभ करे पमायं ॥३॥ सिद्धे भो पयओ णमो जिणमये नंदिसया संजमे देवं नाग सुवनकिन्नर गणलभूअ भावच्चिए। लोगो जन्थ पइठिओ जगमिणं तेलुक्कमच्चान्सुरं धम्मो वठ्ठउ सासओ विजयओ धम्मुत्तरं बढयो ॥४॥ सुअस्स भगवओ करेमि काउस्सग्गं. वंदण वत्तिआए पूअण वत्तिाए सकार वत्तिआप सम्माण वत्तिआए वोहि- लाभ वत्तिआए निरुवसग्ग वत्तिआप सद्धाए मेहाए घि धारणाए अणुप्पेहाए वठ्ठमाणीप ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्थ उसलीएणं निससीपणं खासिएणं छीपणं जमाइ- एणं उडुएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालेहिं सहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिविसंचालेहि एवमाइएहिं आगारहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्स- ग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि ताव- कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।। .( फिर आठ गाथाका कारस्सग्ग करना. न आवे तो आठ नवकारमंत्र गिनना. वह आठ गाथाका काउस्सग्ग नीचे मुजव.) नाणमि दसणमि अ, चरणमि तवंमि तह य विरियमि। आयरणं आयारो, इअ एसो पंचहा भणिओ ॥ १॥ . काले.विणए वहु माणे, उवहाणे तहय निन्हवणे। वंजण अत्थ तदुभय, अविहो नाणमायारो.॥२॥ निस्संकि निखिम निश्चितिगिच्छा असूढदिठी अ । उवयूह थिरीकरणे वच्छलप्पभावणे अठ्ठ ॥३॥ . पणिहाण जोगजुत्तो पंचहि सामिाह तिहि गुत्तिहिं । एस चरित्तायारो, अविहो होइनायवो.॥४॥ बारस विहमि तवे, सभितर वाहिरे कुसलदिखें।
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र.
१३
अगिलाइ अणाजीवी, नायव्यो सी तवायारो॥५॥
अणसणसूणोअरिया, वित्तीसंखेवणं रसञ्चाओ।
कायकिलेसो संलीणयाय बझो तवो होई ॥६॥
पायच्छित्तं विणओ, वेयावच्चं तहेव समझाओ।
झाणं उस्सग्गोवि अ, अम्भितरओ तबो होई ॥७॥
अणमूहिअ चलविरिओ परिकमइ जो जहुत्तमाउत्तो।
जुंजइ अ जहा थाम नायवो वीरियायारो ॥ ८॥
( काउस्सग्ग पारके सिद्धाणं बुद्धाणं कहना. वह नीचे मुजव.)
सिद्धाण बुद्धाणं पारगयाणं परंपरगयाणं।
लोअग्गसुवगयाणं नमो सया सव्वसिद्धाणं ॥ १ ॥
जो देवाण वि देवो जं देवा पंजली नमसंति ।
तं देवदेवमहिरं, सिरसा वंदे महावीरं ॥२॥
इकोवि नमुकारो, जिणवर वसहस्स वद्धमाणस्स।
संसार सागराओ तारेह नरं व नारिं वा ॥३॥
उजितसेलसिहरे, दिक्खा नाणं निसीहिआ जस्स।
तं धम्मचकवादि अरिष्टनेमि नमसामि ॥४॥
चत्तारि अट्ठ दस दोय, चंदिया जिणवरा चउवीसं।
परम निट्टिअट्टा, सिद्धा सिद्धि मम दिसंत ॥ ५ ॥
(फिर तिसरे आवस्यककी मुहपत्ती पडिलहनी फिर दो बांदणां देना
वह नीचे मुजब.)
इच्छामि खमासमणो वंदिर जावाणिजाए निसीहिआए
वाणुजाणह में मिउग्गहं निसीहि अहोकायं काय संफासं
नमाणिज्जो में किलामो अप्पकिलंताणं वहुसभेण भे राइ घर-
शंता जत्ता मे जवणिज च भे खाममि खमासमणो राइ
बाइकम्म आवसिआए पडिकमामि खमासमणाणं राइआए
आसारणाए तित्तीसन्नयराए जकिंचि मिच्छाए मणंदुकडाए
ययदुकंडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए
सम्वकालिआए सव्वमिच्छोवराए सव्वधम्माइकमणाए
थासायणाए जोमे अहआरोको तस्स खमासमणो पडिकमा-
मिनिंदामि गरिहामि अप्पाणं चोसिरामि ॥१॥
१४ राइप्रतिक्रमण विधि. इच्छामिखमासमणो बंदिउंजावणिजाएनिसीहिआए अणु- जाणह मे मिउग्गह निसीहि अहोकायं काय संफालं. खम- गिजो मे किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुभेण भे राइ वकता जत्ता मे जवणिजं च मे खाममि खमालमणो राइवलम्र पडिकमामि खमालमणाणं राइआप आसायणाए तित्तीसन्न य राए जंकिंचि मिच्छाए मणदुकडार वयदुकडाए कायदुक्का- डाए कोहाए माणाए मांयाए ‘लोभाए सव्वकालिआए लब्चमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइकमणाए आसायंणाए जो मे अइसारो को तरस खास रणो पडिकमामि निदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥२॥ फिर इच्छाकारेण संदिसह भगवन् राइ आलोटं ?" इच्छ" आलोपामि जो मे राइओ अइआरो को काइओ पाइओ माणसिओ उस्मुत्तेो उम्मग्गो अकप्पो अकराणिज्जो दुज्झाओ दुविचिंतिओ अणायारो अणिच्छिंयन्वो असावग पाउग्गो नाणे दंसणे चरित्ता चरित्ते सुए सामाइए तिण्हंगुत्तीणं चउ- पहं कसायाणं पचण्हाणुब्बयाणं तिण्हं गुणबयाणं चउण्ह लिक्खाक्याणं वारसविहस्स सावग धम्मरस खंडिजवि- राहि तस्स मिच्छामि दुक्कडं । (फिर) सात लाख पृथिवीकाय सात लाख अपकाय सात लाख तेउकाय सात लाख वाउकाय दस लाख प्रत्येक वनस्पति- काय चउद लाख साधारण वनस्पतिकाय वे लाख वे इंद्रिय वे लाख तेइंद्रिय वे लाख चउरिद्रिय चार लाख देवता चार लाख नारकी चार लाख त्रियं च पचेंद्रिय चौद लाख मनुष्य एवंकारेचोरासी लाख जीवायोनीसेंसे मेरे जीवने जो कोई जीव हनन किया हो करायाहो करनेवाले को भला जाना होय सो सव मन वचन काया कर मिच्छामि दुकाई॥ -(फिर)
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र.
१५.
पहले प्राणातिपात दूजे मृपावाद तीजे अचादान चौथे
मैथुन पांचमे परिग्रह छठे शोध सातमे मान आठमे माया
नवमे लोभ दसमे राग इग्यारमे द्वेप बारमे कलह तेरमें
अभ्याख्यान चौदमें पैशुन्य पंदरसे रति अरति सोलमे पर
परिवाद सत्तरमे मायामृषावाद अठारमे मिथ्यात्वशल्य इन
अठारह पापस्थानों से मेरे जीवने जो कोई पापस्थान सेवन
किया हो कराया हो करनेको भला जाना हो यह सव मन
वचन कायाकर मिच्छामि दुक्कडं ॥
फिर
सवस्सवि राइस दुञ्चिन्तिम दुब्मासि दुधिष्ठिम इच्छा-
कारेण संदिसह भगवन् तस्स मिच्छामि दुकाई ।।
( दाहिणा गोडा ऊंचा करके नीचे मुजब बोलना)
नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं।
नमो उवज्झायाणं नमो लोए सव्वसाहणं एसो पंच
नमुकारो सव्वपावप्पणासणो मंगलाणंच सवेलि
पढम हवह मंगलं ॥
करोभ भंते सामाइयं सावज जोग पच्चक्खामि जाव-
नियमं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न
करोमि नं कारवमि तस्स भंते पडिकमायि निंदामि गरिहामि
अप्पाणं घोसिरामि ॥
इच्छमि पडिकमि जो मे राइओ अइआरो फओ काइयो
वाइओ माणसिओ उस्सत्तो उमग्गो अकप्पो अकरणिज्जो
दुज्झाओ दुविचिंतिओ अणायारो अणिञ्छिअन्वो भला-
वग पाउग्गो नाणे दसणे चरित्ताचारित्तेसुप सामाइए तिह
गुत्तणिं चउण्हं कसायाणं पंचण्हमणुब्बयाणं तिहं गुण-
व्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाण. वारस विहस्स सावग
धम्मस्स जं खंडिजविराहियं तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।।
वादत्तु सम्वसिद्धे, धम्मायरिए अ सव्वसाह अ।
इच्छामि पडिकमि, सावगधम्माइआरस्स ॥१॥
राशतिनग विधि.
जो मे वयाइआरो, नाणे तह दंसणे चरित्ते ।
सुहुमो अ वायरो वा, तं निंद तं व गरिहामि ॥२॥
दुविहे परिगाहमि, सावजे बहुविहे अ आरंभ।
कारावणे अकरणे, पडिकमे राइस ॥३॥
जं वद्धादिएह, चडाह कलाएहि अप्यसत्यहि ।
सगेण व दोसेण व, तं निदेतं च गरिहामि ॥ ४॥
आगमणे निगामणे, ठाणे चंकमणे अणाभोगे।
अभियोगे बनियोगे पतिकमे राइसन्चं ॥५॥
संका कंत्र विगिच्छा, पसंस तह संथदो कुलिंगीसु।
सम्मत्तस्स इआरे, पडिकमे राइ सवं॥ ६॥
जज्ञाय समारंभे, पयणे अ पयावणे अजे दोसा।
अत्तहाय परहा, उभयहा वेव तं निंद ॥ ७ ॥
पंचण्हमणुबयाणं, गुणबयाणं च तिण्हमइआरे ।
सित्ताणं च चउण्इं, पतिक्षम राइयं सन्वं ॥ ८॥
पढमे अणुब्वयंमि, शृलगपाणाइवाय विरईओ
आयरियमप्पसत्ये, इत्य प्पमायप्पसंगणं ॥ ९ ॥
वह बंध छविच्छेए, अइभारे भत्तपाणबुच्छेए ।
पढमवयत्त्ल इयारे, पडिकमे राइयं सव्वं ॥१०॥
बीए अणुल्वयंमि, परिथूलगलिययण विरईओ।
यायरियमप्पसत्थे, इत्य प्पमायप्पलंगेणं ॥११॥
सहसा रहस्ल दारे, मोनुवएसे अ कूडलेहे ।
बीयवयस्ल इयारे, पडिझमे राइसं सन्यं ॥ १२ ॥
तइए अणुब्वयंनि, थलग परदन्बहरण विरईओ।
आयरियमप्पसत्ये, इत्य प्पमायप्पसंगणं ॥ १३ ॥
तेनाहडप्पओगे, तप्पडिस्वे विरुद्धगमणे ।
कुडतुल कूडमाणे, पडिकमे राइ सन्वं ॥ १४ ॥
चडत्ये अणुश्वयंमि, निच्चं परदारगमण विरईओ।
आयरियमप्पसत्ये, इत्य प्पमारपंसंगणं ॥ १५॥
अपरिगहिआइत्तर, अणंगविवाह तिव्व अंगुरागे ।
वडत्यक्यस्सं इयारे, पार्डिकमे राइ सन्वं ॥ १६॥
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र. १७ . इत्तो अणुब्बए पंचमंमि, आयरियमप्पसत्थंमि । परिमाण परिच्छेए, इत्थप्पमायप्पसंगेण ॥ १७ ॥ धण धन खित्तवत्थु, रुप्प सुवन्ने अ कुविअ परिमाणे। दुपए चउप्पयंमि, पडिकमे राइ सव्वं ॥ १८॥ गमणस्सउ परिमाणे, दिसासु उड्ढे अहेअतिरिअंच। बुढिसइ अंतरद्धा, पढममि गुणवए निंदे ॥ १९॥ मजमि अ मंसंमि अ, पुप्फे अ फले अगंधमल्ले अ। उवभोगे परिभोगे, वीमि गुणवए निदे ॥२०॥ सञ्चित्ते पडिबद्ध, अप्पोल दुप्पोलिअंच आहारे । तुच्छोसहि भक्खणया, पडिकमे राइ सव्वं ॥ २१ ॥ इंगाली वणसाडी, भाडी फोडी सुवजए कम्मं । वाणिजचेव यदंत, लक्खरस केसविस विसयं ॥ २२ ॥ एवं खुजंतपिल्लण,कम्मं निलंछणं च दवदाणं। सरदह तलायसोसं, असई पोसं च वजिजा ॥२३॥ सस्थग्गि मुसल जंतग, तणकट्ठे मंतमूलभेसजे । दिने दवाविएवा पडिकम्मे राह सव्वं ॥ २४ ॥ न्हाणवट्टणवन्नग, विलेवणे सद्दरूवरसगंधे। वत्थासण आभरणे, पडिकमे राइ सव्वं ॥ २५ ॥ कंदप्पे कुक्कइए, मोहार अहिगरण भोगअरित्ते। दंडमि अणठाए, तइमि गुणवए निंदे ॥ २६ ॥ तिविहे दुष्पणिहाणे, अणवठाणे तहासइविहुणे । सामाइअ वितह कए, पढमे सिक्खायए निंदे ॥२७॥ आणवणे पेसवणे, सहे स्वे अ. पुरंगलवखेवे। देसावगासिमि, बीए सिक्खावए निदे ॥२८॥ संथारुच्चारविही, पमाए तहचेव भोयणाभोए। पोसह विहि विवरीए, तइए सिक्खावए.निंदे ॥२९|| सञ्चित्ते निक्खिवणे, पिहिणेववएसमच्छरे चेव। कालाइकमदाणे, चउत्थे सिक्खाए निंदे ॥३०॥ सहिएसु अ दुहिएसु अ, जामे असंजएसु अणुकंपा।
१८ राइप्रतिक्रमण विधि . रागेण व दोसेण व, तं निदे तं च गिरहामि ॥३१॥ साहसु संविभागो, न को तवचरण करण जुत्तेसु । संते फायदाणे, तं निदे तं.च गरिहामि ॥ ३२ ।। इहलोए परलोए, जीवित्र मरणे-अ आसंसप्पओगे। पंचविहो अइआरो, मा मज्श हुज मरणते ॥३३॥ कारण काइअस्स, पडिक्कमे वाइअस्स वायाए । मणसा माणसिअस्स, सघस वयाइयारस्त ॥३४॥ चंदणवयसिक्खागा, रवेसु सन्ना कसाय दंडेसु । गुत्तीसुथ समीइसु अ, जो अइआरो अतं निदे॥ ३५॥ सम्मदिटीजीवो, जइवि हु पावं समायरे किंचि । अप्पोसि होई बंधो, जेण न निद्धंधसं कुणइ ॥३६ ।। तं पि हु सपडिकमणं, सप्परिआयं सउत्तरगुणं च। खिप्पं उवसामेइ, वाहिव्व सुसिक्खिओ विजो ॥ ३७ ॥ जहा विसं कुछगयं, मंतमूलविसारया। विजाहणंति मंतेहिं, तो तं हवइ निविसं ।। ३८ ॥ एवं अष्टविहं कम्मं, रागदोस संमजि। आलोअंतो अनिंदतो, खिप्पं हणइ सुसावओ ॥३६॥। कय पावोवि मणुस्सो, आलोइअ निदि गुरुसगासे। होइ अइरेग लहुओ, ओहरिअ भरुव्व भारवहो ॥१०॥ आवस्सएण एएण, सावओ जइवि वहुरओ होइ ।। दुक्खाणमंतकिरिअं, काही अविरेण कालेण ॥४॥ आलोअणा वहुंविहा, नय संभरिआ पडिक्कमणकाले। मूल गुण उत्तरगुणे, तं निंदे तं च गरिहामि ॥ ४२ ॥ तस्स धम्मस्ल केवलि पंन्नत्तस्स। अन्भुटिओमि आराहणाए । विरओमि विराहणाए। तिविहण पडिकतो, वंदामि जिणे चउव्वीसं ॥४३॥ जावंति चेइआई०॥४४॥ जावंत.कोव साहू० ॥४॥ चिर संचिय पाय पणांसणीए.भवसयसहस्स महणाए .
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र. १९ चउवसि जिण विणिग्गय कहाई, वोलंतु मे दिअहा ।। मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साहू सुअंच धम्मो अ। सम्मदिछीदेवा, किंतु समाहिं च चोहिं च ॥४७॥ पडिसिद्धाणं करणे, किच्चाणमकरणे पडिकमणं । असद्दहणे अतहा, विवरीयपरुवणाए अ॥४८॥ खाममि सब्व जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे ॥ मित्ति मे सव्वभूएसु, वेरं मजा न केणइ ॥ ४९ ॥. एवमहं आलोइअ, निदिअ गरहिअ दुगंच्छि सम्म । तिविहेण पडिकतो, वंदामि जिणे चउवीसं ॥५०॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् अभुडिओमि अन्भिन्तर राइअंखामे इच्छं खाममि राइअं, जं किंचि अपत्ति पर- पत्ति भत्ते पाणे विणए वेयावच्चे चालावे संलावे उच्चासणे समासणे अंतरभासाए उवरिभासाए जं किंचि मज्झ विणय परिहीणं सुहुमं वा बायरं वा तुम्भे जाणह अहं न जाणामि तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ (फिर दो वांदना देनां) इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं काय संफासं खमाणिजो भे किलामो अप्पकिलंताण बहुसुभेण भे राइ वइ- कंता जत्ता भे जवणिजं च मे खाममि खमासमणो राइ 'वइकम्मं आवसिआए पडिकमामि खमासमणाणं राइआए आसाएणाए तित्तीसन्नयराए.जकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छोवराए सवधम्माइकमणाए आसायणाए जोमे अइआरोकओतस्स खमासमणो पडिकमा- मि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१॥ इच्छामिखमासमणो वंदिउंजावणिजाए निसीहिआए अणु- जाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं काय संफासं खमणिजो २० राप्रतिक्रमण विधि. - भे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे राइओ वइकतो जत्ता भे जवणिजं च भे खाममि खमासमणो राइअं वइकम्म पडिकमामि खमासमणाणं राइआए आसायणाएं तित्तीसन्नय- राए जंकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाएं कायदुक्क डाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सम्वमिच्छवियाराए सव्वधम्माइकमणाए आसायणाए जो मे अइआरो को तस्स खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥२॥ आयरिय उर्वज्झाए, लीसें साहम्मिए कुल गणेअ, जे मे केइ कसाया, सब्वे तिविहेण खामेमि ॥१॥ सब्वस्स समणसंघस्स, भगवओ अंजलिकरिब सीसे। सव्वं खमावइत्ता, खमामि सवस्स अहयपि ॥२॥ सव्वस्स जीवगसिस्स, भावओ धम्मनिहीअ निचित्तो। सव्वं खमावइत्ता, खमामि सव्वस्स अहयंपि ॥३॥ करोमि भंते सामइयं सावजं जोगं पञ्चक्खामि जावनियम पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं मणेणं चायाए कारणं न करोमि न कारवमि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि। इच्छामि ठामि काउस्सग्गजोमेराइओ अइआरोकओ काइ- ओ वाइओ माणसिओ उस्मुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकर- णिजो दुज्झाओ दुधिचिंतिओ अणायारो अणिच्छियव्वो असावगपाउग्गो नाणे दंसंणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिन्हं मुत्तीणं चउन्हं कसायाणं पंचन्हमणुव्वयाणं तिन्हें मुण- ब्बयाणं चउन्हें सिक्खावयाणं बरसविहस्स.सावगधम्मस्स जं खंडिअंजं विराहिअंतस्स मिच्छामि दुकडं.॥ तस्स उत्तरिकरणेणं : पायच्छित्त करणेण विसोही करणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं 'णिग्घायणट्ठाए ठामि काउस्सग्गं। अन्नत्थ उससिएणं निससीएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ. पण उड्डेएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहु- ..
श्री पंचप्रतिक्रमण सून. २१ . मेहिं अंग संचालहिं सुहुमेहि. खेलसंचालहिं सुहमेहिं दिहि- संचालहिं एवमाइएहिं, आगारहिं . अभग्गो अविराहिमओ हुज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारोमि तावकायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरासि ॥ (यहाँपर तपचिंतनका काउस्सग करना न आवे तो सोलह नवकार गिनने फिर काउस्सग पारके प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे मुताबिक) लोगस्स उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसपि केवली ॥१॥ उसभमजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च। पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्फदतं, सीयल सिजंस वासुपुजं च । विमलमणंतं च.जिणं, धम्म संति:च चंदामि ॥ ३॥ कुंथु अरं च मलिं, वंदे मुणिसुब्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिट्ठनर्मि, पासं तह वद्धमाणं च ॥ ४॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहाणजरमरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्थारामे पसीयंतु ॥५॥ कित्तिय वंदिय महिया, जेर लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग चोहिलामं, समाहि घरमुत्तमंदितु ॥६॥ चंदेस निम्मलयरा, आइञ्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवर गंभीरा, सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु ॥७॥ ( फिर छटा आवश्यककी मुहपत्ती पडिलेहनी, फिर दो खमासमण देने वह नीचे मुजब.) इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं काय संफासं खमणिज्जो मे किलामो अप्पफिलंताणं बहुसुभेण भे राइ वइ- कंता जत्ता भे जवणिजं च भे खामेमि खमासमणो राइ चाकम्म आवसिआए पडिकमामि. खमासमणाणं राइआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए, किंचि मिच्छाए मणदुकडाए चयदुक्कडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए २२ राइप्रतिक्रमण विधि. सवकालिआए सबमिच्छोवराएं सम्बधम्माइकमाए आसायणाए जोमे अइआरो कंओं तस्स स्त्रमासमणो पडिक मामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिलं जाणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं काय संफासं खमणिजो मे किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुभेण भे राइ वइ- कंता जत्ता भे जवणिजं च मे खामेमि खमासमणो राइ वइकम्मं आवसिआए पडिकमामि खमासमणांणं राइआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुकडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए 'मायाए लोभाए सम्वकालिआए सबमिच्छोवराए सबधम्माइक्कमणाए आसायणाए जोमे अइआरोको तस्स समासमणों पडिक- मामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ (फिर सकलतीर्थ कहना.) सकल तीर्थ वंदु कर जोड, जिनवरनामे मंगल कोडं ॥ पहेले स्वर्गे लाख बत्नीश, जिनवर चैत्य नमुं निशदिश ॥१॥ वीजे लाख अठावीश कयां, त्रीजे वार लाख सद्दह्यां। चोथे स्वर्गे अडलख धार, पांचमे वंदु लाखज चारं ॥ २ ॥ छठे स्वर्ग सहस पञ्चास, सातमे चालीश संहस प्रासाद । आठमे स्वर्गे छ हजार, नव दशमे वटुं शत चार ॥३॥ अग्यार वारमे त्रणसे सार, नव ग्रैवेयके त्रणसे अढार । पांच अनुत्तर सर्वे मळी, लाख चोराशी अधिकां वळी ॥४॥ सहस संत्ताणुं त्रेवीस सार, जिनवर भुवनतणो अधिकार । लांवा सो जोजन विस्तार, पचास उंचां बोहोतर धार ॥५॥ एकसो एंशी विच प्रमाण, सभासहित एक चैत्ये जाण । सोकोडवावन कोडसंभाल,लाख चोराणुसहसचौंआल ॥६॥ सातसे ऊपर साठ विशाल, सवि विव प्रणमुंत्रण काल । सात क्रोडने बोहोतेर लाख, भुवनपतिमां देवल भाख ॥ ७॥ एकसो एंशी बिंब प्रमाण, एक एक चैत्ये संख्या जाण ।
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत. ३ तेरसे कोड नेव्याशी कोर्ड, साठ लाख टुं करजोड | वत्रीसे ने ओगणसाठ, तीर्थीलोकमां चैत्यनो पाठ । तण लाख एकाणुं हजार, त्रणसे वीश ते विंव जुहार ॥ ९॥ व्यतर जोतिपिमा वळी जेह, शाश्वता जिन वढुं तेह । ऋषभ चंद्रानन वारिषेणं, वर्द्धमान नामे गुणसेण ॥१०॥ समेत शिखर वहूँ जिन वाश, अष्टापद वंदुं चोवीश । विमलाचल ने गढ गिरनार, आधु ऊपर जिनवर जुहार ॥११॥ शंखेश्वर केसरिओ सार, तारंगे श्री अजितजुहार । अंतरिक वरफाणो पास, जीरावलो ने थंभण पास ॥ १२ ॥ गाम नगर पुर पाटण जेह, जिनवर चैत्य नमुं गुणगेह । विहरमान वर्दु जिन वीश, सिद्ध अनंत नमुं निश दिश ॥१३॥ अढी द्वीपमा जे अणगार, अढार सहस सिलांगना धार । . पंचमहावत समितिसार, पाळे पळावे पंचाचार ॥१४॥ वाह्य अन्भितर तप उजमाळ, ते मुनि बटुं गुण मणिमाळ । नित नित ऊठी कीर्ति करूं, जीव कहे भवसागर तरुं ॥१५|| (फिर जो पञ्चक्खाण धारणा हो सो यहांपर धार लेना.) ॥अथ नमुक्कार सहि मुहिसहिअंर्नु पञ्चवखाण ॥ उग्गए सूरे नमुकार सहि मुठिसहि पञ्चक्खाइ । चउ-- विहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं सहस्सागारेणं महत्तरागारेण सव्वसमाहिवत्तियागारेणंवोसिरे (अथ पोरिसिं साढपोरिसिंका पञ्चश्खाण ) उग्गए सूरे नमुक्कारसहि पोरिसिं साढपोरिसिं मुछि- सहि पञ्चक्खाइ उग्गएसूरे चउविहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं सहस्सागारेणं पच्छन्नकालेणं दिसामोहेणं साहवयणेणं महत्तंरागारेणं "सव्वसमाहिवात्त. आगारेण वोसिरे॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन सामायिक चविसथओ, वंदणा, पडिकमणु, काउस्लग्ग,पञ्चक्खाण, कीया होतो कीया है, धारा होतो धारा है, वैसा कहना, और नोकारसी पारास.
राप्रतिका-विधि. - उपरांत पचरखाण करना होतो भी यहाँ पर ही धार लेना। (पिर वाहनों प्रतिक्रमण करती हो नो यहाँपर संसारखवा कहे वह नीचे मुजद)-. संसारदावानलदाहनीर, संमोहधलीहरणे समीर, मायारलादारपसारसीरं, नमामि वीरं गिरिलारधीरं ॥३॥ भावावनामंसुरदानवमानवेन, चूलाविलोलकमलावलिमालितानि । संपरितामिनतलोकलमीहितानि, कामं नमामि जिनराजपदानि तानि ॥२॥ बोधानाधं सुपदपदवी नारपूराभिरामं, जीवाहिंसाविरललहरी संगमागाहदेहं । चूलावेलं गुरुगममणि संकुलं दृरपारं, सारं वीरागमजलनिधि सादरं साधु सेवे ॥३॥ पुरुष इच्छामि अशुलाई नमो तमासमा नमोहन सिद्धाचार्यों- पाध्याय सर्वसाधुभ्यः ऐसा कहके विशाललोचन कहे विशाललोचनदलं, प्रोद्यद्दतांशुकेसरं, प्रातवीरजिनेंद्रस्य, मुखपमं पुनातु वः || येपामभिषेककर्महन्वा, मत्ता हर्षभरात् सुखं सुरेंदाः। तृणमपि गणयति नैव नांक, प्रति सन्तु शिवाय ते जिनेंद्राः॥२ कलंकनिर्मुक्तममुक्तपूर्णतं, कुतर्कराहुनसनं सदोदयं । -अपूर्ववंद्र जिनचंद्रभाषितं, - दिनानमे नौमि बु(नमस्कृतं ॥३॥ नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताण ॥ २॥ -आइगराणं, तित्ययराणं सयंसंबुद्धाणं ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरियाण;.---: पुरिसवरगंधहथ्योणं ॥ ३॥. लोमुत्तमाणं, लोगनाहाण: लोगहिआणं, 'लोगेपइवाणं, लोगपजोअगराणं ॥४॥ :-
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र.
२५
अभयदयाणं, चख्खुदयाणं, मग्गदयाणं,,
सरणदयाणं, वोहिदयाणं ॥५॥
धम्मदयाणं, धम्मदसिआणं, धम्मनायगाणं,
धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं ॥६॥
अप्पडिहय वरनाणदसणंधराणं, चियछउमाणं ॥७॥
जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं, तारयाणं,
बुद्धाणं वोहियाणं, मुत्ताणं मोअगाणं ॥८॥
सव्वन्नूणं, सव्वदरिसिणं, सिवमयलमरुय मणंत-
मक्खयमवावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं
संपत्ताणं, नमोजिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥
जे अ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले ॥
संपइअ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ॥१०॥
अरिहंतचेइआणं करोमि काउस्सग्गं, वंदणवत्तिआए
पुअणवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिआए वोहिला-
भवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धार मेहाए धीइए
धारणाए अणुप्पेहाए वड्ढमाणीए ठामि फाउस्सग्गं ।
अन्नत्थउससिपणं निसासिएणं खासिएणं छीपणं जंभाइएणं
उहएणं वायनिसग्गणं भमलिए · पित्तमुच्छाए सुहुमेहि
अंगसंचालोहं सुहुमहिं खेलसंचालहिं सुहमेहि दिहिसंचालोह
एवमाइएपहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिओहुजमे काउस्सग्गो
जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं नपारोमि तांवकार्य
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥
(एक नवकारका काउस्सग्ग पारके फिर नमोऽहमिद्धाचार्योपा-
ध्यायसर्वसाधुभ्यः कहके प्रगट स्तुति कहनी वह नीचे मुताबिक.)
कल्लाणकंदं पढमं जिणंद, संति तओ नेमिजिणं मुर्णिदं ।
पासं पयासं सुगुणिकठाणं, भत्तीइ वंदे सिरिवद्धमाणं ॥१॥
( फिर)
लोगस्त उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे
अरिहंते कित्तइस्लं, चउवीसंपि केवली ॥१॥
राइप्रतिक्रमण विधि.
उसममाजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥
सुविहिं च पुष्पदंत; सीयल सिजसं वासुपुजं च ।
विमलमणतं च जिणं, धम्म सतिं च वंदामि ॥३॥
कुंथु अरं च मल्लि, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।
वंदामि रिट्ठनोमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥ ४॥
एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा ।
चवीसपि जिणवरा, तित्थयरा में पसीयंतु ॥५॥
कित्तिय वंदिय महिया, जेए लोगस्ल उत्तमा सिद्धा।
आरुग्ग बोहिलामं, समाहिवरमुत्तमं दितु ।। ६
चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासंयरा।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतुः।। ७ ॥
सवलोए अरिहंतचेइआणं करोमि काउस्सगं वंदणवत्ति-
आए पूअणवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिआए वोहि-
लाभवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धाए मेहाए धिंइएं
धारणाए अणुप्पेहाए वदमाणीए ठामि काउस्सग्गं ।
अन्नत्थ उससिएणं निलसिएणं खासिएणंछीएणंभाइएणं
उडएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसं-
चालहिं सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमहिं दिष्ठिसंचालहिं एव-
माइएहि आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्सग्गो
जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारोमि तावकार्य:
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥
(एक नवकारका काउस्सग करना फिर स्तुति कहनी वह नीचे मुंजत्र)
अपार संसार समुद्दपारं, पत्ता सिवं दितु सुइक्कसारं ।
सव्वे जिणिदा, सुरविंद वंदा, कल्लाण वल्लीण विसालकंदा
पुक्खरवरदीवढे धायइसंडे अजंबुदीवे अ।
भरहेरवय विदेहे धम्माइगरे नमसामि ॥१॥
तमतिमिरपडलविद्धसणस्सं सुरगणनरिंदमाहियस्त।
सीमाधरस्स वंदे पप्फोडिअमोहजालस्स ॥२॥
श्री पंचप्रतिक्रमण सून.
.
जाइ जरा मरण सोग पणासणस्स
कल्लाण पुक्खलविसालसुहावंहस्स।
को देवदाणवनरिंदगणञ्चियरस,
धम्मस्स सारमुवलब्भ करे पमायं ॥३॥
सिद्धे भो पयओ णमो जिणमये नंदिसया संज
देवनागसवन्नकिन्नरगणरसम्भूअ भावच्चिए।
लोगो जत्थ पइठिओ जगमिणं तेलुकमच्चासुरं
धम्मो वढउ सासओ विजयओ. धम्मुत्तरं वढओ॥४॥
सुअस्स भगवओ करोमि काउस्सगं। वंदण वत्तिआए
पूअण वत्तिआए सकार वत्तिआए सम्माण वत्तिआए बोहि-
लाभ वत्तिआए निरुवसग्ग वत्तिआए सद्धाए मेहाए धिइए
धारणाए अणुप्पेहाए वहुमाए ठामि काउस्सग्गं ।
अन्नत्थ उससिएणं निसासिएणं खासिपणं छीएणं जंभाइ-
एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि
अंगलंचालहिं सहुमेहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहिं दिहिसंचालहिं
एवमाइएहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिओ हुन्ज मे काउस्स-
ग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताण नमुकारेणं न पारेमि ताव-
कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥
(फिर एक नवकारका काउस्सग्ग करना, काउस्सग्ग पारके एक
स्तुति कहनी वह नीचे मुजब.)
निव्वाण मग्गे वरजाणकप्पं, पणासियासेसकुवाइदप्पं ।
मयं जिणाणं सरणं बुहाणं, नमामि निच्चं तिजगप्पहाणं ॥३॥
सिद्धाण बुद्धाणं पारगयाणं परंपरगयाणं।
लोअग्गमुवंगयाणं नमो सया सव्वसिद्धाणं ॥१॥
जो देवाण वि देवो, जं देवा पंजली नमसंति ।
तं देवदेवमहिअं, सिरसा वंदे महावीरं ॥२॥
इकोवि नमुकारो, जिणवर वसहस्स वद्धमाणस्स।
संसार सागराओ, तारेइ नरं व नारि वा ॥३॥
उजितसेलसिहरे, दिक्खा नाणं निसीहिआ जस्स।
तं धम्मचक्रवाह, अरिष्टनेमि नमसामि ॥४॥
२८ गइप्रतिक्रमणविधिः ५ . चत्तारि अदस दोय,..वंदिया जिणवरा चउवीसं। परमनिडिअठा, सिद्धा सिद्धिं मम.दिसंतु ॥ ५॥ वेयावञ्चगराणं संतिगराणं सम्मदिष्टि : समाहिगराणं करेमि काउस्लग्गं ।.::- अन्नत्थ उससिएणनीससिएणंखांसिपणं छीएणं जंभाइएणं, उडुपणं चायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहि अंग संबालेहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालहिं, सुहुमेहि दिहिस- चालेहिं, एवमाइपहि, आगारोहि,अभग्गो अविराहिओ, हुज्जमे काउस्सग्गो, जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्कारेणं न पारेमि तावकायं.ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अंपाणं वोसिरामि ॥ एक नवकारका काउस्संग करना फिर नमोऽर्हत् कहके स्तुति कहनी वह नीचे मुजब.) कुंदिंदु गोक्खार तुसारवन्ना, सोजहस्या क्रमले निसना । चाएसिरिपुत्थयवग्गहत्था, सुहाय सा अम्ह सयापसत्यो।।४॥ नमुत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ आइगराणं तित्थंयराणं सयंसंबुद्धाणं ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिसवरपुंडरियाणं, पुरिसवरगंधहत्थीणं ॥ ३॥ लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआणं, लोगपईवाणं, लोगपजोअगराणं ॥४॥ अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गयाणं, सरणदयाणं, बोहिदयाणं ।।५।। धम्मदयाणं, धम्मदेसिआणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं ॥६॥ अप्पडिहय वरनाणदसणधराणं, विअछउमाणं ॥७॥ जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं, वुद्धाणं बोहिआणं, मुत्ताणं मोअंगाणं ॥ ८ सवन्नूणं, सव्वदरिसीणं, सिवमयलमरुय मणंत- मक्खय मधाबाह मपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ।
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र. ठाणं संपत्ताणं, नमोजिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥ जे अ अईआ सिद्धा, जे अं भविस्संति णागए काले ॥ संपइअ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ॥१०॥ (यहांपर चार बख्त एक एक खमासमण देकर दरेकके अंतमें भग-- वान् हं आदि कहना.) भगवानहं, आचार्य ह, उपाध्याय हं, सर्वसाधु हं. फिर अदाइजेसु दीवसमुद्देसु, पन्नरससु कम्मभूमीसु, जावंत- केविं साहू रयहरणगुच्छपडिग्गहधरा पंचमहव्वयधरा अठा- रससहस्स सीलांगधरा, अक्खयायारचरित्ता, ते सव्वे सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि ॥ (फिर एक खमासमण देकर इच्छाकारेण संदिसह भगवन् श्रीसामंधर- स्वामी आराधनाथ चैत्यवंदन करूं. " इच्छं") चैत्यवंदन श्री सीमंधर वीतराग, त्रिभुवन उपगारी । श्री श्रेयांस पिताकुले, बहु शोभा तुमारी ॥१॥ धन्य धन्य माता सत्यकी, जेणे जायो जयकारी। वृषभलंछन विराजमान, वंदे नरनारी ॥२॥ धनुष पांचशे देहडीए, सोहिए सोवनवान । कीर्तिविजय उवज्झायनो, विनयधरे तुम ध्यान ॥३॥ जं किंचि नामतित्थं, सग्गे पायालि माणुसे लोए। जाई जिविंवाई, ताई सव्वाई वदामि ॥१॥ नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ आइगराणं तित्थयराणं, सयंसंबुद्धाणं ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरियाण, पुरिसवरगंधहस्थीणं ॥३॥ लोमुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहिआणं,, लोगपईवाणं, लोगपजोअगराणं ॥४॥ . .
३० . राइप्रतिक्रमण विधि, - अभयदाणं चख्खुदयाणं, मग्गदयाणं, सरणदयाणं, वोहिदयाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसिआणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं ॥६॥ अल्पडिहय वरनाण दंसणधराणं, वियदृछउमाणं ॥७॥ जिणाणं, जावयाणं, तिनाणं तारयाणं, वुद्धाणं बोहियाणं, मुत्ताणं मोअगाणं ॥ ८॥ सम्वन्नूणं, सव्वदरिसिणं, सिवमयलमरुय मणंत- मक्खय मवावाह मयुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमोजिणाणं, जिअभयाणं ॥ ९॥ जे अ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले।। संपइअ वट्टमाणा, सव्वे तिविहण वदामि ॥ जावंति चेइआई उड्ढेअ अहेअतिरिय लोए । सवाई ताई वंदे, इह संतो तत्थसंताई ॥१॥ ( एक खमासमण देके ) जावंत केवि साह, भरहेरवयमहाविदेहे अ । सवेसिं तेसिं पणओ, तिविहेण तिदंड विरयाणं ॥१॥ नमोऽहत् सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः (ऐसा कहके स्तवन कहना.) (स्तवन) पुक्खलवइ विजए जयोरे, नयरी पुंडरिगिणी सार । श्रीसीमधर साहिवोरे, राय श्रेयांस कुमार ।। जिणंदराय धरजो धर्म सनेह । ए आंकणी ॥ मोटा न्हाना अंतरारे, गिरुआ नवि दाखंत ॥ शशि दरिसण सायरवधेरे, कैरवक्नविकसंत । जिल्ध० ॥२॥ ठाम कुठाम नवि लेखवेरे, यरसंत जलधार । करदोय कुसुमे वासिएरे, छाया सवि आधार। जि०ध०॥३॥ राय ने रंक सरिखा गणेरे, उद्योते शशि मूर । . .
श्री पंचप्रतिक्रमण सूत्र. ३१ गंगाजल ते विहुँ तणारे, ताप करे सवि दूर । जि०५०॥४॥ सरिखा सहुने तारवारे, तिम तुमे छो महाराज । मुजखं अंतर किम करोरे, बांहे ग्रह्यांनी लाज । जि०५० ॥५॥ मुख देखी टीलं करेरे, ते नवि होय प्रमाण । मुजरो माने सवि तणोरे, साहेब तेह सुजाण । जि०५० ॥६॥ वृषभलंछन माता सत्यकीरे, नंदन रुकमिणीकंत। वाचकजसएम विनवेरे, भयभंजन भगवंत जि०ध० ॥ ७ ॥ जय वीयराय जगगुरु होउ ममं तुह पभावओ भयवं। भवनिव्वेओ मग्गाणुसारिआ इठ्ठफल सिद्धि ॥१॥ लोगविरुद्धच्चाओ गुरुजणपूआपरत्थकरणं च । सुहगुरुजोगो तवयणसेवणा आभवमखंडा ॥२॥ वारिजइ जइवि निआणवंधणं वीयराय तुहसमए । तहवि मम हुज सेवा भवे भवे तुम्ह चलणाणं ॥ ३॥ दुक्खक्खओ कम्मक्खओ समाहिमरणं च चोहिलाभो । संपनओ मह एअं तुह नाह पणाम करणेणं ॥४॥ सर्व मंगलमांगल्यं सर्व कल्याण कारणं । प्रधान सर्व धर्माणां जैन जयति शासनं ॥५॥ अरिहंत बेइआणं करोमि काउस्सग्गं, वंदण पत्तिआए पूअण पत्तिार सकरवत्तिआए सम्माण वत्तिआए कोहिला- भवत्तिआए निरुवस्सग्गवत्तिआए सद्धाए मेहाए धीइए धारणाए अणुप्पहाए वढमाणीए ठामि काउस्सग्गं । अन्नथ्थ उससिएणं नीससिएणं, खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहमेहिं खेलसंचालेहि सुहमेहि दिसिंचा- लेहिं एवमाइएहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्लग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारण न पारेमि तावकायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (यहाँपर एक नवकारका क उस्सरग करके फ़िर नमोऽह सिद्धाचार्यो- पाध्याय सर्वसाधुभ्यः कहके एक स्तुति कहनी वह नीचे मुजबः)
MM
राप्रतिक्रमण विधि.
.
सीमंधर जिनवर, सुखकर साहिव देवः।
अरिहंत सकळनी, भावधरी करुंसेव।
सकलागम-पारग, गणधरभाषित वाणी।
जयवति आणा, ज्ञानविमल गुणखाणी ।। १ ।।
(दोहरा)
सिद्धाचळ समरु सदा, सोरठदेश मझार ।
मनुषजनम पामी करी, वंदू वार हजार ॥१॥
एकेकुंडगलं भरे, शत्रुजा साहमुंजेह ।
रिषभ कहे भवकोडनां, कर्म खपावे तेह ॥२॥
शेजा समो तीरथ नहि, रुषभ समो नहि देव ।
गौतमसारखा गुरु नहि, वळी वळी वंदू तेह ॥३॥
सिद्धाचळ समरु सदा, सोरठ.देश मोझार।
मनुषजनम पामी-करी, वंदूं वार हजार ॥४॥
सोरठ देशमा संचों,न चढ्यो गढ गिरनार ।
शेजी नदी नाटो नहि, तेनो एळे गयो अवतार ॥५॥
( फिर खमासमण देकर)
इच्छाकारेण संदिसह भगवन् श्रीसिद्धगिरि आराधनार्थ चैत्यवंटन
करूं."इच्छं"
चैत्यवंदन.
.
श्री शत्रुजय सिद्धक्षेत्र, दीठे दुर्गति वारे ।
भाव धरीने जे चंढे, तेने भवपार-उतारे ॥१॥
अनंत सिद्धर्नु एह ठाम, सकल तीरथनो राय ।
पूर्व नवाणुं रुषभ देव, ज्यां.ठवीया प्रभु पाय ॥३॥
सूरजकुंड सोहामणो, कविडयक्ष अभिराम ।
नाभिराया कुलमंडणो, जिनवर करुं प्रणाम ॥३॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. जं किंचि नामतित्थं, सग्गे पायालि माणुसे लोए। जाई जिण विवाई, ताई सव्वाई चंदामि ॥१॥ नमुत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ आइगराणं तित्थयराणं, सयंसंवुद्धाणं, ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरियाणं । पुरिसवरगंधहत्थीणं ॥ ३ ॥ लागुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहिआणं ॥ लोगपइवाणं, लोगपजोअगराणं ॥४॥ अभयदाणं, चल्खुदयाणं, मग्गदयाणं, ॥ सरणदयाणं, बोहिदयाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसिआणं, धम्मनारागाणं ॥ धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं ॥ ६॥ अप्पडिहय वरनाण देसणधराणं, वियदृछउमाणं ।।७॥ जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं, ॥ बुद्धाणं बोहियाणं, मुत्ताणं, मोअगाणं ॥ ८॥ सव्वन्नूणं, सव्वदरिसिणं, सिवमयलमरुय मणंत- मक्खयमव्वाबाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥ जे अ भईआ सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले। संपडअ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ॥१०॥ जावंति चेइआई उड्ढेअ अहेअ तिरिय लोए । सवाई ताई वंदे, इह संतो तत्थ संताई ॥१॥ (फिर एक खमासमण देकर ) जावंत केयि साहू, भरहेरवयमहाविदहे अ। सव्वेसिं तेसिं पणओ, तिविहेण तिदंड विरयाणं ॥१॥ नमोऽर्हत् सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः (ऐसा कहके स्तवन कहना.) (स्तवन) विमलाचल नितु वंदिये, कीजे एहनी सेवा। मार्नु हात ए धर्मनो शिवतरुफल लेवा । विमला०॥२॥ ३ ३ राप्रतिक्रमण विधि. उज्ज्वल जिनगृह मंडली, तिहां दीपे उत्तंगा। मार्नु हिमगिरी विभ्रमे, आइ अंवर गंगा । वि० ॥२॥ कोई अनेरो जग नहि, ए तीरथ तोले । एम श्रीमुख हरि आगले, श्रीसीमंधर बोले । वि०॥३॥ जे सगळा तीरथ का, यात्रा फल कहिए। तेहथी ए गिरि भेटतां, शतगणुं फल लहिए । वि०॥४॥ जनम सफल होय तेहनो, जे ए गिरि दे। सुजशविजय संपद लहे, ते नर चिर नंदे । वि०॥५॥ जय वीयराय जगगुरु होउ ममं तुह पभावओ भयवं भवनिव्वेओ मग्गाणुसारिआ इट्ठफल सिद्धि ॥१॥ लोगविरुद्धच्चाओ गुरुजणपूआपरत्थफरणं च । सुहगुरुजोगो तव्वयणसेवणा आभवमखंडा ॥२॥ वारिजइ जइवि निआणवंधणं वीयराय तुहसमए । तहवि मम हुन्ज सेवा भवे भवे तुम्ह चलणाणं ॥३॥ दुक्खओ कम्मक्खओ समाहिमरणं च वोहिलाभो अ। संपजउ मह एअं, तुह णाह पणाम करणेणं ॥४॥ सर्वमंगल मांगल्यं सर्व कल्याण कारणं । प्रधानं सर्वधर्माणां, जैन जयति शासनं ॥५॥ अरिहंत चेइआणं करेमि काउस्सग्गं वंदणवत्तिआए पूअ- णवत्तिआए सकरवत्तिआए सम्माणवत्तिआए वोहिलाभ- वत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धाए मेहाए धीइए धार- 'णाए अणुप्पेहाए वढमाणीए ठामि काउस्सग्गं ॥ अन्नत्थ उसंसिएणं निससीएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए: पित्तमुच्छाए सुहु- मेहि अंग संचालहिं सुहुमेहिं खेलसंचालोहिं सुहुमहिं दिहि- संचालहिं .एवमाइएहि आगारोहिं अभग्गो अविराहिओ हुन्ज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारोमि तावकार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (एक नवकारका : काउस्सग करना काउस्सग्ग पारके नमोऽहत् सिद्धाचायोपाध्याय सर्वसाधुभ्य ऐसा कहकर स्तुति कहनी.)
: श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ३५ पुंडरिकगिरी महिमा आगममां परसिद्ध । विमलाचल भेटी, लहिए अविचल रिद्ध ॥ पंचमि गति पहोत्या, मुनिवर कोडाकोड। एणे तीरथे आवी, कर्म विपातिक छोड ॥१॥ (अथ सामायिक पारनेका विधि ) इच्छाकारेण संदिसह भगवन् इरियावाहयं पडिकमामि, इच्छं इच्छामि पडिकमिडं, इरियावहिआए विराहणाए गम- णागमणे पाणकमणे चीयकमणे हरियकमणे -ओसाउतिंग पणगदग मट्टी मकडा संताणा संकमणे जे मे जीवा विरा- हिआ एगिदिया इंदिया तेइंदिया चरिंदिया पंचिंदिया अभिहया वत्तिया लेसिया संघाइया संघट्टिया परियाविया किलामिया उद्दविया ठाणाउठाणं संकामिया जीविआओ वव. रोविया तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ तस्स उत्तरिकरणेणं पायच्छित्त करणेणं विसोही करणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं णिग्घायणट्ठाए ठामि काउस्सग्गं। अन्नत्थ उससीएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेण भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालहिं सुहुमेहि खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिसिंचा- लेहिं एवमाइपहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिलो हुज मे काउस्सग्मो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि तावकार्य ठाणेणं मोणणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि॥ ( ऐसा कहके एक लोगस्सका काउस्सग्ग करना लोगस्स आता न हो तो चार नवकार मंत्र गिनने फिर काउस्सग्ग पारके प्रगट लोगस्स कहना चह नीचे मुजब) लोगस्स उजोअगरे, धम्मतिस्थयरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्सं, चउवींसं पि केवली ।। उसभमजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पह सुपासं जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥
गइप्रतिक्रमण विधि. सुविहिं च पुप्फदंत, सीअल सिजंस वासुपुजं च । विमलमणंत च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ॥ कुंथु अरं च मालिं, वंदे मुणिसुव्वयं नामिजिणं च । वंदामि रिठ्ठनमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चउवीसं पि जिणपरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ कित्तिय वैदिय महिआ, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग-चोहिलाभं समाहिवरमुत्तमं दितु ॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्वएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् मुहपत्ति पडिलेहूं, "इच्छ" (ऐसा कहके मुहपत्ति पडिलेहनी. फिर खमासमण देना.) इच्छामि खमाणमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक पारु, यथाशक्ति। इच्छामि खमासमणो वैदिउं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि। इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक पार्यु,"तहत्ति"। (ऐसा कहकर फिर एक नवकार गिनना) नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरिआणं नमो उव- ज्झायाणं नमो लोए सव्वसाहूणं । एसोपंचमुकारो सव्वपाव: प्पणासणो मंगलाणं च सव्वेसिं पढम हवइ मंगलं ॥ ( फिर आसनपर दाहिणा हाथ रखके नीचे मुजब गाथा बोलना). सामाइय वयजुत्तो, जाव मणे होई नियमसंजुत्तो। छिन्नइ असुहं कम्म, सामाइय जत्तिया वारा ॥१॥ सामाइयमिउ कए; समणो इव सावओ हवइ जम्हा ।। एएण कारणेण, बहुसो सामाइयं कुजा ॥२॥ . .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
३७
सामायिक विधिसे लिया, विधिसे पारा, विधि करते जो
कोइ अविधि हुआ हो वो सव मन वचन कायाकर मिच्छामि
दुक्कडं । दश मनके दश वचनके बारह कायाके यह बत्तील
दोषमें जो कोइ दोष हुआ हो वह सव मन वचन कायाकर
मिच्छामि दुकडं ॥
( इति सामायिक पारनेका विधि )
॥ अथ देवसिथ प्रतिक्रमण विधि ॥
नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरिआणं, नमो
उघज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहूणं. एसो पंचनमुकारो,
सव्वपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वोर्स, पढम हवइ मंगलं॥
पंचिंदियसंवरणो, तह नवविहवंभचेरमुत्तिधरो ।
'चउविवहकसायमुक्को, इअ अठ्ठारसमुणेहिं संजुत्तो।
पंचमहत्वयजुत्तो, पंचविहायारपालणसमत्थो ।
पंचसमिओ तिगुत्तो छत्तीसगुणो गुरू मज्झ ।
(आचार्यजी हो तो पंचिंदियन कहना; न हो तो पुस्तक, नवकारवाळी
'प्रमुखकी पंचिदिय कहके दाहणा हाथ नीचे जमीन पर रखके
स्थापना करनी.)
इच्छामि खमासमणो वंदिलं, जावणिज्जाए निसीहिआए,
मत्थएण वंदामि.
इच्छाकारेण संदिसह भगवन् इरियावहियं पडिकमामि,
इच्छं इच्छामि पडिकमिउं, इरियावहिआए, विराहणाए,
गमणागमणे पाणकमणे वीयकमणे हरियक्कमणे, ओसा उत्तिंग
पणग दग, मट्टी मकडा संताणा संकमणे, जे मे जीवा विरा-
हिआ, एगिदिया वेइंदिया, तेइंदिया चरिंदिया, पंचिदिया,
३८ देवसिप्रतिक्रमण विधि अभिहया वत्तिया लेसिया, संघाइया संघट्टिया परियाविया, किलामिया उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ तस्स उत्तरीकरणेणं, पायच्छित्तकरणेणं, विसोहीकर- णेणं, विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणटाए ठामि काउस्सगं॥ अन्नस्थ ऊसासएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणंभाइएणं, उड्डएणं वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं अंग. संचालहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालहि, सुहुमेहि दिहिसंचालहिं; एवमाइएहि, आगारेहि, अभग्गो अविराहिओ, हुज्झ मे काउ- स्सगो. जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्कारेणं न पारेम ताव कायं ठाणणं मोणणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (ऐसा कहकर एक लोगस्सका काउस्सग करना न आता हो तो चार नवकार गिनने. फिर प्रगट लोगस्स कहना. वह नीचे मुताविक.) लोगस्ल उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चवीसं पि केवली ॥ उसभमजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमइं च । पउमप्पहं सुपालं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥ सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल सिजंस वासुपुजं च । विमलमणतं च जिणं, धम्म संतिं च चंदामि ॥ कुंथु अरं च मलिं, वंदे मुणिसुब्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिखनमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥ एवं मए अभिथुआ; विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चवीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ कित्तिय वंदिय महिआ, जे ए.लोगस्स उत्तमा सिद्धा! आरुग्ग-वोहिलाभं समाहिवरमुत्तमं दितु॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा-सिद्धिं मम दिसंतु.॥ इच्छं इच्छामि खमासमणो वंदिरं जावणिजाए निसीहि- ...
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ३९ आए मत्थएण वंदामि। इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामा- यिक मुहपत्ती पडिलेहुं "इच्छं" (ऐसा कहकर मुहपत्ति पडिलेहनी फिर ) इच्छामि नमासमणो वैदिउं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक संदिसाहुं ? "इच्छं"। इच्छामि खमासमणो वंदिउ जाव- णिज्जाए निसाहिआए मत्थएण वंदामि। इच्छाकारेण संदि- सह भगवन् सामायिक ठाउं ?" इच्छं"। (ऐसा कहकर एक नवकार गिनना फिर ) इच्छकारि भगवन् पसाय करी सामायिक दंडक उच्चरा- वोजी ऐसा कहकर दोनों हाथ जोडकर करेमिभंते उचरना वह नीचे मुताविक करोमि भंते सामाइयं, सावज जोगं पञ्चक्वामि, जाव नियम पज्जुवासामि,दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करोमि न कारवेमि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् वेसणे संदिसाहुं ? "इच्छं।" इच्छामि खमासमणो वैदिउं जाव- णिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदि- सह भगवन वेसणे ठाउं ? " इच्छं." इच्छामि खमासमणो वैदिडं जावणिजाए निसीहिआए मत्थरण वंदामि । इच्छा- कारेण संदिसह भगवन् , सज्झाय संदिसाहुं ? इच्छं"। इच्छामि खमासमणो चंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन्, सज्झाय करूं? " इच्छं"। ऐसा कहके दोनों हाथ जोडकर तीन नवकार गिनने. (इति सामायिक लेनेका विधि. ) ४० देवसिप्रतिक्रमण विधि. . इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण चंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् मुहपत्ति पडिले हुं ? " इच्छ" ऐसा कहकर मुहपत्ति पडिलहनी फिर खमासमन देने. इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निलीहि अहोकायं कायसंफास खमाणिजोभे किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुभेणभे दिवसो वह कंतो जत्ता भे जवणिजं च भेखाममि खमासमणो देवसि चइकम्मं आवसिआए पडिकमामि खमासमणाणं दवसिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मणटुकडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छोक्याराए सव्वधम्माइकमणाए आसायणाए जोमे अइआरोकओ तस्स खमालमणो पडिकमा- बम निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१॥ इच्छामिखमासमणो वंदिउंजावणिजाए निसीहिआए अणु- जाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं कायसंफासं खमणिजो मे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइकनो जत्ताभेजवाणिजं च भेखाममि खमासमणो देवसि वइक्कम पडिकमामि खमासमणाणं देवलिआए आसायणाए तित्तीसन्न- यराए जकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदु- डाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सम्वमिच्छोक्याराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे अइआरो की तस्स खनासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥२॥ (फिर पञ्चक्खाण करना.) चउविहारका पञ्चक्खाण । दिवसचरिमं पञ्चक्खाइ चउन्विहं पि आहारं असणं पाणं "खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं सहस्सागारेणं महत्तरागारेणं सव्वसमाहिवत्तिागारेणं वोसिरे ॥ 4 श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ४१ पाणहारका पच्चक्खाण । पाणहारादेवसचरिमं पञ्चक्खाइ अन्नत्थणाभोगेणं सह- स्लागारणं महत्तरागारेणं सव्वसमाहिवत्तिमागारेण वोसिरे। तिविहारका पच्चक्खाण । दिवसचरिमं पञ्चक्खाइ तिविहं पि आहारं असणं खाइम अन्नत्थणाभोगणं सहस्सागारेणं महत्तरागारेणं सव्वसमा- हिवत्तिआगारेणं वोसिरे॥ दुविहारका पच्चक्खाण दिवसचरिम पञ्चक्खाइ दुविहं पि आहारं अलणं खाइम अन्नत्थणाभोगेणं सहस्सागारेणं महत्तरागारेणं सव्वसमा- हिवात्तआगारणं वोसिरे ॥ ( एकासण वा बेआसण किया हो तो भी पाणहारका पञ्चक्खाण करना) ( इच्छाकारेण संदिसह भगवन् चैत्यवंदन करूं ? " इच्छं" ऐसा कहकर चैत्यवंदन करना) चैत्यवंदन माहासुदि आठमने दिने, विजयासुत जायो । तिम फागण सुदि आठमे, संभव चवी आयो॥१॥ चइतर वदनी आठमे, जन्म्या रुषभजिणंद । दिक्षा पण ए दिन लही, हुआ प्रथम मुनिचंद ॥२॥ माधवसुदि आठम दिने, आठा कर्म कर्या दूर । अभिनंदन चोथा प्रभु, पाम्या सुख भरपूर ॥ ३ ॥ एही ज आठम ऊजली, जन्म्या सुमति जिणंद । आठ जाति कलशे करी, नवरावे सुर इंद ॥४॥ जन्म्या जेठ वदि आठमे, मुनिसुव्रतस्वामी । नेम आषाढसुदि आठमे, अष्टमी गति पामी॥५॥ श्रावणवदनी आठमे, नमि जन्म्या जगभाण। तिम श्रावणसुदि आठमे, पासजिन निरवाण ॥ ६॥ .
देवसिप्रतिक्रमण विषि. भादरवा वदि आउम दिने, चविया स्वामी सुपास। जिन उत्तम पद पद्मने, सेव्याथी शिववास ॥७॥ जं किंचि नाम तित्यं, सग्गे पायालि माणुसे लोए । जाई जिणविंवाई, ताई सव्वाई वदामि ॥१॥ नमुत्युणं, अरिहंताणं, भगवंताणं ॥१॥ आइगराणं, तित्ययराणं सयंसंबुद्धाणं ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरियाणं, पुरिसवरगंधहत्थीणं ॥३॥ लोमुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहिआणं, लोगपईवाणं, लोगपजोअगराणं ॥४॥ अभययाणं, चक्खुदंयाणं, मग्गदयाणं, सरणदयाणं, बोहियाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदसिआणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं ॥६॥ अप्पडिहयवरनाणदसणधराणं, वियदृछउमाणं ॥७॥ जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं, तारयाणं, वुद्धाणं योहियाणं, मुत्ताणं मोअगाणं ॥ ८॥ सन्वन्नूणं, सब्बदरिसीणं, सिवमयलमख्यमणंत- मक्खयमन्त्रावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥ जे अ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले॥ संपइअ वट्टमाणा, सब्वे तिविहेण वदामि ।। १० ।। अरिहंतचेइआणं करोमि . काउस्सगं, वंदणवत्तिआए पूअणवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिआए वोहिला- भवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए साए मेहाए धीइए धारणाए अणुप्पेहाए वड्ढमाणीए ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणंखासिएणं छीएणं जंभाइएणं उड्डर्पणं वायनिसग्गणं भमलिए पित्तमुच्छार सुहुमेहि अंगसंचालहि सुहुमेहि खेलसंचालहिं सुहुमहिं दिहिसंचालहिं - श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. एवमाइपहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिओहुजमे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि॥ (एक नवकारका काउस्सग्ग करना. फिर काउस्सग्ग पारकर प्रगट स्तुति कहनी, वह स्तुति नीचे मुजव.) नमोऽहसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः कल्लाणकंदं पढम जिणंद, संति तओ नेमिजिणं मुणिंदं पासं पयासं सुगुणिकठाणं, भत्तीइ वंदे सिरिवद्धमाणं ॥१॥ (ऐसे स्तुति कहकर फिर प्रगट लोगस्स कहना. वह लोगस्स नीचे मुताबिक.) लोगस्स उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥ उसभमजिअंच वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पर वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्फदंत, सीयल सिजंस वासुपुजं च । विमलमणतं च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मलिं, वंदे मुणिसुब्वयं नमिजिणं च । चंदामि रिट्ठनोमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चवीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तिय वंदिय महिया, जे ए लोगस्ल उत्तमा सिद्धा । आरुग्ग-चोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं किंतु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७ ॥ सव्वलोए अरिहंतचेइआणं करेमि काउस्सग्गं वंदणवात्ति- माए पूअणवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिआए बोहि- लाभवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धाए मेहाए घिइए धारणाए अणुप्पेहाए वढमाणीए ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणंछीएणंजभाइएर्ण ४४ देवासप्रतिक्रमण विधि. उडएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमहिं अंगसं- चालेहिं सुहमेहि खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिठिसंचालहिं एव- माइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारोमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (एक नवकारका काउस्सग करना फिर स्तुति कहनी वह नीचे मुजब ) अपारसंसारसमुद्दपारं, पत्ता सिवं दितु सुइक्कसारं । सवे जिणिंदा, सुरविंदवंदा, कल्लाणवल्लीण विसालकंदा ॥२॥ पुक्खरवरदीवढे धायइसंडे अजंबुदीवे । भरहेरवयविदेहे धम्माइगरे नमसामि ॥१॥ तमतिमिरपडलविद्धसणस्त सुरगणनरिंदमहियस्त। सीमाधरस्ल वंदे पप्फोडिअमोहजालस्स ॥२॥ जाइजरामरणसोगपणासणस्स कल्लाणपुक्खलविसालसुहावहस्स। को देवदाणवनारंदगणञ्चियस्स धम्मस्स सारसुवलम्भ करे पमायं ॥३॥ सिद्धे भो पयो णमो जिणमये नंदिसया संजमे देवनागसुवनकिन्नरगणरसम्भूअभावच्चिए। लोगो.जत्य पइडिओ जगमिणं तेलुकमच्चासुरं धम्मो वट्ठउ सासओ विजयउ धम्मुत्तरं बउ ॥४॥ सुअस्स भगवओ करेमि काउस्लग्गं। वंदणवत्तिआए पूअशवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिआए वोहि- लामवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिाए साए मेहाए धिइए धारणाए अणुप्पहाए वढमाणीए ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उडुएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालहिं सुहुमेहि खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिहिसंचालहिं एवमाइएहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिओ हुन्ज मे काउस्स- गोजाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि ताव श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (फिर एक नवकारका काउस्सग्म करके स्तुति कहनी) निव्वाणमग्गे वरजाणकप्पं, पणासियासेसकुवाइदप्पं । मयं जिणाणं सरणं वुहाणं, नमामि निच्चं तिजगप्पहाणं ॥३॥ सिद्धाण बुद्धाणं पारगयाणं परंपरगयाणं। लोअग्गसुवगयाणं नमो सया सव्वसिद्धाणं ॥१॥ जो देवाण वि देवो, जं देवा पंजली नमसंति । तं देवदेवमहिरं, सिरसा वंदे महावीरं ॥२॥ इको वि नमुकारो, जिणवरवसहस्स वद्धमाणस्स। संसारसागराओ, तारेइ नरं व नारिं वा ॥३॥ उजितसेलसिहरे, दिक्खा नाणं निसीहिआ जस्स । तं धम्मचकवहि, अरिठनेमि नमसामि ॥४॥ चत्तारि अट्ट दस दो य, चंदिया जिणवरा चउवीसं। परमनिटिअठ्ठा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥५॥ वेयावञ्चगराणं संतिगराणं सम्मदिठिसमाहिगराणं करोमि काउस्लग्गं। अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणंखासिएणं छीएणं जंभाइएणं, उड्डएणं वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहि अंगसंचालहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालेहि, सुहुमेहिं दिहिसं- चालेहिं, एवमाइएपहि, आगारोहि,अभग्गो अविराहिओ,हुज्ज मे काउस्सग्गो, जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुकारेणं न पारेमि ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (एक नवकारका काउस्सग्ग करना फिर काउस्सग्ग पारकर 'नमोऽर्हत्-. सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः' कहके स्तुति कहनी वह नीचे मुजब.) कुर्दिदुगोक्खीरतुसारवन्ना, सरोजहत्था कमले निसन्ना । वाएसिरी पुत्थयवग्गहत्था,सुहाय सा अम्ह सया पसत्था॥४॥ नमुत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ आइगराणं तित्थयराणं सयंसंवुद्धाणं ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिसवरपुंडरियाणं, ४ देवसिप्रतिक्रमण विधि. पुरिसवरगंधहत्थीणं ॥३॥ लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआणं, लोगपंईवाणं, लोगपज्जोअगराणं ॥४॥ अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गदयाणं, सरणदयाणं, बोहिदयाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसिआणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं ॥६॥ अप्पडिहयवरनाणदसणधराणं, विअट्टछउमाणं ॥७॥ जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं, बुद्धाणं वोहिआणं, मुत्ताणं मोअगाणं ॥ ८॥ सव्वन्नूणं, संवदरिसीणं, सिवमयलमरुयमणंत- मक्खयमवावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं । ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥ जे अ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले ॥ संपइ अ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण चंदामि ॥१०॥ (-फिर ) इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । भगवान्हें । इच्छामि खमासमणो वंदिउ जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वदामि । आचार्यहं । इच्छामि खमासमणो वंदिउँ जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । उपाध्यायहं । इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । सर्वसाधुहं । सर्व श्रावकने वांहूँ। इच्छाकारेण संदिसह भगवन् देवसिय पडिकमणे ठाउं ? इच्छं, सव्वस्स वि-देवसिय दुञ्चितिय दुब्भासिअ दुञ्चिठिी इच्छं तस्स मिच्छामि दुक्कडं । करेमि भंते सामाइयं सावज जोगं पच्चक्खामि जाव नियम
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि
न कारवेमि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि
अप्पाणं वोसिरामि।
इच्छामि ठामि काउसग्गं जो मे देवसिओ अइआरो को
काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकर-
णिज्जो दुज्झाओ दुन्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छियव्वो
असावगपाउग्गो नाणे दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए
तिण्हं गुत्तीणं चउण्हं कसायाणं पंचण्हमणुव्वयाणं तिण्हं
गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावग-
धम्मस्स जे खंडिज विराहि तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥
तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं
विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए ठामि
काउस्सग्गं ।
अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ-
एक उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं
अंगसंचालहिं सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिठिसंचा-
लेहिं एवमाइपहिं आगारहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे
काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि
ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥
( आठ गाथाका काउस्सग्ग करना न आवे तो आठ नवकार गिनने
काउस्सग्गकी आठ गाथा नीचे मुजब.)
नाणमि देसणमि अ, चरणमि तवंमि तह य विरियमि ।
आयरणं आयारो, इअ एसो पंचहा भणिओ॥१॥
काले विणए बहुमाणे, उवहाणे तह य निन्हवणे
वंजण अत्थ तदुभय, अविहो नाणमायारो॥२॥
निस्संकि निखिम निव्वितिगिच्छा अमूढदिठी अ।
उवह थिरीकरणे वच्छल्लप्पभावणे अg॥३॥
पणिहाण जोगजुत्तो पंचहि समिहिं तिहिं गुत्तिहि।
एस चरित्तायारो, अठविहो होइ नायव्वो ॥४॥
४८ देवसिंप्रतिक्रमण विधिः वारहावहाम तवे, सभितरवाहिरे कुसलंदिठे। आगलाइ अणाजीवी, नायवो सो तवायारो ॥५॥ अणसणमूणोअरिया, वित्तीसंखेवणं रसच्चाओ। कायकिलेसो संलोणया य बज्झो तवो होई ॥६॥ पायच्छित्तं विणओ, वेयावच्चं तहेव सज्झाओ। झाणं उस्सग्गो वि अ, अम्भितरओ तवो होई ॥७॥ अणमूहिअ बलविरिओ परिक्कमइ जो जहुत्तमाउत्तो। जुंजइ अ जहाथाम नायव्वो वीरियायारो ॥ ८॥ (फिर काउस्सग पारकर प्रगट लोगस्स कहना, वह नीचे मुजव.) लोगस्ल उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीस पि केवली ॥१॥ उसभमाजरं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमइं च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्पदंत, सीयल सिजंस वासुपुजं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे माणसुव्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिट्ठनमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चउवीसं पि जिणवरा, तित्थयरामे पसीयंतु ॥५॥ कित्तिय चंदिय महिया, जेए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग-बोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥७॥. (फिर तीजा आवश्यककी - मुहपत्ती पडिलेहनी, फिर दो खमासमण देने.) इच्छामि खमासमणो वंदिरं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं कायंसफासं खम- णिजो भे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइ- कंतो जत्ता भे जवणिजं च भे खाममि खमासमणो देवसि श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्रः ४९. वइकम्म आवस्सिाए पडिकमामि खमासमणाणं देवसिआ: ए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मणदुक्क- डाए वयदुक्कड़ाए कायदुकड़ाए कोहाए माणाए माणाए लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक- मणाए आसायणाए जो मे अइकारो कओतस्स रखमासमणो. पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिर जावणिजाए निसीहिआए. अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं कायसंफासं खम- णिजो भे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे.दिवसो वइ. कंतो जत्ता भे जवणिज च भे खाममि खमासमणो देवसि वइकम्म आवस्सिआए पडिकमामि खमासमाणाणं देवसि- आए आसायणाए वित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मण. टुकडाए वयदुक्कडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए जो मे आइकारो की तस्स खमा- समणी पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि.॥ फिर खडा होकर इच्छाकारेण संदिसह भगवन् देवसि आलो? "इच्छे"! आलोएमि जो मे देवसिओ अइआरो को काइओ वाइओ माणसिओ उस्तुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिजो, दुल्झाओ दुन्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअन्वी असावगपाउग्गो नाणे दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिण्हं गुत्तीणं चउ- ण्ह कसायाणं पचण्हमणुव्वयाणं तिण्हं गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं वारसविहस्स सावगधम्मस्स जं खंडिअंज विराहि तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ (फिर हाथ जोडके) सात लाख पृथिवीकाय, सात लाख अपकाय, सात लाख तेउकाय, सात लाख वाउकाय, दस लाख प्रत्येक वनस्पति-- काय, चउद लाख साधारण वनस्पतिकाय,वे लाख से इंद्रिया, ४ ५. देवसिप्रतिक्रमण विधि. वे लाख तेइंद्रिय,बे लाख चरिन्द्रिय, चार लाख देवता,चार लाख नारकी, चार लाख तिर्यंच पचेंद्रिय,चौद लाख मनुष्य एवंकारे चौरासी लाख जीवायोनीमेसे मेरे जीवन जो कोई जीव हनन किया हो, कराया हो, करनेवाले को भला जाना होय वह सव मन.वचन काया कर मिच्छामि दुक्कडं ॥ पहले प्राणातिपात, दूजे मृपावाद, तीजे अदत्तादान, चौथे मैथुन, पांचमे परिग्रह, छठे क्रोध, सातमे मान, आठमे माया, नवमे लोभ, दलमे राग, इग्यारमे द्वेष, वारमे कलह, तेरमे अभ्याख्यान, चौदमे पैशुन्य, पंदरमे रति अरति, सोलमे पर परिवाद, सत्तरमे मायामृपावाद, अठारमे मिथ्यात्वशल्य इन अठारह पापस्थानों में से मेरे जीवने जो कोई पापस्थान सेवन किया हो, कराया हो, करनेको भला जाना हो वह सव मन वंचन कायाकर मिच्छामि दुक्कडं ॥ सव्वस्सवि देवसिम दुञ्चिन्तिय दुभासिय दुञ्चिहिय इच्छाकारेण संदिसह भगवन् तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ ( फिर दाहिणा दींचण खडा ( वीरासन ) करके नाचे मुजब कहना) नमो रिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं । नमो उवझायाणं नमो लोए सवसाहूणं एसो पंच नमुक्कारो सव्यपावप्पणासणो मंगलाणं च सन्वेसि पढम हवा मंगलं॥ करेमिभते सांमाइयं, सावज जोग पञ्चक्खामि, जावनि- यमं पज्जुवासामि, दुविहं तिवीहेण मणेणंवायाए कारणं नक- रेमि न कारवेमि तस्सभंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ इच्छामि पडिकमि जोमेदेवसिओअइआरोकओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उमग्गो अकप्पो अकरणिज्जो 'दुज्झांओं दुविचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअन्वो असा- रागपाउग्गो नाणे दंसणे चरिताचरिचे सुए सामाइए तिण्हं
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
गुत्तीणं चउण्हं कसायाणं पंचण्हमणुव्वयाणं तिण्हं गुण-
च्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं वारसविहस्स सावग-
धम्मम्स जं खंडिअं जं विराहि तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥
वंदित्तु सव्वसिद्धे, धम्मायरिए अ सव्वसाहू अ।
इच्छामि पडिकाम, सावगधम्माइआरस्स ॥१॥
जो मे वयाइआरो, नाणे तह दंसणे चरित्ते अ।
सहमो अ वायरो वा, तं निंद तं च गरिहामि ॥२॥
दुविहे परिग्गहमि, सावज्जे वहुविहे अ आरंभे।
करावणे अ करणे, पडिकमे देसि सव्वं ॥३॥
जं वद्धमिदिपाह, चडाह कसाएहिं अप्पसत्थेहि।
रागेण व दोसेण व, तं निंदे तं च गरिहामि ॥४॥
आगमणे निग्गमणे, ठाणे चकमणे अणाभोगे।
अभिओगे अनिओगे, पडिकमे देवसि सव्वं ॥५॥
संका कंख विगिच्छा, पसंस तह संथवो कुंलिंगीसु ।
सम्मत्तस्स इआरे, पडिकमे देवलि सव्वं ॥६॥
छकायसमारंभे, पयणे अ पयावणे अ जे दोसा।
अत्तठा य परछा, उभयठा चेव तं निंदे ॥७॥
पंचण्हमणुव्वयाणं, गुणव्वयाणं च तिण्हमइआरे ।
सिक्खाण च चउण्ड, पडिकमे देवसिंअं सव्वं ॥ ८ ॥
पढमे अणुव्वयंमि, शूलगपाणाइवायविरईओ ।
आयरियसप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥९॥
वह बंध छवि च्छेए, अइभारे भन्तपाणबुच्छेए ।
पढमवयस्स इयारे, पडिकमे देवसि सव्वं ॥१०॥
चीए अणुव्वयंमि, परिथूलगअलियवयणविरईओ।
आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ ११ ॥
सहसा रहस्स दारे, मोसुवएसे अ कूडलेहे ।
बीयवयस्ल अइयारे, पंडिकमे देवसि सव्वं ॥ १२॥
तइए अणुव्वयंमि, थूलगपरत्वहरणविरईओ।
आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ १३ ॥
५२. देवसिप्रतिक्रमण विधि.. N . - तेनाहडप्पओगे, तप्पडिस्वे विरुद्धगमणे : कूडतुलकूडमाणे, पडिकमे देवसि सव्वं ॥.१४॥ चउत्थे अणुव्वयंमि, निच्च परदारगमणविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ प्पमायप्पसंगणं ॥ १५॥ अपरिग्गंहिआ इत्तर, अणंग विवाह तिव्व अणुरांगे। चउत्थवयस्स अइयारे, पाडेक्कमें देवसिमं सव्वं ॥ १६ ॥ इतो अणुब्बए पंचमंमि, आयरियमप्पसत्यमि। परिमाणपरिच्छेए, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ १७ ॥ धण धन्न खित्तवत्थु, रुप्प सुवन्ने अ कुविअपरिमाणे। दुपए चउप्पयामि, पडिकमे देवसि सब्वं ॥१८॥ गमणस्स उ परिमाणे, दिसासु उड्ढं अंहे अतिरिअंच । बुढि सइ अंतरद्धा, पढममि गुणवएं निदे॥ १९ ॥ मजमि अमसंमि अ, पुप्फे अफले अगंधमल्ले अ। उवभोगे परिभोगे, वीमि गुणव्वए निंदे ॥२०॥ सञ्चित्ते पडिवद्धे, आप्पोल दुप्पोलिअंच आहारे। तुच्छोसहि भक्खणया, पडिकमे देसि सव्वं ॥२१॥ इंगाली वण-साडी भाडी, फोडी सुवजए क्रम्म । वाणिजं चेवदंत लक्खरसकेसवीस वीसंयं ॥ २२॥ एवं खुजत.पिल्लण, क़म्म निल्लंछणच दवदाणं । सरदहत लायसोंसं, असइ पोसंच जिजा ॥२३ । सत्थग्गि मुसल जंतग, तण कहें मंत मूल भेसच्चे । दिन्ने दवा विएवा, पडिकमे देसिंअं सव्वं २४ न्हाणुवट्टण वनग्ग, विले-चणे सदरुव रस गंधे.. वत्थासण आभरणे, पडिकमे देसि सव्वं ॥२५॥ कंदप्पे कुंकइए, मोहरि अहिगरण भोगमारित्ते। दंडसि अणठाए, तइमि गुणवए निंदे.॥ २६॥ तिविहें दुप्पणिहाणे, अणवठाणे-तहासविहुणे.. सामाइअ वितह कए, पढमे सिक्खायए. निंदे ॥२७॥ आणवणे पेसवणे, सद्दे रूवे अ घुग्गलबचे।
'श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. '५३ देसावगासिमि, वीए सिक्खावए निंदे ॥२८॥ संथारुच्चारविही, पमाए तहचेव भोयणा भोए। पोसह विहि विवरीए, तइए सिक्खावए निंदे ॥२९॥ सञ्चित्ते निक्खिवणे, पिहिणे ववएसमच्छरेचेव। कालाइकमदाणे, चउत्थे सिक्खावए निदे ॥३०॥ सुहिएसु अ दुहिएसु अ, जामे असंजएंसु अणुपंका । रागेण व दोसेण व, तं निदे तं च गिरहामि ॥३१॥ साहुसु संविभागो, न कओ तवचरण करण जुत्तेसु । संते फासुयदाणे, तं निंदे तं च गरिहामि ॥ ३२ ॥ इहलोए परलोए, जीविअ मरणे अ आसंसप्पओगे । पंचविहो अइआरो,मा मज्झ हुज मरणते ॥३३॥ कारण काइअस्स, पडिकमे वाइअस्स.वायाए.। मणसा माणसिअस्स, सव्वस वयाइयारस्से ॥३४॥ चंदणवयलिक्खागा, रवेसु सन्ना कसाय दंडेसु । गुत्तीसु अ समीइसु अ, जो अइआरो अतं निंदे ॥ ३५॥ सम्मदिष्ठीजीवो, जइवि हु पावं समायरे किंचि । अप्पोसि होई वंधो, जेण न निद्धंधसं कुणइ ॥ ३६॥ तं.पि हु सपडिकमणं, सप्परिआयं सउत्तरगुणं च। खिप्पं उवसामेइ, वाहि व्व सुसिक्खिओ विजो ॥ ३७ ।। जहा विसं कुछगयं, मंतमूलविसारया। विजाहणंति मंतेहिं, तो तं हवइ निविसं ।। ३८.॥ एवं अठविहं कम्मं, रागदोस समाज। आलोअंतो अनिदंतो, खिप्पं हणइ सुसावओं ॥३९॥। कय पावोवि मणुस्सो, आलोइअ निंदिरं गुरुसगासे। होइ अइरेग लहुओ, ओहरिभरुव भारवहों ॥४॥ आवस्सएण एएण, सावओ जइवि बहुरओ होइ॥ दुक्खाणमंतकिरिअं, काही अचिरेण कालेण ॥४१॥ आलोअणा बहुविहा, नय संभरिआ पडिकमणकाले। . .
५४ देवसिप्रतिक्रमण विधि. मूलगुण उत्तरगुणे, तं निंदे तं च गरिहामि ।।..४२ ।। तस्स धम्मस्ल केवलि पन्नत्तस्स ॥ अब्भुटिओमि आराहणाए । विरओमि विराहणाए। तिविहण पडिकतो, चंदामि जिणे चउवासं ॥४३॥ जावंति चेइआई०॥४४॥ जावंत केवि साहू० ॥४॥ चिर संचिय पाव पणासाए,भवसयसहस्स महाए चउवास जिण विणिग्गय कहाई, वोलंतु मे दिअहा ॥ मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साह सुझंच धम्मो । सम्मदिछीदेवा, दितु समाहिं च वोहिं च ॥४७॥ पडिसिद्धाणं करणे, किच्चाणमकरणे पडिकमणं । असंहहणे अतहा, विवरीयपरुवणाए अ॥१८॥ खाममि सन्न जीवे, सब्वे जीवा खमंतु मे ॥ मित्ति मे सब्वभूएसु, वेरं मज्झ न केंणइ ॥ ४९. ॥ एवमहं आलोइअ, निदिअ गरहिअ दुगंच्छिों सम्मं । तिविहेण पडिकतो, वंदामि जिणे चउवीसं ॥५०॥ (फिर दो खमासमण देने) इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं कायसंफार्स बमाणिजोभे किलामोअप्पकिलंताण बहुसुभेणभे दिवसो वइ. कंतो जत्ता भे जवणिज च भेखामेमि खमासमणो देवसि वइकम्मं आवसिआए पडिकमामि खमासमणाणं देवसिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए भणदुक्कडाए वयदुकडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सम्वकालिआए सवमिच्छोवयाराए. सबधम्माइकमणाए आसायणाए जोमे अइआरोकओतस्स खमासमणो पडिकमा- मि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१॥ इच्छामिखमासमणो वैदिउंजावणिज्जाए निसीहिआए अणु- जाणह मे मिउग्गहंनिसीहि अहोकायं कायसंफासंखमणिजो भे किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुभेण भे दिवसो वइकतो श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. जत्ताभेजवणिजं च भेखामेमि खमासमणो देवलि वइकम्म पडिकमामि खमासमणाणं देवसिआए आसायणाए तित्तीसन्न- यराए जंकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुकाडाए कायदुक्क डाए कोहाएं माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सम्वमिच्छोक्याराए सवधम्माइकमणाए आसायणाए जो मे अइमारो को तस्स खमासमणो परिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥२॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् अन्भुष्टिओमि अभिन्तर देव- सिरं खामेडं इच्छं खामेमि देवसिअं, जं किंचि अपत्ति पर- पत्ति भत्ते पाणे विणए वेयावच्चे आलावे संलावे उच्चालणे समासणे अंतरभासाए उवरिभासाए जं किंचि मज्झ विणय परिहाणं सुहम वा वायरं वा तुम्भे जाणह अहं न जाणामि तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं कायसफासं खम- णिजो भे किलामो अप्पकिलंताणं वहसुभेण भे दिवसो वइ- कतो जत्ता मे जवणिजं च भे खाममि खमालमणो देवसि बइकम्म आवसिआए पडिकमामि खमासमणाणं देवसिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जकिंचि मिच्छाए मणदुकडाए वयदुक्कडाए कायदुकराए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छोक्याराए सव्वधम्माइकमणाए. आसायणाए जो मे अइआरोकओ तस्स खमासमणो पडिक- मामि निदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ : इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं कायसंफास खमणिजो भे फिलामोअप्पकिलंताणंबहुसुभेणभे दिवसोवइ- कतो जत्ता मे जवाणिजं च भे खाममि खमासमणो देवसि वहकम्म पडिकमामि समासमणाणं देवासिआए आसायणाए तित्तीसंन्नथराए जकिंचि मिच्छाए मणदुकडाए वयदुकडाए ५६ देवसिप्रतिक्रमण विधि. कायदुक्कडाए कोहाए माणाएं मायाए लोभाए सव्वकालिआए सबमिच्छोक्याराए सव्वधम्माइकमणाए आसायणाए जो मे अइआरों को तस्स खमासमणो पडिकमामि निदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ आयरिय उवज्झाए, सीसे साहम्मिए कुल गणेश, जे मे केइ कसाया, सव्वे तिविहेण खामेमि ॥१॥ सव्वस्स समणसंघस्स, भगवओ अंजलिकरिब सांसे। सव्वं समावइत्ता, खमामि सव्वस्स.अहयपि ॥२॥ सबस्स जीवगसिस्स, भावओ धम्मनिही निमचित्तो। सव्वं खमावइत्ता, खमामि सन्चस्स सहयपि ॥३॥ करेमि भंते सामाइयं सावज्जं जोग पच्चस्खामि जाव. नियम पज्जवासामि दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करोमि न कारवमि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ इच्छामि ठामि काउसग्गं जो मे देवसिओ अइआरो कमओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकर- णिजो दुज्झाओ दुविचिंतिओ.अणायारो थणिच्छियवो असावगपाउग्गो नाणे दलणे चरित्तांचरित्ते सुए सामाइए तिहं गुत्तीणं चउण्हं कसायाण पंचण्हमणुपयाणं तिण्हं गुणव्वयाणं चउहं सिवखावयाणं वारसविहस्स- सावग- धम्मरस खंडिअंजं विराहियं तरस मिच्छामि दुक्कडं ॥ तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणटाए: ठामि काउस्सरगं । अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उडएणं वायनिसग्गेणं. भमलिए.पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहमेंहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिहिसंचा- लेहि एवमाइएहिं आंगारोहिं अभग्गों अविराहियों हुज में
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
काउस्सग्गों जाव अरिहंताण भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि
ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥
(दो लोगस्सका काउस्सग्ग करना. न आव तों आठ नवकार गिनने.
फिर प्रगट लोगस्स कहना. वह नीचे मुजब.)
लोगस्स उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ।
अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली.॥
उसममजिअंच वंदे, संभवमाभिणंदणं च सुमई च ।
पउमप्पहं सुपासं जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥
सुविहिं च पुप्फदंत, सीअल सिजंस वासुपुजं च ।
विमलमणंत च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ॥
कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।
वंदामि रिठ्ठनमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥
एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा।
चउवीसं पि जिणवरा, तित्थयरों मे पसीयतु ।।.
कित्तिय वंदिय महिआ, जे ए लोगस्स उत्तमा सिंद्धा ।
आरुग्ग-चोहिलाभ समाहिवरमुत्तमं किंतु ॥
चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरां ।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं.मम दिसंतु ॥
अरिहंतचेइआणं करेमि काउस्सग्गं, चंदणवत्तिआए
पूअणवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिआए बोहिला-
भवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धाए मेहाए धीइए
धारणाए अणुप्पेहाए वड्ढमाणीए ठामि काउस्सग्गं ।
अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिंएणं छीएणं जंभाइएणं
उड्डएणं वायनिसग्गणं
भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमहिं
अंगसंचालहिं सुहुमहिं खेलसंचालहिं सुहुमहिं दिहिसंचालहिं
एवमाइएहि आगारोहिं अभग्गों अविरहिओ हुजमे काउंस्सग्गो
जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि ताव कार्य
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि।
५८ देवसिप्रतिक्रमण विधि. (एक लोगस्सका काउसग्ग करना, न आवे तो चार नवकार गिन फिर पुक्खरगरदीवढे कहना.) पुक्खरवरदीवढे धायइसंडे अ जंबुदीवे अ। भरहेरवयविदेहे धम्माइगरे नमसामि ॥१॥ तमतिमिरपडलविद्धंसणस्ससुरगणनारदमहियस्त। सीमाधरस्स वंदे पप्फोडिअमोहजालस्स ॥२॥ जाइजरामरणसोगपणासणस्स कल्लाणपुक्खलविसालसुहावहस्स। को देवदाणवनरिंदगणच्चियस्स धम्मस्ल सारमुवलम्भ करे पमायं ॥३॥ सिद्धे भो पयओ णमो जिणमये नंदी सया संजमे देवनागसुवाकिन्नरगणस्सम्भूधभावच्चिए। लोगो जत्थ पाहिओ जगमिणं तेलुकमच्चासुरं धम्मो वट्ठउ सासओ विजयओ धम्मुत्तरं बदउ ॥ ४॥ सुअस्स भगवओ करोमि काउस्सग्गं । वंदणवत्तिआए पूअणवत्तिआए लक्कारवत्तिआए सम्माणवत्तिआए बोहि- लाभवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धाएं मेहाए धिइए धारणाए अणुप्पेहाए वदमाणीए ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्थ उससिएणं नीसासिएणं खासिएणं छीएणं जंभाई- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पितमन्छाए सुहुमेहि अंगसंचालहिं सुहुमेहि खेलसंचालेहिं सुहुमेहि दिहिसंचालेहि एवमाइएहिं आगाहें अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्स- ग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि ताव: कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।। (एक लोगस्सका काउस्सग करना. न आवे तो चार नवकार गिनने. फिर सिद्धाणं वुद्धाणं काउस्सग्ग पारकर कहना.) सिद्धाणं वुद्धाणं पारगयाणं परंपरगया। लोअम्गमुवगयाणं नमो सया सव्वसिद्धाणं ॥१ जो देवाण वि देवो, जं देवा पंजली नमसंति ।
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ५९ तं देवदेवमहिअं, सिरसा वंदे महावीरं ॥२॥ इको विनमुक्कारो, जिणवरवसहरस वद्धमाणस्स। संसारसागराओ, तारेइ नरं व नारिं वा॥३॥ उजितसेलसिहरे, दिवखा नाणं निसीहिआ जस्स । तं धम्मचकवाह, अरिष्टनेमि नमसामि ॥४॥ चत्तारि अठ्ठ दस दो ष, बंदिया जिणवरा चउवीसं। परमानिटिअट्ठा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥५॥ सुअदेवआए करेमि काउसग्गं । अन्नत्थ उसलिएणनीससिएणंखासिएणं छीएणं भाइएणं, उड्डएणं वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेहि अंगसंचालहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालहि, सुहुमेहिं दिहिसं- चालेहिं, एवमाइएहिं, आगारोहिं,अभग्गोअविराहिमओ,हुज्ज मे काउस्सग्गो, जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुक्कारेणं न पारेमि ताव काय ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (एक नवकारका काउस्सग्ग करके नमोऽर्हसिद्धाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्यः ऐसा कहकर नीचेकी स्तुति बोलनी ) सुयदेवया भगवइ, नाणावरणीय कम्मसंघाय । तेसिं खदेउ सययं, जेसि सुयसायरे भत्ती ॥१॥ (स्त्रियोंको कमलदलकी स्तुति कहनी चाहिए वह नीचे मुताबिक.) कमलदलविपुलनयना, कमलमुखी कमलसमगौरी। कसले स्थिता भगवती, ददातु श्रुतदेव ता सिद्धि ॥१॥ खित्तदेवताए करेमि काउस्सग्गं । अन्नत्थ उससिपणं निससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहु- भेहिं अंग संचालेहिं सुहोहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिहि- संचालोहिं एवमाइएहि आगारोहिं अभग्गो अविराहिओ हुंज में काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेण न पारेमि तावकार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोलिरामि ।।
६० 'देवासप्रतिक्रमण विधि. (एक नवकारका काउस्सग्ग करना काउस्सग्ग पारकें नमोऽर्हत सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः कहके स्तुति बोलनी). जीसे खित्ते साहू, दसणनाणेहिं चरणसहिएहि । साहति मुक्खमग्गं, सा देवी हर'दुरिआई॥१॥ (स्त्रियों को भुवनदेवताकी स्तुति कहनी वह नीचे मुताबिकः) यस्या क्षेत्रं समाश्रित्य, साधुभिः साध्यते क्रियाः । सा क्षेत्रदेवता नित्य, भूयान्नः सुखदायिनी ॥ १॥ नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उव- ज्झायाण नमो लोए सन्चसाहणं । एसोपंचमुकारो सब्वपाव- प्पणासणो मंगलाणं च सवसि पढम हवह मंगलं ॥ .. (फिर छठा आवश्यककी मुहपत्ति पडिलहनी फिर दो खमासमण देने) इच्छामि खमासमणो चंदिर जावणिजाए निसाहिआए 'अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं कायसंफासं खमणिज्जो भे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुमेण भे दिवसो वइकंतो जत्ता मे जवणिजं च भे खाममि खमासमणो 'देव- सिरं वइकम्म आवसिआए पडिकमामि खमालमणाणं देव- सिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जकिंचि मिच्छाए मण- दुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए. मायाए लोभाए सव्वकालिआए सन्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक- सणाए आसायणाए जो से अइआरो की तस्स खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१॥ इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिज्जाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहोकायं कायसंकासं खम- णिजो भे किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुंभेण भे दिवसो वइ- कंतो जत्ता भे जवणिजं च मे खामेमिः खमासमणो.देवसि वइकम्म पडिकमामि . खमासमणाणं-देवसिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मणदुकडाए वयदुक्कडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छवियाराए सव्वधम्माइकमणांए आसायणाए जो .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र..
मे अइआरो को तस्स समासमणो पडिकमामि निंदामि
गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥२॥
सामायिक, चउवीसत्थो, वांदणां, पडिकम', काउरसग्ग,
पञ्चक्खाण किया है जी।
इच्छामो अणुसहि नमो खमासमणाणं
नमोऽर्हत् सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुम्यः
(पुरुषोंको.नमोऽस्तुबर्द्धमानाय कहना चाहिए, सो नीचे मुजव.)
नमोस्तु वर्द्धमानाय, स्पर्द्धमानाय कर्मणा।
तजयावाप्तमोक्षाय, परोक्षाय कुतीर्थिनां ॥१॥
येपां विकचारविंदराज्य
जायःक्रम कमलावलिं दधत्याः
सहशैरिति संगतं प्रशस्य,
कथितं संतु शिवाय ते जिनेंद्राः ॥ २॥
कपायतापार्दितजंतुनिर्वृति,
करोति योजैन मुखांवुदोद्गतःस शुक्रमासोदभववृष्टिसन्निभो,
दधातु तुष्टिं मयि । विस्तरो गिरां ॥३॥
(स्त्रियोंको संसारदावाकी तीन स्तुति कहनी चाहिए.)
संसारदावानलदाहनीरं, संमोहचलीहरणे समीरं ।
मायारसादारणसारसीरं, नमामि वीरं गिरिसारधारा
भावावनामसुरदानवमानवेन,
चूलाविलोलकमलावलिमालितानि ।
संपूरिताभिनतलोकसमाहितानि,
कामं नमामि जिनराजपदानि तानि ॥२॥.
वोधागाधं सुपदपदंवीनीरपुराभिराम,
जीवाहिंसाविरललहरीसंगमागाहदेहं ।
चूलावेल मुरुगममणीसंकुलं दूरपारं,
सारं वीरागमजलनिधि सादरं साधुसेवे ॥३॥..
नमुत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥.
आइगराणं तित्थयराण सयंसंबुद्धाणं ॥ २॥
देवसिप्रतिक्रमण विधि
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पुरिसुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिसंवरपुंडरियाणं,
पुरिसवरगंधहत्थीणं ॥३॥
लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआणं,
लोगपईवाणं, लोगपज़ोअगराणं ॥४॥
अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गयाणं,
सरणयाणं, वोहिदयाणं ॥५॥
धम्मदयाणं, धम्मदेसिंआणं, धम्मनायगाणं,
धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं ॥६॥
अप्पडिहयवरनाणदंसणंधराणं, विअट्टछउमाणं ॥७॥
जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं,
बुद्धाणं वोहिआणं, मुत्ताणं मोअगाणं ॥ ८॥
सव्वन्नूणं, सम्वदरिसीणं, सिवमयलमरुयमणंत-
मक्खयमवावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ।
ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥
जे अ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्सति णांगए काले।
संपइ अ वट्टमाणा, सच्चे तिविहेण वंदामि ॥ १० ॥
इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए "निसीहिआए
'मस्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसंह भगवन् स्तवन भणुं
"इच्छं" नमोऽर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः ॥ :
(स्तवन)
मारं मन मोह्यथुरे सिद्धाचळेरे,
मारं मन मोह्ययुरे श्री विमळा चळेरे,
देखीने हरखीत होय ।
विधिसुं कीजेरे यात्रा एहनीरे,
भव भवनां दुःख जाच मारूं० ॥१॥
पंचम रेरे पावन कारणेरे,
ए समो तीरथ न कोय।
मोटो ते महिमारे जगम एहनोरे।
आ भरते अहिआं जोय । मार्स०.॥२॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ६३ ए गिरि आव्यारे जिनवर गणधरारे, सिंध्या साधु अनंत। कठण करम पण ए गिरि फरसतारे, होवे करमनी सांत । मा० ॥३॥ जैन धर्म ते साची जाणीनेरे, मानवतीरथए स्तंभ । सुरनरकिन्नरनृपविद्याधरारे, करता हो नाटारंभ । मारु० ॥४॥ धनधन दहाडोरे धन वेळाघडीरे, धरिये हृदय मोझार। ज्ञानविमलं गुणएहना घणारे, कहंता न आवेरे पार | मारु०॥५॥ वरकनक शंख विद्रुम, मरकत घन सन्निभं विगतमोहं । सप्ततिशतं जिनानां सर्वामरपूजितं चंदे ॥॥॥ इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । भगवान्ह । इच्छामि खमासमणो दि जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण चंदामि । आचार्यहं । इच्छामि खमासमणी दिलं जाचणिजाए निसीहिआए मत्थएण वदामि । उपाध्यायहं । इच्छामि खमासमणो चंदिर जाचणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । सर्वसाधुहं । (फिर आसनपर दाहिणाहाथ रखके अड्ढाइन्नेसु कहना वह नीचे मुनव.) अढाइजेसु दीवसमुद्देसु, पनरससु कम्मभूमीसु, जावंत- केवि साष्ट्र रयहरणमुच्छपडिग्गहधरा पंचमहत्वयधरा अठा- रससहस्स सीलांगधरा, अक्खयायारचरित्ता, ते सव्वे सिरसा मणसा मत्थएण वदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् देवसिम पायच्छित विशो- धनार्थ करमि काउस्सग्गं "इच्छं" देवसिअ पायच्छित्त विशोधनार्थ करेमि काउस्सग्गं । .
६४. देवसिप्रतिक्रमण विधि.. अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं.सासिएणं छीएणं संभाइ एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमहिं अंगसंचालहिं सुहुमेहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहि. दिहिसंचा- लेहिं एवमाइएहि आगारोहिं अभग्गो अविराहिलो हुन्ज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारोमि तावकायं ठाणेणं मोणणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामिः॥ चार लोगल्सका काउस्सग करना न आवे तो सोले नवकार गिनना. फिर प्रगट लोगस्त कहना. वह नीचे मुताबिक.). लोगस्स उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चवीसंपिकेवली:।। उसभमजिमं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च । 'पउमप्पहं सुपातं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥ सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल सिजंस वासुपुज्जं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म संर्ति च वंदामि ॥ कुंथु अरं च मल्लि, वंदे मुणिसुब्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिकुनेमि, पासं तह वद्धमाणं चं॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ कित्तिय वंदिय महिमा, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग-योहिलाभं समाहिवरमुत्तमं दितु ॥ .... : चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासंयरा.! सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु॥ इच्छामि खमाणमणो वंदिलं जावणिजाए. निसीहिआए मत्थएण वदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सज्झाय:संदिसाहुं. "इच्छं" इच्छामि खमासमणो वैदिउं . जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि। इच्छाकारण संदिसह भगवन् सज्झाय करं ? "इच्छं नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो- आयरिआणं, नमो .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ६५ उवज्झायाणं, नमो लोए सवसाहणं, एसो पंचनमुकारो, सवपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसि, पढम हवइ मंगलं। ॥ सज्झाय॥ पवयण देवी चित्त धरीजी, विनय वखाणीश सार। जंबूने पूछे कहोजी, श्रीसोहम गणधार ॥१॥ मविकजन विनय वहो सुखकार ॥ ए आंकणी। पहिले अध्ययने कोजी, उत्तराध्ययन मझार । सघला गुणमा मूलगोजी, जे जिनशासनसार । भविकजन २ नाण विनयथी पामीयजी, नाणे दरिसण शुद्ध । चारित्र दरिसणी हुवेजी, चारित्रथी पुण सिद्धि ॥ भवि०३ मुरुनी आण सदा धरेजी, जाणे गुरुनो भाव । विनयवंत गुणरागियोजी, ते मुनि सरलस्वभाव ॥ भवि०॥४॥ कणर्नु कुंडं परिहरीजी, विष्टाशुं मनराग। गुरुद्रोही ते जाणवाजी, सूअर ओपमा लाग । भवि० कोह्या काननी कूतरीजी, ठाम न पामीरे जेम । शीलहीण अकाागराजी, आदर न लहे तेम ॥ भवि०॥६॥ चंद्र तणी परे उजळीजी, कीर्ति तेह लहंत । विषय कपाय जीती करीजी, जे नर विनय वहंत भवि०॥७॥ विजयदेव गुरु पाटवीजी, श्रीविजयसिंह सूरिंद। शिष्य उदयवाचक मणजी, विनय सयल सुखकंदाभवि०॥८॥ नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उवझायाणं नमो लोए सव्यसाहणं एसो पंच नमुक्कारो सव्व भावप्पणासणो । मंगलाणंच सव्वेसिं पढमं हवइ मंगलं ।। इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसाहिआए मत्थएण वदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् दुक्खक्खय कम्मक्खय निमित्तं काउरसग्ग करूं ? "इच्छं" दुपखपख्य कम्मक्खय निमित्तं करेमि काउस्सग्गं. अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जभाइ- एणं उडएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि - देवसिप्रतिक्रमण विधि. अंगसंचालहिं सुहुमहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहि दिट्ठिसंचाले- हि एवमाइपहिं आगारेहि अभग्गो अविराहिमओ हुज्ज मे का- उसग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (चार संपूर्ण लोगस्सका क उसग्स करना न आवे तो सोलह नवकार गिनने. फिर एकजन खडे होकर प्रगट नमोऽहसिद्धाचार्योपाध्या- यसर्वसाधुभ्यः ऐसा कहकर शांति बोले वह नीचे मुताविक.) शान्ति शान्तिनिशान्तं, शान्तं शान्तऽशिवं नमस्कृत्य। स्तोतुः शान्तिनिमित्तं, मन्नपदैः शान्तये स्तौमि॥१॥ ओमितिनिश्चितववसे, नमो नमो भगवतेऽर्हते पूजाम् । शान्तिजिनाय जयवते, यशस्विने स्वामिने दमिनाम् ॥२॥ सकलातिशेषकमहा-सम्पत्तिसमन्विताय शस्याय। त्रैलोक्यपूजिताय च, नमो नमः शान्तिदेवाय ॥३॥ सर्वामरसुसमूह,-स्वामिकसंपूजिताय निजिताय । भुवनजनपालनोद्यत,-तमाय सततं नमस्तस्मै ॥४॥ सर्वदुरितौधनाशन,-कराय सर्वाशिवप्रशमनाय । दुष्टग्रहभूतपिशाच,-शाकिनीनां प्रमथनाय ॥५॥ यस्येतिनाममन्त्र-प्रधानवाक्योपयोगकृततोषा। विजया कुरुते जनहित,-मिति च नुता नमत तं शान्ति ॥६ भवतु नमस्ते भगवति ! विजये ! सुजये! परापरैरजिते।। अपराजिते! जगत्यां, जयतीति जयावहे ! भवति ॥७॥ सर्वस्यापि च सङ्घस्य, भद्रकल्याणमङ्गलप्रददे । साधूनां च सदा शिव-सतुष्टिपुष्टिप्रदे जीयाः ॥ ८॥ भव्यानां कृतसिद्ध ! निर्वृत्तिनिर्वाणजननि ! सत्वानाम् । अभयप्रदाननिरते ! नमोस्तु स्वस्तिप्रदे! तुभ्यम् ॥ ९ ॥ 'भक्तानां जन्तूनां शुभावहे नित्यमुद्यते ! देवि!। सम्यग्दृष्टिनां धृति, रतिमतिबुद्धिप्रदानाय ॥ १० ॥ ..जिनशासननिरतानां, शान्तिनतानां च जगति जगतानाम् । श्रीसम्पत्कीर्तियशो, वर्द्धनि ! जय देवि! विजयस्व ॥ ११, श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. 'सलिलानलविषविषधर, दुष्टग्रहराजरोगरणभयतः । राक्षसारिपुगणमारी,-चौरेतिश्वापदादिभ्यः ॥ १२ ॥ अथ रक्ष रक्ष सुशिवं, कुरु कुरु शान्ति च कुरु कुरु सदेति । तुष्टिं कुरु कुरु पुष्टिं कुरु कुरु स्वस्ति च कुरु कुरु त्वम् ॥१३॥ भगवति! गुणवंति! शिवशान्ति, तुष्टिपुष्टिस्वस्तीह कुरु कुरु जनानाम् । ओमिति नमो नमो हाँ ही हूँ व्हः यः क्षः ही, फुट फुट स्वाहा ॥१४॥ एवं यन्नामाक्षर,-पुरस्सरं संस्तुता जयादेवी। कुरुते शान्ति नमन्तां, नमो नमः शान्तये तस्मै ॥ १५ ॥ इति पूर्वसूरिदर्शित, मन्त्रपदविदर्भितः स्तवः शान्तेः। 'सलिलादिभयविनाशी, शान्त्यादिकरश्च भकिमताम् ॥१६॥ यश्चैनं पठति सदा, शृणोति भावयति वा यथायोगम् । स हि शान्तिपदं यायात्, सूरिः श्रीमानदेवश्च ॥ १७॥ उपसर्गाः क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विनवल्लयः। मनः प्रसन्नतामेति, पुज्यमाने जिनेश्वरे ॥ १८ ॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यम्, सर्व कल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वधर्माणां जैन जयति शासनम् ॥ १९ ॥ (फिर सर्वलोक काउसग्ग पारे बाद एक मनुष्य प्रगर लोगस्स कहे.) लोगस्स उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥ उसभमजिअं च धंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई.च. पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्पदंतं, सीयलसिजंसवासुपुजं च । विमलमणंत च जिणं, धम्म संतिं च चंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च भलिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिटुनोम, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥.. एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्ययरा मे प्रसीयंतु ॥५॥ फट् फट् ' इत्यपि.
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. कित्तिववंदियमहिया, जेए लोगस्स उत्तमा सिद्धा! आरुग्गवोहिलाम, समाहिवरमुत्तमं वितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७ ॥ । इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निलीहिआए' मत्थएण वंदामि॥ इच्छाकारेण संदिसह भवगन् इरियाहियं पडिकमासि,. इच्छं इच्छामि पडिक्कमिडं, इरियावहियाए विराहणाए गम- गागमणे पाणकमणे वीचकमणे हरियकमणे ओला उत्तिंग' यणगदग मट्टी मक्कडा संताणा संकमणे जे मे जीवा विरा: हिमा एगिदिया वेइंदिया तेइंदिया चउरिदिया पंचिंदिया अभिहया वत्तिया लेसिया संघाइया संघट्टिया परियाविया किलामिया उद्दविया ठाणाओठाण संकामिया जीवियामओ ववरोविया तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥ तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोही करणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणट्टाए ठामिः काउस्सग्गं । अन्नत्थ उससिएणं नीससिपणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- पुणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेह अंगसंचाहिं सुहुमेहि खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिहिसंचा- लहिं एवमाइएहि आगारहि अभग्गो अविराहिओ हुन्ज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारोमि तावकायं ठाणेणं मोणेण झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि । (एक लोगस्स वा चार नवकारका काउसग्ग करना, फिर प्रगट लो. गस्स कहना) लोगस्त उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥ उसंभमेजिअंच वंदे, संभवमभिणदण च सुमई च। पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं बंदे ॥२
देवसिप्रतिक्रमण विधि.
६६
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"सुविहिं च पुप्फदंत, सीयलसिजंसवासुपुजं च ।
'विमलमणंतं च जिणं, धम्म संति च वंदामि ॥ ३
कुंथु अरं च मल्लि, वंदे मुणिसुव्वयं नमिाजिणं च ।
वंदामि रिडनोम, पासं तह वद्धमाणं च ॥ ४॥
एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा।
चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ ५॥
कित्तियवंदियमहिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा
आरुग्गवोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥
चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु॥ ७ ॥
इच्छामि खमासमणो वंदिरं जावणिजाए निसीहिआप
मत्थएण वंदामि ॥
चउकसायपडिमल्लुल्लूरणु, दुजयमयणवाणमुसुमरणु ।
न्सरसपियंगुवन्नु गयगामिड, जयउ पासुभुवणत्तयसामि॥१॥
जसु तणुकंतिकडप्प सिणिद्धउ,
सोहइ फणिमणिकिरणालिद्धउ ।
नं नवजलहरतडिल्लयलंछिड,
सो जिणु पासु पयच्छिउ वंछिउ ॥२॥
नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥
आइगगणं तित्थयराणं, सयंसंबुद्धाणं, ॥२॥
पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरियाणं ।
पुरिसवरगंधहत्थीणं ॥३॥
लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहिआणं ।
लोगपइवाणं, लोगपजांअगराणं ॥४॥
अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गदयाणं, ॥
“सरणदयाणं, घोहिदयाणं ॥५॥
'धम्मदयाणं, धम्मदेसिआणं, धम्मनायगाणं ॥
'धम्मसारहीणं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं ॥६॥
अप्पडिहयवरनाणदसणधराणं विभट्टछउमाणं ॥७॥
श्रीपंचतिक्रमण सूत्र. जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं, ॥ बुद्धाण बोहियाण, मुत्ताणं, मोअगाणं ॥ ८॥ सबन्नूणं, सब्बदरिसिणं, सिवमयलमरुममणत. मक्खयमवावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाण, जिअभयाणं ॥९॥ जे अं अईभा सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले: संपइ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ॥ १०॥ जावंति चेइयाई उड्डेअ अहे अतिरिय लोए अ। सवाई ताई वंदे, इह संतो तत्थ संताई ॥१॥ इच्छामि खमासमणो चंदिङ, जावणिजाए निसीहिआए, अत्थपण वंदामि. जावंत के वि साहू, भरहेरवयमहाविदेहे । सवेलि तेसिं पणओ, तिविहेण तिदंडविरयाणं ॥१॥ नमोऽर्हसिद्धाचार्ये पाध्यायसर्वसाधुभ्यः । उवसग्गहरंपासं, पासं वदामि कम्मघणमुकं । विसहरविसनिन्नासं, मंगलकल्लाणआवासं ॥१॥ विसहरफुलिंगमंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ। तस्स गहरोगमारी, दुइजरा जति उवसामं ॥२॥ चिट्ठउ दूरे मंतो, तुज्झ पणामो वि बहुफलो होइ । नरतिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्खदोगनं ॥ ३ ॥ तुह सम्मत्ते लद्ध, चिंतामणिकप्पपायवभहिए। पावति अविग्घेणं, जीवां अयरामरं ठाणं ॥४॥ इस संथुओ महायस, भत्तिम्भरानिन्भरेण हिआएण। ता देव दिज चोहिं, भवेभवे पासजिणचंद ॥५॥ जय वीयराय जगगुरु, होउ ममं तुह पभावओ भय भवनिव्वेओ मग्गा,-णुलारिआ इठ्ठफलसिद्धी ॥१॥ लोगविरुद्धच्चाओ, गुरुजणपूआ परत्थकरणं च । सुहगुरुजोगो तव्वयं,-णसेवणा आभवमखंडा ॥२॥ वारिजइ जइवि निआ-णवंधणं वीयराय तुंह समए ।.
दवसिप्रतिक्रमण विधि. तहवि मम हुज सेवा भवे भवे तुम्ह चलणाणं ॥३॥ दुपखवखओ कम्मपखओ, समाहिमरणं च वाहिलामो अ संपन्जउ मह एरं, तुह नाह पणामकरणेणं ॥४॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं, सर्व कल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयति शासनम् ॥५॥ ईच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआएं मंत्थर्पण वंदामि। इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक मुहपत्ती पडिले . (ऐसा कहके मुहपत्ति पडिलेहनी.) इच्छामि खमासमणो दिउं जावणिजाए निसीहिआए- मत्थरण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक पार? 'यथाशक्ति इच्छामि खमासमणो वैदिउ जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक पायुं ? " तहत्ति. ( फिर आसनपर दाहिना हात रखके एक नवकार गिनकर सामायिक. पारनेकी गाथा कहनी वह निचे मुजव.) नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उ- वजांयाणं मो लोए ससाणं । एसो पंचनमुछारो सच पावप्पणासणो मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं हवह मंगलं ॥ सामाइयवयजुत्तो, जाव मणे होई नियमसंकुत्तो। छिनइ असुह कम्म, सामाइय जत्तिया वारा ॥१॥ सामाइयम्मिउ कए, समणो इव सावओ हवइ जग्हा । एएण कारणणं, बहुसो सामाइयं कुजा ॥२॥ सामायिक विधिसे लिया, विधिसे पारा, विधि करते जो कोई आविधि हुआ हो वो सव मन मचन कायाकर मिच्छामि दुफडं । दश मनके दश वचनके घारह कायाके ७२ श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत.. : यह बत्तीस दोपमें जो कोइ दोप हुआ हो वह सब मन वचन कायाकर मिच्छामि दुकर्ड ॥ समाप्तम्. ॥ अथ पाक्षिक प्रतिक्रमण विधिसहित ।। इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसाहिआए मत्थएण चंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् इरियावहिलं पडिकमामि " इच्छं" इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहिआए: विराहणाए, गमणागमणे पाणकमणे बीयकमणे हरियकमणे ओसाउत्तिंग पणगगद मट्टीमकडा संताणा संकमणे जे में जीवा विराहिआ, एगिदिया वेइंदिया तेइंदिया चरिदिया पंचिदिया अभिहया वत्तिया लेसिया संघाझ्या संघट्टिया परियाविया किलामिया उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।। तस्स उत्तरीकरणेणं, पायच्छितकरणेणं, विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घायणटाए ठामि काउ- स्सग्गं। अन्नत्थ उसलिएण नीससिपणं खासिएणं छीएणं जमा- इएणं, उड्डएणं वायनिसग्गेण, भमलिए पित्तमुच्छाए, सह- मेहिं अंगसंचालहिं, सुहुमहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिट्टि संचालहिं, एवसाइपहि, आगारहिं अभग्गो अविराहिओ, हुज मे काउस्सग्गोजाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारण न पारोमि ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि (एक लोगस्सका काउस्सग करना. न आवे तो चार नवकार गिनना फिर प्रगट लोगस्स कहना.) लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥ उसममजिअंच वंदे, संभवममिणंदणं च सुमई च । पउम्मप्पहं सुपांस, जिणं च चदप्पहं वंदे ॥ २ ॥ सुविहिं च पुप्फदत, सीअलसिजसवासुपुज्जं च । विमलमणंतच जिणं, धम्म संति च वदामि ॥ ३॥ 4 पाक्षिकप्रतिक्रमण विधी. 9른 ७ कुंथु अरं च मलिं, चंदे मुणिसुब्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिठ्ठनमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥ ४॥ 'एवं मए अभिशुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा । चवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तियचंदियमहिआ, जे ए लोगस्ल उत्तमा सिद्धा। आरुल्गवोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥ ६ ॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासगरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७ ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक मुहपत्ती पडिलेहु ? " इच्छं" ऐसा कहके मुहपत्ति पडिलेहनी अंगकी पडिलेहना पचास बोलके साथ करना.) इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण चंदामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक संदिसाहुँ?"इच्छे इच्छामि खमासमणो वंदिउ जावणिजाए निसीहिमाए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक ठाउं?" इच्छं" नमो आरिताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाण। नमो उवज्झायाणं नमो लोए सव्वसाटणं एसो पंच नमुकारो सव्वपावप्पणासणो मंगलाणं च सव्वेसि पढम हवइ मंगलं॥ इच्छकारीभगवन् पसायकरी सामायिक दंडक उच्चरावोजी (ऐसा फहकर दोनो हाथ जोडकर फरेमिभंते उचरना (कहना) पह नीचे मुजव) करेमि भंते सामाइयं, सावजं जोग पञ्चक्खामि, जावनि- यमं पज्जुवासामि. दुविहं तिविहेणं मणेण वायाए कारणं क करेमि न कारवेमि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।।
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र- इच्छामि खमासमणो वंदिउँ जावणिजाए निसीहिआए. मत्थएण वंदामि। इच्छाकारेण संदिसह भगवन् वेसणे संदिसाहुं ? "इच्छं: इच्छामि खमासमणों वंदिउँ जावणिज्जाए नीसीहिआए मत्थएण वदामि। इच्छाकारेण संदिसह भगवन् वेसंण ठाउं ? " इच्छं"। इच्छामि खमासमणो वंदिउं जाणिज्जाए निसीहिआए मत्थएण चंदामि, इच्छाकारेण संदिसह भगवन् संज्झाय संदिसाहुं ? " इच्छं” इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावंणि- जाएं निसीहिआए मत्थएणं वदामि इच्छाकारेण संदिसहः भगवन् , सज्झाय करुं ? " इच्छं (फिर दो हाथ जोडके तिन नवकार गिनना.) नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उव-- ज्झायाणं नमो लोएं संवसाहणं । एसो पंचनमुक्कारो संव.. पावप्पणासणो मंगलाणं च सव्वेसिं पढम हवइ मंगलं,॥ (यह नवकार तीन दफे गिनना) (फिर पानी पिया होतो मुहपत्ति पडिलेहनी, ओर आहार किया हो-- वेतो दो खमासमण देना. इच्छामि खमासमणो वंदिई आवणिजाए निसीहिआए. अणुजाणह मे मिडग्गहं निसीहि अहो काय काय संफासं खमणिजो मे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो बइकतो जत्ता भे जवाणिजं च भे खामेमि खमासमणो देव- सियं वइक्कम्मं आवस्सिाए परिकमामि खमासमणाणं देव- बसिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जकिचि मिच्छाए मण- दुक्कडाए वयदुकडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सम्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक- अणाए आसायणाए जो मे अंइआरोको तस्स खमालमणो थडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१॥ इच्छामिखमासमणो वंदिउंजावाणिजाए निसीहिआए अशु-- पाक्षिकप्रतिक्रमण विधी. जाणह मे मिउगह निसीहि अहो कायं काय संपासं रूम- णिज्जो मे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वहकतो जत्ता भेजवणिजं च भेखामेमिखमासमणो देवसि वनकम्म पडिकमामि खमासमणाणं देवसिआए आसायणाए तित्तीसत्रयराए जंकिंचि मिच्छाए मणदुकडाए क्यदुक्कडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सम्वकालि- आए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधग्मारकमणाए आसायणाए जो मे अइआरो को तरस खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहाभि अप्पाणं वोसिरामि ॥ २॥ (इच्छकारी भगवन् पसायकरी पचवखानका आदेश दीजियेजी तिविहार उपवास, आवेल निवी एकासन, बेआसन किया हो तो पाणहार का पञ्चवखान लेना. १ पाणहार दिवसचरिमं पच्चवखाइ अन्नत्थणाभोगेणं सहस्सागारणं महत्तरागारणं सव्वसमाहिवत्तिआगरणं बसिरे. बिलकूल पानी न पीना होतो चउविहारका पञ्चक्खान लेना ।। २दिवसचरिमं पच्चक्खाइ चउविहंपिहारं असणं पाणं खाइम साइमं अन्नत्थणाभोगेणं सहस्सागारेण महत्तरागारेणं सव्व- समाहिवात्तिआगारणं वोसिरे॥ फक्त पानी पीना हो तो तिविहारका ॥ ३ दिवसचरिमं पञ्चक्खाइ तिविहंपि आहारं असणं खाइम अन्नत्थणाभोगेणं सहस्सागारेणं महत्तरागारेणं सव्व- समाहिवत्तिागारणं वोसिरे ॥ पानी और मुखवास खुल्ला रखना हो तो दुविहारका पच्चक्खान लेना. ४ दिवसचरिमं पच्चक्खाइ दुविहंपि आहारं असणं खाइम अन्नत्थणाभोगेणं सहस्सागारणं महत्तरागारेणं सन्द- समाहिवत्तिआगारेणं वोसिरे। इच्छामि खमासमणो वदिउँ जावाणिजाए निसीहिआए.. मत्थएण वंदामि. इच्छाकारेण संदिसह भगवन चैत्यवंदनः करूं?" इच्छं ऐसा कहके सकलाईत कहना.
•७६ श्रीपंचप्रतिक्रमग सूत्रः . चैत्यवंदन. -सकलाहन प्रतिष्ठान,-मधिष्ठानं शिवश्रियः। भूर्भुवः स्वस्त्रयीशान,-माहत्यं प्रणिध्महे ॥ १॥ -नामाकृतिद्रव्यभावैः, पुनतस्त्रिजगजनं । क्षेत्र काले च सर्वस्मि,-नहतः समुपास्महे ॥२॥ -आदिमं पृथिवीनाथ,-मादिम निःपरिग्रह। आदिमं तीर्थनाथंच, ऋषभस्वामिनं स्तुमः ॥ ३॥ अर्हन्तमजितं विश्व-कमलाकर भास्करम् । अम्लान केवलादर्श,-संक्रान्त जगतं स्तुवे ॥४॥ विश्वभव्यजनाराम, कुल्यातुल्या जयन्ति ताः। देशनासमये वाचः, श्रीसम्भवजगत्पतेः॥५॥ अनेकान्तमताम्भोधि, समुल्लासनचन्द्रमा। दद्यादमन्दमानन्दं, भगवानभिनन्दनः ॥६॥ दुसकिरीटशाणायो,-त्तेजिताघ्रिनखावलिः । 'भगवान् सुमतिस्वामी, तनोत्वभिमतानि वः ॥७॥ पंद्रप्रभप्रभोदेह-, भासः पुष्णन्तु वः श्रियम् । अन्तरङ्गारिमथने कोपाटोपादिवारुणाः ॥ ८॥ श्रीसुपार्श्वजिनेन्द्राय, महेन्द्रमाहितामये । नमश्चतुर्वर्णसधं,-गगनाभोगभास्वते ॥९॥ चन्द्रप्रभप्रभोश्चन्द्र, मरीचिनिचयोज्ज्वला। मूर्तिमूर्तसितध्यान,-निर्मितेव श्रियेऽस्तु वः ॥ १० ॥ करामलकवद्विश्वं, कलयन् केवलश्रिया। अचिन्त्यमाहात्म्यानिधिः, सुविधिोंधयेऽस्तु क; ॥१९॥ सत्त्वानां परमानन्द, कन्दोर्दोदनवाम्बुदः । ‘स्याद्वादामृतनिस्यन्दी, शीतलः पातु वो जिनः ॥ १२॥ भवरोगार्तजन्तूना, मगदवारदर्शनः । 'निःश्रेयसश्रीरमणः, श्रेयांसः श्रेयसेऽस्तु वः ।। १३: विश्वोपकारकीभूत,-तीर्थककर्मनिर्मितिः।
पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि.
सुरासुरनरैः पूज्यो, वासुपूज्यः पुनातु वः ॥ १४ ।।
विमलस्वामिनो वाचंः, कतकक्षोदसोदराः।
जयन्ति त्रिजगच्चेतो, जलनैमल्यहेतवः ॥ १५ ॥
स्वयम्भूरमणस्पद्धि,-करुणारसवारिणा।
अनन्तजिदनन्तां वः, प्रयच्छतु सुखश्रियम् ॥ १६ ॥
कल्पद्रुमसधर्माण,-मिष्टप्राप्तौ शरीरिणाम् ।
चतुर्धाधर्मदेष्टारं धर्मनाथमुपास्महे ॥१७॥
सुधासोदरवाग्ज्योत्स्ना,-निर्मलीकृतदिङ्मुखः ।
मृगलक्ष्मा तमश्शान्त्य, शान्तिनाथजिनोऽस्तु वः||१८
श्रीकुन्थुनाथो भगवान्,-सनाथोऽतिशयद्धिभिः ।
सुरासुरनृनाथाना,-मेकनाथोऽस्तु वः श्रिये ॥ १९ ॥
अरनाथस्तु भगवां,-श्चतुर्थारनभोरविः ।
चतुर्थपुरुषार्थश्री.-विलासं तिनोतु वः ॥२०॥
सुरासुरनराधीश, मयूरनववारिदम् ।
कर्मन्मूलनेहस्ति,-मल्लं मल्लीमभिष्टमः ॥२१॥
जगन्महामोहनिद्रा,-प्रत्यूपसमयोपमम् ।
मुनिसुव्रतनाथस्य, देशनावचनं स्तुमः ॥२२॥
लुठन्तो नमतां मुनि, निर्मलीकारकारणम् ।
वारिप्लवा इव नमः, पान्तु पादनखांशवः ॥ २३ ॥
यदुवंशसमुद्रेन्दुः, फर्मकक्षहुताशनः ।
अरिष्टनोमिभंगवान, भूयाद्वोऽरिष्टनाशनः ॥२४॥
कमठे धरणेन्द्रे च, स्वोचितं कर्म कुर्वति ।
प्रभुस्तुल्यमनोवृत्तिः, पार्श्वनाथः श्रियेऽरतु वः ॥ २५ ॥
श्रीमते वीरनाथाय, सनाथायाद्भुतश्रिया।
महानन्दसरोराज,-मरालायाहते नमः ॥ २६ ॥
कृतापराधेऽपि जने, कृपामन्थरतारयोः।
ईपद्वाप्पाईयोर्भद्रं, श्रीवाराजिननेत्रयोः ॥२७॥
जयति विजितान्यतेजाः सुरासुराधीशसेवितः श्रीमान् ।
विमलखांसविरहित,-स्त्रिभुवनचूडामणिभंगवान् ॥२८॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. धीरः सर्वसुरासुरेन्द्रमहितो, वीरं वुधाः संश्रिताः। वीरेणाभिहतः स्वकनिचयो, वीराय नित्यं नमः । वीरातीर्थमिदं प्रवृत्तमतुलं, वीरस्य घोरं तपो। चीरे श्रीधृतिकीर्तिकान्तिनिचयः, श्रीवीर ! भद्रं दिश ॥ २९ ॥ अवनितंलगतानां, कृत्रिमाकृतिमानाम् । वरभवनगतानां, दिव्यवैमानिकानाम् । इह मनुजकृतानां, देवराजार्चितानाम्, । जिनवरभवनानां, भावतोऽहं नमामि ॥ ३०॥ सर्वेपां वेधसामाद्य, मादिम परमेष्ठिनाम् । देवाधिदेवं सर्वज्ञ, श्रीवीरं प्रणिध्महे ॥ ३१ ॥ देवोऽनेकभवार्जितोजितमहापापप्रदीपानलो। देवः सिद्धिवधूविशालहृदयालङ्कारहारोपमः । देवोऽष्टादशदोषसिन्धुरघटानिर्भद पञ्चाननो। भव्यानां विदधातु वाञ्छितफलं, श्रीवीतरागो जिन: ॥३२॥ ख्यातोऽष्टापदपर्वतो गजपदः सम्मेत शैलाभिधः। श्रीमान् रैवतकः प्रसिद्धमहिमा शत्रुञ्जयो मण्डपः । वैभारः कनकाचलोऽर्बुदगिरिः श्रीचित्रकूटादय-। स्तत्र श्रीऋषभादयो जिनवराः कुर्वन्तु वो मङ्गलम् ॥ ३३ ॥ जं किंवि नाम तित्थं सग्गे पायालि माणुसे लोए। जाई जिण विंबाई, ताई सव्वाइं वंदामि । नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ आइगराणं तित्थयराणं, सयंसंबुद्धाणं ॥२॥ पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरीयाण, पुरिसवरगंधहाणं ॥३॥ लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआणं; लोगपईवाणं, लोगपजोअगराणं ॥४॥ अभयदयाणं, चक्खुदयाणं मग्गदयाणं, सरणदयाणं, बोहिदयाणं ॥५॥ धम्तयाणं, धम्मदेसि आणं, धम्मनायगाणं, ।
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र, धम्मसारहिणं, धम्मवरचाउरंतचकवणिं ॥६॥ अप्पडिहयवरनाणसणधारणं, विअट्टछउमाणं ॥७॥ जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाण, तारयाणं, बुद्धाणं वोहिआण मुत्ताणं मोअगाणं ॥ ८॥ -सुव्वन्नूणं, सम्वदरिसीणं. सिवमयलमरुयमणत मक्खयमवावाहमपुणयवित्ति ॥ सिद्धिगइनामधेयं ।। ठाणं संपत्ताणं, नमोजिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥ जे अ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्संतिणागए काले। संपइ अ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ॥१०॥ (फिर चरवलावाले खडे होकर अरिहंत चेइआणं कहे।) अरिहंतचेइआणं करेमि काउस्सग्गं । वंदणवत्तिाए पूअणवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिाए बोहि- लाभवत्तिाए निरुवसग्गवत्तिभाए सद्धाए मेहाए घिइए धारणाए अणुप्पहाए चड्ढमाणीए ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्थ उससिपणं नीससिपणं खासिएणं छीएणं जंभाइ एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेर्हि अंगसंचालहिं सुहुमेहिं खेलसंचालेहि सहुमहि दिविसंचाले- हि एवमाइपहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ हुज काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारोमि तावकायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ ( एक नवकारका काउस्सग्ग कर नमोऽहत् सिद्धाचार्योपाध्याय- सर्वसाधुभ्यः कहकर स्तुति कहना.) स्नातस्याप्रतिमस्य मेरुशिखरे, शच्या विभोः शैशवे। रूपालोकनविस्मयाहृतरस,-भ्रान्त्या भ्रमच्चक्षुषा ॥ उन्मृ; नयनप्रभाधवलितं, क्षीरोदकाशङ्कया। वक्त्रं यस्य पुनः पुनः स जयति, श्रीवर्धमानो जिनः॥१॥ लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवासं पि केवली ॥२॥ .
पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. उसभमजिथंच वंदे, संभवमभिणंदणं च मुसई च पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥३॥ सुविहिं च पुप्फदंत, सीअलसिज्जंसवासुपुज्ज च। विमलमणंतं च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ॥४॥ कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिमुवयं नमिजिणं च । चंदामि रिटुनोमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥५॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥६॥ कित्तियवंदियमाहिआ, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग वोहिलामं समाहिवरमुत्तमं किंतु ॥ ७ ॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइञ्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु।। ८॥ सब्बलोए अरिहंतचेइआणं कमि काउस्सगं बंदणवत्ति-- आए पूअणवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवात्तआए. ब्बोहिलाभवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धाए मेहाए धि. इए धारणार अणुप्पेहाए, वडमाणीए ठामि काउस्लग्गं । अन्नत्य उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालेहि सहुमेहि खेलसंचालहिं सहुमेहिं दिद्विसंचाले- हे एवमाइएहि आगारोहिं अभग्गोअविराहिओ हुज्ज मे काउ- स्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारोमि ताव- कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वासिरामि ॥ एक नवकार का काउस्सग्ग करके फिर स्तुति कहनी.) हंसांसाहतपझरेणुकापशशीरार्णवाम्भोभृतैः। कुम्भैरप्सरसां पयोधरमरप्रस्पद्धिभिः काञ्चनैः । येषां मन्दरत्नशैलेंशिखरे जन्माभिषेकः कृतः। सर्वेः सर्वसुरासुरेश्वरगणैस्तेषां नतोऽहं क्रमान ॥२॥ .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. . पुक्खरवरदीवटे, धायइसंडे अ जंबुदीवे अ। भरहेरवयविदेहे, धम्माइगरे नमसामि ॥१॥ तमतिमिरपडलविद्धं, सणस्सं सुरगणनरिदमहिअस्त। सीमाधरस्स बंदे, पप्फोडिअमोहजालस्स ॥२॥ जाइजरामरणसोंगपणासणस्स, कल्लाणयुक्खलंविसालसुहावहस्स । को देवदाणवरिंदगणांचयस्स, धम्मस्स सारमुवलम्भ करे पमायं ॥३॥ सिद्ध भो पयओ णमो जिणमण नंदि सया संजमे देवनागसुबन्नकिन्नरगणस्सम्भूअभावञ्चिए । लोगो जत्थ पट्टिओ जगमिणं तेलुकामयासुरं । धम्मो वट्टर सासओ विजयड धम्मुत्तरं घट्टड ॥ ४ ॥ सुभस्स भगवभो करोमि काउस्सग्गं । चंदणवत्तिार पक्षणवत्तिाप सफारवत्तिमाण सम्माणवत्तिाप चोहिला- भवत्तिआण. निरुवसग्गवत्तिाप सद्धाण मेहाए धीइए धारणाग अगुप्पेहाए वढमाणीए ठामि काउस्सग्गं ।' अन्नाथ उससिपणं नीससिपणं खासिपणं छीपणं जंभाइ- एणं उगुपणं वायनिसग्गणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुटुमहिं अंगसंचालहिं सुटुमहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिष्टिसंचालेहिं पवमादपहिं आगारोहिं अभग्गो अविराहिओज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं. भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि तावकार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं पोसिरामि ॥ (एक नवकारका काउस्सग्ग करके तीसरी स्तुति कहनी ) अहंकप्रसूतं गणधररचितं द्वादशांगं विशालं, चित्रं बहु- र्थयुक्तं मुनिगणवृपभैर्धारितंबुद्धिमद्भिः। मोक्षाग्रद्धारभूतं व्रत- चरणफलं मेयभावप्रदीपं, भक्त्या नित्यं प्रपद्ये श्रुतमहमखिलं सर्वलोकैकसारं ॥३॥ सिद्धाणं युद्धाणं, पारगयाणं परंपरगयाणं । लोअग्गमुवगयाणं, नमो सया सव्वसिद्धाणं ॥१॥ ६
देवासप्रतिक्रमण विधि.
जो देवाण वि देवो, जं देवा पंजली नमसंति ।
तं देवदेवमहिलं, सिरसा वंदे महावीरं ॥२॥
इको वि नमुकारो, जिणवरवसहस्स वद्धमाणस्स।
संसारसागराओ, तारेइ नरं व नारिं वा ॥३॥
उजितसेलसिहरे, दिक्खा नाणं निसीहिआ जस्स।.
तं धम्मचकवहि, अरिछुनेमि नमसामि ॥ ४॥
चत्वारि अठ दस दो य, वंदिया जिणवरा चउवीसं।
परमठनिहिअठ्ठा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥५॥
वेयावञ्चगराणं संतिगराणं सम्मदिष्ठिसमाहिगराणं करेमि
काउस्सग्गं।
अन्नत्य उससिएणनीससिएणंखासिएणं छीएणं जंभाइएणं,
उद्दएणं वायनिसग्गेणं, भमलिए पित्तमुच्छाए, सुहुमेडिं
अंगसंचालहि, सुहुमहिं खेलसंचालहि, सुहुमेहिं दिहिसं-
'चालेहि, एवमाइएहिं, आगारोहिं,अभग्गो अविराहिओ,हुन्ज मे
काउस्सग्गो, जाव अरिहंताणं भगवंताणं, नमुकारेणं न पारेमि
तावकार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥
(एक नवकारका काउत्सग्ग पारके "नमोऽर्हत सिद्धाचायोपाध्यायसर्व-
साधुभ्यः" कहके फिर स्तुति कहनी.)
निप्पंकन्योमनीलद्युतिमलसदृशं वालचंद्राभदंष्ट्र।
मत्तं घंटारवेण प्रसृतमजलं पूरयंतं समंतात् ।।
आरूढो दिव्यनागं विचरति गगने कामदः कामरूपी।
यक्षः सर्वानुभूति र्दिशतु मम सदा सर्वकार्येषु सिद्धिम् ॥४॥
( फिर बैठके)
नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥
आइगराणं तित्थयराणं, सयंसंबुद्धाणं ॥२॥
पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवरपुंडरिआणं,
पुरिसवरगंधहत्थीणं ॥३॥
लामुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआणं,
लोगपइवाणं, लोगपजोमगराणं ॥४॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. अभयदयाण, चक्दया, मग्गदयाण, सरणदयाणं, वोहिदयाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसिआणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहाणं, धम्मवरचाउरतचकवट्टीणं ॥६॥ अप्पडिहयवरनाणदसणधराणं, वियदृछउमाणं ॥७॥ जिणाणं, जावयाण, तिन्नाणं तारयाणं, वुद्धाणं बोहियाणे, मुत्ताणं, मोअगाणं ॥ ८॥ सव्वन्नूणं, सव्वदरिसिणं, सिवमयलमरुअमणंत- मक्खयमवावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥ जे अ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्सति णागए काले । संपइअ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ।। १० ।। इच्छामि खमासमणो वंदिउँ जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । भगवान्हं । इच्छामि खमासमंणो वैदिउँ जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वदामि । आचार्यहं । इच्छामि खमासमणो वैदिउं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । उपाध्यायहं । इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । सर्वसाधुहं । (फिर) इच्छाकारेण संदिसह भगवन् देवसिअ पडिकमणे ठाउं? "इच्छं" ( दाहिणा हाथ चरवला वा आसनपर रखके ) सव्वस्सवि देवसिअ दुञ्चितिअ दुष्भासिभ दुञ्चिठिा इच्छं तस्स मिच्छामि दुक्कड. (फिर खड़ा होके वा बैठके करेमिभंते कहे वह नीचे मुताबिक ) करेमिभंते सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि जाव नियमं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न देवसिप्रतिक्रमण विधि.. करोमि न कारवमि तस्समंते पंडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ इच्छामि ठामि काउसग्गं जो मे देवसिओ अइआरो को काइओ वाइओं माणसिओ.उस्सुत्तों उम्मग्गो अकप्पो अकर- णिजो दुज्झाओ दुधिचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअव्वो असावगपाउग्गो नाणे दसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिण्हं गुत्तीणं चउण्हं कसायाण पंचण्हमणुब्बयाणं तिण्हं गुणवयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं वारसविहस्स सावग- धम्मस्स जै खंडिअंजं विराहि तसं मिच्छामि दुकडं ॥ तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं पांवाणं' कम्माणं निग्घायणट्टीए ठामि काउस्लग्गं । : अन्नत्थ उससिएणं नीसलिएंणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छांए सुहु- अहिं अंगसंचालहिं सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमहिं दिहि- संचालहिं एवमाइएहि आगारोहिं अभग्गों अविराहिओ हुज़ मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि तावकायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अपाणं वोलिरामि ॥ (फिर अतिचारकी आठ गाथाका काउस्सग्ग- करना, न आवे तो आठ नवकार गिनने फिर लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। : अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ॥१॥ उसभमाजिरं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च। पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ -सुविहिं च पुप्फदंतं, सीयल सिजंस वासुपुजं च । विमलमणंतं च जिणे, धम्म संतिं च वंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च । चंदामि रिट्ठनमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥ .एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. चउवीसपि जिणवरा, तित्थयरामे पसीयंतु ॥५॥ कित्तिय चंदिय महिया, जेए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्ग-योहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं किंतु ॥ ६ ॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा.सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७॥ ( फिर तीजे आवश्यककी मुहपत्ति पडिलेहनी और दो खमासमण देने.) इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो कायं काय संफासं खमाणजोभे किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुभेणभे दिवसो वइ. कंतो जत्ता भे जवणिजं च भे खामेमि खमासमणो देवसियं घडकम्मं आवस्सिआए पडिकमामि खमासमणाणं देवसिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मणदुकडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइकमणाए आसायणाए जोमे अइआरोको तस्स खमासमणो पडिकमा- मि निंदामि गरिहामि अप्पाणं चोसिरामि ॥१॥ इच्छामिखमासमणो वंदिउंजावणिजाए निसीहिआए अणु- जाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो काय काय संफासंखमणिजो भे किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुभेण भे दिवसो वकतो जत्ताभेजवाणिजं च भेखाममि खमासमणो देवसि वइकम्म पडिकमामि खमासमणाणं देवासिआए आसायणाएं तित्तीसन्न- यराए जाकिंचि मिच्छाए मणदुकडाए चयदुक्कडाए कायदुक- डाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआएं सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइकमणाए. आसायणाएं जो मे अइआरो कओ तस्स खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥२॥ (फ़िर खडा होकर) इच्छाकारेण संदिसह भगवन् देवअि.आलोउ ?"इच्छ" आलोएमि जो में देवसिओ जइआरो कओ. काहओ देवसिप्रतिक्रमण विधि. वाइओ माणसिओ , उस्सुत्तो उमग्गो अकप्पो अकर णिजो दुज्झाओ दुविचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअव्यो असावगपाउग्गो नाणे दंसणे चरित्ताचारते सुए सामाइए तिण्हं मुत्तीणं चउण्हं कसायाणं पंचण्हमणुव्वयाणंतिण्हं गुण- व्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं वारसविहस्स सावगधम्मस्स ज खंडिअंजं विराहि तस्स मिच्छामि दुक्कडं (फिर हाथ जोडके) सात लाख पृथिवीकाय, सात लाख अपकाय, सात लाख तेउकाय, सात लाख वाउकाय, दस लाख प्रत्येक वनस्पति- काय, चउदह लाख साधारण वनस्पतिकाय,दोलाख दोइंद्रिय, दोलाख तेइंद्रिय,दो लाख चाउरिन्द्रय, चार लाख देवता,चार लाख नारकी; चार लाख तिर्यंच पचेंद्रिय, चौदह लाख मनुष्य एवंकारे चौरासी लाख जीवायोनीमेसे मेरे जीवने जो कोई जीव हनन किया हो, कराया हो, करनेवाले को भला जाना हो वह सव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुक्कडं ॥ पहले प्राणातिपात, दूजे मृषावाद, तीजे अदत्तादान, चौथे मैथुन, पांचमे परिग्रह, छठे क्रोध, सातमे मान, आठमे माया, नवमे लोभ, दसमे राग, इग्यारमे द्वेष, वारमे 'कलह, तेरमे अभ्याख्यान, चौदमे पैशुन्य, पन्नरमे रति अरति, सोलमे पर परिवाद, सत्तरमे मायामृषावाद, अठारमे मिथ्यात्वशल्य इन अठारह पापस्थानोंमेसे मेरे जीवने जो कोई पापस्थान सेवन किया हो, कराया हो, करतको भला जाना हो वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकडं । सव्वस्सवि देवसिभ दुश्चितिअ दुम्मासिब दुश्चिट्ठि इच्छाकारण संदिसह भगवन् तस्स मिच्छामि दुकडं । (फिर दाहिणा ढवण खडा.करके नीचे मुजब कहना.). नमो आरिहंताणं । नमो सिद्धाणं । नमो आयरियाणं। नमो उवज्झायाणं । नमो लोए.सव्वसाहूणं । एसो. पंच
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
८७
नमुकारो।सव्वपावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसि।।
पढमं हवइ मंगलं॥
करेमिभंते सामाइयं, सावज जोगं पञ्चक्खामि, जावनि-
यमं पज्जुवासामि, दुविह तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न क-
रोमि न कारवोमि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि
अप्पाणं वोसिरामि॥
इच्छामि पडिकमिङ जो मे देवसिमी अहारो को
काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकर-
णिजो दुज्झाओ दुविचितिओ अणायारो अणिच्छिअन्यो
असावगपाउग्गो नाणे दंसणे चरित्ताचरिते सुए सामाइए
तिहं गुत्तीणं चउण्हं कसायाणं पचण्हमणुव्वयाण तिण्हं
गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं वारसविहस्स सावग-
धम्मस्स जं खंडिज विराहि तस्स मिच्छामि दुकाई ॥
वंदित्तु सव्वसिद्धे, धम्मायरिए अ सव्वसाहू अ ।
इच्छामि पडिकमिउं, सावगधम्माइआरस्स ॥१॥
जो मे वयाइआरो, नाणे तह दसणे चरित्ते अ।
सहुमो अ बायरो वा, तं निंद तं च गरिहामि ॥२॥
दुविहे परिग्गहमि, सावज्जे बहुविहे अ आरंभे।
करावणे अ करणे, पडिकमे देसि सव्वं ॥३॥
जं बद्धमिदिपाह, चउहि कसाएहि अप्पसत्थेहिं ।
रागेण व दोसेण च, तं निंदे तं च गरिहामि ॥४॥
आगमणे निग्गमणे, ठाणे चंकमणे अणाभोगे।
आमिओगे अनिओगे, पडिक्कमे देसि सव्वं ॥५॥
संका कंख विगिच्छा, पसंस तह संथवो कुलिंगीसु ।
सम्मत्तस्स इआरे, पडिकमे देवसि सव्वं ॥६॥
छकायसमारंभे, पयणे अ पयावणे अ जे दोसा ।
अत्तठा य परठा, उभयठा चेव तं निंदे ॥७॥
पंचण्हमणुव्वयाणं, गुणव्वयाणं च तिण्हमइआरे ।
सिक्खाण च चउण्हं, पडिकमे देवसि सव्वं ॥८॥
te देवसिप्रतिक्रमण विधि. पढमे अणुव्वयंमि, शूलगपाणाचायविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगण ॥९॥ वह बंध छवि च्छेएं, अइभारे भत्तपाणवुच्छेए। पढमवयस्स इयारे, पस्किमे देवसि सव्वं ॥१०॥. बीए अणुव्वयंमि, परिथूलगअलिययणविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ ११ ॥ सहसा रहस्स दारे, मोसुवएंसे अ कूडलेहे अ। बीयवयस्स अइयारे, पडिकमे देवसिं सव्वं ॥ १२ ॥ तइए अणुव्वयंमि, थूलगपरदव्वहरणंविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ १३ ॥ रोनाहडप्पओगे, तप्पडिरूवे विरुद्धगमणे । कुंडतुल कूडमाणे, परिकमे देसि सव्वं ॥ १४ चउत्थे अणुव्वयंमि, निचं परदारगमणविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थं पमायप्पसंगणं ॥ १५ ॥ अपरिग्गहिआ इत्तर, अणंग विवाह तिव्च अणुरागे चंउत्थवयस्सं अइयोरें, पाकमे.देवसि सव्वं ॥ १६ ॥ इत्तों अणुव्वए पंचमंमि, आयरियमप्पसत्यमि। परिमाणपरिच्छेए, इत्थ पमायप्पसंगैणं ॥ १७ ॥ धण धन खित्तवत्यु, रुप्प सुवन्ने अ कुविअपरिमाणे । दुपए चउप्पयंमि, पडिकमे देसि सव्वं ॥१८॥ गमणसं उ परिमाणे, दिसासु उड्ढं अहे अतिरिच। चुड्ढि सइ अंतरद्धा, पढममि गुणव्वए निंदे ॥ १९॥ मजमि अ मंसंमि अं, पुप्फे अ फले अगंधमल्ले अ। उवभोगे परिभोगे, वीअमि गुणव्वए निंदे ॥ २० ॥ सञ्चित्तें पडिबद्धे, आप्पोल दुप्पोलिंअंच आहारे । तुच्छोसहि भक्खणया पडिक्कमे देसि सन्वं ॥ २१ ॥ इंगाली वण-साड़ी.भाडी, फ़ोडी सुवज़ए कम्म:। वाणिजं चैव दंत; लक्खरसकेसवीस वीसयं... ॥२॥ एवं खुजंतपिल्लण, कम्मं निल्लंछणं च दवदाणं ।
धीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ८९ सरदह तलायसोसं, असइ पोसंच जिज्जा ॥ २३ ॥ सत्थगि मुसल जंतग, तण कड़े मंत.सूल भेसजे । दिन्ने दवा विएवा, पडिकमे देसि सव्यं ॥२४॥ न्हाणुवट्टण वनग्ग, विले-वणे सदरुव रस गंधे। वत्थासण आभरणे, पडिकमे देसि सव्वं ॥२५॥ कंदप्पे कुक्कइए, मोहार, अहिंगरण भोगअइरित्ते। दंडमि अणठाए, तइमि मुणवए निंदे ॥ २६॥ तिविहे दुप्पणिहाणे, अणवठाणे तहासइविडणे । सामाइअ वितह कए, पढमे सिक्खापए निंदे ॥२७॥ आणवणे पेसवणे, सहे रुवे अपुग्गलक्खेवे। देसावगासिऑमि, वीए सिक्खावए निंदे ॥२८॥ संथारुच्चारविही, पमाय तह चेव भोयणा भोए । पोलहविहि विवरीए, तइए सिक्खावए निंदे ॥२९॥ सञ्चित्ते निक्खिवणे, पिहिणे चवएस मच्छरे चेव। कालाइकमदाणे, चउत्थे सिक्खावए निंदे ॥३०॥ सहिएसु अ दुहिएसुःअ, जामे असंजएसुः अणुकंपा । रागेण व दोसेण व, त निंदे तं च रिगहामि ॥३१॥ साहुसु संविभागो, न कोतवचरण करण जुत्तेसु । संते फासुयदाणे, तं निंदें तं च गरिहामि ॥ ३२ ॥ इहलोए परलोए, जीविज भरणे अ आसंसप्पओगे। पंचविहो अइआरो, मा मज्झ हुन्ज भरणते ॥३३॥ : कारण काइअस्स, पडिकमे वाइअस्स वायाए। मणसा माणसिअस्स, सवस वयाइयारस्स॥३४ाः चंदणवयसिक्खागा, रवेसु सन्ना कसाय दंडेसु। गुत्तीसु असमीइसु अ, जो अइआरो अतं निंद॥ ३५ ॥ सम्मदिछीजीवो, जइविहु पावं समायरे किचि । अप्पोसि होई वंधो, जेण निद्धंधसं कुणइ ॥३६॥ तपि हु सपडिक्कमणं, सप्परिआवं सउत्तरगुणं च । खिप्पं उवसामेइ, वाहिव्व सुसिक्खिओ विजो ॥ ३७॥ .
देवसिप्रतिक्रमण विधि. जहा विसं कुष्ठगयं, मंतमूलविसारया। विजाहणंति मंतेहि, तो तं हवइ निधिसं ।। ३८ ३८॥ एवं अठविहं कम्म, रागदोस समन्जि। आलोअंतो अनिंदतो, खिप्पं हणइ सुसावओ ॥३६॥ कयपावोवि मणुस्सो, आलोइअ निंदिन गुरुसगासे। होइ अइरेग लहुओ, ओहरिअ भरुव भारवहो ॥४०॥ आवस्सएण एएण, सावओ जइवि बहुरओ होइ ।। दुक्खाणमंतकिरिअं, काही अचिरेण कालेण ॥४१॥ आलोअणा वहुविहा, नय संभरि पडिक्कमणकाले। मूलगुण उत्तरगुणे, तं निंदे तं च गरिहामि ॥ ४२ ॥ तस्स धम्मरस केवलि पन्नत्तस्ल ।। अभुठिओमि आराहणाए । विरओमि विराहणाए। तिविहण पडिक्कतो, वंदामि जिणे चउवासं ॥४३॥ जावंति चेइआई०॥४४॥ जावंत केवि साहू० ॥४५॥ चिर संचिय पाव पणालणाए,भवलय सहस्स महणाए। चउसि जिण विणिग्गय कहाई, वोलंतु मे दिअहा॥ मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साहू सुअंच धम्मो अ। सम्मद्दिीदेवा, दितु समाहिं च बोहिं च ॥४७॥ पडिसिद्धाणं करणे, किच्चाणमकरणे पडिक्कमणं । असदहणे अतहा, विवरीयपरुवणाए अ॥४८॥ खाममि सब जीवे, सब्वे जीवा खमंतु मे ॥ मित्ति मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झ न केणइ ।। ४९ ॥ एवमहं आलोइअ, निंदिअ गरहिअ दुगंच्छि सम्म । तिविहेण पडिकतो, वंदामि जिणे चउवीसं ॥५०॥ इच्छामि खमासमणो वंदिउं, जावणिज्जाए निसीहिआए, मत्थरण वंदामि. देवसि आलोइम पडिकंता - इच्छाकारण सदिसह भगवन् पक्खि मुहपत्ति पडिले हुंजी ? "इच्छं (ऐसा कहकर मुहपत्ति पडिलेहनी, फिर दो खमासमण देने वह नीचे मुताबिक):
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. इच्छामि खमालमणो दिउं. जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो कायं काय संफासं खमणिजो भे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे पक्खो वइकतो जत्ता भे जवणिजं च भे खामेमि खमासमणो पक्खि. अंवइकम्म आवसिआए पडिकमामि खमासमणाणं पक्खि. आए असायणाए तित्तीसन्नयराए जर्किचि मिच्छाए मण- दुकडाए वयदुक्कडाए कायदुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छोवयाराए सबधम्माइक मणाए आसायणाए जो मे अकारो की तस्स खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो कायं काय संफास खमणिजो भे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे पक्खो- वकतो जत्ता मे जवणिजं च मे खाममि खमासमणो पक्खि- अं वइकम्म पडिकमामि खमासमणाणं पक्खिआए आसाय- णाए तित्तीसन्नयराए जकिचि मिच्छाए मणदुकडाए क्यदुक्क डाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्व- कालिआए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माकमणाए आसा- यणाए जो मे अइकारो की तस्स खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पक्खिरं आलोउ ? "इच्छं" आलोपमि जो मे पक्खिओ. अइआरो को काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिजो दुज्झाओ दुविचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअवो अलावगपाउग्गो नाणे दंसणे चरित्ताचरिते सुए समाइए तिण्हं गुत्तीणंचउण्हं कसायाणं पंचण्हमणुव्वयाणं तिण्हं. गुणव्ययाणं चउण्हं सिक्खाक्याणं वारसविहस्स सावगधम्मस्ल जं खडिज विराहि तस्स मिच्छामि दुकडं ।
देवसिप्रतिक्रमण विधि ( इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पक्खि अतिचार आलोउँ ?"इच्छे" ऐसा कहके पाक्षिक अतिचार कहना वह नीचे मुताबिक ) पाक्षिक अतिचार नाणमि दसणमिअ, चरणमि तवंमि तहय विरियमि । आय- रणं आयारो, इअ एसो पंचहा भणिओ.॥२॥ ज्ञानाचार, दर्श नाचार, चारित्राचारः, तपाचार, वीर्याचार, इन पांचों आचा- रोमें जो.कोइ अतिचार पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या बादर जानतें, अजानते, लगा. हो, वह सव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकडं. तत्र ज्ञानाचारे आठ अतिचार "काले विणए वहुमाणे, उवहाणे तह य निन्हवणे । वंजण अत्थ तदुभए, अठविहो नाणमायारो॥२॥ ज्ञान नियमित वक्तमें पढा नहीं, अकाल वक्तमें पढा. विनयरहित, बहुमानरहित, योगोपधानरहित, पढा. ज्ञानजिससे पढा उससे अतिरिक्तको गुरु माना, या कहा. देववंदन, गुरुवंदन, करते हुए, तथा प्रतिक्रमण सं- ज्झाय पढते, गुणते, अशुद्ध अक्षर कहा, लगमानं न्यूना- धिक कहां, अथवा सूत्र अर्थ दोनों असत्य कहे, पढ़कर भूला, असझाईके समयमें थविराचलि, प्रतिक्रमण, उपदेश- मालाआदिसिद्धांत पढा. अपवित्र स्थानमें पढा, विना साफ किये घृणित भूमिपर रखा.ज्ञानके उपकरण तखती, पोथी, ठवणी, कवली, माला, पुस्तक रखनेकीरील, कागज, कलम, वात आदिके पैरं लगा, थूक लगा, अथवा थूकसे. अक्षर मिटाया. ज्ञानके उपकरणको मस्तकके नीचे रखा, अथवा पासमै लिए हुए आहार निहार किया..ज्ञान द्रव्य भक्षण करनेवालेकी उपेक्षा की ज्ञानद्रव्यक़ीसारसंभालनकी, उलटा नुकसान किया. ज्ञानवंतके उपर द्वेप किया, ईर्षा की, तथा अवज्ञा आशातना की. किसीको पढ़ने गुननेमें विन डाला. अपने जानपनेका मान किया, मंतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञानं, मनःपर्यवज्ञान, और केवलज्ञान इन पांचों ज्ञानोंमें श्रद्धान श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. की. मुंगे तोतलेकी हांसी की इत्यादि. ज्ञानाचार संबंधी जो कोई अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या वादर 'जानते, अजानते लंगा हो वह सव मन, वचन, कायांकर मिच्छामि दुकडे । दर्शनाचारके आठ अतिचारः आठ अतिचार:-"निस्संकि निखिअ, निवितिगिच्छा असूढदिठि ।' उवह थिरीकरणे, वच्छल- प्पभावणे अदृ ॥ ३॥ देवगुरु धर्ममें निशंक न हुआ. एकांत निश्चय न किया. धर्मसंबंधी फलमें संदेह किया, साधु सा. स्वीकी जुगुप्सा निंदा की, मिथ्यात्वियोंकी पूजा प्रभावना देख- कर सूढदृष्टिपना किया. कुचारित्रीको देखकर चारित्रवाले- परभी अभाव हुआ, संघमें गुणवानकी प्रशंसान की. धर्मसे पतित होते हुए जीवको स्थिर न किया. साधर्माका हित न चाहा, भक्ति न की, अपमान किया. देवद्रव्य, शानद्रव्य, सांधारणद्रव्यकी हानि होते हुए उपेक्षा की, शक्तिके होते हुए भली प्रकार सारसंभाल न की, साधर्मीसे कलह, क्लेश करके कर्मबंधन किया, मुखकोश वांधेविना भगवत् देवकी पूजा की, धूपदानी, खसकुची, कलशआदिकसे प्रतिमाजी को ठपका लगाया, जिनवि हाथसे छूटा, श्वासोश्वांस लेते आशातना हुई. मंदिर और पौपधशा- लामें थूका, तथा मल श्लेश्म किया, हांसी की, कुतु- हल किया. जिनमंदिरसंबंधी चौरासी आशातनामसे और गुरुमहाराज संबंधी तेतीस आशातनामसे कोइ आशातना हुई हो, स्थापनाचार्य हाथसे गिरे हो, या उनकी पडिलेहण न हुइ हो, गुरुके वचनको मान न दिया हो इत्यादि दर्शनाचार संबंधी जो कोइ अतिचार,पक्षदिवसमें सूक्ष्म या वादर जानते, अजानते लगा हो वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकडं ॥ चारित्राचारके आठ अतिचार:-"पणिहाण जोंगजुत्तो,पंचहि संमिइहि तिहिं गुत्तीहिं। एसचरित्तायारो, अकृविहो होइनाय: व्वो॥४॥र्यासमिति,भापासमिति, एषणासमिति आदानभंडम- देवसिंप्रतिक्रमण विधि. त्तनिक्षेपणासमिति, पारिष्ठापनिकासमिति, मनोगुप्ति, वचन. गुप्ति, कायमुप्ति यह आठ प्रवचनमाता-सामायिक, पौषधा- दिकमें अच्छीतरह पाली नहीं. चारित्राचार संबंधी जो कोइ अतिचार पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या वादर जानते,अजानते लगा हो वह सव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुफर्ड ॥ विशेषतः श्रावकधर्मसंबंधी श्रीसम्यक्त्वमूल यारहवत सम्यक्त्वके पांच अतिचार."संका कंख विगिच्छा, शंका:- श्री अरिहंत प्रभुके बल, अतिशय, शान, लक्ष्मी, गांभीर्या- दिमुण, शाश्वतीप्रतिमा, चारित्रावानके चारित्रमें तथा जिने- श्वर देवके वचनमें संदेह किया. आकांक्षा:-ब्रह्मा, विष्णु, महेश, क्षेत्रपाल, गरुड, गूगा, दिक्पाल, गोत्रदेवता, नव- ग्रहपूजा, गणेश, हनुमान, सुग्रीव, वाली, माता, मसानी- आदिक तथा देश, नगर, ग्राम, गोत्रके जुदे जुदे देवादिकों का प्रभाव देखकर शरीरमें रोगांतक कष्टादिके आनेपर इस लोक, परलोकके लिए पूजा मानता की. वौद्ध, सांख्यादिक संन्यासी, भगत, लिंगिये, योगी, फकीर, पीर इत्यादि अन्य- दर्शनियोंके मंत्र तंत्र चमत्कारको देखकर, विना परमार्थ जाने मोहित हुआ, कुशास्त्र पढा, सुना. श्राद्ध, संवत्सरी, होली, राखडीपुनम, राखी, अजाएकम, प्रेतदूज, गौरीतीज, गणेशचौथ, नागपंचमी, स्कंदषष्ठी, झीलणपष्ठी सील सप्तमी, दुर्गाष्टमी, रामनवमी, विजया दशमी, व्रत एकादशी, वामन द्वादशी, वत्सद्वादशी, धन तेरस, अनंत चौदश, शिवरात्री, काली चौदस, अमावस्या, आदित्यवार, उत्तरायण, याग, भोगादिकिये कराये, करते को भला माना. पीपलमें पानी डालां, डलावया. कुवा, तलाव, नदी, द्रह, वावडी, समुद्र कुंडउपर पुण्यनिमित्त स्नान और दान किया, कराया, अनुमोदन किया, शनिश्वर,, माघमास, नवरात्रिका स्नान किया. नवरात्रिवत किया, अज्ञानियोंके माने हुए व्रतादि किये, कराये. वितिगिच्छाः-धर्मसंबंधी संदेह किया, जिन श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. - चीतराग अरिहंत भगवान धर्मके आगर, विश्वोपकार सागर, मोक्ष मार्गदातार, इत्यादि गुणयुक्त जानकर पूजा नही, इसलोक, परलोकसंवधी भोगवांच्छाके लिये पूजा की, रोगआंतक कष्टके आनेपर क्षीण वचन बोला, मानता मानी, महात्मा महासतीके आहार, पानीआदिकी निंदा की, मिथ्याष्टिकी पूजा प्रभावना देखकर प्रशंसा की, प्रतीति की, दाक्षिण्यतासे उसका धर्म माना, मिथ्यात्वको धर्म कहा इत्यादि श्रीसम्यकत्व व्रतसंबंधी जो कोइ अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या वादर जानते, अजानते लगा हो वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकर्ड । पहले स्थूल प्राणातिपात विरमणव्रतके पांच अतिचार:- बह बंध छविच्छेए" द्विपद, चतुप्पदआदि जीवको क्रोध वश ताडन किया, घाव लगाया, जकडकर वांधा, अधिक बोझ लादा. निलछिन कर्मः-नासिका विधवाई, कर्णछेदन करवाया, खसी किया, दाना, घास, पानीके समयसार वार न की. लेणदेणमें किसीके बदले फिसीको भूखा रखा, पासे खडा होकर मरवाया, कैद करवाया. सडे हुए धानको विना शोधे काममें लिया, अनाज शोधे विना पिसवाया, धूपमें सुकाया. पानी यतनासे न छाना; ईधन. लकडी, उपले, गोहेआदि विना देखे चाले, उसमें सर्प, विच्छू, कालखूजरा, किडी, मकौडीआदि जीवका नाश हुआ. किसी जीवको. दवाया, दुःख दिया, दुःखी होते जीवको अच्छी जगहपर न रखा. चिल्ह, काग, कबूतरआदिके रहनेकी जगहका नाश किया. घौंसले तोडे, चलते, फिरते या अन्य कुछ काम करते. निर्दयपना किया, भली प्रकार जीवरक्षा न की. विना छाने पानीसे स्नानादि कामकाज किया, कपडे धोये, यतनापूर्वक, कामकाज न किया, चारपाई, खटोला, पीढा, पीढी आदि धूपमें रख, डंडेआदिलें झडकाये. जीव संसक्त जमीनको लीपी, दलते, कूटते, लिंपते या अन्य कुछ कामकाज करते देवसिप्रातक्रमण विधि. यतना, की. अष्टमी, चौदसआदि तिथिका नियम तोडा, धूनी करवाई. इत्यादि पहले स्थूल प्रणातिपात विरमणव्रत- संबंधी जो कोई अतिचार, पक्षदिवसमें सूक्ष्म या चादर जानते, अंजानते लगा हो वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकंड । दूसरे स्थूल मृपावाद विरमणव्रतके पांच अतिचार, “स- स्सा रहस्स.दारे" सहसात्कारे विना विचारे एकदम कि- सीको अयोग्य आलं, कलंक दिया. स्वस्त्रीसंबंधी गुप्तवात प्रगट की, अथवा अन्य किसीका मनसेद मर्म प्रगट किया. किसीको दुःखी करनेके लिए खोटी सलाह दी: झूटा लख लिखा, झूटी साक्षी दी, अमानतमें खयानत की, किसीकी घरोड वस्तू पीछी न दी. कन्या, गौ, भूमिसंबंधी लैन दैनमें, लंडते, झगडतें वादविवादमें मोटा झूट बोला हाथ पैर आदिकी गाली दी. इत्यादि स्थूल मृपावाद विरसणव्रतसं. बंधी जों कोइ अतिचार, पक्षदिवसमें सक्षम या वादर'जानते, अजानते लगा हो, वह सव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकडं ॥ : तृतीय स्थूल अदत्तादान विरमणव्रतके पांच अतिचार "तेनाहडप्पओगे” घर, वाहिर, खेत, खलामें विना मालि- कके भेजे वस्तु ग्रहण की, अथवा विना आज्ञा अपने काममें ली चोरीकी वस्तु ली, चोरको सहायता दी, राज्यविरुद्ध कर्म. किया, अच्छौं, तुरी, सजीव, निर्जीव, नई, पुरानीवस्तुकाभेल- संमेल किया जकातकी चोरी की लेते देतेतराजूकी दंडीचढाई, अथवा देते हुए कमती दिया, लेते हुएं अधिक लिया रिश- वंत खाई, विश्वासघात किया, ठगी की, हिसाव कितावमें किसीको धोखा दिया. माता, पिता, पुत्र, मित्र, स्त्रीआदिके साथ ठगी कर किसीको दिया, अथवा पुंजी अलाहदा रखी, अमानत रखी हुई वस्तुसे इन्कार किया. किसीको हिसाब, कितावमें ठगा, पडीहुइ चीज उठाई इत्यादि स्थूल अदत्ता श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र . •दान विरमण.क्तसंबंधी जो कोइ अतिचार, पक्षदिंदसमें सूक्ष्म या चादर :जानते, अजानते - लगा हो, वह सव मन, “वचन, कायाकर मिच्छामि दुक्कडं । चौथे स्वदालसंतोप.परस्त्रीगमन विरमणवतके पांच अति- .चार "अप्परिगहियाइत्तर" परस्त्रीगमन किया, अविवाहिता, कुमारी, विधवा, वेश्यादिकसे गमन किया, अनंगक्रीडा.की. कामआदिकी विशेष जाग्रति की. अभिलाषासे सरागवंचन कहा..अष्टमी, चौदशादि पर्वतिथिका, नियम तोडा. स्त्रीके अंगोपांग देखे, तीव्र. अभिलाषा की, कुविकल्प चितवन किया, पराये नातेजोड़े,गुडे गुड़ियोंका विवाह किया, वा करा- या. अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार, स्वम, स्वप्नांतर हुआ, कुस्वप्न आया, स्त्री, नट,विट, भांड़,वेश्यादिकसे हास्य किया, स्वस्त्रीमें संतोप न किया इत्यादि स्वदारासंतोष पर स्त्रीगमन विरमण व्रतसंबंधी जो कोई अतिचार, पक्षदिवसमें सूक्ष्म या चादर जानते, अजानेत लगा हो, वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकडं ॥ पंचमे स्थूल परिग्रहपरिमाणके पांच अतिचार धण धन्न खित्त वत्थू" धन, धान्य, क्षेत्र, वास्तु, सोना चांदी, वर्तनआदि. द्विपदः-दास, दासी, नौकर. चतुप्पद-गौ, वेल, घोडादि नवः प्रकारके परिग्रहका नियम न लिया, लेकर बढ़ाया, अथवा अधिक देखकर, सू वश माता, पिता,. पुत्र, स्त्रीके नाम किया; परिग्रहका प्रमाण किया नहीं, करके भूलायां, याद न किया इत्यादि स्थूल परिग्रह परिमाण व्रत- संबंधी जो कोई अतिचार, पक्षदिवसमें सूक्ष्म या बादर जानते, अजानते लगा हो, वह सव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकड़े ॥ छठे दिक् परिमाणवतके पांच अतिचार "गमणस्सउ परिमाणे" उर्ध्वदिशि, अधोदिशि, तिर्यगदिशि जाने, आनेके नियमीत प्रमाण उपरांत भूलसे गया, नियम तोड़ा प्रमाण ७ ९८ देवासप्रतिक्रमण विधि. उपरांत सांसारिक कार्यके लिये अन्य देशसे वस्तु मंगवाई, अपने पाससे वहां भेजी, नौका, जहाजादि द्वारा व्यापार किया, वर्षाकालमे एक ग्रामसे दूसरे ग्राममें गया, एकदिशा- के प्रमाणको कम करके, दूसरी दिशाके प्रमाणको अधिक किया, इत्यादि छठे दिक्परिमाण व्रतसंबंधी जो कोइ अति- चार, पक्षदिवसमें सूक्ष्म या वादर जानते, अजानते लगा हो, वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकडं । सातमें भोगोपभोगवतके भोजनआधी पांच, और कर्म- आश्री पंद्रह अतिचार, "सचित्तेपडीवद्धे" सचित्त खान पानकी वस्तु नियमसे अधिक अंगीकार की, सचितसे मिली हुइ वस्तु खाई, तुच्छऔषधिका भक्षण किया. अपक्व आहार, दुपक्वआहार किया. कोमल इमली, लूंट, भुट्टे फलियां आदि वस्तु खाई. सञ्चित्त १ दब २ विगई ३, 'वाहण ४ तंवोल ५ वत्थ ६ कुसुमेसु ७। वाहण ८ सयण ९ विलेवण १०, चंभ ११ दिसि १२ न्हाण १३ भत्तेसु १४ ॥१॥ यह चौदह नियम लिये नहीं, लेकर भुलाये, वड, पीपलं, पिलंखण, कठुवर, गूलर, यह पांच फल, मदिरा, मांस, शहद, मक्खन, यह चार महाविंगई, वरफ, ओले, कच्ची 'मिट्टी, रात्रिभोजन, बहुवीजाफल, अचार, घोलवडे, द्विदल, बैंगण, तुच्छफल, अंजानाफल, चलितरस, अनंतकाय, यह वावीस अभक्ष्य, सूरन, जिमीकंद,कच्ची हलदी, सतावरी, कच्चा नरकचूर, अदरक, कुवारपाठ, थोर, गिलोय, लसन, गाजर, गटा, प्याज, गोंगलु, कोमलफल, फूल, पात्र, थेगी, हरामोत्था, अमृतवेल, मूली, पदवहेडा, आलु, कचाल, रतालु, पिंडालुआदि अनंतकायका भक्षण किया. सूर्यो दयसे पहेले भोजन किया. तथा कर्मतः पंद्रह कर्मादान इंगा- लकम्मे, वणकम्मे, साडिकम्मे, भाडिकम्मे, फोडीकम्मे यह पांच कर्म, दंतवाणिज्ज, लक्खवाणिज्ज, रसवाणिज, केस- चाणिज्ज विसवाणिज्ज यह पांच वाणिज्ज, जंतपिल्ल-
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
णकम्म, निलंछनकम्म, दवग्गिदावणया, सरदहतलायसो
सणया, असइपोसणया यह पांच सामान्य, एवं कुल
पंद्रह कर्मादान, महा आरंभ किये, कराये, करतेको अच्छा
समझा. श्वान, विल्लीआदि पोषे, पाले, महासावध पापकारी
कठोर काम किया. इत्यादि सातमे भोगोपभोग व्रतसंबंधीजो
कोइ अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या चादर जानते,अजानते
लगा हो, वह सव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुक्कडं ॥
आठमें अनर्थदंडके पांच अतिचार, "कंदप्पे कुकइए
कंदर्पः-कामाधीन होकर नट, विट, वेश्यादिकसे हास्य,
खेल, क्रीडा, कुतुहल किया; पुरुषके हावभाव, रूप, शृंगार
संबंधी वार्ता की, विपयरसपोषक कथा की. स्त्रीकथा, देश
कथा, राजकथा, भक्तकथा, यह चार विकथा की. पराई
भांजगढ की. किसीकी चुगलखोरी की. आर्तध्यान, रौद्र
ध्यान ध्याया. खांडा, कटार, कशि, कुहाडी, रथ, उखल,
मुसल, अग्नि, चकीआदिक वस्तु दाक्षिण्यता वशसे किसी-
को मांगी दी. पापोपदेश किया. अष्टमी, चतुर्दशीके दिन
दलने पीसनेका नियम तोडा.मूर्खतासे:असंबद्ध वाक्य बोला,
प्रमादाचरण सेवन किया. घी, तैल, दूध, दही, गुड, छाछ
आदिका भाजन खुला रखा, उसमें जीवादिका नाश हुआ.
घासी मक्खन रखा, और तपाया, न्हाते, धोते, दातण करते
जीव अकुलित मोरीमै पानी डाला. झुलेमें झूला, जुआ खेला,
नाटकादि देखा, ढोर डंगर खरीदवाये, कर्कशवचन कहा,
किचकिची ली, ताडना, तर्जना की, मत्सरता धारण की,
श्राप दिया; भैसा, मेंढा, मुरगा, कुत्तेआदिक लडवाये, या
इनकी लडाई देखी, ऋद्धिमान्की ऋद्धि देख ईर्षा की. मिट्टी
नमक, धान, विनेले, विनाकारण मसले. हरीवनस्पति खुदी,
शस्त्रादिक बनवाये; रागद्वेषके वशसे एकका भला चाहा,
एकका धुरा चाहा, मृत्युकी वांछा की. मैना, तोते, कबुतर
बटेर, चकोरादि पक्षियोंको पीजरमें डाला. इत्यादि आठमें
देवसिप्रतिक्रमण विधि. अनर्थदंड विरमणवत संबंधी जो कोइ अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या वादर जानते, अजानते लगा हो, वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुक्कडं। "नक्मे सामायिक व्रतके पांच अतिचार "तिविहे दुप्पणि हाणे" सामायिक संकल्प, विकल्प किया, चित्त स्थिर न रखा, सावध वचन बोला,प्रमार्जन किये विना शरीर हलाया, इधर उधर किया, शक्तिके होते हुए सामायिक न किया, सामायिकमें खुले मुह वोला, नींद ली, विकथा की, घर संबंधी विचार किया, दीपक या विजलीका प्रकाश शरीर पर पडा, सचित्त वस्तुका संघट्टाहुआ, स्त्री, तियंचआदिका निरंतर परस्पर.संघट्टा.हुआ, मुहपत्ति संघट्टी, सामायिक अधुरा.पारा, विना पारे उठा इत्यादि नवमे सामायिक व्रत- संबंधी जो कोइ अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या बादर जानते, अजानते लगा हो, वह सव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुक्कडं ॥ दसमे देशावगासिक व्रतके पांच अतिचार " आणवणे पेसवणे" आणवणप्पओगें, पेसवणप्पओगे, सहाणुवाई, रुवाणुवाई, बहियांपुग्गलपक्खवे. नियमित भूमिमै बाहिरसे वस्तु मंगवाई, अपने पाससे अन्यत्र भिजवाई, खुंखारादि शब्द करके, रूप दिखाके वा कंकरादि फेंककर, अपना होना मालूम किया इत्यादि दसमे देशावगाशिक व्रतसंबंधी जो कोइ अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या चादर जानते, अजानते लगा हो, वह सब मन, वचन कायाकर मिच्छामि दुक्कडं॥ ग्यारहवे पौपधोपवासंवतके पांच अतिचार संथारु- च्चारविहि" अप्पडिलेहि दुप्पडिलेहि सिज्जासंथारए, अप्पडिलेहिम दुप्पडिलेहिअ उच्चारपासवण भुमि, पौपधले. कर सोनेकी जगह विना पुंजे, प्रमार्जे सोया, स्थंडिलादि- की भूमि भली प्रकार शोधी नही, लघुनीति, वडीनीति करने ।
श्रीपंचेप्रतिक्रमण ..सूत्र. १०१ या.परठने समय अणुजाणहजस्सुरगह न कहा, पर बाद तीन वार वोसिरे वोसिरे न कहा.. जिन मंदिर और उपाश्रयमें प्रवेश करते हुए निसीहि, और वाहिर निकलते आवस्सही तीनवार न कही. वस्त्रादि उपधिकी पडिले- हणा न की. पृथवीकाय, अपकाय,, तेउकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय, त्रसकायका संघट्टा. हुआ, संथारा पोरिसी पढनी भुलाई विना संथारे जमीनपर सोया, पोरिसीमे नींद ली, पारनादिकी चिंता की, समयसर देववंदन न किया, प्रतिक्रमण न किया, पौषध देरीले लिया और जल्दीसे पारा, पर्वतिथिको पोपध न लिया इत्यादि ग्यारहवें पौपधवत संबंधी जोकोई अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या वादर जानते, अजानते लगा हो, वह संव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुक्कडं ॥ वारहवे अतिथिसंविभाग व्रतके पांच अतिचार "संच्चि- तेनिक्खिवणे" सचित्तवस्तुकै सघट्टेवाला अकल्पनीय आहा- रूपाणी साधु, साध्वीको दिया. देनेकी इच्छासे सदोष वस्तु- को निर्दोप कही, देनेकी इच्छासे पराई वस्तुको अपनी कही, न देनेकी इच्छासे निर्दोष वस्तुको सदोष कही, न देनेकी इच्छासे अपनी वस्तुको पराई कही. गोचरीके वक्त इधर उधर हो गया,गोचरीका समय टाला,वेवक्त साधुमहाराजकी प्रार्थना की. आये हुए गुणवानकी भक्ति न की शक्तिकें होते हुए स्वामीवात्सल्य न किया. अन्य किसी धर्म: क्षेत्रको पडता देख मदद न-की, दीन दुःखीकी अनुकंपा ने की इत्यादि वारहवे अतिथिसंविभागवतसंबंधा जो कोई अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म ' या वादर जानते, अजानते लगा हो, वह सब मन, वचन, कायांकर मिच्छामि दुकडं ॥ संलेषणांके पांच अतिचार " इहलोए परलोए" इहं लोगासंसप्पंयोग, परलोगासंसप्पओगे, जिविआसंसप्पओगे भरणासंसप्पओगे, कामभोगासंसप्पओगे, धर्मके प्रभावसे १०२ देवसिप्रतिक्रमण विधि. इसलोक संबंधी राजऋद्धि भोगादिकी चांछा की, परलोकमें देवदेवेंद्र, चक्रवर्तीआदि पदवीकी इच्छा की, सुखी अवस्थामें जीनेकी इच्छा की, दुःख आनेपर मरनेकी वांछा की. काम- भोग की वांछा की इत्यादि संलेषणा व्रत संबंधी जो कोई अतिचार पक्ष दिवसमें सुक्ष्म या वादर जानते, अजानते लगा हो, वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकडं ॥ तपाचरके वारह भेद, छ बाहा, छ अभ्यंतर अणसव मुणोयरिया अनशनः-शक्तिके होते हुए पर्वतिथिको उपवासादि तप न किया. उनोदरी:-दो चार ग्रास कम न खाये. वृत्तिसंक्षेपः-द्रव्य खानेकी वस्तुओंका संक्षेप न किया, रस विगय त्याग न किया. कायक्लेशः-लोचादि कष्ट सहन न किया.संलीनताः-अंगोपांगकासंकोचन किया, पञ्चक्खाण तोडा, भोजन करने समय एकासणा, विल प्रमुखमें चौकी, पटडा, अखलादि हिलता ठीक न किया, पञ्चक्खाण पारना भूलाया, बैठते नवकार न पढा, उठते. पञ्चक्खान न किया; निवि, आंविल,. उपवासादि तपमें कच्चा पानी पिया, वमन हुआ इत्यादि वाह्य तपसं. : बंधी जो. कोई अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या वादर जान ते अजानते लगा हो, वह सव मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुक्कडं ॥ अभ्यंतर तप "पायच्छित्त. विणओ" शुद्धांतःकरणपूर्वक मुरुमहाराजसे आलोचना. न ली, गुरुकी दी हुई आलोचना संपूर्ण न की, देव, गुरु, संघ, साधर्मिका, विनय न किया वाल, वृद्ध, ग्लान, तपस्वीआदिकी वेयावच्च न की, वांच- ना, पृच्छना, परावर्तना, अनुप्रक्षा, धर्मकथा लक्षण पांच प्रकारका स्वाध्याय न किया, 'धर्मध्यान, शुक्लध्यान ध्याया' नहीं, आर्तध्यान, रौद्रध्यान, ध्याया. दुःखक्षय, ..कर्मक्षय निमित्त दुस, वीस लोगस्सका काउस्सग्ग न किया इ- त्यादि अभ्यंतरतपसंबंधी जो कोई अतिचार, पक्ष दिव- श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र १०३ , समें सूक्ष्म या वादर जानते, अजानते लगा हो, वह सब मन, वचन, कायाकर मिच्छामि दुकडं ॥ वीर्याचारके तीन अतिचार पढते, मुणते, चीनय, घेयाव- च्च, देवपूजा, सामायिक, पौषध, दान, शील, तप, भावना दिक धर्मकृत्यमें मन, वचन, कायाका बलवीर्य, पराक्रम फोरा नहीं. विधिपूर्वक पंचांग खमासमण न दिया, द्वादशा वर्त्त वंदनका विधी भली प्रकार न किया, अन्याचित्त निरो- दरले वैठा. देववंदन, प्रतिक्रमणमें जल्दी की. इत्यादि वीर्या चार संबंधी जो कोई अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या वादर जानते, अजानते लगा हो, वह सब मन, वचन, काया कर मिच्छामि दुकडं॥ नाणाइ अपइवय, समसंलेहण पन्नर कम्मसु । वारस तव विरिअतिगं, चउध्वसिं सय अइआरा ॥१॥ " पडिसिद्धाणं करणे" प्रतिषेधः-अभक्ष, अनंत काय, वहुवीजभक्षण, महारंभ, परिग्रहादि किया, देवपूजनादि पद्कर्म, सामायिकादि छ आवश्यक, विनयादिक आरहंतकी भक्तिंप्रमुख करणीय कार्य किये नहीं. जीवाजीवादिक सूक्ष्म विचारकी सद्दहणा न की. अपनी कुमतिसे उत्सुत्र प्ररुपणा की. तथा प्राणातिपात, मृपावाद, अदत्तादान, मैथून परि- ग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, अभ्या- ख्यान, पैशुन्य, रति, अरति, परपरिवाद, मायामृषावाद, मिथ्यात्वशल्य यह अठारह पापस्थान किये, कराये, अनुमोदे. दिन कृत्य, प्रतिक्रमण, विनय, वैयावृत्य'न किया औरभी जो कुछ वितरागकी आज्ञासे विरुद्ध किया, कराया, करतेको भला जाना इन चार प्रकारके अतिचारमें जो कोई अतिचार, पक्ष दिवसमें सूक्ष्म या बादर जानते, अजानते लगा हो, वह सब मन, वचन, कायाकार मिच्छामि दुकडं ॥ एवंकारे श्रावकधर्म सम्यक्त्वमूल वारहव्रतसंबंधी एकसो चोवीस अतिचारोमेसें जो कोई अतिचार, पक्ष दिवसमें देवसिप्रतिक्रमण विधि. - सूक्ष्म या वादर.जानते, अजानते लंगा हो, वह सब मन, व.. चन कायाकर मिच्छामि दुकडं । सव्वस्सवि पक्खिय दुञ्चितिम, दुभासिअ, दुच्चिहिय, इच्छाकारेण संदिसह भगवन् इच्छं तस्स मिच्छामि दुकडं ।। इच्छकारि भगवन् पसायकरी पक्खि तपप्रसाद करावोजी. गुरुहोवेतो वो कहे नहीं तो आपही नांचे मुजव कहे. चउत्थेणं एक उपवास, दो आंविल, तीन नीवि चार एका सना, आठ वेआसना, दो हजार सज्झाय यथाशक्ति तपः करके पहोंचानाजी. प्रवेश किया हो तो " पइटिओ.” कहे. और करनेका हो.तो" तहत्ति" कहे और न करनेका हो तो मात्र मौनही रहना. -- (फ़िर दो खमासण देना) इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो कायं काय संफासं खमाणिजोभे किलामो अप्पकिलंताणवहसुभेण भे पक्खो वइ. कंतो जत्ता में जवणिज व भे खामेमि खमालमणो पक्खिरं वइक्कम्मं आवस्सिआए पडिकमामि खमासमणाणं पक्खिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मणदुकडाए घयदुक्कड़ाए कायदुक्कडाए कोहाए. माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छोंवयाराए. सव्वधम्माइकमणाए आसायणाए जोमे.अइआरोकओ तस्स खमासमणों पडिकमा: मि.निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१॥ इच्छामि खमासमणो वैदिउंजावणिजाए निसीहिआए अणु: जाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो कायं काय संफासंखमणिज्जो मे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे पक्खो वइकतो जत्ता भेजवणिजं च भेखामेमि खमासमणो पक्खिों वइकम्म पडिकमामि खमासमणाणं पक्खिआए आसायणाए तिनीसन्न: यराए जकिंचि मिच्छाए मणदुकडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कः डाए कोहाए माणाए मायाए लोमाए . सव्वकालिआए .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्रः १०५ सचमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्रमणाए . आसायणाए जो मे अइआरो कओ तस्स खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥२॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पत्ते खामणणं अभुटि ओहं अभितर पक्खि खामेउं ? "इच्छ" खामेमि पक्खिरं पन्नरसदिवसाणं, पन्नरसराइआणं, जकिंचि अपत्तियं, परप- त्ति, भत्ते, पाणे, विणए, वेयावच्चे, आलावे, संलावे, उच्चा- संणे, समासणे, अंतरभासाए, उवरिभासाए, जंकिंचि मज्झ विणय परिहिणं सुहुमो वा बायरो वा तुम्भे जाणह अहं न याणामि तस्स मिच्छामि दुकडं । इच्छामि खमासमणो बंदिउं जावणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो कायं काय संफासं खमणिजो में किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुभेण भे पक्खो वइकतो जत्ता भे जवणिजं च भे खामेमि खमासमणो पक्खि- अं वइकम्मं आवस्सिाए पडिकमामि खमासमणाणं पक्खि: आए असायणाए तित्तीसन्नयराए जाकिंचि मिच्छाए मण- दुकडाए वयदुकडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाप लोभाए सव्वकालिआए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइल, मणाए आसायणाए जो मे अइकारो को तस्स खमासमणों पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ ..इच्छामि खमासमणो वंदिर जावणिजाए: निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो काय काय संफास खमणिजो भे फिलामो अप्पकिलंताण बहुसुभेण भे पक्खो- वइकंतो जत्ता भे जवणिजं च मे खामेमि खमासमणो पक्खि- अं वइकम्म पडिकमामि खमासमणाणं पक्खिआए आसाय- णाए तित्तीसन्नयराए जकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक- डाए कायदुक्कडाए कोहाए: माणाए.मायाए लोभाए सव्व- कालिआए.सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइकमणाए आसा-
१०६
देवसिप्रतिक्रमण विधि.
यणाए जो मे अइआरो कओ.तस्स खमासमणो पडिकमामि
निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥
देवलिअं आलोइअ पडिकंता इच्छाकारेण संदिसह भग-
व्र पक्खि पडिकमुं, सम्म पडिक्कमामि "इच्छ"
(ऐसा कहके फिर ).
करेमिभंते सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि जाव
नियम पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न
करोमि न कारवेमि तस्सभते पडिकमामि निंदामि गरिहामि
अप्पाणं वोसिरामि॥
इच्छामि पडिक्कमि जो मे पक्खिओ अइआरो कओ काइ.
ओ, चाइओ, माणसिओ उस्सुतो उम्मग्गो अकप्पो अकर-
णिजो दुज्झाओं दुग्विचितिओ अणायारो अणिच्छिअब्वो अ-
साक्गपाउग्गो नाणे दसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए
तिण्हंमुत्तीणंचउण्हं कसायाणं पंचण्हमणुध्वयाणं तिण्हं गुण
व्वयाण चउण्हं सिक्खावयाणं वारसविहस्स सावगधम्मस्स
खंडिजविराहि तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।।
इच्छामि खमासमणो वदि जावणिजाए. निसीहिआए
मत्थएण वंदामि, इच्छाकारेण संदितह भगवन् पक्खि सूत्र
पहुँ! "इच्छं
नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरिआणं, नमो.
उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहुणं, एसो पंच नमुक्कारो,
सवपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मं-
बगलं॥
( यह नत्रकार तीन दफे गिनना, फिर साधु हो तो वह पक्खिसूत्र कहे
ओर न होवे तो श्रावक वंदितासुत्र कहे, वह नीचे मुजब)
वंदिच सव्वसिद्ध, धम्मायरिए अ सव्वसाहू अ ।
इच्छामि पडिक्कमिउं, सावगधम्माइआरस्स ॥१॥
जो मे वयाइआरो, 'नाणे तह दंसंणे चरित्ते अ।
सुहुमो अ वायरो वा, तं निंदे तं च गरिहामि ॥२॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १०० दुविहे परिग्गहमि, सावजे वहुविहे अ आरंभे । कारावणे अकरणे, पडिकमे पक्खिरं सव्वं ॥३॥ जं वद्धमिदिएहि, चरहिं कसापहि अप्पसत्थेहि। रागेण व दोसेण व, तं निदे तं च गरिहामि ॥४॥ आगमणे निग्गमणे, ठाणे चंकमणे अणाभोगे । अभियोगे अनियोगे, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥५॥ संका कख विगिच्छा, पसंस तह संथवो कुलिंगीसु । सम्मत्तस्स इआरे, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥६॥ छकायसमारंभे, पयणे अ पयावणे य जे दोसा। अत्तहा य परहा, उभयहा चेव तंनिदे॥ ७॥ पंचण्हमणुब्बयाणं, गुणवयाणं च तिण्हमइआरे । सिक्खाणं च चउण्हं, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥८॥ पढमे अणुव्वयंमि, शूलगपाणाइवायविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगेणं ॥९॥ वह बंध छविच्छेए, अइभारे भत्तपाणवुच्छेए । पढमवयस्सऽइयारे, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥१०॥ पीए अणुव्वयंमि, परिथूलगअलियवयणविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ ११ ॥ सहसा रहस्सदारे, मोसुवएसे अ कूडलेहे अ । घीयवयस्स अइयारे, पडिकमे पक्खिरं सव्वं ॥१२॥ तइए अणुव्वयंमि, थूलगपरदव्वहरणविरईओ ।। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ १३ ॥ रोनाहडप्पओगे, तप्पडिरूवे विरुद्धगमणे अ। फुडतुल कूडमाणे, पडिकमे पक्खिरं सर्व ॥ १४ ॥ चउत्थे अणुव्वयंमि, निच्चं परदारगमणविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ १५ ॥ अपरिग्गहिआ इत्तर, अणंग विवाह तिव्व अणुरागे । चउत्थवयस्स अइयारे, पाडकमे पक्खिअंस॥ १६ ॥ इत्तो अणुव्वए पंचमंमि, आयरियमप्पसत्यमि।
देवसिप्रतिक्रमण विधि.
परिमाणपरिच्छेए; इत्थ:पमायप्पसंगणं ॥ १७॥
धण धन खित्तवत्थु, रुप्प सुवन्ने अ कुविअपरिमाणे ।
दुपए. चउप्पयंमि, पडिक्कमे पक्खि सव्वं ।। १८॥
गमणस्लउ परिमाणे, दिसासु उड्ढे अहे अतिरिमंच
वुइढि सइ अंतरद्धा, पढममि गुणव्वए निंदे ।। १९ ॥
मजमि अ मंसंमि अ, पुप्फे अफले अगंधमल्ले अ।
"उवभोगे परिभोगे, वीमि मुणव्वएं निंदे ॥२०॥
सञ्चित्ते पडिबंद्धे, आप्पोल दुप्पोलिअंच आहारे ।
तुच्छोसहि भक्खणया, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥२॥
इंगाली वण-लाडी भाडी, फोडी सवजए कम्म ।
चाणिज चेव दंत, लक्खरसकेसवीस वीसयं ॥२॥
: एवं खु जंतपिल्लण, कम्म निल्लंछणं च दवदाणं।
सरदह तलायसोसं, असइ पोसंच वजिजा ॥२३॥
सत्थग्गि मुसल जंतग, तण कढे मत मूल भेंसजे ।
'दिन्ने दवा विएवा पडिकमे पक्खि सव्वं ॥२४॥
व्हाणुवट्टण वनग्गं, विलेवणे सदरुव रस गंधे।
वत्यासणं आभरणे, पडिको पक्खिसंव्वं ॥२५॥
कंदप्पे कुकइए, मोहरि अहिगरण भोगअइरिते।
दंडमि अणठाए, तइमि गुणधएं निंदे ॥ २६ ॥
तिविहे दुप्पणिहाणे, अणवठ्ठाणे तहासइविहुणे ।
सामाइन वितह कए; पढमे सिक्खावए निदे ॥२७॥
आणवणे पेलवणे, संदे रुवे अपुग्गलक्खेवे ।
देसांवगासिभि, बीए सिखावए निदे ॥२८॥
संथारुञ्चारविही; पमाय तह चेव भोयणा भोएं।
पोसहविहि विवरीए, तइएं सिक्खावए निदे ॥२९॥
सच्चित्ते निविखवणे, पिहिणे ववएस मच्छरें चेव।
कालइक्कमदाणे, चउत्थे सिक्खावए निदे॥३०॥
सुहिएसु अदुहिएसु अ, जामे असंजएसु अणुकंपा।
रागेण व.दोसेण व तं निंदे तं च गरिहामि ॥३१॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १९. 'साहुसु संविभागो, न को तवचरण. करण जुत्तेसु। संते फासुयदाणे, तं निंदे तं च गरिहामि ॥३२॥ इहलोए परलोए, जीविअ मरणे अ आसंसप्पओगे। पंचविहो अइआरो, मा मज्झ हुज मरणंते ॥३३॥ कारण काइअस्सं, पडिकमेवाइअस्स वायाएं। मणसा माणसिअस्स, सव्वरस वयाइयारस्स ॥३४॥ वंदणक्यसिक्खागा, रवेसु सन्ना कसायं दंडेसु । मुत्तीसु अ समीइसु अ, जो अइआरो अतं निदे।। ३५॥ सम्मदिट्ठीजीवो, जइवि हु पावं समायरे किांच। अप्पोसि होई बंधो, जेण न निद्धंधसं कुणइ ॥३६॥ तंपि हु सपडिकमणं, सप्परिआवं सउत्तरमुणं च । खिप्पं उवसामेइ, वाहिव्व सुसिक्खिओ विजो ॥३७॥ जहा विसं कुछगयं, मंतमूलविसारया । विजा हणंति मंतहि, तो तं हवइ निन्विसं ॥३८॥ एवं अठविहं कम्म, रागदोस समजिरं। आलोअंतो अनिदंतो, खिप्पं हणइ सुसावओ ॥ ३९ ॥. कयपावोवि मणुस्सो, आलोइअ निदिअ गुरुसगासे। होइ अइरग लहुओ,ओहरिअ भरुव्व भारवहो ॥४०॥ आवस्सएण एएण, सावओ जइवि बहुरओ होई ।। दुक्खाणमंतकिरिअं, काहा अचिरेण कालेण ॥४१॥ आलोअणा वहुविहा, नय संभरिआ पडिकमणकाले। मूलगुण उत्तरगुणे, तं निंदे तं च गरिहामि ॥४२॥ तस्स धम्मस्स केवलि पन्नत्तस्स। अभुठिओमि आराहणाए । विरओमि विराहणाए। तिविहेण पडिकतो, वंदामि जिणे चउव्वीसं॥४३॥ जावति चेइआई, ॥४४॥ जावंत केवि साहू, ॥४५॥ चिर संचिय पाव पणासणीए, भवसंयंसहस्स महणीए' चउवीस जिण विणिग्गय कहाई, वोलतुं में दिअहा ४६. मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साह सुअंच धम्मो अ। . . .
११.
देवसिप्रतिक्रमण विधि.
सम्मद्दिादेवा, दितु समाहिं च वोहिं च ॥४७॥
पडिसिद्धाण करणे, किच्चाणमकरणे पडिकमण।
असदहणे अ तहा, विवरीयपस्वणाए अ॥४८॥
खामेमि सन्न जीवे, सब्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ति मे सबभूएसु, वेरं मज्झ न केणइ ॥४९॥
'एवमहं आलोइअ, निंदिन गरहिअ दुगंच्छिअं सम्म।
तिविहेण पडिकतो, वंदामि जिणे चवीसं ॥५०॥
(फिर सुअदेवयाकी स्तुति नाचे सुजब कहनी.)
सुअदेवया भगवइ, नाणावरणीय कम्म संघायं ॥ तेसिं
खवेउ सययं जेसि सुयसायरे भत्ती ॥१॥
(फिर नीचे बैठे दाहिणा ढीचण खडा कर नीचे मुताविक कहना.)
नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाण, नमो आयरियाणं, नमो
उवज्झायाणं, नमो लोए सन्वसाहुणं, एसो पंच नमुकारो,
सवपावप्पणासणो, मंगलाणंच सेबसि, पढमं हवइ मंगलं॥
करेमि भंते सामाइयं, सावजजोगं पञ्चक्खामि, जावनियम
पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न
करोमि न कारवमि तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि
स्पप्पाणं वोसिरामि॥
इच्छामि ठमि पडिक्कमिडं जो मे पक्खिओ अइआरोको
काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अक-
रणिजो दुज्झाओ दुन्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअवो
असावगपाउग्गो नाणेदसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए
तिण्हं गुत्तीणं चउण्ह कसायाणं पंचण्हमणुब्धयाणं तिण्हं
गुणबयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं वारसविहस्स सावग
धम्मरस जं खंडिज विराहि तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।।
वंदित्तु सव्वसिद्धे, धम्मायरिए अ सव्वसाहू अ।
इच्छामि पडिक्कमि, सावगधम्माइआरस्त ॥१॥
जो मे वयाइआरो, नाणे तह दसणे चरित्ते ।
सुहुमो अ वायरो वा, तं निदे तं च गरिहामि ॥२॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. . दुविहे परिग्गहंमि, सावज्जे बहुविहे अ आरंभे । कारावणे अकरणे, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥३॥ जं वद्धमिदिपहि, चउहिं कसाएहि अप्पसत्थेहिं । रागेण व दोसेण व, तं निंदे तं च गरिहामि ॥४॥ आगमणे निग्गमणे, ठाणे चंकमणे अणाभोगे। अमिओगे अनिओगे, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥५॥ संका कंख विगिच्छा, पसंस तह संथवो कुलिंगीसु । सम्मत्तस्स इआरे, पडिकमे पक्खिरं सव्वं ॥६॥ छक्कायसमारंभे, पयणे अपयात्रणे अजे दोसा। अत्तहा य परहा, उभयहा चेव तं निंदे ॥७॥ पंचण्हमणुव्वयाणं, गुणव्वयाणं च तिण्हमइआरे । सिक्खाणं च चउण्हं, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥ ८॥ पढमे अणुव्वयंमि, थूलगपाणाइवायविर ईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥९॥ वह बंध छविच्छेए, अइभारे भत्तपाणवुच्छेए । पढमवयस्स इयारे, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥ १०॥ बीए अणुव्वयंमि, परिथूलगअलियवयणविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥११॥ सहसा रहस्स दारे, मोसुवएसे अ कूडलेहे अ। घीयवयस्स अइयारे, पडिक्कमे पक्खि सव्वं ॥ १२ ॥ तइए अणुव्वयंमि, थूलगपरदव्वहरणविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥ १३ ॥ तेनाहडप्पओगे, तप्पडिसवे विरुद्धगमणे अ। फडतुल कुडमाणे, पडिकमे पक्खि सव्वं ।। १४ । चउत्थे अणुव्वयंमि, निच्चं परदारगमणविरईओ। आयरियमप्पसत्थे, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥१५॥ अपरिग्गहिआ इत्तर, अणंग विवाह तिव्व अणुरागे। चउत्थवयस्स अइयारे, पडिकंमे पक्खि सव्वः॥१६॥ इत्तो अणुव्वए पंचमंमि, आयरियमप्पसत्यमि।
११२
देवसिप्रतिक्रमण विधि.
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परिमाणपरिच्छेप, इत्थ पमायप्पसंगणं ॥१७ ।।
धण धन्न खित्तवत्थु, रुप्प सुवने अंकुविअपरिमाणे ।
दुपए चउप्पयंमि, पडिक्कमे पंक्खिरं सर्व ॥१८॥
गमणस्सउ परिमाणे, दिसासु उड्ढे अहे अतिरिअंच।
बुडि सह अंतरद्धा, पढमंमि गुणव्वए निंदे ॥ १९ ॥
मजमि अ मंसंमि अ, पुप्फे अ फले अगंधमल्ले अ।
उवभोगे परिभोगे, वीअमि गुणव्वए निंदे ॥ २० ॥
संचित्ते पडिबद्धे, आप्पोल दुप्पोलिअंच आहारें।
तुच्छोसहि भक्खणया, पडिको पक्खि सव्वं ॥२१॥
इंगाली वण-साडी भाडी, फोडी सुवजए कम्म ।
वाणिज चेव दंत लक्खरसकेसवीस चीसयं ॥ २२॥
एवं खु जंतपिल्लण, कम्मं निलंछणं च दवदाणं।
सरदह तलायसोसं, असह. पोसं च वजिजा ॥२३॥
सस्थग्गि मुसल जंतग, तण कठे मंत मूल भेसजे ।
दिन्ने दवा विएवा, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥ २४ ॥
न्हाणुवट्टण वन्नग्ग, विले-वणे सदरुव रस गंधे।
वत्थासण आभरणे, पडिकमे पक्खि सव्वं ॥२५॥
कंदप्पे कुक्काइए, मोहरि अहिगरण भोगअइरित्ते।
दंडमि अणठाए, तइमि गुणवए निंदे ॥२६॥
तिविहे दुप्पणिहाणे, अणवठ्ठाणे तहासविहुणे ।
सामाइअ वितह कए, पंढमे सिक्खावए निंदे ॥२७॥
आणवणे पेसवणे, सद्दे रूवे अ पुग्गलक्खेवे।
देसावगासिमि, वीए सिक्खावर निंदे ॥२८॥
संथारुच्चारविहीं, पमायं तह चेव भोयणा भोए ।
पोसहविही विवरीए, तइए सिक्खावए निंदे ॥२९॥
सच्चित्ते निक्खिवणे, पिहिणे वएस मच्छरे चेव ।
कालांइक्कमदाणे, चउत्थे सिक्खावए निंदे ॥३०॥
'सुहिएसु अं. दुहिएसु अ, जामे असंजएसु अणुकंपा।
रागेण व दोसेण व, तं निदेतं च गहिरामि ॥३१॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. साहुसु संविभागो, न कओ तवचरणकरणजुत्तेसु । संते फायदाणे, तं निंदे तं च गरिहामि ॥ ३२ ॥ इहलोए परलोए, जीविअ मरणे अ आसंसपओगे। पंचविहो अइआरो, मा मज्झं हुज मरणते ॥ ३३ ॥ कारण काइअस्ल, पडिको वाइअस्ल वायाए । मणसा माणसिअस्स, सव्वस्त वयाइआरस्स ॥३४॥ वंदणवयसिक्खागा, रवेसु सन्नाकसायदंडेसु । गुत्तीसु असमिईसु अ, जो अइआरोअतं निंदे ॥३५॥ सम्मदिट्टीजीवो, जइ विहु पावं समायरइ किंचि । अप्पो सि होई बंधो, जेण न निद्धंधसं कुणइ ॥३६॥ तं पिहुसपडिकमणं, सप्परिआवं सउत्तरगुणं च । खिप्पं उवसामई, वाहि व्व सुसिक्खिओ विजो ॥३७॥ जहा विसं कुछगयं. मंतमूलनिसारया। विजाहणंति मंतेहिं, तो तं हवइ निव्विसं ॥ ३८ ॥ एवं अविहं कम्मं, रागदोससमाजि। आलोअंतो अनिंदतो, खिप्पं हणइ सुसावओ ॥३॥ कयपावो वि मणुस्सो,आलोइअ निदिध य गुरुसगासे। होइ अइरेगलहुओ, ओहरिअभरु व्व भारवहो ॥४०॥ आवस्सएण एएण, सावओ जइ वि वहुरओ होइ। दुक्खाणमंतकिरिअं, काही अचिरेण कालेण ॥४॥ आलोअणा वहुविहा, न य संभरिआ पडिकमणकाले। मूलगुणउत्तरगुणे, तं निंदे तं च गरिहामि ॥ ४२ ।। तस्स धम्मस्ल केवलि पन्नत्तस्स ॥ अन्भुटिओमि आराहणाए । विरओमि विराहणाए। तिविहण पडिकतो, वंदामि जिणे चउवासं ॥४३॥ जावंति चेइआई०॥४४॥ जावंत के वि साहु० ॥ ४५ ॥ चिर संचिय पाव पणासणीइ, भवसयसहस्समहणाए। चउवीसजिणविणिग्गय, कहाइवोलंतु मे दिअहा ॥४६॥ मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साहू सुअंच धम्मो अ। ८ ११४ पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. सम्मदिही देवा, दितु समाहिं च वोहिं च ॥४७॥ पडिसिद्धार्ण करणे, किन्चाणकरणे परिकमणं । असदहणे अ तहा, विवरीयपरवणाए अ.॥ ४८ ।। खाममि सन्मजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे ॥ मित्ति मे सब्वभूएसु, वेरै मज्झ न केणई ॥ ४९ ॥ एवमहं आलोइअ, निदिअ गरहिअ दुगंछिउं सम्म । तिविहेण पडिकतो, वंदामि जिणे चऊबीसं ॥५०॥ करोमि भंते सामाइयं सावज जोग पचखामिजावनियस पज्जुवासामि, दुविहं तिविणं मणेणं वायाए कारण न करे- मिन कारवेमि तस्स. भंते परिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ इच्छामि ठामि काउरसगं जो मे पविखओ अआरो कओ काइओ वाइओ माणसिओ उरमुत्तो उरमग्गो अकप्पो अकरणिजो दुल्झाओ दुविचिंतिओ आणायारो आणि च्छ- अवो असावगपाउग्गो नाणे दसणे चरित्ताचरिते सुए सा- माइए तिण्हं गुत्तीणं चउण्हं कसायाणं चण्हमणुब्धयाणं तिण्हं गुणवयाणं चउण्हं सिक्खाक्याणं वारसविहास सावंगधम्मरस जं खंडिअं जं विराहिअंतरल मिच्छामि दुक्कडं॥ तस्स उत्तरीकरणणं पायच्छित्तकरणेणं दिसोही करणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं करमाणं निघायणट्ठाए सामि काउ- सग्गं.. अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उकुएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालहिं सुड्डमेहिं खेलसंचालेहिं सुंहुमेहिं दिहिसंचालेहि एवमाइएहि आगारोहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउरस- ग्गो जाव आरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि ताव- कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।। .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ११५ (फिर बारह लोगस्सका चंदेसुनिम्मलयरातक काउस्सग करना न आवे तो अहेतालसि नवकार गिनने.) लोगस्ल उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । रिहते कित्तइस्सं, चवीसपि केवली ॥१॥ उसभमजिअंच वंदे, संभवममिणंदणं च सुमई च । पउपप्पह सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्पदंत, सीअलसिसवासुपुजं च । विमलमणतं च जिणं, धम्म सतिं च ददासि ॥ ३ ॥ कुंथु अरंच मल्लिं, वंदे मुणिसुस्वयं नमिजिणं च वंदामि रिद्वलिं, पासं तह वद्धगाणं च ॥धा एवं सए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरसरणा । चवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा में पसीयंत ॥५॥ शित्तियवंदियमहिआ, जे ए लोगस्त उत्तमा सिद्धा। आरुग्गोहिलामं, समाहिवरमुत्तमंदित ॥ ६॥ चंदेसु निमलयरा, आइन्चेसु आहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतुः ॥ ७ ॥ (फिर मुहपत्ति पडिलेहकर दो खगासमण देना.) इच्छामि खमासमणो बंदिङ जावणिज्जाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निस्सीहि अहो कायं काय संफार्स खमणिज्जो मे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण मे पक्खो वक्रतो जत्ता मे जवणिज्जच भेखामेसि खमासमणो पक्खि- अंवकम्स आवस्सिाए पडिकमामि खमासमणाणं पक्खि- आए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मणदु- कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालिआए सम्वमिच्छोक्याराए सव्वधम्माइक- मणाए आसायगाए जो मे अइकारो कओ तस्ल खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ इच्छामि खमासमणो वैदिउं जावणिज्जाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो कायं काय संफासं ११६ पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. खमणिज्जो मे किलामो अप्पकिलंताणं वहुसुभेण भे पविखओ वइकतो जत्ता भे जवाणिज्जं च भे खामेमि खमासमणोपक्खि- अंवइकम्म पडिकमामि खमासमणाणं पक्खिआए आसाय- जाए तित्तीसन्नयराए जकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्क- डाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सवका- लिआए सव्वमिच्छोवयाराए सवधम्माइकमणाए आसाय. णाए जो मे अइकारो को तरस खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् समत्ताखामणेणं अभुटि- ओमि अभितर पक्खिों खामे ? " इच्छं" खामेमि पविख- अं एक पक्खाणं परनसदिवसाणं, पनरसराइआणं, जैकिंचि अपत्तियं, परपत्ति, भत्ते, पाणे, विणए, वेयावच्चे, आलावे, संलावे, उच्चासणे, समासणे, अंतरभासाए, उवरिभासाए, जंकिंचि मज्झ विणयपरिहिणं सुहुमो वा वायरो वा तुभे जाणह अहं न याणामि तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि, इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पक्खि खामणा खामुं? " इच्छं" (ऐसा कहके प्रत्येक खामणाके पहेले एक खमासमण देकर दाहिना हाथ चखला वा आसनपर रख शिर झुकाकर साधु न हो तो नीचे मुताबिक चार खामणा देना.) ॥१॥ इच्छामि खमासमणो वैदिउंजावणिजाए निसाहिआए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पक्खि खा- मणा खामुं? " इच्छ. नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं नमो उवज्झायाणं, नमो लोए सवसाहूणं, एसो पंचनमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढम हवइ मंगल, सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि ।। , श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ११७ ॥२॥ इच्छामि खमालमणो वंदिलं जावणिज्जाए निसीहि आए मत्थएण वंदामि. इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पक्खि खामणा खामुं? " इच्छं." नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहूण, एसो पंचनमुक्कारो, सवपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं, सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि ॥ ॥३॥ इच्छामि खमासमणो वैदिउं जावणिज्जाए निसी- हिआए मत्थएण वंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पक्खि खामणा खामुं ? " इच्छं." नमो आरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहूणं, एसो पंचनमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं, सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि ॥ ॥४॥ इच्छामि खमासमणो वैदिउं जावणिजाए निसीहि- आए मत्थएण वंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् पक्खि खामणा खामुं? " इच्छं. नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आथरियाणं, नमो उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहूणं, एसो पंचनमुक्कारो, सवपाचप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवा मंगलं, सिरसा मणसा मत्थएण वदामि ।। इच्छामो अणुसहि पक्खि सम्मत्तं देवसि भणामि. इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए. निसीहिआए अणुजाणह मे मिउग्गहं निसीहि अहो काय काय संफासं खमणिज्जो भे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसभेण भे दिवसो वइकतो जत्ता मे जवणिज्जं च भेखाममि खमासमणो देव- सिरं वइकम्मं आवस्सिाए पडिकमामि खमासमणाणं देव- सिआए आसायणाए तित्तीसन्नयराए जंकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए " ११८ पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. लोभाए सबकालिआए सबमिच्छोक्याए सम्वधामाइक- मणाए आरसायणाय जो से अइयारो ओ तल समालमणो पडिक्षमामिनिहामि गरिहामि अयाण बोलिरामि ॥ इच्छामि समारसमणो वैदि जावाणिज्जाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउगह मिसीहि अहो काय काय संफास खमाणिज्जो मे किलामो अल्पनिलंताण बहुसुभेण मे दिवसो वळतो जन्ता से जवणिजं च से खामभि खासमण देव- सिमं वकार पडिझामामि स्त्रमासमणाणं देवसिआप आसा यणाए तित्तीसनयराए जर्किचिमिच्छाए सणसवाए क्यदु- कडाए कायदुकाजाए कोहाए माणाए सायए लोमाए सव्व कालिआए सव्वमिच्छोक्याए सव्वधपाइकमणाए आसा- यणाए जो से अकासे ऋओ तस्ल समासमा पडिलमामि निंदामि गरिहामि अपाणं बोसिरामि ॥ इच्छाकारेण संदिसह भगवन् अभुहिमोमि अभितर देवसिखामेड ? " इच्छे" खामि देवलियंजकिचि अप- ति, परपत्ति, सत्ते, पाग, विणए, यावच्चे, जालाने संलाये, उच्चासणे, समासणे, अंबरनालाय, उचरिमालाए, जकिंचि माझ विणयपरिहिणं सुहगो का मायरो का तुम्मे जाणह अहं न याणामि तस्स मिच्छामि दुई ! इच्छामि खसालमणो वंदिलं जावाणिज्जाए मिलीहिआए अणुजाणह से मिउगह मिसीहि अहो कायं काय संपासं खमणिजो मे किलागो अम्पकिलंता बहुमुभेण से दिवसो वइकतो जत्ता से जयणिज्ज चमे खास समासमणो देव- सिमं वलरमं आवरिसाए पडिकसाग समाससणाण देव- लिआए आसायणाए तित्तीसमयसए किंचिमिच्छाए मण- दुक्कडाए क्यदुकलाए कायदुखाए कोहाए साणाए मायाए लोभाए सबकालिआए त्वषिच्छोधयाराए सवधम्माइक मणाए आसायणाए जो मे अकारो को तरस खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पा कोलिरामि ॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ११९ इच्छामि खमालमणो वैदि जाणिजाए निसीहिआए अणुजा गह मे मिउग्गहं निलीहि अहो काय काय संफार्स खमणिजो से फिलामो अल्पकिलंताणं बहुसुमेण मे दिवसो वइकतो जत्ता मे जवणिज च मे खामेमि खसालमणो देवलियं वाकम्म पडिकमालि खमासमणाणं देवसिआए आसा- यणाए तित्तीसनयराए जकिंचि मिच्छाए सणदुक्कडाए क्य- दुकडाएकायतुकडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सब्वका- लिआए सन्चमिच्छोश्यारोए संवधस्मा कमणाए आलायणाए जो मे अभाव को तस्ल खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अगाणं बासिरासि ।। आयरियउवज्झाए, सीसे साहम्मिए कुलगणे अ । जे से केइ फसाया, सव्वे तिविण खासेमि ॥ १ ॥ सबस्स समणसंघस,भगवो संजलिं करिथ सीसे। सत्वं खसाचइता, खमासि लबरस अहयं पि॥२॥ सवस्त जीवरालिरल, भावो घन्ममिहिअनिअचित्तो। सव्वं खसावत्ता, खमामि सव्वरस अहयं पि ॥३॥ करोमि ते सामाइयं सावजं जोग पञ्चस्खामि जाचनियम पज्जुवासामि दुहि तिनिहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि ताल भंते परिकमासि निदास गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि। इच्छामि ठामि काइरसग्गं जो मे देवसिओ अइआरो को काइओ बाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उस्मग्गो अकप्पो अकर- णिजो दुज्झाओ दुविचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअव्वो असागपाउलो नाणे दंलणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिण्हं गुत्तीण च उहं कसापाणं पंचण्हमगुब्बयाणं तिण्ह गुण. व्चयाणं चउपहं सिक्खाक्याणं वारविहस्त सागधस्मस्स जं खंडिजविराहि.तस्ता मिच्छामि दुकाई ।। तस्स उत्तरीकरणेणं पायछित्तकरणणं विलोहीकरणे णं विसल्लीकरणेणं पावाणं करमाणं निघायणटाए ठामि का- उस्सगं ।
१२० पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. अनत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालहिं सुहुमेहि खेलसंचालेहिं सुहुमेहि दिहिसंचा- लेहिं एवमाइएहिं आगारहिं अभग्गो अविराहियो हुन्ज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारणं न पारेमि ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ ( दो लोगस्सका काउस्सग्ग करना, न आवे तो आठ नवकार गिनने.) लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहते कित्तइस्स, चउचीस पि केवली ॥१॥ उसभमजिरं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च। पउमप्पह सुपासं जिणं च चंदप्पडं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअलसिजंसवासुपुजं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म संति च वंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च । चंदामि रिटनसि, पासं तह वद्धमाणं च ॥ ४॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चवीस पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।५।। कित्तियर्वदियमाहिआ, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा आरुग्गवोहिलामं, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥७॥ लवलोए अरिहंत चेइआणं करेमि काउसगं चंदणवत्ति- आए पूअणवत्तिआए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिए वोहिलाभपत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धाए मेहाए 'धीईए धारणाए अणुप्पेहाए वड्डमाणीए ठामि काउस्सग्गं । अन्नत्थ उललिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जमा- इएक उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालहिं सुहुमहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिहिसंचा- .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १२१ लेहिं एकमाइएहिं आगारहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि तावकार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (एक लोगस्सका न आवे तो चार नवकारका काउस्सग्ग करना फिर) पुक्खरवरदीवड्डे, धायइसंडे अजंधुदीवे अ। भरहेरवयविदेहे, धम्माइगरे नमसामि ॥१॥ तमतिमिरपडलविद्धं,सणस्स सुरगणनरिंदमहियस्स। सीमाधरस्स वंदे, पप्फोडिअमोहजालस्स ॥२॥ जाइजरामरणसोगपणासणस्स, कल्लाणपुक्खलविसालसुहावहस्स । को देवदाणवनरिंदगणञ्चियस्स, धम्मस्स सारमुवलब्भ करे पमायं ॥३॥ सिद्धे भी पयओ णमो जिणमये नंदी सया संजमे । देवनागसुवन्नकिन्नरगणस्सन्भूअभावच्चिए॥ लोगो जत्थ पइडिओजगमिणं तेलुकमच्चासुरं। धम्मो वढउ सासओ विजयओ धम्मुत्तरं वदउ ॥४॥ सुअस्स भगवओ करोमि काउस्सग्गं । वंदणवत्तिआए पूअणवत्तिाए सकारवत्तिआए सम्माणवत्तिआए बोहि- लाभवत्तिआए निरुवसग्गवत्तिआए सद्धाए मेहाए धीईए धारणाए अणुप्पेहाए वढमाणीए ठामि काउस्सगं ॥ अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंवालेहिं सुहमेहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहि दिद्विसंचा- लेहिं एचमाइएहिं आगारहिं अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताण भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि तावकायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (एक लोगस्सका न आवे तो चार नवकारका काउस्सग्ग करना. फिर) १२२ पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. सिद्धरणं बुद्धाणं, पारगयाणं परंपरगयाण । लोअग्गसुधगयाणं, नमोसमा लम्वसिद्धरणं॥१॥ जो देवाण वि देवो, देवा पंजली नसोते। तं देवदेवसहि सिरसावंदे महावीरं ॥२॥ इकोवि नमुकारो, जिणवरबसहस बद्धमाणस्त । संसारसागरा, तारेइ नरं वारि वा ॥ ३ ॥ अजितलेलसिहरे, शिखालाणं निरसीलिमा नस्ल । तं धम्मचकनहि, अरिष्टनेमि नमसामि ॥४॥ चत्तारि अह दस दय, चंदिया जिणवस वडव्वीसं। परमानिठियहा, सिद्धा सिलिं मम दिसंतु॥५॥ सुरणदेवयाए करेल बालस्सन्छ । असत्य उससिपणं नीलसिएणं सासिएणं छीएणं जमाइएवं उखएणं चायनिस- ग्गेण भमलिए पिसमुच्छाए सुहोहिं अंगसंचालहिं सुहुमेहि खेलसंचालेहिं सुहहिं दिहिसंचालहि एमाइपहिं आगारहि असग्गो अविहिओज में काउसो जाब अरिहंताणं भगवंताणं नमुसारेणं न पारेर तावकायं गणेणं मोग झाणेणं अप्पाणं वासिरामि ।। (एक नवकारका काउसरग कर तहमायोपाध्या- यसर्वसाधुभ्यः कहकर फिर स्तुति कहनी) झानादिगुणयुक्ताना मिल्न स्वाध्यायसंयमरतानाम् । विदधातु सुवनदेवी, शिर्ष सदा सर्व साधूनाम् ॥ १॥ खित्तदेवयार कोशिकाउस्सगं अन्नत्थउससिएणं नील: लिएणं खासिएणं छाए जाइएणं उत्एणं वायनिसग्गेणे भमलिए पित्तमुछाए सुलुमेहिं अंगसंचालहिं सुहसहि खेल- संचालहि मुहुमहिं दिहिसंचालहि एचमाश्यहि आगारेहि अभग्गो अविराहिओ हुज्ज मे फाउरसम्गो जान अरिहंताणं सगवंताणं नसुकारेणंभ पारोमि तावकायं ठाणेणं मोजेणं झाणेणं अप्पाणंबोसिरामि॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १२३ (एक नवकारका काउस्सग्ग करके नमोऽस्तसिद्धाचायाँपाध्याय सर्वसाधुभ्यः कहकर फिर स्तुति कहनी ) यस्याः क्षेत्र समाथिस्य, साधुभिः साध्यते क्रिया । सा क्षेत्रदेवता नित्यं, भूयान्नः सुखदायिनी ॥१॥ नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवझायाण, नमो लोए सव्वसाण, एसो पंचनमुकारो, सव्वापारप्पणासणो, मंगलाणं च सटबेसि, पढा हवह मंगलं ॥ फिर छठे आवश्यककी सुहपत्ति पडिलेहके दो खमास- मण देना) इच्छामि खमासमणो वैदिई जावणि उजाए निसीहिआए अणुजाणह मे मिउरमहं निसीहि अहो कार्य काय संफासं खमणिजो मे किलामो अप्पकिलंताणं बहुतुभेण भे दिवसो वकतो जन्ता भे जवणिजच भे स्वासरोमि खमासमणो देव- सिवाकम्म आवसिआए पडिकसालि खसासमणाणं देव- सिआए आसायणाए तित्तीलनयराए जकिधि मिच्छाए सण. दुक्कडाए वयदुकालाए कायदुकलाए कोहाए माणाए मायाए लोमाए सम्वकालिआए सम्बगिच्छोक्यागए सव्वधरमाइश मणाए आसायणाए जो मे अारो की तस्स समासमणों परिक्रमानिनिदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।। इच्छामि खमासमणो वैदिडं जावाणिजाए निसीहिआए अणुजाणह मे सिउरगहं निसीहि अहो काय काय संफार्स .खमणिजो से किलासो अप्पकिलंताणं बहुसुमेण भे दिवसों वकतो जत्ता मे जवाणिजबसे खासमि खमासमणो देवः सिरों परकर परिकमामि खमासमणाणं देवलिाए आसायणाए' तित्तीसन्नयराए' किंचि मिच्छाए मण- दुकडाए क्यदुक्कडाए कायदुकाडाए कोहाए सणाए मायाए. लोभाए सस्वकालिआए सध्यमिच्छोक्याराए सचधम्माइका-
।
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पाक्षिकप्रतिक्रमण विवि.
मणाए आसायणाए जो मे अइआरो को तस्स समासमणो
पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ १॥
इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सामायिक चविसत्था ।
चंदनक पडिक्कमण, कारसग्ग, पञ्चक्खाण किया है जी
(ऐसा कहकर फिर)
इच्छामो अणुसहि नमोखमासमणाणं, नमोऽहत्सिद्धा-
चायोपाध्यायसर्वसाधुभ्यः
(पुरुषवर्ग नमोस्तु वर्द्धमानाय और स्त्रियां संसारदावाको तीन स्तुति कहेवे)
नमोस्तु वर्द्धमानाय, स्पर्धमानाय कर्मणा।
तज्जयावाप्तमोक्षाय, परोक्षाय कुतीथिनाम् ।।१।।
येषां विकचारविंदराज्या, ज्यायःक्रमकमलावलि दधत्याः ।
सहशैरतसंगतं प्रशस्यं, कथितं संतु शिवाय ते जिनेंद्राः॥२॥
कपायतापादितजंतुनिवृति, करोति यो जैन सुखांवुदोगतः।
‘स शुक्रमासोद्भववृष्टिसन्निभो, दधातु तुष्टिं मयि विस्तरो
गिराम् ॥३॥
नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥१॥ आइगराणं तित्थ-
यराणं सयंसंबुद्धाणं ॥ २ ॥ पुरिसुत्तमाणं पुरिससीहाणं
पुरिलवरपुंडरीआणं, पुरिसंवरगंधहत्थीण ॥ ३॥ लोमुत्तमाणं
लोगनाहाणं लोगहिआणं, लोगपईवाणं,लोगपजोअगराणा॥
अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गदयाणं, सरणदयाणं, वोहि-
दयाणं ॥ ५॥ धम्मदयाण, धम्मदेसिआणं, धम्मनायगाणं,
धम्मसारहाणं, धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं ॥६॥ अप्पडि-
हयवरनाणदसणधराणं, विअट्टछउमाणं ॥ ७ ॥ जिणाणं,
जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं, वुद्धाणं वोहियाणं, मुत्ताणं
मोअगाणं ॥ ८॥ सवनूणं, सव्वदरिसीणं, सिवमयलमरु-
अमणतंमक्खयमवावाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं
'संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥९॥
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १२५. जे अ अईआ सिद्धा, जे अ भविस्संति णागए काले । संपह अ वट्टमाणा, सव्वे तिविहेण वंदामि ॥१०॥ इच्छामि खमासमणो वैदिउं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् स्तवन भणुं ?: " इच्छं" (नमोऽर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः ऐसा कहके अजित शांतिका स्तवन बोलना.) (स्तवन) अजिजिअसव्वभयं, संति च पसंतसव्वगयपावं । जयगुरु संतिगुणकरे, दो वि जिणवरे पणिवयामि॥॥ (गाहा). ववंगयमंगुलभावे, ते हं विउलतवनिम्मलसहावे। निरुवयमहप्पभावे, थासामि सुदिट्ठसम्भावे ॥२॥ (गाहा) सबदुक्खप्पसंतीणं, सव्वपावप्पसंतिणं । सया आजिअसंतीणं, नमो अजिअसतिणं ॥ ३ ॥ (सिलोगो). जिअजिण सहप्पवत्तणं, तव पुरिसुत्तम नामकित्तणं । तह य धिइमइप्पक्त्तणं, तव य जिणुत्तम संति कित्तण॥४॥ (मागहिआ) किरिआविहिसंचिअकम्मकिलेसविमुक्खयरं । अजिसं निचिरं च गुणेहिं महामुणिसिद्धिगयं । अजिअस्स य संतिमहामुणिणो वि अ संतिकरं । सययं मम निव्वुइकारणयं च नमसणयं ॥५॥ (आलिंगणय), पुरिसा जइ दुक्खवारणं, जइ. य विमग्गह सुक्खकारणं । अजिसतिं च भावओ, अभयकरे सरणं पवजह ॥६॥ (मागहिआ) अरइरइतिमिरविरहिअमुवरयजरमरणं, सुरअसुरगरुलभुयगवइपययपणिवइयं । अजिअमहमवि अ, सुनयनयनिउणमभयकर, १ पवनहा, दीर्घत्वमार्फत्वात..
१२६ पाक्षिकप्रतिक्रमण विधेि. . - सरणमुवसरिअ सुविदिविजमहि सययमुषणमे ॥ ७ ॥ (संगययं) तं च जिणुत्तम सुत्तममित्तमसत्तधर, अज्जवमद्दवखंतिवित्तिलमाहिनिहि, संतिकरं पणमामि दमुत्तमतिस्थयरं, संतिमणी मम मंतिसमाहिवरं दिसउ ।। ८ ॥ (सोवाणय). सावस्थिपुवपस्थिवं च वरहत्यिमत्थयपसस्थवित्थिनसं- थियं, थिरसरित्थरच्छे अयगललीलायमाणवरगंधहत्थिपत्था- णपत्थियं संथवारिहं । हस्थिहत्यवाहुं धतकणगरुअगनिरुवह- यपिंजरं पवरलक्षणोवचिद्यसोमचारुक, सुइसुहमणाभिरा- मपरमरमाणिजवरदेवदुंदुहिनिनायगहरयरसुहगिरं ॥९॥ (डओ) अजिअं जिआरिगणं, जिअसम्बभयं सयोहरि । पणमामि अहं पयओ, पावं पसमेत से भयवं ॥ १०॥ (रालालुद्धओ) कुरुजणवयहत्थिणाउरनरीसरी पढमं तओ. महाचकवाट्टि- भोए महप्पभायो,जो बांवत्तरिपुरवरसहस्सबरनगरनिगमजण- वयवई वत्तीलारायवरसहस्लाणुयायमग्गो । चउदसवररय- णनवमहानिहिचउसहिसहरलपवरजुबईण सुंदरवई, चुलसी- हयगयरहसयसहस्तसामी छन्नवइगामकोडीसामी आसिजो. भारहमि भयवं ॥ ११ ॥ ( वेइओ) तं संति संतिकर, सतिण्णं सव्वभया। संति थुणामि जिणं, संति विहेउ मे ॥ १२ ॥ (रासानंदिय) इक्खागं विदेहनरासर नरवलहा मुणिवलहा, नवसारयससिसकलाणण विगयतमा विहुअरया । आज उत्तम तेअमुणेहिं महामुणिअमिअवला विउलकुला, , 'पणमामि ते भवभयमूरण जगसरणा मम सरणं ॥ १३॥ (चित्तलहा) श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १२७ देवदाणविंद चंदसुरवंद हतुडजिट्रपरम- लहरूव धंतरूप्पपट्टसेयसुद्धनिद्धधवल- दंतपंति संति सत्तिकित्तिमुत्तिज्जुत्तिगुत्तिपवर । दित्तअवंद घेअ सबलोअसाविअप्पभाव णेअ पइस मे समाहिं ॥१४॥ (नारायओ) विमलससिकलाइरेअसोम, वितिमिरसूरकराइरेअते। तिअसवइगणारेअसर्व, धरणिधर पराइरेअसारं ॥१५॥ (कुसुमलया) सत्ते असया अजि, सारीरे अ चले अजिअं । तवसजसे अ अजिरं, एस शुणागि जिणं अजि॥ १६ ॥ (भुगपरिरिंगि) सोमाहि पावन तं नक्सरयसली, तेमणेहिं पावह न तं नक्सरयरवी । रूपाणी पावइ न तं तिअसगणचई, सारगुणेहिं पावइ न त धरणिधरवई ॥ १७ ॥ (खिजिअयं) तित्थवरणवत्तयं तम रयरहिरं,धीरजणथुआन्चिरं चुअकलि- कलुसं । संतिसुहपकत्तय तिगरणएयओ, संतिमहं महामुणि सरणरमुवणमे ॥ १८ ॥ (ललिअयं) विणओणयसिररइअंजलिरिसिगणसंथु थिमिश्र, विवुहाविधणवइनरवक्शुअगहिचिअं वहुसो। अइरुग्गयसरयदिवायरससहिअलप्पमं तवसा। गयणंगणवियरणसमुइअचारणवंदिरं सिरसा ॥ १९ ॥ (किसलयमाला) असुरगरुलपरिवंदिरं, किन्नरोरगनमंसि। देवकोडिसयसंशु, समणसंघपरि इंदिरं ॥२०॥ (सुमुह) अभयं अणह, अरयं अरुयं । अजियं अजिय, पयओ पणमे ॥ २१॥ (विज्जुविलसि) १२८ पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. आगया वरविमाणदिव्यकणग,-रहतुरयपहकरसहि हुलिअं ।. ससंभमोअरणखुभिअलुलिअचल,-कुंडलंगयतिरी- डसोहंत मउलिमाला ॥२२॥ (वेढओ) जं सुरसंघा सासुरसंघा वेरविउत्ताभत्तिसुजुत्ता, आयरभूसिअसंभमपिंडिअसुङसुविीटेअसव्ववलोधा । उत्तमकंचणरयणपरूविअभासुरभूसणभासुरिअंगा, गायसमोणय भचिवसागय, पंजलिपसियसीसपणासा॥२३॥ (रयणमाला) वैदिऊण थोऊण तो जिणं, तिगुणमेव य पुणो पयाहिणं । पणमिऊण य जिणं सुरासुरा, पमुइआ सभवणाई तो गया ॥२४॥ (खित्तयं) तं महामुणिमहं पि पंजली, रागदोसभयमोहवजिअं । देवदाणवनरिंदवंदिरं, संतिमुत्तममहातवं नमे ॥ २५ ॥ (खित्तयं।) अंबरतरविआरिणआहि, ललिअहंसवहूगामिणिआहि । पीणसोणिथणसालिणिआहि,सकलकमलदललोअणिआहिं ॥२६ ॥ (दीवयं) पाणनिरंतरथणभरविणमिअगायलआहिं, मणिकंचणपसिढिलमेहलसोहिअसोणितजाहिं । वरखिखिणिनेउरसतिलयवलयविभूसणिआहि, रइकरचउरमणोहरसुंदरदंसणिआहि ॥ २७॥(चित्तक्खरा) देवसुदरीहिं पायवंदिआहिं वैदिआ य जस्स ते सुविकमा कमा,अप्पणो निडालएहि मंडणोड्डणप्पगारएहि केहि केहिं वि अवंगतिलयपत्तलेहनामपंहिं चिल्लएहिं संगयंगयाहिं, भत्तिसं- निविट्ठवंदणागयाहि हुँति ते वंदिआ पुणो पुणो ॥२८॥ (नारायओ। तमहं जिणचंदं, अजिअं जिअमोहं । धुयसव्वकिलेसं, पयओ पणमाणि ॥२९॥ (नंदिअयं । थुअचंदिअस्सा रिसिगणदेवगणेहिं, . ।)
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १२९ तो देववहर्हि पयओ पणमिअस्सा। जस्सजमुत्तमसासणअस्सा भत्तिवसागपिंडिअयाहिं। देववरच्छरसावहुआर्हि सुरवररइगुणपडियाहिं ॥३०॥ (भासुरयं) वंससद्दतंतितालमलिए 'तिउक्खराभिरामसद्दमीसए कए- अ, सुइसमांणणे असुद्धसज्जगीयपायजालंघटिआहिं । वलय- मेहलाकलावनेउराभिरामसहमीसए कए अ, देवनट्टिआहिं हावभावविब्भमप्पगारएहि नचिऊण अंगहारपहिं । वदिआ य जस्सते सुविकमा कमा तयं तिलोयसव्वसत्तसंतिकारयं, पसंतसव्वपावदोसमेसहं नमामि संतिमुत्तमं जिणं ॥३१॥ (नारायओ) छत्तवामरपडागजूअजवमंडिआ, झयवरमगरतुरयसिरिवच्छसुंलंछणा। दीवसमुद्दमंदरदिसागयसोहिआ, सत्थिअवसहसीहरहचकवरंकिया ।। ३२॥ (ललिअयो) सहावलट्ठा समप्पइट्ठा, अदोसदुद्दा गुणेहि जिहा। पसायसिट्ठा तवेण पुढा, सिरोहिं इट्ठा, रिसीहिं जुट्टा ॥३३॥ (वाणवासिआ।) ते तवेण धुअसव्वपावया, सन्चलोअहिअमूलपावया । संथुआ अजिअसंतिपायया, हुंतु मे सिवसुहाण दायया ३४ (अपरांतिका।) एवं तवबलविउलं, थुअंमए अजिअसंतिजिणजुअलं । ववगयकम्मरयमलं, गई गयं सासयं विउलं ॥३५॥ (गाहा ।) तं बहुगुणप्पसाय, मुक्खसुहेण परमेण अविसायं । नासेउ में विसायं, कुणड अ परिसा वि अप्पसायं ॥३६॥ (गाहा।) तं भोएउ अ नंदि, पावेउ अनंदिसेणमभिनंदि। . ९ १३० पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. परिसा वि अ.सुहनंदि; मम य दिसउ संजमे नदि ॥ ३७॥ “(गाहा।) पक्खिय चाउम्मासिस, संवच्छरिए अवस्ल भणिअव्वो। सोअव्वो सव्वेहिं, उवसग्गनिवारणो एसो॥ ३८॥ (गाहा) जो पढइ जो अनिसुणइ, उभओकालं पि अजिअसंतिथी न उ हुंतिं तस्स रोगा, पुषुप्पन्ना विनासंति ॥ ३९ ॥ (गाहा।) जइ इच्छह परमपयं, अहवा कित्तिं सुवित्थडं भुवणे । . ता तेलुक्कुद्धरणे, जिणवयणे आयरं कुणह ॥४०॥ (गाहा।) वरकनकशंखविद्रुम,-मरकतघनसन्निभं विगतमोहम् । सप्ततिशतं जिनानां, सर्वामरपूजितं वन्दे ॥१॥ इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए - निसीहिआए मत्थरण वंदामि । भगवान है। इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिज्जाए निसीहिआए 'मत्थएण वंदामि । आचार्य है। इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिज्जाए निसीहिआए मत्थपण वंदामि । उपाध्याय हैं। इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिज्जाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । सर्वसाधु हैं। ( फिर दाहिना हाय चखला अथवा आसनपर रखके वडील हो वह अड्डाइज्जेसु कहे.) अड्डाइज्जेसु दीवसमुद्देसु, पन्नरससु कम्मभूमिसु, जावंत केवि साहू रयहरणगुच्छपडिग्गहधारा, पंचमहत्वयधारा. अठारससहस्ससीलंगधारा, अक्ख(क्खु) यायारचरित्ता, ते 'सन्चे सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावाणिजाए निसीहिआए मत्थरण वदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन्. देवसिअ. 'पायच्छित्तचिसोहणस्थं कमि काउस्सग्गं । १ संवच्छरं राइए अदिअहेअ इति पाठान्तरम् श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १३१ अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालहिं सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिहिसंचालहिं एवमाइपहिं आगारहिं अभग्गो अविरोहिओ हुज मे काउ- स्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पारेमि ताव- कार्य ठाणणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (चार लोगस्स न आवे तो सोलह नवकारका काउस्सग्ग करके प्रगट लोगस्स करना) लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ॥ अरिहंते कित्तइस्सं, चवीसपि केवली ॥१॥ उसभमजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुष्फदंतं, सीअलसिजंसवासुपुजं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म सति च वंदामि ॥३॥ कुंथु अरं च मालिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिठ्ठनेमि, पास तह वद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा । चउवीसपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ ५॥ कित्तिय वैदिय महिआ, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा आरुग्ग-चोहिलाभं समाहिवरमुत्तमं किंतु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु आहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु॥ ७ ॥ इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवान् सज्झाय संदिसाहुं ? " इच्छ" इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् सज्झाय पहूँ ?.". इच्छं' 'नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उव- १३२ २ पाक्षिकप्रातक्रमण विधि. . . ज्झायाणं नमो लोए सव्वंसाहूणं । एसो पंचनमुकारो सन्व- पावप्पणासणो मंगलाणं च सन्वेसिं पढम हवइ मंगलं ॥ : उवसग्गहर-पासं, पासं वदामि कम्मघणमुकं । विसहरविसनिन्नासं, मंगलकल्लाणआवासं॥१॥ विसहरफुलिंगमंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ। तस्स गहरोगमारी, दुहृजरा जति उवसामं ॥२॥ चिट्ठउ दूरे मंतो, तुज्झ पणामो वि वहुफलो होइ। नरतिरिएसुवि जीवा, पावंति न दुक्खदोगचं ॥३॥ तुहं सम्मत्ते लढे, चिंतामणिकम्पपायवभाहिए। पावंति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ॥४॥ इअ संथुओ महायस; भतिब्भरनिव्भरण हिआएण। ता देव दिज वोह, भवे भवे पासजिणचंद ॥ ५॥ संसारदावानलदाहनीरं. संमोहधूलीहरणेसमीरं । मायारसादारणसारसीरं, नमामि वीरं गिरिसारधीर॥ १॥ भावावनामसुरदानवमानवेन, चूलाविलोलकमलावलिमालितानि। संपूरिताभिनतलोकसमीहितानि, कामं नमामि जिनराज पदानि तानि ॥२॥ वोधागाधं सुपदपदवीनीरपूराभिरामं । जीवाहिंसाऽविरललहरीसंगमागाहदेहं। चूलावेलं मुरुगममणीसंकुलं दूरपारं। सारं वीरागमजलनिधि सादरं साधु सेवे ॥३॥ आमूलालोलधूलीबहुलपरिमलालीढलोलालिमाला, झंकारारावसारामलदलकमलागारभूमिनिवासे । छायासंभार सारे वरकमलकरे तारहाराभिगमे, वाणीसंदोहदेहे भवविरहवरं देहि मे देवि सारं ॥ ४ ॥ नमो अरिहंताण, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहूण, एसो पंचनमुकारो, सव्वंपावप्पणासणो, मंगलाणं च सब्वेसिं, पदम हवइ मंगल। .
श्रीपंचप्रतिक्रमण. सूत्र. १३३. इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए । निसीहिआए मत्थएण वदामि । इच्छाकारेण संदिसह भगवन् दुक्खक्खय कम्मक्खय निमित्तं करेमि काउस्सग्गं । अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालहिं सुहुमेहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिहिसंचालेहि एवमाइएहिं आगारोहिं अभग्गो आविराहिओ हुज मे काउस्त- ग्गो जाव आरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेण न पारेमि ताव- कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ (चार लोगस्स वा सोलह नवकारका काउसग करना गुरु अथवा वडीलकी आज्ञा जिसको मिली हो वह नमोऽर्हत्सिद्धाचार्यो- पाध्यायसर्वसाधुभ्यः कहकर बडी शांति कहे.) भो भो भन्याः शृणुत वचनं प्रस्तुतं सर्वमेतद्, यात्रायां त्रिभुवनगुरोराहता भक्तिभाजः। तेषां शांतिर्भवतु भवतामहदादिप्रभावा,- दारोग्यश्रीधृतिमंतिकरी क्लेशविध्वंसहेतुः॥१॥ भो भो भव्यलोका इह हि भरतैरावतविदेहसंभवानां, सम- स्ततीर्थकृतांजन्मन्यासनप्रकम्पानन्तरमवधिना विज्ञाय, सौंध- माधिपतिः सुघोषाघण्टाचालनानन्तरं सकलंसुरासुरेन्द्रैः सह संमागत्य, सविनयमहद्भहारकं गृहीत्वा गत्वा कनकादि: श्रृंगे, विहितजन्माभिषेकः शान्तिमुद्धोपयति. यथा ततोऽहं. कृतानुकारमिति कृत्वा महाजनो येन गतः सः पन्थाः इति भव्यजनैः सह समेत्य स्नानपीठे स्नानं विधाय.[.अधुना] शान्तिमुद्घोषयामि तत्पूजायात्रास्नानादिमहोत्सवानंतरमिति- कृत्वा.कण दत्वा निशम्यतां निशम्यतां स्वाहा... ॐ पुण्याहं पुण्याहं प्रीयन्तां प्रीयन्तां भगवन्तोऽहन्तः सर्व - पाक्षिकप्रतिक्रमण विधि. ज्ञाः सर्वदर्शिनस्त्रिलोकनाथास्त्रिलोकमहितास्त्रिलोकपूज्यास्त्रि- लोकेश्वरात्रिलोकोद्योतकराः ॥ [*] ऋषभ-अजित-संभव-अभिनन्दन-सुमति-पद्मप्रभ-सुपार्श्व.. चन्द्रप्रभ-सुविधि-शीतल-श्रेयांस-वासुपूज्य-विमल-अनन्त-धर्म शान्ति-कुन्थु-अर-मालि-मुनिसुव्रत नमि-नेमि-पार्श्व-वर्द्धमाना- न्ताः जिनाः शान्ताः शान्तिकराः भवन्तु स्वाहा । ॐ मुनयो मुनिप्रवरा रिपुविजयदुर्भिक्षकान्तारेषु दुर्गमार्गपु रक्षन्तु वो नित्यं स्वाहा । ॐ [श्री ही]हीं श्रीं धृति-मति कीर्ति कान्ति-बुद्धि-ल- क्ष्मी-मेधा-विद्या-साधन-प्रवेशन-निवेशनेषु सुगृहीतनामानो जयन्तु ते जिनेंद्राः। ॐ रोहिणी-प्रज्ञप्ति-वज्रश्रृंखला-वज्रांकुशी-अप्रतिचक्रा-पुरुः षदत्ता-काली-महाकाली-गौरी-गान्धारी-सर्वास्त्रा-महाज्वाला- मानवी-वैरुट्या-अच्छुप्ता-मानसी-महामानसी षोडश विद्या- देन्यो रक्षन्तु वो नित्यं स्वाहा । ॐ आचार्योपाध्यायप्रभृतिचातुर्वर्ण्य स्य श्रीश्रमणसंघस्य शान्तिर्भवतु, तुष्टिर्मवतु पुष्टिर्भवतु । ॐ ग्रहाश्चन्द्रसूर्यांगारक-वुध-बृहस्पति-शुक्र-शनैश्चर- राहु-केतुसहिताः सलोकपालाः सोम-यम वरुण-कुबेर वासं- वादित्य-स्कन्द विनायकोपेताः ये चान्येऽपि. ग्रामनगरक्षे. तृदेवतादयस्ते सर्वे : प्रीयन्तां प्रीयन्तां . अक्षीणकोष्ठांगारा नरपतयश्च भवन्तु स्वाहा । ॐ पुत्र-मित्र-भ्रात:कलन-सुहृद्-स्वजन-संबन्धि-बन्धुवर्ग: सहिताः नित्यं चामोदप्रमोदकारिणः 'अस्मिश्च भूमण्डला- यतननिवासिसाधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकाणां, रोगोपसर्ग- १ विनायकाः इति पाठः, श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १३५ व्याधिदुःखदुर्भिक्षदौमनस्योपशमनाय शान्तिर्भवतु । '. ॐ तुष्टि-पुष्टि-ऋद्धि-वृद्धि-मांगल्योत्सवाः सदा प्रा- दुर्भूतानि पापानि [दुरितानि शाम्यन्तु गुरितानि [पापानि] शत्रवः पराङ्मुखा भवन्तु स्वाहा । श्रीमते शान्तिनाथाय, नमः शान्तिविधायिने । त्रैलोक्यस्यामराधीश, मुकुटाभ्यर्चितांघ्रये ॥१॥ शान्तिः शान्तिकरः श्रीमान् , शान्ति दिशतु मे गुरुः। शान्तिरव सदा तेपां, येषां शान्तिहे गृहे ॥ २ ॥ उन्मृष्टरिष्टदुष्ट-ग्रहगतिदुःस्वप्नदुनिमित्तादि । संपादितहितसंप,-नामग्रहणं जयति शान्तेः ॥ ३ ॥ श्रीसंघजगजनपद, राजाधिपराजसन्निवेशानाम् । गोष्ठिकपुरमुख्यानां, व्याहरणैाहरेच्छान्तिम् ॥ ४॥ श्रीश्रमणसंघस्य शान्तिर्भवतु, [श्रीजनपदानां शान्तिर्भवतु] श्रीराजाधिपानां शान्तिर्भवतु, श्रीराजसनिवेशानां शान्तिर्भ- वतु, श्रीगोष्ठिकानां शान्तिर्भवतु, श्रीपौरमुख्याणां शान्तिर्भ- वतु, श्रीपौरजनस्य शान्तिर्भवतु, श्रीब्रह्मलोकस्य शान्तिर्भ- वतु, स्वाहा ॐ स्वाहा ॐ श्रीपार्श्वनाथाय स्वाहा । एषा शान्तिः प्रतिष्ठायात्रास्नानाद्यवसानेषु शान्तिकलशं गृहीत्वा, कुंकुमचन्दनकर्पूरामुरुधूपंवासकुसुमाञ्जलिसमेतः स्नानचतुष्किकायां श्रीसंघसमेतः शुचिशुचिवपुः पुप्पवस्त्रच- न्दनाभरणाऽलंकृतः पुष्पमालां कण्ठे कृत्वा शान्तिमुद्घोषयि- त्वा, शान्तिपानीयं मस्तके दातव्यमिति । नृत्यन्ति नित्यं मंणिपुष्पवर्ष, सृजन्ति गायन्ति च मंगलानि । स्तोत्राणि गोत्राणि पठन्ति मंत्रान्, कल्याणभाजो हि जिनाभिषेके ॥१॥ . 1 "जन्माभिषेके" इति पाठान्तरम् १३६ वउमासी प्रतिक्रमण विधि. - . शिवमस्तु सर्वजगतः, परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः दोषाः प्रयान्तु नाशं, सर्वत्र सुखीभवन्तु लोकाः ॥२॥ अहं तित्थयरमाया, शिवादेवी तुम्हनयरनिवासिनी । अम्ह सिवं तुम्ह सिवं, असिवोक्समं सिर्व भवंतुस्वाहा३॥ उपसर्गाः क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विनवल्लयः । मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वर ॥ ४॥. सर्वमंगलमांगल्यं, सर्वकल्याणकारणम् । प्रधान सर्वधर्माणां, जैन जयति शासनम् ॥५॥ (फिर शेष सर्व काउसगं पारे और एक जन प्रगट लोगस्स कहे) लोगस्स उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥१॥ उसभमजिअंच वंदे, संभवमंभिणंदणं.च सुमई च । पउमपहं सुपासं, जिणं चं चंदप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुप्फत, लीअलंसिर्जसवासुपूज च । विमलमणतंच जिणं, धम्म संति चवंदामि। ३॥ कुंथु अरंच मलि, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ॥ . वंदामि रिटने में, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥ एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा । चउवासंपि.जिणवरा, तित्थयरा-मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तियवदियमहिआ, जे.ए लोगरस उत्तमा सिद्धा। आरुांगवोहिलाम, समाहिवरमुत्तम दितु ॥ ६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइयेसु आहियं पयासयरा । सागरंवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७ ॥ ॥ इति श्री पाक्षिक पतिक्रमणका विधि संपूर्ण । अब चउमासी प्रतिक्रमणको विधिनीचे मुताविक फेरफारसे समझना । (१) पाक्षिक प्रतिक्रमण, खमासमणमें जिस जिस जग- ह" पक्खो घइकतो, पक्खिों वइकम्म" और " परि- क्खिआए आसायणाए" ऐसा कहते उस जगह १ भवतु लोकः इति पाठान्तरम्' :
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्रः १३७ चउमा- . चउमा- वह प्रत्येकमें " एक- चउ- मासो वरतो"" चउमासिकं वदाम्म' और ' सिआए आसायणाएं " ऐसा कहना. (२) वंदित्तासूत्रमै पडिक्कमे पक्खिरं सवं" की. जगह “पडिकमे चउमासिकं सव्वं " ऐसा कहना. (३) अतिचारमें " पाक्षिक अतिचार पद्धं ? पक्ष दिवसमें जो कोई अतिचार लगा हो" उस जगह सिअ अतिचार पटु ? " और " चउमासी दिवसमें जो कोइ, अतिचार लगा हो " ऐसा कहना. (४) पाक्षिक प्रतिक्रमणमें “ पत्तेय खामणेणं, संबु- द्धा खामणेणं, सम्मत्ता खामणेणं पक्खाणं, पन्नरस दिवसाणं, पन्नरस राइआणं" कि जगह चार मासाणं, आठ पक्खाणं, एकसो चीस राइदिवसाणं ऐसा कहना और" पक्खिरं खामुं ?" कि जगह 'मासि खामुं?" ऐसा कहना. (५) पाक्षिक प्रतिक्रमणमें " पक्खियं तपप्रसाद करोजी" वहां " चउत्थेणं एक उपवास, दो आयविलं, तीन निवि, चार एकासना, आठ वेआसनां, दो हजार सज्झाय, यथाशक्ति तप करके पहोंचाना" कि जगह "छट्टेणं, दो उपवास, चार आयंबिल," छह निवि, आठ एकासना,सोलह विआसना' चार हजार सज्झाय 'यथाशक्ति तप करके पहोंचाना ऐसा कहना. (६) " पक्खिसूत्र पढुं ?" कि. जगह " चउमासी सुत्र पहूँ ? " ऐसा कहना. (७) पाक्षिक प्रतिक्रमणमें बारह लोगस्सके काउस्स- ग्गकी जगह यहांपर.. वीस लोगस्सका. .'काउस्सग्ग करना. ८) फिर " इच्छामि ठामि " वगैरह सूत्रोमै जहां जहां " पक्खि शब्द आता हैं वहां वहां चमासि" शब्द बोलना.
१३८ चउमासीप्रतिक्रमण विधि. (९) जव चउमासीक प्रतिक्रमण पुरा होकर, देव- सिक प्रतिक्रमणके प्रारंभमें उसकी संधिके वीचमें जो जो चउमासीक प्रतिक्रमण हो जैसा कि कार्तिक, फाल्गुन ओर आसाढ वह चार मासमें जो जो काल पानी, कंव- ल, सुखडी, भाजीपाला और मेवामिठाई वगैरहका हो वह शास्त्रमें कहे मुताविक साधारण रीतसे सर्व लोगों- को जाननेके लिये दिखलाते है. १ कार्तिकचोमासा १ गरम जलका काल-चार प्रहरका २ कंवल काल-सूर्योदयके बाद और सूर्यास्तके पहेले चार घडी. ३ सुखडी वगैरहका काल-एक मास तक. ४ मेवामिठाइ, भाजीपालेका काल फाल्गुनचोमासेतक २ फाल्गुनचोमासा १ उप्ण जलका काल-पांच प्रहरका. २ कंबलकाल-सूर्योदयक वाद, और सूर्योदयके पहे- ले दो घडी. ३ सुखडी वगैरहका काल-२० दिन तक: ४ मेवामिठाइ, भाजीपालेका काल--८ मास तक ३ आषाढचोमासा १ उपण जलका काल-तीन प्रहरका. २ कंबलका काल-सूर्योदयके वाद और सुर्यास्तके पहेले छह घडी. ३. सुखडी वगैरहका काल-१५ पंद्रह दिन तक. ४ मेवामिठाइ, भाजीपालेका काल-चार मास तक न कल्पे. -
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
१३९.
अथ संवत्सरी प्रतिक्रमणका विधि
-
चउमासी प्रतिक्रमणसे नीचे मुताविक फेरफार समझना
१ जिस जगह " चउमासिअं" है उस जगह " संवच्छ-.
रिअं" कहना.
२ चउमासी प्रतिक्रमणमें " पत्तेअखामणेणं, संवुद्धा खाम
णेणं, समत्ता खामणेण" कहते है वहां संवच्छरी प्रतिक्रमणमें
बारह मासाणं चौवीस पक्खाणं तिनसो साठ राइदिवसा-
णं"ऐसा पाठ कहना
ii
३" चउमासी तप प्रसाद करोजी” की जगह संव-
च्छरी तपप्रसाद करोजी" ऐसा कहके फिर" अभत्तं,
तीन उपवास,छह आयविल,नउनिवि,बारह एकासना, चौवीस
वेआसना ओर छह हजार सज्झाय यथाशक्ति तप करके
पहोचाना," ऐसा कहना.
४ चउमासी प्रतिक्रमणके वीस लोगस्सके काउस्सग्गकी
जगह यहांपर चालीस लोगस्स और एक नवकारका काउ-
स्लग करना लोगस्स न आवे तो एकसो साठ नव-
कार गिनने.
५ दरेक सूत्रमें जहां जहां " चउमासि" बोलनेका हो
वहां वहां" सर्वच्छरिअं" बोलना.
इति श्री पाक्षिक, चाउमासिक और सांवत्सरिक प्रतिक्र-
मणका विधि संपूर्ण ।।
(कोई जगह प्रतिक्रमणके बाद. संतिकरं स्तवन , बोलते है वह--
नीचे मुताबिक है, जिसको बेलना हो वह बोले ).
.॥ अथ संतिकर ॥
संतिकरं संतिजिणं, जगसरणं जयसिरीइ दायार ।।
समरामि भत्तपालग,-निव्वाणी गरुडकयसेवं ॥१॥
१४० संतिकर स्तवन. ॐ सनमो विप्पोसहि;-पत्ताणं.संतिसामिपायाण ॥ झाँस्वाहामंतेणं, सव्वासिवदुरिअहरणाणं ॥२॥ ॐ संतिनमुक्कारो, खेलोसहिमाइलद्धिपचाणं ॥ साँहीनमो सम्बोसहि, पत्ताणं च देइ सिारं ॥३॥ वाणीतिहुअणसामिणि, सिरिदेवीजक्खरायगणिपिडगा ॥ गेहदिलिपालसुरिंदा, सया वि रक्खंतु जिणभते ॥४॥ रक्खंतु मम रोहिणी, पन्नत्ती वजसिंखला य सया ॥ पंजंकुसि चक्केसरि, नरदत्ता कालि महाकाली ॥५॥ गोरी तह गंधारी, महजाला माणवी अं वइरुट्टा ॥ अच्छुत्ता माणसिआ, महामाणसिआउ देवीओ ॥६॥ जक्खा गोमुह महजक्ख, तिमुह जक्खेस तुबरु कुसुमो । मायंगविजयअजिंआ, बंभो मणुओ सुरकुमारो ॥७॥ छम्मुह पयाल किन्नर, गरुडो गंधव्व तह य जक्खिदो ।' कूवर वरुणो भिउडी, गोमेहो पास मायंगो ॥ ८॥ देवीओ चक्केसरि, अजिआ दुरिआरि कालि महाकाली ।। अच्चुअ संता जाला, सुतारयासोअसिरिवच्छा ॥९॥ चंडा विजयकुसि, प-नत्ति निव्वाणि अच्चुआं धरणी ॥ वइरुद्द हुत्त गंधारि, अंव पउंमावई सिद्धा॥१०॥ 'इअ तित्थंरक्खणरया, अन्ने वि सुरासुरी य चउहा वि॥ वंतरजोइणिपमुहा, कुणंतु रक्खं सया अम्हं ॥११॥... एवं सुदिहिसुरगण, सहिओ संघस्स संतिजिणचंदो । मज्झ वि.करेउ रक्खं, मुणिसुंदरसूरिथुअमहिमा ॥१२॥ इअ संतिनाहसम्म, विट्ठी रक्खं सरइ तिकालं जो ... सव्वोवदवरहिओ, स लहई सुहसंपयं परमं ॥ १३॥ तवगच्छगयणदिणयर, जुगंवरसिरिसोमसुंदरमुरूणं । सुपंसायलद्धगणहर,-विजासिद्धी भणइ सीसो॥१४॥ . १ वइरु दत्तःगंधारि" इत्यपि
सामायिक पारनेका विधि.
(इसके बाद सामायिक पारनेका .विधी है वह नीचे मुताबिक )
इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणीजाए निसीहिआए
मत्थएण वंदामि इच्छाकारेण संदिसह भगवन् इरियावहियं
पडिकमामि " इच्छं"इच्छामि पडिकमिङ इरियावहियाए,
विराहणाएंगमणागमणे पाणकमणे बीयकमणे हरियकमणे,
ओसाउसिंगपंणगदगमट्टीमकडासंताणासंकमणे, · 'जे मे
जीवा विराहिआ एगिदिया वेईदिया तेइंदिया चरिंदिया
पंचिंदिया अभिहया वत्तिया लेसिया संघाइया संघट्टिया
परियाविया किलामिया उदविया ठाणाओ ठाणं संकामिया
जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥
तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोही करणेणं
विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माण निग्घायणट्ठाए ठामि काउ-
सग्गं.।
अन्नत्थ उससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जमा--
इएणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि
अंगसंचालेहि सुहुमहिं खेलसंचालहिं सुहुमेहिं दिहि संचा-
लेहि एकमाइएहिं आगारोहिं अभागो अविराहिओ हुज मे
काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि.
तावकार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥
(एक लोगस्सका काउस्सग्ग करना, न आवे तो चार नवकार गिनने.)
लोगस्स उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ।
अरिहंते कित्तइरसं, चउवीसं पि केवली ॥१॥
उसभमजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च।
पउमप्पह सुपासं जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥
सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअलसिसवासुपुजं च ।
विमलमणंतं च जिणं, धम्मं सति चवदामि ॥३॥
कुंथु अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।।
वंदामि रिडनमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥
.१४२ श्रीपचंप्रतिक्रमण सूत्र एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणा। चंउवीसपि जिणवरा, तित्थयरां मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तियवंदियमहिआ, जे ए लोगरस उत्तमा सिद्धा। आरुग्गवोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्छेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७॥ चउकसायपडिमल्लुल्लूरणु, दुजयमयणवाणमुसुमूरणू ॥ सरसपिंअंमुवण्णु गयगामिउ,जय पासु भुवणत्तयसामि॥१॥ जसु तणुकंतिकडप्प सिणिद्धउ, सोहइ फणिमणिकिरणालिंदर । नं नव जलहरतडिल्लयलंछिड, सो जिणु पासु पयच्छउ वच्छिउ ॥ २ ॥ नमुत्युणं अरिहंताणं भगवंताणं ॥ १॥ आइगराणं तित्थ- यराणं सयंसंबुद्धाणं ॥ २ ॥ पुरिसुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिलवरपुंडरीआणं, पुरिसवरगंधहत्यीणं ॥ ३॥ लोमुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहिआणं, लोगपईवाणं,लोगपजोअगराणा४॥ अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गदयाणं, संरणदयाणं, वोहि- दयाणं ॥५॥ धम्मदयाणं, धम्मदेसिआणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहणिं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं ॥६॥ अप्पडि, हयवरनाणदंसणधराणं, विअट्टछउमाणं ॥ ७ ॥ जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं, वुद्धाणं वोहियाण, मुत्ताणं मोअगाणं ॥ ८॥ सन्वन्त्रणं, सम्वदरिसीणं, सिवमयलमरु- अमणतंमक्खयमव्वाबाहमपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं, नमो जिणाणं, जिअभयाणं ॥ ९॥ जे अं अइआ सिद्धा जे अमविस्संतिणागएकाले संपइ अवट्टमाणा सन्वे तिविहेण वदामि ॥ १० ॥ जावंति चेइआई, उड्ढे अ अहे अतिरिअलोए अ सव्वाइं ताई वंदे, इह संतो तत्थ संताई ॥१॥ जावंत के वि साहू, भरहेरवंयमहाविदेहे ।
सामायिक पारनेका विधि. १४३ सबसि तर्सि पणओ, तिविहेण तिदंडविरयाणं ॥२॥ नमोऽर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः । उवसग्गहरं पासं, पासं वदामि कम्मघणमुकं । विसहरविसनिन्नासं, मंगलकल्लाण आवासं ॥ १ ॥ विसहरफुलिंगमंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ। तस्स गहरोगमारी, दुहजरा जति उवसामं ॥२॥ चिट्ठउ दूरे मंतो, तुज्झ पणामो वि बहुफलोहोइ । नरतिरिएसु वि जीवा, पावति न दुक्खदोगच्चं ॥३॥ तुह सम्मत्ते लद्धे, चिंतामाण कप्पपायवभहिए। पावति अविग्घेणं, जीवा अयरामरं ठाणं ॥४॥ इअ संथुओ महायस, भत्तिब्भरनिब्भरेण हिअएण। तादेव दिज वोहि, भवे भवे पासजिणचंद ॥५॥ (फिर दोनो हाथ जोडके नीचे का सूत्र बोलना.) जय वीयराय जगगुरु, होउ ममं तुह पभावओ भयवं । भवनिवेओ मग्गा,-गुसारिआ इट्ठफलसिद्धि ॥१॥ लोगविरुद्धच्चाओ, गुरुजणपूआ परत्थकरणं चं। सुहगुरुजोगो तब्वय,-णसेवणा आभववखंडा ॥२॥ वारिजइ जइवि निया.-ण बंधणं वीयराय तुह समए । तहवि मम हुन्ज सेवा, भवे भवे तुम्ह चलणाणं ॥३॥ दुक्खखओ कम्मखओ, समाहिमरणं च वोहलाभो अ । संपजउ मह एअं, तुह नाह पणामकरणेणं ॥४॥ सर्वमंगलमांगल्यं, सर्वकल्याणकारणम् । प्रधानं सर्वधर्माणां, जैन जयति शासनम् ।। ५॥ इच्छामि खमासमणो दिउँ जावणिजाए. निसीहिआए मत्थएण वंदामि। इच्छाकारण.संदिसह भगवन् मुहपत्ती पडिले हुं.? "इच्छे" (ऐसा. कहकर मुहपत्ती पडीलहना.) इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावाणिजाए . निसीहिआए मत्थएण वंदामि। .
१४४ 'श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. इच्छांकारेण संदिसंह भगवन्सामायिक पारु?"यथाशक्ति" इच्छामि खमांसमंणो वदि जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वदामि । इच्छाकारेणं संदिसह भगवन् सामायिक पार्यु ? "तहत्ति"। (फिर दाहिना हाथ आसन वा 'चंखलेपर रखके नवकार बोलना.) नमो अरिहंताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उव- ज्झायाणं नमो लोए सव्वसाहणं । एसो पंचनमुकारोसव्वैपाव- प्पणासणों मंगलाणं च सव्वेसिं पढम हवई मंगलं ।। समाइयवयजुत्तो, जाव मणे होई नियमसंजुत्तो! छिन्नइ असुहं कम्म, सामाइयं जतिंआ वारा ॥१॥ सामाइअंम्मि उ कंए, समणो इव सावओं हवई जम्हा । एएण कारणेणं, बहुसो सामाइअं कुजा ॥२॥ मैने सामायिक विधिसे लिया, विधिसे पूर्ण किया, विधिमें कोई अविधि हुई हो तो मन वचन कायाकर मिच्छा मि दुकडं॥ दस मनके, दस वचनके, वारह कायाके कुल बत्तीस दोषमें जो कोई दोष लगा हो तो मन वचन कायाकर मिच्छा मि दुकडं। फिर गुरु नहीं होवे और स्थापनाचार्य सन्मुख प्रतिक्रमण किया हो तो सवळा हाथ रखके एक नवकार गिनना, गुरु होवे तो. नवकार गिननेकी जरुरियत नही है. प्रतिक्रमणमें छींक आइ हो उसकी आलोचन करने की विधिः पाक्षिक चउम्मासी वा संवत्सरी प्रतिक्रमण करते समय बडे अतिचार कहनेसे पहिले छींक आई हो तो इरियावहिसे लगाके प्रारंभसेही फिर से सर्व विधि करना. और जो बडे अतिचारसे लेकर वडी शांतितकमें छींक आई हो तो दुक्ख- खओ कम्मखओका काउस्सग्गं करते पहेले नीचे मुताबिक विधि कर लेना.
श्रीपंचप्रतिकमण सूत्र.
इच्छाकारेण संदिसह भगवन् इरियावाहों पडिफमामि
";" इच्छामि पडिकमिङ परियावहिआए विराहणाए,
गगणागमणे पाणफमणे वीयकमणे दरियामणे मोसाउत्तिंग
पणगदग मट्टीमबाडा संताणा संकमणे जे मे जीवा विरा-
दिमा, पगिदिया, येइंदिया, तेदिया, चारिदिया, पंचिंदिया,
अभिहया, वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघटिया, परिवा-
पिया किलामिया उद्दविया ठाणामो ठाणं संकामिया जीवि-
याभो ववरोविया तस्स मिच्छामि दुपाई ॥
तस्स उत्तरीकरणेणं पायछित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं
विसल्लीकरणेणं पावाणं फम्माणं निग्घायणाए ठामि का-
उस्सग्गं।
बाथ उससिपणं नीससिएणं खासिपणं छीएणं जंभार-
एणं उडुएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुमेहि
अंगसंचालेटिं सुद्धमेहि खेलसंचालेहिं सुहुमेहि दिहिसंबा-
लेह पधमारणहिं आगारहिं ममग्गो अविराहियो हुन्ज में
फाउस्सग्गो जाव गरिहंताणं भगवंताणं नमुकारणं न पारेमि
तायसायं ठाणेणं मोणणं आणेणं अप्पाणं पोसिरामि॥
(एक लोगस्स पा चार नवकारका काउस्सग्ग करना फिर प्रगट
लोगस बोलना.
लोगरस उजोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे।
अरिहंत कित्तइस्स, चउसिं पिकवली ॥१॥
उसममजिव यंदे, संभषमामिणवर्ण च सुमाईच।
परमप्पहं सुपास, जिणं च चंदप्पाई वंदे ॥२॥
सुविहिं च पुप्फदंतं, सीमलसिनांसधासुपुजं च ।
विमलमणतंब जिणं, धम्म संति च दामि ॥३॥
कुंशुं भरंजनालिं, चंदे मुणिसुव्वयं नामिजिणं च ।
वाति रिष्टनेमि, पासं तह पदमाणं च ॥४॥
.१४६ श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. . एवं मए अमिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरमरणां चउवीसं पिजिणवरा; तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ ५॥ कित्तियवंदियमहिआ, जे ए लोगस्सं उत्तमा सिद्धा आरुग्गंवोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥ ६॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥७॥ इच्छामि खमासमणो वंदिरं जावणिजाए निसीहिआएँ मत्थरण वंदामि. इच्छाकारेण संदिसह भगवन् क्षुद्रोपद्रवो-' डावणार्थ काउस्सग्गं करूं ? " इच्छं" करोमि काउस्सग्गं अन्नत्य उससिएणं नीससिएणं ख़ासिएणं छीएणं जंभाइ- एणं उड्डएणं वायनिसग्गेणं भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहि अंगसंचालहि सुहुमेहि खेलसंचालहिं सुहुमेहि दिहिसंचालहिं एवमाइएहिं आंगारेहिं अभ्भग्गो अविराहिओ हुज मे काउ-: स्सग्गो जावं अरिहंताणं भगवंताणं नमुकारेणं न पामि तावकायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि॥ (सागरवर गंभीरातकका. चार लोगस्सको काउस्सग करना, ने आ तो सोलह.नवकार गिनने फिर काउस्सग पारकर नाचेकी स्तुति तीन दंफे . बोलना) : सर्वे यक्षाम्बिकाद्या ये, वैयावृत्यारा जिने । क्षुद्रोपद्रव संघातं, ते द्रुतं द्रावयन्तु नः ॥ १ ॥ ॥ समाप्तम्॥
.. श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. ॥ अथ नवस्मरणानि ॥ . ॥ श्रीपार्श्वनाथस्तोत्रं उवसग्गहरे ।। उवलग्गहरं पासं, पासं दामि कम्मघणमुकं । विसहरविसनिनासं, मंगलकरलाणआवासं ॥२॥ विसहरफुलिंगमंतं, कंठे धारेइ जो सया मणुओ..., तस्सगह-रोग-मारी,-दुइजरा.जति उवसामं ॥२॥ चिट्ठउ दूरे मंतो, तुज्झपणामो वि बहुफलो होई । नर-तिरिएंसु वि जीवा, पावंति न दुःख दोगक्षं ॥३॥ ॐ अमरतरु-कामधेणु,-चिंतामणिकामकुंभमाइया । सिरिपासनाहसेवा-, रंगहाण सव्वे वि दासतं ॥ ४॥ ॐ ह्रीं श्री ॐ तुहदसणेण सासिय, पणासे रोगा -लोग, दाहगं फप्पतरुमिव जायइ, ॐ तुहदसणेण सफल हेउं स्वाहा ।।५।। ॐ ही नमिऊण विप्पणासय,मायावीएणधरणनागिदं.. सिरिकामराज क्लीं ( कलिय) पासजिणंद नमसामिः॥६॥ ॐ ही श्री पासविसहर, विजा-मंतेण झाणजनाअन्धोः । धरण-पउमावइ देवी, ॐ ही त्वयु स्वाहा ॥७॥ जयउ धरणदेव, पढमहुत्ती नागिणी विजा। विमलज्झाणसाहिओ, ॐ ही मत्वर्यु स्वाहा ॥८॥ ॐ थुणामि पासं, .ॐ ही पंणमामि परमभत्तिए।', अक्खरणिदः, पउँमावईपयडियकित्ति ॥९॥ जस्स पयकमले सया, चसइ-परमावई धरणिंदो। तस्स नामेण.सयलं, विसहरविसं नासेइ ॥ १०॥. तुह सम्मत्ते लद्ध, चिंतामणि-कप्पपायवभहिए। पावंति अविग्घेणं, जीवा,अयरामरंटाणं ॥ ११. नहट्टमयहाणं, पणठकम्मनसंसार।
१४८ तिजयपहुत्त स्तोत्रम् । परमहानिद्विअट्ट, अट्ठमुणाधीसरं वंदे ॥१२॥ इस संथुओ महायस, भत्तिव्मरनिभरेण हियएण । तादेव दिज बोर्हि, भवे भवे पासजिणचंद ! ॥ १३ ॥ स तुहनाम सुद्धे, मंते जो नर जति सुद्धभावस्स। सो अयरामरं ठाणं, पावंति नयगयसुक्ख ॥१४॥ पनास गोपीडा, अरगहदसणभयंकाये । आपी न हुंति एतह वी, तसीझं गुणी जासो॥१५॥ पीडजंतं भगंदरं, खास सास सुलतह नीवाह । श्रीसामलपासमहंत, नाम पर पडलेण ॥ १६ ॥ रोगजलजलणविसहर, चोरारिमाइंदगयरणभयाई। पासजिणनाम संकि-,त्तणेण पसमति सव्वाई ॥ १७ ॥ तं नमह पालनाह, धरणिंदनमंसियं दुह पणालेइ । तस्स पभावेण सया, नासंति सयलदुरियाई ॥१८॥ एए समरंताणं मुणिं, न दुह वाहि नासमाहिदुक्खं । नासंसियम असम, पयडो नास्थथ्य संदेहो ॥ १९ ॥ जलजलण तहप्पसीहो, मारारी संभवेपि खिप्पं । जो समरेइ पास पहु, पहो वि वकया वि किंचितस्स ॥२०॥ इहलोगट्टि परलोगहि जो समरेइ पासनाहं तु । ततो सिजोइ न कोसंह, नाह-सुराभगवतं ॥ २१ ॥ इति श्रीपार्श्वनाथस्तोत्र उक्सग्गहरं संपूर्ण ॥ -- अथ तिजयपहुत्त तिजयपहुसपथासय,-अठ महापाडिहरजुसाणं । समयक्खित्तडिआणं, सरेमि चकं जिणंदाणं ॥१॥ पणवीला य.असीआ, पनरस पन्नास जिणवरसमूहो। नासेड सयलदुरिअं, भविआणं भतिजुत्ताणं ॥२॥ धीसा पंणयाला विय, तीसा पनसरी जिणवारदा । गहभूभरपखसाइणि, घोरुषसग्गं पंणासंतु ॥३॥ .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. सत्तिरि पणतीला विय, सट्ठी पंचव जिणगणो एसो। चाहिजलज़लणहरि करि,-चोरारिमहाभयं हरउ ॥४॥ पणपना य दसेव य, पन्नही तह य चेव चालीसा। रक्खंतु मे सरीरं देवासुरमणमिआ सिद्धा॥५॥ ॐ हरहुंहः सरसुंसः, हरहुंह तह चेव सरसुसः। आलिहियनामगभ, चक्र फिर सवओभई ॥६॥ ॐ रोहिणि पन्नात्त, बजसिंखला तहय वजअंकुसिआ। चक्केसरि नरदत्ता, कालि महाकालि तह गोरी ॥७॥ गंधारी महजाला, माणवि वाल्छ तहय अच्छुत्ता माणसि महमाणसिमा, विज्झादेवीओ रक्खंतु ॥८॥ पंचदसकम्मभूमिसु, उप्पन्नं सत्तरि जिणाण सयं । विविहरयणाइवन्नो-वसोहि हरउ दुरिआई ॥९॥ चउतीसभइसयजुआ, अहमहापाडिहेकयसोहा। तित्थयरा गयमोहा, क्षाएअव्वा पयत्तेणं ॥१०॥ ॐ वरकणयसंखविहुम,-मरगयघणसन्निहविगयमोह। सत्तरीसयं जिणाणं सव्वामरपूरझं वंदे ॥ स्वाहा ॥११॥ ॐ भवणवइवाणवंतर,-जोइसवासी विमाणबासी । जे के वि दुटु देवा, ते सव्चे उवसमंतु मम ॥ स्वाहा ॥ १२ ॥ चंदणकप्पूरणं, फलए लिहिऊण खालि परिं। एगंतराइगहभूअ, साइणिमुग्गं पणालेइ ॥ १३ ॥ इअ सत्तरिसयजंत, सम्म भतं दुवारि पडिलिहिों। दुरिआरिविजयवंत, निम्मत निश्चमधेह ॥ १४॥ इति तिजयपहुत्त अथ नमिऊण नमिऊण पणयसुरगण,-चूडामणि किरणरंजिरं मुणिणो। चलणजुअल महाभय,-पणालणं संथवं वुन्थं ॥.... सडियकरचरणनहमुह, निबुडनासा विवन्नलायन्ना । कुहमहारोगानल;-फुलिंग निद्दड्डसव्वंगा ॥२॥ ते तुह चलणाराहण,-सलिलंजलिसेयवुड्डियाउ)च्छाया।
१५. नमिऊण स्तोत्रम् । वणदवदवा गिरिपा, यव व पत्ता पुणो लच्छि ॥३॥ तुव्वायखुभिय जलनिहि, उभडकल्लोलभीसणारांने । संमंतभयविसंतुल,-निजामयमुक्कवावारे ॥ ४i अविदालअजाणवत्ता, खणण पार्वति इच्छिों कूलं पासजिणचलणजुअलं, निच्चं चिं जे नमंतिं नरा ॥५॥ खरपवणुष्टुअवणदव, जालावलि मलियसयल दुमंगहणे। डझंत मुद्धमयवहु, मीसणरवीसणमि वणे ॥६॥ जगनुरुणो कमजुअलं, निवाविअसयलतिहुंभाभोरं जे संसरंति भणुआ, न कुणइ जलणों भयं तेलि ।। ७ ॥ विलसंतभोगभीसणफुरिआरुण, नयणतरलजीहाल उम्गमुअंग नवजल य, सत्यहें भीसंणायारं ॥८॥ मन्नति कीडसरिसं, दूरपरिच्छूढविसमविसवेगा तुह नामक्खरफुडसि मंतगु(गरुआ नरां लोएं ॥९॥ अडवीसु भिल्लतकर:- पुलिंदसईलसहभीमासु'। भयविहुरखुम्नकायर, उल्लारियपहियसंस्थातु ॥१०॥ आवलत्तविहवसारा, तुह नाह पणाममत्तवावारा। ववगय विग्घा सिग्छ, पत्ता हियइच्छियं ठाणं ॥ ११ ॥.. पज्झलिमानलनवणं, दूरवियारियमुहं महाकार्य । नहकुलिसघीयविअलिअ, गईद कुंभत्थलाभो ॥ १२ ॥.. पणयससंभमपत्थिव, नहमणिमाणिकपडिअपड़िमस्स।.. तुह्वयणपहरणधरा, सीहं कुद्धं पि न गणति ॥ १३ ॥ ससिधवलदंतमुसलं, दहिकरुल्लालबुद्विउच्छाहं ... : महुपिंगनयणजुअलं, ससलिल-नवजलहरारावं ॥ १४ ॥ भीम महागइंद, अचासण्णं पिते न विगणति । जे तुम्ह चलणजुअलं, मुणिवइ तुगं समलोणा ॥ १५ ॥ समम्मि तिक्खखग्गा, भिग्यायपविद्धदुयकबंधे । कुंतविणिभिन्नकरिकलह, मुक्कसिकारपउमि ॥१६॥ निशिवपुद्धररिउ, नरिंदनिवहां भडा जसं धवलें। . ..
श्रीपंचप्रतिक्रमण. सूत्र. : १५ पावंति पावपसमिण, पासजिण! तुहपप्रभावण.॥ १७ ॥ रोगजलजलणविसहर, चौरारिमईदगयरणभयाई । पासजिणनामसंकि,-त्तणेण समतिसम्बाई ॥१८ ॥ एवं महाभयहरं, पासजिणंदस्स संथवमुआरं। भवियजणाणंदयर, कल्लाणपरंपरनिहाणं ॥ १९.॥ रायभयजक्खरक्खस, कुसुमिणदुस्सउणरिक्खपीडासु । संझासु दोसु.पंथे, उवसग्गे तहय रयणीसु ॥२०॥ नो पढइ जो अनिसुणइ, ताणं कइलो-य.माणतुंगस्स। पासो पावं पसमेउ, सयल भुवणच्चियचलणो.॥२१॥ उवसग्गंते कमठा,-सुरम्मि झाणाओ जो न संचलिओ। सुरनरकिन्नरजुवहहि, संथुओ. जयउ पासजिलो ॥ २२ ॥ एअस्स मज्झयारे, अहारस अक्खरेहिं जो मंतो। जो जाणइ सो झायह, परमपयत्थं फुडं पास ।। २३ ।। पासह समरण जो कुणइ, संतुट्टे.हियएण। . अठुत्तरसयवाहिभयं, नासइ. तस्स दूरेण ॥ २४ ॥ ॥ इति भयहरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ . अथें श्रीभक्तामरस्मरण. भक्तामरप्रणतमौलिमाणिप्रभाणा- मुद्द्योतक दलितंपापतमो वितानम् ।। सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुग युगादा,- वालम्बनं भवजले:पतता जनानाम् ॥ १ ॥ यः संस्तुतः सकलवाङमयतत्त्ववोधा, दुद्भुतवुद्धिपटुभिः सुरलोकनाथैः। स्तोत्रैर्जगत्रितचित्तहरैरुदार .. स्तोप्यो किलाहमपि तं प्रथम जिनेन्द्रम् ॥२॥ बुध्या विनाऽपि विबुधार्चितपादपीठ: : स्तोतुं समुद्यतमतिर्विगतनपोऽहम् ॥..
.१५२ श्रीभक्तामरस्मरण । वालं विहाय जलसंस्थितमिन्दुविम्ब,- मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ॥३॥ वक्तुं मुणान् गुणसमुद्र ! शशाङ्ककान्तान्, कस्ते क्षमः सुरगुरोःप्रतिमोऽपि धुद्धया ।। कल्पान्तकालपवनोद्धतंनकचक्र, को वा तरीतुमलसम्युनिधिं भुजाभ्याम् ॥ ४॥ सोऽहं .तथापि तव भक्तिवशान्मुनीश, कर्तुं स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः ।। प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्य मृगो सृगेन्द्र, नाभ्योत किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ॥५॥ अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम, त्वद्भक्तिरेव मुखरी कुरुते वलान्माम् ॥ यत्कोकिलः किल मधौ मधुर विरौति, तञ्चारुचूतकलिकानिकरैकहेतुः ॥ ६ ॥ स्वत्संस्तवेन अवसंततिसचिवद्धं, पापं क्षणाक्षयमुपैति शरीरमाजाम् ॥ आक्रान्मलोकमलिनीलमशेषमाशु, सूर्याशुभिन्नमिव शार्वरमन्धकारम् ॥ ७॥ मत्वति नाथ! तव संस्तवनं मयेद,- मारभ्यते तनुधियाऽपि तव प्रभावात् ॥ चेतो हरिष्यति सतां नलिनीदलेषु, मुक्ताफलद्युतिमुपैति ननूदविन्दुः ॥ ८॥ आस्तां तव स्तवनमस्तसमस्त दोष, त्वत्संकथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ॥ दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभैव, पद्माकरेषु जलजानि विकाशमाजि॥९॥ नात्यद्भुतं भुवनभूषणभूत! नाथ!, भूनैर्गुणैर्भुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः ।। तल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा, श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १५३ भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥१०॥ दृष्ट्वा भवन्तमनिमेषविलोकनार्य, नान्यत्र तोषमुपयाति जनस्य क्षुः ।। पीत्वा पयः शशिकरघुतिदुग्धसिन्धोः, क्षारं जलं जलनिधेरशितुं क इच्छत् ॥११॥ यैः शान्तरागरुचिभिः परमाणुभिस्त्वं, निर्मापितस्त्रिभुवनैकललामभूत ॥ तावन्त एव खलु तेऽप्यणवापृथिव्यां, यत्ते समानमपरं न हि रूपमस्ति ॥ १२॥ वक्त्रंक ते सुरनरोरगनेनहारि, निःशेषनिर्जितजगलितयोपमानम् ॥ बिम्बं कलङ्कमलिन क निशाकरस्य, यद्वासरे भवति पाण्डुपलाशकल्पम् ॥ १३ ॥ संपूर्णमण्डलशशाककलाकलाप,- शुभ्रा गुणात्रिभुवनं तव लधयन्ति ॥ ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वर ! नाथमके, कस्तानिवारयति संचरतो यथेष्टम् ॥१४॥ चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशागनाभि,- नतिं मनागपि मनो न विकारमार्गम् ।। कल्पान्तकालमरुता चलिताचलेन, किं मन्दरादिशिखरं चलितं कदाचित् ॥ १५ ॥ निर्दूम वतिरपवर्जिततैलपूरः, कृत्स्नं जगत्रयमिदं प्रकटीकरोषि ।। गम्यो न जातु मरुतां चंलिताचलानां, दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाशः ॥ १६ ॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगेभ्यः, स्पष्टीकरोषि सहसा युगपजगन्ति ॥ नाम्भोधरोदरनिरुद्धमहाप्रभावः, सूर्यातिशायिभहिमाऽसि मुनीन्द्र ! लोके ।। १७ ॥ - श्रीभक्तामरस्मरण । नित्योदयं दलितमोहमहान्धकार, गम्यं न राहुवदनस्थ न वारिदानाम् ॥ विभ्राजते तवं मुखाजमनल्पकान्ति, विद्योतयजगदपूर्वशंशाङ्कविम्बम् ॥ १८ ॥ कि शरीषु शशिनाऽह्नि विवस्वता वां, युष्मन्मुखेन्दुदालते' तमस्सु नाथ ! : निप्पन्नशालिवनशालिनि जीवलोके, कार्य कियजलंधरैर्जलभारनम्नः ।। १९ ।। ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाश नैवं तथा हरिहगदिषु नायके ।। तेजः स्फरन्मणिपुं याति तथा.महत्त्वं, नैवं तु काचशकले किरणाकुलेऽपि ॥ २० ॥ मन्ये वर हरिहरादर्य एवं दृष्टा, दृष्टेषु येपु हृदयं त्वयि तोपमेति ॥ किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः, कश्चिन्मनोहरति नाथ भवान्तरेऽपि ॥ २१ ॥ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्तिं पुत्रान्, 'नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता॥ सर्या दिशो दधति भानि सहस्ररश्मि, प्राच्येवं दिग्जनयति स्कुरंदंशुजालम् ॥ २२ ॥ त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमाँस, मादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात् । त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्यु, नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र पंथाः ॥ २३ ।। त्वमव्ययं विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यं, ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनॉकेतुम् ॥ योगीश्वरं विदितयोगमनेकमक, ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः ।। २४ ।। बुद्धस्त्वमेव विवुधाचितवुद्धिबोधान्, श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १५५ - त्वं शङ्करोऽसि भुवनत्रयशङ्करत्वात् ।। धाताऽसि धीर! शिवमार्गविधविधानात्, व्यक्तं त्वमेव भगवन् ! पुरुषोत्तमोऽसि ॥२५॥ तुभ्यं नमस्त्रिभुवनातहराय नाथ, तुभ्यं नमः क्षितितलामलभूषणाय ॥ तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय, तुभ्यं नमो जिन! भवोदधिशोषणाय ॥ २६ ॥ को विस्मयोऽयं यदि नाम गुणैरशेपै,- स्त्वं संश्रितो निरवकाशतयां मुनीश !! दोपैरुपात्तविविधाश्रयजातंगः, स्वमान्तरेऽपि न कदाचिदंपीक्षितोऽसि ॥ २७ ॥ उच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूख - माभाति रूपसमलं भवतों नितान्तम् ।। स्पष्टोलसत्किरणमस्ततमोविंतानं, विम्ब रवेरिव पयोधरपार्श्ववति ॥ २८ ॥ सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे, विभ्राजते तंव वपुः कनकावदातम् ।। विम्ब वियद्विलंसदंशुलतावितांनं, तुगोदयांद्रिशिरसीव सहस्त्ररश्मः ॥ २९ ॥ फुन्दावदातचलंचामरचीरुशोभ, विभ्राजते तव वपुः कलधौतकान्तम् ।। उद्यच्छशाकशुचिनिर्जरवारिधार,- 'मुच्चैस्तटं सुरगिरिव शातकौम्भम् ।। ३० ।। छत्रत्रयं तवे विभाति शशाटककान्त, मुञ्चः स्थित स्थगितभानुकरप्रतापम् ।। मुक्ताफलप्रकरजालविवृद्धशोभ, प्रख्यापयत्त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥ ३१ ॥ उन्निद्रहेमनवपङ्कजपुचकान्तिः- पर्युलसन्नखमयूखशिखाऽभिरामौ ।
श्रीभक्तामरस्मरण । पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र धत्तः, पद्मानि तन विवुधाः परिकल्पयन्ति ॥ ३२॥ इत्थं यथा तव विभूतिरभूजिनेन्द्र ! धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य ।। याक्प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा, ताडक्कुतो.ग्रहगणस्य विकाशिनोऽपि ॥३३॥ . श्चोतन्मदाविलविलोलकपोलमूल,- मत्तभ्रमभ्रमरनादविवृद्धकोपम् ।। ऐरावताभमिभमुखतमापतन्तं, दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम् ॥ ३४॥ मिन्नेभकुम्भगलदुज्ज्वलशोणितात, मुकाफलप्रकरभूषितभूमिभागः ॥ बद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि, नाकामति क्रमयुगाचलसंश्रितं ते ॥ ३५ ॥ कल्पान्तकालपवनोखतवहृनिकल्पं, दावानलं ज्वलितमुज्ज्वलमुत्फुलिङ्गम् ।। विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं, त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेषम् ।। ३६ ॥ रतक्षणं समदकोकिलकण्ठनीलं, क्रोधोद्धतं फणिनमुत्कणमापतन्तम् ।। आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशड्का- स्त्वन्नामनागदमनी हदि यस्य पुंसः ॥ ३७॥ वलगत्तुरङ्गगजगजितभीमनाद,- माजौ बलं बलवतामपि भूपतीनाम् ॥ उद्यहिवाकरमयूखशिखापविद्धं, त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति ॥ ३८॥ कुन्तानभिन्नगजशोणितवारिवाह, वेगावतारतरणातुरयोधभीमे ॥ युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपक्षा,- - .
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. १५७ - - स्त्वत्पादपङ्कजवनायिणो लभन्ते ॥ ३९ ॥ अम्मोनिधौ क्षुभितभीषणनकचक्र,- पाठीनपीठभयदोल्बणवाडवासौ ॥ रगत्तरगशिखरस्थितयानपात्रा,- खासं विहाय भवतः स्मरणाद् ब्रजन्ति ॥ ४०॥ उद्भूतभीषणजलोदरभारभुग्नाः, शोच्यां दशामुपगताश्च्युतजीविताशाः ॥ त्वत्पादपङ्कजरजोऽमृतदिग्धदेहा, मा भवन्ति मकरध्वजतुल्यरूपाः ॥४१॥ आपादकण्ठमुरुशृङ्खलवेष्टितागा, गाढं वृहन्निगडकोटिनिघृष्टजङ्घाः ॥ त्वन्नाममन्त्रमनिशं मनुजाः स्मरन्तः, सद्यः स्वयं विगतबन्धभया भवन्ति ॥४२॥ मत्सद्विपेन्द्रमृगराजदवानलाहि.- सङ्ग्रामवारिधिमहोदरपन्धनोत्थम् ॥ तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव, यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते ॥४३॥ स्तोलस्त्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निवद्धां, भक्त्या मया रुचिरवर्णविचित्रपुष्पाम् ।। धरो जनो य इह कण्ठगतामजलं, तं मानतुङ्गमवशा समुपैति लक्ष्मीः ॥४४॥ इति श्रीभक्तामरनामक स्तोत्रं सम्पूर्णम् अथ श्रीकल्याणमंदिर स्तोत्रम्. वसन्ततिलकावृत्तम् कल्याणमन्दिरमुदारवयमेदि, भीवाणयप्रदमानिन्दितमधिपतम् । संसारसागरनिमजादशेषजन्तु, १५८ कल्याणमन्दिर स्तोत्र। . . पोतायमानममिनम्य जिनेश्वरस्य ।।१।। यस्य स्वयं सुरगुरुगरिमाम्बुराशेः, स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम् । तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतो, स्तस्याहमेप किल संस्तवनं करिष्ये ॥२॥ युग्मम् ॥ सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूपः, मस्मादृशाः कथमधीश! भवन्त्यंधीशाः। धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो, रूपं प्ररूपयति किं किलं धर्मरश्मः ॥३॥ मोहक्षयादनुभवन्नपि नाथ ! मत्या, नूनं गुणान् गणयितुं न तव क्षमेत । कल्पान्तवान्तपयलः प्रकटोऽपि यस्मान्, मीचेत केनं जलधेर्ननु रत्नराशिः ?॥४॥ अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ ! जडाशयोऽपि, कर्तुं स्तवं लसदसंख्यगुणाकरस्य ! वालोऽपि किन निजवाहुयुगं वितत्य, विस्तीर्णतां कथयति स्वधियांम्धुराशेः १ ॥५॥ ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश वक्तुं कथं भवति ते ममावकाशः। जाता तदेवमसमीक्षितकारितेय, जल्पन्ति वा निजगिरा ननु पक्षिणोऽपि ॥६॥ आस्तामचिन्त्यमहिमा जिन संस्तवस्ते, नामापि पाति भवतो-भवतो जगन्ति । तीव्रातपोपहतपान्थजनान्निदाघे, प्रीणाति पासरसः सरसोऽनिलोऽपि ॥७॥ हृद्वर्तिनि त्वयि विभो! शिथिलीभवन्ति, जन्तोः क्षणेन निविडा अंपि कर्मवन्धाः । सद्यो भुजङ्गममया इव मध्यभाग- -मभ्यागते वनशिखण्डिनि चन्दनस्य ॥८॥ ܂ ܃܇ श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.. १५९ मुच्यन्त एव मनुजाः सहसा जिनेन्द्र , रौद्ररुपद्रवशतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि ॥ गोस्वामिनि स्फुरिततेजसि दृष्टमात्र, चौरैरिवाशु पशवः प्रपलायमानैः ॥ ९॥ त्वं तारको जिन ! कथं ? भविनां त एव, त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्तः॥ यद्वा तिस्तरति यजलमेष नून-. मन्तर्गतस्य मरुतः स किलानुभावः ॥ १० यस्मिन् हरप्रभृतयोऽपिं हतप्रभावाः, सोऽपि त्वया रतिपतिः क्षपितः क्षणेन ॥ विध्यापिता हुतभुजः पयसाथ येन, पीतं न किं तदपि दुर्धरवाडवेन ? ॥११॥ स्वामिन्ननल्पगरिमाणमपि प्रपन्ना,- स्त्वां जन्तवः कथमहो हृदये दधानाः ॥ जन्मोदधि लघु तरन्त्यतिलाघवेन, चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभावः ॥ १२ ॥ क्रोधस्त्वया यदि विभो! प्रथम निरस्तो, ध्वस्तास्तदा वत कथं किल कर्मचौरा? प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिराऽपि लोके, नीलद्रुमाणि विपिनानि न कि हिमानि ॥ १३ ॥ त्वां योगिनो जिन सदा परमात्मरूप, मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुजकोशदशे ।। पूतस्य निर्मलरुचेर्यदि वा किमन्य दक्षस्य सम्भवि पद भनु कणिकायाः ॥.१४ ध्यानाजिनेश ! भवंतो भविनः क्षणेन, देहं विहाय परमात्मदशां ब्रजन्ति ।। तीवानलादुपलभावमपास्य लोके, चामीकरत्वमंचिरांदिवं धातुभेदा ॥ १५॥ अन्तः सदैवं जिन! यस्य विभाव्यसे त्वं, कल्याणमन्दिर स्तोत्रम् । भव्यैः कथं तदपि नाशयसे शरीरम् ?।। एतत्स्वरूपमथ मध्यविवर्तिनो हि, . यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावाः ॥ १६॥ आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेदवुद्धया, ध्यातो जिनेन्द्र ! भवतीह भवत्प्रभावः ।। पानीयमप्यमृतमित्यनुचिन्त्यमानं, किं नाम नो विषविकारमपाकरोति ॥१७॥ त्वामेव वीततमसं परवादिनोऽपि, नूनं विभो ! हरिहरादिधिया प्रपन्नाः ॥ कि काचकामलिभिरीश ! सितोऽपि शखो, नो गृह्यते विविधवर्णविपर्ययेण ॥ १८ ॥ धर्मोपदेशसमये सविधानुभावा,- दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोकः अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि, किं वा विवोधमुपयाति न जीवलोकः ॥ १९ ॥ चित्रं विभो ! कथमवाङ्मुखवृन्तमेव, विष्वर पतत्यविरला सुरपुष्पवृष्टिः ॥ त्वगोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश! गच्छन्ति नूनमध एव हि बंधनानि ।। २० ॥ स्थाने गभीरहदयोदधिसम्भवाया, पीयूषतां तव गिरः समुदीरयन्ति ।। पीत्वा यतः परमसंमदसड्गभाजो, भव्या व्रजन्ति तरसाऽप्यजरामरत्वम् ।। २१॥ स्वामिन् ! सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो, मन्ये वदन्ति शुचयः सुरचामरौघाः ।। येऽस्मै नर्ति विदधतें मुनिपुड्वाय, ते नूनमूर्ध्वगतयः खलु शुद्धभावाः ॥२२॥ श्यामं गभीरगिरमुज्ज्वलहेमरत्न सिंहासनस्थमिह भव्यशिखण्डिनस्त्वाम् ।। .
कल्याणमन्दिर स्तोत्र । १६१ - आलोकशान्ति रभसेन नदन्तमुच्चै,- श्वामीकरादिशिरसीव नवाम्बुवाहम् ॥ २३ ॥ उद्गच्छता तव शितिद्युति मण्डलेन, लुप्तच्छदच्छविरशोकतरर्वभूव ॥ सानिध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग! नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि ॥ २४ ॥ भो भोः प्रमादमवधूय भजध्वमेन,- मागत्य निर्वृतिपुरि प्रति सार्थवाहम् ।। एतनिवेदयति देव! जगत्त्रयाय, मन्ये नदन्नभिनभः सुरदुन्दुभिस्ते ॥ २५ ॥ उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ !, तारान्वितो विधुरयं विहताधिकारः ।। मुक्ताकलापकलितोच्छसितातपत्र,- व्याजास्त्रिधा धृततनु वमभ्युपेतः ॥२६॥ स्वेन प्रपूरितजगत्त्रयपिण्डितेन, कान्ति प्रतापयशसामिव सञ्चयेन ॥ माणिक्यहमरजतप्रविनिर्मितेन, सालत्रयेण भगवन्नाभितो विभासि ॥ २७ ॥ दिव्यस्रजो जिन ! नमत्रिदशाधिपाना- मुत्सृज्य रत्नरचितानपि मौलिवन्धान् ॥ पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वा परत्र, त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव ॥ २८ ॥ त्वं नाथ! जन्मजलधेविपराङ्मुखोपि, यत्तारयस्पसुमतो निजपृष्ठलग्नान् ।। युक्तं हि पार्थिव निपस्य सतस्तवेव चित्रं विभो ! यदसि कर्मविपाकशून्यः ॥२९॥ विश्वेश्वरोऽपि जनपालक दुर्गतस्वं, किंवाक्षरप्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश!॥ अज्ञानवत्यपि सदैव कथञ्चिदेव, १६२ श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. . - शानं त्वयि स्फुरति विश्वविकाशहेतुः ।। ३०॥ प्राग्भारसम्भृतनभांसि रजांसि रोषा- दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि ॥ . छायापि तैस्तव न नाथ ! हता हताशो,. प्रस्तस्त्वमी भिरयमेव परं दुरात्मा ॥ ३१॥ यद्व दुर्जितघनौघमदभ्रमीम, भ्रश्यत्तडिन्मुसलमांसलघोरधारम् ॥. दैत्येन मुक्तमथ दुस्तरवारि दधे, तेनैव तस्य जिन दुस्तरवारिकृत्य ॥ ३२ ॥ ध्वस्तोर्ध्वकेशविकृताकृतिमय॑मुण्ड,- प्रालम्वभृद्भयदवऋविनियंदग्निः ॥ प्रेतत्रका प्रतिभवन्तमपीरितो यः, सोऽस्या भक्त्प्रतिभवं भवदुःखहेतुः ॥ ३३॥ धन्यास्त एव सुक्नाधिप! त्रिसन्ध्य,- माराधयन्ति विधिवद्विधुतान्यकृत्याः ॥ भक्त्योल्लसत्पुलकपक्ष्मलदेहदेशाः, पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाजः॥ ३४॥ अस्मिन्नपारभववारिनिधौ मुनीश! मन्ये न मे श्रवणगोचरतां गतोऽसि ॥ आकर्णिते तु तव गोत्रपवित्रमन्त्रे, किंवा विपद्विषधरी सविधं समेति ॥ ३५॥ जन्मान्तरेऽपि तव पादयुग न देव! मन्ये मया महितमीहितदानदक्षम् ॥ तेनेह जन्मनि मुनीश-! पराभवानां, जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम् ॥ ३६ ॥ नूनं न मोहतिमिरावृतलोचनेन, पूर्व विभो ! सकदपि प्रविलोकितोऽसि ॥ मौविधो विधुरयन्ति हि मामनर्थाः, प्रोद्यल्पबन्धगत्यः कथमन्यथैते.? ॥ ३७ ॥ : .
कल्याणमन्दिर स्ते त्रम् । १६३ आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोपि, नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या ॥ जातोऽस्मि तेन जनवान्धव दुःखपानं, यस्माक्रियाः प्रतिफलन्ति न भावशून्याः ॥ ३८॥ त्वं नार्थ दुःखिजनवत्सल! हे शरण्य ! कारुण्यपुण्यवसते वशिनां वरेण्य ! ॥ भक्त्या न ते मयि महेश! दयां विधाय, दुःखाङ्कुरोद्दलनतत्परतां विधेहि ॥ ३९ ॥ निःसङ्ख्यसारशरणं.शरणं शरण्य, मासाद्य सादितरिपुप्रथितावदातम् ॥ त्वत्पादपङ्कजमपि प्रणिधानवन्ध्यो, वध्योऽस्मि चेभुवनपावन ! हा हतोऽस्मि ॥४०॥ देवेंद्रवन्ध ! विदिताखिलवस्तुसार ! संसारतारक! विभो ! भुवनाधिनाथ!। प्रायस्व देव ! करुणाहृद! मां पुनीहि, सीदन्तमद्य भयव्यसनाम्बुराशेः ॥४१॥ यद्यस्ति नाथ ! भवदनिसरोरुहाणां, भक्तेः फलं किमपि सन्ततिसाश्चतायाः ॥ तन्मे त्वदेकशरणस्य शरण्य भूया. स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि ॥४२॥ : इत्थं समाहितधियो विधिवजिनेन्द्र ! सान्द्रोल्लसत्पुलककञ्चुकिताङ्गभागाः-11 त्वद्विम्बनिर्मलमुखाम्बुजबद्धलक्षाः ये संस्तव तव.विभो! रचयन्ति भव्याः॥४३॥ जननयनकुमुदचन्द्र प्रभास्वराः स्वर्गसंपदो.भुक्त्वा॥ ते विगलितमलनिचया, अचिरान्मोक्ष-प्रपद्यन्तेः॥ 'युग्मम् ॥४४॥ इति श्रीकल्याणमन्दिरनामकं स्मरणम् ॥ .. .
१६४ श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. जय तिहुअण-स्तोत्र. जय तिहुअणवरकप्परुक्ख जय जिणधनंतरि, जय तिहुअणकल्लाणकोस दुरिअक्करिकेसरि । तिहुअणजणअविलंधिआण भुवणत्तयसामिअ, कुणसु सुहाइ जिणेस पास थंभणय पुरहिअ ॥ १॥ तइ समरंत लहंति झत्ति वरपुत्तकलत्तइ, धण्णसुवण्णहिरण्णपुण्ण जणं भुजई रजेइ । पिक्खइ मुक्ख असंख सुक्ख तुह पास पसाइण, इअ तिहुअणवरकप्परुक्ख सुक्खा कुण महं जिण ॥२॥ जरजजर परिजुप्णकण्ण नटुट्ठ सुकुट्टिण चक्खुक्खीण खयेण खुण्ण नर सल्लिय सूलिण । तुह जिण सरणरसायणेण लहु हुति पुणण्णव, जय धनतरि पास महवि तुह रोग हरो भव ॥३॥ विजाजोइस मंततंतसिद्धिउ अपयत्तिण, भुवणऽन्भुउ अट्टविह सिद्धि सिज्झहि तुह नामिण । तुह नामिण अपवित्तओ वि जण होइ पवित्तउ, तं तिहुअणकल्लाणकोस तुह पास निरुत्तउ ॥ ४॥ खुद्द पउत्तइ मंत तंत जंताइ विसुत्तइ, चरथिरगरल गुहुग्गखग्ग रिउवग्ग विगंजइ-। दुत्थियसत्थ अणत्थघस्थ निस्थारइ दयकरि, दुरियइ हरउ स पासदेउ दुरियकरिकेसरि ॥५॥ तुह आणा थमेइ भीमदप्पुधुरसुरवर-, रक्खस-जक्खं फर्णिदविंद चोरानल जलहर। जलथरचारि रउद्द खुद्द पसुजोइणिजोइय, इय तिहुअण अविलंधिआण जय पास सुसामिय ॥६॥ पत्थि अस्थ अणत्थतत्थ भत्तिभरनिभर, रोम चंचिअ चारुकाय किन्नरनरसुरवर ।
जय तिहुअण होत्र. १६५ जसु सेवहि कमकमलजुयल पक्खालियकालिमल, सो भुवणत्तयसामि पास मह मद्दउ रिउवलु ॥७॥ जय जोइय मण कमलभसल भयपंजरंकुजर। तिहुअणजण आणंदचंद भुवणत्तयदिणयर। जय मइ मेइणिवारिवाह जयजंतुपयामह, थंभणयट्ठिय पासनाह नाहत्तण कुण मह ॥८॥ बहुविह वन्नु अवन्नु सुन्नुवन्निउ छप्पन्निहि, मुक्खधम्मकामत्थकाम नर नियनियंसथिहि। जं ज्झायहि बहु दरिसणाथ बहुनाम पसिद्धउ, सो जोइयमणकमलभसल सुहु पास पउद्धउ ॥ ९ ॥ भयविम्भल रणझणिरदसण थरहरिम सरीरय, तरलिय नयण विसुण्ण सुण्ण गग्गर गिर करुणय । तइ सहसत्ति सरंत हुंति नर नासिब गुरुदर, मह विजवि सशसइ पास भयपंजरकुंजर ॥१०॥ पइंपासिविअसतनित्तपत्तपवित्तिय,- याहपवाहपवूढरूढदुहदाह सुपुलस्य ॥ . मन्नइमन्नुसउन्नुपुन्नुअप्पाणं सुरनर, इय तिहुअणआणंदचंद जयपासजिणेसर ॥ ११ ॥ तुहकल्लाणमहेसु घंटटंकारव पिल्लिय, वल्लिरमल्ल महल्लभत्ति सुरवरगंजुल्लिम.॥ हल्लुप्फलिअ पवत्तयति भुवणेवि महूसव, इय तिहुअणआणंदचंदजयपास सुहुभव ॥ १२ ॥ निम्मलकेवलकिरणनियरविहुरिअतमपहयर, दसिभ सयलंपयत्थसत्थविथरिअपहाभर ॥ कलिकलुसिजणघूअलोयलोयणह अगोयर, तिमिरई निरु हर पासनाहभुवणतय दिणयर ॥१३॥ तुह समरणंजलवरिससित माणवमईमेइणि, अवरावरंसुहुमत्थवोहकदलदलरेहाण ॥ जायइ फलभरभरिय हरिय दुहदाह अणोचम,
१६६
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
,
इय महमेइणिवारिवाह दिस पास मई मम ॥ १४॥
कय अविकलकल्लाणवल्लि उल्लुरिय दुहवणु,
दाविअ सग्गपवग्गमग दुग्गइगम वारण ।
जय जंतुहजणएणतुल्ल जणि यहियावहु,
रम्मु धम्मु सो जयउ पास जय जंतुपिआमहु ॥ १५ ॥
भुवणारण निवास दरिअ परदसणदेवय,
जोइणिपूअणाखेत्तवाल खुदासुर पसुक्य.॥
तुह उत्तह सुनह सुटु
अविसंतुलचिठहि;
इयतिहुअण वणसीहपास पावाइ पणासहि ॥ १६ ॥
फणिफणफारफुरंतरयणकररजिअनहयल,
फलिणीकंदलदलतमालनिल्लु प्पलसामल ||
कमठासुरउवसग्गवग्गसंलग्गअंगजिअ,
जय पञ्चक्खजिणेस पास थंभणयपुरहिअ ॥ १७ ॥
महमणुतरलपमाणनेय वायावि विसंतुलु,
नियतणुवि अविणयसहाव आलसविहऽलंथलु ॥
तुहमाहप्पुपमाणुदेव कारुण्ण परित्तउ,
श्यमहमाअवहीरपासंपालाहविलवंत ॥ १८ ॥
किंकि कपिउणयकलुण किंकि वनजंपिउ,
किं वन चिट्ठिउकिट्ठदेवीणयमऽविलंबिउ ।।
कासुनकियनिप्पल्ललाल्लिअत्थेहिदुहात्तई,
तहविनपत्त उताण किं.पि पई पहु परिचत्तिई ॥ १९ ॥
तुई सामिहु तुहुं मायं बप्पु तुडे मित्तपियंकरु,
तुहुँ गइ तुहं मह तुहिजी ताणु तुहं गुरु खेमकर ॥
हउंदुहमरभारिअक्राउ राउलनिब्भुग्गह,
लीण तुह कमकमल सरणुजिणपालहि चंगह ॥२०॥
पडू किविकयनीरोयलोयकिवि पावियसुहसय,.
किंविमई मंतमहंतकेवि किविसाहियसिवपय
किवि गंजिअरिउवग्गक्रेविजलधवलिअ भूयल,
मइ अवहीरहि केणपाससरणागयवच्छल ॥२१॥
जय तिहुअण स्तोत्र. १६७ पच्चुवयार निरी हनाहनिप्पणपयोअण, तुहुं जिणपासपरोवयार करुणिकपरायण, सतु मित्त समचित्त विती नय निंदय सममण माअवहीरिअजुग्गउविमइ पासनिरंजण ॥ २२ ॥ हउं बहु विहदुहतत्तगत्तुतहुं दुहनासणपरु, ह सुयणइकरुणिकठाणु तुहुं निरुकरुणाकरु ॥ हउं जिणपास अ सामिसालुतुहं तिहुअणसामि अ, जं अवहीरहि मइ झखन्तइयपासन सोहिअ ॥ २३ ॥ जुग्गाजुग्ग विभागनाहनहुजोवहितुहसम, भुवणुक्यारसहावभाव करुणारससत्तम ।। समविसमइं किंघणमिएइ भुविदाहुसमंतउ, इयं दुहिवंधवपासनाह मई पालथुणतउ ॥ २४ ॥ नयदीणहरीणयमुए विअणविकि विजुग्गय, जं जोइविउवयारुकरइउ वयारसमुजय ॥ दीणहदीणु निहीणुजेणतुहनाहणचत्तर, तोजुग्गउअहमेव पासपालहिमइ चंगउ ॥ २५ ॥ अह अणु वि जुग्गयविसेसु.कि विमणहि दीणह, जंपासविउवयारुकरइ तुह नाहसमग्गह ॥ सुच्चिअकिल कल्लाणुजण जिण तुह्मपसीयह, किं अण्णिण तंचेव देव मामइअवहीरह ॥ २६॥ तुह पच्छण नहु होइ विहल जिणजाणउ किं पुण, हउं दुख्खिय निरुसत्तचत्तदुक्कउ उस्सुयमण ॥ तं मणउ निमिसण एउ एउविजइ लभह, सच्च ज भुक्खियवसेण किं उंबरु पच्चइ ॥ २७ ॥ तिहुअणसामिअ पासनाह मइ अप्पुपयासिउ, किजउ जं नियरूव संरिसुनमणुंव हुंजपिउ । अणु ण जिणजगितुहसमोविदाक्खिण्णु दयासउ, जइ अवगिन्नास तुहिजअहहकिहोइसहयासउ ॥२८॥ जइ तुहरू विणकिणविपेअं पाइणवेलविउ, १६८ श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्रं. तउजाणुंजिणपास तुह्महउअंगीकरिउ ।। इयमहइच्छिउ जं न होइ सातुहंउहावणु, रक्खंतह नियकित्तिणेय जुझाइवहरिणु ॥ २९ ॥ एहमहारिहजत्तदेवइसुन्हवणमहूंसउ, जं अणलिय गुणगहण तुह्म मुंणिजणअणिसिद्धउ । एम पसिअसुपासनाहथंभणयपुरठि इय मुणिवरुसिरि अभयदेवु विणवई अणिदिअ ॥ ३०॥ ॥ इति श्रीस्तंभनकतीथराज श्रीपार्श्वनाथस्तवनम॥ जिनपज्जरस्तोत्रं. . ॐ ही श्री.अर्ह अर्हद्भयो नमोनमः ।। ॐ ही श्री अह सिद्धेभ्यो नमोनमः ।। ॐ ही अह आचार्येभ्यो नमोनमः ॥ ॐ ही अर्ह उपाध्यायेभ्यो नमोनमः ।। ॐ ही अहं गौतमप्रमुखसर्वसाधुभ्यो नमोनमः॥१॥ एष पञ्जनमस्कारः, सर्वपाप क्षयंकरः ।। मङ्गलानां च सर्वेषां, प्रथमं भवति.मङ्गलम् ॥ २ ॥ ॐ ही श्री जये विजये, अहं परमात्मने नमः ॥ कमलप्रभसूरीन्द्रो, भाषते जिनपलरम् ।। ३।। एकभक्तोपवासेन, त्रिकालं यः पठेदिदम् ।।. मनोभिलषितं सर्व, फलं स लभते धुवम् ॥ ४॥ भूशय्या ब्रह्मचर्येण, क्रोधलोभविवर्जितः ॥ देवताग्रे पवित्रात्मा, षण्मासै लभते फलम् ॥५॥. अर्हन्तं स्थापयेन्मूर्ति, सिद्धं चक्षुर्ललाटके ॥ .. ... आचार्य श्रोत्रयोर्मध्ये, उपाध्यायं तु नासिके ॥६॥ साधुवृन्दं मुखस्याने, मनःशुद्धि विधाय च ।। सूर्यचन्द्रनिरोधेन, सुधीः सर्वार्थसिद्धये ॥७॥ - जिनपक्षरस्तोत्रं दक्षिणे मदनद्वेषी, वामपाय स्थितो जिनः । अङ्गसन्धिषु,सर्वज्ञः, परमेष्ठी शिवङ्करः ॥८॥ पूर्वाशां च जिनो रक्षे, दाग्नयी विजितेन्द्रियः॥ दक्षिणाशां परब्रह्म, नैती च त्रिकालवित् ॥९॥ पश्चिमाशां जगन्नाथो, वायव्यां परमेश्वरः ।। उत्तरां तीर्थकृत्सर्वामीशानेऽपि निरजनः ॥ १०॥ पातालं भगवानह-त्राकाशं पुरुषोत्तमः,.॥ रोहिणीप्रमुखादेव्यो, रक्षन्तु सकलं कुलम् ॥ ११ ॥ ऋषभो मस्तकं रक्षे,-दजितोऽपि विलोचनम् ॥ सम्भवः कर्णयुगले,ऽभिनन्दनस्तु नासिके ॥ १२॥ ओष्ठं श्रीसुमति रक्षे, इन्तान्पद्मप्रभु विभुः॥ जिव्हां सुपार्श्वदेवोऽयं, तालु चन्द्रप्रभाभिधः ॥ १३॥ कण्ठं श्रीसुविधि रक्षेद, हृदयं श्रीसुशीतलः॥ श्रेयांसो बाहुयुगलं, वासुपूज्यः करद्धंयम् ॥ १६ ॥ अमुलीविमलो रक्षे, दनन्तोऽसौ नखानपि।। श्रीधर्मोऽप्युदरास्थीनि, श्रीशान्ति भिमण्डलम्॥१५॥ श्रीकुन्थु गुह्यकं रक्षे, दरोलोमकटीतरम् ॥ मल्लिरूपृष्ठवंशं, जो च मुनिसुव्रतः ॥ १६... पादाङ्गुलिनमरिक्षे, च्छीनेमि श्चरणद्वयम् ॥ श्रीपार्श्वनाथः सर्वाङ्गं, वर्धमानश्चिदात्मकम् ।।.१७ ॥ पृथिवीजलतेजस्क, वाय्वाकाशमयं जगत्.॥ राजद्वारे श्मशाने च, सङ्ग्रामे शत्रुसङ्कटे। व्याघ्रचौराग्निसर्पादि, भूतप्रेतभयाश्रिते ॥ १९ ॥ अकाल मरणे प्राप्ते, दारिन्यापरसपाश्रिते ॥. अगुत्रत्वे महादुःखे, मूर्खत्वे रोगपीडिते.॥ २० ॥ डाकिनी शाकिनी ग्रस्ते, महाग्रहगणार्दिते.॥ नात्तारेऽध्ववैषम्ये, व्यसने चापदि-स्मरेत् ॥ २१:॥ प्रातरेव समुत्थाय, यः स्मरेजिनपक्षरस्. . . . तस्य किश्चिद्भयं नास्ति, लभते सुखसम्पदः ॥ २२ ॥ - .
१७० श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र. जिनपञ्जरनामेदें, यः स्मरेदनुवासर ॥ कमलप्रभ राजेन्द्र, श्रियं स लभते नरः ॥२३॥ प्रातः समुत्थाय पठेत्कृतज्ञों, यस्तोत्रमेत जनपञ्जराख्यं । आसादयेच्छी कमलप्रभाख्यं, लक्ष्मी मनोवाञ्छित पूरणाय ॥२४॥ श्रीरुद्रपल्लीय वरेण्यगच्छे, देवप्रभाचार्य पदाजहंसः ॥ वादीन्द्रचूडामणिरेषजैनो, जीयाद्गुरुः श्रीकमलप्रभाख्यः ॥२५॥ इति श्रीकमलप्रभाचार्यविरचितं श्रीजिनपञ्जरस्तोत्रं समाप्तम् ॥ ॥ ग्रहशान्तिस्तोत्रम् ।। जगद्गुरुं नमस्कृत्य, श्रुत्वा सद्गुरुभाषितम् ।। ग्रहशान्ति प्रवक्ष्यामि, भव्यानां सुखहेतवे ॥१॥ जन्मलग्ने च राशौच, यदा पीडन्ति खेचराः ॥ तदा संपूजयेद्धीमान्, खेचरैः संहिताग्जिनान् ॥ २॥ पुष्पैर्गन्धैधूपैदीपैः, फलनैवेद्यसंयुतैः॥ वर्णसदृशदानश्च, वस्त्रैश्च दक्षिणान्वितैः ॥३॥ पभप्रभस्य मार्तण्ड, श्चन्द्रश्चन्द्रप्रभस्य च ॥ वासुपूज्यो भूसुतश्च, बुधोऽप्यष्ट जिनेश्वरः ॥४॥ विमलानन्तं धर्माराः, शान्तिः कुन्थु नमिस्तथा ॥ वर्धमानो जिनेन्द्राणां, पादपद्मे वुधो न्यसेत् ॥ ५॥ ऋषभाजितसुपा , श्वाभिनन्दनशीतलौ । सुमतिः संभवस्वामी, श्रेयांसंश्च बृहस्पतिः ॥६॥ '. सुविधेः कथितः शुक्रा, सुव्रतस्य शनैश्चरः ।।
मंत्राधिराजस्तोत्रं. १७.१० नेमिनाथस्य राहुः स्यात्, केतुः श्रीमलिपार्धयोः ॥७॥ जिनानामग्रतः कृत्वा, ग्रहाणां शान्तिहेतवे ॥ नमस्कारशतं भक्त्या, जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥ ८॥ भद्रवाहुरुवाचेदं पञ्चमश्नुतकेवली विद्याप्रवादतः पूर्वात् ग्रहशान्तिविधिं शुभम् ॥९॥ ॐ ही श्री ग्रहाश्चन्द्रसूर्याङ्गारकवुधवृहस्पतिशुक्रशनै- श्वरराहुकेतु सहिताः खेटा जिनपतिपुरतोवस्तियन्तुः मम धनधान्यजयविजयसुखसौभाग्यधृतिकीर्तिकान्तिशान्तितुष्टि- पुष्टिवुद्धिलक्ष्मीधर्मार्थकामदाः स्युः स्वाहा ॥ इति ग्रहशान्ति स्तोत्रं समाप्तम् ॥ अथ मन्त्राधिराजस्तोत्रम् ॥ A श्री पार्श्वः पातु वो नित्यं, जिनः परमशङ्करः ॥ नाथः परमशक्तिश्च, शरण्यः सर्वकामदः ॥१॥ सर्वविघ्नहरः स्वामी, सर्वसिद्धिप्रदायकः ॥ सर्व सत्व हितो योगी, श्रीफरः परमार्थदः ॥२॥ देवदेवः स्वयंसिद्ध, श्चिदानन्दमयः शिवः ॥ परमात्मा परब्रह्म, परमः परमेश्वरः॥३॥ जगन्नाथः सुरज्येष्टो, भूतेशः पुरुषोत्तमः ॥ सुरेन्द्रो नित्य धर्मश्च, श्रीनिवासः शुभार्णवः ॥ ४॥ सर्वशः सर्वदेवेशः सर्वदः सर्वगोत्तमः॥ सर्वात्मा सर्वदर्शी च, सर्वव्यापी जगद्गुरुः ॥५॥ तत्त्वमूर्तिः परादित्यः, परब्रह्मप्रकाशकः ॥. परमेन्दुः परप्राणः,परमामृतसिद्धिदः ॥६॥ अजः सनातनः शम्भु, रीश्वरश्च सदाशिवः ॥ विश्वेश्वरः प्रमोदात्मा, क्षेत्राधीशः शुभप्रदः ॥७॥ साकारश्च निराकारः, सकलो निकलोऽव्ययः ।।
१७२
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
निर्ममो निर्विकारश्च, निर्विकल्पो निरामयः ॥ ८॥
अमरश्चाजरोऽनन्त, एकोऽनन्तः शिवात्मकः।
अलक्ष्यश्चाप्रमेयश्च, ध्यानलक्ष्यो निरखनः ॥९॥
ॐकाराकृतिरव्यक्तो, व्यक्तरूपस्त्रयीमयः ॥
ब्रह्मद्वय प्रकाशात्मा, निर्भयः परमाक्षरः ॥१०॥
दिव्यतेजोमयः शान्तः, परामृतमयोऽच्युतः॥
आद्योऽनाद्यः परेशानः, परमेष्ठी परः पुमान् ॥ ११ ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशः, स्वयम्भूः परमाच्युतः॥
व्योमाकारस्वरूपश्च, लोकालोकावभासकः ॥ १२ ॥
ज्ञानात्मा परमानन्दः, प्राणारूढो मनस्थितिः ॥
मनःसाध्यो मनोध्येयो, मनोहश्यः परापरः ॥ १३ ॥
सर्वतीर्थमयो नित्यः, सर्वदेवमयः प्रभुः।
भगवान् सर्वतत्त्वेशः, शिवश्रीसौख्यदायकः ॥१४॥
इति श्री पार्श्वनाथस्य, सर्वज्ञस्य जगद्गुरोः॥
दिव्यमष्टोत्तरं नाम, शतमत्र प्रकीर्तितम् ॥ १५ ॥
पवित्रं परमं ध्येयं, परमानन्ददायकम् ।।
भुक्तिमुक्तिप्रदं नित्यं, पठते मङ्गलप्रदम् ॥ १६ ॥
श्रीमत्परमकल्याण, सिद्धिदः श्रेयसेऽस्तुवः ।।
पार्श्वनाथजिनः श्रीमान्, भगवान् परमः शिवः ॥१७॥
धरणेन्द्रफणछत्रा-, लंकृतो वः श्रियं प्रभुः ।।
दद्यात्पद्मावती देव्या, समांधिंधितशासनः ॥ १८।।
ध्यायेत्कमलमध्यस्थं, श्रीपार्श्वजगदीश्वरम् ॥
ॐ ही क्लो श्री समायुक्तं, केवलशानभास्करम् ॥१९॥
• पद्मावत्यान्वित वामे, धरणेन्द्रेण दक्षिणे ॥
परितोऽष्टदलंस्थन, मन्त्र राजेन संयुतम् ॥२०॥
अष्टपस्थितैः पञ्च, नमस्कारैस्तथा त्रिभिः॥
शानायुर्वेष्टित नाथ, धर्मार्थकाममोक्षदम् ॥ २१॥
शतषोडशदलारूढं, विद्यादेवीभिरन्वितम् ।।
चतुर्विशतिपत्रस्थं, जिनं मातृसमावृतम् ॥ २२ ॥
ऋषिमण्डलस्तोत्रं. १७३ मायावेग्य प्रयायस्थ, क्रोङ्कारसहितं प्रभुम् ॥ नवग्रहावृतं देवं, दिक्पालैर्दशभिर्वृतम् ॥ २३ ॥ चतुष्कोणेपु मन्त्राद्य, चतुर्वीजान्वितजनैः ।। चतुरष्ट दशद्वीति, द्विधाङ्कसंशकै र्युतम् ॥ २४ ॥ दिक्षु क्षकारयुक्तन, विदिक्षुलाङ्कितेन च ॥ चतुरस्रेण वज्राङ्कक्षितितत्त्वे प्रतिष्ठितम् ।। २५ ।। श्रीपार्श्वनाथमित्येच, यः समाराधये जिनम् ।। तं सर्वपापनिर्मुक्तं, भजते श्रीः शुभप्रदा ।। २६ ॥ जिनेशः पूजितो भक्त्या, संस्तुतः प्रस्तुतोऽथवा ॥ धातस्त्वं यः क्षणवापि, सिद्धरतेषां महोदयः ।। २७ ॥ श्रीपार्श्वयन्त्रराजान्ते, चिन्तामाणिगुणास्पदम् ॥ शान्तिपुष्टिकरं नित्यं, क्षुद्रोपद्रवनाशनम् ।। २८ ।। ऋद्धिसिद्धिमहावुद्धि, धृतिश्रीकान्तिकीर्तिदम् ॥ मृत्युञ्जयं शिवात्मानं, जपन्नान्नन्दितो जनः ॥ २९ ॥ सर्वकल्याणपूर्णः स्या-, जरामृत्युविवर्जितः ॥ अणिमादिमहासिद्धि, लक्षजापेन चाप्नुयात् ।। ३० !! प्राणायाममनोमन्त्र,योगादमृतमात्मनि ।। त्वमात्मानं शिवं ध्यात्वा, स्वामिन् सिध्यन्ति जन्तवः३१ हर्पदः कामदश्चेति, रियुनः सर्वसौख्यदः ॥ पातु वः परमानन्द, लक्षणः संस्मृतो जिनः ॥ ३२॥ तत्त्वरूपमिदं स्तोत्र सर्वमङ्गलसिद्धिदम् ॥ त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्य, नित्यं प्राप्नोति स श्रियम् ॥३३॥ अथ ऋषिमण्डलस्तोत्रं आद्यन्ताक्षरसंलक्ष,-मक्षरंवाप्ययस्थितं । अग्निज्वालासमंनाद, विन्दुरेखासमन्वितं ॥ १ ॥ अग्निज्वालासमाकान्त, मनोमलविशोधक।
श्रीपंचंप्रतिक्रमण एन. । देदीप्यमान हृत्पद्म, तत्पदं नौमि निर्मलं।। ॥ अहमित्यक्षरं ब्रह्म, वाचकं परमेष्ठिनः । सिद्धचक्रस्य सद्वीजं, सर्वतः प्रणिध्महे ॥३॥ ॐनमोऽर्हद्भ्य ईशेभ्यः, ॐ सिद्धेभ्यो नमोनमः ॐनमः सर्वसूरिभ्यः, उपाध्यायेभ्यः ॐनमः ।।४।। ॐनमः सर्वसाधुभ्यः, ॐ ज्ञानेभ्यो नमोनमः। ॐ नमस्तत्त्वदृष्टिभ्य, श्चारित्रेभ्यस्तु ॐनमः॥५॥ श्रेयसेस्तु श्रियेस्त्वेत, दहदाद्यष्टकं शुभं। स्थानप्वष्टसु विन्यस्तं, पृथग्वीजसमन्वितं ॥६॥ आद्य पदं शिखाम्रक्षे, त्परंरक्षेत्तुमस्तक । तृतीयं रक्षेनेने द्वे, तुयें, रक्षेश्चनासिकां ॥७॥ पञ्चमं तु मुखंरक्षेत्, षष्ठं रक्षेच्च घण्टिकां। नाभ्यन्तसप्तमं रक्षेत्, रक्षेत्पादान्तमष्टमं ॥८॥ पूर्वप्रणवतः सान्त, सरफोद्वयब्धिपञ्चषान् । सप्ताष्टदशसूर्याङ्कान् , त्रितोबिन्दुस्वरान् पृथक् ॥९॥ पूज्यनामाक्षरा आद्याः, पंचातोशानदर्शन । श्चारित्रेभ्यो नमोमध्ये, ही सान्त समलंकृतः ॥१०॥ ॐ हाँ ही हुँ हूँ.हे हैं हो हो..हः असिआउसाज्ञानदर्शनचारित्नेभ्योनमः । जंबूवृक्षधरोद्वीपः, क्षारोदधिसमावृतः । अहंदाद्यष्टकैरष्ट, काष्टाधिष्टैरलकृतः ॥ ११ ॥ "तन्मध्य संगतो मेरुः, कूटलरलकृतः । उच्चैरुच्चैस्तरस्तार, स्तारामण्डलमण्डितः ॥१२॥ तस्योपरिसकारान्त, बीजमध्यस्य सर्वगं । नमामिविम्बमाईत्यं, ललाटस्थ निरजनं ॥ १३ ॥ अक्षयंनिर्मलशान्तं, बहुलं जाड्यतोज्झितं । निरीहं निरहङ्कार, सारसारतरं धनं ॥१४॥ अनुद्धतं शुभं स्फतिं, सात्विक राजसं मत। तामसं चिर संम्बुद्धं, तैजसंशसिम ॥१५॥ - प्रापिमण्डलस्तोत्रं १७५ साकारं च निराकारं, सरसं विरसं परं। परापरं परातीतं, परम्पर परापरं ॥ १६ ॥ एकवर्ण द्विवर्ण च, त्रिवर्ण तुर्यवर्णकं । पंचवर्ण महावर्ण, सपरं च परापरं ॥ १७ ॥ सकलं निष्कलं तुष्टं, निवृतं भ्रान्तिवर्जितं । निरसनं निराकारं, निर्लेप वीतसंश्रयं ॥ १८ ॥ ईश्वरं ब्रह्मसंवुद्धं, बुद्धं सिद्धमतंगुरूं। ज्योतिरूपं महादेव, लोकालोकप्रकाशकं ॥ १९ ॥ अर्हदाख्यस्तु वर्णान्तः, सरफो विन्दुमण्डितः। तुर्यस्वरसमायुक्तो, बहुधानादमालितः ॥२०॥ अस्मिन् वीजे स्थिताः सर्वे, ऋषभाद्याजिनोत्तमाः। वर्णनिजैनिजैर्युक्ता, ध्यातव्या स्तनसंगत ॥ २१ ॥ नादश्चन्द्रसमाकारो, विन्दु लसमप्रभः । फलारुणसमासान्तः, स्वर्णाभः सर्वतोमुखः ॥२२॥ शिरः संठीन ईकारो, विनीलोवर्णतः स्मृतः। वर्णानुसारसलीन, तीर्थकृन्मण्डलंस्तुमः ॥ २३॥ चन्द्रप्रभपुष्पदन्तौ, नादस्थितिसमाश्रितो । बिन्दुमध्यगतौ नेमि, सुवृतौ जिनसत्तमौ ॥ २४ ॥ पद्मप्रभवासुपूज्यौ, कलापदमधिटितौ। शिर ईस्थितिसंलीनौ, पार्श्वमलीजिनोत्तमौ ॥२५॥ शेषा स्तीर्थकरा सर्वे, हरस्थाने नियोजिताः। मायावीजाक्षरं प्राप्ता, श्चतुर्विशतिरहती ॥२६॥ गतरागद्वेषमोहाः, सर्वपापविवर्जिताः । सर्वदा सर्वलोकेषु, ते भवन्तु जिनोचमाः ॥२७॥ देवदेवस्य यश्चक्र, तस्य चक्रस्य का विभा।'... तयाच्छादित सर्वाङ्गं, मा मां हिंसन्तु डाकिनी ॥२८॥ देवदेवस्य यश्चक्रं, तस्य चक्रस्य या विभा॥ तयाच्छादित सर्वाङ्गं, मा मां हिंसन्तु राकिनी ॥ २९ ॥ देवदेवस्य यश्चक्रं, तस्य.चक्रस्य या विभा। -
१७६
श्रीपंचप्रतिक्रमण सूत्र.
.
तयाच्छादित सर्वाङ्ग, मा मां हिंसन्तु लाकिनी ॥ ३०॥
देवदेवस्य यश्चक्रं, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्गं, मा मां हिंसन्तु काकिनी ॥ ३१ ॥
देवदेवस्य पश्चक्रं, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सङ्ग, मा मां हिंसन्तु शाकिनी ॥ ३२॥
देवदेवस्य यश्चक्रं तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्गं, मा मां हिंसन्तु हाकिनी ॥ ३३ ॥
देवदेवस्य यश्चक्र, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्ग, मा मां हिंसन्तु याकिनी ॥ ३४॥
देवदेवस्य यश्चक्रं, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्गं, मा मां हिंसन्तु पन्नगा ॥ ३५॥
देवदेवस्य यश्चक्र, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्गं, मा मां हिंसन्तु हस्तिनः ॥ ३६॥
देवदेवस्य यश्चक्रं, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्ग, मा मां हिंसन्तु राक्षसाः ॥ ३७ ॥
देवदेवस्य यश्चक्रं, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्गं, मा मां हिंसन्तु वन्यः ॥ ३८॥
देवदेवस्य यश्चक्र, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्गं, मा मां हिंसन्तु सिंहकाः ॥ ३९ ॥
देवदेवस्य यश्चक्रं, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्ग, मा मां हिंसन्तु दुर्जनाः ॥ ४०॥
देवदेवस्य यश्चक्र, तस्य चक्रस्य या विभा।
तयाच्छादित सर्वाङ्ग, मा मां हिंसन्तु भूमिपाः ॥४१॥
श्रीगौतमस्य या मुद्रा, तस्या या भुवि लब्धयः।
ताभिरभ्युद्यत ज्योति, रहं सर्वनिधीश्वराः ॥ ४२ ॥
पातालवासिनो देवा, देवा भूपीठवासिनः।
स्वर्वासिनोऽपि ये देवाः, सर्वे रक्षन्तु मामितः॥४३॥
येऽवधिलब्धयो ये तु, परमावधि लब्धयः ।
ते सर्वे मुनयो देवाः, मां संरक्षन्तु सर्वतः॥४४॥
प्रषिमण्डलस्तोत्रं. ७ दुर्जना भूतवेतालाः, पिशाचा मुद्गलास्तथा । ते सर्वेऽप्युपशाम्यन्तु, देवदेवप्रभावतः ॥ ४५ ॥ ॐ हीं श्रीश्चधृतिर्लक्ष्मी, गौरी चण्डी सरस्वती। जयाम्बा विजया नित्या, क्लिन्नाऽजिता मदद्वा॥ ४६॥ कामागा कामवाणा च, सानन्दा नन्दमालिनी। माया मायाविनी रौद्री, कला काली कलिप्रिया ॥४७॥ एताः सर्वा महादेव्यो, वर्तन्ते या जगत्त्रये । मह्यं सर्वाः प्रयच्छन्तु, कान्ति कीर्ति धृति मतिम्॥४८॥ दिव्यो गोप्यः सुदुष्प्राप्यः, श्रीऋषिमण्डलस्तवः। भाषितस्तीर्थनाथेन, जगत्त्राणकृतोऽनघः ॥ ४९ ॥ रणे राजकुले वन्हौ, जले दुर्गे गजे हरौ। श्मशाने विपिने घोरे, स्मृतो रक्षति मानवम् ॥५०॥ राज्यभ्रष्टा निजं राज्य, पदभ्रष्टा निज्यं पदम् । लक्ष्मीम्रया निजां लक्ष्मी, प्राप्नुवन्ति न संशयः ॥५१॥ भार्यार्थी लभते भाया पुत्रार्थी लभते सुतम्। वित्तार्थी लभते वित्तं, नरः स्मरणमात्रतः ॥५२॥ स्वर्णे रूप्ये पटे कांस्ये; लिखित्वा यस्तु पूजयेत् । तस्यैवाष्टमहासिद्धिग्रैहे वसति शाश्वती ।। ५३ ।। भूर्जपत्रे लिखित्वेद, गलके मूनि वा भुजे। धारितं सर्वदा दिव्यं, सर्वभीतिविनाशकम् ।। ५३ ॥ भूत प्रेतैर्ग्रहयः, पिशाचैर्मुद्गलैर्मलैः । वातपित्तकफोद्रेर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ ५५ ॥ भूर्भुवःस्वस्त्रयापीठवर्तिनः शाश्वता जिनाः । तैः स्तुतैवदितैर्यत्फलं तत्फलं स्मृतेः ॥५६॥. एतद्गोप्य महास्तोलं, न देयं यस्य कस्यचित् । मिथ्यात्ववासिने दत्ते, बालहत्या पदे पदे ॥ ५७ ॥ आचाम्लादितपः कृत्वा, पूजयित्वा जिनावलीम् । अपसाहस्त्रिको जापा, कार्यस्तत्सिद्धिहेतवे ॥ ५८ ॥ संतमष्टोत्तर प्रातयें पठन्ति दिने दिने । १२.
१७८ श्रीपंचप्रतिक्रमणसूत्रम्. तेषां न व्याधयो देहे, प्रभवन्ति न चापदः ॥ ५९ ॥ अष्टमासावधिं यावत्, प्रातः प्रातस्तु यः पठेत् । स्तोत्रमेतन्महातेजो, जिनविम्ब स पश्यति ॥ ६॥ दृष्टे सत्याहतो विम्बे, भवे सप्तमके ध्रुवं । पदं प्राप्नोति शुद्धात्मा; परमानन्दनन्दितः ।। ६१॥ विश्ववन्द्यो भवेत् ध्याता, कल्याणानि च सोऽनुते । गत्वा स्थानं परं सोऽपि, भूयस्तु न निवर्तते ॥ ६२॥ इदं स्तोत्रं महास्तोत्रं, स्तुतीनामुत्तमं परं । पठनात्स्मरणाजापालभ्यते पदमुत्तमं ॥ ६३ ।। इति श्रीऋषिमंडलस्तोत्रं ...... अथ श्रीसिद्धसेनीदवाकरकृतः शक्रस्तवः । "+. ॐनमोऽहते परमात्मने परमज्योतिषे परमपरमेष्ठिने परम- वेधसे परमयोगिने परमेश्वराय तमसः परस्तात् सदोदिता- दित्यवर्णाय समूलोन्मूलितानादिसकलक्लेशाय । नमो भूर्भुवः स्वस्त्रयीनाथ ‘मौलिमन्दारमालाचिंतक्रमाय सकल- पुरुषार्थयोनिनिषद्यविद्या प्रवर्तनै कविराय नमः स्वस्ति सुधास्वाहा वषडअर्थंक.न्तशान्तमूर्तये भवद्भाविभूतभा- वावभासिने कालपाशनाशिने सत्वरजस्तमोगुणातीताय अनंतगुणाय वाङ्मनसामगोचरचरित्राय पवित्राय कारण- कारणाय तारणतारणाय सात्विकदेवताय तात्विकजीविता. य निर्ग्रन्थब्रह्मदयाय योगिंद्रप्राणनाथाय त्रिभुवनभव्यकुल- नित्योत्सवाय विज्ञानानंदपरब्रह्मैकात्म्यसमाधये हरिहरहिर- ण्यगर्भादिदेवतापरिकलितस्वरूपाय सम्यग्ध्येयाय सम्यग्- श्रद्धेयाय सम्यग्शरण्याय सुसमाहितसम्यग्स्पृहणीयाय ॥१॥ ॐनमोहते भगवते आदिकराय तीर्थंकराय स्वयंसंबु- द्धाय पुरुषोत्तमाय पुरुषसिंहाय पुरुषवरपुण्डरीकाय पुरुषपर- सीसिद्धसेनदिवाकरशकस्तव १७९ गन्धहस्तिने लोकोसमाय लोकनाथाय लोकहिताय लोकप्र- घोतकारिणे लोकप्रदीपाय अभयदाय दृष्टिदाय मुक्तिदाय वोद्धिदाय धर्मदाय जीवदाय शरणदाय धर्मदेशकाय धर्म- नायकाय धर्मसार्थये धर्मघरवउरंतचक्रवर्तिने व्यावृत. छद्मने अप्रतिहतसम्यग्ज्ञानदर्शनलझने ॥२॥ ॐनमोर्हते जिनाय जीयकाय तीर्णाय-तारकाय घुद्धाय बोधकाय मुक्ताय मोचकाय निकालविदे पारङ्गताय कर्माप्टकनिपूदनाय आदि. स्वराय शम्भव स्वयम्भुवेजगत्प्रभवेजिनेश्वराय स्याद्वादवादिने सर्वाय सर्वशाय सर्वदर्शिने सर्वतीर्थापनिपदे सर्वपाखण्ड. मोचिने सर्वयशकूलात्मने सर्वक्षकलात्मने सर्पयोगरहस्याय केवलिने देवाधिदेवाय वीतरागाय ॥३॥ ॐ नमोऽहंते पर मात्मने परमकारुणिकाय सुगताय तथागताय महाहंसाय हंसराजाय महासत्वाय महाशिवाय महाबौद्धाय महामैत्राय सुगताय सुनिश्चिताय विगतद्वन्द्वाय गुणाधये लोकनाथाय जितमारबलाय ॥४॥ ॐ नमोऽहते सनातनाय उत्तमश्लो- काय मुकुन्दाय गोविन्दाय विष्णवे जिष्णवे अनन्ताय अच्युताय श्रीपतये विश्वरूपाय हृषीकेशाय जगन्नाथाय भुर्भूधास्वःसमु. ताराय मानसराय कालसराय ध्रुवाय अजेयाय अजाय अच- लाय अव्ययाय विभवे अचिन्त्याय असङ्ख्येयाय आदिसंख्याय आदिकेशाय आदिशिवाय महाब्रह्मणे परमशिवाय एकान- कान्तस्वरूपिणे भावाभावविवर्जिताय अस्तिनास्तिद्वयाती- ताय पुण्यपापविरहिताय सुखदुःखविविक्ताय व्यक्ताव्यक्त. स्वरूपाय अनादिमध्यनिधनाय नमोऽस्तु मुक्तिस्वराय ॥५॥ ॐ नमोहंते निरातङ्काय निःशङ्काय निर्भयाय निर्द्वन्द्वाय निस्त- रङ्गाय निरूमये निरामयाय निःकलङ्काय परमदेवताय सदा- शिवाय महादेवाय शङ्कराय महेश्वराय महावतिने महायो- गिने पञ्चमुखाय मृत्युंजयाय अष्टमूर्तये भूतनाथाय जगदान- न्दाय जगद्धीमहाय जगद्देवाधिदेवाय जगदीश्वराय जगदादि- कन्दाय जगद्भास्वते जगत्कर्मसाक्षिणे जंगचक्षुषे त्रयीतनवे श्रीपंचप्रतिक्रमणसूत्र. . अमृतकराय शीतकरायज्योतिश्चक्रिणे महाज्योतिर्महातमः पा. रेसुप्रतिष्ठिताय स्वयंको स्वयंहां स्वयंपालकाय आत्मेश्वराय नमो विश्वात्मने।।ॐनमोऽहते सर्वदेवमयाय सर्वध्यानमयाय सर्वज्ञानमयाय सर्वतेजोमयाय सर्वमन्त्रमयाय सर्वरहस्यमयाय सर्वभावाभावजीवाजीवेश्वराय अरहस्यरहस्याय अस्पृहस्पृह णीयाय अचिन्त्यचिन्तनीयाय अकामकामधेनवे असङ्कल्पितक- ल्पद्रुमाय अचिन्त्यचिन्तामणये चतुर्दशरज्ज्वात्मकजीवलोक- सूडामणये चतुरशीतीजिवयोनिलक्षमाणिनाथाय पुरुषार्थ नाथाय परमार्थनाथाय अनाथनाथाय जीवनाथाय देवदानव- सिद्धसेनाधिनाथाय ॥ ७ ॥ ॐ नमोहते निरञ्जनाय अनन्त- कल्याणनिकेतनकीर्तिताय' 'सुगृहीतनामधेयाय र्धारोदात्त- धीरोद्धतधीरशान्तधीरललितपुरुषोत्तमपुण्यश्लोकशतसहस्र- लक्षकोटिवन्दितपादारविन्दाय सर्वगताय ॥ ८॥ ॐ नमोऽहं- ते सर्वसमर्थाय सर्वप्रदाय सर्वहिताय सर्वाधिनाथाय कस्मैच नक्षेत्राय यात्राय तीर्थाय पावनाय पवित्राय अनुत्तराय उत्तराय योगाचार्याय सम्प्रक्षालनाय प्रवराय अग्राय वाचस्पतये माङ्ग- ल्याय सर्वात्मनाथाय सर्वार्थाय अमृताय सदोदिताय ब्रह्मचा- रिणे तायिने दक्षिणीयाय निर्विकाराय वज्रऋषभनाराच- मूर्तये तत्वदृश्वने पारदर्शिने निरुपमज्ञानबलवीर्यतेजः शकैश्वर्यमयाय आदिपुरुषाय आदिपरमेष्ठिने आदिमहेशाय महाज्योतिःसत्वाय महार्चिधनेश्वराय महामोहसहारणे महा- सत्वाय महाज्ञानमहेन्द्राय महालयाय महाशान्ताय महायोगी- न्द्राय अयोगिने महामहीयले महाहंसराजाय महासिंद्धाय शिवमचलमरूअमनन्तमक्षयमवावाधमपुनरावृत्ति महानन्द महोदयं सर्वदुःखक्षय कैवल्यममृतं निर्वाणमक्षरं परब्रह्म नि- श्रेयसमपुनर्भवं सिद्धिगतिनामधेयं स्थानं सम्प्राप्तवते चरा- चरमरते नमोऽस्तु.श्रीमहावीराय त्रिजगत्स्वामिने श्रीवर्द्धमा. नाय विशालशासनाय निर्विकल्पाय सर्वलब्धिसम्पन्नाय कल्प.
श्रीसिद्धसेनदिवाकरकृत शस्तव, १८१ मातीताय कलाकलापकल्पिताय ॥९॥ । ॐ नमोऽहते .फेवालिने परमयोगिन विस्फुरदुरुशुक्लध्यानाग्निनिर्दग्धकर्मबीजाय प्राप्ता- नन्तचतुष्टयाय सौम्याय शान्ताय मङ्गलवरदाय अष्टादशदो- परहिताय संसृतविश्वसमीहिताय स्वाहा ।। वहीं श्रीं अह नमः ॥१०॥ लोकोत्तमोनिःप्रतिमस्त्वमेव, त्वं शाश्वत मॉलमप्यधीश! ॥त्वामेकमहन् शरणं प्रपद्ये, सिद्धर्षिसद्धर्म- मयास्त्वमेव ॥१॥ त्वमेवमाता पिता नेता, देवी धर्मो गुरु परः ॥ प्राणाः स्वर्गापवर्गश्च, सत्वं तत्वं गतिर्मतिः..॥२॥ जिनो दाता जिनोभोक्ता,जिनः सर्वमिदं जगत् ॥ जिनो. जगति सर्वत्र,यो जिनः सोऽहमेव च ॥३॥ यत्किंचित् कुर्महे देव! सदा सुकृतदुःकृतं ॥ तन्मे निजपदस्थस्य, दुःखंक्षपय त्वं जिन !॥ ४॥ गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं, गृहाणास्मत्कृतं जपं ॥ सिद्धिः श्रयति मां येन, त्वत्प्रसादात्वयि स्थितं ॥५॥ इति श्री वर्धमानजिननाममन्त्रस्तोत्रं प्रतिष्ठायां शान्तिकविधौ पठितो महासुखाय स्यात् ॥ इति श्रीसिद्धसेनदिवाकरकृतशकस्तवः संपूर्णः ॥ . ॥श्री॥ अथ अनुभूतसिद्धसारस्वतस्तवः । की अर्हम् कलमरालविहङ्गमवाहना, सितदुकूलविभूषणलेपना। प्रणतभूमिरुहामृतसारिणी, प्रवरदेहविभाभरधारिणी ॥१॥ अमृतपूर्णकमण्डलुधारिणी, त्रिदशदानवमानवसेविता। भगवती परमेव सरस्वती, मम पुनातु सदा.नयनाम्बुजम् ॥२॥ जिनपतिप्रथिताखिलवाङ्मयी, गणधराननमण्डपनर्तकी ।
१०१ श्रीपंचप्रतिक्रमणसूत्र. गुरुमुखाम्वुजखेलनहसिका, विजयते जगति श्रुतदेवता ॥३॥ अमृतदीधितिविम्वसमानना, त्रिजगतीजननिर्मितमाननाम् । नवसरोमृतचीचिसरस्वती,प्रमुदितःप्रणमामि सरस्वतीम्॥४॥ विततकेतकपत्रविलोचने, विहितसंसृतिदुःकृतमोचमे । धवलपक्षविहङ्गमलाच्छिते, जयसरस्वति पूरितवाञ्छिते।। भवदनुग्रहलेशतरङ्गिता, स्तदुचितं प्रवदन्ति विपश्चितः। नृपसभासुयतः कमलाबला, कुचकलाललनानि वितन्यते॥६॥ गतधना अपि हि त्वदनुग्रहात्, कलितकोमलवाक्यसुधोर्मयः चकितवालकुरङ्गविलोचना, जनमनांसि हरन्तितरां नराः॥७॥ करसरोरुहखेलनचञ्चला, तव विभाति वरा जपमालिका। श्रुतपयोनिधिमध्यविकस्वरोज्ज्वलतरङ्गकदाग्रहसाग्रहा ॥८॥ द्विरदकेसरिमारिभुजङ्गमा, सहनतस्करराजरुजाम्भयम् । तव गुणावलिगानतरङ्गिणा, न भविनां भवति श्रुतदेवते ॥९॥ विधिविधान ॐ ही क्ली ब्ली ततःश्री तदनुहसकलहिमांथो नमोऽक्न्ते लक्षं साक्षाजपेद्यः करसमविधिना सत्तपा ब्रह्मचारी ॥ निर्यान्ती चंद्रबिम्बात् कलयति मनसा त्वां जगञ्चन्द्रिकाभाम्। सोऽत्यर्थं वह्निकुण्डे विहितकृतहुतिः स्याद्दशांशेन विद्वान् १० रे रे लक्षणकाव्यनाटककथाचम्पूसमालोकने । कायसं वितनोषि बालिश मुधा किं नम्रवक्ताम्बुजः ॥ भक्त्याऽऽराधयं मन्त्रराजमहसा तेनानिशं भारती। येन त्वं कवितावितानसविताद्वैतप्रबुद्धायसे ॥ ११ ॥ चञ्चञ्चन्द्रसुखीप्रसिद्धमहिमास्वाच्छन्धराज्यप्रदा- नायासेन सुरासुरेश्वरगणैरभ्यर्थिता भक्तिनः ।। देवी संस्तुतवैभवा मलयजालेपाङ्गरलद्युतिः।