Adarsh Library, Jaipur
Jay Enkling
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जय एकलिंग
[राष्ट्रीय, सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि में आज के युग
समस्याओं से समन्वित, ऐतिहासिक उपन्यास]
परदेशी
अनुराग प्रकाशन, अजमेर
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जय एकलिंग
"यह एकलिंग का आसन
इस पर न किसी का शासन
न इसकी
यह सिंहासन अभिमानी है !"
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...."
चित्तौड़गढ़ के विशाल राजमाग पर, अत्यन्त गम्भीर और मधुर,
बहुत बुलन्द और शानदार एक स्वर गूंज रहा था-
"धणीखम्मा अन्नदाता ! घणीसम्मा !!"क्षत्रिय-कुल-मयंक
शत्रुलंक मह निशंक...चंदेरी के महाराजकुमार, मेदपाट के परम
पुण्यवान् "माणेजलानजी पधार रहे “धन्य-धन्य धरतीषणी,
रायमल्ल सिरमौर ! गढ़वका सिसौदिया, रणबंका राठौर !! बड़े
जाओ महरवान ! " महाराजकुमार मेदिनीराय का मार्ग प्रशस्त
हो ! “मार्ग दीजिए
एक लम्बे कद का, ऊंचा. पूरा, वीर, वृद्ध चारण अपने गम्भीर
स्वर में पुकार रहा था। उसके पीछे-पीछे तरुण मेदिनीराय था ।
दोनो महाबली महाराणा के निजी कक्ष तक पहुंच चुके थे।
भीतर अत्यन्त तेजवन्त, प्रचण्ड, प्रतापी राजपुरुष, किसी निकट जन से
कह रहा था-"मेदिनीरायजी को मेवाड़ के युवराज के समान
पद-मर्यादा और सम्मान सहित सादर लिवा-लाभो वे हमारी परम भाग्या,
पूज्या भगिनी के स्मृति-चिह्न हैं।"
"अन्नदाता, बाहर प्रतिहारियो के स्वर उठ रहे हैं, शायद
महाराजकुमार पधार रहे हैं।"
!" इतना "अच्छी बात है। फिर तो हम उन्हीं के साथ सभा में जाएंगे। आज वे भी पहली बार महाकालेश्वर भगवान् एकलिंग का दरवार देखेंगे।" तब तक राजकीय उच्चाधिकारियों, महाराणा के अंगरक्षकों, सामन्तों और मन्त्रियों की स्वागत-मण्डली से घिरा मेदिनीराय आ पहुँचा- "घणी खम्मा अन्नदाता।" कहकर मेदिनीराय ने सिर झुकाकर, हाथ बढ़ाकर महाराणा के चरण छने का प्रयास किया, किन्तु उसके पूर्व ही महाराणा रायमल्ल ने उसे छाती से लगा लिया- "आज हमारी पुण्यवती बहन की स्मृति फिर से सजीव हो गई। विल्कुल मां-जैसा ही चेहरा है " बहुत वर्षों बाद आए कहते कहते महाराणा की आँखें भर आईं। सामन्तों और मन्त्रियों ने सिर झुका लिए । उद्घोषक ने घोषणा की--"पधारिए, सर्वजन भगवान् एकलिंग के राजदरवार के मुहूर्त का स्वागत करने पधारिए !" सुनकर सब लोग राजदरवार की ओर चल दिए । सबके जाने पर, मेदिनीराय के साथ महाराणा ने भी प्रस्थान किया । महाराणा रायमल्ल का भगवान् एकलिंग के 'दीवान' का दरबार देखकर, मेदिनीराय देखता ही रह गया ! शौर्य, शक्ति, ऐश्वर्य, वैभव, वीरता, त्याग, तप, तेज और तारुण्य प्रखर प्रदर्शन यहाँ प्रस्तुत था। महाराणा के प्रविष्ट होते ही चारणों ने अत्यन्त शौर्य-सम्पन्न-वीरों के भुज-दण्डों को फड़कानेवाले गम्भीर किन्तु मधुर स्वर में डिंगल के दोहों और सोरठों का पाठ प्रारम्भ किया। पृष्ठभूमि में कमनीय, कान्त कंठ से अत्यन्त रूपवन्त गायिकाएँ संस्कृत के गीतों का गान कर रही थीं। बांद्य-यन्त्रों से अत्यन्त मन्द स्वर उठ रहा था और इन सब के बीच वीरों की तलवारें सुशोभित थों और मर्दो की मूंछे चमक रही थीं। ऐसा प्रतीत होता था, मानो - २ : जय एकलिंग नर-सिंहों का मेला लगा है, अथवा वनराजों की महफिर है ! मेवाड़ के अत्यन्त मूल्यवान मणिमुक्ताओ, रत्नों और हीरों से सचित स्वर्ण सिंहासन पर राजमुकुट धारण किए महाराणा रायमल्ल विराजमान या। यह मिहासन व्यक्ति रायमल्ल का नहीं, मेवाड के महाराणाओं का नहीं, भगवान् एकलिंग का प्रासन था। अत. महाराणा एक और हटकर बैठा था, बुद्धिमान् महामन्त्री जिम प्रकार अपने स्वामी नरेन्द्र के ग्रामन पर, आवश्यकता पड़ने पर बैठ कर, राजकाज संभालता है, उसी प्रकार एकलिंग का महामन्धी या दीवान-महाराणा रायमल्ल सिंहासन पर सुशोभित था। उसके एक हाथ में दुर्गा-चण्डी को दी हुई अति कराल कालमुखी तलवार थी, जो अपनी अलौकिक छटा छिटका रही थी। राणा को आयु कठिनाई से तीस वर्ष की होगी, किन्तु उसके शरीर पर पचास से अधिक घाव विद्यमान थे। मेदिनीराय भी अपने विशेप आसन पर आमीन था। वह ध्यान से इरा देव-सभा के सदस्यो और सूरमाओ को देख रहा था । एक सौ आठ प्रधान मामन्त थे. इक्कीस मंत्री थे, अन्य पण्डितों को मण्डली के प्रकाण्ड पण्डित थे । राजकवि, चिशकार और कलाकार थे। राजगायिका, राजनर्तकी और अन्य नतंकियां थी। गरमें सम्मानीय महाराणा के संग रणांगणों में रहने वाले राजचारण थे। राजपुरोहित थे । राजदूत थे । देश-देशान्तरो और द्वीप-द्वीपान्तरों के प्रतिनिधि मोर दूत थे। बन्दी म्लेच्छ, वन्दी यवन, वन्दी फिरङ्गी और बन्दी राजेन्द्र थे। अन्य अनेक महत्त्वपूर्ण जन थे ! एक ही बार में मदमत्त गजराज का झुंड काटकर गिरा देनेवाला देवगढ़ का राजकुमार था। महाराणा का छोटा भाई सूरजमल था। यही प्रणवीर देवलिया- प्रतापगढ के भावो शामकों का पूर्वज, 'महाप्रतापी सूर्यमल्ल था। यह अकेला ही एक सहस्त्र सूरमानो को भगा देता था। उनको चलती तलवारो के बीच से अपने घोडे को दौड़ाता निकल सकता था । यह धीर, वीर, गम्भीर, संयमी और चरित्रवान् था । मेवाड़ की सतत् जय एकलिंग:३ ।
A रक्षा और उसके निमित्त अपने प्राणों का विसर्जन ही, इसका स्वन्न था । व्याघ्र की सवारी करनेवाला इसका कुल-दीपक-वाघ रावत भी था, जो वाद में 'रावत वापसिंह' के नाम से इतिहासों में अमर हो गया। वासिंह की शक्ति से आतंकित म्लेच्छों के दल-वादल लड़ने से पहले ही पलायन का पंथ पकड़ते थे। मेवाड़ की सेना के 'हरावल' में रहने का महान् अधिकारी सलुम्बर का महेन्द्र था। वह अर्जुन-सा वोर और कर्ग-सा दानी था । उसका दान म्लेच्छों को भी प्रभावित कर चुका था। झालाओं का पूर्वज रामसिंह झाला था। वह अपने त्याग के लिए प्रसिद्ध था। महावली तेजसिंह था। प्रचण्ड धर्नु धर धर्मसिंह था। तलवार का धनी अक्षयसिंह था । सुन्दरियों का सरस उपासक परन्तु समरांगणों का सरल पुजारी प्रतापसिंह था । एक हाथ में यवन-प्रिया की पाती और दूसरे में दुधारी तलवार लेकर जूझने वाला केसरीसिंह था। शब्दवेधी वाण चलाने में निपुण गजेन्द्रसिंह था। जिसकी भुजाएँ विशाल थीं और हाथों की उँगलियाँ घुटनों से नीचे पहुँचती थीं। वह दस-हाथ लम्बा भाला चलाकर, बोणित-सपर भर-भर कर, चण्डी को रिझाने में तल्लीन रहनेवाला दुर्गासिंह भालावत था। केसरिया वाना पहनकर अनेकवार म्लेच्छ-दलों को कमल-पत्र की तरह चीर देने वाला चामुण्डराय था । अपनी विविध सुगन्धियों से शत्रुसेना के गयन्द और अश्वों को भ्रमित कर देने वाला सुगन्धपति माणिकचन्द्र गांधी था। इनके अतिरिक्त, भीमसिंह, वीरसिंह, पहाडसिंह, भुजवलीसिंह, विक्रमसिंह, सूर्यसिंह, रूपसिंह, अमरसिंह, रामसिंह, रघुराजसिंह, तेवरसिंह और नरवरसिंह-जैसे सेनानायक और दुर्गपाल थे । राजपूतों की सभी शाखाओं, उपशाखानों और उपजातियों के नेता, अगुया और नायक थे। चौहानों का विख्यात वीर चरणसिंह था। राठौरों का राजदंड- ४ : जय एकलिंग उक्षक-रणवीरसिंह था। कछवाहों का व्यूह-विशारद सुरजनसिंह था। हाड़ाओ का हठी हिम्मतसिंह पा । परमारी का प्रखरसिंह था। सबको, महाराजकुमार मेदिनीराय ने एक-एककर देखा । ज्यों-ज्यो देसता गया, उसका मन प्रसन्न हुग्रा, चेहरा चमकने लगा और भुजाएँ फड़कने लगी, किन्तु एक कोने में एक तरुण को देखकर उसकी आँखें वही टिकी रह गई। अनिमेप दृष्टि से उसने उस वीर वेशधारी को देखा। तभी राणा ने आदेश दिया-"महामंत्रीजी, कल हमने जिन कविराग को मिलने का समय दिया था, उन्हें अवसर दिया जाए। तत्पश्चात् राजकार्य प्रारम्भ हो।" "जो पाना अन्नदाता !" कहकर, महामंत्री ने कांठल-निवासी कविरागा को बुताया। कविराजा के स्वागत के लिए, स्वयं महाराणा अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए। तुरन्त सर्व सामन्त, मंत्री और शासक-वर्ग खड़ा हो गया। इस अनपेक्षित, अपूर्व सत्कार से कवि का मन प्रसन्न हुआ और अपने मे मस्त, वह गर्जनमय स्वर से कवित्त सुनाने लगा। सुनकर शान्त सभा, दरवार अनायास पुकार उठा-"साघु! साधु!! धन्य ! धन्य !! वाह ! वाह !!" मेदिनीराय भी तन्मयतापूर्वक सुन रहा था। उसका रोम-रोम हिंदू-सूर्य महाराणा की कीर्ति कथा, सुनकर प्रसन्न था। महाराणा सुनकर प्रसन्न हुए । तनिक मुसकरा कर उन्होंने महामत्री की भोर देसा-"कोटि मुद्रा-पसाव और पैरों मे पह्नने को सोना, राजकीय सम्मान ।" इस पर कविराज ने आशीर्वाद के साथ दानवीर सम्राट् को दोहे में धन्यवाद दिया। इसी समय एक वीर सैनिक दरवार में उपस्थित हुआ और माज्ञा पाकर उसने अपने पास के राजकीय-पत्र सम्राट् की सेवा में प्रस्तुत किए। ! जय एकलिंग:५ रक्षा और उसके निमित्त अपने प्राणों का विसर्जन ही, इसका स्वन्न था । व्याघ्र की सवारी करनेवाला इसका कुल-दीपक-बाध रावत भी था, जो वाद में 'रावत वाघसिंह' के नाम से इतिहासों में अमर हो गया। बाघसिंह की शक्ति से आतंकित म्लेच्छों के दल-बादल लड़ने से पहले ही पलायन का पंथ पकड़ते थे । मेवाड़ की सेना के 'हरावल' में रहने का महान् अधिकारी सलुम्बर का महेन्द्र था। वह अर्जुन-सा वीर और कर्ण-सा दानी था । उसका दान म्लेच्छों को भी प्रभावित कर चुका था। झालाओं का पूर्वज रामसिंह झाला था। वह अपने त्याग के लिए प्रसिद्ध था। महावली तेजसिंह था। प्रचण्ड धर्नु धर धर्मसिंह था। तलवार का धनी अक्षायसिंह था। सुन्दरियों का सरस उपासक परन्तु समरांगणों का सरल पुजारी प्रतापसिंह था । एक हाथ में यवन-प्रिया की पाती और दूसरे में दुधारी तलवार लेकर जूझने वाला केसरीसिंह था। शब्दवेधी वाण चलाने में निपुण गजेन्द्रसिंह था। जिसकी भुजाएँ विशाल थीं और हाथों की उँगलियां घुटनों से नीचे पहुंचती थीं। वह दस-हाथ लम्बा भाला चलाकर, गोणित-खप्पर भर-भर कर, चण्डी को रिझाने में तल्लीन रहनेवाला दुर्गासिंह भालावत था। केसरिया वाना पहनकर अनेकवार म्लेच्छ-दलों को कमल-पत्र की तरह चीर देने वाला चामुण्डराय था। अपनी विविध सुगन्धियों से शत्रुसेना के गयन्द और अश्वों को भ्रमित कर देने वाला सुगन्धपति माणिकचन्द्र गांधी था। इनके अतिरिक्त, भीमसिंह, वीरसिंह, पहाड़सिंह, भुजवलीसिंह, विक्रमसिंह, सूर्यसिंह, रूपसिंह, अमरसिंह, रामसिंह, रघुराजसिंह, तेवरसिंह और नरवरसिंह-जैसे सेनानायक और दुर्गपाल थे। राजपूतों की सभी शाखाओं, उपशाखाओं और उपजातियों के नेता, अगुआ और नायक थे। चौहानों का विख्यात वीर चरणशिंह था। राठौरों का राजदंड- ४ : जय एकलिंग क्षक-रणवीरसिंह था ! कववाहों का व्यूह-विशारद सुरजनसिंह था। हाड़ानो का हठी हिम्मतसिंह था। परमारो का प्रखरसिंह था। सवको, महाराजकुमार मेदिनीराय ने एक-एककर देता। ज्यों-ज्यो देखता गया, उसका मन प्रसन्न हुआ, चेहरा चमकने लगा और भुजाएँ फड़कने लगी, किन्तु एक कोने में एक तरुण को देखकर उसकी आँखें वही टिकी रह गई । अनिमेष दृष्टि से उसने उस वीर पेशधारी को देसा। तभी राणा ने आदेश दिया-"महामंत्रीजी, कल हमने जिन कविराज को मिलने का समय दिया था, उन्हें अवसर दिया जाए। तत्पश्चात् राजकार्य प्रारम्भ हो।" "जो माज्ञा अन्नदाता!" कहकर, महामंत्री ने कांठल-निवासी कविराजा को बुलाया। कविराजा के स्वागत के लिए, स्वयं महाराणा अपने सिंहासन से उठ राड़े हुए। तुरन्त सर्व सामन्त, मंत्री और शासक-वर्ग सड़ा हो गया। इस अनपेक्षित, अपूर्व सत्कार से कवि का मन प्रराम हुआ और अपने में मस्त, वह गर्जनमय स्वर से कवित्त सुनाने लगा। सुनकर शान्त सभा, दरबार अनायास पुकार उठा -"साधु! साधु!! धन्य ! धन्य !! वाह ! वाह !!" मेदिनीराय भी तन्मयतापूर्वक सुन रहा था। उसका रोम-रोम हिंदू-सूर्य महाराणा की कीर्ति-कथा, सुनकर प्रसन्न था। महाराणा सुनकर प्रसन्न हुए। तनिक मुसकरा कर उन्होंने महामत्री फी पोर देसा-"कोटि मुद्रा-पसाव और पैरों में पहनने को सोना, राजकीय सम्मान।" इस पर कविराज ने पाशीर्वाद के साथ दानवीर सम्राट् को दोहे में धन्यवाद दिया। इसी समय एक वीर सैनिक दरवार मे उपस्थित हुआ और माशा पाकर उसने अपने पास के राजकीय-पत्र सन्नाट को मेवा में प्रस्तुत किए। जय एकलिंग:५ महामन्त्री ने उन पत्रों को पढ़कर निवेदन किया- समाचा महत्त्वपूर्ण है, और नहीं भी है। मध्यएशिया में म्लेच्छों के नायक आर्यावर्त पर आक्रमण करने के सपने देख रहे हैं। अन्नदाता, मुग़ल प्रतितादियों की स्मरण-शक्ति क्षीण है, सम्भवतया वे उस दिन को भूल गये हैं, जब उनके पूर्वजों ने पलायन और पराजय का प्रश्रय लिया था। आज भी वे कवरों में गड़े-पड़े कराह रहे हैं।" महाराणा रायमल्ल कोच में आकर सिंहासन से उठ खड़े हुए। भादों के मेघ भरे अम्बर में प्रलय के आवेग को भुजाओं में भरकर कड़कड़ाने वाली विजली की तरह, अपनी तलवार निकालकर गर्जना "जब तक लार्यावर्त की परम पवित्र वरती पर भगवान् एकलिंग के चाकर रायमल्ल की भुजाओं में रक्त की एक भी बूंद वाकी है, तब तक कोई भत्तभूमि की ओर आँख उठाकर भी न देख सकेगा। और यदि महाकाल एकलिंग की यही मर्जी है कि वे म्लेच्छों के मुण्डों से अपना सिंगार करें तो मेवाड़ माता की शपथ, आज से राणा की तलवार कमी वियाम नहीं लेगी!". "अन्नदाता, अपराध क्षमा हो ।” सलुम्बर का नौजवान महा-सामन्त खड़ा हुआ---- "एक साधारण शृगाल की तैयारी का मोल ही क्या ? जब तक सलुम्बर के पारिवारिक अपनी माताओं का दूध पीते रहेंगे, महाकाल एकलिंग की धरती म्लेच्छों से मुक्त रहेगी। मुझे अपनी जननी के दूध की शपथ, यदि में आततायी को अपने ही प्रदेश में दफ़न न कर दूं।" "शान्ति, शान्ति !" परामर्शदागि-मण्डली के अति शंकरसास्त्री बोले। सब लोग शान्त हो गए। किन्तु पण्डितराज के आदेश को भी अनसुना कर, रावत सूर्यमल्ल के समीप बैठा हुआ तरुण वाध रावत उठकर खड़ा हो गया- "अन्नदाता, मैं मध्यएशिया के म्लेच्छराज से लड़ने जालंगा।" वृद्ध पण्डितराज . • Trform । "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तात !" महाराणा ने हंसकर कहा-"तुम अभी बहुत छोटे हो।" "मनदाता, क्षमा करें।" वापरावत का उत्साह अङ्गों में समा रहा था-"पृथ्वीपति, भगवान् एकलिंग के महारथी महाराणा बाप्पा रावल ने जब मध्यएशिया और खुरासान को पहली बार सभ्यता प्रदान की थी, तब वे केवल बारह वर्ष के थे।" वाप्पा रावल का नाम सुनकर हर्षातिरेक से वृद्धजनो की आंखें भर आई और युवको के चेहरे गम्भीर हो गए। याप रावत बोला- "अन्नदाता ! महाभारत के वीर अभिमन्यु कितने छोटे थे ! चण्ड चौहान-कुल-प्रचण्ड पृथ्वीराज महाराज ने शोणित की प्यासी इम पदिय भूमि को गजनी के म्लेच्छों का उष्ण रक्त पिलाया कर सोलह बार तृप्ति दी, तब वे प्रौढ़ या वृद्ध नही थे। बालयुवा ही ये ! महाराजाधिराज, हमारे बडे दादाजी राणा कुम्भा ने मालदा के सूवेदार मुहम्मदशाह प्रथम को हराकर छह मास तक, इस पवित्र दुर्गराज चित्तौड़गढ़ में बन्दी बनाकर रखा, और अन्त में दया का दान देकर छोड़ दिया, तब महाराणा कुम्मा ग्यारह वर्ष के थे ! कृपानिधान, प्रातःस्मरणीय महाराणा मोकल ने जब एक ही वाण मे सात शिलाएँ बेघ दी थी, तब वे नौ वर्ष के थे। स्वयं श्रीमान् ने अपनी देवदेही पर घावों का सत्कार कर दिल्ली के शह को मेवाड़ की शरण में आने को बाध्य और लालायित कर दिया और अन्त में अत्यन्त उदारतापूर्वक उसका राज्य लौटा दिया था। तब..." महाराणा मुसकराए । याच रावत भी मुमकरा दिया-"मैं अविनीत हूं, तो क्षमासिंघु ! भापको वामा ही मेरा दण्ड है ! महामन्मी ने कहा- "मेनानायक तेवर म्लेच्छ-प्रदेश मे रह चुके हैं। अतः उन्हें प्राथमिक कार्यवाही के लिए भेजा जाए।" "अवश्य ।" महाराजा ने स्वीकृति दी। जय तदनन्तर राजनर्तकी मागंधी अपने नृत्य का प्रदर्शन करने लगी उसके सौरभ-सम्पन्न सौन्दर्य और रसवंत उल्लासमय लास-नर्तन को देख-देखकर दिन-रात भालों, वछियों, कटारों, शमशीरों, तलवारों और तीरों के बीच में रहने वाले वीरों के नयन-मन आनन्द से खिल उठे। सुमन्द संगीत, सुमन्द गायन, सुमन्द वादन और सुमन्द नर्तन ने वातावरण को अपनी कला से खिला दिया। नृत्य और संगीत के विसर्जन पर राज-परिपद् के सदस्य कुछ कहना चाहते थे, अतः उन्हें अवसर दिया गया। सव ने एक स्वर से आन्तरिक एकता, प्रजा को सुख-रान्तोप, सेना में अनुशासन, वफादारी और साधन-संचयन पर जोर दिया। वृद्ध पंडितराज शंकरशास्त्री ने संगठन और राष्ट्रीय एकता की वृद्धि करने और फूट फैलाने वाले तत्वों का अन्त करने का आग्रह किया। - पंडितराज शंकरशास्त्री ने अत्यन्त भावार्द्र वाणी में कहा- "सम्राट् एवं सभ्यजन ! भारत का इतिहास फूट के दुष्परिणाम और सामाजिक अनकता एवं व्यक्ति की स्वतन्त्रता की प्रोट में व्यक्ति की स्वार्थपरता और श्रेष्ठियों के अभिशोपण के दुष्परिणाम आज भी भोग रहा है । आप सर्वजन जानते हैं कि कन्नौज का जयचन्द राठौर हमारे समाज में अाज भी एक-न-एक लोभी और कुटिल व्यक्ति के रूप में जीवित है । देश के इतिहास में, अतीत और वर्तमान में इन विभीपणों की कमी नहीं है। कन्नौज के जयचन्द राठौर, काश्मीर के राजा चक्रदेव, मालवा के वर्मा, गुजरात के माधव, वंग के वेणुपाल, देवगिरि के देवपाल, कर्नाटक के वल्लभदेव, मदुरा के सुन्दरपण्डय, जालौर के महाराजा सांतल और जैसलमेर के मोकल भट्टी जैस कायर देशद्रोहियों और कुलकलंक कपूतों ने इस स्वर्ग को नरक बनाने का प्रयास किया है-चांदी के चंद चमकदार टुकड़ों के लोभ में पड़कर माता का चीर वेचा है। अतः मैं निवेदन करूँगा कि पार्पद वैरी के चारोंग्रोर मित्र के रूप में विश्वासघातियों से सावधान रहें।.." ८: जय एकलिंग उस पल राज-दरवार का भव्य भयन याहर कोसाहारी भर गया। बाहर राज-पथ पर अति विपाट एक स्पर जेरो पीकार कर रहा था- "टूटेगा "टूटेगा ! सोमनाथ फिर टूटेगा! महामास के गन्दिर पर फिर प्रहार होगा । गौरामनाय या भग सिंग रा शरम पा सी है कि राजपूत ने अपनी मां के दूध को भुला दिया है। रागपूरा सोगा है। "जागो, जागो, मायं सतनामो, मैं तुम्हे जगाने भागा है, जागो, जागो, यह जानकर कि मच्चों की दासी होने से विधया होगा या है. "जागो जागो तुकों का गुलाम होने से रणभूमि में पेग रहमा मच्छा है। ' सोमनाथ के मन्दिर फिर टूटंगे । गौरामनाप मे गहागि पर पुनः प्रहार होगा।" राजरामा में रोनाटा छागया । स्वर अय भी पा रहा था "तुम मुझे मुंह दो, मैं तुम्हें मागासी दूंगा ! तुम गुरे राह दो, मैं तुम्हें मुक्ति दूंगा। जागो, जागो, रोच्छ-यपा आ रहे है। में आग लगाने के लिए, गतियों का अपमान करीरिपगली को जलाने के लिए, गौ-माता या भक्षण करने के लिए, सिष्यमा रहे हैं। टूटेगा, सोमनाय फिर टूटेगा। धीर एक पार गया है कायर रोज-रोग मरता है । जागो, जागो में भैरय में पति की भंग लाया । अपनी बेटियों के लिए जोदर फा अंग माया हूँ। मैं मेसरिया रंग लाया है। जागो, गागो, मैं जलता हुआ जंग पापा हूँ।" है कोई चित्तौड़ में माई मा लाल जी एकलिंग का घरमा भना चाहता है ? मृत्यु मुन्दरी का वरण करना चाहता है ? नागो, भागी, कि फिर भगवान् भूतनाथ का समर यज । घण्टी फाग मैले । मागी कि भवानी मा कोप जागे । फिर गे महारद्र हुंकार भरे और भूगmemil भूचाल पाए !...", उपोप भरता यापालिक रामा-मयन में पना पाया। किन्तु उगक स्वर में सनिक भी परिवर्तन नही पाया--- "जागो, जागो अन्यथा मैं कहता?"-बार कापानिया में अपना चिमटा ऊंचा उठाया-गोमनाप फिर टूटेगा, गौतमाय फिर टूटेगा पौर एकलिंग भी टूटेगा."
:२:
एकही अवधि में शरद के दो गिन रूप थे।
पहले जब वह आई थी, देह तन्वंगी थी और दृष्टि में कौतुहल
था ! जैरो, नवपरिणीता, नवोढ़ा थी ! कदम धीमे उठ रहे थे कि गति
की दिशा और गन्तव्य निश्चित था !
इसी अवधि में अतु-
-परिवर्तन यों हुआ किन हुआ ! जैसे नवोढ़ा
वह सिमन्तनी बनी है और लौटकर अव नैहर जानेवाली है ! क्षितिजों
के पोर से छोर तक फैले उसके लोचनों में मनन्त तृप्ति का आस्वाद
भरा है और प्रथम गर्भ के भार से वोझिल पलकें उनींदी होकार,
अर्द्ध मुकुलित प्रसूनपट-सी प्रतीत होती हैं !
पारद सुहागन का अव अङ्ग अङ्ग भरा है-
दृष्टि का कौतुहल अब अनुभूति और परिचय का भाव बन गया
है ! नवोढ़ा वाला तरुणी बन गई है और उसकी चपलता हार्दिक
आलाय वन गई है । श्राह्लाद यह रोज की ऊष्मा बन गया है और धीमे-
धीमे हृदय के रस में सिमट कर पयोधरों का अमृतविदु बनता जा
रहा है !
लेकिन अजानी दिशाओं से, इस अमृत को झपटने के लिए हिंसा
और लोभ के दानव अपने पंजे फलाए चले पा रहे हैं !
१२ : जय एकलिंग
- युद्ध का रक्त-रजित, सौफनाक, खूनी वातावरण ! "युद्ध, युद्ध और युद्ध !" नगरबेष्ठि ने सप्ततलप्रासाद में प्रविष्ट होते हुए, अपनी पत्नी मीनाक्षी की ओर देखते हुए कहा-- "कुछ सुना तुमने ?" उसने उतावले पैरो सेठानी की ओर बढ़ते हुए, अपनी बात को आगे बढ़ाया--"मारमिक देश और गांधार से, आज कुछ व्यापारी उज्जयिनी आए हैं। सूखे मेवे और फलो के अग्रिम सौदे पर वे जोर दे रहे हैं ।" सुनकर मेठानी मीनाक्षीदेवी ने थैट्ठि की और अपनी बड़ी-बड़ी पलक उठाई। वल्लभी सेठानी के परों पर महादर लगा रही थी। आज मीनाक्षीदेवी ने फूलों के गजरो से सिंगार किया था। उसने अपने सप्तांगों में परागवान् पुष धारण किये थे । गोल-गोल मुचिकन जूड़े वारणी की लहर-सी देणियों में, गोरे-गोरे कानों में, सुधर हाथों में ललित लक मे, सुली, धुली बाहों में और कमनीय कलाइयों मैं ! इससे, उसका सौन्दर्य सौगुना बढ गया था । एक तो केरल के मर्वसत्तासम्पन्न परिवार की पुत्री, दूसरे महागालव को महानगरी उज्जयिनी के नगरथेष्टि की धर्मपत्नी कि जिसके श्वसुरालय के अनन्त वैभव की धूम, न केवल सारे मालवा, में वरन् समस्त गुजरात और खानदेश में, मची हुई थी। तीसरे मालवा और भेदपाट राज-परिवारो से निकट सम्पर्क और राजसी- रनिवासों मे अरोक प्रवेश । चौथे आबूजी और ऋपमदेव के जन-सन्तों और नेतामों के धर्मक्षेत्र में पंठ- यह पंठ श्रेट्ठि के धर्म-बल के कारण घी, अथवा धन-बल के -नही कहा जा सकता ! फिर भी धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति और प्रभावमाला के फलस्वरूप देह और आत्मा के मुख-भोग, उन्हें उपलब्ध थे। और गजगामिनी मीनाक्षीदेवी पान गंधित गजरों के बीच में लाल फूल की तरह खिल रही यो। उसको सज्जा देख कर श्रेट्टि अपनी बात भूल गया ! मीनाक्षीदेवी ने अपने घने-घने ऐड़ीचुम्बी कुन्तली के जूड़े मे जय ति.
- कुन्द-कलियों के गजरे सजाए थे। उसकी गुर्जर दासी निपुणा कला में सर्वथा निपुण थी। पहले वह गुजरात के सुलतान की स वेगम जहाँनारा की केशराशि के शृंगार के लिए नियुक्त थी। र कई इतिहासकारों और तवारीखनवीसों ने गुजराती बेगम हांनारा की काली-काली जुल्फों के लम्बे-लम्बे बयान लिखे हैं। कहते है, गुजरात के सुलतान ने एक दिन नौरोज के बाजार में चन्दनवन की चुलबुली चिड़िया-सी चौदह वर्षीया जहाँनारा को देखा था। और सुलतान की पहली नजर जहाँनारा के काकुलों पर गई थी, फिर तो नजर वह वहाँ से लौट कर नहीं आई ! फिर आई-अहमदावाद के शाही हरम में जहाँनारा--सुलतान को चहैत वेग़म वनकर ! इसके वाद 'वेग़म के वाल' तवारीखों के पन्नों तक फैलगए ! निपुणा जहाँनारा बेग़म के केशों में मोती गूथती थी । उसने इस तरह जहाँनारा का सिंगार किया और इतनी तरह किया, कि बादशाह वालों की तारीफ़ भूलकर, उन्हें मोतियों से सजाने वाले खूबसूरत हाथों की तारीफ करने लगा। इससे जहाँनारा के दिल में पत्ता खटका और उसने निपुणा को चुपचाप निकाल दिया ? निपुणा तो जहाँनारा वेगम के मोती महल से चली आई लेकिन बेगम के बाल, कोई वाँदी फिर वैसे न बना सकी, जैसे, निपुणा बनाती थी। भाग्य की लीक पर चलती-चलती निपुणा अवन्ती में आ पहुँची और उसकी कला समय पाकर, उज्जयिनी की श्रेट्ठि-कन्या का सिंगा बन गई। निपुणा की कला के योग से (वेटी) माधुरी का निख हुआ रूप देखकर (माँ) मीनाक्षीदेवी ने निपुणा को अपनी सेवा बुला लिया। यहाँ, यद्यपि निपुणा तन-मन के श्रम से सेठानी का सिंग करती थी, फिर भी सेठानी यही कहती रहती थी . "निपू, तूने उतने अच्छे नहीं सजाए, जितने माधुरीदेवी के !" उत्तर में निपुणा आखिर कैसे कह देती कि माधुरीदेवी खि हुआ चन्द्रमा है और मीनाक्षीदेवी ढलती हुई चाँदनी रात है सेठानी ने जब श्रेट्ठि की वात पर ध्यान न दिया तो, श्रेट्टि - कलिंग - बात बड़वाडता हुआ अपनी प्रथम पत्नी के पुत्र रत्नचन्द्र की पत्नी दीपावली के कक्ष की ओर गया। रत्नचन्द्र की माता चन्द्रावली का देहान्त हो चुका था। उसके परलोक-गमन पर ही श्रेट्टि ने मीनाक्षोदेवी से विवाह किया था। रत्नचन्द्र अपना नौका-दल लेकर मलयदेश गया था। गिम साल उसका विवाह हुआ था, उसी साल सागर-यात्रा का अनिवार्य कार्यक्रम उसे अपने हाथ में लेना पडा। नवविवाहिता वाला पत्नी को सूनी सेज पर अकेती विलसती छोडकर, रत्नचन्द्र उत्तुग मस्तूलधारी अपने जहाजों पर सवार होकर, पूर्व दिशा की ओर अभियान कर चुका था ! दीपावली परुणोदय (माज का अरनोद) के धनपति, नगर निगम- नेता नाहरमल्ल को पौत्री थी। दूज शगि को पहली किरण-सा उसया दर्शन था ! किन्तु दीपावली क्षीण शशिकिरण-मी नही थी, शान्त- शीतल ! पतली किरण-सी थी । अगिधारयन् थी । चपन और उद्दाम था उसका देह-वैभव ! मुंहजोर अश्य के समान, उसका अविनीत यौवन, वल्गानो को गो-मो शृंखलाओं को एक झटके में तोड़कर धरती-आवाम को खूद रहा था। चार-चार सात से उसकी सेज पर वियोग की नागिन बसेरा किए बैठी थी। चार-चार माल से योवन का दुर्दम्य तुरङ्ग कामनामों और कल्पनामों के मैदानो को येतहाशा पार कर रहा था और उसे थाम कर थपथपाकर, उम पर आरोहण करने याला नरनायक कहीं-दूर था। चार-चार मान में कंचुकी के चन्द गुलकर बंध थे और बंधे कर सुले रह गए थे, पर वातायन मे भाते चन्द्र के साय, रत्नचन्द्र नहीं पाया । रत्नचन्द्र नहीं आया और दीपारली ज्योनिपीवानों से अपना भाग्य पूछने लगी। हस्तरेखाएँ दिनाने लगी और वाई फटकने का शकुन पूछने के लिए दूर-दूर तक दामियों को भेजने लगी ! और सप्तनल प्रासाद के प्रांगण मे, जहाँ पाए दिन हिमालय की जड़ी-बूटी बेचनेवाले आते, मदारी और नट पाते ! प्रस्तर जाली को ता.y H प्रोट में बैठी अतृप्त दीपावली नटों और जादूगरों के सम्पर्क में आई अन्धविश्वास ने अपनी काली छाया फैलाई और धीरे-धीरे दीपावली पीरों और फकीरों के मजारों तक परिचारिकाओं को भेजने लगी। -ऐसे वातावरण में दीपा का पैर फिसल जाए तो विस्मय क्या ? रसभरी शहतूत डाली पर तड़क जाए तो शहतूत का दोष कहाँ ? दोष तो रस के अनन्त प्रवाह और आवेश का है, अथवा है उस माली को जो चुनने के लिए आज तक नहीं आया ! माधुरी अपनी भाभीधन दीपावली से वहुत छोटी थी। दोनों सुन्दर थीं। एक दूसरी का उपमान थीं, लेकिन फर्क इतना ही था और काफी था कि भाभी की तरुणाई भ्रष्ट हो चुकी थी और चेहरा आसव की खुमारियों के काले डोरों से कहीं-कहीं साँवला पड़ गया था और लुक-छिपकर अन्धगृहों में, मन्दिरों में, खास बाजारों में, दूतावासों में और सहेलियों के आवासों में किए गए अतिचार के फलस्वरूप झुर्रियों से नहीं-काली रेखाओं और झाइयों से भर गया था ! फिर भी आँख में ऐसा और इतना नशा था कि दर्शक पहले ही पल में मतवाला हो जाता और दीपा को इन झाइयों और काली डोरियों पर उसकी नज़र तक न जाती! इस तरह, दीपा खाली कलशी थी जो भर जाने को आकुल थी। माधुरी भरी हुई कलशी थी, जिसका दूँद एक न छलका था ! दीपा की तृप्ति बाहर थी, माधुरी की तृप्ति उसके अपने भीतर थी ! दीपा देह की पुजारिन थी। माधुरी हृदय और आत्मा की आराधिका थी। दीपा शैव थी ! माधुरी वैष्णव थी। माधुरी राधामाधव की युगलमूर्ति की पूजा किया करती । दीपा देवाधिदेव महादेव के ज्योतिलिंग के अभिषेक के लिए ब्राह्मणों को नित्य नए निमन्त्रण देती! फिर भी भाभीधन और ननदधन दोनों सहेलियाँ थीं, पहेलियां थीं। एक-एक इकाई थीं। स्वयं प्रश्न थीं और स्वयं उत्तर थीं। भिन्न ध्रुव थी, अभिन्न अन्तरा थीं ! जीवन के स-र-ग-म की प-द-नि-सा थीं ! एक बंधी हुई वाह थी। एक खुली हुई आह थी। एक राख थी। एक चिता थी। ।
श्रेटि ने अपनी कुलवधू दीपावली के नीलरंगी मिलन-गृह में प्रविष्ट होने के पूर्व, परिचारिका को पुकारा--"नीलनयना, अपनी स्वामिनी मे कहो, श्रेष्ठ आये हैं।" नीलनयना दौड़कर अपनी मालकिन के पास गई और उसे बुलाकर बाहर ले आयी। दोपा जब वाहर पाई, एक हाथ से अपने अस्त- व्यस्त वेश को महेज रही थी। उसकी कचुको के बन्धन विखरे थे। और दो वेणियाँ अपनी गुम्फनमाला से मुक्त हो कर कपोल-प्रदेश तक झुक पाई थी, सो दीपा देग के बाद, उन्हे कपोलो पर छा जाने से रोक कर, पीछे लौटा रही थी। थेप्ठि ने अपनी वधू को देखते ही पुनः वहीं पहली बात दुहराई-- "युद्ध, युद्ध और युद्ध ! देवि, दीपा आज गाधार, मिराज और दूसरी विलायतो से व्यापारी आए है, कहते थे फिर बहुत बड़ा जग होने वाला है। इधर कापालिक युद्ध की चिनगारी जलाकर चला गया है।" "थेप्ठि ! यह चिनगारी अब युझ न सकेगी। जनता गौतमेश्वर के महालिंग पर किए गए एक प्रहार का बदला सौ-सौ प्रहारों में लेगी। मैंने अरुणोदय में अपने मातुल-गृह मे उन्हे एकत्र होते देखा है। और देसा है कि म्लेच्छराज के उस एक प्रहार को चोट जन-मानम पर लगी है और बहुत गहरी सगी है। इसलिए, आज को घडी मे युद्ध ही निदान है।" "लेकिन देवि, शांतिमागरजी महाराज कहते थे कि युद्ध मे हिंसा होती है और हिंमा निगंठो के सिद्धान्तो के विरुद्ध है।" "प्ठिवर, शातिसागरजी की हिंसा और अहिंमा अवसरविशेष पर यदि हमारे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सिद्धान्तो के अनुकूल नही हो, तो वह सहज त्याज्य है । यदि युद्ध से हमारे व्यापार को लाखों का लाभ पहुंचता है तो उसमे होने वाले हिंमा-अहिंसा से हमारा क्या प्रयोजन ? सफल वणिक वही है जिसकी दृष्टि लाभ पर रागी रहे और शुभ-अशुभ मौर शिव-पशिव की ओर देखे तक नहीं, फिर २ जय एकलिंग:१७ भी, यदि इनसे कुछ अधर्म होता है और गांतिसागरजी का मन म्लान होता है, तो कोटि-कोटि की लाम-राशि में से कुछ द्रव्य जिनालयों को दान में भी दिया जा सकता है। इस प्रकार तथापित लपर्म की राह भी रुक जाएगी और लोक-दृष्टि और लोक-मानन में वह बड़ न सकेगा।" अपनी पुत्र-वधू को ऐसी वित्रतण व्यापारिक वृत्ति देखकर अवन्तिका का नगरट्टि चपल चपला-सा चकित रह गया। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि वाणिज्य के क्रन्यूह में नो दीपावली की, इस भांति नहज, सम्भव पैः है। युद्ध के कठिन काल में कमाई के अनन्य अवसर की प्राप्ति लाभ-राशि की दुल्हता पल भर में उनके मेवावी मस्तिष्क में सहज प्रवेश पा गई, किन्तु बर्मनीर नन ने साय न दिया-इसलिए उसके स्वार्य ने चाहा कि वह स्वयं तो चुप रहे और दीपा ही इस बारे में कुछ कहे और यों, इस समय वह पाप के प्रभाव से बच जाए और अहिंसा का आराधक बना रहे। दीपा बोली-~"याज नहीं कल, कल नहीं साल भर बाद, पाँच- पन्द्रह वर्ष पश्चात् परन्तु म्लेच्छ लाततायियों के विरुद्ध भयंकर संगर जागेगा। और प्रत्येक संग्राम वणिक-वृत्ति के कञ्चन की कमाई और लाभ की उपलब्धि का एक अपूर्व अवसर देता है, इसलिए कि वणिक उभय पन को युद्धोपयोगी सामनी वेचता रहे और दोनों ओर का स्वर्ण उसके नण्डार में संग्रहीत होता हे । हम वह समस्त सामग्री लोदियों और मुगलों को वेत्र देंगे जिने गाजपूत खरीद न लगे। और जिसे विदेवी जय न कर पायेंगे, उने राजपूतों को अथवा कापालिक के 'मुक्ति-मण्डल' को बेच देंगे। हमारा काम अपने लान और लोभ की गति को देखना है न कि राष्ट्र या देश की चिन्ता में दुबले होना। इस चिन्ता-चिता पर चढ़ने के लिए वम्हन और राजपूत हैं ही। हम युद्ध में नाग न लेने की वृत्ति रखते हुए भी, अहिंसा का पालन करते हुए भी, राष्ट्र के हित के लिए लड़े जाने वाले युद्ध से विमुख नहीं हो सकते, वरना जनमेदिनी हमारा पत्ता-पत्ता उड़ा देगी । श्रेफि, बोलों का द्रोह याद है न ! उनकी अहिंसा म्लेच्छ आक्रान्तानों का प्रतिरोध न कर १९ : जय एकलिंग " सको । विलायतों में जहाँ-जहाँ इस्लाम आया, पहले बौद्ध बसने थे, विदेशी आक्रमणकारी नंगी तलवार लेकर जब चढ़ आया, इन इन देशों के बौद्धों ने अहिंसा का फतवा दिया, परिणाम जो प्रकट हुआ माप से दिपा नही है। सारे बौद्ध धर्म-भ्रष्ट हुए और इस्लाम की तलवार ने उन्हें म्लेच्छ बनाने पर मजबूर किया, उन्हें मृत्यु या इस्लाम में से एक अंगीकार करना पड़ा और क्षमा करें, मैंने आज तक एक भी ऐसा अहिमापालक नहीं देखा, जिसने अहिंसा की रक्षा के लिए मृत्यु का बरण किया हो ! घट्टि, प्राण मवको प्यारे हैं। प्राणों की रक्षा भी तो अहिंसा है और है धर्म का पालन ।" "हाँ देवि, कहा है : 'प्राण की रक्षा निश्चय ही धर्म-साधन है !' तो तुम्हारा कहना है ? 'युद्ध अवश्य होना चाहिए। उधर गौतमेश्वरमठ कापालिक को दान, इधर सामग्री का भाव और दर बढ़ाकर उस दान राशि को वापस खीच लेना-हमारे लिए अहिंसा-धर्म है । हमारे स्वायं की हत्या-हिंसा न हो, यही हमारे लिए अहिंसापालन है ।" "तुमने इस नादान वय मे, यह सब कहाँ मे मोया ?" "इस प्रश्न का उत्तर, मुझमें अधिक अच्छी तरह आप जानते हैं।" "मैं जानता हूँ. वधूधन क्या कह रही हो?" धैट्टि ने मानंद में पाश्चयं प्रकट किया। "मच है ! आपको कार्यावली देय-देख कर मैंने यह-मय सीखा है।" "तो हमें भावी लोक-संकट से सुरक्षित रहने और उसके भंवर से भी अपने लाभ का फूल निकाल लाने की तैयारी कर लेनी चाहिए । ट्टि ने बड़ी चतुराई से वक्रवाणी मे कहा। "तैयारी! हम कर चुके हैं।" " "हम !" "जी थेटिवर-पाप और मैं ।" "मैं तुम्हारा सकेत नहीं समझा कुलवधू ।" "अधिक ममय भापका नष्ट न हो, प्रतः स्पष्ट कहूँ तो क्षमा करेंगे !"
! . ? "क्षमा की क्या वात बहू ! तुम इस कुल-परिवार की राज्यलक्ष्मी, भाग्यलक्ष्मी, रूपलक्ष्मी हो !"..." "श्रेट्टि ! क्या आपने दिल्ली के लोदी सुलतान से समझौता नहीं कर लिया है ? क्या आपने म्लेच्छों और मुग़लों से तय नहीं कर लिया है कि उनके आक्रमण के अवसर पर प्राप-~-उज्जयिनी के नगरट्टि, युद्ध-सामग्री देकर उनकी सहायता करेंगे ?" नगर।ट्टि का सिर चकरा गया ! यदि स्थान कोई अन्य होता तो, वह बेहोश हो जाता ! किन्तु अपने ही आवास और रनिवास में उसके धीरज ने उसका साथ न छोड़ा ! पूछा . "देवि, तुम्हें कैसे "ज्ञात हुआ ?" 'लोदियों और मुग़लों के जिस प्रतिनिधि से आपका समझौता हुआ है, उससे ।" "लेकिन वह तो समझौते के बाद तत्काल उज्जियिनी छोड़ चुका था !" । "आपके लिए !" और इतना कहकर उसने ताली बजाई, नीलवसना दासी उपस्थित हुई। दीपावली बोली-"अतिथि को निजी कक्ष से बुलाओ !" फिर परिचारिका के जाने के पश्चात् दीपा ने अपने श्वसुर से कहा-"क्षमा करें प्रतिनिधि वह, मेरे पुरुपसखा हैं। इस सूने जीवन में मेरा मन उनके सामीप्य ने सुख पाता है।" श्रेटि ने अपनी कुलवधू को देखा । सीना तान कर वह, उत्तुंग प्रति- मावत् खड़ी थी ! अनन्त वासना और अनन्त काम की अनन्त रति-सी! "श्रेष्ठिभद्र ! सुनकर आप क्षुब्द हैं ?" "नहीं, नहीं ! देवि, भला, तुम्हारे सुख को देखकर मैं क्यों कर क्षुब्ध हो सकता हूँ। मैं तो प्रसन्न हूँ कि रत्नचन्द्र का अभाव तुम्हारे लिए अभाव न बन सका। आखिर मलयदेश में, रलचंद्र भी तो वाली और स्वर्णद्वीप की रसरमणियों के संग से शारीरिक सुख का धर्म-लाभ पाता होगा ! अपनी युवावस्था में, मैं एक बार चीनाम्बर के क्रय के २० : जय एकलिन निमित्त चीन गया था। अपनी यात्रा की अवधि ब्रह्मप्रान्तर और चीनदेश की चार-वनिताओं, कुल-कान्ताओं और काम-कन्याओं का संयोग मेरे लिए पर्याप्तरूपेण सुखदायक सिद्ध हुआ था !" और, कहते- कहते थेट्ठि यौवनकाल के उन मुस-स्वप्ना को सुखद स्मृति में खो गया ! तभी, खड़ाऊँ की खट-खट् से उसका ध्यान भंग हुआ। विप्रवेशधारी तिलकवंत एक ब्राह्मण को सामने से आते देख, वह समादर के हेतु उठ खड़ा हुया । लेकिन वधूधन ने उसे रोक दिया । तब तक आगन्तुक निकट आ गया था । उसे देखते ही अंट्टि ने पहचान लिया- "इसलाम सा !" "अस्सलामवालेकुम !" 'वालेकुमस्मलाम ! आप तो बम्हनी के भेष में बिल्कुल बम्हन लगते हैं !" “जी, शुक्रिया ! आजकल दीपावली कुवरानी की ओर मे देवालयों में जप-तप चल रहा है ।" और इतना कह कर वह खिलखिलाया । "ये हैं मेरे पुरुप-सखा !" कहकर, दीपा हंसने लगी। इस हंसी से उसकी अति सूक्ष्म प्रावरणा (ओढनी के नीचे, उसके पुण्य पयोघर हिल-हिल रहे थे! फिर श्रेष्ठि और ब्राह्मण-वेसी इसलाम खां व्यापार और राजनीति के वार्तालाप मे संलग्न हो गए । दीपा उठ कर वहाँ से, अपने कक्ष की ओर चली | आगे कुछ बढ़ने पर उसने देखा, उसकी पद-ध्वनि सुनकर, जैसे एक छाया कही प्रोट मे छिप गई है ! सावधान हो कर वह उसी दिशा में चली :३: - राजो आकर कुटिया के बाहर बैठ गई । दो घड़ी पहले ही उसका मुंह उगते चाँद-सा खिला हुआ था, अब, वुझे हुए दीपक-सा उदास था कुछ ही देर पहले जो राजो वगल में काली कलशी दवाए तितली की तरह उड़ती, हंसती-खेलती, अपनी हमजोली बालाओं से चुहल करती, पनघट की ओर गई थी, वही राजो धीमे-धीमे सिसकती, बोझिल मन और मन-मन भर के पैर लिए घर लौटी। रास्ते भर उसकी सहेली सीता ने उसे बहुत समझाया--- "राजो बहन, उन बड़े घर के कुमारों से लड़कर, तूने ठीक नहीं किया । । कहाँ वे महल में रहने वाले, कहाँ हम धूल में लोटने वाले!" "सीता, महल हो या कुटिया, भगवान् सवका एक है। सच तो यह है कि उन्हें जिस भगवान् ने जन्म दिया है, उसी ने हमें भी बनाया है।" "लेकिन राजो, कुमार के पिता राजा हैं और हमारे पिता प्रजा हैं । हम रंक, चमार हैं।" "चमार हैं तो क्या हुआ ? चमार क्या मनुष्य नहीं होते ? जिस तरह और, जैसे; राजाओं, सामंतों और श्रेष्ठियों का जन्म होता है, उनमें जवानी और बुढ़ापा आता है, उसी तरह और वैसे ही हम २२ : जय एकलिंग गोपितों-समाज के सच्चे सेवको, दासो और शूद्रो का जन्म होता है । सीते, उनके जीवन में भी यौवन के वसंत मुसकराते हैं, प्रौढ़ावस्या का अनुभव जीवन-पथ के कुटिल कण्टको से सावधान करता है और वृद्ध होने पर जरा-जन्म, रोग-शोक और सन्ताप सताते हैं अयवा संचित विवेक काल के कष्ट को जन्मान्तर के आमोद में बदल देता है।" "यह ठीक है।" "फिर ऊँच क्या, नीच क्या? फिर वडा और छोटा, महाजन और शूद्रजन क्या ?" "ये भेद प्रभु ने नहीं बनाए, क्योकि प्रभु भेद की रचना नहीं करता, वह विनारा का विधाता नहीं है।" "यही तो मैं कहना चाहती थी-भेद मानव-निर्मित है मनुष्य ने ही अपने स्वार्थों के अनुरूप वर्गों की रचना की और अपने ही जैसे दूसरे मनुष्य को छोटा माना, या बड़ा बनाया। प्रभु का पट्टा लेकर कोई नहीं आया, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली नरेन्द्र हो या ज्ञानवान् पण्डित ।" "परन्तु राजो, ये लोग-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तो यही कहते है : भगवान् ने सबको अपने-अपने भाग्य के अनुसार जन्म दिया है। भाग्य से ही राजा और भाग्य से ही मनुष्य रडू बनता है । भाग्य ने ही स्वामी और भाग्य ने ही सेवक बनाया है।" "जिस प्रकार हम मानव में विद्यमान भेद-प्रभेदो के लिए दोपी नहीं ठहरा सकते, उसी प्रकार भाग्य को भी अपराधी घोपित नहीं कर सकते।" "मेरा अनुमान है राजो भाग्य कोरी कल्पना है। स्वाथियो ने अपने लाभ के लिए यह मन-गढन्त वहाना बनाया है ।" "सीते, भाग्य नही, मनुष्य का कर्म प्रवल है। कर्म के प्रहरी को भाग्य नहीं छलता है।" "जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। कर्म के बन्धन से कोई मुक्त नही हो सकता।"
"बहन, यही भारतीय संस्कृति का सार है। उनके ज्ञान का मौरन और पाण्डित्य का पराग है। समाज ने मदेव श्रम की वन्दना की है। जो श्रम नहीं करता, वास्तव में वही शूद्र है, क्योंकि जो श्रम करना है, वही 'श्रमण' है। इसलिए जो श्रम नहीं करता, वह अस्पृश्य है और तिरस्कार के योग्य है।" "इम दृष्टि से जो हम श्रमिकों, सेवकों और सहकर्मियों का तिरस्कार करता है और हमें अछूत मानता है, वह देश और परमेश का अपराधी है।" "मन्दि, वह तो हमारा तिरस्कार करता है बेचारा कि वह स्वयं परिश्रम नहीं करता और अपने इस पाप को छिपाने के लिए श्रमिकों को भाग्य और भगवान् के द्वारा परित्यक्त घोषित करता है।" "अपनी इस कमजोरी को वे भी जानते हैं और हममे भी छिपी हुई नहीं है. फिर भी जगत् और जीवन की कैसी विचित्र प्रवंचना है है कि श्रेष्ट और शूद्र के भेदभाव ने मनुष्य को मनुष्य से अलग कर दिया है। प्रकाग के विपुल पुंज के मध्य में उत्तुंग प्राचीर खड़े कर दिए हैं।" "मषि, सरिता के पुण्य-प्रवाह को दो धाराओं में बांटने का यह प्रयाग कभी सफल नहीं हो सकता। और फिर जो प्रभु को इष्ट नहीं है, यह अनिष्ट समाज का थेय नहीं बन सकता। उसका मुख अथवा साधन उसका वैभव अथवा विधान नहीं बन सकता।" "इन अल्पवय में नूने यह सब कहाँ सीखा ?" "मेरे मानुलग्राम में शूद्रों के निकाय में नमाज-वहिप्कृत एक देवता निवास करते हैं। अपने अतीत के अपराधों के पश्चातारस्वरूप शूद्री श्रीर दीन-दलितों की मेवा ही उन्होंने अपने शेप जीवन का विशेष लक्ष्य बनाया है। वर्षी उनके चरणों में बैठकर मैंने दिव्य वचनामृत पान किया है।" "तुम देखकर, कोई नहीं कह सकता कि यह शूद्र-कुलोत्पन्न कन्या । यदि तुम मूल्यवान् परिवेग पहना दिया जाए और ग्रामूपणों तेरा शरीर अलंकृत हो तो कौन कहेगा, तू राजकुमारी नही है ?" कहकर सीता चुप रह गई। "यहाँ तू गलती करती है, शरीर और प्राभूपणो से नहीं, मनुष्य की उच्चता या क्षुद्रता, उसके सस्कार, उसके कर्म और उसके विवेक से पहचानी जाती है। आलि, कभी-कभी मेरे मन में यह उत्कृष्ट अभिलापा उठती है और उठकर मेरे सर्वस्व को चुनौती देती है कि चित्तौड़ के इस अपराजेय दुर्गराज के शक्ति सुमेरुदण्ड के समान विजय-स्तम्भ पर खड़ी हो जाऊँ और समस्त संसार को पुकार कर कह ई-संस्कार ही मनुप्य की जाति है ! सुनो, कर्म ही मनुष्य की जाति है । ज्ञान-अज्ञान ही मनुष्य की जाति है। उसकी क्षुद्रता, उसका अविवेक है और उसकी श्रेष्ठता उसका विवेक है । भाइयो, जन्म से कोई कुसीन नहीं, कोई अकुलीन नही । मुझे कोई वताए, जिसे भगवान् ने बनाया, उमे मनुष्य पयो ठुकराए ?" राजो अपने आवेश में कहती गई। "तू सच कहती थी, वस्त्र और विभूषण से मनुष्य मोग्य नही बनता । यदि जीवन-विकास के साधन और सुविधा-स्रोत उपलब्ध हों तो शूद्र-कुलोत्पन्न वालक भी परम पण्डित बन सकता है, वह भी वैद्य अथवा विधायक ; यांत्रिक अथवा स्मृतिकार बन समता है।" "समाज को बनाकर देखो। व्यक्ति को बनाकर देखो !" कहती राजो कुटिया में चली गई । "मनुष्य की रचना करो। प्रभु की रचना करो," गुनगुनाती सोता भी दूसरी ओर चली गई। उस समय दो वास के लगभग दिन चढ़ आया था और पूरव के फैलते हुए प्रकाश की धाराओ ने मैदान की हरियालियो को एक सघन और उजली छाया दे दी थी और लम्बी पगडण्डियो को लाल-लाल रग से भर दिया था। राजो कुटीर के एक कोने में, घुटनो में सिर डाले वैट गई-~-उसको कासी कलसी फूट गई थी और घर में पानी नहीं था और मां को उत्तर देने का दायित्व उसे दु.सी कर रहा था। मांगन में किसी को पदचाप उठ रही थी।
मां ने पुकारा-
"राजो, ओ राजो!
भीतर से कोई उत्तर नहीं मिला।
मां ने फिर से वेटी को पुकारा-
"राजो, प्रो राजवंसी !"
राजवंसी ने झांककर वाहर देखा, मां खड़ी थी। उसके सिर पर
चारे का गट्ठर था। राजो ने दौड़ कर मां का हाथ बटाया।
मां बोली-
"आज भोर से ही काम में लगी थी। काम ही हमारा कर्तव्य है।
वही हमारा धर्म है । वही हमारा परमेश्वर और वही हमारी पूजा है
लेकिन, आज मैं वहुत थक गई हूँ। राजो, अब मुझसे काम नहीं होता।
तेरे पीले हाथ हो जाएँ तो मेरी सभी चिन्ताएँ मिट जाएं।"
बेटी का मुंह अपने व्याह की बात से लज्जा से लाल हो गया।
उसने आंखें झुकाली और चारे का एक तिनका तोड़ कर, उसे अपने
दांतों में, होठों में दवा लिया।
माँ ने उसकी ओर देखकर, पूछा-
"पुत्री कुटिया में अब तक चूल्हे का उजाला नजर नहीं आता
7: जय एकलिंग
? क्या बात है। घर में अग्निसलाई नही थी तो पड़ोसिन से मांग लाती ?" "अाज मुझे पनघट पर देर हो गई !" "क्यो ?" "आज हम लड़कियों को राजपुत्र-कुमारी ने जल भरने से रोक दिया । अपने नुकीले तीरी मे हमारे पडे फोड़ दिए और हमें जलाशय तक न जाने दिया।" राजो के स्वर में रोप था। सुनकर मां स्तब्ध रह गई । अपनी पुत्री से भी अधिक वह इस तथ्य को गम्भीरता से परिचित थी कि उच्च वर्ण यदि निम्न वर्ण का यम-जल बंद कर देता है तो इस का परिणाम क्या निकलता है।" "फिर ?" उसने पूछा। "रोती-यलपती हम वहां से चली आई। "कुमारों में अगुआ पृथ्वीराज होगा ?" "हां, मां ! वही सबसे आगे थे।" "किसी ने उन्हें वुझाया नही ?" "वुझाया। सामन्तराज सूरजमल उघर से निकले । उन्होने पृथ्वी- राज को रोका और ममझाया-बुझाया । परन्तु वे भला किस की सुनें!" "तुम तो चुप रहीं ?" "मैंने कुछ नहीं कहा. इतना ही "सामन्तों के चांदनी की सेती है, हमारे धूल की। वे प्रभु को सन्तान है, हम मनुष्य की । सीता ने उन्हे सुनाकर नाना दिया- मनुप्य को, क्या प्रभु की संतान मार डालेगी ?" "भगवान् एकलिंग सवको रक्षा करें। हमारी कुशल करें। तुमने राजकुमारों के मुंह लगकर अच्छा नहीं किया । यौना चला आकारा छूने !" कुछ सोचकर मां बोली- "शूद्रों का समाज बुलाना पड़ेगा। पृथ्वीराज का उपद्रव बहुत बढ़ गया है । दीवानजी के राज्य में यह अन्याय नहीं चल सकता । पृथ्वी. राज के कारण हमारे निकाय की न जाने कितनी अबलामों की मांग उजड़ गई है ! हाय, जहां-तहाँ मांग जली लड़किमा नचर प्राती हैं !"
"यदि हम संगठित होकर दीवानजी को राज-सभा में प्रार्थी बनें तो अवश्य हमें न्याय-दान मिलेगा।" "दीवानजी की राजसभा ने कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया है, बेटी ! बात सिर्फ इतनी है कि वहाँ तक पहुँचना हमारे लिए कठिन है।" "क्यों ?" "इसके लिए मंत्रियों को चूस देनी पड़ेगी।" "राम-गाम !" "हां, यह पहली जरूरत है । परमभट्टारक महाराणा कुम्भकर्ण का युग और ही था । अब तो महाराणा रायमल्ल के शासन में, धन धर्म का स्वामी बन बैठा है !" "स्वामी धन रहे या धर्म । हम तो दास ही बने रहेंगे । हमारा दासत्व हमारे सिर के साथ है।" "मेरी समझ में नहीं पाता, राजकुमार को हम दीनहीनों की राह में कांटे विधाने में क्या मिल जाएगा ?" "अकेले हम ही उनके कोप के भाजन नहीं बने हैं। बड़े-बड़े सामन्त भी उनकी आंखों में काटे में खटक रहे हैं। काकाजी सूरजमल और उनके साथी सारंगदेव को अपने प्राणों की चिन्ता है। युवराज जयमल की जड़ उखाड़ने को वे तुले हुए हैं। स्वयं उनके भाई साँगा घर से भागकर जंगली कवूनर बन गए हैं !" -~-राजो को अपने ही कथन पर हमी आ गई। मुंह में प्रोढ़नी का पल्लव ठूस कर वह कुटिया में गई और मिट्टी के एक छोटे-से पात्र में जल भर लाई- "कल का ठंडा पानी है। पीभो। इससे थकान उतर जाएगी।" "थोड़ा गुड़ ले आ।" "लाती हूँ।" कहकर राजो कुटिया की ओर गई परन्तु पिछले द्वार से निकल कर, सहेली के घर की ओर भागी। उसके यहाँ गुड़ नहीं था। माँ से कहती, तो वह मांगकर लाने से वरज देती। . ।
"जड़ में मारी, पनों में बर ! मां ने पानी पीकर मोचा --"कुनारों में विरोध और उनके पूर्वजों के प्रति रानमक्ति !पद दुरंगी पाल हम कैसे चल सकते हैं । वेकार राजो ने वात बढ़ाई! हमें, कुमारों के मुंह लग कर, वा झंडे पर चढ़ना है ? और राज-गना में जाने ने भी क्या होगा? कोई परिणाम निकले-मुन्द्र तो नहीं लगता। पिता से पुनों को शिकायत । भौह में आंच की शिकायत करने में फायदा? लड़कियों को रोक कर रखना पड़ेगा "राजो, यरी राजो"गुड़ लेने गई थी, कहां रह गई ? "यह लड़की इननी वटी हो गई, अभी तक इसमें समझ-युद्धि नहीं आई।" राजो सामने में बाती नजर आई- "घर में गुह नहीं था । महली के महाँ ले आई।" "रहने दें । मैं पानी पी चुकी।" "अरे!" "देख राजो, मैंने सोचा : कुलीनो के मुह लगना हमारे लिए हिन कर नहीं है।" इसमे हमारी हानि ही होगी । नुम नव लड़कियां भामंतों के जलाशय की राह जाना ही छोड़ दो।" "मां, 'गगन-मागर' जलागय मामन्ती का ही नहीं है, उमे प्रजा ने बनाया है, जाने कितने दिन भूख-प्याम महकर । पोर मां तुम तो जानती हो, एक बार जब यह जलागय मूख गया या 1..." "मूख गया या, बैठी!" मां ने दुहरामा । "गूब गया था, और राजपुरोहिन ने राणाजी की राय दी थी। "राय दी थी पुर्वी ! " मां का कठभर माया । "राय दी थी कि किसी मूद्र को इसमें बलि दी जाए !" "वलि ! हो, बनि दी जाए ?" मां ने आंखें पॉछी । "तव बलि देने में पहले, मंत्रियों ने उन वाले दिनो में हम में काले तिम चबवाए !" राजी के होठ फड़कने लगे। "तिल ! हो तिल चक्वाए !" मां फूट-फूट कर रो पड़ी। "और मो! उस सूबे जलागय को छलाल भग्ने के लिए कि -- - जल भगवान् महारुद्र के शीश पर झरती शीतल घारा बने, सामन्त- पुत्रियों और कुल-वधुओं के वारि-विहार का स्रोत वने, ब्राह्मणों और पुरोहितों के प्रात:कालीन परिमार्जन का प्रवाह बने ! ...." "प्रवाह वने !" मां ने आंसू भरी आँखें उठाकर देखा ! "प्रवाह बने इसलिए इस जलाशय में मेरे एक भाई की तुम्हारे एक पुन की, प्रथम और इकलौते पुत्र की वलि दी गई।" "तब मैं प्राथिनी बनी थी पुरोहितों की सभा में मेरी नवविवाहित वधू विधवा हो जाएगी।" "मैंने सव सुना है, उन्होंने तुम्हारी प्रार्थना सुनकर अट्टहास किया था और आश्चर्य प्रकट किया था-शूद्राणी और विधवा ! अरे, विधवा हो जाएगी तो दूसरा जवान ढूंढ़ लेगी। शूद्र-नारियों की आँखें पति की बोज में प्रवीण होती हैं ! फिर, एक अट्टहास !" "पुत्री, वही अट्टहास अाज भी मेरे कानों में गूंज रहा है । तब मैंने निवेदन किया था-महाराज, मेरा एक ही लाल है उसे न छोनिए । मैं दासी बन कर पाजीवन आपके खेतों में काम करूंगी।" "परन्तु उन्होंने एक न सुनी। फिर सरोवर की सूखी और तड़की हुई माटी की मांग मैया के लहू से लाल हो गई और भाभी की मांग वैधव्य की आग से काली पड़ गई।" "वह आ रही है वहू हाय, ऐसा रूप तो ब्राह्मण-पुत्रियों में ही देखा है ! मैंने कितना इसे कहा, दूसरा घर-वर देख ले । "मामी ने पुरोहितों की वाणी को झुठला दिया । धन्य है मेरी भाभी ! इसने दिखा दिया है कि ऊँच या नीच भारतीय नारी एक ही पति का वरण करती है। जीवन पर्यन्त अपने धर्म का पालन करता है।" "नीच और शूद्र होने से क्या ! हमें भी मानव तन मिला है, मन मिला है।" "मन है तो भाव भी होंगे ही। फिर ऊंच-नीच की बात ही कहाँ रहती है ?" "हिम की शीतलता और अग्नि की उष्णता का अनुभव ब्राह्मण और शूद्र को समान रूप से होता है।" ! ३० : जय एकलिंग
"प्रिय का वियोग ब्राह्मण नारी के लिए जितना उत्पीड़क है,
उतना ही शूद्र नारी के लिए भी है।"
'हम पापाण नहीं हैं और वे अकेले ही चेतन नहीं हैं। यदि उनमें
जीव है तो हम भी जड नहीं हैं। जन्म हमें भी मिलता है और मृत्यु
उन्हें भी मिलती है।"
भाभी समीप आ गई। उसके सिर पर बडी-सी टोकरी थी। ऊंचे
उठे एक हाथ से उमै थामे रही । राजो के निकट रुक कर बोली-
"माँ, प्राज ननदघन किससे रूठ रही हैं ?"
"अपने आप से । रानी रूठ, अपना मुहै।"
"मैंने मुना, अाज तो ननदधन ने स्वामि-पुषों को एक की वीम
सुनाई?
"मुझे उसी की चिन्ता है, बहू ! कुल-देवता हमारी रक्षा करें।
नागनाथ को चांदी का छतर चढ़ाऊँगी। राज-कोप से रक्षित रहें।
।
राजो ने कहा-
रहा कर।"
"मैंने तो कुछ न कहा-मुना । मैं चुप भी रहूं फिर भी नाम मेरा
ही लिया जाएगा। सारे नगर में ऊँट बदनाम |"
"लास बात की एक बात, तू घर
"शूद्र-कन्या घर में रहे तो अकाल पड जाएगा-ब्राह्मणों की
मान्यता है ।" भाभी ने कहा ।
राजो ने उत्तर दिया
"हां, वे नहीं चाहते कि उनकी कन्याओं की भांति शूद्र-कन्याएँ
भी सुख पाएँ । समान पद की अधिकारिणी हो । शूद्र-कन्याएँ श्रम
करना अस्वीकार कर दें तो अकाल पडेगा ही। इसी कारण बडो ने
उन्हें बेगार के लिए बाध्य किया है ।
अपनों की दुर्दशा देखते-देखते मेरा तो खून पानी हो गया है।"
कहती, मां वहां से चली गई।
मां के जाते ही राजो की चपलता तरगित हुई । दौड़कर वह
भाभी से लिपट गई
भगवान् महारुद्र के शीश पर झरती शीतल धारा वने, सामन्त- नयों और कुल-वधुओं के वारि-विहार का स्रोत वने, ब्राह्मणों और हितों के प्रातःकालीन परिमार्जन का प्रवाह बने ! ...." "प्रवाह बने !" मां ने आँसू भरी आँखें उठाकर देखा ! "प्रवाह वने इसलिए इस जलाशय में मेरे एक भाई की तुम्हारे एक न की, प्रथम और इकलौते पुत्र की वलि दी गई।" "तब मैं प्रार्थिनी वनी थी पुरोहितों की सभा में-मेरी नवविवाहित वधू विधवा हो जाएगी।" "मैंने सव सुना है, उन्होंने तुम्हारी प्रार्थना सुनकर अट्टहास किया था और आश्चर्य प्रकट किया था-शूद्राणी और विधवा ! अरे, विधवा हो जाएगी तो दूसरा जवान ढूंढ़ लेगी। शूद्र-नारियों की आँखें पति की खोज में प्रवीण होती हैं ! फिर, एक अट्टहास !" "पुत्री, वही अट्टहास आज भी मेरे कानों में गूंज रहा है । तब मैंने निवेदन किया था-महाराज, मेरा एक ही लाल है उसे न छीनिए । मैं दासी बन कर आजीवन आपके खेतों में काम करूंगी।" "परन्तु उन्होंने एक न सुनी। फिर सरोवर की सूखी और तड़की हुई माटी की मांग भैया के लहू से लाल हो गई और भाभी की मांग वैधव्य की आग से काली पड़ गई।" "वह आ रही है बहू ! हाय, ऐसा रूप तो ब्राह्मण-पुत्रियों में ही देखा है ! मैंने कितना इसे कहा, दूसरा घर-वर देख ले। "भाभी ने पुरोहितों की वाणी को झुठला दिया। धन्य है मेरी भाभी ! इसने दिखा दिया है कि ऊँच या नीच भारतीय नारी एक ही पति का वरण करती है। जीवन पर्यन्त अपने धर्म का पालन करता है।" "नीच और शूद्र होने से क्या ! हमें भी मानव तन मिला है मन मिला है।" "मन है तो भाव भी होंगे ही। फिर ऊँच-नीच की बात ही कह रहती है ?" "हिम की शीतलता और अग्नि की उष्णता का अनुभव ब्राह और शूद्र को समान रूप से होता है।"
:५: दगपुर के पथ पर, पुण्यतोया शिवना के किनारे किनारे राजकुमार मेदिनीराय की सेना बढ़ रही थी। कुमार ध्यानमग्न था कि अचानक- "कुमार की जय हो ! महा !" सेवक रुक कर पुका रहा था। "क्या बात है मिपाहीजी ?" कुमार का ध्यानसूत्र विखरा।" "अन्नदाता ! दो फिरंगी और एक पादरी श्रीमान् से मिलना चाहते हैं।" "कहां हैं ये ?" "अचेरी-दुर्ग के द्वार पर विराम ले रहे हैं।" 'तो क्या हम अचेरी तक पहुंच गए ?" "अन्नदाता, पधारिये ! इधर !" सेवक आगे-आगे दौड़े- "सावधान ! सा" व धान "भगवान् महाकाल के वरदान" एकलिंग के आगीपरत्न, चिरंजीव राजकुमार मेदिनीराय पधार रहे हैं ! सावधान !" ग्रामीणजनो की भीड़ बढ़ने लगी। दौड-दौड़ कर ग्रामजन आने लगे--फल-फूल, कन्द-मूल जो जिसके हाथ लगा, लेकर दौड़ा। ३ जय एकलिंग: ३३
"छुड़ाओ तो जानें ?"
"पराया हो तो छुड़ाएं, अपने को कौन छुड़ाए ?"
"तुम्हें देख कर मेरा मन मोद की लहरें लेता है।"
"तुम अपने भैया की परछाई हो, इसलिए मुझे बहुत भली और
सुहावनी लगती हो।'
कहते भागी उदास हो गई।
माँ की आवाज़ आई
"अाज का याहार नहीं पकेगा ?"
ननद और भाभी ने चौंक कर एक-दूसरी को देखा ।
रावले में घण्टनाद गूंजा।
नाद का गुंजनस्वर पहले दोनों के कानों में प्रवाहित हुआ फिर
बड़ी देर तक दूरस्थ पहाड़ियों में गूंजता रहा ।
ve
३२: जय एकलिग
:५: दापुर के पथ पर, पुण्यतोया शिवना के किनारे किनारे राजकुमार मेदिनीराय की सेना बढ़ रही थी। कुमार ध्यानमग्न था कि अचानक- "कुमार की जय हो ! महाराजकुमार !" सेवक रुक कर पुकार रहा था। "क्या बात है सिपाहीजी ?" कुमार का ध्यानसूत्र विखरा ।" "अन्नदाता ! दो फिरंगी और एक पादरी श्रीमान् से मिलना चाहते हैं।" "कहाँ हैं चे?" "अचेरी-दुर्ग के द्वार पर विराम ले रहे हैं।" तो क्या हम अचेरी तक पहुंच गए ?" "अन्नदाता, पधारिये ! इधर !" सेवक आगे-आगे दौड़े- "सावधान ! सा " व घान "भगवान् महाकाल के वरदान"" एकलिंग के आगीपरत्न, चिरंजीव राजकुमार मेदिनीराय पधार रहे हैं ! सावधान !" ग्रामीणजनों की भीड बढ़ने लगी। दौड़-दौड़ कर ग्रामजन आने लगे--फल-फूल, कन्द-मूल जो जिसके हाय लगा, लेकर दौड़ा। ३ जय एकलिंग: ३३ दिनी' वह नाम था जो मेदपाट ( मेवाड़ ), मालव, गुजरात और शानदेश के घर-घर में कहानी वन चुका था । ग्राम-कन्याएं मंगलघट लिए सम्मुख आई। राजकुमार ने अप कण्ठ से उतार-उतार कर मुक्ताहार उन्हें दिये। वे विना-देखे, विन सोचे दे रहे थे । क्षात्रपुत्र था, वणिकवृत्ति नहीं थी मन में ! बस 'देना' जानता था ! अश्व से उतर कर अचेरी-माता को प्रणाम किया। वलि के लिए सेवकों को अजादल का संकेत दिया। वृद्ध चारण आगे बढ़ा-"आर्य सम्राट्, पृथ्वीनाथ, राजराजेश्वर, एकलिंग के दीवान, महाराणा के नाती कुमार को नमस्कार !" "चारणराज ! प्रणाम स्वीकार कीजिए ! आप आयुवृद्ध और ज्ञानवृद्ध ! फिर भला हमें 'नमस्कार' कर, इहलोक का भार क्यों वढ़ा रहे हैं ?" "भाणेजलालजी ! भावी भारत के सूत्रधार ! होनहार महामंत्री के रूप में, इतिहास आपका स्मरण करेगा, मैं तो साधारण चारण हूँ !" राजकुमार, सुनकर, तनिक हंसा। आगे बढ़ गया। चारण पीछे-पीछे आया-राजद्वार पर तीन फिरंगी हैं। उनमें दो नर, एक वानर है। युवराज ज़रा..." उसने आँख से संकेत किया। "वैशाली के दत्तात्रय मन्दिर में तीसरे पहर कुमार ने, अप्रकट इंगित दिया। और जैसे, पारितोपिकरूप अपनी मूल्यवान अंगूठी दी। चारण 'नमस्कार सूरां नरां' रटता-सा चुपचाप चला गया। उस मन में कई योजनाएं चल रही थीं। सर्जन और संहार के कई छन रचना और प्राकृति पा रहे थे ! फिरंगियों ने झुक-झुक कर राजकुमार की अभ्यर्थना की। वह मोती और रत्न भेंट किए। राजकुमार ने उन्हें केवल छू कर का मुक्ताहार अपनी ओर से मिलाकर, अतिथि फिरंगियों को लौटा दि राजकुमार की चतुर दृष्टि में फिरंगियों का स्वरूप छिपा न फिर भी अपने मन का भाव गोपन रख कर उसने पूछा- शालिग "वैठिए ! मैं आपको क्या सेवा कर सकता हूँ?" फिरगियों में से एक जो विपुटी का नेता प्रतीत होता था, उठकर बोला-"राजन् ! पुर्तगाल से आए हैं। हम लोग इतिहासकार, यात्री हैं।" "बड़ी अच्छी बात है। पुतंगाल को भारतवर्ष के इतिहास में बड़ी दिलचस्पी मालूम होती है ! बाह, हम तो यह सब देखकर बहुत प्रसन्न हैं !" "हुजूर ! अन्नदाता ! मेरा नाम अल्फाजो है । गोकर्ण (गोआ) में पुर्तगाल के राजा का राज्य है।" सुनकर राजकुमार की भ्रकुटि तन गई- "अतिथि हो फिरंगी ! वरना सिर धड़ से अलग कर दिया जाता!" एक सेवक से न रहा गया--"नरभक्षी, गोमक्षी फिरंगी पुर्तगाली ! गौमाता और तुलसीमाता को अपमानित करने वाले तुम्हारी यह मजाल ! कि भव्य भारत के भू-भाग को पुर्तगाल के अद्ध सम्य राजा का राज्य कह कर हमारी मातृभूमि का अपमान करो !" कुमार की भुजाएँ फडकने लगी- "याद है फिरंगी साहब, सन् १४६८ में पुर्तगाली दॉन वास्को और उसके हाकिम हमारे पुण्यदेश मे भाए थे।" "याद है महाराजकुमार''अपराध क्षमा हो !" "तब तो तुम्हें यह भी याद होगा कि कोडिकोड़ (कालिकट), केरल के प्रात.स्मरणीय महाराजाधिराज सामुरिन के ब्राह्मण महिलादेव ने दान वास्को का स्वागत किया था।" "किया था महाराजकुमार !" दूसरे फिरंगी ने बार-बार सिर हिलाकर कहा-"किया था।" "इसलिए किया था कि इस देश की परम्परा है अतिथि को देवता मानने की।" "कुमार की जय !" लाल दाढ़ी वाला पादरी बोला। "लेकिन पादरी साहब, हमें कहते हुए हादिक दुःख है कि पुर्तगालियों ने हमारे प्रातिथ्य का अपमान किया। हमारे भोलेपन का जवाब अपनी कुटिल चतुराई ने दिया। हमारी सरलता को छलकर' कुमार रोपवा कुछ कह न सका। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें लाल- लाल संगारी सी बचाने लगीं। सेवक ने बाने बढ़कर कहा-"अन्नदाता, अपराध क्षमा हो ! उन दिनों सेवक केरल में था। उसने अपनी मांखों देखा-इन फिरंगियों ने किस प्रकार ब्राह्मण मन्त्रिदेव को घोसा दिया और कोडिकोड़ (कालिकट) जैने सुन्दर नगर में आग लगाई। अन्नदाता, कई अवलाओं पकड़कर ये अपने साथ ले गए । गोकर्ण के मुसलमानों का कत्लेआम किया । मस्जिदें गिरादी और उन्हें बलात् ईसाई बनाया।" "फिरंगियों के पिछले कारनाने, जो इनके रंग से गोरे-उजले नहीं, काले हैं, देखते हुए इनका विश्वास नहीं किया जा सकता। फिर भी, कि ये अतिथि हैं, इनका किसी प्रकार का अपमान न किया जाए, इनके देह-द्रव्य की पूरी रक्षा की जाए। इन्हें वाहन की सुविधाएँ दी जाएँ, जहाँ ये जाना चाहें खुशी से जाएँ, किन्तु प्रवेश और प्रस्थान के समय इनकी भरपूर तुलागी ली जाए।" "जो बाजा अन्नदाता !" अचेरी का दण्डनायक सैनिकों के ढंग से अभिवादन कर, एक और हट गया। उसने तत्काल अपने सैनिकों को आदेश दिया। कुल छह आदमी आगे बढ़े । दो-दो सैनिक एक-एक फिरंगी पुर्तगाली की तलागी लेने लगे। प्रथम दो फिरंगियों के पास कुछ न मिला । फटे हुए कपड़े, सड़ा- मूखा मांस, बदबूदार मछलियाँ, गन्दी मदिरा के पीपे और तांबे के कुछ सिक्के थे। किन्तु दढ़ियल पादरी के पास कुछ कागज-पत्र भी थे। उसके लम्बे लवादे और कोट के नीचे गुप्त रोति से छिपाए गए थे। सैनिकों ने फारन उन्हें राजकुमार के सामने पेश किया "कुमारदेव की जय हो ! फिरंगी पादरी के परिवेश से ये कतिपय पाक प्राप्त हुए हैं।" -- राजकुमार ने उन्हें गौर से देखा, फिर व्यंग्यपूर्वक पूछा--- "पादरी पडितजी, ये कौन-से शास्त्रो से नक्शे है ? ये कौन-से स्वर्ग के मानचित्र है ? ये फिन फिन परियों और हूरो के हालात है ?" "क्षमा क्षमा क्षमा !"-पादरी थर-थर कांपने लगा। कुमार मेदिनीराय ने कहा- “दण्डनायकजी !" "घणीखम्मा अन्नदाता !" दण्डनायक दौड़ कर उपस्थित हुप्रा । "आपने आज तक जितने पाप किए वे सव लोप हो जाएंगे। इन पादरीराम को कुछ रिश्वत दीजिए-ये स्वर्ग के पहरेदारो के नाम एक चिट्ठी लिख देंगे। क्यो पादरी साहब ?" पादरी ने सिर हिला कर 'हाँ' कहा-"पादरीजन स्वर्ग के नाम खात भेजता है।" सुनकर राजकुमार खिलसिलाया। फिर गम्भीर स्वर मे दण्डनायक से कहने लगे-"जानते हैं ये मानचित्र कहाँ के है ? ये 'ये है मढ़द्वीप का नक्शा मैं अच्छी तरह पहचानता हूँ “ये सूरत के महामहिम बन्दर का नक्शा। ये " मोहमयी और महिष्मती (माहिम) के मुसलमान नरेन्द्र के सामरिक महत्त्व के संस्थानों के कागज । ये रहे गुजरात के समर-केन्द्र । ये मापके दशपुर के दुर्ग का मानचित्र ।"वाह ! वाह !! जासूसी कोई फिरगियो से मीसे।" फिर कड़क कर बोले-"ले जानो इन्हें ! पंचजन न्याय करें.. पण्डनायकजी, मन्त्रीजी के पास स्वय उपस्थित होकर समस्त सूचना प्रस्तुत कीजिए और गुजरात के शाह को तरक्षाण पूरा प्रमाण भेजकर, सम्वाद दीजिए कि "सिंह सोता रहेगा तो वानर राज्य करेगा। सूरत की सूरत बदल जाएगी।" अपराधियों को लेकर सैनिकः चले गए। पवनदूत पुन: अपने पथ पर बढ़ा !
२ः श्रेष्ठिपत्नी ने आदेश दिया- "वल्लभी, तू यहाँ रह। शेप सव दासियाँ जा सकती हैं।" रम्भा तभी एक व्यक्ति के साथ भीतर आई। देखकर श्रेष्ठि आश्चर्य से खड़े हो गए। और फिर से बैठ गए। रम्भा उस व्यक्ति को आसन देकर चली गई। श्रेष्ठि का इंगित पाकर मीनाक्षीदेवी भी अपने विधामवास में चली गई। आगन्तुक व्यक्ति बहुत बड़ा गुप्तचर था । चित्तौड़ से आ रहा था। वहाँ के समाचार, गुप्त रहस्य और सामरिक भेद लाना, उसका काम था और इस काम के लिए उसे मुंहमांगा धन मिलता था। इन रहस्य और भेदों और गुप्त सूचनाओं को विदेशी म्लेच्छों तक पहुँचा कर नगरप्ठि अपनी लक्ष्मी को मुटा रहा था। दिल्ली के लोदियों से उसका गहरा और गुप्त सम्बन्ध था। गान्धार के मुग़लों से भी उसका सम्पर्क था। और इन सारे सम्पर्कों और सम्बन्धों और व्यवहारों को उसने वहुत बड़े व्यापार का वढ़िया वाना पहना रखा था और धर्म-कार्य- दान, पुण्य, अन्न-क्षेत्र, मन्दिर-निर्माण, गुरु-सेवा, शाला-स्थापना आदि के जाल-जंजालों से ढक दिया था।
"सूरजमिह ! अचानक तुम ?" "महत्त्व के समाचार लाया हूं, श्रीमान् ।" "तो, जरा द्वार बन्द कर दी और इस मामन पर बैठ जाओ।" सूरजसिंह ने द्वार बन्द कर दिया और प्रासन पर बैठते हुए पूछा- "माधुरीदेवी के वैरियो को क्या हो गया है ?" "साधारण अस्वस्थता है, वैद्यराज और बड़ेहकीम आए थे। ठीक हो जाएंगी।" "ईश्वर इन्हें दीर्घायु करें। "धन्यवाद कहो, क्या समाचार लाए ?" श्रेष्ठि ने कंचनपात्र में केसरिया मासव छलकाते हुए पूछा- "श्रीमान्, चितोड़ में मुझे मालूम हुआ कि महाराजकुमार मेदिनी. राय वहाँ मा रहे हैं । " बीच राह मे एक पारसिक रमणी से उनका संयोग हुआ और भाजकल उसी के रंग मे डूबे हुए है।" माधुरी चौंक कर बैठी। फिर लेट गई- -'मेदिनीराय''मेरा मेदिनी पारसिक रमणी' उसने मन ही मन सोचा और जोर से चिल्लाई- - नगरट्ठि और सूरजसिंह की वार्ता में व्यवधान आया लेकिन माधुरी को पुनः प्रशान्त देखकर, दोनो फिर से अपनी वार्ता में विमग्न हो गए। माधुरी बाहर-बाहर प्रशांत थी परन्तु भीतर-भीतर उसका मन अशान्त था-'चर की बात यदि सच है तो ?"नहीं, नही "वे ऐसे नहीं हैं."और""मैं इन दुष्टो पर कैसे विश्वास कर लू, ये लोग देश- द्रोही हैं."म्लेच्छो और यवनो से इनके सम्पर्क हैं । “अब क्या होगा? इस समय मैदिनी कहाँ है ? मुझे उसके पास जाना चाहिए"जरूर जाना चाहिए।" वल्लभी मेरे साथ जाएगी " मैं उन्हे सब कुछ बता दूंगी मेदिनी, तुम कहते हो पापी चाहे कोई भी क्यों न हो, उसका संहार होना ही चाहिए मेरे पिता "पूज्य पिता लोदियो मोर गांधारी जप एकलिंग : ३९ ययनों के गुप्तचर हैं।"जासूस हैं"हे महाकाल"हे पिनदेव यह सब मैं गया सुन रही हूँ""स्या देख रही हूँ ?' "वल्लभ" वह जोर से पुकारती रही-"वल्लभ" ! "यह मैं आपके पायताने बैठी हूँ। आदेश देवि !" ....." माधुरी ने सुनी-सनी नजरों से पोो-फीके होठों से खोई- सोई आंखों से वल्लभी को देखा । वल्लभी उसके मन की पीर पहचानती थी गोर रादय, प्रेगल, सभाव दृष्टि से उसे अपलक देख रही थी। दोनों की नजरें नजरों में समा गई। माधुरी फिर से शांत हो गई। वल्लभी ने उसे रेशमी चादर ओड़ा थी और उसके पैरों को अपने हाथों से सहलाती रही। नगरद्धि और गुप्तचर सूरजसिंह पुनः अपनी बात में लग गए-- "श्रीमंत, चित्तौड़गढ़ में महाराणाजी युद्ध की जबरदस्त तैयारी कर रहे हैं। अभी दस लाख भाले डलवाने का हुक्म दिया गया है। बड़ी संख्या में भील और मीणे एकम हो रहे हैं और उन्हें राजपूतों के साथ समान पद देकर, हिन्दू-सेना में भर्ती किया जा रहा है। यदि राणा का पक्ष बलवान बनता रहा तो जिन-धर्म की उन्नति रुक जाएगी।" "परन्तु राणाजी ने कभी जिन-धर्म के विरुद्ध कोई आदेश नहीं दिया और न कोई शासनाशा ही प्रकाशित की । उन्होंने तो सदैव जिनालयों के सम्मान का ध्यान रखा है।" लेफिन श्रेष्ठि, आपको विदित है, राजपूतों के पास धन का अभाव है, और जिसके पास धन नहीं, वणिक उसका मिम नहीं। राजपूतों में नीति का अभाव है। ये लोग सिर्फ लड़ना, मारना और मरना जानते हैं। जव कि यवन युद्धभूमि में छल, नापट और धोखे से काम ले रहे हैं, ये लोग धर्म-युद्ध के नशे में वेसुध हैं । "मूलतया इनका धर्म और कर्तव्य हिंसामय है और हमारे जिनधर्म के सर्वधा विपरीत है। आप यदि औषड़, अवधूतों और बाबानों के कार्य-कलाप देखें तो आपका अहिराक मन करणा से द्रवित हो जाएगा। इसलिए हमारी पणिक ४० : जय एकलिंग बुद्धि तो यही सम्मति देती है कि हमारा धार्मिक और आर्थिक लाभ यवनों से, लोदियो से, और कावुल के मुगलो से सम्पर्क साधने में हैं। इससे हम, मुसलमानों की मदद से हिन्दुओ को बलवान बनने से रोकते रहेगे और विजयी होकर सांगा को देश का शासक सम्राट् न बनने देंगे। मेरे खयाल में यही आता है कि राणाजी भारतवर्ष के सम्राट वनना चाहते हैं। यदि वे अपने कार्य में सफल हो गए तो यकीन मानिए इस देश से जिन-धर्म की अहिंसक पताका सदा के लिए ओझल हो जाएगी।" "इसका आशय यह निकला कि हम लोदिया और मुगगो से हार्दिक मंत्री रखें। उन्हें धन-दौलत के बदले समाचार वेचते रहें। उनसे गुलामों का व्यापार करते रहे । राजपूतों को निर्वरा बनाए रखने के लिए ये उपाय उत्तम हैं। वैसे हम, राजपूतो मे पारस्परिका फूट फैला कर, द्वैप और ईर्ष्या जगाकर, उन्हें एक-दूसरे के सानदानी दुश्मन वना सकते हैं और सूरजसिंह, हमें यही करना होगा। मेरी धर्म-प्राण बाखी में महाकाल के इस मदिर की यह विशाल पताका जलते हुए छुरी की तरह चुभ रही है। मैं चाहता हूँ, उज्जयिनी में, विश्व में, सबसे बड़ा जिन-मदिर बने । तुम्हें तो मालूम हैं, जब यह हमारा प्रासाद बन रहा था तब इसकी ऊंचाई को महाकाल के मदिर से अधिक न बढ़ने देने के लिए ब्राह्मणों ने कितना विकराल विरोध किया था? लेकिन मुनि शातिसागरजी महाराज ने मालवा के सूर्यदार, नहीं भूलता हूँ- सुलतान मुहम्मद प्रथम से कह-सुनकर इस प्रासाद का पांचवां, छठवां और सातवां तल्ला बनने दिया । बनने का आदेश पा लिया । अन्यया, ये बम्हन तो, हमे यहां से भगाने पर तुले हुए थे। अतएव, राजपूतों से मौखिक सहानुभूति और प्रेम रखते हए, हमें भीतर ही भीतर उनकी जड़ काटते रहना चाहिए।""देश में हिन्दुओ के शासन की स्थापना के सकट से सावधान रहना चाहिए । "धन्य, धन्य ! महाथेष्ठि धन्य ! आपने मेरे निवेदन को चमका दिया! मैं जो कुछ कह रहा था" शायद वह श्रीमंत के मन मे भी था..." -
".."हाँ..." श्रेट्ठि ने झिझकते हुए स्वीकृति दी-".."प्रत्येक अच्छी
वात प्रत्येक अच्छे प्रादमी के मन में रहती है।"
"श्रीमंत, आपको, इसलिए कि आप जिन-धर्म के, जिन-सम्प्रदाय के
महाप्राण नेता हैं, एक और, अन्य संकट से परिचित रहना चाहिए।
ऐसी मेरी विनम्र कामना है।"
"सूरजसिंह, निःसन्देह आप अपनी अभिलाषा प्रकट कीजिए।"
"श्रीमंत, यह कापालिक हमारे मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है।"
जव तक यह कांटा नहीं निकलेगा..." और सरजसिंह ने अपने एक
हाथ की एक उँगली पर दूसरे हाथ की दूसरी उँगली से काटने का
संकेत किया । अहिंसा के इस अपूर्व प्रस्ताव को श्रेण्ठि ने सहर्ष स्वीकार
किया, परन्तु कुछ दुविधा थी, सो पूछा-
"किंतु " कैसे ?"
"वतलाऊँगा बाद में।"
"लेकिन याद रखना संसार में यह सबसे कठिनतम कार्य
फापालिक पर हाथ उठाना-हिमाचल को फूक से उड़ाने की
कोशिश है।"
"सूरणसिंह, वैसे मुझे तुम्हारी सूझ-बूझ पर पूरा विश्वास है
जतना चाहो, धन कोपपाल से ले सकते हो।"
घण्टनाद ने सांगा को जगा दिया। हल्की-सी झपकी उसे पागई थी। सहसा घन्-घन् की सघन ध्वनि उठी । पहले वह विशाल घण्टराज के घेरे मे घहराई फिर बंधन से छूटी हवाओं की तरह अम्बर में ऊंची उठी और वहाँ वायुमडल के अतिम छोरों को छूकर तेजी से नीचे गिरी और पर्वतमालाओं की गहन कंदराओं के कानो में 'कान्या-मान्या-कुई' करती हुई पठार के मंदानो पर छा गई। इसी समय सांगा की आँख खुली। वह भूखा ही सो गया था। उसे याद पाया प्रात.कालीन कलह के कारण विपाद का जो वाता- वरण बन गया था, उसके साए में किसी कुमार ने भोजन ग्रहण नहीं किया और न किसी ने एक-दूसरे से आग्रह ही किया। मामीजी ने दो-तीन बार प्रयत्न किया। फिर वे चली गई। नानीजी होती तो बात और पी। वे तव तक चन न लेती, जव तक सभी राजकुमार उनकी देखतीआंखो भोजन न कर लेते । उनके स्नेह और दुलार मे अपरिमित शक्ति थी और उनकी घृणा और प्रति- जय एकलिंग:४३
".."हाँ..." श्रेट्ठि ने झिझकते हुए स्वीकृति दी-".."प्रत्येक अच्छी
बात प्रत्येक अच्छे आदमी के मन में रहती है।"
"श्रीमंत, आपको, इसलिए कि आप जिन-धर्म के, जिन-सम्प्रदाय के
महाप्राण नेता हैं, एक और, अन्य संकट से परिचित रहना चाहिए।
ऐसी मेरी विनम्र कामना है।"
"सूरजसिंह, निःसन्देह आप अपनी अभिलाषा प्रकट कीजिए।"
"श्रीमंत, यह कापालिक हमारे मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है।"
जब तक यह काँटा नहीं निकलेगा".." और सरजसिंह ने अपने एक
हाथ की एक उँगली पर दूसरे हाथ की दूसरी उँगली से काटने का
संकेत किया। अहिंसा के इस अपूर्व प्रस्ताव को श्रेष्ठि ने सहर्ष स्वीकार
किया, परन्तु कुछ दुविधा थी, सो पूछा-
"किंतु " कैसे ?"
"वतलाऊँगा वाद में ।"
"लेकिन याद रखना संसार में यह सबसे कठिनतम कार्य है
कापालिक पर हाथ उठाना-हिमाचल को फूंक से उड़ाने के
कोशिश है।"
"सूरजसिंह, वैसे मुझे तुम्हारी सूझ-बूझ पर पूरा विश्वास
जितना चाहो, धन कोपपाल से ले सकते हो।"
: ७:
घण्टनाद ने सांगा को जगा दिया।
हल्की-मी झपकी उसे प्रागई थी। सहसा धन्-धन् की सघन ध्वनि
उठी। पहले वह विशाल घण्टराज के घेरे मे पहराई फिर बंधन से छूटी
हवाओ की तरह अम्बर में ऊँची उठी और वहां वायुमंडल के अंतिम
छोरो को छूकर तेजी से नीचे गिरी और पर्वतमालाओ की गहन
कंदराओं के कानों में 'कान्या-मान्या-कुई' करती हुई पठार के मैदानो
पर छा गई।
इसी ममय सांगा की प्रॉस सुली।
वह भूरा ही सो गया था।
उसे याद पाया प्रात.कालीन कलह के कारण विपाद का जो वाता-
वरण बन गया था, उसके साए में किसी कुमार ने भोजन ग्रहण नहीं
किया और न किसी ने एक-दूसरे से आग्रह ही किया ।
मामीजी ने दो-तीन बार प्रयत्न किया । फिर वे चली गई।
नानीजी होती तो वात और थी । वे तब तक चैन न लेती,
तक मभी राजकुमार उनकी देखतीयांखों भोजन न कर लेते। उनके
स्नेह और दुलार में अपरिमित शक्ति थी और उनकी घृणा और प्रति-
जय लिगा.Y
हिंसा में अनन्त वल था। उनके स्वभाव के दो ध्रुव थेप्रम
और घृणा।
नानीजी जिससे प्रेम रखतीं-वह अन्तहीन, असीम प्रेम का पात्र
वनता और जिससे वे घृणा करतीं, उसे अपार घृणा का स्वामित्व
स्वीकार करना पड़ता।
सांगा को वे वहुत चाहतीं। उसे जी भर प्यार करती।
पृथ्वीराज उन्हें जरा पसंद न था। उससे वे उतनी घृणा करती
जितनी एक राजा अपने शत्रुराजा से करता है । इस घृणा का परिणाम
था कि. मरते-समय उन्होंने सांगा और पत्ता के नाम भरपूर धनराशि
लिखवाई, परन्तु पृथ्वीराज और जयमल को कानी कौड़ी भी न दी।
आजीवन तो नानीजी ने अपनी प्रकृति की सुरक्षा का ध्यान रखा
ही, मरणोपरान्त भी वह अपनी परम्परा में अखंड रहे, इसका पूरा
प्रवन्ध अपने उत्तराधिकारी-पत्रक के द्वारा कर गई !
पृथ्वीराज जितना वीर था, उसका स्वभाव उतना ही कायर था ।
उसका मन उसके तन के विपरीत था।
उसमें अतुल शारीरिक बल था परन्तु मनोवल का सर्वथ
प्रभाव था।
सांगा से उसकी यों भी अनवन रहती थी।
अव इस अनवन ने वर का रूप धारण कर लिया।
सांगा सौतेली माँ का पुत्र, उसका भाई था।
सांगा की माँ झाला राजकन्या थी।
पृथ्वीराज, माता और विमाताओं को मिलाकर, कुल व
माताओं में से किसी भी प्रिय नहीं था। तेरह भाइयों में
जयमल ही उसे चाहता था।
जितना वह अप्रिय था, साँगा उतना ही प्रिय था।
पृथ्वीराज क्रान्त और उद्भ्रान्त था।
सांगा अक्लान्त और शान्त था।
फिर भी तेरहों भाई-तेरह रत्नदीपों की भांति झिलमि
कलिंग
।
थे । उनके सुकोमल तेज से मेवाड़ के राज-प्रासादों के प्रांगण प्रकाशित
थे । रुद्र और आदित्य के समान वे सुशोभित थे।
सांगा ने सोचा-
नानीजी ने पृथ्वीराज को कुछ न देकर अच्छा नहीं किया। तो, मैं
ही अपने भाग का एक अंश उसे दे दूंगा। क्षत्रिय के लिए तलवार का
महत्त्व है, धन-दौलत का नही । धन और धरती तो वह अपनी भुजाओ
के पराक्रम से अनन्त और असीम प्राप्त कर लेगा।
किन्तु, पृथ्वी-दादा को, क्या यो अपना जो छोटा करना चाहिए ?
दे हम सभी भाइयों में बड़े हैं तो क्या उनका हृदग छोटा होना चाहिए?
आखिर, वड़ा कहते हैं किसे ? उसी को, जिसका हृदय बडा है।
जो अधिक देता है।
जो अधिक लेता है, वह अधिकाधिक छोटा है।
मंगोजी के मुह से सुनते-सुनते ही पृथ्वीदादा तलवार लेकर मुझ
पर टूट पड़े !
मगर बीच मे काकाजी सूरजमल कूद पडे ।
उनके साथी सारंगदेव दौड़े।
मैं वच गया।
-मैंने बार नहीं किया । दादा पर हाथ उठाऊँ ? मेरो तलवार
म्यान से बाहर आती ही नहीं। हाथ मुंठ पर पाता ही नहीं।
मैं भलीभांति बता सकता हूँ, कुरुक्षेत्र में वेचारे अर्जुन की क्या दशा
हुई होगी, जब उसने, मेरी तरह, अपने सामने, चारोमोर माई ही
भाई देने होंगे? भ्राता, चाचा, मामा, फूगा, साले, नह्नोई और भांजे,
भतीजे के अतिरिक्त कौन था उसके सम्मुख
जो अपना था, वह वैरी था !
यानी वैर अपने-आप रो था।
-~~शा कही बाहर नहीं, अपने ही भीनर वंठा या !
गवसे पहले यदि किसी को मारना था तो अपने मन को
मारना था।
?
बेचारा अर्जुन !
मन ने कहा-
और वेचारा साँगा !
हाँ, बेचारा साँगा !!
आखिर, इस विपाक्त वातावरण का कारण क्या है ?
मन ने उत्तर दिया-
राज्य-धन और धरती।
हृदय ने निर्णय दिया-
मैं दोनों को छोड़ दूंगा। अपने पूर्वजों के विशाल साम्राज्य को
त्यागकर, उसकी सीमा से दूर, कहीं चला जाऊँगा।
क्या प्रभु रामचन्द्र ने हमारे ही रघुवंशी, सूर्यवंशी पराक्रमी
पूर्वज ने साकेत के राज्य का परित्याग नहीं किया ? नारियल का
जल पीकर जिस प्रकार पंथी फल को कैंक देता है, उसी प्रकार श्रीराम
ने राजसिंहासन छोड़ दिया !
इस हेतु कि श्री भरत से विद्वेप न हो।
सहोदर का वाण सहोदर की कंठमणि का छेदन न करे !
भाई की तलवार भाई के गले पर न गिरे !
सांगा शैया से उठा और बाहर उद्यान में आगया ।
उसके आकर्णान्त विशाल लोचनों के सम्मुख प्रकाश के प्रति
तरने लगे। मन में आह्लाद के उत्स फूट चले !
उसने निश्चय कर लिया- वह वन में चला जाएगा।
पिताजी- महाराणा रायमल्ल के चर वन में भी उसे ढूंढ़ लें
शंका उठी !
वन में ढूंढ़ लेंगे?
सांगा अज्ञातवास करेगा ! साधारण जीवन व्यतीत करेगा
कर रहेगा। किसी से न कहेगा कि वह कौन है ?
'गरीव गड़रिया हूँ. श्रीमान् !'
उसने मन ही मन दुहराया और उसे हँसी आ गई ।
आज भोर के बाद यह पहली हँसी थी। इसलिए तो
।
। लगी । भोर में तो वह खूब हंसा था, खिलखिलाया था। सभी भाइयों के मन शान्त थे। कोई उद्विग्न नही था । कोई क्षुब्ध नहीं था ! उन शूद्र-कन्याओं को जलाशय की राह में ही रोक कर कुमार सभी, प्रसन्न हुए ये तीर-कमान से उनको काली-लाल कलशियों तोड़ने की प्रतियोगिता में मानो प्रत्येक कुमार, दूसरे से आगे बढ जाना चाहता था। सांगा ने किसी की मटकी नही तोडी । "जिस पात्र से किसी की प्यास बुझती है, उसे क्यो कर नष्ट किया जाए ?'-मुझे उस वेला यही विचार प्राया । काकाजी उधर से गुजरे। उन्हे देखकर वह शूद्र-कन्या जिसको उसकी सहेलियां राजो या किसी ऐसे ही नाम से पुकार रही पी, शेर होगई। बोली- "कुमार की जय हो, भन्नदाता आपके चांदी और चांदनी की खेती है। हम धूल और धूप में पैदा होते हैं और वही हमारी कमाई है। हम नीच हैं और आप उच्च हैं. "तब छोकरी. बढ़-चढ़कर यातें क्यों बनाती है ?" बीच मे पृथ्वीराज ने कहा पा। "अन्नदाता प्रभु को सतान हैं और हम मनुष्य की।" "तव दूसरी सहेली ने बीच में ही कह दिया था"- "मनुष्य को, क्या प्रभु की संतान मार डालेगी?" यह तकं सामन्तराज सूरजमल को भा गया था। उन्होने पृथ्वीराज पौर अन्य कुमारों को रोक दिया, लेकिन पृथ्वीराज ने इतना अवश्य दिया था- "शूदे, तुझे मालूम है, सामंतकुल-पुत्रो को यदि तुझ-सी शूद्रा उपदेश देने का दुस्साहम करे, तो जानती है उसका दण्ड क्या है ?" दण्ड की कल्पना कर रागो काप कई परन्तु अपने माक्रोश को मायु को अल्पता के कारण, वश मे नही रस पाई- " ..........
"ऐसे अपराधियों की जीभ काट ली जाती है।"
"फिर ?"
"यदि मेरी जीभ काटने से तुम्हें संतोष हो तो मैं प्रस्तुत हूँ।"
तब बड़ा कुहराम मच गया। सामन्तराज को भी क्रोध आया कि
एक शूद्र-कन्या इतनी धृष्टता करे !
उसके अपराधिन और पापिन होने के लिए यही क्या पर्याप्त नहीं
है कि वह शूद्रा है !
सेवकों ने ढेले मार-मार कर शूद्र-कन्याओं को वहां से भगा दिया।
भागती हुई लड़कियों के गोल में जब-तब राजकुमारों का छोड़ा हुआ
तीक्ष्ण बाण, सनसनाता हुआ आ गिरता और वे घबराकर, चिल्लाकर,
तितर-दितर हो जाती।
दूर से एफ अट्टहास उठता !
फिर दूसरा, तीसरा और चौथा वाण आता । एक-एक डग उन
शूद्रानों के लिए दुष्कर हो गया था। तब मैंने अपने वाणों से उनके
बाणों को बीच में ही काट गिराया। इस पर पृथ्वीराज ने मुझे
ललकारा
मैंने उत्तर में एक और वाण चलाया।
उत्तर न पाकर उसने जैसे स्वतः ही कहा-
"जो शूद्र है, वह सदैव शूद्रा का ही साथ देता है। एक दिन इस
शूद्र को मजा पसाऊंगा।"
पृथ्वीराज के इस कुटिल ण ने मेवाड़ की पवित्र घरती में ८
के वीज वो दिए।
पृथ्वीराज जब इस प्रकार वाक्-व्यूह की वृथा रचना कर रहा
जयमल ने स्मरण दिलाया-
"दादा,ज्योतिपी महाराज के लाश्रम नहीं चलना है ?"
"चलना तो था । इन शूद्राजों ने शकुन खराव कर
पृथ्वीराज ने उत्तर दिया।
जयमल ने घोड़े पर बैठते हुए कहा-
.
'दादा, वीरों का उत्साह-योग ही उनका मुख्य शकुन है ।"
"हाँ, तुमने यह सुन्दर स्वर्गमूत्र सुनाया। आओ चलें।"
"इनसे भी पूछ-देखो ये भी अपना भविष्य जानते हैं ? या इन्हें
वोध हो गया कि आजीवन शूद्रो का समर्थन करना है ! कभी ये भील.
मीणो का पक्ष लेते हैं, कभी गुर्जर-आभीरो का !"
मैंने जयमल से कहा--
"मैं भी ज्योतिषी महाराज मंगल भेनारिया के प्राथम तक अवश्य
आऊँगा।"
हम चल पड़े !
पृथ्वीराज, जयमल और सनामसिंह -तीनों राकुमारों ने मंगलजी
के आश्रम की योर अपने घोड़ो की बागडोर मोड़ दी।
तीनों अश्व पवनवेग से उड़ चले।
:८: ज्योतिपाचार्य मंगल मेनारिया अपने समय का प्रसिद्ध ज्योतिपी था। काशी के पंडितराज प्रभाकर शास्त्री पाद-पड़ों में पच्चीस वर्ष बैठकर, मंगल ने वेद-वेदांग, न्याय ज्योतिष, षट्दर्शन और साहित्य की शिक्षा ग्रहण की थी। काशी से सीधा मेदपाट (मेवाड़) न लौटकर मंगल पंडित हिमालय की ओर चला गया था, जहां उसने बारह वर्ष तक विकट तप किया और तप पूर्ण होने पर दिगम्बर रूप में वह भूतस्थान (भूतान) में प्रविष्ट हुया और वहाँ वक्ष, किन्नरों और गंधों के प्रदेश में उसने तन्त्र विद्या में सिद्धि प्राप्त की। लोग कहते थे-मंगल महाराज को 'कर्णसिद्धि' भी प्राप्त है, जिसके कारण यक्षगण उनके कानों में इच्छित संकेत देते रहते हैं। इसके अतिरिक्त मन्त्रबल से दिन को रात और रात को दिन बना देना मङ्गल महाराज के लिए बाएं हाथ का खेल है। एक वार महाराणा कुम्भकर्ण की राजसभा में पण्डितों के मध्य शिरोमणि के समान मङ्गल महाराज भी विराजित थे। प्रसङ्गवश महाराज के मुख से निकल गया कि 'आज पूर्णिमा है।' विरोधी पण्डितों ने कहा-"आज पूर्णिमा नहीं है पण्डितराज, चतुर्दशी है।"
"आपका भ्रम है, आज पूर्णिमा ही है।" 'तब तो रात्रि में पूर्णचन्द्र का उदय ही सारी समस्या का निर्णय कर देगा कि आज चतुर्दशी अथवा पूर्णिमा ।" सभा-पण्डितो ने बात को बढती देख यही स्वीकार किया कि चन्द्रोदय की प्रतीक्षा की जाए। निशागमन होते-न-होते मैदानों में दर्शनाथियों के समूह के समूह परों से निकलकर आने लगे । आवाल-वृद्ध-युवा--सबके मन में कौतूहल था-~-आकाश किसके पक्ष को सत्य सिद्ध करेगा ? विपक्षी पण्डित भी गणित-गणना में कुछ नही हैं और मङ्गल महाराज को कैसे कम कह दें? जन-मण्डली की दृष्टियाँ गगन की मोर लगी थी मानी चन्द्र का चाहक भकोर निनिमेप दृष्टि से अम्बर की ओर देख रहा हो। ठीक समय पर पूर्णचन्द्रोदय हुआ। दूसरी पूर्णिमाओ की भौति, यह भी अपनी सोलह कलामो मे मिलकर अमृत-नरगिणी-रजत-चन्द्रिका से चौदही भुवन को प्रभावित कर रहा था। जन-समूह मगल महाराज की जयजयकार के घोप पहराता लौट गया। विरोधी पण्डितो के मुरा म्लान हो गए। दूसरे दिन, महाराजजी ने पण्डितराज से एकात में पड़ा- 'देवता, परसों आपने स्वयं मुझे अपने श्रीमुख से बतलाया था कि आज प्रयोदशी है, तो क्या चतुर्दशी और पूर्णिमा मिलकर एक होगई ?" "दीवानजी, नृपेन्द्र के सम्मुख मिथ्या माषण नहीं करूंगा । कल अवश्य चतुर्दगी थी परन्तु भरी सभा मे मंजीवनी को तरङ्ग में मेरे मुख से निकल गया--आज पूर्णिमा है। राजन्, चर्म की तो यह देही है यौर चर्म की ही जिह्वा है, अतः यह फिसल जाए तो क्या आश्चर्य !" महाराज मुराकराए- "से फिर आपके वचन की रक्षा हई ?"
"गुरु का प्रसाद ! एकलिंग की कृपा । मैंने तीसरे प्रहर तक अमित विचार किया फिर निर्णय, कि क्यों न मन्त्रावल का प्रयोग करू ? निदान, मैंने एक कांस्य थाली को अभिमन्त्रित किया और उसे आकाश की ओर, चन्द्रविम्ब पर छा जाने का आदेश दिया। श्रेष्ठ ! समय पर चन्द्रिका चमक उठी।" "धन्य, महाराज धन्य," महाराणा ने हर्षोल्लास व्यक्त किया ! x X मङ्गल महाराज के आश्रम के शुक-सारिका तीनों राजकुमारों को देखकर स्वस्ति मन्त्रों का पाठ करने लगे। जयमल को शुकों का धाराप्रवाह संस्कृत पाठ विस्मयजनक प्रतात हुया । बड़े प्रयास पर भी वह संस्कृत की पाँच पोथियां पूरी तरह नहीं पढ़ पाया था। आथम के द्वार पर मङ्गल-कलश-धारिणी ब्राह्मण कन्याओं ने कुमारों का स्वागत किया। कुमारों ने मुट्ठी भर-भर स्वर्णमुद्राएँ उन पर न्योछावर कीं। और घोड़े से उतर कर, अपने शस्त्रादि वहीं छोड़कर उन्होंने आश्रम के अतिथि-कक्ष में प्रवेश किया । सेवकों ने तीनों अश्वों को विशाल वटवृक्ष की छविमान छाया में बांध दिया। तीनों कुमारों को कुछ देर प्रतीक्षा करनी पड़ी, क्योंकि मङ्गल. महाराज ध्यानस्थ थे। बाहर द्रुतगामी श्रश्च के खुरों की खट्-खट सुनाई दी और ऊंचे उठते धूलिचक्र दृष्टिगोचर हुए । एक प्रचण्ड सैंधव पर सवार सूरज- मल पहाँ पाए । उनके पश्चात् कुछ ही पल बीते होंगे कि एक दूसरे चपल तुरङ्ग पर सवार उनका चाचा सारङ्गदेव अज्जावत भी वहाँ आ पहुँचा। "काकाजी आप ?" पृथ्वीराज ने सूरजमल से प्रश्न किया। "वत्स, मैंने, सोचा, महाराज की सेवा में उपस्थित होकर मैं भी तुम्हारे साथ अपने भविष्य का संकेत प्राप्त करूं।" "और बड़े काकाजी (सारंगदेव) भी प्रा पहुंचे हैं। इन्हें शायद अपनी जागीर के बारे में पूछताछ करती है !" सारङ्गदेव बोला- "ठीक कहते हैं आप । भैसरोड़गढ़ को जागीर जबसे मुझे मिली है, मैं परेशान हूँ | कभी चैन से नहीं रह पाया।" पृथ्वीराज ने सुनकर होठ काटा क्योकि वह सारङ्गदेव से मन ही मन जलता था। और नहीं चाहता था कि महाराणा सारङ्गदेव को पांच लास से अधिक वार्षिक आय की जागीर प्रदान करें। अतएव वह समय-समय पर जागीर के काम में रोड़े अटकाता था। "भाई-भाई का वैरी बन रहा है, कैसा समय आ गया है !" सूरजमल ने उमांस लेकर कहा । पृथ्वीराज जलभुन कर रह गया। लेकिन सांगा को न पृथ्वीराज की कुटिलता पसन्द थी, जो ताप व्यक्त कर रही थी और न सूरजमल की सरलता, जो संताप व्यक्त कर रही थी । वह तो यही चाहता था कि सब मौन और शान्त रहें। भाइयो मे किसी प्रकार का स्वार्थ-विग्रह न हो, मेवाड़ की भूमि और अधिक अब अपने ही दुलारों के शोणित से रंजित न हो । मेवाड़ को आवश्यकता है संगठन और एकता की। "एक माला के मन के है हम सब ! फिर जोन छोटा, कौन बड़ा है ! मो की समदृष्टि में सभी लाल समान हैं। यह तो हमारा विद्वप है, जो हमे दम्भी और दुविनीत बनाता है ।" सांगा प्राय. यह कहा करता था और इसीलिए उसके साथी उसे 'साधु सांगा' कहा करते थे। परन्तु कोई 'साधु' कहें या 'असाधु', सांगा को इसकी चिंता नहीं थी। उसे तो केवल भारत के भावी की चिंता थी। उस भारत की, जिसे एकता के सूत्र में संगठित करना चाहता था। जिसे एक ही छा की छाया में रक्षित रखना चाहता था। "एक देश, एक भेप, एक भाषा, एक पताका और एक प्राण"-एकत्व का उसका प्रथम मन्य था।
- ! "एकता राष्ट्र की प्रथम आवश्यकता है", कहकर सांगा ने 'एकता' का महत्त्व योंही नहीं बढ़ा दिया था। यदाकदा वह कहा करता था- "जो 'एक' है उसे अनेक भी नहीं हरा सकते ! कभी यह देश किसी से नहीं हारा। इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता जब किसी बाहरी शत्रु ने इस देश पर विजय पाई हो और इसे हराया हो ! जव-जब यह हारा, जव-जब यह पराजित हुआ-'अपने आपसे !' अपने ही आंतरिक शत्रु ने, अपने ही वांधवों ने, इसके अपने पुत्रों के विरुद्ध गद्दारी की। पुण्य, पवित्रता और धर्म की यह देश चाहे जितनी चर्चा करे, इस देश में अधम और हीनकर्मा नराधमों और देश- द्रोहियों की कमी नहीं रही है । शूरवीरता का जितना बखान यहाँ किया जाता है, कायरता उतनी ही अधिक यहाँ है। मुख से युद्ध, वलिदान और विजय के व्याख्यान देना और मन में, आत्मा में स्वार्थ और शत्रु से समझौते के स्वप्न सँजोना इस देश के अनेक महत्त्वाकांक्षियों की पापपूर्ण, प्रवंचक परम्परा रही है ! ...." इस भावावेश में वह रुकता नहीं- "इसलिए संगठन और संघटन पहली जरूरत है । विना स्वार्थ- त्याग के संगठन नहीं होगा। बिना बुराइयों और कुरीतियों को छोड़े नवीन संघटना नहीं होगी, नवनिर्माण और अभिनव अभ्युदय के अभिलापी इस महान् और पवित्र देश को नूतन विधान चाहिए, जिसमें शक्ति व्यक्ति की स्वेच्छाचारिता की कारा की बंदिनी न हो। सत्ता उच्छृङ्खल राजपुत्रों के विलास की वस्तु न हो । शक्ति हो या सत्ता, उसका स्रोत समाज के नियन्त्रण में रहे, व्यक्ति पर समाज का अनुशासन रहे । व्यक्ति अपनी इकाई में मुक्त और आत्मनिर्भर हो परन्तु समाज के प्रति पूर्णरूपेण उत्तरदायी और त्यागभावना से भरपूर हो! और समाज.. "समाज..." सांगा कहे विना न रहता "समाज एक स्वप्न है : मनुष्य में जो कुछ दिव्य और अलौकिक है, वह उसके समाज की समृद्धि और समता में अभिव्यक्त होता है। - :
समाज व्यक्ति का स्वामी है और माथ ही उसका सेवक भी ! सागर का ममत्व अपार है बिन्दु के प्रति । सागर यह नहीं कहता कि बिन्दु का भिन्न अस्तित्व नहीं है, या उसका अपना महत्त्व नहीं है अथवा विंदु के न होने से भी सागर बन सकता है !" "बिदु सिंधु का प्रतीक है, यही विदु की गरिमा, महिमा, और यशस्विता है । और सिंघु विदु के सर्वस्व के समर्पण को सहर्ष स्वीकार करे, यह सिंधु के अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक है। बिंदु मिट जाएगा तो सिंधु भी मिट जाएगा। सिंधु न रहेगा तो विदु भी न रहेगा। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । एक दूसरे अभाव की पूर्ति करता है। "और कोई यदि कहे कि बिंदु छोटा है और सिंधु वड़ा है तो, छोटा होने के नाते विंदु का दायित्व भी छोटा है, उस पर कोई नियम- वन्धन नही । वह चंचल कितना ! और सिंधु, उसका दायित्व अनन्त ! दायित्व की गुरुता के कारण ही वह विराट् है। उसके बन्धन कितने ! मर्यादा में वह रहता है कि कभी सीमा नहीं छोड़ता, तट का व्रत नहीं तोड़ता !" "सांगा से कोई कहे तो वह सौ बरस तक व्यक्ति, समाज, देश युद्ध और शांति पर बोलता रहे। वर्षों तक शास्त्रो और शस्त्रो की चर्चा करता रहे । न केवल शस्त्र की झंकारें वरन् शास्त्रों के अनेकानेक मंत्रों की तरंगें भी उसका मन मोहती हैं । पण्डितराज मगल मेनारिया को देखकर पहले काकाजी-सूरजमलजी ने दंडवत् प्रणाम किया। फिर बारी बारी से सारंगदेव और तीनों कुमारों ने दंडवत् प्रणाम किया। पण्डितराज मंगल महाराज ने राजपुत्रों के नाना उपहार स्वीकार किए, जिन्हें उनकी पोपिता कन्या गौरी उठाकर भीतर ते गई। राजकुमारों ने अपना मतव्य प्रकट किया। ज्योतिपी ने कहा- "मुझे आप सभी कुमारी की जन्म-पत्रियां देखकर प्रसन्नता होगी ! ----..
ससे अधिक आनन्द का विषय और क्या हो सकता है ! मेरी
स समय दो सौ तीस वर्ष से कुछ अधिक ही है। मेवाड़पति
न् एकलिंग के सभी पुण्यश्रेय दीवान की कुण्डलियाँ मैंने देखी हैं
पने हाथों अंकित की हैं। प्रत्येक महाराणा, सामान्य और श्रेष्ठि;
क राजपुत्र, अधिकारी और कुलपुत्र विगत युगों में यहाँ आता रहा
वृक्ष के समान अति वृद्ध वह
ज्योतिपी मुसकराया-
"अब तो नवयुग के आप नवयुवकों को इस विद्या पर विश्वास
ही रहा।"
"महाराज, विश्वास नहीं होता तो यहाँ तक आते ?" पृथ्वीराज
ने कहा।
ज्योतिषी ने श्वेतकेगों से अलंकृत अपना शीशा हिलाया। अव वह
जन्मपत्री देखने लगा।
पृथ्वीराज व्यग्र हो रहा था। पहले उसने अपनी जन्मपत्री
ज्योतिषी के चरणों में रखी। वह, यों भी, स्वभाव से उतावला मोर
जल्दबाज था। लोग उसे 'उड़णा पृथ्वीराज' भी कहते थे।
ज्योतिषी ने कुंडली को देखा।
फिर दृष्टि पृथ्वीराज के चेहरे पर डाली।
धीमे-धीमे शीश को गति दी।
मुंह खोला-
"कुमार पृथ्वीराज बाप बड़े प्रतापवान् और विक्रमवंत हैं। यापके
पराक्रम का प्रवाह अखण्ड रहेगा।"
इतना ही कहा और अब जयमल की जन्मपत्री पढ़ने लगा। पृथ्वी-
राज सहज ही पीया छोड़ने वाला नहीं था---
"महाराज, मैं कितनी अवधि तक मेदपाट पर शासन करूंगा ?"
"गासन, सत्ता, भाग्य बल और भुजबज पर निर्भर है। ज्योति
तो एक गणित है, कुमार! वह भला, भाग्य के अगणित की गण
कैसे कर सकता है ! फिर भी आपके ग्रहयोग अनुकूल हैं--तृत
स्यान में मंगल है। छठे स्थान में सूर्य है और ग्यारहवें स्थान
उच्च शनि है । आप सदैव विजयी होंगे, किन्तु पिता को विद्यमानता में
ही मापके देहांत का योग है।"
सारंगदेव और भूरजमल भी चुपचाप सुनते रहे ।
तव पृथ्वीराज का मुख म्लान हो गया-ज्योतिपो ने यह नहीं
बतताया कि वह सिंहासन का स्वामी कब बनेगा ?
पंडितराज ने जयमल से कहा-
"पृथ्वीराज से आप में कम पराक्रम है। अकारण अपने प्राणों को
संकट में न डालना ! आपका मृत्युयोग भी विकट है । पिता का प्राप
पर बहुत प्रेम है, उन्हें आपका मरण-संताप सहना पड़ेगा।"
सांगा की वारी सबसे बाद मे आई। पडितराज ने सांगा की
कुण्डली देखकर हर्ष प्रकट किया-
"प्रकृति अति गम्भीर है, शान्त है। स्वार्य छू भी नहीं गया।
अत्यन्त क्षमाशील और उदार ! मुद्ध-कौशल मे अद्वितीय और रणांगण
में सदैव अपराजेय ! विजयश्री नित्य वरण करेगी !"
ज्योतिपी मौन रह गया । परन्तु उसकी दृष्टि पत्री पर लगी रही।
पृथ्वीराज ने पूछा-
'महाराज, अव क्या देख रहे हैं ?"
"एक विशेष विधान है।"
"कौनसा ?" पृथ्वीराज ने ही पुनः प्रश्न किया ।
सांगा प्रशान्त बैठा रहा । भविष्य के प्रति न उसमें जिज्ञासा थी,
न भय था, न आशा न निराशा ! वह कहा करता था-"मनुष्य स्वयं
अपने भाग्य और भविष्य का निर्माता है।"
ज्योतिषी मुसकरा कर बोला-
"राजकुमार संग्रामसिंह 'सग' की इस जन्मत्री में राजयोग है।
पचम् और नवम् स्थान में शुभ ग्रह पक्ष में हैं। नवांश में वृहस्पति है।"
"और भी कुछ कहिए । राज्य इन्हें मिलेगा या मुझे ?"
"वृहस्पति के पश्चात्" हो, आयुष्मान् कुमार, ऐसे शुभ ग्रहों का
| जिसकी कुण्डली में होता है वह अवश्य चक्रवर्ती सम्राट् बनता
! "आज इतना ही। मेरी यह आराधना की वेला है ।"
इतना कहकर ज्योतिपी खड़ाऊँ खटखटाता भीतर चला गया।
सांगा के चेहरे पर एक ही भाव था--वह न प्रसन्न था, न
वसन्न।
भगवान् राम ने जब राज-तिलक का संवाद सुना तव उल्लास
प्रकट नहीं किया और वनवास का सन्देश मिला, तव भी उदास वे
न हुए !
सांगा भी दोनों अवस्थाओं में समान रहा।
लेकिन श्रवणमात्र से कि सांगा 'चक्रवर्ती सम्राट्' बन सकता है,
पृथ्वीराज और जयमल के वदन विकृत हो गए। उनके हृदयों में वैर
और विद्वेप की होलियां धू-धू कर सुलग उठी !
भाई ही तो थे--
परन्तु भाई के भाग्य से ही उन्हें ईर्ष्या थी।
सहोदर से सहोदर द्वेप द्वन्द्व रख रहा था।
एक ही वृक्ष के वृन्त, कट कर अलग हो गये थे और अब कुल्हाड़ी
के हत्ये वनकर वृक्ष की प्रत्येक शाखा को काट गिराना चाहते थे !
पृथ्वीराज और जयमल की यही गति थी।
या अवगति थी?
सारंगदेव, सूरजमल, संग्रामसिंह, पृथ्वीराज और जयमल अपने-
अपने आसन पर अविचल बैठे रहे।
आश्रम शंखनाद से गूंज उठा।
ब्रह्मचारीगण उच्चस्वर से मन्त्रपाठ करने लगे। गौएँ (भा
लगी। ब्राह्मण-कन्याएँ इक्षुमधुर स्वर में प्रकाश और चेतना के गं
गाने लगी।
इन सभी नादों, स्वरों और गीतों के ऊपर एक गभीर अनहद
उठ रहा था।
वह था पंडितराज मंगल महाराज का राजघोप !
सूरज के सातो घोड़े उस उद्घोप से चौंककर क्षिप्रगति से दौड़ रहे थे। और उन मश्वराजों से भी त्वरित, चपल गति से दौड़ रहा था पृथ्वीराज का मन ! वह सोच रहा था- "मैं - अकेला मैं, मैदपाट का स्वामी कैसे बनू ? स्वर्ण-पिंजर में सारिका चहचहाई- "अर्जुनस्य प्रतिज्ञ द्वैः न दैन्यं न पलायनम् ।" -
| जिसकी कुण्डली में होता है वह अवश्य चक्रवर्ती सम्राट
! "आज इतना ही। मेरी यह आराधना की वेला है .।"
इतना कहकर ज्योतिषी खड़ाऊँ खटखटाता भीतर चला गया।
सांगा के चेहरे पर एक ही भाव था--वह न प्रसन्न था, न
अवसन्न ।
भगवान् राम ने जव राज-तिलक का संवाद सुना तब उल्लास
प्रकट नहीं किया और वनवास का सन्देश मिला, तव भी उदास वे
न हुए !
सांगा भी दोनों अवस्थाओं में समान रहा।
लेकिन श्रवणमात्र से कि साँगा 'चक्रवर्ती सम्राट्' बन सकता है,
पृथ्वीराज और जयमल के वदन विकृत हो गए। उनके हृदयों में वैर
और विद्वेप की होलियां धू-धू कर सुलग उठी !
भाई ही तो थे--
परन्तु भाई के भाग्य से ही उन्हें ईर्ष्या थी।
सहोदर से सहोदर द्वेप-द्वन्द्व रख रहा था।
एक ही वृक्ष के वृन्त, कट कर अलग हो गये थे और अब कुल्हाड़ी
के हत्ये वनकर वृक्ष की प्रत्येक शाखा को काट गिराना चाहते थे !
पृथ्वीराज और जयमल की यही गति थी।
या अवगति थी?
सारंगदेव, सूरजमल, संग्रामसिंह, पृथ्वीराज और जयमल अपने
अपने आसन पर अविचल वैठे रहे।
आश्रम शंखनाद से गूंज उठा।
ब्रह्मचारीगण उच्चस्वर से मन्त्रपाठ करने लगे। गौएँ -
लगी। ब्राह्मण-कन्याएं इक्षुमधुर स्वर में प्रकाश और चेतना के
गाने लगीं।
इन सभी नादों, स्वरों और गीतों के ऊपर एक गभीर अनह
उठ रहा था।
वह था पंडितराज मंगल महाराज का राजघोप !
जय एकलिंग
विस्तीर्ण, प्रफुल्ल, रूपविता आम्रवन-थी कानन्द-उल्लास में मंजरिता; रस और रास के सम्मोहन गीत सुनेंगी ! सपने ससुराल के हालचाल सुनकर कोकिलाएं सबको हमायेंगी । आम्रशासानों पर फुदक फुदका कर वे अपनी ननदों की नकल दिखाएंगी और सौतेली सासों की चाल-ढाल का अभिनय दर्शित करेंगी। पूर्ण हरित आम्र-तरयो के मेघ श्याम तन और गोलाद्धं की प्रकीर्ण परिधि की ओट मे, सरोवर की पनिहारिन, खाली कलश काली भाटी पर एक मोर रस, अपने रमेश्वरी से मिल रही हैं। उन्होने धुंधरुषों में अभिनव द्रुमदल खोंस लिए हैं कि वे मुखर किसी से इस बात भी कह न दें । भाम्रवृक्ष के त्रिशूलाकार तन के सहारे, पीठ टिकाए, गोरी वा विरोधिन शाखाओं तक फैलाए पनिहारिन मुक्त, विनरी-बिसरी-सी खडी हैं । और उनके विशाल दूध भरे, परिपूर्ण पयो- घरो को बढ़ती हुई सांसे उछाल रही हैं ? जघाओं मे थिरकन है । मन में लोक का भय है । नयन में मिलन की साज है और अधरो पर अमृत के अनन्त महासमुद्र अपनी छाप छोड़ रहे हैं ! इन अधरों की रस-स्नात लाली को पिया के चुम्बनो ने अपने में समा लिया है और इस अपराध में पिया के अधरों पर कालिमा लग गई है (नयन-चुम्बन के फलस्वरूप) ! दोपहरियां ताल के दर्पण में देखती, केशराशि गूय रही हैं। सांसें सोई है। नुपूर मौन हैं। पग स्थिर हैं अङ्ग-अङ्ग से जुड़े हैं । और भनन्तानन्द का अनादि रास तुमुतगति से चल रहा है परन्तु पत-छिन रुके बैठे हैं । रस की क्षिप्रता देखकर काल-समय अपनी चाल भूल गया है ! और मूक दृष्टा-सा अपने में विसरा, पड़ा, देस रहा है ! चपल ताल में, वाचाल सरोज बालाएं वयसन्धि की लहरों को गिन रही है। मौवन-पराग अङ्ग अङ्ग में फूट रहा है और मानस में मधुकरों के प्रति मान मचल रहा है, मुग्धाओं-सी मनःस्थिति में हाय आज अपना समर्पण अपने ही लिए बोझ दन बंठा है ! सिपाही पहरा दे रहे थे। भीतर खेमे में कुमार मेदिनीराय सोया पा। रूपराम और सेवकराम अभी-अभी आए थे । एकओर मुंह । क - लटकाए बैठे थे। स्वामी चूंकि विश्राम कर रहे थे, उनकी प्रतीक्षा करते, दो पल को उनीद्र थे, जगाना उचित नहीं था। भूषणमल्ल के दुःखद समाचार कौन सुनाए, इस प्रश्न पर दोनों सेवक परस्पर झगड़ रहे थे। एक दूसरे पर विगड़ रहा था- "आखिर भूषणमल्ल को तुमने बढ़ावा दिया सेवकरामजी, तुम्हीं अन्नदाता को अब अपना काला मुंह दिखायो।" और इतना कहकर रूपराम लम्बी तान कर सो गया। कल शाम से वह भूखा था, अतः वात-बात पर चिढ़ रहा था। सेवकराम ने लोटा और गमछा उठाया और सरोवर की ओर चला। कोई पचास कदम पर वटवृक्ष की घनी छाया में एक नन्ही-सी कुँइया थी। उसके किनारे बड़ी-सी शिला थी। एकओर भैरवजी का चबूतरा था । सेवकराम ने गमछे के छोर पर बँधी बूटी निकाली । सूखा मेवा और मसाला मिलाकर बड़ी शिला पर रगड़ा लगाया। अपनी जटा विखेरे, मन, वचन, कर्म से वह भङ्ग पीसने में तल्लीन था। भंग को गंध उसकी मानस-तरङ्ग को नूतन रङ्ग दे रही थी। अपने प्रापसे वह कह रहा था- "अरे, नालायक सेवकराम ! शिव और शक्ति में कोई अन्तर, कोई फर्क नहीं है। शक्ति हो और अशिव हो तो वह कल्याणकारी नहीं है। उसके संग शिव होना ही चाहिए । शिव के बिना शक्ति अकेली नहीं रह सकती। सेवकराम, उसका मन नहीं लगता ! वह वेचैन रहती है ? एकाकिनी वह संहार करती है, सबको भस्म कर देती है। शिव उसे अपने वस में रखता है। उस पर नियन्त्रण रखता है। उसके उद्दाम यौवन के विप को, सींच कर, अमृत बना देता है।" वैसे तो भैया, शिव भी शक्ति के वियोग में शवमाग है। कल्याण तभी हो सकता है, जब हमारे पास शक्ति हो। शक्तिहीन किसी का कल्याण नहीं कर सकते ।"शक्ति तन की, मन की, धन की-यात्मिक और भौतिक व्यक्ति के शिव-संकल्प और शुभ-रचना के लिए जरूरी है। शिव और शक्ति का संयोग जरूरी है।" - ! । ६२. जय . "इसलिए कहता हूँ सेवकराम ! शक्ति और शिव, शंकरजी मोर पार्वतीजी दोनों भिन्न नहीं एक हैं।" लोक गा कर, अपने में तन्मय वह, कथावाचक पण्डितों की नकल में कहने लगा-"सेवकरामजी के महादेवजी बोले कि हे देवी पार्वती तूने जैशीपव्य सिद्धेश्वर के विषय में जिज्ञासा प्रकट की, सो जानकर में प्रसन्न हुआ! अव सुन, मैं तुझे सक्षेप में सुनाता हूँ।" पार्वतीजी अपने सिर पर अंचल ढक कर श्रद्धापूर्वक सुनने लगी- "प्रभासक्षेत्र में जंगीपव्य ने उग्र तप किया। एक सौ वर्ष तक उसने पवन पान कर, जीवन-निर्वाह किया । यो सो वर्ष के पवन भोज के पश्चात् हजार वपं तक जस भोजी बना। इस कठिन साधना के उपरान्त दस हजार साल तक वह शाकाहारी रहा । इसके अलावा एक हजार चान्द्रायण और सान्तपन ग्रत पूरे किए । फिर अल्पमोजी होकर अपने शरीर को सुपा डाला। अव तो यस्त्र त्याग कर, दिगम्बर रूप में रहने लगा। "हे पावंति ! पूर्व कल्प में आप ही उत्पन, देव-देव शिव का जो महादेव नामक तिग था, उसको स्थापना और पूजा करने लगा। निरन्तर भस्मशायी भोर भस्मवेष्टित मङ्गोवाले जंगीपव्य ने अपने अभिराम नृत्यों और सुमधुर गीतों से भगवान् भोलेनाथ को रिझाया"... इसके बाद, 'गिव शम्म' को ललकार लगाकर, उछल कर वह नाचने लगा'-थेई, घेई-या था तत्-तत्-ताता 'हर-हर महादेव..!" झुरमुट से रूपराम दौड़ता हुआ आया - "यह क्या प्रलय मचा रसी है ? अन्नदाता जाग जाएंगे !" सेवकराम सकपका गया। उसके मन को जोर का जैसे धक्का लगा। महावूटी को सम्मोहनमयी भाभा के आवेश में, वह नश्वर जगत् को भूल, अपने आप में एकाग्र, संलग्न था; रूपराम ने उस भगम उल्लास-लास की लहर को भंग कर दिया ! रूपराम को विनवताए सेवकराम जाकर अपनी जड़ी की पिसाई में मग्न हो गया।
सा क्यों न करें कि उसे मुहम्मद की तरफ ही रहने की कहें और तरी तौर पर वह हमें सारी खवरें देता रहे !"-नगरट्टि ने साहिब खाँ को सुझाया। अव सूरजसिंह ने दूसरी उलझन पेश की- "गुजरात के शाह मुज़फ्फरशाह अगर आपके भाई, मुहम्मद सानी की मदद करना स्वीकार कर लें, तब तो गुजरात, खानदेश और दक्खन की मिलीजुली फौजों का मुकावला हम नहीं कर सकेंगे।" तव नगरट्ठि, जो सारे वार्तालाप के मध्य में वातों का उत्त देते हुए और वातें सुनते हुए किसी विशेष विचार में डूबे हुए थे। सहसा आंखें चमका कर कहने लगे- "मेरी मानिए और मुहम्मद सानी को मेदिनीरायजी और महा- रानाजी की सहायता लेने दीजिए। इससे आप समझ सकते हैं, हमें क्या लाभ है ? दिल्ली के लोदी, गुजरात के शाह और दक्खन के बादशाह हमारी तरफ आ जाएंगे। जनावमन् तव यह जंग साहिव खां और मुहम्मद सानी का वाहमी जंग न रहकर, हिंदुओं और मुसलमानों का, कभी खत्म न होने वाला जंग बन जाएगा।" सूरजसिंह इस प्रस्ताव से सहमत था। उसने नगरश्रेट्टि का अनु- मोदन करते हुए कहा--"हम अगर मुहम्मद सानी और महाराणा बीच, फूट फैलाने में सफल हो गए, अथवा राजा की सेना देर से आए तो विश्वास रखिए गुजराती सेना के सामने मुहम्मद सानी की फौज टिक न पाएगी।" "मुझे पूरा भरोसा है कि मैं गुजरात के शाह मुज़फ्फरशाह को मालवा की हुकूमत का लालच देकर, इस बात पर रजामन्द कर लूंग कि वह मुहम्मद सानी और उसके हिंदू रहन्नुमाओं का साथ न दें इस तरह गुजरात के शाह का हमारी तरफ़ से लड़ना अपने आप एक बहुत बड़ी ताकत वन जाएगी।" साहिब खां ने कहा। इस पर जासूस सूरजसिंह ने नई वात सुझाई -"अगर गुजर के शाह मुजफ्फरशाह हमारी मदद करना मंजूर न करें, तो हम के लिग इस बात के लिए राजी कर लें कि वे मुहम्मद सानो को मदद करने से भी इन्कार कर दें। इस तरह मुहम्मद सानी का एक बाजू टूट जाएगा। रहा खानदेश और दक्खन का सवाल, सो उसके बारे में मेरा ये खयाल है कि गालिब खां मुहम्मदतानी की तरफ से सानदेग के सानों की मदद मागते रहे और मदद जब मिल जाए तब खानदेश को फौज को अच्छा खाना और सामान न दें-यह काम वे माण्डु के सूवा की हैसियत से बखूबी कर सकते हैं। और अगर इस काम में उन्हें सफलता मिली तो माण्डु के दरवाजे पर ही माण्डु की सेना भौर सानदेश की फौजो के बीच में भारी साई पड़ जायगी और तब हम प्रासानी से उन दोनो के बीच में आग भड़का सकेंगे।" सूरजसिंह की बात सुनकर सबने एक स्वर कहा- "वाह ! वाह !!" गाहिब खां ने भी इस विचित्र प्रस्ताव का पूर्ण समर्थन किया और जोर से 'अल्-हम्दुलिल्लाह' कहकर अपनी खुशी जाहिर की- "यालीजनाव, परवरदिगार की यही मर्जी है कि मालवा के शाही तख्त पर आपका यह दोस्त बैठे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि कभी अपनी तलवार मियान में न रखूगा।" "यदि आपकी यही अभिलापा है तो ईश्वर उसे पूर्ण करेगा।" ब्राहाण वेपधारी इसलाम खां ने कक्ष में प्रवेश किया। उसे देखकर साहिब खां ने, विस्मय से सूरजसिंह की ओर देखा। मूरजसिंह ने नगरट्टि की ओर देखा। दोनो की विस्मय और प्रश्नसूचक मुख मुद्रा देखकर बेट्टि ने इसलाम खां को इशारा किया "वास्तव में रंगभवन के बम्हन मुसलमान हैं ।" और वह हंसने लगा। इसलाम रा ने अपना तिलक पीछकर नकली मूंछे उतार फेंकी। साहिब सो ने उसे देखते ही पहचान लिया और उठकर स्वागत किया--"वल्लाह, खां साहब, आप यहाँ-कहाँ ?"
"जनाव, उज्जनी से दिल्ली दूर थोड़े ही है। जिस तरह उज्जनी के साहिबखाँ से दिल्ली के लोदी दूर नहीं हैं।" "वाह, वाह !" कहकर सूरजसिंह ने दोनों बड़ों की खुशामद की । परिचारिका नागरी नगरट्ठि को बुलाकर एक उपकक्ष में ले गई। इस कक्ष में एक चर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। चर के साथ उसकी संगिनी महिला चर भी थी। बड़ी देर के बाद जव नगरभेट्टि अपने चर को विदा कर, लौटे तव साहिब खां और अन्य साथी मदिरा के पात्र खाली कर चुके थे। एक गुर्जरी नर्तकी उनका मनोरंजन कर रही थी ! नगरथेट्टि ने अपने आसन पर बैठते हुए कहा-"मित्रो, अभी- अभी मुझे ज्ञात हुआ है कि राजकुमार मेदिनीराय और वह पारसिक कन्या चित्तौड़ के मार्ग पर, एक दूसरे मे विछुड़ चुके हैं । बिछुड़ते वक्त दोनों के बीच जिन संवादों का आदान-प्रदान हुआ, वे सुनने के काविल हैं। मेरे चर की संगिनी वारुणी ने स्वयं अपनी आँखों सब देखा है और अपने कानों सब सुना है ।" कहते-कहते उन्होंने ताली बजाई। नागरी आई। "वारुणी को यहाँ लाओ।" राजपूत परिवेश में सजी वारुणी रूप की पुतली प्रतीत होती थी ! उसे देखकर इसलाम खाँ का दिल अपने पहलू से निकलने लगा। वारुणी का नाम सुनकर, माधुरी और वल्लभी भी वहाँ आ गई। नगरट्टि के आदेश पर वारुणी ने पारसिक रमणी का प्रकरण निवेदन किया।
:११: शूद्रो के निकाय में आज बड़ा शोरगुल था । कान-पड़े कुछ सुनाई न दे रहा था। इस कुहराम को सुनकर अपने आश्रम में बैठे मङ्गल महाराज ने इतना ही कहा था- "कुमार से कहो, चाडालों की इस चौकड़ी को चबूतरे चढाकर चटनी बना दो।" गांव में कई बाहरी लोग भी पाए थे। दूर मेवंत्री, मादड़ी, मण्डल, महालो, वीमणा, वासोला और वालिया गांवों से शूद्री के यह--यह एकत्र हुए थे। शूद्री कर मुखिया भीमा कुछ कम न था। हालांकि मात्र उप लड़के रामा को 'वरपी' यी फिर भी उसने भोजन-पान का प्रदन्ध इम प्रकार किया था, मानो ग्राज टमके बेटे के व्याह का दिन हो। भीमा की दारा ने अपनी बहू के और स्वयं अपने बाम पोंछते इ. भी कुछ ऐमा ही पाराय प्रकट किया था- "मत रो वहू, आज मेरे लाल को वरमी का दिन नहीं है । उनले व्याह का दिन है । हरेक बादमी के दो विवाह होते हैं, एक दीपन से, दूमरा मृत्यु में।" सुनकर बहू स्पा और और में रोपटी।
सास बोली- "नारी से विवाह करके पुरुष को जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी ही मृत्युरूपी सुन्दरी का वरण करके भी होनी चाहिए।" तभी भीमा भीतर आ गया। अपनी पत्नी का कथन उसके कानों में पड़ गया । मानो घाव पर किसी ने लोन छिड़क दिया हो, दिल में दर्द उठा लेकिन मन मसोसकर, मर्द आदमी की तरह कहने लगा- "रामा की मौत से मेरे पांव तले की धरती खिसक गई है मगर मुझे लगता है, मैंने बहुत बड़ा मैदान मार लिया है। मेरा बेटा शहीद हो गया। अगर वह अपनी जान नहीं देता तो शिवजी के मस्तक के जटाजूट सूखे ही रह जाते और वहां जल का एक विंदु भी नजर नहीं आता । मङ्गल महाराज स्नान कैसे करते ?" "कुछ सुना है, सरोवर को सांमतराज सूरजमल खुदवाकर बड़ा और गहरा वनवा रहे हैं।" "तो इससे क्या? हम श्रमिकों को कुछ काम ही मिलेगा।" राजो आ गई- "तू तो राजो हर वक्त बुराई ढुंढती रहती है।" "जिन बड़े कहलाने वाले लोगों ने मेरे भैया को दिन-दहाड़े मार डाला, हजारों लोगों को साक्षी में मारा, उन्हें यदि मैं बुरा कहूँ और उनमें बुराई देखू तो क्या अपराधिनी ही कही जाऊँगी ?" "यह किस देश का विधान है ?" माँ ने बेटी का समर्थन किया। भीमा ने अपनी बात नहीं छोड़ी, वह अपनी औरत के सामने अपनी हेठी कराना नहीं चाहता था- "तूने राजो, कुमारों पर धूल फेंककर अच्छा नहीं किया ।" "मैंने धूल फैकी?" राजो ने सिर उठाया। "तो क्या तेरी गालियों को फूल कहूँ ?" भीमा ने लाल-लाल आँखें निकाली। उसको दारा ने उसे शांत करने के निमित्त कहा- "लो, थोड़ा मद पी लो, इससे तुम्हारा जी अच्छा हो जाएगा।" - - - mater भीमा ने मिट्टी के मद-पात्र को मुंह से लगाने के पूर्व परली से "रूपा को दिया है ?" "हाँ, वह और राजो तो पूरा महापात्र पी चुकी हैं।" भीमा खड़ा-सड़ा दो-तीन पात्र साली कर गया । फिर जीभ से होठों को गटता हुया कुटीर के बाहर चला गया। राजो ने अपने हाथ का पात्र जोर से फेंका, वह मज्जा के उल्का- दीप पर जा लगा और दीपक वुझ गया। मां ने अंधेरे में कहा- "हाय राम ! बुरा शकुन हुना। रिसभनाथ रक्षा करें। प्राज जरूर कुछ-न-कुछ अमङ्गल होगा।" कहती राजो की मां बाहर चली गई। कुटिया के ओरे कोने में रूपा 'येई-थेई' नाच रही थी। बाहर पंचों के बीच चावला भीमा गरज रहा था- "कौन कहता है, मेरे बेटे को 'सामंतो ने मार डाला' 'सामतों की यया मजाल'''वे ग्ला किस सेत की मूली हैं. 'मेरा बेटा शहीद होगया..." "वाह पटेल, वाह !" विरादरी के, नशे में झूमते सदस्य चिल्लाए । शूद्रो का ब्राह्मण-पुरोहितदेवी के चौरे पर अन-पशु की बलि दे रहा था और भैरवजी का वड़ापोपा अपने लम्बे-लम्बे वाल फैलाकर भाव में धुन रहा था। इसके एक हाय मे नंगी तलवार थी, जिसकी नोंक पर पीला निदू और एक ह मिचं लगी थी। उसकी गोद में मद का पात्र औंधा पड़ा था और ए कुत्ता उसका एक कान चाट रहा या। कुत्ते के दांतों से टकराने से का का कुण्डल अजीव आवाज पैदा कर रहा था। बड़े-बड़े ढोल, नगाड़े और बाजे प-रहे थे। चर्म और तन्तु के वाद्ययन्त्र विचित्र नादस्वर से वातावरण के मुसरित कर रहे थे। चारों और कर्णकटु वुहराम और कलरव फैला हुया। इम कुहराम, इस , '- भीड़, इस हलचल और इस मानव-मेले का कोई क्रम नहीं था। न तो इसके आदि का पता चलता था और न ही इसका अन्त नजर आता था । भैरवजी के चौरे पर रूपा सोलह सिंगार किए पाई। उसने गहरे लाल रंग की साड़ी पहनी थी। पीले रंग का घाघरा था और पीले रंग को उसकी कंचुकी थी। उसके केश-घने, लम्बे और काले केश खुले थे, राजो और सीता-जैसी लड़कियों ने मिलकर, इन केशों को कई तरह की सुगन्धियों से संवार दिया था और मांग को कौड़ियों की मालाओं से सजा दिया था। उसकी कई चोटियां भी वराटिका की ऐसी ही लड़ियों से गुथी थीं। उसकी कलाइयों पर दौड़ियों के गजरे भरे थे और गले में भी कौड़ियों के हार झूल रहे थे। मद से रूपा के विशाल लोचन लाल थे। और उसके लाल-लाल अधर फड़क रहे थे। पुजारी ने उसके हाथ में नंगी तलवार थमा दी थी। भैरवजी के सामने, आंगन में स्त्री-पुरुष मिलर, ढोल के बोल पर नाचने लगे। एक ओर भोजन वन रहा था- उपलों की बड़ी-बड़ी अंगोठियों पर वानियां सिक रही थीं। बड़े- बड़े चूल्हों पर दाल और चावल के महापा सुगन्धित वाप्प छोड़ रहे थे। भोजन भट्ट, महोदर भीमाजी तन्मगहोकर, अपलक एक दृष्टि से इन पात्रों को देख रहे थे। किसनाजी ने दाल को लोहे के छुल से चलाते हुए कहा- "भीमाजी, लोहे का बड़ा स्टोरा अंगारों के नीचे दवायो। केगाजी से कहो कि वधार की तारी करें। पाव भर हींग, दो सेर जीरा, चार सेर घी, तीन सेर लसुन और पांच सेर प्याज मंगवा लो।" केशाजी सुन रहा था हाल के ऊँघ रहा था। "किसनाजी, पांच सेरबाज की बात तो ठीक है मगर तीन सेर लहसुन कुछ ज्यादा होगी - ।
"ज्यादा ? मैं कहता हूँ कम होगी।"
"कम मैं कहता हूँ ज्यादा होगी।"
लोग, जो ऊंघ रहे थे, बासें सोलकर, कान लगाकर इन्हें देखने
और इनकी भडप सुनने को उत्सुक हो गए।
केशाजी ने ताव में आकर दांव लगाया-
"ज्यादा नहीं निकली तो क्या दोगे।"
"देंगे? ...'और किमनाजी ने केशाजी को गाली दी।
केशाजी ने चूल्हे से एक जलती लकडी उठा ली और किसनाजी
की ओर झपटा। किसनाजी ने दात चलाने का गरम-गरम कड़छुल
बाहर निकाला और उसे हवा में ऊँचा उठाया-
"वहीं रहना, वरना सिर फोड दूंगा।"
"फोड़ दिए ! कभी मटका भी फोड़ा था, जो सिर फोड़ने
चले हो ?"
लोगों ने हंसकर, तालियां बजाकर, इन सम्वादो का स्वागत किया
और दोनों पहलवानो को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
"मटके, नयापुरा वालो (केशाजी नयापुरा का रहने वाला था)
के दरवाजे फोडे हैं। यहां तो दुश्मन की विधवाओ की चूड़ियाँ
फोड़ते हैं !"
"अपनी बहनो को राखी का यही बदला देते हो ?" केशाजी के
प्रश्न पर श्रोता सिलखिला उठे। वह बड़ी देर से अंगीठी के निकट
बैठा था । इसलिए उसके पूरे काले बदन पर पसीने की वूदें उभर
आई थी और सिर भी गरम हो गया था ! कडछुल उसने फेंका केशाजी
सावधान था, वार बचा गया।
उसके पीछे एक व्यक्ति चादर तान कर सो रहा था । उसकी
पसली से जाकर कड़छुल टकराया, वह हड़बड़ा कर उठ बैठा और
चकित दृष्टि से चारोोर देखता हुआ इस अचानक आक्रमण का
रहस्य जानने का प्रयाग करने लगा।
केशाजी ने कहा-“चो रहे किसनाजी वाणासुर: अपने आगे
किसी को कुछ समझ ही नही !"
सुप्त व्यक्ति एक ही छलांग में उछला और जाकर किसनाजी से
पिट गया । कुछ ही पल में दोनों गुत्यमगुत्या होकर धरती पर
टने लगे।
कैयाजी ने अवसर देखा और वह किसनाजी के इधर-उवर लकड़ी
वार करता रहा।
इसी समय उसकी पीठ पर एक सनसनाता हुआ तीर लगा और
ह 'हाय' कहकर नीचे गिरा।
तक तक तीरों और वाणों की बौछार से कई व्यक्ति धराशायी
हो गए।
जलती हुई उल्काएं बरसने लगीं।
हाँफता-दौड़ता एक सन्देशवाहक आया-
"हमारे झोंपड़े जल रहे हैं। किसी ने आग लगा दी है।"
फिर बोड़ों के टापों की बावजे गूजी।
दूसरा आया-सांस रोककर बोला-
"राजपुत्रों ने हम पर हमला कर दिया।"
"भागो भागो "जल्दी भागो।" एक व्यक्ति पेड़ पर चढ़कर
चिल्लाने लगा।
स्त्रियां, लड़कियां, वच्चे, बूढ़े, मद के नशे में चूर नौजवान,
अतिथि और दर्शक, नतंक और ढोली- सभी भागे
-जिसे, जो दिशा और राह मिली, वह उसी ओर भागा।
सभी पृथ्वीराज की दुष्टता
से परिचित थे । उसके अत्याचार
जगजाहिर थे।
रङ् हो या राजा, वह किसी को फूटी आँख न सुहाता था।
ऐसा कोई न था, जिस पर उसका जुल्म न वरसा हो। ऐसा एक न
था, जिसकी पीठ पर उसके अनाचार की काली कहानी कोड़ों की
कलम से न लिखी गई हो !
यूद्र-निकाय ज्वालानों में जगमग जल रहा था।
rr mmsfim
ज्वालाओं की लम्बी-लम्बी लपटों का उजाला देखकर, मंगल पंडित ने अपने शिष्यों से कहा- "बादल मंढने से नीम नहीं छिपता !" "समाधान गुरुदेव ! कुछ समझ नही हम !" "वत्स, कुस्वभाव नहीं छिपता, उसे चाहे ऊपरी लेपन से कितना ही छिपाओ।" "धन्य, गुरुदेव !" "कुमार पृथ्वीराज के संस्कार शूद्र के हैं, चाहे वह वीरवंश में, वीर पिता के प्रासाद मे उत्पन्न हुप्रा हो । और शूद्रो के सेवक विप्रराज के सम्पर्क में रहने से चमारों की बैटी राजवंसी को ब्राह्मणों के सस्कार मिले हैं। वत्स, विद्या और सस्कार, उत्तम गुण और कर्म किसी की धपोती नहीं हैं। इन्हें जो धारण करता है, वही धर्मपुत्र और धर्मात्मा कहा जाता है।" "तब तो गुरुदेव, क्षमा करें, जाति और वर्ण, शरीर और आरमा का भेद भी नहीं रह जाएगा?" "भ्रम है तुम्हारा। काले शरीर वाले की, क्या पात्मा भी काली होती है ? गौर देहधारी को, क्या यारमा भी गौर होती है ? तुम आरमा की महिमा के गीत-गायक हो या शरीर के चारण हो? मात्मा का रंग देखो, शरीर का नहीं।" "फिर भी देव, देह की सुन्दरता का अपना महत्त्व तो है ही।" "देह की सुन्दरता ! यह आत्मिक नहीं, भौतिक दृष्टि है । तुम्ही यतामो, उस सुन्दरता और काया का क्या मोल, जो शरीर के जल जाने पर काली पड़ जाती है ? सड़ने पर दुर्गध फैलाती है। कोढ़ी हो जाने पर सफेद धब्बों से भर जाती है। विषली जन्तु के हँसने पर काली-नीली पड़ जाती है । पीत-रोग और मृत्यु के उपरांत पोली पड़ जाती है !" "इसका तात्पर्य यह है गुरुदेव, जाति-परिवर्तन सम्भव है ?"
"अवश्य, मंगल पण्डित ने उच्चस्वर में कहा--
"जाति और वर्ण परिवर्तनशील हैं। कर्म के अनुसार व्यक्ति शूद्र
ब्राह्मण, ब्राह्मण से शूद्र या क्षत्रिय, क्षत्रिय से शूद्र बनता है, यह सब
सम्भव है, क्योंकि मानवकृत है, कर्मरत है।"
"धन्य, गुरुदेव, धन्य !
"वत्स, एक सूत्र सदैव स्मरण रखो- मनुष्य की कोई जाति नहीं।
उसकी एक ही जाति है-महान् मानव-जाति । इस संसार में 'मनुष्य'
एक विराट् सत्य है। और इस सत्य से बढ़कर कोई सत्य नहीं है ।
इसलिए, उठो
मनुष्य
की पूजा
करो! मानव-मात्र की सेवा करो।"
और इस कथन के साथ ही मंगल पण्डित ने शूद्र-विकाय की ओर
संकेत किया-
"धू-धू करती उन सर्वभक्षी ज्वालाओं को, वेटा, अपने आँसुओं से
वुझा दो ! यही प्रभु का आदेश है । यही ब्राह्मण-धर्म है।"
शिष्यों का समुदाय 'शूद्र-निकाय' की ओर दौड़ा। पीछे-पीछे गौरी
मगलपुत्री दौड़ी।
ज्वालाओं के निकट अश्वारोहियों का क्रूर, मारक अट्टहास उठ
रहा था।
रूपा अभी भी भैरव-चौरे पर बैठी थी।
उसकी आँखों से लाल-लाल लहू बरस रहा था। तलवार उठाकर
वह राजकुमार पृथ्वीराज के लौटते हुए घोड़े के पीछे दौड़ी-
"ठहर आततायी !"
"खमा मातेसरी, घणी खम्मा !" चिल्लाती हुई गोरी रूपा
पीछे-पीछे गई।
वनान्तर से समूह-गीत की भाँति एक करुण स्वर उठ रहा था-
"हाय रामा हो""हाय रामा हो !"
:१२: एक ही दिन में दो-दो दुर्घटनाएं हो गई। पृथ्वीराज ने शुद्री के निकाय में आग लगवा दी। उनके सभी आवास जल गए। कल जो कुटीर नन्हे शिशुओ की किलकारियों से मुपरित थे, आज उनमे शृगाली की 'हुआ-हुआ' उठ रही थी। मानो 'अत्याचार हुआ' इम सचाई को गाक्षी मिपार भी 'हा-हुआ' कहकर दे रहे थे। चूद्र-निकाय के अग्निकाण्ड से यह अगियावताल गान्त भी न हुमा था कि जाकर उसने और जयमल ने सांगा को घेर लिया। मारगदेव पीछे आ रहा था, उसने देख लिया- "पृथ्वीराज की चाल-ढाल ठीक नहीं है। वह सांगा को हानि पहुंचाना चाहता है।" पृथ्वीराज ने सांगा पर तलवार का पार करते हुए ललकार लगाई- "जयमल, आज इसको मारकर में जोसी बम्मन की बानी - मुठला दूंगा।" इच्छा न होते हुए भी सांगा ने तलवार म्यान से बाहर निकालो। पलभर में उसने पृथ्वीराज के वार को लौटा दिया। जयमल ने पीठ पर वार किया। सारंगदेव वीच में आ गया। अव तो चार-चार तलवारें विजलियों की तरह चमककर आपस में टकराने लगीं। मेवाड़ का भाग्यदेवता भाई को भाई से जूझते देखकर उदास हो गया और भाग्यदेवी की चूड़ियाँ तड़कने लगीं। जयमल का भीपण प्रहार अपनी ढाल पर झेलते हुए सारंगदेव ने उससे आग्रह किया "वेटा, मेरी बात मानो। भाई से भाई की घृणा और भाई से भाई का युद्ध राजपूतों को सदा के लिए समाप्त कर देगा।" "दादाजी, आप हमारे पिताजी के काकाजी हैं, इस हेतु आपकी वात नहीं टाल सकते और चूंकि आप सांगा के पक्षपाती हैं, आपकी वात नहीं मान सकते।" "यदि मैं सांगा के पक्ष की बात कहूँ, तब तुम, भले मेरी बात मत मानो, किन्तु यदि मैं यह कहूँ कि भाई-भाई की परस्पर की लड़ाई उचित नहीं है तो तुम मुझे सांगा के पक्षपात का दोपी नहीं ठहरा सकते।" जयमल ने तलवार म्यान में रख ली। साँगा और पृथ्वीराज भूखे शेरों की तरह लड़ रहे थे, परन्तु पृथ्वीराज के प्रत्येक प्रहार को साँगा सावधानी से रोक रहा था। फिर भी दोनों के शरीर पर कई घाव बन गए थे। इन घावों में और इनसे बहती रक्त की रेखाओं में सांरगदेव जैसे कुशल राजनीतिज्ञ ने सम्पूर्ण मेवाड़ के विनाश की काली कहानी लिखी देखी। उसने चिल्लाकर कहा- "बेटा पृथ्वीराज, रावण और विभीषण; वालि और सुग्रीव के वन्धु-वर की कथाएँ भूल गए हो ? अरे, नहीं जानते तुम्हारे एक-दूसरे को मिटाने के प्रण से मेवाड़ मिट जाएगा। मैं कहता हूँ, इस असि-द्वन्द्व का अन्त हो । कुमारो ! तुम्हें मेवाड़ माता की शपथ ।" सुनते ही सांगा ने तलवार झुका दी, लेकिन पृथ्वीराज की सीधी बढ़ती हुई तलवार सांगा को आँख में घुस गई। सदा के लिए सांगा काना हो गया।
मारंगदेव ने उसे सहारा दिया और उसके घोड़े को रास पकड़ ली और धीमे-धीमे उमे लेकर एक ओर चला गया ! अब पृथ्वीराज भोर जयमल एक टूटे हुए उछले कुएं के थाले पर पा बैठे और आगे की समस्याओं पर विचार करने लगे। अचानक उन्होंने कुएं से निकलती हुई एक स्त्री-छाया देखो। उसका रौद्ररूप अत्यन्त भयावह था। जयमल तो उसे देखकर डर गया। पृथ्वीराज ने तलवार बाहर खीच ली। उस स्त्री-बाया की सघन केशराशि, उसके मुख पर छाई हुई थी अत: दोनों कुमार उसे पहचान न पाए, परन्तु वह रूपा थी। उसने वड़ी कठोर और तीक्ष्ण आवाज में कहा- "भाई को मारकर राज्य चाहने वाले लालची पृथ्वीराज, मैं तुझे शाप देती हूँ कि जिस तरह मेरे पति की मृत्यु हुई, उस तरह, किन्तु उसके विपरीत पतित रूप में तेरी मृत्यु और तेरा पतन होगा। जहर पिलाने वाले, तू जहर पीकर मरेगा। मौत देने वाते, तू मौत लेकर मरेगा ! तेरा सत्यानाश जाए, यदि मैं सती हूँ तो मेरा 'सत्' सत्य सावित होगा।" इतना कहकर, वह छाया उलटे पैरों कुएँ में उतर गई, किन्तु उसका कथन बड़ी देर तक कुमारो के कानों में गूंजता रहा । पृथ्वीराज पाज पहली बार सशवित, भयभीत हुआ। जयमल ने उसे, उठकर चलने का सकेत दिया। दोनों सिर झुकाए, मुंह लटकाए, तलवारें म्यान में रसे, उस पेड़ के पास में आए, जिससे दोनों के घोड़े बंधे थे। जयमल घोड़े पर बैठ गया । पृथ्वीराज ने रुकते हुए कहा- "चांडालिन और सती!" उसने तलवार सीव ली। "जयमल, मैं इस शूद्रा को यहीं समाप्त कर दूंगा।" "दादा, तिरिया पर, अबला पर हाथ उठाणे " समझाया। कुएं से आवाज आई- । "उठाने दे जयमल, इसे अबला पर तलवार उठाने दे। मेवाड़ । यह शूरवीर अबला को न मारेगा तो क्या सवला को मारेगा ? परे, तू मुझे मारने से पहले मर जाएगा । इधर आकर तो देख ।" जयमल ने पृथ्वीराज का हाथ पकड़ लिया- "दादा, मेरी बात मानो, यह रघुकुल की रीत नहीं है । मर्यादा का उल्लंघन मत करो।" क्षुब्ध पृथ्वीराज अपने घोड़े पर सवार हो गया। दोनों लौट गए। महाराणा रायमल ने रात्रि में भोजन की वेला जब छोटे राज- कुमार साँगा को अनुपस्थित देखा तो उन्होंने पूछा- "भाईजी, आज साँगा नज़र नहीं आता ? वह कहाँ रह गया है ?" "अन्नदाता !" राणा के भाई सूरजमल ने उत्तर दिया-"मैं यदि कुछ कहूँगा, तो कुमार पृथ्वीराज मुझे सांगा के पक्षपात का दोष देंगे, किन्तु मेरे लिए तो दोनों कुमार दोनों आँखों के तारे हैं।" "भाईजी, अवश्य आप हमें सारे समाचार सुनाइए । हम चाहते हैं कि आप उसकी बातों पर ध्यान न दें और आपका सम्मान-अपमान आपकी शूर-वीरता पर निर्भर है, किसी की दया पर नहीं ।” महाराण ने अत्यन्त मधुर और विनम्र वाणी में अपने भाई को समझाया । महाराणा के आदेश पर सूरजमल ने सारी घटनाएं संक्षेप में व सुनाई, लेकिन अन्त में महाराणा ने वही प्रश्न दोहराया- "साँगा कहाँ है ?" सूरजमल बोला "अन्नदाता, कुमार साँगा की एक आँख चली गई है और शरी घावों से खून वहने के कारण, वे काफी कमजोर होगए हैं, - हमारे पूज्य काकाजी सारंगदेवजी ने उनका तात्कालिक उपचार और आवश्यक समझा और उन्हें घटनास्थल के समीप ही अप गांव में ले गए।" "सारंगदेवजी बड़े उपकारी हैं। मन्त्रीजी, आज के एक के द्वारा सारंगदेवजी को मेवाड़ राज्य की ओर से आभार-प जाए और किसी को भेजकर कुमार संग्राम की कुशलक्षेम पूछी जाय।" "जो प्राज्ञा, अप्नदाता।" ब्राह्मणों ने 'अन्नं ब्रह्म' के मन्यों की आघोषणा आरम्भ की किन्तु महाराणा ने उन्हें हाथ के सकेत से रोक दिया और वे थाली पर से उठ खड़े हुए। महाराणा ने उपस्थित-मण्डली के समक्ष ही कुमार पृथ्वीराज को बहुत बुरा-भला कहा और उसे भावी युवराज-पद से सदा के लिए वचित करने को प्रस्तुन हो गए, परन्तु मन्त्रियो ने प्रतिवेदन किया- "अन्नदाता, कुमार बालक हैं 1 वाल्यकाल के उनके अपराध का दण्ड ऐसा न दिया जाए कि युवा और प्रौढकाल भी दण्डित हो जाय । सदा के लिए उनकी सन्तान भी पद च्युत और भाग्यहीन हो जाए।" महाराणा शान्त हुए। अभी उन्हें शूद्र-निकाय के घ्वस को सूचनाएं नही मिली थी, अन्यथा उनका दोप और भी बढ़ जाता । वे पुनः अशान्त हो जाते । सारंगदेव ने सांगा की चिकित्सा मे कोई कसर न रमी । उसके सभी परिवारीजन एक सांगा को ही सेवा-सुथूपा मे लगे थे । वीच-बीच में काकाजी सूरजमल भी उमे देखने चले पाते। उनके आने पर सारङ्गदेव के महल में राजनेताओ को मानो एक समिति ही जुड़ जाती। उत्तर में होने वाले विदेशी आक्रमणों से देश की रक्षा के उपाय सोचे जाते। सांगा और मूरजमल की नीति तटस्थता की थी। वे मुसलमानों से मेलजोल रखना चाहते थे और प्रायः कहते थे-- "मुसलमान भी इस देश के निवासी हैं, इसी भूमि पर उनका भी जन्म हुमा है । वे हमारे अपने अंश है। अग हैं । हिन्दुओं और मुमल- मानों की गम्मिलित शक्ति ही विदेशी हमलावरों में देश की रक्षा कर सकती है।" मूरजमल राष्ट्रीय एकता और सगठन पर जोर देते थे- "काकानी, यह देश आज तक किसी विदेशी वरी आक्रमणकारी नहीं हुआ . - से नहीं हारा। अभी तक इस धरती पर, मां का कोई ऐसा लाल पैदा जो भारतवर्ष पर आक्रमण कर उसे पराजित करने में सफल मनोरथ हुआ हो। अभी भी राम और कृष्ण की; महावीर और गौतमबुद्ध की जन्मभूमि अपराजेय है।" सांगा प्रश्न करता- "क्षमा करें, काकाजी, हम अलिकसुन्दर से हारे । हूणों और यवनों ने हम पर आक्रमण किये और हमें पराजय के दुदिन दिखलाए। मङ्गोल और तातार आए। वाहर वाहरी लोग निरन्तर आते रहे और हमें पददलित करते रहे। इतिहास की ये इतनी और अनेक गाथाएं क्या पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि हम पराजित हुए और अनेक बार पराजित हुए वरन् यों कहा जाय तो अधिक उपयुक्त होगा कि हमने किसी भी युद्ध में विजय नहीं पाई ।" "वत्त,” सूरजमल की बड़ी-बड़ी आँखें आक्रोश से लाल हो जाती- "यह तुम्हारी रुग्णावस्था ही उत्तरदायी है कि तुममें ऐसी पराभूत मनोवृत्ति का उदय हुआ। मैं इतिहास के सत्यों को अस्वीकार नहीं करता। हम हारे- इस सचाई से में इन्कार नहीं करता, परन्तु वत्त, तुमने कभी उन पराजयों और हारों के कारणों पर विचार किया है ?'। "नहीं, काकाजी।" सहम कर, सांगा कहता। "तो सुनो, हमारी हार हमारी फूट और अनेकता के कारण हुई। हमें बाहरी शत्रु ने इसलिए नहीं हराया कि हम कायर या कमजोर थे, वरन् इसलिए हराया कि हमारे अपने ही भाई, हमारे अपने ही देशवासी हमारे शत्रु का; वाह्य-आक्रमणकारी का साथ दे रहे थे, उत्ते घर का भेद बता रहे थे। और यह तो दुनिया जानती है कि जिस पर का भेद उजागर हो जाता है, वह विनष्ट हो जाता है । जब घर का वह हाल है तो पूरे देश की बात ही और । वेटा, जव-जब हम हारे अपने ही आदमियों से हारे !" "मैं आपका दृष्टिकोण स्वीकार करता हूँ काकाजी, प्रथमतः हम अपने-आपसे पराजित हुए, फिर वाह्य शत्रु हमें पराजित कर सका। ।
इसका तात्पर्य यह निकला कि यदि हम अपने आपमें संगठित हैं, तो अवश्यमेव अपराजेय हैं । पहले हम अपने आप पर विजय प्राप्त करले, फिर वैरी पर विजय पाना अत्यन्त सरल हो जाएगा।" "धन्य वत्स !" सारङ्गदेव कहते । "किन्तु काकाजी. हमारे पूर्वज चाहते तो आक्रमणकारी वरी के विरुद्ध : एक या दूसरी शक्ति से सहायता लेकर, विजय का वरण करते।" सूरजमल कहते-कहते नहीं, प्रश्न करते- "तुम्हारा तात्पर्य है-वैरी को अपना घर दिखाते ? कहते हैं; ज्वर ने डेरा देख लिया । जो शक्तिहीन है, वह चाहे प्रलयहर महाकाल की भी सहायता ले, कदापि शक्तिगाली नहीं हो सकता। और वत्स, एक से दूसरी शक्ति में अन्तर क्या है ? अाज इसका लोभ बलवान है. इसका स्वार्थ सजग है, इसने अपने अनुचर को उत्तेजित कर हमारे विरुद्ध सडा कर दिया। हम पर प्राकाण हुआ। इस प्रकार कल दूसरी शक्ति भी अपना स्वार्थ संकट में देखकर; 'असत्य' को सहयोग देने की हमारी अस्वीकृति देखकर; हम पर आक्रमण कर सकती है ! तब इन गक्तियो को मंत्री का मोल क्या, सपूत ! और हम शक्तियों के सेमों में दास बनकर क्यो रहें ? हम स्वयं शक्तिनियता और अनन्त शक्ति के स्रोत हैं, क्या तुम्हे वेदो के ऐसे विजयगीतों का स्मरण नहीं?" सारङ्गदेव अपने भतीजे के कथन को बढावा देते "और विदेशी शक्ति के अपने भी सत्र, होंगे अवश्य । एक बार जहाँ हमने सहयोग के लिए प्रार्थना की, वह हम पर छा जायेगी हमारी सुरक्षा के बहाने । भाग्यशालिनी भूमि पर अपना डेरा डालेगी, अपनी तेनाएं रखेगी और अपने शस्त्रास्त्रों की रखवाली का भार हमें सौंरकर स्वय चन की नीद सोएगी। तुम्हीं बताओ, ऐसे सस्ते सेवक अन्या कहाँ मिलेंगे?" "काकाजी अपनी तटस्थता ही हमारे लिए हितकर है।" - उन दिनों सारङ्गदेव के यहाँ बूंदी के हाड़ाराव सूरजमल के साथ उसकी वहन कर्मवती भी आई हुई थी। कर्मवती साँगा को वीरता और धीरता की कहानियां सुनकर बहुत प्रभावित हुई थी। स्वयं उसके पिता हाडाराव के यहाँ वीरों और वीरता का अभाव नहीं था। समूत्रे इस देश में हाड़ाओं की हठ, उनकी युद्धप्रियता और स्वाभिमानी प्रकृति प्रसिद्ध रही है। राजकुमारी कर्मवती में ये तीनों ही विशेपताएं विद्यमान थीं। उसमें सती पार्वती का हठ था, जव उसने शङ्कर को पतिरूप में प्राप्त करने के निमित्त प्रवल तप किया था। अनाचारियों और पापियों के प्रतिकूल कर्मवती चण्डी और भवानी थी। सिंहवाहिनी दुर्गा के समान हाथ में तलवार धारणकर, उसने अपने भाई राव सूरजमल का रणाङ्गणों में साथ दिया था। यह कर्मवती की अभि- मानिनी प्रकृति ही थी कि बूंदी का छोटा-सा राज्य अव भी विदेशी यवनों का दास बनने से बचा हुआ था। इस प्रकार बूंदी की रचना में कर्मवती का त्याग था। और कर्मवती के निर्माण में दूदी का योग था। साँगा को कर्मवती का सामीप्य सुहाता। वह बहुत भोला तरुण था और मानव-जीवन में काल और परिस्थितियों के वात्याचकों के कारण उपस्थित होने वाले करालमुख छल, विद्वेष, प्रपंच और पाखण्ड से उसका परिचय नहीं हुआ था। शायद सांगा का यह परिचय, उसके स्वभाव का यह अभाव ही कर्मवती के आकर्षण का आधार था। परन्तु अभी न सांगा ने, न कर्मवती ने ही इस सम्बन्ध में साँस ही ली थी। दोनों एक-दूसरे को चाहते हैं यह दोनों को मालूम था। साँगा की मन की बात कर्मवती से छिपी हुई नहीं थी और कर्मवती क्या सोचती है, इससे सांगा अनजान न था। फिर भी दोनों चुप थे। दोनों मान थे। कर्मवती जानती थी कि मेवाड़ के राजसिंहासन को लेकर तेरह भाइयों के बीच जो असन्तोष उभर उठा है, वह किसी के दवाए न । ८४ : जय एकलिंग दवेगा । सांगा चाहे जितना त्याग करे, प्रयत्न करे और अपने ही भाइयो के प्रघातक प्रहार और तीन तिरस्कार सहे, भाई-भाई आपस में लड़कर ही चन लेंगे । एक फर्मवती ही नहीं, मेवाड़ के सभी हितपी मौर परिवार के निकट आत्मीय, महारायत सूरजमल, सारङ्गदेव मज्जावत और राव सूरजमल इस सत्य से परिचित थे। और उनके अति समर्थ और बल वान फलेजे भी राजगद्दी के लिए होने याले भावी गृह कलह की काली कल्पना से कोप-कांप जाते थे ! हाड़ी राजकुमारी कर्मवती भी कभी-कभी ऐसी ही कल्पना करती और उसका अवोध कुंमारा मन कम्पित हो उठता । अपने पारी और देखती-सी यह उदास हो जाती और अपनी उदासी का कारण बहुत पूछने वाली सहेलियों को भी नहीं यताती । वैसे सहेलियों से सांगा के प्रति कर्मवती की कोमल कामनाएँ सर्वथा अजानी नहीं थी । अनवोली प्रति अप्रकट नहीं रहती और प्रेमीजन भी, पया आप-अपने से छिप सकता है लोक दुनिया से वह भले अपना अन्तर्वाह छिपा ले परन्तु अपने अन्तर से उसका याह्य और अपने बाह्य से उसका अन्तर छिप नहीं सकता। कर्मवती जानती थी कि सौगा सुदिन की राह देरा रहा है तो यही इच्छा है कि वह स्वयं भी सांगा की इच्छात्री में अपनी इच्छाओं का विलयन कर दे और उसी मुदिन की प्रतीक्षा करे । उसे मङ्गल महाराज की आगम वाणी में भी विश्वारा था। वह जानती थी कि एक दिन उसका स्वप्न सत्य सिद्ध होगा और उगका 'संग्राम' मेवाड़ का परम प्रतापी महाराणा बनेगा। सारंगदेव और सूरजमल ने सांगा मे यह रहस्य दिपाकर ही रसा या कि पृथ्वीराज भोर जयमल उन्हें परेशान कर रहे हैं। भयोकि उन्होंने सांगा के पावों का उपचार करवाया, उसकी रक्षा की और उसे शरण दी। उन दोनों ने इस भय से मांगा के मुम्भुग रहस्य प्रक नहीं किया कि कहीं सांगा को सबकुछ विदित हो जाएगा तो वह गांव छोड़कर चला जाएगा और इस प्रकार दोनों, परणागत की रक्षा के धर्म से, वंचित हो जाएंगे, लेकिन कर्मवती को उन्होंने सब कुछ बतला दिया था और वह विल्ली की तरह नङ्गी तलवार लिए साक्षात् भवानी की भांति अंधेरी रातों में, घावों की पीड़ा भूलकर सोये सांगा के प्रकोष्ठ पर पहरा देती। प्रेम की इस प्रत्यक्ष प्रतिमा के पहरे में सांगा सतत् सुरक्षित था। दिन बीत रहे थे। अनदेखे, अनजाने, अनबूझे एक नन्हा-सा प्यारा वीज उस सुकुमारी राजकन्या के हृदय में धीमे-धीमे अंकुरित हो रहा था, जो एक दिन भावी भारत की साम्राजी वनने वाली थी। और सांरगदेव के गांव में, कर्म के कण-कण जोड़कर, वह राज- कन्या अपने भाग्य का निर्माण स्वयं ही कर रही थी। इसोलिए लोग उसे कर्मवती कहते ! है :१३: रूपराम लौटकर जव स्वामी के डेरे तक आया 'तीन चार यात्री वाहर बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी वेशभूपा और प्राकृति के वर्ण से विदित था कि वे विदेशी यात्री हैं। रूपराम ने उन्हें देसकर मन ही मन कहा-"अभी-अभी तो अन्नदाता ने अचेरी के दुर्ग में पुर्तगाली जासूस को पकड़ कर पहरे में बिठाया है। अब ये नये शिकार कहां से पा फैसे ! स्वामी हमारे ऐसे कुशल और भाग्यशाली शिकारी हैं कि शिकार स्वय उनके पास चला प्राता है । सघन वनान्तर के क्षुब्ध पशुपति केसरी के समान जब वे दहाड़ कर इन्हें देखेंगे, तब इन्हें दिन में ही तारे नजर आएंगे। रूपराम पछताया, सेवक पीछे रह गया, अपनी भंग में डूबा, वरना, वह भी भगर साथ रहता तो स्वामी की सिंह-गर्जना सुन कर अहोभाग्य मानता लेफिन, अजय; गजव की बात है : स्वामी को इन विदेशी फिरगियों को चाल कमे मालूम हो जाती हैं ! परिचरिका सोने को मारी गे जल उड़ेल रही थी। कुनार हाय. मुह धो रहे थे । भावी दृश्य की रोचकता के प्रलोभन को न संगमा तो, सेवकराम स्वयं ही प्रागे बड़ा और उसने कुमार में निवेदन किया- "मालवपति महाराजकुमार की जय हो!" कुमार ने सिर्फ़ उमकी और देवा।
"अन्नदाता ! कुछ विदेशी फिरंगी श्रीमान् के दर्शनों के अभिलापी हैं । देवद्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं।" "अच्छा ! उन्हें सादर लिवा लायो।" उसी समय उन्हें अपने विश्वस्त चरों के संवादों का स्मरण हुया ! रूपराम विदेशी फिरंगियों को भीतर लाया। भीतर प्रविष्ट होते ही फिरंगी राजकीय वितान के वैभव को देख कर विस्मित रह गए । स्पष्टतया उनकी आंखें फटी रह गई ! फिर उन्होंने वार-वार झुककर अभिवादन किया और बांस की एक खूबसूरत टोकरी में कुछ फल-फूल कुमार को भेंट किए। उनमें एक जो काफी बूढ़ा था, वोला-"महाराजकुमार की जय ! बड़े-बड़े स्वप्न लेकर अपनी मातृभूमि से हमने प्रस्थान किया था। किन्तु भाग्य ने साथ न दिया महाराज! इसलिए यह छोटे-छोटे फल-फूल स्वीकार कीजिए।" "कितने सुन्दर सुगन्धमय पुष्प हैं ये ! ....रूपराम इन्हें हमारी शया के निकट रख दो! ....अतिथिजन, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?" राजकुमार ने मधुर, विनम्र स्वर में पूछा। प्रेम, विनय, करुणा और माधुर्यमयी इन वाणी को सुनकर बूढ़े की आंखें भर आई । जैसे वर्षों से वह प्यासा है और किसी शान्त सरोवर के सुघोपम जल और तट की छायामय वनराजि को शरण में भटक रहा है--"स्वामि ! हम तीन फ्रांसीसी यात्री हैं और यह एक रूसी नागरिक है। यह इतिहासकार है और मेरे इन दो मित्रों में से एक नाविक है और एक यंत्रकार ।" "और आप ?" कुमार ने पूछा । उनकी आवाज से लगता था वृद्ध अतिथि से प्रभावित हैं। रूसी, जो कि इतिहासकार था, बोला - "महाराज, क्षमा करें ये सज्जन इतने नम्र हैं कि अपने मुंह अपना परिचय दे न सकेंगे ये हमारे दल के नेता और फ्रांस के प्रसिद्ध गीतकार हैं। शौर्य अ धर्य के, प्रेम और वलिदान के, युद्ध और शांति के इनके गीत व ओजस्वी हैं । हमारे देश के राजा ग्यारहवें के 'कोर्ट-बार्ड रह चुके हैं " . लिंग हुआ।" "युवराज ! "तो आप धारणराज हैं।" राजकुमार तुरन्त खड़े हो गए- "शिय .. शिव ! क्षमा करें हमें मालूम न था । हमारे देश की धर्म- परम्परा के अनुसार क्षत्रिय और राजा चारणकवि को अभ्यर्थना करके कृतार्थ होता है । हमें अापके दर्शन से अमित मानन्द हुआ चारणराज !' और राजकुमार ने फ्रांसीसी चारण को दोनो हाथों का सहारा देकर अपने आसन पर अपन पास बिठाया-- "कहिए, कविदेव, यात्रा प्रापको सानंद सम्पन्न हुई, कष्ट तो नहीं प्रभु ईसामसीह आपको कोति, शांति और विजय प्रदान करे ! भला, भारतभूमि मे किसे, कुछ कष्ट हो सकता है।" और फिर से, सफेद भौहोंवाली अपनी आँखें यह पौधने लगा । गद्गद् कण्ठ से योला--'राजन् ! हमने पुर्तगाल मे कीर्ति-कथाएं सुनी थी। देवभूमि के दर्शन की कामना न रोक सके तो पुर्तगालियो एक जहाज पर सवार होकर चल पड़े। बीच में दो साथी और मिल गए। मेरी यात्रा का ममाचार सुनकर लुई वादशाह ने हिन्दू-सूर्य के नाराने के लिए यहुमूल्य उपहार और स्नेह-संदेश भेजा था किन्तु राह में हमारे ही पड़ोसी, हमारे ही द्वीप के हमारे ही पुर्तगालियो ने सब कुछ छीन लिया और अनेक प्रकार के कप्ट हमें पहुंचाए । जैसे-तैसे प्रभु का नाम जपते वृद्ध का गला रेघ गया। राजकुमार ने स्वयं अपने हाथों उठाकर जल-पात्र उन्हें दिया, सेवक दौड़े और चारणराज को सहारा दिया। जल पोकर कविवर कहने लगा-- "कुमार को जय हो !प्रभु का नाम सुमरन करते रहे। पहली बार भारतभूमि को तट के दर्शन हुए तो नवजीवन मिला। एक बार पुर्तगालियो के फंदे से वचकर हम भाग निकले और केरल देश के धन्य भाग नागरिको, सौराष्ट्र के मेट्ठियों और महामेदपाट के अश्व विक्रेता व्यापारियों के साथ-साथ मालय में आए। उज्जयिनी में हमने महाकाल और क्षिप्रामया के दर्शन किए। देवी क्षिप्रा के विषय में ......
- - ! मैंने एक तुच्छ तुकवन्दी लिखी है, किसी दिन सुनाऊँगा। महाकाल के पंडितों ने हमें देव-मंदिर के द्वार पर 'म्लेच्छ' कहकर दुत्कार दिया । मेरे साथी तो निराश होकर सराय में लौट गए । मैं तीन दिन निराहार वहीं बैठा रहा तो महामहन्त ने दया दिखाकर अपने साथ दर्शन कराए।" और जैसे दर्शन के अनन्त आनन्द के इस भार को संभालने में असमर्थ उसके लोचन वरसे, कण्ठ गद्गद् हुया, समूचा शरीर सिहर उठा । तब दूसरा फ्रांसीसी, जो यंत्रकार था, आज्ञा पाकर वोला- "कुमार ! हमारे वादशाह ने हिंदू-सूर्य, सम्राट् रायमल्ल की सेवा में और मैत्री सहायता का संदेश भेजा था। हम सम्राट् की सेवा में मेदवाट जा रहे हैं । तुर्क भारत और पश्चिम दोनों के शत्रु हैं। उनके विरुद्ध हमारे बादशाह सम्राट् को सहयोग देना चाहते हैं । "संदेश आप सम्राट् तक पहुंचाएँ । हम कृतज्ञ हैं कि फिरंगी-नरेश हिन्दू-सूर्य के लिए शुभ-कामना रखते हैं । किन्तु क्षमा करें, एक विदेशी को आर्यावर्त से निकालने के लिए दूसरे विदेशी को आमन्त्रण देना, हमारी नीति-परम्परा के प्रतिकूल है। अभी आर्यों की तलवारें म्यान से बाहर हैं, अभी भारत की धरती वीरों से विहीन नहीं हुई है। तुर्क, खिलजी और लोदी चाहे कितने ही प्रवल हों भारत-सपूतों के मन में उनको लेकर भय नहीं है। तन पर केसरिया, हथेली पर शीश और मन पर एकलिंग का आसन रहे तो तुर्क, खिलजी और लोदी क्या, समस्त ससार की संहारमयी शक्तियां भी मिलकर भारत को अपने शांतिमय धर्म-पथ से नहीं डिगा सकतीं ।.........आपने हमारे परम प्रतापी राजराजेश्वर पुरु का नाम सुना होगा। जो समस्त बाधाओं के, यूनानी राजा सिकन्दर से जूझ । और चक्रवर्ती चन्द्रगुप्त की कहानी अभी हमें याद है । चारणराज, आपकी क्या राय है ?" "युवराज, अापके विचार जानकर मैं धन्य हूं। हिंदू-सूर्य-सम्राट रायमल के नाती से हमें यही आशा थी। मैंने तो फ्रांसीसी अधिकारियों से पहले ही कह दिया था कि सूरजवंश के सच्चे पूत विदेशियों का योग लेकर, दूसरे विदेशी से लड़ना कभी पसंद नहीं करेंगे ।" •m rafe 'क्योकि, हमारे पूर्वज-राजेश्वर जयचंद को भयानक भूल का परिणाम प्राज भी हमारे सामने सुलग रहा है ?" कहते-कहते कुमार का चेहरा रोप से लाल हो गया। फिर कुछ सोचकर बोले- 'हमने रोमानी, यूनानी, और अन्य फिरगी यात्रियों के मुंह से फ्रांस देश की स्वतंत्रता की देवी जोन की गाथाएं सुनी हैं । चारणराज क्या आप हमें देवी की कथा सुनाना पसंद करेंगे?' इस पर रूसी इतिहासकार झ ककर क्षमा मांगते हुए कहने लगा- "वीच में बोलने की अभद्रता के लिए राजन् मेरे अपराध पर ध्यान न दें। चारणराज ने देवी जोन और आग्ल-जातीय फिरगियो के साके से सम्बन्धित काव्य लिसा है । उस साके में ये देवी के साथ थे।" अपने नाम का उल्लेख सुनकर कवि ने विनम्रतावा सिर झ का लिया । राजकुमार ने कहा-'यह तो और भी पानंद की बात है चारणराज हमारा निवेदन और निमश्रण स्वीकार कीजिए और आज, माप सब सज्जन हमारे अतिथि बनकर रहिए । कल, हम आपकी यात्रा का पूरा प्रबंध कर देंगे। सायकालीन भोज के उपरान्त, हम देवी की कथा सुनेंगे।" फिर रूपराम की और देखकर प्रादेश दिया- "प्रवन्ध किया जाए !" "जो आज्ञा देव !" कहकर, सेवक चला गया । राजकुमार मेदिनीराय-चारणराज और उनके साथियो को विदा करने के लिए, स्वयं नगे पैरों सेमे से बाहर आए। 1 :१४: माधुरी ने पूछा- "मैं कहाँ हूँ?" उसने आँखें खोलकर अपने आसपान देखा। दूधिया रांदनी चारापोर मात्रन बना रही थी। आकाश में इतनी तारिकानों के बीच चन्दा अकेला था। वारिकाएं अपने स्वप्नों में लीन यी और चन्दा उनकी स्वप्निल छवि देखकर मुनकरा रहा था। माधुरी ने घर-उबर गौर में देवा और उन स्थान को पहचानने का प्रयल किया। परन्तु वह कभी अपने पिता, नगरपट्टि के रंगभवन ने दूर वाहर न गई थी। इसलिए उन स्थान को देखकर भी पहचान नसकी। यह एक सुन्दर आस्तान या। किसी जमाने में चन्द मस्ताने फकीर यहां पड़े रहते थे। चिमटे को आवास पर ने बड़े गहरे और रसीले में प्रेम और विरह के दास्तान गाया करते थे। लेकिन इस समय यह मास्तान उजड़ा हुआ था। उभजयिनी के राजनगर में पर्याप्त दूरी पर नदी के तट ने कुछ हुकर, एक क्षेत्र टीले पर किसी पीर की एक बड़ी दरगाह थी। मानपान वृक्षों का पना नुरमुट या । मसार के आसपास इमली के पात्र पेड़ थे और उनकी छाया में मशार बना हुआ था और जो बाहरी रंगीनियों, हलचलों और घटाओं से वेखवर पीर अपने मनार में अचल समाधि में तल्लीन सोया था। अब इस स्थान पर कोई न आता था, वर्षा के दिनों में नदी की बाढ़ के पानी के सिवाय, जो बाग और आगे बढ़कर, कगारों पर १२:जय एकलिंग चढकर मजार की इमलियों को छूकर जैसे अपनी कोई माती पूरी करता था। लोग कहते थे किसी युग और काल में एक बहुत ही खूब सूरत और मासूम-लेकिन पागल लड़की, इस मजार पर अपने पने लम्बे केश विसरे, कपोल अपना मजार की शिला पर टिकाए दिन-दिनभर, और रात-रात भर बैठी रहती थी। न वह कुछ साती थी और न वह कुछ पीती थी । अथवा उसे अपने भोजन-पान की भी सुध नहीं थी। लोग-साधारण लोग भय, विस्मय और शंका, अन्ध-विश्वास के काल्पनिक प्रेतो से डरकर इस स्थान पर कभी भी आने का नाम नही लेते थे। दरगाह के नीचे एक वडा-सा कमरेनुमा खोखला और साली भाग था। ऊपरी सतह से छोटे-से एक द्वार से सीढियो का रास्ता इम भाग में जाता था। लेकिन यह गुप्त भाग किमी को ज्ञात नहीं था, सिर्फ उस एक फकीर को जो यदाकदा चांदनी और अंधेरी रातो में यहाँ आया करता था। आया करता था और अपने भक्तो के मन की मुराद पूरी करता था। मुंह पर काला वुर्का डाले लम्बे कद को एक सुन्दरी इस वक्त माधुरी के पास खड़ी थी। उसके हाथ में जगली तालाबों के घने काले और खूरुवार मगर को पूछ का बना चावुक या । यह काँटेदार चावुक बहुत लम्बा था और एक ही झपट में दूर से दूर खड़े हुए आदमी या प्राणी को अपनी ओर खीच लेता था। आज इरा खूनी और जहरीले चाबुक की चपेट में आई थी उज्ज. यिनी के नगर सेट्टि की एकमात्र मुकुमारी कन्या माधुरी । इसे यहां कौन लाया था ? यह यहां क्योकर आई थी ? दीपादेवी ने उम दिन बेसुध माधुरी को पहले तो मदिरा पिला कर असावधानी में उसके मन के रहस्य जान लेना चाहा । परन्तु जब यह देसा कि बेसुध माधुरी पर मदिरा का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। और उसके बोलने या बड़बड़ाने की कोई प्रासा नहीं है तो अपनी दासी काशी की सहायता मे वह माधुरी को पीर के मजार तक ले आई।
दीपादेवी ने बड़े हकीम को कहलाकर, आज की रात सोना बनाने का कीमिया मालूम करने की विनती की थी। और इसलाम खां ने भी नाश्वासन दिया था कि वह इसमें, कीमिया को हासिल करने में दीपादेवी की मदद करेगा, लेकिन, किसी खास काम की से वजह इसलाम वा बाहर चला गया। और दीपादेवी के लिए काशी को छोड़कर जोर कोई नहारा न रहा। फिर माधुरी की क्ला तर पर सवार थी। दीपा को यह पूरा नरोता था कि अगर माधुरी को पूरा दण्ड दिया जाय तो वह मेदिनीराय के बारे में बहुत कुछ बतला देगी। लेकिन, माधुरी लगातार वेहोग थी। "मैं कहाँ हूँ?" माधुरी ने फिर से पूछा और उत्तर में बुर्कापोन दीपा खिलखिलाई। "तुम वहीं हो, जहाँ तुम्हें होना चाहिए।" "न यहाँ ज्यों हूँ?" "पीर का चढ़ावा वनकर ! आज मुझे यहां के फकीर का नजराना देता है और सुन्दरि, तुम ने अच्छा नजराना और क्या हो सकता है ?" माधुरी उठकर अपनी जगह के गई और चारों ओर का उजड़ा सूनापन देखकर सहम गई । उनने दुकापोग छाया ने पूछा- "नार तुम कोन हो?" 'मैं तुम्हारी मांत हूँ!" और मूले काठ पर नाचने वाली चिन- गारियों की तरह, इमली की बाड़ में खड़ी वह बुर्कापोश छाया- दीपा जोर ने खिलन्तिलाई। उनको खिलखिलाहट मोतियों की मंहगी लड़ों-सी थी। लेकिन बामांग चांदनी रात इस खिलखिलाहट से खुशनुमा न बनकर औ भी बौनाक हो गई। 'तुन मुझे क्यों मारना चाहती हो ?" माधुरी ने अत्यन्त भोले से पूछा। "मारना चाहती हूँ. इनलिए कि तुम अपने कुल पर कलंक लगाव राजकुमार के पास नाग जाना चाहती हो !"