Bhartiya Shruti Darshan Kendra,jaipur
Bhaktamer Shatdvayi
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मुद्रित- श्रीकृष्ण कापाखाना, उदयपुर * समर्पण * श्रीमान् पूज्यवर श्री १०८ आचार्यवर्य श्रीशांतिसागर स्वामिन् ! यह भक्तामरशतद्वयी आपके ही प्रसाद से लिखी गई है इसलिये आप- केही पवित्र कर कमलोंमें समर्पित है। कातिक शुक्ला वी०नि०सं० श्रीमबरणसरोरुहसेवी विनम्र श्राक्षाकारी लालाराम जैन शास्त्री मैनपुरी IR
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॥ श्री॥
श्री १०८ श्रीजगद्गुरु-सर्वज्ञकल्प-पत्रिंशद्गुण सुशोभित
पूज्यपाद श्री प्राचार्य शान्तिसागर महाराज [दक्षिण] के संघ
का चातुमीस उदयपुर [मेवाड़] के भव्यजीवों के महान
पुण्योदयसे यहा पर हुश्रा है । आपकी मूर्तिके दर्शन मात्र से
सम्यक्त्व और चारित्र की प्राति सुतरा होजाती है। गुरु
भक्तिसे इस प्रान्तकी जैन जनता का महान कल्याण हुश्रा
है । अतएव इस चातुर्मास रूपी गुरुवर्यकी पुण्यस्मृतिम यह
भक्तामर-शतद्वयी अन्य ज्ञानावरण कर्म के क्षयार्थ प्रकाशित
किया है।
कार्तिक सुदी १
वीर निर्वाण सं० २४६१
श्रीप्राचार्यचरणकमल सेवी-
रूपलाल मोतीलाल मीडा
उदयपुर (मेवाड़)
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प्रस्तावना
-
इस संसारमें भगवान प्ररहन्तदेवकी भक्ति सर्वोत्कृष्ट
और परम पवित्र है। यह भगवान अरहन्तदेवकी भक्ति मुनिराज
और श्रावक दोनोको इस पंचपरावर्तन स्वरूप संसारसे पार कर
टेनेवाली है। इस परम पवित्र अहनलिका आनन्द भगवान
समन्तभद्रस्वामीके वचनोमें पद पद पर प्राप्त होता है। श्रावकोके
लिये यह अग्हन्त भक्ति नितान्त आवश्यक और प्रति समय
चिन्तवन करने योग्य है।
भल हो बेचार वेलगाम केशका जिसके प्रसादसे पूज्यवर
प्राचार्यवर्य श्री १०८ शान्तिसागरजी महाराजक पवित्र दर्शन
हुए । उनके दर्शन करने में हृदयमे भरी हुई वह जिन भक्ति ऐसी
बढ़ायी जैसे चन्द्रनाको देख कर महासागर बढ़ता है, उसी बढ़ी
जिन भक्तिका फल यह भक्तामर-शतद्वयी है।
श्रीभक्तामर महाकाव्य एक महा पवित्र स्तोत्र है । उसमे
प्रत्येक कार्यकी सिद्धि करने के लिये महामन्त्र शक्ति भरी हुई है।
विघ्न विनाशक शक्ति भरी हुई है और न जाने क्या क्या और
कितनी शक्तिया भरी हुई है इसलिये वह काव्य तो अनुपम है ।
उसके समान न तो श्राजतक बना है, और न इस युगमें बन
सकता है। उसका पाठ करना वा सुनना दोनो ही महा पवित्र
है, समस्त विघ्नांको दूर करनवाले है, और महा पुण्य उत्पन्न
करनेवाले हैं।
अतएव यह निश्चित रूपसे सिद्ध है कि मेरे लिख हुए
पद उसकी समानता तो कभी रम्ब नही सकतं । इसके सिवाय
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रचयिताका संक्षिप्त परिचय * । यू. पी प्रान्तमें आगराके निकट एक चावली गांव है। वह है तो छोटा परन्तु है सुन्दर । इसी गांवमे पद्मावती पुरवाल जातिके भूषण स्वरूप लाला तोतारामजी रहते थे, वे जैसे धर्मात्मा थे, वैसे ही अनुभवी अच्छे वैद्य थे, और जैसे सज्जन थे, वैसे ही परोपकारी थे। यही कारण था कि वे गांवके शिरोमणी गिने जाते थे। आपने इस असार संसारको वि० स० १९६५ में छोड़ा था। आपके छः पुत्र हुए। १ लाला रामलालजी-आप आजन्म ब्रह्मचर्य पालन करते हुए घर पर व्यवसाय करते रहे । आपका स्वभाव बहुत ही मिलनसार और उत्तम था। आप बड़े धर्मात्मा थे। मापने वि० स० १६७० में अपने नश्वर शरीरको छोड़ा। २ लाला मिठनलालजी-श्राप घर पर रह कर व्यवसाय करते हैं। आपने बाल्य-जीवनमें कुछ दिन अलीगढ़की पाठ- शालामें संस्कृत भाषाका अभ्यास किया था। ३ इस स्तोत्रके रचयिता "धर्मरत्न' पं० लालारामजी शाखी। ४ प० नन्दलालजी शास्त्री वा मुनिराज श्रीसुधर्मसागरजी महाराज । अापने वीर निर्वाण स० २४५४ 'के फाल्गुन मासमें जबकि श्रीसम्मेदशिखरजी पर इतिहास प्रसिद्ध पञ्च कल्याणक .
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[५] दिन तक शालार्थ कर बड़ी शानदार विजय प्राप्त की थी। उसी समय वहांके अग्रवाल, खंडेलवाल, पद्मावती पुरवाल श्राटि समस्त पञ्चोने मिलकर श्रापको "वादीभ केसरी" की सुप्रसिद्ध उपाधि प्रदान की थी। इसके सिवाय 'न्यायालङ्कार" और "विद्यावारिधि' की उपाधिया भी आपको प्राप्त है। श्रीभारत वर्षीय दि० जैन महासभाने श्रापकी,अनुपम सेवासे प्रसन्न होकर "धर्मधीर" की सम्मान्य उपाधि प्रदान की है। इस समय श्राप दि० जैन समाजमें एक अच्छे माननीय कर्णधार विद्वान् हैं। आपने वर्षों तक उक्त महासभाके मुखपत्र साप्ताहिक जैन गजटकी सम्पादकीका जिम्मेदार कार्य बड़ी सुयोग्यतासे किया है । तथा अधार्मिक वातावरणको हटाते हुए धर्मका उद्योग किया है। प्रापन पश्चाध्ययी पुरुषार्थ सिध्ध्युपाय और उत्तरार्द्ध श्रीराजवार्तिकालङ्कारकी अत्यन्त विस्तृत और स्वतन्त्र टीकाए लिखी हैं जिनमें प्रत्येक पदार्थका विवेचन बड़ी योग्यता और सरलताके साथ किया है। इस समय आपश्रीगोपाल दि० जैन सिद्धान्त विद्यालयका कार्य सहायक मन्त्रीक नाते घड़ी योग्यता तथा जिम्मेदारीके साथ चला रहे है । साथमे श्री भा०व०दि० जैन महासमाश्रित परीक्षालयके मन्त्रित्वका कार्य भी, बड़ी योग्यताक साथ चला रहे हैं। आपके परोपकारके उत्तमोत्तम कार्यों में गवालियर स्टेट भी बहुत प्रसन्न है। इसीलिए गवालियर स्टेटने पापको सेकण्ड क्लासके पावर देकर आनरेरी मजिस्ट्रेट नियज्ञ किया है।
[६] ६ बावृ श्रीलालजी जोहर्ग-आप उस समयमे जयपुग्ने रह फर जवाहगत व्यवसाय करने | कलकता बाई श्रादि गर्ग जारी भी पापी अच्छा मान देते हैं। टम समय आपदा पुन ह। इस प्रन्यरे रचयिना "धर्मग्न प लालारामजी मानी समाज पर प्रसिद्ध विद्वान यापन अनेर गम्भीर नन्त मगन ग्रन्यासी यदी माल न्यन हिन्दी टिकाप की है। नया प्रन्योक मर्मस्थलोग बहुत उत्तमताने नटण्य विशद किया है। आपनी टीकायाम प्रन्या टिन भाग मी मरलतान ममना दिया जाता है। अापके हाग टोग किये हुए यहुनने प्रन्य है, जिनमें कुदरे नाम इस प्रकार है। श्रादिपुगग उनपुगग, शान्निपुगग, धर्मामृनायका- चार प्रयोघसार, चारित्रसार, श्राचारमार, धर्मप्रश्नोत्तरधावका- वार, जिनशनर, पात्र गरीन्नीप्र, मगयिवदन विद्याग्न लवी- यस्त्रय, गौतमबग्नि मुहिमुनावली, त्तत्वानुशासन बैंगन्य- मगिमाला, द्वादशानुप्रेना दालानगि जयमाल पांदपलन्कार वृहत्स्वयभूस्तोत्र, पालापपद्धति मुभीमचरित्र, चतुवितिन. घान दशमपत्यादि मग्रह लाटीसहिता। - इसके मिवाय श्रादिपुगग की समीना की परिक्षाचे दोनों भाग बालबोध जैनधर्म ३-४ भाग क्रियामागे श्रादि अनेक छोटी मोटी पुस्तके श्रापन लिखी हैं जिनका प्रभाव जैन [७] समाजपर बहुत अच्छा पड़ा है। आपने इन महान् प्रन्थोकी सरल हिन्दी टीका करके समाजको जो लाभ पहुचाया है, तथा हिंदी साहित्य की जो उन्नति की है उसके लिये यह समाज आपका सदैव ऋणी रहेगा। आप जैन गजटके सम्पादक भी रह चुके हैं, तथा वर्त- मानमें श्री मा दि.जैन महासभा के सहायक महामन्त्री ह। उक्त महासभाने श्रापकी दूरदर्शिताकी पूर्ण निपृस्ह सेवासे प्रसन्न होकर श्रापको "धर्मरत की महत्वशालीनी उपाधिसे विभूपित किया है। आप श्री. भा दि जैन शास्त्री परिषदके सरक्षक भी है आपके पुत्रका नाम चि० राजेन्द्रकुमार है । आपने यह ग्रन्थ वी०नि० सं० २४५६-६० में निर्माण किया है। श्री पडितजीकी यह साहित्य सेवा जैन साहित्यके प्रचार के लिये पूर्ण सहायक हुई है। जैन समाज हृदयसे अपने महोप- कारीका अमिनन्दन करंगा, हम पडितजी का सादर अभिनन्दन करते हैं। निवेदक- प्रकाशक जोहरी रूपलाल मोतीलाल मीडा उदयपुर (मेवाड़) शुद्धिपत्र पृष्ट नति अगुद गद ह गग यादग्य राय श्री ग्री . जगन " श्रीर गशिम 3 ग्रिम समान गहना गहना " प सय वचन वचनमय मग नत्र नग में विन नही वि. । ช (ง - .. ५८ १.
पंक्ति पृष्ट स ६ रसको ने हैं ग १२ कनका ७ So ११ कनक शां शोल ससार तिचयः ७२ ७३ ६ ६ शा शील ससारमे निचयः ने पि बोधदा मोक्ष मद ७७ २ कापि बांध माद मद २ ८७ ३ तं क वृ १६ र्ण ६५ १३ है तह प्राप्ति प्लि चिर पड़ी ६७ १०० १०२ २०४ यह प्रतिमें प्सी चिर बड़ी ५ १३ १४
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परमपूज्य आचार्य श्री १८
शांतिसागर महाराज.
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* श्री.
भक्तामर शतद्वयी
भक्तामरप्रणनमालिमणिप्रभाणां
तत्त्वप्रकाशकसमस्तगणेशगानाम ।
पखण्डभूमिधरचक्रधरेशलक्ष्म्या
उदासकं बृपभपादयुगं नमामि ॥ १ ॥
अर्थ-भगवान वृपभनयम जो दोनो चरण कमल भनि
फरने वाले देवांग नमस्कार करते समय उनके मुकुटों
में लगे दर मणियों का कातिको बढ़ाने वाले, जो
नच्या कल्प को प्रकाशित करने वाले समस्त गण
घराको मरम्बता यो वा उनके १ त सानयो बढाने
वाले आर जो छहा गड पृथ्वीको धारण करने वाले
चमावतियों की लक्ष्मी को चढ़ाने वाले पले श्री वृपगटे-
के उन दोनोंचरण कमलोंको में नमस्कार करता ॥१॥
भकामर-शतडयो २ उद्योतकं दलितपापतमोवितानं कांष्टनाशनविधायिनि कर्मभूमौ । मार्गस्थ मोक्षगमने चिर लुप्तकस्य श्रीद परं वृषसपादयुगं नमामि ॥२॥ अर्थ-भगवान वृषमंटवके जो दोनो चरण कमल कर्मभूमि मे आठों को को नाश करने वाले ओर चिर- काल से लात हुए मोक्षा मार्ग को प्रकाशित करने वाले हे तथा जो पाप रपी अन्धकारके समूहका नाश करन गले है, अन्तरइ पटिग लक्ष्मीको देने वाले है गर जा सर्वोत्कृष्ट है ऐसे श्री वृपसबके दोनों चरण कमलों को मैं नएस्कार करता ॥२॥ आराधित गणरादिमुनिप्रवाहैः श्रीगोमटेशभरतादिकराजलोकैः । सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा बाराधयामि सतत वृषभं जिनेन्द्रम् ॥३॥ अर्थ-मैं सबसे पहले भगवान अरहन्त दव के चरण कमलो को अच्छी तरह नमस्कार करता हू तदनन्तर परपरा से चले आए समरत गणधरादिक मुनियोने जिनका पाराधना का है तथा युगके प्रारंभ मे १ आष्ट प्रतिविधायककर्मभूमो भक्तमर-शतड्यो में चतुर्थ कालके प्रारंभ मदागजभरत और महाराज गोम टेश या पावलि आदि गजा लोगों ने जिनकी आराधना को है से श्री जिनगज भगवान वृषभदेव को मैं नहा आराधना करता ह॥३॥ क्षारात्मके ऽखिलचतुर्गतिनकचक्रे संतापदावभरितेऽखिलरागगर्ने। आलंवनं भवजले पततां जनानां ध्यायामि तं प्रथमतीर्थकरं युगादो॥४॥ अर्थ संसार रूपी समुहम्फा जो जल माग (दुर दायक है) समस्त चारों गतियाही जिसमें मगर मच्छो का समूह है अनेक प्रकार मानसिक व्याधियाही जिस म दावानल अग्निभरी हुई ह तथा अनेक प्रकारके शारीरि- करोग हो जिम्नमें भवर से जन्ममरण रूप ससार ज लमें पड़े हुए लोगो का जो चतुर्थ काल के प्रारभमें महाग देने वाले हैं, ससारी जीवा को समाग्से उजार करने वाले हैपले उन प्रथम तीर्थकर भगवान वृषभदेव का मैं सदा ध्यान करता है॥४॥ यः संस्तुतः सकलवाड डभयतत्ववोधात् यः पूजितोऽखिलसुरेन्द्रनरेन्द्रसव्यात्। ध्यानश्च यः सकलमूरिमुनोन्द्रशिष्यात्
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भकामर-शतद्यो
स्तोत्रं जगत्रितयचित्तहरैरुदारे
रिन्द्रादिभिः श्रुतधरैरहमिन्द्रदेवैः
चक्रयादिभिः हरिहगदिसमस्तदेव-
यः संस्तुतो गणधरैश्च समन्तभद्रेः॥७॥
अज्ञोऽसुधी सकलशास्त्रविचारहीनः
भक्तयानया भवति वालकलीलया वा।
मात्रापदादिरहितैरतितुच्छशहः
स्तोष्ये किलाहमपितं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥८॥
अर्ग-जिन भगवान वृपभदेवको स्तुति पूर्ण श्रुतमान
को धारण करने वाले इन्द्रादिक देवाने, अहमिन्द्रदेवाने
चक्रवनियाने, ब्रह्मा, विष्णु, महादेव आदि समस्त देवाने,
गणधरदेवाने और स्वामी समतभरने तीनों लोकोके
हृदयको हरण करने वाले उदार स्तोत्रोंसे की हे उन्हीं
भगवान वृषभदेवकीस्तुनि अत्गत मूख, बुद्धि रहित, और
और समस्त शास्त्रों के विचार से रहित ऐसा भी केवल
आपको इस परम भक्तिसे अथवा चालक के समान होने
वाली लीलांसे मात्रा पट आदि से रहित से अत्यंत तुच्छ
शबोंके द्वारा अवश्य करना ॥७।--॥ ८ ॥
बुध्या विनापि विधात्रितपाढपोटी
प्रारभ्यने नव नुर्गिजननाथ ? भन्या ।
निमीयते क्षण चल मरन प्रताल्या
वालक्विकर्गहनलिलिन दावा ।। ||
नामानि ते कथयितुं खन्ट नंब आता
प्रजानिनो गगराध नुत कथा का ।
तं शत्रज्यविनय ननु बुद्विहीन
म्नोतुं नमुशनपतिविगतत्रपोहम्॥१॥
मनामर-शनायो भी करता है रिले हे प्रभो! आपकी स्तुति करने के लिये बुद्धिहीन में भा निलंज होकर तैयार हुआ हूँ॥१०॥ जानाति नेव तव पूर्णगुणाननन्तान् तोयं जनस्तव नुतिं विदधाति लोके । अन्यो यथा स्पृशति कः खलु चन्द्रवेत्ता वालं विहाय जलसंस्थितमिंदुविम्॥११॥ अर्थ-हे दंय ! जो पुरर आपके पूर्ण अनन्त गुणोंका नहीं जानता यहा पुनरम समाग्में आपकी स्तुति की रचनाकरना है जिस-चालकको छादयरजिसको चन्द्रमा का अच्छा मानना अन्य कान मनुप्य जो जलमें पटे हुए चन्द्रमा प्रतिविम्बको स्पर्श पर? अर्थात् कोई नहीं ॥१॥ चन्द्रं जिन परममार्गनिदेशकं च लोके बचौमृतझरं ननु पूर्णराशिम् । व्योग्नि स्थितं जगतिमांप्रविहाय बाल- मन्त्रक इच्छति जनःसहसा गृहीतुम् १२ मर्थ- देव हे जिनराज | आर पूर्ण चन्द्रमाके भनागर गया समान - | आप मांधमार्ग दिगाने वाले समार मवचनम्मा अमृतमी पपा बग्नंगाले-जानन्या पुण जिम्मा चारण करने वाले। और आसाराम अपर मियत नणं चमारलमान नापका कानमात्र पर नियमममाम मुर यालयका छोडकर अन्य जान मनुष्य का ना। अधीन माई नी॥1॥ ब, गुणान गुणसमुद्र गांक्रवान्तान गका गगाक न च कान्यजनम्ब वाता भक्त्या तथापि मम देवनुनी प्रवृत्ति- भक्तिनान नव विभो विकली करोनि १३ भर्य- गुणोर माह ' हे प्रभो । चन्द्रमाक नमान निर्मलाले आपके गुणोश वणन करने के लिये मना समन्त कायामा पूर्ण नग्नम मम मा शानभा ( इन्द्र भी) मम नहीं फिर मला अन्य परीनी वानही क्या । तथापि हे भगवन । हे देव ' आपती म्नुनि कर नेमजा भेग प्रनि केवल भनिने ही नई है । हे प्रभो ' आपकी भनिभी लोगो का व्याकुल बना देती है॥३॥ ज्ञानादयो विभुगुणाः परमा घनन्ताः प्रत्येकदेशनिरताः निखिलाशयुक्ताः ।
भक्तामर-शतही ९ सर्वान् विभो ! कथयितुं ननु मर्त्यलोके कस्ते क्षमः सुरगुरुप्रतिमाऽपि बुध्या॥१४॥ अर्थ-हे भगवन आपके केवल ज्ञानादिक व्यापक सवको जानने वाले गुण परमोत्कृष्ट अनत. आत्मा वे. प्रत्येक देशमें व्याप्त है और अपने पूर्ण परिच्छेदोंसे सु शोभित है । हे नाथ । हे प्रभो! इस मनुन्य लोकमें चाहे कोई अपनी बुद्धिसे इन्के गुरु वृहस्पतिके समान पयों न हो, तथापि वह आपके उन ममातगुणों को कहने के लिये कभी समर्थ नहीं हो सकता ॥ १४ ॥ भक्तथा तथापि शिवदायक मादृशोऽज्ञः स्तोतुंय इच्छति जनः भवनाशहेताः। कल्पान्तकालपवनोद्धतनकचक्र सोयं तरीतुमभिवांच्छति वान्तसिंधुम् १५ अर्थ-नयापि मोक्ष प्राप्त कराने वाले हे भगवन् ! जो कोई मेरे समान मुख मनुप्य अपने जन्ममरण रूप संसार को नाश करने के लिये केवल भक्तिसे ही आपकी स्तुति करने की इच्छा करता है वह करप कालके अत समयकी नत्तामर-गतदयो १० बाउले जिलम मगर मच्छोके सनूह पर आरहे है ऐसे अतके त्यभूरमण तमुन्को तैरना चाहता है ॥ ३५ ॥ सूक्ष्मान् स्वभावनिरताल रसरूप हीनान् नित्यान् त्रिलोक महितान् ननुशवाह्यान् शनादयो तव गुणान् नहि रत्तुसीशः कोवा तरीतुमलसम्बुनिधि भुजाभ्यां ॥१३॥ गर्थ-हे स्गवन् आपके गुण अत्यंत सूटस हैं आत्माके शुद्धस्वभावम लीन है, प रस आदिले रहित अनूत है। नित्य है, तीनों लोकोंक द्वारा पूज्य है, और वचनाके अगा- चर है, हेनाथ ऐले आपके गुणोरोइन्द्रादिक समर्थशाली देवभी कहनेको समर्थ नहीं है । लोकहीं है क्योंकि ल- हो केवल सुजाओं ते मला कोन पार कर सकता हे अधांत कोई नहीं ॥ २६॥ तोहं तथापि तव भक्तिवशान्मुनीश ? सुनध्या सुखद । वालकलीलया वा। बुद्ध्या नितान्तरहितपि गुणेषु हदि
११
भक्तामर-शतदयी
देवाधिदेव! तव भूरि यशः प्रवक्ष्ये ॥१७॥
अर्थ-हे भगवन सुखदेने वाले देवाधिदेव ! हे मुनि
गज! मैं इस प्रकार बुद्धि रहित हूं, तथापि केवल आपकी
भक्तिके वशसे अथवा आपके चरणों में होने वाली प्रवल
श्रद्धाले अथवा केवल चालकके समान होने वाली लीला
से अथवा आपके गुणोंको देखकर होनेवाले हर्णसे अत्यत
बुद्धि रहित होता हुआ भी में आपका बहुतसा यश वर्णन
करना चाहता हूं ॥ १७॥
शक्रः स्तवं तव विभो ! नितरां करोति
भेकापि नाथ! कुरुतेऽत्र यदा कदाचित् ।
बिज्ञः सदा प्रकुरुतेऽद्य तथा जनोऽयं
'कर्तु स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः॥ १८ ॥
अर्थ-हे प्रभो ! हे नाथ ! ओपकी स्तुति इन्द्र तो
सदा करता ही है परन्तु कभी किसी समय मेडक भी आ.
पकी स्तुति कर लेता है । इसी प्रकार विद्वान पुरुष तो
आपकी स्तुति सदा करते ही हैं, परन्तु यह शक्ति रहित
मनुष्य भी आज आपकी स्तुति करने के लिये तैयार
हुभा है ॥ १८॥
जानन निजनक म्भिा मुगुणाननन्नान
तोच नुनिहितोऽपि गुणातुनगात् ।
प्रीलानीनविचार्ग गी गेलं
प्राप्तति बुद्धिन्तिोऽपि नानुगगा ?'
नानाकुगनिषु जिनेन्द्र निरं भ्रनित्वा
पहारविल्लारणं तर जागताऽहं ।
नुथ विरिननृसि पुवभ्रमिला
नाभ्यति किनिजशिशोःपरिपालनार्थम् २०
१३ भनासर-मातायी अर्थ-हभगवन् ! मैं अनेक कुयोनियों में परिभ्रमण करता हुमा आपरे चरण कमलों की शरणमें प्राप्त हुआ है। जैसे गाय जगलमें चागेंओर धूमकर, अपने बचेको पालन करनेके लिये क्या अपने घर नही आती है ? अवश्य आ. ता है। इसी प्रकार में भी आपकी शरणमें आया ह । २० अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम छन्दः कलागमकलक्षणशास्त्रहीनम् । श्री शान्तिसागरपदाम्बुजसेवमानं शास्त्रानुकूलचरणंजिनभक्तियुक्तम् ॥२१॥ स्वात्मप्रवोधजननी निजबोधरुपा स्वर्गापवर्गसुखदानपरायणा या। सम्यक्त्ववृत्तभगिनी सुगुणानुरक्ता त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते वलान्माम् २२ अर्थ-हे भगवन यद्यपि में श्री शांतिसागर आचार्य के चरण कमलों की सेवा करने वाला दू, शास्त्रानु कूल
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१५ भक्तामर-शतड्यो मोलके गुलटेनेगाले हैं, और इन्द्रोंके द्वारा पूज्य है। हे देवाधिदेव से आपके चरण कमलो के निकट रहते दुए ही मैं आपकी सुति करता है। जैसे कोयल जो मधुर शद्र करती है सो संत ऋतुके रहने हुपती करती है। जन्यथा नही ।। २३॥ यद्देव ! शक्ति रहितोऽपि नुतिं करोमि तत्कारणं सुखद ! ते चरणप्रसादः। यत्काकिलः परमपावन गायतीष्टं तञ्चारचतकलिकानिकर कहेतु ॥२४॥ अर्थ-हे देव ! म भक्ति रहिन दाता हुआ भी जो आ पफी स्तुति करता है, उसथा कारण केवल आपके चरणो का प्रमाद ही समझना चाहिय । हे परमपवित्र ! हे सुप देने वाले मगरन् । फोकिल जो जधुर गायन गाती है उसका कारण केवल सुन्दर आमकी कलियों का समूहही समस ना चाहिये ॥२४॥ त्वत्संस्तचेम भयसन्तति सन्निवर्द्ध १६ भव्या जहाति दुरितं निजभावबद्धम् । उन्ध्र यथा प्रचुरतैलवृतादिवद्वम् । स्मारं मलं चिरगतं बरपोक्ययोगात् २५ अर्थ-हे भगवन् नव्यपुत्ष आएकी स्तुति करने नामले ने जन्नोंमें व हुए, और अपने ही परिणामाने दांचे हुए पापक्रमाको बहुत शान छोडता है। नष्ट कर देता है । जैसल बहुनते तेल बोले त्रिकटे हुम ( लगे हुए) व्हुनले झैदने उत्तन लोडायोगले बहुन गात्र छोड़ देता है । नाम करता है । भावार्थ-जैले तोडाले लवल अपने आप रजाता है, उत्तीप्रकारापान्तुति करनेनारसे अपने आप सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥२२॥ त्वन्नान मन्त्रजपतोऽशुभभावबद्धम् पापं क्षणात् अयमुपैति शरीरभाजाम्। नाशं प्रयातु सम देव किसत्र चित्रम -स्तुत्यानयाल्पतमया हि शिवान्तरायः २६
१७
भक्तामरल्शतायो
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अर्थ-टे भी आपका नाम पी मन्त्र जप करने
माप्रसे प्राणियोक अशुभभावोसे यन्धे मुए पाप क्षण भरमें
नष्ट हो जाते हैं। फिर भला मैने जो यह आपकी बहुत छोटी
स्तुति की है, उससे मोक्ष लक्ष्मीको रोकने वाला मेरा अन्तगय
कर्म यदि नाश हो जाय, तो इसमें प्राधर्य ही क्या है।
भावार्थ-सापफी इस स्तुति करने में मेरा अन्तराय फर्म अवश्य
नष्ट होगा, और मुझे मोक्षफी प्रामि अवश्य होगी ॥२६॥
जन्माभिषकसमये गिरिराजकूटात्
त्वत्पादपद्मपतिता बरवारिधारा ।
यामांतलोकमलिनीलमशेषमाशु
मिथ्यानमो जगति सुश्रुत! धावतेऽस्मिन् ॥२७॥
अर्थ-भगवन् ! है मुटत । श्राप जन्म होनेके समय
इन्दन जो अभिपंक किया था, उस समय मेरुध्येतसे श्रापके
चरण कमलोंका प्रनालन भरती हुई जो उत्तम पवित्र जलकी
धारा गिरा दी थी, उसन इस समारमें तीनों लोकों को प्रामात
करनेवाली और नमक समान अत्यन्त काली, वा पाप रूप
सी मियान्यरुपी कालिमा घोडाली है। भावार्थ-यह मिथ्यात्व
कपी कालिना श्रापय अभिपके जलसे ही दूर होती है ॥२७॥
भतामर-मनायी
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धमापदेशलमये नव दिव्यभापा
वणीनका शिवमयाऽग्विनवाहीना।
नष्टं तया हि सकलं दुरितं त्रिलोक
ग्यांशुभिन्नमित्र शार्बग्मधकारम् ।।२८॥
सत्वेति नाथ ! तर सस्तवनं मयंद
मारम्यते सुखधिया शिवलिप्तया वा ।
ध्यानस्यतीवनपलो मम नास्ति शक्ति-
स्तस्माग्जिनेन्द्र तव सस्तवनं करोमि P8
अर्थ-2 नाय । यही समझ कर मैंने अनन्त सुन्न प्राप्त
कनिकी ब्लान रथवा मान प्राप्त करने की इच्च में यह
आपकी स्तुति करना प्रारम्भ किया है। जिन्राज! न तो
भक्तामर-शतद्वयी
ध्यान करनेकी मेरी शक्ति है, और न घार तपश्चरण करनेकी
मेरी शक्ति है। इसीलिये हे प्रभो। मैं आपकी यह स्तात
करता ह ॥२६॥
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ध्यानं नितान्तकठिनं कठिनं तपश्च
मोक्षस्य साधनतमा कठिना स्तुतिश्च ।
मोक्षस्य तीव्रतमलालसया मयेय-
मारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात् ॥३०॥
अर्थ-हे भगवन् । उस ससारमे उत्तम ध्यान (धर्मध्यान
वाशुलप्यान ) धारण करना नितांत कठिन है, और मौत की
प्राप्ति अवश्य कराटेनेवाली ऐसी श्रापकी स्तुति भी अत्यन्त
कठिन है । तथा मेरी बुद्धि अत्यन्त छोटी है । तथापि मोक्ष
प्राप्त करने की लालसा अत्यन्त तीत्र लग रही है । इसीलिये
पंचल श्रापक प्रभाव से ही मैंने इस स्तुति का फरना प्रारम्भ
किया है ॥३०॥
चेतेहरिष्यति सतां नलिनीदलेपु
मुक्ताफलद्युतिमुपेति नन्दविन्दुः ।
स्पृष्टं जिनेन्द्रचरशारिविष्टरं वा
पूज्यं पुरं नगवरं विपिनं यथा वा ॥३१॥
- भक्तामर-शतद्वयी तुच्छातितुच्छमपि काव्यकलाविहीन दोपैरुपेतमपि देवगुणानुरक्तम् । देवाधिदेव ! तब संस्तवनं मयदं भक्तया कृतं हृदयहारि ततो प्रकृष्टम् ॥३२॥ अर्थ- भगवन् ! जिस प्रकार कालिनीके पत्र पर पही हुई नलकी बूंद मोतीके लमान शोभाको धारण करती है और सज्जनोंके हत्यको हरण करती है अथवा जिस प्रकार भगवान जिनेन्द्रदेवके चरणोंसे स्पर्श किया हुआ सिंहासन पूज्य गिना जाता है। भगवान जिनेन्द्रन्ने चरणोंसे स्पर्श किया हुआ नगर, पर्वत, वा मेरपर्वत और वन पूज्य गिना जाता है उसी प्रकार हे देवाधिन्च! यद्यपि यहाका लोन अत्यन्त तुच्छ वातुच्छसे भी अत्यन्त तुच्छ है कन्यी समस्त क्लानोंमें रहित है और दोषोंसे भरपूर है । अत्यन्त भकिले वनाया हुआ है और आपके गुणोंसे सना हुआ है। हे प्रभो! इसमें आपके गुणों वर्णन है। इसीलिये यह लज्जनोंके हृदयको हरण करनेवाला है। और अत्यन्त उत्कृष्ट है ॥३-३२॥ आस्तां तव स्तवनमस्तसमस्तदोषं नामापि नाथ! तब विघ्नहरं नितान्तम् । सोमांजनाजनजामुनिमानतुङ्गाः नाम्नैव ते तटगता भवदुःखसिंधोः ॥३३॥ :
२१ - भक्तामर-शतद्वयी अर्थ-हे भगवन् ! समस्त दोषोंको दूर करनेवाला आपका स्तवन करना तो दूर, रहा, केवल आपका नाम लेने माप्रसे ही समस्त विघ्न सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। हे प्रभो ! सती सोमा, सती अंजना, सती सीता, और मुनिराज मानतुंग आदि केवल आपका नाम लेनेसे ही संसारके दुःख रूपी समुद्रसे पार होगये । भावार्थ-उनके समस्त दुःख दूर होगये ॥३३॥ नाना तरन्ति पुरुषा नहि चित्रमत्र वत्संकथापि जगतां दुरितानि हन्ति । तस्मात्पठन्ति रचयन्ति विमर्शयन्ति ये त्वत्कथां जगति ते जिननाथ! धन्याः॥३४॥ अर्थ-हे जिननाथ! आपका नाम लेनेसे पुरुष इस संसारसे पार हो जाते है, इसमें तो कोई आश्चर्यकी बात ही नही है। क्योंकि आपकी कथा, वा आपका जीवन चरित्र रहने मात्रसे ही वा सुननेसे ही संसारके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिये हे प्रभो। जो लोग आपकी कथाको पढ़ते हैं, आपकी कथाकी रचना करते हैं, और उसका मनन वा चिन्तवन करते हैं वे पुरुप इस संसार मे धन्य है ॥३४॥ प्रास्तां कथा त्वदुपदिष्टमिदं हि शास्त्रं ' नित्यं प्रकाशयति नाथ ! निजात्मरूपम् । .
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२३ भक्तामर-शतदयी नात्यभ्दुतं भुवनभूषण ! भूतनाथ ! मोहादिकर्मनिवहं क्षयमाप्नुयान्मे । रत्नत्रयं शिवकरं प्रकटीभवेद्वा स्तुत्यानयैव शिवनाथ ! शिवं भवेद्वा ॥३७॥ अर्थ-हे ससारमात्रके एक भूपण ! हे समस्त जीवोके स्वामी! हे मोक्ष लक्ष्मी के स्वामी । मैने जो आपकी यह स्तुति की है। उमीसे मेरे मोहनीय प्राति समस्त कांके समूह नए हो जायेंगे, अथवा मेरे श्रात्मामें मोक्ष प्राप्त करानेवाला रत्नप्रय प्रकट हो जायगा अथवा मानकी ही प्राप्ति हो जायगी। इसमें कोई आधर्य की बात नहीं है ॥३७॥ भूतैर्गसौ(वि भवन्तमभिष्टुवन्तः शकादया परभवे कृतिनो भवन्ति । शक्तया स्तुति तब जिनेन्द्र ! करोमि भक्तया भूयात्सदा भवति नाथ! शिवान्तभक्तिः ॥३८॥ अर्थ-हे जिनेन्द्र । है स्वामिन् ! इस संसारमें इन्द्रादिक दव आपके अनेक गुणोका वर्णन कर श्रापकी स्तुति करते हैं। इसलिये व परमयमे अर्थात मनुप्य-भव धारण कर कृतकृत्य भक्तामर-शतद्वयी हो जाते हैं। सिद्ध हो जाते हैं। हे भगवन् ! मैने भी यह आपकी स्तुति अपनी शक्ति के अनुसार भक्ति पूर्वक की है। इसलिए हे प्रभो । जब तक मुझे मक्ष प्राप्त न हो. तब तक सदा आपमें ही मेरी भक्ति बनी रहे। यही मेरी प्रार्थना है ॥३८॥ गायन्ति ये तव गुणान् मधुरस्वरेण गुम्फंति काव्यनिवहे निजविद्यया वा। स्तुत्या स्तुवन्ति गुणभूषण ! युक्तया वा विश्रावयन्ति कथयन्ति भवत्कथां ये ॥३॥ ध्वायत्ति वा ननु नमन्ति जपन्ति त्वां ते स्वामिन ! भवैः कतिपयैः तब भूरिभूत्या । तुल्या भवन्ति भक्तो ननु तेन किं वा भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥४०॥ अर्थ-हे स्वामिन् ! जो पुरुष अपने मधुर स्वरसे आपके गुणोंका गान करते हैं । जो पुरुष अपनी विद्याके बलसे आपके गुणोको अनेक काव्योंमें गुफन करते हैं। जो पुरुष आपके गुणोका अनेक प्रासादादिक गुणोसे, वा उपमात्रादि अलङ्कारोसे सुशोभित होनेवाली स्तुतिसे स्तवन करते हैं। जो पुरुष आपकी कथाको कहते हैं ।वा भक्ति पूर्वक सुनाते है, जो पुरुष आपका ।
२५ भक्तामर-शतद्वयी अभिषेक करते है, आपको नमस्कार करते हैं, वा श्राप का जप करते हैं, वे पुरुष थोड़े ही भवोमे श्रापके समान बड़ी भारी विभूतिको धारण कर आपके ही समान होजाते हैं। सो ठीक ही है । क्योंकि संसारमें ऐसे पुरुष से क्या लाभ है, जो बड़ी भारी विभूति देकर, आश्रित पुरुषोंको वा सेवकको अपने समान न करले । भावार्थ-सज्जन पुरुष अपने श्राश्रित पुरुषको अपने समान कर ही लेने हैं ॥३९-४०॥ दृष्ट्वा भवन्तमनिमेषविलोकनीयं भव्याः स्मरन्ति चिरविस्मृत मोक्षमार्गम् । रत्नत्रयं शिवमयं प्रगुणं लभन्ते तेनैव ते सपदि नाथ! भवन्ति सिद्धाः ॥४१॥ अर्थ-हे नाथ ! श्रापका स्वरूप टिमिकार धन्द किये बिना (टकटकी लगाकर) देखने योग्य है। ऐसे आपके स्वरूपको देखकर, भन्य पुरुषोंको चिरकालसे भूले हुए मोक्षमार्गका स्मरण होजाता है । अथवा वे भव्य पुरुष आपके स्वरूपको देख कर, कल्याण करनेवाले और सर्वोत्कृष्ट रत्नत्रय गुणको प्राप्त कर लेते । तथा उसी रत्नत्रय गुणके प्राप्त होनेसे वे बहुत शीघ्र सिद्ध पदको प्राप्त हो जाते हैं। ४१॥ है १६ भलामर-शतदयी शान्तं मनोहरतल वरवीतरागं लः सहस्त्रकिरणोः समतां दधानम् । जातस्वरूपावलोक्य तव स्वरूपं नान्यत्र नोपमुपयाति जनस्य चक्षुः ॥४२॥ अर्थ-हे भगवन् ! प्रापका स्वरूप अत्यन्त शान्त हैं, अत्यन्त मनोहर है, सरन अधिक वीतराग है, करोड़ो सूर्यक समान कान्तिो धारण करनेवाला है । और उत्पन्न होनेके समयके समान, सईया वस्त्र रहित दिगम्बर है। हे प्रभो! ऐसे आपके स्वरूपको है बार लोगोके नेत्र हरि हराटिक अन्य देवोंमे कमी सन्तुष्ट नहीं होते ॥४॥ स्यानादलांच्छतमनारतमर्शनयिं सानात्मकं निखिलजीवदयाप्रधानम् । तत्वोपदेशनिपुण विगतेष्टवा, सत्यात्मकं शिवकर शिवदर्शक च ॥४३॥ एवं त्वदीयवचनं जिनराज ! वुधवा वेदाद्यसत्यवचनं नहि रोचते ने ।
२७
भक्तामर-शतद्वयी
पीत्वा पयः शशिकरयुतिदुग्धसिंधोः
क्षारंजलं जलनिधेः रसितुं क इच्छेत् ॥१४॥
हे भगवन् ! श्रापके वचन अनेकान्तमे सुशोभित है,
सदा विचार करने योग्य हैं, सब तरहके प्रमाणोने मुशोभित हैं
समस्त जीवोंपर दया करनेमे प्रधान हैं, जीवादिक तत्वोके
उपदेश देने में अत्यन्त निपुण है, प्रत्यक्ष वा परोक्ष प्रमाणसे कभी
उनमें बाधा नहीं पाती, वे सत्य वचन स्वरूप है, सब जीवोका
कल्याण करनेवाले हैं, और मोक्ष स्वल्पको दिखलानेघाले है ।
है जिनगज ऐसे श्रापके वचनोको समझ कर दिर यह
मनुष्य वद श्रादि असत्य वचनोको कभी स्वीकार नहीं करता।
सां ठीक ही है। क्योंकि चन्द्रमाकी किरणोके समान श्वेत
कान्तिको धारण करनेवाले तीरसागरके जलको पीकर सा
कीन मनुष्य है जो फिर लवणसमुद्र के पार पानीको पीनेकी
इच्छा दरता हो? अर्थात् कोई नहीं ॥४३-४४॥
यैः शान्तरागरुचिभिः परमाणुभिस्त्वं
श्रेष्ठैः सुनिर्मलतमरतिसुन्दरेवा ।
पुण्यात्मकः सकललोकहितप्रवाह:
स्वर्णोपमैर्विधुमयेः करुणामयैर्वा ॥४५॥
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હ भकामर- शतद्वयी तेनैव जन्मसमयेऽपि तवाभिषेक क्षीराम्बुनाऽखिलसुरैर्विधृतः सुमेरौ ॥४७॥ वोधत्रयं च सहजातिशयान् प्रपन्नो लोकोत्तरोसि भगवन् ! भुवि सर्ववर्यः । ध्येयोलि वा खलु निरन्तरमीक्षणीयः यत्ते समानमपरं नहि रूपमस्ति ॥४॥ - अर्थ-हे भगवन् ! जिन उत्तम परमाणुनोसे आपका सुन्दर शरीर बना है, वे परमाणु ससारमें उतने ही है। इसलिये इस संमारमें अापके जन्मसे पहले ही इन्द्रादिकदेव अतुल रत्नोकी वर्षा करते हैं तथा वे ही इन्द्रादिक समस्त देव श्रापका जन्म होते ही श्रापको मेरु पर्वत पर लेजाते हैं, और वहांपर क्षीरसागरके जलमे श्रापका अभिषेक करते है। हे भगवन् ! आपके जन्म के साथ ही मतिज्ञान, श्रुतशान, अवधिज्ञान तीनों भान उत्पन्न हुए हैं, जन्मके साथ होनेवाले दश अतिशय प्राप्त हुए है, आप इस संसारमें लोकोत्तर हैं, सबसे श्रेष्ठ है, ध्यान करने योग्य है, और सदा दर्शन करने योग्य हैं। हे भगवन् ! आपके शरीरकी रचना करनेवाले परमाणु उतने ही हैं, इसीलिये इस संसारमे श्रापके समान अन्य किसीका रूप नही है।४७-४८॥
मार-मारी ३० वळूच ने सुननगर नेत्रहारि हरयते व चतुर्दिशि ने प्रभावात् । सान्त्या निरस्कृतदिवाकरकोटिकान्नि शान्त निरामयलोकनीयम् ॥१६॥ निर्णननिजगत्रितयाण्कान माइबिसुन्धविदुपां खलु सोचमानस् । अत्यतसुन्दरनमं स्लोपसा वैगग्यभावजन नितरां तथापि ॥५०॥ अर्थ- प्रनो च पके उस मुख्ने तीनों लोकोंकी नमत्त उपमाए जीत ली है । ललिये आप मुख उपमा रहित है। तथापि में समाई विद्यागे लिये उपमा लहित है भक्तामर-शाची. हे नाथ ! श्रापका वह मुख कमलके समान अत्यन्त सुन्दर है। तथापि वह सदा वैराग्य भागांको उत्पन्न करता रहता है ॥५०॥ विम्ब कलंकमलिनं क्व निशाकरस्य यत्क्षीयते प्रतिदिन परिवईते वा । लज्जावशाच दिवस नहि हरयते यत् रात्रौ च पंचदश वासरमेव लोके ॥५१॥ अर्थ-हे स्वासिन् । काकी कालि पानी धारण करनेवाला चन्द्रमाका बिम्ब कहां? जो प्रतिदिन या तो घटना रहता है, या बढ़ता रहता है। तथा जो लजाक धारण दिन दिखाई नहीं देता, और गप्रिमे मी देवल पन्द्र' दिन ही दिखाई देता है ॥५॥ यहासरे भवति पाण्डु पनाशकल्प म्जानं प्रभाविरहितं ननु ररिमहीनम् । चन्द्रोपमं तत्र मुखं कथमन्ति येऽतः ते काव्यवोधरहिता अथ भक्तियुक्ताः ॥५२॥ .
महानर-शतरी
अर्थ-हे प्रभो ! वन्दना प्रतिविम्व हिनने हान्ने
चेके समान र] होजाता है। प्रभा रहित नलिन होजाता है।
और किरणोते या रहित हो जाता है। इसलिये कहना
चाहिये कि जो लोग अपने सुखको चन्नाकी उपमा देकर
ब्णन करते हैं। या तो मारने धार्थ ज्ञानते रहित हैं,
अथवा अपनी पाद मतीनो धारण करते है ॥५॥
इन्दोः कलंकमानिनस्य कलाकलापः
ल्यायात्तदैन सलिनोस्ति ततो सुनीन्द्राः ।
সুলভভাকালাহ
शुभ्रा गुणा स्तव रिभो ! कथयन्ति मक्तया ।५३।
अर्थ-हे प्रभो चन्द्रना कडूने मलिन है। इसलिये
न्याय पूर्वक यह दात रिद्ध हो जाती है, कि इतनी जलानोका
समूह भो नलिन ही होता है । तथापि अनेक मुनिराज जो यह
वर्णन करते हैं, कि श्राप गुण पूर्ण प्रतिदिन्नो शरण करनेवाले
इन्द्रलाली किरणोंने लहले समान श्वेत हैं। यह वर्णन केरल
मनिले करते हैं ॥३॥
सम्यक्त्ववीर्यसुखदर्शन-ताशः
ज्ञानावगाहनगुणाः परमा विशुद्धाः ।
शुद्धात्मजाः स्थिरनरा: सहजा हनन्ताः
शुभ्रा गुणात्रिभुवनं तब लंघयन्ति ॥५४॥
भक्तामर-शतद्वयी अर्थ-हे प्रभो । सम्यग्दर्शन, अनन्त वीर्य, अनन्त सुख, अनन्त दर्शन सूक्ष्मत्व, अनन्त शान, अवगाहनत्व आदि आपमें रहनेवाले गुण सब अत्यन्त उत्कृष्ट है, परम विशुद्ध हैं, शुद्ध प्रान्मासे उत्पन्न हुए हैं, अत्यन्त स्थिर है, अत्यन्त निर्मल है आपकी मुक्तिके साथ साथ उत्पन्न हुए हैं। और अनन्त हैं। हे नाथ ! ऐसे में आपके गुण तीनो लोकोका उल्लघन करते हैं।॥५४॥ ज्ञानादयो तव गुणाः शिवसम्पदा वै यच्छन्ति भक्तपुरुषाय गुणान्विताय । ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वरनाथमेकं शक्ताश्च दातु मनिशं भुवनेश्वरत्वम् ॥५५॥ अर्थ-हे भगवन् । श्रापके ज्ञानादिकगुण सम्यग्दर्शनादिक गुणोंको धारण करनेवाले भक पुरुषोके लिये मोक्ष लक्ष्मी भी देदेते हैं। सो ठीक ही है। क्योकि जो तीनो लोफोके एक ईश्वरके आश्रय जाकर रहे हैं, वे सदा तीनों लोकोका ईश्वरपना भी देनेके लिये समर्थ रहते है। और दे सकते हैं ॥५५॥ भव्या स्त्वदीयसुगुणान्ननु धारयन्ति ते नाथ ! लोकशिखरं सहसा व्रजन्ति ।
भक्तामर-शतद्धयी ३४ ----- ये धारयन्ति नरनाथनिदेशचिन्हें कस्तान निवारयति संचरतोयथेष्टम् ॥५६॥ अर्थ-हे नाथ ! जो भव्य जीव अापके उत्तम गुणोको धारण करते हैं, वे बहुत शीघ्र लोर शिखर पर जा विराजमान होते हैं । सो ठीक ही है। क्योंकि जो पुरुष राजाके आज्ञाचिन्हको ( पोशाक, श्राक्षापत्र, वा पट्टा श्रादि राजाके द्वारा दिये हुए चिन्हको) धारण करते हैं। उनकी इस ससारमें इच्छानुसार घूमते हुए कौन रोक सकता है ? अर्थात् कोई नही ॥५६॥ चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभी- रूपं विकाररहितं सततं प्रदृष्टम् । शांतं विकाररहितं खलु ते शरीरं भव्यान् करोति सहसा हि विकारहीनम् ॥५७॥ अर्थ-हे भगवन् ! आपका रूप विकार रहित है। यदि ऐसे आपके रूपको स्वर्गों की देवागनाए सदा देखती रहे, तो इसमें कोई आश्चर्यकी बात नही है। क्योकि शान्त और विकार रहित आपका शरीर भव्य जीवोको बहुत शीघ्र विकार रहित कर देता है, और अवश्य कर देता है ॥१७॥ ।
३५ भक्तामर-शतस्यो लोकोत्तरं जगति सातिशयं महान्तं ते प्रातिहार्यमवलोक्य सुरेशपूज्य !। शुद्धात्मशक्तिलववोधधरैश्च भव्य- नीतं मनागपि मनो न विकारमार्गम् ॥८॥ अर्य-ई इन्द्रोंके द्वारा पूज्य! भगवन् । आपके प्रातिद्वार्य लोकोत्तर है, अत्यन्त उत्कृष्ट , और चौतीस अतिशयोंमे मुशोभित है। इस संसारमें ऐसे अापक प्रातिहार्यों को देख कर, जिन लागोंको शुद्ध आत्माफी अनन्त शक्तिका घोड़ासा भी मान है। एम भव्य जीयाटायमें किञ्चित भी विकार उत्पन्न नहीं होता है। भावार्य-यापक प्रातिदायाँको देख कर समीके इयमें विकार उत्पन्न हो माना है, जिनको आत्माकी अनन्त शक्तिका मान नहीं ॥५॥ आतापनप्रभृतियोगधरा मुनीन्द्राः भक्ता जिनेन्द्र ! तव घोरतपोदधानाः । कल्पान्तकालनरुता चलिताचलेन अन्येन वा नहि चलन्ति परीपहेन ॥५६॥ अर्थ- जिनेन्द्र । प्रातापानयोग, वर्षायोग आदि योगोको धारण करनवाले, तथा घोर तपश्चरएको धारण
भक्तामर-शतद्वयी
३६
करनेवाले श्रापके भक्त मुनिराज कल्पकालके अन्तमें बहनेवाली
और पर्वतों तक को हिलादेनेवाली वायुम अथवा ऐसी ही ऐमी
अन्य परीपहों में कभी चलायमान नहीं होते हैं ॥५६॥
किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचि-
दित्थं जिनेन्द्र ! कथनं भुवि रूढिमात्रम् ।
जन्माभिषेकसमये पयसा सुरेश्च
देवांगनाभिरपि चंचलितं तदेव ॥६॥
अर्थ-"मेरु पर्वतका शिस्त्रर क्या कभी चलायमान हो
सकता है" संसारमे यह जो क्थन चला पाता है, वह क्वल
रूढ़िस चला पाता है। हे जिनराज! जिस समय आपका
जन्माभिषेक हुश्रा था उस समय वही मेरु पर्वतका शिखर
क्षीरसागरके जलसे, देवॉक समूहसे और देवाङ्गनात्रोंके
समुदायसे कम्पायमान होने लगा था ॥३०॥
निर्धूमवर्तिरपवर्जिततैलपूरः
मोहांधकारनिधनैकपटुः प्रदीपः !
तेनैव दूरमुपयाति मनोन्धकार
मिथ्यात्वभावजनितं चिरकाललग्नम् ॥६॥
३० भक्तामर-शतवयी अर्थ-हे नाथ! आप इस संसारमें एक अपूर्व दीपक हैं, दीपकमें धूम होता है, बची होती है, और तेल होता है, परन्तु माप धूर पत्ती तेल पाटि सप साधनोसे रहित हैं। दीपक अन्धकारको दूर करता है। आप मोह रूपी अन्धकारको माश करनेमे अत्यन्त चतुर है। हे भगवन् ! उसी दीपक रूप आपसे यह मिथ्यात्व भागोसे उत्पन्न हुश्रा और चिरकालसे लगा हुआ मनका अन्धकार बहुत शीघ्र दूर होजाता है ॥६॥ चित्ते प्रकाशयति धर्ममधर्मरूपं कालं नभो निखिलजीवभरं च मूर्तम् । किं वा त्रिकालभवपर्ययसार्धमेव कृत्स्नं जगत्रयमिदं प्रकटी करोपि ॥२॥ अर्थ-हे प्रभो ! अपूर्व दीपक रूप आप भव्य जीवोंके इदयमें धर्म द्रव्या, अधर्म द्रव्यका स्वरूप प्रकाशित करते हैं, आकाश, कालका स्वरूप प्रकाशित करते हैं, समस्त जीवोके समूहका स्वरूप प्रकाशित करते हैं, और पुदल तत्वका स्वरूप प्रकाशित करते है । अथवा यो कहना चाहिये कि तीनों कालोमें होनेवाली समस्त पर्यायोंके साथ साथ आप इस समस्त तीनो लोकगीप्रकाशित करते है ॥६॥ गम्यो न जातु नरुतां चलिताचलानां शान्तो न वातरहिते वहुछादिते वा ।
भक्तामर-शतद्वयी ३८ सूर्यप्रकाशबहुले ज्वलितो नितान्त वासु सागरजले नहि वर्द्धतेऽसौ ॥६३॥ अर्थ-हे प्रभो ! अपूर्व दीपक रूप प्राप पर्वतोको चलायमान करदेनेवाली वायुसे भी कभी नहीं बुझते है, दीपक थोड़ीसी वायुसे ही बुझ जाता है। तथा दीपक वायु रहित प्रदेशमें अथवा ढक देने पर वुझ जाता है, परन्तु श्राप न वायु रहित प्रदेशम बुझते हैं, न आछादन हानेपर बुझ सकते हैं। दीपक सूर्य के प्रकाशमें अच्छी तरह प्रकाशमान नहीं होता, परन्तु श्राप करोड़ो सूर्यके प्रकाशमें भी अत्यन्त प्रकाशमान होते रहते हो। दीपक वर्षा में वा जलमें बढ जाता है (दुझ जाता है , परन्तु आप वर्षा में वा महासागरके जलमें भी कमी नही वढते हो (बुझते हो) ॥३॥ स्थित्वा त्रिलोकशिखरेऽपि विकाशतेयं स्पष्टं त्रिलोकसाहितं युगपद्ह्यलोकम् । तेनैव देव ! भुवि चित्रकरः प्रशान्तः दीपोपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाशः ॥६॥ अर्थ-हे नाथ । श्राप तीनो लोकोक शिखर पर विराजमान होकर भी तीनो लोको सहित अलोकाकाशको एक साथ और प्रत्यक्ष प्रकाशित करते हैं। हे देव । इसीलिये श्राप ।
भलामर शतदयौ P इस संसारमें आधर्य उत्पन्न करनेवाले, अत्यन्त शान्त, और जगतको प्रकाशित करनेवाले, सर्वोत्तम दीपक कहे जाते ह॥६४॥ नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः लोके न तापयसि कानपि जीवलोकान् । भक्तान् करोपि निजभूतिसमान् जिनेन्द्र ! सूर्यः प्रभो ! त्रिभुवन त्रमदृष्टपूर्वः ॥६५॥ अर्थ है जिनेन्द्र । ई प्रभो ! श्राप तीनो लोकोंमें एक अपूर्व सूर्य हैं। और ऐसे अपूर्व सूर्य है. कि जो किसीने कभी न देख हों। क्योंकि सूर्य अस्त होता है। आप कभी अस्त नहीं होते। सूर्य को राहु ग्रस लेता है। आपको यह कभी नही प्रस सकता । सूर्य सरको संतप्त करता है, परन्तु आप इस संसारमें किसी भी जीवको मत नहीं करते। हे प्रभो। सूर्य अपन समान किसी को नहीं कर सकता, परन्तु आप अपने भक्त पुरुषों को विभूनिसे भी अपने समान कर देते हैं। इसीलिये हे नाथ । श्राप इस संसारमे अपूर्व मूर्य है ॥६॥ सूर्यः प्रकाशयति नाथ ! सदाल्पदेशे स्थूलार्थमेव दिवसे न तु सर्वकाले ।
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भक्तामर-शतद्वयी तांबातितत्रितररश्मिचयो हि सूर्यः त्वं नान्तशान्तरसमग्नतमो रवीशः । सूर्य:सदा भ्रपति नाथ ! सुनिश्चलस्त्वं सूर्यातिशाविमहिमाऽसि मुन्द्रि ! लोके ॥६॥ अर्थ-नूर्यकी किरणोका समूह तीवमे भी अत्यन्त दौन है, परन्तु श्राप अनन्त शान्त रसमें नितान्त मग्न है। सूर्य सहा फिरता रहता है, परन्तु श्राप सहा निश्चल बने रहत। आप इस ससारमें सूर्यके भी स्वामी है। इसलिये हे मुनीन्द्र आपकी महीमा सूर्यमें भी यात घड़कर है ||६ell नित्योदयं दलितपापतमावितान दिव्यः वचोमृतझरेः परितर्पयन्तम् । दुष्कर्मतप्तहृदयान् परिशान्तयन्तं चन्द्रोपनं तव मुखं नितरां स्मरामि ॥६६॥ अर्थ नाथ ! श्रापका मुख चन्द्रमाके समान है। अन्तर कयाल इतना ही है, कि चन्द्रमामा उदय सदा नहीं होता, भापका उदय सहा बना रहता है । चन्द्रमा कंघल अन्धकारका नाय करता है, आपका मुन्न पाप रूपी अन्धकारके समूहका
भक्तामर-शतद्वयी
४२
नाश कर देता है। चन्द्रमा अमृतसे सवको तृप्त करता है,
श्रापका मुख दिव्यवचन रूपी, (दिव्यध्वनि रूपी) अमृतके
झरनेसे सवको तृप्त करता रहता है । चन्द्रमा उष्णतासे तप्त
पुरुषोको शान्त करता है आपका मुख पापकर्मसे सतप्त होनेवाले
हृदयोको अथवा पापकर्मसे जिनके हृदय सतप्त हैं, ऐसे पुरुषोको
सदा शान्त करता रहता है। हे नाथ ! ऐसे आपके चन्द्रमाके
समान मुखको मैं सदा स्मरण करता हू ॥६६॥
गम्यं न राहुवदनस्य न वारिदानां
जन्मान्तकाद्यखिलदोषकलंकहीनम् ।
हानादिदोषरहितं परिवेषयुक्तं
मूर्धा नमामि तव वक्रमपूर्वचन्द्रम् ॥७०॥
अर्थ-चन्द्रमाको राहु दवा लेता है, बादल छिपा लेता
है, और वह कलङ्कसे कलङ्कित है। परन्तु आपके मुख कर्ण
अपूर्व चन्द्रमाको न राहु दवाता है न बादल छिपाता है, और
न वह जन्म मरण आदि समस्त दोषरूपी कलङ्कसे कलङ्कित है।
चन्द्रमा घटता बढ़ता है, आपका मुख कभी घटता बढ़ता नही।
तथापि आपकामुख परिमण्डलसे वाभामण्डलसे सुशोभित है।
हे प्रभो ! ऐसे आपके मुख रूपी अपूर्व चन्द्रमाको मैं मस्तक
झुका कर नमस्कार करता हू॥७०॥
४३ भक्तामर-रातयी त्वद्ज्ञानगन्धमनुभूय सुरद्विरेफाः स्वर्गात्समेत्य परितो ननु त्वां भजन्ति । सिद्धान्तकेशरसुगन्धितसर्वलोकं विभ्राजते तव मुखाञ्जमनल्पकान्ति ॥७॥ अर्थ-हे भगवन् ! जिसके भान रूपी सुगन्धका अनुभव कर देव रूपी भ्रमर स्वर्गसे आकर चारो ओरसे आपकी सेवा करते हैं। हे नाथ ! जिसने अपने बचन रूपी केशरसे समस्त लोकको सुगन्धित कर दिया है, और जिसकी कान्ति ही प्रवल है, ऐसा आपका मुख रूपी कमल इस संसारमें बहुत ही शोभायमान हो रहा है ॥७॥ शैलेशगह्वरविराजिततापसानां : मिथ्यानुरागमभिधूय विकाशते यत् । स्वात्मप्रवोधमपि दिव्यवचामृतैर्वा विद्योतयज्जगदपूर्वशशांकविम्बम् ॥७२॥ अर्थ- हे भगवन् ! जो मुनि पर्वतोकी गुफाओमें विराजमान है, उनके भी मिथ्यात्व चा रागद्वेपको दूर कर जो दैदीप्यमान होता है, तथा जो दिव्यवचन रूपी अमृतसे अपने १ भजन्ते । २ ब्राह्मीसुकेशरसुगधितसर्वलोक
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४५ भक्तामर-शतद्वयो तेनैव नाथ! सुखदं भवदुःखहानं प्राप्नोमि कर्मरहितं जिननाथ! मोक्षम् ॥७४॥ अर्थ-हे नाथ ! आपके मुख रूपी चन्द्रमासे समस्त अन्धकार दूर होगया । इसलिये मैं अपने प्रात्माके स्वरूपको सिद्धोंके समान देखने लगा है। हे नाथ! हे जिननाथ ! यही कारण है कि अब मुझे अनत सुख देनेवाली, संसारके समस्त दुःखोंसे रहित, और समस्त कर्मोंसे रहित ऐसी मोक्ष शीघ्र ही प्राप्त होगी ॥७॥ यस्मिन् प्रभो! जनपदे प्रविराजितस्त्वं मिथ्यात्वरोगग्रसितो न कदापि तत्र । निष्पन्नशालिवनशालिनि जीवलोके क्षुद्रोगपीडिततमो न कदापि वित्तः ॥७॥ अर्थ-हे प्रभो। जिस देशमें जाकर आप विराजमान होते हैं, उस देशमें मिथ्यात्व रोगसे पीड़ित मनुष्य कभी नही रह सकता । भला जिस देशमे पके हुए धानके अनेक खेत शोभायमान है, उस देशमें चतुर मनुष्य भूखसे अत्यंत पीडित कमी नहीं रह सकता ॥७५|| मकामर-शनद्वयी भव्यः करोति विपुलां नव नाथ ! भक्तिं यस्तं भवाञ्चिनरणे नपसा न कार्यम् । कृत्स्नान्नद परिणनान्नमुकच्छदशे कार्य कियजन्तुधरेजलभारनम्रः ॥७॥ अर्थ हे नाय । जो मन्य पुरय प्राकी गाढ़, भक्ति करता है उसको संसारमण महासागरम पार होन लियं तपश्चर। कग्नकी श्रावश्यकता नहीं है। सब प्रकार अन्न उत्पन्न करने वालं और जिसमें सब तरहक अन्न तोंमें पलं बड़े ऐम उत्तम कच्छ केश (जिसमें पनाकी अधिकता हो ऐन देश ) जनवं भारनं नवं हुए वाहनोंमें क्या प्रयोजन है। मावाथ-अन्न पक्नं पर ननं बाढल व्यर्थ है उनी प्रकार आपकी गाढ़ मत्रिक भाग तपश्चर मी व्यर्थ है ||sall मोहादिद्वापरहित परमे विरक्त दिव्यवचोभिरभिदर्शिनमोनमार्गे । सिंहासनादिसहिने सुरनाथपूज्ये ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशम् ॥७७॥ माहादिवापसहितषु रमायुतेषु चक्रादिशनमहितेषु विचेष्टितंषु ।
भक्तामर-शैतद्वयी E आप्तान्तरषु च परस्परसेवकेषु नैवं तथा हरिहरादिषु नायकेषु ॥७८॥ अर्थ-हे भगवन् ! आप मोहादि समस्त दोपोसे रहित परम वीतराग है, अपनी दिव्यध्वनिके द्वारा मोक्षमार्गका दिखलाने वाले हैं, सिंहासन आदि प्रातिहााँसे सुशोभित है, और इन्द्रोंक द्वारा पूज्य हैं। ऐसे आपमे जैसा सर्वोत्तम अनन्त झान शोभायमान है।वैसा शान जिनमें मोहादि समस्न दोष भर हुए हैं, जो लियोको साथ लिये हुए हैं, चक्र त्रिशल श्रादि अनेक शस्त्रोसे सुशोभित हैं। जिनकी अनेक लीलाएं विकृत हैं और जो परस्पर एक दूसरंकी सेवा करते हैं, ऐसे अन्य विष्णु महादेव आदि ईश्वर माने जाने वाले अन्य प्राप्तो में कभी नहीं हो सकता।।७७-७८॥ तेजःस्फुरन्मणिपु याति यथा महत्व- माप्तत्वमेव भवति प्रतिभाति नित्यम् । शास्ता प्रदोषरहितः खलु सर्वदर्शी पूज्यः शतेन्द्रपुरुषश्च यतस्त्वमेव ॥७९॥ अर्थ- हे भगवन् ! दैदीप्यमान मणियोंमें तेज जैसा शोमाको प्राप्त होता है, उसी प्रकार आपमें ही प्राप्तपना सदा
भामर-अनायी
१८
शामाषा प्रान हाना है। प्रमा। मीनिण श्राप दिनापाशी
गगठप अादि समम्न दापान रहिन , म है, और
यापीसी न्द्राय हाग पृज्य ||
बुद्धी हरिनरपतिर्नरलोकमज्य ।
ग्रामत्वमति न तथापि कदापि नंपु ।
चिन्तामगा। जगति याति यथा महत्व
नवं तु काचशकले किरणा कुलपि ॥८०||
श्रय-नगलाफ पृज्य ! ममम्न जन समुदायक हुग
पूज्य । चाहे युद्ध हा, चांद विनगुहा, और चाद, घ्रामा हो,
उनमन किमीम भी पानपना कमी नही यासकता। मां ठीक
ही है, हम मसाग्मं चिन्तामणी ग्याम जैसा प्रकाश हाता है,
चमा प्रकाश अनक किरणांम मुशोभित रोमे फाचके टुकटमें
फभी नहीं पा सकता ||20||
एकस्त्वयाहि कथितो भुवि मोक्षमार्गः
कृपणादिभिननु चतुर्गतिमार्गवृन्दः ।
स्वत्तो विशेष विदुरा अपि प्राप्तवाह्याः
मन्ये वरं हरिहरादय एव दृष्टाः ॥८१॥
४१ भकामर-शतवयी, AR - दे भगवन् । इस संमार में आपने फेवल एक मोक्षमार्ग का स्वरूप बतलाया है। तथा हाणादिक अन्य देवोने चारो गतियों के अनेक मार्ग दिसलाये । इलिये रहना चाहिये, कि विष्णु मानदेय प्राटि जाफि प्रामपनेने सर्वथा दूर है, ये भी किसी भी प्रकार आपने अधिक बिहान नहीं है। इसलिए मैं तो उन्ही देशना अच्छा समझता ॥३॥ साले कली जिनभवा जिनदेव ! ग्रन्थाः अडानवृत्तजनका भुवि माननीयाः । श्राद्धस्ततो मुनिभिरेव विलोकनीयाः दृष्टेषु येहृदयं त्वयि तोपमेति ॥८॥ अर्थ-जिनयस मालिकालमें भगवान जिनेन्द्र- देखक को हुप अन्ध सम्यग्दर्शन और मग्यम धारिसको उत्पन्न परनपाल, और संसार मम्मे मान्य है। प्रतपय धावकोको तथा मुनियोंकोमा उनसरा प्रत्यपन करना चाहिये । हे भगवन् ! जन प्रन्योको देखनम ही हम लोगों का हवय श्रापमै सन्तुष्ट होता teen कृष्णस्य वृत्तपठनेन सुदर्शनेन राधादिवन्निखिलदारगणेषु हीहा ।
मामा-गनी किं वीनिन भवना भुवि चन नान्य. चिनं न चोग्यति व विभव. प्रमृतः ॥३॥ म्यादम्नि नाम्नि विभव. वतु मनस्यः दव्यन्वभावजानना नयमाननान्यः । अम्नि त्वीयवचन न ननान्यग्रन्य. चिन्मना हति नाय . भवान्नामि ॥2 महामर-शतइयों ora- स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान् सर्वे भ्रमन्ति नरकादिकदुःखसिंघो । प्राप्तस्त्वया सकलकर्मवधात्प्रमोक्ष- स्तेनेव नाथ ! जननी तु तवेव धन्या ॥५॥ अर्थ-संकड़ो स्त्रियां हजारों पुत्र उत्पन्न करती है, परन्तु घेसय पुत्र नरफादि दुःख रुपी महासागरमें गोते खाते फिरते है। परन्तु हे नाय ! आपने समस्त कर्मोंका नाश कर मोक्ष प्राप्त किया है। इसीलिये हे प्रभो। इस संसारमें एक आपकी ही माता धन्य है MEIN त्वं नाथ ! जातसमये पयसाभिषिक्तः मेरी नगे सकलदेवजनेश्च वंद्यः। एवं प्रपूज्यपुरुपं विमलं महान्तं नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता ॥८६॥ अर्थ-हे नाथ। आप जिस समय उत्पन्न हुए थे, उसी ममय इन्द्राटिक समस्त देघोंने मेरु पर्वत पर ले जाकर क्षीर- सागरके जलसे प्रापका अभिषेक किया था, तथा उसी समय सबने मिलकर आपकी चंदना की थी। हे भगवन् ! आप ऐसे
भक्तामर-शतद्वयी
महा पूज्य पुरुष हैं मलमूत्रादिक से रहित अत्यन्त निर्मल हैं,
और महापुरुष हैं। ऐसे आपके समान पुरुषको आपकी ही
माता उत्पन्न कर सकती है । अन्य कोई माता आपके समान
पुरुपोको उत्पन्न नहीं कर सकती ॥८६॥
उत्पादयन्ति तनयान् बहुशो जनन्यः
त्वां देवदेवमनघं जननी तवैव ।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्त्रराश्मिम्
सूते सदोर्ध्वधरणिनिषिधाचलास्य ॥८७॥
अर्थ-हे नाथ ! अनेक माताएं अनेक पुत्रोको उत्पन्न
करती है, परन्तु समस्त पापोंसे रहित और समस्त देवोके देव
ऐसे आपको आपकी ही माता उत्पन्न कर सकती है। नक्षत्रोंको
वातारोको सव दिशाए उत्पन्न करती है, परन्तु सहन किरणों
को धारण करनेवाले सूर्यको सदा निषिधाचल पर्वतकी ऊपरकी
भूमि ही उत्पन्न कर सकती है ॥८॥
श्रीमोत्तमार्गनिरतं वृषचक्रसेव्यं
स्वामीहशं चमरछत्रविराजमानम् ।
शक्या प्रभो! जनायितु च तवैव माता
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालम् ॥८॥
भक्तामर-शतद्वयी MI- ~ Ma - अर्थ- प्रभो । भाप अन्तरमा पहिरण विभूतिमे मुशोभित मोन मार्गमें लीन है धर्म चक्र यापकी सदा संवा करता है, और चमर नसे आप शोमायमान है। हे नाय ! ऐमें मापी उत्पन्न करने लियं यापकी ही माता समर्थ। क्योंकि जिसकी किरणे अत्यन्त दीप्यमान है, ऐसे मर्यको पूर्व दिशा दी उत्पन्न कर सकती है, अन्य नहीं ll वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस मादीश्वर परमपूज्यमन्न्तशक्तिम् । लोकातिगं सकललोकहित दयालु शांतं प्रशांतरजस निरुपाधिरूपम् ॥८६॥ कर्मेन्धनस्य दहन दहनस्वरूपं क्रोधादिधूलिशमने वरमेघवर्षम् । संसारनिंधुतरणे पटुकर्णधार- मादित्यवर्णममलं तमसः पुरस्तात् ॥६०|| अर्थ- नाथ ! गणधागदिक मुनिराज आपको 'परम पुरुष करते हैं. पाठीश्वर कहते हैं, परम पूज्य पतलाते हैं. अनन्त शक्तिम मुशोभित कहते हैं, लोकोत्तर यतलाते है. समस्त जीवोंक हितकारी और व्या कहते है, अत्यन्त शात नलामर-शतद्वयी वतलाते है, भानावरणाटिक समस्त कर्माको नाश करनेवाले कहते हैं, और राग द्वेष आदि सब तरहकी उपाधियोंने रहित बतलाते हैं। हे नाथ ! कर्म रूपी धनको जलाने के लिये आपको अग्निके समान बतलाते हैं। क्रोध मान माया लोभ त्पी धूलिको दबानेके लिये श्रापको उत्तम मेघोकी वर्षा कहते है । ससार रूपी समुद्रसे पार कर देनेके लिये आपका चतुर खेवटिया बतलाते है. तथा अंधकारके सामने अापकी निर्मल सूर्यके समान वतालते है ||८-०॥ त्वामाप्य भव्यपुरुषाश्च जयन्ति रागं द्वेषं क्षुधा भयगदं मदशोकहर्षम् । मोह स्मयं मनसि जिननाथ ! निद्र त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्युम् ॥६॥ अर्थ-हे जिननाथ ! भन्य पुरुष प्रापको पाकर राग देष, नुधा, भय रोग, मद, शोक हर्ष, मोह, आश्चर्य काम और निद्रा आदि सवको जीत लेते हैं। हे प्रभो ! और की तो क्या ? आपको ही अच्छी तरह पाकर मृत्यु तकको जीत लेते हैं ॥१॥ ? नाथत्वमेव भुवि चक्रिसुम्बप्रदाता देवेन्द्रचन्द्रधरणींद्रपटप्रदाता ।
भक्तामर-शतद्वयी त्वं मोक्षदः सकलदोपहरो विना त्वां नान्यःशिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र ! पंथा|६२|| अर्थ-रे नाथ ! इस ससारमें प्रापही चक्रवर्ती पं. सुख देनयाने है, आपही इन्द्र, चन्द्र और धरणीन्द्र के पद देनेवाला, आपही मानवाले हैं। और आप ही समस्त पोका हरण काने वाले है। हे नाथ! हे मुनीन्द्र! आप विना पल्याए करनयाला मोक्षका मार्ग अन्य नहीं है ॥२॥ वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसंख्यमायं सार्व युगादिपुरुष सुमुखं पवित्रम् । वागीश्वरं परमतत्त्वममेयभावं श्रेष्ट गरिष्टमनघं मुनयो वदन्ति ॥६३|| पुण्यं पुराणपुरुपं विभयं विविक्तं भाषापति शिवपतिं तपनीयकान्तिम् । गण्यं महामहपतिं वदतां वरिष्टं ब्रह्माणमीश्वरमनन्तमनंगकेतुम् ॥६॥ अर्थ-हे भगवन् ! गणधरादिक मुनि श्रापको भव्यय- (कमीन नाश होने वाल) पिभु-मानके द्वारा व्यापक) अचिंत्य-
भक्तामर-शतद्वयी
44
(चितवन करनेमेन पावे) असरय-(असरयात गुणोको धारण
परनेवाले) भाग-(इस युगके प्रारम्भमें होनेवाले) सार्व-(सयका
भला करनेवाले) युगादिपुरुष-(इसयुगके सबसे प्रथम महापुरुष)
सुमुख-(पवित्र मुखको धारण करनेवाले) पवित्र-(अत्यत पवित्र)
घागीश्वर- वाणीधे ईश्वर) परमतत्व-(परम आत्मतत्त्वको
धारण करनेवाले) अमेयभाव-(अनन्त गुणोको धारण करनेवाले)
श्रेष्ठ-(सयसे उत्तम) गरिष्ठ-(सबसे भारी जो जाननेमे न मा
सफें) और अनध-(पाप रहित) पाहते हैं। तथा हे प्रभो! आपको
पुण्य-(पुण्य सपादन करनपाले ) पुरणपुरुष-(सबसे प्राचीन
पुरुष ) विभय-(भयरहित) विविक्त-(पसे रहित) भाषापति-
(समस्त भाषालोके स्वामी) शिवपति-(मोक्षफे स्वामी) तपनीय
काति-(सुवर्णके समान ६ातिको धारण करनेवाले) गण्य-
(गिनते या मनन करने योग्य) महामहपति-(अत्यन्त तेजको
धारण करनेवाले) वदता परिछ (काने वालोमें सर्वोत्तम) प्राप्ला,
ईश्वर, अनन्त और कामफी वक्षाको धारण करनेवाले, कहते
हैं।।६३-६४॥
योगीश्वरं विदितयोगननेकमेक
सौम्य वृष वृषपति प्रभवं कृतार्थम् ।
लोकोत्तर परिवृढं वरदं वरेण्यं
श्रेयोनिधि परतरं यतयो वदन्ति ॥६५॥
मसामर-मयों
Ram मुनिराज मा RAT-(पांगापार
मामी),
रिग-1 FIRTriशाना, पर
पा. मा unt) fruits rams,
प्रय-जिनाना-ies frer
नेपाल) Prime-m), परदन पर
पानेमा-reifal-Terifr
माने) नाना mmu
नांनं नितान्नपिरनं सुगनं भदन्नं
श्रीशं चगनरगुडानमारमारम् ।
दान्नं फर्नकरहिनं नटुर्नयं त्वां
ज्ञानस्वरुपममलं प्रपदन्ति सन्नः ॥६॥
मज्ञानर-शवहरी बुद्धस्त्वमेव विवुधार्चित ! बुद्धिवोशत् सर्वार्थ सिद्धिरनिशं सकलादानात् । शास्ताऽसि देव ! भुवनत्रयशालकत्वात् लोके सुभत्रकरणाछि समन्तभद्रः ॥२७॥ अर्थ-ई इन्छानिनॉन द्वारा ज्या संसारने पाही बुद्ध हैं क्योंकि बुद्धिजन्य का श्राजन्य ज्ञान चत आपने ही है। तया में प्रीत्राही सस्त पार्योगी सिद्धराश स्वार्थसिद्धि स्वर हैं। क्योंकि मन्य जीवन श्राप तना वारों पुत्वायना नवाले हैं। हे भगवर ! प्रापही गुन्ता चा हिताजेशी है चोजिमा तीन लामान शासक है। और है देव ! इस संसारमें त्राही सन्न्तना ही क्योंकि श्राप निचरस्मत जीणा न्यारा झरनंबान न बताने -- है I मृत्युंजयोऽसि जननान्तकनाशकत्वात् शोऽति नाय ! सुन्नेशशतेन्द्रपूज्यात् । कामारिरेव भुवि मन्मयघातकत्वात् वं शङ्करोऽलि भुवनत्रयशङ्करतात !
भRTISTी
वानाऽनि धार ! शियमागविधविधानान
प्रमाऽसिचपरमात्मनि मंस्थिरत्वान् ।
त्वं स्वात्मभूपि निजामगुणप्रहात
लोक त्वमेव मिनदेव : चतुमुग्योऽसि ॥
ri-ar
!! जिनप! mimri
माता निभा mitting
I m; शाप emineri Prem ,
इस alisat | गार IT RAur
गुती मार हुए, Frent rint |
airz! ममा पर्स Aml
जिगणुयना भुवनदुर्जयकामता
विष्णुपता निखिललोकपदावना।
भलमर-शतद्वयी ६० कर्माप्टकृन्तनपरः खलु चक्रपाणिः व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽति ॥१०॥ करनने अत्यन्त चतुर अर्थ है भगवन् ! इस संसारमै कामठेव अत्यन्त रनिताले जीता जाता है उसकी भी प्रापन जीत लिया है, इसलिये श्रापही जिप्यु कहताते हैं। इस समल संसारमें भन् हुए पढ़ाया जाननेवाले श्रापही है इसलिय श्रापही विष्णु वा प्रानके द्वारा रापक रहे जाते हैं। प्राप त्राओं कनानी नाश हैं इसलिये श्रापही चक्रपाणि रहतात हैं। अतएव हे भगवन् । इस संसारमें श्रापही स्पष्ट पुत्योचम कह जाते हैं ॥१०॥ तुभ्यं नमत्रिभुवनातिहराय नाथ ! तुभ्यं नमः सकललोकसुखप्रदाय । तुभ्यं नमः सकलकर्मविनाशकाच तुभ्यं नमो निजगुणाष्टकदायकाय ॥१०१।। अर्थ-हे नाथ! श्राप तीनो लोकोंके दुखोंको दूर करनेवाले हैं, इसलिये श्रापको नमस्कार करता हूं। श्राप समस्त जीवोंको सुख देनेवाते हैं, इसलिये मैं श्रापको नमस्कार करता हूं। श्राप समस्त कमाँको नाश करनेवाले हैं, इसलिये
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भक्तामर-शतद्वयी हे भगवन् ! श्राप तीनो लोकोके एक परमेश्वर है, इसलिये में श्रापको नमस्कार करता हू । श्राप समस्त जीवोका हित करनेवाल है, इसलिए मैं आपको नमस्कार करता है । श्राप मेमस्त शाग्यांक वा द्वादशान वाणीके महोपदेशक है, इसलिये मैं श्रापको नमस्कार करता है। तथा श्राप समस्त भव्य जीवोको शान्तरसको दनवाले हैं, इसलिये मैं आपको नमस्कार करता ह॥२०३॥ तुभ्यं नमो जिन | भवोदधिशोपणाय तुभ्य नमा विमलभव्यविकाशकाय । तुभ्यं नमः परमशान्तपदप्रदाय तुभ्यं नमो विमलकेवललोचनाय ॥१०॥ हे जिन | श्राप इस ससार रूपी समुद्रको सुखा देनेवाले है, इसलिए मैं आपको नमस्कार करता है। आप मिथ्यात्वरूपी दोपांसे रहित भव्य जीवोको प्रफुल्लित करनेवाले है, इसलिय मैं आपको नमस्कार करता है। पाप परम शान्त पट वा मोक्षपदको देनेवाले हैं, इसलिय मैं आपको नमस्कार करता F | तथा श्राप निर्मल केवल ज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले हैं, इसलिये मैं आपको नमस्कार करता ह ॥१०॥ घातिक्षयात्सुखमनन्तमनन्तवीर्य ज्ञानं च दर्शनमनन्तमनन्तदृष्टिः ।
भकामर-शतवयी श्रीधर्मचक्रमसुरैश्च सुरेश्च सेव्यं सत्प्रातिहार्यमपि सातिशयं प्रयन्तम् ॥१०५॥ अन्यश्च व्यक्तरहितैः खलु सूक्ष्मताद्यैः जातैरनन्तसुगुणैश्च निजात्मशुद्धः । को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेष- स्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुन श !॥१०६।। अर्थ-हे भगवन् । घातिया क्रमौके क्षय होनेसे आपके अनन्त सुख प्रकट होगया है, अनन्त वीर्य प्रगट होगया है, अनन्त ज्ञान प्रगट होगया है, अनन्त दर्शन प्रगट होगया है, और अनन्त सम्यक्त्व प्रगट होगया है। इसके सिवाय सुर असुर सब जिसकी सेवा करते हैं, ऐसा धर्म चक्र प्रक्ट होगया है, आठ प्रातिहार्य प्रगट होगये है, और चौतीस अतिशय प्रगट होगये हैं। हे प्रभो। आपकी आत्मा अत्यन्त शुद्ध है, इसलिये उस शुद्ध आत्मामें और भी सूक्ष्मत्व श्रादि अनन्त अव्यक्त गुण प्रगट होगये हैं। अतएव हे नाथ ! हे मुनिराज ! आपके प्रत्येक यात्म प्रदेशमें समस्त गुण सुशोभित हैं, ऐसा कहने में कोई आश्चर्य नहीं है ॥१०५-१०६।। शक्तश्चतुर्मुखधरोहि तिलोत्तमायां शंभुगिरीशतनयासु सदा प्रलग्नः ।
भक्तामर-शतद्वयी
गोपांगनासकलवस्त्रहरीहि कृष्णाः
एवं सुरा व्यसनमोदमदप्रयुक्ताः ॥१०७॥
रामारमाव्यसनभूषणशस्त्रयुक्ताः
चिन्ताक्षुधाद्यखिलदोषयुतास्ततो वै ।
दोषैरुपात विवुधाश्रयजातगर्वैः
स्वप्रान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥१०॥
अर्थ-ब्रह्मा तिलोत्तमामें लीन है, महादेव गिरजामे
सदा ही लीन रहते हैं, और कृष्ण गोपियोंके समस्त वस्त्र हरण
करते रहते है । इस प्रकार ब्रह्मादिक देव सव व्यसनोंके आनन्द
और अभिमानमें लीन है । स्त्री, लक्ष्मी, व्यसन, आभूषण और
शखोसे सुशोभित हैं । तथा चिन्ता, क्षुधाश्रादि समस्त दोषोंसे
परिपूर्ण हैं। इसलिये ब्रह्मादिक देवो का श्राश्रय प्राप्त हो जाने
के कारण जिनको अभिमान हो रहा है ऐसे दोषोने आपको
स्वप्नमें भी कमी नही देखा । ॥१०७॥ ॥१०८ll
उच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूख
संतप्तकांचननिभं स्थिरमेरुतुल्यम् ।
देवर्नुपर्गणधरैश्च सुरांगनाभिः
संसेवितं सकललोकजनैश्च वंद्यम् ॥१०॥
सलामर-शतद्वयी
सिंहासनेन वसुमङ्गालवस्तुना च
भामण्डलेन चमरैश्च विराजमानम् ।
सौम्यं निशाकरसमं रविकान्तिपुंज-
माभातिरूपममलं भवतो नितान्तम् ॥११०॥
अर्थ-हे प्रभो ! आपका कप ऊँचे अशोक वृक्ष से
शामायमान है. उसमेंमे अनेक किरणे निकल रही है, वह
तपाय हुऐ साने के समान है, अथवा अत्यत स्थिर रहनेवाले
मेरु पर्वतके समान है, देच चक्रवर्ती गणधर और देवांगनाएं
सब उसकी मेवा करते हैं, तीनों लोकोके जीव उसकी चंदना
करते हैं। सिंहासन, आठ मङ्गल द्रव्य, भामण्डल, और चमरोंसे
वह अत्यन्त शोभायमान है, चन्द्रमाके समान यह सौम्य है,और
सूर्यकी कान्तिके समूहके समान वह दैदीप्यमान है। हे भगवन् !
ऐसा यह श्रापका निर्मल रुप अत्यन्त शोभायमान हो रहा
है॥०६-११०॥
दीप्त्या प्रभाकरसमं प्रशमं नितान्तं
नेत्रप्रियं हृदयहारि ततो विचित्रम् ।
स्पष्टोल्लसत्किरणमस्ततमो वितानं
रूपं विभाति भवतो तरुशोभमानम् ॥१११॥
भक्तामर-शतद्वयी ६६ अर्य-हे नाथ ! आपके रुपकी कान्ति सूर्यके समान है, तथापि वह अन्यन्त शान्त है सौम्य है नत्रोंको सुन्दर जान पड़ता है, और इयको हरण करनेवाला है। इसीलिये वह अत्यन्त विचित्र है । हे प्रभो ! अशोक वृनके नीचे सुशामित होनेवाला आपका शरीर समस्त अन्धकारको नाश कर रहा है और उससे अनेक देदीप्यमान किरण स्पष्ट रीनिसे निकलती हुई दिखाई दे रही है। हे नाथ ! ऐसा आपका यह शरीर बहुत ही अच्छा शोभायमान हो रहा है ॥१३॥ विस्वं खेरिव पयोधरपार्श्ववर्ति किं वा सुपाडंकवने खलु मेरुशोभम् । सौम्यं च कांचननगं वनशोभमानं देहं विभाति परमं तरुसंश्रितं ते ॥११२|| अर्थ-हे भगवन् । अशोक वृनके नीचे विराजमार आपका शरीर ऐसा शोभायमान हो रहा है मानो काले वाइलोंकी घटाके सगीन सूर्यका विम्ब ही हो अथवा पांडुक वनमें मेरुपर्वत दिखाई दे रहा हो । अथवा चारों और वनॉन शोभायमान अत्यन्त सुन्दर कांचन पर्वत हो। हे प्रमा। ऐसा यह आपका शरीर अत्यन्त शोभायमान हो रहा है ॥१५या सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे चापैः सुरस्य पारतश्च विभासमाने।
भक्तामर-शतदयी
.
।
रम्ये सुवर्णखचिते ननु मेरुतुल्ये
विभ्राजितं जिनवरं शिरसा नमामि ॥११३॥
अर्थ- हे भगवन् ! आपका सिंहासन अनेक प्रकारकी
मणियोकी किरणोंकी शिस्त्रामे अनेक वर्णका सुशोभित होरहा
है, और ऐसा शोभायमान हो रहा है, मानो उसके चारो ओर
इन्द्र धनुष सुशोभित हो रहा हो। इसके सिवाय सुवर्णका घना
हुआ वह सिंहासन, अत्यन्त ही मनोहर है, और मेरु पर्वतके
भमान सुशोभित हो रहा है। ऐसे अत्यन्त मनोहर सिंहासन
पर श्राप विराजमान है। इसलिये हे जिनवर ! मै श्रापको
मस्तक झुक कर नमस्कार करता है ॥१३॥
मेगेश्च नन्दनवन ननु मेरुशृंगं
पूते सुपांडुकवने कनकाचलं वा ।
हेमाद्रिभासितरविं च मृगेन्द्रपीठे
विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम् । ॥११४॥
अर्थ-द भगवन् ! सुवर्णमय ऊँचे सिंहासन पर
विराजमान श्रापका सुवर्णमय शरीर ऐसा शोभायमान होरहा है,
मानो नन्दन वनमें मेरु पर्वतका शिम्बर ही हो, अथवा पवित्र
पाहुक मेरु पर्वतके वनमें कनकाचल पर्वत हो, अथवा हिमवान
पर्वत पर सूर्य ही शोभायमान हो रहा है ॥११॥
भक्तामर-शतद्वयी ६८ लन्च्लन्ट येन प्रभाभिरभिदर्शितमोनमार्ग- मुद्भासितं निखिलभव्यसहस्रपत्रम् । दिव्यध्वनियुतिसमूहवखेन पुंसां दूरीकृतं सकलमोहतमीवितानम् ॥११५॥ सिंहसनादुपरि नाथ विराजमान दृष्ट्वा मनन्ति मुनयस्तव शान्तकायम् । विम्वं वियद्विलसदंशुलतावितानं तुंगोदयाद्रिशिरसीव सहस्ररश्मेः ॥११६॥ । अर्थ-जिन भगवान अरहन्तदेवने अपनी प्रभासे ही मोक्षमार्गको चारो ओर प्रकाशिक कर दिया है, तथा समस्त भव्य रुपी कमलोंको जिन्होने प्रफुल्लित कर दिया है । और दिर ध्वनिकी कान्तिके समूहके बलसे जिन्होंने मनुष्योका मोहान्ध कारका समूह दूर कर दिया है । ऐसे ने भगवान अरह-तदेव सिंहासनके ऊपर विराजमान हैं, उनके अत्यन्त शांत शरीरको देख कर मुनि लोग ऐसा समझते हैं, मानो अत्यन्त ऊचे उदयाचल पर्वतके मस्तक पर जिसकी किरणोका समूह समस्त आकाशमें फैल रहा है, ऐसा सूर्यका मडल ही विराजमान हो॥११५-११६॥
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भक्तामर-शतद्वयी ७० द्वारा घिरा हुश्रा आपका सुवर्णमय शरीर ऐसा शोभायमान होता है, मानो देवांरे द्वारा घिरा हुआ मेरु पर्वतका शिखर ही हो ॥११८॥ देवः समीपनियतः तव पार्श्वभागे उच्चैर्महाकरयुगेन सुवीज्यमानेः । श्वेतः सहस्रकिरणेश्चमरीरुहेश्च नाथ ! त्वदीय वपुष कनकवदातम् ॥११६॥ शान्तं विभाति मनुजेन्द्रगणेन्द्रपूज्यं सिंहासनादुपरि देव ! विराजमानम् । उद्यच्छशांकशुचिनिझरवारिधार- मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शतिकोभम् ॥१२०॥ अर्थ-हे भगवन् । श्रापके दोनो श्रोर अगल बगलमे देव नियत हैं, वे अपने बड़े २ हाथोसे ऊचे लेजा कर चमर ढोर रहे हैं। वे चमर सफेट है, और हजारो किरणवाले हैं। हे देव! हे नाथ ! श्रापका सुवर्णके समान सुन्दर शरीर सिंहासनके ऊपर विराजमान है, और चक्रवर्ती इन्द्र आदि भनेक महापुरुष उसकी पूजा कर रहे हैं, तथा वह शरीर ७१ भक्तामर-शतद्वयी । अत्यन्त शान्त है । प्रभा । उन चमरोसे वह आपका शरीर ऐसा शोभायमान है, मानो उदय होते हुए चन्द्रमाकी किरणोके समान सफेद किसी भरनेसे गिरते हुए जलकी धारासे सुवर्ण- मय मेरु पर्वतका ऊचा किनारा ही शोभायमान हो रहा हो।११६-१२०, रौप्यं सुवर्णमिलितं नितरां प्रदीप्तं तेजोमयं निखिलरलमयं प्रशस्तम् । वृत्तं सुपूज्यमपि नाथ ! तब प्रसादात् छत्रत्रयं तव विभाति शशांककान्तम् ॥१२१॥ अर्थ-हे भगवन् । आपके ऊपर लगे हुए तीनों छत्र सोने चादी बने हुए है अत्यन्त देदीप्यमान है, तेजोमय हैं, उनमें सब तरहक रन लगे हुए है. अत्यन्त सुन्दर हैं, गोल है, और हे नाथ ! आपके ही प्रसादसे वे पूज्य हैं। ऐसे चन्द्रमाके समान आपके तीनो न पड़े ही अच्छे शोभायमान होते है ॥१२॥ उच्चैःस्थितं स्थगितभानुकरप्रताप देवैधृतं सकलमङ्गलरूपमेव ।
भक्तामर-शतद्वयो
श्वेतं मलेन रहितं जिन ! ते नियोगात्
छत्रत्रयं तव विभो !जयतात् त्रिलोके ॥१२२॥
अर्थ-हे प्रभो! आपके तीनो छन बहुत ऊंचे विराज.
मान है, सूर्यकी किरणोके प्रतापको भी तिरस्कृत करते हैं,
देवोके द्वारा धारण किये हुए हैं, समस्त महल रूप है, सफेद
हैं, और हे जिन ! आपके सम्बन्धसे ही मल रहित वा अत्यन्त
निर्मल हैं। हे नाथ ! ऐसे आपके तीनो छत्र इन तीनो लोकॉमें
सदा जय शोल हो ॥१२२॥
मुक्ताफलप्रकरजालविवृद्धशोभं
श्रेष्ठं हरिन्मणिविगुंफिततीरभागम् ।
मध्ये ललामशुभरक्तमणिप्रकान्तं
छत्रत्रयं तव विभो ! जयतात् त्रिकाले ॥१२३॥
अर्थ-हे प्रभो ! मोतियोके समूहके जालसे जिनकी
शोभा खूब बढ़ी हुई है, जो अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, जिनके किनारेके
भाग हरित मणियां - पन्नाश्रोसे) गुंथे हुए हैं। मध्य मध्यमें
सुन्दर और शुभ लाल मणियोसे अत्यन्त शोभायमान हो रहे
हैं। हे प्रभो! ऐसे आपके तीनों छत्र तीनों कालोंमें सदा
जय शील हो ॥१२३॥
भकामर-पातस्यो छत्रं च धारयति मूर्ध्नि स एव लोके लोकोत्तमो भवति सर्वनरेशपूज्यः । छत्रत्रय तव सुमूर्ध्नि विराजते तत् प्रख्यापयत्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥१२४॥ अर्थ-हे भगवन् ! इस संसारमें जो कोई छत्र धारण करता है, वही मनुष्य सलार उत्तम गिना जाता है, और सब राजाओंके द्वारा पूज्य माना जाता है। है प्रभो! आपके श्रेष्ठ मस्तक पर तीन छत्र शाभायमान हो रहे हैं, वे आपको तीनों लामा परमेश्वरपनेको प्रगट कर रहे है ॥१२४॥ गंभीरतारस्वपरितदिग्विभागः लोकानुरञ्जनपरः श्रुतिमिष्टनादः । दूरस्थभव्यजनमोदकरः प्रसन्नः शकाज्ञया नदति खे सुरदुन्दुभिस्ते ॥१२५॥ अर्थ-हे प्रभो। जो गम्भीर और ऊचे शब्दोंसे समस्त दिशाओंको पूरित कर रही है, जो लोगोंको अत्यन्त सन्तुष्ट करनवाली है, जिनका शब्द कानोंको अत्यन्त प्यारा है, जो दूर रहनेवाल भव्य जीयाको भी प्रानन्द देनेवाली है, और जो
मार-गहरी
थ
अत्यन्न टचन्नि गामिन है मां पाप मुनि
दिली आशा आगाज ही है
त्रैलोक्यलांक्शुभलङ्गमभृतिदनः
मिथ्याप्रवादिमननां वन्नु भंदकत्र ।
भव्यप्रबोधनपरोऽशुभकर्मभी
निन्यप्रनोदनिचय. ग्बनु दुन्दुभिस्तं ॥१२६६
अयं ई नापन ! आनि बाई नीनों नाश
जांवोंगे गुन मनागमी बिन न कर है। निग्या
पष्टी विहानवाटियानी हर इन ग्वालं है। कन्य
ग मन्चन का नाम अटम करवातिया मागं
नाग कनंबान हैं. और नहा भान्द नन्ही प्रदान कन्न
३॥
निघ्यावादिन्टुि टिन्द । मुत्रयः
मद्धर्मगजजयघोषणघोपकानन्
त्रैलोक्यमद्ग-नकर. सुखदानदनः ।
प्रायान यूयमिनि दृनिकरः सुगणां
माचार्थमव विदुषां मुरदुन्दुमिस्ते ॥१२७॥
भक्तामर-शतडयो अर्थ-हे नाथ ! आपके देव दुदुभि पाजे श्रेष्ठ धर्म- राजकी जय घोपणको घोषित करनेवाले हैं, तीनो लोकोंके जीवोंको मङ्गल करनेवाले हैं, सुख्ख टेनमे चतुर है, और "तुम सब प्रानो तुम सब प्रायो" इस प्रकार देवोंको भी बुला रहे है, और मोक्ष प्राप्त करनेके लिये विद्वानोको भी घुला रहे हैं ॥१२७॥ मुक्त्वाधमां क्षणसुखां वनितादिलक्ष्मी मुक्तिस्त्रियं वरसुखां पारणेतु कामः । यातीत्ययं जिनवरः खलु सूचकोऽयं खे दुन्दुभिर्नदति ते यशसः प्रवादी ॥१२८॥ अर्थ-हे प्रभो! ससारकी धनितादिकलक्ष्मी अधम है. और केवल क्षण भरके सुख देनेवाली है। इसीलिये इस संसारिक लमीको छोड़ कर श्रेष्ठ मुचको टेनेवाली ऐसी मुकि स्पीखीके साथ विवाह करने की इच्छा करनेवाले, ये भगवान जिनंन्द्रदेव जा रहे हैं, इसीका सूचित करनेवाले तथा आपके यशका प्रगट परनवाले ये अापके दुंदुभि वाले श्राकाशमे यज रह है ॥१२॥ मंदारसुन्दरनमेस्सुपारिजात सन्तानकादिकुसुमोत्करवृष्टिरुद्धा ।
भक्तामर-शतद्वयी ७६ मध्यस्थकेशरसुगन्धितसर्वदेशा नीचैः सुवंधनतया हतकर्मवधा ॥१२६ ।। अत्यंतनिर्मलतमा जिन | ते नियोगात् पूता त्वदीय चरणाम्बुजयोगयोगात् । संसारसिंधुतरणातुरतारिका वा भूयात् ममोपरिसदा जिन ! ते प्रसादात्॥१३०॥ अर्थ-हे जिनराज ! मन्दार, सुन्दर नमेरु पारिजात और सन्तान आदि कल्पवृक्षोके फूलोकी बड़ो भारी वर्षा श्रापके समवसरणमें होती है । व फूल अपने मध्य में रहनेवाले केशरसे सब देशको सुगन्धित करते हैं, उन फलोके बन्धन नीचे हैं, इसलिये वे औरोके कर्म यन्धोको भी दूर करनेवाल है । हे जिनेन्द्र देव । आपके नियोगसे वह फूलोकी वर्षा अत्यन्त निर्मल है, तथा आपके चरण कमलोके सम्बन्ध अत्यन्त पवित्र है, और वह फूलोकी वर्षा ससार रूपी समुद्रम पार होने के लिये व्याकुल होनेवाले मनुष्योको पार कर देनेवाली है, ऐसी वह फूलोकी वर्षा हे भगवन् ! आपके प्रसादसे मेर ऊपर भी सदा होती रहो ॥१२६-१३०॥ - भक्तामर-शतद्वयी -- ~ गन्धोदविंदुशुभमंदमरुत्प्रयाता माहात्म्यमाशु भुवने तव दर्शयन्ती । देहात्मचित्तसकलेन्द्रियहर्षदा ते जीयात्सदा वृषनिकेतन ! पुष्पवृष्टिः ॥१३१।। अर्थ- धर्भ स्थान ! आपके समवसरणोंमे जो पुप्प- वृष्टि होती है वह सुगन्धित जलकी छीटोसे मिली हुई । तथा मन्द मन्द चलनेवाली घायुके साथ ऊपरसे पड़ती है। वह पुष्पवृष्टि इस ससारमे आपके माहात्म्यको बहुत शीघ्र प्रगट करती है. तथा शरीर, आत्मा, मन और समस्त इन्द्रियोको प्रसन्न करनेवाली है । हे नाथ ! ऐसी वह श्रापकी पुष्पवृष्टि सदा जय शील रहा ॥१३॥ कंठेऽथवा शिरसि नाथ ! सुधारणीया दवनरैर्गणधरे(वि माननीया । पुण्यात्मिका तव पुरः खलु पुष्पवृष्टिः दिव्यादिवः पतति तं वचसा ततिर्वा ॥१३२॥ - अर्थ-हे भगवन् ! आपके सामने जो पुप्पवृष्टि हो रही है, वह ऊपर आकाशमे गिर रही है, वह पुष्पवृष्टि कण्ठ अथवा
भामर-शनी
मन्नपर घाग न योर देब मनुश्य और गायगं
समान भन्ने माननीय है पुग्यनर है, और दिव्य बना है।
भी बट पुष्पवृष्टि श्राप बनारसमान अथवा दिन्यन्ि
नमान पढ़नी दुई शोभारमान हनी है
शुभप्रभावनयभूगिविभा विभास्त
भव्यात्मनां च भवसतकदर्शिका या ।
वैराग्यसागरलमृद्धिकरा च माम्या
सूर्योपमाञपि मुखदा मम वाध,स्यान् ॥१३३॥
अर्थ है भगवन् । श्राफी यहुन
मार्ग प्रमा
टीप्यमान
शान्ति समूहले भरपूर है नया वह मन्य जीवोंको सान मत्र
दिखलान्वाली है। हम मिचाय बैंगन्य की महासागर
बढ़ानं निरं यह चन्द्रमारी चादनी समान है। वह प्रमा
यममान होकर भी मुन्न देनेवाली हैं। इननिय वह आपनी
प्रमा मुमान चाली हो ।
लोकत्रये युतिमतां द्युतिमानिपन्ना
सताश्वकोटिशतभाऽपि निरीक्ष्यणाया।
लोकानुरञ्जनपग भुवि मत्तमा त्र
शांनिप्रदा सुखनिधिःजयनात्प्रभा ने॥१३॥
७६ भक्तामर-शतद्वयी अर्थ-हे प्रभो। आपकी प्रभा तीनों लोकोमें होने वाले समस्त प्रभावशाली पदार्थों की प्रभाको तिरस्कृत करती है। वह आपकी प्रभा सैंकड़ों करोड़ सूर्योकी प्रभाके समान होने पर भी अच्छी तरह देखने योग्य है, समस्त जीवोको प्रसन्न करनेवाली है, संसारभरमें सर्वश्रेए है, जीवोको शाति प्रदान करनेवाली है, और सुखोंका खजाना है। हे प्रभो आपकी ऐसी वह प्रभा सदा जय शील हो॥१३४॥ सूर्यप्रभेव खररश्मिमया प्रदीप्ता वाह्यांधकारमिव जीवमनोंधकारम् सम्यक विदीर्य सहसा हि विकाशयन्ती स्वात्मस्वरूपमिव नाथ ! तव प्रभावम् ॥१३५॥ चन्द्रप्रभेव सुखदा हृदयाक्षिरम्या धर्मामृतं भवहरं परितो स्रवन्ती। प्रोद्याद्दिवाकरनिरंतरभरिसंख्या दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्यागी१३६॥ अर्थ-हे भगवन् ! आपकी प्रभा सूर्यकी प्रमाके समान तीक्ष्ण किरणोंवाली है, और अत्यत दैदीप्यमान है वह प्रभा .
भक्तामर-शतद्वयी ८० वाह अंधकारके समान जीवोंके हृदयाघकारको भी अच्छी तरह नष्ट करती है, तथा हे नाथ ! प्रात्माके स्वरूपके समान आपके प्रभावको भी प्रगट करती है ! इसीप्रकार वह प्रमा चन्द्रमाकी प्रमाके समान सुख देनेवाली है हृदय और नेत्रोंको मनोहर है। और चारों ओर से संसारको नाश करने वाले धर्मामृतकी वर्षा करती है। हे प्रभो ! चन्द्रमाकी चांदनी के समान वह आपकी प्रमा निरंतर उदय होते हुए अनेक सूर्यो की कांति से ही शात और शीतल होने के कारण रातकोभी जीतती है।।१३५-१३६॥ स्वर्गापवर्गगममार्गविमार्गोष्टः सद्धर्मतत्वकथनैकपटुस्त्रिलोक्याः । पुण्यप्रभाववशगोऽपि सुपुण्यरूपः भव्यात्मबोधनपरोऽखिलजीवमिः ।।१३७॥ तिर्यग्निगोदपशुदुःखविरोधदक्षः संसारासिंधुतरणे खलु पोतराजः । नायैकयोजनसमोऽपि सुरानुयोगात् दिव्यध्वनिर्जयति ते स्वसभानुरूपः ॥१३८॥ अर्थ-हे नाथ आपकी यह दिव्यध्वनि स्वर्ग और माक्ष के जाने के मार्गको ढूढनेमें अत्यंत निपुण है, और तीनों लोकों में श्रेष्ट धर्मके तत्वोंको कथन करने में एक अद्वितीय चतुर है ।
८१ भक्तामर-शतद्वयी - यह दिव्यध्वनि पुण्यके प्रभावके वश है, तथापि महापुण्यरूप है, भन्य जीवोको सम्बोधन करने.. सटा तत्पर है, समस्त जीवोका भला करनेवाली है, तिर्यच निगांद और पशुश्रोके दुखोंको दूर करनेमे अत्यन्त चतुर है, ससार रूपी समुद्रम.पार होनेक लिए बडे जहाजके समान है, और एक योजन प्रमाण होकर भी मागध जातिके देवोक अनुयोगमे श्रापकी बारह योजन प्रमाण सभाके समान होजाती है । हे प्रभो ! ऐसी यह श्रापकी दिव्य- ध्वनि सदा जय शील रहे ॥१३७-१३८॥ शुद्धात्मतत्वकथनेकवरः प्रवक्ता मियांधकारनिधनलदिवाकरश्च ।। आत्मस्वभावपरभावविभेदको ग जीवादितत्वपरिचायकदीपको वा ॥१३६॥ दिव्योऽपि वर्णरहितोऽपि सुवर्णरूपः नागेन्द्रसोमसुरनाथनरेशपूज्यः दिव्यध्वनिर्भवति ते विशदार्थसर्व- भाषास्वभावपरिणामगुणैः प्रयोज्यः ॥१४॥ अर्थ-हे भगवन् ! श्रापकी यह दिव्यध्वनि शुद्ध श्रात्म- तत्वके म्वरूपको कहने में एक श्रेष्ठ वक्ताके समान है, मिथ्या भकामर-शतद्वयी ६२ पी अन्धकारको नाश करने के लिए सूर्यके समान है, आत्माके स्वभाव और परभावको मिमिन्न करनेवाली है, जीवादिक तत्वोंको दिखलानेवाली दीपकके समान है, यह दिव्यध्वनि दिन्च स्वरूप है, तथा वर्ण रहित होकर भी सुवर्ण रूप है। यह दिव्यधनि चन्द्र-नागेन्द्र-सुरेन्द्र और नरेन्द्रोंके द्वारा पूज्य है, विशद अर्यको धारण करनेवाली है, और समस्त जीवोंकी भाषा रूप परिणत होनेका इसमें अनुपम गुण है। ऐसे अनुपम गुणसे यह शोभायमान है। हे प्रभो! आपकी ऐसी दिव्यध्वनि सहा त्रिकाल होती रहती है ॥१३६-१४०॥ उन्निद्रहमनवपंकजपुंजकांती व्याघाहिभिल्लगजतारणकर्णधारो। संसारसिंधुतरणोद्यतमानसोऽहं पादौ जिनेन्द्र ! भवतः शिरसा नमामि ॥१४१॥ अर्थ-हे भगवन् ! आपके दोनों चरण कमल खिले हुए सुवर्णमय नवीन कमलोंके समूहकी कान्तिको धारण करते हैं। बाघ, सर्प, भील, हाथी आदि जीवोंको पार कर देनेके लिय खेवटियाके समान है। हे प्रमो! मैं भी इस संसार रूपी महा. सागरसे पार होना चाहता है। इसलिये हेजिनंन्द ! मैं भी
८३
भक्तामर-शतवयी
आपके उन दोनों चरण कमलोको मस्तक झुका कर नमस्कार
करताई ॥१४॥
पर्युल्लसन्नखमयूरवशिखाभिरामो
पद्मादिचिन्हसहितौ ललितौ कृतार्थौ ।
भव्यात्मनां सुखकरौ सततेक्षणीयौ
पादौ जिनेन्द्र ! भवतः मनसा स्मरामि ॥१४२॥
अर्थ-हे जिनराज । आपके दोनो चरण कमल चारो
पोरसे दैदीप्यमान होनेवाले नखोकी कान्तिक समूहसे अत्यन्त
सुन्दर जान पड़ते ह, व कमल आदि शुभ चिसे सुशोभित
हैं, अत्यन्त सुन्दर ह कृतकृत्य हैं. भव्य जीवको सुख देने
वाले है, और सदा देखने योग्य है। हे भगवन् ! ऐसे आपके
उन दोनों चरण कमलोका मैं अपने मनसे स्मरण करता
इ॥१४२॥
पुण्योदयादनुगतो तपसा हि लब्धौ
नागेन्द्रचन्द्रमनुजेन्द्रसुरेन्द्रसेव्यों
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्तः
तीर्थं च तत्र भवति स्वयमेव लोके ॥१४॥
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५ भक्तामर-शतद्वयी सालत्रयं कनकरत्नमयं विचित्रं देवांगनानटनशोभितनृत्यशालाः ॥१४५॥ आस्थानमण्डपसभा ननु धूलिशालं स्तभं पुरः सकलवादिमदान्तकं वा इत्थं यथा तव विभूतिरभूजिनेन्द्र ! धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य ॥१४६॥ अर्थ-हे भगवन् ! आपके समवसरणमें वृक्षावली है, भवन है, ध्वजा पताका है, सुन्दर सरोवर हैं, जल, कमल, वाक वा हसोसे सुशोभित खोई है, सुवर्ण और रत्नोंसे बने हुए अनुपम तीन कोट हैं, देवाङ्गनाप्रोकें नृत्यसे सुशोभित होनेवाली नृत्यशाला हैं, बारह सभात्रोंसे सुशोभित स्थान मंडप है, चारो ओर धूलिशाल है, और आपके सामने ही समस्त वादियोक मदको सर्वथा नाश करनेवाला मानस्तम्भ है। हे प्रभो! श्रापक धर्मोपदेशके समय समवसरणमें ऊपर लिखे अनुसार जैसी विभूति श्रापकी है, वैसी विभूति बुद्धादिक किसी भी परधर्माचार्यकी नहीं है ॥१४५-१४६॥ जन्मोद्भवा दश दशातिशया:- प्रपन्नाः । ज्ञानोद्भवा ननु चतुर्दश देवजीताः चक.
भक्तामर-शतद्वयी ८६ 17 सुप्रातिहार्यभवभूतिरनन्तरूपा ज्ञानप्रवीर्यसुखदशनरूपलक्ष्मीः ॥१४७॥ एते गुणास्त्वयि जिनेश्वर ते सभायां नान्यत्र केशवविरंचिमहेश्वरेषु । याक् प्रभादिनकृतः प्रहतांधकारा तादृक् कुतो ग्रहगणस्य विकाशिनोऽपि ॥१४॥ अर्थ है जिनराज । आपकी समवसरण सभामें आपके जन्म समय में होनेवाले दश अतिशय शोभायमान है, केवल शानके समय होनेवाले दस अतिशय विराजमान हैं और देवोंके द्वारा किये गये बौदह अतिशय अलग शोभा दे रहे हैं इसके सिवाय "ठों महाप्रातिहार्योंकी विभूति अलग शोभा दे रही है, और अनन्त शान, अनन्त दर्शन, अनन्त मुख, अनत वीर्य रूप, अनन्त चतुष्टय लक्ष्मी आपको सर्वोत्कृष्ट बत्तारही है। हे भगवन् ! आपकी सभामें आपके ये गुण विराजमान हैं, वे गुण ब्रह्मा, विष्णु, महादेव आदि किसी देवमें नहीं है, सोठीक ही है। अन्धकारको सर्वथा नाश करनेवाली जैसी प्रभा सूर्यमें होती है। वैसी प्रभा थोड़ा बहुत चमकनेवाल तारोमे कभी नहीं हो सकती ॥१४७-१४८॥
भक्तामर-तस्यी श्च्योतन्मदाविलविलोलकपोलमूल- मत्तभ्रमदभ्रमरनादविवृद्धकोपम् । किं वोर्जयन्तशिखरं ननु मेघराजं मुच्चस्तमं सकलयूथपराजराजम् ॥१४६॥ आलानश्रृंखलविहीनमनंकुशं च शुण्डेः सुवीरपुरुषानपि तर्जयन्तम् । स्तम्बरमं सकललोकभयप्रदं तं हस्तेन ताडयति नाथ ! तवाग्रभक्तः ॥१५०॥ अर्थ-हे भगवन् ! जिसके गंडस्थलसे काला काला मद यह रहा है, और उस मदसे जिसका कपल भाग अत्यतचचल होरहा है, तथा उस मदके कारण जिसके कपालों पर झंकार करते हुए मदोन्मत भ्रमर चारों ओर घूमर हे हैं। उन प्रमरों के दुखसे जिस हाथीका क्रोध अत्यंत पढ़ रहा है। तथा यह हाथी अत्यंत ऊंचा है। गिरनार पर्वतकी शिखरके समान, अथवा श्याम बादलों के समूह के समान काला और ऊँचा जान पड़ता है, जो ममस्त हाथियोका स्वामी है। जिसका न यूटा है, न सांकत है, और न अकुश है, जो अपनी सूडसे ही ब२वीर पुरायोको सटेड रहा है। प्रोर समस्त संसारको भय उस कर भक्तामर-शतद्वयी रहा है, ऐसा हाथी यदि मामने पाजाय तो भी हे प्रभा ! आपका श्रेष्ट भक्त पुरुष उस हाथीका अपने हाथम ही मार कर चशमें कर लेता है ॥१४९-१५०॥ उद्घस्थतुण्डमनिश बहुगर्जयन्नं क्रोधेन शुण्डमचिर परिवर्तयन्तम् । वन्यान् समस्तविटपान् ननु दारयन्त कुम्भेन दीर्घपदानपि चूर्णयन्तम् ॥१५१॥, उत्कीर्णयन्तमचल दशनैः नितान्त पादैः स्थिरामपि धरां परिकम्पयन्तम् । ऐरावतासमिभमुद्धतमापतन्त दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥१५२॥ अर्थ-जिसने अपना मुंह ऊपरकी भार उठा रक्खा हे. जो बार बार गर्न रहा है, जो क्रोधसे अपनी सूडको शीघ्रताम साथ चारा और धूमा रहा है, जो वनके समस्त वृक्षोको उखाड कर फेंक रहा है, जो अपने मस्तकसे पड़ २ पत्थरोका भी चूर चूर कर रहा है, जो अपने दातोसे पर्वतोको भा अच्छी तरह उकेर रहा है, जो अपने पेसेसे स्थिर रहनेवाली पृथ्वीको भी कम्पायमान कर रहा है, जो ऐरावत हाथी भामर-शसस्थी ममान है, अत्यंत उदन और सामने गा रहा है रोमाधी को भी देना पर हे नाथ! पापक प्राधित रहनपाल भव्य जीवाको कमी भय नहीं पाता yt-१५२॥ भिन्नभकुंभगलदुबलशागितात- मुक्ताफलप्रकरभृपितभृमिभागः। कंठे ललामघनशरशाभमानः गर्जन् नितांतभयदेश्च कठोरशब्दः ॥१५३।। क्रोधेन तप्तहृदयोऽपि बुभुक्षितोऽपि कंठीरवः शुनकवालिहत पुमांसम् । देव! त्वदीयचरणाम्बुजसंत्रमानं विद्वाऽपि लुब्धकरंगा खरण नाथ ! ॥१५॥ सर्य-जमने प्रकाथियोंकि मानक विदीर्ण कर दिये है. और उन मम्मकोंमें गिर गए लाल रामे गिले दुर संसर मातियोंम जिसने समस्त पनपी पी मुशामित करती है।" जिम में अत्यन्त सुन्दर और पनीशिर (बालोंका गुणा) गांमारमान जायन पर सौर भय उत्पन्न करनबारे शम्दाम गरज हाजी अमा. जिसका जय प्राधम सतप्त हो रहा है, और जो व्याधक तंग याण यिंधा हुआ - भक्तामर-शतद्वयी १० ऐसा सिंह भी है नाथ । हे प्रभा । श्रापक चरण कमलकी मेवा करनेवाले पुरुषको कुत्तेके समान चाटता है ॥१५३-१५४|| कृष्णप्रभो दृषदचूर्णकरो हि खड्गी भल्लो वने सकलजीवसुरक्तपायी । क्रूरो वृको वनचरो भयदो वराहः रेखांकितो वनजीवभयप्रदायी ।१५५॥ व्याघ्रो मृगादनवरो ननु चित्रवर्णः कृष्णो मृगेन्द्रतनयो मृगराजभूपः । वद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि नाकामति क्रमयुगाचल संश्रितं ते ॥१५॥ अर्थ-हे भगवन् ! काले रङ्गका गडा पत्थरको भी चूर्ण कर देता है । वनका रीछ सब जानवरोक वा सब जीवोका रक्त पी जाता है । मेडिया बहुरही दूर होता है ! जङ्गली सूअर अत्यन्त भयङ्कर होता है, अनेक रंखात्रोंसे सुशोभित वाघ जङ्गलके सब जीवको भय देता है । अनेक रङ्गका चीता भी बहुत ही दुःखदायी होता है । काला सिंह सव सिहोका राजा कहलाता है । ये सब जानवर अत्यन्त भयङ्कर होते हैं, तो गली यं सव जानवर सामने प्राव तथा सिह भी यदि दौड़ता हुने भसामर-शतदयी भी प्राव और हे प्रभो । मापसे दोनों चरण कमलरूपी पर्वतका भाभय लेनेवाले पुरुष के पैगमें लिपट जाय तो भी घे सय जानवर या सिंह उस पुरुषके ऊपर किमी प्रकारका हमला नहीं कर सस्ने ३५४-१५६॥ कल्पान्तकालपवनोद्धतवन्हिकल्प सप्ताहेितिपरितापितमेघनीरम् । सीना शशाम तव नामजलेन सद्यः त्वन्नाम नाथ ! दहन सलिलीकरोति ॥१५७॥ अर्थ-प्रमाजी पालके अन्त समय में उसनयाने बायुसे अत्यन्त दीन नेपाली अनिके समान ६, और जा अपनी ज्यालाकी नमी वाटली पानी नहीं गर्म करगी है मी अग्नि मी मीतान भापक नाम मपी जलमं शीघ्र ही शामा करदी थी। द नाथ! नीलिये कहना पड़ता है कि आपका नाम भी अनिका पानी बना देता है| दावानलं ज्वलितमुज्वलमुत्स्फुलिंग विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुग्वमापतंतम् । धू धू वंन बधिरीकृत सर्वलोकं कृष्णेन धूमनममा भृतलोकमध्यम् ॥१५८|| भकामर-शतद्वयी -- चेतश्च दर्शकगणस्य विदीर्णयन्तं तन्मध्यधीरयमिनं प्रविलोपय धीरः । स्मृत्वा त्वदीयचरणं च पयोदतुल्यं भव्यः शशाम सहसा पवनंजयोऽपि ॥१५॥ अर्थ-हे नाथ | जो अग्नि वनमे दावानल रूपसे लग रही है. जो खूब जल रही है, जो ऊपरको उठ रही है, जिसके स्फूलिगे भी ऊपरको उठ रहे है. जो समस्त ससारको भस्म कर देने ही लिये मानो सामने बढ़ी चली आ रही है, जिसके धूधू शब्दसे समस्त लोक वहिरा हो रहा है, जिसके काले धृएस लोकका मध्य भाग सब अन्धकारके समान पूर्ण रूपसे भर गया है, और जो देखनेवालोके हृदयको विदीर्ण कर रही है ऐसी अग्निको देख कर तथा उस अग्निके मध्य भागमे धीर वीर मुनियोको देख कर भन्योत्तम धीर वीर हनुमानने भी मेघके समान आपके चरण कमलोका स्मरण करने मात्रसे ही वह सब अग्नि उसी क्षणमें शान्त करदी थी ॥१५८-१५६॥ दावानलं सकलजीवहर वृतान्तं मत्स्यादिजन्तुशमनं वडवानलं वा । गेहादिधान्यधनकुप्पहरं च वन्हेिं वन्नाम कीर्तनजलं शमयत्यशेषम् ॥१६० १३ भक्तामर-शतद्वयी । अर्थ-हे प्रभो ! दावानल अग्नि वनके समस्त जीवोंको मार देनेवाली यमराजके समान है। वडवानल अग्नि मगर मच्छ आदि जलचर जीवोंको नाश करनेवाली साक्षात् मृत्युके समान है। और साधारण अग्नि घर, धन, धान्य, वर्तन, चलन प्रादि सबको नाश कर देनेवाली है । है प्रभो! इस सब प्रकार की अग्नियोको श्रापका नाम जप रूपी जलसे शीघ्रही शान्त कर देता है ॥१६॥ वालोऽपि नाथ ! सततं जिनराजभक्तः स्मृत्वा त्वदायचरण चरणेन पूतम् । रक्तक्षणं समदकोकिलकण्ठनील हस्ते निधाय भुजगं रमते न चित्रम् ॥१६१॥ अर्थ-हेप्रमो ! जो सदा भगवान जिनेन्द्रदेवका भक है, ऐसाबालक भी पूर्ण चारित्रसे पवित्र हुए आपके चरण कमलोंका यदि स्मरण करले तो फिर यह जिसके नेत्र लाल होरहे हैं, और जा मदोन्मत्त कोयलके कण्ठके समान काला है, ऐसे सांपकोभी हाथ पर रखकरउससे खेलता है, इसमें किसी प्रकारका कोई आश्चर्य नहीं है ॥१६॥ ब्रह्मवतेन सहितः दशधर्मयुक्तः सम्यक्त्वशद्रहदयो वरबांधदनः ।
भक्तामर-शतद्वयी ६४ --- क्रोधोद्धत फणिनमुत्फणमापतन्तं हस्तात्प्रगृह्य सहसा विदधाति कंठे ॥१२॥ अर्थ-जो पुरुष ब्रह्मचर्यवतको पूर्ण रूपसे पालन करता है, दश धर्माको पालन करता है जिसका हृदय सम्यग्दर्शनमे अत्यन्त शुद्ध है, और जो सम्यग्ज्ञान धारण करने में भी चतुर है, ऐसा पुरुष जो क्रोधसे उद्धत होरहा है अपना फण ऊपरको उठाये हुए है, और सामने आ रहा है ऐम सर्पको भी हाथसे उठा कर बहुत शीघ्र अपने कठमे धारण कर लेता है ॥१६॥ वन्यान् समुद्रजलगान् गुरुपार्वतीयान् श्वेतान् सुपीतहरितान् बहुकृष्णकायान् । पक्षः विहायसि गतान् भुविगतगांश्च नानाप्रकारभुजगान् ननु वृश्चिकांश्च ॥१६३॥ अन्यान् शयून् विषधरान् खलमालुधानान् कीटान् विषाक्तविहगान् क्षणनाशकांश्च । श्राकामति क्रमयुगेण निरस्तशंक- स्त्वनाम नागदमनी हृदि यस्य पुंसः ॥१६४y मतामर-शतदयी अर्थ-हे भगवन् ! जिस पुरुष हुदयमें आपका नाम सपी नाग दमनी विराजमान है, यह पुरुष जङ्गली सपाको, समुद्र के गहरं जल में उत्पन्न होनेवाले सपाको, पढ़े बड़े पर्वतों में रहनवाल सपोंकी, सफंद पीले हरे और काले सपाको, पंखोके हाग आकाशमें उड़नेवाले साँको. पृथ्वीके भीतर गहरे गढों में रहनं साल सपाका, बड़े बड़े विषधर अलगरोंको, खाटके आकारके अनेक वर्णने सामो तथा 'और भी अनफके प्रकार सपाको, विन्दुओंको, कीदोंगी, और उसी समय जीवोंको नाश कर देनेवाने विल पक्षियाका, बिना किसी शहाके अपने पैरोंसे करा देना है ॥३६३-१६४ वल्गत्तुरङ्गगजगर्जितभीमनादं नानाध्वजेः निखिलशस्त्रभृतैरथेश्च । पूर्णभृतं धनुषवाणधृतेः सखगः कुंतादिशस्त्रमहितैः पदगैः संमतात् ॥१६५।। उष्ट्रः समुन्ननतमं भुवि भीमकाय- माजावलं बलवतामपि भूपतीनाम् । श्रद्धाकर चरगाचापसमुद्भवे ते त्वा गुणे जयति नाथ ! जिनेशभक्तः ॥१६॥ - रक्त
मामा-गनदया
श्वभ्रप्रदं सकलदुवकर निनांनं
पञ्चप्रकारभवध,ग्गाकारगांवा ।
न्वान्मम्वरूपविमुग्व परभावरूपं
पापात्मकं निग्विन्नपाण्भवप्रीजम् ॥१६७||
एवं जिनश मबन्नं बलकमभूपं
मोनागनं मुम्बहरं भुवि मोहर्नायम
उद्यदिवाकरमशिग्वापविलं
त्वकाननानम हवाशु भिटामुपनि ॥१८॥
मकामर-शतवयी दुष्ट घातिया अर्थ-संसारमें यद मोहनीय कर्म सब प्रकारके दुल देनेवाला है। तथा अत्यंत दुःख देनेवाला है, नरकमें पहुंचाने याला यही मोहनीय कर्म है. इन्य, क्षेत्र, काल, भय, भाव इन पांचा प्रसारक संसारमे परिभ्रमण करने का कारण यही एक मोहनीय कर्म, यो मोहनीय कर्म अपने आत्माके स्वरूपसे विपरीत रूप है, तथा प्रारमा मित्र पुद्गल मय है, यह मोहनीय पाप स्वरूप है, और समस्त पाप उत्पन करने का कारण है। इस के सिवाय तह मांदनीय कर्म अत्यत बलवान् है, काँका राजा है, मोक्षकी प्राप्तिये रोक लगानेवाला अर्गल घडा है। और मयप्रकार मुखीको नाश करनेवाला है। जिनरोज ! ऐसा यद मोहनीय कर्म अापकी स्तुति करनं मापसे इस प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे उदय होते हुए सूर्य की किरणोके समूहमे छिन्नभिन्न हुआ अंधकार बहुत शीघ्र नए हो जाता है॥१६७ १६॥ कुंतापभिन्नगजश्रोणितवारिवाह- वेगावतारतरणातुरयांधभीमे । उष्ट्रप्रपातवयशैलसुमुत्तरन्ते- वीरभयानकतमे विषमे नितान्ते ॥१६॥ विस्फाटितोदरतुरङ्गचलत्प्रवाह- रक्तोच्चयन घृणिते भृतकीकसे वा ।
भक्तामर-शतद्वयी
लन्ड
चूणैरथैः परिभृते मृतपद्पूर्णे
युद्धे चिरं जयति नाथ! तवायभक्तः ॥१७॥
अर्थ-जिस युद्ध में बरछोकी नोक्से अनेक हाथी छिन्न
मिन्न किये गये हैं, तथा उन छिन भिन किये गये हाथियोसे
जो खूनकी नदी निकलकर यह रही है और वढे वगसे वह रही
है उससे पार होनेके लिये यहे वडे योद्धा महापर जल्टी मचा
रहे हैं। जहापर मरे हुए अटोके ढेर लगकर पर्वत बन गये हैं,
और उन पर चढ उतर कर पार होते हुए योद्धाओंसे जा युद्ध
अत्यंत भयानक होरहा है। घोड़ोके पेट फट जानेसे जो उनमें
से रक्तकी धारा बह रही है, उससे वह युद्ध अत्यत घृणित
दिखाई देता है । जिस युद्ध में जगह जगह हड़ियां पड़ी हुई है,
टूटे हुऐ रथोसे जा भररहा है । और मर हुए पयादोसे जो कचा
हो रहा है. ऐसे युद्धमे भी हे नाथ ! आपकी भक्ति करने
वाला भक्त पुरुष चिर कालतक विजय प्राप्त करता रहता
है ॥१६६-१७०॥
चक्रः शासनशरैः करवालपुजैः ।
कुंतैः धनैः परशुभिर्वरतोमरैश्च
वोरै रथैः गजतुरङ्चयैः सशस्त्रैः
पूणे नितांतभयदे शवखण्डयुक्त ॥१७१॥
मतामर-शतद्वयो अत्यंतदानकरशीकरपंकिले च ढकारवे भुवि यथा नृपवज्ररश्मिः । युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपदाः वित्पादपंकजवनाश्रयणो लभन्ते ॥१७२॥ अर्थ-जो युद्ध चक्र, धनुषवाण, तलवारोंके समूह, घरछा, धन, फरसा, तोमर और अनेक योद्धाओंसे भरा हुआ है तथा शस्त्रोसे भरे हुए रथ हाथी घोडोके समूहसे भरा हुआ है, जिसके देखनेसे डर लगता है, जिसमें असंख्य मुरदोंके टुकड़े पड़े हुए हैं हाथियोके गंडस्थलसे बहते हुए मदसे तथा उनकी सूंडसे निकलती हुई पानीकी छीटोसे जिसमे अच्छी कीचड़ हा रही है और जिसमें बाजोंके शब्द चारो और सुनाई दे रहे हैं, ऐसे युद्ध में भी हे प्रभो ! जिन्होंने आपके चरण कमलोंके वनका आश्रय लेरक्खा है, और जिन्होंने किसीसे भी न जीते जा सकें ऐसे दुर्जय युद्ध को जीतने वाले महा योद्धा भी जीत लिये हैं ऐसे आपके भक्त पुरुष इस संसार में राजा वजकिरणके समान विजयही प्राप्त करते हैं ॥१७१-१७२॥ अम्भौनिधौ क्षुभितभीषणनक्रचक्र- पाठीनपीठभयदोल्वणवाडवाग्नौ ।
गंगग्नाबद्दगनन्दन
ऋदिगन्न निना य गगंगाट'
मन्यवाद्याः सद्ग नायाः
लनामनंजनात नुन ननुया.
अंगरनगमश: न्द्रमा नजान्य
नो प्रयानि नन्न नगन्या. 152
१०१ भक्तामर-शतद्वयी 1 गंभीरनीरपरिचुंवितनाकलोके भीमे भयानकमहावड़वानलेन । झंझासमीरणविशालतरवृन्दे कुम्भीररोहिततिमिगिलमत्स्यजाले ॥१७५॥ तीर्यत्तुषारशिखरे जनशब्दशून्ये लकयोजनतटे च महासमुद्रे । रगत्तरंगशिखरस्थितयानपात्रा- खासं विहाय भवतः स्मरणाद्व्रजन्ति ॥१७६॥ अर्थ-हे भगवन् !जो समुद्र अपने गंभीर जलसे नागलोक को भी छू रहा है, भयङ्कर महा बड़वानल अग्निसे जो अत्यंत भयानक है झमा यायुमे जिसमे अनेक बड़ीबड़ी तरगे उठ रही है, कुंभीर रोहित तिमिगिल और मत्स्य आदि अनेक प्रकारक मगरमच्छोसे जिसपर जाल यिच रहा है, जिसमे बड़े बड़े परफ के शिखर तैर रहे हैं, जिसमे मनुप्योका शब्द तक सुनाई नही देता। और जो किनारस एक लास योजनदूर है। ऐसे महासमुद्र में जिन लोगोंके जहाज बड़ी वही तरंगोकै समूहमें डगमगा रहे हैं, वे मनुष्य भी श्रापका स्मरण करने मात्रसे सवतरहके उपद्रवोंसे रहित होकर किनारे तक पहव जाते है ॥१७५-१७६॥
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१०३ भक्तामर-शतद्वयी रोगी भी आपके नाम रूपी मत्रका पाठ करने मात्रसे चिरजीव हो जाते हैं। अच्छे होकर चिर काल तक जीवित रहते ६॥१७॥ रोगैः शरीरसहजैः शतकोटिलतैः वातादिदोषजनितेश्चसहस्रलः । देशोद्भवैः समयजैः शतशंखभेदैः साध्यैश्च साध्यरहितैः खलु कष्टसाध्यैः ॥१७॥ अत्यंतपीडिततमाः शवतुल्यदेहाः भैषज्यहेतुरहिता मरणोन्मुखाश्च । त्वत्पादपङ्कजरजोमृतदिग्धदेहा: मां भवन्ति मकरध्वजतुल्यरूपाः ॥१८०॥ अर्थ-हे भगवन् ! इस संसारमें शरीरके साथ उत्पन्न होने वाले रोग सैकड़ों करोड है वात पित फसे उत्पन्न होने . वाले रोग भी करोड़ों है, तथा त्रास खास देशोंमें उत्पन्न होने चाले करोड़ो रोग है और खास खास समयमें होनेवाले रोग करोड़ो है, इनमेमे कितने ही रोग साध्य है, कितने ही असाध्य है, और कितने ही कष्ट साध्य हैं। इन समस्त रोगोंसे जो अत्यंत दुखी है, मुग्देके समान जिनका शरीर शिथिल हो - भक्तामर तयी १०४ रहा है. जिन पाम श्रीपधि करनेका मी गाई माधन नहीं है. और तो बिलकुल मग्न. मन्मुम हो रहे हैं। ऐसे पुन्पांका गरीर भी थाप चाग कमनकी रज रूपी अमृता लगान मात्रम मुवगर समान अन्यत सुन्दर हो जाता है ||२७E-150|| आपादकंटमुम्शृखलवष्टितांगाः गाढं बृहन्निगडकोटिनिधृष्टजंघा । कोप्टेपु गाढपिहिनपु नागवामाः दुष्टात्मनी नरपनरनिगंपपात्राः ॥१८१॥ ते चिन्तयन्ति यदि नाम तव चित्ते वडाझिता मपदि यान्ति वहिः प्रदेश । भूपः सुशिनिकरः सततं सुसव्याः ख्याता भवन्ति च यथा मुनिमानतुंगाः॥१८२|| अर्थ जो पुरुष मिमिलेर पेर तक बढ़ी • मानो में जकडे हुए है, तथा यहो करोड़ो घड़ियों में जिनकी जधाप ग्और अच्छी तरह बाधटी गई है जो गाढ अधकारमय मोठे मे यन्धं पढ़े हैं, और दुष्ट राजा जिनपर अत्यत क्रोधिन है। राम पुरुष भी यदि अपने हृदयमें आपश नाम म्मरण करे ना व उन समस्त बन्धनोमं टूटकर शीघ्र ही बाहर हो रहा १०५ भक्तामरातयी . - श्रा विराजमान होते हैं, अनेक राजा और अनेक इन्द्रादिकदेव उनकी सदा सेवा करते हैं, और वे मुनिराज श्रीमानुजाचार्य के समान संसारमे अत्यत प्रसिद्ध हो जाते हैं ॥१८१-१८२॥ कारागृहेषु पतिताः परितोऽपि बद्धाः काष्ठेन लोहनिगडेंन वरत्रया च । रक्षानिमित्तनियतैः सुभटैः परीताः देहं मनागपि न चालयितुं समर्थाः ॥१८॥ घोरेषु कप्टनिवहेषु निवद्धदेहाः भक्तानपानरहिताः वहुरोगग्रस्ताः। त्वन्नाममंत्रमनिशं मनुजाःस्मरन्तः सद्यःस्वयं विगतवंधभयाः भवन्ति ॥१८४॥ अर्थ-जो पुरुष जेलखानों में पड़ेहुए हैं, काठसे लोहकी बेडियोसे अथवा बड़ी बड़ी रस्सियोंसे जो चारो औरसे बन्धे हैं, उनकी रक्षाके लिये नियत हुए योद्धाओंसे जो घिरे हुए है, जो अपने शरीरको क्रिश्चित मात्र भी इधर उधर हिलाने में असमर्थ हो रहे हैं, जिनका शरीर घोर काठमें पड़ा हुआ है, जिनको खाने पीनेको कुछ नहीं मिल रहा है, और जो अनेक रोगोसे घिरे हुए हैं, ऐसे पुरुष भी यदि आपके नाम रूपी मंत्र भक्तामर-शतद्वयी को वारवार स्मरण करें तो वे शीघ्र ही अपने श्राप बन्धनक भयमे सर्वथा रहित हो जाते हैं ॥१८३-१८॥ मत्तापिन्द्रमृगराजदवानलाहि- संग्रामवारिधिमहादरवन्धनोत्थम् । विद्युद्भवं सलिल तनुजविचित्रं किं वा भवार्णवभवं नरकादिरूपम् । १८५॥ रोगोंद्भवं नृपतिजं बहुमानसं च दुःख च पंचभवजं सततप्रयातम् । स्तुत्यानया विशदया गुणरुपया ते नाशं प्रयाति सकलं जिन!ते प्रसादात् ॥१८॥ अर्थ-मदोन्मत्त हाथी, सिंह, दायानल अग्नि सर्प, युद्ध, समुद्र, जलोदर और बन्धनसे उत्पन्न होनेवाले दुःख, बिजलीम उत्पन्न होनवाल दुःख, पानीसे उत्पन्न होनेवाले दुःस्त्र, शरीरमे उत्पन्न होनेवाले अनेक प्रकार के दुःख, ससारम्पी महासागरमें होनेवाले नरकादि रूप अनेक दुःख, रोगीसे उत्पन्न होनेवालं. राजासे उत्पन होनेवाले दुःन, मानसिक दुःख और अनादि कालसे चले आए इन्य क्षेत्र काल भव भाव रूप पाचो प्रकारके ससरण रुप दुःख, इस ससारमे प्रगट होते हैं। वे सब दुःख - भकामर-शतद्वयी हे भगवन् ! आपके प्रसादसे आपके गुणोंसे बनाई हुई इस विशद स्तुतिसे ही नष्ट हो जाते हैं ॥१८५-१८६॥ जन्मोद्भवं सकलदेहनिपीडयत्तत् दारिद्रजं मरणजं बहुरोगजातम् । दुःसन्ततः हृदयविद्धकरं नितान्तं वार्धक्यजं सुखहरेष्टवियोगरूपम् ॥१८७॥ चौरोद्भवं शठभवं परराष्ट्रजातं संसारभीषणवन परितो भयं वा । तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते ॥१५॥ अर्थ-इस संसारमें समस्त शरीरको पीड़ा देनेवाला जन्मका भय है, दरिद्रताका भय है, मरणका भय है, अनेक रोगोका भय है, हृदयको अत्यन्त छिन्न भिन्न कर देनेवाला खोटी सन्तानका भय है सुखको हरण करने वाला इष्ट वियोग का भय है, वुढ़ापेका भय है, चोरोंका भय है, दुष्टोका भय है, और पर चक्रका भय है। अथवा यों कहना चाहिये कि इस लसाररूपी भीषण वनमें चारो और भय ही भय है। हे भगवन्! जो बुद्धिमान मनुष्य आपके इस स्तोत्रका अध्ययन करता है .
भक्तामर-शतद्वयी १०८ उसका वह समस्त भय स्वय डरकर शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।।१७-१८ सदृष्टिरम्यमुकुटेन विराजमानः चारित्रवस्त्रसहितो दशधर्मच्छत्रः । विज्ञानभूषणभरः सुतपोवयस्यः ध्यानाश्वपृष्टपरिशोभितरम्यदेहः ॥१८६॥ सोऽयं वरः वररमा परिणेतुकामः स्तोत्रस्रज तब जिनेन्द्रगुणार्निवदाम् । भतया मया रुचिरवर्णविचित्रपुष्पां कंठे निधाय वरति स्वयमेव मुक्तिम् ॥१६०॥ अर्थ-हे भगवन् ! जो पुरुष शुद्ध सम्यग्दर्शन रूपी मनोहर मुकुटसे शोभायमान है, जो चारित्ररूपी वस्त्रोंको धारण किये हुप है, दश धर्म रूपी छत्र जिसके ऊपर फिर रहा है, सम्यग्ज्ञान रूपी श्राभूषणोसे जो सुशोभित है, श्रेष्ठतप स्पी मित्र जिसके साथ है, और ध्यान रूपी घोडेकी पीठ पर जिस का अत्यन्त मनोहर शरीर शोभायमान है। ऐसा यह वर यदि श्रेष्ठ मोक्ष रूपी लक्ष्मी केसाथ विवाह करना चाहता है। तो उस सुन्दर वर्ण वा अक्षर रूपी मनोहर पुष्पोसे सुशोभित और १०६ मकामर-तस्यो +4 M है प्रमा सापकी भानार. परा होकर मेरा सापक गुलाम गयी दुई सनोन कपी मालाकी धार करना चाहिये। इस मनापापी मालकी अपने गढमें पारग पर रस सारको कल्ठम्य कर ) पर अपने प्राय मुनि कपी सामीको परत करता है । मन मुनिकी समीर साध उसका अपने प्राम विवादही साताMet-Jt0 सामान्यशब्दवनजातविचित्रपुष्प रावितर्विविधोपयुत रसाढ्यः । संसर्गतस्तव जिनेन्द्र ! परः पवित्रः नानादिसद्गुणमनोहरगुंफितश्च ॥१६१।। भत्तया कृनां सकलमगलदानदनां स्तोत्रम्र मृदुलनव्यहपीकरम्याम् । धत्त जना य इह कठगतामजन्नं न मानतुंगमिव सा समुपैति लक्ष्मीः ॥१२॥ - मगमन सि नाममालाम माधारण शम्द मपी यनमें उत्पन्न हुए नानामा पुष्प , ये शर पी पुष्प यपि अनेक प्रकार दीपम भर दुप६, तथापि सोलर और अर्थ पूर्ण है। जिन ! ये शः रूपी पुष्प प्राप
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भकामर शतदयी
शान्तिसागर पर्यन्त होनेवाले समस्त मुनियो को मैं नमस्कार
करता हूँ॥१४॥
मोक्षं गते जिने वीरे जगद्वन्ये महाप्रभो ।
चतुर्विशतिसख्यातशते षष्ठितमे समे ॥१५॥
पौषमासे शुक्लपक्षे पौर्णमास्यां रवौ दिने ।
स्थित्वा मैनपुरीमध्य लिखितेयं स्वभावना।१९६॥
अर्थ-जगतवन्ध और महा प्रभु ऐसे भगवान् वर्द्धमान
स्वामीके मोक्ष जाने पर चौवीस सौ साठवे वर्षमें पौष शुक्ला
पौर्णमासी (मिती पौषशुक्ला १५ स० २४६० श्री वीर निर्वाण)
रवीवार के दिन मैनपुरीमे रह कर यह अपनी भावना लिखकर
पूर्ण की ॥१९५-१९६॥
शान्तिसागरशिष्येण सुधमसिन्धु वन्धुना ।
सहोदरेण विदुषो मक्खनलालशास्त्रिणः।१६७।
प्राग्रामण्डलमध्यस्थचावलीग्रामवासिना ।
तोतारामतनूजेन मेवादेवीसुसूनुना ॥१९८॥
भक्तामर-शतद्वयी
पद्मावतीपुरवालसजातिकुलशोभिता ।
धर्मरत्नविशिष्टन लालारामेण शास्त्रिणा १६६
राजेन्द्रस्य स्वपुत्रस्य पठनार्थं कृता मया ।
भक्तामरपदापूर्ति जीयादाचन्द्रमण्डलम् ।२००।
.
अर्थ-मैं श्राचार्य श्री १०८ शान्तिसागर स्वामीका
शिष्य ह मुनि श्री १०८ सुधर्ममागर का सहादर भाई हैं।
वर्तमान समयमें सर्वोत्तम धार्मिक विद्वान् वाढीय केसरी-न्याया
लकार पं० मक्खन लाल
शास्त्री आनरेरी मजिस्ट्रेटका
सहोदर घड़ा भाई हूं। आगरा जिलाके चावलीगांव का
रहनेवाला , लाला तोतारामजीका पुत्र
और मातामेवादेवीका
सुपुत्र है। मैं पद्मावतीपुरवाल नामकी सजाति और सत्कुल
मे उत्पन्न हुआ है । भारतवर्षीय दिगम्बर जैन धर्म सरक्षिणी
महासभाने मेरे साथ "धर्मरत्न" की उपाधि वाध दी है, और
शाखीकी उपाधि मैंने स्वय उपार्जनकी है । यह सक्षिप्त मेरा
परिचय है। लालाराम मेरा नाम है । मैंने अपने प्रारमज चि०
राजेन्द्रकुमारके पढ़ने के लिये यह भक्तामरके पदोंकी समस्यापूर्ति
की है। यह समस्यापूर्ति जय तक चन्द्रमण्डल बना रहे तब
तक चिरजीव रहे ॥१९७-१९८-१६६-२००॥
११३ भक्तामर-शतद्वयो निर्दोषाय जिनेन्द्राय नाभेयाय महात्मने । भक्त्यैव गुंफिता माला भक्तामरपदाश्रयात् २०१॥ अर्थ-अठारह दोपोसे रहित, परम महात्मा, भगवान् वृषभदेव 'जिनेन्द्रदेवके लिये भक्तामरके पदोका श्राश्रय लेकर मैने यह माला केवक मक्तिमे ही गूंथी है ॥२०॥ नाऽहं विद्वान् न प्रज्ञावान् शास्त्रज्ञो न च पण्डितः। जिनभक्तिवशादेव कृतेयं वृषभस्तुतिः ॥२०२॥ अर्थ-मैं न तो विद्वान हन बुद्धिमान है और न अनेक शास्त्रोका जानकार पंडित ह । मैने केवल भगवान् जिनेन्द्रदेवकी भक्ति के वश होकर ही यह भगवान् वृषभदेवकी स्तुतिकी है॥२०२॥ जिनभक्तिसमा लोके स्वात्मशुद्धिर्न वर्तते । समन्तभद्रो भक्तव तीर्थकर्ता भविष्यति ।२०३। अर्थ-- इस नसारमे भगवान जिनेन्द्र देवकी भक्तिके समान और कोई अपने श्रात्माकी शुद्धि नहीं है। भगवान समतभद्र श्राचार्य जिन मक्तिके ही कारण श्राग तीर्थदर हानेवाले है ॥२०३n
भकामर-गृतमयी
११
सेपा जिनेन्द्रभक्ति भूयान्निर्वाणदायिनी ।
मम धर्मगुरुर्जीयात्सूरिः श्रीशांतिसागर ।२०४॥
अर्थ-ची या भगवान जिनेन्द्रदेवकी मलि मुझे मांस
निबाली हो । तया मेर धर्म गुरु प्राचार्य श्रीशान्तिमागर
स्वामी चिरकाल तक जीवित रहैं Poem
समाप्त
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