Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Premiya Ratna Mala�

Chakarwati Shri Natwar · 2011/01

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अफगानस्थानका
इतिहास।
कलकत्ता,
ॐ भवानीचरण पत्त छोट, हिन्दी बवासी
इलेक्टरो मेशीग प्रेमम
बीनटवर चक्रवर्ती दारा मुद्रित
और प्रकापिात ।
सम्बत १९६२ ।
मूल्य २, दो रुपया।
1

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।
भूमिका।
व्यवसे पहले अफगानम्थााका इतिहाम हिन्दीभाषा
साहित्य में शायद नहीं था। हिन्दीभाषा ही क्यों,-वरम
बङ्गला, उर्दू प्रभृति देशको व्यन्याम्य उमत भाषायोंमें भौ
समाचल और सम्पूर्ण व्यफगामस्थानका इतिहास नहीं है।
किन्तु अगरेली भाषामें यफगानस्थानके सम्बन्धमें कितनी
को पुलके है और अगरेजीदा ऐतिशासित पाटक इस
पुस्तकको सभी वातै गईन पावैगे। यमलमें यह सिधाम
मात पुस्तकों के व्यापारपर लिखा गया है। जिनमें दो पुस्तके
उर्दू भाषाकी चौर वाकी पांच ध्यारेजी भाषाको है। इन
सातो पलकोंके नाम इस प्रकार है-
-The Kandhar Campaign,
by Major Ashe.
मेजर एशत "कन्धार युद्ध।
2-A Political mission to Afgbanıstan.
by H W. Bellew
वेलिउशत, राजनीतिक अफगानस्थान मिशन।
3,-Fourly one years in Iudia
व्यङ्गरेजो
by Field Marshal Lord Roberts
प्रधान सेनापति लाई राबर्टसक्षत भारत्में ११ ।
4. --The Afgban Yar
by Howard Hensman
हे क्षमेनक्षत-"अफगान युन्छ।
For-Encyclopeadia Britanica.
नानाविधय विभूषित हटानिका कोष ।'
-
।
।

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अफगानस्थानका इतिहास।
अफगानस्थान-वृत्तान्त ।
फारसी भाषामें व्यफगास्थानको अफगानिस्तान कहते हैं।
अफगात और मता, इन दो पन्दाको मन्धिसे इसको उत्पत्ति
है। सता मानी रहनेकी जगह और अफगान जाति विशेषका
नाम है। व्यफगान नामके ममन्धमे कई कहानिया है। बेलिउ
साहब अपने नरालमे कहते हैं, कि वैतुनमुकद्दस या इस्ली-
मक प्रतिष्ठापक ग्रफरानाको माताको व्यफगनाके नानेके समय
वडी पीड़ा हुई। उसने परमेश्वरसे करमोचनकी प्रार्थना की।
इसके उपरान्त ही पुत्र प्रमव' किया यार कहा, "यफ
गना।' यानी "में बचो। इसो वातपर शिशुका नाम अफगना
पड़ा। व्यगना अफगाका पूर्वपुरुष था। उसोने नामपर
उनकी नातिका नाम अफगान रखा गया। बैलिउ साहब ही
दूमरी कहानी कहते हैं, कि अफगनाको जानो ध्यानाको प्रसव
करने ममय "किया" यागी “हाय हाय' करतो थी। इम
वजहसे नवजात शिशु का नाम "अफगाना रखा गया। नर
ग्रमा लेखक मीर साहब फरिग ताके ध्याधारपर
तोसरो हो कहानी कहते हैं। व्यगचे जमाने में विदेशी
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अफगानस्थानका इतिहास
लोग अफगान जातिसे ना कुशल मङ्गल पुछते थे, तो
व्यफगानोंके नवावका मम्मे इस प्रकार होता था , दर "अफगानि-
स्तान वगावन्द, कि बजुन फरियादो फिगा व गांगा दरां चोने
दीगर नेस्त। यानी, अफगानस्था में लोग कहते हैं, कि उनके
देशमे रोने चिल्लानेके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो हो,
भिन्न भिन्न ऐतिहासिकोंने भिन्न भिन्न रीतिसे अफगान शब्दकी
कहानी कही है। इसमें सन्देह नहीं, कि अफगानों के एक सुप्र
सिद्ध पूर्वपुरुषका नाम अफगना था और खूब मम्भव है कि
उसोके नामपर उसके जातिवालोका नाम अफगान पडा।
अफगानम्यान साधारणतः चापहल भूभाग है। यह समुद्र
वक्षसे जचा है च्योर इसका नीचासे नाचा भाग भी मसद्र
वक्षसे ऊंचा है। ६२ दर से लेकर ७० तक पूब्ब दिशाम
समा यौर ३०से लेकर ३५नक उत्तर दिशामे चोडा है। इमको
पूवाय मीमा बगेपिल दरसे प्रारम्भ होकर चिनाल, पेशावर
च्योर डेरागात प्रान्तस होतो हुइ प्रोटेके समीप बोलन दरतक
पद् चो है। बगेधिन दर के समीप ही अक्षरेन चीन और
रूम इन तीनो वादशाहोंगी वादशाहते व्यायसमें मिल गई है।
अफगानस्थानकी उत्तरीय मीमापर रूमी तुरकम्यान है।
इसके पश्चिम फारम यौर दक्षिण बलूचस्थान यह पूर्वस
पथिम कोइ ६ मा मील यार उत्तरसे दचिण उगभग ४ मा ५०
मील लम्बा है। दो लास ६० हजार वर्गमौलमें फेला
हुच्या है।
मालीजिये, कि मसद व्यपगो वनान स्थितिको अपेक्षा
भार पुट अभा हो जाय। ऐमो दशाने भी पूवकधित

अफगानस्थान-वत्तान्त। चौपहल भूभाग पानी में उबन सकेगा। मिर्म काबुल नदीकी नीची घाटिनोंका कुछ भाग और एक त्रिकोण भूभाग जल. मम होगा। इस तिकोणका नोकदार कोना सदर दक्षिण पूर्वको सीवान झोल बनेगी और उसकी ग्राधार रेसा हिरा. तसे कन्यार पहुच जावेगी। अवश्य ही इस तिकोणके वोचमें असख्य चोटिया धौर टीले मौजूद होंगे। फिर मान लोनिये, कि मसुद अपने वर्तमान स्थानसे ७ हजार फुट ऊंचा हो जावे। इतनेपर भी इतना बडा भूभाग डूबनेसे बच जायेगा, कि हिन्दूकुश पर्वतके कोशान दरैसे कन्धार और गनतीके वीचको सडकके रङ्गक स्थानतक दो सौ मील लमो एक सीधी रेखा तय्यार हो सकेगी। यदि व्यफगानम्यानकी नैसर्गिक विभक्ति की भावे, तो सभ- वन' ई टुकडोमें होगी। उा ई टुकडोंके नाम इम प्रकार हैं,-(१) काजुन साल (२) मध्य अफगानस्थानका वह उच्च भृभाग, निसपर गननी और कलाते गिलगई व्यवस्थित है प्योर जो कन्वारकी ऊपरी घाटियोंका यालिङ्गन करता है, (३) उच्च हलमन्द खाल , (8) शिम्न हलमन्द खाल, जो गिरि प्रक, कन्धार और अफगानके मौस्तानको पेरित किये हुया है, (५) हिरात नदीकी खाल , (६) मध्य अफगानस्थानके उच्च भूभागका पूब्बीय किनारा। मिन्वनमें कभी कभी वाद थाने छीपर इम भूभागमें जल पहुंचता है। इन भागोंकी प्राततिक दशामें बडा च्यन्तर है। कहीं शीत अधिक है, कहीं गम्मी। कही जलकी प्रचुरता है, कहाँ ग्रभाव ! कहीं हरियाली पूरे नहीं मिलती चोर कहीको भूमि सदैव 1 .

8 अफगानस्थानका इतिहास । . । सुनना सुफला और सुश्यामला रहती है। इनसाइनोपी- डिया वृटानिकामे लिखा है, "काबुन खानको नैसर्गिक विभक्ति जलालाबादसे ऊपर गण्डमको ममीप पहुंचते ही स्पर दिखाई देने लगती है। इम जगह भूमि कोई ३ हजार फुट नीची हो जाती है। इसी विषयमे वावर वादशाह कहते है, 'जिस समय तम नीचे उतरोगे, तो उन्हें नई ही दुनिया दिखाई देगी। वनवृक्ष, फसन, पशु, मनुष्य और उगो परिच्छद सभी नये दिखाई देगे।' जलालाबादमे वरनेसने गेहूं की फसल तयार पाई, किन्तु २५ मौल ग्रागे, गण्डमकने जाकर देखा, कि उक्त फसल वहा ग्रारम्भिक अवस्थामें है। इसी जगह प्रकृतिी भारतवर्षका फाटक तय्यार किया है। अफगानस्थानके उच्च भागमे युरोपीसी पैदावार होती है और निम्न भागमें भारत- वर्षकीसी। कावुलो पर्वतोंके विषयमे नैरङ्गे अफगानमे इस प्रकार लिसा है,-"अफगानस्यानको उत्सर योर बहुत ऊंचे पर्वत, नोचे मैदाा और हरे भरे स्थान है। नहरे और नलसोत यधिक है। दक्षिण योर ऐमा नही है। वहां घाम पात और पानो टुप्याय है। उत्तर योरकी पर्वतमालामे हिन्दृकुश एक पर्बत है। यह भारतवर्ष हिमालयसे लेकर अफगा नम्यानके पश्चिमतक चा गया है। इसकी ऊंची चोटिया वरफसेकी रहती है। इसके ममीप ही कोहेवादाकी छवि कि दाला पश्चिमीय सीमापर्यन्त चली गई है। इसके समीप किती हो पर्वत हैं। छामे अधिकाश उच्च गिरिश तुषाराच्यादित है। इन्हीं पर्वतोंकी राइस हलान्ट् नती । .

। अफगानस्थान-वृत्तान्त ।
वहतो है। हिन्दूधरा और कोहेशवाकै बीचमें बामियान
दरी है। कोईवानाके पश्चिम योर कोदेगोर है। यह
हिराततक चला गया है और यही गुरजम्यान योर हरोरोदके
मैदानाको गलग करता है। अफगास्थानको पूर्व घोर,
उत्तरसे पैकर दक्षिणतक, कोईसुलेमानका सिलसिला है।
काबुलकी दक्षिण योर कोहेसुफेट पर्वत माला है।" अफगा
नस्यारे पर्वत तो इतने हो है। पर इनकी शाखा प्रमासा
देशभर लो हु. है। कोड को मासा खलन नामसे
पुकारी जाती है।
व्यफगानस्थागमें नदिया बहुर नही है। जितनो है, उनमें
अधिकाश बहुत छोटी हैं। बलिउ साधन अपने घराणने
कहा है, "काजको कोई नदी सद्रास नहीं पहुचती।
गित देशसे वह शिकलता है, उसको सोनार्क बाहर भी नही
पद् पता। कुल नदिया वर्षफे व्यधिक भागने न्यूनाधिक
पाया रहता है। सब दक्षिण और पसिन योर कहती है।
निम कुरेन चोर गोमलके जलस्रोत कोरलेमान शिकलपार
दक्षिण पूर्व और बहन हैं। इनमे गोमल स्रोत पर्वतते बाधर
विकलनक पहले ही जमीन में समा जाता है। पायाद करनखोत
इमाखेलके मनाप सिन्धनदमे गिरता है। मचिम योर
कन्धार व्यार हित मम भूभागको माँचती हु तारनक
व्यरगन्दाम, खामरूद, फरहद, चार हरीरुद नाम्नी दिया
बहतो हैं। यह सब सोस्तान मोल पा "यानिस्ताट्वे हान्
की च्योर जाती हैं। इन नदियोमें इलमन्द सनसे पडी है।
इसरो में सारनक परगन्दार और खादर मिल गई है। गम्मोके
।

अफगान स्यानका इतिहास ।
।
दिनोंमें सिवा हलमन्दके बाकी सब नदियां सूरव जाती हैं। सूख
नेके कई कारण हैं। इनका बहुतमा जल व्यावपाशीके लिये खे
लिया जाता है। जो वचता है, कुछ तो भाफ वनकर उड जाता
है योर कुछ पोलो भूमिमें समा जाता है। गम्मियोमें सीस्ताग
भोलका भी बडा ग्रंश सूख जाता है। वरसातमे यह
मदिया गौर झील सब बाती है। कभी कभी बकर किनारों के
वाहर निकल पाती है। जमीनके जल्द जल्द पानी सोखने,
गम्म वायुकी वजहसे, पानीके भाफ बगकर उड जानेसे और
मदियोकी बाट अस्थायी और उतनी कामकी नहीं होती।
खुरासानकी अपेक्षा काबुलप्रान्तमें नदियां बहुत कम है।
लोगार, काशगर और स्वात प्रान्तीय प्रधात जलसोत है। यह
तानो कावुल नदीमें मिल जाते हैं और काथुल नदी घटकके पाम
सिम्बनदमें जा गिरती है। लोगार योर काशगर जलस्रोत
ध्यनेक ऋतुयॉमें पायाव रहते हैं। किन्तु खात यौर काबुल
नदी सिफे अपने उहमके समीप ही पायाव है।"
भोलके विषयमें इनसाईकोपोडियामें लिखा है, "इम नों
जानते, कि लोरा नदी अफगानस्थको किस मोलमें जाकर गिरी
है। दूमरौ, सास्तान भील है। इसका वडा भाग व्यफगामस्थानके
बाहर है। रह गया गिलाई प्रान्तरका च्यापिस्तादा वा 'याय
इस्तादा" "स्थिरजल। यह गजनीसे दक्षिण पश्चिम ५ मीलो
फासलेपर है। इसकी स्थिति ७००० फूटको सचाईपर
गर उपनाऊ यार सुनसान स्थानमें हैं। वहां न तो मेड है
च्योर न घासके तखते। वमतीका तो चिन्ह भी दिखाई
गहीं देता। ४४ मौलके घेरेमें इमका छिपता मानी फेला

। अफगानस्थान-वृत्तान्त । । हुया है। बीच में भी सशफिलसे १५ फुट गहरा होगा। यही झील गननीको नदियोकी प्रधान जननी है। अफगानोंका कहना है, कि एक नदी इस मोलमें व्याकर गिरती है। किन्तु यह टोक नहीं है। झील जलका क्षार व्यौर कड़वापन कहा पतका खपडा करता है। जो मछलिया गननी नदीसे चाटकर झोलके सारे नलमें पहुच जाती है, वह ठहरत नही, मर जाती है। यफगानस्थानको सानियो विषयमें परलोकगत अमीर, यपनौ पुस्तक "तुनुक व्यन्दु रहमानों में लिखते हैं, "यम- गागस्थानमें इतनी खानिया है, कि सबसे प्रतिपत्तिशाली देश उसको ही होना चाहिये। सचमुच ही अफगास्थान खानि- योंसे भरा हुया है। लघमान च्योर उसके निकटवत्ती जिलोंमें सोना पाया जाता है। हिन्दूकशके समीप पञ्चशौर दररेके सिरेपर चादीकी खागि है। पेशावरसे उत्तर पश्चिम खतन्त्र देश वानारके यन्तगत, उच्च फर्रम च्योर गोमलक मध्यस्य जिलों में बहुत बतिया लोह चूर्ण मिलता है। बामियान घाटो योर हिन्दूकुशके व्यनेक भागोमे लोहा मिलता है। वाधा अफगानस्थानके कितने ही यशोंमें देखा गया है। करम जिलेके वाश निलेमें, सफेदकोहके शिनकारी देशमें धौर काकाप्रद शमें सौमा धातु मिलती है। हिरातके समीप भी सौसेमी खानि है। परमान्दा, वारदक पहाडी, गोरबन्द हरा धौर व्यपरीदियों के देश में भी मौमा मिलता है। यधि कांश सौसा हमारा देशसे याता है। वहा यह धातु जमीन परसे बटोर ली जाती है। कन्धारसे ३० मौल उत्तर शाह अफगानस्थानका इतिहाम। मवासद म्यानमें सुरमा मिला है। काफार देशके मोद जिले में जस्ता मिराता है। हिरात और हमारा देश के पिर. किसरी स्थाामे गन्यक मिलता है। पिरकिसरीमे गौमादर भी मिलता है। कन्धारके मैदानामें सडिया मट्टी मिलती है। जरमत और गजनीको ममीप कोयला मिलता है। अफगान म्यागदक्षिण पश्चिम प्रदेशोंमें गोरा बहुतायतसे मिलता बदसमा मोमाके समीप चाल स्थानमें नमककी घट्टाने है। अफगागम्यागमे भिन्न निन्न प्रकारका जल वायु । बेलिउ माहब लिखते है, "गजनी, काउल और उत्तर-पूचके देशीम भीषण शीत पडती है। कन्धार व्यार दक्षिण पश्चिम ग्रगान- स्थागने उसका जोर उता अधिक नहीं है। स्था मैदानामे और छोटे पहाडोपर कभी कदाचित हो बरफ पडती हैं। जव पडतो है, तो नमो गहों रहती, शीर ही पिघल जाती है। जैमा शीतका व्याधिक्य है, वैसा ही गरमाका भी। काबुल और गगनीकी गम्मों, चारो योरके तुघारधवलित गिरिइङ्गोंसे टकराकर गाते हुए समीरणसे बहु कुशात हो जाती है। इसके अतिरिक्त वहा भारतकोसो कडी धूप भी नहीं पड़तो। समुदसे उठकर हिन्दुस्थान पार करके दक्षिण पूर्वसे पाये हुए वादल भी कभी कभी पातीके छोटे दे दकर इा स्थागोंको ठण्टा किया करत हैं। किन्तु ठरूक पहुचानके यह कुल सामान एक योर, योर खुरासानको जलतो वलो लू एक ओर है। सुरासान देशको जलवायु बहुत गर्म है। उसके नाम हीसे वहागो उपपता प्रकट होती है। खुरासान अफगानस्थान वृत्तान्त । - यसनमे सुरगिस्तान वा "मात्तण्ड निवास'का गपभ्रंश है वहा गर्दसे भरी हुई व्याधियां चला करती है। कभी कभी मम्प नाम्नी प्राणशकरी यांनी वहने लगती है। रागी चट्टानो, और सूखे रेगम्यानकी तपनमे वहाको गम्मी बहुत वह जाती है। वरमात नहीं होती। इमलिये न तो कभी ठण्डी हवा चलती है और न कभी झुलसी हुई एथिवी शीतल होती है। नरनलमे लिखा है,-"अफगानम्यानकी उपज कुछ तो भारतकोसी, कुछ योरोपकीसी और कुछ ग्वान उमी देशको होती है। गेह, नत्र, बाजरा, मूग, उर्द, चना, मसूर, अरहर, और चावल के अतिरिक्त कहीं कही गमा तथा खजूर भी उत्पन्न होता है। ई, देशके ममरफ लायक थोडीसी जग- हने तय्यार कर ली जाती है। तमकू देशभरमें उत्पन्न होता है। कन्धारका तम्बाकू बहुत अच्छा और रफ्तनी लायक ममझा जाता है। नगरोंकी इर्द गिर्द, 'परम निकालने के लिये, पटएकी खेती की जाती है। कितने ही जिलोंमें मलाने, पाक प्रस्तुत करने और यौषधमे डालनेके तेल के लिये रेडो और हिन व्यधिकतामे उत्पन्न किया जाता है। यह हुई भारतकीमी उपनकी बात, व्यब युरोपकौमी उपनका हाल सनिये। सेव, नाम्पाती, बादाम, जर्दानू, विही, बेर, शाहाल, किशमिश, कागजोनीबू तुरञ्ज, घड्र, इऔर यौर शहतूत यह सब फल भो उपन्न होते है। यह बड़ी सावधानीके माथ उत्पन्न किये जाते हैं। इङ्गलगको अपेक्षा घटिया होनेपर भी व्यन्य स्वागको अपेक्षा वहिया होते हैं। इन सब सूखे वा ८ अफगानस्थानका इतिहास । 1 यणगान मकसूत स्थानमें सुरमा मिलता है काकार देशके झोष जिलेमे जस्ता मिलता है। हिरात और हजारा देशकै पिर किसरी स्थानमें गन्धक मिराता है। पिरकिमरीमे गौसादर' भी मिलता है। कन्धारके मैदानोमें सडिग मट्टी मिलती है जरमत व्योर गजनीके समीप कोयला मिलता है। म्यानले दक्षिण पश्चिम प्रदेशोंमे शोरा बहुतायतसे मिलता वदखशा सोमाके समीप चाल स्थानमें नमककी चट्टाले हैं। अफगानम्यानमे भिन्न निन्न प्रकारका जल वायु है। वेलिउ माहव लिखते है,- गजनी, काबुल और उत्तर-पूचके देशाने भीषण पौत पड़ती है। कन्धार ग्रोर दक्षिण पश्चिम अफगान स्थानमे उसका जोर उतना अधिक नहीं है म्यानोके मैदानोमे और छोटे पहाडोपर कमी कदाचित ही वरफ पड़ती है। नव पड़ती है, तो जमो नहों रहती, शीघ्र ही पिघल जाती है। जैमा शीतका ग्राधिक्य, वैसा ही गरमाका भौ। काबुल और गगनीको गम्मो, चारो घोर तुपारधवलित गिरिष्ठोस टकराकर गाते हुए समोरणसे बहु। कुछ शान्त हो जाती है। इसके व्यतिरिक्त वहा भारतकोमो कडो प्रप भो नहीं पड़ती। मसदसे उठकर हिन्दुस्थान पार करके दक्षिण पूर्वसे ग्राये हुए वादल भी कभी कभी पाके छोटे द दकर हास्यासको ठण्डा किया करते हैं। किन्तु ठए.क पहु चाने के यह कुल सामान एक योर, योर खुरामानको जलती बलतो लू एक व्योर है। सुरामान देशगी जलवायु बहुत गर्म है उसके नाम हीसे वहाकी उपाता प्रकट होती है। सुरासान । --

अफगानस्थान-वृत्तान्त ।
तरह युरेशियन, १७ तरहके हिन्दुस्थानी और शेष सब
युरेशियन चौर हिन्दुस्थानी है। एक टरटरेमरस घर
दुमरो बुकेनट सास इस देशको चिडिया है। यडा देनेके
मोसममे भारत और अफरिकाके मरुस्थलकी कितनी ही
चिडिया व्यफगानन्धान जाती है। जाडे के दिनोंमें अफगास्थान
युरेशियन पक्षियोसे भर उठता है। ध्यफगास्थानमें भारतवध
केसे कितनी हो तरहके साप और विच्छ्र है। यहाके सापोंमें
कम और विच्छ में अधिक विय होता है। अफगानस्थानके
मेंडक कुछ तो युरेशियन के योर कुछ हिन्दुस्थानी पङ्गको
होते हैं। कछुए सिर्फ काबुलमे होते हैं। मछलियां बहुत
कम है। जितनी हैं, उनमें हिन्दुस्थानी और युरेशियन इन्हीं
दो किस्ताकी है।
पलुर पशुयोंमें ऊट सुदृध योर मोटा ताना होता है।
भारतके दुबजे लम्बे डग्गे फटाको अपेक्षा बहुत व्यच्छा होता
है यार अत्यन्त सारधानीपूचक पाला जाता है। कही
कहीं दो कोहानके भी उट दिखाई देते हैं, किन्तु यह देशी
नहीं होते। यहाके घोडे भारतवर्ष भेने जात है। अच्छे
घोडे, मैमा, खुरासान यार तुर्कमान ग्रादि स्थानोंमें मियते
है। यहाके यानू सुन्दर योर सुर होते हैं। इनसे बोझ
लादने व्यार भवारीका कान लिगा नाता है।
यह लदुए
नानवरोंका काम वहुस हो तरहसे कर सकता है, किन्तु
शोधामो घोडे का काम नहीं। कन्चार योर मोक्तानकी गाय
बहुत दूध दिया करती हैं। अफगानस्थाका दूध, घी, दही
बहुत अच्छा होता है। देशमें दो
ग्रार मक्खन

१०
अफगानस्थानका इतिहास।
लायक
ताजे फलोंको बडी रफ्ननी होती है और देशके रफ्ननौके थापा
रमें इन्हौंका प्राधान्य है। इसके व्यतिरिक्त देशमे सर्वत्र ही
नौवू घास और जुन्हरीका भूसा तय्यार किया जाता है।
धफगास्थानको खाम पैदावार पिशता, खाने
माडार और व्यमाफि उटगा है। इनकी भी रफतनी
धोती है। इस देशमें खेतो करनेके दो मौसम हैं। एक
खौ और दूसरी खरीफ। रवीकी फसल खरीफतक तय्यार
हो जाती है और खरीफकी फमल गम्मियोंतक ।
व्यफगानस्थानमें यूसुफजईमें वन्दर, कन्वारमें चीता, यौर
उत्तर-पश्चिमकी पहाड़ियों में शेर मिलते हैं। स्यार सर्वत्र
होते हैं। वौरानोमें झुण्डके झुण्ड भेडिये रहते हैं। पालतू
पशुओंको उठा ले जाया करते है और अोले दुकेले सवारों
पर याक्रमण किया करते हैं। लकडवगधे भी सर्वत्र होते
॥ है। इनका झुण्ड नहीं होता। यह कभी कभी बेलोपर
ब्याक्रमण किया करते है और भेडे पकड ले जाते है।
दक्षिणीय व्यफगानस्थानके युवक कभी कभी लकडबगधेकी
मांदमें मिहत्ये घुमकर लफडवगरे वाघ लाते है। जङ्गलीकुत्त
और तोमडिया सभी जगह मिली हैं। न्योला और ऊद
भी मिलता है। माज दो प्रकारके होते हैं। एक काला और
दूमरा पोला। जङ्गग्लो बकरिया, वारहसिङ्गा और इरिन भी
मिलते है। तिम्न हलमन्दमें जङ्गली सूअर मिलते हैं। रेग
स्थानमें गोरखर मिलते हैं। चमगादड और इछन्दर हर
जगह होते हैं। गिलहरी जेरबोया और खरगोश भी
मिला है। सो २४ तरह पक्षी मिलते हैं। इनमें ५
१

1
अफगानस्थान वृत्तान्त ।
तरहके युरेशियन, १७ तरहके हिन्दुस्थानी योर पोय सब
युरेशियन, और हिन्दुस्थानी है। एक टरटरेसरस व्यौर
दुमरो बुकेनट खास इस देशकी चिडिया है। अण्डा देनेके
मौसममें भारत और अफरिकाले मरुस्थलकी कितनी ही
चिडिया यफगाान्थान जाती है। नाडे के दिनोंमें अफगानम्यान
युरेशियन पक्षियोंसे भर उठता है। अफगास्थानमें भारतवघ
केसे कितनी हो वरहके साप योर विच्छ्र है। यहाके सामोंमें
कम और विच्छ में अधिक विघ होता है। अफगानस्यानके
मेंडक कुछ तो युरेशियन उनके और कुछ हिन्दुस्थानी के
होते हैं। कछुए मिः काइलमें होते हैं।
मछलियां बहुत
कम हैं। जिता है, उसमें हिन्दुस्थानी और युरेशियन इन्हीं
दो किस्मोंकी है।
पलुए पशुप्रोमें ऊट सुट द्यौर मोटा ताना होता है।
भाराकै दुबजे लम्बे डग्गे ऊ टाको अपेक्षा बहुत अच्छा होता
है यार अत्यन्त सावधानीपूचक पाला जाता है। कहीं
कहो दो कोहानके भी उट दिखाई देते है, किन्तु यह देशी
नहों होते। यहाके घोडे नारतवर्ष भेने जाते हैं। अपने
घोडे, भैमा, खुरामान व्यार तुर्कमान ग्रादि स्थानोंमे मिराते
। यहा या सुन्दर यार सहर होते है। इनसे वोझ
लाट्ने यार मयारीका काम लिया जाता है।
यह लदुर
पावरोंका काम बहुत अच्छी तरहसे क्रमकता है, किन्तु
शोधामो घोडे का काम नहीं। कधार योर मीस्तानकी गायें
बहुत दूध दिया करती हैं। अफगानस्थान का दूध, घी, दही
धार मान बहुत अच्छा होता है। देशमें दो
1

अफगानस्थानका इतिहास ।
तरघको वरिया होती हैं। एक श्वेत और दूसरी काली। दोनो
तरहको बकरियों को पूछ बहुत मोटी योर लम्बी चाडी होती
है। वहावाले इन्हें दुम्ग कहते हैं। दुखोंका वाल फारस
घ्यार अब वनइको राहसे युरोप जाता है। नोमाद नातिका
धन दुबोके गले है व्योर भोगन उनका माम। गर्मियों में
बहुसत्या दुसे हलाल किये जाते हैं। उनले मास
टुकडे नमकमे लपेटे नाकर धूपमे सुखा लिये जाते
हैं। जंट तथा व्यन्यान्य पलुए पायाचा भास भी इसी
तरहसे सुसा लिया जाता है। भेडे काली वा कण श्वेत
रङ्गको होती हैं। बाके जानसे शाल प्रति तय्यार किये जाते
हैं। यफगानस्थानमे नाना प्रकारके कुत्ते होत हे।
जरनलने लिखा है,-"व्यफगाास्यानमे भिन्न भिन्न जातिक
लोग वमत है यार नाना प्रकारको भाषाये बोलो जाती है।
वहाके यमों यार ग्ररखोको भाषा 'पखतू' तथा 'पशतू'
है। यही भाषा व्यफगानी भाषा है। ताजीक यार किनम्न
वाशोंकी भाषा फारसा है। हमारा व्यार कितनी ही जाति
पोंको भाषा फारसांमिश्रित है। हिन्दको वा हिन्दू धार
जाट, हिन्दुस्थानीमापात मिलती जुलती भाषा बोलते
है। कुछ कामोरो व्यार परमनो भी काबुलमे जा बसे हैं,
किन्तु इन लोगोको सख्या बहुत घोडौ ।
"इनको अतिरिक्त कितना हो और जातिया है, जिनकी
उत्पत्तिका मना नहीं चलता। उनकी भाषा भी निराली है।
में जहातक व्यनुमारा करता हू,
उनकी भाषा हिदीसे बहुत
मिलती जुलती है योर उसमें कही कही संस्कृत शब्द भी

अफगानस्थान-वृत्तान्त । पाये जाते है। इन जातियोका बहुत बडा भाग काबुलप्रान्तके सचे स्थानोंमे और हिन्दूकश पर्वतमालाको तराइमें वसता है। इनमें याछ प्रधान जातियों के नाम इस प्रकार है, देगानी, लम- घानी, माधु, कवल यौर नीमचाकाफिर। मम्भवत. यह मम जातिया पहले हिन्दू धों, किन्तु पीछे मुसलमान वना ली गई । अफगानम्यानकी मम्पूर्ण नालियों में अफगान जाति सर्वप्रधान है। पहले तो उसकी मरथा व्यधिक है। दूसरे, वही देशका शामन करती है। इनसाइलोपीडिया इटानिकामें लिखा है,- 'भारतकी फोजी सुयोग्य अफसर करनेल मेकग्रेगरने छापा गानस्थानवासियोंको जनसणाका ग्रन्दाजा लगानेकी चेया की थी। उसकी जानमें अफगानस्थानको जनसख्या एक हजार है। इसमें व्यफगान तुरकाधानवासी, चिवालवासी, कापिर और सफलइके स्वतन्त्र लोग मभी शामिल हैं। नल साहब अन्दालेका नशा देखिये,- इमाक और एनारा ४००,००० নাভীক किजलनाश १५०,००० हिन्दू और जाट ५.००,००० कोहस्पानी इत्यादि २००,००० घपगार, पठान और चालीस २.३५८,००० 8E. लाख कर- पू००,००० sareasante } कुल- 8,२००,००० अफगानस्थानका इतिहास । । यफगान जातिका वर्णन मारग्स करने से पहले हम वहाकी कुछ प्रधान नातियोकी बात कहते हैं। अफगानोंके उपरान्त "ताजीक नाम्नी बडी और जबरदस्त नाति है। यह प्रधानत देशके पधिमीय भागमें बसती है। ईरानी योर देशको यादि जाति समझी जाती है। इन लोगोंकी भाषा और व्याजकलको फारमी भाषामें यों हीसा प्रभद है। पोशाक, व्यवहार चेहरामहरा अफगानोंसे मिलता जुलता है। इनमे यौर अफगागोसे एक प्रत्यक्ष प्रभेद यह है, कि वह लोग एक जगह रहकर खेती वारी और नाना प्रकारके रोजगार करते हैं, किन्तु अफगान एका जगह स्थिर होकर रहना नहीं जानते। इस जातिके कितने ही लोग फौजमें भरती हैं। अफगान सैन्यका वडा अश इन्हीं लोगोसे बना किजलबाश' नाति भी ताजीकोंकी तरह ईरानी है। किन्तु इन दोनो जातियोकी भाषामें थोडासा प्रभेद है। किजलवाश जातिको उत्पत्ति फारसकी सगल जातिसे हुई है। यह लोग याजकलको. फारसी भाषा बोलते है। कहते है कि सन १७६७ ई.मे हम लोग नादिर शाहले साथ फारमसे काबुल व्याये थे। उस समय शाहने हम लोगोको काबुलमे वमा दिया था। यह जाति सुन्दर गौर मजबूत व्यप्रगाथानने रिलाये और तोपखानेमें बहुरत्यक किजलवाश नौकरी करते हैं। "हजारा" जाति तुरकौभाषा मिश्रित फारमीभाषा बोलती है। यह अपनी सरतसे तानार- वशी जात पडती है। इन लोगोको कोइ भी गुआन वमती ही है। यह म्बत देशमै फैले हुए है और हि. .

अफगानस्थान-वृत्तान्त । - मत मनदूरी करके पेट पालते हैं। हनारा पर्बतमालामें रहते हैं और शीतकाल उपस्थित होनेपर, झुण्ड के भुड नौकरी या मिहनत मजदूरीकी तलाशमें शिकलत है। हजारा जातिके लोग बहुत ही गरीब है। मिर्फ गनीके समीप इस जातिके कुछ लोग जमीन्दारी करते हैं। "हिन्दू" और जाट" भी व्यफगागस्थानकी प्रधान, जाति है। व्यफ- गॉनस्थानके अधिकाश हिन्दू क्षतिय है और वहा "हिन्दको के नामसे प्रख्यात है। यह व्यवसाय करते है और यफगास्थानके बड़े बड़े नगरोंसे लेकर किसी भी गिनती लायक देहातकमें मौजूद है। देशके लेनदेनका रोजगार इसी नातिकी मुहीमें है। यह अफगानीको रुपये पैसेकी सहा- यता दिया करती है और अफगान इनको यमपूर्वक अपने देशमें रखते हैं। हिन्दू यफगाास्याामें खूब निश्चिन्तता माथ रहनेपर भी कई बातोंमें तकलीफ पाते हैं। उनपर' जभिया" नामक टिकस सिर्फ इसलिये लगा हुया है, कि यह सुमलमान हौं, हिन्दू हैं। वह अपना कोई भी धार्मिक उत्सव खुलमखुला नहों कर समते, न कानीके मामने गवाही देमे पाते है। घोड की मवागभीनही करने पाते , यदि कर । म कते है, तो नगी पौटवाले घोडे पर। हिन्दू इतने कर साह कर भी चार पैसेके रोजगारको लालचसे वहा पडे हुर। दृमरी पात यह है, कि मिर्फ अपने धमकी बदौलत इतनी नकलीफे महा करते है, किन्तु धन नही छोडते । वालवमें काबुलके हिन्दुओं के लिये यह कम प्रशसाका विषय नहीं है। वाट सभी जातिके सुमतमा हैं। उनकी उत्पत्तिका M . 4 अफगानस्थानका इतिहास । - . हाल यज्ञात रहनेपर भी वह देश ग्रादि वासी समझे जाते हैं। उनका रङ्ग पक्का और चेहरा सुन्दर होता है। काबुलके उच्च भागमें कितनी ही जातियां रहती है। उनका हाल बहुत कम मालूम है। कारण, वह अपने पडोमियोंसे भी मिलना पसन्द नहीं करतौं। उनमेको बहुतमी. जातियां अपने गले लिये पहाडों पहाडों फिरती रहती हैं। अछ जातियां स्थायी रूपसे बसकर शधिकार्य करती हैं। कुछ अफगान सैन्यमे भरती हैं और कुछ अमीरों रईसोंकी गले- वानी, खिदमतगारी प्रति नौकरियां करती हैं। यह सब नातिया खास अपनी भाषा वोलती है और एक जातिको भाषा दूमरीकी भाषासे नहीं मिलती। इन जातियों के लोग अपनेको कहते तो सुसलमान है, किन्तु अपना धम्मकम्मे विलकुल नहीं जानते। जान पड़ता है, कि यह सब जातियां पहले हिन्दू थीं। व्यब हम देशकी सर्व प्रधान यौर राना जाति “ अफ- गान की बात कहते हैं। अमर उनकी गणना लिख चुके हैं। इस जातिको चालचलन, पोशाक, रीति यवहार ध्यादि सभी बातें देश की अन्यान्य जालियोसे अलग हैं। यह व्यपनी निनकी भाषा 'पश तो” वा “पख्तों" बोलती है। असलमें यह भाषा विदेशियों के लिये बहुत कठिन है। भाषाका निधार किया नावे, तो उसमे फारसी, अरबी और संस्कृत शब्द मिलेगे। इससे जान पडता है, कि इसकी उत्पत्ति इन्हीं तीनो भाषायोंसे हुई है। इस भाषाको बोली है, किन्तु इसके अक्षर नहीं है । चरखी अक्षरोंको छ .

अफगनस्थान-वृत्तान्त ।' 1 1 - - यौर टेण मीया करतो लिख ली जाती है और इन्हीं यक्ष रोंमे इनका माहित्य है। अफगान भाषाका याकरण च्यावन्त सरल है। किन्तु इसकी क्रिया वा फेल बहुत कठिन है कारण, पश्तोको क्रिया "विरू"भाषाकी क्रियाके ध्यसार वगो हुई है। पश्तो भाषामें कुछ ऐसे स्वर है, जैसे एशियामालकी भाषायोंमें नहीं मिलन। ऐमे, स्वर लिखने के लिये यरवीके व्यचर नथे इसे तोडे मरोडे गये हैं। यह सर किसी कदर मस्कृषक मिले हुए गक्षरके स्वरसे मिलने जुलते हैं। का । नों को इतने विचित्र जान पड़ते हैं, कि जल्द निकलते नहीं, उनमें बसे रहते हैं। यफगान जातिले दो भाग है। एक तो वह जो मारि- वार और गलों के माघ यच्छी यही चरागाई और रमणीक भ्यान पूछना हुआ, इधर उधर भटकता फिरता है। दूमरा वह, जो एक जगह जमकर वमा हुया और खेतो वारी अथवा अन्यान्य चलते घचोंमें लगा हुआ है। पहले तरह के खागारदोश अफगतोंको जातिको नोमाद कहते हैं। यह काबुन प्रान्त और खरालान प्रान्तमें वमती है। यह नाति झगडे वखे टोंसे बची हुई शान्तिपूर्वक वारती है। निर्फ कभरै कमी भीषण रत्तपात भी कर बैठती है। यह जाति खेती नहीं करती। सिर्फ अपने गों की रक्षा करनी पोर उन्हीं की बदौलत अपना जीवन पिर्लाह 'करती है। खूब तन्दुरुस्त और' मिहाती होती है। बहुत परहेजके साथ रहती है। साथ साथ अज्ञान और शानी भी होती है। मवेशी चराने और सड़कोपर झाके समय काटा । + अफगानस्थानका इतिहास । । -- 'डालाने में कमाल रखती है। सरलहृदय होतो और अपने घर याये अतिथिका सत्कार करती है। इसकी गतिधिसेवा देशप्रसिद्ध है। किन्तु इसका व्यवहार उसके घर वा पहावके भीतर ही होता है। जब अतिथि 'उमके पडावसे बाहर निकल जाता है, तो सोनेको चिडिया वा लूटका शिकार समझा जाता है। अफगान कुछ देर पहले जिस अतिथिको यात्रय और भोगन देते हैं, कुछ देर बाद, मडकपर, उसीको लूट येते और मार भी डालते हैं। नोमाद जाति काबुल सर- कारको अपने अपने मरदारोंकी मारफत रानकर भेजा करती है। यह जाति यफगा। सैन्य और मिलिशियामें भी भरती है। इनके चालावा शान्तिके ममय काबुल सरकारसे बहुत कम मम्बन्ध रखती है। फिर भी व्यपने अपने सरदारों के अधीन रहती है, गौर सरदार काबुल मरकारकी ब्याज्ञा प्रतिपालन किया करते हैं। नातिके बड़े बड़े भागडे मरदार मिटाया करते है , छोटे शेटे भागडोंका निवटेरा मन काजी कर दिया करते है। यह हुई खासाबदोश अफगानोको पात । यम नगरवासी ग्रगानीका हाल सुनिये । खानावदोशोंकी अपेक्षा इन लोगोंकी सखा अधिक है। अफगान फौजमें यही लोग अधिक है। इस जातिके प्राय. ममस्त अफगान जमीन्दार है। सिवा फौजी नौकरी गौर सेती वारीके दूसरा काम नहीं करते। यापार करते लगाते हैं। लाखो अफगानोंमें जो गिनतीक अफ- गान रोजगार करते हैं, वह स्वय रोजगारके समीप नही जाते, नौकरोंसे कराते हैं। अफगान खूपखरत गौर + मजबूत होते अफगानस्थान वृत्तान्त ।। १८ - - - । 1 है। स्वदेशमै भांति भातिकी कठिनाइया बरदाशत कर सकते है। शिकार योर घोडे की मवारीक बहुत शौकीन होते हैं। बन्दूक और ठेलेसे बहुत अच्छा निशाण लगाते हैं। प्रमन्नादन और व्याळादित रहते हैं। उनमे व्यय्याशी स्व मिली हुई है। विदेशियोंके' मामने बहुत घमण्ड दिखाते है। व्यफगान सुन्नी मम्पदायके मुसलमान है। मध्ययणी वा निम्नश्रेणीके अफगानीको पोशाक तो वही है, जो इस देशमें यानेवाले यापारी अफगानोकी होती है। वहाके ईमोंकी पोशाकका भी ऐना ही होता है। फर्क इतना है, कि इनकी पोशाकमा कपडा मोटा और उसकी पोशा- कका पतला होता है। रईस गौर मध्यश्रेणीके लोग घुगा पहनते हैं । मध्यअंगीके लोगोके लिये यह कपडा भेडझे अच्छे ऊन अथवा जटो ल्ये से तय्यार किया जाता है। चुगा अफ- गानोंकी नातीय पोशाक है। बडे बडे रईस शालका चुगा पहनते है। अफगाका कमरबन्द १६ से लेकर बीस फुटतक लम्बा और कोई धार फुट चौडा होता है। रईम लोग शालदोशालासे कमर कसते हैं, मध्ययणी वाग्निस्थिति के लोग सूती चादगेसे। कमरबन्दमें आगामी घरातथा एक वा अनेक पित्ताले लगी होती है। अफगान कभी कभी ईरानी पेशकज भी कमरसे लगा लेते है। अपने शिरपर पहले सुलाइ रखते हैं और कुलाहकी गिर्द पाडी र पेटते हैं। रईसोंकी पगडो कीमती और अन्य श्रेणीवालोंकी साधारण होती है। अमीर लोग चमडे, ऊन और कपडे का, तथा मर्वसाधारण सिर्फ चमडे का धूता पहनते हैं। अफगान जातिको उच्चकुलको रस योगा भीतर -- । - - अफगानस्थानका इतिहास । बेनियन वा फतुहीसा एक तङ्ग वस्त्र पहनती हैं। उसपर एक जौलागला चोडी बाहोका कुरता पहनती है। यह करता रेशमी सुत्थनपर भूलता रहता है। साधारणतः रेशमी रूमाल शिरपर बाधती हैं। स्मालके दो सिरे उशीके पाम अापसमें बाध देती हैं। कभी कभी ऊनी शाल कन्धोंपर डाल लिया करती हैं। जब बाहर निकलती हैं, तो श्वेतवा नौले रङ्गका पुरका पहन लेती हैं। इससे उनका सवाङ्गक जाता है। सिर्फ पाखें खुली रहती हैं। कोई कोई उच्च- कुलकी ललना बाहर निकलनेपर सनायम मोले योर खिर १ जूते पहनती है -- उफगान जातिकी उत्पत्तिके विषयमें नैरङ्ग अफगानमें इन तरहसे लिखा है, "ऐसा नियम है, कि नबतक कोई जाति राजनीतिक गौरव प्राप्त नहीं करती, तबतक उमको उत्पत्तिक विषयमें बिलकुल ध्याn हीं दिया जाता। इस तरहगी कितनी ही जातियोमे अफगान भी एक जाति है, जिसकी उत्पत्ति जाननेका खयाल मेकडो मालतक फिमी ऐतिहामिकको नहीं हुआ। यह खयाल हुया तो उम समय, अब ईरानमें मषि योका घराना और भारतवर्ष में सगलशामनका सितारा जवाई- पर चसक रहा था। कन्वारका सूबा, इरान और अफगान स्थान में लडाई झगडे का कारण बना हुया था। उस समय अफगान जाति इतनी शक्तिशाली हो गई थी, कि वह निस रानाको अपना राना मानती, उमौका प्रभाव मम्प र्ण अफगा। स्थापर फेलता था। उस जमाने में केवल, व्यफगानस्यान ही भागडे फिसाद नहीं हुया करते थे, वरच अफगान जातिक

अफगानस्थान-वृत्तान्त!
مت
विषयमे भी भागडा मडा हुआ था। भारतके मुगल सम्राट
जहागीरले शासनकालमें ईरानके रामइतने कहा था, कि व्यमा
गाा दैत्य वजोत्पन्न है। , उमने प्रमाणमे एक कितान दिसाइ।
उममें लिखा था, कि नुहहाम वादशाहको किमी पाश्चात्य
देशमे कुछ सुन्दर स्त्रियों के राज्य करने और लूट तागणका
पेशा करनेकी खबर मिली। जुहहाकने एक बहुत बड़ी
फौज उस देशपर अधिकार करने के लिये भेजी। घोर युद्ध
हुया। स्त्रियां जीती नुहहाकको फोन परास्त हुई। इसके
उपरान्त नुहाकने नरीमानके सेनापतित्वमै एक बडी फौज
स्खियोंके देशमै भनी। इसवार नुहाककी सैन्य गीतो।
खियोंने एक सहस कारी लडकियां नहाका बादशाइके लिये
देकर शाही फौजसे सन्धि कर ली। वापसी के समय एक पर्वतके
समीप नरीमानने डेरा डाला। रातको एक विशालाकार देत्य
पर्वतसे निकला। इसको देखकर वादा ही लशकर भागा।
देय डा स्त्रियोंके पास रहा। भागी हुई फोन जब फिर उस
जगह वापस पाई, वो उमने स्त्रियोंको गणी पाया। यह
भात नहाकको मानूम हुई। उमने व्याज्ञा दी, कि उन स्त्रियों
को उमी पर्चत और वनमे रहने देना चाहिये, वह यदि गरमै
धान गी, तो उनसे मन्ताग नगरवासियोंको कर पहु चारेंगे
उन स्त्रियोंसे जो लडोबाले हुए, उन्हीं की अफगा। जाति
बनी।
"ईरानके राजदूतको यह बात माकर सानेनहान लोदीने
अ आदमियोको अफगातोंकी उत्पनि माननेके लिये अफगा-
नस्यान भेगा। उन लोगोंकी नाचसे जान पड़ा, कि व्यफगाा

अफगानस्थानका इतिहास ।
-
,
चाकूब पैगम्बरके लडके यहदाके वंशसे है। खानेजहान लोदीने
इम जांचपर अफगानम्थानका एक इतिहास लिखा। उसमें ।
ईरानी गजबूतका सण्डन हो जानेपर गौ अफगान जातिको उत्प
तिका यथार्थ निर्णय नहीं हो सका। इसमें यहातक लिखा गया
है, कि कैस ग्रन्दु ररशीद एक मउथ्यका नाम था। वह
मदीनेमें मुसलमान हुआ। वहीं उसने मुसलमानोंके बहुत बड़े
सेनापति खालिद बिन वलीदकी कन्या सुमम्मात सारासे विवाह,
किया । इस कवासे तीन पुत्र उत्पन्न हुए। यही तीनो
अफगानों पूर्व पुरुष है। किन्तु पुस्तकमें यह नही लिखा
है, कि केस अब्द ररशीद मुसलमान होनेसे पहले किस
जातिका मनुष्य था।
नैरङ्ग अफगानमें जो बात अधूरी छोड दी गई, बेलिउ
माहव अपने जरनलमें उसीको पूरी करते है
कसको अफगानोका ग्रादि पुरुष बताते हैं यौर अफगानस्थानके
मात प्रामाणिक इतिहासोंके व्याधारपर कहते हैं, कि कैम
यहृदी था। यहीसे वह सुसल्म 7 हुया। वैलिड साहबने
अपनी इस बातके प्रमाणमें बहुतसी बाते कही है। जिन्हें
स्थानाभाववश हम प्रकाश नही कर सकते। अफगान भी
कहते हैं, कि मुसलमान होनेके पहले हम यहृदी थे। दामाइ
कोपीडियाने भी अफगान यहदियोकी गोलाद कहे गये है।
जो दो , मम्मर है, कि अणगान यहूदी ही हों और घूमते
धामने अफगाास्यान ग्राकर वर हो।
अफगान्यानके माहित्य विषयमे अधिक कहना नहीं
है। कारण, अफगा। बड़ी ही अपा जाति ई कानो मुलायों
। वह भी

। अफगानस्तान-वृत्तान्त । २२ । को छोडकर ऐसे बहुत कम लोग है, जो अपने देशको भाया लिख पा सकते हों। अफगाकी भाषा पश्तोमे गिनती की किताने हैं। अफगास्थानमे जो कर माहित्य मौजूद है, वह फारसी भाषाका है। चिट्ठी पत्री, यापार सम्बन्धी लिखा माळी, सरकारी काम प्रति सत्र फारसी भाषामें किय जाता है। पातो साहित्यमे सिर्फ धर्म, काय, कहानिया और इतिहामकी कुछ पुस्तकें है ! ग्रन्थकर्तव्योंकी गणना बहुत थोडी है और उनको किताने थोडे से यादमी पाते हैं। अफगास्था व चलाने लायक नदी ही है और गाडियां भी नही है। इसलिये वहाको पहाडी राहोंपर रूदुए भागवर, विशेषन अट माल वे ग्राने और ले जानेका काम किया करते हैं। कारवान योर काफिले मोदागरी माल लेकर इधर उधर याते जाते हैं। व्यापारको प्रधान राहें इम तरह अवस्थित हैं,-(१) फारमसे मशहद होती हुई हिरावतक (२) बुखारेसे मर्न होती हुई हिरासतक (३) उसी भगइसे करशी, चल्स और खुलम होती हुई काबुलतक, (४) पावसे पेशावर यौर 'बरखवाने दररेसे होती हुई वावुन तक, (५) पावसे घावालारी दररेसे होती हुई गजनीतक () मिन्धसे बोला दररेसे होती हुई कन्धारतक। इसके अतिरिक्त पूर्वीय तुरकस्थाासे पिनाल होती हुई जलाला बादतक और पेशावर होतो हुइ दौरतक भी एक राह है विन्तु यह नहीं मासूम, कि इस राइसे काफले चलते हैं, वा नही। ध्यायानसे मिन्बकी ओर सन, घोडे, रेशम, फग्न, uadier और assafratrds वाते हैं। भारतपर्वते 1 । । : -- २४ अफगानस्थानका इतिहास । - . ध्यफगानस्थानमें पेशावरको राहसे रई अन योर रेशमी कपडे जाते हैं। इनके अलावा रूस चौर इङ्गलडकी भी कितनी ही चीजें अफगानस्थानमे सपती है। मन १८६२ ई. में ध्यफगानम्यान और भारतवर्षमै जो ग्रामदनी और रफतनी हुई, उसका नकशा इस प्रकार है- भारतमें व्याया भारतसे गया। पेशावरकी राइसे २३४७६६५ १८०४६४५ घावालरी दररेकी राइसे. २६५०००० २४६०००० बोला दररेसे ४७०८०५० २८३३० कुल-४७७२७४५ ४५५३०२५ ध्यफगानस्थान काबुल, जलालाबाद, गननी, कन्धार, हिरात और अफगानतम्याग प्रदेशमें विभक्त है। काबुल, गगनो, कन्वार और हिरातकी वात यथासमय कहेगे। प्रथम प्रधान प्रधान प्रदेशोंके नगरोंका हाल नीचे प्रकाश करते हैं, काबुल नदीको उत्तर गोर समुद्र वक्षसे १ हजार मौ ४६ फुटको ऊचाईपर एक लम्बे चौड मैदानमें जलालाबाद बसा है। यह सडकके फासलेसे काबुलसे मौ मील और पेशावरसे ११ सोलके मासपेपर व्यवस्थित है। जलालाबाद और पेंशावरके वीचमे खेवर और उसके पासके दरे हैं। जलालानाद और काबुलक बीच, जगदलक और सुई काबुल ग्रादि दररे है। सन १८४२ ई०में पालक मारव नामक पहवे अङ्गरेन इम स्थानतक गये धै। पाहरको शहरपनाह • हजार एक सौ गजमे फैली हुई है। शहरमें कोई सौ मकान और कोई २ हजार मदीन होंगे। शहरपनाह DAN LIBRARY अफगानस्थान-वृत्तान्त । २५ वाहर वागोंकी चहारदीवारिया है। इनकी याडसे किसी यासमणकारी शत्रु का अाक्रमण रोका गा मकता है। पालक साहबने शहरपनाह तोड दी थी, किन्तु वह फिर बना ली गई। जलालाबादको गिर्द कोई २५ मौलको लमाई धौर तीन वा चार मौलको चौडाईमें खेती होती है। यहां चारो योर नल मिलता है। जलालाबादप्रदेश कोई ६० मील लमा और ३५ मील चौडा है। जलालावादके पार्श्व- वती दरोंमें अनेकानेक टूटे फूटे बुद्धमन्दिर मौजूद हैं। बावर वादशाहने यहां कितने ही बाग लगवाये थे और उन्होके लगाये "जलालहोन" बागके नामपर शहरका नाम जलालाबाद पडा। (२) काबुलसे २० मील उत्तरपूर्व कोह- दामनमें इतालीफ पानी बनती है। सा १८४२ ई०मे व्यङ्ग- रेखासेनापति मेकासरिलने यह गाव वरवाद कर दिया था। इसके बाद फिरसे बना। यह चित्रमा स्थान अत्यन्त मनो- रम है। पहाडकी तराईमे एक ख जलसोत किगारे नगरको वसती है। वनतीको चारो योर अङ्गरको टहिया यौर उत्तमोत्तम फलोके बाग है। वमतीके ऊपर हिन्दू कश पब्बतकी वरफसे की हुई चोटी अति शोभाको प्राप्त होती है। प्रत्येक नगरपानीको पाम एक एक वाग है और प्रत्ये क वागमें दुर्ग बना हुया है। फलोंकी फसलमें लोग फल खाने के लिये घर छोडकर बागमें जा बसते है। बसती । और उसके शिकटानी गांवोंने मुल १८ हजार मनुष्य बसते है। (३) चारोवार नगरमे कोइ पाच हजार मनुष्य वसते है। यह इतालीफसे बीस मील उत्तर और कोहदामनकी ३inthan अफगानस्थानका इतिहास । रहता है। छोरपर बसा हुया है। बारां नदीको गोरबन्द शाखासे इममे जल पहुचता है। इसी जगह बखतरिया, इस्तिराव और पिलवीकी राहें मिलकर तिराहा बनाती है। इसी जगहसे तुरकस्थानको काफले जाते हैं और यहीं कोच स्थानका गवरनर यहां अगरेजी फौजका कबजा था। सन २८४१ ई०मे काबुल गदरके जमानेमें यहाकी गहरेजी फोन काइल चली, किन्तु राह होमे नर, कर दी गई। फौजका सिर्फ एक मिपाही जान लेकर काबुल पहुंचा था। (४) कलाले गिलजई प्रदेशको कोई खास वसती नहीं है। प्रदेशके नामका सिर्फ एक किला तारनक नदीके दाहने किनारेपर बना है। यह कन्चारसे मौलके फासलेपर और समुद्रवचसे ५ हजार ७ सौ ७६ फुटकी ऊ चाईपरविना है । सन १८४२ ई०मे इमपर भी व्यङ्ग- रेनोंने अधिकार कर लिया था। (५) गिरिशक भी किला ही है, किन्तु नाममात्र के लिये इसके साथ एक वसती भी लगी हुई है। यह किला बडे मोकेका है। हिरात यौर कन्या रके वीचको शाराह, कितनी ही छोटी छोटी राह और हलमन्द नदीका गम्मियोंके मौसमका घाट इसकी मारपर है। सन् १८३८ ई०के बगल महीनेसे सन् १८४२ इ०तक इसपर गरेनोंका करजा रहा। कार के पासरी नौ महीने बडी मुशकिलस कटे थे। [६] फरह नगर फरह नदीके किना रेपर हिरात कन्वारकी सडक किनारे सौस्तान सातमें बना है। हिरातसे १ सौ मील धौर कन्चारसे ३६ मील दूर है। शहरकी गिर्द बुर्जदार शहरपद है और शहरमनाहक

अफगानस्थान-वृत्तान्त ।
२७
नीचे चौडो और गहरी साई है। प्रयोजन होनेपर साई
पानीसे भर दी जा सकती है। साईपर पुल पडा रहता है।
शहर लमा है। इसके दो फाटक हैं। लडाई भिडाईके लिये
मौकी जगह है, किन्तु यहाका जलवायु खराब है।
रमे गिनतीके मकान है। इसको शाह अब्बास और दि-
रने यथाममय परवाद किया था। सन् १८३७ ई.मे कोई ६
हजार गरवामी नगर छोडकर कन्धार वमाने चले गये थे।
(७) सनगार गरका नाम फारमीके "ग्रस्य नार शब्दका व्यप
भ्र भई। यह नगर हिरातसे १५ और फरहसे ७१ मीलके
सामवेपर है। सा १८४५ इमें गरमें कोइ एक सौ मकान
ध्योर एक छोटासा बाजार था। नगरका वडा भाग वीरान
पडा था। इससे जान परता है, फि किसी जमानेमें वह
बहुत ग्राबाद रहा होगा। कितनी ही नहरारूत नदीसे
नगरमे पहु पाई गई है। यह गहरे शत्रु को चाइमें बहुत
वाधा उपस्थित कर सकती ! ] हिरातको पू योर
गोर प्रदेशमें जरशी छोटासा नगर है। गोर प्रदेशले गोरीद
वाने कइ पुशततका अफगानस्थानपर राज्य किया था। परि
यर माधवको कथनानुसार जग्नी गोरकी पुरानी रानपानी है।
एहरपनाहकी मेखला पहने हुए बरनीके मण्डर उसको भूत
पून विगाल बनीमा पता यताते हैं। यह घाटीगे वसा है
और किसो हो घुमावदार जलमोत इमको स्याा स्थानसे चूमते
मा १८४५ ई.में इसको जनसमा कोइ बारह मी
थी। यधिका नगरनामी फारमकी प्राची नाति है।
[EJ कन्दन प्रदेश व्यफगान तुरकस्थान में है। इसके पूर्व

२८
अफगानस्थानका इतिहास ।
n
वदवश, पश्चिम खुलम, उत्तर अक्ष नदी और दक्षिण हिन्दू
कुश है। कुन्दुजके जिले इस प्रकार है, [क] कन्दन पाच
वा छ• मौ छोटे छोटे कच्चे मकानोंकी बनती है। वसतीके
ममीय थाछ वाग और खेत है और एक किनारे, टोलेपर रक
कच्चा किला , (स) हिरातेइमाम ग्रच नदी किनारे एक
उपजाऊ भूभागपर बना है, यह वसती भी कन्दनकोसी ही
है , निर्फ यहाका किया अपेक्षाकृत अच्छा है और उसकी
चारो ओर दलदलकी खाई है, [ग] वागलान और []
गोरीसुरखाव नदीकी याद घाटीमें बसे हुए है, [ड ] दोशी
वसती इसी घाटीमें ग्रन्दराव नामक जलसोतके किनारे बसी
है , [च] किलगई और खिनजान बसतिया इसी नदीके छोरमर
बसी हुई है, [] अन्दराव वसती हिन्दूकुश पर्वतके तल
और खावाक दररेके समीप बसी हुई है। मशहूर है, कि
दशौं शताब्दिमें परयानमें चादीको खानि रहनेकी वजह से
यह वसती बहुत गुलजार थी , (ज) खोज वमतो धन्दराज
और कन्दजको बीच में बनी हुई है। बादशाह वावर और
उनके वशधरोके समय यह वसती वहुत मशहर थी, (भ)
नारिन और इशकिमिश बस्तिया वघलानके पूर्च, वधसाग
नदी उहमपर और कन्दन नदीको शोराव नाम्नो शाखापर
यसो हुई है , [[ ] फरहण और चाल दोनो वसतो बदखशाकी
मरहद पर यमी हुई है और इनका हाल विदेशी ऐतिहामि-
कोंको मालूम नहीं है , (2) तालीकान वसती भी वसशांकी
सरहदपर है। यह कन्दज और बदखाकी राजधानी फेना
वादके नौचकी शाराहपर सौ हुई हैं। व्यव यह गिरी
.

अफगानस्थान-वृत्तान्त ।
.
हुई दशामें है, किन्तु पुराणी और खूब मशहर है। वमतीके
समीप एक किला भी है। चङ्गेज खाने इमका घेरा किया
था। कन्दजवाले सरावेगके शासनकालमें यह बदसशांकी
राजधानी थी,(ठ) खानावाद खान नदीके किनारे बमा है
और किसी जमाने में इम प्रान्त के रसोंका ग्रीनिवास था।
[१०] खुलम प्रदेश कन्दज यौर बलखके वीचमें है। जहांतक
मालूम है, इसके मिले इस प्रकार है,-[क] ताशकरधाा या
खुल्म बमती अघ नदीके मेदानपर बसी है। इसकी चारो
घोर जलसे सोचे हुए व्यच्छे अच्छे वाग है। इमसे ।
मौल दक्षिय कुछ गाव है। गावों और कमरेकी मिली
क्षुली जनमस्या कोई १५ इनार है, (ख] हेवक वसती किमी
कदर सुटत किल्की गिर्द बसी हुई है, बमतीके मकान
प्राय गुम्बजदार और येले बने हैं। गुल्म नदीकी घाटी
यहां खुलती है । म्यान उपजाऊ है। नदीके दोनो किनारे
फाल मृक्षोंसे छ के हैं। इसी जगह एक युद्ध स्तूप है,
[ग] खुलम नदीके सिरेपर खुर्रम यौर सरवाग नामको दो
वसतियां हैं। [११] वलख प्रदेशका बल्ख बहुत पुराना नगर
है। गगरकी चारो योर कोई बीस मीलतक खण्डर पडा
हुआ है। भीतरी नगर 8 वा ५ मोलके घेरेकी टूटी फूटी
शहरपनाहके भीतर वसा हुया "है। शहरपनाहके बाहर
खसरोंमें भी कुछ लोग वसते हैं। सन् १८५८ ई०में अमीर
दोस्त मुहम्मद खांका लडका, तुरकस्थानका गवरनर अफजल
खां अपनी राजधानी वलखसे तख्तपुल ले गया। तखतपुल
बल्खसे ८ मील पूर्व है। इस , जिलेमें मजारेशरीफ भी
--

अफगानस्थानका इतिहास , वर्णनयोग्य बनती है। वहावाले कहते हैं, कि मजारेशरीफ, मुसलमान पैगमर सहम्मदके दामाद अलोकी का है दूर दृरो सुसलमान कमका दर्शन करने आते हैं और बहा साल साल बहुत वडा मेला लगता है। नाबरी नामक लेख कका कहना है, कि कनभर एक तरहके गुलाबके पेड है। इनको रङ्गत व्यौर सुगन्विको ससार भरके गुलाव नहीं पहु चते। पहाडके भीतर बलख नदी किनारेके जिलोंका हाल अगरेज ग्रन्थकारोंको मालूम नहीं है, [रा] पाकघा वमती वलससे ४० वा ४५ मौल पश्चिम है। वसती छोटी होनेपर मो जल और मनुष्योंसे भरी पुरी है। वसती मोरचावन्द है और उसमें एक किला भी है। (१२) चहारबकलीम वा चार प्रदेशक जिले इस प्रकार है,-क शिवरघन वमती ग्रावाचेसे २० मील पश्चिम.हे। चमतोमें कोई बारह हजार उगवक और पारनी वान वसते है। बसतीके मोरचावन्द न होनेपर भी उसमें एक किला है यह अच्छे अच्छे बागीचों च्योर खेतोंसे घिरी हुई है। मिरीपुल वसतीसे यहा पानी ग्राता है। कभी कभी सिरीपुलवाले पानी रोक देते हैं। इससे दोनो धमतियों के रहनेवालोंमें युद्ध हो जाता है। यहांकी भूमि उपगाऊ और यहां के रहनेवाले हर तथा पराक्रमी है, [ख] धन्दखई शिवरघनसे बीस सील उत्तर पश्चिम रेगस्थामें है पसतोमें, मैमना चौर सिरोपुलसे जल ग्राता है। किमी जमाने में यहा कोड ५० हजार मनुय्य वसते थे। किन्तु सन् १८४० ई.मैं हिरालो यारसहम्मदके हाथसे ऐमो तबाह हुई, क अाजतका न सुधरी, [ग] मेमना वसती वलखसे एक सौ । । -

। प्राचीन इतिहास।
३२
-
च मीलके फासलेपर और अन्दखईसे ५० मौल दक्षिण पश्चिम
है। राजधानीके सिवा कोई दश गाव इसके समीप हैं। राण
धागी और गांवों की मिली जुली जनसरथा कोई एक लाख
इन प्रान्तमें रोजगार और थापार खूब चलता है, (घ) मिरौपुल
वसती वलखसे उत्तर पश्चिम यौर मेमनेसे पूच है। इसकी
जनसस्था मेमना जिलेकी अपेक्षा शुछ कम है। वसतीको
दो तिहाइ मनुष्य उनवक हैं और शेयके हमारा।
प्राचीन इतिहास।
वेलिउ माइब जरनलमें लिसते हैं,-"पाठवीं शतान्दिके
यारम्ममें अफगानजाति इतिहास में लिखी भाने लायक हुई।
उस समय यह गोर और खुरासानके पश्चिमीय किनारेपर
बनतो थी। इमी ममय या इससे कुछ पहले व्यरखोंने बफ
गान राज्यपर ग्रासमण किया। उस समय घरबोंके एक हाथमें
अगा और दूमरेमें तलवार रहती थी। इमी सरतसे उन
लोगोंने कितने ही देशोंमें सरलतापूर्लक प्रवेश करके अपना
धम्म प्रतिक्षित किया था। अमलमें उन लोगोंने अफगागोंको
। धर्म परिवर्तन के लिये उत्सुक पाया। थोडे ही समयमें जातिका
बहुत बडा भाग समुलमान पन गया।
"इस घटनाके दो शताब्दि वाद देशके उत्तरीय और पूनोय
भाग- काबुलके वर्समा प्रदेशोंपर उत्तर बोरसे तातार बादशाह
।

अफगानस्थानका इतिहास।
सुबुक्तगीनने याक्रमण किया। उनके साथ कट्टर मुसलमान
तातार थे। उसने विना विशेष कठिनाईके काबुलके प्राचीन
शासनकर्ता हिन्दुग्योंको काइलप्रान्तसे मार भगाया। सयुक्त
गीन काबुलमे जमकर बैठ गया और कुछ सालके उपरान्त
सन् ६७५ ई में उसने गजनी नगर वमाया योर उसीको अपनी
राजधानी बनाया। इसमे सन्देश नहीं कि समक्तगीनका अधिकार
प्रतिक्षित करने में व्यफगानोने भी खासी सहायता दी होगी।
कारण, एक तो वह लोग काबुलप्रान्तके किनारे गये नये
याबाद हुए थे, दूसरे, तातारोंकी तरह वह भी मुहम्मदी
धम्के व्यनुयायी थे।
सम् ८६७ ई में सुबुक्तगौनके मरनेपर
उसका पुत्र महमूद मिहासनारूप हुया। उस समय वहुस
स्मक अफगाग उसकी फौजमें भरती हुए। महमदने जिस जिस
योर व्याक्रमण किया, उसी उमी योर अफगान सैन्धन उसे बहुत
सहायता दी। विशेषत भारतवर्षपर वारवार याक्रमण करने में
अफगान सिपाहियोंने यौर ज्यादा सहायता पहुंचाइ । व्यन्तमें
अफगान सैन्य हौकी सहायतासे सन् १०११ इ.में महमूदने
दिलीपर कबजा कर लिया। महमूदने अफगान सिपाहियोंको
बहुत पसन्द किया। उमने बहुसख्यक अफगानोंको अफगान
स्थानसे भारतवर्ष भेजकर वहा उनका उपनियश बनाया। बहे
लखण्ड, सुलतान योर डेराजातमें अफगानोंके उपनिवेश बने ।
इन स्थानोंमे प्रवासी अफगानोंके वशधर याज भी पाये
जाते हैं।
"सन् १०२७ ई में महमूदकी ग्टत्यु हुई। लिग रिससे लेकर
गङ्गा किनारेतक फैला हुआ महमूदका सम्मा चोडा राण्य
.

--
प्राचीन इतिहास।
उसके बेटे सहम्मदको हाथ लगा। सहम्मद नालायक था।
उमने अपने जोडा भाई मसऊदके साथ झगडा किया। मस
जदने महमूदको सिहासनसे उतार दिया। इस प्रकार रान
घरानेमें झगडा चला चौर सागोतक चलता रहा। ग्रन्तमें
लाहोरमें सुहम्मद तामे मनुष्यने सुबुक्तगीन धरानेके अन्तिम
बादशाह खमरो मलिकको हत्याकरके यह वादशाही घराना
निर्वश कर दिया। असल में महमूदकी म्रत्यु के उपरान्त होसे
इस घरानेका पतन व्यारम्भ हुआ। उसी समयसे उसके फारम
पौर भारतवर्ष में जीते हुए प्रदेश एक एक करके स्वतन्त्र होने
लगे थे।
.
*गननोका सामान्य कुल १ सौ ८८ साल जीया। इसकी
उम्पत्तिके समय अफगान मातहत सिपाही बने। जैसे जैसे
यह मरने लगा अफगान अपने शौय्य वीर्यके प्रतापसे उमत होते
गये और घोडे ही दिनोंमें सैनिक तत्त्वावधाा करने योग्य वा
गये। यह शक्ति वह अपने ममरफमें लाये । सन् १९५०
ई. में अफगाा ग्रपो देशको गोर जातिसे मिल गये। गोर
जातिका राजकुमार मुरी व्यफगानों और गोर लोंगोकी पौन
लेकर गजनीपर चढ़ गया। गजनीपर कयजा किया और उनको
पोजसे अछी तरह लुटवा लिया। मन् १९५१ ई० में गजनवी
घरानेके बैरम मे मनुष्यने गजनी विनय किया और सुरीको
गिरफ्तार करके मग्रा डाला। इनके अनन्तर सरी भाई
अलाउद्दीने गजमीपर व्याक्रमण करके अधिकार कर लिया ।
वैरमसा भारतवर्य भाग व्याया। अलाउद्दीनने व्यपनी सैन्यसे
सात दिनोंतक गगी नगरको शुटवाया। इसके उपरात उसने

अफगानस्थानका इतिहास ।
इम नगरको द्याग लगाकर भन्मकार दिया और ध्वम गजनीपर
नया गमती नगर वमाया।
हनी नगरको यी राजधानी
वाई।
सिर्फ
"यह रानघराना घरपकालमें नए हो गया ।
वा सात बारमाह हुए। मन् १२१४ ड में महमद गोरीको ग्टत्य :
के साथ माध इस घरानेका राज्य भी मर गया। गोर घरानेका
राज्य अफगागम्यागके भीतर ही भीतर रहा और वहीं पर
हो गया। इस घरानेकी एक शाखाने भारतवर्ष विजय किया
था और सन् ११८३ ई में गोरवंशीय इबराहीम लोदीने
भारतवर्षकी उस समयको राजधानी दिल्लीपर अधिकार कर
लिया। भारतमामी इसी घरानेको पठघराना कहते हैं।
सन् १३२६ इ० में चङ्गेज खाने गौर सन् १३८८ ई० मे तैमूर लगने
भारतवर्षपर व्याक्रमण करके इन घरानेके शासनपर बडा धक्का
लगाया। न ध खानेपर भी इस घरानेको प्रमता लुप्त नहीं
हुई। अन्तमे सन् १५३५ ई.मे वावर बादशाहने गोर
घरानेको पददलित फरक दिलीपर कबजा कर लिया।
पादशाहने इससे बारह वर्ष पहले कालपर अधिकार कर
लिया था।
वावरने दिलीपर अधिकार करके भारतमे
मुगल वा तुर्क फारम घरानेके शामनकी नीव डाली। सन्
१५३० ई०मे दिलीमें वायरका देहान्त हुया और उसके
उपदेशानुसार उसकी लाश काबुल में गाडी गई। यान भी
यह काम कावुलमे मौजूद रे और अफगान उमकी वडी प्रतिष्ठा
करते हैं। मानो वह उनकी नातिके किसी साधु महा-
माको कान रे।
बावर
।

प्राचनी इतिहास। i "च्यफगानस्थान भारतवर्ष योर फारसके बीचमे । वावरकी स्टत्य के उपरान्त उधर पारसके बादशाह योर इधर भारतमन्ना टके दात अफगानस्थानपर लगे। एक जमातमा कभी व्यफगा। स्थान फरमके व्यधीन रहा और कभी भारतवर्धके । समय समयपर पारम वा भारतवर्ष में राातिक झगडे उठनेकी बहसे च्यफगास्थान स्वतन्न हो जाता था। उभी देशका कोई यादमी अफगानस्थानका शासनकाय करने लगता था। ग्रन्तमें सन् १७३६ ५० मे फारसके बादशाह शादिर शाहने अफगानम्यार फतह किया। इसके दो वर्ष बाद भारतवर्षपर व्याक्रमण किया और दिल्ली नह करके मारनसे लेकर भारतवर्षतक फारमका राज्य फैला दिया। इसी वादशाहने सन् १७३७ ई.में दिखीमे माहर कत्ले व्याम कराया था। किन्तु नादिरको धय व्यधूरी, शीघ्रता पूर्वक और बहुत रामी चौडी होती थी। इमसे वह उतनी मजबूत नहीं होती थी। सन् १९४७ ई में नादिर भारतवर्ष एटका माल माघ ऐकर फारम वापस जा रहा था। मशहद के समीप रात्रिने ममय पाद लोगोंने उसकी हत्या की और नरपिशाच नादिरने अपनी पैशाचिक पीला सम्परण की। "दिरकी म्टत्यु के उपरान्तसे अफगास्थान प्रसतरूपसे स्वतन्त्र दृया। व्यरदाल जातिमा ग्रहमद खां अफगा। मरदार था। वह नादिरको सैन्चमे जंचे टरनेपर थारू था। उस समय उसके अयो। यही मोज घी, नो भारतवर्षनो लूटका माल झारम ले ना रही थी। पादिरशाहका टाय ममाचार पाते ही अहमद साो क्यारमें नादिरके सगाोपर कमजा कर लिया। 7 घमसी सहायतासे उसने अपनेको अफगान- लूटकर और 1 अफगानस्थानका इतिहास । - इम नगरको व्याग लगाकर भमकर दिया और ध्वम गलनीयर या गणनी नगर माया। इनी नगरको अपनी राजधानी बनाई। हो गया। "यह राजघराना अल्पकालमें नए हो गया। सिर्फ छ: चा मात बादशाह हुए। मन् १२१४ इ. में महमूद गोरीको स्टत्यु, के साथ साथ इम घरानेका राज्य भी मर गया। गोर धरानेका राज्य ध्यफगानम्थानके भीतर ही भीतर रहा और वहीं नर इस घरानेकी एक शासाने भारतवर्ष विनय किया था और सन् १९६३ ईमें गोरवशीय वराहीम लोदीने भारतवर्षकी उस समयकी राजधानी दिल्लीपर अधिकार कर लिया। भारतवासी इमी घरानेको पठान घराना कहते हैं। सन् १२६३ ई० मे चङ्गेन साने गौर सन् १३८८ ई० मे तैमर लगने भारतवर्षपर व्याक्रमण करको इस घरानेके भासापर वडा धक्का लगाया। खूब धक्के खानपर भी इस घराकी ग्रभुता लुप्त नहीं हुई। अन्तमें मन् १५२५ ई.मे बाबर बादशाहने गोर घरानेको पददलित करके दिलीपर कवजा कर लिया। बादशाहने इससे बारह वर्ष पहले कावुलमर अधिकार कर वापरने दिलीपर व्यधिकार करके भारतमे सुगल वा तुर्क फारस घरानेके शासनकी नीव डाली। सन् १५३० इ०मे दिल्लीमें पावरका देहान्त हुया और उसके उपदेशानुसार उसकी लाश काबुल में गाडी गई। यह कान काबुलमे मौजूद है और अफगान उसकी वसी प्रतिया करते है। मानो वह उनकी जातिके किमी साधु महा- वावर लिया था। ग्राण भी माफी कम है। 1

! प्राचनी इतिहास।
"अफगास्थान भारतवर्ष और फारसके वीचमे है। वावरकी
सत्य के उपरान्त उधर फारसके बादशाह और इधर भारतसम्रा
टके दांत अफगानस्थानपर लगे। एक जमातक कभी अफगान
म्यान फरसके अधीन रहा और कभी भारतवर्षके । समय समयपर
मारम वा भारतवर्षने राजनीतिक झगडे उटनेकी वजहसे
व्यफगानस्थान खतन्त हो जाता था। उसी देशका कोई
यादमी अफगानस्थानका शासनकार्य करने लगता था। अन्तमें
सन् १७३६ ई.मे फारसके बादशाह शादिर शाहने अफगानस्थान
फतह किया। इसके दो वर्ष बाद भारतवर्षपर व्याक्रमण किया और
दिल्ली फतह करके मारमसे लेकर भारतवर्षतक फारसका राज्य
शिक्षा दिया। इमी बादशाहने सन् १७३७ ई. में दिल्लौमे मशहर
कतले ग्राम कराया था। किन्तु नादिरकी जय अधूरी, शीघ्रता
पूर्वक व्यौर बहुत लम्बी चौडी होती थी। इससे वह उतनी
मजबूत नही होती थी। सन् १७४७ ई. में नादिर भारतवर्ष
लूटकर और एटका माल साथ लेकर फारस वापस जा रहा था ।
मशहदले समीप रात्रिने समय पुछ लोगोंने उसकी हत्या की
और नरपिशाच नादिरने अपनी पैशाचिक लीला समरण की।
"दिरको ग्टत्यु के उपरान्तसे अफगानस्थान प्रकृतरूपसे स्वतन्त्र
हुया। अवदाल जातिका ग्रहमद खा गफगाा सरदार था।
वह नादिरकी मैन्यमे जचे दरनेपर या था। उस समय
उपके घ्यधरेन वही लोग थी, जो भारतवर्यको लूटका माल फारम
'ले ना रही थी। नादिरशाहका न्याय ममाचार पाते ही
ग्रहमद माो क्यारमें नादिरके मगानेपर वना
लिया। इस घपकी सहायतासे उसने अपनेको अफगान
कर
(

३६
अफगानस्थानका इतिहास।
म्यागका बादशाह प्रसिद्ध किया। उस समय कन्धार प्रान्त
अबदाल नातिले अफगान वसते थे। उा भजने ग्रहमद शाहका
प्राधान्य स्वीकार किया। इसके उपरान्त ही हमारा भावि
पौर बसूचियों भी अहमद शाएको व्यपना बादशाह माना।
एक दिन कन्धारक ममीप यथाविधि अहमद शाहका राण्या
भिषेक हुन्या। प्रशाने उमको धधमद शा दुर दुरागकी
उपाधि दी। सो उपरान्त उसने एक नया नगर बसाया।
"अहमद पाही' या 'अहमद शहर उसका नाम रखा।
शहर नये वादशाहकी राजधानी बनी। पिर
उसने व्यन्तरस्थ और साधरी भगडोसे विगडे हुए देशक
बनानेकी योर ध्यान दिया। च्यपी सट हाथमें मुहर
रूपसे गनदण्ड धारण किया। इसी नीति अवलम्बसे वह
देशको बहुत कुछ सुधार सका।
अमलमें गहमद शाही शासनकालमे अफगानस्थान
सेकड़ों सालसे चलते हुए वारी और भीतरी भगोंसे माग्न
"हुन्धा। यह पहलीबार एथक देश बना और उसने ऐसी स्वत
न्यता माई, नेमी और कभी नहीं पाई थी। कोई २६ सालतक
उत्तम रीतिसे शासनकाय करके, मन् १७७३ ३०में अहमद
शाहने शरीरत्याग किया। वह गया और उसके साथ साथ गये
माम्बाज्यको सुख शाति भी चली गई। उसके बाद उसका
तेर लिहतानारुट हुमा। सन् १७६३ ईमें उसकी
दत्य की उपरान्त उसका पुत्र अमान शाइ राज्याधिकारी बना।
नमान शाह अपने पिताको तरह लक्ष्यभर, दुर्चलचित्त और
अत्याचारी था। इसके प्रतिइद्रियोंने इमको अपने चक्र में
.

प्राचीन इतिहास। 7 । प्रसाया। सौतेले भाइ महमूदने उसे राज्ययुत तथा अन्धा करके के वानेमे डाल दिया। अनन्तर अभागे जमानशाइके भाई शुजाउलमुल्कने अपने भाईका बदला महमदसे लिया। उसने उसे मिहामनसे उतारकर कैद कर दिया। "शुजाउलसुल्क वा शाहशुजाको सिहासनारूप हुए बहुत दिन नहीं बीते थे, कि देशमे बलवा हुया । वारकगई जातिका सरदार फतह खा बलवाइयों का सरदार बना। शाहशुजा वल वाइयोंसे इतना दुखी यौर भीत हुया, कि सन् १८०६ ई० में अपना राज्य छोडकर भारतवर्ष भाग याया। भागा हुव्या बादशाह पहले मिसौकी शरण गया। पञ्जाबकेशरी रणजित सिंह उस ममय मिखोंके महाराज थे। मशहर है, कि महा रानने पदद्युत बादशाहके साथ सुव्यवहार नहीं किया। याण जो सुप्रमिड 'कोद्देसूर' नामे हीरा हमारे राज : गधर मातम एडवर्ड के पास है, वह उस ममय शाह शुनाके माम था। कहते हैं, कि मिखनरेशने शाह शुनासे यह हीरा छीा लिया। इमसे हृदयभान होकर शाहशुजा अगरेजीके पास चला याया। उस ममय बागरेजोकी सरहदी शनी लोधियामेमे थी। वहीं शाहशुजा सिसोफे राज्यसै भागकर व्यगरनीकी शरण व्याया। उधर शाह शुजाके अफगानम्याामे भाग यानेके उपरान्त महम्मद कैदखानेसे छूटा। बलवाइयोले सरदार फतह साके उद्योगसे अफगानस्थानका बादशाह बा। उसने फतह खामो यमा पनीर बााकर उनकी खिदमतका बदला दिया। इमो थोडे ही दिनों बाद फतह खो मतीनो दोस्तमुहम्मद खां - , 11 ४ ३८ अफगानस्थानका इतिहास । - - व्योर कुहनदिल खाको काउल और कन्धारका गवरनर यथाक्रम जगाया। फतह खाकी वाती हुई शक्ति महमूहके , वेटे युवराज कामरानको काटा बनकर खटकी। सन् १८१८ ई में गजनी शहरके समीप हैदरखेलमें फतह खा बुरी तरह मारा गया। अमीर अब्दुरहमान व्यपने तुनुकमें इस वजीरकी प्रशसा इस प्रकार करते हैं, "विलायतके ग्रल च्याफ वार्कको 'बादशाह बनानेवाला' की उपाधि दी गई थी, किन्तु यह विचित्र पुरुप वहुत ज्यादा वादशाह बनानेवाला' कहे जानेके योग्य है। वह अफगानस्थाके इतिहासमें कोई १८ मालतक छ व्यासनपर ग्रामीन था। अमौर इसकी स्टत्यु के विघयमें इस तरह लिखते हैं, "माह शुगाफे परास्त होनेके उपरान्त वनौर फतह खाने शाह महसूदके राज्यका शामन करना घरम्भ किया। गपने स्वामीके लिये हागो फौरोजसे हिरात छौना व्यौर ईरानियोंने जब उस नगरपर याक्रमण किया, तो उमे रोका। इस ग्राक्रमणका कारण यह था, कि ईरानी उस नगरका राजकर वसूल कराा और वहां व्यपना सिका चलाना चाहते थे। इस सेवाका वदना यह मिला, कि उम प्रभागे, कृतमी, कर्तव्याकत्तय ज्ञानशून्य शाह महमूदने अपने दगाबाज बेटे तथा अन्यान्य माघ्योंक कहनेसे फतह खाकी ग्राखे निकलवा डाली। फिर जब वनीरने अपने भाइयोंका हाल बताने और उनका भेद खोलनेसे इनकार किया, तो एक एक करके उनके व्यङ्ग प्रत्यङ्ग कटवा डाले। उसी मनुष्यको इतनी दुर्दशा की, जिसकी बदौलत महमूदने दुपारा राज्य प्राप्त । किया था। इस प्रकार इस अदितीय मनुष्यका अन्त हुया।" . - प्राचीन इतिहास। । इम गन्दे कामसे महमके मोते हुए शव, जागे। उधर मारे गये वजीर के समन्वो भी बिंगड सई हुए। फतहखाके बीस भाई थे। उनके नाम इस प्रकार है,-'महम्मद याजम खा, तैमर कुली खा, पुरदिल खा, शेरदिल खा, कुहनदिल सा, रहमदिल सा, मिहरदिल खां, यता मुहम्मद खा, सुलतान सुह- म्मद सा, पीर सहम्मद खा, सईद मुहम्मद खां, अमौर दोस्त सहम्मद खा, सहम्मद खा, सहम्मद जमान खा, जमीर खा, दर खां, तुरंहवान खा, लुमा सा और खैरलह खा । यह वीमो भाई शाह महमूद और उससे लडके कामरानसे विगड गये। टेशमें वदअमली फैल गई। चारो योर मार काट और लूट होने लगी। इसका फल यह हुअा, कि व्यफ- गानस्यानमे चारो तरफ बगावत फैल गई। सरदारोंने देश के टुकडे टुकड़े पर कवना कर लिया और एक सरदार कैमरेको नीचा दिखानेकी घातमें रहने लगा। इम दुर्घटनाके उपरान्त शाह महमूद हिरात चला गया। मिर्फ यही देश उनके पाम रह गया था। यहां कुछ साल रहकर उमी शगेरत्याग किया। इसके बाद कामगा अपने पिताके आमनपर यासीन हुया और केवल हिरात प्रदेशका रान्य करने लगा। इमने कई मालतक व्यन्यायपूर्वक राज्य किया। यासिर मन् १८४२६० में इसमें वजीर यार मुहम्मद सांने अपो बादशाह कामरानकी हत्या की और स्व मिहामन पर बैठा। यह स्वामिहन्ता अलिफोनई जातिका कला था। घर फमह खांकी मृत्यु के उपरान्त ही मारे गये वजीर फतह खा भाइ कुहनदिल खाने कन्धारमर कवजा कर लिया। - .

४०
अफगानस्थानका इतिहास ।
1
.
उसके भाई पुरदिल खा, रहमदिल खां और सिहरदिल खां भी
उसके साथ थे। फतह खाके छोटे भाई दोस्त मुहम्मद खाने
काबुलमर कवजा कर लिया। देशका वाकी भाग, जेमा इम
ऊपर लिख चुके हैं,-मिन मिन्न जातियोंके भिन्न भिन्न
सरदारोंके हाथ लगा। मन् १८३६ ई. तक अफगानस्यानको
ऐसी ही दशा रही। ऐसे ही समय अगरेन महारान
शाहशुनाको काबुनकी गद्दी दिलानेके लिये अफगानस्थानमें
घुसे। इमी नमानेमें प्रथम अफगानयुद्ध हुया और इसी
जमानेसे व्यफगानस्थानका ध्यान देने योग्य मनोहर इतिहास
च्यारम्भ होता है।
प्रथम अफगान-युद्ध ।
किन्तु इतिहासका मिलमिला जारी करनेसे पहले अगरेज
अफगान सम्बन्धक विषयमे थोडीसी बातें कहना चाहते है।
ग्रान जिम तरह रूम भारतपर याक्रमण करने और उनको
ले लेनेकी घातमे लगा हुया है, कोई सौ साल पहले,
उन्नीसवी शताब्दिके प्रारम्भमे फ्रान्स भारत भाग्यका विधाता
बननेको चेप्टाने लगा हुया था। फलतः ग्राज अगरेज महा.
रान जिस तरह रूसका स ह फेरनेको रय्यारीमें लगे हुए हैं,
उनीसवी शताब्दिक प्रारम्भमें उन्हें फ्रान्सोमियोंको भारतसे
दर रखनेकी चिन्तामे फमना पड़ा था। उस जमानेमे शाह
जमा अफगानस्थानका बादशाह था और वह पन्नाबपर वार
7

प्रथम अफगान-युद्ध
।
५१
८५
बार व्याक्रमण करता था। ग्रङ्गरेनोंको शाहेजमानको व्योरसे
भी थोडी बहुत चिन्ता थी। इम प्रकार गाा रानीतिक
कारणोंसे वाध्य होकर उस ममय अगरेज महाराजने ईरानसे
मन्यि को। मन् १८०१ ईक जनपरी महोने में अगरेजोंके
रानढ़त मेलकम 'साहबने ईरान जाकर ईराापति फतहयली
पाह- सा की। नर अफगानमें मयिकी जो नकल प्रकाश
की गई है, वह इस प्रकार है-
“(१) अफगानस्थानका वादशाई यदि अगरेजोके अधीन
हिन्दुस्थानपर चलाई करें, तो ईरान एक सा सेन्च भेनकर
व्यफगानस्थानको नए कर देनेकी चटा करेगा।
(२) अफगानस्थानका बादशाह यदिईरागसे सन्धि करे, तो
उमको इस बातको प्रतिज्ञा करना होगी, कि हम व्यगरेनोंसे
घुद्ध न करेंगे।
(३) अफगानस्यान अथवा फाम यदि ईरानपर चलाई
करेगा, तो व्यगरेण लोग ईशाको व्यस्त्र शस्त्रसे यथोचित
महायता देंगे।
(४) मास यदि ईरानके किनारेके पास किमी टापूपर पैर
जमाना चाहेगा, तो अगरेगोंको मैन्य उसे वहासे भगा देगी।
कोई पान्दोसी यदि इरानमें पा इरानके अधीन किसी टापूमे
। वसना चाहेगा, तो ईरान सरकार उसको वसनेको व्याज्ञान
देगी।
(५) ईरान यदि अफगानस्थानपर व्याक्रमण करेगा, तो
अगरेन, इरान और अफगानम्या दोन किमीका भी साथ 1
देगे। दोनो बादशाह यदि मयि करानेके लिये गरेजोंको

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अफगानस्थानका इतिहास !
।
मध्य थ बनाना चाहेंगे, तो अगरेज वन गे।"
इम सन्धिके उपरान्त मान्य के सुप्रसिद्ध सम्राट नेपोलियन
बोनापाटने रूसको परास्त किया। फिर रूस और फ्रान्मम सन्धि
हुई। दोगो देशके समाटोंने मिलकर भारतपर याक्रमण कर,
नेकी सलाह को। मन् १८०७ ई० मे फान्सोसियोंने भी ईशनसे
सन्धि की। इस सन्टिकी नकल "नासिखल तवारीख में प्रकाश
हुई थी। नैरों अफगानने उसीकी नकल इस प्रकार की है,
सन्धि पत।
-
(१) शाह ईरान ग्राला हजरत फतह अलीशाह काचार ।
और हिन इम्पीरियल मेनेष्टी मान्स सम्राट् इटलीराम निपो
लिया वोनापार्ट मरके निमित्त सन्धि करते हैं। दोनो मरमति
पारस्परिका प्रेम स्थिर रखनेकी चेया करेंगे और दोनो राज्यों में
मदेव सत्य ममन्य रहेगा।
(२) फान्स सम्बाट ईरानसे प्रण करते व्यौर जिग्मेदार
होते हैं, कि इन मन्धि मन के उपरान्त हम कभी ईराामे उप
'द्रव न करेंगे। कोई दूमरी शक्ति जब ईरानपर आक्रमण
करेगी, तो मान्य सम्राट ईरानके साथ होकर वेरीको मार
भगानेको चेचा करेंगे। इस विषयमै कभी बेपरवाही और
स्वार्थसे काम न लेंगे।
(३) मान्स मबाट गुरजस्थान देशको ईरााका मानते हैं।
(४) मान्म मबाट इरानको गुरजस्थान यौर ईरानसे
रूमियोंके निकालने में यथोचित
सहायता देंगे।
ন
उपरान्त नव रूस और ईरानमें सन्धि होगी, तो सन्धि यथा
शिवम करा देनेमे फान्स सन्नाट ईरानको सहायता देगे।

। प्रथम अफगान-युद्ध। . . . (५) मान्स सरकारका एक राजदूत ईरानमें रहेगा और प्रयोजन उपस्थित होनेपर इरान सरकारको सलाह देगा। (६) ईरान यदि चाहेगा, तो फान्स सम्राट ईरानी सैन्यको युरोपको युद्धविधा सिखानेका प्रबन्ध कर देंगे और इरानी किलोंको युरोपोय किलोंके उगपर वनवा देंगे। ईरानकी इच्छा होनेपर फान्स सम्बाट युरोपको तोपें चादि भी ईरानमें भेष देंगे। ईरागको ग्रन शखका मूल्य देना पड़ेगा। (७) ईरानके शाह यदि अपनी फौजमें मान्मीमी व्यफसर नियुक्त करना चाहे गे, तो कान्य मन्त्राट उनके पास व्यफमर योर उहदेदार भेन देंगे। (८) फान्मको मसीके खयालसे ईरागको उचित है, कि व्यारेजोंको, , शन, ममझी। उन्हें भगानेसी चेसा करे। ईरा. नके जो राजदूत भारतवर्ष और इङ्गलण्ड गये है, ईरानकी उन्हें वापस बुलाा चाहिये। इङ्गलण्ड और ईए इण्डिया कम्पनीको योरसे जोडून ईरागमें हैं, ईरानको उन्हें निकाल देना चाहिये। ग्रङ्गरेनोंकी सम्पत्तिपर अधिकार कर लेना पाहिये और उनका जल और स्थलका व्यापार बन्द कर देना चाहिये। इसके व्यतिरिक्त इस विषयका एक याचामन निकालना चाहिये, कि मिलायतका जो दूत इरान ध्याना चाहेगा, वार याने 7 पावेगा। (६) भविष्यमै रुम व्यौर इङ्गलण्ड मिलकर यदि ईराम वा फ्यान्सपर चलाई करनेकी घेया करें, तो ईरान और मान्य मिलकर उन्हें भगाने की कोशिश करेंगे। रूस और घर 1- - - १४ अफगानस्थानका इतिहास । । रेव मिलकर यदि किमी शक्तिपर चालाई करें, तो ईरान यौर फान्स मिलकर उनके रोकनेकी फिक्र करेंगे। (१०) ईरान अपनी सैन्य तय्यार करे और निदिए समय- पर भारतके अगरेजी राज्यपर अधिकार करनेके लिये भारतको च्योर रवाना हो। (११) जिस भमय फान्सीसी जहाज ईरानके समुद्र में घ्यावे, तो ईरानको उन्हें हर तरहकी सहायता देना पडेगी। (१२ फान्स-सम्राट जब भारतपर व्याक्रमण करने के लिये अपनो फोन स्थल मार्गसे ले जाना चाहेगे, तो शाह ईरानको अपने देशमें फान्मामी सैन्यको राह देना पडेगी। ईरानी मन्च भी दूम सैन्यके साथ हो लेगी। जब कभी ऐसा समय उपस्थित होगा, तो फान्स मन्बाट ईरान-सम्राटसे यौर एक मन्यि कर लेंगे। (१३) ईरानके लोग समुद्र किनारे व्यथवा देशके भीतर पान्मोसियोंके हाथ व्यपना माल और रसदका मामान वेच नेमें मोच न करें। १४) अपरके बारहवे नियममें ईरानने फान्सके माथ जो प्रण किया है, वह वही प्रण ईरान रूस वा जलाडके साथ म कर सकेगा। (१५) दोनो देशोंमें यापार सम्बन्ध में भी एक मन्नि की जायेगी (१६) चार महीनेमे इस सन्धिमनपर फ्रान्स मबाट और शाह ईरानको सहरें लग जावेगी। दो मुहरदार मन्धिपत्र तय्यार किये जायेंगे। एक मान्म सबाट गौर दूसरा शाह फान्स के पास रहेगा। । । १ - -

प्रथम अफगान युद्ध।
४५
।
नैरङ्ग अफगानमें लिखा है, इस कान्हीसी सन्धिसे
गलगडकी सन १८०१ वाली सन्धि कुछ न रही। इरानमें
फ्रान्सका प्रभाव बछ गया। सन् १८०२ ई.में भारतके गपरनर,
जनरल लार्ड मिण्टोने जव मलकम साहवको दुबारा ईरान
भेजा, तो ईरानियोंने उनको बुशहरसे आगे वाानेको यात्रा
न दी। ईरानमें फान्सीसी प्रभाव फैल गानेसे लहन और
भारतवर्ष में हलचल पड गई थी। जब ईरानियोंने मलकम
माहपके साथ ऐसा यवहार किया, तो वह हलचल और
वट गई। इसके उपरान्त ही इङ्गलण्डने हरफर्ड साहवको
व्यपना दूत बनाकर ईरान भेजा। मलकम माहव तो ग्रागे
बात न सके थे, किन्तु हरफई साहन देखटके व्यागे वार गये।
इस अवमरमें और एक दुर्घटना हुई। फ्रान्स और ईरानमें
'नो सन्धि हुइ थो, उसके तोमरे और चौथे नियममै रुसको।
इराासे किालनेको वात कही गई थी। यह शियम ईरा
नकी योरसे किये गये थे। किन्तु फान्मसे और रूससे मैत्री
हो चुकी थी। इसलिये पलान्य इन विषयोंको स्वीकार करने में
मोच कर रहा था। इसलिये फान्म और ईशाके सन्धि
पत्नपर हस्ताक्षर नहीं हो सके। फान्सीसी मिशन इरान
राजधानी तिहरानसे वापम चली गई। एमके उपरान्त
इरानमें इङ्गलराटको अपना प्रभाव को लानेका ममय मिल गया।
ईरानी मन्त्री मिरजामुहम्मद शफी द्यौर हरफर्ड साहवने
मिल जुलकर एक या मन्धि पत्र तय्यार किया ।"
इसके उपरान्त मान्यको साथ साथ रूस भी भारतवर्षपर
ग्राकमया करने की धमकी देने लगा। कारण, वह उस समय

अफगानस्थानका इतिहास ।
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मध्य एशिया पार करके अफगानम्थानकी मीमाके समीप पहुं
रहा था। इसलिये सन् १८०६ इ.मैं । अगरेजोंने ईशा चौ
'अफगानस्थान दोगोंसे मन्धि की। मन् १८०६ ई० में शाहशुन
काइलका अमौर था। ग्रनरेगोंने एलपिएन साहब
शाहशुनाके पाम मन्धिके लिये भेजा था। यह पहले महत
अगरेजों और व्यफगानोका सम्मन्य हुया था। इसके उपरान्त
सन् १८१५ ई०मैं मान्य के वाटरलू स्थानमे मबाट नेपोलियनक
पतन हुआ। नेपोनिया-पतनके उपरान्तसे ग्रजरेन फ्रान्चक
व्योरसे निश्चिन्त हो गये। उन्होंने ईरानके साथ भी उतन
मेल जोल रखनेकी जरूरत नही देखी। उनको सिर्फ रूमक
खटका रह गया। हम व्यफगानम्यान होकी राहसे भारतप
चाई कर सकता है। इसलिये अगरेजोंने ईरानको छोड़कर
अफगानस्थानको योर अधिक ध्यान दिया।
रूमके भारतवर्षको अोर धीरे धीरे बाहनेके विषयमें लाई
राबर्टस अमारे पुस्तक "फार्टीपन इधर्म इन इण्डिया में इस
प्रकार लिखते हैं,-" कोइ दो सौ माल पहले अगरेजोंके
पूचीय राज्य योर मराज्य में कोई चार हजार मीलका
यन्तर था। उम समय रूसकी सबसे आगे बाहर हुई चौकी
योरनवर्ग और मेटरोपावलस्कमें थी, इधर इङ्गल एट दचि
णीय भारतके समुद्रतटपर अनिश्चित रूपसे पैर जमा रहा था।
भारतवर्षमे सिर्फ फान्स हमारा प्रतिद्वन्दी था।
हमे मिन्धकी योर वाज्नेका उतना ही कम खयाल धा, जितना
रूसका यक्ष नदीको योर वाउनेका ।
"तीस सालके उपरान्त सौ सालके परिश्रमके उपरान्त रूस
उस समय

प्रथम अफगान-युद्ध । -- किरगिज इडप करता हुया व्यागे याने लगा। इधर इङ्ग- लण्ड भी तिचिन्त नहीं बैठा था। उसने बङ्गालपर अधिकार किया, मन्दाजमें प्रेसिडेन्सी स्थापित की और बम्बईको प्रयोग नीय वमती यमाई। इस तरह दोनो शक्तियोंके यागे बापनेसे दोनोका फासला चार हजार मोलसे घटकर सिर्फ दो हजार मील रह गया। } "यव हम लोग जल्द जल्द तरक्की करने लगे। उधर रूम एका गैरयावाद रेगस्थान पार कर रहा था। हम लो । गोंने यवध, पश्चिमोत्तर प्रदेश “युक्तपदेश, करााटक, पेशवाके राज्य, सिन्च और पल्लाबपर क्रम' अधिकार किया। सन् १८५० ०तक हमारा अधिकार मिन्वादक पारतक पहु च गया। "उधर रूम रेगस्था पार करके व्यरल झील और मिर दारि याके ममीम अरलस्क स्थानतक पहुंच गया। इम' तरह एशियामे दो बानी हुई शक्तियों के बीचमें सिर्फ एक हजार मीनका मामला रह गया। पाठकोने देख लिया, कि यन्नरेन रूमको योरसे यका ग ही सगा नहीं । एक ओर तो रूम बम गानम्यानपर और दुमरी घोर फारमपर अपना प्रभार डालना चाहता था। सन्नाट नेपोलिया नमानेमें ईशापर रुमका ग्रमर गम नही सका। हमने ईरानसे युद्ध करके रंगारी सिर्फ कद्र म्यागपर अधिकार कर लिया था। किन्तु पोलिगमा पान होनेके उपरान्त होसे उसने ईराापर व्यपगा असर जमाया। मन् १८३७ ई में रूसने अवरोधसे ईरानो दिरात घेर लिया। इसके उपरान्त हो इसके लिए 1 + ४८ अफगानस्थानका इतिहास । . रानस्थ राजदूतने कप्तान विटकेविचको काबुल भेजा। वजीर फतहखाने भाई दोस्त सहम्मदखा उस समय काबुल के शासक थे। रूसो कप्तान विटकोविच अमीरक, पास चिट्टी लेकर पहुचे। चिट्ठीमें जारने लिखा था, मैं आशा करता ह, कि भारतपर याक्रमण करने में ग्राम मेरा और ईरानका माथ देगे। अगरेजोंने ल्सको इच्छा पहले हौसे समझ ली थी इमलिये भारतके गवरनर जनरल लार्ड याकलण्डने सन् १८३० ई में कप्तान वररोसकी प्रघातामें एक मिशन काबुल भेज दी थी। रूसदूत विटकेविच सन् १८३७ ई के अन्तमै काबुल पहुंचा। वरनेस साहब उससे तीन महीने पहले काबुल पहुंच चुके थे। प्रत्यक्षमें तो यह कावुल मिशन अफगानस्थानसे यापार सम्बन्धी भन्धिके लिये गई थी, किन्तु यथार्थमे इसका व्यभिनाय यह था, कि काबुलमें रूमकी प्रभाव प्रतिपत्ति रोके। इससे कुछ पहले पञ्जावपति महाराज रणजितसिंहने अफगानस्थानके परिश्रमीय भागयर और उनके काश्मीर देशपर अधिकार कर लिया था। अगरेजोंकी मिशन जव काबुल पहु ची, तो अमीर दोस्त सहम्मदने उ मकी बडो खातिरदारी की। कारण, अमीरको व्याशा थी, कि अगरेन हमसे मिलकर हमें हमारा छिना हुया देश सिखोसे वायम दिला देंगे। अगरेजोसे मैनो करने सयाल हौसे अमीर दोस्त मुहम्मदने ल्सद्भुतते कावुल पहुंचनेपर भी उससे अठवारोंतक मुलाकात नहीं की। इमसे रूमदूत कुछ उदास भी हो गया। ६ 1 '- प्रयम अफगान-युद्ध । -- । -- किन्तु यमौरती यान्तरिक व्याशा पूर्ण नही हुई। ग्रङ्ग रेज मिसोको छेडकार लडना झगडना नहीं चाहते थे। इमलिये उन्होंने निसोंसे अमानत्याका देश वामम दिला नेका वादा नहीं किया। इतना ही नहीं, यमीर 'दोस्त सहम्मदी ध्यङ्गरेनोंसे जब यह कहा, कि हम जब हम और इरानसे मन्धि न करेंगे, तो खूब मम्भर है, कि दोनो शक्तिमा हमपर चालाई करें। ऐसी दशामें क्या व्याप हमें अख शलकी सहायता देंगे और हमारे दुर्ग सुत कर देंगे ? अगरेजोंने इमसे भी हाकार कर दिया। अगरेजोका यह उत्तर पाकर अमीर 'दोस्त मुहम्मदने रूसदूत विटकी विचको योर ध्यान दिया। उनपर इतनी दया प्रकाश उप्तकी पिछली उदासी मिट गई। वाम मा १८२८ ०को । अन्तपश्यत्त काबुल रहे। इनके उपरान्त उन्होंने भाग वापस आकर भारत मरकारको समा. चार दिना, कि अमीर पूर्ण रूपसे रूमने तरफदार हैं। इसपर पितायती सरकारने भारत गरनर जनरलको लिखा, कि दोल नुहम्मदको कावुन सिहानगपर बैठा रखा उचित रही। कारण, वह हमारा विरोधी है। उनकी जगह वह अमौर बैठाना चाहिये, नो हमसे मिला रहे। अफगार युद्ध होने का यही कारण था। कितीही अगरेजाने टिश सरकारका यह काम पमन्द नौं किया। “कपार कम्पन' यानी पुस्तकमें मेवर एण लिखते है-*गमीरने का पररोममे अपने दिनको बान साप मा भुनाई । किन्तु वरनेसको राजनीतिक विष को, कि . - । । प्रथम - - 4

अफगानस्तानका इतिहास।
यपर बातचीत पारनेका अधिकार नही दिया गया था।
अमीरने यारेजोके साथ मम्बन्ध स्थापन करने में व्यारेजोंने
सहायता लेने के लिये यथाशक्य चेष्ा की। यह पेठा कर
नेके समय रूम दूतको मुंह गही लगाया। जब उमने देखा,
कि लार्ड व्याकलण्ड किसी तरह नहीं पसीजते, तो उसने
व्यपनेको उसकी गोदमे डाल दिया। विटकोविचने आमीरको
रुपये देने, हिरात दिला देने और रणजित खिसे बातचीत
करनेको ग्रामा दिलाइ । यमीरको इच्छासे उमने कन्वारके.
शाहगादोंसे बातचीत को। कन्धारके शाहजादों और
अमीर काबुलमें मयि हो गई। शाहनादोंने 'अमीरको
सैनिक सहायता देनेकी प्रतिज्ञा की। रूसकी शयामें व्यफ
गानस्थान और फारसका सम्बन्ध हो जानेसे भारत सरकार
डरी और उसने इस विषयमे उचित कारवाई करनेका हर
सकप किया।
उस समय लिपरल दल प्रधान था। हमारे
मानीय करनेल मेलेसन उस समयकी काररवाईपर तीन
कटाक्ष करते हैं। वह कहते हैं, कि लिवरेज दलको उस
समयकी काररवाई ध्यान देने योग्य घो। उनका कहा है,-
'उन लोगीने उस शासकको पदच्युत करनेका सङ्कल्प किया,
जिसो मोदाइयोंको फेलाई हुई अशान्ति दवाकर देश मे,
शान्ति स्थापित की थी। उनकी जगह एक ऐसा शासक
नियुक्त करना चाहते थे, जो शान्तिके समय भी यफगानस्थानका
शासन नहीं कर मका था। उनके व्यफगानस्थान चले छान्के
उपरान्त वारयजई सरदारीने व उस्को फिर वापस बुलाया,
तो उसने ऐसे ऐसे नियम करना चाहे, जिससे प्रमाणित हुया,

। प्रथम अफगान-युद्ध। कराने वडे बनवसे भी वह न तो कुछ भूला और न सीख व्यगरेजोंने काजुलपर चापाई करनेसे पहले सन् १८३८ ई.के जून महीनेमे रणनितसिह ब्योर शाहशुजासे एक सन्धि की । सन्धिपत्रपर महाराज रणजितसिंह, शाहशुजा योर गवर- गर जनरल ग्रापालगड माहवने हस्ताक्षर किये। मेरङ्ग व्यफ में यह सम्धि इस प्रकार प्रकाश की गई है। (१) शाहशुजा ध्यानी घोरसे और अपने जातिवालोंकी प्योरसे सिन्धकी दोनो योरके देशोंको छोडते है। उमपर मिखारपतिका अधिकार रहे । छोडे हुए स्थानोंके नाम इस प्रकार है, (क) काश्मीर प्रदश (ख) ग्रटक, झज्जर, हजारा, कैथल और अम्मले किले, (ग) यूसुफा गई, खटक, इतनगर, मची चोर कोहाटके माघ पेशापर जिला। इसमें वर दररा, वजीरस्थान, दोरेगानक, मााक और कालाबाग शामिल है, (घ) डेराजात, (ड) च्यमठन चोर उसके पामके इलाके , और (च) समताा जिला। शाहशुना ग्रंब इन जगहोसे किसी तरहका वास्ता न रखेगे। इन जगहोंके । मालिक महारान हैं। (२) जो लोग खेवर घाटोकी दूसरी योर रहते हैं, वह पाटीकी इस ओर ग्राकर चोरी या लूट पाट न करने पायेंगे। दोगो गज्योंका कोड बाकीदार यदि रुपये हजम करके एक राज्यसे दूसरे राज्यमे चला नावेगा, तो शाह शुजा और महारान गजितसिह दोनो नरपति प्रण करते हैं, कि उन्हीं एक टुमरेको दे देंग। जो नदी सैवर दररेसे निकलकर - , - ५२. अफगानस्थानका इतिहास । . फतह गा में पानी पहुचाती है, दोने बोइ नरेश उसको रोकगे। (३) व्यगरेज सरकार और महारागमे गो सन्वि हो चुकी है, उसके अनुसार कोई मनुध्य बिगा महारानका परवाला लिये मतलजके बाये किनारेसे दाइने किनारे नहीं जा सकता। सिन्धनदके विषयमे भौ, जो सतलजसे मिलता है, ऐना ही समझना चाहिये। कोई मनुष्य विना महाराजको अाज्ञाके सिन्धन पार न कर सकेगा। (४) मिन्धनदके दाहने किनारेके मिन्ध यौर शिकारपुरको वस्तियोंके विषयमे महाराज जो उचित समझेगे, करेंगे। (५) जव शाह शुजा कन्वार और काबुमर व्यपना कवना कर लेंगे तो महाराजको प्रतिवर्ष निम्नलिखित चीजे दिया करेंगे, सने मजाये सुन्दर घोडे ५५ , ईरानी तलवार और खञ्जर ११ , सूखे और ताजे मेवे , अहर, गगार, सेव, हीन बादाम, किशमिश और पिशता रके रे, रङ्गवा है माटनके थाा, चुरो, समूर , किमखाव और सुनहरे रुपहले इरानी कालीग एक सौ। (६) पत्र यवहारमें दोनो योरसे बरावरीका बताय किया जायेगा। (७) महाराज देशके यापारी साफगानस्थानमे गौर ध्यफगानस्थानके पापमें वैगेकटोक थापार किया करेगे। (८) प्रतिवर्ष महाराज शाहशुनाके पास मित्रभावसे निम्नलिखित चीज भेजा करेंगे, दुशाले ५५ , मलमलो पान २५ , दुपट्टे ११, किमसावा घाण ५, रूमाल ५, पगरी योर पेशावरक वारविरन ५५ ॥ , - ५

प्रयम अफगान युद्ध ।
પર
.
(1) महाराजका कोई नोकर यदि ग्यारह हजार
रुपयेतकका माल खरोदने अफगानस्थान जावे वा शाहका नौकर
उतने ही रपयेका माल खरीदने यदि पञ्जाव यावे, तो
दोनो घोरकी सरकारें ऐसे नौकरोंको खरीदने में सहायता
-
(१.) जव दोनो योरकी सेन्य एक जगह जमा होंगी, तो
। पहा गोवध न होने पविगा।
(११) शाह यदि महारानको सैन्यसे महायता लें, तो लूटका
जो माल मिलेगा, उममें व्याधा महारानको सैन्यको देना होगा।
यदि शाह बिना महाराजको चैन्यकी सहायताके वारकजइयोंको
सूटें, तो लूटका चाचा भाग अपने नौकरोंकी मार्फत महारानके
मास मेज दें।
(१२) दोनो योरसे वरार पत्र व्यवहार होता रहेगा।
(१३) महारानको यदि शाही सैन्यका प्रयोजन होगा, तो
माह किमी बड़े अफसरको अग्रीनतामें सैन्य भेजनेका वादा
करते हैं। इसी तरह महाराज भी अपनी सतनमान पौन
किसी बडे व्यफभरकी अधीनतामें काबुज्ञ भेन देंगे। जब
महाराज पेशावर जाया करेंगे, तो शाह किसी शाइनादेको
महाराजसे मिलने लिये मना करेंगे। महाराज शाहनादेके
पद के व्यनुसार उसका यादर सत्कार करेंगे।
(१४) एक मिन और शव, दूसरेके भी मिन और
भव
समजावेगे।
(१५) महाराज माच हजार सुसलमान सिपाही शाह
साथ रहेंगे। भाइ । व्यगरेजोंकी सलाहसे उग सिपाहियोंको
-

५५ अफगानस्थानका इतिहास। में -शहां जरूरत होगी, रवाने करेंगे। निस, तारीखसे यह सिपाही शाहके पास जावे गे, उमी तारीखसे भाद महारानको दो लाख रुपये माल दरमाल देंगे। जव महारानको शाहको शौनकी जरूरत होगी, तो महारान भी शाहको इसी हिसान, बसे रुपये देंगे। व्यगरेज महाराज शाहके रुपये व्यदा कर निकी समागत करते हैं। (१६) शाह वादा करते है, कि वह सिन्धकी मालगुजारी सिन्धक असीरोंको छोड़ देते हैं। जय सिन्धके गमौर व्यारे- जोंकी बताई हुई रकम अदा कर देंगे और महारानको पन्द्रह लाख रुपये दे चुक गे, तो सिन्व देशपर अमीरोंका कवजा हो जार्षगा। इमपर भी अमौरों योर महारानके वीचमें नियमित पसव्यवहार और भेंट उपहारादिका लेना गिनवाना जारी रहेगा। (१७) शाह शुगा जफगानस्थानपर अधिकार करके भी हिरातपर अाक्रमण न करेंगे। (१८) शाइ शुना वादा करते है, कि वह बिना अङ्गजों और सिखोंकी सम्मतिने किसी दूसरी शक्तिके साथ किसी तरहका मबन्ध न करेंगे। जो कोई अगरेजोंके अथवा सिखोंके राज्यपर आक्रमण करेगा, उससे लग सौनी सरकारे, यानी व्यङ्गरेज सरकार, सिख सरकार और शाह शुभा इस सन्धिपान के नियमोंको खोकार करती है। इन सन्धिपत्रके अनुसार उसी दिनसे काम होगा, जिस दिसे इसपर तीनो सरकारने हस्ताक्षर होंगे। सन् १८३८ ई० को १५वौं जुलाईको शिमलेमे तीनो नरपतियोंके हस्ताघर सन्धिपालमर हो गये। । । - प .

1; प्रथम अफगान-युद्ध। - -- व्यगरेज महाराज काबुलपर चदाईके लिये तय्यार हुए। हले उन लोगोंने पन्नावको राहसे कावुलपर चढनेका इरादा कया। किन्तु , 'महारान रणजितसिहने व्यपने देशसे पारेनी सैन्यको जाने नहीं दिया। अन्तमें अगरेजी सैन्य मन्धको योरसे काबुलपर चल्नेको : तय्यार हुई। पहले अगरेजोंने सिन्ध , व्यमीरोंको परास्त किया। ग्रान्तर छन् १८३८ ई. के मार्च महीनेमें अगरेजी फौनके २१ हजार सपाही बोलन दरेसे अफगानम्यानमें दाखिल हुए। सर जानकन साहब इस सेन्य के प्रधान सेनापति थे। राहमें बडी कठिनाइयां मिली, किन्तु वाधा नही। कन्वारको हाकिम और अमीर दोस्त मुहम्मदके भाई कुहनदिल खां रान भाग गये। सन् १८३८ ई० के अपरेल महीनेमे अङ्ग- रेगी फोजने इम शहरपर कवना किया। शाह शुना ध्यपने दादेको मसजिदमें सिंहासनपर बैठाया गया। २१वीं जुलाइको घगरेनी फोन गननी पहुची। गगरेजी सैन्यके इमोनियरोंने शहरपनाहका फाटक उड़ा दिया।, व्यगरेजी सैन्य गरमें घुस पडी। खामी मारकाटके उपरान्त नगरका पतन हुआ। दोस्त मुहम्मदसा यानी फौजके पैर उखडते देखकर काबुलसे भागकर हिन्दूकुश पार कर गया और ७ वीं ध्यास्तको शाह शुजा राजधानी काइलमें दाखिल हुआ। ग्रङ्ग- रेजोने ममझा, कि इतने हीमें झगड़ा मिट गया। सैन्यको प्रधान सेनापति वा साहब भारत लौट आये। उनके साथ यहरेजी मेन्यका बहुत वडा भाग कावुलसे वापम या गया। मिर्म व्याठ इनार सिपाहियोंकी च्यङ्गरेनी फोन कालमें रह 1 अफगानस्थानका इतिहास । 7 - - गई। इसके व्यतिरिक्त शाहशुजाके पास उसके हजार सिपाही थे । मेकनाटन साहव अगरेजोंका राजदूत होकर और घरनेस साहब उसका साथी बनकर काइलमे रहा। कोई दो सालतक घगरेजों चौर माहम जाने मिलकर काइलपर राज्य किया। यह हुई शाहशुजाको वात। यव अमीर दोस्त सहम्मदका हाल सुनिये। नैरङ्ग व्यफगानमें लिखा है,-"नव गगनी फतह हो गया और अमीर दोस्त सहम्मदका लडका गननीमें बडी लड़ाई लडनेके उपरान्त कैद हो गया, तो शाहशुजा काबुलको व्योर बा। इधर अमीर दोसमहम्मद खांकी नद मालूम हुया, कि शाह शुजा काइलके समीप व्या गया, तो उसने च्यफगान सरदारोको अपने खेमेमें बुलाया और अपना साथ देनेके लिये सबसे कसमें ली। सबने शपथ किया, कि जबतक शरीरमें प्राण हैं, हम चापके वेरीसे लगे। इसके उपरान्त अमीरने प्रण किया, कि जबतक शाहको पकडन तु, या लडाई में मारा न जाऊ और अपने युतको छुडा न लू तलवार नियाममें न करूगा। शाह शुनाकी और जब इस हर प्रणमा समाचार पहुचा, तो उदासी छा गई। लोगोंने कानाफूसी की, कि हैदरखाने बिना यधिक सैन्धक गवनी में घोर युद्ध किया था। अमीरके पास तो सैन्य है-उसके भाई वेटे है। वह और भी भयबर युद्ध करेगा। उचित है, कि जिन लोगोंने अमीरको योरसे युद्ध करनेका प्रण किया है, शाह उन्हें अपने पास बुलावें। उाको रापये देकर यमनी योर मिला लें। यह लोग बुलाये गये और . + । - प्रथम अफगान-युद्ध। । J , यह शाहसे रुपये और गागीरें पावार प्रमौरके विरुद्ध हो गये। शाह बहुत प्रमा हुया चोर मौरवो फेला समझ कर तुरन्त हो काबुनको बोर रवाना हुया। किन्तु एक खेरखाह नोकरने व्यमारको सूचित कर दिया, कि यदि च्यान को रात ग्राप यहासे चले 7 जागे, तो ग्राप मारे जावेगे, वा पकड लिये जायेंगे। यमीरने अपने पकले होपर बहुत दुख किया। यह भी खयाल किया, कि यहसि यदि. चला न भाऊ गा, तो मारा जाऊगा और मेरे लडकैयाले पकड लिये गावगे। इससे यही उचित है, कि अपने परिवारको किमी सुरक्षिर नाह भेजकर मैं कही चला जाऊ ! कहीं जाकर व्योर ठहरवार देख, कि मेरे ग्रएमे क्या वदा है। उसने अपने लडनो सहम्मद अकावर खासे सलाह ली। यह घिर हुआ, कि मुहम्मन अकबर खा परिवार लेकर बलख चता नाये। अमीर वामियानको रवाना हो। ऐसा हो हुन्ा। रातोरात मुहम्मद अकबर बलमकी योर और व्यमोर पामियानको योर रवाना हुआ। इधर मवेरे शाइ शुना काबुलमे दाखिल हुया। उमो सुना, फिशमी देस्त सुहम्मद बामियान चना गया। ग्रमोरको गिरफ्तारीके निये फाजका एक दस्ता भेना। किन्तु भाहो लप्रकार के एक व्यार- मोने अमीरने मडावमें जाकर उधको खबर दो, कि व्यापको पकडने लिये फान उग रही है। व्याप होशियार रहे ! यह समाचार पाते ही चनौर रात होको चल सड़ा हुया। प्रातः काल भन अगरेजो भौग पहुची, तो उसी अमीर पडायपर घोडाको लोद, घात और धूलहोंकी रास पडी .

असमानम्मानमा विभाग।
मोर मुग्नद सारे न पाना । किमाए
सागा उनको या तो वहां गा मा मान्न
राम प्रकार या सुमाराफी मागम हुनया, कि शाय
शशाते से धमोर दोन मुशामद सामन्द पा च्याया
। मपर उसी यमना गरु मन व दस भेगा। उनकी
मारता मार दोन मुहम्मदको बाला भेगा, कि यापकी
मिमिया धागार मे वहा दुसग में बहुत
दिशामें यारका दशा बराा पाता है। बहुत दिनोले
শাধ Tম - বীজ া না ,
चीर
मा उग्गगमा पा पसर गौर पैगाम उनपर पुस्मार
। गरम दो तीन दिया पसाबमें हरा। गपने
पम्पिार, मितमुहम्मद गकार रस मापो पडे बेटेको
माय कर पांध को मारो काध बारबग बुताको जोर
राहुगा। मतिय कमी का पारा गगरले ममीर
मा धागो शारको बाचावे शादी समारोी उमका स्वागत
अफमर गी प्रचि पूल या पनीर गौर के
लडके को शाह मुखारा पान द गये। अमीरी यथाशियम
भेंट करने उपरात शाहको याशीर्वाद दिया। मीने
शायी और शारने अमीरकी प्रशंमा की। शादी अमीरको
ग्रन्हो खिपत और कितनी ही बहुम्रय चोने दीं।
शाहो पाहा, कि आप हर दिशोतक यो याराम करें।
में यापी महायताये लिये अपने मलियोसे सलाह लूंगा
गौर तुरकोसी पोज पामते सध पारयो दाजुरा फिर गायको
दिलासगा। सुसारेसे तोत कोचो यन्तरपर एका किला
किया।

प्रक्ष्म अफगान युद्ध । -- प था। शाह बुखाराने अमीरको उसीमें उतारा । अमीर व्यारा- मके लिये किले में रसद भर दो गई। ग्रमोरने वह कायदा रसा था, कि सप्ताह एकवार व्यपने पुत सरदार मुहम्मद अकबर खों के साथ गाह बुखाराने दरवार जाता था। एक दिन दरबार- में शाह बुखाराने दरबारियोंके मामने कहा, कि शाइ शुभाने व्यमीरको गृहविहीन करके कालसे निकाल दिया है। वह अनेला काबुलसे वामियान यौर बामियानसे कन्दश ग्राया। फिर यह बोर । यहा पहुचा। इनकी सहायता करता चाहिये। मन्त्रियोंने कहा, कि ऐसा करनेसे यश धौर कीस नयश्य ही मिलेगी, किन्तु काबुलको चारो योर और कोच स्थानमें इतनी वरफ पडी है, कि राह बन्द हो गई है। फौनका जाना कठिन है। जय वरफ पिघवेगी, उस समय अमौरकी महायता की जा सकती है। अमौरने इस वातको बहाना समझा और कहा, कि तुरकोंको नाति कायर है। पोस्तीग और दुशानोंके होते हुए नौ वरफसे डरती है। जान पड़ता है, कि इन लोगों अपने देशमे वाहर कनी पर नहीं रखा। स्त्रियोंकी भी अपेक्षा अधिक शरीरमाला रते रहते हैं। इनसे बहादुरीयो याशा नहीं की जा सकती। शाह बुखा- राको इस बातोंसे बहुत दुख हुया चार उमने अमौरको नोइत की, कि अमीर तुम्हारी बुद्धि ठिका नहीं है। इसी लिये ऐनी बातें मेरी जाति और मेरे सेन्यो धारेमे कहते हो। तुमको पदमगादाका विधार'नहीं। यमोरले गघ माध उनके पुत्र सुहम्मद अकबर खाने भी ऐसी ही याते कहा शुरू की। अन्तमें दोस्त सुहम्मद खां पहुर व हुआ। . ई

अफगानस्थानका इतिहास।
--
कहा, कि अब समे बुखारेका दानापती हराम है। यह
काहकर ग्रमीर उठा। शाह बुखाराको समझाने बुझानेका
खयाल नहीं किया। निम किलेमें ठहरा था, वहासे अपने
साधियोंमहित चल खडा हुया। इधर शाह बुखाराको
खयाल हुया, कि मैं ग्राश्रयदाता था घोर अमीर व्याश्रित ।
सुझसे असन्तुए होकर उसका चला गाना अच्छा नहीं। उसको
राहसे वापस बुलाना चाहिये।
“इम विचारसे उसने अपने सईद भामक पहलवानको पांच
सौ सवारों के साथ अमौरको वापस लाने के लिये भेगा। अमीरने
सईद और सवारोंको देखकर व्यनुमान किया, कि शाह असाराने
यह फोन मेरे पकडनेके लिये भेजी है। यह भी अनुमान
किया कि, मेरी दरवारकी बातोसे व्यसन्तुर होकर शाह मुझको
कैद करना चाहता है। पिता पुत्र इसी विचारमें ये, कि सईद
पहुच गया और कहा, कि अमौर। ठहर जा, कक्षा साता
है। बादशाहने तुझे बुलाया है। तुझे मेरे साथ अखारे
चलना पड़ेगा। अमीरने जवाब दिया, कि अब मैं शाह
बुखारापर विश्वास नहीं करता और मै बुखारे न जाज गा ।
न मैं उमका गुलाम डूं, न नौकर और न प्रना। सईदने अमौरस
यारोध किया और उसकी कमरमें हाथ डालकर अपनी बोर
खींचा। यन्तमे दोनो योरसे तलवारें निकल पडो और
मार काट हुदा
“कहते हैं, कि इस लडाईमें कोई दो सौ तुर्क हताहत हुए।
व्यमौरके भी कुछ यादमी मारे गये। अमारका घोडा घायल
हुमा । मुहम्मद अनवर खा जखमी होकर घोडे से गिर

प्रथम अफगान-युद्ध।
।
।
पहा यौर वेहोश हो गया। घोडे के घायल हो जाने से अमीर
एक जगह ठहर गया। इसी समय बुखारेक सवारोने अमौरको
घेर लिया और इमी दशाने उसको सारे ये गये। मईदने
व्यमौर और उनके बेटेको शाह साराने सामो पेश किया।
साथ साथ दोगोफे शोर्य वीर्यको प्रशमा की। कहा, कि
व्यमीर दोस्त सहम्मद खां और मरदार सुहम्मद खाकासा
कोई अफगान बहादुर नहीं देखा। यह दोनो निमपर तलवार
मारते, उमने दो टकडे होते थे। यमौरने एक भाले में दो
मगारोंको छेदकर जीनसे उठा लिया था। यही बात उसके
लडके सुहम्मद अकवर खाने की। मैं नहीं कह सकता
कि यह मनुष्य हैं, वा दैत्य। युद्ध के समय यह अपनी जान
टगवत ममझ रहे थे। व्यमीरका घोडा यदि घायल न हो
जाता, तो अमौर कदापि पकडा न जाता। शाह बुखारासो
चामीर के पराक्रममा हाल साकर अपने दिलने कहा, कि ऐमे
वहादुरोंको मासा वा कैदा करना शाहामा शानके खिलाफ है।
"शाहने उनका व्यपराध क्षमा किया। उनके घावको स्वा
कराई। पर मरदार सुहम्मद खाके भी जखम अच्छे हो चुके,
तो व्यमीर दोस्त मुहम्मदी शाइसे कहा, कि अव ग्राप समे
यामा टोभिवे। वलस जाकर अपने वाल वबोसे मिलूं।
शाह अग्वाराने कहा, कि मैने ,यापको इनलिये युलाया था,
कि आपकी महायता करके व्यापको फिर काबुल मिहामनपर
पेठा है। किन्तु यापकी कटोर वातोंसे फुल तुर्क दुखी हो
गये । व्यापकै महदने माथ लहनेसे वह और भी ग्रमन्तुर
हो गये है। इसलिये यहां अापमा ठहरना उचित नहीं।
।
-
-

३४
अफगानस्तानका इतिहास।
चाप जिस तरफ जागा पाहत है, जाइये। भगवान आपके
सहाय होंगे। फिर कहा, कि अशरफियोंकी थैलियो, दो घोडे
चौर मान मामा अमीर और उनके पुत्रको ६ दिये जायें।
शाइने गमीरको राहदारीका परवाना देकर निदा किया।
"असीर दोस्त सहम्मद खा यफनर के माथ सुखारेसे
कन्दज बामस व्याया। वहां अपना मुटुम देखकर बहुत
प्रमन्न हुआ। कुछ दिनोंतक वही टहरा। फिर एक दिन
उसके मममें पाया, कि अपने परिवारको किमी सुरक्षित नगद
भेन देना चाहिये। पुमा उसको सुरक्षित जान एमा।
अमौर वहांके हाकिमपर विश्वास करता था। यमीरने अपने
भाई जब्बार खांके साथ अपना परिवार कुश भेगा। जव्यार
खां जब तीन या चार मझिल पहुचा, तो उसने शाद शुनाको
चिट्ठी लिखी, कि यदि ग्राप मुझे रुपये और जागौर दें, तो मैं
अपीरका परिवार कुशा ले जाकर व्यापके पास लाऊ । यह
चिट्ठो पाते ही शाह शुजाने व्यपना एक विश्वस्त कम्मचारी
जब्बारको पाम भेगा। जब्बारको कहलाया, कि तुम शोध
ही दोस्त सहम्मदके कुटुप्पसहित काबुल घले ध्याचो। मैं
तुमको इतना धन दूगा, जितना तुमो कभी स्वप्नमें भी देखा न
होगा। अमीरने जब्बारके पाम अपने कर्मचारीको मारफत
बहुतसी अशरफिया भेज दी। जब्बार खां अशरफिया पाकर
बहुत मन्तुष्ट हुच्या व्यौर व्यन्तमें अमौरले 'परिवारमहित
काबुन पहुचा।
"इधर अमौर अपना परिवार कन्दजसे भेजकर निश्चित हो
गया। वह सैर योर शिकारमें
लगा। एक दिन एक
.

प्रथम अफगान-युद्ध।
मनुष्यने अमीरको खवर दी, कि व्याप तो चैग कर रहे हैं,
किन्तु अापके भाई जम्बारने रपयेको लालचसे व्यापका
परिवार काइल पहुचा दिया। यह सनकर अमीर बहुत
घबराया। जब धवराहट कम हुई, तो परमेश्वरसे सहायता
पानेको प्रार्थना करने लगा। इस घटनासे वह इतना विशाल
हुया, कि एक दिन यमधर मारकर यात्महत्या करनेपर
उदात हुया। ऐसे ही समय कन्दनका हाकिम घड़ों ग्रा
गया। उसने व्यमौरका हाथ पकड लिया यार समझाया, कि
अपग्टत्यु, अच्छी नहीं।। मरना ही है तो सम्मुख समरमें
मरिये । यदि जीत गये तो अच्छा है, मारे गये तो शहादत
पाइयेगा। मेरे पास जो खनाना है, उसे पापको देता हूं।
मेरी मान व्यपनी फोन ममझिये। कुछ दिन धीरज धरिये।
मैं सुप्रसिद्ध वीरों और पहलवानोंको एकत्र करके व्यापके साथ
किये देता हू । हाकिमने अपनी बात पूरी की। जय कुल'
फोन अमौरके पास जमा हो गइ, तब वह कन्दनसे काबुलकी
योर चला। युवामियानमें पहुचकर पडाव किया। मौनमें
'प्रत्येक जातिके सिपाहियोंपर उसो जातिका अफसर नियुक्त
किया। कुछ पौन दाइने रखी, कुछ बांये। बीचमें
च्याप हुद्या।' कह दिया, कि लडनेके समय इसी कायदेसे युद्ध
करना होगा। उधर शाह शुजाने अमीरके यानेका समाचार
पाकर एक फौज सुकाविलेके लिये भेजी। पांच घ्यगरेज व्यप
सरोंकी अधीनतामें कोई वीस हजार सिपाही ते
पामिपानको और रवाना हुए। अव यह पौन 'व्यमौरकी
पौषके समीप पहुंची, तो सरदारोंने सलाह करके 'घमीरके
-
-

अफगानस्थानका इतिहास।
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पास एक सरदार भेजा और कहलाया, कि ग्राम शुधा ही
अपनी जान देना यौर शाही फौनसे सामना करना चाहते है।
व्याप जङ्गल जङ्गल पहाड पहाड भटकते फिरते है। उचित
तो यह था, कि अाप शाहको सेवामें चले याते। शाह
आपको शरण देंगे और आपका देश ग्रामको लोटा देगे।
सरदारकी यह बात सुनकर अमौरको बहुत क्रोध याया।
उसने सरदारसे कहा, कि यह वादशाह अन्यायी और व्यत्या
चारी है।
वह इस योग्य नही, कि मैं उसकी सेवा स्वीकार
करूं। काटन साहवसे कह देना, कि कल मैं युद्ध करूंगा।
घर कभी ऐसा सन्दे सा मुझे न भेना जावे।
"दूसरे दिन घमौर तुरको फोन लेकर व्यगरेजी फौजक
सामने ग्राया। अगरेजोंको शिक्षित मैन्यकी गोली गोलोके
मामने यमौरके रजल्ट सिपाही भागे। अमीरका पडाव
लुट गया।
इस पराजयसे अमीर बहुत दुखी हुआ।
रात्रिके समय भगवानसे प्रार्थना करने और रोने लगा।
अमौरके रोनेकी यावान माकर तुरकी यफसर यमौर के पास
आये। कहा हम लोगांने पहले पहरेजोके युद्ध करनेका
मग, देखा नहीं था। इसीलिये गोली गोलाके मामने ठहर
नहीं सो। दूसरी लडाईमें हम लोग चीते गे और वन
पडेगा, तो व्यारेजी फोनका एक भी यादमी जीता न छोड़ेंगे।
इसके उपरान्त सपने मोरके मामने शपथपूबक प्रण किया,
कि जनतक हमारे शरीरमे प्राण है हम युद्ध करेंगे। इस
प्रगसे अमीरके निर्बल हृदयमें बलका सधार हुया। उसने
अपनी फोन फिरसे दुरस्त को गौर युद्धस्थलमें या इंटा।
-
.

प्रयम अफगान-युद्ध। ६७ "दूमरी लड़ाई में अग्नी फोनने बडी चेष्टा की। खूब गोली गोले फरमाये। किन्तु यमौरकी सैन्य अग्निरिकी परवा न करके यागे वही और अगरेजी सैन्यसे भिड़ गई। घोर युद्ध हुआ। पाटन माहवकी फौजके व्याये यादमी "मारे गये। युद्ध देखनेवालोंका बयान है, कि अमौरकी फौजके 'सिपाही निमपर तलवारका भरपूर हाथ मारते उसके ककडी कैसे दो टुकडे करते। अन्तमें अगरेजी फौनके पैर उखडे । वह भागकर एक पहाड़पर चळ गई। व्यमौर दोस्त मुहम्मद या इम युहम वहुन थक गया था। वह अगरेजी शौनका पीछा नहीं कर सका। उसने दूसरे पहाडपर चाकर दम लिया। दोनो घोरको फोन एक मप्ताहतक लाती रही। सिर्फ गश्तो सिपाहियों में छोटी मोटो लडाइया हो जाया करती धौ। उपर अमौर यह मोच रहा था, कि या तो लडते मासे मारा जाऊ या कावुल पहुचमार शाह शुमासे अपना पदलाल गौर अपना परिवार कैदमै कडाऊ। इसके उप- गन्त किसी ऐमो जगह चला जाऊ, कि फिर मेरा हाल किमाको मालूम न हो। अमीर न तो गोसे डरता था और न गोलियोंसे। वह अपनी बात इधेलीपर रखे हया था। एक पचके उपरान्त अगरेनी फौज पहाडसे उतरकर मेदाम आई। फौजले यफमरने यमौरको कहला भेजा, कि या तो पाप उतरकर युद्ध करे, अन्यथा में व्यापपर गाक्रमा करूगा। अमीरने माय दिया, कि कलसे में युद्ध में प्रवृत्त गा। दूरे दिन दोनो पांजोंका मामना हुया। योरसे गोले गोलिया चलनो घी, दूमरी धोरसे सवार और .' । +

अफगानस्थानका हातहासा
पैदल सिर्फ तलवारें खींचकर धावा मारते हुए यात्र
मण करते थे। अमीरके सवारोंने घगरेजोंके सोपखानेपर
याक्रमण किया। तोपखानेने गोले मार मारकर च्याते हुए।
सवार उड़ाना प्रारम्भ किये। च्यधिकांश सवार उड गये
अन्समें जो बचे, वह तोपखानेतक पहुंचे। उन लोगोंने वह
पहुचते ही तोपखानेके सिपाहियोंके टुकड़े टुकडे उडा दिये।
रसके उपरान्त वही सवार अगरेजोंकी शिक्षित मैन्यपर टूट
पडे। अगरेजी सैन्य सङ्गोनों और तपश्चोंसे मवारोंको मारने
लगी। इसी अवसरमें अमीरकी सैन्यने घ्यगरेजी फोनपर पीछे
धौर ध्यागेसे व्याक्रमण किया। उस समय अगरेजी फौज
बहुत चिन्तित हुई। फौजने अपने खजानेके कोई पैतीस
लाख रुपये नदीमें फेंक दिये और वह भागकर एक पर्चतपर
घट गई। अमौरकी फौगने घ्यगरेजी फौजका पडाव लूट
लिया। घ्यमीर भी दूसरे पहाडपर चला गया यौर धमने
घायलोंकी व्यौषधि करने लगा।
"धव यमौरने हर सङ्कल्प किया, कि मैं कालमर व्यवश्य
ही धाक्रमय करूगा। इधर व्यङ्गरेजी मैन्यके सेनापति बहुत
चिन्तित थे। उन्होंने रातिके समय कप्तान बाकरको उस ध्यङ्ग
रेणी पौणमें भेना, जो युद्धस्थल और काबुलके वौचमें पड़ी थी।
यह कुमको पौन थी। कमान बाकरने कुमकी सैन्यके सेगाम
तिसे जाकर कहा, कि जो सैन्य अमीरसे लड रही है, वह
ध्याधी मारी जा चुकी है। जो बची है, घायल पडी हुई है।
हम लोग अपना खनाना पानी में डाल चुके है। अमीर मनुष्य
नहीं, वरच दैत्य जान पडता है। गोला गोलीको दृष्टिमें बेध.
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प्रथम अफगान-युद्ध । ६४ - । न डक घुम पाता है। यही दशा उमके तुरकी मियादियोको है। लडई ममय वह अपनो दाहिया महमें दवा लेते हैं चौर तलवारे खीचकर हमारी फौजपर या टटते हैं। घोर युद्ध करते है। हम लोगोने दो सप्ताइतक युद्ध किया। तोम वन्शसे खूब काम लिया। पर लडाईने अमौर होका पक्षा. भारी रहा। प्रत्येक वार उसने हमारे सिपाहियों और एफ सरोंको मारा। अब हम सिपाहियोका छोटामा झुण्ड लिये दो पहाडोंके बीच में पड़े हुए हैं। उन्होंने मुझे आपके पास भेना है। ग्राप शीघ ही अमकी फौज लेकर चलिये। चलिरोगा, तो हमारी घोडीसी फौष मारी जायगी। कमान धाकरकी बात सुनकर थामकी सैन्य के सेनापतिको चिन्ता हुई। उसने इस घटनाका समाचार काबुल भेजा। "इपर अमीरने अपनी छोटीसो फोन और नाममात्र खना नेपर तिमाह की। खयाल किया, कि इम दशासे मैं काबुल कैसे पहुच सकगा। किन्तु वह अपनी जिन्दगीसे हाथ धो पुका था। इस लिये सिर्फ दो हजार सवार लेकर कावुलकी ओर । रवाना हो गया। राहमें उमको यशद नामे नगर मिला। सम्बद ममगिदी गिरका हाकिम था। वह अगवानी करके अमीरको अपो फिमें ले गया। वहा अमीरको दावतें कौ। हाकिमको इटसे अमौर कर दियोतक किन्ने रहा। मेनापति काटन माइनको जान यह हाल मालूम हुच्या, तो उन्होंने मय्यद ममजिदीने पास अपना एक दृत भेजा। दृतको मारफत मस्यदको कहलाया, कि अमौरको गिरफ्तार करके मेरे पास भेज दो। भेज दोगे तो पारितोषिक पायोगे, न भेलोगे, । -

अफगानस्तानका इतिहास।
तो व्याफनमें अंसोगे। नय्यद मसनिदीने दूतको शवाब दिया
कि माहयकी इस बातका जवाब में तलवार और खञ्जरसे दशा
चाहता है। दूत यह सुनकर चला गया। दूसरे दिन अमीर
दस्त मुहम्मद गौर सय्यद मसजिदी तुरकी फौज लेकर काट
नकी फौजके सामने पहुचे। सामने पहुंचते ही नियमायुसार
अमौरकी फौजने वादशाही फौजपर अाक्रमण किया। दोनो
च्योर मङ्गीनें तलवारें चलने लगीं। कहीं कहीं सिपाही'
इतने भिड गये, कि आपसमें कुपाती होने लगी। एकको
दृमरेकी खबर नही थी। वह नहीं मालूम, कि काटन माहम
कहीं मारे गये। रेट साहव गुम हो गये। अगरेजी सैन्यके
कुल सिपाही हताहत हुए। यमीरने अगरेजी फौजका
कुल माज सामान लूट लिया। इसके बाद अमीर मय्यद मस
जिदीके माथ अपने डेरेपर वापस ग्राया। जब सेनापति सीलकी
यह हाल मालुस हुना, तो वह स्वय व्यपनी फौज लेकर अमी.
रसे लडने यौर अपनी फौजको सहायता करनेके लिये चला ।
राहमें उसको अपनी फौजके परास्त होने और दो यारेज
अफसरोंके मारे जानेका हाल मालम हया। इस समाचारसे
उसे बहुत दुःख हुया। लारेस माहव हिन्दूकुश पर्वतपर
अपनी फोज लिये पडा था। सीलने उसको सैन्यसहित अपने
पास बुला लिया। घगरेनो फौजमें बहुत सिपाही हो गये।
इस फौजने व्यागे वळकर यशट किले को घेर लिया। किपर
इतने गोले परसाये, कि किरोके बुर्ज यादि टूट गये। यह देख
कर अमीर योर मय्यद ममनिदी चिन्तित हुए। उाको भर
हुगा, कि किसी समय अगरेजी फौज किलमे धुम यावेगी।

प्रथम अफगान युद्ध।
।
“एक दिन ग्रमौर और मय्यद मसजिदीने फिलेका खजाना व्यपने
माध लिया और बाको सामान फूक दिया। इसके उपरान्त
वह व्यगी फोगले साथ फिके बाहर निकले और अगरेजी
कोजसे लड मिहकर निकल गये। एक महाडपर चाकर दम
लिया। रात्रिके ममय युद्ध नही हुया। अगरेजी फागने
यशद नगरने याग लगाकर उसको भरस कर दिया। प्रात काल
सम्पद मानिदी पन्नतपरसे उतरा और गती मिपाहियों को
माग्मर सीलकी सैन्यपर याक्रमण करनेके लिये बा । किन्तु
कर न सका। कारण, सौलाको सयदके व्यानेका समाचार पहले
दी मिल चुका था। उसने तोपें लगवा दी थी और एक
किलामा वावा लिया था। इसके उपरान्त फिर यह न मालूम
हुया, कि मम्यद मसविदोका क्या हुया। वह मारा गया वा
किमी योर चला गया। प्रातःकाल यमीर भी पहाडसे उतरा
योर अगरेजीको पौनसे लड़कर फिर पहाडमर चढ़ गया।
एस समाहतक व्यमीर इसी प्रकार लडता रहा। किन्तु रातिक
ज्याप्रमाने डरसे एक जगह नहीं ठहरता था। एक पर्वतसे
मरेपर चला जाता था। इधर अगरेजी फौज सिके व्याज
मसे डरती थी। उसका अधिकाश रातभर कमर कसे तय्यार
रममा पााभर अमीरने देखा, कि उसके मिपाही इस तरह
सरते शाही धक गये, तो यह व्यपने सिपाहियोको लेकर
याधिगार गामे शिवेने पहुपा । बाजोहिमारकै हाकिमने
प्रत्यक्षमें नागीरका बहुत सम्मान दिया। अमीरकी जियाफत
शोर मामार किये और दिनरात नोकरीकी तरह
कामी पान सपने पगा। किनु उसका यह सब काम
।

૭૨ अफगानरपानका इतिहास । .. 4 नाली था। पर यमीरसे प्राय. कहता था, कि यह झा वहुत सुइ है। ग्राप किमी तरहदी चिन्ता न करे।। चिन्त होकर यहां रहे। आपका वेरी यदि यहां न्यायेगा, तो मैं अपनी मैन्यसे उसका मामा काँगा। किन्तु व्यमौर , दोस्त सहमदने उमको वातोस उमको ताड लिया था। वह उसपर विश्वान नहीं करता था और वहुत मावधानी माथ रछता था। "अमीरकी यहाको स्थितिका हाल भी सेगापतिको मालूम हुया। यह भी मालूम हुया, कि अमीर वर्धा लऽनेका सामाा एवास कर रहा है। सामाग एकस करते ही वह कायुलपर चलाई करेगा। सेनापतिने खयाल दिया, कि- व्यमौर यदि काबुतपर चार गया, तो पहले वह शाह शुजाको मार डायेगा। इसके उपरात काबुलमै ध्याग लगाकर उसे मस कर देगा। यह मोचकर उमने हर सदस्प किया, कि घमौरको काबुल ग गाने दगा। उसी बहुतसे सिपाही और । तोपे एकल की। इसके उपरात वह पालीहिसार पहुचा च्योर उमने किला घेर लिया। यमीरने कियेपरसे देखा, कि यहुत यडी पोज शिला घेरे पड़ी है। एनपर वह अपनी सदोमर फोन लेकर किसे निकल वाया गोर अरेगी पोजमर ट्ट पडा। धमसन युद्ध करने उपरान्त फिर किले में वापस । इधर ग्राइरेज सेनापति फिलेको गिर्द मोरचे बना दिये धौर कोई सात दिनोंतक मिलेपर गोलोवी शशि को। इसका कोई फल नही हुया। अन्तमें अमौर फिलेमें घिरा धिरा धवराया। उसनी रसद भी घट गई थी और लाशों सड । गया। .

. - । . प्रथम अफगान-युद्ध । नेसे किलेने बहुत बदबू फैल गई थो। एक रात उसने फिलेमें आग लगा दी गौर व्यपगी फौनके साथ गारेजी फोन चीरता पाडवा पत्र किलेकी घोर चला। इस किणे हाकिमने भी च्यमौरका स्वागत किया, फितु स्वच्छ इनसे नहीं। अमीरने किरोसे पहुंकर ग्रमी घोडे चरागाहोंमे चरने योर मोटे होनेको शेड दिये। व्याप सैन्यसहित दम ने हा। घर जिले दगाबाज हाकिमने सेनापति सील साह वको समाचार दिया, कि अमीर मेरे किरोसे उतरा है आप शीव ही आवे। किला घर ले। किले के फाटककी वालो मेरे पास है। मैं हार खोल दूगा। अमौरको इस घटनाको खबर 7 मिली। एक दिन सरे धनीरका एक सिपाहो किसे बाहर निकला। उसने अगरेजी फौगको किला रे माना। वन उखटे पैर लौटकर अमीरके पास गया। उमने उन्हें जगाकार अगरेजी फौजले व्यानेकी खबर दी। व्यमौर तुरन्त ही किलेकी दीवारपर , व्याया। उनने अपनी न्यास पाइरेजी फोन देखी। यह देखकर आपो, 'सिपाधियोंको कमर कसने और विलेने हाफिमसे किये फाटककी वाली ले लेनेके लिये कहा। इसपर गावाज हाकिम मौके पास आया।' कहने लगा, कि मै हैरान हू, कि आपके यहा यानेकी सबर किमने अगरेजी फौनको दी। याचा दोनिये, तो मै फिलेका फाटक सोलकर बाहर जाक और अनरेगी मानका हाल मालूम करू । अमीर हाकि- मका चेहरा देखते ही उसकी दगापानी समझ गया। कहा, पदमा । नून ही यह सब किया है। मैं तेरा मेहमान धा - ७

७४
अफगानस्थानका इतिहास।
।
और तूने मेरे मरवा डालनेकी फिक्र की। तूने जैसा किया,
यब उसका पल चख ! यह कहकर वलवारसे उसका सिर
काट डाला। फिर उसको घरमे घुसकर उसके घराने में
किसीकी भी बोता न छोडा। इसके उपरान्त अपनी
पौग लेकर किलेके फाटकपर व्याया और दरवाजा खुलवाकर
यारेजी फौजपर याक्रमण किया। यमीर जान हथेलीपर
लिये गोला गोलीकी रिसे होता हुया साफ निकल गया और
एक पहाडपर पहुंच गया। दो सप्ताहतक पहाडपर ठहरा
रहा। वहा पहाडी जवानोंकी एक फौज तय्यार की।
“इधर अगरेज सेनापतिको जब अमीरका पता लगा, तो
अपना दलबल लेकर ग्रमोरके सामने पहुच गया। अमीर
भी सेनापतिको देखकर पहाडसे उतरा। युद्ध प्रारम्भ हुन्या।
यह युद्ध प्रातकालसे लेकर सन्याापर्यन्त हुआ। युद्धस्थल
साशोंसे भर गया। अन्तमें दोनी फौनें ग्रलग हुई और।
अपने व्यपने पडावपर लौट गई। दूसरे दिन अमीर फिर
पहाडसे उतरा और अगरेजी फौजसे लडकर पहाडपर वामस
चला गया। कुछ दिनोंवक ऐसा ही हुया । दिनको युद्ध होता
और रातको दोनो फौज अलग हो जाती। सेनापति सील इस
असे बहुत हैरान हुआ। कारण, उसकी फौज रातको याराम
नहीं कर सकती थी। दिनको लडने हौसे फुरसत नहीं पाती
थी। वह स्वयं हर घडी कमर कसे रहता था। न मुमलमानों
की लाशोंको कफन और कम मिलती थी-न हिन्दुओंको ला-
भोको ध्याग। सौष यमीरको लिये दुखी था। वह जानता था,
कि यमौरका देश छिन गया है-उसके बाल बच्चे कान में

७५
, प्रथम अफगान युद्ध ।
"
कैद है-मीलिये वह ध्यपनी जानकी परवा न करके लड
रक्षा बोर इसी तरह लडता लडता एक दिन मारा जावेगा।
उसने विचार किया, 'कि क्या ही अच्श हो, यदि यह वीर
पुरुष अकालाटाय से वच बावे यऔर हमारी शरण चला यावे।
सैनातिने एक दूतको मारफत यही बात अमीरसे कहलाई।
त्यमोरने दूतको प्रतिठापूर्वक अपने सामने बुलाया। सेना-
पतिका पैगाम सना योर जवाब दिया, कि सोल साहबने इस
विचारसे मैं अनुर होत हुया। किन्तु शाइ शुजासे अत्याचारी
बादशाहकी शरण जाना पमन्द नही करता। सौल साइव
यदि सझपर अहसान करना चाहते है, तो मेरे वालपच्चोंको
कैसे छडाफर मेरे पाम भन दें। में उन्हें लेकर ऐची
जगह पा बसू गा, कि फिर मेरा नाम निशान किसीके
सुनने में न आयेगा। किन्तु गवतक मेरा कटुम कैद है और
मेरे शरीरमें प्राय है, तबतक मैं बिना युद्धके न रहूंगा! दूतने
वापम याकर मील साहयको व्यमीरकी उक्त बात सुनाई।
मौन समझ गया, कि अमोर साधारण मनुष्य नहीं है। फिर
उसने पंधर साहबके सेनापतित्त्वमें एक फौज यमीरसे
एम्स करने के लिये नियुक्त की। अमीर भी फेजरको सकावले
-
डट गया।
।
"इस युद्ध में कुछ नयापन हुया।' अगरेजोंने ध्मीरसे
कहलाभेगा, कि शेनो मैन्यका एक एक ममुय्य युद्धस्थलमें यावे।
यही सडे, पाकी मिपाही दूर खडे रहें। फेजर साइक्ने
घोषापा, काम पुराने जज युहमें विशा विशेष मारकाटके
समोर मारा पा सकता है। धमोरको जो ध्यादमी मार ोगा,

अफगानस्थानका इतिहास।
-
उसकी नामवरी भी कम न होगी। यह विचारकर खयं फेजा
माहव यती फौजसे अकेला निकलकर युद्धस्थल, पाया
और अपने समावलेले लिये अमीरको बुनाया। ग्रमौर
ज्यपना नाम सुनते ही उसके सामने या गया। कहा, साहब ।
अपनी हिम्मत दिखाइये, जिसमें ग्रापके मनमें कोई हौसला
बाकी न रहे। फेजरो प्रमौरयर ततवारको दो चोटें की।
व्यमीर खफ्ताा पहने था, इसलिये उसपर कोई असर न
हुया। अमीरने हंसकर कहा, इसी दल और हथियारके
भरोसे मेरे मामने पाये थे। अब टहरो और मेरा भी जोर,
देखो। यह कचकर व्यमीरने तलवारका वार किया। पहले
हो वार में प्रजरका हाथ कटकर जमीनपर गिर पडा। जरने
पीठ फेरी। चाहा, कि भागे, किन्तु अमीरने उसकी पौठपर
और एक घाव लगाया। इसके उपरान्त कप्तान मपली (1)
यमीरको सामने पाया। अमीरने इमकी कमरपर वार किया।
कप्तान कमरसे दो टुकडे हो गया। नीचेका धड घोडे की
पोटपर रह गया, ऊपरका नोचे गिर पड़ा। इसके उपरान्त
कप्तान वाकर पाया। इसने पाते ही यमीरपर वरही चलाई।
यमीरने उसको वरकी राती दी और उसको घोर्ड की परापर
यपना घोसा ले नाकर उसने शिरपर ऐसा खञ्जर मारा, कि
दिमागवक घुस गया। इसपर कप्ताग वाकर भागने लगा।
किन्तु ग्रमौरने उसको पकड लिया और घोडे से उठावर
जमौनपर इस बोरसे पटवाा, कि कप्तागका दम निकल गया।
यह देखकर एक मोटे ताले डाकर बनीरके सामने पाये।
ध्यमीरने डामरका सामना दरना अपनी यतिठा सामो।

। प्रथम अफगान-युद्ध ।
।
-
-
"
सलिये यमने नहने यजल खाको उसके मुकाबले के लिये
जि दिया। इससे डाककर बहुत शुद्ध हुया। बड़े बोधसे
उम्म्रो च्यफल खापर याममय किया। डामरी वाजलपर
सजवारका पार करना चाहा, किन्तु व्यसनलने इससे पहले ही
हाकरी घोह पर एस गहा मारी। साकरका घोडा तडप
कार गिर पड़ा और डार भाग गये। इमी तरइसे चमीर
फा दूसरा लहशा से नामे व्यफसरो लडा और
उसने भी अपनी वीरता प्रकट की।
'सब इमारह युद्ध समाप्त हुया, तो दोतो' पोरकी
को निड गई। एक पोरने अगरेजी फोग अमीरवार
फौनपर गोवे गोली परमा रही घी, दूसरी योरस
योर के मिनाहो अगरेजी तोपसानी तरफ टूटे पड़े थे और
ररी बार परे पारिसे लड रहे धै। इन युद्ध में कोई एका
इनार 'निमालो गौर अमानर अगरेगोकी गोरकै यौर वोर्ड
एक भी सवार बमीरदी नरपके हताहत हुए। अव यसोरको
पान में शद पिपाशी व्यौर दो लड़के रह गये।
मी मागे उसने एक पहाडपर नाकर लेग साना।
अगेजी फाज सापक गई थी, कि वह नौरपा पीटा
न कर मकी।
। अय दयनीरने देखा, कि मेरे अधिकांश सिपाही चौर मेरे
समित मारेभा पुस १३ । मेरे पाम समानानी नदी है, कि में
दूनरी पोज तयार कर न । एक योर मेरी यह दशा है,
हमरा घोर यजरेणी फोन पनि टिवट सुझपर धारमय पर
शे में सो व्यारेनी पोनरी सामना करने जायका नहीं
-

अफगानस्थानका इतिहास। - - । - - । हूँ और ऐसा कोई सुरक्षित स्थान वा सहायका भी नहीं है, जिसकी शरण जाफर यात्मरक्षा कर सजू। मैंने वो बहुतः चाहा था, कि लउते लडते मारा ना, किन्तु विना साधु के कोई कैसे मर सकता है। मैं यही उचित ममझता हूं, कि यहारो अकेला काजुल ना। वहां अगरेज राजदूत मेकाना टन माहयके हाथ यात्म समर्पण कर दूं। याशा है, कि यह मेरे साथ न्याय करेगा-मेरी दशापर दया प्रकाश करेगा। यह रियर करके उमने व्यपने लोहेके कपड़े उतारे योर एक नौकर' माथ लेकर रात ही रात वह काबुलकी योर चला। कावुल" पहुचकर मेकनाटग साहबके घर गया। सन्तरीसे कहा, वनी रको मेरे यानेको सबर दे दो। मेकानटन अमीरका नाम सुनते ही बाहर निकल याया। साहवको देखकर अमौर घोडेसे - उतरा। मेकानटग व्यमीरको अपने घरमे से गया। उपने उसकी बडी प्रतिष्ठा की और ग्रानेका कारण पूछा। कहा, व्यमौर। कलाका तो ग्राम युद्ध कर रहे थे, ग्राज इस तरह । यहां क्यों चचे व्याये? कल राततक व्यापके काबुल यानेकी सपरसे नगरमें हलचल पड़ी हुइ थी। काबुनवासी बहुत चिन्तित थे। मेकपाटा साहयने यह बात पूछते पूछते याछ अफगान सरदारोंको ग्रमौरक पहचान के लिये वहा बुलाया। सरदारोंने अमीरको देखते ही सलाम किया और उसके हाथ और चूमे। इसके बाद वह अमीरके मौछे जा खड़े हुए। यव मेकनाटनको निश्चय हो गया, कि यही अमीर है। उमने अमीरयी प्रतिष्ठा और ज्यादा की। अमीरने अपना हाल बयान करनेसे पये प्रपनी कमरसे तलवार खोलकर मेकनाटनसे 1

} -प्रधम अफगान युद्ध!!
-
.
.
हमले की। कहा अब आपने सामो सझे तलवार बाधना
उचित होई। यह देखकर मेजनाटनकी घाखोंने च्यास्त्र
था गर। उसने तलबार फिर अमीरकी कमरते बाघ दो चोर
साहा, कि मैं यह तनबार इजलडकी घोरसे व्यापकी कमरसे
कायता हूँ। अमल में यह तलवार ग्राप होको शोभा देती है
मक उपरान्त मेकाटिनने अनौरके धानेका कारण फिर पूछा।
धमीरने वारिसे व्यन्तनस अपनी कहानी कह सुनाई। अन्तमे
साहा, कि अब में व्यापक मास न्यायप्रार्थी होकर आया ।
किनाटनने कहा, कि व्याप धैर्य धरिये आपकी इच्छा पूर्ण
} भारोका देवा की जायेगी। अमीरी कहा कि मेरी मिर्म तीन
रा। एफ यह कि आप सझे शाहके सामने न ले जायें।
टूमो यह, कि अाप मुझे भारत भेज दै यौर सभे मेरे
हाडके दरबार मिला दे। तोमरी यह, कि मेरे लडके
অস্থায় ঢাজী দল নদী মা নাম বুলাৰ কাৰ
मह या सापे, तो उनको भी मेरे पास हिन्दुस्थान भेग ।
मे शनाटन मानने अमीरको तीनो बर्ति स्वीकार की चौर
उमै एका बहुत बड़े ममानमै ठहराया। साय माय बारामका
पहलमा मापात भेन दिया। अमीर गनोसे अपना पाटुम्प
चाक बागुल रहा। इसके उपरान्त भारतवर्षकी च्योर
मा मेकाटिन शाहरने निकलनन माइनसो अमीरने साथ
दिया। तीर मारती राह काइलले भारत याया।
मारने उनको सोवियानेने रखा। सारण, सोधियानेमें
एलोजी फोन घी और वह अमीरकी देश भाल कर
मरनी पी
W

६०
अफगानस्थानका इतिहास ।
1
*धमौरको बोधियानेमे सपरिवार रहते हुए बहुत दिन नहीं
यति थे, कि उस जमाने के गवरनर जनरल लाई चाफलखने
धमीरको कलकत्ते तुलाया। एक चिट्ठी लिखी। उमम ।।
लिखा था, कि मैंने आपकी वहादुरौकी तारीफ सुनी है। अर
आय कम्पनीको शरण ध्याये हैं, इमलिये में व्यापसे मिलना,
चाहता हूँ। चाहता था, कि मैं वय व्यापको मुलाकातको
या। पर काम बखेडोमें फंसा हुया तू। आवामकी
च्योर फोजे भेज रहा हू। इसलिये इस समय मेरा बाना
मही हो नवाता । आप यदि यहा व्याव गे, तो मैर कर सकेंगे
मुझसे मिरोगे और अपने लडके गुलाम हैदर खासे भी मुलाकात,
करेंगे। यमोरने चिट्ठोके जवाबमें लिखा, कि मुझे गापने पास ,
या फियो तरहको अापत्ति नहीं है। इसके उपरान्त
ध्ययना परिवार लोरिवाने में छोडा यार झुछ यादमियोंको
साध लेकर कलकत्ते चला। मिएर निकेलसन यमौरके साथ
था। जब अमोर कलकारी को समाप पहुचा, तो गवरनर जनरल
बहादुरने बडे बडे व्यफसरोको उसको अगवानीके लिये भेजा।
बड़ी प्रतिष्ठाको साथ कलकत मे दाखिल किया। एक सने
सपाये बडे मकानमें ठहराया। गवरनर जनरलने व्यमीरको
खातिरदारौके लिये एक व्यफसर नियुक्त किया। अमीर का
काको सडको, कमो चाडो हरियालियो योर सुन्दरी खि
याँको ६खकर बहुत प्रसन्न हुया। एक दिन व्यमौर योर
गवरगर जनरखको सुलाकात हुई। उस दिन गवरनर ननरखके
सिकत्तर तथा एकीकाङ्ग चमीरकी अगवानीको याये।
अमीर उस कमरे से ममीय मह चा, निबमें गवरार जनरल थे,
जव

प्रथम अफगान-युद्द । - P । तो म्बन गवरनर जनरल वहादा यमौरको स्वागत के लिये कम . के बाहर निकल पारे। मौरका हाथ पो हाथमे लेकर विटे की नगद ये गरे और उसे अपनी बराबरने बैठाया। पूछा कि भारतवर्ष में व्याप किस नगरमे रहना चाहते है । ब्यमी- रने जवाब दिया, कि यब में व्यापकी रक्षामे च्या गया है, तिम जगह इच्श हो रखिये । गरिनर मारलने कहा कि भार- तवर्षका निता भाग हमारे पाम है। उनमे याय नहां चाहे, पा रहें। इनको उपरान्त गवार नारलो व्यनीरको एक सलवार मोनियोको माला योर किन्मी ही अगरेजी चीजें न रमें ना अन्तम जिस नगहसे अगवानी करके अमीरको लाये थे, वहातक पहुंचा दिया। अमीरके पास इतने रुपये रख दिये जाते थे,कि वह जिस नमय जो पौन चाहा खरीट करता था। कातक में अमीरने व्यपने और अपने परिवारले निये लाखों रुपयेकी चासरी। यमौरको महरामे नाच रङ्गने जली रया करते थे। अमीर कभी कभी नाच घरमै नाता पौर फलासे देखकर प्रसन्न हुन्या करता था। तीमहीने तक व्यमीर कानात रहा। यही अपने लडझे गुलाम दर खाम मिला। मिते उपरान्त बच लोधियानेकी छोर चला । किन अभी त्रिी भी 7 पहुचने पाया था, कि भारत सरकारको काउलकी गायतका हाल मागम हुआ। अमौर जहा था, वहओं नजर पद कर लिया गया पाठा पर अमीर शेस्त सहस्मदका हाल अभी तरह पान गये होगे। सरका उहुत खखण्ड छ लम्बा है, शिन्तु प्रोसनीय सूचनाचोसे भरा हुदा है। इमे किती न ..

अफगानस्यानका इतिहास ।
--
।
-
अगरेजी पुलकमें ग्रमौर दोस्त मुहम्मदका अधिक हाल नही,
मिला, इसीलिये उक्त लेखको गैरङ्गे व्यफगानसे उहत
करना पड़ा। अव हम अमीर दोस्तमहम्मदके काबुलसे चले
यामे के बादको अफगानस्थानका हाल लिखते हैं। अमौर
जिस समय अगरेजी सैन्यसे लड रहा था, उसो समयसे व्यफ
गालस्थानमें बगावतकी याग भडक रही थी। बगावतको
याग भडकनेके कई कारण इस प्रकार हैं-
(१) शाह शुजा अफगानस्थान पर अधिकार करने के उपरान्त
एक सालतक विधिपूर्वक, न्यायपूर्वक देशका शासन करता
रहा। इसके बाद उसने स्वभाववश व्यन्याय और अत्याचार करना
ध्यारम्भ किया। शाहने एक दिन मेकानटन,साहबसे कहा,
कि
यह अफगाननाति बहुतांधनाध्य है। धन सम्पतिके नसे वह
मेरी अवज्ञा किया करती है। अफगानोंको नन बनाने के लिये
इनका मासिक वेतन घटा देना चाहिये इनकी जागीरोंका व्याधा
भाग ये देना चाहिये और इनका टिकस दूना कर देन
चाहिये। मेकनाटन साहबने शाहको समझाया, कि यार
ख्वाजा अच्छी नहो है। माहने मेकनाटन साहवको जवा
दिया, कि याप विदेशी है। व्यापको यह नहीं मालूम, वि
खफगान नाति नव कङ्गाल हो जाती है, तो शान्ति और नम
हो जाती है यौर जव धनी रहती है, तो वादशाहकी वरावर
करना चाहती है। अन्तमें मेकनाटन साहबने बादशाहर्क
बात मार लो। शाहको याचा कार्यमें परिणत होते ई
सम्पर्ण व्यफगानस्थानमें बगावतके चिन्ह परिलक्षित होने लगे।
(२) इस घटनाके उपरान्त ही किसी च्यफगानने ध्यपन

प्रथम अफगान-युद्ध। ८३. - सरिता स्वीका वध किया। पछ पकडा गया। मेकनाटन कि मामने उसने व्यपना व्यपराध खीकार किया। इसपर किनाटलने उसको नगर भरमें घसिटपाकर 'मरवा डाला। फगानोको वगायतका यह दूमरा कारण हुया। यफगान सोचने लगे, कि अब इस देश विदेशियोंका ग्राइन चल गया । । इमसे हमारी मयादापर ठेस लगेगी। घरकी खियां कमिचारिणी बनेंगी। पुरुष डाका यभिचार देखकर भी उन्हें किसी तरहका दण्डन दे सकेंगे। '(३) वरनेम माह एक दिन कायुन गरकी सैर कर रहे घे। उन्होंने किसी कोठेपर एकासुन्दरी रमणी देखी। उसकी सरल उन्द भली पान पडी। यापने घर वापस व्याकर नर्ग- र कोतपालसे कहा, कि यसक महले के व्यसक "मका कर मामीको चुनायो। यहवामी अफगात मियाहो पा।' नेम मापने उससे कहा, कि मैं तेरी स्वीपर र यदि उमको मेरे पास लायेगा, तो मैं मुग्धन भम्पत्ति देकर मालामाल वगा दूंगा। व्यफगाल क्रोधसे नायि माल लाल करके वोमा,-"साहव । ऐसी वात फिर ग करियेगा। नही, वो में तलवारगे यापकी गरदन उतार गा परनसने इम अफगानको कैद कर लिया। अफगानके } मन्यो यमगर सरदारों के पास गये। उनको वरनेमका सब स समाया। आगामरशर भाइके माम गये, किन्तु शाहने नमको पारा सुगकर उन्हें पिटवाकर निकला दिया। दूसरे दिन र रगान मादार वरनेसझे पाम गये। उन लोगोंने अग्नेसकी परत करी आसे एमाईधार प्रनामें उनकी हत्या की - र .

८३ अफगानस्वानका इतिहास। अफगानोंकी सैन्यने वालाहिसारपर मोरचे बांधकर अङ्ग्रेजी पौष और शाह शुजाकी फौगका सम्बन्ध तोड दिया था। इम बाधासे अगरेजी फोनको रमद महौ पहुचती थी। अकबर खांने मेकनाटन साहवको पूर्वोक्त पत्र भेजकर वासादि सारक मोरचे हटवा दिये। उधर दूतने वापस जाकर व्यक- यर साका पन मेकनाटन साहबको दिया। नुवानो भी कहा, कि सुहम्मद अकबर सां यापसे युद्ध करना नहीं चाहता। उसने वालाहिसारका मोरचा छोड दिया है। व्याप यदि उसकी तीनो बात मान लेंगे, तो वह अापके पास यावेगा। मेकनाटन साहबने सोच समझकर तीनो वाते खोकार कर ली। अकबर खाको लिख भेगा, कि व्यपकी वते मन हैं। व्याप आकर समझे मिलिये। यापको यदि यहां ग्रानेसे इनकार हो, तो मुलाकात के लिये कोई दूसरी बार चुनिये। नेरङ्ग अफगानमें लिखा है,-'मेकनाटेन साहबने यह चिट्ठी भेजनेके बाद एक चाल खेली। सहम्मद व्यकवर खोको लिखा, कि सरदार व्यमोन खां, अब्द लहसा, शोरी खाव्यौर अजीज खां यह सब अफगान सरदार व्यापके विरुद्ध है। जैसे ही में व्यसगास्थानसे बाहर निकल जाऊ, धाप इन लोगोंको मरवा डालियेगा। यह पोते रहगे, तो व्याप बोते न रहेंगे। मेकनाटेनने ध्यकपर खाँको तो यह लिखा और पूर्वोक्त कफ गान सरदारोंको यह लिखा, कि मेरे यफगानस्थानसे बाहर निकलते हो तुम लोग धफवर खांको मार डालनेकी मिक करना। वह तुम लोगोंको श्या करना चाहता है। सह- मट कर नौको मेकपाटन सावकी विीर सली

-1
प्रथम अभागा 3
'हुशा। उन्नै रातको पू:क्त सरदारोंको अपने सेनेमे
बुलाया। मेकनाटन साहवकी चिट्ठी सपके सामने रख दो।
यह मन देखकर मन सरदार याश्चर्यान्वित हुए और उन्होंने
अपनी व्यपनी चिट्ठी भी निकालकर सरदार मुहम्मद छाक
पर खा सामने रख दी। इन चिट्ठियोंको देखकर घवापर
बाने कहा, कि ज्यान में मेकनाटन साहबसे तनाकात करू गा।
तुम योग मुलाकातके खेमेके पास मौजूद रहना। दृसरे
दिन प्रात काल यमौरने मेकनाटेन साहयको जवाब दिया, कि
यसक पुलके वीचमें में समा खडा कराता हू। याम वहाँ
'याने। वही मेरी आपकी मुलाकात होगी। अमीरने
पुलके वीध खेमा सडा कराया और उसमें बैठकर मेकनाटन
मगहरकी प्रतीक्षा करने लगा। उधर भेकनाटन माहवने
एसपियन माहवको कहा, कि व्याप थोडीमी फोन लेकर
होम समीम छिप रहिये। भर में इशारा करू, तो खेमेपर
टट पडियेगा योर व्यकार खांको कैद कर लीजिये।
पनि में मारा जाऊ, तो याप मन्चके प्रधान सेनापलिका पर
ग्रहया कीजियेगा। इनके उपरान्त मेकपाटा-वर, मेवानी
योर लागेम्स इन तीन घागरेनों और कुछ मवारों साथ
रोमेकी घोर पला। व्यकबर खाने खेमेसे बाहर निकलकर
मझगाटेनका स्वागत किया। मेकनाटनका हाथ अपने हाथों
कर खेमे पापम आया। दो वरावर परावर बैठे।
भात पोतयारम्भ होनेके उपरान्त प्रकार खाने कहा कि
याम अरमानोंसे बहुत दुखी जान पड़ते है। इसीलिये याप
उन्हें घोरमें डालकर व्यापस लडा देना चाहते हैं। यापने

अफगानस्थानका इतिहास ।
कुछ अफगान सरदारोंको मेरे विरुद्ध और मुझे उनके खिलाफ
चिडिया लिखी। मैंने अापको वातपर विश्वास करके मोर
चोपरसे यमनी फौज हटा ली। व्यापने उसके बदले में मेरे
साथ चालाकी खेली। मेकनाटन साहव व्यकवर खांकी
बात सुनकर लज्जित हुया। उसके मुहसे बात न निकली।
इसपर अकबर खाने डपटकर कहा, कि ग्राप मेरी बातका
जवाब दौनिये। मेकनाटन साहबसे जवाब तो वन न पडा,
घकबर खांको समझाने लगा। कहा, कि याम नामममीकी
बातें न करे। मैंने जो कुछ कहा है, उसपर हर हू ।
मेरी हार्दिक का यही है, कि मैं यहासे भारतवर्ष चला
जाऊ। ग्राशा है, कि ग्राप भी अपना वादा पूरा करेंगे।
"अकबर खा और मेकनाटेनमें ऐमी ही बात हो रही थी,
कि एक व्यफगान अकवर खाके पास दौडता हुया याया।
पश्तो भायामें कहा, कि एलफिंटन सैन्य लेकर व्या रक्षा
है और पुलके समीप पहुंचना चाहता है। यह सुनकर
प्रकवर खा खडा हो गया। मेकनाटेन भी खड़ा हो गया
यौर खेमेसे बाहर निकलने लगा। इसपर अकवर खाने
मेकनाटेनका हाथ पकड लिया और कहा, कि मैं यापको
नहीं छोड़ गा। ग्राप मेरे कैदी हैं। मैं यामको मार
डालता, किन्तु बडा समझकर छोड़ देता हूँ। इसपर मेक
नाटेनने जेबसे तपचा निकालकर यकबर खांको मारा
निशाना सालो गया। इसपर ट्रेवर साहब अकबर खाँकी
योर था, किन्तु व्यकवर खाने डांटकर कहा, कि तुम अपनी
जगहपर रहो। व्यकवर खा मारकाट करना नहीं चाहता

मयम अफगोन-धुंह। घा) एमको व्यान्तरिक कामदा घी, कि मेकनाटनको अभी कैद रखगा व्यऔर फिर हम नियममर छोड दूगा, कि कर छूटने ही यफगानस्थानसे चला पाये। किन्तु भगनाटेनी बुद्धिसे काम नहीं लिया। उसने यमर खाशिरपर एक घुसा मारा। इससे संकर खा वहुत क्रुद्ध हुया। उसने भी भैरुनाटेा भावले शिरपर एक घुसा मारा। इनपर मेशाटन साहव व्यकार साको गालिया देने लगा। पर खो गालियां बरदाश्त न कर मका। उसो नेक्नाटेनकी पटाकर शोर जमकी शातीपर सफर उसकी शिी घोर डाली। यह देखकर ट्रेनर साहदने वधार खोंचरर प्रक- पर खापर च्यामा किया। च्यावर खा, तोच गया, । किन्तु उनका एक सरदार मारा गया। अकबर खा मेक- गली यौर सालको पकडकर, एपने माय हे गया। एट फिटनको जव यह समाचार मिला, तो वह अपनी-थोडीसी पौवके माप वापस चना गया। इमामासोपीसिया रटानिशाने यही पात पम तार लिसी हुई है, 'सन १८४०१० को ५ वी दिममरको यमीर दोचा सहम्मद साले बडो पावर सो योर नर बदला मेकमाटामें एक समपन्ह हुई। म घरमरपर कवर शांने पपने हापसे मेझगाटेन भावको श्या की।' इस घटना उपरात उहत कापियोंका भोग मा पा गया। येनापति एमपिएन ध्यपनो कोष लिये हुए हार, मोम महे थे। पानीको पारो घोर पागी भांप लिये थनरेजी पीपको रमाद

अफगानस्थानका इतिहास ।
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वर घिरावमे पडे पडे बहुत घबराई। धन्नमें एलफिएन
साहवने बागियोंके सरदार अकबर खासे सन्धि, की।
सन्धिपत्रका सार मर्म यह था, कि एलफिन साहव अपनी
फोनके माघ काबुलसे भारतवर्षको योर चले जावे यौर
यकबर खां उन्हें राहने वाधा न दे। सन् १८४२ ई. की
ठी शनवरीको व्यगरेजी पोन पडावसे बाहर निकली।
फोजमे कोई चार हजार पाच सौ सिपाही और कोई
१२ हजार नौकर चाकर थे। इन सिपाथियो। ४४
नम्मर रेजिमेण्टके ६ खो ६. गोरे घे। फोनमें कितनी
ही गोरी बीवियां और उनके बच्चे थे। व्यगरेजी फौज
पडावसे बाहर निकलते ही वागी व्यफगानोंने मारकाट
ग्रारम्भ की। ध्यागे पीछे मव योरसे अगरेजी फौजपर व्याक
मग किया जाता था। अगरेजी फौजको तो एक एक
करके झिा गई और फोनको एक एक कदमपर बागियोंसे
भिहना पड़ता था। उम समय वलाको बरफ पड रही थी।
पहाड, मैदान, दररे बरफसे सुफेद हो गये थे। इसलिये
फोजको शीसे बडा ही कर मिला। रसदकी कमीसे सिपाही
भूखों मरने लगे अगणित सिपाही शीत व्यौर भूखसे
ऐसे यााल हो गये थे, कि विगा हाथ पैर हिलाये मारे
गये। ४४ नम्बर व्यङ्गरेजी फोनके फुल सिमाही मारे गये।
जालक दररा काजुलसे कोई पैंतीस मीलके फासलेपर है।
अगरेजी फौन जगदलक दररेतक पहुंचते पहुंचते गरम
हो गई।
फौज चोलह हजार पांच सौ मनुष्योंमे सिर्फ
तीन सौ यादमी जगदलक पडु च। पाकी सब राहमें मारे

प्रथम अफगान युद्ध
गये। फौजके प्रधान सेनापति एलफिरन साहक्ने अकवर
सके हाथ यात्मममर्पण किया। ध्याठ व्यारेज रमणियां
भी व्यकार बांकी कैदमें व्याई । अगरेज रमणियोंमे वीवो
सेल यौर वीवी मेकनाटेन भी थीं। इसनी बडी फोनमे, यानी
मोलह हजार पाच सौ मनुप्पोंमें सिर्फ डाकर प्राइडा ध्यपने
तेज घोडे की बदौलत मारे वा पकडे जासे बचे व्यौर नसाला
पाद पहुचे। कपार कम्य नमें लिखा है, "मन् १८४२ ई० में
जनवरी महीनेकी १३ वी तारोल थी। जलालाबादके किलेमे
सर रानट सेलाके व्यधीन एक गेड पड़ा था। गेडो सिया
हियोंने देवा, कि एक मधार घोडे की पौठपर भुवा हुया,
घोडा भगाना किले में घुस च्याया। यह सवार डाक्टर
पाडा धे। काजुतमें कई महीनेतका पडी रहनेवाली फौगसे
यो यची बचे थे। डाक्टर ब्राइडनको कितने ही पखम
लगे थे। तलवारी घारसे उसका हाथ काटकर गिर चुका
था। यह डाक्टर भी बहुत दिनोंतक न गिये। सिर्फ पार
सालके उपरान्त मर गये। ध्यारेजी फौष काजुत परित्याग
करनेसे उपरान्त ही शाह शुभाके जीवनका व्यन्त हुआ।
वह एक दिा काउलझे वालाहिसार किसे बाहर किया।
व्यकपर खांके कुछ सिपाही उमकी ताकमें लगे थे।
शुगायो सामने पाते ही मिपाहियोंी गोलियां चलाई ।
शाद शुगा कई गोलियां रगकर उखा हो गया।
इमके उपरान्त प्यारेजो फोनने यफगानों बदला लेने
लिये फिर ध्यप्रगानम्यानपर चालाई की। मन् १८४२ की
१६षी धमरेलको सेमापति मोलाकने नक्षालावादका उचार
शाह

अफगानस्थानका इतिहोस । किया और उमी सन्की १५ वी सितपरको काबुलपर का कर लिया। उधर सेनापति नाट गजनीको ध्वस करके १७वों सितम्बरको काउलमे सेनापति गोलाकसे मिल गये। वामि- यानमें अगरेनी फाजने अकवर खासे अपने कैद निपाही स्तो, बचे यादि छडाये और अकबर खांको भगाकर काबु लकी पडेससे दूर कर दिया। अगरेजी फौजने कायतका वडा बाजार गोलोंसे उड़ा दिया और सन १८४४ ई-के दिस- बर महीनेमें व्यफगानस्थानसे भारत वर्यकी योर प्रत्यावर्तन किया। व्यङ्गरैजी फौज घ्यफगानोंको सिर्फ दण्ड देने यौर अपने कैद सिपाहियोंको छडाने यफगानस्यान गई थी। यह दोनो काम करते वह लोट व्याई। व्यफगानस्थानपर कवजा फरला नहीं चाहती थी। कारण, उसको मालूम हो गया था, कि इस देशपर अधिकार कराा उतना व्यासान काम नहीं। राबर्ट साहब च्यपनी पुस्तक "पाटीवन इयम इन इस्टिया में लिखते हैं, "इस विषयके दुखमय परिणामने एटिश सरकारको सिखा दिया, कि इमारी सीमा सत उनतक जो पढ गई, पहा यथैए थी। व्यफयानस्थानपर किमी वरहका प्रयते - प्रभाव डालनेका वा ध्यपगारस्यानके मामले में दखल देनेका समय ध्यभी नहीं पाया था। पर मरमें लिखा है, 'योर यव, भुमवने हटिश भरकारको सिखा दिया, कि उसकी हालकी बीति बहुत खराप थी। इसलिये उसने अफगामस्थान चोर उस मैतिक सम्बन्धमें हस्तक्षेप करगेसे हाथ धो लिया।

प्रथम अफगान-युद्ध।
पाठकोंको स्मरण होगा, कि अमीर दोस्त सहम्मद कल
कत से लोधियाने जा रहा था। ऐसे ही समय यारेजोंको
काबुलमें वगावतकी याग मन्डकनेकी खबर मिली। अमीर
दोस्त महम्मद दिल्ली भी नहीं पहुचने पाया था, कि गिर
फ्तार कर लिया गया। वह शाह शुभाको उत्य तक कैदमें
रखा गया। इसके उपरान्त अगरेनोंने उसे छोडकर सावा
जानेकी याज्ञा दी। दस्त सुहम्मद दुवारा काबुल पाया
यौर फिर अफगानस्थानका ग्रमीर बना। अफगानोंने बड़े
यादर सम्मानसे ग्रमौरको काबुलकै मिहासनपर बैठाया और
उसकी सेवा करने लगे। चमीरने घोडे ही दिनोंके शामनमें
अफगानस्थानमें शान्ति स्थापित कर दी। अपने पुत्र अकबर
खांको अपना मन्त्री बनाया। किन्तु अकवर खां वहुत दिशतक
जीवित न रहा। सन् १८४८ ई.में पञ्चत्वको प्राप हुया।
सन् १८४८ ई.में पलाव, सिखोंका बलवा हुया। दोख
सहम्मद खां अपना प्राचीन देश घेशावर लेनेकी अभिसापासे
सीमा पार करके अटक याया। सिख सेनापति शेरमि
उस समय घगरेजोंसे युद्ध कर रहा था। अमीर दोस्त
सहम्मद खांन सिखोंके कहने सननेपर व्यपना व्यपगान रिमाला
सिखोंकी सहायताको भेना। मन १८४६ ई.की २१ वी
फरवरीको पक्षाव-गुजरातकी लड़ाई में इस अफगान रिमानेने
सिख सेन्चके साथ अगरेजी फौजसे मुकाबला किया था।
हाम्तमें मिस पराल हुए। सिखोंके माथ भाष व्यफगानी
रिमाला भी परास्त हुया। मर वाल्टर रेले गिलवर्टके सेनाप
तिधर्म व्यारेजी फौलने व्यफगान पौनका पौश किया! शेज
।

EU
अफगानस्तानका इतिहास ।
सहमद खा मेन्यामहित भागकर अफगानस्थाा भीमामें
हाखिल हो गया। इसके उपरान्स, अमोर दोस्त सहम्मदने
स्वतन्त्र व्यफगात सरदारोको विजय करके व्यपने अधीन करना
ग्रारम्भ किया। इस कामसे छुटकारा पाकर मन् १८५० ई.
में उसने व जसपर कबना किया योर इमसे चार साल बाद
कन्यारपर। अव व्यमौर दोस्त मुहम्मद योर अगरेज सर
कारमें मेल मिलाप वाने लगा। इसका फल यह हुया, कि
नन १८५५ ० जनवरी महीने में पेमावरमें व्यङ्गरेन अफगान
सन्धि हुई। नैरङ्ग अफगानमें यह सन्धि इस प्रकार लिखी
(१) यानरेवल ईट इण्डिया कम्पनी और काबुलपति
दोस्त सहम्मदके वीचमें सदैव मैत्री रहेगी।
(२) यानरेषल ईए ईण्डिया कम्पनो वादा करती है,
कि वह व्यफगानस्थानके किसी भागपर किसी तरहका हस्त
क्षेप न करेगी।
(३) अमीर दोस्त सहम्मद खां प्रण करते हैं, कि वह
कम्पनीके देशपर हस्तक्षेप न करेंगे और ग्रानरेबल कम्पनौके
मियोंको मिन व्यौर शव गोंको शत्रु, ममोंगे।"
इम सन्धिके सालभर वाद इरानने यफगानस्थानके हिरातपर
प्याक्रमण किया। याक्रमणका हाल लिखनेसे पहले हम हिरा
त पगरका थोडामा हाल लिखते हैं। हिरात नगर हिरात
प्रदेशको राजधानी और भारतवर्षकी फुची कहा जाता है।
यह १३ मील लखी और १५ मोल चौडी जल प्योर
हरियालीसे परिपूर्ण घाटीमें बना हुआ है। नगर प्रायः

प्रथम अफगान युद्ध ।
६५
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पोस्टा है। मगरको चारो योर चालीससे पचास फुटतक
ऊंचा मट्टीका टीला है। यह टीला कोई बीम फुट ऊ ची
टोंसे बनी हुई शहरपानहसे घिरा हुया है। शहरपनाही
वाहर तरल सन्दक है। खन्दक प्रत्येक व्योर की एक
मील लम्बी है। इस हिसावसे नगर एक वर्ग मीलो भीतर
है। नगरमें कोई पचास हजार मनुष्य वसते हैं। नगर
वासियोंगे घधिकांश लोग शीया सम्य दायके मुसलमान है।
पापारमें माना जाति यौर नाना देशके लोग दिसाई देते
है। कहीं व्यफगान है, कहीं हिन्दू-कही तुर्क हैं, कहीं
ईराणी और की तातार है, कही यहूदी। शहरके यादमौ
इथियारोंसे लदे रही है। कावुल, कन्धार, भारतवर्ष,
फारस और तुरकम्यााके बीचमें सौदागरीका केन्द्र होकी
बजहसे हिरात सोदागरों हीसे वम गया है। दिरा-
सकी दस्तकारियोंमें कालीन प्रधाा है। यहांका फालौन
सम्पूर्ण एशियाने प्रसिद्ध है और बड़े दामोंपर विकता है।
यहाँ नाना प्रकारके स्वादिर पल उत्पन्न होते है। निष्पक
खादा पदार्थ, जैसे रोटी, तरकारी, माम प्रति मस्ते दामी
विकत है। यहांका जल वायु स्वास्थाप्रद है। सिर्फ दो
महीने गर्मों पर जाती है। बाकी दश महीने यमन्तकी
मी तु रहती है। इसका प्राचीन इतिहास बहुत खमा
चौडा है। बहुत पीछेकी बातें 7 लिखकर व्यपगी यात प्रच्छी
सरह समझा देनेके लिये हम ईरानके हिरात ले लेनेसे चार
मारा पहलेसे हिरातका इतिहास लिखते हैं। मन् १५०
में हिरान हाकिम सुहम्मद खांकी दत्य इरे। उसका
।

२६ अफगानस्थानका इतिहास। यह - पुन सय्यद सहम्मद खा हिरातके सिहासनपर बैठा। तीन सालतक शासन करने पाया था, कि सद्दोनई जातिक मुहम्मद यूसुफ खाने इसे सिंहासनसे उतारा और वह खयं हिरातका शासक बना। किन्तु कुछ महीनोंके वाद ही दुररानी जातिका ईसा खां सुहम्मद यूसुफको भगाकर उसकी जगह बैठा। इधर दुररानी सरदार रहमदिल खा हिरान । पर घमाई करने की तय्यारी कर रहा था। इसकी तय्यारियोंसे - हरकर हिरातने ईरानियोंसे सहायता मांगी। ईरानने समय देखकर अपना लशकर भेजकर सन् १८५६ ई.में हिरातपर' कवजा कर लिया। ईरानने अगरेजोंसे सन्धि करने में एक प्रण यह भी किया था, कि में हिरातपर अधिकार न करुगा। जब ईरानने अपना प्रण भङ्ग किया, तो अगरेज महाराज कुछ हुए। उन्होंने पहले यमौर दोस्त मुहम्मद खाकी मैत्री खूब पक्की' की। सन् १८५७ ई.में अमीरको पेशावर बुलाया। वहां अगरेज कमिभर सर जान लारेस साहबने ग्रमौरसे मुलाकात की। यमौरको याठ विलायती घोडे,यसी हजार रुपयेकी खिलयत चौर ८ लाख रुपये नकद दिये। अगरेजोंने यारेब ईराम युद्धको समाप्तितक अफगानस्थानको फौजी तय्या- रोके लिये १२ लाख रुपये साख देना मश्नर किया। इसके उपरान्त व्यगरेनोंने ईरागपर दो ग्रोरसे अाक्रमण किया। एक तो हिरातको बोरसे और दुसरा फारसको खाडीकी सरफसे ! फारसको, खाडौने बूहरपर अगरेजोंने कयणा कर लिया। एमाले न मीता गौरमले नानी । - प्रथम अफगान युद्ध १७ . - सन्धि कर सन १८५७ ई०के जुलाई महीनेमें हिररात खाली कर दिया। ईरानके हिरात खालौ करते हो सुलतान यह मद खां नामे एक वारकणई सरदारने हिरासमर कवजा कर लिया। ग्रन्तमें सन १८६३ इ.में व्यमौर दोस्त मुहम्मदने -हिरातपर याक्रमण किया गौर उसी सनके मई महीने में नगरपर अधिकार कर लिया। उसी समयसे हिरात अफ गानस्थानके अधीन हुथा धौर काजता है सन् १८५७ ईजी १३ वी मार्च को छमोर व्यफगानस्थान' : बमानेमें मेनर। एच. वी. लम्सडन साहपकी प्रधानतामें' अगरेजोगी एक मिशन क पार गई थी। उसी समय भारत वर्षमें गदर फूट रहा था। घगरेनोंका भारतशासन डावा डोल हो गया था। कितने ही अफगान सरदारोंने , और कितने ही पचाववामियोंने यमौर दोस्त सुहम्नद खोको अफगातस्थानसे भारतवर्ष यादर वागियोंको सहायता पहुचा. देनेके लिये उत्तजित किया था। किन्तु अमीर कुछ तो दूरदर्शितानश और कुछ अगरेजोंकी कन्यार मिशन समभाने बुझानेसे गदरकी भडकती हुई ग्रागको और भडकानेपर राणी नहीं हुए। भारत सरकार अमौरके इस कामसे बहुत सन्तुष्ट हुई थी। सन १८६३ ई०की १८ वी भूनको हिरातमें नामी गरामी अमौर दोस्त महमद खांका परलोकवासे हुया। घमौर दोख सम्म खाकी ग्टय के उपरान अमीरपुल शरव्यली खा ध्यमगागस्थानका अमीर निस समय सिहालगपर बेटा, उस समय रुव भारतवर्ष के । बना। यह । ६ अफगानस्थानका इतिहासः। बहुत समीप पहुंच चुका था और भारतको भी हिरात पर कबजा कर लेनेका भय दिखा रहा था। द्वितीय आमगान- युद्धके उपरान्त ही ग्रङ्गरेज सिख युद्ध ग्रारम्भ हुवा। अङ्ग रेखोने सिसोको पराख करके सिन्ध नदके किनारेतक अपना राम्य फैला दिया। उपर रूसको विशाल रेगस्थान पार करने पर उयनाक भूमि मिली। वह जल्द जनद भारतवर्षको ओर बाने लगा। सन् १८६४ ई में रूसने 'चमक दपर कवना कर लिया। रूस-राजकुमार गरचकामने कहा था, कि स्व चम कान्दसे च्यागे अधिकार-विस्तार करना नही चाहता। किन्तु राणामारको वात वात होत रहो। दूसरे सालकी २८वीं जनको रूसने चमकन्दसे ग्रागे बहकर ताशकन्दपर कवना कर लिया। सन १८६६ ई में रूमने खोजन्तपर वायना किया। ३०वीं अक्टोवरको विशारवपर कहजा किया और सन १९६७ ई० की वसन्तरतु, तुराता पर्वतो यानीकरगानपर। सिफ सुखारा हसने हाथ पडनेसे बच गया। पहले 'अमीर बुखा.' राने भारतवर्ष और अफगास्थानसे व्यपनी रक्षाके लिये प्रार्थना को, किन्तु इसका कोई फल हुया। अन्त में रूससे सन्धि कर ली, और प्रकारान्तसे रूसका अधिकार बुखारे पर भी हो गया। असतक इङ्गलराइने रूमको व्योर विशेषाधान नही दिया था। एक तो इस कारणसे, कि इङ्गलण्डने मध्य एशियाको मामलोंमें दखल न देनेको नीति अवलम्बन की थी। दूसरे इसलिये, कि वृटिश सरकार युरोपले राजनीतिक बखेडोंमे उलझी हुई थी। ध्यन्तने जब रूसने समरकन्दपर अधिकार किया, तो इङ्गन, - .

। - प्रथम प्राफगान युद्ध। - को चैत य लाभ हुना। वह रूसको इतना वा हुया देख पार चिन्तित हुया। सन् १८७० ई०में इङ्गलण्ड चैदेशिका मिकत्तर लाड तारेनडा और हमके राजदूत भगोमें कामरश हुई। कनफरन्यका विषय यह था कि मध्य एशियामे एक ऐसी रेखा निहिर कर देना चाहिये, नितका उलग दृटिश- सरकार का रूस सरकार नपारे। तीन मालतक यह भागटा चना, कि अफगालस्थाा स्वत समभा जाव या बगरेश महा रानो प्रभाव में। रूम कहता था, कि वह खतन्य समझा जाये। अगरेज कहते थे, कि उसपर हमारा प्रभाव । यन्तमे सन् १८०३ ई की वी चनवरीको ऐसी रेसा तयार की गई, सिसके उन पारनेका प्रण रूम चार व्यनरेज दोनोने किया। किन्तु रूप अपो पराकी उतनी परना ही किया करता। यह प्रय हो जानेके छ ही महीनों बाद उसने खोवमें फौज मेंहो। जन गरेनोंने रूससे इम-अमरावका कारण पूना, तो रूम सरकारकी बोरसे काउण्ट स्कायवाफने पवार निस, किसीपमें डागायोंका बहुत जोरहे। डासमी पपास हमी पकड लिये है। डायुगोंको दान देने योर एसियोको शेट्ले छुटाने जिये जी फोनका टुकडा खीव गेगा गया है। यह ना कुछ कहने पर भी रूपो खीवपर पिकार कर लिया चोर च्यागतक करना मिाये हुया है। इस प्रकार रूम वीस सानमें कोई ६ सो मौत भारतक्यवी और पा च्यावा थोर व्यय रूस तथा घगरेजोको सीमामें चार मौलका अन्तर रह गया। ल्मकी दक्षिणीव इनोमा अफ माधानको उतरीय सीमासे सट गई। २ - ।

স্থানান্য বিষাদ।
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अमीर शेरच्यली खोके भाई अमौरके विरुद्ध थे। इसलिये
अमौरको अफगागस्थानके सिहासनपर बैठने के उपरान्त होसे
अपने भाइयोंके साथ युद्ध में प्रत्त होना पड़ा। अमीर निवष
था। उसने अगरेजोंसे सहायता मागौ। किन्तु व्यबरेजोको उस
पर विश्वास नहीं था। उन्होंने अमौरको लिखा, कि हम उन्हें
नहीं रच तुम्हारे भाई अफजल खांको काबुलका समोर
मानने के लिये तथ्यार है। इसपर धमौर शेरगलोने अपने
सुजालपर भरोसा करने अपने भाइयोचे युद्ध करना प्रारम्भ
किया । सन् १८६७ ईसे ध्यकोवर महीनेमे ग्रमौर शेरव्यली
साने सत्रह हजार फौज तय्यार की। बलखके हाकिम क्षेत्र
महम्मद खांने भी उसको सैन्यसे सहायता पहुचाई। सन्
१८६८ ई० को १ली अपरेलको अमीर शेरयली कन्धारमर
कबजा कर लिया। इसके उपरान्त सन १८६६ ई की री जन
वरीको अपने माई व्याजम खां और अपने भाई सुहम्मद बर्फ
जल खामे लड । व्यदररहमान खांको गजनामें शिकायत
दो। यही अन्दरहमान खां अन्त में अफगाभ्यानके यमीर
हुए थे। पन्द्ररहमान साने अपनी इस पराजयका वृत्तान्त
गयगी तुझमें इस प्रकार लिखा है-
"जब गगनी पहुचा, तो देखा, कि नगर खा दरूकने
पहले हीसे किला मनवून कर रखा है। मैंने उसका घेरा
किया, किन्तु वह बहुत सुरु था। मेरी सभर वाटरोयो,
तोपोसे फतह नहीं हो सकता था इमलिये मुझे उचित
न जान पडा, कि मैं अपने पासका धोडला गोला बारूदको
उसीपर नए पार हूं। उधर घिरे हुए लोगोंकी हिम्मत
-

{" प्रथम अफगान-युह ।
इस लिये ज्यादे हो रही थी, कि उाको चालीस हजार
सिपाहियोंकी फौनके साथ व्यमीर शेर अली यानेका ममा
चार मिल चुका था। मैंने ग्यारह दिनोंतक कुछ न किया।
इम अवमरमें अमौर पर अली खाकी कोई चालीस हजार
सिपाहियोकी फौज गनगीसे एक मछिलके फासलेपर पहुच
। गई। मैंने नासूमोंसे समाचार पाया, कि सचतच ग्रमीर
शर अलीखाके पाम चालीम हजार फौज घी और यह मुशि-
पित थी। यह सुनकर मैने मीर रफीक खासे सलाह की।
यह स्थिर हुआ, कि इतनी बडी फोनसे खुले मैदान युद्ध
करा उचित नही है। इमलिये हम एक तङ्ग दररेमें चले
गये। जिस समय हम सईदावाद वापस जा रहे थे, अमीर
शेर अली खाने दश हमार हिराती और कन्यारी भवारीको
हमारे पीछेसे याक्रमण करनेकी ग्राज्ञा दी। यह भी ग्राना
दौ, कि वह काउलवाली नडकपर काना कर लें। जिसमे
दृमरे दिन जब वह विजयी हो, तो हमारी भागनेकी राह
रोका दी जाये। वैरीको सैन्यके इस भागसे मेरे छ. मो
मिपाहियोंका। मामना हो गया। इन्हें मैंने अपनी फौज
व्यागे भेगा था । मेरे सवार बडी वीरतासे लडे चौर धोर
पीरे पीछे हटने लगे। उन्होंने अपनी विपत्तिका ममाचार
सुझे दिग। मैो समाचार पाते ही पैदलोकी दो पलटने
उनकी सहायताको भेजी। वह एकाएक युद्धस्थलमे पहुची।
अमीर पोर अली खाने सन मवार एक ही जगह जमा थे।
थोडी ही गोलियोसे उन्हें बहुत सुवासान पहुचा। यह भाग
खरे हुए। मेरे सिपाही बैरियोका माल लेकर वापस आये
।
1

अफगानस्थानका इतिहास।
T
और हम सईदावादको घोर फिर रवाने हुए। मन अमीर
शेर अली खांने इस शिकशनका समाचार पाया, तो योर उसन
ही सिपाही अपनी सैन्यको महायताको भेजे। उन्होंने गाकर'
मैदान खाली पाया और मेरी नैन्यको वापस जाते देखा।
इमलिये वह स्वयं वापस चले गये। उन्होंगे अमीरको यह
मुसमाचार सुनाया, कि उाकी फौनका गाधिका देखकर मैंने
हिम्मत हार दी और लडाईसे मुंह मोडकर मैं भागा जाता
था।" ग्रव भारत सरकारी कुछ तो इस ध्यागसे, कि बनी
से शक्ति मश्चित की और कुछ अफगानम्थान हतका प्रभाव
प्रस्तार रोकनेके ध्याासे, शेर व्यती खासे मेल जोल वजनेता
उपक्रम किया। भारत के वडे लाट उर्ल मेयोने शेरव्यलीको
अमीर खीकार किया। शरबलो साले पुन याकूब साको
लोगों। ममझा दिया, कि व्यमीर तुम्हारी जगह तुम्हारे भाइ
ग्रन्दुल राराको युवराज वावगे और अपने वाद' उन्हींको
काउनका रानसिहारुन देगे। इस वातसे याकूम खा विगहा।
उसने नन् १८७० ई०को ११वी सितम्बरको वगावतका मजा
खडा किया। याकूान साने सन् १८७१ ई.मे गोरियान किलेपर
अधिकार कर लिया योर उमो सनके मई महीने में हिरातपर
कवना कर लिया। वाप वेटेका यह झगडा गरेजों होने
घोचमें पडकर मिटा दिया। बाप बेटेमे मुलह कराई व्यौर
च्यमीर याकूम खाको हिरातका हाकिम स्वीकार किया।
इससे प्रमाणित होता है, कि अमीर शेयली भी ग्रन
रेनोंका बहुत खयाल रखता था।
यारेजोंको गीतिसे भारत सरकार और अमीर शेरव्यलीकी
.
-
किन्तु उस समय

प्रथम अफगान युद्ध। रवी बहुत दिनोंतक नहीं निवही। अमीर पोरयलीने भारत सरकारसे दो प्रार्थनाये की। एक तो यह, कि मैं 'अपने प्रिय पुत्र ग्रन्दुलह खाको युवरान बना चाहता है। आप भी उसोको युवरान मानिये। दूसरी यह, कि जन रूस अफगानस्थानपर ग्राफ्रामण करे, तो याप मेरी सहायता कीनिये। भारत सरकारने दोनो प्राधायें अस्वीकार कर दी। अगरेनोंने अफगास्थान ईरानकी सीस्तानवाली नरहदवन्दीका भी उचित फेमला नहीं किया। भारत सर- कारमी इन बातोंसे अमीर शेयलीन दृश्य टूट गया। वह अगरेजोंका शव, पन गया। चालीस साल पहले "उनके पिता दोस्त सहम्मदने जिस तरह निराश होकर रूमकी यग्ण जाना हिर किया था, उसी तरह उदयभन्न धौर निराश छोगार शेरव्यली भी रूसको रचामें जानेपर तय्यार । हुया। चमीरका रूसकी शरण लेनेकी चेया करना ही द्वितीय वनगा युद्धका कारण बना। रावटेस चाहय अपनी गुरुक “माटी वा इयर्स इन इख्यिा में कहते हैं, यह ध्यान देने योग्य बात है, कि दोनो अफगान युद्धका कारण एक यील्स च्यफमरोका काबुल प्रवेश ।' इनमें कोई मन्देह नही, फि दो गफगान युद्धका कारण कम रफमरीका काबुल प्रोग वा कावुलपतिका हमरी मेल मिलाप करनेकी चेया है। वार्ड रापर्ट लिखते हैं,-१८७३ ४० रुम युद्ध हुना। एक सालते जपर झूमर दोनो शक्ति माइती रही। उसो समय इलटको भी इस युद्धमें गरी छोनिकी चाशवा हुई। अगरेजोने पाच हजार देशी

अफगानस्तानका इतिहास ।
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सिपाहियोंकी फौन वम्बईसे मालटा भेज दी। रूसने मध्य
एशियागे अग्रसर होनेको चेया करके अगरेजोंको इस तथ्या
गैका जवाव दिया। सन् १८७८ ई के जून महीनेने पेशावर के
डिपटी कमिश्नर मेनर कीगन ने भारत सरकारको समाचार
दिया, कि ताशकन्दके रूपी गवरनर जनरलके वरावर अधिकार
रखनेवाला एक रूसी अफसर काबुल ग्रानवाला है। जनरल
काफमेनने अमीरको चिट्ठी लिखी है, कि अमोर उक्त यफमरको
स्वयं रूस मम्बाट् जारका दूत समझे। कुछ ही दिनों बाद यह
खबर भी मिली, कि रूसी फौज ग्रच नदोके करेकी और
किलिफ घाटपर एकत्र हुई है। वहा वह छावनी बनाना
चाहती है। इसके उपरान्त खबर मिली, कि व्यमारने अफगान
मरटारीकी एक सभा करके यह प्रश उत्यापन किया था, कि
अफगानस्थानको अवरेजोका साथ देना चाहिये, वा रूसका।
अवश्य ही इन सभाी रूस होका साथ देनेका फैसला किया।
कारण, रूस सेमापति शालीराफसी अधीनताम एक मिशनो
काजुल प्रवेश करनेपर व्यफगातोंने उसका व्यादर सत्कार करना
ग्रारम्भ किया। कादलसे पाच मोलके फामलेपर छामीरक
मरदारोंने मिशाका स्वागत किया। मिशाके लोग जङ्गी साजसे
मने हुए हाथियोंपर 'सवार कराये गये। एक फोन 'उनको
अगवानो करती हुई उन्हें कावुलदुर्ग यालाहिसारतक लाई।
दृभरे दिन मिानने व्यमीर पोरचली और अफगान मासे
सलामात की।
।

मेजरको मिशन।
निशन सम्बन्धी उपरकी फुल वाते तारदारा भारत के बड़े
। लॉट बहादुरने भारत सिकत्तरसे कही। साथ साथ अवरोध
किया, कि याम मुझे काबुजमें मिशन भेजनेको ध्याजा दौ.
निये। भारत मिकतरने मिशन भेजनेकी व्याज्ञा दे दी।
बडे लाटने भारत सिकत्तरकी बाजा पाते ही यमौर गेर
चलीको एक पत्र लिखा। 'फाटोवन इयर्स इन इण्डिया में
उस चिट्टीको नकल छपी है। उसका मग्मा इस प्रकार
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"शिमला
*१४ वी अगस्त, १८७८ ई० ।
"कावस और अफगानस्यानकी मौमाको अछ सच्ची सवरें
समें मिली हैं। इन खबरोसे सझे इस बातकी जरूरत जाने
पद्धती है, कि में भारत और अफगानस्थानके लाभके लिये
घापसे निसझोच होकर जरूरी विषयोंपर कुछ बातें कह
इस कामके लिये मुझे च्यापके पास एक उच्चन्थेणीका दूत
मेनना जरूरी जान पडता है और में मन्दानके प्रधाा सेना
पति हिन एकसिमी चेमरलेन वहादुरको इस काम
लिये उपयुक्त समझता हूँ। वह सीध ही कावुल जायेगे
और अापसे बात चीत करेंगे। वर्तमान अवस्थापर
खस पूचक बातचीत हो जानेसे दोनो रोज्योंकी भलाडू
होगी और दोगे राज्योंकी मैत्री चिरस्थायी रहेगी। यह

अफगानस्थानका इतिहास । पल मेरे ईमानदार और प्रतिष्ठिन सरदार नबाब गुलाम हुसेन सामो० एम० आई० को मात यापले पाम भेजा जाता है। वह अापसे दूत नानेके प्रयोजनके विषय में सब बातें कहेगे। ग्राम यापूर्वक पेशावररी कामुलकतकी राहके सरटारोंको प्राज्ञा दीगिये, कि वह एक मित्र शक्तिके दूतको इतने साथियों सहित निर्विन कावुल पड चोमें सहायता दें।" लाई रावर्टम लिखते हैं, इसके साथ साथ मेजर कवेग- नरीको यह समाचार काबुल भेननेके लिये कहा गया, कि व्यन रेजोंकी मिशन मिनभावसे देशमें प्रवेश करती है। यदि उमको अफगानस्थानमे दाखिल होनेको बाजा न दी गई वा, रूस मिशनकी तरह उसकी भी पथमें रचान की गई, तो समझा नापेगा, कि व्यफगानस्थान खुलकर अगरेनोसे. शतु ता कर रहा हे। "१७यी अगस्तको वडे लाटकी चिट्ठी काबुल पहुंची। जिस दिन चिट्ठी पहुची, उसी दिन अमौरके प्रिय पुत्र य.दुलह नागका देहान्त हुया। इस दुर्घटनासे बडे लाटको चिट्टीका जवाब देने में देर को गई,किन्तु रुसी मिशनसे बात चीत कररोमें किमी तरहकी आपत्ति दिखाई नहीं गई। हन्त दूत शाली. रामाने असौर परालीसे पूछा कि क्या ग्राप अगरेजोंकी मिशन काबुनने बुलाए चाहते हैं। इसपर अमीरने हम दूतकी राय लो। हम दूतने अमीर शेरव्यलीसे गौण भावसे समझाया, कि परस्पर शत्रु भाव रखनेवाली दो शक्तियों के राजदूतोंका एक जगह जमा करना युत्तिासङ्गत - गहों है। इसपर अमीरने गारेगोको मिशनको काबुल न बुलानेका फैसला कर लिया .

मंजरजी मिशन। न इस फैसलेकी सपर वह लाटको नहीं दी गई। उपर १वीं मितमरको व्यगरेनोंकी मिशन पेशावरसे रवाना हुई और उसो सैवर दररेसे तीन मीलो फासलेपर जमख्दमें डेरा डाला। घमीरका ज वैरियोंकासा था। इसलिये अगरेकी मिशन के प्रधान व्यफसर चेमरलेन साहरने खेवर दररेकी अफ गान फोनके सेनापति फैजसहम्मद खाको एक चिट्ठी लिखी। चिट्टोकी जो नकल लार्डरापर्टसने अपनी पुस्तकामें प्रकाश की है, उसका सम्माश इस प्रकार है- “पेशावर १५वीं मितमर, १८७८॥ "मैं आपको सूचित करता है, कि भारतकै वडे लाटकी यचासे एक व्यङ्गरेज मिशन यमनी रक्षक फौली साथ मित्र- भावसे खैबर दररेकी राहसे होती हुई काबुल जानेवाली है। गवान गुलाम हुसेनको माफी अमीरको इस मिशनको खबर भज दी गई है। “सझे खवर मिली है, कि काबुलसे कोई अफगान अफचर व्यापके पास अलीमसजिद ग्राया था। ग्राशा है, कि उसने यापको अमीरको व्याज्ञासे सूचित किया होगा। मुझे यह भी खबर मिली है, कि खैबर घाटीके जिन सरदारोंको पेशावर मुखाकर हम लोग डासे अपरचाके सम्बन्धमे बातचीत कर रहे थे, यापने उन लोगोंको पेशावरसेखवर दररेमें वापस बुला लिया है। अब मैं आपसे पूछता हूँ, कि अमौर के सामानुमार याम इटिशमिशनको खैबर दररेसे डाकातक पहुचा देनेकी जिम्म -- १२० अफगानस्तानका इतिहास। 11 लिखी। शुतुरगरदन दररा पार करते हो हम लोगोंको इन्ट्री मलिफोंके देशमें पहुंचना था। मुझे मणिकोको समायसाकी बडी चिता थी। १८ पौ तारीखको मने यमीर काइलको फिर एक चिट्ठी लिखी चिट्ठीके साथ व्यपगा शतधार धीर मलिकोंकी चिट्ठी भी शामिल कर दी। मैंने पनीरको चिटोमें लिखा था, कि में अपनी पहली चिट्ठीका भधाव घऔर ग्राप किसी प्रतिनिधिके यानेको प्रतीक्षा कर रहा धूं। मैंने यह भी ध्याशा प्रकट की थी, कि याम मेरा मन सूबा पूरा करने क्षिये उचित यात्रा जारी करेंगे धौर च्याम भारत सरकारको सहायतापर भरोसा रखेगे। "१ वो सितम्बरतका बहुवसी तथ्यारियां हो गई। मसे लाटको सूचना दे सका, कि गेडियर जनरल कर शुतुर- गरदगपर ध्यपगी फौनके साथ मीरचा बांधकर डट गये हैं। शीतककी राह साफ करा रहे हैं। लोगार घाटौ जानेमें पहले इसी जगह फोगका पड़ाय होगा। प्रादेशिक पारवरदारीसे रसद जुटाई जा रही थी। मैं पीजके पिछले भागसे सोमखानेकी गाडीपर खजाना और गोली वायद ले पाया है। व्यस्त पौषक यागे वणनेकी घेता यथाशयब की जा रही है। । । *२० घी तारीखको शुभ अमीरका जवाब मिला। उसो इस भातपर दुख प्रकाश किया था, कि मैं लय धनीखेलन पा सका। किन्तु मैं व्यपो हो विश्वस्त कर्मचारी यामके पास भेजताई। इसमें एक गायययो मन्त्री इयौलह खां और दूसरे शाड सम्म खां प्रधान मन्त्री हैं। चिठी गाने दूसरे दिन यस खोग भा गये 14 ।

+ । म हितीच अफगान युद्ध । "यह भने आदमी तीन दिनोंतक हमारे मडायमे रहे। मैंने डाचे ना 'भन मुलाकात की, तो उन लोगोंने मेरे दिलमर यही विश्वास धमाकी चेया को, कि अमोर दृटिश सरकार के भिन्न ने यौर वह टिश् मरकारकी मलाहके अनुवार चलना चाहते है। कि तु सुभ शीघ्र ही मान हो गया, कि यमलमें "अमीरने इन उच्चकर्मचारियोंको हमारी काबुलको चाई रोशने तिये, काइल मिशांकी हत्या करनेवालोको दण्ड देनेका 'भार यावल गरकारको दिलाने के लिये योर मन्पूर्ण देशके उत्तजित हो उठनेता इमारी रवानगो रोकनेके लिये, भेला धा। में अमीरके दोनो प्रतिविमें एकको व्यपने माथ रखना चाहता था, किन्तु दो एका भी हमारे पडाबमें रहनेमर रागा नही होता या! इसलिये मुझे उन दोनोको, छोड दे:- घटा। मैंने उन हाथ निम्नलिखित चिट्ठी अमीरको भेजी- 'दिन हाईनेन अमौर काबुन । चलीखेल कम्य । २५ वी मितमर, १८७८ इ० । शियाचारके उपरान्त)। मैने यापकी १६ वो और २० वी मितपर १ मो और रीशवालकी चिट्टिया ससफी हवीच सरा सा गौर पनीर शाह सहम्मदकी मार्फत पाई। ऐसे सुप्रमिड योर सुयोग्य मनुष्यों भेगनेकी पनरी में आपका क्षता हुन्धा। उन्होंने सभी यापकी इच्छा प्रकाश को और में उनको बाते सुर नमझ गया।। दुर्भाग्यवश का मॉन्ग जान जलद खतम हो रहा । झाडा पोरी धाना चाहता है, किन्तु पिपत उपायो 1 . - -- " - - । - १२२ अफगानस्थानका इतिहास। ही अगरेजी फौजले काबुल पहुंच जानेके लिये यधेस समय है। च्यापने अपनी तीसरी और चौथी तारीखकी चिट्ठीमें हमारी सलाह और सहायता पानेकी इच्छा प्रकाश की है। बडे लाट बहादुर चाहते हैं, कि अगरेजी फौज यथासम्भव शीत्र ही काबुल पहुंचकर यापकी रक्षा करे और व्यापक देशमे फिरसे शान्ति स्थापित करे। दुर्भाग्यवश रसद संग्रह करनेमे कुछ हफ्तोंकी देर हो गई, फिर भी वडे लाट वहा दुरको यह जानकर हर्घ हुया, कि इस समय व्याप खतरेमें नही हैं और उन्हें ध्याशा है, कि अगरेजी फोन कावल पह पोतक ग्राप देशमें शान्ति रख सकेंगे। मैं धामको यह सुसमाचार सनाता हूं, कि कन्यारसे यौर जलालाबादसे एक । एक व्यङ्गरेनी फोन काबुलकी ग्रोर रवाना हो चुकी है। मेरी फौज भी शोघ्र ही काबुलकी योर रवाना होगी। व्यापको मालूम होगा, कि कुछ दिनोंसे हम लोगोंने शुतुरगरदनपर कवना कर लिया है। अतिरिक्त रिसाले पल्टने यौर तोय.. खाने पुर्रम पहुंच चुके हैं। यह उस फौजले स्थानामम होंगे, जिसे करमसे लेकर मैं काबुल ग्राता हूं। अब एका एक सुझे मालूम हुया, कि मुझे और फौजकी जरूरतः पडेगी। बड़े लाट बहादुरने यापकी रक्षाके ध्यानसे व्याज्ञा दी है, कि काबुलको योर जानेवाली प्रत्येक अगरेनी यौन ऐसौ जवरदस्त हो, कि, ग्रामके भन्न योंकी वाघासे यक नसके। निसन्देह तीनो फोन बहुत जबरदस्त हैं। रसे यानेवाली फौजको किलातगिलगई और गजनी रोकने वाला कोई नहीं है। इसलिये उसके शीघ्र ही कादल न . 1 कन्या- . . - द्वितीय अफगान युद्ध । १२३ पहुँचनेका कोई कारण दिखाई नहीं देता। गत मई मही- नमें यापने दृटिश सरकारसे जो सन्धि की घी, उसके खयालसे खैबरको जातियां पेशावरवाली फौनको खैबर घाटीमें ने रोकगी,वरच अपने वारवरदारोके जानवरोंसे फौजको सहा- यता करेंगी। इससे यह पोज भी शौष ही, काबुल पहुंच जावेगी। आपकी दयासे मेरी कठिनाइयां भी घट गई है। समें व्याशा है, कि खैवर गौर कन्धारवाली फौजो साथ माथ में भो अापके पास पहुच नाऊंगा। व्यापकी मुलाकातके खयालसे में बहुत खुश हूं। मुझे याशा है, कि आपकी कपासे में वारबरदारी और रमदको सहायता पा मकू गा! मैंने अापके इस प्रस्तावको खव गौरके साथ देखा, कि याम बागो मोजके दण्डको अवस्था करके दृटिश फौलको काजुल पानेके करसे बचाना चाहते हैं। में व्यापको इस अतिरिक्त कपाक लिये भारत सरकार और बडे लाटको योरसे धन्यवाद देता हूँ। किसी दूसरे समय यापकी यह वात वडी खुमोके भाथ मझूर कर लो जाती, किन्तु वर्तमान दशामें विशाल टिश् नाति व्यपनी पौनके साथ विना काबुल यावे और यापकी सहायतासे बागियोंको विना कठोर दण्ड दिये रह हो. सकती। मैंने अापकी चिट्टी बडे बाटके पास भेन दी है। इस नवाजको भी एक नकल बडे लाटके विचा. रार्थ ग्रानकी डाकसे भेज दंगा। इस अवमरमें में सुस्तकी इबोडलहसा चौर वनीर शाह मुहम्मदको आपके पास "वापस पानेकी इजाजत देता है।" रुन १८७८ ई की २७ वी सितमरको राबर्टप साहबने कुरै , - . 17 "

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२२४
अफगानस्यानका इतिहास।
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मकी फौजका सेनापतित्व भार सेनापति गार्डनको टिया योर
स्वय काबुल जानेवाली फौगको खेकर कुरमसे कुशी पहुचे।
राहमें कोई दो हजार अफगानों और अगरेजी फौजमें एक
छोटौसी लड़ाई हुई। कुशीमें अमीर काउल अगरेजी
फौजको साथ रहनेके लिये या पहुंचे थे। लार्ड राबर्टसने
कुमो पहुचकर अमीरसे सलाकात की। ‘लाई राबर्टसने,
इम मुलाकातकी वात अपनी पुस्तकमे इस प्रकार लिखी
है,-"सुझपर ग्रमौरकी सूरतका अच्छा असर नही हुआ।
वह श्रीभ्रष्ट और कोई बत्तीस मालका मनुष्य है। उसका माथा
दवा हुया व्यौर शिर गावदुम है। तुद्धो नामले लिये भी
नही है। उसमें वह शक्ति नहीं जान पडती थी, जिससे
अफगानस्थानको उद्दण्ड जातिया दवाई जा सकती है। इसके
ध्यतिरिक्त 'उसकी अखेिं वहूत चप्पल थौं।
वह देरतक
निगाहें चार नही कर सकता था। उसको सूरत ही उसके
टुचित्त का पता देती थी। उससे मुझे बडी अाशा धौ।
कारण, वह मेरे पडावमे रहकर चिडिया मगाता गौर भेजता
अवश्य ही वह अपने काबुली मितो तो हमारे इरादे
और कामकी सूचना दे रहा था। फिर भी वह हमारा
मित था। काबुलके अपने वागी सिपाहियोंके भयसे भागकर
हमारी शारण ग्राया था। इसलिये भीतर भीतर इस सब
कुछ सोच सकते थे, किन्तु निता प्रमाण पाये प्रकाश रूपसे
कुछ ही कह सकते थे। मिर्फ उसका पादर करनेगर
वाध्य थे।
मन् १८७८ ई० की री अकोवरको अङ्गरेजी फौज कुशीसे
।

द्वितीय अफगान युद्ध ।
.१२५
.
रखा हुई और तीमरी अकोनरको नाहिदाबाद पहुंची।
है ठी ७वीं और प्वौं अकोवरको सङ्गाविशतेसे लेकर काबु
लाक अगरेजी फान और अफगागोमें खासी लडाई हुई।
अन्त वीं योवरको व्यारेजी फौपने काडुल नगर और
काल दुर्गपर अधिकार कर लिया। इसके उपरान्त हो
लार्ड रावर्टम वालाहिसारको रेसिडन्सी देखने गये।
ममयका हाल प्रगान वार' गानो पुस्तकमें इस प्रकार लिखा
'है, रेमिडन्सीका पहला दृश्य उसके पीछे की दीवार घो।
पर दुरत थी, किन्तु अधिक धु या लगनेकी वाहसे उसका
ऊपरी नाश काला हो गया था। दीवारके प्रत्येक कोनेपर
। छेद बने हुए थे। रेसिडन्तीफे थोडेसे सिपाही इन्ही छेदोंसे
बहुसख्यक अाक्रमण करनेवालोंपर गोलिया चलाते थे।
इस तरहके छिद्रोंकी चारी बोरके प्रत्ये क वर्ग फूटपर व्यसख्य
गोलियों के चिन्ह ने हुए थे। कहीं कही गेला बाये
बडे बडे निशाा धे। रेमिडन्मोकी पश्चिनौर दीवार
बालाहिवारके सामने पडती थी। इम दीवारपर बने हुए
गोली गोलोंके व्यसख चिन्होंसे जान पडता था, कि वाला-
हिसारके व्यस्त्रागारपर अधिकार करके बागियोंने रेसिडन्होमर
"कितगा भरकर व्याक्रमण किया था। इस व्योर रेसिडन्सीकी
तीन महिलें थी। दो अब भी मौजूद थी। एक व्यागते
नर हो गई थी। * रेसिडन्सीका च्याङ्गा कोड
६० वर्ग फुट होगा। इसके उत्तरीय किनारेपर एक तिमधिला
मकान बना है। किन्तु इस समय वह मका ही था।
कारण, यह जल गया था, सिर्फ उनकी काली काली दीवारें
.

१२६
अफगानस्थानमा इतिहास।
.
।
।
बाकी रह गई थीं। वाई योरकी दीवारपर खूनके छोटे
पड़े हुए थे। इमारतको कुरसीपर राखका र लगा हुया
था। जिसमे इस समय भी व्यागकी चिनगरिया मौजूद
थी। मकान इस समय भी भीतर ही भीतर सलग रहा था।
यह जानना कठिन था, कि किस जगह जीवित मनुष्य जल दिये
गये थे। किन्तु एक कोठरीको बीचकी राखसे नाम पडता
था, कि वहा मनुष्य नलाने लायक याग जलाई गई थी।
कोटरीके बीचमे राख पडी थी और उसीको समीप मनुष्यको
दो खोपडियां यौर हदिया पडी थीं। इस समय भी इनसे
दुर्गन्धि निकल रही थी। कोठरीको रस और दीवारों
पर खूनके धब्बे लगे थे। इससे जान पडता था, कि वहा धोर,
युद्ध हुआ था। सरजनोने खोपडियोंकी जाच की। कारण,
खोपडियोंके युरोपियनोंकी होनेकी सम्भावना की गई थी। रेखि
डन्सी ऐनी सफाई के साथ लूटी गई थी, कि दीवारपर एक
खटोतक बाकी नहीं थी। कावेगनरी सायके मकानकी
नालाहिसारकी बोर वाली खिडकियोंके चीखटेतक तोड डाले
गये थे। गचपर पड़े हुए मोशेके कुछ टुकडे ही उनकी
निशानी थे। परदे आदि लूट लिये गये थे। एक खू टीमें
रङ्गीन परदेका सि एक टुकडा रह गया था, वही कोठरीको
लुटनेसे पहलेको भडकका पता देता था।
१२ वौं अकोवरको लार्ड राबर्टाने वालाहिसारमे दरवार
किया। दरवार के पहले की एक प्रयोजनीय घटनाका हाल
लार्ड रावर्टस इस प्रकार लिखते हैं, मैं इस चिन्तामें पडा
था, कि थाकूरखाके साथ क्या काररवाई करना चाहिये।
।

हितीय अफगान-युद्ध।
T
मेरी ऐसी हो व्यवस्थामे १२वौं व्यकोवरकै सबेरे याकूनखाने
चाकर व्याप ही अपना फैसला कर लिया। मेरे कपडे पह
भनेक पहले ही वह मेरे खेमेमें थाया। उसके सलाकावनी
इच्छा प्रकट करनेपर मैं उससे मिला। मेरे पास सिर्फ एक
कुरमी थो। उसे मैंने अमीरको दे दी। उसने कहा, कि
मैं अपनी इमारतसे इस्तमा देना चाहता हू । जिस समय
में कुशो गया था, उसी समय मैंने यह स्थिर कर लिया था।
* उसने कहा, कि तझे अपना जीवन वोझ मालम
होता है योर में व्यफगास्थानका अमीर होनेकी अक्षा
व्यरेणी फौजका पनि रा होगा' पसन्द करता है। ग्रन्तमे
उमने कहा, कि जवनवा में वडे लाटकी याज्ञासे भारत,
लहन, वा जहा बडे लाट भेजना चाहे , भेना न जाऊ
याप, होके खेमेके पास व्यपना खेमा खडा कराकर रहा
चाहता । मैंने अमौरके लिये एक खेमा दिया। उसका
जलपान तय्यार पारीको ग्राज्ञा दी और उसे सोच समझकर
मला करने के लिये कहा। उसे यह भी कहा, कि प्याज,
दश बजे दरवार होगा। उस ममय यायको भी नरबारमै
चलना पड़ेगा। यह खयाल रखना चाहिये,
। तक छामौरको यह मालूम नहीं था, कि हम लोग दरबार में
शिम तरहको विज्ञप्ति करेंगे वा हम लोग उनके मन्त्रियोंक
'साथ कसा थाहार करेंगे।
राश बने मैने वापसा सलाकात को। वह यमनी
समारत छोडनेपर अटल घा। ऐसी दशाम यह दरबारमै
भरीमन होगा नहीं चाहता था। उसने कहा, कि में थमने
समय
।

१२८ अफगानस्थानका इतिहास । - उस दिन बदले अपने बडे लडको आपने साथ कर दूंगा और मेरे कुल मन्त्री यायले पाम रहेगे। मैंने उससे सोचनेके लिये फिर कहा। किन्तु उसे अपना पदत्याग करनेपर उद्यत देखा, कर मैने उमसे कहा, कि मैं बडे लाटकी अाशाके लिये तार भेजता ह । व्यापकी मिना मरनीके जबरदस्ती यापसे - राज्य, ग कराया जावेगा। फिर मैंने यह कहा, कि गवतक बड़े लाटका जवाब न ग्रावे, आप अपना गल्य कायम रखिये। "दोपहरको मैं बालाहिसार पहुचा। मेरा साफ, युवराज, मन्तिदल और काबुली सरदारोंका वडा अण्ड मेरे साथ था। राहको दोनो योर पंक्ति वाधकर फोन खडी थी। अपनी फौजपर मुझे वडा अभिमाा हुया। फौनके सिपाही इस उपलचके लिये खूब साफ हो गये और बने बने थे। "मेरी सवारीके अगले भागके मटर फाटकमें प्रवेश करते, ही घटिश-वैजयन्ती चला दी गई, पेण्ड बानेमें जातीय गोत बनने लगा चौरतोपोंने ३१ फेर सलामी सर की। "दरबारके कमरे में पहुचकर मैं घोडे से उतरा और उना मनपर जाकर मैंने दृटिश सरकारी निम्नलिखित विज्ञान और अजा, उपस्थिा मनुष्योंको सुनाई,-- गत ३ रौ व्यको वरके विज्ञापनमें , मैं कालवासियोंको मचित किया था, कि अगरेजी फौन काबुलपर अधिकार कर पा रही है। मैंने उन लोगोंको अगरेजी फौज तथा ध्यमीरके गख्तियारका मुकाबला करनेसे मना कर दिया उस विज्ञापनसे अवज्ञा की गई। मेरी फोन व फागुल यच चुकी है और उसने वानाहिमारपर कवणा कर - था।

. द्वितीय अफगान युद्ध । १२६ - . लिया है। किन्तु इसके अग्रसर होनेमे स्व वाधा दी गई ग्रौर काबुलवामियोंने भी इमके रोकनेके काममे बहुत वडा भाग लिया। इमसे यहले वह ब्रमौरने बगावत कर चुके है। उन्होंने इस अपराधको कवेगनरी साहप चमीर दोस्तको इत्या करके गौर गुरु कर लिया है। उन्होंने नितान्त नामदी और दगावानाम यह हत्याकाण्ड किया। इससे नम्पर्ग वाफगानन्यानवामियोंकी अप्रतिष्ठा हुइ। ऐसे दुष्कर्मों का उचित प्रतिफल तो यही है, कि काबुल नगर बरबाद कर दिया जाये और इसका नाम निशानतक वाकी 7 रहे। किन्तु पेट टेन न्याय भी दयापूर्वक करना चाहता है। मै कावु. सामिगोंको सूचित करता हूँ, कि उनके अपराधका पूर्ण दद नहीं दिना नावेगा और यह नगर वरनादीसे बचा लिया जागा। "फिर भी, इस बातकी जरूरत है, कि वह दाड पानसे पच , पावें और दष्ट भी ऐमा हो, कि उन्हें मालूम हो गौर याद रहे। इमलिये काबुल नगरका वह भाग जो वालाहि मारनी गरेजी अधिकारपर वा वालाहिमारकी गगरेनी फोनकी रक्षामे किसी तरहका याघात उपस्थित कर मकता है, तुरन्त छो भृमात कर दिया जावेगा। इमझे गति रिता काउनवासियोंके अवस्थानुमार उपर बहुत बडा नुम्माना किंग नायगा ! नमानेकी रकम पीछे 'प्रकट की नावेगी। में यह सूचना भी देता ह, कि शान्ति स्थापित रखनेके लिये कायत नगर और उसकी चारो योर दश दश मौल तक फोनी कानन रसा जावेगा। अमीरको मलाहसे काउ - । . .

.
अफगानस्थानका इतिहास ।
लमें एक नही गंवरनर नियुक्त किया जावेगा। वई शासन
करेगा योर कठोर हायसे व्यपराधियोंको दण्ड दिया करेगा।
काबुलवासी योर व्यास पास के गांववाणे गवरनरको व्याज्ञा
माननेके लिये सूचित किये जाते हैं।
'यह हुई काबुल नगरके दडको वात। जो मनुष्य अप
राधी समझी जायेंगे, उन्हें अलग दण्ड दिया जावेगा। हाल
लाले बलकी खासी तहकीकात की जावेगी। 'उसमें जो-
लोग जैसे अपराधी प्रमाणित होगे, उन्हें वैमा ही दण्ड
दिया जायेगा।
'अपराध ग्रोर यशान्ति निवारण के लिये यौर काबुलवासी
भलेव्यादमियोंको रक्षाके लिये सूचित किया जाता है, कि
भविष्यमे किमी तरहका धातकशस्त्र 'कावुल नगर तथा
काबुलसे पाचकोससे फासलेतक वांधा न जावे। इस सूचनाके एक
सप्ताहके उपरान्त जो मनुष्य हथियारबन्द दिखाई देगा
उसको प्राय दण्ड दिया जायेगा। टिश मिशनको चीजे
जिन मनुप्योके पास हों, वह उन्हें दृटिश पडावमें पहुंचा
दें। इस सूचनाके उपरान्त निसले घरसे घटिश-मिशनको
चीजें निकलेंगी, उसको कठोर दण्ड दिया जायेगा।' ।
इसके अतिरिक्त जिस मनुष्य के पास याग्नेय च्यख हो,
वह उसे घटिश मडावमें जमा कर है। जमा करनेवालेको
देशी बन्दूकके लिये तीन, रुपये और युरोपियनके लिये पांच
रुपये दिये जायेंगे। इस सूचनाके उपरान्त यदि किमीको
पाससे ऐसे हथियार निकलेंगे, तो उसे कठिन दण्ड दिया
चावेगा। व्यन्तमें में यह सूचना देता हूं, कि जो मनुष्य
।।
।
।

द्वितीय अफगान-शुद्ध।
।
रेसिडन्सीपर ध्यान करनेवाले वा याक्रमणसे किसी तरहका
सम्बन्ध रखनेवालेको गिरफ्तार करा देगा, उसे? पचास
रूपये मारितोषिक दिये नावे गे। इतना ही इनाम गत श्री
मतम्बरके उपरान्त व्यारेजी फौजसे सामना करनेवालेको
गरफ्तार करानेपर दिया जावेगा। कारण, व्यङ्गरेजी
जसे सामना करनेवाला यथार्थमें अमीरका बागी है।
दि इस तरहका अपराधी मनुष्य च्यफगान फौनका कमान
रोगा तो ७५ रुपये और सेनापति होगा, तो १ सौ बीस रुपये
उसके गिरफ्तार करनेवालेको दिये जावेंगे।'
"अफगानों इस विज्ञप्तिसे बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने ध्यान
बक इसे सुना। विज्ञप्ति हो चुकनेपर मैंने लोगोंको जाने
हा और मन्त्रियोंको ठहरने । कारण, मैं उन्हें कोद करना
हता था। उनसे मैंने कंध दिया, कि मिशनकी इत्याको
हकीकात होनेतक तुम लोगोंको कैद रखना में अपना
।
,
-
थि समझाता है।
'दूसरे दि मैने नगर प्रवेश किया। मैं नगरके प्रधान
घान बनारोंसे होकर निकला। जिसमें नगरवासियों को
रासूम हो, कि वह मेरे वशमें है। रिसाला गेड मेरी सवारीके
पागे था। मैं अपने साफ और शरीररक्षकोंके साथ उसके
छि था। मेरे पीछे पैदल सिपाहियोंकी पांच बटालियग पेरल
न ची। तोपखाना साथ नही था। कारण, कुछ बाजार,
तने सङ्कीर्ण थे, कि दो सवार बराबर वरापर सशकिलसे चल
अकते थे।
1
"सशकिलसे इस वातकी याशा की जा सकती थी, कि

१३२ अफगानस्थानका इतिहास L - . . । 1 नगरवासी हमारा स्वागत करेंगे। फिर भी, वह हमारी प्रतिया करते थे। सभ ग्राशा भी थी, कि, मेरा जी नखूब उन्द खु अवनत करेगा। "मैंने काबुलमे शान्ति स्थापन करनेके लिये मेजर जनरल बेमस हिलको उस समय के लिये काउलका गवरनर बनाया। उनले साथ एक मुसलमान भलेग्रादमी नवाव , गुलाम सेन खाको भी रखा। इसके अतिरिक्त मैंने दो अदालत कायम, की। एक फोजी और दूसरी सन्की। मिशन-हत्याको तहकीकातका काम,अदालतोंको सौप दिया।" १६वी कटोवरको पालाहिसारके एक बारूदभगारमें अाग लगनेसे भण्डारघर बडे भयवर शब्द के साथ उड गया। अहरेजोंको इस भण्डारघर और उसमें रखी हुई वासदनों खर नही घो। उम समय वालाहिवारमें ५ौं गोरखा और ६७ नम्बर पैदल फौजका पडाव था। वारूद उडनेनो साथ साथ ६ नमर पैदा फोणके कप्तान शाफ्टो, यो गोरसाकै सुवेदार मेजर और देशी सिपाही उड गये। इस घटनाके उपरान्त हो व्यारेजी मौलने वालाहितार खाली करके बुद्धिमान दिखाई। कारण, दो घण्टे के उपरान्त हो दूसरा वाद भखार उडा। इसबार पहलेसे भी ज्यादा शब्द हुव्या वालाहिसारसे चार सौ गज दर कितने ही अफगान मर गये वारुद भकारोंके उखनेका कारण खूब नाच करनेमर व्यज्ञात रहा। कितने ही लोग अनुमान करते थे, व्यफगानोने वालाहिसारको अगरेजी फोन उडा देने के लि जाम्टमे बाग लगाई यौ। अगरेजी फौनके प्रधान सेनाप .

डितोय अफगान-गुद। । . 1 1 जाट राजनको भी डमी बातकी याशङ्का घी और उन्होंने লতা রূৰখাৰ নাথ নালামি ক্রিী ভূ না ভান্ধী ध्यामहासे अगरेजी फौज बालहमारमे नही रखी। अपराधी कावुलिौने दस देनेका काम पौघ्र ही नारी । किया गया। "अफगान वार' नानी पुस्तक लेखक हेन्समेन माहप मियाहस पडावसे २०वी उ कोवरको इस प्रकार लिखते हैं, "यान हम लोगाने पाच आदमियोंको फासीको सना पानेके लिये नाते देखा। सन्तोष हुथा। गत कुछ सप्ता होंकी घटनासे इन लोगोका थोडावा बहुत सम्बन्ध था। इन लोगोंका व्यपराध हम लोगोंकी निगाहोंमें यच्छी तरह खुप गया था। कावुलमे गवाह सग्रहका काम महन नहीं हे। कितने ही यादमी गवाही देनेके दुष्परिणामसे डरते हैं। हम लोगोंने अतक यह किसी तरह प्रक्ट नहीं किया है, कि हम कबतक यहां रहेगे। हम लोग अच्छी तरह नाति है, कि अपनी-रक्षाकी शया अपन शुभचिन्तकोंपरसे हटाते ही उनका क्या परिणाम होगा। च्यण्गाको बरावर बदला लेनेवाली शायद ही चौर कोई . नानि हो। व्यपराधी विरुद्ध गवाही दीवालीको अपराधोके रिशतेदार निगाहमर पा रोगे। * कल कमिशन मामने पाच केही उपस्थित किये गये। माचोको मासीका दिया गया और वह मासी चण दिये गये। पांचोने एक नगरका बोलवाल धा। बालाहिसारके हारपर दो मासिनी खड़ी की गई घौ। एनपर चार गादमी पटनाये गये। 1 दृतरेपर मिन कोतवाल स्टकाया गया। अगरेजो फोनो । . । १३ १३२ अफगानस्थानका इतिहास + - . । या। - 1 नगरवासी हमारा खागत करेंगे। फिर भी, वह हमारी प्रतिक्षा करते धै। तुझे व्याशा भी थी, कि मेरा जङ्गी नलून उन्द खूप व्यवनत करेगा। "मैंने काबुलमे शान्ति.म्यापन करने के लिये मेजर जनरल नेमन हितको उस समय के लिये काबुलका गवरार बनाया उनी साथ एक मुसलमान भलेनादमी गन्याव गुलाम हसन खाको भी रसा। इसको अतिरिक्त मैंने दो अदालतेकायम की। एक फोजी और दूसरी सच्ची। मिशन हत्याको तहकीकातका काम अदालतोंको मौम दिया।' १६वी व्यकोवरको वालाहिसारकै एक वारूदभारमें अाग लगनेसे भडारवर वर्ड भयङ्कर शब्द के साथ उड गया। यहरेनोंको इस भण्डारघर और उसमें रखी हुइ याख्दको खमर नही थो उस समय वालाहिसारमें पूवी गोरखा और ৩ নম ইল সদা মাৰ ঘা। না ৰ নাথ নাথ ६ नम्बर पैदल मोजके कप्तान शाफ्टो, पूवी गोरखा सुबेदार मेजर और १६ देशी सिपाही उड गये। इस घटनाके उपरान्त ही व्यारेजी मौलने वालाहिमार सालो' करके पुद्धिमानी दिखाई। कारण, दो घण्टे के उपरान्त ही दूसरा वारूद भण्डार उडा। इसबार पहलेसे भी ज्यादा शब्द हुग्रा बासाहमारसे चार सौ गन दृर कितने ही व्यफगान मर गये बारुद भकारोंके उडनेका कारण खूब जाध करनेपर में अज्ञात रहा। कितने ही लोग अनुमान करते थे, च्यफगानोने वालादिमारकी अगरेजी मौज उडा देने के लि बारूदमे आग लगाई यौ। अगरेजी फौजके प्रधान सेनापा ।

। - । हितीय अफगान-युद्ध। लाई राबर्टसको भी इसी बातकी याशड्डा घी और उन्होंने नागा कारणों के साथ बालाहिबारमें छिपी हुई वारद उडमेकी घाशकासे व्यगरेगी फोग, वालहिसारमे नही रखी। अपराधी कालिग टण्ड देनेका काम पौघ्र ही जारी किया गया। “अफगाा वार" पानी, पुस्तक लेखक इन्धमेन । साहन, नियाचमड़ पडावसे २०वौं गकोवरको इम प्रकार लिखते है,-"या- हम लोगी पाच ग्रामियोंको फासीकी "सना पाने के लिये नाते देखा । सन्तोष हुया। गत कुछ सप्ता होंकी घटगासे इन लोगोंका घोडा वा बहुत सम्बन्ध था। इन होगीका अपराध हम लोगों की निगाहोमें अच्छी तरह खुप गया था। कावुलमे गवाह संग्रहका काम सहज नहीं है। कितने ही यादमी गवाही देनेके दुष्परिणामसे । डरते हैं। हम लोगोंने व्यस्तक यह किसी तरह प्रक्ट नहीं, किया २, कि हम कबतक यहा रहेगे। हम लोग अच्छी तरह जानते हैं, कि अपनी रक्षाको छाया अपने शुभचिन्तकोंपरसे हटाते ही उनका क्या परिणाम होगा। अफगानाको रावर बटला लेनेवाली शायद ही चौर कोई जाति हो। व्यपगधोली विरद्ध गवाही दीवानोको अमरापीके रिशतेदार ,निगाहपर बन लेगे। * काल लमिशाके मामा पाच की उपस्थित किये गये। पाचोको फासीका 'मा दिया गया और वह फामी चा दिये गये।'/पाचोने राम नगरका मोरयाल धा। वालाहिसारजे दारपर से मासिया सही की गई थी। एकपर पार गादमी लटकाये गये। हरेपर मिर्ष कोतवाल स्टकाया गया। । . + - । अङ्गरंगो फौगने p4 १२ ।

११५
अफगानस्तानका इतिहास ।
।
F
अभागे कोतवालको इतनी इब्बत की। इसके उपरान्त नित्य
हो जाछ अफगान मिशनको हत्या करने वा अमौरसे दगावत
करनेके अपराधपर फासी पाने लगे। इसपर भी कुछ लोग
यारेजी फौजके इस कामसे सन्तुए नही थे। हंसमेन साइव
ध्वी नवमरको चिट्टीमें लिसते हैं, "लोगोंके दिलमै यह
खयाल जर्मता जावा है, कि यहांकी फोन बदला लेने काममें
सुस्ती करती है और उसने प्रत्याशानुमार खूब रक्तपात नही
किया। इसके उपरान्त हो यानी १०वी, ११वीं और
१२वी नवम्बरको कोई उनचास यादमियोको फांमी दी गई। ,'
अमीर याकूब साके पदत्याग करनेकी बात पड़े लाट
'वहादुरने स्वीकार कर लो। सन् १८७६ ई.की पहली दिस'
बरको यमीर याकूब खा काबुलसे भारत भेज दिया गया।
इसके एक सप्ताहके उपरान्त लाडे राबर्टमने प्रधान मन्त्री तथा
और कितने ही ग्रादमियोंको भारतवर्य भेज दिया।
एक योर तो व्यगरेजी फौज यह सब कर रही थी, दूसरी
और अफगान शान्त नही थे। वह समय भमयपर अगरेनी
फौजसे छोटी मोटी लडाइया लह लिया करते थे। इसके
अलावा वह अगरेजी फौजमर याक्रमण करनेके लिये स्थान
स्थागयर एकास हो रहे थे। इन छोटे छोटे कई दलों
मिलनेसे बड़ी मौज तय्यार हो सकती थी। उस मौनमें काबुल
बानियोंको भी शरीक हो जानेसे वह और भी बड़ी और मन
बूत हो जा सकती थी। व्यगरेनौ भोजन प्रधान सेनापति
लाड रापर्टभ इन सब बातोंकी खबर रखते थे। उन्होंने जला
लावादसे कुछ और सिपीह भेजनेस लिये तार दिया। व्यतिरिक्ष
।
।

द्वितीय अफगान-युद्ध।
११५
सिपाहियों ने पहले उन्होंने ऐमो चैया की, निमसे व्यफ
गानों ने छोटे छोटे दल , यापममे मिल न मक। दो
तस्यार की। सेनापति मेकपारसनके व्यधोतस्थ
कौनको उत्तरसे ग्राते हुए अफगानीसे पश्चिमके व्यफगानोंका
मिलाय रोकने का काम सौंपा गया। दृसरी, सेनापति वेकरके
व्यधीनस्य फौजको वह राह रोकनेका काम सौपा गया, जिससे
यफगानोके परास्त होकर भागनेकी सम्भावना की गई थी।
सेनापति मेकफरसाने कोहस्थानके लघमन और धारदेह दररेनें
देखा, कि वहा दलके दल अफगान एकन हैं। मेकफरमनने
उन लोगोंपर याक्रमस किया। अफगात मीछे हटे। हटते
हटते एक पर्वतपर चाठ गये और वहां नमकर उन लोगोने
, सकाबला करना प्रारम्भ किया। ध्यङ्गरेजी फोजने याक्रमण
करके अफगानोंको इम पब्बतपरसे भी हटा दिया। इमी
तरह सेनापति वाकरने भी अफगानोंको परास्त करके पौर
इटा दिया। सुहम्मद जान खा वनवाई अफगानोंका भरदार
था। उमने दूसरे दिन,-११वी दिसम्बरको किलाकाजी गायक
ममोप मोरचा तय्यार किया। लार्ड रावर्टमने सेनापति
मासीको किलाकाजीको व्योर भेजा। मासी और जानसह
ग्मदको फोनमें युद्ध हुया। जामुहम्मदको फोन बहुत
जबरदस्त घो। उमके दवावसे अगरेजी फौजको पीछे हटना
पड़ा। उसी दिन दूलगे योर लार्ड रावर्टमको फोन और
वलवाइयोंको फौनमें मुकाबला हो गया। रियोंकी मण्या
अधिक देखकर लार्ड राबर्टसको भी पीछे हटना पडा।
दाइयों को प्रतिसे लार्ड राबर्टस चिन्तित हुए। वह ५
।
--

.
,
-
अफगानस्थानका इतिहास।
सकी तो वापस लाने व्यौर बलवाइयोले साध कालवालियोंका
मिना रोकने की चेष्टा करने लगे। वो, सी, चौर १३वी
दिसम्बरको भी बत्तवाइयां गौर अगरेजी फौनमे स्थान म्यानपर
युद्ध हुआ। एक लडाईमै बहरेजी फौजको तोप शेडकर
मौके हटना पडा था। किन्तु दूसरी राडाईमें उसने अपनी -
तोपे वापन ले ली। फिर भी बलवाइयोंकी मम्या अधिक
होनेकी वनहरी आगरेजी फौजको प्रत्येक म्यानसे पौछ घटना
मटा। साई राटस अपनी पुस्तक लिखते हैं,--"यान
१०वी दिलमर दोपहरसे पहले मुझे यह नही मालूम घा,
कि अफगान इतने ज्यादनी रवान कर सकते हैं। फिर भी,
सभी यह बात माननेकी कोई जररत दिखाई नहीं देती, कि
वह लोग शिक्षित मैन्धका मुकाबला कर मोंगे।
शेरपुरको पदावमे जाकर ठहरनेका खयाल रहुत दु.खद है।
शेरपुर जाने काबुलनगर चौर बालाहिसार हम लोगों
करनेसे शिकल जायंगा। उधर, इन दोगोपर कबजा करके,
यफगान जातिया बहुत मजबूत बन जावे गो।'
"सभी अपने कामका फैसला तुरन्त ही कर डाला है
कारगा, यदि मै पीछे चढूँ, तो रालि होनेसे पहले काबुल नगर
जमरकी पहाडितीपर सेनापति' मेकफरमनकी फौगले लिये
गौर यासमाई पर्व पर सेनापति देकरको फनसे लिये रसद
भेज देना जरूरी है। मैंने हेलियोग्राफपारा मेकमारयनसे पूछा,
कि वेरी या कर रहे है और उनकी संख्या क्या अबतक बालो.
ही जाती है? उसने जवाब दिया, कि उत्तर, दक्षिण और
मसिमसे दलो दल अफगा। चले ज्या रहे है और उनकी
*
ग

हितीय अफगान-युद्ध।
११७
गाना प्रति क्षण यति अधिक होती जाती है। जो युवक
'अफसर - सनदारा समाचार भेज रहा था, उसने अपनी
योरसे इतनी वात और कही,-'चारदेह घाटीकी अफगानोंकी
.
भौह Derby day का Epoom याद दिलाती है।'
'यह उत्तर पाकर मैंने फैसला कर डाला। मैंने मव
जगहोंको मोश शेरपुरमें एकत्र करना चाही। इससे शेरपुरको
रक्षा होने और व्यवतककामा वृथा रक्तपात रकनेकी घोशा
थी। मैंने इन कामको खराबो अच्छी तरह ममझ ली थी।
किन्तु मुझे इसके सिवा दुसरा कोई उपाय दिखाइ
नही देता था। ऐसे समय मणी रक्षा हौका प्रबन्ध
करना चाहिये था और ममय पानेपर वा कुमकी फौज यानेपर
अफगानोंपर व्याक्रमण करमा उचित था।
"दो बने दिनको दोनो सेनापतियोंको पीछे इंटनेकी यात्रा
भेजी गई। उमी ममय इस याज्ञार्क अनुसार कयी ध्यारमा
किया गया। अफगान हमारी फनपर दबाव डालने लगे।
हमारी मोज गो मोरचा छोडी, अफगान तुरन्त ही उसपर
कबजा कर लेते थे। राहमें योर पडावतक अफगान मिपाहो
हमारो फोनपर दबाव डालते पले याये। कहीं कहीं मिडकर'
लहाई हो गई और इस तरहको लडाईमें कितने ही वहादुरीके
काम दिखाई दियेतो. * राम इमारी शौनमें कमी
साहकी घबराहट नहीं फैली। वह बही शान्ति और
चालाकी साथ परिचालित की जाती थी। रातोमर
उपरान्त हो फोन और उसका सान सामाा निर्विा शेरपुर

अफगानस्थानका इतिहास
.
।
-~-
पहुंच गया। उती- रातको व्यफगानोंने कयुल और बाला
हिसारपर कवजा कर लिया।
"भारतके सुशिक्षित सिपाहियोंका प्राध्यवासियों के बडे से वडे
दलका सामना करना यामान काम है। शिक्षित पौनका
हमतापूर्वक अग्रसर होगा, एक बहुत बडी बात है। प्रायके
लोग इस तरह की फौनका सामना शायद ही कर सकते हैं।
किन्तु पीछे हटना और ही बात है। नव प्राध्य वासी..यो
मुकाविलकी पौन घटनौ देखते है, तो अपने ऊपर और
अपने वलपर बहुत भरोमा करने लगते हैं। सकाबिलको
फ्रोज यदि किसी तरह की घबराहट दिखावे, तो उसका
नाश निश्चय है। इसलिये यह खयान करनेकी बात है,
कि घरटोतक मैं कितनो याका साथ अपनी पौनका
प्रत्यावर्तन देख रहा था। जमीन याक्रमणकारी अफगानों के
अनुकूल थी। वह बिना किसी वाधाके पीछे हटते हर
सहीमर प्रादमियोपर टूट पडते थे। व्यपगा जयध्वनिके
निनादसे दिशायें कपाते थे यार अपने कुरे हिलाते चमझाते
थे। किन्तु हमारे और पुरुष व्यपने व्यपसरोंके याज्ञानुसार
तनिक भी विचलित न होते थे। वह शान्तभावसे अपने-
स्थासे हटते थे, प्रत्येक काम इस तरह करते मानो साधारण
कवायभूमिमे चल फिर रहे थे और अपने मरे हुए तथा घायल
यादमियोंको बिना किसी घराहट और जल्दबाजीले उठा
लेते थे। असनमें प्रत्येक कठिन काम बडी यामानी के साथ
किया गया। जिस समय फेजे पडावमे यह भी मैंने अपने
साथियोंको यान्तरिक धन्यवाद दिया।

द्वितीय अफगान-युद्ध।
"दिनभरमें ,हमारी फौजके जितने सिपाही हताहत हुए,
उनको मण्या इन प्रकार है,-१६ मारे गये। इनमें कप्तान
स्पेन्स और ७२ हाईलेण्डर फोनके लफटिनण्ट गेसफर्ड शामिल
है। ८८ घायल हुए, इनमे ४२ हाइलण्डर्सके कमान गोरखन
और ७२ हाइलण्डसके लमटिण्ट इगर्टन चौर गाइडस मौजके
कमान वेटी शामिल है।
"जिस ममय छावनीका फाटक बन्द हुया, मैंने बड़े लाट
यहादुरको दिनभरके कामका समाचार तारदारा भेज दिया।
कारण, मैं जानता था, कि वैरियों का पहला,'काम तार काटकर
हम लोगोंके गौर मारतके वीचका सम्बन्ध तोड देना होगा।
मैंने समाचार भैना, कि मैंने गेडियर जनरल चार्लम गफ
माहबको गहमको यथासम्भन शोध यानेकी ग्राज्ञा दी है।
उनको मेन्यसे काबुल और भारतकी राह खोल रखूगा और
प्रयोगा मडनेपर शगुदमनके लिये महायता भी लू गगा। मुझे
हाकिमोंको तारद्वारा यह समाचार भेनकरः चत्तोय हुया,
कियगरजी मानके लिये उतनौ चिन्ता करनेका प्रयोजन
नहीं है। शेरपुरमे कोई चार महीनेकी रसद यादमियों के
लिये, समाइका चारा वारवरदारीके जानवरों के लिये एकल
है। ईधन, दवा और अस्पतालसम्बन्दी मामानकी अफरात
है। छावगीके भीतरसे तो बन्दूक चलानके मौके हैं।
कोई सीमा चार महीनेतक हम लोग यशो तरह सकायना
कर मकते हैं।
"मौभाग्यवश हमारे पास रमदकी कमी नहीं थी।
हम लोगोंकी नासत्या बाळ गई घो। बन्नीसुहम्मद खां
-
।

१२० अफगानस्थानका इतिहास । -- और कितने ही सरदार इमारी रक्षामें शेरपुर चचे आये। उन्होंने कहा, कि यदि हम लोग काबुल नगर जावेगे, तो वहा मार'डावे जावेंगे। हमें ऐसे मेंहमाग पसन्द नहीं थे। कारण, मैं उनपर विश्वास नहीं कर सकता था। फिर भी, : वह हमारे मितये और मैं उनकी प्रार्थना अस्वीकार नहीं कर सकता था। मैंने उन्हें इस प्रत्तपर शवनौमें दाखिल कर लिया, कि प्रत्येक सरदारके साथ गिनतीके छ यादमी रहें। “१४वी तारीखको तूफानी घटनाके उपरान्त शान्ति उपस्थित हुई। इसमे छावनोके मोरचे दुरस्त किये गये यौर काबुल- अस्त्रागारसे मिली हुई बडी बडी तो कामके लिये तयार की गई। "इधर हम मुकाबलेके लिये तय्यार हो रहे थे, उघर वैरी बिलकुल हो निकम्म थे। इस अवसरमें उन लोगोंने यदि " कोई काम किया, तो यह, कि काबुल नगर लूट लिया व्यौर यमीरका व्यस्त्रागार' खाली कर दिया! वारूद सम्भवतः मष्ट कर दी गई थी। फिर भी बहुत झछ बच रही थी। बहुत सो बची हुई बारूद मुंहम्मद जानकी फौजके हाथ पड गई। मुहम्मदनान वलवाई व्यफगानीका प्रधान सरदार बन गया था। उसने याकून खाके सबसे बडे लडके भूमा सांको काई लका व्यमोर बना दिया था। "पांच दिनतक दोनो योरसे कोई प्रयोजनीय काम न किया गया। वैरो पडोषक किले और बांगोंमर करना करने जाते थे। इममे दो एक यादमी इताहत हुया करते थे। निम गइसे बेरी इमेतकलीफ पहुचा सकते, व होस - 14

। द्वितीय अफगान-युद्ध ।
१२२
-
।
*
+
हम उन्हें हटा दिग करते थे। मेरी फुश किरो तुडमा दिये
और हावीको पडोमो रक्षाम्बना नए करा दिये। फिर मी,
वैग्यिो हटाने के लिये में कोई बडी लडाई नहीं लड़ा।
इमलिये, कि छोते हुए स्थानोपर व बना जमा रसने लिये
फोगही थो योर म्यान शीन ने उपरान्त काला
न रखनेसे छोको ममयका रक्तपात स्था होता।
*२१वो तारीग्यसे अफगालोको बडी ल्य्यारी के लक्षण दिखाई
देने लगे। उसदित और उम दृमरे दिन हामीले पुन
कई जगहोंपर गफगों शनीपर गाक्रमरा करने के लिये
करना' कर लिया। मुझे यह भी सबर मिली, कि न्फगान
हामीकी दीवार पार करने के लिये बड़ी बडी मीन्धिा तयार
करनेमे मसरूफ है। इस समाचारसे नाा पडा, कि अब
अफगाा प्रधान कार्यमे स्लम है। दूसरी सनर मिली, कि
कुन्न समभिदौमे मुले, लोगोंको उपदेशकर रहे हैं, कि तुम
लोग मिलकर काफिरोंका IT करो। सच तुजा सके
बालम लोगोकी उत्तेजनामी ग्राग मडकानेकी चेला यथा
कि कर ! रहा है। ग्रागामो श्वी तारीसको सन्याको
सहर्रम मउता था। उस दिन समनमानोंको वामिक उत्तेजना
चरमसीमामगन्त पहुँच, गाती है। सजा सुनायो व्यालमने
पाह किया था, कि उम दिन प्रात काल वह नईतकी यामि
अपने हाथरों जलावेगा । इम अमिवो देसते ही अमगानोंने
छातीपर ग्राममा करका प्रण किया था।
"ची की रान निबित बीती। छापीकी दीवारके,
।

अफगानस्तानको इतिहास।
।
प्रात काल होते ही एकाएक वा दगने लगी। हमारे
सियाही इथियारसे लेस होकर व्यपनी अपनी जगह खडे
ध्याक्रमणको प्रतीक्षा कर रहे थे। अाक्रमण यारम्भ हुया ।
शवनीको पूब्ब और दक्षिण-पोरसे गोलियोंकी दृष्टि होने लगी।
अत्यन्त भयङ्कर याक्रमण दो व्योरसे हो रहा था। इनमे
एक अोर सेनापति हिउ गफ गोर दूमरौ योर करनेल जेनकिन
था। उनकी हप्ता देखकर मुझे विश्वास हुया, कि जो
विश्वास मैंने उनपर किया था, वह इसके योग्य थे।
"च्यभी सपेरा नही हुया था। चारो योर इतना अन्धरा
था, कि दीवार के सामनेकी चीजें दिखाई नही देती थी। मैंने
अाज्ञा दे दी थो, कि रियों को बिना अच्छी तरह देखे बाप
न दागी जावे। लफटिगण्ट शर्सके अधीन गफको पहाडी तोपोने
शार गोले दागे। इससे मैदानमें प्रकाश फैल गया। प्रकाश में
दिखाई दिया, कि व्यगान छावनीसे कोई एक हजार गजके
मामलेपर या चके है। २८ नम्बर पञ्जाव पलटनने पहले
वाठ मारना प्रारम्भ की। इसके उपरान्त गाइड्स, ३६ नम्बर ।
और ३ नम्बर पलटा यथाक्रम पाठ दागने लगी। दीवारके
सीप पहुंचे हर गाजियोंपर बाठ पड़ी लगी। फिर तो
तोपखानी अागे बाते हुए वैरियोंपर गोले उतारने लगे।
मात बनेसे लेकर दश बनेतक इसी तरह
लडाई होती रही। वैरियोंने पडालको दक्षिण योरकी
पार उल्लङ्घन करनेकी चेया वारवार की। कितनी ही
तो वैरी दोवारके अत्यन्त समीप पहुच गये। पर
न पीछे हटाये गये। निस जिस जगह इस तरहको वडी
.
प्रातःकाल
।

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अफगानस्थानको इतिहास। . प्रात काल होते ही एकाएक वादगो लगी। हमारे सिपाही हथियारसे लैस होकर अपनी अपनी जगह खड़े व्याक्रमणको प्रतीक्षा कर रहे थे। अाक्रमण प्रारम्भ हुया । शवनौकी पूर्व और दक्षिण योरसे गोलियोंको थरि होने लगी। अत्यन्त भयङ्कर व्याक्रमण दो योरसे हो रहा था। इनमें एक ग्रोर सेनापति हिउ गफ और दूसरी ओर करनेल नेकिन था। उनको हाता देखकर मुझे विश्वास ढुंगा, कि जो विश्वास मैंने उनपर किना था, वह इसको योग्य थे। "यसी सरेरा नही हुया था। चारो ओर इतना ग्रन्धरा था, कि दीवार के सामनेकी चीजें दिखाई नही देती थी। मैंने याज्ञा दे दी थो, किरियोंको विना अच्छी तरह देखे बाद न दागी जाये । लपाटिनण्ट शसके अधीन गफकी पहाड़ी तोपोंने शार गोले दागे। इससे मैदानमें प्रकाश फैल गया। प्रकाशमे दिखाई दिया, कि अफगान छावनीसे कोई एक हजार गनके फामलेपर या चके हैं। २८ नम्बर पञ्जाब पल्टनने पहले बास मारना यारम्भ की। इसके उपरान्त गाइड्स, ३६ नम्बर योर १२ नमर पल्टन यथाक्रम वा दागने लगीं। दीवारके मनीय पहुंचे हर गाजियोंपर पाठ पड़ने लगी। फिर तो, तोपखाने भी यागे बदले हुए वैरियोंपर गोले उतारने लगे। मात बनेसे लेकर दश वनेतक इसी तरह लडाई होती रही। वैरियोंने पडावकी दृक्षिण चोरको दीवार उक्षत करनेकी देश वारपार की। कितनी ही, तो वेरी दीवारके व्यत्यन्त ममीम पहुच गये।, पीछे घटाये गये! जिस जिस जगह इस तरहकी वही - प्रातकाल पर + ।

द्वितीय अफगान-शुद्ध
भारी
---
मेर
,
या की गई थ, लाशोंका र उन जगहोका पता बता रहा
-था। ऐसे ही मन सभी भारतवामियों के साहस और उनकी
निकिताका परिचय मिला। यह बहुत जोर शोरसे
धा। मैं एक जगह खड़ा था। प्रति पय कमारिडत
अपनरोंकी रिपोर्ट सझे मिल रही थीं। ऐसे समय
थनीवश नामे नौकरने मेरे, पाम पाकर कानमें कहा,
कि स्नान कर लीजिये। पर गोलियों और सोप यदुशकी
यावानसे तनिक भी विचलित नहीं हुअा। उसने अपना
दैनिक काय इस प्रकार पालन किया, मानो कोइ व्यसागरण
माताहीं हो रही थीं।
"दा याने ज्यरान्त ही युह पाद स्थगित हुआ।
ख्याल-किया, कि व्यफगान बीच नोडिङ्ग , बन्दूकों माम्ने
याने विचाते हैं। पर घण्टे भर बाद आक्रमरा जोरशोरके
माय पिर प्रारम्भ हुआ। मैंने देखा, कि मेरी हमारी पार्शमें
पोछे नही हटते, इसलिये उति नाग पहा, कि अपनी मौन
र बाहर निकालू चौर अाक्रमण करके उन्हें अपने मामने में ।
घटा हूँ। मैंने मेजर कायरको फोलह प्रारदिप्तरी तोमा
माघ और लफटिनएट करनेल विलयमको ५ नम्बर
रिमाले साथ दिमाख्वालके उपर पहुंचकर करणा
मामे गांवकी गिर्द एकत्र ग्यौको ध्वस्त्र विभाग
याज्ञा दी। इस याक्रममासे प्रभार मिद्ध
फगान हितराकर भाग गये।
'इनले उपरान्त ही पास पड़ा।
सुदन टूट गरा
स

भागानरानमा इतिहा।।
IITTER पर मनी पास
को रोगया। माम! रिमा
पारा मोरया।
और मामोतो याता
मारा मयार कर तुम रोगियोका पोता
रोभार रानि मे ती गपुरी गारो घोरजी कर
ती : सगर गरियो गाम कर गई। माप मार
frमका र भारा प्रारमा भित करतानगो मन
भारतमा । पन गांवरियान में र
মহা খা খা ভন বা হাে না মংন্স মাসল
गायक यम शोरगेडियर जनरल नमको ने
निगम प्रारमुरमे मील कामापर
मन परे । सी उगा पा सेमे दिरंगाई देते थे।
रोने से भाग पडला , पिच पर,
घोनिया गाटे गये। गमगाणो मिले। इन
৭ ম ম শ মা হল গলা ফানি
समझा। जरा पर गा मानों साथ माथ उटा दिये
गो। सभी iffr an, कमा SITE. मो.
नगार साटिre 10 1मकान सारी वल गर,
उस गये।

। - । हितीय अफगान-युद्ध। १५५ 'याये थे। राइके ग्रामवासी और काबुलबासी दा लोगों के 'मघ हो गये थे। अमिज्ञोका कहना था, कि अाक्रमणकारि योंकी संख्या एक लाखके करीब थी। मैं भी इसे अधिक नहीं ममझता। १५ वीसे लेकर.५३ वींतक हमारे बहुत थोडे यादमी हताहत हुए। दो यफमर ६ सिपाही और ७ नौकर मारे गये, ५ व्यफसर ०१ यादमो और २२ कर घायल हुए। वैरियोंके कोई ती हलार यादमी काम याये होगे।" इस घटनाके उपरान्त अगरेजी, पोन शेरपुरसे बाहर निकली। उसने काइल और बालाहिसार प्रति स्थानोंपर फिर कवना किया। राबर्टस वाहवने जिम्नलिखित विज्ञप्ति प्रकाश की,- "कुछ वागी यादमियोंके उत्तेजित करनेपर' साधारणत' यज्ञ और अदूरदर्शी मनुष्योंने बगावतका भण्डो खडा किया। यागियोंको उचित प्रतिफल मिल चुका है। प्रजा भगवानको घाती है। शक्तिशालिनी न्यायपरायणा दृटिश मरकार प्रजाका । अपराध क्षमा करती है। जो लोग बिना बिलमके टिशकी शरण ग्रावे गे, उनका मराध क्षमा किया जावेगा। सिर्फ वारदको मुहम्मद जान, कोहस्थानकै सौर बूचा, लोगारका सम- • न्दर खां, चार घेदका गुलाम हैदर और सरदार सुहम्मदहमा खांके हत्यारोंका अपराध क्षमा नहीं किया जावेगा। चाहे तुम किसी जाति हो, यायो यौर अधीनता स्वीकार करो। इमक उपरान्त तुम अपने मकानों में सुख छोर पान्ति मान रह सकोगे। तुम्हारा किसी तरहका नुक्रमाा 7 होगा। ल । -- १२४ अफगानस्थानका इतिहास । , करते थे। मध्याहने उपरान्त एक बनते बनने आक्रममा सवारणी ही वन्द हो गया। वैरी भागने तगे। अब रिसा लेने ग्राममण करनेका मौका था। मैंने सामीको याज्ञ दी, कि छापनीका प्रत्ये क सवार लेकर तुम वेरियोका पीछ करो योर राति होने से पहले शेरपुरको चारो घोरको कुख खुजी हुई जगह वैरियोंसे साफ कर दी गई। माथ साथ रिमालेका एक भाग शवनीके दचिण कुछ गावोंको ध्यान करनेके लिये भेजा गया। इन गावोंसे वेरियोंने हमें कर महुंचाया था और उन्हें वहांसे हटा देना बहुत यावश्यक था। इन गावोंके ध्वस होनेपर सोडियर जनरल गफको फौज लिये राह खुन जाती। वह शेरपुरने कोई दमौल के मामलेपर पद् च चुके थे। मुझे उनी पडावके खेमे दिखाई देते थे। खेमेाडोके से नान पड़ता था, कि वह एक रात' हो लिये वहां गाड गये थे। गांवों में गाजो मिले । इन सवने यात्म नमर्पण करनेके वा.भागने बदले मरना सामित्र नमभा। सुतरा पह गाव मकागो के साथ नाथ उडा दिये गये। दो वीर जोगियर अफनर, कमान डखाम बी० सी० और लमाटिस्ट मौ० बनेट मकान उडाते वक्त स्य उड गये। * * गने मातम हुया, कि वेरियोने अाक्रमण करना। हो तो छोड दिया, राष, जातियोका वडा जमाव टट युग था और का मुकातला करनेवाये वहम सहम मनुष्यों में एक भी पावतो गाशे वा पहादियोंमें नहीं था। याक्रमण करने थालोको ठोक या पाना कठिन था। दूर दृरके लोग ६ ॥ -- द्वितीय अफगान-युद्ध। १५५ - । . ध्याये थे। राहके ग्रामवासी और काबुनवासी हा लोगोके म घ हो गये थे। अमिज्ञोका कहना था, कि अाक्रमणकारि- यौको संख्या एक लाखके करीव घो। मैं भी इसे अधिक नहीं ममझता। "१५ वीसे लेकर २३ वातक हमारे बहुत थोडे आदमी हताहत हुए। दो अफमर : सिपाही और' नौकर मारे जये, ५ अफसर ६१ यादमी और २२ नोकर घायल हुए। बैरियों कोई तीन हजार यादमी काम व्याये होगे।" इस घटनाके उपरान्त व्यगरेजी मौज ,शेरपुरसे बाहर निकली। उसने कोमुल व्यौर वालाहिसार प्रति स्थानोंपर फिर कवजा किया। राबर्टस साहवो निम्नलिशित विज्ञप्ति प्रकाश की,- , "कुछ बागी ग्रादमियोके उत्तनित करनेपर साधारणत यज्ञ और अदूरदर्शी मनुष्योंने बगावतका झण्डा सडा किया। वागियोंको उचित प्रतिफल मिल चुका है। प्रज्ञा भगवानको घाती है। शक्तिशालिनी न्यायपरायणा घटिश सरकार प्रजाका अपराध क्षमा करती है। जो लोग विना विलम्ब्के घटिशको शरण आये गे, उनका अपराध क्षमा, किया जावेगा। सिर्फ वारदकके मुहम्मद जान, कोइस्थानकै मीर सूचा, लोगारका सम न्दर खा, चार हेदका गुलाम हैदर और सरदार, सुहम्मदइसन खाके हत्यारोंका अपराध क्षमा नहीं किया जावेगा। चाहे तुम किसी जाति हो, यायो धौर अधीनता स्वीकार करो। इनके उपरान्त तुम अपने मकानोमें सुख चौर शान्ति मान रह सकोगे। तुम्नाग किसी तरहका नुक्रमाल न होगा। - १७

1
१७६
अफगानस्थानका महास।
।
,
प्रनाके विरुद्ध घटिश गवरमेण्ट किसी तरहका वैरभाव नहीं'
रखती। ग्रर जो मनुष्य बगावत करेगा, निश्चय ही इस
पायेगा, यह जरूरी बात है। किन्तु भी लोग निना
बिलमो चले याये गे, उन्हें भय व्यथवा पाहा ग पारगा।
चाहिये। टिश-सरकार वह कहती है, जो उसके
हृदयमें है।"
इस विधप्तिका असर बहुत व्यहा हुया। काबुल नगर
और पार्थवत्ता देशोंमें शान्ति स्थापित हो गई। नगरके
লাসাং বল মই স্বীং ব্যালার্ম ঘুমন মীভভ ন শী।
दूर दूरके सरदार याकर रावर्टम साहवसे मुलाकात करने लगे।
सन् १८८०ई०से प्रारम्भमें काबुलमे शान्ति विराजने लगी।
'किन्तु यह शान्ति असली नहीं थी। जिस तरह ज्यालासखौ
पर्वतका जपरीभाग ठण्डा हो जानेपर भी उसके भीतर बाग
भडकती रहती है, ठीक उसी तरह काबुलनासी प्रत्यक्ष में
शाम्त दिखाई देनेपर भी ध्यान्तरिक उत्तेजनासे परिपूर्ण थे।
कहीं अफगाा अनरेगी पोनपर जेहाद करनेकी चेष्टा कर
रहे थे। यही बलवाई सरदार मूमामा यौर सफा सके
यालमको अधीनतामें सक्षम सहस मनुष्य कालपर फिर
नई करनेके लिये सनधन रहे थे। ग्रहरेजी फौज भी
निश्चिन्त गही थी। वह हर घडी अफगानोसे लड़ने झगड़ोके
लिये तय्यार रहती थी। अगरेजी फौभने वडी चेचा करके
र' और उसकी इर्दगिर्द कोई बीस बीस कोसके
ता व्यपने शासनको प्रस्तार प्रतिपत्ति कर रखी थी। को.
इस्था तथा व्यागान तुरकस्थानतक अगरेजी मौन नहीं गई।

हिताय अफगान युद्ध । । . . पर पूर्वका सतल और साधीन था। देशको दशा देखकर रटिश सरकार किसी उपयुक्त मनुष्यको अफगास्थानकी गद्दी देकर यमनी फोनको भारतमें वापस लाना चाहती थी । अमगान कहती थे, कि याकूब सा कालका ग्रमोर फिर बनाया जावे। इटिश सरकार यह बात मार नहीं करती थी। कारण, उमको विधास हो चुका था, कि मौरको साटसे कर्वगनरीकी मिशन मारी गई थी। ठीक ऐसे हो, समय सम्पर्ण अफगान स्थानमें यह खबर फैल गई, कि अमीर दोस्त मुहम्मदः पोते और अमीर शेर अली सांके,मतीने व्यवदुररहमान खां स्मकी अमलदारीसे व्यफगान तुररस्थान ' या पहुंचे हैं। च्यबद्धररहमान सन १८८० ई. के प्रारम्भमें अफगाा तुरदास्यान ध्याये थे। मार्चका अन्त होत न होते उन्होंने मम्पर्ण अम गान तुरकस्थातपर अपना अधिकार जमा लिया। अन्दर रहमानकी, शक्ति वानेसे अगरेजोको अाशका दुई छोर व्यफ गानोंकी हिम्मत वाद गई। इससे कुछ पहये सन् १८८०को १६वीं फरवरीको हेसमेत माइप "अफगान वार नाम्नी अपनी पुस्तकामें लिखते हैं, "अन्दररहमानको चारों समझना बहुत कठिन है। रफगानस्थानके प्रधान मरदारोंको अपेक्षा इम सरदारका नाम लोगोकी जुबानपर प्यादा है। जैसा मैंने खयाल किया था, अबदुररहमा च्यफगास्थानके अभिनय प्रधान पान बाता मालूम होता है। कारण, प्रादेशिक मोतिपर - उसका असर बहुत जल्द पड सकता है। तुरकस्यानो माम नेकी सनर हमें गत्यन्त कठिगतापूर्वक मिलती है। इरोपीय तार समाचारदारा मालाम हुया, कि वियोन - , - १४८ अफगानस्थानका इतिहास । व्यवदुररहमानको अवकाश दे दिया और अब वह अपनी भाग्य परीक्षा लिये अफगानस्थान ग्राया है। वथामि यवतक हम लोगोको उसके यक्ष नदोकी दक्षिण चोर पहुचनेकी पकी सनर नहीं मिली है। यह मत्य है, कि उसके बलख पानेको खबर एकबार मिली थी, किन्तु इस समाचारका नमर्थन नहीं हुआ। इसलिये वह अविश्वासनीय समझा गया। अब हम लोगोको उसकी गतिकी दूसरी सबर मिली है। वलखके एजण्टोंने कावुली सौदागरोंको चिट्ठी लिखी है, कि मीर अफजल खाका निरहेश लडका वखशांमे है। उसके साथ कोई ३ हजार तुर्क मिपाही हैं। वह इमारतका दाया करना चाहता है। * अमीर अवदररहमानको अफगानस्थानकी जातिया और अफगान सिपाही दोनो प्यार करते हैं। समा सशके व्यालमके लोगोके जेहादके लिये उभारने चौर सहन्नद जानकी फौजके कुछ दिनोके लिये शेर- पुर घेर रोनेकी खबरसे विदेशमें पड़े हुए अबदुररहमानको अपना मनवा पूरा करनेकी व्याजमायशका खयाल पैदा हुया होगा। इस मन्सू का हाल भविष्यमे मालूम होगा। कि तु इमका प्रत्यक्ष वरूप कुछ तुरको सवारोंको एकब करना और दो स्थानसे अक्ष नदी पार करना है। छबदुर रहमान बदखशांकी अोर ग्राया। वहा उसकी रखीका स बन्यो हाकिम था। * * * खवर है, कि अबदुरहमानके पाल दो हमारसे तीन हजारतक' सवार है। यहावाले कहते है, कि जिस समय उसने अक्ष नदी पार को घौ, उसके पास १३ लाख रुपये बुखारेको यशरफियोंमे थे। * * * अबदुर ।

and । - . . द्वितीय अफगान युद्ध। १४८ । हमाग यदि अफगान तुरकन्यानके साथ कालपर भी करना करना चाहेगा, तो या तो हम लोगों को उसे अमीर माना मडेगा, या उसकी फोजसे युद्धम्यलमे भिडना पडेगा। अनी यह देखना वाको है, कि वह रूखको पसन्द करता है, वा रङ्गलराटको। इस अवमरमें काइजका शासन मम्बन्धी फेसना करने के लिये सर पेल ग्रिफिन माहव राजनीति समितिले प्रधान बन- फार भारतसे कायन याये। उन्होंने अमीर अबदुररहमाको एक चिट्ठी भेगी। ', इस चिट्ठीका हाल लिखनेसे पहले हम व्यवदुररहमाके सम्बन्धमे कुछ बातें कहा चापते है। ध्यन्दुरहमान का ग्रीवा व्यव्यत्त कौतू इलमय है। उन्होंने कभी कोद होकर पेड़ियां खडकाई यौर कभी अपने हाथमे अमा। भोजन मनाया। कमो देशके हाकिम बने व्योर कभी हाकिमकी प्रगा। कभी मैन्यके सेनापनि धौर कभी सेनापतिले व्यधी। "मिपाही हुए। कभी उन्होने गणकुमारों की तरह की शुहारों और कभी इसीनियरोंकामा जोवन यतीत किया। कभी उन माम मम्पसिका भण्डार रहा, कभी भोगाने लिये एक टुकडा भी मयस्सर न हुया। प्ररररमार गन नाम यपो चाचा शेग्मद खासे परास्त हो र अफगान- म्याकी मीमा पार करने रुमकी अलमदारी में चशे गये थे। भन उनको माल्न हुया, कि अफगानन्यानमें अगरेजी फौनका कपमा योर फगाम घारेजो पौनसे धमन्नुए है, तो वह रूस अपमरोंकी मलाइ धौर यामासे यशागस्थान याये। । ,

१५०
अफगानस्थानका इतिहास ।
-
इनको देखते ही अफगान तुरकम्यान अमीर रईस अपनी
अपनी फौजोफे साथ इनसे मिलने लगे। अमौर अबदुरहमान
अमनो पुस्तक तुक व्यवदुरहमानीमे अपने रूमकी ग्रम
लहारीसे व्यफगान तुरकस्थान याने और अपने अमीर बननेका
हाल इस प्रकार लिखते हैं,-"दूसरे दिन में 'कन्दन महु चा।
सिपाहियोने एक मौ एक तोपोको सलामी दी। मुझे देख
कर वह बहुत प्रसन्न हुए। मेरे वैरी दो अफसरोंको मेरे
मामने लाये। दोनोको मेरे सामने मार डालना चाहते थे।
मैंने मारनेकी ग्राजा न दी। दोगोंको छोड़ दिया।
"अगले दिन तोपखानेकी देख भाल कर रहा था। इतने में,
एक मनुष्य यागे शिफल व्याया और सलाम करके मेरे पैरोंपर
गिर पडा। समै बहुत अाश्चर्य हुया। उसे उठाया, तो
देखा, कि नाजिर हैदरका लडका सरवर खां है। यह मुझसे
चमरकन्दमें छुट गग था। पहले तो उसने मुझसे अत्यन्त
विनीत भावसे क्षमा प्रार्थना की। जर मैंने उसको क्षमा किया,
तो उसने कहा, कि मै काबुलसे यायो नामको चिट्ठी लाया
ह। में अपने खेमेमे वापम याया, वो जान पडा, कि सर लेपेल
ग्रिफिन साहबका पल बेकर याया है। राहमे विषम शीत
थी। पाला और वरफ घुटनोंसे ऊपर जर थी। पत्रका
विधर इस प्रकार था,
'मेरे प्रतिष्ठित मिल सरदार ग्रन्द्ररहमान खां ।
'यघायोग्यके उपरान्त ग्रामवा मिन ग्रिफिन यापको सूचित
करता है, कि रटिश सरकार व्यापफे साल कतागान पहुँ।
। पनेसे अयन्त सन्तुए है। ग्राप यदि यह लिखे गे, कि रूससे

दितीय अफगान युद्ध।
-
T
-
ग्राम कैसे पाये और अब व्यापको क्या इच्छा है, तो गवरमेण्ट
व्यत्यन्त प्रसन्न होगी।'
"मैंने अपनी फोनको यह, मन सुनाया। कारण, यह पहले
पहल टिमरकारसे मेरा समन्ध हो रहा था। विना
फौनको सलाहके इस पत्रका उत्तर देना उचित जान न पडा।
सझो भय था, कि फिमादो लोग कही यह न प्रसिद्ध कर दे,
कि में अगरेजोंसे मिला हुया था और इसी बहानेसे उन्हें
देश देना चाहता था। इससे मैं वरवाद हो जाता। सझे
यह भी आजमाना था, कि लोग नैतिक सम्बन्धमे मुझे
कहातक स्वतन्त्रता देते हैं। मैंने पन उच्चसरसे पा दिया
और कहा, कि सरदारगण मुझे इस पतका उत्तर देने में
सहायता प्रदान करें। मैं नहीं चाहता, कि व्यपने नये मिलोकी
सलाह बिना लिये कोई काम करू । मेरी इच्छा है, कि सव
लोग जवाव तय्यार करनेमे मिल नावें। उन लोगों ने मुझसे
दो दिनोंकी मुहलत चाही। तीमरे दिन कोइ सौ चिष्टिया
लाये । इनमे किसी किसीका विषय यह था,-'हे ग्रङ्गरेज नाति !
हमारा देश छोड दो। या तो हम तुम्ह निकाल देंग, या
स्वय इमी ठामे मारे जावेगे।' एक पल में हरजानेो रुपये
मागे गये थे। एकमे लिखा था, कि ग्रङ्गरज तो व्योर किले
वरबाद करनेके लिये एक करोड रुपयेका हरजाना दाहीं
वो एक भौ व्यङ्गरेज मेशावरतक जीता जाने न मावेगा। ऐमा
हो एकवार पहले भी हो चुका है। एक सरदारने लिखा,
'ऐ दगगवान काफिरो। तुमने भारतवर्ष तो धोखेसे वे लिया
योर अब इसी तरह अफगास्थानपर भी कवना करना च एते

J
१५२
अफगानस्थानमा इतिहास ।
हो। यधासाध्य हम तुम्हें रोकेंगे। इसके उपरान्त स्म वा
कोई हमरा राण्या तुम्हारा सामना करो लिये हमारे नाथ
मिल जावेगा। मतरान यह, कि उन लोगोंने इसी तरहकी
पेममझीकी, जर पटाङ्ग वात मिली धों।' मैंने सय चिडिया
जोरसे परकर मगाई यौर कहा कि मैं भी एक चिट्ठी तुम्हारे।
सामने हो लिख गा। जिसमें यह 7 मालूम हो, कि मैंने
पहले से मलाह कर ली है। मैंने चिट्ठी लिखनेका एक
कागज और कलम लिया। भगवानसे प्रार्थना की, कि मुझे
उचित उत्तर लिवनेको शक्ति है। इसके उपरान्त मात
हमार उपक और अप्रगानों के मामने यह पत्र लिखा,-
'मेरे प्रतिष्ठित मित ग्रिफिन साइव रेजिडराट घटिश गवरमेण्ट ।
'यत्र शेखक मरदार व्यगदररहमान खांकर भलाम खीमार
कीजिये। सझे ग्रामका पत्र पाकर अममता हुई। व्यापक
मेरे रुमसे ध्याने प्रश्नको उत्तरमे निवेदन है कि मैं वायमगय
जनरल काफमेन और रूम मरकारकी ग्राशासे अफगानस्थान
घाया हूं। यहां मैं इसलिये गाया है कि ऐसी सुसीवत
और विपत्तिमें में यमनी नातिको महायता करूं। वस्सलाम।'
“यह मन ऊ ची गावाजसे पाकर अपनी पाजको सुनाया।
पूछा, कि सबको पसन्द है, वा नहीं? मक्ने जवाब दिया, कि
यापके अधीन रहकर अपने देश और धमन तिये धमा
लडनेको तय्यार है, किंतु वादशाहोंसे पत्रव्यवहार करना
नहीं जानते। उन्होंने सुदा और रसूलको कमम खाकर
'मुझे उचित उत्तर लिखनेको यात्रा दो। इससे उपरान्त
'चारया'की ध्वनि करके कहने लगे, कि जो उत्तर यायने
1

द्वितीय अफगान-युद्ध।
,
में भी
.
लिखा, ठीक है। हम मब उसे स्वीकार करते है। इसके
उपरान्त यह मत सरवर खाको दिया गया। वह चार दिन
उहरवार कन्दनसे काबुनको योर रवाना हो गया।
धीरे धीरे चाराकारको व्योर चता। इसके साथ साथ व्यङ्गरेनौ
अफमरोसे कहला भेजा, कि मैं उसे फैमला करनेके लिये
चाराकार याता हूँ। ३० अपरेलको ग्रिफिन माहनका और
एक पत्र मिला। इसमे अनुरोध किया गया था, कि काबुल
ग्राकर काबुल शामा कौजिये। १६ वी मइको मैंने जो जवाब ,
दिया उमकी कल इस प्रकार है,
'मेरे प्यारे मित्र
'मुझे टिश भरकारसे वडी व्याशा थी और अब भी है
मुमी यापकी मतोको नितनी व्याशा थी, उतनी हो प्रमाणित
हुई और वही मेरी कुल ग्राशायोका कारण भी है। ग्राम
यफगानोका स्वभाव अच्छी तरह जाते हैं। एक यादमीको
वातका कोई असर नहीं हो सकता। वह इस बातका विश्वास
कर लेना चाहते हैं, कि जो कुछ किया जाता है, वह उसकी
भलाई के लिये। वह समै काबुन जानेकी यात्रा देने प्रहरी
निम्नलिखित प्रमोका उत्तर चाहते हैं,-(१) मेरे राज्यको
सीमामा होगी। (२) कन्धार भी मेरे राग्यमे रखा जायेगा,
वाँ नहीं ? (३) या कोई अगरेज दूत ग्रथया अगरेजी पौग
घमास्यानमे रहेगी१ (8) क्या हरिश गन्धक किमी बेरी
पारूससे मामा करने की व्याशा सुझसे की जावेगी? (५)
रटिश राज्य सझे और मेरे देशको क्या लाभ पहुंचाना चाहता
(६) योर इमने पहले वह कौनसी सपा सभास चाहता
.

अफगानस्थानका इतिहास - -- बादशाही घराोका नगर था। उसके निकल जानेसे देशको प्रतष्ठिामे व्याघात पहुंच सकता था। "भगवानपर निर्भर रहकर मैं कोहस्थानको राहसे चारा. कार दाखिल हुया। अगरेजी फौज गाजियोंका व्याधिक्य देखकर किसी कदर परेशान थी। अगरेजोंसे लडनेवाले कोहण्यानो योर काबुजी सरदार प्रति दिवस याकर सुझसे मिलते जाते थे और मेरे अधीन होते जाते थे। जो खय न च्या मने, उन्होंने मुझे पत्रदारा वा किसी दूसरे उपायसे समाचार भेज दिया। मेरे जासूसोंने काबुलसे समाचार दिया, कि अगरेन कर्मचारी किसी कदर घबराये हुए थे और उनकी समझमे गहो पाता था, कि मेरा अभिप्राय क्या था। २०वी जुलाईको अफगान जातियोंके उपस्थित कुल सरदार चौर सगरोहोंने मुझे चाराकारने व्यपना बादशाह और ध्यमीर बनाया। मुझे देशका शासक मानकर मेरा नाम खुत- बेमे दाखिल किया। लोग अत्यन्त प्रसन्न थे, कि भगवानने उगका देश एक सुसलमानको मौंप दिया। उघर ग्रिफिन साहवने भी श्वी जुलाईको कावुलमें दरबार किया। उन्होंने अगरेज कम्मचारियों और अफगान सरदारों के सामने मेरे धमौर होने की सूचना दी। उस समय उन्होंने जो वक्तता ही वह यह है- 'घटगायोंके क्रमसे सरदार गटररहमानके लिये एक ऐमी सूरत पैदा हो गई है, जो गवरमेण्ट की इच्छाके अनुकूल है। इसलिये गवरमेण्ट और बडे लाट प्रसन्नतापूबक सूचना देते है, कि हममे अमीर दोक्ष मुहम्मद के पोते सरदार अबदुर- - 1 हितोय अफगान-युद्ध। - - 4. 1 जबतक रहमान खाको काबुजका अमीर मान लिया। भारत गरता रको इम पातसे बहुत हर्ष हुआ, कि अफगास्थानको सभ्य र नातिनों और सरदारोंने वारकज वरानेगे ऐसे सुप्रसिद्ध पुरु घको पमन्द किया, जो मुप्रमिद्ध सिमाली, बुद्धिमान और अनु भवी है। वह भारत सरकारने मैली रखते हैं। भारत सरकारको यह बात मालून होती रहेगी, कि भारत सरकारके प्रति उनके विचार पूजयत है, उस ममयतक भारत मरकार उनकी सहारता करती रहेगी। सबसे अची वात अफगानस्थान मरकारके लिये यह होगी, कि उसकी जिस प्रजाने हमारी सेताकी सहायता की है उसके साथ अच्छा । 1 मुलक करे। । “२वीं जुलाइको शिललेसे एक तार पाया। इनमे काज- लके व्यगरेज कर्मचारियोंको सूचना दी गई थी, कि कान्यार- मैवन्दमे अगरेजी फौन सम्टार ग्रयूक्खांदारा परास्त हुई। यह सुाकर ग्रिफिन साहब थोडे मे सवार लेकर तुरन्त ही जिमे मुझसे मिलने याये। यह एक गार है, जो काबुनसे कोइ मोनह मौलके फासलेपर है। 'तीन गेज, यानी ३वीं जनाइसे १ली अगस्ततक मुझसे उनसे बातचीत होती रही। वो बात स्थिर हुई, उसके लिये मैंने एक लिसाक्ट मागी। जिममे में वह लिखावट अपनी प्रजाको दिसा मकू । ग्रिफिन साहमने निलिखित विषयका एक पन्न मुभी दिया, 'हिन एसियेगी वाइमराय और गवरनर जनरलको यह मुम्काय हुया, कि घटिश सरकारी बुलानेपर ग्राम कामुलकी घोर खाने हुए। इसलिये यापके मिनभान और उम लाभवा অন্যনা বুনিয়া। - - ध्यान करके जो व्यापको स्थायी गवरमेण्ट हो जानेसे मरदारों और प्रजाको प्राप्त होंगे टिश सरकार व्यापको यमौर मानती है। बडे लाटकी योरसे मुझे यह कहनेको भी याना दो गई है, कि टिश सरकार यह नहीं चाहती, 'कि ग्राम के शासन समन्धी कामोंमें किसी तरहका हराम करे। वह यह भी नहीं चाहती, कि कोई अगरेज रेजिडएट व्यापक राज्यमें रहे। यह सम्भव है, कि दोनो सरकारोंकी सलाइसे एक मुसलमान एजएट काबुल में रहे। याप यह मालूम करना चाहते हैं, कि अफगानस्थान विदेशी शक्तियोसे किसी तरहका समन्व रख सकता है, या नहीं? इस विषयमें बड लाटने मुझे यह कहनेको याज्ञा दी है, कि दृटिश सरकारको जानमें अफगानस्थानसे कोई विदेशी शक्ति सम्बन्ध नहीं रख . सकती। रूस और ईरानने यह बात स्वीकार कर ली है। इसलिये साफ नाहिर है, कि अाप सिवा दृटिश मरकारक यौर किसी बाहरी शक्तिसे नैतिक सम्बन्ध नही कर सकते है। आप यदि वैदेशिक सम्बन्धमे घटिश सरकारको रायके मुताविक काम करेंगे और ऐसौ दशामें बिना यायको योरसे छेडछाड हुए यदि कोई वैदेशिक भक्ति यमगानस्थानपर ध्यानमय करेगी, तो रदिश सरकार यापकी ऐसी सहायता करेगी, जिसमें व्यापक वैरीका आक्रमण' रुके और वह अफगानस्थाासे बाहर निकाल दिया जाये।' यिफिन माहवने मुझसे कहा, कि कावुल नाइये और अङ्ग- रेल कर्मचारियोको विदा कौनिये। साथ ही यह प्रार्थना मा.की, कि उनके कालसे भारततक निर्विघ्न जाने योर ३ .. -

द्वितीय अफगान-युद्ध।
१५८
राह मे रसद व्यादि संग्रह करने की सुथवस्था भी कर दीजिये।
(याकून खाको दण्ड देनेके लिये) एक फौन सेनापति
राबर्टसके अधीन कन्धार जानेवाली थी दुमरी पौन सर डाल्ड
सुपार्टके मातहत काबुलसे पेशावर लौट जानेवाली थी। मैंने
यथाशक्ति सन प्रपन्य करनेका वादा किया। यगरेनी फौजको
व्यारेजी मोमातक निर्विघ्न पहुंचा देनेके लिये बहुत तमली
दो। मैंने उनसे कहा, कि मेरी नागमें सेनापति रिवर्टमको
यथासम्भव शीघ्र कन्धारको योर ‘जाना चाहिये। उनके
जानेके उपरान्त मैं मर डानल्ड शु च्याटसे विदा होनेके लिये
गाऊ गा। ८ वौं व्यगस्त को लार्ड रापर्टस थोडीसी पौनके
साथ कन्वारकी योर' रवाने हुए। मैंने सरदार, शमशुद्दीन
खाके लडो सहमद अनौज खांको कुछ अफसरों के साथ
मेनापति रावर्टमो 'माथ कन्यारतक भेज दिया। जिनमें
लोग राहमें किसी तरहकी बाधा न दें। *
१० वी व्यगरतको मर डालड शुमार्ट चौर राफिा माइन
शेरपुरसे पेशावरको 'योर रवाने हुए। उनको विदा होने से
छ मिनिट पहले मैं उनसे मिलने गया। कोड १५ मिनिट
-तक सुभासे और उनसे मिनभावसे बातें हुई। वातों बातोंमें
यह भी स्थिर हुया, कि शेरपुरमै रखी हुई अफगान तोप
खानेकी बीस तो मुझे दे दी गावे। दूमरे यह, कि कोई
उन्नीस लाख रुपये जो अगरेजोंने अपनी स्थितिमें देशसे वसूल
किये थे और किले वानेमे खर्च हुए धे, वह मुझे वापम दिये
मा योर नो नये किले व्यारेनोंने काबुल में बनाये थे, वह
(नरेन द न किये जाद
।
१
4

अफगानस्थानका इतिहास ।।
-
1
जिम नमय अगरेजी फोन काबुल खाली करके भारतवर्षको
योर चली उन ममय अफगागा हर्षका वारापार नहीं रहा।
वह राहकी गिर्दके पर्वतोपर एकत्र होकर नागा प्रकारका
उस्लाम प्रकट करते थे। एषा माहब कन्चार कम्पन'मे लिखते
है,-"पडावकी गिर्दक टोले ऐसे मनुष्योहारा अधिक्षत ही
पुके थे। वह एक तरहका टोल वगाते और लडाईका नाच,
गाचते थे। जिस समय उन लेगोंने हमे कूच करते देखा,
उम समय यमानुयिक उत्त जना दिखाने लगे। ऐसे मनुथ्योंके
पिटालित दल पहाडोंकी चोटियोंपर एकत्र होकर शैता-
नोकाना चीत्कार करने लगे। शाके चीत्कारके बीच में हमें
परावर यह आवाज सुनाई देती पी,-'यो-हो, यहा-
वहमखक यफगान धीरे धीरे. यह सब कहते थे।
इसकी प्रतिभनि होती थी।" इतना ही नही, वरञ्च कुछ
दष्ट और बदमाश फगानोंने व्यहरेजो फोनको चिलाकर
झगडा उठानेताकी चेठा की थी। किन्तु धीर गम्भीर
दृटिगवाहिनीने उचल अफगातोगी पर यान नहीं
दिया।
वह निबन भारत लोट चाई और उनमें पाने के
साथ साथ दिलीय व्यकगान युद्धको ममापि हो गई।
-
-

1
वन्धार-युद्ध।
हम तुजुक अन्दररहमानीके उद्दत या यह प्रकट
कर चुके हैं, कि अयूपसाने कन्धारको , अगरेजी फौजको
शिकस्त दी थी। लार्ड राबर्टस अयूबखासे युद्ध करने के
लिये कावुझसे कन्धारको योर रवाने हुए। लार्ड राबर्टस चौर
अयूनखाकी लडाईका हाल लिसनेसे पहले हम अयूरखा
और बाहरेजी फौजको लडाईका हाल लिसना चाहते हैं।
कन्धास्की अगरेजी फौजने अयूबखकि हिरातसे कन्वारकी
योर चलनको खबर पाते ही सेनापति बरोके अधीन एक
जवरदस्त फोन व्ययूनखांकी योर भेनी। सेनापति वगेने कन्धा ।
रसे थोडे फामलेपर मैवन्द स्थानमें डेरा डाल दिया और अयूम
खाके यानेकी प्रतीक्षा करने लगा। मन् १८८० ई०को २७ वी
जुलाईको मैवन्दमें व्यारेजों यौर अफगानों को फौजमें मुकाबला
• हुआ। व्यारेजो फौजकी अपेक्षा व्ययूबकी पोन अधिक थो
च्योर उसका अधिकांश शिक्षित था। ग्रङ्गरेनी फौण दिशभर
सब जमकर लडी। तीसरे पहरतक' उसका बहुत बड़ा भाग
हताहत होनेकी वजहसे निकम्मा हो गया। जितने सिपाही
बचे, उनके पैर उखड़ने लगे। मन्वया होते होते अङ्ग्रेजो
लौज परास्त हुई। कपार वेम्पेनमें लिखा है,-"अपनी
माजको मामाल हड यताना अत्युक्ति होगी। किन्तु इमने
सही, कि ऐमी पूरी योर कुचल डालोवाली पिरन्त

अफगानस्थानका इतिहास।
7
।
कभी नहीं मिली थी। अयूब खाने बादिसे लेकर अन्ततक
हमारी चालें पाटी। हम लोगोको जो स्थान चुनना चाहिये
था, वह उसने चुन लिया। इतना हो नही,-वरच जिम
नगह हम लोग घातमे बैठे थे, वहासे हमे लालच देकर ऐसो
जगह ले बाया, जिम जगह उपके रिमालेको अाक्रमण करनेकी
सुविधा थी, जहा हमारी पैदल फोनकी अपेक्षा उसकी पैदल
फौज अच्छी तरह काम कर सकती थी। यह निन्दनीय मान्य
है, किन्तु इसको पूर्णरूपसे छिपा रखना असम्भव है। तीसरे
पहरके मा तीन बनते बनते हमारी तीन रेजिमेण्टों और दो
रिमालेके बाकी बने हुए सिपाही मिलजुलकर भागे।
अगरेज और नेटिव,-अफसर और सिपाही,-बद्ध और युवक,
वीर योर कायर एक साथ मिलकर एक राइपर भागने लगे।
सेनापति और उनका साफ दुखके साथ भागना टेस रहे थे ।
उन्होंने भागनेवालोंको ठहराने और व्यागे वणनेकी चेया की,
किन्तु इमका कोई फल नही हुआ। वरी हम लागोमे इतने
भिल गये थे, कि सौभाग्यवश उनके तोमखानाने गोले उतारना
मौकूफ कर दिया था। यव सिर्फ छुरे, सङ्गीनी, तलवारो और
भालोंसे लडाई हो रही थी। संगपति, वरोने मेजर छोलि-
वरको महायतासे बडी मुशकिल के साथ अग्रगामी गार पश्चा
झामौ सैन्य बनाई। कुछ ऊटा यार खञ्चराको वाचमे रख
लिया। एक तो इस लिये, कि जिमम एक तरहकी पाज
वन जावे, दूसरे इस लिये, कि कोई पीछे ग रह जार पार
फौनको गति न एके। उस समय राक्षको धूलि बादमियों
रतके ससबसे कीचड वन गई थी। अरेजी फागको ग ली
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1
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कन्चार-युद्धा कन्धार . M धा। बाल्द और तो वैरियोंके हाथ पडं गई थी। सिपाही इतने थक गये थे, कि राह चल नही सस्ते थे। म्य नमे लिखा है, "हम लोग बडे दु.सफे माथ चुपचाप चले जाते थे। ,मरते हुए अमागे राहमे गिरने लगे। प्यासकी वनहसे उनका कर और वा गया था। सुहा मनुष्य योर लडके दोनो ही मारे करक विइल हो गये घे। दुनिवार्य वैरियोंसे काम करके वह राहमे गिरने लगे। हम यदि उम जगहका हाल जानो नो सीधी राह चलते और कुछ ही भीलों उपगन्त परगन्दान नदी पार करके प्यास र शायद बैरियोम भी रक्षा पा जात। किन्तु भाग्य में और ही वदा हम ले ग नदीकी बराबर बराबर चले। इस अवमरमें हन रक्षा योर रात्रि के अचकारकी प्रतीक्षा कर रहे थे। किन्तु नवरात्रि व्याइ तो करकी विभीषिका और वाही । कारमे जैसे जैसे हम ग्रागे वळा फौजका कायदा विगडता गया। व्यगरेनी फोन बडो सशकिलके साथ मैवन्टसे कन्धर पहुची। इसके उपरान्त ही अयुवखांकी फोन भी पहुची। व्ययपने कन्वार घेर लिया। मैवन्दको लडाईमे २ हजार चार मो ७६, अगरेजी सिपाही थे। इनमे : सौ ३४ सिपाही मारे गये और १ मौ ७५ मिपाही धारल तथा गुम हुए। ५५ फोनी नौकर मारे गये तथा गुम हो गये। अस्त्र शस्त्रका ; पहुत बडा भडार लुट, गगा। कोड । हजार बन्दूकें और मडातीने गौर कोई ७ मा तलवारें और मीट गइ । मोघोडे मारे गये चार हजार ६ मा ७६ , 5 मौ ५५ र, ३ सौ १५ सचर यौरा देल गुम हो गये। द - अफगानस्यानका इतिहास -- " 1 N स - कन्यार काबुजसे कोई ३ मौ १३ मोलके फासलेपर है। नापति राबर्टम ८ वी अगस्तको काबुलसे चये और ३१ वीं अगलके सबेरे कन्चार दाखिल हो गये १ली सित श्वरको सेनापति राबर्टसने ३ हजार ८ सौ गोरे, ग्यारह हजार हिन्दुस्थानी सिपाहियों और ३६ वोपोंके साथ पीरपैमल गावर्क समीप बावा अलीकोवल पर्वतपर व्ययूवखाकी फौजपर ध्यान मण किया। तीसरे पहरतक, व्यङ्गरेजी फौजने अयूबलाकी केजको मार काटकर भगा दिया। अयूब खा अपना पडाव छोडसार अपनी बची वचाई फोनके साथ हिरातको चोर • भागा। इसके उपरान्त कोई एक सालतक व्यारेजोने कन्या : स्पर अपना कवना रखा। व्यपनी योरसे शेरगली खांको रहाका हाकिम बनाया। छन्तमें सन् १८८१ ई०की २२ वी "अपरेको गरेनोंने शराली खांकी पेनशा नियत करके, उसे रतवर्ष भेज दिया और कपार व्यमौर व्यन्टररहमाके हवारी कर दिया। प्रमौर अपने तुमुकमें लिखते है, "अहातक मैं समझ सकता है, मेरा खयाल, किरियली कि कन्धारसे हटाये जानेके कारण यह थे,- (१) व्ययून खाने प्रयोजनीय तथ्यारिया हिंगतमें की थी। उसने फिर कन्धारपर चा जानेके लिये बहुत रडी फोन रक्त की धी।', पराली खामें उनका सामना करनेकी शक्ति न धौ। कारण, वह इससे पहले एकबार व्ययवखाके सामने निर्बल प्रमाणित हो चुका था। (२) कन्धारो लोग योर दुसरे मुमलमान उनके विरुद्ध थे। वह बहुत बदनाम था और सदैव वगावन चौर मारे जानेका भय उसे रहता था। (३) मैंने कन्धारक । - - J कन्धार-युद्ध। . . र अपने सामान्य एथक किये जानेका कोई पुरा नही किया घा चौर ,न सुझे उस्का पृथक किया नाना सीहत था- पर मैं उसे व्यपो पूर्चपुरुयोका निवासस्थान ममता और अपने देश के प्राचीग शासकीकी राजधानी सम्झता था। ममय व्यगरेजोने जो मुझे उसपर कावजा करने में लिये कहा, तो मैंने पच विचारकर उनकी बात मान ली। वास्तवमे कन्धार दुर्रागो बारमाहोके जमानेमे समगानन्या- -की राजधानी रह धुका था। दुर्रानी वारशाह 'वही कब- रम्य किये गये थे। यह नगर कारगन्दाप चौर तुरनावा नदियों के बीच यमा हुया है। किलाते गिलनइसे दक्षिण पश्चिम कोई ८६ नौल के पास पर है और कटेसे उत्तर पच्चिम कोद , सौ ४४ मोलके अन्तरपर । शहरकी पारी बोर मट्टी को हर माह है, जिनमें म्यान स्थ नपर गोल इन वने शहरयवाह के बाहर च.डो और गहरी साई है। गरमें कोई बीस हजार मकान हैं। चरिकाश मकान इटोसे बने हैं। ये ऐमै १, जिनपर दुनाम नानक सफेद मसाला लगा हुगा है। यह ममाला च ममता बरसे मरमर पत्थर माल्म होता है। चहमद पाहसी बहुत सबसरस है। इनका गुम्बद मोका है। कन्धर. प्रधान किरात बार गोमन तथा बोला दररेकी राह हिन्दुत्याक साथ थापार किया करता है। । - - अमौर अब्दररहमानका शासन काल। । 2 4 ३ अमीर अन्दररहमान खा वडे ही ग्रगुभवी और परि- अनी शासक थे। उन्होंने अपने परियमके वलसे अफगान- भ्यानको सुहा और शक्तिशाली देश बनाया वह खय कहा करते थे,-"यह अजीब बात है। मैं जितनी ज्यादा मिगत करता है, उतना ही, थक नानेकी जगह और ज्यादा काम करनेको जी चाहता है। मच है, कि जिस पदार्थसे भूव पूरी होती हैं, वहीं पदार्थ उसकी उन्नतिका कारण भी । - होता है।', प्रमौरके खाने पीने का कोई समय निर्दिया नही था। भोजन घण्टोंतक उनके सामने रखा रहता और वह ध्यपने काममें इतने डूबे रहते, कि मोगनको योर तनिक भी ध्यान न देते। प्रार. रात रातभर वह काम करते रहते। उन्होंने स्वय लिखा है, "रात दिन चौबीस घण्टे जो मै काम करता हैं, उसके लिये कोई समय निर्दिष्ट नही है और कोई विशेष प्रवन्ध भी नहीं है। प्रात कालसे सन्धधामयन्त और सन्धनासे प्रात कालपर्यन्त एक साधारण मजदूरको तरह परिश्रम किया करता हूं। जब भूख मालूम होती है, तो भोजन कर लेता है। कभी कभी तो यह भी भूल जाता हूं, कि व्याज मैंने भोजन किया वा नहीं। इसी तरह नव में धक नाता हूं और नोंद या जाती है, तो उस चारपाईपर सो जाता है, जिसपर बैटकर काम करता है। मुझे किसी विशेष कोठरी वा सोनेकी कोटरीका प्रयोजन नहीं होता। न गुप्तग्रह अथवा ।। किसी - । .

अमोर अब्दररहमानझा गासनकाल । A -दरबारी करेका प्रयोजन है। मेरे महलोंमें इस तरहके अनेक कमरे हैं, पर मुझे फुरसत कहा, कि एक कमरेसे दुस- रेमें भी जा सका। * * साधारणत मैं सबेरे पाच वा छ. बने सोता हू और तीसरे पहर दो बजे उठता हूं। किन्तु इतनी देरतक लगातार नही सो सकता। प्रायः प्रत्येक घण्टे पर मेरी नौद खुल जाती है। * * * तीसरे पहर कोई दो तीन वजे उठता हू और पहला काम जो होता है, वह यह है, कि हकीम और डाक्टर याकर मेरी दवाकी जरूरत देखते. है।" इसके उपरान्त धमौर कोई ६ बजे सबेरेतक काममे लगे रहा करते थे। अमीर अब्दररहमानने मिहासनारू होनेके उपरान्त हो देशके बागियों और स्वतन्त्र मनुष्योंको दवाया यौर देशमें शान्ति स्थापित की। अयूब खाकी परास्त किया और हिरा तको अफगानस्थानमें मिलाया। मन १८८५ ई की ३०वी मार्चको रूसियोंने पञ्चदेहपर कबजा कर लिया। इसपर घमौरने अगरेजोंसे कह सुनकर यफगानस्थानकी मीमा निर्धरित कराई। इसके उपरान्त व्यारेजों और अमीरने मिलकर रूससे कहा, कि भविष्यमै यदि तुम अफगानस्थानके किमी यशपर अधिकार करोगे, तो तुमसे युद्ध प्रारम्भ किया जावेगा। इसके उपरान्त यांनतक रूसने अफगानस्थानपर किसी तरहका हस्तक्षेप नहीं किया। सन् १८८६ और सन् १८८४ ई में अफगानस्था । नमें वक्षवेकी याग प्रज्वलित हुई। अमौरने व्यपने बुद्धिबलसे इसे भी शान्त की। मन् १८८८ ईमे इसहाक खाने बगावत की। अमौरने उसको भी पराक्ष किया। हजारा देशकी' 1 . .

१६८ অজানানা নিৰাৰ . । . हमारा जानियोसे चार पडी बडी लडाइयां' लडकर उन्हा भी शान्त किया। इसके उपरान्त मन् १८८६ इग्ने काण- रस्थाा विनय किया । देशमे शान्ति स्थापित करके विलायती कलोंकी सहायतासे देशमे तरह तरह कल कारखाने खोले। उन्होंने अपने नमान्मे टकमाल ,खोली, कारतूस, मारटिनो हेनरी बन्दूक, कलदार तोपों, तपश्च, इञ्जिर, बायलर, परतिक कारखाने खोये। इसके अतिरिक्त धाव कारी और नाना प्रकारके चमडे के काम, साबुन और बत्तियों बनानेका काम चौर वरदी बनानेका काम जारी किया। छापा, खाना खोला, साहित्यकी भी उन्नति की। इनके गतिरिक्त तरह तरहके छोटे बडे कारखाने खोले। अमीरने अपने नङ्गी और सुल्को विभागका भी बहुत अच्छा प्रबन्ध किया। अफगानस्थानकी फोन इतने भागोंमें विभक्त की, (10 तोपखाना, (२) रिसाला, (३) पैदल, (8) पुलिस, (५) मिलिशिया चौर (E) वलमटेर। "तोपखानेमे भीचलोडिङ्ग, निवरडेमिल्ट, चेक्य और. क्रम तोमं । घुडचा तोपखानों में मेकमिम, गर्डिनर और गेटलिन तो है। सिपाही लोमेटफर्ड, मारटिनी हेगरी, साइडर और लसर वन्डकोंसे मुमजित हैं। मवारोंके माम व्याट्रेलियाकी कडानीनोंकीसी कडाबीने हैं। यह सब शख काबुलने तयार किये जाते है। पन्दूकोंके कारतूस और तरह तरह फटने वाणे गोले भी काबुलमै प्रस्तुत किये जाते हैं। अमोरने, लाख सिपाहियोंके काम लायक यख शख तय्यार कर रखे धे।। इमो अतिरिक्त प्रत्येक अफगानस्यावासीको पन्दु अादि दे

अमीर अब्दररहमानमा शाल ।'
'रसी थी। व्यफगान फोगको रसके लिये उना तरद
करना नहीं पडता। कारण, प्रत्येक अफगान मिपाहीको ग्रस्त
शस्वी माथ साथ तीस रोटिया मिलती है एक रोटी यफ
गान सिपाहीको एक दिनकी सरादा है। इस प्रकार वह
महीनेभरकी रसद अपनी कमरमे बांधकर चलता है। अमीर
इस बातको याम थे, कि उसके माम दश लाख सिपाहियोंकी
एकत्र हो जावे। नहीं कह सकते, कि वई यमपी यह
घेष्टा कहातक पूर्ण कर सके।
-व्यमीरने स को विभागकी इतनी शाखायें स्थापित की,
समाना, अदालन, इमीनियरी, डाकळरी, सानिसम्बन्धी व्यौर
डाकरवाना। इनकी कितनी ही प्रशाखाये भो म्यापित की।
अमल में अमीरने अपने ग्राम योर प्रबन्यसे व्यफगास्थानको
बिलकप, ही बदल दिया। वह स्वय लिखते हैं,-"वर्तमान
अफगाम्यान वह अफगानस्यान नहीं है, जो पहले था। न
भविष्य कालकी पाते खनकी बात मालम शेती ।'
अमीर ग्रन्दुरहमानको यान्तरिक इप्त घी, कि उन ।
एक दून जलयमे रहे। अमीरजे जगानेमे प्रवरेज चाम्दगान
। युद्ध फिर छोनेको। ग्रामका दुई धो। अमोरको विधान घ,!
कि हमारा दून सलाउमें रहोपर योन ग्रमा सुद्धको
व्यागावानरगो। इमो खयारा उतो अपने पुत्र नरम
माको विजाया मेगा था। कि उगी वर काममा
पुरान।
स्म १८। इसीपी अपरेनो समरिने
समोर प्रब्युसमान उस समय के बडे लाट भारजित ग्राम
-
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१७०
अफगानस्थानका इतिहास ।
डफराि बहादुर तथा वर्तमाग सम्राटके भाई डिउक याफ
कनाटसे मिले थे। इस दरपारमें अमीर और बड़े लाट दोनो
शासकोंने व्यापसकी मैत्री बनाये रखनेको प्रतिज्ञा की थी।
इस दरवारको विषयमे अमीर अपनी पुस्तकने इस प्रकार लि
खते हैं, "सभी लेडी डफरिनसे मिलकर वडी प्रसन्नता हुई।
ऐमो विदुधी बुद्धिमती स्त्री मैंने कभी नहीं देखी थी। डिउका
गोर ड्वेन ब्राफ कनाटसे मिलकर मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
मैंने देखा, कि भारतीय प्रजा उनकी बहुत भक्ति करती थी।
डिजक और उचेनने प्रनाका हृदय मोह लिया है। डिसक
बडे ही दयालु, ख ऋदय, सत्यवादी औरहतेद सिपाही है।
इसलिये यह जरूरी है, कि फौन ऐसे अफ्सरको सेवा हृदयसे
करे। अपनी इस मुलाकातमे मैंने एक दुखद दृश्य देखा।
इसे देख कर मेरे हृदयमे असीम टुस हुआ। यह दृश्य पक्षा
बजे बाबों और राजोंकी दुरवस्था था। यह सबको समस्याके
पात स्तियोंकामा परिच्छद वारण किये थे। हीरे नन्दी हुई
सूइया इनके वालोंमें खुसी हुई थी। यह कानोमे वाले,
हाथीने कडे और गजेने हार तथा माले पहने थे। इन
अतिरिक्त जियो के पहानेको अन्यान्य ग्राभूषण भी पहने थे ।
इनके तारजन्दमे भी जवाहरात टके थे। नमे छोटे छोटे
'धुंघरू बधे थे, गो मैगेतक लटकते थे। यह लेग अज्ञता रस्तो
और शरीर पालने में काम डूबे हुए थे। उन्हें यह नहौ
मलम, शिममारमे क्या हो रहा है। वह पैदल भी हो
चल सकते थे। कार, इसका उभ्यास नही गौर
इससे वह गपनी प्रतिष्ठा सस्माते हैं। उन सायचमीम
-
+
--
.

अमीर हबीवुलह।
पाने गोर चस्यानौमे अतिवाहित होता है। सझे इन जमाने
इके बेचारांपर बडो दया ग्राई। इनकी प्रनायर भी दया
पाई। कारण, ऐसे लोगोंसे न्याय तथा उत्तम मामाकी क्या
प्रयाणा की जा सकती है। किन्तु भगवााकी दयासे पञ्चायो
नरेभोंकी दशा इम ममय वैमो नहीं है।
व्यमीर अन्दररहमानका जीवाचरित बहुत सारा पांडा
है। यहा म्यानाभाववश हम उरी प्रकाश नही कर मकस।
इसके अतिरिक्त उनकी नीवनी हिन्दी भाषा, भौघूर ।।
उसके पाटनेसे अमीर शामनकालमें व्यफगानम्यानमें दो रिक्षा
'क्षण परिवर्तन हुए, उनका सुविस्तृत हात माणूम घोगा।
उन्दीका ग्रामास इम ऊपर दे चुके हैं। मन् १९०१ ई०को
३ री व्यकोवरको व्याधीरातके उपरान्त काबुलमें गामवर प्रमौर
व्यन्द्ररहमानने देहत्याग किया।
अमौर हबीबुल्लह।
व्यतीरको ग्टत्यु को उपरान्त डाके व्ये टपत हवी युज
काबुलको मिहामनपर बैठे। अमीर हबोलको इम विषय
नो पार कहा है, वह नेरङ्गे अफगाामे इस प्रकार प्रक
किया गया है,-"मेरे पिताको स्टत्व का दुखमय समा
देशभर में फैल गया। उसे सुनते हो युाल मौनी और
अपसर मातमपुरमीक लिये मेरे पास याये। उापा

१७२
अफगानस्थानका इतिहास ।
J
हाल था, मानो उनका प्रिय पिता उनसे सदैवके निमित्त एषक
हो गया था। कधार और तुरकरयान इत्यादिके कुल अफसर
इस तुच्छ मनुष्य के पास ग्राये। तहस सहस मनुष्य फातिहा
पानेमें शरीक हुए। सबने विशुद्धान्त करयसे फातिहा पी।
फिर उन लोगोंने मेरी सेवाकी कसमे खाई। यह काहा,
कि हम हुनूर हीको व्यपना वादशाह जानते है। हमे इस
दुरवस्थामें न छोडिये। हमने सत्य सत्य ही यापको अपना
स्वामी माना है। हम प्रार्थना करते हैं, कि ग्राम हमपर
शासन कीजिये। हमारी नातिके शिरपर हाथ रखिये। निस
तरह अापके स्वर्गवासी पिताने ग्रहनिशि श्रम करके छापना,
करंथ पालन किया, उसी प्रकार ग्राप भी करें।
"फातिहाके उपरान्त मैंने अत्यन्त दयाके साथ उनकी कसमें
स्वीकार को। उसी दिन मेरे सब छोटे भाई याये। उन्होंने
बारी बारीसे मेरी सेवा करना स्वीकार किया।"
सन् १६०१ की छठी यकोबरको काबुलमे एक दरबार
हुआ। दरवारमें राष्यो यावत् उच्चकर्मचारी तथा सरदार
गण एकल थे। सबने मिलकर शपथपूर्वक हबीबुबह खाको
व्यपना यमीर स्वीकार किया। वों यकोवरको यमीर
हबोवृक्ष हने विधिपूर्वक शासन करनेकी शपथ की। इसके
उपरान्त मम्पूर्ण अफगानम्यानमें यह विज्ञापन प्रकाश किया
गया,-
"विज्ञापन।
"मेरे पिताका स्वर्गवास हो गया। मुझे, यानी इबीबुलह
को कल भरदारोंने इच्छापूर्वक अपना बादशाह बनाया है।

L { आमीर हबीवुनह। १७३ था। जो कमरबन्द कुरान और तलवार मनारशरीफके तबर्कने मेरे पित को दी थी, वही जाति के लोगोंने मुझे दी है। में लोगोको सूचना देता छ, कि में राजकर घटा दिया है। देशवामि योंको विश्वास रखा चाहिये, कि मैं सदेव उनके हित और उन्नतिके लिये चेठा करता रहूंगा।" अमीर हबीबजह सा ही इम ममय काउलके ग्रमौर हैं। आप अभी नौजवान है। नोजवान होमर भी बुद्धिमान,. दूरदशों और अत्यन्त स्वतन्त्र स्वभावके हैं। अमीर व्यव दररहमानी अपने जोवाकाल हीमें हनीयुमह साको शामा करने की शक्ति प्रदान की थी। एकबार हवीमह खाने अपने मिताको अनुपस्थितिमे अपनी जानतककी परवा न करके काबु लका उठना हुआ बलया दमाया उन्होंने यफ गानस्थानको और भी सजाया है। पिता अमीर यन दुरहमानने अफगाम्बिाको किननो ही जातियोंको दे वाहर निकाल दिया था, अव पुत अमीर बीबुल्लह उन्हें बुला रहे हैं। पिता ममय देशमें शान्ति गौर ऐक्यका बीज वोया गया, था, पुत्र के समय उसी वौनसे वृक्ष प्रकट हुआ और शव वह क्रमश वाना घोर फलता फूलता जाता है। वमान अमीर हबीबुलह सके मात खियां चौर कइ लडके लडकिया है। सबसे बड़े बेटेका नाम इनायतुल्लइ खां यहाँ व्यगानम्धामके युवराज नमने जाते हैं। भूतपू, यमीर घरदुररइमान से जमाने में अगरेजों और च्यफगानस्थानमे जैसी मैत्री थो, मी ही अब भी है। वर्तमान घमौरने नमानमे सिर्फ एक बात गई, दुइ है। व्यारेन N -

१७४
अफगानस्थानका इतिहास ।
महारान ग्टत अमीरको १८ लाख रुपये सालाना देते
अमीर हबीबुलहने सिंहासनारूप होनेके उपरान्तर्स
रुपये नहीं लिये है। मन् १६०५ ई के २५ वी जूनवाले पा
निचरने कहा था, "सन् १६०१ ई०के यकोवर महीनेसे व्यर
रने अपने १८ लाख रुपये सालानाको रकम नहीं वसूल
इस ममय प्रमौर सरकारी खजानेसे ६० वा ७५ ला
रुपये वसूल कर सकते हैं। व्यगरेजोंने ग्रमोरको का
लेनेके लिये वारमार कहा, किन्तु अमीरने 'याजतक का
नहो लिये है।
डेन साहबको मिशन।
यन्तन
सन् १८०४ ई.के अन्त में भारतके वडे लाट कर्ननने
माहवकी ग्रीनतामें एक मिशन काबुल भेजी थी।
मिशन काबुलमें महीगोलक पडी रही। उस समय उस
काम वारेमें तरह तरहकी अफवाहें उड़ती रहीं।
मिशन काबुलसे शिमये वापस गाई। मन् १६०५ ई० को २५०
मईको भारत सरकारने मिशनको काररवाई प्रकाश की
मिशाने और कुछ न किया, वह काबुल जाकर अमौर ग्रवदुर
रहमानके जमानेको सन्धि नई कर ग्राई।
असीरको बादशाहकी उपाधि दे व्याई। मिशाने निस
सन्धिदारा प्राचीन मन्वि नई की, उमको नकल इस प्रकार
साथ साह

डेन साहबकी मिशन। गानस्थान और उसके अधीन राज्यके खतन्त्र बादशाह श्रीमान मिराजुलमिलतुद्दीन अमौर इवीबुल्लहखा एक योर है और प्रशंसनीय दृटिश सरकारके प्रतिनिधि तथा प्राक्तिशालिनी भारत सरकारके देशी मिकत्तर मानीय मिटर लूई डा सौ, एस, आई दूभरी कोर। बादशाह सलामत स्वीकार करते है, कि मेरे परलोकगत श्रीमान पिताने, जिनकी यात्मापर भगवा- नने दया की धौर भगवान जिनकी कनमें प्रकाश प्रदान करे, नो सन्धि प्रशमगीय टिश गवरमेण्टसे की थी, उसकी ग्रम- लियत और उसके सहायता सम्बन्धी विषयों के अनुसार मैंने काम किया,मैं करता हू और कहगा। मैं अपने किसी कार्यसे व्यथवा किसी वादेसे सन्धिशियमोंको भगा करू गा। नीय एई विलियम डेन माइव स्वीकार करते हैं, कि प्रशंम- नीय वृटिश सरकारने वनमान बादशाह सिराजुलमिलतुद्दीनके टत प्रतिष्ठित पिता श्रीमान जियाउलमिल्लतुद्दीनसे, भगवानी जिाकी यात्माको शान्ति दो और जिनकी कान में रोशनी होवे, स्वदेश और विदेशके सम्बन्धमें वा सहायताले मसन्धमें जो मन्यि की थी, मैं उसकी पुरि करता हू और लिखता है, कि दृटिश सरकार उम मन्विक विरह कभी यौर किसी तरहमे कोई काम न करेगी। "यह सन्धि मङ्गलबार १३२३ हिजरीकी १४ वी महरंसल हरामको वा सन १९०५ ई. के मार्च महीनेमें लिखी और दस्त खत की गई। जिस समय व्यङ्गरेनोंकी मिशन काबुल में थी, उसी समय व्यमीरके डे लडके इनायतुल्लाह खां भारत ग्राये थे। . ।

१७६ अफगानस्थानका इतिहास - - ग्रन्यान्य ग्रमोरोको तरह वर्तमान अमोर हबीबुल्लहो भी कावुल होको अपनी राजधानी बनाया है। काबुल जलाला , घादसे १०३ मील, गगनीस ८८ और कन्धारसे ३ सौ १८ मौलके फासलेपर है। काबुल और लोगार नदीके सजम्पर बहुत बड़े मैदानके पश्चिमीय किनारेपर बसा हुगा है। नदिनीपर दो पुल पड़े हुए हैं। यह नगर ससद्वक्षसे ६ हजार ३ सो ६ फुटकी अ चाईपर वसा हुगा है। चारो और पर्वतमाना है। पर्वतमाला चौर शहरपनाहके बीच एक तङ्ग जगह बची हुई है। पहाडियोंपर भी बुर्जटार दीवारें बनाई गई थों। किन्तु मरम्मा न होनेको वनइसे टूट गई है। काबुलनगर पूर्वसे पश्चिम कोई एक मील लखा । और उत्तरसे दक्षिण कोई अाध मील चौडा है। इसकी गिर्द मट्टीकी शहरपनाह है, कि तु खन्टक नही। गरको पूर्व योर एक खन्दक है । सन्दकमी दूसरी छोर यक पर्व पर वालाहिसार दुर्ग व्यवस्थित है। पञ्चकने छालु जसपर शाही महत वन है और एक बाजार भी है। नगरमे कोई एक ख मनुष्य वसो है। अगर नीचे ही कापुन नदी बहती है। वर्तमान व्यमीर के जमानेमे यह ागर बहुत रौनकमा । वनमा अमौरकी प्रशासनकारामें ग्रन्यान्य गगेको उनति होने साथ साथ गणारे नगरको भी खानी उनति हुई है। तोगार घाटी पार करनेपर एक खुले मैदाामे यह पाचीन गिर मिलता है। इमजे पार्श्व में एक सुह दुर्ग हे व्योर गरको गिर्द पाहापनाह तथा सन्दक । -- अफगानस्थान, रूस और अगरेज। अमीर अन्ररहमााने लिखा है, इसके लोग हिन्दु म्य नको सावरका भटार समझत हैं। मैंने प्राय ल्मी मिमा हियोंको इम ग्राशासे उछलसे कूदते देखा है, कि उन्हें एक दिन इस धन धान्यसे परिपूर्ण देशके लुटनेका समय मियेगा। वह इस दिनकी बाट जोह रहे हैं। रूसी केवल वाही जोह रहे हैं, वरच भारतपर चणाई करनेकी तय्यारीने लगे हुए है। उन्होंने व्यफगानको सोमापर्यन्त अपनो रेल का ली, वह यक्ष नदीपर पुल वाघनेकी चिन्तामे है और उन्होंने अपनी मध्य एशियाको फोन वारा यारम्भ की है। रूम भारताक्रमण करनेमें छतकार्य हो, वा चाहे असतकाण, किन्तु लक्षणसे जान पडता है, कि वह पूरी तरह तय्यार होने के उपरान्त ही भारतवर्षपर याक्रमण कर मरुता है। इधर अगरेज महाराज भी रूससे सामा करनेके लिये पूर्णरूपसे तय्यार है योर तय्यार होते जाते हैं। उसकी सरहद्दो रले बन चुकी हैं। ऐमो रेलका एक छोर कान्वा. रको पडोमतक पहुच चुका है। दूसरा छोर खेवर दररेके पाम पहुच गया है और सवर है, कि शीघ्र ही खैबर दररे. तक पहुच जावेगा। भारतवर्ष मे लोम बन्दूकफे नये कार- माने खुल रहे है। भारतको फोन भी बाजाइनानेकी खबर है। हटिश सरकारने वर्तमाा वडे लाट कर्जा वहादुरके परत फेको उतजी परवा न करके वर्तमान नङ्गी लाट किचनर ।

अफगानस्थानका इतिहास।
1
स
अन्यान्य व्यमौरोंको तरह वर्तमान अमोर हबीबुलइने भी ।
काबुल होको अपनी राजधानी बनाया है। काबुल जलाला
बादसे १०३ मील, गगनीसे ८८ और कन्धारसे ३ सौ १८
मौलके फासलेघर है। काबुल और लोगार नदीक सङ्गमपर
बहुत बड़े मैदानके पश्चिमीय किनारेपर बसा हुगा
नहिनोपर दो पुल पड़े हुए हैं। यह नगर ससनवक्षसे
६ हजार ३ सो ६ फुटकी ऊ चाईपर वमा हुया है। चारो
योर पर्वतमाना है। पर्वतमाला चौर शहरपनाह बीच
एक तग जगह मची हुइ है। पहाडियोंपर भी बुर्मदार
दीवारें बनाई गई धों। किन्तु मरम्मा न होनेकी वजह से टट
गई है
काबुलनगर पूर्बसे पश्चिम कोई एक मील लषा
और उत्तरसे दक्षिण कोई व्याध मील चौडा है। इसकी
गिर्द मट्टीकी शहरपनाह है, किन्तु खन्दा ही। नगरकी
पूर्व व्योर एक खन्दा है । बन्दकाको दूसरी ओर एक पर्व पर
वालाहिसार दुर्ग ग्रपस्थित है। पञ्चको कालु गमपर पही
महल बने है और एक वागार भी है। नगरमे कोई एक
लस भगुप्य वसो है। गरके नीचे ही काम नदी बहती
है। वर्तमान मोरके जमानेमे यह नगर बहुत रौनकर है ।
वर्तमान मौरके पासनकालमें व्यन्यान्य नगरोंकी उमति होने के
साथ माघ गजाो नगरकी भी खामी ' उन्नति हुई है। लोगार
घाटी पार वारनेपर एक खुजे मैदानें यह प्राचीन पर
मिलता है। इमने पार्थ में 'रक मुंबदु योर गिरको
गिर्द प्रधरपनाह तथा सन्दक है।
-
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अफगानस्थान, रूस और अगरेज। १ अमीर अब्द रहमानने लिखा है, "स्वके लोग हिटु नको कुवरका भार समझते हैं। मैंने प्राव हमी मिपा हवोंको इस याशासे उछलते कूदते देखा है, कि उन्हें एक इन इम धन धान्यसे परिपूर्ण देशके लुटनेका समय मिलेगा। ह इस शिकी वाट नोह रहे है। रूसी नवल वा नहीं मोह रहे हैं, वरच भारतवर्षपर वााई करनेकी तय्यारीमें लगे हुए है। उन्होने अफगानकी सोमापच्यन्त अपनी रेल वना तो, वह यक्ष नदीमर पुल बांधनेकी चिन्तामे है और उन्होंने घपनी मध्य एशियाकी फौज बहाना व्यारम्भ की है। हम गरताक्रमण करनेमें छतकार्य हो, वा चाहे अक्षतका, किन्तु अक्षणसे नान पडता है, कि वह पूरी तरह तय्यार होनेने उपरान्त ही भारतवर्षपर याक्रमण कर सकता है। इधर अदरेन महारान भी रूससे सामना करनेके लिये पूर्णल्पसे तय्यार है चोर तयार होते जाते है। उनकी माहदो रेले बन चुकी हैं। ऐसी रेलका एक छोर कन्या रको पडोमतक पहुच चुका है। दूसरा छोर खेवर दररेके पास पहुच गया है और सपर है, कि शीघ्र ही खवर दररे- नक पहुच जावेगा। भारतवर्ष मे तोप बन्दूकः नवे कार- ने खुल रहे हैं। भारतकी फौज भी वाड जाने की सबर । अटिश सरकारने वर्तमा। बडे लाट कर्जन वहादुरके लेकी उनी परवा न करने वर्तमान नङ्गी - - । 7 ।

अफगानस्थानका इतिहास
--
-
बहादुरको पौनी शक्ति वाण दी है। जङ्गी लाट इस शक्तिद्वारा
भारतरक्षाका मनमाना प्रबन्ध करना चाहते है
व्यङ्गरेज महाराज भी निश्चिन्त नहीं है। वह रसके रोक ।
नेकी पूरी तय्यारोमे लगे हुए हैं।
यह कहनेका प्रयोजन नही है, कि अफगानस्थान भारत
वर्ष का माटक है। इमी राहसे रूम भारतवर्ष ने घुस सकता
है। इस समय अफगानस्थान खतन्त होनपर भी अगरेजोका ,
मिल गौर व्यारेजो प्रभावमे है। जिस समय रूमग्रङ्ग
रेज युद्ध होगा, उस समय भी च्यफगानस्थानको दोगे एक
शक्तिके साथ रहना पड़ेगा। किन्तु प्रश्न यह है, कि ऐसा
ममय उपधित होनेपर अफगागस्थान किसका साथ दे सकता ।
₹! इस गळ प्रश्नका उनर देनेसे पहले हमे यह दिखाना
उचित ३, कि रूस और अरमकी देशिक नीति ज्या
और अफगानस्यान रूससे कोगना लाभ उठा सकता है और
गरेनोसे कौरमा। रूसकी नौति शनाम यह है, कि वह
उचित वा गनुचित रीतिमे, सन्ति वा मैलोसे,-निम युक्ति
उसे सुविधा होती है, रशियाई शक्तियोंको नर और निल
कर रहा है। हारको यान्तरिक पहा यह है, किम,
अफान या गोर इगन यह नो शक्तिमा पर शे गाय ।
यदि है तो रूसो अधोग होकर रहे। कितने ही लग
कहते हैं, कि हम जिस देश को जीतता है, उस देशके रहने
वाजों होको वहाका हाकिम बताना है। इस बातो प्रायमें.
मुखारे गौर खान की बात उपस्थित करते हैं। किन्त ध्याा
पूर्वक देखा जवे, तो उत दो दशके शामक गाममात लिये
।

अफगानस्थान, रूस और अङ्गारेज।
+
-
सद और
खतन है।
इन देशामे न्याय प्रकृतिका काम देशी शाम के
हाथमे रसा गया है मही, कि तु रागार वटल कार का
काम रूसी कर्मचारी ही करते हैं। इस प्रकार रूम विजित
शक्तिको प्रकारान्तर । निर्जत करने बिलाल हो अपने
काम कर लेता है।
किनु परेज महारान राशियाई शक्तियोंके साथ ऐमा
व्यवहार नहीं करते। वह सदन उनके साथ मितभाव
रखते हैं और यह चाहते हैं, कि उनकी मिन लिया
मु वनो रहे। अमीर अब्दररहमान कहते हैं, किन्तु
इम पालिसौमे व्यस्थायी परिवर्तन हो जाया करते ।
अगरेजो मालिसी रूसी पालिसीकी तरह
स्थायी' नही। निम दलका राप्य रहता है, उसीवी शक्ति
मानी जाती है। उनके मन्त्री उमी मलाहको वानुमार काम
करने है। कि तु एक दाका यसतियार हिटते ही दृमरे
दनका जखतियार होता है। पहले दल विचारको अरेचा
दृसरे बलमा विचार निजकुल हो विनिन होता है। इमलिये
यह नहीं कहा ना नका, शिगवरमेण्टनी अमुक अमुक मालि
मी मशायी है। इन वाल्में कोई मन्देह नही, कि बहुत
दिनोंसे मेंटरटेनकी यह पालिसी है, कि रशियाई रूम धा
भारतवर्ष में जो समलमानी राज्य है, वह रचित रहे और
। उासी स्वतन्त्रता न होने पाये। इनमें कइ मन्दह नही,
गि विलायतमें कभी लिनरत दलका प्राधय होता हे और
कभी कामरवटिका। घो दल प्रमाा होगा, वह अपनी
गीति अवलमा कारता है। दोनोरलोंकी नातिने वा यन्तर

अफगानस्थानका इतिहास
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है। किन्तु यह निश्चय है, कि अगरेन रूसकी तरह रशियाई
शक्तियोकी स्वतन्त्रता छीनना नहीं चाहते।
इसलिये यद्यपि दोबार गरेज अफगान युद्ध हो चुका
है, यद्यपि च्यफगानस्थानकी कितनी ही नातिया आगरेजोंस श्या
करती है, यदापि कितने ही राजनीति विशारटोका कहना है,
कि व्यारेजों यौर अफगानोमें कभी मैत्री होगी, फिर भी,
स्वतन्त्रताप्रेमी अफगानस्थान अपनी स्वतन्त्रता स्थापित रखने के
ध्यानसे ग्रगरज होके साथ रहेगा।
किन्तु इसके साथ साथ यमौर अन्दुररमानको यह बात
भी देखना चाहिये, यदि दुर्भाग्यवश अगरेज अपनी
पालिनी बदल दे योर अफगानस्थानपर अधिकार करने वा
उनको खतन्त्रतामे बाधा पहुंचाने के अभिप्रायसे ज्यादती करेंगे,
तो अफगान जातिको विवश होकर यडरेनोंसे लडना पड़ेगा।
वह यदि पराजित हुए तो रूससे मिल जावेंगे। कारण,
हम इङ्गल एट की अपेक्षा यफगानस्थाग के व्यत्यत समीप हैं।
इमलिये रूम अफगानस्थानकी सहायता कर सकता है।"
नो हो, समझदारोंका कहना है, कि ग्रेटरटेन व्याा
स्थानसे यथाशक्य मैत्री स्थापित रखेगा। उपर अफगानस्थानको
भी वही उचित है, कि वह पिछली बातें भुलाकर कायमनो
बायसे अगोणोकी मैत्री कायम रखनेको पेश करे। इससे
अगरेजोंका तो भला होवे होगा, किन्तु अफगानम्यानका
बहुत भला होगा। वह बरवाट हो जाओसे बचा रहेगा।
.

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अफगानस्थानका भविष्य ।
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अब हम च्यफगाम्यान विषयमें यत्तीस भविष्यवाणियां
नेरने व्यफगानसे उन्हत करके यह पुस्तक समाप्त करते हैं,
(१) रूस और इलय में किसी न किसी ममय बहुत
बडा युद्ध होगा।
(२) रूम यदि अफगानम्यानमें दासिल हो गया, तो
ग्रगान उमको जबरदस ममझेंगे और उसकी छायामें रह
कर भारतवर्ष लूटने जायेंगे।
(३) यव जो अफगान व्यापममें लगे, तो उस युद्धका फल
यह होगा, कि उधर हम अपने निकटस्थ स्था। जैसे हिरात,
बलख इत्यादिपर अधिकार कर देगा और इधर अगरेज
अपने निकटस्थ स्थान कन्वार, जलालाबाद प्रतिपर कबजा
कर लगे।
(8) प्रभी कुछ दिनोंतक रङ्गलया यौर रूसमें युद्ध र
होगा। काबुग्नमें इमारत कायम रसी जावेगी और वही
काबुल इन दोनो बादशाहों के बीच में व्याड बना रहेगा।
(५) फिर यह होगा, कि अमीर काबुलकी बदौलत दोनो
बादशाहों में झगडा हो जावेगा यौर तब रूस अगरेज युद्ध
थारम्भ होगा।
(६) भारतवर्य बहुत दिनोतक सरचित रहेगा।

१८२
अफगानस्थानका इतिहास ।
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(७ जो गवरत्त प्रमाणित होगा, अफगान उसीका साथ
दगे। उमौका प्रभाव अफगानस्यागपर स्थापित होगा। नो
दोगा, उमका साथ छोड देंगे। यह ऐतिहासिक मत्य है।
(८) कमी एक न एक दिन अफगानस्थान अफगानोके लिये
न रहेगा और रहेगा, तो उस समय, जब व्यफगान किसी
जबरदस्तको छाया मान ले।।
(E) अफगान भिन्न धर्म यौर मिन्न जातिके लोगोका
शामन कभी स्वीकार न करेंगे। जो जबरदस्ती में साध
शामग करेगा, उसे साजिश करके परेशान कर देंगे। जिसको
वह स्वय बुगकर प्रामक बावे गे, उमको भी कर पहु धावेंगे।
(१०) उनके देशुने रूस वा इङ्गलण्ड जो बादशाह दाखिल
होगा, वह अपनी जबरदस्त फौजको वन हसे दाखिल हो
जावे, किन्नु वाफगान उससे मिलकर वही करेंगे जो पहले
“कर से गाये हैं
(१) जिस बादशाहो पाम अधिक फोग होगी, वही
गफगागस्यागका शामन कर सकेगा।
(१२) अमीर दोस्तमुहम्मदके घरामें इमारत रदेशी
गोर उन्होंने मन्तान के जमानेमे इङ्गल और रूममे युद्ध होगा।
(१३) रूस पोर इकल की रेल मिल जावगी और यह
मनगाव जो गवर, रह न नावगा।
(18) अमीर व्यबदुररहमाने यममाप्यागमे जो सभ्यता
फेनाइहै, यह एक मायने मिट जागी।
(१५) पहले रूम गफगानस्थानको छेडार हारे गा धार
अनमै गफगानम्यागको परास्त करगा।

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अफगानस्थानका भविष्य ।
१८३
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(१६) रूम को देश लेगा, उसे न छोड़ेगा।
(१७) एकाएक दिन रूसो दूत भी काबुनमें रियुक्त होगा।
(१८) रूम वाभिया और पामीरसे दाखिल होगा और
जय दान्य पारी दुमरे बादशादोकी फोन याई, तो उसकी
भी चल पायेगी।
(१६) कोइ नियमपत्र कायम न रहेगा।
(२०) एक जमानेमे अफगानस्वानले हिस्से हो जायेंगे,
तो हम गोरलम मन्धि होगी।
(1) हिरात इरानको न मिलग।
(२०) जबतक और जिम हमियतसे काबुलमें इमारत
होगा योन रुपये देते रहेगे।
(२३) काफरस्थान व्यौर हगारा एक गिअफगानस्याको
यधीनता स्वतन्त्र हो जायगा।
रूम चा फगा• म्यान विजय नरकेविहाँ शान्ति स्थापित
कर सकता है।
(२५) लण्ड यदि फिर कभी अफगाम्यान विजय
। करेगा तो वापन गायेगा।
iseो “ग गाको मसता चौर सानिशमें किमी
तर का परिवर्तन न होगा।
(६७ साफगानी स्मिक उत्तेजना वाभी कम होगी।
(२) जर हव अफगानम्याामे यावेगा, वो पेशारका
दावा करेगा।
(E) रुम नाङ्गीन युद्धमें अटकपर घमसान युद्ध होगा।
है

फगानस्थानका इतिहास।
(३०) रूस-अगरेज युद्धने ममय मध्यरशियाकी कमी
प्रजा यलवा करेगी।
(३१) भारतवर्ष में अलबसे बगावत न होगी।
(३२) भारतवर्ष में व्यय जो बडे लाट होंगे, वह वही होंगे,
को सीमाममन्धी बातें जानते होग।'
इति।

वो बस एण्ड कम्पनीका
हाथी मारका सालसा।
हिन्दुस्थानी लोग योवन ही में वह हो जाते हैं
बत्तीस वर्षकी समरसे पहले ही कितनोंका अङ्ग
शिथिल हो जाता है। बयालिस वर्षकी उमरमें
कितने ही सचमुच बूढे हो जाते हैं। वी• बस
एण्ड कम्पनीका मालसा पीनेसे आदमी सहनमें बुढा
म होगा। शरीर चुस्त, रहेगा। जो साठ वर्षको
पड़े हैं कमर झुक गई है और मास लटक गया है
तीन महीने यह वी• बसु एण्ड कम्पनीका सालसा
पौके देखें शरीरमें - नई जवानीका उभार होगा,
बलबीर्य बटेगा, नए आदमी बन जावेगे। पारेको
घाव, चर्मरोग, सुस्ती, खान गर्मीके घाव, वातरोग
जोडोका दर्द, अशोका दर्द, बवासीर, भगन्दर इत्यादि
माना रोग आराम होते हैं।
नम्बर
पोभी मूद्ध डामा पेकिन
१ न. आध पावकी भीगे । 15
२ न. पावभरकी भौगे ,
३ ने डेट पावकी गोपौ १३,
W
मिखनेका पता-बी. बस एण्ड कम्पनी,
२६ नम्बर हेरिसन रोड, कलक ।
.

विजया वटिका।
अनेक प्रसिद्ध डालर कविराज वैदा करते हैं
ज्वरादि रोगोंकी ऐसी महौषध अभौतक और कभी
ईजाद नहीं हुई। ज्वर होनेका लक्षण आगया है
भरीर हाथ पैरोमें
हड़फूटन
होने लगी है पाखोमें
गर्मी आ गई है-ऐसे मौकेपर तीन घण्टे पौई
एक एक कारके दो विनया वटिका मात्र खा लेने
प्वर पानेका भय नहीं रहेगा। विजया वटिका
तन्दुरुस्तीको हालतमें खाई जाती है। सहन
शरीरमें खानेसे वल बढता है कान्ति बढ़ती है तन्दु-
रुस्तीगे खानेसे और रोगोंसे जकड़ जानेका भय नहीं
रहता।
विजया बटिकाका मूल्यादि।
बटिकाको संस्था मूश हाकमहसूल पैकिङ्ग पो.पो.
१
।
२० सरिया ३६
U
३१. उविया ५४
१॥
बहुत बडी-रहस्थीके कामको सक्यिा अर्थात
१न. एविया 188
3
मिलनेका पता, बी. वसु• एण्ड कम्पनी,
७ नम्बर हेरिसन रोड, कलकत्ता
ग.विया १६

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Premiya Ratna Mala�

Author
Chakarwati Shri Natwar
Title
Premiya Ratna Mala�
File name
Premiya Ratna Mala�
Text
OCR done
Citation
1892
Published
2011/01
Publisher
Bhawani Charan Datt Street Press Calcutta
Language
Sanskrit
Pages
186
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546318
Barcode
4990010024805.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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