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Lokokti Aur Muhavara

Swaroop Vishleshan · 2011/03

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लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप-विश्लेषण डॉ. सूर्यप्रकाश

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लोकोक्ति और
मुटाव
स्वरूप-विश्लेषण
डॉ.सूर्यप्रकाश
प्रकाशक
लोक प्रकाशन, नई दिल्ली-110009

लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप-विश्लेपण
० डॉ० सूर्यप्रकाश
लोक प्रकाशन
39-डी, पुरानी गुप्ता कॉलोनी
नई दिल्ली-110009
Lokokti Aur Muhayata : Swaroop-Vishleshag
लोक प्रकाशन नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित एव हरिकृष्ण प्रिंटर्स,
शाहदरा दिल्ली-32 मे मुद्रित । आवरण सज्जा श्री चेतनदास तथा
आवरण मुद्रण गणेश प्रेस, गाधीनगर दिल्ली-31 द्वारा।
प्रथम, 1990
सस्कण
मूल्य
6000 रुपये
by Dr. Surya Prakash

मातृदेव-पितृदेव को सश्रद्ध...

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विषय-अनुक्रम
लोकोक्ति स्वरूप विश्लेषण/17-54
लोकोक्ति विमर्श
लोकोक्ति के समानायक शब्द
लोकोक्ति की परिभाषा एव रूप-सरचना सक्षिप्तता, सारगभितता सप्राणता,
लोकप्रियता मानवीय अनुभव एव उनकी सत्यता, लोकोक्ति की कुछ अन्य विशेष
ताए एव परिभाषाए । लोकोक्ति और लौकिक न्याय । लोकोक्ति और कहावत ।
लोकोक्ति और पहेली। लोकोक्ति और अलकार, लोकोक्ति और प्राज्ञोक्ति अथवा
सूक्ति।
मुहावरा स्वरूप विश्लेषण/55-96
मुहावरे की परिभाषा एव रूप-सरचना
मुहावरा एव रोजमर्रा (बोलचाल)
मुहावरा एव सयुक्त क्रिया
लोकोक्ति एव मुहावरे मे साम्य वैषम्य
लोकोक्ति एव मुहावरे का क्षेत्र
लोकोक्ति एव मुहावरे का महत्व
सदभ सकेत/97 114

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पूर्व पीठिका मानव-जीवन के सभी पक्षो को सूत्र रूप मे व्याख्यायित करने वाले, जन-जन के कण्ठ पर विरजित लोकोक्तिया और मुहावरे लोक-जीवन के न्यायशास्त्र, लोकाचरण की आचार- सहिता, लोक-मान्यताओ के मानक कोश तथा मानव-समाज की मनीषा है, जिनका चमत्कार पूर्ण प्रयोग अभिव्यक्ति-कौशल के रूप मे परम्परामुक्त रूप से होता है । लोकोक्तियो एव मुहावरो का प्रयोग प्राय दो क्षेत्रो मे स्वीकृत है—क जन साधारण, ख साहित्य । इसमे मानव-जीवन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद, ईर्ष्या-लोभ, रुचि-अरुचि, प्रेम- घृणा, राग-द्वेष, समर्थन-विरोध, सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति, मूर्खतापूर्ण-विद्वत्ता- पूर्ण व्यापारो के अतिरिक्त रीति-रिवाज, मनन-चिन्तन, आचार-विचार, तथा आर्थिक- धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, सास्कृतिक जीवन आदि की सफल अभिव्यजना होती है। मानव-जीवन से सम्बन्ध रखने वाला शायद ही कोई ऐसा विभाग हो जो इनके क्षेत्र मे न आया हो । यही कारण है कि लोकोक्तिया एव मुहावरे वाणी के शृगार वनकर जहा लोक-साहित्य मे अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हुए हैं, वहां अभिजात अथवा शिष्ट साहित्य मे भी साहित्यकारो द्वारा सम्पूजित हुए हैं । भावपूर्ण प्रसगो की उद्भावना के अवसर पर वाग्मितायुक्त इन भगिमापूर्ण, विदग्ध, भावप्रेरित एव भावानुमोदित लोकोक्तियो एव मुहावरो के प्रयोग से साहित्य मे जो सौन्दर्य प्रस्फुटित हुआ है, वह सर्वथा आकर्षक एव विलक्षण होने के कारण अधिकाधिक प्रभावशाली बनकर सहृदय के चित्त को चमत्कृत कर देता है । वस्तुत लोकोक्तिया व मुहावरे साहित्य-रत्नाकर की बहुमूल्य रत्नावलि हैं, जिनसे सुसज्जित होकर साहित्य अपूर्व वैभव-सम्पन्न बन जाता 'लोकोक्ति और मुहावरा. स्वरूप-विश्लेषण' नामक इस पुस्तक में विभिन्न कोशकारो एव विद्वानो-विशेषत. सम्बन्धित विषय पर शोध-कार्य करने वाले शोध-कर्ताओ की एतद्विपयक मान्यताओ का समुचित परिशीलन कर लोकोक्ति एध मुहावरे के स्वरूप को स्पष्ट किया गया है। इनमे प्रथम लोकोक्ति शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए लोकोक्ति के समानार्थक प्रयुक्त शब्दो, विभिन्न परिभाषाओ तथा प्रमुख तत्त्वो का विवेचन किया गया है । लोकोक्ति को कतिपय विशेषताओ-सक्षिप्तता, सारगर्भितता, सप्राणता एव लोकप्रियता मे मूल रूप मे ट्रेंच ने प्रथम तीन गुणो को और उसके बाद हैस्टिग्स ने चतुर्थ तत्त्व के रूप मे लोकप्रियता को अनिवार्य तत्व स्वीकार किया है। इन तत्वो के अतिरिक्त भानवीय अनुभव और उनकी सत्यता, प्रसगानुकूल उपयुक्तता, सरलता, उपयोगिता, तुक-साम्य आदि विशेषताओ पर विचार किया गया है। लोकोक्ति के समानान्तर प्रयुक्त शब्दो मे-लौकिक न्याय, कहावत, प्रहेलिका, अलकार तथा प्राज्ञोक्ति के साथ साम्य- वपम्य प्रतिपादित कर लोकोक्ति के स्वतन्त्र अस्तित्व की पहचान करायी है। 'मुहावरा' अरबी भाषा का शब्द है जो फारसो के माध्यम से हिन्दी मे आया है । 'गया सुल्लुगात', 'फरहग आसफिया' तथा 'लुगात किश्वरी' आदि फारसी कोशो के अतिरिक्त अनेक हिन्दी-अग्रेजी कोशकारी तथा अन्य विद्वानो के मतो की समीक्षा कर इसको परिभाषाबद्ध किया गया है । मुहावरे का प्रहेलिका, सुभापित, लौकिक न्याय, दृष्टकूट आदि के साथ भी पर्याप्त साम्य-वैषम्य है। इसी प्रकार कुछ चलते क्रियापदो को मुहावरा समझने का भ्रम हो जाता है, अत युग्मक क्रिया अथवा सयुक्त क्रिया के साथ तुलना करके इस भ्रम का निवारण किया गया है। लोकोक्ति एव मुहावरे मे पर्याप्त साम्य होने पर भी अत्यधिक वैषम्य है। रूपात्मकता, अर्थ-विधान, प्रयोजन एव प्रयोग आदि के निकषण द्वारा इनमे परस्पर पार्थक्य स्थापित किया गया है। अन्तत इसके अनन्तर इनके क्षेत्र एव महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है । साहित्य के उभय क्षेत्रो, लोकसाहित्य व अभिजातसाहित्य मे अपना वर्चस्व स्थापित करने मे सफल लोकोक्ति और मुहावरे का महत्त्वाकन भी क्षेत्र की भाति द्विविध रूपो मे किया गया है- क लोक-वाणी के शृगार के रूप मे, इनकी लोक-ख्याति के आधार पर । ख काव्य-भाषा के अलकार के रूप मे, इनकी साहित्यिक उपयोगिता के आधार पर । अन्त मे मैं उन सभी विद्वानो एव शोधकर्ताओ के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करना अपना कर्तव्य समझता हू जिनकी ज्ञान-राशि का उपयोग इस पुस्तक को तैयार करने मे किया गया है। इस पुस्तक के लेखन-मुद्रण मे श्रुटियो का रह जाना स्वाभाविक है। यह भी सम्भव है कि इस विषय पर कार्य करने वाले कुछ बोध-कर्ताओ के नाम सूचनादि के अभाव में छूट गए हो। ऐसी स्थिति मे मेरा निवेदन है कि इसे मेरी असमर्थता व अनवधानता समझकर भविष्य मे इसके सशोधन-परिवर्धन के लिए तत्सम्बन्धी सूचना व सुझाव देकर उपत करेंगे। इस पुस्तक मे स्थापित तथ्यो से यदि किसी विद्वद्वर्य की स्थापना को अन- जाने ढेम पहुची हो, तो उसके लिए क्षमा चाहूगा । हिन्दी जगत् मे लोकोक्ति और मुहावरे को मान्य स्वरूप प्रदान करने मे यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी और इसका समुचित आदर होगा-इस आशा के साथ यह पुस्तक पाठको की सेवा मे प्रस्तुत है। हिन्दी-विभाग, हाराज शॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-110307 -सूर्यप्रकादा -- आमुख डॉ. सूर्यप्रकाश कृत 'लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप-विश्लेषण' अपने ढंग का एक मौलिक एव अनूठा कार्य है । लेखक ने पहले 'लोकोक्ति' के स्वरूप पर विचार किया है । इस विवेचन को कई आयामो मे विभक्त किया गया है। जैसे-सर्वप्रथम ! 'लोकोक्ति' शब्द की विशद व्याख्या 2. लोकोक्ति के लक्षण निर्धारक तत्त्व 3 समान विधाओ से अन्तर। 'लोकोक्ति-विमर्श' के रूप मे लेखक ने विशेष सदाशयता से काम लिया है। लोकोक्ति' शब्द' 'लोक+उक्ति' इन दो शब्दो से मिलकर बना है। इस सम्बन्ध में प्रस्तुत ग्रन्थ मे सर्वप्रथम सस्कृत लोकोक्ति सग्रह' मे व्यक्त 'लोकोक्ति' का शाब्दिक अर्थ प्रस्तुत किया है-लोकोक्ति : लोक कल्याणाय उक्ति, लोक प्रचलिता उक्ति। इस कथन मे समस्त पदमूलक लोकोक्ति शब्द का विभक्तिमूलक अर्थ व्यक्त किया गया है। प्रथम अर्थ के अनुसार 'लोकोक्ति' शब्द स्पष्ट रूप से कथन की उपयोगिता पर प्रकाश डालता है और द्वित्तीय अर्थ में उस उपयोगिता का परिणाम स्वीकृत किया गया है। इस विमर्श का आशय यह है कि जो उक्ति लोक-कल्याणकारक होगी वही अपनी उपयोगिता के कारण लोक मे प्रसिद्ध होगी। यहाँ ये दोनो ही विवक्षाए एक-दूसरे की पूरक हैं। इनमे चोली- दामन का साथ है । ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहि- यत भिन्न न मिन्न' की ध्वनि से प्रपूरित हैं। लेखक ने अपने इस ग्रन्थ मे 'लोक तथा 'उक्ति' का भी विशद विवेचन किया है । 'लीक' शब्द का सामान्यत: समाज, या लोग अर्थ बहुचचित है । 'लोकोक्ति' के सदर्भ मे यही अर्थ ग्रहण किया जाता है । "उक्ति' के लिए 'क्थन' शब्द का व्यवहार निरन्तर होता है। और लोकोक्ति के सदर्भ मे यही अर्थ सर्वग्राह्य है। फिर भी अध्यवसाय सूझ-बूझ तथा विशुद्धता की दृष्टि से यह विवेचन उपयुक्त है। शाब्दिक विमर्श के पश्चात् लेखक ने लोकोक्ति के पारिभाषिक तत्त्वो का विश्लेषण किया है । इस विश्लेषण मे लेखक की सग्रहात्मक दृष्टि प्रस्फुटित होती दिखाई देती है । और लेखक ने लोकोक्ति के स्वरूप-निर्धारक तत्त्वो का एक अच्छा कोश तैयार कर दिया है। लोकोक्ति का लक्षण निर्धारित करते समय लेखक ने सर्वप्रथम कुछ विद्वानो के मतो का उल्लेख किया है । ये सभी मत यूरोपीय भाषाओ के हिन्दी-रूपान्तर के रूप मे प्रस्तुत किये गए है । कतिपय उदाहरणो को यहा उद्धृत करना समीचीन है--- "ससार की समस्त सद्भावनाए लोकोक्तियो मे निहित होती हैं।" "लोकोक्तिया अनुभवी की सतति हैं।" "लोकोक्तिया ज्ञान का पथ हैं।"

"प्रत्येक लोकोक्ति सत्य होती है।" "लोकवाणी ईश्वरीय वाणी होती है।" इन मतो मे यह स्पष्ट है कि विद्वानो ने 'लोकोक्ति' के तत्त्वो का 'स्वान्तः सुखाय' निरूपण किया है । परन्तु इस पृथक् व्यावृति मे ही लोकोक्ति का समष्टि-विधान निहित है । ये सभी मत बिखरे हुए मोती हैं जिन्हे एकत्र करके क्रमबद्ध- रूप मे पिरोना ही तो लेखक का कार्य है । उपर्युक्त परिभाषाओ मे लोकोक्ति के तात्त्विक स्वरूप का प्रतिपादन भिन्न-भिन्न विशेषताओ के आधार पर किया गया है । लेखक का यह मत गहन एवं सचिन्त्य है, क्योकि इन सभी परिभाषाओ मे लोकोक्ति के तत्त्वो का विशद निरूपण है। कुछ विश्लेषणात्मक तत्त्व-शृखला इस प्रकार हैं । 1 लोकोक्ति मे सार्वभौम सत्य विद्यमान रहता है। 2 अनुभव या लोकानुभव लोकोक्ति मात्र का अनिवार्य तत्त्व है। 3. लोकोक्ति 'ज्ञान' का साधन है । वह आप्त वाक्य प्रकरण भी होती है। इन सभी परिभाषाओ को मिलाकर लोकोक्ति की परिभाषा करें तो वह इस प्रकार होगी-- "लोकोक्ति-लोकानुभव-प्रसूत लोक जीवन से सम्बद्ध सार्वभौम सत्य पर आधारित याप्त याक्य या आप्तवाक्यवत् होती है।" इस प्रकार लोकोक्ति के निम्नलिखित तत्त्वो पा निर्धारण होता है। 1 सार्वभौम सत्य 2 लोकानुभव 3 आप्तता। प्रस्तुत ग्रन्थ मे आगे चलकर लोकोक्ति के तत्त्वो पर भी विचार किया गया है और विद्वानो मे प्रचलित मतो का आधार लेकर आगे बढते हुए इन तत्त्वो का उल्लेख भी किया है- "सक्षिप्तता, सारगर्भितता, सप्राणता, लोकप्रियता, प्रसगानुकूल उपयुक्तता, पुष्टि अथवा विरोध, सरलता, उपयोगिता, पूर्णवाक्य या वाक्य समूह, तुक्साम्य, अप्रस्तुत प्रयोग, यपिश्य, प्रकृति का गम्भीर निरीक्षण, घटना या कहानी से सम्बद्धता, समाज-नीति, धर्म, ध्ययहार, शिक्षा, उपदेश, विश्वास, रीति, शान आदि की विद्यमानता।" इन तत्वों से देखने से तो ऐमा लगता है जैसे ब्रह्माड का समस्त ज्ञान, विज्ञान शिक्षा नीति और धर्मादि लोयोक्ति ये वामनापार मे ही समाहित हो गये हैं । यह यथार्थ भी है क्योकि सोकोक्ति मा विषय-क्षेत्र बहा ही विस्तृत है। परन्तु इन विषयात्मक तत्त्वो गो ग्रहण करने पा आपार एक ही है-सोवानुभव अर्थात् सोवस्यानुभव, क्योकि मोरोति या विषय यही बनता है जो 'लोवानुभव'पर आधारित हो-"उक्ति कागद शो मेसो नही आगो की देसी हो।" अत सोगनुभव ही लोकोक्ति या प्रधान विषय है और उगी। "अक्षयवट वे यासाने उदर यी भाति" साकार विश्वका समस्त आगर ममाति है। इस प्रसार मोरोस्ति विषय-तत्त्व दे रूप में समग्र रूप से लोकानु भय कोही पहारिया जाता है। मेरार ने यहा मोरोक्ति के विषय-तत्व के रूप में माती पारणामाबन्दीत एप पपस्थित परने में सफलता प्राप्त की है। मोमोक्तिरे परों में गणिता, गारमितता तथा मप्राणता भी मोरोपितये अनिवार्य तत्व हैं। पोरना भी मौरोक्तिमा महावपूर्ण तत्व है, परन्तु मेरी मम्मति में यह रिवार्य नहीं है, क्योंकि हिन्दी साहित्य मे असख्य उक्तिया ऐसी हैं जिनमे लोकोक्ति के सभी अनिवार्य गुण विद्यमान हैं परन्तु वे प्रचलित नहीं हैं । लोकप्रियता के सम्बन्ध मे मत इस प्रकार व्यक्त किया गया है- "लोकोक्तिया लोक प्रचलित होती हैं। विना लोक-प्रसिद्धि और लोक-मान्यता के कोई भी उक्ति चाहे वह सारगभित हो या सक्षिप्त हो, लोकोक्ति हो ही नहीं सकती। जो उक्तिया लोक प्रचलित नहीं होती, वे प्राज्ञोक्तिया आदि कही जाती हैं क्योकि वे सामान्य लोकवाणी से दूर रहती हैं।" यह मत "सूरसाहित्य मे प्रयुक्त लोकोक्तियो का अध्ययन" नामक अन्ध से उद्धृत किया गया है जिसके लेखक डॉ० लक्ष्मीनारायण शर्मा हैं । इसके आगे जो मत है वह लेखक का स्वय का ज्ञात होता है इसका भी अवलोकन यहा वाछनीय हैं- "लोकमान्य एव लोकविश्रुत होकर ही लोकोक्ति पूर्णता को प्राप्त करती है। लोकोक्ति के अन्य तत्त्वो मे सक्षिप्तता-सारगर्भितता आदि की भूमिका, इसके निर्माण मे गौण रूप में होती है, लोक स्वीकृति से ही लोकोक्ति का आत्म तत्त्व सिद्ध होता है।" इस प्रकार लेखक ने लोकप्रियता, को ही लोकोक्ति का एक मात्र अनिवार्य तत्त्व स्वीकार किया है। इस धारणा से ज्ञात होता है कि स्वय लेखक तथा सदभित डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा लोकप्रियता को प्राय आवश्यक मानकर चले हैं। परन्तु देखना यह है कि सूर साहित्य हो या अष्टछाप, तुलसी-साहित्य हो या कबीर-वाणी, जहा भी सक्षिप्त, सरल, सारगभित, सजीव, लोकानुभव पर आधारित, लोक जीवन से सम्बद्ध सार्वभौम सत्य को उद्घाटित करने वाली, महान् पुरुषो की अमरवाणी-रूप उपयोगी और प्रेरणा- दायक उक्तिया हमे साहित्य में मिलती हैं उनमें किंचित्मात्र ही लोक प्रचलित होती है, परन्तु फिर भी वे लोकोक्तिया । उन्हें लोकोक्तियो को कोटि से नहीं निकाला जा सकता-जैसे- "तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आखो की देखी!" "हिन्दू कहै मोहि राम पियारा तुरक कह रहमाना । कबीर लडि-लडि दोऊ मरे-भरम न काहू जाना ।।" "धकरी पाती खाति है ताकी काढी खाल । जे नर बकरी खात है तिनके कोन हवाल ।।" "प्रमुजी मेरे औगुन चित न धरो।" "सूरदास तीन्यो नहिं उपजें धनिया, धान, कुम्हेडौ।" "ऊयो मन माने की बात।" "धीरज धरम मित्र अरु नारी । आपद काल परखि यह चारी ॥' "दुष्ट सग नहिं देइ विधाता॥" "सठ सुपरहि सत सगति पाई।" "दया धरम को मूल है, पाप मूल अभिमान । तुलसी दया न छोडिये जब लगि घट मे प्रान ।।" - उपर्युक्त सभी उक्तिया साहित्य की हैं और जन सामान्य मे प्रचलित भी नहीं हैं। इनका प्रयोग केवल साहित्य के विद्यार्थी और अध्यापक ही उद्धरण के रूप मे करते हैं, परन्तु इन्हें लोकोक्ति के रूप मे मानने से भी कोई इनकार नहीं कर सकता। इसका कारण क्या है ? यही कि इन उक्तियो मे लोकोक्ति से सभी अनिवार्य तत्त्व, जैसे- सक्षिप्तता, सारगर्भिता, सजीवता, सरलता, उपयोगिता, प्रेरणादायकता, लोकानुभव तथा लोकजीवन से सम्बद्ध सत्य विद्यमान हैं । अतः लोकोक्ति का एक मात्र तत्त्व लोक प्रचलन ही नही है। लोकोक्ति का कलेवर तो उसके उपर्युक्त तत्त्वो के सयुग से ही निर्मित होता है-चाहे वह उक्ति लोक-प्रचलित हो या नहीं। इससे लोकोक्ति के स्वरूप पर कोई प्रभाव नही पडता। लोक की दृष्टि मे आते ही जो उक्ति सुगन्ध और शौर्य की भाति तुरन्त समाज के मन-मानस मे विहरित होने लगती है, वही लोकोक्ति होती है । 'तुक साम्य' लोकोक्ति का कोई अपरिहार्य तत्त्व नहीं है। यह तो सरलता का ही एक अशमात्र है। प्रसगानुकूल उपयुक्तता उसकी उपयोगिता मे ही निहित रहती है । अप्रस्तुत विधान, उक्ति वैचित्र्य सजीवता के ही द्योतक हैं । इस प्रकार लोकोक्ति के स्वरूप निर्माण मे जो अनिवार्य तत्त्व विद्यमान रहते हैं-वे इस प्रकार हैं- लोक-जीवन से सम्बद्ध सत्य, लोकोक्ति का विषय होता है। लोकानुभव विषय को स्वीकार करने का साधन है । सारभितता, सजीवता उपयोगिता और प्रेरणादायकता लोकोक्ति के गुण हैं । पुष्टि और विरोध लोकोक्ति की प्रवृत्ति है । सक्षिप्तता इसको शैली और सरलता लोक-प्रसिद्धि का मूल आधार है। इस प्रकार जहा ये सभी तत्त्व समवेत रूप मे उपस्थित हो जाते हैं वही लोकोक्ति का निर्माण हो जाता है चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात। 1 । लोकोक्ति के सम्बन्ध मे एक यह धारणा भी अकाट्य रूप में व्याप्त है कि लोकोक्ति विना लेखक को रचना होती है अथवा इसके निर्माता का पता नही होता। लेखक ने भी यह तत्त्व अपने विवेचन मे लिया है। ट्रेंच का यह कहना सर्वथा अनुचित है कि लोकोक्तियो का लेखक ज्ञात ही नहीं होता । लेखक ने इस दृष्टि से इनके दो विभाग किए हैं-ज्ञातनामा तथा अज्ञातनामा । ज्ञातनामा लोकोक्तियो के रचयिता का नाम प्रयोक्ता को ज्ञात होता है । अनेक साहित्यकारो द्वारा प्रयुक्त लोकोक्तिया उन्ही के नाम से ज्ञात होती हैं । लेखक का यह मत सर्वथा स्वीकार्य है। अन्त मे प्रसगानुकूल लोकोक्ति के स्वरूप-विवेचन-सम्बन्धी तीसरे चरण पर भी विचार कर लेना चाहिए, जहा लेखक ने लोकोक्ति की समानान्तर विधामओ से उसकी समता- विषमता का प्रश्न उठाया है- सर्वप्रथम लोकोक्ति और लौकिक न्याय के सम्बन्ध मे विचार किया गया है। लौकिक न्याय कोई पृथक् से विधा नही है। वह तो एक विषय है जो लोकानुभव-प्रसूत होता है । अत लौकिक न्याय अर्थात् लोक जीवन से सम्बद्ध सत्य जो लोकानुभव-प्रसूत होता है-लौकिक न्याय कहलाता है और यह लोकोक्ति का विषय हो सकता है। यदि सोविय न्याय (लोर-सत्य) यो सक्षिप्तता आदि सभी तत्त्वो के साथ प्रयुक्त किया जाता है तो वह भी लोकोक्ति की वोटि मे आ जाता है। प. रामनरेश त्रिपाठी ने लौकिक न्याय और लोकोक्ति मे जो अभिन्नता स्वीकार की है, उसका आधार वे ही सूत्र या उक्तिया हैं जिनमे लोकोक्ति के सभी अनिवार्य तत्व विद्यमान है और 'लौकिक सत्य' जिसका विषय है । लेखक ने इस सम्बन्ध मे अपना सुस्पष्ट मत ही व्यक्त किया है । अत यहा प्रणेता की दृष्टि वस्तुस्थिति का सम्यक् अवलोकन करती हुई चली है। लोकोक्ति और कहावत प्रसग मे भी लेखक ने पूर्ण विवेकशीलता का परिचय दिया है। विभिन्न विद्वानो के मत-मतान्तरो का विश्लेषण करते हुए लेखक इस निश्चय पर पहुंचने में सफल हुआ है कि-"लोकोक्ति कहावत का समानार्थक शब्द है।" यह धारणा सही है और श्लाघ्य भी। लोकोक्ति और पहेली ऐसी विधाए हैं जो प्रचलन मे अपनी पूर्ण समानता रखती है । यहा तक कि पहेली लोकोक्ति से अधिक प्रचलित देखी जाती है, परन्तु सक्षिप्तता, सार गभितता, मार्मिकता, प्रेरणादायकता आदि गुणो का अभाव रहने के कारण पहेली को लोकोक्ति नहीं माना जा सकता। लेखक ने इस तथ्य को पूर्ण स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त किया है. लोकोक्ति पहेली से भिन्न विधा है। लेखक ने लोकोक्ति एव अलकारो के साम्य-वैषम्य के प्रश्न को भी उठाया है। परन्तु अलकार कोई विधा नहीं है, वह तो काव्य-सौन्दयं के उद्भावक साधन है और लोकोक्ति, लोकप्रेरणा पर आधारित होने के कारण साध्य है। अत लोकोक्तियो मे अधिक प्रयोग उन्ही अलकारी का मिलता है, जो लोक जीवन से सम्बद्ध सत्य को उद्- घाटित करके लोक-प्रेरणा का आधार बन जाते हैं-इस प्रकार के अलकारो मे--अस- गति, विरोधाभास, व्यतिरेक, अर्थान्तरन्यास, विभावना विशेषोक्ति-तुल्ययोगिता, दीपक, दृष्टान्त, उदाहरण, प्रतिवस्तूपमा, निदर्शना तथा अन्योक्ति आदि को लिया जा सकता है । किसी-किसी विद्वान् ने 'लोकोक्ति अलकार' का भी उल्लेख किया है परन्तु यह उपयुक्त नहीं, भ्रामक ही है। लेखक ने इस स्थिति को भी स्पष्ट कर दिया है कि लोकोक्तिमात्र को एक मलकार विधा के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अन्त मे लेखक ने लोकोक्ति एव प्राज्ञोक्ति अथवा सूक्ति के साम्य-वैषम्य पर विचार करते हुए यह मत स्थिर किया है- "निष्कर्षत कहा जा सकता है कि सूक्तियो (प्राज्ञोक्तियो) एव लोकोक्तियो मे भिन्नता का आधार प्रचलन है। प्राज्ञोक्तिया जहा प्राज्ञो द्वारा निर्मित होकर शास्त्रो अथवा विद्वद् समुदाय मे ही सम्मानित रहती हैं, वहा लोकोक्तियो लोकप्रिय होकर देश- देशान्तर तक भ्रमण करती हुई सावंदेशिक सम्पत्ति बन जाती हैं।" मेरी सम्मति मे लोकोक्तियो और सूक्तियो सास्य-वैषम्य की विवक्षा करते हुए यदि सूक्ष्म एव गहन दृष्टि से देखा जाय तो लोकोक्ति और सूक्ति में कोई भेद नहीं है जिस प्रकार लोकोक्ति और कहावत मे कोई भेद नहीं है। केवल प्रचलन के आधार पर ही लोकोक्ति और सूक्ति को पृथक् नही किया जा सकता, यदि रिसी उक्ति में लोकोक्ति के निर्धारित अनिवार्य तत्त्व विद्यमान है । जिस प्रकार मानव-समाज एक है, चाहे उसकी जातिया और स्थितिया भिन्न हैं, उसी प्रकार लोकोक्ति→कहावत--सूक्ति भी एक ही है। इनमें जो भिन्नता आभासित होती है वह परिहार्य है, अपरिहार्य नही ।

लोकोक्ति के स्वरूप पर विशद् रूप से विचार कर लेने के पश्चात् लेखक ने मुहावरे के स्वरूप पर भी विचार किया है। मुहावरे का स्वरूप विशेष विवादास्पद नही रहा है। कहीं-कही यह देखने मे आता है कि 'लोकोक्ति कोशो' मे मुहावरे को और 'मुहावरा कोशो' मे लोकोक्तियो को रख दिया गया है। यहा इस भ्रान्ति का निराकरण भी आवश्यक है। मुहावरा एक वाक्याश होता है जो 'ना' प्रत्यय से जुड़ा रहता है । मुहावरे मे लक्षणा और व्यजना अनिवार्य रूप से विद्यमान रहती है मुहावरे का विषय लोकोक्ति की भाति व्यापक न होकर केवल कोई भाव होता है, जिसे व्यग्य कहते हैं। मुहावरे मे इस व्यग्य का चमत्कारी रूप सजोकर रक्खा जाता है। इस प्रकार मुहावरा चमत्कार, सजीवता, रोचकता, मार्मिकता, गभीरता, सक्षिप्तता एव प्रेरणादायकता मे लोकोक्ति के समान ही होता है, परन्तु वह लोकोक्ति की भाति पूणवाक्य न होकर वाक्याश ही होता है। प्रस्तुत पुस्तक मे लेखक ने मुहावरे के स्वरूप को निर्धारित करने के लिये देश और विदेश के सभी विद्वानो के मतो को प्रस्तुत किया है । इस दृष्टि से लेखक का प्रयत्न अवश्य ही सराहनीय है। प्रस्तुत ग्रन्थ मे लोकोक्ति एव मुहावरे के क्षेत्र निर्धारण का प्रयास भी किया गया है । वस्तुस्थिति यह है कि लोकोक्ति का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है और मुहावरे का सीमित । लोकोक्ति का विषय-इतिहास-पुराण, ज्ञान विज्ञान, प्रकृति-सामाजिक व्यवहार और क्रियाए, सभ्यता तथा सस्कृति के सभी प्रधान रूपो जैसे-धर्म दर्शन, जीवन दर्शन, नीति आदि सभी विषयो का लोकानुभव-प्रसूत रूप पुष्टि और विरोध के रूप मे सन्निहित रहता है । मुहावरे का क्षेत्र प्राणियो के अगादि तथा क्रिया भावादि तक ही सीमित रहता है। अत क्षेत्र की दृष्टि से लोकोक्ति मुहावरे से बहुत आगे हैं। इस क्षेत्र सम्बन्धी विवेचन को हम लोकोक्तियो और मुहावरो के वर्गीकरण के रूप मे ले सकते हैं। अन्त मे लोकोक्ति एव मुहावरे के महत्त्व पर प्रकाश भी डाला गया है । लोकोक्तिया समाज के हाईकोर्ट की नजीरें होती हैं और मुहावरे विष मे बुझे हुए ध्यग्यवाण, जो अपनी सफल चोटो से हृदय को झकझोर देते हैं। महत्ता को दृष्टि से लोकोक्तिया और मुहावरे प्राय समान ही हैं। इनके सम्बन्ध म "को बड छोट कहत अपरापू" की ही स्थिति है । अत विवेचनोपरात यह सिद्ध हो जाता है कि लोकोक्तिया और मुहावरे केवल ला-साहित्य की ही विधाए नही हैं अपितु सत्साहित्य की भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विधाए हैं क्योकि सत्माहित्य म भी जो जीवन-ज्याति प्रज्वलित दिखाई देती है, उनका स्रोत ये तारोक्तिया और मुहावरे ही हैं। निपत यह पहने में मुझे अत्यधिक हर्ष हो रहा है कि लेखक ने लोकोक्ति और मुहावरो पे स्वरूप विश्लेषण में जो विवेकशीलता प्रदर्शित की है, उससे अध्येता-यगं कोइन विधाओ का सम्पद परिचय मिल सकेगा। मेरा विश्वास है कि यह कृति इस विषय पी ए महत्त्वपूर्ण कही ये रूप मे विद्वसमाज मे अवश्य सभादत होगी। अन्त में में इस पुस्तर के प्रशन पर मालिप कामनाओ के साथ लेखक को साधुवाद देता है। परोरीमन पवित्र, दिल्ली विश्वविद्यालय दिस्मी-110007 एम० ए० (हिन्दी-सस्कृत), पी-एच०डी०, डी० सिट मदनलाल दार्मा हिदी विभाग लोकोक्ति : स्वरूप-विवेचन लोकोयित-विमर्श 'लोकोक्ति' शब्द में मध्यम पदलोपी समास है, यथा लोक कल्याणाय उक्ति लोकोक्तिः अथवा लोक प्रचलिता उक्ति लोवाक्ति ।। 'लोक' शब्द नानार्थक है। यह अनेक- विध निष्पन्न हुआ है। 'लोक' धातु आत्मनेपदी है जिसका वर्तमानकालिक शब्दरूप संस्कृत में लोकते बनता है । स्वार्थ मे णिव होने पर 'लोक' धातु का परस्मैपद मे लोक- यति शब्दरूप निष्पन्न होता है। उक्त शन्दरपो के अतिरिक्त भावार्थ मे आत्मनेपद मे लोक्यते शब्द भी बनता है। लोक शब्द का अर्थ स्पष्ट करने के लिए 'लोक्यतेऽसौ इति लोक' अर्थात् दिखाई देने वाले के लिए लोक को सज्ञा से अभिहित किया गया है। 'लोक' शब्द से घञ् प्रत्यय करने पर 'लोक' शब्द की निष्पत्ति होती है। 'कविकल्पद्रुम' मे 'लोक' धातु र ईक्ष अर्थ में प्रयुक्त हुई है जिसका अर्थ दर्शन है तथा एक अन्य पुरुष एकवचन रूप लाफ्ते होता है । स्पष्ट है कि 'लोक' शब्द मा अर्थ है देखने वाला । अत वह समस्त जन समुदाय जा इस कार्य को करता है, लोक रहलाता है। 'उक्ति' शब्द वच व्यक्तायां वाचि धातु में उत्तरकृदन्त क्तिन् प्रत्यय के योग से व को उ सम्प्रसारण होने पर निप्पन्न हुआ है। इसके दो अर्थ स्वीकृत हैं--(1) भाषा तथा (2) स्थन । इन दोनों में द्वितीय अर्थ ही प्राय विश्रुत है। इस प्रकार लोकोक्ति का शाब्दिक अर्थ हुआ लोक प्रसिद्ध अथवा लोक-प्रचलित उक्ति । शब्दकोपो मे 'लोक' के अनेक अर्थ प्राप्त होते हैं। इनमे से साधारणत दो अर्थ विशेष प्रचलित हैं एक तो वह जिससे इहलोक, परलोक अथवा त्रिलोक का ज्ञान होता है। वर्तमान प्रसग मे यह अर्थ अभीष्ट नहीं । दूसरा अर्थ लोक का होता है जन-सामान्य । इसी का हिन्दी रूप लोग है। इसी अर्थ का वाचक 'लोक' शब्द साहित्य का विशेषण है, किन्तु इतने से लोक का वह अभिप्राय प्रबट नहीं हो पाता, जो साहित्य के विशेषण के रूप मे वह प्रदान करता है। अमरकोपकार ने लोक का विवेचन भूतल जगत् तथा अधोलोक के अन्तर्गत किया । नानार्थ वर्ग के अन्तर्गत लोक के भवन तथा जन दो अर्थ किए हैं। मुवनार्थक लोक की सख्या परिगणन की दृष्टि से अमरकोपकार ने तीन तथा सात लोकी की चर्चा की है । शब्दकल्पद्रुम मे भी सप्तलोको की चर्चा है। हिन्दी शब्दसागर मे लोक . 18 लोकोक्ति और मुहायरा . स्वरूप विश्लेषण पशब्द के 15 अर्थ किए गए हैं--स्थान-विशेष, ससार, निवास स्थान, प्रदेश, लोग, समाज, प्राणी, यश, दृश्य, प्रकाश, 6 या 14 को सख्या,निज स्वरूप, फज, भोग्य वस्तु तपा नेत्र ।' हिन्दी शब्दसागर ने इन अर्थों का उल्लेख करते हुए यद्यपि यह भी बताने का प्रयत्न किया है कि इनका उल्लेख अमुक-अमुक स्थलो पर हुआ है, तथापि इनमे अनेक अर्थ लोक मान्य न हो सके। मुख्यतया पूर्व विवेचित दो अर्थ ही मान्य हुए हैं। प्रयोग की दृष्टि मे 'लोक' शब्द अत्यन्त प्राचीन है । ऋग्वेद मे अनेक स्थलो पर इसका प्रयोग हुआ है । वहा यह शब्द जन और स्थान के समानार्थी भाव का द्योतक है। ऋग्वेद के एक सूक्त मे व्यवहृत लोक शब्द स्पष्टत' उभय अर्थछविया प्रस्तुत करता है- नाभ्या आसीदन्तरिक्ष शोरो धो सम्वतंत् । पदम्या भूमिदिश श्रोप्रात्तथा लोका अफल्पयत् ॥ यहा सृष्ट्युत्पत्ति के वर्णन मे लोक शब्द स्थान तथा जीवो या वाचक है । वैदिक साहित्य मे अन्यत्र इस शब्द का प्रयोग ब्राह्मण, उपनिषद् आदि ग्रन्थों में हुआ है । सप्तलोको की पौराणिक परिकल्पना का आधार भी वैदिक साहित्य ही है । उपनिपदो मे दो लोक माने गए हैं-इहलोक और परलोक । निरुवत मे तीन लोको का उल्लेख मिलता है-पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा लोक । इनका दूसरा नाम-भू, मव , स्व है। ये महाव्याहृति कहलाते हैं । इन तीन महाव्याहृतियो की भाति चार और शब्द है-~-'मह', 'जन', तप', 'सत्यम्' । शब्द तीन महाव्याहृतियो के साथ मिलकर सप्त व्याहृति कहलाते हैं । इन सातो महा- व्याहृतियो के नाम से पौराणिक काल मे सात लोको की कल्पना हुई-भूर्लोक, भुवर्लोक, आदि । फिर इनके साथ पाताल-जिनके नाम अतल, नितल, वितल, गभस्तिमान, तल सुतल और पाताल हैं और सब मिलकर चौदह लोक किए गए। पुराणो मे पातालो के नाम मे मतभेद है । पद्म पुराण मे इनके नाम अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल, पाताल तथा विष्णु पुराण मे मतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल सुतल और पाताल इनके नाम लिखे गए हैं । इस प्रकार चौदह लोक या भुवन माने गए हैं । मुवनार्थक लोक शब्द पौराणिक काल मे वैदिक साहित्य से प्रेरणा ग्रहण कर चौदह भवनो के रूप मे परिनिष्ठित हो गया । वैदिक साहित्य के अतिरिक्त लौकिक साहित्य के अन्तर्गत गीता, महाभारत आदि ग्रन्थो मे प्रचुर रूप मे यह शब्द प्रयुक्त हुआ है । अशोक के शिलालेख मे भी इसके प्रयोग से समग्र प्रजा का भाव प्रकट है-- अनुवत्तरासव लोकहिताय गिरिनार फरयत हि मे सर्वलोकहितम् ।। 'लोन' शब्द को अद्यावधि विविध व्याख्याए प्रस्तुत की गयी हैं। 'लोक' शब्द का समानार्थी आग्ल भाषा का शब्द 'फोक' प्रचलित है। फोक शब्द ऐंग्लो सेक्सन शब्द Folc का विक सित रूप है । जर्मन मे यह Volk हो गया है। यूरोपीय विद्वानो मे सर्वप्रथम जान आग्रेन ने सन् 1687 ई० मे सर्वसाधारण जनता के रीति-रिवाज, रहन-सहन, अविश्वास आदि के अध्ययन का प्रारम्भ किया। डब्ल्यू जे० थामस ने सन् 1846 ई० मे प्रथम बार 'फोक- लोर' पान्द का प्रयोग किया। उन्होने इस शब्द को सार्वजनिक पुरावृत्त (Popularan: tuquities) के लिए रचना की थी। आगे जाकर यह शब्द प्रयोग और व्यापकता के ', । - लोकोक्ति : स्वरूप-विवेचन : 19 कारण जातिवोधक शब्द की तरह चल पड़ा। उनका मत है कि प्राचीन असभ्य और पिछड़ी जातियो वे अन्धविश्वास, उनके रीति-रिवाज तथा उनकी प्रथाए आदि के अव- शिष्ट अश ही आगे सभ्य कहलाने वाली जातियो मे प्राप्त होते हैं। डॉ० बकर ने एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के फोक डासिंग निबन्ध में 'फोक' शब्द को व्याख्या करते हुए कहा है कि एक आदिम जाति मे वे समस्त जन फोक होते हैं, जिनके द्वारा वह समुदाय निर्मित हुआ है और व्यापक अर्थ म 'फाक' सभ्य राष्ट्र को समग्र जन- सख्या के लिए व्यवहृत हो सकता है। फिर भी पाश्चात्य प्रकार को सभ्यता की दृष्टि में 'फोक' का सामान्यत. प्रयोग (फोकलोर और फोरम्यूजिक आदि समस्त पदो में) सकुचित अर्थ मे केवल उन्ही के लिए आता है जो नागरिक सस्कृति की धाराओ तथा विधिवत् शिक्षा से बाहर हैं, जो निरक्षर हैं अथवा अल्पसाक्षर हैं तथा ग्राम और जनपदो मे निवास करते हैं। हिन्दी मे 'फोक' का पर्याय ग्राम, जन और लोक के रूप मे प्राप्त है। प०रामनरेश त्रिपाठी फोक' शब्द के समानार्थी 'ग्राम' शब्द पर ही अधिक आग्रह प्रकट करते हैं, किन्तु उनका यह विचार बहुत वंज्ञानिक स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योकि 'ग्राम' शब्द 'लोक' की विशाल भावना को सकुचित रूप मे प्रस्तुत करता है। इसके विपरीत 'जन' पाब्द मे सभी प्राणियो का समावेश किया जा सकता है और इनसे सम्बन्धित जनपद, जनप्रवाह आदि प्रचलित शब्द होने पर भी इसका समावेश 'लोक' शब्द की व्यापकता मे हो जाता है । डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी भी इसके व्यापक अर्थ को ग्रहण करने के पक्ष में हैं । जनपद पत्रिका में वे लिखते हैं कि 'लोक' शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम नहीं, बल्कि नगरी और गांवो में फैली हुई समूची जनता है, जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथिया नहीं हैं। इस प्रकार डॉ. द्विवेदी 'लोक' शब्द का सकुचित अर्थ ग्रहण न करके इसकी व्यापक व्याख्या ही प्रस्तुत करते हैं । डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल सम्मेलन पत्रिका के लोक-सस्कृति विशेषाक मे 'लोक' शब्द के विषय में अपने विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं लोक हमारे जीवन का समुद्र है, उसमे भूत-भविष्य-वर्तमान सभी कुछ सचित रहता है । वह राष्ट्र का अभर स्वरूप है । कृत्स्न ज्ञान और सम्पूर्ण अध्ययन में सब शास्त्रो का पर्यवसान है । अर्वाचीन मे मानव के लिए लोक सर्वोच्च प्रजापति है। लोक और लोक की धात्री सर्वभूतरता पृथ्वी और लोक का व्यक्त रूप मानव यही हमारे नए जीवन का अध्यात्म शास्त्र है। इसका कल्याण हमारी मुक्ति का द्वार और निमण का नवीन रूप है। लोव, पृथ्वी और त्रिलोकी मे जीवन का कल्याणात्मक रूप है।15 डॉ अग्रवाल जीवन मे लोक का अतिशय महत्त्व स्थापित करते हैं । लोक से यहां उनका अभिप्राय भूतल तथा भूलोक मे निवास करने वाले लोगो से है। लोर-विषयक अपने-अपने मन्तव्यो को अनेक विद्वानो ने प्रसगानुसार प्रस्तुत किया है, जिनके आधार पर सहज ही यह स्वीकार किया जा सकता है कि आग्ल भाषा का 'फोक' शब्द 'लोक' का पर्याय होकर भी इस व्यापक अर्थ की व्यजना नहीं करता, जिस अर्थ मे लोक अभिव्यजित होता है।

20 . लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण 'लोक' एव उक्ति' शब्द के विवेचन के अनन्तर विवेच्य विषय लोकोक्ति के स्वरूप प्रतिपादन का काय सुगम हो जाता है । शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से लोकोक्ति का अभिप्राय है जन सामान्य मे प्रचलित उक्ति, किन्तु प्रस्तुत अर्थ मे अतिव्याप्ति दोष स्पष्ट है, क्योकि जन सामान्य की प्रत्येक उक्ति लोकोक्ति की अधिकारिणी नही हो सकती। अतएव लोकोक्ति का तात्पर्य लोक प्रसिद्ध प्रत्येक उक्ति न होकर विशिष्ट उक्ति ही होगा। लोकोक्ति के स्वरूप के स्पष्टीकरण के लिए उसके पर्यायो, परिभाषाओ एव प्रमुख तत्त्वो आदि पर विचार करना आवश्यक है। 2 3 लोकोक्ति के समानार्थक शब्द 'लोकोक्ति' लोक मात्र की सम्पत्ति है। स्वदेशी भाषाओ के अतिरिक्त विश्व को विभिन्न भाषाओ मे इसके पर्याय रूप मे शब्द प्रयुक्त हैं। लोकोक्ति का समानार्थक आम्ल भापा का शब्द 'Proverb' है। इसका सम्बन्ध फ्रेंच के Proverbe' तथा इटली व लैटिन के 'Proverbho' से है। इनके अतिरिक्त लैटिन भाषा मे लोकोक्ति के अर्थ मे प्रयुक्त Proverbum (Pro, verbum, word) शब्द आलकारिक उक्ति का अर्थ देता है। विश्व की विभिन्न भाषाओ मे लोकोक्ति के अर्थ मे प्रचलित शब्दो का सग्रह फर एस० जी० चैम्पियन नामक पाश्चात्य विद्वान् ने उनका शाब्दिक अर्थ भी दिया है। उनको पुस्तक 'रेसियल प्रावर्स' मे उल्लिखित लोकोक्ति के समानार्थक शब्दो का सक्षिप्त विवरण इस प्रकार है- Arabic- 'Mathal' or 'tamthai' Bularian & Sebro-Croatian' as in Russian 'Poslovitsa' Chinese-- 'YEN' or 'yen yu' 'Su hua' (common talk) or 'Su yu' (common saying) Czech- 'Prislovı & 'Porekadlo' & 'rikadlo' (a saying) Estonian 'Vana Sona' (old word) Finnish- 'Sanalasku' (Dropping of a word) Gorgia— 'Andaza' & Igavi (Example, Form) German 'Sprich Worter' (A Figure of Speech) Greck 'Paroemian' (by word) Hausar- *Karim Manga' (by-play with words) Hebro- *Mashal' (as Arabic, viz—to make like) Hungarian Koz-Mondas' (common sayıog) Ice Landic- 'oroskvior' Irish Scan Fhucal' (an old word) 4 5 6 7 8 9 10 12 13 15. Italian 'Proverbio' (as in Latin) 16. Jabo-- 'da' 'te' kps' (old matter take). 17. Japanese 'Koto-wazn' (wordsthal work) 18. Latin- 'Proverbium' (Figurative Expression) 19 Lattish- 'Sakamvards' (Repeatable or sayable) 20. Lithuanian 'Partarle' (to say to utter) 21. Malay- 'Umpama-an' (Likeness, similarity resemblence) 22. Maori--- 'Whaka tauki' (Similar-simlitude) 23. Persian- 'Amsal' (to sesemble or to reproduce) 24. Polish- 'Przyslowic' (saying, Expression or a by.word) 25. Ronga- 'Siga' (current saying) 26 Russian Poslovitsa' (Proverbial Expression> 27. Siam 'Suphasit' (Skt.--subhasit, Pali-Subhasito---well spoken word) 28 Spanish Proverbo' (an apothegm, a maxim ~~not a proverb) 29 Spanish-~ "Refram' (Referendo) 30. Swedish Ordspark' (ord-nord, sprak-language) 31. Swahil 'Methah', 'Methili', 'Mush' (from the Arabic) (Allegory or simihtude) 32. Turkish- Atlarsozu(Grand father's saying or Elder's word etc.) 33 Welsh-- 'Diharreb' or 'Dihaereb' (A saying, to affirm or assert) 34 Yoruba 'Owe' (Riddless or play upon words).17 उपर्युक्त शब्दो मे लैटिन, इटैलियन तथा स्पेनिश के शब्दो मे समानता है। हिबू व अरबी भापाओ के शब्दों में भी पर्याप्त साम्य है । स्याम का 'सुफासिट' शब्द संस्कृत के 'सुभापित' शब्द के सन्निकट है । मलय भाषा का 'उम्पमान' शब्द भी इसी प्रकार सस्कृत के 'उपमा शब्द के पर्याप्त निकट है । इन विदेशी भाषाओ के शब्दो का प्रयोग कही लोकोक्ति के रूप मे हुआ है, तो वही नीति-कथा, सादृश्य या उपमा आदि के अर्थ मे । इससे यह सिद्ध होता है कि लोकोक्ति के अर्थ मे अथवा उसके निकटवर्ती उपमा मादि अन्य अर्थ के रूप में प्रयुक्त होकर ये शब्द विभिन्न भाषाओं में लोकोक्ति के लिए ही ग्रहण किए गए हैं। लोकोक्ति किसी भाषा, देश व काल तक सीमित न होकर 'सावं. कालिक' सार्वदेशिक एव सार्वभाषिक सम्पत्ति है।

22 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेपण भारतीय भाषाओ मे लोकोक्ति के अनेक पर्याय मिलते हैं। सस्कृत मे लोक प्रवाद, लौकिकी गाथा, आभाणक जंस शब्दो का प्रयोग हुआ है । रामायण में अनेक स्थलो पर ये शब्द प्रयुक्त हुए हैं, यथा अशोक वाटिका मे सीताजी की उक्ति है-- लोक प्रयाद सत्योश्य पण्डित समुदाहत । अकाले दुर्लभो मृत्यु स्त्रिय या पुरषस्य वा 118 यहा सीताजी ने विद्वज्जन-सम्मत लोकप्रवाद की सत्यता स्वीकार की है कि स्त्री अथवा पुरुष को असमय मृत्यु दुर्लभ होती है। रामायण मे अन्यत्र 'लौकिक गाथा' शब्द का प्रयोग हुआ है । भरत का हनुमान के प्रति कथन है कि सौ वर्ष के व्यतीत हो जाने पर भी मनुष्य को जीवन का आनन्द प्राप्त होता है, यह लौकिक गाथा कल्याणप्रद है- पल्याणी यत गायेय लौकिकी प्रतिभाति मे। एति जीवन्त मानन्दो नर वर्ष शतादपि ॥19 महाकवि बाण ने कादम्बरी मे 'लोक प्रवाद' शब्द का प्रयोग किया है । लोकप्रवाद है- विपत्ति विपत्ति के पीछे और सम्पत्ति सम्पत्ति के पीछे बधी होती है-सत्योऽय लोक प्रवादो यद् विपद् विपद सपद् सपदमनुबध्नाति 120 'आभाणक' शब्द का प्रयोग भी सस्कृत साहित्य मे अनेक स्थलो पर हुआ है । 'मधुर पिण्ड को छोडकर हाथ चाटना' इस लौकिक न्याय को 'आभाणक' शब्द के द्वारा अभिहित किया गया है- सोऽयमाभाणको लोके पिण्डमुत्सुज्य फर लेढीति ॥1 पालि, प्राकृत और अपभ्रश के ग्रथो मे लोकोक्ति के पर्याय के रूप मे प्रवाद या आहाण शब्द स्वीकृत हैं । रत्नशेखर सूरि ने 'सिरवाल कहा' मे अक्खाणय शब्द का प्रयोग कर 'पानी पीकर फिर पर पूछने' वाली लोकोक्ति की सत्यता सिद्ध को है महवा नरवर तुमए एय अक्वाणय कयै सच्चम् । पाऊण पाणिय फिर पच्छा पुच्छिज्जए गेहम् ॥22 कहने की आवश्यकता नहीं कि 'आहण' अथवा 'अक्खाण' शब्द सस्कृत के 'आख्यान' शब्द के हो परिवर्तित रूप हैं । 'उपर्युक्त सस्कृत के शब्दो के अतिरिक्त लोकोक्ति के पर्याय के मे कुछ अन्य सदा का भी सर मोनियर विलियम्स ने प्रयोग किया है । ये हैं-लोक वाक्य, प्राचीन वाक्य, पुराण वाक्य, लोकप्रचलित वाक्य, वाक्य, वचन, वाक् (च), सूत्र, प्राचीन सूत्र, पुराणसूत्र, उपमान, उपदेश वाक्य, उपदेश सूत्र, न्याय , न्याय वाक्यम् उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि देशिक एव वैदेशिक प्राय समस्त मापामो मे लोकोक्ति के समानार्थक पान्द उपलब्ध होते हैं । यद्यपि किसी भी शब्द का सटीक एव यघायं समानार्थक शब्द सिद्ध करना मुगम नहीं है, तथापि अर्थ-साम्य की दृष्टि से विदेशी एव स्वदेशी भाषाओ मे अनेक ऐसे शब्द है, जो लोकोक्ति रूपी धुरी के इतस्तत चक्कर काटकर लोकोक्ति में अयं का ही द्योतन करते हैं। यद्यपि 'उपदस रूप 123 सूत्र' तथा 'न्याय वाक्य आदि शब्दो का लोकोक्ति के साथ सीधा सम्बन्ध नहीं है, तो भी प्रसग के अनुरूप ये शब्द जिस तथ्य को और सकेत करते हैं, वह लोकोक्ति से भिन्न नहीं है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पूर्व विवेचित पर्यायवाची शब्द लोकोक्ति के लिए ही प्रयुक्त हुए हैं। इनमे कुछ शब्द लोकोक्ति से भिन्न प्रतीत होने पर भी अर्थ- नेकट्य के आधार पर लोकोक्ति के ही वाचक माने गए हैं। . । UNE लोकोक्ति की परिभाषा एव रूप-सरचना यद्यपि किमी भी साहित्यिक विधा को सुनिश्चित शब्दो में परिभाषाबद्ध नहीं किया जा सकता और न उसकी वैज्ञानिकता एव सत्यता को अन्तिम रूप प्रदान करने की घोषणा ही की जा सकती है, तथापि इसका इतना लाभ अवश्य है कि इससे परिभाषित वस्तु के स्वरूप का स्पष्टीकरण अवश्य हो जाता है। लोकोक्ति लोक को सम्पत्ति होने के कारण विश्व की विभिन्न भाषाओ मे एतद्- विषयक विचार प्रकट किए गए हैं । योरोपीय भाषाओ को ही लीजिए, इनमे लोकोक्ति के बारे में अपनी-अपनी दृष्टि से विचार किया गया है- -प्राचीन उक्तिया असत्य नहीं होती। -~-लोकोक्तिया वार्तालाप मे अन्धकार में प्रकाशपुज (टाचं) के समान हैं । --ससार की समस्त सद्भावनाए लोकोक्तियो में निहित होती हैं। -लोकोक्तिया अनुभवो की सन्तति हैं। -लोकोक्तिया ज्ञान का पथ हैं । -~लोकोक्तियो का सृजन अनुभव से होता है। --लोकोक्तिया समाज का सारतत्व हैं। -~-छ व्यक्तियो का कथन सत्य हो सकता है, किन्तु सभी व्यक्तियो का कथन सत्य ही होता है। -लोकोक्तिया विचारो तक पहुचने का सोपान है। ~~~-हमारा जीवन दोप ग्रस्त हो सकता है, परन्तु लोकोक्तियो मे समाविष्ट भाव को व्यवहार मे क्रिपान्वित करने से जीवन दोषमुक्त हो सकता है। --उत्तम कथन ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है और लोकोक्तिया कभी-कभी कल्पना मे पांव के जूते के सही माप से भी अधिक उचित प्रतीत होती हैं। -वैश को एक उमित के अनुसार प्रत्येक लोकोक्ति सत्य होती है । -डच की एक लोकोक्ति के अनुसार-ये दैनिक अनुभव को दुहिताए हैं। --एस्टोनियन भाषा मे लोकोक्ति को विचारो की कुजिका माना गया है। --स्पेनिश भाषा में कहा गया है कि वह लोकोक्ति लोकोक्ति कहलाने की अधि- कारिणी नही, जो सत्य न हो, लोकोक्ति तो समस्त ज्ञान की माता है। -~~एक जापानी लोकोक्ति के अनुसार-लोक-वाणी ईश्वरीय वाणी होती है। --यिद्दिश मे एक लोकोक्ति है कि इसके द्वारा मत्य नद्घाटित होता है ।

24 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण यहा लोकोक्ति के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए वही रही आलकारिक शैली का आश्रय ग्रहण किया गया है । वही अतिशयोक्ति के आधार पर उनको प्रशसा की गई है, तो कही उनम निहित विचार, अनुभव, सत्य एव ज्ञान के सारतत्त्व की चचा की गई है। कही इन्हे विचारो की सवाहिका बताया गया है, तो कही इन्हे विचारो की कुजी बताते हुए इन्हे विचारप्रधान सिद्ध किया गया है । इगलिश एव डच भाषा की उक्ति म जहा इन्हे अनुभव-प्रसूता बताया गया है, वहा इसके विपरीत स्पैनिश भाषा मे इन्हें समस्त ज्ञान की जन्मदात्री सिद्ध किया गया है। लोकोक्ति के विषय मे अनेक विद्वानो ने अपने-अपने विचार प्रकट किए हैं। अरस्तू के शब्दो मे-सक्षिप्त और प्रयोग के लिए उपयुक्त होने के कारण तत्त्वज्ञान के खण्डहरो मे से चुनकर निकाले हुए टुकडे- --बचा लिए गए अश को लोकोक्ति की सज्ञा से अभिहित किया जा सकता है। टेनीसन के अनुसार लोकोक्तिया वे रत्न हैं जो लघु आकार के होने पर भी अनन्त काल की अगुली मे सदा जगमगाते रहते हैं । जुबर्ट ने इन्हे 'ज्ञान' के सक्षेपीकरण के नाम से अभिहित किया है। सर्वेण्टीज का मत है कि लोकोक्तिया वे छोटे छोटे वाक्य हैं जो जीवन के दीर्घकालीन अनुभवो को अन्तनिहित किए हुए हैं । एग्रीकोला की दृष्टि मे ये सक्षिप्त वाक्य हैं जिनमे सूत्रो की तरह आदिम पुरुषो ने अपनी अनुभूतियो को भर दिया है। इरेस्मस का मत है कि वे प्रसिद्ध और सुप्रयुक्त उक्तिया लोकोक्ति कहलाती हैं, जिनकी एक विलक्षण ढग से रचना हुई हो। बाइबिल मे कहा गया है कि कहावती ज्ञानज्ञानी जनो की उक्तियो का निरूपण है। डिजरेली के अनुसार लोकोक्तिया पाण्डित्य को अश हैं जो मानव सृष्टि के आदिम काल मे अलिखित नतिक कानून का काम देती थी। इस विषय मे कुछ अन्य विचारको का मन्तव्य भी देखा जा सकता है-- (क) जीवन मे व्यवहृत होने वाले छोटे छोटे कथन-एग्रीकोला (ख) जनता मे निरन्तर व्यवहृत होने वाले लघु कथन-जानसन (ग) व्यावहारिक जीवन मे मार्ग दर्शक वचन-फीस्ते (घ) वे कथन जो अनाम हैं, जिनके निर्माता का पता नही-ट्रेच (ड) दीर्घ कालीन चतुराई (मानव अनुभव) से चुने हुए छोटे छोटे वचन -सर्वेण्टीज (च) सर्वथा जनता की अपनी भाषा मे किसी सवमान्य सत्य को थोडे से शब्दो म प्रकट करने वाला लोर प्रचलित कथन-वोरकोर्ट (७) अनेको का चातुर्य और एक की वृद्धि का चमत्कार- एक की सूझ जिसम अनेको का चातुर्य सन्निहित है- रसेल ।26 उपर्युक्त परिभाषामो मे लोकोक्ति के तात्विक स्वरूप का प्रतिपादन न हाकर उसकी भिन्न भिन्न विशेषताओ का ही निर्देश किया गया है। प्रथम परिभाषा मे इसकी उप- योगिता सिद्ध की गई है, तो दूसरी म लोकप्रियता। तृतीय परिभाषा म इसके प्रयोजन पर प्रशाश डाला गया है। ट्रेंच ने एक नवीन तथ्य प्रकट किया है कि लोकोक्तिया अशात.

27 नामा होती हैं । उनका यह मत सर्वथा स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इस दृष्टि से इन दो- विभाय किए जा सकते हैं-ज्ञातनामा तथा अज्ञातनामा जोतनामा लोकोक्तियो के. रचयिता का नाम प्रयोक्ता को पता होता है। अनेक साहित्यकारो द्वारा प्रयुक्त लोको- वितया उन्ही के नाम से जानी जाती हैं । लाई रसल ने इसकी अर्थ मे लोकोक्ति को एक व्यक्ति की विदग्धता तथा अनेक का ज्ञान कहा है। इन परिभाषाओ मे कहीं लोकोक्ति के सक्षिप्त रूप की चर्चा है, तो कही उनमे निहित मानव अनुभव, बुद्धिगत चमत्कार अथवा सर्वमान्य सत्य का प्रतिपादन किया गया है, किन्तु कोई भी परिभाषा ऐसी नहीं है, जिसमे लोकोक्ति को पूर्णरूपेण परिभाषित किया गया हो, अतएव इनमे अव्याप्ति दोप आ जाता है। विभिन्न शब्दकोशो मे लोकोक्ति मा सारगर्भित विवेचन प्राप्त होता है। शिप्ले अपने साहित्यिक पारिभाषिक कोश मे लिखते है कि लोकोक्ति लोक-माहित्य का सक्षिप्त किन्तु अर्थपूर्ण एक सूत्रमय प्रकार है, जिसमे सामान्य अनुभव पर आधारित सक्षेपतः जीवन की एक विचारपूर्ण आलोचना होती है। सामान्यत जनप्रिय मस्तिष्क से उद्भूत इस लोकोक्ति मे लोक-प्रचलित मनोवृत्ति का महत्त्वपूर्ण प्रतिबिम्ब होता है। रोम व जमंन की नाटकीय व साहित्यिक आलोचना मे इसका बहुधा प्रयोग हुआ है । अपनी विशेषताओ के कारण ही यह लोक के द्वारा ग्राह्य होती है । एक विश्वकोश के अनुसार लोकोक्ति किसी सत्य अथवा किसी उपयोगी विचार को एक सक्षिप्त वाक्य में कहती है। इसके प्रयोग से भाषा मे सरसता एव चित्रात्मकता आ जाती है। इनका प्रयोग चिरकाल से अनेक व्यक्तियो द्वारा होता रहा है और आज भी प्रसग के उपस्थित होने पर इनका प्रयोग होता है। जन-सामान्य द्वारा ग्रहण दिए जाने पर ही कोई उक्ति लोकोक्ति का रूप धारण करती है ।28 विभिन्न कोशो में लोकोक्ति की अद्यावधि अनेक परिभाषाए उपलब्ध हैं । एक विश्वकोश मे विवेचित तत्त्वो के आधार पर लोकोक्ति मे चार गुण स्वीकार किए गए हैं। ये हैं---सक्षिप्तता, सारगर्भितता, सप्राणता अथवा चटपटापन एव लोकप्रियता । मूल रूप मे इनमे ट्रेंच तया हैवेल ने प्रथम तीन गुणो को और बाद मे हेस्टिग्स ने एक अन्य तत्त्व 'लोकप्रियता' को इसके अनिवार्य तत्त्व के रूप में अगीकृत किया है। 29 डॉ० कन्हैयालाल 'सहल' ने सक्षिप्तता, सारगर्मितता और सप्राणता किसी उत्कृष्ट लोकोक्ति के तो अपरिहार्य गुण स्वीकार किये हैं किन्तु लोकोक्ति मात्र के अनिवार्य गुण नही माने हैं।30 यहा विचारणीय है कि प्रत्यक्षत डॉ० सहल ने इन गुणो को लोकोक्ति का अपरिहार्य तत्त्व न मानकर भी परोक्षत इन महत्त्व को स्वीकार किया है। सक्षिप्तता--सक्षिप्तता लोकोक्ति की अन्यतम विशेषता है । विस्तृन भाव को भी लोकोक्ति सक्षिप्त शब्दो द्वारा अभिव्यक्त कर देती है । गागर मे सागर भर देने का गुण लोकोक्तियो मे विद्यमान है। व्यापक समस्याए, अनुभव गाम्भीर्य और जटिल प्रश्न छोटे से नुकीले और चटपटे वाक्यों में सिमट कर सदा से प्रचलित होते रहे हैं। लोकोक्ति अपने लाघव के कारण सबके मुंह पर रहती है । बडे वाक्यो को स्मरण वरना 26 लोकोवित और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण कठिन होता है । अनुभवो का विस्तार लाघव गुण के कारण हृदय पर एकदम असर करता है। सम्पूर्ण प्रभाव एकमुख होकर छोटे से वाक्य अथवा वाक्यारा मे इस तरह व्यक्त होता है कि लम्बे-चौडे तकं और विस्तृत वर्णन वहा बेकार हो जाते हैं । लोकोक्ति का लाघव ही उसे सूत्र रूप प्रदान करता है । लोकोक्ति में कम से कम शब्दो का प्रयोग करके अधिक से अधिक प्रभावोत्पादन की क्षमता विद्यमान होती है। यही कारण कि शेक्सपीयर ने सक्षिप्तता को वाग्वदग्ध्य वा प्राण माना है ।2 जॉनयर्ट के अनुसार ज्ञान के सक्षेपीकरण को लोकोक्ति कहा जा सकता है । 33 मा विशप ट्रेंच लिखते हैं कि लोकोक्ति सक्षिप्त, अर्थपूर्ण और रोचव होती है। यह योडे से शब्दो से सजा हुआ बृहद् ज्ञान है। डॉ० ओम्प्रकाश गुप्त की दृष्टि से लोकोक्तिया वे सक्षिप्त वाक्य हैं, जिनमे सूत्रो की तरह आदिम पुरुषो ने अपनी अनुभूतियो को भर दिया है 134 डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय ने इसका प्रधान उद्देश्य समास रूपो मे सचित अनुभूत ज्ञान-राशि का प्रकाशन माना है । उन्होंने इसकी दो विशेषताए मानी हैं-समास शैली और अनुभव निरीक्षण-लोकोक्तियो मे सबसे पहली विशेषता है इसको समास शंली। इनमे इनके रचयिताओ ने गागर मे सागर भरने का प्रयास किया है। इनकी दूसरी विशेषता है अनुभूति और निरीक्षण 15 सक्षिप्तता लोकोक्ति को एक ऐसी विशेषता है जो इसे अन्य विधाओ से भिन्न करती है। 'लोकगीतो', 'पवारो' और 'लोककथाओ' मे विस्तार की भावना रहती है, जबकि कहावतें और पहेलिया गागर मे सागर भरने का प्रयास करती हुई सूत्र शैली का प्रयोग करती हैं । इसी शैली के कारण इन्हें घनीभूत रत्न को सज्ञा दी जाती है । डॉ० सहल लोकोक्ति की सक्षिप्तता के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि लोकोक्ति की सक्षिप्तता से यही अर्थ लिया जाना चाहिए कि उसमे न्यूनतम शब्दो का प्रयोग हो, अनावश्यक एक भी शब्द उसमे न आने पाये । उदाहरणार्थ अरबी की एक कहावत प्रस्तुत है-"शतुरमुर्ग से किसी ने कहा-ले चल। उसने उत्तर दिया-मैं पक्षी हू, भार वहन नही कर सकता । तब किसी ने कहा-उड चल । तुल ही शतुरमुर्ग कह उठा-मैं उड नही सकता क्योकि मैं क्ट है।" यह कहावत ऐसी है जिसे और सक्षिप्त नही किया जा सकता किन्तु है लोकोक्ति ही, चाहे कितनी लम्बी क्यो न हो। इसी प्रकार की एक अन्य लोकाक्ति भी प्रस्तुत की जा सकती है-"चमगादड पहले पक्षियो के पास गया और कहा-मैं पक्षी हू, मेरे पख हैं। फिर वह पशुओ के झुण्ड मे गया और कहा-मैं पशु है। उन्होने पूछा-कैसे ? तुरन्त ही दात दिखाते हुए चमगादड के कहा-क्योकि पशुओ को हो तरह मेरे भी दात हैं।" वैसे इस प्रकार की लोकोक्तिया बहुत कम हैं, इन्हे अपवाद स्वरूप ही स्वीकार किया जाएगा। लोकोक्तिया प्राय. सक्षिप्त ही होती हैं। विषय के स्पष्टीकरण के लिए अष्टछाप-काव्य की कुछ लोकोक्तिया प्रस्तुत हैं- (क) अनलहि औषधि मनल है। (ख) अपनी योयो आप लुनो। (ग) आप काज मह काज।

लोकोक्ति : स्वरूप-विवेचन - 27 - (घ) मासुर ग्यान प्रतच्छ प्रमाने। (5) इह जोवन धन दिवस चारि को। (च) एफ पप काज। (छ) एक म्यान दो खाँ। (ज) कहा करो जो नाहि आई। (झ) गोरस बेचत आपु विकानी । (अ) ससि न गहो परत बोन 138 उपर्युक्त लोकोक्तियो के आधार पर यह तथ्य प्रकट है कि इनमे कोई भी पाब्द व्यर्थ नही जोडा गया है । हा, इतना अवश्य है कि साहित्य में लोकोक्ति के प्रयोग करने पर प्रयोक्ता को छन्द-रचना आदि की दृष्टि से इन्हें कुछ परिवर्तन के साथ अवश्य प्रस्तुत करना पडता है। इसके लिए अष्टछापेतर साहित्य मे प्रयुक्त कतिपय लोकोक्तियो को लिया जा सकता है। एक लोकोक्ति है-'किसी के लिए कुआं खोदना । इस लोकोक्ति का प्रयोग किसी को हानि पहुचाने की चेष्टा करने के अर्थ मे होता है । तुलसी ने इसका प्रयोग कुछ भाषिक परिवर्तन के साथ इस प्रकार किया है- 'जोइ जोइ कूप खनंगो पर कहं सो सठ फिरि तेहि कूप पर 39 हिन्दी की एक लोकोक्ति है-~'खोदा पहाड निकली चुहिया'। बहुत करने पर थोडा लाभ होना इसका अभिप्राय है । गिरधर कविराय ने इसका प्रयोग कुछ परिवर्तन के साथ किया- छोटा जिय हत्या बडी, अल्प लाभ बहु खेद। सो न पड़े प्रवृत्ति मे जिन जान्यो यह भेद । जिन जान्यो यह भेद नही वह छानत भूसा। खोदे महा पहाड़ मिले एक लघु सा मूसा 140 अभिप्राय यह है कि लोकोक्तिकार इसका साहित्य मे प्रयोग करते हुए भाषा-छन्द तुक लय आदि की सुविधानुसार इसमे यत्किचित् परिवर्तन कर देता है, फिन्तु फिर भी प्रकृत्या लोकोक्ति सामासिक शैली से युक्त होने के कारण प्राय सक्षिप्त ही होती है। सारभितसा लोकोक्ति का दूसरा प्रमुख तत्त्व सारगभितता है। सारगर्भित होकर लोकोक्ति प्रभावोत्पादक होती है। लोकोक्ति की मुख्य विशेषता के रूप मे सार- गभिताको ग्रहण किया गया है। इसके अभाव मे कोई भी उक्ति वाग्जालमान ही रह जाती है और वह लोकोक्ति का स्थान प्राप्त नहीं कर सकती। इसके विपरीत कही-कही बडे बडे वाक्य भी सारगर्भित और लोकसम्मत होने के कारण लोकोक्तियो के रूप में प्रयोग होने लगते हैं । कही-कही लयात्मक, भावात्मक और अनुभवपूर्ण उक्ति ही दोहा, चौपाई आदि छन्दो के रूप में बदलती हुई लोकोक्तिवत् प्रयोग मे आती रहती है, यथा --"जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पठ' । लोकोक्तियो के अनुशीलन करने पर बलपूर्वक कहा जा सकता है कि इनमें हास्य, व्यग्य, ललकार, चेतावनी सभी के द्वारा तात्त्विक वातो की शिक्षा दी जाती है । किसी भी कहावत को देखा जाए, उसमे सारगर्भितता अवश्य विद्य- - । 28 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण मान होगी। साधारण से साधारण उक्ति मे भी सारपूर्णता को देखा जा सकता है। डॉ० कन्हैयालाल सहल ने अधिकांश लोकोक्तियो मे सारगभितता को स्वीकार किया है, तथापि इसकी अनिवार्यता स्वीकार नहीं की है-कहावतें एक समान सारगर्भित होती हैं, ऐसा नही कहा जा सकता । वपडा फाट गरीबी आई। जूतो टूटी चाल गमाई ।"अर्थात कपडे फट गए और गरीबी आ गई । ज्यो ही जूते टूटे चाल का मजा जाता रहा। कहने का तात्पर्य यह है कि फटे वस्म और टूटे जूते गरीबी के द्योतक होते हैं । सारमितता की दृष्टि से इस कहावत का कोई विशेष महत्त्व नही जान पडता किन्तु यह अवश्य स्वीकार करना होगा कि अधिकाश कहावतें सारगर्भित होती हैं । 3 अन्य कुछ विद्वानो ने डॉ० सहल के इस मन्तव्य के प्रति अपना विरोध प्रकट कर सारगभितता को अपरिहार्य गुण स्वीकार किया है। डॉ० सहल के मत का खण्डन करते हुए डॉ. मदनलाल शर्मा लिखते हैं--इस लोकोक्ति में 'गरीबी' जैसी दीन दशा का वडा ही मार्मिक चित्रण किया है। कितने ही गरीब लोग उस प्रकार को 'दीन हीन दशा में फिरते है, जिनके न सिर पर टोपी है न गात मे लगोटी और न परो मे जूते । ऐसी दशा को देखकर कठोर हृदय भी पिघल जाते हैं, फिर इस कथन मे निस्सारता कैसे आ गई। सुदामा की दशा भी तो यही थो- 'धोती फटो सी लटी दुपटी अरु पाय उपानह की नहीं सामा"। इस दशा को देख कर तोक्यनाथ श्रीकृष्ण भी गद्गद हो गए, फिर इसी के समान भावपूण चित्रात्मक क्थन सारगभितता से वचित रह जाए, उपयुक्त नही लगता। इसी प्रकार डॉ. सहल की दृष्टि मे जो लोकोक्तिया सारभित नही हैं, वे या तो लोकोक्तिया ही न होगी, और यदि विद्वानो द्वारा उन्हे लोकोक्ति की कोटि मे रखा गया है तो वे सारगर्भित अवश्य हैं। क्योकि कोई भी सारगर्भितता से रहित कथन लोक द्वारा नहीं अपनाया जा सकता। देखिए--- गुण के गाहक सहस नर बिन गुन लह न कोय' (गिरधर की कुडली) और सारगभितता गुण ही है । फिर जिस उक्ति को सहस्रो व्यक्ति अपनाकर व्यवहार मे लाते हैं और जिस पर लोक द्वारा प्रामाणिकता की मुहर लगा दी हा, वह उक्ति कभी भी गुण अथवा साररहित नही हो सकती। डॉ० शर्मा के मन्तव्य को उद्धृत करने के बाद लोगोवित में निहित सारभितता के प्रति कोई सन्देह नहीं रह जाता। सप्राणता-सप्राणता का अर्थ है सजीवता। डॉ० सहल ने इसे चटपटापन का पर्याय स्वीकार किया है। इससे लोकोक्ति की महत्ता बढ जाती है। भगिमापूर्ण होने के पारण लोकोक्ति वैचि*य को सृष्टि करती है। मुक्तक शैली मे रचित लोकोक्तिया मर्म स्पर्शी एव विदग्धतायुक्त होकर श्रोता के हृदय मे जहा अपनी अमिट छाप अकित करती है यहा वक्ता भी लोकोविन की इस विशेषता से परिचित होता है। नायक और नायिका में कोई किसी से कम नहीं है। इस बात को कहने के लिए सूर सामान्य ठग को न अपना पर अनूठे ढग से ही कहते हैं-यह हादस यह कदम को 145 सप्राणता वस्तुत मोकोक्ति को जीवन्तता है। अपनी अपूर्व विशेषताओं के कारण लोकोक्ति लोकप्रिय होकर भालजयी बन जाती है। हालक्ष्मीनारायण शर्मा ने सजीवता को लोकोक्ति मे आवश्यक मानते हुए इसे सारगमितता के अन्तर्गत माना है। उनके अनुसार किसी भी वस्तु की ।

लोकोक्ति .स्वरूप-विवेचन 29 सजीवता उसका सार ही है। उनका यह दृष्टिकोण एकागो दृष्टि का परिचायक है, क्योंकि लोकोक्ति में ज्ञान के सार तत्त्व को विशिष्ट भगिमापूर्ण ढग के साथ प्रस्तुत किया जाता है। इसके अभाव मे सारगभित होकर भी उक्ति सूक्ति मात्र रह जाती है। विच्छित्ति लोकोक्ति को अमरता प्रदान करती है। डॉ० सहल सप्राणता को लोकाक्ति का महत्त्वपूर्ण तत्व मानते हुए भी इसको अप रिहार्यता मानने के पक्ष मे नही हैं। वे लिखते हैं-सप्राणता (चटपटी) होने से कहा- क्त का महत्त्व बढ जाता है, किन्तु ऐसी भी अनेक कहावतें हैं जिनमे अभिव्यक्ति का वंचिश्य नहीं मिलता। 'घन खेती, धिक चाकरी', 'बहो की बडी ई बात', 'बाटकर खाना और सुरग मे जाणा', जैसी कहावतो मे कोई चटपटापन नही है। इनके प्रतिपक्ष मे सप्राणता को साग्रह स्वीकार करते हुए अन्य विचारक लिखते हैं कि इन उदाहरणो मे सप्राणता का निषेध करना उपयुक्त नहीं जचता । प्रथम लोकोक्ति को ही लीजिए। खेती करने में 'स्वतन्त्रता' की और नौकरी करने मे 'परतन्त्रता की ध्वनि व्यजित होने से खेती करना प्रशसनीय है और नौकरी करना निंदनीय । स्वतन्त्र व्यक्ति का आत्मसम्मान सुर- क्षित रहता है और परतन्त्र व्यक्ति को 'रोजी' के लिए आत्मसम्मान को बेचना पडता है। खेती और नौकरी मे एक अन्तर यह भी है कि किसान सर्वाधिक परिश्रमी-ईमानदार होता है जबकि नौकरी करने वाले व्यक्ति में इनका अभाव भी हो सकता है। जो लोकोक्ति अपने गर्भ मे स्वतन्त्रता परतन्त्रता की इतनी बलवती भावना को सजोए हो तथा जहास्पष्ट शब्दो मे खेती' और 'नोकरी' के गुण दोर्पो पर इतना तीक्ष्ण व्यग्य हो वहा यह कैसे कहा जा सकता है कि इस लोकोक्ति मे सप्राणता या चटपटापन नही है ।48 इसी प्रकार दूसरी लोकोक्ति मे एक साधन विहीन निर्धन व्यक्ति की असमर्थता एव साधन सम्पन्न व्यक्ति की सम्पन्नता अभिव्यजित है । दोनो की तुलना मे जहा एक स्वय को अशक्त एव असमर्थ अनुभव करता है, वहा घनिक व्यक्ति के कार्यों से उसे ईर्ष्या भी होती है। तृतीय लोकोक्ति मे व्यक्ति को स्वार्थ के परित्याग की शिक्षा दी गई है। वैदिक साहित्य मे भी कहा है- जो व्यक्ति अकेला खाता है, वह पाप खाता है- केवलाघो भवति केवलादी। इस उक्ति मे जहा व्यक्ति मे लोभ के त्याग के लिए भय दिखाया गया है, वहा 'वाटकर खाणा अर सुरग मे जाणा' इस लोकोक्ति मे लोभ-नीति के द्वारा ही लोभ-त्याग का आदेश दिया गया है। उदारता-दया-दान आदि की शिक्षा देने के कारण इसका महत्त्व प्राचीन काल से ही रहा है। हा, इतना अवश्य है कि उपदेशपरक अथवा शिक्षाप्रद लोकोक्तियो मै सप्राणता न्यूनाधिक हो सकती है, किन्तु इसके मस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। विषय के स्पष्टीकरण के लिए कुछ उदाहरण लिए जा सकते हैं--एक प्रचलित उक्ति है कि अज्ञानी व्यक्ति का चित्र अनियत्रित रहता है । ज्ञान के अभाव में वह अपनी चित्तवृत्तियो का निरोध नहीं कर सकता। नन्ददास ने इस उक्ति को चमत्कारपूर्ण बनाने के लिए पूरे प्रकरण को ही वैचित्र्ययुक्त कर दिया है । वानगी देखिए- महानक मुष जो मन । होई ताहि कर करि फाद कोई। कुपित भुजगम सिर पर घर । हापनि पार-रासि पुनि तरं॥

30 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण तेल लहै करि धुरि को धानी । मृगतृष्णा ते पीवं पानी। खोजि ससा के शृगनिपावं । पं मूरख मन हाथ न आवै ॥49 यहा कवि ने वैचित्र्य व्यापार की सृष्टि करते हुए इस बात पर बल दिया है कि प्रकृति की व्यवस्था विपरीत हो सकती है, हर असम्भत कार्य सम्भव हो सकता है, किन्तु अज्ञानी व्यक्ति कभी भी यम नियम आदि का पालन न कर सकने के कारण ज्ञान के अभाव मे मन पर सयम नही रख सकता। वस्तुत यह मनोवंज्ञानिक तथ्य है कि अनुभूति की तीव्रता को प्रकट करने के लिए कवि सामान्य भाषा के स्थान पर भगिमापूर्ण अभिव्यक्ति के द्वारा ही अपने भावो को मूर्त रूप देता है। लोकोक्ति की सरचना भगिमापूर्ण होने के कारण इस दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी है। लोकमान्य सिद्धान्तो के आधार पर कवि लोकोक्ति के प्रयोग के द्वारा अपनी सवेदना को सार्थकता प्रदान करता है। नन्ददास की एक लोकोक्ति है-दरबोज्यो व्यजन मे स्वाद न जाने मद 150 यहा कविका अभीष्ट है-मन्दमति व्यक्ति की अयोग्यता पर व्यग्य करना। अवसर प्राप्त होने पर भी अज्ञानी व्यक्ति उसका लाभ प्राप्त नही कर सकता। इस आशय को प्रकट करने के लिए कवि एक लोकसिद्धान्त को आधार बनाता है। अर्थात् जिस प्रकार कडछो मधुर व्यजनो मे निमज्जित होने पर भी उसके स्वाद से अपरिचित होती है इसी प्रकार अज्ञानी व्यक्ति अनभिज्ञता के कारण उद्दिष्ट वस्तु के महत्त्व को न जानकर उसके लाभ से वचित रह जाता है । अन्य लोकोक्तिया देखिए- –फाग हस फी सगति लहसुन सग कपूर। -किहि कागद को तरनो कीन्हीं, कौन तो सर जाई । -डरपत फिर मृगी ते सिंघ क्यो? -खाए आये वेर के हो सो पन मे होत कुमार। यहा क्रमश वैषम्य, असम्भाव्य, वैचित्र्य तथा मिथ्या प्रदर्शन सम्बन्धी विषयो की चर्चा की गई है। अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए लोकोक्तिकार ने सामान्य कयन के रूप मे न कहकर अनूठे ढग से अपनी बात कही है। प्रथम उक्ति मे विषमता प्रति- पादित की गई है । इस वैषम्य के प्रतिपादन के लिए लोकोक्तिकार अपनी कल्पनाशक्ति के द्वारा प्राणिजगत् के काग' एव 'हस' के गुणगत-वर्णगत आदि वैषम्य से परिचित होकर लोकोक्ति मे इसका प्रयोग करता है। इसी प्रकार परस्पर विरोधी स्वभाव वाली वस्तुओ लहसुन तथा कपूर को एक स्थान पर एकत्रित कर विषम वस्तुओ की सगति के आधार पर लोकोक्ति को सम्यक्रीत्या प्रभावशाली बनाकर अभिव्यक्ति को शक्ति प्रदान की जाती है । प्रयोग की दृष्टि से प्रसगानुसार प्रयुक्त होकर भगिमापूर्ण होने के धारण लोकोक्ति पूरे प्रकरण मे चमत्कार उत्पन्न कर देती है। द्वितीय लोकोक्ति म अनु पयुक्त साधन से साध्य की प्राप्ति को असम्भव बताया गया है। इसके लिए कवि ने लोक- प्रचलित सिद्धान्त को आधार बनाया है कि कागज की नाव से जल यात्रा को पूर्ण करने मा दुस्वप्न हास्यास्पद ही कहा जा सकता है। किसी व्यक्ति की अनुपयुक्त घेप्टाओं के दारा लक्ष्यप्राप्ति की आशा करना मृगमरीचिका की भाति है। व्यक्ति के इस कार्य ध्या पार पर रवि ने सोक-न्याय को आधार बनाकर जो उपहास किया है, उससे समस्तप्रसग लोकोचित स्वरुप विवेचन 31 प्राणवन्त बन जाता है। तृतीय लोकोक्ति में निबल व्यक्ति द्वारा प्रक्तिशाली व्यक्ति को भयभीत करने की कल्पना पर व्यग्य किया गया है । शक्तिहीन व्यक्ति को दुराशा को प्रकट करने के लिए वन्य पशुओ-मृग सिंह को आधार बनाकर अपनी अभिव्यक्ति को सप्राण बनाया गया है । अन्तिम उक्ति मे अनधिकारी व्यक्ति के मिथ्या प्रदर्शन पर सीधा व्यग्य है । 'खाए आधे वेर' कहकर उसको अल्पावस्था तथा 'होत कुमार' के द्वारा मिथ्या भिमान को अनुचित बताया गया है। यह उक्ति 'छोटे मुह बडी बात वाली लोकोक्ति के भाव को किंचित् परिवर्तन के साथ प्रस्तुत करती है। विशिष्ट भगिमा से युक्त होकर लोकोक्ति जहा स्वय सप्राण होती है, वहा प्रकरण में भी चमत्कार उत्पन्न करके उसे प्राणवन्त बना देती है-गो० तुलसीदास की एक व्यग्यात्मक लोकोक्ति देखिए- करम उपासन ज्ञान वेदमत, सो सव भाति सरो। मोहिं तो सावन के अहिं ज्यों, सझत रग हरी 152 लोकोक्ति है- सावन के अधे को हरा ही हरा दिखाई देता है।' तुलसी ने वैदिक धर्म को श्रेष्ठता प्रतिपादित करत हुए अवैदिक मान्यताओ के प्रति विरोध प्रकट करने लिए इसका आश्रय ग्रहण किया है। लोकोक्ति वा भावार्य करते हुए कोशकार ने लिखा है कि जो अनुचित उपाय स अथवा अकस्मात कुछ प्राप्त कर लेते है और समझते हैं कि ऐसा ही सब करते हैं। इसी से मिलती जुलती एक और लोकोक्ति है-'पीलिया के रोगी को पीला ही पीला दीखता है।' कहने का अभिप्राय यही है कि सप्राणना पुक्त लोकोक्ति युग युगांतर तक लोक जिह्वा पर नर्तन करती रहती है। सजीवता लोकोक्ति की अपरिहार्य विशेषता है । इसके अभाव म लाकोक्ति प्रचलन रहित होकर अपने स्वरूप को खो दती है । वस्तुत लोकोक्ति मनुष्य के परम्परित ज्ञान की परिपुष्ट, लोक सिद्ध, प्रभावोत्पादक, कलात्मक और पृष्ठभूमि के वैचिग्य का सजीव सूत्र है । लोकप्रियता लोकप्रियता लोकोक्ति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निकष है। सक्षिप्तता, सारगभितता एवं सप्राणता---इन तीनो गुणो के होते हुए भी कोई उक्ति लोकोक्ति के रूप मे अभिहित की जा सके, पह यावश्यक नहीं है, क्योकि मात्र इन तीनो तत्वी से आधार पर लोकोक्ति के स्वरूप का निर्धारण असम्भव है। इनके आधार पर कोई उक्ति सूक्ति अथवा प्राज्ञोक्ति का रूप धारण करती है, किन्तु लोकोक्ति रूप तभी प्राप्त होता है जब उसे लोक-मानस ग्रहण कर ले।जेम्स हेस्टिस लिखते हैं कि सक्षिप्तना, सारगर्भिता और सप्राणता-इन तीन गुणो के होते हुए भी कोई उक्ति लोकोक्ति वही जा सके, यह अनिवार्य नही है क्योंकि उस उक्ति लोकोक्ति नाम लोक-स्वीकृति की प्राप्ति थे अनन्तर ही प्राप्त होगा 155 लोकोक्ति लोक की ही उक्ति है। हॉवल ने अपने सोकोक्ति-सग्रह को एक "चतुपंदी में इस तथ्य को सामह स्वीकार किया है। उनकी निम्नलिखित पक्तियाँ पठनीय है-जनता की उक्ति जनादन की उक्ति है और सोकोक्तियां जनार्दन की उक्ति के अतिरिक्त और हैं ही क्या? और जो जनता-जनार्दन को उक्तियां हैं उनकी सत्यता और प्रमावात्मरता मे मला सन्देह ही छोन पर माता है 758

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लोकोक्तिः स्वरूप-विवेचन : 33 .. शर्मा इस सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं कि लोकोक्तिया लोक प्रच- लित होती हैं। विना लोक-प्रसिद्धि और लोक-मान्यता के कोई भी उक्ति चाहे वह सारभित हो या सक्षिप्त, लोकोक्ति हो ही नहीं मकती। जो उक्तिया लोकप्रचलित नहीं होती; वे प्राज्ञोविनया आदि कही जाती हैं क्योकि वे सामान्य लोक वाणी से दूर रहती हैं। लोक-मान्य एव लोक-विश्रुत होकर ही लोकोक्ति पूर्णता को प्राप्त करती है। लोकोक्ति के अन्य तत्वो में सक्षिप्तता-सारगभितता आदि की भूमिका, इसके निर्माण में गौण रूप में होती है। लोक-स्वीकृति से ही लोकोक्ति का आत्म तत्त्व सिद्ध होता है। उपर्युक्त विभिन्न मन्तव्यो के परिप्रेक्ष्य मे अध्ययन का साराश इस प्रकार प्रस्तुत दिया जा मकता है- (क) लोकोक्ति लोक की उक्ति है। (ख) व्यष्टि की सम्पत्ति जब समष्टि की सम्पत्ति बन जाती है, तब लोकोक्ति का रूप धारण करती है। (ग) लोक-प्रियता इसका प्राण तत्त्व है। इसके अभाव मे लोकोक्ति का स्वरूप नष्ट हो जाता है। (4) सक्षिप्तता-सारगभितता आदि से युक्त होने पर भी लोक-प्रसिद्धि के अभाव मे लोकोक्ति प्राज्ञोक्ति मात्र बनकर रह जाती है। (ड) लोकानुभव पर आधारित लोकप्रिय लोकोक्ति की सत्यता एवं प्रभावा- स्मकता असदिग्ध है। निष्कर्षत कहा जा सकता है नि लोकप्रियता लोकोक्तिमात्र को अपरिहार्य विशेषता है। मानवीय अनुभव एवं उनको सत्पता मनुष्य निसर्गतः ज्ञान का आदान-प्रदान करता है। लोकोक्ति इसका उपयुक्त माध्यम है। जीवन के विविध अनुभव, व्यवहार, नीति, शिक्षा, उपदेश, कथा, घटना आदि का लोकोक्ति मे सूत्ररूप मे उद्घाटन होता है। लोकोक्तियां ज्ञान का भण्डार हैं। इसमे मानव-जीवन के युग-युग को अनुभूतियो का परिणाम और निरीक्षण-शक्ति अन्तनिहित होती है। काशी निवास के सम्बन्ध मे एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है-'राड साड सीढी सन्यासी इनसे बचे तो सेवे कातो'। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसमे बहुत कुछ ज्ञान का अश विद्यमान है । इसका प्रकटीकरण व्यक्ति को हानि से बचने के लिए सचेष्ट करता है। लोकोक्तिकार ने स्थानीय चिर अनुभव के पश्चात् ही इसका निर्माण किया होगा। इसी प्रकार कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की छुआछूत की भावना लोकविख्यात है। वियोगी हरि इस सम्बन्ध में लिखते हैं- हैं जह 'आठ कनोजिया नौ चूल्हे' की रीति। तहा परस्पर प्रीति की, वहाँ पहावत नीति ॥2 उनकी आपस मे बहुत अधिक फट के परिणामस्वरूप लोकोक्ति बन गई-आठ कनौजिया नौ चूल्हें' । जहा ऐक्य का अभाव व भेदभाव को प्रधानता होती है, वहा यह प्रयुक्त होती है। / 34 . लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण अपूर्णता की द्योतक सस्कृत की एक लोकोक्ति है-~-'अद्धं घट घोषमुपैति नूनम् ।' इसका हिन्दी रूपान्तर है-"अब जल गगरी छलकत जाय। जिसके पास मल्प धन या विद्या होती है वह उसका प्रदर्शन करता रहता है । सूर ने भी इसका प्रयोग किया है-- 'जसे घट पूरन न डोल, अघ भरी डगऔर 14 यही भाव अन्य लोकोक्ति 'थोया चना बाजे घना' द्वारा भी प्रकट होता है। अष्टछाप के कवि परमानन्द ने अपनी कल्पना की कची उडान भर कर इस का नवीन प्रयोग किया है-इतराइ चली थोरे पानी ज्यों भादों वी नदिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस लोकोक्ति का प्रयोग परमानन्ददास प्राकृ- लिक ज्ञान का परिणाम है। सस्कृत की एक अन्य लोकोक्ति है-'शठे शाठ्य समाचरेत्' । इसमें यथायोग्य व्यवहार की शिक्षा दी गई है । 'आग्ल भाषा में इसका प्रयोग "टिट फॉर टेट' के रूप में होता है। हिन्दी में इसका रूप-जैसे को तैसा है। सूर ने भी कहा है जो जसो हासों त्यो चलिये 15 वृन्द यथायोग्य आचरण के लिए भ्रमर का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं- जो जसो तिहि तसिप, करिये नोति प्रफास । काठ कठिम भेदै भ्रमर, मदु अरविन्द निवास ॥3B व्यावहारिक नीति की यह शिक्षा मानवीय अनुभव पर ही आधारित है। घाघ और भड्डरी के नाम से हिन्दी मे बहुत सी लोकोक्तिया प्रचलित हैं। इन मे कृषि के लिए ऋतु सम्बन्धी उपयोगी बातें कही गयी है। इसमें सन्देह नहीं कि पाप और भड्डरी ने अपनी पनी निरीक्षण शक्ति के बल पर ऋतु सम्बन्धी तथ्यो का अनुसंधान करके ही इन लोकोक्तियो का निर्माण किया होगा । जव विज्ञान की इतनी उन्नति नहीं हुई थी-ऋतु सम्बन्धी तथ्यो को जानने के लिए वेधशालाए नहीं बनी थी, उस समय लोग अपने चिर सचित अनुभव और निरीक्षण-शक्ति के द्वारा आगामी दिनो मे ऋतु- परिवर्तन की घोषणा किया करते थे। यह परम्परा सभवत बहुत प्राचीन है। आकाश मे चमकने वाली चचला के रग को देखकर निरीक्षण शक्ति सम्पन्न व्यक्ति प्रमजन आने तथा अकाल पड़ने की सूचना देते हैं- वाताय कपिला विद्युत्, आतपायाति लोहिनी। कृष्णा भवति सस्याप, दुभिक्षाय सिता भवेत् ।। प्राचीन काल के ये ऋतु-विशेषज्ञ किसी यन्त्र को सहायता से नहीं, अपितु अपनी निरीक्षण- शक्ति के द्वारा ही ऋतुओ के परिवतन को उद्घोषित करते थे। लोकोक्ति में घिर- काली मानवीय अनुभव सचित रहता है, किन्तु इसकी सत्यता के विषय मे देश-विदेश के विद्वानो मे मतैक्य नही है। स्टीवेन्सन ने तो यहां तक कह दिया था कि निरपेक्ष सत्य जैसी कोई वस्तु नही, हमारे सब सत्य अद्धसत्य मात्र हैं। इसीलिए लोकोक्तियो का सत्य यदि सार्वदेशिन और सार्वकालिक न हो, तो इसमे कोई माश्चर्य की बात नहीं। मार्ग-दर्शन के लिए लोकोक्तिया श्रेष्ठ साधन का काम देती हैं, किन्तु कोई उन्हें परम सत्य का पर्याय समझने को मूल न करे। इनमे वैज्ञानिक निष्कर्ष का सा सत्य नहीं होता। वे सत्य के लिए समेत मात्र उपस्थित करती है। टी० टी० मुगर के शब्दो मे लोकोक्तिया अदं सत्य मात्र लोकोक्ति स्वरूप विवेचन 35 । होती हैं । इनके विपरीत इमर्सन लोकोक्ति में निहित मानवीय अनुभव को सर्वथा सत्य स्वीकार करते हैं। उनके विचारानुसार जो जाति जिन लोकोक्तियो का प्रयोग करती है, उस जाति के लोग अपनी लोकोक्तियो को निरपेक्ष सत्य के रूप मे ही ग्रहण करते हैं। इमर्सन के निरपेक्ष सत्य को जिन्होने स्वीकार नहीं किया, वे सत्य को सापेक्षता स्वीकार करते हैं । कुछ लोगो के अनुसार सत्य व्यक्ति सापेक्ष, समय सापेक्ष तथा परिस्थिति सापेक्ष होने के कारण निरपेक्ष सत्य का अस्तित्व स्वीकार्य नहीं है। यथा महाभारत की एक लोकोक्ति है-'अश्वत्यामा हत नरो वा कुजरो वा।' यहा सत्य असत्य पर आधारित होकर भी युधिष्ठिर की झूठी अनभिज्ञता को प्रच्छन्न कर सत्यवादी की सत्यता की कोटि में आ गया। इसकी वस्तुन निरपेक्षतारहित सापेक्षता ही प्राय मान्य रही है । जीवन के सत्य को विविध रूप हैं, जिनको अपने अपने अनुभवो के आधार पर लोकोक्ति में स्थान मिला है, अतएव परस्पर विरोधी भावो को प्रकट करने वाली उक्तिया भी प्राप्त हो जाती हैं । यथा तीन व्यक्तियो का एक साथ चलग कुछ व्यक्तियो के लिए अपशकुन होता है। उनके अनुसार 'तीन काणे माने गए हैं। किन्तु इसके विपरीत शकुन की भी परिकल्पना की गई है--ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश अर्थात् त्रिदेव की कल्पना के रूप में ये शुभ के प्रतीक बन गए हैं। इस भिन्नता का कारण जीवन मे अनुभूति एव निरीक्षण का वैविध्य है। आत्मानुभूति और निरीक्षण का जीवन मे विशेष स्थान है। सार्वजनीन अनुभूति और निरीक्षण सामान्य सिद्धान्तों को जन्म देते हैं । लोकोक्तियो मे हमे इस भूमि पर आधारित निश्चित सिद्धान्तो के दर्शन होते हैं 170 इन सिद्धान्तो की सीमा देश काल आदि से परिबद्ध होती है । श्री श्याम परमार के अनुसार लोकोक्तियो म सत्य स्पष्ट है, फिर कहावतें पूर्ण सत्य तो नही कही जा सकती। उसका सकेत भर कहावतें प्रस्तुत करती हैं। एक स्थान- विदोष का सत्य व दूसरे स्थान-विशेष का सत्य पूर्णत नहीं होगा। अपने स्थान की सीमा और तत्कालीन प्रभाव उसमे होगा। यदि लोकोक्तियो में निहित पूर्ण या अपूर्ण, वैज्ञा- निक अथवा विज्ञान-रहित सत्यता का प्रश्न छोड दिया जाय, तो भी विद्वानो ने इनमें माशिक-पाक्षिक रूप से अथवा असत्य को तो स्वीकार किया ही है। यथार्थत लोकोक्ति के लोक-प्रचलन का हेतु इसमे निहित मानवीय अनुभव एव उनकी सत्यता है, जिनके अभाव में सारहीन एवं प्रभावशून्य होकर उक्ति मात्र ही रह जाती है । अत कहा जा सकता है कि लोकोक्ति किसी गहन अनुभूति एव महत्त्वपूर्ण तथ्य की चिन्तनापूर्ण अभिव्यक्ति है। इनमें मानव जीवन के सुख-दुख, हर्प विषाद, रचि-अरुचि, ईर्ष्या-लोभ आदि सभी को सूत्र रूप से व्याख्या होती है। जातियो के आचार विचार, रीति-रिवाज, मनन चिन्तन, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, सास्कृति जीवन-सभी को अभिव्यजना इनमे होती है । सासारिक व्यवहार पटुता का जैसा निदर्शन इनमे मिलता है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है । इनम जीवन के सत्य बडी खूबी के साथ प्रकट होते हैं। लोकोक्ति को कुछ अन्य विशेषताएएव परिभाषाए-लोकोक्ति की एक विशेषता है प्रसगानुकूल उपयुक्तता अथवा इसका यथावसर प्रयोग । लोकोक्ति की यह विशेषता इसके प्रयोग पर आधारित है । प्रसग के अनुरूप प्रयुक्त होकर लोकोक्ति प्रभावशाली बन 36 - लोकोक्ति और मुहावरा रूप विश्लेषण जाती है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल लोकोक्ति को परिभाषित करते हुए लिखते हैं- लोकोक्तिया मानवीय ज्ञान के चोखे और चुभते हुए सूत्र हैं । वे मानवीय ज्ञान के धनीभूत रत्न हैं, जिन्हें बुद्धि और अनुभव की किरणो से सदा फूटने वालोज्योति प्राप्त होती हैं। डॉ० अग्रवाल ने यहा लोकोक्ति को आर-पार कर जाने वाली चुभन अथवा उसको प्रमा- वोत्पादकना प्रतिपादित करने के लिए अन्य गुणो के साथ इन्हें 'चुभते हुए सूत्र' कहकर प्रसगानुकूलता एव लोकोक्ति को प्रभावात्मकता का सकेत किया है। श्री विक्रमादित्य मिश्र भी लोकोक्ति के यथावसर प्रयोग पर बल देते हुए लिखते हैं-चूकि ये सूत्र वाक्य (कहावत) जीवन के सार्वभौम सत्य-सुख दुख, जीवन-मरण आचार-विचार, रीति- नीति, खान-पान, शकुन-अपशकुन, सेती-बारी,आहार-विहार,पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, आदि सभी से सम्बद्ध हैं, इसलिए ये सामान्य अथवा सर्वमान्य उक्तियो के रूप में प्रचलित हो गए और चूकि ये उक्तिया यथावसर परस्पर कही सुनी जाती रही, इसलिए इन्हे लोक-जीवन मे 'कहावत' नाम से अभिहित किया गया।" लोकोक्ति का प्रयोग यथाप्रसग किसी तथ्य, मान्यता और स्थिति में से किसी एक के पोपण आदि के लिए होता है। डॉ० कन्हैयालाल सहल प्रयोग की दृष्टि से लोकोक्ति की परिभाषा करते हुए लिखते है-अपने कथन की पुष्टि में किसी शिक्षा या चेतावनी देने के उद्देश्य से किसी बात को किसी आड मे रहने के अभिप्राय से अथवा किसी के उपालम्भ देने व किसी पर व्यग्य कसने आदि के लिए अपने मे स्वतन्त्र अथं रखने वाली जिस लोक प्रचलित तथा सामान्यत सारगभित सक्षिप्त एव घटपटी उक्ति का प्रयोग लोग करते हैं, उसे लोकोक्ति अथवा कहावत का नाम दिया जा सकता है । डॉ० सल ने लोकोक्ति का प्रयोग अपने कथन की पुष्टि के रूप में माना है, वहा डॉ० भोलानाथ तिवारी ने इसका प्रयोग किसी यात की पुष्टि अथवा विरोध के लिए माना है। डॉ. तिवारी ने लोकोक्ति की परिभाषा इस प्रकार प्रस्तुत की है-लोकोक्ति अनुभव, ऐति- हासिक या पौराणिक कथाओ या प्राकृतिक नियमो पर आधारित ऐसी सक्षिप्त और सार- गर्भित लोक प्रचलित उक्ति या कथन है, जिसका कि उपदेश किसी बात की पुष्टि या विरोध मादि के लिए होता है। प्रस्तुत परिभाषा मे परिभाषाकार ने निम्न तथ्यो को प्रस्तुत किया है- (क) लोकोक्ति के आधार मानवीय अनुभव, प्राचीन कथाए व प्राकृतिक नियम (ख) यह सक्षिप्त एव सारगर्भित उक्ति है। (ग) लोक प्रचलित होने पर कोई उक्ति लोकोक्ति का रूप धारण करती है । (घ) इसका प्रयोग क्सिी वात की पुष्टि या विरोघ आदि के लिए होता है। इनमे प्रथम एव अन्तिम तत्त्व जो कि लोकोक्ति के आधार एव प्रयोग हेतु हैं, पर विशेप बल दिया है। प्राचीन कथाआ को ही लीजिए। अनेक लोकोक्तिया प्राचीन कथाओ पर बाधारित होती हैं, उदाहरणार्थ दुर्योधन द्वारा कथित महाभारतकालीन लोकोक्ति है- 'सूच्यामपि नंव दास्यामि यिना युद्धन केशव ।' यह उक्ति सुप्रसिद्ध है, इसे ऐतिहासिक लोकोक्ति : स्वरूप-विवेचन : 37 महत्त्व की उक्ति कहा जा सकता है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण की दुर्योधन के प्रति उक्ति सूरदास के शब्दों मे है-'वै विध भोजन कोज राजा। विपत्ति पर के प्रोत।' कुभनदास की सुप्रसिद्ध उक्ति--'भक्त को (भक्तनि को) कहा सोकरी काम' भी ऐतिहासिक महत्त्व की लोकोक्ति है। इसमे जहा भक्त प्रवर कुभनदास को निस्पृहता एव निर्भयता व्यजित है, वहा ऐतिहासिक घटना पर आधारित होने के कारण यह उक्ति बहुत महत्त्वपूर्ण बन डॉ. तिवारी ने लोकोक्ति का अन्य आधार प्राकृतिक नियम स्वीकार किया है। अनेक लोकोक्तिया प्राकृतिक नियमो पर आधारित होती हैं, यथा समय एव परिस्थिति के अनुसार कार्य करने की प्रेरणा देने वाली एक लोकोक्ति है-'जैसी चले बयार, तब तैसी दोर्ज ओट ।' कवि वृन्द ने इसका प्रयोग इस प्रकार किया है-- बनती देख बनाइए, पूरन न दीजै खोट । जैसी चले बयार तब, तैसी दोर्ज ओट 177 'बयार' शब्द वायु का वाचक है । वात या वायु प्रकृति का महत्त्वपूर्ण उपादान है। 'जल' को लीजिए । पचतत्त्वात्मक सृष्टि में 'जल' का स्थान महत्त्वपूर्ण है । वर्षा पर आधारित अनेक लोकोक्तियां हैं । सावन-भादो मास पर आधारित एक लोकोक्ति है-~'जैसा सूखा साधन, वैसे भरा भादों। जब किसी व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सुख प्राप्त होने के स्थान पर बराबर दुख ही भोगना पडता है, तब इस प्राकृतिक लोकोक्ति का प्रयोग होता है । अनेक लोकोक्तिया प्राकृतिक नियमो पर आधारित होती हैं । डॉ० तिवारी का यह कथन कि लोकोक्ति अनुभव, ऐतिहासिक-पौराणिक कथाओ या प्राकृतिक नियमो पर आधारित है, पूर्णत स्वीकार्य इसलिए नहीं कि क्योकि इसमें अव्याप्ति दोष है । लोकोक्ति अनुभव पर आधारित है, इसमे सन्देह नही, किन्तु यह मानवीय अनुभव अनेकविध है, जिसका एक रूप प्रकृति भी है, अत: उनका यह आधार-निर्धारण दोय-पूर्ण हो जाता है। प्रकृति के अतिरिक्त लोकोक्ति लोक एव शास्त्र पर भी आधारित होती है। कुछ लोकोक्तियो का आधार जहा लोक-न्याय है, वहा अनेक शास्त्रीय कथन लोकोक्ति के रूप मे परिवर्तित हो गए हैं । अनुभवो का वैविध्य लोकोक्ति को व्यापक रूप प्रदान करता है। डॉ० तिवारी का यह कथन कि इसका उपदेश किसी बात की पुष्टि या विरोघ आदि के लिए होता है, चिन्तन की अपेक्षा रखता है। उपदेश के अतिरिक्त लोकोक्ति में आलोचना का रूप भी प्राप्त होता है । विशेषत जहा पुष्टि न होकर विरोध का स्वर मुखर होता है, लोकोक्ति मे उपदेशात्मकता लुप्त हो जाती है। हॉ० तिवारी ने इसके प्रयोग के दो हेतु पुष्टि एव विरोध स्वीकार किए हैं। कुछ लोकोक्तियो मे दोनो एकत्र दर्शन होते हैं। इनमे एक की पुष्टि तथा दूसरे का विरोध होता है । उदाहरणार्थ सस्कृत की एक लोकोक्ति है--'पक तु नभसि मिप्या क्षेप्त पतति मूनि ।' अर्थात् आकाश पर कीचड फैरने वाले व्यक्ति पर ही कीचड गिरता है । इसका भाव है यदि कोई व्यक्ति सज्जन व्यक्ति की निन्दा करे तो सज्जन निन्दनीय नहीं होता, प्रत्युत निन्दम स्वय घृणा का पात्र बन जाता है। इसी भाव को स्पष्ट मरने वाली एक लोकोक्ति है--'धूल डालने से सूरज 38 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेपण नहीं छिपता। इसमे जहां मज्जन की सज्जनता की पुष्टि है, यहां दुर्जन की दुर्जनता के प्रति विरोध प्रकट किया गया है। एक लोकोक्ति है-"कुत्ते भूक्ते रहते हैं और कारवां (हायो) चलता रहता है।" तुच्छ लोगों को आलोचना की चिन्ता न करते हुए बडे लोग अपना काम करते रहते हैं। यहां भी बड़े व्यक्तियों की कार्य पद्धति की पुष्टि एव तुच्छ व्यक्तियो की आलोचना के प्रति विरोध प्रकट किया गया है। लोकोक्तियो का प्रयोग पुष्टि-विरोध आदि भिन्न-भिन्न दृष्टियो से भी होता है। पुष्टि को ही लीजिए । इसमे किसी बात का पोपण अथवा मण्डन होता है। दृढ़ प्रतिज्ञ व्यक्ति प्राणपण से अपनी प्रतिज्ञा निभाते हैं, उसे भग नहीं करते । उनको दृढ़ता की पुष्टि मे एक लोकोक्ति है- सिंह गमन सुपुरुष वचन, कदलो फिरे इक बार। तिरिया तेल हमीर हठ, घड़े न दूजी यार ॥1 कवि नन्ददास ने भ्रमर के माध्यम से अधिकारी के महत्त्व की चर्चा की है- अधिकारी धो भलो रस जाने । अलि बिन मामलहि को पहचान 182 विरोध पुष्टि का प्रतिरूप है । इसका स्वर खण्डनात्मक होता है। यथा परछिद्रान्वेपण को ही लीजिए । इस प्रवृत्ति को घृणाहं एवं हेय माना गया है। इलाचन्द्र जोशी ने पर- छिद्रान्वेषी व्यक्ति के प्रति लोकोक्ति के माध्यम से अपना विरोध प्रकट किया है--'काली पतीली अपनी ही तरह काली बलटोही को 'काला' कहती है ।' एक दोषी व्यक्ति का दूसरे दोपी व्यक्ति की आलोचना करने पर इसका प्रयोग होता है। उपयोग की दृष्टि से डॉ० तिवारी की दो दृष्टिया-पुष्टि एव विरोध के द्वारा सभी प्रकार की लोकोक्तियो को इनके अन्तर्गत समाहित नही किया जा सकता। डॉ० सत्येन्द्र द्वारा विवेचित लोकोक्तियो के उपयोग की चार दृष्टिया साधारणतः मान्य रही हैं। ये हैं--पोषण, शिक्षण, आलोचन एव सूचन । लोकोक्तियो के प्रयोग की दृष्टि से डॉ० रमेशचन्द्र का यह कथन अपेक्षाकृत सम्यक् प्रतीत होता है-लोकोक्तियो के विश्लेपण करने से ज्ञात होता है कि इनमे संक्षिप्तता, सारगभितता, सप्राणता, लोका- नुभव, लोकप्रियता, परम्परित ज्ञान, हास्य, व्यग्यात्मकता, आलकारिकता, सूत्रात्मकता, चमत्कार, प्रभावोत्पादकता, सत्यता, नीति, आलोचन, सूचन, निर्देश एव पोपण आदि तत्त्व मिलते हैं।83 डॉ. सत्येन्द्र द्वारा प्रतिपादित पोपण, शिक्षण, आलोचन एव सूचन चार दृष्टियो मे शिक्षण के स्थान पर डॉ. रमेश चन्द्र ने नीति का तथा 'सूचन' के साथ "निर्देश' का प्रयोग किया है, वह सूचन के ही निकट है । उपयोग सम्बन्धी चार दृष्टिया ही विचारको ने प्रकारान्तर से स्वीकार की हैं। डॉ. रमेशचन्द्र ने लोकोक्ति मे निहित हास्य, व्यग्यात्मकता, आलकारिकता आदि को चर्चा के साथ अन्य तत्त्व चमत्कार स्वी. कार किया है । चमत्कार अथवा रमणीयता की सृष्टि करने वाली लोकोक्ति में कही अलकार के माध्यम से सौन्दयं के दर्शन होते हैं, तो कही हास्य-व्यग्य आदि के द्वारा अद्भुत चमत्कार उत्पन्न होता है । लोकोक्ति मे निहित इस सौन्दर्य का उद्घाटन ही हमारे शोध- प्रबन्ध का विषय है। डॉ. रमेदाचन्द्र ने जिन तत्त्वो को छोड़ दिया है, मुख्यतः वे हैं- - - लोकोक्ति स्वरूप विवेचन 39 पशब्द शक्ति, रस, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि। लोकोक्ति मे जहा रसात्मकता होती है वहा उक्ति वैचिश्य के भी दर्शन होते हैं । ध्वन्यात्मकता लोकोक्ति को एक विशेषता है। लक्षणा व्यजना शब्द शक्ति क माध्यम से लोकोक्ति अपने अर्थ गाम्भीर्य को प्रकट करती है। यही नहीं बिम्ब-विधान के सफल सयोजन के द्वारा लोकोक्ति एक चित्र उपस्थित करती है जिससे जहा इसके अर्थ का स्पष्टीकरण होता है, वहा इसका भाव भी हृदयगम हो जाता है तात्पर्य यह है कि लोकोक्ति मे निहित सौन्दर्य तत्त्व का दर्शन विभिन्न दप्टियो द्वाराकिया जा सकता है। शब्द शक्ति की दृष्टि से विचार करते हुए डॉ. रमेशच द्र लिखते हैं--लोकोक्तिया वाक्यात्मक, लक्ष्यात्मक एव व्यग्यात्मक तीनो ही प्रकार की होती हैं. तुलनात्मक दृष्टि से व्यग्यात्मक लोकोक्तियों सख्या मे सबसे अधिक होती हैं। पाश्चात्य विचारको ने भी लोकोक्तियो मे शब्द शक्ति या अभिप्राय की अनिवायता स्वीकार की है। लोकोक्ति के अन्य तत्वो मे डॉ. मदन लाल शर्मा ने अपने शोध प्रबन्ध में उपर्युक्त तत्त्वो के अतिरिक्त तीन अन्य तत्त्वो को अनिवार्य माना है। ये हैं- सरलता, 2 उप- योगिता, और 3 पूर्ण वाक्य या वाक्य समूह का प्रयोग 186 ५० मुरलीधर व्यास ने अपनी परिभाषा मे लोकोक्ति को घरेलू भाषा कहकर इसको सरलता' को ओर सकेत किया है 187 डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय के मतानुसार लोकोक्तियां वडी सरल भाषा मे निबद्ध होती हैं जिससे सुनते ही इनका अथ हृदयगम हो जाता है। इनकी यही सरलता इनके अतिशय प्रभाव उत्पन्न करने का कारण है। जो वस्तु अथ काठिन्य के कारण समझम नही आती उसका प्रभाव हृदय पर नहीं पड़ता। परतु लोकोक्तिया अपनी सरसता और सरलता के कारण हृदय पर सीधे चोट करती हैं। जैसे- नसफट पनहो, बतकट जोय जो पहिलोठी विटिया होय । पातर कृषी बौरहा भाय, घाघ कहे दुख कहा समाय। यह बात किसी से छिपी नही है कि पैर का काटने वाला जूता और (पति को) बात काटने वाली स्त्री कितनी दुखदायी होती है। इसके साथ ही कमजोर फसल और शत्रुता रखने वाला भाई भी व्यक्ति के कष्ट के कारण हुआ करते हैं। घाघ ने इही बातो का बड़ी सोधी सादी भाषा मे कहा है जिसका प्रभाव ग्रामीण जनो के हृदय पर मयत सहजता से होता है । अत सरलता को लोकोक्ति को लोकप्रियता का यदि सहायक गुण स्वीकार किया जाए, तो आपत्ति न होगी। उपयोगिता लोकोक्ति का एक अनिवाय तत्त्व है। प्राय देखा जाता है कि लोकोवित की उपयोगिता समाप्त हो जाने पर इसका प्रचलन भी अवरुद्ध हो जाता है। डा. शर्मा ने लोकोक्तियो मे यह उपयोगिता दो प्रकार की मानी है-- (1) शाश्वत उपयागिता जा सावदेशिक और सादकालिक होती है। (2) अशाश्वत उपयोगिता जो समय और स्थानानुसार परिवर्तित होती रहती 40 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण है । शाश्वत उपयोगिता मे एक 'सार्वभौम सत्य' निहित रहता है । जैसे—'एक हाथ से ताली नहीं बजती।' अतः उसका कभी लोप नहीं होता। अशाश्वत लोकोक्ति का उपयोग समय के व्यतीत होने के साथ ही साथ समाप्त भी हो जाता है। जैसे—'डमिनेच्छा वलीयसी' आदि।89 उपयोगी न रहने के कारण ऐसी लोकोक्तिया काल कवलित हो जाती हैं। डॉ० शर्मा ने लोकोक्ति का अन्तिम तत्त्व पूर्ण वाक्य या वाक्य समूह का प्रयोग माना है । 'पूर्ण वाक्य' या 'पूर्ण कथन' के बिना लोकोक्ति मुहावरे की कोटि मे चली जाएगी क्योकि 'मुहावरा' एक 'वाक्याश' मात्र ही होता है। लोकोक्ति और मुहावरे मे प्राय: अनेक गुण तो समान ही होते हैं, परन्तु केवल 'दाक्य' और 'चाक्याश' का ही अन्तर रहता है । मुहावरे के साथ लोकोक्ति का अन्तर स्पष्ट करते हुए इस विषय पर विस्तार पूर्वक आगे विचार किया गया है। लोकोक्ति की अन्य विशेषताओ मे एक विशेषता है-तुक साम्य । तुकान्त होने पर लोकोक्ति शीघ्र ही याद हो जाती है। मुख-सुख लोकोक्ति को तुकान्त बनाने में सहायक होता है । तुकान्त लोकोक्ति चिरस्थायित्व प्राप्त करती है और लोक-जिह्वा पर नर्तन करवे लोकप्रियता भी प्राप्त कर लेती है। लोकाक्तिया गद्यबद्ध और पद्यबद्ध दोनो प्रकार की होती हैं । गद्यबद्ध लोकोक्ति शुष्क वाक्य से भिन्न होती है । इसमे एक लय होती है । यदि लय का संगीत न हो तो भी लयाश (रिदिम) अवश्य विद्यमान होता है । इस लय को तुक द्वारा सुविधा प्राप्त होती है, परिणामत. लोकोक्ति चमत्कारपूर्ण बन कर जन-वाणी मे मुखरित जाती है और श्रोता अथवा पाठक को अपनी इस आकर्षण शक्ति द्वारा आकपित कर लेती है । एक लोक प्रसिद्ध उक्ति है-वनिया जान-प,चान वाले को और ठग अनजान को ठगता है—'वनिया मारे जान, चोर(ग) मारे अनजान ।'91 किन्तु सर्वत्र ऐसा नहीं होता। कही-कही सतुलित वर्णों की आवृत्ति से विशिष्ट शब्द ध्वनि निर्मित होवर लयाश उत्पन्न करती है। यया--'सेया भए कोतयाल अव उर काहे का 12 लोकोक्ति मे अप्रस्तुत प्रयोग भी होता है । इस अप्रस्तुत प्रयोग के द्वारा प्रस्तुत विषय का प्रतिपादन किया जाता है। उदाहरणार्थ-'नाच न जाने बायरी कहै आगन टेढ़ो।' यहा कर्म करने को कुशलता का सर्वथा अभाव है किन्तु अपनी अकुशलता या अनिपुणता वो प्रच्छन्न रखने के अभिप्राय से किसी अनुपयुक्त कारण का उल्लेख किया गया है । सामान्यतः विस्तृत होने के कारण आंगन नृत्य के उपयुक्त होता है किन्तु उसमे दोप बताकर नृत्य न करने को विवशता को प्रकट किया गया । इस प्रकार यहा प्रस्तुत है फर्म करने की अनिपुणता के परिणामस्वरूा तत्वार्य के साधन को व्याज मे अनुपयुक्त बनाकर अपनी अनुशलता को प्रच्छन्न रखना तथा अप्रस्तुत है नतंन की अज्ञानता से आगन को मिथ्या ही दोपयुक्त बनाना । ऐमो लोकोक्तियो मे अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत विषय का प्रतिपादन किया जाता है. स्तुि लोरोक्ति और अप्रस्तुत विधान एक ही शन्द में दो पर्याय नही, क्योंकि हर लोकोक्ति अप्रस्तुत प्रयोग नहीं है और हर अप्रस्तुत-विधान सोक्ति नहीं है । कुछ ऐमी भी लोकोक्तिया होती हैं जिनमे मात्र प्रस्तुत का ही प्रति- लोकोक्ति : स्वरूप-विवेचन : 4! 193 पादन होता है, यथा--"ईश्वरेच्छा बलीयसी', 'पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं सूर की एक उक्ति भी इसी प्रकार को है-अति सर्वत्र भलो नहीं, कहिगे सन्त अनन्त ! रहीम ने भी कहा है- रहिमन अति न कीजिए, गहि रहिए निज कानि । सहिजन अति फूल डारि पात को हानि । इसी प्रसग में यह भी उल्लेख्य है कि लोकोक्ति का यथार्थ स्वरूप व उसमे निहित भक्ति तभी प्रस्फुटित होती है जब उसका प्रसंगानुकूल प्रयोग किया जाए। यथा-'गोरस बेचन हरि मिलन एक पंप दो काज' मे मात्र 'एक पन्य दो काज' लोकोक्ति का प्रसग रहित प्रयोग किया जाए तो वह प्रभावोत्पादक नहीं होगी, किन्तु प्रसंगवशात् गोपिकाओ के कथन रूप मे यह लोकोक्ति 'एक पन्थ दो काज' इसलिए सार्थक है क्योकि एक साथ ही नवनीत-विक्रय एवं श्रीकृष्ण-दर्शन का द्विगुणित लाभ को बतलाया जाना अभि- प्रेत है। डॉ० सत्येन्द्र ने लोकोक्ति की निम्न विशेषताएं स्वीकार की हैं-- (क) लोकोक्ति साधारणत. लघु होती है. यथा-अगायो सो सवायो । (ख) गद्य के अतिरिक्त पद्यबद्ध भी होती हैं तथा सतुक होती हैं, यथा--'स्यारी बाप ही ते न्यारी। कभी-कभी शब्द-ध्वनि की सतुलित आवृत्ति से छन्द चरण निर्मित हो जाता है-'घर की खाड किस किसी लाग, बाहर को गुड मीठो। (ग) अधिकाश कहावतें अन्योक्तियां होती हैं । इससे अभिप्राय विस्तत हो जाता है।-'आगे नाथ न पीछे पगहा।' यह बैल से सम्बन्धित है, पर अनाथ आवारा के लिए ठीक बैठेगी । उक्ति में वणित 'विशेष' मे जो 'सामान्य' रहता है, उसी 'सामान्य' के अर्थ मे उसका चाहे जहा उपयोग किया जा सकता है। (घ) विशेष का संयोजन और उसके द्वारा वैचित्र्य का विकास-इसमे असाधारण कल्पना होती है, यथा-'छदाम की बुढिया।' बुढ़िया छदाम कैसे हो सकती है ? ऐसे स्थलो पर कल्पना की सभावना-असभावना का ध्यान नही, वैचित्र्य का प्राधान्य होता है। ऐसी कहावतें (ब्रज मे) बहुत कम, अपवाद स्वरूप ही हैं। (च) प्रकृति का गम्भीर निरीक्षण एव तत्सम्बन्धी सचित अनुभव-ये ज्ञान कोश को भांति कृषि आदि मे सहायक हैं । पशु-स्वास्थ्य-शुभाशुभ आदि के सम्बन्ध मे कही गई लोकोक्तिया ज्ञानवर्द्धक होती हैं। (छ) घटना या कहानी से सम्बन्धित-यथा--'कायस्थ का बच्चा कभी न सच्चा, जो सच्चा तो गधे का बच्चा 1195 उपर्युक्त विवेचन मे डॉ० सत्येन्द्र ने लोकोक्ति की जिन विशेषताओ से अवगत - 42 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेपण कराया है, वे प्राय पूर्वोक्त ही हैं । प्रथम विशेषता सक्षिप्तता है, द्वितीय तुकान्त । तृतीय और चतुर्थ विशेषता का अन्तर्भाव लोकोक्ति की आलकारिकता एव उक्ति-वैचित्र्य के अन्तर्गत हो जाता है । अन्तिम दोनो विशेषताए लोकोक्ति के विषयगत आधार प्रकृति एव कथा के अन्तर्गत पूर्वत वणित हैं । डॉ. सत्येन्द्र का यह प्रतिपादन इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योकि इन्होने लोकोक्ति को प्रमुख विशेषताओ का पृथक्-पृथक् सोदाहरण निरूपण किया है। डॉ० गयासिंह 'तुलसी-काव्य की लोक तात्त्विक सरचना' नामक पुस्तक में लोकोक्ति की निम्न विशेषताए प्रदर्शित करते हैं- लोकोक्तियां समाज-नीति, धर्म, अनुभव, व्यवहार, शिक्षा, उपदेश, विश्वास, रीति, ज्ञान आदि से सवलित रहती हैं। इनका स्वरूप घटनात्मक, कथात्मक, व्यग्यात्मक, वस्तुनिर्देशात्मक, सवादात्मक और उपदेशात्मक होता है। ये गद्यात्मक और पद्यात्मक दोनो रूपो मे होती हैं और प्राय एक विचार, भाव, घटना आदि से सदभित रहकर पूर्ण वाक्य या सार्थक पद-समूहो मे व्यक्त की जाती हैं। एक ही मूल की विभिन्न भाषाओ तथा बोलियो मे कुछ सामान्य हेर फेर से इसका ढांचा एक-सा रहता है । भाषा के कवि इनके माध्यम से अपने काव्यात्मक कथनो को अधिक तीव्र तथा प्रेषणीय बनाते एव उनमे चमत्कार और मार्मिकता लाते रहे हैं ।96 कहना न होगा कि प्रस्तुत विवेचन मे डॉ० गया सिंह ने लोकोक्ति के विषय-वैविध्य का प्रतिपादन करते हुए उसे उभयरूपा स्वीकार किया है। उनका यह कथन है कि एक ही मूल की विभिन्न भाषाओ तथा वोलियो मे कुछ सामान्य हेर-फेर से इसका ढांचा एक-सा रहता है, उपयुक्त प्रतीत होता है । इसके साप उन्होने जो यह कहा है कि लोकोक्ति के द्वारा काव्य भाषा मे तीव्रता, प्रेषणीयता, चमत्कार एव मामिकता को सृष्टि होती है, काव्य भाषा मे इसके प्रभाव-सामर्थ्य का प्रतिपादन है । इस सम्बन्ध मे विस्तारपूर्वक चर्चा की जाएगी। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर लोकोक्ति की निम्नाकित विशेषताए निर्धारित की जा सकती हैं- -सक्षिप्तता, सारगर्भितता एव सप्राणता इन तीनो तत्त्वो का निरूपम श्री आर०सी० देंच ने और चौथे तत्त्व लोकप्रियता को हेस्टिग्स ने स्वीकार किया। डॉ०कन्हैयालाल 'सहल' ने सक्षिप्तता, सारभितता एव सप्राणता किसी उत्कृष्ट लोकोक्ति के तो अपरिहार्य गुण स्वीकार किए हैं, किन्तु लोकोक्ति मात्र के अनिवार्य गुण नहीं माने हैं। डॉ० सहल ने अपने मत की पुष्टि के उप- युक्त उदाहरण भी उद्धृत किए हैं, जिनका खण्डन अनेक विद्वानो ने किया है। सक्षिप्तादि लोकोक्ति के अनिवार्य गुण हैं। यद्यपि कुछ लोकोक्तिया सक्षिप्त न होकर विस्तृत भी होती हैं; किन्तु इस प्रकार की लोकोक्तिया अपवाद स्वरूप ही कही जाएंगी, क्योकि प्राय लोकोक्ति सक्षिप्त होती है । सारगर्मितता एव मप्राणता का अभाव लोकोक्ति को स्वीकार्य नहीं है। डॉ. लक्ष्मी नारायण गर्मा ने सजीवता को सारगभितता के अन्तर्गत माना है, जो उचित प्रतीत नहीं होता। सारगमितता एव सपाणता लोकोक्ति के दो भिन्न-भिन्न तत्त्व हैं।

लोकोक्ति स्वरूप-विवेचन : 43 लोकप्रियता लोकोक्ति का प्राणतत्त्व है। -लोकोक्ति मे निहित मानवीय अनुभव एव उनकी सत्यता के विषय मे विद्वानो मे विवाद रहा है । कुछ विद्वानो ने लोकोक्ति के सत्य को चरम सत्य माना है तो कुछ विचारकों-टी०टी० मुगर आदि ने अद्धसत्य मात्र स्वीकार किया है। वस्तुत जीवन के अन्त एव बाह्य पक्ष का, इहलोक एव परलोक का, जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त विविध अनुभवो का उद्घाटन लोकोक्ति के माध्यम से होता है। अनुभवो का वैविध्य लोकोक्ति मे प्रतिपादित ज्ञान को विविधता प्रदान करता है। -कुछ विद्वानो ने लोकोक्ति का आधार ऐतिहासिक या पौराणिक कथाओ एव प्राकृतिक नियमो को माना है। लोकोक्ति का यह आधार अपनी सीमाओ का स्पष्ट सकेत कर देता है। मानवीय अनुभव का क्षेत्र जितना विस्तृत होगा, लोकोक्ति का विषयगत वैविध्य भी उतना ही व्यापक बन जाएगा। प्राकृतिक अनुभव भी मानवीय अनुभव का एक रूप है। इससे इतर भी लोक-शास्त्र आदि द्वारा भी अनुभवो का ग्रहण कर, उन्हें लोकोक्तियो मे समाविष्ट किया गया है। ऐतिहासिक-पौराणिक घटना-कथा, प्राकृतिक अनुभव के अतिरिक्त लोक एव शास्त्र का सारतत्त्व भी लोकोक्ति का आधार निर्मित कर इसे सारगर्भित बनाते हैं। -~-प्रयोग को दृष्टि से डॉ० तिवारी ने पुष्टि अथवा विरोध-इन दो दृष्टियो की स्थापना की है, किन्तु उनका यह मन्तव्य सीमापूर्ण है। लोकोक्तियो का उपयोग डॉ० सत्येन्द्र द्वारा विवेचित चार दृष्टियो-पोपण, शिक्षण, आलोचन एव सूचन द्वारा ही प्राय मान्य रहा है। डॉ० रमेश चन्द्र ने अपने शोध प्रबन्ध मे नीति, निर्देश आदि शब्दो का प्रयोग कर नवीनता लाने का प्रयत्न किया है, किन्तु प्रकारान्तर से उपयोग सम्बन्धी ये दृष्टिया डॉ. सत्येन्द्र के द्वारा विवेचित चार दृष्टियों के समानान्तर ही व्याख्यायित हुई हैं। इनके अतिरिक्त डॉ. रमेदा चन्द्र ने इममे हास्य, व्यग्यात्मक, आलकारिकता आदि विशेषताएं स्वीकार की हैं। --शब्दशक्ति की दृष्टि से लोकोक्तिया वाच्यात्मक, लक्ष्यात्मक एव व्यग्यात्मक तीनो ही प्रकार की होती हैं, किन्तु तुलनात्मक दृष्टि से व्यग्यात्मक लोकोक्नियो की सख्या सर्वाधिक होती है। - लोकोक्ति के अन्य तत्वो में डॉ. मदनलाल शर्मा ने तीन अन्य तत्व माने हैं। ये हैं-सरलता, उपयोगिता एव पूर्ण वाक्य 1 ५० मुरलीधर व डॉ. कृष्णदेव ने भी 'सरलता' पर विशिष्ट बल दिया है। -'तुक साम्य' लोकोक्ति की एक अपूर्व विशेपता है। गद्यरद्ध और पद्यबद्ध दोनो ही प्रकार की लोकोक्तियो मे लय अथवा लयांश मनिवार्यत होता है।

44 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेपण -डॉ० सत्येन्द्र के मतानुसार लोकोक्तिया प्राय अन्योक्तिया होती हैं। आलकारिकता लोकोक्ति वो अभिन्न विशेषता है। -- लोकोक्ति समग्रत सौन्दर्य को सृप्टिकी है। लोकोक्ति द्वारा निष्पादित सौन्दर्य का उद्घाटन रस, अलकार, ध्वनि, उक्ति-वैचित्र्य, शब्द-शक्ति, व्यग्य एव बिम्ब-विधान आदि विभिन्न दृष्टियो के द्वारा देसा जा सकता है । -लोकोक्ति की अन्तिम विशेषता है इसका प्रसगानुकूल प्रयोग । इससे प्रकरण मे प्रभावात्मकता आती है। लोक-व्यवहार के अतिरिक्त साहित्य के क्षेत्र मे लोकोक्ति के प्रयोग के द्वारा काव्य-भाषा मे तीव्रता, प्रेषणीयता, चमत्कार एव मार्मिकता की सृष्टि होती है। डॉ० गयासिंह ने अपने विवेचन मे काव्य मापा और लोकोक्ति के सम्बन्ध पर विचार किया है। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्पत लोकोक्ति के स्वरूप को इस प्रकार स्थिर किया जा सकता है-किसी ऐतिहासिक-पौराणिक घटना अथवा कथा, प्राकृतिक नियम, लोक व्यवहार (लोक-न्यायादि) एव शास्त्र-सम्बन्धी मानवीय अनुभव पर आधारित ज्ञान (सत्य) को उद्घाटित करने मे समर्थ प्राय सक्षिप्त, सारगर्भित, सजीव, सरल, उपयोगी तथा लोकप्रिय सतुक (लय-लयांशयुक्त) गद्य या पद्यमय पूर्ण वाक्य अथवा वाक्य-समूह का जब प्रसगानुकूल किसी पुष्टि, शिक्षा, आलोचना अथवा सूचना- निर्देश आदि के लिए प्रयोग होता है, तो उसे लोकोक्ति की सज्ञा से अभिहित किया जाता है । इसके प्रयोग से प्रकरण मे जीवन्तता-प्रभावोत्पादकता तथा काव्य-भाषा मे तीव्रता प्रेपणीयता आदि की सृष्टि होती है। समग्रत लोकोक्ति एक चमत्कार अथवा सौन्दर्य की सृष्टि की है। साहित्य मे लोकोक्ति द्वारा निष्पन्न इस सौन्दर्य का दर्शन रस, अलकार, ध्वनि, उक्ति-वैचित्र्य, शब्दशक्ति एव व्यग्य आदि विभिन्न दृष्टियो के परिप्रेक्ष्य मे किया जा सकता है। इनके सभी काव्यागो के आलोक मे लोकोक्ति मे निहित सौन्दर्य का अन्वेषण इन पक्तियो के लेखक को शोघ कृति का मूल उद्देश्य है। लोकोक्ति के समानान्तर कुछ अन्य शब्द भी प्रचलित हैं, जिनकी लोकोक्ति के साथ तुलना करते हुए भेदाभेद स्थापित करना आवश्यक है। ये हैं-लौकिक न्याय, वहायत, प्रहेलिका और सूक्ति अथवा प्राज्ञोवित आदि । लोकोक्ति और लौकिक न्याय-सन् 1877 मे डॉ० वीलर की काश्मीर-रिपोर्ट मे न्याय शब्द का प्रयोग 'परिचित उदाहरणो से निकाले हुए अनुमान' के अर्थ मे किया गया था। कर्नल रब ने लौकिक न्याय के पर्याय रूप मे Maxim शब्द ग्रहण किया था, विन्तु इस पर्याय से वे स्वय सन्तुष्ट नहीं थे। उन्होंने तो केवल बडे-बडे विद्वानो द्वारा न्याय के अर्थ मे गृहीत Maxim शब्द को देखकर ही अपनाया था, अन्यथा उनकी मान्यता थी कि अग्रेजी भाषा मे न्याय के अन्तर्गत दृष्टान्त, नियम और अधिवरण तीनो पा सन्निवेश किया गया है। अग्रेजी का Maxim शन्द इतना व्यापक नही है कि वह उक्त तीनो प्रकार के अर्यो या वाचा बन सके । इसलिए जैक्व के मतानुसार तो न्याय लोकोक्ति स्वल्पविवेचन 45 शब्द का अग्रेजी अनुवाद न करके अग्रेजी भाषा मे भी इसे ज्यों का-रयो ग्रहण कर लेना, चाहिए। 'लोकोक्ति' एव 'लौकिक न्याय' मे प्राय विद्वानो ने भिन्नता स्वीकार की है। १० रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार तो संस्कृत में लौकिक न्याय के अन्तर्गत बहुसख्यक सूत्र उस समय की या उससे पहले की लोक विश्रुत कहावतें ही हैं। उसमें जो युक्ति-मूलंक: दृष्टान्त हैं, वे किसी एक समय के नही हैं, भिन्न भिन्न परिस्थितियों में पडवर बुद्धिमानो को जो सच्चे अनुभव हुए, उन्ही को उन्होंने सूनबद्ध करके जनता को सौंप दिया। जनता ने उनको उपयोगी समझकर अपना लिया। इस प्रकार भुक्तभोगियों के कितने ही सच्चे हृदयोद्गार लोकोक्तियो के रूप मे प्रचलित हो गए। यहा निपाठी जी ने यही विशेष बात कही है कि सस्कृत साहित्य मे लौकिक न्याय लोकोक्तियो से भिन्न नहीं है तथा लौकिक न्याय के अन्तर्गत बहुसख्यक सूत्र अथवा युक्ति मूलक दृष्टान्त से लोकोक्ति भिन्न नहीं है। लोक-विश्रुत कहावतों को जहा लौकिक न्याय के रूप में स्थान मिला, वहा अनेक सूत्रबद्ध युक्ति-मूलक दृष्टान्त लोकोक्ति के रूप म लोक प्रचलित हो गए। इस सम्बन्ध मे डॉ० कन्हैयालाल सहल ने जो मतव्य व्यक्त किया है, वह इस प्रकार है- (1) अनेक न्याय ऐसे हैं जो एक पदात्मक है । मत्स्य न्याय, टिटिभन्याय आदि उदाहरण स्वरूप रखे जा सकते हैं। विश्व मे शायद ही कोई ऐसी लोकोक्ति हो जो केवल एक पद मे समाप्त हो जाती हो। छोटी-से-छोटी लोकोक्ति क लिए भी कम से कम दो पद आवश्यक है। ट्रेंच के मतानु- सार voll, toll जर्मन-लोकोक्ति दुनिया की सबसे छोटी कहावत है। (2) प्राय न्याम द्विशब्दात्मक हैं, जिनका सम्पूर्ण वाक्य की भाति प्रयोग नहीं होता, यथा-अजाकपाणीन्याय, अन्धगज, कूपमण्डूक न्यायादि। इनके मूल में कोई न कोई कथा मिलती है, जिसको जाने बिना स्पष्टीकरण नहीं हो पाता । अनेक लोकोक्तिया भी ऐसी हैं, जिनके पीछे कोई-न-कोई कथा पाई जाती है, किन्तु लोकोक्ति सम्पूर्ण वाक्य की तरह प्रयुक्त होती है, दो दो शब्दो मे पद्याश की तरह नही। कहावती रूप मे क्रिया का कभी. कभी अभाव होने पर भी क्रिया सदा गम्म रहती है। (3) कुछ न्यायो को लोक प्रसिद्ध उपमाओ का नाम दिया जा सकता है, यथा घभ्रमण न्याय, अरण्यरोदन न्यायादि । लोकोक्तियो मे भी यद्यपि एसे उदाहरण प्राप्त है, किन्तु लौकिक न्यायो मे इस प्रकार की उपमाओ का प्राचुर्य दृष्टिगत होता है। (4) कतिपय न्याय ऐसे भी हैं, जिनमें लोकोक्ति के लक्षण प्राप्त होते है, जैसे (क) भक्षितेऽपि लशुने न शान्तो व्याधि लहसन खाकर भी रोग शान्त न हुआ। जैकब इस प्रकार के न्याय के लिए 'प्रोववं' शब्द का ही प्रयोग करते हैं।

46 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेपण (ख) यरमद्य कपोतः श्वो मयूरात्-कल के मयूर से आज का कपोत अच्छा। (ग) सर्व पद हस्तिपदे निमग्नम्-हाथी के पैर मे सबपर आ जाते हैं। (5) ऐसे न्याय जो कहावत के रूप में उपलब्ध हैं, जैसे 'गौ महिपो न्याय' अथवा राजस्थानी लोकोक्ति -'गाय को भैस के लागे और भंस की गाय के लागे?' अर्थात् गाय और भैस का परस्पर क्या सम्बन्ध ? (6) जैकब द्वारा सगृहीत और सम्पादित लौकिक न्यायाजलि मे कही-कही न्याय के स्थान मे निदर्शन और नियम शब्द का प्रयोग हुआ है। यथा (क) 'तम प्रकाश निदर्शनम्' । अर्थात् अन्धकार और प्रकाश युगपत् स्थिति का दृष्टान्त । (ख) 'तेल फुलपित शालिबीजादं करानुदय नियम.' । अर्थात् तेल से कलुषित बीज के अकुरित न होने का नियम । (7) प्रश्नोत्तर के रूप मे न्याय, यथा- प्रश्न : जागति लोको ज्वलति प्रदीप. सखी जनः पश्यति फोतक मे। क्षणेक मानं कुरु कान्तय बुभुक्षितः कि द्विकरेण भुक्ते॥ उत्तर - जागति लोको ज्वलतु प्रदीप. सखी जनः पश्यति कौतुक मे । क्षणेक मात्र न करोमि धैर्य बुभुक्षितं न प्रतिभाति किचित् ॥ (8) आभाणक न्याय को न्याय का एक भेद माना गया है । 'वराटकान्वेषण प्रवृत्तश्चितामणि लब्धवान्' इसे आभाणक न्याय स्वीकार किया गया है। (9) कुछ कवियों की उक्ति को न्यायान्तर्गत स्वीकार किया गया। यथा- (क) छिद्रेष्वन बहुली भयन्ति (विष्णु शर्मा) अर्थात् विघ्न पर विघ्न आया करते हैं । (ख) सर्वारम्भा हि दोषेण घमेनाग्निरिवावृता. (गीता) अर्थात् जैसे अग्नि घूम से आवृत होती है, उसी प्रकार सब समारम्भ दोष से युक्त होते हैं। डॉ० सहल का लौकिक न्याय एव लोकोक्ति विषयक यह प्रतिपादन यद्यपि उनकी सूक्ष्म विचारशीलता का परिचायक है, तथापि उपर्युक्त वर्गीकरण मे कुछ संशोधन की अपेक्षा है। उदाहरण के लिए चतुर्थ वर्ग को उन्होने न्याय का एक ऐसा रूप माना है, जिसमें लोकोक्ति के लक्षण प्राप्त होते हैं । मेरे विनम्र मत मे वस्तुस्थिति सर्वथा प्रतिकूल है, क्योकि इस वर्ग मे निर्दिष्ट उदाहरण लोकोक्तियों के हो उदाहरण हैं। इनका प्रयोग भी सस्कृत मे लोकोक्तियो के ही रूप मे हुआ है। हां, न्याय का लक्षण यदि इस प्रकार को लोकोक्ति मे स्वीकार किया जाए तो आपत्ति न होगी, किन्तु इन लोकोक्तियो को न्याय स्वीकार करना युक्तियुक्न प्रतीत नहीं होता। इसी प्रकार जहां पर उन्होंने पचम वर्ग के न्यायको कहावत के रूप में माना है और उदाहरण 'गोमहिषी न्याय को उद्युत विया है, उसके मम्बन्ध में मेरा विचार है कि यह उदाहरण लोकोक्ति का उदाहरण न होकर न्याय या उदाहरण हो है । इम प्रकार के ऐसे अनेक न्याय हैं जो आजलोकोक्तियो के रूप में प्रचलित हो गए हैं, अन्वेपण करने से प्रायः सभी वर्गों के लौकिकन्याय के रूपलोकोक्तियों ---- मे प्राप्त हो सकते हैं। इसका मात्र एक ही आधार है, वह है लोक-प्रसार डा महल अनुसारन्याय के अन्तर्गत लोक-प्रचलित पदाश, प्रसिद्ध उपमाएं विश्रुतदर सुमित तथा आमाणक अथवा लोकोक्तिया-सभी को स्थान मिल गया है, किन्तु यह बात लोकोक्ति के विषय मे भी कही जा सकती है। लोकन्याय व उससे सम्बद्ध प्रकार को लोकोक्ति अपने गर्म में समाहित रखती है, किन्तु लोकप्रियता के अभाव में इन्हें भाष सूत्र की सज्ञा देना समीचीन प्रतीत होता है। वे स्वय लिखते हैं कि बहुत से न्याय ऐसे हैं जिन्हें पारिभाषिक दृष्टि से लोकोक्ति तो नहीं कहा जा सकता किन्तु वे सूत्र-शैली मे अथित ऐसे पद-समुच्चय हैं जो अपने मे गम्भीर अर्थ छिपाए हुए हैं। 101 वस्तुत 'लोकोक्ति एव लौकिक न्याय' के पार्थक्य का मुख्य कारण यह भी है कि 'लोकिक न्याय' जहा शास्त्र का विषय होने के कारण ताकिको से सम्बद्ध है, वहा 'लोकोक्ति' का प्रयोग सर्वसाधारण एव शिष्ट सभी प्रकार के व्यक्तियो द्वारा होता है । 'लौकिक न्याय एव लोकोक्ति के परस्परसम्बन्ध के विषय मे उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'लोकिक न्याय' के अन्तर्गत 'लोकोक्ति' तथा 'लोकोक्ति' के अन्तर्गत 'लौकिक न्याय' का भी समावेश है, किन्तु प्रत्येक 'लौकिक न्याय' मे 'लोको- कित' और इसी प्रकार प्रत्येक 'लोकोक्ति' में 'लोकिक न्याय' का समावेश नहीं हो सकता। गूढ, शास्त्रीय अथवा दार्शनिक लौकिक न्याय मात्र शास्त्रबद्ध ही रहते है, जबकि इनसे पृथक् कुछ लोकिक न्याय अपने विशिष्ट गुणो के परिणामस्वरूप लोक-प्रचलित होकर कदाचित् किंचित् परिवर्तन के साथ लोकोक्ति का पर्याय बन जाते हैं। लोकोक्ति और फहायत-कुछ विद्वानो द्वारा इनमे परस्पर भेदाभेद स्थापित करने का प्रयत्न हुआ है। इस समस्या का श्रीगणेश तब हुआ जब कहावत कोश के सपादक डॉ०भुवनेश्वरनाथ मिश्र 'माधव' एव श्री विक्रमादित्य मिश्र ने कहावत को श्रेष्ठ सिद्ध करते हुए लोकोक्ति को सामान्य कोटि का बताया। यही नहीं उन्होने विभिन्न विद्वानो के मतो द्वारा साग्रह अपने मत की स्थापना की। उनका मन्तव्य इस प्रकार है--किसी भी सामान्य उक्ति को लोकोक्ति कहा जा सकता है, लेकिन कहावत लोक की सामान्य उक्ति न होकर एक विशेष प्रकार की सर्वग्राह्य उक्ति होती है । इसके विपरीत लोकोक्ति सर्वग्राह्य होते हुए भी एक सर्वमान्य उक्ति होती है। लोकोक्ति के अन्तर्गत बच्चो के खेल-सम्बन्धी उक्तिया, मनोरजन विषयक उक्तिया, बुझौवल (पहेलियां), निरर्थक अयवा निरभिप्राय सार्थक अथवा साभिप्राय उक्ति होने के कारण लोकोक्ति का ही एक प्रकार है, जिसका एक विशेष प्रयोजन होता है। उपदेश, शिक्षा, ज्ञान, सूचना, आलोचना, मनोविज्ञान, कृषि, व्यवसाय, विधि निषेध, रीति-नीति, हास्य व्यग्य आदि कहावतो के विशेष अभि- प्राय होते हैं।...निष्कर्ष यह है कि कहावतें सार्थक तथा साभिप्राय होती हैं और उनमे सीधे चोट करने को ऐसी क्षमता है, जो शास्त्रीय उपदेश-वाक्यो मे भी उपालम्भ सम्भव नहीं। किन्तु लोकोक्तियां सार्थक अथवा निरर्थक दोनो ही प्रकार की होती हैं ।102 उनका यह मन्तव्य कहावत को उच्चता व श्रेष्ठता बताते हुए लोकोक्ति को निरर्थक एव महत्त्वहीन सिद्ध करता है। किन्तु यह नामक है। उन्होंने लोकोक्ति एद कहावत के विषय मे की : 48 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण गई चर्चा को आधार बनाते हुए अपने मत को पुष्ट कर अर्थ का अनर्थ कर दिया है। उदाहरण देकर आगे वे लिखते हैं -तात्त्विक दृष्टि से कहावत और लोकोक्ति मे अन्तर है । कहावत व्यक्ति की उक्ति होती है, किन्तु लोकोक्ति व्यक्ति की उक्ति होकर व्यक्तित्व विहीन होती है ।103 आगे वे लिखते हैं-कहावतें लोकोक्तियो का एक अंग है। ये निश्चय ही विशेष अभिप्राय से परिचालित होती है ।104 उपर्युक्त विवेचन मे एक में कहावत को लोकोक्ति से बिल्कुल भिन्न तथा दूसरे में लोकोक्ति का ही एक प्रकार माना गया है। यह ठीक है कि कहावत लोकोक्ति का ही एक प्रकार है, किन्तु विशेष प्रकार की उक्ति होने के कारण इसका स्वतन्य अस्तित्व और विशेष अभिप्राय होता है । व्यक्ति को उक्तिया तो कहावत और लोकोक्तिया, दोनो ही हैं, पर एक का अभिप्राय विशेष और दूसरे का सामान्य होता है । एक का सार्थक तथा साभिप्राय होना आवश्यक है, पर दूसरे के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं।...कहावत भी लोकोक्ति ही है, पर वह कर्ने का एक विशिष्ट ढग है, जिसमे बुद्धि-वैभव के साथ-साथ मूक्ति की-सी मार्मिकता और गहरी अन्तदृष्टि तो होती है, उसमे सर्वाधिक प्रधान होता है 'लोकानुभव' जवकि लोकोक्ति का क्षेत्र इससे भिन्न और विस्तृत होता है 1105 श्री भुवनेश्वर नाथ मिश्र 'माधव' के उपर्युक्त मन्तव्य से लोकोक्ति एव कहावत के भेदाभेद से सम्बद्ध सन्देह तो उत्पन्न हो जाता है, किन्तु ताकिकता के अभाव के कारण इनमे भेदाभेद स्पष्ट नही हो पाता। डॉ. सत्येन्द्र के विचार इस विषय मे द्रष्टव्य हैं। उनके विचारानुसार अन्य प्रकार के लोक-साहित्य से भी कहावतो का अधिक भाण्डार मिलता है। परसोकले, पटके, अनमिल्ला खुसि, गहगड्ड आदि रूप और अभिप्राय के कारण कहावत के भेद ही हैं । वे लोकोक्ति के बड़े नाम से भी पुकारे जा सकते हैं । लोकोक्तियो मे मानवीय ज्ञान का सार सन्निहित रहता है । इसमे नीति तो होती ही है, ग्रामीण दर्शन भी होता है । लोकोक्तिया मूत्रो की शैली पर हैं। सूत्र-शैली का विकास उपनिपदो के वाद हुआ और चाणक्य आदि के समय मे 'सूत्र प्रणाली' का अधिकाधिक विकास हुआ। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि सभवतः सूत्र मे ही कहावतो और लोकोक्तियो का विशेष उत्कर्ष हुआ। यह वह उक्ति है जो लोक की उक्ति के साथ ही साथ साहित्य का अग और साहित्य मे भी सम्मान की भागी बनी 1106 प्रस्तुत विवेचन से यह स्पष्ट है कि 'लोकोक्ति' 'वहावत' का समानार्थक शब्द है । लोकोक्ति का विकास उपनिषद् युग के अनन्तर सूत्र-काल मे सूत्र-शैली मे हुआ। अर्थात् जब अनुभूत मानवीय ज्ञान को अति- सक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया तो ये सूत्र जो सुविज्ञो द्वारा निर्मित थे, प्रचार-प्रमार पाफर लोक-विख्यात हो गए और लोक-वाणी का शृगार बनकर लोकोक्ति के नाम से अभिहित हुए। 'पहायत' शब्द की व्युत्पत्ति अति विवादास्पद है, किन्तु इतना निश्चित है कि शाब्दिक दृष्टि से इमग प्रचलन 'लोकोक्ति' शब्द की अपेक्षा बाद में हुआ ! कहावत' पदमी पुरसत्ति के विषय मे डॉ. सहल ने दादर मतो को विस्तृत स्थापना की है, जिस का माराम प्रसार है- - लोकोक्ति स्वरूप-विवेचन 49 1 ५० रामदहिन मिश्र ने 'कहावत' पाब्द की व्युत्पत्ति 'कथावत' शब्द से मानी है। प्राकृत व्याकरण के नियमानुसार 'थ' को 'ह' हो जाता है । प्लाट भी इसी बात के समर्थक हैं । डा. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार प्राकृत धातु 'कहाच' से भाव वाचक सज्ञा बनाने के लिए 'त' प्रत्यय जोडकर 'कहावत्त' 'कहावत' रूप बन सकता है। प्राकृत मे 'कहावत्ता' औरसस्कृत मे 'कयावार्ता' शब्द के साथ भी इसका निकट का सम्बन्ध है। टर्नर के नेपाली शब्द-कोश मे भी इस मत की पुष्टि की गई है । कहावत से मिलते-जुलते अनेक शब्द हैं-'कहाउत्' 'कहावत् (नेपाली), 'कहोत' (पजावी), 'कहात' (सिन्धी) आदि। मूल रूप 'कथ्' है, जिससे उत्तान कयापित', 'कपोद्धात' या 'कथावृत्त' से इसकी उत्पत्ति होना सम्भव है । अपभ्र श मे 'थाभाणव', 'अहान' आदि शब्दो का प्रयोग तो मिलता है, किन्तु 'कहावत' के किसी पूर्व रूप का नही। कुछ विद्वानो के मत मे 'कहावत' शब्द की व्युत्पत्ति के विषय मे उर्द-फारसी शब्द-रचना-'मुसोवत' जैसे शब्दसामने रखकर विचार करना चाहिए । स्व० आचार्य केशवप्रसाद मिश्र का अनुमान है कि 'कह धातु के आगे अरबी 'आवत' प्रत्यय लगाकर 'कहावत' शब्द बन सकता है । इन सबसे भिन्न कुछ विद्वान् 'क्थावस्तु' को इसका मूल रूप स्वीकार करते हैं 107 अभिप्राय यह है कि 'कहावत' की व्युत्पत्ति का कार्य विवाद की अधिकता के परिणामस्वरूप जटिल बन गया है। विभिन्न मतो के विशेषण करने से इसकी व्युत्पत्ति-विपयव दो सम्भावनाए प्रकट होती हैं- (1) वहावत शब्द की व्युत्पत्ति पदि किसी संस्कृत शब्द से हुई है तो उसके लिए सम्भावना 'कथावार्ता' शब्द से है, जिसका प्राकृत रूप 'कहावत्ता' ध्वनि और अर्थ दोनो दृष्टियो से 'कहावत' शब्द के सन्निकट है। दूसरी बात यह है कि 'कथावार्ता' शब्द 'कथावत्' आदि शब्द की तरह कल्पित शब्द न होकर प्रयोग मे भी आता है । (2) यदि 'कहावत' शब्द सादृश्य के आधार पर प्रचलित हुआ है तो 'लिखावट' 'सजावट' आदि के सादृश्य पर कहावट (कहावत) शब्द का बन सकना असम्भव नहीं है। राजस्थानी भाषा मे कथन के अर्थ में 'कुहावट', 'कुवावट' आदि शब्द बोलचाल में अव भी प्रयुक्त होते हैं।108 कन्नौजी मे भी कहावत के लिए 'कहनोति', 'कहाउति' और 'कहाउट' शब्द मिलते हैं । ब्रज मे भी इससे मिलते जुलते कई शब्द हैं, यया सूर ने एक स्थान पर 'कहनावति' शब्द का प्रयोग किया है-'साची भई कहनावति उनकी ऊची दुकान अरु मीठो पकवान'। इस तथ्य को दृष्टि मे रखकर सादृश्य के आधार पर इस शब्द की व्युत्पत्ति की बात कष्ट कल्पना नही प्रतीत होती।109 शाब्दिक दृष्टि से भी 'लोकोक्ति' शुद्ध तत्सम पान्द होने के कारण इसकी परम्परागत प्रचलन को मान्यता पर सहज ही विश्वास किया जा सकता है, जबकि "कहावत' शब्द तद्भव शब्द है । अत यह निश्चित है कि इसका प्रचलन 'लोकोक्ति' शब्द की अपेक्षा बाद मे ही हुआ। निष्कर्षत कहा जा सकता है कि 'बहावत' शब्द का उन्म 'लोकोक्ति' शब्द के पश्चात कालान्तरमे हुआ और इसे हम यदि जन्म होने के स्थान पर रूपान्तर होना स्वीकार करें, तो यह कथन उपयुक्त प्रतीत होगा। सोकोक्ति और पहेलो-लोकोक्ति और पहेली का मूल एक ही है--लोक- 50 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण मानस । पहेली भी लोक की उक्ति है । लोक-मानस इसके द्वारा किसी विशिष्ट अर्थ की अभिव्यक्ति करता है और इसको बुद्धि-परीक्षा का साधन बनाता है, फिर भी लोकोक्ति और पहेली मे पर्याप्त भिन्नता है। पहेली का शुद्ध रूप 'प्रहेलिका' है । सस्कृत-साहित्य में इसके लिए एक और नाम ब्रह्मोदय मिलता है । डॉ० घोरेन्द्र वर्मा के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ मे यह अनुष्ठान का एक भाग था। अश्व की वास्तविक बलि के पूर्व होता' और 'ब्राह्मण' ब्रह्मोदय पूछते थे । इसे पूछने का अधिकार केवल दो व्यक्तियो को ही था।110 किन्तु कुछ कर्मकाण्डी विद्वानो ने इस यज्ञ मे बलि को स्वीकार नहीं किया है। जहा तक ब्रह्मोदय अथवा प्रहेलिका का प्रश्न है, वैदिक साहित्य मे इसका प्रचुर प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद को उसकी रहस्यात्मक ऋचाओ के कारण 'पहेलियो का वेद' कह सकते हैं।111 उपनिषदो मे इस प्रकार वे कितने ही रहस्यात्मक प्रश्न मिलते हैं । नचिकेता ने यम से वह रहस्यपूण तत्त्व बताने का आग्रह किया था जिसे प्राप्त कर लेने से मनुष्य अमर हो जाता है । गीता मे श्रीकृष्ण द्वारा सासारिक सृष्टि का वर्णन अत्यन्त गूढात्मक शैली पर है। महाभारत में उपलब्ध यक्ष-युधिष्ठिर सवाद प्राचीन काल की पहेलियो का एक सुन्दर उदाहरण है जब युधिष्ठिर ने यक्ष द्वारा पूछे गए चार प्रश्नो का उत्तर क्रम से दिया था। संस्कृत साहित्य मे 'अन्तापिका' और बहिापिका' नामक पहेलिया मिलती हैं। सुभाषित सग्रहो मे इनकी अगणित सख्या है, जहा कोई प्रश्न करते हुए उतर अलग से दिए गए हैं या प्रश्नोत्तर साथ-साथ हैं। पद-मग करके प्रश्न का उत्तर समझ लिया जाता है या श्लोक के कुछ चरणो मे प्रश्न करके एक चरण मे सबका उत्तर दे दिया जाता है ।112 लोकोक्ति की भाति 'प्रहेलिका' भी सुदीर्घ काल से लोक प्रचलित रही है । हिन्दी साहित्य कोग के अनुसार-'लोकोक्ति' केवल 'कहावत' ही नही है, प्रत्येक प्रकार की उक्ति लोकाक्ति है । इस विस्तृत अर्थ को दृष्टि मे रखकर लोकोक्ति के दो प्रकार माने जा सकते हैं--एक पहेली, दूसरी कहावतें । पहेली भी लोकोक्ति है । लोक-मानस इसके द्वारा अर्थ गौरव को रक्षा करता है और मनोरजन प्राप्त करता है । यह बुद्धि-परीक्षा का भी साधन है । यद्यपि पहेलिया स्वभाव से कहावतो को प्रवृत्ति से विपरीत प्रणाली पर रखी जाती हैं, क्योकि पहेलियो मे एक वस्तु के लिए बहुत से शब्द प्रयोग मे आते हैं, भाव से इनका सम्बध नही होता, प्रक्ट को गोप्य करने की चेष्टा इनमे रहती है, ये बुद्धि कौशल पर निर्भर करती है, जबकि कहावत मे सूत्र प्रणाली होती है, लघु प्रयल मे विस्तृत अर्थ व्यक्त करने को प्रवृत्ति रहती है, फिर भी पहेलिया उतनी ही उक्तियां हैं जितनी कहावतें ।11। इससे स्पष्ट है कि पहेलियां लोक म लोकोक्तियो के समान ही विख्यात हैं, इस समानता को अस्वीकार नही किया जा सकता, तपापि इनमें वैषम्य भी प्राप्त होता है जो इस प्रकार (1) पहेलियां बुद्धि-परीक्षा का साधन हैं और इनका साध्य है बुद्धि-चमत्कार। ये युद्धि- बोल पर निमंर परती हैं जवनि इमरे विपरीत लोरोक्तिमा सम्बन्ध अनुभूत मानवीय ज्ञान से है। सोशक्तियो म निहित मानवीय अनुभव की प्रवणता उन्हें प्रहेविका लोकोक्ति स्वरूप विवेचन 51 - को कौतूहल-प्रदर्शन की प्रवृत्ति से पृथक कर लघु प्रयत्न से अर्थ के विस्तृत मायाम प्रदान करती है। (2) पहेली मे प्रक्ट को गोप्य रखने की चेष्टा रहती है जवकि लोकोक्ति के श्रवण मात्र से अर्थ व्याप्त हो जाता है। अर्थ की दृष्टि से पहेलिया अपनी स्वाभाविक गुण धर्मिता के कारण क्लिष्ट होती हैं । अर्थात् इसके अर्थ बोध के लिए मस्तिष्क को भीषण श्रम करना पड़ता है, वहा लोकोक्ति एक बार पढकर अथवा श्रवण कर हृदयगम हो जाती है । लोकप्रियता की दृष्टि से परस्पर साम्य प्रतीत होने पर अन्य दृष्टियो से इनका परस्पर वैषम्य स्पष्ट हो जाता है । निष्कर्पत 'लोकोक्ति' 'पहेली' से भिन्न विधा लोकोक्ति एव अलकार---लोकोक्ति मे आलकारिकता के स्पष्ट दर्शन होते है, किन्तु लोकोक्ति मात्र को लोकोक्ति नामक विशिष्ट अलकार के अन्तर्गत समाहित करके कुछ अलकारशास्त्री विद्वानो ने इसके साथ अन्याय किया है। भारतीय साहित्य कोश' के अन्तर्गत इस विषय मे लिखा गया है-लोकोक्ति एक गौण अलकार है । जब प्रसग- प्राप्त किसी लोकोक्ति (मुहावरा) का प्रयोग किया जाए तो लोकोक्ति अलकार होगा। 'लोकोक्ति' का अर्थ लोक-कथन या कहावत है। यदि किसी प्रसग मे लोक प्रसिद्ध कहावत का प्रयोग किया जाए और उससे कथन मे चमत्कार का आधान हो तो वहा यह अलकार होगा। 'लोकोक्ति' को अलकार का रूप देने का श्रेय अप्पयदीक्षित को है। दीक्षित के इस प्रयल का स्रोत भोजकृत लोकोक्ति ही है। इन्होंने भोज के उदाहरण मे प्रतिपादित 'लोचनेमीलयित्वा' को भी यथावत् प्रण किया है। उदाहरण है-'सहस्य कतिचिन्मा- सान् 'सोलयित्वा विलोचने' । यहा नायक के द्वारा विरहिणी के सदेश का वर्णन है । आखें मूदकर (मीचकर) कुछ मास और व्यतीत कर लो। दीक्षित के अनुसार जब काव्य मे लोक प्रवाद या लोकोक्ति का अनुसरण किया जाय तो 'लोकोक्ति अलकार' होगा।115 यहा उपर्युक्त लोकोक्ति का उदाहरण बस्तुत लोकोक्ति का उदाहरण न होकर मुहावरे का उदाहरण दिया गया है। 'लोचने मीलयित्वा' अर्थात् ध्यान हटाकर इसका लक्ष्यार्थ है । ध्यान की विस्मृति का द्योतक यह मुहावरा प्रथम भोज द्वारा और तदनन्तर अप्पय- दीक्षित द्वारा लोकोक्ति के रूप में प्रमुक्त होने के साथ-साथ 'लोकोक्ति अलकार' के लक्षण का भी अग बन गया, जो उचित प्रतीत नहीं होता। इधर भोज ने लोकोक्ति को एक शब्दालकार के अन्तर्गत माना है। छाया नामक शब्दालकार के पद मेदो म एक मैद 'लोकोक्तिछाया किया है । काव्य मे कवि के द्वारा लोकोक्ति के प्रयोग होने पर प्रस्तुत शब्दालकार का भेद होता है- अन्योक्ति नामनुष्कृतिश्छायासापीहपड् विधा। लाकच्छेकार्भकोन्यात पोटामतोक्ति मेदत ||16 अग्निपुराणकार के मतानुसार या अन्य की उक्ति का अनुकरण है । यह चतुविधा है-- लोकोक्ति, कोक्ति, अमकोक्ति एव भत्तोक्ति-तत्रान्योक्तेरनुकृतिरच्छाया सापि 52 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण चतुर्विधा ।117 केशव मिश्र ने आभाणक को लोकोक्ति को संज्ञा स्वीकार कर इसका पूर्ववत् 'लोकोक्तिच्छाया' के रूप मे वर्णन किया है-- आभाणको हि लोकोक्तिः। यानुधावति लोकोक्तिच्छायामिच्छन्ति ता खुधा ||118 रीतिकालीन आचार्यों मे जसवन्तसिंह, मतिराम तथा पद्माकर आदि ने अप्पय- दीक्षित द्वारा निर्धारित लोकोक्ति अलकार के लक्षण को स्व-स्व ग्रयो में अनूदित किया (क) लोक उक्ति कछु बचन जो लीन्हे लोक प्रवाद (भाषा भूपण, 184)। (ख) जह कहनावति अनुकरण, लोक उक्ति मतिराम (ललित ललाम, 366)। (ग) लोकोक्ति जह लोक की कहनावति ठहराउ (पद्माभरण, 257)। इनसे पृथक् उद्योतवार नागेश ने चमत्कार के अभाव मे इसे अलकारत्व भी प्रदान नहीं किया।119 प्रस्तुत विवेचन लोकोक्ति की आलकारिक्ता को एक विशिष्ट प्रकार मे परि- बद्ध कर देता है, जो लोकोक्ति के साथ न्याय नहीं करता। लोकोक्तियो मे शम्दालकारो एव अर्थालकारो का सुन्दर सयोजन हुआ है। कही भी ये अलकार कृत्रिम रूप में प्रयुक्त नही हुए हैं, प्रत्युत इनका प्रयोग स्वाभाविक रूप मे ही हुआ है। अत. लोकोक्ति मात्र को एक विशिष्ट अलकार के अन्तर्गत सीमित करना उपयुक्त प्रतीत नही होता। शोध- प्रबन्ध के स्वतन्त्र परिच्छेद मे लोकोक्तियो मे निहित अलकारगत रमणीयता का विस्तृत विवेचन किया गया है। लोकोक्ति एव प्राज्ञोक्ति अथवा सूक्ति-प्राज्ञोक्ति के अन्तर्गत प्रशासूत्र (Aphorism), व्यवहार-सूत्र (Maxim), मर्मोक्ति (Epigram) आदि आती हैं । प्रज्ञा-सूत्र के लिए प्रयुक्त अग्रेजी शब्द Aphorismग्रीक के Aphorismos से निकला है, जिसका अर्थ है परिभाषा देना। Apo का अर्थ है 'से' और Horsos का अर्थ है 'सीमा'। 'Aphorism' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ हुआ 'किसी विचार-बिन्दु को सीमाबद्ध करके उसका लक्षण निर्धारित करना अर्थात् उसे निश्चयात्मक रूप देना।' प्रज्ञा-सूत्र एक प्रकार की ऐसी सक्षिप्त और सारगर्भित उक्ति है जिसमे किसी सामान्य सत्य की अभि- व्यक्ति हुई है । Maxim (व्यवहार-सूत्र) लेटिन शब्द Maxima से निकला है जिसका अर्थ है सबसे बडा । आग्ल भाषा के शब्द-कोप मे 'सर्वाधिक गुरुतापूर्ण उक्ति को' इसकी सज्ञा दी गई है । व्यवहार-सूत्र प्रज्ञा-सूत्र को भाति जीवन के सत्य को मुखरित करता है, किन्तु प्रज्ञा सूत्र जहां विचार को लेकर प्रवृत्त होता है वहा व्यहार-सूत्र का सम्बन्ध आचार-व्यवहार से है । 'मर्मोक्ति' के विषय में कहा गया है कि 'मर्मोक्ति' ऐसी निशान- दार उक्ति को कहते हैं जो अपने पीछे एक प्रकार को घटक छोड जाए। संस्कृत-साहित्य मे 'सूत्र, सूक्ति, व्याजोक्ति, वक्रोक्ति, नर्मोक्ति, मोक्ति, छैकोक्ति, मुक्तक और सुभा- पित आदि अनेक पादों का प्रयोग हुआ है, किन्तु सुभापित एक अत्यन्त व्यापक शब्द है जिगमे प्रज्ञा-सूत्र, व्यवहार-सूत्र तथा मर्मोक्ति आदि सभी का समावेश किया जा सरता लोकोक्ति. .स्वरूप-विवेचन 53 है। 120 सुभाषित मे इन सबका समाहार हो जाता है। इस 'सुभाषित' को 'प्राज्ञोक्ति' के पर्याय के रूप मे स्वीकार किया जा सकता है । लोकोक्ति एव प्राज्ञोक्ति के परस्पर भेदाभेद का निरूपण अनेक विद्वानो द्वारा किया गया है। किसी भी विद्वान् ने इनकी अभिन्नता पूर्णरूपेण स्वीकार नहीं की है। लोकोक्ति एव प्राज्ञोक्ति के पार्थक्य का उद्घाटन विद्वानो द्वारा निम्न प्रकार से किया गया है- (1) प्रासोक्ति मे ज्ञानी के ज्ञान का जो निष्कर्ष हमें मिलता है, वह सुचिन्तित होता है और प्राय उपदेशमूलक नीति-वाक्य के रूप में देखा जाता है किन्तु प्रवाद या लोकोक्ति पाण्डित्य, चिन्तन तया उपदेशात्मक को लेकर अग्रसर नहीं होती। लोकोक्ति तो स्वत प्रसूत होती है और सरस तथा सक्षिप्त रूप मे अभिव्यक्त होती है। किन्तु प्राज्ञोक्ति ज्ञान और चिन्तन के परिपक्व फल के रूप में देखी जाती है। नीति-शिक्षा, तत्त्व ज्ञान और उच्चादशं लोकोक्तियो के प्रेरक हेतु नही है 1121 (2) प्राज्ञोक्ति नैतिक जगत् का सत्य होते हुए भी व्यावहारिक जगत् का तथ्य नहीं होती और लोकोक्ति व्यावहारिक जगत् का तथ्य होते हुए भी नैतिक जगत् का सत्य होती है।122 (3) व्यवहार सूत्र या सूक्तिया इकट्ठे हुए सिक्के है जबकि लोकोक्तियो को प्रचलित सिक्को के नाम से अभिहित किया जाता है। व्यवहार-सूत्र यदि प्रचलित न हो तो केवल पुस्तकों की शोभा बढाते हैं जबकि लोकोक्तिया जनता को जिह्वा पर नृत्य करती रहती हैं।123 (4) व्यवहार-सूत्र कहावत तो है किन्तु मिनगे की अवस्था मे । पर उगने पर ही भिनगा उड सकता है । जब इसको लोक हृदय ने स्वीकार कर लिया हो और यह सर्व साधारण मे प्रचलित हो जाए, तभी व्यवहार-सूत्र लोकोक्ति का रूप धारण करता 124 (5) जनसाधारण की उक्ति होने के कारण लोकोक्ति को सूत्र, सूक्ति, मर्मोक्ति या सुभापित से भिन्न समझना चाहिए, क्योकि सूक्ति आदि का सम्बन्ध विद्वानो, प्राज्ञो से है- प्राज्ञो को उक्तियां हैं। इसका तात्पर्य यह नही कि उन्हे लोकोक्तियो मे ग्रहण नही किया जाता। हिन्दी तथा अन्य भाषाओ मे कितनी ही लोकोक्तियां प्राचीन साहित्य एव लोक-साहित्य दोनो स्रोतो मे आई हैं।. पारस्परिक आदान-प्रदान के कारण अनेक लोकोक्तियो को देखकर यह कहना कठिन हो जाता है कि कौन जन-साधारण की उक्ति थी, जिसने काव्यात्मकरूप धारण कर लिया और कवि की उक्ति भी जो लोकोक्ति बन गई।12 (6) इतिहास को प्रत्यक्ष कर जब हम देखते हैं तब लोकोक्ति का विकास ही प्रकारान्तर से सूक्ति या सुभापित बन जाता है। लोक की उक्ति लोकोक्ति है, वहीं जब कवि विशेप द्वारा उद्गरित हुई तो सूक्ति हो गयो, सुभाषित हो गयी। अत ये तीनो नाम सूक्ति सुभाषित-लोकोक्ति एक ही सज्ञा के पर्याय है।...जैसे लोकोक्ति का अर्थ 54 • लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेपण है-लोक (विराट् समाज) की उक्ति अर्थात् मान्यता, नीति वचन, वैसे ही सूक्ति का सामान्य अर्थ है—सु-उक्ति. सुन्दर या सौष्ठवपूर्ण क्थन, शब्द अर्थ का ललित-अन्वर्थ विधान । सामान्य लोकवाणी से विचित्र, प्रभावकारी विशेष कथन को ही आरम्भ में सूक्ति कहा गया 1126 उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निम्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैं- (1) प्राज्ञोक्ति मे निहित पाण्डित्य, चिन्तन, तत्त्वज्ञान एव उच्चादर्श से भिन्न लोकोक्ति सरस एव स्वतः प्रसूत होने के कारण नीति-शिक्षा, उपदेशा- त्मकतादि से रहित होती है। (2) प्राज्ञोक्ति मे नैतिकता का अभाव होता है; जवकि लोकोक्ति मे व्याव- हारिकता एव नैतिकता दोनो का युगपत् समन्वय होता है। (3) प्राज्ञोक्ति अथवा व्यवहार-सूत्र ही लोक-प्रचलित होकर लोकोक्ति का रूप धारण कर लेते हैं। (4) लोकोक्ति जन-साधारण की युक्ति होने के अतिरिक्त प्राजो की भी उक्ति है। लोकोक्ति के लोक-साहित्य एव शिष्ट-साहित्य (प्राचीन साहित्य) दोनो ही स्रोत हैं। (5) लोक की उक्ति जब कवि द्वारा उद्गरित होती है तो सूक्ति बन जाती उपर्युक्त निष्कर्षों मे प्रथम मन्तव्य पूर्णतः मान्य नहीं है। इसका कारण यह है कि लोकोक्ति मे प्राज्ञोक्ति जैसा तत्त्व-चिन्तन, नीति-कथन व उपदेशात्मकता के दर्शन होते हैं, किन्तु लोक-प्रिय होकर प्राजोक्ति जहा लोकोक्ति बन जाती है, वहा प्रचलन के अभाव मे अनुपयोगी बनकर पुस्तको तक सीमित रह जाती है। द्वितीय निष्कर्ष द्वारा इसकी पुष्टि होती है कि प्राज्ञोक्ति जहा सीमा पूर्ण है, उसमे व्यावहारिकता का अभाव रहता है, वहा लोकोक्ति मे नैतिकता के साथ व्यावहारिकता के भी एकत्र दर्शन होते हैं। यही कारण है कि लोकोक्ति का सम्मान लोक एव शास्त्र दोनो के द्वारा होता है। निष्कर्पत. कहा जा सकता है कि सूक्तियो (प्राज्ञोक्तियो) एव लोकोक्तियो मे भिन्नता का आधार प्रचलन है। प्राज्ञोक्तिया जहा प्राज्ञो द्वारा निर्मित होकर शास्त्रो अथवा विद्वद्समुदाय मे ही सम्मानित रहती हैं, वहा लोकोक्तिया लोकप्रिय होकर देवा- देशान्तर तक भ्रमण करती हुई सार्वदेशिक सम्पत्ति बन जाती हैं।..

मुहावरा : स्वरूप-विवेचेन मुहावरा-विमर्श न यह मन्द महाविरा, महावरा, मुहावरा, मुहाविरा, मुहन्दरा, मुहावरा एव महावुरा आदि के रूपों में भिन्न-भिन्न ढंग से लिखा हुआ प्राप्त होता है, इससे यह प्रश्न उपस्थित होना स्वाभाविक है कि इसका शुद्ध रूप कौन-सा है ? 'लुगात किश्वरी' मे इसके विषय में लिखा है कि इस शब्द के 'मीम' ' पर 'पेश जो उ' की मात्रा का प्रतीक है और 'बाव ( )पर 'जबर' ( . है. ही शुद्ध एप उपयुक्त शब्द प्रतीत होता है। इस शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ के विषय मे विवाद का प्रायः अभाव है । 'मुहावरा' शब्द अरबी भाषा का शब्द है, जिसकी व्युत्पत्ति 'हौर 2 )-हि-बाद-२) से हुई है। ‘गयासुल्लुगात' में इसके विषय मे कहा गया है-'मुहावरा विक्जिम मीम, वकतेह, वाव्, वायक, दीगर कलाम करदन व पासुख दादन यक दीगर-अज से राह वकन्ज वगर आ(128 इसका हिन्दी-अनुवाद करके 'लुगात किश्वरी' में कहा गया है-'मुहावरे का अर्थ है आपस मे कलाम (बातचीत करना), एक-दूसरे को जवाब देना, गुफ्तगू-बातचीत (यक दीगर कलाम करदन व पासुख . दादन) आदि 1129 'फरहंग आसफिया जिल्द चहारूम' मे अपेक्षाकृत विस्तृत एव सुस्पष्ट प्रतिपादन किया गया है-'मुहावरा इस्म मुजक्कर (सज्ञा, पुल्लिग), (1) हम कलामी, बाहम गुफ्तगू, सवाल जवाब । (2) इस्तिलाह आम, रोजमर्रा, वह कलमा या कलाम जिसे चन्द सकात (विश्वासपात्र) ने लगवी मानी कि मुनासिबत या गैरमुनासिबत से किसी खास मानी के वास्ते मुख्तस (रूढ) कर लिया गया हो। जैसे 'हैवान' से कुल जानदार मकसूद (अभिप्रेत) है, मगर मुहावरे मे गैर जीउल-अक्ल (बुद्धिहीन) पर उसका इतलाक (प्रयोग) होता है और जीउल-अवल (बुद्धिमान) को इन्मान कहते हैं। (3) आदत, चस्का, महारत (कुशलता), मश्क (अभ्यास), रन्त-जैसे मुझे अब इस बात का मुहावरा नहीं रहा।130 56 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण मुहम्मद मुस्तफा खा मद्दाह ने उर्दू-हिन्दी शब्दकोश मे मुहावरे के प्रचलित पर्यायो मे मुहरंफ, मुहरिफ, मुहावरत तया मुहावरात आदि शब्द दिए हैं। मुहर्रफ - टेढा किया हुआ, वनित, वक्र, फेरी हुई बात या इवारत मूल अर्थ से हटाया हुआ। मुहरिफ-टेढा करने वाला, बात को कुछ का कुछ बनाने वाला। मुहावरा-रोजमर्रा, वोलचाल, किसी भाषा के वाक्यो का वह प्रयोग जो उस भाषा के बोलने वाले करते हैं और जिसका अर्थ अभिधेय अयं से पृथक होता है ।131 इन शब्दो के अतिरिक्त उर्दू मे मुहावरे के लिए 'तर्जे कलाम' तथा 'इस्तलाह' आदि शब्द प्रयुक्त होते हैं । 'मुहावरा' अरवी शब्द होते हुए भी हिन्दी और उर्दू मे अरबी की अपेक्षा व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता है ।132 'मुहावरा' से मिलते जुलते शब्द हैं- मुहावरत और मुहावरात । मुहावरत शब्द का अर्थ है-आपस में बातचीत करना तथा मुहावरात मुहावरे का बहुवचन है ।133 आग्ल भाषा मे मुहावरे के पर्याय के रूप मे इडियम (Idiom) शब्द का प्रयोग होता है । अग्रेजी मे यह शब्द लटिन और फ्रेंच मे होता हुआ ग्रीक भाषा से आया है। डॉ० ओम्प्रकाश गुप्त इसके इतिवृत्त के विषय मे लिखते हैं-'सोलहवी शताब्दी मे ग्रीक शब्द 'इडियोमा' (Idioma) से लैटिन मे (Idioma) 'इडियोमा' फ्रेंच से इडियोटिस्म (Idiotusme) के रूप मे वही शब्द अग्रेजी मे आया । व्युत्पत्ति की दृष्टि से यह शब्द मूढता की ओर सकेत करता है। 'इडियट' शब्द से सबोधित होने के नाते 'इडियोसी' की ध्वनि भी इससे निकलती है। अब अग्रेजी मे इस शब्द का प्राय लोप हो गया और इसके स्थान पर 'इडियम' शब्द का प्रयोग होने लगा है ।134 सोलहवी शताब्दी के अनन्तर कदाचित् सत्रह्वी शताब्दी के आसपास इडियोटिज्म के स्थान पर 'इडियम' शब्द मुहावरे के लिए प्राय सर्वमान्य हो गया होगा और वर्तमान काल में 'इडियम' शब्द ही इसके लिए रूढ हो चुका है । आग्ल भाषा के प्राय. सभी कोशो में इसी शब्द को ग्रहण किया गया है। डॉ.मोनियर विलियम्म ने 'मुहावरा' शब्द के निम्न सस्कृत पर्याय स्वीकार किए हैं—वाग्रीति , वाग्वृत्ति., वाग्व्यापार, वाग्व्यवहार, वाग्धारा, यिशेप वाक्य, विशेष वचन, सविशेष वाक्य, भाषा विशेषण, विशेष भाषा, विशिष्ट वचन, विशिष्ट वाक्य विशिष्ट भाषा, भाषा लक्षण, भाषा वच्छेद , अवच्छेदक वाक्य तथा सप्रदाय 1195 इन पर्यायो द्वारा 'मुहावरा' दाब्द के वास्तविक अर्थ का सम्यक् बोध नही हो पाता, किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि संस्कृत मे मुहावरो का प्रयोग नहीं हुआ। कुछ विद्वानो ने वाक् पद्धति, भापा सम्प्रदाय, आदिशन्दों को इसका उपयुक्त पर्याय भी स्वीकार दिया है। प० रामदहिन मिश्र ने भाषा सम्प्रदाय' को तथा डॉ. कृष्णचन्द्र शर्मा ने 'वाक् पदति' शब्द को उचित पर्याय माना है । १० रामदहिन मिय के अनुसार सस्कृत तपा हिन्दी में मुहावरा शन के यथायं अर्थ का बोधर कोई शब्द नहीं है। . 4 मुहावरा स्वरूप विवेचन :57 प्रयुक्तता, वाग्रीति, वाग्धारा और भाषा-सम्प्रदाय आदि शब्दो को इसके स्थान में रख सकते हैं । हिन्दी मे मुहावरे के बदले विशेषत वाग्वारी' शब्द का व्यवहार देखा जाता है किन्तु मुहावरा शब्द के बदले 'भापा सम्प्रदाय' दोब्द लिखना यही अच्छा है, क्योकि वाग्रीति, वाग्धारा और प्रयुक्तता इन तीनो शब्दो का अर्थ इससे ठीक-ठीक झलक जाता है और भाषागत अन्यान्य विषयो का आभास भी मिल जाता है ।136 4० रामदहिन मिश्र द्वारा मान्य 'भाषा सम्प्रदाय पर्याय प्रचलन के अभाव मे स्वीकृत न हो सका । अन्य कुछ विद्वानो ने इसके लिए अन्यान्य शब्दो का प्रयोग किया, किन्तु प्राय मान्य न हो सके। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय के अनुसार कुछ विद्वानो ने 'वाग्रीति' या रमणीय प्रयोग' का व्यव- हार इसके लिए किया है, परन्तु वास्तव मे ये उपयुक्त नही जचते क्योकि इनसे 'मुहावरे' के भाव का सम्यक् प्रवाशन नहीं होता।137 जहा तक मुहावरो का सस्कृत मे प्रयोग का प्रश्न है, निस्सदेह वहा इनका प्रयोग-बाहुल्य है । सस्कृत मे मुहावरो के लिए कोई उप- युक्त पर्याय चाहे न मिलता हो किन्तु मुहावरो का इस भाषा मे कभी अभाव नही रहा। 'अगुलिदाने मुज गिलसि' (आर्या सप्तशती) तथा 'ईदश राजकुल दूरे वन्दयताम्' (कर्पूर मजरी) जैसे प्रयोग सस्कृत ग्रन्थो मे प्राय उपलब्ध होते हैं। इतना सब कुछ होते हुए भी संस्कृत भाषा मे मुहावरो का जो सैद्धान्तिक विश्लेपण नही मिलता, इसका सभवत कारण यही है कि सस्कृत के आचार्य मुहावरो को लक्षणा के अन्तर्गत मानकर चले हैं 1133 गुजराती भाषा मे मुहावरे के लिए प्रयुक्त शब्द 'रूढि प्रयोग' के विषय मे श्री रामचन्द्र वर्मा लिखते हैं-लक्षणा के हमारे यहा दो भेद किए गए हैं-रूढा लक्षणा और प्रयोजन- वती लक्षणा- इनमे से रूढा लक्षणा मे वे शब्द प्रयोग अग्ते हैं जो रूढ या प्रचलित हो जाते हैं और प्रयोजनवती लक्षणा मे किसी प्रयोजनवश शब्दो के अर्थ मे विशेषता आती है। तत्त्वत मुहावरा हमारे यहा की रूढा लक्षणा के अन्तर्गत आता है । अत हम मुहावरे को 'रूढ़ि' और मुहावरेदार को 'रूढ कह सकते हैं। हमे इसके लिए एक दूसरा शब्द 'वाक् सम्प्रदाय' भी सुझाया गया है, पर यह शब्द बहुत बड़ा है, अत यदि मुहावरे के लिए रूढि' शब्द ही रूढ हो जाए तो कोई हर्ज नही । और फिर यदि अपने यहा कोई उपयुक्त शब्द न होने के कारण हम स्वय 'मुहावरा' शब्द भी चलने दें तो यह कोई क्लक या लज्जा की बात नहीं है । 139 रूढि' शब्द के प्रयोग के लिए वर्मा जी स्वय आग्रही नहीं हैं। उनके मतानुसार उपयुक्त शब्द के अभाव मे 'मुहावरा' शब्द को यथावत् ग्रहण करना उचित है । इससे स्पष्ट है कि 'मुहावरे' के लिए 'रूढि' शब्द का प्रस्ताव उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। 'मुहावरे' के विस्तृत आयाम को रूढा-लक्षणा तक ही सीमित नही किया जा सकता। मुहावरा-मीमासाकार ने मुहावरे के स्थान पर विभिन्न विद्वाना द्वारा प्रयुक्त-वाक् सम्प्रदाय, विशिष्ट प्रयोग, वाक् चिभ्य, वाग्योग तथा इष्टप्रयोग आदि बारह नामो का उल्लेख किया है। इस विषय मे स्पष्ट मत है कि इन बारह शब्दो मे स कोई भी शब्द मुहावरे के सही पर्यायवाची शब्द के रूप मे नही रखा जा सकता।140 यद्यपि अनेक हिन्दी विद्वानो ने 'मुहावरे' के लिए विभिन्न पर्यायवाची शब्दो के अन्वेषण का स्तुत्य प्रयत्न किया है, किन्तु अद्यावधि मुहावरे के समान लोक ख्यात एव विद्वज्जनो ।

58 लोकोक्ति और मुहावरा . स्वरूप विश्लेषण द्वारा सर्वमान्य किसी पर्याय का निर्धारण नहीं हो सका है। ऐसी स्थिति मे 'मुहावरा' शब्द को यथावत् रूप मे ग्रहण करना ही युक्तिसगत प्रतीत होता है। मुहावरे की परिभाषा एव रूप-संरचना मुहावरे के विषय मे विभिन्न कोशो मे अपनी-अपनी दृष्टि से विचार किया गया है । आग्ल भाषा के विभिन्न विश्वकोशो एवं अन्यान्य कोशो मे एतद्विषयक विस्तृत विवेचन किया गया है। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका मे मुहावरे के पर्याय 'इडियम' शब्द के विषय मे कहा गया है-1 किसी भाषा के लिए शब्दो, व्याकरण-सम्बन्धी रच. नाओ, वाक्य-रचनाओ इत्यादि के वर्णन का विशिष्ट ढग, 2. कभी-कभी किसी विशेष भापा की विचित्रता भी, 3 एक विभाषा (ग्रीक इडियोमा) कोई विचित्र और व्यक्ति- गत चीज़ 'मुहावरा' है।41 वेबस्टर के अन्तर्राष्ट्रीय कोश के अनुसार-1. (अ)किसी भाषा के विशेष ढाचे मे ढला वाक्य (आ) वह वाक्य जिसकी व्याकरण-सम्बन्धी रचना उसी के लिए विशिष्ट हो और जिसका अर्थ उसकी साधारण भापा शब्द-योजना से न निकल सके, 2 किसी एक लेखक को व्यजना शैली का विषय, रूप अथवा वाग्वैचित्र्य । यथा-याउनिंग के दुरुह मुहावरे 1142 'डिक्शनरी आफ द इगलिश लेंगुएज' के आधार पर 'मुहावरा' अथवा 'इडियम' फॅच इडियोमी 1 सार्वलोकिक व्याकरण अर्थात् भाषा के प्रचलित नियमो के व्यवहार से सर्वथा बाहर और किसी एक बोली के स्वभाव से बधा हुआ बोलने अथवा लिखने का किसी भाषा के लिए विशिष्ट वर्णन शैली 2 किसी भाषा का विचित्र स्वभाव 3. एक विभाषा अथवा भाषा की विचित्रता है।143 इम्पीरियल डिक्शनरी के अनुसार मुहावरा 1. किसी भाषा की विशिष्ट वाक्य- शैली, वर्णन अथवा शब्द विन्यास की विशेषता, किसी भाषा अथवा लेखक के अभिप्राय से मुद्रित, उनकी व्याकरणिक तथा ताकि युक्तियो से विलक्षण वाक्याश । 2 किसी भापा की मुख्य या विशेष समान। 3 बोली, भाषा का विशेष रूप है ।144 मरे के कोश के आधार पर मुहावरा 1 किसी जाति अथवा देश का मुख्य या विशेष बोलचाल का ढंग, निजी भाषा या बोली। सकीणं अर्थ मे किसी भाषा का वह भेद जो किसी सीमित क्षेत्र अथवा जाति मे प्रसिद्ध हो, बोली। 2 किसी भाषा का विशिष्ट गुण, स्वभाव या लक्षण, वर्णन का स्वाभाविक या विशिष्ट ढग। 3 किसी भापा या विशिष्ट शैली या व्याकरणिक रचना है।15 आक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार 'मुहावरा' (1) (अ) किसी देश या जनसमूह अथवा उचित बोलने की माषा या बोली की विशिष्टता है। (आ) किसी एक ऐसी भाषा का विशिष्ट रूप है जो किसी सीमित जनपद या लोगों के वर्ग अथवा बोली की मुख्य विशेषता है। (2) पिसी भाषा का विशिष्ट रूप, गुण या प्रशा, अभिव्यक्ति वा ढग जो कि ढग, मुहावरा स्वरूप विवेचन 59 - इसके प्रति स्वाभाविक और विशिष्ट है। (3) किसी भापा की अभिव्यक्ति का रूप व्याकरणिक सरचना, वाक्याश या पदावली आदि । किसी भाषा के प्रयोग द्वारा पदावली की विशिष्टता की मान्यता और व्याकरणिक एव ताकिक विशिष्टता के अतिरिक्त महत्त्व को 'मुहावरा' रखता है। (4) विशेष रूप या गुण, विशेष प्रकृति विशेष रूप से इसमे होती है । 146 इसमे सन्देह नही कि मरे के शब्द कोश एव आक्सफोर्ड कोश के मुहावरे विवेचन में पर्याप्त साम्य है । इनमे भाव साम्य के अतिरिक्त भाषिक समानता भी प्राप्त होती है लोगन पीयरसल स्मिथ कृत 'वई स एण्ड इडियम्स' मे मुहावरे के बारे मे लिखा है चूकि इस शब्द के बहुत अर्थ हैं, इसलिए मुझे इसकी उपयोगिता बता देनी चाहिए। । कभी-कभी फ्रेंच की तरह हो अंग्रेजी में 'इडियम शब्द का अर्थ किसी जाति अथवा राष्ट्र की विलक्षण वाक शंली होता है । (2) फेंच शब्द इडियोटिस्मी के स्थान मे भी हम लोग 'इडियम' शब्द का प्रयोग करते हैं । अर्थात् व्युत्पत्तिलभ्य और युक्तिसगत अर्थ को दृष्टि से भिन्न अयं देते हुए भी जो कहने का ढग, व्याकरण सम्बन्धी रचना अथवा वाक्य रचना किसी भाषा को प्रयोग-सिद्ध विशेषता हो, मुहावरा है (3) भाषा और गतिगत स्वभाव । (4) व्याकरण अथवा तर्क के नियमो का उल्लघन 1147 उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं- --मुहावरा किसी देश, जाति अथवा जनसमूह की विलक्षण वाक् शैली का नाम -मुहावरा किसी भाषा का विशिष्ट रूप, गुण स्वभाव अथवा लक्षण है तथा एक व्याकरणिक रचना है। ---मुहावरा किसी भाषा का वह विशिष्ट वाक्याश या पदावली है, जिससे भाषा मे विचित्रता अथवा वाग्वैचित्र्य की सृष्टि होती है। - इसका अर्थ सामान्य भाषा एव उसकी शब्द योजना से ग्राह्य नहीं होता है। यह भाषा के विशिष्ट ढाचे मे ढला हुआ होता है । यद्यपि 'मुहावरा' शब्द अरबी भाषा का है तथा 'हिन्दी' मे फारसी' के माध्यम स आया है, तथापि हिन्दी के मान्य विद्वानो द्वारा एव विभिन्न शब्द कोशो मे एतद्- विषयक चिन्तन मनन किया गया है। हिन्दी शब्द कोशो मे इसका विवेचन इस प्रकार भाषा विज्ञान कोश के अनुसार-मुहावरा भाषा-विशेष म प्रचलित प्रयोग, वाक्याश या कुछ पदो या शब्दो का समूह, जिसका लक्ष्यायं या ध्यग्यायं लिया जाता हो, मुहावरा कहलाता है। इसका अर्थ अभिघार्थ से भिन्न है ।168 हिन्दी शब्द-सागर के आधार पर-मुहावरा लक्षणा या व्यजना द्वारा सिद्ध वाक्य या प्रयोग जो किसी एक ही बोली अथवा लिखी जाने वाली भाषा में प्रचलित हो और जिसका अर्थ प्रत्यक्ष (अभिधेय) अर्थ से विलक्षण हो । किसी एक भाषा मे दिखाई पहने वाली असाधारण शब्द-योजना अथवा दाब्द प्रयोग । जैसे-'लाठी साना' मुहावरा 60 लोकोक्ति और मुहावरा . स्वरूप विश्लेषण है, क्योकि इसमे 'खाना' शब्द अपने साधारण अर्थ मे नही आया है, लाक्षणिक अर्थ मे आया है। लाठी खाने की चीज नहीं है पर बोलचाल मे लाठी खाने का अर्थ लाठी का प्रहार सहना किया जाता है । इसी प्रकार 'गुल खिलाना', 'घर करना', 'चमडा खीचना' 'चिकनी चुपडी बातें करना' नादि मुहावरे के अन्तर्गत हैं । कुछ लोग इसे रोजमर्रा या बोलचाल कहते हैं। अभ्यास, आदत जैसे आजकल मेरा लिखने का मुहावरा छूट गया।149 फारसी एव अग्रेजी विद्वानो द्वारा मुहावरे के लिए प्रयुक्त असाधारण अथवा विशिष्ट शब्द-योजना के स्थान पर हिन्दी-कोशकारो ने अर्थ-तत्त्व के लिए लक्षणा एव व्यजना शब्द-शक्तियो का व्यवहार इसलिए किया है, क्योकि भारतीय काव्य शास्त्र मे शब्द शक्तियो-अभिघा, लक्षणा एवं व्यजना का विस्तारश प्रतिपादन किया गया है, किन्तु फारसी व अग्रेजी काव्य शास्त्र मे यह विवेचन अप्राप्त था, अतः हिन्दी कोशकारी ने शब्दशक्तिमूलक प्रयोगो के आधार पर इस समस्या का समाधान किया। हिन्दी कोशकारो के अतिरिक्त अन्य विद्वानो द्वारा भी मुहावरे की परिभाषा एव स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है। श्री ब्रह्मस्वरूप शर्मा 'दिनकर' मुहावरे का परिचयात्मक बोध कराते हुए लिखते हैं-'मुहाविरा'-(1) अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है बातचीत करना अथवा प्रश्न का उत्तर देना परन्तु परिभाषित हो जाने के कारण दिल- क्षण अर्थ मे मुहाविरो का प्रयोग किया जाता है। जैसे- लज्जित होना । (11) मुहाविरे का निर्माण किसी व्यक्ति विशेष द्वारा नही होता, अनेक व्यक्तियो के द्वारा बहुत दिनो तक एक वाक्याश विलक्षण अर्थ मे प्रयुक्त होने के कारण 'मुहाविरा' बन जाता है । (11) वाक्याश होने के कारण मुहावरे मे उद्देश्य और विधेय का अभाव होता है ।150 श्री रामचन्द्र वर्मा 'अच्छी हिन्दी' मे 'क्रियाए और मुहावरे' के अन्तर्गत मुहावरे का विवेचन करते हुए लिखते हैं-(1) शब्द और क्रिया-प्रयोगो के योग से बुछ विशिष्ट पद वना लिए जाते हैं जो मुहावरा कहलाते हैं । अर्थात् मुहावरा उस गठे हुए वाक्याश को कहते हैं जिससे कुछ लाक्षणिक अर्थ निकलता है और जिसकी गठन मे किसी प्रकार का अन्तर होने पर लाक्षणिक अर्थ नहीं निकल सकता।151 डॉ० उदय नारायण तिवारी ने भोजपुरी मुहावरो का विवेचन करते हुए मुहावरे के निम्न दो लक्षण निर्धारित किए हैं-(1) हिन्दी-उर्दू मे लक्षणा अथवा व्यजना द्वारा सिद्ध वाक्य को ही 'मुहावरा' कहते हैं । (2) मुहावरे के अर्थ मे अभिधेयार्थ से विलक्षणना रहती है।15 श्री राम नरेश त्रिपाठी के अनुसार मुहावरे वो दो विशेषताए हैं-मुहावरा वाक्य के बाहर कभी नही जाता और 'मुहावरा' अपना असली रूप नही बदलता1153 ५० रामदहिन मिश्र ने मुहावरे का समोचीन विवेचन प्रस्तुत किया है । उन्होन अपनी पुस्तक 'हिन्दी मुहावरे' मे तरसम्बन्धी विभिन्न कोशकारो एव समीसको वे मता को सार रूप में एकत्र कर इसकी द्वादश मान्यताए वणित की हैं-(1) क्तिने ठीक-ठीच लेख, शंसी व घोसने के ढग को मुहावरा मानते हैं। जैसे जहाऊ के तरह-तरह के गहने ।

मुहावरा. स्वरूप-विवेचन 6t यहा तरह-तरह के जडाऊ गहने लिखना मुहावरा है। (2) कोई-कोई व्याकरण-विरुद्ध होने पर भी सुलेखक के लिसे होने का कारणविसी-किसी शब्द और वाक्य को मुहावरा बतलाते हैं। जैसे-उपरोक्त (उपर्युक्त) सराहनीय (श्लाघनीय) (3) कोई-कोई कहावत को हो मुहावरा कहते हैं-नौ नकद न तेरह उधार (4) कोई-कोई विलक्षण अर्थ प्रकाशित करने वाले वाक्य को ही मुहावरा कहते हैं । जैसे [बाल की खाल निकालना।(5) कितने भगो-पूर्वक अयं प्रकाशन के ढग को ही मुहावरा कहते हैं । जैसे-फारसी भाषा के कवियो ने इस नई भाषा को शाहजहानी बाजार मे अनवस्था मे इधर-उघर फिरते देखा। उन्हें इसकी भोली सूरत पसद आई, वह इसे अपने घर ले गए। (6) बहुतो ने शब्द या वाक्य को भिन्नाथं वोधक होने से ही मुहावरा माना है । जैसे—आख, यह अन्याय कब तर चलेगा। (7) कोई-कोई आलकारिक भाषा को ही मुहावरा कहते हैं । यथा-वसन्त वरसो पेरे, नेत्रो के सामने सब नाचने लगते हैं । (8) बहुत लोग विचित्र रूप से अर्थ प्रकट करने वाले वाक्य को मुहावरा कहते हैं । यथा-अग्रेजो के राज्य मे बाघ-बकरी एक घाट पर पानी पीते हैं। (9) कोई-कोई एक खास अर्थ के बोधक वाक्य को मुहावरा कहते हैं। यथा--लघु शका करते जाओ। (10) कोई-कोई एकार्थ मे वह क्रिया आदि को मुहावरा कहते हैं जैसे-हाथी चिंघाडता है, घोडा हिनहिनाता है। (11) कोई-कोई प्रचलित शब्द प्रयोग को हो मुहावरा बतलाते हैं जैसे नेहर की जगह 'मैके' आदि । (12) कोई-कोई किसी विषय पर प्राय प्रयुक्त होने वाले शब्द या वाक्य लाने को ही मुहावरा कहते हैं । जैसे-किसी के राज्य वर्णन मे राम-राज्य कह देना।16। यहा प० रामदहिन मिश्र ने मुहावरे सम्बन्धी लोगो के भ्रम का निवारण किया है । कहावत और मुहावरे मे पर्याप्त भिन्नता है, जिसका अन्यत्र वर्णन किया गया है । प्रत्येक भगिमापूर्ण वाक्याश मुहावरा नहीं बन सकता, यद्यपि मुहावरो मे वैदग्ध्य के दर्शन होते हैं। इसी प्रकार आलकारिकता आदि मुहावरे की महत्त्वपूर्ण विशेषताए हैं, तथापि प्रत्येक आलका- रिक कथन मुहावरा नहीं हो सकता। मुहावरे के निर्धारित स्वरूप से अपरिचित होने के कारण ही कुछ लोग भ्रमवश होकर किसी-किसी क्रियापद आदि को ही मुहावरा समझने की 'मूल करते हैं । हिन्दी के अनेक विद्वानो ने मुहावरे का स्पष्टत स्वरूप-निर्धारित करने का साघु प्रयत्न किया है। डॉ. रमेशचन्द्र ने अपने शोधप्रबन्ध मे मुहावरे के निम्नलिखित पड़ लक्षण स्वीकार किए हैं--(1) मुहावरा वाक्याश होता है । (2) मुहावरा भाषा विशेष की विलक्षणता है जो भाव के किसी विशेष पहलू को व्यक्त करता है । एक भाषा के मुहावरो का दूसरी भाषा में अनुवाद नही किया जा सकता। (3) मुहावरा शब्द का अर्थ है अभ्यास, स्वभाव या बातचीत । इसी अर्थ का प्रयोग भाषा में भी होता है और इसी के कारण मुहावरा रूदिगत प्रयोग कहलाता है। (4) मुहावरे की उत्पत्ति विभिन्न शारीरिक चेष्टामो, अस्पष्ट ध्वनियो के अनुकरण, कहानी, कहावतो, विभिन्न अलवारो तथा लक्षणा-व्यजना शब्द-शक्तियो आदि के आधार पर होती है । (5) मुहावरा ऐसा शब्दबद्ध रूप का नाम है जो व्याकरण के नियमो से निरपेक्ष होता है तथा प्रयुक्त पान्दो के मूल अर्थ से भिन्न अयं की व्यजना करता है। (6) मुहावरा भिन्न-भिन्न देश, जाति 62 लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण अथवा समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों को सूचर सजा है ।155 इन लक्षणो के आधार पर डॉ. रमेशचन्द्र ने मुहावरे का स्वरूप स्थिर किया है। इसे परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं -मुहावरा किसी लिखित अथवा वध्य भाषा में प्रचलित वह वाक्याश है जिसका अर्थ प्रत्यक्ष (अभिधेय) अर्थ से विलक्षण होने के कारण लक्षणा अथवा व्यजना द्वारा सिद्ध हो । उदाहरणार्थ 'मार खाइयो' वाक्याश एक मुहावरा है, क्योपि इसमे 'खाइवो' अपने साधारण अर्थ मे न आकर लाक्षणिक अर्थ 'सहन करना' में प्रयुक्त हुआ है, किन्तु 'नदी के किनारे पं' वाक्याश कोई भी विलक्षण अर्थ न प्रस्तुत करने के कारण मुहावरा नहीं है । अत. यह कथन कि 'मव मुहावरे वाक्यात होते हैं परन्तु सब वाक्यारा मुहावरे नही होते', सर्वथा युक्ति-युक्त एव समीचीन है 1156 डॉ० ओम्प्रकाश गुप्त ने मुहावरा-मीमासा मे मुहावरे की परिभाषा इस प्रकार प्रस्तुत की है-प्राय. शारीरिक चेष्टाओ, अस्पष्ट ध्वनियो, कहानी और कहावतो अथवा भाषा के कतिपय विलक्षण प्रयोग के अनुकरण या आधार पर निर्मित और अभिधेयार्य से भिन्न कोई विशेष अर्थ देने वाले किसी भाषा के गठे हुए रूढ वाक्य, वाक्याश अथवा शब्द इत्यादि को मुहावरा कहते हैं । जैसे-हाथ-पर मारना, सिर घुनना, अगारो पर लोटना, आग से खेलना आदि 1157 डॉ० ओमप्रकाश गुप्त ने इस परिभाषा मे तीन तथ्यो पर विशेष बल दिया है, ये हैं-(क) मुहावरो का निर्माण भाषा आदि प्रयोग के अनुकरण अथवा आधार पर होता है । (ख) मुहावरे अभिघार्थ से भिन्न विशिष्ट अर्थ के द्योतक होते हैं तथा (ग) ये किसी भाषा के गठे हुए रूढ वाक्य, वाक्याश अथवा शब्द होते हैं। डॉ० प्रतिमा अग्रवाल अपने शोध-प्रबन्ध 'हिन्दी मुहावरे' मे इसकी लाक्षणिक्ता पर विचार करती हुई लिखती है-मुहावरा लाक्षणिक प्रयोग है और इसके द्वारा भाषा को वक्रता एव चुटीलापन प्राप्त होता है। 'लाक्षणिक प्रयोग' कहने का तात्पर्य यह नहीं समझना चाहिए कि लाक्षणिक प्रयोग और मुहावरा समानार्थी हैं एव हर लाक्षणिक प्रयोग मुहावरा है । लाक्षणिकता के साथ ही साथ दूसरा अनिवार्य गुण है-रूढ होना अर्थात् उस विशेष अर्थ मे वह लाक्षणिक प्रयोग रूढ एव जनप्रचलित हो। इस गुण अभाव मे मुहावरा मुहावरा हो ही नहीं सकता। लाक्षणिक प्रयोग एव मुहावरो के बीच सीमा रेखा खीचना सरल नही । कहा कौन-सा लाक्षणिक प्रयोग, अपनी विशुद्ध आलकारिकता छोडकर मुहावरे की सीमा स्पर्श करता है, और कहा अपनी सीमा में ही बद्ध आलकारिक प्रयोग मात्र है, यह कहना कठिन है।158 प्रस्तुत विवेचन मे डॉ० अग्रवाल ने मुहावरे एव लक्षणा शब्द-शक्ति के सम्बन्ध स्थापन मे जिस बात पर विशेष दल दिया है, वह यह है कि मुहावरा लाक्षणिक प्रयोग का पर्याय न होकर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है । डॉ. अग्रवाल मुहावरे को परिभाषित करती हुई लिखती है- मुहावरा वह विशिष्ट पद-रचना है जो अभिधेयार्थ से भिन्न कोई विशेष लाक्षणिक अर्थ को सम्मुख रखती है या किसी अभिधेयापं को गौण बनाकर कोई विशेष अर्थ की ध्वनि देती है। 153 कुछ विलक्षण 'अपेक्षित मुहावरे स्वरूप विवेचन 63 उपर्युक्त मन्तव्यो के आधार पर निष्कर्पत कहा जा सकता है कि 'मुहावरा' एक पारिभाषिर शब्द है, जिसका प्रयोग विलक्षण अर्थ में किया जाता है। मभिधेयार्थ से नितान्त भिन्न मुहावरा वह वाक्याश है जो किसी भाषा वे लाक्षणिक एव व्यजनामूलक अर्थ में लोक-विश्रुत होरर रूढ हो गया हो। 'महायरा' एप रोजमर्रा (बोलचाल)-हिन्दी शब्द-सागर में मुहावरे की परिभाषा देते हुए कहा गया है कि कुछ लोग इसे 'रोजमर्रा' या 'बोलचाल' भी कहते हैं।160 इसलिए रोजमर्रा एव 'मुहावरे' के साम्य वैषम्म पर विचार करना भी आवश्यक हो जाता है। रोजमर्रा का प्रयोग सर्वप्रथम 'फरहग आसफिया' में प्राप्त होता है । इसके आधार पर श्री गया प्रसाद शुक्ल, ५० रामदहिन मिश्र प्रमृति चिन्तको ने मुहावरे के निरूपण के साथ ही इसका भी विवेवन किया है। मौलाना 'हाली अपनी कृति मुकदमा- शेरो शायरी' मे लिखते हैं कि मुहावरे के जो मानी हमे अव्वल (पहले) बयान किए हैं, वह आम यानी दूसरे माइनो (अयो) मे भी शामिल हैं, लेकिन दूसरे मानो पहले मानी से खास हैं। पर जिस तरकोव को लिहाज से भी मुहावरा कहा जायेगा, उसको दूसरे मानो के लिहाज से भी मुहावरा कहा जा सकता है, लेकिन यह जरूरी नही है कि जिस तरकीब (व्यापार) को पहले मानी के लिहाज से मुहावरा कहा जावे, उसको दूसरे माइनो (अर्थों) के लिहाज से भी मुहावरा कहा जावे । मसलन, 'तीन पाच करना' (झगडा टटा करना) । उसको दो मानो के लिहाज से मुहावरा कह सकते हैं क्योकि यह तरकीब अहले-जवान की बोलघाल के भी मुआफिक है, और चीज उसमे 'तीन पाच' का लपज अपने हकीकी मानो मे नहीं, बल्कि मजाजी (साकेतिक) माने मे बोला गया है। लेकिन रोटी खाना या मेवा खाना या पाच-सात या दस-बारह वगर सिर्फ पहले मानों के लिहाज से नही, क्योकि यह तमाम तरकीबें अहले जबान के मुआफिक तो जरूर हैं, मगर उनमे कोई लफ्ज़ मजाजी मानो मे इस्तेमाल नहीं हुआ।161 मौलाना 'हाली' के इस वक्तव्य के आधार पर 'मुहावरा सज्ञा से उसे अभिहित किया जा सकता है जो मजाजी मानो अर्थात साकेतिक अर्थ मे प्रयुक्त हुआ हो, जबकि "रोजमर्रा के लिए इस प्रकार का कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है अत साकेतिक अर्थ एक ऐसी विभाजक रेखा है जो रोजमर्रा को मुहावरे से पृथक करती है । मौलाना 'हाली के मन्तव्य को स्पष्ट करते हुए श्री रामचन्द्र वर्मा लिखते है-कुछ लोग वोलचाल के प्रचलित और शिष्ट सम्मत प्रयोगो को ही मुहावरा समभते हैं, पर वास्तव मे वह 'मुहावरे' का दूसरा और गौण अर्थ है । यह वह तत्त्व है जिसे उर्दू वाले रोजमर्रा कहते हैं । यह 'रोजमर्रा' भी होता ता है-प्राय कुछ गढे हुए या निश्चित शब्दो मे ही, पर उन शब्दो से सामान्य अथ निकलता है । उस प्रकार का कोई विशप अर्थ नही निकलता, जिस प्रकार का मुहावरे से निकलता है। जैसे- हम यह तो कहेंगे कि 'यह पाच सात दिन पहले की बात है', पर यह नही कहेगे कि यह पाव-आठ दिन पहले की बात है या छह नौ दिन पहले की बात है । बोलचाल का बधा हुआ रूप 64. लोकोक्ति और मुहावरा . स्वरूप विश्लेपण 'दिन दूना और रात चौगुना' ही है। इसे हम रात दूना और दिन चौगुना नहीं कर सकते। कुछ सज्ञाओ के साथ जो कुछ विशिष्ट या निश्चित क्रियाएं आती हैं, वे इसी बोलचाल तत्त्व की सूचक हैं 1162 उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निम्न तथ्य उपस्थित होते हैं- (4) बोलचाल का प्रचलित एव शिष्ट-सम्मत प्रयोग वस्तुत: मुहावरा न होकर उसका दूसपा और गौण अर्थ है। (ख) यह गौण अर्थ उर्दू मे रोजमर्रा के नाम से प्रचलित है। (ग) रोजमर्रा' का प्रयोग भी कुछ गढे हुए या निश्चित शब्दो मे ही होता है, पर उन शब्दो से सामान्य अर्थ ही द्योतित होता है। (घ) मुहावरे के द्वारा कोई विशेष अर्थ अभिव्यजित होता है। धर्मा जी ने मौलाना हाली' के विचारो को स्पष्टता प्रदान की है, इसमे सन्देह नही। वर्मा जी का सामान्य अर्थ मौलाना 'हाली' के हकीकी अर्थ के समानान्तर प्रयुक्त हुआ है और विशेष अर्थ मजाजी मानो के रूप मे आया है, अत मुहावरा हकीकी अथवा सामान्य अर्थ या अभिधेयार्थ से नितान्त भिन्न विशेष अर्थ अथवा मजाजी मानो मे प्रयुक्त होता है। थी अयोध्या सिंह उपाध्याय ने 'बोलचाल' नामक अपनी पुस्तक में 'मुहावरे' व 'रोजमर्रा के पारस्परिक सम्बन्ध का विस्तृत निरूपण किया है। वे लिखते हैं--"मुहावरे और रोजमर्रा या बोलचाल पर हमे दो दृष्टियो से विचार करना है-पहले भाषा की दृष्टि से उनकी अलग-अलग उपयोगिता और आवश्यकता पर, और दूसरे उन दोनो के पारस्परिक सम्बन्ध पर । जैसे मौलाना साहब ने कहा है-उपयोगी तो दोनों हैं, परन्तु आवश्यक जितना रोजमर्रा है, मुहावरा उतना नहीं। भाषा को यदि एक स्त्री माने तो रोजमर्रा उसके शरीर की सावयवता और गठन तथा मुहावरे (उसके) किसी मग विशेष का सौन्दर्य है। रोजमर्रा का सम्बन्ध भावो के बाह्य परिधान, शब्दो के क्रम सानिध्य और इप्ट प्रयोग तक ही विशेष रूप से सीमित रहता है। आशय, तात्पर्य, अथवा व्यजना ना उस पर कोई नियन्त्रण नहीं रहता, जबकि मुहावरे के लिए भावो के बाह्य परिधान, शब्द-क्रम इत्यादि के साथ ही उनसे अभिव्यजित तात्पर्यायं की रूठियों का पालन करना भी अनिवार्य है ।16। उदाहरण के द्वारा आगे अपनी बात स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं ---'कुत्ते भौंकना' एक वाक्याश है । रोजमर्रा की दृष्टि से चूकि कुते के साथ 'भौंकना' क्रिया ही आनी चाहिए, इसलिए 'कुत्ते भौंकना' इसका अर्थ कोई झगडे की बात छेडना, किसी भी अर्थ मे लें, रोजमर्रा के पद से च्युत नही हो सकता; किन्तु यह याक्या। मुहावरा केवल अपने अर्थ में ही हो सकता है, दोनो अयों में नही । सक्षेप में हम यह सकते हैं कि वोनचाल या रोजमर्रा और मुहावरे मे वही सम्बन्ध है, जो दारीर और पारीरी मे होता है । जिस प्रकार शरीर के विना शरीरी अति सुन्दर और प्रिय होने पर भी मून और पिशाच ही समझा जाता है, कोई उसकी ओर आकृष्ट नहीं होता, उसी प्रकार रोजमर्रा (इष्ट प्रयोग) के निना मुहावरा' सर्वथा अप्रिय और कणं क्ट ही लगता है 1165 इस प्रकार उपाध्याय जी के अनुसार- (क) मुहावरे एव रोजमर्रा की तुलना में आवश्यकता की दृष्टि से रोज मरी अपेक्षाकृत अधिक आवश्यक है, तथापि दोनो की उपयोगिता, असे दिग्ध (ख) रोजमर्रा भाषिक शरीर की सावथवता या गठन है तो विशेष का सौन्दर्य है। (ग) रोजमर्रा भावो के वाह्य परिधान-शब्दो मे क्रम, सान्निध्य और इष्ट प्रयोग तक सीमित है वहा मुहावरे मे इनके साथ ही अभिव्यजित तात्पर्यायं की रूढियों का पालन भी अनिवार्य है। (घ) इन दोनो मे परस्पर शरीर-शरीरी का सम्बन्ध होने के कारण भाषा में दोनो की ही महत्त्वपूर्ण उपयोगिता एव आवश्यकता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि गठन तथा वाक्य-विन्यास को दृष्टि से दोनो मे समानता है तथा भाषा मे दोनो की महत्त्वपूर्ण उपयोगिता एव अनिवार्यता है, किन्तु फिर भी सापेक्षता की दृष्टि से यदि रोज़मर्रा शरीर है तो मुहावरा शरीरी। प्रथम यदि साधन है तो द्वितीय साध्य । प्रथम यदि भाषिक स्त्री की सावयवता है तो द्वितीय उसका लावण्य । अर्थ तत्व की दृष्टि से भी दोनो मे पर्याप्त भिन्नता है, क्योकि प्रथम मे अभिधेयार्थ की विद्यमानता है तो द्वितीय मे साकेतिक अर्थ को, तथापि भाषा मे दोनो का ही महत्त्व है। मुहावरे के साथ तुलना करते हुए विद्वानो ने पहेलिया, रोज़मर्रा, सुभाषित, लौकिक न्याय, दृष्टिकूट, प्रतीक, सयुक्त क्रियाए तथा व्याकरण-तकं आदि के साथ मुहावरे का साम्य-वैषम्य प्रदर्शित किया है168, किन्तु विस्तार भय से इसकी चर्चा सभव नहीं है । हा। कई बार कुछ चलते क्रियापदो को मुहावरा समझने का भ्रम हो जाता है, अत युग्मक क्रियापद अथवा सयुक्त क्रियाए एव मुहावरे की तुलना आवश्यक हो जाती है। डॉ० अप्रवाल के शब्दो मे~-हिन्दी साहित्य-भाषा में प्रयुक्त कुछ सयुक्त क्रियाए ऐसी हैं जिनमे एक ही अर्थ मे दो क्रियाए आती हैं, जैसे मारपीट कर, बिना कहे-सुने आदि। ये युग्मक क्रियापद मुहावरेदानी के आस-पास पहुच जाते हैं, लेकिन वास्तव मे मुहावरे नहीं हैं। 'मारपीट करना', 'कहासुनी करना', 'ना' प्रत्यान्त होने पर ही वे मुहावरे होगे:167 मुहावरे एव सयुक्त क्रियाए-जब किसी क्रिया को कुछ विशिष्ट कृदन्तो के आगे जोड कर क्रिया बनती है, सयुक्त क्रिया कहलाती है, यथा--मरने/मारने लगना, खा/पो सकना, करने/मरने देना आदि में कृदन्तो के आगे क्रमश लगना, सकना, देना शियाए जोडकर सयुक्त क्रिया बन गई है। संयुक्त नियाओ मे मुख्य त्रिया का कोई न कोई कृदन्त-रूप होता है और सहकारी क्रिया जो कृदन्त की विशेषता द्योतित करती है, काल पे रूप में रहती है। उठना, आना, करना, चाहना, चुकना, जाना, लगना, सक्ना, होना आदि क्रियाए इसी प्रकार की है, जो संयुक्त नियाओ म आती हैं। इन सहकारी 66 : सोकोक्ति और मुहावरा :स्वरूप विश्लेषण क्रियाओ का मुस्य क्रियाओं के साथ मेल होने से सयुक्त क्रियाओ मे एक नवीन अर्थ उत्पन्न होता है, जिससे सयुक्त किया और मुहावरे को एव मानने का भ्रम उत्पन्न हो जाता है, किन्तु इस प्रकार की सयुक्त क्रियाए लक्षणा-यजना-सिद्ध न होने के कारण मुहावरे की श्रेणी में नहीं आती हैं। यथा-'माला टूट गई और मोती बिखर गए' वाक्य में 'गई' और 'गए' सह्यारी त्रियाए हैं । 'टूट गई और 'विसर गए' सयुक्त त्रियाए हैं । 'टूट गई' सयुक्त प्रिया से मुक्ता व सूत्र ये सम्बन्ध विच्छेद का बोध होता है। इससे मिलता-जुलता एक मुहावरा है 'टूट पडना' जिसका अर्थ लक्षणा द्वारा होता है-पूरी शक्ति के साथ यात्रमण करना। इसके विपरीत अन्य मुहावरा है 'टूटी जुडना'। इसका अभिप्राय है-पुन सम्बन्ध स्थापित हो जाना। इसी प्रकार एक अन्य उदाहरण है- 'पिता यो आते देखकर लडया उठ बैठा' । इस पाक्य मे प्रयुक्त बैठा' सहायक प्रिया के द्वारा अविलम्ब-त्वरित उठने को प्रिया की व्यजना हुई, विन्तु धातुगत अर्थ मे किमी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ। इसके विपरीत 'उस लडने का अपने साथियो के घरों मे उठना यंठना है' इस वाक्य मे व्यवहृत रेखाकित मुहावरे मे धारवर्ष का परिवर्तन हुआ है। इससे भी प्रकट है कि सयुक्त क्रिया एव मुहावरे मे पर्याप्त पार्थक्य है। सयुक्त क्रियापद एव मुहावरे मे पारस्परिक भेद का एक अन्य आधार यह भी है कि सयुक्त क्रियापद से उच्चारण करते समय वलापात-प्रधान क्रियापद रहता है और सहायक क्रियापद अल्पतर प्रयत्न से बोला जाता है, यथा-'वह चला गया होगा। प्रयुक्त 'चला' प्रमुख क्रियापद और 'गया होगा' सहायक क्रियापद है। वाक्य बोलते समय बलाघात प्रथम क्रियापद 'चला' पर ही सुनाई देता है। इसके विपरीत मुहावरो का उच्चारण करते समय मुहावरे के दोनो पद समान होते हैं अर्थात् किसी एक पद पर बलाघात प्रमुख या गौण नहीं होता 1168 यथा-'राम आता है-सीता आती है । यहा क्रियाए कृदन्त तिडन्त (सयुक्त) हैं। 'आता-आती' कृदन्त मुख्य क्रियाए हैं और 'हे' तिडन्त, सहायक क्रिया।169 किन्तु 'राम का श्याम के घर आना जाना है। या "सीता श्यामा के पास आती जाती है। इन वाक्यो मे दोनो पद समान हैं । 'आने' की क्रिया से सम्बन्धित अनेक मुहावरे हैं, यथा 'आइ जुरी', 'आइ जुर' या 'आइ परे। आदि। इनका अभिप्राय है एकत्रित हो गई तथा एकाएक (विपत्ति आदि) उपस्थित हो गई। स्पष्ट है कि यहाँ मुहावरो मे कोई एक पद प्रमुख या गौण न होकर दोनो पद समान रूप मे प्रयुक्त हुए है। लोकोक्ति एव मुहावरे मे साम्य-वैषम्य लोकोक्ति एव मुहावरे मे पर्याप्त साम्य होने पर भी वस्तुत भिन्नता है । यद्यपि कुछ विद्वानो ने इनमे परस्पर अभेद स्थापित करने की चेष्टा की है। डॉ. स्मिथ एक स्थान पर लिखते हैं-कुछ लोकोक्तिया तथा लोकोक्तिपरय वाक्याश भी हमारी बोलचाल की भाषा मे घुल-मिल गए हैं, इन्ह भी शायद मुहावरा मान सकते है, यथा- एव सिर से दो सिर अच्छे हैं (Two heads are better than onc) वाक्य मे मुहावरा .स्वरूप विवेवन 67 पुराने मूरों की तरह कोई मूर्ख नहीं है (No fool like an old fool).71 डॉ. स्मिथ ने अपने कथन की पुष्टि मे जो उदाहरण दिए हैं, वे लोकोक्तियो के हो उदाहरण है, मुहावरो के लक्षणो का इनमे अभाव है। डॉ. स्मिथ की भाति प. राम दहिन मिश्र भी हिन्दी मुहावरे' नामक अपनी पुस्तक में मुहावरे के द्वादश लक्षणो में एक लक्षण के अन्तर्गत इन दोनो के पारस्परिक भेद को समाप्त कर देते हैं-"कोई-कोई कहावत को भी मुहावरा कहते हैं-जैसे, नौ नकद न तेरह उधार, नौ की लकडी नब्ब खर्च, आदि !12 डॉ० रमेशचन्द्र के अनुसार इन दोनो को अभिन्न समझने का प्रमुख कारण यह भी हो सकता है कि ये दोनो ही विलक्षण (असामान्य) अर्थ देते हैं, परन्तु इस एक समानता के अतिरिक्त इन दोनो में रूपात्मक, अर्थपरक तथा अन्य दृष्टियो से भी भेद होता है। वस्तुत डॉ. रमेशचन्द्र द्वारा कथित इन दोनो की समानता का आधार असामान्य अर्थ मात्र ही नहीं है, कुछ अन्य भी आधार हैं-यथा लोकाविन एव मुहावरे दोनो ही समान रूप से लोकप्रिय एव लोक-प्रचलित हैं, इनके उद्भव एव विकास का इतिहास भी एक समान है, दोनों ही कथन को रोचक एव प्रभावपूर्ण बनाते हैं तथा दोनो ही लक्षणा-व्यजना शक्ति से युक्त होते हैं, भाषा मे आलकारिकता, वाग्वेदाध्य आदि विशिष्टताओ के कारण चमत्कार की सृष्टि करते हैं आदि आदि। डॉ० ब्रजेश्वर वर्मा के अनुसार लोकोक्ति एव मुहावरे को अभिन्न समझे जाने का एक कारण यह भी है कि तनिक से परिवर्तन के साथ अनेक मुहावरे लोकोक्ति में परिणत किए जा सकते है। बहुत से मुहावरेदार वाक्यांश का प्रयोग कहावतो की भाति होता है और बहुत सी कहावतो के कलेवर मे मुहावरो का समावेश पाया जाता है । कहने का तात्पर्य यह है कि तनिक से परिवर्तन से मुहावरे कहावतो का और कहावतें मुहावरो का रूप धारण कर लेती हैं । उदाहरण के लिए एक मुहावरा है-"उगली पकडते पहुचा पकडना', जिसका अर्थ है - अल्पाश्रय ग्रहण कर फिर पूर्णाधिकार जमाना । इस मुहावरे का प्रयोग अनेक कवियो द्वारा किया गया है, पथा-- -~-छचे छिगुली पहुचौ गिलत अति दीनता दिखाइ। बलि बावन को ब्यौतु सुनि को, वलि तुम्हे पत्याइ । ~पहा एती चतुराइ पढी आप जदुराई, आगरि पकरि पहुंचा को पपरत हो। प्रथम देवरानी फिर सौत कहते हैं इसको ही अगुली पकड प्रकोष्ठ पकड लेना1178 बिहारी ने इस मुहावरे का प्रयोग करते हुए 'उगली पकडने' के स्थान पर 'छवे छिगुली' तथा गुप्त जी ने 'पहुचा' की जगह 'प्रकोष्ठ' शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु इससे मुहावरे का अर्थ परिवर्तित नही हुआ, अपितु कवि को नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा का परिचय प्राप्त होता है । मुहावरे का स्वरूप नष्ट नहीं हुआ। इधर सूरदास ने एक स्थान पर इस मुहावर का लोकोक्ति परक प्रयोग किया है, जिसका भाव है-वह व्यक्ति जो अल्लाश्रय ग्रहण कर तदनन्तर पूर्णििधकार जमाने का प्रयल करता है, अपने इस कार्य- 68 : सोशोपिन और मुशायरा स्यम्प विश्लेषण पलाप पो गुप्त नहीं रख समता, उगी अपिएन पस्तु आदिपा भेद सोर को प्राप्त हो जाता है- मपुरि गहत गह्मो निहिपापोरा दुरति दुराए। गूरदास मा मुहायरे का लोपोविपरर यह प्रयोग उनमें गैर-गान मा परिचाया है। हमने यह बात स्पष्ट हो जाती है रिना परस्पर सम्बन्ध भीषम नहीं है । मुहावरों यो परतन्नता से लाभ उठापर अनेक सोयोक्तियो मा तिर्माण मुहावरों में आधार पर ही होता है । डॉ० मुक्तेश्वर तियारी अपने अपने गोप-प्रयाघ- भोजपुरी सोकोक्तियां एय मुहायरे' के अन्तर्गत इसी तथ्य यो पुष्टि में निम्नोक्त उदाहरण प्रस्तुत पर विषय स्पष्ट करते हैं- (4) 'पर ये ययुमा याहर गइसग-मुह सूति पो घोपा भइलन ।' (स) 'गरज मधनिया अपनी सेले नाचत पर।' (ग) पाठ गढ़से घोक्न होला, यात गढ़से रखर होला।' (घ) 'पोति खातिर गइसी, मांगोगंवाइ के अाइती।' (1) 'जे दोसरा खातिर या तोनेला, भगवान बोकेरा के भगाइ सोने सन ।' इनमे पहली कहावत का तात्पर्य है कि "घर से यालक परदेश गया उसरा मुख सूखकर मूख कर पचुवत् हो गया। इस कहावत मे दो मुहावरे हैं 'याहर गहलन' और 'मुह सूख फर चोचा भइलन' दूसरी व हायत या तात्पर्य है, 'मजपूरी से अपना ही सर्च करके किसी या वार्य करना।' इसमे 'अपने तेले नाचल' मुहायरा है, जिसका अर्थ होगा अपना ही खर्च कर नाचना । तीसरी कहावत का मतलब होगा कि लबडी गढ़ने से चिकनी होती है, किन्तु यात गढने से कटुता बढ़ती है। इस कहावत मे 'याति गढ़न' मुहावरा है, जिसका तात्पर्य है 'वात बढाना' । चौथो कहावत का मतलब है पुत्र कामना के लिए गई, किन्तु पति भी गया बैठी। इसमे 'कोख खातिर गइले' (पुत्र के लिए जाना) तपा माग गवा के आइल (पति गवाकर आना) ये दो मुहावरे हैं। इसी प्रकार पाचवी कहावत का अर्थ होगा-जो दूसरो का अहित चाहते हैं, भगवान् स्वय उसको कष्ट देते हैं । इस कहावत मे भी 'कुआ खोनल' (अनिष्ट चाहता) और 'भगोड खोनल' (कप्ट देना) ये दो मुहावरे हैं 1178 इससे ज्ञात होता है कि लोकोक्तियो के निर्माण मे मुहावरे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । यही कारण है कि कही-कही इनका पारस्परिद भेद इतना सूक्ष्म होता है कि इनका पृथक्करण दुष्कर प्रतीत होता है । डॉ० सरोज अग्रवाल का कथन उपयुक्त ही प्रतीत होता है कि कहावतो और मुहावरो का यह भेद इतना सूक्ष्म होता है कि प्राय कहावतो को मुहावरे और मुहावरो को कहावतें समझ लिया जाता है। विभिन्न कहावत-कोशो मे कहावतो के साथ मुहावरे और 'मुहावरा-कोशो' मे मुहावरो के साथ कहावतें भी सम्मिलित कर दी गई हैं 1170 किन्तु मूलत लोकोक्तिया और मुहावरे अपना पृथक्-पृथक् अस्तित्व रखते हैं। पर्याप्त साम्य होने पर भी वस्तुत इनमे पारस्परिक अन्तर होता है। इनको पारस्परिक भिन्नता के अनेक ऐसे आधार हैं, जिनके द्वारा इनमे अभेद-स्थापन के भ्रम की निवृत्ति हो जाती है । विषय के स्पष्टीकरण के लिए कुछ मान्य - . विद्वानो के मत प्रस्तुत हैं--डॉ० ओम्प्रकाश गुप्त की दार्शनिक ब्दिावली से मुहावी वाक्य के सूक्ष्म शरीर हैं और स्थूल शरीर के बिना उनकी अभिव्यक्ति मेंही हो सकता परन्तु लोकोक्तिया वाक्य-समाज (भाषा) के प्रामाणिक व्यक्ति हैं जिनको व्यक्तित्व ही उनकी प्रामाणिकता का प्रमाण होता है, जहा-कही और जिस किसी के पास बैठे, उनकी तूती बोलने लगे 1180 बाबू गुलाबराय के मत मे लोकोक्ति का स्वतन्त्र प्रयोग होता है, जबकि मुहावरा परतन्त्र है---'कहावत मे एक पूर्ण सत्य या विचार को पूरी अभिव्यक्ति हो जाती है। वह पूरे वाक्य का अश नही बनता वरन् एक स्वतन्त्र वाक्य होता है। मुहावरा स्वतन्त्र नहीं होता, वह किसी वाक्य मे रखे जाने का मुहताज रहता है। 'तेते पांव पसारिए, जेती लाबी सोर', 'ठडा लोहा गरम लोहे को काटता है', ये कहावतें हैं, लेकिन 'टेढी खोर', 'पापड बेलना', 'दांतो तले उगली देना', 'दांत खट्टे करना', ये मुहावरे हैं (181 श्री ब्रह्म स्वरूप शर्मा 'दिनकर' इस सम्बन्ध में कहते हैं कि दोनो मे बडा अन्तर है, दोनो को एक समझना भूल है। (अ) 'हाथ पाव मारना'। (ब) 'देनी पडे बुनाई, घटा बताए सूत'। (अ) एक मुहावरा है, अतएव वाक्याश है। (ब) एक लोकोक्ति है और वाक्य है । मुहावरा एक वाक्याश होता है और लोकोक्ति एक पूर्ण वाक्य । मुहावरे का प्रयोग वाक्य मे होता है और लोकोषित का स्वतन्त्र रूप से। मुहावरा वाक्य के अर्थ मे चमत्कार उत्पन्न करता है और लोकोक्ति किसी बात के समर्थन के लिए प्रयुक्त होती है। 182 श्री 'दिनकर' के प्रस्तुत विवेचन का अन्तिम मश कि मात्र मुहावरा हो वाक्य मे चमत्कार उत्सन्त करता है तथा लोकोक्ति का प्रयोग किसी बात के समर्थन के लिए होता है, आपत्तिजनक है । वस्तुत दोनो ही भगिमापूर्ण विधान कर वैचित्र्य की सृष्टि करते हैं। लोकोक्ति के द्वारा भी अर्थ मे चमत्कार उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त जहा तक उसके प्रयोग का प्रश्न है, उन्होंने मात्र समर्थन के रूप मे ही लोकोक्ति का प्रयोग स्वीकार किया है, जबकि लोकोक्ति का प्रयोग किसी बात के विरोध आदि के लिए भी होता है। लोकोक्ति के प्रयोग की पोषण, शिक्षण, आलोचन आदि दृष्टियों पूर्व विवेचित हैं । यहा मात्र इतना कहना आवश्यक है कि लोकोक्ति मात्र को प्रयोग की दृष्टि से 'किसी बात के समर्थन के रूप में मानना अव्याप्ति दोष से युक्त होगा। श्री रामस्वरूप त्रिपाठी का मन्तव्य श्री ब्रह्म स्वरूप शर्मा 'दिनकर' के कथन से मिलता-जुलता है। उनके अनुसार--मुहावरा वाक्य का अश होता है। वह स्वतन्त्र रूप से व्यवहार मे नही लिया जा सकता। पर कहावत एक स्वतन्त्र वाक्य होती है और अपना स्वतन्त्र अर्थ रखती है। किसी कथन को पुष्ट करने के लिए उदाहरण के तौर पर अलग से उसका प्रयाग किया जाता है। 183 यहा यह कहना अनुचित न होगा कि इस विवेचन मे नवीनता का अभाव है, पूर्व विवेचित मन्तव्य से इस विवेचन को भिन्नता नहीं है। कहावत-कोशकार ने लोकोक्ति एव मुहावरे के पार्थक्य को इस प्रकार स्पष्ट किया है---मुहावरा एक वाक्य खण्ड अथवा वाक्याश होता है, जबकि कहावत एक सम्पूर्ण तथा स्वतन्त्र सामासिक सूत्र वाक्य । कहावत मे एक पूर्ण सत्य अधवा विचार की अभिव्यक्ति - 70. लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण होती है, पर मुहावरे मे ऐमा नहीं होता। मुहावरा किसी भाषा मे एक साक्षणिक प्रयोग होता है । कोई भी मुहावरा जब तक किसी वाक्य मे स्यान नहीं पाता, तब तक यह लग. भग निरयंक होता है। मुहावरे वी सबसे बडी पहचान है--उसका प्राय. 'ना' प्रत्ययाल होना । अधिकाश मुहावरे प्रिया की तरह 'ना' प्रत्ययान्त होते हैं और इनसे किमी कार्य या व्यापार का बोध होता है 1184 अपने विवेचन को विस्तार प्रदान करते हुए आगे वे लिखते हैं-कुछ मुहावरेदार वाक्य भी ऐसे होते हैं जिनका प्रयोग कहावतों की तरह होता है। इनके विषय मे जल्द निर्णय कर पाना कठिन होता है कि ये सचमुच कहावतें हैं या मुहावरेदार वाक्य । यथा, 'भले घर में बन देलउ (मुज० 2) एक मुहावरेदार वाक्य है, जिसमे 'भले घर में धन देहन।' (भले घर मे वायन देना) एक मुहावरा है, जिसका मानी है-विसी जबरदस्त व्यक्ति से उलझना। गो० तुलसीदास ने भी इसका प्रयोग मुहावरे के रूप मे किया है-'भले भवन अव यायन दीन्हा।' इस मुहावरे वाक्य वा प्रयोग अक्सर वहावत के रूप मे भी होता है 1185 वस्तुत. मुहावरा होने के कारण कहावत के रूप में इसका प्रयोग करना उचित नहीं होता। कहावत-कोशकार का यह कथन कि मुहावरा लाक्षणिक प्रयोगमात्र है, इसलिए अपूर्ण प्रतीत होता है क्योकि मुहावरो मे व्यग्यात्म- कना का भी प्राधान्य होता है। इसके अतिरिक्त लोकोक्तियो मे भी व्यंग्यात्मकता के साथ- साथ निरूढा लक्षणा भी कार्य करती है, अतः मुहावरे को लाक्षणिक प्रयोग मात्र स्वीकार करके इनका भेद-स्थापन नही हो पाता। डॉ० प्रेम नारायण शुक्ल के दृष्टिकोण के अनुसार मुहावरो की भाति लोकोक्तिया भी भापा और भाव-सौन्दर्य की सृष्टि करती हैं। इन दोनो मे अन्तर यह है कि मुहावरो मे लाक्षणिक अर्थ लिया जाता है और लोकोक्ति के पीछे कोई घटना होती है, जिसके द्वारा प्रस्तुत विषय का समर्थन किया जाता है 1186 कहना न होगा कि उक्त कथन मे डॉ. शुक्ल लोकोक्ति एव मुहावरे के भेद को स्पष्ट करने में असमर्थ रहे हैं। इसका पुष्ट प्रमाण यह है कि इन्होने मुहावरो की सूची मे–'बालू माहि तेल नहिं निकसत काहू विधि' तथा 'गगा उलटि फरि करि जमुना माह आणि जसे कहावतो के उदाहरणो को भी उसमें सम्मिलित कर दिया है। अत: शुक्ल जी का प्रस्तुत विवेचन इस दृष्टि से अपूर्ण ही कहा जा सकता है। डॉ. कृष्ण चन्द्र शर्मा द्वारा लोकोक्ति एव मुहावरे के साम्य-वैपम्य निरूपण में अधोलिखित तथ्य प्राप्त होते हैं- दाक् पद्धतियां (मुहावरे) लोकोक्तिया (1) व्यजना रूदिया है। ये अभिव्यक्ति चिरकाल के अनुभवो और गहन को बल प्रदान करती हैं। इनका विचारो को निष्कर्षात्मक अभि- प्रयोगान्तर्गत रूप-परिवर्तन सम्भव व्यक्तिया है । ये अपरिवर्तनीय हैं । (2) खण्ड वाक्य अपूर्ण विचार की वाहिका। सक्षिप्त वाक्य तथा सम्पूर्ण विचार- वाहिका।

मुहावरा स्वरूप विवेचन 71 व्यवस्था - (3) भाव को हृदयगम कराने में सहायक तकं को प्रमाण प्रदान कर अन्तिम अप्रस्तुत विधान के समान (4) भापा की शृगार-मजूषा एव निर्णय को उद्घोषिका (5) वाणी को चित्र तथा चिन को सजी लोक-मनीषा की समाहिका वता देने वाली सतत उद्धत उद्धरण काव्य बीज- (6) गद्य गरिमा से युक्त मण्डित इनके अतिरिक्त इनमे कुछ साम्य भी है, यथा-सक्षिप्ति, सुस्पष्टता, कुशाग्रता, विदग्धता आदि जो वाक् पद्धतियो और लोकोक्ति मे समान रूप से पाई जाने वाली विशेषताए हैं।187 डॉ० शर्मा ने अपने इस विवेचन मे लोकोक्ति एव मुहावरे को पृथक्ता कुछ आधार प्रस्तुत किए हैं, किन्तु यदि इन आधारा को वैज्ञानिक रीति से प्रस्तुत दिया जाता, तो उनका यह प्रतिपादन स्थिर एव मान्य हो सकता था, जबकि इस विवेचन मे भी अपूर्णता के दर्शन हो जाते हैं, यथा--अतिम आधार ही लीजिए-मुहावरे जहा गद्य- गरिमा से युक्त होते है, वहा, लोकोक्तियो गद्य एव पद्यबद्ध दोनो ही रूमो मे प्राप्त होती हैं। फिर भी डॉ० शर्मा का यह विवेचन इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बन जाता है कि इन्होने लोकोक्ति एव मुहावरे मे परस्पर भेद-स्थापित करने के लिए कुछ नियम निर्धारित करने का प्रयत्न किया है। डॉ. भोलानाथ तिवारी इन दोनो के परस्पर वैषम्य को उद्घाटित करते हुए कहते हैं--मुहावरा वाक्य में बिल्कुल मिल जाता है, किन्तु लोकोक्ति को अलग सत्ता रहती है। इसका कारण यह है कि अर्थ की दृष्टि से लायोक्ति अपने आप मे--सूत्र रूप में ही सही--पूर्ण होती है, किन्तु मुहावरे मे यह बात नहीं होती। उसे अन्य शब्दो की भी आवश्यकता होती है। साथ ही मुहावरा हमारा अभिव्यक्ति का अग होता है, किन्तु लोकोक्ति उस रूप मे अगनहीं होती। उससे प्राय किसी बात का समर्थन याखण्डन आदि ही विमा जाता है। इन अन्तरो के बावजूद कभी कभी दोनो एक दूसरे के पर्याप्त निक्ट होत हैं और कभी-कभी तो लोकोक्तियो का क्रिया आदि जोडकर मुहावरे के रूप मे प्रयोग होता है। जैसे 'नो दिन चले मलाई कोस' करना या 'आंखें कहीं और दिल कहीं और होना' आदि।188 अलकार एव शब्दशक्ति के आधार पर श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय ने दोनों में पार्थक्य इस प्रकार स्थापित किया है-'सम्पूर्ण कहावतो वा अन्तर्भाव लोकोक्ति अलकार मे हा जाता है। किन्तु मुहावरो के पक्ष में यह नियम लागू नहीं होता। मुहावरे लक्षणा और व्यजना पर आश्रित है, अतएव अलवार मुहावरो मे आ जाते हैं । शन्दालकार भी मुहावरो मे मिलते हैं किन्तु वहावतो में उनका आधिक्य पाया जाता है। स्वभावोक्ति, ललित तथा गूढोक्ति आदि अलकारो या प्राचुर्य देखने को मिलता है ।18 असारो की प्रचुरता लोकोक्तियो के अन्तर्गत प्राप्त होती है, अत लोकोक्तिमात्र को 'लोकोक्ति अलकार' मै अन्तर्भूत करमा न्यायोचित नहीं है । लोकोक्तियों एवं मुहावरों में बलशार- 72 . लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण प्राचुर्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । उपाध्याय जी ने मुहावरो को लक्षणा व्यजना पर आश्रित माना है, किन्तु मुहावरो की भाति लोकोक्तियो मे भी उभय शब्दशक्तियो का कार्य-व्यापार अमन्द गति से चलता है। श्री कन्हैयालाल सहल इस सम्बन्ध मे अपने मत की स्थापना करते हुए लिखते हैं-कहावत और मुहावरे मे एक अन्य प्रमुख अन्तर है। कहावतो को 'अनुभव को दुहिता' कहा गया और अनुभव की समानता दुनिया के प्रत्येक देश मे देखने को मिलेगी। यही कारण है कि एक देश की अनेक कहावत दूसरे देश की कहावतो से बहुत कुछ मिल जाती हैं। कभी-कभी तो बहुत सी कहावतें परस्पर अनूदित सी जान पडती हैं, किन्तु मुहावरों के सम्बन्ध मे यह नहीं कहा जा सकता।190 उपर्युक्त मन्तव्यो का सार इस प्रकार है- (क) लोकोक्ति पूर्ण वाक्य का अश न बनकर स्वतन्त्र वाक्य के रूप में प्रयुक्त होती है, जबकि मुहावरा वाक्याशमात्र होता है तथा स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त न होकर वह परतन्त्र होता है। (ख) लोकोक्ति का स्वरूप प्रयोग-काल मे प्राय अपरिवर्तनीय होता है, जबकि मुहावरे के लिए ऐसा कुछ नहीं है । (ग) लोकोक्ति का प्रयोग खण्डन-मण्डन-शिक्षण आदि के रूप में होता है, जबकि मुहावरे के प्रयोग का प्रयोजन मान वाक्य के अर्थ मे चमत्कार उत्पन्न कर उसे सार्थकता प्रदान करना है । मुहावरे का स्वतन्त्र प्रयोजन लोकोक्ति की भाति नहीं होता। (घ) अनेक लोकोक्तियो के अन्तर्गत मुहावरे समाविष्ट होते हैं, जबकि किसी मुहावरे मे लोकोक्तियो का अन्तर्भाव नहीं होता। (ड) कुछ लोकोक्तिया और मुहावरे उभयनिष्ठ होते हैं, अत उनको परस्पर पृथक करना दुष्कर हो जाता है। (च) लोकोक्ति मे किसी पूर्ण विचार, सत्य अथवा मानवीय अनुभव की सशक्त अभिव्यक्ति होती है, जबकि मुहावरे मे किसी भाव, दशा, प्रिया, चेष्टा आदि का ही प्रदर्शन अभीष्ट होता है। (छ) मुहावरे का लाक्षणिक एव ध्वन्यात्मक अर्थ ग्रहण किया जाना आवश्यक होता है, जबकि उपदेशप्रधान, नीति-शिक्षा आदि से सम्बन्धित अभिधा- प्रधान लोकोक्ति के लिए ऐसा कोई प्रतिबन्ध नही है। (ज) कुछ विद्वानो ने लोकोक्ति का अन्तर्भाव 'लोकोक्ति अलकार' के अन्तर्गत किया है, जबकि मुहापरे को किसी अलकार विशेष मे परिवट नहीं दिया गया, यद्यपि लोकोक्तियो एव मुहावरो मे अनेक शब्दासकारो एव अर्या- लगारो के सुष्ट्र प्रयोग प्राप्त होते हैं । (म) लोकोक्तियाँ अनुभव की दुहिता होने के कारण यत्किपित् भेद से विभिन्न देशो को विभिन्न भाषाओं में प्रचलित हैं, अत इनका एक भाषा से दूसरी - मुहावरा : स्वरूप विवेचन 73 भाषा मे सुगमतापूर्वक अनुवाद किया जा सकता है, परन्तु मुहावरो के सम्बन्ध मे यह नहीं कहा जा सकता। (ब) इन दोनो मे एक प्रमुख अन्तर यह भी है कि 'मुहावरा' प्राय 'ना' प्रत्ययान्त होता है और लोकोक्ति मे क्रिया का पूर्ण स्वरूप विद्यमान रहता है। लोकोक्ति एव मुहावरे के विवेच्य वैषम्य को स्पष्टता एव स्थिरता प्रदान करने लिए लोकोक्ति एव मुहावरे से सम्बन्धित विषय पर शोध-कार्य करने वाले अन्य शोध- ताओ के तत्सम्बन्धी प्रतिपादन का अवलोकन आवश्यक है । प्राय. इन समस्त शोर- ताओ ने विभिन्न नियमो के आधार पर इनमे परस्पर भेद स्थापित करने का प्रयत्न पा है। इन्होंने रूपात्मकता, अर्थपरकता, उपयोगिता, प्रयोगात्मकता तथा शैली आदि दृष्टि से लोकोक्ति एव मुहावरे के परस्पर भेद को स्पष्ट किया है। डॉ० मुक्तेश्वर गरी 'बेसुध' ने 'भोजपुरी लोकोक्तिया तथा मुहावरे' नामक शोध-प्रबध मे तीन नियमो प्राधार पर, डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा ने 'मूर साहित्य में प्रयुक्त लोकोक्तियो का प्रयन' में चार, डॉ. छोटे लाल द्विवेदी ने 'हिन्दी (अवधी) लोकोक्तियो का सास्कृतिक ग्यन' मे पाच, डॉ. रमेश चन्द्र ने 'कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावती और मुहावरो अध्ययन' मे दस तथा डॉ० सरोज अग्रवाल ने 'भक्तिकालीन ब्रज साहित्य में मुहावरे' क अपने शोध-प्रबन्ध में पोडश नियमो के आधार पर यह भेद स्थापित किया है। सरोज अग्रवाल के ये आधार हैं-रूप, सरचना, प्रत्यय, शब्द-योजना, समावेश रूप , अर्थ, उद्देश्य-विधेय, शब्द-शक्ति, शैली, अलकार, निर्माण, क्षेत्र (देश), अनुवाद, उपयोग तथा नीति तत्त्व । इनमे कुछ आधार ऐसे हैं, जिनका कुछ प्रमुख आधारो मे भर्भाव हो सकता है, यथा-प्रथम आधार रूपात्मकता अथवा सरचना को लिया जा है। अनेक प्रारम्भिक आधार इसमे अन्तर्भूत हो सकते हैं, अत कुछ प्रमुख आधारो रा इनका वैपम्य प्रदर्शित सुगमतापूर्वक सम्भव है। रूपात्मकता अथवा शाब्दिक कलेवर की दृष्टि से लोकोक्ति एव मुहावरे में मूल- द यह है कि कहावतें मुहावरे की तुलना मे बृहत्तर होती हैं डॉ० ओम्प्रकाश के शब्दो कोक्ति और मुहावरे मे सबसे बड़ा अन्तर तो उनके शाब्दिक कलेवर का है । अग्रेजी हन्दी में प्राय सर्वत्र लोकोक्ति को वाक्य और मुहावरा के खण्ड वाक्य अथवा पद पया है ।191 उदाहरणार्थ 'अधिक मिठाई मा कीरा परत हैं लोकोक्ति मे वाक्य की स्पष्ट है, किन्तु 'नो दुई ग्यारह होब' या 'मार खाव' मुहावरो मे केवल वाक्य का ही प्रयोग किया गया है। इससे प्रकट है कि मुहावरा एक वाक्याश होता है कोक्ति एक सम्पूर्ण स्वतन्त्र या सूत्र वाक्य होती है। मुहावरे की सरचना में कम दो या अधिक पदो का होना अनिवार्य है। अधिकाशत मुहावरे सजा, सवनाम, I, क्रिया विशेषण, कृदन्त, अव्यय आदि पदो के साथ क्रियापद के योग से बनते हैं, हावतो की सरचना मे अनेक पद होते हैं । वे समास शैली में पूर्ण वाक्य हैं । अनेक मे एक से अधिक वाक्य भी पाए जाते हैं ।192 । 74 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण लोकोक्ति एव मुहावरे को रूपात्मकता के परिवर्तन के विषय मे हरिऔध जी का क्यन है कि कहावतो का रूप निश्चित है और उनके शब्द प्राय निश्चित रूप मे ही बोले जाते हैं । 193 इधर डॉ० सरोज अग्रवाल लिखती हैं कि मुहावरो की शब्द योजना मे किसी भी प्रकार का परिवर्तन अवाछनीय है। शब्द न्यूनाधिक्य या शब्द परिवर्तन से उनका स्वरूप नष्ट हो जाता है । कहावतो के शब्दो के हेरफेर से उनका रूप नष्ट नहीं होता।" इसके विपरीत डॉ. रमेश चन्द्र का मत है कि कहावत का वाक्य प्राय ज्यो का त्यो रहता है, अधिक से अधिक कभी-कभी कोई भले ही आगे-पीछे रख दिया जाय या कम-बहती कर दिया जाय, किन्तु सदैव अपने उसी रूप मे बोली जाती हैं, किन्तु मुहावरो मे ऐसी बात नहीं पाई जाती । वे काल, पुरुष, वचन और व्याकरण के अपेक्षित नियमो के साथ साय बदलते रहते हैं, यपा- -घरे में पामरी गादियो-के स्थान पर-घरे में पामरो गढि गयो, पूरे मे पामरि गदि दिगे, पूरे मे पामरो गाढ़ि दूगो। आदि कहावतो मे इस प्रकार का रूप परिवर्तन ५ रने से उनको अर्थ बोधगम्यता नष्ट हो जायगी। इसलिए वहावतो मे रूप परिवर्तन नहीं होता ।100 परस्पर विरोधी मन्तव्यो को पढकर सन्देह उत्पन्न होता है कि इनमे म्प की दृष्टि से परियर्तन होता है अथवा नहीं ? वस्तुत उपर्युक्त कथन मे मुहावरों का जो परिवर्तन बताया गया है उससे मुहावरे के मूल स्वरूप को पति नही पहुचती, मात्र त्रिया ही अशत परिवर्तित हुई है। जैसे एव मुहावरा है-'पेट में चूहे दौडना'। इस मुहा- यरे को याक्य में वर्तमानकालिक के रूप में प्रयोग करते हुए इस प्रकार भी प्रयोग में मा सकते है कि 'पेट म चूहे दौर रहे हैं', विन्तु इससे मूल स्वरूप नष्ट नहीं होगा, किन्तु यदि दौटने को त्रिया ये स्थान पर धनने या भागने की त्रिया या भी प्रयोग करेंगे, तो मुहावरा नष्ट हो जाएगा। जहा तर लोकोक्तियों के स्वरूप-परिवर्तन का प्रश्न है निस्म ह मुप्रमिश सोोक्तियों का प्रयोग परते हुए मामान्यत. उसका यथायत् ही प्रयोग परते हैं यथा-'मार अपे गाठ ये पूरे', 'अप जल गगरी छलफात जाय','मिया की दौर मरिया तष: 'साए पना रहे पना' मादि सोकोक्तियों का प्रयोग करते हुए यस्ता दाफा अपरि यगिरमे हो प्रयोगमरता है, जिन्तु जब योई साहित्यकार अपने साहित्य मे इन्हें स्थान देता है तो दरपना आदि की दृष्टि ग न्यूनाधिप परिवर्तन हो जाता है. रिनु मोरोपामा दांपा यथया मूस रूप नष्ट न हो पर घमा ही बना रहता है। उदाहरणार्य एर मोरगेशित -'पिप राया मी सणार महीपाटा जाता', जिसमा अभिप्राय है- पापागद दुष्ट मे दुष्ट मनुष्य को भी हानि नहीं पहुपाई जाती। तुमगी ने इस राग प्राररिया है- पानिपामु मान-सानो ममारिए. पौराए म माप पिरोस्त मा रसगरमे मानों में प्रकार मन्किार- 'पोहोरिपा मगारेशम माहिोरी।" netratri विर भी मन भाव में कोई भारी मार। rl.eों में मुहारों में रिमोरमा परिवर्तन महोती मुहावरा : स्वरूप विवेचन • 75 सक्ता । मुहावरी के पदो और उसकी योजना मे किया हुआ किसी प्रकार का परिवर्तन मुहावरो के अभिप्रेत अर्थ को नष्ट कर देता है। जैसे 'काठ को उल्ल', 'बिना घीऊ के फुलका', 'गोबर गणेस हैबो' के स्थान पर 'काठ उल्लू', 'घोऊ के फुलका चुपरियौं', 'गोवर को गणेस हैवी' प्रयोग करें तो शब्दो न्यूनाधिक्य हो जाएगा। इससे मुहावरो की मुहावरेदानी और अर्थ-सामर्थ्य नष्ट हो जाएगा। किन्तु कहावतो मे पद-क्रम-विपर्यय, पद-परिवर्तन, पद-क्रम-मग एव शब्दो का न्यूनाधिक्य हो सकता है। जैसे, 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' यहा 'अढाई कोस' क्रिया विशेषण 'चले' क्रिया के बाद प्रयुक्त हुआ है। 'नाच कूदै बादरा टूफ जोगना साई' इस कहावत मे 'बादरा' कर्ता नाचे कूदै प्रिया के बाद और 'ट्रक' वर्म 'जोगना' कर्ता के पूर्व प्रयुक्त हुआ है । 'हींग की कोथरी मे बासु ई बासु' इस कहावत मे 'होति ए' क्रिया का लोप है ।198 लोकोक्ति और मुहावरे मे एक प्रमुख अन्तर यह है कि 'मुहावरा' प्राय 'ना' प्रत्ययान्त होता है और लोकोक्ति मे क्रिया का पूर्ण स्वरूप विद्यमान होता है । डॉ० छोटे लाल द्विवेदी लिखते हैं -हिन्दी मे प्राय नान्त पद वाले वाक्य-खण्ड मुहावरे होते है, यथा---'माख आना, आंख उठाना, यात बनाना' आदि। इस आधार पर भी मुहावरो और लोकोक्तियो वा अन्तर स्पष्ट है, यद्यपि दो-चार नान्त पद वाली लोकोक्तिया भी मिल जाती हैं, जैसे 'कम खाना, गमखाना' 1199 अन्वेषण से 'ना' प्रत्ययान्त अन्य लोको- क्तिया भी उपलब्ध हो सकती हैं, जैसे- (क) ऊधो का न लेना न माधो का देना। (ख) कम खा लेणा पण कम कायदे न रखना 1200 लोकोक्तियो मे उद्देश्य और विधेय वा पूर्ण विधान होता है, इसलिए अर्थ समझने के लिए प्रसग आदि किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं होती, किन्तु मुहावरो मे उद्देश्य- विधेय का विधान स्पष्टत नही होता, यही कारण है कि इनका अर्थ समझने के लिए परिस्थिति, प्रसग और प्रयोजन को समझना नितान्त आवश्यक है 1201 किसी भी वाक्य मे अर्थ को स्पष्ट करने के लिए उद्देश्य एव विधेय का होना आवश्यक है। परिवेश के आधार पर कहावत एक वाक्य के रूप मे अपने अर्थ गौरव को प्रस्फुटित करती है जबकि मुहावरा वाक्य में प्रयुक्त होकर अपनी अर्थ गरिमा को निर्धारित करता है । 202 लोको. क्तियो मे अर्थ का अध्याहार भी विद्यमान होता है । इस विषय में डॉ०सहल लिखते हैं- स्वल्पाक्षरता श्रेष्ठ कहावत का गुण है। इसलिए जिन कहावतो मे न्यूनतम शब्दो के प्रयोग के द्वारा अधिक्तम अर्थ की अभिव्यक्ति होती है, वे कहावतें श्रेष्ठ समझी जाती हैं । अनेक कहावतें ऐसी होती हैं जिनमे अर्थ का अध्याहार करना पडता है । यह अर्थ का अध्याहार राजस्थानी लोकोक्ति मे अनेक रूपो मे उपलब्ध होता है । अध्याहार के विविध रूप- (क) उद्देश्य (Subject) का अध्याहार (अ) 'ढल्यो घाटी, हुयो माटो'। अर्थात् जब भोजन कठ की घाटी को पार कर गया, तो मिट्टी हो गया, उसके प्रयोग के 76: लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण क्योकि स्वाद तो जिव्हा में ही है। इसमें भोजन का अध्याहार है। (स) विधेय (Predicate) का अध्याहार (अ) 'राजा को दान, प्रजा को स्नान'। अर्थात् राजा दान करके और प्रजा स्नान करके ही पुण्य लाभ करती हैं, क्योकि दान देने की शक्ति सामान्य प्रजा जन में नहीं होती।203 यहा लोकोक्ति के बाद मे 'पुण्याजित करती है' का अनुवर्तन अपवा अध्याहार करने से इसका अर्थ स्पष्ट होता है। इससे स्पष्ट है कि लोकोक्तियों में कही उद्देश्य का और कही विधेय का अध्याहार रहता है, जबकि मुहावरे मे उद्देश्य-विधान के स्पष्टत: अभाव के कारण उसके प्रसंगादि का ज्ञान आवश्यक है। मुहावरे मे उद्देश्य (कर्ता) का तो प्राय अभाव ही रहता है, किन्तु कही-कही कर्ता के रूप में प्रयुक्त होने पर लिए तदनुकूल वाक्य-रचना आदि अपेक्षित होती है, यथा- (क) तुम अधे को यष्टि हमारी । वनो न हा गान्धारी। (मैथिलीशरण गुप्त) (ख) अधों में फाना राजा 1204 यहा प्रथम मुहावरे 'अधै की यष्टि' के प्रयोग के लिए 'अंधे' शब्द से पूर्व उद्देश्य 'तुम शब्द का तथा बाद मे 'न बनो' विषय का अनुवर्तन आवश्यक है । इसी प्रकार द्वितीय सज्ञार्थक मुहावरे 'अषों में काना राजा' के साथ वाक्य-रचना का प्रयोग नितांत आवश्यक है, तभी वह भाव-भगिमा लाने में समर्थ हो सकता है। अर्थ प्रकाशन की दृष्टि से कहावतें प्रायः किसी तथ्य या ज्ञान के पोषण, शिक्षण, नीति, आलोचना तथा सूचन को स्पष्ट करती हैं, परन्तु मुहावरो का प्रयोग वाक्य के अर्थ मे चमत्कार उत्पन्न करके उसे साधारण वाक्य से अधिक समृद्ध, उत्कृष्ट, प्रभावशाली, मर्मस्पर्शी एव ओजपूर्ण बनाने के लिए होता है, जैसे-आजु तो राधा चाद को टकु लगि रई ऐ।205 डॉ० छोटे लाल द्विवेदी भी इस मत का समर्थन करते हुए लिखते हैं ---उप योगिता की दृष्टि से मुहावरे का प्रयोग अर्थ मे चमत्कार उत्पन्न करके उसे साधारण वाक्य से अधिक रोचक, सुन्दर एव प्रभावपूर्ण बना देता है, किन्तु लोकोक्ति का प्रयोग किसी बात के समर्थन, पुष्टीकरण, आलोचना, विरोध, खण्डन जैसे उद्देश्यों के लिए होता है। राम नाम जपना, पराया माल अपना' लोकोक्ति दोगियों के आचरण की आलोचना ही करती है परन्तु 'जले पं नमक छिड़कना' मुहावरा वाक्य मे जमकर उसे रोचक और प्रभावपूर्ण बना देता है 1206 डॉ० सरोज अग्रवाल ने लोकोक्ति एवं मुहावरे मे भेद-स्थापनार्थ अपने विवेचन मे दो अन्य स्थापनाए की हैं, वे हैं- (क) मुहावरों का प्रायः निर्माण आवेशपूर्ण मन स्थिति मे होता है, क्योकि उन का सम्बन्ध मानव-प्रकृति से है। जबकि कहावतो का निर्माण जन मानस के सामान्य अनुभवो से होता है। (ख) अधिकारातः कहावतो के मूल मे कोई न कोई कथा छिपी रहती है, किन्तु मुहावरो के मूल मे यह अनिवार्य नही, यद्यपि कुछ मुहावरे प्राचीन कथाओ के आधार मुहावरा स्वरूप विवेचन 77 पर बने हैं 1107 इनमें प्रथम पा वर्णन अप्रत्यक्षात पूर्व विवेचन में हो गया है कि प्रयोजन भी दृष्टि से मुहावरे अर्थ-धमलार उत्पन्न करते हैं, अत इनका प्रयोग सामान्य मन - स्थिति से हट पर होता है, इधर लोकोक्ति सामान्य अनुभवी पर आधारित होने के कारण समर्थन-सूचन आदि उद्देश्यो के लिए प्रयुक्त होती है । डॉ० अग्रवाल की यह स्थापना कि सहायतो ये मूल मे पपा छिपी रहती है, भी महत्त्वपूर्ण है। गुजराती की एक लोकोपिन 'अप्रे-अग्नेविन जटालो ते जोगी, भन्ने यच्चे नो जे फन्द ते आरोगे आनन्द' के पौधे रोचर क्या है-एष गाव मे एक ब्राह्मण और एक जोगी भीष मागते-मागते। एक घर के सामने आए। घरवाली ने दोनो नो मिलाकर एक जडमूल के साथ पूरा ईख का हसा दिया और कहा कि आपस मे बाट लो । ईस लेकर दोनो चल दिए, पर वाटते समय दोनो में झगडा हुआ। ऊपर वा पन्ने वाला भाग और जहमूल विसको मिलना चाहिए और बीच वाला रसदार भाग किसको कोई निर्णय नहीं हो पाता था। इतने मे वहा से एष धनिया जा रहा था। उसको दोनों ने बुलाया और उसको पच बनाकर झगडा सुलझाने को कहा। बनिये ने इा दण्ड हाय मे लिया और यहा-"देखिए, शास्त्र मे लिखा है कि अग्रे-अप्रै विप्र होता है । तब यह ईस का घोटी वाला भाग ब्राह्मण होगा तो ब्राह्मण को देता है । जोगी के जटाए होती हैं, तो नीचे वा मूलियो वाला भाग जटिल समझना चाहिए। यह में जटा वाले जोगी को देता हूँ। अब जो बीस वाला कन्दयुक्त भाग है वह मेरे पल्ले का गया, वह मैं ले जाता हूँ 120+ इसी प्रकार हमारी कामनाए हमेशा पूरी नहीं होती। विषयसे सम्बन्धित अग्रेजी की कहावत-There's many a shp twixt the cup and the lip के पीछे एक कथा है-अरव देश मे पुराने जमाने में गुलामी की प्रथा यो । एक मालिक अपने गुलामी के साथ बडी निर्दयता का व्यवहार करता था। उसने उनको अपने अगरी बाग मे काम में लगा दिया। वह जुल्म-जबरदस्ती तथा मारपीट से उनसे काम करवा लेता था । पीडितो के मुह से शापवाणी निकली- "इतनी जोरों जबरदस्ती से तुम यह अगूर बाग हमसे बनवा ले रहे हो, लेकिन इन अगूरो से बनी शराब तुम्हारे मुह मे नही पडेगी।" यह सुनकर मालिक बौखला उठा । आगे चल कर जब पहली भट्टी की शराब तैयार हुई तब उसने उसी गुलाम से पहला प्याला भरवाया और ध्यग्य से कहा, 'देखो बच्चू, अब तो मैं शराब पीने वाला है। तेरा शाप विफल होगा। "तिस पर गुलाम ने कहा, 'साहब, प्याला होठो तक जाने मे काफी अडचनें हैं।" इतने मे वहा ऐसी खबर आ धमकी कि उस बगीचे मे जगली सूअर घुस गए हैं। बगीचा पूरा चौपट न हो इसलिए मालिक ने भाला उठाया और वह फुर्ती से बगीचे की ओर चल पडा। पहला प्याला वैसा ही भरा पडा रहा। सूमर से लड़ते-लडते वह मारा गया और गुलाम को शापवाणी सही साबित हुई 1209 लोकोक्ति एव मुहावरे मे पार्थक्य का एक प्रमुख आधार यह भी है कि अनुभव की दुहिता होने के कारण लोकोक्ति की अनुभव जन्य समानता सावंदेशिक एव सार्वभा- पिक होती है, जबकि एक देश या भाषा के मुहावरे दूसरे देश या भाषा मे नहीं मिलते। प्रत्येक देश, जाति, समाज एव भाषा के मुहावरे भिन्न होते हैं तथा वे अपने-अपने क्षेत्र की - 78 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण सूचना देते हैं, इसलिए विभिन्न भाषाओ के मुहावरो मे पर्याप्त मेद पाया जाता है। डा. सहल का यह कथन सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होता है-अनुभव की समानता के कारण एक भापा की कहावतो का दूसरी भाषा मे अपेक्षतया सरलता से अनुवाद हो सकता है, किन्तु एक भाषा के मुहावरो का दूसरी भाषा में अनुवाद करना टेढी खीर है ।10 इसकी पुष्टि के लिए कुछ लोकोक्तिया प्रस्तुत हैं-चचल स्त्री से सम्बन्धित लोकाक्तिया देखिए- चचल स्त्री को चाचल्यपूर्ण अस्थिर मनोवृति के परिणामस्वरूप उस पर अविश्वास प्रकट करते हुए उसके चरित्र के प्रति भी सन्देह किया गया है । शेक्सपीयर एक नाटन मे विशप सदर्भ मे लिखते हैं -चचलता। तेरा नाम स्त्री है-Fraillts ' tby name is women | एक पजाबी की उक्ति है-"रना चल हारीआ, चचल कम्भ करे। दिन डरन परछविया, राती नदी तरे।' यहा 'रन्ना' सम्बोधन दुश्चरित्र स्त्री के लिए प्रयुक्त हुआ है। वाड्ला लोकोक्ति गी चेतावनी देती है-"नदी, नारी, शृगपारी, एइ तिने ना विश्वास करो।" अर्थात् नदी, बैल और स्त्री के चाचल्य स विश्वास करना बुद्धिमता नही है । एक कन्नड की कहावत है कि चचल स्त्री का पाव अपने विस्तर पर नहीं ठहरता 'हादर गितिग कालु हासिगेय मेले निल्लदु ।" स्त्री की अविश्वसनीयता पर विदेशी भाषाआ को कहावतो म भा व्यग्य कसा गया है। अग्रेजी कहावत देखिए-A whist. ling woman and crowing hen, nether fit for God, nor for men ' यह लोकोक्तिकार के अतिवादी दृष्टिकोण का ही परिणाम है । एक अन्य कहावत मस्त्री को हवा और भाग्य की भाति चचल बताकर परिवर्तनशील कहा है-'Women, wind and fortune are ever changing' जर्मन की एक कहावत के अनुसार स्त्रिया अप्रैल मास की हवा की भाति चचल एव घोसा देने वाली होती हैं-Weber sind veranderlich wie April wether' पुर्तगाली भी स्त्रियो का विश्यास करता नही पाहा-'Da mal mother te guardaeda boa nao fies nada' अर्थान युरी स्त्री से बचकर रह और अच्छी औरत का विश्वास न करें। ईनिश को या भाव भी यही है । स्पेनिश की एक लोकोक्ति के अनुसार स्त्री और सरबूजे को ऊपर से पहचानना पठिन है-'Elmelon la muger malos son de concer' घो न स्त्रियो पर सस्त निगरानी रखने की आवश्यकता पर बल दिया है-Wepence, Vrouwen, enbocken behoeven dagelijk sche behandeling gefaarao पारो, स्त्रियो तपा पुस्तयो पर प्रतिदिन नजर रखनी चाहिए। एक भोजपुरी उपित है- 'भोसग गइस मंदान फिरे, सोग रहित नि हेराप गेले ।' अर्थात् मोई स्त्री बाहर शौच परने गई, तो मोगा ने सोचा कि भाग गई। स्त्री के विषय में इतनी आसरा, ऐसा सरह तसारोक्तियाम है कि सहमा योता या पाट आधरित हो जाता है । यह स्त्री सोन रापर कटपुतली बन गई है-भाग हमारी रस तम्हारी, देसो लोगो फेराफी (हेराफेरो)।' बी ए मोसोनि म भी यही यागय प्राट दिया गया है- 'Varium ta mutabileesramina'ए और पाय या दागिए-तिरिया परित भनी पोप, सप्तम मार रातीहोर। समर को भी उति है-त्रिपास्त्रि 'एक उक्ति मुहावरा : स्वरूप विवेचन : 79 परपस्य भाग्य, देयो न जानाति कृतोः मनुष्यः ।' एक इतालियन लोकोक्ति देखिए--- 'Douna si lagna sa doule, donna, Sammath quando la vuole.' अर्थात् स्थी इतनी ढोगी होती है कि जव चाहती है, उसे दुख होता है, उसे दर्द होता है और वह बीमार भी हो जाती है, चाहे जिस समय वह अपना रंग बदल सकती है। अपना काम निकालने के लिए वह बहुरूपिया बनकर पुरुषो को आसानी से ठग लेती है ।211 कहना अनुचित न होगा स्त्री मात्र के विषय मे उनकी यह धारणा अतिवादी और एकागी दृष्टि की परिचायक है, मध्ययुगीन कल्पना से सम्पृक्त है। उपर्युक्त वर्णन के द्वारा यहा मात्र यह बताना अभीष्ट था कि अनुभव को समानता होने के कारण एक ही विषय से सबंधित लोकोक्तिया विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध हो जाती हैं, किन्तु मुहावरो पर यह नियम लागू नहीं होता। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि लोकोक्ति और मुहावरे मे पर्याप्त साम्प होने पर भी अत्यधिक वैषम्य है और दोनो मे मूलत. स्पष्ट अन्तर है। मात्र कुछ अपवादो को, जो उभयनिष्ठ उक्तियो के अन्तर्गत हैं, छोड दिया जाए तो लोकोक्ति एव मुहावरे स्पष्ट ही भिन्न-भिन्न रूप मे दृष्टिगत होते हैं । इसके अतिरिक्त महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि उभयनिष्ठ उक्तियो का लोकोक्ति एव मुहावरे-~दोनो रूपो मे प्रयोग यत्किचित् परिवर्तन के साथ ही किया जा सकता न कि अपने मूल रूप में। उदाहरणार्थ कुछ मुहावरेदार प्रयोग देखिए--1. 'ऊस छोड़कर भाग चिचोरना', 2. 'एक पय दो कान होना', 3 'एक प्रान दो शरीर होना', 4. 'फत्ते को पूछ का सीधी न होना' आदि। इनका लोकोक्ति के रूप में प्रयोग द्रष्टव्य है-- (1) (क) 'सूरदास प्रभु ऊष छाडिक चतर घचोरत माग।' (ख) 'सूरदास प्रभु माफ चचोरत, छाडि अख को मूढ (2) (क) पीपल पूजन में चली, निगम बोध के घाट । पीपल पूजत पी मिले, एक पंप दो काज 21 (ख) ज्ञान बुझाइ खबर दे आवहु, एक पंथ द्वै काज 115 (3) (क) "एक प्रान वपु दोह।' (ख) 'एक प्रान द्व देह' आदि 116 (4) (क) 'स्वान पूंछ कोऊ कोटिक लागे, सूधी कहू न करो' 117 (ख) 'सूघे होत न स्वान पूंछ ज्यों, पचिपचि बद मरे ।"216 इससे स्पष्ट है कि इस प्रकार की उभयनिष्ठ उक्तियो का लोकोक्तियो एव मुहावरो के रूप मे किंचित् परिवर्तन के साथ ही प्रयोग होता है। मुहावरे जहा अपूर्ण वाक्य के रूप में प्रयुक्त हुए हैं, वहा लोकोक्तियो का प्रयोग स्वतन्त्र एव पूर्ण वाक्य के रूप में ही हुआ 1213 निष्कर्षतः रूपात्मकता, अर्थ-विधान, प्रयोजन और प्रयोग आदि निकपो के आधार पर सिद्ध करने के अनन्तर कहा जा सकता है कि लोकोक्ति एव मुहावरे मे इतना वैषम्य है कि वे एकरूप नही हो सकते । सुविधा की दृष्टि से इन्हे तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-- 80 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण (क) विशुद्ध लोकोक्ति~जो लोकोक्ति पे निकप पर खरी उतरती है । (ख) विशुद्ध मुहावरे -जो मुहावरे ये निकष पर सरे उतरते हैं। (ग) उभयनिष्ठ उक्तिया-जो अन्यय वे आधार पर लोकोकिन भी हो सकती हैं और मुहावरा भी। लोकोक्ति एव मुहावरे का क्षेत्र लोकोक्तियो एव मुहावरो का प्रयोग दो क्षेत्रो मे स्वीकृत है-(क) जनसाधारण, (ख) साहित्य । मानव जीवन को कोई ऐसी गतिविधि नही, जिसे इनके क्षेत्र से बाहर कहा जा सके। इनम मानव जीवन के सुख दुख, हर्प-विषाद, ईर्ष्या लोभ, रुचि- अरुचि, प्रेम-विद्रोह, रीति-रिवाज, मनन-चिन्तन, आचार-विचार, आर्थिक, धार्मिक राजनैतिक, सामाजिक, सास्कृतिक जीवन-सभी की अभिव्यजना होती है। यही कारण है कि जहा इन्हें एक ओर लोक ख्याति प्राप्त होती है, वहा साहित्य मे भी पर्याप्त प्रतिष्ठा मिलती है। डॉ० रवीन्द्र भ्रमर के अनुसार इनके व्यवहार से साहित्य को दुहरा लाभ होता है । एक तो उसमे लोकभाषा की मिठास आ जाती है, दूसरे लोकाभिव्यक्ति का सीधा पन 1219 डॉ० गया सिंह के शब्दो मे लोक प्रचलित उक्तियो-लोकोक्तियो, मुहावरो आदि के प्रयोग से अभिजात साहित्य को लोक तात्त्विक विशेषता में वृद्धि होती है, साथ ही बोलचाल की अभिव्यक्ति विधि से सयोग होने से उसकी अभिव्यजना को लोकप्रियता सहजता और सम्प्रेषणीयता प्राप्त होती है । लोकोक्तियो एव मुहावरोका क्षेत्र अतिविस्तृत है । लोकख्यात लोकोक्तियो एव मुहावरो को जहा लोक-साहित्य की विधा-विशेष के रूप मे प्रतिष्ठित स्थान मिला है, वहा शिष्ट अथवा अभिजातसाहित्य मे भी इन्हे गौरवपूर्ण पद से अलकृत किया गया है, विन्तु अभिजात-साहित्य मे अभिनन्दित होकर भी लोकोक्तिया एव मुहावरे मूलत लोक साहित्य के ही अग हैं । इनके क्षेत्र का सम्यग्ज्ञान करने के लिए लोक-साहित्य का ज्ञान आवश्यक है। 'लोक साहित्य', 'लोक वार्ता' (Folk lore) का अग है। 'लोकवार्ता' शब्द अंग्रेजी के 'फोक लोर' पर्यायवाची पद के रूप मे प्रचलित है। हिन्दी मे इसके प्रयोग का श्रेय प्राय श्रीकृष्ण गुप्त एव डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल को है। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने हिन्दी मे वैष्णवो के वार्ता सम्बन्धी प्रन्यो के अनुरूप फोक लोर का पर्याय 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, 'चौरासी वैष्णव की वात आदि के आधार पर 'लोक- वार्ता' स्वीकार किया है। डॉ. सत्येन्द्र भी इस विचार से अपनी सहमति प्रकट करते - हैं 1220 लोक वार्ता विषयक वाटविन के विचार से द्रष्टव्य हैं-लोकवार्ता बहुत दूर को या कोई बहुत प्राचीन वस्तु नही है, बलि वह हम लोगो के बीच का हो एक गति- सील एव जीवित सत्य है । कारण, यहा अतीत वर्तमान से और अशिक्षित समाज, उस समाज से कुछ कहना चाहता है, जो अपने मौलिक मौखिक एव लोकतान्त्रिक संस्कृत वे कध मूल और प्रारम्भिक रूपों के मान से अपनी कलाओ को जड़ तक पहुंचना चाहता है और जिससे उसकी कलाओ के ऐतिहासिक विकास पर प्रकाश पड़ता है। लोकवार्ता के सम्बन्ध मे विचार करने वाले पाश्चात्य विचारकों में प्रमुख मेरेर्ट' गोम्मे, फेजर, लेविस स्पन्स आदि हैं। इन विद्वानों ने लोकवार्ता के क्षेत्र मे स्वरूप पर विचार करते हुए उसके अन्तर्गत उन समस्त अभिव्यक्तियों को स्थान दिया है, जिसमे आदिम मानव के अवशेषों के दर्शन अद्यावधि होते हैं 1222 आधुनिक युग को एक मान्यता के अनुसार ससार की प्रत्येक जाति ने अपनी यात्रा का आरम्भ आदिम अवस्था या बर्बरावस्था से ही किया है । इनके अनुसार मनुष्य को देवी उद्भावना या दिव्य महत्तायुक्त आरम्भ के विषय में अविश्वास करना मूर्खता का द्योतक है ।223 इस मत के पक्षधरो का विश्वास है कि आधुनिक मानव की इस चिर यात्रा के उपरान्त उपार्जित सभ्यता के विकास के साथ ही कुछ तयुगीन अवशेप भी अवशिष्ट हैं, जिसके द्वारा उस आदिम लोक-प्रवृत्ति का अध्ययन भी 'लोक वार्ता' के अध्येता करते हैं, किन्तु उपर्युक्त मन्तव्य आप्त कथन या स्थिर मत नही बन सका है, इसके विपक्ष मे भी अनेक विचारको ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं । एक प्रतिपक्षीय मान्यता के आधार पर लोक वार्ता जिन अवशेषो का अध्ययन करती है वे (अवशेप) मूल आदिम मनुष्य के हैं, इस बात को निश्चय पूर्वक आज किसी भी शास्त्र अथवा विज्ञान को कहने का अधिकार नहीं है, क्योकि आरम्भिक आदिम मनुष्य इतना प्रागैतिहासिक है और मनुष्य के अनुमान के भी इतने परे है कि उसके सम्बन्ध मे भी कुछ भी कहना अवैज्ञानिक समझा जाएगा 1221 प्रत्येक वार्ता मे स्पष्टत. दो बातें मिलती हैं--(1) कोई न कोई आधारभूत तथ्य तथा (2) इसका स्वरूप 125 तथ्य तो तथ्य है यथा सविता को ही लीजिए- सविता तो सविता ही है, किन्तु उसके स्वरूप-निर्धारणार्य प्राकृतिक विज्ञान-वेत्ता के लिए जहा वह एक अग्नि पिण्ड है, क्योकि उसको सविता का भौतिक स्वरूप ही अभिप्रेत है, वहा लोकवार्ताकार के लिए सविता इससे भिन्न भी बहुत कुछ है । यह सूर्य पुरुषवत् आचरणों को करता हुआ मोहासक्त भी हो जाता है । सूर्य प्रिय है और उसकी प्रियतमा उपा है। वह उस अपूर्व सुन्दरी तथा अनिंद्य यौवना उषा के सौन्दयं-जाल मे आवद्ध होकर उसको आकर्षण शक्ति से आकर्षित होकर रसका पीछा करता है ।227 लोकवार्ता का प्रतिपादन करते हुए शार्लट सोफिया बर्न ने अत्यन्त वैज्ञानिक ढग से प्रकाश डाला है। उनके आधार पर डॉ. सत्येन्द्र ने भी इस पर विचार प्रकट किए हैं। उनके अनुसार 'लोकवार्ता' शब्द विशद अर्थ रखता है । इसके अन्तर्गत वह समस्त आचार-विचार की सम्पत्ति आ जाती है, जिसमे मानव का परम्परित रूप प्रत्यक्ष हो उठता है और जिसके स्रोत लोक-मानस होते हैं, वे लोक-मानस जिनमे परिमार्जन अथवा संस्कार की चेतना काम नही करती होती। लौकिक धार्मिक विश्वास, धर्म गायाएं तथा कथाएं, कहावतें, पहेलियाँ आदि सभी लोकवार्ता के अग हैं 1228 स्पष्ट है कि डॉ. सत्येन्द्र ने लोक्वार्ता के अन्तर्गत मानव-जीवन के समस्त आचार-विचार, जो लोकोक्तियों आदि - 82 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण के द्वारा अभिव्यक्त होते हैं, सन्निविष्ट किया है। 'लोकवार्ता वा क्षेत्र बहुत विस्तृत है। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल लिखते हैं-~-लोक मे वसने वाला जन, जन की भूमि और भौतिक जीवन तथा तीसरे स्थान मे उस जन की सस्कृति-इन तीनो क्षेत्रो मे लोक के पूरे ज्ञान का अन्तर्भाव होता है और लोक्वार्ता का सम्बन्ध भी उन्हीं के साथ है 1225 'लोक्वार्ता' के अन्तर्गत समस्त विषयो के विभाजन का कार्य अनेक विद्वानो ने किया है इस दृष्टि से सोफिया वन का प्रयत्न महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने लोकवार्ता के विषयो को तीन श्रेणियो में विभाजित किया है। उनके इस वर्गीकरण को डॉ. सत्येन्द्र ने निम्नाकित रूप से प्रस्तुत किया है- (1) लोक विश्वास एव अन्ध परम्पराए, जो निम्नांकित विषयो से सम्बन्धित हैं--(क) पृथ्वी और आकाश से; (ख) वनस्पति जगत् से; (ग) पा- जगत् से; (घ) मानव से; (ड) मनुष्य निर्मित वस्तुओ से; (घ) आत्मा तथा इसके जीवन से; (छ) परा-मानवी व्यक्तियो से; (ज) शकुनो- अपशकुनो, भविष्यवाणियो से; (झ) जादू-टोनो से; (ण) रोगो तथा स्थानो की कला से; (2) रीति-रिवाज तथा प्रथाए-- (क) सामाजिक एव राजनीतिक; (ख) व्यक्तिगत जीवन के अधिकार, व्यवसाय, घघे तथा उद्योग; (ग) तिथिया, व्रत तथा त्योहार; (घ) खेल कूद तथा मनोरजन। (3) लोक-साहित्य- (क) कहानिया-(अ) जो सच्ची मानकर कही जाती हैं, (आ) जो मनोरजन के लिए होती हैं । (ख) गीत सभी प्रकार के (ग) कहावतें तथा पहेलिया (घ) पद्यबद्ध कहावतें तथा स्थानीय कहावतें 1229 डॉ० सत्येन्द्र ने लोक-साहित्य का स्वरूप निम्न प्रकार से निर्धारित किया है-- (1) लोक वार्ता साहित्य-(क) धर्म गाथा साहित्य (ख) साधारण लोक वार्ता साहित्य (2) लोक-साहित्य-(ग) ग्राम साहित्य (घ) नागरिक साहित्य230 मानव ईश्वर की सबसे सुन्दर सृष्टि है। स्वभावत मानव सामाजिक प्राणी है। उसके सम्बन्ध का पहला रूप कौटुम्बिक है। पुरुष>स्त्री>यौन > आकर्षण पति- पत्नीत्व>यौन>सभोग>सहवास>सहकार>सन्तान जन्म>मातृत्व>पितृत्व पोषण-रक्षण =कुटुम्ब । इस कुटुम्ब मे प्रत्येक प्रक्रिया और स्थिति के लिए कुछ विशेष आनुष्ठानिक प्रक्रियाए होने लगती हैं। कुटुम्ब कुटुम्ब मिलते अथवा मानव-समूह मिलकर विविध सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं तो सामाजिक संस्कृति का जन्म होता है।

मुहावरा :स्वरूप विवेचन : 83 इस सामूहिक स्थिति की अपनी एक विशेष प्रकार की जीवन-यात्रा होती है, जिसे परि- स्थितियों से, प्रकृति से, अपने ही कोम्बिक अवयवो से बाहरी दलो से सघर्ष करना पड़ता है। इन सबके साथ एक लोकवार्ता और अनुष्ठान प्रस्तुत हो जाता है । 31 मानव इस 'लोकवाता' का नियन्ता है। समस्त मानव समुदाय के मानवीय स्वरूप को तीन भागो मे बाट सकते हैं। प्रथम लोक-मानस, द्वितीय जन-मानम, तृतीय मुनि-मानस । लोक-मानस वह मानसिक स्थिति है जो आज आदिम मानव को परम्परा मे हैं, उसी का अवशेप है। आज के सम्य समाज के मानसिक स्वरूप मे इसे सबसे नीचे का धरातल माना जा सकता है। मुनि-मानस वह मानमिक स्थिति है जो मानव-समाज ने सभ्यता के विकास के साथ- साय उपार्जित की है। यह आज के समाज के मानसिक स्वरूप का सबसे ऊचा घरातल माना जा सकता है। मध्य की स्थिति जन-मानस को है । लोक-मानस से लोक-वार्ता का जन्म होता है । मुनि-मानस से दर्शन, शास्त्र, विज्ञान और उच्च कलाओ का। जन-मानस साधारण व्यवसायात्मक बुद्धि से ही सम्बन्ध रखता है ।232 लोकवार्ताकार मानव ने इसका द्विविध निर्माण किया है-(क) लोककला- विलास तथा (ख) लोक वाणी-विलास के रूप मे लोक कला-विलास के अन्तर्गत उत्पादन सम्बन्धी, सग्रह सम्बन्धी आदि वस्तु-पदार्थ आते हैं। डॉ० सत्येन्द्र ने शरीर विलास मे उन आनुष्ठानिक कलाओ का जन्म स्वीकार किया है जो चित्र, मूर्ति, नाट्य आदि से सम्बन्धित होती हैं । वाणी-विलास मे उन अनुष्ठानो का समावेश होता है जिनका सम्बन्ध वाणी-सम्बन्धी अभिव्यक्तियो से होता है । शरीर-विलास की आनुष्ठानिक कलाओ का विभाजन233 इस प्रकार किया गया है- अनुष्ठान शरीर व्यक्तिगत सामूहिक करज शरीरज कर विलास नृत्य हस्त कौशल नाट्य समूहापेक्षी उद्योग कर मुद्राए अन्य मूर्ति अन्य 84 : लोकोक्ति मोर मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण वाणी-विलास भी जीवन से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है और उत्पादन व उपयोग तथा कुटुम्ब और समाज से निरन्तर लिपटा रहता है। फिर भी इसके कई रूप मिलते हैं, वे इस प्रकार हैं लोक-याणी-विलास । मन्त्र तन्त्रा- ख्यान धर्मगाथा परी लोक अवदान लोक लोकोक्ति कथा कहानी गीत (Myth) (Fairy (Folk (Anec- (Fable) (Ballet) (Incan- (Proveb) tale) tale) dote) tation) लोक-वाणीविलास के इन रूपो को पहले तीन प्रकार मान सकते हैं—बात, कथात्मक और गेय । कला के आदिम विकास मे विविध अन्य तत्त्वो के समावेश से वाणी विलास मे कई विशिष्ट प्रकारो का जन्म हुआ। कथात्मक वाणी विलास का जन्म अलग-अलग प्रेरणाओ से पृथक् रूप मे हुआ। वार्तालाप तथा कथात्मक प्रकार सामाजिक मूल से सम्बन्धित हैं । गेय' का सम्बन्ध वैयक्तिक एवं सामाजिक द्विविध प्रवृत्ति से है । इस प्रवृत्ति के अन्तर्गत 'अर्द्ध गेय' अथवा 'पाठ्य' रूप का विकास भी होता है ।234 इनका वर्गीकरण करते हुए डॉ० सत्येन्द्र ने लोकोक्तियो को 'वात' तथा 'अर्द्ध गेय लोक-साहित्य' के अतर्गत रखा है। उनका विभाजन इस प्रकार है- बात मन्त्र लोकोक्ति प्रहेलिका चुटकले नाट्य- कथोपकथन कथात्मक धर्म गाथा परीकथा अवदान (Myth) (Fairy tale) (Legend) लोककहानी तन्त्राख्यान लोकगाथा (Folk tale) (Fable) (Ballet) मुहावरा : स्वरूप विवेचन :85 मेय आनुष्ठानिक प्राकृतिक प्रेरित मल्हार, रसिया, होली आभिचारिक जहारपीर, बिरहली आदि भिक्षार्थ नैमित्तिक टैसू-माकी विविध विवाह आदि संस्कारगत, प्रतादिगत-वैरियरा अदि अर्द्धगेय या पाठ्य लोक-साहित्य पद्यबद्ध लोकोक्तियाँ बच्चों के छदगीत मन्त्र इसमे सन्देह नहीं कि डॉ. सत्येन्द्र ने अपनी भूमिका-लेखन मे लोकवार्ता को अधिकाधिक विस्तृत रूप में वर्गीकृत करके उसका व्यवस्थित प्रतिपादन किया है, किन्तु इस विवेचन की एक सीमा तो यह है कि इसमें मुहावरो को सम्मिलित नही किया गया है। इसके अतिरिक्त लोकोक्तिया डॉ. सत्येन्द्र के उपर्युक्त तीन प्रकारों-बात, कथात्मक एवं गेय के अन्तर्गत प्रथम एवं अंतिम मे ही ग्रहण की गई हैं, जबकि द्वितीय प्रकार 'कथात्मकता' से लोकोक्ति का महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध है, क्योकि इनके मूल मे प्रायः कथा भी होती है। उन्होंने 'लोकोक्ति' को उसके लोक-प्रचलित अर्थ कहावत के रूप मे ग्रहण न करके लोक की उक्तियों कहावत- मुहावरा तथा प्रहेलिका को लोकोक्ति-साहित्य मे समाविष्ट कर उसका अर्थ-विस्तार कर दिया है । लोक-साहित्य के एक प्रमुख भाग के रूप मे स्वीकार करके उन्होने लोकोक्ति- साहित्य का वर्गीकरण इस प्रकार है235--

86 : लोकोक्ति मोर मुहापरा: स्यरूप विरसेषण
लोकोक्ति साहित्य
।
कहावतें
मुहावरे
पहेलियां
सामान्य
विशेष
भोजन
पदार्थ
सम्बन्धी
घरेलू
वस्तु
सम्बन्धी
प्राणी
सम्बन्धी
प्रकृति
सम्बन्धी
कृषि
अग-प्रत्यग
सम्बन्धी सम्बन्धी
प्रकीर्ण

सामाजिक जीवन-दर्शन ऐतिहासिक स्थान विशेष नीति सम्बन्धी सम्बन्धी T हास्य-व्यग्य कृषि-वर्षा प्रधान सम्बन्धी प्रकीर्ण उपदेश प्रधान भाग्यवाद कर्म जन्मात दार्शनिकता- सम्बन्धी सम्बन्धी लोक सत्य सम्बन्धी घटना सूचक व्यक्ति जाति प्रधान स्थानीय राजवंश सम्बन्धी शहरी पट्टी गाव सम्बन्धी स्त्री-पुरुप सम्बन्धी नदी-पर्वत सम्व जातीय नारी सम्बन्धी धर्म, आचार, व्यक्तित्व प्रधान भोजन पदार्थ अर्थ राजनीति- रीति सम्बन्धी सम्बन्धी मूल मुहावरा : स्वरूप विवेचन : 87 - 88 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेपण वस्तुत: लोकोक्ति-साहित्य के अन्तर्गत प्रहेलिका एव मुहावरे मादि का समाहार इसलिए उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि इनका स्वतन्त्र अस्तित्व है। डॉ. सत्येन्द्र का यह वर्गीकरण यद्यपि कुछ सं'मा तक व्यवस्थित बन पडा है, तथापि सर्वथा दोपमुक्त नही कहा जा सकता। इसमे लोकोक्ति अथवा पहावत का वर्गीकरण जितने अच्छे ढंग से किया है, मुहावरे का नहीं किया। इसके अतिरिक्त कहावत के सामाजिक वर्ग के अन्तर्गत धार्मिक-राजनीतिक कहावतो का समावेश अनुचित प्रतीत होता है। इसी प्रकार ऐतिहासिक कहावतो के समानान्तर पौराणिक या कल्पित कथाओ पर आधारित कहावतो को भी अलग से लिया जा सकता था । जीवन-दर्शन का क्षेत्र भी अत्यन्त विस्तृत है, इसे मात्र दो भागो मे विभक्त करना युक्तिसगत प्रतीत नहीं होता। इसमे विभिन्न मानवीय स्वभाव के अतिरिक्त लोक-विश्वास-शकुन-अपशन आदि से सम्बन्धित लोकोक्तियो को भी समाविष्ट किया जा सकता है तथा नीति-उपदेश-हास्य-व्यग्य प्रधान लोकोक्तियों को भी उपखण्डो मे विभक्त करके विस्तृत एव व्यवस्थित विवेचन हो सकता है। इन सीमाओ के बावजूद डॉ० सत्येन्द्र का यह वर्गीकरण इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है, कि सम्बद्ध विषय पर कार्य करने वाले अध्येताओ ने इससे दिशा-ग्रहण कर अपना मार्ग प्रशस्त किया है। लोकोक्ति एव मुहावरे का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है । लोकोक्ति की भाति मुहावरे का लोक-साहित्य के साथ इसलिए अटूट सम्बन्ध है, क्योकि इन दोनो के जीवन की प्रायः एक ही राम-कहानी है। इनकी उत्पत्ति एव विकास की अवस्थाएं भी प्राय. समान हैं। डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा का यह विचार कि मुहावरे की उत्पत्ति भी मानव-जीवन की किसी घटना या कार्य-कारण परस्परा से होती है236, उचित प्रतीत होता है। लोकोक्तियो को भाति मुहावरो मे भी प्रायः मानव जीवन के साधारण व्यापारी के चित्र रहते हैं । मुहावरे जीवन की सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति, उत्थान-पतन, हार-जीत और मनुष्य के विद्वत्तापूर्ण एव मूर्खतापूर्ण व्यापारो का भी परिचय देते हैं।237 यही कारण है कि ये ब्रह्मवत् सर्वत्र व्याप्त हो गए और वाणी के शृगार वनकर जहा लोक-साहित्य में अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हुए हैं, वहा अभिजात-साहित्य मे भी साहित्य- कारो द्वारा सम्पूजित हुए हैं । निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मुहावरो और कहावतो का क्षेत्र विस्तृत है । मानव-जीवन मे सम्बन्ध रखने वाला कौन-सा ऐसा विभाग है, जो उनके दायरे के भीतर न आया हो।238 लोकोक्तियों और मुहावरों का महत्त्व लोकोक्तियो एव मुहावरो के क्षेत्र की भाति ही इनके महत्त्व का प्रतिपादन भी मुख्यत: द्विविध रूपो मे सम्भव है- (क) लोक-वाणी के शृंगार के रूप मे, इनकी लोक-ख्याति के आधार पर । (ख) काव्य-भाषा के अलंकार के रूप मे, इनकी साहित्यिक उपयोगिता के 1 आधार पर।

मुहावरा : स्वरूप विवेचन : 89 - लोकोक्तियो एव मुहावरो को लोक-साहित्य के अतिरिक्त अभिजात अथवा शिष्ट साहित्य मे भी सीमातीत श्लाघा प्राप्त हुई है । काव्य-भाया के अलकरण एव साहित्यिक सौन्दर्य के अभिवर्द्धक होने के कारण अनेक महाकवियो ने इनके आश्रय से जहा सरस्वती को तुष्ट किया, वहा इनके सफल प्रयोग के द्वारा शिष्ट-साहित्य मे जनमानस के अनुकूल लोक-तात्त्विक विशेषता की वृद्धि कर अपनी कृतियो को कालजयी भी बना दिया। डॉ० गया सिंह का यह कथन उपयुक्त ही प्रतीत होता है कि लोकोक्तियो, मुहावरो आदि के प्रयोग से अभिजात-साहित्य की लोकतात्विक विशेषता में वृद्धि होती है, साथ ही बोलचाल को अभिव्यक्ति विधि से सयोग होने से उसकी अभिव्यजना को लोकप्रियता, सहजता और सम्प्रेषणीयता प्राप्त होती है ।239 इसके कारण पर प्रकाश डालते हुए एक विचारक लिखते हैं-लोक-साहित्य मानव जाति का आदिम एव अन्तरग चित्रण होने से शिष्ट साहित्य की तुलना में अधिक मौलिक और ताजा अनुभूतियो का कोश कहा जा सकता है। सच तो यह है कि लोक-साहित्य ही शिष्ट साहित्य का प्रेरक तथा विधायक उपादान है क्योकि साहित्य के मूल मै निहित चेतना शतश. सामाजिक एव लोकमूला ही होती है। हमारे प्राचीन साहित्य मे वेद के साथ-साथ महाकवि व्यास ने लोकचिन्ता को भी प्रमाण रूप में मान्यता दी है। लोक-साहित्य एव लोक-वाणी का माधुर्य द्राक्षारम की भाति अपूर्व आस्वाद का हेतु माना जाता रहा है। पान के पुन -पुनः चवाने मे, गन्ने की पोर-पोर के रस मे तथा महाभारत की कथा के श्रवण मे जो मजा, पचतन्त्रकार के अनुसार आता है, वही सरसता और ताजगी लोक-साहित्य के कण-कण में व्याप्त है। यही कारण है कि कालिदास, जयदेव, विद्यापति, कवीर, सूर, तुलसी, जायसी, केशवदास तथा बिहारी सरीखे रस-सिद्ध कवि भी अपने काव्य मे लोक-तत्त्व की छोक बघार तथा गहरी छाप से (चेतन-अचेतन रूप मे) उन्मुक्त नहीं रह सके ।240 लोकोक्तियो एव मुहावरो का महत्त्व लोक-जीवन मे चिर काल से रहा है । डॉ० कृष्ण चन्द्र शर्मा के अनुसार ये लोकानुभव की वे सिद्ध मणिया है, जिनको पाकर मनुष्य वाक्शक्ति-सम्पन्न बनता है । ये भाषा की ऐसी थातिया हैं, जिसमे युग-युगान्तर का अनुभव बोलता है और जो हमारे नैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की आधार- शिलाए हैं, जीवन के परिवेश में जो कुछ समा सकता है, वह यहा प्राप्त है । महर्षि वेदव्यास ने अपने महामन्य महाभारत के सम्बन्ध मे जैसे कहा है कि यदि हास्तितदन्यत्र पन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ।' वही लोक मनीषा को इस ज्ञान-गाठरी के विषय मे भी निर्भीकतापूर्वक कहा जा सकता है। लोक जीवन की इन वाक्-पद्धतियो और लोकोक्तियो मे भी सभी कुछ है। प्राचीन काल से ही लोकोक्तियो एव मुहावरो के महत्त्व से परिचित होकर साहित्यकारो ने इसे अपनाया, किन्तु आज अनेक लोकोक्तिया और मुहावरे अपनी सुदीर्घ परम्परा से सम्पृक्त होने के बावजूद कुछ कारणो से लुप्त हो गए हैं. उन्हें पुन प्रतिष्ठित करने की समस्या जटिल है । ५० राम प्रताप त्रिपाठी इस पर खेद प्रकट करते हुए लिखते हैं--लोकोक्तियो के समान मुहावरे निरन्तर चिन्तन का प्रतिफलन, एक बूद मे अनन्त सिन्धु समेटने का प्रयत्न, फलत किसी भाषा के प्राण होते 90 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण हैं। इनका उत्स बहुलाशत नार से दूर उन उजटवासियो मा सहज मन होता है, जिन्होंने स्तिने ही जेठ मासों की तपन एव भादो की माडी अपनी काया पर ही उतार दी है। ये मणिया प्रत्येक जनपद मोली की धूल मे पड़ी मिलती हैं, आवश्यकता रहे घो-पोछने की है। इसके लिए निस्वार्य कर्तव्य परायण सकलनकर्ताओ को महती आवश्यकता है। यदि ऐसे अलख जगाने वाले हिन्दी को मिल जाए तो यह कितनी समुख हो जाए---कहने की आवश्यकता नहीं। हिन्दी क्षेत्र इतने लम्बे काल तक गुलाम रहा कि अपने ही लोग उसे घृणा कराने वाले काम में सफल रहे। वह वेद, महाभारत, पाणिनि पतजलि, कैयट, भत हरि आदि की सुदीर्घ परम्परा भूल गया, जिन्होंने अपने काल मे लोक की आरती उतारी। लोकोक्तिया एव मुहावरे हमे अपनी परम्परा से जोडते हैं। हमारी राजनैतिक-सामाजिक धार्मिक-सास्कृतिक आदि परम्पराओ के लोकोक्तिया एव मुहावरे सवाहक हैं, परिचायक हैं। लोकोक्ति और मुहावरे लोक-जीवन में प्रचलित वे सिक्के हैं, जिनका मूल्य कभी कम नहीं होता । साहित्य के इन बहुमूल्य रत्नो का प्रयोग जन-सामान्य से लेकर उच्च कोटि के साहित्य-मर्मज्ञ तक करते हैं। इनमे राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, साथिक तथा साहित्यिक आदि परिस्थितियो का प्रेरणादायक, प्रभावोत्पादक, व्यग्यात्मक एव भावात्मक चित्रण अत्यन्त सजीव, रोचक, सारगर्मित, सरल, सक्षिप्त एव उपयोगी भाषा मे करते हुए लोक-जीवन के सार्वभौम सत्य का उदघाटन बडे ही कौशल के साथ किया जाता है। यही कारण है कि दोनो ही विधाएं जन मानस का पुष्पहार बनी हुई हैं । अत साहित्य-सागर के इन मुक्त गुच्छो को निरख परख कर आवश्यक मूल्य निर्धारित करने का प्रयास किया गया है।243 लोक मे जितना महत्त्व जीवन का है, उससे कही अधिक महत्त्व जीवन में लोकोक्तियो का है । लौकिक मानव इन लोकोक्तियो के प्रभाव से स्वय को अछूता नहीं रख सकता है। इन लोकोक्तियो मे मानव जीवन से सम्बन्धित सामान्य भाव के अतिरिक्त गम्भीर भाव भी पाया जाता है। मानव जीवन इन्ही लोकोक्तियो के संकेत पर चलकर पूर्णता को और बढा है । बिना लोकोक्तियो के लोव व्यवहार अधूरा है। तेलुगु की एक कहावत द्वारा बात भली भाति स्पष्ट हो जाती है-'सामेत से निमाट आमेत सेनि इल्ल । अर्थात् विना लोकोक्ति के प्रयोग के वार्तालाप उसी घर के समान है, जहा कभी स्वादिष्ट भोजन बनता ही नही । लोकोक्तिया लोक जीवन के साथ सम्बन्धित होने के कारण लोक जीवन को समग्र एव सच्चे रूप मे अकित करती हैं। ये सदैव लोक मानव के अन्तमन पर आच्छादित रहती हैं तथा समय समय पर उनके द्वारा प्रकाशित होती रहती हैं। वे दैनिक जीवन मे अधिक व्याप्त रहती हैं कि इनके लिए लघु प्रयासो की भी आव. श्यरता नही होती। प्रसग एव उचित अवसर पर लोकोक्तिया स्वय प्रकट हो जाती हैं। इससे लोकोक्तियो की लोक-जीवन से अभिन्नता प्रकट हो जाती है । 145 किसी भी देश की परम्परा के अध्ययन के लिए लोकोक्तिया अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन हैं। डॉ. रमेशचन्द्र का क्यन उपयुक्त ही है कि इनमे किसी देश की राज- मुहावरा : स्वरूप विवेचन :91 - राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास की प्रचुर सामग्री सचित रहती है। लोकोक्तिया परम्परित होती हैं । अतः इनके माध्यम से हम युगों-युगों के लोक-जीवन का ज्ञान जान सकते हैं । लोकोक्तियां जन-मानस को अत्यन्त प्राचीन धरोहर होती हैं। इनमें सम्बद्ध जन-समुदाय क्षेत्र अथवा राष्ट्र का युगों-युगो का अनुभव सिद्ध ज्ञान भरा रहता है। संसार के प्रत्येक देश एवं जाति में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। संसार में कोई भी ऐसा देश एवं जाति न होगी जिसमें कि कहावतो का प्रचलन न हो 1246 डॉ० शशि शेखर तिवारी के अनुसार लोकोक्तियां परम्परा की संवाहिका और ऐतिहासिक चेतना की प्रतिध्वनि होती हैं । इसलिए उनमें किसी देश या जनपद के राजनीतिक और सास्कृतिक इतिहास की प्रचुर सामग्री संचित रहती है । लोकोक्ति-साहित्य भी इतिहास के मुख्य अंगो-मुद्रा, अभिलेख और भग्नावशेष की भांति परम्परा के उद्घाटन मे विशेष रूप से सहायक होता है ।247 सांस्कृतिक दृष्टि से इनका बहुत महत्त्व है। लोकोक्तियो मे तो मानो सांस्कृतिक बिम्बों के चौमुख दीपक से बल उठते है और अनुभव-प्रसूत चिन्तन की पुडी-सी बांधकर रख दी गई है। सभी देशो के साहित्य का अक्षय अनुभव इनमे अगूर के छिलके के भीतर रस और गूदे को उज्ज्वल-मोतिया कांति से लहलहाते रजकणो का मानिद प्रतिविम्बित हो उठता है। लोकवाणी का जितना सहज, अलंकृत, सूत्रबद्ध, लाक्षणिक-व्यंजक चित्र-विचित्र रूप इनमें मिलता है, उतना अन्यत्र कहा ?243 लोकोक्तियां मानव-समाज को मनीषा हैं। इनमे अनुभूत ज्ञान की निधि सचित रहती है। डॉ. उदय नारायण तिवारी के अनुसार हम अपनी जाति की परम्परागत विचारधारा का ज्ञान इन्ही के माध्यम से कर सकते हैं। इनके महत्त्व का निरूपण करते हुए डॉ. तिवारी लिखते हैं-"शताब्दियो से किसी जाति की विचारधारा किस ओर प्रवाहित हुई है, यदि इसका दिग्दर्शन करना हो तो उस जाति की लोकोक्तियो का अध्ययन आवश्यक है। काल-क्रम के अनुसार लोकोक्तियों का वर्गीकरण करके राज- नीतिक तथा भाषा की इतिहास सम्बन्धी सामग्री प्रचुर परिमाण मे उपलब्ध की जा सकती है ।219 लोकोक्तियो मे जीवन के सत्य को सुन्दर ढग से उद्घाटित किया जाता है । पही कारण है कि मौखिक लोक-साहित्य में लोकोक्ति-साहित्य का बहुत महत्व है 1250 डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने लोकोक्तियो को ग्रामीण जनता के नीतिशास्त्र के रूप मे स्वी- कार किया है। उनके भत में ये मानवी ज्ञान के घनीभूत रत्न हैं, जिनसे बुद्धि और अनुभव की किरणें फूटने वाली ज्योति प्राप्त होती है। लोकोक्तियां प्रकृति के स्फुलिंगी (रेडियो ऐक्टिव) तत्त्वो की भाति अपनी प्रखर किरणें चारो ओर फैलाती रहती हैं। लोकोक्ति- साहित्य संमार के नीति-साहित्य (विजडम-लिटरेचर) का प्रमुख अग है 1231 इसका कारण यह है कि लोकोक्तिया मानव-जीवन को गहन अनुभूतियो को व्यक्त करती हैं। इनके द्वारा व्यावहारिक जीवन की विभिन्न समस्याओ पर भी प्रकाश पड़ता है ।252 लोकोक्तियों मे भाव गरिमा कूट-कूट कर भरी रहती है। अर्थान्तरन्यास, अन्योक्ति, दृष्टात, सम, विषम तथा दीपक आदि उपदेशमूलक अलकारों का लोकोक्तियो मे बडा ही सुष्ठ प्रयोग मिलता है, जिनसे भावगत सौन्दर्य की प्रस्तुति होती है । - 92 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण लोकोक्तिया जीवन की पाठशाला के जागरूक शिक्षक हैं। साधारण से साधारण लोकोक्तियो मे जीवनोपयोगी कोई न कोई रत्न अवश्य छिपा मिलेगा। -"जैसे प्राचीन कान के शिलालेखो और सिक्को आदि से इतिहास की कडिया जुडती हैं, वैसे ही कहावतो की मार्फत हम कितनी ही कडिया जोड सकते हैं।"253 इनमे भावो, विचारो आदि के समाहार की शक्ति विद्यमान होती है । सासारिक व्यवहार पटुता एव सामान्य बुद्धि का विलक्षण निदर्शन इनमे मिलता है । लोकोक्तिया ग्रामीण सस्कृति के प्राचीन गौरव चिह्नो की एलबम हैं। लोकोक्तियो के द्वारा ज्ञान की किरणें चतुर्दिक फैलकर जन जीवन को आनोक प्रदान करती हैं। डॉ० कन्हैयालाल सहल के विचारानुसार लोकोक्तिया समाज के न्यायालय के अन्तिम निर्णयन्त् हैं- "कहावती न्यायालय मे निर्णय होने के बाद उसकी कभी कही अपील नही होती। कहावत ने जो निर्णय दे दिया, वही अन्तिम है 1254 लोकोक्तियो का महात्म्य अद्भुत है । डॉ०चाटुा की दृष्टि के आधार पर यह कहावती जगत भी एक विलक्षण लोक है। बडे-बडे ऋषि मुनियो की उक्तियो को भी यदि जनता स्वीकार न करे तो वे भी लोकोक्तियो के गौरवपूर्ण पद पर आसीन नही हो सकती। कहावतो की सचमुच बडी महिमा है, कोई उनकी अवमानना न करे 1255 लोकोक्ति की लोक-स्वीकृति का एक कारण यह भी है कि आप्त वचनो को भाति बिना किसी प्रकार के वाद विवाद के लोकोक्ति को आप्तोपदेश प्रमाण रूप में मान्यता प्राप्त हो जाती है । इसी तथ्य को प्रकट करते हुए बाइबिल कोश मे कहा गया है कि व्यावहारिक क्षेत्र में लाकाक्ति का महत्वपूर्ण स्थान इसलिए है क्योकि न्यायाधीश के सर्वमान्य विश्वासमूलक निर्णयो की भांति जन-सामान्य लोकोक्ति के आदेश का पालन करता है ।258 लोकोक्तियो का जितनामहत्त्व किसी देश, काल, पात्र अर्थात् जाति, जन समुदाय, प्रदेश अथवा सम्पूर्ण राष्ट्र को सभ्यता सस्कृति तथा साहित्य के अध्ययन की दृष्टि से है, उतना ही उसकी भाषा के अध्ययन की दृष्टि से भी है ।257 भाषा के भी मुख्यत दो रूप हैं-मामान्य या वार्तालाप की भाषा तथा साहित्यिक अथवा काम्य भाषा । डॉ. नरसिंह राव की दृष्टि से वार्तालाप मे लोकोक्तियो का दो प्रकार से महत्त्व है- (क) भाषा को सक्ति मे वृद्धि करना, (ख) क्थन मे वक्रता और चमत्कार उत्पन्न करना । काव्यात्मक नापा म जिस प्रकार अलवार-विधान भाषा की शक्ति वृद्धि करता है, उसी प्रकार लोकोक्तियों के द्वारा वार्तालाप मे शक्ति और सुन्दरता का समावेश हो जाता है। भाषा का यह सोन्दर्य दो प्रकार का है-(1) बाह्य सौन्दर्य और (2) आन्तरिक सौन्दय । बाह्य सौन्दयं में किसी कथन मे शब्द क्रम और विविध उपमानो के रूप में प्रयुक्त अप्रस्तुत सामग्री की कल्पना के द्वारा दो तत्त्व आ जाते हैं। लोकोक्ति के द्वारा ये दोनो ही तत्व वार्तालाप को प्राप्त हो जाते हैं । भाषा के मान्तरिक सौन्दर्य में उसके अर्थ को पुष्ट लाधार, अयं परिवर्तन पेली, बौद्धिक रूप से मान्य तर्क और कुछ भावात्मक मधुवेष्टन आते हैं। ये सभी तत्त्व लोकोक्तियो मे विद्यमान होते हैं, अत वार्तालाप की भाषा पाह्यान्तर सौन्दर्य से युक्त होने के लिए लोकोक्तियो का सहारा लेती है।258 इसमे सदेह नहीं लोकोक्तियो के द्वारा पन में तोत्रता एवं प्रभावारमकता को सृष्टि होती है। ।

मुहावरा स्वरूप विवेचन 93 लोकोक्तियो का जितना सम्बन्ध वक्ता से है, उतना ही श्रोता से भी है, अत दोनो प्रभाव ग्रहण करते हैं। वक्ता एव श्रोता का पारस्परिक साधारणीकरण इनके माध्यम स सम्यक्तया हो जाता है। श्री गोपाल प्रसाद व्यास का कथन है-कहावतो के गर्भ में चमत्कार और इनके कथन मे वक्रता होती है, इसलिए बात जितनी जल्दी कहावतो द्वारा घर उतरती है, उतनी किसी और माध्यम से नहीं 1259 भाषा के विविध स्तरो क अध्ययनार्थ लोकोक्तिया कामसुधा-स्रोतवत् उपयोगी, फलन महत्वपूर्ण होती हैं । 'राजस्थानी कहावता' के लेखक को दृष्टि मे भाषा के सौन्दर्य की वृद्धि भी इनके द्वारा ही सम्पन्न होती है। वे हमारे कथन को मार्मिक, मधुर और प्रभावशाली बना देती हैं । वस्तुत भाषा को सुन्दरता और सरसता का प्रधान कारण कहावतें हैं। इनके प्रयोग से लेखो और भाषणो का माधुर्य क्तिना बढ़ जाता है, वे कितने सजीव और प्रभावोत्पादक बन जाते हैं, यह सब पर प्रकट है ।260 साहित्यिक दृष्टि से भी लोकोक्तियो का महत्व कम नही है । काव्य-भाषा अथवा साहित्यिक भाषा के सौन्दर्य की वृद्धि मे लोकोक्तियो का योगदान अप्रतिम है। डा० सन्तराम अनिल इस विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं-साहित्यिक दृष्टि से भी कहावतें महत्वपूर्ण हैं । उन्हें भाषा का शृगार कहा जा सकता है और इसी लिए परिनिष्ठित साहित्य मे 'लोकोक्ति' की अलकार के रूप मे प्रतिष्ठा हुई है । कहावतो के द्वारा भाषा मे सजीवता, स्फति और चौखापन आता है। भाषा-विज्ञान वेत्ता ५ अध्ययन के लिए भी कहावते महत्त्वपूर्ण सामग्री का काम करती हैं। समाज शास्त्र और सस्कृति के अध्येता के लिए भी कहावतें अनेक समस्याओ का रहस्योद्घाटन करनी हैं 1261 साहित्यिक भाषा अथवा काव्य-भाषा मे लोकोक्तियो एव मुहावरो के महत्त्व- प्रतिपादन करने से पूर्व काव्य-भाषा का सक्षिप्त अध्ययन अनुपयुक्त न होगा। सुप्रसिद्ध रूसी विद्वान् प्रे-दिन के मत मे~~भापा विचार का साधन है। भाषा का इस्तेमाल लापर- वाही से करने का मतलब है विचारो मे लापरवाही करना 1262 सम्भवत्त इसी कारण भाषा को पर्याप्त प्रतिष्ठा मिली। काव्य-पुरुष थे भाव यदि प्राण हैं तो उस पुरुप-शरीर मे कलात्मकता, आकर्षण-सम्पन्नता, प्रभविष्णुता तथा सम्प्रेषणीयता आदि का समावेश भाषा के द्वारा ही होता है । वस्तुत किसी भी काव्यकृति को पाव्यत्व का स्वरूप काव्य- भाषा के माध्यम से ही प्राप्त होता है। प्राच्य एव पाश्चात्य साहित्याचार्यों ने साहित्या- लोचन के सन्दर्भ में काव्य-भाषा पर पर्याप्त चिन्तन किया है। संस्कृत साहित्य शास्त्र में पान्द एव अयं के सहभाव को काव्य को सज्ञा से अभिहित किया गया है और काव्य के स्वरूप विवेचन के सन्दर्भ मे आनुपगिक रूप से शन्द-तत्त्व अर्थात् काव्य-भाषा का भी प्रतिपादन किया गया है। आत्मवादी और देहवादी दोनों प्रकार दे आचार्यों ने स्व-स्व सिदान्त का प्रतिपादन करते हुए काव्य के बाह्य रूप अर्थात काव्य-मापा श्री भी पर्चा की है। पण्डितराज जगन्नाय ने रमणीयता को काव्य वा सर्वस्व घोपित करते हुए कहा कि रमणीयता अर्थ में होती है और उसको अभिव्यक्ति भाषा द्वारा सम्भव है 103 94 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण पाश्चात्य काव्य शास्त्र मे काव्य भाषा-विषयक विस्तृत विवेचन हुआ है । अरस्तू काव्य-भाषा की भावगत एव शिल्पगत विशिष्टता के विषय मे लिखते हैं-काव्य भाषा मे भापा-शिल्प का प्रयोग होता है, उसमे ललित कल्पना की क्रीडा होती है । होरेस काव्य- नापा को सामान्य बोलचाल की भाषा से भिन्न मानते हैं। वे अपने सवादो मे होने वाली अशिष्ट बातचीत के धरातल पर न उतर आए और ऐसा भी न हो कि धरती से बचने के प्रयत्न मे वे मेघो और शून्य मे उमल कर रह जाए। तुच्छ पद्य का उच्चारण त्रासदी की गरिमा के विरुद्ध है 1284 लोगिनुस, दाते, कालरिज तथा डब्ल्यू०पी० केर आदि अनेक विद्वानो ने कलात्मक सौन्दर्य को काव्य-भाषा का प्रमुख गुण माना है । दाते लोक- भाषा को काव्य-भाषा का आधार स्वीकार करके भी उसकी विशिष्टता एव परिष्कृति को महत्त्व प्रदान करते हैं 1265 काव्य के अभिव्यजना-कौशल का निरूपण द्विविध सभव है-(क)भाषा शास्त्रीय आधार पर तथा (ख) काव्यशास्त्रीय आधार पर। इनम प्रथम दृष्टिकोण के अनुसार काव्य-भाषा का अध्ययन भाषा विज्ञान के सिद्धान्तो के आधार पर किया जाता है। भाषा के विभिन्न तत्त्वो-शब्द रचना, रूप-रचना, सज्ञा, सर्वनाम, त्रियापद आदि के आधार पर काव्य-भाषा का विश्लेषण किया जाता है जबकि द्वितीय आधार पर काव्यशास्त्र के विभिन्न सिद्धान्तो की दृष्टि से काव्य के अभिव्यजना कौशल का दिग्दर्शन कराया जाता है। लोकोक्तियो एव मुहावरो को जहाँ भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन का आधार बनाया जा सकता है, वहा इनमे साहित्यिक सौन्दर्य के स्वाभाविक दर्शन होने के कारण साहित्यशास्त्रीय तत्त्व भी उपलब्ध हो जाते हैं। काव्यशास्त्र के विभिन्न काव्य-तत्त्वो के द्वारा काव्य-सौन्दर्य की अभिव्यक्ति मे लोकोक्तिया एव मुहावरे महत्त्वपूर्ण भूमिका निमाते हैं। जिस प्रकार काव्य-रचना को प्रक्रिया मे काव्य-भाषा का महत्त्वपूर्ण योगदान है, उसी प्रकार काव्य-भाषा की रचना-प्रक्रिया मे लोकोक्तियों एव मुहावरोका स्तुत्य योगदान है । प्रो० इन्द्रपाल सिंह का विचार है कि किसी भी भाषा की यथार्थ शक्ति का आभास उसमे प्रयुक्त लोकोक्तियो एव मुहावरो के प्रयोग से मिलता है अर्थ-सौन्दर्य, भावा- भिव्यजना, अभीष्ट प्रभाव एव वाछित अनुभूति की दृष्टि से पद्य मे जो स्थान अलकारो का है, गद्य मे वही स्थान लोकोक्तियो एव मुहावरी का है। 266 लोकोक्तिया एव मुहावरे काव्य मे प्रयुक्त होकर भाषा को सजीवता, सप्राणता, स्फूति एव दाक्ति प्रदान करते हैं। श्री बदरी प्रसाद साकरिया के निम्न कपन से यह बात सिद्ध हो जाती है--(1) व्याकरण- भाषा का अस्थिपजर, (2) शन्द सम्पन्नता-उसका प्राण और (3) लोकोक्तियां और मुहावरे-~-उसका ओज, सौष्ठव और शारीरिक गठन है । वही भाषा प्राणवान है जिसमें सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावो को अभिव्यक्त करने वाले शब्दो की प्रचुरता हो और वही कोज वाली भाषा है जिसमे उसवी वाग्व्यवहार एव व्यजना शक्ति की सम्पूर्ण योग्यता हो । प्राणवान् शरीर मे यदि मोज नही है तो वह शरीर अकृती होता है ।267 लोकोक्तियों का साहित्यिक दृष्टि से अत्यन्त महत्व है। इसका एक कारण यह 1 मुहावरा स्वरूप विवेचन 95 । भी है कि उनमे साहित्य के कलापक्ष की कृत्रिम बोमिलता नहीं है । अभिव्यक्ति मे सहज स्वाभाविक्ता और मामिकता है। भाषा और बोलियो मे जो प्रभावोत्पादकता का गुण प्राप्त होता है, वह इन्ही के द्वारा प्रदत्त है । इनके बिना वे रसहीन प्रतीत होती हैं । 268 लोकोक्तियो की भाति मुहावरो का भी इस दृष्टि से अतिशय महत्त्व है। इनके द्वारा भाषा मे चमत्कार उत्पन्न होता है और नवस्फूर्ति आती है। मुहावरे भाषा का प्राण सजीवता की मूर्ति, शक्ति का अक्षय भण्डार, मानवता की कमोटी, सास्कृतिक मान्यताओ का मानक कोश, महान पुरुषो का स्वरूप दर्शन, लोकाचरण का आधार और रसानुभूति के रत्नाकार हैं । 269 भाषा मे मुहावरो के महत्त्व का कारण यह है कि इनके सफल प्रयोग भाषा मे एक ऐसी शक्ति सम्पन्न तीव्रता उत्पन्न कर देते हैं जिससे वह मानव-हृदय को बेधकर उसके अन्तराल मे समा जाती है। सिद्ध लेखक गिने-चुने शब्दो मे ऐसी भाव भरित पक्तिया प्रस्तुत करता है जिसमे शब्द अर्थ-गाम्भीर्य के साथ ही भाषा मे एक विशिष्ट आकर्षण एव लोच प्रतीत होता है।270 मुहावरो के प्रयोग से प्रयोक्ता अथवा लेखक को भाषा मे प्रौढता एव प्रभावात्मकता भाती है । अभिव्यक्ति की सशक्तता भाषा को प्रोढता पर अवलम्बित होती है । तात्पर्य यह है कि मुहावरे भाषिक सजीवता के प्रमाण हैं । सरहिन्दी मुहावरा-कोश मे कहा गया है कि मुहावरे प्रत्येक भाषा की निधि हैं, जिस पर भाषा जीवित रहती है । मुहावरो का कुण्ठित हो जाना तथा जन सामान्य की बोलचाल से उनका उठ जाना भाषा का मरना है। ये जनसाधारण की सम्पत्ति होते हैं। ये व्यक्ति के अनुकूल और प्रतिकूल दोनो होते हैं। ये भाषा की सजीवता के चिह्न हैं। इसलिए विद्वान्, साहित्यिक, रसिक इन्हें अपनाते हैं 171 काव्य-भाषा मे प्रसगानुकूल विशिष्ट मुहावरो के सफल प्रयोग करने से तात्पर्य यह है कि उसमे माधुर्य, सौन्दर्य, ओज, अर्थ-व्यक्ति आदि गुणों का यथेष्ट विकास हो। मुहावरो के अभाव मे भाषा अमधुर, नीरस एव निष्प्राण बनकर अपने स्थायित्व को नष्ट कर देती है। डॉ० रमेश चन्द्र के अनु. सार भाषा यदि सुव्यवस्थित घर है तो मुहावरे उसका प्रकाश हैं । भाषा मे मुहावरो के महत्त्व की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं कि मुहावरे भाषा के 9 गार हैं, सुविधा एव सौदर्य सृष्टि अथवा भाव विकास के लिए उनका सृजन हुआ है। उनकी उपेक्षा उचित नहीं। वे उस आधार स्तम्भ के समान हैं जिनके अवलम्ब से सुविचार-मन्दिर का निर्माण सुगमता से हो सकता है। मुहावरेदार प्रयोग आमतौर से सुन्दर, सक्षिप्त और ओजपूर्ण होते हैं जिनके कारण किसी कथन का आकर्षण और सौन्दर्य वहुत बढ़ जाता है । मुहावरो महत्त्व के विषय में कहा जा सकता है कि यदि भाषा अच्छे-अच्छे पदार्थों से सम्पन्न एक सुसज्जित और सुव्यवस्थित घर है, तो मुहावरे उसका प्रकाश हैं। जिस प्रकार अनेक मणियो एव रत्नो से जड़ा हुआ सुन्दर और आकर्षक घर भी प्रकाश के अभाव मे अन्धकूप लगता है, उसी प्रकार अच्छे से अच्छे भावो से युक्त शुद्ध एव सस्कृतमयी भाषा भी महा- वरेदारी के अभाव मे नीरस एव निष्प्राण लगती है, अतः बोलचाल या साहित्य दोनो भाषाओ के लिए मुहावरो का होना अति आवश्यक है । उपर्युक्त विवेचन के आधार पर समग्रत. यह कहा जा सकता है कि लोकोक्तियाँ - 96 . लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेपण एव मुहावरे लोक-जीवन तथा साहित्यिक जगत् मे गौरवपूर्ण पद पर आसीन हैं । लोको- क्तियो एव मुहावरो का महत्त्व अनेक दृष्टियो से आका जा सकता है--इनके द्वारा जहा ऐतिहासिक पौराणिक तथ्यों का पता चलता है, वहा सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एव सास्कृतिक आदि तथ्य भी प्राप्त होते हैं। किसी भी राष्ट्र के अतीत का ज्ञान इनके द्वारा हो जाता है। भाषा-विज्ञान के अध्येता को लोकोक्तियो एव मुहावरो के द्वारा भाषा को इतिहास-विषयक रोचक एवं महत्त्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हो जाती है । वस्तुत. मुहावरे और लोकोक्तिया लोकोपवन की सर्वाधिक सुगन्धित पुष्पमाल्य एव साहित्यिक रत्नाकर को बहुमूल्य रत्नावलि है। कन्नड मे कहा गया है-'गादेय मम पनि रितवनु वेदद मर्म बन्नरितवन्नु'-जो जाने लोकोक्ति का मर्म सो जाने वेद का मर्म । 'गादे वेदयके समान'-- ये वेद के समान हैं। 'वेद सुललादरू गादे सुललागदु'-वेद भी झूठे सावित हो सकते हैं पर लोकोक्ति मूठ नही हो सकती 27 भारतीय संस्कृति के मूलाधार एव अपौरुषेय माने वाले चतुर्वेदो से भी बढकर इनकी जो प्रशसा की गई है, इसे लोकोक्तिमो एव मुहावरे के महत्त्व की पराकाष्ठा ही समझना चाहिए।००

संदर्भ-संकेत
।
1. 'संस्कृत लोकोक्ति संग्रह '-पं० धरणीधर वाजपेयी, पं० बालकृष्ण भट्ट, पुरोवाक् ।
2. (क) सूर साहित्य में प्रयुक्त लोकोक्तियों का अध्ययन -डॉ. लक्ष्मीनारायण
दार्मा (अशो०प्र०) प्रथम अध्याय (अ) लोकोक्ति-निरूपण, पृ०1
(ख) भ्वा० लोक 76 दर्शने । लुलोके। लोक अतुलोकदिति ।-सिद्धान्त कौमुदी
-भट्टोजि दीक्षित, पृ० 87 तथा पृ० 348, पृ० 343
(ग) लोक दीप्तो चु० उभ० सक०
सेट् । लोकयति ते अल्लुकतत् । लोक दर्शने
म्वा० ० सक० सेट् । लोकते अलोकिप्ट लुत्तोके। ऋदित् पनि प हस्यः ।
अलुलोक्त्त । लोक पु० लोक्यतेऽसौ लोक-पन् । -वाचस्पत्यम् भाग पप्ठत्तो,
पृ०48331
3. हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास, पोडश भाग, प्रस्तावना, पृ. 1
4. (क) उवित स्त्री यच् भावे क्तिन् । कयने ।
"अति संक्षिप्त पिरन्तनोयितभिः"-मुक्तावली। "उस्तिप्रायग्निरूपं यारो
वाफ्यम्"-
'-ठा०भा० । “व्याहार उकिरालंपितं भापितं यचनं वचः" इत्यमर
तया शशक्तीप" एक्योक्ता पुष्पवन्तो दिवाकर निभाकरी-अमर०
-~याचस्पत्यम् भाग द्वितीय, पृ० 1050
5. हिन्दी साहित्य कोश (भाग 1)-सम्पा० धीरेन्द्र वर्मा, पृ. 747
5. (क) जगती सोकोऽविष्टप भुवन जगत् । मोकोऽयं भारतवर्षम् । अमरकोष 2/1/6
अधो मुवन पाताल यसिसम रसातलम् । नागलोरोप"। वही 1/8/l
पोरस्तु मुक्ने जने-वही 31312
"भयनार्पर लोों' परस्य परुड पुराणे सणभेदा सस्ताहि-गप्तमोर:
भगोविता:'-मनोमाभिमम्मे तुमयसोर सद्बर। स्वोर विटा
स्पष्टदेगे महस्तपा। जनमोफ परदेशे सपोमोर मनाररे । मरय मोर
बहार-ति गहर पुरा 115/57-591 मदः पदेन पर दब गोरा
एचापि परेशबही-अमरोप परिशिष्टम् ।
(स) समहापर नए | मारो मनमो...
परिकीतिताः॥ग्निपुराणम् । पिष-मोकोमग परनामोर,

98 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेपण मिदमुच्यते । महर्जनस्तप सत्य सप्तलोका प्रकीर्तिता ।। -शब्द कल्पद्रुम --चतुर्थ वाण्डम्, पृ0 231 7 हिन्दी शब्द सागर, मूल सपा० श्यामसुन्दर दास, भाग 8, पृ० 4318 8 ऋ० 10/90/14 १हिन्दी शब्द सागर, मूल सम्पा० श्यामसुन्दरदास, भाग 8, पृ० 4318 10 अशोक का शिलालेख, पृ० 174(14) गिरिनार मे । 11 Folklore includes folk are, folk crafts, folk tools, folk custom, folk custume, folk belief, folk medicine, folk recipes, folk music, folk dance, folk games, folk gestures and foll speech, as well as those verbal forms of expression which have been called folk literature but wbich are better described as verbal art Verbal art, which includes, such forms as folk tales, legends, myths, proverbs, riddles and poetrv, has been the primary concern of folk. lorists from both the humanities and the social sciences sioce the beginning of folklore as a field of study, and it is with this principal segment of folklore that this article of concerned European interest in folklore goes back at least to the site teenth century and the age of exploration, but the modern study of folklore is generally considered to date from the early years of the nineteenth century, when the Grimm brothers began collecing german folktales in the field The Folklore was first introduced in English in 1846 by William John Thoms,who urged that accounts of "manners, customs, observances, superstitions, bellads, proverbs, &c, of the olden time be recorded in Britain for future study and for comparison with the materials which were being recorded in Germany by the Grimm brothers and other scholars" -~-International Ency of Social Science, Vol 5, pp 496-497 12 ए•साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, भाग 9, पृ० 444 13 हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास, पोडश भाग, प्रस्तावना, पृ०१ 14 जनपद प्रैमासिक, अक 1, पृ०66 15 सम्मेलन मासिक, लोक सस्कृति विशेषाक, पृ. 65 16 लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेपायतो । दग्धाना किल वह्निना हितकर सेकोऽपि तस्योदभव ।। ---दे० सस्कृत लोकोक्ति संग्रह-५० ५० ५० वाजपेयी, प० वा. कृ. भट्ट, भूमिका। "

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100 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण 25-A proverb is the remnant of the ancient philosophy preserved amidst very many destructions on account of its brevety and fitness of use (Aristotle) -Jewels five words long that on the streiched forefinger of all tjme sparkle for ever (Tennyson) - Proverb may be said to be ibridgments of wisdom (Joubert) Short sentences drawn from long experience (Cervates) Short sentence into which as in rules, the ancient as have compressed life (John Agricola) - Well-known and well used dicta framed in a sort of out way from and fashion (Erasmus) -A proverb is the interpretation of the words of the wise (Bible) - These Fragments of wisdom, the proverbs in the earliest ages serve as the unwritten laws of morality (Disrach) -देखिए राजस्थानी कहावत-हॉ० कन्हैयालाल सहल, पृ. 19 26 देखिए-साहित्य-सदेश -U14979777 1197 1955, 6* 12, RTT 16, 9. 445 27 A goomic forms of folk literature a short pregoant Criticism of life, based upon common experience, as (Bible) 'The book of proverbs' quite generally the product of the popular mind it was important as reflecting prevalent attitudes In Gr and Rome it often served as a vehicle of literay and dramatic criticism In longer works, it brought vividness color by compression and boldness of imagery - Dictiopary of World Literary terms-Joseph T Shipley, p 258 28 Proverb tells a truth or some bit of useful wisdom in a short sentence, The Language is generally picturesque and simple Oply those saying which many people have used for a long time are called proveros A man may compose a proved that becomes a part of everyday speech But most proverbs have been created through common usage -The World Book Encyclopaedia, V 14, P 740 29 While the formal definition of a proverb is difficult to frame, and every authority attempts to give his own, there is a general agracement as to the chief characteristics of proverbial sayings संदर्भ सकेत : 101 Four qualities are necessary to constitute a proverd, bravity (or, as some prefer to put it, conciseness) sense, piquancy or salt (trench) and popularity ---Encyclopaedia of Religion and Ethics by James Hastings, Vol x, p. 412. 30 विस्तार के लिए देखिए-राजस्थानी कहावतें, पृ० 12-14 31. साहित्य-संदेश,-श्याम परमार जुन 1955, अक 12, भाग 16 पृ० 445-446 32. Brevity is the soul of wit (Hamlet) 33 A proverb may be said to be the abridgment of wisdom. (Jonbert) 34 मुहावरा-मीमासा-डॉ० भोम्प्रकाश गुप्त, पृ० 366-67 35. लोक साहित्य की भूमिका--डॉ कृष्णदेव उपाध्याय, पृ० 136, 140-41 36 कन्नोजी लोक साहित्य-डॉ० सन्तराम अनिल, पृ. 204 (अवतरणिका) 37. राजस्थानी कहावतें-डॉ० कन्हैयालाल सहल, पृ० 13 38 सू० सा० 3316 पृ० 641, वही, 4522 पृ० 1563, सारा० 970 पृ० 160, न० ग्र० भा० द० स्क० अ० १, पृ० 194, गो० स्वा० 487 पृ. 187, सू० सा० 4050. 1418, वही 4222 पृ० 1471, प० सा० 174 पृ० 81, च० दा० 258 पृ०132 तथा न००भा०६० स्क० अ०14 पृ० 233 39. देखिए-साहित्यिक मुहावरा-लोकोक्ति कोश-~-हरिवंशराय शर्मा, पृ० 56 40 देखिए-वही, पृ074 41. सूर साहित्य मे प्रयुक्त लोकोक्तियो का अध्ययन-डॉ० लक्ष्मीनारायण शर्मा, पृ० 16 (अ० शो० प्र०) 42 कन्नोजी लोक साहित्य--डॉ० सन्तराम अनिल, अवतरणिका, पृ. 204-210 43. राजस्थानी कहावतें-डॉ० कन्हैयालाल सहल, पृ० 14 44. हिन्दी गद्य-साहित्य मे लोकोक्तिया और मुहावरे-~डॉ० मदनलाल शर्मा, पृ०11-19 (म० शो० प्र०) 45 सू० सा० 2521 पृ. 909 46. सूर साहित्य में प्रयुक्त लोकोक्तियो का अध्ययन-~-डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा, पृ०18 (अ० शो० प्र०) 47. राजस्थानी कहावतें-डॉ० क० ल० सहल, पृ० 14 48 दे० हिन्दी गद्य-साहित्य में लोकोक्तिया और मुहावरे--डॉ. मदनलाल शर्मा, पृ० 120 (अ० शो० प्र०) 49. न०प्र० रसमजरी, पृ० 127 50 न० अ०भा० द० स्क० म०पृ० 218 51. दे० प्रमशः सू० सा० 3770 पृ० 1336, वही 4586 पृ. 1586, कु० दा० प्रकोणं 102 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेपण 399 पृ० 138 तथा वही 23 पृ० 13 52 साहित्यिक मुहावरा लोकोक्ति कोश -हरिवशराय शर्मा, पृ० 290-91 53 वही, पृ० वही 54 तेलुगु और हिन्दी लोकोक्तिया-डॉ० वेंकट रमण राव, पृ० 7 55 To attain the rank of a Proverb, a saying must either spring from the masses or be accepted by the people as true In a Profound sene it must be vox populi --Encyclopaedia of Religion and Ethics, Hastings Vol X P412 56 The people voice, thc voice of God we call, and wbat are pro verbs but the public's voice? Coind first, and common made by common choice Then sure they must have weight and truth withal See-Proverbs Maxims & Phrases--Vol I, Robert Christy, p 1 (Preface) 57 साहित्य-सदेश-श्याम परमार । (आगरा, जून 1955, अक 12 भाग 16, पृ० 445) 58 लोक-साहित्य-श्री इन्द्रदेव सिंह पृ. 177 59 अवधी का लोक-साहित्य-डॉ० सरोजनी रोहतगी, पृ० 108 60 कुमाऊ का लोक साहित्य-डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय, पृ० 219 61 सूर साहित्य में प्रयुक्त लोकोक्तियो का अध्ययन-डॉ० लक्ष्मीनारायण शर्मा, पृ० 18 19 (म० शो० प्र०) 62 साहित्यिक मुहा०-लोको० को-हरिवशराय शर्मा पृ० 23 63 साहित्यिक मुहा० लोको० कोश-वही, पृ० 12 64 सू० सा0 2461, पृ० 892 65 वहीं 2938 पृ० 1033 66 साहित्यिक मुहा० लोको० कोश-हरिवशराय शर्मा, पृ० 131 67 लोक-साहित्य की भूमिका-डॉ० कृष्ण देव उपाध्याय पृ०141 68 There is nothing like absolute truth, all over truth arc half truth (Stevenson) Proverbs are usually but half truths and seldom contain the principle of the action they teach (T T Munger) -विस्तार के लिए देखिए-राजस्थानी कहावते-डॉ. पहपालाल सहल पृ० 1718 69 Proverbs are the literature of reason or the statement of absolute truth, without qualification Like the sacred books of each pation, सदर्म-सकेत 103 they are sanctuary of its Institutions -दे० वही, पृ०18 70 साहित्य-सन्देश -श्याम परमार, आगरा, जून 55, अक 12, भाग 16, पृ० 446 71 वही, पृ० 447 72 लोक वार्ता पत्रव-पृष्णानन्द गुप्त, स० 3, पृ० 1, 73 पृथिवी पुत्र-डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, पृ० 111 74 कहावत-कोश, सम्मा० श्री भुवनेश्वर प्रसाद मिश्र एव श्री विक्रमादित्य मिश्र, प्रस्ता- वना, पृ० (क) 75 राजस्थानी कहावतें-डा० कन्हैयालाल सहल, पृ० 20 76 भाषा विज्ञान कोश, पृ० 581 77 साहित्यक मुहा० लोको० कोश-हरिवंशराय शर्मा, पृ० 130 78 वही, पृ० 131 79 वही, पृ० 182 80 वही, पृ० 60 81 वही, पृ० 153 82 नन्द० ग्र० गो० ली० पृ० 169 83 कथ्य प्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन-डॉ. रमेशचन्द्र, पृ० 23(म० शो० प्र०) 84 वही, पृ० 48 85 A proverb sage and a Modern Novelist, an Elizabathen antiquary and a form of house aqents today These have all found a sginificance in proverb -दे० सूर साहित्य मे प्रयुक्त लोकोक्तियो का अध्ययन, -डॉ० लक्ष्मी नारायण शर्मा, पृ. 14 (अ० शो० प्र०) 86 हिन्दी गद्य साहित्य मे लोकोक्तिया और मुहावरे, डॉ० मदनलाल शर्मा (अ० शो० प्र०) पृ. 126 87 राजस्थानी कहावता, प्रो. नरोत्तमदास स्वामी व मुरलीधर व्यास, भाग 1 अवतरणिका, पृ० 6 88 लोक-साहित्य की भूमिका-डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय, पृ० 143 89 हिन्दी गद्य साहित्य मे लोकोक्तिया एव मुहावरे-डॉ. मदनलाल शर्मा (अ० शो० प्र०) पृ० 128 90 वही, पृ. 128 91 साहि० मुहा० लोको० कोश-हरिवश राय शर्मा, पृ० 227 92 वही, पृ० 299 93 वही, पृ० 203 94 वही, पृ० 12 104: लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेपण 95 दे० ग्रज लोक साहित्यि का अध्ययन-डॉ. सत्येन्द्र, पूर्वपीठिका, पृ० 493-507 96 तुलसी-काव्य की लोक्तात्विक सरचना-डॉ० गया सिंह, पृ० 155 97 लौकिक न्यायाञ्जलि सी० जी० ए० कब, तृतीयो भाग., पृ० 2 (प्रिफेस) 98 मालवी कहावतें, मेहता, रतन लाल, भाग 1 का प्राक्कथन, पृ० 2 99 राजस्थान कहावतें-डॉ० सहल, पृ० 29-32 100. वही, पृ० 32 101 वही। 102 कहावत कोश-सम्पादक श्री भुवनेश्वर नाथ व श्री विक्रमादित्य मिश्र, प्रस्तावना, पृ० ख-ग 103 दे० हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास, पोडश भाग (सम्पादक राहुल साकृत्यायन, एव डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय)-(अवधी लोक-साहित्य)--श्री सत्यव्रत अवस्थी, पृ० 190 सहल, पृ049 104 दे० वही (छत्तीसगढी लोक-साहित्य), दपाशकर शुक्ल, पृ० 284 105 कहावत कोश-सम्पादक श्री भुवनेश्वरनाथ मिश्र व श्री विक्रमादित्य मिश्र, प्रस्तावना, पृ० ग 106 बजलोक साहित्य का अध्ययन-डॉ. सत्येन्द्र, पृ० 83-84 107 विस्तार के लिए देखिए-राजस्थानी कहावतें--डॉ० 108 वही 109. दे० कन्नौजी लोक-साहित्य-डॉ० सन्तराम अनिल, पृ० 206-207 110 हिन्दी साहित्य कोश-सम्पादक डॉ० धीरेन्द्र वर्मा ० 446 111 ग्राम-साहित्य-५० रामनरेश त्रिपाठी, तृतीय भाग, पृ० 288 112 कुमाऊ का लोक-साहित्य-डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय, पृ० 222-223 113 हिन्दी साहित्य-कोश, सम्पा० डॉ० धीरेन्द्र वर्मा, पृ० 754 114 भारतीय साहित्य शास्त्र कोश-डॉ० राजवश सहाय, 'हीरा' पृ० 1107 115. लोकप्रवादानुकृतिर्लोकोक्तिरिति भव्यते । सहस्व कति चिन्मासान्मीलयित्वा विलोचने । कुव० 157 116 सरस्वती कण्ठाभरण, भोज, 2/39 117 अग्निपुराण-6/21 118 अलकार शेखर-केशवमिश्र, 6/22 119 विस्तार के लिए देखिए-भारतीय साहित्यशास्त्र कोश-डॉ० राजवश सहाय 'हीरा', पृ. 1108 120 Aphorism is a short Pithy statement containsog truth of genral import-A treasury of English Aphornsn - by Logan Pearsal Smith-P.44 (1 ) Maxim is a statement of greatest weight सदर्भ-सवेत : 105 (II) Aphorism only states some broad truth of general bearing, a maxim besides statiog the truth, enjoins a rule of conduct as its consequence--Studies in Literature by F V Morley, p 62. Any saying of pointed character and a sting in its tail is an epigram -विस्तार के लिए देखिए--राजस्थानी कहावतें- डॉ० कन्हैयालाल सहल, पृ० 32-34 121 'वाङ ला प्रवाद'-डॉ० सुशील कुमार, पृ० 4 122 'नैतिक जगतेर सत्य हइले ओ व्यावहारिक जगतेर तथ्य नये'--वही 123 राज० कहावतें-डॉ० सहल, 37 124 Introduction note to Stevension's book of Proverb, Maxim & Familiar Phrases 125 कुमाऊ का लोक-साहित्य-डॉ० पाण्डेय, पृ० 219-220 126 सस्कृत लोकोक्ति सग्रह-५० धरणीधर वाजपेयी, १० बालकृष्ण भट्ट, भूमिका। 127 हिन्दी मुहावरे--ब्रह्मस्वरूप शर्मा 'दिनकर' 128 गया सुल्लुगात-फारसी कोश, पृ० 445 129 लुगातकिश्वरी, स्तम्भ 2, पृ० 439 130 फरहा नासफिया, जिल्द चहारूम, स्तम्भ 1, पृ० 303 131 उर्दू-हिन्दी शब्दकोप-मुहम्मद मुस्तफा खां यद्दाह, पृ० 543 132 कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन-डॉ० रमेशचन्द्र, पृ० 74 (म० शो० प्र०) 133 उर्दू हिन्दी शब्द कोश-मुहम्मद मुस्तफा खा मद्दाह, पृ० 543 134 मुहावरा-मीमासा-डॉ० ओम्प्रकाश गुप्त, पृ० 5-6 135 A Dict of English & Skt by Dr Monier Williams p 357 136 हिन्दी मुहावरे-५० रामदहिन मिश्र, पृ.6 137 लोक-साहित्य की भूमिका-~-डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, पृ० 151-152 138 राजस्थानी कहावतें-डॉ० सहल पृ० 23 139 अच्छी हिन्दी-(क्रियाए और मुहावरे) -रामचन्द्र वर्मा, पृ० 164 140 मुहावरा भीमासा-डॉ. ओम्प्रकाश गुप्त, पृ० 12 141 एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, भाग 12, पृ० 60 142 Idiom To make a Person's own, to make proper or peculiar, Fr 1dios one's own proper, peculiar, akin to skr vi asunder (1) The Language proper or peculiar to a people (a tongue) or to a district, community, or class (a dialect) 106 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण (2) The syntactial, grammatical, or structural form Peculiar to any language, the genius, habit, or cast of alanguage (3) An Expression established in the usage of a language that is peculiar to itself either in grammatical construc tion, or in having a meaning which can not be derived as a whole from the conjoined meanings of its elements (4) A form or form of expression characteristic of an author, as Browing s Idiom,—some times extended to individuals and school in printing music, etc (5) Peculiarity, special nature Now Rare -Webster s Internation Dict Col 3 p 1067 143 डिक्शनरी आफ द इगलिश लेंगुएज पृ० 613 (1) A mode of expression peculiar to a language Peculianty of expression or Phraseology a phrase staned by ths usage of language or of a writer with the signification other than its grammatical or logical one (2) The genius or peculiar cast of a language (3) Dialect peculiar form pariety of language Imperial Dict, page 555 144 Idiom 145 146 Idiom (1) The Form of spoech peculiar of proper to a people of country, own language or toogue (b) In nanower sense , the variety of a language which is peculiar to a limited distric or class of people dialect (2) The specific character property or genius of any language the manner of expression which is natural or peculiar to it (3) A Form of expression grammatical construction, phrase cto Piculiar to a Language -Murray s New English Dict Vol V PP 20-21, 147 Idiom 1 (a) The form of Speech peculiar or proper to a people or country, own language or tongue सदर्भ सकेत • 107 (b) In narrower sense that variety of a language which is peculiar to a limited distric or class of people, dialect, 2. The specific character, property, or genius of any language, the manner of expression which is natural or peculiar to it 3 A form of expression, gaammatical construction, phrase, etc to a language, a peculiarity of phraseology approved by the usage; of a language, and often having a sigoificant other than its grammatical or logical one 4 Specific form or property, peculiar nature, peculiarity ---The Oxford English Dict , Vol V P 21. 148 Words and Idtoms, Dr L P Smith,p 167 149 भाषा-विज्ञान कोश-डॉ. भोलानाथ तिवारी, पृ० 524-525 150 हिन्दी शब्द सागर, भाग 8, मूल सम्पादक श्यामसुन्दरदास, पृ० 3986 151 हिन्दी मुहावरे--ब्रह्मस्वरूप दिनकर, भूमिका 152 अच्छी हिन्दी-क्रियाए और मुहावरे श्री राम चन्द्र वर्मा,पृ. 169-170 153 हिन्दुस्तानी, अप्रैल, 1940, पृ० 168 154 हिन्दी मुहावरे, रामनरेश त्रिपाठी, प्रस्तावना, पृ. 3-4 155 हिन्दी मुहावरे--प० रामदहिन मिश्र, पृ. 5-6 156 कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन-डॉ. रमेशचन्द्र (अ० शो० प्र०), पृ० 65 157 वही 158 मुहावरा-मीमासा-डॉ० ओम्प्रकाश गुप्त, पृ० 49 159 हिन्दी मुहावरे-डॉ० प्रतिभा अग्रवाल, पृ० 3 161 हिन्दी शब्द-सागर, आठवा भाग, मूल सम्पा० श्यामसुन्दरदास, पृ० 3986 162 मुकदमा शेरो शायरी-मौलाना हाली, पृ० 142-143 163 अच्छी हिन्दी (क्रियाए और मुहावरे)- --रामचन्द्र वर्मा, पृ० 163 164 विस्तार के लिए दे०, बोलचाल-अयोध्यासिंह उपाध्याय, मुहावरा प्रकरण- पृ०115-225 165 दे० हिन्दी गद्य-साहित्य में लोको० और मुहा०-डॉ. मदनलाल शर्मा, पृ० 168- 169 (अ० शो० प्र०) 166 विस्तार के लिए देखिए--भक्तिकालीन व्रज साहित्य मे मुहावरे-डॉ० सरोज अप्रथाल, पृ०118-141 (अशो०प्र०) 167. वही, पृ० 135 168 वही, पृ० 136 160 वही, पृ.5 108 लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेपण 169 हिन्दी शब्दानुशासन-५० किशोरीदास वाजपेयी, पृ० 227 170 गो० स्वा०-पद 23 पृ० 12, सू० सा० 1523 पृ० 573 तथा वही 62 पृ० 21 171 Certain proverbs are proverbial phrases are also so firmly embedded in our colloqual speech that they may perhaps, without stretching the definition too far, be regarded as English Idioms ---Words & Idioms, Dr. L. P. Smith, p 176 172 हिन्दी मुहावरे 2-५० रामदहिन मिश्र, पृ० 7-8 173 कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन-डॉ० रमेश चन्द्र पृ० 79 (म० शो० प्र०) 174 सूरदास-डॉ० बजेश्वर वर्मा, पृ० 483, चतुर्थ सस्करण 175 भक्तिकालीन ब्रज साहित्य मे मुहावरे--डॉ० सरोज अग्रवाल पृ० 112-113 (अ० शो० प्र०) 176 बिहारी रत्नाकर-159, कृ० र०-सेनापति-41, पच-म० श० गुप्त, पृ०51 177 सू० सा० 1923 पृ० 718 178 भोजपुरी लोकोक्तिया और मुहावरे-~~-मुक्तेश्वर तिवारी बेसुध, पृ० 60-61 179 भक्तिकालीन ब्रज साहित्य मे मुहावरे----डॉ० सरोज अग्रवाल (अशो०प्र०) पृ० 112 180. मुहावरा मीमासा-डॉ० ओम्प्रकाश गुप्त, पृ० 372 181 हिन्दी लोकोक्तिया और मुहावरे-बाबू गुलाबराय, आमुख, पृ० ख 182 हिन्दी मुहावरे-श्री ब्रह्मस्वरूप शर्मा 'दिनकर', विषय परिचय, पृ०1 183. हिन्दी मुहावरे-श्री राम नरेश त्रिपाठी, भूमिका, पृ०5 184. कहावत कोश-श्री विक्रमादित्य मिश्र 'माधव' प्रस्तावना, पृ० 185 वही, पृ० च 186 सन्त-साहित्य (भाषापरक अध्ययन)---डॉ० प्रेम नारायण शुक्त पृ० 368 187. कोरवी वाक्-पद्धति और लोकोक्ति-कोश-डॉ० कृष्ण चन्द्र शर्मा, भूमिका, पृ०12-13 --- 188 भाषा विज्ञान कोश-डॉ० भोलानाथ तिवारी, पृ० 526 189 बोलचाल-अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', पृ. 176-177 190 राजस्थानी कहावतें--डॉ० कन्हैयालाल सहल, पृ० 26-27 191. मुहावरा मीमासा-डॉ० ओम्प्रकाश गुप्ता, पृ० 370 192. भक्तिकालीन ब्रज साहित्य में मुहावरे-डॉ० सरोज अग्रवाल, पृ० 114, (म० शो०प्र०) 193. बोलचाल-भूमिका-अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिओप, पृ. 170 सदर्म-सकेत 109 194 भक्तिकालीन बज साहित्य मे मुहावरे, डॉ० सरोज अग्रवाल, प० 115, (अ० शो० प्र०) 195 कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन-डॉ.रमेशचन्द्र, पु. 79 (म० शो० प्र०) 196 साहित्यिक मुहावरा-लोकोक्ति कोश-हरिवशराय शर्मा, पृ०279 197. सू० सा० 4592, पृ० 1584 198 कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन-डॉ.रमेशचन्द्र, पृ० 83 (अशो०प्र०) 199 हिन्दी (अवधी) लोकोक्तियो का सास्कृतिक अध्ययन-डॉ० छोटे लाल द्विवेदी, पृ० 41 (अशो०प्र०) 200 राज० कहावतें-डॉ० क०ला० सहल, पृ० 26 201 भक्तिकालीन ब्रज साहित्य मे मुहावरे-डॉ० सरोज अग्रवाल पु० 115, (अ० शो० प्र०) 202 कच्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन-डॉ० रमेशचन्द्र पृ० 80 (अशो०प्र०) 203 राजस्थानी कहावतें-डॉ० क० ला० सहल, पृ० 81 204 साहित्यिक मुहा० लोको० कोश-हरिवश राय शर्मा, पृ० 10-11 205 कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन-डॉ० रमेशचन्द्र, पृ० 81 (अशो०प्र०) 206 हिन्दी (अवधी) लोकोक्तियो का सास्कृतिक अध्ययन-डॉ० छोटेलाल द्विवेदी, पृ० 41 (अशो०प्र०) 207 भक्तिकालीन ब्रज साहित्य में मुहावरे-डॉ० सरोज अग्रवाल, पृ० 116 (अ० शो० प्र०) 208 भारतीय कहावत सग्रह-सम्पा० विश्वनाथ दिनकर नरवणे, पृ०5 209 वही, पृ० 210 राजस्थानी कहावतें-डॉ० क० ला० सहल, पृ० 371 211 विस्तार के लिए देखिए--भारतीय कहावत सप्रह, विश्वनाथ दिनकर नरवणे पृ० 82-83 212 हिन्दी मुहावरे--डॉ० प्रतिभा अग्रवाल, पृ० 78, 83 तथा 136 213 सू० सा० 4270, पृ० 1486,4351, पृ० 1511 214 भारतीय कहावत सग्रह-विश्वनाथ दिनकर नरवणे, पृ. 197 215 सू० सा0 4050 पृ०1418 216 ५० सा0577पृ० 256 217 दे० सू० सा० 1798 पृ०672, 2232 पृ० 814, 2460 पृ०892, 2500 पृ. 903, 2521 पृ०910, 2526, पृ० 911, 3446 पृ० 11941 10 लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण 218 CTTO #TO 4144 0 1447, 4348 90 1510 219 हिन्दी भक्ति-साहित्य मे लोक तत्त्व-डॉ० रवीन्द्र भ्रमर, पृ० 191 220 देखिए-~-व्रजलोक साहित्य का अध्ययन-डॉ० सत्येन्द्र, विषय प्रवेश, पृ. 2 221 Folklore 18 not something far away and longage, but real and living among us --Here the past has some thing to say to the present and bookless world that likes to read about itself, concerning our basic, oral and democratic culture as the root of arts and as a sidelight on history -American Folklore (Pocket Book) p 15 द्रष्टव्य मगही लोक साहित्य-डॉ० सम्पत्ति आर्याणी, पृ० 2 222 (A) Folk-lore may be said to include all the culture of people, which has not been worked in to the difficial religion and history, but which is and always been of self growth --Psychology and Folklore by RR Maret, p 76 (B) Modera researches in to the early history of man, conducted on different lines bave converged with almost irresssıble Force on the conclusion, that all civilized races have at some period or other emerged from a state of savagery resembling more or less closely the state in which many backward races have continued to the present time; and that long after the majority of man in a community have ceased to think and act like savages, not a few traces of the old ruder modes of life and thought survive in the habits and institution of the people Such survivals are included under the head of folklore which, in the broadest sense of the word, may de said to emrbace the whole body of a people traditionary believes and customs, so far as these appear to be due to the collective action of the multitude and can not be traced to the individual of grcat men ---Frazer man and God and Immortality, p 42 (C) Myth arose in savage condition prevalant in remote ages among the whole buman race, it remains comparatively unchanged among the modern rude tribes who have de- 2 partted least from these primitive conditions, wliole' even higher and later grades of cıylization. Ratli yaddly retailag its actul principlcs, party by carrying too gita ilmetfect results in the form of ancestral tradition have continued it not merely in toleration but in honour - Tylore, Primitive Culture, Vol 1, p 283 Quoted 10 poetry and Myth Prescott, p 13 (D) Folkore means the study of survivals of early custom, belief, narrative and art An Introduction to Mytholoy by Lewis Spence, p 11 विस्तार के लिए दे० भारतीय साहित्य आगरा वि. वि. हिन्दी विद्यापीठ का प्रमुख पत्र, अक्तूबर, 1956, वर्ष 1 अक 4 पृष्ठ 1-31 223 Indeed the notion that man began with pure moral and religious ideas and a sensible language but gradully became possessed by a licentious imagination and so formed untrue and unlovely conceptions, has been quite given up, and we see instead that be began with the crudest daeams and Fancies, which were by a long, natural and (10 general) healthy growth gradually elevated and refined -Poetry and myth by Presscot p 101 द्रष्टव्य, वही पृ--2 224 द्रष्टव्य वही 225 Every tradition...Myth and story contains two perfectly independent elements the fact upon which it is founded and the interpretation of the Fact which is founders have attempted -Gomm Folklore as an Historical Science, p 10 It need to be said again that the art business has two sides to it First the subject, and second the way in which the subject is treated Famous Artists their models by Thomas Craven, P X द्रप्टथ्य, वही, पृष्ठ-3 226 मर्यो न योपामभ्येति पश्चात् । o 1/115/2 227 बज लोक-साहित्य का अध्ययन, डॉ० सत्येन्द्र, पृ०2 112 . लोकोक्ति और मुहावरा स्वरूप विश्लेषण 228 पृथिवीपुत्र-डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल, पृ० 85(लोकवार्ताशास्त्र) 229 द्र० मजलोक-साहित्य का अध्ययन-डॉ. सत्येन्द्र, पृ० 5 230 वही, पृ०8 231 लोक कला मूल्प और सदर्म-डॉ० महेन्द भानावत, भूमिका, डॉ. सत्येन्द्र, पृ० 3 332 भारतीय साहित्य-आगरा वि० वि० हिन्दी विद्यापीठ का प्रमुखपत्र, अक्टूबर 1956, वर्ष 1, अक 4, पृ० 3 233 लोक कला मूल्य और सन्दर्भ--डॉ. महेन्द्र भानावत, भूमिका, पृ० 34 234 वहीं । 235 वही। 236 सूर साहित्य में प्रयुक्त लोकोक्तियो का अध्ययन-डॉ० लक्ष्मीनारायण शर्मा, पृ० 38 (अशो० प्र०) 237 कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन--डॉ. रमेश चन्द्र पृ० 66 (अशो०प्र०) 238 राजस्थानी कहावता-प्रो० न० दा० स्वामी, १० मु०प० व्यास, अवतरणिका, पृ० 3 239 तुलसी-काव्य की लोक-तात्त्विक सरचना-~~डॉ० गया सिंह, पृ. 155 240 हरियाणा लोक-साहित्य सास्कृतिक सन्दर्म-डॉ० भीमसिंह मलिक, पृ० 76-77 241 कोरवी वाक् पद्धति और लोकोक्ति-कोश-डॉ० कृष्ण चन्द्र शर्मा, पृ० 5-6 242 सम्मेलन पत्रिका-स०प० रामप्रताप त्रिपाठी 1-भाग 59, सख्या 4, आश्विन- मार्गशीर्ष, त्रैमासिक (विविधा), पूर्वी ब्रज को वाक् पद्धतिया, पृ० 91 243 हिन्दी गद्य-साहित्य मे लोकोक्तिया और मुहावरे--डॉ० मदनलाल शर्मा पृ० अ, दो शब्द (अ० शो०प्र०) 244 सूर साहित्य में प्रयुक्त लोकोक्तियो का अध्ययन-डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा पृ० 46 (म० शो०प्र०) 245 हिन्दी (अवधी) लोकोक्तियो का सास्कृतिक अध्ययन-डॉ० छोटेलाल द्विवेदी पृ० 43 (अशो०प्र०) 246 कथ्य ब्रजभाषा मे प्रचलित मुहावरो और कहावत्तो का अध्ययन -डॉ. रमेशचन्द्र पृ० 51,53 (अशो०प्र०) 247 भोजपुरी लोकोक्तियो का अध्ययन-डा. शशि शेखर तिवारी, पृ० 74 (अशो०प्र०) 248 हरियाणा लोक-साहित्य . सास्कृतिक सन्दर्म, डॉ० भीमसिंह मलिक पृ० 85 249 हिन्दुस्तानी स० रामचन्द्र टण्डन (हिन्दुस्तानी एकेडेमी, सयुक्त प्रान्त, इलाहाबाद, अक 2, भाग 9--'भोजपुरी लोकोक्तिया'-डॉ. उदयनारायण तिवारी), - पृ० 19 250 लोकवार्ता पत्रक, लेखक श्री कृष्णानन्द गुप्त,सं० 3, पृ० ।

सदर्म-सकेत 113 251. पृथिवीपुत्र-डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, पृ० 111 252 शोध-पत्रिका-मालवी कहावतें-सम्पा० रललाल मेहता। साहित्य शोध सस्थान, राजस्थान वि०वि०, भाग 3, अक 3, चैत्र, पृ० 151, 253 कहावतो की कहानिया -डॉ. सुनीति कुमार चाटुा, पृ० 5, भूमिका 254. राजस्थानी कहावतें --डॉ० क० ला० सहल, पृ० 2 255 लोकवार्ता पत्रक,-कृष्णानन्द गुप्त स० 3, पृ० । 256 Dictionary of Bible pp. 767-768. 257. कहावत-कोश-श्री विक्रमादित्य मिथ, प्रस्तावना, (6) 258 तेलुगु और हिन्दी लोकोक्तियो का तुलनात्मक एव भाषा वैज्ञानिक अध्ययन- डॉ०के०वी०वी०एल० नरसिंह राव,पृ०6 (अशो०प्र०) 259 प्रजभारती, "कहावतो द्वारा मानव जीवन की अभिव्यक्ति।" वर्ष 3, अक 4, पृ०३ 260 राजस्थानी कहावता-प्रो० न० दा० स्वामी, १० मु०१० व्यास प्र० भा० अवतरणिका, पृ० 45 261 कन्नौजी लोक-साहित्य-डॉ० सन्तराम मनिल, अवतरणिका, पृ० 204-210 262 लेखक और कला, क्रोन्स तौन्तिन प्रे-दिन, अनु० अमृतराय, पृ० 49 दे० बालो- चना, अक्टू० 1954, 263. रमणीयायं प्रतिपादक • शब्द : काव्यम्-रसगगाधर 1/1 264 होरेस की काव्यकला, सम्पा० डॉ० महेन्द्र चतुर्वेदी, पृ. 12 265 R A Scott James : Making of Literature, p. 104. 266. तेलुगु और हिन्दी लोकोक्तियो का तुलनात्मक एव भाषा वैज्ञानिक अध्ययन-- के० वी० वी० एल० नरसिंहराव, पृ०6 (अ० शो० प्र०) 267 'राजस्थान भारतो', शीर्षक 'राजस्थानी हिन्दी शब्दकोश'-'सोट' शब्द और ----स० बदरीप्रसाद साकरिया, जुलाई, 1956, अक 3-4,१० 152 268. हहोती कहावतें--डॉ० नाथूलाल पाठक, भूमिका 269. हिन्दी गद्य साहित्य मे लोकोक्तियां और मुहावरे-डॉ० मदन लाल शर्मा, पृ० 172-173 (२० शो०प्र०), 270. सन्त साहित्य-(भाषापरक अध्ययन)-डॉ० प्रेम नारामण सुक्ल, पृ० 368 271 हिन्दी मुहावरा कोश-सरहिन्दी, प्रस्तावना 272. हिन्दी मुहावरे-~-१० रामदहिन मिश्र, भूमिका, पृ. 15 273 कथ्य प्रजभाषा मे प्रचलित कहावतो और मुहावरो का अध्ययन --डॉ. रमेश चन्द्र पृ० 74 (अ० शो० प्र०) 274 भारतीय कहापत सग्रह-सम्पा० विश्वनाथ दिनकर नरवणे, भूमिका, पृ० 3-4 उसके मुहावरे'-

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संदर्भ संकेत 1. 'सस्कृत लोकोक्ति संग्रह' --पं० धरणीधर वाजपेयी, पं० बालकृष्ण भट्ट, पुरोवान् । 2. (क) सूर साहित्य मे प्रयुक्त लोकोक्तियों का अध्ययन-डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा (अ० शो० प्र०) प्रपम अध्याय (अ) लोकोक्ति-निरूपण, पृ० १ (ख) भ्वा० लोक 76 दर्शने । लुलोके । लोक अलुलोकदिति ।-सिद्धान्त कौमुदी -भट्टोजि दीक्षित, पृ० 87 तथा पृ० 348, पृ० 343 (ग) लोक दीप्तौ चु० उभ० सक० सेट् । लोकयति ते अलूलुकत् (त)। लोक दर्शने भ्वा० आ० सक० सेट् । लोकते अलोकिष्ट लुत्तोके । ऋदित् चडि च ह्रस्वः। अलुलोकत् (त) । लोक पु० लोक्यतेऽसो लोक-घन ।वाचस्पत्यम् भाग पष्ठ, पृ048331 3. हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास, पोडश भाग, प्रस्तावना, पृ. 1 4. (क) उक्ति स्त्री व भावे क्तिन् । कयने । "अति सक्षिप्त चिरन्तनोक्तिभिः"-मुक्तावली। "उक्तिप्रत्युक्तिरूपं वाको वाक्यम्"--छा०भा० । "व्याहार उक्तिर्लपितं भाषितं वचनं वचः" इत्यमर तथा शब्दशक्ती च" एकयोक्ता पुष्पवन्तौ दिवाकरनिशाकरौ-अमर० -वाचस्पत्यम् भाग द्वितीय, पृ. 1050 5. हिन्दी साहित्य कोश (भाग 1)--सम्पा० धीरेन्द्र वर्मा, पृ0 747 6. (क) जगती लोकोविष्टपं भुवनं जगत् । लोकोऽय भारतवर्षम् । अमरकोष 2/1/6 अधो भुवनपातालं बलिसद्म रसातलम् । नागलोकोऽय" वही 1/8/1 लोकस्तु भुवने जने-वही 31312 'भुवनार्थक लोक शब्दस्य गरुड पुराणे सप्तभेदा उक्तास्तथाहिं'-सप्तलोकाः प्रकीर्तिताः-भूर्लोकं नाभिमध्ये तु भुवोकं तदूवंके । स्वर्लोकं हृदये विद्या- स्कण्ठदेशे महस्तथा। जनलोकं वक्त्रदेशे तपोलोक ललाटके। सत्य लोक ब्रह्मरन्ध्र-इति गरुड पुराणे 115157-59 1 भूर्भवः स्वभेदेन अय एवं लोका इत्यपि परे। वही--अमरकोष परिशिष्टम् । (ख) भूर्भुवः स्वमहश्चैव जनश्च तप एव च । सत्यलोकश्च सप्ततते लोकास्तु... परिकोर्तिता । इत्यग्निपुराणम् । अपि च-भूलोको भुवः स्वलॊकस्त्रलोक- 98 : लोकोक्ति और मुहावरा : स्वरूप विश्लेषण मिदमुच्यते । महर्जनस्तप सत्यः सप्तलोकाः प्रकीर्तिता.॥ -शब्द कल्पद्रुमः-चतुर्थ काण्डम्, पृ० 231 7. हिन्दी शब्द सागर, मूल सपा० श्यामसुन्दर दास, भाग 8, पृ० 4318 8. ऋ० 10/90/14 9 हिन्दी शब्द सागर, मूल सम्पा० श्यामसुन्दरदास, भाग 8, पृ० 4318 10. अशोक का शिलालेख, पृ० 174(14) गिरिनार मे। 11. Folklore includes folk are, folk crafts, folk tools, folk custom, folk custume, folk belief, folk medicine, folk recipes, folk music, folk dance, folk games, folk gestures and folk speech, as well as those verbal forms of expression which have been called folk literature but which are better described as verbal art Verbal art, which includes, such forms as folk tales, legends, myths, proverbs, riddles, and poetry, has been the primary concern of folk-lorists from both tbe humanities and the social sciences since the beginning of folklore as a field of study, and it is with this principal segment of folklore that this article of concerned. European interest in folklore goes back at least to the sixteenth century and the age of exploration, but the modern study of folklore is generally considered to date from the early years of the nineteenth century, when the Grimm brothers began collecting german folktales in the field. The Folklore was first introduced in English in 1846 by William Jobn Thoms, who urged that accounts of "manners, customs, observances, super. stitions, bellads, proverbs, &c, of the olden time." be recorded in Britain for future study and for comparison with the materials which were bemg recorded in Germany by the Grimm brothers rand other scholars." International Ency. of Social Science, Vol. 5, pp 496-497. 12. एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, भाग १, पृ. 444 13 हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास, पोडश भाग, प्रस्तावना, १०१ 14. जनपद त्रैमासिक, अंक 1, पृ. 66 15. सम्मेलन मासिक, लोक सस्कृति विरोपाक, पृ० 65 16. लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेपा यतो। दग्धाना क्लि पह्निना हितकर सेयोऽपि तस्योद्भवः । -दे० रास्त लोकोनि रामह-प० घ०३० वाजपेयी, १० पा. १० भट्ट, भूमिका।

शुद्धि-पत्र पृष्ठ पंक्ति 18 9,10 21 22 22 22 22 25 20 5 11 12 19 4 28 27 29 पक अशुद्ध शुद्ध इस प्रकार पढ़ें-नाभ्या आसीदन्तरिक्ष शीर्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्या भूमिर्दिश: श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन् ।। ordspark ordsprak पुरपस्य पुरुषस्य वत वत जीवन्त मानन्दो जीवन्तमानन्दो पिण्डमुत्सज्य पिण्डमुत्सृज्य इसकी इस सारगर्भिता सारगभितता ग्रामीण क्षेत्र से इतर- -यहां 'प्रश्न' शब्द न पढ़ें। को के इस प्रकार पढ़ें-'सूच्यनं नव दास्यामि विना युद्धेन केशव ।' पंक फूलैफलंडारि मक्षिप्तादि संक्षिप्ततादि क्षणकमात्र इस प्रकार पढ़ें-'वराटकान्वेषणे प्रवृत्तश्चितामणि लब्धवान् । धमेनाग्निरिवावृताः धूमेनाग्निरिवावृताः आभाणक 'कथावत 'कथावत्' सीलयित्वा मीलयित्वा यत्त पोटामतोक्ति मत्त पोटा मत्तोक्ति छायामिच्छन्ति छायामिच्छन्ति उपदेशात्मक उपदेशात्मकता 10 35 32 5 30 14,16 17,18 21 32 35 36 37 41 42 46 46 46 47 49 51 51 52 53 फूलडारि क्षणेक मात्र 3 आमाणक 21 33 4 9 ES पवित अशुद्ध नैतिकता व्यावहारिकता ईदृश आदि कुछ आदि ये कुछ गुण के अभाव गुण अभाव दूसपा 9 13 16 26 6 3 24 23 10 4 8 पृष्ठ 54 57 62 62 64 68 70 73 74 75 75 76 78 78 78 78 79 79 81 89 101 104 106 106 दूसरा गह्मो गहो फरि फेरि प्रदशित प्रदर्शन पामरा पामरो शब्दो न्यूनाधिक्य शब्दो का न्यूनाधिक्य नाचे नाच जिव्हा जिह्वा Frasilty Frailty Wether Wetter da boa da ba boa EL melon, concer EL Melon, conocer .."पुरुषस्य भाग्य देवो न जानाति, तो मनुष्य । चंद यद अविग्याम विश्वाम यदि हास्तितदन्यत्र यदिहास्ति तदन्यत्र 8 21 22 25 इस प्रकार पढ़ें- 27 9 27 पृष्ठ 136 पृष्ठ 137 भन्यते 25 पृ. 713 पृष्ठ 613 12 20 मदर्भ मख्या 144. Idiom यो पस्तिस013 में सदर्भ प्रारम्भ में परें। पदम माग 145-146 रेस्पा पर 1454। गदर्भ माया 147-164 प्रमाणुमार 146-163 पर। 106 21 106,107- 107 27 108 108 31 112 34 पृष्ट 163 पृष्ठ पृष्ठ 173 पष्ट53 riमोसार गुप्ता ri. ओस्त्र पुन पृष्ठ 19 पट16

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Lokokti Aur Muhavara

Author
Swaroop Vishleshan
Title
Lokokti Aur Muhavara
File name
Lokokti Aur Muhavara
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Lok Prakashan New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
122
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551158
Barcode
4990010031927.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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