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Dhavni Sidhant Aur Vayanjana Vrati Vivechan

Upadyay,dr.gaya Prasad · 2011/01

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ध्वनि-सिद्धान्त और व्यंजनावृi
; विवेचन :
[प्रागरा विश्वविद्यालय से स्वीकृत शोध प्रत्य का अश ]
लेखक
डा० गयाप्रसाद उपाध्याय शास्त्री,
एम० ए०, पी-एच. ०
र मध्यक्ष, हिंदी विभाग
एस० भार० के० कलिज, फिरोजाबाद, भागरा
प्रकाशक
सरस्वती पुस्तक सदन
मोती कटरा, मागरा-३

0 प्रकाशक
प्रतापच द जैस्वाल
@ सचालक
।
सरस्वती पुस्तक सदन, मोतीकटरा, भागरा-३
.
० प्रथम सस्करण
१००० प्रतियां, १९७०
० मधिति विनता
पुस्तक वित्री केद्र,
९/१४६ मोतीक्टरा-३
प. पूमगार पारार
पाराशर प्रिटिंग प्रेस प्रतिमा प्रागरा-1

समर्पण
प्रत्यूपा जननी तथा
पिता रेयतीराम ।
सुकृति देखि निज पुत्र को हो प्रफुल्ल सुर-धाम ॥
-गयाप्रसाद

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विषय-सूची प्रथम अध्याय १-रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का विकास ध्वनि का प्रय, प्रादवधन के पूर्व ध्वनि की स्थिति, भामह के काव्यालकार में ध्वनि सक्त, दण्डी का काव्यादा, वामन का ध्वनि विकास में योगदान, उभट और अवगमन व्यापार, रद्रट के काव्याल कार में ध्वनि, अग्निपुराण और ध्वनि, मानदवघन और उनका, घनि सिद्धात, प्राचाय राजशेखर और उनका काकु यग्य । २--ध्वनि सिद्धात का विरोध ध्व यालोक की चद्रिका टीका, प्राचार्य प्रतिहारे राज भट्टनायक, धनजय पौर धनिक का ध्वनि विरोध, कुता की ध्वनि उपेक्षा, महिम भट्ट का ध्वनि विरोध । ३०-४२ ३-ध्वनि समयन और प्रतिष्ठा भाचाय मभिनव और ध्वनि, रुय्यक द्वारा महिम भट्ट का उत्तर, मम्मट द्वारा ध्वनि शास्त्र निर्माण, विश्वनाथ का ध्वनि प्रतिष्ठा म योग, ध्वनि सिद्धात का विकास और पण्डितराज । द्वितीय अध्याय १-ध्वनि सिद्धान्त-निरूपण ध्वनि के विभिन्न प्रथ, वाच्याथ और प्रतीयमान की भिन्नता, मभिधावादी मीमासकों के सम्प्रदाय, व्यजना से दोषों की नित्यानित्य व्यवस्था, अभिधा और ध्यजना कामतर। लदाणा और ध्यजना का प्रतर, मुकुलमट्ट का ध्वनि का लक्षणा मे अतर्भाव फरने का प्रयत्न, अनुमान पोर व्यजना, अखडसुद्धिवादी मोर व्यजना, व्याकरण शास्त्र मर्यापत्ति और व्यजना, शाब्दी व्यजना और प्रकरण, प्रार्थी यजना, वाच्य समवा व्यजना, लक्ष्य समवाठ यजना, व्यग्य सभवा व्यजना, मथ व्यजक्ता के हेतु, यग्याप और उसके भेद, शाब्दी व्यजना पौर विविध व्यग्यार्थ, ध्वनिकाव्य के भेद श्लेप और शब शक्तिमूल ध्वनि का अन्तर पृ० ११० तक, मम्मट पोर शाद शत्ति मूल वस्तु ध्वनि, पडितराज और राद शक्तिमूल वस्तुध्वनि प्रत्ययदीक्षित और शब्द शक्तिमूल वस्तु ध्वनि । तृतीय अध्याय ध्वनि का व्यावहारिक परिचय १-व्यजना वृत्ति ११०-१४४ २--ध्वनि काव्य मविवक्षित वाच्य ध्वनि, विवक्षितवाच्य ध्वनि, असलम्पनय व्यग्य, सलक्ष्य क्रम व्यग्य, विविध प्रथ को मा यता, सलक्ष्याम के भेद और उदाहरण । ३--गुणीभूत व्याय १६३-१८० मोर उदाहरण, अपराग विवेचन, याव्य सिद्धयग प्रस्फुट, सदिग्ध प्राधा य, तुल्यप्रापाय, याक्वाक्षिप्त और मसुदर।

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- विषय-सूची प्रथम अध्याय १-रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का विकास पृष्ठ ध्वनि का अप, भादवधन के पूर्व ध्वनि की स्थिति, मामह के काव्यालकार मे ध्वनि सकेत, दण्डी का काव्यादा, वामन वा ध्वनि विकास में योगदान, उदभट पौर प्रवगमन व्यापार, रद्रट के कायालवार में ध्वनि, अग्निपुराए और ध्वनि, मान दवधन और उनका, ध्वनि सिद्धान्त, प्राचार्य राजशेखर और उनका काकुभ्यग्य । २-ध्वनि-मिद्धात का विरोध ध्व यालोक की चन्द्रिका टोका, प्राचाय प्रतिहारेद्र राज भट्टनायक, धनजय और पनि का ध्वनि विरोध, कुता की ध्वनि उपेक्षा, महिम भट्ट का ध्वनि विरोध । ३०-४२ ३-ध्वनि-समथन और प्रतिष्ठा माधाय भभिनव पोर ध्वनि, रुय्यक द्वारा महिम भट्ट का उत्तर, मम्मट दारा ध्वनि शास्त्र निर्माण, विश्वनाथ का ध्वनि प्रतिष्ठा में योग, ध्वनि सिद्धात का विकास मोर पण्डितराज । द्वितीय अध्याय १-ध्वनि सिद्धात निरूपण ध्वनि के विभिन्न मथ, वाच्याथ और प्रतीयमान की भिन्नता, अभिधावादी भीमामकों के सम्प्रदाय, व्यजना से दोपो की नित्यानित्य व्यवस्था, अमिधा पौर प्यजनाका प्रतर। साणा और व्यजना का मतर, मुकुलभट्ट का ध्वनि का लक्षणा मे अतर्भाव करने का प्रयत्न, भनुमान मोर व्यजना, अखडबुद्धिवादी पोर व्यजना, व्याकरण पास्त्र पर्यापत्ति और व्यजना, शाब्दी व्यजना और प्रकरण, प्रार्थीन्यजना, वाच्य समया व्यजना, लक्ष्य समवा० यजना, म्यग्य समवा व्यजना, मथ व्यजक्ता वे हेतु व्यग्याय और उसके भेद, शाब्दी व्यजना और विविध व्यग्यार्थ, ध्वनियाव्य के भेद इलेप और पर शक्तिमूल ध्वनि वा मन्तर पृ० ११० तक, मम्मट पोर शब्द शक्ति पूल वस्तु घ्वनि, पडितराज और शब्द शक्तिमूल वस्तुध्वनि अप्पयतीक्षित मौर दाब्द शक्तिमूल वस्तु ध्वनि । ५०-१९६ तृतीय अध्याय ध्वनि का व्यावहारिक परिचय -व्यजना वृत्ति ११०-१४४ २-प्वनि काव्य प्रविवक्षित वाच्य ध्वनि, विवक्षितवाच्य ध्वनि, मसलक्ष्यमय व्यग्य, सलक्ष्य १४५-१६२ प्रम म्पग्य, विविध प्रप की मा यता, सलक्ष्यनम भेद और उदाहरण । ३-गुणोमूत ध्याय भगृह मोर उदाहरण, मपरांग विवचन, काव्य मिद्धयग मस्फुट, सदिग्ध १६३-100 प्राधा य, तुल्यमापाय, काववाभिप्त मौर समुदर। १ - लेखक की ओर से प्रस्तुत प्रथ मरे शोध प्रबध 'ध्वनि सिक्षात तथा हिनी के प्रमुख रीतिकालीन माचाय मे समाविष्ट प्वनि के सिद्धात-पक्ष का समह है। उल्लिखित शोध प्ररघ मागरा विश्वविद्यालय की भोर से सन् १९६४ मे पी एच० डी० को उपाधि के लिए स्वीकृत हुपा था। स्वीकृत शोध प्रबाघ के दो भाग ये ध्वनि या मिद्धात पक्ष पौर रीतिकालीन माघार्यों द्वारा विवेचित ध्वनि एव उनो उगहरणो की समीक्षा । जिन रीतिकालीन प्राचार्यों के रीति प्रथों के ध्वनि भाग को विवेचना शोध प्रब घ का मुख्य विषय थी उनके नाम ये हैं (१) चितामणि, (२) कुलपति (३) देव (४) कुमारमणि, (५) श्रीपति, (६) सोमनाथ, (७) मिपारीदास, (4) हरिचरणदास, (९) रतन कवि, (१०) जनराज, (११) जगतसिंह, (१२) प्रतापसिंह । इनके अतिरिक्त श्रीधरान द, धनीराम पौर लछिराम का सक्षिप्त सल्लेस परिशिष्ट मे दिया गया है। इनमें प्राचाय हरिचरणदास तो ऐसे भाचाय हैं जिनके नाम मोर कृतियो को हिदी ससार पूणरूपेण मुला चुका था। सम्पूण सोप प्रबध का कलवर बडा और रीतिकालीन भावार्यों के मालोचना सिद्धातो के प्रति हिन्दी जगत की उपेक्षा होने के कारण प्रकाशक ने सिद्धात पक्ष को ही प्रकाशित करने का निणय किया। सम्पूण प्रबध के प्रकाशित होने की सम्भावना अभी भी भविष्य का प्रसग है । 'ध्वनि सिद्धात सस्कृत पालोचना शास्त्र का प्रत्यन्त प्रौढ़ सिद्धा त है। अपने उदभव के दिन से माजतक सवग्राही काव्य सिद्धात बना हुमा है । समय समय पर माविभूत होने वारो रस सिद्धात, कार सिद्धान रीति सिद्धात बमोति सिद्धा त और मौचित्य सिद्धा त को इसने इस प्रकार प्रात्ममा कर लिया कि सभी सिद्धातो का एव काय सिद्धा त म राम वय हो गया और उनकी अपनी अपनी विशेषतायें और काव्य स्थितियां भी यथावत् बनी रही। जिसका भूत इतना महान है उसका भविष्य भी कम उज्वल नहीं है । वहुत सम्भव है, भविष्य मे भय भाषामो मे भी इम सिद्धा त को पहुँच हो जाय । जो काय सिद्धात इतमा महान मोर प्रोड है वह तो हिदी द्वारा स्वीकरणीय है ही। फलत प्रकाशक भाई प्रतापचद जसवाल ने प्रबघ में विवीण इसके सिद्धान्त पक्ष का स ग्रह प्रकाशित करने का प्रयत्न उचित ही है । शोध प्रब घ की रूप रेखा विश्वविद्यालय भेजने के पूर्व ही इस विषय के सिद्धात पक्ष से सम्बद्ध एक शोध प्रब घ 'ध्वनि सम्प्रदाय और उसके सिद्धात लेखक डा. भोलाश कर “यास, एम० ए०, पी एच० डी०, डी. लिट प्रवक्ता काशी हिदू विश्वविद्यालय, छप चुका था। जितु दोनो प्रबधो मे निम्न मौलिक विशेपतायें हैं १- उपयुक्त प्रबध मे ध्वनि सिद्धात' के अन्तगत श द शक्तिया का ही विवेचन है । वही प्रवध का प्रमुख विषय है। इस प्रबध के प्रथम अध्याय म ध्वनि का पूर्व रीतिकालीन विकास भी - सनिविष्ट है जिससे 'ध्वनि' के ऐतिहासिक विकास पर प्रकाश पडता है । यह 'ध्वनि विकास क्रम भी चार भागो मे विभक्त है। १-पूर्व ध्वनिवात के मलकार विवेचन मे व्यग्याथ की स्थिति, २-ध्वनि सिद्धात का स्वरूप मोर उसके भद, ३-उसका विरोध और ४-~-ध्वनि का समथन और उसकी प्रतिष्ठा । यह इस सग्रह को उपयुक्त प्रब ध से पहली विशेषता है। २-० “यास के शोध प्रबध मे यद्यपि व्यजना का विवेचन प्रमुख है, परन्तु उसमे प्रय शब्द भक्तियो का विवेचन भी स्वत भ रूप से हुआ हैं । इसके दूसरी मोर, इस प्रथ में ध्वयालोक की भांति केवल व्यजना शक्ति का ही निरूपण है, अय शब्द शक्तियों का नामोल्लेख तो प्रासगिक ३-~दोनो प्रबधों मे प्रतिपादन को थोडी समानता होने पर भी कई सद्धातिर विभिनतायें हैं । सक्षेप मे वे ये हैं उपयुक्त प्रवघ मे मम्मट के अनुसार लक्षणा के पद गत भेद हो स्वीकृत हैं, परतु इस प्राय मे विश्वनाथ की भांति पदगत और काव्यगत दोना भेद । डा० ध्यास ने अभिनव और मम्मट के अनुसार अभिघामूला शाब्दी व्यजना के अप्राकरणिक प्रथ की प्रतीति व्यजना से मानी है लेकिन इसमे दोनो अर्थों की प्रतीति श्लेप की भाति दो अभिधानो से मानी गई है। अर्थात् अभिघामूला शाब्दी व्यजना प्रसग में होने वाली अलकार प्रतिभा व्यजना से होती है। यह भायता प्रानद वधन की है। इस प्रबध मे शब्न शक्तिमूल वस्तुध्वनि को व यालोक कार में अनुसार मा यता दी गई है जबकि उसमै मम्मट के मत को समथन मिला है। 'स्वनि सम्प्रदाय और उसके सिद्धात मे काम्य विभाजन मम्मट के आधार पर किया गया है जबकि इस अथ में रस गगाधरकार जगन्नाथ के भाधार पर। इनके अतिरिक्त दो एक स्थल और हैं जहाँ दोनो प्रब घी मे सैद्धातिक मतभेद उपलब्ध होगा। ये सातिक मतभेद दोनो प्रथो की मौलिक भिन्नता है। जसा कि ऊपर लिखा जा चुका है यह न थ उल्लिखित शोध प्रबध के सैद्धान्तिक पक्ष का सग्रह है। फिर भी सद्धातिक पक्ष यावहारिक पक्ष के प्रभाव में अधिक लाभकर सिद्ध न होता इसलिए इसमें ध्वनि' के व्यावहारिक पक्ष भी सक्षिप्त कर जोड दिया गया है। इस प्रकार पूरा अथ तीन मध्याया में विभक्त है (१) ध्वनि का ऐतिहातिक विकास अम (२) व्वनि सिद्धात और उसके भेद (३) ध्वनि का व्यावहारिक परिचय । ध्वनि के व्यावहारिक परिचय पे पुन तीन भाग कर दिये गये हैं व्यजना वृत्ति और उसके उदाहरण (२) ध्वनि-काव्य और उसके भेदोपभेद सोदाहरण तथा गुणीभूत व्यग्य का सोदाहरण विवेचन । मावश्यक उदाहरणो का समह रीतिकाल के प्राचार्यों से किया गया है। उदाहरण चयन मधुकरी वृत्ति से औचित्य और सगति के माधार विषय की गम्भीरता के कारण प्रवध को प्रस्तुत करने मे मधिक समय लगा। संस्कृत काम्यशास्त्र के मौलिक मयों से जूझ जूझ कर उनके मम तक पहुँचने का कार्य, समय की अपेक्षा रखता है। सस्कृत के अधिकारी विद्वानो मे एक अद्भुत प्रवृत्ति के दशन होते हैं। वे अपने ही अन्तेवासियो को भपना ज्ञान-कोप सुलभ करते हैं, भयो को पान सागर की गहराई नापने का इच्छुक मानकर शास्त्राय को सलकार देत हैं और फिर 'मघवामूल विद्वौजा टीका' जो सूत्रपात होता है उसमे खो जाने के भय से सरल जिज्ञासु को भागना पड़ता है । लेखक को काशी, खुरजा और जयपुर मे ऐसे हो भवसर प्रामे हैं । इसलिए प्रथ स्थलो पर अकेले ही जूमना पड़ा है ।

कनेश फलेन पुननवता विधत्त' वाले कथन पर ध्यान दार माज इस बात को प्रसन्नता है कि भततोगत्वा विषय से सम्बद्ध कई ग्रा ययाँ सुलझो और 'ध्वनि सिद्धात' की मध परम्परा पुन एक नवीन शास्त्रीय मोड पर उपस्थित हुमा है । हमारा विश्वास है कि इस रूप में यह प्रय हिदी के उन पाठको को जो सस्कृत के वायशास्त्र सागर के मतल से रत्न पाने के इच्छुा हैं बहुत दूर तक सहायक सिद्ध होगा। सस्थत काव्य शास्त्र की रत्नाकरता हमागे शपथो से सिद्ध करने का विषय नहीं है। प्रय के सुधी पाठको से निवेदा है कि वे अपनी विप्रतिपत्तिया से अवश्य सूचित करें। यदि यह अथ किसी की जिज्ञासा को गात कर सका, किसो को जिनासा मे वृद्धि कर सका, किसी की विप्रतिपत्ति जाग्रत कर सका तो लेखा अपने श्रम को सफल समभेगा। प्रब घ का विषय गम्भीर है और सामग्री कष्ट लक्ष्य । इसम मनेक व्यक्तियो ने अपने रूप मे सहायता पहुँचाई है। लेखक उन सभी का हृदय से प्रामारी है। विशेषता थोकृष्ण किशोर द्विवेदी टीकमगढ़, स्वर्गीय प्रजकिशोर मिश्र लखनऊ श्री ब्रजमोहन जावलिया, सरस्वती भवन, पुस्तकालय उदयपुर, श्री कृष्णचन्द्र शास्त्री, हिदी विद्यापीठ, उदयपुर, डा० मुनिकात सागर, उदयपुर, डा० मापार याज्ञिक, लखनऊ, श्री सुधाकर पाण्डेय, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, मादि के सहज और स्नेह सिक्त सहयोग के लिए हानिक कृतमता प्रस्ट करने के पश्चात भी हृदय उनके साभार से उऋण नहीं होता। डा० सरयूप्रसाद मप्रवाल, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ जिस विश्वास और धय के साथ प्रबध का पथ प्रदशन किया है उसको प्रकट करने मे श- मोछे पड़ते हैं । डाक्टर साहब के सौहाद एव सौजय के प्रति मैं कृतनता नापन करने में असमय है। परतु इसके अतिरिक्त मुझ मकिचन के पास कुछ है भी तो नहीं। इसको प्रस्तुत करने में मरे मित्रों का भी कम सहयोग नहीं है। कुछ के मीठे खट्ठ उपालम्भ काय करने में मुझे सतत प्रणोदिन करते रहे हैं । उन सभी के नामो का मानसिक स्मरण कर उनके प्रति भी अपनी हानिक कृतनता नापन करना मैं अपना पवित्र त य समझता हूँ। इस प्रबध को इस रूप मे प्रकाशित करने का श्रेय भाई प्रतापच द्र जसवाल यो है। उनके सहयोग के बिना यह सिद्धात पक्ष सग्रह भी कदाचित सुधीर पाठको के घर कमला म न पहुँच पाता, मत उनके प्रति प्रामार प्रदशन मरा कर्तय है। -गयाप्रसाद उपाध्याय

FEHEEEEEEEEEEEEEEFHEEEEEEEEEE
प्रथम अध्याय
रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास
Baa

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काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति समाम्नातपूव -ध्वयालोक ध्वनि के विभिन्न अयं-'ध्वनि का साधारण अथ शब्द अथवा मावाज है । ससार मे यह सयोग और विभाग दो कारणों से उत्पन होकर कर्णेद्रिय द्वारा ग्रहण किया जाता है। भर्तृहरि ने इस प्रकार के शव को शदज माना है।' शज शट का प्रत्यक्ष अनुभव घटानुरणन मे होता है। घटे के बज चुक्ने के पश्चात भी उसमें एक प्रकार की झकार होती रहती है । यही शादज शद का स्वरूप होता है । इमो अनुरणन की भाति ही महृदय को वाच्याथ के पश्चात् व्यग्याथ को प्रतीति होती है इसलिये व्यग्याथ को भी 'ध्वनि' नाम से अभिहित किया गया है। लोकिक 'वनि' दो प्रकार की होती है-प्राकृत और वैकृत । प्राकृत ध्वनि को ही अक्षर कहते हैं । यही प्राकृत ध्वनि भिन्न व्यक्तियो, शुक आदि पक्षियों द्वारा अस्वाभाविक रूप मे उच्चरित होपर भिन्न भिन प्रकार की जान पडती है । यही वकृत ध्वनि है । वकृत ध्वनि के भेद होते हुये भी प्राकृत ध्वनियों म भेद नहीं होता है। जिस प्रकार अनेक बंधुत ध्वनियो से एक ही प्राकृत ध्वनि का बोध होता है उसी प्रकार वयाकरणो के अनुसार प्राकृत ध्वनियो से एक एव प्रखड स्फोट का बोध होता है । ये अत्यबुद्धिनिग्राह्य प्राकृत ध्वनिया स्फोट की व्यजक मानी जाती हैं । इस आधार पर भी का यशास्त्री व्यग्याथ के व्यजक शद और अथ को 'ध्वनि नाम देते हैं । कभी कभी एक ही पद दो व्यक्तियो द्वारा उच्चरित होता है । यही शब्द गुक, सारिका पक्षियों के द्वारा भी उच्चरित होता है । इन सभी दशाओ में शद की प्राकृत ध्वनियां अपरिवर्तित रहती हैं । दानो व्यक्तियो मे से एक तुतलावर बोलता है और दूसरा बहुत शीघ्र बोलता है। इस लिये तुतलाने वाला व्यक्ति शब्द का उच्चारण देर से करता है और शोघ्र भापी उसी शब्द या उच्चारण शीघ्र करता है । पक्षी उही प्राकृत ध्वनियो का उच्चारण अस्पष्ट रूप से करते हैं । एक अर बीमार व्यक्ति बहुत मद ध्वनि से उच्चारण करता है । इन स्थितियो म यह भी सभावना है frकृत धनिया की प्रसष्टता, और माद-स्वरता के कारण प्राकृत शद का बोध ही न हो। पर तु यदि प्राकृत शर का बोध होगा तो पूण और स्फुट बोध होगा।' वयाकरण उच्चारण की इस प्रक्रिया को भी 'ध्वनि सज्ञा प्रदान करते हैं। इसी आधार पर ध्वनिवादियो द्वारा प्रसिद्ध उच्चारण अभिषेयाति से अधिक भय का प्रत्यायन कराने वाली वृत्तिको भी 'ध्वनि' सज्ञा प्रदान की १ य सयोगवियोगाम्या करणरूपजयते । स स्फोट शदजा शदा बनयो ऽयरुदाहृता ॥ लोचन पृ० ५५ २ तेन यजको शब्दार्थवपोह ध्वनिशब्देनोक्तो । - लोचन, पृ० ५५ ३ अल्पायसाठि यत्नेन पान्दमुच्चारित मति । यदिवानव गृहणाति वण वा सकल स्फुटम् ॥ -भतु हरि, लोचन, पृ०५६ ४ ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन जाती है इस प्रकार ध्वनि के कई अथ क्यि जाते हैं । काठप में व्यायाथ का स्थान जो वयथ बुद्धिप्रदेश में अनुस्वानरूप से उत्पन्न होता है वह कविकृत काय से ही जागृत होता है। वह कवि के मानस की ही तरह है जो शदता के सूत्रों के सहारे पाठक के मानस म झूलती है । 'अपारे काव्यससारे कविरेव प्रजापति -कवि ही प्रजापति की भांति स्वसृष्ट का य-विश्व को मनोवांछित रूप देता है । ववि के भावा मोर विचारो को सम्प्रेषणीय बनाने में काव्य माध्यम का काम देता है । फलत वह ध्वयय काय के वियास मे हा समाहित रहता है । जिस प्रकार क्सिी मदनाविष्ट रमणी के सुदर अवयवा स लावण्य पूरता हुआ प्रतीत होता है उसी प्रकार यह व्यग्य अथ भी काव्य से व्यक्त होता है । परतु जिस प्रकार अगनागलावण्य उसके शरीर अवयवा मे समाहित रहता हुमा भा उनस निता न भिन है उसी प्रकार यह भी काव्य के प्रसिद्ध प्रगा से भल पता हुमा भी अश्य ही पताथ है ।२ माथ ही जिस प्रकार अगना लावण्य अवयवो से ही व्यक्त होता है, अवयव ही उस लावण्य की प्रताति के साधन हैं उसी प्रकार काव्य ही ध्वयप का साधन है । इस आधार पर वाव्य को भी ध्वनि सज्ञा प्रदान की जाती है।' यह व्यग्य अथ ही काय की आत्मा है । का यगत रामस्त चमत्कार इसी से सम्बन्धित हैं । इस अथ की अपेक्षा काध्य के शाथ गौण हैं । यह भी तो रस स्वरूप होता है और कभी वस्तु एव अलकार स्वरूप । रस रूप मे यर ध्वनि को प्रात्मा माना जाता है। रस चित्तवृत्ति रूप है और वस्तु और प्रकार बौखिक ज्ञान रूप । चित्वृति विसी स्थिति म वाच्य नहीं हो सकती है। जब साधारण सुख दुप्प वाम नहीं होते तो चितवति का वाच्यत्व तो सर्वथा बहुत दूर है। यह ही काय का चरम लावण्य है। इस का य लावण्य की ओर कायनास्त्रियो को दष्टि तो गई परतु सिद्धात रूप मे उसका सम्यक विवेचन प्रान दवधन से पूर्व न हो सका। मानदवधन के पूर्व ध्वनि की स्थिति पान दवधन ने ही सव प्रथम काय शास्त्र में ध्वनि सिद्धात की प्रतिष्ठा की। उसके। पूर्व वर्ती काल म काव्य शास्त्रीय सिद्धाता पर विचार विमा अवश्य हुमा और रस, अलकार, रीति प्रादि सिद्धात भी अवतरित हुये । वयालोक में ध्वनि की पूवस्थिति एव अनुपस्थिति दोनो का . १ ता तावत्स्वेवध यमाणपु वक्त यौँ यो द्रतिविलम्बादिवृतिभेदारमा प्रसिद्धा दुच्चारण यापारादम्यधिक स ध्वनिरुक्त । यदाह स एव श दस्यौध्वमभिव्यक्त व तिभेदे तु वकृता ध्वनय समुपोहयन्ते, स्फोटात्मा तन भिद्यन्ते । लोचन पृ०५६ २ प्रीतीयमान पुनर यदेव वस्त्वस्ति वाणीपु महाक्वीनाम । यत् तत प्रसिद्धावयवातिरिक्त विभाति लावण्य मिवागनासु ॥ ध्व० १४ ३ व्यक्त का विरोप स ध्वनिराित सूरिभि कथित [ध्व. ११३ ४ ध्व०,१-१३ ५ वही, २-२ रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास ५ उल्लेख है । प्रथम कारिका की धृत्ति मे उहोने स्वीकार किया कि काव्य ममज्ञो ने काव्य के प्रारम- भूत तत्व को ध्वनि नाम दिया है और परम्परा से बार-बार प्रकाशित किया है ।' शब्द और अर्थ को सहकारिता से व्यक्त इस अथ से सम्पन काव्य को काव्यतत्वाथदर्शी विद्वानो ने ध्वनि वहा है। उक्त प्राशय को स्पष्ट करने के लिये ध्वयालोककार ने भूतकालिक क्रिया का प्रयोग किया है। इससे स्पष्ट है कि ध्वनि पूर्ववर्तीकाल मे काव्यशास्त्री उस चमत्कार तक पहुच चुके थे, जिसको ध्वयालोक मे ध्वनि नाम प्रदान किया गया है । पर तु इसी प्रय म पारिका एव वृति दोनो में यह भी प्रमदिग्ध पदा मे उल्लेख है कि ध्वनि पूर्वकाल मे न तो लक्षणकारा को इस मिद्धा त का पता था, न इसकी प्रसिद्धि हो थी और न उनको सूक्ष्म बुद्धि इसके उद्घाटन करने मे ही समथ हुई थी। इसके अतिरिक्त रीति का लक्षण करने वाले वामनादि को जो ध्वनिकार के पूर्ववर्ती हैं। यह ध्वनि रूप काव्यतत्व थोडा थोडा स्फुरित हुआ था। वे केवल व्यारया करने में असमय रहे। वयालोर में ही ये परस्पर विरोधी उल्लेख प्राप्त होते है । अतएव इनको सगीत स्थापित करना पावश्यक है। प्य यालोककार ने प्रथ के प्रारम्भ में ध्वनि प्रभाववादियो के विकल्पो को क पना की है। उनमे एक विकल्प यह है कि प्रसिद्ध प्रस्थाना सिद्धातो मे ध्वनि का नाम नही सुना जाता है । अभी तक गुण, अलकार ही काय सिद्धात प्रगिद्ध हैं। यदि ध्वनिमाग इन प्रसिद्ध सिखातो के अतिरिक्त कोई माग है तो उसम काव्य हानि होगी । पूर्व पनवालो के इस विकल्प का उत्तर देते हुय प्रथ- कार ने लिखा कि यह घनिमाग केवल लक्षणकारो को ही प्रसिद्ध नहीं था, वे ही इसकी नही जानते थे । यदि जानते होते, तो इसका लक्षण अवश्य करते । परतु लक्षण की प्रसिद्धि में सिद्धात अथवा वस्तु का प्रभाव सिद्ध नही होता है । पूर्ववर्ती लक्ष्य-मथो को परीक्षा करने पर यही १ बुध का यतत्वविदिभ , काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति सनित , परम्पग्या य समाम्नातपूर्व सम्यक नासमन्तात, भात प्रकटित । ध्वयलोक प्रकथ कारिका की वृति । २ स ध्वनिरिति सूरिभि कथित । ध्वयालोक, १-१३ सूरिभे पायतथि शिभि अनिरित्युक्त ! ध्व या०,१ १३ वृत्ति भाग ३ म यतो लक्षणाकृतामव स केवल न प्रसिद्ध । ध्वया०, १-१३ का वृति माग व अणीयमीभिश्चिरतन का यलक्ष्मविधायिना बुद्धिभिरनु मोलितपूर्वम् । ध्वया, १-१ का वृत्तिभाग स सतततमविदितसतत्व । ध्वया०, ४ अस्फुटस्फुरित काप्यतत्वमेतद्ययोदितम् । भराम वरिभर्याक्तु रोतय सम्प्रवतिता । घ्वया०, ३ ४७ रीतिलक्षणविधायिना हि का यतत्वमेतदस्फुटतया मनाक स्फुरितमासीत । ध्वया०, ३ ४७ को वृत्ति ५ यतो लक्षणकृतामेव स सेवल न प्रसिद्ध ध्वया०, १-१३ की वृत्ति ध्वनि सिद्धात मोर ध्यजनावृत्ति विवेचन भामह के काव्य मलकार में ध्वनि सकेत लक्षण प्रथों की प्रमिक परम्परा मे नाश्यशास्त्र के पश्चात् भामह का काव्यालकार ही उपलब्ध लक्षण-प्रय है। इन दोनो आचार्यों के मध्य में काव्यालोनन पर विचार अवश्य ही हुआ होगा । स्वय काव्यालकार में मेघावो, रामशर्मा, शाखवद्ध न के नामा का उल्लेख है । रामशर्मा के 'मच्युतोत्तर' नामक प्रथ का भी नाम इसमे है ।' परतु अय प्रयो को अप्राप्ति मे मगत्या नाट्यशास्त्र के पश्चात् काव्यालकार का ही क्रमिक स्थान मानना पड़ेगा। भामह अलकार-पद्धति के प्राचाय हैं। काव्यशास्त्र की विचार विमश परम्परा में इस प्रय का अनुपम मूल्य है। उद्भट, वामन, प्रान दवधन और मम्मट प्रादि प्राचार्य इस ऋणो हैं। अभिषेयाय की सुदर व्याख्या इसम उपलब्ध होती है। भामह अमिधावादी प्राचाय हैं । पर तु भामह ऐसे अभिधावादी नहीं हैं जो ध्यजना का विरोध करें । अपितु उनन न य म ध्वनि के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। काव्यालकार में व्यग्याथ अथवा ध्वनि के प्रतिपादन में प्रयुक्त होन वाली पदावली का बाहुल्य है। साथ मे यह भी निश्चित है कि भामह जसे स्वतत्र विचारक एव स्पष्ट वक्ता पाचाय ने अपने शन्ना का भय जानकर हो प्रयोग पिया है । प्रतिवस्तूपमा के लक्षण म गुण साम्य प्रतीतित ,' प्रर्या तर यास म 'अयमय तरयास मुतरा व्यज्यत, समासोक्ति म यत्रोक्त गम्यतेs “योऽथ एव वक्रोक्ति 'प्रनयार्थो विभाव्यतेइत्यादि ऐसी पावली हैं जिसम वाच्येतर अथ को प्रतीति (व्य जना) की ओर सष्ट मकेत है। अर्थात इन उगाहरणा म प्रयुक्त 'प्रतीतित 'व्यज्यने 'गम्यत और 'विमान्यने ऐसे पद हैं जो व्यजना के प्रसग म हो प्रयुक्त होते हैं और कई विद्वानो ने भामह की इस पदावली को व्यग्याथ सूचक स्वीकार भी किया है। लोचनकार तो 'विमा यते का प्रथ 'रसमयी क्रियते से लेते हैं। इम पदावली के अतिरिक्त काव्यालकार के लक्षणा से उद्धरण भी यथेष्ट सरया में सकलित किये जा सकते हैं जिनमे वाच्याय से भिन्न विसी अतिशयवान वन, गुरु, विशेष प्रादि विपणो से विशिष्ट प्रथ की पोर सकेत विद्यमान हैं। नितान्त आदि श दमात्र (प्रयोग) से वाणी म सौंदर्य नहीं हो पाता है । पक्र-गम्द और अप की उक्ति ही वाणी का काम्य प्रलकार है। वाणी में 'वनाथशनाक्ति ही अलकार जनक ७ १ प्रहेलिका साह्य दिता रामशर्माच्युतात्तरे। भामह काव्यानकार, २-१६ २ काव्यालकार,६-७-१५ ३ विरोपेण च भायते रसमयीजियते इति । -लोचन, पृ० २६० काव्यालकार, २-३४ वही, २-७६ ६ वही, २-८५ ध्वनि सम्प्रदाय और उसके सिद्धात, पृ० ३७२ विरोपण च भाव्यते रममयो मियते इति । लोचन पृ० २६० ६ न नितान्तादिमात्रण जायते चारुता गिराम् । वनाभिधेयादोतिरिष्टा वाचामल कृति 1 का यालकार १-३६ नोट- इसका अनुवाद डा. सत्यदेव चौधरी ने भा० का की परम्परा में थोडा भिन्न किया है। उनके अनुवाद से हमारे अभीप्ट को विशेष पुष्टि होती है। उनका अनुवाद यह है कि नितात आदि शदी द्वारा व्यक्त अतिशयोक्ति से ही वाणी सोप्ठव नही हो जाता ।' गेप ऊपर की भाति । इस मनुवाद मे शब्दा द्वारा व्यक्त अतिशयाक्ति पद समूह विचारणीय है ।

रीतिकाल के पूव ध्वनि का क्रमिक विकास भी गुरण होती है।' हेतु, सूक्ष्म लेश को अलकार स्वीकार नही किया जाता क्याकि उनमें वक्रोक्ति का समावेश ही होता है। इससे यह स्पष्ट हो गया कि प्राचाय न वक्र कथन में हो अलकारता मानी है और उसके प्रभाव ये हेतु प्रादि अलकारा को अलकार नहीं माना है । वरक्थन साधारण वान्य मे भिन्न है । समानवस्तु के यास से जहा यथा, इव प्रारि वाचकों के अभाव साम्य प्रतीति होती है उसे प्रतिवस्तूपमा कहते है। स्मरण रहे ध्वयालोवजार शब्द से अनुक्त शब्द शक्ति से आक्षिप्त प्रलवार को शदशयुत्य विवक्षितवाच्य ध्वनि स्वीकार करते हैं।४ कृता कवि उपमालकार मे असम्भव अर्य वा निवधन नहीं करता, पर तु अतिशयवान अय ही इष्ट है। अतिशयवान और व्यग्य एक ही प्रथ वे दो नाम जान पड़ते हैं। अतिशयाक्ति मे लाकातिमातगाचर वचन निमित्त होते हैं । यहा पर लोकातिकात गाचर वचन से आचाय का तालय यह है यि अतिशयोक्ति में एसी शरावनी का प्रयोग होता है जिससे लोकातिनात अथ (व्यग्य) का द्योतन हो। ध्वयालोर म भामह की अतिशयाक्ति को लेकर विचार हुआ है और अन्त म प्राचाय को यह स्वीकार करना पडा है कि 'विशेप यही है कि सभी अलकार अतिशयोक्ति के विषय हो सकते हैं। इमो को सर्वालकार रूप समझना चाहिये। वह गुणातिशयोग वाली सभी 'वक्रोत्ति' हा है जिससे अथ मे सरसता मातो है। इसके बिना कोई अलकार होता हा नही । उत्प्रेक्षा के लक्षण में तो पाचाय ने वाच्य को विवमा का त्याग किया है। उससे उनका अभिप्राय है वाचक शदों का प्रयोग तो किया जाय परन्तु पाप को विवक्षा न रह । इस वाच्येतर विवक्षा म नाणिक प्रयवा व्याय प्रथ को ही विवक्षा हो सकती है। जिसम सामा य (वाच्य) की विवक्षा नहीं होती और उपमा का थाडा योग रहता है, उसे भिन्न गुण और भित क्रिया के योग से अतिशयवान् अथ से वित रहन वाली उत्प्रेभा कहते हैं। अन्य प्रकार द्वारा किया गया क्या ही पर्यायोक्त होता है। यही पर यह कहना प्रत्य त अावश्यक एव प्रामगिक है कि प्राचार्य भामह का पर्यायोत लक्षण व्यग्य वाचावकाथ पा दोक्तिरलकाराय कल्पते । वही, ५-६६ २ हेतुश्च सूक्ष्मो लेशोऽप नालकारतया मत । समुदाया:भिधानस्यऽवक्रौत्यनभिधानत । काव्यालकार, २ ६६ ३ समानवस्तु यामेन प्रतिवस्तूपमोच्यत । यथैवानभिधानऽपि गुणसाम्यप्रतातित । -वही, २ ३४ ध्वयालोर,२ २२ तासम्मविनार्थेन के कुर्यादुपमा कृती। २४६ यस्यातिशयवनाय क्थ सोऽमम्भवो मत । ६ निमित्ततौ पचो यतु लोपानिनातगोचरम् । २ ५१ ७ अतिशयोक्तिस्तु सर्वातकार विषयोऽपिसमवतोत्यय विशेष । २०, ३ ३७ की वृत्ति सव सलिकाररूपा-ध्वया, ३ ३७ वृति । ६ अधिवभितसामाया किंचितापमया सह । मतद्गुण निया योगानुरप्रेक्षातिशयाविता !! का यालवार, २-१ पयायात यदयन प्रकारणाभिधीयत । वहीं, ३-८ ध्वनि सिद्धान्त और ध्यजनावृत्ति विवेचन दशन का एक प्रधान कारण बना। इसी लक्षण पर उद्भट और मम्मट के लक्षण धापारित हैं जिनम व्यजना की स्वीति है। यह निश्चित है कि साक्षात् रूढ़ सकेतित्-अथ म अभिधा स्वीकार करने वाला प्राचाय अय प्रकार का क्यन अभिधेतर वृत्ति से स्वीकार करता है। कदाचित् मीमासको के प्रभाव के कारण उहांने अभिधा वृत्ति के नामकरण को चिन्ता नही की। निदशना अलकार म यथा, इव और वर के विना केवल प्रिया के द्वारा ही विशेष अथ की प्रतीति होती है।' निदशना अलवार म प्रतीत होने वाला विरोप अथ उपमा की परिकल्पना है । यह उपमा प्राक्षिप्त और यग्य है । इमोलिये कायप्रका के टीकाकार मलकीपर ने मम्मट के लक्षणातगत 'उपमा परिक्ल्पक पद का कल्पना का अथ पजना से किया है। इसी प्रकार विरोध प्रादि अ य अलकारा क लक्षणा म अभिधेय स अ य अथ पी स्वीकृति है । भामह ध्वनिवादो प्राचाय उपयुक्त सभी उदाहरणों की परीक्षा करके देखा जाय तो सवत्र व्यग्याथ की ही प्रार सक्त है । डा० भोलाशकर व्यास ने इन उदाहरणा स कतिपय का उल्लख करके भामह को प्रतीयमानाथ का स्वीकार करने वाला स्वीकार किया है।' लोचनकार अभिनव गुप्त ने भी उपयुक्त स्थला मे यग्याथ की सत्ता स्वीकार की है। ध्व यालोक में दो प्रकार से भामह के अलकारा की परीक्षा की गई है। एक उनका नामत उल्लेप करके और दूसरे बिना नाम के । भामह का नामोल्लेख वाक्तिगमा अतिशयोक्ति के प्रसग में है। प्रथम उद्योत मे ध्वनिकार अलकारा म ध्वनि का खडन करते हुये भामह के समामोक्ति माक्षेप, विरोपोक्ति पर्यायोक्त, अपह, नुति, दीपक मादि अलकारी म “यग्य प्रतीति स्वीकार करते है ।५ लोचनकार ने ध्वयातोक्कार की उपयुक्त मा यता को स्पष्ट कर दिया है । 'अनुरागवती सध्या, वाला उदाहरण भामह ने समासाक्ति के उदाहरण म दिया है । इसम भी व्यग्य है। भामह के अभिप्राय को ध्यान में रखकर ही प्रयकार ने यह उदाहरण ग्रहण किया है।' उहोने ध्वयालोक फी वृत्ति को स्पष्ट करने के लिये का यालकार की परिभाषाए और उदाहरण दिये हैं। प्राय सभी अलकार अतिशयोक्ति गभ हो सक्ते हैं। यह अतिशयाक्ति गमता ही का य को अनिर्वचनीय शोभा प्रदान करती है। कवि की प्रतिभावा यह अतिशयोक्ति जिस अलकार म निवास करती है वही गोभातिशय प्राप्त करता है । अन्य अलका म यह क्षमता नहीं है। सभी अलकारो का रूप धारण कर सकन को सामथ्य के कारण यही अति शयोक्ति गभ वक्रोक्ति सर्वालकार स्वरूप है । १ २ ३ किययव विशिष्टस्य तदयस्योपदशनात् । नया निदशना नाम यथैववतिभिविनो॥ वही ३-३३ कल्पन व्यजन काव्यप्रकाश-वालबोधिनी टीका पृ० ६१५ ध्वनि मम्प्रयाय तथा उसके सिद्धात, पृ० ३७२ लोचन, पृ० ४१-४२ यत्र तु प्रतीतिरस्ति । ध्वयालोक, पृ० ४१ लोचन पृ० ४४ वही, पृ० ४५-४६ ४ ५ ७ रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास अपने अलकार सवस्व के प्रारम्भ मे स्य्यक ने काव्य सरणियो का उल्लेख करते हुये लिखा है कि भामह और उद्भट आदि प्राचीन मालकारिक प्रतीयमान अथ को वाच्यार्य का उपस्कारक स्वीकार करते हैं और उस अराकार कोटि में छोड़ देते हैं।' प्राचाय मम्मट भामह का नामोल्लेख करके काव्यालकार मे प्रतीयमानाथ के सकेत पर अपनी सम्मति नहीं देते हैं । पर तु वह काव्यालकार के विशेष ऋणी हैं । प्राक्षेप, विभावना और भाविक अलकारो के लक्षण काव्य प्रकाश मे काव्यालकार से ही ग्रहण किये गये हैं। काव्यालकार के पर्याय लक्षण को उ होने उद्भट के सुधार के साथ स्वीकार किया है, जिसमे अवगमन व्यापार की शब्दत स्वीकृति है। पडितराज न रसगगाधर मे पर्यायोक्त मलकार का उपमहार करते हुये लिखा है, 'ध्वनि- कार से प्राचीन मामह एव उदमट ग्रादि पालकारिको ने अपने ग्रथो कही भी गुणीभूत व्यग्याथ शब्दो का प्रयोग नहीं किया है। केवल इमीलिये स्वीकार करना वि व ध्वनि प्रादि को स्वीकार मही करते, यह प्राधुनिक पालकारियों का मत ठीक नहीं है । गरण, समासोक्ति, व्याजस्तुति, अप्रस्तुति, प्रशसा प्रादि अलकारा के निरुपण द्वारा उहोने गुरणीभूत पाय के कोई भदो का उल्लेख किया है । दूसरे उहाने सभी व्यग्य प्राच को पर्यायोक्त में अतर्भावित कर दिया है । अनुभवसिद्ध प्रथ को तो बालक भी अस्वीकार नहीं कर सकता फिर, फिर भला भामह प्रादि चिरतन पालका- रिव प्रतोयमानाथ का सवथा निषेध कसे कर सकते थे ? यह ठीक है कि उहाने अपने ग्रयो म ध्वयादि शता का व्यवहार नहीं किया है। इससे उनकी ध्वनि विषयक अस्वीरति सिद्ध नहीं होती है । हा, यह विचार दूमरा है कि प्रधानभूत ध्वनि स्प अलकाय को उहाने अलकार की कोटि मे किस प्रकार अनर्भावित कर दिया। पडितराज के इस उल्लेख से काव्यालकार म गुणोभूत-व्यग्य का निरूपण है। याधुनिक विद्वाना में श्री सोवानी, डा० के० पी० त्रिवेदी, और डा० भोला शकर व्यास भामह का घनिवानी मानते हैं । डा० सोवानी ने अपने निवध 'ध्वनि के पूर्ववर्ती अलकार सिद्धात' मे भामह वी वनाक्ति और मम्मट को प्रोढात्तिमान निप्पन शरीर अथशत्युत्य ध्वनि का साम्म लिख कर उनके ध्वनिवादी होने का सकेन क्यिा है । 3 डा० के० पी० त्रिवेदी अपने निबध मे मुक्त व । अलकार-सवस्व, १०३ २ ध्वनिकारात्प्राचीन महोट सट प्रमतिभि स्वप्रयेषु कुनापि ध्वनिगुणीभून यंगादि सन प्रयुक्ता इत्येतावतव तव यादयो न स्वीविपत इस्पानिकाना वाचौयुक्तिर यत समायोक्ति याजस्तुत्यप्रस्तुतप्रासाद्यलवारनिस्पेरणेन क्यिन्तोऽपि गुणीभूतेव्यगसेदाम्तेरप निरूपिता । अपरश्च सयोऽपि व्यग्यप्राच पर्यायोक्त तुक्षौ निक्षिप्त नह यनुभवसिद्धीर्थों वालेनाधपहनोतु शक्यते । घयादिशदे पर व्यवहारो न कृत । मीनावतानगोकारो भवति । प्रापा पादलकाया हिघ्वनिरलकारस्य पर्यायोक्तम्य कुक्षी पथकार निवियतामिति नु विचारान्तराम् । रमगगाधर, पृ० ५५५ ध्वनि सम्प्रदाय, पृ०३७५ . However Bhamaha s Vakroktı does appear in kavya prakash under the name of प्रौढिक्ति प्रौढोक्तिमायनिष्पनगरोरोऽथशतयुल्य ETC | Bhandarkar Comm Vo ध्वनि सिद्धात और ध्यजनावृत्ति विवेचन भामह वी वनोक्ति, अतिशयाक्ति प्रादि की परीक्षा के पश्चात उनको पूण ध्वनियादी मानते हैं। उनके विचारो वा सार यहाँ पर देना पूर्वोक्तक्थन की पुनरावृत्ति होगी । उभट ने भामह विवरण नामक वायालवार को यारया म शब्तश्च दो ऽभिधानाथ'म अभिधान को व्याख्या में 'शब्दा नामभिधा व्यापारो मुख्यो गुणवृत्तिश्च लिया है। मभिनव ने लोचन मे उद्भट के नाम से इसको उद्धत किया है। डा० त्रिवेदी वा पहा है पि जब उद्भट 'अभिधानम से अभिधा व्यापार और गुणवृत्ति दोनो को ग्रहण करते हैं तो इमना उपलक्षण मानकर लक्षणा और व्याना को भी ग्रहण क्या न कर लिया गय?' डा. त्रिवेदी या यह क्थन औचित्यपूर्ण है। पायालकार के लोका तिमा त गोचरवचा को ध्वनि का ही पर्याय माना जा सकता है। जिसके प्रभाव मे सूक्ष्म पोर लेश को अलकार ही स्वीकार नहीं किया गया है । इसमे कोई सदह नहीं है कि ध्वनि के विकास मे भामह का प्रमुख स्थान है । उनो वाव्यालकार म ध्वनि के स्पष्ट समेत विद्यमान है और उनके अलकारलक्षण ध्वनि का भूमिका मिद्ध हुये हैं । दडीका कायादश- काव्यालकार के पश्चात् काव्यशास्त्र सम्बधी दूमरा ग्रथ दडी का कायादश है । इस ग्रन्थ म कही भी शदशक्तियो का उल्लख नही है। का पालकार म कम से कम शदाय सम्बध के विषय में मक्षेपत' निणय किया गया है जिससे उस आचाय को अभिधा विषयक धारणा स्पष्ट होती है । प्रतएव दनी ध्वयालोा के प्रभाववादी विकल्प वे मतगत सम्मिलित होते हैं, पर तु काव्यादा म अभिधा के अतिरिक्त अन दो गक्तिया लक्षणा, यजना के सम्बन्ध मे समेत विद्य मान हैं। काव्यादा की रचना से पूर्व वा यालकार की रचना हो चुकी यो । मायशास्त्रिया को खडे होन लिय आधार मिल चुका था । दूसरे काव्यशास्त्र क अतिरिक्त व्याकरण, मोमासा, याय आदि मे अभिधा और लक्षणा का प्रतिपादन हो चुका था । परतु काय का सुदरतम चम कार तो व्यजना मे निवाम करता है । वही अगनागलावण्य की भाति प्राक्पण का कारण है । इस समय तक इस चमत्कार की झलक मालसारिका को दिखाई पड़ने लगी थी। काम्पादन मे ध्वनि समेत का य के लक्षण गरीर तावदिष्टाथ यवच्छिन्ना पदावली म 'इप्टाथ' काव्यात्मा का द्योतक है । 'इष्टाथ ही अलकार एव प्रधान है, इसी से व्यवच्छिन्न पदावली का यपद लाभ कर पाती है। यह 'इष्टाथ सवदा वाच्य ही नही होता वह ला पणिक और व्यग्य भी होता है । यह अनुभव सिद्ध है । कायादश के एक व्याख्या-वारव' रगाचाय रेडडी ने 'इष्टत्व की व्याख्या चमत्कार पूवक वएना भिलाप ३ समोर 'प्रथ' की वाच्य लक्ष्य व्यगभदेन विविध ४ से की है। व्यारयाकार के - १ Should it bot be explained as अभिधानभमिधा यापार । उपलक्षणमिदम । तेन नक्षरणा यजनयोरपि ग्रहणमित्यथ । Bhandarkar comm Vol कायादश,११० रगाचाय रेडडी 'का पादश, पृ००प०१५ वही, पृ० ६ ५० ३५ २ ३ रीतिकाल के पूर्व ध्वनि को क्रमिक व्यजना अनुसार रमणीयार्थोपस्कृत' सुदर वाक्य ही काव्य है। रमणीया र्योपस्कृत पद व्यग्यार्थ का समथक है। प्राचाय के अनुसार 'वाचिवस्तु यपि रसस्थिति '२ वाणी (शद) और वस्तु ( प्रथ) में रस स्थिति होती है, पर तु शब्द और प्रथ का रस से सम्बध अभिधा के अतिरिक्त ही मानना होगा। सम्पूण अलकार समुदाय भी प्रथ में रम सिंचन करता है। पर तु अलकार का चमत्कार-जनक रस सिंचन करने वाला रूप व्यग्य ही है। प्राचार्य का विश्वास है कि जो अथ अविदग्धजनक्थन विधि से ग्राम्यता धारण कर विरसता उत्पन्न करता है वही विटग्य जनकपन विधि से अग्राम्य होकर रसावह हो जाता है । ४ स्पष्ट है कि अविदग्धजन स्थन अभिधेय और विदग्धजन-कथन उिससे भिन लक्ष्य व्यग्य ही होगा। दडी ने रमवत अलकार म सभी रसा के उदाहरण देकर उनका उपसहार करते हुये लिखा है 'वाक्यस्याग्रामतायोनिर्माधुर्य दशितो रस । ध्वनि के इस सिद्धात को रसानि की प्रीति को कोई भी गुणवृत्ति नहीं कहता है और न कह हो गक्ता है। पर ध्यान देते हुये योनि की व्यारया 'व्यजिका' ही की जा सकती है । इस प्रकार रडी ये मत म भी व्यजना वृत्ति की स्वीकृत सिद्ध की यारया होती है। प्राचाय ने उदारता गुण का लक्षण इस प्रकार दिया है, 'जिस वाक्य के प्रयोग से क्सिी धम के विशेष उत्कप की प्रतीति (व्य तना) हो उमे उतार गुरण नाम दिया जाता है और काव्य पद्धति इसी गुण से गनाथ मानी जाती है । ० एस० के० वैलवलर ने वायाश के अग्रेजी अनुवाद मे उदार एवं प्रतीयते, शब्ना के अनुवाद व्यग्य परक किये हैं डा. भोलाशकर ने भी इस 'प्रतीयत्ते' पद मे व्यजना स्वीकार की है। इस गुण के उदाहरण का अथ यह है कि हे दव याचक की कृपण दष्टि एक बार ही प्रापवे मुख पर पडती है, उस अवस्था में उहें फिर भी दूसरे का मुखावलोकन नहीं करना पडता है । इस प्रकार इस वाक्य में प्याज का उत्सर्प भली भाति दिखलाइ पडता है। इसमें स्वय उहाने त्याग का उत्पप स्वीकार किया है । पर तु यह उत्कर्षाव बौध वाक्य का प्रभिधेयाथ नहीं है। फलत यह बोध अभिधेतर शक्ति से हो सभव है । वस्तुत 'लक्ष्यते' पद प्राचाय द्वारा 'व्य यते व' ही अथ में प्रयुक्त है। - १ वही, पृ०६, १० ४० २ कायादा, १५१ काम सर्वोप्यलकारो रममर्थे निपाति । का यादश, १६२ काव्यादश, १६३-६४ ५ वही, २-२६२ ६ हिदी पयालोक, पृ० ३५५ काव्यादश का अग्रेजी अनुवाद, पृ०६ ध्वनि सम्प्रदाय, पृ० ३७३ 8 मथिना वपणा दप्टिस्त्व मुख पतिता सक्त । तत्वस्था पुनर्देव ना यस्य मुपमीक्षते । इति त्यागस्य वाक्येस्मिन कप साघु लक्ष्यते । का० दश, १ ७७-७८ ७ १४ . प्वनि शिसात प्रौर पजनावृत्ति विवेचन उपमा के लक्षण म 'ययावयचित माहस्य पत्रोभून प्रतीयत" म प्रयुत्त 'प्रतीया' पर की म्याख्या करते हुय रगाचाय ने लिखा है। मभिधा, सणा मोर ध्यजना म से विमो एक वृत्ति के द्वारा प्रतीति होती है । वस्तूपमा म मापारण घम का उल्लेख नहीं होता है प्रतएव दही उसे 'प्रतीयमानधर्मा स्वीकार करत हैं। 1- की अनुपस्थिति म घम को प्रतीति प्पा स हो हो साता है । कारण, पभिषा को पुन्यमूना लगा का भी यहाँ भवकास सम्भव नहीं है । अतएव प्रतीयमान कधर्मा को 'गम्यमानधर्मा' प्रयया 'व्यग्येवघर्मा स्वीकार कर दही में मत में भी प्पगना को मत्ता मानना पडेगी। इसी प्रकार प्रतिवम्पमा म साम्यवाचक इवानि पाली में प्रभाव में 'साम्यग्नोति व्यजना वृत्ति स ही सम्भव होगी।' भाविर ये लभण में व्यक्ति पद का प्रयोग अभिम्पत्ति के मय में किया गया है। प्राचाय 1 उपमान में पी तलिवा दी है जिसको रगाचाय ने उपमावार, उपमा सभा मौर उपगायन तान भागा म विभत किया है। इनम इव, यत मादि T- उपमायापक है, स्पर्श करता है, जो मात्रि अमानता है, क्यादि स्पर्श करता है मादि - सादृश्य पाया नहीं हैं, पौर 'गौभाग्य यो गुगता है पारि उपमाव्यजक हैं। दूसरा बात यह कि पापा दाम भो में उपमा सूवर - विना किमी तामवरण में अलग अलग ती भागा म विमा है। इगनिये रगाचाय को ध्यानमा मानाय से मानुकून मानी जा सकती है । कारण, पाधाप न उनरा उगी प्रम से उग किया है। यतिरेर प्रसार के उमाहरण। म मा एमा ही समरगा गया है।' प्राप दरीन प्रतीपमा यहा स्रार को है जहाँ याचा का प्रभाव है। मतगार सालों में भाग्य पथ का गरेत-पाप प्रसार म प्रोपमााय पी निश्चित मता होती है । दगा प्रोयमाय पे गाव ग म प्राप सभी प्रापाग एक मन है। पाण्यादराम उपमादिमागरा को भांति पाIT विविध भेलामा विस्तृत यणा है। इनम सवस पर उगारणार यपर होगा। " पर मो जाा गोदपा गा पगापिरापली है. परि । मार विजापाना' साप जाप मार मर विषय म तपिर भी चिरें पारा -या मुाधिार र दुग 7६ गरगा । इगरे पमान दूगर र मग अनुना पाय मारते हो निगो है इस प्रसार पनि गमन की मरिगेमपा मरण को गूगलान वानी नापिशाप द्वारा पति गमन का निपप र दिया गया। 3 उरण परियोमा प्रयोग TI है निगग मरण को पना ६ २ रगा टोn Ter: 'अभिपागणापना गरपाily पियमशि ३ दयानिगागाभारनिना मार मारोप । रंगापा ..Yि र पृ. २१३ परि २५ ४ का २-१८. ७ .

रोतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास १५ वाच्य स्वीकार की जा सके । अभिधा से तो गमन की अनुमति ही प्रतिपादित होती है परतु वही अनुमति हो प्राचाय के मत मे मरण को सूचिका है और फलत अनुमति से उसके विपरीत गमननिषेप अथ की प्रतीति होती है । साहित्यिक जगत मे यह निषेध व्यग्य के अतिरिक्त दूसरी अय कोई वस्तु नही है । प्राय उदाहरणा में भी प्राय यही स्थिति है । दडी के व्याख्याकारों ने भी यहा व्यग्यार्थ की प्रतीति ही मानी है । सुयोग को बात यह है कि प्राचाय ने उदाहरण देकर उसके द्वितीयार्थ व्यग्याय का तदन तर दूसरे श्लोक मे उल्लेख कर दिया है । नयायिक गाधर में शक्तिवाद के प्रारम्भ में ही व्यजना का खडन करने के लिय इस उदाहरण का पूर्व पक्ष म उल्लेख किया है। वह द्वितीय अथ जिसका साहित्यिक-व्यग्याथ मानता है का बोध किसी वत्ति विशेप से न मानकर सहृदय की मन कल्पना ही स्वीकार करते हैं। कहने का तात्पय यह है कि शक्तिवाद के लेखक को दृष्टि म प्रथम उदाहरण में द्वितीयाथ व्यग्याथ ही है। समासोक्ति मे व्यग्याथ की सत्ता रहती है । कायादश का समासोक्ति का लक्षण यह है 'किसी वस्तु उपमान अथवा उपमय-~का वणन अभीष्ट होने पर उसके तुल्य अन्य वस्तु-उपमेय अथवा उपमान-का वणन किया जाय । संक्षेप मे इसी प्रकार के क्थन को समासोक्ति कहत हैं।' समासोक्ति म अभीष्ट का वणन न करक तत्तत्य अय वस्तु का वणन किया जाता है। इससे अभीष्ट की प्रतीति होती है । इस पर व्याख्याकार का अभिमत इस प्रकार है', प्रस्तुत अथवा अप्रस्तुत से किसी एक का शद के द्वारा प्रतिपादन करके उसके अतिरिक्त अन्य अप्रस्तुत अथवा प्रस्तुत का यजना से वोध विरोष चमत्कार प्राधायक होता है और यही इस अनकार का बीज है । जैसा कि ध्वनिकार ने कहा है 'वाज्यार्थ ता उतना पास्वादन नही होता जितना प्रतीयमान का होता है।" समासाक्ति का उदाहरण यह है, 'प्रौटा नायिका से प्रम करने वाला कोई नायक उसस वहता है 'हे प्रिये देखा, भ्रमर पूण विकसित पक्ज मे यथातृप्ति मधुपान करता हुप्रा भी अपरिपक्व सुगधवाती कलिका का चुम्वन करता है । इसको व्याख्या मे प्राचाथ रडी ने लिखा है, "यहा पर इस कथन से प्रौटा नायिका मे पावडरति रागी वी क्सिी वाला म इच्छावृत्ति, समोगेच्छा विभावित (विभा यते) हो रही है। कवि अथवा कवि निवद्धवक्ता को उपयुक्त शब्दोपात्त वणन प्रभीष्ट नहीं है । अपितु यही अर्थ अभीष्ट है । परनु यह अर्थ अभिधेय नहीं है। यह तो विभावित होता है । पान के मत म 'विमा यते का प्रयोग ('ध्वनित होता है') के लिय है।" १ ध्वनिसिद्धात, पृ० ३२५ मनसव तादृशवोष स्वीकारात् । २ काव्यादा,२-२०५ गाचाय, पृ० २१४ २०७-६ ५ काव्यादश,२-२०६ ६ वही, २-२०७ रगाचाय व्याख्या, पृ० २१७ १६ ! प्यनि सिद्धात और व्यजाति विवेचन पर्यायोक्त एर ऐसा अलवार है जिसम रामो मालरारिका ने अभिधेपनर अप को ससा स्वीकार की है। वाट्यावा पर्यायारा लक्षण दग प्रसार है, 'प्रभोप्ट प्रथा माक्षाद (वाचा शब्द से) । वर्णन न करणे, उम भभीष्ट अप की गिति में निम जो प्रारान्तर ग यान दिया जाता है उसे पर्यायोक्त पलवार पहत है । इस समय यो रगाचायटन व्याख्या विचारणीय है । 'प्रतिपाव इष्ट मय वा साक्षात (याचर गर) से प्रतिपान 7 इस उगो इप्य भी सपमसार प्रतिपत्ति के लिये पातुयद्योता भगिविशेष रा-व्यगना वृति द्वारा पोतन-से पर्यायात पहनाता है।' याच्यार्य का य्यजना स प्रतिपादा हो पर्यायोत है। पर्यापोत में यायाय या पजना मे वपन होता है और ध्वनि म बाध्य भय विषय ही ना यही दोन। म भेट है। तुपयोगिता प्रगग म ध्यास्यावार ही साम्य या पयगानगम्य स्वीगार वरत हुय नियते हैं। पजना मा यत्तित्व ता सभी मालकारिखा को मान है। दडी सकारा मजा मा पमत्कार मनिहित है। इस प्रकार पाचाय दहा को भी भामह को भौनि मलाराम गुणीभूत-व्यग्य का चमत्कार तो स्पष्ट प्रतीत हुमा परतु वे उम प्रतीति के नियमय वृत्ति की पलना न कर गरे । वस्तुत साहित्य में वृत्तिया-शब्द पतिया का विवेचन प्रारम्न ही नहा हुअा था। फिर भी दडो न मभिधेय लागणिक एव प्रतीयमानाप म स्पष्ट भे- पिया है। पर्ण वे विविधत्व पे सर समेत का यादा म विद्यमान हैं। इनम प्रतीयमानार्ग म उसो गर्वाधिक भाषण पा । व्यजना के विकास-श्रम में पायादा उच्चतर सीढ़ी है। प्राचाय दडी ने अपने उदाहरणा को व्याख्या मा उल्लेस पर प्रधिक बहुमूल्य याय दिया है। स्थान-स्थान यो ध्याच्या म जो-जो प्रर्य माचाय यो अभीष्ट है, उनम से अधिकतर म्यग्य ही हैं। वामन मोर उनका साध्यास्त्र म योगदाा--- हो र पश्चात् वामन या स्थान है। यह भी पूर्व ध्वनि पाल के प्राचाय है । मवप्रथम याव्यात्मा की बात यामा ने कहा है । यद्यपि सम्पूण सस्कृत-वाव्यास्त्र पर दृष्टि डालन भौर का पशास्त्रियो मा वा विभाजन परो । यह देहवादी ही ठहरत हैं-ध्वनि की अपेशा रीति बाह्य ही है-परतु उनी निमा शास्त्राभ्यास थालित मन्तभैदिनी दृष्टि का प के उस मर्म तर पहुँच सुरो थी जिगवा उत्पाटन ध्वनिवार एवं उत्तर ध्वनिकाल के प्राचार्यों ने अपनी प्रसर प्रतिभा के द्वारा दिया । यद्यपि उनी अपनी दृष्टि सीमा अवश्य पी।४ वामन ने रीति को पाव्य को प्रात्मा स्वीकार किया है। अभी ता भामह एव दडी ने काव्य के शरीर की बात तो यही थी लेकिन उसकी प्रात्मा की चर्चा गहने पहन वामन ने की। उहोने एक दूसरा महत्वपूण फाय गुण मौर मलकार में नित्य एव प्रनित्य भेद स्वीकार कर किया । काव्य मे गुण नित्य है और काव्य शोमा गुणो से सम्पादित होती है।' वामन द्वारा १ याव्यादा,२२६५ २ रगाचार्य-इष्ट प्रतिपादनाभिलपितम् । ३ रगाचाय पृ० २६३ प० २५ नगेद्र का मू० वृ० मू० प०६१ रीतिरात्माका यस्य, का सू० वृ०, १-२ ६ ६ पूर्वेनित्या । वा० सू० वृ० ३ १ ३ गुणनिवृ त्या या यशोभा ।-का० गु०व० ४ प्रास्ताविरम् ।

रोतिकाल के पूर्व ध्वनि का कमिक विकास स्वीकृत गुणो की संख्या घटाकर तीन मान ली गई परतु उनकी नित्यता विषयक मा यता को ध्वनिवादी प्राचार्यों ने भी बिना किसी ननुनय के स्वीकार कर लिया। वामन का शारद शक्ति परिचप-यह निश्चित है कि मभिधा के सम्बध में वामन जैमिनीय मत के मानने वाले थे।' मीमासा शास्त्र में मभिषा शब्द-शक्ति पर विशेष विचार हुमा है। न्याय एव दशन जगत में लक्षणा का भी प्रवेश हो चुका था। इन दोना शब्द-शक्तियो से प्रकार भलीभांति परिचित थे और उहोने इनका यत्रतत्र उल्लेख भी किया है परन्तु मम्मट इत्यादि प्राचार्यों की भांति उनका विवेचन नही किया है। वामन लक्षणा से भी पूण परिचित जान पड़ते हैं । उ होने वोक्ति मलकार का लक्षण यह माना है, 'सादश्य के कारण से की गई लक्षगा वोक्ति अलकार मानो जाती है। उसका उदाहरण यह है 'उमिमील कमल सरसीनो केरवच निमिमील मुहूर्तात्' । उमोलन और निमोलन नेत्र धम हैं जो सादश्य के कारण लक्षणा से कमल और कौरवो के विकास तथा सकोच को बोधित करते हैं। लक्षणाविद् इस प्रसग में लक्षणा के द्वारा प्रथ को शीघ्र प्रतिपत्ति स्वीकार करते हैं। ये सभी अविवक्षितवाच्य ध्वनि के उदाहरण हैं। यहां पर लाक्षणिक अर्थ की भोर तो भाचार्य का ध्यान है उसके प्रयोजन को प्रोर नहीं। सक्षणा के प्रयोजन में ही ध्वनि होती है। इसी को डा० नगेन्द्र ने प्रान दवधन की पूव-सूचना स्वीकार किया है। यह उनकी व्यापक दृष्टिा प्रमाण है। बामन के 'शद गुणो' म यण ध्वनि का सकेत है, 'प्रयगुण' मोज के प्रतर्गत प्रथ-श्रीदि के कई रूपों म भी ध्वनि की प्रच्छन्न स्वीकृति है। समास के भेद में केवल निमिपति कह देने से ही दिवागना का व्यक्तित्व ध्वनित हो जाता है, इसी प्रकार 'साभिप्राय विशेषण' प्रयोग में पर्याय ध्वनि का ही प्रकारातर से वणन है । प्रयगुण काति मे तो मसलक्ष्यक्रम ध्वनि की प्रत्यक्ष स्वीकृति - वामन के प्रय गुणों के मूल में रस-~-ध्वनि का भावात्मक सौन्दय विद्यमान है। उनके उदारता, सौनुमाय, समाधि और प्रोज वे मनेक रूपो मे लक्षणा-व्यजना का चमत्कार है।' १ " तद्धि जमिनीया जानति । वयन्तु लभ्यसिद्धो सिद्ध परमतानुवादिन । वृत्ति, का. सू० वृ०,५११७ २ The secondary meaning became well established in the time of Amar Singh, The Journal of the University of Gohati V X 59 "A critic on India as known to Panini सादश्यास्लक्षणा वक्रोक्ति । का० सू० वृ०, ४ ३ ८ लक्षणायाच झटित्यर्थप्रतिपत्तिक्षमत्त्व रहस्यमाचक्षत इति । का० सू० वृ०,४३८ की वृति। ५ का०सू०७० को हिदी टीका की भूमिका, पृ० २५ ६ वही, भूमिका, पृ० १८४ नगेद्र का० सू० वृ० को हिदी टी० की भूमिका, पृ०४६ ७ १५ प्वनि सिद्धात मोर ध्यजनावृत्ति विवेचन प्राचार्य ने अभिधेयाय के दो भेद माने हैं व्यक्त और सूक्ष्म ।' इनमें व्यक्त और स्थूल सर्व जनसवेध मप हो है, और सूक्ष्म सहृदयमाप्रसवेद्य । सुक्ष्म अर्थ के दो भेद किये गये हैं । भाव्य और २ वासनीय । भावको की अवधान रूप भावना का विषय होने से 'भाव्य' रस की कोटि का सिद्ध होता है । इसके उदाहरण में कामधेनु के टीकाकार ने पूणरस स्थिति सिद्ध की है।' वासनीय भयं वित्त की अत्यधिक एकाग्रता से समझ म पाता है। फ्लत इममा समावेश प्रवि वक्षितवाच्य व्यग्य के मन्तगत ही होगा। कामधेनु टीका म वासनीय अथ के उदाहरण मे इसीलिये वस्तु ध्वनि सिद्ध की गयी है । अविवक्षितवाच्यध्वनि म केवल वस्तु ध्वनि ही होती है । इसलिये प्रव्यग्य पयवा प्रतीयमान प्रथ से प्राचाय वामन को भी परिचित स्वीकार करना पड़ेगा। उभट और प्रयगमन व्यापार-उदभट ने काव्यालकार सा० संग्रह प्रथ की रचना की है । इम ग्राय में पूर्व प्रयो की भांति काय का सर्वांग विवेचन नही है, इसलिये इसम शदाय मम्बध एव साद-व्यापारों पर विचार करने का अवकाश ही नहीं था। फिर भी यह निर्विवाद स्वीकार किया जा सकता है कि प्राचाय उदभट काव्य की लाक्षरिणा एव यग्य पारुता से भली भांति परिचित थे । उक्त प्रथम शब्द को शक्तियो अपना व्यापारो का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। ध्वनि के विकास-प्रम म पाचाय उदभट का महत्वपूर्ण स्थान है । उहाने व्यजना के लिये मव गमन श्यापार नाम स्वीकार ( पर्यायोक्त मलकार के लक्षण म) क्यिा है जिसको मागे ध्वनि वादियों ने ज्यो का त्यों स्वीकार कर लिया । भट्ट उद्भट ने भामह के कायालवार पर भामह विवरण नामक टीका लिखी । यह टीका आज अनुपलब्ध है । उसका उल्लेख लोचन म प्राप्त होता है । भामह वे 'शनच्छदोभिधानार्थ ६ को व्याख्या करते हुये उन्हाने लिखा है कि 'शब्दों का अभिधान मुख्य मभिधा व्यापार और गुण वृत्ति है। इससे स्पष्ट है कि यहाँ तक माते माते शब्दवृत्ति अथवा व्यापारो का विवचन साहित्य से भी सम्बघित हो गया था। उपयुक्त प्रथ के मध्ययन से पता चलता है कि प्राचार्य अभिघा, लक्षणा और तात्पर्या से भलीमाति परिचित थे। वामन पोर उद्भट दोना समकालीन थे। वामन को इन शक्तिया का पान था । उद्भट तो उस पडित सभा के समापति थे जिसके वामन सदस्य थे। फ्लत यह निवि वाद माना जा सकता है कि उहें भी इनका नान था । उहोने अभिधा-शक्ति के लिये रूपक की परिभाषा मे श्रुत्या व्याजस्तुति में 'श दशक्तिस्वभावेन मोर पर्यायोक्त म 'वाचकवृत्ति' का प्रयोग दिया है । उपयुक्त पद समूहो का अभिधापरक अर्थ उनके टीकाकार प्रतिहरि दुराज को भी माय है । लक्ष्णा को वह गुण वृत्ति मानते हैं, कारण, गौणी मोमासा मे अलग शक्ति मानी जाती थी। का० सू० वृ०३२-६ २ वहीं, ३२-१० ३ कामधेनु टो, पृ०६१ एकाग्रताप्रापगम्यो वासनीय इति । का० सू० वृ०, ३२-१० की वृत्ति । ५ कामधेनु पृ० ६२ काव्यालकार, पृ०१-६ श दानामभिधानामभिधा यापारो गुणवृत्तिश्च । लोचन, पृ० १२ श्रतिनिरतराथनिष्ठोऽभिधा यापार । लघुवृत्ति, प० १२ १०२२ ८ रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास ! १६ रूपक के लक्षण में गुणवृत्ति का भी उल्लेख है।' स्पा म लक्षणा का सम्बध रहता है। अतएव यह मानना कि यह ल रणा के सहकारी हेतुप्रा से भी परिचित थे, युक्तियुक्त है । पर्यायोक्त के लक्षण म लक्षणा के अतिरिक्त तोन अय शक्तिया का उल्लेस है, जिनमें से अवगमन नामक ध्या पार व्यजना के अतिरिक्त दूसरा नहीं है। उसम 'वाच्य वाचक वृत्तिम्या पद प्रयुक्त हैं । इस पद से अवश्य ही आपाय का मतव्य वाच्यवृत्ति और वाचक वृत्ति दो भिन्न वृत्तियो से है। इनमे वाचक वृति तो अभिधा का ही दूसरा नाम है । वाच्य-वृत्ति से उनका तात्पर्य जिस वृत्ति से था? स्पष्ट नही है। उनके दो टीकाकारो ने वाच्य-वृत्ति को प्राकाक्षा सनिधियोग्यता से ससगगमन रूप 'तात्प ख्या' वृत्ति के समकक्ष स्वीकार किया है । पर्यायोक्त मलकार का लक्षण निम्नलिखित है पर्यायोक्त यदयेन प्रकारेणाभिधीयते । वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां पूनावगमात्मना ॥3 इस सक्षण म तीन वृत्तियो का स्पष्ट उल्लेख है । वे ये हैं-१ वाच्य वृत्ति २ वाचक वृत्ति एव ३ इन दोनों से भिन अवगम व्यापार । इनम वाचक-वृत्ति प्रभिधा और वाच्य वृत्ति तात्पर्याख्या वृत्ति है । फलत भवगम यापार व्यजना ही निश्चित होता है। अभिनवगुप्त, प्रतिहारे दुरान मौर मम्मट के अनेक टोकाकारा ने इसको व्यजना-व्यापार ही स्वीकार किया है। अमिधा, तात्पर्य और लक्षणा से भिन्न चौथा व्यापार यही है जिसको ध्वनन, धोतन, व्यजन, प्रत्यायन, अवगमन, मादि नामा से पुकारा जाता है। यही कारण है कि प्रतीहारेन्दुराज को पर्यायोक्त मलकार में समस्त ध्वनि प्रपच का प्रतर्भाव करने का साहस हुआ। इस भवगमन-व्यापार को लक्षणा भी स्वीकार नही किया जा सकता है क्योकि प्राचार्य लक्षणा के सहकारी हेतुमो से भली भांति परि चित थे । उहाने रूपकादि अलकारो के स्वरचित लक्षणा में प्रभिधा लक्षणा, तात्पय मोर व्यजना को भी स्थान दिया है । समासोक्ति) भाक्षेप, विरोपोक्ति, पर्यायोक्त, भपति मादि मलकारो में व्यग्य का समावेश रहता है, इस तथ्य का प्राचाय उदभट ने भलीभांति पहिचाना, और इसीलिये ध्वनिकार ने अलकार सनिविष्ट यग्य से ध्वनि को मिन सिद्ध करके अलकार सन्निविष्ट व्यग्य से १ २ ३ गुणवृत्तिप्रधानेन युज्यते रूपक तत् । काव्यालकार सार संग्रह १-११ अ वाचक वृति रभिधा विवृत्ति । व वाचक्स्य भिधायक्स्या स्वशब्दस्य वृत्ति र्यापारो वाच्यार्थप्रत्यायनम् । - लघु वृत्ति, पृ० ५५ ५०१३ का० सा० स०,४,६ अ अतएव पर्यायणप्रकारातरेण अवगमात्मना व्यग्येनोपलक्षित । लो० पृ. ४६ व एव विघश्य यो वाध्यवाचक्यो र्यापारस्तमतरेणापि प्रकारातरेणार्थसामार्यात्मन वगमस्वभावेन यदवगम्यते । लघु वृ०, पृ० ५५ ५० १६ स अवगमन यापारेण व्यजनास्पव्यापारेण । वामन भलकीकरें, पृ०६८० तस्मादभिघातात्पर्यलभरणा व्यतिरिक्तो चतुर्थोऽसो व्यापारी ध्वननं द्योतन यजनात्यायनावनमनादिमोटरव्यपदेश निरूमितोऽभ्युपग तव्य । ५ - लोन, पृ० २१ २० । प्वनि सिकात भार प्यजनावृत्ति विवेचन से युक्त काव्य को गुणीभूत-व्यग्य की कोटि मे स्थान प्रदान किया। इस प्रकार प्राचाय उद्भट समय तक साहित्य शास्त्र में अवगमन-व्यापार, व्यजना व्यापार की ओर भी काव्यशास्त्रियो का ध्यान पहुँच गया था। देवल सस्कृत-कायशास्त्र में ही नहीं अपितु ध्वनि सिद्धात के प्रतिपादन मे भी भाचार्य उद्भट का उल्लेखनीय योगदान है। रुद्रट के काव्यालकार में ध्वनि सकेत-काव्यालकार में भी वाच्याथ से भिन्न प्रतीयमान पर्ष की सत्ता स्पष्ट सिद्ध होती है । उहोंने मभिधेयेतर का सकेत अधिक्तर, प्रतीयते, गम्यते, गमयेत् मादि पदो से किया है। रुद्रट की वक्रोक्ति विषयक धारणा भामह, दडी से नितान्त भिन्न है । भामह इत्यादि पूर्वा चार्यों की वक्रोक्ति का क्षेत्र विस्तृत था, रुद्रट ने उस क्षेन को सकुचित करके अलकार मात्र तक सीमित कर दिया । उहोंने वक्रोक्ति के दो भाग किये हैं १ श्लप वक्रोक्ति और २ काकु वनोक्ति प्लेप वक्रोक्ति मे श्लिष्ट शब्द की सहायता से दूसरा अर्थ निकलता है परतु काकु वक्रोक्ति मे "कठध्वनि" अथवा उच्चारण विधि से ही प्राकरणिक प्रथ से भिन्न मर्ष प्रतीत होता है। परवर्ती माचाय ने वक्रोक्ति को रुद्रट के अनुसार ही माना और काकु की सहायता से भिन्न प्रतीत होने वाले मर्थ को 'काकवाक्षिप्त, व्यग्य स्वीकार किया है। केवल राजशेखर ने काकु के अलकारत्व को मा यता नहीं दी है । वैसे उसे काव्य का जीवित तक स्वीकार कर डाला है ।२ काव्यालकार म काकु-वक्रोक्ति का लक्षण इस प्रकार है जहां पर (काव्य मे) स्वर विशेष (क्ठ ध्वनि विशेप) से स्फुट उच्चायमाण पदादि से पक्लिष्ट (कल्पना रहित) अथवा बिना विशेष खीचतान किये हुये अर्थातर प्रतीति होती है उसे काकु वनोक्ति कहते हैं।' काव्यालकार में मर्यालकारो को चार भागो मे विभक्त किया गया है १ वास्तव २ प्रौपम्य ३ भतिशय ४ प्लेष। वास्तव कोटि के मलकारो में भाव' नामक मलकार भी माना गया है। इस प्रकार के दो लक्षण मौर दो उदाहरण इस प्रथ में उपयस्त हैं। उनमें प्रथम-- "जहां किसी भनेकातिक हेतु के द्वारा किसी व्यक्ति में विकार ( मुखमालि यादि) उत्पन्न होता है तथा वहो विकार अपने मोर हेतु के काय कारण भाव मोर विकारवान् यक्ति के मातरिक मभिप्राय का सूचक होता है वहां माव प्रलकार होता है। १ वपतुबोद्धष्यकाकूनो वाक्यवाध्याश्यसम्निषे । योऽथस्या यापपीहेतुापारो व्यक्तिरेव सा | का.प्र०, ३ २१-२२ काकुवनेविकार । वही २ मयकाकुकृतोलोके व्यवहारो न केवल । शास्त्रप्वप्यस्य साम्राज्य काव्यस्याप्येपजीवितम।-काव्य मीमासा । मर्यान्तरप्रतीतियत्रासो काकुवक्रोक्ति । काम्यालकार, २-१६ काव्यालकार ७ ६ अर्यस्यालकारा वास्तवमौपम्यमतिशय प्लेप। यस्प विकार प्रमवनप्रतिवदेन हेतुना येन । गमयति तदभिप्राय तत्प्रतिष प ध भावोऽसौ । का० ल०, ७ ३८ ३ रोतिकाल के पूर्व प्वनि का क्रमिक विकास . इसके उदाहरण मे रद्रट ने एक प्रार्या दी है जिसका अर्थ यह है, 'क्सिी प्रामतरण को नववजुलमजरी हाथ में लिये हुये देखने वाली तरुणी को मुख क्रान्ति अत्यन्त मलिन हो जाता है।' वास्तव मे ग्रामतरण को, जो उसका उपपति है इस तरुणो ने रति हेतु वजुय-बुज में मिलने का समेत कर दिया था। परतु वह गृहकाय अथवा विस्मति प्रादि कारणो से सकेत स्थल पर पहुँच न सकी, पामतरुण वहां पहुंचा और विप्रल घ वहां से वजुल मजुल-मजरी हाथ में लेकर उसको स्मृति दिलाने उसके घर पहुँचा । उसको उस प्रकार देखकर हार्दिक खिन्नता से उसकी ( तरुणी) मुख कान्ति मलिन पड गई । मुख मलिन छाया ही सहृदय को इस समस्त सदर्भ को सूचना देती है । काव्य प्रकाश एव अलवार-सरकार ने यही प्रार्या मध्यम काव्य के उदाहरण मे दी है और वजुल कुज म दत्त सकेत तरणो नही गई' मादि गुणीभूत व्यग्य स्वीकार किया है। दूसरे भाव का लक्षण-"जो वाक्य अपने वाच्यार्य का प्रतिपादन करते हुये वक्ता के अभिप्राय रूप भय विलक्षण प्रकृताथ थे विधि निषेध के भिन्न-अर्थ का भवगमन कराता है, वह वाक्य दूसरा भाव नामर पलवार है।'3 उदाहरण-स्वयदूती पथिक से कहती है इम गृह में मैं अकेली तरुणी अबला हूँ, गृहस्वामी विदेश गये हैं, बेचारी यह सास अधी मोर बहिरी है, मूर्स पथिक मेरे घर मे राति निवास पाहते हो'। इस कथन से प्रायातत तो निवास निषेध की प्रतीति होती है परतु तरुणी, मूक मादि पदों पर विचार करने से प्रकृतार्ग निपैध से विलक्षण विधिरूप अर्थ की प्रतीति होती है। भाव का प्रथम लक्षण और द्वितीय उदाहरण लोचन मे उधृत है । लोचनकार ने इसम गुणीभूत व्यग्य स्वीकार किया है। पर्याय का लक्षण उनके इम भाव लक्षण से मिलता-जुलता है । अन्य प्राचार्यों की भांति पर्याय मे उहोने अर्थातर को सत्ता स्वीकार को है । यह मर्म व्यग्य ही है । इसी प्रकार परिसरया, गम्योपमा, समासोक्ति, भयोक्ति एव वाक्यमूलक अर्थश्लेप प्रलंकारो में रुद्रट को मतर प्रतीति मा य है । इनमे से गम्पोपमा मोर समामोक्ति के लक्षणों का उल्लेख व्यग्या की मा यता की दढता के लिये किया जाता है । १ प्रामतरुण तरुण्या नववजुलमजरीसनायकरम । पशत्या भवतिमुहुनितरा मलिना मुखच्छाया ॥ का० ल०, ७ ३६ प्रत्र वञ्जुलकु ज्जे दन्तसकेता तरुणी न गतेति । व्यज्यते । तच्च गुणीभूत । अलकारशेखर, पृ० ११ एव काव्यप्रकाश-हरिमगल मिश्र, २ ३ अमिधेयमभिदधान तदेव तदसदशसकलगुणदोषम । अर्थातरमवगमयति यद्वा वाक्य सोऽपरो भाव । का० ल०७ ४० एकाक्निी यदबता तरणी तपाहमस्मिगृहे गृहपतिश्च गतो विदेशम । क्यिाचसे तदिह वासमिय वगकी श्वथ ममा धवधिरा ननु मूढ पाथ ॥ -वही,७ ४१ ५ लोचन, प०५३ २२ । प्यनि सिद्धान्त और व्यजनावृत्ति विवेचन गम्योपमा म सुप्रसिद्ध साधारण घम तद्वाची पद के प्रयोग के अभाव में प्रतीत होता है।' वाचक के प्रयोगाभाव म प्रतीति व्यग्य ही है। समासोक्ति-'जहाँ पर सभी समान विशेषणो से घण्यमान उपमान केवल उपमेय की प्रतीति कराता है वहां समासोक्ति नामक भलकार होता है ।'२ उदाहरण मे सुवृक्ष का वर्णन शब्दो से किया गया है अतएव वाच्य है परतु इससे उपमेयभूत सत्पुरप को प्रतीति व्यजना से ही हो सकती है । वक्ता को सत्पुस्प ही अभीष्ट भी है। प्रयश्लेष- रुद्रट ने अर्थश्लैप का प्रत्य त विस्तृत विवेचन किया है और उसके कई भेदोपभेद किये हैं। शुद्ध अर्थश्लेप के ये भाग हैं १ अविशेष, २ विरोध, ३ मधिक, ४ वक्र, ५ व्याज, ६ अस भव, ७ अवयव, ८ तत्व, ६ विरोधाभास और १० सश्लिष्ट । अर्थ श्लेप के अगणित भेद हो सकते हैं, मतएव उनका उल्लेख नहीं किया गया है । शुद्ध अर्थश्लेष के उपयुक्त भेदो मे से व्याजश्लेष एवं विरोधाभास परवर्ती प्राचार्यों के व्याज-स्तुति और विरोधाभास नामक मलकार ही हैं । रुद्रट द्वारा उपयस्त व्याजश्लप का उहाहरण घ्वनि के उदाहरणो म स्थान पा सकता है। उसके भविशेष, वन एव उक्तिश्लेष मे चमत्कारक व्यग्य सन्निविष्ट हैं । कदाचित् अर्थश्लेश के इस विस्तार को देखकर ही जयरप मे श्लेपवादियों की ध्वनि विरोधियो मे गणना की थी। और ध्वनिकार ने श्लेप एव ध्वनि मे अतर स्पष्ट करके भ्रम को दूर किया था। मग्निपुराण और ध्वनि- अग्निपुराण के समय एव उसकी विषय-सामग्री के सम्बघ मे मतभेद है । पुराण सग्रह ग्रय प्रतीत होता है। इसको यदि नवम् शतादी के भासपास का सग्रह स्वीकार किया जाता है तो ध्वनि का इस प्रकार प्रभाव स्वीकार किया जायगा इसका ध्वनि पर नहीं । इस समय से पूव का सिद्ध होने पर यह अथ ध्वनि विकास म एक अदभुत बडो सिद्ध होगा। मथ के 'शदार्थालकार' प्रकरण मे ध्वनि का उल्लेख मिलता है । इस प्रकरण के ७ से १६ तक के श्लोको मे मभिधा, लक्षणा एव ध्वनि का निम्न प्रकार का सकेत है । 'भाव प्रकटन का नाम अभिव्यक्ति है । इसके दो भेद है-श्रुति तथा प्राक्षेप । 'श्रुति श द से अपना प्रय प्रकट करती है। इसका एक भेद पारिभापिकी भी है जो सकतित मर्थ प्रकट करती है। वस्तुत यह पति १ कायालकार, ८-७ २ वही, ८ ६७ पत्र तरुरूपमान गुणसाघमर्यात्सत्पुरुपभेव गमयति । नमिसाधु, पृ० ११३ काव्यालवार, १०-१२ ध्वनिसम्प्रदाय और उसके सिद्धात, प० ३७६ ६ ध्वन्यालोक,प० ११६ अग्निपुराण का का यशास्त्रीय माग भूमिका, प०४ प्रक्टत्वमभि यक्ति ध्रुतिराक्षय इत्यादि । तस्या भेदो, श्रुतिस्तत्रशाद स्वाथ समपणम ।। अग्निपुराण, ३४५-७ 8 सकेत परिभाषेति तत स्यात्पारिभापिकी । वही, ३४५-८ रोतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास • २३ अभिधा ही है । उद्भट ने भी अपने रूपक-लक्षण मे 'श्रुति' का प्रयोग अभिधा के लिये किया है। लेखक ने युति का दूसरा भेद नमित्तिको माना है । यह भेद लक्षणा ही है। तदुपरान्त ध्वनि का इस प्रकार उल्लेख है। धुतेरलम्यमानार्यो यस्मादमाति सचेतन । समाक्षेपो ध्वनि स्थाच्च ध्वनिना व्यज्यते यत ।' 'जहाँ थुति (मभिधा ) से मलम्यमान जिस मय पथ की सचेतन को प्रतीति होती है, वह मार ध्वनि कहलाता है, क्याकि इसको व्यजना (प्रतीति ) ध्वनि से होती है।" श्री रामलाल वर्मा शास्त्री ने 'श्रुति' का अर्थ 'कर्णेद्रिय किया है जो प्रसग को देखते हुए उचित प्रतीत नहीं होता है । उसका अर्थ 'मभिधा' सगत जान पडता है। जिस प्रथ की प्रतीति मभिधा । परिमापिकी एव नमित्तिको लक्षणा से नही होती है, परन्तु सहृदय को उस मथ की प्रतीति होती अवश्य है, उसको ध्वनि कहते हैं। ध्वनिकार ने प्रथम उद्योत मे अभिषा एव लक्षणा से ध्वनि को भिन्न सिद्ध करके प्रकारा तर से यही बात कही है। इसमें अथ का 'माक्षेप' है । विरोप बात इसमे ध्वनि के नामकरण की है । ध्वनिकार का क्पन है कि उन्होंने 'ध्वनि नाम वयाकरणो से ग्रहण किया है । उह पग्निपुराण वा ऋण स्वीकार करना चाहिये था। दूसरी विशेष बात यह है कि "वनिनाव्यज्यते यत का प्रयोग है । वनिना का तृतीयान्त प्रयोग उसके करणत्व का सूचक है । यह स्पष्ट है कि 'ध्वनिना' का प्रयोग 'व्यजना के भय में 'पज्यते' का प्रयोग 'ध्व यते' के अथ में हुमा है । अन्य प्रकार से कही गई बात को 'पर्यायोक्त' कहकर पुराणकार ने 'एपाम्मेकतस्मेव समारया ध्वनिरित्यत 3 कहा है, जिसका प्रथ यह है कि इन प्रकारा मे से (धति के भेदो से) एक प्रकार, पर्यायोक्त ध्वनि भी कहा गया है अथवा सभी को सामूहिक रूप से ध्वनि मी कह सकते हैं । यदि अग्निपुराण के का यशास्त्रीय भाग को ध्वनिकार का पूर्ववर्ती स्वीकार किया जाता है तो यह निस्स देह सिद्ध होता है कि ध्वनिकार के काय के लिये पुराणकार ने यथेष्ट माग प्रशस्त कर दिया था । ध्वनि का उत्तरवर्ती मानने पर इसका मूल्य समाप्त हो जायगा । पान दवधन मोर उनका सिद्धात- ध्वनि स्वरूप-ध्वनि पूर्ववर्ती प्राचार्यों के काप सिद्धात्ता को परीक्षा करके यह दिखाया जा चुका है कि व्यग्य अथ की रमणीयता का प्रामास उनका था पर तु वे सिद्धात उसका प्रति- पादन न कर सके । इसका सिद्धात प्रतिपादन सव प्रथम प्रान दवर्द्धन ने ही किया। इसमे सदेह नहीं है कि व्यग्यार्थ का प्रधानता और रमणीयता के प्रतिपादन को प्रेरणा भावाय पान दवधन को अपने पूर्ववर्ती आचार्यों और महाकविया के काव्या स ही मिली। 'समाम्नात पूर्व से उहोंने इसी कृतनता का ज्ञापन किया है । इसका 'ध्वनि नाम उहान यावरणा से ग्रहण किया जसाकि उहोंने स्वीकार भी किया है। - . 1 १ 1 २ अग्निपुराण, ३४५---१५ अग्निपुराण का काव्यशास्त्रीय भाग, ५० ७६ अग्निपुराण, ३४५-१६ ध्व यालोक, प० ५५ ४ २४ ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन प्राचार्य ने ध्वनि-स्वरूप का निरूपण करने से पूर्व ध्वनि विरोधियों को कल्पना की है। वे प्रभाववादी २ भक्तिवादी और ३ प्रलक्षणीयतावादी । इन तीना वी उद्भावना करके उहोंने खडन भी किया है। इनमे प्रथम प्रभाववादी पक्ष विपययमूलक, द्वितीय भक्तिवादी सदेहमूलक और सतीय अलक्षणीयतावादी मपानमूलक हैं । प्रथम ध्वनि का स्पष्ट विरोध करता है, दूसरा सदेहवादी उसको ईपत्स्वीकृति प्रदान करता है और तीसरा केवल उसका लक्षण करने में मसमथ है। प्रभाववादी और अलक्षणीयतावादी पक्षा का उल्लेग करते समय परोक्ष भूत की क्रियामो का प्रयोग किया गया है । अतएव वे दोनो सम्भावित पक्ष हैं और भक्तिवादी पक्ष का उल्लेख वर्तमान की क्रिया से है । भतएव वह प्रवतमान भाचार्यों की भोर सकेत कराता है। इसी लिये लोचनकार ने उसमें भामह, उद्भट मादि के मत को प्रहण किया है। इसका यह तात्पय पदापि नही है कि ये पूर्ववर्ती प्राचाय ध्वनि का विरोध करते हैं जबकि उनकी कृतियो में व्यग्याथ के स्पष्ट समेत मिलते हैं । पान दवधन ने स्वीकार किया है कि कायो में गुणवृत्ति से व्यवहार दिखाने वाले (भटट उद्भट और भामह) ने ध्वनिमाग का थोड़ा सा स्पश करके उसका स्पष्ट लक्षण नहीं किया।' उभट और भामह के सिद्धान्तों मे ध्वनि का अतर्भाव न हो सके इसलिये इस भक्तिवादी पक्ष की कल्पना की गई है। प्रभाववादी पक्ष के भी तीन विकल्प हो सकते हैं १ प्रसिद्ध अभाव, २ रमणीयता का प्रभाव और ३ अन्तर्भाव का प्रभाव । प्रथम प्रकार के प्रभाववादी कह सकते हैं कि काव्य मे शब्द मौर पथ के चारुत्व हेतु अलकारा, सघटना घमगुणो और इही दोनो में अन्तभूत होने वाली उनागरिकादि वत्तियो मौर वैदर्भी पारि रीतियों के अतिरिक्त कोई अन्य सोदय हेतु प्रसिद्ध ही नही है। प्रतएव इनके अतिरिक्त ध्वनि कोई तत्त्व नहीं हो सकता है । १ दूसरे प्रकार के प्रभाववादी कह सकते हैं कि जितने काय माग प्रसिद्ध हैं उही में सोदय रहता है, उनके अतिरिक्त माग म सौदय न रहने से का यत्व भी न रह सकेगा। यदि कुछ सहृदयो की कल्पना कर सोदय मोर पाहलाद का सदभाव स्वीकार भी किया जायगा तो वह सभी विद्वानों को उस रूप मे न होगा। तीसरे प्रकार के अभाववाटी कह सकते हैं कि यदि ध्यनि-माग कमनीयता का मतिनमण नही करता तो उसका अन्तर्भाव प्रसिद्ध गुण प्रलकारादि म हो जायगा । फिर उनमे से ही किसी का नया नाम रख लेना व्यय होगा। उनकी दृष्टि म यह ध्वनि प्रवादमात्र है। भक्ति की व्युत्पत्ति चार प्रकार से की जा सकती है। सभी व्युत्पत्तिया के अनुसार भक्ति शब्द से पालकारिको को लक्षणा और मोमासको की गोणी, दो प्रकार की शब्द शक्तियो का ग्रहण होता है। इनसे प्राप्त होने वाले लक्ष्य और गौण, दोनों प्रथ भक्ति से ग्रहण १ ममुख्या वृत्या काव्येषु व्यवहार दशयता ध्वनिमार्गों मनाक स्पष्टोऽपि न लक्षित इति ध्वयालोक, प०१२। २ ध्व यालोक ३ वही, पृ०६ वही, पृ०६-१९ ४ रोतिकाल के पूर्व प्यनि का पमिक विकास २५ होते हैं । यह भक्तिवादी पक्ष ध्वनि का स्पष्ट विरोधो नहीं है । यदि विचार करके देखा जाम तो इसमे ध्वनि को इपत्स्वीकृत निहित है । कारण लक्षणा के प्रयाजन म ध्वनि रहती है। भक्तिपादो पर मुख्य व्यापार मभिधा वे अतिरिक्त एव गुणवृत्ति नामक ममुरय व्यापार भी मानता है । उद्भट ने भामह विवरण म भामह के 'अभियानाथ को व्याख्या में 'मुख्य अभिधा व्यापार और गुणवृत्ति प्रमुख्य व्यापार माना है।' प्रतएव यदि ध्वनि मुख्य व्यापार मभिधा के अतिरिक्त कोई भमुख्य व्यापार है तो उसका ग्रहण गुणवृत्ति से हो जायगा । पारण, ध्वनिकार ने भी उस सहृदय श्लाध्य मथ के दो भेद स्यो कार किये हैं । अग्निपुराण मे अभिधा के पारिभाषियी और नमित्तिको दो भेद क्यि हैं। उनकी नमित्तिको सक्षणा ही है । इसलिए लक्षणा मे अन्तर्भाव हो जाने के कारण ध्वनि यो अलग व्यापार मानना इन प्रभीप्ट नहीं है । ध्वनि वे अलक्षणीयतावादी विरोधी पत करण से ध्वनि सद्भाव स्वीकार करते हैं, वे पेवल उस तत्व को अनिवचनीय मानकर उसका लक्षण निश्चित करने में प्रममय हैं । ये ध्वनि के साक्षात् विरोधी नहीं माने जा सकते । ध्वनिकार इन तीनो विराधी पक्षा की अवतारणा परके ध्वनि का स्वरूप निर्देश करते हैं। कारण, मम्पूण सत्काव्या के परमरहस्य भून अत्यन्त रमणीय उस तत्व का रामायण, महाभारत प्रादि लक्ष्य ग्रयो म सवत्र सनिवेश है । उस सहृदय इलाध्य काव्यात्मा अथ थे वाच्य और प्रती पमान दो भेद हैं । मथ तो तीन प्रकार का होता है वाच्य, लक्ष्य और व्यग्य । गुणवृत्ति के रूप मे ध्वनिवार को भी तीसरा-लक्ष्य अथ मा य है। फिर उसका प्रय भेदा म क्यो नही गिना ? उसका कारण यह जान पडता है कि वाच्य लक्ष्य और व्यग्य को प्राधार भूमि है और व्यग्य काव्य को मारमा है । यह भर्थ भेद प्राधाय की दृष्टि से है। ये दा अर्थ हो प्रधान है एक लक्ष्य पौर व्यग्य का प्राधार हाने ५ कारण और दूसरा चारुता की दृष्टि स प्रधान होने कारण । प्रतीयमा। अर्थ वाच्य स निवान्त भिन है, वह तो महाव विया की वाणी मे काव्य के प्रसिद्ध दार्थ-दारीर से उसी प्रकार भिन्न प्रतीत होता है जिस प्रकार स्त्रियो का लावण्य । वह समस्त अवयवो से पृथक प्रतीत होता हुमा जिस प्रकार सहृदयो ये लोचनो को शीतल करता है, उसी प्रकार काय ममज्ञा को यह अर्थ नाहनादित करता है । मोतियो म आन्तरिक कान्ति की भांति अगा मे जो तरलत्व प्रतीत होता है उसे लावणय कहत हैं । 'ध्वनि शद' को व्युत्पत्ति पाच प्रकार मे होती है। १-'ध्वनति इति ध्वनि व्युत्पति काय गरीर शब्ाथ से सम्बधित है। सहृदयश्लाघ्य अथ के जो वाच्य और प्रतीयमान भेद क्यि है उनम से वाच्य वा ध्वनि के प्रतगत ग्रहण इसी "युत्पत्ति से होता है । वाच्य से वाचक शद को सहकारिता के कारण ग्रहण किया जाता १ शदानामभिधानभभिव्यापारो मुख्यो गृणवृत्तिश्च । लोचन, पृ० १२ ध्वयालोक, कारिका, २ यही कारिवा४ लोचन, पृ. ३६, नगेद्र भूमिका, पृ० २४, काव्यालोक रामहिन, पृ० २०० शदोऽप्येव व्यग्यो वा ध्वयते इति । लोचन, पृ० ३६ २ ३ २६ ध्वनि सिद्धान्त और ध्यजनावृत्ति विवेचन १ २--'ध्ययते इति ध्वनि' व्युत्पत्ति से विविध प्रतीयमान अथ ध्वनि कहलाता है । यही काव्य की मात्मा है । रसादि अथ ध्वनि को भी प्रात्मा हैं । उही दोनो व्युत्पत्तिया को ध्यान में रखकर ध्वनि की भूमिका म माचाय ने प्रथ के वाच्य और प्रतीयमान दो भेद किये हैं। प्रतीयमान अथ तीन प्रकार का होता है १ वस्तुमात्र, २ अलकार और ३ रसादि । इनका विस्तृत विवेचन अवसर पर होगा । यह अथ अपने तीनो स्पो मे वाच्य से सवया मिन होता है । कही वाच्य विधि रूप है तो वह प्रतिपेघ रूप, कही इसके विपरीत कही विधि प्रतिषेध भिन्न रूप मोर कही भिन्न विषयगत प्रतीत होता है । द्वितीय, अलकार ध्वनि भी वाच्य अलकार से भित है। रमादि ध्वनि तो वाच्य से विभिन्न है हो । कारण, जर रसादि स्वश दनिवेदित होते हैं तब एक तो रसादि की प्रतीति नहीं होती है और दूसरे स्वश वाच्यत्व दोष भी माना जाता है । रसादि की प्रतीति स्वशब्दवाच्यत्व के अभाव म विभावादि के द्वारा ही होती है। हां, उसकी प्रतीति वाच्य के साथ ही होती है ' वह वाच्याथ की सामथ्य स प्राक्षिप्त होता है । वह सद व्यापार का विषय नहीं है। वह रसादिरूप प्रतीयमान अथ ही इतिहास और स्वानुभव से काव्य का सवस्व सिद्ध होता है । प्रौंचमियुन के वियोगोत्पन्न शोक के रूप में वही पथ प्राचीन काल म मादि-कवि वाल्मीकि के मुस से काव्यरूप लोक मनि सत हुपा था । रस का यह प्राधा य इतिहास प्रसिद्ध है । केवल प्यावरण से शाथ सम्बध मात्र जान लेने से हो उस अथ यो जानने की क्षमता नहीं पाती है, वह पाट्याथ तत्वना को ही प्रतीति होती है। इस प्रतीयमान भय को व्यक्त करने की शक्ति से युक्त कोई विरोप गदा ही है । रादमात्र म उसको भभिव्यक्त करने की सामथ्य नहीं है । हो पा काव्य म प्राधा य है भतएव महाकवि को उनको पहिचानने का प्रयत्न करना चाहिये । फिर भी वाग्य-वाचा का प्रथम उपादान प्यथ नही है क्योंकि व्यग्याथ की प्रतिपत्ति याच्यायपूर्विश होती है और वह वाक्याथ पदाय से उसी प्रकार प्रतीत होता है जिस प्रकार दीपक के प्रकार से मधवार म स्थित वस्तु । जिस प्रकार वाक्याय के प्रकाशित होने पर पदाय विभावना समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार महृदय की तत्वदगिनी बुद्धि म उस व्यग्याध की शोघ्र प्रतीति होन पर वाच्याथ पात हो जाता है।' 1-ध्वनि की मधिकरण प्रधान व्युत्पत्ति ध्यायतेऽस्मिन्तिति प्यनि ' से काव्य विप का ग्रहण होता है। इस काव्य विरोप म व्य जर पारायं गुणीभूत होकर उस प्रतीयमान मर्य को प्रभि ध्यक्त परते हैं। यहाँ हम ध्वनि वे तीन व्युत्पत्तिपरप प्रों म ध्वनि का सदभाव और उसकी प्रधानता सिद्ध १ मपालोर, पृ०१८-३१ २ वयालोर, १-५ ३ वहीं,१-७ ४ वही, १-८ घही, १-१-१० हो, १-११-१२ यही, पारिरा १३ रीतिकाल के पूर्व पति का अमिर विकास की गयी। परणपरक व्युत्पति मे व्यजा पति वो ग्रहण क्यिा जाता है। व्यजना की प्रभिधा तथा लक्षणा से भिन्नता अगो मध्याय म प्रदर्शित की जायगी। व्यजना हो चतुथ व्यापार है। इसी की सहायता से प्रभीष्टाय की प्राप्ति होती है। इसके बाद उहोंने विरोध-विवल्पा का समाधान किया है। सब प्रथम प्रमाववादी दष्टि से तीन विरल क्येि ये१ प्रसिद्धि प्रभाव र रमणीयता भाव ३ प्रातर्भाव प्रभाव । ध्वनि देवल काध्य लक्षण-कारी के लिये हो मप्रसिद्ध रही है। सक्ष्य प्रयों की परीक्षा करने पर वही सहृदय हृदयाह लादकारी काव्यनत्व सिद्ध होती है।' वह का यतत्व महत्यहृदयाह लादकारी है प्रतएव उसम रमणीयातामाव स्वीकार नहीं विया जा सकता है। वह काव्यतत्व यदि रमणीयतायुक्त है तो उमया प्रसिद्ध प्रलकारादि प्रकारो म अन्तर्भाव हो जायगा, यह प्रभाववादी पक्ष का तीसरा विकल्प है। यह विकल्प भी प्रममीचीन है। कारण, वाच्यवाचक भाव पर प्राधिन रहने वाले अलवार माग में यग्य-उपज प्राश्रित ध्यान का अर्भाव करो हो सकता है ? दूसरे वाच्य वाचव चारुत्व हेतु उसो अग हैं, वह अगी है । जहाँ प्रतीयमान अप की स्पष्ट प्रतीति नही होती यहाँ ध्वनि नहीं मानी जायगी । यदि यह कहा जाय कि समा सोक्ति, पाप, पर्यायोक्त, अपहति प्रादि अलवारो म ध्वनि का प्रतर्भाव हो जायगा क्योंकि इन अलकारा मे प्रतीयमान प्रथ की प्रतीति होती है, यह कथन भी मसमीचीन है। कारण, प्रल पाणबाच्ययावक पा प्रापा य का रहता है और प्यानि मे उनका गौणत्व विवक्षित है। प्रतएव उक्त प्रलयारा म ध्वनि का प्रतर्भाव नहीं हो सकता है। यदि पर्यायोक्त ( उभट सम्मत) में पनि का प्राधा य स्वीकार किया जाय तो उसका भतर्भाव ध्वनि म हो जायगा, ध्वनि का उसम नही । वनि वा उसके अतिरिक्त भा विषय है । भामह के पर्यायोक्त मे पनि का प्राधा य नहीं है। २ इस प्रकार प्रभाववादी तीनो विकल्पो पा निराकरण पर यह सिद्ध हो गया कि ध्वनि है। भतिवादी पक्ष में मो ती विकल्प सम्भव हैं-१ भक्ति और ध्वनि को स्वाप एक्ता भक्तिमतिका लक्षण और ३ भक्ति ध्वनि का उपलक्षण | भक्तिवापाच्याथ से नियत सम्बध होता है परन्तु ध्वति का उससे नियत सम्बघ ही नहीं होता है । इसलिए दोनों मे स्वस्प भिन्नता है। भव्याप्ति और प्रतियाप्ति दोष के कारण भक्ति ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती है, और न उसका उपलक्षण ।" इसका वि तृत विवेचन द्वितीय अध्याय में किया जायगा। ध्वनि का सामाय और विशेष लक्षण प्रतिपादित होने पर प्रलक्षणीयतावादी पम का ध्वन्यालोक, पृ० ३६ २ वही, पृ० ४०-४१ ति भाग । ३ वही, पृ०४६ भत्तया विति नैवत्व रूपभेदादय ध्वनि । व यालोक, १, १७ ॥ १ ध्वयानोक, १, १७ ॥

ध्यान सिसात और ध्यजनावृत्ति विवेचन भी समाधान हो जायगा। यदि ध्वनि को अनिवचनीय कहने में प्रतियोक्ति का प्रयोग पर उसके उत्कृष्ट स्वरूप का कथन है तो उचित है। ध्वनि की मत्ता और उसके स्वरूप के निश्चय के पश्चात् व्यग्य और व्यजक को दृष्टि से ध्वनिकार ने उसके भेदोपभेद करने का प्रयत्न क्यिा है। व्यग्य अर्थ की दृष्टि से ध्वनि दो प्रकार की है-१ अविवक्षित वाच्य ध्वनि और २ विवक्षितायपरवाच्य ध्वनि । इनमे स प्रथम में लक्षणामूलक व्यग्य की स्थिति होती है और द्वितीय म अभिधा मूलक व्यग्य की । लक्षणा मूलक व्यग्य लक्षणा के भेदा की दृष्टि से दो प्रकार का होता है। एक म मजहत्स्वार्थी लक्षणा की स्थिति होती है और दूसरे में जहत्स्वार्थी की। इनके आधार पर अविवक्षित वाच्य ध्वनि के दो भेद किये गये हैं। जिस रूप म प्रजहत्स्वार्थी लक्षणा रहती है उसे अर्थातर समितवाच्य नाम दिया जाता है और जिसमे जहत्स्वार्थी लक्षणा रहती है उसे अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य नाम दिया जाता है। विवक्षितायपर वाच्य ध्वनि के भी दो भेद हैं-१ मसलक्ष्यनाम व्यग्य और सलक्षत्रम ध्यग्य । इनमें से अस लक्ष्यक्रम व्यग्य म रस ध्वनि, भाव ध्वनि रस भाव के माभास आदि का ग्रहण किया जाता है । यह रसादि ध्वनि ही ध्वनि को भी प्रारमा है। इसी के सम्बध से श दा लकार और अर्यालकार भी ध्वनि के विषय हो जाते हैं। ध्वनि काव्य म रसादि की प्रधानता का होना मावश्यक है । जहाँ ये रसभाव आदि गौणता प्राप्त कर लेते हैं वहाँ ये रसवत अलकार माने जाते हैं । काय म गुण रसाश्रित माने जाते हैं । गुणों का रसा से नित्य सम्बध है । शृङ्गार करणा मादि कोमल रसा से युक्त का य मे माधुय गुण की स्थिति रहती है, रोद, वीर मारि रसो मे पोज और प्रसाद गुण सभी रसा से सम्बधित है। रस चित्तवृत्ति स्प है । इनमे करण, विप्रलम्भ शृङ्गार मौर शृङ्गार म चित्त द्रुति की स्थिति म रहता है, रौद्र, वीर और वीभत्स म दीप्ति की स्थिति म और स्वच्छता अथवा विस्मृति स्थिति मे सभी रसो म रहता है । चित की तीन द्रुति, दीप्ति और विस्तृति स्थितियो की दृष्टि स क्रमश माधुर्य, ओज मोर प्रसाद गुण मान जाते हैं । यह रसादि ध्वनिरूप मसलक्ष्यक्रम यद्यपि स्वगत प्रौर परगत भेदो के मिश्रण के आधार पर प्रनत प्रकार का हो सकता है, पर तु वह एक प्रकार का ही माना जाता है । रस निवधन का कवि को प्रयत्न करना चाहिये । इस प्रयत्न मे ही जिन अलकारो की योजना स्वत ही काव्य म। जाती है, वे ही अलकार साथक हैं। यमक और अनुप्रास का सानुबघ निर्वाह रस-परिपाक मे बाधक होता है इसलिये रस निबध न करने वाले को चाहिये कि काव्य में इनकी योजना करने मे समय होने पर भी इनकी योजना नही करे। सलक्ष्यगम म्यग्य भी शब्दाक्तिमूल और प्रयशक्तिमूल दृष्टि से दो प्रकार का होता है। इनम से पशब्द शक्ति मूल ध्वनि मे केवल प्रलकार ध्वनि ही सम्मिलित है। इस ध्वनि का क्षेत्र श्लेष से नितात भिन है। भयाक्तिमूल ध्वनि भी पाक्षिप्त वस्तु और प्राक्षिप्त प्रलवार की दृष्टि से दो प्रकार की है । भय भी स्वत सम्भवी और कवि प्रोटोक्ति सिद्ध दो प्रकार का होता है । इस प्रकार अथक्ति मूल ध्वनि के माठ भेद हो गये। जहाँ व्यग्य अथ अप्रधान और कम चमत्कार युक्त होता है। वहा गुणीभूत व्यग्य माना जाता है । ध्वनि की दृष्टि से काव्य के मुख्य दो ही भेट हैं । ध्वयालोक के द्वितीय उद्योत म व्यग्य रोतिकाल के पूय घ्यनि का क्रमिक विकास २६ अथ को दृष्टि से हो ध्वनि का विभाजन किया गया है। तृतीय मे व्यजक दृष्टि से भेद क्येि गये हैं। ध्वनि के सभी भेद और उपभेदा म कभी पद व्यजक होता है और कभी वाक्य । प्रसल- ध्याम में पद और वाक्य के अतिरिक्त वण, सघटना और प्रबंध को भी व्यजकता हो सकती है। मलक्ष्याम व्यग्य में प्रथशक्तिमून घ्वनि में भी प्रबध व्यजक होता है। वणमाला मे अल्पप्रारण वण कोमल माने जाते हैं और महाप्राण कठोर। कोमल वणों का प्रयोग शृगार, विप्रलम्भ और करण के लिए प्रावश्यक होता है क्याकि ये माधुर्य के व्यजक होते हैं । इन रसो म महाप्राण वर्गों का प्रयोग दोषाधायक होता है। ये महाप्राण वणरोद्र और वीर रस में प्रोज व्यजक होने के कारण प्रौचित्यपूण होते हैं । इसी प्रकार सघटना भी रसो की व्यजक होती है। सघटना माधुय प्रादि गुणा के माथित रहती है । वण मोर सघटना से माधुय आदि गुणों की व्यजना होती है । सपटना, वक्ता, विपय अादि की दृष्टि से असमासा, दीपसमासा तथा मध्यसमागा होती है। इस प्रकार ध्वनि काव्य, गुणीभूत यग्य काय वे सपर और समृष्टि के द्वारा अनन्त भेद हो सकते हैं । सक्षेप में यही ध्वयालोक का विपय है । धान दवधन ने ध्वनि के प्राविमार से रस मीमामा वो प्रथमवार ही कलात्मर दृष्टिकोण प्रदान किया तथा रस और रसास्वादन पी मनोवनानिक सौदय नास्त्रीय विवेचना प्रस्तुत की। ध्वनि का प्राविष्कार भारतीय रम मीमांसा के इतिहाग में प्रत्यत महत्वपूण घटना है।' ध्वनि सिद्धात म मभी पालोचना सम्प्रदाया वा सम वय हो गया। यहो सवम महत्वपूण काय है । प्राचाय राजशेखर और उनका पाकु व्याय- वाय मीमासा के प्रणेता प्राचाय राजशेखर (८७०६२०) ध्वनि सिद्धात के प्रवतक मान दवधन के परवर्ती प्राचार्ग हैं । काय मीमासा का पूरा ग्रथ उपलब्ध नही है। इसलिए प्राचाय पी रीति, वृत्ति ध्वनि प्रादि समची धारणा का निश्चयात्मर पता नहीं है, परतु यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जा सकता है कि ग्राम के "मौक्तिक' अधिकरण में ध्वनि निरूपण होता है । कायमीमासा के हिती अनुवादक पडित वेदारनाय शमा न अपनी भूमिका मे इम मा यता की पुष्टि करते हुए लिखा है "रसो और रीतियो के सम्बघ म एक एक अधिकरण के अतिरिक्त एक सौतिक अधिकरण भी लिखा है । इम अधिकरण मे उत्ति सम्ब धा विचार हैं । सम्भवत इसमे अभिधा, लक्षणा, और व्यजना सम्बधी विचारा की मीमासा की गई है, जो प्राचाय पान द वे ध्व यालोक का मुख्य विषय है।' राजशेखर वयालोक से परिचित अवश्य थे । वयालोक की पवि सम्वधिनी अव्युत्पत्ति उसी रूप में परिक्र श्लोर के साथ काय मीमासा मे उद्धृत है।' उनसे पहले भामह इत्यादि अनेक प्रमिद्ध प्राचाय हुए थे। ग्रथ के प्रस्तुत अधिकरण में इहोने यथासम्भव सभी प्राचार्यों से ग्रहण किया है । यथावसर अय मता की प्रालोचना भी की है १ रस और रसास्वदन, पृ० ३२। २ कायमीमांसा, हिदी, अनुवाद भूमिका, पृ० २७ ३ वही, पृ० ३७ ध्वनि सिसात मोर व्यसनावृति विवेचन यथा काकु के प्रसग म रुद्रट की कार, यनोक्ति अलकार को।' अतएव ध्वनि जरो प्रसिद्ध साहित्य प्रस्थान को वह अनालोच्च क्मे छोड दते । समवत उहाने उसका प्रसग निरूपण 'पौक्तिक प्रधिकरण म क्यिा है जो दुर्भाग्यवा अप्राप्य है । काव्यमीमासा मे उक्ति का प्रयोग व्यग्य चमत्कार के लिए ही हुआ है। इसी उक्ति की स्थिति के कारण ही उहोने वार के अलकारत्व का सडन कर पायजीवित स्वीकार कर लिया है। अय काकुकृतो लोचे व्यवहारो न केवल । शास्त्र प्यस्य साम्राज्य वा यस्याप्येपजीवितम् ॥२ पाव्य की प्रारण यह काकु अर्थातर का स्फुटत करने में सतत तत्पर रहती है और सहृदया की भावना को व्यक्त करती है काम विवृत्गुने काकुरन्तरमतद्रिता । स्पुटीकरोति तु सता भावाभिनयचातुरीम ॥' उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि राजशेखर ध्वनि का विरोध करो वाले व्यक्ति नही हैं। परन्तु उनके अनि सिद्धात समथन के सम्बध में कोई निश्चित निणय नहीं दिया जा सकता है। ध्वनि सिद्धान्त का विरोध द्रिका टोकापौर ध्वनि विरोध- ध्वन्यालोर के ध्वनि सिद्धान का प्रारम्भिक विरोध मौग्पिक हो रहा। प्राचाय पानाद वद्धन ने ध्वनि के बकलिला विराधा का उल्लख करते हुए गपन ममसामयिर पिसी मनोरप कवि का एक पद दिया है जिसका प्राशय निम्नलिखित है- "जिसमे न तो अलवार से युक्त मन को प्ररा न करने वाली कोई वस्तु है, न जो व्युत्पन वचनो द्वारा रची गई है भौर न जिगम वद्रोक्ति है, जड़ लोग उसो काय की, ध्वनि समवित कहकर बडे प्रेम से प्रशसा करते हैं । नहीं पता यदि कोई पुण्यात्मा उनमे उसका स्वरूप पूछ दे तो वे क्या कहेंगे।" परन्तु ध्वनि सिदात के लिखित रूप में आने के पश्चात उसा विरोध भी लिखित रूप म माने लगे। प्रत्येक मिद्धात के सम्बध मे यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। यह खण्डन मण्डन स्वतत्र प्रथा के रूप में भी हो सकता है और टीकामा के रूप मे भी। व्यक्ति विवेक का खण्डन करने लिए रुय्यर ने यत्ति विवेक यारयान नाम की प्रसिद्ध टीका लिखी । इसी प्रकार ध्वनि का साधारण विरोध करने और ध्वनि सिद्धान्त के विपरीत प्रथ का अथ लगाने के लिए अभिनवगुप्त के किसी पूववशज ने ध्वयालोक की 'चद्रिका' नामक टीका लिखी । रुय्यक न १ वही पृ० ७५ २ वही, पृ०७६ काय मीमासा, हिदा अनुवाद भूमिका, पृ० ७६ । घ्वयालोक पृ० १०॥

रीतिकाल के पूर्व प्वनि का कमिक विकास इसको ध्वनि विचार का प्रय स्वीकार किया है। महिमभटट को भी यही धारणा प्रतीत होती है। उन्होंने इसका अवलोकन नहीं दिया था, इस तथ्य को उहोंने अपने प्राय के प्रारम्भ में। स्वीकार किया है । लोचन में "द्रिया" की नातिया का समाधान किया गया है। मुकुलमटट द्वारा ध्वनि विरोध-चन्द्रिका के पश्चात अमिधावृत्ति मातृका के एणेता मुकुल भन्ट ने ध्वनि सिद्धात का विरोध दिया । उ होने ववल एक अभिधा व्यापार को ही माना । उहाने लापरिएक अर्थ को भी लक्षणावृति बोध्य न मानकर अभिधा के भीतर ही ग्रहण किया है । वाच्य के लक्षण और अभियावत्ति के दश प्रकारा से उपयुक्त कथन की पुष्टि होती है। उनका वाच्य लक्षण यह है "शब्द के द्वारा अमिधा व्यापार का प्राथय लेकर जो मुरय अथवा लाक्षणिक प्रय गोचर होता है उसे वाच्य कहते हैं । इससे स्पष्ट है कि लाक्षणिक अथ भी पापाय के मत म वाच्य ही है। प्रथ के अत म अभिधा के चार और लक्षण के छ प्रकारा को मिलकर कुल दस प्रकार अभिधा वृत्ति के माने गये हैं ।" बहने का तात्पय यह है कि व-यालोक की रचना के पश्चात् भी प्राचाय मुकुल ने सभी प्रकार के अर्थों को अमिधा व्यापार बोध्य मानने का साहस किया। मुकुलमटट ने ध्वनि सिद्धान्त को अवहेलना करते हुए लिखा है, "कतिपय सहृदयो न जिस ध्वनि का भूतन ढग से वर्णन किया है वह लाभणा माग के प्रवगाह्न के अतिरिक्त कुछ नही है। उन्होने तीन उदाहरण देकर उनका लक्षणा म अतर्भाव सिद्ध किया है । इन तीन उदाहरणो म से एक वस्तु ध्वनि, दसरा अलकार ध्वनि और वीमरा रस ध्वनि का उदाहरण है। इनमें लक्षणा के अनिमाय सहारी हेतुप्रो वा प्रभाव है अतएव उनका लक्षणा म अतर्भाव सिद्ध नहीं हो पाया है । मुकुल का खण्डन मम्मट ने शब्द व्यापार विचार नामक प्रकरण मे क्यिा है। इसके पश्चात मुकुल भट्ट के शिप्य प्रतिहार दुराज ने ध्वनि सिद्धात का प्रबल विरोध किया । उहोने काव्यालकारसार मग्रह को टीका लिखी। इसी टीका के प्रत में उन्होंने ध्वनि सम्बधी मत दिया है। प्राचाय प्रतिहारे दुराज का विरोष मुकुन ने अभिधा में एक भाग गौणी लक्षणा म व्यजना का अताव करने का प्रयत्न किया है और उहोने पयोक्ति, अतिशयोक्ति गादि अलवारो म इनका कथन है कि 'कुर सहृदय जिस ध्वनि नामक नूतन सिद्धात को का य को प्रात्मा पापित करते हैं उसको अलग काव्य धर्म मानने वो कोई प्रावश्यक्ता नहीं है । उसका भातर्भाव इही प्रसिद्ध मलकारा में हो जायगा । कदाचित उद्भट न भी ध्वनि का अलग विवेचन इसीलिए नही विया है। ध्वनि में तीन भेद माने जाते हैं-1 वस्तुवनि, २ प्रलवार वनि और रस १ द्रिका, ध्वनि विचारण प्रथ । व्यक्ति विवेक, पृ०६। २ मुरयस्याभिधावृतस्य प्रकाराश्चत्वारो लाक्षणिस्य तु पहित्यव दश प्रकार भिधावृतमत्र विवचिरम । अभिधावृत्ति मातृका, पृ० २१: शन मुरय लाक्षणिक वामिधाव्यापारमाश्रित्य यद्गोचरोलियत तद्वाच्यम् । अमिधावृत्ति मातृका, पृ० १० । लक्षणामार्गा वागाहित्व तु ध्यने सहृदयन्तनतयोपरिणतस्य विद्यते तम् । पृ० २१ ध्वनि सिद्धान्त और व्यजनावृत्ति विवेचन ध्वनि । इस त्रिविधि ध्वनि भेदा से वस्तु ध्वनि का अतर्भाव पर्यायोक्त में हो सकता है और अलकार ध्वनि का मतर्भाव भी पर्यायोक्त अथवा अय मलकारो म सम्भव है। रही रस ध्वनि की बात, उसम से जहाँ रस भाव आदि अगी होते हैं ये रसवत् अलकार माने हो जाते हैं और जहा वे अग रूप में चित्रित होते हैं वहां द्वितीय उदात्त मलकार माना जाता है। इनके अतिरिक्त ध्वनि मे कोई दूसरी विपता नहीं होती है। प्रनिहारे दुराज ने ध्वनि के समस्त भेदा को भी उपयुक्त भांति से प्रमाय ही सिद्ध किया है। उनकी मा यता है कि उद्भट के घलकार प्रपच को विस्तृत रूप प्रदान कर देने के पश्चात ध्वनि को का यात्मा स्वीकार करने म कोई युक्ति नहीं है।' प्रतिहारे दुराज के तकों का अलग उत्तर देन की ध्वनिवादिया ने अावश्यक्ता नहीं समभी, कारण, पालकारिको की मा यतानो का खण्डन करने पर उनको मा यतामो का स्वत ही खण्डन हो जाता है। प्राचाय भट्ट नायक का ध्वनि विरोध-भट्टनायक न धनि का खण्डन करने के लिए हृदय दर्पण नामक ग्रथ की रचना थी । व्यक्ति विवेव प्रथ के यारयाकार रुययक ने यही मा यता व्यक्त की है । इसी मा यता का समथन महिमभट्ट और अभिनवगुप्त ने दिया है । महिमभट्ट ने यद्यपि हृदय दपण का अवलोकन नहीं किया था, परतु उसका नाम बडे उत्साह के साथ स्मरण किया है क्यानि स्वय वह भी ध्वनि का अनुमान में अतर्भाव करने क लिए प्रवत्त थे । अभिनवगुप्त ने अपनी टीका म अनेक स्थानो पर हृदयदपण के मत को उद्धृत करके उसका खण्डन किया है। लोचन के उद्धरणो से उनके प्रति थोडो अवना सी प्रतीत होती है। ग्रथ के अनुपलब्ध होन के पारण इन उद्धरणो के सकलन स ही प्राचाय के ध्वनि-सम्बधी अभिमत का चित्र मिल सकता है । यहाँ पर दो तीन प्रसगों का उल्लेख ही प्रथेष्ट होगा। उहोंने कहा था, 'यदि ध्वनि नाम के इस व्यजनात्मक यापार व अभिधा और भावना रसचवणा भेद सिद्ध भी हो जाय तो भी उसका काय म अशत्व ही होगा, रूपता नहीं होगी, अर्थात् उस ध्वनि म सम्पूण काय का अतर्भाव न हो सकेगा। इसका निराकरण लोचनकार ने इस प्रकार किया है, रस मलकार और वस्तु भेद से ध्वनि तीन प्रकार की स्वीवार की गई है । उन तीनो भेदा म रसचवर्णा अथवा रम ध्वनि ही कार का प्राण होता है । इस विषय में हृदय दपण के प्रणेता का भी मतैक्य है क्योकि उहाने भी काम्य म एक मात्र रस की प्रधानता मानी है, ज्ञान और उपदेश को नहीं। ऐसी स्थिति मे काय में ध्वनि की रूपता नहीं मानी जा सकती इत्यादि कथन से यही समभा जा सकता है कि प्रश मानने स उनका (भट्टनायक) का अभिप्राय यह है कि वस्तु और अलकार ध्वनियाँ अश होती हैं । यदि एसा ही है तो इसस ध्वनिकार के मत का ही समर्थन होता है । इसके विपरीत रस को काय का सबस्व स्वीकार रखे अश मानने पर स्वमत के विरोध के साथ प्रसिद्धि और स्वसवेदन सिद्ध तत्व का विरोध होगा। भट्टनायक के २ ३ लघुवत्ति पृ० ८५ ६२ दपणी हृदयदर्पणाख्यो ध्वनिध्वसपथ । व्यक्ति विवेक-व्याख्यान, पृ०६ ध्वयालोष तारावती पृ. ६ ॥ काध्यरसयितासों न बौद्धा न नियोगमाक । हृदय पण लो०प०१४। Y रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास उद्धारणा की परीक्षा से यह निष्क्ष निकलता है कि वह ध्वनि को रस तक ही सीमित करके अलकार ध्वनि और वस्तुध्वनि का प्रत्याख्यान करना चाहते थे।' वह काव्य में एक मात्र रस को प्रधानता स्वीकार करते हैं । इसका कपर उल्लेख हो चुका है । परन्तु रस निष्पत्ति के सम्बध मे उहोने भावकत्व और भोगकृतत्व दा भिन्न व्यापार स्वीकार किये हैं । अभिनव गुप्त ने अपनी टीका मे उनके रस निप्पत्ति विषयक मा यता को विस्तृत और मार्मिक मोमांसा करके भोग व्यापार का ध्वनि म मतर्भाव क्यिा पीर रस के मुक्तिवाद के स्थान में अभिव्यक्तिवाद की स्थापना की। ध्वनिकार ने ध्वनि का जो लक्षण किया है उसम 'व्यक्त काव्य विरोप पद समूह का प्रयोग है। व्यक्त' मिया में द्विवचन का प्रयोग है । ऐसा जान पडता है कि जिस प्रकार व्यक्तिविवेक- कार ने इस लक्षण में दम दापा का उद्घाटन करने का प्रयत्न किया था उसी प्रकार कदाचित भटटनायक ने भी इस लक्षण मे कतिपय दोष दिखायें हाग । उनम से क्रिया के द्विवचन को दूपित मित करना भी एक दोष रहा होगा । लाचनकार ने भटटनायक के द्विवचन के खण्डन को गज निमोलिका ( बिना सोचे समझे खण्डन पर टूट पडता) स्वीकार किया है। ध्वनिकार ने लक्षण म द्विवचन का ठीक ही प्रयोग किया है क्याकि अविवक्षित वाच्य में शब्द व्यजक होता है और प्रय की उसम सहकारिता बनी रहती है तया विवक्षिताय पर वाच्य में अथ की व्यजक्ता के साथ शद को सहकारिता समाप्त नही होती है । शब्द और अथ की प्यजकता को समान महत्व देने के लिए ही निकार ने लक्षण म द्विवचन का प्रयोग किया है।' ऐसा प्रतीत हाता है कि घ्व यालोक म उद्धृत पद्या को भट्टनायक ने अपने अनुसार व्याख्या करके भी ध्वनि का खण्डन किया । लोचनकार ने यत्र-तन पद्या को ध्वनिपरक व्याख्या करते हुये भटटनापक की व्याख्याना का निराकरण किया है । घ्व यालोक म- धार्मिक निभय तोडिय गोदा कुज स फूल । हत्यो वही के सिंह ने कूकुर तव भय भूल ॥' उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है । प्राचाय ने यहा पर सिंह ग्रादि वस्तु ध्वनि का और धार्मिक इत्यादि पदो के प्रयोग म भयानक रम के प्रावेश से उद्भूत निषेध को प्रतीति मानी है ४ और वस्तु ध्वनि म झोप दिखलाते हुए इसम रस की अनुग्राहक्ता स्वीकार की हैं अभि- नव गुप्त न भयानक रस के स्थाना मे शृगार सिद्ध किया है जो उचित ही है । भटटनायक ने भी कदाचित् भ्रमण निषेध को प्रतीत के लिए हो भयानर रम का उल्लेख किया है। वस्तु ध्वनि रसानुमाता के सम्बध में उनकी खिल्ली उडाते हुए लोचनकार ने लिखा है, 'यह ध्वनि का 12 १ हिस्ट्री प्राफ सस्कृत पोपटिक्स पी० वी० काणे, पृ० २२३-२२४ । २ तेन भटटनायकेन द्विवचन दूषितम् तद्गनिमीवियव । घ्व० ता०, पृ० १८६ । ३ भ्रम धार्मिक विश्रब्ध इत्यादि, ध्वयालोक, ५० १६ । यत्त. मटटनायकेनोक्तम्-दहप्तसिंहादिपद प्रयोगे च धामिन पद प्रयोगे घ भयानकरसावेशकृतव निषेधावगति । द० ता०, १२५ । ५ विच वस्तुध्वनि दूषयता रसध्वनि स्तनुग्राह्न समस्यते । ध्व०, पृ० १२७ ।

३४ ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन अच्छा खण्डन हुमा । श्रीमान का मोघ भी हमारे लिए वरदान के समान है । यदि उनकी रसा नुग्राहकता का तात्पय रस की प्रधानता से है तो यह हमारे पक्ष का ही समथन है। प्राक्षेपकर्ता भटटनायक की दृष्टि में यदि यह वस्तुध्वनि का उचित उदाहरण नहो, तो वाव्य का उदाहरण होने के कारण दोनो ध्वनियो भटटनायक की दृष्टि से रसनुग्राहक्ता और ध्वनि की दृष्टि से वस्तु ध्वनि का उदाहरण मानने मे कोई दोष नही है । ध्वनि के तीना प्रबल विरोधियो भटटनायक, कुतक और महिमभटट की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वे काव्य म रस को प्रधानता का विरोध न कर सके । ध्वनि के समयको के लिए उनको यही मा यता सबसे बडा बल था। महामहोपाध्याय पी० वी० काणे के नुसार भटटनायक ध्वनि के उन विराधियो म परि गणित होते हैं । वह उन लोगो के वग म थे जिनको दयालोक मे ध्वनि के तत्व को कभी वाणी का विषय ही स्वीकार न करने वाला माना गया है । धनजय मोर पनि का ध्यान विरोय- दशरणव की कारिकामा की रचना धनजय ने की है और उस पर प्रवलाव नामन वृत्ति को रचना उनके भाई घनिक न की है । दोनो हो भाई अभिहिता चयवादी मटट मोमासको से प्रत्यधिक प्रभावित हैं और उनकी भांति गट की वेवल तीन ही वृत्तिा मानते है । ये दोनो भाई शब्त को चतुर्थ शक्ति व्यजना के पटटर विरोधी हैं । उन्होने रस-योध भी तात्पर्या शक्ति स ही स्वीकार किया है। ध्वनिवादी माचाय रस-बोध केवल व्यजना से ही स्वीकार करते है इसलिए व्यनाा फा खण्डन करने के लिए मवलोक्कार धनिक ने पहले मार दवद्ध न और अभिनवगुप्त का सिद्धात सारारा पूर्वपन के रूप में प्रस्तुत किया है और तत्पश्चात उरारो भमाय सिद्ध करने यह दिखान वा प्रयत्न क्यिा है कि रस वोप भी तात्पर्या गति से हो सकता है, अलकार मोर वस्तु बोध को सो प्वनिवाी भी वाच्य स्वीकार कर लेते हैं । यहा पर पूर्व पक्ष का उदधृत करने की मावश्यक्ता नहीं है । फेवल उत्तर पक्ष वा सारा ही नीचे दिया जाता है। लौक्सि वाक्यो में दो प्रकार वे पदा या प्रयोग होता है, ण्य पारय पद, दूसरा दिया पद । इही को वैयाररणो ने ग्रमा सिद्ध और साध्य नाम दिया है । साध्य को विधेय भी पहा जाता है । यावय का तालय भपया वाक्पार्थ साध्य ही है गिद्ध नही । फ्लत निया म हा वाक्य मा तात्पप निहित होता है। इस वाक्यार्थ प्ररागिनी प्रिया के पाचर राब्द याक्य म मौजूद भी रह सकते हैं और नही भी । जहाँ पर निया का वाचर प है यहा प्रिया याच्य ही होगी और प्रयत्र प्रसरणार की सहायता स प्रिया बुद्धिस्य रहगी । इन दोनो ही स्थान पर प्रिया ही वारणा द्वारा पुष्टि होकर वाक्याय का रूप धारण करेगी। इसका स्पष्ट करने के लिए दा उदाहरण लें । प्रथम तुम गाय ल जाम्रो । इम वाक्य म स जामो' नियापद है जो न जाना निया का याचक है । यह धान्य त्रिया हो 'तुम और माय बारका स पुष्ट होकर पाण्याय 4 रूप म परिसित होती है। यह याश्याप हो वक्ता का तासय अथवा प्रभीष्ट पर्य है। याना यही कहना चाहता है । इसी प्रशर मय नौगिर वारपो म याम्प प्रिया हा वाक्यय गा पारण करणो । दूगरा वाक्य वह हा रारा निमम प्रिया प्रथम वापि सो भाग य यमाण न होगी। यया द्वार, द्वार इस वापय में प्रिया के लिए वावर पर नहीं है । यहा पर वत्ता याय म प्रिया र वापर पदमा प्रयोग नहा रोतिकाल के पूर्व ध्वनि का श्रमिक विकास पर रहा है, परन्तु वक्ता को प्रभीष्ट विया उसकी परिस्थिति, अथवा सकेतादि के द्वारा शीघ्र ही श्रोता को बुद्धिस्य हो जाती है । यथा यदि वक्ता बाहर से दौड़ता पा रहा है तो 'द्वार-द्वार' वाक्य से 'दरवाजा बंद करो' वक्ता का अभीष्ट अर्थ होगा और यदि वह कर के भीतर से दरवाजा परखटाता हुमा 'द्वार-द्वार' वाक्य का प्रयोग करता है तो 'दरवाजा खोलो' उमका तात्यय श्रोता प्रकरण की सहायता से बुद्धिस्य कर लेगा। ऊपर जो बात लौक्कि वाक्यो के सम्बध मे कही गयी है, वही काव्य के सम्बध ही जा सकती है। काय मे कभी-कभी तो रखादि भाव के वाचक शब्दो का साक्षात् उपादन होता है यया 'नवोरा प्रियतमा प्रोति वढाती है। इस सम्बध मे रति भाव के वाचक पद 'प्रीति का साक्षात प्रयोग है । काव्य मे कुछ ऐसे भी उदाहरण होगे जिनम लौवित वाक्यो की भाति रस अथवा भाव वाचन पदों का माक्षात उपादान नहीं होगा। एमे वाक्था मे प्रकरणादिक की सहायता से बुद्धिस्थ रत्यादि स्थायोमाव काव्य के वाक्याथ होगे । काय मे विभाव, अनुभाव और सचारी काव्य के प्रकरणादि हैं और इनका वणन तो वाचक्तया ही होता है। इन विभावादि के साथ स्थायी भाव का अविनाभाव सम्ब घ होता है । अत सहृदय भावक के चित में सात विमावादि सस्वार परम्परा के कारण रस्यादि स्थायी भावा को पुष्ट करते हैं । रसादि व्यजक काय म भी रम ही वक्ता अथवा कवि का प्रचार प्रयोजन होता है अर्यात वही वाव्यादि में प्रयुक्त वाक्या तात्पर्याय है जिस प्रकार अभिषा शक्ति का साध्य वाच्यार्थ है और लक्षणा शक्ति का साध्य लक्ष्याथ है, ठीक उमो प्रकार तात्पर्याशक्ति का साध्य तात्पर्याय है । यही तात्पर्याय वक्ता का प्रभीष्ट प्रयोजा है । लौविक अथवा वैदिव सभी वाक्य कार्यपरक होते हैं । वक्ता का प्रयोजन ही इनका कार्य है । प्रत जहा तक वक्ता का प्रयोजन होगा यहीं तक तात्पर्या शक्ति का क्षन होगा। उमकी सोमा वहीं तर मानो जायगो । इग गक्ति के सम्ब व म निणयात्मक रूप मे यह नहीं कहा जा सकता है कि यह अमुक स्थान तक ही जा सकेगी।' काव्य प शब्दा का विमावादि रूप प्रर्य से अवय-व्यतिरक सम्बध है । काव्य के शब्दो से उही विभावादि का बोध होता है जिन विभावादि वे य वाचा है। उनके वाचक शब्दो के प्रयोग वे प्रमाव मे उनका बोध नहीं होता है । ये विभावादि ही निरतिशय सुख वे प्रास्वादि स्पप्रलौक्वि रम की चवरण के प्रतिपादक और रम अथवा भाव इनके प्रतिपाद्य । फलत काव्य काय्यापाता, विभावादि तथा स्थायी भाव तथा रमादि के सम्बन की पर्यालोचना से सिद्ध होता है कि सहृदय पाठक के हृदय म निरतिशय सुखास्वाद उत्पन्न करना ही काव्य का काय प्रयया प्रयोजन है। इगरे अतिरिक्त कोई दूसरा प्रयोजन दिखाई नहीं पड़ता है। इसलिए मानदानुभूति ही काम्य बा काय निश्चित होती है । इमको उत्पत्ति में विमावादि-मसष्ट स्थायी हो निमित्त है । इसलिए काव्य प्रयुक्त वाक्य को तात्पय-गक्ति वाव्य के प्रयाजन उम रम की प्रतीति के लिए भपेक्षित विभावादि के प्रतिपान द्वारा रस-बोध कराकर पयवमित हो जाती है। इस प्रकार माध्य वाक्य है, विभावादि पदाय भोर तत्मसृष्ट रत्यानि भाव दाक्या हैं । यह तात्पर्य पत्ति का हो क्षेत्र है। १ यावत्कार्यप्रमारित्वात सातपय न तुसाचतम् । -प्रवलार ४ कारिवा ध्वनि सिवात पोर ध्यानावृत्ति विवेचन गीतादि से उत्पन्न सुखवाला हष्टात भी काव्य एव रस के विषय में देना ठीक नहीं है। कारण, काव्य से रसानुभूति विशिष्ट भावादि सामग्री का ज्ञान रखने वाले एव उस प्रकार की रत्यादि भावना से युक्ति सहृदयों को ही होती है । रसादि प्रथया रत्यादि भावा को काव्य का वाक्यार्थ निश्चित पर देने पर अमिधा लक्षणा और तापय गति से ही अवतक समस्त वाक्याथ थ यूमाए एव प्रश्न यमाण की प्राति होती है । पलत व्यजना नामक अलग शक्ति पी कल्पना व्यप का प्रयल है । वास्तव मे तात्पर्या के अतिरिक्त व्यजना शक्ति नहीं है।' "पूजक निर्भय तोडिये' मे निभय पुष्प चयन करें, रूप विधि इत्यादि को ही यदि मपेक्षा की पूर्णता स्वीकार कर लिया जाय और यह कहा जाय कि यही वाक्य का प्रतिपाद्य है और यही तक तात्पयशक्ति यो माना जाय तो वक्ता की विवक्षा पूर्णता 'निषेधादि' तक ही तात्पय शक्ति को क्या नही स्वीकार किया जाता । लौविस अथवा पौरपेय वाक्य की कोई विवक्षा अवश्य होती है । वाक्य इसी विवक्षा की मभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है प्रतएव वह विवक्षापरत त्र है । लौकिक वाक्य म तात्पर्याय उसी वस्तु में होगा जो वक्ता की विवना है । इसी लौकिक वाक्य को माति काव्यादि में भी रसादि उमका तात्पर्याथ ही है व्यग्य प्रयवा ध्वी नहीं है । घाजय के मत का यही साराश है । इमका खण्डन अभिनवगुप्त और मम्मट प्रादि प्राधाय ने किया है जिसका उरलेख द्वितीय अध्याय में दिया जायगा। पुतक को ध्वनि-उपेक्षा- प्राचाय कुतक ने "ध्वनि-मिद्धात' वा समय विरोध किया । वह ध्वनि सिद्धात से पूण परिचित थे। उसकी प्रवतना उनसे लगभग १०० वप पहिले वाश्मीर में ही हो चुकी थी। ध्वनि- सिद्धान्त का उन विरोध करने के लिए ही उहोंने वोक्ति-सिद्धात का प्रवतन किया। आचाय मे स्वप्रणीत मय वोक्ति जीवित मे ध्वनि सिद्धात का खण्डन करो की महिमभटट की भाति प्रतिना कही नहीं की है । अत कुता को 'ध्वनि की उपेक्षा करने वाला प्राचाय स्वीकार करना अधिक सगत जान पडता है । उपेक्षा मे उत्कटम विरोध सनिविष्ट रहता है । जिस वनोक्ति वो काव्य के जीवित रूप में प्रतिष्टित करने का प्रयल कुतक ने किया, उसके सबल सक्त संस्कृत साहित्य एव का य-शास्त में पहिले से ही विद्यमान थे। सस्कृत साहित्य मे वाण की कादम्बरी मे वक्रोक्ति का व्यापक अथ मे प्रयोग प्राप्त होता है। भामह ने अपने कायालकार में भो "वक्रोक्ति को उसके व्यापक भय म हो ग्रहण किया है। भामह की 'वनोक्ति' के प्रति वस्तुपरक दृष्टि है और उनके अनुसार हर प्रकार के काय चमत्कार को प्राप्ति के लिए इसका समावेश अनिवाय है। दण्डी भी वजोक्ति को अलकार विरोध न मानकर "उक्तिवैचिय' के रूप में स्वीकार करते हैं। दण्डी के लिए वोक्ति काय चमत्कारोपादक तत्व है । उसमें लोकातिक्रान्तगाचर तत्व विद्यमान रहता है । स्पष्ट है कि दण्डी को वक्रोक्ति भी साधारण अलकार न होकर व्यापक पाय-चमत्तार ही है। १ तात्पर्यानतिरेकाच्च यज्जनीयस्य न ध्वनि । दशरूपक रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास दण्डी के पश्चात् 'वक्रोक्ति' का अथ सकुचित हो गया और वह केवल एक मलकार विशेष माना जाने लगा । वामन और रुद्रट ने उसे अलकार ही माना है । पर प्रान दवद्ध न ने प्राय भामह के पक्ष का ही अवलम्बन क्यिा है। पान दवद्धन ने काव्य का लक्षण "सहृदयहृदयाह लादि शदाथमयत्व काव्यलक्षण" किया था । काव्य का यह लक्षण व्यक्ति परक अथवा प्रात्मनिष्ठ दृष्टि से किया गया है और वस्तु परक दृष्टि को सवथा उपेक्षा कर दी गई है। कवि की अपनी कृति मे उसकी एका त प्रवहेलना बहुतो को अच्छी न लगी । काव्य का यह लक्षण काव्य विशेष का लक्षण तो माना जा सकता है परन्तु काव्य सामाग्य का लक्षण स्वीकार करने में कठिनाई पडी। साहित्य दपणकार की स्थिति 'वाक्य रसात्मक काव्यम मानकर जो दशा हुई, वही पान द वे लक्षण की हुई। कुतक इसी व्यक्तिनिष्ट दृष्टि के विपरीत एकात वस्तु परक दृष्टि लेकर ध्वनि का उपेक्षात्मक विरोध करने के लिए 'वक्रोक्ति' म समग्र काव्य वभव रम वस्तु, अलवार को समेटने के लिए प्रयत्नशील हुए, यह सत्य है कि काव्य के जिन सौदय भेदो की प्रान दवधन ने ध्वनि के द्वारा प्रात्मपरक व्याख्या की थी, उन सभी को कुतक ने अपनी अपूर्व मेधा के बल पर वक्रोक्ति के द्वारा वस्तुपरक विवेचना प्रस्तुत करने की चेष्टा की । वक्रोक्ति प्राय ध्वनि की वस्तुगत परिकल्पना ही है। इसलिए कुछ विद्वान दोना मे भेद स्वीकार करते हैं । यह प्रारम्भ मे स्वीकार किया जा चुका है कि कुतक ने ध्वनि का अपने ग्रथ में प्रत्यक्ष सण्डन कही पर नही किया है । उहोने तो ध्वनि के समान हो एक समथ काय सिद्धान्त प्रस्तुत करने की चेष्टा की है । पर तु जिम ध्वनि साम्य को लेर वे ध्वनि का वक्रोक्ति मे अन्तर्भाव करने चले थे । वही साम्य उनके सिद्धा त के लिए घातक सिद्ध हुआ। वस्तुत जब लोगो ने यह देखा कि कुतक वक्रोक्ति रा प्रकारातर से वही बात कह रहे हैं जो 'मान द' ध्वनि के द्वारा कह चुके हैं, तो उहोने उमकी उपेक्षा की और कभी उसका नाम न लिया। सस्कृत काव्य शास्त्र में भी उसका अनुकरण न हुआ । महिम भटट न तो ध्वनि सिद्धा त के इम साम्य के कारण हो कुन्तक को क्टु मालोचना की और कहा "कुतक की वोक्ति ध्वनि से अभिन्न है। उसमें मार्गातर प्राग्रह को छोड़कर और कोई विशेषता नहीं है। इसलिए ध्वनि के ममान उसका भी अनुमान म अन्तर्भाव सवथा सम्भव है । '3 वक्रोक्ति का ध्वनि साम्य उसके लिए घातक बन गया। प्रागे के विचारतो ने उसको नया माग चलाने का आग्रह समझ कर त्याग दिया। यहा वोक्ति का ध्वनि के साथ साम्य स्पष्ट कर दना प्रासगिक जान पड़ता है। इस साम्य को बाह्य और भान्तरित साम्य दो भेदो मे विभक्त कर लेना सुविधाजनक होगा। बाह्य साम्प व यालोक मोर वक्रोक्ति जीवित दोनो प्रथो की प्रवध-कल्पना मे प्राय पूर्ण साम्य है। घ्ययालोर चार उद्योतो में समाप्त हुआ है और वक्रोक्ति जीवित चार उमेषों म । दोनो ही ग्रथ हा० नगेद्र-वक्रोक्ति जीवित भूमिका, पृ० १६३ । २ वोक्ति मोर अभिव्यजना, प०६८। व्यक्ति विवेव, १० १२७ । १ ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन मे मूल सिद्धात का प्रतिपादन कारिकामो में हुमा है। ध्वयालोर के कारिका भाग का नाम 'ध्वनि' है और वक्रोक्ति जीवित के कारिया भाग का 'का यालकार' । ध्वनिवारिकामा पर लिखी जाने वाली वृत्ति जिम प्रकार 'पालोक नाम से प्रसिद्ध है उसी प्रकार इसका वति भाग वक्रोनि जीवित नाम से । दोनो हो म उदाहरग वत्ति भाग में दिये गये हैं । 'वक्रोक्ति जीवित' म उधृत उदाहरण भी कही कही ध्वयाला से ही लिए गये हैं । ध्व यालोर के चतुथ उद्योत की भाति वक्रोक्ति जीवित का चतुथ उमेप भी लघुकाय है। विषय प्रतिपादा को पाली मे भी साम्य है। प्रातरिक साम्य ध्वनि के द्वारा मानद ने काय के जिग चमत्कार का उद्घाटन किया था उसकी अवहेलना ध्वनि विरोधी प्राय न कर सके । रसध्वनि क चमत्कार को भटट नायक, कुतक और महिम सभी काव्य वा सर्वोत्तम चमत्कार स्वीकार करते हैं। महिम ने यहां तक कह दिया है कि रस को प्रधानता के राम्बध में क्या किसी की विप्रतिपत्ति हो सकती है।' ध्वयालोक और वनोक्ति जोविता वा सर्व प्रथम प्रातरिव साम्य ध्वनि भार बोक्ति में लक्षणा में है। दोना की तुलनात्मक समीक्षा करने पर यह निष्कप निकलता है--- दोनो ही माचार्य काय का चमत्कार वाच्यवाचक से भिन्न मानने के पक्ष में हैं। मानन्दवद्ध न ध्वनि के द्वारा अभिव्यक्ति स्वीकार करते हैं और कुतक विचित्रा अभिया के द्वारा। दोनो की दृष्टि में यह वचित्र्यमिति अलौकिक प्रतिभाजय है। इस प्रकार दोना मे प्राय स्वरूप साम्य है। स्वरूप साम्य वी अपेक्षा ध्वति भौर वनोषित + भेद प्रस्तार म और भी अधिक साम्य हैं । इसी भेद प्रस्तार साम्य को दसकर का यप्रकाश की वाल-वाधिनी टीका के लस न अपनी भूमिका में लिखा, 'कुन्ना ने उपचार वग्नता इत्यादि से प्रान द का सम्पूण ध्वनि प्राच स्वीकार कर लिया है । २ पहने वा मभिप्राय यह है कि दोना म गमान यापकता है । मानद की पजक्ता मोर कुन्तक को वनता पर्याय जान पडता है। मानद ने ध्वनि वाथ्य के दो भेद स्वीकार किये थे--१ मविवक्षित वाच्य ध्वनि और २ विवक्षित वाय ध्वनि । इनम प्रथम ये भी अर्थातर गक्रमित वाच्य और अत्यत रिस्कृत वाच्य भेट दिये थे। पुतव की रूदिवचिश्य-वनता उपयुक्त प्रर्या तर सममित वाच्य ध्वनि को भिन सशामा । है । पुता के उदाहरण भी ध्वयालोक वे है मौर उसी लाक्षणिक चमत्कार की ओर उनका सक्त है। रावृत्ति यत्रता का भी इसी भेद फ मतगत प्रतर्भाव हो सकता है । उपचार वग्नता अत्यन्त तिरस्कृत याच्य ध्वनि का ही रूपातर है। उपचार वनता म भी उपचार लक्षणा का ही चमत्कार है। पर्याय यत्रता का मन्तव पद सक्युस्थ संलश्याम-व्यग्य स्वय प्राचाय कु तक का भी माय है। 'एप एव शन्द पक्तिमूनानुरगनरूपय्यग्यस्य परध्वनेविषय । १ व्यक्तिविवेक पृ० १०५ काव्यस्यात्मनि समिनि रसादिस्परचिम्मिति । उपचार यकनादिमि समस्तो ध्वनिप्रपच स्वीकृत । -ना. वा. भलीपर प्रस्तावना पृ. ३ व्यक्तिविवर १२ वृतिभाग । 3 سی रीतिकाल के पूर्व ध्वनि या क्रमिक विकास इस प्रकार वयोक्ति जीवित के ममस्त प्रसग का ध्वनि मे अन्तर्भाव किया जा सकता है । परन्तु प्रान द की मात्मनिष्ठ' समालोचना-पद्धति म वस्तु की उपेक्षा सनिहित है और कुन्तक की पद्धति में व्यक्ति की। दोनो के समय से समालोचना को स्वस्थ परम्परा का रूप स्थिर हो सकता है। प्राचाय महिमभटट का ध्वनि विरोध ध्वनि सिद्धात वा खण्डन करने के लिए महिमभटट ने व्यक्ति विवेक नामक स्वतन्त्र ग्रथ की रचना की है। प्रथ के नाम से स्पष्ट है कि वह सब की चतुथ शक्ति व्यक्ति' की पालोचना करने के लिए लिखा गया है । ग्रथ का लेखक व्यग्याथ को प्रकट करने वाली व्यजना शक्ति को मानने वाले और उसका समथन करने वाले प्राचार्यों की विवेकहीनता' प्रक्ट करना चाहता था । प्राय के प्रारम्भ म व्यजना का 'अनुमान' में अतर्भाव करके ध्वनि सिद्धात का सोखलापन सिद्ध करने की उसने प्रतिना की थी।' पानादवद्धन ने ध्वनि की व्याख्या व्यक्ति निष्ठ अथवा भात्मनिष्ठ दृष्टि से की थी। कुतक ने वक्रोक्ति जोदित म विषयनिष्ठ दृष्टि स वोक्ति का प्रतिपादन क्यिा, परन्तु महिमभट्ट ने व्यक्तिविवेक के द्वारा ध्वनि सिद्धात पर दुहरा पानमण किया था। उनका दृष्टिकोण कही विषयनिष्ठ है और कही प्रात्मनिष्ठ । उहोने रम का प्रात्मनिष्ठ स्वीकार कर लिया है परन्तु अलकार ध्वनि और वस्तुध्वनि को विपयनिष्ठ दृष्टि से पालोचना की है। महिमभटट अभिमानी प्रकृति के व्यक्ति थे और दूसरे प्राचार्यों को नगण्य समझते थे। साथ ही वह प्रसिद्धि भी शीघ्र प्राप्त करना चाहते थे और वह उह मान दवधन और कुन्तव जसे प्रतिष्ठित प्राचार्यों के खण्डन से मिलती जान पडी। महिमभटट नयायिर नही थे पर तु वाश्मार को शव परम्परा को मानने वाले थे। सम्पूण ग्रथ तीन विमा म विभाजित है, प्रथम का ध्वनिलक्षणाक्षप, द्वितीय का शब्ानौचित्यविचार और तृतीय का अतर्भावोपदशन नाम रखा गया है । प्रथम विमर्श में ध्वनि लक्षण के दोषा के उद्घाटन करने का प्रयत्न है, दूसरे विमा में काय के बहिरग-शब्द से सम्बद्ध पांच दोषा विधेयाविमर्श, प्रनमभद, अमभेद पोनरुवत्य और वाच्यावचन का उल्लेख है। सम्पूण द्वितीय विमश (१४८, ३६८ ) इही दोपो के लक्षण और उदाहरण देने में समाप्त हुआ है। तृतीय विमश मे लेखक ने ध्वयालोक वे लगभग चालीस उदाहरणो की व्याख्या करके उनका अनुमान में प्रतर्भाव करने का प्रयत्न किया है। वस्तुत प्रथम और अतिम विमर्श ही ऐसे हैं जिनमे ध्वनि सिद्धात का खण्डन समाविष्ट है। २ १ अनुमानऽन्तर्भाव सपस्यव वने प्रकाशयितुम् । “यक्तिविवेक वुस्त प्रणम्य महिमा परा वाचम् । वि०१-१। के० सी० पाडेय, इण्डियन ऐस्थेटिक्स पृ० ३२१ । ३ मधुसूटनी टोका द्वितीय विमश का प्रारम्भ । व्यक्तिविवेक १-३। डा० के० सी० पाण्डेय ।

ध्वनि सिद्धात और ध्यजनावृति विवेचन १ ध्वयालोक में ध्वनि का लक्षण प्रथम उद्योत की तेरहवी कारिका मे किया गया है।' व्यक्तिविवेककार ने इस लक्षण में निम्नलिखित दस दोष दिखलाये हैं- मय के साथ उपसजनोकृत स्वाथ विशेषण का प्रयोग अनुचित एव अनावश्यक है। २ शब्द का अभिधा के अतिरिक्त दूसरा व्यापार ही नहीं होता, इस 'शब्द का प्रयोग करने की आवश्यक्ता ही नहीं थी शब्द के अप्रयोग म पद का विशेपण 'उपसजनाकृत स्वाथ' भी अनावश्यक सिद्ध हो जाता है। 'तम्' में पुल्लिग का प्रयोग भी अनुचित है। ५ "यक्त ' द्विवचन का प्रयोग दोपपूरण है। 'वा' निपात का प्रयोग भी दोपपूर्ण है। ७ 'व्यज्ज' धातु के प्रयोग से लक्षण में अयानि और प्रतियाप्ति दोष आ जाते है । कायदे ही दूसरे 'ध्वनि नामकरण म वफ्ल्य दोष का समावेश होता है। . 'काय विशेप' में 'विशेष क्थन म अवाच्यवचन दोष है । १० कथित ' निया के कर्ता का प्रयोग लक्षण मे अनावश्यक है और अवाच्यवचन ८ दोप है। इन दस दोषो के अतिरिक्त और भी दोष हैं जो भेदादि के लक्षणो से सम्बद्ध हैं अतएव उनकी गणना नहीं कराई गई है। प्राचाय ने ध्वनिकार के ध्वनि लक्षण को अनेक दोपदुष्ट सिद्ध करने का असफल प्रयास करके भनुमिति का शुद्ध लक्षण यह दिया है धाच्यस्तवनुमितो वा यत्रार्थोऽर्थातर प्रकाशयति । सम्बघत कुतश्चित् सा काव्यानुमितिरित्युक्ता ॥3 'जहाँ बाच्याथ अथवा उससे अनुमित पथ विसी सम्बध स अ य अथ को प्रकाशित करता है, उसे कायानुमिति कहा गया है । महिमभट्ट का प्राग्रह है कि जिस प्रकार ध्वनि लक्षण म अभिधेयाथ और उसक विशेषण का ग्रहण किया गया है उमी प्रकार उसम अभिया का ग्रहण भी चाहिये था। इस सदभ में वे अभिधा को अलङ्कार के प्रथ ग्रहण करके वक्रोक्तिजोवितकार का अनुकरण करते जान पड़ते हैं । उहोंने कुन्तक के "भगीभणति पद का प्रयोग भी किया है। उनका मत है कि अभिधा का प्रयोग न होने से लक्षण की अयाप्ति के कारण दीपक अलकार में, जहा उपमाति की प्रतीति होती है, 'ध्वनि' अभीष्ट न होगो और ध्वनि का लक्षण प्रयाप्ति दोपयुक्त हो जायगा। १ २ ध्वयालोक, १-१३। यक्ति विवेक, १-२३-२४ एव मधुसूदनी विवृति ५० १०४ । वही, प०१०५। व्यक्ति विवेक, प०१५-१६ । ४ रीतिकाल के पूर्व प्वनि का प्रमिक विकास मापाय को काव्य का 'म्वनि' और गुणीभूत-व्यग्य में विभाजन भी माय नहीं है।' उनको वस्तुध्वनि मोर मल कार घ्वनि को ध्वनि नाम देने में भी भापत्ति है क्योंकि उनमें प्रम सुलक्षित रहता है और 'ध्वनिवादी' ध्वनि मे प्रकाशक प्रकाशित सम्बध से पम नही मानते हैं। रस के सम्बघ में 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग किसी प्रकार क्षम्य माना जा सकता है। भत हरि ने पथ दो प्रकार का स्वीकार किया था, मुख्य और गौण । महिम नी मय के दो ही भेद स्वीकार करते हैं। मभिधेय (मुख्य) और मनुमेय । इस अनुमैयाप में ही उनका तात्पर्याथ, लक्ष्यार्थ मोर व्यग्याय का मन्ताद स्काय है। यहां तक कि वे तीनों प्रकार की ध्वनि को भी अनुमेयाथ अपवा अनुमितानुमेय मे गताय स्रोकार करते हैं। इस अनुमितानुभ्याम् को ध्वनि नाम देने में भी उनको कोई भापति नहीं जान पड़ती है। ध्वनिवादी गुल,, व्यजना, काव्य मादि सभी को 'ध्वनि' नाम देते हैं परन्तु माचाय को ध्वनि के ये विभिन्न उचित नहीं जान पड़ते हैं । वह इनका विरोध करते हैं।' ध्वनि के उदाहरणों का पर व्यक्तिविवेक के तृतीय विमर्श मे दिया गया है उनमें से कुछ उदाहरणों मे तो उन्होंन - सद्भाव ही स्वीकार नही किया है, कुछ में व्यग्याथ स्वीकार करके उसका प्रताव मटि दिया है । उनका प्रध्ययन प्रस्तुत प्रवध के द्वितीय अध्याय में किया जायगा। 'ध्वनि का विरोध करते हुए भी महिमभट्ट को कतिपय महत्वपूर्ण सत्य वादियों से पूर्ण मेल खाती हैं । वयालोक्कार ने रस को ध्वनि को भो पाला र है। लोचनकार ने अपनी टीका में स्थान-स्थान पर रस को काव्य की मान- किया है । महिम ने भी रस को काव्य की प्रात्मा स्वीकार किया है। दिया इतना ही है कि ध्वनिवादी रस को प्राक्षिप्त अथवा ध्वनित स्वाकार - अनुमिताय स्वीकार करते हैं। रस परिपाक के सम्बध मे अभिनव से पूर्व यथेष्ट विचारमा ने रस-परिपाक के चार सिद्धातो का उल्लेख किया है। उनमें गहमर है । रस-परिपाक के सम्बध मे वह शकुक के अनुयायी हैं और हर प्राधार ग्रहण किया है । अभिनव भारती में अभिनवगुप्त ने पकर के मrarti से खण्डन किया है वे ही उनके विरुद्ध भी दिये जा सकते हैं। Prine भारती की पोर न गई हो। उहोंने रस को ध्वनिवादियो की भांति प्रात्मनिष्ट #ramr" उनके मत से रसानुभूति में सहृदयत्व ही मुरय काररा है Firrrre' सर्दन १ २ वही, पृ० १३६ । डा० के० सी० पाण्डेय, इण्डियन एस्थेरियम, 27 ३ वही, पृ० ३४६ । व्यक्ति विवेक, पृ० ३६ । डा० के० सी० पाण्डेय, इण्डियन एस्थेरियम् ६ वही, पृ० ३५०-५१ । कायस्यात्मनि सगिनी रसादिरूपे न Pre व्यक्ति विवेक, पृ० ६७ । ८ ४२ वनि सिद्धात और व्यंजनावृत्ति विवेचन 17 सम्बध में भटटनायक का मनुवर्तक स्वीकार किया है । 'रस प्रलोरिक मनुमिति हाने के कारण ही घमापार युक्त है।' ध्यनिवादियो में मत रो प्रतीयमानाथ याच्याय यी मपेशा प्राय पागता सम्पन होता है । उनको दृष्टि स भी प्रतीयमानार्थ म वाच्यार्य पी मपेशा मधिर स्वाद प्राप्त होता है। 'नच सुसयतिऽवाच्योऽध प्रतीयमान स एव यया।" प्राय एसे ही वारणों से इनका विद्वरममाज मे समादर न हुमा । ध्वनि सिद्धान्त या समथन और उसकी प्रतिष्ठा पापाय अभिनय और ध्वनि संस्कृत काव्य गास्त्र में मानदवधन युग प्रवत प्राचाय हुए हैं और मभिनवगुप्त युगप्रतिष्ठापक । पुगप्रवतनवारी जिस घ्वनि सिदात या मान दवर्धन ने प्रवतन किया था. प्राचाय मभिनव गुप्त ने, उरायी ऐसी प्रतिष्ठा की रिपागे माने वाल प्राचाय दम माग का प्रतिग्रमण न कर सके । लोचन टोवा या काय-गास्त्र में ठीक वही स्थान, प्रतिष्ठा मोर महत्व है जो यावरण के क्षेत्र म पन्तजलि ये महाभाष्य का भौर वेदात म जगद्गुरु गराधाय के शारीरिक भाप्य का। वे गाव परम्परा के उच्चकोटि के दाशनिक विद्वान थे । वयालोद की लाचन टीका लिसवर ध्वनि सिद्धात को होने दान मोर मनोविनान की स्थिर भूमि पर सहा पर दिया । यह अत्यत महत्वपूर्ण और सगक्त टीका है जिस साहित्य शास्त्र का महाभाष्य कहा जा सकता है। इस टीका म विषय प्रतिपादन म उच्चकोटि की तय पद्धति का प्राथय लिया गया है । इमम घ्य यालोक दुरूह स्थानों का ससप्ट करने का सराहनीय प्रयत्न किया गया है। इस प्रयत्न से इसका लोचन नाम साथ सिद्ध होता है । पर तु स्थान स्थान पर टीकाकार ने अपनी मौलिक विचारधारा का भी उल्लेख किया है। लाचन के प्रणयन से पूर्व ध्वयालोर पर 'चन्द्रिका नाम की टीका उही के दिही पूषवश्य के द्वारा लिखी जा चुकी थी परन्तु उसरा प्रथ का प्राशय यथावत सष्ट नहीं होता था। प्रत लोचन म स्थान-स्था पर उराको मालोचा की गई है। प्रथम और तृतीय उद्योत के प्रत म उहोने लिखा है यि लाचन बिनालोको भाति घद्रिक्यापिहि अर्थात् क्या द्रिका की सहायता से मालोक, विना लोचन के शोभा पाता यह नि सदेह टार है कि लोचा के उमीलन से ध्वनि सिद्धात क स्पष्ट दशन हो सके। इस टीग से पूर्व भटटनायर पे 'हृत्य दपरण' नामक प्रय की भी रचना हो चुकी थी। इसमें ध्वनि का खण्डन किया गया था। चन्द्रिका टोका और हृत्यदपण के द्वारा ध्वनि सिद्धान के सम्ब ध में जो-जो विपतिपत्तियां और शकायें खडी हो चुकी थी, उनका लोचन में तकपूण उत्तर मिलता है। 'चन्द्रिका की भांति हृदयदपण के ध्वनि खण्डन की भी स्थान स्थान पर तकपूण आलोचना की गई है। कहने का तात्पय यह है कि . १ वही, पृ०७४। २ हिस्ट्री ग्राफ रास्तृत पोयटिक्स, पृ० २०३ । लोचन, पृ० १५१, २१७, २६६ । लोचन, पृ० १४, १८, २३, २४, ३२ । ३ ४ रातिकालि के पूर्व बान यात्रामविकास - - लोचन को रचना से पूर्व पनि मिद्धात ये विरद्ध जितना घान्त एकत्र हुअा था उग राबवो लोचन ने दूर कर दिया। पान दवधन ने ध्वनि सिद्धा त का प्रतिपादन तो कर दिया था, पर तु कारिका और वृत्ति के होते हुए भी विषय को मरलतर और स्पष्टतर करने वो आवश्यक्ता बनी हुई थी। लोचन की रचना इस आवश्यकता को सुदर पूर्ति हुई । अन्य के गूढ़ स्थलो को लोचनकार ने सरल, स्पष्ट और बोधगम्य कर दिया है । इस प्रकार के उदाहरण स्थान स्थान पर प्राप्त होते हैं। लोचन की रचना का यह प्रथम उद्देश्य रहा है । ध्वयालोक की प्रथम कारिका में ध्वनि-स्वरूप निरूपण करने की प्रतिज्ञा कसे 'द्वितीय कारिका में उसके वाच्य और प्रतीयमान भेद करना प्रसगत प्रतीत होता है । वृत्तिकार ने भी इस असगति का कोई सोपपतिक समाधान करने का प्रयल नहीं किया है । लोधनकार ने इस खटकने वाली असगति वा सोपपतिक समाधान इस प्रकार करने का प्रयत्न किया है- "प्रतीयमान विशेष अर्थ का आधार वाच्याथ हो है । वाच्यार्थ के अभाव में प्रतीयमान अथ की स्थिति ही नहीं हो सकती है । वाच्य अथ के साथ प्रतीयमान प्रय को भी मुरय माना गया है । इसी मुख्यता को प्रकट करने के लिए का यास्मा रूप से यवस्थित सहृदय श्लाध्य पथ के वाप और प्रतीयमान भेद किये गये हैं। ये दोगो अथ मुग्य हैं। निस प्रकार वाच्य अथ का अपह्नव (छिपाना ) सम्भव रही है उसी प्रकार प्रतीयमान अथ का भो। द्वितोय कारिका में 'स्मतो' पद का प्रयोग प्रथम कारिका के जो पहले समाम्नात किया गया था, को पुष्टि करने के लिए ही हमा है। काय को पद और अय गरीर यासा माना गया है। दारीर के ग्रहण करने से ही यह स्वत सिद्ध हो जाता है कि उममें कोई न कोइ प्रात्मा अवश्य होनी चाहिए। उस प्रात्मा के सद्भाव से काय जीवित रह सकता है । शब्द को पारमा का स्थान नहीं दिया जा सकता क्याकि उसको शरीर भाग में सनिविष्ट किया जा चुका है। जिस प्रकार शरीर को स्थूलता और कुशवा प्रादि धम सर्वजन सवेद्य हैं उमी प्रकार सुनाई पडने के कारण यह शब् का श्रावण प्रत्यक्ष है- शब्द भी प्रत्यार हो है, अतएव प्रात्मा श द से भि न ही होनी चाहिए। श के अतिरिक्त प्रव अथ की बात रही । वह अथ दो प्रकार का होता है उसमें एक प्रथ एसा होता है जिसमें कोई ऐसी विशेषता नहीं होती जो सहृदयो को अपनी ओर आकृष्ट कर सके। दूसरा अथ वस्तुत चमत्कार होने के कारण सहृदय-श्लाघ्य होता है। इनमें प्रथम अथ शरीर स्थानीय हो है। द्वितीय प्रकार का यथ ही काव्य की प्रात्मा है । अय शब्द की भाति सर्वजन संवेद्य नहीं होता है। साथ ही प्रथ को सत्तामात्र से ही 'काव्य को 'सज्ञा नहीं दी जा सकती है। प्रथ को सत्ता तो लौकिक और वरिक वाक्यो में भा होती है। परतु उनको काय का नाम नहीं दिया जाता है । साधारण प्रथ से प्रतीयमान प्रथ को विशेषता प्रकट करने के लिए ही सहृदयश्लाघ्य और कायात्मा विरोपण दिये गये हैं । वह अथ तो वस्तुत एक ही है पर तु विवेकशील उमको विवेचन का सरलता के लिए दो भागों में विभक्त कर लेते हैं । यद्यपि लौकिक और पदिक वाक्यों में सनिविष्ट रहने वाला भी अथ ही कहलाता है और कायात्मारूप से स्थित राहत्य-श्लाघ्य भी। दोनो को अथ नाम से अभिहित किया जाता है । इसत्रिये दोनों को एक दूसरे से अलग करने के लिए कायाथ में लौकिक अथ की अपेक्षा कोई न कोई विशेषता स्वीकार करनी पडेगी। इन दोना प्रों में जो विशेष है, वही प्रतीयमान है। अर्थात जितना अथ समान है उसे वाध्य कहते ru पनि सिवात मोर व्यजनावृत्ति विवेचन हैं । विशेषता के कारण ही प्रतीयमान प्रथ काव्य की प्रात्मा माना जाता है। परतु प्रतीयमान अथ वाच्याप के साथ मिश्रित रहता है जिसके व्यामोह में पडकर दोनो की एकता मानने वाले झुछ असहृदय व्यक्ति प्रतीयमान अथ का विरोध करते हैं। जसे चार्वाक लोग शरीर स प्रति रिक्त प्रात्मा को सत्ता नही स्वीकार करते उसी प्रकार यहाँ भी कतिपय लोग वाच्य को ही काय का सवस्व स्वीकार कर लेते हैं। इसलिए प्रयकार ने कारिका में 'अथ शद का एक वचन में प्रयोग किया है और उसका विशेपण दिया है 'सहृद श्लाघ्य'। यह विशेषण काव्याथ को विशेषता के हेतु को अभिव्यक्त करता है। दो भेद कहने का तात्पय यह कि उसके दो प्रश अथवा दो भाग हैं । भेद का प्रय है अश। इन दोनो प्रयों के समिश्रण के कारण एक्ता को बुद्धि से एक वचन का प्रयोग कर दिया है और विभाग-बुद्धि से उसके दो भश अथवा भेद बतला दिये हैं। दोनो अथ काव्य को प्रारमा नहीं होते । केवल प्रतीयमान ही काव्य की प्रात्मा होता है।" अभिनवगुप्त ने आपातत प्रतीत होने वाली उस प्रसगति का सोपपत्तिक समाधान कर दिया है । लोचन की रचना का यह दूसरा उद्देश्य है। उसकी रचना का तीसरा उद्देश्य है ध्वनि सिद्धात से भय सिद्धातो का समय । उदाहरण के लिये ध्वनि को अभिधा से भिन्न सिद्ध करने के लिये अभिहिता नयवाद भविताभिधानवाद तात्पर्यवाद आदि सिद्धातों का भी उल्लेख करते ध्वनि को उनसे भिन सिद्ध किया है।' ध्वनिकार ने जब ध्वनि सिद्धात प्रतिपादन पर दिया तो विद्वानो की दृष्टि उधर गई मोर उहोने उस पर विचार करना प्रारम्भ कर दिया। लोवन को रचना होने तक ध्वनि सिद्धान्त पर यथेष्ट विचार विमश हुआ, ऐसा प्रतीत होता है । लोचाकार न यह सबसे बड़ा कार्य किया कि ध्वनिकार के समय से लेकर अपने समय तक होने वाले विचार विमश का निचोड लोचन मे यत्रतत्र सनहित कर दिया है । लोचन के अध्ययन से यह बात भलीभांति स्पष्ट हो जाती । विवभितायपरवाच्य ध्वनि के शब्द शक्ति मूल भद का श्लेष स अ तर दिखाने के अवसर पर उन्होंने मप्रारणिक प्रथ की प्रतीति व्यजना से होती है अथवा अभिधा से, इस सम्बन्ध में चार मतो का संग्रह किया है । इन मतो का साराश यहा देने का अवकाश नहीं है । ध्वनिकार ने ध्वनिकाव्य और गुणीभूत-व्यग्य काव्य के भेदों की ओर सवेत तो किया है पर तु उनको सरया नही गिनाई है। लोचनकार ने ध्वी का य के भेदो को सख्या ३५ भी गिना दी है। इस प्रकार वयालोक का स्पष्टीकरण और समथन करते हुए भी लोपन मे कुछ विशेष महत्वपूण उल्लेख प्राप्त होते हैं । लोचनकार ने सवत्र ध्वनिकार का अनुवतन ही किया हो सो बात कही कही उन्होने ध्वनिकार से अपनी भसहमति भी प्रक्ट की है। उदाहरणत शक्ति मूल ध्वनि के प्रप्रावरणिक प्रथ की प्रतीति के सम्बध में इस प्रकार का मवसर पाया है। शद शक्ति से जब पाक्षिप्त होकर अलकार की प्रतीति होती है तो वह श दशक्ति मूल ध्वनि मानी जाती है। ध्वनिकार ने 1 लोचन, पृ० १५ हिदी रूपातर तारावती टीका की सहायता २ वही प० २०, २३॥ ३ वही, प० १२०, १२१।

रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास - कादम्बरी से इसका उदाहरण दिया है। उस उदाहरण को परीक्षा करते हुये उहोने लिखा है 'योग शक्ति से रूढि बलवान होती है इस याय का उल्लघन करते हुए 'महाकाल' प्रादि शब्द ऋतुपरक अथ को कहकर कृतकृत्य हो जाते हैं। इसके पश्चात् अप्राकरणिक शकर परक मथ की प्रतीति ध्वनन व्यापार से ही होती है।' ध्वनिवार अप्राकरणिक प्रथ की प्रतीति अभिधा से मानते है और अभिनवगुप्त ध्यजना से। इस स्थान पर उहोने ध्वनिकार से अपनो असहमति प्रकट कर दी है। यह सब होते हुए भी यदि अभिनव लोचन की रचना न करते तो कदाचित मम्मट का काव्य प्रकाश भी काव्यशास्त्र को न मिल पाता। यह सत्य है कि ध्वनि सिद्धात के वैभव और ध्यापक्ता के दशन लोचनो मीलन के पश्चात् ही हो सके । प्राचाय रुययक द्वारा महिम भट्ट के ध्वनि विरोध का उत्तर तिस प्रकार महिमभटट ने ध्वनि सिद्धात का खण्डन करने के लिए व्यक्तिविवेक नामक प्रथ की रचना की उस प्रकार रुय्यक ने ध्वनि सिद्धान्त के समथन के लिए किसी अन्य विशेप की रचना नहीं की। फिर भी ध्वनि समथन को दृष्टि से उनका महत्व क्मिी प्रकार कम नहीं है। उन्होंने व्यक्तिविवेक की टीका व्यक्ति विवेक व्यारयान म ही महिमभट्ट के प्राक्षेपो का प्रत्यत व्युत्पन्न एव समथन उत्तर दिया है । यदि यह कह दिया जाय कि व्यक्तिविवेककार के अविवेक, वदतो याद्यात मादि दोपो का प्राचाय रुय्यक द्वारा उद्घाटन होने के कारण ही विद्वत्ममाज मे उसका समादर न हुआ तो प्रत्युक्ति न होगी। अलकार सवस्व के प्रारम्भ में भी उहोने महिमभटट के विरोध की अविचारित कथन कहकर उपेक्षा कर दी है। ध्वनि के लक्षण मे वाच्याथ को गौणता प्रकट करने के लिए 'उपसजनीभूत' विशेषण का प्रयोग किया गया है । महिमभट्ट को इस विशेषण के प्रयोग पर आपत्ति है । उहोन लिखा है, किसी भी लक्षण में विशेपण का प्रयोग उसी स्थिति में युक्ति-युक्ति माना जाता है जब विशेषण का प्रयोग उसके उदाहरणो पर तो लागू होता है मौर उसके विरुद्ध उदाहरणा पर लागू नही होता है । पर तु ध्वनि लक्षण में प्रयुक्त 'उपसजनीभूत' विशेषण में यह बात नहीं है । वह समासोक्ति अलकार और गुणीभूत यग्य के कतिपय भेदो म खरा नहीं उतरता है। इनमे वाच्यार्थ व्यग्याथ की प्रतीति में कारण होने पर भी गौण नहीं होता है। समासोक्ति में तो वाच्यार्य की ही प्रधानता होती है । चारुता के प्राधार पर भी वाच्याथ को प्रतीयमान की अपेक्षा गौणता संगत नही है क्योकि गुणीभूत यग्य के पतिपय भदो में व्य ग्याथ की अपेक्षा वाच्याथ मे अधिक चारता रहती है । इसलिए 'ध्वनि लक्षण का उपसजनीभूत विशेषण सगत नहीं है।' रुययक ने उनके इस आक्षेप का उत्तर निम्न श दो मे दिया है, 'कोई भी अर्थ तीन कारणो से गौण माना जाता ह-१ वह अर्थातर को प्रतीति का कारण होता है, २ वह प्रतीयमान अथ की अपेक्षा अचारु होता है । और ३ वह स्वय समाप्त होकर प्रान्तर का उपकारक होता है । - व्यक्ति विवेक, पृ०६। इडियन एस्थेटिक्स, पृ० ६३ । २ har ध्यनि सिद्धात मोर ध्यानावृत्ति विवेचन ध्वनिवार के लक्षण म वाच्याथ की गौणता उपर्युक्त परणो मे से प्रथम दो को दृष्टि से नहीं हैं । उन दोनो की दृष्टि से उनम दोप मिल सकता ह । परतु उसमे तीसरे कारण की दृष्टि से गौणता है । ध्वनिवार ने ध्वनिकाव्य उत्तमवायव्य विरोप का लण क्यिा है । जसा कि उहाने कहा भी ह 'काध्यविरोप स ध्वनि इति सूरभि कथित । इस लक्षण में 'प्रथ' मा 'उपसजनीकृत' विशेषण गुणीभूत-व्यग्य पो भिन वरने के लिए ही दिया गया है । गुग्गीमूत व्यग्य मे वाच्याथ जहाँ गोण भी होता ह वह स्वय समाप्त होकर प्रतीयमान प्रथ का उपकारक नहीं होता ह । समासोक्ति मे वाच्याथ प्रतीयमान अथ की प्रतीति का कारण होता ह परतु प्रतीयमान मर्थ स्वत पूण न होकर लौटकर याच्याथ ये उपस्कार के लिए ही प्रवृत्त होता ह । इस प्रकार ध्वनि के लक्षण मे अथ वा 'उपराजनीभूत विरोपण पूण युक्ति युक्त ह ।' महिमभट्ट ने ध्वनिलमग मे प्रयुक्त 'कायविशेष पद के प्रयोग पर भी भाक्षेप किये हैं । ध्वनिवादियो की ओर से इस माक्षेपो का उत्तर देते हुए प्राचाय रुपया ने कहा है. प्रसिद्ध लक्ष्य का पाश्रय लेकर ही लक्षण को रचना की जाती ह । लक्ष्य की दृष्टि स दो प्रकार का काव्य दिखलाई पडता ह-~-१ मुस्य और २ गौण । मुग्य वह है जहाँ यग्म का प्राधाय है, शेष मे यग्य का प्रप्राधा य ह । वह गुणीभूत व्यग्य ह । य दोना हो का य हैं क्योकि मनादि काल से उन दोना के लिए ही वाव्य का व्यवहार होता चला पाया है ध्वनिवादी मुख्य मोर गौण की बात न करके 'काय विशेष कहते हैं जिरास गुरणीभूत व्यग्य का ध्वनिकाय के भीतर परिगणन न हो सके । गुणीभूत यग्य काय की सत्ता को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। कारण, ऐसी रचनाएँ उपलध होती हैं जिनम रम प्रस्फुट है अयया अगभूत है। ऐसी रचनामा मे का यत्व तो अनादिकाल के व्यवहार के कारण स्वीकार ही करना पड़ता है। जिग रचना म लगीरस स्फुट एव प्रधान होता है वहाँ ध्वनि का य का यवहार होता है अन्यत्र गुणीभूत यग्य प्रादि का । यदि यह कहा जाय कि मन को विश्राति प्रदान करने वाला रम मप्रधान नहीं हो सकता, तो ठीक नहीं है । क्योकि कभी भी अगोरस के प्रति अय रम अग रूप में वित्रित मिलता है। इसी अगागिभाव को ही ध्यान म रखकर भरत मुनि ने स्थायी पौर सचारी भावो का विभाजन दिया है । जहाँ स्फुर अगी रस है, वहाँ रस ध्वनि का यवहार होता है और जहा प्रस्फुट रस है वहाँ वस्तु ध्वनि अथवा प्रकार पति का। इस प्रकार ध्वनिबादी में मत में सभी प्राशकायो का समुचित समाधान उपल ध हाता है । प्राचाय रुय्यक' ने महिमभट्ट ये याक्षेपो को निस्सारता प्रकट करके ध्वनि सिद्धात का समर्थन किया है | व्याख्यान मे स्पष्टीकरण वे दो दजन से अधिक स्थल । उनम उहोने कही तो व्यक्ति विवेकवार का प्राग्रह, कही बदतोव्यापात, कही मिथ्या माक्ष प प्रादि दोपो का उद्घाटन करके ध्वनि मिद्धा ना को अनुमान के चगुल से घुलने का सफल प्रयाम दिया है। ध्वनि को प्रतिष्ठा में व्ययक का सहयोग सराहनीय है । २ व्यक्ति विवेक-व्याख्यान पृ० १३ । अवयक्तिवादिन कृत । -व्यक्ति विवेक यारयान, पृ० १०३ ॥

रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का कमिक विकास ४७ Pr क्षेमेद्र का मौचित्य सिद्धात और ध्वनि- नौचित्यविचार चर्चा नथ के अाधार पर क्षेमेन्द्र 'औचित्य प्रस्थान के प्रतिष्ठापक स्वीकार किये जाते हैं। पर इस प्रस्थान की उद्भावना के बीज भरत के नाग्यशास्त्र तक म प्राप्त होते हैं । उसके पश्चात भामह, दडी और वामन अपने अपने अथो म यद्यपि मौचित्य शन्द का उल्लेख नही करते, परन्तु उनके दोपो मे अनौचित्य का बहुत कुछ अशो मे समावेश है । काव्यालकार, काव्यमीमासा और घ्व यालोक में औचित्य का उल्लेख है । ध्वयालोक में मौचित्य को रस परिपाक' का अनिवार्य अग स्वीकार करत हुये निम्नलिखित कारिका उद्धृत है- अनौचित्याहत नायद् रसमगस्य कारणम् । प्रौचित्योपनिय वस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥२ क्षेमेद्र ने इसी 'परा उपनिपत्' को मा यता का पल्लवन किया है । इसीलिय प्रौचित्य रस की पात्मा माना गया है । औचित्य प्रस्थान ध्वनि विराधी मार्ग नहीं है । इसका एक कारण तो यह कि इस प्रस्थान का ध्वनि के साथ जसा कि कु०पू० स्वामी शास्त्री ने प्रदर्शित किया है- उसको बिना किसी प्रकार की क्षति पहुँचाये ही भली भांति समवय किया जा सकता है। दूसरे 'पौचित्य' बहुमुखी मार्ग है और ध्वनि केवल अथमुखो। तीसरे वह 'पौचित्य ध्वनि का स्पष्ट विरोध नहीं करता और न कर सकता है । वह ध्वनि का समथन ही करता है । मम्मट द्वारा प्यनि-शास्त्र का निर्माण- प्राचाय मम्मट न काव्य के क्षेत्र में विस्मयकारी समवय की चेष्टा की। स्वाथ काव्य प्रकाश मे उहोने अपने समय तक के काय मिद्धा तो पी महत्वपूर्ण उपलब्धियो को ध्वनि के पालोक, म व्यवस्थित मोर समर्मावत रूप प्रदान किया है। उनके समग्र प्रेरणा-स्रोतो का उल्लेख करने का अवसर यहा नहीं है और न उनके द्वारा पुरस्कृत काव्यालोचन के मानदड का विवेचन करने का ही इस समय तो ध्वनि के ऐतिहासिक विकास कम उनकी महत्वपूण शृङ्खला पर ही विचार करना है। आन दवधन ने मवप्रथम मौसिक रूप से चलते हुय ध्वनि सम्बधी विचार विमश को सुव्यवस्थित सिद्धा त का रूप प्रदान किया । यह एक मानी हुई बात है कि जब कोई सिद्धात व्यवस्थित रूप से लिखित रूप में प्रस्तुत होता है तो पालोचको को दृष्टि उस पर अवश्य पडती है । इनमे से कुछ उसका सण्डन करते हैं और कुछ मण्डन । ध्वयालोक ने ध्वनि को जब व्यवस्थित कायालोचन के सिद्धात रूप में प्रस्तुत क्यिा तो उसके प्रवल ममथक भी सामने आये। उनमें अभिनवगुप्त और मम्मट का नाम मुरय है । यह कई बार कहा जा चुका है कि ध्वनि मे काव्य को प्रारमा को खोजने का प्रयल पौर उमकी उपलचि को सूचना है। श्रोता अथवा पाठक की दृष्टि से वह 'सद्य परनिवृत्ति ही है। इसी को काव्य कसौटी मानकर ध्वयालाक्कार ने काव्य परीक्षा की, व्यारया की। अभिनवगुप्त ने २ डा० राघवन सम कनसप्टस माफ अलकारशास्त्र, पृ. २४५ । ध्वयालोर. ३-१५॥ मौचित्यविचार चर्चा, कारिका ३ । ३ ४८ ध्वनि सिद्धात मोर व्यजनावृत्ति विवेचन ध्वनि के मालोक का दर्शन कराने के लिये 'ध्वयालोक' पर लोचन टीका लिखी। 'लोचन' ने ध्वनि का समस्त वभव स्पष्ट कर दिया. उन प्रानुपगिक तथ्यो का भी दर्शन कराया जो ध्वनि के आलोक में स्पष्ट नहीं थे तथा कुछ नवीन तथ्य भी प्रस्तुत किए । 'ध्वयालोक' की अपेक्षा 'लोचन' ही मम्मट का अधिक प्राधार है। जसा प्रारम्भ में कहा गया है कि मम्मट ने काय क्षेत्र में समवय प्रस्तुत किया है । उहाने ध्वनि के क्षेत्र में यहो काय किया है। एक विद्वान का मत है कि मम्मट से बढकर म्वनिवाद का प्रचारक कोई नहीं हुमा है और उनका प्राय काय प्रकाश ही ध्वनिवादी अलकारशास्त्र का सव प्रथम और साथ ही साथ सबसे श्रेष्ठ प्रामाणिक प्रय है।' मत निविवाद माना जा सकता है कि ध्वनि के क्रमिक विकास में मम्मट अतिम क्डी हैं । विश्वनाथ और पण्डितराज भी आगे नहीं बढ़े हैं । ध्वनि विकास में मम्मट ने जो काय किया है उसे सरलता के लिए तीन भागो में विभक्त कर सकते हैं । पहिले पान द और अभिनव के द्वारा प्रतिष्ठित मूल सिद्धातो को अपनी सक्षिप्त एवं समन्वयवादी शब्दावली में प्रकट करने का प्रयत्न दूसरे आनद मथवा अभिनवगुप्त में सकेत रूप से प्रतिपादित सिद्धान्तो का बोधगम्य स्पष्टीकरण प्रदान करने की चेष्टा और तीसरे अपनी धारणामो का भी इस समय में स्थान देने का प्रयत्न । इसलिए ध्वनि विकास का अध्ययन करते समय मम्मट के प्रथम प्रयल का विवेचन करना अप्रास गिक प्रतीत होता है । इस अनुल्लेख का यह तात्पय कदापि नहीं है कि मम्मट के इस प्रयत्न को कम महत्व प्रदान किया जाता है। वस्तुत मूल्य तो इसी प्रयत्न का अधिक है। परतु मम्मट की वास्तविक प्रतिभा के दर्शन तो अन्य दो ही प्रयत्लो में होते है। दूसरे मानद और अभिनवगुप्त के उल्लेख के अवसर पर मूल सिद्धातो का एक बार उल्नेख हो चुका है यहाँ उनका उल्लेख चर्वितचवण ही होगा। मानदवधन के अनुसार काव्य का लक्षण यह है- 'सहृदयहृदयालादि शब्दायमयत्वमेय काव्यलक्षणम् । २ सामा यतया यह काव्य लक्षण ठीक है, परतु विश्वनाथ की भाति यह भी 'काव्यविशेष का ही लक्षण है, काव्य-सामाय का नही । यह पहले स्वीकार किया जा चुका है कि ध्वनि में काव्य की प्रात्मनिष्ठ याख्या का प्रयत्न है। इस दृष्टि से उपयुक्त लक्षण मे 'सहृदय प्रमाता, श्रोता अथवा पाठक है। 'पाह लाद रस का परिचायक है और 'गनाथमयत्व कायम प्रयुक्त शब्द और अथ के लिए प्रयुक्त है । यह परिभाषा इस प्रकार रखी जा सकती है। 'सहृदय के हृदय को प्राह लाद प्रदान करने वाला ही शब्दार्थ काव्य है ।' पाठर अथवा सामाजिक की दृष्टि से लक्षण को यदि पूण भी मान लें तो भी काव्यातोचक की दृष्टि से इस एकागो ही स्वीकार करना पडेगा । इममे वाद विवाद की यथेष्ट गुज्जाइश है। अब तक काय क्षेत्र में प्रचलित काय लक्षणो का समन्वय करने की भी चेष्टा नही है। इस दृष्टि से मम्मट का काय लक्षण सक्तीमद्र डा० सत्यव्रतसिंह हिदी का प प्रकाश वो भूमिका, प०७० । ध्वयालो प्रथम उद्योत, पृ०३। २ : 3९९५ on रोतिकाल के भूप ध्वनि का क्रमिक विकास ! Ye लपण है । उसकी विस्तृत परीक्षा न करके सक्षेप मे उसकी विशेषतानो का उल्लेख है । मम्मट का लक्षण यह है तददोषो शग्दाथों सगुणावनलकृती पुन पत्रापि ॥' मम्मट के अनुसार दोषरहित, गुणसहित और यथासम्भव अलकृत शब्ताय ही काव्य है। मम्मट के अनुसार दोप, गुण और अलकारा का किसी न किसी प्रकार रस से ही सम्बध है । दोष रस के विधातक हैं, गुण रस के नियत प्रगी धम हैं और अलकार परम्परया रस से उपकारक, फ्लत इन सभी विशेषणो से रस की व्यजना है। सबसे बड़ी बात यह है कि ध्वनि-दृष्टि से निरपित काव्य लक्षण में भी यदि ध्वनि का समावेश न हा सका वह लक्षण ही क्या ! काव्य- लक्षण मे भानन्द-वर्धन के लक्षण को व्यापक, ध्वनियुक्त, सवतोभद्र और प्रचलित लक्षणो से समवित प्रस्तुत करने का ही मम्मट का प्रयत्न है। ध्वयथ के अनुसार मानद ने काव्य के दो भेद निये है। दो हो हो भी सकते हैं । एक काव्य का वह रूप जहा व्यग्य अथ चमत्कारयुक्त और प्रधान हो और दूसरा वह रूप जहाँ व्यग्य अपेक्षाकृत कम चमत्कारयुका और अप्रधान हो। परतु इसके अतिरिक्त ध्वयालोककार काव्य के चित्रभेद की ओर भी सकेत किया है । समवयवादी मम्मट ने उनका सूत्र ग्रहण कर काव्य के तीन भेद किये और काव्य के तीसरे भेद में भी व्यग्य सस्पशत्व का समावेश कर दिया । वस्तुत ध्वनि के अनुरूप दो प्रकार का काव्य स्वीकार कर लेने पर काफी मात्रा में ऐसा मथ चित्र अथवा शब्द चित्र प्रधान वाडमय रह जाता है जिसका समावेश उपमुक्त दो भेदो में असम्भव था। और तृतीय येद न मानने से विवाद-परम्परा का प्रत न हो पाता । विश्वनाथ आनद को दो भेद वाली उक्ति पर चले और उलझ गय । मम्मट के काव्य के तीन भेद मान लेने पर विवाद का प्रत हो गया और काव्य के तीन भेद सवमा य हो गये । ध्वनिकार ने व्यग्य के प्रधानभाव और गौणभाव के कारण काय दो भेद किये और प्रथम को ध्वनि नाम दिया तथा दूसरे को गुणी भूत-व्यग्य । इसके बाद भी बचे वाड्मय को 'ततोऽयत् चित्र नाम दिया है। 'काव्ये उभे को विधेय स्वीकार करके विश्वनाथ ने चित्र को काव्य सीमा से बाहर धकेल दिया। साथ ही साहित्य दपण के दशम उल्लास मे चित्र काव्य के प्रलकारो का विवेचन करने की प्रवाछित चेष्टा की । विश्वनाथ भी ध्व पालाक के अनुक्तक हैं । पर तु मम्मट ने देखा कि ध्वनिकार ने 'ततोऽ यत् चित्रम्' कह कर चित्र की उपेक्षा नहीं की जसी कि उन्हें काव्य के दो भेद मानने के पश्चात करनी चाहिए थी। अपितु चित्र का भी सक्षिप्त विवेचन अभिनवेश के साथ किया । दूसरे उहाने स्वय भी प्राचीन मालकार प्रधान काव्य की परिपाटी पर एक साथ पर्दा डालने के प्रयत्न की असफलता देखकर चित्र का भी काव्य का तीसरा भेद मान लिया। ध्वनिकार ने व्यग्याथ प्रधान काय को ध्वनि की सना प्रदान की है और व्यग्याथ गुणभाव- युक्त को गुरणीभूत-व्यग्य काय की । अय का नाम चित्र दिया है । यहाँ भी मम्मट ने अपनी विशेषता का परिचय दिया है । उहोंने काय के तीनो भेदो के नाम उत्तम, मध्यम मौर प्रवर पर दिये हैं । साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह उत्तम काय ही परम्परागत ध्वनि काय १ काव्यप्रकाश प्रथम उल्लास । .

५० : ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन है और मध्यम हो गुणी भूतव्यग्य । प्रवर तो चित्रकाव्य है । ही यदि विचार किया जाय तो ध्वनिकार ने काव्य के तीन नाम देकर काय के विविध विभाजन की अोर पक्षपात तो प्रदर्शित कर दिया था परतु उनके ध्वनि और गुणीभूत व्यग्य मे जो सूत्र अथवा तारतम्य विद्यमान है, वही सूत्र चित्र में नही हैं । 'मानद और अभिनव' को ध्वनि और गुणीभूत काव्य के यग्यो में चारुत्वाचारत्व अभीप्ट नहीं है। उनके अनुसार ध्वनि और गुणीभूत व्यग्य कान्यो का व्यग्याप समान रूप से मति रमणीय है। ध्वनिकार ने स्वीकार किया है, ध्वनि निष्यद रूपो द्वितीयोऽपि महाकविविषयोऽतिरमणीयो लक्षणीय सहृदय ।' इसके विपरीत मम्मट ने उत्तम, मध्यम और अधम नाम देकर उत्तम प्रौर म यम के व्यग्यों को प्रति चारु और "यून चार मानकर उत्तम से गुणीभूत व्यग्य तक पाने वाले ध्वनिकार के व्यग्य चारत्व सूत्र में प्रवरकाव्य को भी सग्रथित कर दिया। इससे ध्वनिवादी समालोचना में उत्कृपा गया, काव्य भेदो में तारतम्य स्थापित गया और उसमें व्यवहारिकता का समावेश हो गया जिसकी बडी आवश्यकता थी। उत्तम और गुणीभूत-व्यग्य के व्यग्य में समरमणीयता देखने म सत्यता तो थी परतु याव हारिकता नहीं थी। व्यग्य सौदर्य कहने से अचारु नही होता, इसे मम्मट जानते थे । यही मम्मट वा सबसे बडा काय था। मध्यम काव्य भेद ध्वनिकार और अभिनवगुप्त म गुणोमूत व्यग्य के माठा भेदा के सकेत हूढे जा सकते हैं परन्तु उनका स्पष्ट लक्षण विवेचन नहीं हुआ है । मम्मट केवल ध्वनि सिद्धात का मात्र प्रति पादन नहीं कर रहे थे प्रत्युत ध्वनि शास्त्र का निर्माण कर रहे थे। उहाने उन सकेतो का सूत्र ग्रहण कर गुणीभूत व्यग्य मध्यम काव्य के आठ भेद किय, प्राठा के ध्वन्यालोक पौर अभिनव से ही सूत्र ग्रहण कर नामकरण किये, पाठो के लक्षण, उदाहरण और सगति प्रदर्शित करके मध्यम काय के प्रसग को अतिम रूप प्रदान किया । उहाने रस को सवथा अलकाय स्वीकार कर पानदवधन और अभिनवगुप्त की रसवत् अलकार सम्बधी मा यता का प्रत्याख्यान करके अपराग की स्थापना की। मम्मट को ध्वनि-माग भ्रष्ट माने जाने का भय नही है । भय उह यह है कि अव्याव हारिकता मे पडकर वक्राक्ति-सिद्धात की भांति ध्यान सिद्धान्त सकीण होकर अवरुद्ध न हो जाय । ध्वनि-काव्य में रस और भाव प्रगीभाव अथवा प्रधान रूप स यवस्थित रहते हैं परतु काव्य म कभी कभी इसके विपरीत स्थिति मी या जाती है। कभी कभी काव्य मे वाक्याथ भगी होकर प्रधानता प्राप्त कर लेता है और रस, माव रसामास, भावाभास प्रादि उसके प्रग हो जाते हैं, ऐसी स्थिति म अगभूत गौणभूत रस मादि को ध्वनिवार अलकार रसवदादि मानते हैं। यह उनका अपना पक्ष है। इसलिये इसम उनका अभिनिवेश है । यद्यपि अपनी इस स्थापना की कमजोरी भी उनको स्पष्ट है कि जो रस, माव प्रादि सवदा अलराय हैं उहें अलकार मानने में अव्यवस्था की समावना है। फिर भी वह मानते हैं। अभिनवगुप्त ने भी इस मायता का समर्थन पर दिया । मम्मट प्रलवार को परम्परा से रस अात्मा का उपकारक स्वावार करते हैं । ध्वयालोर ३-३७ ।

रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का ऋमिक विकास . यदि उह रस से, परम्परा से ही सही सम्बद्ध नही किया जाता है तो काव्य में उनकी व्ययता सिद्ध होती है और गुणीभूत रस आदि को अलकार स्वीकार कर लेने पर 'अलकार्य-अलकार' सम्बध ठीक नही बैठता है । वक्रोक्तिकार इसी आधार पर रसवत का खण्डन कर चुके थे। ऐसे घम सकट मे मम्मट ने ध्वनिकार और अभिनव का माग छोडने मे ही भलाई देखी और रसवदादि को अलकार नहीं माना ।' उहोंने गौण रस भाव आदि गुणीभूत व्यग्य के मदर 'अपराग' की सायक सज्ञा देकर सम्मिलित कर दिया है । यद्यपि इनकी मा यता का भी साथ ही साथ उल्लेख कर दिया है। यह परिवर्तन मम्मट की वज्ञानिक दृष्टि का ही सूचक है । इस 'रसवत का विशेष उल्लेख मध्यम-काव्य के विवेचन के प्रसग मे पागे किया जायगा। मम्मट नवीन मार्ग का अनुसरण करते हैं और बडे साहम के साथ, परतु केवल नवीनता के लिये नहीं । उनका नूतन मार्गालम्बन कभी व्यावहारिक्ता की रक्षा के लिये होता है तो कभी वज्ञानिकता के सनिवेश के लिये, परन्तु ध्वनि का राज माग कभी भी दृष्टि से प्रोझल नही होता है। ध्वनिकार ने ध्वनि का विवेचन क्यिा । उह ध्वनि के पांच अथ अभीष्ट हैं। इन पाचों में एक का प्रयोग व्यजना वृत्ति के लिए भी होता है । ध्वनिकार ने प्रथम उद्योग मे ध्वनि को भक्ति से भिन्न सिद्ध किया है। वहाँ ध्वनि से उनका तात्यय यजना-वृत्ति' से ही है, परतु व्यजना वृत्ति का उहाने शब्दत कही उल्लेख नहीं किया है। मम्मट को यह त्रुटि प्रतीत हुई । व्यजना के सुकुमार बुद्धि वाले अध्येतानो के लिए एसे स्थल शकास्पद हो जाते हैं । मम्मट ने स्वय काव्यप्रकाश मे व्यजना-वृत्ति के इस रूप को पूर्ण स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। व्य जना का वणन मोर विवेवन अभीष्ट होने पर भी प्रमिधा, लक्षणा, मोर तात्पर्या नामक शब्द-शक्तियों का विवेचन भी प्रासगिर हो जाता है । ध्वनिकार ने इस तथ्य को भोर भी दृष्टिपात नहीं किया था। इन शब्द शक्तियों का परिचय और विवेचन व्यञ्जना के स्वरूपबोध को सरलता के लिये है । व्य नना तो चौथी शक्ति है उमका प्रसव प्रथय तीन शक्तिपी में असम्भव सिद्ध करने के लिए भी इन शक्तियों का स्वरूप बोध प्रावश्यक है । ध्वनिकार से पूद अभिधा मौर लक्षणा का काव्यक्षेत्र मे पदापण हो चुका था। इन तथा कई अय कारणो से मम्मट ने अमिषों लपगा का सप्रसग विवेवन किया है भोर तात्पर्या को मोर सकेत भी । यह वृत्ति विवेचन भी मम्मट ने पाडित्य प्रादि प्रशन के लिये नही किया है वस्तुत भनि का माग सरल और प्रशस्त करने के लिए ही क्यिा है। व्यजना के साथ-साथ प्राय तीन शक्तियों का विवेचन होने से ध्यजना के स्वरूपबोध में सरलता तो हुई लक्नि उनका ध्यजना से सम्बय स्थापित करने को भी प्रायश्यकता उपस्थित हो गई । मम्मट ने उस भावश्यकता का भी अनुभव किया और घ्यजना धृत्ति के शाब्दी रूप के अमिधामूला ध्यंजना मोर लक्षणामूना व्यजना भेद किये। इस भेदविभाजन से मभिधा मौर सक्षणा का प्यजना से सम्बघ स्थापित हो गया तथा सभी शक्तियों का क्षेत्र-विभाजन भी हो गया । इसो प्रसग मे मभिधा के वाच्याय नियामकों का भतृहरि के प्राधार पर उल्लेख ध्वयालो २-२७ 1 ५२ ध्वनि सिकात मोर ध्यानावृत्ति विवेचन किया भोर मार्थी व्यजना के वक्ता, बौद्धव्य भादि प्रर्थ अभिव्यक्ति हेतुमो का भी उल्लेख किया है। व्यजना की प्रतिष्ठा के लिए यह अत्यन्त आवश्यक काय था। इतना ही नहीं पचम उल्लास के अन्त म पहुँच कर सभी विरोधी सिद्धान्तो का एकत्र निराकरण किया है । ध्वनिकार ने भी अभिधावादी, लक्षणावादी आदि विरोधी सिद्धता का यत्र तत्र निराकरण किया है, परतु उसको एकत्र करके अकाट्य तर्कों से व्यजना की प्रतिष्ठा को अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा मानकर उत्तर देने का प्रयल मम्मट का अपना प्रयल है। सव प्रथम 'रसादि लक्षण प्रथ तो स्वप्न मे भी वान्य नहीं होता कहकर व्यजना को मभिधा तथा लक्षणा से व्यतिरिक्त सिद्ध किया है । यही पर मोमासको ये ममिहिता वयवाद फोर अविताभिधानवाद में व्यजना की सिद्धि की, मोर वाच्याथ तथा व्यग्याथ मे भनेक रूप भेद दिखाकर व्यग्य बोध के लिये व्यजना को प्रतिष्ठा की है। इसका विस्तत उल्लेख इसी प्रबन्ध के द्वितीय अध्याय में किया जायगा। 'वयालोक' तथा 'लोचन' के रचियतामो ने 'ध्वनि सिद्धात' का प्रतिपादन किया था, उहोने काव्य में भदोपभेदा के लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत नहीं किये थे। परतु मम्मट 'ध्वनि शास्त्र' की रचना कर रहे थे, उहोने काव्य के भेदोपभेदो के नामकरण, लक्षण, उदाहरण आदि प्रस्तुत किय और गद्यवृत्ति के द्वारा लक्षणो की उगाहरणो मे सगति भी प्रदर्शित की । ध्वनि के विकास क्रम में मम्मट का योगदान विरोप महत्वपूर्ण है। काव्य को, भेदोपभेद-व्यवस्था मे मम्मट ने दो प्रसग ऐसे भी जोडे जिनका समुचित मौचित्य दिखाई नहीं पड़ता है । उनम से एक है शशक्त्युत्यवस्तु व्यग्य का प्रसग और दूसरा है अयशक्त्युत्य वनि के विनिवद्धवक्त प्रोटोक्तिमात्र सिद्ध भेद को कल्पना । घयालोककार ने पाशक्ति से अलकार ही व्यग्य माना है । श दशक्ति से वस्तु ध्वनि ध्वनिकार एव लोचनकार को मा य नहीं है । इसका विशेष उल्लेख द्वितीय अध्याय मे होगा। मम्मट ने शब्दशक्तिमूल वस्तु ध्वनि भी स्वीकार को है पविनि बद्धवक्त प्रौढोबिन की मा यता का पण्डिनराज ने खाइन कर दिया है । कविनिबद्धवक्ता कवि से अलग कसे माना जा सकता है । ध्वनि प्रतिष्ठा में विश्वनाथ का योग- ध्वनि के विकास नभ मे विश्वनाथ का योगदान अधिक महत्वपूर्ण नहीं है । साहित्य दर्पण के प्रथम परिच्चे में कायप्रकाशकार मोर ध्वनिकार के खण्डन मे प्रदर्शित उत्साह को देखकर अध्येता को दपण-दशन से नवीनता-दशन को जो भाशा बघती है वह घोरे धीरे क्षीण होकर निराशा में परिणत हो जाती है। काय का लक्षण निश्चित करने के पश्चात् 'अष्टादश भाषा धारविलासिनी भुजग' और 'ध्वनि प्रस्थापनपरमाचाय विश्वनाथ प्राचाय मम्मट के शदो से हो दुहराते दिखाई पड़ते हैं। विश्वनाथ भी ध्वनिवादी प्राचाय हैं । साहित्यदपण का भी दनि प्रतिष्ठा में थोडा बहुत योग स्वीकार करना पडेगा, पर तु उसम ध्वनि को लेकर कोई विशेष स्थापना उपल ध नही होती है। साहित्य दपण कायप्रकाश की अपेक्षा सरल शैली में लिखा प्रय है । इसलिए 'दपण प्रकाश दृष्टि के लिए प्राधार अथवा सीढी अवश्य बन सका।

रीतिकाल के पूर्व ध्वनि का क्रमिक विकास ५३ विश्वनाथ ने ध्वनि की प्रतिष्ठा में दो एक काय विशेष उल्लेखनीय किये हैं। यद्यपि वे दोनो नवीन नहीं माने जा सकते हैं। फिर भी अपनी सरल शैली में ध्वनि वोध के लिए अग्रसर होने वाले सुकुमारमति अध्येतानो के लिए उनका उपयोग कम नहीं है। व्यजना वृत्ति ही व्यग्य का बोध कराने वाली वृत्ति है। अब तक उसकी प्रतिष्ठा मली- भाति हो चुकी थी, काव्यक्षेत्र मे व्यजना का सावभौमत्व स्वीकृत हो चुका था, परन्तु उसका लक्षण अभी तक नहीं हो पाया था। सबसे पहले विश्वनाथ ने ही व्यजना वृत्ति का युक्तिसगत लक्षण प्रस्तुत किया है। अपना मपना मथबोधन कराके अभिधा आदिक वृत्तिया के शान्त होन पर जिससे प्रय अथ का बोध होता है, वह शब्द म तथा अर्थादिक मे रहने वाली वृत्ति व्यजना मानी जाती है।' रीतिकाल में इस लक्षण का सबसे अच्छा अनुकरण हरिचरणदास के सभाप्रकाश में उपल ध होता है। प्राचाय मम्मट तक व्यजना तृतीया वृत्ति मानी जाती थी। मम्मट ने 'तात्पर्या' वाश्य शक्ति को स्वीकार तो किया था, परतु 'अथभेद' बताते समय 'तात्पर्यार्थोऽपि के चित्'- कुछ लाग तात्पर्यार्थ को चौथे प्रकार का अथ स्वीकार करते हैं-कहकर मौन हो गये थे। विश्वनाथ ने इस शका को दूर कर दिया और 'तात्पर्या शक्ति को तोसरी शक्ति मानकर व्यजना को चौथी शक्ति घोषित कर दिया। विश्वनाथ ने इसका सकेत 'लोचन' से ग्रहण किया था। इस स्थापना से व्यजना तुरीया शक्ति होकर तुरीया अवस्था की भांति 'आत्मसाक्षात्कार' का दानिक महत्व प्राप्त कर सकी। प्राचाय मम्मट ने व्यजना को अनेक प्रकार से अभिधादि शक्तिया से भिन्न सिद्ध क्यिा पा। विश्वनाथ ने इस प्रसग को सुकुमार बुद्धिग्राह्य बनाने का प्रशसनीय प्रयत्न क्यिा है, और व्यग्य का अभिषेय से भेद स्पष्ट करने के लिय कहा है-- बौद्धा, स्वरूप, सख्या, निमित्त, काय, प्रतीति, काल, माश्रय और विषय प्रादि की भिन्नता के कारण व्यग्य वाच्याथ से भिन्न है ।२ इनवा सकेत काव्य प्रकाश मे अवश्य है परतु उहोने इनकी गणना करके भेद को स्पष्ट कर दिया है । इनका सविस्तार विवेचन द्वितीय अध्याय में किया जायगा। ध्वनि सिद्धात का विकास और परितराज रस-गगाधरकार के समय तक पहुंचते पहुंचते प्रलकार शास्त्र पूण परिनिष्ठित हो चुका था। काव्य के सभी सिद्धान्त वादि प्रतिवादिया के सघर्षों के पश्चात प्रतिष्ठा पा चुके थे । फलत पहिसराज ने अपनी भव्ययाय की शली में उनका बहुत सुदर एव सफल परिष्कार किया है। विषय का प्रतिपादन अत्यन्त नपा-तुला एव प्रौढ है। प्रकार की शनी म कही भी सक्षिप्तता १ विरतास्वभिधाधासु ययायों बोध्यते पर । सा वृत्ति व्यञ्जना नाम शब्दस्यार्यादिस्य च । सा० ८०,२, १२ । २ बोधस्वरूपसस्यानिमित्तकायप्रतीतिकालानाम् । माश्रयविषयादीनां भेदाभिन्नो अभिषेयतो व्यग्य ॥ सा०६०,५,२।

ध्वनि सिवात मोर ध्यजनावृत्ति विवेचन राज ने बडे लम्बे विवाद के पश्चात स्वीकार क्यिा है । उहोंने सलक्ष्यक्रम व्यग्य के शब्दशक्तिमूल प्रसग में द्वितीय अप्राकरणिक अथ की प्रतीत के सम्बध मे काफी विचार किया है। इस सबका विस्तृत परिचय द्वितीय अध्याय में किया जायगा। मम्मट मादि मालकारिकों ने प्रर्यशक्तिमूल सलक्ष्यनमध्वनि के बारह भेद माने हैं । उहोंने कविनिबदरक्त प्रौढोक्ति निष्पन्न मथ को व्यजक मानकर वस्तु और प्रकार के माधार पर चार भेद और बढ़ा दिये हैं । परन्तु पडितराज को दृष्टि मे कविकल्पित और कविनिबद्धवक्त कल्पित अर्थों में कोई भेद नहीं है । दोनो ही अथ कविकल्पना प्रसूत ही हैं। इस प्रकार के भेद बढाने से सख्या अनत हो सकती है।' पडितराज का यह तक समीचीन है। ये चार भेद ध्वयालोक के 'तत्र वक्ता कवि कवि निबद्धो वा कश्चित' के माधार पर अभिनवगुप्त ने माने हैं। उन्हो का अनुकरण मम्मट एव विश्वनाथ ने किया था। परन्तु ध्व यालोक का यह उद्धरण कारिका का अश नहीं है दूसरे व्यजक पथ के भेटो का उल्लेख करने के अवसर का भी नहीं है । संघटना को रस यजकता सिद्ध करने के प्रसग मे उल्लेख है। पडितराज को शनाथमूल ध्वनि भी माय है । यह दवयुत्यध्वनि वाक्यमान मे ही सम्भव है । लक्षणामूला ध्वनि के दोना भेद तथा अभिवामूलाध्वनि के सलक्ष्यत्रम के दश भेद पद मोर वाक्य दोना मे होते हैं । इस प्रकार पडितराज के अनुसार ध्वनि के उत्तीस भेद होते हैं । पडितराज रस गगाधर को पूरा नही कर पाये । फलता उसमे -यजनावत्ति का विवरण एव उत्तमकाव्य के भेद उपलब्ध नहीं हैं। यहा तक ध्वनि सिद्धान्त के रीतिकाल से पूर्व विकासक्रम का उल्लेख हुना। रसगगाधर कार और रीतिकाल के प्रथम शनिवारी प्राचाय चि तामणि समकालीये पोर दोनो शाहजहा के आश्रित थे। रीतिकाल रो पूव ध्वनि सिक्षात का प्रतिपादन करने वाले सभी ग्रय सस्कृत में लिखे गये थे। चिन्तामणि से ध्वनि सिद्धान्त का विवेचन हि दी में भा प्रारम्भ हुआ। परन्तु हिन्दी के जिन प्राचार्यों ने ध्वनि सिद्धात का विवेचन किया है उहोंने मुख्यतया काश्यप्रकाश का ही अनुकरण किया है । कही-कही साहित्यदरण का भी प्राय लिया गया है, परतु रस गगाधर का उसको नययाय को तार्किक गली के कारण अनुकरण न हो सका । काय प्रकाश सम जयवादो ग्रथ है । वस्तुत इसी प्रथ के कारण ध्वनि सिद्धान्त को स्थिरता मिली। १ हिदो रसगगाधर पृ० २'प्रतिभा-भेदातर प्रयोजकतापते । २ तदेवमते प्रागुक्ता द्वयुत्थातिरिक्ता सर्वेऽपि ध्वनय एकस्मिन वाच्ये योक्पमात्रगतास्तदा पदध्वनितया व्यपदिस्यन्त नाना पदगताया तु बाक्पध्यनितयेति । रसगगाधर, पृ० १७५ ।

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द्वितीय अध्याय
ध्वनि-सिद्धान्त-निरूपण
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२ अध्याय का प्रतिपाद्य ध्वनि-शब्द वयापरणो के स्फोट से ग्रहण किया गया है । उसका थोडा सा परिचय प्रथम अध्याय के प्रारम्भ मे दिया जा चुका है । उसो प्राधार पर ध्वनि के पांच प्रथ किये जाते हैं जिनका उल्लेख पान द वधन के प्रसग में प्रथम अध्याय में हो चुका है, यहां उनकी सक्षिप्त पुनरावृत्ति की जाती है । वे ये हैं (१) जो ध्वनि करे अथवा कराये वह व्यजक शब्द ध्वनि कहलाता है। (२) शद की भांति उसका प्रथ भी व्यजक होता है इसलिये व्यजक अथ को ध्वनि को सना प्रदान की जाती है । ये दोनों क्त प्रधान व्युत्पत्तियां हैं । (३) जो ध्वनित किया जाय वह भी ध्वनि है । ध्वनि की इस व्युत्पत्ति से त्रिविष- (रस, अलकार वस्तु) व्यग्याय को मी ध्वनि माना जाता है। यह कम प्रधान व्युत्पति है । (४) शद की जिस शक्ति के द्वारा व्यग्याथ ध्वनित होता है उस शब्द-शक्ति को भी ध्वनि कहते हैं । ध्वनि की इस व्युत्पत्ति के माधार पर शब्द की चौथी व्यजना शक्ति भी ध्वनि पहलाती है। यह करण प्रधान व्युत्पत्ति है। (५) वह काव्य भो ध्वनि कहलाता है जिसमे व्यग्याथ प्रधान और चमत्कार युक्त होता है । ध्वनि शाद को यह अधिकरण प्रधान व्युत्पत्ति है । इस प्रकार व्यजक पद और अथ, व्यग्याय, व्यग अथ को प्रकट करने वाली व्यजना शक्ति एव चमत्कारयुक्त मोर प्रधान व्यग्याथ युक्त काव्य को ध्वनि नाम से पुकारा जाता है। ध्वनि पद को ये पांचो व्याकरिणक प्रथ देखने के लिये एक दूसरे से भिन्न भौर मलग अवश्य है, परतु व्यावहारिक रूप में एक दूसरे से इतने अधिक सम्बद्ध हैं कि एक का उल्लेख करते समय दूसरे का मापसे पाप ही ग्रहण हो जाता है । इमलिय ध्वनिवादी आचार्यों ने ध्वनि सिद्धान्त के निरूपण में प्रधानतया ध्वनि की तीन व्युत्पत्तियों को ग्रहण किया है, व्यग्याथ का बोध कराने वाली व्यजना शक्ति, व्ययार्थ मोर ध्वनि कान्य। इस अध्याय मे ध्वनि सिद्धात के मतगत व्यजना-शक्ति, व्यग्य अथ और व्यग्य-अर्थ समिविष्ट काव्य का ही अध्यया पिया जायगा। ध्यग्य मय में मुख्यतया रस का परिगणन ध्वनि सिद्धात और ध्यजनावृत्ति विवेचन १ २ है मया के सुख मे भी विघ्न बन रही है । नायिका की चाटुकारिता ही व्यग्य है । यह चाटुकारिता विधि निषेध से उदासीन है। (५) कभी व्यग्याथ और वाच्याथ का विषय भी भिन्न होता है- पेखि प्रियाधर बन सहित का कों होहि न रोप । भ्रमर सहित सूघत पदुम परजी सह निज दोप।' इस दोहे का वाच्याथ तो एक ही है, परतु इसका व्यग्याथ नायिका, पति, उपपति, सहृदय आदि विषया के लिये भिन्न है । अर्थात याच्याथ एक ही है परतु व्यग्यार्थ अनेक है । यथा- वाच्याथ-अपनी प्रिया के होठ को व्रण सहित देखकर किस पति को प्रोध न होगा। मैंने तुझको सुभ्रमर कमल सूघने से रोका था । अब अपनी अविनय का फल भोग। पति विषयक व्यग्याथ-इस वेचारी का दोष नही है फ्लत इसके अधर के व्रण को देखकर इस पर क्रोध न करें। ३ सपत्नी विषयक व्यग्याथ-नायिका को पति द्वारा उपालम्भ दिये जाने पर सपलियां खुश हुई। इसलिये प्रिया शद के प्रयाग से उसका सौभाग्य सूचित किया जा रहा है । पति इससे अति मनुरक्त है प्रत मोघ कर रहा है । प्रतिवेगिक विषयक व्यग्यार्थ-पत्नी को गाढ उपालम्भ दिये जाने पर पडोसियो को उसके चरित्र के विषय मे शका हुई । इस प्रकार उमको प्रविनय को छिपाकर पडौसियो को उसकी निष्क्लक्ता बताना व्यग्य है । नायिका विषयक व्य ग्यार्थ-सपत्नियो के मध्य म इम नायक ने मेरा अपमान किया है यह जानकर तुम दुखी मत हो। यह तुम्हारा अपमान नही प्रत्युत सम्मान है। तुम इसे सहन करो। ६ उपपति विषयक यग्याथ-ग्राज तो आपकी प्रच्छ नानुरागिणी की मैंने इस प्रकार रक्षा कर ली है । भागे इस प्रकार स्पष्ट दतक्षत न करना। सहृदय विषयक व्यग्याथ-देसिये। किस प्रकार मैंने वात छिपा डाली । मैं क्तिनी चतुर हूँ। इस प्रकार यह स्पष्ट हुआ कि जिस गाथा का वाच्यार्थ एव है उसके छ व्यग्याथ हैं । ऐसे और भी उदाहरण देकर यह सिद्ध किया जा सकता है कि वाच्याथ से यग्याथ नितान्त भिन्न है। अभियावादी मीमांसकों के सम्प्रदाय- ध्वनिवार और लोचनकार ने अभिधावादियों की उक्तिया का सहन सक्षेप में ही दिया है। काव्य प्रकारी और साहित्य-दपण म इनका विस्तृत सहन प्राप्त होता है । मीमासवो मे शब्द ४ ७ वही, पृ० २६ लोचन, पृ. २७ २ अध्याय का प्रतिपाद्य ६३ पौर प्रथ के सम्बन्ध को प्रकट करने वाली शक्ति के सम्बध मे दो विभिन्न सम्प्रदाय हैं। एक सम्प्रदाय शब्दा को वाक्य से स्वतत्र अथ प्रत्यायक स्वीकार करता है । ये पूर्व मीमासा के मानने वाले कुमारिल भट्ट के अनुयायी हैं । इनका अर्थ प्रत्यायक सिद्धान्त अभिहिता वयवाद कहलाता है । इही के मत मे तात्पर्या शक्ति को अवकाश प्राप्त होता है । दूसरा सम्प्रदाय शद को वाक्य से स्वतत्र नहीं मानता है, वह मानता है कि अर्थ प्रत्याय शक्ति प्रवित वाक्य मे ही होती है। यह प्रभाकर भट्ट के अनुयायी मीमासको का अभिमत है। इसे अविताभिधानवाद कहते हैं। निमितवादी मोर दोघतराभिधा-व्यापारवादी भी इसी के अतर्गत गृहीत होते हैं। इस प्रकार भोमासको के निम्नलिखित पाच सम्प्रदाय हुए- (१) अभिहिता वयवादी-कुमारिल भट्ट । (२) तात्पयवादी-धनजय धनिक । (३) अविताभिधानवादी-प्रभाकर भट्ट । (४) शरवर दीपतरामिधा-व्यापारवादी सम्भवतया भट्टलोल्लट । (५) निमित्तिवादी। अभिहिता वयवाद का स्वरूप- अभिहिता वदवाद सिद्धात के प्रवतक प्रसिद्ध मीमासक कुमारिव भट्ट हैं । कुछ नयायव भी इस मत को मानते हैं । यह सिद्धात चयाकरण वाजप्यायन के ससगवाद पर आधृत है जिसके अनुसार विभिन्न शब्दो का वाच्यार्य ही मिलकर वाक्यार्य होता है । इसके अनुसार वन वृक्ष से भिन्न नहीं है।' वह वृक्षो का समूह ही है । वृक्षा को जब दूर से देखा जाता है तो उनमे सामूहिकता का भ्रम उत्पन्न होता है । वस्तुत वे वृक्ष ही हैं और वहा वृक्षो के अतिरिक्त बन नाम की कोई वस्तु नहीं है । वृक्षो के समूह को सरलता के लिये उसी प्रकार वन नाम दे दिया जाता है जिस प्रकार सनिकों के समूह को सेना कह लेते हैं 1४ एव कपडे का टुक्डा उन धागो से जिनसे वह बना है भिन्न नहीं है । एक धागे और कपडे के टुकडे में केवल यही अतर है कि कपडा अधिक स्थान घेरता है । इसलिय यह निर्विवाद स्वीकार विया जा सकता है कि कि अशी म प्रश की विशेषतामो के अतिरिक्त कोई विशेषता नहीं होती है । उसी प्रकार वाक्य भी शब्दों का समूह है, शब्द उस वाक्य के जिसको वे गठित करते है अग है। प्रत्येक श द का अपना अपना अलग अथ होता है । कोई भी शद अपने अथ के लिये दूसरे शद को अपेक्षा नहीं रखता। अथवान शब्दो या जब माफोक्षा, योग्यता और सनिधि के आधार पर प्रयोग होता है तब व एक दूसरे से अन्वित होते हैं । यह ठीक है कि प्रत्येक श द का एक स्वर मध है, परन्तु वह शब्दार्थ अपूण है, यह वाक्य मे ही अवित होकर पूर्णता को प्राप्त होता है । पूण अथ का वोघ वाक्य के बिना सम्भव नही है । अपूण अथवान् शदो का पूण अथवान् समुदाय ही वाक्य है । वाक्य को सघटित . १ २ ३ लोचन, पृ० २२ इडियन थियोरोज ग्राफ मोनिंग, । पृ० २०३ । श्लोर वातिर १८,७५७६ द प्राबलम माफ मीनिंग म पृ० ७२५ पर उधृत । वही, ७२। द प्राबलम अाफ् मीनिग इन इडियन फिलोसफी, पृ०६३ । १ ६४ ज्यनि सिखान्त भोर व्यसनावृत्ति विवेचन करने वाले शब्द मुख्य है, वाक्य गौण है । किसी भी भाषा के अध्ययन प्रम मे पहले रादों का मध्ययन होता है । जो वाक्य म प्रयुक्त शब्दों पे मथं नही जानते है वे वाक्य का अर्थ भी नहीं समझ सकते है । एसा कोई वाक्य उदाहरण में नहीं दिया जा सकता जिसका मर्म दाब्दों का पर्थ बिना जाने समझ में आ जाय । कहने का अभिप्राय यह है कि शब्दो के अतिरिक्त वाक्य का कोई स्वतन मस्तित्व नही होता है। यही अमिहिता वयवाद की विचार भित्ति है। इस सिद्धान्त में शब्द को स्वतत्र सत्ता मानी जाती है। तात्पय-क्ति का स्वरूप- पद तीन हेतुमो के कारण पवित होकर वाक्य की रचना करते हैं। व हेतु हैं, भाकाक्षा, योग्यता मोर सनिधि । निराकाक्ष शब्द हाथी, घोडा, मादमी प्रादि वाक्य नहीं बना सकते हैं । इनमें आकाक्षा का अभाव है। द्वितीय हेतु योग्यता है । माग से सोचता है, वाक्य नहीं है क्याकि माग में सोचने की योग्यता का अभाव है । आकाक्षा और योग्यता के होने पर सनिधि समीपता के प्रभाव मे भी वाक्य पूरा नहीं होता है। यदि एक पद का उच्चारण करने के पश्चात् घण्टे भर बाद दूसरे श द का उच्चारण किया जाय तो व दोनों वाक्य न बन सकेंगे। इस प्रकार माकांक्षा, योग्यता और सनिधि के पामार पर बने वाक्य मदो प्रभार का मय होता है, एक पदाथ और दूसरा वाक्याथ । इसम पदाथ मे सतित अथ सन्निविष्ट रहता है। अभिहिता वय-वादियो के अनुसार प्रभिधा इसी मय को प्रस्ट करती है । वाक्याथ को प्रकट वरने की शक्ति इस मभिधा मे नहीं होती है । वाक्याथ को तात्पय शक्ति प्रकट करती है। प्राचाय शुक्ल ने तात्पय शक्ति को वाक्य की अभिधा स्वीकार किया है प्रमिहिता वयषाद और व्यजना- यदि वाक्य में प्रयुक्त शब्दो को स्वतत्र अथवान इकाई स्वीकार नहा किया जाता है तो उनका सज्ञा, सवनाम, प्रिया आदि म विभाग करना व्यथ और अनुपपन हो जायगा। यदि पदाथ से वाक्याथ स्वतत्र स्वीकार किया जायगा तो कोई भी वाक्य कोई भी प्रथ दे सकेगा, जो व्यवहार में देखने में नहीं पाता है । अतएव वाक्याथ किचित भिन्न होते हुये भी पदार्थों का समुदाय ही है । सक्षेप मे यही अभिहितावयवाद का सार है । इसम अभिधा का सम्बघ शद के सकेतित प्रथ-बोध तक ही सीमित है । इसके अनुसार अभिधा भी शदाथ का बोध कराके ही विरत हो जाती है उसमें वाक्याय बोध की क्षमता नहीं है । व्यजना शक्ति का उदय तो वाक्याथ के पश्चात होता है । मत शद के साकेतित अर्थ का प्रत्यायन करावे विरत हो जाने वाली अभिधा और वाक्याथ के पश्चात उदय होने वाली व्यजना समकक्ष नही मानी जा सकती हैं। प्रत यह सिद्ध हो गया कि अभिहिता वयवाद में व्यजना अभिधा से नितान्त भिन शक्ति है। तात्पयशक्ति और व्यजना-यह समेत दिया जा चुका है कि अभिहिता वयवाद मे वाक्मार्थ का बोध कराने से पूर्व ही अभिधा विरत हो जाती है । वाक्याथ का बोध एक दूसरी शक्ति से वही, पृ०७४। इडियन थियोरोज ग्राफ मोनिग, पृ० २११ । २ अध्याय का प्रतिपाद्य ६५ होता है जिसको तात्पर्या कहते हैं । पोछे जो कपडे और धागे का उदाहरण दिया गया है उसमें धागे और कपडे में कोई विशेष भिनता नहीं है। परन्तु कपडा धागे की अपेक्षा अधिक जगह घेरता है । यह मधिक स्थान ही वाक्याथ के अधिक प्रथ को ओर सकेत करता है। शब्द का प्रर्य अपूर्ण होता है और धाक्य का अथ पूण । वाक्याथ मे शब्द की अपेक्षा यही अधिक विशेषता है । यह अधिक अर्थ शब्दो के एक दूसरे से प्रवित होने के पश्चात ही निकलता है। इसी को वाक्याथ, ससर्गाय, अथवा तात्पर्याप कहते हैं । वक्ता की विवक्षा यही है। यह कहना कठिन है कि वाक्याथ किस स्थान से निकलता है। वाक्यार्थ का बोध कराने वाली शक्ति को कुछ लोग वाक्य-शक्ति, कुछ वाक्य की अभिधा, कतिपय ससर्ग मर्यादा, अन्य तात्पर्या शक्ति कहते हैं।' जब विभिन्न शब्द अपने अपने प्रों का प्रत्यायन कराके शात हो जाते हैं तब उनके भवित प्रों से वाक्याथ का उदय होता है । इस ससर्गार्थ की प्रतीति किस प्रकार होती है इसकी अभी तक कोई विवेचना नहीं हो सकी है और अभी रहस्य ही बनी है। यह स्पष्ट हो गया कि तात्पर्या शाक्ति वाक्यार्थ का ही बोध कराती है। वह वाक्य शक्ति है । इसलिये यह तात्पर्या शक्ति उस व्यजना के समकक्ष किस प्रकार मानी जा सकती है जिसका उदय इसके विरत हो जाने के पश्चात् होता है। साथ ही यजना का सम्बध शब्द से भी होता है तात्पर्या का सम्बध वाक्य से ही होता है। अलकार-शास्त्र मे सबसे पहले लोचनकार ने तात्पर्या शक्ति का उल्लेख किया है। उन्होने यहाँ शब्द की चार शक्तियां गिनाई हैं--(१) अमिधा, (२) तात्पर्या, (३) लक्षणा और (४) व्यजना । ध्वनिकार ने तीन ही शक्तियो को मा यता दी है। भोज ने व्यजना का तात्पर्या शक्ति म भतर्भाव करने का प्रयत्न किया। इसी पक्ष का समयन जयन्त भट्ट ने अपनी याय मञ्जरी में किया है ।' भोज के पश्चात धनजय और धनिक ने तात्पर्या में व्यजना का मतर्भाव करने का प्रसफल प्रयत्न क्यिा है । ध्वनिकार ने वाच्याथ वाक्याथ और व्यग्याथ में प्रदीप घट-न्याय स्वीकार किया है । अर्थात् जिस प्रकार दीपक और घट दोनो की स्वतत्र सत्तायें होती हैं उसी प्रकार वाच्याथ और व्यग्याथ की स्वतत्र सत्तायें होती हैं । जिस प्रकार दीपक घट की सत्ता का बोधक है उसी प्रकार वाच्याय व्यग्याथ का। प्रतएव दोनों एक नहीं हो सक्ते हैं। अभिनव गुप्त की स्वीकृति के पश्चात परवर्ती ध्वनिवादी पालकारिकों ने तात्पय शक्ति को स्वीकार किया है । ध्वनिवादी यदि ममिहिता वयवाद को स्वीकार न करेंगे तो वे पद, पदाश की यजकता कैसे स्वीकार कर सकेंगे । फलत ध्वनिवादी अभिहिता वयवादी ही हैं । परन्तु यह भी सत्य है कि तात्पर्याक्ति और व्यजना समकक्ष नही मानी जा सकती हैं। प्रमाकर भट्ट के अनुयायी मीमासक पविताभिधानवाली कहलाते हैं । यह गुस्मत भी माना जाता है ये विद्वान् शब्दो को ही भाषा के वास्तविक घटक स्वीकार करते हैं। प्रत्येक शब्द - २ इडियन थियोरोज माफ मीनिंग, पृ० २०६। 'एक्स्य ततो विशेषरूपे वाक्या तात्पर्यशक्ति परस्पराविते । लोचन, पृ० १९ । डा० बी. राघवन का भूगार-प्रकाश, पृ० १६ इण्डियन थियोरीज माफ मोनिंग में उदधृत। ध्व लो०, पृ० २३६ । ४ ध्वनि सिद्धान्त और व्यजनावृत्ति विवेचन - वाक्य मे 1 का एक निश्चित अथ भी है परतु शब्द का वास्तविक अय वाक्य मे हो है । ये तात्पर्या शक्ति को स्वीकार नहीं करते हैं । शब्दबोध प्रवित रूप में ही होता है। प्रभाकर के मत को काय प्रकाशकार ने विस्तृत रूप से दिया है, अतएव यहाँ उही वे शदो का स्पातर प्रस्तुत करना ही हमे उचित प्रतीत होता है । 'शदों मे सकेत-ग्रह अवित रूप मे वाक्य से ही होता है। उस सकेतग्रहण की निम्नलिखित प्रक्रिया 'जब कोई वद्ध विसी युवक को आदेश देता है, 'गाय लायो' और युवक उसकी प्राज्ञा से सास्नायुक्त प्राणी को ले जाता है । जब बालक इस वाक्य को कई बार सुनता है और गाय लाने की क्रिया को देखता है तो आदेश वाक्य, 'गाय लाओ' और गाय लाने की क्रिया का सम्बध समझ लेता है । इस प्रकार बालक को प्रथमत सतग्रह अर्यापत्ति की सहायता स प्रखड होता है । इसके बाद वही बालक 'गाय लायो' 'अश्व लामो 'गाय ले जानो और 'अश्व ले जाना आदि आदेश वाक्य वार बार सुनता है और प्रादश के पश्चात होने वाली क्रियानो को देखता है और भिन्न भिन वाक्यो के भिन भिन्न शलोक भिन्न भिन प्रयोगों को सुनता है तब वह निवृति और प्रकृति (ले जाने और तान) की प्रियामा के द्वारा श दो के अमिधेय को भी समझता है । प्रारम्भ म वह अलग अलग शदा के जिस अथ को समझता उसमे अवयाश रहता है । अभिहिता वयवाद मे अभिधा अलग अलग श दो मे सक्तग्रह कराती है और इस मे अय पदार्थावित शब्द मे । इसलिये इस सिद्धात के अनुसार तात्पर्याशक्ति मानने की पावश्यकता नही रहती है । इस सिद्धात के अनुसार बालक सकेत ग्रह म प्रत्यक्ष, अनुमान और अर्यापति प्रमाणो का सहारा लता है । कितु इस मत में एक शका हो सकती है। कि गाय लामो वाक्य मे जो लामो पद है वही' अश्व लामो' में भी है। इस प्रकार प्रत्यभिना के विश्वास से पूर्व पद-'गाय लामो वाक्यवाला पद का ही निश्चय होता है और उस पद के विशेष अथ की प्रतीति के लिए तात्पर्या वृत्ति मानने की आवश्यक्ता पडेगी। सिद्धा तवादिया की ओर से इसका उत्तर यह है कि सकेतग्रह मय पदार्थावित श दो म सामाय प्रकार का होते हुए भी विशेष रूप का प्रत्यय कराता है।' दाशनिक दृष्टि से यह पक्ष अभिहिता वयवाद से श्रेष्ठ है । यही मत का सार है । इस सिद्धात के अनुसार अभिधा शक्ति अय पदार्थावित शदा म हो सकेत ग्रह कराती है पौर तात्पर्या शक्ति मानने की आवश्यकता नहीं रहती। वारयार्थातगत द म सक्तग्रह नहीं होता है इसलिए असतित होने के कारण अति विशेप वाक्याथ तो अवाच्य ही रहेगा। उसके पश्चात् प्रतीत होने वाले व्यग्याथ म तो मभिधावृत्ति का प्रसग ही नही हो सकता । फलत अविता भिधान-वादियो के मतानुसार भी यजना शक्ति अभिधा से भिन्न ही ठहरती है । दीघ वीघतराभिषा व्यापारवादी और ध्यजना- इस विताभिधानवाद की एव मौर शाखा है जो 'यत्पर ग स शताथ साऽयमिपोरिवदीघदीपतरो व्यापार' मानन वाल हैं । इनका सक्त मभिनवगुप्त न लाचन मे दिया है। अधिकतर विद्वान इसे भटट लोल्लट का अभिमत स्वीकार करते हैं, परतु डा० एस० ० दे तथा १ काय प्रकाश पचम उल्लास पृ० १११ प्रथ विनान मोर यावरण-दान, पृ० ३२७ योप्यविताभिधानवादी 'यसर शद स शनाथ इतिहृदये गृहीत्वा शरवदभिधा व्यापारमेव दीघमिच्छति । लोचन पृ० २२ ३ अध्यायकाप्रतिपाद्य इसको शकास्पद मानते हैं।' ये लाग व्यजना-वृति को अभिधा में हो सनिविष्ट करते हैं। इनकी मायता का खडन लोचन में भी उपलब्ध है। परतु काव्य प्रकाश में इनकी विरोप आलोचना की गई है अत यहां पर उमी का सार दिया जाता है बलवान् यौद्धा द्वारा छोडा हुमा तोर अपने वेग नामक व्यापार द्वारा रान कवच को काटता है, उसके मम स्थान को विदीर्ण करता हुमा उसके प्राणों का हरण करता है। इसी प्रकार प्रभिघा व्यापार हो पदाथ की उपस्थिति करता है और भावयबोध कराके व्यग्याथ को प्रतीति भी 'कराता है। अभिप्राय यह है कि पदाथ को प्रतीति कराने के पश्चात् वक्ता के विवक्षित मथ की प्रतीति के बाद ही उसका विराम होता है। मोमासको की 'यत्पर शद स शदार्थ' वाली मा यता का यही मतव्य है। किन्तु ध्वनिवादी इसका यह अर्थ करते हैं कि जो विधेय है वही तात्पय है। वाक्यो में विधि ही माध्य है । वाक्य म कारक सिद्ध होता है और रिया साध्य । निया की मिद्धि के लिए ही कारवा का प्रयाग होता है। प्रधान प्रिया की मिद्धि के लिए कारको की अपनी क्रियायें भी होती हैं जो गौण नियायें हैं । यथा 'गाय लायो' आदेश ये पालन में लाना' प्रधान लिया है और लाने वाल एव गाय का चलना गौण क्रियायें हैं। ये गौण प्रियायें प्रधान प्रिया की निर्वाहत प्रियायें मानी जाती हैं, कि तु अदग्ध-दहन याय से विधि प्रधान क्रिया म ही होती है, गौण क्रियानो म नहीं होती है, उनमे भी साध्या हो जाया करता है। उदाहरण के लिये 'लाल पगडी वाले ऋत्विक प्रचरण करते हैं मप्रचरण तो भय प्रमाण से मिद्ध है इसलिए लाल पगढी' मे ही विधि है । इमी प्रसार 'दही मे होम परें में होम तो सिद्ध है केवल 'दही' ही विधि का विषय है। यदि कोई विमी जुनाहे से कहे नि लाल कपडा बुनो' तो यहाँ 'लाल म विधि मानी जायगी। इनम कभी एक वस्तु का विधान होता है, कभी दो का और भी तीन का। फ्लत जिसका विधान करना है उसी म विधि का तात्पय है। इस प्रकार उच्चारित शद का तात्पय अर्थ म हो होता है प्रतीयमान अथ म नही । यही 'यत्सर शब्द स शब्दाथ' का तात्पय है । यदि उच्चारित शन्द का तात्पय प्रतीयमान अथ म भी स्वीकार कर लिया जायगा तो 'पूर्वोगावति' से अपर' इत्यादि म तात्पय हो जायगा । तात्पर्यार्थ श दोपात्त अथ मे होता है और प्रतीयमान उससे पथक रहता है। इसलिए इस सिद्धान्त के अनुसार भो अभिधा के द्वारा व्यग्याथ गताय नहीं सकता है। इस पर पूर्व पक्ष वाले की ओर से प्रश्न किया जाता है 'विप खालो मोर उसके घर मत खाना' वाक्य का तात्पय यह है कि इसके पर में नही खाना चाहिए । यही वाक्याथ है । परन्तु यह अथ शब्दा से प्राप्त नहीं हाता है, लेकिन यह इस वाक्य का तात्पय तो माना जाता है। जब ऊपर के वाक्य की भांति शदोपात्त अथ से भिन्न प्राय अथ मे तात्पय माना हो जा सकता है और उसम अभिधावृत्ति से काम चल जाता है तब यह कहर कि यग्याथ शदोपात्त नहीं है, तात्पर्याय से भिन्न कैसे जा सकता है । ध्वनिवादी इसका उत्तर इस प्रकार देते हैं विप सालो और इसके घर मत खाना' इन दोना वाक्यो को 'और' सयोजक अयय नाडता है। इसस दोना वाक्यो की एक वाक्यता सूचित होती है । इसमें दा पूर्ण प्रियायें हैं 'खालो और मत खाना।' दोनो का प्रगागीभाव 1 This is dubiously ascribed to Lollat Sanskrtt Poetics Dr SK De काव्य प्रकाश, पचम उल्लास, प० ११३ ११४ २ ध्वनि सिकात और व्यंजनावृत्ति विवेचन - नही हो सकता है। यह एक मित्र का कहा हुमा वाक्य है। इसलिए दोनों का मगागीमाव की कल्पना करनी पड़ती है। मत इसका अर्थ होगा कि इसके घर में भोजन करना विष भक्षण से भी अधिक दोष युक्त है। यह मथ लक्षणा से निकलगा। इस प्रकार शब्दोपात्त मर्य मे ही वात्पर्य है। यह सिद्ध हो गया। यहां यह मभिधा से न मिलकर सक्षणा से मिलता है । व्यजना लक्षणा से भी भिन्न है । इसलिये व्यग्यार्थ का मभिधा से बोध सम्भव नहीं।' यदि शब्द सुन लेने के पश्चात जितना मथ मिलता है उतने सब में अभिधा व्यापार ही मान लिया जाय तो 'हे ब्राह्मण । तुम्हारे पुत्र उत्पन्न हुमा है', अथवा 'तुम्हारी क्या गर्भिणी है' इत्यादि वाक्यो से हाने वाले हप एव विपाद भी वाच्य हो जायेंगे। साथ ही लक्षणा की भी आवश्यक्ता न होगी। तात्पर्या, लक्षणा और व्यजना सभी शक्तियो का प्रतर्भाव अभिधा मे ही हो जायगा । इसलिए व्यजनाशक्ति माननी ही पडेगी। निमित्तयादी और प्यजना मोमासको का एक सम्प्रदाय भौर है जिसे निमित्तवादी नाम दिया जा सकता है । लोचन फार ने मविताभिधान के प्रसग में हो इसका उल्लेख किया है। काव्य प्रकाशकार ने भी इहें पविताभिधान और दीपतराभिधाव्यापारवादियो के मध्य में स्थान दिया है। ये लोग ध्यग्याय की प्रतीति के लिए काय कारण भाव को स्थापना करते हैं। इनके अनुसार व्यग्यार्थ प्रतीति नमित्तिको है और वाच्याथ है उसका निमित । वाच्याथ को प्रतीति राब्द से होती है प्रत शद और व्यग्याथ में निमित्त नमित्तिक सम्बघ स्वीकार करने से व्यजना व्यापार मानने की आवश्यक्ता ही नहीं पडेगी। वह काय भी अभिधा से ही सम्पन हो जायगा । उसका खडन करते हुये काय प्रकाशकार ने लिखा है कि निमित्त दो प्रकार का होता है १ कारक और २ नापक । मिट्टी से घडा बनता है इसलिये मिट्टी घडे का कारक निमित्त है और दीपक अधकार स्थित घडे को प्रकाशित करता है इसलिये दीपक घडे के लिए शापक निमित्त है । मभिधेय प्रतीयमान को उस प्रकार मही बनाता जिस प्रकार मिट्टी घडे को बनाती है इसलिये दोनो मे कारक निमित्त-सम्बध नही हो सकता है। यह ठीक है कि शब्द और वाच्याथ व्यग्याथ को व्यक्त करते हैं । इनम पापक निमित्त भाव भी नही हो सकता है क्योंकि दीपक पूर्व सिद्ध घडे का ज्ञापक है, किन्तु व्यग्याप पूवसिद्ध नहीं है, वह तो वाच्याथ के पश्चात प्रतीत होता है। प्रत शब्द और व्यग्याथ मे निमित्त नमित्तिक भाव मानना ठीक नहीं है । व्यजना से घोषों की नित्यानित्य ध्यवस्था इस सब कथन का निष्कय यह है कि अभिधा के मतिरिक्त व्यजना व्यापार मानना हो पडेगा। यनि व्यजना यापार न माना जायगा तो दोषो की नित्यानित्य व्यवस्था न हो सकेगी। श्रुति कटुत्व प्रादि दोष काय में अनित्य माने जाते हैं और च्युतसंस्कृति प्रादि नित्य । श्रुति-कटुत्व शृङ्गार रस में दोष स्वीकार किया जाता है। श्रुति क्टुत्व वही होता है जहा महाप्राण, मूर्धय, द्वित्व प्रादि बों का प्रयोग होता है। ये शृङ्गार और करुण मे रस विघातक सिद्ध होते हैं इसलिये दोष स्वीकार क्यि जाते हैं। परन्तु ये ही वीर और रौद्र रसो मे ओजकारक होने के कारण गुण १ काय प्रकाश पचम उल्लास, पृ० ११५ । २ वही, पृ० ११६॥

अध्याय का प्रतिपाद्य १९ हो जाते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि महाप्राण मूधय और द्वित्व पण प्रोज की व्यजना करने मे ही समर्थ हैं माधुय की नहीं। इसलिये दोपो की नित्यानित्य व्यवस्था के लिये व्यजना का मानना मावश्यक है। इसी प्रकार काव्य में कोई शब्द कही उपयुक्त प्रतीत होता है और प्राकरणिक प्रभाव में वृद्धि करने वाला सिद्ध होता है मौर दूसरा अनुपयुक्त । ब्रह्मचारी शकर पावती को शकर से विरक्त करना चाहते हैं । फलत वे कहते हैं 'द्वय गत सम्प्रति शोचनीयता समागमप्रार्थनया कपालिन" महां पर शकर के लिए 'कपाली' शब्द का प्रयोग किया गया है। पाली से शकर के अघोरीपन, अशुचिरव मादि को व्यजना होती है। इसी के स्थान पर यदि 'पिनाकिन' पद का प्रयोग कर दिया जाय तो उपयुक्त व्यग्याथ को प्रतोति न होगी। पिनाकी पद शकर की धीरता, भोज प्रादि गुणो की व्यजना करता हैं । यथ "कुर्या हरस्यापि पिनाकपाणे धयच्युति के मम विनोऽय पदि पिनाकपाणे' के स्थान पर 'क्पालपाणे' कर दिया जाय तो वीरता और भोज की होने वाली व्यजना समाप्त हो जायगी। यद्यपि 'पिनाकी और 'कपाली शदो का अभिषेय शकर हो है मोर छ द को दृष्टि से भी दोनों का गण यगण भी एक हो है । इसलिए व्यजना जसी शक्ति अवश्य माननी पड़ेगी। अभिधा और व्यजना का प्रतर साहित्य दर्पणकार ने अभिधा और व्यजना मे निम्नलिखित बातों में भेद स्वीकार किया है। बोद्ध भेद-याच्याथ की प्रतीति उन लोगो को होती है जो व्याकरण, कोश प्रादि प्रथो का अध्ययन करते हैं । ये अध्ययन करने वाले वाच्याथ मे व्युत्पन्न हो सकते हैं। परन्तु प्रतीयमान को प्रतीति के लिए पद पदाथ ज्ञान के प्रतिरिक्त सहृदयता थी महती आवश्यकता है। प्रतिमाशाली महृदय को ही प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति होती है। २ स्वरूप भेद-कही वाच्याय विघि रूप होता है भोर कहीं व्यग्यार्य निषेध-रूप, कही वाच्याथ निषेध रूप होता है और व्यग्याथ विधि रूप प्रादि । यह मभिधा पौर व्य जना का स्वरूप गत अतर है। ३ सरया भेद--'सूय छिप गया है' इस वाक्य का वाच्याथ एक है कितु इसके व्यग्यार्थ अनेक हैं । यही वाच्याथ और व्यग्याथ का सरया भेद है। कुमार-सम्भव, ५७१। २ वही, ३१०॥ बोद्ध स्वरूपसख्यानिमित्तकार्यप्रतीतिकालानाम् । आश्रयविषयादीना भेदाद् भिन्नोऽभिधेयतो व्यग्य ||-सा० ६०, ५५२०, पृ० २२० । ३ ७२ ध्यनि-सिवात और व्यजनावृत्ति विवेचन को भक्ति से भिन्न सिद्ध करने के लिये जो तक दिये हैं उनका साराश यहां पर प्रस्तुत किया जाता है। सहकारी हेतु भिन्नता- लक्षणा का सवप्रथम हेतु मुख्याथ बाघ है। यह पहिले कहा जा चुका है कि लक्षणा को मावश्यकता वही होती है जहा तात्पर्य अनुपपभ होता है परन्तु व्यजना के लिए मुरयार्थ बाघ की कोई प्रावश्यक्ता नही है । गगा में अहीर वस्ती है इस वाक्य में 'गगा' का प्रवाह रूप अथ अवय में वाधक होता है । अवय सगति के लिये ही 'गगा पद से 'गगा' के अभिधेय से सम्बद्ध 'गगातट' अथ ग्रहण करके तात्पर्य की सगति स्थिर की जाती है। इसलिए "गगा' पद लाक्षणिक माना जाता है । 'सूय प्रस्त हो गया यह एक ऐसा वाक्य है जिससे व्यग्याथ प्रतीति तो हाती है परन्तु उपयुक्त 'गगा में महीर वस्ती है वाक्य की भाति अवय में बाधा उपस्थित नहीं होती है । मुख्य प्रथ का बाघ लक्षणा का अनिवार्य सहकारी हेतु है, और व्यजना में उसका अभाव है । व्यजना के सहकारी हेतु प्रकरण आदि हैं जिनका मागे उल्लेख किया जायगा । प्रकरण के कारण 'सूय अस्त हो गया' इस वाक्य से अनेक व्यग्यायों की प्रतीति होगी । फलत सहकारी हेतुप्रो की भिन्नता के कारण लक्षणा और व्यजना भिन्न भिन्न शक्तियां ही मानी जायगी। सम्बध भेद- लक्षक शब्द का लक्ष्याय के साथ नियत सम्बध होता है । उपयुक्त वाक्य में गगा' पद लक्षक है और 'गगा तट' उसका लक्ष्याथ है । गगा का अपने तट के साथ नियत सम्बध है । 'गगा पद लक्षक होकर तट इत्यादि का ही बोधक हो सकता है । किसी असम्बद्ध पदाथ का बोधक नही हो सकता है । इसके विपरीत 'सूय अस्त हो गया' इस वाक्य का प्रकरण के अनुसार 'सध्या कीजिये , अभिसार का समय हो गया', 'गायो को घर ले चलो आदि अनेक व्यग्यार्थी को प्रतीति हो सकती है । उपयुक्त लक्ष्याथ की भाति यहां कथित वाक्य और व्यग्याथ में कोई नियत सम्बध नहीं है । उसका नियत अनियत मोर सम्बद्ध सम्बध भी हो सकता है । इसलिए दोनों शक्तियां भिन्न भिन्न स्वीकार को जायगीं। निमित्त भेव और सख्या मेव- लक्ष्याथ का बोधक निमित्त वसे तो शब्द ही होता है परन्तु जहा वाक्य में एक से अधिक लक्षक पदो का प्रयोग होता है वहां परम्परा से वाक्य को भी लक्षक माना जा सकता है। इस प्रकार लक्षक दृष्टि से लक्षणा के दो ही लक्षक सम्भव हैं । एक शब्द और दूसरा वाक्य । लक्षणा का वाक्य से परम्परा सम्बध है, साक्षात् सम्बध नहीं है । वाक्य में एक से अधिक लक्षक पद होते हैं । पदवादियो की दृष्टि में तो लक्ष्याथ का केवल शद ही लक्षक हो सकता है । वहाँ लक्षणा का केवल एक पदगत हो भेद सम्भव है । इसके विपरीत व्यग्याथ के वण, पद्याश, पद वाक्य, प्रबध मादि अनेक व्यजक होते हैं । इसलिए केवल श द लक्षित लायार्थ और वरण, पद्याश पद मादि से अभियक्त व्यग्याथ एक स्वीकार नहीं किये जा सकते । फलत लक्षणा में व्यजना का अन्तर्भाव सम्भव नही है। १ पदकदेश रचना वर्णेष्वपि रसादय का० प्र०, सूत्र ६९।

अध्याय का प्रतिपाद्य ७३ विषय भेद--- लक्ष्याथ का व्यग्याय से विषयभेद भी है । सक्ष्याय में विषय का मिलता नहीं होती है । वह प्रत्यक व्यक्ति के लिये एव हा होता है जबकि एक ही वाक्य का व्ययाय मिन भिन्न व्यक्तिया का भिन्न भिन्न प्रतीत हो सकता है। काल भेद--- लक्षणा और व्यजना का एक भेदक तत्व यह भी है कि व्यजना को सवदा लक्षणा के पश्चात हो अवसर मिलता है । 'गगा मे भाभीर बस्ती है' वाक्य मे 'गगा शद तो 'गगातट' का बोधक है परतु व्यजना से तट बाध के पश्चात जो शीतलता और पवित्रता का बोध होता है वह व्यजना से हाता है । लक्षणा से इस शोतलता और पवित्रता का बोध सम्भव नही है। जो विद्वान प्रयोजन विशिष्ट लक्ष्याथ को स्वाकार करते हैं उनका खडन करते हुये काव्य प्रकाश-कार ने लिखा है, 'जब हम किसी पदाथ को प्रत्यश करते हैं तो वह पदार्थ हमार ज्ञान का विषय होता है, परतु इस प्रत्यक्ष मान का फल ज्ञान के विषय से भिन्न वस्तु है। इस फल को मीमासक माता और नयायिक 'सवित्ति' मानते हैं । मैं घडे को देखता है, इस उदाहरण म पडा पान का विषय है और देखन के पश्चात होनेवाला 'मविति उमसे विल्कुल भिन्न है । यह सवित्ति अथवा 'बोध देसन वाले कर्ता को होता है । इसी प्रकार 'गगा' पद का लक्ष्यार्थ गगा तट हुआ । यही उसका विषय हुमा । इसका पल शीतलता और पवित्रता हुमा । यह 'सवित्ति विषय तान के सवदा पश्चात् ही होगी। वह पहिल अथवा ममवालिक कभी नहीं हो सकती है । ज्ञान के फल जा सविति रूप होता है ---का बाध सदा लक्षणा के अतिरिक्त व्यजना पाक्ति से ही समव है। यही कारण है कि लोचनकार ने लक्षणा को तृतीय कक्षानिवेशी माना है। अर्थात् दोना मे काल भद भी है। क्षेत्र भिन्नता प्रयया पतिव्याप्ति तथा अव्याप्ति- यदि तक्षणा म व्यजना का अतर्भाव स्वीकार कर लिया जाता है तो दोना के क्षेत्र भी समान स्वीकार करने पड़ेंगे । इस प्रकार व्यजना की स्थिति रूढ़ा लक्षणा के प्रसग मे भी माननी पडेगी। वह लक्षणा वा क्षेत्र तो है परतु व्यजना का नहीं है क्योधि रूढा लक्षणा व्यग्य रहित हाती है । लक्षणा की दृष्टि से यहां अतिव्याति दोप माना जायगा। अर्थात लक्षणा के पूरे क्षेत्र मे “यजना को अवसर नही मिलता है, वह तो लक्षणा के केवल एक भेद प्रयोजनवती में ही स्थान पाती है। दोना शातियो के एक मानन म अव्याप्ति दोष भी माता है । वह इस प्रकार कि सक्षणा ता क्वल लक्षणामूला व्यजना म ही यजना का निमित वन पाती है, अभिधामूला व्यंजना में तो उसको कोई स्थान हो नहीं है । अर्थात लपला व्यजना के पूरे क्षेत्र में नही जाती है।' क्षत्रा की मिनता के कारण भी व्यजना लक्षणा से नितान्त भिन्न शक्ति है। मकुलभट्ट का ध्वनि का लपणा मे अत्तर्भाव करने का प्रयल- 'घभिधावत्तिमातृका के प्रणयन से पूर्व ध्वनि सिद्धात का प्रतिपादन हो चुका था, परन्तु फिर भो मुकुल भन्ट न ध्वनि का गौणी लपणा म अतभार करने का प्रयल क्यिा । लक्षणा पर विचार करत हुय उहोने लशणा के तान भेदक तत्व माने हैं-वक्ता, वाक्य और वाच्य । परन्तु फलत १ २ अतिव्याप्तरथा व्याप्तेनत्वासो लक्ष्यते तया। ध्व० १-१७ अभिधा वृत्तिमातृका, का०६ ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन ये लक्षणा के निश्चित भेदक तत्व नहीं हैं, अपितु व्यजना के निश्चित भेदक तत्व हैं । इनका उल्लेख प्रार्थी व्यजना के प्रसग में किया जायगा। प्राचाय ने वक्तृ निब धना लक्षणा का जो उदाहरण दिया है वह व्यजना को वस्तु ध्वनि का है और उसकी प्रतीति वक्त वशिष्टयरत प्रार्थी व्यजना से होती है । प्राचाय द्वारा स्वीकृत लक्ष्याथ में लक्षणा के सहकारि हेतु मुख्यार्थवाध प्रादि नहीं मिलते हैं । वाक्य निबधना लक्षणा का जो उदाहरण दिया गया है वह अलवार ध्वनि का है, लक्षणा का नही और वाच्य निव धना लक्षणा का उदाहरण रस वनि का है । इस प्रकार नूतनतया उपरिणत ध्वनि का उहोने जो लभरणा म अन्तर्भाव करने का प्रयत्न क्यिा वह असफल ही सिद्ध हुमा । प्राचाय पुतक- यद्यपि प्राचाय कुन्तक ने लक्षणा का उतना भी उल्लेख नहीं किया है जितना अभिघावादी मुकुल भट्ट ने फिर भी कतिपय विद्वान उह भक्तिवादी स्वीकार करते है । इन विद्वानो एका वलोकार विद्याधर और डा० हरिश्चन्द्र शास्त्री हैं ।' कुतक ने उपचार वव्रता मे ध्वनि के प्रविवक्षितवाच्य भेद का समावेश करने का प्रयत्न किया है, उह भक्तिवादी नही माना जा सकता है । वह वक्रोक्तिवादी है जो विचित्र अभिधा स्प है । मुकुनभटट ने कहकर ध्वनि का लक्षरणा म अतर्भाव करने का प्रयत्न क्यिा है । वुन्तक ने ऐसी प्रतिना कही नहीं की है, उहाने ता ध्वनि के समान एक सबल सिद्धात का प्रतिपादन किया है । उनको लक्षणावादी नहीं माना जा सकता है। अनुमान और व्यजना- अनुमान में भी व्यजना का अन्तर्भाव सम्भव नहीं है । अनुमान नानापलधि का प्रमाण माना जाता है। अनुमान की सहायता स यथाथ नान होता है । यद्यपि चार्वाक अनुमान को स्वतत्र प्रमाण नहीं मानते हैं । उनका कहना है कि अनुमान से केवल सम्भावित नान ही हो सकता है। अनुमान कभी भी निश्चयात्मक यथार्थ ज्ञान नहीं प्रदान कर सकता । यद्यपि यह भी एक प्रश्न है जिसका उत्तर सहज नहीं दिया जा सकता है । परतु चार्वाको के अतिरिक्त अय सभी भारतीय सम्प्रदाय अनुमान को स्वतत्र प्रमाण मानते हैं।' ध्वनि विरोधियो मे केवल महिमभटट ने ही सम्पूण ध्वनि के भेद प्रभेदो का मतर्भाव अनुमान मे करने का प्रयत्न किया है । इसलिये उनके ही उदाहरण और तर्कों का अध्ययन आवश्यक है। महिम भटट काश्मीर के शव परम्परा के अनुयायी होने के कारण रस का विरोध न कर सके । रस काय के सारस्प में भी उनको स्वीकाय है यद्यपि ध्वनिवादी रम मा यता और उनकी मायता में थोडा अतर अवश्य है । उनको शवलो मे कही-कही ध्वनिकार का अनुभोटन सा जान पडता है । जस, वाच्याथ मे वसा पास्वाद नहीं है जसा उस प्रतीयमान मे है । इस बात को उहाने ध्वनि-सम्प्रदाय और उसके सिद्धात, पृ. २७७ २ अभिधा-वृ० पृ० २१ भारतीय तक्शास्त्र, पृ० ५४ 'यक्तिविवेक, पृ० १-१ वाच्यो हि अर्थो न तथा स्वदत यथा स एक प्रतीयमान । ध्वनि० सम्प्रदाय, १ ३ ४ ५ पृ० ३०४ अध्याय का प्रतिपाद्य ७५ दुहराया भी है। अथ के भेद करते हुए महिम भटट ने कहा है कि प्रथ दो प्रकार का होता है, वाच्य और अनुमेय । वाच्याथ शद व्यापार का विषय होता है । यही प्रथ मुख्य है । इसी लिंगभूत वाच्यार्थ को सहायता से जो मर्षा तर की प्रतीति होती है उसे अनुमेय कहते हैं । यह अनुमेय अथ तीन प्रकार का है वस्तुमात्र, अलकार और रसादि । इनम से प्रथम दो वाच्य मे भी हो सकते हैं तृतीय तो अनुमेय ही है। उपयुक्त स्थन से यह निष्कप निकला कि अनुमानवादी व्यक्ति विवेककार अभिधेय को हो मुख्य मानते हैं । काव्य मे वाच्याथ के अतिरिक्त जिस प्रर्या तर की प्रतीति हाती है वह अनुमेयाथ है। ध्वनिवादी व्यजना को चौथी शक्ति स्वीकार करता है अभिया, लक्षणा, तात्पर्या और व्यजना और चार प्रकार के अर्थ अभिधेय, लक्ष्याय, तात्पर्याय और व्यग्याथ । अनुमानवादी को केवल दो ही अथ माय हैं वाच्य और अनुमय । कहने का मभिप्राय यह है कि वह लक्ष्याय, तात्पर्यार्थ मौर यग्यार्थ सभी का अनुमेयार्थ म अन्तर्भाव करना चाहता है । लक्ष्यार्य मे वाच्यार्थ अनुपपन होता है। अनुमान में वाच्यार्थ की अनुपप नता सह्य नहीं हो सक्ती । इसलिये लक्ष्यार्थ का अतर्भाव अनुमेयार्म में नहीं हो सकता है । तात्पर्यार्थ का सम्बन्ध केवल वाक्य से है । वह वाक्यार्थ है । वाक्यार्थ बोध के लिए हेतु, व्याप्ति, परामां को प्रावश्यक्ता नहीं पड़ती है। अनुमैयार्थ सवदा यथार्थ नान हो होगा । वाक्यार्ग के लिय ऐसा कोई नियम नही है । इसलिये तात्पर्यार्थ भी अनुमेयार्थ से भिन्न ही है। जिस प्रकार प्रान दवधन ने ध्वनि को वस्तुमात्र अलवार और रस भेद से तीन प्रकार का माना था उसी प्रकार महिमभटट ने भी अनुमेयार्थ को वस्तुमात्र, प्रलकार और रस भेद से तीन प्रकार का माना है। यग्यार्थ म सवदा चमत्कार स्वीकार नहीं किया जाता है । कभी-कभी वह चारत्वहीन भी होता है, पर तु अनुमेयार्थ में चमत्कार ही स्वीकार किया जाता ह । यह भी दोनों में असामजस्य की स्थिति है। अनुमान प्रमाण की सहायता से ऐसे पदार्थों का ही बोध होता है जिनको पूर्व सत्ता निश्चित है उन पदार्थों का नान जिनकी पूर्व सत्ता का निश्चय नहीं है अनुमान स सम्भव नहीं है । साथ ही इस ज्ञान के निश्चित हेतु होते हैं। व्याप्ति सबसे प्रथम हेतु है। दो सत्तात्मक पदार्थों के नियत सम्बघ पान को “याप्ति कहते हैं जो उसको जीवन मे बार बार देखने से होता है । इन नियत सम्बध वाले दो पदार्थों में से प्रत्यक्ष पदाथ अप्रत्यक्ष पदाथ का लिंग माना जाता है । व्याप्ति और लिंग प्रादि का विचार ही परामश कहलाता है। परामश से ही अनुमय का ज्ञान हाता है । जस १ वाच्यो ार्थो न तथा, चमत्कारमातनोति यथा स एव विधि निषेधादि काव्याभिधेयता मनुमयतावावतीर्ण इति । व्यक्ति विवेक, पृ० ५४ अर्थोपि द्विविधो वाच्योनुमेयश्च । तत्र व्यापार विषयो वाच्य । स एव मुरय उच्यते । ततएव तदनुमिताद्वा लिगभूतायदातरमनुमीयते सोनुमेय । सच विविध । वस्तु मात्रमलकारा रसादयश्चेति । तत्राद्यो वाच्यावपि सम्भनत अयस्त्वनुयय एवेति । व्यक्ति-विवक,पृ० ३६ ध्वनि सिद्धात और ध्यजनावृत्ति विवेचन जीवन में अनेक बार माग और धुयें के नियत सम्बघ का पान हो जाने पर वही पवत इत्यादि में धुम्रा देखने पर वहा पर अप्रत्यक्ष अग्नि की सत्ता का मान हो जाता है । अग्नि के समान रस को पूर्व सत्ता नहीं मानी जा सकती है। रस की स्थिति तो उतनी ही देर की होती है जितनी देर उसकी अनुभूति होती है। न तो अनुभूति से पहले उसको सत्ता है और न बाद म । दूसरे जिस प्रकार धुयें का अग्नि से नियत सम्ब ध हैं उस प्रकार कि ही विशेष विभाव इत्यादि का किसी विशेष रस से नियत सम्बध नहीं होता है, इसका बोधक कोई निश्चित हतु सम्भव नहीं है । एसी स्थिति मे रसानुभूति को कदापि अनुमेय स्वीकार नहीं किया जा सकता है । यदि यह ज्ञान हो भी गया है कि राम सीता से प्रेम करते हैं तो इतने नान से वह मानद प्राप्त नहीं हो सकता है जो रसानुभूति काल मे प्राप्त होता है । यदि चार्वाक के सिद्धात को माना जाता है तो राम सीता के प्रेम का निश्चयात्मक नान ही सम्भव नहीं है। इसी प्रकार अलकार-ध्वनि का भी अनुमान से ज्ञान सम्भव नहीं है । वस्तु ध्वनि के कतिपय उदाहरण अनुमेयाथ मे मम्मिलित किये जा सकते हैं, लकिन जब रस बोध मोर माक्षिप्त अलकार ज्ञान के लिये व्यजना की स्वीकृति आवश्यक है तो वस्तु ध्वनि को अनुमेयाथ म सम्मिलित करने से कोई लाभ भी नहीं है। महिमभट्ट ने प्राय वस्तु ध्वनि के उदाहरणो को ही अनुमय में गताथ सिद्ध किया है। इमलिये व्यजना का अनुमान मे अतर्भाव सम्भव नहीं है । व्यजना को भिन शक्ति स्वीकार करना अनिवाय है। प्रखड बुद्धियादी और व्यजना- अखडताबादी दी हैं-१ वेदाती और २ वैयाकरण । लाचनबार एक काव्य प्रकाश कार न दोनो मतो को एक साथ रखकर अालाचना की है । यहाँ पर दोनो के मनो की अलग अलग विवेचना की जायगी । यदा ती 'एवमवाद्वितीय ब्रह्म 'ब्रह्म सत्य जगा मथ्या प्रादि थतियो के द्वारा ब्रह्म का नित्यता, अखस्ता पार अद्वितीयता एव ससार की अनित्यता प्रादि सिद्ध करते है । उनको दष्टि म नित्य और अखड ब्रह्म प्रखड बुद्धि द्वारा ही ग्राह्य है। इसलिये प्रखड बुद्धि द्वारा परब्रह्मात्मक वाक्याथ भी प्रखड हा सिद्ध हुअा। फ्लत प्रखड प्रथ का बोधक निमित्त वाक्य भी प्रखड ही होगा। उसमे क्रिया कारक विभाग करना भी अनुचित है। क्रिया और कारक भाव घम मिभाव के आधार पर ही सम्भव है और वह धर्म मिभाव ससार मिथ्या होने के कारण मसम्भव है। ब्रह्म सभी धर्मों से परे है अतएव धम धर्मिभाव उममे नही बन सकता है । जब घम घमिभाव न तो मिथ्या होने के कारण समार में बन सकता है और न निगुण होने के कारण ब्रह्म में ही सम्भव है तो पद-पदाथ को कल्पना भी असम्भव है । पद पदाथ विभाग से रहित प्रखड वाक्य ही प्रखड बुद्धि द्वारा प्रखड ब्रह्म का प्रत्यायक है । इसका अभिप्राय यह है कि वाक्याथ बोध में बुद्धि निया-कारकादि-भाव ग्रहण नहीं करती अपितु एक रस प्रखड वाक्याथ ग्रहण करती है । इस प्रकार वाक्य ही वाचक है और सम्पूण वाक्याथ ही वाच्य है। इस मत के अनुसार वाच्य, लक्ष्य, व्यग्य प्रथदा उससे भी आगे बढकर जितना अथ निकलता है वह सब प्रखड वाक्य का ही वाच्य है । उसके वाच्य लक्ष्य और व्यग्य भेद करना अनुचित है । निष्कप यह है कि व्यजना शक्ति की स्वीकृति को इस मत में कोई प्रावश्यक्ता नही है ।

अध्याय का प्रतिपाद्य ७७ इस का उत्तर प्राचार्य मम्मट ने इस प्रकार से दिया है -जो लोग प्रखड वाक्य से मखड वाक्याथ के समथक हैं उनकी भी दो दृष्टिया हैं-१ ब्रह्म दृष्टि मौर २ ससार दृष्टि । यह ससार-दृष्टि हो व्यवहार दृष्टि है । इस मायामय संसार के व्यवहार म उस अभेद दृष्टि से काम नहीं चलता जो भखर ब्रह्म विपपिणी है । ससार के व्यवहार में आकर अनेक भेद प्रभेद कल्पना उन वेदातियो को भी करनी पड़ती हैं। वे लोग भी इस लौक्षि भेद प्रभेद कल्पना को व्यावहारिक सत्य मानते हैं और उसके अनुसार व्यवहार करते हैं । फनत परमाथत प्रखड वाक्य उहें भी पद पदाथ विभाग अवश्य मानना पडेगा। पद-पदाथ विभाग मानते हो व्यग्याथ और व्यजना वृत्ति की स्वीकृति भी स्वत हो जायगी।' ध्याकरणशास्त्र और व्यजना- नागेश के व्याकरण सिद्धात मजूपा' से पूर्व व्याकरण में व्यजना का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है । इसका थोडा सा सकेत कोणड मटट के व्याकरण भूपणसार में भी मिलता है। उहाने व्याकरणो के स्फोट मे पालकारिको की ध्वनि को सबद्ध स्वीकार किया है। इस सम्बध में उहोने काव्य प्रकाश की वृत्ति का थोडा मा अश दिया है । नागेश ने घ्यजना का अपने ग्रथ में विस्तत वणन किया है। और अन्त में यह सिद्ध किया है कि प्रालपारिको की भांति “याकरणो द्वारा भी व्यजना की स्वीकृति आवश्यक है। उन्होने व्यजना का लक्षण भी सागपूण दिया है। यह ठीक है कि व्याकरण शास्त्र मे नागेश से पूर्व व्यजना का विवेचन नहीं हुआ है। परतु यह भी निर्विवाद है कि काव्यशास्त्र में ध्वनि की प्रतिष्ठा व्याकरणशास्त्र की कृपा से हुई है। व्याकरणो के दम ऋण को प्राय सभी ध्वनिवादी प्राचार्यों ने स्वीकार किया है। ध्वनि की प्रेरणा व्याकरणा के स्फोट से प्राप्त हुई है और उसी से इसवी पारिभाषिक शदावली भी ग्रहण की गई है। यही नही ध्वनि के विभिन रूपा का सकेत भी ध्वनिवार को व्याकरणो से ही मिला । इसका विस्तृत विवेचन लोचनकार ने किया है इस का सक्षिप्त परिचय प्रस्तुत प्रबय के प्रथम अध्याय के प्रारम्भ म है । व्यजना पर स्फोट का इससे अधिक प्रभाव नही है । स्फोट व्याकरणा का वह सिद्धात है जिसके प्राधार पर वे शद और अथ का सम्बध निश्चित करते हैं। साथ ही यह विचार भी करते हैं कि अनेक वर्णो से बना हा शब्द किस प्रकार पदाथ का बोध कराता है, पद का पदाथ स क्या सम्बर है ? ये सभी प्रश्न अभिधेय से ही सम्बन्धित हैं। स्फोट का व्यग्याथ से कोई सम्बध नहीं है । यह भी सत्य है कि प्रतीक पदाथ का ध्यजक माना १ काव्य प्रकाश पचम उल्लास, पृ० १२३ । 2 There is 20 evidence to believe that vyaojaba was ever recognised by the ancient Grammarians Philosophy of Sanskrit Grammer ३ वयाकरणानामत्येत तस्वीकार आवश्यक परमसघु मजूपा, पृ० ६४ । ४ बुधयावरण प्रधानीभूत स्फोट व्यग्य व्यजक शब्दस्य ध्वनि-व्यवहार कृत । -~-का० प्र०, ११४ की वृत्ति लोक्न, पृ०५५५६॥

ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन जाता है, परन्तु पदाथ व्यग्यार्थ न होकर अभिषेयार्थ हैं । भाषा के अध्ययन मे स्फोट सिद्धान्त ने अनुपम योगदान दिया है। अर्यापत्ति प्रमाण और व्यजना- मीमासक प्रसिद्ध चार प्रमाणो-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, और प्राप्त से भिन पाचवा अर्थापत्ति प्रमाण पोर मानते हैं । नयायिक प्रर्यापत्ति को प्रमाण नहीं स्वीकार करते हैं । उनके अनुमार वह अनुमान का ही भेद है । यदि अपत्ति को अनुमान के अ तगत स्वीकार कर लिया जाता है तो यह सिद्ध किया जा चुका है कि रस अलकार रूप व्यग्याप कदापि अनुमय नहीं है । इसलिये अनुमान को प्रतीयमान अथ की प्रतीति मे यसमथ सिद्ध करने पर 'प्रर्थापित' स्वत ही प्रतीयमान पथ को प्रतीति मे असमय हो जाती है । मोमासका के अनुसार इसको अनुमान से भिन्न मानने पर इस पर विचार करना प्रावश्यक है। उनके मत से प्रर्थापति म उपपाद्य नान से उपपादक की कल्पना की जाती है।' अर्थात जहाँ पर अप अनुपपन होता है वहां पर इसकी सहायता से अर्थ की उपपत्ति सगति बिठाने वाल हेतु की कल्पना की जाती है । जसे, मोटा देवदत्त दिन में भोजन नही करता । यहा पर बिना भोजन के स्थूलना को सगति नहो वठनो, इसनिये देवदत्त के रात्रि भोजन की कल्पना की जाती है । रात्रि भोजन की कल्पना से ही प्रथ की उपपत्ति वठ जाती है । इस रात्रि भोजन की कल्पना अर्थापत्ति से होती है । अनुमान की भाति अर्थापत्ति में भी पूर्व सिद्ध एक प्रकार की व्याप्ति की प्राश्यक्ता होती है । ससार में जो अधिक भोजन करता है वही मोटा देखने मे प्राता है, यही पूर्व सिद्ध-व्याप्ति है । इस व्याप्ति से परिचित जब यह जानता है कि मोटा देवदत्त दिन मे भोजन नहीं करता है तो वह उम व्याप्ति के प्राधार पर रात्रि भोजन की कल्पना कर लेता है । विविध व्यग्याथ के सम्बध मे इस प्रकार की कोई पूव सिद्ध न्याप्ति नही होती हैं। यदि किसी प्रकार खीचतान करके अर्यापत्ति से वस्तुबोध स्वीकार भी कर लिया ज य तो भी अलकार बोध और रस वोध क्सिी प्रकार भी प्रर्थापत्ति स सम्भव नहीं है । विश्वनाथ ने । पित्ति को अनुमान के मतगत मानते हुये इसका इस प्रकार खडन किया है अर्थापत्ति पूर्व सिद्ध याप्ति के ऊपर प्रश्रित रहने के कारण व्यग्याथ का वोध नहीं करा सकती । इसलिये उसका भी खडन हो गया । जसे चत्र को जीवित मानने पर उसकी कही उपस्थिति अवश्य माननी पड़ेगी चाहे वह यहाँ गोष्ठी मे अनुप स्थिति हो क्योकि जो कोई जिदा होता है वह कही न कही विद्यमान अवश्य होता है । फ्लत व्यजना अर्थापत्ति से भी भि न है । अर्थापत्ति से भी विविध यग्य का बोध सम्भव नहीं है । यह निश्चय हो गया कि एक एसा भी अथ है जो न तो अभिधा से सकेतित होता है और न लक्षणो से नथित अपितु यजना नामक शद की चतुथ वृत्ति से ही यक्त होता है। प्राचाय विश्वनाथ ने व्यजना की परिभाषा में इसी तथ्य का उल्लेख किया है कि अभिधा इत्यादि शद शक्तियो के स्व स्व अथ को प्रकट कर विरत हो जाने पर जिस शक्ति से अ य अथ का बोध होता है। उसे यजना कहते है । कतिपय प्राचीन प्राचाय यजना को श द की शक्ति स्वीकार नहीं करते हैं । व्यजना का श द से कितना सम्बध है और प्रथ से कितना इस प्रश्न ने काय शास्त्रियो को विशेप उलझन म डाला है। दो एक प्राचाय, कुतक, अप्यय दीक्षित प्रादि विद्वानो ने उपपाद्य नानेनापपादक क्रपनमापति । वेदात परिभाषा। साहित्य पपरण, पचम परिच्छेद पृ० २३५ । २ अध्याय का प्रतिपाद्य ७६ पानी व्यजना को अस्वीकार करके प्रकारान्तर से उसे अथ-शक्ति हो स्वीकार किया है । इधर प्रो० कान्तानाथ शास्त्री सलग ने अपने एक लम्बे निवध व्यजना अर्थ का व्यापार है शब्द का नही मे यही मत व्यक्त किया है कि व्यजना को शब्द शक्ति न मानकर प्रथशक्ति मानना चाहिये । 'कविराज मुगरिदान के अलकार प्राय यादन्त यगोभूपण' के सस्मृत अनुवादक रामकरण असोपा भी शब्द- शक्ति मूला व्यजना स्वीकार करने के पक्ष मे नही हैं। इसके विपरीत सभी ध्वनि वादी व्यजना को शद-शक्ति स्वीकार करते हैं । मम्मट ने व्यजना के शादी और प्रार्थी भेद करणे शाब्दी के दो भेद माने हैं-१ लक्षणामूला शादो-व्यजना प्रौर २ अभिधा मूला शाब्दी व्यजना । लक्षणामूला शानी व्यजना में शब्द का प्राधाय होता है। पयादि लक्षणामूला व्यजना प्रयोजनवती लक्षणा के प्रयोजन को ही व्यक्त करती है। प्रयाजनवती लक्षणा के तीन प्रावश्यक तत्व हैं- सकेतिताथ का बोध २ तत्सम्बध और ३ प्रयोजन । इनमे भी प्रथम तत्व प्रमुख और द्वितीय और ततीय गौण हैं क्यालि सकेतिताथ के बोध होने पर ही उनको अवकाश प्राप्त होता है । सकेतिताथ का गठन से अविच्छेद्य सम्ब ध है । क्सिी विरोप शद का ही एक विशेष सवेतित अथ होता है। एक विशेष सतित अथ का निश्चित शब्द ही प्रकट कर सकता है । इमम अव्यवस्था स्वीकार नही की जा सक्ती । इसलिये लक्षणामूला ताब्दी व्यजना में शब्द का हो प्राधा य मानना पडेगा अथ का नहीं। यह सत्य है कि लक्षणामूला घ्यजना म शब्द परिवृति सह होता है। गगाया धापे, मे प्रयोजनवती लक्षणा है । यहा पर 'गगा' शद के सकेतित अथ प्रवाह का बोध होता है । इसी शब्द के प्रयोग के कारण लक्षणा को अवसर मिलता है । पर तु गगा' के स्थान पर उसचे पर्यायवाची 'जाह नवी' प्रादि शटो का भी प्रयोग किया जा सक्ता है । कहने का तात्पय यह है कि श द परिवृतिसह होने पर भी अथ की अपेक्षा प्रधान है । व्यजना को गद-शक्ति स्वीकार करने का यह एक कारण है। अभिधामूता शाब्दी व्यजना के भी तीन मावश्यक तत्व हैं-१ अनेकाथर शाट' का प्रयोग २ प्रकारणिक एथ अप्रकारणिक प्रथ को प्रतीति । अलकारान्तर की प्रतिमा। अनेकाय के शब्दो के प्रयोग में इसके अतिरिक्त दूसरी स्थिति यह भी हो सकती है कि शब्द से प्रकट होने वाले कम से कम दो अथ प्राकरणिक हो अर्थात वे दाना वत्ता और श्रोता को माय हो । जहा दोना अथ प्राकरणिक माने जाते है वहा श्लेष अलकार वाच्य होता है । यथा- रावण सिर सरोज बन चारी। चली रघुवीर शिलीमुख धारी । इस अर्धालो में सिर सरोज रूपक को सार्थक सिद्ध करने के हेतु शिलीमुख के दो अथ बाण एव भ्रमर प्राकरणिक हैं अत यहा श्लप मलकार है। वारण इसलिये प्राकरणिक है कि यह राम रावण के युद्ध के समय की उक्ति है और भ्रमर इसलिये प्रारणिक है कि वक्ता प्रथवा कवि का वाण के लक्ष्य सिर पर सरोज का प्रारोप अभीप्ट है । प्रतएव यहाँ गिलीमुख' शब्द के स्थान पर कोई दूसरा श द नही प्रयुक्त हो सकता है कारण यही एक एसा शब्द है जिसके दो अभीष्ट सकेतित प्रथ हैं वाण और भ्रमर । इसमे स्पष्ट है कि श्लेष में शर बदला नही जा सकता है। श्लप की भाति ही मभिधामूला शादी व्यजना मे भी अनेकायक शद परिवत्यसह होता है। श द के परितृत्यसह होन - १ ना०प्र० पत्रिका, वप ५३१२। ध्वनि-सम्प्रदाय और उसके सिद्धान्त म उद्धत, पृ० १६७ । २ ८० ध्वनि सिद्धान्त मोर ध्यजनावृत्ति विवेचन के कारण ही इस व्यजना को शादी मानना पूण युक्ति सगन है । शाब्दी के दोनो ही भेदो म शब्द का ही प्रामुख्य है और ये ही कारण है कि प्राचार्यों ने व्यजना को पद गति ही स्वीकार किया है। व्यजक्ता में शन्न पोर प्रथ का साहचय- मम्मट और विश्वनाथ ने यजना के दो भेद (१) शाला और (२) प्रार्थी माने है। यह विभाजन पूण युक्ति-सगत है। कारण, ध्यग्याथ को व्यजक्ता में कभी पद को प्रधानता होती है, अथवा किसी प्रथ विरोप को। पथ को व्यजक्ता पर विचार प्रार्थी व्यजना के प्रसग म किया जायगा। व्यग्याथ की प्रतीति में जब शद वा प्राधाय होता है वहां प्रय को सदारिता रहती है । जब अथ का प्राधाय होता है और प्रथ गड से सकेतित होता है इसलिये श द का साहाय्य होना है। अर्थात व्यग्याथ को प्रतोति म शब्द और पथ दाना का साइचय विद्यमान रहता है । इसो अाधार पर ध्यजना के शाब्दा और प्रार्थी भेद किये गय हैं। इनमे मे शागे व्यजना का क्षेत्र प्रार्थी को अपेक्षा सीमित है । व्यजना को अभिधा मादि को भाति शत गति ही मानना उचित है। कुछ विद्वान व्य जना को अथ की ही शक्ति स्वीकार करत हैं। पर तु सशक्ति-मूल यग्याथ स्वीकार करन पर उसने शादी रूप का अपनाप सम्भव नहीं है। यह टोक है कि यजना का शब्द से वैसा सम्बध नहीं है जसा वि अभिधा प्रादि म य श द गतिया का। यजना को शद शाक्ति मानना उचित ही है । शब्द शक्ति का प्रार्थी भेद- व्यजना का शद से सम्बध स्वीकार करन पर उसका प्रार्थी भद वरना भी वरतो याघात सा प्रतीत होता है । यदि उसका प्रार्थी भेद भी स्वीकार किया जाता है तो उसे श दाथ उभय की शक्ति मानना समीचीन होगा। इसका उत्तर काव्य प्रकाशकार न दिया है कि राद प्रमाण से हो सवेद्य अथ जब दूमर अथ । यत्त करता है तो व्यजक्ता में प्राधा य अथ का ही हो जाता है । यद्यपि शर का माहचय बना रहता है। प्रमाणातर सवेद्य मथ व्यजन नहीं होता है। इसलिये व्यजना वे श-द-शक्ति होते हुये भी शाब्दी और प्रार्थी जैसे भेद भी उचित ही हैं। शाब्दी व्यजना और प्रकरण- व्यग्याथ मात्र की प्रतीति प्राय प्रसरण के कारण ही होती है। यहा पर प्रकरण का प्रयोग उपलक्षण + रूप में है। वत्ता, श्रोता की सभी स्थितियां, स्थन भगिसा स्थान काल आदि का समावेश प्रकरण के भीतर ही होता है। इसी प्रकरण की सहायता स सहृदवो का यग्याय की प्रतीति होती है। प्रसिद्ध भापा-वैनानिक ब्लूमफाल्ड ने वक्त बौद्ध यादि प्रकरण को महता घोपित करते हुये कहा है यदि हम प्रत्येक वक्ता का स्थिति तथा प्रत्येर श्रोता को प्रतिपति का पूण नान हो, तो केवल इहा दो वस्तुग्रो को हम क्सिी गट वै अथ के रूप में ग्रहण कर सकते हैं। केवल इही के आधार पर हम अपने अध्ययन के विषय वा समस्त नान वे अय क्षेत्रा में अच्छी तरह अलग कर सकते हैं।' कतिपय पाश्चात्य विद्वान प्रकरण को विल मानसिक प्रक्रिया 1 If we had an accurate knowledge of every speakers situation and of every hearers response -We could simply register these two facts as the meaning of any given speech-utierance and neatly separate hour study from all other domains of knowledge -- अध्याय का प्रतिपाद्य ८१ १ प्रकरण को के रूप में ही ग्रहण करते है।' भारतीय काव्यशास्त्री भी वक्ता, प्रोता को वाह्य परिस्थितियों का का भी प्रकरण के प्रतगत ग्रहण करते हैं। देश, काल, चेष्टा अय सनिधि मादि ऐसी ही परिस्थितियां हैं जो बाह हो मानी जायेंगी। पर तु इसम भी कोई सदेह नहीं कि प्रो० टिचनर' का मत भी अधिकाश मे सत्य है। ये हो वाह्य परिस्थितियां वक्ता और श्रोता की मानसिक प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं और प्रभावित मानसिक प्रक्रिया हो व्यग्यार्थ का कारण बनती है । रिचडस तथा आग्डन भी प्रकरण को मानसिक ही मानते हैं, "कोई। वस्तु, क्सिी भाव को प्रतिपादित करती है, इसका अभिप्राय यह है कि वह किसी विशेष प्रकार के मनोवैज्ञानिक प्रकरणो मे से एक है। २ वस्तुत प्रकरण में वक्ता और श्रोता को बाह्य परिस्थितियां एवं उनकी मानसिक प्रक्रियाओं को सम्मिलित करना समीचीन है । मातर एव वाह्य दोनो ही स्थितियों एक दूमरे से ऐसी जुडी हैं कि एकान्तिक रूप से अलग करके नहीं देखी जा सकती 1 मम्मट ने प्रकरण वैशिष्टय' का उल्लेख प्रार्थी व्यजना क प्रसग मे ही किया है । शादी के प्रसग में नही । विश्वनाथ ने इसी का अनुकरण किया है । क्या इसका यह निष्कप निकाला जा सकता है कि शाब्दी व्यजना में सहायता के बिना ही यायाय बोध सम्भव है ? इस प्रश्न 'को काव्यप्रकाश की प्रदीप टोका के टीकाकार गोविन्द ठक्कुर ने उठाया है और उसका समाधान भी किया है । उनका क्थन है कि 'प्रार्थी' व्यजना में तो वक्तृवशिष्य पान की सवथा अपेक्षा है हो, किंतु शादी में भी कमी कभी इसकी प्रावश्यक्ता होती है, उसम उसका सवया अनुपयाग सिद्ध नहीं किया जा सका है। गोविद ठक्कुर का मत समीचीन है । शाब्दो मै भी प्रकरण की महत्ता है, यद्यपि वह प्रार्थी स अपेक्षाकृत कम है । यहाँ शाब्दीगत प्रकरण के उदाहरण दिप जाते है अभिषामूला शाग्दी व्यजना और प्रकरण- अभिघामूला शाब्दी व्यजना म भी प्रकरण का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रकरण के बदलने से'यहाँ मी अथ मे हेरफेर हो जाता है-यथा-- भयो अपत क कोपयुत के बोरो यहि काल । मालिनि माज क्हे न क्यो वा रसाल को हाल ॥ यह नायिका की मालिनि-दूती के प्रति उक्ति है । नायिका का मुख्य मतव्य नायक का समाचार पूछने से है । दोहे म अपत, कोपयुत, बौरी, रसाल आदि द्वयथक शब्दो का प्रयोग है। मालिनि को सम्बोधित करने के कारण भाम वृक्ष वाला प्रारणिक अथ है और नायक वाला अप्राकरणिक । परतु प्रकरण के बदलने पर अर्थात् उपयुक्त नायिका के स्थान मे प्रय व्यक्ति को वक्ता कर देने से नायक वाले अप्राकरणिक अथ की प्रतीति न हो सकेगी। 7 r , । -- 1 1 I understand by contact simply the mental process or complex of processes Ogden and Richard page 58 2 To say indeed that anything is an interpretation is to say that it is a dumber of psychological contests of a certain kind -Meaning of Meaning page 5 ३ अर्थव्यजक्तायावक्त वशिष्टादीनामावश्यक्त्वमात्रम् । न तु शदव्यजनामा सवथानुपयोग । ध्वनि सम्प्र०सि०, पृ. २८६ काव्य निणय, २०४५ ४ १२ । ध्वनि सिसात और व्यजनावृत्ति विवेचन -- सक्षणामूला शादी व्यजना मोर प्रकरण- अमिधामूला शाब्दी व्यजना की भाति लक्षणामूलाशा व्यजना म भो प्रकरण का महत्व पूर्ण स्थान है, परन्तु शाब्दी व्यजना के दोनो भेदा मे प्रकरण की वह महत्ता नही है जो प्रार्थी व्यजना में होता है। सज्जनता प्रकटित करी कियो बहुत उपकार । ऐसो काजु करी सदा जीवो वप हजार ॥' यदि यह किसी अपकार करने वाल से कहा जायगा तो इसका विल्कुल विपरीत अथ होगा और यदि उपकारी के प्रति कहा जायेगा तो साधारण जैसा प्रथ है वही मुख्य होगा । इसस स्पष्ट हो गया कि प्रकरण का शाब्दा व्यजना के व्यग्य निणय म भी प्रमुख स्थान है। अनेकायक बाब्दों के प्रसग म अभिषेय नियामक- शादी यजना दे दो भेद हैं । १ लक्षणामूला और २ अभिधामला । लेप की भाति मभिधामूला में भी ऐसे अनेकाथर रादा का प्रयोग होता है जिनको बदलना सम्भव नहीं है । प्राकरणिक और अप्राकरणिय अथ म सदह होने पर प्रकरण के साथ सयाग प्रादि नियामक तत्व भी सहायक होते हैं । य अभिधेय अथ के नियामक हैं । मभिधेय को स्मति ही विशेष स्मति है। मम्मट ने इनका उल्लेख अभिषा के प्रसग मे तो क्यिा है परतु इनके उल्लेख के पश्चात यह कहा है कि "इस प्रकार भभिषामूला का विवेचन क्यिा' । इससे सभी रीतिकालीन प्राचार्यों ने इनका उल्लेख ध्यजना के प्रसग म किया है । इनका विस्तृत विवेचन तृतीय अध्याय मे होगा। पायों ध्यजना- यह शाब्दी यजना के प्रसग म कहा जा चुका है कि यजना का शद से अधिकतर परम्परा गत सम्बध होता है । अभिधा इत्यादि को भांति शद से उसका साक्षात् सम्बध नहीं होता है। इसीलिये कुछ विद्वान् व्यजना को शदाक्ति मानने तर मे हियक्त हैं। वे उसे अथ शक्ति कहना ही अधिक उपयुक्त समझते हैं । परन्तु जसा पहिल स्वीकार किया जा चुका है व्यजना को प्रय शक्तियो की भांति शब्द शक्ति मानना ही समीचीन है और शादी "यजना की सत्ता भी स्वीकार करनी ही पडेगी। यह भी सकेत किया जा चुका है कि शादी यजना श क्षेत्र भार्थी व्यजना की अपेक्षा सीमित है । वाच्याथ और लक्ष्याथ का बोध पद से ही होता है पर तु व्यग्यार्थ की अभिव्यक्ति कराने के पश्चात शद और अर्थ की वमी ही स्थिति हो जाती है जसो वाक्याथ की प्रतीति के पश्चात पदाथ की होती है । काय म इस यग्याथ की प्रधानता भी होती है और इसी की रमणीयता भी । कायकर्ता कवि को ऐसे शद और अथ की पहिचान मे विशेष श्रम करना पडता है जो उसके उस प्रधान और रमणीय व्यग्याय के प्रत्यायर हो सकते हैं, क्योकि ऐसा कोई ही शद अथवा अथ होता है जो उस व्यग्या को प्रतीति कराने मे सफल होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि का य प्रणेता और का य अध्येता दोनो को दृष्टि से व्यग्यार्थ प्रधान और - १ कविकुल कल्पतरु, ५।२।११ २ प्रो० का तानाथ तेलग शास्त्री ना.प्र. पत्रिका, वप ५३ १२ प्रक।

प्रार्थी व्यजना ८३ रमणीय होता है।' इसीलिये उसको अभिव्यक्त करने वाले शब्द और अर्थ उसकी प्रतीति कराके गौणता प्राप्त कर लेते हैं। शब की व्यजक्ता का उल्लेख हो चुका यहां पर प्रर्ष की “यजक्ता का विचार करना शेष है । अर्थ तीन प्रकार के होते है-(१) वाच्य, (२) लक्ष्य और (३) ध्यप्य । ये सभी पर्ण-व्यजक हो सकते हैं ! इसलिये भार्थी व्यजना इन प्रयों की दृष्टि से तीन प्रकार की होती है । (१) जहा व्यग्य की प्रतीति वाच्य से होती है वहा वाच्य सम्भवा माझे व्यजना मानी जाती है । (२) जहां व्यग्यार्थ प्रतीति म लक्ष्यार्थ व्यजक होता है मौर व्यग्या का उस वाच्यार्थ से येवल परम्परा सम्बध रह जाता है वहाँ लक्ष्य-सम्भवा प्रार्थी व्यजना होती है भोर (३) जहाँ व्यग्यार्थ का कोई व्यायार्थ ही व्यजक है उसे व्यग्य सम्भवा कहते हैं । वाध्य सभथा प्राथों व्यजना-- जहा पर का य मे सव प्रथम अभिधा शक्ति से शादी के संकेतित अर्थ का बोध होता है, तत्पश्चात प्रकरणादि को पर्यालोचना से उसी मुख्यार्थ से अय अर्थ का बोध होता है, वहाँ वाच्य समवा प्रार्थी यजना मानो जाती है । इसका उदाहरण है- अब तक अम्ब नहीं हुआ घर का कोई काज । अब कह क्या करना मुझे, छिपता है दिनराज ।। इम दोहे से सर्व प्रथम यह अथ बोध होता है कि अब तक घर का कोई काम नहीं हुमा है यदि कोई काम करणीय है तो बता दिया जाय क्योकि सायकाल होने वाला है । पर तु प्रकरण से जब यह पता चलता है कि कहने वाली पुश्चली है. तो पाठक को इस प्रथ की प्रतीति होती है कि वह सायकाल स्वर विहार का समय मिलना चाहती है यह व्यग्याथ वाच्याथ प्रतीति के बाद उसने द्वारा ही होता है । इसीलिये इस यजना को वाच्य मभवा कहते हैं। लक्ष्य सभवा प्रार्थी व्यजना- जहा काय म सब प्रथम अभिधा शक्ति से मुख्याथ की प्रतीति होती है, कि तु मुग्याथ के बाघा के कारण वह अथ संगत नहीं होता, तर मुख्याय के योग से लक्ष्याथ को प्रतीति होती है, ये प्रयोजनवती लक्षणा के हो म्थल होते हैं इसलिये लक्ष्याथ के साथ कोई न कोई प्रयोजन भी अवश्य ही विद्यमान रहता है। लक्षणा मे प्रयोजन सबदा व्यग्य ही होता है। यदि व्यजना प्रयोजन में ही कृत्यकृत्य हो जाती है तो लक्षणामूलाशाब्दी मानी जातो है । उसका उस्लेख शादी के प्रसग में हो चुका है । पर तु जब लक्षणा के लक्ष्याथ से किसी प्रय व्यग्याथ की प्रतीति होती है तब लक्ष्य सम्भया प्रार्थी व्यजना मानी जाती है । लभणामूला शाब्दी मे प्रयोजन व्यग्य का सबध शब्द से प्रार्थी के व्यग्याथ को अपेक्षा निक्ट का होता है । इसलिये उसे शाब्दी और इसे प्रार्थी माना जाता है । लक्षणामूला शाब्दी व्यजना और लक्ष्य सम्भवानार्थी व्यजना का दूसरे पादो मे इस प्रकार कह सकते हैं । लक्षणामूला शादी व्यजना मे एक प्रयोजन रूप व्यग्याथ होता है। और लक्ष्य सम्भवाप्रार्थी में प्रयोजन के अतिरिक्त एक व्यग्य और रहता है । अर्थात् शाब्दी १ वयालोक, १६१० २ वही १२३ का०प्र०२ २८ ८४ : वनि सिवात और प्यजनावृत्ति विवेचन 1 . म एक व्यग्याय रहा है भार प्रार्थी मे दो व्यग्याथ ।' दूसरे व्यग्याय का सम्ब घ लक्ष्याथ से रहता है इसलिये इसे प्रार्थी मानना ही सगत है। उदाहरण के लिए-- मोहित मैं चित ६ फिरी सखो निकु जन माहि । भये मग श्रम स्वेदकन लह्यो मु प्रीतम नाहि ।। मुख्याय- हे सखि तू मेरा हित करने के लिये मनोयोग पूर्वक कुज मे घूमती रही। परिश्रम से यद्यपि तेरे शरीर पर श्वेदकरण हो गये परन्तु वह प्रियतम न मिल सका। जब प्रकरण का पता चलता है कि नायिका ने दूती को नायक के पास भेजा था, परन्तु वह स्वय उससे उपभुक्त होकर लौटी है । शरीर पर नस सत भादि हैं, निकु जो में घूमने को खरोंचं नहो हैं पौर रतिकोडा के कारण श्वेद कण हैं घूमने के परिश्रम के कारण नही हैं सो 'मोहित और "चित द फिरी प्रादि का मुख्याय सगत नही होता, और विपरीत लक्षणा से निम्न लक्ष्याथ की प्रतीति होती है लक्ष्याय-तूने मनोयोग पूर्वक मेरा काय नहीं किया है। ये श्वेद-वण भी परिश्रम के नही हैं । प्रियतम के न मिलने की भी बात मिथ्या है । प्रयोजन--तूने मुझसे पात्रुता की है । इसे मैं कभी भुला नहीं सकती। द्वितीय व्यग्याय-तुम दानो ने मेरे प्रति अपराध क्यिा है तुम दोनों का गुप्त प्रेम भी प्रगट हा गया है। व्यम्य-सम्भवा प्रायों- कभी कमी काय में इस प्रकार के प्रसग पाते हैं कि मुख्याथ अथवा वाच्याथ की प्रतीति के पश्चात प्रकरण इत्यादि की सहायता से एक व्यग्याथ की प्रतीति होती है। तत्पश्चात् इस व्यग्याथ से पुन अय यग्याथ की प्रतीति होती है। जहा ऐसा अवसर उपस्थित होता है। वहा व्यग्य सम्मवा प्रार्थी व्यजना मानी जाती है। वाच्य-सभवा में वाच्याथ व्यग्याथ का व्यजक होता है । लक्ष्य सम्भवा म लक्ष्याथ भौर व्यग्य सम्भवा में प्रथम व्यग्याथ द्वितीय व्यग्याय का यजक होता है , व्यग्य सम्भवा प्रार्थी-व्यजना वाच्य सम्भवा पर भी प्राधृत हो सकती है और लक्ष्य सम्मवा पर भी, परतु वाच्य सम्भवा यग्य की व्यजक्ता के अवसर अधिक मिलते हैं। उदाहरण- स्वस्थ प्रचल पुरहनि पर बक ठहरातु । जनु पन्ना भाजन पर दर बरसातु ॥' नायक और नायिका एकात रम्यस्थली मे घूम रहे हैं । नायिका नायक से कहती है । मुख्याथ-~-देखिये, कमल पत्र पर बगुला कितना निश्चित भौर निश्चल बठा है, ऐसा प्रतीत होता है, मानो पन्ना के पात्र पर शख रखा है । प्रथम व्यग्याय-दिखलाई पड़ने वाला बगुला क्तिना विश्वस्त और भय रहित है। १ १ सभा प्रवास, ६५८ साहित्य सुषा निधि, २०५१ प्रार्थो भ्यजना ८५ - द्वितीय व्यग्याय-यह स्थल इतना एकात है कि पता भी नही खडकता और बगुला प्रादि पक्षी भी निश्चिन्त और निभय रह रहे हैं, यह सहेट का सुन्दर स्थल है। तुम यहां नहीं आये, यदि आये होते तो बगुला नादि इतने निभय न होते । तुमने वचन भग कर मुझे कष्ट दिया है और अपराध भी किया है। इस उदाहरण में स्वस्थ और अचल शब्दा से निभयता और निजनता मादि का बोध होता है। प्रथम व्यग्याथ वाच्य-सम्भव है और द्वितीय व्यग्यार्थ यग्य सम्भव । दूसरा उदाहरण सबै कहें करतार को जग में बहुत प्रवीन । यह रचना ताको लखी राहु बधू कुच कौन ॥' यह कवि की उक्ति है । राहु के हाथ नही है । मुख्याथ-ससार मे विधाता को सभी बुद्धिमान कहते हैं। उसकी यह रचना कि की पत्नी के कुच क्येि, भली भाति देख ली । लक्ष्यार्य-विधाता की सृष्टि समझ-बूझ के साथ नही हुई है । वह बडा मूस है। विधाता का मूखताधिक्य प्रयोजन है। प्रथम व्यग्याय-भूख की सभी रचनायें बेढगी और उल्टी होती है। द्वितीय व्यायाय-यह व्यग्याथ प्रकरण के अनुसार अथवा वक्ता की स्थिति के अनुसार बदलता रहेगा। यदि वक्ता क्मिी राजा से पीडित दरवारी है तो यह राजा होने योग्य नहीं था प्रादि । व्यग्यार्थ लक्ष्य-सम्भव व्यग्याय से प्रतीत होता है । यह उदाहरण लक्ष्य मम्भवा प्रार्थी व्यजना का माना जाना चाहिए अथवा व्यग्य सम्भवा का, इसका निश्चय करना भो आवश्यक है। लक्ष्य-सम्भवा प्रार्थी व्यजना म प्रयोजन के अतिरिक्त एक व्यग्यार्थ और निकलता है अर्थात उसमे प्रयोजन को मिला कर दो यग्याथ हात हैं और लभ्य सभवा पर आघत मे प्रयोजन को मिलार तीन व्यग्याथ होते हैं । लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना म वक्ता अथवा कवि का अभिप्राय प्रयोजन-गत होता है। लक्ष्य-सभवा में द्वितीय व्यग्याथ-गत और लक्ष्य सभवा सबद्ध व्यग्य-समवा मे ततीय व्यग्याथ गत। पार्यो व्यजना और प्रकरण--- यह पहले देखा जा चुका है कि शादी व्यजना मे प्रकरण बोध की आवश्यकता है, परन्तु शाब्दी की अपेक्षा प्रार्थी मे प्रकरण-वोध की विशेष प्रावश्यक्ता है। शादी में और प्रार्थी में यह एक विशेष भद है। जहां कहा पाय में दो एक परिवृत्यसह शब्द के होते हुए भी ध्यग्याथ प्रतीति में प्रकरण का विशेष महत्व हो तो उस पार्टी यजना का ही उदाहरण माना जायगा, शाब्दी का नही । यदि कह दिया जाय कि प्रार्थी प्रकरण मे ही व्यग्याथ का नियामक तत्व है तो अनुचित्त न होगा । यही कारण है कि मम्मटादि प्राचार्यों ने शादी के प्रसग में प्रकरण का उल्लेख न करके पार्थी के प्रसग मे ही किया है। प्रय-व्यजकता के हेतु- यह स्पष्ट हो चुका कि प्रार्थी व्यजना में व्यग्यार्य की प्रतीति के हेतु प्रकरणादि हैं। प्रकरण समा प्रकारा, ६-६४ । - ध्वनि सिद्धान्त और ध्यानावृत्ति विवेचन में निम्नलिखित का ग्रहण होता है-१ वक्ता, २, बौद्धव्य ३ काकु, ४ वाक्म, ५ वाच्य, ६ अयसन्निधि, ७ प्रस्ताव, ८ देश, ६ काल १० चेष्टा मादि। इन वक्तादि को विशिष्टता के कारण ही प्रतिभाशाली व्यक्तियो को व्यग्याथ को प्रतोति होती है । इन अर्थ की व्यजकता के विभिन हेतुमा के उदाहरण मागे दिये जायग। प्रतिभा भी ध्यग्याय बोष का हेतु- काव्य प्रकाशकार ने स्वीकार किया है व्यग्याथ की प्रतीति वक्तादि को विशिष्टता से प्रभाव पाली व्यक्तियो को ही होती है । तात्पय यह है कि वक्तादि की भांति 'प्रतिमा भी अप-व्यजकता का हेतु होती है। यह प्रतिभा पाठक और कवि भेद से दो प्रकार की है। कविगत प्रतिभा को कारयित्री नाम दिया जाता है और पाठक-गत प्रतिमा को भावयित्री अथवा ग्राहयित्री । कविगत प्रतिभा को लोधनकार ने अपूव वस्तु निर्माण क्षमा प्रमा स्वीकार किया है । वस्तुत यही प्रतिमा मनुभूत प्रसगो को अपूव रूप म रखती है। इसी के कारण काय कर्ता महाकवि की पदवी प्राप्त करता है । महाकवि की वाणी स्वत स्फुटित होती है और ऐसे का य की रचना करती है जिससे दिव्य आनद की स्वत वर्षा होती रहती है। जिस प्रकार दुधारू गाय अपने बछड़े की तष्णा शात करने के लिये स्तन से बछडे का मुख लगते ही स्वत हो दूध देने लगती है उसी प्रकार कवि-वाणी स्वत ही पाठन को मानद रस प्रदान करती है। ध्वयालोककार ने कविगत प्रतिभा का उल्लेख करते हुये उसके लिए 'निष्य दमाना विरोपण का प्रयोग किया है । "निप्य दमाना' पद की व्याख्या में लोचनकार ने दिय भान ? रस को स्वयं प्रस्तुत करनी है, लिखा है। कारयित्री प्रतिभा के अभाव में कवि की वाणी पाठक को अविरल भान द धारा में मग्न ही कर सकती है। यही कारण है कि कालिदास प्रादि दो चार महाकवि हो हुये हैं। जिस प्रकार कवि के लिये कारयित्री प्रतिभा की महत्ती आवश्यकता है उसी प्रकार भावक के लिये भी भावयित्री प्रतिभा की। इसी से सम्पन्न पाठक को मम्मट ने अपनी कारिका में प्रतिभा जुषाम् प्रतिभा सम्पन्न से ही अभिहित किया है । वाच्याथ का मान तो शब्द पौर अथ के सम्बन्ध को जानने वाले व्यक्तियो को भी हो सकता है दाशनिक प्रयो की संगति पाडित्य से लग सकती है परन्तु काय का मान द बिना प्रतिभा के नही मिल पाता है। इस भावयित्री प्रतिभा से सम्पन का य परिशीलको को महृदय नाम दिया जाता है। सहृदय का स्वरूपोल्लेख करते हुये लोचनकार ने लिखा है जिन व्यक्तियों का मनोमुकुर काध्य के अनुशोलन तथा अभ्यास के कारण निमल हो गया है, जिन व्यक्तियों मे काय के वणय विषय मे तमय होने की योग्यता है, एव जिनमे अपने हृदय मे हृदय से सवाद प्राप्त करन की क्षमता है वे ही सहृदय हैं। वहीं अथ हृदय-सवादी माना जाता है जिसमे सहृदय में हृदय को त मय करने की शक्ति होती वक्त बोद्ध यकाकूना वाक्यवाच्याय स िनधे । प्रस्तावदेशकालादेव शिष्या प्रतिभाजुपाम् ।। योऽथस्या याथधीहेतु व्यापारो व्यक्तिरेव सा। २ प्रतिमा मपूव वस्तु निर्माणक्षमा प्रना। ३ ध्वयालोक, १-६ निष्य दमानेति दिव्यमान द रस स्वयमेव प्रस्नुवानेत्यथ -का० प्र०३-२१-२२ । -लोचन, पृ० ३४ ४ -लोचन, पृ० ३३ प्रार्थी ध्यजना २७ है और जिसकी चवणा से उसका प्रभाव सम्पूण शरीर में इस प्रकार व्याप्त हो जाता है जिस तरह सूखे काष्ट अग्नि व्याप्त हो जाती है। रोमांचादि अनुभव इसी चणा का फल होते हैं।' फवियो और पाठको को प्रतिमा की प्राप्ती पम्यास मादि के कारण नही होती है । इसलिए प्रतिमा को पूर्वजन्म का सस्कार माना जाता है । कविगत मोर पाठकगत प्रतिभा प्रथ को व्यजकता का मातरिक हेतु है भौर वक्तादि बाह्य । वक्त पशिष्टय-काव्य परिशोलन स प्रथम तो उसके मुख्याथ का बोध होता है, पुन उस वक्ता के स्वभाव प्रादि का । तत्पश्चात् काव्य के मुख्याथ से वत्ता स्वभाव, उसके स्रोता सम्बध मादि की सगति बिठाने का प्रयत्न होता है। इस प्रयल म व्यग्याय की प्रतीति होती है, यया प्रीपम में दापो कूप सरवर सूखे सब, जल नदो झिरना ते प्रावतु नगर में । जहाँ जात प्रायत लगत कांट झारन के, हो न जहाँ हो ही पानी पोवति हो घर में। अति दूर हो त भरी गागरि ल माति हों, टूटत पसीना प पहति हो पुनि सासु ननद झुक न मोप, जाऊँगी तो माऊँगो भरि दुपहर में॥ पाठक को सव प्रथम इस छद के मुख्याय का ज्ञान होता है । मुख्याथ सरल एव साधारण है । कहने वाली स्वो अपनी पडोसिन से कह रही है । दूमर क्षण म जब यह मान होता है कि कहने बाली व्यभिचारिणा है यो एक विशेष अथ पा प्रतोत होती है कि वह दुपहर समय पानी लेन के बहाने नदी-तट पर अपने उपपति से मिलने के लिए जाना चाहती है और कांटो को खराचो से होने वाले नखक्षत तथा दतक्षता को और परिश्रम-स्वेद स मावी तिज य स्वद को छिपाना चाहती है । यही कहने वाली का मुख्य अभिप्राय है । कहने वाली के आचरण और स्वभाव से अपरिचित रहने पर इस व्यग्याथ की प्रतीति न हो सकेगी। प्रग थर थर 4. २ बोद्धव्यवेशिष्टप-जिसस बात कही जाती है उसे बौद्धव्य कहते हैं। जिस प्रकार वता का स्वभाव और श्रोतृ-सम्बध व्यग्याथ की प्रतीति में माधन का काम करता है उसी प्रकार बोद्धव्य स्वभाव और व्यवहार भी। इसीलिये यहाँ बाढव्य वशिष्टय के कारण व्यग्याथ की प्रतीति स्वीकार करते हैं। इसका उदाहरण यह है - यषा काव्यानुशीलनाभ्यासवशाद विशदीभूते मनोमकुरे वणनीय वमयी भवन योग्यता ते स्वहृदय सवादभाज सहृदया । यथोत्तम-- योऽर्थों हृदय सवादो तस्य भावो रसोदभव । शरीर व्याप्ते तेन शुष्क काष्ठभिवाग्रिना ॥ लोचन, पृ० १३ २ वही, ३ कवि, कुल-कल्पतरु, ५२२४ ध्वनि सिद्धात और घ्यजनावृत्ति विवेचन ३ दूपरी भर्या है देह नींद सौ तजो सनेह हिप भो पिरह गहे चिन्ता अधिकात है। 'धोपति" सुजान भनि जनन अनेकन सौ यासर विहात सौ प राति न विहाति है । हरिये कराहि क सुकहिये परोसिन सों, सहिये परम दुख कटूना विसाति है। हो ही मदभागिनी हाँ यडरों प्रभाग जागो, मेरो दुख देखि माली मति बिलखाति है। नायिका की दूतो नायक के पास माती जाती है। क्लायमानुसार उसके हृदय में भी नायक के प्रति अनुराग के अकुर जम गये हैं, कामोपभोग की इच्छा का भी उदय हो गया है प्रत दूती को वही स्थिति हो रही है जो प्रेम के उदय से होती है । नायिका को इसका पता लगाने पर दूती से कहती है । मुख्याथ के पान होने के पश्चात जब इस प्रकरण का पता चलता है तो नायिका के इस साधारण लगने वाले कथन से तीन एव तीक्ष्ण उपालम्भ-रूप, व्यग्याथ को प्रतीति होती है। दूतो की नायिका के प्रति सापराधता जान पड़ती है। काकु वैगिप्टय से-जहाँ बाप म गल के स्वर भद से पाठ करने पर ही माय मथ की प्रतीति होने लगती है वहाँ काकु-वशिष्टय व्यग्य माना जाता है । काकु वशिष्टय से प्रतीत होने याला व्यग्ग वही प्रधान और चमत्कार मुक्त होने से ध्वनि-काव्य भी होता है और कही अप्रधान तथा वाच्याथ का उपस्कारक होने के कारण गुणीभूत व्यग्य । जहाँ वाक्याथ की पूर्ण विश्रान्ति के द्वारा प्रश्न किया जाता है पौर उसका उत्तर वाध्याय से नितान्त भिन्न रहता है और वाच्याय व्यग्य का उपस्कारक हो जाता है वहा ध्वनि-काव्य माना जाता है। वह व्यग्यायं प्रधान रहता है। यथा दुवन दुसासन महीपत सभा में गहो, दुपद मुताको घोर जग हाहा खात भी। ध्यापन के साप पस्यो जग में नियास भयो, परमूल प्रसन वसन तपात भी। श्रीपति भनत जाइ रहे हैं विराट गेह जिहि दिन दिन अनुचित प्रपिकात भो। सापर तश्त मया करिक सुमोधन प, घरम सम्प राजा मों पर रिसात भो॥ काय प्रकाश में पाकु-य्यग्य ध्वनि का जो उनाहरण दिया गया है वह वणी राहार नाटक म सहदेव के प्रति भीमसेन की उक्ति का है । काव्य-सराजकार श्रीपनि न उसी उदाहरण मा -- १ याव्य-सरोज, २-८८ प्रनमाणापि वारा विधान्ते ।-का प्रमाण, पृ. काम्पसरोज, ३८९ प्रार्थों ध्यजना २६ यह हिदी रूपान्तर प्रस्तुत किया है । 'सहदेव से भीमसेन ने कहा कि श्रीकृष्ण जिस सधि को करने गपे हैं उसको मैं नहीं करने दूगा, तो सहदेव ने अनुनय करते हुए कहा, माप ऐसा न कहें मायथा बड़े भाई युधिष्ठर प्रप्रम होंगे। उस समय भीम ने कहा, क्या बड़े भाई प्रोध करना भी जानते हैं ? उसके बाद उहोने दुर्योधन द्वारा किये गये उपयारो का स्मरण कराके काकु से कहा कि इतने अपकारी दुर्योधन पर तो वह भाज भी कृपा दृष्टि से देखते हैं और मुझ पर लोप करेंगे।' पूज्य बडे भाई का दुर्योधन के प्रति बोध करना उचित था वहा तो वे कृपा दृष्टि करते हैं और जिस पर कृपा-दृष्टि रखनी थी, उस पर क्रोध करते हैं । यह उनका व्यवहार अनुचित है। व्यग्य वाच्याय से स्वतंत्र है और उसको प्रतीति काकु से होती है । वाक्य-वैशिष्टय से-जव छद म प्रयुक्त वाक्य स ही व्यग्याथ की प्रतीत होती है तो उसे वाक्य वैशिष्टया प्रार्थी कहते हैं । यथा इकटक हग द स्वच्छ रूचि निरखत है मो हार । वही हार घाही समैं लखत न पहा विचार ॥' नायिका के हार में उसको सखी का प्रतिविम्व पड रहा था जिस नायक टकटका लगाकर देख रहा था। उसके अयत्र चले जाने पर उसन जब दृष्टि हटाली तब ायिका ने उससे यह कहा । यहाँ पर यग्याथ की प्रतीति इसी वाक्य के सहारे होती है। इससे यह प्रतीत होता है कि नायक उस सखी पर प्रासक्त है। - ५ वाच्य वशिष्टय से-काव्य मे कभी कभी यग्याथ की प्रतीति वाच्य की विशिष्टता से होतो है । अर्थात् प्रयुक्त शब्दावली का मुख्याथ ऐसा निकलता है जो अपनी विशेषता से व्यग्य की ओर संकेत करता है। वाक्य वशिष्टय म ध्यग्याथ की प्रतीति वाक्य के गटन से होती है और वाच्य वशिष्टय मे मुख्याथ को सहायता से । दानो म बहुत सूक्ष्म अन्तर है । हिंदी के रीतिकालीन ध्वनिवादो भाचार्यों ने प्राप वाक्य वैशिष्टय के संस्कृति-ग्रथों में दिय गये उदाहरणो के अनुवाद भर कर दिये है और वाच्य-वशिष्टय के स्वतत्र उदाहरणो की रचना का प्रयत्ल भी यत्र-तत्र परिलक्षित होता है । यथा भौन अंध्यार हूँ चाहि अंध्यारो चवेली के घुज के पुज बने हैं। बोलत मोर फरें पिक सोर जहां तहां गुंजत भौंर घने हैं । दास रच्यो अपने ही विलास को मैन जू हानि सों अपने है । फल कलिदजा के सुख मूल लतानि के वृद वितान तने हैं ॥२ नायिका नायक से अथवा नायक नायिका से यमुना-तटवर्टिनी किसी एकान्त रम्य स्थली का वणन कर रहा है। इस छद के मुरयाथ से ही वत्ता को विहार की इच्छा व्यग्य है । वाच्य वशिष्य के उदाहरणो म रम्य स्थली, वर्षा और वसत प्रादि का ही प्राय वणन मिलता है। ६ प्रय सन्तिपि वशिष्टय से-कमी कभी काव्य म वक्ता और बौद्धव्य के बीच में ऐसा व्यक्ति खडा कर दिया जाता है जिसको उपस्थिति में वक्ता वौद्धव्य को अभीष्ट प्रसग का १ समा प्रकाश,६६० काव्य, निणय, २-५७ ६० ध्वनि सिद्धान्त घ्यजनावृत्ति विवेचन ७ उल्लेख मुख्यार्थ द्वारा न कराके व्यग्याय द्वारा कराना हो उचित समझता है । ध्यग्याथ को प्रतीति में इसी व्यक्ति को सनिधि प्रयवा सामीप्य माधन वा काम करता है । मतएव इसको अयसनिधि की विशिष्टता स्वीकार किया जाता है । यथा- नाह नेह सायो सरस नकुन "यारो होई। मूनि पैपे प्रात छिन रहे नोंद यस भोह ॥' कोई व्यभिचारिणी अपनी सखी अथवा पडोसिन के निकट बडी बात-चीत कर रही है। इतनी देर मे जार वहा पावर ठिठक्ने लगा है । उसपे ठिठक्न का अभिप्राय “यभिचारिणी से यह जानने के लिये है कि वह किस समय मिलेगी। सहेट पहले से ही निश्चित है। फलत नायिका पडोसिन से उपयुक्त पत्तियां कहती है । इन पक्तियो से पडोसिन को यह बताती है कि उसे पति से एक मिनट को छुटकारा नहीं मिलता है । क्वल छुटकारा नित्य प्रति के काय करन के लिए प्रात काल ही मिलता है । परन्तु नायक को यह समझा दिया कि मैं पवल प्रात काल ही मिल सक्ती प्रस्ताव वशिष्टय से-कभी-कभी वत्ता ऐसा प्रसग अथवा प्रस्ताव चला दता है कि उससे विशेष व्यग्याथ को प्रतीति होन लगती है । यथा - घोर घटा उनई पहुँघा टिन ए1 में घोजु छटा बि घाई है । धोपति राइ कहा करिवो परिवी फरिके पुन चातक गाइ है ॥ कारो पिछोरो उतारिहहा भय चूनरी ताल अनूप सुहाइ है । हो जो सुनों घरी चारिक मैं सखि माजु तिहारौ पिया घर माह है।' कृष्णाभिसारिका ने उपपति से मिलने के लिए पूरी तैयारी कर ली है। उसने काली पिछौरी भी मोढ ली । इतन में हो सखी को उसके पति के प्रागमन का स्मरण पाता है । वह उसी का स्मरण दिलाकर उसको उपपति के पास जाने से रोक्ना चाहती है। तू अपने पति स मिलने के लिए उचित शृङ्गार कर उपपति के समीप मत जा यह व्यग्य है । इस व्यग्य की प्रतीति प्रस्ताव को विशेषता के कारण ही होती है । देश वशिष्टय से-कभी-कभी यग्याथ की प्रतीति देश-वणत के ज्ञान से भी हो जाती है । यथा:- सासुरे को चली बाहिरो बाग बिलकति हो अखियां भरि पाई । जानत हो सुजनो जियको तिन कान में प्राइ तहीं समुझाई। देखें बिना पहिले हो भलो रति खेल को ठाहर को पछिताई । जात जहा हो तहां पुनि सुन्दर मदिर सूने धनी ममराई ।' कोई “यभिचारिणी जब ससुराल को चलने लगो ता अपने सहेट-स्थल को देखकर उह छोडने का उसे दुख हुमा । अतरग सखी उसके दुख का कारण समझ गई और उसे प्राश्वासन १ २ ३ रस रहस्य, २१३७ काय-सरोज ३-१३ सुदर शृङ्गार का छद सभाप्रकाश ६७२ प्रार्थी व्यजना ६१ । है देती हुई वोलो कि ससुराल में बहुत से सूने मदिर और घनी अमराइया हैं । इमसे व्यग्य यह है कि जिस प्रकार तुम यहाँ बेखटक जार से मिलती रहीं वहा भी उसी प्रकार मिलती रहोगी । चिता मत करो। यहाँ 'सूने मदिर और घनी अमराई देश को विशेषता से व्यन्याय की प्रतीति होती है। फाल पशिष्टय से कभी कभी व्यग्याथ की प्रतीति वाल-वणन से भी होती है। यथा- कियो सब जग काम बस जोते जिते अजेय। कुसुम सरहि सर धनुष कर अगहन गहन न देय ॥' यदि इसे मानिनो नायिका के प्रति सखी का वचन माना जाय तो यह ध्यग्याथ होगा कि माज तू मर कहने से नहीं माननी पर अगहन के पाते ही मान छोडपर पति से मिलेगी। अगहन महीना तेरा मान तोड देगा। यह व्यग्याथ अगहन महीने की विशेषता के कारण निक्लता है। चेष्टा पशिष्टय से-अथ की यजकता के जिनने वाद्य साधन हैं उनम चेष्टा भो एक है । जिस प्रकार यापार्थ प्रतीति मे अय तत्वो से सहायता मिलती है उसी प्रकार चेप्टा से भी । चेष्टा की भाव व्यजक्ता के सम्बध में भारत में विरोप विचार हुआ है। प्राचीन साहित्य शास्त्रिया ने चेष्टा स भी भाव व्य फता स्वीकार की है। वस्तुत चेप्टा का भाव-व्यजकता मे विशेष हाथ रहता है । यथा- हौं बछगन चराइब को तित्तगो जित हो वृषभान को द्वारो। जध मिलाइ लई भुज मेलि सकोचि तक अरु बन विसारो॥ श्रीपति ज् भनि नन नचाइ क तीख चलाइ कटाछ कटारी । सोस ते खचि लियो पट पूंघट पे मुख पद रख्यो न उज्यारो ॥२ नायिका ने उपति के सम्मुख प्रान पर अपनी उपयुक्त अनेक चेष्टामो से कामोपभोग को पानामा व्यक्त की। चतुर नायक जो नायिका की इन चेष्टापो का भाव समझता है अपने अतरग मित्र से कह रहा है कि जब बछडे घराने के लिए नायिका के द्वार से निकला तो उसने अपनो विगेप चेष्ायो से घर आने का सक्त किया। उसने अपनी दोनो जघानो को फलाकर मिला दिया और उसन स्पष्टक नाम प्रालिंगन का भाव प्रकट किया। त? तर उसने अपने घट को रखीवार पह सलाह दी कि छिपकर मेरे पास आना | चघल नेत्रो के नचान का यह तात्पय है कि भान का समय सध्या होना चाहिए । उसने मुख को बद कर यह मक्त किया कि मनुष्यो का कोलाहल वाद होने पर प्राना। ये यग्यार्थ नायिका को चेष्टायो से महुदय को प्रतीत होते हैं। व्यग्याथ और उसके भेद- यहां तक यजना के दोना भदो-गाब्दी और प्राधों का सप्रपच उल्लेख हो चुका । यहाँ पर यम्याथ का विचार भी आवश्यक है। व्यग्याथ तीन प्रकार ना माना जाता है--१ वस्तु- १ विहारी रत्नाकर, ४६५ २ दाय सरोज, ३६७, ६२ ध्वनि सिक्षात घ्यजनावृत्ति विवेचन रूप,२ मलकार रूप प्रौर ३ रस अथवा भाव रूप । जहाँ वस्तु अर्थात् केवल अय को व्यजना होती है। वहाँ वस्तु व्यग्य मानी जाती है। जहाँ अलकार की व्यजना होती है वहां मलकार व्यग्य स्वीकार क्यिा जाता है, जहाँ रस मथवा भाव को व्यजना होती है वहाँ रस अथवा भाव व्यग्य स्वीकार किया जाता है । व्यग्याथ के प्रम का उल्लख पहले हो चुका है। यहाँ इतना पहना ही पर्याप्त है कि व्यग्याथ की प्रतोति सर्वदा मुख्याथ अथवा वाच्याथ के बाद ही होगी। पाच्याथ ही लक्ष्याथ पौर ध्यग्याय का आधार है। व्यग्याथ के ये तीनो रूप सदा यग्य ही होते है, सो बात नहीं । इनमें से प्रथम दो भेद अर्थात वस्तु-रूप प्रौर मलकार रूप वाच्य भी हो सकते हैं और व्यग्य मी । स्वाभावोक्ति मे बालक प्रादि का वस्तु-वणन वाच्य रूप म हो सकता है।' उपमादि मलकारों मे प्रलवार मी वाच्य ही होते हैं। परतु रस माव सदा व्यग्य ही होते हैं । ये कभी और क्सिी स्थिति मे वाच्य नही होते हैं । बात यह है कि रस और भाव चित्तवृत्ति स्वरूप होते हैं और चित्त वृत्ति कभी भी वाच्य नहीं हो सकती है। शाब्दी ध्यजना और निविष ध्यग्याथ- ऊपर व्यग्यार्थ के तीन भेद क्येि गये हैं-१ वस्तु रूप, २ अलकार रूप मौर ३ रस भाव रूप । इनमे से प्रथम दो अर्थात् वस्तु रूप और अलकार रूप शादी व्यजना से भी ध्वनित होते हैं, परन्तु रस भाव रूप व्यग्या शादी व्यजना से ध्वनित नही होता है । रस और भाव को त मयकारी अभि यत्ति केवल प्रार्थी व्यजना से ही सम्भव है। यही कारण है कि ध्वयालोककार ने यमक और श्लेप जसे पदालकारो को रस-परिपाक मे बाधक स्वीकार किया है, काव्य मे जहाँ 7 गार रस का अड्गी रूप म चित्रण हो रहा है वहाँ यति कवि प्रयत्नपूर्वक एक रूप अनुप्रास का निबधन करने लग जाय तो वह अनुप्रास रस का व्यजक नहीं होता है। अनुप्रास मे एकरूपता लाने का यत्त करने पर अनुप्रास ही मुख्य हो जाता है और रस भाव परिपार गौण २ जिय कबहुं न जाचिय जांचिय जो जिय जांचिय जानको जानहि रे । जेहि जांचत जांचाता जरि जाइ जो जारति जोर जहानहि रे ॥ इन पक्तिया में अनुप्रास की एकरूपता का निबन्धन है यहां अनुप्रास ही मुख्य हो गया है। कवि प्रतिभावान है, उसको वाणी त मयकारी रस परिपाक करने मे भी समय है और यमक आदि शादालकारो का निर्वाह करने में सक्षम । परन्तु शृङ्गार रस में मौर विशेषकर विप्रलम्भ शृङ्गार मे कवि यदि अपनी उपयुक्त प्रतिभा का प्रयोग करता है-रसो में शृङ्गार का यहां पर उपलक्षणा स्मक प्रयोग है, और यमक और श्लेष मादि का निबधन करता है तो यह उसका प्रमाद है।' तात्पय यह है कि शब्दाडवर रस-परिपाक में बाधक होता है। शा दो यजना के लक्षणामूला स्वभावोक्ति रसो चारु यथा ववस्तु वणनम, -माहित्य-दपण । २ शृगारस्यागिनो यलादेक रूपानुबधवान् । सर्वप्वेव प्रमेदेषु नानुप्रास प्रकाशक ||-ध्व० लो०, २१४ । ३ ध्वयात्मभूते शृगारे यमकादि निवधनम् । शक्तावपि प्रमादित्व विप्रलम्भे विशेषत ॥ -ध्वयालोक, २१५ प्रार्थी व्यजना भेद में वस्तु रुप की हो व्यजना होती है । इसका विीप उल्लेख "प्रगढ़" नामक गुणीभूत-व्यग्य के अवसर पर मागे किया जायगा । यही कारण है कि प्राधुनिक हि दो काव्य में जहां लाक्षणिक प्रयोग सानुबघ चलते हैं, रस-परिपाक नही हो पाता है । रस-परिपाक के अभाव में ही कविता वो पोर से जनता को रुचि हन्ती जारही है। जनता की रुचि जगाने के लिये सशक्त प्रतिभावान कवियो को लाक्षणिकता के मोह को छोडना होगा। अलकार रूम की व्यजना अभिधामूला शाब्दी में होती है । इसमें वस्तु-व्यजना नही होती है। प्रार्थी व्यजना और विविध व्यग्य- प्रार्थी व्यजना मे त्रिविघि व्यग्यार्थ का समावेश रहता है । जसा ऊपर दिखाया जा चुका है रस भाव की व्यजना तो भार्थी व्यजना द्वारा ही हो पाती है । वस्तु ध्यजना और प्राह लाद- वस्तु-यजना अविवक्षितवाच्य के दोनों भेदो मे होती है और विवक्षिताय पर वाच्य में भी होती है । वस्तु-व्यजना मे चमत्कार तो भी रहता है परन्तु अलकार-व्यजना और रस भाव-व्यजना की अपेक्षा कम । वस्तु-व्यजना मे भाव-सस्पश भी रहता है। परन्तु बहुत कम । बस्तु-व्यजना में सनिविष्ट भाव उच्च काटि के सहृदय को भो त मय नही कर सकता है । अपूर्व-व्यजना मे सहृदय का बोध-सीमा का विस्तार होता है और यह विस्तार ही उसे पाहलाद प्रदान करता है। यह आहलाद भावानुभूति से भिन्न होता है । वस्तु यजना के कुछ उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं वस्तु व्यजना १ यह समयो पहै न फिरि कहै यन समुझाइ । निज हितु मन समुझि क जोति परन के वाइ॥" यहा अर्था तर सक्रमित अविवक्षित वाच्य का उदाहरण है। दोहे के दूसरे तीसरे चरण में जब कथनीय कह दिया गया तो 'कहे बन समुझाइ' कहना व्यर्थ है। परन्तु इससे उपदेश-वस्तु की व्यजना होती है। २ को हो भलाई भलो हमसौं, सु कहा कहिये जग मैं जस लोजो। जाहिर है घर बाहिर रीति प्रतीति यहै पर स्वारथ छोजो। काज सुधारत ही सबको निशि बासर ऐसे सदा सुख कोजी । हौं जगबीस सौ मांगो प्रसीस जु कोटि वरी सकलौ तुम जोजो ॥२ यह अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य अविवक्षित वाच्य ध्वनि का उदाहरण है। यह किसी अपत को अपकारी के प्रति उक्ति है । इससे पार निद्रा और सापराधल्य वस्तु व्यग्य है। इसमे क्रोध के मुझलाहट अथवा खीझ रूप का सस्पश भो है । ३ नव जलधर सम ऊनये कूरम राम कुमार । लखि महि मडल में कियो कचन को पासार ॥3 रस रहस्य, ३४ रसिक रसाल २।२४ रस रहस्य, ३१०४ ३ ६४ ध्वनि सिद्धात व्यजनावृत्ति विवेचन ४ यह विवक्षितवाच्य ध्वनि मे अलकार से वस्तु व्यग्य का उदाहरण है । प्राश्रयदाता महा राज रामसिह की दान प्रशसा मे आश्रित की उक्ति है । उपमा अलकार से महाराज की दानमहिमा वस्तु व्यग्य है। सुनि-सुनि प्रोतम मालसी, धूत सूम धनवत । नवल बाल हिय में हरप बाढ़त जात अनत ।' यह अथ शक्तयुत्य स्वत सम्भवी वस्तु से वस्तु के व्यग्य का उदाहरण है। मालसी होने से सदा घर में रहेगा, सूम और धनवत क्ले से दरिद्रता का भय नहीं है एव धूत होने से कामी होगा आदि वस्तु व्यग्य हैं । प्रलकार व्यजना- १ २ जाको कर सब दिसन में सौभ लहै द्विजराज । रहे विष्णुपद मे सुरुचि सुबहादुर महाराज ॥२ यह श द शक्त्युत्थ मलकार ध्वनि का उदाहरण है । यह अभिघामूला शादी का प्रसग है । कवि पाश्रयदाता महाराज बहादुर सिंह जी की प्रशसा कर रहा है । वही प्राकरणिक अथ है । कर, द्विवराज, विष्णु प्रालि द्वयथक शब्दों के प्रयोग स सूय का पथ भी निकलता है। महाराज बहादुरसिंह और सूय मे उपपेयोपमान भाव होने से उपमात्रकार व्यग्य है । येही चिरजीवी अमर निधरक फिरौ कहाय । छिन बिछुर जाकी नहीं पावस प्राइ सिराय ॥3 वर्षा में परदेश गमनमना पति के प्रति प्रियतमा की उक्ति है । जो प्रियतम का क्षरण भर भी वियोग सहन कर सकते हैं निश्चय वे अमर हैं । मैं तो आपका क्षण का वियोग भी सहन न कर सकू गी। मेरा प्रेम सर्वोत्कृष्ट है। यह व्यतिरेक अलकार यग्य है । यह स्वत सम्भवी वस्तु से अलकार की यग्यता का उदाहरण है। सीय स्वरूप लता सी मही तल तो उलही दुलही रति रानी । काम महीव्ह सो वर राम विलोक्त लौ पिय काम पहानी ॥ एक मे एक पर छहरी मुख लावनि की लहरी अधिकानी । प्रापुस मे उछल पछलें ज्यों नदी नद सगम को बढ़ि पानी ॥ यह क्सिी अतरग सखी की सखी के प्रति उक्ति है। 'सीय लतासी मही-तल और 'वर राम महोरुह सो मे उपमा अलकार स्वत सम्भवी है । इससे दृष्टात अलकार व्यग्य है। यह स्वत सम्भवी अलकार से अलकार को व्यग्यता का उदाहरण है । ३ १ काव्य निणय, ६।३३ २ समा प्रकाश, ७.१८ ३ बिहारी रलाकर ५६३ ४ फते-प्रकाश, २१७५ प्रार्थो ध्यजना ६५ रस-५जना- मो प तो न कछु हवै प्राई। और निवाहि भली विधि भायप चल्यो लखन सौ भाई ॥ पुर, पितु मातु, सकल सुख परिहरि जेहि यन विपत्ति बटाई। ता सग हो सुर लोक सोक ताज सश्यो न प्रान पठाई ॥ जानत हो या उर कठोर ते कुलिस कठिनता पाई। सुमिरि सनेह सुमित्रा सुत को दरकि दरार न जाई ।। तात मरन, तिय हरन, गीध यध भुज दाहिनी गवाई। तुलसी में सब भांति मापने फुलहि कालिमा लाई ॥' इस छन्द में करुण रस का परिपाक है । रस ध्वनि की प्रात्मा है । रस मे वस्तु और अलकार की अपेक्षा अधिक त मयकारिता होती है । जिस पवि की वाणी से रस रूप प्रान द की स्वत ही वर्षा होती है वही महाकवि है। यह रमानुभूति केवल व्यजना शक्ति से ही सम्भव है। इसकी महत्ता के कारण ही विश्वनाथ ने रस को काव्य की प्रात्मा स्वीकार किया था। ध्यान काव्य का लक्षण-- जिस काव्य मे चमत्कारयुक्त व्यग्याथ प्रधानता प्राप्त कर लेता है उस ध्वनि-काव्य माना जाता है । ध्वनि-काव्य का लक्षण ध्वनिकार ने इन शदों म किया है "जहां पर शब्द अथवा अथ दोनों अपनी आमा और अपने अथ का गौण बनाकर यग्यार्य की अभिव्यक्ति करते हैं, उस काध्यविशेष को विद्वान् ध्वनि नाम देते हैं । ध्वनि काव्य में स्थित यग्याय काव्य के चाच्याथ को अपेक्षा प्रधान होता है और उसमे अगना लावण्य की भांति एक विशेष चमत्कार विद्यमान रहता है । ध्वनि काम के व्यग्यार्थ में ये दो मुरय विशेषतायें होती हैं। ध्वनि काव्य के भेद- ध्वनिकाव्य के दो मुख्य भेद हैं --(१) प्रविषितवाच्य ध्वनि और विवक्षिता य-पर- वाच्य ध्वनि । इनमें से प्रथम म लक्षणामूला शाब्दी व्यजना और लक्ष्य सम्भवा प्रार्थी व्यजना का प्राधार रहता है और दूसरे भेद में अभिधामूला शादी व्य जना, वाच्य-सम्मवा प्रार्थी यजना पौर यग्य-सम्भवा प्रार्थी व्यजना का प्राधार होता है । लक्षणामला और लक्ष्य सम्भवा व्यजना में लक्षणा शक्ति की स्थिति होने से मुरम अथ में कवि को विवक्षा (कहने को इच्छा) नही होती है । इसीलिए उसका नाम अविवक्षित वाच्य रखा गया है। यह पहले बताया जा चुका है कि ध्वनि की दृष्टि से लक्षणा के दो भेद दिये गये हैं (१) अजहल्लक्षणा और (२) जहल्लक्षणा। इनमे प्रथम लक्षणा को उपादान लक्षणा और द्वितीय को लक्षण-लक्षणा भी कहते हैं । लक्षणा के इही दोना भदा को आधार मानकर अविवक्षितवाच्य के भद किय गये हैं -(१) अर्थातर सवामित भौर (२) अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य । इनम अर्थातर सक्रमित वाच्य का सम्बध उपादान लक्षणा से है और अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य का सम्बध लक्षण-लक्षणा से । लक्षणा के पदगत और वाक्यात भेद- कतिपय प्राचाय अभिधा को भौति लक्षणा को भी पदो से सम्बंधित स्वीकार करते हैं १ गीतावली लावाह, ६ २ ध्वनि, ११३ ६६ ध्वनि सिद्धान्त ध्यजनावृत्ति विवेचन पौर कुछ पद और वाच्य दोनो से सम्बन्धित । लक्षणा को पद से सम्बंधित स्वीकार करने वाले प्राचार्यों में मम्मट और उनके टीकाकार गोविद ठाकुर का नाम उल्लेखनीय है। उसे पद और वाक्य से सम्बधित स्वीकार करने वालो में विश्वनाथ ही प्रमुख हैं। उहाने स्पष्ट लिखा है, 'य सभी लक्षणायें पदगत और वाक्यगत होने के कारण पुन दो-दो प्रकार का होती हैं। वाक्य गत लक्षणा का निम्नलिखित उदाहरण दिया गया है उपकृत बहु तत्र किमुच्यते सुजनता भवता प्रथिता परम् । विदधदी दृशमेव सदा सखे सुखित भास्व तत शरदा शतम् ॥ 'आपने हमारे साय वडा उपकार किया है हम उसका उल्लख कहाँ तक करें। मापने उच्चकोटि की सज्जनता दिखलाई । ह मित्र आप ऐसा ही करते रहे और सकडो वर्षों तक सुख - पूवक रहें। ऊपर उद्धत छद में एक से अधिक लक्षक पद हैं यथा उपकृत सुजनता, सुखित प्रादि । इसलिये लक्षणा वाक्यगत मानी जानी चाहिए । यह ता विश्वनाथ का अभिप्राय है और तात्पय की भाति उसका सम्बध वाक्य से न होकर केवल पद अथवा पदा से ही है यह अभिप्राय लक्षणा को पदगत मानने वालो का है । इस पर अपना निणय देते हुये डा० भोलाशकर ने लिखा है, हमे विश्वनाथ का मत नहीं जचता। वस्तुत लक्षणा कवल पदगत होती है। वाक्यगत जैसा भेद मानना समीचीन नही ।' परन्तु यह प्रश्न इस प्रकार के निणय से सुलभता दिखाई नही पड़ता है। यह पीछे किया जा चुका है कि उपादान लक्षणा अर्थान्तर सक्रमितवाच्य ध्वनि और लक्षण लक्षणा अत्यात तिरस्कृत वाच्य ध्वनि का मूल है । ये दोनो अविवक्षित वाच्य ध्वनि के भेद हैं। ध्वनिकार ने अविवक्षितवाच्य ध्वनि की पद और वाक्य प्रकाशता स्वीकार की है। यदि लक्षणा केवल पदगत होती है तो उस पर माधत अविवक्षितवाच्य ध्वनि भी पदगत ही हानी चाहिए, वह वाक्यगत कस मानी जा सकती है । यहा भी यह प्रक्ट कर देना आवश्यक है कि अविवक्षितवाच्य ध्वनि की पदवाक्य प्रकाशता के सम्बध में किसी प्राचाय ने शका नहीं की है। विश्वनाथ ने कदाचित इसी आधार को लेकर लक्षणा को पदगत और वाक्यगत स्वीकार किया है । अविवक्षित वाच्य ध्वनि के पदगत और वाच्यगत भेद स्वीकार करने से ध्वनिकार और लोचनकार की भी यही सम्मति जान पडनी है । इसलिये लक्षणा के विश्वनाथ द्वारा किये गये पदगत और वाक्यगत भेद समीचीन ही हैं। इस प्रकार अविवक्षितवाच्य ध्वनि के चार भेद हुए (१) पदगत प्रर्थान्तर सक्रमति वाच्य, (२) वाक्यगत अर्थातर समितवाक्य, (३) पदगत अत्यन्त तिरस्कृत वाध्य और (४) वाक्यगत वाच्य । पदवाक्यगतत्वेन प्रत्येक तायपि द्विधा । -सा०६०,२-१२ ध्वनि-सम्प्रदाय और उसके सिद्धात, पृ० १३२ अविवक्षितवाक्यस्य पदवाक्य प्रकाशता । ध्व०,३-१ ध्व, २-२ ४ नार्थी व्यजना ७ ध्वनि-काव्य का दूसरा भेद विवक्षिता यपरवाच्य ध्वनि माना गया है। इसके मुख्य द्वो भेद हैं (1) प्रसलक्ष्यक्रम व्यग्य और (२) सलक्ष्यक्रम-व्यग्य । असलक्ष्यक्रम व्यग्य का विवेचन चतुप अध्याय में किया जायगा। व्यजक को दृष्टि से इसके अनत भेद हो सकते हैं परतु अभिनव गुप्त ने इसके पांच भाग किये (१) वरणगत, (२) पदगत, (३) वाक्यगत, (४) सघटनागत, भोर (५) प्रबधगत परन्तु मम्मट और विश्वनाथ ने इसके छ भेद किये है (१) वर्णगत, (२) पदगत, (३) पदाशगत, (४) वाक्यगत, (५) रचनागत और (६) प्रव घगत । १ पदाशगत मे कृत तद्धित प्रत्ययो को व्यजक्ता सम्मिलित करके छ भेद माने हैं । इस भेद प्रभेद कल्पना में मम्मट की मा यता को प्रामाणिक माना जा सकता है । इसके पश्चात् सलक्ष्यकम व्यग्य के ध्वनिकार ने दो प्रमुख भेद किये हैं। (8) शद-शक्तिमूल और (२) अथशक्तिमूल । लेकिन बत्तिभाग मे उहोने उभयशक्तिमूल का भी उदाहरण दिया है। इसी के आधार पर बाद के ध्वनिवादी प्राचार्यों ने सलक्ष्यक्रम व्याप के दो स्थान पर सोन भेद कर दिये हैं, यद्यपि लोचनकार दो ही भेद स्वीकार करते हैं। इस विभाजन प्रक्रिया मे मम्मट का माग ही युक्तियुक्त है । रीतिकालीन प्राचार्यो ने सलक्ष्यक्रम-व्यग के तीन भेद हो माने हैं । इनमे से शब्द शक्तिमूल ध्वनि के ध्वनिकार ने दो ही भेद किये हैं। (१) पदगत शद शक्तिमूल अलकार ध्वनि और (२) वाक्यगत शब्दशक्ति मूल मलकार ध्वनि । मम्मट इत्यादि परवर्ती प्राचार्यों ने शब्दशक्ति मूल के वस्तु ध्वनि के भाघार पर दो भेद किये हैं । परन्तु शब्दशक्ति-मूल वस्तु ध्वनि के भेद मानना उचित प्रतीत नही होता है। इसका विवेचन मागे इसी अध्याय मे दिया जायगा। पदशक्तिमूल ध्वनि का प्राधार मभिधामूला व्यजना है। इसमें ऐसे अनेकार्थक शब्दो का प्रयोग होता है जो बदले नही जा सकते हैं। श्लेप मे भी ऐसे अनेकार्थक शदी का प्रयोग होता है को परिवर्तित नही हो सकते है । इसलिए शद-शक्तिमूल ध्वनि और श्लेप के क्षेत्रों का निश्चय करना यावश्यक है। श्लेष-श्लेप अलकार वही माना जाता है जहां दोनो पथ प्रस्तुत होते हैं मर्यात प्रकरण- योजना में दोनों की पारीक्षा रहती है। ये दोनो अय भिन्न भिन्न और समान कोटि के होते हैं जिनमें सयोग इत्यादि के द्वारा अभिधा का नियत्रण होने के पश्चात् द्वितीय अभिधा से प्रय अथ यो प्रतीति होती है । मिन्न प्रथ मान लेने से भिन्न शब्द भी मानने पडे गे क्योकि जहां प्रथ का भेद होता है, 'मप भेदन शब्द भेद ' यह नियम है । कहने का तात्पय यह है कि प्रत्येक' अथ के लिए एक पद की प्रावश्यक्ता है 'प्रत्यथ रार निवेश । 'इस प्रकार इलेप में दो भिन्न भिन्न अर्थ होगे वहाँ दो भिन्न पदो की कल्पना करनी पड़ेगी। यथा रतस्य नवपल्लवरह्मपि दलाध्य स्वामापान्ति गिलोमुखा स्मरधनुर्मुक्ता सखे मामपि । शान्तापादता हतिस्तत्व मुदे त ममाप्यावयो । सव तुल्यमलोक केवलमह पात्रा सगोक कृत। प्रियाया गुण 7 पदावण रचना प्रयधेप्वस्फुट प्रम । सा० द०,४-११ प० लो०,२-२१ २ २८ ध्वनि सिद्धान्त व्यजनावृत्ति विवेचन वो अथ दो मभिपाय- इस छद में तुम (प्रशोक) को गिलीमुख भ्रमर पाते हैं और मुझे स्मर धनुष से छूटे शिलीमुख बाण माते हैं । इस प्रकार दो शिलोमुम्ब शब्द मानने पडे गे जिनमें से एक शिलीमुख का अभिषा व्यापार द्वारा भ्रमर मथ होगा और दूसरे शिलीमुख सर का दूसरे अभिधा व्यापार द्वारा घाण अर्थ । दोनों प्रस्तुत प्रथ एक ही मभिधा द्वारा प्रकट न हो सकेंगे, उन दोनो के बोध के लिये दो मभिधायें स्वीकार करनी पडेगी । अभिनवगुप्त ने श्लेष के प्रसग में दो ही अमिषायें स्वीकार की हैं । उनका मत है कि जहां द्वितीय अभिधा व्यापार को सत्ता को बनाने वाला प्रमाण है जसे 'तस्याविनापि हारेण इत्यादि श्लोक मे।' यह श्लोक श्लेप का उदाहरण है। यहां दो अभिधायें होगी । मागे चलकर उहोंने पुन दो अभिघावाली मा यता दुहराई है । श्लेप से भिन्न ध्वनिक्षत्र का उल्लेख करते हुये उहोंने तत्सम्बधी चार मतो का उल्लेख किया है । चौथे मत के प्रारम्भिक शब्द ये हैं, द्वितीय पक्ष-अप्रस्तुत पक्ष की व्याख्या मे जो अथ सामथ्य है उससे द्वितीय अभिघा ही पुनरुज्जीवित हो जाती है। श्लेष अलकार के इस प्रसग को एक दूसरा उदाहरण लेकर अधिक स्पष्ट करने की मावश्यक्ता है । उदाहरण है- रावण सिर सरोज बनचारी । रघुवीर शिलोमुख धारी रामायण को इस अख़्ली में गोस्वामी जी ने द्वययक शब्द शिलीमुख का प्रयोग किया है। शिलीमुख के दो मय होते है (१) वाण और (२) भ्रमर । यह राम रावण युद्ध के प्रसग की प्राली है । रावण के दश सिरो मे राम ने बाण समूह मारे । तुलसी ने रावण के सिर समूह पर सरोजवन का भारोप करके एक नवीन प्रसग की योजना को जिससे "शिनीमुख' के दोनों प्रथ सार्थक हो गये । काव्यशास्त्रियो ने इस प्रसग के दोनो प्रों को प्रारणिक स्वीकार किया है और "शिलीमुख पद के प्रयोग के कारण 'इलेप' प्रलकार को वाच्य । श्लेष अलकार को वाच्य कहने का तात्पय यह है कि यहां द्वितीय प्रथ का बोध भी मभिधा से ही होता है -यजना से नहीं। इस विषय म डा० भोलाशकर यास ने लिखा है, 'जहाँ दोनो ही प्रथ प्रारणिक होग, वहाँ अभिधा मूला शादी व्यजना नही मानी जायगी । वहाँ श्लेप से युक्त कोई न कोई साम्यमूलक अलकार हो होगा और वह भी वाच्य रूप मे । ३ उपयुक्त मत में तीन तत्व हैं। (१) जहाँ दोनो प्राकरणिक अथ होंगे वहाँ अभिधामूला शाब्दी यजना नही होगी (1) वहाँ श्लेप से युक्त कोई न कोई साम्य मूलक अलकार ही होगा पोर (३) वह भी वाच्य रूप में। वाच्य रूप म अलकार का बोध होगा' कहने से विद्वान आवटर का यही अभिप्राय है कि वहाँ दोनो ही अर्थों का बोध अभिधा द्वारा ही होगा । इसके अतिरिक्त मलकार भी वाच्य होगा अर्थात उसके वाचकों का प्रयोग भी रहेगा। शब्द-बुद्धिकमणा विरम्य यापारामाव का ध्यान रखते हुये श्लेप के दोना प्राकरणिक अर्थों का - १ २ यत्र वा प्रत्युत द्वितीयाभिधा यापार सद्भावादेक प्रमाणमस्ति यथा 'तस्या विनापि हारेण' इत्यादी । लोचन, पृ० ११६ इतरेतु-द्वितीयपक्ष यारयाने यदथसामथ्य तेन द्वितीयाभिधव प्रतिसूयते ततश्च द्वितीयार्थो भिधीयत एव न ध्वयते । लोचन पृ० १२१ ध्वनि-सम्प्रदाय और उसके सिद्धान्त, पृ० १९२ ३ प्रार्थी व्यजना ६६ बोधक दो पभिधायें स्वीकार करनी पहे गो। एक अभिघा एक प्राकरणिक अथ का बोध करावेगी और दूसरी दूसरे प्रावरणिक अथ का। इही दोना अर्थो के वाच्य होने के कारण ही 'कोई न कोई साम्यमूलक अलकार वाच्य होगा' पाक्षिप्त नहीं। इस सम्बध में यह कहना प्रावश्यक है कि श्लेप के साथ सवत्र अलकार का होना आवश्यक नहीं है । अलकार सभावना को स्थिति में उसका वाच्य होना तो अनिवाय है। परतु उसका साम्यमूलक होना अनिवाय नहीं है। इलेप के साथ अलकार नही भी हो सकता है। यथा- येन ध्वस्तमनोभवेन बलिजित्काय पुण्ऽस्त्री कृतो। यश्चोवृत्त भुजगहारवलयो गगा च पोधारयत् । यस्याहु शनिमच्छिरोहर इति स्तुत्य च नामामरा । पायात्स स्वयमकक्षयकरस्त्वां सघदोमाघछ । भगवान विष्णु परक प्रथ-अज मा जिस भगवान् ने शकटासुर को मारा, बलि अथवा बलवान् राक्षसो को जीतने वाला, गोवधन तथा पाताल गत भूमि को धारण करने वाला और जो पत्र को बलय के रूप मे धारण करने वाला है, जिसका नाम देवता लोग चद्रमा को दमन करने वाले राह के शिर को नष्ट करने वाला बतलाते हैं, वे यादवो वा प्रावास बनाने वाले, सय कुछ प्रान करने वाले लक्ष्मीपति तुम्हारी रक्षा करें। भगवान शकर परक मय -वामनेव को जीतने वाले जिन भगवान् शकर ने बलि को जीतने वाले विष्णु के शरीर को पुराने समय में अस्म बना लिया था, उवृत्त सर्प ही जिसके हार एव क्कण हैं जिसने गगा को धारण किया है, जिसो सिर को च द्रमा से युक्त महते हैं, देवता जिसका 'हर यह स्तुत्य नाम बतलाते हैं वे अधक का नाश करने वाले उमाका त भगवान् शकर तुम्हारो रक्षा करें। यहाँ पर द्वितीय अर्थ वस्तु मात्र ही है अलकार नहीं । यह छद श्लेष का ही उदाहरण है। साथ ही यह भी सवत्र धावश्यक नहीं है कि श्लप ६ साथ साम्यमूलप भलकार ही हो । माधाय भामह का प्रमाण देते हुये अभिनव गुप्त ने सहोक्ति, हेतु पौर उपमा अलकारों का अधिक्ता साथ रेप का अनुपाहकत्व स्वीकार किया है ।२ सहोक्ति और हेतु साम्य मूलक मलकार ही हो जसा कि उपयुक्त विद्वान् ने स्वीकार किया है । इलेप दूसरे अलकारों के साथ सम महत्व प्रथवा समान चमत्कार युक्त होकर भी रह सकता है । यथा--रक्तत्व इत्यादि छन्द मे विरही राम को अशोक के प्रति उक्ति है, हे ! अशोक तुम नव पल्लव मे प्रौर में प्रियतमा के पलाध्य गुणो से रगा हुमा हूँ। है मित्र मुम भ्रमर पा रहे हैं और कामदेव ये धनुष से छूटे हुए शिलोमुख वाण मुझ पर भी। प्रिया का पार प्रहार तुम्हें प्रााद देता है और मुझे भो । हे। प्रशोक हम चाना की सब बातें समान हैं, विधाता ने पेवल मुझे सोर बनाया है। प्रत्र वस्तुमात्र द्वितीय प्रतीत नालकार इति श्लेपस्यव विषय -लोचन, पृ० ११६ २ सहीत्युपमा हेत्वलंकाराणां हि भूयसा इलेपानुप्राहकत्वम् । -लोचन, पृ० ११० तुम पर शिली १०० ध्वनि सिद्धात व्यजनावृत्ति विवेचन १ २ यहाँ पर 'रक्त', 'शिलीमुख' मादि में श्लेप अलकार है और अन्तिम पक्ति में व्यतिरेक अलकार है । दोना अलकार सम महत्व के हैं । यहाँ पर श्लेष व्यतिरेक को ससृष्टि है। दो मभिधानों के अन्य स्थान- श्लेप अलकार के अतिरिक्त दो अभिधायें प्रश्नोत्तर अलकार में भी रहती हैं। कभी-कभी मनोरजन के लिये विद्वद्गोष्ठियो मे दो प्रश्नो का शदच्छल से एक साथ उत्तर देने की चेष्टा होती है। जैसे सफेद कुत्ते को दौडते देखकर दो प्रश्न किये गये है –(1) कौन दौड रहा है ? (२) दौडने वाले का रग क्या है ? दूसरे व्यक्ति ने दोनो प्रश्नो का एक उत्तर 'श्वेतो धावित' कहकर दे दिया। दोनो उत्तरो को स्पष्ट करने के लिये दो प्रकार से अथ किया जायगा । श्वा =कुत्ता, इतो इधर से, घावति-दौड रहा है। श्वेर इतो घाँवति सफेद दौड़ रहा है। श्वेतो से भग-श्लेप की सहायता से दो शब्द मानने पडे और दोनो शदो का दो अभिधामो से अलग अलग मथ हुमा । इसी प्रकार बाधित प्रथ के प्रसग म भी असम्य मथ को प्रतीति भी अभिधा से माननी पडेगी। कहने का अभिप्राय यह है कि काय मे कभी कभी इस प्रकार के श दो का प्रयोग हो जाता है जिनके, भिन्न क्रमपाठ से अथवा दो शदा के सभी पस्थ अशो के सहपाठ से एक ऐसे अर्थ की प्रतीति हो जाती है जिसे असम्य प्रथ कहा जाता है। पडित राज ने इसे बाधित स्वीकार क्यिा है। यथा- सरलपन ही या उसका मन । (पन्त) नर हो न निराश करो मन को। (मथिलीशरण गुप्त) ३ रचि कुरु। (काय प्रकाश) महामीच रासी सरा पान पांव घोव । (केशव) प्रथम उद्धरण में सरलपन और ही को साथ साथ पढने से सरल पनही पाठ भी हो जाता है और उस समय पनही जूते के बाधित अथ की प्रतीति होती है। द्वितीय उद्धरण में 'नर और 'हो' को साथ पढने में 'न रहो का भी पाठ हो जाता है और उससे एक अमागलिक अथ की प्रतीति होती है जो सवथा अवाछित है । तृतीय उद्धरण मे दोनो पदा मे कवि और कुरु के सहपाठ से दोनो पदों के चि और तु समीपस्थ भशो के सहपाठ से तथा चौथे उद्धरण में भी एक अश्लील प्रवाछित अर्थ का बोध होता है । यह अथ बाधित इसलिये कहा गया है क्योकि यह अथ न तो कवि को अभीष्ट है, न जानकर ही उसने इस प्रथ के प्रत्यायक शब्दों का प्रयोग किया है एव न यह अथ प्रकरण सगत ही है । इस प्रवाछित मथ को प्रतीति अभिघा से होती है अथवा व्यजना से।' इसका सीधा और सरल उत्तर यही है कि इस प्रथ को प्रतीति अभिधा से ही होती है, क्योकि 'रुचि कुरु' में 'चि कु' मे अश्लीलाय का सकेत है। यह कश्मीरी भाषा का यौनिवाचक शद है। जिस यक्ति को इस प्रश्लील सकेतिक अथ का पूर्व नान होगा उसी को इसकी प्रतीति होगी अय को नहीं। यजना से सहृदय को सवथा असकेतित प्रथ को प्रतीति होती है । पडितराज ने भी ऐसे स्थलो में अभिधा शक्ति से ही बोध स्वीकार किया है। श्लेष के दोना अर्थों की प्रतीति तो दो अभिधामो से होती है, इसका निणय हो चुका । शब्द-शक्ति मूल ध्वनि के अप्राकरणिक अथ की प्रतीति अभिषा से होती है अथवा यजना से, इस ४ , रस गगाधर, पृ० १४४ प्रार्थी पंजना १०१ बात का निणय करना है। शन्द-शक्ति-मूल सलक्ष्यक्रम व्यंग्य का प्राधार अभिधामूना घान्दो व्यजना है । श्लेष को प्रसग योजना मे तो दोनो मयों की प्राकाक्षा रहती है परन्तु शब्द शक्तिमूला ध्वनि को प्रसगयोजना के अनुसार केवल एक अर्थ ही प्रकरण-सगत रहता है। लेकिन अनेकापक शादी के प्रयोग के कारण द्वितीय प्रथ को प्रतिभा भी होतो है और यही द्वितीय मथ कवि अथवा कविनि बद्ध वक्ता की दृष्टि से मुख्य और रमणीय होता है। इसे प्रकरण योजना मे मनाकाम होने के कारण प्रप्रावरणिक नाम दिया जाता है । इसी प्रथ मे कवि की विवक्षा होती है । महिम भटट मोर प्रभाकरणिक प्रथ को अस्वीकृति शाब्दिक व्युत्पत्ति की दृष्टि से प्रकरण सगत अथ प्राकरणिक और प्रकरण वाह्य पर्थ अप्राकरणिक माना जायगा । परतु यह कसे स्वीकार किया जाय कि उस अप्राकरणिक अथ को प्रतीति होती ही है। महिम भट्ट ने अप्राकरणिक अथ को अस्वीकार करके उसे वाच्यावचन-दोप मान लिया है । वाच्यावचन दोप वही माना जाता है जहाँ किमी क्थनीय बात को न कहा जाय अर्णत कवि द्ववथक शब्दों का प्रयोग करके भी प्रकरण में ऐसी योजना न करे किलिप्ट शब्दो के दोनों अथ सार्थक और प्राकरणिक हो जाय । इमसे भाचाय शब्द शक्ति-मूल ध्वनि के प्रयोग का निषेध करते हैं । इसको उहाने इन शब्दो में स्पष्ट किया है। 'इलेप का प्रयोग वहीं होना चाहिये जहाँ अर्थाभि यक्ति के लिये दोनो स्थानो पर कोई निब धन दिया गया हो भयथा श्लेप प्रयोग में कवि का उद्यम व्यथ है । लेप का वह प्रयोग कवि को कष्टदायक हो हो सकता है जहाँ यथर शब्दों का प्रयोग होने पर भी भय की अभियक्ति के लिए प्रकरण मे किसी हेतु का निवप नहीं है।' प्राचाय के अन्तिम वाक्य मे शद शक्ति-मूल ध्वनि का संकेत है । साहित्य-दर्पण में भी एक स्थान पर दुधोलधित विग्रहो' मादि उदाहरण देकर महिम भट्ट द्वारा अप्राकरणिक शिव-परक अथ के निषेध की बात कही गई है। छहोंने जिन पद्या के अप्राकरणिक प्रथ का निपेध किया है उनमे से एक छद शिशुपाल वध महाकाव्य मे रैवतक पवत मा वर्णन है पूर्ववर्ती पाचाय वल्लभ देव, ने श्लेप स्वीकार किया है और ध्व युत्तरवर्ती टीकाकार मल्लिनाथ ने अभिधामला शादी व्यजना, अर्थात शब्दशक्तिमूल ध्वनि । इस पद्य का उद्धरण देकर वे कहते हैं। यहाँ गिरीश पद को प्रावति के क्सिी हेतु का प्रकरण में निवधन नहीं है, इसलिये वाच्यावचन माम दोप है। एक बार प्रयुक्त गिरीश दाह ही 'श्वेतो धावति की भांति बिना प्रकरण की २ मे ध्वनि १ उभयत्राप्य भिव्यत्तय वाच्य किचिनिनबधनम । प्रयया व्यथ एव स्याच्छलेष व धोद्यम क्वे । तस्मादातर व्यक्तिहेतो कस्मिश्च्च नासित । य प्लेपवध निबच क्लशायद कवरसो।-व्यक्ति-विवेक, २५४८९ २ पाच्छादितायत दिगम्बर मुच्चकैर्गामातम्य सस्थितमुदय विशाल शृगम । मूनिस्खसत हिनदीपिति कोटिमे नमुद्रीक्ष्यको मुर्विन विस्मयते गिरीशम् । -शिशुपालवध, ४ १६ व्यक्तिविवेक, पृ० ३४५ तस्मात्प्राकरणिकार्यमात्रपयवसितामिधाव्यापारेणापि पा देनार्या तर घोद्ध्वनि । मल्लिनाथ सवरपा टोका, वही, पृ. १४६ ३ १०६ ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन यहाँ 'भद्रात्मनो' वाले उदाहरण मे जो दूसरे हाथी अप्राकरणिक अथ की प्रतीति होती है वह व्यजना नाम की चौथी वत्ति से ही होती है। कारण अभिधा शक्ति प्राकरणिक प्रथ का बोध कराके विरत हो जाती है, मुख्याथवाद इत्यादि हेतुना के प्रभाव मे लक्षणा का यहां अवकाश नही है, तात्पय-शक्ति अभिहित मोर लक्षित अर्थो मे ससगमात्र का बोध कराती है इसलिये इसका भी यहा अवसर नहीं है। इस प्रसग में यदि कोई यह प्रश्न करे कि 'मथ भेद के कारण शब्दभेद स्वीकार कर लेना चाहिये, नियम के कारण यहां पर दो शदो की कल्पना उसी भाति कर लेनी चाहिये जिस प्रकार श्लप अलकार के प्रसग में की जाती है । वे वहाँ है भी, केवल मीयता के कारण एक का भ्रम होता है । इसलिये प्रथम परवारणादि शादा से राजा इत्यादि का प्रय बोध कराके विरत होने वाली अभिधा के पश्चात द्वितीय श द की उपस्थिति के कारण द्वितीय शद निष्ठ अभिधा शक्ति से ही दूसरे प्रथ का बोध हो सकता है। इसके वोध व लिय अय वृत्ति की कल्पना करने से क्या लाभ ? इस कथन का उपस्थापन प्राचाय ने पूर्व पक्ष के रूप मे पिया है । इस पूर्व पक्ष का खान करते हुये वे कहते हैं, 'इस प्रसग में यदि दो शब्दा की कलाना र ली जाय तो प्राकरणिक अथ की प्रथम प्रतीति किस प्रकार होगी । प्राकरणिक और प्रप्रावरणिक दोना अर्थों की प्रतीति अभिधा से स्वीकार करने पर कौन से प्रथ को प्रतीति पहले और कौन से अथ की बाद मे मानी जानी चाहिये। दोनो समकालिक प्रतीति असम्भव है। द्वितीय अथ के बोध म अभिधा स्वीकार करने पर शब्द की कल्पना आवश्यक होगी, परतु धर्मी शद की कल्पना के स्थान में उसके धम-वृत्ति की कल्पना मे लाघव है । इसलिय द्वितीय अप्राकरणिक प्रथ की प्रतीति के लिये व्यजना नाम को वृत्ति की स्वीकृति हो उचित है।' प्रसन्नता इस बात की है कि जिस बात को लोचनकार ने बिना उपपत्ति के कह दिया था। उस बात की उपपत्ति देने की विश्वनाथ ने चेष्टा को । परतु विश्वनाथ न किसी न किसी प्रकार से परम्परा की पुष्टि ही की है। उनका कथन है कि प्राकरणिक और अप्राकरणिक दोना अर्थों की प्रतीति मभिधा से स्वीकार कर लेने पर किस प्रथ को प्रतीति पहले और क्सि अथ की बाद मे स्वीकार की जायगी। ऊपर ध्वयालोक का शशक्तिभव ध्वनि का उदाहरण दिया जा चुका । उसकी मोमासा मे लोचनकार ने स्वीकार किया है कि प्रकरण के कारण 'रूढ़ियोंगावलीयसी सिद्धात का उत्ल घन करके ग्रीष्म ऋतु परक यौगिक प्रथ का ही बोध होता है। प्रकरण में इतनी शक्ति है कि रूढ़ि का बल भी उसके कारण समाप्त हो गया है । उसी प्रकार 'भद्रात्मनो उदाहरण म मी प्रकरण के कारण राजा परक अथ प्रथम और हाथी परक अथ बाद मे सरलता से निश्चित हो सकता है । प्राकरणिक पथ की प्रतीति सवत्र पहले होगी और अप्राकरणिक प्रथ की याद मे । वस्तुत दपणकार की यह मापत्ति तक्-सम्मत नहीं जान पडती है । उनको दूसरी प्रापत्ति है कि द्वितीय अथ के बोघ मे अभिधा स्वीकार कर लेने पर 'प्रथभेदेन गद भेद भिन्न शद की कल्पना करनी पड़ेगी। यह भी कोई प्रापत्ति है । यदि यह आपत्ति उठानी थी तो श्लेप प्रसग में क्या नही उठाई लेप प्रसग म साहित्य-दर्पण मे उही ने द्वितीय अथ के लिये शब्द कल्पना को प्रश्रय दिया है। यहाँ उसी सिद्धान्त के उपयोग से अरुचि क्यो ? ऊपर से तो कोई कारण जान नहीं पडता है। कारण तो केवल इतना ही जान पडता है कि परम्परा का विरोध किस प्रकार किया काव्य प्रकार को वाल वोधिनी टीका में उद्धत काय प्रकाश-दपण का मत । -पृ० ६६ ध्वनि विकास जाय ? उहोने एक बात यह कही कि धर्मी की कल्पना से घम को कल्पना श्रेयस्कर है अर्थात द्वितीय अय के बोध के लिए भिन्न शब्द-कल्पना और पुन अभिधा से उसको अथ प्रतीति मानने में अधिक कठिनाई है, मप्राकरणिक प्रथ का व्यजनागम्य स्वीकार कर लेने पर सरलता है। यह भी वज्ञानिक तक नहीं है। समझ में तो ऐसा आता है कि पूर्व पक्ष मे उहाने अपनी ययाथ मायता का उल्लेख करके परम्परा पोपण के लिये उसका प्रतथ्यपूण खडन कर दिया है । प्राप्यय दीक्षित का मत- वृत्ति वार्तिक नामक अपने लघुकाय प्रथ मे अप्यय दीक्षित ने अभिघा पर विचार करते हुये अभिधामूला शाब्दी व्यजना को ममीक्षा की है। उहोने इस समोसा को हृदयगम कराने के लिये 'असावुदयमारुढ' श्लोक का उदाहरण प्रस्तुत किया है । यहा उदय, रक्त मडन और पर प्रादि द्वयथक र दो के प्रयोग के कारण दो मिन भिन्न अर्थों की प्रतीति होती है । इन दोना अर्थों में से एक चद्र सम्बधी अथ प्राकरणिक है और राजा से सम्बद्ध अथ अप्राकरणिक । प्राचीन ध्वनिवादो अभिनवगुप्त मादि यहाँ अप्राकरणिक अथ को प्रतीति व्यजना से ही स्वीकार करेंगे। परतु इसके विपरीत प्रानन्दवधन की परम्परा का समथन करते हुये आगे उहोन अपने मत का उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि यहां पर चद्रवाला प्राकरणिक अथ है और राजावाला प्रप्रावरणिक अथ । इस पथ से जिस प्रकार चद्र वाले प्रावरणिक प्रथ की प्रतीति हो रही है उसी प्रकार राजा वाले अप्राकरणिक अथ को प्रतीति भी। प्रथम अभिघा प्रकरण के कारण चद्र वाले प्राकरणिक अथ मे नियत्रित हो गई। इससे प्राकरणिक प्रथम राज कर, मडल आदि द्वययक शदो से चद्र किरण, बिम्ब प्राटि अर्थों का बाध होता है । उसी प्रकार राजापरक अप्राकरणिक प्रथम मी इही द्वयथक श दो स नपति योग्य एवं तद्ग्राह्य धन, देश आदि वाच्याथ का बोध होता है। वे जिस प्रकार प्राकरणिक अर्थो के वाचक हैं उसी प्रकार प्रप्रावरणिय अर्थों के भी वाचक प्रसिद्ध ही हैं। इसलिए जिस प्रकार चद्र परक प्राकरणिक प्रय को प्रतीति अभिधा से होती है । उसी प्रकार राजा परक प्रप्रावरणिक अय की प्रतीति भी अभिधा से हो होती है। श्लिष्ट शब्द जिस प्रकार प्रारणिक अथ के नियामक हैं उसी प्रकार वे अप्राकरणिक के भी नियामक हैं । अत जिस प्रकार दोनो अर्थों के प्रावरणिक होने पर दोनो जगह अभिधा व्यापार होता है, उसी प्रकार. एक प्रथ के प्राकरणिक और दूसरे के प्रप्राकरणिक होने पर भी अमिधा व्यापार ही होता है। अप्राकरणिक अर्थ को प्रतीति में प्राचीन पालकारिक व्यजना क्यो मानते हैं, अमावुदयमारुढ काम्तिमान् रक्तमडल । राजा हरति लो फस्य हृदय मदुभि करै । उदयाचल पर पारूढ़ लाल रग वाला कातिमान् चद्र कोमल किरणों से लोगों के हृदयो को आकृष्ट करता है । २ उनतिशील प्रजा का अनुरजन करने वाला राजा थोडा कर ग्रहण करने के कारण प्रजा के हृदय को आकृष्ट करता है । वय सुबम-'असावुदयमाद' इत्यादौ-प्राकरणिकेऽयं प्राकरणिक वद प्राकर- णिकेऽपि राजकर मडलादि शदाना परस्परावययोग्य नृपति तद्ग्राह्यधन देशा दि वाचकाना समभि याहाररुपम मभिधानियामक मस्तोत्यय द्वयस्यादि प्राकर पित्त इव प्राकरणिका प्रकारणिक रूपत्वेऽप्यु मयत्रामिधव व्यापार यथोत्त समभियाहारस्यापि शनातुर सनिधिरूपत्वेन प्रकरण वदभिया नियामक्त्वात । -वृत्तिवार्तिक, पृ०१० १ १ २ १०८ प्यनि सिसात व्यजनावृत्ति विवेचन प्रप्यय दीक्षित ने इसका उत्तर भी अपने ढग स दने का प्रयत्न दिया है । उनका तात्पय यह है कि अभिधामूला शादी व्यजना के प्रसग मे उपमा प्रादि साम्यमूलक अलकार प्रतीयमान रूप में अवश्य विद्यमान रहते हैं उही को दृढता के अभिप्राय से प्राचीन मालकारिक अप्राकरणिक अर्ण को प्रतीति में भी व्यजना-व्यापार मानने लगे हैं । वे वस्तुत व्यजना-व्यापार के अस्तित्व के कारण ऐसा नहीं करते । कहने का अभिप्राय यह है कि श्लेष को भांति अभिधामूला शाब्दी व्यजना के भी दोनो अर्थ प्राकरणिक तथा अप्राकरणिक अभिषेय होते हैं । पडितराज का मत- उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि ध्वनिकार को मा यता जिस पर लोचनकार के कारण पर्दा पड़ गया था और जिसको विश्वनाथ इत्यादि प्राचाय पूव-पक्ष मे रखते रहे थे, को मप्यय दीक्षित ने पुनरुज्जीवित फरके उत्तर-पक्ष में खड़ा कर दिया। इस मा यता को पडितराज का भी समधन हुमा। यह पहले कहा जा चुका है कि इस विषय पर मम्मट ने कोई विवाद खडा नहीं किया, विश्वनाथ ने काव्य प्रकाश दपण मे इस प्रश्न को पूर्व पक्ष में उठाया तो अवश्य परन्तु कतिपय शिथिल तकों से परम्परा का अनुमोदन र विषय को चलता पर दिया । पडितराज ने जिस प्रकार माय प्रश्नो की वारोकियो में प्रवेश किया, उसी प्रकार इस प्रश्न की वारोक्यिा को मोर भी उनका घ्यान गया। उ होने अपने रस गगाधर में इमसे सम्बधित भिन्न भिन्न मतो का संग्रह किया है । जिनको पक्षरश यहाँ उद्धृत करना प्रावश्यक नहीं है। परन्तु उहोंने अपने प्रौढ़ तकों से यह निश्चित कर दिया कि अप्राकरणिक अप भी प्राकरणिक को भांति वाच्याथ ही है। पूर्व पक्षी व्यजना वादिया के तर्कों का उत्तर देते हुये पडितराज इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नानाथक शब्दो के प्रयोग स्थलो में श्लेप की भाति दोनो अर्थों की एक साथ प्रतीति होती है। उसमे प्रकरण प्रादि कोई बाधक नही होता है। वस्तुत जिस प्रकार प्लेप अलकार में दोनो अथ एक साथ अभिधा शक्ति के द्वारा प्रतीत होते हैं उसी प्रकार व्यजना में भी। अभिप्राय यह है कि पण्डितराज के अनुसार दोना प्रथ वाच्याथ ही होते हैं और दोनो का बोध अभिधा शक्ति से हो होता है इसलिए द्वितीय अप्राकरणिक प्रथ की उपस्थिति के लिये व्यजना को स्वीकार करना अनुचित ही है।' इसके विपरीत पण्डितराज कुछ ऐसे स्थल भी स्वीकार करते हैं जहाँ पर अप्राकरणिक अथ व्यजना से ही प्रतीत होता है । उहोने ऐसे स्थलो मे जहा रूढ़ अथवा यौगिक अनेकाथक शब्दो का प्रयोग होता है प्रप्रावरणिक अथ का बोध अभिधा से स्वीकार किया है, किन्तु योग रूढ अथवा यौगिक रूढ अनेकायक शब्दो का प्रयोग होने पर प्रभाकरणिक प्रथ की प्रतीति प्रतीयमाने उपमाद्यर्थालकारे तदवश्यभाव दृढीकरणाभिप्रायेण न तु तत्रापि वस्तुत यजना यापारा स्तित्वाभिप्रायण । वही पृ० १३ २ (अ) नानायस्थलेऽपि तात्पधिप कारणताया शिथिली भव त्यामतात्पर्याय विषय शाब्द बुद्धि सपादनाय व्यक्ति स्वीकारोऽनुचित एव शक्तियव बोधद्वयोपपत्ते । -रस गगाधर पृ० १४१ इलेप और ध्यजना १०६ मे व्यजना व्यापार ही स्वीकार किया है।' इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए उहोने यह उदाहरण दिया है- प्रवलानां श्रिय हुत्वा वारियाहै सहानिशम् । तिष्ठा त घपला पत्र स काल समुपस्थित ॥ प्राकरणिक अर्थ यह वह समय ( वर्षाकाल ) मा गया है जब प्रवलामा की शोभा को हरण करके बिजली मेघो के साथ रात दिन रहा करती हैं। अप्राकरणिक प्रथ-यह वह समय मा गया है जब चपल स्त्रिया (पुश्चली) कमजोरो की लक्ष्मी का हरण करके रात दिन पानी ढोने वालो के साथ रहा करती हैं। इस पद्य के प्राकरणिक अथ मे अबला स्त्री के प्रथ मे योगरूढ़ है पारिवाह मेघ के अर्थ मे योगिक रूढ तथा चपला बिजली के अर्थ म रूढ है । इस मण में प्राय शदो की रूढि-शक्ति ही काय करती है । दूसरे अर्थ को प्रतीति मे न तो अवयव यौगिक शक्ति ही काम करती है और न रूढि नान ही। यहां दोनों का साकय रहता है । इसलिय ऐसे स्थलों मे व्यजना व्यापार के बिना काम नहीं चल सकता है । इसके लिये वे एक संग्रह श्लोक प्रमाण देते हैं, योग रूढ धरो की योग शक्ति जहां रूढ शक्ति के द्वारा नियत्रित हो जाय वहाँ योग वाले अर्थ की बुद्धि व्यजना उत्पन्न करती है। नयनयायिक भी प्रभिधामूला ताब्दी व्यजना के अप्राकरणिक अर्थ को प्रतीति अभिवा से ही स्वीकार करते हैं । निष्कप- श्लेप और शद-शक्ति मूल ध्वनि मे अनेकार्थक शब्दा का प्रयोग होता हैं । इन शब्दो से भिन्न भिन्न अर्थों का सकेत-गृह है । यह सकेत ग्रह कहीं रूढ कहीं यौगिक और कही योगस्ढ अथवा यौगिक रूढ होता है। अतएव श्रवण करने के प्रथम क्षण में इन शब्दो के प्रमुख पर्थ बुद्धिगोचर होते हैं । दूमर क्षण में कौन सा सकेतित अर्थ प्रकरण प्राप्त है और कौन-सा अर्थ नही, यह शका उत्पन्न होती है । भतृहरि की कारिका में 'अनवच्छेदे से इसो शका का उल्लेख है । सृतीय क्षण में प्रकरण ज्ञान होता है । इमो समय यह भी बोध हो जाता है कि प्रकरण में एक प्रथ की माकाक्षा है अथवा एक से अधिक की । श्लेष अलकार म एक से मधिक पर्थ की प्रकरणगत भाकाक्षा होती है, इसलिए वहां सभी प्रों को प्रावरणिक माना जाता है । प्रथम क्षण मे बुद्धिगोचर होने वाले मयों में से कम से कम दो अर्थ-श्लेप में कम से कम दो अर्थ अवश्य प्राकरणिक होगे, दो से अधिक मर्थ हो सकते हैं जस थीहप प्रणीत नैषधीय-चरित के पचनली प्रसग मे प्रकरणगत प्राकाक्षा की पूर्ति करेंगे । इस समय पाठक को बुद्धि एक यवस्था और करेगी । वह यह भी १ एवमपि योगरूढिस्थने रूढिजानेन योगापहरणस्य राक्लत प्रसिद्धया रूढयन धिकरणस्य योगालिंगितस्यायतरस्य व्यक्ति विना प्रतातिदु सपादा। -रस गगाधर पृ० १४४ २ योगरूढस्य शतस्य योगेरूढया नियत्रिते। घिय योग स्पृशोऽर्थस्य या सूते व्यज्जनव सा ॥ -रस गगाधर, पृ० १४७ ३. ध्वनि सम्प्रदाय और उसके सिद्धान्त, पृ० ३२६ I M ११०: यनि सिदात घ्यजनावृत्ति विवेचन निणय करेगी कि किस प्रकरण में कौन सा अर्थ नियत्रए हो । इम नियन्त्रण काय करते समय शब्द, उसका सकेतित भर्थ तथा नियामक प्रकरण तीनो तत्व बुद्धिगोचर रहेंगे । यही प्राचीनो का पर्यभे देन शब्द भेद वाला नियम है । यह पाय दो भिन्न भिन्न क्षणो का है। एक क्षण म एक प्रारणिक अर्थ का नियमन मोर दूसरे क्षण म दूसरे प्राकरणिक पथ का नियमन । यही प्राचीनो का श्लेप में दो अभिधा व्यापारों वाला सिद्धात है । कहने का अभिप्राय यह है कि इलेप में सभी प्राकरणिक पर्थ राच्यार्य ही होते हैं। इस प्रकार राद शक्ति मूल ध्वनि म एक हो अर्थ की प्रकरणगत पाकाक्षा होती है। श्रवण के तृतीय क्षण म प्रयुक्त भनेकार्थक शब्द का कौन सा अर्थ प्रकरणोपयुक्त है इसका निश्चय होता है । इस निश्चय के क्षण म मप्रावरणिक प्रथ स्मति गोचर रहते हैं जो प्राकरणिक अथवा निश्चय होते ही स्मतिवल रो पुन युद्धिगोचर हो जाते हैं । शद शक्तिमूल ध्वनि में प्राय दो ही अथ वाले प्रसग उपस्थित होते हैं जिनम से एक अर्थ का प्रावरणिक अथ में नियमन होते ही प्रत्य अथ अपने वाचक शब्द के साथ बुद्धि गोचर हो जाता है और इस प्रय का निश्चय भी श्लेश वाले अर्थों की भाति द्वितीया अभिधा से हो होता है । श्लप म दोनो अर्थ तुल्य प्रधान पोर तुल्य रमणीय होते हैं और दोनो म कवि को विवक्षा होती है लेकिन इसमें कवि की विवक्षा प्राकरणिक से अधिक मलकाराश म होती है और वह माम्ययूलक उपमादि अलकार ही कवि का विवक्षित पर्ण होने से मुख्य रहता है । श्लेप म दो वस्तु वाच्य होती है और यहाँ प्रतीयमान शब्द शक्तिमूल ध्वनि मे अलकार होता है । फ्लत शब्दशक्तिमूल ध्वनि का अलवार श्लेप की वस्तु की अपेक्षा अधिक रमणीय पौर घमत्कार युक्त होता है । यद्यपि इसके दोना अर्थ प्रथम नितात भिन्न जान पडते हैं । परतु स्पणा होते ही सम्बद्ध और चमत्कार युक्त प्रतीत होने लगते हैं । यही कारण था कि मानद वर्धन, अप्ययदीक्षित और पडितराज ने दोनों अर्थों को प्रतीति अभिधा से ही मानी है । इस मा यता के पक्ष में एक प्रमाण यह भी है कि ध्वनि पूर्ववर्ती प्राचार्यों ने ऐसे स्थलो मे जहा ध्वयुत्तरवर्ती प्राचार्यों ने शब्दशक्तिमूल ध्वनि स्वीकार की है श्लेप अलकार ही माना है।' नाद शक्ति मूल ध्वनि और श्लेप का अन्तर- शदशक्ति मूल ध्वनि और श्लेप में समानता होते हुये भी अतर है। दोनो में समानता के निम्नलिखित तत्व हैं १ दोनो मे दो दो प्रयों की प्रतिभा दोती है २ होनो ही स्थितियों मे दोनो हो अर्थ एक दूसरे से नितात भिन्न होते हैं और ३ दोनो ही प्रयों का बोध भी मभिधा शक्तियों से होता है। दोनो के अतर के निम्नलिखित तत्व हैं १ श्लेष मे दोनो अर्थ प्राकरणिक होते हैं परन्तु ध्वनि में एक अर्थ प्रापरणिक होता है और दूसरा अर्थ अप्राकरणिक होता है, २ श्लेप मे दोनो अर्थ तुल्य प्रधान और प्राय तुल्य रमणीय होते हैं, परतु इमम प्रप्रावरणिक अर्थ मुस्य और अपेक्षाकृत अधिक रमणीय होना है और ३ श्लेप के साथ यदि कोई अलकार है तो वह वाच्य ही होगा जबकि ध्वनि में अलकार सवम अनिवायत रहेगा और वह भी व्यग्य अथवा माक्षिप्त होगा। १ माघ के ४१६ की टीका में बल्लभदेव ने इलेप स्वीकार क्यिा है और मल्लिनाथ ने अभिघामूला शादी व्यजना। --शिशुपाल वध, पृ० १४६ शब्द शक्तयुस्य वस्तु ध्वनि १११ ध्वनिकार और शब्द शक्तयुत्य ध्वनि- ध्वनिकार न विवक्षिताय पर वाच्य सलक्ष्य-बम ध्वनि के दो भेद स्वीकार किये हैं एक शदशक्तिमूल और दूसरा अर्थशक्तिमूल । इनमे शब्दशक्तिमूलध्वनि का लक्षण उहोंने इन शदों मे किया है 'जिसमे शाद के द्वारा न कहा हुआ रितु शद-शक्ति के द्वारा माक्षिप्त हो किया हुआ अलकार प्रकाशित होता है, वह शब्द-शक्तिमूल ध्वनि मानी जाती है।" इसी तथ्य को बृत्ति के गद्य भाग में पुन इस प्रकार स्पष्ट किया गया है, जिसमे 'अलकार ही, वस्तुमात्र नही, जिस काव्य मे शब्द-शक्ति से प्रकाशित होता है वह शब्द शक्तिमूल ध्वनि होती है । ध्वनिकार इसे दृढ करने क लिये कहते हैं कि यह हमारी धारणा है ।२ सम्भव है मौखिक विवादो मे इसका प्रतिवाद रखने के कारण ध्वनिकार को इस प्रकार जोर देकर चलना पडा हो । इसका अभिप्राय यह है कि ध्वनिकार और वृत्तिवार यदि भिन्न भिन माने जाये तो दोना ही श द मूल ध्वनि में वस्तु ध्वनि मानने के पक्ष में नहीं हैं। इस मा यता के पक्ष मे दूसरा प्रमाण यह है कि उहोंने शब्द-शक्ति मूल ध्वनि की वस्तु ध्वनि का उदाहरण भी नही दिया है । अभिनवगुप्त और शव शक्त युत्य वस्तु प्यनि- लोचनकार ने ध्वनिकार की उपयुक्त मा यता को बिना किसी ननुनच के स्वीकार कर लिया है । उहोने इसी प्रसग में अप्राकरणिक अथ की प्रतीति के सम्बध मे कई मता का संग्रह किया है परतु वस्तुध्वनि के सम्बघ म कोई प्रश्न नही उठाया है। इसका तात्पय यही है कि प्राचार्य अभिनवगुप्त भी शब्द शक्तिमूल ध्वनि म वस्तु ध्वनि मानने के पक्ष मे नही है । यदि उनको वस्तु ध्वनि प्रभीष्ट होती तो इस प्रसग को वे अवश्य उठाते । इसका प्राशय यह है कि मान दवधन तथा अभिनवगुप्त क्वल अलकार ध्वनि को ही शब्दशक्तयुद्भवो ध्वनि मानते है । वस्तु ध्वनि को नहीं। वे दोनो शब्द शक्तिमूलक ध्वनि का केवल एक ही भद अलकार ध्वनि स्वीकार करते हैं। मम्मट पोर शब्दशक्तयुत्य वस्तु ध्वनि- ध्वनिवादी प्राचार्यों में अभिनवगुप्त के पश्चात मम्मट का स्थान है। मायता के अनुरोध से तो उनका सव प्रथम स्थान है। अधिकतर स्थानो में उहाने लोचनकार का अनुगमन किया है, परन्तु शब्दशक्तयुत्य वस्तु ध्वनि के प्रसग मे वे लोचनकार की मायता का अनुगमन नहीं करते । उहाने पदशक्ति मूल ध्वनि का लक्षण और भेद करते हुए लिखा है, "जहा पर शब्द से। अथवा वस्तु को व्यजना होती है और उसकी प्रधानता भी होती है, वहां पर शब्दशक्त युद्भव अलकार पाक्षिप्त एवालकार शब्द शत्या प्रकाशिते । यस्मिननुक्त शदे न शब्द शक्त युद्भवो हि स । । -~वयालोक, २-२१ यस्मादलकारो न वस्तु मात्र यस्मिन् काव्ये शब्द शक्त या प्रकाशते स । शद-शतयुद्भवा ध्वनिरिव्यस्माक विवक्षितम् ॥ -वयालोक, २-२१ की वृत्ति ।। २ ध्वनि सिद्धान्त व्यजनावृत्ति विवेचन मानी जाती है। वह दो प्रकार की होती हैं-१ अलकार ध्वनि भौर २ वस्तुध्वनि ।' उहोने वस्तु ध्वनि का निम्नलिखित उदाहरण दिया है- पयिफ ! पहाड़ी ग्राम में प्रस्तर को नहि नाउ । उठे पयोधर देखि चाहो तो वसि जाउ ।' साहित्य दपणकार न इस विषय मे कास्य प्रकाशकार पा प्रधानुसरण किया है । उनको शद शक्ति मूल वस्तु ध्वनि विषयक मा यता भी यही है और उहोने उदाहरण भी यही दिया है । फलत इस पर विचार करने से दोना भाचार्यों की मारतानो का एक साथ विचार हो जायगा। उपयुक्त उदाहरण मे किसी उनत पयोधरा, स्वरिणी युवती को पथिक के प्रति उक्ति है । उसका अभिप्राय है कि यदि तुम उपभोग-क्षम हो तो यहाँ पर रात्रि निवास परो। इस प्रसग मे इस व्यग्य के दो तत्व प्रधान नियामक है--१ वत्त वशिष्टय मौर२ शिलष्ट शब्द। यहा पर यह पुन कह देना मावश्यक है कि प्रार्थी यजना म प्रकरण वक्तादि विशिष्टता की विशेष मावश्यक्ता होती है । शादी व्यजना म उसका सवथा भनुपयोग अवश्य नहीं होता है पर तु उसम प्रकरण की वंसी नियामकता नही हाती जसी प्रार्थी में होती है । ध्वयालोक में प्रदत्त उदाहरण 'दतान दा प्रजाना में प्रकरण का विशेष महत्व नहीं है । इसे किसी सूय भक्त की उक्ति मानने पर भी जो अर्थ होगा किसी साधारण यक्ति की उक्ति मानने पर भी वहीं अर्थ होगा, अर्थ में अधिक अन्तर नही पायेगा। यही कारण था कि काव्य प्रकाशकार ने पाब्दी व्यजना के प्रसग में प्रकरण की नियामकता का उल्लेख ही नहीं किया है। प्रकरण की नियामकता का उल्लेख केवल प्रार्थी के ही प्रसग में किया गया है। परतु इस पद्य का व्यग्य वक्तादि की विशिष्टता के कारण ही निकलता जान पड़ता है। उनत पयोधरा स्वरिणी युवती के स्थान पर इसी बात को पथिक से कहने वाली कोई शिथिल पयोधरा शिथिल शरीरा बद्धा मान ली जाय तो उही श्लिष्ट शदो के रहने पर भी यह व्यग्य कदापि न निकलेगा। अपितु उसमे श्लप का चमत्कार भी दरिंद्र के मनोरथ को भाति उठकर विलीन हो जायगा । इससे यह निर्विवाद स्वीकार किया जा सकता है कि यहां पर व्यग्य का एक मात्र नियामक वक्तादिवशिष्टय युक्त प्रकरण ही है । श्लिष्ट गब्द नहीं है । जबकि शदशक्तिमूल वस्तु ध्वनि में श द फेवल पर ही दूसरे अर्थ की यनना होनी चाहिए । फलत इस उदाहरण को शुद्ध श दशकायुद्भव ध्वनि का उदाहरण न मानकर उभयशक्ति मूलक ध्वनि का उदाहरण माना जाना चाहिए । कदाचित इसी आधार पर रुय्यक ने काव्य प्रकाश की सक्त नामक टीका में काव्य प्रकाश की मा यता का खण्डन किया है 13 रय्यक के मत में काव्य प्रकाश के द्वितीय उदाहरण में वस्तु ध्वनि मानी जा सकती है । काय प्रकाश का दूसरा उदाहरण यह है- १ अलकारोऽथ वस्त्वेव शब्दाद्यभ्रावभासते । प्रधानत्वेन सनेय शब्दशक्तयुभवो द्विधा ।। ---का०प्र०,४-५३ काव्य प्रकाश, ४-५८ ध्वयालोक-तारावती टोका, पृ०५२२ २ ३ शव शक्त्युत्य वस्तु ध्यनि ११३ पत्र स शनिरशनिश्च तमुच्चनिहति कुप्यसि मरेद्र यस्मै त्वम् । प्रसीदसि पुन भात्युवारोऽनुदारश्च ॥" इस पद्य के 'भात्युदारोनुदारश्च' में 'बाल बोधिनीकार' और काव्यप्रकाश की हिदो प्रभा के टीकाकारों ने विरोध ध्वनि स्वीकार की है । इसलिये इस पक्ति को विवादस्पद मानकर छोड दिया जाता है । इस पर विचार नहीं किया जाता है । पद्य के 'शनिरशनि' में काव्य प्रकाशकार ने भी वस्तुध्वनि स्वीकार की है, 'विरोधी भी तेरे अनुगामी होकर एक कार्य करते हैं।' इसके 'नज्ञ' मथ में बाल बोधिनीकार ने विरोधध्वनि स्वीकार की है । २ वस्तुत यहा भी विरोध मे ही अधिक चमत्वार है । ध्वयालोक को टोका तारावती के टीकाकार ने लिखा है, 'उपभेद कल्पना में इस बात पर ध्यान रखना होगा कि पाठको के लिए चमत्कार विधान क्सि तत्व पर प्राधारित है । यदि चमत्कार विधान साम्य पर निभर है तो वह अलकार ध्वनि कही जावेगी, यदि उसका आधार द्ववक शदा का प्रयोग है तो वह श्लेष मलकार कहा जावेगा और यदि उसका प्राधार शब्द केवल पर निकलने वाला दूसरा अर्थ है तो वह वस्तुध्वनि कहलावेगी।' इसी सिद्धात को कसौटी मानकर शनि और अनि एक घम सम्बध मानने से तुल्ययोगिता मे और व्यग्य विरोध में, उपयुक्त वस्तुध्वनि को अपेक्षा अधिक चमत्कार है। इसलिए यह भी वस्तुध्वनि का उपयुक्त उदाहरण प्रतीत नहीं होता है । इसलिये मम्मट और विश्वनाथ की श दशक्त्युत्प वस्तुध्वनि विषयक माय- तामों का निराकरण हो गया। पडितराज मोर शरद शक्त्युत्प वस्तुप्यनि-- रसगगाधर के प्रणेता पडितराज जग नाथ ने शव शक्तिमूलक' वस्तुवनि को स्वीकार तो किया है, लेकिन बडे तक वितक के पश्चात । ससेप मे उनके क्थन पर भी विचार कर लिया जाय । पहितराज ने प्राय पान दवघन और अभिनवगुप्त का सोपपत्तिक अनुकरण किया है। यहां भी उहोंने अपनी दाशनिक सूक्ष्मदृष्टि से मार्ग प्रशस्त अवश्य किया है, परतु न जाने यहाँ उनका अनुकरण क्या न कर सके ? पडितराज ने श दशक्तिमूलक वस्तुघ्वनि का उदाहरण यह दिया है, 'कोई कामवागता स्वरिणी युवती विमी पथिक को देखकर अपनी अन्तरग सखो से कह रही है-'राजा के मेरे प्रतिकूल होने के कारण मेरे लिये बहुत बडा भय उपस्थित हो गया है, हे वाले ! पथिक को वास देने की व्यवस्था से उस भय का निराकरण करो। यहाँ पर राजा पाद के दो मर्म हैं, भूपति और पद्रमा । युवती प्रक्ट रूप में नपतिपरक बात कहती है किन्तु चद्रपरक प्रय कर लेने पर कामोद्दीपन की ध्यजना के साथ प्रतीत होता है कि नायिका पपिक के साथ सहवास की प्राक्षिा व्यक्त कर रही है । इम को मीमासा करते हुए पडितराज ने लिखा है, 'यहाँ न तो राजा मोर पदम उपमानोपमय भाव की कल्पना की जा सकती है और न इनकी अभेदता मानकर रूपक ही माना जा सकता है । कारण यह है कि उपमा प्रयवा रूपक वहीं होते हैं जहाँ उपमेय मोर उपमान दोनो एक साथ उल्लसित हो । यहाँ पर नूपपरक पर्ण का ग्रहण मुख्य मर्म को छिपाने लिये हुअा है । इसलिये उपमा भौर रूपर दोना अलार दि मौर यक्ता को विवक्षा का विषय नहीं हो मक्ते । दोना भर्य ममम्बद्ध भी नहीं हो सकते क्याकि दोनों १ २ २ मा० प्रवास, ४५६ 'नमो भिन्नार्थत्व' एव विरोध इत्यपि योध्यम् ।' रस गंगाधर ।

११४ ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन समकक्ष नहीं है एव दोनों का असम्बद्ध रूप में प्रतिपादन हो कवि को मभीप्ट है । इस प्रतिपादन से हो राजा-परक अर्थ प्रथम क्षरण मे उल्लसित होगा मौर चद्र परक मर्थ द्वितीय क्षण म। दोनो मे पाच्छाद्य पाच्छादक भाव रहेगा। इसलिये यहाँ पर शब्द शक्तिमूलर वस्तुवनि ही मानी जायगी।' कायप्रकाश को उन्नत पयोधरा, स्वरिणी युवती भी अपने मताय को छिपाना चाहती है । सम्भव है पडितराज को पाच्छाद्य गाच्यादक भाव को कल्पना करने में काय प्रकाश के इस प्रकरण से प्रेरणा मिली हो । पडितराज के उदाहरण का प्रकरण भी ठीक वैसा ही है जसा काव्य प्रकाश का । यहाँ भी वक्ता और श्रोता दोना एक से ही हैं। जिस प्रकार काय प्रकार के वक्ता को बदल देने से उमकी वस्तुध्वनि समाप्त हो जाती है उसी प्रकार रस गगाधर पे उदाहरण में भी वक्ता को बदल देन से वस्तुध्वनि समाप्त हो जायगी। रस गगाधर के उदाहरण के प्रकरण में एक बात और भी है जो काय प्रकाश के उदाहरण में नही है, वहां युवती स्वय पथिक से कहती है, यहाँ पर वह अपनी अतरग सखो से । सखी (तो वस्तुत उसके अभिप्राय को समझती है।) तब उसको उससे बात छिपाने की आवश्यक्ता क्या पडो है ? इसका अर्थ है कि यह वात भय सन्निधि मे कही जा रही है । इस प्रकार प्रकरण को दोहरा बल मिल गया। कहने का तातय यह है कि पडितराज के उदाहरण म भो शब्द केवल पर-अथ को अभिव्यक्ति नहीं होती है, प्रत्युत प्रकरण के कारण होती है । इसलिये काय प्रकाश के उदाहरण की भाति यहाँ भी शुद्ध पाब्द शक्तिमूलक वस्तुध्वनि नही मानी जा सकती है । अध्यय दीक्षित और शन्द शक्त युत्य वस्तुध्यनि- यह तो पहिले बताया जा चुका है कि प्रत्यय दीक्षित अभिधामूला शाब्दी यजना के अप्रा करणिक अथ की प्रतीति अभिधा से मानते हैं । वे शब्दशक्त्युत्य वस्तुध्वनि के मानन के पक्ष मे भी नही जान पड़ते हैं । वस्तुत उही का मत ध्वनिवार और लोचनकार की परम्परा म है। निष्कप-डाक्टर रामसागर त्रिपाठी ने इस सम्बध मे स्वमत को स्थापना करने के अवसर पर पडितराज के मत को ही प्राय अपन शब्दो मे दुहराया है परतु उहाने उसका उदाहरण न देकर केवल यह कहा है कि 'ऐसे स्थान देखे जाते हैं जहाँ श द के बल पर दूसरा अर्थ निकलता है, और वक्ता का उस अर्थ को छिपार किमी अपन अतरग मित्र पर प्रकट करना ही अभीष्ट हाता है । ऐसे स्थान पर वस्तुत चमत्कार मे मूलकारण वह छिपाकर कहा हुमा अर्थ ही होता है । वहाँ एक तो सादृश्य की ओर पाटक का ध्यान ही नही जाता और यदि जाता भी है तो वह इतना उपेक्षणीय होता है कि उसके प्राधार पर ही पाठक के चमत्कार का पयवसान नहीं हो सकता। श्लिष्ट शब्दो से श्लेष की ओर यद्यपि पाठको का ध्यान जाता है तथापि उसम ही सौदय की विधान्ति नहीं हो जाती । सौदय की विश्राति तब होती है जब पाठक उस छिपाकर कहे हुये अर्थ का परिशीलन करता है। यह क्षेत्र शादशक्ति मूलक-वस्तु ध्वनि का हो है प्रत उसका अपलाप नहीं हो सकता । २ यहाँ पडितराज का ही मत दूसरे श दा म रखा गया है इसलिये जो कुछ तारावती के आधार पर, पृ० ५२३ ध्व० ला० तारावती टोका, पृ० ५२४ २ ध्वनि मेव । ११५ वहाँ उस मत के निराकरण में कहा गया है वह यहां भी कहा जा सकता है। दूसरे विद्वान लेखक ने ऐसे स्थानो' की बात तो कही है। जहा शब्द शक्ति मूलक वस्तु ध्वनि का अपलाप नहीं हो सकता, परतु कोई उदाहरण नहीं दिया है । इसलिए उनका क्थन केवल कल्पना पर प्राधृत है क्सिी उदाहरण पर नही । तीमरे अन्तरग मित्र से छिपाकर कही जाने वाली बात सदा म य सन्निधि मे ही होगी एकात मे नही, पलत उस मर्थ का नियामक प्रकरण ही रहेगा। वस्तुत वह अर्ण शक्ति मूल वस्तुध्वनि का प्रसग माना जाय ।। । चौथे उसमे चमत्कार भी नही होगा। चमत्कार की दृष्टि से तो वस्तुध्वनि तृतीय कोटि की ध्वनि है। इसम स्वत ही उतना चमत्कार नहीं होता जितना अलकार ध्वनि और रस ध्वनिया मे होता है । वह चमत्कार अर्थ शक्ति मूलक वस्तुध्वनि में थोडा बहुत होता भी है । शब्द शक्तिमूलक चमत्कार श्लेष के चमत्कार के अतिरिक्त दूसरा चमत्कार ही नहा होगा । जितना चमत्कार प्रतीत होगा वह प्रकरण का चमत्कार होगा जैसा काय प्रकाश और रस गगाधर के उदाहरणा मे है । यदि चमत्कार होता तो ध्वनिकार, लोचनकार दोना की सूम दृष्टि से न बच पाता । फलत इस वस्तुध्वनि मे चमत्कार श्लेप के अतिरिक्त दूसरा नहीं होता । दूसरे पर्थ की प्रतीति जब अभिघा से होती है उस समय वस्तुध्वनि श्लेप का ही पर्याय होगी। प्रत शब्द शक्ति मूनक वस्तुघ्वनि स्वीकार नही की जा सकती। इम उल्लख का अमिप्राय यह है कि सलक्ष्य प्रम-व्यग्य मे श द शक्ति मूल ध्वनि के केवल दो ही भेद ध्वनिकार को मा य हैं-१ पदगत शक्ति मूलक मलकार ध्वनि और २ वाक्यगत शब्द शक्ति मूलक प्रलकार ध्वनि । रा शक्ति मूल ध्वनि के अतिरिक्त सलक्ष्यन म व्यग्य का दूसरा भेद अर्थ शक्ति मूल ध्वनि है। ध्वनिकार ने प्रथशक्ति मूलध्वनि के दो भेद माने हैं-१ स्वत सभवी वस्तुध्वनि, २ कवि प्रोटोक्तिमात्र निप्प न शरीर वस्तुध्वनि ।' यहाँ पर उहोने प्रथ को कारिका मे अर्थो पिऽद्विविधो नयो 'पद समूह का प्रयोग किया है। इसको स्पष्ट करते हुए उहोने वृत्ति में भी लिखा है, कवि प्रोगेवित सिद्ध अथवा कविनिबद्ध प्रोढोक्ति सिद्ध वस्तु ध्वनि एक भेद और स्वत सम्भवी दूसरा भेद । परतु मागे चलकर पवि निबद्ध वा प्रोडोक्ति मिद्ध वस्तु ध्वनि का उदाहरण भी दिया है फ्लत लोचनकार ने मर्य-शक्ति मूल ध्वनि के तीन भेद मान लिये हैं । उ हाने 'प्रौढोक्ति' को दो भागों में विभक्त कर दिया है १ कवि प्रौढोक्ति और २ पवि निबद्ध वक्त प्रौढोक्ति । इम का अनुकरण मम्मट एव विश्वनाथ ने किया है, पर पडितराज ने 'प्रौढोक्ति' को दो भागो मे विभक्ति करने वाली मायता का खडन परके पुन ध्वनिकार को मा यता का समर्थन किया है। हेमघद्र एव माणिक्य चन्द्र ने भी पवि निबद्ध व प्रौढोक्त शक्ति को कवि प्रौढोक्ति में ही स्थान दिया है। वस्तुत प्रौढोक्ति को दो भागो में विभक्त करना समाचीन नहीं है । ध्वनिकार ने ध्वनि के भेदोपभेदा की गणना करके किसी निश्चयात्मक सह्या का उल्लेख नहीं किया है । लोचनकार ने ध्वनि के शुद्ध भेद तोम, मम्मट पौर विश्वनाप ने प्रमश ५१ ५१ पौर पडितराज ने २६ स्वीकार किये हैं। लोचन में मर्ष गस्ति मूल ध्वनि के प्रवध को व्यजक्ता की दृष्टि से भेद नहीं पिये हैं। नयालोज, २२२५ २ तारावतो, पृ० ११६ । ध्वनि सिद्धात और ध्यजनावृत्ति । विवेचन मम्मट ने मय शक्ति मूल ध्वनि में भी प्रबध की व्यजकता मानी है। इस प्रबय की मा यता के मनुसार ध्वनि के ३७ भेद हुये। रीतिकालीन प्राचार्यों ने अधिकतर मम्मट का ही अनुकरण किया है । उन भेदोपभेदो का विशेष उल्लेख आगे होगा। ध्वनि में व्यग्या प्रधान एवं प्रतिराय चमत्कार युक्त होता है । यदि वह भप्रधान अथवा वाच्य की अपेक्षा कम चमत्कार युक्त होता है तो काव्य को गुणीभूत-व्यग्य की सजा दी जाती है। व्यग्य मर्थ की स्थिति की दृष्टि से ध्वयालोक प्रादि प्राथो में इस पर भी विचार हुआ है।

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kelfh flable, le fez
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३ व्यञ्जना वृत्ति गत अध्याय में ध्वनि का सद्धान्तिक निरूपण करने का यल हुआ है । 'ध्वनि' शब्द के व्युत्पत्तिपरक पांच अथ होते हैं। उनमे एक अर्थ-ध्वयते अनया इति, व्यञ्जनावृत्तिपरक होता है । ध्वनि की स्थापना के पूर्व काव्यक्षेत्र में लक्षणावृत्ति प्रवेश कर चुकी थी। वनाक्ति के लक्षण म वामन ने उसका उल्लेख किया है।' उद्भट के का यालङ्कार-सार संग्रह के पर्यायोक्त मलकार के लक्षण मे चौथो वृत्ति और उसके प्रवगमन नाम का भी उल्लेख है। इसीलिये पान दवधन ने वयालोक के प्रथम उद्योत के अन्त मे भक्ति और व्यजना म अतर स्पष्ट किया है। भक्ति, गुण वृत्ति मादि लक्षणावृत्ति के ही नाम हैं । ध्व यालोककार ने लक्षणावृत्ति से ध्वनि का जहां पर भेद स्पष्ट किया है वहाँ पर उहनि ध्वनि से व्यजनावृत्ति को ही स्वीकारा है, परन्तु उहोने व्यजनावृत्ति का नामोल्लेख कही पर नहीं किया है और न उसका विवेचन ही किया है। उसका वृत्ति रूप से भिन्न विवेचन सवप्रथम काव्यप्रकाश में उपल ध है । कि तु व्यजना का वृत्तिपरक लक्षण होने भी नहीं किया है। व्यजना का वृत्तिपरक सरल एव सुदर लक्षण, सबसे पहले साहित्य दर्पणकार विश्वनाथ ने अपने प्रय में किया है । वह इस प्रकार है, 'जब अभिघा और लक्षणा वृत्तियां विरत हो जाती हैं तो व्यजना वृत्ति द्वारा मय अथ को प्रतीति होती है । रीतिकालीन माचार्यों मे सभाप्रकाश के रचयिता माचाय हरिचरणदास ने इसका लक्षण निम्न प्रकार से किया है। वृत्ति न्यजना व्यग्य जो व्यक्त करन को भोग । जहाँ म अभिया लछना तात्पर्या न समर्थ । सध्द मप से व्यजना रव सु पोरे प्रपं ।' 'जो वृत्ति “यग्याथ को व्यक्त करने में समर्थ है वही वृत्ति व्यजना है। जहां अभिघा, लक्षणा भौर तात्पर्या किसी मय को व्यक्त करने म असमय हो जाती हैं तो शब्द मोर अथ को सहायता से जो वृत्ति माय मर्थ की प्रतीति कराती है उसे व्यजना कहते हैं । इस लक्षण के पूर्वार्द्ध में थोडी सी शिथिलता हैं किन्तु उसका दूसरा भाग समुचित मोर वज्ञानिक है । स्पष्ट है कि यह लक्षण साहित्य दर्पण के प्रापार पर किया गया है किन्तु उसम सभी शब्दृत्तियो के नामो का समावेश नहीं है। माचाय विश्वनाथ ने 'भभिषा प्रादि' पद का प्रयोग किया है किन्तु हिन्दो के लक्षण में शब्द की तीना शक्तियो भभिषा, लक्षणा, तात्पर्या का नाभत उल्लेख है। ध्यान रहे कि 'ध्वनि १ सादृश्याल्लसरपणा वमोक्ति का सू० वृ०४३८ २ विरतास्वमिषाधासु यथार्थों बोध्यते पर । सावृत्तिव्यञ्जना नाम शब्दस्यार्थादिस्य च। सा०६०२१३ समाप्रकाच२१७१८ ३ १२२ ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन वियोग मे कथित पदाथ उसका लक्षण होता है। यहां यह भी जान लेना आवश्यक है कि जिन पदो का प्रयोग सयोग मे किया जाता है उही का प्रयोग वियोग की स्थिति में होता है। इस सम्बन्ध के तथ्य का उल्लेख मम्मट और विशनाथ ने भी नहीं किया है और रीतिकालीन प्राचार्यों मे से भी हरिचरणदास के प्रतिरिक्त किसी ने नहीं किया है। उहाने अपन इस मत य को इस प्रकार रखा है मनेकाथ है शब्द इरु लछन लछ खाइ। यो हो प्रथ वियोग करि सो सयोग ठहराय ॥ जो जानने योग्य है वह लक्ष्य है और जिससे जाना जाता है उसे लक्षण माात है। यथा गदापद्म सहित विष्णु अथवा गदा पद्म बिना विष्णु पद समूहो म विष्णु श द अनेकाथवाची है । इसके प्रथ विष्णु, चन्द्रमा और कपूर आदि है। इन अर्थो म से गदापद्म विष्णु के ही लक्षण हैं फ्लत विष्णु का प्रथ चद्रमा और कपूर आदि नहीं होगा, पर तु विष्णु ही होगा। सयोग से- हरि सोभिन हैं चक्र सौ शिव कर लस त्रिशूल । पुष्कर सोभित घद्र सौं बन पलास के हरि के विष्णु सूय मादि अनेक अथ होते हैं परन्तु विष्णु लक्ष्य है और चन लक्षण है इसलिये हरि का प्रथ विष्णु, इसी प्रकार त्रिशूल लक्षण के कारण शिव का अथ महादेव, चन्द्र लपण से पुष्कर का अथ माका, तालाब नही और फूल लक्षण से बन का अर्थ बाग, जल नहीं । दूसरा उदाहरण भी सुदर है । वह यह है घन की सौभा कज है सर की सोभा नीर । अम्बर सोभा जोह है घर को सोभा चीर ।। कज लक्षण से बन का प्रथ जल, नीर लक्षण से सर का मथ तालाव बाण प्रादि नही, जोह चादनी लक्षण से अम्बर का अथ प्राकाग, वस्त्र आदि नही और चीर लक्षण से धरका प्रथ शरीर, पृथ्वी नहीं। हमारी समझ में इस दोहे म कज, नीर और जोत्स्मा तो क्रमश बन सर और अम्बर के लक्षण हैं परतु चीर धर शरीर का लक्षण नहीं है। वियोग से- नाग न सोहत मद बिना राग कहा बिन तान ! बाग न सोहत प्रथ दिन मुख न लस बिनु पान ।। मद लक्षण के वियोग स नाग का प्रथ हाथी सप नहीं तान लक्षण के वियाग से राग का अर्थ गान प्रोति नहीं, अथ लक्षण के वियोग से बाग का अथ वाणी वाटिका नहीं है। यहा पर भी पान और प्रानन में लथण लक्ष्य सम्बध नहा है। जहा प्रयुक्त अनेकार्थक शब्द के साथ ऐसे शद का प्रयोग हो जो भनेकाथवाची के समान प्रधान भी हो पर I उसका लक्षण न हो और यह दूसरा पद स्वय अनेकार्थक हो तो यहाँ साहचय के कारण अनेकायक श द का अमिधेय निश्चित होता है। साहचय से- जीत तहां सपति तहाँ धम को जोर। भरि करि सक न शता हरि अरजुन जिहि मोर ॥

ध्यजना वृत्ति १२३ अजुन हरि के समान ही प्रधान है। दोनो हो शद अनेकायक हैं। दोनो मे लक्षण क्ष्य सम्बध भी नहीं है। अजुन के साहचय से हरि का अय कृष्ण, रवि आदि नहीं, और हरि के साहवय से अजुन का अथ पाथ वृक्ष नहीं । साहचय म दोनो शदो की समान प्रधानता होती है और दोनों ही शब्द अनेकाधवाची होते है। इन दो तथ्यों का उल्लेख सस्कृत के प्राचार्यों ने नहीं किया है हिंदी के रीतिकालीन प्राचार्यों मे इन तथ्यो का उल्लेस केवल हरिचरणदास ने किया है। यहा स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि साहचर्य सयोग और प्रारण दोना से भिन्न है। इन दोनों म एक ही शब्द मनाथवाची होता है । यहा दानो शद अनेकायवाची होते हैं । साहचय और विरोध में दोनो शगे की प्रधानता होती है, परतु साहचय म दोना शद अनेकायवाची होते हैं, विरोध में एक ही अनेकाथवाची होता है और दोनो के मध्य विरोध की ही प्रधानता होती है । यही साहचय मोर विरोध दोनो का मतर है । विरोध का उदाहरण- देखोरावन राम में लख्यो प्रलब सु राम । इन दोउ रामनि में हो कौन गौर को श्याम ॥ यहाँ राम रावण म लक्ष्य-लक्षण सम्बध भी नहीं है। दोनो ही साहचय वे शब्दो की भाति प्रधान भी है, दोनों में एक अनेकार्थवाची है। दोनो म यहाँ विरोध ही प्रधान है । विरोध का ही निम्नलिखित उदाहरण है- याचक लखि हरिपित परम वल धीरज को घाम । अरजुन को जिन मद दलो नमों नमों श्री राम || परशुराम एव सहस्राजुन को शत्रुता प्रसिद्ध है । फ्लत इस दोहे में प्रयुक्त अजुन पद से सहस्राजुन का पथ ग्रहण किया जायगा पाडव अजुन का नहीं और श्रीराम से परशुराम का बोध होगा दशरथ तनय श्रीराम का नहीं । कही कही वाक्य सगति अथवा अथ भी अभिधेय का नियामक होता है । अर्थ प्रसग में भी सर बहुत पथवाचा होता है परतु जहाँ साहचय और विना अ य शब्द की सनिधि वे अथ का नियमन पद समूह प्रयवा वाक्य के अर्थ से ही होता है, वहा प्रथ को ही नियामक मानना चाहिय । भय का लक्षण इन पदो म किया है प्रय हित बहु अथ को गन्द युझावं एक । साहचय दिन प्रय साप्रय लखौ सविवेक ।। भय स- विष्णु सो गति जोगी लहें हरिमय जगत निहारि । चित्रभानु ग्रह घुति हर मम्बर हर्यो मुरारि ॥ यहाँ विषणु का प्रय नारायण है, चद्रमा नहीं। यह नारायण परख अय पूरे वाक्य का मथ करन पर निश्चित होता है। वारण नारायण के अतिरिक्त गति मुक्ति दूसरे से सम्भव नही है। वाक्य-रागति भी दे और पुराणा ये प्रमाग माशि देन पर निश्चित हाती है । इसी प्रकार हरि या प्रय भगवान् इदु मादि नहीं चित्रभानु मूय अग्नि नहीं, मौर मम्वर का भय वस्त्र भामाश नहीं है । यहाँ सय ग सनिधि भी नहीं है जसे धन घरसत म पन के साथ वरसत पद का निधि है । इममा निम्नलिखित भो एक सुदर उदाहरण दिया है १२४ । ध्वनि सिद्धात और ध्यजनावृत्ति - विवेचन नाचत मूढ़ महीसलों भूतल भोजन मम । निसदिन भो गिरोग भव-बधन छेदन घम ॥ भव बधन काट ने के लिए गिरीश-शकर की माराधना करना ही उचित है । गिरीश हिमालय आदि का भजन करने से उपर्युक्त मनोरथ की सिद्धि न होगी प्रतएव गिरीश का मर्य हिमालय न होकर महादेव होगा। प्रकरण का लक्षण- एक शब्द बहु वाचक प्रान । प्रकरन तहा प्रसग प्रमान । प्रकरण में भी कोई श द अनेकाथवाची होता है । इस शब्द का एक पथ प्रसग अथवा प्रकरन के कारण ही निश्चित होता है। प्रकरण का उदाहरण- पावक ते दाहक प्रबल को करि सक घखानि । दियो महावल जानिक गरल भीम को भानि ॥ यहाँ भोम पद अनेकाथवाचो है । यह दोहा यदि समुद्र मपन के प्रसग मे कहा जाय तो भीम का मय महादेव-महादेव को समुद्र मथन के पश्चात् विप पीने को दिया गया था और महाभारत का प्रसग हो तो भीम का प्रथ पांडव भीमसेन होगा-पाडव भीम को दुर्योधन ने विष पिलाया था। यह पिछले अध्याय में कहा जा चुका है कि शाब्दी व्यज्जना मे भी प्रकरण मथवा प्रसग फा विशेष महत्व है, यद्यपि प्रकरण प्रार्थी मे यञ्जना शाब्दी की अपेक्षा महत्वपूर्ण है । चिह अथवा लिंग का लक्षण निम्नलिखित है । वहै चिह जाको नहीं सक वियाग पनाय । जो वियोग ताकौ कर और आर्य ठहराय ।। चिह वह दृढ़ लक्षण है जिसका वियोग सम्भव न हो और यदि उसके दृढ़ लक्षण का वियोग कर दिया जाय अर्थात उसका उल्लेख न किया जाय तो अय पथ की प्रतीति होने लगे। चिह का उदाहरण- बिन भूषन मन को हर काहे करत सिंगार। तुव छवि पार लहै न हरि जाव नन हजार ॥ इस दोहे में हरि शब्द अनेकाथवाची है, परतु उसके साथ उसके चिह हजार नेत्र का उस्लेख है इसलिए हरि का अथ इद्र निश्चित होगा। हजारो नत्र ऐसा चिह है जिसका वियोग नहीं किया जा सकता है । यदि हजार नेत्र का यहां उल्लेख न किया जाय तो इद्र अप नहीं होगा, राजा मादि मथ की प्रतीति हाने लगेगी। मय-सन्निधि लक्षण- एक सव सग ते और भय ठहराय । वहवाचक के शव को अय सनिधि इह भाइ।

व्यजनावृत्ति । १२५ जहां अनेकायवाची शब्द बहुवाचक का किसी अ य शब्द के सयोग मथवा सामीप्य के कारण प्रभिधेय निश्चित होता है वहाँ प्रय शद सन्निधि ही नियामक मानी जाती है। प्रय शब्द सन्निधि का उदाहरण- घन बरसत फूलत सुमन काम चलावत तीर । नयो नेह पिय को लग्यो तिय घर सर्फ न घोर ।। वरपत को सन्निधि से धन का अथ मेघ होगा, लोह का धन नही, और फूलत की सनिधि से सुमन का प्रथ पुष्प होगा, देवता नहीं। इसी प्रकार निसाकारी भारी घटा' मे कारी के सग से निसा का प्रथ रात्रि है। हल्दी नहीं है और पिया बिन लागत हैं अम्बुद डरावनी में पिया के सामीप्य के कारण प्रम्बुद का अथ मेघ है, नागरमोया नहीं है, वाजत निसाने शिवराजजू नरेस के' मे बाजत से निसान का प्रथ नगाडा, पताका नही है । अय उदाहरण दृष्टव्य है । मान सब्द विंग ते पहूँ बसे एक प्रय । सिखी पक्ष तें जानिये, केकी पर समय ॥ यहाँ पर पक्ष शन्द के समीप प्रयुक्त होने से 'शिखी' का पथ मोर होगा, अग्नि नही । जब कवि फी उक्ति व्यय होती जान पडती है तो अनेकार्थवाची शब्द का वही अर्थ निश्चित होता है जो अपनी सामथ्य के कारण उम अथ मे सगति स्थापित कर देता है। इसीलिये इसे सामध्ये का नाम दिया जाता है। सामप्यं का उदाहरण- मुनि गन सजे समाधि-सुख जती तजे सब जत्त । मान रहे नहि तियनि फो बोलप्त पिक मधु मत ।। मधु का पथ प्राय मदिरा होता है। पर तु उसका पान कोकिल के लिए सम्भव नही है। इस प्रकार कवि की उक्ति व्यथ होतो सी जान पड़ती है। उस समय मधु का दूसरा अर्थ वसत ग्रहण किया जाता है । वसत म कोकिल को मतवाला बनाने की सामथ्य है । सामर्थ्य का ही एक प्रय उदाहरण भी दृप्ट य है- दास पहू सामथ्य तें, एक प्रथ ठहरात । पाल वृक्ष तोरयो कहें फुजर जायो जात ।। यह सामर्थ्य का उदाहरण है। 'व्याल वृक्ष तोरयों' कहने से व्याल का भय हाथी होता है, सप नहीं । कारण, वृक्ष तोडन की सामथ्य हायो हो म है, सप मे नहीं। प्रोधितीका सक्षण- दो मप ये सब तें निकर जोग प्रजोग। नोग प्रप तहाँ क्येि सो मोचिती प्रयोग। भौचिती पयवा मौचित्य में सयोगादि की अपेक्षा विोपता यह है कि सयोगादि में प्रयुक्त शरद पहुवाचक होता है परतु मौचितो के प्रमग में प्रयुक्त शब्द येवल दो ही अयं वाला होता है। इन दोनों प्रों में से एक भय हो भौचित्यपूर्ण होता है । उसको ग्रहण किया जाता है। इसलिए मौचिती ही पप नियामक मानी जाती है। भौचिती का उदाहरण- दुनिरि सकट पर लक्षि चित प्रति अपुलाइ । सहा तहाँ गुरु मुखनि को गुरुपद होत सहायो ।।

ध्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति विवेचन गुरुमुख के दो अय हैं । एक गुरु के समान मुव और दूसरा गुरु के सम्मुव । इनम प्रयम अयोग्य अथवा अनौचित्यपूर्ण है । दूसरा अथ माय है । प्रोचिती और सामथ्य का अ तर स्पष्ट करने की आवश्यकता है । कनक वरन तन कामनी मोहत मन न दाल में कना का अर्थ सुवण है, धतूरा नहीं है। कनक के समान रग म ही औचित्यपूण अथ है । यहाँ सामथ्य की सम्भावना अथवा शका का स्थान नहीं है। कारण, सामथ्प में दोनो अर्थो मे सदह रहता है तब सामथ्य से अथ निश्चित होता है, पर तु पौचितो के प्रसग म निकलने वाले दो अर्थो में एक अथ औचित्यपूण होता है । काल से- है वहा व्यक्ति चित्रभानु को रूप ज्या रजनी मे प्रति होत । हरि छवि जसे दिवस म त्यो तब बदन उदोत ।। यह दोहा समय काल की प्रधानता का उदाहरण है। चित्रभानु का अथ रजनो समय के प्रसग से अग्नि होगा, सूय नही और दिवस समय के कारण हरि का अथ सूय होगा, चद्रमा नहो । व्यक्तिका लक्षण- बहु पाचर मे भेद यताव । लिंग वचन पुनि व्यक्ति कहाय । व्यक्ति म लिंग और वचन का ग्रहण होता है । जहाँ अनेकाथवाची श' का एक प्रय लिंग पुल्लिग अथवा स्त्री लिंग और वचन-एक वचन अथवा बहु वचन के कारण निश्चित होता अथ का नियामक माना जाता है । व्यक्ति का उदाहरण- काहे को सोचति सखी काहे होत विहाल । बुधि बल छल करि राखिहौं, पति तेरी नय वाल ॥ यह अभिसारिका नायिका से अतरग सखी की सक्ति है। मैं तेरी पति लाज रवस्खू गी। यहाँ पति का प्रथ तेरी के स्त्रीलिंग प्रयोग के कारण लाज हो होगा स्वामी नही । यदि नायिका प्रोपित-पतिका होती तो तेरो पति प्रयोग होता। ऐसी स्थिति मे तरी पुल्लिग प्रयोग होता ता पति का प्रथ स्वामी निश्चित होता। हिदी म ऐस अनेक उदाहरण नहीं है । दूसरा उाहरण भी दृष्टव्य है। यक्ति (वचन) का उदाहरण- सोहत अंगूठा पाइके अनवट जरयो जराय । जीत्यो तरवन दुति सुटर परयो तरनि तिय पाय ।। यहां पर जीत्यो प्रिया एक वचन है । इसका यह अथ कि एक 'तरवन पर के नीचे का प्रदेश-ने सूय को जीत लिया यदि दोनो तरवन होते तो रविच द्र दानो को जीत लते इत्यादि पनि । यह ध्वनि वचन के कारण ही निकली है। देगका उदाहरण रस ल पुनि तज देत है यसत न ठिक इक घाम। ज्यों विहरत धनश्याम नभ यों विहरत बज राम || इस दोह मे घनश्याम और राम अनेकायक हैं। घनश्याम नभ प्रावास म विहरते हैं । इससे नम देश के कारण घन याम वा अय मेघ होगा, कृष्ण नहीं और ब्रज देश के कारण राम का अथ बल्ल्व होगा, परशुराम अथवा दारथि नहीं। - व्यंजना वृत्ति १२७ देश का प्रय उदाहरण- देखे विरहत गगन मे राधा हरि इक स थ । हरि राधा इस साथ ही चले गली मे जात ।। यद्यपि राधा और हरि का साहचय है। दोनों की प्रधानता भी है। परतु गगन देश के कारण इनका प्रथ राधा और कृष्ण न होकर विसाखा अथवा अनुराधा नक्षत्र और चन्द्रमा होगा। दूगरी पक्ति में गली देश को प्रधानता के कारण उपर्युक्त चद्रमा और नक्षत्र वाना अथ न होकर राधा कृष्ण वाला अथ ही निश्चित होगा। साहचर्य और देश का यही भेद है। इस प्रकार अभिघामूला -शाली ध्वनि के प्रतगत उपयुक्त ते ह प्रसार के प्रथ नियामको का उल्लेख किया गया है । स्वर आदि का प्रभाव वेद में ही होता है। कार म 'स्वर परिवतन से अभिषेय का निय त्रण नहीं होता है। काय में इ हा तरह हेतुमा को अभिधेय का नियामक स्वीकार किया जाता है । इनके कारण अनेकथर पद एक ही प्रय म नियत्रित हो जाते हैं, कि तु इस नियनित अभिधेय के मतिरिक्त भी यदि किमी अ य य का भी बोध होता है वहाँ अभिधा मूला शादा यजना मानी जाती है। श्लप म एक पद के दो अथ प्रकरण सगत हाते हैं । किनु अभिधामूला शादी व्यजना मे एक हो अथ प्रकरण सम्पत प्रौर प्रकरण सगत होता है । अभिधामूला गाब्दी व्यजना का उदाहरण बहु चरन चचल करि हसत रस मय करज्ञ बनाय । रहै उरवसी उर लगी राजत हो हरि राय ॥ यह क्सिी गोपी को उक्ति कृष्ण के प्रति है। कृष्ण के प्रति जितना अथ है वह मभिधा प्रतिपारित हैं । इसके अतिरिक्त इसम रसमय जलमय, और उवशो नाम की अप्मरा मादि अर्थों के कारण एक अप इद्र के प्रति भी लगता है। भय उदाहरण- भयो अपत के कोपजुत, फ बोरो इहि काल । मालिनि माजु करें न क्यों, वा रसाल को हाल । मालिन नायिका के पास पहुँचती है, कितु उसे नायिका से बातचीत करने के लिए एकान्त नहीं मिला है । मरेश दना पावश्यक है । नायिका भी सदेश पाने के लिए मातुर है। फ्लत वह मालिन से निम्न शन्ने म उपवनगत रसाल के माध्यम से नायर का सदेश पूछती है । नायिका के समप विद्यमान भय श्रोता केवल रमाल से सम्बद्ध प्रथ ही समझेंगे, वारण उपवन की देखभाल मालिन ही करती है। यहाँ श्लेप अलकार मानना उचित नहीं है। यद्यपि अपत, कोपजुन, वोरो मोर रसाल पदा के दूसरे प्रयों की सहायता स ही प्रश्न पूछा जा रहा है। पिछले अध्याय में पाती व्यजना और श्लेप का मतर विशन्तमा सष्ट किया जा चुका है। यहां इतना हो पर्याप्त है कि जिम मथ का बोध मालिन पौर मय श्रोताग्रो को समान रूप से हाता है वही प्रमग प्राप्त मथ है, उसके अतिरिक्त नायक गत मय प्रसग प्राप्त नहीं है वह केवल नायिका और मालिन से हो सम्बद्ध है। यहाँ प्रसग अथवा प्रारण ही अय का नियामा तत्व है। प्रसग के अनुसार उपवनगत- रसाल वा वणन है पर तु शद दियाम से नायक का अर्थ भी प्रतीति होता है । हिदी के काव्य शास्त्र मे मभिधामूला पाग्दी व्यजना का यह सरल, सुबोध एव सगत उदाहरण है।

१२८ ! प्वनि सिद्धात और व्यजनावृत्ति । विवेचन शादी व्यजना के अभिषामूल भेद का निमण हो पुका। मागे लक्षणामूला शागे न्यजना का निरूपए दिया जाता है । लक्षणाबो प्रशर को होती है-स्टा लदारणा मोर प्रयोजनवती लक्षणा। रूढा लक्षणा में सासणिक पाने का प्रयोग होता है जो पिसी प्रथ विशेष म रूठ हो गई है। उदाहरणत प्रवीण, पुराल, पज मादि । प्रवीण पद का प्रारम्भिक मभिधेय वीणावादन में दा मोर गुरास का कुरा माने में दक्ष था। वितु भव दोना पद माने लासणिक मय में रूट हो गये हैं। इसी प्रकार 'पज का रूठ भय कमल है। इन के प्रारम्मिा मभिधेय मय प्राय भूले जा पुके हैं। इसीलिए मापाय मान द-यधन ने 'रुदा लक्षणा' म व्य जना की स्थिति स्वीकार नहीं की है। लक्षणामूला पानी व्यजना का प्राधार वेवल प्रयोजनवती लक्षणा ही होती है। इसम प्रयोजन को प्रतीति व्यजना से ही होती है। काव्य प्रकाशकार मौर साहित्य दपणवार ने प्रयोजनक्ती सापा के दो भेद गूढ व्यग्या मोर मगूढ व्यग्या माने है । कि तु हिदी के रीतिकालीन भाचार्यों ने ये लक्षणामूला दानी व्यजना से भर स्वोर किये हैं। हमारी सम्पत्ति म वे माने भी जा सकते है। मापायों ने साहित्य-दपण के अनुसार गूड व्यग्य उसे माना है जिसे पेवल पुत्पन्न सहृदय ही समझ स भोर मगढ उसे जिस सवसाधारण समझ सकें। रवि सहाय नाश सस व्यग सुकरिये गूछ । जारो सामोज ससं सो पुनि होइ प्रगूर ॥ पूर-व्यग्या सानिम्नलिमित उदाहरण है- पूले प्रग मग दचि राम पहरग मानो। प्राप्त मनग सग लोहे पशि को ससे॥ मिली दुमि पेसियन पागनि विसासनितो, पूरन परत बोसो घौर र बानि दी। सोमनाप पारेसा सौम पनामिनी की, कामिनि को चाहे बुद्धि मर गुर बानिरी थोत मुरत देति प्रय पानद के ए, चिरहोनि में ऐति मुरवानि । गियनितारी सी सी प्रचार मन, मोति मार बन पार पुरयान ॥ पति पर जाने के लिए प्रस्तुत है, उम गमप पतिको परदेश जाने ने भी इग्या यानी मापिशायर्पा पामोटोपर वपन कसो है। इमर्म मिमीः रेलि से जद नगर में भी संगम बीमा रिहीन ति में पाक वियोग में मुझे मार दुग होगा, मारिहार परे जाने मे रोना चाहती है। यह रोषने सो महामन्य है। हमापता रटिनाई से राहदागही पता है। प्रामायापार उमप भी डरर है- पानन में मुगुरानि मुहानि यपुरता यानि पाहै। पन मुने पुराने रमान रोपितो गति टोनि॥

व्यजना वृत्ति १२६ दास प्रभा उछल सव प्रग सुरग सुवासता फलि गई है। चमुखी तनु पाइ नवोनो भई तरुनाई प्रान द मयो है। च द्रमुखी के नूतन शरीर को पाकर स्वय उसका यौवन पान दमय हो उठा है । मानद प्राप्त करना चेतन का लक्षण है, यौवन उसका लाभ नहीं कर सकता है । यही लक्षणा प्रसग है। इस वाच्याथ का व्यग्याथ यह है कि जो कोई पुरुप इस च द्रमुखी को प्राप्त करेगा उसे परम मानद प्राप्त होगा। इस ध्यग्यार्थ को केवल सहृदय ही समभने में समय होगे । अत यह व्यग्यार्थ गूढ है । इस सवैया में मम्मट के उदाहरण को छाया है । प्रगूढ व्य ग्या का उदाहरण- धन जीवन इन दुहुन को सोहति रोति सुबेस । “मुग्ध नरनि मुग्धनि घर, ललित धुद्धि उपदेश । घन मूखों को और यौवन कामिनियो को चातुय का उपदेश देता है । 'उपदेश' चेतन गुरु का व्यापार है अर्थात सिखा देता है । यह अगूढ व्यग्य का उदाहरण है। प्रगूढ़ व्यग्या का एक भय उदाहरण- केसरि प्रग से प्रगनि मे ससिनाम दुकूलनि को दुति भारी। भाल मे रोरी की प्राड रची मुख बोरी प्रवीर को फेंट महारी । लाल प डारि गुलाल की मूठो विलोकति होति हियें यलिहारी । खेलति होरी गुपाल सों प्राज यो लाज तर्ज वृषभान कुमारी!! यहां पर लज्जा के त्याग के कारण प्रौढा नायिका व्यग्य है । यह यग्य सवसाधारण बोधगम्य होने से प्रगढ़ है । शादी ध्यजना के पश्चात् प्रार्थी का प्रसग उपस्थित होता है । शादी व्यजना मे शब्द की व्यजकता रहती है मौर अर्थ की सहकारिता, प्रार्थी व्यजना मे अर्थ व्यजक होता है, शब्द की अर्थ का पाश्रय होने के कारण सहकारिता रहती है । काव्य प्रकाशकार ने वक्तादि के कारण अर्थ की ध्यजक्ता स्वीकार की है । प्राचाय मिखारी 'दास' ने वक्तादि दशवशिष्टयों का उल्लेख करके उनके परस्पर सयोग से प्रार्थी व्यजना के अनेक भेदों को और सकेत क्यिा है। यह का य-प्रकाश में भी प्रच्छन रूप में विद्यमान हैं । दास से पहिले किसी भय प्राचाय ने इन भेदो की ओर सकेत नहीं . किया है। T चेष्टा, माकु, "इनके मिल मिल किय, भेद अनत सखाइ ।' सस्कृत प्राचार्यों ने प्रार्थी व्यजना के प्रसग म अथ को अभिव्यक्ति के दश हेतुप्रो का उल्लेख किया है। वे ये है वक्ता, बोधव्य, वाक्य, घाच्य, मय-सनिधि, देश, काल, और प्रकरण । इहीं दा हेतुप्रो के कारण प्रतिभाशाली व्यक्तियो को व्यग्याप का बोध होता है।' इही को हिंदी रीतिकालीन माचाय हरिचरणदास ने निम्न दोहे में एकत्र कर दिया है- धक्ता पर योधण्य पुनि पचन वाच्य अनिसग देस काल दस जानिये चेष्टा काकु प्रसग । १ वसुबोधव्य वाकूना वाक्यवाच्या यसनिधे प्रस्तावदेशकालादेव शिष्यात्प्रतिभाजुपाम् ॥ पोऽयंस्या यायधीहेतुापारो व्यक्तिरेव सा " -वाव्य प्रकाश ३॥२१॥२२ १३० प्वनि सिद्धात व्यजनावृत्ति विवेचन यद्यपि प्रार्थी व्यजना के इन अभिव्यक्ति हेतुनो का सक्षिप्त उल्लख पिछले अध्याय में हो चुका है । वहां व्यजना यापार को अभिधा, लक्षणा तात्पर्या आदि व्यापारो से भिन्न व्यापार सिद्ध करने का उद्देश्य था, यहाँ उनका व्यावहारिक स्वरूप स्पष्ट करने की दृष्टि से विस्तृत विवरण दिया जा रहा है। (१) पत्ता-कवि अपनी उक्ति को जिस पात्र के द्वारा कहलवाता है वह वक्ता माना जाता है । वक्ता के कारण भी साधारण वाक्यो से भी कभी कभी प्रत्यात गम्भीर व्यजना होती है । मित्र के मुख से निसृत प्रत्यत साधारण वाक्य शत्रु के मुख से निकलकर अपेक्षाकृत विशेष व्यजना करता है । (२) बोपय्य-कवि निबद्ध-वक्ता का श्रोता ही बोधव्य है । मभिधामूला शादी व्यतना के प्रसग मे उधृत उद्धरण 'भयो अपत क कोप जुप्त, मे बोधव्य के मालिन होने से ही दोहे से वह व्य जना होती है। (३) पाक्य-कमी कभी वाक्य का गठन हो इस प्रकार का होता है कि उससे उसके गठन के कारण विशेष अथ की व्यजना होती है । वाक्य में प्रयुक्त शब्द आपातत अनुपयुक्त से प्रतीत होते हैं । वाक्य पर्यातोचना से विशेष प्रय को यजना होने पर उनकी सगति बठती है । (४) मय सनिधि-वक्ता के समीप एक निश्चित उद्देश्य से माया हुआ कि तु बोधव्य को प्राय अकस्मात प्राप्त हुआ प्रतीत होने वाला व्यक्ति । वत्ता की उक्ति इसी पान को सुनाने के अभिप्राय से कही जाती है । बोध प को साधारण प्रतीत होने वाली उक्ति इस वक्ता की सन्निधि सामीप्य में रहने वाले इस “यक्ति को ही विशेष प्रथ की प्रत्यापक होती हैं । (५, ६)-देश और काल भी विशेष प्रथ की अभिव्यक्ति के हेतु हो रहे हैं । (७) वाच्य-वाच्य का प्रथ प्रयुक्त वाक्य के पथ से है । उक्ति में प्रयुक्त वाक्यो का अर्थ ऐसा रहता है कि उससे विरोप प्रथ-यजना होती है। पाच्य और वाक्य में स्पष्ट मतर है। वाक्य मे वाक्य का गठन और प्रयुक्त शदो को पर्यालोचना से यग्य निकलता है । कि तु वाच्य के प्रसग में प्रप से । वाक्य में पाठक का ध्यान भाषा पर रहता है मौर वाच्य में प्रयुक्त शब्दावली के अर्थ पर। (८) काकु-काकु कण्ठ ध्वनि को कहते हैं । कण्ठ ध्वनि के बदल से कवि की उक्तियों से विशेप मर्य की प्रतीति होने लगती है । जहाँ कण्ठ ध्वनि मात्र प्रश्न करने मान-से विशेष प्रथ की प्रतीति होती वहां ध्वनि मानी जाती है । इस पर विशद विचार प्रांगे गुणीभूत व्यग्य के प्रसग में किया जायगा। (e) चेष्टा-प्रग विकार, नेत्र सकेत प्रादि । (१०) प्रस्ताव-प्रकरण का सम्बध वक्ता और बोध य को स्थिति से है । प्रकरण को ही प्रसग अथवा सदभ भी कहते है । प्रकरण शाब्दी और प्रार्थी दोनों व्यजनानो में विशेष प्रथ का प्रत्यायन कराता है । गत अध्याय में इस पर विशेष विचार हो चुका है। इन दश हेतुप्रो का सक्षिप्त विवरण देने के पश्चात् उसके उदाहरण मागे दिये जाते हैं । यहाँ हम एक से अधिक उदाहरण देने का प्रयत्न करेंगे । कभी-कभी इन हेतुनों में से एक, दो अथवा तीन तक मिलकर विरोप अथ व्यजना में सहायक होते हैं । वक्ता विशेष से- देवरी ननद खेल खेलत हैं तिहें सासु ले सिधारी पीहर के सुख शुभ घरी है।

ज्यजना वृत्ति । १३१ खरी दुपहरी प्राखि दुख पाई बाबाजू की, पूजा बिन लीज क्यों निकाम दुख भरी के । सीरी बेर जेते बचन परोसिनि सों, सुकवि रतन बरजै को डर हरी के ॥ तुम्हें ऐसी हौंसहै तो प्रावोजू हमारे घर, फूल फूलि यों ही जात फूल दुपहरी के । वक्ता सभोग की कामना करने वालो व्यभिचारिणी है। घर के उद्यान के साय प्रात के पुष्पो को तो परोसिन ले जाती हैं दुपहरी के मुरझा कर गिर जाते हैं । घर में इस समय एक वृद्ध बाबा हैं जिनकी मा दुख रही हैं । तुम नि सकोच दुपहरी के पुष्प लेने आ सकते हो। दुपहरी में मभोग का निष्क्टक समय मिल जायगा, व्यग्य है । कवित्त सुदर है । वता वशिष्टय का यह दूसरा उदाहरण है- कोऊ जो एक कहे तेहि को सुनि एक को चारि बनाय सुनहो । रोस कर ननदी पिन कारन ताहू को बात सबै मुनि लहाँ । क्टक के छत घाती लगे तिनको तन पीर कहाँ लगि सहो । "! होप न मय क्यों सामु उदास प हों तो कपात के पास न जै हों। ध्यभिचारिणी नायिका की सखी से उचित है । सखी ने वक्ष स्थल के नखक्षत देख लिये हैं। उहे वह पास बीनने में कपास को बोडो की मुड़ी नौकों से उत्पन बताकर छिपाना चाहती है। विषेश अध्ययन के लिए ग्राग ववत वशिष्ग्य से होने वाली व्यग्यार्थ प्रतीति के उदाहरण दिये जा रहे हैं। उपरो घटल डगरी अकुलाइ चवाइ लो गाइन सो डोरि हो। भनि श्रीपति दीरप तप्त उठी प्रब जहों तो हौं उतही मोरि हों। इत कधी निसेनिन के चढ़ते श्रम भोति गई मातप ते जी जरि रहीं। सपि माफि हो बठि हो एक घरी फिरि सांझ भये पनिया भरि हो। नायिका ने उपपति के साथ चौयरति को है जिसके श्रम के कारण स्वेद भा गया है और लम्बो सास चल रही है। वक्ता व्यभिचारिणी है वह झूठे कारण बता कर अपनी चौयरति को बिपाना चाहती है। प्रतिभारी जल फुभ स प्राई सदन उताल । सखि थम सलिल, उसास अलि कहा झतो हाल । यह उदाहरण मम्मट के उदाहरण का रूपातर मात्र है। रूपान्तर सुदर है, व्यग्याय की पूर्ण रक्षा हुई है। दूस्त है कोइस पढगी वैन चातुरो सफूने पांचो धान जागे देखे मैंन भाग में। फूलत है परा विनित्र चित्र पद देषि उपधन जीव सब होत अनुराग में । गिलि मागे नभ पाइ रही सालो द्रुमराजी हूँ विराजी सखि सपति सुहाग में। दिनु हो पसत सीपत मयमत होत तेरो मुख देख ते वसंत बाग में 12 १३२ ध्वनि सिसात ध्यजनावृत्ति विवेचन यहा दूती की उत्ति हो तो परवीया नायिका है और जो समान सखी की उक्ति हो तो रवेल के व्यसन की थ्यजना होगी । वत्ता के अनुसार ही उक्त उदाहरण का ध्यग्य बदल जायगा । ध्याख्या स्पष्ट है। विशेष से- तोहि गई सुनि फूल पलि दि के हो? गई सुनि हेसि हहारी। भूली प्रपेली 'घुमार पहू डरपो लखि कुजन पज अभ्यारी। गागर के जल के श्लके, घर प्रायत लौ तन भीजिगो भारी। फपत नासनि ये री यिसासिनि ! मेरी उसास रहे न सम्हारी ॥२ यहाँ वत्ता व्याभिचारिणी स्त्री है जो पानी भरने के बहाने प्रच्छन कामुर से मिलने यमुना कुज मे गई है वहाँ से लौटने के पश्चात अपनी सखी से कह रही है। सुरति ज य कम्पादि अमजय कम्पादि से छिपाये जा रहे हैं। बौद्धय विशेप से- दूपरी भई है देह नौद सौ तजौ सनेह हिय मो विरह गहे पिता अधिकाति है । थीपति सुजान भनि जतन अनेकन सौ वासर विहात तो प रातिना विहाति है। हरिये फराहि के सुपहिये परोसिन सों सहिये परम दुष्ट कछूना विसाति है। हो हो मद भागिनी हो यारो प्रभाग जागो मेरो दुःख देखि माली प्रति दिलवाति है। दूती नायक के पास माती जाती है । उसके हृदय में भी कामोपभोग पाकाक्षा का उदय हो गया है। प्रेम के उदय से जो स्थिति होती है वह दूती को भी हो रही है। नायिका उसको माकाक्षा जान गई है । पद्य को मातम पक्ति से यह यग्य स्पष्ट है रितू मेरे लिये रुष्ट नहीं उठा रही है अपितु अपने ही विरह म दुखी है । बोद्ध य दिपेश के ही मागे कुछ उदाहरण दिय पा रहे हैं- बौद्धय विशेप से चिता जम उनदिता विह यत्रता मलसानि । लह्यो प्रभागिनि हौं प्रलो तेहू गहै सुवानि ॥२ यह उदाहरण भी मम्मट का स्पा तर मात्र है । नायिका को दूती के प्रति उक्ति है। तूने नायक से रति की है' यह व्यग्य है । सूनी परयो सब मदिर है बम रनि पधारियो पय सबेरे । मेरी रहे इत सेज लखो, उत सोयत सासु सुन जुन टैरे ।। सूझत साझ घर तुमको न, 'कुमार कही यह बात उजेरे । पथिय मीत! डराति हो जो कहूँ रात गिरौ जिनि ऊपर मेरे॥ इसम श्रोता कामातुर पथिक है । 'तुम मेरी शयया मे वेखटके माकर सोना यह इससे व्यग्य है। छ द का यप्रकाश के उदाहरण पा सुपर अनुवाद है। मोहित मैं चित दे फिरो सखो निकु जन माहि । भए प्रग श्रमस्वेदकन लह्यो सुप्रीतम नाहि ।। किसी नायिका ने अपनी दूती को नायक के समीप भेजा था। वह नायक के साथ रति नीडा करने के पश्चात लौटी। उमसे नायिका को यह उक्ति है । दूती के शरीर पर उपभोग के ज्यजना वृत्ति । १३ । - चिह हैं । यहाँ 'मो हित मरे काम के लिए का विपरीत लक्षणा से यह अर्थ होगा कि तने मेरा प्रहित किया है और नायक से सभोग करने के पश्चात् अब मुझे दुख देने आई है । तुझे लज्जा मानी चाहिये मादि ध्वनि होगी। जिसको प्राचाय मम्मट ने वाक्य वैशिष्टय स्वीकार किया है उसे प्राचाय हरिचरण दास ने वचन वशिष्टय स्वीकार किया है। उसके उदाहरण पर मम्मट के उदाहरण की छाया है - इक टक हग दं स्वच्छ रुचि निरखत है मो हार । घही हार पाही सम लखत न हा विचार । नायिका के हार में उसकी सखी का प्रतिबिम्ब पड रहा था, उस समय नायक उसको टक- टकी लगाकर देख रहा था । उसके चले जाने पर उसने नायिका की ओर से दृष्टि भी हटा ली। सखी से प्रेम है मुमसे नहीं, यही ध्वनि है । वाक्य विशेष का दूसरा उदाहरण- पाई हैं गोधन पूजन को सब गोकुल गाँव की गोप कुमारी। सा मे महा एक सुदरि है मनि श्रीपति श्री वृषभान दुलारी। राथ्यो इत उत नेकन स्याम जु मेरे कपोलन दोठि न हारो। हो तो वहै अब बेई कपोल हैं ह गई औरई दोठि तिहारी । यह भी वाय प्रकाश के वाक्य वशिष्ट्य के उदाहरण का छायानुवाद है। एनुवाद मौलिक जान पडता है। वह सरस, सु दर एव मम्मट गम्मत है। वाक्य विशेष के बुथ स्मरण-- पजरत हियो समीर तें एवं न सके धनसार । सजे दूरि धरि बगनि त नव अरविंदनु हार ।। यहाँ वाक्य से ही विरहिणी नायिका व्यग्य है । ल्यायो मनोरम पूरन के वर व्याह को दूलहि या रति रानो ॥ सासु जिठानि ननद परोसिनि पोरते पारछि के घर पानी। सौति सबै तकियाको महावर बाके विलोचन क मुसुक्यानो । । नैन (भोर) सलाके ललो, विलोकि के पोधे तिरीछे मुरी मुरझानी।। सवैया का प्रतिम वाक्य है कि सभी सपत्निया नवौढा का महावर देखकर प्रसन हुई परन्तु नायक के ललौहें नेत्रो को देखकर मुरमा गई । पाने वालो बधू अपने स्नेह, द्यौवन प्रादि के सहारे हमसे नामक को छीन लेंगी, यह उनके मुरमाने से व्यग्य है। मेरे कान लाल तन लाल ! लखत हों ईठि। हो यह, वे तुम, पैन अब वह सनेह की डोठि।। नायक एप नायिका के समीप नायक को उपपलो खडी है उसका प्रतिविम्ब नायिका की पारसी में पड रहा है । नायक उपपत्नी के पारसीगत प्रतिबिम्ब को स्निग्ध दृष्टि से देख रहा है। उसके चले जाने पर दृष्टि म परिवतन मा गया । उसको नायिका ने देख लिया है । इस दोहे में यही प्रयन स्नेह व्यग्य है । यह भी काव्य प्रकाश के उदाहरण की छाया है । काव्य प्रकाशकार ने इसमें वाक्य वशिष्टय से यग्य स्वीकार किया है। प्राय सनिधि से भी व्यग्य माना जा सकता है।

१३२ : प्वनि सिसात घ्यजनावृत्ति विवेचन यहा दूती को उत्ति हो तो परकीया नायिका है मौर जो समान सखी की उक्ति हो तो खेल के व्यसन की ध्यजना होगी। वक्ता के अनुसार ही उक्त उदाहरण का ध्यग्य बदल जायगा । प्याख्या स्पष्ट है। विशेप से- तोहि गई सुनि कूल पलि दि के हो? गई सुनि हेलि हहारी। भूली अली 'पुमार' कहू डरपी लखि कु जन पज अभ्यारी। गागर के जल के एलक, घर प्रापत लौ तन भीजिगी भारी। फपत सासनि ये रो पिसासिनि ! मेरी उसास रहे न सम्हारी ॥ यहां वत्ता व्याभिचारिणी स्त्री है जो पानी भरने के बहाने प्रच्छन कामुक से मिलने यमुना कुज मे गई है यहाँ से लौटने के पश्चात अपनी सषी से कह रही है। सुरति जय कम्पादि धमजप कम्पादि से छिपाये जा रहे हैं। बौद्धव्य विशेप से- दूपरी भई है देह नीव तो तनो सनेह हिय मो विरह गहे पिता अधिकाति है । थीपति सुजान भनि जतन भनेक्न सो वासर विहात तो प रातिना विहाति है । हरिये कराहि के सुकहिये परोसिन सों सहिये परम दुष्ट कछूना बिसाति है। हो ही मद भागिनी हो यारो प्रभाग जागो मेरो दुप्प देखि माली प्रति विलखाति है॥ दूती नायक के पास पाती जाती है । उसके हृदय में भी कामोपभोग माकाला का उदय हो गया है। प्रेम के उदय से जो स्थिति होती है वह दूती को भी हो रही है। नायिका उसकी माकाक्षा को जान गई है । पद्य को मतिम पक्ति से यह व्यग्य स्पष्ट है कि तू मेरे लिये कष्ट नहीं उठा रही है अपितु अपने ही विरह मे दुखी है। बोद्धय विषेश के ही मागे कुछ उदाहरण दिय जा रहे हैं- बौद्ध य विप से चिता ज म उनदिता विह यत्रता मलसानि । लह्यो प्रभागिनि हो मली सेहू गहै सुवानि ॥२ यह उनाहरण भी मम्मट का रूपातर मात्र है । नायिका की दूती के प्रति उक्ति है । 'तूने नायक से रति की है यह व्यग्य है । सूनो परयो सब मदिर है बम रैनि पधारियो पथ सवेरे । मेरी रहे इत सेज लखो, उत सोयत सासु सुन जुन टेरे।। सूझत साझ वर तुमको न, 'कुमार' कही यह बात उजेरे । पथिय मौत । डराति हो जो कहुँ रात गिरी जिनि ऊपर मेरे॥ इसमें श्रोता कामातुर पथिक है । 'तुम मेरी शयया में देखटके प्राकर सोना यह इससे व्यग्य है। छ द का यप्रकाश के उदाहरण वा सुदर अनुवाद है। मोहित मैं चित दे फिरी सखी निफु जन माहि । भए प्रग श्रमस्वेदकन लो सुप्रीतम नाहि ॥ किसी नायिका ने अपनी दूती को नायक के समीप भेजा था। वह नायक के साथ रति श्रीडा करने के पश्चात लोटी । उससे नायिका की यह उक्ति है । दूतो के शरीर पर उपभोग के ज्यजना वृत्ति । १५३ - चिह हैं । यहाँ 'भो हित' मेरे काम के लिए का विपरीत लक्षणा से यह प्रर्य होगा कि तने मेरा महित किया है और नायक से सभोग करने के पश्चात अब मुझे दुख देने माई है। तुझे लग्जा मानी चाहिमे प्रादि ध्वनि होगी। जिसको प्राचाय मम्मट ने वाक्य वैशिष्टय स्वीकार किया है उसे प्राचाय हरिचरण दास ने बदन वशिष्ट्य स्वीकार किया है । उसके उदाहरण पर मम्मट के उदाहरण की छाया है - इक टक दृग ने स्वच्छ रुचि निरखत है मो हार । घही हार पाही समै लखत न हा विचार ॥ नायिका के हार मे उसकी सखी का प्रतिबिम्ब पड रहा था, उस समय नायक उसको टक- टकी लगाकर देख रहा था । उसके चले जाने पर उसने नायिका की ओर से दृष्टि भी हटा ली। सखो से प्रेम है मुझसे नहीं, यही ध्वनि है । माय विशेष का दूसरा उदाहरण- पाई हैं गोधन पूजन को सब गोकुल गाँव की गोप कुमारी। सा में महा एक सु दरि है मनि श्रीपति श्री वृषभान दुलारी। राष्यी इत उत नेग्न स्याम जु मेरे कपोलन दौठि न हारी। हो तो वह प्रव बेई कपोल हैं ह्व गई औरई दोठि तिहारा । यह भी धाव्य प्रकाश के वाक्य वशिष्ट्य व उनाहरण का छायानुवाद है। नुवाद मौलिक जान पड़ता है । यह सरस, सु दर एव मम्मट पुम्मत है। वाक्य विशेष के कुछ स्मरण--- पजरस हियो समीर तें छये न सके धनसार । सज दूरि परि गनि त नव परविंचनु हार ॥ यहाँ वाक्य से ही विरहिणी नायिका व्यग्य है। स्यायो मनोरप पूरन क यर म्याह को दूलहि या रति रानो ।। सासु जिहानि ननद परोसिनि पौरतं पारछि घर पानी। सोति समै तरियाको महावर बांके विलोधन क मुसुषपानी । जैन (भोर) सलाये ललौहें विलोकि के पीछे तिरोछे मुरी मुरझानी ॥ सर्वया का प्रतिम वाक्य है कि सभी सपत्निया नवोढ़ा का महावर देवार प्रसन हुई परतु मायक के ललो. नेत्री को देखकर मुरमा गई । पान वाली बधू अपने स्नेह, धौवन मादि के सहारे हमसे नायर को घोन लेंगी, यह उनके मुरझाने से व्यग्य है। मेरे कान साल तन साल ! सक्षत हो ईदि। पैन पर वह सनेह की शेठि॥ नायक एव नायिका के समीप नायर को उपपत्नो सही है उसका प्रतिबिम्ब नायिका की भारसी में पड़ रहा है । नायर उपपत्नी के पारसीगत प्रतिविम्ब को स्निग्य दृष्टि से देख रहा है। उसके घले जाने पर दृष्टि में परिवतन पा गया । उसको नायिका न देय लिया है । इस दोहे में यही प्रपन-स्नेह ध्यग्य है । यह भी काव्य प्रकारे उगहरण को पाया है । काय प्राकार में पाप बतिपय से ध्यग्य स्वीकार किया है। प्रय सन्निपि म भी व्याय माना जा सरता है। । घे १५४ ध्वनि सिसात ध्यजनावृत्ति विवेचन मधुर मधुर बातें बहत यो गहि बैठे मौन । मुख को छवि प्रौरे भई लखो रावरी गौन ॥ नायिका नायक से कहती है कि अभी अभी माप मुझसे मीठी मीठी बातें करते थे । माप एकदम चुप क्यों हो गये, आपके मुख को छवि भी भिन हो गई है। इससे मापको किसी प्रय नायिका तथा उसके साथ किये वायदे का स्मरण हो पाया है । यह यग्य है । भय सन्निधि विशेष से- नाहु नेह सायो सरस नैकुन पारो होइ । छूननि पये प्रात छिन रहै नोंद बस सोइ । नायिका पडोसिन से कह रही है। यह दूती जो नायक का सदेश लेकर पाई है-को सुनाकर कहा जा रहा है । नायक रात्रि भर घर मे रहता है और प्रेम के कारण जागता रहता है, देवल प्रात काल थोडी देर के लिये सोता है । इससे यह व्यग्य है कि मैं उपपति से केवल प्रात काल ही मिल सकती हूँ। प्रय सनिधि के कुछ प्रय उदाहरण गोई प्रमावस सोम समोई अहे हैंसोई जि हे लहनौ है । सासु विभास की बेर सिधारि है साँझ सवारि धरयो गहनो है । केतो क्यिो ननदी मन दतिन देवर घेवर सो लहनी है । दोस इहै न रहैगी परोस को काल्हि को सनो हमें सहनो है । जार को समीप जान कर कोई -यभिचारिणी अपनी सखो से कहती है कि सास सोमवतो स्नान के लिये प्रात काल चली जायगी, ननद एव देवर भी न रहेंगे, परोसिनें भी गगा स्नान को जायेंगी। कल मैं अली रहूँगी । तुम कल प्रा सक्ते हो । यह यम्य है । मली करेरो हियो मेरो सासु को मो सिर हो सब भार दियों है । पंथत है जग में कवि श्रीपति जो कछू पूरब बीज बयो है । साझ परे खिन एक लहाँ विसराम इतों बडो काज लयो है। कासौं कहाँ सहिबोई बन रहिवो यहि भौति को मेरो भयो है। नायिका नायक जो समीप ही खडा है—को सकेत करती है कि सायकाल ही मिल सकूगी। यहा व्यग्य है । उदाहरण मम्मट के अनुकूल है । सासु ननद सौप्यो सदन कहि करि घर को काज । टि होइ क होइ नहिं सांझ समै मुहि प्राज ॥ इस उदाहरण पर मम्मट क उदाहरण को छाया है । नायिका अपने गुरुजनो के समीप वर्ती होने के कारण निक्ट स्थित जार से सष्टत कुछ कहने में असमर्थ सध्याकाल सहेट में मिलने का सकेत कर रही है । यही ध्वनि है । देश वैशिष्टय का उदाहरण ल्याई लाल बिलोकिये राखो प्रापु समीप । जानौ याहि न मौर सो जाई सिंहल दीप ।।

व्यजना वृत्ति १३५ - यह दूती को नायक के प्रति उक्ति है । यह नायिका जिसको मैं मापके समीप लाई हूँ सिंहल द्वीप में उत्पन हुई है। इससे यह ध्वनि निक्लती है कि यह प्रति सुदरी है और पदिमनी है। देश वैशिष्टय के कुछ म य उदाहरण हों अपने फर फूल विछाइ हौं प्रचर झारि सुधारि मही को। नसुफ के विसराम ही फेरि जगाइ हौं जाइ निसा जगे पी को। ल पोऊ और निकु ज में फूलरी बात तोपर छाडि हौं जो को। जोरि दुहू कर तोहि निहोरत यहाँ त सिधारियो राघरो नोको ॥ पहाँ पर 'यह एका तप्रदेश है' प्रत तुम यहाँ गुप्त वेपधारी मेरे जार को वेखटके चले माने दो। कोई नायिका अपनी विश्वासपात्र सखी से निवेदन करतो है । उदाहरण सरस, एव पायप्रकाश सम्मत है । इस पर भी काव्य प्रकाश को छाया है। बारे बडेन की पाते चलें तिरछी तकि क तिरछी मुसुफहैं । जपे न कैसे खिजये तुम्हें तजि पारो बडेन तो जांचन जहै ॥ साप परोसिन ले बरई हरये हरये घर हो फिी अहहैं । सास सुनो जु कपास चुनै हम काहुके जहें न पाहु बुलहैं । 'कपास चुनने के लिये हम किसी के यहाँ न जायेंगी और अपने कपास के लिये न किसी को बुलायेंगी' मादि बन 'सहेट का स्थान है' पथ प्रतीत होता है। यह दृवायन प्रति सुखद बसोवट सुख पाम । लाल दुपहरी रहि यहाँ चलिहें बीतं धाम ॥ पह देश एव काल का मिश्रित उदाहरण है। काल विशेष से- मापनी बात कहा कहिपे मन मोहन जू सबर्फ समुदाय हो। मोचक जागो प्रभाग को प्राखर प्रानप्रिया तुमही पं मिटाय हो। जो गुरु लोगन के घसवै पवि श्रीपति श्याम विदेश सिघाय हो। राखियो नौको तो बोल बरेन को प्राइ हों तो फिरि मोहिन पाइ हो । गुरुजनो के आदेशानुसार परदेश गमन के लिये तैयार पति से प्रियतमा कहती है कि यदि माप इस बसन्त ऋतु में प्रवास जाते हैं तो मैं मापके विरह में जी न सकूगी। मापको क्या गति होगी उसे मैं नहीं जानती । माप इस समय परदेश न जायं। यह ध्यग्य है । उदाहरण मम्मट के मनुसार है। काल वशिष्य के प्रय उदाहरण- समय वशिष्टय से- दरसत हग सरसत सलिल बरसत घिर धन घोर। बोलत सुख दोलत भवनि बन बन बोलत मोर।।

१३६ ध्वनि सिद्धात व्यजनावृत्ति विवेचन नायिका की विदेश गमन के लिये तत्पर नायक के प्रति उक्ति है । वह वर्षा की मोर नायक का ध्यान आकृष्ट करती है। इससे यह व्यग्य है कि वषा मे दूसरे जब घर लौट कर पाते हैं, माप जाने की तैयारी कर रहे हैं । खेद की बात है । इस अवसर पर मत जाइये । दिन दुक बठे घर ऐठे से रहत जेठ, कहा करों तिहैं ते सुख कौंन सकाइ हो । सहज सुभाव जोशु भाव जो सुमेद मान, ऐसे छेद मेव कसे वासर विताइ हों। याही अटपटे में न पट गहि राखति हो, इत बीति है जो बात पाति ही सा पाइ हो । प्रोधि बदि मधु को सिधारे हो सिधारौ प्यारे मधु में न प्राइहो तो माधो में तो प्राइ हो । 'मधु म इतै बीति है से 'मैं आपके वियोग मे मर जाऊंगी' अथ यग्य है । यह भी कवि का अपना उदाहरण है। चले दुहू दिसितें चमडि सुभट समर किलकारि । हुव विनोद मन में निरखि तिष्य तरल तरवारि ।। युद्ध भूमि का वणन है। समाम समय म विनोद बढने के वणन से युद्ध की इच्छा अथवा उत्साह व्यग्य है। देश वशिष्टय से- सुखद कुज छाया सघन हरत हिये की ताप । निरखि दुपहरी जेठ को चलन चहत अब पाप ॥ सगभोत्सुका नायिका को उक्ति है। जेठ को इस भयकर दुपहरी मे इस सघन कुज से अच्छा स्थान और कहा मिलेगा ? पाप यही सुरति कोजिये। यह यग 'जेठ की दुपहरी समय की विशेषता के कारण है। काव्य वैशिष्टय के प्रय उदाहरण- वाच्य विशेष से- भौन अध्यार हू चाहि अध्यारो चबेली के के बने हैं। बोलन मोर कर पिक सोर जहा तहाँ गुजत भौंर घने हैं ।। दास रच्यो अपने ही विलास को मन जू हानि सौ अपने हैं । कूल कलिंदजा के सुखमूल लतानि के वृद वितान तने हैं ।। यह 'दास' का मपना उदाहरण है। इस सवये मे एकात प्रकृति का रम्य चित्रण है। प्रकृति का यह वणन नायक द्वारा नायिका के प्रति अथवा नायिका द्वारा नायक के प्रति क्यिा गया है। इससे इस स्थान मे विहार को इच्छा व्यग्य है । घचला चपल चाह चमस्त चारों मोर, भूमि भूमि धुखा घनि परसत है। सीतल समीर लग दुखद वियोगिन को, सयोगिनि समाज सस साज सरसत है।

ग्यजना वृत्ति १३७ कहै परताप प्रति निविड मंध्यार मह मारग चलत नहिं तम दरसत है। भुमहि झलानि चहूँ कादते उमटि पाशु, घराघर धारन प्रपार वरसत है। इसकी व्याख्या में प्राचाय ने लिखा है 'इहा सुरति सभोग को व्यग सो मित्र सम बताय २ वहत है तात सुनया क विशेप से यग्य ।' यहाँ धाता की विशिष्टता से समोग व्याय मानने पर याता व्यभिचारिणी स्त्री होगी। इस छद में वर्षा का सुदर चित्रण है। यह वाच्य वशिष्य पा सगत उदाहरण है। लपटि रही है लता तरुन तमालन सों, विटप बिगालन प्रभाष दरसत है। सोतल सुखद दाह होतल हरनहार, सोतल समोरन सनेह सरसत है। कहै 'परताप' ल कुसुम कदयन ते, झरि झरि प्रबनि पराग परसत है। उमगि प्रमोद चहुँ कोद तें अधिक माजु, प्यारे बन वीथिन विनोद बरसत है । सभोग के लिये उत्सुकमना किसी कामिनी को एकान्त म नायक से रक्ति है । 'लपटि रही लता तरुन तमालन सों' आदि के कहने से सभोग की इच्छा व्यग्य है। वाच्याथ विशेष से--- बदलो धन सुदर सोतल छाहर श्रोपति मोमन मोद भरी। जमुना तट तें सोई कुज बनौ लखि के गृह राज सब यिसरी । प्रजु तमिय सोरी बधारो बहो मकरदन कजन पुजघरो। दिन कान अचानक काम महीपति तानि सरासन कोप करौ।। यह भी काव्य प्रकाश क वा 7 वशिष्टय यग्य के उदाहरण का मुदर अनुवाद है। फु जो की प्राकृतिक सघनता, सुदरता, स्थान को एका नता एव समय को मनोमोहकता कामोद्दीपन के लिये ययेष्ट है । सुरत के लिये इस नु ज में प्रवेश क्यिा जाय, यह व्यग्प है। वाच्याथ विरोप के अय गहरण- काजर सो बरस धन काजर से परसे ते वियोगन प्राधे। घोर घुमार सुमार पर मो खुमार खरो रसकों उपजाव ।। दादुर सोर झोर ययारि के त्यो वन और तें मोर सताय । साक्ष जयद्रय के दिन को यहि राति को भोर भदूसरि भाव ॥ वर्षा कान का वणन कामु अथवा उसको दूतो द्वारा है। वादल से जल अधेरे वी वर्षा, काम को पीडा द दुरो का शोर, हवा के झोंके, मयूरो का शोर मा िहै । इस समय सभोग का अवसर है । छ द के प्रय से ही यह व्यग्य है ।

१३८ प्वनि सिद्धात मोर व्यजनावृत्ति विवेचन काकु विशेष स- दुवन दुसासन महीपति सभा मे गो द्रुपत सुता को चोर जग हाहाखात भी। ब्यापन के साथ करयो वन मे निवास भयो कद मूल असन बसन तरुपात भो । श्रीपति भनित जाय रहे हैं विराट गेह जिहि दिन दिन अनुचित भधिकात भो। तापर तस्त मया करि क सुयोधन पं धरम स्वरूप राजा मोपर रिसात भौ ।। वेणी सहार नाटक मे भीम की सहदेव के प्रति उक्ति है। उसी का यह धायानुवाद है । मम्मट ने काव्य प्रकाश में भी काकु का यहो उदाहरण दिया है। जय भीम ने युधिष्ठिर को अनुत्साहित देखकर उलाहना लिया तो सहदेव ने भीम स उसाहना न देने के लिये प्राथना की क्याकि युधिष्ठिर चिढ जायेंगे। उस समय भीम ने सहदेव से कहा कि भाई मुझस जरा सी बान पर चिढ़ जायंगे, कौरवों पर इतने अत्याचार करने पर भी न चिढे । यदि कोध करेंगे तो मेरे ऊपर क्रोध करना अनुचित है। यह व्यग्य । छायानुवाद सुदर है। काकु की विश्राति प्रश्नमात्र से ही हो जाती है। विशेष अध्ययन के लिये काकु के उदाहरण- ज्याइ समीर उसीर से बारहिं बार मुरारि निकाम भुतो। जाति जरीरी मरीरी इहै रटि सोवन दोहीं न मापु सुती । राति व मोलि प्रबोलि भई अब ऐसिह मौसी कि तीनि धुती। क्यों हो लली जु ललाहि बुलायन हों ही न गई तुम यों ही हुती । क्यो लाल को बुलाने मैं ही न गई ? अर्थात् मैं ही अकेली गई थी। यह कम्प स्वेद मादि सभोग्य ज य नहीं अपितु मागभय एव गमन थम जय है, आदि अथ यग्य है । गोकुल माज गई दघि बेचन ग्वालि सब मिलि ढिकु जानहि । मायौ अचानक दौरि हूँ ते गुपाल तहा लिये सग सखानहि । माननि ते पट पूघट टारि लुटाय भटू घटतें कुल शनि है। कौन विकाइ गई बिन मोल विलोकति मोहन को मुसिक्शनहि ॥ यहा को न विकाइ गइ प्रश्न से ही प्रथ की प्रतीति हो जाने से काकु की विश्रान्ति हो जाती है । इसलिये मार्थी व्यजना का सुदर उदाहरण है । हग लखि हैं मधु द्रिका, सुनि है फल धुनि कान । रहि हैं मेरे प्रान तन प्रीतम करौ पयान ।। 'रहि है मेरे प्रान तन काकु से यह अथ निकलता है कि प्रापके प्रयाण करते ही मैं मर जाऊ गो । इससे व्यग्यार्थ यह हुआ कि 'पाप परदेश न जाय । मागे चेप्टावैशिष्टय से प्रकट होने वाले व्यग्य के उदाहरण हैं- हरि ललचौहें घखनि त देखी तिय सुख मूल । 7 प्रात धतुर जल में दियो बघु जीव को नायिका को नायक ने लालच मगे दृष्टि से देखा तो नायिका ने दुपहरिया का पुष्प दिखाया। इससे यह ध्वनि कि में मापसे दुपहरी में वन में मिलू गी।

यजना वृत्ति चेष्टा का लपण यह है और भय जो समुझाव । चेप्टा ऐसी प्रिया रहार्य । ही बछरान चराइवे को तित गो जित हो वृषभान का द्वारो। जध मिलाइ लई भुज मलि सको चित्तक अरु वन विसा । श्रीपति जू मनि नन नचाइ क तोख चलाइ क्टाछ कटारों। सोसते चि लियों पर घूघट के मुख चद ररशत उज्पारो॥ नायिका ने उपपति के सम्मुख आने पर अनेक चेप्टामो से अपनी कामोपमोग की प्राकाक्षा यक्त की। इसका विशेष उल्लेख दिवतीय प्रध्याय म प्रार्थी व्यजना के प्रसग म चेष्टा के उदाहरण में हो चुका है। कसिबे मिस नोदिन के छिन तो अग प्रगनिदास दिखाइ रही। अपने ही भुवानि उराजनि को गहि जानु सों जानु मिलाइ रही। ललचोहैं लजोहैं हंसो हैं चित हित सौ चित चाह बढाई रही। क्नसा करिक पगु सो परिष पुनि सूने निकेत में जाइ रही। इम उदाहरण पर भी काव्य प्रकाश की छाया है । उदाहरण सु दर एव मौलिक सा है। यहां चेष्टामा से सभोग के लिए नायक का बुलाना यग्य है। चपक माल मलो हिये सखी सामु हैं स्याम । निरखि प्यारि हू हरसि हसि उर दूदी पर दाम ।। नायक ने नायिका को सम्मुख देखकर चपक माला को हृदय से मलकर गाढ प्रालि गन का समेत विया ! नापिका ने भी नायक के सात को समझ कर हसकर हार को हृदय में दवा लिया । इमसे अपने अनुराग का मकेत करके अदमर पर मिलने का वायदा किया। प्रमग वैशिष्ठ्य का उदाहरण मुयो पीय तो प्राय है सजनी याही बार । जो करनी सोकीजिये प्रब क्यों करति अपार ।। माधाम मम्मट ने प्रसग के लिये प्रकरण शब्द का प्रयोग किया है । यह दोहा मम्मट के उदाहरण की छाया है । यदि यह दोहा परकीया के प्रसग म कहा गया है तो यह ध्वनि कि जब प्रय नायिकायें अपने उपपतियो से मिलने गई हैं तू मो अपन उपपति से मिलने के लिये जा पोर पनि स्वकीया का प्रमग हो तो यह ध्वनि कि तू गृह काय पूरा कर और शृगार मादि कर । प्राचाय ने यहां पर प्रसग और प्राय सनिधि का अन्तर स्पष्ट किया है । प्राय सनिधि में चोध्य बाधक भाव होता है जिसको समीप जान कर बात कही जाती है वह वोध्य है और वक्ता है बाधक । श्रोता तो बहाना मात्र होता है । इसके विपरीत प्रसग में श्रोता मुख्य होता है, वही बोध्य होता है । जिसके सम्बध मे प्रसग होता है उससे छिपा कर बात कही जाती है । विरोप प्रत्ययन के लिए प्रस्ताव वशिष्ट्य से व्यग्या के माय उदाहरण दिये जा रहे हैं- प्रस्ताव विशेष से- राज करो बलि राज करौ मिलि, प्राजु हसे बिन जाति न यारी। सासु रिसाति निसो सरसाति, तुम्हें क्छु काव करवे न स्यारी।।

१४. पनि मिहान जनावृत्ति विवेचन मे में पपने अपने घर, पारि परी को है पायु मारो। जान से मानो रिती वम गो से होप परगो मारी। परम पर होन वानी पिया काईम्पमियारिया पारी दर और शेरना पाहा १.मो शाप में सात की तो उन स्त्रियों से विशन मिपे बहाने बनाता है ।मर पहरिनारोपनामाह TR,नको जान मिसे तिस मिलन रे पिय एम मिरमा पन घोपन तन मास मुस र म जान । रहि लोग ये है परो जो गए करनी हो। गिकों ने भाग में मूरत का विनता र धौर नान के प्रमा म अमार हो। जोक्न माग गोहान गुण रहल म जाने । र सो पौनयन पावोगरने हो। गातार होगा उगोक पनुगार इस मार्ग पर रायगागार माय -मोगवार मोमि, मोर उमाश में पर्म रनिनिय माना चामा पोर पग पा लिन एवं रिपरिपाई है। पोलिसा हा हरियो पर रसिं तुम चार गार है। कालो पिरो मार हाए पर पूरी साम र गुर रोमो गुनों परापार में परिभातु कोरिया पर पाई है। गीत free rमन के मि HIT गाना गीत मा है। बोरी के मामने रा महाग रागरा निरपति मान मर-पार जापाम जाने में निवारकरी है। मामिण पर पौधार REP SETTER नरीमrn पास हो तो Ruary पर मारा महापESIITTETTI- हो गr on Tre frr Hair frr at गो। परमार, nिgathanो। 41 रने और मर मर Rare meी। yen wala fruirien. Ktr mr...।.rimrrit Pitrum..rrentiaurat taimraightent.. Preeti Irriatr.ir Arrrrrrrrr- Enet यजनावृति १४१ मिश्रित तुमा से प्रकट हान वाले व्यापार्ण के अय उदाहरण- भारे भरोसे घरो रह साम लों, साझको और तो भोर तो ध्यावति । तेरे तो वीरन नीर को औरो, कटोरो भरे तौं धो ढरकावति ।। लावति । ऐसी उदार को दूसरो दार जो मौसर मापने नौसरी नागरि तू गुन प्रागरि गागरि धूप ही मे गहि कूहि धावति ।।' प्रतरग सखी दुपहरी मे नायक से नायिका के मिलाने का वायदा कर पाई है। नायिका को सखिया म उपस्थित देखकर उस नायक से दुपहरी म मिलने का स्मरण दिला रही है । यहाँ वक्ता, बौद्ध-प प्रादि का सदाह अर्थ व्यजक्ता का हतु है। इहि सज्जा अजा रहै, इहि हो चाहतु सन । है। रतौधिहे बात यह, सैन सम भूल न । यह दोहा मम्मर का अनुवाद है। प्रोपितपतिका व्यभिचारिणी स्वय दूतो बनकर कामातुर पथिक स कह रहा है। रात्रि को मरा शय्या म आकर सोना' व्यग्यार्थ का प्रतीति हो रही हैं। यहाँ वक्ता और बोद्ध य दोनो हतुओ का समुदाय है । अग तीन प्रकार का होता है ? वाच्य, लक्ष्य, और व्यग्य । इन तीनो अर्थो स पुन व्याय प्रतोति हाती है। इनके क्रमश उगहरण मागे दिय आते हैं ! वाच्य को व्यजकता का उदाहरण- पहिले सुनि यात परीसिनि की कहिवोई करी कब देखो दई । सुसदेगनि नेह बढाई बुलाइ हसी जव पाहुनी देखो नई । लखि लाल के लोचन लाज कडू अव तो तन को गति और भई तिय चार विचार जुतै मन फार पिय मुख हेरि उसास लई । यहाँ लोचन लाज' पद से नायक की आसक्ति जानकर उसास लो इससे नायिका का दुष व्यग्य है। वाच्य की व्य नक्ता के कुछ और उदाहरण दिय जात है- छिन छिन अोछा होति कटि छुनी चपलता पान । चतुराई बननि बसो नन लगे तिरछान । यह भा सु दर उदाहरण है। नायिका योवन म प्रवेश कर रही है। व्यग्याय की प्रताति दाह व वाच्याथ से होती है। बूमत तोहि न बुझत और पजौ प तुही मति को समुदाय है। पाइन छूर्व विनती अति ठानति जानि प्रवीन महा मेरी धाय है भोर ही काज करो घर को भान श्रीपति जो कछु याको उपाय है । काह को ध्याँस गयो सुख सो अब प्राजु को वार तो कस विताय है । व्यभिचारिणी प्रपनी धाय से प्रार्थना करती है कि घर का काय शीघ्र समाप्त कर लिया जाय जिसस स या म विश्राम का अवकाश मिल जाय फ्लत उस अवकास में पति स सुख पूर्वक विहार किया जा सके । इसम काव्य प्रकाश + उदाहरण को छाया सी है । यहाँ वाच्य प्रथ स ही प्यजना होती हैं। - - १४२ ध्वनि सिद्धात और कनावृत्ति विचन कहि दीजै हम सौति सो काज जित घर माहि । करि लीज याही घरी दिवस रहे थिर नाहिं ।। नायिका की प्रतरग सखी के प्रति उक्ति है । मैं दिवम म ही अपने सभी काय समाप्त कर लेना चाहती हूं जिससे रात्रि म नि शक होकर प्रिय से मिल सकू। यह व्यग्य वाच्य अर्थ से ही निक्लता है। प्रवर सघन घन परषत मन हरपत बन हेरत हरित छ छाई है। महमहे कुज लहलहे बेलि पुज अलि पर मजु गुज पिक वोलनि सुहाई है । पूरि रहे पल जल पुहमो न हल चल पावस प्रबल यह बेर पनि पाई है। मोरन की घोर मागे सुनिये न सोर प्राजु विधि हरि चौरन को भाग की बनाई है। उक्त उदाहरण में लक्षरण का प्रसग उपस्थित नहीं होता है । वाच्य से ही एकात एव निजन स्थान और कामोद्दीपक समय व्यग्य है । इस व्यग्य से सुरति की विनती यग्य है । प्रम मदमाते विन जोहा पिक जोहा जोर, बोलत पपीहा मोरधान मुख चूमि चूमि । तेसिये झकोरन चलत पुरवाई इहै घुरक्षा घुरारै छिति छोरन लो भूमि भूमि ।। कहे परताप घोर घटा घहराती विज्जु छ। छहराती लहराती लता लूमि लूमि । अमडि शलान झाने झए सौ झमकि भुकि कपि भपि धन धूमि पूमि ॥ यहाँ वाच्य से वर्षा का समय प्रतीत होता है और उमसे भोग की इच्छा प्रतीत होतो हैं । लक्षणा से लक्ष्यार्थ को प्रतीति होती है । लक्षणा के प्रसग म प्रयोजन की प्रतीति व्यजना व्यापार से होती है। किंतु कही वही लक्ष्यार्थ पुन व्य ग्यार्थ की प्रतीत का हेतु बन जाता है। लक्ष्यार्थ की व्यजकता का उदाहरण प्रेम को पाठ पढ़ी है तुही यह कोउन जानत प्रेम प्रबीनो । श्रीपति प्रावत जात थकानहि मोल हमे विन दामन लोनो ॥ सेरी सो तो सोन और हितू क्यु दोबो धौ मोहि कहा सुख दोनों। मेरी महा लखि बेदन को सखि प्रापन देह निवेदन कोहा ।। नायिका ने दूतो को नायक के समीप उसको बुलाने भेजा। नायक ने दूतो के साथ भोग कर लिया । दूती के लौटने पर उसके शरीर लक्षणा से नायिका को पता चल गया कि नायक ने इसके साथ रमण किया है । नायक के इस कथन हे सखि ' तूने मेरी वेदना को दूर करने के लिये अपनी देह दे डाली' से विपरीत लक्षण से यह यग्य निकला कि नायर ने तेरे साथ रमण करके मेरे प्रति अपराध किया है । तुम दोनों ने मुझे दुख दिया है। लक्ष्याप की व्यजक्ता के कुछ प्राय उदाहरण- सीतल होत हियो सुनत कहत बात तुनरात । सालनु भले भले बदन प्राइ दिखायो प्रात ।। सघन स्यजना वृति १४३ नायिका धीग खडिता है । नायर भयत्र रात्रि विता कर प्रात काल उपस्थित हुप्रा है । इमलिय 'हियो सोतल होत' से विपरीत लक्षणा द्वारा' मे भापके व्यवहार से प्रत्य त दुसी हू ध्याय निक्लता है। तोतों कौन हितू परी भरी खरी निज काज । मेरे हित निज प्रग मे सहे नख-खत प्राम ॥ नायक से सब उपमुक्त सखी से नायिका को उक्ति है। उस पर-सक्षत प्रादि मभोग विह प्रकट हो रहे हैं । उनको दसकर नायिका रहती है । विपरीप लक्षणा स 'तून मपराध क्यिा है प्रति व्यग्य है। सचर सदा सुनति हो सुजस बढयो सुभ सर । सुबस बस लकापुरी पिय रघुवर के बर ॥ यह मदादरी की रावण के प्रति उक्ति है। विपरीत लक्षणा से यह यम्य बी लका उजाड होगी। भली करो नंद • नद तुम रगे बरी रण। कहियो ऊधौ नित हमें होति विरह सौ जग। विरहिणी गोपी उद्धव से कह रही हैं । यहा 'भली करो' से यह व्यग्य है कि 'मापने अच्छा नहीं क्यिा' । जब से माप कूबरी से प्रेम करने लगे हैं तब से हम मापके विरह मे प्रत्यात दुखी हैं । पर तु यह व्यग्य विपरीत लक्षणा से निकलता है, इसलिये यह लक्ष्यार्थ का उदाहरण है। साहित्य दपण कार और काय प्रकाशकार ने भी इस प्रसग मे विपरीत लक्षण वे ही उदाहरण दिम हैं। यग्याथ पुन ध्यजन हो जाता है । व्यग्याथा को ध्यजकता का उदाहरण-- तु ग तमाल की छह घनो जह सूरज हू नहिं ताप करी है । सारस हसन कूजत जह देदन को मन मोद भरी है । श्रीपति जू मलिनी दल में बक - बाल अचल भछोभ भरौ है । मानो सिंगार के भाजन पर रतिनायक सुदर सख धरौ है । इस उदाहरण पर का य प्रकाश को छाया है । नायिका नायर के साथ एका त प्रदेश म पहुँच गइ है । वह नायक को अपनी मातरिक कामना व्यक्त करना चाहती है। वह कहती है, चारों मार तमाल वृक्षा की सतापहारी छाया है और मन म मोद बढ़ाने वाल सारस और हस कूज रहे हैं। इससे स्थान विहार योग्य प्रतीत होता है। कमलिनी पत्र पर बर बाल प्रचचल बठा है जिससे स्थान को निजनता प्रकट होती है। यह यग्य से ययार्थ प्रतोनि का सु दर उदाहरण है। छद मौलिक सा प्रतीत होता है । व्यम्य यजक्ता के कुछ मय उदाहरण- सोहि रही सरिता चहू मोर ते पाच लुव ते बुझे तिहि माहो । दोस न कोस लो गाऊ चहु दिसि कैलि विह्य कर चित चाही । मारम भूलि तु माये भले हो मिली तुर भाग अकेलो इहा हो । देखि रे पपिक यावा बीच सुपाजु को ग्रोषम भीषम नाहों।

ध्वनि सिद्धात पोर व्यजनावृत्ति विवेचन
उपयुक्त वणन से एका त और निजनता है। इस पग्य से 'इम मनोरम, मुखर एम
एका त निजन स्थान में मेरे साथ मुखपुवक भोग करो' नायिका की इच्छा यग्य है । यह उनाहरण
कवित्वपूण एव सगत है।
कुण्डल मुकुट कटि काछनी तिलक भाल ।
सोमनाम है मद गवन मनोहरा ।
यारिये रो। कोरि मनमय की निकाई देखि,
भकुटो नचाव रो रचाव चित मोहरा ।
बडे बडे नैन पुनि सावरे वरन घर
लोगनि को लगर लुभावे पदि दोहरा।
माय नित मुरली बजावे तान गावै यह
छरहरी फोन को छवीलों छल छाहरा ।।
इसमे वत्ति के पथन की भाँति अपरिचय यग्य पोर पुन उस यग्याय से भी परिचय करने
को इच्छा अथवा मिलने की इच्छा व्यग्य है।
निवल विसनो-पत्र पर, उत बलाक इहि भाति ।
मरक्त भाजन पर मनौ, अमल सुख सुभ जाति ॥
नायक और नायिका एकात प्रदेश में पहुंचते हैं ता नायिका नायक से कहती है । बलाका
का विसनी पत्र पर निश्चल बैठना उसके प्राश्वस्त होने का सूचव है और इससे वह स्थान निर्जन
और एका त है फ्लत सु दर सहेट है, यह यग्याथ । अथवा तुम इवर नहीं प्राय यदि इधर
भाते तो यह बलाका इस प्रकार निश्चल बैठो होतो तुमने वायरे का पालन नहीं किया प्रालि
यग्याथ की प्रतीति भी होती है।

- २-ध्वनि-काव्य यहां तक ध्वनि के किस व्यावहारिक रूप का उल्लेख हुप्रा जो करण प्रधान मर्थ अथवा व्यञ्जना-व्यापार माना जाता है । ध्वनि का एक प्रय अधिकरण प्रधान भी होता है और इस भयं ध्वनि शब्द से प्रमुखतया काव्य का ग्रहण किया जाता है। ध्वनि कार ने उसका लक्षण निम्न- लिखित शब्दों में किया । जहाँ मथ अथवा पर अपने को अप्रपान करके उस मर्थ (व्यग्य) को मभिव्यजन करते हैं इस काव्य विशेष को विद्वान् लोग ध्वनि कहते हैं।' इस लक्षण में ध्वनि के दोनों ही प्रधान रूपों का उल्लेख है। (१) ठग्य मथ और (२) व्यग्य पथ मुक्त काव्य । व्याय अर्थ के प्रति व्यजक श द और अथ गौण हो जाते हैं। वाच्य की अपेक्षा व्यग्य मे जव चारता और प्रधानता होती है उस समय उससे युक्त भाव्य ध्वनि कहलाता है। पर तु वस्तुत वही व्यग्य ध्वनि माना जायगा जो वाच्य या अपेक्षा प्रधान और चमत्कार युक्त होगा, वाच्य की अपेक्षा व्यग्य मे सवदा प्रधानता रहती है पयोकि वक्ता का वोघव्य के प्रति यही प्रभीप्टार्य है। इस प्राधा य का एक प्राधार व्यापार्य का याच्याथ की अपेक्षा चारत्व युक्त होना भी है। साहित्य-दपणकार के लक्षण में ध्वनि पद का प्रयोग व्यग्याथ का बोधक है और काव्यप्रकाश के लक्षण म काव्य का । काव्यप्रकाशकार ने अपने लक्षण की वृत्ति में स्पष्ट करते हुए लिखा है, "लक्षण, मे जो इदम् पद है वह काय का बोधक है । ध्वयालोककार के परवर्ती भाचार्यों ने इही दोनों मों में से किसी एक को प्रधानता दी है। अर्थात् प्राचार्यों का एक वर्ग काव्य को प्रधानता देकर चला तो दूसरा व्यग्य पथ को। मम्मट कान्य को प्रधानता देने वाले प्राचाय हैं और विश्वनाथ व्यग्य अथ रस को प्रधानता देने वाले । जैसा पहले कहा जा चुका है व्यग्याथ वाच्याथ की अपेक्षा प्रधान अथवा प्रमुख होता है । व्यग्या का प्राधा य दोनों वर्गों के प्राचार्यों को मा य है। इसकी प्रधानता तो काव्यस्थात्मा ध्वनि ।' पहने वाले प्राचाय से लेकर व्यक्तिश्चानावरणा चित् स्वीकार करने वाले भाचाय तक ने स्वीकार की है। काय की उत्तमता और प्रधमता इसी प्रथ के यूनाधिक समावेश अथवा उसके चारुवाचारुत्व पर निभर करती है। प्राय प्राचार्यों ने काय का विभाजन इसी व्यग्याथ के माधार पर किया है । यह अथ ही काव्य के विमाजन की प्रमुख क्सौटी है। ध्वनिवार ने व्यग्य की प्रधानता अथवा अप्रधानता की दृष्टि से काव्य के मुख्य दो भेद दिये हैं। प्रधानगुणभावाच्या व्यग्यस्यैव व्यवस्थिते । काव्ये उमे। - Low १ ध्वयालोर १/१३ २ इदमुत्तमतिपिनि व्यग्ये वा यानिबुध बयित । का०प्र० १/२ ३ वयालोक १/१ रसगगाधर ५ ध्वन्यालोक ॥४२ ४ १४६ बनि सिदान्त और व्यजनावृत्ति । विवेचन जहाँ काम्य में व्यग्य पर्ष की प्रधानता होती है वहाँ 'ध्वनि' नामक काव्य स्वीकार रिया पाता है और जहाँ व्यग्य मयं मप्रधानता प्राप्त कर लेता है वहां गुणीमूत व्यग्य नामक मप्यते काव्य माना जाता है। उदारचेता माचाय ने जब यह देखा कि ध्वनि जसे विशाल क्षेत्र में प्रतिष्ठित हो जाने पर भी कुछ काव्याभिधायी वाहमय बच जाता है। जो व्यग्य पाएरव को प्रधानता और प्रप्रधानता वाले उपयुक्त दोनों काप्यो को कोटि मे सम्मिलित नहीं दिया था सकता तो उहोंने काव्य के तीसरे भेद चित्र को भी मान्यता दी "उसके (प्वनि मोर गुणीभूत व्याय ) मतिरिक्त जो मय काव्य है उसको चित्र काव्य - बहते हैं।" रहोंने अपनी चित्र-काव्य सम्बधी मा यता को स्पष्ट करते हुए लिखा है। "उन (प्वनि तपा गुणीभूत व्यग्य) दोनो से मिन रस, भाव मादि तात्पर्य से रहित, मोर ध्यग्यार्थ विरोप के प्रकाशन की शक्ति से रहित, केवल धाच्यवाचक मोर शब्द) के वचित्र्य में मापार पर निर्मित जो काव्य मालेख्य (चित्र) के समान (तात्विक रूप रहित प्रतिकृतिमात्र) प्रतीत होता है उसमो चित्र-साध्य कहते हैं । वह मुख्य रूप से साध्य नहीं है अपितु काव्य की अनुकृति मात्र है। उनमें से पुष सन्द चित्र होते हैं जसे दुप्पर यमा मादि मौर बुछ मर्म चित्र को द चित्र से मिन, प्यम्य सस्पा रहित, रसादि तात्पर्य से पूय, प्रधान वाक्यार्य रूप से स्थित उत्प्रेक्षा मादि घ्यनिकार ने चित्र काम्य को 'म्यग्य सस्परा रहित, स्वीकार किया था। काव्य प्रसार को भी चित्रकाय्य के सम्बप में यही मा यता रही। व्यग्य की पोडी बहुत स्थिति तो सवा सिट मी जा सकती है । इसी समावना के कारण हो भामह ने वोक्ति के सम्बय में स्वीकार पिया पा कि इसके मिना कोई मलकार हो ही नहीं सकता। इस समाषना को स्योरार करते हुए प्पनिमार में महा पा" दीपर और समासोक्ति मादि में समान मय पलार भी प्राप म्यग्य-पग्य प्रकार मपवा मर वस्तु के रास्पां से युक्त दिखाई देते हैं। स्वनिसार के वचनों में पदको म्यम्यस्यास्म प्रापाये ध्वनि सशित साम्य प्रकार गुणभावे तु गुणीभूत प्यग्यता । प्पग्या वृत्ति, पृ. २७१ २ वयासोर, ३४२ ३ সমীয়ামে বি এমথ যি মুফান ঘষ্টি ঘুম ঘামবৰ যাম वापर यचिन्य मात्रा में येणोपनिबसमालेश्य प्रस्य मदामासने तश्विरम् । म वरमुस्य पस्याम् । दाम्पानुकारो एसौ । "अगादि। पया०, पृ. २७५ हिदी रावियेपर, पृ. ४१६ 11०प्र०, १r (4) तपाहि दौर ममासो छयादिषद मेऽप्त द्वार प्रायेण ध्वम्यामधारावर पररवनर सपनोसनेमा,पृ. २५९ (३) मसानोर, पृ. २१३ गयपानास्रवेष सहदय हृदय हारिण सम्पाय ए प्रारोपत्र म प्रतीपमानाय सुरपान गौमाम्यम् ।

ज्वनिकाय , व्याधात् दोष का सा मामास होता है । इस प्रामास की समावित स्थिति को समवयवादी माचार्य मम्मट ने अपने प्रव्यग्यम्' पद को वृत्ति मे 'स्फुट प्रतीयमानार्थरहितम् ' से स्पष्ट कर दिया था। कहने का तात्पय यह कि ध्वनि काव्य मोर गुणीभूत काव्य मे प्रतीयमान अप स्फुट रूप 'मे विद्यमान होता है । 'प्रस्फुट' नामक गुणीमूत व्यग्य कान्य के प्रसग मे भो व्यग्य समावेश चित्र काव्य की अपेक्षा स्फुट तर होता है। ध्वनिबार ने चित्र काव्य के दो भेद-शब- चित्र मोर वाच्य चिन अवश्य किये थे। परतु दोनों को काव्य का एक भेद हो माना। काव्यप्रकाशकार ने भी इसको मा यता दी। परतु पण्डित राज ने शब्द चित्र और भथ चित्र दोनो भेदों का समावेश एक ही प्रघम कोटि में अनुचित माना । कारण वाच्य, चित्र शब्द चित्र की अपेक्षा उत्कृष्ट है। यद्यपि पण्डितराज के कथन मे भौचित्य है परन्तु ध्वनि के आधार पर अलग भेद कल्पना करना विशेप समोचीन नहीं जान पडता। इस दृष्टि से दोनों भेदो को एक ही चित्र कोटि मे रखना युक्ति युक्त है। यदि चमत्कार के माधार पर भेद किये जाते तो पण्डितराज की मा यता ठीक होती। जहाँ व्यग्य चमत्कार युक्त एव प्रधान वहां उत्तम जहाँ वाच्यार्य कोटि का अथवा उसका मग व्यग्य वही मध्यम और जहां केवल व्यग्य ससारा मात्र चित्र काग्य माना गया। डा. भोलाशकर ने पहित राजका मत मान्य ठहराया है । रस के आधार पर काव्य के भेद स्वीकार करने वाले प्राचाय विश्वनाथ ने चित्र काव्य को काव्य की कोटि से निकाल कर बाहर फेंक दिया उहोने ध्वनिकार के 'उभे काव्ये' को ही ध्वनिकार को यथाथ स्वीकृति माना। मम्मट की मा यता को पालोचना करते हुए उहोंने लिखा 'कोई विद्वान् चित्र नामक का तीसरा भेद भी मानते है । यह ठीक नहीं। भव्यङ्गपद से यदि यह तात्पर्य है कि व्यग्याय से एकदम पूय हो' तब तो वह का य ही नहीं हो सकता, मोर यदि कुछ अथ मे 'ना का प्रयोग मानकर भयग्य पद का प्रथ 'ईपद्व्यग्य' माना जाय तो प्रश्न यह है कि क्या प्रास्वाद्य वस्तु के थोडे व्यग्य होने पर 'ईपद् व्यग्यत्व' विवक्षित है अथवा अनास्वाद्य वस्तु के थोडे व्यग्य होने पर यदि पहला पक्ष मानो तब पहिले दो भेदो (ध्वनि और गुणीभूतव्यग्य) मे ही इसका अतर्भाव हो सकता है, और यदि दूसरा पक्ष मानो तो वह काध्य ही नही हो सकता । क्योकि प्रास्वाद्यवत्व ही काम होता है। इसमें कोई स देह नहीं कि अलकारवादियो एव ध्वनिवादियो द्वारा अलकारो के उदाहरण 17 ५ का०प्र०, १/४ घ्यया, ३/४३ का पृ०, १/४ रसगगाधर, पृ० २४ ध्वनि-सम्प्रदाय और उसके सिद्धात पृ० ३३६ के चिच्चित्रास्य ततीय काव्यभेदमिच्छति । तन्न । यदि हि भव्यग्यत्वेन व्यग्या भावस्तदा तस्य का यत्वमपि नास्तीति । ईपद्व्यग्यत्वमिति चेत्, किनामेपद व्यग्यत्वम्, भास्वाद्यव्यग्यत्वम्, मनास्वाद्य यग्यत्व वा । माद्य प्राचीन भेदयोरेवात पात । द्वितीये त्वकाव्यत्वम् । मास्वाद्यवत्त्व कायस्वम् । साहित्यदर्पण विमला टीका, पृ. २१५ २१६ ६ १४८ ध्वनि सिकात व्यंजनावृत्ति । विवेचन स्वरूप प्रस्तुत घो की परीक्षा की जाय तो काव्य सौदर्य की दृष्टि से उह मम्मट के शब्दों में चित्र मथवा मधम (प्रवर) काव्य पौर पण्डिनराज के शब्दों में मध्यम वहा समीचीन प्रतीत नहीं होता। वे सभी गुणीभूत व्यग्य काव्य मे ८ भेटो में से किसी न किसी भेद मे समाविष्ट हो सकते है। इस प्रकार मधम पाय का क्षेत्र गण्य ही रह जाता है मौर विश्वनाथ का पयन श्रुटिपूण होते हुए भी बहुत मसगत नहीं रहता है। 'मलकार सर्वस्व' के प्रणेता स्टयक मोर "चित्र मीमासा' लेखक मप्ययदीक्षित भी मम्मट के अनुसार काव्य के तीन ही भे मानते हैं । प्रस्तुत प्रवप के सीमा क्षेत्र में चित्र काव्य या व्यग्य विरहित हाने से समावेश प्रसग प्राप्त नहीं है। इसलिए उसका विस्तत उल्लेख भी मप्रासगिर है। पाग्य के नेप दो भेदों के विषय मे किसी भी ध्वनियाती प्राचार्य को विप्रतिपत्ति नहीं है । ध्वनिकार ने उन दोना को अमरा ध्वनि और गुणीभूत की सगा दी है। मोर वाव्यप्रकाशकार ने उत्तम मौर मध्यम की। पण्डित राज ने अप चित्र को मध्यम याव्य की राज्ञा देकर ध्वनि को उत्तमोत्तम भोर गुणीभूत व्यग्य काव्य को उत्तम काय कहा है । साहित्य दर्पणकार ने ध्वनि को उत्तम मौर दूसरे को गुणीभूत व्यङ्गय ही माना है। व्यग्य के चारत्व उत्वप एव प्राधाय के कारण ध्वनि को उत्तम कार माना गया है । ध्वनिकार, काव्यप्रकाशकार और साहित्यदपणकार इस मा यता के सम्बध में एक्मत हैं । पण्डितराज भी उसे उत्तमात्तम स्वीकार करके वही बात कहते हैं । ध्वनिकार काव्य में ध्वनि की आत्मारूप में प्रतिष्ठा करने के लिये वृतनिश्चय ये फलत उन्होंने म्यग्य का ही विवेचन क्यिा है और उसी के सम्ब ५ से काय भेदा का यथास्थान सकेत कर दिया है। समग्र काव्य का साङ्ग विवेचन प्रसग बाह्य था। वह काव्य के सभी प्रगों पर विचार करते तो काय के भेदादि का विवेचन पावश्यक होता। काव्य प्रकाशकार भोर साहित्य दपणकार का य का साङ्ग विवेचन करना चाहते थे। इसलिये उहोंने अपनी विवेचना काय परिभाषा और उसके भेदों से प्रारम्भ की। काय प्रकाशकार ने उत्तम वाय पा लक्षण इन पदों मे दिया है इदमुत्तमतिशति यग्ये वाच्याद् ध्वनिबुध कयित । इस लक्षण म इदम्' पद काय के लिये है भौर उत्तम पद उसकी सज्ञा है। इस उत्तम काव्य को का य शास्त्र के पण्डित ध्वनि भी कहते हैं। इसमे व्यग्य वाच्य की अपेक्षा मतिशायी (अधिक चमतारयुक्त और प्रधान) होता है । विश्वनाथ को भी यही मा यता है। मम्मट ने अपने लक्षण का निर्माण काय को ध्यान में रखकर किया था मोर साहित्य दपणकार ने व्यग्य प्रथ को ध्यान में रखकर । १ हिरी०प्र०माचाय, पृ० १८८ २ ध्वया०, ३, ३४, ३५ ३ का०प्र०, १२३ रसगगाधर, पृ० ११ ५ सा०८०, ३१३ ४ म्वनि-काव्य । १४९ - -- - न . - -- - यह उत्तम काव्य का लक्षण है, 'मात्र काव्य का नहीं है । रीतिकाल के प्राचार्य सूरति मिश्र ने अपने प्रथ काव्य प्रकाश मे उत्तम का लक्षण इस प्रकार किया है याच्य प्रयते जहँ मनत सुदर ध्यग्य प्रधान । प्रय चमत्कृत पद ललित उत्तम काव्य गुजान । जिस काव्य मे वाच्य प्रथ की अपेक्षा व्यग्य सुदर, प्रधान और चमत्कार युक्त होता है पौर जिसमें ललित पदो का प्रयोग होता है वह काव्य उत्तम है। व्यग्य प्रथ पे तीन विशेषण दिये गये हैं, सुदर, प्रधान और चमत्कृत । इनमे सुदर से रस, प्रधान से वाच्य की अपेक्षा मुख्यता मोर चमत्कार से भी वस्तु तया अलकार व्यग्य ग्रहण कर लें तो उत्तम काव्य का लक्षण पूर्ण सगत सिद्ध होता है। प्राचार्य हरिचरणदास ने उत्तम काव्य का लक्षण इन शब्दो मे किया है जहाँ वाच्यत रहत है अधिक चमत्कृत व्यग। ताही सौं ध्वनि कहत सो उत्तम का य प्रसग । यह लक्षण भी पूण और वनानिक है । उत्तम काव्य का उदाहरण यह है खोर को राग छुटयो कुच कों, मिटिगौ प्रधरा रग देख्यौ प्रकासहि । अजन गो दृग-कजनि ते, तनु चपत तेरौ रुमच हलासहि। नेकु हितू जन को हित चोही न कोहो प्ररो मन मेरों निरासहि । घाबरी ! बाबरी तू हान गई प तहाँ न गई उहि पोउ के पाहि ।। नायिका ने दूतो को नायक के पास भेजा था वह नायक से उपमुक्त होकर लौटी है। नायिका दूती के वेश वि यास व्यतिगम से उसकी चोरी को पहिचान गई । वह घाच्याय मे उससे वावडी स्नान की बात कह रही है परतु 'तहाँ न गई उहि पीउ के पासहिं से यह व्यग्य है कि तू उसके पास सुरत हित अवश्य गई । सवैया के तृतीय पद से नायिका के क्रोध की भी व्यजना स्पष्ट है । यह सवैया का यप्रकाश के उत्तम काव्य के उदाहरण या सफल अनुवाद है। काव्यप्रकाश के 'प्रथम पद को निकालकर प्राचाय कवि ने छ द का व्यग्य चमत्कार अधिक बढा दिया है । बिहारी सतसई से उत्तम काय का यह उदाहरण दिया जा सकता है । पूस मास सुनि सखिन सौ साई चलत सवार । गहि कर बीन प्रबीन तिय राग्यो राग मलार । पूस मास की वर्षा मे यात्रा का निषेध है । अकाल वृष्टि में यात्रा नहीं करनी चाहिए इसलिये नायिका ने मल्हार राग गाया जिससे वर्षा हो, पौर नायक यात्रा स्थगित कर दे। कालचेष्टावशिष्ट्य से यही यग्य है। ध्वनिकाव्य के भेद-उत्तम काव्य के लक्षण और उदाहरण परीक्षा के बाद उसके भेदो पभेदो के लक्षण और उदाहरणो की परीक्षा प्रावश्यक है । ध्वनिकार ने काव्य को प्रथम दो भागो म विभक्त किया है (1) अविवक्षितवाच्यध्वनि मौर (२) विवक्षितायपरवाच्य ध्वनि । काव्यप्रकाशकार और साहित्यदपणकार ने भी ये ही दो भेद स्वीकार क्येि हैं । उपर्युक्त दोनो भदो मे अविवक्षितवाच्य ध्वनि का प्रसग सक्षिप्त मौर सीमित है इसलिय प्रपम उसी का विवेचन किया गया है । यही परिपाटी सभी प्राचार्यों ने अपनाई है । इसमें शद को १५. ध्वनि सिलान्त पोर व्यंजनावृत्ति । विवेचन प्रधानता रहती है, मर्य की तो केवल इसमें सहकारिता रहती है । लक्षणामूला व्यजना इसका भाधार है । इसमे केवल वस्तु ध्वनि ही होती है । इसमें मलकार ध्वनि पोर रस ध्वनि का समावेश नहीं हो पाता है । वस्तुत ये ही दोनो व्यग्याथ वस्तु व्यग्य की अपेक्षा रमणीय हैं। मत विवक्षिता यापरवाच्य की अपेक्षा मविवक्षितवाच्य ध्वनि यूनचारत्ववाली है । इसका एक कारण मोर भी है । लक्षणामूला में लक्षणा के सहकारी हेतुप्रो-मुख्यायें बार प्रादि की स्थिति रहती है । फ्लत भविवक्षितवाच्य ध्वनि से वस्तु यग्य तक पहुँचने के लिये बुद्धि को प्रयास करना पड़ता है और हृदय की वृत्तियां उस क्षण में निष्क्रिय सी रहती हैं। इसलिये अविवक्षितवाच्य ध्वनि का मग होते हुए भी उस कोटि को नहीं पहुंच पाती जिसको विवक्षितायपरवाच्य ध्वनि पहुंचती है । अविवक्षितवाच्य ध्वनि के दो भेद माने गये हैं। मर्या तर सक्रमित वाच्य मोर भत्यन्त तिस्कृत वाच्य'। पद और वाक्य भेद से ये दोनो पुन दो दो प्रकार के होते हैं 'प्रविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्य प्रकाशता' -ध्वया ३१ काव्य प्रकाशकार ने भी 'पादेऽप्य ये' और साहित्य दपणकार ने तद येपदवाक्ययो कहकर ध्वनिकार की बात को दुहरा दिया है । इस प्रकार अविवक्षित वाच्य ध्वनि के चार भेद हो गये (३) पदगत अर्थातर सक्रमित वाच्य, (२) वाक्यगत अर्थातर सक्रमित वाच्य, (३) पदगत अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य और (४) वाक्यगत अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य । अविवक्षित वाच्य-अविवक्षित वाच्य ध्वनि मे लक्षणामूला व्यजना रहती है। लक्षणा मूला से यात्पय यह है कि वाच्यार्थ प्रतीति के पश्चात् लक्षणा का प्रसग उपस्थित होता है और तब प्रयोजन के फल मे व्यजना को अवकाश मिलता है । इसकी वस्तु ध्वनि के कारण ही ध्वनि विरोधी प्राचार्यों को ध्वनि का लक्षणा, अनुमान प्रादि में प्रतर्भाव करने का उत्साह जाग्रत हमा या। अर्थातरसक्रमित वाच्य जसा कि उसके प्रथ से स्पष्ट है में मुख्याथ का पूर्णतया तिरोधान नही होता मपितु उसका अपने विशेष रूप अर्थातर में सक्रमण होता है। अर्थातर- सममित वाच्य में अजह स्वार्था लक्षणा होता है। पर तु भत्य व तिरस्कृत वाच्य जसा कि उसके शादिक अथ से स्पष्ट है मे मुख्याथ का पूर्णतया तिरस्कार हो जाता है । इसमें जहत्त्वालक्षणा का माधार होता है। अविवक्षित वाच्य ध्वनि के उपयुक्त विवरण मे उल्लिखित निष्कपोको पाठकों की सरलता के लिये इस प्रकार रखा जा सकता है १-अविवक्षितवाच्य ध्वनि का प्राचार गूढ़ यग्या लक्षणा होता है। २-ध्वनि के इस भेद में सवदा वस्तुध्वनि ही रहती है। इसमे रस भाव मौर मलकार ध्वनि नही रहती है, फलत इसमें विवक्षिता यपरवाच्य ध्वनि को रमणीयता और चारता नहीं होती है। अर्थातरेसक्रमितमस्य तवा तिरस्कृतम् अविवक्षित वाच्यस्य धनेर्वा य द्विधामतमू-ध्वया०२-१ म्वनि-काम्या १५१ - ३-भविवक्षित वाच्य ध्वनि के मुख्य दो भेद हैं--(१) मन्तिरसक्रमितवाच्य और प्रत्यततिरस्कृत वाच्य। इनमें प्रर्थातरसममित वाच्य का प्राधार अजहत्स्वार्या अपवा उपादान लक्षणा होती है क्षौर प्रस्य ततिरस्कृत वाच्य का प्राधार जहत्स्वार्था । ४-लक्षणा का सम्बघ प्राय शब्द से ही रहता है किन्तु जब एक हो वाक्य में एक से भधिक पद मथवा पद समूह लक्षक होता है तो उसको वाक्यगत लक्षणा माना जाता है। इसका विशेष विवरण द्वितीय मध्याय में दिया जा चुका है। पर्थान्तर सक्रमित वाच्य का लक्षण एक रीतिकालीन प्राचार्य ने इस प्रकार दिया हैं प्रथ अनथक मासिक और प्रथ में जाइ। ताहि अथ मिलि सार्यता मर्यातर सुलपाइ।' इस लक्षण के तीन भाग हैं (१) अर्थ मनर्थक भासता है (२) उसी प्रथ को सहायता से सापकता होती है प्रौर (३) वह मर्थ मय (भोर) अथ मे जाता है । इन तीनो का सामूहिक प्रथ यह है कि वाक्य अपने विशेष रूप में परिणत हा जाता है । लक्षण पूर्ण और सग्रत है । मर्यातर सममित वाच्य का उदाहरण यह है महदी पुद सुसदमन लेत लाल को बाल । काहे को तू करत है मान कपट को जाल ।। उपादान लक्षणा यहाँ होती है जहाँ कोई वाच्यार्थ अपनी सिद्धि के लिए मौरीका माक्षेप करले । जसे 'गोली चली' वाक्य में गोलो वाच्यार्य सिद्धि के लिए गोली चलाने वाले व्यक्ति का माक्षेप करना पड़ता है। इसे कोई-कोई प्राचाय मजहतस्वार्था लक्षणा भी कहते हैं। भर्या तर संमित वाच्य में मजहत्वार्या लक्षणा ही रहती है। उपर्युक्त उद्धरण मे 'महँदो बुद' पद से महंदी युक्त नायिका का योप होता है । बाला नायिका का महंदी बूदों से युक्त परपल्लव नायक के मन को भत्यन्त भावपक लगता है। यह भतरसनमितवाच्य की पदगत ध्वनि का उदाहरण है । इसका दूसरा उदाहरण भी दृष्ट व है सुवर गुन मदिर रसिक, पास खरो घृजराजु । पालो कोन समान है। मान ठानियो माजु ॥ मानिनो नायिका को समभाती हुई सखी कहती है कि हे सखि मत्यन्त गुणी एव रसिक नायक यहाँ एकान्त में तेरा मानापनोद करने के लिए तेरे समीप ही प्रस्तुत है फिर भी माज मना करने में कौनसा समानापन है ? 'माज' पद अपना कालवाचक अर्धा देते हुए भी एकात मादि समय विशिष्ट में सन्नामित होता है । मर्यान्तर-सममित वाच्य का वाक्यगत उदाहरण यह है गजकर गजकर हो रहा पदली बदली दीन । प्यारी के उफ युगल को समता में सब होन ।। मन्तिर सपमित पाध्य ध्वनि पदगत मौर वाक्यगत उदाहरणों को प्रस्तुत करने के पश्चात् अत्यन्त विरत वाध्य का पदगत उदाहरण नीचे दिया जा रहा है भास भयुटि सोधन प्रपर, हिये हिये रो भात ! पसा गिनिर्णा पोर को, सखि सिरात ग लाल ॥

१५२ । ध्वनि सिमान्त मोर घ्यजनावृत्ति विवेचन - 1 F . " यह खण्डिता को उक्ति है । प्रियतम रात्रि निवास प्रयन करके प्राया है। सपत्नी के साथ सयोग के अनेक प्रकट एव अप्रकट लक्षण देखरर अपकृता खण्डिता कहती है । 'हे लाल | आपके हृदय की माला, छिगुनिया के छला प्रादि को देखकर मेरे हग शीतल हो रहे हैं ।' प्रकरण से शीतलता का वाच्यार्थ व्यर्थ होकर विपरीत अर्थ जसने मे परिणत हो जाता है । मत्य ततिरस्कृत वाच्य का वाक्यगत ध्वनि का उदाहरण कोन गुन गुन रावरे के सब दीनन को परिताप हरीजू । मेरो जितो फछु याज परौ सो करो नित हो मति ऐसी करोजू । श्री पति प्रेम तरोवर जानिफै मासिष देति हो फूला करीत । जोयो क्रों जुगलौ हित को सुख दो बो करो जसलोधो फरोजू ।। मत्य ततिरस्कृत वाच्य ध्वनि को वाक्य व्यापता का उदाहरण ध्वयालोक में गीता का 'यानिशा सर्वभूताना वाला श्लोक दिया गया है। काव्यप्रकाश और साहित्यदर्पण मे एक हो छद दिया गया है जो पिसी अपकृत को अपकारी के प्रति उक्ति है । उसमे विपरीत लक्षणा से स्तुति निदा मे परिणत होती है । रीति कालीन प्राचार्यों में से कई एम ने उसो का अनुवा- क्यिा है अथवा उसी छाया पर विपरीत लक्षणा का कोई प्रय उदाहरण दिया है। काव्यसरोज के इस उदाहरण मे का य प्रकाश के ही उदाहरण की छाया है । अपकृत के मुख से अपकारी को यह स्तुति वस्तुता निदा म परिणत हो जाती है । विवक्षितवाच्य- उत्तम काव्य अथवा ध्वनि काव्य के प्रथम भेद अविवक्षितवाच्य के चारो भेदो का विवेचन हो चुका अब विवक्षितवाच्य ध्वनि का विवेचन प्रसग प्राप्त है। जैसा पहले कहा जा चुका है भविवक्षित वाच्य का प्राधार गूढ व्यग्या लक्षणामूला व्यञ्जना है। प्रयोजनवती लक्षणा के व्ययग्यबोध की दृष्टि से दो भेद स्वीकारे गये हैं-१ मगूढ व्यग्या लक्षणा और गूढ यग्या लक्षणा | इनमे उत्तम काय के अविवक्षित वाच्य का आधार गूढव्यग्या लक्षण है और गुणीभूत व्यग्य का माधार भगूढ व्यग्या लक्षण | मगूढ व्यग्या पर माधृत व्यग्य प्रधान नही होता है इसीलिए माचार्यों ने उसे गुणीभूत व्यग्य में स्थान दिया है। विवक्षितवाच्य ध्वनि का प्राधार अभिधामूला यजना है । व्यजना-व्यापार के यावहारिक स्वरूप का विवेचन करते समय शादी व्यजना के दो भेद किये गये थे । अभिधामूला और लक्षणामूला । अभिप्राय यह कि प्रार्थी यजना का क्षेत्र तो केवल मभिधामूला का क्षेत्र है अतएव उसमे विभाजन को आवश्यक्ता ही नही पडी मितु शादी के प्रसग लक्षणामूला के साथ अभिषामूला का क्षेत्र और सम्मिलित है इसलिए उसको दो भेदो मे विभक्त कर उसमें सम्मिलित अभिधामूला का क्षेत्र स्पष्ट कर दिया है । विवक्षित वाच्य का माधार जो अमिधामूला यजना कही गई है उसम शाब्दी अभिधामूला और प्रार्थी व्यजना दोनों सम्मिलित हैं। भविवक्षित वाच्य को दो भागो मे विभक्त किया गया है। उसम विभाजन का प्राधार यद्यपि व्यग्याथ प्रतीति है किन्तु वह लक्षणा के दो भेदो से अलग अलग सम्बद्ध होने के कारण भिन्न सो लगती है। सप्टत उसमे विभाजा का प्राधार लक्षणा जान पडती है। विवक्षितवाच्य में विभाजन का प्राधार स्पष्टत व्यग्याय प्रतीति है । जहाँ अभिधेय से लेकर व्यग्याथ-बोध तक प्रतीति मे क्रम परिलक्षित होता है उसे सलक्ष्यम व्यग्य मोर जहाँ मभिधेय के बोष के पश्चाद ध्वनि-काव्य । १५३ व्यग्याथ प्रतीति इतनो शीघ्र होती है कि जम का अभाव सा जान पडता है उसे असलक्ष्य नम व्यग्य माना जाता है । क्रम तो इस प्रतीति म भी रहता ही है किंतु बुद्धि उस क्रम को पकड नही पाती है। बिजली के लटठो पर लगे बत्व एक के बाद दूसरा जलता है, यह निश्चित है कितु बिजली गति तीव्र होने के कारण देखने वाले को सभी यत्व एक साथ जलते स जान पड़ते हैं । यही स्थिति असलक्ष्यक्रम व्यग्य के प्रम के सम्ब ध म समझनीचाहिए । यहां प्रश्न यह उठता है कि जब प्राचार्यों ने अम परिलक्षित होने के आधार पर विवक्षितवाच्य के भेद किये हैं तो उहोने इस आधार पर ही उत्तम काव्य के भेद क्यो नही किये? इस प्रकार भेद करने पर अविवक्षितध्वनि भी लक्ष्य क्रम व्यग्य मे स्थान पा जाता है। यह सत्य है कि अविवर्तित वाच्य ध्वनि का समावेश सलक्ष्य कम व्यग्य म किया जा सकता है क्याकि उसमें सवप्रथम अभिधा से वाच्य का बोध होता है, तत्पश्चात उसकी अनुपद्यतता का बोध होता हैं, उसके बाद उसके योग के द्वारा अय प्रथ की प्रतीति, और अत में लक्षणा के प्रयोजन के फल का बोध होता है । इस प्रकार अविवाक्षितवाच्य ध्वनि मे सप्ट क्रम विद्यमान है । पर तु अविवक्षित वाच्य तथा विवक्षितवाच्य सलक्ष्यक्रम व्यग्य मे जो प्रम के लक्षित होने के आधार पर एक ही वर्ग मे सनिविष्ट हो जाते हैं एक मौलिक भैद बना रहता । उनमे से अविवक्षितवाच्य मे लक्षणा व्यग्यनिष्ठ होती और विवक्षितवाच्य मे अभिधा अर्थात् सलक्ष्यक्रम व्यग्यता की छोटी सी समानता रहने पर भी शक्ति भेद को भिनता बनी रहती । इसलिए प्राचार्यों ने पहले व्यग्यनिष्ठता के भाधार पर अभिषामूला और लक्षणामूला भेद कर दिये । उसके पचात कमलक्षिता के प्राधार पर विभाजन किया । रस मे वाच्य वोध से रस वोध तक प्रम भी विद्यमान है परतु उसमे बुद्धि का माध्यम अनायास बोध के कारण अविञ्चनता को प्राप्त कर लेता है और हृदय को भाव में रमने मा पूण अवसर प्राप्त हो जाता है । अनायास बोध के कारण ही क्रम रहते हुए भी प्रतीत नहीं, होता । वस्तु ध्वनि और अलकार ध्वनि रस ध्वनि को अपेक्षा निम्न काटि की मानी गई है । कारण इनमें बुद्धि को व्यग्य बोध मे योग देना पड़ता है और उस वोध से नानचारिपि म ही पद्धि होती है, हृदय की मुक्त दशा को प्राप्ति मे योग नहीं मिलता। इसलिए रस ध्वनि वस्तुध्वनि और मलकार ध्वनि से उत्कृष्ट सिद्ध को गई है। रस ध्वनि मे वाच्याथ वोष से व्यग्याथ बोध तक में बोध पक्ष शान्त सा हो जाता है और अय ध्वनियों में बोध पथ सनिय रहता है । इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए प्राचार्यों ने मभिधामूला ये प्रसलक्ष्यक्रमध्यग्य और सलक्ष झम व्यग्य भेद किये हैं। असलक्ष्य क्रम ध्यग्य विवेचन--पसलक्ष्यक्रम में रसादि के पाठ रूप ग्रहण किये गये है। वे ये हैं (१) रस (२) भाव (३) रसामास (४) भावाभास (५) भावशाति (६) भावोदय (७) भावसधि (८) मोर भावशवलता । जिन पाठ रसादि का उल्लेख किया गया है वे काव्य के मङ्गी हैं । ये ही अलकाय हैं । ये ही काय का मुरय प्रथ है।' इसके विभावानुभाव व्यभिचारी के प्रतिपादन भेद से अनेक भेद हो सकते हैं । पुन इनक अङ्गीभूत प्रथ तया शद के मालित उपमादि १-रसभावतदामासभावशान्त्यादिराम । मिनोरसाद्यलङ्कारादलकाय तया स्थित ! का० प्र०, ४॥२६ रसमावतदाभासतत्पशा त्यादिरमम म्वनेरात्माङ्गि मावेन भासमानो व्यवस्थित । ध्वन्यालोर, २३ १५४ । ध्यान सिद्धात और ध्यजनावृत्ति : विवेचन । एव अनुप्रासादि अलकारी के सयोग से अपरिमित भेद होने की सभावना है । एक एक अङ्गी रस भाव के ही उपयुक्त विधा के अनुसार अनेक भेद सम्भव हैं । जसे अङ्गी शृङ्गार के, प्रारम्भ में दो भेद होते हैं, सम्भोग और विप्रलम्ब । उनम भी सम्भोग के परसर प्रेम दशन, सुरत और विहारादि भेद हैं । इसी प्रकार वियोग के भी अमिनाप ईया, विरह, प्रवास और शापादि निमित्तक भेद हैं। उनमें से प्रत्येक भेद के विभाव, अनुभाव, व्यभिचारि के भेद हैं । उन विभावादि ये भी देश, काल, माश्रय, अवस्था, प्रादि भेद हैं । इस प्रकार स्वगत भेदो के कारण एक शृङ्गार के भेद गिनना हो असम्भव है फिर भेदोपभेद के मिश्रण से भेदो की गणना करना तो दूर की बात है'। इस' प्रकार रसादि के मनन्त भेद हो सकते हैं।' इस समावना के कारण इनका एक भेद ही स्वीकार किया जाता है। रीति काल के आचार्यों ने रस मादि का विस्तृत निरूपण क्यिा है इसलिए इस सीमित प्रबध मे उन सबके लक्षण एव उदाहरणा की समीक्षा यदि प्रासगिक भी स्वीकार वरली जाय तो भी घ्यावहारिक नहीं है। सस्कृत के ध्वनिवादी प्राचार्यों ने रस को काव्य का अङ्गी अथवा मुख्य प्रथ स्वीकार किया है। उ हाने रस, मसलक्ष्य प्रम व्यग्य के सम्ब प म एक बात एक स्वर से स्वीकारी है। वह है रस की नित्य ध्यग्यता। ध्वनिवादी प्राचार्यों ने रस की व्यग्यता के कारण ही उसका ध्वनि का एक भेद स्वीकार किया है। रसको ध्वनि का भेद मानने में आन दवधन का प्रधान तक यह है कि रस को प्रतीति अथवा अनुभूति अभिधा के द्वारा नहीं होती है अपितु व्यजना के द्वारा होती है। प्रत रसादि को वाच्य स्वीकार नहीं किया जा सकता है वे व्यग्य ही हैं । रसादि चित्तवृत्ति स्वरूप है।' चित्तवृत्ति को अनावृत करने की शक्ति व्यजना में ही है। इस सम्ब प में एक प्रमाण तो यह है कि जिस रचना मे विभावादि को परिपक्व सामग्री का प्रभाव है उसमें रस, भाव, विमावादि अथवा इनके विभिन्न भेदा म से किसी एक का नामोल्लेख मान कर देने से रस को थोडी भी प्रतीति नही होती है। उदाहरण के लिए (क) उस मृगाक्षी को देखकर हमें कोई विचित्र रस उत्पन्न हो गया। (ख) इस चन्द्र मण्डल को देखकर हमारा मन शृगार म मग्न हो गया। १ तस्यााना प्रभेदा स्वगताश्च ये। तेपामान त्य मयो य सम्बध परिकल्प ने । ध्वया०, २/१२ व यालोक २/१२ को वृत्ति । २ रसादीना मन तत्वाद एकोहि गण्यते । का० प्र०, ४/५७ वत्ति । ३ रसश्चमुरय, । काव्य प्रकाश०७/१ रसादिलक्षण प्रभेदो वाच्य सामर्थ्याक्षिप्त प्रकाशते, न तु साक्षाच्छन्द-व्यापार विषय इतिवाच्याद विभिन्न एव । व या० १/४ वत्ति व्यक्तिश्चानावणा चित् । रसगगाधर ६ नहि केवल शृङ्गारादिशत मात्र भाजि विभावाति प्रतिपादन रहिते काव्ये मनागपि रसवत्त्व प्रतीतिरस्ति । धया०, १/४ धत्ति । हिदी रीति परम्परा के प्रमुख प्राचार्य पृ० २७६ T } ४ ध्वनि-काव्य १५५ * --- (ग) तुझे देख लेने पर उसमें रति उत्पन्न हो गई। (घ) प्रिय के चुम्बन करने पर वह मुग्धा लज्जावती हो गयी। इन वाक्यों मे रस, शृगार, रति और लज्जा शब्दो का उल्लख होने पर भी अलौकिक चमकारजनक रसादि की अनुभूति नहीं होती है। यदि रस, भाव, विभाव आदि के नामोल्लख- मात्र से रस की प्रतीनि सम्भव थी ऊपर के वाक्यो मे उसकी प्रतीति अवश्य होती पर तु उनसे वसी रस, भाव मादि की प्रतीति नही होती है। इसके विपरीत इस प्रकार के रस, भाव आदि के नामोल्लेख से स्वशद वाच्यत्व दोष और आ जाता है। वास्तव में स्थायी, सचारी और विभावादि के स्वशब्द प्रयोग की आवश्यक्ता का उल्लख उद्भट ने दिया था। उसको ध्वनिवादियो ने दोप मान लिया। रस की अनुभूति विभावादि की सयुक्त (विशिष्ट) सामग्री के ध्यजना से ही होती है । उनके अभिधा प्रतिपादित अथ से भी रसादि की प्रतीति नही होती है । रस तो आक्षिप्त ही होता है। रस की यग्यता के कारण ही महिमभट्ट उसका अनुमान में प्रतर्भाव न कर सके। वस्तु ध्वनि का अ ताव तो खीचतान कर किया भी जा सकता है पर तु रस ध्वनि तो चित्तवृत्ति रूप होने के कारण व्यञ्जना के द्वारा ही अनावृत होती है। आन दबधन ने तो रस की व्यग्यता का सकेत ही किया था, परन्तु मम्मट ने ध्वनि विरोधियों के प्रदत्त तथा सम्भावित तकों की उद्भावना करके उनका सप्रसग खण्डन करके रस को ध्व यथ प्रतिपादित किया। रीतिकालान सभी मालोच्य आचार्यों ने रस को व्य ग्य स्वीकार किया है। उसकी व्य ग्यता की ओर सकेत को एक प्राचार्यों ने ही किया है। मान दवघन ने भावध्वनि को अयशक्त युत्य सलक्ष्य प्रम व्यग्य के अन्नगत भी स्थान दिया है । उन्होने कुमार सम्भव का यह श्लोक उदाहरण स्वरूप दिया है एव वादिनी देवर्षी पावें पितु रपो मुखी। लीला कमल पवाणि गणयामास पावती ॥ दवर्षि नारद के ऐसा कहने (पावती के साथ विवाह की गिव द्वारा सहमति प्रकट करन) पर पिता के पास वठी हुई पावती मुह नीचा करपे लीला कमल की पखुडियां गिनने लगी।' यहाँ लीला कमल के पवा की गणना गौण होकर श द व्यापार बिना ही व्यभिचारीभाव (लज्जा) को मभि यक्त करती है । बोधपक्ष की दृष्टि से प्रथम लीला कमल की गणना के शटत व्यापार का बोध होता है। उस प्रथ बोध के पश्चात् लज्जा व्यभिचारी भाव की ममियक्ति होती है। कहने का तात्पय उसमें कम स्पष्ट रूप से विद्यमान है। इससे यह निवप निकला कि रसादि का असलक्ष्यग्रम ध्यग्य होना अनिवाय नहीं है। वे अथ शक्तयुस्थ सलक्ष्य प्रम ध्य ग्य हानि से भी प्रतीत होते हैं। मसलक्ष्य प्रम में भी अत्यत सूक्ष्म ही सही नम तो रहता ही है । रस निष्पत्ति का उल्लेख यहाँ नहीं किया जाता है। कारण यह स्वतन विषय है और इसके विवेचन के लिए हिदी मे रस सिद्धात जसे कई प्रथा को रचना हो चुकी है। वितु रोतिकाल पे १ ध्यभिचारिस स्थायिभावाना स्वाद वाच्यता-काव्य प्रकाश, २ रसपद्दति स्पष्ट शृङ्गरादि रसोदयम् स्वसन्द स्यायि सचारि विभावामिनया स्पदम् । वा० सा० स०,४/३ ३ वयालोक, २/२२ वी वृत्ति - १५६ - पनि सिद्धात व्यजनावृत्ति विवेचन भाचाय भिखारीदास ने रस सारांश नामक अपने एक अन्य प्रप में दास ने रस को अभियक्ति के सम्बध मे एक सुदर रूपक प्रस्तुत किया है। वह छद यह है जाये नृप मन के बयालीस विचारि देखो, थाई विभिचारी सब तैतीस पखानिये । पाई यदि निजर जवानो कियौ मानस में, रस कहवायो विभिचारी सगी जानिये ॥ रजपानी पालम्बन सम्पत्ति उद्दीयता को, चहिब को लच्छन को अनुभाव मानिये । फोऊ रच भूषन या सौ कोऊ बिना भूपनहि, कवि को निह के चितेरे पहिचानिये ।। सक्षेप म यह रूपर यह है-पालम्बन नामक राजधानी में मन नामक ना निवास करने लगता है। इस राजा के बयालास पुत्र हैं जिनम से तैतीस सवदा इतस्तत धूमते फिरते हैं इसलिए उनको सवारी सज्ञा दी जाती है और जो नौ सदा राजधानी में ही निवास करते हैं उनको स्पायो नाम दिया जाता है। जब कुछ सवारी राजकुमार राजधानी मे लौटकर किसी स्थायी राजकुमार से मिल जाते हैं तो उसको रम युवराज की परवी मिल जाती है। राजपुत्रा के पास सहीपन विभाव नामक सम्पत्ति है। इनकी पहिचान अनुभावा द्वारा हाती है । इन राजपुत्रो मे से कभी कोई राजकुमार माभूपण उपमाति धारण कर लेता है और कभी बिना आभूपण के हो प्रकट होता है। कपि लोग इन राजकुमारों के चित्रकार हैं। रीतिकाल के एक अ य आवाय हरिचरणदास ने रस के स्वरूप का भी एक दोहे में उल्लेख किया है। सक्षेप म उहोंी ध्वनि के प्राचीन संस्कृत प्राचार्यों की मा यता का सुदर निब धन किया है इसलिए वह पाठको की जानकारी के लिए यहाँ दिया जा रहा है रोध करन सुख करत को जो शुल पोर पाम । प्रादि विभावन सौ मिल्यो सो रस है अभिराम ॥ इस दोहे मे करत का अथ इद्रिय है। रस निष्पत्ति काल में सामाजिक अथवा पाठकको इद्रियों के अपने अपने बाय व्यापारी को अवरुद्ध करता है और मन इद्रिय को परनिवृत्ति जसा सुख प्रदान करता है। विभिन रमों के उदाहरण भी सरलता से अयन मिल सकते हैं इसलिए उनका भी उल्लख नहीं लिया गया है। सलक्ष्य कमव्यग्य विवेचन विवक्षित वाच्य ध्वनि का दूसरा भेद सलक्ष्यक्रम व्य ग्य ध्वनि है ! घण्टे के बजने पर प्रथम ध्वनि होती है। सब प्रथम यह ध्वनि श्रीता के कानों मे पडता है नत्पश्चात् धीरे धीरे विलीन होती हुई अनुरणा रूप प्रतिध्वनि सुनायी दती रहती है। इस अनुरणन में एक कम होता है। इसको अनुरणन अनुस्वान मादि नामो से पुकारा जाता है। जिम प्रकार घण्टे की प्रथम ध्वनि के पश्चात् श्रोता को उसका मनुरणन सुनायी पडता रहता है उमी प्रकार पाठक को वाच्याथ के बोध मे पश्चात जिसे व्य ग्याय की प्रतीति वसे ही पूर्वापर कम से होती रहती है उसे सलक्ष्यक्रम व्य ग्य कहते हैं। इसम वाच्याथ व्य ग्य निष्ठ होता है । वापाथ बाध के पश्चात व्य ग्याथ बोध होता वेद्यान्तर शूया परिमित भावेन पुरइव परिस्फुरन् हृदयभित्र प्रविशन सर्वाङ्गीण भिन्नालिङ्गन-का० प्र० प्रभिनव वामत पृ. ४६ - - ध्वनि-काय! १० उसे शक शवस्य है। ये दोनो स्थितियां बोध स्वरूप ही होती हैं। इन पर भावना का ग कम चढ़ पाता है । सलक्ष्यक्रम प्य ग्य बोध तीन प्रकार का होता है रसादि बोध, अलकार बोध और वस्तु दोष सलक्ष्य कम व्य ग्य रसादि वा बोध परगतत्व रूप से होता है, पाठक दृष्टा के रूप में रहता है । इस रसादि से पाठक की भावना का वह तादात्म्य नहीं हो पाता जो अस लक्ष्य प्रम ध्य ग्य मे होता है, उसमे भावना पक्ष प्रवल हो जाता है । इसीलिए इसे रसादि घोध माना है । अनुभूति और बोध में थोडा मन्तर है। अनुभूति में हृदय की द्रुति विप्रलम्भ करण और शा त में, दीप्तिवीर, रौद्र और भयानक में और विस्तृति प्राय सभी रसों में, वा प्रसग रहता है और बोध मे ज्ञान के विस्तार का, जानकारी के एक नये रूप का। यह सलक्ष्य प्रम तीन प्रकार का माना गया है -(१) शब्द शक्त्युत्थ, (२) अर्थ शक्त्युत्प और (३) शब्दाथ शक्त्युत्य । इनमे से शब्द शक्त्युत्प ध्वनि मे शब्द परिवृत्यसह होता है। इसीलिए स्वीकार करते हैं । यह पहिले स्वीकार किया जा चुका है कि माद के व्यञ्जक होने पर अर्थ की सहकारिता बनी रहती है और अर्थ के ध्यजन होने पर शब' की सहकारिता रहती है । यह एक शका उठती है कि व्यजना वृत्ति के विवेचन प्रप्तग में उसके दो विभाग किये थे एक शानी व्यजना और दूसरी आर्थी व्यजा। यहाँ आकार व्य ग्य के दो भेद किये- लक्षणामूलक और अभिवामूलक । यति शान्ती यजना को लक्षणामूला स्वीकार किया जाता है तो अभिधामू नक सलक्ष्य क्रम व्य ग्य में अर्थ की व्यञ्जकता का ही प्रसग शेप रहना चाहिए उसम शद को पजक्ता के प्रसग का समावेश उचित प्रतीत नहीं होता है। आचार्य मम्मट तथा विश्वनाथ ने सलक्ष्य प्रम व्य ग्य के तीन भेद स्वीकार किये हैं (१) शब्द शक्त्युदभव, (२) अर्थ शक्त्युद्रभव और (३) दार्थ शक्त्युभव । इनम शब्दशक्त्युत्थ सलक्ष्य अम ध्वनि के पुन दो भेद होते है (१) वस्तु ध्वनि और (२) अलकार ध्वनि । ये दोनो भेद पद और वाक्य की व्यजक्ता के भेद से दो दो प्रकार के होते हैं। इस पकार शब्द शक्त्युत्थ सलक्ष्य प्रम नि के चार भेद हो गये। इहीं प्राचार्यों के अनुमार अर्थ शक्त्युत्य सलक्ष्य प्रम के प्रमुख तीन भेद हैं (१) स्वत सभवी, (२) कवि प्रौड़ोक्ति मात्र सिद्ध और कवि निबद्धवक्त प्रौदोक्ति मात्र सिद्ध। ये तीनो भेद पुन चार चार प्रकार के होते हैं-वस्तु से अलकार व्य ग्य, वस्तु से वस्तु व्य ग्य अलवार से वस्तु थ्य ग्य और अल्वार स उ लवार यग्य 1 इस प्रकार अर्थ शवायुस्थ सलक्ष्य प्रम ध्वनि के बारह भेद हो गये। ये वारहों भेद फिर पद, वाच्य और प्रवध की व्यजकता की दृष्टि से तीन तीन प्रकार के हैं। इस प्रकार अर्थ शक्त्युत्थ ध्वनि के कुल छत्तीस भेद होते हैं। दाम्दार्थ शक्त्युत्थ ध्वनि का केवल एक भेद होता है, वाक्पगत । इस प्रकार सलक्ष्य क्रम ध्वनि के कुल भेद मिलाकर ४१ हुए । पण्डितराज इन ४१ भेदों के स्थान मे क्वल उनतीस भेद स्वीकार करते हैं उसे कवि निवद्ध पात्र प्रौढाक्तिमात्र सिद्ध भेद को स्वीकार नहीं करते। उनका कथन है कि पि निबद्ध पात्र प्रौढोक्ति तो प्रकारान्तर से कवि प्रौढोक्ति ही है इसलिए कवि निवद्ध पात्र प्रौढोक्तिमात्र सिद्ध भेद स्वीकार करना निरयक है ।' पण्डितराज का यह क्यन वयालोरकार के अनुकूल है। ध्वया लोकवार ने एतत्सम्बधी मत निम्नलिखित शब्दा म व्यक्त किया है "वस्तु अथवा पत्रकार का अभिव्यजक अथ भी स्वत सभवी तथा प्रौढोक्तिमान सिद्ध प्रकार से दो प्रकार का होता है।' उहान अपनी कारिका की वृत्ति इस बात को पुन दुहराया न शन्द विचारणीय हैं :- ११पनि सिवात यजनावृति विवेचन "अयं शक्त्युरप सलक्ष्यतम ध्यग्य ध्वनि मे जो व्यञक मयं कहा है उसके भी दो भेद होते हैं। एक पवि भयवा कवि निवत वसा की प्रौढोक्तिमात्र से सिद्ध पौर दूसरा स्वत सम्भव । 'क्वे कवि निबद्धस्य वा वक्तु प्रौढोक्तिमात्र निष्पन परीर प्राचार्य मम्मट एव भावार्य विश्वनाथ के अनुसार उत्तम वाध्य के कुल मिलाकर ५१ भेद माने हैं, कितु हमने पिछले मध्याय ५१ के स्थान में केवल ३७ भेद ही स्वीकारे है । वे ये हैं -चार अविवक्षित वाच्य के भेद, छ मसलक्ष्य यम व्यग्य के भेद, दो पद शक्त्युत्य सलक्ष्यग्र मध्यप के भेद, पौवीस अर्थ शक्त्युत्य सलक्ष्य प्रम व्यग्य के भेद मोर एक उभय पारत्युत्य सलक्ष्यक्रम व्यग्य का भेद। हम अपनी भेद मा यता में समथन म पिछले अध्याय और इस अध्याय पर यथास्थान निवेदन कर चुके हैं। उसको दुहराने की आवश्यक्ता नहीं है । मविवक्षित वाच्य ध्वनि और विवमित वाच्य के असंलक्ष्य प्रम ध्यग्य के भेदों का सोदाहरण विवेचन किया जा चुका है। यहाँ पर सलक्ष्य प्रम व्यग्य के सत्ताईस भेदों का विवेचन प्रसग प्राप्त है। सलयनमध्यग्य के तीन भेट आचार्यों द्वारा स्वीकारे गय हैं -(१) पार शक्त्युरथ सलक्ष्य अमव्यग्य (२) अथ गवत्युत्य सलक्ष्यनमव्य ग्य, (३) उमय शरत्युत्य सलक्ष्यमाम व्यग्य । मागे इनके भेदोपभेदो का सोदाहरण विवेचन किया जाता है। जसा पहले उल्लख मा है शत शक्त्युत्य सलक्ष्यमाम व्यग्य में शन्त अनेकायक ह ता है और उसके स्थान मे उराके पर्यायवाची अयश का प्रयोग नहीं हो सकता है। राट शक्ति से पाक्षिप्त मलकार ही व्यग्य होता है। इसके पद मोर वाक्य भेद से दो भद होते हैं शम्दशक्ति से अलवार ध्वनि यथा- जाकी पर सब दिसन मे सोम लहै द्विजराज । रहे विष्णु यह मे सुरुचि सुबहादुर महाराज ॥ कवि आश्रयदाता बहादुरसिंह महाराज को प्रशसा कर रहा है । राजरति प्रधान है । यदि को राजा का वणन ही अभीष्ट है। पर तु कर, द्विजराज आदि द्वययन पदों के प्रयोग के कारण भी अथ लगता है। पर तु सूय का अथ अप्रकरगिव है । सूय मोर राजा की उपमा नोपमेयता घ्य ग्य है । काध्य प्रकाश और साहित्य दपण दोनी ग्रथो में शत शक्त्युत्थ मलकार ध्वनि का उनाहरण प्राश्रयदाता को प्रशस्ति का ही है। इसका दूसरा उदाहरण भी राजरति प्रधान है। हाटपाट विचित्र बनायत याज गहे परि बरिन मानो। गायन प्रौ महिषी न जु राखत धारत है कुलकानि पिछानौ । बापत सेर भो दान चुवावत श्री गज को व्यवहारहि पानी । मौरि देस सुलापै जहाँ हरि साहसु ऐसे जहान मे जानी ।। सलक्ष्यनमध्यग्य में शक्तिमूल वे भो का उल्लेख हो चुका, आगे अथशक्तिमूल य म्य के भेदो का उल्लख दिया जा रहा है। प्राचाय मम्मट और आचाय विश्वनाथ ने लोचनकार अभिनव के अनुसार अथ तीन प्रकार का स्वीकारा है (१) स्वत सम्भवी, (२) कवि प्रौढोक्ति सिद्ध और (३) कविनिबद्ध वक्त प्रौढोक्तिसिद्ध । ध्व यालोशार ने अथ दो ही प्रकार का माना था । हाँ, उ होने वति भाग मे कवि प्रोकोक्ति सिद्ध को स्पष्ट करते हुए कवि प्रौढोक्तिमिद्ध अथवा कविनिबद्धवक्त प्रौढाक्तिसिद्ध पदो का । सूय के ध्वनि-काव्य - १५४ . प्रयोग अवश्य किया है। कि तु उनकी वृत्ति से यह बात भली भांति स्पष्ट है कि वह दोनो को अलग अलग भेद न मानकर एक ही भेद स्वीकारते हैं। पण्डितराज ने मम्मट प्रौर विश्वनाथ की मा यता का खण्डन करके घयालोककार की मा यता को पुन स्थापना की हम भी ध्वयालोककार और पीडितराज को मा यता को उचित मानते हैं। इस प्रबध की मा यता के अनुसार प्रथ दो प्रकार का होता है (१) स्वत सम्मवी और (२) कवित्रौढोक्तिसिद्ध । काग काला होता है और इस सफे- । कौए का कालापन और हम की सफेदी स्वन सम्मवी वस्तु है । कि तु मुख चन्द्रमा के समान है वाक्य का तथ्य कौए के कालेपन को सफेदी की भांति स्वत सिद्ध नहीं है, वह कविया की मा यता भर है। यह कवि ससार की प्रसिद्ध है। फनत यह अथ कवि प्रौढोक्तिमात्र सिद्ध है। रीतिकालीन आचायदास ने अपने मय काष्य निणय में, इसका सुन्दर विवेचन क्यिा है । कही पर स्वत सम्मवी अथ से वस्तु की व्यञ्जना होती है और कही पर अलकार को और वहा पर कविप्रोटोक्ति सिद्ध अप से वस्तु और अलकार को व्यञ्जना होती है। इस प्रकार प्रथ शक्तिमूल सलक्ष्यक्रमन्यग्य के चौबीस भेट हो गये। (१) स्वत सम्भवी वस्तु से वस्तु व्यग्य, (२) स्वत सम्भवी वस्तु से अलकार व्यग्य, (३) स्वत सम्भवी अलकार से वस्तु व्यग्य (४) स्वत सम्मवी अलकार से अलकार ध्यग्य । जिस प्रकार स्वत सम्भवी अर्थशक्तिमून व्यग्य के चार भेद होते है उसी प्रकार कवि प्रौढोक्तिसिद्ध के भी चार भेद हुए। ये आठो भेद पुन पद, वाक्य और प्रबंध की प्रकाशता के कारण चौबीस भेदो में परिणत होते हैं। आगे इन सभी के उगाहरण दिये जा रहे हैं। स्वत सम्भवी वस्तु से वस्तु व्य ग्य- प्रलय करन बरसन लगे जुरि जलधर इक साथ। सुरपति गय हस्यो हरपि गिरिपर गिरधर हाय।। यह क्सिी गोप की उक्ति है। 'सुरपति गव हरयो स्वत सम्भवी वस्तु से ब्रज की रक्षा वस्तु व्यग्य है। सम्भव है कोई विद्वान यहां काव्यलिंग पलकार स्वीकार करें। उसके सम्बन्ध में निवेदन है कि अलकार तो प्राय सभी स्थानों पर मिल सकते हैं पर तु यहाँ अथ से ध्वनि है । यह उदाहरण बिहारो से है- सुरति न ताल को उठे न ठहराय। ऐरी ! राग विगारिगो वरी बोल सुनाय ।। नायिका की य तरण सखी को उक्ति है। नायक के बोल सुनते ही गान आरम्भ करने वाली नायिका का तान स्वर विगड गया इस स्वत सम्मवी वस्तु से नायिका की नायक के प्रति अगाध आशक्ति वस्तु व्य ग्य है। उदाहरण सगत चुना है। स्वत सम्मवी वस्तु से अलकार यथा- भूप बहादुर तो हिलखि नव सुसफल जहान । है सवही के सीस तेरी तेज समान ॥ इस उदाहरण की द्वितीय पक्ति में भूप वहादुरसिंह पी सूय ने साथ समानता व्यग्य है और प्रपम पक्ति में 'नवे सुसकल जहान' इत्यादि स्वत सम्भवी वस्तु से ध्यतिरेक अलकार प्य ग्म है। इतान पर

१६२ . प्वनि सिखात व्यजनावृत्ति विवेचन
शब्दार्थ शक्ति मूल सलक्ष्य क्रम व्यग्य भी ध्वनि पाव्य का एक भेद है। इसका उदाहरण
नीचे दिया जाता है-
भाय तोलौ यसन सुहात है सुगंध तौलों,
सुखनि की सुपि तोली हिय में हुस्पारी है ।
सब लो सिंगार हार विविध विहार तोतों,
संसारसार तौलों फलति उज्यारी है।
सुकवि रतन प्रग लगी रंगीली जोली,
सब टूटत छिनक छहरति सो अभ्यारी है।
चार घाल धारी प्रानपरतीति कारी कर,
सार की सवारी एक नारी जग प्यारो है। १
यह कवि की उक्ति है । यहाँ शब्द और अथ की विशेषता के कारण नारी (पत्नी) और
नाड़ी मे उपमा अलङ्कार यग्य है । जहाँ एक प्राकरणिक अथ होगा वहाँ दूसरा भप्राकरणिक
होगा । किसी के मरने पर यदि कहा जायगा तो नाडी वाला पथ प्राकरणिक और किसी
नव दम्पत्ति को देखकर कहा जायगा तो दूसरा मय प्राकरणिक ।

r r - ३-गुणीभूत व्यंग्य-काव्य कर डाले [१] पिछले अध्याय मे ध्वनि काव्य का उल्लेख किया जा चुका है । ध्वनि काव्य में व्यग्य की पाच्य से चमत्कार युक्त प्रधानता होती है। उन शब्दों का प्रतिपाद्य विषय दो प्रकार का होता है वाच्य और व्यग्य । ध्यग्य भी दो प्रकार का होता है-प्रधान और प्रधान । जहाँ व्यग्य का प्राषाय होता है वहां उत्तम काव्य माना हो जाता है और जहां उसका अप्रधाय होता है वहाँ गुणीभूत- व्यग्य काव्य को सज्ञा प्राप्त होती है । यह नाम आन दवघन का दिया हुआ है। ध्वनि की प्रतिष्ठा करने के पश्चात भी जब प्राचाय को दिखाई पडा कि अब भी बहुत सी ऐसी रचनायें हैं जो चमत्कार. युक्त होने पर भी विविध ध्वनि-रसध्वनि, वस्तुध्वनि, मलकार ध्वनि के विस्तृत क्षेत्र मे सन्नि विष्ट नहीं हो सकतीं तो प्राचाय ने व्यग्यार्य के चमत्कारन्तारतम्य को दृष्टि से काव्य के तीन भेद १ ध्वनि-काव्य, २ गुणीभूत व्यग्य-काव्य और ३ चित्र काम्य, ध्वनि का क्षेत्र तो विस्तृत है ही परन्तु गुणीभूत व्यग्य का भी क्षेत्र कम नहीं। हमारे विचार से चित्र काव्य का भी बहुत बड़ा मश इसी क्षेत्र मे सन्निविष्ट हो सकता है। ध्वयानोक पौर लोचन में गुणीभूत व्यग्य का उस तारतम्य के साथ वणन नही है जिस धारतम्य के साथ काव्यप्रकाश में उपलब्ध होता है। यह निश्चित है कि गुणीमूतव्यग्य के मागे भेदो के सकेत प्वयालोक में भी विद्यमान हैं मोर लोचन में तो वे सकेत ध्ययालोक की अपेक्षा स्फुटतर रूप में विद्यमान हैं यहां तक कि उनके भिन्न भिन्न नामो के सवेत भी उन दोनो में उपलब्ध है। [२] साहित्य दपणकार विश्वनाथ ने मम्मट की ही सामग्री का उपयोग किया है। मम्मट ने गुणीभूत व्यग्य के निम्नलिखित पाठ भेद किये हैं- प्रगूड, अपरांग, वाच्यसिव्यग्य, अस्फुट, मदिग्ध प्राधा य, तुल्य प्रापाय, काक्वाक्षिप्त मौर मसुदर। - १ वाध्यादतिशयिनि व्यङ्गये-का०प्र० १/२ २ ध्वयालोक, पृ. २५२, पक्ति ७ ३ वयालोक, २३४ ३५ ४२४३ ध्व यालोक प्रधानगुणभावाम्या व्यग्यस्यैव व्यवस्थिते । ध्व यालोक ३ ४२ । ४ काव्यप्रकाय सविमा शशिकला टीका, पृ० १३८ ।

११४ पनि सिवात्त और व्यंजनावृत्ति विवेचन - । गूद-यग्य सहृदयजन सवेध होता है । यह प्राय गूढ़ हो होता है। परतु ध्याय की अधिक गूढ़ता मोर मधिक प्रगढ़ता उसकी चारुता कम कर देती है। इसलिए इतना अधिक गूढ माय कि जिसको सहृदय भी न समझ सकें और इतना अधिक प्रगूढ़ अथवा स्पष्ट कि सर्वसाधारण भी समभले गुणीभूत व्यग्य के क्षेत्र में ही प्राते हैं । जहां ध्याय सहृदयजन संवेद्य भी नही होता वहां वह 'प्रस्फुट' माना जाता है, जहाँ वह सवसाधारण संवेध हो जाता है वहाँ स्फुट अथवा भगूढ माना जाता है। भाचाय मम्मट सु दर ध्यग्य उसको स्वीकार करते हैं जो कामिनी कुच कलशवत् न तो प्रत्यन्त प्रकाशित प्रौर न'मधिक निगूढ़ होता है । बालबौधिनीकार ने इस प्रकार के प्यङ्गय चमत्कार को स्पष्ट करने के लिए यह उद्धरण दिया है नाभीययोधर इवातितरी प्रकाशो नो गुजरीस्तन इवातितरी निगढ़ । पर्थो गिरामपिहित पिहितश्च कश्चित् सौभाग्यमेति मरहट्टवयूकुचाभ । काव्य का भस्मत स्पष्ट अथ तैलङ्गनारियों के खुले कुच दद्व की भांति सहृदय के हृदय में पालाद उत्पन्न नही करता और न गुजरीस्तनवत अत्यत निगूढ मम भी पालादक होता है। प्रपितु महाराष्ट्र की नारियो के कुच को भांति इन दोना के मध्य की स्थिति वाला व्यग्याथ मधिक मार्मिक होता है। व मालोक्कार ने सवप्रथम 'मगूढ़ नामक गुणीभूत व्यग्य की पोर ही सकेत किया है। "मगूह' गुणोमूत व्यग्य का सम्बध वस्तुमात्र की व्यङ्गयता से ही है । वस्तुमात्र की व्यग्मयता का बोत्र सीमित है । इसके दो ही क्षेत्र है-प्रथम अविवाक्षितवाच्य ध्वनि का क्षेत्र और दूसरे सलक्ष्य प्रम यग्य में भय वाक्तिमूल वस्तुध्वनि का क्षेत्र । मविवाक्षितवाच्य ध्वनि में केवल वस्तु की ही यजना होती है । काव्य प्रकाश म प्राचार्य मम्मट ने 'भगूढ गुणीभूत ध्यगय के तीन उदाहरण दिये हैं-(१) दो अविवाक्षितवाच्य ध्वनि के दो भेदों से सम्बधित और तीसरा अथ श द शक्तिमूल सलक्ष्य क्रम ध्वनि से सम्बधित वस्तु ध्वनि का। श दशक्तिमूल मलकार ध्वनि प्रौर प्रथ शक्तिमूल वस्तु मलकार ध्वनि तो निश्चित ध्वनि क्षेत्रात पाती हैं । जसा कि पान दवधन ने स्पष्ट कद्द rr - "जर वस्तुमात्र से प्रलकार की व्यञ्जना होगी तो वह निश्चित ध्वनि का विषय होगा। वहाँ गुणीभूत का प्रसग ही नही उठ सकता।"3 लक्षणा मूला ध्वनि के दो प्रमुख भेद हैं अर्थातर सङ्गमित और मत्यात तिरस्कृत वाच्य । १ २ तत्र वस्तुभाचस्य यहुचस्य ध्व० लो० पृ० २५६ मर्थातर सक्रमित वाच्यमत्य त तिरस्कृत वाच्य परगत शनाथ शक्ति मूल सलक्ष्य प्रम व्यय घागूढ भवतीत भाव च द्रालोक की पौणमासी टीका, पृ० २६५ ध्यन्ते वस्तुमाचेण मडाल कृतय स्तदा ध्र व ध्वयगता तासा-वाया० २३. बाल वोधिनी, पृ० १६४ ४ है गुणीभूत व्याय-काव्य । १५१ इन दोना भेदों मे जहाँ यग्य गूढ होता है वह ध्वनि का विषय है, केवल जहा व्यग्य प्रगूढ़ रहता है वही त नामक गुणीभूत व्यग्य का क्षेत्र है। दूसरे जहा रस ध्वनि होती है, वहा भी व्यग्य को अगूढता का प्रसग नही उठता हैं । कारस रस-भाव ध्वनि म रस भाव की प्रतीति विभावादि के मनुसधान से ही होती है । विभावादि का अनुसधान सवसाधारण बोध्यगम्य नही होता। रस-भाव की प्रतीति इसी विभावादि के अनुसधान के कारण प्रगूढ नही हो पाती।' शद शक्युत्य अलकार ध्वनि से अगूढ़ का सम्बध नही है । शब्द शक्ति मूलक अलवार ध्वनि मे प्रकृत वाच्यार्य की प्रतीति का व्यवधान उपस्थित हो जाता है।' शब्दाथ शक्युत्य ध्वनि मे भी अगुढ व्यग्य का अवकाश नहीं है । यही बात काव्य प्रकाश के उद्योतकार ने भी स्वीकार की है। अगूढ के इस सीमित क्षेत्र का सकेत ध्वन्यालोक, लोचन, घद्रालोक को पौणमासी टोका भौर काव्य प्रकाश मे है । अगूढ़ का उदाहरण- कचुकी सौधे सनी सुपनो पहिरी चुनरी चटकीली सुरग सौ । घपन देखि 'कुमार' सरूप सिंगार सिगारति प्रीति उमग सों॥ एक कही, करि हेली हहा, यह पाव सही करि सोभ तरग सों। राखति भूषन में रुचि रग तो लाल मिलाउरी सोने से प्रग सों ॥२ यह सखी की नायक के प्रति उक्ति है । वह नायक को कञ्चनशरीरा किसी नायिका से मिलाना चाहती है जिसको 'लाल मिलाउरी सोने से अग सो' कहकर मत्यात स्पष्ट कर दिया है । यह मर्यातरसङ्गमित प्रगढ़ व्यग्य का उदाहरण है । द्वितीय उदाहरण यह है बालर बैस के मानिक प्राजु बिलोकनि रचक नन प्रघात हैं । पीत सगा प्र तीये पाग समीप सखा छवि तो सरसात है। खजन से हग प्रानन चद लस शशिनाथ हिये हुलसात हैं । काह जसोमति के प्रगना मधिमाखन हाय घरे मुसिक्यात हैं ? वक्ता भक्त है । बालकृष्ण के लोकरजक स्वरूप को देखने से भक्त को प्रीति की तृप्ति नही होती है । यह 'नैन प्रघात' मे अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य ध्वनि से सवजन स्पष्ट है । प्रत्य ततिरस्कृत अविवक्षित वाच्य का दूसरा उदाहरण- बधु धधु अवलोकि तुव जानि पर सव ढग । बीस विसे यह वसुमती, जहे तेरे संग । यह भत्य ततिरस्कृत वाच्य ध्वनि की गौणता का उदाहरण है । यहा विपरीत लक्षणा का प्रसग है 'जैहे तेरे सग, से यह अथ है कि न वह किमी के साथ गई है न तेरे साथ जायगी। अत्यन्ततिरस्कृत का भय उदाहरण भी दृष्टव्य है पलक पीक अजन प्रघर धरै महावर भाल । प्राजु मिले जु भली करी भले बने हो लाल ।। - १ वही पृ० १६४ २ काय प्रकाश उद्योत-बालगोधिनी म उद्धृत, पृ० १६४ १६१ भ्वनि सिवात और व्यजनावृत्ति . विवेचन यह बिहारी कवि का दोहा है । यह खण्डिता को सापराध नायक के प्रति उक्ति है। यहां भली करी मोर 'मले बने हो' के विपरीत लक्षणा के द्वारा 'मापने अच्छा नहीं किया, मापने मेरे प्रति अपराध किया है। मापका यह रूप मुझे प्रत्यात कष्ट दे रहा है।' मर्थ स्पष्ट है यहाँ पर खडिता का क्रोध सवजन सवेध है। अपरांग विवेचन-वस्तुत काव्य म रस ध्वनि ही प्रधान होती है। ध्वनियादी मापार्यों में इसकी सर्वोत्कृष्टता ही केवल घोषित न की अपितु काव्य के मय अगो को भी रसादि सम्बध से ही चमत्कार युक्त स्वीकार किया । ध्वयालोकामार ने एक से अधिक स्थान पर रस ध्वनि को वस्तु और मलकार ध्वनि का भी जीवित स्वीकार किया है। मम्मट ने भी ध्वयालोक का ही अनुवतन करते हुए रस को काव्य का मुख्य मथ स्वीकार किया है। रस मे प्रतीत्यात्मक उत्कृष्टता भी विद्यमान है । रस विवपित वाच्य ध्वनि का एक भेद है । रस भाव की प्रतीति मे बुद्धि का व्यवसाय पूर्णतया समाप्त हो जाता है। मविवक्षित वाच्य ध्वनि मे बुद्धि का व्यवसाय यथेष्ट मात्रा में विद्यमान रहता है। उसमें मुख्याथ बाघ, तद्योग मोर प्रयोजन मादि का विमर्ष बुद्धि व्यवसायज य है। पलत प्रयोजन फल की प्रतीति में कुछ समय लग जाता है और फल प्रतीति का माल्हाद मायाससाध्य होने के कारण निम्नकोटि का रहता है। उसे धुद्धितोप कहना ठीक है । सलक्ष्यक्रम विवक्षित-वाच्य में व्यग्याथ की प्रतीति में मविवक्षित वाच्य की अपेक्षा बुद्धि व्यवसाय कुछ कम अवश्य रहता है पर तु उसका थोडा बहुत अवकाश अवश्य बना रहता है । वाच्याथ वोध के उपरात व्यग्याथ वोष तक का प्रम स्पष्ट प्रतीत होता है । रस- घोष मे बुद्धि व्यवसाय प्राय शात सा जान पड़ता है। रस भाव रूप अथ वाच्य के साथ ही सा प्रतीत होता है । शब श्रवण के पश्चात वाच्य का बोध होता है और वाच्य बोध के तुरन्त बाद ही रसादि प्रवभामित होते हैं । वाच्य बोध मोर रसानि प्रतीति में क्रम अवश्य रहता है परन्तु उसकी प्रतीति नहीं होती इसलिए रसाति को प्रसलक्ष्य क्रम उपगय माना जाता है। इसलिए भी रसादि ध्वनि वस्तु एव मलकार ध्वनि की अपेक्षा उत्कृष्ट स्वीकार की जाती है। रसादि ध्वनि की उत्कृष्टता का एक कारण और भी है । वस्तु ध्वनि अथवा मलकार ध्वनि के प्रत्येक उाहरण में किसी न क्सिी रस अथवा भाव का सम्बध अवश्य बना रहता है । रस माव ध्वनि काव्य का प्राण है जिसकी सत्ता अनिवाय है । इसीलिए साहित्य दपणकार ने रस को काव्य की आत्मा स्वीकार कर लिया था। कहने का सारांश यह है कि रसादि ध्वनि उच्चकोटि का काव्य-धमत्तार है। इस चमत्कार के प्रभाव में का को काय सना नहीं दी जा सकती है । रस ध्वनि, वस्तु ध्वनि और अलकार ध्वनि की अपेक्षा एक प्रय दृष्टि से भी उत्कृष्ट है । रस ध्वनि वाच्यतासह होती है उसका वाच्याथ से कोई सम्बघ नहीं होता वह उससे नितात मिल होती है । वस्तु ध्वनि तथा अलकार ध्वनियो म वाच्यार्थ का योग बना रहता है। यह रस ध्वनि ही पाठक अथवा सामाजिक को सद्य परनिवत्ति प्रदान करके मानदप्रदान करता है जो काप का सवमोलिभूत प्रयोजन है। मलकारवादी प्राचाय और रसयत ध्वनिवादियों से पूर्व प्रलकारवादियो ने रस की महत्ता को स्वीकार तो क्यिा था परतु उहोंने मलकार को काय का सवस्व माना। उहोने काय के समस्त सौदय को अलकार में गुणीभूत ध्यंग्य-काव्य १६७ . सनिविष्ट करने की चेष्टा की । रस को भी अलकार नाम से अभिहित करके प्रलकार सीमा में धकेल दिया । इन मलकारवादियो में भामह, दण्डी, वामन और उद्मट का नाम उल्लेखनीय है। भामह मोर दण्डी ने रस मोर भाव को रसवत मादि मलकारो में सम्मिलित कर लिया। उद्भट्ट ने भी भामह का अनुकरण किया है और भामह को मा यतानो पर अपनी प्रतिभा की छाप लगादी है । ये सभी प्राचाय रस को वह स्थान प्रदान न कर सके जो उसको बाद में ध्वनिवादी भाचार्यों द्वारा प्रदान किया गया । इसका प्रधान कारण यह था कि नाटय शास्त्र मे 'नाट्ये प्रष्टौ रसा स्मता लिखकर महाकाव्य में मानो उसका निषेध कर दिया गया था। इसका प्रथम प्रतिवाद रुद्रभट्ट ने अपने शृगार तिलक नामक प्रथ मे किया। उसने स्पष्ट लिखा-नव काव्ये रसा स्मता' काव्य में नव रस स्वीकार किये जाते हैं । भामह, दण्डो, रुद्रभट्ट के पूर्ववर्ती प्राचाय हैं । यद्यपि ये अलकारवादी प्राचाय व्यग्याययुक्त काव्य के चमत्तार से पूण परिचित से जान पड़ते हैं तथापि वे उस अय को अलकार से अधिक महत्ता न दे सके। उसमें नाट्य शास्त्र का का उपयुक्त उल्लेख ही प्रमुख बाधक जान पडता है। भामह दण्डी और उद्भट तीनो भाचार्यों ने रस, भाव रसाभास और भावाभास को प्रमश रसवत, प्रेयस्वत और ऊजस्वि अलकार म दिया है और प्राचाय उद्मट ने भाव शान्ति को समाहित भलकार माना । भामह और दण्डी के समाहित से उद्भट का समाहित भिन्न है । इन तीनों माचार्यों मे भामह पहिले प्राचार्य है और गेप दोनों प्राचार्यों ने इनसे यथेष्ट प्रेरणा ली है परतु दण्डी भौर उद्मट का विवेचन भामह की अपेक्षा उत्तरोत्तर प्रवल है। मलकारा की परिमापा निश्चित करने में उभट ने विशेष सूझ बूझ का परिचय दिया है। उद्भट द्वारा प्रतिपादित परिभाषायें मषिक स्पष्ट एव वज्ञानिक हैं। रसवत मलकार का लक्षण दण्डो ने अायत सक्षिप्त दिया है, रसवत रसपेशलम परन्तु उद्भट की परिभाषा मे रस के अवयवा का भी समावेश हो गया है वह इस प्रकार है- रसवद्दशित स्पष्ट शूगारादिरसादयम् । स्वशब्द स्थायि सचारि विभावामिनया स्पवम् । उक्त परिमाषा मे स्थायी सचारी, विभाव और अभिनय के साथ स्वशब्द का भी उल्लेख है। जैसा इसी प्रसग मे मयत्र उल्लेख किया जा चुका है कि उद्मट के समय तक रस स्थिति नाटको तक ही सीमित पो। इसीलिए उद्भट ने इसमे मभिनय को ग्रहण कर लिया । रस निष्पति में स्थायी, सचारी और विभावादि की स्थिति तो ध्वनिवादियो को भी माय है। रस निष्पति के लिए स्थायी पौर सचारी मादि को स्वशब्दवाच्यता उदमट के समय में अनिवाय रही होगी जैसाकि अनेक उदाहरणो से स्पष्ट है । ध्वनिवादियो के समय में रस, भाव भादि की स्वश दयाच्यता दोष मानी गयो । मलारवादी प्राचार्यों ने रसवत अलकार वहां स्वीकार किया जहा यह अङ्गीभूत स्थिति में हो। इसके विपरीत ध्वनिवादियो ने रसवत अलकार महाँ माना है जहा पर रसादि किसी मय रसादि प्रथदा वाक्यार्थीभूत वाच्य का प्रग बन गया हो । प्रेय अलकार की परिभाषा उद्भट ने यह दी है, जहा पर मनुभाव मादि के द्वारा इत्यादि स्थायी भावो का काव्य मे बधन होता है सज्जनों ने उसे प्रेय का उदाहरण स्वीकार किया है। कहने की मावश्यक्ता नही कि यहाँ पर मलकारवादिया का भाव का मङ्गो (प्रधान) होना स्वीकार है । इसके विपरीत ध्वनिवादी भाव को मङ्गता मे प्रेयस्वद भासार स्योकार करते हैं।

१६८ ध्यनि सिवात मोर ध्यजनावृत्ति विवेचन कजस्वि नामक मलकार के जो उदाहरण भामह और दण्डी द्वारा प्रस्तुत किये गये हैं उनसे प्रकट होता है कि ये दोनों प्राचार्य इस प्रकार का सम्बघ कजस्वि वचनों के कथन से स्वीकार करते थे । परतु ऊजस्वि के लक्षण में उद्भट ने एक महत्वपूण एव प्रावश्यक परिवतन कर दिया है । उहोने अपने लक्षण मे ससपर लिखा कि काम क्रोध प्रादि कारणा से अनौचित्य रूप से प्रवर्तित रसो मौर भावो का काव्य में निव धन ऊजस्वि कहाता है । उद्भट के इस लक्षण में ध्वनिवादियों ने उतना हो परिवतन किया जो पिछले दोनों अलकारा रसवत और प्रयस्वत् में किया था, अर्थात् उद्भट ने पङ्गीभून रसाभास और भावाभास को कम्बि प्रकार स्वीकार किया । पर ध्वनिवादियो ने अगभूत रसामास और भावभास को ऊजस्वि माना। समाहित मलकार के लक्षण और स्वरूप के सम्बयम भी उद्भट मोर ध्वनिवादी प्राचार्यों की मा यतामा में वही अगीभूत पौर अगभूत वाला प्रधान अन्तर है । उद्भट ने समाहित अलकार वहा स्वीकार किया है जहा रसभाव, रसामास मोर भावाभास की शाति का ऐसा निवधन हो जिसमे अय किमी रस रमाभास आदि के अनुभावा की प्रतीति न हो। 7 उद्भट प्रादि अंगीभूत रसादि को अलकार मानते हुए भी चित्रालकारा से भिन्न मानते थे। हमारी इस धारणा को पुष्टि इस बात से और भी अधिक होती है कि- उद्भट द्वारा प्रस्तुत द्वितीय उदात्त मलकार में उनके यारपाता प्रति हारे दुराज ने भगभूत रसादि को सम्मिलित किया है। उनके इस कथन का अनुमोदन रुय्यक के मलकार सवस्व में भी उपलब्ध है । उहोने इस का अनुमोदन करते हुए लिखा है यत्र यास्मिन दशने वाक्यार्थीभूता रसादयो रसवदायलकारा । तत्रांगभूत रसादि विषये द्वितीय उदात्तालकार ॥ कहने का तात्पय यह है कि मल कारवादियो को रसादि की दो स्थितिया स्पष्ट माग्य थी (१) भगीभूत और (२) अगभूत । रसादि की अगीभूत स्थिति में रसवत् प्रादि मलकार नाम दिया जाता था और अगभूत स्थिति को उदात्त अलकार मे सम्मिलित किया जाता था । ध्वनि मौर रसवादी भाचार्यों ने जब अगभूत-गौण रस प्रादि को गुणीभूत के अपरोर्ग भेद के प्रतगत स्थान प्रदान कर दिया तो द्वितीय उदात्तालकार वाली धारणा भी समाप्त हो गयो। विश्वनाथ ने इसी तथ्य का उल्लेख किया है । म्वनिकार से पूर्व की रसवत् मायता ध्वनिकार से पूर्व रसवादि अलकारो के सम्ब ध म इस मा " अतिरिक एक मा यता 7 १---अनौचित्य प्रवताना कामजोधादि कारणात् । भावानां च रसाना च बघ ऊर्जस्वि क्थ्यते । का. सा. स, -रसमाव तदाभास वत न । का० सा० स०,४१७ x-मलकारस गुणीभूत ध्यग्य काय १६६ मौर थी, जिसका उल्लेख ध्वनिकार ने पूर्व पक्ष के रूप म किया है । "जहा पर चेतन व्यक्तिया के वणन का प्राधाय होता है वहा रसवत मलकार माना जाता है । यह मा यता किस विद्वान को है इसका कोई उल्लेख नहीं है । ध्वनिकार ने इस मा यता का खण्डन निम्नलिखित ढग से किया है । प्रथम जहा जहा प्रचेतन पदार्थों का वणन उपलब्ध होता है वहा वहा चैतन का सम्पक अनिवार्य रूप से रहता ही है । यदि चेतन वणन में रसवत प्रलकार मान लिया जाता है तो उपमादि प्रलंकारो का विषय क्षेत्र ही समाप्त हो जाता है।' अनेक महाकविया के अचेतन पदार्थों के प्रत्य त सरस वणन उपलब्ध हैं । यदि रसवत को केवल चेतन जीवन के वर्णन तक ही सीमित कर दिया जायगा तो मचेतन पदार्थों के सभी वणन नीरस मानने पडेगे । अचेतन जगत के वणन भी मानव भावना के भारोप से ही रसपेशल हैं । यहाँ तक कि उपमादि के प्रप्रस्तुत विधान म भी मानव भावनाप्रो और चेष्टामा का प्रयोग प्रचुर रूप से मिलता है। भामह, दण्डी, उद्भट और ध्वनिकार को रसवत सम्बन्धी मा यताओं के साथ इस उपयुक्त मा यता का भी फुतक ने पूर्व पक्ष मे उल्लेख किया है । इससे स्पष्ट है कि चेतन व्यक्तियो के भावपूर्ण वर्णन सम्बधी रसवत की उपयुक्त मायता काव्यशास्त्र में प्रमुख रही है, तमो तो ध्वनिकार भोर वक्रोक्तिजीवितकार ने उसका पूवपक्ष म खण्डन करने के लिए उल्लेख किया है। ध्वनिकार और रसवत अलकार-रसवत अलकार के सम्बन्ध में ध्वनिकार की मान्यता का सार यह है । रसादि कभी भी अलकार नहीं हो सकते वे तो अलकाय हैं । जहाँ कही उहे मलंकार माना जायगा वहा भी उस पथ मे नही जिस अथ में असकार माने जाते हैं । राजा क्सिी मनुयायी सेवक के विवाह मे वर के पोछे पीछे चलता हुमा भी गौणत्व प्राप्त नहीं करता। उन्होंने स्पष्ट कहा है- "मेरी सम्मति में रसादि अलार काव्य म वहां पर माना जाना चाहिए जहां पर किसी अय वाक्याथ की प्रधानता होने पर रसादि अग हो।' ५ पभिनय गुण मौर रसवत अलकार-वस्तुत अगभूत रसादि भी अलकार्य है । मलकार कसे माने जा सकते हैं । लोचनकार अभिनव गुप्त ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ध्वनिकार के मत का इस प्रकार समथन किया है "उपमादि अलवारो म चद्र प्रादि जिस प्रकार मुख मादि को प्रलयत करते हैं उसी प्रकार रसादि दूसरे रस अथवा वस्तु को प्रलकृत कर सकते हैं । इसलिए चन्द्र मादि की भाति रसादि को अलकार कहने मे न कोई कठिनाई है और न कोई विरोध है। ' 'यदि तु चेतनाना वाक्यार्थीभापो रसाचलकारस्य विषय इत्युच्चते । तहयुपमादीना प्रविरलविषयतानिविषयता वाभिहिता स्यात् । घ्व०, प०६१ 12 ध्वयालोक पृ०६२ ३ वक्रोकिजीवित हिदी टीका, प० ३५३ ३५४ ४ वयालोक दीधिति, पृ० ३४७ प्रधानेऽ यत्र वाक्या यत्रागतु रसादय । काम्ये तस्मित्रलकारो रसादिरिति में मति । ध्व० २।५ ५ १७० प्वनि सिद्धात ध्यजनावृत्ति विवेचन "इस पर यदि यह प्रश्न किया जाय कि रस किस प्रकार प्रस्तुत मथ को अलकृत करता है ? तो प्रश्नकर्ता से यह भी पूछा जा सकता है कि उपमा किस प्रकार प्रस्तुत पथ को अलकृत मरती है ? यदि प्रश्नरर्ता पूछे गये प्रश्न का यह उत्तर देता है कि उपमा प्रस्तुत प्रथ के सदृश पदार्थ लाकर उसके सौदय एव प्रभाव को हृदयगम कराने में सहायता करती है । तो बस, यही उत्तर इस प्रसग मे स्वीकार किया जा सकता है कि रस मी गोश रहकर प्रस्तुत प्रधान मथ को सरस बना देता है । इसमे अपनी सवेदना ही प्रमाण है।" कुतक और रसवत अलकार-वोक्तिजीवितकार मानाय कुतक ने रसवत् की तीन मा यतामा मलकारवादियों की मा यता चेतन व्यक्तियों के वणनवाली मा यता और ध्वनिकार को मा यता को पूर्वपदा में रखकर तीनो का खण्डन किया है । कुतक ने रसवत की उपयुक्त मा यतामा का विभिनरूप से खण्डन किया है । उहाने अलकारवादियों भामह दण्डी पोर उभट की परिभाषामा का उल्लेख किया है और रसवत् शद की व्याकरणिक निष्पत्ति के प्राधार पर अधिक ध्यान दिया है । इन भाचार्यो की रसवत की भा यता के अनुसार जो भी अलकार अपने रसात्मद सौदय से रस के समान ही सहृदय ग्राह्लादकारी होता है उसे ही रसवत अलकार कहते हैं । भामह उद्मट आदि ने जो रसवत शन का प्रयोग किया है उसम रस श द से मतुप' प्रत्यय स्वीकार न करके पाणिनि के 'तन तुल्य० क्रिया चेद्दति ' सूत्र से सादृश्याथक वति' प्रत्यय स्वीकार क्यिा है। पुतक ने 'रसवत्' के अपने समय तक के प्रचलित सभी लक्षणो का बौद्धिक खण्डन करने का प्रयत्न किया, परतु उहोने 'रसवत' की कोई नवीन स्थापना प्रस्तुत नही की। 'रसवत्' की उनकी व्याकरणिक व्यारया से सुदर समाधान नहीं हुआ। चुतक ने प्रेय , ऊजस्वी, समाहित अलकारो के प्राचीन लक्षणो की भी आलोचना की है। यह पालोचना भी प्राय खण्डन के लिये ही है। उनके स्थान पर उन्होंने कोई अपना सुझाव नही दिया है । "कुतक ने उपयुक्त सभी अलंकारो का रसवत् अलंकार को भांति ही निपेष क्यिा । उनका एक सामा य तक तो यही है कि रसपूण कयन की भांति प्रिय क्थन प्रथवा ऊजस्वी कथन आदि उभट के अनुसार भाव, भावाभास, रसामास तथा भाव शान्ति भी अलकाय ही हैं, वे अलकार नहीं हो सकते । इसके अतिरिक्त प्रत्येक मलकार के विरुद्ध विशेष तर्क 'भो कुतक ने प्रस्तुत किये है उदाहरण के लिये दण्डो का 'प्रियत्तर पाख्यान' उमाज स्तुति मात्र 'है, उदमट का भाव कथन भी ज्याज स्तुति मादि कोई अलकार हो सकता है । उनका अजस्वी तो किसी प्रकार माय नहीं हो सकता क्योकि अनौचित्य काव्य में सवथा अग्राह्य है"' कुतक के पश्चात् कालक्रमानुसार मम्मट का समय है । परन्तु उनसे पहिले उनके परवर्ती विश्वनाथ और पण्डित राज पी 'रसवत् को मा यताम्रो का विवेचन किया जाता है क्योकि मालोच्य रीतिकालीन प्राचार्यों ने 'रसवत्' के सम्बध में प्राय मम्मट का ही मनुसरण किया है । रसवत् मलकार और विश्वनाथ रसवत को विश्वनाथ ने चुपचाप गुणीभूत यग्य के अतिरिक्त व्यग्य के मतर्गत रस दिया हिदी वक्रोक्तिजीवित की भूमिका, पृष्ठ १६० गुणीभूत ध्याय झापा ११ है । उहोने कोई विशेष बात नहीं कही है। वस्तुत रस मे काव्यत्व स्वीकार करने वाले विश्वनाथ ने रस के गौण प्रसग को गुणीभूत व्यग्य के अतिरिक्त दूसरा नाम देना उचित न समझा। रसयत् मोर पण्डितराज पण्डितराज ने रसव के विवेचन में कई विवादो मोर विकल्पो पी सक्षेप मे सूचना दो है जिनका यहाँ उल्लेख प्रसगत प्रतीत होता है । रसवत के सम्बय म वह मम्मट के अनुयायो नहीं है, अपितु प्रान दवधन और अभिनवगुप्त के अनुयाया है। उन्होने मान दवधन और अभिनवगुप्त के 'रसवत् सम्बधी सिद्धात को भी माख वद करके स्वीकार नहीं कर लिया है, लेकिन उसकी बारीकियों का भी उद्घाटन किया है । इससे मम्मट की अरुचि के समाधान की भी सभावना भी वे प्रस्तुत करते हैं।' मम्मट फी रसबद सम्पयो मा यता मम्मट ने "रसवदलकार के स्थान मे 'अपराग' शब्द का प्रयोग किया है जो उचित है । भाब्य मे प्रधान स्यार रखने वाला रस अप्रधान होने पर 'मपराङ्ग' दूसरे प्रधान का मग ही स्वीकार किया जायगा। मान दवधन ने 'रसवत' को अलवाय होते हुए भी अलकार माना है मम्मट को यह स्वीकार नहीं । उहोने मलकार का यह लक्षण किया है उपयुवति त सत प्रगद्वारेण पातुमित । हारादिपदलकारा । मम्मट के अनुसार मलकार वे हो हैं जो काय के शरीर शद अथवा अर्थ को सुशाभित करते हुए काव्य के अगीभूत (प्रधान) रस अथवा व्यग्य यो उपटत करते हैं । मलबार का यह लक्षण 'रसवत' मलकारो पर घटित नही होता है । गुणीभूतरसादि किसी पद अथवा अथ को उपमादि अलकारो की भांति भूपित करते हुए विसी माय रसादि यो उपरत नहीं करते । इसीलिये कदाचित मम्मट को 'रसवदादि मलकार वना उचित प्रतीत नहीं होता और यही कारण है कि मम्मट ने रसवदादि को न तो दशम उल्लास म अलवारा के साथ रक्खा और न उनका रसवदादि' नाम के मतगत विवेचन हो किया । उनको गुणीभूत यग्य मानकर उसका अपराङ्ग नामक भेद स्वीकार किया है । ध्वनि की दृष्टि से मम्मट का पक्ष सगत है। अपराङ्ग 'गुणीभूत व्यग्य के मम्मट सम्मत दो रूप हैं, (१) अपर रसादि का प्रग अय रम, (२) वाक्यार्थी भूत (प्रधान) वाच्य के प्रति अनुरणन रूप व्यग्य की अगता। इनम से प्रथम रूप के निम्नलिखित सात प्रकार हो सकते हैं १-क्सिी नगीभूत रस अथवा भाव के प्रति रस की अगता। २-प्रगीभूत भाव के प्रति भाव अथवा रस की प्रगता। - 7 १ २ रसगगाधर का शास्त्रीय अध्ययन, पृष्ठ ३०२ काव्यप्रकाश को बाल वोधिनी टीका, पृष्ठ २०१। टीकावार वामन झलकीर ने अनेक टीकाकारो के मतों का उल्लेख करके सिद्ध कर दिया है कि मम्मट को 'रसवदादि वा अलकारत्व माय नहीं है। काव्यप्रकाश, पृष्ठ २८ ३ १७२ ध्वनि सिवारत और ग्यजनावृत्ति विषेधन ३-अगीभूत भाव के प्रति रसाभास और भावाभास की अगता। ४-प्रगीभूत भाव के प्रति भावशाति को प्रगता। -अगीभूत भाव पे प्रति भावोदय की प्रगता। ६.-प्रगीभूत भाव के प्रति भाव सधि को अगता। ७-अगीभूत भाव के प्रति भाव शबलता को प्रगता। १-किसी अंगीभूत रस अथवा भाव के प्रति रम की अगता का उदाहरण । 'सपनो है ससार यह रहत न जान कोइ । मन मिलि पिय भावति परी काल्हि कहा पो होइ । २-यहाँ शात रस शृङ्गार का प्रग हैं । मानिनी नायिका से नायव अथवा दूतो की उक्ति है। अपराग के इसी रूप का अय उदाहरण हाथ यहै मोडत कुचनि, मनि मु दरो उजियार। यह रसना गुन कचुरी नीषी-खोलन हार ॥ इसमें शृङ्गार रस करुण रस का भग होकर चित्रित है। यह का य प्रकाश के रसवत के उदाहरण का अनुवाद है । अगीभूत रस के प्रति अय रस की प्रगता के कुछ अन्य उदाहरण ३-अदुभूत रसवत् अलकार का वणन जाहि दावानल पान किये तें बढ़ी हिय में सरवी सरदेसो । वास अघासुर जोर हरयो नु लरयौ यतसासुर से बरसों॥ बूढप्त राखि लियो गिरि ल वृज देश पुर दर बेदरदे सों। ईस हमें पर दे परदेसी मिलों उडि ता हरि सों परदेसो । यह छद किसी विरहिणी की उक्ति है । छ द की प्रथम तीन पक्तियो मे हरि के विस्मयकारी काय-कलाप का उल्लेख होने से अद्भुत रस की व्यजना होती है। पर तु विरहिणी का मतव्य हरि के मद्भुत स्वरूप की व्यजना कराना नही है अपितु वह उस लोक विस्मयकारी अद्भुत पुरुष से परदेश मे गुप्त रूप से मिलने के लिये यन है । यहा अद्भुत रस शृङ्गार का अग है । ४-भयानक रसवत का उदाहरण- भूल्यो भिर भ्रमजाल में जीव के पाल की ख्याल में फूल्यो फिर है । भूत सु पांच लगे मजबूत है सांच अवत है नाच नचहै ।। कान मे मानुरेदास कहीं को नहीं तो तहीं मनही पछित हैं । काम के तेज निकाम तप विन राम जपें विसराम न पहैं । इस छद की प्रथम दो पक्तियों और चौथी प्राधी पक्ति में ससार के भ्रम-जाल म जीव का बपना मोर पाचभौतिक शरीर म उसको मास्था प्रादि का उल्लेख करके ससार के प्रति भय जाग्रत किया गया है । तीसरी पक्ति एव चौथो पक्ति के बिन राम जपं विसराम न पंह' से शात रस की व्यजना है । यहाँ पर शात ही प्रधान है और भयानक रस उसका प्रग है। इस पाराग का एक रूप और है-भाव के प्रति रस को अगता उसका उदाहरण यह है । कासो में बासु कर सुमिर गिव को शिवलोकनि ऊपर जहे । भूल हू तू जो चितहै इत जम भाजत हू हूँ ठौरन पहे। काल को काल सरूप सखें जम को जम है हमे जीति न लहे। प्रान पयान सम निहच भव जु भवतारक तारक है।

गुणीभूत म्याय-काय । १३ -- - - प्रेयस्वत् मलंकार भी 'अपरांग' गुणीभूत ध्यग्य का भेद है । इसके भी दो रूप सम्भव हैं ? प्रगीभूत रस के प्रति भाव को प्रगता और अगोभूत भाव के प्रति भाव को अगता । इसमें प्रथम भेद समोचीन एव भव्यावहारिक है । कारण भगीभूत रस के प्रविरोधी भाव उसके परिपाक मे सहायक होकर प्रग होते हैं । रौद्ररस मे गयभाव सवदा सचारी रूप में मग बनकर रहता है। रस को परिपक्वावस्था मे उत्तम काव्य होगा। अगीभूत रस के विरोधी भाव उसके परिपाक में बाधक होगे, यथा शृङ्गार में जुगुप्सा । फलत इसका द्वितीय रूप ही व्यावहारिक है । जो प जाइ रहै मेरु मदर को कदर तो, घेऊ राखि सक न सुनत परक नाम के। लोकालोक लगु लगु लागन न पाव कहूँ। बेई पाई गहिये पहार छोडि मान के। होहि जो अलच्छि तो न देव फोउ घच्छु, नेक होत ही समच्छ ह्व है धन के न धामके, फेरत है पच्छ विन नीर जैसे मच्छ, असे यन बन गाहत विपच्छ फिर रामके। यहा बरियों की चिता राजरति भाव ध्वनि का प्रग है इसी का दूसरा उदाहरण यह है दीह दरीभत बेहद बारिद बागवनी प्रौ नदी नव नारे । भूपन के दल भारे घरे धरकी न घरा घीन तेरे करारे । में विसम यसते बसुधा घर धानीन के गुन गाय पसारे । तौली नरेश फतेश को बाहुँ करो मन मे पुनि बैन निवारे ।। यहा पर कवि की भूमि विषयक प्रीति प्राश्रयदाता विषयक प्रीति का प्रग है । जस्वि में दो रूप हो सकते हैं । रसाभास भाव का अग और भावाभास भाव का भग । प्रथम रूप का उदाहरण नीचे दिया जा रहा है इक चु बत इ. गहत इक प्रालिंगत भरि बह । तुब बेरनि को याम बन भ्रमत फिरत धिन नाह ।। उपयुक्त दोहे मे एक ही शत्र नारी के प्रति अनेक जेता सनिको का चुम्बन और मालिंगन प्रादि वरिणत है । यह शृङ्गारामास है जो राजविषयक रतिभाव का अग है । विषय की दृष्टि से उदाहरण मम्मट सम्मत है । मम्मट के उदाहरण मे माश्रय दाता राजा के सनिक राजा के पराजित शत्र के सामने उसको नारियो के प्रति विभिन्न काम चेष्टामो का प्रदशन करते हैं । इसी का दूसरा उदाहरण भी अवलोकनीय है। ३-दारिद विवारिवे की प्रभु के प्रयास तो, हमारे यहाँ अनगन दारिद की खान है। मध को सिकारी जो है बजीरे तिहारो तो हो, तन मन पूरन अपनि राख्यो ठानि है।

१७४ावनि सिवात मोर म्यजनावृत्ति विवेचन बास निज समति सुसाहिब के काज पाए, होत हरपित पूरो भाग उनमानि है। मापनो विपत्ति को हजुर हो करत लखि, रायरे को विपत्ति विवारन को पानि है। यह विसी रक्त को अपने इष्ट देव ६ प्रति उक्ति है। यह कहता है 'हे देव यदि माप को नष्ट करने के लिए दारिद्र की प्रावश्यक्ता है तो मरे पास दारिद्रय का भण्डार है, और यदि आपकी दृष्टि पाप' का शिकार करना चाहती है तो मैंने पापो से अपना तन मन पूर्ण कर रक्खा है । मेरा तो यह बहा सोमाग्य और हप वा अवसर होगा कि मेरी कोई भी सम्पति मेरे स्वामी के काम पावे। मैं तो वास्तव में पापवी विपत्ति विदारण की प्रवृत्ति देख कर ही विपत्तियों को एकत्र किये रहता है। भक्त अपने इष्टदेव को यह कहकर कि मै दारिद्रय, पाप मौर सकटो से घिरा हुमा हूँ अपनी दीनता को प्रकट कर रहा है, परतु क्थन पद्धति से यह जान पड़ता है मानो वह अपना सवस्व अपने प्रभु की इच्छा को पूर्ति के लिए देन को प्रस्तुत है । भक्त का दान दने में उत्साह दिखाना दानवीर का रसाभास है, यह उसको दोनता का प्रङ्ग है । यहाँ रसाभास भाव का ऊजस्वि के दूसरे रूप म भावाभास भाव के अङ्ग होते हैं । इसका उदाहरण यह है रामसिंह कर खाग लखि मरिगन अधिक अधोर। सजत सार साजत नहीं सूर वीर ग नोर ॥ पूरो का अधीर होना हग से नीर बहाना 'त्रास' नामक भावाभास है जो यहा पर राज विषयक रतिभाव का पङ्ग है। कजस्वि का दूसरा उदाहरण यह है सहज सिकार महाराज रामचद्र प्रल घोर घा से निसान गरजत हैं। है परताप मुनि तिनके कठोर घोर जोर दिगपालन के हिये लरजत हैं। मिले एक ठौर उपदेस येक येकन को कोजियो न घर एक एक परजत हैं । राबरे सरासन के त्रासन सा सूर धोर हमान के नीर नये नद से रचत हैं। माश्रयदाता की वीरता की प्रासा है । राजरति प्रधान भाव है। श-पक्ष के शूरवीरो पा नेत्रो से नीर बहाना चिता त्रास आदि भावाभास हैं । ये राजरति के अङ्ग हैं। उदाहरण लक्षण सम्मत है। समाहित मे भाव के प्रति माव शाति को अङ्गता रहती है । इसका उदाहरण यह है गरजि गरजि डरपाबत पातक मदहि बढ़ाई । जात न जाने कित गये देखत कसोराइ ।।

गुणीभूत ध्यंग्य-काय १७५ उपयुक्त दोहे में देव विपयक रतिभाव के प्रति पातको के गव भाव की शान्ति की इसका दूसरा उदाहरण यह है पोल पपरत गाजे दुदुभी अनेक बाजे सुभट समाज साज ताजी सेज घाइ क । मम्बर गरद मढे पदी विरवनि पढ़े ढाढ़ी करखनि रढ़ चढ़े चोष धाइ के ॥ मागे नेजवाजनि प्राराब को पाबाजनि सो सिंघ को गराजनि गरूर भरे प्राइ के । फतेपति साह तेरे सामुहें समर भरिन की कीरति होति जती के सुभाइ कै॥ फतेहशाह को सुव्यवस्थित सेना के सम्मुख उसके शत्रुओं के सभी उत्साह शान्त हो जाते हैं । पाश्रयदाता विषयक कवि की प्रीति प्रङ्गीभूत भाव है । शत्र प्रो की उत्साह-शाति उसका अङ्ग है । भाव के प्रति भावोदय को अङ्गता का उदाहरण परिगन निजु मदिर रमत युवतिन सग सुभाइ रामरूप लखि चिनहूँ उठत गिरत भहराइ ॥ प्रस्तुत दोहे में राजा विषयक रति के प्रति शत्रमा के 'पास' भाव के उदय की मङ्गता का चित्रण है । इसपर काव्यप्रकाश के तत्सम्बधी उदाहरण की खाया है ! इसका एक भय उदाहरण यह है साह फते सुनिये वसुधाषिप, धरिन के बर को अधिकाई । साजि समाज जलूस यजेज भरें चरचा चहुँधा की चलाई। मावेगी साह फ्ते फरि दच्छिन កត្តា परी सुलतान बडाई। वाक विचार सफ कहि को भ्रम तेरे ममयी उयो सी मथाई ।। यहां पर कवि-गत माश्रयदाता राजा की प्रीति मङ्गोमूत भाव है । शत्र मो म वास अथवा मावेग भाव का उदय उस राजा विषयक अङ्गीभूत प्रीतिभाव का अङ्ग है । यहा भावोदय मलकार है। भाव के प्रति भाव सघि को मङ्गता, यथा रामसिंह दुदुभि सुनत खलमल बरनि धाम । पिय मिलिबो भर भाजिवो करो विकल प्रतिवाम ॥ प्रस्तुत दोहे मे राजविषयक रति के प्रति शत्र प्रो को नारियों के प्रियमिलन के प्रति - मौत्सुक्य भाव भोर माश्रयदाता के कारण 'त्रास भाव' की सधि की मङ्गवा का उल्लेख है ।

परसन करत प्रभात ही पावन सरिस पतगी रग । प्रस्तुत दोहे में विरह कमलिनी पायन मादिदा परिवृत्यसह हैं। इन प्रयोग से पर्तगौर नायक का उपमेयोपमान भाव वाच्य हो गया। यही वाच्य भङ्गामू मन्यानुरक्त नायक के सण्डिता प्रति व्यवहार को भभि पक्ति हो रही था। परतु 'सरिस' उपयुक्त राम्दशक्तमूल सलक्ष्यवमयग्य इसी वाच्य का भङ्ग हो गया। यह अपर १७६ • ध्वनि सिद्धान्त और व्यजनावृत्ति विवेचन इसका दूसरा उदाहरण यह है कुसुमतें कोमल कलेवर कुवरि गौरि तप सों कठोर जामे थाबरो थकत हैं। देखत दयाल के दुखियत दोन वधुहर में- हो दास तेरो पहिवे को उचात है ।। अषते पियूष ते मधुर मधु दाप हूँ ते सुबनीन भरमबस रस हूँ छकत हैं। प्राइक उतावरे गिरी गिरिजा के ढिग सहो न सकत क्छु कह्यो सक्त है ।। शविगत देवी गिरिजा विषयक भक्ति-श्रद्धा मङ्गीभूत भाव है । इसम शव चपलता मोर ब्रीडा की सघि मन है । उदाहरण शास्त्र सम्मत है। भाव के प्रति भाव सबलता की अङ्गता पुलक्ति मन घर झलक हग मानद उमग अपार । भक्तन के उर होत हैं, सुमिरत नद कुमार ।। प्रस्तुत दोहे मे देव विषयक रति के पति भक्तो की भाव सबलता अङ्ग रूप में चित्रित वाच्य के प्रति सलक्ष्यनमव्यग्य भीम द्वितीय रूप का उदाहरण --- अपराग के दूसरे रूप मे वाक्यार्थीभूत सकता है। इसका उदाहरण यह है राति वितं किलहू विरह बिकल कमाल । दोहे पर का यप्रकाश की छाया है। पाप सिम्यग। काप में जहा व्यग्य वाक्यार्थीभूत वाच्याथ को सिद्धि में योगदान करके अप्रधानता स्थिति में स्थित रहता है यहाँ धाच्यासिध्यग गुणीभूतव्यग्य होता है। मम्मट ने वाच्यसिद्धयग गुणीभूत के दो उदाहरण दिये हैं मोर उसके एक वक्तगत ! भिन्न वक्तगत दो भेद स्वीकार किये हैं।' इनमे एक भिन्नता और प्रतीत होती है जिसका का प्रकाशकार ने उल्लेख नही किया है । एक उदाहरण में शदशक्तिमूल व्यग्य है और दूसरे में। पक्ति मूल व्यग्य । १ एतन्चक वक्त गतत्वेन भपरत्र भिन्न वक्त गत्वेनेत्यनयोनँद ।

गुणीभूत व्यजना काव्य १७७ मम्मट का उदाहरण इस प्रकार है। भ्रनिमरति मल सहृदयतां प्रलय मूत्रिम शरीरसादम । मरण च जलदभुजगज प्रसह्य कुफ्ते विष विपोगिनीनाम । 'मघ रूपी भुजा से उन विप वलपूर्वी विवागिनिया को भ्रमि, परति, अलस थना, अ धकार गरीर दुबलता भोर मरण भी उत्पन्न करता है ।' वक्ता पवि मेघ से मुजग सिद्ध करना चाहता है । उसवे मतन्य वी सिद्धि जल और हालाहल पा प्रथ देने वाला दिप श द वरता है। विप मैघ के सम्ब घ म जल के प्रथम नियां प्रत हो जा। पर जलद मम्यध मे हालाहाबा अथ भी देता है । इरा उदाहरण म, जलद भुजग पा रूपकत्व द्वयाथव विप पद के प्रयोग द्वारा सम्भव बनता है , मम्मट के इस उदाहरण की छाया दास प निम्नलिखित उदाहरण म हैं । वरपाल न लाल गह गौन करो केहि हेतु । ध्याल बलाहरु विष यरसि, विरहिनि को जिय लेतु ।। यह एक वक्त गत वाच्यसिध्यग गुणीभूत घ्यग्य का उदाहरण है । यह किसी व्यगिधारिणा पोस या समय भाये जार के प्रति उरि है। वह कहती है कि इस समय वषा काल है. पति पर में नहा है पाप भी जाने के इटा जान पडते हैं, मेघ स्पो सप यिप की वर्षा करक दिरहिणियों पे प्राणा के ग्राहक हो रहे हैं । मम्मट वै उदाहरण पो भाति यहां पर भी 'विप' द्वयथय पर है। इसका दूसरा उनाहरण यह है घषभ वाहिनी अग उर यासुकि लसत नवीन । शिव सँग सोहै सयदा शिया कि राय प्रधान ।। उदाहरण मे यदि शिव पावती पद का उल्लेख न होता तो 'राय प्रवीन' यी ममानता पावती से यग्य होती। परतु शिवा के उल्लेग से वाचाथ मुम्प हा गया और व्यग्य उमकी मिद्धिदायग बन गया। - एक वक्त गत वाच्यसिद्धयग गुरणीभूत व्यग्य या एक मय उगहरण । जीवन गोपन जेठ यो, पूपा विपु योर । उयो प्रयानी अब कहा, उपचारना और नायिका की अतरग ससी वक्ता है । नायिका वा सम्पर जेट मे है । ममी पति प्रागमन 1 की सूचना न रही है वि विधु वीर उरित हुा । इम वाच्य की सिद्धि में जावन नापन जेट या का प्पग्याथ कि अब जठ को यष्ट हो गया इसमा मिदिम सहायक है। मिन्न क्त गत दाच्यसिध्यग का उदाहरण- तरे देखिये वो मेरो साल तरमन, महाहप रम बांध्या तारो तू न उमानि। यह मनि वास जौली कनर को देन लागी, पार परी सामु बात कम मिवनि है॥

१७८ पनि सिद्धात मोर ध्यजनावृत्ति विवेचन रखी जो कहति तो तो नेह मरत भर नेह के कहे जे सास डाटति दहति है। सेनापति याते निठराई ते क्ह त, पलिहार फरों ताहि जाहि लाल तू कहति है ।। नायिका के पास दूतो नायक का स देश लेकर पहुंची है उसने लाल का सदा देना प्रारम्भ किया था कि नायिका को सास पहुँच गई। उसको उपस्थिति में नायिका सीधा वाच्याथपरव उत्तर न दे सकी उसने यग्य का सहारा लिया । उसो क्थन का लाल पद दययक है। उसका व्यग्य वाच्याय का पोषक है। प्रस्फुट ध्य यालोककार ने मस्फुट ध्यग्य के सम्बध मे लिखा था जहां प्रतीयमान प्रथ प्रक्रिप्टता अथवा अगता से प्रतीत होता है उसका ध्वनि मे अतर्भाव सम्भव नही । वह मस्फुट गुणीभूत यग्य का विषय है । "दो प्रकार के प्रतीयमान स्फुट और प्रस्फुट-म जो स्फुट प्रतोयमान श दशक्ति अथवा मथ शक्ति से प्रकट होता है वही ध्वनि है प य नही। यग्य की सत्ता है पर तु उसकी प्रतीति सरलता से नहीं होती है उसका काध्यप्रका कार ने भी गुणीभूत व्यग्य में सम्मिलित किया है और ध्वयालोक के उपयुक्त प्रसङ्ग के अनुसार हो उसका नाम है मस्फुट का उदाहरण यह है मस्फुट का उदाहरण यह है । मगन साजि सिंगार सय निज मदिर त पिय-पास सिधारी। रूप अनूप निहारत भूपर कामक्ला पधि पर वारी। मजुल सी न हंस बिहस हुसस विलस सुख पुजन प्यारी। यहि गहे भयो प्रग रोमचित कपित गात ससकित भारी। नायिका अभिसारिका है । स्वय कामोत्सुका होकर प्रिय से मिलने के लिए सहट गई है। स्वत जाने से मुग्घा नहीं है, तब कपित और सशक्ति होने का विशेष कारण दिखलाई नही पडता चिन्तनोपरात क्लिविचित हाव व्यग्य होता है। सन्दिग्ध प्राधाय विवेचन-गुणीभूत व्यग्य मे का यात्मा ध्वनि गौण हो जाता है । उसकी गौणता के कारण ही उसकी गणना मध्यमकाव्य मे की जाती है । सदिग्घ प्राधाय नामक मध्यम काव्य में न तो व्यग्य ही पूण गौणता प्राप्त कर पाता है मौरन वाच्य ही निचित प्रधानता प्राप्त करता है, और न दोनो की प्रधानता यहो निश्चित रूप से समान हो पाती है । इस भेद म और तुल्य प्राधा य में केवल यही मतर है कि इसम व्यग्य मोर वाच्य की तुल्य प्रधानता का निश्चय नहीं हो पाता, जबकि दूसरे (तुल्यप्राधा य) मे तुल्य प्रधानता का निश्चय होता है। दो व्यग्यार्थी की प्रधानता में सदेह का प्रश्न यहा उपस्थित नहीं होता है । इसका उदाहरण यह है १-यत्र प्रतीयमानोऽथ प्रक्लिष्टत्वेन भासते । वाच्यस्याड गतया वापि नास्पा सौ गोचरो भने । व० २ ३२ गुणीभूत न्याय काव्य १७६ लाल लसत हसत से दोह हा विहसत विमल कपोल। चद मुखी मुख च द लसि, नद नदन चित लोल ॥ नायिका नायक क समक्ष उपस्थित है । उसके सुदर और प्रसन्न वद्र मुख को देखने भर के लिए नायक का चित्त चचल है । यह वाच्याथ प्रधान है अथवा उस च द्रमुख का चुम्बन करने के लिए चचल है यह व्यग्यार्थ प्रधान है इसम स दह है । दोह पर काव्य प्रकाश की छाया है । तुल्यप्रायाय गुणीभूत व्यंग्य तुल्य प्राधाय नामक गुणीभूत व्यग्य मे वाच्चार्थ और व्यग्यार्थ की निश्चित समानता हाती है, इमीलिये इसे तुल्यप्रधा य नाम दिया गया है। सदिय प्राधा य और तुन्य प्राधाय में यही प्रतर है। तुल्य प्राधा य गुणीभूत का उदाहरण यह है भले रुप गुन जाल को ख्याल पमारत खजन ननिनि के बंधत हर-खजन इहि हाल ।। कवि दृष्टा अथवा दूनी को उक्ति है । 'पापके हृदयग्राही रूप को देखकर परम सुदरी नारियाँ भी मुग्न हो जाती हैं । इस व्यग्याथ को भी उतनी ही प्रधानता है जितनी वाच्याथ की। इस दोहे का वाच्याथ भी कम महत्वपूर्ण नहीं है । यह तुल्य प्रापाय गुणीभूत व्यग्य का शास्त्रा नुकूल उनहररा है। गुणीभूत यग्य का माक्षिप्त व्यग्य और काव्य ध्वनि का मतर। व्यग्य प्राक्षिप्त ही होता है। का काक्षिप्त व्यग्य मे कण्ठध्वनि (काकु) स मङ्गि विशेष से कहने पर व्यग्य का तुर त बोध होता है । उत्तम काप्प म काववक्षिप्त व्यग्य का समावेश होता है और मध्यम काव्य में भी। तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि वह कौन सा कास्वक्षिप्त व्यग्य है जिसके समावश से काय उत्तम कोटि मे परिणित होता है और वह कौन सा है जिसके समावेश स मध्यम कोटि मे । दोना व्यग्या की प्राक्षिप्तता मे क्या अ तर है ? जहाँ प्रश्न मान से ही काक्वाक्षिप्त यग्य की प्रतीति होती है वहाँ काकु को प्रधानता होती है वहाँ उत्तम का य माना जाता है ।' जहाँ श द शक्ति हो काकु की सहायता से व्यग्य वोधन मे समय होतो है वहाँ गुरणीभूत व्यग्य माना जाता है । इसका उदाहरण यह है प्रेमरस पूरन पिपूर्हि पछलि यो जु जोग ज्वाल झलि प्रलवेलीपन डाहेंगी। सोमनाय ति हे कसे भावत विभूति जटा जिमकी गुविध मिलि खेलो मन साहेंगी। परन की माला से विद्याई मगछाला साथि प्रानायाम त्रिपुटी सहेलो तन चाहेंगी। चेलो हतिहारी हम ऊधो कहा सेलो गरी कचन की बेलो-सी प्रली बन पाहेंगी।

१८०
ध्यनि सिद्धात और पनाति विवेचन
मस पर गुणीभूत व्यग्य
मसुदर गुणोभूत यग्य म वाच्याथ व्यग्य की प्रधानता मोर मारयुक्त जाता है।
ध्यग्य को अपना वाच्याच चमवारयुक्त होने पर भी प्रमुष्टर होने कारण ही वाचत
इमयो अगुदर नाम पिया गया है।
मुप पियरी रखे हरी हरी डार कर लीन ।
लेति उसासनि सांस प्रति सिथिल प्रग मनु दीन ।
नायर पूर्व निश्चयानुसार सहेट पर पहुंचा तो नायिका न मिती । वह उम पुन की एक
हरी डाली तोडवर नायिका के घर पहुंचा। नायक को हरी डाल गहित दसार नायिका का
मुस पीला पड गया। मैंने यचन भग किया अथवा मैं सहे पर पूर्व निश्चय व अनुमार न पहुँचो
यह यग्य है। अमु दर का यह मगत उन्नाहरण है। इस पर कार प्रकार के उदाहरण की
छाया है।

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Dhavni Sidhant Aur Vayanjana Vrati Vivechan

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Upadyay,dr.gaya Prasad
Title
Dhavni Sidhant Aur Vayanjana Vrati Vivechan
File name
Dhavni Sidhant Aur Vayanjana Vrati Vivechan
Text
OCR done
Citation
1970
Published
2011/01
Publisher
Agra,sarsvati Pustak Sadan
Language
Sanskrit
Pages
178
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikanerbhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
444545
Barcode
99999990026321.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
8QihBZanptY
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Dhavni Sidhant Aur Vayanjana Vrati Vivechan