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Arshgranthawali Vedopadesh Volume - I

Pandit, Rajaram · 2009/11

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पिग्रन्थावलि
के
नियम
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१-इस अमावलि में प्रतिमाम १८ पृष्ट का एक साता॥
-एक अंक में एक ही धरना
-म में वेद, उपनिषद, धर्मवृत्र, यमपाश्रीनों में
हिन्द्रमाय !
५-इमका नागिक मात्रम गृप मग देने
में प्रति अंक 1-) माना।
५. दाकव्यय परग नहीं।
mom
राजाराम
सम्पादक आर्पग्रन्थावलि
लाहार॥

ओ३म् वेदोपदेशः एक एवाग्निर्बहुधा समिद्धः एकः सूर्यो विश्वमनुप्रभूतः । एकैवोषाः सर्वमिदं विभा- त्येकं वा इदं विवभूव सर्वम् ॥ धये कर्मणि वर्तमान इहामुत्र च मोदते परं । नेम लौकिकमर्थं पुरस्कृत्यधर्माश्चरेत् ॥१ निष्फला ह्यायुदये भवन्ति ॥२॥ तद्यथाऽऽने फलार्थे निमिते छाया गन्ध इत्य- नूत्पद्यते।एवं धर्मचर्यमाणमर्थाअनूत्पद्यन्ते॥३॥ नो चेदनूत्पद्यन्ते न धर्महानिर्भवति ॥ ४॥ (आपस्वम्वीय धर्मसत्रे प्रथमे प्रश्ने सप्तमस्प पटलस्य १-४ रत्राणि):- एपामर्याः-१-इम लौकिकं लोके विदित ख्याति-लाभ-पू- जो धर्म के कार्यों में प्रवृत्त होता है, वह इस लोक और पर 'लोक में प्रसन्न रहता है । परन्तु- १-किसी लौकिक अर्थ को (अर्थात मेरी जगत् में प्रसिदि ram . - . वेदोपदेशः जात्मकाथ प्रयोजनं पुरस्कृयाभिसंधाय धर्म न चरेत् । किं कारणम् ॥ २-यस्मादेवं क्रियमाणा धर्मा अभ्युदये फलकाले निष्फला भवन्ति ॥ ३-तबथा फलमुद्दिश्याम्रो रोप्यते न छायां नापि गन्धं, तथापि छाया गन्ध श्चैत्रमेवानूत्पयेते, एवंधर्मेऽनुष्टीयमाने लौकिका अर्धा एवमेवानुत्पद्यन्ते ॥ ४-यद्यपि देवादी नानृत्पद्यन्ते, तथापि धर्मस्तावद् भवति स च स्वतन्त्रः पुरुषार्थः, किमन्यैथैरिति ॥ धर्मएव सर्वस्य जगतः प्रतिष्ठा, धर्ममाश्रिता एक जगति जी- पन्ति, धर्म एव च पुरुषस्य महद् बलम् ।। हो, वा मुझे कुछ लाभ हो, अथवा मेरो लोक में पूजा हो इस दुन्यावी फायदे को) लक्ष्य में रखकर धर्म का आचरण न करे । २-क्योंकि । ऐमे धर्म ) फलकाल में निष्फल होजाते हैं (जब धर्म लौकिक अर्थ के लिये किया जाता है, तो वह निष्फल हो जाता है । धर्म का जो सच्चा फल है, वह उससे नहीं मिलता) ३-जैसा कि आम का वृक्ष फलके लिये लगाया जाता है, तो भी छाया और गन्ध मुफ्त में मिल जाते हैं । इसी प्रकार धर्म पर चलने से (लौकिक) अर्थ मुफ्त में मिल जाते हैं। ४-और यदि नहीं भी मिलते, तथापि धर्म की हानि तो नहीं होती (धर्म तो बना है, वह स्वयं फल है। उसके और छोटे छोटे फल ढूंढने से उसको स्वयं छोटा वनाना है) (आपस्तम्ब धर्म सूत्र० प्रश्न १ पटल १ सूत्र १-४) धर्म ही सारे जगत् का सहारा है। वे जन जो धर्म का सहारा लिये हैं वे ही जगव में जीते हैं, क्योंकि यह ही पुरुष का बड़ा भारी बल है ॥

वेदोपदेशः 'धर्मों विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा लोके धर्मिष्ट प्रजा उपसर्पन्ति धर्मेण पापमपनुदति,धर्मे सर्वप्र- तिष्ठितं तस्माद् धर्म परमं वदन्ति" (ले० आ० २०, ६३, ७) “येषां च बहवः शूरा ज्ञातयो धर्ममाश्रिताः। ते जीवन्ति सुख लोके कर्षन्ति च महद्यशः (महाभारत) तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्म तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यधर्मस्तस्माद् धर्मात परंनास्त्यथो अबली- 'धर्म सारे जगत् की प्रतिष्ठा है, लोक में धर्मिष्ट पुरुष की ओर लोग झुकते हैं, धर्म से पाप को भगा देता है, धर्म में सब कुछ सहारा लिये है। इसी कारण से धर्म को सबसे बढ़कर कहते हैं। (तै० आ० १० । ६३ । ७) " जिन लोगों की जाति के बहुत से लोग शूरवीर हैं और धर्म के आश्रित हैं, लोक में वे ही मुखी जीते हैं और बड़े यश को खींचते हैं" (महाभारत) उस (ब्रह्म) ने कल्याणरूप (जिससे उसकी प्रजा का कल्याण हो) एक और सृष्टि रची (इस से पहिले चारों वर्गों की रचना कह चुके हैं ) जिसका नाम धर्म है। सो यह जो धर्म है यह क्षत्रका क्षत्र है (सब को मर्यादा में रखने वाली क्षत्रिय जाति है यह उसको भी मर्यादा में रखने वाला है) इसलिये धर्म से बढ़कर कोई नहीं है । किञ्च, जो बलहीन है वह घड़े बलवान .

. वेदोपदना यान बलीयांस माशंसते धर्मेण, यथाराहवम्" (शत० प्रा० १४ । ४ । २।२६) तोऽय मेवं महिमा धर्मः कात्स्न्येन मन्त्रध्वाम्नातः । यथोक्त- मुपनिषत्सु- "तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यं- स्तानि त्रेतायां वहुधासन्ततानि । तान्याचरथ नि यतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके"। (मुण्ड० उप० ।।२।१) ("नाम्नि मन्त्रा एकंभवन्तिमन्त्रेषु कमाणि") (छान्दो• उप० ७।४।) अत्र माहुः शङ्कराचार्या:- का भी धर्म के सहारे से इस प्रकार मुकाबिला करता है, जैसे राजा के सहारे से (छोटा सा सिपाही बलवान् और धनवानों को आगे लगा लेता है)(शत० प्रा० १४, ४, २, २६) सो यह इस महिमावाला धर्म पूर्णरूप से मन्त्रों में बतलाया गया है। जैसाकि उपनिषदों में कहा है- "सो यह सत्य है, कि मन्त्रों में ऋषियों ने जिन कमों को देखा है, वे कर्म त्रेता (ऋग्, यजु और साम इन तीन प्रकार मन्त्रों ) में बहुत फैलाव के साथ वर्णन कियेगए हैं । उनको नियम से आचरण करो हे सचाई के चाहने वालो । लोक में यही तुम्हारे लिये पुण्य का मार्ग है (मुण्ड० उप० १ ।२।१) "मन्त्र पान्द के अन्तर्गत है और कर्म मन्त्रों के अन्तर्गत हैं" (छान्दो० उप० ७।४।१) इस पर शङ्कराचार्य कहते हैं- के

..५
वेदोपदेशः
"नाम्नि नामसामान्य मन्त्राःशब्द विशेषाःसन्तः
एकं भवन्ति अन्तर्भवन्तीत्यर्थः । सामान्ये हिवि
शेषोऽन्तर्भवति।मन्त्रेषुकर्माण्येकं भवन्ति ।मन्त्र
प्रकाशितानि कर्माणि क्रियन्ते नामन्त्रकमस्ति
कर्म। यदि मन्त्रप्रकाशनेन लब्धसत्ताकं सत्कर्म
ब्राह्मणेनेदंकर्तव्यमस्मैफलायेति विधीयते । या-
प्युत्पत्ति ह्मणेषु कर्मणो दृश्यते सापि मन्त्रेषु
लब्धसत्ताकानामेव कर्मणां स्पष्टीकरणम् ।
नहिमन्त्राप्रकाशितं कर्म किश्चिद्ब्राह्मणे उत्पन्न
“मन्त्र जो कि शब्दरूप हैं, वे नाम में एक होजाते हैं अर्थात
नाम के अन्तर्गत होते हैं। क्योंकि विशेष सामान्य के अन्तर्गत
होता है । मन्त्रों में कर्म एक होते हैं । मन्त्रों से प्रकाशित किये
हुए ही कर्म किये जाते हैं, कोई कर्तव्य ऐसा नहीं जो मन्त्रों में
न बतलाया हो । जो कर्म मन्त्र से प्रकाश पाकर (प्रकटहोकर)
आत्मलाभ कर चुका है, ब्राह्मण उसके विषय में यह विधान
करता है, कि यह कर्म इस फल के लिये करना चाहिये । और
जो प्राणों में कर्म की उत्पत्ति देखी जाती है ( अर्थात् नया
कर्म बतलाया हुआ प्रतीत होता है ) वह भी मन्त्रों में जो सत्ता
पाचुके हैं ऐसे कर्मों को स्पष्ट कियागया है (जो मन्त्रों में संक्षेप से
आचुके हैं ऐसा कोई कर्म नहीं, जिसकी उत्पत्ति केवल ब्राह्मण में हो
और मन्त्रों ने उनका प्रकाशन किया हो । लोक में भी यह प्रसि-

वेदोपदेशः दृश्यते । त्रयीविहितं कर्मेति प्रसिद्ध लोके त्रयी शब्दश्चर्यजुः सामसमाख्या । मन्त्रेषु कर्माणि कवयोयान्यपश्यन्नितिचाथर्वणे।तस्माद्युक्तंमंत्रेषु कर्माण्यकं भवन्तीति ।" अतएव दशतयधि। "मन्त्रोगुरुः (१।१४७। ४) सत्यो मन्त्रः(११ ५२।२) मन्त्रेभिःसत्यैः (१।६७।३) तमि- द्वोचेमा विदथेषुशम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम् (१। ४०।६) नकिर्देवामिनीमसि न किरायोपया मसि मन्त्रश्रुत्यं चरामसि (१०।१३४।७) इत्यादयः मन्त्रस्तुतयो भवन्ति । द्धि है, कि कर्म त्रयी से विधान कियागया है । और त्रयी शब्द ऋग् , यजुः, साम इन तीन प्रकार के मन्त्रों का नाम है । मुण्ड- क उपनिषद् में भी लिखा है कि " मन्त्रों में ऋपियों ने जिन कर्मों को देखा, इसलिये यह वात ठीक है कि मन्त्रों में कर्म एक (अन्तर्गत ) होते हैं" इसीलिये ऋग्वेद में-मन्त्र गुरु (२॥ १४७ १४) सच्चा मन्त्र (१।१५२।२) सच्चे मन्त्रों से ( १ । ६७ । ३) हे देवो हम यज्ञों में उस मन्त्र को कहें जो सुखदेनेवाला और पाप से रहित (बचाने वाला) है (१।४०।६) हे देवो न हम विरुद्ध करते हैं न धोखा देते हैं किन्तु जैसा मन्त्रों में बतलाया है वैसा आचरण करते हैं (१०। १३४।७) इत्यादि, मन्त्रों की स्तुतियें हैं।

वेदोपदेशः । मन्त्रा एव च धर्मप्रतिपादने समर्थाः, धर्मोखलौफिकः न तत्रा- ग्दिशांबुद्धिरमतिहतामवर्तते इति प्रतिपादितेऽपिकेनचिदग्दिशा तत्रानाश्वास एव जगतांस्यात्, यदातु साक्षाजगन्नियन्त्रा प्रका- शितोऽयंधर्मः साक्षात्कृतधर्मभिपिभिष्ट स्तदाऽअनश्वासचर्चापि भवितुन्नाईति अपितु सर्वथा विश्वासपरिपूर्णहृदयास्तत्रप्रवर्तीमहे । जगन्नियन्त्रा स्वयमेवाय धर्मः प्रकाशित इयत्र सर्वेपामैकमसम् । तथाहि ॥ अग्निर्मूर्धा चक्षुपी चन्द्रसूर्यो दिशःश्रोत्रे वाग्विट ताश्च वेदाः। वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्यपद्धयां मन्त्र ही धर्म के वतलाने में समर्थ भी हैं। क्योंकि धर्म अलो. किक है, उसको वे लोग क्योंकर जान सक्ते हैं जिन की दृष्टिपरे तक (परलोकतक ) नहीं पहुंचती । इसीलिये यदि कोई अदूरदर्शी धर्म को प्रतिपादन भी करे तो उसमें जगत् की तसाडी नहीं होगी। पर जब साक्षात् जगत् को नियम में रखनेवाले परमात्मा ने इस धर्म का प्रकाश किया है और जिन्हों ने धर्मका साक्षाद किया था उन पारदर्शी ऋपियों ने इस धर्मको देखा है, तव फिर इसमें न तस्सली होनेकी चर्चा ही नहीं रहती । बल्किपूर्ण विश्वास से हमारा हृदय भर जाता है और हम उसमें विश्वस्त हृदय से प्रत्त होते हैं । जगन्नियन्ता ने ही धर्मका प्रकाश किया है, इस विषय में सब की एक सम्मति है सो दिखाते हैं। "धुलोक उसका सिर है। चन्द्र और सूर्यय नेत्र, दिशाएं कान भौर उच्चारण कियेहुए वेद वाणी है । वायु प्राण है और विश्व . हृदय है पृथिवी पाद है। यह सब भूतों का अन्तरात्मा' है। .

८. वेदोपदेशः एथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा (मुण्ड० उप० २॥ १॥ ४) "महतऋग्वेदादेःशास्त्रस्यानेकविद्यास्थानो- पछंहितस्य प्रदीपवत्सर्वार्थावद्योतिनः सर्वज्ञक- ल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म । नहीशस्य शास्त्र- स्यर्वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञगुणान्वितस्य सर्वज्ञा- दन्यतःसंभवोऽस्ति । यद्यद्विस्तरार्थशास्त्रं यस्मात् पुरुषविशेषात् संभवति, यथा व्याकरणादि पाणिन्यादे यैकदेशार्थमपि सततोऽप्यधिक- तर विज्ञान इति प्रसिद्ध लोके । किमुवक्तव्यम- (अर्थात् वह इस ब्रह्माण्ड का आत्मा है और यह ब्रह्माण्ड उसका शरीर है इस शरीर में उसकी वाणी वेद हैं मुण्ड २।२४) महान् जो ऋग्वेदादि शास्त्र है निसको अनेक विद्यास्थानों ने फैलाया है (अर्थात् भिन्न २ विद्या के प्रचार करने वाले ऋषियों और आचार्यों ने जिस के विषय को फैलाकर बतलाया ).जो प्रदीप की न्याई सव अर्थों का प्रकाश करने वाला जो सर्वज्ञ के सदृश है, (सर्वज्ञ का ज्ञान भी परोक्ष अपरोक्ष दोनों विषयों में होता है, वेद का विपय भी परोक्ष अपरोक्ष दोनों हैं) उसका कारण ब्रह्म है। इस प्रकार का शास्त्र ऋग्वेद आदि जो सर्वज्ञ के गुणों से युक्त है, उसकी सर्वज्ञ से विना उत्पत्ति नहीं हो सक्ती । जो २ विस्तृत अर्थ वाला शास्त्र भी जिस पुरुष विशेष से उत्पन्न होता है । वह पुरुष उससे भी अधिकतर ज्ञान वाला होता है जैसे व्याकरण आदि पाणिनि आदि के जानका एक हिस्सा है । यह लोक में प्रसिद्ध ही है-

M
वेदोपदेशः
नेकशाखाभेदभिन्नस्य देवतिर्यङ् मनुष्यवर्णा-
श्रमादि प्रविभागहेतोॠग्वेदाद्याख्यस्य सर्वज्ञा-
नाकरस्याऽप्रयत्नेनैव लीलान्यायेन पुरुषनिः
श्वासवद्यस्मान्महतोभूताद्योनेः संभवः अस्य
महतो भूतस्य निश्वसित मेतद्यहग्वेदः, (बृह० २ ।
४।१०)इत्यादिश्रुतेःतस्यमहतोभूतस्य निरतिशयं
सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तिमत्त्वंचेति
इति शंकराचार्याः (वेदान्त० १।१।३ । भाष्यम् )
किं येनैव कर्ता पृथिव्यादिकार्यं निर्मितं
तेनैव वैदिक्यो रचनानिर्मिताइति चेद् ओमित्यु-
(जव थोड़े अर्थ वाला शास्त्रभी अधिक ज्ञान वाले से उत्पन्न
होता है) तब ऋग्वेद आदि शास्त्र जिसकी अनेक शाखाएं हैं,
जो देवता पशु मनुष्य वर्ण और आश्रम आदि की अलग:
व्यवस्था करता है, और जो सारे ज्ञानों की खान है, उसकी
उत्पत्ति जिस महद्भुतरूप कारण से विना प्रयत्न के ही लीला
के तौर पर हुई है उस महद्भत की सबसे बढ़कर. सर्वज्ञता और
सर्वशक्तिमत्ता में क्या कहना । (ऋग्वेद आदि परमात्मा से
मकट हुए हैं इसमें ) " इस महद्भुत का सांस है यह जो ऋग्वेद
है (बृह०२।४।१०) इसादि श्रुति (प्रमाण) है" यह शङ्कराचार्य
ने (वेदान्त १।१।३).के भाष्य पर लिखा है ॥
"क्या जिप्त कर्ता ने पृथिवी आदि कार्य रचा है, उसी ने
वेदकी रचनाएं भी. रची है यह पूछते हो, तो हम उत्तर देते हैं। .
-

१० वेदोपदेशः च्यते । किमत्र प्रमाणमिति चेत् ॥ उच्यते तर्हि सर्वज्ञः स्रष्टुं प्रभवतीदृशम् । विचित्रं प्राणिभृत्कर्म फलभोगाश्रयं जगत् ॥ तत्कर्मफलसम्बन्धविदा तदुपदेशिनः। तेनैव वेदा रचिता इति नान्यस्य कल्पना । एकैनैव च सिद्धेऽर्थे द्वितीयं कल्पयेम किम्। अनेककल्पनावी नहि किंचिन विद्यते। जगत्सर्गे तावदेक एवेश्वर इष्यते,न द्वौ बह- वो वा...एवं जगत्सर्गवत् स एव वेदानामप्येकः प्रणेताभवितुमर्हति । नानात्वकल्पनायांप्रमाणा- हां । इसमें क्या प्रमाण है, यह पूछते हो, तो कहते हैं कि जिस में असंख्यात माण धारियों को अपने २ कर्म का भिन्न २ फल मिल रहा है ऐसे विचित्र जगत् को सर्वज्ञ ही रच सक्ता है। फिर उन २ कमों के फल सम्बन्ध को जानने वाले उसही ने उन २ कर्मों का उपदेश करने वाले वेद रचे हैं, इसलिये किसी दूसरे (बनाने वाले) की कल्पना नहीं हो सक्ती । एक से ही जब अर्थ सिद्ध होजाता है, तो दूसरे की कल्पना क्यों करें। अनेक (बनाने वालों) की कल्पना का कोई मूल नहीं है। जगद की रचना के विषय में तो एकही ईश्वर माना जाता है न दो न बहुत....इसी प्रकार जगत् की रचना की न्याई वही एक वेदों का भी बनाने वाला हो सकता है । वहुत मानने में कोई ११ वेदोपदेशः भावात् कल्पनागौरवप्रसङ्गाच्च- अतश्चैककर्तृका वेदा यतः परस्परव्यतिषक्ता- र्थोपदेशिनोदृश्यन्ते। एकमेवहिकर्मवेदचतुष्टयो- पदिष्टैः पृथग्भूतैरप्येकार्थसमवायिभिरङ्गैरन्वितं प्रयुज्यते। तत्रहि हौत्रमृग्वेदेन यजुर्वेदेनाध्वर्यवम् औद्रात्रं सामवेदेन ब्रह्मत्वमथर्ववेदेन क्रियते ॥ कर्ता य एव जगतामखिलात्मवृत्तिः कर्म प्रपञ्च परिपाकविचित्रताज्ञः।विश्वात्मना तदुपदेशपराः प्रणीतास्तेनैव वेदरचना इति युक्तमेतत् ॥ आप्तं Im प्रमाण नहीं और पर्थ कल्पना बढ़ानी है । इस कारण भी वेदों का एक ही कर्ता है, क्योंकि आपस में मिले हुए अर्थ को उप- देश करते हैं। एकही कर्म के अङ्ग अलग २ चारों वेदों में उप- देश किये गए हैं, उनमें से ऋग्वेद से होता का काम, यजुर्वेद से अध्वर्यु का, सामवेद से उद्गाता का और अथर्ववेदसे ब्रह्मा का काम किया जाता है। सारे जगतों को बनानेवाला वह है, जो सारे आत्माओं के कर्मों के फल की विचित्रता को जानता है और उसके अनुसार जल स्थल में अन्तरिक्ष और घौ में सारी मजा को एक दूसरे से विलक्षण फल दे रहा है, उसी अन्तर्यामी ने उन कर्मों का (जिन का फल वह देता है ) उपदेश करनेवाले वेद प्रकाश किये हैं यह बात युक्ति युक्त है । उसी आप्त (यथार्थ वक्ता) भगवान १२ वेदोपदेवाः तमेव भगवन्तमनादिमीशमाश्रित्य विश्वसिति वेदवचःसु लोकः ॥ इति जयन्त भट्टः( न्यायमञ्जाम् १ । ४।१) इत्येवं बहुभिः युक्तिप्रमाणैः साधितोऽयमर्थः ऋपिभिर्मुनिभि- राचार्यैश्च, यथा धर्मों वेदैकवेद्यःईश्वरेण प्रदर्शितः साक्षात्कृतधर्म- भिषिभिष्ट इति ॥ यथा धर्मों वेदैकवेद्यः तथा ब्रह्मापि वेदैकवेद्यम् । अतएवाभि- हितम् " नावेदविन्मनुते तं वृहन्तम् " (तै०ब्रा०३ । १२।९) तदेवं "धर्मब्रह्मणीवेदैकवेद्ये" इति सिद्धमित्यतो धर्मब्रह्मणी जिज्ञास- मानेन वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च । तच्च वेदाध्यनं न काम्यं किन्तु नित्यम् , अनादि ईश्वर के सहारे लोक (दुनिया ) वेद वचनों पर विश्वास करता है ॥ यह जयन्तभट्ट ने (न्यायमअरी १।४।१)की टीका में कहा है । इस प्रकार अनेक तर्क और प्रमाणों से पुराने ऋषि मुनि और आचार्यों ने यह बात सिद्ध की है, कि धर्म केवल वेद से ही जाना जाता है । धर्म को परमात्मा ने दर्शाया है और धर्म के साक्षात् करनेवाले ऋषियों ने देखा है ॥ जैसे धर्म केवल वेद से ही जानाजाता है, वैसे ही ब्रह्म भी केवल वेद से ही जानाजाता है । इसीलिये कहा है " जो वेदको नहीं जानता वह उस महान् को नहीं जानता" (तै० ब्रा० ३ । १२ । ९) सो इस तरह "धर्म और ब्रह्म केवल वेद से ही जानने योग्य हैं " यह वात सिद्ध हुई । अतएव धर्म और ब्रह्म के जानने की इच्छा वाले को वेद पढ़ना और जानना चाहिये । यह वेद का पढ़ना काम्य कर्म नहीं किन्तु नित्य कर्म है । इसीलिये पुरु-

वेदोपदेशः
१३
अतएव पुरुपार्यानुशासने सूत्रितम्, "वेदस्याध्ययनं नित्यमनध्यपने
पातादिति, पातित्यं चैवमान्नायते । अपहतपाप्मा स्वाध्यायो
देवपवित्रं वा एतत्तं योऽनुसृजत्यभागो वाचिभवत्यभागो नाके
तदेपाभ्युक्ता-
यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि
भागोअस्तिायदींशृणोत्यलकंशृणोतिनहिप्रवेद
सुकृतस्य पन्थाम्, इति ॥ (ऋग् १०।७१।६)(तै.
आ. २):-
वेदाध्ययनेन यथा परो लोकः सिद्धयति, एवमयं लोकोऽपिसि-
पार्यानुशासन में मूत्र कहा है “वेद का पढ़ना नित्यकर्म है जो
इसको त्यागता है, वह पतित होता है" और पतित होना इस
प्रकार बतलाया है " वेद स्वयं दोपों से रहित है और पाप से
बचाने वाला है, यह एक परमात्मा की दीहुई पवित्र वस्तु है जो
इसको त्याग देता है, उसका वाणी में हिस्सा नहीं और न
स्वर्ग में हिस्सा है । इसविषय में यह ऋचा है-
साथी के जानने वाले साथी को (वेद को, वेद की और जो
झुकता है, वेद अपने उस साथी को पहचानता है और अपने
पाम से उस सखा को धर्म और ब्राह्मज्ञान का बल देकर स्वारा-
ज्य में अभिपिक्त करता है ) जिसने त्याग दिया है, उसका भी
वाणी में हिस्सा नहीं है, वह जो कुछ मुनता है व्यर्थ सुनता
है क्योंकि धर्म के मार्ग को नहीं जानता है (ऋगू १०।७१।६)
(ते. आ० २)
वेद के पढ़ने से जैसे परलोक नुधरता है, वैसे ही यह लोक

वेदोपदेशः द्धयति । वेदस्य परिग्रहेणायुर्वर्द्धते, त्यागेन च मृत्युः प्रभवतीति यथोक्तं मनुना- अनायासेन वेदानामाचारस्यच वर्जनात्।बाल- स्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति॥(मनु०५। ४) यथाह्यन्नदोषाधथालस्याद्यथा वाऽऽचारस्य वर्जनान्मानवान् मृत्युजिघांसति, एवमेव वेदानामनभ्यासेनापि मृत्युजिघांसति । फलान्तराण्यपि तेनैव भगवतोपदिष्टान- यः स्वाध्याय मधीतेऽव्दं विधिना नियतः शुचिः । तस्य नित्यक्षरत्येष पयोदधिघृतं मधु मिनु० २।१०७) भी सुधरता है । वेदके स्वीकार से आयु बढ़ता है और त्याग से मृत्यु दवालेता है जैसाकि मनु ने कहा है। वेदों का अभ्यास न करने से, आचार के छोड़देने से, आलस्य से, और अन्न के दोष से मृत्यु विद्वानों को मारना चाहता है ( मनु ५। ४) जैसा अन्न के दोष से, और जैसा आलस्य से, वा जैसा आ- चार के सागने से मृत्यु मनुष्यों को मारने की इच्छा करता वैसे ही वेदों के सागने से भी मृत्यु मारना चाहता है । आयु वृद्धि के सिवा और फल भी भगवान् मनु ने वतलाएहैं- "जो शुद्ध पवित्र होकर नियमसे विधि पूर्वक वर्षभर स्वाध्याय पढ़ता है । उसके.हां यह स्वाध्याय सदा दूध दही घी और शहद की धाराएं बहाता है (अर्थात उसके जीवन को पुष्ट और शुद्ध रखने वाले पदार्थ उसके घरमें पानीकी तरह वहते हैं) (मनु०२।१०७) वेदोपदेशः मात्रेव हित मिच्छन्त्या श्रुसा स्वयं प्रोक्तं स्वाध्ययनस्य फलम्- स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तांपाव- मानी द्विजानां । आयुः प्राणं प्रजां पशु कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसम् ॥ मह्यं दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ॥ (अथर्व०१९।७१।१) तदेतत्सयमेव यतो न वैदिकादभ्युपायादपरः कश्चिदुपायो महत्त्वेन प्रकृष्यते । अतएवावधारितम्- वेदएव द्विजातीनां निःश्रेयस्करः परः (मनु) तत्रैवं सति इहामुत्र निःश्रेयस्करो वेदोऽवश्य मध्येयस्तदर्थश्चा- माता की न्याई हित चाहने वाली श्रुति ने अपने पढ़ने का फल स्वयं कह दिया है- " मैंने वेदमाता की स्तुति की है जो वर देने वाली है ।(जिस माता से सब प्रकार के इष्ट फल मिलते हैं) वह द्विजों के पवित्र करने वाली (वेदमाता) हमारे प्रेरने वाली हो । और आयु, माण (जीवन, वल) सन्तान, पशु, कीर्ति, धन, और ब्रह्मवर्चस (वेद के पढ़ने और धर्म पर चलने से जो तेज मिलता है) मुझे देकर ब्रह्मलोक को प्राप्त हो (अर्थात् ये लौकिकफल देवे और परमात्मा के साथ मिलावे) सो यह ठीक ही है । क्योंकि वैदिक उपाय से बढ़कर कोई और उपाय नहीं है । इसीलिये यह निश्चय किया है कि- वेदही द्विजातियों का परमकल्याण करने वाला है (मनु०) सो यहां और वहां कल्याण करने वाला वेद अवश्य पढ़ना १६ वेदोपदेशः नुष्ठातव्य इति ॥ अथेदानीं वेदविषयाः संक्षिप्य प्रदर्श्यन्ते, तत्रादौ ब्रह्मस्वरूप निरूप्यते, किं स्वरूप ब्रह्मेति ॥ द्वैरूप्येन हि ब्रह्म वोधयन्ति वेदाः, केवलं, प्रकृतितद्विकार सम्बद्धं च । तयथा, यदि कश्चिदनुयुभीत कोयमात्मेति स वक्त व्यो भवति, यश्चक्षुपा पश्यति यश्चं श्रोत्रेण शृणोति स आत्मेति । स यदि पुनरेवंब्रूयात, सत्यमेप आत्मा, परं भवता चक्षुपा श्रोत्रेण च सम्बद्धः प्रदर्शितः, अहं पृच्छामि, समस्तवाह्यसम्बन्धेभ्यः पृथग्भूतः स्वरूपावस्थितः सन् किस्वरूपास आत्मेति । तदायद्वक्त- व्यं तदेव तस्य शुद्धं स्वरूपमिति ॥ . चाहिये और उसके अर्थ का अनुष्ठान करना चाहिये । अब वेद के विषय संक्षेप से दिखलाते हैं । उनमें से पहिले ब्रमका स्वरूप निरूपण करते हैं, कि ब्रह्म का स्वरूप क्या है ? वेद दो प्रकार से ब्रह्म का निरूपण करते हैं, एक बाहिर के सारे सम्बन्धों से रहित केवल स्वरूपमात्र का, दूसरा प्रकृति और उसके विकारों के साथ सम्बन्ध रखते हुए का। सो जैसे यह बात है, कि यदि कोई पूछे, कि आत्माक्या है? तो उसे कहा जायगा कि जो आंख से देखता है और जो कान से सुनता है, वह आत्मा है । यदि वह फिर पूछे वेशक यह आत्मा है। पर आपने आंख कान के साथ सम्बन्ध रखता हुआ बतलाया है । मैं पूछता हूं कि बाहिर के सारे सम्बन्धों को अलग रखकर केवल उसका अपना जो स्वरूप है वह बतलाओ कि आत्मा का क्या स्वरूप है। तव जो कहना होगा, वही उसका शुद्ध स्वरूप है ।

वेदोपदेशः एवं किं तब्रह्मेति प्रश्ने यद्युच्यते, य इदं ब्रह्मचक्र प्रवर्तयति, तब्रह्मेति । स यदि पुन—याद, ससमेतद् ब्रह्म । परंभवता तद्रूपा- तिरिक्तं वस्त्वादाय तद्रूपं मदर्शितम् । अहं ब्रवीमि, निरस्तसमस्त बाह्यसम्बन्ध स्वरूपावस्थितं तद किंरूपमिति । तदा यदुत्तरं, तदेव तस्य शुद्धस्य स्वरूपमिति । यच्च प्रकृतितदिकार-सम्बद्धं तद्विशि- ष्टमिति ।शुद्धं च श्यामं विशिष्टं च शवलमियाख्यायते । एतदेव शुद्ध- मथर्ववेदे ज्येष्ठं ब्रह्मेति स्कम्भ इति चाभिहितम्। शवलमपि द्विमकारं निरूपितम् । समष्टिजगतोऽन्तरात्मतया, व्यष्टिजगतश्चान्तरात्मत्मत- यति । यथाहियः शरीरमेतत् प्रवर्तयति स आत्मा।यो वा सर्वाणीन्द्रि- याणि स्वस्वव्यापार प्रवर्तयति सआत्मत्युक्तआत्मासमाष्टशरीरस्या- इसी प्रकार ब्रह्म क्या है ? इस प्रश्न का यदि यह उत्तर दिया जाय कि जो इस ब्रह्माण्ड के चक्र को चला रहा है वह ब्रह्म है। यदि वह फिर कहे, वेशक यह ब्रह्म है । पर आपने ब्रह्मके स्वरूप से भिन्न वस्तु के सहारे से उसका स्वरूप दिखलाया है । मैं पूछता हूं, कि वाहिर के. सारे सम्बन्धों को अलग रख कर केवल उसी के स्वरूप को लेकर उसका स्वरूप बतलाओ, कि ब्रह्मका क्या स्वरूप है । तब जो उत्तर होगा, वही उसका, शुद्ध स्वरूप है और जो प्रकृति और उसके विकार के साथ सम्बन्ध रखता है वह उसका विशिष्ट स्वरूप है । शुद्ध को श्याम और विशिष्ठ को शवल, कहते हैं । इसी शुद्ध को ही अथर्ववेद में ज्येष्ठ ब्रह्म और स्कम्भ कहा है । शवल भी दो प्रकार से निरूपण किया है। एक तो समष्टि जगत् (सारे के सारे जग ) के अन्तरात्मा के तौरपर, दूसरा व्यष्टि जगव (अलग २ सूर्यादि) के अन्तरा- स्मा के तौर पर । जैसाकि जब ऐसा. कहते हैं, कि जो इस सारे . १८ वेदोपदेशः न्तरात्माऽभिहितो भवति । यदा चोच्यते यश्चक्षुपा पश्यति स आत्मा, एवं यः श्रोत्रेण शृणोति स आत्मति,तदाऽऽत्मा भ्यष्टिशरीर- स्यान्तरात्माऽभिहितो भवतीति । एवं ब्रह्मापि यदा समाधिजगव प्रवर्तयोध्यते, तदा समष्टिजगतोन्तरात्मतया विवक्ष्यते, यदा तु व्याष्टजगत् प्रवर्तयद् बाध्यते, तदा व्याटिजगतोऽन्तरास्मतया विवक्ष्यते इति- समष्टिजगतसम्बद्धं पुनस्त्रिधा निरूपितम्। मथमं तावद नासीदकि मप्युत्पत्तिमद्वस्तु । सर्वमेतदव्यक्तमासीत् । ततः प्राणिनां भोगभूत ये ब्रह्मणः सिमक्षानन्तरं प्रकृतौ क्षोभ उत्पद्यते । ब्रम च तदा प्रक शरीर को चला रहाहै वह आत्मा है, अथवा जो इन सारे इन्द्रियों को अपने २ काम में लगाता है वह आत्मा है । इसमें आत्मा को सारे शरीर का प्रवर्तक अन्तरात्मा बतलाया है। और जब यह कहते हैं, कि जो आंख से देखता है वह आत्मा है, इसी प्रकार, जो कान से सुनता है वह आत्मा है । इसमें आत्मा को व्यष्टि शरीर का अन्तरात्मा बतलाया है । इसी प्रकार जब ब्रह्म के विषय में भी यह कहा जाता है, कि जो इस सारे जगत् को चला रहाहै । तब वह समष्टि जगत् का अन्तरात्मा वतलाया है। और जब यह कहते हैं, कि जिसके शासन में सूर्यका उदय होता है । वह ब्रह्म है । तब व्यष्टिजगत् का अन्तरात्मा बतलाया है ॥ समष्टि के सम्बन्धबाला फिर तीन प्रकार से निरूपण किया है। पहिले जब यह उत्पत्तिवाली वस्तु कोई भी न थी, यह सब कुछ अभी प्रकट न हुआ था उसके पीछे माणधारियों को अपने २ भोग देने के लिये ब्रह्म को जगत् के रचने की इच्छा होती हैं, तब प्रकृति में क्षोभ उत्पन्न होता है, ब्रह्म उस समय प्रकृति के " वेदोपदेशः १९ तेरन्तरतया सर्वां प्रकृति चालय प्रयतिरित्यभिधीयते । अत्र सर्वा प्रकृतिः ब्रह्मणः शरीरं, ब्रह्म च तस्यान्तर्यामिभूतं तां प्रेरयत्ति निय- मयति च । यदा पुनर्गतिमत्याः प्रकृतेः क्रमण महदण्डमुद्भूत- तदातस्याण्डस्यान्तरात्मतयाऽखिलं तजसमण्डं प्रवर्तयद हिरण्य, गर्भ इति परमेष्ठीति ब्रह्मेतिचाभिधीयते । यदा तु तस्मादण्डात् वहिनिःस्सेदं पृथिव्यादिकमाकाश उड्डीयते । तदा तस्यान्तरात्म तयाऽखिलं पृथिव्यादिकं जगत् स्वस्वव्यापार प्रवर्तयत् पुरुष इति प्रजापतिरिति विराडिति चाभिधीयते । महतोऽण्डादुत्पद्यानवरत- माकाशे उड्डीयमानानां सूर्यादीनां पक्षिणां तदेव ब्रह्म विश्राम- स्थानमिन्यतो “यत्र विश्वं भवत्येकनाडमिति" वर्णितम् । एतत्तस्य अन्दर रहकर सारी प्रकृति को चलारहा है। इसीलिये उस अवस्था में ब्रह्म को प्रयति कहा है । इस अवस्था में सारी प्रकृ- ति ब्रह्म का शरीर है और ब्रह्म उसका अन्तर्यामी होकर उसको मेरता है और नियम में रखता है। फिर जब उस गतिवाली प्रकृति से क्रमशः एक भारी भण्डा उत्पन्न होता है। ये सूर्यादि सारे पक्षी जिस अण्डे से निकल कर आकाश में उड़ते हैं। तव वह उस अण्डे का अन्तरात्मा होकर उस अण्डे को चलाता हुआ हिरण्यगर्भ, परमेष्ठी और ब्रह्मा कहा जाता है । जब फिर उस अण्डे से वाहिर निकल कर ये पृथिवी आदि आकाश में उड़ते हैं, तव उनका अन्तरात्मा होकर पृथिवी आदि सारे जगव को अपने २ काम में लगाता हुआ पुरुष, प्रजापति और विराद् नाम से कहा जाता है । उस बड़े अण्डे से उत्पन्न होकर लगातार आकाश में उड़ते हुए सूर्यादिक पक्षियों का वही ब्रह्म विश्राम का स्थान है इसीलिये " जो इस ब्रह्माण्ड का एक घोंसला है, २० ܙܝ वेदोपदेशः समष्टिसम्बद्धं त्रिविधं स्वरूपम् । व्यष्टीनां पुनरनेकत्वाद्यष्टिसम्ब- मनेकधा प्रतिपादितम्- तत्रनायंद्रष्टाऽऽदावश्यामं रूपं द्रष्टुं शक्नोति ।मथमं तावत् मृर्यादीनां नियमतः प्रवृत्ति दृष्टा तन्नियन्तारमवधारयनि- यतश्चोदेतिसूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति। तंदेवाःसर्वेऽर्पितास्तदुनात्येति कश्चना(कट ०४९) स इत्येवं ज्ञात्वा यदा श्रधानस्तदर्शनाय प्रयतते, तदा तत्साक्षात्कुर्वाण उभयरूपं पश्यति उयामं च शवलं च । असच्छाखां प्रतिष्ठन्ती परममिव जना विदुः । यह वर्णन किया है। यह उपका तीनप्रकार का स्वरूप समष्टि के साथ सम्पन्ध रखने वाला है । व्यष्टियें (अलग २ दैव पदार्थ) अनेक हैं इसलिये व्यष्टियों के साथ सम्बन्ध रखनेवाला अनेक प्रकार से वर्णन किया है। सो इन में से यह द्रष्टा (जीवात्मा) पहिले ही पहिल उसके शुद्धस्वरूप को नहीं देखमक्ता । पहिले तो सूर्यादिकों की नियम से प्रवृत्ति देखकर उनके नियन्ता का निश्चय करता है। जिससे सूर्य उदय होता है और जिसमें अस्त होता है । सारे देवता उसीमें प्रोए हुए हैं । कोई उसका उलंघन नहीं करता है । (कठ०.४।९) वह इस प्रकार जानकर जब श्रद्धावान् बनकर उसके साक्षात् करने के लिये प्रयत्न करता है, तब वह उत्तको साक्षात् करता हुआ उसके दोनों रूपों को देखता है श्याम भी और शवल भी॥ ज्ञानीलोग उस प्रतिष्ठित शाखा को उत्तम जानते है, - २१ वेदोपदेशः उतोसन्मन्यन्तेऽवरे येतेशाखामुपासते (अथर्व०१० ७।२१) यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् । अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ (वेता० ) इमामेवावस्थामुद्दिश्यैतदभिहितम्- ब्रह्मैवेदममृतंपुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । अधश्चोर्वच प्रमृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ (मुण्डक० २।२। ११) जो व्यक्त (इस जगव में प्रकट ) नहीं है । और वे (उनसे ) नीचे के लोग व्यक्त को ही. समझते हैं (इसलिये ) वे उसी शाखा (व्यक्त शाखा) की उपासना करते हैं ( अथव०१० । ७ । २१) जव पुरुष तत्परायण होकर दीपक के सहश अपने आत्मतत्व से ब्रह्मतत्त्व को देखता है । ( उस ब्रह्मतत्त्व को जो) अजन्म, अटल, और सारे तत्त्वों से विशुद्ध (केवल स्वरूप ) है। उस देव को जानकर सारी फांसों से छूट जाता है.(श्वेता०) इसी अवस्था को लक्ष्य में रखकर यह कहा है- ग्रह्म ही यह अमृत सामने है, ब्रह्म पीछे है । ब्रह्म दाएं है और ब्रह्म वांए है। ब्रह्म ही नीचे और ऊपर फैल रहा है। यह सब परम मुन्दर मारे ब्रह्म ही है(मुण्डक २।२। ११) जिस अव- स्था में विज्ञानी के लिये सबकुछ आत्मा ही होगया, उस अवस्था में एकत्वके अनुभव करनेवालेको क्या मोह और क्या शोक(ईश०५) .

, २२: वेदोपदेशः यस्मिन् सर्वाणि भूतान्पात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्व मनुपश्यतः ॥ (ईश० ७) स तं विशुद्धं देवं पश्यन्नाश्चर्यवदनुपश्यति, आश्चर्यवदेव पुनस्तं जगन्नियच्छन्तं प्रतिपश्यति। अत्रास्योभयरूपदर्शने कामचारोभवति, श्याम पश्यन् शवलं पश्यति, शवलमनुभवंश्च श्याममनुभवति । अतएव शुद्धस्य प्रस्तावेऽपिशवलंवर्यते, शवलस्य प्रस्तावेच शुद्धं प्रस्तूयते । तद्वैतत् पश्यन्नृपिराह- श्यामाच्छवलंप्रपद्येशवलाच्छयामंप्रपद्येअश्व इव रोमाणि विधूय पापंचन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य तब वह (साधक ) उस विशुद्ध देव को देखता हुआ आश्चर्य- वत् देखता है, और आश्चर्यवत् ही फिर दूसरी ओर उसको जगत् का प्रबन्ध करता हुआ देखता है । इभ अवस्था में उसको दोनों रूप देखने में स्वतन्त्रता होती है । श्याम को देखता हुआ शवल को देखता है और शवल को अनुभव करता हुआ श्याम को अनुभव करता है । इसीलिये शुद्ध के प्रकरण में भी शवल का वर्णन आजाता है और शवल के प्रकरण में शुद्ध का वर्णन आजाता है ऐसा अनुभव करते हुए ऋपिने कहा है- श्याम से शवल को प्राप्त होता हूं और शवल से श्यामको प्राप्त होता हूं । जैसे घोड़ा रोमों को झाड़ता है (रोमों से धूलि को झाड़ देता है ) वैसे पाप को झाड़कर, चन्द्र की न्याई राहु के (पृथिवी की छाया) के मुख से छूट कर (जैसे छाया के मुख से छूटकर चन्द्रमा चमकता है, वैसे विद्या के अन्धेरे से छूटकर चमकता हुआ मैं ) शरीर को झाड़कर कृतार्थ हुआ । मैं MY वेदोपदेशः धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भ- वामीत्यभिसम्भवामीति ॥ (छान्दो उप०८ ॥ १ ॥ १३) शुद्धं हि ब्रमेतदखिलमपि जगत् सर्वतो वृत्वाऽतिरिच्यते, एत च सर्व तस्यैकदेशे वर्तते, यथोक्तम्- एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्चपूरूषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि (ऋ०१०१९०३) एतद्धि ब्रह्मणो विशुद्ध रूपम्,अस्य प्रतिपादनायाथर्ववेदे देसूक्त नित्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूं ॥ (छान्दो० उप०८।१।१३) शुद्ध ब्रह्म इस सारे जगत् को सव ओर से घेर कर भी इससे वढ़कर है और यह सारे का सारा उसके एक हिस्से में पड़ाहुआ है, जैसे कहा है:- यह सब उसकी महिमा है । पुरुष इससे बहुत बड़ा है । यह सारा ब्रह्माण्ड उसका एक पाद है और उसके तीन अविनाशी पाद अपने प्रकाश स्वरूप में हैं। (अभिप्राय यह है, कि इस ब्रह्माण्ड को देखकर मनुष्य उसके महत्त्व को बहुत कुछ समझ सकता है। परन्तु परमेश्वर के स्वरूप का यह ज्ञान बहुत थोड़ा है, क्योंकि उसका स्वरूप इससे बहुत बढ़कर है) (ऋ० १० ९०३) यह ब्रह्म का शुद्धस्वरूप है, इसके प्रतिपादन करने वाले अथर्ववेद में दो सूक्त है । पहिले उपनिपद में जो शुद्ध का वर्णन है उसको लिखकर फिर उन दोनों सूक्तों की व्याख्या करते हैं- २४ वेदोपदेशः विद्यते,पूर्व तावदुपनिपदुक्तमभिधाय ततस्ते उपन्यस्य व्याख्यायते सहोवाचैतद्वैतदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्यस्यूलमनवहस्त्र मदीर्घमलोहित मस्नेहमच्छायमतमोऽवाबनाकाशमसङ्गमरसमगन्ध मचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कममाणममुखममात्रमनन्तरमवाय- न तदश्नाति किंचन न तदनाति कश्चन ॥ ८ ॥ एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्म सूर्याचन्द्रममौ विधृतौ ति- हत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि यावापृथिव्यो विधृते ति- छत एतस्प वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेपा मुहर्ता अहोरात्रा उसने (याज्ञवल्क्य ने ) कहा, हे गार्गि (जो आकाश का कारण तूने पूछा है)। इस ब्रह्म के जानने वाले अक्षर ( अवि- नाशि ब्रह्म) को कहते हैं कि वह न मोटाईन पतला है न बौना है न लम्बा है, न उसमें लाली है न उसमें स्नेह है, न गया है । वह अन्धेरा नहीं, वह वायु नहीं, वह आकाश नहीं, वह असङ्ग है, उसमें कोई रस नहीं, कोई गन्ध नहीं । उसका नेत्र नहीं श्रोत्र नहीं बाणी नहीं मन नहीं, न उसमें गर्मी है, न उसमें सांस चलता. है, न कोई उसका सुख है । उसका कोई परिमाण नहीं । न उस के अन्दर है न वाहिर है । न वह कुछ खाता है । न कोई उसको खाता है ॥ ८॥ इसी अक्षर के प्रशासन (जबरदस्तहुक्म ) में हे गार्गि ! सूर्य और चांद मर्यादा में खड़े हैं, इसी अक्षर के प्रशासन में हे गार्गि! धौ और पृथिवी मर्यादा में खड़े हैं । इसी अक्षर के प्रशासन में हे गार्गि! निमेष (पलक) मुहूर्त, दिन रात, आधे महीने, महीने ऋतु और वर्ष अपनी २ मर्यादा में खड़े हैं । इसी अक्षर के प्रशा - वेदोपदेशः २५ ण्यधमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यः पर्व- तेभ्यः प्रतीच्योऽन्याः यां यां च दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशा- सने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशसन्ति यजमानं देवा दवी पित- रोऽन्वायत्ताः ॥ १ ॥ यो वा एतदक्षरं गायविदित्वाऽस्मिल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्पसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद् भवति, यो वा एनदक्षरंगायविदित्वाऽस्माल्लोकात मैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लोका प्रति स ब्राह्मणः ॥ १० ॥ (हदा० उप० ३ 1८-१०) अथर्व संहितायां काण्डम् १० मं० सूक्तम् ७ मम्-- "कस्मिन्नने" इतिस्तम्भसूक्तमायथामासादःस्कम्भैधियते, एवमस्य सन में हे गार्गि! श्वेत (सुफैद ) पर्वतों से कई नदियां पूर्व की ओर वहती हैं कई पश्चिम की ओर बहती हैं, चाहे जिस किसी दिशा की ओर वहती हैं, इसी के शासन में वहती हैं । इसी के प्रशासन में हे गार्गि! मनुष्य दान देनेवालों की प्रशंसा करते हैं, देवता यजमान के और पितर दर्वी होम के अनुगत होते हैं ॥९॥ जो इस अक्षर को हे गार्गि ! विनाजाने इस लोक में होम करता है, यज्ञ करता है वा तप तपता है, चाहे वह बहुन सहस्रों वर्ष भी हो, वह इसका अन्तवाला ही होता है । जो इस अक्षर को हे गार्गि! विना पहचाने इस लोक से चल वसता है वह दया का पात्र है । और जो इस अक्षर को हे गार्गि! जानकर इस लोकसे चलता है, वह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) है ॥ १० ॥ (हदा० उप०३) २६ वेदोपदेशः सर्वस्यापि जगतो धारणाय ग्रीवेकः स्कम्भः। यतश्चायं सर्चासामव स्थानामाघभूतः । अतोज्येष्ठंब्रह्मति तस्य संज्ञा । तस्मिन् सर्वमेतत् तिष्ठति तत्सर्वमेतेनाविष्टिम् । विरापि तस्मिन्नेव समाहितातस्मिन्नेव देवादयः सर्वे समाहिता इसादि वर्णनम्- कस्मिन्नने तपो अस्याधितिष्ठति कस्मिन्नड ऋतमस्या ध्याहितम् । क्व व्रतं व श्रद्धास्य तिष्ठति कस्मिन्नने सत्यमस्य प्रतिष्ठितम्।। अथर्व संहिता काण्ड १० सूक्त ७- "कस्मिन्नङ्गे" यह स्कम्भ मुक्त है। जिस प्रकार खम्भे घरको धारण किये होते हैं । इसी प्रकार इस सारे जगत् को धारण करने के लिये यह ब्रह्म ही एकमात्र खम्भा है। और जिसलिये यह सब अवस्थाओं का आदि है, इसलिये इसको ज्येष्ठ ब्रह्म कहत हैं । उसके सहारे यह सब कुछ खड़ा है । सत्र कुछ इस से घिरा हुआ है। विराटू भी इसी में स्थित है और देवता आदि सारे इसी में स्थिति रखते हैं इत्यादि रूप से इस सूक्त में वर्णन किया है- इसके किस अङ्ग में तप स्थित है। किस अङ्ग में ब्रत (प्राकृ- त नियम-कानूने कुदरत ) है । कहां व्रत है और कहां इसके श्रद्धा स्थित है । सत्य इसके किस अङ्ग में स्थित है ॥ १॥ यहां परमात्मा को इस प्रकार याद किया गया है, जैसे प्रेम से. भरा हुआ प्रेमी अपने प्रेमिक को याद करके सारे गुणोंको उसके स्वरूप में पाता है । परमात्मा के प्रेमी को उसीसे भक्ति उसी से श्रद्धा उसीसे ऋत और उसीसे सस प्राप्त होता है।

२७ वेदोपदेशः कस्मादङ्गदीप्यतेअग्निरस्यकस्मादङ्गात् पवते मातरिश्वा । कस्मादङ्गाडिमिमीतेधि चन्द्रमा मह स्कम्भस्य मिमानोअङ्गम्॥२॥ कस्मिन्नने तिष्ठति भूमिरस्य कस्मिन्नने तिष्ठत्यन्तरिक्षम् । कस्मिन्नने तिष्ठत्याहिता द्यौः कस्मिन्नने तिष्ठत्युत्तरं दिवः ॥ ३ ॥ व प्रेप्सन दीप्यत ऊवों अग्निःक्वप्रेप्सन् पवते मातरिश्वा। यत्र प्रेप्सन्तीरमियन्त्या- वृतः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेवसः॥४॥ अमि इसके किस अङ्ग से दीप्त होता है । किस अङ्ग से वायु चलता है। किस अङ्ग से चन्द्रमा स्कम्भ के बड़े अङ्गपर चलता हुआ अपने मार्ग को मिन लेता है (तै कर लेता है )॥२॥ इसका कौनसा अङ्ग पृथिवी को सहारे हुए है, अन्तरिक्ष किस अङ्गपर स्थित है । यौ किस अङ्ग के सहारे पर ठहरा हुआ है और किस अङ्ग पर वह ठहरा हुआ है, जो घौ से ऊपर है ॥३॥ जिसको पाने की इच्छा से भरी हुई अग्नि चमकती है, जिस की ओर वेगसे भरी वायु चलती है । जिसकी ओर इच्छा करते मार्ग (धर्म के मार्ग) जाते हैं, उस स्कम्भ को कहो, यह इन में कौन है ॥ ४॥ हुए

२८
वेदोपदेशः
कार्धमासाः क्व यन्ति मासाः संवत्सरेण
सह संविदानाः । यत्र यन्त्य॒तवो यत्रार्तवाः
स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः ॥५॥
क्वप्रेप्सन्ती युवती विरूपेअहोरात्रेद्रवतः
संविदाने। यत्र प्रेप्सन्तीरमियन्त्यापःस्कम्भ
तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः ॥६॥
यस्मिन्त्स्तब्ध्वा प्रजापतिर्लोकान्त्सा
अधारयत् । स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदे-
व सः॥७॥
.
जिसकी और आधे महीने (पक्ष ) जाते हैं, जिसकी ओर
वर्ष के साथ एकता रखते हुए महीने जाते हैं जिसकी ओर ऋतुएं
और ऋतुओं की उपज (वा ऋतुओं के समूह ) जाती है, उम
स्कम्भ को कहो वह इन में कौन है ॥ ५॥
दिन और रात की दोनों युवतियें जो आपस में एक दूसरी
से भिन्न २ रूप रखती हैं। आपस में एकता रखती हुई जिसकी
ओर भागती हैं, जिसकी ओर इच्छा से भरे पानी जाते हैं।
उस स्तम्भ को कहो, वह इन में कौन है ॥ ६॥
प्रजापति (विराट् ) ने जिसपर सहारा लेकर मारे लोकों को.
धारण किया है । उस स्कम्भ को कहो, वह इन में कौन हैं ॥ ७॥

वेदोपदेशः २९ यत्परममवमं यच्च मध्यमं प्रजापतिः स- सृजे विश्वरूपम्।कियता स्कम्भः प्रविवेश तत्र यन्न प्राविशत कियत्तबभूव * ॥ ८॥ कियता स्कम्भः प्रविवेशभूतं कियद्भबि- ष्यदन्वाशयेस्य। एकं यदङ्गमकृणोत सहस्रधा प्रजापति ने जो सब से ऊपर सबसे नीचे और मध्यमें सृष्टि रची है, जो सृष्टि भान्ति २ के रूप (शकले) रखती है। उस (सारी सृष्टि) में स्कम्भ कितने अंश से भविष्ट हुआ है और जो अंश उसमें नहीं प्रविष्ट हुआ, वह कितना * है ॥ ८ ॥ कितने अंश से स्कम्भ भृत में प्रविष्ट हुआ है और उसका कितवां हिस्सा भविष्यत् में पहुंचा है । जिस एक अङ्ग (प्रकृति) को उसने सहस्रों मकारों कर दिया है, उसमें स्कम्भ कितने अंश से प्रविष्ट हुआ है " ॥९॥ प्रयमभिसन्धिः-इयमखिला सृष्टिम्तस्यैकस्मिन् प्रदेश वर्तते । तस्य ने रूपमस्या वह्नतिरिचते। अस्य जगतोऽन्तो विद्यते, ब्रह्म तु स्वरूप- तोऽप्यनन्तम् । अम्मिन् महिनि तस्याल्पोऽशः प्रविष्टोऽस्ति। अप्रविष्टस्तु कियानिति न परिच्छेतुं शक्यते इति । * तात्पर्य यह है कि यह सारी महती सृष्ठि उसके एक अंश में पड़ी है। उसका अपना स्वरूप इस रचना में बहुत बढ़कर है। इस सृष्टि को सोमा है पर उसकी कोई सीमा नहीं। इस महिमा में उस- का थोड़ा स्वरूप प्रविष्ट है । जो इससे पर है, वह अनन्त है। - वेदोपदेशः कियता स्कम्भः प्रविवेश तल ॥६॥ यत्र लोकांश्च कोशांश्चापो ब्रह्म जना विदुः । असच यत्र सच्चान्तः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥ १० ॥ यत्र तपः पराक्रस्य व्रतं धारयत्युत्तरम् । जिस में सारे लोकों को और लोकों के परदों को जलों को और वेद को विद्वान् लोग जानते हैं। जिसमें अव्यक्त (जोप्रकट नहीं) और व्यक्त (जो प्रकट है ) विद्यमान हैं, उस स्कम्भ को बताओ, वह इन में कौन है ॥ १० ॥ जिसमें तप पराक्रम वाला वनकर ऊंचे व्रतको धारण करता है। P-अनादिकालादारभ्य यदयदुद्भूत, तत्सवं तस्मिन्नेव स्कम्भे ध्वाहितं सदुद्भूतम्, एवमनन्तं कालं यद्भविष्यति तदपि तस्यैकस्मन् प्रदेशे सत्ता लप्साते, यतो येयं प्रकृति: यस्था अखिलमुत्पत्तिमदुत्पद्यते सापि तस्यैकस्मिन्नंगे तिष्ठति । तच्चास्या एतापद परं विद्यते,यच्चिन्तयि तुमग्यशक्यम् इति ॥ + अनादि काल से जो कुछ होरहा है, वह सब उस खम्भे के एक अंश पर सहारा लिये होरहा है। और जो आगे अनन्त काल तक होता रहेगा, वह भी उसके एक अंग पर होता रहेगा, क्योंकि सारी को सारी प्रकृति हो जिससे यह सहस्रों प्रकार की रचना होती रही है और होती रहेगी, उसके एक अंग पर खड़ी है और वह इस से इतना परे है जो चिन्तन में भी नहीं पासता ॥ जिसके आश्रय तप का ऐसा पराक्रम बढ़ता है, कि उससे बड़े २ ऊंचे व्रती को धारण करक पुरुष उनकी पूर्ण करता है ।।

३१ वेदोपदेशः ऋतं च यत्र श्रद्धा चापो ब्रह्म समाहिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥ ११ ॥ यस्मिन् भूमिरन्तरिक्षंद्यौर्य स्मिन्नध्याहि- ता।यत्राग्निश्चन्द्रमाः सूर्यो वातस्तिष्ठन्त्या- पिताः स्कम्मं तंब्रूहि कतमःस्विदेवसः।१२। यस्य त्रयस्त्रिंशदेवा अङ्गे सर्वे समाहिताः स्कम्मं तं ब्रूहि कतमः स्विदेवसः॥ १३॥ जिसमें ऋत (कानून कुदरत ) और श्रद्धा, जल और वेद प्रोए हुए हैं । उस स्कम्भ को वताओ, वह इन में कौन है ॥ ११ ॥ जिसमें पृथिवी, अन्तरिक्ष और धौ सहारा लिये खड़े हैं, जिस में अग्नि, चन्द्रमा सूर्य और वायु मोए हुए ठहरे हैं उस स्कम्भ को वताओ, वह इन में कौन है ॥ १२ ॥ जिस में सब के सब ३३४ देवता समाए हुए. है । उस स्कम्भ को वताओ, वह इन में कौन है ॥ १३ ॥ * देवास्त्रयस्त्रिंशत् सन्तोति वेदेषु बहुत्र प्रतिपादितम्- आ नासत्या त्रिभिरेकादशैरिह देवेभिर्यात मधुपेयमश्विना (ऋग् १ । ३४ । ११) श्रुष्ठीवानो हि. दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः। तान रोहिंदश्व.गि- र्वणस्त्रयस्त्रिंशतमा वह (ऋग० १ ॥ ४५ ॥२) येदे- वासो दिव्येकादश स्थ एथिव्यामध्येकादशस्थ । - " वेदोपदेशः अप्सुक्षितो महिनैकादशस्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्(ऋग १ । १३९ । ११) ऐभिरग्ने सरथंया ह्याङ् नानारथं वा विभवो ह्यश्वाः । पत्नी व- तस्त्रिंशतं त्रीश्चदेवाननुष्वधमावह मादयस्व (ऋ० ३। ६ । ९) ये त्रिंशति त्रयस्परोदेवासोबर्हिरास- दन् । विदन्नह द्वितासनन् (ऋग् ८ । २८ । १ ) इति स्तुतासो असथा रिशादसो येस्थत्रयश्च त्रिंशच। मनोर्देवा यज्ञियासः (ऋग् ८ । ३०१२) विश्वैर्देवै- स्त्रिभिरेकादशैरिहाद्भिर्मरुद्धिर्भृगुभिः सचाभुवा । सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं पिबतमश्विना (ऋग ८ । ३५। ३) वृहदारण्यकेत्वेवं प्रतिपादितम्- “अथ हैन विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ, कति देवा याज्ञवल्क्येति सहैतयैव निविदा प्रतिपेदे। यावन्तोवैश्वदेवस्यनिविद्युच्यन्ते त्रयश्चत्रीचशता त्रयश्चत्रीचसहस्रेत्योमितिहोवाचाकत्येवदेवाया- ज्ञवल्क्येतिात्रयस्त्रिंशदित्योमितिहोवाचाकत्येव- देवा याज्ञवल्क्यति । षडित्योमिति हो वाच । कत्येवदेवा याज्ञवल्क्येति । द्वावित्योमिति हो वेदोपदेशः वाच । कत्येव देवायाज्ञवल्क्येति। अध्यर्ध इत्यो- मिति होवाच । कत्येव देवायाज्ञवल्क्यत्येक इत्योमिति होवाच.........कतम एकोदेव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते । (यह ३११) अन्यत्र ऋग्वेदे ३३३१ देवाः प्रतिपादिताः, तद्यथा- त्रीणिशतात्री सहस्राण्यग्नि त्रिंशच देवा नव चा सपर्यन् । (ऋग ३ । १ । १) निरुक्त त्रयो देवा अभिहिताः । अग्निः पृथिव्यां वायुरन्तारक्षे, सूर्योदिवीति । अत्रैतद्रहस्यम्-त्रयोलोकाः, तत्र निलः मुख्याः दिव्यशक्तयः, अग्नि, वायुः, सूर्यश्चेति । ता एव अवान्तरभे- दैर्दशभिर्गुणताः त्रिंशद् भवन्ति । मुख्याश्च तिस्त्रइति मिलित्वा त्रयस्त्रिंशदभवन्ति । एवं तिस्रः एव शतेन गुणिता त्रीणि शतानि सहस्रेण च गुणिता त्रीणि सहस्राणि भवन्ति । उभयत्र मुख्यानां त्रयाणां देवानां मेलनेन त्रीणि शतानि त्रयश्च देवा नीणि सहस्रा- णि त्रयश्च देवा भवन्ति । एतदेव वृहदारण्यके ऽभिदितम् । एवं ३००३+३०३+३३ इसेवं सर्वपां योजनेन ३३३१ देवा भवान्त। यथाऽभिहित (ऋग्वेदे ३ । १।९) यास्केन मुव्यक्तमभिहित यथैकस्यैवात्मनः बहुधा वर्णनं विद्यते, दृइदारण्यके देवानामनेक- त्वमभिधायान्ते “कतम एकोदेव इति माणइति स ब्रात्यदित्या- चक्षते" इत्येक एव देवो निर्धारितः स सर्वस्य प्राणभूतः परमात्मैव। - * देवता ३३ हैं, इस विषय का वर्णन वेदों में कई स्थलों पर पाया है "अानासत्यानिभिरकादशैरिहदेवेभिर्यातमधुपेय मना" वेदोपदेशः यत्र ऋषयः प्रथमजा ऋचः साम यजुर्म ही । एकर्षिर्ययस्मिन्नार्पिताः स्कम्भंतंब्रूहि कतमः स्विदेव सः ॥ १४॥ जिममें पहिले उत्पन्न हुए ऋषि, ऋचा, साम, यजु, पृथिवी और एक ( सब से बड़ा ) ऋपि रहते हैं। उस स्कम्भ को कहो, वह इन में कौन है ॥ १४ ॥ । ऋग् १ । ३४ । ०१) अर्थ-हे मच्चे अश्वियो तम ना, तोनवार ग्यारह देवता हैं उनके माथ हमारे मधुपेय पर पानी । मी प्रकार देखो ऋग् १। ४५ २.१ । १३६।११, ३।६।६,८।२८ । १,३० । २, ३५३ और बालखिल्य ८ । २ ऋग्वेद ३।८।८ में ३३३८ देवता कहे हैं। वृहदारण्य क में ३०३, ३००३, ३३, ६, ३, २, डेढ़ और एक देवता क्रम बर्णन किये हैं निरुत में पृथिवी, अन्तरिक्ष और धो में अग्नि, वायु और सूर्य तीन हौ देवता वर्णन घि ये हैं। इसमें रहस्य यह है, कि तीन हौ लीक हैं, उनमें तीन ही मुख्य दिव्य शक्तिये हैं अग्नि, वायु और सूर्य्य । और सब देवता इन्हीं की भवान्तर शक्तियें हैं । मुख्य तीन देवता अलग रखकर उनकी अवान्तर और शक्तियें दसगुणा, सौगुण और हजारगुणा मान कर ३३, ३०३, और ३००३ देवता माने हैं और इन सबको मिन्नान से ३३३८ देवता हो- जाते हैं, जो ऋग्वेद ३ । ८ । ८ में कहे है। यास्क मुनि ने इमबात को स्पष्ट किया है, कि इस में देवता को बड़ी भारी महिमा है कि एक परमात्मा को इसीति पर बताया है, कि जैसे बहुत से हैं। परमार्थ यह है, कि ये मव दियशक्तिये जा छोटे २ प्रवान्तर भेदों में तो अधिक से अधिक हैं और मुख्य भेदों में न्यून मे न्यून होती हुई एक तक है। ये सब अपने २ प्रकाश से परमात्मा को जितन्ताती हैं । वृहदारण्यक ३1८ । में भी जो अन्त में सब देवताओं का एक ही देवता माना है। वह सबका प्राण (जीवन) है और एक परमात्मा है।

३५ वेदोपदेशः यतामृतं च मृत्युश्च पुरुषेऽधि समाहिते समुद्रो यस्य नाडयः पुरुषेऽधि समाहिताः स्कम्मं तं ब्रहि कतमः स्विदेव सः॥ १५॥ यस्य चतस्रः प्रदिशो नाड्यस्तिष्ठन्ति प्रथमाः। यज्ञो यत्रपराक्रान्तः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥ १६ ॥ ये पुरुषे ब्रह्मविदुस्ते विदुःपरमेष्ठिनम् । यो वेद परमेष्ठिनं यश्च वेद प्रजापतिम् । ज्येष्ठंयेब्राह्मणंविदुस्तेस्कम्भमनुसंविदुः।१७॥ जो मनुष्य के अर्थ अमृत को और मृत्यु को धारण करता है । जो समुद्र को मनुष्य के अर्थ अपनी नाडियों की न्याई धारण करता है, उस स्कम्भ को कहो,वह इन में कौन है॥१५॥ ( आकाश के) चार प्रदेश ( बड़े २ हिस्से अर्थात् चारों दिशाएं) जिसकी मुख्य नाड़ियें है । जिस में यज्ञ पराक्रम * वाला होता है, उस स्कम्भ को कहो वह इन में कौन है ॥१६॥ जो, पुरुप (विराट् ) में ब्रह्म को पहचानते हैं, वे ही परमेष्ठी (जो सबसे ऊंचे पद पर स्थित है अर्थात् हिरण्यगर्भ ) को जानते हैं। जो परमेष्ठी (हिरण्यगर्भ ) को जानता है और जो प्रजापति (विराट् ) को जानता है और जो ज्येष्ठ (सब से बड़े, सबसे ऊपर) * यज जो मनुषर को दि का हेतु है उसमें यह बल परमात्मा के सहारे है। क्योंकि यज्ञ परमात्मा का उपदेश किया धर्म है।

३६ वेदोपदेशः यस्य शिरो वैश्वानरश्चक्षुरङ्गिरसोऽभवन् । अङ्गानि यस्य यातवः स्करमं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥१८॥ यस्य ब्रह्म मुखमाहुर्जिव्हां मधुकशासुत । विराज मूधो यस्याहुः स्कम्मतं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥ १६ ॥ ब्रह्म को जानते हैं, वे फिर उस स्कम्भ को जानते हैं ॥ १७ ॥ वैश्वानर जिसका सिर है, अङ्गिरस जिसके नेत्र हैं। और यातु जिसके अङ्ग हैं, उस स्कम्भ को कहो, वह इन में कौन है। ॥ १८ ॥ वेद जिसका मुख है और जिह्वा शहद का चाबुक है (उसकी जिह्वा अर्थात उसकी वाणी, उसका उपदेश, चाबुक की न्याई शक्ति के उकसाने और उत्पन्न करने वाला है, पर यह . चाबुक भयका कारण नहीं, किन्तु शहद सा मीठा है ) और विराट् जिमका ऊरः ( इवाना, जसे गौ के हवाने में बच्चे के लिये द्घ भरा रहता है, इभी प्रकार परमात्मा की प्रजा के लिये * यहां परमेशूर के चार स्वरूप वर्णन क्येि हैं, तीन शवल और एक शुद्ध स्कम्भ । और दर्शन का क्रम भी वर्णन किया है, शिजो वि- राट् में परमात्मा के दर्शन कर लेता है। वही परमेष्ठी के दर्शन कर सता है और नो इन दानों अवस्थाओं और उनसे भो पहिलो अवस्था में स्थित परमात्मा के दर्शन करलेता है, वही उन स्कन्न को पह- चानता है।

वेदोपदेशः यस्मादृचो अपाततन यजुर्यस्मादपाकषन्। सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखं- स्कम्मतं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥२०॥ असच्छाखां प्रतिष्ठन्ती परममिव जना विदुः उतो सन्मन्यन्तेऽवरे येतेशाखामुपासते।२१ यत्रादित्याश्च रुद्राश्च वसवश्च समाहिताः। इम विराट् में दर, हमारी जीवन की रक्षा और पुष्टि करनेवाले द्रव्य, भरे हैं ) बतलाते हैं। उस स्कम्भ को बतलाओ, वह इन में कौन है ॥ १९ ॥ ऋचाएं जिस से निकली हैं, यजु जिस से उत्पन्न हुए हैं, साम जिसके लोम (रोमों की न्याई हैं ) अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद के मन्त्र, जिन मन्त्रों के द्रष्टा अथर्वऋपि और अङ्गिरस ऋपि हैं) जिसका मुख हैं, मुझे वताओ, वह स्कम्भ इन में कौन है ॥२०॥ (ज्ञानी) लोग उस प्रतिष्ठित (एकरस स्थिर) शाखा को सबसे बढ़कर समझते हैं, जो (माखा) व्यक्त (प्रकट) नहीं है। और जो निचले लोग व्यक्त (प्रकट) को ही समझते हैं, वे उसी शा- खा की उपासना करते हैं * ॥ २१ ॥ -- , - * परमात्मा को वह महिमा, जिमकी यह उसका बनाया हुआ ब्रह्माण्ड प्रकाशित कररहा है। ज्ञानीलोग इस महिला को देखते हैं और हमी की उपासना करते हैं, पर परमजादी उसको उम अनन्त महिमा का देवशर चकित होते हैं, निमकी यह ब्रह्माण्ड भी प्रका- शित नहीं कर सका है। यहां भी परमात्मा के शुद्ध और बल दोनों स्वरूप का वर्णन है।

३८ वेदोपदेशः भूतं च यत्र भव्यं च सर्वे लोकाःप्रतिष्ठिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः ।। २२ ।। यस्य त्रयस्त्रिंशदेवा निधिं रक्षन्ति सर्वदा। निधिं तमद्य को वेदयं देवाअभिरक्षथ ॥२३ यल देवा ब्रह्मविदो ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। यो वैतान विद्यात् प्रत्यक्ष स ब्रह्मा वेदिता स्यात् ॥ २४॥ जिस में आदित्य, रुद्र, और वसु समाए हुए हैं। भृत भविष्यत् सब जिसके सहारे हैं, सारे लोक जिसका सहारा लिये खड़े हैं । मुझे बताओ, वह स्कम्भ इन में कौन है ॥२२॥ जिस की निधि को ३३ देवता सदा रक्षा करते हैं । उस निधि को आज कौन जानता है, हे देवताओ जिसकी तुम रक्षा करते हो (निधि दवे हुए खज़ाने । इन ३३ देवताओं के अन्दर जो ब्रह्म की महिमा प्रकाशित हो रही है, वही उस ब्रह्म का इन देवताओं में दवा हुआ खज़ाना है, जिस निधि की ये सदा रक्षा रख रहे हैं। परन्तु ये देवता भी उसके जितने खज़ानों (जितनी महिमा ) की रक्षा कर रहे हैं उस निधि को भी कौन जान सक्ता है) ॥ २३ ॥ ब्रल के पहचानने वाले* देवता जिन (३३देवताओं) में ज्येष्ट ब्रम की उपासना करने हैं । जो उनको ( देवताओं को) प्रसक्ष .......... अथवा वद के जानने वाले ॥

वेदोपदेशः वृहन्तो नाम ते देवा येऽसतः परि जज्ञिरे। एकंतदङ्ग स्कम्भस्यासदाहुः परोजनाः।२५। यत्र स्कम्मः प्रजनयन पुराणं व्यवर्तयत् । एकंतदङ्ग स्करसस्य पुराणमनुसंविदुः ॥२६ यस्य त्रयस्त्रिंशद्देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे। तान् वै त्रयस्त्रिंशद्देवानेके ब्रह्म विदो विदुः ॥ ॥२७॥ समझलेगा । वह ब्राह्मण होगा, वही ज्ञानी होगा (अर्थाद इन दिव्य शक्तियों के अन्दर उस अन्तर्यामी ब्रह्म को पहचानना ही देवताओं का यथार्थ स्वरूप जानना है । ऐसी पहचान वाला पुरुष ही ज्ञानी है, वही ब्रह्मा वा ब्राह्मण है ) ॥ २४ ॥ बड़े हैं वे देवता जो अव्यक्त (न प्रकट) से प्रकट हुए । और स्कम्भ के उस एक हिस्से को ज्ञानी लोग अव्यक्त (छिपाहुआ) कहते हैं, जो (इस व्यक्त से ) परे है ॥ २५ ॥ जहां स्कम्भ ने अनादि (प्रकृति ) को जन्म देते हुए, उसको वर्तमान आकार (शकल) दिया । उस अनादि प्रकृति को (विद्वान् ) स्कम्भ का एक अंग जानते हैं ॥ २६ ॥ ३३ देवता जिसके शरीर में अंगों की जगह पर हैं । कई एक वेदवेत्ता (वेद के जाननेवाले ) उन्हीं ३३ देवताओं को समझते हैं (वेद का तात्पर्य यह है कि जैसे शरीर के भिन्न २ अङ्ग आत्मा की भिन्न २ शक्तियों का प्रकाश करते हैं । जो उस अन्तरात्मा को न वेदोपदेशः हिरण्यगर्भ परसमनत्युचं जना विदुः । स्कम्भस्तदने प्रासिञ्चद्धिरण्यं लोके अन्त- रा॥२८॥ स्कम्मे लोकाः स्कम्से तपः स्कम्मेऽध्य- त माहितम् । स्कम्मत्वा वेद प्रत्यक्ष मिन्द्रे सर्व समाहितम् ॥ २६॥ इन्द्रे लोका इन्द्रे तप इन्द्रे ध्यतमाहितम् जान कर केवल उन्हीं अंगोंपर भूलता है, वह भ्रान्ति में है। इसी प्रकार यह साना ब्रह्माण्ड ब्रम का शरीर है और ये भिन्न २ देवता उसमें भिन्न २ अंग हैं, जो ब्रह्म की भिन्न शक्तियों का प्रकाश कर रहे हैं । जो वेदवेत्ता इन अंगों (देवताओं) में उस अन्तरात्मा को न पहचान कर केवल इन्हीं अंगों पर भूलते हैं, वे वेद के तत्व अर्थ को नहीं जानते) ॥ २७ ॥ . लोग हिरण्यगर्भ को ही सब से ऊंचा और वाणी की पहुंच से बहुतपरे मानतेहैं। (तत्व यह है किस्कम्भ ने उस तेज को सृष्टि के अन्दर आदि में प्रकाशित किया ॥ २८ ॥ स्कम्भ में लोक हैं, स्कम्भ में तप है स्कम्भ में ऋत (सृष्टि नियम) रक्खा हुआ है । हे स्कम्भ में तुझको प्रसक्ष जानता हूं, तुझ इन्द्र में सब कुछ इकट्ठा रक्खा हुआ है ॥ २९ ॥ इन्द्र में लोक हैं, इन्द्र में तप है और इन्द्र में ऋत रक्खा हुआ है । हे इन्द्र मैं तुझको प्रसक्ष जानता हूं, कि तुझ स्कम्भ में सब वेदोपदेशः इन्द्रं त्वा वेद प्रत्यक्षं स्कम्भे सर्व प्रतिष्ठितम् ॥ ३०॥ नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात् पुरो कुछ इकहा रक्खा हुआ है ॥ ३०॥ (इन दोनों मन्त्रों में यह प्रकट किया है, कि वे नियम जो इस ब्रह्मांड को चला रहे हैं और वह तप जो आत्मा के तेज को बढ़ाता है और ये सारे पृथिवी आदि लोक ये सब उसी स्कम्भ का आश्रय लिये खड़े हैं। और जो स्कम्भ है वही इन्द्र अर्थात् मालिक ऐश्वर्य वाला है और जो इन्द्र है, वही स्कम्भ है । इस असन्त अभेद को जितलाने के लिये ही जो कुछ २९ मन्त्र में कहा है, वही ३०.में कहा है । २९ में जहां स्कम्भ पद था, ३० में वहां इन्द्र रख दिया है, और जहां इन्द्र था वहां ३० में स्कम्भ रख दिया है । इससे साफ स्पष्ट कर दिया है, कि इन्द्र और स्कम्भ केवल नाम भेद है । नाम ये दोनों उसी एक परमात्मा के हैं। और इससे अगले (३१) मन्त्र में भी यही बतलाया है, कि मनुष्य भिन्न २ नामों से उसी एक परमात्मा को पुकारता है पिछले २३, २४ और २७ मन्त्रों के आशय से भी यही वात प्रकट होती है) . सूर्य के उदय होने से पहिले और उपा से भी पहिले वह (ईश्वर की भस्तुति करने वाला) एक नाम को दूसरे नाम से बुलाता है। जो अजन्मा सब से पहिले प्रकट हुआ, वह उस सूर्य के उदय होने से पहिले जो पाकाश में लाली पड़ जाती रेडमा नाम उपा 1 ४२ . वेदोपदेशः षसः। यदजः प्रथम संबभूव सह तत् स्वारा- ज्य मियाय यस्मात् नान्यत् परमस्ति भूतम् ॥ ३१॥ यस्य भूमिः प्रमाऽन्तरिक्ष मुतोदरम् । दिवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥ ३२॥ यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः।अग्नि स्वाराज्य ( पूर्ण स्वतन्त्रता, जिस पर कोई और राजा नहीं) को प्राप्त हुआ, और जिससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं हुआ है ( अभि- प्राय यह है, कि ईश्वर की पूजा करने वाला वेद मन्त्रों के द्वारा जव अग्नि, इन्द्र, सूर्य, मित्र वरुण को पुकारता है, तो वह एक नाम से दुसरे नाम को पुकारता है, इन्द्र कहकर भी स्कम्भ को पुकारता है, और वरुण कहकर भी उसी को पुकारता है । वही एक अजन्मा सव उत्पत्ति वालों से पहिले है, उसी का इस जगत् में स्वतन्त्र राज्य है, उस-से बढ़कर कोई नहीं, वह सबसे ऊपर है । अतएव वही पुकारने योग्य है । ॥ ३ ॥ उस पर ब्रह्म को नमस्कार है । यह पृथिवी जिस के पाओं है अन्तरिक्ष जिम का उदर (पेट) है और चौ को जिसने मस्तक (माथा) बनाया है.)॥ ३२॥ उस परब्रह्म को नमस्कार है, सूर्य -जिस का नेत्र है और चन्द्रमा भी, जो फिरर नया होता है (नेत्र है) और जिसने अग्नि वेदोपदेशः ४३ यश्चक्र आस्यं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥ ३३ ॥ यस्य वातः प्राणायानौ चक्षुरङ्गिरसोऽ भवन् ।दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठा- य ब्रह्मणे नमः ॥ ३४॥ स्कम्भो दाधार द्यावाप्टथिवी उभे इमे स्कम्भोदाधारोवन्तरिक्षम्। स्कम्भो दाधार प्रदिशः षडुर्वीः स्कम्भ इदं विश्वं भुवनमा- विवेश ॥ ३५॥ यः श्रमात् तपसो जातो लोकान्त्सर्वा- को अपना मुख बनाया है ॥ ३३॥ नमस्कार है उस परब्रह्म को, वायु जिसका प्राण और अपान है, आङ्गिरस (सूर्य के किरण) जिसका चक्षु है, दिशाओं को जिसन श्रोत्र (कानं) बनाया है ॥ ३४ ॥ ये जो धौ और पृथिवी हैं, इन दोनों को स्कम्भ ने धारण किया हुआ है । स्कम्भ ने विस्तृत अन्तरिक्ष को धारण किया हुआ है । स्कम्भ ने इन फैली हुई छ: दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर, नीचे और ऊपर) को धारण किया हुआ है । यह सारा भुवन स्कम्भ में घिरा हुआ है ।। नमस्कार है उस पर ब्रह्म को,जो तप और श्रम (जगद रचना .

४४ वेदोपदेशः समानशे । सोमं यश्चक्रे केवलं तस्मै ज्ये टाय ब्रह्मणे नमः॥ ३६॥ कथंवातो नेलयति कथं न रमते मनः। किमापः सत्यं प्रेप्सन्तीर्नेलयन्ति कदा- चन ॥ ३७॥ महत्यक्षं भुवनस्य मध्ये तपसि क्रान्तं का ज्ञान और उसको रचना में लाना) से प्रकट होकर सारे लोकों (दुन्याओं) को घेर लेता है । जिसने सोम को केवल ( अपने लिये ) बनाया है (सोम को उसने इसलिये बनाया है। कि उससे उसकी पूजा की जाए । सोमरस इन्द्र आदि के लिये बहाया जाता है, और यहां लिखा है, कि सोमरस को स्कम्भ ने केवल अपने लिये बनाया है, इस से भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि इन्द्र आदि नामों से केवल परमात्मा की ही पूजा की जाती है )॥ ३६॥ वायु क्यों नहीं बंद होता, मन क्यों जरा भी दम नहीं लेता। पानी किस सचाई को चाहते हुए कभी नहीं ठहरते (किसकी शक्ति से अथवा किसके भय से अपने काम में लगातार लगे रहते है ) ॥ ३७॥ बड़ा यक्ष (पूजनीय.) जो तप में बढ़ा हुआ है, भुवन के मध्य में है और भुवन के ऊपर स्थित है । सब उसी में आश्रय लेते हैं, जो कोई नाम देवता है । जैसे वृक्षाका स्कन्धः (कन्धा) जिसकी चारों ओर शाखा हैं (क्षकी सारी हरी भरी शाखाएं उसी से .

बेदोपदेशः सलिलस्य पृष्ठे । तस्मिञ्छ्रयन्ते य उ केचं देवा वृक्षस्य स्कन्ध परित इव शाखाः॥३८॥ यस्मै हस्ताभ्यां पादाभ्यां वाचा श्रोत्रेण चक्षु- पा। यस्मै देवाः सदा वलिंप्रयच्छन्ति विमि- तेऽमितं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥ ॥३९॥ अप तस्य हतं तमो व्यावृत्तः स पा- प्मना । सर्वाणि तस्मिञ् ज्योतींषि यानि त्रीणि प्रजापतौ॥४०॥ हरी भरी हैं, जो बड़ा डाल उनको अपने अन्दर से जीवन भेज रहा है। इसी प्रकार सारे देवताओं का जीवन भी वही एक ब्रह्म है) ॥ ३८॥ जिसको देवता हाथों से पाओं से वाणी से श्रोत्र (कान) से और नेत्र से परिमित * ( यज्ञशालां) में सदा अपरिमित वाले देते हैं, मुझे बताओ, वह स्कम्भ इन में कौन है ॥ ३४ ॥ अन्धकार उससे दूर है, पाप से वह परे है, सारी ज्योतियां * परिमित यज्ञगाना - मिनी हुई छोठी सी यज्ञशाला, अभिप्राय मनुष्य शरीर में है। और तात्यर्य यह है कि मनुष्य के मारे प्राईवर के अपंप रहें। मनुष्य का चनना फिरना, बोलना चानना मब बन की पाजा में हो। यही उसको भेट है और इमोनिये पुरष कायन कप वर्णन किया है देखी छान्टो• उप०३ । १६ ॥ .

वेदोपदेशः यो देतसं हिरण्ययं तिष्ठन्तं सलिले वेद । सवै गुह्यः प्रजापतिः॥४१॥ तन्त्रमेके युवती विरूपे अभ्याक्रामं वयतः षण्मयूखम् । प्रान्या तन्त॒स्तिरते धत्ते अ- उसमें है, जो तीन (ज्योति ) मजापति न के अन्दर हैं ॥ ४० ॥ जो जलों में ठहरते हुए सुनहरी वैत को जानता है । वह गुह्य प्रजापति है (जलों में ठहरता हुआ वैत-विजली । आभिप्राय यई है, कि जो बिजली को उस अवस्था में भी देखता है, जबकि वहं व्यक्त नहीं, किन्तु जलोंके अन्दर छिपी हुई है, वहीं इस जगत में छिपा हुआ सारी मजा का मालिक है ॥ हिरण्ययवेतस अर्थाच मुनहरी वैत ऋग्वेद ४ । ५८१५ में भी इसका वर्णन है- “घृतस्य धारा अभिचाकशीमि हिरण्ययोवेतसो मध्य प्रासाम् " अर्थात् नलकी धाराओं को मैं देखरहा हूं और सुनहरी वैत उनके मध्य में हैं )॥११॥ दो युवतियें भिन्नररूपवाली वारी वारी से छ. खूटियों वालाताना तनती हैं। एक उन में से तागों को बढ़ाती है और दूसरी उनको धारण करती है। वे उनको तोड़ती नहीं और न अन्त को पहुंचती हैं (दो- युवतियें दिन और रात । छः खुटियां छः ऋतु हैं । भिन्न २ ऋतु में भिन्न परिवर्तन होता रहता है मानो दिन और रात इन छ: खटियों पर जगत् का ताना बाना बुन रहे हैं । एक इन में से ये जो तीन ज्यौतियां अग्नि, विद्युत्, और सूर्य विराट के भंग ये उस स्कम्भ में महारा लिये हैं।

वेदोपदेशः न्या नापञ्जाते न गमातो अन्तम् ॥४२॥ तयोरहं परिनृत्यन्त्योरिवन विजानामि यतरा परस्तात् । पुमानेनद्वयत्युद्ग्रंणत्ति पुमानेनद् विजमाराधिनाके ॥ ४३ ॥ इमे मयूखा उपतस्तमुर्दिवं सामानि च- तागा निकालती है, दूसरी उस को धारण रखती है और इन दोनों के इस काम से एक नया वस्त्र बन जाता है। वे इस सिल. सिले को वरावर किये जारही हैं और कहीं अन्त नहीं पाती। यह सारा जगव सोया हुआ है और इसके अन्दर दिन रात नई से नई रचना होरही है। यह उस महान स्कम्भ की लीला है ) ॥४२॥ इन दोनों में से जो मानो चारों ओर नाच रही हैं, मैं नहीं जानता, कि कौन इन में से पीछे है । एक पुरुष इस वस्त्र को बुनता है और उसको अलग २ करता है, और उसी पुरुष ने इसको नाक (धौ से ऊपर जो लोक हैं) के सिरे तक पहुं- चाया है (यह काल चक्र जिसमें दिनके पीछे रात और रात के पीछे दिन आता है, यह कब से आरम्भ हुआ, कौन इन में से पहिले है और कौन पीछे है, इस बात को कौन वतला सक्ता है। हम केवल इतना ही जानते हैं और यही जान सक्ते हैं, कि एक आदि पुरुष (प्रजापति ) है, जो दिन रात इस सृष्टि के वस्त्रको बुनता रहता है, और जिसने इस वस्त्र को माक के सिरे तक. पहुंचाया है)॥ ४३ ॥ ये रश्मि घौ को सहारे हुए हैं, सामों को उनों ने सिरणे ४८ वेदोपदेषाः क्रुस्तसराणि वातवे ॥४४॥ अथर्व० १० कां० ७ सूक्त समाप्तम् ॥ तन्तु (वाना) बनाया है ॥ ४४ ॥ ४३ मन्त्र का उत्तरार्ध और यह मन्त्र थोड़े भेद से ऋग्वेद में है, पुमाँ एनं तनुते उत्कृणत्ति पुमान् वितत्ने अधि- नाके अस्मिन् । इमे मयूखा उपसेदुरु सदः सामानि चक्रुस्तसराण्योतवे (ऋग्वेद १० । १३० १२) पुरुष (आदि पुरुष प्रजापति) इस यज्ञ (पहिला यज्ञ अर्थात् सृष्टि की रचना) को फैलाता है और ऊपर तक लपेटता है और पुरुष ही इसको इस नाक के सिरे तक फैलाता है। ये रश्मियें (सृष्टि नियम, जिनसे यह सृष्टिका वस्त्र बुना जारहा है ) सदम् ( यज्ञ में सभ्यों के. बैठने की जगह ) में बैठी हैं । और सामों (रथन्तर आदि सामों) को उन्होंने बुनने के लिये तिरछे तन्तु (बाना) बनाया है। ॥ अथर्ववेद काण्ड १० का सातवां सूक्त समाप्त हुआ।

ब्रह्मा का स्वरूप । अथर्ववेद काण्ड १० सूक्त ८। इस सूक्त में भी स्कम्भ का वर्णन है, यहां भी बतलाया है, कि स्क्रम्भ सब से बड़ा, सब से श्रेष्ठ, और सारे जगत् का आश्रय है। स्कम्भ के विषय में एक पूरा सूक्त पहले लिख दिया है। इसलिये यहां इस सूक्त के कुछ मन्त्रों को व्याख्या करके अगला विषय आरम्भ करेंगे- यो भूतं च भव्यं च सर्व यश्चाधितिष्ठति । स्वर्यस्य च केवलंतस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणेनमः १ पदार्थ-(यः) जो (भुतं*) हो चुका है (च) और (भव्य) होगा (च) भी (सर्व ) सारे का (यः) जो (च) और (अधि- तिष्ठति) अधिष्ठाता है - हकूमत करता है (स्व:) मुख = आनंद (यस्य) जिसका (च) और (केवलं) केवल (तस्मै ) उस (ज्ये- छाय) सब से बड़े (ब्रह्मणे) ब्रह्म को (नमः) नमस्कार हो । अन्वयार्थ-उस पर ब्रह्म को नमस्कार है, जो उसपर हकूमत करता है, जो कुछ हो चुका है, और उस पर भी, जो होगा। और जो सारे (विश्व ) पर हकूमत करता है । और आनन्द जिसका केवल है (वह केवल आनन्दमय है उस में दुःख का लेश मात्र भी नहीं है) ॥१॥ * अमल में यह पद भूतम् लिखना चाहिये। आसानी के लिये म् न लिखकर ऊपर बिन्दु दे देते हैं। जहां अन्त में बिन्दु है, वहां सब जगह ऐसा ही समझना चाहिये । स्व:, का अर्थ प्रकाश भी है अर्थात् जो केवल प्रकाश खरूप हे॥

५० वेदोपदेश स्कम्भेनेमे विष्टभिते धौश्च भूभिश्च तिष्ठतः ।स्कम्भाइदं सर्वमात्मन्वद् यत् प्राण निमिषच यत् ॥२॥ पदार्थ-(स्कम्भेन स्कम्भसे (इमे)ये दोनों (विऽस्तभिते) थामे हुए (यौ) छौ (च ) और (भूमिः) भूमि (च) और (तिष्ठतः) ठहरे हुए हैं (स्कम्भे) स्कम्भ में (इदम् ) यह (सर्व) सारा (आत्मन्वद ) आत्मा वाला (यत् ) जो (माण ) सांस लेता है (निमिपत् ) आंख झपकता है (च) और ( यत् ) जो ॥ अन्वयार्थ-स्कम्भ की शक्ति से थमे हुए ये दोनों द्यौ और पृथिवी ठहरे हुए हैं। स्कम्भ में ही यह सव आत्मा वाला वन रहा है, जो सांस लेता है और आंख झपकता है ॥ २ ॥ यो विद्यात् सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः। सूत्रं सूत्रस्य यो विद्यात् स विद्याद् ब्राह्मणं महत् ॥३७॥ प-(यः) जो (विद्या ) जान ले (सूत्रं) सूत्र को (विऽततं ) फैले हुए ( यस्मिन् ) जिस में (आऽउताः) प्रोई हुई (प्रजाः) प्रजाएं (इमाः) ये (सूत्रं ) सूत्र को (सूत्रस्य) सूत्रके (य:) जो (विद्यात् ) जान ले (सः) वह (विद्यात् ) जान सकता है (ब्राह्मणं) ब्रह्म को (महत् ) बड़े ॥ अ-जो विद्वान उस फैले हुए सूत्र (हिरण्यगर्भ ) को * जो दो पदों से मिलकर एक पद बना है उनके मध्य में s यह चिन्ह रहता है, अर्थात् यह समास का चिन्ह है।

ग्रम का स्वरूप
जान लेगा जिसमें ये सारी प्रजाएं मोई हुई हैं, और जो फिर सूत्र
के सूत्र को जान लेगा, वह उस पर ब्रह्मको पहचानेगा ॥
अकामो धीरो अमृतः स्वयंभूरसेन
तृप्तोन कुतश्चनोनः । तमेव विहान् न बि-
भायमृत्योरात्मानंधीरमजरंयुवानम्॥४४
प-(अकामः) कामना से रहित (धीरः) धीर (अमृतः)
अमर (स्वयंभू ) अपने आप होने वाला (रसेन ) रस से (तृप्तः)
तृप्त हुआ (न) नहीं ( कुतः। चन* ) किसी से (ऊनः) कम (तं)
उसको (एव) ही (विद्वान्) जानता हुआ (न) नहीं (विभाय)
डरता (मृत्योः) मृत्यु से (आत्मानं ) आत्मा को (धीर) धीर
(अजरं) बूढा न होने वाला (युवानं ) जवान ॥
अ-वह कामना से रहित है, वह धीर है, वह अमर
और अजन्मा है, आनन्द से तृप्त है, किसी से न्यून नहीं, उसको
हां केवल उस कोजान कर ही,जो कि आत्मा, धीर,जरा रहित और
युवा है, जानने वाला पुरुप मृत्यु से नहीं डरता ॥
यहां तक ब्रह्म के विशुद्ध स्वरूप का वर्णन हुआ । पर
जैसा कि पूर्व (२२ पृष्ट में ) दर्शा आए हैं, कि शुद्ध के प्रकरण
में भी शवल का वर्णन और शावल के प्रकरण में शुद्ध का वर्णन
आ जाता है । सो यहां भी वीचर में शवल का वर्णन आया है।
अव यहां से आगे शवल का वर्णन करते हैं। पहले शिख
आए हैं, कि एक तो वाहर के सारे सम्बन्धों से अलग उसके
* नहा मध्य में। यह चिन्ह है, वर्ग दो पद अलग २ है,
समास नहीं।

-- ५२ वेदोपदेश केवल स्वरूप मात्र का वर्णन है । यही विशुद्ध स्वरूप है। और दूसरा पाय जगत् के सम्बन्ध को लेकर जो उसका वर्णन है। अर्थात् जहां इस सरह पर वर्णन है, कि यह वाह्य जगत उसका शरीर है और वह इसका अन्तरात्मा है, इस जगत् में जोरघटनाएं होती है. सघ उसी का आश्रय लेकर होती हैं । यही उसका शवल, स्वरूप है । इस अवस्था में ब्रह्म का दो प्रकार से वर्णन किया है, एक तो यह, कि यह सारा जगत् उसका शरीर है और वह इस सारे जगत का नियन्ता है । दूसरा जहां अलग २ सूर्यादिकों का नियन्ता बतलाया है। यहां पहले उन सूक्तों को लिखते हैं, जिन में ब्रह्म को समष्टि जगत् का अन्तरात्मा बतलाया है। पहले (१८पृष्ट में) लिख आए हैं, कि इसका तीन प्रकार से वर्णन है, विराट्, हिरण्यगर्भ और प्रयति । इन में से पहले प्रति का वर्णन करते हैं- पहले जब यह उत्पत्ति वाली वस्तु कोई भी न थी। यह सारा जगत् प्रलय की अवस्था में धा । जो कुछ हम अब देखते हैं, यह अभी प्रकट नहीं हुआ था । और न ही अभी इस को प्रकट करने वाली क्रिया ही उत्पन्न हुई थी। उस समय भी पर- मात्मा का हाय इस सारे प्रबन्ध में था। उसके नियम ने प्रकृति को पलटा दिया और फिर इस में जगत् रचने की क्रिया उत्पन्न हुई । ब्रह्म उस समय प्रकृति के अन्दर वाहर रहकर सारी प्रकृति को चला रहा है, इसीलिये उस अवस्था में ब्रह्म को प्रयति कहा हैं । इस अवस्था का इस प्रकार वर्णन है- ऋग्वेद-मण्डल १० सूक्त १२१ । नासदासीनो सदासीत्तदानीं नासीद्र मलय की अवस्था ५.३ जो नो व्योमा परो यत् । किमावविः कुह कस्य शर्मन्नम्भःकिमासीद्गहनं गभीरम्॥१॥ प-(न) नहीं ( अमत् ) असत् (आसीत् ) था (नो) नहीं ( सत् ) सव ( आसीत् ) था (तदानीं) उस समय (न) नहीं (आसीत् ) था ( रजः) अन्तरिक्ष (नो) नहीं (विऽओम) 'आकाश (परः) परे ( यत् ) जो (किम् ) कौन (आवरीवः) ढांपे हुए था (कुह ) कहां (कस्य ) किसकी (शर्मन् ) छाया में = पनाह में ( अम्भः) जल (किम् ) क्या (आसीत् ) था (गहनं । गभीरं ) घना और अथाह ॥ अ-उस समय न असत् था,न सत् था,न अन्तरिक्ष और न यह ( उस से) परे जो आकाश है । कौन ढांपे हुए था, और कहां और किस की छाया के नीचे (ढापे हुए था) । क्या वहां गहन और अथाह जल था? उस समय = आरम्भ में । न असत् था और न ही सत् था आपत् = अविधमान(नामौजूद)भी नहीं था। और सत् = विद्यमान भीनहीं था,अर्थात् अभाव भी नहीं था। क्योंकि यदि अभाव होता, तो फिर यह हो कैसे जाता,अभाव से भाव की उत्पत्ति नहीं होती। पर जैसा अब है, ऐसा भी न था ॥ कौन ढापे हुए था, कहां और किस की छाया के नीचे ढापे हुआ था जैसे अब इस पृथिवी को वायु चारों ओर से हांपे हुए है । और अन्तरिक्ष में भरपूर होकर आकाश के सहारे उसको ढांपे हुए है । इस प्रकार उस समय न ढांपने वाला था, न उसके लिये स्थान था, न उसको कोई आश्रय देने वाला था। ।

वेदोपदेश गहन और अथाह जल से अभिप्राय सूक्ष्म स्थाष्टि से है (देखो. बृह० उप० पृष्ट २६ का नोट) अर्थात् जो पहले ही पहल प्रकृति से सूक्ष्म सृष्टि उत्पन्न होती है, वह भी उस समय नहीं हुई थी। न मृत्युरासदिमृतं न तर्हि न रात्र्या अन्ह आसीत् प्रकेतः। आनीदवातं स्वधया तदेकंतस्माद्यान्यन्न परः किंचनास ॥२॥ प-(न) नहीं (मृत्युः) मुंत्यु (आसीत् ) था (अमृत) अमृत (न) नहीं (तर्हि ) उस समय (न) नहीं (राव्याः)रात का (अन्हः) दिन का (आसीत् ) था (प्रकेतः) * निशान (आनी ) जीवित था ( अवातं ) विना वायु के (स्वधया) प्रकृति के साथ (तत् ) वह (एक) एक (तस्मात् ) उस से (ह) वेशक ( अन्यत् ) और (न) नहीं (परः) परे (किं । चन) कुछ (आस ) था ॥ अ-उस समय न मृत्यु था न अमृत (न मरना था न नमरना) न दिन और रात का कोई चिन्ह था। हां जीवित था अपनी प्रकृति के साथ वह एक, विना वायु के (उसका जीवन सांस लेने पर निर्भर नहीं था, वह स्वयं जीवी था) वेशक उस से परे और कुछ नहीं था ॥२॥ प्रकृति के साथ वह एक = इसका तात्पर्य यह है, कि प्रकेतः-प्रकाश देने वाले के अभिप्राय में प्रयुक्त है,देखो ऋग् १।११३ । १ और १ । ८४ । १५ अर्थ यह है दिन और रात का प्रकाश करने वाला, अर्थात् जिससे यह मालूम हो, कि यह दिन है और यह रात है ऐसा चिन्ह नहीं था।

प्रलय की अवस्था ५५ . प्रकृति भी उस से दूसरी जगह पर न थी, किन्तु प्रकृति उसका शरीर थी और वह उसका अन्तरात्मा था। इस तरह पर ये दोनों एक होरहे थे । प्रकृति जड़ शक्ति थी और वह इसके अन्दर चिति शक्ति थी। प्रकृति, मैटर ( Matter) और ब्रह्म, फोर्स ( Force ) या इच्छा शक्ति ( Vill power ) थी। ये दोनों आत्मा और शरीर हैं । इसीलिये प्रकृति के साथ एक कहा है। यही एक सारे विश्व का कारण है। वह अपने शरीर से इस सारे विश्व को रचता है औरआप उस सत्र में अन्तरात्मा होकर रहता है। तव उसको- “इन्द्रं मित्रंवरुणममिमाहुरथो दिव्य ससुपर्णोगरुत्मान्। एकंसद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निंयममातरिश्वानमाहुः इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं और वही दिव्य,सुपर्ण,गरु- स्मान् है । उस एक सत् (हस्ती) को विद्वान् लोग अनेक प्रकार से वोलते हैं, अग्नि, यम और मातरिश्वा कहते हैं। तम आसीत् तमसा गूढमग्रेप्रकेतं स- लिलं सर्वमा इदम् । तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत् तपसस्तन्महिना जायतैकम् ॥३॥ श-तमः) अन्धेरा (आसीव) था (तमसा) अन्धेरे से (गूढं ) छिपा हुआ ( अग्रे) आरभ्भ में (अमकेतं * ) विना चिन्ह के (सलिलंग ) एक रूप वना हुआ (सर्व) सारा (आ) *अपकतं = प्रकाश न देने वाला, अर्थात् यह सब कुछ जो अब है, था उस समय भी, पर अलग २ विविक्ता (तमीज) नहीं किया न सलिलं = इकट्ठा हुअा हुआ, जिस में गड़बड़ मची हुई है, यह क्या है और यह क्या है, ऐसा कोई विभाग नहीं हो सका। जा सकता था।

६६ वेदोपदेश था (इदं) यह (तुच्छयेन ) तुच्छ से कुछ न से= खाली से (आभु) फैला हुआ सारा (अपिऽहित) ढपा हुआ (यत् ) जो (आसीत् ) था (तपसः) तप की (तत्) वह (महिना) शक्ति से अजायत) उत्पन्न हुआ (एकं) एक ॥ अ-~-आरम्भ में अन्धेरा था अन्धेरे में छिपा हुआ। यह सव विना अलग २ चिन्ह के एक रूप हो रहा था * यह सारा. जो उस समय तुच्छ से ढपा हुआ था, " तप की शक्ति से वह एक उत्पन्न हुआ ॥ कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो वन्धुमसति निरविन्दन हृदिप्रतीष्याकवयोमनीषा४ (कामः) इच्छा (तत्) सो (अग्रे) आरम्भ में (अधि। सम्। अवर्तत ) उत्पन्न हुई (मनसः) मन का (रेतः) वीज (प्रथम) पहला (यव) जो (आसीत् ) था (सतः ) सद के (वन्धुं ) वन्धु * देखो मनु १ । ५ ॥ * तुच्छ से ढपा हुआ था,जिस तरह अब सूर्यको मेघ ढांप लेता है, इसी तरह उस समय भी यह सारा विश्व ढया हुआ तो था, पर ढांपने वाला परदा कोई नहीं था। वह वस्तु भी ढप जाती है, जिस पर परदा डाल दिया जाए, और वह भी ढप जाती है, जो अपने कारण में लीन हो जाए। यह जगत् उस समय अपने कारण में लीन था। वह एक, जो प्रकृति के साथ एक है, इसी श्राशय से उप- निषद में कहा है " एकोऽहं ब्रहुस्यां प्रजायेयेति” । तप= गर्मी वा सृष्टि रचने का ज्ञान॥

सृष्टि की उत्पत्ति ५७ .. में -- को (असति) असत् में (निः अविन्दन ) पाया (हृदि) दिल में (प्रतिइण्य)हूंढ कर(कवयः)बुद्धिमानों ने (मनीपा)बुद्धि से असो आरम्भ में इच्छा उत्पन्न हुई, जो मनका (जगत् रचने के ख्याल का) पहला वीज था । बुद्धिमानों ने बुद्धि से दिल में खोज करके सद के वन्धु को असतू पाया ॥ ४॥ जिस इच्छा के अन्दर यह जगत् अव चल रहा है, वही इच्छा 'इस जगत की रचना का वीज है, जिन विद्वानों ने अपने दिल में खोज की, उन्होंने इस बात को पालिया कि वह जो इस सद, व्यक्त (प्रकट) जगत् का बन्धु है, वहीं उस असद,अव्यक्त (अप्रकट) के अन्दर था, उसी की इच्छा से यह प्रकट हुआ। सव-व्यक्त और असत्-उससे उलट अर्थात् अव्यक्त । असत् अभाव के अर्थ में भी प्रयोग किया जाता है, जैसा कि इसी मुक्त के पहले मन्त्र में है। 'सतो वन्धुमसति निरविन्दन्" इसका अर्थ योरुपीय वि- द्वानों ने यह किया है कि "सत की रिश्तेदारी को असत् में पाया" अर्थात् यह व्यक्त उस अव्यक्त से प्रकट हुआ है । इस अर्थ में वन्धु शन्द वन्धुता के अर्थ में लिया गया है । हमने जो अर्थ दिया है उसमें वन्धु शब्द अपने असली अर्थ में है और अभिमाय यह है, कि जैसे अब इस जगत् के नियमित प्रबन्ध को देखकर एक विद्वान् पुरुप किसी चेतन का हाथ इस प्रबन्ध में देखता है यदि वह और आगे बढ़कर देखेगा, तो वह उस सब से पहली क्रिया में भी उसी हाथ को प्रबन्ध करता हुआ पाएगा, जो इस प्रकृति को इस अवस्था में लाने के लिये सब से पहली क्रिया हुई। तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषा ६८ वेदोपदेश मधः स्विदासी दुपारस्विदासीत् । रेतोधा आसन् महिमान आसन स्वधा अवस्तात् प्रयतिःपरस्तात् ॥५॥ प-(तिरश्चीन:) तिरछी (दिततः) फैली (रश्मिः) किरण (एपां) इन की ( अधः। स्वित्.) नीचे क्या (आसीत) था (उपरि । स्वित् ) ऊपर क्या (आसीत् ) था (रेताऽधाः) वीज डालने वाले*-आत्मा (आसन् ) थे (महिमान:) शाक्तियां (आसन् ) थीं (स्वधा) प्रकृति ( अस्ता) बरे (प्रयतिः) प्रयत्न करने वाला परमात्मा (परस्ताव ) परे ॥ अ-इन (विद्वानों) की एक तिरछी किरण फैली । (तब इसके ) नीचे क्या था और ऊपर क्या था। बस जीवात्मा थे और बड़ी २ शक्तियां था । प्रकृति बरे और परमात्मा परे था ॥ आशय यह है कि विद्वानों ने इस सृष्टि के दो विभाग ख्याल किये। एक जहां मनुष्य वास करते हैं और दूसरा जहां से इसको प्रकाश और जीवन मिलता है। जैसे एक सड़क जो पूर्व पश्चिम को जाती है, दक्षिण उत्तर की सड़क उसमें से गुज़रती हुई उसके दो हिस्से कर देती है, इस तरह उनके ज्ञान की रेखा (किरण) मध्य में फैली, जिससे निचले और उपरले ब्रह्मांड के दो विभाग हुए । जब उन्होंने इस बात को देखा, कि नीचे क्या था और ऊपर * मंत्र 8 में बोन इच्छ्रा को प्रकट किया है। यहां भी इच्छा अर्थ लेकर रेतोधा का अर्थ इच्छा वाले अर्थात् आत्मा किया गया है । सायणाचार्य ने भी येतोधाः= कर्म करने वाले और भोगने वाले जीव ही लिखा है।

सृष्टि की उत्पत्ति
५९
क्या था, तो उनको नीचे ऊपर सब जगह चेतन आत्मा और
वड़ी २ शक्तियां जो इस जगत में काम कर रही हैं, जान पड़ीं
और उन्होंने इस प्रकृति को अपने आप काम करता नहीं देखा.
किन्तु इसके परे एक प्रयत्न देखा, जो इमको चला रहा है ॥
को अडावेद क इह प्रवोचत- ३॥५४॥५)
कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेना-
थाको वेद यत श्राबभूव ॥६॥
प-(का) कौन ( अद्धा) ठीक २ (वेद) जानता है
(कः) कौन (इह ) (म नाचव) कह सकता है (कुतः ) कहां से
( आऽजाना) आ उत्पन्न हुई ( कुनः ) किार से ( इयं ) यह (विs
सृष्टिः) भिन्न २ रचना ( अर्वाम् ) वरे ( देवाः) देवता ( अस्य )
इसके (विऽमर्जनेन) भिन्न २ रचना से ( अथ ) तव (कः) कौन
(वेद) जानता है (यतः ) जहां से (आवभूव) आषिधमान हुई ।।
अ-कौन ठीक २ जानता है और कौन यहां कह सक्ता
है, कहां से यह आ उत्पन्न हुई और किस (कारण) से इसकी
भिन्न २ रचना हुई. जब कि देवता इस विविध रचना से वरे के
हैं, तब कौन जान सक्ता है, जहां से आविधमान हुई ।
इयं विसृष्टिर्यत आवस्व
यदि वा दधे यदिवा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन
सो अङ्गवेद यदिवा न वेद ॥७॥

वेदोपदेश प-(इयं विष्टियंत आवभूव ) यह विविध रचना जहां से आविद्यमान हुई (यदि । वा) चाहे (दधे) उसने रचना (तरतीव) दी हुई थी(यदि,वा) चाहे (न) नहीं (यः) जो (अस्य)इमका (आधिs अक्षः ) अधिष्ठाता (परमे) सब से ऊंचे (वि, ओमन् ) आकाश में (स.) वह (अंग) प्यारे(वेद)जानता है (यदि।वा) चाहे (न, नहीं (वेद) जानता है ॥ अ-यह विविध रचना जहां से आविद्यमान हुई है, चाहे उसने इसको यह तरतीय दी हुई थी चाहे नहीं । हे प्यारे जो इस का मालिक परम आकाश में है वही (इस भेद को) जानता चाहे नहीं जानता है ॥ इस सूक्त से एक बड़ी अद्भुत शिक्षा मिलती है, मन्त्र ५ तक इस बात को प्रकट किया है, कि यह रचना जो अब अन- गिनत भेदों में है, पहले अपने अन्दर कोई भेद नहीं रखती थी यह एक साम्यावस्था (तुल्यता की अवस्था) में थी, पर यह निरी जड़ न थी इसके अन्दर इसका चेतन अधिष्ठाता था, उस की इच्छा से इसमें परिणाम (तबदीली) हुआ । वह इसके अन्दर एकरस है,उसमें कोई परिणाम नहीं होता,अर्थात् जैसा कि अहिरन के ऊपर सारा घाड़ घड़ा जाता है,अहिरन में कोई परि- णाम नहीं होता, परिणाम उस वस्तु में होता है, जो उसके ऊपर घड़ी जा रही है । इसी प्रकार यह प्रकृति उस एकरस ब्रह्म के ऊपर बदलती रहती है, इस का घाड़ घड़ा जाता है, और ब्रह्म उसके अन्दर अहिरन की न्याई विना परिणाम के रहता है। प्रकृति अपनी अवस्थाको बदलती है पर नित्य है,इसलिये प्रकृति को परिणामि नित्य कहते हैं । ब्रह्म उसके अन्दर कूट ( अहिरन) सूक्त का तात्पर्य ६१ की नाई टिका रहता है इसलिये उसको कूटस्थ नित्य कहते हैं, और इसीलिये यह कहा है, कि "कि प्रकृति परे है और ब्रह्म परे है" प्रकृति का परिणाम हमारी आंखों के सामने हैं, और ब्रह्म उस के अन्दर छिपा हुआ है । प्रकृति को हम पहले जानते हैं और ब्रह्म को पीछे पहचानते हैं। मनुष्य की गति यहां तक है और इसीलिये ( मन्त्र ४ में ) यह प्रकट कर दिया है कि "बुद्धि 'मानों ने बुद्धि से इस वात.को पालिया" मन्त्र ६, और ७ का अभिप्राय यह है, कि जो बातें मनुष्य की पहुंच से परे हैं, उन प्रश्नों में पड़कर समय खोना उचित नहीं। जैसा कि यह पृथिवी जिन परमाणुओं से बनी है, वे इसके बनने से पहले कहां फैले. हुए थे, और कितने कोसों में फैले हुए थे । वह जगह कौन है कि जिप्त जगह के परमाणु परस्पर मिल २ करके इतनी पड़ी ठोस पृथिवी वन गई और सूर्य वना इत्यादि । दूसरा जब आदि में एक ही प्रकृति थी, तो यह रचना भिन्न २ किस तरह हुई, कहीं वे तत्त्व हैं, जिन से पानी वनता है और कहीं वे हैं, जिनसे वायु बनता है । एक आदि प्रकृति से अनेक तत्त्व किस तरह प्रकट हुए । फिर यह विविध रचना जिस तरह अब है, किसी जगह सूर्य चन्द्र तारे और किसी जगह पृथिवी है और इसी प्रकार अनगिनत सूर्य और अनगिनत पृथिवियां है, क्या इनके कारण में भी अपनी जगह की अपेक्षा से यही तरतीब थी अर्थात् एक सौर जगत् की प्रकृति (मैटीरियल) पहले ही दूसरे सौर जगत् की प्रकृति से अलग स्थान रखती थी, या पहले यह कोई भेद नहीं था । इस प्रकार की बातों को बह जान सक्ता है, जो उस समय देख रहा हो, बुद्धिमान तो सारे इस विविध रचना के पीछे हुए । इसलिये जो उस परम आकाश अर्थात् ६२ या एम वेदोपदेश परम प्रकृति के अन्दर इसका अध्यक्ष वही इस यान को जानना है, जिसकी आंखों के सामने यह मर कुछ हुआ है । अध्यक्ष उसको कहते हैं, जिसकी आंग्न ऊपर है ॥ "हे प्यारे वह जानना है, चाहे नहीं जानता अभिमाय से कहा है, कि तुम्हें इस ये क्या, क्योंकि तुम इमको जान नहीं सकोगे। इसके जानने का अधिकार तुमें नहीं हैं। या. अधिकार केवल उस ब्रह्मको है, जिसकी आंखों के नागने या हुभा है । जब कोई अपने अधिकार मे बढ़कर बात करता है, तो उम को इन्हीं शब्दों से हटाया जाता है। यहां यह बिलकुल तात्पर्य नहीं, कि शायद वह नहीं जानता हो, क्योंकि जिसको जानने न जानने वाला बतलाया है, उसी को पहले अश्या कहा भला जिसकी दृष्टि उसके ऊपर है, वह केन नहीं जानना । इमामय यह एक ऐसे प्रश्नों से हटाने की शैली (मुहावरः ) है ॥ आजकल हमारे देशवाली इसी तरह की बहुन मी आकाशा बातों के निर्धारण (इल करने) में लग रहते हैं। ये लोग बंद के इस अभिप्राय के विरुद्ध जाते हैं, वेद का अनुशाशन यह है, कि ऐसी बातों को परमात्मा पर छोड़ दो और तुम उन वाने को सीखो, जो तुम्हारी पहुंच की है और तुम्हारे उपयोगी हैं । इस सूक्त में सब से पहली अवस्था अर्थात् प्रलय और उस से पीछे फिर सृष्टि उत्पन्न होने का वर्णन आया है। और यहां परमात्मा को मयति (प्रयत्न शक्ति वा मयत्न करने वाला) . कहा है। यह है सब से उस पहली अवस्था का वर्णन, जब ब्रह्म ने प्रकृति के अन्दर प्रयत्न किया अब दूसरी अवस्था का वर्णन

रचना विषयक दूसरों का सिद्धांत
करते हैं । यह याद रखना चाहिये, कि वेद इस विषय में दूसरी
जातियों के धर्म पुस्तकों से निराले हैं, उन . ग्रन्थकारों ने देखा
कि वादल पहले आकाश में न था, अब बन गया है, मेंह भी
बरस रहा है। उन्होंने कहा, कि परमेश्वर सर्व शक्तिमान है, वह
जो कुछ चाहता है, कर लेता है । देखो पहले कुछ नहीं था,
फिर वादल बन गया । इसी तरह पहले कुछ नहीं था, फिर
सृष्टि वन गई। उनको यह ख्याल ही नहीं आया, कि कोई चीज़
नई नहीं उत्पन्न होती, केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदलती
है, और सूक्ष्म से स्थल बनती है । बस उनके लिये आसान था,
यह कह देना, कि पहले कुछ नहीं था, जब उसने चाहा, तो
यह सव कुंछ होगया । उन्होंने यह भी सोचा, कि भला परमेश्वर
सर्वशक्तिमान, और वह जगत् को रचते २ वड़ी देर लगा दे,
यह कैसे हो सकता है । वस उसने छः दिन में सब कुछ रच लिया
और सातवें दिन आराम किया और जिसको इतनी देर भी
परमात्मा की बड़ी शक्ति के विरुद्ध मालूम हुई, उसने कहा, कि
जब उसने चाहा, उसी समय सब कुछ हो गया । तीसरी बात
यह है, कि उन्होंने परमात्मा को ठीक उसी तरह समझा,
जैसा कि कोई एक प्रवल (जवरदस्त) पुरुष हो, वा राजा
हो । उसके रहने के लिये एक जगह नियत हुई और सब से
ऊंची जगह पर उसका तख्त नियत हुआ । तख्त के मास
पास फिरिश्तों (देवताओं) का जमघटा बना, जैसा कि उस
समय राजाओं की सभा में था । वह इन फिरिश्तों को अपने
राज्य में दौरा करने के लिये भेजता, और वे उसे सारी
खबरें पहुंचादेते । कभी २ वह आप भी दौरे पर निकलता और
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. वेदोपदेश बहुत खुछ चढ़ावे और पुजावे ले लिबाकर फिर घर आ बैठता इत्यादि जो कुछ वर्णन है, वह एक ऐसे परमेश्वर का है, जो इस सृष्टि के अन्दर एक शक्ति के तौर पर नहीं, किन्तु अलग वैठ कर इस पर हकूमत कर रहा है । आजकल के विद्वानों ने ऐसे ईश्वर का नाम पनलगाड (Personal God) रक्खा है और आजकल की नदीचही विद्या ने इसके मानने से इन्कार करदिया है। वेद में ये तीनों बातें निराले तौर पर हैं । परमात्मा के साथ उसकी प्रकृति या माया है । वह इस प्रकृति से सारी रचना रचता है । वह कहीं अलग बैठा हुआ नहीं, इस सारी दुनिया के अन्दर रम रहा है। प्रकृति उसका शरीर है और वह इसका अन्तरा- स्मा है । जैसे मकड़ी अपने शरीर से जाला निकालती है । वह प्रकृति से जगत को निकालता है । वह प्रकृति को हुक्म नहीं दे देता, कि तू झट पट सब कुछ, वन जा, किन्तु ईश्वरीय नियमों द्वारा उसमें क्रमशः परिवर्तन करता है । और यह परिवर्तन न मालुम कितनी बड़ी देर तक रहा, पर होते होते क्रम से एक बड़ा गोला वना, उस गोले में से क्रमशः सूर्य पृथिवी आदि उत्पन्न हुए । ये उस गोले में से निकले हुए मूर्य आदि आकाश में पक्षियों की तरह उड़ते फिरते हैं, इसलिये उस गोले को अण्ड कहते हैं (देखो मनुश९) वही ब्रह्म जो इस प्रकृति का अन्तरात्मा वन कर उस प्रकृति का नियन्ता था। वही अव इस बड़े गोले का अन्तरात्मा है और इसका नियन्ता है । अब यह उसका शरीर है और वह अन्तरात्मा है, इस शरीर में वह हिरण्यगर्भ परमेष्ठी ब्रह्मा मूत्रात्मा औरमाणकहलाता है। यदि मनुष्य के दृष्टान्तसेइसको वर्णन करें,तो यह कहेंगे,कि यह उसने नया शरीर धारण किया है -- .

. हिरण्यगर्भसूक्त अर्थात् जन्म लिया है । और जैसे मनुष्य शब्द केवल शरीर के लिये, केवल आत्मा के लिये, और दोनों के लिये भी आता है। अर्थात् जब हम कहते हैं मनुष्य मरने वाला है, तो हमारा तात्पर्य शरीर से है, और जव कहते हैं मनुष्य धर्म को पहचानता है, तो हमारा तात्पर्य आत्मा से है,और जव कहते हैं, कि मनुष्य देखकर चलता है, तो दोनों से तात्पर्य है, देखना आत्मा का धर्म है और चलना शरीर का है, इसी रीति पर हिरण्यगर्भ शन्द भी तीनों के लिये प्रयुक्त होता है । ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त १२१ । हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं चामु- तेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम* ॥ १ ॥ श-(हिरण्यगर्भः) हिरण्यगर्भ (सम् । अवर्तत)प्रकट हुआ (अग्रे) पहले (भूतस्य ) जो कुछ है उसका (जातः) प्रकट हुआ (पतिः) मालिक ( एकः) एक (आसीत् ) था (स.) उसने (दाधार) धारण किया (पृथिवीं) पृथिवी को (घ) धौ (उत ) और (इमां) इस (कस्मै ) किस (देवाय) देवकी, (हविषा) हवि से (विधेम) हमें पूजा करनी चाहिये । हमें किस देवता की हवि के साथ पूजा करनी चाहिये ? 2 ऋचा १ = वाजसनेयी संहिता १३ १४, २३ । १, २५।१० तैत्तिरीय संहिता ४।१।८।३, ४।२।८।२, अथर्ववेद ४।२७॥ इस शैली का वाक्य १० । १६८।४,८४८।१३ में भी है।

६६ वेदोपदेश (उसकी जो) हिरण्यगर्भ पहले प्रकट हुआ, जो प्रकट होतेही उस सवका जो कुछ कि है, एक पति था, उसने छौ और पृथिवी को धारण किया ॥ य आत्मदा वलदा यस्य विश्व उपा- सते प्रशिषं यस्य देवाः । यस्य छाया ऽमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेमा श-(य:) जो (आत्मदाः) माण का देने वाला (बल ऽदाः) बल का देने वाला (यस्य ) जिसके (विश्ने ) सारे (उपsआसते ) सेवन करते हैं (मऽशिप) प्रशासन (ज़बरदस्त हुक्म) को (यस्य ) जिसके (देवाः) देवता ( यस्य) जिसकी (छाया) छाया.(अमृत) अमृत ( यस्य) जिसका (मृत्युः)मृत्यु (कस्मै ....) अ-हमें किस देव की हवि के साथ पूजा करनी चाहिये? जो माण का देने वाला और वल का देने वाला है, सारे जिस के शासन को मानते हैं । देवता (भी) जिम के शासन को मानते हैं। जिसकी छाया अमृत है और मृत्यु जिसका है॥२॥ 'यस्य....देवाः' इसमें 'विश्व'को 'देवा' का विशेषण मान कर यह अर्थ भी कई टीकाकारों ने किया है, कि सारे देवता जिसके शासन को मानते हैं इस अर्थ में एक 'यस्य ' पद विना अर्थ के रह जाता है । मृत्यु जिसका है अर्थात् वह मृत्यु का मालिक है मृत्यु * ऋचा २ = वाज०सं० २५.१३; तै०सं० ४१२८१४, ७,५११७। १, अथर्व० ४२११, १३ ३ २४ देखो वृह उप०३12॥

- हिरण्यगर्भरक्त उसके भय से दौड़ता है । कठ० ६ । ३ । और जिस लिये मृत्यु उसकी आज्ञा में है, इसी लिये उसकी छाया अमृत है। अथवा जिसकी छाया अमृत है और जिस की छाया मृत्यु है। जैसे छाया मनुष्य के साथ रहती है, मनुष्य के आधीन है, इसी प्रकार मृत्यु और अमृत उसके अधीन हैं, सायण का इस मन्त्र की व्याख्या में यही आशय है और इस' आशयं" को उसने तै० सं० ४ । १ । ८ । ४ की व्याख्या में इस प्रकार स्पष्ट किया है “प्रजापतेः छायावत् स्वाधीनममृतं मोक्षरूपं मृत्युः प्राणिनां मरणमपि " अमृत अर्थाद । मोक्ष, छाया की न्याई प्रजापति के स्वाधीन है और इसी प्रकार मृत्यु अर्थात् प्राणियों का मरना भी" महीधर ने वाजसनेयि संहिता (२५ । १३) की व्याख्या में इस तरह लिखा है "जिस । की छाया= आश्रय अर्थात् जानकर उपासना करना अमृत है अर्थात् मुक्ति का कारण है और जिसका न जानना मृत्यु अर्थात संसार का हेतु है ॥ यः प्राणतो निमिषितो*महित्वैक इद्रा- जा जगतो बभूव । य ईशे अस्य विपदश्च तुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥३॥ * वाज० सं० २३ । ३ में महीधर ने 'निमेषती' पाठ मान कर उसको व्याख्या की है। पर यह पाठ अशुद्ध है 'निमिषतो' ही ठीक है। ऋचा ३ = वा० सं० २३ १३; २५ । ११; तै० सं० ४।१। ८।४७1 ५ । १६ । १ अथर्व० ४।२।२॥

६८. वेदोपदेश प-(यः) जो (माणतः) सांस लेते हुए (निमिपतः) आंख झपकते हुए (जगनः ) जगत का (महिऽत्वा) महिमा से 3 शक्ति से ( एकः) एक (इत् ) ही (राजा)मालिक (बभूव ) हो गया (यः) जो (ईशे ) ईशन करता है = हकूमत करता है (अस्य) इस (द्विपदः) दो पाओं वाले मनुष्य की (चतुष्पदः) च.पाओं वाले पशु की (कस्मै....) अ-हमें किस देवता की हवि के साथ पूजा करनी चा- हिये ? उसकी जो सांस लेते हुए और आंख झपकते हुए जगत् का अकेला ही अपनी शक्ति से मालिक होगया और जो इस समस्त मनुष्य और पशु पर हकूमत करता है ॥ ३ ॥ 'निमिपतः' निमिप-आंख झपकना और सोना इन दोनों अर्थों में आता है । यहां दोनों अर्थ वन सक्ते हैं, जोसांस लेते और आंख झपकते हुए जगत् का अर्थात् इस जीवित जाग्रत जगत् का अथवा जो सांस लेते हुए और सोते हुए जगद का अर्थात् जड़ और चेतन का । ऋग्वेद १०११९०१२ में "विश्व स्य मिषतो वशी" का अर्थ है, उस सवको वश में रखने वाला जो आँख झपकता है अर्थात् जीवित है । सायण ने (ऋर १०॥ १२१॥३; तै० सं० ४।१।८।४; में) और महीधर ने वाज०सं०२३। , ३ ॥ में निमिपिता का अर्थ 'आंख झपकते हुए' ही किया है । पीटरसनने 'सांस लेते हुए और सोए हुए जगत् का' यह अर्थ लिखकर नोट दिया है, कि पहिले विशेषण द्वारा जड़ से भेद किया है क्योंकि जड़ सांस नहीं रखते और दूसरे विशेषण से देवताओं से भेद किया है, जो सोते नहीं हैं। ‘सोए हुए' इस न 'महित्वा' यह वैदिक टतीया है, जैसा अगले मंत्र में भी है हिरण्यगर्भसूक्त से 'पृथिवी को द्यौ लोक से अलग किया गया है, जहां रहने वाले न ऊंघते हैं, न सोते हैं। पर मैक्समूलर का नोट पीट- रसन के इस विचार को काटता है- The later idea that the gods do not wink, has nothing to do with our passage. पिछला ख्याल कि देवता आंख नहीं झपकते, उसका इस वचन से कोई सम्बन्ध नहीं ॥ 'जगतः। विशेषण भी हो सकता है अर्थात जो सांस लेते हुए, साए हुए और चलते हुए का राजा हो गया। यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः । यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥४॥ * प–(यस्य) जिसकी (इमे ) ये (हिमवन्तः) बर्फ वाले (महिऽत्वा) महिमा से (यस्य) जिसका (समुद्रं ) समुद्र को (रसया । सह ) नदी के साथ (आहुः ) कहते हैं (यस्य) जिसके (इमाः) ये (प्रदिशः) प्रदेश (यस्य) जिसकी (वाह)दोनों भुजाएं। अ-हमें किस देवता की हवि के साथ पूजा करनी चा- हिये ? ये वर्षांनी पर्वत जिसकी शक्ति से हैं, मीठी नदी के साथ * ऋचा ४ = वाज०सं० २५ । १२; तै० सं० ४।०४ अथर्व. ४।२।५॥ + बर्फानी पहाड़ होने से हिमवान हिमालय का नाम है । पर यहां हिमालय अभिप्रेत नहीं, हर एक बर्फानी पहाड़ से अभि- प्राय है। 'हिमवन्तः' बहु वचन हे ॥

वेदोपदेश समुद्र को जिसका कहते हैं। जिसके ये प्रदेश हैं और दोनों भु- जाएं जिसकी हैं ॥४॥ दोनों भुजाएं जिसकी हैं, अर्थात् जोहमारी दोनों भुजाओं कामालिकहै। यह ऋचा एक धर्मात्मा शूरवीरके मुखमें बड़ी सुन्दर प्रतीत होती है, जो यह देखता है, कि ये बर्फानी पहाड़, समुद्र और नदियें उसकी गति को नहीं रोक सक्तीं, क्योंकि यह सब- जिसकी.महिमा से हैं वही इन दोनों भुजाओं का मालिक है, जिन के बल से वह इन सब को अधीन करता है । येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम*॥६॥ प-(येन) जिसने (द्यौः) द्यौ (उग्रा) उग्र ( पृथिवी) पृथिवी (च) और (दृढा) दृढ (येन) जिसने (स्वः) स्वर् (स्तभितं) थामा है (येन) जिसने (नाकः) नाक (यः) जो (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (रजसः) वायु का (विमानः) मापने वाला॥ अजिस ने उन धौ और पृथिवी को दृढ़ किया है, जिस ने स्वरको थामाहै, और जिसने नाक को थामा है जो अन्तरिक्ष में वायु का मापने वाला है ॥५॥ उग्र भयानक, तेजस्वी, जिसका तेज दूसरोंको मात करताहै। ** ऋचा ५ = वाज० सं० ३२ । ६; तै० सं० ४ । १।८।५; अथर्व० ४।२।४ ॥ ............

हिरण्यगर्भमूक्त स्वर, और नाक, इन दोनों लोकों का निर्धारण करना कठिन है । प्रायः ये दोनों घौ से ऊपर के लोक हैं; स्वर = स्वर्ग और नाक = अदित्य = सूर्य (सायण) स्वर- सूर्य और नाक -स्वर्ग (महीधर) यो अन्तरिक्षे रजसोविमानः = जो आकाशमें पानी (राष्टि) का बनाने वाला है (मायण, महीधर) यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यै- क्षेतां मनसा रेजमान। यत्राधि सूर उदितो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥६॥ प-(य) जिसको (क्रन्दसी) ची और पृथिवी (अवसा) रक्षा से (तस्तभाने ) हद ठहरे हुए (अभिऽऐक्षता) देखते हैं (मनसा) मन से (रेजमाने ) कांपते हुए (यत्र । अधि) जिसके अधीन (मूरः ) मूर्य (उत् । इतः) उदय हुआ (विऽभाति) चमकता है। अ-हमें किस देव की हवि के साथ पूजाकरनी चाहिये ? जिसकी रक्षा से दृढ़ थामे हुए द्यौ और पृथिवी मन में कांपते हुए जिसकी तरफ देखते हैं और जिसके अधीन सूर्य उदय होकर चमकता है। "उदितो विभाति" की जगह तै० सं०४ । १। ८ । ५; में "उदिता व्यति" पाठहै अर्थात उदय के विपयमें अनेक प्रकार से माप्त होता है। * ऋचा ६- वान. सं० ३२ । ७; तै० सं० ४।१।८।५; अथर्व ४ । २ । ३॥

७२ वेदोपदेश आपोह यद्बहतीविश्व मायन् गर्भ दधाना जनयन्ती रग्निम्। ततो देवानां स मवर्ततासुरेकाकस्मै देवाय हविषा विधेम.७ प-(आपः) जल = सूक्ष्म दृष्टि (यद )जव (बृहतीः) बड़े (विश्व) सारे पर (आयन्) पहुंचे (गर्भ) गर्भ को (दधानाः) धारण करते हुए (जनयन्तीः) उत्पन्न करते हुए (अग्नि) अग्नि- प्रकाश और गर्मी को (ततः) तब (देवानां) सारे देवताओं का (सं । अवर्तत) प्रकट हुआ (असुः) माण (एका) एक (कस्मै....) अ-हमें किसदेव की हवि के साथ पूजा करनी चाहिये? जब बड़े जल गर्भ को धारण करते हुए और अग्नि को उत्पन्न करते हुए सारे छागए, तव (उनसे) वह प्रकट हुआ,जो सारे देव- ताओं का एक प्राण है ॥ ७ ॥ अर्थात् यह सब कुछ जो अब यहां है अभी प्रकट नहीं हुआ था, किन्तु अभी सूक्ष्म सृष्टि के गर्भ में था, वह सूक्ष्म सृष्टि जव सारे छा गई और उसकी लगातार क्रिया से उसमें से अग्नि प्रकट हुआ । उससे पीछे वह आत्मा (हिरण्यगर्भ) प्रकट हुआ जो सारे देवताओं का एक मात्र जीवन है ॥ ऋचा ७-वाज०सं० २७ । २५; ३२१७; ते० सं० २।२।१२।१; ४२५ ते पा० ११२३८ अथर्व ४२१६ ॥ +देखो शतपथ ११।१।६।१॥ * गर्भ से हिरण्यगर्भ अर्थ भी यहां संगत है। मैत्रायणी संहिता में 'एक: पद नहीं है।

७ हिरण्यगर्भसूक्त यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद् दक्षं द- धाना जनयन्तीर्यज्ञम् । यो देवेष्वधि देव एक आसीत कस्मै देवाय हविषा विधेम प-(यः) जो (चित् न) भी= और (आपः) जलों को * = सूक्ष्म सृष्टि को (महिना)शक्ति से (परि। अपश्यत्) ऊपर से देख रहा था (दक्ष) वल को फुरती को (दधनाः) धारण करते हुए (जनयन्तीः) उत्पन्न करते हुए ( यज्ञ) यज्ञ को (यः) जो (देवेषु । अधि) देवताओं के ऊपर (देवः) देव (एकः) एक (आसीत् ) था (कस्मै....) अ—हमें किस देव की हवि के साथ पूजा करनीचाहिये? जो अपनी महिमा से जलों के ऊपर देख रहा था, जबकि वे वल को धारण करते हुए यज्ञ को उत्पन्न कर रहे थे । और जो सारे देवताओं के ऊपर एक देव है ॥ ८॥ वल को धारण करते हुए यज्ञ को उत्पन्न कर रहे थे जब यह -सूक्ष्य सृष्टि पूरे ज़ोर में एक नई रचना में प्रवृत्त थी। * ऋचा ८=वाग०सं०२१२६, ३२१०, ते.सं.० ४ । १।८।६ अथर्व में यह चा नहीं है। । 'चित, ऋग्वेद में यह पद बहुत बार आया है, यह प्रायः : 'भी' के अर्थ में आता है। यहां भी हमने वही प्रसिद्ध अर्थ लिया है। पर यहां 'चित्, का अर्थ चेतन भी बड़ा संगत प्रतीत होता है, क्योंकि देखना चेतन का धर्म है। सच्चिदानंद में चिंत् पद चेतन के अर्थ में प्रसिद्ध है। चित्, धातु भी इसी अर्थ में ऋग्वेद में बहुंधा प्रयुक्त है, तथापि यह पद ऋग्वेद में और कहीं इस अर्थ में आया है, यह अन्वेषणीय है। - ७४ वेदोपदेश मानो हिंसीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिवं सत्यधर्मा जजान ।यश्चापश्चन्द्रा बृहतीर्जजान कस्मैदेवाय हविषा विधेम ॥९ प-(मा) मत (नः) हमें (हिंसीत ) क्लेश दे (जनिता) उत्पन्न करने वाला ( यः) जो (पृथिव्याः) पृथिवी का (यः) जो (वा) या= और (दिवं) द्यौ को (सत्यऽधर्मा) सच्चे धर्मों वाला = अटेल नियमों वाला (जजान) उत्पन्न करता हुआ (य:) जो (च) और (आपः) जल (चन्द्राः) चमकते हुए (बृहत्ती) बड़े (जजान) उत्पन्न करता हुआ (कस्मै....) अ-हमें किस देवकी हवि के साथ पूजा करनी चाहिये जो पृथिवी का उत्पन्न करनेवाला है और जिस अटल नियमों वाले ने धौ को उत्पन्न किया है और जिसने चमकते हुए बड़े जलों ( अग्नि को उत्पन्न करती हुई सूक्ष्म सृष्टि) को उत्पन्न किया है, वह हमें कभी क्लेश न दे ॥ ९ ॥ प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जा- तानि परितावभूव। यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ १० ॥ प-(प्रजापते) हे प्रजा के मालिक (न) नहीं (त्वत् ) * ऋचा ८ वाज०सं० १२ । १०२ ते०सं०४.२।७'१ ॥ आपचन्द्राः = मनुष्य (शतपथ ७।३।१।२०) ऋचा १० वाज०सं० १०॥२०; २३१६५; ते०सं० १८१४॥ २; १२:५६ ब्रा० २।८।१।२, ३।५ ७१ अथर्व ७७६18; १८०३.

हिरण्यगर्भसूक्त तुझ से (एतानि) इन को (अन्यः) भिन्न (विश्वा) सारे (जा. तानि) उत्पन्न हुई वस्तुओं को (ता) उनको (परि । बभूव ) घेरे हुए है ( यत्ऽकामाः) जिस कामना वाले (ते) तेरें लिये (जुहुमः) हम होम करते हैं (तत्.) वह (नः) हमारा (अस्तु) हो (वयं) हम (स्याम) होवें (पतयः) मालिक ( रयीणां) धनों के खज़ानों के॥ अ-हे प्रजापते ! तेरे विना और कोई इन उत्पन्न हुई सारी वस्तुओं को घेरे हुए नहीं है (इन पर हकूमत नहीं कर रहा है ) हम जिस फल की कामना से तेरे लिये होम करते हैं, वह हमारा हो । और हम खज़ानों के मालिक वनें ॥ १० ॥ यह दूसरी अवस्था का वर्णन समाप्त हुआ । अब इस से आगे तीसरी• अवस्था का वर्णन करते हैं। यह दूसरी अवस्था धीरे २ वदल कर इस तीसरी अवस्था में पहुंची, जैसी कि अव यह भिन्नर रचना दीखती है। इस अवस्था में हम देखते हैं, कि परमात्मा इस सारे सौर जगत का अन्तरात्मा होकर इस में काम कर रहा है, और यह जगव उसका शरीर है । इस सारे प्रश्नांड को चलाने वाला और नियम में रखने वाला केवल एक पर- मात्मा है, जो आत्मा की जगह इस में काम करता है । अत एव वह उस से इस प्रकार अलगहै, जिस प्रकार शरीर से जीवात्मा हां जिस प्रकार मनुष्य का वर्णन करते हुए किसी जगह केवल जीवात्मा का वर्णन होता है और किसी जगह शरीर और किसी जगह दोनों का। इसी प्रकार इस सूक्त में किसी जगह तो पर- मात्मा का अलग वर्णन है, किसी जगह उसके शरीर अर्थात् प्रमाण्ड का है और किसी जगह इन दोनों का ॥

७६ वेदोपदेश ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ९०* ॥ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । सभूमि विश्वतोस्त्वात्यतिष्ठद् दशांगुलम्॥ प–(सहस्रऽशीर्पा) हज़ारों सिरों वाला (पुरुपः) पुरुप (सहस्रऽअक्षः) इजारों आंखों वाला (सहस्रपात) हज़ारों पाओं वाला (स.) वह (भूमि ") त्रिलोकी ब्रह्माण्ड को (विश्वतः) सब ओर से (त्या) घेर कर (अति । अतिष्ठव ) वढ़कर ठहरा (दशऽअंगुलं) दस अंगुल ॥ अ-वह पुरुष असंख्यात सिरों असंख्यात आंखों और असंख्यात पाओं वाला है, वह इस ब्रह्माण्ड को चारों ओर से घेरकर आप फिर भी दस अंगुल उस से परे है ॥ १ ॥ ब्रह्म इस सारे ब्रह्माण्ड में व्यापक है, यह ब्रह्माण्ड उसको शरीर है । और इस ब्रह्माण्ड के अवयव उस के शरीर के अव- यव हैं । जैसे द्यौ सिर है सूर्य आंख है और पृधिची पाओं है जैसा आगे (१३ । १४ मन्त्र में ) कहेंगे। और इसी लिये इसको पुरुष कहते हैं । उस ब्रह्मकी दृष्टि में असंख्यात छौ और असं- * यह सूक्त अथर्व १८६ मेंहै। पर मन्त्रीका काम इससे भिन्न है, और यहां का १६वां मन्त्र यद्यपि अथर्व में अन्यत्र पाया जाता है, पर पुरुष सूक्त में इस की जगह एक और मन्त्र है, वानसनेयि संहिता के ३१ वें अध्याय के २२ मन्त्रों में पहले १६ मंत्र ये हैं। + ऋग्वेद में पृथिवी और उसके पर्याय-वाचक शब्द मूमि अन्तरिक्ष ओर द्यौ इन तीनों लोगों के लिये पाते हैं (देखो ऋग् ११८८-१०; १.१०।८॥

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पुरुपसूक्त
ख्यात पृथिवियां है, इसीलिये कहा है, हज़ारों सिर और हज़ारों
पाओं वाला है, यहां सहस्र शब्द असंख्यात के अभिप्राय में है।
दस अंगुल वहकर ठहरा,इसका अभिप्राय यही है, कि वह
इस ब्रह्माण्डको घेरकर भी इस से परे है । जैसे यह एक शैली है,
कि वह इससे वालिश्त भर वढ़कर है। इसी प्रकार यह शैली है
कि वह दशांगुल परे है । अंगुलियों से मापा जाता है और अं-
गुलियां दसहैं । इसलिये दशांगुल बढ़करहै, यह इस अभिप्राय में
वोला जाता है, कि वह वस्तु उस माप से बढ़कर है। दशांगुल
शब्द ऋग्वेद में एक ही वार आया है। कई एक टीकाकारों
ने दशांगुल को हृदय मानकर यह अर्थ किया है, कि वह इस
ब्रह्माण्ड को व्याप कर हृदय में ठहरा है अर्थात् यद्यपि वह सारे
परिपूर्ण है, पर उसका दर्शन हृदय में होता है, जैसे सूर्य का
मतिदम्य तो सब जगह पड़ताहै, पर दिखलाई पानी में ही देताहै।
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उताकृतत्त्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।२
प-(पुरुषः) पुरुप (एव) ही (इदं) यह (सबै) सारा
(यव) जो (भूत) हुआ (यत् ) जो (च) और (भव्यं ) होगा
(उत) भी ( अमृतऽत्वस्य) अमृतत्व = मोक्ष का (ईशानः) हकू-
मत करने वाला = मालिक (यत्) जो ( अन्नेन) अन्न से (अतिs
रोहति ) बढ़ता है ॥
अ-पुरुप ही यह सब कुछ है. जो हुआ है और जो होगा
(और वही) अमृतत्व का भी मालिक है (और उसका भी
मालिक है) जो अन्नं से बढ़ता है ॥ २ ॥

वेदोपदेश ब्रह्माण्डरूपी शरीर से उसको शरीरी ठहराया है, इसीलिये कहा है, जो हुआ और होगा, वह पुरुप ही है ॥ जो अन्न से बढ़ता है = संसार में भोग भोग रहा है । मुक्ति का मालिक भी पुरुष है और संसार का मालिक भी पुरुप है। मुक्तात्मा इसके ईशन में मृत्यु से पार होता है और संसारी जीव इसके शासन में सां- सारिक भोग भोगते हैं। एतावानस्यमहिमाऽतोज्यायाँश्च पूरुषः। पादोस्यविश्वाभूतानित्रिपादस्यामृतंदिवि३ प-(एतावान ) इतनी ( अस्य ) इसकी (महिमा) महिमा (अतः) इससे (ज्यायान् ) वढ़कर (च) और (पूरुपः) पुरुप (पादः) पाओं (अस्य) इसका (विश्वा) सारे (भूतानि) भूत उत्पत्ति वाली वस्तु (निपाव) तीन पाओं (अस्य) इसका (अमृतं) अमृत (दिवि ) द्यौ में प्रकाश में । अ-यह सव उसकी महिमा है और वह पुरुष इससे बड़ा है । यह सारे भूत उसका एक पाद हैं और उसके तीन अविनाशि पाद अपने प्रकाश में है ॥ ३ ॥ अभिप्राय यह है, कि इस ब्रह्मांड को देखकर मनुष्य उसके महत्त्व को बहुत कुछ समझ सक्ता है, परन्तु परमेश्वर के स्वरूप का यह ज्ञान बहुत थोड़ा है, क्योंकि उस का स्वरूप इस से बहुत बढ़कर है॥ ब्रह्म का कोई परिमाण नहीं है, इसलिये 'ये सारे भूत उस के एक चौथे पाद में है, इसका अभिप्राय यही है, कि यह जगद ब्रह्म के स्वरूप की अपेक्षा बहुत थोड़ा है । इसी अभिप्राय से पुरुषसूक्त अथर्व १०८७, १३ में कहा है " अर्धेन विश्व भुवनं जजान आधे से उसने सारे भुवन को उत्पन्न किया है ॥ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोस्येहाभवत्पुनः। ततोविष्वङ व्यकामत्साशनानशनेअभिाया प-(त्रिपात ) तीन पाद वाला (ऊर्ध्वः) ऊपर (उत् । ऐत) उदय हुआ (पुरुषः) पुरुष (पादः) पाद (अस्य) इसका (इह) यहां (अभवत् ) विद्यमान हुआ (पुनः )फिर (ततः) तव (विष्वङ्) सव ओर (वि । अक्रामत् ) व्याप्त हुआ (साशनs अनशने ) खाने वाले और न खाने वाले के ( आभि ) ऊपर ।। तीन पाद वाला वह पुरुष ऊपर उदय हुआ = (ब्रह्मांड से ऊपर रहा)और इसका एक पाद फिर यहां आविद्यमान हुआ* तब वह सब ओर सारे जड़ चेतन पर व्याप गया ॥ ४ ॥ तस्मा हिराडजायत विराजो अधि पूरुषः । सजातोअत्यरिच्यतपश्चाद्भूमिमथोपुरः५ प-(तस्मात् ) उससे (विराट् ) विराट-समष्टि ब्रह्मांड (अजायत) उत्पन्न हुआ (विराजः) विराट् से (अधि) ऊपर (पूरुपः) पुरुप (सः) वह ( जातः) प्रकट हुआ (अति । आरे- च्यत) बढ़कर रहा= फैल गया ( पश्चात ) पीछे (भूमि)ब्रह्माण्ड के ( अथो) और (पुरः) आगे ॥ अ-उस से विराट् (समष्टि ब्रह्माण्ड )उत्पन्न हुआ। विराट् मैं जगत् को एक अंश से थाम कर स्थित हूं (गीता १०। ४२) * इस सारे वेदोपदेश से वह पुरुप प्रकट हुआ और प्रकट होते ही ब्रह्माण्ड के वार पार फैल गया ॥५॥ अभिप्राय यह है, कि यह विराट् उस ब्रह्म से उत्पन्न हुआ है । और यह उस ब्रह्म को प्रकाशित (प्रकट) करता है ।। यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञ मतन्वत । वसन्तोअस्यासीदाज्यंग्रीष्मइध्मःशरडविः प–(यद ) जब (पुरुपेण ) पुरुप से = विराट से (ह- विपा) हवि से (देवाः) देवताओं ने ( यज्ञ) यज्ञ (अतन्यत) फैलाया (वसन्तः) वसन्त (अस्य) इसका (आसीत् ) था (आज्य) घी (ग्रीष्मः ) ग्रीष्म = जेट, आसाढ़ (इध्मः) इन्धन (शरत् ) शरत् ऋतु = असूज, कातिक ( हविः) हवि= पुरोड़ाश ।। अ-जब इस पुरुप रूप हवि से देवताओं ने यज्ञ फैलाया तब वसन्त इस ( यज्ञ) का घी शरत् हवि और ग्रीष्म इन्धन था॥ उत्तम प्रजा का होना यज्ञ का फल है । इसी हेतु वेद में सृष्टि की उत्पत्ति के लिये सूर्यादि देवताओं ने यज्ञ रचा,उस यज्ञ में वसन्त घी था क्योंकि वसन्त में नया रस प्रकट होता है और शरत् में नया अन्न उत्पन्न होता है इसलिये शरतको हवि कहाहै तं यज्ञं बर्हिषि प्रौतन पुरुषंजातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्चये ॥७॥ प--(तं). उस (य) यज्ञ को (वर्हिषि )आकाश में (प्रौक्षन् ) प्रोक्षण करते हुए = छिड़कते हुए (पुरुष) पुरुष को (जातं) उत्पन्न हुए ( अग्रतः) पहले (तेन ) उस से (देवाः) ८१ पुरुपमूक्त देवताओं ने (अयजन्त) यज्ञ किया (साध्याः) साध्यों ने (ऋ- पयः) ऋपियों ने (च) और (ये) जो॥ पहिले उत्पन्न हुए यज्ञ (के साधन ) उस पुरुप (विराट्) को आकाशमें प्रोक्षण किया और उस से साध्य देवताओं और ऋपियों ने यज्ञ किया ॥७॥ सृष्टि के उत्पन्न करनेवालों में देव और ऋपियों का नाम अन्यत्र भी पाया जाता है। ये कोई प्राकृत शक्तियां हैं, इन के निर्धारण करने के लिये अभीऔर अन्वेपण करने की आवश्यकताहै वर्हिम्' कुशा का नाम है और आकाश का नाम भी है। कुशा यज्ञिय द्रव्यों में है, विशेप करके प्रोक्षण में इसका उप- योग है । यहां स्वाभाविक यज्ञ का वर्णन है, जिसका वसन्त आज्य, शरत् हवि और ग्रीष्म इन्धन है । उस यज्ञ का मोक्षण अन्तरिक्ष में दृष्टि द्वारा बन सकता है । और अथर्ववेद के पाठ से भी यही आशय प्रतीत होता है, वहां यह पाठ है "तं यज्ञ प्रारपा प्रौक्षन्" "उस यज्ञ को वरसात से प्रोक्षण किया" इस लिये हमने यहां वहिस् शब्द का अर्थ आकाश लिया है अर्थात् पृथिवी आदि की उत्पत्ति के पीछे जय पृथिवी पर वसन्त, ग्रीष्म, शरद और वर्षा ऋतुएं अपने २ समय पर प्रवृत्त होने लगी और अपने २ समय की ओपधि और वनस्पतियां विराट देह से उत्पन्न हुई, और यह उत्पत्तियज्ञ लगातार रहा, तब इस . से फिर पशु आदि की सृष्टि हुई । तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संसृतंटषदाज्यम् । पस्ताँश्चकेवायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्चये .

८२ वेदोपदेश प- (तस्मात् ) उम ( यज्ञात् ) यज्ञ से (सर्वऽहुतः ) जिस में सब ने होम किया (सम्ऽभृतं ) इकट्ठा किया गया (पृपदऽ आज्यं ) दही और घी ( पशून् ) पशुओं को। (तान् ) उन (चक्रे ) उत्पन्न किया (वायव्यान ) जो वायु के आश्रय हैं - पंछी (आरण्यान् ) जंगली । ग्राम्यान् = ग्राम के अर्थात् पालतू (च) और (ये) जो अ-उस यज्ञ से जिसमें सबने हवन किया दही और घी इकट्ठा किया गया और (उस से उन्हों ने) उन पशुओं को उत्पन्न किया जो जंगली हैं और घरालू हैं और हया के पंछियों को॥८॥ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसिजज्ञिरेतस्माद्यजुस्तस्मादजायत।९ प-(तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः) उस सर्वहुत् यज्ञ से (ऋचः) ऋचाएं (सामानि) साम (जज्ञिरे) उत्पन्न हुए । (छन्दांसि) छन्द । जज्ञिरे) उत्पन्न हुए । (तस्मात् ) उस से (तस्मात् ) उस से ( यजुः) यजु (अजायत) उत्पन्न हुआ। अ-उस. यज्ञ से जिसमें सबने हवन किया ऋचाएं और साम उत्पन्न हुए उस से छन्द उत्पन्न हुए उस से यजु उत्पन्न हुआ ॥२॥ ऋचा यजु और साम ये तीनों मन्त्रों के भेद हैं । जो मन्त्र पद्यमय हैं वे ऋचा, जो गद्यमय हैं वे यजु और जो गाये जाते हैं वे साम कहलाते हैं। यहां ऋचा से ऋग्वेद और साम से सामवेद अभिमेत नहीं किन्तु उक्त प्रकार के मन्त्र ही अभिप्रेत हैं इसी लिये 'ऋचःसामानि' बहुवचन हैं। चारों वेदों में ये तीनों ही प्रकार के मन्त्र हैं । अथर्ववेद के मन्त्र भी इन्हीं तीन प्रकार के मन्त्रों ।

पुरुषमूक्त
८३
में से हैं । इस पर अधिक विचार वेदोत्पत्तिविषय में लिखेंगे।
तस्मादश्वा अजायन्त येके चोभयादतः ।
गावो हजज्ञिरेतस्मात्तस्माज्जाताअजावयः।
प-(तस्मात् ) उस से ( अश्वाः) घोड़े (अजायन्त)
उत्पन्न हुए । (ये) जो ( के । च) कोई । (उभयादतः ) दोनों
और दान्तों वाले (गावः) गौएं । ( जज्ञिरे) उत्पन्न हुई (तस्मात् )
उस से (तस्मात् ) उस से (जाता ) उत्पन्न हुई (अजाऽअवयः)
वकरी भेड़
अ-उस से घोड़े और दोनों ओर के दांतों वाले उत्पन्न
हुए । उससे गौएं उत्पन्न हुई और उस से भेड़ बकरिये उत्पन्न हुई।१०।
इन मन्त्रों में उत्पत्तिक्रम वर्णन करने का अभिप्राय नहीं
किन्तु स्वाभाविक यज्ञ के द्वारा पहले उन पदार्थों की उत्पत्ति
का वर्णन है जो यज्ञ के लिये आवश्यक हैं और फिर मनुष्य के
उपयोगी वस्तुओं का वर्णन है ॥
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किमस्यको वाहूकाऊरूपादा उच्यते११
प-(यत् ) जव (पुरुष) पुरुष%3विराद पुरुष को (वि।
अदधुः) उन्होंने विभक्त किया (कतिधा) कितने प्रकार से
(वि । अकल्पयन् ) उन्होंने कल्पना किया (मुखं ) मुख (किं);
कौन (अस्य) इसका (को) कौन (वाहू ) दोनों भुजाएं (कौ) कौन
(ऊरू) दोनों राने (पादौ ) दोनों पाओं (उच्यते ) कहलाते हैं।
अ-जब विराट् पुरुप को विभक्त किया गया, तो कितने
.

वदोपदेश प्रकार से उसकी कल्पना की गई ? कौन इसका मुख था कौन भुजाएं कौन राने और कौन पाओं कहलाते हैं ॥ ११ ॥ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीवाहू राजन्यः कृतः। ऊरूतदस्ययदैश्यःपक्ष्यांशूद्रोअजायत। १२ प-(ब्राह्मणः) ब्राह्मण (अस्य ) इसका (मुख) मुख. ( आसीत् ) था (वाहू) दोनों भुजाएं (राजन्यः) क्षत्रिय (कृतः) बनाया गया (जर) दोनों राने (तव ) वह वस्तु ( यत् ) जो वस्तु (वैश्यः ) वैश्य (पतऽभ्यां) पाओं से (शूद्रः) शूद्र (अजा- यत) उत्पन्न हुआ ॥ अब्राह्मण इसका मुख था, भुजाएं क्षत्रिय, राने वैश्य और शूद्र पाओं से उत्पन्न हुआ ॥ १२ ॥ सारे ज्ञानेन्द्रिय सिर में है और मस्तिष्क (दिमाग) ही सारे शरीर का नेता है और धर्म और विद्या सिखलाना जो बाणी का धर्म है वह वाणी भी मुख में हैं । इसलिये ब्राह्मण को मुख कहा है, ज्ञान और धर्म के लाभ करने में तत्पर रहना और दूसरों को विद्या और धर्म सिखलाना यह उसका अधि- कार है । क्षत्रिय भुजाएं हैं । रक्षा करना और हकूमत करना यह उनका अधिकार है। वैश्य रानें हैं । वाणिज्य और खेती कर के देश की दौलत को बढ़ाना यह उनका अधिकार है, पाओं से शूद्र हैं, ऊपरले तीनों वर्गों को अपने २ कामों में सेवन करना उनका धर्म है ॥ चन्द्रमा मनसोजातश्चक्षोः सूर्योअजायत । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायता१३ - पुरुषसूक्त प-(चन्द्रमाः) चन्द्रमा (मनसः) मन से (जातः) उत्पन्न हुआ (चक्षोः ) नेत्र से (सूर्यः ) सूर्य (अजायत) उत्पन्न हुआ (मुखात् ) मुख से (इन्द्रः) इन्द्र (च) और (अग्निः) आग (च) और (माणात ) श्वास से (वायुः) वायु (अजायत) उत्पन्न हुआ अ -मन से चन्द्र उत्पन्न हुआ, नेत्र से सूर्य उत्पन्न हुआ मुख से इन्द्र(विजली)और अग्नि और श्वास से वायु उत्पन्न हुआ।१३ नाम्याआसीदन्तरिक्षंशीष्र्णोद्यौः समवर्तत पढ्यांभूमिर्दिशश्रोत्रात्तथालोकाँअकल्पयन् प-(नाभ्याः) नाभि से (आसीत् ) हुआ (अन्तरिक्ष ) अन्तरिक्ष (शीर्णः) सिर से ( द्यौः) द्यौ (समवर्तत) उत्पन्न हुआ (पदऽभ्यां ) पाओं से (भूमिः) पृथिवी(दिशः)दिशाएं (श्रोत्राव) •. कान से (तथा) इस प्रकार (लोकान्)लोकों को (अकल्पयन्) उन्होंने कल्पना किया। अउसकी नाभि से अन्तरिक्ष हुआ सिर से द्यौ उत्पन्न हुआ, पाओं से भूमि और श्रोत्र से दिशाएं, इस प्रकार लोकों को कल्पना किया ॥१४॥ पहले जिस प्रकार मनुष्यों के विभाग में विराट् के अंगों की कल्पना की गई है, इसी प्रकार लोकों के विभाग में भी उस के अंगों की कल्पना की गई है, कि पृथिवी पाओं, अन्तरिक्ष नाभि और यौ सिर है । इसी प्रकार सूर्य आदि देवता उसके अंग हैं । यह विराट् का वर्णन है। इस प्रकार तीनों अवस्थाओं में स्थूल सूक्ष्म और प्रकृति का नियन्ता परमात्मा को दिखलाया है। और उसके दर्शन का क्रम यह है, कि जिज्ञासु पहले स्थूलमें फिर सूक्ष्म में और फिर प्रकृति में उसके दर्शन करता है । संहिता में " .

वेदोपदेश इसी क्रम से ये सूक्त आए हैं । ऊपर के सूक्तों में हम प्रत्येक स्थल में परमात्मा को इस सारी सृष्टि का स्रष्टा पाते हैं, और हम देखते हैं, कि उसे इस विचित्र रचना के लिये किसी साधन और किसी सहायक की अपेक्षा नहीं । वह हमारा पिता है और उसने इस ब्रह्माण्ड को हमारे लिये घर बनाया है, जैसा कि पिता पुत्र के लिये बनाता है । पर उस ने राजकी नाई बैठने की अलग जगह नहीं ढूंढी, और न ही किसी दूरके जंगलसे लकड़ी मंगवाई है किन्तु जिस दीवार को उठाया, उसके अन्दर बैठकर उठाया और जिस लकड़ी को छीलकर यह भुवन तय्यार किया, वह उसके साथ उसकी प्रकृति थी। उस एक के अन्दर ही सारी शक्तियां हैं, वह अकेला सब कुछ बनाता है, इसलिये उसको विश्वकर्मा कहा है । इसका वर्णन इस प्रकार है- ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ८१ । भुवनानि जव्हदृषिों- ता न्यसीदत्पितानः । स आशिषा द्रविण मिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ आविवेश ॥१॥ प--(यः) जो (इमा) इन (विश्वा) सारे ( भुवनानि) भुवनों को (जुव्हत् ) होम करता हुआ (ऋषिः । होता) ऋषि हवन करने वाला (नि । असीदव ) बैठा (पिता) पिता (नः) हमारा (सः ) वह (आशिषा ) इच्छा से (द्रविणं) धन को (इच्छमानः) चाहता हुआ (प्रथमऽच्छत् ) पहला ढांपने वाला ( अवरान् ) छोटों में (आ। विवेश) प्रविष्ट हुआ ॥ अं-जो हमारा पिता इन सारे भुवनों को होम करता हुआ य इमा विश्वा पुरुपमूक्त . होम करने वाला ऋपि (बन कर बैठा)। वह इच्छासे धन(ब्रह्माण्ड) कोचाहता हुआ,वह पहला ढांपने वाला छोटों में प्रविष्टहुआ॥१॥ अभिप्राय यह है, कि वह प्रलय के समय होता वन कर इन सारे भुवनों को होम कर देता है । और इस यज्ञ में वह फल चाहता है कि यह धन(ब्रह्माण्ड)उसको फिर मिले। इस लिये वह फिर इन भृत भौतिक को उत्पन्न कर उसमें प्रविष्ट होताहै । यज्ञ का जो फल है उसको धन (खजाना) कहा है (देखो १० । ४५ । ११, १० । ४६ । २) इसलिये यहां भी विश्वकर्मा के यज्ञ का फल यह ब्रह्माण्डरूप धन है, जिस धन का वह प्रलय के पीछे फिर मालिक बना। यहां पहले भुवन का मलय और मलय के पीछे फिर उत्पत्ति कहने से यह सिद्ध किया है,कि यह प्रवाह से अनादि है। प्रथमच्छद ऋग्वेद में और कहीं नहीं आया। इस चाल का शब्द 'कविछद.३ । १२ । ३ में इन्द्राग्नि का विशेषण है । किंस्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतम- स्वित् कथासीत्। यतो भूमिं जनयन् विश्व- कर्मा विद्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षाः॥२॥ प-(किम् । स्वित् ) क्या (आसीत् ) था( अधिऽस्थान) ठहरने की जगह (आरम्भणं) सहारा (कतमव । स्वित्) कौन सा (कथा) किस प्रकार ( आसीत् ) था (यतः )जिस से (भूमि । पृथिवी को (जनयन् ) उत्पन्न करता हुआ (विश्वऽकर्माः) विश्वं कर्मा ने (यां) द्यौ को(वि। और्णोतु ) खोला( महिना)शक्ति मे (विश्वऽचक्षाः) सत्र के देखने वाले ॥ अ-अधिष्ठान क्या था ( अर्थात् कोई नहीं - ) कौन .

. वेदोपदेश सा सहारा था और किस प्रकार था, जिस से, सनके देखने वाले विश्वकर्मा ने पृथिवी को उत्पन्न किया और धौ को खोला। २। विश्वतश्चक्षुरुतविश्वतोमुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ।सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैवाभूमी जनयन देव एकः॥३॥ प-(विश्वताऽचक्षुः) सब ओर आंखों वाला ( उत्त) और (विश्वतःऽमुखः) सब ओर मुख वाला (विश्वत:ऽवाहुः) सब ओर भुजाओं वाला (उत) और ( विश्वतः ऽपात्) सब ओर पाओं वाला (बाहुभ्यां ) दोनों भुजाओं से (सम् । धमात ) धौंकता है (पतत्रैः) पंखों से (द्यावाभूमी) द्यौ और पृथिवी को (जनयन् ) उत्पन्न करता हुआ (देवः) देव (एक:) एक ॥ अ-सव और नेत्रों वाला और सब ओर मुख वाला सव ओर भुजाओं वाला और सव ओरपाओं वाला एक ही देव द्यौ और भूमि को उत्पन्न करता हुआ दोनों भुजाओं से पंखों से धौंकता है ॥२॥ जिस गोले में से द्यौ और पृथिवी निकले, वह गोला इन की उत्पत्ति के समय अत्यन्त प्रचण्ड होता है, मानों इस तरह विश्वकर्मा ने अपनी दोनों भुजाओं से धौंककर उस अग्नि को प्रचण्ड किया है । जैसे लोहार धौंकनी से धौंककर अग्नि को प्रचण्ड करता है लोहार जिस धौंकनी से धौंकता है, वह उसकी भुजाओं से अलग होती है। यहां भुजाओं से अलग धौंकनी नहीं, इसलिये भुजाओं को पंख ठहराया है। 'सम्+धम्' का अर्थ धौंक विश्वकर्म सूक्त ट९ कर अग्नि प्रचण्ड करना है । १० । ७२ । २ से यह विषय और सम्+धम्, का अर्थ स्फुट प्रतीत होताहै "ब्रह्मणस्पति रेता संकर्मा- र इवाधमत् । देवानां पू] युगेऽसतः सदजायत" "ब्रह्मणस्पति ने इनको लोहार की नाई धौंका, तब देवताओं के पुराने युग में अव्यक्त से व्यक्त उत्पन्न हुआ" । इसी प्रकार ४।२ । १७ में इसी अर्थ में 'धम् । धातु का प्रयोग है ॥ किं स्विडनं क उस वृक्ष आस-यतो द्यावा पृथिवीनिष्टतक्षुः । मनीषिणोमनसापच्छ- तेदु तद्यदध्यतिष्ठभुवनानि धारयन् ॥ ४॥ प-(किं । स्त्रिद ) कौन (वन) वन (कः) कौन (उ) और (सः) वह (वृक्षः) वृक्ष (आस )था (यतः )जिससे (धा- वाऽपृथिवी) द्यौ और पृथिवी को (निःऽततक्षुः) (उन्होंने) छील कर बनाया (मनीपिणः) हे सोचने वालो (मनसा) मन से (पृच्छत ) पूछो (इन् । उ) भी (तत्) वह (यव) जिसको (अधि । अतिष्ठत् ) उसने अधिष्ठान बनाया ठहरा (भुवनानि) भुवनों को (धारयन् ) आसानी से धारण करता हुआ ॥ अ-वह वन कौन था और वह वृक्ष कौन था जिस से (जगत् के रचने वाली शक्तियों ने) द्यौ और पृथिवी को छील कर बनाया। हे सोचने वालो! यह अपने मन से ही पूछो (मन में ढूंढो) और वह (वस्तु ) भी जिस पर वह ठहरा, जब कि उसने सारे भुवनों को आसानी से धारण किया ॥४॥ अभिमाय यह है कि न कोई उसका आधिष्ठान है और न * इस मन्त्र का पूर्वार्ध १० । ३१७ का भी पूर्वाध है ॥

वेदोपदेश कोई उससे परे वृक्ष है । अधिष्ठान वह सबका आप है और घा- चाथिवी को उस प्रकृति से बनाता है, जिस के आप अन्दर है । तै० प्रा० २१ ८९ में इस मन्त्र के उत्तर में कहाहै "ब्रह्म वन प्रस स वृक्ष आसीद" वन वन और ब्रह्म ही वह वृक्ष था इत्यादि। या ते धामानि परमाणि याऽवमा विश्व- कर्मन्नुतेमा । शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्व- धावः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः ॥५॥ प(या) जो (ते) तेरे (धामानि) धाम = स्थान(परमाणि) ऊंचे (या) जो ( अवमा ) निचले (विश्वकर्मन् ) हे विश्वकर्मन् (उत) और (इमा)ये (शिक्ष) सिखा (सखिऽभ्यः) मित्रों को (हविपि ) हपि में = यज्ञ में (स्वधावः) प्रकृति वाले प्रकृति के मालिक (स्वयं) आप (यजस्व ) यजनकर (तन्वं) शरीर को अपने आपको (वृधान:) वढ़ता हुआ ॥ अ-हे विश्वकर्मन् ! जो ये तेरे धाम (यज्ञ के योग्य स्थान) बड़े हैं और जो ये छोटहैं, हे प्रकृति के मालिक! यज्ञ में वे अपने मित्रों को (हमें ) सिखाओ और बढ़ते हुए (मसन्न होते हुए) आप अपना यजन करो॥५॥. तुम्हाराही यह यज्ञ है,तुम आप इसको पूर्ण करो,और आप हमें अपनी पूजा सिखाओ । यह आशय १०।७।६; ६।११।२ के देखने से और भी स्पष्ट होता है ।। विश्वकर्मन् हविषा वावृधानःस्वयं य- जस्व पृथिवीमुतद्याम् । मुह्यन्त्वन्ये अभि- विश्वकर्म सूक्त तो जनास इहास्माकं मघवासूरिरस्तु ॥६॥ प-(विश्वकर्मन्) हे विश्वकर्मन् (हविषा) हवि से (वाह- धानः) बहुत बढ़ता हुआ = बहुत प्रसन्न होता हुआ(स्वयं) आप(यज. स्व) यजन कर (पृथिवीं) पृथिवी को (उत) और (चां) चौ को (मुह्यन्तु) मोह को प्राप्त हों (अभितः )दोनों ओर (जनासः लोग ( इह.) यहां (अस्माकं) हमारा ( मघवा) धनवान (सरिः) बुद्धिमान (अस्तु) हो । अ-हे विश्वकर्मन् ! हवि से प्रसन्न होते हुए तुम स्वयं घौ और पृथिवी को यजन करो । दूसरे लोग ( यह न करने वाले) दोनों ओर से हैरान हों, उदार और बुद्धिमान् (विश्व- कर्मा) हमारा हो ॥ ६॥ चौ और पृथिवी को यजन करो, हमारे यज्ञ को चौ और पृथिवी के लिये बनाओ । अथवा द्यौ और पृथिवी की आहुति करके उस से पवित्र जीवन हमारे लिये प्रकट करो। वाचस्पति विश्वकर्माण मूतये मनोजुवं वाजे अद्या हुवेम। स नो विश्वानि हवनानि जोषविश्वशम्भू वसे साधुकर्मा ॥ ७ ॥ प-(वा चः । पति) वाणी के स्वामी (विश्वकर्माणं) वि. श्वकर्मा को (ऊतये) सहायता के लिये (मनाऽजुवं) मन जैसे वेग वाले (बाजे ) यज्ञ में ( अद्य) आज (हुवेम) बुलावें = पुकारें (सः) वह (नः) हमारे (विश्वानि ) सारे (इवनानि) बुलावों को (जोपद) सेवन करे-सुने (विश्वऽशम्भूः ) सब का भला चाहने वाला (अबसे ) रक्षा के लिये (साधुऽकर्मा) भले काँवाला वेदपोंदेश.. अ-वाणी के पति और मन जैसे वेग वाले विश्वकर्मा को आज हम यज्ञ में बुलावें (पुकारें) वह सब का भला चाहने वोलां और भले कर्मों वाला (विश्वकर्मा) हमारी रक्षा के लिये हमारे बुलावों को सुने ॥ ७॥ ऋग्वेद मण्डल १० सूक्त ८२ । चक्षुषःपिता मनसा हि धीरो घृतमेने अ: जनन्नम्नमाने।यदेदन्ताअददृहन्त पूर्व आ- दिद् द्यावाष्टथिवी अप्रथेताम् ॥ १॥ प-(चक्षुषः) आंख का (पिता) पिता (मनसा) मन से (हि) निःसंदेह (धीरः) धीर (घृतं) घृत में (एने) इन दोनों को (अजनत् ) उत्पन्न किया (नम्नमाने) नमे हुए = डूबे हुए (यदा । इत् ) जूही ( अन्ताः) किनारे (अदहन्त ) दृढ़ हुए (पूर्व ) पहले (आत् । इत् ) त्यों ही (द्यावापृथिवी) द्यौ और पृथिवी (अप्रथेतां) फैले ॥ अ-आंख का पिता और मन में धीर (विश्वकर्मा) ने घृत में डूबे हुए इन दोनों ( छौ और पृथिवी) को बनाया ।जूही कि इनके पहले किनारे दृढ़ हुए त्यों ही द्यौ और पृथिवी फैले ।१ आंख का पिता = प्रकाश का देने वाला, प्रकाश का उत्पन्न करने वाला॥ घृत = पिघला हुआ मादा, अर्थात् द्यौ और पृथिवी के चारों ओर पिघला हुआ मादा था पानी की नाई ॥ विश्वकर्मा विमना आदिहाया धाता वि- धाता परमोत संदृक् । तेषामिष्टानि समिषा . - विश्वकर्म सूक्त मदन्तियत्रा सप्तऋषीन पर एकमाहुः॥२॥ प--(विश्वकर्मा ) (विऽमनाः) बड़े मन वाला=ज्ञान में सब से बड़ा (आव) इसके पीछे (विहायाः) सब से बड़ा- बड़ी शक्ति वाला (धाता) धारण करने वाला(विधाता )वांटने वाला वा धर्म का विधान करने वाला ( परमा) सब से ऊंची शक्ति (उत) और (संऽहक ) ठोकर देखने वाला ( तेषां) उनके (इष्टानि) हवियें (इषा ) रस से ( सं। मदन्ति ) प्रसन्न होती हैं ( यत्र ) जहां (सप्तऋषीन ) सात ऋषियों से (परः) परे (एक) एक (आहुः) कहते हैं। अ-विश्वकर्मा जैसा ज्ञान में सब से बड़ा है, वैसा ही शक्ति में सब से बड़ा है । वह धाता विधाता सब से ऊंची शक्ति और सब का साक्षी है। उनकी हवियें वहां रस से प्रसन्न होती हैं, जहां बतलाते हैं, कि एक है, वह एक जो सात ऋषियों से परे है ॥२॥ उनकी हवियें वहां रस से प्रसन्न होती हैं = यज्ञ करने वालों के यज्ञ वहां रस से भरते हैं, वहां फल देते हैं, जहां वह एक शक्ति है जो "विमना विहाया" है ।। 'सात ऋषि, वेद में सात ऋषियों से क्या अभिमायहै यह अभी अन्वेषणीय हैं। पूर्व कह आए हैं, कि ऋषियों को उत्पन्न करने वाला बतलाया है, अतएव यह कोई स्वाभाविक शक्तियां हैं । हां बृहदारण्यक २ । २ में सात ऋषि, सात इन्द्रिय बतलाए हैं । दोनों कान दोनों नेत्र दोनों नासिका और जिव्हा । इस अर्थ यह अभिप्राय है, कि विश्वकर्मा इन सात ऋषियों से परे है। अर्थात् इनकी पहुंचसे परे हैं,इन्द्रियों द्वारा उसको नहीं पासते ॥ में ९४. वेदोपदेश आकाश में जो सात नक्षत्र इकट्ठे हैं, अर्थात् मरीचि,अत्रि, आंगिरम् , पुलस्त्य, पुलह, ऋतु और वसिष्ठ उनको भी सप्त ऋषि कहते हैं । सांख्य सिद्धान्त में महत्तत्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा ये सात पदार्थ हैं, जिन से यह सारा ब्रह्माण्ड बना है। यदि यहां सात ऋषि से यह सात तत्व अभिप्राय समझा जाए, तो अर्थ तो ठीक संगत हो जाता है। क्योंकि इन से परे एक ही तत्त्व है जो उस ब्रह्म के साथ शरीरभाव से एक हो रहा है । और सव कुछ जगत इससे वरे है । परे एक ही है । पर हमें यहां इस अर्थ के स्वीकार करने में पूरा २ संकोच है, क्योंकि यहां सात ऋषियों से यह अभिमाय है इस में कोई प्रमाण नहीं। असली अर्थका यह चिन्ह नहीं,कि यह बात किसीयोग्य विद्वान् ने किसी जगह मानी है। असली अर्थ वही है जो वस्तुतः उसका अर्थ है ॥ यो नःपिताजनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यो देवानां नामधा एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्त्यन्या॥३॥ प-(यः ) जो (नः) हमारा (पिता)(जनिता)उत्पन्न करने वाला (यः) जो (विऽधाता) वांटने वाला, अथवा धर्म का विधान करने वाला (धामानि) धामों को (वेद) जानता है (भुवनानि ) भुवनों को (विश्वा) सारे (या) जो (देवानां) सारे देवताओं का (नामऽधाः) नाम धारने वाला (एक:) एक (एव) ही (तं) उस (संऽपश्नं) इकठे प्रश्न को (भुवना) भुवन (यन्ति ) पहुंचते हैं ( अन्या) दूसरे ॥ अ-जो हमारा पिता सवका उत्पन्न करने वाला है और विश्वकर्म सूक्त . जो विधाता है जो (त्रिलोकी के) सारे स्थानों और सारे भुवनों को जानता है । जो एक ही सारे देवताओं का नाम धारने वाला है दूसरे सारे भुवन उस एक प्रश्न को पहुंचते हैं ॥३॥ सारे भुवनों से उस एक ही की महिमा प्रकाशित होती है, इसलिये सारे भुवन उसी एक प्रश्न को निधारण करते हैं । सूर्य के अन्दर धसकर देखो, एक चितिशक्ति सारे काम करती दि- खाई देगी । अव अग्नि के अन्दर प्रवेश करो, वही शक्ति यहां भी काम कर रही है, अब अपना हृदय खोलकर कहो, क्या देखा है ? जो वहां है,वही यहां है। सूर्य ने जो प्रश्न निर्धारण(हल) कर दिया था आने भी उसीके हलकरने में तत्पर है। सूर्य उत्तर देता है, मेरा यश सारा उसका है, इसलिये मेरा नाम उसी का नाम है । अग्नि भी यही उत्तर देता है, तब यह वचन कितना मीठा होजाता है “यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भु- वना यन्त्यन्या" जिस ऋषि ने इस सचाई को साक्षाव कर लिया था, वह ज्वलन्त वाणी में कहता है " यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विहामृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” कट । ३ । १० जो यहां है वह ही वहां है, जो वहां है, वह ही यहां है। मृत्यु से वह मृत्यु को प्राप्त होता है, जो इस में विभिन्न सा देखता है। त आयजन्त द्रविणं समस्माऋषयःपूर्वेज- रितारो न भूना । सूर्ते सूर्ते रजसि निषत्ते ये भूतानि समकृण्वन्निमानि ॥४॥ प-(ते)वे (सं । आ । यजन्त ) मिलकर यजन करते

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वेदोपदेश
हुए (द्रविणं) धन ( अस्मै ) इसके लिये ( ऋषयः) ऋाप
(जरितारः ) स्तुति करनेवाले (न ) जैसे ( भूना) बहुतायत से
( अमूर्ते ) न चमकते हुए में (मूर्ते ) चमकते हुए में ( रजसि)
अन्तरिक्ष में ( निपत्ते ) बैठे हुए (ये ) जो ( भूतानि ) भूतों को
( सं । अकृण्वन् ) मिलकर बनाते हुए (इमानि ) इनको ॥
अ-उन पहले ऋषियों ने स्तुति करनेवालों की नाई
बहुतायत से अपने धन इस (विश्वकर्मा) के लिये मिलकर यजन
किये (अर्पण किये) जिन्होंने न चमकतेहुए (पृथिवी) चमकते हुए
(यौ) और अन्तरिक्ष में बैठकर इन सब भूतों को बनाया ॥४॥
यहां स्पष्ट प्रतीत होता है, कि यह ऋपि जो भूतों के
बनाने वाले हैं, ये स्वाभाविक शक्तियां हैं, जो न केवल पृथिवी
में हैं किन्तु अन्तरिक्ष और द्यौ में भी स्थित हैं।
परो दिवा पर एनाटथिव्यापरोदेवेभिर
सुरैर्यदस्ति। कंस्विद्र्भ प्रथमं दध्र आपो यत्र
देवाः समपश्यन्त विश्वे ॥५॥
प-(परः) परे (दिवा) द्यौ से (परः) परे (एना) इस
(पृथिव्या) पृथिवी से (परः)परे (देवेभिः) देवों से ( अमुरैः)
असुरों से (यत् ) जो (अस्ति) है (कं। स्वित्) किस (गर्भ)
गर्भ को (प्रथम) पहले (दभ्रे) धारण किया (आपः) जलों ने
= सूक्ष्म सृष्टि ने (पत्र) जिस में (देवाः)देवता(सं। अपश्यन्त)
देखे गए (विश्वे) सारे॥
अ-द्यौ से परे इस पृथिवी से परे देवताओं से परे और
असुरों से जो परे है । किस गर्भ को जलों ने पहले धारण किया,
जिस में सारे देवता इकठे देखे गए ॥५॥

विश्वकर्म सूक्तं तमिद्गर्भ प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः सम गच्छन्त विश्वे। अजस्य नामावध्येकमर्पि- तं यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः ॥६॥ प-(त) उस (इद) ही (गर्भ) गर्भ को (दधे ) धारण किया (आपः) जलों ने सूक्ष्मदृष्टि ने (यत्र) जिस में (देवाः) देवता (सं । अगच्छन्त) इकठे थे (विश्वे) सारे (अजस्य) अजन्मा की (नाभौ । अधि) नाभि में (एक) एक ( अर्पित) रक्खा हुआ था (यस्मिन् ) जिस में (विश्वानि ) सारे (भुवना- नि) भुवन (तस्थुः ) ठहरे हुए थे । अजलों ने पहले उस ही गर्भ को धारण किया, जिस में सारे देवता इकठे थे । अजन्मा की नाभी में वह एक रक्खा हुआ था, जिस में सारे भुवन ठहरे हुए थे ॥५॥ अजन्मा से यहां तात्पर्य विश्वकर्मा प्रतीत होता है, न तं विदाथ य इमा जजानान्ययुष्माक- मन्तरं बभूव ।नीहारेण प्रास्ता जल्प्या चा सुतृप उक्थशासश्चरन्ति ॥ ७॥* प-(न) नहीं (ते) उसको (विदाथ ) जानते हो (यः) जिसने (इमा) इनको (जजान) उत्पन्न किया है (अन्य ) भिन्न . (युष्माकं ) तुम्हारे (अन्तरं) अन्दर (वभूव ) है (नीहारण) कुहर से अज्ञान से (माऽवृताः) ढपे हुए (जल्प्या) कहने से. . * ये दोनों सूत यजुर्वेद में भी हैं। वाज..सं. १७ । १७से२१. : तक ८१ सूत फिर २५ से ३१ तक ८२ सूता है। २४ पौर ११ मंच भी विणकर्मा के विषय में हैं, पर वे ऋग्वेद में नहीं है । '.

. वेदोपदेश (च) और ( अमुऽतृपः) प्राणों में तृप्त होने वाले (उक्थऽशास:) उक्थ के कहने वाले (चरान्ति) फिरते हैं। अं-जिसने इन (भुवनों) को उत्पन्न किया है, वह तुम्हारे अन्दर तुम से अलग है, पर तुम उसको नहीं जानते हो। क्योंकि तुम कुहर से ढपे हुए और कहने मात्र से ढपे हुए, माणों में तृप्त और उक्थ कहने वाले वनकर विचरते हो ॥ ७॥ जो अपने पाणपोषण में ही सन्तुष्ठ हैं, वे कुहर (अन्धकार) में ढपे हुए हैं, वे उस परमात्मा को नहीं जानसक्तं । और जो उक्थ ( वेद के भजन ) कह छोड़ते हैं, वे कहने मात्र से ढपे हुए हैं, वे भी उसको नहीं जान सक्ते । उसको वे ही जानते हैं, जो प्राणों से परे आत्मा को अधिक प्यार करते हैं और उक्थ के तात्पर्य पर पहुंचते हैं । यह सारा वर्णन जो ऊपर कर आए हैं, यह ब्रह्म का समष्टि वर्णन है । या यूं कहो, कि यह उसकी समष्टि महिमा का वर्णन है । अब व्यष्टि महिमा का वर्णन लिखते हैं । पर यहां हम आगे नहीं बढ़ सक्ते, जब तक इस बात को निर्धारण न करलें, कि व्यष्टि में भी उसी की महिमा का वर्णन है। क्योंकि साधारण- तया वेदों को देखकर यही जान पड़ता है, कि वेदों में भिन्न २ देवताओं का वर्णन है । पर हम जिस निश्चय पर पहुंचे हैं, वह यह है कि वेदों में एक ही ब्रह्म का कई प्रकार से वर्णन है। और उसके कारण यह हैं- (१) हम पहले दिखला आए है, कि वेदों में उस ईश्वर का वर्णन नहीं, जो मनुष्य के ख्याल से उत्पन्न हुआ है, किन्तु उस ईश्वर का वर्णन है, जो इस सृष्टि का ईश्वर है । जो इस विश्व से अलग बैठा हुआ नहीं, किन्तु इस के अन्दर .

ब्रह्म का शक्ति रूप से वर्णन ९९ शक्तिरूप से काम कर रहा है । जिस तरह आंख आत्मा के अधीन खुलती है, इसी तरह सूर्य उसके अधीन चमकता है। जिस तरह आंख देखती हुई उसं शक्ति का प्रकाश करती है, जिस के अधीन उसकी दर्शन शक्ति है, इसी तरह सूर्य चमकता हुआ उस शक्ति का प्रकाश करता है, जिसके अधीन उसकी प्रकाशन शक्ति है:-" येनं सूर्यस्वपति तेजसेद्धो नावेदविन्मनुते : तं बृहन्तम्" तैवा० ३।१२।९ "जिस तेजसे प्रकाशित होकर सूर्य चमकता है, वह उस बड़े (तेज) को नहीं जानता, जो वेदको नहीं जानता है" यह जगद परमात्मा का शरीर है और वह इसका अन्तरात्मा है जिस तरह जीवात्मा की शक्ति से शरीर परि चालित होता है, उसी तरह परमात्मा की शक्ति से ब्रह्माण्ड परि चालित होता है। वह इस सारे विश्व में एक शक्ति है, जो चेतन है । यह उसके विना शक्ति हीन है * । वस्तुतः वही एक शक्ति है, जिस से सारे ब्रह्माण्ड को सामर्थ्य मिलरहा है । इसी लिये उसको शक्तिरूप से वर्णन किया है। हम १० । ८२ । २ में देखते हैं, कि विश्वकर्मा पुल्लिङ्ग है (पुरुष रूप में वर्णन किया है) और उसके विशेषण " विमना, विहाया, धाता, विधाता और सन्ह " ये भी पुल्लिङ्ग है । पर इनके भीतर “ परमा" यह एक स्त्री लिङ्ग शब्द पड़ा है । यह क्यों स्त्री लिङ्ग है, दूसरे शब्दों की नाई “परमः" इस प्रकार यह भी पुल्लिङ्ग हो सक्ता था। पर 'परमः' न कह कर 'परमा' कहा है । यह इसी लिये है, कि यह विश्वकर्मा जो धाता विधाता है, यह एक शक्ति है, जो सब से ऊपर है । यह सारा विश्व उसी शक्ति से प्रकाशित है। इसी लिये आग्नेय सूक्तों में अग्निद्वारा जो उसका प्रकाश (जहूर. * देखो हहदारण्यक की भूमिका पृष्ट ८ से १३ तक ॥ " .

वेदोपदेश है, उसको दिखलाया है और वारुण सूक्तों में वरुणद्वारा जो उसका प्रकाश है, उसको दिखलाया है । ऋग्वेद का एक पूरा सूक्त जिस में परमात्मा को शक्तिरूप से वर्णन किया है, नीचे लिखते हैं-ऋग् १० । १२५ अहं रुद्रेभिर्वमुभिश्चराम्यहमादित्यै रुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणोभाविमर्म्यह मिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ॥१॥ प-(अहं ) मैं (रुद्रेभिः) रुद्रों के साथ (वमुभिः) वसु ओं के साथ (चरामि ) विचरती हूँ ( अहं ) मैं (आदित्यैः) मादित्यों के साथ ( उत) और (विश्वदेवैः) सारे देवों के साथ (अहं ) मैं (मित्रावरुणा) मित्र और वरुण को (उभा) दोनों (विमि) धारण किये हूं (अहं ) मैं (इन्द्राग्नी) इन्द्र और अग्नि को (अहं ) मैं ( अश्विना) अश्वियों को (उमा) दोनों अ-मैं रुद्रों के साथ और वसुओं के साथ विचरती हूं। मैं आदित्यों और विश्वदेवों के साथ (विचरती हूं ) मैं दोनों मित्र और वरुण को धारण किये हूं, मैं इन्द्र अग्नि को और दोनों अश्वियों को धारण किये हूं ॥ १ ॥ अहं सोम माहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम् । अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ॥२॥ प-( अहं) मैं (सोम) सोम को (आहनसं *) चोट देने * "ाहनम्" प्रसिद्ध शब्द नहीं, इसका अर्थ धात्वर्थ के " ब्रम का शक्ति रूप से वर्णन वाले उत्तेजना देनेवाले(विभर्मि) धारण किये हूं (अहं) मैं (त्व- टारं ) त्वष्टा को (उत) और (पूपणं) पूपा को (भगं) भगको (अहं ) (दधामि ) धारण किये हूं (द्रविणं ) धन ( हविष्मते) हविवाले (मुमऽअव्ये न) शुद्धाचारी (यजमानाय) यजमान के लिये (सन्यते) (सोम) रस बहाते हुए । अ-मैं चोट देनेवाले सोम को धारण किये हूँ, मैं त्वष्ठा को पूपा को और भग को। मैं हवि वाले, सोम रस बहाते हुए, शुद्धाचारी यजमान के लिये धन ( यज्ञ का फल) धारण कियेहूं। यजमान के लिये धन धारण किये हूं, यह वचन प्रकट करता है, कि वैदिक कर्मों का फल देने वाली वही शक्ति है। जो शाक्ति मित्र और वरुण को धारण कर रही है, वही वैदिक कमी का फल धारण किये है। यह विषय ब्रह्मसूत्र ३।२। ३८-४१ तक भगवान वेदव्यास ने सविस्तर वर्णन किया है। महार किया गया है। ऋग्वेद में यह शब्द सात बार प्रयुक्त हुआ है। दीवार यमयमी सूक्त में । एकवार पर्जन्य वा इन्द्र के सम्बन्ध में, और सब जगह सोम के सम्बन्ध में है। जो अर्थ ऊपर दिया है, वह मव जगह मंगत होजाता है। सोम को चोट देनेवाला इस लिये कहा है, कि मोम का लौकिक फल शत्रों पर विजय पाना है। अर्थात् सोम शत्रुओं को चोट देने वाला है । वा चीट देकर सग्राम में लगाता है अर्थात् उत्साह मे भर देता है । • " मुमावी: " यह शब्द भी अप्रसिद्धार्थक है, पर यह भी यौगिक है क्योंकि २ । १३ । ८ में " समाव्यः " यह कदन्तपद इन्द्र का विशेषण है और ४ । २५। ६ में "मुप्रावीः” का प्रतियोगी टुःप्रावी: " शब्द प्रयोग किया है । प्रावीः, बहुत अच्छी तरह रना करने वाला, अर्थात् शुद्ध भाव मे यज्ञादि कर्म करनेवाला। शुदाचारी (परहेज़गार) और दुःप्रावी = दुराचारी ॥ Rew - ।

. १०२ वेदोपदेश अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥३॥ प-(अहं) मैं (राष्ट्री) देशवाली देशकी मालिक (संs गमनी ) इकट्ठा करनेवाली (वमूनां) धनों की खजानों की (चिकितुपी ) जानचुकी हुई = साक्षात् करचुकी हुई, (प्रथमा ) पहली= मुखिया ( यज्ञियानां) यज्ञके योग्यों में से (तां) उस (मा) मुझको (देवाः) देवताओं ने (वि । अदधुः ) वांटा है (पुरुऽत्रा) बहुत स्थानों में (भूरिऽस्थानां) वहुत में = हर एक में स्थित (भूरि) बहुत में (आऽवेशयन्ती) प्रवेश करती हुई ।। अ-मैं सारे देशकी मालिक हूं, सारे धन मेरे पास इकठे हैं।मेरे ज्ञान से बाहर कोई वस्तु नहीं । जो यज्ञ के योग्य हैं,उन में मैं ही मुखिया हूं। मैं जो हर एक वस्तु में प्रविष्ट हूं और हर एक वस्तु में रहती हूं । उस मुझको देवताओं ने बहुत स्थानों में बांटा हुआ है ॥ ३॥ यह मन्त्र स्पष्ट वोधन करता है,कि यह सारा राज्य, जिस में किसी प्रकार की भी प्रजा वास करती है, सब उसी एक शक्ति के अधीन है। इस ब्रह्माण्ड के सारे धन उसीके हैं। वह अपनी सारी प्रजा को स्वयं जानती है । प्रजा भी उसी के लिये यज्ञ करती है, उसी को बलि देती है, क्योंकि वही उनकी रानी है । इन्द्र के लिये बलि, वरुण के लिये बलि, और अग्नि के लिये वलि देखकर यह नहीं समझना चाहिये कि भिन्न २ देवताओं को बलि दी जाती है । नहीं, यह उसी एक शक्ति को वलि दी

ब्रह्म का पाक्ति रूप से वर्णन
१०३
जाती है । वही इन्द्र में प्रविष्ट होकर इन्द्र में स्थित है और वही
अग्नि में मविष्ट होकर अग्नि में स्थित है । देवताओं ने उसी को
अपने अन्दर अलग २ वांट रक्खा है, " तद्यदिदमाहुरमुंयजामुं-
यजेत्येकै देवमेतस्यैव सा विरोष्टरेप उ ह्येव सर्वेदेवाः ॥ सो जो
एक २ देवता के लिये यह कहते हैं, कि “ उसको पूजो उसको
पुजो, इसी की यह त्रिविध रचना है यह ही सारे देवता है"
मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः
प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् । अमन्तवो मा-
न्त उपक्षियन्ति श्रुधिश्रुत श्रद्धिवंतेवदामि?
प-(मया) मेरे द्वारा (सः) वह ( अन्नं ) अन्न ( अत्ति)
खाता है (यः) जो (वि । पश्यति ) देखता है (यः) जो (प्रs
अणिति ) सांस लेता है (यः) जो (ई) इस (शृणोति) मुनता
है ( उक्तं ) कहे हुए को (अऽ मन्तवः) न समझते हुए (मां)
मेरे (ते) वे (उपक्षियन्ति ) पास रहते हैं (श्रुधि ) सुन (श्रुत)
हे मुने हुए = जग में विख्यात । (अद्धिऽयं) श्रद्धावाली वात (ते)
तुझे (वदामि ) कहती हूं ॥
अ-मेरे द्वारा वह अन्न खाता है, जो देखता है, सांस
लेता है और कहना सुनता है । न जानते हुए वे मेरे पास रहते
हैं, मुन हे सुने हुए ! तुझे (यह) श्रद्धेय वचन कहती हूं ॥ ४ ॥
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरु-
त मानुषेभिः । यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि
तं ब्रह्माणं तमृषि तं सुमेधाम् ॥५॥

वेदोपदेश प-(अहं) मैं (एव) ही (स्वयं) आप (इदं) यह (वदामि ) कहती हूं (जुष्टं ) सेवन किया हुआ प्यार किया हुआ (देवेभिः) देवों से ( उत ) और (मानुभिः । मनुष्यों से (यं) जिसको (कामये) चाहती हूं = प्यार करती हूं (तंऽतं) उस २ को (उग्रं) उग्र तेजस्वी (कृणोमि) वनाती हूं (तं) उसको (ब्रह्माणं) ब्राह्मण (तं) उसको (ऋषि) ऋषि (तं) उसको (सुऽमेधां) बड़ी समझ वाला ॥ अ--मैं ही स्वयं यह वात कहती हूं, जो प्यारी है देवता- ओं के लिये और प्यारी है मनुष्यों के लिये । मैं जिसको प्यार करती हूं उस २ को उग्र वनाती हूं उसको ऋषि और उसको सुमेधा (बनाती हूं)॥५॥ उग्र = भयानक, तेजस्वी, जिस का तेज दूसरों पर छा जाए, जिसकी ओर आंख उठाकर न देखसकें। यह १०११२११५ में छौ का विशेषण आया है " येन द्यौरुग्रा" और यहां यह शब्द क्षत्रिय के लिये है, जिस पर परमात्मा का अनुग्रह होता है, वह क्षत्रिय धनता है, वह ब्राह्मण बनता है, वह ऋषि वनता है और सुमेधा बनता है। अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शवे हन्तवा उ । अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आविवेश ॥ ६॥ प-(अहं ) मैं (रुद्राय) रुद्र के लिये (धनुः) धनुष को (आ। तनोमि) खींचती हूं = चढ़ाती हूं (ब्रह्मऽद्विषे) ब्रह्म से देष करने वाले के लिये, ईश्वरीय नियमों के विरुद्ध चलने वाले प्रम का शक्ति रूप से वर्णन मैं - के लिये (शरवे) तीर (हन्तवे । उ) मारने के लिये (अहं) मैं (जनाय) मनुष्य के लिये (सऽमद ) संग्राम को (कृणोमि) उत्पन्न करती हूं (अहं) मैं (द्यावाऽपृथिवी) द्यौ और पृथिवी में (आ। विवेश ) भविष्ट हुई हूं। रुद्र के लिये धनुप चढ़ाती हूं, ब्रह्म के द्वेषी को तीर मारने के लिये । मैं मनुष्य के लिये.संग्राम उत्पन्न करती हूं, मैं द्यौ और पृथिवी में प्रविष्ट हूं ॥६॥ अथवा ब्रह्मद्विषे = वेद के द्वेपी के लिये अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिर- प्स्वन्तः समुद्रे । ततो वितष्ठे सुवनानुविश्वो ताऽमुं द्यां वर्मणोपस्टशामि॥७॥ 4-(अहं ) मैं (सुत्रे ) उत्पन्न करती हूं (पितरं ) पिता को- धौ को (अस्य ) इस जगत के (मूर्धन ) मस्तक पर (मम) मेरा (योनिः) स्थान (अप्सु । अन्तः ) जलों के अन्दर (समु- दे) समुद्र में (ततः) उससे (वि । तष्ठे) फैलती हूं (भुवना अनु) भुवनों के साथ (विश्वा) सारे (उत) और ( अ ) उस (यां) यौ को (वर्मणा) शरीर से-सिरसे (उप । स्पृशामि) छूतीहूं। अ-मैं पिता को इस (जगत ) के मस्तक पर उत्पन्न करती हूं। मेरा.स्थान जलों के अन्दर समुद्र में है, उस से मैं भुवनों के साथ २ फैली हूं और उस छौ को सिरसे छूती हूं। "मेरा स्थान....हूं" समुद्र%D सूक्ष्मदृष्टि । सूक्ष्मदृष्टि के अन्दर मैं ही अन्तर्यामिनी हूं और जब उससे यह भुवन वनते हैं तो इनकी अन्तर्यामिनी होकर इनके साथ फैलती हूं । अथवा मैं

.१०६
वेदोपदेश
समुद्र की गहराई में विद्यमान हूं और वहां से लेकर सारे भुवनों
के साथ २ फैली हुई हूं ॥
अहमेव वात इव प्रवास्यारममाणा भुव-
नानि विश्वा। परो दिवा पर एना पृथिव्यैता
वती महिना संबभूव ॥८॥
प-(अहं ) मैं (एव) ही (वातः। इत्र ) वायु की नाई
(म । वामि) प्रवल वहती हूं (आऽरममाणा) सहारा देती हुई
(भुवनानि ) भुवनों को (विश्वा) सारे ( परः ) परे (दिवा) द्यौ
से (परः) परे ( एना) इस (पृथिव्या) पृथिवी से (एतावती)
इतनी (महिना) महिमा से (सं । वभूव) हूं ॥
अ-मैं ही सारे भुवनों को सहारा देती हुई वायु की
नाई वेग से वहती । धौ से परे और इस पृथिवी से परे इतनी
बड़ी मैं अपनी शक्ति से हूं ॥ ८ ॥
(२) जिस तरह वायु हमारे प्राण के लिये वहता है, इसी तरह
वह शक्ति सारे भुवनों में जीवन देती हुई वेग से बहरही है।
सर्वत्र उसी के सहारे जीवन उत्पन्न होरहा है। जव इस सारे
जगत में वही एक शक्ति काम कर रही है, तो इस में कोई सन्देह
नहीं रहता, कि यह सारा विश्व उसी का प्रकाश करता है, इसी
लिये यह कहा है " तस्माद्विराजायत विराजो अधिपूरुषः"
(ऋग् १० । ९ । ५) उस से विराट् उत्पन्न हुआ और विराट् से
पुरुप प्रगट हुआ। हम यह वात अथर्ववेद में और भी स्पष्ट पाते
हैं:-(अथर्व० १३ । ४)
स वा अन्होऽजायत तस्मादहरजायत ॥ २९॥

१०७
सारा विश्व ब्रह्म का प्रकाश करता है
स वै रात्र्या अजायत तस्माद्रात्रिरजायत ॥३०॥
सवाअन्तरिक्षादजायत तस्मादन्तरिक्षमजायत॥३१
स वै वायोरजायत तस्मादायुरजायत ॥ ३२ ॥
स वै दिवोऽजायत तस्माद्यौरजायत ।। ३३ ।।
स वै दिग्भ्योऽजायत तस्मादिशोऽजायन्त ॥३४॥
स वै भूमेरजायत तस्माद्भूमिरजायत ॥ ३५॥
स वा अग्नेरजायत तस्मादग्निरजायत॥ ३६॥
स वा अन्योऽजायत तस्मादापोऽजायन्त ॥ ३७॥
स वा ऋग्भ्योऽजायत तस्मादृचोऽजायन्त ॥ ३८॥
स वै यज्ञादजायत तस्माद्यज्ञोऽजायत ॥ ३९ ॥
स यज्ञस्तस्य यज्ञः स यज्ञस्य शिरस्कृतम् ॥ ४०॥
वह दिन से प्रकट हुआ, उस से दिन प्रकट हुआ ॥ २१ ॥
वह रात्रि से प्रकट हुआ, उस से रात्रि प्रकट हुई ॥ ३० ॥
वह अन्तरिक्ष से प्रकट हुआ, उस से अन्तरिक्ष प्रकट हुआ३१
वह यायु से प्रकट हुआ, उस से वायु प्रकट हुआ ॥ ३२ ॥
वह धौ से प्रकट हुआ, उस से धौ प्रकट हुआ ॥ ३३ ॥
वह दिशाओं से प्रकट हुआ, उस से दिशाएं प्रकट हुईं ॥३४॥
वह पृथिवी से प्रकट हुआ, उस से पृथिवी प्रकट हुई ॥३५॥
वह अग्नि से प्रकट हुआ, उस से अग्नि प्रकट हुई ॥ ३६ ॥
वह जलों से प्रकट हुआ, उस से जल प्रकट हुए ॥ ३७ ॥
वह ऋचाओं से प्रकट हुआ, उस से ऋचाएं प्रकट हुईं ॥३८॥ .
वह यज्ञ से प्रकट हुआ, उस से यज्ञ प्रकट हुआ ॥ ३९ ॥

१०८ वेदोपदेश वह यज्ञ है, उसका यज्ञ है, वह यज्ञ का मूर्धा है ॥ ४० ॥ (३) यह कैसा स्पष्ट उपदेश है, कि यह मारा विश्व उस से उत्पन्न हुआ है और यह अपने स्वरूप से उसीका प्रकाश करता है । इसी लिये वेदों का जानने वाला जब सूर्य के लिये ऋचा वोलता है, तो वह इस मूर्य में अपने परमात्मा का प्रकाश देख- ता है और वह अपनी स्तुति उसके लिये भेजता है, जिस की महिमा उससे चमकती है। और जब वह वरुण के लिये ऋचा बोलता है, तो उसकी भक्ति उसी में है, जिसकी महिमा को वरुण दिखलाता है । इस लिये वह इन भिन्न २ नामों से एक ही मालिक की महिमा को गाता है। क्योंकि ये सारे नाम उसीके हैं, यह वात भी वेदों से बड़ी स्पष्ट प्रतीत होती है:- यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या॥ (ऋग् १० । ८२३) जो सारे देवों का नाम धारने वाला एक ही है, उसी सां झे प्रश्न को सारे भुवन पहुंचते हैं, यहां “ सम्मश्न" साझा प्रश्न, यह शब्द ध्यान देने योग्य है । सारे भुवनों का वही एक सांझा प्रश्न है, सब भुवन उसीके बतलाने वाले हैं, और इसी लिये सारे देवताओं के नाम उसीके हैं। इन्द्रंमित्रं वरुणमाग्निमाहुरथो दिव्यःस सुपर्णोंगरु स्मान् । एक सदिप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरि- श्वानमाहुः॥ ऋग ०१ । १६४ । २२ एक तत् (हस्ति) को विद्वान् लोग अनेक प्रकार से कहते हैं । इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं और वही दिव्य सुपर्ण - -

अग्नि आदि ब्रह्म के ही नाम है १०९
गमरमान है. उमी अलि को यम और मातरिया कहते हैं।
स्वाम्भ मूक्त के २० मन्त्र में सम्म को सबका आधार
ठहराकर उसी स्कम्भ को बिना संकोच के इन्द्र शब्द से कहा
है, और फिर अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से आरम्भ करके बिना
संकोच उसीको स्कम्भ रहा है । और फिर उससे आगे यह
कहा है " नाम नाम्ना जोडवीति पुरामूर्याव पुरोपसः" सूर्य
से पहले और उपासे भी पहले परमात्मा की स्तुति करने वाला
एक नाग को दुगरे नाम से बुलाता है । अर्थात् जिसको उसने
स्कम्भ कहा है, उसीको इन्द्र कहता है, और जिसको इन्द्र कहा
है. उमीको फिर और मन्त्रों में सबिता कह देता है।
(४) सच तो यह है,कि ये देवता जिनकी महिमा आश्चर्यय
कर देनी है, ये मय जी की महिमा से महिमा वाले हैं, अग्नि
उसके विना अनमि है और वायु उसके बिना अवायु है इसी
लिये कहा है।
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तदायुस्तदु चन्द्रमाः । तदे
व शुक्र तदब्रह्म ता आपःस प्रजापतिः । (यजु ०३२॥ १)
वही अमि है, वही आदित्य है वही वायु है और वही
चन्द्रमा है,वही शुक्र, वही ब्राम, वही जल और वही मजापति है।
सवणःसायमनिर्भवति समित्रोभवति प्रातरुधन।
स सविता भूत्वाऽन्तरिक्षण याति सइन्द्रो भूत्वा तपति
मध्यतो दिवम् ।। (अथर्व० १३ । ३ । १.३)
नायकाल बढ़ वाण और अग्नि होता है, और मातःकाल उदय
हुआ यह मित्र होता है, वह सविता होकर आकाश से चलता है,
-

वेदोपदेश
वह इन्द्र होकर मध्य से द्यौ को तपाता है ।
स धाता स विधाता स वायुर्नभ उच्छ्रितम् ॥३॥
सोऽर्यमा स वरुणः स रुद्रः स महादेवः ॥ ४ ॥
सो अमिः सउ सूर्यःसउ एव महायमः५(अथर्व १३१४)
वह धाता (धारने वाला) वह विधाता (तरतीब देनेवाला)
वह वायु और ऊंचा मेघ है । ३ । वह अर्यमा है वह वरुण है वह
रुद्र है वह महादेव है । ४ । वह अग्नि है, वह सूर्य है और वही
महायम है ॥५॥
यह कैसा स्पष्ट वर्णन है, इस विषय का, कि जो कुच्छ
हमारे सामने है, वह सब उसी एक शक्ति से परिपूर्ण है, यह सन
उसका शरीर है और वह अन्तरात्मा है। जिस तरह आत्मा
भिन्न २ शरीर धारण करके मनुष्यादिरूप में उपस्थित होता है,
उसी तरह परमात्मा सायंकाल वरुणरूप में उपस्थित होता है
और प्रातःकाल मित्ररूप में उदय होता है।
(६)अथर्ववेद काजो विषय हमने ऊपर लिखा है,इसी प्रकरण
में हम आगे चलकर देखते हैं, कि उसकी एकता को कैसे ज़ोर
के साथ वर्णन किया है और उस एकता के पहचानने का कैसा
उत्तम फल कहा है :-
कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च ब्रह्माण-वर्चसंचानं
चान्नाचंच ॥१४॥
य एतं देवमेकवृतं वेद ॥१५॥
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थों नाप्युच्यते ॥ १६ ॥

- ब्रह्म के एकत्व का वर्णन १११ न पञ्चमो न षष्टः सप्तमो नाप्युच्यते ॥ १७ ॥ नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते ॥ १८॥ स सर्वस्मै विपश्यति यच्च प्राणिति यच्च न ॥१९॥ तमिदं निगतं सहः स एप एक एकवृदेक एव।२०॥ सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति ॥ २१ ॥ कीर्ति, यश, शक्ति, मेघ, ब्रह्मवर्चस, अन्न और पुष्टिदेने वाली वस्तुएं (उसके लिये हैं ) ॥ १४ ॥ जो इस एकत् (जो एक ही तत्व है, दो तत्त्वों के मेल से नहीं बना) देवको जानता है । १५ । वह न दूसरा है, न तीसरा है न ही चौथा कहलाता है ॥ १६ ॥ न पांचवां है, न छटा है, न ही सांतवां कहलाता है ॥ १७॥ न आठवां है, न नवां है, न ही दसवां कहलाता है ।१८॥ वह उस सवको देखता है, जो सांस लेता है और जो नहीं (सांस लेता) ॥ १९ ॥ उस में यह जीतने की शक्ति भरपूर है, वह यह एक है, एक है और एक ही है ॥ २० ॥ सारे देवता इस एकटत होते हैं ॥ २१ ॥ एक से लेकर दसतक ही सारे अंक हैं, सब संख्या इन्हीं के मेल से बनती हैं । सो परमात्मा के विषय में दो से लेकर दस संख्या तक निषेध करके एक ठहराने का यह अभिमाय है, कि एक के सिवा और कोई भी संख्या उसको नहीं देसक्ते । बस उसको केवल एक, एक, एक ही कहसकते हैं। वह एक है और एक तत्त्व है । जैसे दो भिन्न २ तत्त्व मिलकर एक वस्तु बनती है वह इस तरह का एक नहीं, किन्तु एक है और एक तत्त्व भी है, । मित्र, वरुण, अग्नि, यम ये भिन्नरदेवता वही एक तत्व है। . में ,

११२
वेदोपदेश
यह नाम भेद है और बाहर के सम्बन्ध का भेद है । जैसे एक
ही आत्मा नेत्र के सम्बन्ध से द्रष्टा और श्रोत्र के सम्बन्ध में
श्रोता है । इसी प्रकार वह एक ही परमात्मा एक सम्बन्ध से
वरुण है और दूसरे सम्बन्ध से मित्र है । यास्कमुनि ने इस विषय
को कैसा स्पष्ट दिखलाया है-
माहाभाग्याद्देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते ।
एकस्यात्मनोऽन्ये देवाःप्रत्यङ्गानि भवन्ति । (निरु०७४)
परमेश्वर का ऐश्वर्य बहुत बड़ा है, इसलिये उस एक ही
आत्मा की इस प्रकार स्तुति की गई है, जैसे कि वे बहुत से हैं ।
एक ही देव है, दूसरे सारे देवता उसी एक आत्मा के प्रत्यंग है।
उपनिषद् और आरण्यक में भी ऐसा ही स्पष्ट कहा है-
तद्यदिदमाहुरमुंयजामुंयजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा
विसृष्टिरेष उद्येव सर्वे देवाः। (बृहदा० ४ । १ । ६)
सो जो यह कहते हैं, कि उसकी पूजा करो उसकी पूजा
करो इस प्रकार एक २ देवता की (पूजा कहते हैं ) वह इसी
की विविध सृष्टि है, यह ही सारे देवता है ।
एतं ह्येव बव्हचा महत्युक्थे मीमांसन्ते एतममा
वध्वर्यव एतं महाव्रते छन्दोगा।(ऐ०आ० ३।२।३।१२)
इस (परमात्मा) को ही ऋग्वेदी बड़े उक्थ में विचारने हैं,
इसी को यजुर्वेदी अग्नि में उपासते हैं, इसी को सामवेदी महाव्रत
में उपासते हैं।
(६) फिर हम देखते हैं, कि एक ही देवता को सारे
देवताओं के रूप में वर्णन किया है, यह तभी होसक्ता है, जब

ब्रह्म ही सारे देवों का अन्तरात्मा है ११३ वह देवता जिसका वर्णन हो रहा है, सबका अन्तर्यामी हो और सब में एक हो, हम इस विषय में थोड़े से प्रमाण उद्धृत करने हैं, त्वममे इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः। त्वं ब्रह्मा रयिविद् ब्रह्मणस्पते त्वं विधर्तः स- चसे पुरुन्ध्या ॥३॥ त्वमने राजा वरुणो धृतव्रतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईड्यः । त्वमर्यमा सत्पतिर्यस्य संभुजं त्वमंशो विदथे देव भाजयुः॥४॥ त्वममे त्वष्टा विधते सुवीर्य तवभावो मित्रमहःस जात्यम् । त्वमाशु हेमा ररिषे स्वश्व्यं त्वं नरां शों असि पुरूवसुः॥ ५॥ त्वमने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शङ्ख मारुतं पृक्ष ईशिषे ॥ (ऋग्वेद० २ । १ । ३-६) हे अग्ने ! तू इन्द्र है, सारी सत्ता रखनेवाली वस्तुओं में तू शक्ति डालने वाला है, तू ही बड़ी पहुंच वाला (विस्तृत-जगत पर ईशन करने वाला) नमस्कार के योग्य विष्णु है । तू ब्रह्मा है, धन का जानने वाला हे ब्रह्मणस्पते, तू हे विधनः! पुरुन्धी के हुआ है ॥ ३ ॥ हे अग्ने ! तू ही राजा वरुण है, जिसके नियम अटल तू ही मित्र होता है, आश्चर्य स्वरूप, पूना के योग्य | तू अर्यमा है सव हस्ती रखने वालों का मालिक है, जिसको मैं भोग सक्ता हूं हे देव तू ही अंश है यज्ञ में (फल का) वांटने वाला ॥ ४ ॥ साथ मिला ११४ वेदोपदेश हे अग्ने ! तू त्वष्टा होकर पूजा करने के लिये बड़ी वीरता देता है, हे शक्तिवाले! तू जो मित्र की नाई बड़ा है, तेरे साथ ही हमारा वन्धुपन है,त. ही तेज़ उक्साने वाला होकर बहुत अच्छे घोड़ों के समूह को देता है, तू जो धन में बड़ा अमीर है, तू मनुष्यों में सेना (वल) है ॥ ५॥ तू ही हे अग्ने ! रुद्र है और ऊंचे द्यो का असुर है तू ही मरुतों की सेना होकर अनाज पर ईशन करता है ॥ ६ ॥ इसी प्रकार ५ । ३ । १-२ में अग्नि को वरुण मित्र विश्वेदेव, इन्द्र और अर्यमा कहा है । फिर ५ । ८१ । ४-५ में सविता को मित्र और पूपा बतलाया है और यह भी " उत्तेदं विश्व भुवनं विराजसि" तू ही इस सारे भुवन पर अनेक प्रकार से हकूमत करता है ॥ इसी प्रकार हम बृहस्पति के विषय में १०१९८१में पाते हैं- बृहस्पते प्रतिमेदेवतामिहि मित्रो वायबरुणोवासिपूषा हे बृहस्पते तू मेरे लिये देवता (पर्जन्य) को ला, तू जो मित्र है, वरुण है, वा पूपा है ॥ यह हमने संक्षेप से दिखला दिया है, कि एक ही देवता को विना संकोच के सारे देवताओं के रूप में वर्णन कर दिया है और यह इसलिये है, कि जव हम अग्नि देवता का सूक्त पढ़ते हैं, तो वह अग्नि वही है, जो वरुण देवता के सूक्त में वरुण है । और मित्र के सूक्त में मित्र है ।। (७) हमारा यह निश्चय और भी दृढ़ होता है, जब हम इस बात को देखते हैं, कि एक ही देवता में असीम (बेहद्द) शक्ति वर्णन की गई है । यदि यह देवता उस परम शक्ति से भिन्न होते, तो इनका सामर्थ्य अवश्य सीमा में रहना चाहिये क्योंकि असीम सामर्थ्य केवल उसी एक शक्ति का है, और हम हर एक देवता के ११५ वरुण परमात्मा है वर्णन में ऐश्वरी शक्तियों का वर्णन पाते हैं- वनेषुव्यन्तरिक्षं ततान वाजमवत्सुपय उस्रियासु । हृत्सु क्रतुं वरुणो अप्स्वमिं दिवि सूर्यमदधात्सोम मद्रौ ।। (ऋग् ५। ८५ । २) वृक्षों में वरुण ने अन्तरिक्ष को फैलाया है, उसने घोड़ों में वेग और गौओं में दूध (स्थापन किया है ) वरुण ने हृदयों में बुद्धि और जलों में अग्नि को स्थापन किया है, सूर्य को द्यौ में और सोम को पर्वत पर स्थापन किया है ॥२॥ वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षण पतताम् । वेद नावः समुद्रियः॥ (ऋग् १ । २४ । ७) जो (वरुण ) आकाशमार्ग से उड़ते हुए पन्छियों के पद (पाओं के चिन्ह. खोज) को जानता है और जो समुद्र के अन्दर जहाज़ के पद को जानता है ॥७॥ इस वर्णन से कैसा स्पष्ट प्रतीत होता है, कि वरुण से अभिमाय परमात्मा है । अधिक स्पष्ट करने के लिये कुच्छ मन्त्र और भी लिखते हैं। यस्तिष्ठति चरति यश्च वञ्चति यो निलायं चरतियः प्रतकम् । दौ सन्निषद्य यन्मन्त्रयेते राजा तबेद वरुण- स्तृतीयः ॥ २॥ उतेयं भूमिर्वरुणस्य राज्ञ उतासौ द्यौ बृहती दूरे अन्ता । उतो समुद्रौ वरुणस्य कुक्षी उता- स्मिन्नल्प उदके निलीनः॥३॥ (अथर्व० ४ । १६) जो खड़ा है, जो चलता है, जो काम करता है, जो सोता है, उठता है, (उसको वरुण जानता है) दो मनुष्य अलग बैठ ११६ वेदोपदेश कर जो सलाह करते हैं, राजा वरुण उन में तीसरा होकर उस को जानता है ॥ २॥ यह पृथिवी राजा वरुण की है और वह द्यौ राजा वरुण का है, जो बहुन वड़ा है और दूर तक फैला हुआ है । दोनों समुद्र (जलका और वायु का) वरुण की कुक्षी हैं और वह पानी की छोटी सी बून्द में भी छिपा हुआ है ॥३॥ यह वर्णन सर्वान्तर्यामी परमात्मा का है, इस में क्या सन्देह हो सकता है ।। इसी प्रकार इन्द्र के विपय में है- इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्रइत्प- वंतानाम् । इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमे . योगे हव्य इन्द्रः॥ (ऋग्० १० । ८९ । १०) इन्द्र धौ पर हकूमत करता है, इन्द्र पृथिवी पर हकूमत करता है, इन्द्र जलोंपर हकूमत करता है और इन्द्र ही मेघ पर हकूमत करता है, इन्द्र बढ़ने वालोंपर हकूमत करता है और इन्द्र ही समझ वालोंपर हकूमत करता है, जो कुछ पास नहीं है, उस के पाने के लिये इन्द्र पुकारने योग्य है । और जो कुछ पास है, उसकी रक्षा के लिये भी इन्द्र पुकारने योग्य है = (इन्द्र की प्रार्थना से उस वस्तु को पाओगे, जो तुम्हारे पास नहीं है और जो कुछ मिलगया है, उसकी रक्षा के लिये भी वही प्रार्थनीय है)। अहं भुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि संजयामि शश्वतः। मां हवन्ते पितरं न जन्तवो ऽहं दाशुषे विभजामि भोजनम् ॥ (ऋग्० १० । ४८ । १) मैं (इन्द्र) सारे धन का मुख्य स्वामी हूं, मैं सदा रहने है वेद एक ही उपास्य देव बतलाते हैं ११७ वाले धनों को जीतता हूं, मुझे लोग पिता की नाई बुलाते हैं (पुकारते हैं) मैं देनेवाले को भोजन वांटता हूं। और फिर एक और जगह पर यह वचन पाते हैं “विश्वस्यैक ईशिषेसा " हे इन्द्र सारे विश्व पर तू ही अकेला हकूमत करता है, सो तू ही भक्ति के योग्य है ॥ इन्द्र के विषय में ये वचन, कि "इन्द्र ही बढ़ने वालों और बुद्धिमानों पर हकूमत करता है" "इन्द्र ही मुख्य मालिक है" इन्द्र सारे विश्वपर अकेला हकूमत करता कैसा स्पष्ट इन्द्र को परम आत्मा ठहराते हैं । फिर हम इन्द्र के वर्णन में यह भी पाते हैं "सत्यमद्धानकिरन्यस्त्वावान" (१ । ५२ । १३ ) यह विल्कुल ठीक है, कि तेरे बराबर और कोई नहीं । “य एक इद्विदयते वसुमर्ताय दाशुषे" (ऋग् १०८४७) "जो एक ही धन देता है उस मनुष्य को, जो हवि देता है"। इसी प्रकार और देवताओं के विषय में भी हम ऐसे वचन पाते हैं, जो परमात्मा में ही घट सकते हैं । इससे यही जान पड़ता है,कि एक ही आत्मा को अनेक प्रकार से वर्णन किया है। (८)वेद हमारे लिये किस देवकी उपासना बतलाते हैं,इसका उत्तर हिरण्यगर्भ वक्त में तो हम यह पाते हैं, कि हमारा उपास्य देव वही एक हिरण्यगर्भ है और उसके सिवा और कोई उपास्य देव नहीं। उस मुक्त में जैसाकि पहले लिख आए हैं, नौवार यह प्रश्न मिलता है, कि हमें किस देवकी पूजा करनी चाहिये ? और सब जगह यही उत्तर है, कि उस हिरण्यगर्भ की जो सारे देवों का एक देव है । और हम दूसरी जगह इन्द्र. के वर्णन में भी ऐमा ही पाते हैं:- .

११८ वेदोपदेश उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत । दधाना इन्द्र इदुवः ॥ ५॥ उतनः सुभगाँ अखिोंचेयुर्द- स्म कृष्टयः। स्यामदिन्द्रस्य शर्मणि॥६॥ (ऋ० ११४) चाहे हमारे निन्दक यह कहें, कि तुम यहां से निकल जाओ और दूसरी जगह से भी निकल जाओ। क्योंकि तुम इन्द्र केवल इन्द्र की ही पूजा करते हो ॥५॥ और चाहे हमें अच्छे लोग हे आश्चर्यस्वरूप (इन्द्र) अच्छा कहें, पर हम तुम्हारी केवल तुम्हारी ही छाया में रहें ॥ ६॥ यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि जिन लोगों का उपास्य देव केवल हिरण्यगर्भ को ठहराया है, उन्हीं का उपास्यदेव इन्द्र किस तरह हो सकता है, अगर इन्द्र और हिरण्यगर्भ एक ही न हो और फिर जब इन्द्र को उपास्य देव ठहराया है तब भी यही कहा है, कि तुम जो केवल इन्द्र की ही उपासना करते हो। यह तब ही ठीक होसक्ता है, कि जब इन्द्र मित्र वरुण और अग्नि में कोई भेद नहो, क्योंकि वेद में इन्द्र के सिवा वरुण आदि की भी उपासना पाई जाती है । जब इन में कोई भेद नहीं तो वह जो वरुण की आराधना करता है. वह इन्द्र की आराधना में कह सक्ता है, कि मैं सिवा इन्द्र के और किसी की पूजा नहीं करता, क्योंकि वह वस्तुतः किसी दूसरे की पूजा नहीं करता, जब वह इस सचाई को अनुभव करता है " इन्द्र मित्रं वरुण- मनिमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान। एकं सद्विप्रा वहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः" (९) फिर हम देखते हैं,कि देवताओं के नाम भी हमें एक ही देवता देवताओं के यौगिक नाम ११९ बतलाते हैं। हम कई ऐसे नाम पाते हैं,जो कर्म से उत्पन्न हुए हैं, जैसे वि- श्वकर्मा अर्थात वह देवता जिसने सब कुछ वनाया है (देखो ऋग् १॥ ८१, ८२) बृहस्पति = वाणी का मालिक ( १०, ६८) प्रजाप- ति= मजा का मालिक (१०। ८५ । ४३ ) वास्तोष्पति = घर का मालिक (७।५४) इसी प्रकार क्षेत्रपति, ब्रह्मणस्पति इत्या- दि । जब एक गृहस्थ पुरुष घर में कुशल क्षेम और आरोग्य वृद्धि के लिये उसमे प्रार्थना करता है, तो वह अपने इष्टदेव को वास्तोष्पति कह कर पुकारता है । और उस समय उसकी यह प्रार्थना कितने प्रेम और भक्ति से भरी हुई होती है:-" वास्तो- प्पते प्रतिजानीह्यस्मान्त्स्वावेशोअनमीवो भवा नः। यत्त्वेमहे प्रति तन्नोजुषस्व शन्नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे" (ऋग् ७ । ५४ । २) हे घर के मालिक, हमें स्वीकार करो, हमें अच्छी स्थिति दो और रोगों से बचाए रक्खो हम जब तुम से मांगते हैं, तुम हम को प्यार करो । हमारे मनुष्य और पशुओं के लिये कल्याणकारी रहो,, जिस प्रकार एक गृहस्थ घर में बैठकर उसको वास्तोष्पति मानकर उस में भक्ति दिखला ता है, उसी प्रकार एक किसान अपने क्षेत्र में बैठा हुआ उसको क्षेत्रपति मानकर उसकी स्तुति गाता है:-"क्षेत्रस्यपतिना वयं हितेनेव जयामसि।गामश्वं पोषयित्न्वासनो मृडातीहशे" (ऋग ४ । ५७ । १ ) क्षेत्रपति की सहायता से हम, गौ, घोड़ा और हर एक पुष्टि देने वाली वस्तु को जीतते हैं, जैसाकि किसी हितैपी की सहायता से, वह क्षेत्रपति हमें ऐसे . १२० वेदोपदेश काम में मुखी करे,, कई एक नाम ऐसे हैं,जो "तृ" प्रत्यय से बना ए गए हैं, जैसे 'पू' से सवितृ, 'धा' से धातृ, विधात, ''से बात, त्वक्षु' से त्वष्ट, 'नी' से नेत् । वास्तव में ये एक विशेषण शब्द है, जो उस २ कर्म को प्रगट करने के लिये बोले गए हैं। सावत = प्रेरने वाला, काम में लगाने वाला। धात = धारनेवाला, रचना करने वाला ! त्रातृ = रक्षा करने वाला । त्वष्ट = छीलने वाला- वढई । नेतृ = लेजाने वाला= जीवन पथका नेता = जी- वन का मार्ग दिखलाने वाला । जिन धातुओं से यह शब्द वने हैं, उनके अलग प्रयोग भी आते हैं । इसलिये ये शब्द उस २ कर्म के करने वाले को प्रगट करते हैं । ये किसी आकृति विशेष के नाम नहीं, इन से कोई आकृति वाला देवता सिद्ध नहीं होता, किन्तु यही प्रतीत होता है, कि उसी एक निराकार देवता को उस २ कर्म का कर्ता होने से वह २ नाम दिया है । इनके साथ कभी २ देवशब्द का अलग प्रयोग आता है । “विश्वो देव- स्य नेतुर्मों वुरीत सख्यम् । विश्वो राये इषुध्य ति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे” (५।५० ॥१) हर एक मनुष्य को चाहिये कि वह नेता देव की मैत्री को चुने, हर एक मनुष्य को चाहिये, कि वह ऐश्वर्य के लिये युद्ध करे, हर एक मनुष्य को चाहिये, कि वह पुष्टि के लिये यश को चुने ॥ (१०)अब इस विषय को हम यहां ही समाप्त करते हैं,इन प्रमा- णों से यह दिखलाया है, कि वेद का तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्म में है । वेद, कहीं साक्षात और कहीं उसकी रचना द्वारा, उसी एक को बतलाता है । इस दृढ़ विश्वास पर दृढ़ता देने वाला ऋषि का वह बचन सहस्रों वर्ष से अभी तक वैसा ही जाज्वल्यमान हुआ हमारे -

१२१
सारे वेदों का तात्पर्य ब्रह्म में है
पास आपहुंचा है:-"सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति
(कठ० २ । १५) इस वचन से विश्वास पाकर जव वेद की
शरण लेते हैं, तो वहां हमको फिर यही विश्वास मिलता है:-
ऋचो अक्षरे परमे व्योमनू यस्मिनूदेवा अधि
विश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति
य एदद्विदुस्त इमे समासते ॥(ऋग् ११.६४।३९)
ऋचाएं उस अविनाशी परम आकाश (परमात्मा ) में हैं
अर्थात् उसको वतलाती हैं, जो सारे देवताओं का अधिष्ठाता है।
जो उसको नहीं जानता, वह ऋचा से क्या करेगा, हाँ जो इस
को जानलेते हैं, वे हैं, जो ये आनन्द से रहते हैं ।।
स वै ऋषयोऽजायत तस्माचोऽजायन्त ॥
(अथर्व १३ । ४ । ३८)
ऋचाएं उससे प्रगट हुई हैं और वह ऋचाओं से प्रगट हुआ है।
ऊपर जो विषय निर्धारण किया गया है, कि एक ही
परमात्मा की महिमा अनेक रूपों से प्रगट की गई है । व्यष्टिद्वारा
भी उसी की महिमा को गाया है और समष्टिद्वारा भी उसी का
ज्ञान सिखलाया है । इसके लिये हमने संहिता के अन्दर से
पुष्कल प्रमाण देदिये हैं, मन्त्र संहिता का तात्पर्य जब मन्त्र की
भीतरी साक्षी से स्पष्ट हो जाता है, तो फिर कोई सन्देह शेष
नहीं रहता । पर हम यह बात भी दिखलाना चाहते हैं, कि यह
विचार हमारा कोई नया नहीं हैं । वैदिक काल से लेकर आज
तक इसकी वरावर रक्षा होती चली आई है। हां इस में सन्देह
नहीं, कि जितना हम मन्त्रों के पास २ रहते हैं, उतना ही यह
,

वेदोपदेश सिद्धान्त ज्यादा चमकता हुआ दिखलाई देता है और ज्यों २ पीछे हटते हैं, त्यों २ मध्यम पड़ता गया है, पर यह विश्वास किसी समय भी आर्यावर्त ने खो नहीं दिया ।। सब से पहले हम इस विषय को उपनिपदों से आरम्भ करते हैं, छान्दोग्य में से शुद्ध और शवल का भेद उपनिपद् के वचन से २२ पृष्ट में दिखलाया है और शुद्धस्वरूप का वर्णन २४-२५ पृष्ट में दिखलाया है । और ३३-३४ पृष्ट के नोट में ३०३, ३००३, ३३, ६, ३, २, डेढ़ और एक देवता दिखला कर अन्त में यह सिद्ध किया है, कि एक ही देवता है, और वह ब्रह्म है । फिर बृहदारण्य के प्रमाण से यह भी दिखलाया है, कि यह जो भिन्न २ देवताओं की पूजा कही है, यह उसी एक की पूजा है, वही सारे देवता है । बृहदारण्यक ३ । ७ में एक ही परमात्मा को सारे भूतों और सब देवों में अन्तर्यामी अधिष्ठाता वतलाया है । और ब्रह्मसूत्र १ । २ । १८ से २० तक यह सिद्ध किया है, कि यह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर है । छान्दोग्य १।६।६ ७, ८ में सूर्य के अन्दर उसको हिरण्मयं पुरुप दिखलाया है और ब्रह्ममूत्र .१ । १ । २०-२१ में यह सिद्ध किया है, कि हिरण्मय पुरुष परमात्मा है । और फिर छान्दोग्य ३ । १३ । ७ में इस प्रकार है:- अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वत: एष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विद वाव तद् यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः॥ जो इस यो से परे, उत्तम और अनुत्तम सारे लोकों में

ज्योति परमात्मा है
सब के ऊपर ज्योति (जोत) चमकती है। यही है, जो कि यह
पुरुप के अन्दर ज्योति है-
यहां ज्योति शब्द से और चमकने से यह संदेह होता है,
कि.यह भौतिक ज्योति का वर्णन है, भौतिक ज्योति सब के
ऊपर चमकती है और पुरुष के अन्दर भी यह ज्योति है, जो
विद्युत् और जाठराग्नि के रूप में है । पर ब्रह्ममूत्र १ । १ । २४
में इस सन्देह को काटकर यह सिद्ध किया है, कि यह ज्योति
परमात्मा है । स्वामी शङ्कराचाय ने इस सूत्र के भाष्य में बहुत
से सन्देह उठाकर उनका उत्तर दिया है। जिन में से एक यह है-
यत्तूक्तं " ज्योतिर्दीप्यते” इति चैतौ शब्दौ
कार्य ज्योतिपि प्रसिद्धाविति । नायं दोषः ।
प्रकरणाद्ब्रह्मावगमेसत्यनयोःशब्दयोरविशेष
कत्वात् । दीप्यमानकार्यज्योतिरुपलक्षिते
ब्रह्मण्यपि प्रयोगसम्भवात्। येन सूर्यस्तपति
तेजसः" ॥ (ले० प्रा० ३ । १२ । ९ । ७) इति च
मन्त्र वर्णात् ॥
जो तुमने यह कहा है, कि " ज्योति चमकती है। ये
दोनों शब्द (ज्योति और चमकना ) इसी ज्योति के लिये वोले
जाते हैं, जो यह उत्पन्न होनेवाली ज्योति है (इसलिये इस ज्योति
से तात्पर्य ब्रह्म नहीं किन्तु भौतिक ज्योति है) यह कोई दोप
नहीं । जब प्रकरण से ब्रह्म का निश्चय होगया, तो फिर ये दो.
नों शब्द कोई भेद नहीं कर सक्ते। यह चमकता हुआ कार्य ज्योति
भी तो अपनी चमक से उसी ब्रह्म का प्रकाश करता है; इसलिये

॥ -- . १२४ वेदोपदेश इन दोनों शब्दों का प्रयोग उस में संभव है और जिस तेज से म- दीप्त होकर सूर्य चमकता है" यह मन्त्र में ही वर्णन कर दिया है। स्वामी शङ्कराचार्य के इस लेख से स्पष्ट प्रतीत होता है, कि यह जगन् जब उसी का प्रकाश करने वाला है और उसी के अधीन इस के सारे काम हैं, इसलिये उपनिषदों में इसके द्वारा एस की महिमा का प्रकाश किया है। और जो शब्द इग के लिये वोले जाते हैं, वे ब्रह्म के लिये वोले गये हैं। इसी प्रकार ब्रह्ममूत्र १ ॥ १।२८-३१ के भाष्य में स्वामी शङ्कराचार्य कौषीतकि उप- निपद् के एक प्रकरण का विचार करते हुए यह सिद्ध करते हैं, कि यहां इन्द्र ने प्रतर्दन को जो माण की उपासना पतलाई है, यह ब्रह्म की ही उपासना है, क्योंकि प्राण की उपासना वतला- कर आगे कहा है:-"स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽऽन- न्दोऽजरोऽमृतः" सो यह प्राण ही ज्ञानस्वरूप, आनन्द अजर और अमर है । यह वात ब्रह्म में ही घट सक्ती है, दूसरे प्राण में नहीं घट सक्ती, इस लिये यहां प्राण से ब्रह्म अभिमाय है, दूसरा माण नहीं । इस पर पूर्वपक्षी ने कहा, कि इसी प्रकरण में यह भी तो लिखा है कि “इदं शरीरं परिगृह्योत्थाप- यति" प्राण ही इस शरीर को सहारा देकर उठाता है । शरीर को उठाना तो इसी माण का काम है, ब्रह्म का नहीं, फिर क्यों 'न यहां यही प्राण ममझना चाहिये, जिसका प्राण नाम प्रसिद्ध भी है। इसका उत्तर यह दिया है:- प्राणव्यापारस्यापि परमात्मायत्तत्वात, पर- मात्मन्युपचरितुंशक्यत्वात्। “नप्राणेन नापा- , उपनिषद में व्यष्टि समष्टि द्वारा ब्रह्म का वर्णन १२५ नेन मयों जीवति कश्चन । इतरेण तु जीव- न्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ" ॥(कठ२।५।५)इतिश्रुतेः। माण का काम भी परमात्मा के अधीन है, इसलिये (मा- ण का काम) परमात्मा में कह सक्ते हैं, जैसाकि श्रुति में है " न पाण से न अपान से कोई मनुष्य जीता है, किन्तु जिस से जीते हैं, वह इन दोनों से भिन्न (ब्रह्म) है, जिस में कि ये दोनों (माण, अपान) सहारा लिये हुए हैं" ॥ संहिता में जिस प्रकार शुद्ध और शबल का वर्णन है, इमी प्रकार उपनिषदों में शुद्ध और शवल का वर्णन है, संहिता में जिस प्रकार विराट् , हिरण्यगर्भ और प्रयति का वर्णन है इसी प्रकार उपनिषदों में भी तीनों का वर्णन है । संहिता में जिस प्रकार व्यष्टि के द्वारा उसकी महिमा को बतलाया है, उपनिषदों में भी इसी प्रकार व्यष्टि द्वारा उसकी महिमा को प्रगट किया है । उपनिषदों में ये सारे भेद अपने २ स्थान पर मिलेंगे। यहां हम उनमें से व्यष्टि और समष्टि उपासना का भेद दिखलाने के लिये उपनिषद् की एक प्रसिद्ध कथा का अनुवाद देते हैं-छान्दोग्य ५। ११.-"उपमन्यु का पुत्र प्राचीन- शाल, पुलष का पुत्र सत्ययज्ञ, भाल्लव का पुत्र इन्द्रद्युम्न, शार्क. राक्ष का पुत्र जन और अश्वतराश्व का पुत्र बुडिल,ये बड़े गृहस्थ और वेद के पूरे २ जानने वाले थे, इन्हों ने इकठे मिलकर यह विचार किया, कि हमारा आत्मा क्या है ब्रह्म क्या है । १ । उन्होंने निश्चय किया, कि अरुण का पुत्र उद्दालक जो अभी वैश्वानर आत्मा के विषय में शिक्षा पाकर आया है, आओ उस के पास चलें । तब वे उसके पास गए । अब उद्दालक ने यह .. - १२६ वेदोपदेश निश्चय किया, कि ये नो बड़े गृहस्थ और बड़े वेदवेत्ता हैं। ये मुझ से पूछेगे, और मैं इनकी सारी वातों का पूरा उत्तर नहीं दे सकूँगा । इस लिये मैं इनको किसी और आचार्य की और इशारा करूं । ३ । उसने उनको कहा, आओ हम केकय के पुत्र अश्वपति के पास चलें, जिसने अभी वैश्वानर आत्मा के विषय में शिक्षा पाई है, तब वे उसकी ओर गए । ४ । अश्वपति उनका आदर से स्वागत किया,और दूसरे दिन प्रातःकाल अव पति ने उनको कहा, मेरे देश में कोई चोर नहीं, कोई कदर्य (कंजूस ) नहीं, न कोई शराब पीनेवाला, न कोई ऐसा है जो अग्निहोत्र न करता हो, न कोई विनपढ़ा, न कोई व्यभिचारी पुरुष है, व्यभिचारिणी स्त्री तो कहां । हे भगवन्तो, मैंने यज्ञ करना है, उस में जो हर एक बात्विज को धन दिया जाता है, वह आप को दिया जाएगा, आप महानुभाव यहां रहें ॥ ५ ॥ उन्होंने उत्तर दिया, अपने अतिथियों को वह वस्तु दो, जिस की वे ढूंढ में हैं, आप वैश्वानर आत्मा के विषय में ज्ञान रखते हैं, वह ज्ञान हमें सिखलाओ ॥ ६ ॥ उसने उनको उत्तर दिया, कि मैं तुम्हें इसके विषय में कल सवेरे वताउंगा। दूसरे दिन प्रातः काल वे उसके पास आए, और समिधाएं हाथ में लेकर आए । उसने उनको उपनयन के बिना ही कहा ॥ ७ ॥ हे उपमन्यु के पुत्र तू किस आत्मा की उपासना करता है, उसने कहा, हे भग- चन् राजन् ! छौ की। (अश्वपति ने कहा कि तुम जिस की उपासना करते हो, वह बड़े तेज वाला आत्मा वैश्वानर है, इसी लिये तुम्हारे कुल में उत्तम यज्ञ देखे जाते हैं ॥ १॥ और तुम . भोग भोगते हो, प्रिय देखते हो। क्योंकि वही भोग भोगता है और मिय देखता है, उसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है, जो इस वैश्वा- उपनिषद में व्यष्टि समष्टि द्वारा ब्रह्म का वर्णन १२७ नर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है। पर द्यौ उस आत्मा का मूर्धा है (अर्थात यह वैश्वानर-विराट का एक अङ्ग है, वैश्वा- नर का पूर्णस्वरूप तुम इतने से नहीं समझे हो).... ॥२.॥ फिर उसने पुलुष के पुत्र सत्ययज्ञ को कहा, हे प्राचीन- योग्य! तुम किस आत्मा की उपासना करतेहो, उसने उत्तर दिया हे भगवन राजन् ! आदित्य (सूर्य) की। उसने कहा, तुमजिसकी उपासना करते हो, यह विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है । इसी लिये तुम्हारे कुल में सब प्रकार का ऐश्वर्य दीखता है ॥१॥ तुम्हारे रथों में खच्चरें जुड़ती हैं और तुम्हारी दासियों के पास मुहरों के हार हैं, तुम भोग भोगते हो, मिय देखते हो। क्योंकि वह भोग भोगता है और पिय देखता है,उसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है, जो वैश्वानर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है । पर आदित्य उस आत्मा का नेत्र है........ ॥२॥ तब उसने थाल्लव के पुत्र इन्द्रद्युम्न को कहा, हे व्याघ्रपाद की वंशवाले, तुम किस आत्मा की उपासना करते हो, उसने कहा, हे भगवन् राजन् ! वायु की। अश्वपति ने कहा, वह आत्मा जिसकी तुम उपासना करते हो, यह भिन्न२ मागों वाला वैश्वानर आत्मा है, इसीलिये भिन्न २ स्थानों से तुम्हें भेंट आती हैं, भिन्न २ रथों की श्रेणिये तुम्हारे पीछे चलती हैं. ॥ १ ॥ तुम भोग भोगते हो, मिय देखते हो । क्योंकि वह भोग भोगता है, मिय देखता है और उसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है, जो इस वैश्वानर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है, पर वायु वैश्वानर आत्मा का साल है........॥ २ ॥ तब उसने जन को कहा, हे शार्कराक्ष्य तुम किसं आत्मा - १२८ वेदोपदेश . की उपासना करते हो, उसने कहा, हे भगवन् राजन् ! आकाश की । अश्वपति ने कहा, तुम जिसकी उपासना करते हो, यह बहुल (भरपूर) वैश्वानर आत्मा है, इसीलिये तुम सन्तान से और धन से भरपूर हो ॥१॥ भोग भोगते हो और मिय देखते हो । क्योंकि वह पुरुप भोग भोगता है प्रिय देखता है और उसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है, जो इस वैश्वानर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है, पर आकाश वैश्वानर आत्मा के देह का मध्यभाग है........ ॥ २॥ तब उसने अश्वतराव के पुत्र बुडिलं को कहा, हे व्याघ्र पाद की वंशवाले ! तुम किस आत्मा की उपासना करते हो, उसने कहा हे भगवन् राजन् ! जलों की । अश्वपति ने कहा, तुम जिसकी उपासना करते हो, यह धनरूप वैश्वानर आत्मा है, इसी लिये तुम धनवाले और पुष्टिवाले हो ॥२॥ भोग भोगते हो, प्रिय देखते हो । क्योंकि वह भोग भोगतां है, मिय देखता है और उस की कुल में ब्रह्मवर्चस होता है, जो इस वैश्वानर आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है । पर यह वैश्वानर आत्मा की वस्ति (मूत्राशय ) है........ ॥ २॥ तब उसने अरुण के पुत्र उद्दालक को कहा, 'हे गौतम तुम किस आत्मा की उपासना करते हो । उसने कहा, हे भगवन् राजन् ! पृथिवी की । अश्वपति ने कहा, तुम जिसकी उपासना करते हो यह प्रतिष्ठास्वरूप वैश्वानर आत्मा है, इसी लिये तुम सन्तान के और पशुओं के द्वारा प्रतिष्ठा वाले हो ॥ १॥ भोग भोगते हो, प्रिय देखते हो। क्योंकि वह भोग भोगता है,प्रिय देख- ता है और उसके कुल में ब्रह्मवर्चस होता है; जो इस वैश्वानर .

उपनिषद में व्यष्टि समष्टि द्वारा ब्रह्म का वर्णन १२९ आत्मा की इस प्रकार उपासना करता है । पर यह वैश्वानर आत्मा के पाओं है ........ ॥२॥ तब अश्वपति ने उन सवको कहा, तुम इस वैश्वानर आत्मा को पूरा न जानते हुए भी भोग भोगते हो, पर जो इस वैश्वानर आत्मा को पूर्णरूप में जानता है, वह सव लोकों में सव भूतों में और सब आत्माओं में भोग भोगता है ॥ १॥ यह जो पूर्णरूप में वैश्वानर आत्मा है, बड़े तेजवाला धौ इसका मूर्धा है, सारेरूपों वाला आदित्य इसका नेत्र है, भिन्न २ गतिवाला वायु इसका सांस है, भरपूर आकाश इसका मध्यदेह है, धनरूप जल इसकी वस्ति है, पृथिवी पाओं है........ ॥ २॥ यह कथा पूरावर्णन है इस बात का, कि वैश्वानर-इस सारे विश्व का चलाने वाला आत्मा जैसे वह पृथिवी का नेता है, वैसे ही चौ का नेता है, जैसे द्यौ उसका प्रकाश करता है, वैसे ही पृथिवी भी उसका प्रकाश करती है । पर जो खाली घौ में ही उसके प्रकाश को देखता है, वह उसके एक ही कर्म को देखता है, क्योंकि धौ उसका एक ही अंग है । यद्यपि वह परमात्मा की बहुत थोड़ी महिमा को जानता है,पर वह उसी की ही महिमा को पहचानता है, इसलिये वह लोक में ऐश्वर्य भोगता है, भलाई देखता है और उसकी वंश में धर्म का तेज बढ़ता है । पर उसकी पूर्ण महिमा को वह पहचानता है, जो इस सारे विश्व में उसकी महिमा को देखता है। हम यहां संक्षेप से इतना ही लिखना पर्याप्त समझते हैं, कि उपनिषदों में परमात्मा के वर्णन करने की सारी रीति. वही है, जैसी मन्त्र में है। हां यह भेद अवश्य है, कि.मन्त्र में व्यष्टि वर्णन .

.. १३० वेदोपदेश की प्रधानता है और उपनिपद में समष्टि और शुद्ध वर्णन की प्रधानता है । जिस तरह नाम और वर्णन के भेद मे मन्त्रों में सन्देह उत्पन्न होता है, इसी प्रकार उपनिपद में भी नाम और वर्णन के भेद से सन्देह उत्पन्न होता है, जिसकी निवृत्ति के लिये भगवान वेदव्यास ने ब्रह्मसूत्रों को रचा । और इस प्रकार उपनिपद का विषय स्पष्ट कर दिया गया । ब्रह्ममूत्र के अध्याय १ पाद १ में उपनिपदों के उन वचनों पर विचार किया गया है, कि जिन में साफ तौर पर कोई ऐसा धर्म पाया जाता है, जो ब्रह्म में ही घट सक्ता है, शेप धर्म किसी देवता, भौतिक वा अध्यात्म पदार्थ के प्रतीत होते हैं। वहां उसी एक धर्म के सहारे पर यह सिद्ध कर दिया गया है, कि यह धर्म केवल ब्रह्म में ही घट सक्ता है, इसलिये यहां ब्रह्म का ही वर्णन है, शेप धर्म जो दूसरे पदार्थ के प्रतीत होते हैं, वे भी ब्रह्म में घट सक्ते हैं, क्यों- कि दूसरे पदार्थों के सारे काम ब्रह्म के अधीन हैं, इसलिये यहां ब्रह्म का ही वर्णन है। और यद्यपि ब्रह्मसूत्रों पर कई एक विषयों में आचार्यों का मत भेद है, पर ऊपर कहे हुए विषय में सव एक- मत हैं । इसीरीति पर जब वेदमन्त्रों को विचारें, तो वहां भी आप ऐसाही पाएंगे, कि जहां अग्नि का वर्णन है, वहां कई एक ऐसे धर्म हैं, जो इस अग्नि में घट सक्ते हैं, पर कई एक धर्म स्पष्ट ऐसे होंगे, जो केवल ब्रह्म में ही घट सक्ते हैं । अब यहां क्या निर्धा- रण होना चाहिये, उपनिपदों के ऐसे स्थलों में जो निर्धारण वेदाचार्यय भगवान् वेदव्यास ने किया है, और दूसरे आचायाँ ने एकमत हो कर जिसको स्वीकार किया है, वही निर्धारण यहां भी होना चाहिये । और ऐसा मानने में हम ठीक न्याय पर चलते हैं, क्योंकि जो धर्म ब्रह्म में ही रहसक्ते हैं, उनको किस

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मनुस्मृति से परमात्मा का वर्णन
१३१
तरह किसी और में कल्पना कर लें। ब्रह्मसूत्र अध्याय १ पाद
१ में तो उपनिपदों के उन विषयों पर विचार है, जहां कोई
स्पष्ट चिन्ह ब्रह्म के विषय का पाया जाता है, पर दूसरे और
तीसरे पाद में उन वाक्यों पर विचार है, जहां ब्रह्म के विषय
का स्पष्ट चिन्ह नहीं, किन्तु अस्पष्ट चिन्ह है, वहां पहले उस
अस्पष्ट चिन्ह को स्पष्ट किया है, और फिर यह सिद्ध किया है,
कि यहां भी ब्रह्म का ही वर्णन है । वेद का तात्पर्य समझने में
भी ऐसी ही सूक्ष्मदृष्टि की अपेक्षा है, जब इस दृष्टि से देखा
जाएगा, तो उस ब्रह्मवेत्ता ऋषि का वचन समझ में आजाएगा,
जिसने वेद के मर्म को समझा, ब्रह्म, को साक्षात किया और
फिर कहा “ सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति"
उपौनपदों की नाई धर्मशास्त्र भी इसी आशय पर पहुंचाते
हैं और इस लिये हम मनुस्मृति से नीचे उद्धत करते हैं-
आत्मैव देवताःसर्वा सर्वमात्मन्य वस्थितम्॥
(मनु० १२।११९)
(इन्द्र आदि ) सारे देवता परमात्मा ही है, परमात्मा में
ही सब कुछ ठहरा हुआ है ॥
प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि।
रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥
एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।
इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥
(मनु० १२ । १२२, १२३)

१३२ वेदोपदेश जो सव पर शासन करने वाला है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, तेजोमय है, समाधि की बुद्धि से जानने योग्य है, उस परम पुरुष को जानना चाहिये ॥ १२२ ॥ इसी को कई लोग अग्नि कहते हैं, दूसरे मनु और मजापति, कई इन्द्र, कई माण और दूसरे नित्य ब्रह्म कहते हैं ॥ १२३ ॥ इस प्रकार के प्रमाणों का सब प्रकार के ग्रन्थों से एक भारी संग्रह किया जासक्ता है, पर यह पढ़ने वालों को थकाने वाला होगा, इसलिये इतना ही पर्याप्त समझकर अव यह दिख- लाते हैं, कि वेदों के विषय में दूसरे भाष्यकार और टीकाकार भी हमारे इस सिद्धान्त को पुष्ट करते हैं, ऋग्वेदभाष्य के उपो- घात में:-"तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानिज- ज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजा- यत" इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए सायणाचार्य लिखते हैं, कि यह मन्त्र “सहस्रशीर्षा पुरुषः" इस प्रकरण में है, इसलिये इसका अर्थ यह है, कि उस (परमेश्वर ) से जो यज्ञ अर्थात् पूजनीय है और सर्वहुत् अर्थात जिसके लिये सब लोग होम करते हैं । सर्वहुत्, का अर्थ लिखते ही यह प्रश्न सामने आगया, कि होम तो इन्द्र आदि देवताओं के नाम पर किया जाता है, तुम कैसे कहते हो कि परमात्मा सर्वहुव है, इसका उत्तर वे इस प्रकार देते हैं:- यद्यपीन्द्रादयस्तत्र तत्र हृयन्ते, तथापि पर मेश्वरस्यैवेन्द्रादिरूपेणावस्थानादविरोधः ।

सायणाचार्यादि की सम्मति तथाच मन्त्र वर्णः “इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमा- हुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं स- द्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्चानमाहुः" इति । वाजसनेयिनश्चामनन्ति-"तद्यदिद- माहुरमुंयजामुंयजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेप उह्येव सर्वे देवाः" इति । तस्मात् सर्वेरपि परमेश्वर एव हूयते ॥ यद्यपि इन्द्र आदि के लिये ही वहां २ होम किया जाता है, तथापि परमेश्वर ही इन्द्र आदि स्वरूप से स्थित है, इसलिये यह दोप नहीं । जैसाकि मन्त्र में कहा है, एक सत् को विद्वान् लोग अनेक प्रकार से कहते हैं, इन्द्र. मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान, यम और मातरिश्वा कहते हैं। वाजसनेयी शाखा वाले भी पढ़ते हैं-" सोजो यह कहा जाता है, कि उस की. 'पूजा करो, उसकी पूजा करो,इस प्रकार एक २ देवता की। इसी की यह विविध सृष्टि है, यही सारे देवता है" इस से सिद्ध है, कि सब लोग एक परमेश्वर के लिये ही होम करते हैं। इसी प्रकार १ । १६४ मुक्त का सायण भाष्य भी हमें इसी आशय पर पहुंचाता है । महीधर-उबट और राजा गिरिमसाद-वाजसनेयी संहिता के आरम्भ में ही "देवो वःसविता" इसकी व्याख्या करते हुए महीधर ने लिखा है-सरितादेव, अर्थात अपने २ कर्तव्य में लगाने वाला धोतमान परमेश्वर । फिर हम-" तदेवाग्निः १३४ वेदोपदेश (३२ । १) की व्याख्या में इसी विषय को और स्पष्ट देखते हैं। इन्हीं स्थलों का उबटभाष्य और चन्द्रवंशी पाण्डव गिरिप्रसाद देववर्मा के रचित भाषा भाष्य से भी यही वात स्पष्ट प्रतीत होती है आनन्दतीर्थ-आनन्दतीर्थ ने ऋग्भाष्य के आरम्भ में गायत्रीमन्त्र के अर्थद्वारा परमात्मा का निरूपण करके यह लिखा है:- स पूर्णत्वात पुमान्नाम पौरुषे सूक्त ईरितः । स एवाखिल वेदार्थः.... वही सारे परिपूर्ण है, इसलिये पुरुषसूक्त में उसे पुरुप कहा है। और वही सारे वेद का अर्थ है । इस विषय में बहुत से हेतु देकर, जव सूक्तों का भाष्य आरम्भ किया है, तो वहां अग्नि, वायु इसादि से परमात्मा का ही वर्णन सिद्ध किया है । भट्टभास्कर ने तै० सं० की व्याख्या में पहले मन्त्र पर ही लिखा है:- तत्रैकैव महती देवता ग्निवायुसूर्यरूपेण वि- भक्ता सर्वत्र ध्यातव्या। तासां विभूतयः ए- थिव्यन्तरिक्षयुस्थाना अन्या अपि देवता इति नैरुक्ताः॥ एक ही देव अग्नि, वायु और सूर्यरूप से अलग २ हुआ सब जगह समझना चाहिये, पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यौ में रहने वाले और सारे देवता उनकी विभूतियें हैं। फिर इसी मन्त्र में " सविता" का अर्थ इस प्रकार दिखलाया है “सविता स- -- भट्ट भास्कर की सम्मति र्वस्य प्रेरकः, येन विना तृणायमपि न चलति सविता= सव का प्रेरने वाला, जिसके विना तिनके का सिरा भी नहीं हिलता । १ । २ । १४ की व्याख्या में (याहि )= जा, यह अग्नि का विशेषण देखकर उसपर लिखा है- नहि देवो विश्वात्मा कुतश्चिदायाति नक्वचि- याति, स्तुतिः खल्वियं क्रियते स्वाभिलषित सम्पादनानुरूपा-याहि, आयाहि, उत्तिष्ठ, प्रत्यातनुष्व, ऊोभव इत्यादिस्वरूपा॥ सर्वान्तर्यामी देव न कहीं से आता है, न कहीं जाता है। इसलिये जा, आ, उठो, फैलाओ और ऊपर हो, इत्यादि शब्दों से अपने मनोरथ सिद्धि के लिये केवल स्तुति ही है । * यहां यह दिखलाना भी उपयोगी है, कि परमात्मा के इस रीति से वर्णन करने में क्या गुण है। सच तो यह है,कि सर्वान्त- र्यामी का वर्णन ही इसी गति पर होसक्ता है और इसीलिये अन्तर्यामी ब्राह्मण (बृह० ३ । ७) में देवता, लोक, वेद, यज्ञ, भूत, इन्द्रिय और आत्मा में अलग २ उसकी अन्तर्यामिता दिख * श्रानन्दायम संस्कृत ग्रन्यावलि में जो सन्ध्याभाष्यसमुच्चय छपा है, उन में से कई एक भाप्यों में अग्नि, जातवेदस्, वरुण, मित्र और अप आदि शब्दों से स्पष्ट परमात्मा का वर्णन किया है और बव्हृच सन्यापद्धतिभाष्य में, भूः, भुवः इत्यादि सात व्याहृतियों का अर्थ परमेश्वर सिद्ध करते हुए यह प्रमाण उद्धृत किया है- "तत्र तत्र स्थितो विष्णु स्तन्नाम्नोच्यते बुधः" उस २ में रहने वाला विष्णु उसो २ नाम से बोला जाता है।

वेदोपदेश लाई है । इसलिये सर्वान्तर्यामी के वर्णन करने की रीति ही इस से भिन्न नहीं होसक्ती । और फल इसका यह है, कि जो अपने मालिक को इस प्रकार सर्वान्तर्यामी देखता है, वह सदा अपने मालिक को अपने सामने और अपने साथ देखता है और उसके नीलकण्ठ-महाभारत की टीका में नीलकण्ठ ने जो बहुत जगह पर इन्द्र आदि शब्दों से परमात्मा का वर्णन माना है, उस में से हम दो स्थल दिखाते हैं १ । १ । २२ को व्यख्या में सब से पूज नौय एक ही परमात्मा है, यह दिखलाते हुए किसी मा ति का प्रमाण दिया है- "यदेनमृग्भिः शंसन्ति यजुभिर्यजान्ति,सामभिःस्तुवन्ति " कि ऋचाओं से उसी की स्तुति करते हैं और यजुत्रों से उसी के लिये यज्ञ करते हैं और साम मन्त्रों से उसी के स्तोत्र पढ़ते हैं। और फिर १ । ३ । ५६ को व्याख्या में अखिदेवताओं का वर्णन करते हुए यह लिखा हैं उभाउनून" (१० । १०६ । १) . इस मन्त्र में “ वितन्वाथे धियः" इन पदों से अश्वियों को अन्तर्यामी बतलाया है, और इसका अर्थ 'धियो यो नःप्रचोदयात्' के बराबर है, इसलिये अखि ब्रह्म हैं, और इसके आगे मन्त्र '६ में "जर्भरीतुर्फरीतू " ये दो शब्द अखियों के विशेषण हैं, अर्थात् पालन करने हार और प्रलय करने हारे, पालन और प्रलय करना भी ब्रह्म का ही धर्म है, इसलिये यहां अखियों के द्वारा ब्रह्म का उपदेश दिया है इत्यादि । हम जानते हैं,कि यह संग्रह हमारे पाठकों के लिये रुचिकर नहीं होगा, पर यह जितलाना आवश्यक था, कि आर्यावर्त में वैदिक विद्या को बहुत ही थोडी चर्चा रह जाने पर भी यह विचार विल्कुल अस्त नहीं हुए। हां इसमें भीसन्देह नहों,कि वेदोंका पवित्र धर्म जो एक बार अज्ञात होगया है,उसको फिर अपने असली स्वरूप में प्रकाश करने के लिये आर्यावर्त में फिर पूरा प्रयत्न नहीं हुआ । खामी शङ्कराचार्य के प्रबल काम के पीछे हम फिर से एक .

वैदिक धर्म का प्रभाव जीवन में धर्मबल और निर्भयता दोनों का वास होता है, उसका भावन धर्म का जीवन, सचाई का जीवन, और शूरवीरता का बन जाता है। - - बार शैव और वैष्णव सम्प्रदायों को अपने पुराने धर्म के उचार में महत्त हुआ देखते हैं, हम उनके उस समय के ग्रन्थों में वैदिक उच्च भावों को झलक देखते हैं, पर साथ ही शोक के साथ यह भी देखते हैं, कि यह काम अभी प्रारम्भ ही हुआ था और नए संस्कारों और साम्प्रदायिक विवादों से अभी शुद्ध नहीं हुआ था, कि यह काम उसी अवस्था में बंद होगया । उसकी कई शताब्दियां पीछे आज हमारे समय में स्वामी दयानन्द सरस्वती के प्रबल कामने फिर आर्यावर्त को वेदों की ओर झुकाया है । और हम देखते हैं कि वेदों में अनेक विभूतियों द्वारा जिस प्रकार परमात्मा का वर्णन हमने ऊपर दिखलाया है, यह हमारे नए साथियों से स्वीकार किया गया है। विक्रमी संवत् १८४१ में पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव ने यजुर्वेद का भाष्य छपवाया, उसके प्रारम्भ में वह लिखते हैं:- वेदेषु व्यक्ताव्यक्तेश्वरस्यैवस्तुतिरूपा मन्त्राःसन्ति तस्मात्तन्नामब्रह्मच" सारे वेदों में शुद्ध और शबल ब्रह्म को ही स्तुति गाने वाले मंत्र हैं, इसीलिये वेदों का नाम ब्रह्म है। इसके भागे इसी बात को श्रुति स्म ति के प्रमाणों से सिद्ध किया है। और फिर मन्त्रों की व्याख्या में सारे मंत्रों का एक २ अर्थ अध्यात्म विद्या में लगाया है और उस में अग्नि आदि सब ब्रह्म के नाम पाये जाते हैं। मार्च सन् १८८० ई० में उन्होंने सामवेद का भाष्य छपवाया यह भाष्य भी यजुर्वेद के भाष्य की रीति पर एक अर्थ में अध्यात्म विद्या का प्रकाशक है। और अभी विक्रमी सम्वत् १८५१ में वाजसनेयी संहिता का नी भाष्य पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र ने छपवाया है, उस में वह पहले ही मन्त्र की व्याख्या में यह शंका उठाते हैं कि जड़ी को सम्बोधन करने से क्या लाभ है, क्योंकि वे सुनते नहीं हैं। इसके उत्तर ।

१३८ वेदोपदेश जो इस भान्ति हरएक समय अपने मालिक को अपने निकट देखेंगे, उनके भाव उच्च होंगे और वे बड़े ही सदाचारी होंगे । एम०वार्थ साहिव बहुत ठीक कहते हैं, कि वैदिक देवता निकटवर्ती स्वामियों की नाई हैं और वे मनुष्यों से अपने धर्म का उचित प्रतिपालन चाहते हैं, लोगों को उनसे निष्कपट होना चाहिये, क्योंकि उनको (देवताओंको) धोखा नहीं दिया जा सक्ता, स्वयं वे भी किसी को धोखा नहीं देते, अतएव उन (देवताओं) का यह हक है, कि वे मित्र भाई और पिता की भान्ति अपने ऊपर लोगों का विश्वास तथा प्रीति प्राप्त करें ........मनुष्यों को अपवित्र बनने की अनुमति कैसे दी जासक्ती है, जबकि स्वयं देवता पवित्र हैं । सूक्तों में निःसन्देह यह एक अद्भुत बात है, कि उनमें कोई दुष्ट प्रकृति के देवता नहीं पाए जाते । कोई नीच और हानि कारक यात नहीं पाई जाती.... ....अतएव हमलोगों को यह स्वीकार करना चाहिये, कि मुक्तों में एक उच्च और विस्तृत धर्म की शिक्षा पाईजाती है । (एनौंट इन्डिया १।६)- इस उदृत भाग में यह वात कैसी स्पष्ट दिखलाई गई है, कि वैदिक देवता स्वयं पवित्र हैं, निष्कपट हैं, उनकी पूजा करने का सारांश यह है, कि ये जड़के सम्बोधन नहीं, ये सब चेतन परसा मा के सम्बोधन हैं, क्योंकि "सारे वेद उसोको वतलाते हैं " इसके आगे मन्त्रों की व्याख्या में भी हम अग्नि आदि शब्दों से परमात्मा का वर्णन देखते हैं। देखो (१ । १३ । । १७,४।२४।३ । २८) ये प्रमाण हमें इतने ही अंश में अभिप्रेत हैं, कि वेदों को अभ्यास से हरेक को यह बात आसानी से प्रतीत हुई है, कि वेद में एक पर- मात्मा को अनेक प्रकार से वर्णन किया है ! और किसी अंश में हम इन प्रमाणों के जन्मेवार नहीं, १३९ वैदिक धर्म का प्रभाव वाला पवित्र और निष्कपट बनेगा । वैदिक देवता न किसी को धोखा देते हैं और न कोई उनको धोखा देसक्ता है। उन पर हमारा विश्वास और प्रेम इस भान्ति है, जैसे मित्र का मित्र में भाई का भाई में और पुत्र का पिता में होता है। हम अपने देवता के साथ इस से बढ़कर और क्या सम्बन्ध रखसक्ते हैं, हमारा देवता हमारे लिये भयानक नहीं और दुष्पाप नहीं । वह ऐसा ही हितैषी है, जैसे पिता पुत्र का, भाई भाई का और मित्र मित्र का और ऐसी ही आसानी से उसके पास जासक्ते हैं, जैसे पुत्र पिता के। ऐसासच्चा धर्म निःसन्देह इस योग्य है,कि वह सारी दुनिया का धर्म बने । एम० वार्थ साहेच.का यह वचन कैसा सचाई से भरा हुआ है, कि हम लोगों को यह मानलेना चाहिये, कि सूक्तों में जिस धर्म की शिक्षा है । यह एक बड़ा उच्च और विस्तृत धर्म है। वैदिक धर्म संकुचित नहीं, वह किसी एक जाति वा एक देश का धर्म नहीं, वह एक ऐसा फैला हुआ धर्म है, जिसकी छाया में सारे देश और सव जातियां विश्राम पासक्ती हैं। ऐम०वार्थ साहिब की एक बात से हमारा मेल नहीं. और वह यह है, कि सूक्तों में देवता अनेक नहीं, किन्तु एक ही देवता अनेक भेदों से वर्णन किया है, सो हम पूर्व दिखला आए हैं। और हम यह देखते हैं, कि वेद में स्वयं इस भ्रान्ति को बड़ी अच्छी तरह दूर कर दिया गया है जैसाकि पूर्व (३९ पृष्ट में) दिखला आए हैं- यस्य त्रयस्त्रिंशद्देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे । तान् वै त्रयस्त्रिंशतोदेवानेके ब्रह्मविदो विदुः॥

१४० वेदोपदेश यहां तक हमने वेद के और दूसरे ग्रन्थों के प्रमाणों के द्वारा यह दिखलाया है, कि वेद एक ही परमशक्ति परमात्मा का प्रतिपादन करते हैं और यह भिन्न २ देवता उसकी महिमा के प्रतिपादन करने का द्वार हैं । अब हम इस विपय में थोड़ा सा तर्क भी दिखलाना चाहते हैं । हम पूर्व (७४ पृष्ट में)लिखआए हैं- प्रजापते नत्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि- परि ता बभूव । हे प्रजा के मालिक ! तेरे बिना कोई दूसरा इन सष पर हकूमत नहीं कर रहा है। इस मन्त्र में दिखलाया है, कि वह सघका ईश्वर है और उसके सिवाय कोई दूसरा ईश्वर नहीं, यह क्यों! इसलिये, कि यदि दो बरावर के ईश्वर हों, और उन दोनों की कदाचित् एक ही वस्तु के विषय में विरुद्ध इच्छा हो, एककी यह इच्छा हो कि यह वस्तु बहुत देर तक बनी रहे और दूसरे की इच्छा हो,कि अभी नष्ट होजाए,तो उनदोनों में से एक की इच्छा पूरी होगी, अब जिसकी इच्छा फल नहीं लाए- गी, वह दूसरे के वरावर नहीं होसक्ता और वह ईश्वर नहीं हो सक्ता या दोनों तब बराबर रह सक्ते हैं, जबकि दोनों की इच्छा पूरी नहो, पर ऐसी अवस्था में ईश्वर दोनों ही नहीं बन सक्ते । या दोनों तब वरावर हो सक्ते हैं, कि दोनों की ही इच्छा पूरी होजाए, सो हो नहीं होसक्ता, क्योंकि वे परस्पर विरुद्ध इच्छ। रखरहे हैं। और यदि यह कहो,जबकि उनकी इच्छा कभी एकदूसरे के विरुद्ध होती ही नहीं, इसलिये यह दोष नहीं आता, तव. दूसरा ईश्वर मानने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि जो एक की इच्छा है, यदि उसके अनुसार काम पूरा होजाता है, तो उसी - .

ईश्वर के एक होने में युक्ति
१४१
काम को पूरा करने के लिये दूसरे की इच्छा कोई अधिक फल
नहीं लाती। यदि यह कहो, कि सारे ईश्वर मिलकर एक सम्मति
करके काम करते हैं, जैसे अन्तरङ्गसभा (पंचायत) किया करती
है, तो उन में से कोई भी ईश्वर नहीं, क्योंकि किसी एक का
इख्तियार नहीं। और यदि यह कहो, कि वारी से ईशना (हकू-
मत) किया करते हैं, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जो धर्म
नित्य है, वह वारी को नहीं देखता। यदि वह सदा ईशना करत
है, तो उसकी ईशना नित्य है और यदि कभी करता है और
कभी नहीं, तो उसकी ईशना अनित्य है, और अनित्य ईशना
को रखकर ईश्वर नहीं होसक्ता, ईश्वर वही है, जो सदा ईश्वर है।
जो कभी अनीश्वर है, वह कभी भी ईश्वर नहीं। और आप
अपनी तरह उसके थकने की चिन्ता न करें, जिस के लिये
वारी की जरूरत पड़ती है, वह सर्वशक्ति अकेला ही अपने
सारे काम आप साधता है और हमेशा साधता है । इसलिये-
स एष एक एक एक वृदेक एव
एक एवामिबहुधासमिद्ध एकःसूर्यो विश्वमनु प्रभूतः।
एकै वोपाः मर्वमिदं विभायेकं वा इदं विवभूबसर्वम् ।

(३४२ ) ॥ विषय सूची॥ पृष्ट १ २ :: ४ विषय धर्म से लोक परलोक दोनों सुधरते हैं धर्म ही जगत् का सहारा है मन्त्रों में धर्म का पूरा वर्णन है मंत्र ही धर्मके बताने में समर्थ हैं ब्रह्म का यथार्थ ज्ञान वेद से ही होसला है वेद का पदना नित्य कर्म है वेदाभ्यास के ऐहिक फल वेदों में ईश्वर का वर्णन किस रीति पर है ब्रह्म का शुधखरूप (स्कम्भसूत) प्रसङ्ग से ३३ देवताओं का वर्णन (नोट) ब्रह्म का विशुद्ध स्वरूप (स्कम्भसूक्त) प्रलय की अवस्था उत्पत्ति का कारण :: १२ १३ १३ १६ २५ C . ... ३१ ४८ ५२ :: : : प्रलय सूक्त का तात्पर्य : : C ८६ ८४ :: सृष्टि विषय में दूसरों का सिद्धान्त हिरण्यगर्भ का वर्णन (हिरण्यगर्भसूत) ६५ विराट् का वर्णन (पुरुषसूक्त) विश्वकर्मा का वर्णन (विश्वकर्मसूत २) सब देवताओं के नाम उसी एक परमात्मा के हैं ब्रह्म का शक्तिरूप से वर्णन सारा विश्व व्रत को प्रकाश करता है १०६ अग्नि आदि ब्रह्म के नाम हैं १०८ अग्नि प्रादि देवता ब्रह्म की महिमा से महिमा वाले हैं १०८ ब्रह्म के एकत्व का वर्णन ११० एक ही ब्रह्म की अनेक प्रकार से स्तुति और पूजा (यज्ञ) हैं ११२ ब्रह्म हो सब देवताओं का अन्तरात्मा है ११२ वरुण में असीम शक्ति का वर्णन ११४ इन्द्र में असीम शक्ति का वर्णन :: : :

पृष्ट ( १४३ ) विषय वेद एक ही देव की उपासना बतलाते हैं उपासना के नियम से भी एक ही देवता सिद्ध होता है ११८ यौगिक नामोंसे भी एकहीदेवभिन्नगुणों वाला सिद्ध होता है ११९ सारे वेदों का तात्पर्य ब्रह्म में है १२० ज्योतिः से परमात्मा अभिप्रेत है (उपनिषद्) १२२ प्राण से परमात्मा अभिप्रेत है १२४ उपनिषद् में व्यष्टि समष्टि द्वारा ब्रह्म का वर्णन १२५ ब्रह्म के वर्णन में मन्त्र और उपनिषद् की समता १२९ मनुस्मति से परमात्मा का वर्णन १३१ सायणाचार्य की सम्मति १३२ महीधर, उबट और गिरिप्रसाद को सम्मति १३३ प्रानन्दतीर्थ की सम्मति १३४ भट्टमास्कर की सम्मति वैदिक धर्म हमारे जीवन पर क्या प्रभाव डालता है १३५ एम.बार्थ साहब को सम्मति १३८ ईश्वर के एक होने में युक्ति १४० १३४ हैं • इस ग्रन्थ में जो २ प्रमाण उद्धृत हुए उनका सूची। ११८ ११५ our ११३ . ऋग्वेद १।४ । ५-६ १।२४ । ७ १ । ४०१६ १ । ५२ । २ १ । ५२ । १३ ११६७।३ १।८४।७ १ । १४७।४ १ । १६४ । ७ ६ ११७ ६ १।१६४ । २२ "१०८ ११ १६४।३८ । ५५,१२१ २।१।३-६ ४। ५७।१ ५। ५०।१ ११९ ५। ८५।१ ११५ ७. ५४।१ ११८ १०।४८।१. १० । ७१।६ १३. ६ ६ ( १४४ ) '३ । १.. ४ . १०।८१* ८५ १०।८२ * २२ ४।८ २० १०।८२।३ १०८ | मुण्डक, उपनिषद १।२।८ १०।८८।१० १०1८।१-१४ ७६ २।१।११ २१ १०।८।३ २३ | छान्दोग्य ३ । १३ । ७ १२२ १०।८८।१ ११४ ७।४ । १ १०।१२१ * ६५ ८।१ । १३ २२ १०।१२५ * १०० हहदारण्यक ३1८।१० २४ १०। १२८ * ५२ ४।१।६ ११२ १०।१३४।७ ६ खेताखतर १२१ वाजसनेयसंहिता ३२१८ १६ निरता ७।४ ११२ ३२।१ १.८ | आपस्तम्बधर्मसूत्र।। ७।१-४ १ अथर्ववेद ४ । १६॥२-३ ११५ | मनुस्मृति २।१०७ १४ १. ।७* २६ ५।४ १४ १. ।७। २१ २१ १२ १०।८।१ ४८ १२ । ११८ १३१ १०।८।२:३७ ५. १२।१२२-१२३ १३१ १०।८।४४ ५१ महाभारत १३.।३। १३ १०८ शङ्कराचार्य (छान्दोग्य भाष्य) ७ । १३।४।३-४ ११० ४।१) ५ १३।४।१४-२१ ११० १३।४।२९-४० १०६ ब्रह्मसूत्र भाथ १।१।३३ १३।४।३८ १२१ १।१।२४ १२३ १६।७१।१ १५ १।१।२८ १२४ मतपथ ब्राह्मण १४।४।२।२ ६३ जयन्तभट्ट(न्यायमनरो१।४।१)८ तैत्तिरीय ब्राह्मण ३ । १२.८ १२ सायण १३२ ऐतरेयारण्यक ३ । २।३।१२ ११२ | महौधर, उबट, गिरिप्रसाद १३४ तैत्तिरीयारण्यक ३।२।४ १३ प्रानन्दतीर्थ १३४ रंश उपनिषद् ७ २२ । भट्टभास्कर कठ उपनिए । १५ १२१ एम.बार्थ साहेब २। ५ । ५ १२५ | नोट- सन्ध्याभाष्यादि १३५.१३७ ३ धर्मसम्बन्धी और विद्यासम्बन्धी पुस्तकें प्राचीन भारत वर्ष की सभ्यता का इतिहास पहला भोग- यह पुस्तक मिस्टर. आर. सी. दत्त के प्रसिद्ध इतिहास एन0ट इन्डिया का हिन्दी अनुवाद है महात्मा ग्वीसप मेज़नी ) जापान का संक्षिप्त इतिहास 1) वाला वोधिनी-पहला हिस्सा (लड़कियों के लिये): -) ईश उपनिषद-हिन्दीभाषामें शब्दार्थ भावार्थ और व्याख्यान समेत. ITT केन उपनिषद-इसकी व्याख्या भी वैसी ही है उपदेशसप्तक-इस में आर्षग्रन्थों के आधार पर उत्तम २ उपदेश लिखेगए हैं गार्थना पुस्तक भोंकार की उपासना और माहात्म्य बामि शंकराचार्य और उनकी शिक्षा 13) विकृतःप्रथम पुस्तक इन्दी की प्रथम पुस्तक डाक व्यय अलंग देना होगा। पत्रादि भेजने का पता राजाराम सम्पादक आर्षग्रन्थावलि, लाहौर॥ न

॥ आर्षग्रन्थावलि ॥
यह मासिक ग्रन्थावलि दिसम्बर १९०४ से निकलनी.
आरम्भ हुई है। इस में वेद,उपानपद् और धर्मसूत्रों के सरल हिन्दी
उल्थे छपते हैं । संस्कृत और इङ्गलिगा के योग्य विद्वानों ने इस
का आदर के साथ स्वागत किया है और इसके परिश्रम का.
कदर की है। हम २० समाचार पत्रों की सम्मति नीचे प्रका-
शित करते हैं-
"यह ग्रन्थावलि सचमुच एक नया प्रकाश लाने वाली है।
पण्डित राजाराम जी संस्कृत प्रोफेसर डी०ए०वी कालिज इस
ग्रन्थावलि के द्वारा उन सचाइयों को रोशनी में लाना चाहते हैं,
जिनपर ज़माना के हाथों परदा पड़ चुकाहै" काम बहुत बड़ा
और....(सम्पादककी प्रशंसा छोड़दी लेख सरल और मीठा है,
पण्डित जी जिस सौन्दय और विस्तार के साथ लिख रहे हैं
उसका सम्बन्ध केवल देखने से ही है । ऐसा पूरा विचार यदि
सारे आर्षग्रन्थों पर लिखा जाएंगा, तो निःसंदेह नागरी के सा-
हित्य में एक बड़ी भारी बढ़ती होगी। "इससे आर्षग्रन्थों का
स्वाध्याय बढेगा, जो इसका उद्देश्य भी है" यह उचित है, कि
सारी की सारी कौम " नागरी मचाणीसभाएं" "आर्ययसमानें"
इसकाममें पूरी मदद देकर सम्पादक का हौसला बढ़ाये ॥
समाचार पत्रा के नाम हम अलग प्रकाशित करेंगे। इसके
सिवाय योग्य २ विद्वानों के प्रशंसा पत्र भी हैं।
भीग्रम वार्षिक मूल्य डाकखच समेत
"
३
)
मैनेजर
आर्षग्रन्थावलि लाहौर ॥

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Arshgranthawali Vedopadesh Volume - I

Author
Pandit, Rajaram
Title
Arshgranthawali Vedopadesh Volume - I
File name
Arshgranthawali Vedopadesh Volume - I
Text
OCR done
Citation
1905
Published
2009/11
Publisher
Lahore, Anglo -sanskrit Press
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Ved - Updesh
DLI number
344330
Barcode
99999990234200.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
8RTCP5ylkZU
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