Kumarappa Institute Of Gram Swaraj, Jaipur
Ek Krantikari Ke Sansmaran
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न एक क्रांतिकारी के संस्मरण -प्रिंस क्रोपॉटकिन का रेखाचित्र और संस्मरण- १९५७ सत्साहित्य प्रकाशन
मान्द शाय
मंग, गम्ना गाहिर मान
पहली बार : १९५७
मल्य
वारह आना
मुद्रक
नेशनल प्रिटिंग यरम,
प्रकाशकीय
।
क्रोपॉटकिन के नाम से हिंदी के पाठक भली-भाति परिचिन
है। वह रूस के महान क्रानिकारियो में से थे, पर उनकी
काति कोरमकोर तोड-फोड की क्राति नही थी। वह ऐसी थी, जो
धीरे-धीरे अपना प्रभाव डालती है और व्यक्ति तथा समाज के
मूल्यो को बदल देती है। वे उच्च कोटि के वैज्ञानिक तथा
चितक भी थे। उनकी अनेक रचनाए उपलब्ध है. जिनमें बड़ी
महत्त्वपूर्ण विचार-सामग्री प्राप्त होती है।
हाल में प्रोपॉटकिन की एक पुस्तक 'मण्डल' में प्रकाशित
हुई है-'क्राति की भावना'; और भी उनको कई कितावे
'भण्डल' से निकल चुकी है। इस पुस्तक में उनको आत्म-कया
('दी मेमोयर्स ऑव ए रिवोल्यूगनिस्ट') के आधार पर उनकम्म
में रहनेतक की जीवनी का सार दे दिया गया है । एक रेखा-विम
मे उनके पूरे जीवन पर भी प्रकाग डाला गया है। नाथ में
उनके जेल से भागने का वृत्तात भी उनकी आत्म-गया
मे से दिया गया है, जो इतना रोचक और रोमानकारी है कि
पढकर रोंगटे खड़े हो जाते है।
आशा है, पाठकों को इस पुस्तक ने कुछ स्फूर्ति मिलेगी
और वे इसके प्रसार में सहायक होगे।
--मंत्री
विषय-सूची.
पृष्ठ
१. प्रिन पोरांटकिन :
रेवानिन
५
१८
२. नम्मरण
३. में जेल में में भागा
१
-प्रोपॉटरिन
७३
एक क्रांतिकारी के संस्मरण
: १ :
प्रिंस क्रोपॉटकिन : रेखा-चित्र
"जनाव व्लादीमीर इलियच (लेनिन), जब आपकी गाना तो यह
कि हम एक नवीन मत्य के मसीहा बनें और नवीन गज्य के नाम,
तो फिर आप किग प्रयाग बीभत्स नरनारी जनानागं और गैर-मुनामिन्द
सरकारी तौर-नर्गको को अपनी म्बीपनि दे मनने हैं. जनतरिमी मगर
के लिए अपगधी के नाते-रिस्तेदागे को गिरगनार करना ना
प्रतीत होता है कि आप जाग्गाही को विनागे मे विपरहा है । गायन
निरपराध आदमियों को परदार आप अपनी जान कोसाना नाना
क्या आप उनने अधे होगए हैं और अपनी नानागाही विनाश
गुलाम वन गए है कि आपको परवान नही मूलती कि आT-नमें गिन
साम्यवाद के अग्रणी के लिए यह कार ( रज्जाजना नर्गनागनियन
की गिरफ्तारी) मा अनधिकार पेष्टा ' पागम भरा
रुप से शुटिपूर्ग तो है ही, बनि उमगे यह भी प्राट होता है मामा
से उग्न है, जो गर्वथा तकं-विहीन बान है। उन नायगारे विका
कहा जाय, जिनका एक महत्त्वपूर्ण भाम प्रगानमार्गगता
भावना को पैरोनले गुनगना जाना
यह है उस लाजवाब पनका. अगजिन पनजननिस्निी
मे (अपनी मृत्य ने दो महीने पूर्व) योगनिने लेनिन योनि
24
एक निराग के मंग्मरण नदिनी निगान मनी गन्य ने निगुन माया और न ४१ दंग-निगाले में बाद नार यांनी मातृभूमि में मोटू पाजायण मंगाटार परलोर-गमन की नमारी कर रहे थे। इन पदो में उगयी और बीमयो नताली के उस महापुरत को आन्मा बो रही है. जिगने सभी अन्याय पे माय नमोना रग्ना मुनागियन गमज्ञा, जिमनं मापन और गाय मोनीयोपविमना पर ममान म्प में जोर दिया और जिनने ईमानदारीनपा अपरिग्रह ना यह दृष्टान उपगित कर दिया, जिसकी मिगा: ममार में गजनिक गर्नाओ के निहाम में दुर्लभ ही है। जब रेम्बी ने गोटिफिन में पहा, "आप हमारे मार्ग मनि- महल में नाहे जिस पद को नन लीजिए, वही आपो अपित हो जायगा", उस समय पाटक्नि ने उत्तर दिया था-"मंत्रित्य में वायं की अपेक्षा तो में उनी पर पालिका पग्नेवाले नमार का नाम लिए आदरणीय नया उपयोगी मानना है।" उसी प्रकार दम रजार बलपी पंगन में प्रगार को उन्होने टुकरा दिया और जार ये गीतरालीन मरलो निवाग मीमांया मोक्षा की। यह नो हुई लेनिन में पूर्व में गागा गमय की बा7, म्या गाम्यवादी मरवार शिक्षा-मनीदनाचरम्मी ने जब मन को लगा, "आप मकारवाईलाम बसेकर अपनी गिनानोकानमा अघि कार में दीजिए", गो ग्रोपानिने उना दिया-"मन नागभी भागनगे पंगारिया नहीं और न अब ही मगार्ग माया र मर गाना।" पर उन दिनो पी वान है. जय गोपटिपिन रायसायग्गा नगर पांच भोरन भी नही मिलना था, जब उनक. पाग गगनानी भी पानी पी और रोः महायर भी नही था। नो फिर सादगार पगगप्टा ना पहला देने वाले पोराग्नि अपनी मुज-यमा मंगे नग्न है? दंग-निवाले ये ८१ व उन्होने मनोगेपनी में करने पर ही गाट दिए। इसमें भी अगरवादी गमी गेवरान गंगा नही थमाया ! यद, अन्दर उच्चकोटि कचनानिर और दिनान-नवी नेगी नया टिप्पणियों में उन बुछ मजदूरी मिल जानी प्रिंस कोपॉटफिन : रेपा-चित्र . थी। वढी सादगी के माय उन्होंने अपने आन्म-चरित में लिया है-"अगर रूम मे पर्याप्न ममाचार आ जाते अथवा वजानिक विषयों पर भी नीट स्वीकृत हो जाते, तो रोटी-चाय के माय मकवन भी मिल जाता था, नही तो रुग्वी गेटी पर ही गुजर करनी पड़ती थी।" सुप्रसिद्ध लेखक फेक हैग्यि ने प्रोपॉटफिन के उगलंष्ट के प्रवान ने दिनो के आतिथ्य का एक अच्छा गव्द-चिन गीचा है-"कोपॉटग्नि की धर्मपत्नी सोफी भोजन नैयार कर रही है, पति के लिए, डोटी-सी पुत्री के लिए और अपने लिए, कि इतने में कोई अतिथि महास्य न जाने कहा मे आ टपके प्रोपॉटविन ने मीघ्र ही भीतर जाकर कहा-'गोपी, जग माग में थोड़ा पानी मिला देना।' थोडी देर बाद एक और अनिधि देश पधारे और क्रोपॉटविन को फिर भीतर जाकर कहना पा-'त पानी और भी।' इस प्रकार की प्रिया कई बार करनी पत्नी और नापी हाई आदमियों के बजाय छ-मात आदमियों को भोजन ागना पाना। मेहमानदारी फ्रोपॉटकिन फे अत्यत प्रिय गुणों में मे पी और कोई दिन्नु अजनवी आदमी भी उनके घर पर मकाच अनुभव न करना था।" सगार में अनेक राजनैतिक महापुरष हए है और होगे. पर मलित, की विशालता, हृदय की उदारता, चरित्र को बसमा और जीवनी उच्चता यो सयाल ने प्रोपॉटफिन या दृष्टान प्राय अनुपम ही मिहोगा। वमे प्रारभिक तथा यौवन मे वर्षों की दृष्टि में प्रोपारिन ने जीपन रा मर्वोत्तम वृत्तात तो उनके आत्म-चरित 'मेमोयन ऑव ॥ ग्पिोमानिन्ट' मे ही मिल पाता है, पर यह अप मन् १८९८ तमामाही और उपर दाद फोगॉटफिन २३ वर्ष और जीवित रहे थे। इस नारण उनले पर पिना जीवन-चरित की आवश्यकता थी और उनकी पूत्ति जाज बागोर जोर आश्वन अपाफुमोविक नाम के दो प्रपपारो ने पीहैं। (प्रिंमपीटर:- फिन-प्रकाशक योर्टनन)। प्रोपॉटफिन का जन्म मन् १८४२ मेहुना और मन्यु १९२१ मं । नो जीवन-चरित में तत्कालीन समपाएप. चलता-फिरता दिन दिमाग + १man MAN - alm-- ८ एकांतिकारी के संस्मरण है। उनका आन्म-बन्ति उजनी गयी रे माय लिया गया कि उसे उगवी पलानी का मातम आम नरितारा जाना हैटरिन साजन एकागी न था, वह बहुअंगीन पा। शानिधागेअगलागतोबा धेही, पर माय-ही-गाय ममार के भूगोलवेताओं में भी यर निगेगि ये और समाजविज्ञान के भी जाने-माने आनार्य। ग्गनमा रोपवे गार गरे इतिहाम पर भी उनके जीवन मे निगा प्रभाव पड़ा है। प्रोपॉनि के कम जीवन-चरित को पाने हुए हम उना और माधीजी मे जीवन नया दृष्टिकोण में अद्भुन गाम्य प्रतीत हुआ। मानो मी पहिला पर वह उतना ही जोर देनं थे, जितना कि महात्मा गाधी । मेरी गोमिय नामक एक यहूदी अगजकवादी ने लिया है-"जो मी नमुना गंटन मे मिलने जाना था, उसका क्यन वह बटी प्रेगपूर्ण मुमगाट और मोम्म भावना में गुनते थे; पर एक बात थी, यह यह कि यद्यपि प्राईमानदानया उल्लाही युवक ये प्रति उनका व्यवहार उसारतापूर्ण रहना था, गयापि मायनों के चुनाव के गिय में काफी गशेग्नागे गाम लेने थे । प्रनार गुणगी गोपॉटग्नि अगत्य मानते थे। अनुनित मापनीतिक वर्ग उना स्वर मठोर हो जाता था और उनको निदा बिना विगी गाअंगी मी यी। चाहे जैसे बरे-भले नापनों में अपने पत्र की प्रानिग गिला गे उन्हे पोर पणा थी और कोई भी प्रश्न हो-नारे गगठन मा, मा गये एर बग्ने गा. या विरोधियों के प्रति पवार ना, मादुगरी पाटिती मनाय गंवय स्थापित करने पा-अगर नई गानों की विनता को नगमानना, नोकर उगे नररत की निगार मेदगतं और निदनीय मानने थे।" श्रीजगारग्नालजी या पपन है कि 'मारनी की पत्रिता पर जोररमामाडीने गजनीति में बरे ऊंचे पगार पर ला दिया। गमार ली गीत गं यह उनकी एरवी देन थी। ग frपय में शनिबनजननीही। मिया, पि, शारीरिक श्रम का महत्व और विवरण के मिनावी प्रिस कोपाटक्नि:रोपा-विय पर तो दोनो महापुम्पी के विचार बिल्कुल मिलने-जुलने है । गन् १८९६ में जव टाउनमाइड के कुछ कार्यकर्ता एक कृषि-मन कायम करनी जाना चाहते थे, क्रोपॉटकिन ने उन्हें एक पत्र दिवसर प्रोन्नाहिन लिागेर साथ ही मार्ग की बाधाओ के विषय में भी आगान र लिया। उनाने बतलाया था कि छोटेममूह में अक्सर झगडे उठायदे होते है गहरी नानांनी के लिए भूमि पर काम करना मुश्किल हो जाना। पजी की कमी का गतग अलग रहना है और मन्यानोपन की भावना भीगन गन्ने जाती है। इसके बाद उन्होंने लिया था-"यदि पारामको आकर्षक गना है नो उमीको ग्रहण कगे। तुम्हें उगर्म भरनं जो न अपेक्षा मफलता की आगा अधिर है। यम-ग-गम तुम्हें मान मिलंगी ही और मेरी मद्भावना नो बगवर नुम्हारे मार गंगी। फ्रोपॉटकिन ने कृषि के विषय में भी अनमधान रिए । जय वागनीनी जेल में थे, नी मरमार ने उन्हें जान अपि-मवधी रोगों नि: दिया था, और ना कहा जाता है कि उन्होंने जोप्रांगाशि उन कृषि-जगत् में एक यानि ही पर दीन्दी प्रांगी ये मागाने अपनी सुप्रसिद्ध पुम्नक 'फील्ड फाटगेज ययगा मिीन:- के अनेक मूल निदान इम पुग्नक में मौजद है। मोपॉटकिन पंजीयन- ग्निगी मिा--"slim तथा उनके गार्थियों में मानापार पर बगवन मादाट- पिन ने भी एक जगह मिलता है.--'गधाान पर पहना दानाfr आतक की प्रनिष्ठा एप मिडान गम्प में परांना नकार में मन् १८९६ की एक महत्वपूर्ण घटनाकाजी मे हडताल होगः थी। मगदूर नेता । थे और उन्होंने प्रोपॉटपिन पो भी निमनि रियाया। मजदूरो गाष्टो मे निवारण की चपनी की भी सहमत रहे, पर ज्याही सापोंपादिमिनट Ir. प्रियता'ने मानो मेज पर पिन्टनाराम गितम-भी ।
१० एक निहारी मे मम्मरण - - नेतामगार गिर और मारनामनानेmtar उग विगन प्रोटविन गहना या मामीन-माया प्रनार मे ही नाम लेनागारिकाजवाद- गिरतानतीजामामाममा मग होगः। दामन मन नामक मजद नेना बार-बार मिला ये- "हमें विश्वन पीनीति का आभय ना ना नीजो गानो-पोराना चारिण, जालिमोनोगत्म कर देना नाहिणा" जीन पोती माfrini, निगरापान अपने वीगिर जेबी विनमा बगवरपरीको गुनादी-नी, पिनाग नारी, हम निर्माण करना चाहिए । मे मनायो के हदय मा निर्माग ग्ना चाहिए।" गर तो बिनु महात्मा गाभी ने जंग ही प्रतीत होते हैं, और उन दिनी-१८९३ मे–महात्माजी ने दक्षिण अफ्री में काला केला. प्रवेगहीशिया था। देशकादेन काही नही, गगार गा~यर दुर्भाग्य किमारे गहा गंगारगिद्ध-प्रमिदनाम विनाग ना मागंग निराननेवाले विद्वान बहुत कम है, और गाग नोर मे आन वो, जी दुनिया चौगो पर गती है और उगोगामने टीम मार्ग प्रगान ना प्रश्न उपग्गित है, पर विषय और भी अधिक मायां बन जाता है। मार्ग प्रापाट- शिन नया गानाजी ग और दूगग माम और नालिन का। मरापुरगी। जीरन नग्नि में जान पनि प्रान ने की मागणं ली,औरटमटिमोनीयन-ग्निगागामा माननीय गिनंगा-नंगा दस्य या मार्ग मोंगामने गग्गिन मग्ना ! अपनानीन और वर में , गरमा गया- मागसपनार आरार, गलामीनी प्रयागा दौरोग, भाटवा की उनमगर पाद वानर, १ वर्षको अवस्था में मैच भागायन गैर मी गनगिर मागिन्य में नि, भाने व मागहरा गाय आदिर म, पानी पर शिक्षा, गादरिया की यात्रा--गवर्नर जनरल के मी अनार रिका में जागरण, नमःचान गंट पीटगंवर्ग के विश्वविशाल पाच वानरपति नया भगीर या अध्याग, बानियारी प्रिम कोपॉटफिन : रेखा-चिन दल मे मम्मिलित होना, यूरोप की यात्रा और वहा अगजर वादी मन्यागे का मंपर्क, मस लौटकर क्रातिकारी विचागे का प्रचार आदि नाकार का दृश्य ए जी. गादिनर के रेखाचित्र में देश लीजिए: "नाटक का पर्दा बदलता है। जाज निकोलस भी अप्रेगनहर होगई। लेकिन उसके बाद दासत्व-प्रथा बद होने गालबोटी देर लिए जो उपाकाल आया था, उसे ग्नोलिपिन प्रनिश्यिा वे अपवार ने टक लिया और मम फिर पुलिस के अन्याचागेमे कुचला जाने लगा। मेरो निरपराध आदमी फामी पर लटका दिये गा और हजागहीमेटेर दिये गए, अथवा माइग्यिा में अपनी पन्द्र गोदने कमा नियमित रति गए । मारम पर भय और आनर का गज्यपा, रविन भीतर-भी-भीतर म्य जानन हो रहा था । जार एलेक्जेदर द्वितीय ने अपने गामना दो जालिम पुलिम अफमगे-ट्रेपोफ और गवालोप-यो मोर पिया था। वैचाहे जिसे फामी पर लटका देते थे और चाहे जिने निर्वामिन करने। लेकिन फिर भी वे क्रानिकारी गुप्त ममितियों की रायंगर को गाने में सफल नहीं हुए। ये ममिनिया दनादन म्याधीनना नया नाति मानि जनगाधारण में बाट रही थी। इस घोर अगानिमय पारम में की न्याल ओटे एक अद्भत व्यविन, भूत गी परेवापर मन उसका नाम बोगेटिन है। पुगिन अपलर हाय मम 'बम, अगर हम लोग बांगग्नि को मिनी नगह पाने तीन मानिगर्ग मर्पिणी का मुह ही फुचल बाया, बोरोटिन को और उनसे मानी मागियी कोकिन वोगेडिन को पटना सामान नाम नही निकर मजदूरी को बीच में यह काम करना है. पे उप मार दिगमान नंगे लिए तैयार नहीं । वे नकली नी नंग्या में पाये जाते, पर, गंग:: मिलता है और पुछ को फानी पा; पर वे दोनागर जोर पता बतलाने के लिए तैयार नहीं होते। "मन् १८७४ पी पनन मत । माया पा समर । मंद वीर फे सभी जानिर और किसान-प्रेमी योगापि-मोगावीरे नन्द - ना -- - एक हानिकारी के सम्मान । में महान् मानिा निमांदरिन का यानाग सुनने में लिया है। मिनटगी यात्रा में परिणाम पिम में ना नारा ग्ग 'दादयविन्द (जलपायल के निरप में वैज्ञानिकों ने जो मिला अवना मारम र रमेये, ये पली-बाद दूसरे ननितो गर्न है और अगट्य नां ने आधार पर एक नगन गिमात नौ पाना तो सारे यज्ञानिक जगन में कराटनिन की पा जम जाती। इस महाग मनियमिप में मना रहा जाय। उगरामानन भिन्न- भिमानी नया विज्ञान के गमचे गमान पर है। वन महान् गगिता है, यार (बार वर्ष की उम्र में उगने जान्दारित). मगीन है और दानित। चांग भाषाओ गाना है और गान भागाओ मगर आगानी गाय वाननोन र माना है। नाग पर की उम्र में गोटी कनिमानी में-- उम महान् देश के सीनिम्नमी में-प्रिन पोलारिन गो गणना नेगी है। प्रिनग्न गोवागावल्या में फोनी ममीगना पापा, और पान वर्गाद जब उनां नामने म्यान ननान गा गवाट माया नो नोने शाग्या को नुना गा । यहा यार की योजना उमोन पेग की और आमर ग्यिा मी गामा पर एमिया के भगोलागीमती भनी गनिम नर मणेनशिया, र उनी वीनि पहले ही बन गयो, पारना भोगोलिरजनन में जिग मेगा पिर नाम दिया गया। गि प्रोपांनोमाविलगमापटी लियोमा गमा. पति मनोनीत पिगए। मामाबाद मोगा में नेटार बार निा, पर दमर्गगारी नाग में गरी: जाने गगा मेग सा-'मिस्टर बागान गाम ।' दाना गाया गादी गई । उलारे गामणि TT आदमी उस गाने में में कद पटा और बादा--'निरोटिन प्रिन तासीन, में जो निहारना । म जामम गारे पर परिम आदर्ग पर प। ना सिंगर माना जाता, टीन पा लिया। दिगम्मानी गला दुर्ग माटी में सांपले-गोले नग।"
निस कोपॉटफिन : रेसा-चित्र . इसके बाद वह किस तरह किले की जेल में डाल दियं गए, का उन्हें क्या-क्या यातनाए महनी पड़ी, और वहा में ग्रह, किन तह भाग निकले, इसका अत्यत मनांग्जक वृत्तात पाठर म पुग्नय में पर मकते है। मन १८७६ मे लेकर १९१७ नम ४१ वर्ष कोपॉटकिन को न्या बाहर व्यतीत करने पडे । काठोर-मे-कठोर माधना का यह लया युग पर उनके जीवन का ही नहीं, ममार के गजननिक इतिहास का भी एक मारत. पूर्ण अध्याय है। इस बीच वह स्विटजरलैट और मान में भी नं और दो- ढाई वर्ष के लिए उन्हें फामीमी जेल को भी हया यानी परी। उनने सभी महत्वपूर्ण अथ इमी युग में लिखे गए। इनमें फर्क नो ऐने हैं, जिना विश्वव्यापी महत्त्व है, जैसे 'पारस्परिक सहयोग' और 'गेटी नया आदि । उनके पातिकारी लेगो के भी कई मह मिर-भिन्न भामाग में छपे थे और अनेक रचनाए हिरी में भी छप चुकी है। प्रोपॉटकिन ने लदन में मन् १८८६ में 'फीम' नामक पर प्रारभ पिया. जो अवता चल रहा है। इसी वर्ष कोपॉटकिन के जीवन गी पर जन्मन दुखमय घटना घटी, उनके वटे भाई ने मावेनिया में लोने प गर्ग में आत्मघात कर लिया। उन्हें भी देग-निकालेका पर दिया गयामा जिती कारण यारह वर्ष उन्हे माश्वेरिया में विताने पपे। जब उग गरे के दिन निकट आए तो उन्होने अपने बाल-बच्चों को परोही कम पाना फर दिया और फिर एक दिन निरागाने अभिभत होकर अपने-जापागनी मार ली । वह महान् गणिता ये, यगोलमान नो अद्भुत जाना थे, और ज्योतिष-मान्य के बरे-मे-बरे विद्वानो ने उनकी कारनामोर नाही बहुत प्रसमा पी पी । महज आसपा से आधार पर गमगीन देश- निगालेका दे दियापा, जवरि निकालने उनका भीगा न घा! यदि जन स्वाधीनतापूर्वक अपने गोर गगी अनाने मुविधा होती, तो उन मान्न की उन्नति में न जाने ने मारा रोते। पर निरकुरा मानगो में माननी पीनानाति! frn १४ एक क्रांतिकारी के सस्मरन * हदय में उनके प्रति अत्यंत असा गो। इन दोनों मागो का नेग- व्यवहार आद या. पर मोमीन ने आनी इन पगार दुटनाका जिक अवान गयम के माग मेरा यार में रिया-मारी दुटिका पर नई महीने तर दुगनी घटा छाई रही।" कोरांटीन में आती भाभी तथा भनीजे-भताजियों की मानति मेया की। नॉटीन की ममम्न निभाओ का आभार उनाी मनुष्का की। वग्नुन. अराजाचा इगगिय में मारा गंगांया भिन्त मा. नादियों नीदष्टि में यातिया गोई माल नही । माामंगानी गरे माग गतरंज ने मुहरे की भाति यातार नग्न है और मिला-गी मानहाने पर उगार्गर गया आत्मा की अलग-अलग करने में भी उनको गाग नहीं होता । पर अगजातादी में गि मनुष्य गनुा मनु है. गिगां गि मानो उगाहदय उमा पहना। गाम्यादी को अपनी प्रणाली' की चिना है, जी अगजावादी को 'मनु' गी। जय भी कभी अपाग तथा अत्याचार या प्रस्न आता, शनि बिना किसी भेदभाउगरा विरोधाने-नारे वह अन्याय उन विरोधी पपगाले परकीयनशिया गया हो। उनसे मार मुन लीजिए-"मति की पूर्ण गभीना को मानने है । हम उमादिर जीवन पी अगुग्गा नया उमा गमन प्रतिभामो का पता गिगाग मातम म पर लादना कुछ भी नही मारी। इस प्रकार म उस गिदान पर परना है, जिग मिदान को प्योग्गिने धामिा नोनि-शान में विरोध में गत हप का या-'मनत्य गोविनु तर मांट दी। उग जगहीन मत बनामी, नगी धर्म पर गेही उग आग-- उम्र में मान आग-बना नगा है।' उगरे मनोमिारी में भी मा दगे। मान समाज में मनग्नास नही होतं।" निगोवाक्निप्रियो गोपा नाश नाही भी मापदभारना उनमें दियान देगी। सम्बनिस्ट गायि माहिर जाट यानी नामी. निमारनी। सम्यनिष्ट गवंग को इतना मान देने और शिमा रोनना ना मानन नि मागिय की दाट में मिमी प्रिम कोपॉटकिन: रेसा-चित्र १५ भी सहृदय मनुष्य की आन्मा झुलम मानी है। प्रोटिपिन का माहिन्य इसके बिल्कुल विपरीत है। उसमें ननिकता की गीतल, मद गौर नहा ही बहती रहती है। क्रोपाटकिन के ४१ वर्षीय देग-निकाले के विननं ही रिम्म उनारे जीवन-चरिन में तथा उनके विषय मे लिये मम्मरणो मे याना विमा परे है, जिनसे उनकी मत प्रकृति पर पूग-यूग प्रकाश पाता है। पर बारक हरिम ने उनसे कहा-"आपने देया, उन अगजावादियों ने यौवनावग्या में तो खूब काम किया, पर अब वे अर्थ-लोलुपना के गिवार होगा है। इमपर कोपॉटविन ने उत्तर दिया--"उन लोगों ने जोग-जवानी में पिन हमारे अर्पित कर दिए और अपना मर्वोत्तम हमे भेट पर दिया । अब :ग्ने अधिक की माग उनमे हम कर ही क्या सकते हैं "यह उदाग्नाशीगाट- किन के गपूर्ण जीवन की कुजी थी। विलायत मे रहने हुए फ्रोपाटकिन की मंत्री यहा के सर्वश्रेष्ठ विधाग्यो तथा कार्यकर्ताओ मे होगई थी। उनमें से कितने ही उनो प्रगर थे। हिटमैन, वरनाई पा, लंगवरी, एडवर्ट नागपंटर, नविनम्न और दल. फोर्ड प्रभति से उनके मवध बहुन निकट ये थे। जब पापिन २० वर्ष के हुए तो उनके अभिनदन के लिए आयोजित एक सभा में बग्नाटाने पहा था-"मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है रिनने यर्ष नाम लोग गलत रास्ते पर चलते रहे है, और प्रोपॉनि लगना ही टीपा। तपस्वियो तथा विचारको की विचारधारा यहन धीरे-धीरे बाम ली। क्रोपॉटकिन ने अपनी वाणी तथा लेपनी माग जो महान वापरिपा, जगन केवल इग्लंड ही नहीं, फ्रान, इटली, म्पिटजाल तथा मनप में भागी के विचारको को भी प्रभाषित किया और जो दिनार उनपिनी नानी होते थे, वे आज नार्वजनिक बन गए है। मन् १९१७ पी सनी पानि में बाद ग्रोपानि मा टन्न उचित समक्षा । तब यह ०५ या हो गये थे, फिर भी नोनपरी जमा उत्साह पा । पटोग्रेड में ६० हजार आदमियों ने नामाता एक शातिरागे रे मंग्मरण और भी मारप्रशन पी भी नरें गलग्गिा । ननिगमिगन रिमी भीगार में नरेगा, उन्होने मांगमार्गपद ग्रहण नरिया नगगी माप उनके गगन थे, पर लेनिन हाय में गरिन उनने पर तीन नांया माती पान वन गर्ने । पोटासिन के अनिमहिनी मी एक शागी एमा मौनमन में आम- नग्नि निगि माःगफ में मिलनी है। उलीने सिगा-"न पहुंचने पर मजे नमानिन्दो ने बार-बार निमान दिलाया माहितीपोटरिननोको आगम मी जिगी बगर कर रहे है और उसे न भोजन-यन की पीई, न पिगी अन्य यस्तु की। पर जब मै भोजॉग्नि में पर पहुनी नो मामा यम विपर्गन हो पाया 'नटग्नि, उनकी पत्नी गोपी तया लसी पळाग, नीनोएर कमरे में रहने थे भोर पर समग भी काफी गरम नहीं भानमा बाग में गमनने ये पिm नापमान गन्य में भी नीने थाजो भोजन मिरवा पा पर बम जीवित रहनेगर गोलिए पनि पा।जिन मार्ग गमिति गेलं गगन मिलना या,वा टट की थी और उगा मम्बर जेल भेज दिय गाये। मन मोती मे पूछा-'गुगर अगर कंगे होती है उन्होंने उमर दिया---'हमारे पागमा गाय और बगीने में भी गुर पंदा हो जाता है । गाली ग बार मे कुछ भेन देने 1 अगर पीटर (कोरिन) बीमार न होने और उन पर गोष्टिर भोजन नी जान नगीनोहमयोगी पापामगर जाना।" नंगवर्गीदिनी गगा। उत्ताने एमा गोमन में गाभा --"पुजना पर मान जगमय भीमनी: frगरिया मगार के मन पापिगरी गोनि-गे माग मानिा को ग प्राार भागों मग्न । म गांग: मंगोमगा नापार को अगाय शीनादिनी पानी मिला. 'नीशमान दिने मागिता गगंदन लानां पागनीय बाा या टापिग्ट प्रिस भोटकिन .पा-चित्र . रग्बने की तो वह कपना भी नहीं पर माने थे; मात्रा पनेरी पाण्डुलिपि उन्हें चुद ही तैयार करनी पडनी थी। भोजन भी उन्हें पुष्टि नही मिल पाता था, जिनमे उनकी कमजोर्ग बन्नी जाती थी और एक युपी दीपक की रोगनी में उन्हें अपने ग्रंय की रचना फग्नी पानीबी! जब मोपॉटकिन मरणासन्न हुए तो अपन्य निन नै मागो मे मधेठ टायटर और भोजन इत्यादि की सामग्री भेजी थी और यह जान भी दिया था कि प्रोपॉटफिन के स्वास्थ्य के ममाचार उनकी पान यगय भेजे जाय ! जीवन के अतिम दिनों में जिसे दमघोटू वातावरण में रहने के लिए मजबूर किया गया, उसकी मृत्यु के समय हननी चिंता का जयंती नाही सफता था ? ८ फरवरी, १९२१ को नोपॉटरिन का देहान होगया। मन की सरकार ने नरकारी तौर पर उनकी जत्येष्टि करने का दिनार किया, जिने उनकी पत्नी तथा नाची मागियो ने तुग्न अन्धोगति। अराजपावादियो नो मजदूर गय के भयन गे उन पर नि. जिनमे २० हजार मजदूर ये मर्दी -तने जोनं की मी शियानाक कारण जम गए । लोग फाले लिए थे और चि- "फ्रोपॉटफिन को नगी-माथियो को, अगमपानी बगे, गोरे में छोलो।" मोवियत नरकार ने सिमिटीय मामा-मापा शानिय पत्नी को रहने पोतिए और उनका मापा मगन मान मिने तथा भक्तो को दे दिया, जहा उनणे. गागज-पम चिटि: . पन्तुए नुरक्षित रही । लोपो १९९० नानापिनी सोरान नाम पर स्थापित म्यूजियम की मानी तो। मनहाय भी टि- भिदिया गया परदार पुजारी युग-बगानर तामर गंगा । उनमा मान और भाषांपादिता नागनार निर। N : २: संस्मरण कोपॉटकिन का जन्म मास्को नगर में सन् १८४२ मे हुआ था । उनके दो बड़े भाई थे, निकोलस और एलेकजेडर और एक बड़ी बहन थी, जिमका नाम था हैलीना । जब क्रोपॉटकिन केवल साढे तीन वर्ष के थे, उनकी माता का देहात होगया । माता की मृत्यु का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखाह: माता की मृत्यु "मुझे उस समय की कुछ थोडी-मी याद है, जब मैं और मेरा भाई उस कमरे में, जहा मेरी माता मृत्यु-गय्या पर पड़ी हुई थी, बुलाये गए थे। एक बडा-सा शयनागार था । खाट पर सफेद विस्तरा बिछा हुआ था। मेरी मा उसपर लेटी हुई थी। बच्चो के लिए छोटी-छोटी कुसिया पड़ी हुई थी। नजदीक ही मेजें बिछी थी। सुदर कार के बर्तनों में सफाई के माय मिठाइया और मुरव्वे रसे हुए थे। यह दृव्य कुछ बुधले रुप में अब भी मेरी मांगों के मामने है। मरते नमय हमारी माता ने मुझे और मेरे भाई को अतिम बार अपनी आंखों के मामने सिलाने के लिए यह मिठाई रखवाई थी। माता को तपेदिक होगई थी। उसकी उमर कुल ३५ वर्ष की थी। उमफी इच्छा थी कि हमेगा के लिए हमने विदा होने के पहले यह हमें एक बार पुचकार ले और हमें प्रसन्न देसकर म्वय प्रसन्न हो ले। मुझे उमा पीले और पनले चेहरे की याद है। उसके नेत्र बडे-बडे और गहरे भूरे रंग के थे। बडे प्रेम के माय उसने हमारी ओर देगा, हममें पाने के लिए कहा और फिर बोली-'आओ बेटा, मेरी ग्वाट पर बैठ जाओ। उसके बाद
संम्मरण
उसकी आयो में मामू भर आए। उसे पानी आग, और रोगीनी
वहा मे चले जाने के लिए कहा गया।
"फिर हम लोग उन व मकान में पोटे में जाना।
हमारी जर्मन धाय मैदम बर्मन और गियन पार इलियाना ने हमा-
बच्ची, तुम अब नो जाओ।' उनकी मात्रा में आग भोप. और
हमारे लिए काली कमी नी रही थी। हमे नीर नहीं गई, रिनी अमान
वोल मे हम डरे हुए थे और अपनी मा के बारे में उन दोनों पायांनी नारी
को मुन रहे थे, पर हमारी समाज में कुछ नहीं आना का। माना गट पर
से हम कूद पटे और कहने लगे, 'अम्मा काई जम्मा मानना
पायें रोने लगी, और हमारं घुघगले वाग पर याने "नी-
बेचारे अनाथ होगए ।' फिर रगिवन धाय बोली-'तुमारी अम्मा का
आकाग में चली गई, यहा देव-दूतो के पान ।'
'अम्मा आग में में बनी गई? मीनालीग'
"हमारे बाल्यावस्था के कल्पनागी दिमाग मेन प्रानो पाए
उत्तर न मिला।"
प्रिंस प्रोपॉटकिन पी माता वरं प्रेमपून्यमाय नी भी। नी और
गुलामी पर उनकी वजी पाष्टिगती दी और अंगनी
और श्रना कोटि मेदयते थे। उनके मरने से बाजारगपन
से रहा करते थे-~"वर होने पर व्या नुम भी अपनी माता
रुपालु होगे उनकी म दानो पर बीमा भी।"
कर दीन-हीन मनुष्यों को गिनिजमाधान मानापनि
मूल मे उनको माता का प्रेममय बनानही मा।
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पिताजी
प्रिनपादागिनने अपने पिता नना।
पह पुराने हग फेनैनिता-पिप गरमी । नाम
काफी अभिमान पानिागनगर शिकार
एक क्रांतिकारी के संस्मरण भी थे, पर युद्ध-क्षेत्र मे गायद ही कभी गए हो! नाराम्मी शागन उन दिनों इसी तरह के आडवरयुक्त मैनिको मे भरा हुआ था। यदि सैनिको का कोई गुलाम-गुलामी की प्रथा उन दिनो रूस में काफी प्रचलित थी बहादुरी का काम करता था तो उसका पुरस्कार उसके स्वामी को मिलता था! क्रोपॉटकिन लिखते है- "हमारे पिताजी ने मन् १८२८ के स्स-टर्की युद्ध में भाग लिया था, लेकिन जोड-तोड लगाकर आप वरावर चीफ कमाडर के आफिस में ही वने रहे। जब हम लोग कभी उन्हें बहुत खुश देखते तो मौका पाकर उनसे प्रार्थना करते कि आप हमे युद्ध का कुछ हाल सुनाओ, पर वह केवल एक वात बतलाया करते थे कि किस तरह रात के वक्त एक बार सैकडों तुर्की कुत्तो ने उनपर तथा उनके स्वामिभक्त नौकर फ्रोल पर आक्रमण किया था। तलवार चलाकर ही वह इन भूवे जानवरों से वच सके। यदि वे तुकं लोगो के आक्रमण की बात कहते तो हम बच्चो के मन को कुछ मनोप भी होता। जव हम जिद करके पूछते कि आपको वीरता के लिए 'मैण्ट एनी' का पदक कैसे मिला तो वह इनका जो उत्तर देते थे, उनमे सचमुच बढी निराशा होती थी। बात यह हुई थी कि जिस ग्राम में मेनापति और उनके माथी ठहरे हुए थे, उसमे आग लग गई। किसी घर में एक बच्चा पढ़ा रह गया और उसकी मा वैचारी करणोत्पादक टग मे रो रही थी। फ्रोल आग की लपटों में से घुस- कर उस बच्चे को निकाल लाया। चीफ कमाउर ने इस दृश्य को अपनी आगो में देखा और तुरन पिताजी को वीरता का पदक प्रदान डिया! "हम लोग पूछने-'पिताजी, बच्चे को तो फ्रोल ने बचाया था।' पिताजी वढी दवना में जवाब देने-'नो इनमे पया! मोल नोकर निगका था। यह मत्र एक ही बात है।" । सार के पार्षद जय निगमोपॉटरिन यी उमर आठ की थी, उनके जीवन में एक सनरायनाजार की गाजाको जनजयती थी और संस्मरण २१ उसके लिए मास्को में बडी धूम-धाम के साथ उत्सव मनाया गया था । जार तथा उनके कुटुवी मास्को पधारनेवाले थे। उसीके उपलक्ष में एक वाल-नाच हुआ था। क्रोपॉटकिन अपनी माता के माय उसमे गए थे। उन्हें फारिस के राजकुमारो के-से वस्त्र पहना दिये गए थे। जार को बालक क्रोपॉटकिन का भोला-भाला चेहरा बडा पसद आया और उसने अपने नौकरी को आज्ञा दी कि उस बच्चे को मेरे पास ले आओ। जार के नोकर क्रोपॉटकिन को लाने के लिए दौडे । क्रोपॉटकिन वहा ले जाये गए। जार को भद्दे मजाक करने का वडा शौक था। वह क्रोपॉटकिन का हाथ पकडकर अपनी पुत्र-वधू मेरी एलेक्जेंड्रोवना के पास, जो उन दिनो गर्भवती थी, ले गए और बोले- "मुझे ऐसा बच्चा जन कर देना।" यह वेचारी इम मजाक से लज्जित हो गई । जार के भाई माइकेल ने वालक कोपॉटकिन को रला दिया। उसने कोपॉटकिन के मुह पर ऊपर से नीचे हाथ फेरते हुए कहा-“देखो बच्चे, जब तुम अच्छे वालक होते हो, तब सब तुम्हारे माथ ऐमा बर्ताव करते है।" और फिर नीचे से ऊपर की ओर हाथ फेरते हुए क्रोपॉटकिन की नाक को रगडते हुए कहा--"जब तुम बुरे लडके होते हो, तव सब तुम्हारे साथ यो बर्ताव करते है।" बहुत कोशिश करने पर भी वालक ऋोपॉटकिन अपने आमू न रोक सका। जो महिलाएं वहा उपस्थित थी उन्होने कोपॉटफिन की तरफ ली, उसे पुचकारने लगी, और ज़ार की पुत्र-वधू मेरी एलेक्जेंडोवना ने उने अपनी गोदी में ले लिया। मोपॉटकिन उसकी गोद मे ही मो गए । बाल-नाच में वह शामिल न हुई और वह बालक को गोद मे लिए बैठी रही। इसके बाद ज़ारने प्रसन्न होकर क्रोपॉटफिन को अपना पापंद बना दिया। जार का पार्षद होना उन दिनो अत्यत गौरव की बात नमजी जाती थी और यह गौरव विरले ही आदमियो को प्राप्त होता था। - दासों की दुर्दशा कोपॉटकिन ने अपने जीवन-चरित मेरम के दानों को दुर्दमा अत्यत हृदय-द्रावक चिन खीचा है । उनके साथ जानवरो ने भी बुरा पत्तापरिया २२ एक क्रातिकारी के संस्मरण . जाता था। छोटे-छोटे अपरावो के लिए उनपर कोडे लगवाए जाने थे। उनके गादी-ब्याह, विना उनकी अनुमति के, चाहे जिनके साथ कर दिये जाते थे। वेचारे रोते थे, मना करते थे, बिननी करते थे, गिडगिडाते थे, पर सब व्ययं । जमीदार लोग यह समझते ही नहीं थे कि उन वेचारो के नी आत्मा है। क्रोपॉटकिन लिखते है। "किमीको इस बात की आगका भी न होती थी कि बेचारे दामो के हृदय में भी मानुपिक भाव है । जव तुर्गनेव ने अपनी गल्प मूमू' प्रकाशित की, और ग्रिगोरोविच ने अपने उपन्यानो मे दासो की दुर्दगा का वर्णन करके रूसी पाठको कोल्लाया था, उम ममय कितने ही स्मी लोग आचर्य मे पूछते थे कि क्या मचमुच इन दामो के हदय में भी हमारे तरह के भाव पाये जाते है ? वडे-बडे घराने की जो स्नी स्त्रिया अपनी भावुकता के कारण फासीसी भाषा के उपन्यासों के नायक-नायिकाओं के वृत्तातो को पढ़कर आमू वहाए विना न रहती थी, कहती थी-'अरे, क्या यह रशियन दाम हमारी-तुम्हारी तरह ही प्रेम करते है ? क्या यह बात सभव है?". मिलिटरी स्कूल में क्रोपॉटफिन ने अपने स्कूली जीवन का जो विवरण लिखा है, वह भी वडा चित्ताकर्पक है । गीवे-मादे शिक्षकों को विद्यार्थी किम तरह तग किया करते है, इमरा बड़ा मनोरंजक वृनांन है । वह लिखते है-"एक जर्मन यहूदी मि. एवर्ट थे,वह विद्यार्थियों को लिम्बना निसाया करते थे।लडो उन्हे इतना अधिक तग किया कन्ने ये कि अगर उनकी निर्धनता उन्हें यहां रहने के लिए बाध्य न करती तो वह कभी के स्कूल छोटकर चले गए होने । वडे दर्जी के लड़के उन्हें पाम तौर पर तग करते थे, पर उन्होंने एक नमजीता कर लिया था-'एक दिन में मिर्फ एक ही मजाक होना चाहिए, उनमें ज्यादा नहीं।' ममतात नी नगनं का प्रायः नाटकोपी और में उलंघन किया जाना था। एका दिन पिटलो वैच पर बैठनेवारे एक लड़के ने पटिया और न्याही में भिगोकर मंजन गिक्षक महोदय को निगाना बनाकर माग ।
संस्मरण वह उनके कधे पर लगा और स्याही के छोटे छिटककर उनसे मुह और नफेद कमीज पर फैल गए। हम लोगों को यह उम्मीद थी कि एवट महोदय अपने क्लास को छोडकर तुरन ही इम्पॅक्टर में इस बात की शिकायत परेंगे, पर उन्होंने ऐमा नहीं किया। अपना स्माल जेब मे निकालकर उन्होंने अपना चेहरा पीछा और कहा-'भाई, एक मजाक हर गेज का नियम है, ना हो चुका, इसमे ज्यादा न होना चाहिए।' "फिर दबी जवान मे यह कहते हुए कि हमागे कमीज बगव होगः, वह किसी लडके की नोटबुक मुद्ध करते रहे । हम सबको बहुत गर्मिदा होना पदा । उनकी महनगीलता मे लडकी के विचार उनके पक्ष में होगए। हम लोगो ने उमनायी को फटकारते हुए कहा-'मन। यह तुमने क्या विचा" किमी लडके ने कहा-"तुम्हे गर्म आनी चाहिए, वह बैचाने गरीब आदमी है और तुमने उनकी कमीज सराव कर दी।" अपराधी रटका गिभर के पास माफी मागने गया। एवर्ट ने खेदयुक्त स्वर मे केवल इनना कहा-"म:, भवको सीखना चाहिए, मीग्वना ।" पलाम में सर्वत्र मात्ति छा गई। दूसरे मवक के दिन हम सबने बहुत ही बटिया ढग मे लिसा और एयर्ट माहब के पान अपनी नोटबुक ले गये। यह देखकर उनका चेहग पिल गया और दिनभर वढे खुश रहे। उनकी यह महनशीलता मेरे हदय पर अक्ति होगा और मैं उमे आजतक नहीं भुला मका। उन्होंने जो गवक मुझे निमाया, उसके लिए में उनका कृतन हू।" हस्तलिखित क्रांतिकारी पत्र का संपादन मन् १८५९ या १८६० मे मोपॉटफिन ने स्कूल में ही रहन्नलिगित फ्रातिकारी पत्र निकालना गुरु कर दिया था।प्रथम जक को नापने तीन प्रतिग की और अपने मे ऊचे दर्जेजे विद्यापियों की उम्र में गदी जोर नामती यह भी लिख दिया कि इन पाणे विषय मे अपनी मम्मनि एमाजपरति कर हमारे स्कूल की घी के पोरे न आना । दो रगो ने उन पर और अपनी मम्मति लिनफर पाए। दूसरे दिन दोपॉन्निकोसा २४ एक कातिकारी के संस्मरण - साथ वहा गए, तो उन सम्मतियो को रखा पाया। उसमे लिसा था- "हम लोग आपकी बातो से पूर्णतया सहमत है. पर आप ज्यादा सतरे में न पडें ।" वहुत उत्साहित होकर आपने अपने पत्र का द्वितीय अक निकाला और फिर उसी तरह उन विद्यार्थियो की डेन्क में उनकी प्रतिया रख दी। इस अक में बड़े जोरी के साथ स्वाधीनता का पक्ष समर्थन किया गया था और इस बात की प्रेरणा की गई थी कि सबको मिलकर देश को स्वाधीन करने का प्रयत्ल करना चाहिए। इस बार उन विद्यार्थियों ने अपनी सम्मति लिखकर घडी के पीछे नही रखी, बल्कि वेबुदही क्रोपॉटकिन के पास आए और बोले- "हमें यह दृढ विश्वास है कि तुम्ही इस पत्र का मपादन करते हो। हम लोग आपमे इस विपय में बातचीत करना चाहते है । हम आपसे बिल्कुल सहमत है और हम आपसे यह कहते आए है कि हम और आप मित्र है। अब आपको अपने पत्र के निकालने की आवश्यकता नहीं, क्योकि स्कूलभर मे हम लोगो के विचारों के केवल दो लडके और है । यदि भेद खुल गया तो हम सबकी आफत आ जायगी। हम लोगों को चाहिए कि एक गुट वनाले और यथावकाग इन विपयो पर बातचीत किया करें।" कोपाटकिन ने उन दोनो विद्याथियो से हाथ मिलाया और एक मित्र-मउली स्थापित होगई। ये तीना मित्र आपम में प्राय देग की स्थिति पर बातचीत किया करते थे। मोपाटकिन के दिमाग पर तत्कालीन रूमी माहित्य-मेवियों की रचनाओ का बड़ा प्रभाव पड़ा था। उन दिनो तुर्गनेव, टल्लिटाय, हर्जिन, वाकुनिन, डोल्टोवस्की इत्यादि के पथ प्रकाशित हो रहे थे, और वास्तव में मन् १८५७ और १८६१ के बीच का समय न्मी माहित्य की दप्टि मे महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। रूम में उन दिनो राजनैतिक विषयों पर तो कोई पुस्तक गुल्म- खुल्ला लिसी नही जानरनी थी, इसलिए लोग ला-छिपकर उपन्यानों और पहननो के प में गजनतिर विनारी का प्रचार किया करते थे। ऊपर में नो यह माहित्य विल्गुल मामूली-मा जचता था, पर या वह वाम्नय में यानिमार्ग और उनकी लहरे उन एमान न्यानो नक भी, जहा उनके जाने गेछ भी गुंजाम नहीं थी, पच जानी थी । पहा नोटिरिन का संस्मरण वोर राजभक्त मिलिटरी कालेज और कहा इस प्रकार का माहित्य ! पर क्रातिकारी विचारो की लहरी को कोई दीवार नहीं रोक मरनी और वह मभी विघ्न-बाधाओ को पार करती हुई म्वाधीनता-प्रिय पुन्पो के हद तक पहुच ही जाती है, क्योंकि वे हृदय में निकली हुई होती है। नियुक्ति जव क्रोपॉटकिन अपनी गिक्षा समाप्त कर चुके, तो उनकी नियुक्ति का समय आया। इन लोगो को, जो फौज में जाकर अफसर बनते थे, यह जाप- कार था कि वे अपनी-अपनी इच्छानुमार अपनी रेजीमेट चुन लेते थे। कोई तोपखाने में जाता था तो कोई कज्जाक मेना में नम्मिलित होना था। नॉट- किन की इच्छा मैनिक बनने की विरकुल नहीं थी। वह कालेज में अध्ययन करना चाहते थे, पर उनके पिता इसके सर्वथा विरुद्ध थे, उमलिए वह लाचार थे। क्रोपॉटफिन के अन्य माथियों ने भिन्न-भिन्न रेजीमेंटी में अफसर बनने का विचार किया, पर क्रोपॉटकिन ने माइवेग्यिा की कज्जाक सेना में अफसर वनने का निश्चय किया। उन गत को सुनकर भोपाटरिन ने मानी गन्ह गए । कोई-कोई कहने लगे-"माश्यरिया अरे भाई, मजाक तो नहीं कर रहे । नचमुच तुम बडे दिल्लगीवाज हो । भला उस मनहम मुल्क में जाकर क्या करोगे?" पर प्रोपाटकिन ने मजाक नहीं किया था। उन्होंने भूगी या अत्यन परिश्रम के माप अध्ययन किया था, और उनकी छा पोशिना.. वैरिया पहुचकर आमूर नदी के विषय में कुछ वैज्ञानिक अन्नधान गरे। मरे साथ ही उन्हें इस बात को आमा थी कि नादेरिया पहचकर वह उन गज- नैतिक सुधारो को, जो गीघ्र ही होनेवाले थे. पार्य म्पने परिणत पन्ने ग अवसर प्राप्त करेंगे। माइबेरिया जाना को पनद नहीं करता था, और न. लिए क्रोनॉटफिन ने नोचा कि वहा इच्छानुसार कार्य करने में विचिन्तन क्षेत्र मिलेगा। जार से बातचीत तमाम युवा अमला पने-अपने पानी को जाने नेपाले जमिन्ने 2०१० २६ एक क्रांतिकारी के संस्मरण के लिए गए। क्रोपॉटकिन को भी जाना पड़ा। आम के कज्जाको को रेजीमेट उमर मे बहुत छोटीहोने के कारण कोगॉटकिन को अफसरोकी पक्ति में सबसे नीचे खडा होना पड़ा। जार ने क्रोपॉटफिन को देखा और कहा-"आसिर तुमने नाइवेरिया जाना तय कर ही लिया ! क्या तुम्हारे पिताजी राजी हो गए ?" क्रोपॉटकिन ने कहा-"जोहा, उन्होंने अनुमति दे दी।" फिर जार ने पूछा-"क्या तुमको इतनी दूर जाने में डर नही लगता?" कोपॉटकिन ने वडे उत्साहपूर्वक उत्तर दिया-"नहीं, मैं तो काम करना चाहता है। नए मुवारो के वाद साइवेरिया में बहुत कुछ काम करने को मिलेगा।" जार ने नीचे क्रोपॉटकिन की ओर देखा, कुछ चिता की झलक उसके चेहरे पर प्रकट हुई, और फिर वह वोला-~"अच्छा, जाओ, आदमी हर जगह उपयोगी मिद्ध हो सकता है।" इसके बाद जार के चेहरे पर वडी थकावट के मे चिह्न प्रतीत हुए। कोरॉटकिन लिखते है-“म उनी ममय ममझ गया कि यह आदमी तो वीत चुका, इनसे मुबार इत्यादि कुछ नहीं होने के । यह तो फिर अत्याचारपूर्ण नीति का प्रयोग किए बिना न रहेगा।" हुआ भी ऐमा ही, जेलखाने देशभक्तो से भरे जाने लगे और चारो ओर जारगाही का आतक छा गया। साइबेरिया में माइबेग्यिा में क्रोपॉटक्किन को पाच वर्ष तक रहना पडा। यहा उन्हें अनेक अनुभवं हुए । क्रोपॉटकिन को अभी यह विश्वास था कि जार की गार मुधागे के लिए मत्रमुच उत्सुक है और उन्होने अत्यन परिश्रम के माय माउ वेरिया में देश-निकाले की प्रथा के सुधार और म्युनिसिपल गुगार के लिए अपनी योजनाए तैयार की, परनु ये योजनाए कागजो में लिपी दुई जहा-की- तहा पड़ी रही और उनका कोई उपयोग नहीं हुआ ! जाग्गाही के मामन का एक दृष्टांन मुन लीजिए। मावरिया के किसी जिले में एक अत्यत धूर्त अफमरया।यहरिमानो कोम्बवलटा करता था और इटकर ग्विन लिया करता था। पर उनी मोटे भी लगवाया करता था, यहातक कि स्त्रिया भी गोमत्याचार में नहीं बनी थी। उनके भी कोडे उगते थे। इन अफसर की ! ।
संस्मरण २७ र र : -- तब धूर्तताओ की खबर प्रात के गवर्नर के कानो तक पहुच चुकी थी, पर वे कुछ भी नहीं कर सकते थे, क्योकि संटपीटर्मवर्ग में इम अफमर के मितो जयवा सवधियो का जोर था, और इसलिए वह निन्चिन होकर मन-मानी किया करता था। प्रात के गवर्नर जब उनकी शिकायतें मुनते-सुनने तग भागए, तो उन्होंने क्रोपॉटकिन को इम वान के लिए नियुक्त किया कि वह इस अफसर की कार्रवाइयो की जाच करे । यह काम आमान नहीं था, क्योकि कोई भी किमान उस दुप्ट अफसर के खिलाफ गवाही देने को तैयार नहीं था। हमी भापा में एक कहावत है-'परमात्मा तो बहुत दूर रहता है, पर तुम्हारा अफसर तुम्हारे निकट का पडोमी है', इमी डर मे वे लोग अपने जिले के अफसर के विरुद्ध मामी नहीं दे सकते थे, यहातक कि वह औरत भी जिनके कोटे लगवाये गये थे, अपना लिखित बयान देने को तैयार नहीं थी। जब पद्रह दिन रहकर फ्रोपॉटकिन वहा के निवामियों के विश्वासपान बन गए, कही उन्होंने अपनी दुख-गाथा सुनाई। उस अफसर के विरुद्ध इतने प्रवल प्रमाण मिले कि वह आखिरकार वर्खास्त कर दिया गया, पर कुछ महीने बाद क्या हुआ कि वही अफसर किमी दूसरे प्रात में उच्चतर पद पर भेज दिया गया वहा भी उपने लूट-मार जारी रसी। दो-चार वर्ष बाद ही वह धनवान होकार मैटपीटर्मवर्ग को लौट गया और वह फिर ममाचार-पत्रो में देग-भलि पूर्ण लेख लिखने लगा। फिर विद्यार्थी-जीवन सैनिक जीवन गोपॉटकिन के स्वभाव के बिल्कुल प्रतिकूल या और सन् १८६७ में वह अपनी नौकरी ने त्यागपत्र देकर पीटनवगं आगाए। जो पाच वर्प उन्हें नाइबेरिया में बिताने पडे, उनने उन्हें पहन चुछ अनुभव होगया। उन्हें जारमाही को सुधार-प्रवत्ति का दोलापन सचीनन्द नाम होगया, और देग-भक्तो के काप्टमय जीवन ने भी मनी-मानि परिचित हो गए। वहा रहते हुए उन्हें आमूर नदी के विषय मे अन्नधान भोगना पा. इसलिए उन्हें अपने देश के जन भाग मा भौगोलिक मान भी होगा । अद --- -- २८ एक क्रांतिकारी के संस्मरण । विश्वविद्यालय में आकर भोपॉटकिन ने अपना सारा ममय भूगोल के लिए लगाना प्रारभ कर दिया। उत्तरी एगिया के जो मानचित उन दिनो छापे जाते थे. उनमे पहाड़ इत्यादि के निगान यु ही अदाज से और गलत लगा दिये गए थे। क्रोपॉटकिन ने कई वर्ष तक परिश्रम करके इनका ठीक-ठीक पना लगाया। बड़े-बड़े भौगोलिक और वैनानिक जिस ममस्या को हल नहीं कर पाए थे, उसे कोपॉटकिन ने हल कर दिया । विनान-मंमार में उनकी कीर्ति फैल गई। वैज्ञानिक अनुसंधान करने के बाद वैज्ञानिक को जो आनंद होता है, उसका वर्णन करते हुए कोपॉटकिन ने लिया है : "जिस किमीने अपने जीवन में एक बार भी उस आनन्द का अनुभव किया है, जो वैनानिक कृति के सफल होने के बाद आता है, वह उस आनन्द को कदापि भूल नहीं मरता, और वह बार-बार इनी वात की इच्छा करेगा कि वह आनद मुझे जीवन में अनेक बार मिले। पर एक बात से उने दुग होगा, वह यह कि इस तरह का आनंद किनने अल्प-सत्यक आदमियों के भाग्य में बदा है। यदि माधारण जनता को अवकाग मिलता और विज्ञान की बाते उन्हें समझा दी जाती तो थोडे-बहन अग में वे भी इस आनद का गुछ अनुभव कर लेते, पर दुर्भाग्यवग यह ज्ञान और अवकाम केवल मुठ्ठी-भर आदमियो तक ही परिमित रहता है।" जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन अब कोरॉटरिन के जीवन में प्रातिकारी परिवर्तन का समय आता है। भौगोलिक अनुसंधान करने के लिए वह फिनलंड भेजे गए थे। वहा जाकर उन्होंने उस देश के दीन-हीन रिमानो की हालत देसी । उममे उनका हृदय द्रविन होगया और वह नाचने लगे-"ये बेचारे मेहनत करते-करते मरे जाते है, फिर भी उन्हें पेट-भर भोजन नहीं मिलता। अपने वैनानिक अनमंधान पल में उन्हें यह बताऊनी कि तुम अमुक जमीन मै अमुक प्रकार का पाद दो और पला कार्य के लिए फला अमरीक्न मगीन मंगाओ, नो जगणे या फायदा होगा' मारी टेम वगवर बटता जाता है, औरटेनम देने के बाद मंस्मरण 23 . य पेट-पूत्ति के लिए भी काफी अन नहीं वचना। गरीन्टरने के लिए रपटे भी उसके पास नही। भला वह मेरे वैज्ञानिक अनुमपानी को और मलाही को लेकर क्या चाटेगा? इस किमान को मेरी यज्ञानिक नलाह की जमग्न नहीं, उसे जरूरत है मेरी, यानी में उसके पाम रहू और अपनी जमीन का मालिका बनने में उसकी मदद करूं। जव उसको भरपेट खाना मिलेगा, तब वह मेरी किताव भी पढ लेगा और उसमे कुछ लाभ भी उठा लेगा, अभी नहीं । विमान बडी अच्छी चीज है। मंने वनानिक अनुनधानो के मानद या अनुभव विया है और उसका मूल्य में भली-भानि जानता हू, पर मुझे क्या अधिकार है कि मैं अकेले ही उन सर्वोच्च आनदो का मजा लूटू, जब मेरे चारी और एक-एक रोटी के टुकाटे के लिए भयकर जीवन-मनाम चल रहा है जो लोग गेहू उगाकर भी इतना नहीं बचा सकते कि गुद उनके बच्चे गेह की रोटीमा मके, तो मुझे क्या अधिकार है कि मैं उनके मुह की रोटी के दाटे ग्रीनपार स्वय उच्च भावनाओ के समार मे विचरण कार? मनुष्य-जानि जोगु उसन करती है, उसकी मिकदार अभी बहुत थोडी है, इसलिए यदि में मजे मे रहता हुना वैज्ञानिक अनुसंधानो में मस्त रहू, तो इसका पचं भी तो पिनी गर्गव को मुह की रोटी छीनकर ही आवेगा। जान बजी भाग चीज है, में भी यह मानता हू । इमसे इन्कार कौन करता है ? गप्प को जान बटाना चाहिए। बहुत ठीक । पर नवाल तो यह है कि जितना ज्ञान प्राप्त होगा है, जितने वैज्ञानिक अनुमधान हो चुके हैं, क्या वे नर्वनाधारण तक पहुंच गए या आम लोग उन्हें जान गए? मेरी ममल मे जिनने मान का पता लग गा. वह बहुत काफी है। यदि यह मान सर्वसाधारण की नाति वन जाय. नो फिर विज्ञान की कितनी गवर्दन्त उनति हो तब उत्पत्ति, जादिनार जोर मानाजिक कार्यों की गति, पतनी तीन हो जायगीरिजमीनमाज भी नहीं समा नकते। नापारण जनता मान शप्त गन्ना मागी। उसकी हादिया इजह कि उसे जान मिले। जाने मान प्रान पन्नगी सामध्यं भी है, पर उरोमान देना गान है? उन पान नना पात है" एक क्रांतिकारी के संस्मरण क्रोपॉटकिन लिखते है-"मेरे विचार उनी दिगा में काम कारने लगे। मैने कहा, वन, मै तो अब इसी तरह के दोन-हीन आदमियों के लिए काम काँगा। जो आदमी वैनानिक अनुमचान परने और मायारण जनना का मान बढाने तथा उसकी उन्नति करने का दम भरते है, वैगुद कभी नाधारण जनता के पास भी नहीं फटकने ! कमी विडवना है ! उनो विचार और उनका वास्तविक जीवन, वितने परस्पर-विरोधी है ! जब मेरे मन में इस प्रकार के विचार चक्कर खा रहे थे, तभी म्मी भोगोलिक सोमायटी का तार आया, "क्या आप कृपा कर हमारी मोसायटी के नेटग का पद स्वीकार करेंगे?" मैने जवाब दिया--"नहीं।" ! रूस की तात्कालीन दशा प्रिस प्रोसॉटकिन नेगम की उस समय की हालत का जो चिन पीचा है, वह भारत की पराधीनता के दिनो की स्थिति में बिल्कुल मिलना-जुलता है। नवयुवको को ऐसी शिक्षा दी जाती थी जिममे उनमें विचार-गति उत्पन्न ही न हो । जिन लड़को में स्वतंत्र विचार-क्ति की थोटी-मी माना पाई जाती थी, वे निकाल बाहर दिए जाने थे। लटको को आद्योगिक गिक्षा की जरूरत थी और विद्यालयों में लटिन तथा ग्रीक भापाए पाई जाती थी! शिक्षा का विस्तार करने और उसे उपयोगी बनाने के बजाय उने परिस्थिति के बिल्कुल विपर्गन बनाएर निरर्थक कर दिया गया था। नवयुवको के हृदय में निगमा घर कर रही थी। किमान भारी टैगलों के बोन मे पिमे जाते थे। मुगिक्षित गमाज की दगा बड़ी विचित्र थी। उनके जीवन मे भोग- दिलान ने पर कर लिया था और गजननिक मामलों के विषय में बातचीत पग्ने हुए भी वे उरते थे ! माहित्यिक समाओ के आदमी और भी दब्बू बन गए थे । जब कभी प्रिंस कोरांटपिन या उनके बरे भाई गजनैतिक चर्चा हेपने, तोरनमंन्याओ के सदस्य उनकी बात बीच में ही वाटार नाटा और गमन की बातें करने लगते। अट और अपने अनुभवी ममनने आदमी नवयुवको को उपदेश संस्मरण २ देते थे.---"हाथ-पाव वचाए और मृजी को टरकाए" की नीति मे काम लो। पत्थर की दीवार मे मिर मारने से क्या फायदा है' धीरज धरो, यह वक्त भी निकल जायगा, इत्यादि ।" पुलिस के अत्याचार वरावर बढ़ रहे थे। उन्नत विचारो के नवयुवक को यही ग्वतग रहता था कि वह नव परट लिया जाय । किमी राजनैतिक अपगधी ने महानुभूनि प्रकट करना भी एक भयकर अपराव ममझा जाता था। अगर पिसीके यहा नलागी में कोई मामूली चिट्ठी मिल गई, जिमका अट-बड कुछ दूसरा अर्थ भी निकलना हो, तो उसका जेल जाना निश्चित था। विनने ही नवयुवक उनलिए जेल भेज दि जाते थे कि उनके विचार 'सतरनाक है।' 'राजनतिक सारणो मे रिननी ही गिरसतारिया होती थी, और राजनैतिक कारण का अर्थ चाहे जो फुट भी समझ लिया जाता था। मेंटपीटनं और मेटपाल के भयकर पेटमानी में सैकडी नवयुवक मड रहे थे, कितनो ही को देग-निराला देकर नाइन्यिा भेज दिया गया था और कितनोही को फामी पर भी चटा दिया गया था। गुछ वर्षों पहले जिनके राजनैतिक विचार उन्नत भी थे, ये भी जब पुटिन में इतने डर गए थे कि नवयुवको में मिलते हुए भी उन्हें नकोच होता था। तगनेव ने अपने सुप्रसिद्ध उपन्यास 'पिता और पुन' में बड़ी सूबी के नाय यह दिखलाया है कि उन नमय के पुराने विचारों के उपोर पिनाओ और नए जमाने के माहगी नवयुवको के बीच में एक पानी पीपी, उनके विचारो में बना अतर था। पिनाओ और पुत्रों के वर्गच में बना होने की वात तो रही अलग, पद-वीस वर्ष के नवयुवको तथा तीन वर्ष ने कार. वालो के विचारो मे वडा फर्क पर गया था। उनममयमा नादावली विचित्र दशा में थे। पुराने पचाल के पिताओ मे नो-न्हें जगा नाही पडता था, अपने मे आठ-दन वर्ष अधिया उम्रपाले बनायो ने भी ना प्रवल मतभेद था। नवयुवको के विचार माम्पनाद को और मनगर वे तीन वर्षवाले आदमी उन युवको का नाप गन्नति नाम भी देने से डरते थे। पिन नोनॉटकिन लिखते है "मेरे मन में प्रश्न होता है कि पग निदान ने निी देगी ३२ एक क्रांतिकारी के संस्मरण को इतने भारी गत्रु का मुकाबला ऐसी भयंार स्थिति मे करना पड़ा है ? इन नवयुवको को इनके पिताओ और बडे भाइयो तक ने त्याग दिया था। इन वेचारो का अपराध क्या था? वस, यही कि उन्होंने अपने पिता और अग्रेजो के विचारो को हृदयगम करके उन्हें अपने जीवन मे चरितार्य करने का प्रयल किया था। क्या इसमे भी कठिन तया दुखजनक परिस्थिति में कही किमी देश के नवयुवको को स्वाधीनता की लडाई लड़नी पड़ी है ?" रूसी स्त्रियों में जागृति जिन दिनो स्म के नवयुवकों के हृदय में कातिकारी भाव उत्पन्न हो रहे थे, उन्हीं दिनों रूसी लडकिया भी जागृत होकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए आदोलन कर रही थी। प्रिम कोपॉटफिन लिग्नते है । "मेरी भानी स्त्रियो के विद्यालय मे लौटकर मुझे सुनाया करती थी कि आज उस मामले पर युवतियों मे वी गरमागरम बहह्म हुई, कल इस विषय पर विचार होगा। कभी स्त्रियो के लिए विश्वविद्यालय सोलने की स्कीम गोची जाती थी, तो कभी उनके लिए उच्नकोटि की वाक्टग्नी बनाने के उपायों पर विचार किया जाता था। स्त्रियों को कैसे शिक्षा दी जानी चाहिए, इस विषय पर वाद-विवाद हुआ करते थे और मैकडो स्त्रिया उन बहम-मुवाहों में वटी गभीरता और बरे उत्माह के माय भाग लिया करनी थी। गर्गव लडकियो की मदद के लिए इन नियों ने अनुवादक-माल, छापेमाने, जिल्द- बदी इत्यादि काम पोल गे थे। मैटपीटर्मवर्ग में अनेक युनिया इगो आगा मे आकर साठ्ठी होती थी कि उन्हे किमी प्रकार उच्च शिक्षा मिल जाय । गवर्नमेटरमी लड़कियों को विश्व-विद्यालय की गिक्षा देने की घोर विरोधी घी, मला ये वैचारी अपना प्रबंध आपही करती थी। गवर्नमेंट करती थी तिहाई स्कूल की परीक्षा पाग लतियों में उतनी योग्यता नही होती कि वे बिजविद्यालयको पटानागमन, उनपर लडफिया महती, "नो हमारे लिए प्रारभिक नभानी मा प्रवध कर दो, नहा पका हम विन्य-विद्यालयों .
संस्मरण में दाखिल होने की तैयारी कर सकें, पर गवर्नमेंट इन बात पर गजी नही थी। प्राइवेट तौर पर बडे-बड़े अव्यापकों के वे व्याख्यान कराती थी। विन्व- विद्यालय के कितने ही अध्यापक, जो उनके नाथ महानुभूति रसते थे, दिना एक पैसा लिये उन्हे पढा दिया करते थे। वे कहते थे कि अगर तुमने पैसे देने को बात कही तो हम इसमें अपना अपमान समझेगे। यद्यपि ये अध्यातक स्वय गरीव थे, तथापि अपनी बहनो के अदम्य उत्माह को देखकर उनका हदय द्रवित होगया था। भौतिक विज्ञान के अध्ययन के लिए यूनीवनिटी के अध्यापक विद्यार्थियों को साथ लेकर थानाओ पर बाहर जाया करते थे। इन यानियों में अधिकाग स्निया ही होती थी । धायों के काम के लिए जो पाठ्य- क्रम नियत किया गया था, उस पाठ्यक्रम से वे सतुष्ट नही थी और जयापको पर जोर डालकर उन्होने उस पाठ्यक्रम को और भी बचा लिया। उनकी ज्ञान-पिपासा इतनी बढी हुई थी कि वे जहा-कही औरजव-कभी मौका मिटता, अपने समाज के लिए उच्च शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश करती। यदि उन्हे पता लग जाता कि अमुक अध्यापक महोदय नार के दिन अपनी प्रयोगशाला में लटकियों को काम करने की इजाजत दे देंगे तो वम फिर पया था, वे उसके पास दौड जाती और इस अवसर से लाभ उठाती। यद्यपि जार कामत्रिमडल स्त्रियो को उच्च शिक्षा देने का घोर विरोधी पा, तापि उन लडकियो के उत्साह का दमन करना उनके लिए भी आनान नहीं पा मग भावी माताओको शिक्षा-पद्धति सीखने ने कोन रोग नाना पा उन्होंने 'शिक्षण विद्यालय खोल ही डाले। अव यह नवाल हुआ कि पनाति-गाम तथा गणित की शिक्षा-पद्धति किन प्रकार मिसरंजारसके लिए कोरमकोर सिद्धातो से तो काम चल नहीं पता था। नगे लिए आवश्यकता थी, इन विपयो की व्यापहारिक शिक्षा लो ! न विद्यालयों में बनस्पति-शास्न तपा गणितगीभी जानाटिकी मिमा प्रवध करना पापाठ्यनम ने सीन ही न विपणे को भी मार विका गया। बस, विश्वविद्याय में प्रदेश पन्ने पिर नगा आया। एम प्रमार धोरे-धीरे पेलपनी शिक्षा का मार्ग प्रान। .
૨૪ एक क्रांतिकारी के संस्मरण । क्रोपॉटकिन ने आगे चलकर लिखा है कि कितनी ही रूसी लडकियां जर्मनी तया स्विटजरलंड में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने लगी। उन्होने कानून तथा इतिहास पढ़ने के लिए हीडलवर्ग के लिए प्रस्थान किया, गणित पढने के लिए वे वलिन को चल पड़ी और लगभग नौ लड़किया फ्यूरिच में औद्योगिक शिक्षा प्राप्त करती थी। जार को यह बात बहुत नापसंद थी कि स्त्रियां उच्च शिक्षा प्राप्त करें। जब कभी जार को कोई लडकी चश्मा पहने हुए दीख पडती, तो वह कांपने लगता था। उसके मन में यही आशंका होती थी कि कही यह लटकी प्रातिकारी दल की न हो। सरकारी पुलिम उच्च शिक्षा प्राप्त लड़कियों की बड़ी विरोधी थी और वह उनके विरत अधिकारियो के कान भरा करती थी, पर इतने पर भी स्मियो ने गवर्नमेंट की मुखालफत में अपने लिए कई गिक्षण-पालाए सोल दी। पितनी ही लड- कियां जव विदेगो मे डाक्टरी परीना पाम करके लोटी, तो उन्होंने अपने निजी खर्च से डाक्टरी स्कूल गोले और गवर्नमेट को इस बात के लिए मजबूर किया कि वह उनके मार्ग में कोई रुकावट न डाले । अब जारशाही के मिर पर एक फिक्र और मवार थी, वह यह कि विदेश में जाकर ये लड़किया नातिकारियो के मंसर्ग में आती है और फिर उनके द्वाग म्म में क्रातिकारी विचारों का प्रचार होता है । इनको विदेश जाने से कैसे रोका जाय? ज्यूरिच मे जो लद- कियां गिना प्राप्त कर रही थी, कातिकारियो के मसगं मे बचाने के लिए बुला ली गई। तब उन्होंने आदोलन करना गुरु किया कि देश में ही स्त्रियो की उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय हो, तो हम क्यों विदेग जाय ? याविर तंग आकर गवर्नमेंट को स्त्रियोपी गिक्षा के लिए चार विश्वविद्यालय बोलने ही पडे। नियों के मेडिकल कालेज के मार्ग में जो-जो वापाए गवर्नमेंट की और में की गई, उनका वर्णन करने की आवश्यकता नहीं, पर फिर भी ये स्त्रिया हतोलाह न हुई और वगवर उन्होंने अपनी पढाई जारी रखी। मन् १८९०. नक लगभग मान मी स्त्रिया स्म में परीक्षा पास करके डाक्टरी परने लगी थी। प्रिंस मोपॉटपिन इन स्त्रियों की आश्चर्यजनक सफलता के विषय में - ।
संस्मरण ३५ । लिखते हैं-"इस मफलता का मुख्य कारण यह था कि जो विवान आदी- लन में मुखिया बनकर भाग ले रही थी, जो इनकी आत्मा नता प्राण थी, वे अपने स्वार्थ के लिए नहीं पड रही थी। वे उन स्त्रियों में ने नी पी, जो ममाज में केवल अपना दर्जा ऊचा करने के लिए लल्तीसगनी है। गर- कारी उच्च पदो की लालना उनके मन में न थी। उनमें न धिगामी महानुभूति साधारण जनता के नाय पी। फैरटगियों में काम करनेवालीना- कियों के साथ उन्होंने मंत्री स्थापित कर ली थी और उनलिो योगिए ये लोभी मालिको तथा लालची पूजीपतियों ने लड्नी थी। ग्राम्य पाठमालाओगे गिलिका बनने की ओर उनकी विगेपचि थी। जिन अधिकारीला स्निया लट रही थी, वे केवल कुछ इने-गिने व्यक्तियों के ही अधिकार नाहीये। वे सिर्फ यही नहीं चाहती थी कि हमको उच्च शिक्षा प्राप्त ने ना अमि पर मिल जाय, उनका उद्देश्य इमने यही उच्च या, यानी वे मांगापापी सेवा के लिए, दीन-हीन रंगी नमाज के लिए, अधिक उपयोगी नेवि काना चाहती थी। उनकी सफलता को अमली कुजी यही थी।" जो लोग आज भारतवर्ष में प्रगति-नाति' चिलाते हैं, उन नोटीन के उपर्युक्त शब्दो पर ध्यान देना चाहिए । पवनार भाग्नीय चीनमान में इस प्रकार की नि स्वार्थ नेवा गाव उत्पन्न नहीं होते, तन पारि फाति होना नभव नहीं। पिता की मृत्यु सन् १८७१ में भोपाटपिन के पिता की मृत्य होगः । पर गुगनं खयाल के बादमी थे और उनी पुगनी मान-गौरत मेलामा थे। पर पिछले कुछ वपों से उनके जान-पान को निभनि में बाल मा भागया था। अव दानत्य की प्रपा बद होगी। जिनले गगन थे, न रपया दे दिया गया था और गुमन मुफ्त पग दिरे गए थे। पर या न लोगो ने थोडे दिनो में ही भोग-विमानमय जीवन में नर दिया। ज्य इनकी जमीन तथा जापदादो पर व्यापानियो मानिारोगा। मि.
एक क्रांतिकारी के सस्मरण कार मास्को छोड़कर इन लोगो को ग्रामो अथवा छोटे-छोटे कस्बों में चले जाना पड़ा । मास्को के उस प्रगिद्ध मुहल्ले में जहां पहले धनाड्य-ही-धनाढ्य रहते थे, अब दूसरी तरह के आदमी नाफर बस गए। नोपॉटकिन के रिश्ते- दारो के वीस कुटुव पहले इसी मुहल्ले में रहते थे, पर उनमे से अब फेवल दो कुटुव ही बाकी बचे थे, शेप इवर-उपर चले गए। ये दो कुटुब भी समय को गति से प्रभावित हुए बिना न रहे । उन कुटुबो से झोपॉटफिन के पिता बडी घृणा करते थे, क्योकि इन युटुबो मे माताएं अपनी लडकियो के साथ सावारण जनता के लिए विद्यालय और स्त्रियों के लिए विश्वविद्यालय इत्यादि नवीन विपयो पर वातचीत करती थी। प्रिंस कोपांडफिन के पिता इस बात से अत्यत असतुष्टये कि उनके दोनो लड़के ऐलेकजेंडर और क्रोपॉट- किन ने उनकी आमा का उल्लघन किया था। वह चाहते थे कि हमारे लडके सनिक जीवन व्यतीत कर उसी पुरानी शान से रहे, पर यह वात दोनो को नापसद थी। जब नोपॉटकिन के पिताजी बहुत वीमार थे, तो दोनो भाई घर पहुचे। पिताजी को आगा थी कि दोनो भाई अपनी गलती को मंजूर करके पश्चात्ताप करेंगे, पर दोनों ने ऐमा नहीं किया। जब पिताजी ने इस विपय की चर्चा चलाई भी तो दोनो भाइयो ने हमकर यही जवाब दिया- "आप हमारी जोर से किनी प्रकार की फिक न कीजिए। हम लोग बडे मजे में है।" पिताजी को यह आमा थी कि प्राचीन पद्धति के अनुसार दोनों लटके क्षमा याचना करेंगे और रुपये भी मागेंगे, पर उन्हे निराश होना पड़ा। रपया न मागना उन्हें और भी सटका, लेकिन उनके हृदय में दोनों बच्चो की दृटता के लिए गन्मान भी बट गया। जब दोनो भाई पिताजी से अलग होने लगे तो उन्हे वदा दुल हुआ। ऐलेक्जेंडर को तो अपनी नौकरी पर पाना था और भोपांटीन को फिनलंट । यही उनकी अनिम भेट थी। जय पिताजी का भतार निषट आया तो प्रोपॉगिन के पास सबर भेजी गई। यह नुरन फिन गेलोटे, पर घर आफर उन्होंने अपने पिता का जनाना निरलनाग देना। मेजॉगिन ने तत्कालीन परिस्थितिका वर्णन परेमापक टंग में सस्मरण किया है। जिन मालीशान घरो मे पुराने विचार्ग के बडे-बडे बनास युटुव रहते थे, अब वहा नई रोगनी के आदमी बग गए । वृद्धों, अन गया नवयुवको में विचारो का मघर्ष जारी था। एका पनलिनाव के एक लड़की थी। वह मास्को में स्त्रियो के लिए खुले नवीन चिन्नाविधालय में पढना चाहती थी, पर जनरलमाहव तथा उसकी माता दोनों इन बात को निहायत नापसद करते थे। दो वरन तक वह लड़की अपने माता-पिता ने अगली रही और तव कही उमे इस बात की इजाजत मिली कि यह पिचविद्यालय में पढे और मो भी इस तं पर पि. उगकी मा नित्यप्रति उनले मानविन- विद्यालय मे जाया करेगी! मा बराबर हर रोज अपनी नाकी को विद्यालय में ले जाती और अन्य बालिकाओ के नारबह भी पटी तक अपनीर की साथ बैठी रहती, पर इन तमाम देगभा और नियंत्रण के होने हा भी ने वर्ष के भीतर ही लडकी के विचार प्रातिकारी होगाए। यह एक प्रालिका दल में सम्मिलित होगई ! पकड़ी गई और मालभर के लिए उसे गट-मीटर तथा सेंट-मॉल के भयकर जेलपानी पी हवा भी पानी पड़ी। पाम ही उमी मुहरले में एक और फुटब रहना पा । पाउट महाशय तथा उनकी रची कावागाठोर मामन पा । गुगने विचागे, और उनकी लडकिया थी नई रोशनीवाली। लविगे की निरमंत आलस्यमय जीवन वहुन असन्ता पा, ये उसने तग लागः पी जोर पनी अन्य सहेलियो की तरह स्वतनतापूर्वक विद्यालय में पाना पारती पी. पर कठोर माता-पिता भला इसकी अनुमति मचा देने को गाना- पिता तथा पुप्रियो का पगडा पन्ता रहा । आपिर वडी रसीने निगा होकर जहर खा लिया और अपनी जीवन-लीला नमाप्त कर ली। तर ती छोटी बहन को विद्यालय में जाने की छूट मिली। जिन घरो में पहले प्राचीन प्रपा पोपर जमीदारापेला मन 'गतिकारियों के अडे होगए ।
३८ एक क्रांतिकारी के संस्मरण - स्विट्जरलैंड की यात्रा सन् १८७२ में क्रोपॉटकिन ने स्विट्जरलैंड की याना की। वहा वह अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संघ के कार्यकर्ताओ से मिले। मजदूरो को जागृति के लिए जो आदोलन अन्य देशो मे हो रहे थे उनके विपय में अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनकी अभिलापा वढने लगी । कोपॉटकिन की भाभी उन दिनो ज्यूरिच में पढ रही थी। उन्होने कोपॉटकिन को बहुत-मा साहित्य लाकर दिया । दिन-रात भोपाटकिन उसी साहित्य के पढ़ने में व्यस्त रहने लगे। क्रोपॉटकिन लिखते है: "उस समय मैने जो-कुछ अध्ययन किया, उसका अमिट असर मेरे दिमाग पर हुमा । मुझे यव भी उस छोटी-सी कोठरी की याद है, जिसमें बैठकर मैने उस साहित्य का अध्ययन किया था । कोठरी में एक खिडकी थी, जिसके सामने एक विशाल नील सील दीरा पडती थी, और कुछ फासले पर पहाडिया नज़र आती थी। इन्ही पहाड़ियों के निकट स्विटजरलैंड के निवासियो ने अपनी स्वाधीनता के लिए अनेक लड़ाइया लड़ी थी । वह दृश्य अनेक पुण्यमय संग्रामो की याद दिलाता उम था।" साम्यवादी साहित्य की विशेषता जिस साम्यवादी माहित्य का अध्ययन कोपॉटफिन कर रहे थे, उसका जिक्र करते हुए वह लिखते है : "साम्यवादियों के साहित्य मे बडे-बडे पोर्थ नहीं है। यह साहित्य गरीब आदमियों के लिए लिया जाता है और गरीबों के पागदो-चार आने से अधिक मत्रं करने के लिए होता नहीं, इसलिए साम्यवादी साहित्य की मुख्य गावित उसकी छोटी-छोटी पैमपलेटो और समाचारपत्रो के लेगो में ही होती है। इसके निया साम्यवाद के ग्रथो में वह चीज मिल भी नही सकती, जिगको आवश्यकता इस विषय के प्रेमियो को हुआ करती है । ग्रंथो मे तो निर्फ मिद्धांतों का वर्णन रहता है और उन सिद्धानी के समर्थन में वैज्ञानिक संस्मरण युक्तिया रहती है, पर जो असली चीज है, यानी मजदर लोग इन निद्धातो को किस प्रकार ग्रहण करते है और ये निद्धात व्यवहार में बने लाए जानपने हैं, इन बातों के जानने के लिए नाम्यवादी समाचारपनो का पटना बचत आवश्यक है। केवल अग्रलेस ही नहीं, बल्कि सवरे भी पटनी चाहिए, जोर लेसो की अपेक्षा खवरो को पढना और भी अधिक आवश्यक है। आदोलन की गहगई और उसके नैतिक प्रभाव या अदाज इन सबसे मे ही लग सकता है। कोरमकोर सिद्धातो मे कुछ ममल में नहीं आता। जरूग्न इन वात के जानने की है कि ये सिद्धात कहातक साधारण जनता के हस्य सक पहुच गए है, और कहातक वे अपने दैनिक जीवन में उन निद्धातो को कार्य- रूप में परिणत करने के लिए तैयार है।" मजदूरों के साथ निवास साम्यवादी साहित्य को पढकर क्रोपॉटविन को एक नई दुनिया पा दृश्य दीपने लगा, वह दुनिया, जिमन विषय में समाज-शास्त्री के गिलाती के विद्वान् रचयिता वित्युल नहीं जानते, यानी मजदग्गगार, जिमा मच्चा शान उमफे बीच में रहकर ही हो सकता है । बम, प्रोपॉगिन ने पही निश्चय किया कि दो महीने मजदूरी के बीच में गुजारे जार । नोए वे प्यूरिच मे चलकर जिनेवा पहुचे। यहापर उन्हें मजारी ये माय गर्न और उनकी हालत देसने का अच्छा अवनर मिला। जब देश में मजार-गटन का आदोलन शुरू होता है तो उसका मजदूरी पर बना प्रभार परता, इमका जिक्र करते हुए कोपॉटपिन रिपते है : "बिना मजदूरो के साथ रहे, इन यात का पता ही नही ग मागति सगठन का प्रभाव मजदूरो के दिमाग पर ना पटता है। पेनगन में पूरा-पूरा विश्वास करने उगते है, जब पनी उगफे दिपप में दोनो बडे प्रेम यो साप और हर तरह ने उनकी महापना माग्ने के लिए - त्याग करने को उचत रहते हैं। हर रोज हजारोही नजर अपना मायने है और भूलो मरकर बनाये हुए पंने देते है । उन्न पापिया ४० एक कांतिकारी के संस्मरण मामूली गरीव रहती है कि हमारे चलाए हुए पत्र कही बंद न हो जायं। अपनी मजदूर- काग्रेस के अधिवेशनों के लिए जो खर्च होता है, उसकी भी फिक उन्हे रहती है और अपना काम करते हुए जो सायी जेल जाते हैं या अन्य प्रकार मे दंडित होते है, उनकी भी वे मदद करते है। ....वाहर- वाले इस बात का अंदाज लगा ही नही मकते कि मजदूरी को अपने आदोलन के जीवित रसने के लिए कितना आत्म-त्याग करना पड़ता है । जिनेवा में मैंने देखा कि अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संघ का मेवर होना भी मजदूरी के लिए कोई कग साहस का काम नहीं था। उसके लिए भी बडे नैतिक माहस की जरूरत थी, क्योकि उससे मालिक लोग नाराज हो सकते और नौकरी से बरखास्त तक कर सकते थे। परसास्त होने पर महीनो तक घर बैठे रहना पड़ता था। मजदूर संघ में शामिल होने पर कुछ-न-कुछ चदा देना ही पड़ता था, और यह चदा एक मजदूर के लिए अपनी क्षुद्र आमदनी में मे निकालना कोई सानान वात नहीं थी। मीटिंग में जाना भी इन बेचारों के लिए एक प्रकार का त्याग ही था, क्योकि मजदूरी करने के बाद जो घटे बच रहते हैं, वे उनके आराम के लिए ही काफी नहीं थे, और दो घंटे मीटिंग में खर्च करने के मानी थे दो घंटे आराम में कमी करना। ये मजदूर शिक्षा प्राप्त करने के लिए अत्यंत उत्सुक थे, पर उन शिक्षित स्वयसेवको की, जो इन लोगो को पटाने के लिए उद्यत थे, संस्था अत्यल्प थी। बटी जरूरत इस बात की थी कि वे मिक्षित आदमी, जिनके पास अवकाग हो, इन मजदूरी के पास माकर उन्हें अपना मंगठन करना सिपलाते, लेकिन ऐगे आदमी बहुत कम थे, जो इन गरीव मजदूरी की नि स्वार्थ भाव मे मेवा करने के लिए उद्यत हो । वैने इनकी निम्नहाय अवस्या मे लाभ उठाकर अपना राजनैतिक महत्व बढानेवाले आदमियों की कमी नहीं थी। ज्यो-ज्यों में इन मजदूरो के साथ रहा, मेरा यह विश्वास दृट होता गया कि इन गरीब मजदूरो की मेवा करना ही मेरे जीवन का प्रधान उद्देश्य है । स्टेपनियाक नामक प्रातिकारी ने एक जगह लिया है-'प्रत्येक कातिवारी के जीवन में एक क्षण ऐमा संस्मरण ४१ आता है चाहे उन क्षण को घटना विल्कुल क्षुद्र ही हो-जब वह । वात की कमम पा लेता है कि मैं अपना मारा जीवन काति लिए अग्नि कर दूगा।' वह क्षण मेरे जीवन में भी आया था। ज्यूग्धि में रहते हुए मैने देखा कि वे शिक्षित मादमी कितने कायर होते है, जो अपने भान और अपनी पक्तियो को उन लोगों की सेवा में अपित करने में नकोच करते है, जिन्हें नान तथा पवित की उतनी अधिक आवश्यकता है। मैंने दिल मे पता, ये मजदूर अपनी गुलामी का अनुभव कर रहे है । ये उन दानता में अपना पिंड छुटाना चाहते है, पर इनके मददगार कौन है और याहा है ? महा। ये आदमी, जो सर्वसाधारण को मेवा करने के लिए भागे माने आदमी नही, जो अपनी महत्वाकाक्षाओ की पत्ति के लिए इन बेचारी या उपयोग करके अपना मतलब गाठते है ?" फ्रोपॉटविन की ये बाते भारतीय मजदूरी की यर्तमान स्थिति में कितनी मिलती-जुलती है ? मजदूरो की निस्महाप अपस्पाने नान उठाकर अपना उल्लू मीषा करनेवाले और उनकी मदद ने अपना राजननिर महत्व वढानेवालो को इन देश में भी कमी नहीं है, पर प्रोपाटग्नि की तरह नि स्थापं सेवको का तो अभाव ही ममजिए। अराजकवादी कैसे बने ? प्रिंस क्रोपॉटबिन जिनेवा में अवता जिन मजदर नेताओं के मन में आए थे, वे वाहर पलेटफार्म पर जोर-जोर के लेक्चर जारने पे,पर भीतर- ही-भीतर बढी तिकड़मवाजी ने माग रेने थे। पॉगिन को जनरी या दुरगी चाले बहुत नापसद आई। उन्होने एक नेता ने पहा--"मनांतीय मजदूरमय की एक गाना भी तो है, जो बानिन्ट नाम अनिल (अनामिस्ट गब्द गा व्यवहार तबतक नहीं हुआ पा), उसने परिनाला चाहता हू।" उन नेता ने नोपॉटकिन को एक परिचय-पन दिशा, फिर कोपॉटनिन ने कहा-"मातम होताह फिअब आप हमारे दामे पान नही नापगे। आप उन्हीके पास रह जापगे।' पॉटपिन निमो:- - - ४२ एक क्रांतिकारी के संस्मरण 'इन महाशय का अनुमान ठीक ही निकला।' ये एक अराजकवादी नेता से मुलाकात जूरा पहाड के निकट घड़ी बनानेवाले मजदूरी का एक सघ था। पहले तो क्रोपॉटकिन वहां जाकर एक सप्ताह रहे, पीछे वहा अराजकवादियो के नेताओ से मिलने का निश्चय किया । एक नेता का नाम था जेम्स गुलीम। महागय एक छोटे-से प्रेस के मैनेजर थे और प्रफ-रोडिग का काम करते थे। इस काम से उन्हें इतनी कम आमदनी होती थी कि उन्हें रात के समय बैठकर जर्मन भाषा से फ्रेंच में अनुवाद करना पडता था, जिसके लिए उन्हें ५) २० फार्म मिलता था। क्रोपॉटकिन लिखते है: "जब मैं जेम्स गुलोम मे मिलने के लिए गया और दो घंटे बातचीत करने के लिए मागे, तो उसने कहा-'मुझे खेद है कि दो घटे अपने वक्त में से में नहीं बचा सकता। मेरे प्रेस मे बाज गाम को एक स्थानीय पत्र का प्रयम अंक निकलनेवाला है । मुझे उगके प्रूफ तो देखने ही पड़ेंगे, साथ ही उसका मंपादन भी करना पडेगा । पर्चों को लपेटकर उनपर पते लिसने के लिए कागज भी मुझे ही चिपकाने पड़ेंगे, और फिर लगभग एक हजार पते भी मुझे अपने हायो मे लिखने पडेगे।' मने कहा-'पते लिखने का काम मेरे जिम्मे रहा। उसने जवाब दिया, 'यह हो नहीं सकता, क्योकि अधिकाश पने मुने याद करने पडे है, वे कही लिखे हुए नही रखे और जो थोड़े-से लिये हुए है भी, वे ऐसे हस्ताक्षरों में कागज के टुकड़ी पर लिसे पडे है कि उन्हें दूनरा कोई पढ़ नहीं मकता ।' तब मैंने कहा-'तो फिर मै आज शाम को आफर आपके पचों को लपेटकर उनपर पते लिखने के लिए कागज ही चिपका दगा। उनमे आपका जो थोडा-मा नमय वच जायगा, वह बाप मुझे दे दीजिए।" यह मुनकर जन्म गुलोम ने प्रोपॉटफिन मे हाथ मिलाया और कहा- "तुम्हारी बात मंजूर है, नाम को माना।" दोपहर के ममय फ्रोपॉटकिन यहां पहचे और उन्होंने गाम तक अपवारों में विटें चिपकाई । गुलोम उनपर संस्मरण ४३ । पते लिखते रहे । जब रात होने को आई तो गुलाम ने काम पर से छुट्टी ली और दो घंटे कोपॉटकिन से बातचीत के लिए निकाले । दोनो बाहर टहलने के लिए गए, और फिर वहा से लौटकर गुलीम को जूरा फेरेगन की अराजकवादी पत्रिका का संपादन करना पड़ा। रूस को वापसी जवतक क्रोपॉटकिन रिवट्जरलैंड में रहे, वह अराजकयाद के सिद्धाती का अच्छी तरह अध्ययन करते रहे, या यो कहना चाहिए कि यहीपर यह अराजकवादी बने । यहीपर उनके विचारो में दृढना भी आगई। काति के विषय में भी उनके विचार स्पष्ट होने लगे। यह लिखते हैं : "स्विट्जरलैंड में रहकर धीरे-धीरे यह बात मेरी तमल में आने लगी कि जव विकाम धीरे-धीरे होने के बजाय बहुत तेजी से एक माय होने लगता है तभी उमे प्राति कहते है, और क्राति भी मनुप्य-जाति के लिए उतनी ही स्वाभाविक है, जितना कि धीरे-धीरे क्रम-विकाम । यह क्रम-विकास तो सभ्य समाज में बरावर होता ही रहता है । जय कभी शान्ति (यायो फहिए शीघ्र-विकास)का प्रारभ होता है, तो उसके साप थोडा-यहुत गृह-युद्ध भी प्राय. गुरू हो जाता है। देश के निवासियों में आपस में पून-सच्चर होने लगता है । उस समय यह सवाल नही उठना चाहिए कि पाति को रोकी जाय, बल्कि यह प्रश्न होना चाहिए कि कम-से-कम पून-सच्चर ने अधिप- से अधिक लाभ ने उठाया जाय । कम-से-कम आदमी हताहत हो, कम-से- फम मात्रा में पारस्परिक विरेप फैले और प्राति का उद्देश्य पूरा हो ही जाय। इसके लिए सर्वोत्तम उपाय यही है कि समाज मे अत्याचार-पोन्ति भाग को यह बात साफ तौर पर बतला दी जाय कि उनका उद्देश्य क्या है। जदनक पोन्ति समाज को अपने ध्येय का बिल्कुल स्पष्ट मान न होगा, तबराफ उनमें उनकी प्राप्ति के लिए उपयुक्त उलाह नहीं हो नयता नौर दिना उत्साह के गति मे मफना मिाही नही गल्ती । परि अत्याचार पोलि समाज अपना ध्येय पितुनाफ तौर पर निश्चित कर ले तो धनादर ४४ एकांतिकारी के संस्मरण और मुशिक्षित जनता में जो भले आदमी हैं, उनमें से कुछ तो उसका साय देने को अवश्य तैयार हो जायंगे।" जब्त को हुई कितावों का रूस में प्रवेश जब कोपॉटफिन स्वदेग को वापस आने लगे तो उन्होंने नोचा कि अव इकट्ठे किये हुए ममाले का क्या करना चाहिए। स्म में तो उसकी विल्कुल मनाई थी और वहां के प्रातिकारियों को इम साहित्य की बडी आवश्यक्ता थी । वहा वह किमी दाम पर भी नहीं मिलता था। आगिरफार उन्होंने यही तय किया कि वैमे हो तसे इन माहित्य को रूम में प्रवेश कराना ही चाहिए । वियना और वारसा होते हुए ये मैटपीटमंवर्ग को लौटे । उन दिनो कितने ही यहूदियों का यह काम पा कि वे जन-गुदा किताये इनी तरह रूस में भेजकर अपनी गुजर करते थे । एक यहूदी के मारफत उन्होने अपना मारा मनाला रूम को भिजवा दिया, जो किसी अगले स्टेगन पर उन्हें ज्यों-का-त्यो मिल गया। निहिलिस्ट संप्रदाय इस में उन दिनों नवयुवको में एक विशेष प्रकार की मनोवृनि का विकास हो रहा था। पिछले २५० वर्षों में, जब रूम में दामत्व-प्रया वनी हुई थी, अनेक ढोग और दभपूर्ण प्रयाए प्रचलित होगई थी और इन प्रयाओं ने शिष्टाचार का रुप धारण कर लिया था । मनुष्यों के व्यक्तित्व का कोई खयाल नहीं दिया जाना था। पिता लोग अपने पुत्रो पर जोर- जबरदम्नी करने थे । स्त्रिया, लहरिया और पुनों का भी आचरण कपट- पूर्ण होगया था। सम का संपूर्ण जीवन इमी दम नया कपट का जीवन था। पुगने रीति-रिवाजो, दंभपूर्ण कुप्रथानो और नैतिक पायग्नाओं ने धार्मि- बता का रूप धारण कर लिया था। मरकारी कानून में तो इन कुप्रयाओं फा मन किया नहीं जानता था। उनके पितो आवस्यानाथी एक मामा- जिप विद्रोह को, जिममे कि यह कपटाचरण जट-मूल से नष्ट होजाय ।
संस्मरण ४५ म्सी युवको ने यह विद्रोह किया, और यह विद्रोह इतना अधिक व्यापक हुआ, जितना यूरोप तथा अमेरिका में भी नहीं हुआ था। सुप्रनिद हनी लेखक तुर्गनेव ने इस विद्रोह को 'निहिलिपम' का नाम दिया था। इस गब्द का प्रयोग पहले-पहल उनके युगातरकारी उपन्यास 'फादर्न एण्ड चिरडन' ('पिता और पुत्र') में हुआ था। सबसे पहला काम जो निहिलिस्ट लोगो ने किया, वह था 'सन्य' मानव-समाज के ढोगों का विरोध, उन ढोगो का जिन्होने गिप्ट आचरण का स्प धारण कर लिया था । निहिलिन्ट लोगो का सर्वश्रेष्ठ गुण पा पूर्ण सच्चाई। वे बुद्धिवादी थे, और किसी भी ऐमो रीति-रिवाज को, जो उनकी नमज्ञ में अपल के खिलाफ थी, मानने के लिए तैयार नहीं थे। प्रिन झोपॉटकिन लिखते है : "मम्य याहलानेवाले आदमियो के जीवन छोटे-छोटे शिष्टतापूर्ण नूठी से भरे हुए होते है । सन्य समाज में ऐसे बहुत-से मादमी देखने में आते है, जो मन में तो एक-दूसरे ने घोर घृणा करते है, पर जव अकस्मात् कही मिल जाते है, तो अपने चेहरे से बड़ी प्रफुल्लता और मधुर मुस्कराट जाहिर करते हैं, और यह दिखलाते है, मानो उन्हें एक-दूसरे से मिलार वटी भारी न्युनी हुई हो। निहिलिस्ट लोग इन प्रकार के दभपूर्ण वर्ताव में घृणा करते थे। वे तभी मुन्कराते थे, जब किमी आदमी ने मिलकार उन्ट हार्दिक प्रसन्नता हुई हो। सारी ऊपरी दिवावट की नम्रताओ से, जो दरजमल दंभ का ही दूसरा रप होती है, वे नफरत करते थे। इन नितिलिस्ट लोगों की प्रवृत्ति अपने पिताओ को प्रवृत्ति से पिन्कुल भिम थी। "जिन पौडी के पिता पे, वह ऊपरी मिलनलारी, नन्नता और जाद- भगत में तो कमाल की होमियरो जाहिर करनी पी, परनीतर उनकाहदय बज पाठोर था। जपने बच्चो, लियो तपादानो के हाप रन पीडी का दांव जानवरो जैसा था, पर यह पीटी रूपर ने वटी नावा प्रतीत होती थी। निहिलिस्ट लोग इस भयकर बावरपूर्ण भावपता में विरोधी थे। निति ४६ एक झांनिगरी के संस्मरण लिन्ट लोगों के पूर्व की पीटी'नौंदर्य', 'आदगं', 'कला के लिए कला', तथा 'सौंदर्य-विज्ञान' टन्यादि विषयो पर दी नौज के माय गप्पं मारा करती थी, और कभी इन बान का सवाल भी नहीं करती थी कि कला की ये मुदर चीजें उस स्पये से खरीदी जाती है, जो गरीबी का मून चूमकर इक्ट्ठा किया जाता है। भूखा मरनेवाले विनानी पी कमाई ने और आये पेट रहनेवाले मजदूरों के वेतन में छीनकर इमझे किये हुए स्पर्य ने ये 'सांदर्य-प्रेमी' फला की चीजों को बगैदनं थे। बम, यह वान निहिलिस्ट लोगो को नुहाती न थी और वे टॉल्नटाय के शब्दों में रहा करते थे-'एक जोडी जता तुम्हारे तमाम मुदर-ने-गुदर चित्रो तया गेक्सपीयर के विषय में तुम्हारे नभापणां मे कहीं अधिक उपयोगी है।' निहिलिन्ट लोगों के निदातो का प्रचार फेवल लड़को में ही नहीं, लड़कियों में भी होगया था। अमीर घरानो की अनेक लड़किया अपने माता-पिता के घरो को छोड़कर निकल पड़ी थी। उन्होंने गुडियों की तरह रहना और रेनमी कपडे पहनना पसंद नहीं किया, और वजाय इसके वे मोटे-मे-मोटे ऊनी कपड़े पहने तथा अपने बाल कटाए हुए हाई-स्कूलों में पढ़ने जाने लगी। अपनी व्यक्तिगत स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए उन्होने अनेक कष्ट नहना अंगीकार किया। जिन स्त्रियों ने देखा कि उनके तथा उनके पतियो के बीच में कोई मच्चाम्नेह नहीं रहा है, और कानूनी विवाह वाहर ने भीतरी प्रेमभाव को ढके हुए है, वे अपने पतियो को छोडफर अलग होगई। ऐसी स्त्रियां को अपने बच्चों के माय गरीवी का मुकाबला करना पड़ा, पर उन्होने अपनी आत्मा की विरोधी तया पने स्वभाव के मर्वोत्तम गुणो की नानक पहले की दमपूर्ण परिस्थिति से इसे कही अच्छा ममहा। "निहिलिन्ट लोग नित्यप्रनि की छोटी-छोटी बातो में भी मच्चाई गे कान ननेये। समाज में बातचीत करने का जो परंपरागत ढंग था, उसे भी निहि- लिस्ट लोगों ने तिलांजलि दे दी थी, और जो कुछ उन्हें कहना होता था, उमे नक्षेप में और बरे ढग मे यह देने थे, वल्कि ऊपर मे कुछ रूग्वापन भी जाहिर करते थे।" ।
संस्मरण फ्रोपॉटकिन का लिया हुआ निहिलिस्ट लोगों का विवरण सचमुच यहा मनोरजक है। हमारे यहा के युवक-आदोलनो में निहिलम्टि लोगों की. मी स्पष्टवादिता तया दम-हीनता की नितात आवश्यकता है। साधारण जनता की ओर मन् १८६०-१८६५ में यानी आज मे ९५ वपं पूर्व स्मो नवयुवको ने जो कार्य कर दियाया था, वह अभी हमारे यहा प्रारन ही नहीं हुआ यह काम था सर्वसाधारण को-गाववालो की-नेवा का । प्रिंस प्रोपा- टकिन लिगते है. "हजारो ही म्मी नवयुवक मादा जीवन व्यतीत करते हुए गर्वमाधारण की सेवा कर रहे थे। उनका ध्येय था 'जनता की बोर चलो' 'मर्वसाधारण TOTTEN (To thc pcoplc, bc thc pcoplc), 31 TTT FOR के अमीर घरानो के माता-पिताओ तथा पुन-पुत्रियों में एक तरह या संघर्ष-मा छिड़ा हुआ था। माता-पिता यह चाहते पे कि हमारे लाके तथा लडकिया प्राचीन परपरा को कायम रखे, पर यह नई पीटी अपने जीवन को अपने आदनों को लाने में टालना चाहती थी। नवयुवको ने फोज गो, बैंको की तथा दुकानो की नौकरी छोड़ दी और वे उन नगर्ग में जाफर गठे होगए, जहा विश्वविद्यालय थे। बडे-बडे घरानी की पिया बिना पैसे के मेंटवीटर्मवर्ग तथा मास्को को जाती पी और वा आगर कोई ऐमा धंधा नीयती पी, जिमने उन्हें स्वाधीनता मि। बाबती कठिनाइयों के बाद उन्हें यह स्वाधीनता मिली, पर यह स्वाधीनता उन्होंने अपने मुख-उपभोग के लिए प्राप्त नही की पी, बल्कि यही चारती पो कि उन जान को ये नाधारण जनता तर-गेव पिसान-मगदूगेल- ले जायं, जिमने उन्हें पराधीनता ने मुक्त किया था। उनके प्रत्येक नगर मे और सैटपीटनंवर्ग को प्रत्येक मुहल्ले में रफी तपा पिछोटे- छोटे समूह बन गये थे, जिनका उद्देश्य मा आत्म-निष तपा मारमोपनि । इन समूहों में तत्वत्तालो के ग. अपंगागियो मे प्रवर तपा इतिहन- - ४८ एक क्रांतिकारी के संस्मरण । लेखको के गवेषणापूर्ण निबंध पढे जाते थे और फिर उनपर सूब वहन होती थी, पर इस निबंध-पाठ तया वाद-विवाद का उद्देश्य एक ही था, यानी 'हम लोग साधारण जनता (Masses) के लिए किस प्रकार उपयोगी बनें। धीरे-धीरे ये युवतियां और नवयुवक इन परिणाम पर पहुंचे कि साधारण जनता की सेवा करने का एक ही उपाय है, यानी उनके वीच में जाकर वसना और उन्ही-जैनी जिंदगी व्यतीत करना । ये नवयुवक डाक्टर, कपाउडर, गिक्षक, लुहार, बढई तथा मजदूर इत्यादि वनार ग्रामों में पहुंचे और गाववालो के साथ रहने लगे। लडकियों ने शिक्षिकाओ तथा दाइयो और नसों का काम सीखा और नैकड़ो की तादाद में गावों में पहुच कर वहा गरीब-से-गरीव आदमियो की सेवा करने लगी। ये नवयुवक और ये युवतिया समाज-संगठन या क्राति के विचारों के उद्देश्य से ग्रामो में नहीं गई थी। उस वक्त उन्हें इसका खयाल भी नहीं था। उस वक्त तो उनका उद्देश्य केवल यही था कि जनता को लिखना-पढना मिखाया जाय, बीमार पड़ने पर उनके लिए दवा का प्रवर किया जाय तया अज्ञानांधकार से उन्हें निकालकर ज्ञान के प्रकाश में लाया जाय। साथ ही ये युवक ग्रामवामियो के विचारों से भी परिचित होना चाहते थे। वे यह जानना चाहते थे कि समाज-नुवार के विषय मे इनके क्या खयाल है।" हमारे देश के नवयुवक प्रिंम श्रोपॉटकिन को इन बातो को पढ़ें और फिर सोचें कि क्राति किम चीज को कहते हैं, और उसके लिए प्रारभिक तयारी किस तपस्या तया त्याग के माय की जाती है। काति का नारा लगाना आसान काम है, लेकिन सच्ची क्राति की तैयारी में योग देना बड़ा ही कठिन है। सत्साहित्य का प्रचार उन दिनों स्म की ठीक वैमी ही हालत थी,जनी किछवपं पहले भारतवर्ष की थी। पयत्रो का सफलतापूर्वक संचालन करना सभव नहीं या। मन् १८६९ में नीचेफ नामक एक रशियन ने एक पत्रकारिणी मम्या संस्मरण ४९ कायम की थी, पर उसे सफलता नहीं मिली। जितने भदस्य इस सभा के बने थे, सब पकड लिये गए, और रूस के सर्वश्रेष्ठ युवको को देश-निकाला देकर माश्वेरिया भेज दिया गया। वेचारे कुछ काम भी न कर पाए । पड- यत्रकारियों को प्राय. अमत्य और धोखेबाजी का भी आश्रय लेना पड़ता है और नीचेफ के साथी भी उन सव धूर्तताओ से काम लेते थे। उन्ही दिनो इन पड्यग्रकारी युवको की कार्य-पद्धति के विरोध में दूसरे युवको ने एक और मम्या कायम की थी, जिसका नाम था 'चेकोवस्की का सत्लग'। इन सत्मग ने स्म के मामाजिक आदोलन में काफी भाग लिया था और इसके द्वारा आगे चलकर कडा जवरदस्त काम हुआ ! प्रिंस कोपॉटकिन इम सत्संग के सदस्य बन गए । इम सस्था का उद्देश्य था आत्म-शिक्षण । इम मस्या के सदस्यों ने यह बात पहले ही समझ ली थी कि यदि हम किसी सस्या को चिरस्थायी बनाना चाहते है तो उसकी नीव सच्चरित्रता पर पर रखी जानी चाहिए । प्रिंस क्रोपॉटकिन ने इसका जिक्र करते हुए एक वटा महत्वपूर्ण वाक्य लिता है, जिसकी ओर उन सबको, जो भारत में सस्याओ के मचालया है, ध्यान देना चाहिए । वह लिखते है-'उन थोडे-से मित्रो ने, जिन्होंने चेकोवस्की के सत्संग की स्थापना की थी, यह बात अच्छी तरह ममन ली थी (और उनको यह समझ विल्कुल ठीक भी थी) कि प्रत्येक मरथा के मूल में नैतिक दृष्टि से विकसित (सच्चरित्रता-युवत) व्यक्तित्व होना चाहिए, आगे चलकर उस सस्पा का चाहे जो राजनैतिक रम हो और भविष्य मे यह चाहे जो कार्यक्रम निश्चित करे।" निस कोपॉटकिन की यह बात कितने तजुरवे की है। जो लोग झूठ, दगाबाजी और फरेव का माधय लेकर देश का उद्धार करना चाहते है और पो अपने विरोधियों के पतन के लिए किसी भी तरह के त्य उपाय काम में ला सकते है, वे इन पक्तियों को पढ़ें ! कोपस्की के नत्सग में ऐसे ही व्यक्ति थे, जो नीतिवान् थे। फ्रोपॉटपिन लिखते है-- "यही कारण था कि चेकोवस्की के सलग का माम धीरे-धीरे काफी व्यापक बन गया और उनकी शाखाए तमाम .
५० एक क्रांतिकारी के संस्मरण रूस देश में फैल गई। आगे चलकर जव गवर्नमेंट के घोर अत्याचारी के कारण देश में कातिकारी सग्राम शुरू हुआ तो इस सत्सग ने कितने ही ऐसे स्त्री और पुरुप उत्पन्न किए, जिन्होने रूस की जारशाही के विरुद्ध युद्ध करते हुए अपने प्राण अपित कर दिये।" कोपॉटकिन इस सत्सग की प्रारभिक दगा का वर्णन इस प्रकार करते है--"सन् १८७२ में इस सत्संग के सामने कोई कातिकारी कार्य- क्रम नहीं था । उस समय उसका एकमात्र उद्देश्य था 'आत्म-शिक्षण', पर यदि इसका उद्देश्य यहीतक परिमित रहता, तब तो, जैसाकि प्रायः मठो में हुआ करता है, उसकी उन्नति रुक जाती, पर सदस्यो ने एक उपयुक्त कार्य अपने लिए चुन लिया था, और वह था सत्साहित्य का प्रचार । ये लोग अच्छी-अच्छी पुस्तकें खरीदते, मसलन मार्स की किताबें, रूस के ऐतिहासिक ग्रथ और मजदूरो की हालत से सबंध रखनेवाली किताबें इत्यादि । सत्मग के सदस्य इन कितावों को खरीदकर प्रातीय नगरो के पाठको तक पहुचाते थे। थोडे दिनो में यह कार्य इतना व्यापक होगया कि रूस के ३८ प्रातो में एक भी प्रात ऐसा नहीं बचा कि जहा इस प्रकार के साहित्य के प्रचारक न हों। धीरे-धीरे यह सत्संग शिक्षित आदमियो में साम्यवादी साहित्य के प्रचार करने का केंद्र बन गया। आगे चलकर विद्या- थियो तथा किसानो और मजदूरी के बीच संबंध स्थापित करने में यह सत्संग वडा महायक हुआ। इसी अवसर पर सन् १८७२ ई. में मै इम मत्सग का सदस्य वना । उन दिनो रूस मे तमाम गुप्त समितियां दमन की शिकार वनाई जाती थी। इस 'आत्म-चरित' के पाश्चात्य पाठक शायद मुझसे यह आशा करते होगे कि मैं उन्हें यह बतलाऊं कि इस सत्संग में प्रवेश-संस्कार कराते समय मुझे क्या-क्या रस्म अदा करनी पड़ी और कौन- कौन गपथें खानी पड़ी, पर मुझे ऐसे पाठको को निराश ही करना पडेगा। इस नत्मंग के कोई विशेष नियम नहीं थे, सिर्फ एक बात का खयाल ग्या जाता था, वह यह कि केवल उन्ही लोगो को इसका सदस्य बनाया जाय, जिनकी परीक्षा मंकट में की जा चुकी हो और जो कप्टो की कमीटी में बरे संस्मरण ५१ उतर चुके हो। "किमी नए सदस्य को गामिल करने के पहले उनके चरित्र की पूर्ण स्पष्टता तया गभीरता के माय आलोचना की जाती थी। स्पाटना तया ईमानदारी निहिलिम्ट लोगों का विशेप गुण घा । यदि फिली नादमी में थोड़ा भी फरेव या अहकार पाया जाता तो उसका दामिल होना जनमान था। सत्मगवाली को इस बात की फिर नहीं थी कि उनके गदग्यो गो नग्मा खूब वढ जावे । मत्मग यह भी नहीं चाहता था कि देश की भिन्न-निन संस्थाए जो काम कर रही है, वह सब हमारे द्वारा ही हो । उन यक्त ग्म में जनता की सेवा के लिए कितने ही गिरोह काम पर रहे थे । गोवणी गा सत्मग यह नहीं चाहता था कि वे हमारे अधीन होजाय । अधिकाग गिरोहो के साथ सत्सग का मित्रतापूर्ण सवध था, मत्मग उनको मदर भी करता पा, और वे भी मत्संग की मदद करते थे, पर एक-दूसरे को स्वाधीनता में कोई बाधा नही पहुचाता था। "इस प्रकार हमारा मत्मग थोटे-मे मित्रो का दृढ नमूह पा। जिन पर- बीस स्त्री-पुरपी से मेरा परिचय इस सलग में हुमा, मंगे नौनियान् नौर सच्चरित्र व्यक्ति मुले जीवन में अन्यम नही मिले।" क्रांतिकारी लड़कियां उस समय रस में जो लडकिया देश को उद्धार के लिए कार्य पर नी पी, उनके चरित्र का वृत्तात सचमुच अत्यत उत्साहप्रद है । प्रिंस शेपॉटगिन लिखते है-"एक लडकी का नाम पा नोपिया पीरोदम्पाया। पर एक अत्यंत उच्च घराने की थी और उसने अपना वनावटी नाम गोपा। इस लरकी का पिता पहले भेटपीटनंवर्ग वा मिनिटरी-गयनर गर मामा। यह लड़की अपनी माता से, जो उसे बहुत प्रेम पारती पी. नानावरा:- स्कूल में पढने के लिए चली आई पी और नने कन्य तीनशीनी को साप आत्म-शिक्षण का एक समूह फापन पर लिया था। इन पर पर मेरी तपा मेरे साथियों की मीटिंग (आ परती पीकर, पहले टपीटनंवर्ग के अपने-हले भपनो में जोगी पर grua .५२ एक क्रांतिकारी के संस्मरण पहने हुए दीख पड़ती थी, अब विल्कुल मजदूर लड़कियो की तरह रहती थी। वह मोटे सूती कपड़े पहनती थी, पुस्पो के-से जूते पहनती थी और जब वह अपने कचे पर पानी के भरे हुए डोल रखकर लाती थी, तो उसे देसकर यह कोई भी नहीं ताड सकता था कि यह किसी उच्च घराने की लड़की है। जब हम लोग किसानो के से कपड़े और गवारो केसे जूते पहने हुए उसके घर में घुसते और इन जूतो मे उसका साफ-सुथरा घर मैला हो जाता तो उसके भोलेभाले निप्कलक चेहरे पर वडी कठोरता आ जाती थी और वह हम सबको डांट वतला देती थी । नैतिक दृष्टि से वह बडी मंयमशील थी, लेकिन वह उपदेश देनेवाली नही थी। जब उसे किसी सदस्य की कोई बात नामुनासिव जचती तो वह वडी कठोरता से उसकी ओर दृष्टिपात करती। चरित्र-सबधी मामलो मे वह वडी कठोर थी। एक आदमी का जिक्र करते हुए उमने कहा था-'वह तो जनवा है।' जिस ममय उसने ये शब्द अपना कार्य करते हुए कहे थे और जिस ढग से कहे थे, वह अवतक मुझे भली-भांति स्मरण है और मैं उसे कभी नहीं भूल सकता। उसकी वह मुद्रा मेरी स्मृति मे जमकर बैठ गई है। यह लडकी क्रातिकारी विचारो की थी और यह वडी दृढ़प्रतिन तथा वीरात्मा थी। किसानो और मजदूरो के लिए काम करना ही उसके जीवन का एकमात्र व्येय था । एक दिन उसने मुझसे कहा -'हमारे समुदाय ने वडा जबरदस्त काम उठाया है। इसके पूर्ण करने मे दो पीडिया बीत जायगी, पर यह काम होना जरूर चाहिए और पूरी तौर पर ।' हमारे माय काम करनेवाली लडकियो में एक भी ऐसी नहीं थी,जो फासी से डरती हो । मौका आने पर सभी फांसी के तम्ते पर हमी-त्रुगी के माय चढ़ मरती थी, पर जिम ममय हम लोग मत्साहित्य के प्रचार में लगे हुए थे, उन ममय उनमे मे किलीको यह खयाल भी नहीं था कि फामी का मौसा भी आयगा। जब आगे चलकर पीरोवस्काया पकडी गई और उनको फामी या हुक्म हुआ तो उस समय मृत्यु के कुछ घटे पहले उसने जो चिट्ठी अपनी माता को लिखी थी, वह बड़ी कारणाजनक है और उसमें पर स्त्री पी प्रेममय आन्मा का मच्चा म्बन्प प्रतिविदित है।" .
मंस्मरण । प्रोपाटकिन ने एक दूमरी लटकी का जिक्र करने हा पहा है "एक दिन रात को हमे अपने कार्यक्रम ने गवय ग्पनेवाली जम्नवान अपने माय की एक लटकी को बतलानी थी, नयिा गान के पाल ने अपने एक मित्र के माय वहा गया । बाधी गत बीच चुकी थी, पर उमर कमरे में दीपक जल रहा था। हम लोग ऊपर गये, दया नी यह हमारे कार्यक्रम की नकल करती हुई पाई गई।मने उन परत एक मजाय गता। मैने कहा-'हम लोग तुम्हें बुलाने के लिए आये है। बात यह है कि किले मे हमाग जो माथी कैद है, आज हम छापा मारर उन गना चाहते है । उसीके लिए तुम्हारी जमग्न पी है। उसने दम पर भी मवाल नहीं किया । तुरत ही कलम रखकर कुर्मी पर ने उठी, और बोली-'नो चलो।' यह गब्द उमने इतनी मन्त्राः बार भोजन के साथ कहे थे कि उमे मुनकार मुझे अपने मजाक मी मर्मता पर कि होना पड़ा। जब मैने उसे बतलाया कि हम लोगों ने तो गिफं, मजारिया था तो वह अपनी कुर्मी पर बैठ गई, उनकी आगो मे आन भाग और निरागापूर्वक उसने कहा-'क्या मचमुच तुम्हाग या मजार ही था भला ऐगा मजाक क्यो करते हो?' उनका यह उत्तर नुनकर मतं पाया कि मैने कमा निर्दयतापूर्ण कार्य किया है।" फ्रोपॉटकिन के इस कथन मे जात होनागि मी लडकियो के हृदय में स्वार्थ-त्याग नया आत्म-निदान में भाप मार तक घर कर गए थे। क्रोपॉटकिन का मित्र-मंडल अत्याचारी जारमाही के दिनों में प्रिन प्रोसॉन नपा साथियों को जो महान सष्ट नहले परे उनको क्या पती मनोरे । है। इन महापुरपो के जीवन नगमुच उरना-प्रदान एका साथी सः पापिनको गाहारनामी में नि सपा नगेरिका में नः सवचिसयो पनिमायाम २ एक क्रांतिकारी के संस्मरण हम लोग अपने मित्रमंडल में उन्हें बच्चे के नाम से पुकारा करते थे। अपनी रक्षा के विषय मे इतने लापरवाह रहते थे कि इसीके कारण उनका उप- युक्त नाम पड़ गया था। उनकी इस लापरवाही के मूल में उनकी निरांक 'निर्भयता थी । डरना तो वह जानते ही न थे, और पुलिस जिस आदमी का पीछा कर रही हो उसके लिए सर्वोत्तम नीति भी प्राय. यही है कि वह विल्कुल निडर बना रहे। किसानो तथा मजदूरों में हमारे इस मित्र ने वड़ा जवरदस्त प्रचार-कार्य किया था, और इसीलिए पुलिस भी इनकी तलाश में रहती थी, पर सघेई ने कभी इसकी परवाह नही की, और न कभी अपने को छिपाने का कुछ प्रयत्न ही किया। एक बार तो उनकी इस उद्दण्ड लापरवाही के लिए हमारे मित्र-मंडल ने उन्हें खासी डांट वतलाई थी। बात यह थी कि उस स्थान से, जहा हम लोगों की मीटिंग हुआ करती थी, सई की जगह दूर थी, और वह वहां अक्सर देरी से पहुचते थे। किसानो की तरह भेड़ की खाल ओढे हुए वह सदर सडक के बीचो-बीच दनादन भागे आते थे। हम लोगो ने उन्हें फटकार बतलाते हुए कहा-'तुम भी बड़े अजीव आदमी हो ! भला ऐसी बेवकूफी क्यो करते हो? मान लो, तुम्हें इस तरह भागते हुए देखकर किसी पुलिमवाले के दिल में शंका पैदा हो जाती और वह तुम्हें चोर समझ के पकड लेता तो?' पर मियवर सर्पेई अपने विषय में जितने ही लापरवाह थे, दूसरो के विषय में वह उतने ही अधिक सावधान और चितागील थे। क्या मजाल कि उनकी जवान से कोई ऐमी वात निकल जाय, जिससे भेद खुल जाय और दूसरे आफत में जा फंसें ! क्या ही अच्छा होता, यदि हम लोगों में से प्रत्येक आदमी दूसरो की रक्षा के विषय में उतना ही सावधान रहता, जितना मित्रवर मई थे। मेरी उनकी घनिष्ठ मित्रता भी मुन लीजिए। एक दिन रात के वारह बजेतक हमारे मंडल में बातचीत होती रही। मीटिंग खतम करके जब हम लोग जानेवाले थे, उस समय एक लड़की ने आकर कहा-'मेरे पास एक अंग्रेजी विताब है, सवेरे तक इसके १६ पृष्ठो का अनुवाद हो जाना चाहिए। आठ बजे मुझे अनुवाद तैयार मिले । बोलिए, आप लोगों में से यह कार्य कैसे हुई, यह ।
संस्मरण . कौन कर सकेगा ?" मैने किताब का आकार देखा, और यहा- 'अगर मुझे कोई सहायक मिल जाय तो मंगन-भर मे ही माग याम कर गाना सर्घई ने कहा- 'मैं तैयार हू ।' बम, हम दोनो जुटकर बंट गए. और चार वजे ही १६ पृष्ठो का अनुवाद खतम कर डाला । फिर मर अग्रेजी मे हमने अपने अनुवादो को मिलाकर दुहराया। इसके बाद एक थालभर के दरिया हम लोग हज्म कर गए, जो मेज पर हम दोनों के लिए पुरस्कार-यापन दिया गया था। इस प्रकार कार्य समाप्त कर हम दोनो घर लौटे। नी रात से हम दोनो मे घनिष्ठ मित्रता होगई। ऐगे आदमियों को मै हमेगा पसद करता रहा हू, जिनमे कार्य करने की प्रबल गपिन हो और जो अपना काम मन लगाकर अच्छी तरह करे । मधे के जनुवाद ने और गोधनापूर कार्य करने की प्रवृत्ति ने मुझपर अच्छा प्रभाव डाला था और मो-ज्यों मेरी उनकी घनिष्ठता वढती गई, मेरे हृदय में उनके प्रनि गम्मान भी दाना गया। वह ईमानदार थे, स्पष्टवक्ता थे, उनमे युवको-जमा उल्लाह पा सुलझी हुई तवीयत के थे, तथा वुद्धिमत्ता भी उनमें उच्चकोटि की थी। उनके इन गुणो ने और उनकी सादगी, सच्चाई, हिम्मत और गन ने मुझे मुग्ध कर लिया। उन्होंने बहुत-कुछ पढ़ा था और विचार भी पापी किया था। कातिकारी संग्राम के विषय में, जो हम लोगो ने ऐटमा मा. हम दोनो के विचार बहुत-कुछ मिलते-जुलते थे। वह मुपने उप मे दम पाई छोटे थे और शायद उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं पा ति आगे पता क्राति कमा भयंकर रूप धारण करेगी और भावी मग्राम हम योगी के लिए कैसा कठिन सिद्ध होगा। बहुत दिनो वाद उन्होने मुझे बताया कि बिनानी मे वह किस ढग से प्रचार करते थे'एक दिन में अपने पर मिलने नाम सडक पर जा रहा था कि इतने में एक विमान उस तरफा नि । गाडी पर बैठा हुआ था, जिनमें एक घोडा गुनाहा पा। मैंने उन मिलान यहना शुरू किया कि तुम टैक्स मत दो; नरपारी अपनर नो गान जनता को लूटते है । वाइविन ने मैने पः दादान र उसे पाला शुरु किया कि विद्रोह करना तुम्हारा गतंय है । रिनान प्रा पर - एक क्रांतिकारी के संस्मरण और उसने अपने घोडे में एक चावुक जमाया। हम लोग भी उसके पीछे- पीछे भागे। फिर उसने घोड़े को दुलकी चाल चलाना शुरू किया, वस हम लोग भी उनके पीछे उसी चाल से चलने लगे । गरज यह कि उसे टैक्स न देने और विद्रोह करने का उपदेश देना मैने वंदन किया। आखिरकार इम उपदेग मेतंग आकर उसने घोडे को सरपट दौडाया, पर वेचारा घोड़ा कमजोर था। घोडा क्या था एक किसानू टट्ट, जिसे पेट-भर खाना नहीं मिलता था, इसलिए बहुत तेजी से दौड न मका। इस कारण हम लोगो ने उसे जल्दी ही पकड़ लिया। मतलब यह कि भागते-भागते जवतक हमारी मास न फूली, तवतक हम अपना प्रचार-कार्य करते ही रहे ।' पत्र-व्यवहार का अजीब तरीका आपस में किस प्रकार पत्र-व्यवहार करते थे उसके बारे में कोनॉट किन लिखते है : "कुछ दिनो के लिए मई को एक दूसरे प्रात में जाना पटा । आपस में पत्र-व्यवहार की आवश्यकता हुई । यदि सब बातें साफ-साफ लिसते, तव तो पुलिम फौरन ही पकड लेती । भिन्न-भिन्न वातो के चिह्न बनाकर लिखना मई को बहुत नापसंद था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि अच्छा एक तरकीव करे । चिट्ठी इम प्रकार लिखी जाय कि प्रत्येक पाचवा या और किमी नवर का अक्षर मार्थक हो और उन अक्षरो के मिलाने में पूरे वाक्य बन जायं, जिनमे हमारा मतलब पूरा हो जाय । इस प्रकार की लेखन- प्रणाली पहले भी पयत्रो में काम में लाई जा चुकी थी।" चिट्ठी उस प्रकार लिन्बी जाती थी : 'Excusc my hurried letter. Come to-night to sec me; to-morrow I shall go away sister. Vy brother Nicholas is worse ; it was late to perform an operation.' to my - संस्मरण - --- . अर्थात-~'माफ कीजिए, जल्दी मे है। आइए मझने गन गती मिलिए । कल वह्न के यहा रवाना हो जाऊगा । निकोलन गनी और बदतर है । यहा आपरेशन हुआ लेकिन काफी देर में।" इम पत्र में प्रत्येक पाचवा गब्द ही मार्थक है, गेप वाले ही दिली गई है। पाचवे गन्द मिलाकर पढने से यह वाक्य बनता है-'Come to-morrow to Nicholas late. अर्थात्-'माए, र निको के यहा देर में।' इस ढंग से चिट्ठी लिखना आमान माम न था। गोपॉटबिन लिने "इम प्रणाली मे लिखने में परिश्रम पाफी पटना था। जो वान यंग मामूली तौर पर एक पृष्ठ मे लिग्बी जा सकती थी, उन गिने पान- पाच और मात-पात पन्ने लिखने पडते थे। इन मारही आभागाफी लगानी पटती थी। अनेक बातो की परपना करनी पतीवी, निगे गन्द, जिनकी हमें आवश्यकता थी, यथाम्यान विकाए जानो नमः पत्र-व्यवहार का यह ढग वहत पसद आया। उसने म पनी निदिका भेजना शुरू किया, जिनमे वडी मनोजक कहानिया को भी जोर जिनका अत नाटको की तरह अत्यत आश्चर्यमय होता था। "सई ने एक वार मुझगे कहा था गिन्न प्राा पार के कारण मेरी माहित्यिक प्रतिभा जागृत होगः। अगर रिनामे प्रतिभाग, तब तो प्रत्येक बात उनके विकास में नहायका ही होती। गामों में क्रांति का प्रचार "१८७४ को जनवरी या फग्वर्ग में जद में भादमी ने मुझमे आकर कहा कि आपने एफपिमान गिना बाहर जाकर देखा, तो मित्रवर नः पिचमान । गिरफ्तार कर ल्यिा था, पर वह उने पामा दंगर भाग आदेश: यह पूर्व हृष्ट-पुष्ट पे और उनके नाम रोगनाप, नाभीपा। पर भी काफी तारतवर पारगावो में ये दोनी --- गन -- ... ।
एक क्रांतिकारी के संस्मरण . करते हुए घूमते थे, और क्राति का संदेश ग्रामीण जनतातक पहुचाते थे। लकड़ी चीरने का काम काफी कठिन था, और उनके हाय इसके लिए अन्यस्त भी नहीं थे, पर वे दोनो इस काम को खूब पसद करते थे। इन दोनों को देखकर कोई भी यह नही ताड सकता था कि ये लकडी चीरने- वाले दरअसल कौन है । पंद्रह दिन तक तो विल्कुल बे-खटके वे दोनों क्रातिकारी प्रोपेगंडा करते रहे, और किमीको इस बात का शक भी नहीं हुआ कि आखिर ये है कौन? कभी तो सर्घई वाइविल से, जो उसे कण्ठस्य थी, कुछ वाक्य कहकर ग्रामवासियो को यह धार्मिक उपदेश देता कि काति करना तुम्हारा कर्तव्य है और कभी वह अर्थशास्त्र की बातें समझाकर उन्हें गदर करने की सलाह देता। उन दोनो उपदेकों को ग्राम्य जनता ने ईश्वर- प्रेरित धर्म-दूत समझा। किमान लोग बड़े ध्यान मे उनकी बाते सुनते थे। उन्हें घर-घर लिये फिरते थे और उनसे भोजन के दाम भी नही लेते थे । कोई पद्रह दिनो में ही उन दोनो लकडी चीरनेवालो ने आस-पास के दस-बीस ग्रामो में खामी हलचल पैदा कर दी। उनकी कीर्ति भी चारो ओर फैलने लगी। किमान लोग–युवक और वृद्ध-खेत और खलिहान पर आपम मे काना-फूमी करने लगे-"अरे भाई, ये तो 'दूत' आगए मालूम होते है।" फिर कहते, “अव क्या है, जमीदारों से जमीन छीन ली जायगी। जार उन्हें पेंगन दे देगे।" किसान नवयुवक जग और भी जोश में भर गए और मरकारी पुलिस के मिपाहियो के सामने अकड-अकडकर कहने लगे-"बच्चा, ठहरो जरा। अवको हमारी पारी है। तुम राक्षसो के शासन का अव अत आ चुका है।" आखिर उन लकड़ी चीरनेवालो की कीर्ति-कथा एक पुलिस के अधि- कारी के कानो तक पहुची । उमने उन दोनो को गिरफ्नार कर लिया। कितने ही किमानो को गार्ड बनाकर पुलिसवाले उन्हें हैडक्वाटर की तरफ ले चले। गम्ते में एक गाव पडा। वहा एक उत्सव मनाया जा रहा था और ग्राम्य जनता बाने-पीने में मस्त थी। ज्योही ये लोग पहुंचे कि किमानो ने कहा-“केटी लोग है ? बहुत वक्त पर आये । आओ, चाचा!" किसान संस्मरण । उन मवको अपने घर ले गए और घर की बनी गगन टर नि। पुलिस के गार्डो मे भी भराव पीने के लिए कहा गया, वे नो पहले से ही तैयार बैठे थे। उन्होने सद तो पी ही, साथ ही यह भी कहानि फैदियो को भी पिलामो । मई को भी पीने के लिए कहा गया. पर बनंग इतना बडा था कि मई ने वर्तन मुह मे लगाकर पीने का बहाना तो रिया, पर पी विल्कुल नही। पुलिसवालो ने खूब इटकर पी। फिर उन्होंने गांचा कि इस हालत में तो पुलिस के अफसर के पास चना ठीक नहीं होगा। सवेरा होने पर चलेंगे। म उनमे मनोरजक बानवीन सन्ता ! मच लोग वडे ग्युग हुए, और आपम मे कहने लगे-'देवो, वैचा भने आदमी को पुलिस ने पकट लिया है ।' एक नवयुवक दिनान ने गाया कि रात के वक्त हम दरवाजा खुला छोड देंगे। म और असा साथी इम इशारे को समझ गए और जब मब लोग नो गए, पाने निकल भागे और मवेरे पाच वजने-बजते उमग्राम ने ये वीन मीमां निकल गए। वहा मे एक छोटे-मे रेलवे स्टेशन ये माग्यो fm रवाना होगए । मधेई ने मास्को में ही अपना अद्दा बना पिया और रख सेंटपोटमवर्ग के तमाम कार्यकर्ता पकड लिये गा, उन गमन मग अड्डा आदोलन का मुख्य केंद्र बन गया।" जनता में प्रचार-कार्य क्रोपॉटकिन ने दाहरो तथा ग्रामो मे प्रातिकारी विद्या गपंगने वालो का बडा ही सजीव चित्रण किया है। वे लियते । प्रचारक लोग नाना प्रकार के रूप धारण करने और मिर पेगो में काम करने लगे थे। कोई लुहार को पान पर पाम परगना कोई खेत पर और इस प्रकार धनीमानी जादमियो मेजपानमन- हीन किसानों तथा मजदूरो के मप में जाने लगे थे। मागी मनोका हुआ था कि अमीर पराने को लकियो ने, जोतिदिन शिक्षा प्राप्त कर चुकी थी, कपास के यामानो मे नौरीप:
एक क्रांतिकारी के संस्मरण - वह चौदह से सोलह घटे प्रतिदिन कठिन परिश्रम करती थी। यही नहीं, व फैक्टरियों से संलग्न छोटी-छोटी गदी कोठरियो मे रहती थी और मामूली मजदूर औरतो जैमी जिदगी विताती थी। यह एक महान् आदोलन था, जिसमे कम-से-कम दो-तीन हजार आदमी अपना पूरा-पूरा समय लगाये हुए थे और इनसे दुगने-तिगुने आदमी भिन्न-भिन्न प्रकार से उन आगे बढ कर काम करनेवालो को पीछे मे मदद दे रहे थे। सेंटपीटर्मवर्ग में काम करनेवाली मडली इन लोगो मे मे कम-से-कम आधे आदमियो से मवध बनाये हुए थी। हा, उनसे पत्र-व्यवहार गुप्त अक्षरो द्वारा ही हुआ । करता था। . 4 क्रांतिकारी साहित्य स्म में प्रकाशित होनेवाले साहित्य पर कठोर नियत्रण था । अपने लेख या पुस्तक में ममाजवाद का नाम लेने या उसका जिक्र करने की भी मनाही थी। इसलिए विदेश में अपना प्रेम कायम करने का प्रबंध किया गया। किमानो तथा मजदूरों के लिए छोटी-छोटी पुस्तिकाए तैयार करनी थी और उसके लिए हम लोगो ने एक साहित्यिक कमेटी बना दी थी, जिसका मै भी एक सदस्य था। इस कमेटी के पास काफी काम था। ये कितावे और पैमफ्लेट विदेश में छपवाई जाती थी और फिर-फिर गोपनीय टुग में एक जगह पर जमा करके तत्पश्चात उन्हें भिन्न-भिन्न केंद्रो को भेजना होता था, जहा में वे किमानी नथा मजदूगे मे बटवाई जाती थी। इसके लिए एक विस्तृत मगठन की जरूरत थी और तदर्थ काफी पन-व्यवहार तथा यात्राए भी करनी पड़ती थी। पुलिन की निगाह मे बचते हुए अपने में सहानुभूति रखनेवाले पुग्नक-विप्रेताओ नक इन पुस्तको को पहुचाना कोई आमान काम नहीं था और इसके लिए गप्त अक्षरो मे काफी पन-व्यवहार भी करना पड़ता था। अलग-अलग चंद्रो के लिए अलग-अलग गुप्त अक्षर थे। स्त्रिया इस काम में बहन नहायता देती थी। इस प्रकार के पत्र-व्यवहार के खाके ग्वीचने में ये रातें गुजार देनी थी।
सस्मरण ६१ कार्य करने का ढंग हम लोगो की मभा-समितियो मे मवंथा भाईचारे का वनांव होना । मभापति, मत्री इत्यादि की गिप्टाचार युक्त कार्रवाण्या हमे नग्न नारना थी। यद्यपि हम लोगो मे कभी-कभी वटी गरमागरम वहन होती ना, कपाधि हम लोग पाश्चात्य देगो के सभा मचालन के तौर-तर्गरों का आभय दिये विना अपना काम चला लेते थे। हार्दिक मच्चाई मे काम लेना और दिया. ग्रस्त विपयों के सर्वोत्तम हल निकाल लेना ही हम नवका उपाया। मिती भी प्रकार की कृत्रिम या नाटकीय बातचीत या रग-टग में हमे नफन ची। भोजन के लिए हम लोगो को मोटी गेटी, ककडी, पनीर और हल्ला चार, प्रचुर मात्रा में, वम यही मिल पाता था। पैसे का बिल्कुल ही अभार होनी बात नही थी। पैमा था, लेकिन हम लोगो के बढ़ते हुए वायं को गने अपरान था, क्योकि चीजो के छपाने मे, किताबो के यर-उधर भेजने में, पुलिग जिनर्ग तलाम मे थी, ऐसे मित्रो के छिपाने में और नये कार्यक्रमो के प्रान्म पाने बहुत पैमा खर्च हो जाता था। सफेद-पोशों और मजदूरो की मनोवृत्ति मेरी सहानुभूति सान तौर पर बुनकरो तथा फेन्टानियों के मन में साथ थी। सेंटपीटर्सवर्ग मे हजारोही ऐमे मजदूर ये, मोजानने में कार में आते थे और गर्मियों में अपने ग्रामो को लोट जाते थे, जता देनी करते थे। इन लोगो के बीच मे हमारे आदोन ने परीपी। लोग दन-दम, बारह-बारह मिलकर एक कामग किन पनगर उसीमे रहते थे। इन्ही कमरो पर पहुंचकर हम अंग माना प्रभार- थे। इन्हें हम लिसना-पढना भी मिलाते थे और नापानान् उपनेता बतलाते थे। इन लोगो के पास जाने के लिए स्म लिनानोमेन पडतेप, पयोकि जेण्टिलमैनो की पोगाक मे नांगोरेपान आना : साली नहीं था, उनमे पुलिस को फौरन पर गंदा हो जाता होता कि मैं जार के महलों में, जहा मजे एक मि में ने - ६२ एक क्रांतिकारी के संस्मरण लौटकर अपनी शिप्ट-मडली की पोशाक उतारता और किसानो-जैसे कपडे पह, कर इन लोगो के पास गंदी वस्तियो में जाता। जव मै उन्हे बतलाता कि विदेशों के मजदूर अपना सगठन कैसे करते है तो वे मेरी बातो को वडे ध्यानपूर्वक मुनते और फिर अत में कहते-हम लोगो को रूस में क्या करना चाहिए? "आप लोग अपना सगठन करके आंदोलन कीजिए। इसके सिवा दूसरा कोई तरीका नही।" फरांसीसी क्रांति के विषय मे हम लोग उन्हे पेम्फलेट दे देते और हमारा यही संदेश होता, "दूसरो तक हमारी बात पहुंचाइए और जब हमारे-जैसे विचारो के आदमियो की तादाद ज्यादा हो जायगी तव कोई दूसरा कार्यक्रम सोचेगे।" वे मजदूर हमारी वातो को भली-भाति समझ लेते थे। यही नहीं, वे इतने उत्साहित हो जाते थे कि उनके जोश को नियत्रित करने की जरूरत पड जाती थी। सन् १८७४ की पहली जनवरी का दिन मुझे खास तौर पर याद आता है। उसके पहले की रात मुझे सुशिक्षित मडली में गुजारनी पड़ी थी। इन सुशिक्षित सफेदपोगो ने नागरिको के कर्तव्य, देशहित इत्यादि के विपय में वडी लबी चौडी वातें हांकी थी, लेकिन इनसव स्फूत्तिप्रद व्याख्यानो के पीछे एक भावना छिपी हुई थी, वह यह कि अपना हाथ-पैर बचाकर मूजी को कैसे टरकाया जाय ! अपने निजी स्वार्थ की रक्षा ही इन लोगो का मुख्य उद्देश्य था, लेकिन किसीमें भी इतना साहस नही था कि सुलकर इस बात को स्वीकार कर ले कि हम उसी सीमा तक काम कर सकते है, जिस हदतक स्वयं हमाराजीवन संकट में न पडे। नीच जाति के आदमी बड़े आलसी है, विकास तो धीरे-धीरे ही होता है, निरर्थक बलिदान से क्या फायदा, वैसे हम तो त्याग करने के लिए उद्यत है, इत्यादि दंभपूर्ण बातें सुनकर मेरे हृदय को वडा दुःस हुया। दूसरे दिन सबैरै मै जुलाहों की मीटिंग में गया, मेरी पोशाक किसानों-जमी ही पी, इमलिए उसमें शामिल होने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मेरे सायी ने मेरा परिचय कराते हुए मिर्फ इतना ही कहा-"ये वोरोडिन है-अपने मित्र।" तद उन जुलाहो ने पूछा-"भई चोरोहिन ! अपने विदेग-यात्रा के अनुभव हमें मुनाइये।" फिर मैंने उन्हें पाश्चात्य देगो के मजदूर-मगठन, उनके मथर्प, संस्मरण - . कठिनाई, आशा और निरागा के किस्ने मुना दिये । वटी दिलचपी ने उनाने सारी बाते सुनी । श्रमजीवी मघो के विषय मे सवाल किये और अनर्गष्ट्रीय मघ के उद्देश्यो के विषय में भी पूछताछ की। तत्पन्चात्मन्य सवाल यह पा- "इस में यदि हम लोग वैमा मगठन करें तो कहानक सफलता मिलेगी।" मैने उनसे साफ तौर पर कह दिया, "इम प्रकार के बादोलन मनमानी न होगे। नतीजा यह हो मकता है कि हम लोगो को देग-निपाले का दिया जाय और हम माइवेरिया भेज दिये जाय और वायद आप लोगों को महीनो के लिए जेलखाने की हवा खानी पटेगी, इस जपगप में लिपी हम लोगो की वातं सुनी।" मेरी इन बातो से वे तनिक भी भयभीत न हुए। बोले-"नापिर गा.- वैरिया में सिर्फ रीछ ही नही रहते, आदमी भी रहते है । जहा पुछनादनी मकते है, वहा दूसरे भी रह सकते है। अगर आप भेटियों ने उन्ने है नो जगः में जाने का खयाल ही छोड दीजिए, इत्यादि। और भविष्य में जब मकट का वक्त माया और इन जुलाहो मे मे बान से पकडे गये, तो करीव-करीव सभीने बदी वहादुरी में काम लिया। उन्होंने हमारी रक्षा की और किमीने भी विश्वासघात नहीं किया। मेरी गिरफ्तारी अगले दो वर्षों में काफी धर-पकड हुई-राजधानी में और प्राता में भी। हर महीने हमें इस प्रकार के दुखप्रद ममाचार मिन्ते पे गि गजब साथी पकडा गया तो कल दूसरा । सन् १८७४ यो लत मेनापीगिर- पतारियो की मख्या और भी बढ गई। पुलिन ने भेंटपीटनंद नारे अड्डे पर छापा मारा और कई व्यक्तियों को गिरफ्तार पर पा। पुति- वही सतक होगई। अगर कोई विद्यार्थी मजदूरोपी पन्नियों में चा हुआ दीख पडता तो वह फौरन पुलिन की निगाह मे ग. जाना। के अनेक व्यक्ति पकड लिये गए बोर निर्फ ५-६ बानीही दिनो बाद मैने सुना कि दो जुलाहे पकटे गये है। पापियानो ६४ एक क्रांतिकारी के संस्मरण पर वे मुझे जानते थे-मेरे गुप्त नाम वोरोडिन से भी वाकिफ थे। एक सप्ताह के भीतर मुझे और मेरे एक मित्र को छोड़कर सब पकड़ लिये गए। हम लोगो के पास सेटपीटर्सवर्ग को छोड़कर भाग जाने के सिवा और कोई चारा न था। पर यह काम हम करना नही चाहते थे। हमारा काम काफी फैला हुआ था। विदेशो में पेम्पलेटो की छपाई होती थी, चोरी-चोरी उन्हें रूस मे लाया जाता था, कितने ही केंद्रो तथा क्षेत्रो पर उन्हें वितरित किया जाता था । चालीस प्रातो मे हमारा जाल फैला हुआ था और इस सगठन मे हमारे दो वर्ष लग गये थे। इनके सिवा खुद सेंटपीटर्सवर्ग मे मजदूरो के वीच काम करनेवाले हमारे चार केंद्र थे और उनमे छोटे-मोटे अनेक कार्य- कर्ता थे। इन सवको मझधार मे छोडकर कैसे भागा जा सकता था, जबतक कि इनसे पत्रव्यवहार करने और सवध बनाये रखने का कोई इतजाम न कर लिया जाता। हम लोगो ने दो नये मेवर अपनी मढली में शामिल किये और उन्हें मारा काम समझाना शुरू कर दिया। सर्ड कोफने अपना कमरा छोड दिया और वह अपने मित्रो के यहा रहने लगे-कभी किसीके तोकभी किसीके। मुझे भी अपना मकान छोड़ देना चाहिए था, पर मेरे मामने एक मुश्किल थी- वह यह कि मैने फिनलैण्ड तथा रूस के एक भौगोलिक विपय पर अपनी रिपोर्ट तैयार की थी और उमे भूगोल-समिति के सामने पेश करना था। इसी कारण मुझे एक सप्ताह के लिए रुक जाना पड़ा। इस बीच अनेक अजनबी आदमी वहाने ढूढ-टर्कर मेरे मकान के आसपास चक्कर लगाते रहे। इस बीच एक दिन एक जुलाहा जो पकडा गया था, मुझे अपनी गली में दीस पड़ा, जिससे मैं समझ गया कि मेरे मकान पर पुलिन की निगाह है। पर मै विना उद्विग्न हुए यह सव देवता-सुनता रहा, क्योकि मुझे अगले गुरवान को भूगोल-ममिति के सामने अपनी रिपोर्ट पेग करनी थी। मीटिंग हुई और उनमे काफी उत्साह प्रदर्शित किया गया। मेरे निद्धात की पुष्टि होगा और मीटिंग में यह प्रस्ताव रखा गया कि फिजीकल ज्याग्राफी विभाग का प्रधान मुझे बना दिया जाय । वहां जब प्रधान बनाने की बात हो - संस्मरण ६५ रही थी, मै मन-ही-मन यह सोच रहा था कि आज अपने घर पर सोऊगा या मुफिया पुलिस के जेलखाने में बेहतर होता, अगर मैं उस गाम को घर न लौटता । पर मै पिछले कुछ दिनो के परिश्रम से इतना थक चुका था कि मैने घर ही जाने की बात सोची । उस रात को पुलिस ने छापा नही मारा। उस रात को मैने वे सारे कागज-पत्र, जिनसे किसीको भी खतरा हो सकता था, जला डाले। अपना वोरिया-विस्तर वाव लिया और चलने की तैयारी करने लगा। मैने सोचा कि झुटपुटे के वक्त निकल भागूगा।ज्योही कुछ अँधेरा वढा, मरी नौकरानी ने कहा-"आप दूसरे जीने से बाहर जाइए।" मैं समझ गया कि क्या मामला है। जीने से उतरकर मै घोडागाडी में बैठ गया और गाड़ीहंकवा दी। पहले तो मैने समझा कि जान वची, पर थोड़ी देर में देखता क्या हूं कि एक तेज गाटी मेरा पीछा कर रही है। हमारी गाडी का घोडा कुछ अटका ही था कि वह गाडी हमसे आगे निकल गई। उस गाड़ी में मैने उस जुलाहे की शकल देखी और उसके साथ कोई दूसरा आदमी भी बैठा देखा । उस जुलाहे ने मेरा नाम वोरोडिन लेकर हाथ का इशारा किया। मैने सोचा कि शायद यह छूट गया है और मुझे कुछ सूचना देना चाहता है । ज्योही हमारी गाड़ी रुकी, जुलाहे के उस साथी ने जो खुफिया पुलिस का आदमी था, जोर से चिल्लाकर कहा-"मिस्टर वोरोडिन, प्रिंस क्रोपॉटकिन, मै तुम्हे गिरफ्तार करता हूं।" पुलिसवालो को उसने पहले से इशारे से वुला लिया था। निकल भागना भमभव था। उस खुफिया पुलिसवाले ने मुझे एक कागज दिखलाया, जिस- पर पुलिस की मुहर थी। उसने मुझसे कहा, "नापको अपनी सफाई देने गवर्नर जनरल के यहा चलना है।" मै नमल गया कि अवतक इन लोगो को मेरे बारे मे कुछ शक था कि चोरोग्नि में ही हैं, पर जुलाहे की वात पर मेरे ध्यान देने के कारण उनका यह प्रम दूर होगया। ये लोग मुझे खुफिया पुलिस के हेडक्वार्टर पर ले गये। इनके बाद प्रोपॉटकिन ने सुफिया विभाग की जिरह का मनोरजक वर्णन मिया है, जिसे हम विस्तार भय के कारण नहीं दे सकते। - . -- एक क्रांतिकारी के संस्मरण पीटर के दुर्ग में गया, क्रोपॉटकिन उस वदनाम पीटर के किले में रक्से गये, जहा रस के क्तिने ही प्रसिद्ध-प्रसिद्ध व्यक्ति पले रक्खे जा चुके थे। यह वही किला था, जिसका नामत्स मेदबी जवान से लिया जाता था। इसी किले मे प्रथम पीटर ने अपने लड़के की हत्या की थी। इनीमे रानी तारकेनोवा एक गफा म वद रखी गई थी, जिसमें नदी में पानी आ जाने के कारण पानी भर गया था। इसी दुर्ग में द्वितीय कयराइन ने वीनियो आदमियो को मरवा डाला था। गरज यह कि पिछले एक सौ सत्तर वर्षों में यह किला अपने घोर अत्याचारों के लिए रूसभर में बदनाम हो चुका था। न जाने कितने व्यक्तियो का यहा वध किया कितनो पर मारीरिक जुल्म, कितने ही धीरे-धीरे मौत के घाट उतरे और कितने ही उन अंधकारमय नम कोठरियो में पागल होगये। इसी रिले मे रस में प्रजातन का झंडा सर्व-प्रथम फहराने वाले डिसम्बिस्ट लोग बंद रहे थे, इनीमें कवि राइलीफ, गैवलको, डोस्टोवस्की, वाकूनिन, चींगवस्की, पिसारेफ तया स्स के अनेक महान लेखको को जेलखाने का दंड दिया गया था। यही काराकोजोफ को फासी दी गई थी। नोपॉटकिन ने आत्मचरित में लिखा है-"इसी किले में नैचेफ, जिसे स्विटजरलैण्ड नेत्स को सौंप दिया था, वद है और उसका कभी छुट- फारा न होगा। जार के द्वारा किसी अज्ञात अपराव के लिए दो आदमी और भी इभी किले में बंद है और जिंदगी भर यही रहेंगे, गायद उनका यही अपराव है कि जार के महलो की किसी गोपनीय वात का उन्हें पता है। इन मव दुर्घटनाओ की छाया मेरी कल्पना दृष्टि के मामने घूमने लगी, पर खास तौर पर ख्याल माया मुझे वाकूनिन का, जिन्हें मन् १८४८ में दो वर्ष के लिए आस्ट्रिया के एक किले में वद कर दिया गया था, यही नहीं, जिन्हें कमर में जजीर यांच कर एका दीवार से जकड़ दिया गया था और तत्पश्चात् पार की स्मी सरकार को सौंप दिया गया था और जो छ. वर्ष इनी दिले में रहे थ, और जो जार की मृत्यु के बाद ही ठोड़े गये थे। वाकूनिन जब इस किले मंस्मरण ६७ मैंने कहा- - से छुट थे तो वे अपने उन साथियो मे, जो बाहर स्वतंत्र रहे थे कि स्वस्थ और गक्तिगाली थे और उनमे कही अधिक ताजगीधी। मने मन में कहा-“जब वाकूनिन इस किले में मे जिंदा निकाल गरे नो मनीया निकलगा, यहा मस्गा नहीं।.....चारो तरफ सन्नाटा था। यो आसन मुनाई नही पटती थी। मैं अपने स्टूल को विटकी के पान नीच काया और उस पर सडे होकर बाहर दिखाई देनेवाले आकाम के छोटे-टर को देने लगा। मै किसी भी ओर से कोई आवाज सुनना चाहता था, पर पती गई भी ध्वनि नहीं आ रही थी। इस व्यापक मनाटे मे मै नग आगया और कुछ गाने की कोगिश की, पहले कुछ धीमे स्वर में, फिर पीले पुरजोर साय । मेरी कोठरी के छेद मे से मिपाही ने आवाज बी, "धीमान, गाना न गाइए" मैने जवाब दिया,"मै जस्र गाऊगा।" निपाही ने कहा, गिज नती।" "तुम चाहे जो कहो, मै जरा गाउगा।" तस-नान अध्यक्ष आया और उसने मुझसे यही कहा कि अगर तुम गाना नागोगे तो मुझे किले के गासक से रिपोर्ट करनी पडेगी। मने उत्तर में का-"ग गला वैठ जायगा और फेफडे भी सराव हो जायगे, अगर में कमानी और गाऊगा नहीं।" इसपर जेल के अध्यक्ष ने कहा-"तब जाकर पीने स्वर में गा सकते है-खुद अपने लिए।" लेकिन यह सव निरर्थक था। कुछ दिनो वाद मेरी गाने नाही जाती रही । सिद्धात की रक्षा के लिए मैंने गाने के प्रम को जानने ग प्रयत्न भी किया, पर वह चल नहीं नका। मैने अपने मन में कहा: "सवमे मुख्य बात यह है कि मैं अपनी पारीरिफार गम में बीमार हर्गिज नही पडू गा । मै ऐनी परपना करना : को यात्रा करनी पडी है और एक झोपी में दो वर्ष विनाने व्यायाम करगा, जमनास्टिक करगा जोर ऐनी लोगिन - ओर का वातावरण मुले बीमार न ल दे। जानी रोटी से दूसरे कोने तक दस कदम होते है, अगर मैरेनीवार ६८ एक क्रांतिकारी के संस्मरण तो दो तिहाई मील का टहलना हो ही जायगा । इस ढग से में पांच मोल रोज व्हलगा। दो मील भोजन के पहले, दो वाद को और एक सोने के पूर्व।. मैने दवात, कलमबीर कागज के लिए प्रार्थना की, पर वह अस्वीकृत कर दी गई। इस किले में बंद जेलियों को कलम-दावात तभी मिल सकती थी, जब स्वय स्मी सम्राट जार से उसके लिए आज्ञा ले ली जाय । पर मेरे भाई अलेक्जेडर ने मेरे लिए कलम दावात की अनुमति मगा ली थी । एक दिन मुझे एक गाडी मे विठलाकर खुफिया विभाग के कार्यालय को ले जाया गया, जहां दो पुलिस के अफसरो के सामने मुझे अपने बड़े भाई से मिलना था। जब मै पकडा गया, उस समय मेरे बडे भाई ज्युरिच में थे। अपने यौवन के आरभ से ही एलेक्जेंडर की इच्छा विदेश जाने की रही थी, जहा कि आदमी स्वाधीनता-पूर्वक विचार कर सकते है, मनचाही किताबे पढ सकते है और स्वतत्रता के साथ अपनी सम्मति भी प्रकट कर सकते है। इसके दमघोंटू वाता- परण से उसे नफरत थी। सच्चाईबावन तोले पाव रत्ती सच्चाई और हद दर्जे की स्पष्टवादिता, ये मेरे बडे भाई के गुण थे। वह किसी भी शकल में घोसा या व्याभिमान को विल्कुल सहन नहीं कर सकता था। रुस मे लिसने बोलने की स्वाधीनता का अभाव था और साधारण जनता जुल्म के सामने सिर झुका देती थी और स्सी लेखक दबी जुबान से लिखने के अभ्यस्त हो चुके थे। ये सब चाते मेरे बडे भाई के स्वभाव के सर्वथा विपरीत थी। इसलिए उन्होने स्विटजरलैण्ड जाने का निश्चय कर लिया था। इसके सिवा उनके दो बच्चे संण्टपीटर्स वर्ग में मर चुके थे। एक तो कुछ ही घंटे में हज से और दूसरा क्षय रोग से । इसलिए राजधानी में रहना भी उसे नापसद था। मेरे भाई ने हम लोगो के आदोलन में हिस्मा नहीं लिया था और जनता द्वारा विद्रोह की भावना में उनका विश्वास भी नहीं था।...वे स्विटजरलैंड के ज्यूरिच नगर में बन गये थे, पर जब उन्होंने मेरे पकडे जाने की सवर सुनी तो वे अपना मव काम छोडकर मेंट पीटनंवर्ग चले आये। वातत्रीत के समय हम दोनों ही काफी उत्तेजित थे, मेरे भाई तो और भी ज्यादा। पुलिसवालों की वर्दी मे ही उन्हें नफरत थी-रस में स्वाधीन विचारो का गला घोटनेवाले पुलिसवालो से- संस्मरण और उनकी मौजूदगी मे वे अपनी यह सम्मनि प्रकट भी कर देने थे। उनी रस में वापस आने से मेरे हृदय में नाना प्रकार की गकाए उठ गीण। उनके ईमानदार चेहरे और प्रेम-पूर्ण नेत्रो को देखकर मजे हर्षला था जोर यह जानकर खुशी हुई थी कि वे मुझसे महीने में एक बार मिल नगे, पर मेरी हार्दिक इच्छा यही थी कि वे इस जगह से मैकड़ो मीर दूर गई। मजे पर आशका थी कि कभी-न-कभी वे भी पुलिस की निगरानी में इसी गने में लाये जायगे। मेरी अतरात्मा कह रही थी-"अरे! गेर को मार में यो चले आये ? जल्दी-से-जल्दी इस देग को छोड जाओ।" पर में जानना यानि जवतक में जेल में हूं, तबतक मेरा वटा भाई स्म छोडेगा नहीं। मेरे बडे भाई जानते थे कि कुछ काम न कर मकने के मानी होगे मंगे मौत । इसलिए उसने पहले से ही अर्जी भेज रखी थी कि मुझे कलम, वात, कागज मिल जाय । भूगोल-समिति चाहती थी कि मैं अपनी किताब को नमान कर दूं। मेरे भाई ने विनान-समिति को भी इस मामले में दिलपपीने या अनुरोध किया। मेरे जेल में दो-तीन महीने रहने के बाद एक दिन शासक ने आकर मुझे हुक्म सुनाया कि मम्राट ने मुझे अनुमति प्रदान कार की कि शाम तक में लिखने का काम कर सकता हूँ । भाई की गिरफ्तारी सबसे अधिक कप्टप्रद चीज थी चारो ओर का मसाटा।विमान- जैसी शाति-जिसे तोडना असभव था। बात करने के लिए मामी नही था । एक महीना गुजरा, दो गुजरे, तीन गुजरे, महाकालि पानी इसी सन्नाटे में गुजर गये। जेल का अध्यक्ष रावेरे आता पानि ही पूछता-"तमाखू या कागज तो नही चाहिए ?"स्नेत में की कोशिश करता, पर वह चुप रह जाता' पहर-उपर नि- मानो मुलसे यह कहना चाहता था कि "मेरे उपर भी निगारा है।" फेवल कबूतर ही ऐसे जीव थे, जो मासे वातवीत पन्ने मेसी थे। वे सवेरे और शाम को मेरी खिड़की पर मारपसार ७० एक क्रांतिकारी के संस्मरण । जाते थे। ....जाड़े के दिनो मे मेरे कमरे में इतनी नमी होगई कि मुझे गठिया की बीमारी होगई। फिर भी मै प्रसन्न था, क्योकि मै लिसने- पढ़ने का काम कर सकता था। पांच मील रोज टहलने का अपना नियम मैने वरावर जारी रखा था, पर कुछ दिनो बाद मेरी कोठरी पर दुख की घटा छा गई। मेरे बड़े भाई को गिरफ्तार कर लिया गया। मेरी अंतिम मुलाकात उनके साथ दिसंबर १८७४ मे हुई थी। वे और मेरी वहन हैलेनी मुझसे मिलने आये थे। पुलिस का अफसर मौजूद था। बहुत दिनो के बाद जब जेल में अपने सगे- संवधियो से मिलना होता है तो कैदी तथा उसके रिश्तेदार दोनो ही उत्तेजित हो जाते हैं। अपने प्रेमियो को इतने निकट पाकर और उनकी चिर-परिचित आवाज को सुनकर बड़ा आनद होता है। पर साथ-ही-साथ यह अनुभूति भी कि यह मिलन क्षण स्थायी है। खुफिया पुलिस के सामने कोई निजी बातचीत तो हो ही नहीं पाती। मेरे भाई और वहन दोनो ही मेरी तदुरस्ती के बारे में बहुत चिंतित थे, क्योकि जाड़े का असर मेरे स्वास्थ्य पर स्पप्टतया दीस पड़ने लगा था। इस बातचीत के एक सप्ताह बाद पोलाकोफ का एक पत्र मेरे पास आया कि भविप्य में वे मेरी किताब के प्रूफ देखा करेगे। मै तो बडे भाई से पत्र की आगा कर रहा था । मुझे गक होगया कि गायद मेरा भाई पकडा गया होगा। मेरे जैसे अविवाहित आदमी के लिए गिरफ्तारी तो एक व्यक्तिगत कठिनाई और तकलीफ थी, पर मेरा भाई तो विवाहित था, उसे अपनी पत्नी में बहुत प्रेम था और अपने बच्चे पर भी वे दोनो बहुत मुहव्वत रखते थे, क्योंकि उनके पहले दो बच्चे मर चुके थे। मेरी चिंता का क्या पूछना ! मै मोचता था कि आगिर मेरे बड़े भाई को क्यो पकड़ा गया उमने क्या जुर्म किया होगा? मप्ताह के याद सप्ताह बीत गये, पर मुझे कोई भी खबर नहीं मिली। बहुत दिनो पीछे मालूम हुआ कि उने लदन के एक पत्र फोग्वाई को एक चिट्ठी भेजने के अपराध में गिरफ्तार किया गया था। लैवराफ नामक एक मी मज्जन लदन मे हम समाजवादी पत्र के सम्पादक थे और मेरे बडे भाई ने उन्हीरो एक रात भेजा था, जो बीच में ही पकड लिया गया। मेरे भाई ने ।
संस्मरण ७१ उस पन में मेरे स्वास्थ्य के विषय में लिखा था, बहुत-नी गिरफ्तारियो की चर्चा की थी और रूसी सरकार के जालिमानामामन के प्रति घृणा प्रदर्मित पीपी। बस, इसी जुर्म में उसकी तलाशी ली गई और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। मेरे भाई को खुफिया पुलिस ने कई महीने तक हवालात में समा । मेरे भाई के बच्चे को क्षय होगया था, वह मरणासन्न था। डाउटर ने कह दिया था कि वह वस दो-चार दिन का मेहमान है। मेरे वटे भाई ने अपने दुश्मनों में कमी किसी रियायत के लिए प्रार्थना नहीं की थी, लेकिन इस बार मृत्यु के मुस मे जानेवाले पुत्र के प्रेम ने उसे मजबूर कर दिया और उगने अपने बच्चे को देखने के लिए घटेभर की मोहलत मागी, पर पुलिस ने उसे अस्वीगार कर दिया। बच्चा चल वमा और उसकी मृत्यु ने मेरी भाभी को पागल-गा बना दिया। इसके बाद मेरे भाई को देश-निकाले का दट दे दिया गया। देगा:- बेरिया भेज दिये गए, जहा वे १२ वर्ष रहे और जीवित न लौटे।' जार के भाई का आगमन एक दिन अकस्मात जार के भाई मेरी कोठरी में पधारेजोराने की उन्होंने कहा, "गुड डे प्रोपॉटकिन।" वे मुजे निजी तौर पर जानने और उन्होने चिर-परिचित स्वर मे मुजसे पूज. "भोपॉटविन, भला यह पगे मुमपिनाकि तुमारे-प्रनितिन आदमी, जो जार का पार्षद रह चुपा हो, न नकर मे अपना" प्रिस प्रोपॉटकिन ने आगे पर कर आत्मग्नि में जाने पर जो पब्द लिये है, वे अत्यन्त मयत है । दोनो ना करते थे और अपने जग्रज की मृत्यु ने निगमगरला लगा होगा । पर उन्होंने सिर्फ इतना ही निका, मंगेतीrf-: महीनो दुरो गो पटा हाई नही और नाना :- प्राणी का जन्म हुआ, जिमने उन पदा गु vi का नाम मेरे भाई पर होगमा गया।' गुण:: मलेगा अभी जीपितर परिण मेमोन । . . में .
७२ एक क्रांतिकारी के संस्मरण . मैने उत्तर दिया--"हर आदमी के विचार अलग होते है।" "विचार! तो आपके विचार-चांति को उभारने के पक्ष में थे?" जार के भाई ने पूछा। मै इसका क्या जवाब देता? यदि मै 'हा' कहता तो उसका मतलब यह होता कि जिस आदमी ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना अपराध स्वीकार नहीं किया था, जार के भाई के सम्मुख अपना कसूर कबूल कर लिया। और अगर में 'न' कहता तो वह सरामर झूठ होता। इसलिए में चुपचाप सडा रहा। ज़ार के भाई मुझे चुप देसकर बोले : "हां, तो जनाब अपने कारनामों से अब गर्मिदा है ?" इस बात से मुझे क्रोध आगया और मैने कहा, "मुझे जो कुछ कहना है, मैने जाच करनेवाले मजिस्ट्रेट से कह दिया है, मै उममे कुछ भी जोड़ना नहीं चाहता ।' फिर वे चोले "अरे भई शोपाटकिन, मै तुमसे कोई जाच करनेवाले मजिस्ट्रेट की हैसियत मे थोड़े ही वात कर रहा हूँ। मैं तो एक प्राइवेट आदमी की हैसियत से वातालाप कर रहा हूँ।" उम वक्त मेरे मन में एक बात आई। ययोनजार के मामने उनके भाई की मार्फत स्म की दुर्दशा के, किमानो के सर्वनाग को, अफसरों की हिमाकत के और शीघ्र ही आनेवाले भयंकर अकाल के समाचार पहुंचा दू ? शायद उमसे जार पर कुछ प्रभाव पडे । फिर तुरंत ही मैने मन में कहा, "ये सब फालतू बातें है, उनने कुछ भी कहना बेकार है । गरीब जनता की दुर्दशा से वे भली भाति परिचित है और मेरे निवेदन मे उनमें कुछ भी परिवर्तन न होगा। तत्पश्चान् जार के भाई ने मुझे और बातों में उलझाने की कोशिश की और मै ताड गया कि वह मुझमे अपराध कबूल कराना चाहता है। आसिर तंग आपर मुझे कहना पटा-"जनाय, मैं अपने जवाव मजिस्ट्रेट के सामने दे चकाह।" यह मुनकर जार के भाईमाहब मेरी कोटरी छोड़कर चल दिये। X X X इसके बाद निमोपॉटफिन ने अपने जेल से भागने का जो रोमाचकारी वृत्तांत लिया है, उसे ज्यो-कान्यों मगले अध्याय में दिया जाता है।
: ३ : मैं जेल से कैसे भागा? दो माल बीत चुके थे । मेरे साथियों में से कई मर चुके थे, बहुत-से पागल होगए थे; लेकिन हमारे मुकदमे की सुनवाई की कोई चर्चा ही नही थी! मेरा स्वास्थ्य भी दूमरे वर्ष का मत होते-होते गिरने लगा था। लकडी का स्टूल (जिमसे मै कसरत करता था) भारी लगने लगा और पाच मील का टहलना मानो वडा लबा मफर! चूकि किले में हम लोग साठ फैदी थे और जाडो में दिन छोटे होते थे, हममे से प्रत्येक तीसरे दिन सिर्फ बीम मिनट के लिए बाहर टहलने ले जाया जाता था। मैंने अपनी शक्ति को बनाए रखने की भरसक कोशिश की थी, लेकिन पूरे माल उत्तरी ध्रुव की सर्दी में रहने का असर होना ही था। साइवेरिया की यात्रा के बाद मेरे शरीर में रक्त-रोग के जो लक्षण प्रकट होने लगे थे, वे अब कोठरी की नमी और अधेरे के कारण पूरी तरह से व्याप्त होगए। इस तरह की जेल की उस भयकर बीमारी का मेरे शरीर पर पूरा-पूरा असर होगया। आखिर १८७६ के मार्च अथवा अप्रैल में हमें बताया गया कि तीसरे दस्ते (मुफिया लिम) ने प्रारभिका छान-बीन पूरी कर ली है और हमारा मुकदमा न्यायाधीगो के पास भेज दिया गया है। इसलिए हम अब कचहरी नेपामपाली जेल में भेज दिये गए। यह जेल चार मजिल की एक वटी भारीश्मारत थी, जिनमें कोठरी-ही-कोठरी थी। यह फ्राम और वेलजियम के गारागारों के नमूने पर हाल ही में बनी थी। प्रत्येक कोठरी में आगन की तरपा एक मिकी थी और लोहे के छज्जो की ओर एक दरवाजा। चारो मजिलों के ये एग्जे लोहे के एक जीने मे मिले हुए थे। हममे मे अधिकार को इस जेल में आना जन्छा लगा। यहा उस किले से नही अधिक पाल-पहल थी और बाहर के नादमियों से पत्र-व्यवहार, ७४ एक क्रांतिकारी के संस्मरण - अपने रिश्तेदारी से मिलने अथवा आपस में बातचीत करने की सुविधा भी अधिक थी। बिना किसी रोप-याम के दीवारो पर ठुक-छुक जारी रहती थी। इसी तरह मैने अपने पडोसी युवक को पेरिस कम्यून का सारा इतिहास मुना दिया, पर इममे लगभग एक सप्ताह लग गया | लेकिन मेरा स्वास्थ्य और भी खराव होगया। उस तग कोठरी का, जो एक कोने से दूसरे कोने तक सिर्फ चार कदम थी, संकीर्ण वातावरण मुझे असह्य था। जैसे ही भाप की नलिया चालू की जाती, वह वर्फ-जैमी ठडी कोठरी एकदम हद से ज्यादा गरम हो जाती कोठरी मे टहलने के लिए जल्दी-जल्दी मुडना पड़ता था, इसलिए थोड़ी देर मे ही चक्कर आने लगते और दम मिनट की खुली हवा की कसरत भी, आगन तंग होने के कारण, स्फूनिप्रद नहीं होती थी। जेल का वह डाक्टर, जिसके विपय में जितना ही कम कहा जाय, उतना ही अच्छा, 'अपनी जेल में' 'रक्त-रोग' का नाम भी नहीं सुनना चाहता था । मुझे घर में खाना मगाने की अनुमति मिल गई थी, क्योकि मेरे एक रिश्तेदार वकील इस जेल के नज़दीक ही रहते थे। लेकिन मेरी पाचन. क्रिया इतनी खराब होगई थी कि मुश्किल से रोटी का छोटा टुकड़ा और एक-दो अडे खा पाता। मेरा स्वास्थ्य दिन-पर-दिन गिरने लगा और लोग कहने लगे कि अब मै बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह मकूगा । अपनी कोठरी मे जाने के लिए जब मै जीना उतरता था, तो मुझे दो-तीन बार ससाना पडता था। मुझे याद है कि एक वृद्ध पहरेदार सिपाही ने मुझसे कहा था- "दुख है कि तुम इन वसन के आखिरतक न वच मकोगे।" मेरे रिश्तेदार अब अवंत चिंतित होगए। मेरी बहन हेलेन ने मुश जमानत पर छुड़ाने का प्रयल किया; लेकिन गृविन (अफसर) ने व्यग्य मे मुनगते हुए उत्तर दिया--"अगर तुम दास्टर का लिखा हुआ यह गर्टी- फिकेट ले माओनि तुम्हारा भाई दन दिन के भीतर मर जायगा, तो मै उमे छोड़ दूंगा!"मेरी बह्न यह जवाब पाकर कुर्मी परने वदाम मे गिर गई और अफसर के मामने ही मिमरने लगी, जिनमे उस अफसर को नंनोपही हुआ - में जल से फमे भागा? .५ . - होगा! लेकिन अंत में उसने अपनी यह प्रार्थना मजूर गीरीमिंग इलाज सेंटपीटगंवर्ग में फोजी वन्यनार के मवमेदारान चाहिए। इम वृद्ध होगियार डाक्टर ने बहुत ही मचीनगर वह इस निर्णय पर पहुचा कि मुझे कोई भयकर नारीचिनीमार्गी शुद्ध वायु न मिलने के कारण सत-रोग होगया है। उसने मन- "केवल शुद्ध वायु की ही तुमको जनग्न है।" योती में रहा और तत्पश्चात् उमने निश्चयपूर्वक कहा-"ज्यादा गाना कि है। तुम्हें किसी भी हालत में यहा न रहने दिया जाना चाहिए, हमरी भेजना ही है।" दस दिन बाद मुझे एक फीजी मन्यताल में भेज दिया गया। सेंट पीटर्सवर्ग के वाहर बना था। इसमें बीमार जगमगं और नियां लिए एक छोटी जेल भी थी। मेरे दो नापी, जब पर निनाम: वह शीघ्र ही तपेदिक में मर जायगे, नी जेल में भेजे गए । का मेरी तंदुरस्ती ठीक होने लगी। मुझे फोजी गागाने पाग--7 कमरा मिला। कमरे में दक्षिण की तरफ गोपनीरना थी। खिडकी के सामने एक मकापी, जिनो दोनों नरम और मटक के उस पार मुली जगह घी, नागेनी र रोगियों के रहने के लिए छोटे-छोटे कमरे बना। पटेतक ये वढई मिलकर गाना गाने । एमा, तैनात था, मउक पर पहरा देता सता पा। मै पिडकी को दिनभर चली गना * नमीव नही हुई पी, मजे लिया गया। तरह नाम लेने या अवसर मिज-भग:- .::: हल्फा साना पचाता, नाभीमानी फिर नए उत्साह से लारम मिला। का दूनरा भाग रिनी भी ना - 7 ही रिप पर याद RAIN - . .." .. -- ~ A ७६ एक क्रांतिकारी के संस्मरण . किले में मैंने एक मायो से, जो इन अस्पताल में रह नुका था, सुना या कि यहा से भाग जाना बहुत मुस्किल नहीं है। गीघही मने अपने मित्रों को यहां आने की सूचना दे दी। लेकिन भागना उतना आसान नहीं था, जितना मेरे दोस्तो ने मुझसे कह रखा था। मेरा पहरा और भी ज्यादा कडा कर दिया गया और मेरा कमरे से बाहर निकलना भी बंद कर दिया गया। अस्पताल के सिपाही और मतरी यदि कमरे में आते, तो कभी एक या दो मिनट से ज्यादा नहीं ठहरते थे। मित्रोने मेरे छुटकारे के लिए कई-एक योजनाएं बनाई। कुछ तो उनमें अत्यंत मनोरंजक थी। उदाहरण के लिए एक योजना यह थी कि मैं खिड़की के लोहे के सींकचे काट लू । फिर किसी बरसात की रात को, जब संतरी अपने सदूक में झपकी ले रहा हो, दो मित्र पीछे से आकर इस संदूक को इस होशियारी से उलट दें कि उसे चोट भी न लगे और यह संदूक से ढंक जाय! और इसी बीच में सिडकी मे वाहर कूद जाऊं ! लेकिन अचानक ही इमसे अच्छी तरकीब निकल आई। "बाहर टहलने की अनुमति मांगो।"-एक सिपाही ने धीरे से मुझसे कहा। मैने तदनुसार प्रार्थना की । डाक्टर ने मेरा समर्थन किया और हर रोज तीसरे पहर चार बजे को लगभग मुझे टहलने की आज्ञा मिल गई। उम पहले दिन को, जब मै टहलने निकला, में कभी नहीं भूलूंगा। निकलते ही मैंने देखा कि करीब २०० गज लंबा और १५० गज चौडा हरी घास का आंगन है । फाटक खुला रहता और उसमें से अस्पताल, महक और उसके राहगीर दीखते थे । जव में जेल की मीढियो से उतरता तो आंगन और उन फाटक को देखते ही रह जाता, मानो पर ही रुक गए हो ! यांगन में एक तरफ जेल यी--करीव १०० गज लंबी छोटी इमारत थी,जिमके दोनों तरफ मतरियों के छोटे-छोटे संदूक थे। दोनो सतरी जेल के सामने इधर-से-उपर चकर लगाते रहने और इस तरह धान पर एक पगढडीही वन गई थी। मुझमे कहा गया कि में इमी पगइडी पर टहला करूं। कि दोनों मंतरी भी इनीपर टहलते रहते थे, इसलिए मेरे और किमी संतरी के ।
मैजेल से पासे भागा ?
बीच का फासला फभी १०-१२ गज में ज्यादा नबना, और ना
के तीन सिपाही गीढियो पर बैठकर चोरनी करने गये।
इस वढे अहाते की दूसरी ओर जनाक लाठी गाड़ियों में मारी।
रही थी और कई किसान उगे दीगार के महारे लगाने माने जाने
तरफ मोट तलो की दीवार थी और उममा फाटा गालियान आन-बाने
के लिए खुला रहता था। यह गुला फाटक मुझे वहन जन्मालगा। मन में
मोचता, "मुझे इस तरफ दृष्टि नही गटानी चाहिए।"फिर भी उनी Trm
देखता रहता! पहले दिन जब मुन्ने कोठरी में वापन पहुन्गा गया तो गुग्न
वाहर के मित्रों को कापते हुए हाथो मे अत्यन अस्पाट जारी में मनं पिा-
"इम समय इगारे की भाषा मे लिग्वना असम्भव-मा प्रतीत
भागना तना आसान लगता है कि बुमार-जैनी जपानी मामलगी।
आज ये लोग मुझे बाहर आंगन में टहलाने ले गए थे। का पाया
और नजदीका कोई मंतरी भी न था।ग फाटया ने मैनिक नागना, का
के मतरी मुने पकड नही सकेगे।" और फिर मैंने जाने भागने र
का खुलासा लिखा--"एका महिला को गुली गाली ने जा।
वह गाडी से उतरे । गाडी फाटक से लगभग ५० परमजीती।
फाटक के बाहर एक आदमी टहलना रे । जव चार वर्ग में टार-m
निकाला जाऊ, तो थोड़ी देर हार मे टोप लिए वगानी :
मतलब समझे कि यहा मेरी तैयारी है। फिर तुम लोगो को मन
कि 'मक माफ है। बिना तुम्हारे नारे गो मै नी भागमा और
दफा फाटक से बाहर हो जाऊ तो गिरफ्तार नहीोनाकानी
सामने का हरा वगला, जो पता ने नाणवलागि
उमरी पिटको में सारा कर दे, और यदि समय:
इशारा रोशनी या आपाजो ने गरना, जने गाजनिी -
पर दे । इसमे भी बेहतर होगा जिनको गाना fr:
होगा कि सपा साफ है । मतरी गिरीin.
लेकिन पिनी तरह में उनने ०.५ म भनेकीर।
Mon
७८ एक काातकाराक सस्मरण में झपटकर बैठ जाऊंगा और फिर हम लोग भाग जायगे । अगर इस बीच सतरी ने गोली मार दी, तो फिर चारा ही क्या है ? उससे बचना अपनी सूम से बाहर है । फिर यहां जेल के भीतर निश्चित मौत के मुकाबले में यह खतग कुछ बुरा तो है नहीं।" कई सुझाव और भी दिये गए; लेकिन आखिर यही तरसीव स्वीकृत हुई। हमारे मित्रो ने तैयारिया शुरू कर दी । इसमें कुछ ऐसे नज्जनों ने भी भाग लिया, जो मुझे बिल्कुल न जानते थे। फिर भी उनका जोश ऐमा था, मानो उनके अत्यंत प्रिय मित्र का छुटकारा होने जा रहा हो। लेकिन इस उपाय में कुछ मुस्किले थी और समय कम रह गया था । मै सूब मेहनत करता, राततक लिखता रहता; लेकिन फिर भी मेरा स्वास्थ्य अच्छा होने लगा-इतनी जल्दी कि स्वय मुझे आश्चर्य होता। जब मैं पहले दिन मागन मे लाया गया था तो धीरे-धीरे चलने में भी थकान मालूम होती थी और अब मै दौट सकता था! लेकिन मै तो अब भी उसी तरह धीरे-धीरे टहलता था, वरना मेरा टहलना ही बद कर दिया जाता। डर लगता रहता कि कही मेरी स्वाभाविक पी सारा भेद ही न सोल दे ! और इमबीच मेरे माथियो को इसके लिए बहुत-गे आदमी जुटाने थे, एक तेज़ घोडा और अनु- भवी गाडीवान टूटना था और ऐमी बीसियो बाधाओ का भी खयाल करना था, जो इस तरह के पढ्यन में तत्काल उपस्थित हो जाती है । इनसव तैयारियों में लगभग एक माह लग गया और इस बीच किमी भी दिन मुझे पुरानी जेल में भेजा जा माना था आखिर भागने का दिन निश्चित होगया। पुराने रिवाजी के अनुमार २९ जून मत पीटर और नंत पाल का दिन है। मेरे मित्रों ने अपने पड्यंत्र में थोटी भावुपना का पुट देकर मेरे छुटकारे के लिए इसी दिन को निश्चित किया! उन्होंने मुझे मूचित कर दिया था कि जब में अपनी तैयारी का इशारा पलंगा, तो वे एक लाल गुब्बारा उदाकर मुझे जता देगे कि बाहर सब ठीप है। फिर एक गाडी आवेगी, और आखिर में एक गाना होगा, जिनमे मुझे मालूम होजाय कि मटक माफ है ! 1 में जल से कसे भागा? 3 - -- - - २९ तारीख को में बाहर निकला और टोप नारार गुलाम इंतजार करने लगा, लेकिन वहा कुछ भी न था। नाना पटा बीता, नर पर गाटी की सड़सडाहट सुनाई दी। एक नादमी को गाते हुए भी मुना, गुव्वारा नज़र नहीं आया । बाधा घटा खत्म हुना जोर में कर निराश होकर अपने कमरे में लौट आया। नोचा कि कायाः होगी। उस दिन मचमुच अनहोनी होगई थी। नेटपोटगंवर्ग में गमा बाजार में विका करते है, लेकिन उन दिन एक भी गुम्बाग नपाएर बच्चे से एक गुयारा लिया गया, लेकिन वर गुराना पा, महीन' में मिन फिर एक चम्मैवाले की दुकान में हान्द्रोजन बनाने पर जमा एक गवारा भरा भी, लेकिन वह उड़ाती नहीं। हाजन में नीगन थी। समय थोडा बचा था। फिर एक छाने में गुब्बारे को वारा गया और महिला इस छाते को ऊचा करके महातं की दीवार में मां लेकिन मुले कुछ भी न दीप पड़ा-दीवार बहुल ऊनी पीर । बहुत ठिगनी! बाद को मात हुआ कि उन दिन गुमानमिनट हुआ। जव मेरे भागने का समय निकल गया तो गाती पूर्व- मिलामा दोटाईगई। उसी सजा पर दस-बारह नादिगा जनताल रही थी। इन गाड़ियो के कुछ घोरेपा ओर भागे, पुरवासीर । मला यह हुआ कि हमारी गाडी यहुन धीमे-नीमे परमार विल्कुल ही रुपा गई । अगर में उगम होता तो निम्लिा- गया होता। अब उस सटा पर पाजगहमारे दैनंगि मालूम हो जाय कि सना माफ पानी। दोन- मेरे सापी गतरियो गी तगमएकमाता - परता पाचदिमामने गाती तो दुसरा मापी मूगरुनी माना करनm- दो, मूगफली साना वर रोमनि :-- -- ८० एक क्रांतिकारी के संस्मरण - उस घोड़ागाडीतक पहुंचने थे। मेरे मिनी ने सामने का हरा बंगला भी, जो फाटक के सामने ही था, किराये पर ले लिया था, और जैसे ही सडक साफ हो, उमकी खिड़की में एक आदमी को वायलिन बजाना था। अब अगला दिन निश्चित हुआ। ज्यादा देरी सतरनाक होती। वास्तव में अस्पताल के अधिकारियो ने गाडी का आना-जाना नोट कर लिया था। कुछ सदेहात्मक खबरें भी उनके पास अवश्य पहुच गई होगी, क्योकि भागने मे एक रात पहले मैने अफसर को सतरी ने कहते हुए गुना था-"तुम्हारे कारतूस कहा है ?" संतरी ने अपने कारतूस निकाल लिये तो अफसर ने कहा- "क्या तुमसे नहीं कहा गया कि आज रात को चार कारतूस अपनी जेब में तयार रखना?" और यह तबतक वहा सडा रहा, जवतक सतरी ने चारो कारतूस अपनी जेब में न रख लिये! जब वह चलने लगा तो फिर आज्ञा दी-"मुस्तैद रहो!" उन सव इगारों की रूप-रेसा मुझतक पहुचानी थी। दूसरे दिन दो बजे मेरी एक रिस्तेदार मुझे घडी देने जेल आई। वैसे तो मेरे पास हर चीज़ एक अफसर के मार्फत आती थी, लेकिन चूकि यह घड़ी सुली थी, मेरे पास मीधी पहुंचा दी गई। इस घडी में एक छोटा पुर्जा था जिममे सारी तरकीय लिखी थी । मै तो उसे पटकर काप गया! कितनी हिम्मत और कमी दिलेरी का काम था! यदि किमीने घडी के ढाकन को गोल लिया होता, तो वह महिला, जिमका पीछा पुलिस पहले से ही कर रही थी, तुरत वहीं गिरफ्तार होजाती। लेकिन मैंने देखा कि वह जेल के बाहर सड़क पर निकल गई और नौ-दो-ग्यारह होगई ! मदेव की भांति में चार बजे बाहर निकल आया और मैंने अपना गाग कर दिया। थोड़ी देर में गाड़ी की गदम्बडाहट सुनाई दी और हरे बगले में वायलिन की ध्वनि भी आई। लेकिन उस वक्त में अहाते के दूसरे कोने पर था। फाटय की तरफ चला-मन में नोचा, 'वम, कुछ क्षण और ।' लेकिन फाटक के पान पहुंचते ही मला वायलिन बजना वद होगया। करीब १५ मिनट परीफिक में बीते । नोचता, 'वायलिन बंद क्यो होगया!' कुछ समय मेजेल मे ने भागा ? बाद ही देखा कि कोई एक दर्जन गाडिया गाटर ने अहाने में आई। नुगत ही वायलिनवाले मज्जन ने एक जोगी चीज उंदी, मानो वह यह का हो-"वम, यही वक्त है, आगिरी मौका!" में पीरे-धीरे बापता हुआ फाटक की ओर चला दम आगका में कि. काही वायलिन फिर बदन जाय। फाटक पर पहुचकर मंने मुडकर देगा गि मनरी ५-६ कदम पीछे या और उल्टी तरफ देख रहा था। 'बम यही मौका है मेरे मन में आया तुरल मैने जेल की पोगाक उतार फेंकी और दोरने लगा। उसलवी. चोटी पोशाक को उतारने का अभ्यास में बहुत दिनो मे कर रहा था। या गेट इतना बडा था कि किमी भी तरह एक मपाटे में उनग्नाही नरीमानने उसकी वाहों के नीचे की मिलाई काट दी, फिर भी काम नहीं कर। आरिपर मैने उमे दो हरफनो मे उताग्ने का अन्यान प्रारम जिया, पाके वाह मे उतारता और बाद में उसे नुरन जमीन पर पटपता । पी-पान में इन प्रिया में पारगत हो गया। मुझे अपनी गपिन पर बहुत विश्वास नही था, जिम गरीने के लिए गुम मे धीरे-धीरे दोटा। लेकिन में कुछ ती पदम भागा रोजगाति किमान, जो दीवार के सहारे लफडी लगा रहे , निल्ने-' पपाडो ! वह भाग रहा है ।" और वे मुझे फाटा भी। अब तो मै पूरे जोर मे दोहा । मेरे मन में बन पर पाबा पी दोटो।' फाटगा के नजदीक गाभियो ने जो गई धना शिश मैने पयाल नही दिया। मेरे मित्रो ने, जो हरे बगले ने मते भागा वेग का- मगरीने तीन सिपाहियों के नामंग पामिरी - फासला गम था और चने बगदरपती दिनार नाकाnिt गा। कई दफा उनने अपनी दागी नगीन में सेना --- भागे ला नी । ए दफा नो मेरे मितीनमा । नारी गोपूरा विमानमामिलेगा । - ८२ एक क्रांतिकारी के संस्मरण । - - नहीं दागी। लेकिन मै उसमे आगे ही रहा और अत मे तो वह विपुल पिछड गया! फाटक के बाहर निकलकर देतातो दग रह गया-गाडी में एक अफसर फौजी टोप पहने बैठा था, उसने मेरी तरफ देगा भी नहीं। मन में सोचा, 'वन, खात्मा होगया!' मिनो ने लिया था कि सड़क पर आने के बाद हर्गिज न धवराना । वहां तुम्हारी रक्षा के लिए कई माथी उपस्थित रहेंगे। मैंने निश्चय किया कि जिम गाडी मे दुश्मन बैठा है, वहा न बैठू । लेकिन जैसे ही मैं गाड़ी के करीब पहुंचा, मने देखा कि इन अफसर के मेरे एक पुराने दोस्त की तरह के भूरे गलमुच्छे है । वह दोस्त हमारे गुट मे तो नही था, लेकिन मेरा निजी मित्र अवश्य था और उनकी दिरी, और खासकर सतरे के मौके पर उसकी हिम्मत को मै जानता था। मन मे मोत्रा, 'वह यहा इस वक्त कसे आ मकता है !' में उसका नाम लेकर पुकारनेवाला ही था, लेकिन फिर अपनेको जल लिया और उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए नालिया पीटी । अब उसने मेरी ओर मुह किया और तुरत मै उसे पहचान गया । वह रिवारवर हाथ मे लिये तैयार था। मुझमे कहा-"जल्दी बैठो।" और तुरंत गाडीवान ने कहा--"जल्दी भगाओ, नही तो तुम्हारी जान की बर नहीं।" घोड़ा बहुत ही अच्छा था। वह साम उमी मौके के लिए लाया गया था। पूरीनेजी में दीटा। पीछे मेनकाटी आवाजें आ रही थी -"पाटो। पाडा! भाग न जाय !" मेरे मित्र ने उमीनमय मुझे एक शानदार ओवर- कोट पहना दिया। लेविन पीछा करनेवालो से भी ज्यादा मतग उम मतरी मेवा, जो अस्पताल के फाटक पर ही तैनात था, गादी के गडे होने की जगर ने ठीक नामने । वर थोडाही आगे बढकर आनानी में मुझे गाड़ी में चटन मेरोर मरना था। इसलिए एक मित्र को न मिपाही का ध्यान वटाने । लिए गा गया था। और इम मित्र ने पिया भी वह काम बी बी में । मह मिसाही पहीं अस्पताल को ग्मायन-विभाग में काम कर चुका था। मेरे मिन ने नवीन और उनके द्वारा दीमनेवाली चीजो के बारे में उममे बहन पेट दी। मनु नगरीर पर रहने वाले एक कोटा के विषय में उसने गिपार्टी में जेलने कांसे भागा ? . में पूछा-"तुमनं कभी देना है कि उसके गिननी लबी पूल होती। "क्या वक्त हो ? पूछ" फिर उसने कहा-"जीहा, उना पूरी और काफी वी; युदंवीन मे माफ दीखती है।" मिशाही ने उना दिया- "अच्छा अपने ये किस्म तुम मुझे न मुनाओ।" में मित्र ने कि-": इसके बारे में ज्यादा जानना हसबसे पहनो उदंवीन ने मने पल थी "जब मैं उनके नजदीक में भागकर जयाट के मार गान बंगला यही बहन चल रही थी। पाठको को यह घटना निन्मेनहानी-सी नगी, पर है यह पूर्णनया सत्य। गाडी तुरन एका तग गली में मुह ग-उनी दीवारी नाय, जिसके महारे किमान लकडी प रहे थे। अब ये मय रिगान मंग पीछा करने में लगे थे। गाडी ने मोद नने सपाट लिया शिव- करीव उलट ही गई! मै तुरत आगे की ओर बढ़ गया और मित्र भी गग गीच लिया, इसमे गाडी उलटनं गे बच गः! तग मा पो पायावा. तरफ मुडे । यहा एक नार्वजनिक नस्था के नामने दो नामित घे। उन्होंने हमारे माथी की फोजी टीपी को मामी दी। बदनीग उत्तेजित था, गलिए मैने उममे गहा-"गान हो । 'उगनं उत्त विण- "मय ठीक हो रहा है, फोजी आदमी हमें नलामी देन है।"जगातीवान न मेरी तरफ मुह किया। मैने देगा कि यह भी अपना ए पुगना । हमारा घोल तेज गाल में भागा जा रहा था।र जगामित मिले। वे हमें दमाग कर रहे थे और हमारी गम गाना - मि. फागनाए ' जय हम एकादरवाजे पर जोर गाना मैगीषा डीना बह गया और अपनी मातीने मिmar पानी में मिलता पापा और नाप अत्यत चितित भी। हां और विकास गन आगों में थे। उगने मो रन पूसरी पोगा फार का सनी गो मुलाचारोलिए पत। दमिन्ः- मंपर में पर पिं और दूसरी मारी। नवी IIोपदार और auraham - --- -open Un ८४ एक फ्रानिकारी के संम्मरण निकले और मोचने लगे कि क्या किया जाय । आस-गान गा मोना कोई गाडीहीन थी, मभी गाडिया हमारे मित्रों ने किराये पर ले गनी थी। उग भीट की एक किमान बुढिया इन सबमे होगियार थी। उसने धीरे-गे कहा--"वनारे कंदी वे लोग प्रोमपंवट पर अवन्य पहुनेगे, और अगर कोई आदमी इम रास्ते से दौड़कर मीया वहा पहुचे तो ये मत्रमुगही पकडे जायगे।"वह बिगुल ठीक कह रही थी। अफमर नजदीयाली गाडी पर गया और उन आदमियो में प्रार्थना की कि वे घोट दे दें, लेकिन उन्होंने देने से साफ इकार कर दिया और अफसर ने भी बल-प्रयोग नहीं किया । और ये वायलिन बजाने- वाले सज्जन और वह महिला भी, जिन्होने हग बगला किराये पर लिया था, वाहर निकल आये और उन बुटिया गे माय भीट में गामिल होगा। जब भीड छट गई तो वे भी चपत होगए । उन दिन नीमरे पहर मोमम भी अन्छा था। हम लोग उन टापुओ की और चल दिये, जिवर मंटपीटर्मवर्ग के अधिकाग उच्च श्रेणी के लोग वगत ऋतु मे सूर्यास्त देवनं गाया यग्ने थे। गग्ते में बगल की मडक पर एक नाई की दुकान पर मैने अपनी दादी भी मफाचट कगली। अब मुझे पहचानना काफी मुश्किल था। हम लोग उन टापुओ मे अपनी गाडी मे ग्यर-गे-उधर काफी देर तक चक्कर लगाते रहे। हममे कह दिया गया था कि अपने गत के विश्राम स्थल पर जग देर ने पहुचे । अब सवाल था, इस बीच कहा जाय ? मैने मायर्या में पूछा-"अब क्या करे?" वह भी थोड़ी देर मोचता रहा और फिर तुरंत गाडीवान मे पहा-"दोनोन, होटल ले चलो।" यह मेटपीटगंवर्ग का मचर्म मानदार होटल था । यह बोला-"तुम्हे देखने के लिए कोई भी आदमी उग मागीमान होटल में न पहुंचेगा। वे तुम्हे मव जगह ढंगे, लेकिन उन जगह त पिनीको सवाल भी न आवेगा। वहा हम लोग भोजन करेंगे और फिर कुछ मुगपान भी तुम्हारे छटकारे की सफलता की गुगी में।" मला,एंगे मुनानिय मुझाव सा में जवाब ही क्या देता। इसलिए हम लोग टोनीन पहुँने । गत के भोजन ममय था। मरी में मानदार उजालाही महासा और आदमियों ने भरथे। उन नबको हमने पार किया और में जेल से कसे भागा ? ! - । अलग कमरा किराये पर लिया और वहा तबतक रहे, जबतक पूर्व निदिष्ट स्थान पर हमारे पहुंचने का समय नहीं होगया । जिन मकान में हम पहले- पहल उतरे थे, उसकी तलागी हमारे वहा मे हटने के थोड़ी देर बाद ही हो गई । लगभग सभी मित्रों के घरों की तलागी हुई, लेकिन डोनोन में दृढने की किमीको न मूली दो दिन बाद मुझे एक कमरे में चले जाना था, जो मेरेलिए एक फर्जी नाम मे किराये पर ले लिया गया था। लेकिन जो महिला मेरे मार जानेवाली थी,उन्होंने उन मकान को पहले देय आने की होगियारी की। इन मकान के चारो तरफ जामूग थे। कमिय मुनये कहने आए कित्यहा जाना अब पता में गाली नहीं पुलिस अन्यन मनक हो गई थी। मुफिया विभाग ने मेरी तम्बीर की गोली प्रतिया छपवाकर वटवा दी थी। जो जागूम मुझे पहचान ये, मुजे गडको पर तलाग कर रहे थे। जो पहचानते नहीं थे, वे उन पहरे- दारों को साथ लिये घूम रहे थे, जिन्होने मुझे जेल में देखा था। जार बहुत ही कुद थाति उनकी गजधानी मे ही में दिन-दहाडे उस तरह भाग गया उमने हुरम दे दिया था-"प्रोपॉटफिन को जारही पकडना है।" मेंटपीटगंवर्ग में बने रहना अमभव था, इसलिए मैं नजदीक के गायो मंछिपा गाापाच-छ दोस्तों ने माप में उम गाव मे रहा, जहा उन मागम में मेटपीटगंवर्ग के लोग तफरीह के लिए आया करते। फिर नयरिया गया कि मुझ ही बाहर ही चा जाना चाहिए। लेकिन एक विदेनी पन हाग संग मालूम होगया था कि बाल्टिप और फिनर प्रांगो की नीमाओं के भर स्पानो और न्टेगनी पर वे जामून नैनात थे, जो मुझे पहनानते थे। म- गिए मैने निश्चय पिया मिउग नरकपल, जिम नरफ मिनीरा नयापही न पहुगे । एर मित्र त पागोटं लार और दमन मिरको नाम र मेने पिन कोनीमा पारी और नीस रोपनियाको गठी र बदर- गार पर पहुंचा। पाने मीना गया। दमकाज परटगाधर याने पापा, नी मेरे मापी में मेरपीरनंदन नी पर मुनगम ने मर्ग कनन गो ८६ एक क्रांतिकारी के संस्मरण । जो एक गिरफ्तार कर लिया था। मेरे भाई की मालो भी, जो भाई और भाभी के माइवेरिया चले जाने के बाद मुझमे हर महीने मिलने आनी थी, हिरासत में ले ली गई थी। मेरी वह्न को तो मेरे जेल मे भागने के बारे में कुछ भी पता न था। जव में भाग आया था, उसके बाद मेरे एक मित्र ने उमको यह पयर मुनाई थी। मेरी बहन ने बहुत-कुछ यहा, आग्जू-मिन्नत की नि मुझे कुछ भी पता नहीं; लेकिन फिर भी पुलिम उना उसके बच्चों में अलग करके ले गई और पद्रह दिन जेल में रखा। मेरे भाई की माली को गायद कुछ भान तोही गया था कि कुछ तैयारिया हो रही है । लेकिन उनमे उनका हाय विन्धुल न था। अधिकारियों में यदि तनिक भी बुद्धि होतीनो ममत लेते कि जो महिला हर महीने नियमपूर्वक मुझमे मिलने आती थी, कम-मे-कम वह तो इस पड्यन में गामिल न होगी। उमको दो महीने जेल में रखा गया। उनके पति ने, प्रतिष्ठित वकील या, उमे छुदाने का भरपूर प्रयत्ल किया। उने अधिकारियो मे उत्तर मिला, "हमे भी मालूम होगया है कि इस ड्यय में इस महिला का कोई हाथ नहीं; लेकिन जिम दिन हमने इमे गिरफ्तार किया था, हमने जार को यह मूचना भेज दी थी कि पड्यय की मचालिका गिरफ्तार कर ली गई है और अब जार को यह ममनाने में देर लगेगी कि पट्यय मे इस औरत का कोई मवध नही!" विना यही रके मै स्वीडन पार कर गया और प्रिस्चियाना पहुंचा। वहां हल नामक वदरगाह के लिए जहाज मिलनेतफ इतजार करता रहा। जब मैं जहाज पर पहुंच गया, नो मैने जग चितित होकर मोचा--जहाज के ऊपर झटा पहा पा है-नारवे का, जर्मनी का या इंग्लं. का? तुरंत मुझे दीना, जहाज के ऊपर यूनियन जैक फहग रहा है वही सदा, जिसके नीने हालियन, मी, मानीसी और सभी देगो के मरणायियों को मरण मिली है ! मैने हृदय में उन पनाया या अभिनदन किया।' । उपर्युक्त वृत्तांत प्रोपॉटकिन के आन्म-चरित से लिया गया है। ?.56 ८) 'मंडल द्वारा प्रकाशित प्राप्य साहित्य गांधीजी लिखित | गावास्योपनिपद प्रार्थना प्रवचन (भाग १) ३) सर्वोदय-विचार (भाग २) २॥) स्वराज्य-शास्त्र गीता-माता ४) भू-दान-यम पद्रह अगस्त के बाद १॥),२) गाधीजी को श्रद्धाजलि धर्मनीति १॥), २ राजघाट की सनिधि में ६० अफ्रीका का सत्याग्रह | विचारपोषी १) मेरे समकालीन । सर्योदय का घोषणा-पत्र यात्मकथा जमाने की माग बात्म-मयम नेहरूजी की लिसी गीता-बोध मेरी वाहानी प्राम-सेवा हिन्दुस्तान को ममन्याए २॥) मगल-प्रभात लडनाती दुनिया २) सर्वोदय राष्ट्रपिता नीति-धर्म राजनीति मे पूर भाश्रमवामियो से चिम्य इतिहास की सना ) हमारी माग | हिन्दुस्तान की कहानी न० ॥) सत्यवीर की कया अन्य नेसको को सक्षिप्त आत्मकथा आत्मरुपा (राजेन्द्रदा) हिंद-स्वराज्य ॥ गाधीजी गोन अनीति की राह पर १) । गाधीमान । माभागापा (ग) गाधी-शिक्षा (तीन भाग) १०) तुलना मुन्दरी आज का विचार (दो भाग) I) मिग-पार मानर्य (दो भाग) १m) म भन नगीना गापीजी ने गहा पा(५ भाग) ११) पागपान-मसान (10) पिनोदाजी को लिसी गानी जानी (7) "} दिनोवा-विचार (२ भाग) 3) भारत-विगतमा गीता-प्रवचन १॥) एकमेगा पान्ति-माना नावाद जीपनलोर मिपाप २) गायोगिक स्थितप्रासन १) गीमिन उपनिषदोपा अध्ययन १) गालोताना m) नलग- १॥ बापू को नीस " . शावरपालि 117 प्रार्थना (वियोगी हरि) ॥) का० का इतिहास (२ भाग) २०) अयोध्याकाण्ड १) पंचदशी (सं० २० जैन) १॥) भागवत-धर्म (ह. उ.) ६॥) सप्तदगी यार्थी जमनालालजी, ६॥) रीढ़ की हड्डी शा) स्वतन्त्रता की ओर ४) अमिट रेखायें बापू के आश्रम में १) एक आदर्श महिला मानवताके झरने (माव.) १५) राष्ट्रीय गीत बापू (घ. विडला) २) तामिल-वेद (तिक्कुरल) रूप और स्वरूप आत्म-रहस्य डायरी के पन्ने १) थेरीगाथाएं ॥) घवोपाख्यान 1) बुद्ध और बौद्ध साधक स्त्री और पुरुष (टाल्स्टाय) जातक कथा (आनंद को. २॥ मेरी मुक्ति की कहानी १॥) हमारे गांव की कहानी प्रेम में भगवान २) अन्नो की खेती २) जीवन-साधना ११) दलहन की खेती कलवार की करतूत 1) साग-भाजी की सेती हमारे जमाने की गुलामी, पशुओ का इलाज(प.प्र. धुराई कैसे मिटे १) रामतीर्य-मंदेश (३भाग) बालकों का विवेक रोटी का सवाल (कोपा०) हम करें क्या ॥) नवयुवको से दो बातें धर्म और सदाचार ११) पुरुषार्य (डा भगवान्दाम) अधेरे में उजाला १॥) काश्मीर पर हमला भारतमावित्री (वा. अग्रवाल)1) शिष्टाचार माहित्य और जीवन २) भारतीय संस्कृति ३॥) कन्ज (म. प्र. पोद्दार) १) आधुनिक भारत हिमालय की गोद में २) फलों की खेती २॥ कहावतों की कहानिया तन्दुरुस्त हूं या बीमार || राजनीति प्रवेमिका भा० नवजागरण का इतिहास ३ जीवन-मंदेवा (म्म जियान) गाधीजी की छपछाया में २।।) अशोक के फट ३ भागवत-कया ६) लोकमान्य तिलक २) जय अमरनाथ शा हमाग कानून ५) प्रगति के पथ पर ६ पुस्तके १॥) माति की भावना २॥) मंन्न-नाहित्य-सौरभ नपागम गाया मार (२८ पुस्तकें) प्रति पुम्नक ।) हिनूर की गनी नमाज-विकास-माला सोयन-प्रभाव प्रति पुस्तका) में