Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
Kavita-nikunj
Front matter
मुद्रक-गोपीनाथ सेठ, नवीन प्रेस, दिल्ली ।
विषय-सूची उन छा 3०७२ सोमवाब सभा, पृष्ठ संख्या विषय १ भूमिका २ कविपरिचय ३ चन्दवरदाई ४ अमीर खुसरो ५ विद्यापति ६ कबीरदास ३१ ३४ - ३६ ७ रैदास ४६ ६. गुरु नानक - - ५५ ६ दादू १० मलूकदास . ६० ६६ ११ मलिकमुहम्मद जायसी १२ गोस्वामी तुलसीदास १३ हृदयराम १४ सूरदास १५ नन्ददास १६ मीराबाई १७ रसखान १०० १२० १२४ १३१ ( २) विषय पृष्ठ १३४ १३७ संख्या १८ नरोत्तमदास ..१६ गंग २० केशवदास २१ रहीम २२ विहारी १४० १४८ १५४ २३ भूषण १५६ . - - २४ मतिराम २५ देव २६ भिखारीदास २७ बेनी (बन्दीजन) २८ पनाकर २६ गुरु गोविन्दसिंह ३० घन आनन्द ३१ दीन दयालगिरि १६३ १६५ १६६ १७२ १७४ १७६ १७८ १८१ . .
भूमिका हिन्दी साहित्य की धारा पिछले लगभग एक हजार साल से अपने विभिन्न किन्तु अनवरत रूप में प्रवाहित हो रही है । विक्रम की सातवीं शताब्दी मे ही तांत्रिक और योगमार्गी बौद्धों की रचना में प्रयुक्त अपभ्रंश के रूप में हिन्दी भाषा की उत्पत्ति चुकी थी। भोज के समय मे तो इसने शुद्ध साहित्य का रूप ग्रहण कर लिया था। इस प्रकार ग्यारहवीं शताब्दी मे महाराज भोज के समय को साहित्यिक हिन्दी की उत्पत्ति का समय माना जा सकता है। हिन्दी के साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देनेवाली प्रवृत्तियों के आधार पर इतिहासज्ञों ने एक हजार वर्ष के इस इतिहास को चार भिन्न-भिन्न युगों मे वांटा है । इन्हे क्रमशः आदि काल, पूर्व मध्यकाल, उत्तर मध्यकाल और आधुनिक काल के नाम से पुकारा जाता है। आदिकाल को वीरगाथा काल भी कहा जाता है । इस समय में वीर रस की कविताओं के वाहुल्य के कारण हो इसे यह नाम दिया गया है । इसी प्रकार पूर्व मध्यकाल को भक्ति काल, उत्तर मध्यकाल को रीतिकाल और आधुनिक काल को नाम से पुकारते है। आदिकाल की परम्परा मे पहले डेढ़ सौ वर्षों की सभी रचनाएं दोहों में मिलती हैं। परन्तु जब मुसलमानों की चढ़ाइयां । प्रारम्भ हुई तो चारणों ने राजाओं की वीरता का वर्णन आरम्भ किया । ऐसी कक्षात्मक रचनाओं को रासो के नाम से पुकारा गद्यकाल के [ २ ] जाने लगा। ये वीर गाथाएं प्रबंध काव्य और वीर गीत दोनों ही रूप में मिलती हैं । इस काल की साहित्यिक सामग्री कुछ असंदिग्ध है और कुछ संदिग्ध । असदिग्ध सामग्री की भाषा अपभ्रंश है। अपभ्रंश शब्द से जिस साहित्यिक हिन्दी का ग्रहण होता है उसमें हमे नीति, शृगार, वीर आदि की कविताओं के अतिरिक्त जैन और बौद्ध धर्माचार्यों के उपदेश भी मिलते हैं। आगे चलकर लोकभाषा ने अपभ्रंश का स्थान लेना शुरू कर दिया । अमीर खुसरो और विद्यापति की भाषा में हमें उसके दर्शन जहां-तहां होते हैं। संदिग्ध सामग्री में बीसलदेव गसो और पृथ्वीराज रासो जैसे पुराने काव्य मम्मिलित हैं । साहित्यिक प्रबन्ध के रूप में इनमें सबसे प्राचीन पृथ्वीराज रासो ही है । दिल्ली से अंतिम हिदू सम्राट सम्बन्ध होने के कारण इस ग्रन्थ का विशेष महत्व है । महाराज हम्मीर के समय से वस्तुतः वीरगाथा काल समाप्त हो जाता है उसके बाद उत्तर भारत में मुसलमान शासक जम कर बैठ गये । इसके परिणामस्वरूप जनता की भावधारा वदलने लगी। राजनीतिक पराजय ने उमको अधिक धर्म-परायण बना दिया । उसी समय से हिन्दी में भक्ति का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है। भक्ति की विभिन्न पद्धतियों और तत्कालीन परिस्थितियों ने हिन्दी-साहित्य-क्षेत्र में भक्ति की कई धाराओं को प्रवाहित किया। इनमें क्रमशः पहला स्थान निगुण उपासकों का है। उन्होंने उपा- सना के वाह्य उपकरणों का विरोध किया और नैतिकता तथा से [ ३ ] अंतःकरण की शुद्धि पर विशेष जोर दिया । कवीर, नानक, दादू आदि इसी परम्परा के सन्त कवि हैं । सूफी धर्म से प्रभावित कवियों ने हिन्दी मे काव्य-रचना की एक अनूठी पद्धति को जन्म दिया जहॉ लौकिक कथा के रूप में उस प्रेमतत्व का वर्णन किया गया है जो ईश्वर को पिलाने वाला है । कुतवन, मंझन, उसमान, जायसी आदि कई इस धारा के कवि हैं। मलिक मुहम्मद जायसी का इनमें सबसे ऊंचा स्थान है। भक्तिकाल मे राम-भक्त कवियों का अपना विशेष स्थान है। रामानन्द जी रामभक्ति के प्रचारक थे और कबीरदास, रैदास आदि सन्तों को उनका शिष्य होने का गौरव था । परन्तु राम- भक्ति को हिन्दी साहित्य में अपूर्व और अद्वितीय स्थान देने का श्रेय गोस्वामी तुलमीदास जी को ही है । उनका गमचरितमानस हिंदी माहित्य का हो सबसे अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ नहीं है; संमार भर के साहित्य में उसकी जोड़ का ग्रंथ मिलना कठिन है। वे एक भक्त और कवि ही नहीं थे, वे एक महान राष्ट्र-निर्माता थे। उनके मस्तिष्क में एक आदर्श समाज की रचना की भावना उग्ररूप में काम करती थी। रामभक्ति की इस परम्परा मे बहुत से कवि हुए परन्तु तुलसीदास जी की टक्कर का दूसरा कवि कोई नहीं हुआ । हिंदी साहित्य को प्रभावित करने वाली दूसरी प्रवृत्ति कृष्णभक्ति को है । कृष्णभक्ति की परम्परा मे हिन्दी के कई उच्चकोटि के कवि प्रादुर्भूत हुए हैं; जैसे सूरदास, मीरा, रसखान नंददाम आदि । यद्यपि कृष्णभक्त कवियों ने रामचरित मानस जैसा कोई प्रबन्ध काव्य नहीं लिखा परन्तु काव्यगत विशेषताओं की दृष्टि से प्रमुख कृष्णभक्त कवियों की रचना अद्वितीय है। भावों की कोमलता और कल्पना की उड़ान दोनों [ ४ ] ही दृष्टियों से इस काल की कविता उत्कृष्ट है । सूरदास और मीरा के पद स्वतन्त्र रूप से करोड़ों मानव-हृदयों को शांति प्रदान करते है। इसी काल में आचार्य केशव और रहीम जैसे उच्च कोटि के कवि भी हिन्दी मे हुए। कृष्णभक्ति की रचनाओं ने हिंदी कविता को प्रौढ़ता के शिखर पर पहुंचा दिया अब उसमें रस और अलंकार आदि का शास्त्रीय विवेचन प्रारम्भ हुआ। हिन्दी में काव्य रीति का ठीक ढंग से समावेश करने वाले पहले कवि आचार्य केशव ही हैं। परन्तु इस पद्धति का विकसित रूप प्रायः पांच वर्षों के बाद दिखाई पड़ा। संस्कृत साहित्य मे इस विषय का बहुत विवेचन हो चुका था और हिन्दी के प्राचार्यों ने संस्कृत की परम्परा पर साहित्य-शास्त्र के इतिहास का ही मानो हिन्दी मे फिरसे दूसरा संस्करण कर डाला। रीतिकालीन परम्परा की इस अखंड धारा मे चिन्तामणि त्रिपाठी का स्थान पहला है। इस परम्परा के कवियों ने पहले दोहे मे अलंकार या रस का लक्षण लिखकर फिर कवित्त या सवैये में उसका उदाहरण देने की परिपाटी बनाई जो खूब चली। साहित्य-शास्त्र का कविता के साथ इस प्रकार का गठ- बन्धन शास्त्रीय दृष्टि से कहाँ तक सफल हुआ यह कहना कठिन है परन्तु इसमें तो सन्देह नहीं कि कवियों का इस प्रकार झमेले मे उलझना कविता के स्वाभाविक विकास के लिये कभी अच्छी बात नहीं हो सकती। इससे कवि की प्रतिभा संकुचित घेरेमें बंध जाती है और उससे किसी प्रकार की युगांतरकारी रचना की आशा नहीं की जा सकती। दूसरी ओर यह भी ध्यान देने के ।
[ ५ ] की बात है कि आचार्यत्व के लिये जिन गुणों की आवश्यकता है उसका कवि में होना आवश्यक भी नहीं है । हिंदी साहित्य की प्रगति की दृष्टि से देखा जाय तो रीति काल का यह आचार्यत्व और कवित्व का पारस्परिक मिलन साहित्य के विस्तृत विकास में बाधक ही सिद्ध हुआ है। इस काल मे यद्यपि वीर रस की रचनाएं भी हुई किन्तु प्रधानता श्रृंगार की ही रही है। इस काल के मुख्य कवि विहारी, मतिराम, भूषण, देव, पद्माकर और घन-आनन्द हैं। हिंदी साहित्य में काव्य रचना की यह परम्परा यद्यपि अब भी जारी है परन्तु उसका युग रीति काल के साथ ही समाप्त हो जाता है । पद्य का एकच्छत्र साम्राज्य गद्य के साथ समाप्त हो जाता है। हिंदी साहित्य के समस्त साहित्य का सिंहावलोकन करने पर हमें दिखाई पड़ता है कि उत्तर भारत के विस्तृत हिन्दी भाषा-भाषी प्रदेश में साहित्य के लिये लगातार एक ही बोली का प्रयोग नहीं हुआ। श्रादि काल में हमें वीर-गाथाओं मे अप- भ्रंश और देशभाषा दोनों के रूप दिखाई देते हैं । खुसरो की कविता में खड़ी बोली स्पष्ट रूप से झांकती है और विद्यापति की रचना मे हमे मैथिली का प्रारम्भिक रूप मिलता है। भक्तिकाल मे ब्रजभाषा, पूर्वी हिन्दी और अवधि इन तीन भाषाओं की रचनाएं मिलती हैं। कबीर की रचना मे पूर्वी का पर्याप्त सम्मिश्रण है, सूरदास आदि के कृष्णभक्त कवियों की प्रायः सभी रचनाएं प्रधानतया व्रज भाषा में हैं और जायसी तथा गोस्वामी तुलसीदास की रचनाए प्रधानतया अवधि में । परन्तु इन सभी प्रादेशिक भाषाओं में प्रमुख स्थान ब्रज भाषा का ही [६] है। आगे चलकर रीतिकालीन कवियों ने ब्रज भाषा को ही अपना लिया और यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उस समय ब्रजभाषा ही कविता के लिये सर्व सम्मत भाषा बन गई। हिंदी गद्य के विकास का अर्थ खड़ी बोली का विकास है। धीरे-धीरे जब खड़ी बोली ने व्यापक रूप धारण कर लिया और पारस्परिक विचार विनिमय के लिये ही नहीं पठन-पाठन मे भी खड़ी बोली का साम्राज्य स्थापित हो गया तो ब्रज भाषा की कविता वर्तमान का विषय न रहकर पूर्वजों की संचित निधि बनकर रह गई। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि व्रज भाषा में आधुनिक काल में उच्च कोटि की रचनाए नहीं हुई। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,सत्यनारायण,कविरत्न जगन्नाथदास रत्नाकर वियोगी हरि और श्री रामेश्वर करुण आदि ने ब्रज भाषा में उच्च कोटि के साहित्य को सृजन किया है। ब्रज भाषा की धारा भले ही क्षीण हो गई हो पर अभी सूखी नहीं है। हिंदी साहित्य के माध्यम के रूप में खड़ी बोली के स्वीकृत हो जाने के बाद वस्ततः ब्रज और अवधि के लिये भविष्य में महात्मा सूरदास और गोस्वामी तुलसीदास जैसे महान् कवियों का फिर उत्पन्न होना कठिन है । परन्तु इन भाषाओं में इस प्रकार के उच्च कोटि के इन कवियों की रचनाओं का होना ही यह सिद्ध करता है कि हिन्दी भाषा चाहे जो रूप बदले, चाहे जो प्रादेशिक भाषा समस्त हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करे, इन प्रादेशिक भाषाओं का महत्व सदा बना रहेगा। ब्रज, अवधि, राजस्थानी और पूर्वी सभी एक उसी व्यापक हिंदी भाषा के अविच्छेद्य और अविभाज्य अंग हैं।
[ ७ ] कवितानिकुंज में हिंदी के प्रारम्भिक युग से लेकर उत्तर मध्यकाल तक के प्रतिनिधि कवियों की चुनी हुई रचनाओं का संग्रह किया गया है। यह पुस्तक जहाँ हिंदी काव्य साहित्य के क्रमिक विकास और व्यापक स्वरूप का दिग्दर्शन कराती है वहीं यह हिंदी के प्रतिनिधि कवियों की काव्य-प्रतिभा और उनके उच्च कोटि के साहित्य से हमें परिचित कराती है। स्वाधीन भारत में हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। वह समय दूर नहीं है जब संसार के विभिन्न देशों के लोग हिंदी को संसार की एक समृद्धतम भाषामानकर उसका अध्ययन करेंगे और हिन्दी के प्राचीन और मध्यकालीन साहित्य के अमूल्य भंडार को देखकर यह कहेगे कि हिन्दी साहित्य का वह युग, जब वह एक पराधीन देश की भाषा थी, साहित्यिक दृष्टि से किसी भी देश के साहित्य की तुलना में पीछे नहीं है। उसके कबीर और तुलसी, उसके सूर और मीरा हिंदी की ही नहीं, भारत की ही नहीं, विश्व भर की विभूति हैं।
कवि-परिचय १. चन्दबरदाई चन्दवरदाई हिन्दी के सर्वप्रथम उल्लेखनीय ग्रंथ पृथ्वीराज रासो के रचयिता है। वे अन्तिम हिन्दू सम्राट महाराज पृथ्वीराज चौहान के राजकवि, मित्र और सामन्त थे। उनका जन्म लाहौर में हुआ था। कहा जाता है कि चन्द और महाराज पृथ्वीराज एक ही दिन पैदा हुए थे और उन्होंने अपनी इह लीला एक ही दिन संवरण की थी। पृथ्वीराज रासो ढाई हजार पृष्ठों का बृहद् ग्रंथ है जिसमें ६६ समय या अध्याय हैं। इसमें प्राचीन काल में प्रयुक्त सभी छन्दों का व्यवहार हुआ है। किन्तु रासो की प्रामाणिकता पर संदेह है और विद्वानों में इस पर बड़ा मतभेद है। संवत् की गलती, भाषा की व्यवस्था और असंभव घटनाओं की बहुलता ये ऐमी बातें हैं जिनके कारण इस ग्रंथ का प्रामाणिक मानना कठिन है। २. अमीर खुसरो अमीर खुसरो का समय संवत् १३४० के लगभग माना जाता है। ये हिन्दी, संस्कृत और फारसी के विद्वान थे। इनका स्वभाव वहुत विनोदी और मिलनसार था। इनकी रचनाओं में इनका यह गुण स्पष्ट झलकता है। इनकी पहेलियां और मुकरियां प्रसिद्ध है। इन्होंने कुछ गीत और दोहे भी लिखे हैं। इनकी रचना में खड़ी बोली और ब्रजभाषा दोनों के उदाहरण मिलते हैं।
[१] ३. विद्यापति विद्यापाति अपने सरस पदों के लिये विख्यात है। अपनी सरल रचनाओं में तत्कालीन मैथिली का व्यवहार किया है। वगाली माहित्य में भी विद्यापति को वंगला भाषा का कवि माना जाता है। विद्यापति के पद अधिकतर शृंगार के हैं जिनमें नायक और नायिका राधा कृष्ण हैं। इसके अतिरिक्त अन्य देवताओं की स्तुतियों के रूप में भी इनकी रचना मिलती है। भाव और भापा दोनों ही दृष्टियों से विद्यापति की रचना अत्यन्त मरल और मधुर है। ४. कबीरदास महात्मा कबीरदास की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई मत हैं। इनका जन्म काल जेठ सुदी पूर्णिमा सोमवार विक्रम संवत्१४५६ माना जाता है। कहते है कि इनका जन्म किसी विधवा ब्राह्मणी के पेट से हुआ था और नीरू नामक जुलाहे ने इन्हें पाला था। ये अपने को रामानन्द जी का शिष्य मानते थे। कुछ लोगों का कहना है कि इन्होंने शेखतकी से भी दीक्षा ली थी। कबीर एक भक्त थे, इन्होंने निर्गुण ब्रह्म को अपनी उपासना और प्रेम का विषय बनाया और योग को साधन के रूप में स्वीकार किया। इन्होंने अहिंसा को महत्व दिया और इसके लिये हिन्दू और मुसलमान दोनों की ही कड़ी आलोचना की है। धर्म के नाम पर ऊँच-नीच का भेद करने वालों को भी इन्होंने खूब म्बरी-खोटी सुनाई है। ये अन्धविश्वास के बड़े विरोधी थे
से
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और इसके विरुद्ध प्रचार करने में इन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।
इनका जीवन अत्यन्त सदाचारपूर्ण था और अपने सिद्धान्तों
का हढ़ता
पालन करते थे।
कबीर की बाणी बीजक के नाम से प्रसिद्ध है और यह तीन
भागों में विभक्त है-रमैनी, शव्द और साखी। रमैनी और
शब्द गाने के पद हैं और साखी दोहों में है। कबीर की कविता
में राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली आदि के पद बड़ी मात्रा में
पाये जाते है परन्तु उनके पदों में ब्रजभाषा और पूर्वी हिन्दी को
ही स्थान मिला है।
कबीर की कविता में अत्यन्त सरलता, सचाई और सादगी
है। अपने उत्कट सत्य, प्रेम के कारण कभी-कभी ये कठोर
आलोचक के रूप मे भी उपस्थित होते हैं परन्तु फिर भी इनकी
सरलता सर्वत्र व्याप्त है। कबीर एक बड़े कवि ही नहीं थे ये
एक बड़े भक्त और समाज-सुधारक भी थे।
५. रैदास
रैदास या रविदास जाति के चमार थे। इनकी गिनती
रामानन्द जी के प्रसिद्ध भक्तों में होती है । कबीर के समान ही ये
काशी के रहने वाले थे और भक्तों में इनका बड़ा आदर था।
इनकी भक्ति भी निर्गुण की ओर झुकी हुई थी । इनका प्रभाव
पश्चिमी संयुक्त प्रांत मे अधिक है। गुरु ग्रंथ साहब में इनके बहुत
से पद मिलते हैं।
कबीरदास के समान ही ये भी स्वावलम्बन में विश्वास
करते थे। जिस प्रकार कवीरदास जी कपड़ा बुनकर जीविका
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चलाते थे वैसे ही ये भी जूते बनाकर अपना निर्वाह करते थे।
भक्ति और मरलता की ये मूर्ति थे। कवीर की भांति इन्होंने भा
१२० वर्ष की आयु मे संसार त्याग किया था। आज भी गुजरात,
बिहार आदि प्रान्तों मे लाखों व्यक्ति अपने को भक्त रैदास का
अनुयायी मानकर अपने को धन्य मानते हैं।
६. गुरु नानक
गुरु नानक का जन्म सं० १५२६ कार्तिकी पूर्णिमा को लाहौर
जिले के तलवण्डी ग्राम में हुआ था। ये बचपन से ही प्रभु-भक्ति
की ओर आकर्षित हो गये थे। इन्होंने निगुण उपासना का
प्रचार किया। और आगे चलकर सिख सम्प्रदाय के आदि गुरु
हुए। इनके भक्तिभाव से पूर्ण भजन ब्रजभाषा में हैं पर उनमे
खड़ी बोली और पजाबी की भी पुट है। इनकी कविता सीधी-
सादी भाषा मे है और उसके भाव अत्यन्त सरल है। अपनी
कविता में प्रभु की महिमा वहुत विस्तार से गाई है। इन्होंने
ईश्वर के व्यापक और विराट् स्वरूप का अनुभव किया था
और उसी की भक्ति का प्रचार किया।
इन्होंने देश-विदेश की दूर-दूर तक यात्रा की थी।
७. दादू
दादूदयाल का जन्म संवत् १६०१ में अहमदाबाद गुजरात में
हुआ था। उन्होंने अपने मत का प्रचार राजपूताने में किया और
संवत् १६६० में जयपुर के पास ही इनका देहान्त हुआ।
दादू की वानी दोहे और पड़ों में है। इनकी भाषा पश्चिमी
। १२ ] हिन्दी है जिसमें राजस्थानी का मेल है। गुजराती, पंजाबी और राजस्थानी में भी इनके पद मिलते हैं। इनकी रचना में प्रेम की व्यंजना अधिक है और खण्डन- मण्डन में इनकी रुचि नहीं दिखाई देती । सिद्धान्त की दृष्टि से दादू और कबीर के मत में कोई अन्तर नहीं है। ८. मलूकदास मलूकदास का जन्म, संवत् १६३१ में कड़ा जिला इलाहाबाद में हुआ था । संत के रूप मे इनकी बहुत प्रसिद्धि हुई थी । जयपुर, गुजरात, मुलतान, पटना, नेपाल और काबुल तक में इनकी गहियां स्थापित हुई थीं । इनकी दो पुस्तके प्रसिद्ध हैं-रत्लखान और ज्ञानबोध । हिन्दू-मुसलमान दोनों को ये समान रूप से उपदेश देते थे । इनकी रचना में काव्योचित प्रतिभा दिखाई देती है। इन्होंने अपनी रचना में जहां-तहां खड़ी बोली का प्रयोग किया है। प्रेम, वैराग्य आदि पर इनके पद बहुत मनोहर हैं । संवत् १७३६ में १०८ वर्ष की अवस्था में इनका देहान्त हुआ। ६. मलिक मुहम्मद जायसी मलिक मुहम्मद जायसी सूफी फकीर थे और शेख मुहीउद्दीन के शिष्य । इनके जन्म-काल के सम्बन्ध में ठीक निश्चय नहीं हो सका है पर इतना तो निश्चित ही है कि ये शेरशाह के समय में थे। जायस में रहने के कारण ये जायसी कहलाए । जायसी अपने समय के माने हुए फकीर थे। अमेठोराज [ १३ ] घराने में इनका बहुत मान था। इनके जीवन-काल में ही इनकी रचना बहुत लोकप्रिय हो गई थी। इन्होंने पद्मावत, अखरावट और आखिरी कलाम ये तीन पुस्तके लिखीं जिनमें पद्मावत सबसे प्रसिद्ध है । पद्मावत प्रेम गाथा परम्परा का सबसे उत्तम ग्रन्थ है । इसकी नायिका रानी पद्मावती और नायक राजा रतनसेन हैं । दोनों ही चरित ऐतिहासिक है परन्तु जायसी ने अपनी कल्पना को खूब उड़ान भरने दिया है और इस प्रकार यह ग्रन्थ बहुत सरस हो गया है। अखरावट में वर्णमाला के एक-एक वर्ण को लेकर सिद्धान्त सम्बन्धी चौपाइया कही गई है। आखिरी कलाम मे क्यामत का । वर्णन है। १०. गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के क्षेत्र मे रामभक्ति का उज्ज्वल प्रकाश फैलाने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास जी को ही है । गोस्वामी जी जैसे उच्च कोटि के सन्त थे वैसे ही उच्च कोटि के प्रतिभा सम्पन्न कवि । यह उनकी प्रतिभा का चमत्कार ही है जो अपने समय की सभी प्रचलित पद्धतियों में इन्होंने अपनी रचना की और आज इनकी रचना हिन्दी साहित्य की सबसे अधिक मूल्यवान् सम्पत्ति बनी हुई है । गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्मकाल के सम्बन्ध में मतभेद है। परन्तु गृयर्सन के अनुसार यह संवत् १५८८ है जो ठीक जान पड़ता है । इनके दीक्षा गुरु वाया नरहरिदास और कवितागुरु शेष सनातन जी थे । परन्तु जैसा कि कहा जाता है इनको विरक्त [ १४ ] बनाने वाली स्वयं इनकी स्त्री थी । विरक्त होकर गोस्वामी जी तीर्थयात्रा के लिये निकल पड़े और अन्त में अयोध्या आकर संवत् १६३१ में रामचरितमानस लिखना आरम्भ किया। इसका कुछ अंश काशी में भी पूरा किया गया । रामायण समाप्त करके गोस्वामी जी काशी में ही रहने लगे। तुलसीदास जी का ब्रज और अवधी दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था और दोनों भाषाओं में इन्होंने उच्च कोटि की रचनाएं की हैं। हिन्दी की सभी प्रचलित शैलियों में वीर गाथा काल की छप्पय पद्धति, विद्यापति और सूर की गीत पद्धति, गंग आदि की कवित्त, सवैया पद्धति, कबीर की दोहा पद्धति और प्रेममार्गी कवियों की दोहा-चौपाई पद्धति सबमें इनकी रचनायें मिलती हैं। कविता के वयं विषय की दृष्टि से देखा जाय तो इनका क्षेत्र बहुत विस्तृत है । वास्तव में ये जनता के प्रतिनिधि कवि हैं । मनुष्य के सारे भावों और व्यवहारों के सम्बन्ध में इन्होंने लिखा है और समाज के सामने एक निश्चित और स्पष्ट आदर्श रखने का प्रयत्न किया है । तुलसीदास जी की काव्य-प्रतिभा का प्रमाण रामचरितमानस में एकत्र ही मिल जाता है । यह ग्रन्थ सभी काव्योचित गुणों से सम्पन्न है । शृंगार के वर्णन में इन्होंने मर्यादा का बडी कड़ाई से पालन किया है। ये कवि ही नहीं महान उपदेशक भी थे। गोस्वामीजी के बारह ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं, जिनमे दोहावली, कवित्त रामायण, गीनावली, रामचरितमानस, रामाज्ञाप्रश्नावली और विनयपत्रिका बड़े ग्रन्थ हैं । तथा रामलला नहछू, पार्वती- [ १५ ] मंगल, जानकी-मंगल, चरवै रामायण, वैराग्य-संदीपनी और कृष्ण-गीतावली छोटे। हिन्दी माहित्य को अपनी गौरवमयी रचना से गौरवान्वित करके संवत् १६८० मे गोस्वामी जी ने काशी मे गंगा और असी मंगम पर अपना शरीर परित्याग किया। ११. हृदयराम ये पंजाब के रहने वाले थे। इन्होंने संवत् १६८० में संस्कृत के हनुमन्नाटक के आधार पर हिन्दी मे हनुमन्नाटक लिखा। इसमें मवैयो और कवित्तो मे बड़े अच्छे संवाद है । इस ग्रन्थ की कविता बडी ही सरल, सरस और परिमाजित है । इस प्रकार के नाटक ग्रंथ उस समय में कई लिखे गये जिन में हृदय- राम का हनुमन्नाटक सबसे ऊँची श्रेणी का है। १२. सूरदास सूरदास जी के प्रारंभिक जीवन के सम्बन्ध में विशेष बातें लोगों को मालूम नहीं है । परन्तु यह निश्चय है कि वल्लभाचार्य जी उनके पद सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें श्रीनाथजी के मन्दिर में कीर्तन करने का भार सौंपा । तब से वे वरावर गोव- ईन पर्वत पर मन्दिर की सेवा मे रहे । सूरदास जी का जन्म काल संवत् १५४० के लगभग माना जा सकता है। वल्लभाचार्यजी के पुत्र गोसाई विट्ठलनाथजी ने आठ कृष्ण- भक्त कविया को चुनकर 'अष्टछाप' की स्थापना की थी, उनमे सूरदास जी भी एक थे।
[ १६ ]. कृष्णभक्त कवियों ने श्रीकृष्ण की प्रेममयी मूर्ति को लेकर बहुत अच्छी और बहुत अधिक रचना की है। वास्तव में जयदेव और विद्यापति के मार्ग का ही बाद के कृष्णभक्ति कवियों ने अनुसरण किया है । सूरदासजी ने भी उसी पद्धति को अपनाया है किन्तु उनकी कविता में जो तन्मयता पाई जाती है वह अन्यत्र मिलना कठिन है। शृंगार और वात्सल्य में हिन्दी का कोई दूसरा कवि इनसे आगे नहीं जा सका। श्रीकृष्ण की बाललीला का ऐसा सजीव और सुन्दर वणन अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। शृंगार में विशेषकर विरहदशा के वर्णन में सूरदासजी को अपूर्व सफलता मिली है। नये-नये प्रसंग हूंढ निकालने की तो सूरदास जी में अद्भुत क्षमता थी। बाल्य-जीवन और किशोरावस्था के सीमित क्षेत्र में इन्होंने नये-नये ऐसे प्रसंग ढूढ निकाले हैं जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। सूरसागर में भ्रमर-गीत सब से उत्कृष्ट भाग है। उद्धव और गोपियों का ऐसा संवाद साहित्य के लिये गौरव की चीज है। १३. नन्ददास ये भी अष्टछाप के कवियों में से है किन्तु इनका कविताकाल सूरदासजी के बाद तक का माना जा सकता है। इनकी रचना बड़ी सरस और मधुर है। इन्होंने कई पुस्तके लिखी हैं जैसे रासपंचाध्यायी, रुक्मणी मंगल, भागवत दशम स्कंध, रूपमंजरी, भ्रमर-गीत आदि इनकी सरस पद रचना के कारण ही यह कहावत प्रसिद्ध हो गई है "और कवि गढ़िया नन्ददास जड़िया।"
[ १७ ]
१४. मीराबाई
मीराबाई मेड़तिया के राठौर रत्नसिंह की पुत्री थीं और
इनका विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराजजी से हुआ
था। इनका जन्म संवत् १५६३ मे हुआ था। आरम्भ से ही ये
कृष्ण-भक्ति में मग्न रहती थीं और ज्यों-ज्यों इनकी अवस्था
बढ़ी इनका कृष्ण प्रेम भी बढ़ता गया । इनकी भक्ति से इनके घर
के लोग रुष्ट रहते थे। इसमें उन्हे अपने कुल की मर्यादा की हानि
दिखाई देती थी।
मीरा की उपासना माधुर्य भाव की थी। वे कृष्ण को ही
अपना पति मानती थीं। देश के संत-समाज मे मीरा का नाम
बड़े आदर से लिया जाता है। इनकी कविता की भापा ब्रज है।
पर कहीं-कहीं राजस्थानी भी मिली हुई है। इनके पदों में अपूर्व
तल्लीनता दिखाई देती है। इनके बनाये ग्रन्थ नरसीजी का
मायरा, गीत गोविन्द टीका, राग गोविन्द और राग सोरठा के
पद हैं।
१५. रसखान
रसखान दिल्ली के एक पठान सरदार थे। किन्तु आगे
चलकर विरक्त हो गये। ये माने हुए कृष्णभक्त थे। इन पर
गोसाई विट्ठलनाथजी की बड़ी कृपा थी।
इनकी कविता में गंभीर प्रेम और आत्मसमर्पण के भाव
पाये जाने हैं। इनकी टकर के दूसरे कवि नानन्द ही हैं जिनका
प्रेमोदगार इतना सफल हुआ है। इनकी रचनाएं बहुत नहीं हैं। वे
बहुत ही जोरदार हैं। इनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है
[ १८ ] प्रेम वाटिका दोहों में है और सुजान रसखान कवित्त और सवैयों में। अन्य कृष्णभक्त कवियों के समान गीतों के स्थान पर इन्होंने कवित्त और सवैयों को ही अपनाया है। इनकी भाषा बहुत गठी हुई है और इनकी रचना में तन्मय करने की अपूर्व शक्ति है। १६. नरोत्तमदास ये सीतापुर जिले के बाड़ी नामक कसबे के रहने वाले थे। इनका ग्रन्थ सुदामा चरित्र बहुत प्रसिद्ध है। घर की दरिद्रता का चित्रण इस ग्रन्थ में बहुत सफल हुआ है। छोटा होते हुए भी यह ग्रन्थ बहुत ही सरस एवं हृदयस्पर्शी हुआ है । भाषा की दृष्टि से भी यह ग्रन्थ अनूठा है। गंग गंग अकबर के दरबारी कवि थे और रहीम इनका बड़ा आदर करते थे। इनके जन्म, कुल आदि के सम्बन्ध में बहुत कम बातें मालूम हैं। कोई इन्हें ब्राह्मण कहता है और कोई ब्रह्मभट्ट । इनका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है परन्तु फुटकर रचनाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये अपने समय के उत्कृष्ट कवि थे। सरसता और वाग्विदग्धता इनकी कविता के विशेष गुण है। हास्य रस की कविता रचने में भी ये कुशल थे। कहा जाता है कि इनकी एक मजाक की कविता से रुष्ट होकर किसी नवाब ने इन्हे हाथी से कुचलवाकर मरवा डाला था। १७. १८, केशव यह सनाढ्य ब्राह्मण थे। इनका जन्म, संवत् १६१२ में हुआ [ १६ ] था। ओरछा नरेश महाराजा रामसिंह के भाई इन्द्रजीतसिंह की ममा में ये रहते थे। इनका घराना पंडितों का था और राजकुल में इनका वडा सम्मान था। ये स्वयं भी अच्छे पंडित थे। हिन्दी में तो ये साहित्य शास्त्र के प्रथम श्राचार्य माने जाते हैं। केशव के रचे सात ग्रन्थ मिलते हैं-ऋविप्रिया, रसिकप्रिया, रामचन्द्रिका, वीरसिंहदेव चरित, विज्ञान गीता, रतन बावनी और जहांगीर जस चन्द्रिका । इनकी रचनाओं पर संस्कृत का बहुत प्रभाव है। भाव और शब्दावली दोनों ही दृष्टियों से यह वान लागू होती है। प्रबन्ध-काव्य की दृष्टि से इनका स्थान बहुत ऊंचा नहीं है परन्तु उनके द्वारा काव्य के अंगों का अच्छा परिचय मिलता है। १६. रहीम यह अकबर बादशाह के अभिभावक वैरमखाँ के पुत्र थे। इनका जन्म, संवत् १६१० में हुआ था। ये संस्कृत, अरवी और फारमी के विद्वान और हिन्दी के उच्चकोटि के कवि थे। ये बड़े उदार, नम्र और दानी थे। ये 'अनुभवी और भावुक व्यक्ति थे इसी कारण इनकी कविता बहुत लोकप्रिय हुई है। इनका भाषा पर बहुत अच्छा अधिकार था। इनके दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं पर ये वरवै, कवित्त, सवैया, मोरठा और पद मभी लिखते थे। इनका देहान्त संवत् १६८३ में हुम्पा । इनके बनाये हुए कई ग्रंथ हैं। जिनमें रहीम दोहावली, वग्वै नायिका भंद, शृंगार सोरठ, मदनाष्टक, रासपंचाध्यायी, नगरशोभा। फुटकल वरवं और फुटकल कवित्त सवैये का पता लग चुका है।
[ २० ] २०. विहारी महाकवि बिहारीलाल का जन्म, संवत् १६६० मे. ग्वालियर के पास वसुआगोविन्दपुर गांव में हुआ था। ये जयपुर के राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे। इनके दोहों का संग्रह बिहारी सतसई हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों मे से है। इसमें प्रधानता शृंगार की है । नीति के भी कुछ दोहे है। थोड़े शब्दों मे अधिक भाव भरने की अद्भुत शक्ति बिहारी मे थी। सतसई की पचासों टीकाएं लिखी गई है और संस्कृत उर्दू में भी इसका अनुवाद हो चुका है। शृंगार रस के ग्रन्थों मे बिहारी सतसई का सबसे अधिक सम्मान हुआ है। २१. मतिराम ये रीति काल के प्रधान कवियों में हैं। कहा जाता है चिन्ता- मणि तथा भूषण इनके भाई थे। इनका जन्म, संवत् १७७४. में तिकबापुर जिला कानपुर मे हुआ था। इनके आश्रयदाता बूंदी के महाराज भावसिंह थे। ललितललाम, छंदसार, रसराज साहित्यसार-शृंगार और मतिराम-सतसई इनके बनाये हुए ग्रंथ है। भापा और भाव दोनों के विचार से इनकी रचना सरल है । २२. भूषण वीररस के प्रसिद्ध कवि भूषण का जन्म-काल संवत् १६७० है। इनके दो भाई चिन्तामणि और मतिराम भी अच्छे कवि थे। कई राजाओं ने इन्हें आश्रय दिया पर अन्त में ये महाराज शिवाजी के पास चले गये। पन्ना के महाराज छत्रसाल ने भी इनका बहुत सम्मान किया था।
में
खूब है।
[ २१ ]
२३. देव
ये इटावा के रहनेवाले सनाढ्य ब्राह्मण थे। इनका जन्म
संबन १७३० है। ये १६ वर्ष की अवस्था से ही कविता लिखने
लगे थे। ये आश्रयदाता की खोज मे बहुत घूमे पर अच्छा
आश्रयदाता इन्हें कोई नहीं मिला । कहते है इन्होंने ३२ पुस्तकें
लिग्वीं जिनमे २५ के लगभग उपलब्ध है। ये आचार्य और कवि
दोनों ही थे। इनकी रचना में कवित्य और मौलिकता दोनों ही
गुण हैं और भाषा
प्रवाह
भी
२४. भिखारीदास
प्रतापगढ़ के पास ट्योंगा गांव के रहने वाले थे। इनका
कविताकाल संवत् १७८७ से संवत १८०७ तक माना जा सकता
है। इन्होंने कई ग्रन्थ लिखे जिनमे प्रधानना रीनि ग्रन्थों की है।
काव्य के अंगों के निरूपण मे हिन्दी के कवियों में इनका स्थान
सबसे ऊँचा है।
इनकी भाषा परिमार्जित है। शब्दाडम्बर से रहित है ।ये ऊँचे
दर्जे के कवि थे। शृंगार के वर्णन में भी इन्होंने बहुत संयम से
काम लिया है।
२५. वेनी चंदीजन
ये बनी जिला रायबरेली के रहने वाले थे। इनके आश्रयदाता
अवध के प्रसिद्ध वजीर महाराज टिकैतराय थे। इनके लिए दो
प्रन्ध टिकोराय प्रकाश और रमविशाल हैं पर ये अपने भड़ौवों
के लिये प्रसिद्ध है। इनका कविताकाल १८४६ से १८८० तक
माना जा सकता है।
[ २२ ] २६. पद्माकर रीतिकालीन कवियों में बिहारी के बाद पद्माकर ही सबसे अधिक लोकप्रिय कहे जा सकते हैं। अपनी सुन्दर रचनाओं के लिये ये विख्यात थे। इनका जन्म, संवत् १८१० में बांदे में हुआ था। ये अनेक स्थानों में घूमते रहे और सितारा, जयपुर, ग्वालियर और बूंदी आदि के महाराजाओं ने इनका बहुत सम्मान किया । हिम्मत बहादुर विरुदावली, जगद्विनोद, पद्माभरण, प्रबोध- पचासा, रामरसायन आदि इनके रचे हुए प्रन्थ है। इनकी रचनाये बहुत भावपूर्ण और सरस हैं। २७. गुरु गोविन्दसिंह ये सिखों के अन्तिम गुरु थे। इनका जन्म, संवत् १७२३ में हुआ था। ये काव्य के अच्छे ज्ञाता थे और सिखों मे विद्याप्रचार के विचार से इन्होंने बहुत-से लोगों को विद्याध्ययन के लिए काशी भेजा था। इनके विषय में प्रसिद्ध है कि ये शक्ति के उपासक थे। इन्होंने कई प्रन्थ लिखे हैं जैसे सुनीतिप्रकाश, सर्व लोह- प्रकाश, प्रेमसुमार्ग, बुद्धिसागर और चंडी-चरित्र। अपनी रच- नाओं में इन्होंने प्रौढ़ ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। २८. घन अानन्द ये ब्रजमाषा के प्रधान कवियों में है। इनका जन्म, संवत् १७४५ में हुआ था और सम्वत् १७६६ में ये नादिरशाही में मारे गये । इनके रचे ग्रन्थों में सुजान-सागर, विरह-लीला, कोक- सार, रस-केलिवल्ली और कृपाकांड मिलते हैं। इनकी भाषा प्रौढ़
-
[ २३ ]
और मधुर है। प्रेम विशेषकर विरह के वर्णन में ये अद्वितीय
हैं। हृदय के कोमल भावों के वर्णन में तो मानो भाषा इनकी
दासी होकर चलती है।
२६. दीनदयाल गिरि
ये गोसाई थे। इनका जन्म १८५६ में काशी में हुआ था।
ये हिन्दी और संस्कृत दोनों के पण्डित थे। अन्योक्ति लिखने में
इन्हें बहुत सफलता मिली है। इनकी भाषा बहुत परिष्कृत और
सुव्यवस्थित है । अन्योक्ति कल्पद्रुम, अनुरागबाग, वैराग्यदिनेश,
विश्वनाथ नवरत्न और दृष्टांत तरंगिणी इनके रचे ग्रंथ हैं।
संवत् १६१५ में इनका परलोकवास हुआ।
चन्दबरदाई
(पद्मावती विवाह से)
दूहा
पूरब दिस गढ़ गढ़न पति, समुद्र सिषर अति दुग्ग ।
तहँ सुविजय सुर राज पति, जादू कुलह अभग्ग ।।
हसम हयग्गय देस अति, पति सायर म्रज्जाद ।
पबल भूप सेवहिं सकल, वुनि निसाँन बहु साद ।।
,
कवित्त
धुनि निसान बहु साद, नाद सुर पंच बजत दिन ।
दस हजार हय चढ़त, हेम नग जटित साज तिन ।।
गज असंख गज पतिय, मुहर सेना तिय संखह ।
इक नायक कर धरी, पिनाक घर भर रज रख्खह ।।
दस पुत्र पुत्रिय एक सम, रथ सुरंग उम्मर डमर ।
भडार लछिय अगनित पदम, सो पदमसेन कूवर सुघर ॥
दूहा
पदम सेन कुँवर सुघर, ता घर नारि सुजान ।
ता उर इक पुत्री प्रकट, मनहुं कला ससि भान ||
[ २५ ]
कवित्त
मनहुँ कला ससि भान, कला सोलह सो बन्निय ।
वाल बेस ससिता समीप अम्रित रस पिनिय ।।
विगसि कमल मृग भ्रमर, पैन खजन मृग लुट्टिय ।
हीर कीर अरु विम्ब, मोति नखसिख अहि घुट्टिय ।।
छत्रपति गयंद हरि हस गति, विह बनाय संचै सचिय ।
पद मिनिय रूप पद्मावतिय, मनहु काम कामिनि रचिय ।।
दूहा
मनहु काम कामिनि रचिय, रचिय रूप की रास ।
पसु पंछी सव मोहिनी, सुर नर मुनियर पाम ।।
मामुद्रिक लच्छन सकल, चौसठि कला सुजान ।
जानि चतुर दस अंगषट, रति बसंत परमान ।।
सखियन सँग खेलत फिरत, महलनि वाग निवास ।
कीर इक्क दिष्षय नयन, तब मन भयौ हुलास ।।
कवित्त
मन अति भयौ हुलास, विगसि जनु कोक किरन रवि ।
अरुन अधर तिय सधर, बिम्ब फल जानि कीर छवि ।।
यह चाहत चख चक्रित, उह जुतक्किय भरप्पि मर ।
चंच चहुट्टिय लोभ, लियौ तव गहित अप्प कर ।।
हरपत अनन्द मन महि हुलम, लैजु महल भीतर गई।
पंजर अनूप नग मनि जटित, सो तिहि मॅह रष्षत भई ।।
.
[ २६ ]
दूहा
तिही महल रष्षत भइय, गई खेल सब भुल्ल ।
चित्त चहूँट्टयो कीर सों, राम पढ़ावत फुल्ल॥
कीर कुंवरि तन निरखि, दिखि नखसिख लौ यह रूप ।
करता करी बनाय कै, यह पदमिनि सरूप ।।
कवित्त
कुटिल केस सुदेस, पौहप रचियत पिक सद।
कमल गंध वय संघ, हंस गति चलत मँद मद ।।
सेत वस्त्र सोहै सरीर, नख स्वाति बुद जस ।
भमर भँवहि भुल्लहि सुभाव मकरन्द वास रस ।।
नैन निरखि सुख पाय सुक, यह सदिन मूरति रचिय ।
उमा प्रसाद हर हेरियत, मिलहि राज प्रथिराज जिय ॥
दूहा
सुक समीप मन कुँवरि को, लग्यौ बचन के हेत।
अति विचित्र पंडित सुश्रा, कथत जु कथा अमेत ॥
गाथा
पुच्छत बयन सुबाले, उच्चरिय कीर सच सच्चाये।
कवन नाम तुम देस, कवन यंद करै परवेस ॥
उच्चरिय कीर सुन बयनं, हिन्दवान दिल्ली गढ़ अयनं।
तहाँ इन्द्र अवतार चहुँवानं, तहँ प्रथिराजह सूर सुभारं ।।
पद्धरी
.पदमावतीरि कुँवरी सँधत्त, दुज कथा कहत सुनि सुनि सुवत्त ।
हिन्दवान थान उत्तम सुदेस, तहँ उदत द्रुग्ग दिल्लो सुदेस ।
[ २७ ]
संभर नरेस चहुवॉन थॉन, प्रथिराज तहाँ राजंत भांन ।
बैंसह वरीस पोड़स नरिंद, आजान बाहु भुअ लोक यंद ।
संभरि नरेस सोमेस पूत, देवंत रूप अवतार धूत।
सामंत सूर सवै अपार, भूजॉन भीम जिम सार भार॥
जिहि पकरिसाह साहाव लीन, तिहुं बेर करिय पानीप हीन ।
सिंगिनि सुसद्द गुन चढ़ि जंजीर, चुक्कै नसबद वेधंत तीर ।।
बल बैन करन जिमि दॉन मान, सतसहस सील हरिचँद समान ।
साहस सुक्रम विक्रम जुवीर, दॉनव सुमत्त अवतार धीर ।।
दिस च्यार जॉनि सब कला भूप, कंद्रप्प जानि अवतार रूप ।
दूहा
कामदेव अवतार हुआ,
सुत्र सोमेसर नंद।
सहस किरन झलहल कमल, रिति समीप बर विद ॥
सुनत श्रवण प्रथिराज जस, उमंग बाल बिधि अंग ।
तन मन चित चहुँवान पर, वस्यो सुरत्तर रंग ।।
बेस बिती ससिता सकल, आगम कियौ बसंत ।
मात पिता चिन्ता भई, सोधि जुगति को कंत ।।
कवित्त
सोधि जुगति को कंत, कियौ तव चित्त चहौं दिस।
लग्यौ विप्र गुरु बोल, कही समझाय वात तस ।
नर नरिंद नर पति, बड़े गढ़ द्रुग असेसह ।
सीसवन्त कुल सुद्ध देहु कन्या सुनरेसह ॥
तव चलन देहु दुलह लगन, सगुन बंद दिय अप्प तन ।
आनंद उछाह समुदह सिपर, वजत नद्दनीसॉन धन ।।
[ २८ ]
दूहा
सवा लष उत्तर सयल, कमऊँ गढ़ दूरंग।
राजत राज कुमोदमनि, हय गय द्रिव्य अभग ।।
नार केलि फल परठि दुज, चौक पुरि मनि मुत्ति ।
दई जु कन्या वचन बर, अति अनन्द करि जुत्ति॥
भुजंग प्रयात
पदमावती विलखि बर बाल वेलीं, कही कीरसोंबात तबहो अकेली।
झट जाहु तुम्ह कीर दिल्ली सुदेसं, वरं चहुबान जु आनौ नरेसं।
दूहा
आनो तुम्ह चहुँवान वर, अरु कहि इहै संदेस |
सॉस सरीरहि जो रहै प्रिय प्रथिराज नरेस ।।
X
X
X
X
लै पत्री सुक लै चल्यौ, उड्यो गगनि गहि बाव ।
जहँ दिल्ली प्रथिराज नर, अट्ठ जाँम में जाव ।।
दिय कग्गर नृप राज कर, पुलि बंचिय प्रथिराज ।
सुक देखत मन मे हंसे, कियो चलन को साज ॥ .
दूहा
जा दिन सिषर बरात गय, ता दिन गय प्रथिराज |
ताही दिन पति साह को भइ गज्जनै आवाज ।।
पद्धरी
दिष्पं पंथ दिल्ली दिसॉन, सुख भयो सुक जब मिल्यो आन ।
संदेस सुनत आनन्द नैन, उमगीय' वाल मनमथ्थ सैन ।
[ २६ ]
तन चिकट चोर डार्यों उतारि मज्जन मयंक नव सत सिंगार।
भूपन मॅगाय नख शिख अनूप, सजिसेन मनो मनमथ्थ भूप ।
सोत्रन्न थार मोतिन भराय झलहल करंत दीपक जराय ।
संगह सखिय लिय सहस बाल, रुकमिनिय जेम लज्जत मराल ।
पूजिय गवरि संकर मनाय, दच्छिनै अंग करि लगिय पांय ।
फिर देखि देखि प्रथिराज राज हॅस मुद्ध मुद्ध कर पट्ट लाज |
कर पकरि पीठ हय पर चढ़ायौ, लै चल्ल नृपति दिल्ली सुराय ।
भइ खबरि नगर बाहिर सुनाय, पदमावतीय हरि लीय जाय ।
बाजी सुबंब हय गय पलान दौरे, सुसजि दिस्सह दिसान ।
तुम लेहु लेहु मुख जंपि लोध, हन्नाह सूर सब पहरि क्रोध ।
अग्गे जु राज प्रथिराज भूप पच्छै सुभयो सत्र सेन रूप ।
पहुँचे सुजाय तत्ते तुरङ्ग भुअ घिरन भूप जुरि जोध जग।
उलटी जु राज प्रथिराज वाग, थकि सूर गगन धर घसत नाग ।
सामंत सूर सब काल रूप गहि लोह छोह वाहै सुभूप ।
कम्मान वान छुट्टहिं अपार, लागंत लोह इम सारी धार ।
घमसान घान सब वीर खेत धन श्रोने वहत अरु रुकत रेत ।
मारे बरात के जोध जोह, परि 'रुड मुंड अरि खेत सोह।
परे रहत रिन खेत अरि करि दिल्लिय मुख रुक्ख।
जीति चल्यो प्रथिराज रिन, सकल सूर भय सुक्ख ॥
पदमावति इम ले चल्यो, हरखि राजप्रथिराज ।
एते परि पतिसाह की, भई जु आनि अवाज ।।
कवित्त
भई जुआनि अवाज, आय साहा बदोन सुर।
आज गहौं प्रथिराज, बोल बुल्लंत गजत धुर ॥
क्रोध जोध जोधा अनंत, करिय पंती अनि गजिय ।
बान नालि हथ नालि, तुपक तीरह सब सज्जिय ।।
पवैपहार मनो सार के, भिरिभुजान गज ने सबल।
आये हंकारि हंकार करि, खुरासान सुलतान दल॥
जीति भई प्रथिराज की, पकरि साह लै संग ।
दिल्ली दिसीमारग लगो उतरि घाट गिर गंग ।।
वर गोरी पद्मावती, गहि गोरी सुर ताँन ।
निकट नगर दिल्ली गये, प्रथीगज चहुआँन ।।
कवित्त
बोलि विप्र सोधे लगन्न, सुभ धरी परिट्ठय ।
हर बॉसह मंडप बनाय, करि भॉवरि गठिय ॥
ब्रह्म वेद उच्चरहिं, होम चौरी जु प्रति वर।
पद्मावती दुलहिन अनूप, दुल्लह, प्रथिराज राज नर ।।
डंड्यौ साह साहाबदी, अट्ठ सहस हय वर सुवर।
दै दान मॉन षट भेष को, चढ़े राज दुग्गा हुजर ।।
चढ़े राज द्रुग्गाह नृपति, सुमत राज प्रथिराज ।
अति अनन्द आनन्द सैं, हिन्दवान सिर ताज ॥
अमीर खुसरो
खालिक वारी
खालिकवारी सिरजन हार । वाहिद एक विदा करतार ।।
रसूल पैगम्बर जान बसीठ । यार दोस्त बोले जो ईठ ॥
वया विरादर आवरे भाई । बन शान मादर बैठरी माई ॥
मुश्क काफूर अस्त कस्तूरी कपूर। हिन्दवी प्रानंद शादाऔरसरूर ।।
मूश चूहा गुर्वः बिल्ली मार नाग । सोजनो रिश्तःबहिन्दी सुईताग॥
पहेलियाँ
तरवर से एक तिरिया उतरी उसने खूब रिमाया।
बाप का उसके नाम जो पूछा प्राधा नाम बताया।
आधा नाम पिता पर प्यारा बूझ पहेली मेरी।
"अमीर खुसरो" यों कहे बूझ पहेली मेरी।
निबोरी।
आदि कटे ते सवको पार। मध्य कटे ते सबको मार।
अन्त कटे ते सब को मीठा । सो खुसरो मैं आँखों दीठा।
काजल।
वाला था जव सव को भाया । बढ़ा हुआ कछु काम न आया ।
खुसरो कह दिया इसका नांव । अर्थ करो या छोड़ो गॉव ।
दिया ।
[ ३२ ]
सावन भादों बहुत चलत है, माघ पूम में थोरी।
अमीर खुसरो यों कहे तू बूझ पहेली मोरी।
मोरी।
आवे तो अंधेरी लावे । जावे तो सब सुख ले जावे ।
क्या जानू' वह कैसा है। जैसा देखो वैसा है।
ऑख।
नारी ते तू नर भई, औ श्याम बरन भइ सोय ।
गली गली कूकत फिरे, कोइलो कोइलो लोय ।
कोयला।
झिले मिल का कुआँ, रतन की क्यारी।
बताओ बताओ, नहीं दूगी गारी।
दर्पण।
एक नार तरवर से उतरी, वाके सर पर पॉव ।
ऐसी नार कुनार को, मैंना देखन जाव ।
मैना।
मिला रहे तो नर रहे, अलग होय तो नार ।
सोने का सा रङ्ग है, कोई चतुरा करे विचार ।
चना।
श्याम बरन पीताम्बर कांधे, मुरली धर नहिं होय ।
बिन मुरली वह नाद करत है, बिरला बूझे कोय ।
भौरा।
एक नार कूए मे रहे। वाका नीर खेत में बहे ।
जो कोई वाके नीर को चाखे । फिर जीवन की आस न राखे ।
तलवार।
।
[ ३३ ]
मुकरियां
वह आवे तब शादी होय | उस विन दूजा और न कोय ।
मीठे लागें वाके बोल । ऐ सखि, साजन? ना सखी;
ढोल।
जब मेरे मन्दिर मे आवे । सोते मुझको भान जगावे।
पढ़त फिरत वह विरह के अच्छर । ऐ सखि, साजन? ना
सखि, मच्छर।
चेर वेर सोवतहिं जगावे । ना जागू तो काटे खावे ।
व्याकुल हुई मैं हक्की चक्की । ऐ सखि, साजन? ना सखि,
मक्खी।
विद्यापति
शक्ति स्तुति
१
कनक भूधर शिखर वासिनि, चन्द्रिका चय चारु हासिनि,
दसन कोटि विकास, वङ्किम तुलित चन्द्र कले,
क्रद्ध सुर रिपु बल निपातिनि, महिष शुम्भ निशुम्भ घातिनि,
भीत भक्त भयापनोदन, पाटल प्रबले ।
जय देवि दुर्गे दुरित हारिणि, दुर्गमारि विमर्दकारिणि,
भक्तिनम्र सुरासुराधिप, मङ्गलायत रे,
गगन मण्डल गर्भ गाहिनि, समरभूमि सुसिंह वाहिनि,
परसुपास कृपाण सायक शङ्ख चक्र धरे।
अष्ट भैरवि सङ्ग शालिनि, सुकर कृत्त कपाल मालिनि,
दनुज शोणित पिशित वर्द्धित पारणा रभसे।
जगत बन्धु निदान मोचिनि, चन्द्रभानु कृशानु लोचनि,
जोगिनी गण गीत शोभित नृत्य भूमिरसे।
जगति पालन जनन मारण, रूप कार्य सहस्र कारण,
हरि विरचि महेश शेखर, चुम्ब्य मान पदे ।
सकल पाप कला परिच्युति, सुकवि विद्यापति कृतस्तुति,
तोषिते शिवसिंह भूपति, कामना फलदे ।
-
[ ३५ ]
गङ्गा स्तुति
२
कत सुख सार पाओल तुअ तीरे।
छाड़इत निकट नयन वह नोरे।
कर जोड़ि विनमओं विमल तरंगे।
पुन दरसन हो पुनमति गंगे।
एक अपराध छेमब मोर जानी ।
माय पाऊ तुअ पानी।
कि करव जप तप जोग धे आने ।
कृतारथ एकहिं सनाने ।
भनहिं विद्यापति समदओं तोहि ।
अनृकाल जनु विसरह मोहि।
परसल
जनम
शिव स्तुति
३
चानन
कखन हरव दुख मोर हे भोलानाथ ।
दुख ही जनम भेल दुखही गमाइच,
सुख सपनहुँ नहिं भेल हे भोलानाथ ।
अच्छत
अउर गंगाजल,
वेलपात तोहि देव हे भोलानाथ ।
यहि भवसागर थाह कतहुँ नहि,
भैरव धरु कर आए हे भोलानाथ ।
भन विद्यापति मोर भोलानाथ गति,
देहु अभय वर मोरा हे भोलानाथ । '
.
[ ३६ ]
कृष्ण स्तुति
४
तातल सैकत वारि बिन्दु सम सुतमित रमनी समाजे ।
तोहि विसरि मन ताति समर्पल अब मझु होव कोन काजे ।
माधव हम परिणाम निराशा।
तुहुँ जगतारण दीन दयामय अतए तोहार विसवासा।
आधे जनम हम नीदे गमाओल जराशिशु कत दिन गेला ।
निधुवन रमनी रसरंग मातल तोहें भजब कोन बेला।
कल चतुरानन मरि मरि जाएत न तुअ आदि अवसाना ।
तोहे जननि पुनि तोहे सगाएत सागर लहरी समाना।
भनए विद्यापति सेस शमन भय तुअ विनु गति नहिं आन।
आदि अनादिक नाथ कहाओसि अब तारन भार तोहारा ।
वसन्त-वर्णन
फुटल कुसुम नव कुंज कुटिर वन कोकिल पञ्चम गावे रे ।
मलयानिल हिमशिखर सिधारल पियानिज देस न आवे रे।
चनन चान तन अधिक उतापए उपवन अलि उतरों ले रे ।
समय बसन्त कन्त रहु दुर देस जानलनिधि प्रतिकूले रे।
अनमिख नयन नाह मुख निरखैत तिर पित नभे नयाने रे।
ईसुख समय सहए एत संकट अबला कठिन पराने रे।
दिन-दिन खिन तनु हिम कमलिनि जनि नजानि कि निबपरजंत रे।
विद्यापति कह धिक धिक जीवन माधव निकरुन कन्त रे।
वर्षा-वर्णन
सखि हे हमर दुखक नहिं ओर।
[ ३७ ]
इ भर बादर माह भादव शून्य मन्दिर मोर ।
झपि घन गरजन्ति सन्तति भुवन भरि वर सन्तिया ।
कन्त पाहुन, काम दारुन, सघन खर शर हन्तिया ।
कुलिश कत सत पात मुदित मयूर नाचत मातिया।
मन्त दादुर डाक डाहुक फाटि जायत छातिया।
तिमिर दिग भरि घोर यामिनि अथिर विजुरिक पांतिया।
विद्यापति कह कैसे गमा ओव हरि बिना दिन रातिया ।
अन्य-पद
माधव कत तोर करव बड़ाइ ।
उपमा तोहर हम ककरा कहव कहितहुँ अधिक लजाइ ।।
जो श्रीखण्ड सौरभ अति दुर्लभ तौ पुनि काठ कठोर ।
जो जगदीश निशाकर तौ पुन इकहि पक्ष इंजोर ।।
मनि समान अओरो नहिं दूसर तिन कहुँ पाथर नामे ।
कनक कदलि छोट लजित मैं रहु की कहु ठामहि ठामे ।।
तोहर सरिस एतोह माधव मन होइछ अनुमाने ।
सज्जन जन सों नह कठिन थिक कवि विद्यापति भाने ॥
मुनु रसिया।
श्रावन बजार विपिन वसिया।।
बार बार चरणारविन्द गहि सदा रहव वनि दसिया ।
कि छलहुँ कि होएव सेके जानए वृथा होएत कुल हसिया ॥
अनुभव ऐसन मदन भुजंगम हृदय हमर गेल डसिया ।
नन्द नन्दन तुअ सरन न त्यागव चनु जनु अहाँ दुर जसिया।।
विद्यापति कह सुनु बनिता मनि तोरे मुख जीतल ससिया।
धन्य धन्य तोर भाग गोयालिनि हरि भजु हृदय हुलसिया ॥
[ ३८ ]
सखि कि पुछसि अनुभव मोय ।
सेही परित अनुराग बखानइत तिले तिले नूतुन होइ ।।
जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल ।
से हो मधुर बोल स्रवनहि सुनल सति पथे परसन गेल ।।
कत मधु जामिन रभसे गमाओल न बुझल कैसन केल ।
लाख लाख जुग हिअहिअराखल तइओ हिआजुडन नगेल।
कत विदग्धजन रस अनुगमन अनुभव काहु न पेख ।
विद्यापति कह प्राण जुड़ाइत लाखवे न मिलल एक ।।
कबीरदास
दोहे
गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागू पॉय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दिया बताय ॥
यह तन विप की वेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुरु मिलें, तो भी मस्ता जान ।।
बहे बहाये जात थे, लोक वेद के माथ ।
पैंडा में सतगुरु मिले, दीपक दीन्हा हा
सतगुर साँचा सूरमा, नखसिख भारा पूर ।
बाहर घाव न दीखई, भीतर चकनाचूर ॥
सतगुरु दीन दयाल हैं, दयाकरी मोहिं प्राय ।
कोटि जनम का पथ था, पल में पहुंचा जाय ॥
कवीर हम जव गावते, तब जाना गुरु नाहिं ।
अवगुरु दिल में देखिया, गावन कोकछु नाहिं ।।
सिख तो ऐमा चाहिये, गुरु को सह कछु देय ।
गुरु तो ऐसा चाहिए सिख से कछु नहिं लेय ॥
सिंहों के लेहड़े नहीं, हंसों की नहिं पॉत ।
लालों की नहि वेरिया, साधु न चले जमात ।।
माधु कहावन कठिन है, व्यों खॉडे की धार ।
डगमगाय तो गिरि परे, निःचल उतर पार ।।
गॉठी दाम न वॉधई, नहिं नारी से नेह ।
कह कबीर ता साधु के, हम चरनन की खेह ।।
[ ४० ]
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।।
कबीर संगत साधु की, हरै और की व्याधि ।
संगत बुरी असाधु की, आठों पहर उपाधि ।।
कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय ।
खीर खांड भोजन मिले, साकट संग न जाय ।।
साधु ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुभाय ।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय ।।
साधु भया तो क्या भया, बोले नाहि बिचार ।
हतै पराई आतमा, जीभ बॉधि तरवार ।।
बोलत ही पहिचानिये, साहु चोर को घाट ।
अन्तर की करनी सबै, निकसै
मुख
की बाट ।
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदय सॉच है, ताके हिरदै आप ॥
साँचे साप न लागई, साँचे काल न खाय ।
साँचा को साँचा मिलै, सॉचे मॉहि समाय ॥
सुख के माथे सिलि परै, नाम हृदय से जाय ।
बलिहारी वा दुक्ख की, पल पल नाम रटाय ।।
लेने को सतनाम है, देने को अनदान ।
तरने को आधीनता, बूड़न को अमिमान ॥
विरहा बिरहा मत कहो, बिरहा है सुलतान ।
जाघट बिरहन संचरै, सो घट जान समान ॥
पावक रूपी नाम है, सब घट रहा समाय ।
चित चकमक चहुँटै नहीं, धूवाँ है है जाय ।
[ ४१ ]
जो जन बिरही नाम के, तिनकी गति है येह ।
देही से उद्यम करें, सुमिरन करै बिदेह ॥
कविग बैद बुलाइया, पकरि के देखी बांहि ।
बैद न बेदन जानई, करक करे जे मांहि ॥
प्रेम प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्हे कोय ।
आठ पहर भीना रहै, प्रेम कहावै सोय ।।
जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं हम नाहिं ।
प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहि ।
माई इतना दीजिये, जामें कुटुम्ब समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ॥
क्या मुख लै विनती करो, लाज अबत है मोहिं ।
तुम देखत औगुन करौ, कैसे भावौ तोहि ।।
अवगुन मेरे बाप जी, बकस गरीबनिवाज ।
जो मैं पूत कपूत हो, तऊ पिता को लाज ||
लाली मेरे लाल की, जित देखू तित लाल ।
लाली देखन मैं चली, मैं भी हो गई लाल ।
दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय ।
विना जीव की स्वास से, लोह भस्म हो जाय ।।
दाया दिल मे राखिये, तू क्यों निरदइ होय ।
साई के सब जीव है, कीड़ी कुजर सोय ॥
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर ||
आव गई आदर गया, नैनन गया सनेह ।
ये तीनों तवही गये, जव हिं कहा कछु देह ।।
[ ४२ ]
पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहार।
ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार ।।
कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लई चुनाय ।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय ।।
केसन कहा विगारिया, जो मूंडो सौ बार ।
मन को क्यों नहिं मूड़िये, जामें विषय विकार ।।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित हुआ न कोय ।
ढाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।
x
x
x
X
पद
१
काया बौरी चलत प्रान काहे रोई ।। टेक ।।
काया पाय बहुत सुख कीन्हों नित उठि भक्ति मलि धोई।
सो तन छिया छार है जैहै नाम न लै है कोई ।।
कहत प्रान सुनु काया बौरी मोर तोर संग न होई ।
तोहिं अस मित्र बहुत हम त्यागा संग न लीना कोई ।।
ऊसर खेत के कुसा मंगाचे चांचर चँवर के पानी।
जीवत ब्रह्म को कोई न पूजै मुरदा कै मिहमानी ।।
सब सनकादिक आदि ब्रह्मादिक सेस सहस मुख होई ।
जो जो जन्म लियो वसुधा मे थिर न रह्यो है कोई ।।
पाप पुण्य है जन्म सँघाती, समुझि देखि नर लोई ।
कहत कवीरा अन्तर की गति, जानत विरला कोई ।।
[ ४३ ]
२
सूर संग्राम को देखि भागे नहीं, देखि भागै सोई सूर नाहीं ।
काम और क्रोध मद लोभ से जूझना, मंडाघमसान तह खेत वाही।।
शील औ सांच संतोप साही भये, नाम समसेर तहँ खूब बाजै।
कहै कबीर कोई जूमि है सूरमा, कायरा भीड़ तह तुरत भाजै ॥
३
माया
जानी।
महा
ठगिनि
हम
तिरगुन फांस लिये कर डोले मधुरी बानी ।।
केशव के कमला है वैठी शिव के भवन भवानी ।
पंडा के सूरत कै बैठी तीरथ में भई पानी ॥
योगी के योगिन है बैठी राजा के घर रानी।
काहू के हीरा है बैठी काहू के कौड़ी कानी ।
भक्तन के भक्तिन है बैठी ब्रह्मा के ब्रह्मानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतो यह सव अकथ कहानी ।।
४
कैसे दिन कटि है, जतन वताये जइयो।
एहि पार गंगा ओहि पार जमुना।
विचवा भड़इया हमको छवाये जइयो ।
अंचरा फारिके
कागद वनाइन
अपनी सुति हियरे लिखाय जइयो।
कहत कवीर सुनो भाई साधो
बहियां पकरि के रहिया बताये जइयो ।
[ ४४ ]
५
करम गति टारे नाहि टरी।
मुनि वसिष्ठ से पंडित ज्ञानी सोधि के लगन धरी।
सीता हरन मरन दसरथ को बन में बिपत परी ।।
कहें वह फन्द कहाँ वह पारधि कहँ वह मिरग चरी।
सीता को हरि लैगौ रावन सुवरन लंक जरी ।।
नीच हाथ हरिचन्द्र विकाने बलि पाताल धरी।
कोटि गाय नित पुन्न करत नृप गिरगिट जोनि परी॥
पांडव जिनके आप सारथी तिन पर विपत परी।
दुरजोधन का गरव छटाओ जदुकुल नास करी ।।
राहु केतु श्री भानु चन्द्रमा विधि संयोग परी।
कहत कबीर सुनो भई साधो होनी होके , रही ।
६
सन्तो राह दोऊ हम दीठा।
हिन्दू तुरुक हटा नहिं माने, स्वाद सबन को मीठा ।
हिन्दू परत एकादसि साधे, दूध सिंघाड़ा सेती।
अन को त्यागै मन नहिं हटकै, पारन करै सगोती ॥
रोजा तुरुक नमाज गुजारै बिसमिल, बांग पुकारे ।
उनकी भिस्त कहां से होइ है, सांझे मुरगी मार ।।
हिन्दू दया मेहर को तुरकन, दोनों घट सों त्यागी।
हलाल वै छटका मारै, आगि दोनों घर लागी ।
हिन्दू तुरुक की एक राह है, सतगुरु इहै बताई।
कहैं कबीर सुनो हो सन्तो राम न कहेउ खोदाई॥
ब
[ . ४५ ]
मनन रंगाये रंगाये जोगी कपरा।
आसन मारि मन्दिर में बैठे, नाम छाडि पूजन लागे पथरा ।
कनवा फड़ास जोगी जटवा बढ़ौले, दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैलैं
जङ्गल जाय जोगी धुनियां रमौलें, काम जराय जोगी बनि गैलै
हिजरा।
मछवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रंगौले, गीता बांचिकै होइ गैले
बकरा।
लबरा।
कहत कवीर सुनो भाई साधो, जमदरवजवां बांधत जैवे पकरा ।
८
घूघट का पट खोलरे तोहें जीब मिलेगे।
घट घट मे वह साई रमता, कटुक बचन मत बोल रे।
धन जोवन का गरब न कीजै, झूठा पंचरंग चोल रे।
सुन्ना महल मे दियरा वारिले, आसन सों मत डोल रे।
जोग जुगुत सों रङ्ग महल मे, पिय पायो अनमोल रे।
कहै कवीर आनन्द भयो है, बाजत अनहद डोल रे।
६
तेरे दया धरम नहिं तन में, मुखड़ा क्या देखे दरपन मे ।।
घरवारी तो घर में राजी, फक्कड़ राजी वन मे ।।
ऐंठी धोती पाग लपेटी, तेल चुवत जुलफन मे ।।
गली गली की सखी रिझाई, दाग लगाया तन में ।।
पाथर की एक नाव बनाई, उतरा चाहै छन में ।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, कायर चढ़े न रन में।
[ ४६ ]
मैं
१०
मेरा तेरा मनुवां, कैसे एक हो रे।
मैं कहता हौं आखिन देखी, तू कहता कागद लेखी।
कहता सुरझावन हारी, तू राख्यो अरुझाह रे॥
कहता तू जागत रहियो, तू रहता है सोइ रे।
मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे
जुगन जुगन समुझावत हारा, कहा न मानत कोइ रे।
तू तो रंगो फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोइ रे॥
सतगुरु धारा निरमल बाहै, वा में काया धोइ रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होइ रे॥
११
तोहिं मोही लगन लगाये रे फकिरवा।
सोवत ही मैं अपने मन्दिर में, सबद न मारि जगाये रे फकिरवा।
वूड़त ही भव के सागर में, बहियां पकरि समुझाये रे फकिरवा ।
एक बचन बचन नहिं दूजा, तुम मोसे बन्द छुड़ाये रे फकिरवा ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सत्तनाम गुन गाये रे फकिरवा ।
१२
अँधियरवा ठाड़ि गोरी, का करतू।
जब लगि तेल दिया मे वाती, एही अंजोरवा विछाय धमतू
मन का पलंग संतोप विछौना, ज्ञान का तकिया लगाय रख तू ।
जरि गया तेल बुझाइ गई बाती, सुरत में मुरत समाय रख तू।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, जोतिया मे जोतिया मिलाय रख तू।
[ ४७ ]
१३
बान को गेंद कर सुरति का दंड कर, खेल चौगान मैदान माहीं।
जगत का भरमना छोड़ दे बालके, आयजा भेख भगवंत पाहीं।।
भेख भगवंत की सेस महिमा करे, सेस के सीस पर चरन डा।
कामदल जीति के कंचलदल सोधिके, ब्रह्म को बेधिकै क्रोध मारै ॥
पदम आसन करै पवन परिचै करै, गगन के महल पर मदन जारै।
कहत कबीर कोई संत जन जौहरी, करम की रेख पर मेख मारै ।।
१४
झीनी झीनी वीनी चदरिया ।
काहे के ताना काहे की भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया।
इंगला पिंगला ताना भरनी, सुख मन तार से वीनी चदरिया ।।
आठ कंवल दल चरखा डोले, पांच तन्त्र गुन तीनी चदरिया ।
साई को सियत मास दस लागे, ठोक ठोक के बीनी चदरिया ।।
सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े, ओढ़ि के मैली कीनी चदरिया।
दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों घर दीनी चदरिया ।।
१५
रहना नहिं देस विराना है।
यह संसार कागद की पुड़िया, बून्द पड़े घुल जाना है।
यह संसार कांट की बाड़ी, उलझपुलझ मर जाना है।
यह संसार भाड़ औ झांखर, आगि लगे धरि जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरु नाम ठिकाना है।
१६
आई गवनवां की सारी, उमरि अवहीं मोरी वारी ।। टेक ।।
साज समाज पिया लै आये और कहरिया चारी।
[ ४८ ]
वम्हना बेदरदी अचिरा पकरि के जोरत गंठिया हमारी॥
सखी सब गावन गारी॥
विधिगति बाम कछु समझ परत ना बैरी भई महतारी।
रोम रोम आंखियां मोर पोंछत, घरवॉ से देत निकारी ।।
भई सब को हम भारी॥
गबन कराय पिया लै चाले, इत उत बाट निहारी ।
छूटत गांव नगर
छूटै महल अटारी॥
करम गति टरै न टारी ।।
नदिया किनारे बलम मोर रसिया, दीन्ह चूंघट पट टारी ।
थरथराय तन कांपन लागे, काहू न देख हमारी ।।
पिया लै आये गोहारी।।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, यह पदुलेहु विचारी ।
अबके गौना बहुरि नहिं औना, करिले भेट अंक बारी॥
एक बेर मिल ले प्यारी॥
से
नाता,
-
रैदास दोहा हरि सा हीरा छाडि के, करै आन की आस । ते नर जमपुर जाहिगे, सत भाषै रैदास ॥१॥ रैदास रात न सोइये, दिवस न करिये स्वाद । अहनिसि हरिजी सुमरिये, छाड़ि सकल प्रतिवाद ||२|| पद १ भगती ऐसी सुनहु रे भाई। आइ भगती तब गई बड़ाई। कहा भयो नाचे अरु गाये, कहा भयो तप कीन्हे । कहा भयो जे चरन पखारे, जौ लौ तत्त्व न चीन्हे ।। कहा भयो जे मूंड मुड़ायो, कथा तीर्थ व्रत कीन्हे । खाली दास भगत अरु सेवक, परम तत्त्व नहिं चीन्हे ।। कह रैदास तेरी भगति दूर है, भाग बड़े सो पावे । तजि अभिमान मेटि आया पर, पिपलिक है चुनि खावे ।। पहले पहरे रैन दे बनजरिया तैं जनम लिया संसार वे । सेवा चूकी राम की तेरी बालक बुद्धि गंवार वे ।। बालक बुद्धि न चेता तू भूला माया जाल वे। कहा होय पीछे पछताये जल पहिले न बांधी पाल वे ।।
[ ५० ]
बीस बरस का भया अयाना थांभि न सका भार वे।
जन रैदास कहै वनजरिया जनम लिया संसार वे
३
राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊं। फल अरु मूल अनूप न पाऊं।।
थनहर दूध जो बछरु जुठारी। पुहुप भंवर जल मीन बिगारी ।।
मलयागिर बेधियो भुअंगा। विष अमृत दोउ एकै संगा ।।
मन ही पूजा मन ही धूप । मन ही सेऊं सहज सरूप ॥
पूजा अरचा न जानू तेरी। कहै रैदास कवन गति मेरी॥
४
रेचित चेत अचेत काहे बालक को देख रे।
जाति ते कोई पद नहिं पहुंचा राम भगति विशेष रे ।।
खट क्रम सहित जे विमहोते हरिभगति चित्त दृढ़ नहिं रे।
हरि की कथा सोहाय नाहीं स्वपच तूलै ताहि रे॥
मित्र शत्रु अजात सब तें अन्तर लावे हेत रे।
लाग वाकी कहां जाने तीन लोक पवेत रे॥
अजामिल गज गनिका तारी काटी कुंजर को पास रे।
ऐसे दुरमत मुक्त कीये तो क्यों न तरै रैदास रे ।।
५
जो तुम गोपालहिं नहिं जैहौ।
तो तुम का सुख में दुख उपजै सुखहि कहां ते पैहो ।
माला नाय सकल जग डह को झूठो सेख बनै हो।
झूठे ते सांचे तब होइ हो हरि की सरन जब ऐहौ ।।
कनरस बतरस और सबै रस झूठहि मूड डोलेहौ ।
जब लगि तेल दिया में बाती देखत ही वुझ जैहौ ।
[ ५१ ]
जो जन राम नाम रंगराते और रगन सोहै हो।
कह रैदास सुनो रे कृपानिधि प्रान गये पछितैहौ।
६
प्रभु जी संगति सरन तिहारी।
जग जीवन राम मुरारी॥
गली गली को जल वहि आयो सुरसरि जाय समायो।
संगत के परताप महातम नाम गंगोदक पायो ।
स्वाति बू'द बरसे फनि ऊपर सीस विषै होइ जाई ।
वही बंद के मोती निपजै संगत की अधिकाई ।।
तुम चंदन हम रेड वापुरे निकट तुम्हारे आसा।
संगत के परताप महातम आवै वास सुवासा ।।
जाति भी ओछी करम भी ओछा, ओछा कसब हमारा ।
नीचे से प्रभु ऊंच कियो है कह रैदास चमारा ।।
अब कैसे छुटै नाम रट लागी ।। टेक ॥
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग अंग वास समानी।।
प्रभु नी तुम घन वन हम मोरा । जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती । जाकी जोति वरे दिन राती।
प्रभ जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहि मिलत सोहागा॥
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा । ऐसी भक्ति करै रैदासा ।।
गुरु नानक
दोहे
जागो रे जिन जागना, अब जागनि की बारि।
फेरिकि जागो “नानका",जबसोवड पांव पसारि ॥
मित्रां दोस्त माल धन, छडि चले अति भाइ ।
संगि न कोई “नानका", उह हंस अकेला जाइ ।।
जेही पिरीति लगंदिया, तोड़ निबाहू होइ ।
"नानक" दर गह जां दियां ढक न सक्के कोइ ।।
सूरा एक न आखियम, जो लड़नि दला में जाय ।
सूरे सोई नानका जो, मनणु हुकुम रजाय ।
हिरदे जिनके हरि बसे, ऐ जान कहियहि सूर ।
कही न जाई “नानका", पूरि रह्या भर पूर ।।
मन की दुबिधा ना मिटै, मुक्ति कहां ते होइ ।
कउड़ी बदली नानका, जन्म चल्या नर खोइ ।।
पद
१
सब कछु जीवन को व्योहार ।
माता पिता भाई सुत बांधव, अरु पुन गृह की नार ।
तन ते प्रान होत जब न्यारे टेरत प्रेत पुकार ।।
आध घरी कोऊ नहीं राखै घर ते देत निकार ।।
कहु नानक भज राम नाम नित जातें हो उद्धार ॥
[ ५३ ]
२
मन की मन ही माहि रही।
ना हरि भजे न तीरथ सेये चोटी काल गही ।।
दारा मीत पूत रथ संपति धन जन पूर्न मही ।।
और मकल मिथ्या यह जानो भजना राम सही ।।
फिरत फिरत बहुते जुग हारयो मानस देह लही॥
"नानक" कहत मिलन की विरियां सुमिरत कहा नहीं ।
३
जो नर दुख
में
दुःख नहिं माने ।
सुन सनेह अरु भय नहिं जाके कंचन माटी जाने ।
नहिं निन्दा नहिं प्रस्तुति जाके लोभ मोह अभिमाना।
हर्प शोकतें रहे नियारो नाहिं मान अपमाना।
आसा मनसा सकल त्यागिकै जगते रहै निरासा ॥
काम क्रोध जेहि परसैं नाहिन ते हि घट ब्रह्म निवासा ।।
गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्हीं नित यह जुगति पिछानी ॥
नानक लीन भयो गोविन्द सों ज्यों पानी संग पानी ॥
रे मन कौन गत होइ है तेरी।
यहि जग मे रामनाम, सोतो नहिं सुन्यो कान,
विपयन सों अति लुभान, मति नाहिन फेरी ।।
मानम को जनम लीन्ह, सिमरन नहिं निमिप कीन्ह ;
दारा सुत भयो दीन, पडाहुं परी वेरी॥
"नानक" जन कह पुकार, सुपने ज्यों जग पसार;
सिमरत नहिं क्यों मुरार, माया जाकी चेरी॥
[ ५४ ]
५
विना॥
सुमरन करले मेरे मना ।
तेरी विति जाति उमर हरिनाम
कूपनीर बिनु धेनु छोर बिनु मंदिर दीप विना ।
जैसे तरुवर फल बिनु हीना तैसे प्राणी हरिनाम बिना ।।
देह नैन बिन रैन चद बिन धरती मेह बिना।
जैसे पंडित बेद विहीना तैसे प्राणी हरिनाम बिना ।।
काम क्रोध मद लोभ निहारो छांड दे अब संत जना ।
कहे "नानक शा" सुन भगवंता या जग में नहिं कोई अपना ॥
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G
दोहे
निर्मल गुरु का ज्ञान गाह, निर्मल भगति विचार ।
निर्मल माया प्रेमरस, छूटे सकल विकार ॥१॥
निर्मल तन मन आतमा, निर्मल मनसा सार ।
निर्मल प्राणी पंचकरि, दादू लंघे पार ॥२॥
सरवर भरिया दह दिसा, पंखी प्यासा जाइ।
दादू गुरु परमाद विन, क्यों जल पीवै आइ ।।३।।
मन माला तहँ फेरिये, जहें आप एक अनंत ।
सहले सो सतगुर मिल्या, जुग जुग फाग बसन्त ||४||
यहु मसीत यहु देहरा, मतगुरु दिया दिखाइ।
भीतरि सेवा बन्दगी, वाहरि काहे जाइ ||५||
दादू सुधि बुधि आतमा सतगुरु परसै आइ ।
दादू भृगी कोट ज्यों
देखत ही
जाइ ॥६॥
दादू नीका नॉव है, हरि हिरदै न बिसारि ।
मूरति मनमा है बसी, सॉस मॉस सॅभारि ॥७॥
एक राम के नॉव विन, जिव की जरनि न जाइ।
दादू केते पचि मुए, करि करि बहुत उपाइ ॥८॥
सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर ।
दादू दे एक को,
दूजा नाहीं
नाहीं और ॥
नैनहुँ आगे देखिये, आतम अन्तर सोइ।
तेज पुज सब भरि रह्या, मिल मिल झिल मिल होइ ॥१०॥
[ ५६ ]
बिगसि बिगसि दरसन करै, पुलिक पुलिक रस पान ।
मगन गलित माता रहै, अरस परस मिलि प्रान ॥११॥
निरखि निरखि निज नांव ले, निरखि निरखि रस पीव ।
निरखि निरखि पिव कौं मल, निरखि निरखि सुख जीव॥१२॥
श्रासा अपर पार की, बसि अंबर भरतार।
हरे पटम्बर पहिरि करि, धरती करै- सिंगार ॥१॥
बसुधा सब फूलै फलै, पिरथी अनंत अपार ।
गगन गरजि जल थल भरै, दादू जै जै कार ॥१४॥
रोम रोम रस प्यास है, दादू करहिं पुकार ।
राम घटा दल उसँगि करि, बरिसह सिरजन हार ॥१५॥
मलूकदास दोहे माला जपों न कर जपों, जिभ्या कहाँ न राम | सुमिरन मेरा हरि करे, मैं पाया बिसराम ॥१॥ जीवहुँ ते प्यारे अधिक, लागै मोही राम । बिन हरि नाम नहीं मुझे और किसी से काम ॥ २॥ कह मलूक हम जबहिं तें लीन्ही हरि की ओट । मोवत हैं सुख नींद भरि डारि भरम की पोट ॥ ३ ॥ गॉठी सत्त कुपीन मे, सदा फिरै निःसंक । नाम अमल भाता रहै, गिनै इन्द्र को रंक ॥४॥ साहेब मेग सिर खडा, पलक पलक सुधि ले । जवहीं गुरू किरिपा करें, तबहिं राम कछु दे ॥ ५ ॥ जो तेरे घर प्रेम है, तो कहि कहि न सुनाव । अन्तर जामी जानि है, अन्तर गत का भाव ॥ ६॥ गुप्त प्रगट जेही करी, करे मन की खूम । अन्तर जामी राम जी, सब तुमको मालूम || ७ || सुमिरन ऐसा कीजिये, दूजा लखे न कोय । ओंठ न फरकत देखिये, प्रेम राखिये गोय ॥८॥ पद . १ तेरा मैं दीदार दिवाना। घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ सुन साहेब रहमाना ।।
[ ५८ ]
हुश्रा अलमस्त खबर नहीं तनकी, पीया प्रेम पियाला।
ठाढ होहुँ तो गिर गिर परता तेरे रंग मतवाला ॥
कहैं मलूक अब कजा न करिहौं दिल ही सों दिल लाया।
मक्का हज्ज हिये में देखा, मूरा मुरसिद पाया ।
( २ )
नैया मेरी नीके चलन लगी।
आंधी मेह तनिक नहीं डोलौ साहु चढ़े बड भागी।
राम राम डगमगी छोड़ाई, निर्भय कड़िया लैया।
गुन लहासि की हाजत नाही, आछा साज बनैया ॥
अवसर परै तो पवेत बोझै, तहूँ न होवै भारी।
धन सत गुरु यह जुगुति बताई, तिनकी मैं बलिहारी ॥
सूखे पड़े तो कछु डर नाही, ना गहिरे का ससा।
उलटि जाय तो बार न बांके, याका अजब तमासा ॥
कहत मलूक जो बिन सिर खेवै, सो यह रूप बखाने ।
या नैया की अजब कथा कोई बिला केवट जाने ।
( ३ )
दर्द दिवाने बावरे,
अलमस्त फकीरा।
एक अकीदा ले रहै, ऐसे मन धीरा ।।
प्रेम पियाला पीवते, बिसरे सब साथी ।
आठ पहर यों झूमते, ज्यों माता हाथी ॥
उनकी नजर न आवते, कोई राजा रंक ।
बधन तोड़े मोह के, फिरते निहसंक ।।
साहेब मिल साहेब भये, कछु रह न तमाई।
कहै मलूक तिस घर गये, जहँ पवन न पाई ॥
[ ५६ ]
( ४ )
सदा सोहागिन नारि सो, जाके राम भतारा ।
मुख
मांगे
सुख ढत हैं, जग जीवन प्यारा ॥
नर देही दिन दोय की, सुन गुरूजन मेरी।
क्या ऐसों का नेहग, मुए विपति घनेरी ॥
ना उपलै न वीनस, मंतन सुखदाई।
कहैं मलूक यह जानि के, मैं प्रीति लगाई ।।
मलिक मुहम्मद जायसी
पद्मावती-सौन्दर्य
बेनी छोरि मार जौ केसा। रैनि होई, जग दोपक लेसा ।।
सिर हुंत बिसहर परे भुइं बारा । सगरों देश भएउ अंधियारा॥
सकपकाहिं विष भरे पसारे । लहरि भरे लह कहिं अति कारे ।
जानहुँ लोटहिं चढ़े मुअंगा, । बेधे बास मलगिरि अंगा।
लुरहि मुरहिं जनु मानहिं केली । नाग चढ़े मालति के बेलीं।
लहरे देह जनहु कालिंदा । फिर फिर भंवर होय चित बन्दी ।।
चवर दुरत पाछे चहुँपासा । भंवर न उहि जो लुबुधे वासा ।।
होइ अंधियार बीजु धन लोपे, जब हि चीर गहि झांप ।।
केस नाग कित देख मैं, संवरि संवरि जिय कांप ।।
मांग जो मानिक सेंदुर रेखा । जनु बसन्त राता जग देखा ।।
के पत्रावली पाटी पारी। औ रचि चित्र विचित्र संवारी॥
भए उरेह पुहुप सब नामा । जनु बग बिखर रहे घनसामा ।
जमुना मांझ सुरसती मंगा। दुहुँ दिनि रही तरंगिनि गंगा ॥
मेंदुर रेख सो ऊपर राती । वीर बहूटिन्ह के जसि पांती॥
वलि देवता भए देग्वि सेंदूरू । पूजै मांग भोर उठ सूरू ॥
भोर सांझ रवि होए जो राता। ओहि रेखा राता होइ गाता ।।
बेनी कारी पुहुप लेह, निकसी जमुना आइ।
पूज चन्द्र आनन्द सौ, सेदुर सीस चढ़ाइ॥
[ ६१ ]
दुहुज लिलार अधिक मनियारा । संकर देखि माथ तहं धारा ।।
यह नित दुइज जगत सब दीमा । जगत जौहरै देह असीसा ।।
मसिजो होइ नहि सरवरि छाज।होइ सो अमावस छपि मन लाजै ।।
तिलक संवारि जो चुन्नी रची। दुइज मांझ जानहुं कचपची ॥
मसि पर करवत सारा राहू । नखतन्ह भरा दीन्ह बड़ दाहू ॥
पारस जोत लिलाटहि ओती । दिस्टि जो करै होइ तेहि जोति ।।
मिरि जो रतन मांग बेठारा । जानहु गगन टूट निसि धारा ।।
ममि श्री सूर जो निरमल, तेहि लिलाट के ओप ।
निसि दिन दौरि न पूजहि, पुनि पुनि होहिं अलोप ।।
राजा का स्वर्गवास (पद्मावत से)
तौ लहि श्वास पेट महूं अही। जो लहि दशा जाउ की रही ।।
काल आह टेग्वलाई सांटी। उठि जिय चला छांड़ के माटी ॥
काकर लोग कुटुम घर वारू। काकर अर्थ द्रव्य संसारू ।
वही घडी सव भयो पगवा। आपन मोड जो परसा खावा ।।
रहि जे हित माथ के नंगी । सवै लाग काढ़त तेहि वेगी।
हाथ झार जस चलै जुवारी । तजो राज है चला भिखारी ।।
जब लग जीव रतन सव काहा। मा बिन जीव न कौड़ी लाहा ।।
गढ़ सौपा तेहि वाढल, गये टेकत वसुदेव ।
छोडी गम अयोध्या, जो भावै सो लेव ।।
पद्मावती पुनि पहरि पटोग। चली साथ प्रिय के है जोग ।।
मृरज छिपा ग्यनि है गई । पूनो शशि सो अमावस भई ।।
छोर केश मोति लट छूटी। जानो रयनि नखत सब छूटी ।।
संदुर परा जोशीम उधारी। आग लाग चहि जग अंधियारी॥
,
[ ६२ ]
यही दिवस हों चाहत नाहीं । चलो साथ पिय दै गलवाहीं॥
सारस पंखि नहिं जिये निरारे । हौं तुम बिन का जियों पियारे ।।
न्योछावर के तन छहराऊँ । छार होऊ सग बहुर न आऊ ।।
दीपक प्रीति पतंग ज्यों, जन्म निवाह करेउं ।
न्योछावर चहुंपास है, कंठ लाग जिय देउं ।
पद्मावती का सती होना
नागमती पद्मावती रानी । दोउ महासत सती बखानी ।।
दोउ सौत चढ़ खाट जो बैठी । औ शिवलोक परा तहं दीठी ॥
बैठो कोई राज औ पाटा। अन्त सबै बैठे पुनि खाटा ।
चन्दन अगर काढ़ सर साजा। औ गति देय चले लै राजा
बाजन बाजहिं होय अगोता ! दोर कन्त लैं चाहैं सोता ।।
एक जो बाजा भयो विवाहू । अब दूसरे है और निबाहू ।।
जियत जलै जौ कन्त की आसा। मुये रहस बैठे इक पासा ।।
आज सूर दिन अथयो, आज रयनि शशि बूड ।
आज नाथ जिय दीजिये, आज अगिन हम जूड़ ।।
सर रच दान पुन्य बहु कीन्हा, सात बार फिर भांवर लोन्हा॥
एक जो भांवर भयो बियाही । अब दूसर है गोहन जाही ।।
जियत कन्त तुम हम गल लाई। मुये कंठ नहिं छाड़हु साई ।।
लै सर उपर खाट बिछाई। पौढ़ी दोउ कन्त गल लाई ।।
और जो गांठ कन्त तुम जोरी । आदि अन्त लहि जाय न छोरी ।।
यह जगकाह जो अर्थाह न याथी। हम तुम नाह दोहू जग साथी॥
लागी कंठ अंग दै होरी । छार भई जर अंग न मोरी ॥
राती पिया के नेह की, स्वर्ग भयो रतनार ।
जो रे उवा सो अथवा, रहा न कोई संसार ॥
[ ६३ ]
वे सहगवन भई जिय आई। बादशाह गढ़ छेका धाई।
तब लग मो अवसर है वीता । भये अलोप राम औ सीता।
आय शाह जो सुना अखारा । है गइ रात दिवस उजियारा ॥
छार उठाय लीन इक मूठी। दीन्ह उड़ाइ पिरथवी झूठी ॥
मगरे कटक उठाई माटी। पुल बांधा जहं जहं गढ़ घाटी ।।
जौ लहि उपर छार नहिं पर। तौ लहि यह तृष्णा नहिं मरै ।।
भा दहवा भा जूझ असूझा । बादल आय पवर पर जूझा ।।
जून्हर भई सब स्त्री, पुरुष भये संग्राम ।
बादशाह गढ़ चूरा, चितौर भा इसलाम ।।
मैं यह अर्थ पंडितन बूझा । कह कि हम कुछ और न सूझा ॥
चौदह भुवन जोहत उपराहीं। सोमव मानुष के घट माहीं॥
तन चिनौर मन राजा कीन्हा। हिय सिंहल बुद्धि पद्मिनी चीन्हा ।।
गुरू सुवाजेहि पथ दिखावा। विन गुरु जगत सो निरगुन पावा।।
नागमती यह दुनिया धंधा । वाचा सोई न यह चित बन्धा ।।
राघव दूत मोड शैतान । माया अलाउदीं सुलतानू ।।
कथाप्रेम यह भांति विचारू । बूझ लेहू जो वूझहि पारू ||
तुरकी अरवी हिन्दवी, भाषा जेती आहि ।
जामे मारग प्रेम का, सवै सराहै ताहि ॥
मुहमद कवि यह जोर सुनावा । सुना मो प्रेम पीर का पावा।।
जोरे लाय रक्त ले गये। प्रेम प्रीति नयनहिं जल भये ।
श्री में जान गीत अस कीन्हा। की यह रीति जगत मह चीन्हा ।
कहां मो रतनसेन अब राजा । कहां सुवा अल बुध उपराजा ।।
कहां अलाउदीन सुलतानू । कहं राघव जेहि कोन्ह वखानू ।।
,
[ ६४ ]
कहं सुरूप पद्मावति रानी। कुछ न रही जग रही कहानी ॥
धन साई यह कोरति तासू । फूल मरै पर मरै न बासू ।
कैन जगत यश बेचा, कैन लीन यश मोल ।
जो यह पढ़े कहानी, हम संबरै दोउ बोल ।।
मुहम्मद वृद्ध वैस जो भई । यौवन हम सो अवस्था गई ।।
बल जो गयो के खीन शरीरू । दृष्टि गई नयनहिं दै नीरू ।।
दमन
गये कै बचा कपोला । बैन गये अनरुच दै बोला।
बुधि जो गई दै हिय बौराई । गर्व गयो तरिहत शिर नाई ।।
श्रवण गये ऊच जो सूना । स्याही गये सीस भा धूना ॥
भंवर गये केसहि दे भुवा । यौवन गयो जीत ले जुवा ।।
जो लहि जीवन जोवन साथा । पुनि सो मीच पराये हाथा ।।
अखरावट
ठा ठाकुर बड आप गोसाई । जेइ सिरजा जग अपनइ नाई ।।
आपुहि श्राप जो देखइ चहा। आपन प्रभुता आपसे कहा ॥
सबइ जगत दरपन के लेग्वा । आपुहि दरपन आपुहि देखा।
आपुहि बन ौ श्रापु पखेरू । आपुहि मउजा आपु अहेरू ।
आपुहि पुहुप फूल वन फूले । आपुहि भंवर बासरस भूले ।।
आपुहि फल श्रापुहि रखवारा। आपुहि मो रस चाखनहारा ।।
आपुहि घटघट महँ मुख चाहइ । आपुहि आपन रूप सराहइ ।।
पानी मह जस बुल्ला, तस यह जग उतराइ
एकहि आवत देखिये, एकहि जात बिलाइ ।
सा सांसा जड़ लहि दिन चारी । ठाकुर से करि लेहु चिन्हारी ।।
अंध न रहहु होहु डिठिपारा । चीन्हि लेहु जो तोहि संवारा॥
पहले से जो ठाकुर कीजिय । अइसे जियन मरन नहिं छीजिय ||
छाड़हू घिउ अरु मठरी मासू । सूखे भोजन करहु गरासू ।।
दूध माम घिव कम न अहारू। रोटी सान करहु फरहारू ।।
यहि विधि काम घटावहु काया । काम क्रोध तिसना मद माया ।।
कब बइठ उ बजरासन मारी । गहि सुखमना पिंगला नारी ।।
प्रेम तन्तु तम लागि रहु, करहु ध्यान चित बांधि
पारवि जइस और कह, लागि रहइ सर सावि ।।
गोस्वामी तुलसीदास
राम-चरित-मानस
परशुराम लक्ष्मण संवाद
तेहि अवसर मुनि सिव धनु भंगा। पाए भृगु कुल कमल पतंगा।
देखि महीप सकल सकुचाने | बाज झपट जिमि लवा लुकाने ।
गौर सरीर भूति भलि भ्राजा। भाल विसाल त्रिपुंड बिराजा।
सीस जटाससि बदन सुहावा।रिसि बस कछुक अरुन होइ पावा।
भृकुटी कुटिल नयन रिसवाते । सह जहुँ चितवत मनहुँ रिसाते ।
वृषभ कंध उर वाहु बिसाला । चार जनेउ माल मृग छाला।
कटि मुनि-बसन तून दुइ बांधे । धनु सर कर कुठार कल कांधे।
संत बेष करनी कठिन, बरनि न जाइ सरूप ।
धरि मुनि तनु जनु बीर रसु, पायेउ जहँ सब भूप ॥
देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भयबिकल भुआला
पितु समेत कहि निज निज नामा । लगे करन सब दंड प्रणामा ।
जेहि सुभाय चितवहिं हितु जानी । सो जानै जनु आइ खुटानी ।
जनक बहोरि आइ सिरु नावा । सीय बोलाइ प्रनाम करावा।
आसिष दीन्हि सखी हरषानी । निज ममाज लै गई सयानी ।
विस्वामित्र मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।
रामुलषनु दसरथ के ढोटा । देखि असीस दीन्ह भल जोटा।
रामहिं चितै रहे भरि लोचन | रूप अपार मार मद मोचन ।
[ ६७ ]
बहुरि बिलोकि बिदेह सन, कहहु काह अति भीर ।
पूंछत जाति अजान जिमि, व्यापेउ कोपु सरीर ॥
समाचार कहि जनक सुनाए । जेहि कारन महीप सब आए।
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चाप खंड महि डारे।
अतिरिस बोले बचन कठोरा । कहु जड़ जनक धनुष केहि तोरा ।
बेगि देखाउ मूढ़ नत आजू । उलटौं महि जहँ लगि तब राजू ।
अति डर उतर देत नृप नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं।
सुर मुनि नाग नगर-नर-नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी।
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सॅवरी बात बिगारी।
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता । अरध निमेषु कलप सम बीता।
समय बिलोके लोग सब, जानि जानकी भीरु ।
हृदय न हरष विषाद कछु, बोले श्री रघुवीरु ।।
नाथ संभु-धनु-भंजनि हारा। होइहि कोउ एक दास तुम्हारा।
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।
सेवक सो जो कर संवकाई । अरि करनी करि करि अलराई ।
सुनहु राम जेहि सिव-धनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। नतु मारे जै हैं सब राजा।
सुनि मुनिवचन लषन मुसकाने । बोले परसु धरहि अपमाने ।
बहु धनुही तोरी लरिकाई। कबहुं न असि रिस कीन्ह गोसाईं।
एहि धनु पर ममता केहि हेतू । सुनि रिसाइ कह भृगुकुल केतू ।
रेनृप बालक काल बस, बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम त्रिपुरारिधनु, विदित सकल संसार ।।
लखन कहा हॅसि हमरे जाना । सुनहु देव सब धनुष समाना।
का छति लाभ जून धनु तोरे। देखा राम नये के भोरे।
[ ६८ ] छुअत टूट रघुपति नहिं दोषू । मुनि विनु काज करिअ कत रोषू । बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहु स्वभाव न मोरा । बालक बोलि वौं नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहिं मोही। बाल ब्रह्मचारी अति कोही । विस्व विदित क्षत्रियकुल द्रोही । भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्हीं। विपुल बार महिदेवन्ह दीन्हीं। सहसबाहु भुज छेदनिहारा । परशु बिलोकु महीप कुमारा । मातु पितहि जनि सोचवस, करसि महीप किसोर। गरभन के अरभक दलन, परसु मोर अति घोर । विहँसि लखन बोले मृदु वानी । अहो मुनीस महाभटमानी। पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू । चहत उड़ावन फूं कि पहारू । इहाँ कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं। देखि कुठार सरासन वाना । मैं कछु कहेउँ सहित अभिमाना। भृगुकुल समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहौं रिस रोकी । सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई । बधे पाप अपकीरति हारे । मारत हू पा परिय तुम्हारे। कोटि-कुलिस-सम बचन तुम्हारा । व्यर्थ धरहु धनुवान कुठारा। जो बिलोकि अनुचित कहेउँ, छमहु महामुनि धीर । सुनि सरोष भृगुवंसमाने, बोले गिरा गंभीर । कौसिक सुनहु मंद यह बालक । कुटिल काल बस निजकुल घालक । भानु-वंस-राकेस कलंकू । निपट निरंकुस निठुर निसंकू । काल कवलु होइहि छिन माँही। कहौं पुकारि खोरि मोहि नाहीं। तुम्ह हटकहु जो चहहु उबारा । कहि प्रतापु वसु रोषु हमारा। लषन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा । तुम्हहिं अछत को वरनै पारा । अपने मुँह तुम्ह अापन करनी। बार अनेक भॉति बहु बरनी।
[ ६६ ]
नहिं संतोष तो पुनि कछु कहहू । जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।
बीर व्रती तुम्ह धीर अछोभा । गारी देत न पावहु सोभा।
सूर समर करनी करहिं, कहि न जनावहिं आपु ।
विद्यमान रिपु पाइ रन, कायर करहिं प्रलापु ।
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा, वार वार मोहिं लागि बुलावा।
सुनत लखन के वचन कठोरा । परसु सुधार धरेड कर घोरा।
अव जनि देइ दोष मोहि लोगू। कटुबादी बालक बध जोगू ।
वाल विलोकि वहुत मैं बांचा । अब यह मरनिहार भा साचा ।
कौसिक कहा छमित्र अपराधू । वाल-दोष-गुन गनहिं न साधू ।
कर कुठार मैं अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरु द्रोही।
उत्तर देत छाडौं विनु मारे । केवल कौसिक सील तुम्हारे ।
न तु एहि काटि कुठार कठोरे। गुरुहिं उरिन होतेउँ श्रम थोरे।
गाधि सूनु कह हृदय हँसि, मुनिहिं हरिअरै सूम।
अयमय खॉड़ न उखमय । अनहुँ न बूझ अबूझ ।
कहेउ लखन मुनि सोल तुम्हारा । को नहिं जान विदित संसारा।
माता-पितहिं उरिन भए नौके । गुर रिन रहा सोच बड़ जी के।
सो जनु हमरे हि माथे काढ़ा । दिन चलि गयेउ व्याज बहु बाढ़ा।
अव आनिअ व्यवहरिया बोली । तुरत देउँ मैं थैली खोली ।
सुनि कटु वचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।
भृगुवर परसु देखावहु मोहीं। विप्र विचारि बचौ नृपद्रोही।
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहिं के बाढ़े।
अनुचित कहि सब लोग पुकारे । रघुपति सैनहिं लषन निवारे।
लखन-उत्तर आहुत सरिस, भृगु-वर कोप कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन, बोले रघुकुल भानु ।
[
मैं
७० ]
नाथ करहु बालक पर छोहू । सूध दूध मुख करिय न कोहू ।
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना । तौ कि बराबर कर अयाना ।
जौ लरिका कछु अचगरि करहीं। गुरु पितु मातु मोद मन भरहीं।
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी । तुम्ह सन सील धीर मुनिग्यानी ।
राम बचन सुन कछुक जुड़ाने । कहि कछु लखन बहुरि मुसुकाने ।
हँसत देखि नख सिख रिस व्यापी । राम तोर भ्राता बड़ पापी ।
गौर सरीर स्याम मन माहीं । काल कूट मुख पय मुख नाहीं ।
सहज टेढ़ अनुहरै न तोहीं। नीच मीच सम देखत मोहीं।
लषन कहेउ हँसि सुनहु मुनि, क्रोध पाप कर मूल ।
जेहि बस जन अनुचित करहिं, चरहिं बिस्व प्रतिकूल ।
तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोप करित्र अब दाया।
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने । वैठिन होइहि पाय पिराने ।
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिय कोउ बड़ गुनी बोलाई।
बोलत लषनहिं जनक डेराही । मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं।
थर थर कॉपहिं पुर नर नारो। छोट कुमार खोट बड़ भारी ।
भूगुपति सुनि सुनि निर्भय बानी। रिस तन जरै होइ बलहानी ।
बोले रामहिं देइ निहोरा । बचौं विचारी बंधु लघु तोरा।
मन मलीन तनु सुन्दर कैसे । विष रस-भरा कनक घट जैसे
सनि लछिमन बिहँसे बहुरि, नयन तरेरे राम ।
गुर समीप गवने सकुचि, परिहरि वानी वास ।
अति विनीत मृदु सीतल वानी। बोले राम जोरि जुग पानी।
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना । वालक वचन करिअ नहिं काना ।
बररै बालक एक सुभाऊ । इन्हहिं न संत विदूषहि काऊ ।
तेहि नाहीं कछु काज विगारा । अपराधी मैं नाथ तुम्हारा ।
[ ७१ ]
कृपा, कोप, वध, बंध गोसाई । मोपर करिश्र दास की नाई।
कहिअ वेगि जेहि विधि रिस जाई । मुनिनायक सोइ करौं उपाई ।
कह मुनि राम जाय रिस कैमे । अजहुँ अनुज तब चितव अनैसे।
एहि के कंठ कुठार न दीन्हा । तो मैं काह कोप करि कीन्हा।
गर्भ श्रवहि अवनिप वनि, सुनि कुठार गति घोर ।
परसु अछत देखौं जित, बैरी भूप किसोर ।
चहै न हाथ दहै रिस छाती । भा कुठार कुठित नृपघाती।
भयेउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ । मोरे हृदय कृपा असि काऊ।
आजु देव दुख दुमह सहावा । मुनि सोमित्रि बहुरि सिरु नावा।
बाउ कृपा मूरति अनुकूला । बोलत बचन भरत जनु फूला ।
जो पै कृपा जरहिं मुनि गाता । क्रोध भए तन राखु विधाता ।
देखु जनक हठि बालक एहू । कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू ।
बेगि करहु किन ऑखिन ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा।
बिहँसे लखन कहा मुनि पाहीं । मुंदे आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।
परसु राम तब राम प्रति, बोले उर अति क्रोध ।
समु सरासन तोरि सठ, करसि हमार प्रबोध ।
बंधु कहै कटु संमत तोरे । तू छल विनय करसि कर जोरे।
करु परितोष मोर संग्रामा। नाहित छॉडु कहाउब रामा।
छल तजि करहि समर सिवद्रोही । बंधु सहित नत मारौं तोही।
भृगुपति बकहिं कुठार उठाए । मन मुसुकाहिं राम सिरनाए ।
गुनहु लषन कर हम पर रोषू । कतहुँ सुधाइहुं तें बड़ दोषू ।
टेढ़ जानि सँका सब काहू । बक्र चंद्रमहिं प्रसै न राहू ।
राम कहेउ रिस जिन मुनीसा । कर कुठार आगे यह सीसा।
जेहिरिस जाइ करिअसोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी।
.
-
,
।
[ ७२ ]
प्रभु सेवकहि संमर कस, तजहु विप्रवर रोसु ।
वेष विलोकि कहेसि कछु, बालकहू नहिं दोसु ।
देखि कुठार-बान-धनु-वारी। मै लरिकहि रिस वीर बिचारी।
नाम जान पै तुम्हहिं न चीन्हा । बस सुभाव उतरु तेइ दीन्हा ।
जौं तुम्ह अवतेहु मुनि की नाई। पदरज सिर सिसु धरत गोसाई।
छमहु चूक अनजानत केरो। चहिअ विप्र उर कृपा घनेरी।
हमहिं तुम्हहि सरवरि कस नाथा । कह हुत कहाँ चरन कहें माथा।
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तुम्हारा ।
देव एक गुन धनुष हमारे। नवगुन परम पुनीत तुम्हारे।
सब प्रकार हम तुम सन हारे । छमहु विप्र अपराध हमारे।
बार बार मुनि विप्रवर, कहा राम सन राम ।
बोले भृगुपति सरुष होइ, तहूँ बंधु सम बाम ।
निपटहि द्विजकरि जानहि मोहीं। मैं जस बिप्र सुनावौं तोहीं।
चाप ध्रुवा सर आहुति जानू । कोप मोर अति घोर कृसानू ।
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महामहीप भए पसु आई ।
मैं यह परसु काटि बलि दीन्हें । समर जग्य जग कोटिक कीन्हें ।
मोर प्रभाव विदित नहिं तोरे । बोलसि निदरि बिन के भोरे।
भंजेउ चाप दाप बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जग ठाढ़ा।
राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ।
छूवतहि टूट पिनाक पुराना । मैं केहि हेतु करौं अभिमाना ।
जो हम निदरहिं विप्र बदि, सत्य सुनहु भृगुनाथ ।
तौ अस को जग सुभट जेहि भय बस नावहिं माथ ।
देव दनुज भूपति भट नाना । समबल अधिक होउ बलवाना।
जौं रन हमहिं प्रचारै कोऊ । लरहि सुखेन काल किन होऊ ।
।
।
[ ७३ ]
छत्रिय तनु धरि समर सकाना । कुलकलंक तेहि पांवर जाना।
कहौं सुभाव न कुलहि प्रसंसी । कालहु डरहिं न रन रघुबंसी।
विप्रबंस के असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहिं डेराई ।
सुनि मृदु बचन गूढ रघुपति के । उघरे पटल परसु-धर-मति के।
राम रमापति कर धनु लेहू । खैचहु मिटै मोर संदेहू ।
देत चाप आपुहि चलि गयेऊ । परसुराम मन विस्मय भयेऊ ।
जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात ।
जोरि पानि बोले बचन, हृदय न प्रेमु समात ।
जय रघुबम-बनज-बन भानू । गहन-दनुजकुलदहन कृसानू ।
जय सुर-विप्र-धेनु-हित कारी जय मद-मोह-कोह-भ्रम-हारी ।
विनय सील करुना गुन सागर । जयति बचन रचना अति नागर ।
सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छवि कोटि अनंगा।
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।
अनुचित बचन कहेॐ अग्याता छिमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता ।
करि जय जय जय रघुकुल केतू । भृगुपति गए बनहिं तपहेतू ।
अपभय कुटिल महीप डेराने । जहँ तह कायर गवहिं पराने ।
देवन दीन्ही दुंदुभी, प्रभु पर बरषहि फूल ।
हरषे पुर-नर-नारि-सब, मिटा मोहमय सूल।
सीता की शोभा
जनम सिंधु पुनि बंधु विष, दीन मलीन सकलंक ।
सिय मुख समता पाव किमि, चन्द्र बापुरो रंक ।।
घटइ बढ़इ बिरहिन दुखदाई । प्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।
कोक सोकप्रद पंकज द्रोही । अवगुन बहुत चन्द्रमा तोही ।
वैदेही मुख पटतर दोन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे ।
सिय शोभा नहिं जाय बखानी । जगदंबिका रूप गुन खानी ।
उपमा सकल मोहि लघु लागी। प्राकृत नारि अंग अनुरागी।
सीय बरनि तेहि उपमा देई । कुकवि कहाइ अजस को लेई ।
जौ पटतरिय तीय महं सीया। जग अस जुवति कहां कमनीया ।
गिरा मुखर तनु अरघ भवानी। रति अति दुखित अतनु पतिजानी।
विष बारुनी बन्धु प्रिय जेही। कहिय रमासम किमि वैदेही।
जौ छवि सुधा पयोनिधि होई । परम रूप मय कच्छप सोई।
सोभा रजु मदर सिंगारू । मथइ पानिपंकज निज मारू ।
एहि विधि उपजह लच्छि जब, सुन्दरता सुखमूल ।
तदपि संकोच समेत कवि, कहहिं सीय समतूल ।
.
सुमित्रा का लक्ष्मण को उपदेश
धीरज धरेउ कुअवसर जानी । सहज सुहृद बोली मृदु बानी।
तात तुम्हारी मातु वैदेही। पिता रामु सब भांति सनेही ।
अवध तहाँ जहँ राम निवासू । तहँइ दिवसु जहँ भानु प्रकासू ।
[ ७५ ]
जो पै सीय राम बन जाहीं । अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं ।
गुरु पितु मातु बंधु अरुसाई । सेइअहिं सकल प्रान की नाई।
रामु प्रान प्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही के।
पूजनीय प्रिय परम जहाँ ते । सब मानिअहिं राम के नाते ।
अस जिय जानि संग बन जाहू । लेहु तात जग जीवन लाहू ।
भूरि भाग भाजन भयहु, मोहि समेत बलि जाउँ ।
जौं तुम्हने मन छॉडि छल, कीन्ह रामपद ठाउँ ।
पुत्रवती जुवती जग सोई । रघुपति भगतु जासु सुत होई।
नतरु बांझ भलि बादि बिानी। राम विमुख सुत ते हित जानी।
तुम्हरेहि भाग राम बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।
सकल सुकृत कर बड़ फल एहू । राम सीय पद सहज सनेहू ।
राम रोष इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इनके बस होहू ।
सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ।
तुम्ह कहें बन मब भांति सुपासू । संग पितु मातु राम सिय जासू।
जेहिं न गम बन लहहि कलेसू । सुत सोइ करेहु इहेइ उपदेसू ।
उपदेसु यह जेहिं तात तुम्हरें राम सिय सुख पावहीं।
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।
तुलसी प्रभुहि सिख देई आयसु दीन्ह पुनि आसिस
रति होउ अबिरल अमल सिय रघुवीर पद नित नित नई ।
दई
।
भगवान के रहने के स्थान
बालमीकी हॅसि कहहिं बहोरी । बानी मधुर अमिय रसबोरी।
सुनहु राम अब कहउँ निकेता । जहाँ बसहु सिय लखन समेता।
जिन्ह के श्रवण समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।
[ ७६ ] भरहिं निरन्तर होहिं न पूरे । तिन्ह के हिय तुम्ह कहँ गृह रूरे। लोचन चातक जिन्ह करि राखे । रहहिं दरस जलधर अभिलाषे। निदरहि सरित सिंधु सर भारी । रूप बिन्दु जल होहिं सुखारी। तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बन्धु सिय सह रघुनायक! जस तुम्हार मानस विमल, हँसिनि जीहा जासु । मुकताहल गुनगन चुनइ, राम बसहु हियँ तासु । प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा । सादर जासु लहइ नितनासा। तुम्हहिं निवेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं। मीस नवहिं सुरगुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय विसेखी। कर नित करहिं रामपद पूजा । राम भरोस हृदय नहिं दूजा । चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम वमहु तिन्हके मन माहीं। मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा । पूजहिं तुम्हहिं सहित परिवारा। तरपन होम करहिं बिधि नाना । बिष जेंचाइ देहिं बहुदाना। तुम्हतें अधिक गुरुहि जिय जानी । सकल भाग्य सेवहि सनमानी। सब करि माँगहिं एक फल, राम चरन रति होउ । तिन्ह के मन मन्दिर बसहु, सिय रघुनन्दन दोउ ।। काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा। जिन्ह के कपट दम्भ नहिं माया तिन्हके हृदय बसहु रघुराया। सबके प्रिय सबके हितकारी । दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी । कहहिं सत्य प्रिय बचन विचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी। तुम्हहिं छांडि मति दूसर नाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं। जननी सम जानहिं पर नारी । धनु पराव विष ते विष भारी। जे हरषहिं पर सम्पति देखी । दुखित होहिं पर बिपति बिसेखी। तिन्हहिं राम तुम प्रान पियारे। तिन्ह के मन सुभसदन तुम्हारे।
। [ ७७ ] स्वामि सखा पितु मातु गुरु, जिन्ह के सब तुम्हें वात । मन मन्दिर तिन्ह के बसहु, सीय सहित दोउ भ्रात । अवगुन तजि सबके गुन गहहीं । विप्र धेनु हित संकट सहहीं। नोति निपुन जिन्ह कइ जग लीका । घर तुम्हार तिन्हकर मनु नीका। गून तुम्हार समुझाइ निज दोसा जेहि सब भांति तुम्हार भरोसा। राम भगत प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहु सहित वैदेही। जाति पांति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई। सब तजि तुम्हहि हिरह उर लाई । तेहि के हृदय रहहु रघुराई । सरगु नरकु अपबरगु समानी । जहें तहें देख धरे धनुबाना। करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि के उर डेरा। जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु, तुम्ह सन सहज सनेहु । बसहु निरन्तर तासु मन, सो राउर निज गेहु । रामराज बरनाम निज निज धरम, निरतवेद पथ लोग । चलहि सदा पावहिं सुखहिं, नहिं भय सोक न रोग । दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज नहिं काहुहिं व्यापा। सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत अतिनीति । चारिउ चरन धर्म जगमाहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं। राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी। अल्प मृत्यु नहिं कवनेउ पीरा । सब सुन्दर सब बिरुज सरीरा। नहिं दरिद्र कउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना। सब निर्दम्भ धर्मरते गुनी । नर अरु नारि चतुर सब गुनी। सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतंग्य नहिं कपटसयानी।
[ ७८ ]
रामराज नभगेस सुनु, सचराचर जगमाहि ।
कर्म
सुभाव गुन । कृतदुख काहुहि नाहिं।
भूमि सात सागर मेखला। एकं भूप रघुपति कोसला।
भुअन अनेक रोम प्रति जासू । यह प्रभुता कछु बहुत न तासु ।
सो महिमा ममुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।
सोउ महिमा खगेस जिन जानी। फिर एहि चरित तिनहुँ रतिमानी।
सोउ जाने कर फल यह लीला । कहहिं महा मुनिवर दमसीला।
रामराज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा।
सब उदार सब पर उपकारी । विप्र चरन सेवक नर-नारी।
एक नारि व्रतरत सब झारी । ते मन बच क्रम पतिहितकारी।
दण्ड जतिन्ह कर भेद जहँ, नतक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहि सुनिय अस, रामचन्द्र के राज ।
फूलहिं फलहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक संग गज पंचानन ।
खग मृग सहजु बयरि बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।
कूजहिं खगमृग नाना वृन्दा । अभय चरहिं बन करहिं अनन्दा।
सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुजत अलि लै चलि मकरंदा।
लता बिटप मांगें मधु चवहीं । मन भावती धेनु पथ् सवहीं।
ससि सपन्न सदा रह धरनो । त्रेता यह कृतजुग के करनी।
प्रगटी गिरिन्ह विविध मनि खानी । जग दातमा भूप जग जानी।
सरिता सकल बहहिं बरबारो । सोतल अमल स्वाद सुखकारी।
सागर निज मरजादा रहहाँ । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।
सरसिजसंकुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा विभागा।
विधु महि पूर मयूखन्हि, रबितप जेतनेहि काज ।
मांगे बारिद देहिं जल, रामचन्द्र के राज ।
[ ७ ]
विजय-रथ
रावनु रथी बिरथ रघुवीरा । देखि विभीषन भयउ अधीरा।
अधिक प्रीति मन भा सदेहा । वंदि चरन कह सहित सनेहा ।
नाथ न रथ नहि तन पदत्राना । केहि विधि जितब वीरबलवाना।
सुनहु सखा कह कृपा निधाना । जेहिं जय होइ सो स्यदन आना।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ।।
वल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे।
ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरतिचर्म संतोष कृपाना।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।
अमल अचल मन त्रोन समाना । समजम नियम सिलीमुख नाना।
कवच अभेद विप्र गुरपूजा । एहि सम विजय उपाय न दूजा।
महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर ।
जाके अस रथ होइ दृढ़, सुनहु सखा मतिधीर ।
सन्त-लक्षण
संत असंतन्ह कै अस करनी । जिमि कुठार चन्दन आचरनी ।
काटइ परसु मलय सुन भाई । निज गुन देइ सुगंध बसाई ।
ताते सुर सीसन्ह चढ़त, जग बल्लभ श्रीखण्ड ।
अनल दाह पीटत घनहिं, परसु बदन यह दंड ।
विषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुम्ब दुख सुख सुख देखे पर।
सम अभूत रिपु बिमद बिरागी । लोभामरष हरष भय त्यागी ।
कोमल चित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया ।
सबहिं मानप्रद आप अपानी । भरत प्रान सम मम ते प्रानी।
[ ८० ]
बिगत काम मम नाम परायन । सांति बिरति बिनती मुदितायन ।
सीलता सरलता भयत्री । द्विजपद प्रीति धर्म जनयत्री।
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर । जानेहु तात संत संतत फुरें।
समदम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहीं नहिंबोलहि।
निन्दा अस्तुति उभय सम, ममता सम पदकंज ।
ते सज्जन मम प्रानप्रिय, गुनमंदिर सुखपुज ।
राम सतसई
आसन दृढ़ आहार हड़, सुमनि ज्ञान दृढ़ होइ ।
तुलसी विना उपासना,
विन
दूलह
की जोई ॥१॥
राम चरण अवलम्व विनु, परमारथ की आस ।
चाहत वारिद कुंद गहि, तुलसी उड़न अकास ॥२॥
स्वारथ परमारथ सकल, सुलभ एक ही ओर ।
द्वार दूसरे दीनता, उचित न तुलसी तोर ।।३।।
जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम |
तुलसी राम कवहूँ होत नहि, रवि रजनी इकठाम ||४||
सम्पत्ति सकल जगत की, स्वासा सम नहिं होइ।
सो स्वासा तजि राम पद, तुलसी अलग न खोइ ।।५।।
तुलसी सो अति चतुरता, राम चरन लवलीन ।
पर मन पर धन रहन को, गनिका परम प्रवीन ।
स्वामी होनो सहज है, दुर्लभ होना दास ।
गाडर लाये ऊन को, लागी चरन कपास ||७||
तुलसी सब छल छांडिकै, कोजै राम सनेह ।
अन्तर पति सों है कहा, जिन देखी सव देह ।।।।
कोटि विन्न संकट विकट. कोटि सत्रु जो साथ ।
तुलसी वल नहिं कर सके, जो सुदिष्ट रघुनाथ ॥६॥
लगन महूरत योगवल, तुलसी गनत न काहि ।
राम भये जेहि दाहिने, सबै दाहिने ताहि ॥१०॥
[ २ ] ऊंची जाति पपीहरा, पियत न नीचो नोर ! कै याचे घनश्याम सों, के दुख सह शरीर ॥१॥ होइ अधीन याचै नहीं, सीस नाइ नहिं लेइ । ऐसे मानी मांगनहिं, को वारिद बिनु देइ ॥१२॥ मान राखिबो मांगिबो, प्रिय सो सहज सनेहु । तुलसी तीनों तब फबै, जब चातक मत लेहु ॥१३॥ गंगा यमुना सरसुती, सात सिन्धु भरपूर । तुलसी चातक के मते, बिन स्वाती सब धूर ॥१४॥ एक भरोसे एक वल, एक आस विश्वास । स्वाति सलित रघुनाथ यश, चातक तुलसीदास ||१शा राम राम रटिवो भलो, तुलसी खता न खाय । लरिकाई ते पौरिबो, धोखेहुं बूड़ि न जाय ॥१६॥ तुलसी बिलम्ब न कीजिए, भजि लीजै रघुबीर । तन तरकस तें जात है, स्वांस सार सो तीर ॥१७॥ असन वसन सुत नारि सुख, पापिहुँ के घर होइ। सन्त समागम रामधन, तुलसी दुर्लभ दोइ ॥१८॥ तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुं ओर । बसीकरन यह मंत्र है, परिहरु बचन कठोर ||१|| तुलसी अपने राम कह, भजन करहुं निरसंक। आदि अन्त निर्वाहियो, जैसे नव को अंक ॥२०॥ तुलसी राम सनेह करु, त्याग सकल उपचारु । जैसे घटत न अंक नव, नव के लिखत पहारु ॥२१॥ तुलसी मंत सुअंबु तरु, फूल फलहिं पर हेतु । इतते ये पाहन हनत, उतते वे फल देत ॥२२॥ ,
[ ८३ ]
गोधन गजधन बाजिधन, और रतन धन खान ।
जब आवत सन्तोष धन, सब धन धूरि समान ॥२३॥
काम क्रोध मद लोभ की, जौ लों मन में खान।
तौ लों पण्डित मूरखौ, तुलसी एक समान ॥२४॥
प्रेम अरु पुन्य अघ, यश अपयश जय हान ।
बात बीज इन सबन को, तुलसी कहहिं सुजान ||२||
तौ लग योगी जगत गुरु, जौ लगि रहत निरास ।
जब आसा मन में जगी, जग गुरु योगी दास ॥२६॥
उरग तुरंग नारी नपति, नर नीचो हथियार।
तलसी परखत रहब नित, इनहिं न पलटत बार ॥२७॥
विनय पत्रिका
गाइये गनपति जगवदन, संकर 'सुवन भवानी' नंदन ।
सिद्धि सदन गजबदन बिनायक, कृपासिंधु सुदर सव लायक ।
मोदक-प्रिय
मुद मंगल दाता,
विद्यावारिधि बुद्धिविधाता।
मांगत "तुलमिदास" कर जोरे, बसहिं रामसिय मानस मोरे ।।
२
बावरोरावरो नाह भवानी।
दानि बड़ो दिन देत दये बिनु बेद बड़ाई भानी ॥
निज घर की बर बात बिलोकहु हो तुम परम सयानी ।
सिव की दई संपदा देखत श्री सारदा सिहानी ।।
जिनके भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नहीं निसानी ।
तिन रंकन को नाथ सवारत हौ आयों न कबानी ॥
दुख दीनता दुखी इनके दुख जाचकता अकुलानी ।
यह अधिकार सौपिये औरहि भीख भली मैं जानी ।।
प्रेम प्रशंसा विनय व्यग जुत सुनि विधि की वर बानी ।
"तुलसी" मुदित महेस मनहिं मन जगत मातु मुसुकानी ।
३
श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरन भव भय दारुनं ।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुनं ॥
कन्दर्प अगनित अमित छवि नव नील नीरज सुन्दरं ।।
पटपीत मानहु तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक सतावरं ।
[ ८५ ]
भजु दीनवन्धु दिनेस दानव दैत्यवंश निकंदनं ।
रघुनन्द आनंदकन्द कौसलचन्द दसरथ नन्दनं ।।
शिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदार अंग विभूषनं ।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर दूसनं ॥
इमि वदत "तुलसीदास" शंकर शेष मुनि मनरंजनं ।
मम हृदय कंज निवास करू कामादि खल दल गंजनं ॥
४
अव लौं नसानी अब न नसैहौं।
राम कृपा भवनिसा सिरानी जागे फिरि न डसैहौं ॥
पायौ नाम चारु चिन्तामनि उर करते न खसैहो ।
श्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कचनहिं कसैहौं ॥
परवस जानि हंस्यो इन इन्द्रिय निज बस है न हसैहौ।
मन मधुकर मन करि "तुलसी" रघुपति पद कमल बसैहौं।
मन पछतैहै अवसर वीते।
दुर्लभ देह पाइ हरि पद भजु करम बचन अरु ही ते ॥
सहसवाहु दसवदन आदि नृप बचे न काल बली ते ।
हम हम करि धन धाम संवारे अन्त चले उठि रीते ॥
सुत वनितादि जानि स्वारथ रत न करु नेह सवही ते ।
अन्तहुं तोहिं तजैगे पामर तू न तजै अबही ते ॥
अब नाहिं अनुरागु जागु जड त्यागु दुरासा जीते।
बुझे न काम अगियि "तुलसी" कहुं विषय भोग वहु घीते ॥
६
तू दयाल, दीन हो, तू दानि, हौ भिखारी।
हूं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप पुंज हारी ||
[ ८६ ]
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मो सों ।
मो समान आरत नाहिं आरतहर तो सों।।
ब्रह्म तू हौं जीव, तू ठाकुर, हौ चेरो
तात मात गुरु सखा तू सब विध हित मेरो॥
तोहि मोहि नातो अनेक मानिये जो भावै ।
ज्यों त्यों "तुलसी" कृपाल चरण शरण आवै ।।
ममता तू न गई मेरे मन ते ।
पाके केस जन्म के साथी लाज गई लोकन तें।
तन थाके कर कम्पन लागे जोति गई नैनन तें॥
सरवन वचन न सुनत काहु के वलगये सव इन्द्रिन तें।
टूटें दसन वचन नहिं आवत सोभा गई मुखन तें।
कफ पित वात कंठ पर बैठे सुतहिं बुलावत कर तें ।
भाइ वन्धु सब परम पियारे नारि निकारत घर तें॥
जैसे ससिमंडल विच स्याही छुटै न कोटि जतन ते ।
"तुलसिदास" वलि जाउ चरन ते लोभ पराये धन ते ॥
कवहुंक हौ इहि रहनि रहौगो।
श्री रघुनाथ कृपाल कृपा तें सन्त सुभाव गहोंगो ॥
जथा लाभ सन्तोष सदा काहू सौ कछु न चहाँगो ।
परहित निरत निरन्तर मन क्रम वचन नेम निवौगो ।
परुप वचन अति दुसह स्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो।
विगत मान सम सीतल मन परगुन औगुन न कहौंगो।।
[ ८७ ]
परिहरि देह जनित चिन्ता दुख सुख समबुद्धि सहौंगी ।
"तुलसिदास" प्रभु इहि पथ रहिअविचल हरिभक्ति लहौंगी।
ह
केसव कहि न जाइ का कहिये।
देखत तव रचना विचित्र अति, समुझि मन ही मन रहिये ।।
सून्य भीति पर चित्र रंग नहि, तनु बिनु लिखा चितेरे ।
धोये मिटै न मरे भीति, दुख पाइय एहि तनु हेरे ॥
रबि कर-नीर बसै अति दारुन, मकर रूप तेहि माहीं।
बदन हीन से ग्रसे चराचर, पान करन जे जाहीं ॥
कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबन्ध कोउ मान ।
तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचान ॥
१०
माधब असि तुम्हारी यह माया।
करि उपाय पचि पचि मरिय, तरिय नहिं, जब लगि करहु न दाया
सुनिय गुनिय समुझिय समुझाइय, दसा हृदय नहिं आवै ।
जेहि अनुभव विनु मोह जनित भव,दारुन बिपति सतावै ॥
ब्रह्म पियूष मधुर सीतल जो, पै मन सो रस पावै ।
तौ कत मृगजल-रूप विषय, कारन निसि बासर धावै ।
जेहि के भवन विमल चिन्तामनि, सो कत कांच वटोरै।
सपने पर बस परै जागि, देखत केहि जाइ निहोरै।
ग्यान भक्ति साधन अनेक सब सत्य झूठ कछु नाहीं।
तुलसिदास हरि कृपा मिटै भ्रम, यह भरोस मन माहीं।
[ 7 ]
,
बरवै रामायण
कुंकुम तिलक भाल श्रुति कुन्डल लोल ।
काकपच्छ मिलि सखि कस लसत कपोल ॥१॥
केस मुकुत सखि मरकत मनिमय होत ।
हाथ लेत पुनि मुकुता करत उदोत ॥२॥
सम सुबरन सुखमाकर सुखद् न थोर ।
सीय अंग सखि कोमल कनक कठोर ॥३॥
सिथ मुख सरद कमल जिमि किमि कहि जाय ।
निसि मलीन वह निसिदिन यह बिगसाय ॥४॥
चंपक हरवा अंग मिलि अधिक सुहाइ ।
जानि परै सिय हियरे जब कुम्हिलाइ ॥५॥
सिप तुअ अंग रंग मिलि अधिक उदोत ।
हार बेलि पहिरावौं चंपक होत ॥६॥
का चूंघट मुख मूदहु नवला नारि ।
चांद सरल पर सोहत यहि अनुहारि ॥ ७॥
गरब करहु रघुनन्दन जनि मन मांह ।
देखहु आपनि मूरति सिय के छांह ॥८॥
स्याम गौर दोउ मूरति लछिमन राम ।
इनते भड सित कीरति अति अभिराम ॥६॥
बिरह आगि उर ऊपर जब अधिकार ।
ए अंखियां दोउ बैरिनि देहिं बुताय ॥१०॥
डहकनि है उजियरिया निसि नहिं धाम ।
जगत जरत अस लागै मोहिं बिनु राम ॥ ११ ॥
[ ८८ ]
अब जीवन के है कपि आस न कोइ ।
कनगुरिया के मुंदरी कंकन होइ ॥ १२॥
जान आदि कवि तुलसी नाम प्रभाउ ।
उलटा जपत काल तें भये ऋषिराउ ॥ १३ ॥
केहि गनति महं गनती जस बन घास ।
राम जपत भये तुलसी तुलसीदास ॥ १४ ॥
नाम भरोस नाम बल नाम सनेहु ।
जनम जनम रघुनन्दन तुलसिहिं देहु ॥ १५ ॥
गीतावली
१
पौढ़िये लाल पालने हों झुलावौ ।
वाल विनोद मोद मंजुल मति किलकनिखानि खुलावौं ।
तेह अनुराग तागग्रहिवं कहुँ मति मृगनयनि बुलावौ।
"तुलसी" मनित भली भामिनि उन सो पहिराइ फुलावौं ।
चारुचरित रघुवर तेरे तेहि मिलि गाह चरन चित लावौं ।
जागिये कृपानिधान जानि राय रामचन्द्र
जननि कहै वार बार भोर भयो प्यारे।
राजिवलोचन विसास प्रीति वापिका मराल
ललित कमल बदन उपर मदन कोटि वारे।
अरुन उदित विगत सर्वरीससांक किरिन हीन
दीन दीप ज्योति मलिन दुति समूह तारे।
मनहुँ ज्ञान धन प्रकाश वीते सव भव विलास
आस त्राम तिमिर तोम तरनि तेज जारे।
वोलत खग निकर मुखर मधुर करि प्रतीत सुनहु
श्रवन प्रान सीवन धन मेरे तुम वारे।
मनहु वेद वन्दी मुनि वृन्द सूत मागधादि
विरुद बदत जय जय जय जयति कैटभारे।
सुनत बचन प्रिय रसाल जागे अतिसय दयाल
भागे जञ्जाल विपुल दुखकदम्ब हारे ।
[ ६१ ]
"तुलसिदास" अति आनन्द देख के मुखारबिन्द
छूटे भ्रम फन्द परम मन्द द्वन्द भारे।
३
जननी निरखत बाल धनुहि ।
बार बार उर नयननि लावति प्रभुजु की ललित पनहि ।।
कबहु प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सकारे।
उठहु तात बलि मातु बदन पर अनुज सखा सब द्वारे ।
कबहुँ कहत बड़वार भई ज्यों जाइ भूप पै भैया ।
बन्धु बोलि जेइये जो भावै गई नेछावरि मैया ॥
कबहुँ समुझि वन गमन राम को, रहि चकि चित्र लिखी सी।
"तुलसीदास" या समय कहेते लागति प्रीति सिखी सी।।
बैठी
सगुन
मनावति माता।
कव अइहै मेरे बाल कुशल घर कहहु काग फुरि बात ॥
दूध भात की दोनी देही सोने चोंच महौं ।
जब सिय सहित बिलोकि नयन भरि रामलखन उर लैहो ।।
अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी ।
गनक बुलाइ पाय परि पूछति प्रेम मगन मृदुबानी ॥
तेहि अवसर कोइ भरत निकट ते समाचार लै आयौ।
प्रभु आगमन सुनत "तुलसी" मानो मीन भरत जल पायौ।
---
कृष्ण गीतावली
१
मोकह झूठहि दोस लगावहि ।
मैया इनहिं बानि परि गृह की नाना युक्ति बनावहिं ।।
अन्त के लिये खेलिबो छोड्यो तऊ न उबरन पावहिं ।
भाजन फोरि बोरि कर गोरस देन उलहनों आवहिं ॥
कबहुंक बाल रोवाइ पानि गहि मिस यहि करि उठि धावहिं ।
करहिं आपु शिर धरहिं आनके बचन बिरंचि हरावहिं॥
मेरी टेव बूझ हलधर सों संतत संग खेलावहिं ।
जे अन्याय करहि काहू को ते शिशु मोहिं न भावहिं ।'
सुनि सुनि बचन चातुरी ग्वालिनि हँसि हसि बदन दुरावहिं ।
बाल गोपाल केलि कलि कीरति "तुलसिदास' मुनि गावहिं ।।
२
देसु सखी हरि बनन इन्दू पर ।
चिक्कन कुटिल अलक अवली छवि कहि न जाय शोभा अनूपवर ।।
बाल मुअंगिनि निकर मनहुँ मिलि रही घेरि रस जानि सुधाकर !
तजि न सकहिं नहिं करहिं पान कहो कारन कौन विचारडरहिं उर।।
अरुन बनज लोचन कपोल सुभ श्रुति मंडित कुंडल अति सुन्दर ।
मनहुँ सिन्धु निज सुतहि मनावन पठये युगल बसीठि बारिचर ।।
नन्द नन्दन मुख की सुन्दरता कहि न सकहिं श्रुति शेष उमावर ।
"तुलसिदास" त्रैलोक्य विमोहन रूप कपटनर त्रिविधशुलहर ॥
[ ६३ ]
३
गोपाल गोकुल वल्लभी प्रिय गोप गोसुत बल्लभं ।
चरणारविन्दमहं भजे भजनीय सुरनर दुर्लभं ।।
घनश्याम काम अनेक छवि लोकाभिराम मनोहरं।
किजल्क वसन किशोर मूरति भूरि गुन करुनाकरं ।।
सिर केकि पच्छ बिलोल कुंडल अरुन वनरुह लोचनं ।
गुञ्जावतंस विचित्र सव अंग धातु भवभय मोचनं ।।
कच कुटिल सुन्दर तिलक भ्रराका भयङ्क समाननं ।
अपहरत "तुलसीदास" त्रास बिहार वृन्दा काननं ॥
जानकी मङ्गल
(सांहर छन्द)
देखि सपुर परिवारजनक हिय हारेउ।
नृप-समाज जनु तुहिन बनज बन मारेउ ।।
कौसिक जनकहिं कहेउ देहु अनुसासन।
लखहिं भानुकुल भानु इसान-सरासन ॥
मुनिवर तुम्हरे बचन मेरु नहिं डोलहिं ।
तदपि उचित आचरन पांच भल बोलहिं ।।
बान बान जिमि गयउ गवहिं दसकन्धर ।
को अवनीतल इन सम ,बीर धुरन्धर ।।
पारबती मन सरिस अचल धनुषालक ।
हैं पुरारि तेउ एक नारि व्रत पालक ।
सो धनु कहिय विलोकन भूप किसोरहिं ।
बेध कि सिरिस सुमन कन कुलिस कठोरहिं ॥
रोम रोम छबि निदरत सोम मनोजनि ।
देखिय मूरति मलिन करिय मुनि सों जनि ।।
मुनि हँसि कहेउ जनक यह मूरति सोहइ ।
सुमिरत सकृत मोह मल सकल बिछोहइ ।।
पार्वती मङ्गल
तजे भोग जिमि रोग लोग अहिगन जनु ।
मुनि मनसहुँ ते अगम तपहिं लायो मनु ।।
[ ५ ]
सकुचहि बसन विभूषन परसत जो बपु ।
तेहि सरीर हर हेत अरंभेउ बड़ तपु॥
पूजहिं शिवहिं समय तिहुँ करहिं निमज्जन ।
देखि प्रेम व्रत नेम सराहहिं सज्जन ।।
नींद न भूख पियास सरिस निसि बासर।
नयन नीर मुख नाम पुलक तनु हिय हर ॥
कन्दमूल फल असन कबहुँ जल पवनहिं।
सूख बेल के पात खात दिन गवनहिं ।।
नाम अपरना भयेउ परन जब परिहरे।
नवल धवल कल कीरति सकल भुवन भरे ॥
देखि सराहहिं गिरिजहिं मुनिवर मुनि बहु।
अस तप सुना न दीख कबहुँ काहू कहुँ।
देखि दसा करुनाकर हर दुख पायउ।
मोर कठोर सुभाय हृदय अस आयउ॥
कवितावली
अवधेश के द्वारे सकारे गई सुत गोद कै भूपति लै निकसे ।
अवलोकि हो सोच विमोचन को ठगिसी रही जे न ठगे धिकसे।।
तुलसी मनरंजन रंजित अंजन नैन सुखं जन जानक से ।
सजनी ससि मे समसील उभै नवनील सरोरुह से बिकसे ॥
२
तनकी दुति स्याम सरोरुह लोचन कंज की मंजुलताई हरैं।
अति सुन्दर सोहत धूरि भरे छवि भूरि अनंग को दूरि धरै ।।
[६६ ]
दमकै दतियां दुति दामिनि ज्यों किलकै कल बाल विनोद करै।
अवधेस के वालक चारि सदा तुलसी मन मंदिर मे विहरै ॥
३
वरदंत की पंगति कुंद कली अधराधर पल्लव बोलन की ।
चपला चमकै घन वीच जुगै छवि मोतिन माल अमोलन की ।
घुघुरारि लटै लटकै मुख ऊपर कुडल लोल कपोलन की।
नेवछावर प्राण करें तुलसी बलि जाऊं ललाइन बोलन की ॥
४
कीर के कागर ज्यों नृप चीर विभूषन उघस अंगति पाई ।
औध तजी मग बाम के रुख ज्यों पंथ के साथ ज्यों लोग लुगाई॥
सग सुबंधु पुनीत प्रिया सनो धर्म क्रिग धरि देह सहाई ।
राजिवलोचन राम चले तजि वाप को राज वटाउ की नाई॥
५
पुर ते निकसी रघुवीर वधू धरि धीर दये मग में डगढ ।
झलकी भरि भाल कनी जल की पटु सूखि गये मधुराधर
फिर वूझति है चलनोऽव कितो पिय पर्न कुटी करहौ कितहु ।
तिय की लखि आतुरता पिय की अँखियाँ अति चारु चली जलच्चै ।
६
जलकों गये लक्खन है लरिका परखो पिय छांह परीक है ठाढ़े।
पोंछ पसेउ क्यारि करौं अरु पॉय पखारिहौ भूभुरि डाढ़े ॥
तुलसी रघुबीर प्रिया श्रम जानि के वैठि विलम्ब सों कंटक काढ़े ॥
जानकी नाह को नेह लख्यो पुलको तन वारि विलोचन वाढ़े।
[ ६७ ]
सीस जटा उर वाहु विसाल त्रिलोचन लाल तिरीछी सी भौहें ।
तून सरासन बान धरे तुलसी बन मारग मे सुठि सोहैं ॥
सादप वारहि वार सुभाय चितै तुम त्यों हमरो मन मोहैं ।
पूछति ग्रामवधू सिय सों कहो सांवरो सो सखि रावरो को है ॥
कतहुँ विटप भूधर उपारि अरि सैन बरषत ।
कतहुँ वाजि सो बाजि मर्दि गजराज करष्षत ॥
चरन चोट चटकन चकोट अरि उर सिर बज्जत ।
विकट कटक बिछरत बीर बारिद जिमि गजत ॥
लंगूर लपेटत पटकि महि जयति राम जय उच्चरत ।
तुलसीस पवननन्दन अटल जुद्ध क्रुद्ध कौतुक करत ॥
६
खेती न किसान को भिखारी को न भीख बलि
वनिक को बनिज न चाकर को चाकरी ।
जीविका विहीन लोग खिद्यमान सोच बस
कहै एक एकन सों कहाँ जाय का करी ।
वेदहुँ पुरान कही लोकहुँ विलोकियत
सांकरे समै के राम रावरे कृपा करी ।
दारिद्र दसानन दवाई दुनि दीनबन्धु
दुरित दहत देखि तुलसी हहा करी ।
हृदय राम
देखन नो पाऊँ तौ पठाऊँ जमलोक, हाथ
दुजो न लगाऊँ, वार करौं एक कर को।
मीजि मारौं उर ते उखारि भुजदंड, हाड़
तोरि डारौ बर अवलोकि रघुबर को ।।
कासों राग द्विज को, रिसात भहरात नाम,
अति थहरात गात लागत है घर को।
सीता को संताप मेटि प्रगट प्रताप कीनो,
को है वह आप चाप तोरो जिन हर को॥
२
जानकी को मुख न बिलोक्यो, ताते कुंडल
न जानत हौं, वीर पाय छुवै रघुराइ के।
हाथ जो निहारे नैन फूटियो हमारे
ताते कंकन न देखे बोल कह्यो सतमाह के॥
पायन के परिवे को जाते दास लछमन
यातें पहिचानत है भूषन जे पायँ के
विछुआ हैं एई, अरु झांझ हैं एई जुग,
नूपुर हैं तेई राम जानत जराइ के।
[ ६६ ] ३ सातों सिंधु सातों लोक, सातों रिषि हैं ससोक, सातों रवि घोरे घोरे देखे न डरात सातों दीप, सातो ईति काँ प्योई करत और सातों मत रात दिन प्रान है न गात मैं । सातों चिरजीव बरराइ उठे बार बार, सातों सुर हाय हाय होत दिन रात मैं । सात हूँ पताल काल सवद कराल, राम भेदे सात ताल, चालपरी सात सात मैं ॥ ४ एहो हनू कह्यौ श्री रघुबीर कळू सुधि है सिय की छितिमाही ? है प्रभु लंक कलंक बिना सुवसै तह रावन तह रावन बाग की छाँहीं। जीवित है है ? कहिबेई को नाथ, सु क्यों न मरी हमा हमतें विछुराही ? पंकज आवत पर पावत प्रान बसै पद में जम नाहीं ।
सूरदास
१
२
चरणकमल बंदौं हरिराई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंधै अंधे को सब कछु दरसाई ।।
बहिरो सुनै, मूक पुनि बोले, रंक चलै सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुणामय, बार बार बन्दौ तेहि पाई ।।१।।
अविगत गति कछु कहति न आवै ।
ज्यों गूंगे मीठे फल को रस अंतर्गत ही भावै ॥
परम स्वाद सबही जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन, वाणी को अगम अगोचर सो जानै जो पावै ।।
रूप रेख गुण जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब विधि अगम विचारहिं ताते सूर सगुन लीला पद गावै॥
शरण गये को को न उबारयो ।
जब जब भीर परी संतन को चक्रसुदर्शन तहां सँभारयो ।
भयो प्रसाद जो अबरीष को दुर्वासा को क्रोध निवारयो ।
ग्वालन हेतु धरयो गोबर्धन प्रगट इन्द्र को गर्ब प्रहारयो ।
कृपा करी प्रहलाद भक्त को, खंभ फारि उर नखन बिदारयो ।
नरहरि रूप धरयो करुणा करि छिनक मांहि हरनाकुश मारयो।
पाह प्रसत गज को जल बुड़त नाम लेत वाको दुख टारयो।
सूरश्याम बिनु और करै को रंग भूमि मे कंस पछोरयो ।
३
[१०१ ]
रांको कौन सुदामाहू
ते
जापै दीनानाथ ढरे।
सोइ कुलीन वड़ो सुन्दर सोइ जिनपर कृपा करे ।
राजा कौन बडो रावण ते गहि गर्व गरे॥
आपु समान करे।
रूपौ कौन अधिक सीता ते जन्म वियोग भरे।
अधिक कुरूप कौन कुविजा ते हरि पति पाय बरे ।।
जोगी कौन बड़ो शंकर ते ताको काम छ ।
कौन विरक्त अधिक नारद सों निसि दिन भ्रमत फिर।।
अधम सु कौन अजामिल हू ते यम तहं जात डरै।
सूरदास भगवंत भजन बिन फिर फिर जठर जरै ॥
५
कितक दिन हरि सुमिरन बिनु खोए ।
परनिंदा रसना के रस में अपने पर तरबोए ।
तेल लगाय कियो रुचि मर्दन, वस्त्रहिं मलि मलि धोए ।
तिलक बनाय चले स्वामी है, विषमनि के मुख जोए ।
काल वली ते सब जग कपत, ब्रह्मादिक हूँ रोए ।
सूर अधम की कहौ कौन गति उदर भरे परि सोए।
६
बंदों चरणसरोज तुम्हारे।
सुन्दर श्याम कमलदल लोचन ललित त्रिभंगी प्रानन प्यारे॥
जे पद पद्म सदाशिव के धन सिंधुसुता उर ते नहिं टारे।
जे पदपद्म परसि जलपावन सुरसरि दरस कटत अघ मारे ।।
पदपद्म परसि ऋषिपत्नी, वलि, नृग, पतित
जे
व्याध
बहु तारे।
[ १०२]
जे पदपद्म रमत वृन्दावन, अहि सिर धरि अगणित रिपु मारे।
जे पदपद्म परसि व्रजभामिनि सर्वस दै सदन विसारे ।
जे पदपद्म रमत पांडवदल दूत भए, सब काज सँवारे ।।
सूरदास तेई पदपंकज त्रिविध ताप दुख हरन हमारे ।
हृदय की कबहुं न जरनि घटि ।
बिनु गोपाल बिथा या तन की कैसे जात कटी ॥
अपनी रुचि जितही तित बँचति इन्द्रिय ग्राम गटी।
होति तहीं उठि चलति कपट लगि बाँध नयन पटी।
झूठो मन झूठी यह काया झूठी आरभटी।
अरु झूठनि के बदन निहारत मारत फिरत लटी ।।
दिन दिन हीन छीन यह काया दुख जंजाल जटी।
औ
भूख मुलानी नींद फिरत उचटी ।।
मगन भयो माथा रस लंपट समुझत नाहिं हटी।
ता पै मुड चढ़ी नाचति है मीचति नीच नटी ।।
खैचत स्वाद श्वान पातर ज्यों, चातक रटत ठटी।
सूर जलधि सींचे करुणानिधि तिज जननि मिटीं॥
चिता गइ,
अब के नाथ मोहिं उधारि।
मगन हौं भव अंबुनिधि मे कृपासिंधु मुरारि ॥
नीर अति गंभीर माया लोभ लहरति रंग।
लये जात अगाध जल मे गहे ग्राह अनंत ।।
मीन इंद्रिय अतिहि कादति, मोट अघ सिर भार ।
पग न इत उत धरन पावत उरभि मोह सिवार ।।
[ १०३
काम क्रोध समेत तृष्णा पवन अति झकझोर।
नाहिं चितवन देत तिय सुत नाम नौका ओर ।।
थक्यो वीच बिहाल विह्वल सुनो करुणामूल ।
श्याम; भुज गहि काढ़ि लीजै सूर ब्रज कूल
के
॥
६
करुणामय । तेरी गति लखि न पर।
धर्म अधर्म धर्म करि, अकरन करन करे।।
जय अरु विजय करम कह कीनो ब्रह्म सराप दिवायो।
असुर योनि ता ऊपर दीनी धर्म उछेद करायो ।
पिता वचन खडे जो पापी सो प्रहलादहि कीनो।
निकसे खंभ बीच ते नरहरि ताहि अभयपद दीनो।
दान धर्म बहु कियो भानुसुत
सो तुव विमुख कहायो।
वेदविरुद्ध मकल पांडवसुत सो तुम्हरो मन भायो ।।
यागहि करत विरोचन को सुत वेद विमल विधि कर्मा ।
सो छलि बांधि पताल पठायो कौन कृपानिधि धर्मा ॥
द्विजकुल पतित अजामिल विषयी गणिका नेह लगायो।
सुत हित नाम लियो नारायण सो वैकुंठ पठायो॥
पतिव्रता जालंधरयुवती सो पतिव्रत ते टारी।
दुष्ट पुश्चली अधम जो गणिका सुवा पढ़वत तारी।।
मुक्त हेतु योगी श्रम कीनो असुर विरोधहिं पावै ।
अविगत गतिकरुणामय तेरी सर कहा कहि गावै ।।
१०
अविगत गति जानी न पर।
मन वच अगम अगाध अगोचर केहि विवि बुधि संचरै ।।
मरै।
॥
[ १०४ ]
अति प्रचंड पौरुष बल पाये केहरि भूख
बिन अाशा विन उद्यम कीने अजगर उदर भरै
रीते भरै, भरे पुनि ढारै चाहै फेरि मरे ।
कवहुक तृण बूढ़े पानी मे कबहूं शिला तरै ॥
बांगर ते सागर करि राखै चहुँ दिसि नीर भरै
पाहन वीच कमल बिगसावै, जल में अगिनि जरै॥
राजा रंक, रंक ते राजा, लै शिर छत्र धरै
सर पतित तरि जाय तनक मे जो प्रभु नेकु ढरै ।।
११
आजु हौं एक एक करि टहिौ।
कै हमहीं कै तुमहीं माधव अपुन भरोसे लरिहौं ।
हौं तो पतित अहौ पीढिन को पतित है निस्तरिही।
अव हौं उघरि नचन चाहत हौ तुम्हें विरद बिनु करिहौ।
कत अपनी परतीत नसावत मैं पायो हरि हीरा ।
सूर पतित तवही ले उठिहै जब हँसि देहौं बीरा ।।
.
१२
प्रभु हौ सब पतितन को टीको।
और पतित सब दिवस चारि के हौं तो जन्मत ही को।।
बधिक अजामिल गणिका तारी और पूतना ही को।
मोहिं छांडि तुम और उधारे मिटै सूल क्यों जी को।
कोउ न समरथु अघ करिवे को खैचि कहत हौं लीको ।
मरियत लाज सूर पतितनि मे हमहूँ ते को नोको ।
[ १०५ ]
१३
अब मैं नाच्यों बहुत, गुपाल ।
काम क्रोध को पहिरि चोलना, कंठ विषय को माल ॥
महामोह को नूपुर वाजत, निंदा शब्द रिसाल |
भरम भयो मन भयो पखावज, चलत कुसंगत चाल ॥
तृष्णा नाट कति घट भीतर नाना विधि दै ताल ।
माया को कटि फेटा बांध्यो लोभ तिलक दियो भाल ।।
कोटिक कला काछि दिखराई, जल थल सुधि नहिं काल ।
रदाम की सवै अविद्या दूरि करो नंदलाल ||
मेरो मन अनत कहां सुख पावै ?
जैसे उडि जहाज को पंछी फिरि जहाज पै श्रावै।
कमलनैन को छोड़ि महातम और देव को ध्यावै ?
परमगग को छोड़ि पियासो दुर्मति कूप खनाबै १
जिन मधुकर अंबुजरस चाख्यो क्यों करील फल खावै १
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै १
१५
भावी काहू सो न टरै।
कहं वह राहु कहां वह रवि शशि आनि संयोग परै ॥
मुनि वसिष्ठ पंडित अति ज्ञानी रचि पचि लग्न धरै ।
तात मरन, सिय हरन, राम वन, वपु धरि विपति भरै ।।
रावण जीति कोटि तैतीसो
त्रिभुवन राज्य करै।
मृत्यु बांधि कूपै मैं राखे भावीवश सिगरे।।
[१०६]
अर्जुन के हरि हितू सारथी सोऊ बन निकरै ।
द्रु पदसुता के राजसमा दुःशासन चीर हरै ॥
हरिश्चन्द्र सों को जग दाता सो घर नीच चरै।
जो गृह छोड़ि देश बहु धावै तउ वह संग फिरै ।।
भावी के बस तीनि लोक है सुर नर देह धरै ।
सूरदास प्रभु रची सु है है को करि सोच मरै ।।
१६
जोपै हरिहि न शस्त्र गहाऊ ।
तो लाजौ गगा जननी को, संतनुसुत न कहाऊं ॥
स्यंदन खडि महारथ खडौं कपिध्वज सहित दुलाऊं ।
इती न करौं शपथ मोहिं हरि की क्षत्रिय गति हि न पाऊं।
पांडबदल सम्मुख है धाऊ सरिता रुधिर वहाऊ ।
सूरदास रणभूमि विजय विन जियत न पीठि दिखाऊं ।
वा पटपीत की फहरानि ।
कर धरि चक्र चरण को धावनि नहिं विसरति वह बानि ॥
रथ ते उतरि अवनि आतुर है कच रज की लपटानि ।
मानो सिंह शैल ते निकस्यौ महामत्त गज जानि ॥
जिन गुपाल मेरो प्रण राख्यो मेटि वेद की कानि ।
सोई सूर सहाय हमारे निक्ट भए हैं आनि ।।
१८
भगति कब करिहौ जनम सिरानो ।
बालापन मे खेलत खोयो तरुना पै गरबानो ॥
[ १०७ ]
बहुत
प्रपंच करै माया को तऊ न पेट अघानो ।
जतन जतन करि माया जोरै लै गये रंक न रानो ।
सुत वित वनिता मोह लगायो भूठ भरम भुलानो ।
लोभ मोह मे चेत्यो नाहीं सुपने ज्यों डहकानो ॥
वृद्ध भये कफ कठ निरोध्यो सिर धुनि धुनि पछितानो।
सूरदास भगवंत भजन विनु यम के हाथ बिकानो ।।
१६
भजन बिनु जीवन जैसे प्रेत ।
मलिन मंदमति डोलत घर घर उदर भरन के हेत ||
मुख कटु वचन. नित्त प्रति निंदा सगुन सुयश सुख लेत ।
कबहू पाप करै पावत धन, गांठि धूत तहं देत ।
गुरु ब्राह्मण संतनजन सज्जन जात न कबहुं निकेत ।
संवा नहिं भगवंत चरण की भवन नील को खेत ॥
कथा नहीं गुणगीत सुयश हरि साधत देव अचेत ।
ताकी कहा कहौ सुनि सूरज बूड़त कुटुंब समेत ॥
२०
जननी हौ अनुचर रघुपनि को।
मति माता करि क्रोध मरा नहिं दानव, विग मति को।
आना होय देउं कर मुंदरी कहौं मदेमो पति को ॥
मति हिय विलख करोसिय रघुवर वधिहैं कुल दैयत को।
कहो तु लंक उखारि डारि देउं जहां पिता सपति को ।।
कहौ तु मारि संहारि निसाचर रावण करौं अगति को
सागर तीर भीर बनचर की देखि कटक रघुपति को।
लै मिलवै हौं अवै सर प्रभु राम रोष उर अति को ।
-
[ १०८ ]
यशोदा हरि पालने झुलावै ।।
हलरावै दुलराय मल्हावै जोइ सोई कछु गावै ॥
मेरे लाल को अउ निदरिया काहे न पानि सुवावै।
तू काहे न वेगि सों आवै तोको कान्ह बुलावै ॥
कवहूं पलक हरि मूदि लेत है कबहूं अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन है है रहि कर करि सैन बतावै ।।
यहि अतर अकुलाइ उठे हरि यशुमति मधुरै गावै ।
जो
सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ सो नंदभामिनि पावै ।।
२२
कर पग गहि अंगूठा मुख मेलत ।
प्रभु पौढ़े पालने ।अकेले हरपि अपने रंग खेलत ॥
शिव सोचत, बिधि बुद्धि विचारत, पट बाढयो सागर जल झेलत।
बिडरि चले धन प्रलय जानिकै दिगपति दिग दन्तौ न सकेलत ॥
मुनि मन भीत भए कंपित शेप सकुचि सहसौ फन पेलत ।
उन ब्रजवासिन बात न जानि समुझे सर शकट पगु ठेलत ॥
२३
सिखवत चलन जसोदा मैया ।
अरबराय करि पानि गहावति डगमगाय धारै हरि पैया ।
कबहुंक सुन्दर बदन विलोकति उर आनंद भरि लेति बलैया ।
कबहुंक बलि की टेरि बुलावति इहि आंगन खेलौ दोउ भैया ॥
कबहुक कुल देवता मनावति चिरजीवो मेरो बाल कन्हैया ।
सरदास प्रभु सब सुखदायक अति प्रताप बालक नंदरैया ।।
[ १०६]
गोपालराय दधि मांगत औ रौटी।
माखन सहित देहि मेरि जन्नी सुपक सुमंगल मोटी ॥
क्तहौ आरि करत मेरे मोहन कत तुम आंगन लोटी ।
जौ मांगहु सो देहुं मनोहर यह बात तेरी खोटी ॥
प्रातकाल उठि देहुं कलेऊ बदन चुपरि औ चोटी ।
सूरदास को ठाकुर ठाडो हाथ लकुट लिये छोटी ॥
मैया कवहिं बढ़ेगी चोटि ।
किनी बार मोहिं दूध पित भई यह अजहूं है छोटी।
तू जो वहति बल की वेनी ज्यो है है लांबी मोटी ।
काढत गुहत न्हवावत ओंबत नागिनि मी भ्व लोटी ||
काचो दूध पिआवत पचि पचि देत न माखन रोटी ।
सर श्याम चिरजीवों दोऊ हरि हलधर की जोटी ।।
२६
कहन लगे मोहन मैया मैया।
पिता नट को वावा भापत अरु हलधर को भैया ।।
ऊंचे चढ़ि चढ़ि कहत जसोदा लै लै नाम कन्हैया ।
दृरि हूं जनि जाहु लला रे! मारैगी काहू की गैगा ।
गोपी ग्वाल करत कौतूहल घर घर नेत बधैया ।
मनि खंभत प्रतिबिंव लखत नवनीत कुवर हरि पैया ।
नद जसोदाजी के उरतें इह छवि अनत न जैया ।
सुरदाम प्रभु तुमरे दरस को चरनन की बलि गैया॥
[ ११० ]
लेहौं री मा चंद चहौंगी।
कहा करौ जलपुट भीतर को बाहर याहि गहौंगो।।
यह तो झलमलात झकझोरत- कैसे कै जु लहौंगो।
वह तो निपट निकट ही देखत वरज्यो हौ न रहौंगो ।।.
तुमरो प्रेम प्रगट मैं जान्यो बौराए न बहौंगो
सूरश्याम कह कर गहि ल्याऊ ससि तनु दाप दहौंगो।।
२७
प्रात भयो जागौ गोपाल।
नवल नवल सुदरी आयके बोलत तुमहिं सबै व्रजबाल ।।
प्रगटो भानु, मंद उडुपति भयो, फूले सुंदर तरुन तमाल ।
दरसन को ठाड़ी ब्रज बनिता ल्याई कुसुम गुन बनमाल ।।
मुखहि धोइ सुदर बलिहारी करहु कलेऊ मोहनलाल ।
सूरदास प्रभु आनंद के निधि अंबुज लोचन नयन विशाल ।
२६
खेलत अब मेरी जात बलैया ।
जबहिं मोहिं देखत लरिकन संग तबहिं खिझत बल भैया ।।
मोसों कहत ,तात वसुदेव को देवकि तेरी मैया ।
मोल लियो कछु दे वसुदेव को करि करि जतन वटैया ॥
अव बावा कहि कहत नंद सों जसुमति को कहै मैया।
ऐसे ही कह मोहि खिझावत तव उठि चलों खिसया ।।
पाछे नंद सुनत हैं ठाढ़े हसत हसत उर लैया ।
सूर नंद बलराम हिं धिरयो सुनि मन हरष कन्हैया ।।
[१११]
३०
मैयारी मोहिं माखन भावै।
जो मेवा पकवान मिठाई मोहिं नहिं रुचि आवै ।।
ब्रज जुवती इक पाछे ठाढ़ी सुनति श्याम की बात ।
मन मन कहति कबहुं मेरे घर देखौं माखन खात ।।
वैठे जाय मथनियां के ढिग मैं तब रही छिपानी।
सूरदास प्रभु अंतरजामी ग्वालि मनहिं की जानी ॥
३१
सखा सहित गये माखन चोरी।
देख्यो श्याम गवाच्छ पथ कै गोपी एक मथत दधि भोरी ॥
हेम मथानी धरी माट तें माखन हो उतरात ।
आपुन गई कमोरी मांगन हरि पाई तब घात ||
पैठे सखन सहित घर सूने माखन दधि सब खायो।
छूछी छोडि मटुकिया दधि की हंसि तव वाहिर आयो ।
प्राय गई कर लिये मटुकिया घर ते निकरे ग्वाल ।
माखन कर, दधि मुख लपटानो देखि रही नंदलाल ||
यह आये ब्रजवालक संग ले माखन मुख लपटानो ।
खेलत तें उठि भजे सखा घर आइ ससंक छपानी।
भुज गहि लियो कान्ह इक वालक निकरे व्रज की खोरि ।
सूरदास ठगि रहि ग्वालिनी मनु हरि लियो अंजोरि ।।
३२
ब्रज घर घर प्रगटी यह गत ।
दधि माखन चोरी के ले हरि ग्वाल सखा संग खात |
ब्रजवनिता यह सुनि मन हरषीं सदन हमारे आवें।
[ ११२]
माखन खात अचानक पार्दै भुज भरि उरहि लगावै ।।
मन ही मन अभिलाष करत सब हृदय करत यह ध्यान ।
सूरदास प्रभु को घर तें लै देहों माखन खान ।।
३३
तेरे लाल मेरो माखन खायो।
दुपहर दिवस नानि घर सूनो दूढ़ि ढंढोरि आप ही आयो॥
खोलि किंवार सून मन्दिर मे दूध दही सब सखन खवायो।
सीके काढ़ि खाट चढ़ि मोहन कछु खायो कछु लै ढरकायो॥
दिन प्रति हानि होत गोरस की यह ढोटा कौने ढंग लायो।
सूरदास कहती ब्रजनारी पूत अनोखो जसुमति जायो।
जसोदा ऊखल बांधे स्याम ।
मनमोहन बाहिर ही छोड़े आपु गई गृहकाम ।।
दहयो मथति मुख
कछु बकुरति गारी दै दै नाम ।
घर घर डोलत माखन चोरत षटरस मेरे धाम।
ते
३५
जसुमति केहि यह सीख दई।
सुतहिं बांधि तू मथति मथानी ऐमी निठुर भई ।।
हरै बोल जुबतिन को लीनों सुन सब तरुनि नई ।
लरिकहि त्रास दिखावत रहिये कत मुरझाय गई ॥
मेरे प्रान जीवनधन माधव वांधे बेर भई।
सूरश्याम को त्रास दिखावत तुम कह कहत गई ।
[ ११३ ]
३६
चरावत वृन्दावन हरि धेनु।
ग्वाल सखा सव संग लगाए खेलत है करि चेनु ।।
कोउ गावत कोउ मुरलि बजावत कोउ विषान कोउ बेनु ।
कोउ निर्तत कोउ उघटि तार दै जुरि ब्रजवालक सेतु ॥
त्रिविधि पवन जहं वहत दिवस निसि सुभग कुज घन एन ।
सूरश्याम निज धाम बिसारत आवत यह सुख लेनु ।
३७
मेरे नैन निरखि सुख पावत ।
संध्या समै गोप गोधन संग बन ते बने लाल ब्रज आवत ।।
बलि वलि जाउ मुखारविंद की मन्द मन्द सुन्दर गति धावत ।
नटवर रूप अनूप छचीलो सब ही के मन भावत ॥
गुजा उर बनमाल मुकुट सिर वेनु रसाल वजावत |
कोटि किरन मनि मुख परकासत, उडुपति कोटि लजावत ॥
चन्दन खौरि काछती को छबि सबके मनहिं चुरावत ।
सूरश्याम नागर नारिन को वासर बिरह बसावत ॥
आजुबने बन तें व्रज आवत ।
नाना रंग सुमन की माला नंदनंदन उर पर छवि पावत ॥
संग गोप गोधन संग लीने नाना गति कौतुक उपजावत ।
कोउ गावत कोउ नृत्य करत, कोउ उघटत, कोउ ताल बजावत ।
रांमत गाइ बच्छ हित सुधि करि प्रेम उमंगि थन दूध चुवावत ।
जसुमति बोलि उठी हरपत है "कान्हों धेनु चराये आवत।।
[ ११४ ]
इतनी कहत आय गए मोहन जननी दौरि हिये ले लावत ।
सूरश्याम के कृत जसुमति सों ग्वाल बाल कहि प्रगट सुनावत ॥
३६
मैया बहुत वरो वलदाऊ।
कहन लगे बन बड़ो तमासो सव मोंड़ा मिलि आऊ ॥
मोहूँ को चुचकारि गए लै जहां सघन वन भाऊ ।
भागि चले कहि गयो वहां तें काटि खाइ है हाऊ ॥
हो हूं डरप्यो कापि पुकारयो कोउ नहिं धीर धराऊ।
थरसल गयो न भागि सकौं वै भागे नात अगाऊ ॥
मोसों कहत मोल को लीनो आपु कहावत साऊ।
सूरदास बल बड़े चबाई तैसे मिले सखाऊ ॥
४०
तुम्हरो कहा
बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहं ब्रज खोरी ॥
काहे को हम व्रज तन श्रावति खेलति रहति आपनी पोरी।
सवनन सुनंति रहति नंदढोटा करतरहत माखन दधि चोरी ॥
चोरि
हम
लै है खेलन चलौ संग मिल जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि वातन भुरइ राधिका भोरी ॥
४१
खेलन के मिस कुवरि राधिका नंदमहर के आई हो।
सकुच सहित मधुरे करि बोली “घर हो कुंवर कन्हाई हो"॥
सुनत स्याम कोकिल सम बानी निकसे अति अतुराई हो।
माता सों कछु करत कलह हरि सो' डारयो बिसराई हो ।
[ ११५ ]
'मैया री तू इनको चीन्हति' वारंवार वताई हो।
'जमुना तीर काल्हि मैं भूल्यौ बांह पकरि लै आई हो ।
भावनि यहां तोहि सकुचति है, मैं दै सौह बुलाई हो।
सूर स्याम ऐसे गुन आगर नागरि बहुत रिझाई हो ।
४२
जसुमति राधा कुचरि संवारति ॥
बड़े वार सीवंव मीस के प्रेम सहित लै लै निरवारित ।।
मांग पारि वेनीहि संवारति गूथी सुन्दर भांति ।
गोरे माल विंद वदन मनु इंदु प्रात रवि कांति ॥
सारी चीर नई फरिया ने अपने हाथ बनाई।
अंचल सों मुख पॉछि अंग सब आपुहि लै पहिराई ।।
तिल चांवरी बतासे मेवा दियो कुवरि के गोद।
सूरश्याम राधा तन चितवत जसुमति मन मन मोद ।।
४३
कन्हैया निरतत फन पर ऐसे ।
मनो गिरिवर पर वादल देखत मोर अनंदित जैसे ॥
डोलत मुकुट मीस पर हरि के कुडल मंडित गंड ।
पीत वमन दामिनि तनु घन पर ता पर सुर कोदंड ॥
उरगनारि आगे सब ठाढ़ीं मुख मुख सुस्तुति गाई ।
सर स्याम अपराध छमहू अब हम माग्यो पति पावै॥
४४
अवकै राखि लेउ गोपाल ।
दसहुँ दिसा ते दुसह दवागिनि उपजी है यहि काल ||
[ ११६ ]
पटकत वांस, कास कुस चटकत, लटकत ताल तमाल ।
उचटत अति अंगार, फुटत फर, झपटत लपट कराल ।।
धूम धूधि बाढ़ी धर अंबर, चमकत विच विच ज्वाल ।
हरिन, बराह, मोर, चातक, पिक, जरत जीव वेहाल ॥
जानि जिय डरहु नयन मूंदहु सबे, हंसि बोले गोपाल ।
सुर अनल सव वदन समानी अभय करे ब्रजबाल ॥
सखी री ! सुंदरता को रंग।
छिन छिन बांह परति छवि और कमलनयन के अंग ।।
परिमित करि राख्यो चाहति है तुम लगि डोलत संग।
चलत निमेष विसेष जानियत भूलि भई मति भंग ॥
स्याम सुभग के ऊपर वारौं, आली ! कोटि अनंग ।
सूरदास कछु कहत न आवै गिरा भई गति पंग ।।
४६
हरि मुख निरखत नैन भुलाने।
ये मधुकर रुचि पंकज लोभी ताहि ते न उड़ाने ।।
कुडल मकर कपोलन के ढिग जनु रवि रैनि बिहाने ।
ध्रुव सुंदर नैननि गति निरखत खंजन मीन लजाने ।
अरुन अधर, द्विज कोटि वज्रदुति ससिगन रूप समाने ।
कुचित अलक सिलीमुख मानो लै मकरंद निदाने ।।
तिलक ललाट कंठ मुकुतावलि भूषणमय मनि साने ।
सूरदास स्वामी अंग नागर ते गुन जात न जाने ।
[ ११७ ]
नैन न मेरे हाथ रहे।
देखत दरम स्यामसुदर को जल की दरनि बहे ।।
वह नीचे को धावत आतुर ऐसेहि नैन भये ।
वह तो जाइ ममात उदधि में, ये प्रति अंग रमे ।
वह अगाध कहुँ वार न पार न, येउ सोभा नहिं पार।
लोचन मिले त्रिवेणी है कै सूर समुद्र अपार ॥
४८
नैन भए वेहित के काग।
उड़ि उडि जात पार नहिं पावै फिरि श्रावत नहि लाग॥
ऐसी दशा भई री इनकी अब लागे पछिनान ।
मो वरजत वरजत उठि धाए नहिं पायो अनुमान ॥
वह ममुद्र ओछे चासन ये, धरे कहा सुखरासि ।
सुनहु सूर ये चतुर कहावत, वह छवि महा प्रकासि ॥
४६
यशोदा चार बार यों भाप ।
है कोई वन हितू हमारी चलत गोपालहिं राखै ।।
कहा काज मेरे छगन मगन को नृप मधुपुरी बुलायौ
सुफलक सुत्त मेरे प्राण हनन को काल रूप है आयौ ।।
वरु ये गोधन हरो कस सब मोहि वदी ले मेलौ।
इतने ही सुख कमल नयन मेरी अखियन आगे खेलौ ।
वासर बदन विलोकत जीवों निसि निज अंक में लाओं।
तेहि बिछुरत जो जीवों कर्मवश तो हंसि काहि बुलाओं ।।
[ ११८ ]
कमल नयन गुण टेरत टेरत अधर बदन कुम्हिलानी।
"सूर" कहा लगि प्रकट जनाऊँ दुखित नन्दजू की रानी॥
अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी।
देख्यो चाहत कमल नैन को निसिदिन रहत उदासी॥
आये ऊधो फिरि गये आंगन डारि गये गर फांसी।
केसरि को तिलक मोतिन की माला बृन्दावन को वासी॥
काहू के मन की कोऊ न जानत लोगन के मन हांसी।
सूरदास प्रभु तुमरे दरस को जाइ करवट त्यों कासी॥
ऊधो मोहिं व्रज बिसरत नाहीं।
बृन्दावन गोकुल तन आवत सघन तृणन की छहीं।
प्रात समय माता यसुमति अस नन्द देख सुख पावत ।
माखन रोटी दहयो सजायो अति हित साथ खवावत।।
गोपी ग्वाल बाल संग खेलत सब दिन हंसत खिरात ।
"सूरदास" धनि धनि व्रजवासी जिन सों हंसत ब्रजनाथ।।
५२
नैना भये अनाथ हमारे।
मदन गोपाल वहां ते सजनी सुनियत दूरि सिधारे।।
वे जल सर हम मीन बापुरी कैसे जिवहिं नियारे।
हम चातक चकोर श्यामघन बदन सुधानिधि प्यारे॥
मधुवन बसत आस दरसन की जोई नैन मग हारे।
"सूर" श्याम करी पिय ऐसी मृतकहु ते पुनि मारे ॥
[ ११६ ]
५३
प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो।
समदरमी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो ॥
इक नदिया इक नार कहावत मैलोहि नीर भरो।
जब दोनों मिल एक वरन भये सुरसरि नाम परो ।।
इक लोहा पूजा में राखत इक घर वधिक परो ।
पारस गुन अवगुन नहिं चितवै कंचन करत खरो ।।
यह माया भ्रम जाल कहावै "सूरदास" सगरो ।
अबकी बार मोहि पार उतारो नहिं प्रन जात टरो।।
-
नंददास
रूप मंजरी से
प्रथमहिं प्रनऊ प्रेममय परम जोति जो आहि ।
रूप उपावन ? रूप निधि, नित्य कहत कवि ताहि ।
परम प्रेम पद्धति इक आहीं, 'नंद' जथामति बरनत ताहीं।
जाके सुनत मन सरसै, सरस होइ रस बालुहि परसै ।
रस परसे बिन तत्व न जाने, अलि बिन कमलहि को पहिचान ।
पुनि प्रनऊं परमातम जोई, घट घट बिघट पूरि रह्यौ सोई।
ज्यों जलभरि बहुभाजन माहीं, इंदु एक सबही मैं छाहीं।
जु कछु मानसर ससि की झांई, सो न छुद्र छिल्लर छबि पाई।
तरनि किरन सब पाहन परसै, फटिक माझ निज तेजहि दरसे ।
स्वाति वू'द अहि मुख बिख होई, कदली दल कपूर होइ सोई ।
जुवन रूप संग सोभा पावें, सो कुरूप ढिग बदन दुरावै ।
एकै पट अनेक रंग गहै, सुरंग रंग सँग अति छबि लहै।
पुनि जस पवन एक रस आही, वस्तु के मिलत भेद भयौ ताही।
रविकर परसि अग्नि जिहिं होई, सो दरपन जग बिरलौ कोई ।
जगमग जगमग करहि नग, जो जराइ सँग होइ।
कांच किरन कंचन खचे, भलौ न कहियै कोइ ।
भ्रमर गीत से
वे तुम तें नहिं दूरि, ग्यान की आँखिन देखौ ।
अखिल बिस्व भरपूरि, ब्रह्म सब रूप विसेखौ ॥
[ १२१ ]
लौह दारू पापान मैं जल-थल माहिं अकास ।
सचर अचर चरतत सबै, जोति ब्रह्म परकास ॥
सुनौ व्रजवासिनी॥
कौन ब्रह्म की जोति ग्यान का सौं कहौ ऊधौ ?
हमरे सुन्दर श्याम, प्रेम को मारग सूधौ ।
नैन, वैन, अति, नासिका, मोहन-रूप दिखाइ ।
सुधि बुधि सर मुरली हरी, प्रेम ठगौरी लाइ ।।
सखा सुनि स्याम के॥
यह सब सगुन उपाधि, रूप निर्गुण है उन को ।
निरविकार निर्लेप, लगत नहिं तीनों गुन
को॥
हाथ न पॉर, न नासिका, नैन, वैन, नहिं कान |
अच्युत-ज्योति प्रकास है, सकल विस्व को प्रान ।।
सुनौ व्रजवासिनी ॥
जौ मुख नाहिं न हुतो, कहौ किन माखन खायौ ?
पाइन बिन गो संग, कहौ को वन बन धायौ।
ऑखिन मे अंजन दियौ, गोवर्धन लियौ हाथ ।
नंद जसोदा पूत है, कुँवर कान्ह व्रजनाथ ।।
सखा सुनि स्याम के ।।
जाहि कहो तुम कान्ह, ताहि कोउ पिता न माता ।
अखिल अंड ब्रह्मड, विस्व उन्हीं
विस्व उन्हीं तें जाता ॥
लीला-गुन अवतारि कै धरि आये तन स्याम ।
जोग-जुगति ही पाइयै, परब्रह्म-पुर धाम ।।
सुनौ ब्रजवासिनी॥
[ १२२ ]
ताहि बतावहु जोग, जोग ऊधौ जेहि पावौ।
प्रेम सहित हम पास, नंद-नंदन-गुन गावौ ।।
नैन, वैन, मन, प्रान मै मोहन-गुन भरपूरि ।
प्रेम पियूषै छॉड़ि के, कौन समेट धूरि ।।
सखा सुनि स्याम के ।।
धूरि बुरी जौ होड, ईस क्यों सीस चढ़ावै ।
धूरि-क्षेत्र मे आइ, कर्म करि हरि पद पावै ।।
धूरिहि तै यह तन भयो, धूरिहि ते ब्रह्मड ।
लोक चतुर्दस धूरि तैं सप्त दीप नव खंड ।।
सुनौ ब्रजवासिनी ॥
कर्म धर्म की बात, कर्म अधिकारी जानें ।
कर्म-धूरि को श्रानि, प्रेम अमृत मैं सानैं ।
तवहीं लौं सब कर्म है, जब लौ हरि उर नाहिं ।
कर्म वध सब विश्व के, जीव बिमुख है जाहि ।।
सखा सुनि स्याम के॥
कर्महिं निदौ कहा, कर्म तै सद्गति होई ।
कर्म रूप से बली, नाहिं त्रिभुवन मैं कोई ॥
कर्महि तै उत्पत्ति है, कर्महि ते नास ।
कर्म किये से मुक्ति है परब्रह्म-पुर बास ।।
सुनौ ब्रजवासिनी ॥
कर्म पाप अरु पुन्य, लौह सोने की बेरी |
पाइन बंधन
दोउ, कोउ मानौ बहुतेरी॥
ते
[ १२३ ]
ऊँच कर्म ते स्वर्ग है नीच कर्म ते भोग ।
प्रेम विना सव पचि मरे विषय-वासना रोग ।।
सखा सुनि स्याम के॥
कर्म बुरे जौ हौहि, जोग काहे कोउ धारै ।
पद्मासन सत्र द्वार रोकि, इन्द्रिन को मारै ।।
ब्रह्म-अग्नि जरि सुद्ध है सिद्धि समाधि लगाइ ।
लीन होइ सायुज्य मैं जोतिहि जोति समाइ ॥
सुनौ व्रजवासिनी॥
जोगी जोतिहि भनें, भक्त निज रूपहि जाने ।
प्रेम पियूषै प्रगट, श्याम सुन्दर उर आने ।।
निर्गुन गुन जो पाइयै, लोग कहै यह नाहिं ।
घर आयौ नाग न पूजहीं बॉबी पूजन जाहिं ।।
सखा सुनि स्याम के॥
मीराबाई
मन रे परसि हरि के चरण ।
सुभग सीतल कँवल कोमल, त्रिविध ज्वाला हरण ।
जिण चरण प्रहलाद परसे, इंद्र पदवी धरण।
जिण चरण ध्रुव अटल कोने राखि अपनी सरण ।
जिण चरण ब्रह्मांड मेटयो नखसिखां सिरी धरण ।
जिण चरण प्रभु परसि लीने, तरी गौतम "घरण ।
जिण चरण काली नाग नाथ्यो गोपलीला करण ।
जिण चरण गोबरधन धारयो, इंद्र का अव हरण ।
दासी मीराँ लाल गिरधर, आगम तारण तरण ।।
२
बसो मोरे नैनन में नंदलाल ।
मोहनी मूरति सॉवरी सूरति, नैणा बने बिसाल ।
अधर सुधारस मुरली राजति, उर बैजंती माल ।
छुद्र घंटिका कटि तट सोभित नूपुर सबद रसाल!
मीरा प्रभु सतन सुखदाई, भक्त बछल गोपाल ।
३
हरि मोरे जीवन प्रान अधार ।
और आसरो नाहीं तुम बिन, तीनू लोक मंझार ।
आप बिना मोहि कछु न सुहावै, निरख्यौ सब संसार ।
मीराँ कहै मैं दास रावरी, दीज्यौ मती बिसार ।
[ १२५ ]
४
आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी।
चित्त चढ़ी मेरे माधुरी भूरत, उर विच आन अड़ी।
भव की ठाढ़ी पंथ निहारू, अपने भवन खड़ी।
कैसे प्राण पिया विन राखू, जीवन मूर जड़ी।
मीरॉ गिरधर हाथ विकानी, लोग कहै विगड़ी।
श्री गिरधर आगे नाचूंगी।
नाचि नाचि पिव रसिक रिझाऊँ, प्रेमीजन । जाँचूंगी।
प्रेम प्रीति की वॉधि चूंघरू, सुरत की कछनी कालूंगी।
लोक लाज कुल की मरजादा, यामे एक न राखू गी।
पिच के पलंग जा पौडेंगी, मीरॉ हरि रग राचूंगी।
६
मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई ।
जा के सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।
छाडि दई कुल ही कानि, कहा करिहै कोई ।
मंतन ढिंग वैठि वैठि, लोक लाज खोई ।
असुवन जल सीचि सीचि, प्रेम बेलि बोई ।
अब तो वेल फैल गई, आणेद फल होई ।
भगति देख राजी हुई, जगति देख रोई ।
दासी मीरॉ लाल गिरधर, तारो अब मोहीं।
-
मैं तो मॉवरे के रंग राची।
साजि सिंगार वॉधि पग घुघरू, लोकलाज तजि नाची।
[ १२६ ]
गई कुमति लई साधु की संगति, भगत रूप भई साँची।
गाय गाय हरि के गुन निसदिन, काल व्याल V वॉची।
उण विन सब जग खारो लागत, और वात सव कॉची।
मीरों श्री गिरधरलाल सू, भगति रसीली जाँची ।
मैं तो गिरधर के घर जाऊँ।
गिरधर म्हारो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ।
रैण पड़े तवही उठि जाऊँ, भोर गये उठि आऊँ।
रैण दिना वाके संगि खेलू, ज्यों ज्यों वाहि रिमाऊँ ।।
जो पहिरावै सोई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ ।
मेरी उणकी प्रीति पुराणी, उण विण पल न रहाऊँ ।।
जहाँ बैठावै तितही बैटू, बेचै तो बिक जाऊँ।
मीरॉ के प्रभु गिरधर नागर, बार बार बलि जाऊँ।
६
माई री मैं तो लीयो गोविन्दो मोल ।
कोई कहै छाने कोई कहै चौड़े, लियोरी बजंता ढोल ।
कोई कहै मुँहधो कोई कहै सुहधो, लियोरी तराजू तोल ।
जाही । सब लोग जाणत है, लियोरी आँखी खोल ।
मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीज्यौ, पूरब जनम को कोल ।
१०
पग घुघरू बाँध मीरॉ नाची रे।
मैं तो मेरे नारायण की, आपहि होगई दासी, रे।
लोग कहैं मीरा भई बावरी, न्यात कहै कुलनासी, रे।
[ १२७ ]
विप का प्याला गणा ने भेजा, पीवत मीरा हॉसी रे।
मीरों के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी रे।
११
हरि तुम हरो जन की भीर।
द्रोपता की लाज राखी, तुरत वाढ्यौ चीर ।
भक्त कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर ।
हिरणाकुश मारि लीन्हौ, धर्यो नाहिन धीर ।
वृड़तो गजराज राख्यो, कियौ बाहर नीर ।
दासी मीरॉ लाल गिरधर, चरण कॅवल पै सीर।
१२
हेरी मैं तो दरद दिवानी होइ, दरद न जाणे मेरो कोइ ।
घाइल की गति घाइल जाणे, की जिण लाई होइ ।
जौहरी की गति जौहरी जाणे, की जिन जौहर होइ ।
सूली ऊपरि सेज हमारी, सोवण किस विध होइ ।
गगन मंडल पै सेज पिया की, किस विध मिलणा होइ ।
दरद की मारी वन वन डोलू, बैद मिल्या नहिं कोई ।
मीरों की प्रभु पीर मिटेगी, जव वैद साँवलिया होइ ।
१३
वादल देख डरी हो स्याम मैं वादल देख डरी।
काली पीली घटा ऊभरी बरस्यो एक घरी ।
जित जाऊँ तित पाणी पाणी हुई हुई भोम हरी ।
जाका पिय परदेस बसत है, भी वहार खरी।
मीरॉ के प्रभु हरी अविनासी, कीज्यो प्रीति खरी।
[ १२८ ]
१४
सखी मेरी नींद नसानी हो।
पिय को पंथ निहारत, सिगरी रैण बिहानी हो।
सब सखियन मिलि सीख दई, मन एक न मानी हो।
बिनि देख्याँ कल नाहिं पड़त, जिय ऐसी ठानी हो।
अंगि अंगि व्याकुल भई, मुखि पिय पिय बानी हो ।
अन्तर वेदन विरह थी, वह पीड़ न जानी हो।
ज्यूँ चातक धन । रटै, मछरी जिमि पानी हो ।
मीराँ व्याकुल विरहणी, सुध बुध बिसरानी हो ।
१५
म्हारो जनम मरन को साथी थाँने नहिं बिसरू दिनराती।
तुम देख्याँ बिन कल न पड़त है, जानत मेरी छाती।
ऊँची चढ़ चढ़ पंथ निहारू, रोय रोय अखियाँ राती।
यो संसार सकल जग झूठो झूठा कुलरा न्याती।
दोउ कर जोड़याँ अरज करत हूँ, सुण लीज्यो मेरी बाती।
यो मन मेरो बड़ो हरायो, ज्यूँ मद माती हाथी ।
सतगुरु हाथ धरयो सिर ऊपर अंकुस दे समझाती।
पल पल तेरा रूप निहारूँ, निरख निरख सुख पाती।
मीरों के प्रभु गिरधर नागर, हरि चरणां चित राती ।
१६
मोहि लागी लगन गुरु चरनन की।
चरन बिना कछुवै नहिं भाव, जगमाया सबसपनन की।
भवसागर सब सूख गयो है, फिकर नहीं मोहिं तरनन की।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, आस वही गुरु सरनन की।
[ १२६ ]
कोइ कहियो रे प्रभु श्रावन की।
आवन की मन भावन की।
आप न आवै लिख नहि भेजे, वाण पड़ी ललचावन की।
पदोइ नैण कयो नहिं माने, नदिया वहै जैसे सावन की।
कहा कह कछु नहि वस मेरो, पॉख नहीं उड़जावन की।
मीरा कहै प्रभु कवरे मिलोगे, चेरी भइ हूं तेरे दॉवन की।
मुनी हो मैं हरि आवन की आवाज ।
म्हैल चढ़े चड़ि जोऊँ मेरी सजनी, कव आवै महाराज ।
दादर मोर पपइया बोले,
कोइल मधुरे साज।
उमॅग्यो इन्द्र चहुं दिमि वरसै, दामणि छोड़ी लाज ।
धरती रूप नवा नवा धरिया, इन्द्र मिलण के कान ।
मीरा के प्रभु हरी अविनासी वेग मिलो महाराज !
१६
मने चार गग्यो जी, मने चाकर राखो जी।
चाफर रहसू बाग लगा , नित उठ दरसण पासू।
वृन्दावन की कुंज गलिन में, तेरी लीला गास।
चाकरी में दरमरण पाऊँ, सुमिरण पाऊँ खरची।
भाव भगति जागीरी पाऊँ, तीनों वातॉ सरसी।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहैं, गल वैजन्ती माला।
वृन्दावन में धेनु चरावे,
मोहन मुरली वाला।
हरे हरे नित बन्न बनाऊँ, विच विच राखू क्यारी।
[ १३० ]
सांवरिया के दरसण पाऊँ, पहर कुसुम्भी सारी।
जोगी आया जोग करण कू तप करणे सन्यासी।
हरी भजन कू साधू आया, वृन्दावन के बासी।
मीरा के प्रभु गहिर गंभीरा, सदा रहो जी धीरा।
आधी रात प्रभु दरसण दै है, प्रेम नदी के तीरा ।
२०
मैंने राम रतन धन पायो।
वसत अमोलक दी मेरे सतगुर, करि किरपा अपणायो।
जनम जनम की पूंजी पाई जग में सवै खोवायौ।
खरचे नहिं कोई चोर न लेवे, दिन दिन बधत सवायौ ।
सत की नाव खेवटिया सतगुर भवसागर तरि आयो ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर हरखि हरखि जस गायौ ।
रसखान दोहे प्रेम प्रेम सब को उ कहत, प्रेम न जानत कोय । जो जन जाने प्रेम तो मर जगत क्यों रोय ॥शा प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान । जो पावत यहि ढिग बहुरि, जात नाहिं रसखान ॥२॥ प्रेम बामनी वानिके, बस्न भये जलधीस । प्रेमहि ते विपपान करि, पूजे जात गिरीस ॥३॥ दम्पति मुख अरु विषय रस, पूजा निष्ठा ध्यान । इनते परे वखानिये शुद्ध प्रेम रसखान ॥४॥ मित्र कलत्र सुबन्धु सुत, इनमें सहज सनेह । शुद्ध प्रेम इनमें नहीं, अकथ कथा सबिसेह ||५|| इक अंगी विनु कारनहिं, इक रस सदा समान । गर्ने नियहि मरवस्व जो सोई प्रेम प्रधान ॥६॥ ढरै मदा चाहै न कछु, सहै सवै जो होय । रहै एक रस चाहिके, प्रेम वखानो सोय ॥७॥ सवये १ मानुप हो तो वही रसखान चमों संग गोकुल गांव के ग्वारन ।
[ १३२ ]
जौ पसु हौं तो कहा बसु मेरो
चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन ।
पाहन हौं तो वही गिरि को
जो कियो ब्रज छत्र पुरन्दर कारन ।
जो खग हौं तो बसेरो करौ वही
कालिंदी कूल कदम्ब की डारन ।
२
या लकुटी कामरिया
पर राज तिहूं पुर को तजि डारौं ।
आठहु सिद्धि नवौ निधि के
सुख नन्द की गाय चराय बिसारौं ।
नैनन सों रसखान जब
ब्रज के बन बाग तडाग निहारौं।
केतिक कलधौत के धाम
करील के कुजन ऊपर बारौं ।
३
मोर पंखा सिर ऊपर राखिही
गुज की माल गरे पहिरोगी।
ओढ़ि पितांबर लै लकुटी बन
गोधन ग्वालन संग फिरौंगी।
भाव तो सोई मेरो रसखान
सो तेरे कहे सब स्वांग करौंगी ।।
मुरली मुरलीधर की
अधरा न-धरी अधरा न धरौंगी ।।
या
[ १३३ ]
४
सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावें।
जाहि अनादि अनन्त अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावै॥
नारद से सुक व्यास रहै पचिहारै तऊ पुनि पार न पावें।
ताहि अहीरकी छोहरियॉछछियाभर छाछ पैनाच नचावै॥
कवित्त
कहा रसखान सुख
सम्पति
सुभार कहा,
कहा तन जोगी है लगाये तन छार को।
कहा साधे पंचानल कहा सोये बीच तल,
कहा जीति लाये राजसिन्धु भारपार को।
जप बार बार तप संयम . बयार-व्रत
तीरथ हजार अरे बूझत लबार को।
कीन्हों नहीं प्यार नहीं सेयो दरबार चित
चाह्यो न निहार जो पै नन्द के कुमार को।
२
आई खेलि होरी व्रज गोरी वा किशोरी संग,
अंग अंग रंगनि अनंग सरसाइगो।
कुंकुम की मार वापै रंगनि उछार उड़े,
हुक्का ओ गुलाल लाल लाल तरसाइगो।
छोड़े पिचकारिन धमारिन वियोग छोड़े,
तोड़े हियहार धारि रंग बरसाइगो।
रसिक सलोनो रिझवार रसखान आज,
फागुन के औगुन अनेक दरसाइगो ॥
नरोत्तमदास
सुदामा-चरित
१
लोचन कमल दुख मोचन तिलक भाल,
स्रवननि कुण्डल मुकुट धरे माथ हैं।
ओढ़े पीत बसन गरे में बैजयन्ती माल,
सङ्घ चक्र गदा और पद्म लिये हाथ हैं।
कहत नरोत्तम संदीपन गुरु पास,
तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं।
द्वारिका के गये हरि दारिद हरेंगे पिय,
द्वारिका के नाथ वे अनाथन के नाथ हैं ।।
के
-
२
कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट,
न चाहति हो दधि दूध मठौती।
सीत वितीतत जौ सिसियात,
तौ हौं हठती पै तुम्हें न हठौती ॥
जो जनती न हितू हरि सों तौ मैं,
काहे को द्वारिका पेलि पठौती ॥
या घर तें कबहूँ न गयो पिय,
टूटो तवा अरु फूटी • कठौती ॥
[ १३५ ]
३
तैं तो कही नीकी सुनि बात हित हो की,
रीति मित्रई की नित प्रीति सरसाइए ।
मित्र के मिले तें चित्त चाहिए परसपर,
मित्र के जो जेइए तो आपहूँ जेंवाइए ।
वै महाराज जोरि बैठत समाज भूप,
तहाँ यहि रूप जाइ कहा सकुचाइए ।
सुख दुख करि दिन काटे ही बनेंगे भूलि-
विपति परेप द्वार मित्र के न जाइए ।
४
सीस पगा न झगा तन में प्रभु!
जाने को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोती फटी सिजटी
दुपटी,
अरु पाय उपानह की नहिं सामा ।।
द्वार खड़े
द्विज दुर्वल देखि,
रह्यो चकि सो बसुधा अभिरामा।
पूछत दीन दयाल को
वतावत आपनो नाम सुदामा ॥
धाम,
५
ऐसे
वेहाल बिवाइन सों,
पग कंटक जाल लगे पुनि जोए।
हाय महा दुख पायौ सखा !
तुम आये इते न कितै दिन खोए ।
देखि सुदामा की दीन दसा,
[ १३६ ]
करना करि के करुनानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छयौ नहिं,
नैनन के जल सों पग धोए॥
६
के वह
कह कैंचन
हुती
वह टूटी सी छानी हुती,
सब धाम सुहावत।
के पग में पनही न
कहँ ले गजराजहु ठाढ़ महावत ॥
भूमि कठोर
कट,
कह कोमल सेज पै नींद न आवत ।
नहिं कोदों सवाँ,
प्रभु के परताप ते दाख न भावत ॥
रात
다.
कै जुरतो
गंग
कवित्त
१
नवल नवाब खानखाना जू तिहारी त्रास,
भागे वेसपती धुनि सुनत निसान की।
गङ्ग कहै तिनहूँ की रानी राजधानी छॉड़ि,
फिरै बिललानी सुधी भूली खानपान की।
तेक मिलि करिन हरिन मृग बानरन,
तिनहुँ की भली भई रच्छा तहाँ प्रान की।
सची जानी करिन भवानी जानी केहरिन,
मृगन कलानिधि कपिन जानी जानकी।
२
प्रबल प्रचण्ड बली बैरम के खानखाना,
तेरी धाक दीपन दिसान दह दहकी।
कहै कवि गङ्ग तहां भारी सूर वीरन के,
उमड़ि अखण्ड दल प्रलै पौन लहकी ॥
मच्यौ घमासान तहां तोप तीर बान चलै,
मंडि वलवान किरपान कोपि गहकी।
तुण्ड काटि मुण्ड काटि जोसन जिरह काटि
नीमा जामा जीन काटि जिमी आनि ठहकी ।।
[ १३८ ]
३
मुकत कृपान मयदान ज्यों उदोत भान,
एकन तें एक मनो सुखमा जरद की।
कहैं कवि गङ्ग तेरे बल की बयारि लागे,
फूटी गजघटा घनघटा ज्यों सरद की।
एते मान सोनित की नदियां उमड़ि चली,
रही न निसान कहूँ मटि में गरद की।
गौरी गह्यो गिरिपति गनपति गह्यो गौरी,
गौरीपति गह्यो पूँछ लपकि बरद की।
फूट गये हीराकी विकानी कनी हाट हाट,
काहू घाट मोल काहू बाढ़ मोल को लयो।
टूट गई लंका फूट मिल्यो जो विभीषन है,
रावन समेत बंस आसमान को गयो।
कहैं कवि गंग दुरजोधन से छत्र धारी,
तनक में फूटे तें गुमान वाको नै गयो।
फूटें तें नरद उठि जात वाजी चौसर की,
आपस में फूटें कहु कौन को भलो भयो।
५
देखत के बृच्छन में दीरघ सुभायमान,
कीर चल्यो चाखिवे को प्रेम जिय जग्यो है।
लाल फल देखि के जटान मँडरान लागे,
देखत बटोही बहुतेरे डग मग्यो है।
[ १३६ ]
गंग कवि फल फूटे भुआ उधिरान लखि,
सबनि निराश है कै निज गृह भग्यौ है।
ऐसो फलहीन बृच्छ बसुधा में भयो यारो,
सेमर विसासी बहुतेरन को ठग्यो है।
छप्पय
तिमिर लंग लई मोल, चसी बब्बर के हलक ।
रही हुमायू साग, गई अकबर के दलके ।
जहांगीर जस लियो, पीठि को भार छुड़ायो।
शाहजहां करि न्याय ताहि को मांड चटायो।
वल रहित भई पौरुष थक्यो, भर्भाग फिरत बन स्यार डर।
औरंगजेब करिनी सोई, लै दीन्हीं कवि गंगधर ॥
--
केशवदास
रामचन्द्रिका से
रावण अंगद संवाद
दोहा
अंगद कूद गये, जहां आसन गत लंकेश ।
मनु मधुकर कर हाट पर, शोभित श्यामल वेष ।
(नाराच छंद)
प्रतीहार-पढ़ो विरंचि मौन वेद जीव सोर छडिरे।
कुवेर बेर कै कही नयक्ष भीर मंडरे।
दिनेश जाइ दूरि बैठु नारदादि संगहीं।
न बोलु चंद मंद बुद्धि इन्द्र की सभा नहीं।
(चित्रपदा छंद)
अंगद यों सुनि बानी । चित्त महारिस आनी ।
ठेलि के लोग अनसे । जाह सभा महँ बैसे।
(चंचरी छंद)
रावण-कौन हो पठये सो कौने ह्यां तुम्हें वह काम है।
अंगद-जाति बानर लंक नायक दूत अंगद नाम है।
रावण और अंगद-कौन है वह बांधिकै देह पूछि सबै दही।
लंक जारि संहारि अक्ष गयो सो बात वृथा कही ।
कौन के सुत बालि के वह कौन बालि न जानिये।
कांख चापि तुम्हे जो सागर सात न्हात बखानिये ।
--
[ १४१ ]
है कहां वह वीर अंगद देवलोक बताइयो।
क्यों गयो रघुनाथ वान विमान बैठि सिधाइयो।
लंकनायक को विभीपण देव दूषण को दहै ।
मोहिं जीवत होहिं क्यों जग तोहि जीवत को कहै ।
मोहिं को जग मारिहै दुर्बुद्धि तेरिय जानिये।
कौन बात पठाइयो कहि वीर वेगि बखानिये ॥
सवैया
अंगद--
श्री रघुनाथ को वानर केशव आयो हो एक न काहू यो जू।
सागर को मद झारि चिकारी त्रिकूट को देह बिहार धयो जू ।
सीय निहारि संहारि कै राक्षस शोक अशोक बनीहि दयो जू।
अक्ष कुमारहि मारिकै लंकहि जारि के नीकेहि जात भयो जू।
( गंगोदक छन्द)
राम राजान के राज आये इहां।
धाम तेरे महाभाग जागे अवै।
देवि मंदोदरी कुंभकर्णादि दै
मित्र मन्त्री जिते पूछि देखौ सबै ।
राखिजै जाति को भांति को वंश को
साधि जै लोक मे लोक पर्लोक को।
अनिकै पॉ परो देसले कोश लै
आसुहीं ईश सीता चल ओक को।
रावण-लोक लोकेश स्यों शोचि ब्रह्मा रचे
अपनी अपनी सीव सो सो रहै।
चारि चाहे धरे विष्णु रक्षा करै
[ १४२ ] वात सांची यहै वेद वाणी कहै। ताहि भ्रूभंग ही देव देवेश त्यों विष्णु ब्रह्मादि दै ताहि हौं छोड़ि के पाय काके परौं आजु संसार तो पायँ नेरे परें। रुद्रजू संह। (मदिरा छंद) राम को काम कहा ? रिपुजीतहिं कौन कब रिपुजीत्यो कहाँ ? वालि वली, छल सों, भृगुनन्दन गर्व हरो, द्विज दीन महा॥ दीन सो क्यों ? छित छत्र हत्यो विन प्राणनि हैहय राज कियो। हैहय कौन ? वहै विमर्यो जिन खेलत हो तुम्हें वांधि लियो। (विजय छन्द) अंगद- सिंधु तरयो उनको बनरा तुमपै धनु रेख गइ न तरी। वांध्योइ बांधत सो न बघ्यो उन वारिधि बांधि कैवाटकरी।। अजहूँ रघुनाथ प्रताप की बात तुम्हें दशकंठ न जानिपरी । तेलनि तूलनि पूछि जरी न जरी जरी लंक जराइ जरी ।। रावण- नील सुखेन हनू उनके नल और सबै कपि पुंज तिहारे। आठहुआठ दिशा वलिदै अपनो पदुले पितुजा लगि मारे।
, [ १४३ ] तोसे सपूत हि पाइ कै वालि अपूतन की पदवी पगु धारे। अंगद संग ले मेरो सबै दल आजुहि क्यों न हनै बप मारे॥ (दोहा) जो सुत अपने बाप को, पैर न लेइ प्रकाश । तासों जीवत ही मर्यो, लोय कहैं तजि त्रास ।। अंगद-इतको बिलगुन मानिये, सुनि रावण पल आधु । पानी पावक पवन प्रभु, ज्यों असाधु त्यों साधु ।। (द्रुत विलंवित) रावण- उरसि अंगद लाज कछू गहौ । जनक घातक बात वृथा कहो। सहित लक्ष्मण रामहिं संहरौ। सकल बानर राज तुम्हें करौ।। (निशिपालिका छन्द) अंगद-शत्र सम मित्र हम चित्त पहिचानहीं। भूत विधि नूत कबहूँ न उर आनहीं । आप मुख देखि अभिलाष अभिलाखहू । राखि भुज शीश तव और कहँ राखहू ।। (भुजंग प्रयात छन्द) रावण-महामीचु दासी सदा पाइँ धोवै। प्रतीहार है के कृपा सूर जो वै॥ क्षमानाथ लीन्हें रहै छत्र जाको । करेंगो सुग्रीव ताको॥ सका मेघमाला शिखी पाककारी। करें कोतवाली महादंडधारी॥ कहा शत्रु [ १४४ ] पढे वेद ब्रह्मा सदा द्वार जाके। कहा बापुरो शत्रु सुग्रीव ताके ।। (विजय छन्द) अंगद-पेट चढ्यो पलना पलिका चढ़ि पालकि हू चढ़ि मोह मड़यो रे। चोक चढ्यो चित्रसारी चढ्यो गजवाजि चढ्यो गढ़ गर्व चढ्यो रे। व्योम विमान चढ़यो ई रह्यो कहि केशव सो कबहूँ न पढ्यो रे। चेतत नाहीं रह्यो चढ़ि चित्त सों। चाहत मूढ़ चिता हू चढ्यो रे॥ (भुजंगप्रयात छन्द) रावण-निकरयो जो भैया लियो राज जाको। दियो काढ़ि के जू कहा त्रास ताको । लिये बानराली कहौं बात तो सों सो कैसे लरै राम संग्राम मो सों।। - (विजय छन्द) अंगद- हाथी न साथी न घोरे न चेरे न गाऊँ न ठाऊँ की ठाउँ बिलैहै। तात न मात न पुत्र न मित्र न वित्त न तीय कहीं संग र है । केशव काम को राम बिसारत और निकाम न कामहि ऐहै। चेति रे चेति अजौं चित अन्तर अन्तक लोक अकेलोई जैहै ।।
[ १४५ ]
(भुजंग प्रयात छन्द)
रावण-डर गाय विप्रै अनाथै जो भजै।
पर द्रव्य छोड़े परस्त्री हि लाजै ।।
पर द्रोह जासों न हो वै रती को।
सु कैसे लरै वेष कीन्हें यती को।।
(दोहा)
गेंद करेउँ मैं खेल को, हरगिर केशोदास ।
शीश चढ़ाये आपने, कमल समान सहास ।।
(दंडक)
अंगद-जैसो तुम कहत उठायो एक गिरिवर,
ऐसे कोटि कपिन के वालक उठावहीं ।
काटे जो कहत शीश काटत धनेरे घाघ,
मगर के खेले कहा भट पद पावहीं।
जीत्यो जो सुरेश रण शाप ऋषि नारि ही को,
समुझहु हम द्विज्ञ नाते समुझावहीं।
गहौ राम पायें सुख पाइ करै तपो तप,
सीता जू को देहु देव दूंदभी बजावहीं।
(वंशस्थ छन्द)
रावण-तभी जपी विनि छिपही हरौं।
अदेव द्वेपी सब देव संहरौ ॥
सिया न देहों यह नेम जो धरौं।
अमानुपी भूमि, अवानरी करौ।।
[ १४६ ] - Dhco [विजय छंद] अंगद- पाहन ते पतिनी करि पावन टूक कियो हर को धनु कोरे। छत्र विहीन करी क्षण मे क्षिति गर्व हयौं तिनके बल कोरे॥ पर्वत पुज पुरैनि के पात समात तरे अजहूँ घर कौरे। होई नरायण हूँ पै नये गुण कौन इहाँ नर बानर कोरे। [चंचरी छंद] रावण-देहिं अंबद रज तो कहें मारि बानर राज को। बांधि देहि विभीषणौ अरु फोरि सेतु समाज को ।। पूँछ जारहिं अक्षरिपु की पाई लागहि रुद्र के सीय को तब देहूँ रामहि पार जाइ समुद्र के अंगद-लंक लाइ गयो बली हनुमंत संतन गाइयो । सिंधु बांधत शोधिकै नल क्षीर छीट बहाइयो ।। ताहि तोहिं समेत अंध उखारि हौं उलटी करौं। आजु राज कहां विभीषण बैठि है तेहि ते डरौं । [दोहा] अंगद रावण को मुकुट, ले करि उड़ यो सुजान । मनि चलो यमलोक को, दश शिर को प्रस्थान ।। अंगद लै वा मुकुट को, परे राम के पाइ। राम विभीषण के शिरसि भूषित कियो बनाइ ॥ रसिक प्रिया से सवैया चपला कह मोर किरीट लसै मघवा धनुमोय बटावत हैं। मृदु गावत आवतु बेनु बजावत मित्र मयूर नचावत हैं।
[ १४७ ]
उठि देखु भटू भरि लोचन चातक चित्त की ताप वुझावत हैं।
घनस्याम घने धन वेस धरेजु बने बनते व्रज आवत हैं।
कवि प्रिया से
कवित्त
जो हौं कहौं रहिये, तो प्रभुता प्रकट हत,
चलन कहाँ तो हित हानि नाहि सहनो।
भावै सो
करहू उदास भाव प्राननाथ,
चलहु
कैसे लोक लाज बहनो ?
क्सौ राय की सौ तुम सुनहु छवीले लाल,
चते ही बनत जो पै नाहीं आज रहनो।
तैमियै सिखाओ सीख तुम ही सुजान पिय,
तुमरे चलत मोहिं जैसो कछू कहनो।
साथ
लै
---
रहीम सतसई
कहि रहीम इक दीपते, प्रकट सब धुति होय ।
तनु सनेह कैसे दुरौ, हग दीपक जरु दोय ॥१॥
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहि न पान ।
कहि रहीम परकाज हित, सम्पतिसुचहिं सुजान ॥२॥
जिहि रहीम चित श्रापनों, कीन्हों चतुर चकोर ।
निशिवासर लागो रहे, कृष्णचन्द्र की ओर ॥३॥
रीति प्रीति सबसों भली, बैर न हित मिल गोत ।
रहिमन याही जनम की, 'बहुरि न संगति होत ॥४॥
दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि ।
सोच नहीं वित हानि को, जोन होय हित हानि ।।।।
को रहीम पर द्वार पर, जात न जिय पछितात ।
संपति के सब जात हैं, विपति सबहिं ले जात ।।६।।
जो रहीम होती कहूँ, प्रभु गति अपने हाथ ।
तौ को धौं केहि मानतो, आप बड़ाई साथ ॥७॥
जो रहीम मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं ।
जल में ज्यों छाया परी, काया भीजति नाहिं ।।८।।
तेहि प्रमान चलिबो भलो, जो सब दिन ठहराय ।
उमड़ि चले जल पारते, जो रहीम बढ़ि जाय ffe}}
तबहीं लग जीबो भलो, दीबो परे न धीम |
बिन दीबो जीबो जगत, हमाहिंन रुचै रहीम ॥१०॥
[ १४६ ] बड़ माया को दोप यह, जो कबहुँ घट जाय । तो रहीम मरवो भलो, दुख सहि जिये वलाय ।।११।। अमर वेलि बिन मूल की, प्रतिपालत है ताहि । रहिमन ऐसे प्रभुहि तजि, खोजत पिरिये काहि ॥१२॥ रहमन अति न कीजिये, गहि रहिये निज कानि । सहिजन अति फूले तऊ, डार पात की हानि ।।१।। सरवर के खग एक से, बादत प्रीत न धीम । पै मराल को मानसर, एकै ठौर रहीम ॥१४॥ जो रहीम करिवो हुतो, ब्रज को यही हवाल । तौ कत मातहि दुख दियो, गिरवरधर गोपाल ॥१५॥ दीरघ दोहा अर्थ के, आखर थोरे श्राहिं । ज्योंरहीम नट कुण्डली, सिमिटि कूदि कढि जाहि ॥१६॥ जै रहीम विधि चड़ किए, को कहि दूषण काढ़ि। चन्द्र दूबरो कूवरो, तऊ नखत तै बाढ़ि ॥१७॥ रहिमन याचकता गहे, बड़े छोट है जात । नारायण हूं को भयो, वावन आंगुर गात ||१८|| संतत संपति जानिके, सबको सब कुछ देइ । दीनबन्धु विन दीन की, को रहीम सुधि लेइ ॥१६॥ सर सूखे पंछी उडै, औरे सरन समाहिं । दीन मीन विन पच्छ के, कहु रहीम यह जाहि ॥२०॥ आप न काहू काम के, डार पात फल मूर । औरन को रोकत फिरें, रहिमन कूर बवूर ||२१|| बड़े पेट के भरन मे, है रहिमन दुख काढ । यातें हाथी हहरि के, दये दांत द्वै वादिर।।
[ १५० ]
यों रहीम सुख होत है, बढ़त देखि निज गोत ।
ज्यों बड़री अंखियां निरखि, आंखिन को सुख होत ॥२३॥
जो बड़ेन को लघु कहो, नहिं रहीम घट जाहिं ।
गिरिधर मुरलीधर कहै, कछु दुख मानत नाहिं ॥२४॥
शशि, संकोच, साहस, सलिल, मान सनेह रहीम ।
बढ़त बढ़त बढ़ि जात है, घटत घटत घटि सीम ॥२५॥
यह रहीम निज संग ले, जनमत जगत न कोय ।
बैर, प्रीति, अभ्यास, यश, होत होत ही होय ॥२६।।
वड़े दीन को दुख सुने, लेति दया उर आनि ।
हरि हाथी सों कब हुती, कहु रहीम पहिचानि ॥२७॥
रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लिपटाय ।
पशु खर खात सवाद सों, गुर गुलियाये खाय ॥२८॥
दुरदिन परे रहीम कहि, दुरथल जैयत भागि।
ठाढ़े हूजत धूर पर, जब घर लागत आगि ॥२६॥
प्रीतम छवि नैनन बसी, पर छवि कहां समाय ।
भरी सराय रहोम लखि, आप पथिक फिरि जाय ॥३०॥
कौन बड़ाई जलधि मिलि, गंग नाम भौ धीम ।
केहि की प्रभुता नहिं घटी, पर घर गये रहीम ॥३१॥
मान सरोवर ही मिले, हंसनि मुक्ता भोग।
सफरिन भरे रहीम सर, बक बालक नहिं योग ॥३२॥
रहिमन बिगरी आदि की, बनै न खरचे दाम ।
हरि बाढ़े आकाश लौ, तऊ बावनै नाम ॥३३॥
रहिमन रिस सहिं तजत नहिं, बड़े प्रोति को पौरि।
मूकन मारत आबई, नींद बिचारी दौरि ॥३४॥
[ १५१ ] जे रहीम तन मन दियो, कियो हिये विच भौन । तासों दुख सुख कहन की, रही बात अब कौन ॥३५॥ जो पुरुषारथ ते कहूँ, सम्पति मिलति रहीम | पेट लागि वैराट घर, तपत रसोई भीम ॥३६॥ सव कोऊ सबसों करै, राम जुहार सलाम । हित रहीम तब जानिये, जा दिन अटकै काम ॥३७॥ ज्यों रहीम गति दीप की, कुल कपूत की सोय। वारे उजियारो लगै, बढ़े अंधेरो होय ॥३८॥ छोटेन सों सोहैं बड़े, कहि रहीम यहि लेख । सहसन को हथ वांधियत, लै दमरी की मेख ॥३६॥ सम्पति भरम गंवाय क, हाथ रहत कछु नाहि । ज्यों रहीम शशि रहत है, दिवस अकासहि माहि ॥४०॥ अनुचित उचित रहीम लघु, करहिं वड़ेन को जोर। ज्यों शशि के संयोग ते, पचवत आग चकोर ॥४१॥ काम कछू आवे नहीं, मोल न कोऊ लेइ । बाजू टूटे बाज को, साहब चारा देइ ॥४२॥ धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पियत अधाय । उदधि बडाई कौन है, जगत पियामो जाय ॥४३॥ नाद रीमि तन देत मृग, नर धन हेत समेत । ते रहीम पशु ते अधिक, रीझेउ कछु नहिं देत ॥४४॥ रहिमन अब वे घिरछ, कहें, जिनकी छांह गंभीर । वागन विच विच देखियत, सेहुँड कंज करीर ॥४॥ अमृत ऐसे वचन मे, रहिमन रिस की गॉस । जैसे मिसिरिहु में मिली, निरस वॉस की फॉस ||१६|| [ १५२ ] रहिमन मनहिं लगाय के, देखि लेहु किन कोय । नर को बस करिबौ कहा, नारायन बस होय ॥४७॥ रहिमन अँसुवा नयन टरि, जिय दुख प्रगट करेइ । जाहि निकारों गेह ते, कस न भेद कह देइ ॥४८॥ गुन ते लेत रहीम जन, सलिल कूप ते काढ़ि। कूपहुँ ते कहुँ होत है, मन काहू को बाढ़ि ॥४॥ बिरह रूप धन तम भयो, अवधि आस उद्योत । ज्यों रहीम भादों निशा, चमकि जात खद्योत ॥५०॥ शीत हरत तम हरत नित, भुवन भरत नहिं चूक रहिमन तेहि रवि को कहा, जो घटि लखै उलूक ॥५१॥ गहि सरनागति राम की, भवसागर की नाव । रहिमन जगत उधार कर, और न कछू उपाय ॥५२॥ अभी हलाहल मद भरे, श्वेत श्याम रतनार। जियत मरत झुकि मुकिपरत, जिहि चितवत इक बार ||३|| रहिमन कोऊ का कर, ज्वारी चोर लबार । जो पति राखन हार है, माखन चाखन हार ॥५४॥ सोरठा रहिमन मोहि न सुहाय, अमी पियावत मान बिन। जो विष देय बुलाय, प्रेम सहित मरिवो भलो ।। बरबै नायिका भेद होइ कत आय बदरिया, बरखहि पाथ। जैहौं धन अमरैया, सुगना साथ ॥ १ ॥ ते अब जासि बेइलिया, बरु जरि मूल ।
[ १५३ ]
विन पिय सूल करेजवा, लखि तुव फूल ।। २ ।।
कासों कहो
संदेसवा, पिय परदेसु ।
लगेहु चहत नहिं फले, तेहि वन टेसु ॥ ३॥
वन घन फूलहिं टेसुआ, बगियन वेलि ।
चले विदेस पियरवा, फगुवा खेलि ॥ ४॥
पीतम इक सुमिरिनियां, मुहिं देइ जाहु ।
जेहि जपि तोर विरहवा, करव निवाहु ।। ५ ।।
लैकर सुघर खुरुपिया, पिय के साथ।
छइवे एक छतरिया, वरसत पाथ ॥६॥
पिय मूरति चितसरिया, चितवत चाल ।
चितवत अवध सवेरवा, जपि जपि माल ॥ ७ ॥
दूटि खाट घर टपकत, टटियो टूटि ।
विय के वांह उसिसवां, सुख के लूटि ॥ ८ ॥
बिहारी दोहा मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ । जा तन की झांई परै स्याम हरित दुति होइ ।। १ ।। अजौं तरयौना ही रह्यौ, श्रुतिसेवत इक रंग। नाक बास बेसरि लह्यो, बसि मुकुतन के संग ।।२।। जम करि मुँह तरहर परयो, इहिं धरिहरि चितलाउ । विषय तृषा परिहरि अौं, नरहरि के गुन गाउ ॥ ३ ॥ तो पर वारौं उरबसी, सुनि राधिके सुजान । तू मोहन के उरबसी, उरबसी समान |॥४॥ कौन भांति रहिहै बिरदु, अब देखिवी मुरारि । बीधे मौमों आइकै, गीधे गोधहिं तारि ॥ ५॥ जगतु जनायौ जिहि सकलु, सो हरि जान्यौ नाहिं । ज्यौं ऑखिन सब देखिये, ऑखि न देखी जाहिं ॥६॥ दीरघ सांस न लेहि दुख, सुख साईहिं न भूलि । दई दई क्यों करतु है, दई दई सु कवूलि ।। ७ ।। तंत्री नाद, कवित्त रस, सरिस राग रति रंग । अब बूड़े बूड़े तरे, जे बूड़े सब अंग ।। ८ ।। या अनुरागी चित्त की, गति समुझ नहिं कोइ । ज्यौ ज्यौ चूड़े स्याम रंग, त्यौं त्यौ उज्जवल होइ।। ६ ।। सरत बड़नु के काम। मढ्यौ दमामौ जातु क्यौं, कहि चूहे के चाम ॥ १० ॥ कैसे छोटे नरनु ते [ १५५ ] जपमाला, छापै तिलक, सरै न एको कामु । मन कांचै नाचे वृथा, सांचे रांचे रामु ।। ११ ।। घर घरु डोलत दोन है, जनु जनु जाचतु जाइ। दियै लोभ चसमा चखनु, लघु पुनि बड़ौ लखाइ ॥१२॥ कनक कनक तै मौ गुनौ, मादकता अधिकाइ । उहि खाएं बौराइ जग इहि, णये बौराइ ॥ १३ ॥ तजि तीरथ हरि राधिका, तन दुति करि अनुरागु । जिहिं ब्रज केलि निकुंज मग पगपग होतु प्रयागु ॥१४॥ संगति सुमति न पावहिं, परे कुमति के धंध । राखी मेलि कपूर में, हींग न होइ सुगंध ॥ १५ ॥ जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सु वीति बहार । अब, अलि, रही गुलाब मे अपत, कंटीली डार ॥१६॥ सीस मुकुट, कटि काछनी, कर मुरली उर माल । इहिं वानक मो मन सदा, बसौ विहारी लाल ।। १७ ।। नर की अरु नल नीर की, गति एक कर जोइ । जेतौ नीचौ है चले, तेतौ ऊंचौ होइ ॥ १८ ॥ बढ़त बढ़त संपति सलिल, मन सरोजु बढ़ जाइ । घटत घटत पुनि ना घटै, वरु समूल कुम्हिलाइ।। १६ ।। कोटि जतन कोऊ करौ, परै न प्रकृतिहिं बीचु । नल वल जलु ऊंचे चढ़े, अन्त नीच को नीचु ।। २० ।। तो लघु या मन सदन में, हरि आचें किहि वाट । विकट जटे जौ लगु निपट, खुलें न कपट कपाट ॥ २१ ॥ भजन कह्यो, तांते भज्यौ न एकौ वार । दूरि भजन जाते कहो, सो तैं भज्यौ गंवार ।। २२ ।।
[ १५६ ] रनित भृग घंटावली, झरित दान मधु नीरु । मंद मंद आवतु चल्यौ, कुजरु, कुंज समीरु ॥ २३ ॥ पतवारी मोला पकरि, और न कछू उपाउ । तरि संसार पयोधि कौ, हरि नाचै करि नाउ ॥ २४ ॥ यह बिरिया नहिं और की, तूं करिया वह सोधि । पाहन नाव चढ़ाइ जिहिं, काने पार पयोधि ॥ २५ ।। अति अगाधु अति औथरौ, नदी कूपु सरु बाइ । सो वाको सागर जहां, जाकी प्यास बुझाइ ।। २६ ॥ मोर मुकट की चन्द्रिकनु, यो राजत नंद नंद । मनु ससिसेखर की अकस, किय सेखर सत चंद ॥२७॥ अधर धरत हरि कै परत, ओठ डोठि पट जोति । हरित बांस की बांसुरी, इद्र धनुष रग होति ।। २८ ।। करौ कुवत जगु कुटिलता, बजौ न दीनदयाल। दुखी होहुगे सरल हिय, वसत त्रिभगी लाल ॥ २६ ॥ को कहि सके बड़ेनु सौ, लखै बड़ीयौ भूल । दीने दई गुलाब की, इन डारनु वे फूल ॥ ३० ।। समै समै सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोइ । मन की रुचि जेती जिते, तित तेती रुचि होइ ।। ३१ ।। इहि आसा अटक्यो रहतु, अलि गुलाब के मूल । है है फेरि बसन्त ऋतु, इन डारन वै फूल ॥ ३२ ॥ इक भीजै चहलै परै, बूढ़े बहै हजार। किते न औगुन जग करें, बै नै चढ़ती बार ।। ३३ ॥ मीत न नीति गलीतु है, जो धरियै धनु जोरि । खायै खरचै जौ जुरै, तौ जोरियै 'करोरि ॥ ३४ ।।
लै
[ १५७ ]
कहलाने एकत वसत, अनि मयूर मृग बाघ ।
जगतु तपोवन सौ कियौ, दीरघ दाब निदाघ ॥ ३५ ॥
सूघि सराहि हूं, रहे सवै गहि मौनु ।
गंधी गंध, गुलाव की, गंवई गाहकु कौनु ॥ ३६ ॥
पटु पाख भखु कांकर, सपर परेई संग।
सुखी परेवा पुहुमि मैं, एकै तु ही विहंग ॥ ३७ ॥
मनमोहन सौ मोह करि, तू घनस्यामु निहारि ।
कुंज बिहारी सौं विहरि, गिरधारी उर धारि ।। ३८ ।।
समै पलट पलटत प्रकृति, को न तजै निज चाल |
भौ अकरुन करुना करो, इहि कपूत कलिकाल ॥ ३६ ॥
को छूट्यो इहि जाल परि, कत कुरंग अकुलात ।
व्यौ ज्यौ सुरझि भज्यौ चहत, त्यौं त्यो उरझत जात ॥४०॥
कीने हूँ कोटिक जतन, अब कहि काढ़े कौनु ।
भौ मन मोहन रूप मिलि. पानी मे को लौनु ॥ ४१ ॥
लौनै मुहु डीठि न लगे, यो कहि दीनो ईठि ।
दूनी ह लागन लगी, दिये दिठौना दीठि ॥ ४२ ॥
पाइ महावरु दैन को, नाइनि वैठी आइ ।
फिरि फिरि जानि महावरी, एड़ी मीडति जाइ ॥ ४३ ॥
अंग अंग नग जगमगत, दीप सिखा सी देह ।
दिया बढ़ाए हूँ रहै, बड़ौ उज्यारौ गेह ॥ ४४ ॥
पत्रा ही तिथि पाहए, वा घर के चहुँ पास ।
नित प्रति पून्यौई रहै, आनन ओप उजास ॥ ४५ ॥
है छिगुनी पहुँचो गिलत, अति दीनता दिखाइ।
बलि बावन को व्यौंतु सुनि, को बलि तुम्है पत्याइ ॥४६॥
[ १५८ ] सोवत जागत सुपन बस रस रिस चैन कुचैन। सुरति स्याम धन की सुरति, बिसरै हूं बिसरै न ॥४७॥ सधन कुंज, घन घनतिमिरु, अधिक अंधेरी राति। तऊ न दुरिहै स्याम वह, दीपमिखा सी जाति ॥ ४ ॥ मानहु विधि तन अच्छ छवि, स्वच्छ राखिबै काज । हग पग पॉछन को कर, भूषन पायंदाज ॥ ४६ ॥ कहा कुसुम, कह कौमुदी, कितक आरसी जोति । जाकी उजराई लखै, आंखि ऊजरी होति ॥ ५० ॥ छिप्यो छबीली मुहु लसै, नीले अंचर चीर । मनौ कलानिधि झलमले, कालिंदी के नीर ॥ ५१ ॥ इन दुखिया अखियानु को, सुखु सिरज्यौई नाहिं । देखें बनै न देखतै, अनदेखै अकुलाहिं ॥ ५२ ।।
भूपण
१
ऐन बाजिराज देत महाराज सिवराज,
भूपण जे बाज की समाज निदरत है।
पौन पाय हीन, हग घूघट मे लीन,
मीन जल में विलीन क्यों बरावरी करत है ।।
सब ते चलाक चित तेऊ कुलि आलम के,
रहैं उर अन्तर मे धोर न धरत है।
जिन चढ़ि आगे को चलाइयतु तीर तीर,
एक भरि तऊ तीर पीछे ही परत है।
२
दुरजन दार भजि भजि वेमम्हार चढ़ीं,
उत्तर पहार डरि मिवाजी नरिन्द ते ।
भूपन भनत विन भूपन वसन, साधे,
भूग्वन पियासन हैं नाहन को निन्दते ॥
बालक अयाने बाट वीच ही विलाने,
कुम्हिलाने मुम्ब कोमल अमल अरविन्द तें।
गजल कज्जल कलित वढ़यों बढ़यों मानो,
दूजा सोत तरनितनृजा को कलिन्द ते ।।
३
पूरब के उत्तर के प्रबल वछांह हूँ के,
सब बादशाहन के गढ़ कोट हरते ।
[ १६० ]
भूषन कहैं यों अवरंग सो बजीर जीति,
लीवे को पुरतगाल सागर उतरते ॥
सरजा सिवा पर पठावत मुहीम काज,
हजरत हम मरिबे को नाहिं डरते ।
चाकर हैं उजुर कियों न जाय नेक पै,
कछु दिन उबरते तो घने काज करते ॥
४
लोमस की ऐसी आयु होय कौन हूँ पाय,
तापर कवच जो करनवारा धरिये ।
ताहू पर हूजिये सहसबाहु, तापर,
सहसगुनो साहस जो भीमहु ते करिये ।।
भूषन कहैं यो अवरंगजू सो उमराव,
नाहक कहौ तौ जाय दच्छिन में मरिये।
चले न कळू इलाज भेजियत वे ही काज,
ऐसा होय साज तौ सिवा सौ जाय लरिये ॥
५
ब्रह्म के आनन तें निकसे ते अत्यन्त पुनीत तिहूँ पुर मानी।
राम युधिष्ठिर के बरने बलमीकहु ब्यास के अंग सोहानी ॥
भूषन यो कलि के कविराजन राजन के गुन गाय नसानी ।
पुन्य चरित्र सिवा सरजै सर न्हाय पवित्र भई पुनि बानी ।।
६
काहू के कहे सुने ते जाही ओर चाहे,
ताही ओर इकटक घरी चारिक चहत है।
कहे ते कहत बात कहे ते पियत खात,
[ १६१ ]
भूषन भनत ऊंची सांसन जहत हैं।
पौढ़े हैं तो पौढ़े, बैठे बैठे, खरे खरे,
हमको हैं, कहा करत,
यों जान न गहत हैं।
साहि के सपूत सिव साहि तव वैर इमि,
साहि सब रात दिन सोचत रहत हैं।
चकित चकत्ता चौंकि चौकि उठे वार वार,
दिल्ली दहसनि चितै चाह करपति है।
विलग्वि बदन बिलखात विजैपुर पति,
फिरत फिरंगिन की नारी फरकति है।
थर थर कॉपत कुतुबशाह गोलकुंडा,
हहरि हवस भूप
भरि फरकति है।
राजा सिवराज के नगारन की धाक सुनि,
केते बादसाहन की छाती दरकति है।
८
मालवा उजैन भनि भूपन भेलास ऐन,
महर सिरोज लौ परावने परत है।
गोंडवानो तिलंगानो फिरंगानो करनाट,
महिलानो महिलन हिये हहरत हैं।
माहि के सपूत सिवराज तेरी धाक सुनि,
गढपति वीर तेऊ धीर न धरत हैं।
बीजापुर गोलकुंडा आगरा दिल्ली के कोट,
बाजे बाजे रोज दरवाजे उघरत हैं।
[ १६२ ]
६
राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यो,
अस्मृति पुरान राखे वेद विधि सुनी मैं।
राखा राजपूती राजधानी राखी राजन की,
धरा में धरम राख्यो राख्यो गुन गुनी में ।
भूषन सुकवि जीति हद मरहट्टन की,
देस देस कीरति बखानी तब सुनी मैं
साहि के सपूत सिवराज समसेर तेरी,
दिल्ली दल दाबि के दिवाल राखी दुनी मैं॥
१०
छूटत कमान और तीर गोली बानन केहि,
मुसकिल होत मुरचान हूँ की ओट मे।
ताही समै सिवराज हुकुम कै हल्ला कियो,
दावा बांधि पर हला वीर भट जोठ मैं।
भूषन भनत तेरी किस्मत कहां लौ कहाँ,
हिम्मत यहां लगि है जाकि भट भोट मैं।
ताव दै दै कगूरन पै पांव दै दे,
अरि मुख घाव दै दै कूद परें कोट मे ।।
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मतिराम बूदी-वर्णन महान ऊपर जहं वने, कंचन कलस अनूप । निज प्रभानि सौ करत हैं, गगन पीत अनुरूप ॥१॥ वीना वेनु निनाद मृग, मोहि अचल करि चन्द । सौंध सिखर ऊपर कहां, दम्पति करत अनन्द ।।२।। जहाँ छहौ ऋतु मैं मधुर, सुनि मृदंग मृदु सोर । संग ललित ललनानि के, नृत्य करत गृह मोर ।।३।। मरकत लाल प्रयाल मनि, मुकुत हीर अवदात । ललित राजपथ मैं जहाँ, जरकस बसन विकात ॥४॥ सदा प्रफुल्लित फलित जह, दुम रेलित के वाग । अलि कोकिल कल धुनि सुनत, लहत श्रवण अनुराग ।।शा कमल कुमुद कुवलयन के, परिमल मधुर पराग । सुरभि सरिस पूरे जहाँ, वापी कृप तड़ाग ॥६॥ शुक चकोर चातक चुहिल, कोक मत्त कलहंस । जहा तरवर सरवरन के, लसत ललित अवतंस ॥७॥ ता नगरी को प्रभु बड़ो, हाड़ा सुरजन राव । रन्यो एक सब गुननि को, वर विरंचि समुद्राव ।।८ [ १६४ ] बाजत गाजत जे कवित्त नगारे जहाँ गयन्द, तहाँ सिंह सम कीनो बीर संगर बिहर हैं। कहैं मतिराम कवि लोगनि कौं रीमि करि, दीन ते दुरद चुवत मदधार हैं। शत्रुसाल नन्दराव भावहिं तेग त्याग, तोसे और औनितल आजु न उदार हैं। हाथिन बिदारिबे को हाथ हैं हथ्यार तेरे, दारिद बिदारिबे को हाथियै हथ्यार हैं । जूथपति बैठयो पानी पोषत प्रबलमद, कलम करेनु कनि लीनै संग सुखतें । ग्रह गह्यो गाढ़े बैर पीछले के बाढ़े भयो, बलहीन विकल करन दीह दुखतें ॥ कहै मतिराम सुमिरत ही समीप लखे, ऐसी करतूति भई साहिब सुरुख तें। दोऊ बातें छूटी गजराज की बराबर ही, पांव प्राह मुख ते पुकार निज मुखतें। सवैया गुच्छनि के अवतंस लस सिखि पच्छनि अच्छ किरीट बनायो। पल्लव लाल समेत छरी कर पल्लव मे मतिराम सुहायो ।। गुञ्जनि के उर मंजुल हार निकुञ्जनि तें कढ़ि बाहिर आयो। आज को रूप लखे ब्रजराज को आजही आँखिन को फल पायो। -
देव
मूनौ के परम एन ऊनौ के अनंत मद,
नूनो के नदीस नद इन्दिरा झुरै परी ।
सहिमा मुनोसन की संपति दिगीसन की,
ईसन की सिद्धि ब्रज वीथी विथुरै परी।
भादों की अधेरी आधिरानि मथुरा के पथ,
पायके संयोग 'देव' देवकी दुरै परी।
पारावर पूरन अपार पर ब्रह्म-रासि,
यमुना के कोर एक वार ही कुरै परी।
डार द्रुम पलना, बिछौना नव पल्लव के,
सुमन मॅगूला मोहै तन छवि भारी दै।
पवन मुलावै, केकी कीर वहरावै देव,
कोकिल हलावै हुलसावै कर तारी दै।
पूरित पराग सों उतारो करै राई लोन,
कंज कली नायिका लतानि सिर सारी है।
मदन महीप जू को बालक वसंत ताहि,
प्रातहि जगावत गुलाव चटकारी है।
।
३
कथा मैं न कंथा मैं न तीरथ के पंथा मैं न,
पोयी मैं न पाथ मैं न साथ की वसीति में।
नटा मैं [ १६६ ] न मुण्डन मैं न तिलक त्रिपुण्डन मैं न, नदी कूप कुंडन अन्हान दान रीति मैं। पीठ मठ मण्डन न कुण्डल न कमंडल न, माला दंड मैं न देवदेहरे की मीति मैं। आपु ही अपार पारावर प्रभु पुरि रह्यो, पाइए परमेसर प्रतीति मैं। प्रकट ४ जब ते कुंवर कान्ह, रावरी कला निधान, कान परी वाके कहूं सुजस कहानी सी। तवहीं ते 'देव' देखी देवता सी हँसति सी, खीझति सी, रीमति सी, रूसनि, रिसानी सी। छोही सी, छली सी, छोरि लीनी सी, छकि सी छीन, जकी सी, टकी सी, लागी थकी, थहरानी सी। वीधी सी, बंधी सी, विष चूड़ी सी, विमोहित-सी, वैठी वह बकति बिलोकति सी बिकानी सी। ते ५ तेरो कह्यो करि करि जीव रह्यो जरि जरि, हारी पाय परि परि तऊ न की संभार। ललन बिलोकि 'देव' पल न लगाये तब, यों कल न दीनी ते छलन उछलहार । ऐसे निरमोही सों सनेह वांधि हो बंधाय, आयु विधि वुड्यो मांझ वाधा सिंधु निराधार । ऐरे मन मेरे तै घनेरे दुख दीन्हें अब, एके बार देके तोहिं मूदि भारौं एक बार ।
[ १६७ ]
६
अंजन नौ रंजि निरंजनहिं जाने कहा
झीको लगै फूल रस चाखै ही जूबौड़ी को।
बजाय सुर मूरज को वेधि जाय.
नाहि कहा सबट सुनावत हौ डौढ़ी को ॥
धौ पूरे पारख हो परखे बनाय देव,
पारही ६ वोरौ परवैया धार औड़ी को।
मनु मनिका = हरि हीरा गाँठि बांध्यो हम,
तिन्हें तुम वनिज बतावत हो कौड़ी को ।।
बस्नी वघंवर में गूदरी पलक दोऊ,
कोये राते बसन भगोहे भेस रखियाँ।
वृडी जलही में दिन-जामिनिहू जानें, भौंहै,
धून निर जायो विरहानल विलखियाँ।।
ऑम्म ज्यों फटिक माल लाल डोरे सेली पैन्हि,
भई है अकेली तजि चेतो संग सखियाँ।
दीजिये दरस 'देव' कीजिये संजोगिनिसु,
जोगिनि है वैठी चे वियोगिनि वी अखियाँ।
एनोजो ही जानतो कि जैहै तु विष के संग,
एरे मन मेरे हाथ पांव तेरे तोरतो।
आजु लौ होक्त नर नाहन की नाहीं सुनी,
नह नो निहाग हारि बदन निहोरतो।।
[ १६८ ]
चलन न दे तो 'देव' चंचल अचल करि,
चाबुग चितावनीनि माँहिं मुंह मोरतो।
भारो प्रेम पाथर बगारो दै गरे सों बॉधि,
राधा वर-विरद के बारिधि में बोरतो।।
६
प्रेम पयोधि परोगाहिरे, अभिमान को फेन रह्यो गहिरे मन ।
कोप तरंगनि सों बहिरे, पछिताय पुकारत क्यों बहिरे मन ॥
देवजू लाज जहाज ते कूदि,रझौ मुख मूंदि, अजौं रहिरे मन ।
जोरत तोरत प्रीति तुही अब तेरी अनीति तुही सहिरे मन ।।
१०
जाके न काम न क्रोध विरोध, न लोभ छुवै नहिं छोम को छांहौं।
मोहन जाहि रहै जग बाहिर, माले जवाहिर तो अति चाहो ॥
बानी पुनीति ज्यों देवधुनी, रस आदर सारद
के
सील-ससी सविता-छविता, कविता हि रचै कवि ताहि सराहौं ।
गुन गाहौं ।
भिखारी दास
१
वाही घरी ते न सान रहै, न गुमान रहै नर है सुधराई ।
दाम न लाज को माज रहै, न रहै तनको घर काज की धाई ।।
या दिग्व माध निवारे रहो, तव ही लौ भटू सब भॉति भलाई।
देखत कान्हे न चेत रहै, नहिं चिंत्र रहै, न रहै चतुराई ।।
२
नैनन को तरमैए कहां ह्यो, कहां लौ हियो विरहागि मैं तैए ?
एक घरी न कहूँ कल पैए, कहां लगि प्रानन को कलपैए ?
पावै यही अब जी में विचार सखी चलि सौतिहु के घर जैए ।
मान घटे तें कहा घटि है जुपै प्रान पियारे को देखन पैए ॥
३
ऊयो ! तहॉई चलौ लै हमे जहँ कूवरि कान्ह वसै एक ठौरी ।
देखिय दाम अघाय अघाय तिहारे प्रसाद मनोहर जोरी ।।
कृचरी मों कछु पाइए मंत्र, लगाइए कान्ह सों प्रीति की डोरी।
कृवरी-भक्ति बढ़ाइए वंदि, चढ़ाइए चटन वंदन रोरी ॥
४
धूरि चढ़े नभ पौन प्रमंग में कीच भई-जल-मंगति पाई।
फूल मिल नृप पै पहुंचे कृमि कीट निसंग अनेक विथाई ।।
चन्दन संग कुदाम सुगन्ध है नीच प्रसंग लहे क्रुआई ।
दाम जू देख्यो सही सब ठोरनि संगति को गुन दोसन जाई ।।
[ १७० ]
५
पंडित पडित सों सुख मंडित, सायर सायर के मन माने ।
संतहिं संत भनंत भलौ, गुनवंतनि को गुनवंत वखाने ।
जापहँ जासह हेतु नहीं, कहिये सुकहा तिहि की गति जाने।
सूर को सूर सती को सती अरु दास जती को जती पहचान ।।
६
प्रान विहीन के पाइ पलोटि अकेले है जाइ घने बन' रोयो।
आरसी अंध के आगे धरयो बहिरे मतो करि उतर जो यो॥
ऊसर मे वरस्यो बहु वारि पखान के ऊपर पंकज बोयो ।
दास वृथा जिन साहब सूम की सेवति मैं अपनो दिन खोयो ।
कढ़ि के निसंक पैठि जाति मुंड मुडन मे,
लोगन को देखि दास आनंद पगति है।
दौरि दौरि जहीं तहीं लाल करि डारति है,
अंक लगि कंठ लगिबे को उमगति है।
चमक-झमक-वारी,
वारी,
रमक तमक वारी जाहिर जगति है।
राम! असि
रावरे की रन
मे नरन
मे-
निलज वनितासी होरी खेलन लगति है।
ठमक-जसक
अखियाँ हमारी दई मारी सुधि वुधि हारी,
मोहूं ते जु न्यारी दास रहैं सब काल मे।
कौन गहै ज्ञान, काहि सौ पत सयाने कौन,
लोक ओक जानै, ये नहीं हैं निज हाल मे ॥
[ १७१ ]
प्रेम पगी रहीं महा मोह में उमगि रहीं,
ठीक ठगि रही लगि रहीं वन माल मे ।
लाज को अंचे के कुल परम पचै के वृथा,
बंधन मॅचै के भई भगत गोपाल में ।
बेनी (बंदीजन)
१
कारीगर कोऊ करामात के बनाय लायो,
लीनी दाम थोरो जानि नई सुघरई है।
रायजू को रायजू रजाई दई राजी है के,
सहर मे ठौर ठौर सोहरत भई है।
वेनी कवि पायके अघाय रही धरी दुक,
कहत न वने कछु ऐसी सति ठई है।
सांस लेत उडिगो उपल्ला औ मितल्ला सबै,
दिन ढके पाती हेत रई रह गई है ।।
२
चींटी की चलावै को मसा के मुख आय जायें,
सांस की पवन लागे कोसन भगत है।
ऐनक लगाय मरु मरु कै निहार परै,
अनु परमातु की समानता खगत है ।।
बेनी कवि कहै हाल कहाँ लौं बखान करौं,
मेरी जान ब्रह्म को विचारिवो सुगत है।
ऐसे आम दोन्हें दयाराम मन मोद करि,
जाके आगे सरसों सुमेरु सी लगत है ।।
३
वियत विलोकत ही मुनि मन डोलि उठे,
वोलि उठे वरही विनोद भरे बन वन ।
[ १७३ ]
अकल विकल है विकाने रे पथिक जन,
उद्र मुग्व चातक अधोमुख मरालगन ।।
बेनी कवि कहत मही के महाभाग भये,
सुग्वद संयोगिन वियोगिन के ताप तन ।
कज-पुज-जन, कृषीदल के रंजन सों,
आये मान भंजन ये अंजन वरन घन ॥
४
पृथु नल जनक जजाति मानधाता ऐसे,
केते भये भूप यश छिति पर छाइगे।
काल चक्र परे सक्र मैकरन होत जात,
कहॉ ली गनावो विधि वासर विताइगे ।।
बनी माज संपनि समाज साज सेना कहाँ,
पायन पमारि हाथ खोले मुख बाइगे ।
छुद्र छिति पालन की गिनती गिनावै कौन,
में बली तर
चुल्ला
से बिलाइगे ॥
रावन
५
वट मत सोधि मोधी देग्वि के पुगन सबै,
मंतन-श्रमंतन को भंट को बतायतो।
कपटी कपून कूर कलिके कुचाली लोग,
कौन राम नाम ह की चरचा चलावतो।।
बनी कवि कर मानो मानो रे प्रमान यही,
पाहन मे हिय कौन प्रेम उमगावतो ।
भारी भव मागर में फैले जीव होते पार,
जो पै रामायण नहिं तुलसी बनावतो ॥
पद्माकर
१
कूलन में केलि में कछारन में कुजन में,
क्यारिन में कलिन कलीन किलकन्त है।
कहै पदमाकर परागन में पानहुँ में,
पानन में पीक में पलाशन पगन्त है।
द्वार में दिशान मे दुनी मे देश देशन में,
देखो दीप दीपन में दीपत दिगन्त है।
वीथिन में ब्रज में नवेलिन मे बेलिन में,
बनन में बागन में बगरो वसन्त है ।
२
मल्लिकान मंजुल मलिन्द मतवारे मिले,
मन्द मन्द मारुत मुहीम मनसा की है।
कहै पदमाकर त्यों नादत नदीन नित,
नागर नवेलिन की नज़र निशा की है।
दौरत दरेरे देत दादुर सदूदै दीह,
दामिनि दमकनि दिसनि में दशा की है।
बद्दलनि बुन्दनि विलोको बगुलानि बाग,
बंगलनि वेलिन बहार बरसा की है ॥
३
पै
개
तालन ताल
पै तमालन
मालन पै,
वृन्दावन बीथिन वहार वंसीवट पै।
[ १५ ]
कई पदमाकर अखंड राज मण्डल पे,
मंडिन उमडि महाफालिन्दी के तट पै॥
दिनि पर छान पर छाजत इतान पर,
ललित लतान पर लाडिली के लट पै।
आई भले छाई यह सरद जुन्हाई जिहि,
पाई छवि आजु ही कन्हाई के मुकुट पै ॥
४
जैसो ते न मों सो कह न कहूँ डरान हुतो,
तैमो 'प्रब हो ह नकह न तासो डरिहीं।
कदै पदमाकर प्रचंड जो परंगो तो,
उमंड करि तोसों भुजदंड ठोंकि लरिहौं ।।
चलो चलु चलो चलु विचलु वीच ही ते,
कोच बीच नीच तो कुटुम्ब को कचरिहौ ।
एरे दगा दार मेरे पातक अपार तोहि,
गगा के कछार मे पछार छार करिहौ ।।
संपति सुमेर की कुबेर की जो पावै ताहि,
तुरत लुटायत विलम्ब उर धार ना।
फर पदमाकर मुहम हय हाथिन के,
एलके हजारन के वितर विचार ना॥
दान गज बकस महीप रघुनाथ राय,
यादिगा धोरवे कई काइ देइ डार ना ।
चाही टर गिरिजा गजानन को गोचू रही,
निरित गर ते निज गोद ते उतारै ना।।
गुरु गोविन्दसिंह
के
निरजुर निरूप हो कि सुन्दर सरूप हो कि,
भूपन भूप हो कि दाता महादान हो।
प्रान के बचैया दूध पूत के दिवैया,
रोग सोग के मिटैया किधौ मानी महा मान हो।
विद्या के विचार हो कि अद्वरत अवतार हो कि,
सिद्धता का सूर्त हो कि सिद्धता का सान हो ।
जीवन के जाल हो कि कालहू के गाल हो कि,
सत्रुन सूल हो कि मित्रन के प्रान हो।
के
२
खूक मलहारी गज गदह बिभूतिधारी,
गिदुआ मसान बास कार्यो ई करत हैं।
धू धू मठ बासी लगे डोलत उदासी मृग,
तरवर सदीव मौन साधेई मरत है।
बिन्दु के सिधैया ताहि ताज की बढ़ या देत,
बन्दरा सदीव पाय नांगे ही फिरत है।
आंगन अधीन काम क्रोध में प्रवीन एक,
ज्ञान के विहीन छीन कैसे के तरत है।
३
धन्य जियो तिन्हें को जग में मुखतें हरि चित्त में युद्ध बिचारें ।
देह अनित्तन चित्त रहै जसुनाव चढ़े भवसागर तारै।
[ १७७ ]
धीरज धाम बनाइ इहै तन बुद्धि सुदीपक ज्यों उजियारें।
नानहिं की बढ़नी मनु हाथ लै कायरता कतवार चुहारें।
४
का भयो जो सबही जगजीत सुलोगन को बहु त्रास दिखायो ।
और कहा जु पै देस विदेसन मांहि भले गज गाहि बंधायो।
जो मन जीवत है सब देस वहै तुमरे नृप हाथन आयो।
लाज गई कछु काल सरयो नहिं लोक गयो परलोक गमायो।
घनानन्द
वहै मुसकानि वहै मृदु बतरानि वहै,
लड़काली बनि आनि उर में अरति है।
वहै गति लैनि औ बजावनि ललित वैन,
वहि हंसि दैन हियराते न टरति है।
वहै चतुराई सो चिताई चाहिबे की छबि,
वहै छैल ताई न छिनक बिसरति है।
आनँद निधान प्रान प्रीतम सुजान जू की,
सुधि सब भाँतिन सों बेसुध करति है।
२
तब है सहाय हाय कैसे धौं सुहाई ऐसी,
सब सुख संग लै बियोग दुःख दै चले।
सींचे रस रंग अंग अंग न अनंग सौंपि,
अन्तर में विषम विषाद-बेलि बै चले ॥
क्यों धौं में निगोड़े प्रान जान धन आनंद के,
गोहन न लागे जब वे करि विजै चले।
अति ही अधीर भई पीर भीर घेरि लई,
हेली मन भावन अकेली भोहि के चले ॥
३
ए रे बीर पौन तेरो सबै ओर गौन वारी,
तो सों और कौन मनै ढरकौंही बानि दै।
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जान [ १७६ ] जगत के प्रान ओछे बड़े सो समान, धन आनंद निथान मुखदान दुखियारि दै॥ उजियारे गुन भारे अति मोहिं प्यारे, अब है अमोही बैठे मीठि पहिचानि दै॥ विरह विया की भूरी आखिन मैं राखौ पूरी, धूरी तिन पान की हा हा नैकु आनि है॥ ४ गुरनि वतायो, राधा मोहन हू गायौ सदा, सुखद सुहायो वृन्दावन गाढ़े गहिरे। अभुत अभूत, महि मडल परे ते परे, जीवन को लाभ हा हा क्यों न ताहि लहिरे॥ आनद की धन छाया रहत निरन्तर ही, सुदेस सों पीहापन बहिरे। यमुना के तीर केलि कोलाहल भीर ऐसी, पावन पुलिन पै पतित परि रहि रे ॥ सरन ५ मंजु मोर चन्द्रिका सहित सीस सांवरे के, केसी आछी फवि छवि पाग पच रंग की। दारिम कुमुम के वरन झीने नीमा मधि, दीपनि दिपति सुललित लोने अंग की। मंजन करत तहां मन वनितान के निहारि, मोती मालहिं विचार धार गंग की। आनंदनि भरो खरो मुरली धुनि उपजाचे राग-रागिनी तरंग की। वजावै मीठी,
[ १८० ]
w
डगमगी डगनि घरनि छवि ही के भार,
ढरनि छबीले डर आदी बनमाल की ।
सुन्दर बदन पर कोटिन मदन वारौं,
चित चुभी चितवनि लोचन विसाल की ।
काल्हि इहि गली अली निकस्यौ अचानक है,
कहा कहाँ अटक भटक तिहिं काल की।
भिजई हौं रोम-रोम आनंद के घन छाई,
वसी मेरी आँखिन मैं आवनि गुपाल की ॥
दीनदयाल गिरि
दोहे
जा मन होय मलीन सो, पर संपदा सहै न ।
होत दुखी चित चोर को, चितै चन्द रुचिरैन ॥१॥
तृठे जाके फल नहीं, रूठे बहुत भय होय ।
सेव जु ऐसे नृपति को, अति दुर्मति ते लोय ॥ २॥
बहु छुद्रन के मिलन ते, हानि वली की नाहि ।
जूथ जम्बुकन तें नहीं, केहरि कहुं नसि जाहिं ॥३॥
पराधीनता दुख महा, सुख जग मे स्वाधीन ।
सुख रमत सुक वन वसै, कनक पीजरे दीन ॥४॥
तहाँ नहीं कछु भय जहां, अपनी जाति न पास।
काठ विना न कुठार कहुं, तरु को करत विनास ॥५॥
नहीं रूप कछु रूप है, विद्या रूप निधान ।
अधिक पूजियत रूप ते, विना रूप विद्वान ॥ ६ ॥
सरल सरल तें होय हित, नहीं सरल अरु वंक ।
ज्यों सर सुघटि कुटिल धनु, और दूर निसंक ॥ ७ ॥
केहरि को अभिषेक कब, कीन्हों विप्र समाज ।
निज भुजवल के तेज तें, विपिन भयो मृगराज ॥ ८ ॥
इक बाहर इक भीतरे, इक मृदु दुहु दिसि पूर
सोहत नर त्रिविध ज्यों, बेर् वदाम अंगूर ।। ६ ॥
वचन तर्ज नहिं सत पुरुप, तजै प्रान वरु देस ।
प्रान पुत्र दुहे परियो, वचन हेत अवधेस ॥ १० ॥
[ १८२ ] कुण्डलिया बरखै कहा पयोद इत, मानि मोद मन माहिं ! यह तो ऊसर भूमि है, अंकुर जमि हैं नाहिं ।। अंकुर जमि हैं नाहि, बरस शत जल जो हैं । गरजै तरजै कहा, वृथा तेरौ श्रम जैहै । बर. दीनदयाल, न ठौर कुठौरहिं परखै । नाहक गाहक बिना बलाहक ह्यां तू वरखै ॥ १ ॥ भौरा अन्त बसन्त के, है गुलाब इहि रागि। फिरि मिलाप अति कठिन है, या बन लगे दवागि ॥ या बन लगे दवागि, नहीं यह फूल लहंगो। ठौर हि ठौर भ्रमात, वड़ो दुख तात सहैगो॥ किते दिन फिरि है दौरा। पछतैहै कर दए गये ऋतु पीछे भौंरा ॥ २ ॥ रम्भा झूमत हौ कहा, थोरे ही दिन हेत | तुम से केते है गये, अरु है है इहि खेत ।। अरु कै हैं इहि खेत, मूल लघु साखा हीने । ताहू पै गज रहै, दीठि तुम पै प्रति दीने । बरनै दीनदयाल हमैं लखि होत अचम्भा । एक जन्म के लागि, कहा झुकि झूमति रम्भा ॥३॥ नाहीं भूलि गुलाब तू, गुनि मधुकर गुजार । यह बहार दिन चार की, बहुरि कटीली डार। बहुरि कटीली डार, होहिगी प्रीषम आये। लुबै चलेंगी संग, अंग सब जैहैं ताये ॥ बरनैं दीनदयाल, [ १८३ ] बरनै दीनदयाल, फुल जौं लौं तो पाहीं। रह घेरि चहुँ घेरि, फेरि अलि ऐहै नाहीं ॥४॥ टूटे नख रद केहरी, वह वल गयो थकाय | हाय जरा अब आइकै, यह दुख दियो बढ़ाय ।। यह दुख दियो बढ़ाय, चहूं दिसि जम्बुक गाजै । मसक लोमरी आदि, स्वतन्त्र कर सब राजै ।। वर. दीनदयाल, हरिन बिहरै सुख लूटैं। पंगु भयो मृगराज आज नख-रद के टूटै ॥५॥ घनाक्षरी छोड्यो गृहकाज कुललाज को समाज सबै, एक ब्रजराज सों कियोरी प्रीतिपन है। रहत सदाई मुखदाई पद पकज में, चंचरीक-नाई भाई छोड़े नाहिं छन है ।। रति पति मूरति विमाहन को नेम धार, लिखे प्रेम रंग भरि मति के सदन है। कुँवर कन्हाई की लुनाई लखि भाई मेरो, चरो भयो चित्त औ चितेरो भयो मन है ।।