Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Khatar Panchpartkaman
Front matter
-NPL जानना शाहिये कि प्रथम चौकानेर कल कता, गंगईभ हमारी पाठशालाकी तरफसें, रत्नसागर प्रथम माग, तथा दूसरा भाग छपायके प्रकाशित कियाहै इन दोनोमें संपूर्ण जैनलोकके वरिमास उपयोग आधे ऐसा पोसा पडिकम- णादि संपूर्ण धर्मकृत्य, तथा जैनलोकका जन्म विवाहादि मरण पर्यंत कुलाचार, तथा जैन इतिहासहै । तथापी बडा पुस्तक है इससे ये छोटी पुस्तक पहिली चोपडी मुजव छपा, यके प्रकाशित करीहै, इसमें सामायक सूत्रविधि, तथा राई, देवशी प्रतिक्रमणसूत्रविधि, तथा जिनमंदर जाने की १० त्रिक सहित पूजन करनेकी, तथा पांच शक्रस्तव देववंदन विधिहै। (तथा) वृद्ध अतीचार, सातेस्मरण, भक्तामर, कल्याण मंदर बडीशांत, सेवेंजरास, गोतमरास, परकी, चौमाशी, संवच्छरी प्रतिक्रमण, अठपहरी चउपहरी पोसादि, संपूर्ण सूत्रविधि है आशाहै कि धर्मज्ञपुरुष सर्व जैन शालाओमें ग्यानवृद्धीखाते शिक्षक लडकोंको इनाममें देकर ग्यानवृद्धीकरेंगे । न्यहै जो ग्यानवृद्धीकरै, करावे, करतांकी अनुमोदनाकरै, श्री जैन लक्ष्मीमोहन पाठशाला॥ नाश्री मो। गणिः nirwa अथ अनुक्रमणिका प्रारंभः। श्रीनवकार पंचमंगल १/वंदण वतियाए १८ प्रभातसामायकविधि १/पुखरवरदीवढे १९ थापना पडिलेहणके १३वोल, २ सिद्धाणं वुद्धाणं २० खमासमण गुरुवन्दना २ देयावञ्चगराणं २१ मुहपची पडिलेहणके २५ बोल ३ सुगुरु वांदणा २२ अंगपडिलेहणके २५ बोल ४/देवसियं आलो २३ करेमिभंते सामाइयं ६ आलोयण आजूणा.. २४ इरियावही ७वंदित्तसूत्र २६ तस्मुत्तरी करणेणं ७ अपभुछियोमि ८ आयरिय उवझ्झाए ३४ लोगस्स उज्जोयगरे ८ सकलतीर्थ नमस्कार ३५ राई प्रति क्रमणविधि ११/परसमयतिमर जयउ सामिहि २ चैत्यवंदन ११ संसार दावानल जैकिंचि, नमोत्युणं १२/पार्थजिन स्तुति जावैतिचेइ० जावंति. १३ अढाइजेस ४२ स्वसग्गहरं पासं १४ श्रीसीमंधरजिन चैत्यवंदन ४३ जयवीयराय १५/सीमंधरजिन स्तवन सव्वस्तवि देवसिय १६ सीमंधरजिन थुई १७ सिद्धाचलका चैत्यवंदन अन्नत्थू ससियेणं m w mm हामि काउसमें
निशान.
हमारी पाठशाला की, ... Artist, of
दुसरा भाग पाय के प्रकाशित किया कि वो
अनलाक के बारमास उपयोगी मोशा पोमा -
जादि संपूर्ण धर्म:य, तथा जनलोका Trn firi
मरण पर्यंत कुलागार, तथा अन इतिहामी ॥ तथापी
पुस्तक है इससे ये छोटी पुस्तक पहिली गोपटी मात्र छपा-
यके प्रकाशित करीहै, इसमें सामायक सूत्रविधि, तथा राई,
देवशी प्रतिक्रमणसूत्रविधि,तथा जिनमंदर जाने की १० त्रिक
सहित पूजन करने की, तथा पांच शक्रस्तव देववंदन विधि है ।।
(तथा) वृद्ध अतीचार, सातेस्मरण, भक्तामर, कल्याण मंदर
बडीशांत, सेजरास, गौतमरास, परकी, चौमाशी, संवच्छरी
प्रतिक्रमण, अठपहरी चउपहरी पोसादि, संपूर्ण सूत्रविधि है
आशा है कि धर्मज्ञपुरुष सर्व जैन शालाओमें ग्यानवृद्धीखाते
प्रथम शिक्षक लडकोंको इनाममें देकर ग्यानवृद्धीकरेंगे ।
धन्यहै जो ग्यानवृद्धीकर, करावे, करतांकी अनुमोदनाकरे,
श्री जैन लक्ष्मीमोहन पाठशाला॥
नाश्री मो। गणिः
॥ श्री॥
अथ राईदेवश्यादि प्रतिक्रमए।
सूत्रविधि लिख्यते ॥
॥ तत्र प्रथम।।
॥ प्रान्नातिक सामायिक विधि प्रारंन्नः।
॥अथ नवकार मंत्रः ॥
॥ णमो अरिहंताण ॥ १ ॥ गमा सिन्हा
॥२॥ णमो प्रारियाणं ॥३॥ मा नवज्ञा
याणं ॥४॥ णमो लोग सबमादृाणं ॥ ५॥ प
सो पंच मुक्कारो ॥६॥ सबपावग्याणामाणा ।।
॥ ७॥ मंगलाणं च सबसि ॥ ८॥ पहम हवड़
मंगलं ॥९॥ इति ॥३॥ यह नवकार तीन
बखत गुण के थापनाजीकी थापना करे, तब
तेरे बोल चिंतनो कहते हैं।
(२) ॥अथ थापनाचार्यजीकी तेरे पडिलेहणा॥ ॥शुद्ध स्वरूप धारूं ॥१॥ज्ञान ॥१॥दर्श न॥२॥ चारित्र ॥३॥ संहित सद्दहणा शुद्धि ॥१॥ प्ररूपणा शुद्धि ॥२॥ दर्शन शुद्धि ॥ ॥३॥ सहित पांच प्राचार पालुं॥१॥ पला ॥२॥अनुमोढुं॥३॥ मनोगुप्ति ॥१॥ व चनगुप्ति॥२॥ कायगुप्ति ॥३॥ एवं तेरे बोल श्रीधर्मरत्नप्रकरणसूत्रत्तिमें कहेहैं।इति ॥२॥ ॥पीछे गुरुजीके सामने अथवा थापनाचा यंजीके सामने खडा हो के तीन खमासमण देवे, सो लिखते हैं। ॥अथ खमासमण.॥ ॥ इनामि खमासमणो वंदिलं जावणिकाए निसीहिआए मबएण वंदामि ॥ इति ॥३॥ ॥अथ सुगुरुने शाता सुखपृष्ठा। ॥ इन्कार नगवन् सुहराइ,सुहदेवसी,सुख तप शरीर निराबाध सुखसंयम. यात्रा निर्वहो
डोजी ? स्वामी शाता बेजी? इति.॥४॥ ए
म गुरुने कही नमस्कार करे, तेवारें गुरु कहे
देवगुरु प्रसाद ॥
॥पनी नीचे बैठकें जिमणा हाथ नीचा करके
अनुहिनमि कहे पीठे खमासमण देके इच्छा
कारण संदिस्सह नगवन् सामायिक लेवा मु
हपत्ति पडिलेडे? गुरु कहे, पमिलेह. पठी इडं
कही दूजी खमासमण देई मुहपत्ती पमिलेहे ॥
॥ अथ मुहपत्ति पडिलेहणके पच्चीश बोल लिखते हैं।
।। सूत्र, अर्थ साचो सईहुं ।। १ ॥ सम्यक्त्व
मोहनी ॥२॥ मिथ्यात्व मोहिनी॥३॥मिश्र
मोहनी॥४॥परिहरूं. यह चार बोल मुहपत्ति
खोलती बिरीयां कहणा ।।
॥कामराग॥१॥स्नेहराग ॥२॥ दृष्टिराग
॥३॥परिहा यह सात बोल प्रथम कहीजें
॥ गरु॥१॥ सुदेव ॥ २॥ सुधर्म
। न० ॥सामायिक ठाउँ ? गुरु कहे वागह ॥ ॥ पी इकही खमासमण देइ थोमो झुकी तीन नवकार गुणी इशाकारेण संदिस्सह जग वन पसानकरी सामायिक दंमक जरावोजी।। गुरु कहे नचरावेमो ॥ पी करेमि नंते सामाइ यं इत्यादि सामायिक सूत्र तीन वार नचरे ॥ ॥अथ सामायिकर्नु पञ्चरकाण ॥ ॥ करेमिन्नते सामाइयं,सावळजोगं पच्चरका मि॥जावनियमं पङ्गुवासामि ॥ दुविहं तिबिहे ए मणेणं वायाएकाएण, न करेमि,नकारमि, तस्स नंते पमिकमामि निंदामि गरिहामि अ प्पाणं वोसिरामि ॥ इति ॥६॥ ॥पीठे खमासमण दे के इहाकारेण संदिस्सह नगवन् इरियावहियं पमिकमामि ॥ गुरु कहे पमिक्कमह. पीछे इ कही। इछामि पमिक्कमि इरियावहियाए इत्यादि पाठ कहे.सोलिखते हैं।।
(७)
॥ अथ दरियावहियं ।।
इलाकारेण संदिस्संह नगवन् ॥ इरियाव
हियं पडिकमामि ॥ इह इहामि पमिकमि ॥
॥ १॥ इरियावहियाए विराहणाए ॥२॥ गम
गोगमणे ॥३॥ पाणक्कमणे बीयकमणे हरियक्क
मणे॥सा नत्तिंग पणग दग मट्टी मक्कमा सं
ताणा संकमणे ॥४॥ जे मे जीवा विराहिया
॥५॥ एगिदिया वेइंदिया तेइंदिया चरिंदिया
पंचिंदिया ॥६॥ अनिहया वत्तिया लेसिया
संघाइया संघट्ठिया परियाविया ॥ किलामिया
उद्दविया गणानाणं संकामियाजीविया वव
रोविया ॥ तस्स मिचामि दुक्क ॥७॥ इति ॥
॥अथ तस्स उत्तरी॥
॥तस्स उत्तरीकरणेणं॥पायश्चित्त करणेणं ॥
विसोहीकरणेणं । विसल्लीकरणेणं ।। पावाणं
म्माणणिग्घायणछाए॥गमि कानसग्गं'
.
(१०)
सं कह के बली खमासमा दे कर इम० ॥
जगवन् बेसणी ठावं ? गुरु कहे वापह फेर र
छ कह के खमासमा देकर इनागाजल।
ज्ञाय संदिस्सान? गुरु कहे संदिस्सावेह॥ पत्री
इठं कह के वली खमासमण दे कर इलाज
ग० ॥ सिज्ञाय करूं ? गुरु कहे करह ॥ फेर ख
मासमण देके खडे होकर आठ नवकार कहक
र सिज्ञाय करे. तथा जोशीतकालादि होवे तो
खमासमण दे के इना॥न ॥ पांगरणो सं
दिस्सावं ? गुरु कहे संदिस्सावेह ॥ पीठे इहं
कह कर खमासमण दे कर इछा० ॥०॥पा
गरणो पडिग्घानं ? गुरु कहे पडिग्घाएह॥ पीठे
इठं कही वस्त्र ग्रहण करे तथा सामायिकवंत
अथवा पोसासहित श्रावक वांदे तो “वंदामों'
असो कहे. और कोई दूसरो वांदे तो, सिज्ञा
य करेह. एसें कहे ॥इति प्रनतिकसामायिक।
(११) ॥अथ राई प्रतिक्रमणविधिः प्रारंभः॥ ॥प्रथम एक खमासमण दे के इहा॥न चैत्यवंदन करूं ? गुरु कहे करह ।। पीनें इई क ही जयन सामि जयठ सामि इत्यादि कहे. सोही लिखते हैं। ॥अथ सकल तीर्थकर नमस्कारो लिख्यते ॥ ॥जयन सामिहि जयन सामिहि, रिसहसेत्तुंजि नतिपहु नैमिजिण, जयन वीर सच्चनरि मंण ॥ १ ॥ जरुअहिं मुणिसुवय, महु रिपासदुह दुरिय खमण ॥ अवरविदेहिं तिल यर, चिहुँदिसि विदिसि जंकेवि ॥ तीप्राणा गय संपइय. वंदं जिण सोवि॥२॥ । कम्मन्नूमिहि कम्मनूमिहिं पढम संघवण || सक्कोसन सत्तरिसत. जिणवराण विहरंत ल पई ॥ नवकोडीहिं केवलिण: कोडि सहस्स न व साहु संपय ।। संपइ जिपवर बीस मुणिं, विनं कोडीहिं वरनाण ॥ समणह कोडी सहस्स
(१४)
हे अ॥सवेसिं तेसिं पण ॥ तिविहेण तिदंक
विरयाणं ॥१॥इति ॥१५॥
॥अथ परमेष्टि नमस्कारः॥
॥ नमोऽर्हत्सिद्धाचार्योपाध्याय सर्व साधुभ्यः
॥अथ नपसर्गहरस्तवनं ।
॥ नवसग्गहरं पासं ॥ पासं बंदामि कम्म
घणमुकं ॥ विसहरविसनिन्नासं ॥ मंगलकल्ला
पावासं ॥१॥ विसहरफुलिंगमंतं ॥ कंठे
धारेइ जो सवा मणुन ॥ तस्स ग्गहरोगमारी॥
दुछ जरा जंति नवसामं ॥२॥चिन दरे में
तो॥ तुझ पणामो वि बहुफलो होइ॥ नरतिरि
एसुवि जीवा ।। पावंति न दुक दोहग्गं ॥३॥
तुह सम्मत्ते लद्दे ॥चिंतामणि कप्पपायवप्नहि
ए॥पावंतिअविग्घेणं ॥ जीवा अयरामरंगा
णं॥४॥इन संथु महायस ॥ नत्तिप्नरनि
परेण हिअएण ॥ ता देव दिऊ बोहिं ॥ नवे
पासजिणचंद ॥५॥इति ॥१६॥
(१५) ॥अथ जयवीभराय॥ ॥ जय वीराय जंगगुरु ॥ होउ ममं तुह पन्नाव जयवं नवनिवे॥ मग्गाणु सारि श्रा इह फलसिद्धी १॥ लोगविरुद्धच्चा॥ गुरुजणपूना परचकरणं च ॥ सुहगुरुजोगोत बयण सेवणा प्रानव मखण्डा ॥२॥१७॥ ॥इत्यादिजयवीयराय पर्यंत चैत्यवंदन करे। पीठे खमासमण दे के इहा०॥ न० ॥ कुसुमिण दुसुमिण राई प्रायवित्त विसोहणलं कानसग्ग करूं ? गुरु कहे करेह. पीठे इठं कह कर कुसु मिण दुसुमिण राई पायचित्त विसोहण करे मिकाउसग्गं॥अन्नलससिएणं ॥ इत्यादिपा ठकह के सोले नवकार अथवा चार लोगस्सका चंदेसु निम्मलयरा पर्यंत चिंतन कर के काम सग्ग करे॥ पी- णमो अरिहंताणं कह कर का उसग्ग पारिके मुखसें एक लोगस्सका पाठ प्र गट कहे, जोरात्रि में गुण संबंधि मोटको 16
लागो होवे तो कानसंग्ग माहे ॥सागरवरगं
नीरा पर्यंत चिंतये ॥ इती संप्रदायः॥
॥अब पमिकमणां गयवेका अवसर हुवा ।।
जब खमासमण देइ श्रीप्राचार्यजी मिश्रक
हिकें वांदीयें ॥१॥खमासमण देई श्रीनपाध्या
यजी मिश्र कहि के वांदीयें॥२॥खमासमण
देइ जंगम युगप्रधान वर्तमान नट्टारक श्रीपू
ज्यजीका नाम ले के वांदीयें ॥३॥ खमासमण
देइ के सर्व साधुजीकों वांदीयें ॥४॥ इस तरे
चार खमासमणसें पडिकमणांगवीगोमालायें
बैठकें मस्तक नमाय कर दोनुं हाथे मुहपत्तीमु
खे देकर सबस्सविराइय इत्यादि पाठकहे, परं
तु इलाकारेणसंदिस्सह इवं इसमाफकनकहे
॥ अथ सबस्सवि॥
॥सबस्सवि देवसिब दुचिंतित्र दुनासिय दु
चिठिन इकारेण सन्दिस्सह जगवन इ०
(१७)
तस्स मिहामि दुक्कम ।। इति ॥ १८॥ सवेरका
देवसी के ठिकाने राइयं ऐसा पाठ कहे ॥
॥ पीनें णमोहुणं कहके खमा होयके॥करेमि
नंते सामाइयं सावजोगं पच्चखामि॥ इत्यादि
क पाठ कहे ॥ पीलें इन्चामि गमि कानसग्गं
जो मे राइ० ॥ यह पाठ कहे, सो लिखते हैं।
॥अथ इच्छामि गामि॥
॥ इहामि गमि कानसरगं॥जो मे देवसिन
अइभारो कळ ॥ काइवाइ माणसि॥ठ
स्सुत्तो नम्मग्गो अकप्पो॥अकरणिको ।। दुशा
॥दुविचिंति प्रणायारो॥ अणिविप्रबोध
सावगपानग्गो। नाणेतह दंसणे चरित्ताचरित्ते
॥सुए सामाइए॥तिन्हं गुत्तीणं ॥ चनन्हं कसा
याणं ॥ पंचन्हमणुववाणं ॥ तिन्हं गुणबयाणं ।।
चनन्हं सिरस्कावयाणं ।। बारसविहस्स सावगध
म्मस्स ॥जं खंमिश्रं जं विराहिमं॥ तस्स
(१८) बामि दुक्कडं ॥ इति ॥ इहाँ देवसियके ठिकानें राइयं कहनां॥ इति ॥ १९॥ ॥पी तस्सत्तरी०॥अन्नबनससिएणं कह कर चारित्रशुद्धि निमित्त चार नवकार अथवा एक लोगस्सका कारसग्ग करे पारि के दर्शन शुद्धि निमित्त प्रगट लोगस्स कंही सबलोए अरिहंत चेईप्राणं ॥करेमि कास्सग्गं वंदण वत्तिश्राए॥ इत्यादि कहनां, सो लिखते हैं । ॥अथ वंदपवत्तिाए। ॥ वंदण वत्तिाए, पूअण वत्तिश्राए॥सक्का र वत्तिाए, सम्माण वत्तिाए ॥ बोहिलान वत्तिाए॥निरुवसग्ग वत्तिाए ॥१॥ सि हाए मेहाए धीईए ॥ धारणाए अणुप्पेहाए ॥ बट्टमाणीए गमि कानस्सग्गं॥२॥इति ॥२०॥ ॥पी अन्नतूकही चार नवकार(अथवा)एक लोगस्सका कानस्सग्ग करके पारके, ज्ञानाचार
(१९)
शुद्धि निमित्त पुरकरवरदी०॥सुअस्स नगवनक
रेमिकाउस्सरगी।इत्यादि पाठ कहे, सोलिखतेहै
॥ अथ पुरकरवरदी॥
।। पुरकरवरदीवट्टे. धायइसमे अ जंबुद्दीवे
अ॥नरहे रवय विदेहे. धम्माइगरे नमसामि
॥ १॥ तमतिमिर पमलविहंसणस्स: सुरगण
नरिंदमहिअस्स ॥ सीमाधरस्स वंदे, पप्फोडि
अमोहजालस्स ॥२॥ जाई जरामरण सो
गपणासणस्स: कल्लाण पुरकलविसालसुहावह
स्त ॥ कोदेव दाणव नरिंदगणचिअन्स, थ
म्मस्स सार मुवलन करे पमायं ॥३॥ सिद्धे
नो पवन मा जिणमए नंदी सया संजम ।।
देव नाग सुवन्न किन्नर गण स्सन नावच्चि
ए। लोगो जह पइहि जगमिणं, तेक्कनचा
सुरं ॥ धम्मो बट्टन सास विजयनः धन्नुत्तरं
वहन ॥इति॥२१॥ सुन्नल्स नगव करमि
कानस्सग्गं, वंदणवतियाए ॥ए पात्र
(२०)
कहकर अन्नत्ससिएणं कहके, आठ नवकार
अथवा दो लोगस्सका कानस्सग्ग करे. कान
स्सग्गके मांहे श्राजुणा चार प्रहर चिंतवे. सो
आगे लिखेंगे. पी सिन्हाणं बुदाणंका पाठ
कहे, सो लिखते हैं।
॥अथ सिद्धाणं बुद्धाणं॥
॥ सिद्धाणं बुद्धाणं, पारगयाणं परंपरगयाणं
॥ लोअग्ग मुवगयाणं, णमो सया सबसिहाणं
॥१॥जो देवाणवि देवो, जं देवा पंजली नम
संति ॥ तं देव देव महिलं, सिरसावंदे महाबी
रं ॥२॥ इक्कोवि नमुक्कारो, जिणवरवसहस्स
वडमाणस्स ॥ संसारसागराने, तारेइ नरं व ना
रिवा॥३॥ति सेल सिहरे, दिरका नाणं
जस्स ॥ तं धम्मचक्कवहि, अरिक
नमंसामि॥४॥चत्तारि अह दस दोय
जिणवरा चन्बीसं॥परमह निहित्रका
। सिद्धिं मम दिसंतु॥५॥इति ॥२२॥
(२१) ॥अथ वेयावञ्चगराणं॥ ॥ वेयावच्चगराणं संतिगराणं ॥ सम्महिछि समाहिगराणं करेमि कानस्सग्गं ॥ अन्नवू० ॥ इति ॥२३॥ पीवें संमासा प्रमान पूर्वक बैठ कें, तीसरे आवश्यग सूत्र वांदणां निमित्तें मुहपत्ति पडि से हुँ! गुरु कहे पडिलेहे॥मुहपत्ति पडिलेहे. पीठे वांदणां दे. तिनका विधि कहते हैं। ॥अवग्रहकै बाहिर कन्ना हा प्राधा नीचा नम कर, इहामि खमासमणो वंदित जावणि जाए निसीहिआए अणुजाणहमे मिनग्गरं.इत ना पाठ कह कर नूमि प्रमार्जन करता हूश्रा नि सोहि कहके कबुक अवग्रहमें प्रवेश कर के सं मासा प्रमाीन करके उक्कड बैठकें मावे हाथमें मुहूपत्तिले कें, मावे कानसें ले के जिमणा कान पर्यंत, निल्लाड पूंजी, मुहपत्ति आगें रख के ति सके मध्य नागमें गुरु चरणकी कल्पना
(२२)
र कें॥ अहोकायं इत्यादि आवर्त कर के कटक
नीचा नमकर मस्तकें अंजली करकें गुरु सन्मु
ख दृष्टि स्थापन कर के ॥ खमणिकोने किला
मो॥ इत्यादि पाठ कहे. पीठे फेर । जत्ता ने॥
इत्यादि प्रावर्तन कर के खमा होकें पीवें पगसें
भूमि पूंजता हूश्रा अवग्रहसें बाहिर निकलकें
स्वस्थान पर प्रावे. नहां ॥ प्रावस्सियाए।
इत्यादि पाठ सर्व कहे, सो लिखते हैं।
॥अथ सुगुरुवांदणां॥
॥ इहामि खमासमणो वंदिन, जावणिजाए
निसाहिआए॥अणुजाणह मे मिनग्गहं निसी
हि ॥अहो कायं काय, संफासं, खमणिको,
किलामो, अप्पकिलंताणं, बहु सुन्नेण ने, दि
वइक्वंतो, जत्ता ने जवणि ऊंच ने, खामे
खमासमणो, देवासभं वइक्कम्म, आवसि
पडिकमामि खमासमणाणं देवसिपा
आसायणाए तित्तीसन्नयराए जं किंचि मि
ने
(२३) बाए: मणदुक्कडाए वयंदुक्कडाए कायदुकडाए कोहाए, माणाए, मायाए लोनाए, सबकालि श्राए, सब मिहोवयाराए, सबधम्माइक्कमणा ए॥श्रासायणाए जो मे अइअारो कन, तस्स खमासमणो पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ १॥ दूजी वारके वांदणे श्रावसिाए ए पद न कहनां, अने राइयें राइन वइकतो. तथा चनमासीयें चनमासीवा कंतो, परकीय परको वइक्कतो, संवचरीयें संवत री वइक्वंतो॥इसीतरें पाठ कहेनां।। इति ॥२४॥ ॥ अथ देवसियं आलोठं ।। ॥ इहाकारेण संदिस्सह नगवन देवसियं बालोतं. इई पालोएमि जो मे० ॥ इति ॥ ॥ २५ ॥देवसियंके ठिकाने राइयं कहेनां ।। ॥ पीठें रात्रि संबंधि प्रतीचार गुरु समक्ष आलोवे, सो कहते हैं ।।
(२४)
॥ अथ आलोयण लिख्यते ॥
॥आजूणा चार प्रहर दिवसमें जे में जीव
विराध्या होय ॥ सात लाख टथिवीकाय ॥सा
त लाख अप्पकाय॥सात लाख तेऊकाय॥
सात लाख वाऊ काय॥ दशलाख प्रत्येक वन
स्पतीकाय ॥ चनदे लाख साधारण वनस्पती
काय ॥दोय लाख वेइंद्रिय ॥ दोय लाख तेंद्रि
य॥दोय लाख चौरिंद्रिय ॥चार लाख देवता
॥ चार लाख नारकी॥चार लाख तिर्यंच पंचें
द्रिय ॥ चनदे लाख मनुष्य ॥ एवं चार गतिके
चौराशि लाख जीवायोनिमें, महारे जीवें जे
कोइ जीव हएयो होय, हणाव्यो होय, हणतां
नलो जाएयो होय, ते सच्चे मन वचन
करी मिन्नामि दुष्कर्म ।। इति ॥२६॥
॥अथ अढारे पापस्थानक आलोन ॥
प्राणातिपात ॥१॥ मृषावाद ॥२॥
॥३॥ मैथुन ॥४॥ परिग्रह ॥५॥
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(२८) प्पसले, इन पमायप्पसंगणं ॥ ९॥ वह बंधन विजेए, अइ नारे लत्त पाण वुळेए ॥ पढम व यस्स इारे, पडिक्कमे० ॥१०॥बीए अणुवयंमि परिथूलगअलिअ वयण विरईन । आयरिस मप्पसले, इन पमायप्पसंगणं ॥११॥ सह स्सा रहस्सदारे, मोसुवएसे अकूमलेहे अ॥ बी यवयस्स इशारे, पडिक्कमे० ॥ १२॥ तइएअर णुवयंमि, थूलग परदवहरण विरईना आयरि अ मप्पस, इन पमायप्पसंगणं ॥१३॥ ते नाहडप्पगे, तप्पमिरुवे विरुद्ध गमणे अ॥ मतुल्ल कुममाणे, पडिक्कमे० ॥१४॥चनले अ णुवयंमि, निचं परदारगमण विरई ॥ प्राय रिश्रमप्पसबे, इन्च पमायप्पसंगणं ॥ १५॥ अपरिग्गहिश्रा इत्तर, अणंग वीवाह तिव अ णुरागे॥ चनन वयस्स इआरे, पमिक्कमे० ॥ ॥१६॥इत्तोअणुवएपंचमंमि,आयरिश्रमप्प सबंमि॥ परिमाण परिआए, इस पमाय प्पसं .
(२११) रहिवायो रे॥वीर०॥ ५॥ निर्यामक जवसमुनो रे, नव अटवी सववाह ॥ ते परमसर विण मिल्यां रे किम वाधे नछाहो रे॥ वीर० ॥ ६ ॥ वीर थकां पणश्रुत तणो रे हुंतो परम आधार ।। हमणां श्रुत आधार ने रे ए जिन आगम सारो रे ॥ वीर ॥७ ॥ .इण कालें सब जीवने रे, आगमथी आनंद ॥ध्यावो सेवो भवि जना रे, जिन पडिमा सुख कंदो रे । वीर० ॥ ८ ॥ गणधर आचारिज मुनी रे, सहुनें इण परिसिध ॥ व नव आगम संगथी रे, देवचं पद लीधो रे॥ वीर ॥९॥ इति निर्वाणकल्याणक स्तव०॥ ॥3॥ ।। अथ श्रीतीर्थमालास्तवनम् ॥ ॥शत्रुजय रूपन्न समोसरयाः जला गुणनरया रे॥ सीधा साधु अनंत तीरथ ते नमुं रे, ॥ तीन कल्याण क तिहां थयां: मुगतें गया रे॥नेमीसर गिरनार ॥ती० ॥१॥ अष्टापदएक देहरो, गिरिसेहरो रे।। जरतें जराच्या विंब ॥ ती० ॥आधु चौमुख अति जलोः त्रिनुवनतिलो रे॥ विमल वसइवस्तुपाल। ती० ॥२॥समेतशिखर
(२१२)
सोहामणोरलीयामणो रे॥सिद्धा तीर्थंकरवीशाती.
नयरी चंपा निरखीये, हीये हरखीयें रे॥ सिधा श्रीवार
पूज्य ॥ती०॥३॥ पूर्व दिशें पावापुरी, झवें ज
रे॥ मुक्ति गया महावीर ॥ ती॥जेसलमेर जुहान
ये, पुःख वारीयें रे॥अरिहंत विवअनेक ॥ ती०॥४
वीकानेरज वंदीयें, चिर नंदीयें रे॥अरिहंत देहरा
उ॥ती॥सोरिसरो संखेसरो. पंचासरो रे॥ फलोध
थंत्रण पास ॥ती० ॥५॥ अंतरीक अंजावरो, अम
ऊरो रे॥ जीरावलो जगनाथ ॥ ती० ॥ त्रैलोक्य दी
क देहरो, जात्रा करो रे॥राणपुरे रिसहस ॥ ती०
॥६॥श्रीनाडुलाई जादवो गोमी स्तवो रे॥ श्रीव
काणो पास ॥ ती० ॥नंदीश्वरनां देहरा, बावन जना
रे॥ रुचक कुंडल चार चार ॥ ती॥ ७ ॥ शाश्वती
अशाश्वती, प्रतिमा बती रे॥ स्वर्ग मृत्यु पाताल ती
॥तीरथ जात्रा फल तिहां होजो मुफ इहां रे॥ समय
मुंदर कहे.एम ॥ती०॥८॥इति ॥
॥अथ सिद्धाचल स्तवनम् ॥
"आज आपेंचालो सहीयो सिद्धाचल गिर जइवे
M
(२१३) ॥ सुण वहेनी ए गिरनी महिमा: आदि जिनंद इम नाली ॥ जरतादिक नरपतिने आगल इंशदिक सहु साखी रे॥आज०॥१॥ण गिरिवरिये काल अनंते साधु अनन्ता सीधा ॥ जनम मरणनां पुःख गेडीने, अमल अखय गुणा लीधा रे ॥आ० ॥२॥ण गिरि सनमुख पगला परतां आतम शुध सुनावें ॥कोम नवांरा पातक कीधाः एक पलकमें जावे रे॥०॥ ॥३॥ सासतो तीरथ ए शेठेजो जोतां लागे मीठो ॥ तीन नुवनमें इण गिरि तोले: बीजो कोइन दीठो रे ।। आशानीरंजनथुनेह धरीने आगें नजग करस्यां। अद्भुत आदि जिनेसर निरखी, प्रेम सुधारस पीस्यां रे ॥०॥५॥ पुहप सुगंधा लेइ पचरंगा, हार सु गंधा गूंथी। पहिरावी प्रनु कंठे लहिस्यां, शिव मार गनी सूथी रे॥०॥६॥गहिर स्वरें जिनवर गुण गातां यात्र नवाणूं करिये ॥ मन गमती जमती विच जमतां, नव सायर निसतरिये रे॥ आ० ॥७॥ पूरव नवाणू वार प्रथम जिन, रायण रुंखे आया ॥ ए. रथ शुन्न जावे फरशीः करिये निरमल काया (२१४) ॥०॥८॥लान नदे ए गिरिवर लहियेंकहे इम केवल नाणी॥ श्रीजिनचंद सदा हित बहलः प्रेम घणे चित आणी रे॥आ०॥९॥ ॥॥॥॥ इति सिघाचल स्तवनम् ॥ ॥॥ |||| ॥अथ उपदेशमाला पोसह सिझायलि०॥ ॥ जग चूडामणिनून नसनो वीरो तिलोय सिरि तिलन॥ एगो लोगाइचो, एगो चरक तिहुअणस्स ॥ ॥१॥ संवहरमुसन्न जिणो उम्मासे वचमाण जिण चंदो ॥ विरहिया निरसणा:जए आए बमाणेणं ।। ॥ २॥ जइता तिलोयनाहो, विसहइ बहुयाई असरि सजणस्स ॥ इयजीयंतकराई, एस खमा सवसाहुणं ॥३॥ न चइआइ चालेन, महइ महावच्माण जिण चंदो ॥ नवसग्ग सहस्सेहि वि, मेरु जहा वाय गुंजाहि ॥४॥ दो विणीय विणन, पढम गण हरो समत्त मु यनाणी ॥ जाणतो वि तमहं, विम्हिय हियन सुपर सर्व ॥५॥जं आणवेइ राया, पयइन तं सिरेण इति ॥श्य गुरुजण मुह जणियः कयंजलिनडोहिं मोयत्वं ।।
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(२१६ )
॥१५॥ संवाहणस्सरणो, तइया वाणारसीइ नयरीए।
कन्ना सहस्समहियं, अासी किररूववंतीणं ॥१६॥ तह
वि य सारायसिरी नबटुंती न ताश्या ताहि ॥ नपरति
एण इक्के ण, ताइया अंगवीरेण ॥१७॥ महिलाणसु
बहुयाण वि, मजान इह समत्त घरसारो ॥रायपुरिसे
हिं निझाइ, जणेवि पुरिसो जहिनहि ॥१८॥ किं पर
जण बहुजाणा वणाहिं, वरमप्प सरिकयं मुकयं ॥ इह
नरहचक्कवट्टी, पसन्नचंदो य दिलंता ॥ १९॥ वेसो वि
अप्पमाणो, असंजम पएसु वट्ठमाणस्स ॥ किं परियत्ति
यवेसं, विसं न मारेइ खांत ॥२०॥धम्म ररका वेसो.
संका वेसेण दिरिकनमि अहं ॥ नम्मग्गेण पडतं रकर
राया जणवन य ॥२१॥ अप्पा जाणइ अप्पा: जहठि
अप्पसरिकन धम्मो॥अप्पा करेइ तं तह, जह अप्प
सुहावहं होई ॥ २२ ॥ जं जं समयं जीवो, आ
विस्सइ जेण जेण नावेण ॥ सो तमि तंमि समए,
सुहासुहं बंधए कम्मं ॥ २३ ॥ धम्मो मएण हुँतो.
तीनवि सीन्ह वायविकडिन ॥ संवहरमणसीन,
।
(२१७)
वाहुबली तह किलिस्संतो ॥२४॥ नियगमइ विग
प्पिय चिंतिएण, सहंदबुधिचरिएण ॥ कत्तो पारत्त
हियं, कीरइ गुरु अणुवएसेणं ॥ २५ ॥ थचो निरोव
यारी, अविणीनं गविन निरवणामो। साहुजणस्स गर
हिन, जणेवि वयणिजायं लहइ ॥ २६ ॥ थोवेण विस
प्पुरिसा, सणंकुमार बकेश् वुझंति ॥ देहे खणपरिहाणी:
जंकिर देवेहिंसे कहियं ॥ २७॥ जपता लवसत्तमसुर,
विमाण वासीवि परिवडंति सुरा ॥ चिंतित सेसं, सं
सारे सासयं कयरं ॥ २८ ॥ कहतं जन्नइ सुरकंः मुचि
रेण वि जस्स पुरकमलिहियए ॥जं च मरणा वसाणे:
नव संसाराणुवंधिं च ॥ २९॥ बएस सहस्सेहि वि:
बोहितांतो न बुझई कोई ।जह बनदत्तरायाः उदार
निवमारने चेव ॥ ३० ॥ गयकन्न चंचलाए. अपरिच
त्ताइ रायलहीए ॥ जीवासकम्म कलिमल नरियन
रातो पति अहे ॥३१॥ वोत्तूणवि जीवाणं. मुद
राति पावचरियाई॥ जयवंजा सा मासा. पक्षापमोह
इणमो ते ॥३२॥ पडिवजाऊणदोसे नियए सम्म
॥ - (२१८) पायवडियाए ॥ तो किर मिगावईए, नप्पन्नं केवल नाणं ॥ ३३ ॥ इति पोसह सिज्ञा०॥ ॥ अथ राईसंथारा पोसह सिज्ञाय ॥ ॥ निस्सिही निस्सिही नमो खमासमणाणं, गोयमा ईणं महामुणीणं ॥ नधकार ३. करेमि नंते ३, कहिये. अंणुजाणह चिठिका अणुजाणह परमगुरुः गुणगणरय णेहि मंडिअसरीरा॥ बहुपडिपुन्ना पोरिसी, राससंथारए गमि॥१॥अणुजाणह संथारं, बाहुवहाणेण वामपा सेण।। कुकंड पाय पसारण, अंतरं तु पमझए नूमि ॥२॥ संकोश्य संडासं, नवतेय काय पडिलेहा ॥ दवाइ नवनगं, ऊसासनिरंजगालोयं ॥३॥ जइ में हुजी पमान इमस्स देहरिसमाइ रयणीए॥आहार मुवहि देह, सवं तिविहेण वोसरियं ॥४॥आसव कसाय बंधन, कल हा नरकाण परपरीवान ॥ अरइरई पेसुन्नं माया मोस च मिबत्तं ॥५॥वोसिरिसु इमाई मुकमग्ग, संसग्ग विग्घ प्राइं॥ दुग्गइनिबंधणाई, अहारस पावहा पाई॥६॥ एगोहं नलिमे कोवि, नाहमन्नस्स कस्सवि
(२१९)
॥ एवं प्रदीण मणसो, अप्पाण मणुसासए॥७॥ ए
गो मे सास ने अप्पाः नाणदसणसंजुन । सेसा मे वाहि
रा नावाः सवे संजोगलरकणा ॥ ८॥ संजोग सूला
जीवेण: पत्ता पुरकपरंपरा ॥ तना संजोग संबंध सवं
तिविहेण वोसिरे ॥९॥ अरिहंतो महदेवोः जावजीवं
मुसाहुणो गुरुणो । जिणपन्नत्तं तत्तः यसम्मत्तं
मए गहियं ॥१०॥ चत्तारिमंगलं: अरिहंता मंगलं.
सिघ मंगलंः साह मंगलं- केवलिपन्नत्तो धम्मो मंगलं
चत्तारिलोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिधा लोगुत्त
मा- साह लोगुत्तमाः केवनि पन्नत्तो धम्मो लोगुत्तमो
॥ चत्तारि सरणं पवसामि अरिहंते सरणं पवजामि.
सिझे सरणं पदकामि- साहमरणं पवळामि केवलि प
नत्तं धम्म मरणं पवजामि ।। अरिहंता मंगलं मन. अ
रिहंता मज देवया ।। अरिहंता कित्ति अत्ताणं. वोमिरा
मित्ति पावगं ॥ १॥ सिद्धाय मंगलं मन मिनाय नम
देवया । सिचाव कित्ति अत्ताण- वोनिरामिनि पाडगं
॥२॥आयरिया मंगलं मनमायरिया मादेवया ॥
आयरिया कित्ति प्रतावं. दोमितामिनि पादनं॥३॥
(२१८') पायवडियाए ॥ तो किर मिगावईए, नुप्पन्नं केवलं नाणं ॥३३॥ इति पोसह सिज्ञा०॥ ॥॥ ॥ अथ राईसंथारा पोसह सिशाय ॥ ॥ निस्सिही निस्सिही नमो खमासमणाणं, गोयमा ईणं महामुणीणं ॥ नघकार ३, करेमि नंते ३, कहिये. अणुजाणह चिहिडा, अणुजाणह परमगुरुः गुणगणरय णेहि मंडिअसरीरा ॥ बहुपडिपुन्ना पोरिसी, राससंथारए गमि॥१॥अणुजाणह संथारं, बाहुवहाणेण वामपा सेण।। कुकंड पाय पसारण, अंतरं तु पमझाए नूमि ॥२॥ संकोश्य संडासं, नवट्टतेय काय पडिलेहा ॥ दवाइ नवगं, ऊसासनिरुंनणालोयं ॥३॥ जइ मे हुजी पमान इमरस देहरिसमाइ रयणीए|पाहार मुवहि देहं, सवं तिविहेण वोसरियं ॥४॥आसव कसाय बंधन, कस्त हा नरकाण परपरीवान ॥अरइरई पेसुन्नं माया मोसं च मिचत्तं ॥५॥वोसिरिसु इमाई मुरकमग्ग, संसग्ग विग्घ नूआई॥ मुग्गइनिबंधणाई, अठारस पावटा पाई॥६॥ एगोहं नलिमे कोवि, नाहमन्नस्स कस्सवि ..
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(२२०)
ज्वझाया मंगलं मज्ञानवझाया मज्ञ देवयानवझाया
कित्ति अत्ताणं, वोमिरामि त्ति पावगं ॥४॥ साहूणो
मंगलं मझ, साहूणो मझदेवया॥ साहूणो कित्ति अत्ता
ए, वोसिरामि त्ति पावगं ॥५॥ पुढवि दग अगणिमा
स्य, इक्किकेसत्त जोणि लरकान॥ वणपत्तेय अणंते दस
चन्दसजोणि लरकान॥१॥विगलिदिएसु दोदो, चनरो
चनरोयनारय सुरेसु॥तिरिएसु हुंति चनरो, चनुदसल
काय मणुएसु॥२॥खामेमि सबजीवे, सत्वे जीवाखमंतु मे
मित्ती मे सबनूएसुवेर मज्ञ न केणवि॥३॥ एवमहं
आलोइम, निदिअ गरहिन पुगंनियं सम्मं ॥ तिवि
हेण पमिकतो, वंदामि जिणे चन्चीसं ॥ ४ ॥ खमिश्र
खमाविषमइखमिश्र, सबहजीव निकाय॥ सिघहसाख
आलो यणह, मशहवेरन नाय ॥५॥सबे जीवाकम्म
वसु, चन्दहरफनमंतु॥ ते मई सब खमाविया, मझ
वितेह खमंतु ॥६॥इति राई संथारा गाथा स०॥
॥अथ निंदावारक सशाय ॥
॥ निंदा म करजो कोनी पारकी रे, निंदानां
(२२१) बोल्या महा पाप रे॥ वयर विरोध वाधे घणो रे, निं दा करतां न गणे माय बाप रे॥ निं०॥ १ ॥ दूर व संती कां देखो तुम्हें रे, पगमां बलती देखो सहु कोय रे। परना मेलमां धोयां लूगडा रे, कहो केम ऊजला होय रे॥निं० ॥२॥ आप संजालो सहुको आपणो रे निंदानी मूको परी टेव रे॥ थोमे घणे अवगुणे सहु जरया रे: केहनां नलीया चुए केहनां नेव रे ॥ नि. ॥३॥ निंदा करे ते थाये नारकी रे, तप जप कीg सहु जाय रे॥ निंदा करोतो करजो आपणी रे. जेम बूटकवारो थाय रे॥ निं०॥ ४॥ गुण ग्रहजो सहुको तणो रे. जेहमां देखो एक विचार रे- कृष्णपरें थे सहु सुख पामशो रे, समयमुंदर सुखकार रे॥ निं०॥५॥ ।। अथ शीता सिज्ञाय लिख्यत ।। ॥ जल जलती मिलता वणी रे: कालो जाल अपा ररे। सुजाण शीता ॥ जाणे केलू फूलियारेलाल, राता खर अङ्गार रे॥१०॥१॥धाज करे शीतासती रेलाल ॥शाल तण पारंमाण रेसु०॥ लक्ष्मण (।
- (२२२) खुशी थया रेलाल, निरखे राणो राण रे॥सु०२ ॥ स्नान करी निरमल जलें रेलाल, पावक पासें आयरे सु०॥३॥कली जाणे सुराङ्गना रे लाल, अनुपम रूप दिखाय रे॥ सु०॥३॥नर नारी मिलीया घणां रेलाल, ऊना करे हाय हाय रे सु० ॥ भस्म हुशी इण आगमें रेलाल, राम करे अन्यायः रे।मु० ॥४॥ राघव बिन बांग्यो हुवे रे लाल, सुपनेही नही कोय रेसु०॥५॥तो मुझ अगन प्रजालजोरे लाल, नहीं तो पाणी होय रे ॥सु०॥५॥ इम कहि पेठी आगमें रेलाल, तुरत अगन थयो नीर रे.॥ सु०॥ जाणे ह जलशुंजस्योरेलाल, फीले धरम सुधीर रे॥सु०॥६॥ देव कुसुम वरषा करे रे लाल, एह सती शिरदार रे। सु०॥शीता धीजे कतरी रे लाल, साख नरे संसार रे॥सु०॥७॥ रलियायत सहुको थया रे लाल, सगले थया कारंग रे॥सु० ॥ लक्ष्म ण राम खुशी थया रे लाल, शीता शील सुरंग रे॥ सु०॥८॥जगमाहे जश जेहनो रे लाल, अविचल
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(२२४) मान ॥ ला०॥धरमसिंह मुनिवर कहे, मुगति तणुं ए निदान ॥ला०॥६॥ कर०॥ ॥ 11॥ इति प्रतिक्रमण सिझाय सं०॥ ॥१॥ ॥अथ मंगलीक सरणा लिख्यते॥ ॥ मह छीने समरीजे हो।नवियण मंगलीक सर णा चार ॥ आपदा टाले संपदा हो ॥०॥ दोल तनो दातार ॥ हियडे राखीजे हो ॥ ॥१॥ अरिहंत सिघ साधां तणोहो ॥०॥ केवलि नाष्यो धर्म ॥ए चारूं जपता थकां हो॥०॥ टूटे आई कर्म ॥ हि० ॥२॥ए चारूं सुखकारि हो ॥०॥ ए चा रूं मङ्गलिक ॥ ए चारूं नत्तम कह्या हो॥०॥ ए चारूं तहतीक ॥ हि०॥३॥ गेले घाटे चालतां हो ॥०॥ समरूं वारंवार ॥ गामे नगरे चालता हो । ॥०॥ विश्न निवारण हार ॥ हि०॥४॥ माकण साकण नूतमा हो ॥०॥ सिंह चित्ताने सूर ।। वैरी उसमन चोरटा हो॥०॥रहे सदाई दूर ॥ हि०॥ ॥५॥ मुख शाता वरते वणी हो ॥ ॥ जे ध्यावे नर नारः॥ परजव जातां जीवने हो ॥न॥सरणाको (२२५) आधार ॥ हि ॥६॥राखो सरणाकी आसता हो । ॥०॥नेमो नही आवे रोग ॥ वरते आनंद सुख सही हो॥०॥ वाला तणो संयोग ॥ हि०॥ निशि दिन याक्कुं ध्यावतां हो॥॥ जीव तणो उधार ॥ कमी नही कोई वस्तुनी हो ॥नयोही जगमें सार ॥ हि०॥ ८॥ मनचिंता मनोरथ फले हो॥०॥वर ते कोर कल्याण | शुध मने करी समरता हो॥०॥ निश्चेपद निरवाण । हि॥९॥ए सरणाने ध्यावतां हो । न० ॥ नाम तणो आधार ॥ ए सरणाकी किरती कही हो॥०॥ध्यावो मनह मकार ।। हि० ॥१०॥ संवत् अढारे बावने हो॥०॥ पाली सेहर सुखकार। चोथमक्ष इम वीनवे हो ॥न ॥ सुनजो बाल गो पाल ॥ हि० ॥११॥ इति श्रीमंगलीक सरणा ॥४॥ ॥अथ कल्याणमंदिरस्तोत्र ।। ॥ कल्याणमन्दिर सुदारमवद्यन्नदि । नीता नय प्रदमनिन्दित मंहपद्मं । संसारसागरानिमझदशेषजंतु। पोतायमानमनिनम्यजिनेश्वरस्य ॥१॥ यस्यस्वयं सुर
(२२६)
गुरुगरिमांबुराशेः। स्तोत्रं सुविस्तृतमति नविजुर्विधातुं।
तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतो। स्तस्याहमेष किल
संस्तवनं करिष्ये ॥ २ ॥ (युग्मं ॥) सामान्यतोपि
तव वर्णयितुं स्वरूप ।मस्मादृशाः कथमधीश नवत्यधी
शाः। ष्टोपि कोशिकशिशु यदिवादिवांधो । रूपं प्ररू
पयति किं किलधर्म रश्मः ॥३॥मोहल्या दनुजवन्न
पि नाथमयों । नूनं गुणान् गुणयितुं न तव कमेत ।
कल्पान्तवान्तपयसः प्रकटोपि यस्मा। न्मीयेत केन ज
लधे ननु रत्नराशिः॥४॥ अभ्युद्यतोस्मि तवनाथ ज
माशयोपि । कर्तुंस्तवं लसदसंख्य गुणाकरस्य । बालो
पि किं ननिजबाहु युगं वितत्य । विस्तीर्णतां कथयति
स्वधियांबुराशिः॥५॥ये योगिनामपि न यांति गुणा
स्तवश । वक्तुं कथं नवति तेषु ममावकाशः जातातदेव
मसमीक्षित कारितेयं । जल्पति वा निजगिरा ननु पदि
गोपि ॥६॥प्रास्ताम चिंत्यमहिमा जिनसंस्तवस्तानामा
पिपाति नवतोरजगंतितीव्रातपोपहतपांथ जनान्निदा
वे । प्रीणाति पद्मसरसः सरसोनिलोपि ॥७॥हर्तिनि
(२२७) त्वयिविनोशिथलीनवंति । जंतोकणन निवमाअपि कर्मबंधाः । सद्यन्नुजङ्गममया इवमध्य नाग ।मभ्या गते वनशिखांमनिचंदनस्य ॥वामुच्यंत एव मनुजाः सहसा जिनेंद्र । रोट्टै रुपद्रवशते स्त्वयिवीवितेपि । गौ स्वामिनि स्फुरित तेजसि दृष्टमात्रै । ] रैरिवाशुपशवः प्रपलायमानैः ॥९॥ त्वंतारको जिनकथं विनां तएव । त्वामुग्रहंति हृदयेन यउत्तरंतः। यादृति स्तरति यकाल मेषनूना मंतर्गतस्यमरुतःसकिलानुन्नावः॥१०॥ यस्मिनहर प्रनृतयोपि हतप्रनावा। सोपित्वया रतिपतिः पिताहणेनः । विध्यापिता हुतनुजः पयसाथ येन । पीतं न किं तदपिपरिवामवेन ।। ११ ।। स्वामिण तुल्य गरिमाणमपिप्रपन्ना । स्त्वांजंतवः कथमहो हृदयेदधा नाः । जन्मोदधिं लघुतरंत्यतिलाघवन । चिंत्यो नहंत महतां यदिवा प्रज्ञाव ॥ १२ ॥ क्रोधस्त्वया यदि विनो प्रथमं निरस्तो। ध्वस्तास्तदावतकथं किलकर्मचौराः। प्लोषत्यमुत्र यदिवा शिशिरापिलोके । नीलगुमानि विपिनानि न कि हिमानी.॥१३॥ त्वां योगिनो (२२८) जिन सदा परमात्मरूप । मन्वेषयतिहृदयां बुजकोश देशे। पूतस्य निर्मलरुचेर्यदिवा किमन्य । दक्षस्य संन विपदं ननुकर्णिकाया॥१४॥ध्याना जिनेश अवतो नविनः कृणेन । देहविहायः परमात्मदशां बजंति । ती बानलाउपलनाव मुपास्यलोके । चामीकरत्वमचिरा दिवधातुन्नेदाः॥१५॥ अन्तं सदैव जिन यस्य विना व्यसेत्वं । जव्यै कथं तदपि नाशयसे शरीरं। एतत्स्वरूप मथ मध्यविवर्तिनोहि । यनिग्रहं प्रसमयंति महानुन्ना वाः॥१६॥ आत्मामनीषिनिस्यं त्वदन्नेदबुच्या। ध्या तोजिनेंद्रनवतीहः भवत्पन्नावः । पानीयमप्य मृतमि त्यनु चिंत्यमानं । किं नामनो विषविकार मपाकरोति ॥१७॥ त्वामेव वीततमसं परवादिनोपि । नूनं विनो हरिहरादि धियाप्रपन्नाः । किंकाचकामलिजिरी शसि तोपि शंखो। नो गृह्यते विविधवर्ण विपर्ययेण ॥ १८॥ धर्मोपदेशसमये सविधानुनावा । दास्तांजनोनवति ते तरुरप्यशोक । अभ्युजते दिनपतो समहीरहोपि । किंवा विवोधमुपयाति न जीवलोकः ॥१९॥ चित्रं (२२९) विनो कथमवाङ्मुखतमेव । विष्वकूपतत्यविरलासुर पुष्पवृष्टिः। त्वज्ञोचरे सुमनसां यदिवासुनीश, गहंति नून मधएवहि बंधनानि ॥ २०॥ स्थाने गन्नीरहदयो दधिसंनवायाः। पीयूषतां तव गिरः समुदीरयंति। पी त्वायतः परमसंमदसंगनाजो । जव्यावति तरसाप्य जरामरत्वं ॥ २१ ॥ स्वामिन् सुदूरमवनम्य समुत्पत न्तो । मन्ये वदंति सुचयः सुरचामरौघाः । यस्मैनति विदधते मुनिपुंगवाय । ते नूनमूर्धगतयः खनु शुचना वाः ॥ २२ ॥ श्यामं गनीरगिर मुज्वलहेमरत्न । सिंहा सनस्थमिहनव्य शिखंमिनस्तां । आलोकयन्ति रत्नसेन नदन्तमुच्चै । श्वामीकरादिशिरसी वनवांबुवाहं ॥ २३ ॥ उजहता तवशति शुतिमंमलेन । सुप्तबद हविरशोक त वनूव । सानिध्यतोपि यदिवा तव वीतराग । निरा गतां ब्रजति कोन सचेतनोपि ॥२४॥नो नो प्रमाद मवधूय नजध्वमेन । मागत्यनितिपुरी प्रतिमार्थवा हैं। एतनिवेदयति देव जगत्त्रयाय । नन्ये नवन्नति ननः सुरइंशनिले ॥२५॥ न्योति तेषु नत्तान - (२३०) नेषु नाथ । तारान्वितोविधुरयं विहताधिकारः। मुक्ता कलापकलितो सितातपत्र । व्याजात्रिधाततनु व मभ्युपेतः॥२६॥ स्वेनप्रपूरित जगत्त्रय पिमितेन । कांति प्रताप यशसामिव संचयेन । माणिक्य हेम रजत. प्रविनिर्मितेन शालत्रयेणनगवन्ननितोविनासि॥२७॥ दिव्यस्रजो जिन नमत् त्रिदशाधिपाना । मुत्सृज्यरतर चितानपि मौलिबंधान् । पादौ श्रयंति जवतो यदिवा परत्र । त्वतमङ्गमे सुमनसो नरमन्तएव ॥२८॥ त्वं नाथ जन्म जलधेर्विपराङ्मुखोपि । यत्तारयस्य सुमतोः निजपृष्टालग्नान् । युक्तंहि पार्थिव निषस्य सतस्तवैव । चित्रविनो यदसिकर्म विपाकशून्यः ॥ २९ ॥ विश्वेश्वरो पि जनपालक पुगतस्त्वं । किंवाकर प्रकृतिरप्य लिपिः वमीश । अज्ञानवत्यपिसदेव कथंचदेव । ज्ञानंत्वयि फुरति विश्वविकाशहेतुः॥३०॥प्रागनार संतन नांमि जांसिरोपा। इत्थापितानि कमठेन शठेन यानि। गया पेते स्तवननाथ हता हताशो। ग्रस्तस्त्वमी निरयमेव रंरात्मा ॥३१॥ यति धनोव मदद्मनीम !
(२३१) भ्रश्यत्तडिन्मुशल मांसलघोरधारं । दैत्येन मुक्त मथ स्तरवारिदः । तेनैवतस्य जिनस्तर वारिकृत्यं ॥३२॥ ध्वस्तोकेशविकृताकृतिमर्त्यमुंभ । प्रालंबद्भयदवक्र विनियंदग्निः। प्रेतब्रजः प्रतिनवंत मपीरितोयः। सोस्या नवत्पतिनवं नवपुःखहेतु ॥ ३३॥ धन्यास्त एव नुव नाधिपये त्रिसंध्य। माराधयंति विधिवनिधतान्यकृत्याः नक्युवसत्पुलकपदमलदेहदेशाः । पादश्यं तवविन्नो नुवि जन्मन्नाजः ॥३४॥ आस्मापार नववारिनिधौ मुनीशामन्येन मे श्रवणगोचरतांगतोसिआकर्णितेतु तवगोत्र पवित्रमंत्र । किंवा विपशिषधरी सविधंसमेति ।। जन्मांतरेपि तव पादयुगं नदेव । मन्ये मया माहित मी हित दानदहं । तेनेह जन्मनि मुनीश परानवानां । जातो निकेतन महं मथिता शयानां ॥३६॥ नूनं न मोहतिमिरा वृतलोचनेन । पूर्वविन्नो सकृदपि प्रविलो कितोसि । मर्मा विधौ विधुरयति हिमामनर्थाः ! प्रोच प्रबंधगतयः कथमन्यथे ते ॥ ३७ ॥आकर्णितोपि म हितोपि निरीदतोपि । नूनं नचेतसि मया वि (२३२) अक्त्या ! जातोस्मि तेन जनबांधवपुःखपात्रं । यस्मात क्रियाः प्रतिफलंति नन्नावशून्याः ॥३८॥ त्वं नाथ अखिजनवत्सल हे शरण्य । कास्रायपुण्यवसतेवशिनां वरेण्य । नत्यानते मयि महेश दयांविधाय ॥ दुःखांकु रोदलन तत्परतां विधेहि ॥ ३९ ॥ निःसंख्यसारशरणं शरणंशरण्यः। मासाद्यसादितरिपुप्रथितावदातं । त्वत्पा दपंकजमपि प्रणिधानवंध्यो । वध्योस्मिचेदूजुवनपावन हाहतोस्मि ॥४०॥ देवेन्द्रवंद्यविदिताखिलवस्तुसार। संसारतारकविनोन्नुवनाधिनाथ । त्रायस्व देव करुणा है दिमांपुनीहि । सीदंत मद्यन्नयद व्यसनांबुराशे ॥४१॥ पद्य स्तिनाथ नवदंति सरोरुहाणां । उक्त फलं किम पसंतति संचितायाः । तन्मत्वदेक शरणस्य शरण्यनू पाः । स्वामीत्वमेव नुवनेत्र जवांतरेपि ॥४॥ इत्थंसमा हेतधियो बिधिवजिनेंद्र । सांद्रोलसत्पुलक कंचुकि तां . । त्वबि निर्मल मुखांबुज बच्चलक्ष्या । तवविनो रचयांतिनव्याः ॥४३॥ जननयन ५५ । प्रनासुराःस्वर्गसंपदोजुक्ता।ते विगलितमल प निचया । अचिरान्मोतं प्रपद्यते ॥४४॥ ॥३॥ इति कल्याणमंदिरस्तोत्रं संपूर्णम् ॥॥ ॥अथ सेव्रुजरास॥ ॥॥श्रीरिसहेसरपायनमी आणीमनाणंद । रासन्न" रलियामणो । सेठेजनोमुखकंद ॥ १॥ संवत च्यारसतोतरे । हुवाधनेसरसूरि। तिण सेQजमहातम कियो । शिलादित्यहजूर ॥२॥ वीरजिणंदसमोसरया। से ऊपरजेम । इन्द्रादिक आगलिकह्यो । सेचूँजम हातमएम ॥३॥ सेलूंजतीरथ सारिपो । नहीं तीरथ कोय । स्वर्गमृत्यु पातालमें । तीरथसगलाजोय ॥४॥ नामेनवनिधिसंपजें । दीगंरितपुताय । नेटतां नव भयटलै । सेवंतांमुखथाय ॥ ५ ॥ जंबूनामैदीपए। द किन्नरतमकार । सोरठदेसरहामणो । तिहां के तीरथ सार ॥ ६ ॥ ॥ ढालपहिली । रामगिरी॥॥ । सेठेजोनेंश्रीपुंडरीक । सिच्छेत्रकर्ष तहतीक । दि मताचलनेकरं परणाम । एसेजेना इकवीसनाम ॥ {११॥ सुरगिरिने महागिरि पुन्यरास । श्रीपद पर्व (२३२) अक्त्या ! जातोस्मि तेन जनबांधवपुःखपात्रं । यस्मात क्रिया प्रतिफलंति नन्नावशून्याः ॥३८॥ त्वं नाथ पुःखिजनवत्सल हे शरण्य । कास्रायपुण्यवसतेवशिनां वरेण्य । नत्यानते मयि महेश दयांविधाय ॥ दुःखांकु रोद्दलन तत्परतां विधेहि ॥ ३९ ॥ निःसंख्यसारशरणं शरणंशरण्यः। मासाद्यसादितरिपुप्रथितावदातं । त्वत्पा दपंकजमपि प्रणिधानवंध्यो । बध्योस्मिचेदूनुवनपावन हाहतोस्मि ॥ ४०॥ देवेन्द्रवंद्यविदिताखिलवस्तुसार। संसारतारकविनोन्नुवनाधिनाथ । त्रायस्व देव करुणा है दिमांपुनीहि । सीदंत मद्यनयद व्यसनांबुराशे ॥४१॥ यद्य स्तिनाथ नवदंज्ञि सरोरुहाणां । भक्तेःफलं किम पसंतति संचितायाः । तन्मेत्वदेक शरणस्य शरण्यनू पाः । स्वामीत्वमेव जुवनेत्र जवांतरेपि ॥४॥ इत्यसमा हेतधियो बिधिवजिनेंद्र । सांद्रोजसत्पुलक कंचुकि तां नागाः । त्वप्रिंब निर्मल मुखांबुज बच्चलदया । संस्तवं तवविनो रचयतिनव्याः ॥४३॥ जननयन मुदचंद्र। मन्नासुराःस्वर्गसंपदोजुक्ता।ते विगलितमल (२३३) निचया । अचिरान्मोहं प्रपद्यते॥४४॥ ॥॥ इति कल्याणमंदिरस्तोत्रं संपूर्णम् ॥ ॥ ॥ ॥अथ सेव॒जरास॥ ॥॥श्रीरिसहेसरपायनमी। आणीमनग्राणंद । रासन रखियामणो । सेनुंजनोमुखकंद ॥१॥ संवत च्यारसतोतरे । हुवाधनेसरसरि। तिण से@जमहातम कियो । शिलादित्यहजूर ।। २॥ वीरजिएंदसमोसरया। सेञ्जैऊपरजेम । इन्द्रादिक आगलिकयो । सेजम हातमएम ॥३॥ सेहूंजतीरथ सारियो । नहीं तीरथ कोय । स्वर्गनृत्यु पातानमें । तीरथसगलाजोय ॥४॥ नामेनवनिधिसंपजें। दीगंरितपुताय । तां जब नयटल। सेवंतांमुखथाय ॥ ५ ॥ जंडूनामदीपए। द दिनरतमकार । मोउदेसमहामणो । तिहां से तीरथ सार ॥६ ॥ दालपहिली । रानगिरी॥ ।। सेठंजोनेंत्रीपुंडरीक । मित्रक वहतीक । वि मलाचखनेक परणाम । एमेजना इकवीसनांन । ॥१॥ हरगिरिने नहागिरि पुन्यराम । श्रीपद ५
(२३४)
इंद्रप्रकास । महातीरथपूरवेसुखकाम । ए०॥२॥ सास
तोपर्वतने दृढशक्ति । मुक्ति निलो तिणकीजैनक्ति ।
पुप्फदंत महापदम सुठाम । ए० ॥३॥ पृथ्वीपीठ सु
नद्र कैलाश । पातालमूल अकर्मकतास । सर्वकाम
कीजे गुणग्राम । ए०॥४॥श्रीसेव॒जैनाइकवीसनाम।
जपैजवेगप्रपणेठांम । सेठेजजात्रानोफल लहै । महा
वीरनगवंतइमकहै ॥ ५॥ ॥ दूहा ॥ ॥ सेठेजो
पहिलेअर, असीजायणपरमाण। पिहलो मूल ऊंचपण
ब्बीसजौयणजाण ॥१॥ सित्तरजोयणजाणवो । बीजै
अविशाल । बीसजोयणकंचोकह्यो । 'मुझवदणा त्रि
काल ॥२॥ साठजोयणतीजैअरै। पिहलो तीरथ
राय। सोलजोयण ऊंचोसही। ध्यानधरूं चितलाय॥
॥३॥ पचासजोयण पिहुलपण । चौथे अरै मकार ।
ऊंचो दसजोयण अचल । नितप्रणमें नरनार.॥४॥वार,
जोयण पंचम अरै । मूलतण विशतार । दोजोयण ऊंचो
अजे । सेठेजतीरथसार॥५॥सातहाथ है अरै । पिहलो
तीरथजेह । ऊंचाहोस्यै सनंधनुष । सासतोतीरथएह॥६
॥ ढाल.॥ जिनवरसुं मेरोमनलीणों ॥ ॥ केवल.
• .
(२३५) न्यानी प्रमुखतीर्थकर । अनंतसीधाइणठामरे । अनंत वली सीमसै इणठामै । तिणकरुं नितपरणामरे ॥१॥ सेवजैसाधुअनंतासीधा । सीकसीवलीय अनंतरे । जि पसेजतीरथ नहीनेट्यो । तेगरनावासकहंतरे । सेतुं० ॥२॥ फागुणसदि आठमने दिवसे । रिषनदेव सुख काररे । रायणरूंख समोसरचास्वामी । पूरबनिना' वा रे । से॥३॥ चरतपुत्रचैत्रीपूनमदिन । इणसेठेज गिरिभायरे । पांचकोडिसू मुमरीकसीधा । तिण पुंम रीक कहायरे । से०॥४॥ नमि विनमि राजाविद्याधर । वेवेकोडिसंघातरे। फागुणमुदिदशमी दिनसीधा । ति पप्रणमुंपरन्नातरे। से॥५॥ चैत्रमासवदि चन्दसने दिन । नमिपुत्री चौसछिरे । अणसणकरिसेठेजगिर क पर । एसहुसीधा एकछरे। से० ॥६॥ पोतरा प्रथम ती थैकर केरा । द्रावमने वारितिक्षरे । कातीनुदिपूनमदि नसीधा । दशकोडिमुं नुनिशिक्षरे । से० ॥७ पांचे पांमव इणगिरसीधा । नवनारद रिपिरायरे । संब प्रजून गया यहां सुगते। भालेकरमस!
(२६६)
से॥८॥नमिविना तेवीसतीर्थकर । समोसरया गि
रिशंगरे । अजितशांति तीर्थकरबेळं। रह्या चोमासोरं
गरे॥से॥९॥ सहससाधुपरिवारसंघात । थावचा
सुकशाधरे । पांचसै साधुसुं सेलगमुनिवर । सेजेजे सिव
सुख लाधरे ॥से०॥ १० ॥ असंख्यातामुनि सेव॒जै
सीधा। नरतेसरने पाटरे । राम अने जरतादिक सीधा
मुक्तितणी एवाटरे ॥से ॥ ११॥ जालिमयालीने नव
याली । प्रमुख साधुनीकोडिरे । साधुअनंता सेव॒जैसी
धा, प्रणमुंबेकरजोमिरे॥ से० ॥ १२॥ ॥ ढालचों
पाईनी ॥ ॥ सेजैनाकहुंसोलनधार । तेसुणिज्यो
सहुको सुविचार । सुणतां आणंद अंगनमाय । जनम
जनमना पातिकजाय ॥१॥ रुपनदेव अयोध्यापुरी।
समवसस्या स्वामी हितकरी । जरतगयो बंदणकाज
येनपदेसदियोजिनराज ॥२॥जगमां है मोटा अरिहं
तदेव । चौसठ इंद्र करजमुसेव । तेहथीमोटो संघकहा
य । जेहनें प्रणमें जिनवरराय ॥३॥ तेहथीमोटो संव
वीकह्यो । भरतमुणींने मनगहगह्यो । नरत कहेतेकिम
(२३७) पामिये । प्रनु कहै सेव॒जै जात्राकियै ॥४॥ नरतकहै संघवीपदमुश । थेप्रापोहुँ अंगजतुझ । इंद्राण्याअद तवास । प्रनु आपै संघवीपदतास ॥ ४ ॥ इंद्रेतिणवेला ततकाल । नरत सुन्नद्रा विहंनेमाल । पहिरावी घर सं प्रेडिया। सखरसोनाना स्थापिया॥६॥ रिपनदेवनी प्रतिमावली। रत्नतणीदीधीमनरली । रतै गणधर घरतेडिया । सांतिक पोष्टिक सहुतिहांकिया ॥ ७ ॥ कंकोत्रीमुंकी सहदेस । जरततेडायोसंघप्रसेस । आयो संघ अयोध्यापुरी । प्रथमथकी रथजात्राकरी ॥ ८ ॥ संव नगति कीधी प्रतिघणी । संघचलायो सेठंजान्नणी गणधर वाहूबलकेवली । मुनिवरकोमि साथेलियाव ली॥९॥ चक्रवर्तिनी सगलीरिधि। जरतें साथे ती धीसिधि । हयगयरथ पायक परवार । तेतो कहतां नावे पार ॥ १० ॥ नरतेसर संघवीकहवाय । मारगचैत्य व्य रतोजाय । संघ आयो सेढंजेपाम । सहुनीपूगी मननी आस ॥ ११ ॥ नयणे निरख्यो मेजराय। मणि माग मोत्यांसुं धाय । तिण गमें रही महोत्वक्यिो ।
( २३८) आणंदपुर वासियो॥१२॥ संघसेठेजा ऊपर चढ्यो। फरसंता पातिक ऊडपड्यो । केवलन्यानी पगला तिहां प्रणम्यारायण रूंख जिहां ॥१३॥ केवलन्यानी सना त्रनिमित्त । ईशानेंद्र प्राणीसुपवित्त । नदीसेजै सो हामणी । जरतेंदीठी कौतुकन्नणी ॥१४॥ गणधर देव तणे उपदेस । इंद्रेबलिदीधो आदेस । श्रीआदिनाथ तणोदेहरो। जरत करायो गिरिसेहरो॥१५॥ सोनानो प्रासाद नत्तंग । रतन तणी प्रतिमा मनरंग । जरते श्री आदीसरतणी। प्रतिमाथापी सोहामणी ॥ १६॥ मरुदे वानी प्रतिमानली । माहीपूनिम थापीरली । ब्राह्मी सुंदरी प्रमुखप्रासाद । भरतैथाप्या नवलैनाद ॥ १८ ॥ इमअनेक प्रतिमाप्रासाद । नरतकराया गुरुसुप्रसाद। भरततणोपहिलो नबार । सगलोही जाणै संसार ।। १९ ढाल सिंधूमो आसानरी ॥ ॥जरत तणे पाट आठमें दंम वीरज थयो रायोजी। जरत तणी परि संघकीयो। सेठेजसंघवी कहायो जी॥१॥सेजैघार सांगलो। सोलमोटा श्रीकारोजी । असंख्यात वीजावालि । तेह
(२३९)
नकहुं अधिकारोजी। सेना २॥ चैत्यकरायो रूपातणो।
सोनानो बिंबसारोजी । सूलगो विवनमारीयो । पति
मदिश तिणवारोजी । से०॥३॥ सेठेजेनी जात्राकरी
सफलकियो अवतारोजी । दमवीरज राजातणो ! एवी
जो नचारोजी ।। से॥४॥ सोसागरोपम वितिक्रम्या
दमबीरजथी जिवारोजी । ईशानेंद्रकरावीयो । एतीजो
उधारोजी॥से०॥५॥ चोथा देवलोकनो धणी । माहें
इनाम नदारोजी । तिणसेनंजनो करावीयो । ए चोथो
नधारोजी।से०॥६॥ पांचमा देवलोकनोधणी ।
महेंद्र समकित धारोजी । तिणसेāजैनो करावीयो । ए
पांचमो नधारोजी॥से० ॥७॥ नुवनपती इंद्रनोकी
यो । ए उसो घरोजी । चक्रवर्तिसगरतणोकीयो । ए
सातमो चारोजी ।। से० ॥ ८ ॥ अनिनंदन पाने नु
एयो । सेठेजनो अधिकारो जी। व्यंतररंद्र करावीयो
एआठमो नारोजी । से॥ ९ ॥ चंद्रप्रनुत्वामिनो
पोतरी । चंद्रशेपरनाम मल्हारोजी । चंद्रजसराय करा
वीयो । ए नवमो नद्धारोजी । मे ॥१०॥ शांतिनाथ
(२४०) नी सुणीदेशना। शांतिनाथ सुत सुविचारोजी। चक्र धर राय करावीयो । ए दशमो नद्धारोजी॥से० ॥११॥ दशरथसुत जगदीपतो । मुनिसुव्रत स्वामी वारोजी श्रीरामचंद्र करावीयो। ए इग्यारमो नद्धारोजी ॥से. ॥१२॥ पांमवकहै अम्हेपापीया किमवटां मोरीमायोजी। कहैकुंतीसेजतणी । यात्राकीयां पापं जायोजी ॥ से० ॥१३॥ पांचपांडव संघकरी । सेज नेव्यो अपारोजी। काष्टचैत्य बिंबलेपना। एबारमो उच्चारोंजी । से०॥१४॥ मभ्माणी पाषाणनी । प्रतिमां सुंदरसरूपोजी । श्रीसे ध्रुजैनो संघकरी। थापी सकल सरूपोजी। से॥१५॥ अष्टोत्तर सोवरसांगयां । विक्रमनृपथी जिवारोजी । पो खाडजावड करावीयो। एतेरमोनद्धारोजी।से०॥१६॥ संवत बार तिमोत्तरै । श्रीमाली सुविचारोजी। वाहडदे मुहतै करावीयो । ए चवदमो नधारोजी । से॥१७॥ संबत ते इकोत्तरै । देसल हर अधिकारोजी । समरै साहकरावीयो । ए पनरमो नद्धारोजी। से०॥ १८ ॥ संवत पनर सत्यासीयै । वैशाखवदि सुन्नवारों जी। --
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(५४)
॥ अथ देवसि पडिकमण विधि लिख्यते॥
प्रथम त्रण खमासमण देई ॥ इहा० ॥
सं० ॥न०॥ चैत्यवंदन करूं? गुरु कहे करेह, पी
में इदं कही ॥ जयतिहुश्रण कहे ॥ जिस
में परस्की तथा चनमासी तथा संवचरीके रोज
तीस गाथा कहेनी ॥ और दिनोंमें तो पांच
गाथा पहेलेकी, और दोय गाथा पिगडीकी,
एवं सात गाथा कहेनेकी प्रवृत्ति देखणेमें श्रा
वे हैं. अब जयतिहुप्रण लिखते हैं।
॥अथ जयतिहुअण लिख्यते ॥
॥जय तिहुश्रण वरकप्परुक जय जिण धन्नं
तरि, जय तिहुअण कल्लाणकोस दुरिअक्करिके
सरि ॥ तिहुण जण अविलंघियाण नुवणत्त
य सामिप्र, कुणसुसुहाई जिणेसपास थंनणय
पुरठिश्र॥१॥ तई समरंत लहंति झत्ति वर पु
त्त कलत्तहि, धम सुवन्न हिरण पुण जणजहि
रऊहि॥पिकहि मुरक असंखसुरक तुह पासप
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(५६)
॥६॥पडिअ अ अपबहिबन्नत्तिप्नरनिम्नर,
रोमं चंचिअचारुकाय किस्मरनरसुरवर ॥ जसु
सेवहि कमकमलजुअल परकालिअकलिमलु,
सो नुवणत्तयसामिपास महमद्दन रितबलाखा
जय जोइन मणकमलनसल नय पंजरकुंजर;
तिहुअपजण आणंदचंदनुवणत्तयदिणयराज
य मइमेइणि वारिवाह जयजंतु पिअामह, थंन
यहिश्र पासनाह नाहत्तणकुणमह॥८॥ बहु
विहवष्णुअवमु सुणुवमिन बप्पमहि,मुकधम्मु
कामबकाम नर नियनिय सबहि ॥ जं जायइ
बहु दरिसणन बहु नाम पसिद्धन, सो जोइ अ
मण कमलनसलसुह पास पवचन॥९॥ नय
विप्नल रणझणिरदसण थरहरिप्रसरीरय, तर
लिअनयणविसम्मुसुमुगग्गिरगिरकरुणय।।तइ
सहसत्तिसरंत्ति हुंति नरनासिअगुरुदर, महवि
अविसऊसइपास नय पंजरकुंजर ॥ १० ॥ पई
विसंतनित्तपत्तंतपवित्तिय,वाहपवाह
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॥
(६०)
हावन्नाव करुणारससत्तम।।समविसमह किंघणं
नएइ नुविदाहुसमंतर, इय दुहबंधवपासनाह
मइं पालथुणंतन ॥२४॥नयदीणहदीणयमुए
विश्राविकिविजुग्गय, जंजोइयन्वयारुकरइन
वयारसमुजय ॥दीणहदीणनिहीणजेणतुहनाह
पचत्तत, तोजुग्गनअहमेव पासपातहिमइंचं
गत ॥२५॥ अहामविजुग्गयविसेसकिविमम
हि दीणह, जंपासविनवयारुकरइ तुहनाहसम
ग्गह ॥ सुच्चिअकिल कल्लाणुजेण जिण तुम्ह प
सीयह, कि अगुंण तंचेव देव मामइअवहीरह
१.२६ ॥ तुह पत्रण नहु होइ विहल जिजाण
न किं पुण, हवं दुरिकन निरुसत्तचत्तदुक्कन नस्सु
यमण॥ तं मम निमिसेण एण एविकाइ ल
नइ, सञ्चं जं नुरिकयवसेण किं नंबरु पच्चइ ॥
॥ २७॥तिहुअणसामिप्रपासनाह मई अप्पप
यासिन,किऊन जनियरूवसरिसुनम[वहुजपि
न॥अणु ण जिणजगतुहसमोविदरिकपदयास
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(६०)
हावन्नाव करुणारससत्तम।।समविसमह किंघणं
नएइ नुविदाहुसमंतन, इय दुहबंधवपासनाह
मई पालथुणंतन ॥२४॥नयदीणहदीणयमुए
विप्रणविकिविजुग्गय,जंजोइयनवयारुकरइन
वयारसमुजाय ॥दीणहदीणनिहीणजेणतुहनाह
एचत्तन, तोजुग्गनअहमेव पासपालहिमइंचं
गन ॥२५॥ अहाविजुग्गयविसेसकिविमल
हि दीणह, जं पासविग्वयारुकरइ तुहनाहसम
ग्गह ॥ सुच्चिअकिल कल्लाणुजेण जिण तुम्ह प
सीयह, कि अप्सुण तंचेव देव मामइअवहीरह
॥२६॥तुह पत्रण नहु होइ विहल जिजाण
न किं पुण, हवं दुरिकन निरुसत्तचत्तदुक्कत नस्सु
यमण ॥ तं मन निमिसेण एण एनविजइ ल
नइ, सच्चं जं नुकियवसेण किं नंबरु पञ्चइ ॥
॥ २७॥तिहुअणसामिपासनाह मई अप्पप
यासिन, किऊन जंनियरूवसरिसुनमjबहुजपि
न॥अणु ण जिणजगतुहसमोविदकिपदयास
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(६२) नवियह नीम नवुड, नव अवणंता पंत गुण तुश तिसंग नमोबु ॥१॥इति ॥ ॥ पीउ शकस्तव कह के खडा हो कर.अरि हंत चेइयाणं०॥करेमि कालस्सग्गं वंदणवत्ति श्राए०॥अन्नहू० इत्यादि पाठ कह के काम स्सग्गमांहे एक नवकार चिंतवी एक श्रावक कामस्सग्ग पारी नमोऽर्हसिद्धा०॥कही एक गाथा स्तुति कहे, सो लिखते हैं। ॥ मूरति मन मोहन, कंचन कोमल काय ॥सिद्धारथ नंदन, त्रिशलादेवि सु माय ॥म गनायक लंडन, सात हाथ तनुमान ॥ दिनदि न सुख दायक, स्वामी श्रीवईमान ॥१॥ .. ॥ ए स्तुति एक श्रावक कहें. अरु दूसरे श्रावक सर्व कानस्सग्गमें रहे थके सुनें. पीने णमो अरिहंताणं कह के कास्सग्ग पारै, इसी तरे आगे पण स्तुतिकी चारोंगाथामें जानलेनां ,
(६५)
तस्सुत्तरी०॥अन्नतू०॥इत्यादि कहि कें,आठ न
वकारका कानस्सग करें, कालस्सग्गमाहा
जूणा चन प्रहर में ।।(इत्यादि)पाठ मन में चिंत
वी, णमो अरिहंताणं कही कानस्सग्ग पारिके
प्रगट लोगस्स कहे॥
॥पोनें संडासा प्रमार्जन पूर्वक वैठ के तीस
रे आवश्यक सूत्र वांदणां मुहपत्ती पमिलेहुं ?
गुरु कहे पमिलेहेह. पीठे मुहपत्ती पडिलेहि के
वांदणां देवे. पीठें अवग्रहमाहिज कलो थको
इहा॥सं०॥०॥ देवसियं अालोचं? असा
कहे. तब गुरु कहे बालोएह.पीठे इहं पालो
एमिः
• ॥ यह पाठ कह के प्रतीचार आलोवे
पीवें सबस्सवि देवसिय इत्यादिथी मामीने इ
हाकारेण संदिस्सह पर्यंत कहे: तब गुरु पनि
कमह, यह पाठ कहे।
॥ पीठे इतस्स मिहामि दुक्क कहि कें
संमासा प्रमाङि, प्रमार्जित नूमियें श्रासन पर
।
.
,
(६४)
गराणंअन्नद्ब० ॥ कही कानसग्ग पारी उक्त
स्तुतिकी चोथी गाथा कहे, सो लिखते हैं।
॥सिद्धायिका देवी, वारे विघनविशेष॥ सहु
संकट चूरे, पूरे प्राश अशेष ॥अहनिश कर
जोडी, सेवे सुर नर इंद॥ जंपे गुण गण इम,
श्रीजिनलान सुरिंद ॥४॥इति महावीरजिन
स्तुति ॥ यह चौथी स्तुति कहि के बैठ के नमो
बुणं कहे.पी एक खमासमण देके श्रीप्राचार्य
जीमिश्र, दूसरा खमासमण दीये पीवें श्रीनपा
ध्यायजी मिश्र.तीसराखमासमण देकर श्रीवर्त्त
मानाचार्यजीका नाम लेवे, चोथे खमासम
पो सर्वसाधुजी मिश्र, इसी तरें कह कर गोमा
लीयें बैठ के मस्तक नमावी सबस्सविदेवसिय०
इत्यादि कह कर तस्स मिहामि दुक्ककहे, परंतु
'इडाकारेण संदिस्सह इहं ' ए पद न कहे ॥
॥पी- खमेहोकर करेमि नंते सामाइयं०॥
म.गमि कानस्सग्गं जो मे देवसिन० ॥
।
(६७)
कानुस्सग्ग करै, पारि के पीठे दर्शन शुद्धि नि
मित्तें प्रगट लोगस्स कही सबलोए अरिहंत
चेइयाणं०॥ वंदणवत्ति० ॥अन्नतू ॥ कहि कें
एक लोगस्सका कामस्सग्ग करै, पारि के ज्ञान
शुद्धि निमित्ते. पुरकरवरदीवढे कहिकें, सुअस्स
नगव०॥ वंदणवत्ति० ॥ अन्नतू० ॥ कहि के
एक लोगस्सका कानस्सग्ग करे, पीठे पारि
के सिहाणं बुद्धाणं० कहिके, वेयावञ्चगराणं न
कहे. पीठे सुयदेवयाए करेमि कानस्सग्गं अन्न
तू० ॥ कहीं एक नवकारको काठस्सग्ग करे.
पीठे गुरुका योग न होवे तो एक श्रावक कान
स्सग्ग पारिके, णमोऽहत्सिद्धाः कहि कें, श्रुत
देवताकी स्तुति कहे. गुरु हुवेतो गुरु कहे. और
दूजा सर्व स्तुति सुण के कानस्सग्ग पारे.अब
श्रुतदेवताकी स्तुति कहे, सो लिखते हैं।
॥ अथ श्रुतदेवताकी स्तुति ।।
।। सुवर्णशालिनी देवाद्. हादशांगी जिन
.
(६६)
बैठ के नगवन् सूत्र लणं ऐसा कहे तब गुरु कहे
नणेह. पी. इदं कही तीन नवकार गुणी, तीन
करेमि नंते कहीने,इहामि पमिकमिन जोमे देव
सि इत्यादि कही एक श्रावक वंदित्तु कहे. दू
सरा सब सुनें. पी- खमा हो कर अनुनिमि
आराहणाएं इत्यादि संपूर्ण पाठ कही. दो वांद
णां देवे, अरु अवग्रह माहीज खमा हुवा इच्छा
॥सं०॥न० ॥ अनुछिनमि अग्निंतर देवसियं
खामेवं गुरु कहे, खामेह॥
॥ पीसें इलुखामेमिदेवसियं कहि कें, गोमाली
ये बैठकें, वाम हाथें मुहपत्ति मुखें धरकें, दक्षि
ण हाथ गुरु सनमुख करकें,सर्व पाउ कहे पीठे
विधिसेती दोवांदणांदेकर, प्रायरिय उवशाए
इत्यादि त्रण गाथा कहि के.करेमिनंते सामाइ
यं,इहामि गमिकानस्सग्गं, इत्यादि कही चारि
त्र शुद्धि निमित्तें करेमिकालस्सग्गं, अन्नतू०॥
कहि के श्राव नवकार अथवा दो लोगस्सका
(६७)
काठस्सग्ग करै, पारि के पीलें दर्शन शुद्धि नि
मित्तें प्रगट लोगस्स कही सबलोए अरिहंत
चेइयाणं० ॥ वंदणवत्ति० ॥ अन्नडू ॥ कहि के
एक लोगस्सका काठस्सग्ग करै, पारि के ज्ञान
शुद्धि निमित्ते, पुरकरवरदीवढे कहिकें, सुअस्स
नगवळ० ॥ वंदणवत्ति० ॥ अन्नबू० ॥ कहि के
एक लोगस्सका कामस्सग्ग करे. पी- पारि
के सिद्धाणं वुद्धाणं० कहिके. वेयावच्चगराणं न
कहे, पीलें सुयदेवयाए करेमि काउस्सग्गं अन्न
तू० ॥ कही एक नवकारको काउस्सग्ग करे.
पीवें गुरुका योग न होवे तो एक श्रावक कान
स्सग्ग पारिकें, णमोऽर्हत्सिद्धा० कहि के, श्रुत
देवताकी स्तुति कहे, गुरुहुवेतो, गुरु कहे, और
दूजा सर्व स्तुति सुण के कानस्सग्ग पारे.अब
श्रुतदेवताकी स्तुति कहे, सो लिखते हैं।
॥ अथ श्रुतदेवताकी स्तुति ॥
॥ सुवर्णशालिनी देयाद्, द्वादशांगी जिन
(६८)
द्भवा ॥ श्रुतदेवी सदा मह्य, मशेषश्रुतसंपदं
॥१॥पी खित्तदेवयाए, करेमि कानस्सग्गं०
॥अन्नतू०॥ कहि कें, एक नवकार चिंतवी पूर्व
ली परें क्षेत्र देवताकी स्तुति कहे, सो लिखते हैं.
॥अथ क्षेत्रदेवताकी स्तुति॥
॥ यासां क्षेत्रगताः संति, साधवः श्रावका
दयः॥ जिनाज्ञां साधयंतस्था, रक्षतु क्षेत्रदे
वताः॥३॥इति ॥
॥पी- खमा हुवा एक नवकार कही, सं
मासा प्रमार्जी उकडू बैठ के बठे आवश्यककी
मुहपत्ती पमिलेहुँ! गुरु कहे पमिलेहेह. पी
उ मुहपत्ति पमिलेही, विधिशुं दो वांदणां देई
इलामो अणसहि ॥ कही बैठे. पी गुरु एक
स्तुति कह्यां पीनें. श्रावक समस्त मस्तकें अंज
ली करिकें, णमो खमासमणाणं ॥ णमोऽहत्सि
। हा०॥कही। णमोस्तु वईमानाय० ॥ इत्यादि
(६९) तीन स्तुति कहे.श्राविका णमो खमासमणाणं कही संसार दावाकी स्तुति कहे. ॥अथ नमोस्तु वर्द्धमानाय ॥ ॥ नमोस्तु वईमानाय, स्पर्डमानाय कर्म पा॥ तजया वाप्त मोक्षाय. परोक्षाय कुती र्थिनाम् ॥ १॥ येषां विकचारविंदराज्या, ज्यायः ऋमकमलावलिं दधत्या ॥ सहशैरिति संगतं प्रशस्य, कथितं संत शिवाय ते जिनेन्द्राः ।। ॥ २॥ कषायतापादितजंतुनिर्वृतिः करोति यो जैनमुखांबुदोगतः ॥ स शुक्रमासोद्भवदृष्टि सन्निनो, ददातु तुष्टिं मयि विस्तरोगिराम् ॥३॥ श्वसित सुरनिगंधा लीड मुंगीकुरंग. मुखश शिनमजतं बिभ्रती या विनति ॥ विकच कम लनुच्चैः सास्वचिंत्यप्रनावा. सकलसुख वि धात्री प्राणनाजां श्रुतांगी ॥४॥इति । ॥ यह तीन गाथा कहि के पीछे एनोदाjo कहि के.एक श्रावक खनासमण दई कहे:-इहा
(६८)
द्भवा ॥ श्रुतदेवी सदा मह्य, मशेषश्रुतसंपदं
॥१॥पी खित्तदेवयाए, करेमि कानस्सग्गं०
॥अन्नतू०॥ कहि कें, एक नवकार चिंतवी पूर्व
ली परें क्षेत्र देवताकी स्तुति कहे, सो लिखते हैं.
॥अथ क्षेत्रदेवताकी स्तुति॥
॥यासां क्षेत्रगताः संति, साधवः श्रावका
दयः॥ जिनाझां साधयंतस्था, रक्षतु क्षेत्रदे
वताः॥३॥इति॥
॥ पी- खमा हुवा एक नवकार कही, सं
मासा प्रमार्जी उकडू बैठ के बछे अावश्यककी
मुहपत्ती पमिलेहुँ? गुरु कहे पमिलेहेह. पी
में मुहपत्ति पमिलेही, विधिशुं दो वांदणां देई
इलामो अणसहिं० ॥ कही बैठे. पीठे गुरु एक
स्तुति कह्यां पी. श्रावक समस्त मस्तकें अंज
ली करिकें, णमो खमासमणाणं ॥ णमोहत्सि
डा०॥कही॥ णमोस्तु वर्धमानाय० ॥ इत्यादि
.
(६९) तीन स्तुति कहे. श्राविका णमो खमासमणाणं कही संसार दावाकी स्तुति कहे. ॥अथ नमोस्तु वर्द्धमानाय ॥ ॥ नमोस्तु वईमानाय, स्पईमानाय कर्म णा । तझया बाप्त मोक्षाय. परोक्षाय कुती र्थिनाम् ॥ १॥येषां विकचारविंदराज्या, ज्यायः ऋमकमलावलिं दधत्या ।। सहोरिति मंगतं प्रशस्यं. कथितं संतु शिवाय ते जिनेन्द्राः ॥ ॥ २ ॥ कपायतापादितजंतुनितिं. करोति यो जनमुखांबदोद्गतः ।। स ाक्रमासोद्वदृष्टि सन्निना, ददात तष्टिं मयि विस्तरोनिराम ॥३॥ श्वसित सुरनिगंधा लोट जंगीपुरंग. मुम्बका शिनमज विनती या बिनर्ति। विकद कम लमशेः सास्वचित्यप्रनावा. लकलनख कि यात्रा प्राणनाजां श्रुतांगी ॥१॥ इति !! । यह तीन गाया कहि के. पी. पनाह कादि में एक शावक पदनाममाणावहः-इह
(७०)
का०॥सं०॥न० ॥ स्तवन नj ? दूसरा खमा
समण देई कहे॥इना०॥सं०॥ न०॥ स्तवन
सांनलुं ? गुरु कहे, नणेह सानलेह पी- प्रास
नपर बैठ के, नमोर्हसिद्धा० कहि के बमो
स्तवन कहे, सो लिखते हैं।
॥ अथ श्री चिंतामणि पार्श्वजिन स्तवनम् ॥
॥ नविका श्रीजिनबिंब जुहारो, आतम प
रम आधारो रे॥न० श्री०॥ जिनप्रतिमा जि
न सारखीजाणो, न करो शंका काई॥आगम
वाणीने अनुसारें, राखो प्रीत सवाई रे॥ न०
श्री० ॥१॥ जे जिनबिंब स्वरूप न जाणे, ते
कहिये किम जाणे ॥ नूला तेह अज्ञाने नरि
या, नहीं तिहां तत्त्व पिगणे रे॥न० श्री० ॥
॥२॥अंबड श्रावक श्रेणिक राजा, रावणप्र
मुख
अनेक ॥ विविधपरें जिन नगति करंता,
पाम्या धरम विवेक रे॥न. श्री ॥३॥जिन
प्रतिमा बहु नगतें जोतां, होय निश्चय उपगा
4
(७१) र॥ परमारथ गुण प्रगटे पूरण, जो जो श्राद्र कुमार रे॥न० श्री०॥४॥ जिनप्रतिमा श्रा कारें जलचर, वे बहु जलधि मजार ॥ ते देखी बहुला महादिक, पाम्या विरतिप्रकार रे॥न. श्री० ॥६॥ पांचमा अंगें जिन प्रतिमानो, प्र गटपणे अधिकार ॥ सूरीयान सुर जिनवर पू ज्या, रायपसेणी मझार रे॥ न० श्री०॥६॥ दशमे अंगें अहिंसा दाखी, जिन पूज्यां जिन राज ।। एहवा अागम प्ररथ मरोडी, करिये केम अकाज रे॥न० श्री०॥७॥समकितधारी स तीय द्रोपदी, जिन पूज्या मन रंगें॥ जो जो ए हनो प्ररथ विचारी, उठे ग्यातायंगें रे॥न. श्री० ॥ ८॥ विजयसुरें जिम जिनवरपूजा, कीधी चित्त थिर राखी ॥ द्रव्य नाव विडं ने कीनी, जीवानिगमते साखी रे॥ न० श्री० ॥ ॥९॥ इत्यादिक बहु भागम साखें, कोई का मती करजो ॥ जिनप्रतिमा देखी ॥
(७२) नवला, प्रेम घणो चित्त धरजो रे॥ न० श्री ॥१०॥ चिंतामणि प्रन्नु पास पसायें, सरधा होजो सवाई ॥ श्रीजिनलान सुगुरु नपदेशें, श्रीजिनचंद्र सवाई रे॥न० श्री० ॥ ११ ॥ इति श्रीचिंतामणि पार्श्वजिन स्तवनम् ॥ ॥पी तीन खमासमणे प्राचार्य, नपाध्याय, सर्व साधू वांदी, अट्ठाइ जोसु कहना,फेरखमास मणे॥इबाका०॥सं०॥न०॥देवसि पायचित्तवि शुद्धि निमित्तं कानस्सग्गकरूं? गुरु कहे, करेह. पी इवं कहि के देवसी पायबित्त विशुद्धि नि मित्तें अन्नतू० ॥ कहिके, शोले नवकार, अथ वा, चार लोगस्सका काठस्सग्ग करे, पार के लोगस्स कहे. ॥पीनें खमासमण दे कर इहाका०॥सं०॥ न० ॥ खुद्दोवद्दव नमावण, करेमि काठस्स ग्गं॥अन्नतु०॥ इत्यादि कही. शोल नवका र अथवा चार लोगस्सका कानस्सग्ग करे, पा ...
-
(७३)
रि के प्रगट लोगस्स कहे. पीठे खमासमण
देई । सिशाय संदिस्सावं, फेर खमासमण देई
सिज्ञाय करूं? तीन नवकार गुणीजे. पी. ख
मासमण तीन दे के।इला०॥सं०॥नगवन् चै
त्यवंदन करूं जी ॥ ऐसा कहकर थंनणा पा
र्श्वनाथजीका चैत्यवंदन करे, सो लिखते हैं।
॥अथ श्रीनणा पार्श्वनाथजीका चैत्यवंदन॥
॥श्रीसेढीतटिनी तटे, पुरवरे श्रीस्तंभने
स्वर्गिरौ, श्रीपूज्या जयदेवसूरि विबुधा धीशैः
समारोपितः ।। संसिक्तः स्तुतिनिर्जलैः शिव
फल स्फूर्जत्फणापल्लवः, पार्श्वः कल्पतरुः समे
प्रथयतां नित्यं मनोवांगितम् ॥ १॥श्राधि
व्याधिहरो देवो, जीरावल्लीशिरोमणिः ॥ पार्श्व
नाथो जगन्नाथो, नतुनाथो नृणां श्रिये॥इति॥
॥ पीठे नमोहुणंसें लेके जयवीयराय सूधी
कहे॥ 3 खमासमणपूर्वक मस्तक न
(७२) नवलां, प्रेम घणो चित्त धरजो रे॥न. श्री० ॥१०॥ चिंतामणि प्रनु पास पसायें, सरधा होजो सवाई ॥ श्रीजिनलान सुगुरु नपदेशें, श्रीजिनचंद्र सवाई रे॥न० श्री० ॥ ११ ॥ इति श्रीचिंतामणि पार्श्वजिन स्तवनम् ॥ ॥पी- तीन खमासमणे प्राचार्य, नपाध्याय, सर्व साधू वांदी, अट्ठाइ सु कहना,फेर खमास मणे॥इबाका०॥सं० ०॥०॥देवसि पायबित्त वि शुद्धि निमित्तं कानस्सग्गकरूं? गुरु कहे, करेह. पी इहं कहि के देवसी पायबित्त विशुद्धि नि मित्तै अन्नन्नू०॥ कहिके, शोले नवकार, अथ वा, चार लोगस्सका कानस्सग्ग करे, पार के लोगस्स कहे. ॥पीनें खमासमण दे कर इबाका०॥सं०॥ न० ॥ खुद्दोवद्दव नमावण करेमि कानस्स ग्गं॥अन्नतु०॥ इत्यादि कही. शोल नवका र अथवा चार लोगस्सका कानस्सग्ग करे, पा (७५) ॥ श्रीखरतरगल सिणगारहार जंगमयुग प्रधान नट्टारक दादाजी श्रीजिन कुशल सू रिजी चारित्र चूमामणिजी आराधवा निमित्तं करेमि कानस्सग्गं । अन्नतू० कहि के चारन वकारका कानस्सग्ग करे. पीठे प्रगट लोगस्स कहे बैठ के मावो गोमो उचो करि के खमास मण देइकें, इला० ॥ सं० ॥ न० ॥ चैत्यवं दन करुं जी. ऐसें कहि के चैत्यवंदन करे. ॥ अथ चनक्कसाय॥ ॥ चनक्कसाय पमिमल्लुल्लूरण, दुकार मय बाण सुसमूरण । सरस पियंगु वन्न गय मिय, जयन पास नुवण त्तय सामिय॥१॥ नुतणु कंति कमप्पसिणिडन, सोहइ फण किरणालिन ॥ नंनव जलहर तमिल्ल विय, सो जिणपास पयहन वंठिय ॥२॥ अर्हन्तो नगवन्त इन्द्रमहिताः सिद्धाश्च स्थिता, प्राचार्या जिनशासनोन्नतिकराः
(७४)
'सिरि थंनणयध्यि पास सामिणो०' इत्यादि
दोय गाथा कहे, सो लिखते हैं.
॥अथ श्रीथंनणयध्यि पास सामिणो॥
॥ सिरिथंनणयध्यि पास सामिणो, से
स तिन सामीणं ॥ तिव समुन्नय कारणं, सु
रासुराणं च सवेसिं ॥१॥ एस महं सरण,
काठस्सग्गं करेमि सत्तीए नत्तीए गुण सुध्यि
संघस्स समुन्नयनिमित्तं ॥२॥ इति ।
॥श्रीथंनणा पार्श्वनाथजी अाराधवा नि
मित्तं करेमि कानस्सग्गं॥पी खमे होके, वंदण
व०॥अन्न०॥ कही चार लोगस्सका कानस्स
ग्ग करे पारिके प्रगट लोगस्स कहे, पीनें
॥श्रीखरतरगन सिणगारहारजंगम युगप्रधा
न नट्टारक दादाजी श्रीजिनदत्त सरिजी चारि
त्र चूमामणीजी अाराधवा निमित्तं करेमि कान
स्सग्गं ॥ अन्नकू० कहि कें, चारनवकारका का
नस्सग्ग करे, पीवें प्रगट लोगस्स कह कें.
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(७८)
शो, वर्द्धिनि जयदेव विजयस्व ॥ ११ ॥ स
लिला नल विष विषधर, दुष्ट ग्रह राज. रोग
रणनयतः॥राक्षस रिपुगण मारी, चौरेति
श्वापदादिभ्यः ॥ १२॥ अथ रक्ष रक्ष सुशिवं
कुरु कुरु शांतिं च कुरु कुरु सदेति ॥ तुष्टिं
कुरु कुरु पुष्टिं, कुरु कुरु स्वस्ति च कुरु कुरु
त्वं ॥ १३ ॥ नगवति गुणवति शिवशांति,
तुष्टि पुष्टि स्वस्तीह कुरु कुरुजनानाम्॥मिति
नमो नमो, जाँ ही हुशः यः क्षः ही फुट
फट् स्वाहा ॥१४॥ एवं यन्नामाक्षर, पुरस्स
रं संस्तुता जया देवी ॥ कुरुते शांति निमित्तं,
नमो नमः शांतये तस्मै ॥ १५॥ इति पूर्वसूरि
दर्शित, मंत्रपद विदर्जितः स्तवः शांतेः ॥ स
लिलादि नय विनाशी, शांत्यादिकरश्च न
क्तिमताम् ॥१६॥ यश्चैनं पठति सदा, श्रयणोति
नावयति वा यथायोग्यं ॥ स हि शांतिपदं या
यात्. सूरिः श्रीमानदेवश्च ॥१७॥उपसर्गाः
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(८०) ॥ अथ कमलदलस्तुतिः॥ ॥ कमलदलविपुलनयना, कमलमुखी क मलगर्नसमगौरी ॥ कमले स्थिता नगवती, ददातु श्रुतदेवता सौख्यम्॥१॥ ज्ञानादिगुणयु तानां, स्वाध्यायध्यानसंयमरतानां ॥ विदधा तु नुवनदेवी, शिवं सदा सर्वसाधूनाम् ॥२॥ यस्याः क्षेत्रं समाश्रित्य, साधुनिः साध्यते कि याः॥सा क्षेत्रदेवता नित्यं, नूयान्नः सुखदायि नी॥३॥ इति क्षेत्रदेवता स्तुतिः॥ ॥ कल्याणकमला गेहं. नीलदेहं महासहं ॥नवखंमानिधं पार्श्व, सदाध्यायामि मानसे ॥ ॥ सकसकुशलवल्ली, पुष्करावर्त्तमेघो, दु रित तिमिर नानुः कल्पवृक्षोपमानुः॥ नवजल निधिपोतः सर्वसंपत्ति हेतुः, स नवतु सततंवः, श्रेयसे पार्श्वदेवः॥१॥ इति श्रीपार्श्वजिन०॥ ॥नवबीजांकुरुजनना। रागाद्याक्षयमपागताय स्याब्रह्मावाविष्णुं।हरोजिनोवानमस्तस्म।॥१॥ Have
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(८०.) ॥अथ कमलदलस्तुतिः॥ ॥ कमलदलविपुलनयना, कमलमुखी क मलगर्नसमगौरी ॥ कमले स्थिता नगवती, ददातु श्रुतदेवता सौख्यम्॥३॥ ज्ञानादिगुणयु तानां, स्वाध्यायध्यानसंयमरतानां ॥ विदधा तु नुवनदेवी, शिवं सदा सर्वसाधूनाम् ॥२॥ यस्याः क्षेत्रं समाश्रित्य, साधुनिः साध्यते कि याः॥ सा क्षेत्रदेवता नित्यं, नूयान्नः सुखदायि नी॥३॥ इति क्षेत्रदेवता स्तुतिः॥ ॥ कल्याणकमला गेहं. नीलदेहं महासहं नवखंमानिधं पार्श्व, सदाध्यायामि मानसे ॥ ॥ सकलकुशलवल्ली, पुष्करावर्त्तमेघो, रित तिमिर नानुः कल्पक्षोपमानुः॥ नवजल निधिपोतः सर्वसंपत्ति हेतुः, स नवतु सततंवः, श्रेयसे पार्श्वदेवः॥ १॥ इति श्रीपार्श्वजिन०॥ ॥नवबीजांकुरुजनना। रागाद्याक्षयमपागताय स्याब्रह्मावाविष्णुा।हरोजिनोवानमस्तस्मै॥१॥ दु
(८१)
॥अथ पवरकाण लिख्यते॥
॥ उग्गएसूरे नमोक्कार संहियं ( मुंउसिं)
पञ्चरकाइ चनविहं पिाहारं, असणं, पा.
खाइम, साइम, अन्नहणा नोगेणं, सहस्रा
गारेणं, बोसरई. ।। इति नवकारसीपञ्चरकाण ॥
॥नग्गएसरे पोरसिं: (मुंठसिं.)पञ्चरफाइ चन
विपि श्राहारं, असणं, पाणं. खाइमं. साइन
अन्नः. सहस्सा०. पन्नकालणं.दिला मोहणं.
साह वयणेणं, महत्तरा गारेणं सहसमाहि वत्ति
या गारणं बोसरह ।। इति पोरली पञ्चका ||
इसीतरे. साढ पोरली. पुरमह. अब. कोपन
साण जाणनो, निकेवल, पारनि माटपोगनि
पुरमहूँ. अबदं ( वा ) पञ्चकाइ । इलीतरे जो
पत्रकाण करना होय लो कहना।। इति !!
॥दिगया परिकार
। विगय पचाकाइ अन्न महला ने
वालेवेणं, निहत्य संलिप नकित वित्र
(८२)
पडुच्चमरिकयेणं, महत्तरा० सब० वोसरइ इति०
॥अथ देशावगासी पच्चरकाण ॥
॥ देशावगासियं नोग परिन्नोगं पच्चरकाइ
अन्न० सह० मह० सबस० । वोसरइ इति ॥
॥अथ एकाशणेका पञ्चरकाण. ॥
॥प्रथम पोरसी साढ पोरसीका पच्चरकाण,
सबस० तक बोलके, एकाशणं पच्चकाइ तिबिह
पिाहारं, असणं खाइम, साइमं, अन्न।
सह० । सागारी प्रागारेणं, अाउंटण पसारेणं,
गुरु अनुहाणेणं, मह० । सब० बोसरइ इति ॥
॥अथ आंबिलका पच्चरकाण ॥
॥ प्रथम पोरसी, साढ पोरसी का पच्चरकाण
करावे, पीआयंबिलं पञ्च० स्काइ०,अन्न, सह.
लेवा, गिह, नरिकत्त०, पडुच्च०, मह०, मव०
एकाशणं पच्चरकाइ तिविहंपि आहार०, इत्या
दि एकाशणेंका पच्चरकाण बोले इति०॥इसीतरे
निवीका पच्चरकाण करावे, निवीमें बिलके
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(८४)
॥इति दश पञ्चरकाणः॥ पच्चरकाण, श्रापकरे
तो अंतमें बोसरामि कहै ॥ और दूसरेकों
करावै तो वोसरइ कहै.॥
॥अथ पच्चरकाण पारणकी विधिः॥
खमासमण देके इरियावही पमिक्कमें, फिर
खमासण देके इलाका० पच्चरकाण पारवा मुह,
पत्ती पमिलेहे फिर इनामी,इबाका० कहके अमु
क पञ्चरकाण पारुं यथा शक्ति, अमुक पञ्चरकाण
पारियु, तहत्ति कहके एक नवकार गुणी, अमु
क पच्चरकाण फासियं, पालियं सोहियं तीरियं,
किट्रियं, श्राराहियं, जंचन आराहियं, तस्समि
हामि दुकर कही चैत्यवंदन करे, क्षणेक सिशा
य करै, पीने यथा संनवे अतिथि संविनाग
- करी पाणीपीवै॥ इति पञ्चरकाण पारणविधिः॥
॥अथ श्राद्ध दिन कृत्य (तथा ) देव वंदन
नाष्यसें मंदर जाणेकी पूजन करनेकी विधिः॥
॥प्रथम श्रावक दो च्यार. घमी रात्ररहते
॥
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(८६) संबंधी कुबनी कार्य विचारणा न करे॥१॥ (दू सरी निस्सही.)प्रदक्षिणा तीनदिये पीछे कहै। जिन मंदरमें फूटा टूटा ठीककरानेंकी सारसंन्ना ल रक्खीथी सोनोगम। इहां द्रव्य पूजा करणी मोकली रही॥२॥ तीसरी निस्सही कहे पीठे निकेवल नाव पूजा करै। पिण द्रव्यपूजा न करै ॥ यह प्रथम निस्सही त्रिक कहा। ॥ (दूसरा त्रिक) ज्ञान त्रिककी आराधना करनेकों प्रनूके दक्षिणावर्त्तसें तीन प्रदक्षिणादेवै (तीसरा त्रिक) मूल नायकजीके बिंबों पं चांग मिलाके, तीन बेर नमस्कार करै॥३॥ (चोथा त्रिक) प्रनूकी अंग १ । अग्र २। ना व ३॥ त्रिविध प्रकार पूजा करै॥(अबनिस्स ही किये पीने । कृत्य, अकृत्य तथा पूजा बि धि, संक्षिप्त लिखतेहें॥निस्सही किये पीने मनो गुप्ती, बचन गुप्ती, काय गुप्ती, करके युक्त रहे पांचों इंद्रियांको बशमें रक्खै।गमनां गमनमें
(८७)
नपयोगी रहै। गीतादिक अन्यका सुनके चित्तमें
व्याकुलतान रक्खै । कुन्नी देव कार्यको बोसके
श्रोर कार्यकी विचारणा न करै । राज कथादि
संपूर्ण विकथा गेम। जन्म (ोर) कर्मके, अनु
गत बचन न बोले (अर्थात् ) कोईके माता
पितादिकका किया थका, खोटा कार्यकों प्रगट
न करै (तथा ) कर्मानुगत वचनांधेकों प्रां
धा, गोलेको गोला (इत्यादि वचन) नबोले।।
निस्सहीकिये पीछे, जिन मंदर में धर्म संयुक्त,
आत्म हितकारी,प्रमाणोपेत बचन बोलनाचा
हिये ॥ (जिसमें ) मन, बचन कायाके, खोटे
व्यापारोंका निषेध अपनी प्रात्मालें किया
नसके नावसे निस्सही होय (ोर ) जिस
में दूषणका त्याग न किया। उसके केवल श
व्द नञ्चारण मात्र, द्रव्य निस्सही होय (इसवा
स्ते)पूजायोग्य उत्तम वस्त्र पहरके पाउतहरके
नसान वस्त्रसें मुखकोश बांधे । धूपादिकसें -
(८८)
ग अपना सुद्ध करै । जावसें, दूसरी निस्सही
कहते, मुलगनारैमें प्रवेश करै ।जयणा संयुक्त
पूजा करें। पूजाकरते हुए, शरीरमें खाज नखूणे
खेल खंखार न करै। निकेवल नगवानकी स्त
वनामें चित्त रक्खे। प्रथम सुगंधयुक्त जल पं
चामृतसें स्नान करावै । सुकमाल अबा कोमल
सुगंध युक्त वस्त्रसें नगवानका अंगलूहै। कपूर
कस्तूरी मिश्रित शुद्ध केशर चंदनका विलेपन
करै॥ सुनवर्ण, सुनगंध युक्त, जीवादि रहित,
निर्दोस । गुलाब, चंपा चंपेली, केवमा, जाई,
जुई, मोगरादिक पुष्पोंसें पूजा करे। अष्टांग धू
प अगरबत्ती खेवै॥ मंगलदीप करै । अखंग
नकाल अक्षतोंसें प्रनुके सन्मुख अष्ट मंगली
क लिखै॥दर्पण १। नद्रासन २। वर्द्धमान
सरावसंपुट ३। श्रीवत्स ४। मबयुग ५। क
लश ६ । स्वस्तिक ७। नंद्यावर्त ८ । (ऐसे)
अष्ट मंगलकी रचना करै।पंच वर्ण फूलोंसे अ
॥
(८९) ष्ट मंगलीक पूजै । सुंदर कुंकम मिश्रित चंद नसे हत्थोदेवै । उत्तम नैवेद्य चढावै । अनाखा द्य फल चढावै। (इत्यादि) पूजाकी विधि,श्रा रती पर्यंत । राय प्रशेणी ग्याताधर्म कथा, जी वानिगमादि, सिद्धांतोंमें लिख्ये मुजब करै (पी ने)अंतरंग जक्तीसें प्रनुके सन्मूखनाटक करै। (जैसें ) देवेंद्र. दानवेंद्र,नारद, इनोंनें (तथा) उदाई राजाकी राणी प्रत्नावतीने द्रोपदीने ना टक किया (और ) रावण प्रमुख, कई जीवोंने अष्टापदादि ऊपर नाटक करके, तीर्थंकर गोत्र उपार्जन किया (तैसें ) प्रनुके सन्मुख शंकारहि त होके । उत्तम पुरष नाटक करै। (अब) जल चंदन पुष्पादिकसे पूजा कर (सो)अंगपूजा ॥ १ ॥ प्रनुके सन्मुख नैवेद्य प्रमुख चढावै (सो)अन पूजा ॥२॥ प्रजूके सन्मुख शस्तवादि गीत गान नाट कादिक करें (सो) नाव पूजा ॥ २
(८८)
ग अपना सुद्ध करै । नावसें, दूसरी निस्सही
कहते, मुलगनारैमें प्रवेश करै।जयणा संयुक्त
पूजा करै। पूजाकरते हुए, शरीरमें खाज नखूणे
खेल खंखार न करै। निकेवल नगवानकी स्त
वनामें चित्त रक्खे। प्रथम सुगंधयुक्त जल पं
चामृतसें स्नात्र करावै। सुकमाल अबा कोमल
सुगंध युक्त वस्त्रसें जगवानका अंगलूहै। कपूर
कस्तूरी मिश्रित शुद्ध केशर चंदनका विलेपन
करै। सुनवर्ण, सुनगंध युक्त, जीवादि रहित,
निर्दोस । गुलाब, चंपा चंपेली, केवमा, जाई,
जुई, मोगरादिक पुष्पोंसें पूजा करे।अष्टांग धू
प अगरबत्ती खेवै ॥ मंगलदीप करै । अखंग
नकाल अक्षतोंसें प्रनुके सन्मुख अष्ट मंगली
क लिखै ॥ दर्पण १।नद्रासन २। वर्द्धमान
सरावसंपुट ३। श्रीवत्स ४। मन्बयुग ५। क
लश६। स्वस्तिक ७। नंद्यावर्त ८ । (ऐसे)
अष्ट मंगलकी रचना करै। पंच वर्ण फूलोंसे अ
प्रजा सुन्नस मन्तवादि गीतगान नाट (८९) ष्ट मंगलीक पूजै । सुंदर कुंकम निश्रित चंद नसें हत्योदेवै । उत्तम नैवेद्य चढावै । अवाखा द्य फल चढावे । (इत्यादि) पूजाकी विधि.श्रा रती पर्यंत । राय प्रशणी ग्याताधर्म कथा. जी वानिगमादिलितांताने लिख्ये मुजब करे (पी ने) अंतरंग नतीलें प्रनले लन्मूखनाटक करे। (जैसे )देवंद्र.दानवंद्र.नारद इनॉन (तथा) दाई राजाकी राणी प्रनावतीने द्रोपदीने ना टक किया (और ) गवण प्रमुख. कई जीवॉन प्रष्टापदादि ऊपर नाटक करके तीर्थकर गोत्र उपार्जन किया (तैलें )प्रनुलन्मुख काहि त होके । उत्तन पुरव नाटक करें। (अत्र) जल चंदन पुष्पादिकले जा करे (लो) श्रृंगपूजा ॥ ॥ प्रके सन्नड नवेच प्रनु चहादै (लो) अन पूजा ॥२॥ कादिक करें (लो) नाव पूजा । २ (९०) यह द्रव्य पूजाका विचार गम्नित चोथा त्रिक कहा॥ (अब पांचमा त्रिक)॥ ती न अवस्था विचारणी॥ पिमस्थ (१) पदस्थ (२.)रूपातीत ॥३॥इसमें पिंमस्थ अवस्था के तीन नेद ॥जन्मावस्था ॥ १ ॥राज्यावस्था ॥२॥श्रमणावस्था॥३॥ (और ) केवल अ वस्थाको विचार करणा (सो)पदस्थ अवस्था निरंजनाकार (सो)सिद्धावस्था। तिसकुं रूपा तीत अवस्था कहतेहै ॥ (अबबहात्रिक) तीन दिशा बोडके प्रनूके सामने निजर रखै ।नई॥ अध २॥ तिरग३॥ दहणी। वांइ। पिबाडी। निजर नहीं करै ॥ (अब सातमात्रिक)तीन वे र धरती प्रमार्जकैं।नस ठिकाणे चैत्यवंदन करौ। (अब पाठमा त्रिक) ॥ वर्णादिक तीन संप दाका ॥ हरफशुद्ध उच्चारण करै ( सो) वर्ण शु छि॥१॥हरफोंके अर्थपर प्रालंबन रक्खै (सो) अर्थशुद्धि २॥श्रालंबन एक जिन प्र-
(९१)
तिमाका रक्खै (सो) मन सुद्धि ॥३॥ (अव
नवमात्रिक)॥ तीन मुद्राकरनी ॥ जोग मुद्रा
॥ जिनमुद्रा २ ॥ मुक्ताशुक्ति मुद्रा ३॥ (इ
समें ) जोग मुद्रा किसकुं कहते है ॥ पद्म को
शाकारै । दोनुं हाथ परस्पर अंगुली मिलानी
। एजोग मुद्रायें सक्रस्तव कहिये १ ।। कानसग्ग
मुद्रा (सो) जिन मुद्रा २॥(और) दोसीपका
जोडा तिस श्राकार हाथ रखना। (सो)मुक्ता
शुक्तिमुद्रा ३॥ इस मुद्रासें प्रणिधान जय वी
यराय इत्यादि करै (अब दशमात्रिक)॥प्र
णिधान तीन ।। जिन बंदन प्रणिधान १॥ मु
नि वंदन प्रणिधान २! प्रार्थना प्रणिधान ३॥
इसमें (जो) जावंति चेइयाइं (इत्यादि)इहसं
तो तत्थ संताई (तक) जिन वंदन प्रणिधान
१॥ जावंति केवि साहु (इत्यादि)तिविहेण
तिदम विरियाणं (इहां तक) मुनि वंदन प्रणि
धान ॥जय वीयरायसें ( लेके) श्रानवम
(९०) यह द्रव्य पूजाका विचार गम्नित चोथा त्रिक कहा ॥ (अब पांचमा त्रिक) ॥ ती न अवस्था विचारणी॥ पिंमस्थ (१) पदस्थ (२.) रूपातीत ॥३॥इसमें पिंमस्थ अवस्था के तीन नेद ॥ जन्मावस्था ॥१॥राज्यावस्था ॥२॥श्रमणावस्था॥३॥ (और ) केवल अ वस्थाको विचार करणा (सो)पदस्थ अवस्था निरंजनाकार (सो)सिद्धावस्था । तिसकुं रूपा तीत अवस्था कहते है। (अबछात्रिक) तीन दिशा बोडके प्रनके सामने निजर रखै ।गई॥ अध २॥ तिरी ३॥ दहणी। वांइ । पिलाडी। निजर नहीं करै। (अब सातमात्रिक)तीन वे र धरती प्रमार्जनसठिकाणे चैत्यवंदन करौ। (अब भाउमा त्रिक) ॥ वर्णादिक तीन संप दाका॥ हरफशुद्ध उच्चारण करै (सो) वर्ण शु दि॥१॥ हरफोंके अर्थपर प्रालंबन रक्खै (सो) अर्थशुद्धि २॥श्रालंबन एक जिन प्र- .
(९१)
तिमाका रक्खै (सो) मन सुद्धि ॥३॥ (अव
नवमात्रिक)॥ तीन मुद्राकरनी॥ जोग मुद्रा
१॥ जिनमुद्रा २॥ मुक्ताशुक्ति मुद्रा ३॥ (इ
समें) जोग मुद्रा किसकुं कहते है ॥ पद्म को
शाकारै। दोनुं हाथ परस्पर अंगुली मिलानी
। एजोगमुद्रायें सस्तव कहिये १ ॥कानसग्ग
मुद्रा (सो) जिन मुद्रा २॥ (और) दोसीपका
जोडा तिस श्राकार हाथ रखना । (सो)मुक्ता
शुक्तिमुद्रा ३॥ इस मुद्रासें प्रणिधान जय वी
यराय इत्यादि करै (अब दशमात्रिक)॥ प्र
णिधान तीन । जिन बंदन प्रणिधान १॥ मु
नि वंदन प्रणिधान २! प्रार्थना प्रणिधान ३॥
इसमें (जो) जावंति चेइयाइं (इत्यादि)इहसं
तो तत्थ संताई (तक) जिन वंदन प्रणिधान
१॥ जावंति केवि साह (इत्यादि)तिविहेण
तिदम विरियाणं (इहां तक) मुनि वंदन प्रणि
धान २॥ जय बीयरायसें ( लेके) प्रान
(९२)
खंमा तक।प्रार्थना रूप प्रणिधान३॥ (ऐस
दशत्रिकका पहला द्वार कहा)॥(अब पांच
अभिगमन साचवणेंका दूसरा द्वार कहतेहैं)
। सचित्तद्रव्य कुशमादिक अपनेंपास होय,
सकुं अलग रख देना १॥(और) राजचिन्ह
मुगटा उत्र, खड्ग, चामर, पादुका, अचित्त व
स्तू गेमना। प्रान्नषण प्रमुख पहखारखना।
मन एकाग्र करना ३॥ एक पट्ट तत्तरासंग क
रना ४॥जिन बिंब देखतेही ( नमो नुवण वं
धुणो) ऐसे नमस्कार करना ॥५॥ ए दूसरा
द्वार कहा ॥ (अब तीसरा द्वार दोदिशीका) पु
रष दहणी दिशा बैठा। नगवंतकों लांदे॥ स्त्री,
बांइ दिश बैठके नगवंतकुंवांदे॥(अब चौथा
द्वार तीन अनिग्रह) अनिग्रह देव बांदणांमें
कहाहे ।। (जघन्य) नव हाथ दूर बैठके देव वा
दे १ ॥ (मध्यम) नव हाथसें नपरांत बैठके
देव वांदे २॥ (नरकृष्ट)६० हाथ दूर बैठके
(९५)
हत सिद्धाः तक कहके वमो स्तवन आवे सो
कहे. पीठे जय वीयराय कहके फिर पांचमी
वेर नमोहुणं सवे तिविहेण तक कहै, इति
पांच शकस्तवे देव वंदन विधि.॥
॥अथ दादाजी स्तवन ॥
सद्गुरु करुणा निधान राखोलाजमेरी स०॥
। टेर ॥ जैजै जिनकुशल सूरि, समरत हाजर
हजूर, महकत जिम जसकपूर महमाजगतेरी।
सः ॥ १॥ जापर तुमहो दयाल, ग्निमें कर
दो निहात. संकटकों चूरदेव, दोलतकी ढेरी
स०॥२॥ तुमहोसुरतरुसमान, वंचित फलदेवो
दान । सेवकों दीनजाण मेटो नवफेरी ॥ स.
॥३॥सरण आयेकी राखो लाज, वंचित सब
पूरोकाज, हरखचंद सरणश्राए महनासुनतेरी
॥ ४॥ इति ॥ पुनः ।। कुशल गुरु देदके दर
शन: मेरान्लिहोतहे पान । जगतनं श्री
देखा नयन भर जोई॥
मो कार
(९६) विरुद नूमंमले गाजे । फरसतां पापसहु नाजे । पूजतां संपदा पावे। अचिंती लछि घरिश्रा वे॥ २॥इके मुख गुण कहुंकेता । मुळेही ये ग्यान नहिं एता । लालचंदकी अरज सुणलीजे। चरणकी नक्ति मोहि दीजै ॥३॥ राजैथुन गेर ठोर, ऐसो देवनहिं ओर, दादो दादो नामसे, जगत्र जश गायोहै।प्रापणेही भाव अाय, पूजै लरक लोकपाय प्यासनकों र न्नमांह, पाणी प्रान पायोहै ॥ वाट घाट शत्रु दाट हाट पुरपट्टणमें देवगेह नेहसु कुशल वर तायोहै। धरमशीह ध्यानधरै सेवकां कुशलकरै साचो श्रीजिन कुशलसूरि नामयुं कहायोहै॥३॥ मन मोहन पारस मिल्यो। मोहनगुण · सुखकंद ॥ मोहन मूरति देखके । मोहन चित आनंद ॥१॥ पारश प्रजुके नामसें । सहु संकट मिट जाय ॥ ईति नपइव नयः टले । मोहनगुण प्रगटाय ॥२॥ ॥ ॥ इति ॥ॐ॥
(९७)
॥अथ जिनस्तुति॥
दर्शनारितध्वंसीः वंदनादिचितप्रदः॥ पूजना
त्पूरकः श्रीणां: जिनः सादात्सुरद्रुमः ॥१॥ इति
जिन स्तुतिः॥ ॥॥ ॥॥
॥ अथ आदिजिन स्तुतिः॥
सुवर्णवर्ण गजराजगामिनं, प्रलंबवाहुं सुविशाल
लोचनम् ॥ नरामरेंद्रैः स्तुतपादपङ्कजं नमामि अत्या
ऋषनं जिनोत्तमम् ॥ १॥ इति आदिजिन स्तुतिः॥
॥ अथ शांतिनाथ स्तुति॥
॥ सोलम जिनवर शांतिनाथ: सेवो शिर नामी ।।
कंचन वरण शरीर कांतिः अतिशय अनिरामी ॥
अचिरा अंगज विश्वसेन: नरपति कुलचंद ॥ मृगलंदन
धर पद कमल: सेवे सुरद ॥ जुगमां अमृत जेहवी
ए, जास अखंमित आण ॥ एक मनें आराधतां: ल
हियें कोडि कल्याण ॥२॥इति श्रीशांतिनाथ स्तुतिः॥
॥अथ नेमिनाथ स्तुतिः॥
॥ मह सम प्रणमुं नेमिनाथ, जिनवर जयवंत॥4
(९८)
वकुल अवतंस हंस, उत्तम गुणवंत ॥ समुद्र विजय
शिवा देवी जास, मति सहित नदार ॥ मुंदर श्याम
शरीर ज्योति, सोहे सुखकार॥गढ गिरनारें जिण लहा
ए, अमृत पद अनिराम ॥ तास कमा कल्याण गणि,
अहनिशिकरत प्रणाम ॥३॥ इति श्रीनेमिनाथ० ॥
॥अथ श्रीपार्श्वनाथ स्तुतिः॥
॥ पुरसादाणी पास नाह, नमियें मन रंग ॥
नील वरण अश्वसेन नंद, निरमल निःशंक ॥ कामित
पूरण कलप साख, वामासुत सार ॥ श्रीगोडी पुर
स्वामि नाम जपियें निरधार ॥ त्रिनुवन पति नेवी
शमो ए, अमृत सम जसु वाण ॥ ध्यान धरतां एहर्नु,
प्रगटे परम कल्याण ॥ ४ ॥ इति पार्श्वनाथ स्तुतिः॥
॥अथ श्रीमहावीर स्तुतिः॥
॥ वं जगदाधार सार, शिव संपत्ति कारण ॥
जन्म जरा मरणादि रूप, जव ताप निवारण ॥ श्रीसि
घारथ तात मात, त्रिशला तनु जात ॥ सोवन
वरण शरीर वीर, त्रिभुवन विख्यात ॥ अमृत रूपे
राजतो ए, चोवीशमो जिनराय ॥ दमा प्रमुख क
L
(९९)
ज्याण गणि: आपो करि सुपसाय ॥ ५ ॥ इति
श्रीमहावीर स्तुतिः॥ ॥॥ ||||
॥अथ पाहिकादि पडिक्कमणविधिः लि०॥
॥ तिहां प्रथम वंदित्तु सूत्र पर्यंत देवसिक पडि
कमी ॥ १ खमासमण देई देवसी आलो इयं
पडिकता।। ठा० ॥ सं० ॥ नः ॥ पदिय मुह पत्ति
पडिलेहुँ ? चनमासीए चनमासीय मुहपत्ति. संवत
रीवें संवकरी मुहपत्ति पडिलेहुं? एम कहे. पी। गुरु
कहे: पमिलेहेह ।। पीठे उठं कहे. दूजी खमासमण
देश. मुहपत्ति पडिलेही. वांदणां देई. तिहा परकी
परको वरतो ॥ चनमासीमें चनमासीन वा
हंतो. ॥ संवहरीमें संवहरो वहतो ।। एम यथायोगें
कहे ।। पीनें गुरु कहे. पुण्यवंतो देवमिनें स्थानिकें
(९८)
वकुल अवतंस हंस, उत्तम गुणवंत ॥ समुद्र विजय
शिवा देवी जास, मति सहित नदार ॥ सुंदर श्याम
शरीर ज्योति, सोहे सुखकार॥ गढ गिरनारें जिण लहयुं
ए, अमृत पद अनिराम ॥ तास कमा कल्याण गणि,
अहनिशिकरत प्रणाम ॥३॥ इति श्रीनेमिनाथ ॥
॥अथ श्रीपार्श्वनाथ स्तुतिः॥
॥ पुरसादाणी पास नाह, नमियें मन रंग.॥
नील वरण अश्वसेन नंद, निरमल निःशंक ॥ कामित
पूरण कलप साख, वामासुत सार ॥ श्रीगोडी पुर
स्वामि नाम जपियें निरधार ॥ त्रिजुवन पति त्रेवी
शमो ए, अमृत सम जसु वाण ॥ ध्यान धरतां एहर्नु,
प्रगटे परम कल्याण ॥४॥ इति पार्श्वनाथ स्तुतिः॥
॥अथ श्रीमहावीर स्तुतिः।।
॥ वं जगदाधार सार, शिव संपत्ति कारण ॥
जन्म जरा मरणादि रूप, जव ताप निवारण ॥ श्रीसि
चारथ तात मात, त्रिशला तनु जात ॥ सोवन
वरण शरीर वीर, त्रिनुवन विख्यात ॥ अमृत रूपें
राजतो ए,. चोवीशमो जिनराय ॥ कमा प्रमुख क
(९९)
ल्याण गणिः आपो करि सुपसाय ॥ ५ ॥ इति
श्रीमहावीर स्तुतिः॥ ॥॥
॥ अथ पालिकादि पडिकमणविधिःलि०॥
॥तिहां प्रथम वंदित्तु सूत्र पर्यंत देवसिक पडि
कमी ॥ १ खमासमण देई देवसी आलो इयं
परिवंता॥इवा ॥सं०॥ ॥ पक्षिय मुह पत्ति
पडिलेहुं ? चनमासीए चनमासीय मुहपत्तिः संवत
रीयें संवहरी मुहपत्ति पडिलहुँ ? एम कहे. पीठे गुरु
कहे. पमिलेहेह ॥ पीनें इहं कहे. दूजी खमासमण
दे. मुहपत्ति पडिलेही. वांदण देई. तिहा परकीमें
परको वकंतो ॥ चनमासीमें० चन्मासी वा
दंतो.॥संवहरीमें संवहरो वरतो ।। एम यथायोगे
कहे पीनें गुरु कहे. पुण्यवंतो देवसिने स्थानि
पारिकक ॥ चळमासिक. सांवहारिक नपजो. वींक
जयणा करजो. मधुर स्वरें पडिकमजो. खाने मो वि
वरा शुष्ध सामजो. मानसमें नाव रहेजो. पाने
सगलाही तहत्ति कहे। पीने कठी॥हाकाल मं०
(१००) ज०॥ मंबुधा खामणेणं ॥ अग्निमि अघितर प रिकयं ॥ खामेळं ? गुरु कहे: खामेह ॥ पीनें मस्तकें अंजली करतो थको, उई खामेमि परिकयं ॥३॥ कही, गोमा लीयें बेसी. मस्तक नमावी दक्षिण हाथ गुरु साहमो करी मुहपत्ति मुखें देई॥ परिका, प नरसन्हं दिवसाणं, पनरसन्हं, राईणं जं किंचि अप्प त्तियं इत्यादि सर्व पाठ कहे ॥ चनमासें चनन्हें मासाणं, अठन्हें परकाणं, वीसोत्तरसो राइंदियाणं जं किंचि अप्पत्तियं इत्यादि कहे ॥ संवढरीयें वाल सन्हं मासाणं, चनवीसन्हं परकाणं, तिन्निसयसाहिरा इंदियाणं ॥ जं किंचि अप्पत्तियं इत्यादि कहे ॥ तेवारें गुरु पण मिठामि मुक्कडं कहे ॥ तिहां दोय साधु नचरता हुवे तो पाखियें तीन, चनमासीयें पांच, संवहरीयें सात साधनें खमावे ॥ पी- की अब ग्रहमांहि रह्यो कहे ॥ इला०॥सं० ॥०॥ परिकयं आलोवू ? गुरु कहे आलोएह ॥ पीछे इवं : एमि, जो मे परिकन ॥३॥.. कन ... 1 सूत्र नणी ॥ संदेपे अथवा विस्तारें पाखी चनमार्स संवहरी अतिचार आलोवे, सो लिखते हैं। ॥अथ वृहदतीचार लिख्यते ॥ ॥ नाणंमि दसर्पमिय, चरणमि तवेय तह य विरियंमि ॥ प्रायरणं आयारो, इअ एसो पंचहा नपिन ॥१॥ ज्ञानाचार १ दर्शनाचार २ चारित्रा चार ३ तपाचार ४ वीर्याचार ५ एवं पांच विधि आचारमांहि जिको अतीचार पद दिवसमांहि सूक्ष्म वादर जाणतां अणजाणतां हुने होइ ते सहू मन वचन कायाई करी मिठामि मुक्कम ॥ ॥अथ ज्ञानाचारना आठ अतीचार॥ ॥ काले विणए बहुमाणे, नवहाणे तहय निन्हवणे॥ वंजण अव तउनए, अविहो नाण मायारो ॥ १ ॥ झान, कालवेलामांहि पढिनं गुणिलं नही, अकालें 'टिन, विनय हीन बहुमान हीन नपधान हीन श्री पाध्यायकनें नही पढिनं अथवा अनेराकने पटिन, रो गुरु कह्यो व्यंजन अर्थ तनय कूमो पड्यो, बांदणे पडिकमणे सिझाय करतां पढतां गुणतां (१००) ज०॥ मंत्रुधा खामणेणं ॥ अपजिमि अपितर प रिकयं ॥ खामेळं ? गुरु कहे. खामेह ॥ पीचें मस्तकें अंजली करतो थको. एवं खामेमि परिकयं ॥३॥ कही, गोमा लीयें बेसी. मस्तक नमावी दक्षिण हाथ गुरु साहमो करी, मुहपत्ति मुखें देई॥ परिकयें, प नरसन्हं दिवसाणं, पनरसन्हं, राईणं जं किंचि अप्प त्तियं इत्यादि सर्व पाठ कहे ॥ चनमासें चनन्हें मासाणं, अठन्हें परकाणं. वीसोत्तरसो राइंदियाणं जं किंचि अप्पत्तियं इत्यादि कहे ॥ संवतरीय ज्वाल सन्हं मासाणं, चनवीसन्हं परकाणं, तिन्निसयसहिरा इंदियाणं ॥ जं किंचि अप्पत्तियं इत्यादि कहे ॥ तेवारें गुरु पण मिठामि मुक्कडं कहे ॥ तिहां दोय साधु उचरता हुवे तो पाखिये तीन, चनमासीयें पांच, संवचरीयें सात साधुनें खमावे ॥ पी- ऊठी अव ग्रहमांहि रह्यो कहे ॥ इहा॥सं०॥०॥ परिकयं आलोवू ? गुरु कहे पालोएह ॥ पीनें इठं अ एमि, जो मे परिकन ॥३॥अश्यारो कन इ (१०१) सूत्र नणी ॥ संदेपे अथवा विस्तारें पाखी चनमासी संवहरी अतिचार आलोवे, सो लिखते हैं । ॥अथ वृहदतीचार लिख्यते ॥ ॥ नामि दसणंमिय, चरणमि तवेय तह य विरियंमि ॥ आयरणं आयारो, इस एसो पंचहा नविन ॥१॥ ज्ञानाचार १ दर्शनाचार २ चारित्रा चार ३ तपाचार ४ वीर्याचार ५ एवं पांच विधि आचारमांहि जिको अतीचार पद दिवसमांहि सूक्ष्म बादर जाणतां अणजाणतां हुन होइ ते सहू मन वचन कायाई करी मिठामि मुक्कम् ॥ ॥अथ ज्ञानाचारना आठ अतीचार॥ ॥ काले विणए बहुमाणे, नवहाणे तय निन्हवणे॥ वंजण अव तमुन्नए, अठविहो नाण मायारो ॥ १ ॥ झानः कालवेलामांहि पढिनं गुणिनं नही, अकालें पडिनं, विनय हीन बहुमान हीन नपधान हीन श्री नपाध्यायकनें नही पढिनं अथवा अनेराकने पढिन, अनेरो गुरु कह्यो व्यंजन अर्थ तनय कूमो पड्यो, देववांदणे पडिकमणे सिझाय करतां पडतां रात - -- -- - -- . - (१०४) पी कलश तणो ठबको लागो. मुखतणी बाफ लागी, उवणारिय हाथथकी पमीन, पमिलेहवो वीसारयो नवकरवानीने पग लागो, दर्शनाचार विषईजिको अतीचार० ॥ ३ ॥ ॥ चारित्राचारना आठ अतीचार ॥ ॥ पणिहाणजोग जुत्तोः पंचहिं समईहिं तिहिं गु त्तीहिं ॥ एस चरित्तायारो, अविहो होइ नायबो ॥१॥ शरियासमिती १, नासासमिती २, एषणा समिती ३, आयाणममत्तनिरकेवणासमिती ४, न चारपासवणखेलजलसंघाण पारिछावणीया समिती ५, मनोगुप्ति १. वचनगुप्ति २, कायगुप्ति ३, एपंचसमिती तीनगुप्ति, रूडीपरें पाली नही ॥ साधु तणें सदैव अष्टविध चारित्रा चार विषईजिको अतीचार०॥४॥ विशेषतः श्रावकतणे धर्मे श्रीसम्यक्त मूल बारह व्रत, श्रीसम्यक्ततणा पांच प्रतीचारसंका कंख विगिला पसंस तह संथवो कुलिंगीसु॥संकाः-श्रीअरिहंत तणी बल अतिशय ज्ञान लक्ष्मी गांभीर्यादिक गुण, शाश्वती प्रतिमा चारित्रियानां चारित्र जिन वचन तणो संदेह
(१०५)
कीधो. आकांदाः ब्रह्मा विष्णु महेश्वर क्षेत्रपाल गोगो
गोत्रदेवता ग्रह पूजा विणाइग हनुमंत इत्येवमादिक
ग्राम गोत्र देश नगर जूजुना देवदेहराना प्रभाव देखी
रोगें प्रातकें इहलोक परलोकार्थे पूज्या मान्या बोच
सांख्यादिक संन्यासी नरमा जगत लिंगिया योगी
दरवेश अनेराई दर्शनियानो कष्ट मंत्र चमत्कार देखी
परमार्थ जाएयाविण नल्या अनुमोद्या कुशास्त्र शीख्या
सनिल्यां शराधसंवत्सरी होली बलेव माहीपूनिम अ
जापमिवा प्रेतवीज गोरत्रीज विणायगचोथ नागपांच
भ झूलगाउड शीलसातम द्रो आठम नननी नवम
अहवदसम व्रतऽग्यारस वत्सवारस धनतेरस अनंतचो
दश आदित्यवार नत्तरायण नवोदक- जाग नोग नता
रणा कीधा- पीपल पाणी घाल्या घलाव्या घर वाहिर
कृई तलाव नदी समुद्र कुममें पुण्य हेतु नान कीधा
दान दीधा, ग्रहण शनीचर माहमास नवरात्रि नाहि
या अजाणना थाप्पा. अनेराई तोला कीधा क
राव्या विचिकिहा:-धर्मसंबंधिया फल तणो संदेह
कीधो जिण अरिहंत धर्मना आगर. विक्षोपकार सागर
(१०४) पी कलश तणो ग्बको लागो. मुखतणी वाफ लागी: उवणारिय हाथथकी पमीन, पमितेहवो वीसारयोः नवकरवालीन पग लागो, दर्शनाचार विपईजिको अतीचार० ॥ ३ ॥ ॥ चारित्राचारना आठ अतीचार ॥ ॥ पणिहाणजोग जुत्तो, पंचहि समईहिं तिहिं गु त्तीहि ॥ एस चरित्तायारो अठविहो होइ नायवो ॥१॥ इरियासमिती १, नासासमिती २, एषणा समिती ३, आयाणनंममत्तनिरकेवणासमिती ४, न चारपासवणखेलजलसंघाण पारिछावणीया ममिती मनोगुप्ति १. वचनगुप्ति २, कायगुप्ति ३, एपंचसमिती तीनगुप्ति, रूडीपरें पाली नही ॥ साधु तणे सदैव अष्टविध चारित्रा चार विषईन जिको अतीचार०॥४॥ विशेषतः श्रावकतणें धर्म श्रीसम्यक्त मूल बारह व्रत, श्रीसम्यक्ततणा पांच प्रतीचारसंका कंख विगिता पसंस तह संथवो कुलिंगीसु॥संकाः-श्रीअरिहंत तणी वल अतिशय ज्ञान लक्ष्मी गांगीर्यादिक गुणः शाश्वती प्रतिमा चारित्रियानां चारित्र जिन वचन तणो संदेह (१०७) कीडी मकोडी नदेही घीवेली कातरा चूमेली पतंगिया मेमका अलसिया ईली कूति मांस मसा बगतरा माखी प्रमुख जे कोई जीव विणठा चांपिया दूहव्या माला हलावतां पंखी काग चिमकलाना इंमा फूटा, अनेरा एकेंद्रियादिक जिके जीव विणा चांप्या दूहव्या हाल तां चालतां अनेरुं कांइ काम काज करतां विध्वंस पणं की,. जीव रक्षा रूमेन कीधी संखारोसूकव्योः सुख्या धान तावमे दीधा दलाव्या नरमाव्या खाटला तावमे फाटक्या, गुंक्या झूकाव्याः जीवाकुल नूमि लीपावी वाशी गार राखी रखाची, दलणे खामणे लीपणे रूमी जयणांन कीधी, आठम चन्दशना नियम नांग्या, धूणी करावी ॥ पहिला प्राणातिपात व्रत विषईन अनेरो॥१॥ ॥ वीजू थूल मृषावाद विरमण व्रतें पांच प्रतीचार॥ ॥ सहसारहस्सदारे: मोसुवएसे य कूम लेहेय ॥ सह साकारः-किणहिक प्रतें अयुक्तो आल दीधो किणहिक प्रतें एकांतें वात करतां देखी तुम्हें तो राज विरुध (१०६) मोकमार्ग दातार देवाधि देव वुशुधना न पृज्या न मान्या महात्माना जात पाणी तपी गंग कीची. कुचारित्रिया देखी चारित्रिया ऊपरं अन्नाव हुन मिथ्या त्वीतणी मनावना देखी प्रशंसा कीधी प्रीति मांमी दा क्षिण लगें तेहनो धर्म मान्यो॥ श्रीममकित विषे अने रो जिको प्रतीचार पच दिवस मांहि सूक्ष्म बादर जा णतां अजाणतां हुन होय, ते मह मन वचन कायाई करी मिठामि एक ॥ १ ॥ ॥ पहिले प्राणातिपात विरमण व्रतें पांच अतीचार: वह बंध विच्छेए, अनारे जत्तपाण युछेए॥ प्रिपद चनपद प्रतें रीशवशे गाढो घान प्रहार घाख्यो गाडे बंधन बांध्या घणे जार पीड्या. निलोउन कर्म कीधा. चारापाणी तणी वेला सार संजाल न कीधी लहिणे दणे किणही प्रतें लंधाव्यु, तेणें नृखे आपण जीम्या. अणगल पाणी वावरयुं, रूडे गव्यु नही गलाव्यु नही अणगल पाणी जील्यां लूगडाधोयां: इंधण अण सोध्यु जाल्यु. साप कानखजूरा मुलहला माकड मां गोंगिंडा साहतां मूआं दूखव्यां रूडे थानक न सूक्याः (१०७) कीडी मकोडी नदेही घीवेली कातरा चूमेली पतंगिया मेमका अलसिया ईली कृति मांस मसा बगतरा माखी प्रमुख जे कोई जीव विणा चांपिया दूहव्या माला हलावतां पंखी काग चिमकलाना इंमा फूटा, अनेरा एकेद्रियादिक जिके जीव विणा चाप्या दूहव्या हाल तां चालतां अनेरं कांइ काम काज करतां विध्वंस पणं कीg. जीव रक्षा रूमेन कीधी संखारोसूकन्योः मुल्या धान तावमेदीधा दलाव्या नरमाव्या खाटला तावने फाटक्या- क्या काव्या- जीवाकुल तृमि लीपावी वाशी गार राखी रखावी. दलणे खोमणे लीपणे रूमी जयणांन कीधी: आठम चनदशना नियम नांग्या: धृणी करावी ॥ पहिला प्राणातिपात व्रत विषईन अनेरो० ॥ १॥ ॥ वीजू थूल मृपावाद विरमण व्रतें पांच प्रतीचार॥ ॥ सहमारहस्सदारे- मोनुवएमे व कृम लेहेय ।। मह साकार:-किणहिक प्रतं प्रयुक्तो बाल दीधो किणहिक प्रतें एवात करतां देखी तुम्हें तो राज दिलाव
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,
(१०८)
वो बो. 'इत्यादि क कहूं. स्वदार मंत्र जेद कीधो, अने
राई किणहीनो मंत्र आलोच मर्म प्रकाश्यो; किण हीने
कूमी वुधि दीधी, कूडो लेख लिख्यो, कूमी साख भरी
थापण मोसो कीधो, कन्या ढोर गाय चूमि संबंधिया
लेहणे देयणे व्यवसाय वाद वढावढि करतां मोटकुं जून
बोल्यु, हाथपाग जणी गाल दीधी, करडका मोड्या.
अधर्म वचन बोल्या॥ बीजे मृषावाद व्रत विषइ० ॥
॥त्रीजे अदत्तादान विरमण व्रतना पांच अती
चार ॥ तेनाहरप्पनगे, घर वाहिर क्षेत्र खले पराई
वस्तु अण मोकलावी लीधी, दीधी, वावरी, चोरीनी
वस्तु मोल लोधी, चोर धाडीत प्रतें संबल दीधु,
संकेत कहां. विरुष राज्या तिक्रम कीधोः नवा पु
राणां सरस विरस सजीव निर्जीव वस्तु तणा जेल
संजेल कीधा, खोटे तोल मान माप वोहम्यांमा
चोरी कीधी, साटे लांच लीधी, माता पिता पुत्र
कलत्र परिवार वंची जुदी गांठ कीधी किणहीने
लखे पालेखे नूलव्युं, पमी वस्त ननवी लीधी त्रीजे
अदत्तादान व्रतविषइन० ॥
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(१०८)
वो जो. इत्यादि क कहा. स्वदार मंत्र नेद कीधो, अने
राई किणहीनो मंत्रालोच मर्म प्रकाश्योः किण हीने
कूमी बुधि दीधी, कूडो लेख लिख्यो, कूमी साख जरी
थापण मोसो कीधोः कन्या ढोर गाय चूमि संबंधिया
लेहणे देयणे व्यवसाय वाद वढावढि करतां मोटकुं जून
बोल्यु, हाथपाग नणी गाल दीधी, करडका मोड्या.
अधर्म वचन बोल्या॥ बीजे मृषावाद व्रत विषइ० ॥
॥त्रीजे अदत्तादान विरमण व्रतना पांच अती
चार॥ तेनाहरप्पनगे, घर बाहिर क्षेत्र खले पराई
वस्तु अण मोकलावी लीधी, दीधी, वावरी, चोरीनी
वस्तु मोल लोधी, चोर धाडीत प्रतें संबल दीधू,
संकेत कीं. विरुध राज्या तिक्रम कीधो, नवा पु
राणां सरस विरस सजीव निर्जीव वस्तु तणा प्रेत
संजेल कीधा, खोटे तोल मान माप वोहग्यांमा
चोरी कीधी, साटे लांच लीधी, माता पिता पुत्र
कलत्र परिवार वंची जुदी गांठ कीधी, किणहीने
लेखे पलेखे नृलव्युं, पमी वस्त उजवी लीधी त्रीजे
अदत्तादान व्रतविपइन ॥
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(११०)
स्सय परिमाणे ॥ ऊर्वदिशि अधोदिशि नियंगदिशि
जायवा प्रायवा तणो नियम जे कोई अजाणे जागो,
एक गमा संकोमी वीजी गमा वधारी विस्मृति जगे
अधिक नृमि गया पाठवणी आवी मोकली ॥ के
दिगत्रत वि०॥
॥सातमें लोगोपनोग परिमाण व्रत ॥ जेहना नो-
जनप्राश्री पांच प्रतीचार (अने) करम हुँती पन्नरे एवं
वीश अतीचार ॥ सच्चित्ते पडिबचे, अपोल दुप्पोलयं व
आहारे सच्चित्त तणे नियमाप्तीधेअधिक सच्चित्त लीधु
तथा सचित्त मनी वस्तु अपक्काहार उपक्काहार तुत्रौषधी
तणो नकण कीचूं. होला बी पहुंक काकडी नडया
कीधा, मुल्या धान प्रमुख लक्षण कीधा ॥ सच्चित्त दव
विगई, पाणह तंबोल व कुसुमेसु ॥ वाहण सयण
विलेवण, बंन दिसि एहाण नत्तेसु ॥१॥ ए चवदे
नियम दिन प्रतें संजारया संकेया नहीं, लेई नियम
नांग्या बावीस अनक वत्तीस अनंतकायमांहि आदो
मूला गाजर पीमालू सूरण सेलरां काची आंबली गो
व्हां खाधां चोमासा प्रमुख मांहे वासी कठोलनी
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(११२)
चार ॥ कंदप्पे कुकुइएकंदर्प लगें विटनी परें हास्य
कुतूहल मुखादि अंग कुचेष्टा कीधी मृरख पणा लगें
कुणहीने असंवच वाक्य बोल्या. खांमा कटारी कुसि
कुहाडा रथ ऊखल मूसल अगन घरटी आदिक सज
करी मेल्यां माग्यां प्राप्यां, कणक वस्तु ढोर लेवरा
व्यां अनेरो कांड पापोपदेश दीधो, अंघोल नाहण दा
तण पगधोरण पाणी तेल अधिक प्राण्यां, हीमोले
हीच्या राजकथादेशकथा नुक्तकथा स्त्रीकथा पराइ वात
कीधी, आर्त रौष ध्यान ध्याया, कर्कश वचन बोल्या
करडका मोड्या, संन्नेडा लाया, नेसा सांड कूकडा:
ढा श्वानादि मतां कलह करतां जोया. खाधि लगें
अदेखाई चिंतवी माटी मी कण कपासिया काज विण
चाप्या, तेह नपर बयठा, आले वनस्पती दी जान
पाणी, वी रस तेल गुल आम्लवेतस बेरजादिक तणां
जाजन नघाडां मूल्यां. ते मांहि कीडी कंथुआ माखी
नंदर गिरोली प्रमुख जीव विणणा, सूडा प्रमुख जीव
क्रीडा हेते बांधी राख्या, घणी निज्ञ कीधी राग द्वेष
मी
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(११४) नाखी आपण पणुं उतुं जणाव्युं ॥ दशमे देसावकासिग व्रतविष इयो० ॥१०॥ ॥ इग्यारमे पोषधोपवास व्रतें पांच अतीचार ॥संथा रुचार बिही, पमाय तह चेव जोप्रणा नोए०॥ पोसह लीधे संथारा तणी नूमि बाहिरला थंडिला दिवमें शोध्यां पडिलेह्या नही, मातरं अणपडिलेद्यं वावरिन, अणपुंजी नूमिकाई परठविनं, पररवतां चिन्तवणा न कीधी, अणुजाणह जस्सुग्गहो न कह्यो. परठव्यां पूठे वार त्रण वोसिरामि वोसिरामि न कह्यु. पोसहशाला मांहि पइसतां नीसरतां निस्सही आवस्सही कहेवी वीसारी, पृथ्वीकाय अप्पकाय तेककाय वानकाय वन स्पतीकाय त्रसकाय तणा संघट्ट परिताप नपद्रव हुआ संथारा पोरसि तणो विधि नणन, वीसारिन पोरसि मांहि बुध्यां, प्रविधि संथारं पाथरपुं, काल वेलायें पडिक्कमणु न कीधन, पारणादिक तणी चिंता निपजावी, कालवेला देव वांदवा वीसा रिया, पोसह असूरो लीयो, सवारो पारीयो, पर्व तिथि प्रावी पोसह लीधो नही ॥ इग्यारमे पोषधोपवास व्रतविषइयो० ॥
(११५)
॥बारमे अतिथि संविनागवतें पांच प्रतीचार ॥
सञ्चित्ते निरकवणे०॥ सचित्तवस्तु हेठे ऊपरि थके महा
तमा प्रतें असूझतुं दान दीधुं. अदेवा तणी वु सूझतुं
फेडी असूझतुं कीg: देवा तणीवुचे असूझतुं फेडी सूफ तुं
कीg:आपणुं फेडीपरायु कीधुं.विहरवा वेला दलिगया,
असुर करी महातमा तेड्या-मरलगेंदान दीधुं गुणवंत
आवे जगति न साचवी उती शक्ति साधार्मिक वात्सल्य
न कीधुं. अनेराई धर्म केत्र सीदाता नती शक्ते नग्ध
रचा नहीं ॥बारमे अतियि संविनाग व्रतवि पश्यो० ॥
॥संलेहणा तणा पांच प्रतीचार. इहलोए परलो
ए०॥ इहलोका संसप्पळगे परलोगासंसप्पनंगे जीवि
आसंसप्पनगे मरणासंसप्पनगे कामन्नोगासंसप्पनगे इह
लोक मनुष्यनद मान महत्त्व लोक तणी सेवा उकुराई
बलदेव वानुदेव चक्रवर्ति पद यांच्या. परलोक इंद्र
अहमिंद्र देवाधिदेव पदवी वांगी: मुख प्राव्ये जीव
वातणी बांगा कीधी. मुख प्राव्ये मरवातणी वांचा
कीधी: कामनोग तणी इवा कीधी । संलेहणानतवि
।तपाचारवारनेदें ।। 3 अभ्यंतर- बाहिर: अण
(११४) नाखी आपण पणुं उतुं जणाव्यु ॥दशमे देसावकासिग व्रतविष इयो० ॥१०॥ ॥ इग्यारमे पोषधोपवास व्रतें पांच प्रतीचारसंथा रुवार बिही, पमाय तह चेव जोप्रणा नोए०॥ पोसह लीधे संथारा तणी नृमि बाहिरला थंडिला दिवमें शोध्यां पडिलेह्या नही, मातरं अणपडिलेहा वावरिन, अणपुंजी जूमिकाई परविन, परठवतां चिन्तवणा न कीधी, अणुजाणह जस्सुग्गहो न कह्यो. परतव्यां पूठे वार त्रण वोसिरामिवोसिरामि न का. पोसहशाला मांहि पइसतां नीसरतां निस्सही आवस्सही कहेवी वीसारी, पृथ्वीकाय अप्पकाय तेककाय वानकाय वन स्पतीकाय त्रसकाय तणा संवट्ट परिताप नपद्रव हुआ संथारा पोरसि तणो विधि नणन, वीसारिन पोरसि मांहि नंध्यां प्रविधि संथारं पाथरद्यु. कात वेलायें पडिक्कमणु न कीधन, पारणादिक तणी चिंता निपजावी, कालवेला देव वांदवा पीसा रिया, पोसह असूरो लीयोः सवारो पारीयो, पर्व तिथि आवी पोसह लीधो नहीं ॥ इग्यारमे पोषधोपवास व्रतविषयो० ॥ .
(११५)
॥ बारमे अतिथि संविनागवतें पांच अतीचार ॥
सचित्ते निरकवणे० ॥ सचित्तवस्तु हेठे ऊपरि थके महा
तमा प्रतें असूफतुं दान दीधुंअदेवा तणी बुड़े सूझतुं
फेडी असूम कीg: देवा तणीबु-असूझतुं फेडी सूफ तुं
कीg:आपणुं फेडी परायु कीg-विहरवा वेला दलिगया।
असुर करी महातमातेड्या:मरलगेंदान दीधुं गुणवंत
आवे जगति न साचवी उती शक्ति साधर्मिक वात्सल्य
न कीर्घ, अनेराई धर्म क्षेत्र सीदाता उती शक्ते नम
स्था नहीं ॥बारमे अतियि संविनाग व्रतवि षश्यो० ॥
॥ संलेहणा तणा पांच प्रतीचार. इहलोए पर लो
ए॥ इहलोका संसप्पनगे परजोगासंसप्पनंगे जीवि
प्रासंसप्पनंगे मरणासंसप्पनगे कामनोगासंसप्पनगे इह
लोक मनुप्यन्नव मान महत्त्व लोक तणी सेवा ठकुराई
बलदेव वासुदेव चक्रवर्ति पद वाव्या. परलोक इंद्र
अहमिंद्र देवाधिदेव पदवी वांगीः मुख प्राव्ये जीव
वातणी बांगा कीधी: मुख प्राव्ये मरवातणी वांग
कीधी: कामलोग तणी इहा कीधी ॥ संहणाव्रतवि०
॥ तपाचारखारनेदें । उ अभ्यंतरः उ बाहिर:
(११६)
सणसूणोयरियाः अणसण कहीयें नपवास, ते पर्व
तिथि उती शक्ते कीनही. कणोदरी ते पांच सा
त कवल कणा रह्या नही, द्रव्य संदेष विगय प्रमुख
परमाण कीधुं नहीं. आसनादिक काय किलेशन कीधो
संजीणता अंगोपांग संकोच्या नही, नवकारसी पोरसी
गंठसी मूंठसी साढपोरसी पुरिमट्ट एकासणो बेआसणो
नीवी आंबिल प्रमुख पञ्चरकाण पारवा वीसारया. वेस
तां नवकार नण्यो नही, नातां दिवसचरिम न की :
नीवी आंबिल नपवासादिक तप करी काचं पाणी पी
धुं. वमन थयुं ॥ बाह्य तपत्रत विषयो॥
॥अभ्यंतर तप ॥ पायचितं विणन । गुरु कनें मन
सुचें आलोयणा लीधी नही गुरुदत्त प्रायद्वित्त तप लेखा
शुच पुहचानयु नही. देवगुरु संघ साहम्मी प्रतें विनय
साचव्यो नही, वाचना प्रबना परावर्त्तना अनुप्रेक्षा
धर्मकथा लवण पंचविध सिज्ञाय कीधी नहीं धर्मध्या-
न शुक्लध्यान ध्यायुं नही, कर्म क्य निमित्त लोगस्स
दस वीसनो कानसग्ग न कीधो ॥ अभ्यंतर तप
विषयो॥
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सणसूणोयरिया, अणसण कहीयें नपवास, ते पर्व
तिथि बती शक्तं कीg नही. कणोदरी ते पांच सा
त कवल कणा रह्या नही, द्रव्य संदेष विगय प्रमुख
परमाण कीधु नहीं. आसनादिक काय किलेशन कीयो
संलीणता अंगोपांग संकोच्या नही, नवकारसी पोरसी
गंठसी मूंठसी साढपोरसी पुरिमट्ट एकासको बेआसणो
नीवी आंबिल प्रमुख पच्चरकाण पारवा वीसारया. वेस
तां नवकार नण्यो नही बता दिवसचरिम न की,
नीवी आंबिल नपवासादिक तप करी काचं पाणी पी
धुं. वमन थयुं ॥ बाह्य तपनत विषयो॥
॥अभ्यंतर तप ॥ पायचितं विनः । गुरु का मन
मुझें पालोयणा लीधी नही गुरुदत्त प्रायवित्त तप लेखा
शुच पुहचामधु नही, देवगुरु संघ साहम्मी प्रतें विनय
साचव्यो नही, वाचना प्रबना परावर्त्तना अनुप्रेक्षा
धर्मकथा लवण पंचविध सिज्ञाय कीधी नही, धर्मध्या-
न शुक्लध्यान ध्यायुं नही, कर्म कृय निमित्त लोगम्स
दस वीसनो कानसग्ग न कीधो ॥ अभ्यंतर तप
विषयो॥
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खमावे, पी। वे वांदणां देई. जगवन् देवसियं आलो
(११८)
परिवाद १४, पैशुन्य १५, अरतिरति १६, मायामृषा
वाद १७, मिथ्यात्वशल्य १८, ए. अठारह पापस्थानक
मांहि जे कांड कीधो कराव्यो अनुमोद्यो॥ एवं प्रकारे
श्रावक धर्मे श्रीसम्यक्तत्व मूल बारह व्रत चोवीसां सो
अतिचार मांहि जिको अतीचार पत्र दिवसमांहि
शुम बादर जाणतां अजाणतां हुवो होय ते सहू मन
वचन कायायें करी मिहामि पुक्कडं ॥ इति श्रीश्राव
कोंके वारह व्रतका अतीचार सं० ॥
॥ पीनें सबस्सवि परिकय ३॥ इत्यादि इलाकारेण
संदिस्सह पर्यंत कहे. तेवारें गुरु कहे. चन्छेण पडिक
मह. चनमासे बण पडिक्कमह. संवचरी अष्टमेण
पडिक्कमह. इखें तस्स मिठामि पुक्कडं कही. प्रादशा
वर्त्त वांदणां देवे. पी. इछाकारेण संदिस्सह जगवन
देवसियं आलोऽयं पमिकता पत्तेयखामणेणं
अप्नुनिमिअप्नितर परिकयं ॥३॥खामेळ? गुरु के
हे खा०॥पी इवं खामेमि परिकयं ॥३॥ इत्यादि
पाठ सर्व पूर्वे कह्यो, तिम कही मिठामि पुक्क दे
३
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(११९)
इयं पर्मिता परिकयं ॥ ३ ॥ पडिकमावेह गुरु
कहे सम्म पडिकमह. पी- इहं कही करेमि नंते
सामाश्यं । हामि गामि कानस्सग्गं जो मे परिकन
: ॥३॥ इत्यादि कही, तस्सुत्तरी• अन्नतू॥ कही ॥
• कानस्सरग करे: गुरुः पाखी सूत्र कहे. ते सांजले. अने
। गुस्थकी जूदा पडिकमता हुवे. तो एक श्रावक खमास
मणदेई कहे. जगवन सूत्र नपुं ? गुरु कहे, लणेह.
एसो वचन मनमें धारी। इहं कही: कनो थको हाथ
; जोडी नुहपत्ति सुखें देई. तीन नवकार कही, मधुर
; स्वर सूत्रार्थ मनमें चिंतवतो वंदित्तु सूत्र गुणे. बीजा
श्रावक करेमिनंतेहामि गमि कानस्सग्गः तस्मुत्त
री अन्नत्थू कही कानस्सरगमें रह्या मुणे ॥ सूत्रप्रांत
णमोअरिहंतागं कही. कासग्ग पारी, उना थका ती
न नवकार गुणी बेसे. पी॥३ नवकार ॥ ३ क
रोमि नंते कही. इहामि पडिकमिमं जो मे परिक
३॥ इत्यादि कही, वंदित्तु सूत्र गुणे: पडिकमे देव
सिचं सर्व ॥ एहने ठिकाणे पडिकमे परिकयं. चन
: मासिब संवहरियं सच कहे: पी कली. अमिळनि
--
(१२०)
आराहणाए इत्यादि पूर्ण जणी, खमासमण देई इना.
॥सं०॥०॥ मूलगुण उत्तरगुण प्रतीचार विशुधि
निमित्तं, कानस्सग्ग करूं ? गुरुकहे करेह. पी. इई
कही: करेमि नंते सामा० इछामि गमि कानरसग्गं
तस्सु० अन्नत्थू इत्यादिक कही. पाखी ये वार लोगस
चौमासियें बीसलोगस्स, संवहरीयें चालीस लोगस्सनो
काउस्सग्ग करे, एक नवकार ऊपर, कानस्सग्ग करी.
पारी लोगस्स कहे. बेसी मुहपत्ति पडिलेही, वे वांदणां
देई हा०॥ सं० ॥ ॥ समाप्ति खामणेणं ॥ अप्लाठि
जमि अग्निंतर परिकयं ३॥ खामेनं ? गुरु कहे खामेह
पीने इवं खाममि परिकयं ॥ इत्यादि पाठ पूर्वं कह्यो.
तिम कहे, पी. इनाका० ॥सं०॥०॥पाखी. ३॥
खामणां खा ? गुरु कहे, पुण्यवंतो चार वर खमासमण
देई. तीन तीन नवकारकही, पाखी ३॥समाप्त खामणां
खामेह. पी. श्रावक एक खमा समण देई. मस्तक
चुं नमावी, तीन नवकार गुणे, इम चार बार कहे, पीठे
गुरु कहे नित्थारग पारगाहोह. पी- श्रावक कहे. इठं
इचामो अणुसहि कही, पुण्यवंतो पाखीने लेखे, एक
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(१२२) वमो रतवन अजित शांति कहाणो सस्तवन नपर्ग हर स्तोत्र कहणो तथा पडिकमणो पूरो हुवां पीनें एक श्रावक गुर्वाज्ञायेंनमोऽई सिमा० कही. वडी शांतिका स्तोत्र कहे बीजा सर्व सुणे जिणाने रात्री पोसह न हुवे, ते पोसह सामायिक पारी सांजले॥ इति पादि कादि तीन पडिकमणविधि ॥ ॥ पाणहार दिवसचरिमं पचरकामि प्राण सह मह० सब० वोसिरामि ॥ इति पाणहार नपवासरोय चरका॥९॥ ॥जवश्चरिमं पच्चरकाइ तिविहंपि चनविहंपि प्राहार असणं पाणं खाइमं साइमं अणा सह मह० सत्र सिरइ ॥ आगार॥४॥नवरिम दो आगारकाजी होय ॥ इति नवचरिम पच्चरकाण ॥ (तथा) इमहीज गंठिसहि मुठिसहि अंगुरु सहि प्र मुख अनिग्रह पञ्चरकाणकेनी ए चार आगार. अणः सह० मह सब वोसिरह ॥ पांचमो चोलपट्टागारेणं सो साधुकों होय ॥ इति अनिग्रह पचरकाण ॥ ॥ अहणं ते तुम्हाणं समीवे देसावगासियं पञ्चरका वो
(१२३)
मि दवा खित्तकात नाव दवगं देसावगासियं
खित्तम इवा असा वा कालणं महत्तधारणाम
माणे जावनियम पञ्चरकामि नावनणं जावगहेणं नग
हिजामि उत्तेणं न उलिजामि अहोणकविरायंकेण वा
एसो परिणामो न पडिवजा ता अनिग्गह प्रमाणा
जोगेणं महासागारेणं महत्तरागारेणं सबसमाहिवत्तिया
गारेणं वोसिरह ॥ इति देसावगासी पञ्चरकाण ॥
॥ तथा साधु पञ्चरकाण करे- तब देसावगामी नही
पञ्चन्ने अन्ततिविहार नपवासमें प्रांविनमें नीबीम ए
कामण प्रमुखमें पाणसका उ आगार पञ्चखे. मो नि
खाने हैं। पापल्स खेवाडेण वा-अलेवाडेण वा-अपवा
बहुलेण वा ममिण वा अमिण वा वोमिइ ।।
॥ अथ पञ्चरकाण श्रागार संख्या॥
॥दोचेव ननुकारो. प्रागारा उस हंति पोरमिए ।।
सत्तेवय पुरिमट्टे एगासणमि अहवे ।। १ ।।मने गहा
गमन. अवय प्रायवितमि श्रागारा ॥ पंच वयन
तपारो चरिम चत्तारि॥२॥ पंच बढो अन्नि
(१२२) वमो स्तवन अजित शांति कहणो लघुस्तवन उपसर्ग हर स्तोत्र कहणो तथा पडिकमणो पूरो हुवां पीनें एक श्रावक गुर्वाज्ञायें नमोहसिधा कही. वडी शांतिका स्तोत्र कहे बीजा सर्व सुणे जिणाने रात्री पोसह न हुवे, ते पोसह सामायिक पारी सोनले ॥ इति पारि कादि तीन पडिकमणविधि ॥ S ॥ पाणहार दिवसचरिमं पच्चरकामि अण सह मह० सब० वोसिरामि ॥ इति पाणहार नपवासरोप चरकाण॥९॥ ॥जवश्चरिमं पञ्चरकाइ तिविहपि चनविहपि आहार असणं पाणं खाइमं साइमं अग सह० मह° सब सिरइ ॥ आगार ॥ ४ ॥ नवश्चरिम, दो आगारकानी होय ॥ इति अवचरिम पच्चरकाण ॥ (तथा) इमहीज गंठिसहि मुसिहि अंगुष्ठ सहि प्र मुख अनिग्रह पञ्चरकाणकेनी ए चार आगार. अब सह० मह° सब वोसिरइ ॥ पांचमो चोलपट्टागारेणं सो साधुकों होय ॥ इति अनिग्रह पच्चरकाण ॥ ॥अहण नंते तुम्हाणं समीवे देसावगासियं पञ्चरका
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(१२५) णयं च नमसणयं ॥ ५॥ आलिंगणयं ।। पुरिसा जइ पुरकवारणं- जश्त्र विमग्गह सुरककारणं ॥ अजिअं संतिं च नावन. अजयकरे सरणं पवजाहा ॥६॥ माग हिआ॥ अरइ रइ तिमिर विरहिलः मुवरय जरमरणं, सुर असुर गरुन नुयगवई पयय पणिवाअं॥अजि अ महमवित्र सुनय नय निनण मन्नयकर: सरणमुव सरिन जुवि दिविलमहिनं सयय मुवणमे ॥ ७ ॥ संगययं ॥ तंच जिणुत्तम मुत्तम नित्तम सत्तधरं, अ जब मद्दव खंतिविमुत्ति समाहि निहिं । संतिपरं पण मामि दमुत्तमतिबयरं, संति मुणी मम संति समाहि वरं दिसत ॥ ८॥ सोवाणयं ।। सावठिपुवपछि वंच वर हहि मध्य पसत्त विछिन्न संथिभं थिरसरित वई मयग ल लीलायमाण वर गंध हवि पहाण पछियं संथवारिहं हबिहाव बाहुं धंतकणग रुसग निस्वय पिंजरं पवर लरकणो वचित्र सोमचारु रूवं सुइ सुहमणानिराम परमरमणिक वरदेव इंहि निनाय महुरयरय सुहगिरं ॥९॥ वेडन । अजिनं जिप्रारिंगणं, जिन यं जवो हरिनं ।। पणमामि अहं पयः पावं पस .
(१२४)
गहे, निबीए अहनवय आगारा ॥ अप्पावरणे पंचन
हवंति सेसेसु चत्तारि ॥३॥ इति आगार संख्या॥
॥ अथ सप्त स्मरणानि प्रारंभ्यते ॥
॥तत्र प्रथमं॥
॥श्री बृहदजितशांतिस्मरणं लिख्यते ॥
॥अजिअं जिअ सबजयं, संतिं च पसंत, सवय
पावं ॥ जयगुरु संति गुणकरे, दोवि जिणवरे पणिव
यामि ॥१॥गाहा ॥ ववगय मंगुल नावे, तेहं विनत
तवनिम्मल सहावे ॥ निरुवम महप्पनावे, थोसामि म
दिक सनावे ॥ २ ॥ गाहा ॥ सब पुरक प्पसंतीण।
सब पावप्पसंतिणं, सया अजिय संतीणं, नमो अजिन
संतिणं ॥३॥ सिलोगो।अजिय जिण सुहप्पवत्तर्णः
तव पुरिसुत्तम नामकित्तणं ॥ तहय धिमइ प्पबत्तण
तवय जिणुत्तम संतिकित्तणं ॥४॥मागहिया ॥ कि
रिआविहि संचित्र कम्म किलेस विमुस्कयरं, अजिनं
निचियंच गुणेहि महामुणि सिधिगयं ॥अजिअस्स य
संतिमहा मुणिणोवि अ संतिअरं, समयं मम निवइ कार
(१२५) शयं च नमसणयं ॥५॥आलिंगणयं ॥ पुरिसा जा अकवारणं जान विमरगह सुरककारणं ॥ अजिनं मंतिं च जानन. अनयको सरणं पवळहा ॥ ६॥ माग दिया। अदर तिमिर विरहिअ सुवरय जरमरणं, नुन अनुर गरुत नुरगवः पयय पणिव॥अजि अमहवित्र नुनय नय निनमा मनयकर- सरणमुव मरिन नृवि दिविकतमहिनं सयय मुवणमे ॥ ७ ॥ गंगययं ॥नंच जिणुनम सूत्तम नित्तम सन्नधर- अ उस गाव खंतिदिमृत्ति समाहि निहिं ।। संतिपरं पण मामि दमनमनिश्वर मंनि मुणी मम मंति समाहि ।। ८॥मांचाग ।। सावहिपहपहिवंच वर मिल पादन विधि पिरमनिह वह मयग नहीबारमा दागंध पनि पाप पहियं मंधवान्हि. दाता निम्न किंज पदर हमलानि 11 . 12 . -- --
नि धवल ॥ दंतपंति संति सत्ति कित्ति मुत्ति जुति
(१२६)
जयवं ॥ १० ॥रासाधन ॥ कुरु जण वय हविणानर
नरीसरो पढमं तन महाचक्कवट्टिनोए महप्पन्नावो जो
बाहत्तरि पुरवर सहस्स वर नगर णिगम जणवयवई व
त्तीसारायवर सहस्साणुजाय मग्गो चनदस वर रयण
नवमहानिहि: चनसहि सहस्स पवर जुबईण सुंदर वई
चुलसी हय गय रह सय सहस्स सामी उन्नवइ गाम
कोडि सामी आसिजो नारहमि जयवं ॥ ११॥ वेदन॥
तं संतिं संतियरं, संतिन्नं सब जया-॥ संतिं थुणामि
जिणं, संति विहेनमे ॥१२॥रासाणंदिअयं ॥ इरकारा
विदेह नरीसर, नरवसहा मुणिवसहा ॥ नव सारय
ससि सकलाणण, विगय तमा विहुअरया ॥ अजित
त्तम तेष गुणेहि महामुणि अमिय बलाविनल कुला
॥ पणमामि ते नवनय मूरण जग सरणा मम सरणं
॥१३॥ चित्तलेहा ॥ देव दाणविंद चंद सूरवंद हरू
तु: जिह परम. लह रूव धंत रुप्प पट्ट से मुध
गुत्ति पवरः दित्त तेप्रवंदधे सबलोअ जावित्र पना
वणे अपइसमे समाहि ॥ १४ ॥ नारायन ॥ विमल
(१२७)
ससिकताइरेअसोम वितिमिरसूर कलारेन तेनं॥
तियसवइगणाइरेन रुवं धरणिधर प्पवराऽरेन सारं
॥१५॥ कुसुमलया॥ सत्ते असया अजिअंसारीरे
अबले अजिनं ।। तव संजमेन अजिनं एम थुणाभ
जिण मजिनं ॥१६॥ नुअंगपरिरिंगिनं ॥ मोमगुणे
हिं पावन तं नवसरय समी. तेत्र गुणेहिं पावन
तं नवसरयरबी ॥ रुवगुणेहिं पावन तं तिप्रस गणव
इ. सारगुणेहिं पावइन तं धरणिधवः ॥१७॥ खि
जिययं ।। तिव्वर पवत्तयं तमरयरहियं धीरजण थुत्र
चित्रं चुन कलिकनुमं ॥ मंतिनुहप्पवत्तयं तिगरण प
यता संतिमहं महा नुणिं मरण सुवणमे ॥ १८॥सलि
अयं ॥ विणणय मिरिर अंजलि. रिमिगण संयुधे
थिमित्रं ॥ विबुहाहिब घणवइ नरवइथुन महिन
चित्रं बहुमो ।। अलगय मरय दिवायर समहिनन
प्पनं तवमा ॥ गयणंगण विवरण नमुन. वारण बंदि
अंमिरसा ॥ १९ ॥ किसानयमाता।।अमर गम परि
वंदिनं. किन्नरोग पामंमित्रं ॥ देव तोडिनरम
मणसंघ परिवंदिनं ॥२०॥सुनुहं ।। प्रनयं
(१२६)
जयवं ॥१०॥रासाधन ॥ कुरु जण वय हविणानर
नरीसरो पढमं तन महाचकवहिलोए महप्पन्नावो जो
बाहत्तरि पुरवर सहस्स वर नगर णिगम जणवयवई व
त्तीसारायवर सहस्साणुजाय मग्गो चनदस वर स्यण
नवमहानिहिः चनसहि सहस्स पवर जुबईण सुंदर व
चुलसी हय गय रह सय सहस्स मामी उन्नवइ गाम
कोडि सामी आसिको नारहमि जयवं ॥ ११॥ वेदन।
तं संति संतियरं, संतिन्नं सब नया ॥ संति थुणामि
जिणं, संतिं विहेनमे ॥१२॥ रासाणंदिअयं । इस्कार
विदेह नरीसर, नरवसहा मुणिवसहा ॥ नव सारख
ससि सकलाणण- विगय तमा विहुअरया ॥ अजिन
त्तम ते गुणेहि महामुणि अमिय बलाविनल कुला
॥ पणमामि ते नवनय मूरण जग सरणा मम सरण
॥ १३ ॥ चित्तलेहा ॥ देव दाणविंद चंद सूरवंद हठ
तुह जिह परम. लह रूव धंत रुप्प पट्ट सेत्र मुध
निध धवल ॥ दंतपंति संति सत्ति कित्ति मुत्ति जुत्ति
गुत्ति पवर, दित्त तेप्रवंदधेत्र सबलोन नाविन पना
वणे अपइसमे समाहि ॥ १४ ॥ नारायन ॥ विमल
ससिकलाइरेअसोम: वितिमिरसूर कलाइरेन तेनं ॥
तियसवइगणाइरेन रुवं धरणिधर प्पवरारेन सारं
॥१५॥ कुसुमलया॥ सत्ते असया अजिअंसारीरे
अवले अजिनं ॥ तव संजमेत्र अजिअं एस थुणाम
जिण मजिअं ॥ १६ ॥ नुअंगपरिरिंगिनं ॥ सोमगुणे
हिं पावइ न तं नवसरय ससीः तेन गुणेहिं पावर न
तं नवसरयरवी ॥ रूवगुणोहिं पावइ न तं तिअस गणव
इ: सारगुणेहिं पावन तं धरणिधरवा ॥ १७॥ खि
जिययं ।। तिव्वर पवत्तयं तमरयरहिरं धीरजण थुन
चियं चुन कतिकसं ।। संतिसुहप्पवत्तयं तिगरण प
या संतिमहं महा सुणिं सरण सुवणमे ॥ १८॥ ललि
अयं ॥ विणणय सिरिर अंजलि. रिसिगण संथुग्रं
थिमि ॥ विबुहाहिव धणवइ नरवइथुन महिन
चित्रं बहुसो ॥ अलग्गय सरय दिवायर- समहिन स
प्पनं तवमा ॥ गयणंगण वियरण समुत्र. चारण वंदि
अंसिरमा ॥१९॥ किसन्तयमाला॥ अमुर गरन परि
वंदिः किन्नरोरग मंसिघ्रं । देव कोडिसयसंथुर्यः म
मणसंघ परिवंदिनं ॥२०॥ सुनुहं ।। अनयं अणहं पर
(१२८) यं अस्यं ।। प्रजिअं अजिनं पयन पणमे ॥ २१ ॥ विझुविलसि ॥ आगयावर विमाणः दिवकणग रह तुरय पहकर सएहि हुलियससंजमो रयण रकुनित्र ललिअचल कुंमलं गय तिरीम सोहंत मनलिमाला ॥२२॥ वेढनजं सुरसंघा सासुर संघावेर विनत्तात्र त्ति सुजुत्ता आयर जूसित्र संनमपिमित्र सुदृसु विनि अ सबबलोपा ॥ नत्तम कंचण रयण परूवित्रः जा सुर सण जासुरिअंगा, गाय समोणय अत्तिव सागय, पंजलि पेसिय सीस पणामा॥२३॥ रयणमाला॥ वंदिळणथोऊणतोजिणं तिगुणमेवय पुणो पयाहिणं ॥ पणमिळणय जिणं सुरासुरा, पमुइमा स नवणाइतो गया॥२४॥ खित्तयं ॥ तं महामुणिमहं पि पंजलि, राग दोस नय मोह वङियं ॥ देवदाणव नरिंद वंदिरं, संति मुत्तम महातवं नमे ॥२५॥ खि. त्तयं ॥ अंबरंतरविभारणियाहिं, ललिअ हंस बहुगामि जिंाहिं ॥ पीण सोणिवण सालणिमाहिं, सकल क मल दललोअणिमाहिं ॥२६॥ दीवयं ॥ पीण निरं तर थणनरविणमिय गायलयाहिं, मणिकंचण पसिडि
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तर थणनरविणमिय गायलयाहिं, मणिकंचण पसिढि (१२८) यं अस्यं ॥अजिअं अजिनं पयन पणमे ॥ २१ ॥ विझविलसिअं॥ आगयावर विमाण, दिवकणग रह तुरय पहकर सएहिं हुलिअं॥ ससंजमो रयण रकुनिया ललिअ चल कुंमलं गय तिरीम सोहंत मनलिमाला ॥२२॥ वेढन॥जं सुरसंघा सासुर संघा र विनत्तात्र त्ति सुजुत्ता, आयर नूसिव संनमपिमिश्र, सुासु विह्मि अ सबबलोघा ॥ उत्तम कंचण रयण परूविक्षः जा सुर नूसण नासुरिअंगा, गाय समोणय उत्तिव सागय, पंजलि पेसिय सीस पणामा॥२३॥ रयणमाला वंदिऊणथोकणतोजिणं तिगुणमेवय पुणों पयाहिणं ॥ पणमिकणय जिणं सुरासुरा, पमुश्मास जवणाइतो गया॥२४॥ खित्तयं ॥ तं महामुणिमई पि पंजलि, राग दास जय मोह वजिरं ॥ देवदाणव नरिंद वंदिरं, संति मुत्तम महातवं नमे ॥ २५॥ खि तयं ॥ अंबरंतरविभारणिग्राहि, ललिअ हंस बहुगामि पिंप्राहिं ॥ पीण सोणिबण सालणियाहिं, सकल के मल दललोअणिमाहिं ॥२६॥ दीवयं ॥ पीण निरं - । (१२९) लमेहल सोहिल सोणितजाहिं ॥ वरखिंखिणिनेनर स तिलय वलय विमणियाहि ।।रएकर चनर मणोहर सुं दर दसणियाहिं ॥ २७॥ चित्तरकरा ॥ देवमुंदरीहि पाय वंदित्राहिं वंदित्राय जस्स ते सुविक्कमाकमा अप्प णो निमालएहिं मं मणोड्डणप्पगारएहिं केहि केहिं वी अवंग तिलय पत्तलेह नामएहिं चिन्नएहिं संगयं गया हिं नत्ति सन्निविज्ञ बंदणागयाहिं हुंति ते बंदिया पुणो पुणो ॥२८॥ नारायन ॥ तमहं जिणचंदं, अजिन जिअमोहं ॥ धुप्रसबकिनेमः पयन पणमामि ॥ २९ ॥ नंदिप्रयं ।। थुअवंदिअस्मारिसिगण देवगणेहि नो देव वहहिं पयन पणमिप्रस्मा । जस्म जगुत्तमसास सयरमा तिवसागयपिंमिप्रनाहि ॥ देव वरहर मा बहुमाहि. सुरवर रहगुण पंमिप्रनाहिं ।। ३०॥ जामुत्यं ॥ दन मद्द तंति ताल मेलिए निकरानिराम महमी मएकए प्र. सुसमागम समसगीन पाय जान दिया हिं ।। वलय मेहता कतावनेनादिरामनद भीमराकार प देवनहिनाहि ॥हाव नाव विनमपगार एहिं नदि
(१३०)
नणग्रंग हारएहि वंदियाय जम्स ते सुविकमा कमा॥
तयं तिलोम सब मत्त मंतिकारयं पसंत सब पाव दोस
मेसहं नमामि मंतिमुत्तमं जिणं ॥ ३१ ॥ नारायन ॥
उत्त चामर पडाग जव मंडिआ, जयवर मगर तुरंग
सिरि वच मुलंगणा ॥दीवममुद्द मंदरदिसागयसोहिमा
सचित्र वसह माहमिविवमन्तंत्रणा ॥ ३२॥ लजि
अयं ॥ सहावना समप्पडघा, अदोस पुछा गुणेहि
जिष्ठा । पमायसिहा नवेण पुठा. सिरीही इछा रिसीहि
जुहा ॥३३॥ वाणवासिया॥ते तवेण धुप्रसवपावया
सबलोअहिअ मूल पावया ॥ संथुआ अजिअसंति पा
यया, हुतु मे सिव सुहाणदायया ॥३४॥ अपरांतिका
एवं तव बलविन्न, थुझं मए अजिम संति जिणज
यलं ॥ ववगय कम्म रयमलं, गइंगयं सासयं विमलां
॥३५॥ गाहा ॥ तं बहुगुणप्पसायं, मुरक सुहेण पर
मेण अविसायं ॥ नासेन मेविसायं, कुणनअ परिसावि
अ पसायं ॥३६॥गाहा ॥ तं मोएन अनंदि, पावेनमा
नंदिसेणमन्निनदि । परिसाविय सुहनदि म..
सन संजमे नदि ॥३७॥ गाहा। परिकन चाम्मा
सिय- संवहरिए अवस्मन्नणि अबो, ॥ सोमवो सबहिं
नवसग्ग निवारणो एसो॥३८॥जो पढइ जोअनिसु
पाइ: नन्नने कालंपि अजिम संतिथवं ॥न हु हुँति त
स्स रोगा. पुछप्पन्ना विनामंति ।। ३९ ।। जर वह
परम पयं. अहवा कित्तीसुविहडा नुवणे ॥ ता तिखुक्क
परणे जिणवयणे आयरं कुणह ॥ ४० ॥ गाहा ॥ इति
श्रीबृहद जितशांतिस्तवनं प्रथमस्मरणम् ।।१।।
॥अथ द्वितीय लघु अजितशांतिस्मरणम्॥
॥ लामिक म, नरक निग्गयपहा दंडवतेणं गिणं.
वंदारुण दिसंत व पयर्ड निवाणमग्गावलि ॥ कुंति
पुजान दंतकतिमिसनीहंत नाणंकुरु. केरे दोविफ
प्रजा मोलम जिणे थोमामि खेमंकरे ॥१॥ चरम जन्न
हिनीरंजोमिणि जतीहिंखय समय ममीर जो जीण
का गईए। महल नहय संवा लंबएजो पएहिं. अजि
अमहव संनि मो समझो थुणे ॥ २ ॥ तहविह बहु
माणु सामन्नतिप्नरेण- गुणकणमिवकिनी हामि चिता
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(१३३)
।। फुरइ फुडपलंताणतणाणं सुपूरो- पयड मजिप्रसंत
काण सूरो न जाव ॥ ९॥ अरि करि हरि तिएहु एहंज
चोरा हिवाही: समर डमर मारी रद्द खुद्दो वसग्गा।
पलय मजिप्रसंती कित्तणेऊत्तिजंती-निविडतरत मोहा
जरकरालंखिम व ॥१०॥ निचिअपरिमदारु दित्तक
पग्गिजाला- परिगय मिव गोरं चितिनं जाण रूवं ।
कणय निहसरेहा कंनिचोरं करिता. चिर थिर मि ।
हलहिं गाढमंथनिश्च ॥ ११॥ अडवि निवडिलाएं
पनिवृत्तासियाणं- जलहि लहरि हीरं ताण गुत्ति हि
याणं ॥ जलिय जलण जाला लिगिाणं च जाणं
जय लहु संनि संनिनाहा जिवाणं ।।१२॥ हरि
करि परिकियां पक्क पाउक्षण- मयलपुहवि र उड्डिअं
प्राण सज्ञ॥ तण पिवपडिल्लग्गं जेजिणा मुत्तिमग्गं.
चरण मणुपवणा हुँतु ने मे पसगा ।। १३ ।। णामसिवय
पाहिं फुलनित्तुप्पलाहि थणनरनमिशीहिं मुछिगिजो
दरीहिं । ललिम नुअलयाहिं पीण मोहिणीहिं. मय
सुर रमणीहि वंदिया जेमि पाया ॥ १४ ॥ अ
(१३२)
मणिव ॥ अलमहव अचिंता तसामचनसिं, फलहा
लहु सर्व वंनियंणिविमं मे ॥३॥ सयलजयहिआणं
नाममित्तण काणं, विहडइ लहुकुछा निम्दोवसृथहूँ ॥
नमिरमुर किरीडू घिपायारविंदे, सयय मजिन
संती ते जिणिंदे निवंदे ॥ ४॥ पसरइ वरकित्ती बढ़ए
देहदित्ती विलसइ नुवि मित्ती जायए सुप्पवित्ती॥
फुरइ परमतित्ती होइ संसारचित्ती, जिजुअपयनत्ती
ही चिंतोरुसत्ती ॥५॥ ललिय पयपयारं जूििदवंग
हारं, फुडगणरसन्नावो दारसिंगारसारं ॥अणमिसरमणि
आईसणअनीया, इवपुणमणि बंधा कास नट्टोवयारं
॥६॥थुणह अजिअसंती ते कया सेससंती, कणयरय
पसंगा नहाए जाणिमुत्ती ॥ सरनसपरिरंना रंजनिवा
पलही, घणथणघुसि कु प्पंकपिंगीकयवा बहुवि
हनयनंगं वत्रुणिचं अणिचं, सदसदनिलप्पा लप्पमेगं
अणेगं ॥ इय कुनय विरुवं सुप्पसिधं तु जेसिंः वयण
मवय णि ते जिणे संनरामि ॥ ८ ॥ पसरइ तित्र
लोए ताव मोहंधयारं, नमइजय मसणं तावमिहत्तवणं
। फुरइ फुडपताणतणाणं सुपूरो. पयड मजिप्रसंती
काण सूरो न जाव ॥९॥अरि करि हरि तिराहु एहंबु
चोरा हिवाही: समर डमर मारी रद्द खुद्दो वसग्गा ।।
पनय मजिप्रसंती कित्तणेऊत्तिजंती-निविडतरत मोहा
नरकरालखिव ॥१०॥ निचिनपुरिअदारु दित्तमा
पाग्गिजाला- परिगय मिव गोरं. चिंतिनं जाण रूवं ।।
कणय निहसरेहा कंतिचोरं करिता. चिर थिर मि ॥
हलहिं गाढसंथन्निव ॥ ११॥ अडवि निवडिप्राणं
पहिबुत्तासियाणं. जलहि लहरि हीरं ताण गुत्ति हि
याणं ।। जलिअ जलण जाला लिगिाणं च जाणं.
जणय लहु संति संतिनाहा जिवाणं ॥ १२॥ हरि
करि परिकिपा पक्क पारकपुमयलपुहवि र उडिग्रं
प्राण सह ॥ तण पिवपडिजग्गं जेजिणा नुत्तिमग्गं.
चरण मणुपवणा हुँतु ते मे पमना ॥ १३॥ उगमसिवय
पाहि फुल्लनित्तप्पनाहि. थणनरनमिरीहिं मुहिगिको
दरीहिं । ललिम नुअलयाहिं पीण मोणिहीहिं. मय
सुर रमणीहि वंदिया जेमि पाया ॥ १४ ॥ अरिस
लोए ताव मोहंधयारं, नमइजय मसणं तावमिहत्तनणं
(१३२)
मणिव ॥ अलमहव अचिंता तसामचनसिं: फलहर
लहु सर्व वंनियंणिचिअं मे॥३॥ सयलजयहिआर्ण
नाममित्तण काणं, विहडइ लहुधा निदोघट्टथटै ॥
नमिरसुर किरीट्ट घिपायारविंदे, सयय मजिन
संती ते जिणिंदे निवंदे ॥ ४॥ पसरइ वरकित्ती वट्ठए
देहदित्ती विलसा नुवि मित्ती जायए सुप्पवित्ती॥
फुरइ परमतित्ती होइ संसारचित्ती, जिजुअपयत्नत्ती
ही चिंतोरुसत्ती ॥५॥ ललिय पयपयारं नृरिदेिवंग
हारं, फुडगणरसन्नावो दारसिंगारसारं ॥अणमिसरमणि
ऊ देसण अन्नीया, इवपुणमणि बंधा कास नट्टोवयार
॥६॥थुणह प्रजिअसंती ते कया सेससंती, कणयरय
पसंगा बजाए जाणिमुत्ती ॥ सरनसपरिरंना रंजनिवा
लही, घणथणघुसि कु प्पंकपिंगीकयव॥७॥ बहुवि
हनयनंगं वबुणिचं अणिचं, सदसदनिलप्पा लप्पमेगं
अणेगं ॥ इय कुनय विरुदं सुप्पसिचंतु जेसिं, वयण
मवय णि ते जिणे संनरामि ॥ ८ ॥ पसरइ तिम
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जय जरक ररकस्सः कुसुमिण पुस्सनण रिस्क पीडासु ॥ संकासु दो सु पंथे. नवसग्गे तहय रयणीसु ॥२०॥ जो पढइ जो अनिसुणइ. ताणं करणो य माणतुंगस्स ।। पासो पावं पसमेनु, सयल नुवणचित्र चलणो ॥ २१॥ इति श्रीपार्श्वजिन स्तवनं तृतीय स्मरणं संपूर्णम् ।।३॥ अथ गणधर स्तुति चतुर्थस्मरण प्रारंनः ॥ तं जयन जए तिचं. जमिह तिवाहि वेण वीरेण ॥ सम्म पवत्तिनं नव सत्त- संताणसुहजणयं ॥१॥ना सित्र सयल किलेसा निहय कुलेसा पसब मुहलेसा॥ सिरि बद्धमाण तिबस्स. मंगलं किंतु ते अरिहा ॥२॥ निकम्मवीप्रा. बीआपरमेष्णिो गुणसमिद्धा ।। सि शातिजय पसिद्धा- हणंतु हाणि तिलस्म ॥३॥आ यार मायरंता. पंचपयारं सया पयासंता आयरिया तहतिर, निहय कुतिहं पयासंतु ॥ ४ ॥ सम्ममु अ वायगा वायगाय- सिवाय वायगा वाए । पवयण पडिणीय कए: वाणितु सबस्स संवस्म ॥ ५॥ निशाण साहुणुकाम साहणं जणि मब साहला । तिहप्प भावगाते. हवंतु परमेडिको जड़गो ॥६॥ जेणाणुग (१३६) ग्या सिग्छ, पत्ता हिय इचियं गणं ॥११॥ पञ्जलि आनलनयणं. दूरवियारियमुहं महाकायं ॥ नह कुलि सायविअलिप गइंदकुंजवतानोरं ॥ १२॥ पणय ससंनम पचिव. नहमणिमाणिक पडिअ पडिमस्स ॥ तुह वयण पहरणधरा. सीहं कुछपि न गणंति ॥ १३॥ ससिधवल दंतमुसलं. दीहकरुवाल वढि नाहं ॥ महु पिंग नयणजुअलं. ससजिल नवजलहरायारं ॥१४॥ भीमं महागइंदं: अचा सन्नपि ते नवि गिणंति ॥जे तुम्ह चलण जुअलं, मुणिवइ तुंगं समझीणा ॥१५॥ समरम्मि तिरक खग्गा निघाय पविच नद्धय कबंधे ॥ कुंतविणिनिन्न करि कलह- मुक्कसिकार पनरंमि ॥१६॥ निलिय दप्पुच्चर रिन नरिंद, निवहानडा जसं धवल। पावंति पाव पसमण, पासजिण तुह प्पनावेण ॥ १७॥ रोग जल जलण विसहर, चोरारि मइंद गयरण न याई॥ पास जिणनाम संकित्तणेण, पसमंति सवाई ॥१८॥ एवं मह नियहरं, पास जिणिंदस्स संथवमुभारं ॥ नविय जणाणंदमर कक्षाण परंपरनिहाणं ॥१९॥राय (१३७) जय जरक ररकस्सः कुसुमिण पुस्सनण रिरक पीडासु ॥ संमासु दोसु पंथे. नवसग्गे तहय रयणीसु ॥२०॥ जो पढ जो अनिसुणइ: ताणं कइणो य माणतुंगस्स ॥ पासो पावं पसमेन- सयल नुवणचित्र चलणो ॥ २१॥ इति श्रीपार्श्वजिन स्तवनं तृतीय स्मरणं संपूर्णम् ॥३॥ अथ गणधर स्वति चतुर्थस्मरण प्रारंना ॥ तं जयन जए ति जमिन तिवाहि वेण वीरेण ॥ सम्म पचत्तिनं नच सत्त- संताणसुहजणयं ॥१॥ना सित्र सयल किलेसा- निह्य कुलेसा पसह मुहलेसा ।। सिरि बद्धमाण तिस्स- मंगलं दितु ते अरिहा ॥२॥ निकम्मवीग्रा. वीआपरमेछिणो गुणसमिद्धा ॥ सि डातिजय पसिद्धा. हणंतु प्रचाणि तिलस्म ॥३॥ यार मावता. पंचपवारं सया पयासंता आयरिश्रा तहतिहं, निह्य कुतिहं पयासंतु ॥ ४ ॥ सम्ममु अवायगा वायगाय- मित्रवाय वायगा वाए । पत्याग पहिणीय कए: वणिंतु सबस्म संवस्म ॥५॥निवाण साढणसाप्र. साहणं जणिन मह माहला ॥ तिप्प भावगाते हवंतु परमेठिण जाणो ॥६॥ जेगाग निझिय दप्पुचर रिन नरिंद, निवहा नडा जसं धवल। (१३६) ग्घा सिग्घ, पत्ता हिय इहियं गणं ॥११॥ पति आनलनयणं, दूरवियारियमुहं महाकायं ॥ नह कुति सघायविअलिअ, गइंदकुंजबलानोरं ॥१२॥ पणय ससंनम पचिव, नहमणिमाणिक पडिअ पडिमस्स ।। तुह वयण पहरणधरा, सीहं कुचपि न गणंति ॥१३॥ ससिधवल दंतमुसलं, दीहकरुवाल वढि नचाहं ॥ महु पिंग नयणजुअल, ससलिल नवजलहरायारं ॥ १४ ॥ जीमं महागइंद, अच्चा सन्नपि ते नवि गिणंति ॥जे तुम्ह चलण जुअल, मुणिवा तुंगं ममलीणा ॥१५॥ समरम्मि तिरक खग्गा, निघाय पविच नछुय कबंधे ॥ कुंतविणिनिन्न करि कलह, मुक्कमिकार पनरंमि ॥१६॥ पावंति पाव पममाण- पामजिण तुह प्पन्नावेण ॥ १७॥ रोग जान जना विमहर, चारारि मईद गयगणन याई ॥ पास जितनाम मंकित्तागण, पममंनि मनाई ||१८||एवं मह नयहरं, पाम जिगिदम्म मंथवमा ॥ नविय जणाणंदम कलाण परंपरनिहाणं ।। ११. ॥ राय
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(१३८)
यं नागां निवागफलं च चमगमबिहवः ॥ निवन्म दम
एतं. मंगात मुबणेन मिडिया ॥ ७॥ निहम्मो सुन्न
धम्मो ममग्ग नवंगि वग्ग कय सम्मो॥ गुणमुहिम
संघ स्स. मंगलं मम्ममिह दिमन ॥ ८ ॥ रम्मो चरि
त धम्मो. संपावित्र नबमन मिवमम्मो ॥ नीसेस
किलेसहरो. हवन मया मयत मंवम्म ॥॥
गुणगण गुरुणो गुरुणो. शिवमुह माणो कुर्णतु
तिवस्स ॥ सिरि वचमाण पहु पयडिअम्म. कु
सलं समग्गस्स ॥१०॥ जिय पडिवग्का जरका.
मुह मायंग गयमुह पमुग्का ॥ सिरि बंन मंति महिमा
कय नयररका सिवं दिंतु ॥ ११ ॥ अंबा पडिहयमिबा
सिघा सिघाइआ पवयणस्स ॥ चक्केसरि वइरुट्टा, संति
सुरा दिसन सुरकाणि ॥१२॥ सोलस विजा देवी
नदितु संघस्स मंगलं विन्तं ॥ अबुत्ता सहिमान, वि
स्सुअ सुयदेवयान समं ॥ १३ ॥ जिण सासण कय
सुरावी ॥ सुहनावा
तावं, तिबस्स सया
१४ ॥ जिणपवय
गो
ररका, जरका चनवीस
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(१४९) निरया. विरहा कुप हान सबहा सके। वेयावच करावि अ: तिबस्स हवंतु संतिकरा ॥ १६॥ जिणसमय सुध समग्ग- विहिन नबाण जणित्र साहजो ॥ गीयरई गीयजसोः सपरिवारो मुहं दिसन ॥१६॥ गिहयुत्त खित्त जलथल. वण पचय वासि देव देवीन॥ जिण सासण हिश्राणं- हाणि सवाणि निहणंतु ॥१७॥द सदिसिपाला सरिकत्तवानयाः नवरगहा सनरकत्ता ।। जोइणि राहुग्गहना लपास, कुलिश्रम पहरेहिं॥ १८ ॥ सहकाल कंटएहि सविडिवहिं कालवेलाहिं ॥ सवे सब सुहं: दिमंतु मवस्स संवस्स ॥१९॥ नवणवइ वाणमंतर: जोइस वेमाणित्रा य जे देवा ॥ धरणिंद सक सहिया. दलंतु परियाई तिवस्स ॥ २० ॥ चर्क जस्सजलंतः गहा पुरवणासि ॥ तंतिठस्स
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(१४३) -पणय मुणितिलन ॥२१॥इति श्रीगुरुपारतंत्र्यनामक पंचमस्मरणम् ॥ ५॥ ॥अथ श्रीषष्ठमस्मरणम् ॥ ॥सिग्घमवहरन विग्य, जिणवीराणाणुगामि संघ स्स ॥ सिरि पासजिणो थंनण, पुरहिन निहियानिडो ॥१॥गोयम सुहम्म पमुहा, गणवणो विहिअ नव सत्तसुहा ॥ सिरि वचमाण जिणति न, सुन्नयंते कुणंतु सया ॥२॥सकाइणो सुराजे, जिण वेयावच्च कारिणो संति ॥ अवहरि विग्ध संघा, हवंतु ते संघ संतिकरा ॥ ३ ॥ सिरि थंनणय छिप पाससामि, पय पनम पणय पाणीणं ॥ निदलिप पुरिम विंदो धरणिंदो हरन पुरिआई॥४॥ गोमुह पमुरक जरका, पडिहय पडिवरक परक लरकाते । कयमुगुण संघ ररका हवंतु संपत्ति सिव सुरका ॥ ५॥ अप्पडिचक्का पमुहा, जिण सासण देव यान जिण पणिमा । सिघाइमा समेया ह वंतु संघस्स ६॥ सक्काए सा सच्चनर पुरठिन वघमाण सिरि वन (- सकन -
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(१४३) पणय मुणितिलन ॥२१॥इति श्रीगुस्पारतंत्र्यनामक पंचमस्मरणम् ॥ ५॥ ॥अथ श्रीषष्ठमस्मरणम् ॥ । सिग्घमवहरन विग्य: जिणवीराणाणुगामि संघ स्स ।। सिरि पासजिणो यंत्रण- पुरठिन नियिनिहो ॥१॥ गोयम सुहम्म पमुहा. गणवणो विहिन जब सत्तमुहा । सिरि वक्ष्माण जिगति छ. सुबयंते कुणंतु सया ॥२॥सकारणो सुराजे. जिण वेयावञ्च कारिणो संति ॥ अवहरिण विग्ध संवा. हवंतु ने संघ संतिकरा ॥ ३ ॥ सिरि थंनणय छिन पामसामि, पय पनम पणय पाणीणं ॥ निहनिप्र पुरित्र विदो. धरणिंदो हरत शरिआई॥४॥ गोमुह पमुरक जरका पहिय पडिवरक परक लरकाते ।। कयमुगुण मंर ररकाः हवंतु संपत्ति सिव सुरका॥५॥ अप्पडिचका पमुहा. जिण सासण देव यान जिण पणिया। मिथाइत्रा ममेया ह वंतु संबस्स विग्वहरा।॥ ३॥सझाए मा सबनर पुरहित पक्षमाण जिण अत्तो।। सिरि वन मंतिज.
(१४६) तथापि तव जक्तिवशान्मुनीश: कर्तुं स्तवं विगतशक्ति रपि प्रवृत्तः। प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्य मृगो मृगें ना भ्यति किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ॥ ५ ॥ अल्प श्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम, त्वजक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्मां ॥ यत्कोकिलः किलमधौ मधुरं विरौति. तथा रुचाम्रकलिकानिकरैकहेतुः॥६॥ त्वत्संस्तवेन जवसं ततिसंनिबद्धं, पापं दाणादायमुपैति शरीरजाजाम् ॥ आक्रांतलोकमलिनीलमशेषमाशु, सूर्याशुनिन्नमिव शार्वरमंधकारम् ॥ ७॥ मत्वेति नाथ तव संस्तवनं म येद, मारभ्यते तनुधियापि तव पन्नावात् ॥ चेतो हरि ष्यति सतां नलिनीदलेषु, मुक्ताफलद्युतिमुपैति ननूंद बिंदुः॥८॥आस्तां तव स्तवनमस्तसमस्तदोष, त्व संकथापि जगतां पुरितानि हति ॥ दूरे सहस्रकिरण: कुरुते पर्नेव, पद्माकरेषु जलजानि विकाशनांजि ॥९॥ नात्यद्भुतं नुवननूषणनूत नाथ, नूतै गुणै नुवि भवं त मनिष्टुवंतः ॥ तुल्या नवंति नवतो ननु तेन '. वाः नृत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ।।
(१४७) ॥१०॥ दृष्ट्वा नवंतमनिमेषविलोकनीयं नान्यत्र तोष मुपयाति जनस्य चक्षुः॥ पीत्वा पयः शशिकरद्युति पुग्धसिंधो कारं जलं जलनिधेरशितुं क श्छेत्॥११॥ यैः शांतरागसचिनिः परमाणुनिस्त्वं निर्मापितत्रिनु वनैकतनामनूत ॥स्तावंत एव खनु तेप्मणवः पृथि व्यां: यत्ते समानमपरं नहि रूपमस्ति ॥ १२ ॥ वक्रंक ते सुरनरोरेगनेत्रहारि, निःशेषनिर्जितदगवितयोपमा नम् ।। विवं कलंकमसिन व निशाकरस्यः यशसरे न वति पांडुपलाशकल्पम् ॥ १३॥ संपूर्णममनशशांकक लाकलाप, शुभ्रा गुणाविनुवनं तव लंघयंति॥ये सं श्रितास्त्रिजगदीश्वरनाथमेकं. कस्तान्निवारयति संचर तो यथेष्टम् ॥ १४॥चित्रं किमत्र यदि त्रिदशांगना निः नीतं मनागपि मनो न विकारमार्गम् ॥ कठ्यांत कालमस्ता चलिताचलेन. किं मंदरादिशिखरं वतिनं कदाचित् ॥ १५ ॥ निर्दू मवत्तिरपजिनतेलपूरः कृल्नं जगत्रयमिदं प्रकटीकरोषि ।। गम्यो न जातु मस्तां च लिताचलानां दीपोऽपरस्त्वममि नाथ जगत्रका (१४८) ॥१६॥ नास्तं कदाचिछुपयासि न राहुगम्यः, स्पष्टी करोषि सहसा युगपऊगंति ॥ नांनोधरोदरनिरुपमहा प्रनावः, सूर्यातिशायिमहिमासि मुनींद्र लोके ॥१७॥ नित्योदयं दलितमोहमहांधकार, गम्यं न राहुवदनस्य न वारिदानाम् ॥ विभ्राजते तव मुखानमनल्पकांति, विद्योतयजगदपूर्वशशांकबिंबम् ॥ १८॥ किं शर्वरीषु शशिनान्हि विवस्वतावा, युष्मन्मुखंदलितेषु तमस्सु नाथ ॥ निष्पन्नशालिवन शालिनि जीवलोके, कार्य कियऊनधरैलजारननैः ॥ १९॥ ज्ञानं यथा त्वयि विनाति कृतावकाशं, नैवं तथा हरिहरादिषु नाय केषु ॥ तेजःस्फुरन्मणिषु याति यथा महत्त्वं, नैवं तुकाचशकले किरणाकुलेऽपि ॥ २० ॥ मन्ये वरं हरिहरादय एव दृष्टा, दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमति किं वीकृितेन नवता नुवि येन नान्यः, कश्चिन्मनो हरति नाथ नवांतरेपि ॥ २१॥ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयंति पुत्रान्, नान्या सुतं त्वउपमं जननी प्रसूता॥ सर्वा दिशो दधति जानि सहस्ररमि, प्राच्येव दिग्जन
(१४९)
यति स्फुरदंशुजालम् ॥ २२ ॥ त्वामामनंति मुनयः प
रमं पुमांस, मादित्यवर्णममलं तमसः पुरस्तात् ॥ त्वा
मेव सम्यगुपलभ्य जयंति मृत्यु, नान्यः शिवः शिवपद
स्य मुनीपंथाः ॥२३॥ त्वामव्ययं विनुमचिंत्यमसं
ख्यमाद्यं, ब्रह्माणमीश्वरमनंतमनंगकेतुम् ।। योगीश्वरं
विदितयोगमनेकमेकं ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदंति संतः
।। २४ ।। वुद्धस्त्वमेव विबुधार्चितबुद्धिबोधात्, त्वं शं
करोऽसि नुवनत्रयशंकरत्वात् ॥धातासि धीर शिव मा
गविधेर्विधानात, व्यक्तं त्वमेव जगवन् पुरुषोत्तमोऽसि
॥ २५ ॥ तुभ्यं नमविन्नुवनार्तिहराय नाथ, तुभ्यं नमः
दितितलामलनृषणाय ।। तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्व
रायः तुभ्यं नमो जिनन्नवोदधिशोषणाय ॥ २६ ॥ को
विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैः स्त्वं संश्रितो निरव
काशतया मुनीश ॥ दोषैरुपात्तविवुधाश्रयजातगः,
स्वमांतरेऽपि न कदाचिदपीड़ितोऽसि ॥ २७॥ नन्चेर
शोकनरुसंश्रितमुन्मयूख, मानाति रूपममलं नवतो
निम् ॥ स्पष्टोलसत्किरणमस्त तमोवितानं. विवं
(१५०)
रवेरिव पयोघरपार्श्ववति ॥ २८ ॥ सिंहासने मणिमयूखं
शिखाविचित्रे, विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम् ॥
बिंबं वियग्लिसदंशुलतावितानं, तुंगोदयाशिशिरसीव
सहस्ररश्मेः ॥ २९॥ कुंदावदातचलचामरचारुशोनं
विभ्राजते तव वपुः कलधौतकांतम्॥ नद्यच शांकशुचि
निरवारिधार, मुच्चैस्तट सुरगिरेरिव शातकौनम्॥३०॥
बत्रत्रयं तव विनाति शशांककांत,मुच्चैः स्थितं स्थगितना
नुकरप्रतापम् ॥ मुक्ताफलप्रकरजालविवृधशोनं, प्रख्या
पयत्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥३१॥ननिहेमनवपंकज
पुंजकांती, पर्युल्लप्सन्नखमयूखशिखानिरामौ ॥ पादौ
पदानितव यत्र जिने धत्तः, पद्मानि तत्र विबुधाः परि
कल्पयंति॥३२॥इवं यथा तव विजृतिरजूछिनेड, धर्मो
पदेशनविधौ न तथा परस्य ॥ याहक प्रना दिन
कृतः प्रहतां धकारा, तादृक्कुतो ग्रहगणस्य विकाशिनोऽ
पि॥३३॥श्योतन्मदाविलविलोलकपोलमूल, मत्त
भ्रमभ्रमरनादविवृकापेम् ॥ ऐरावतानमिनमुवतमाप
तंतं दृष्ट्वा भयं भवति नो अवदा श्रितानाम् ॥ ३४॥
(१५१) जिन्ने कुंजगलपुज्ज्वलशोणिताक्त, मुक्ताफलप्रकरलू षितनूमिनागः॥ वचक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि नाकामति कमयुगाचलसंश्रितं ते ॥ ३५ ॥ कल्पांत कालपवनोचतवनिकष्टपं: दावानलं ज्वलितमुज्ज्वल मुत्स्फुलिंगम् ॥ विश्वं जिघत्सुमिव संमुखमापतंतः त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेषम् ॥ ३६ ॥ रक्तकणं समदकोक्तिकंठनील क्रोधोतं फणिनमुत्फणमापतं तम् ॥ आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशंक, स्त्वन्नामना गदमनी हृदि यस्यपुंसः॥३७॥ वलगत्तुरंगगजर्डि तन्त्रीमनाद: माजौ बलं बलवतामपि नृपतीनाम् ॥नच दिवाकरमयूखशिखापविश्यं त्वत्कीर्तना त्तमश्वाशु नि दामुपैति ।। ३८ ॥ कुंताग्रनिन्नगजशोणितवारिवाह, वेगावतारतरणातुरयोधनीमे ।। युधे जयं विजितपुर्ज यजेयपक्वा- स्त्वत्पादपंकजवनाशयिणो लनते ॥३९॥ अंनोनिधौ कुजितनीषणनकचक्र: पाठीनपीठन्नयदो वागवाडवानो ॥रंगत्तरंगशिखरस्थितयानपात्राः खा सं विहाय लवतः स्मरणाबजंति ॥४०॥ नहतनीषण
(१५४)
२१ शिवकर २२, स्यन्दन २३, संप्रति २४.
एते अतीत चतुर्विशतितीर्थकराः॥
॥श्रीपान १, अजित २, संजव ३, अभिनं
दन ४, सुमति ५, पद्मपन ६, सुपार्थ ७, चंद्रप्रन ८,
सुविधि ९, शीतल १०, श्रेयांस ११, वासुपूज्य १२१
विमल १३, अनन्त १४, धर्म १५, शान्ति १६,
कुंथु १७, अर, १८, मल्लि १९; मुनिमुबत २०
नमि २१, नेमि २२, पार्श्व २३, वर्षमान २४,
एते वर्तमानजिनाः॥
॥ श्रीपद्मनान १, सूरदेव २, सुपार्थ ३, स्वयं
प्रन ४, सर्वानुनूति ५, देवश्रुत ६, नदय ७, पेढा
ल ८, पोट्टिल ९, शतकीर्तिः१०, सुव्रत ११,
अम
म १२, निष्कषाय १३, निप्पुलाक १४, निर्मम १५,
चित्रगुप्ति १६, समाधि १७, संबर १८ यशोधर १९,
विजय २०, मल्लि २१, देव २२, अनन्तवीर्य २३,
नद्रंकर २४॥
॥ एते नावितीर्थकराः जिनाः ॥ शान्ताः शा
(१५५)
न्तिकरा नवंतु मुनयो मुनिप्रवराः रिपु विजयधार्न
कान्तारेषु पुर्गमार्गेषु रतुवो नित्यं ॥ ॐ श्रीना
नि १. जितशत्रु २, जितारि ३, संबर ४, मेव ५.
धर ६: प्रतिष्ट ७, महसेन नरेश्वर ८, सुग्रीव ९, दृ
ढरथ १०. विष्णु ११: वसुपुज्य १२, कृतवर्म १३,
सिंहसेन १४. जानु १५, विश्वसेन १६, सूर १७, सु
दर्शन १८. कुंन १९. सुमित्र २०, विजय २१, स
मुद्रविजय २२, अश्वसेन २३: सिच्चार्थ २४, ॥
॥ इति वर्तमान चतुर्विंशतिजिनजनकाः ।।
॥श्रीमरुदेवा १: विजया २, सेना ३. सिधार्थी
४: सुमंगला ५. सुसीमा ६, पृथिवीमाता ७, लक्ष्म
णा ८, रामा ९: नंदा १०, विष्णु ११, जया १२: श्या
मा१३: सुयशा १४: सुव्रता १५, अचिरा १६: श्री
१७. देवी १८. प्रत्नावती १९, पद्मा २०, वडा २१:
शिवा २२. वामा २३: त्रिशला २४, ॥
॥ इति वर्तमान जिनजनन्यः ।।
॥ गोमुख १, महायत २, त्रिमुख ३. यदनाय
(१५४)
२१ शिवकर २२, स्यन्दन २३, संप्रति २४.
एते अतीत चतुर्विशतितीर्थकराः॥
॥ श्रीषन्न १, अजित २, संजव ३, अजिनं
दन ४, सुमति ५, पद्मप्रन ६, सुपार्श्व ७, चंद्रप्रन ८,
सुविधि ९, शीतल १०, श्रेयांस ११, वासुपूज्य १२,
विमल १३, अनन्त १४, धर्म १५, शान्ति १६
कुंथु १७, अर, १८, मल्लि १९; मुनिसुव्रत २०
नमि २१, नेमि २२, पार्श्व २३, वर्षमान २४,
एते वर्तमानजिनाः॥
॥श्रीपद्मनान १, सूरदेव २, सुपार्श्व ३, स्वयं
प्रन्न ४, सर्वानुनूति ५, देवश्रुत ६, नदय ७, पेढा
ल ८, पोट्टिल ९, शतकीर्ति १०, सुव्रत ११, अम
म १२, निष्कषाय १३, निप्पुलाक १४, निर्मम १५,
चित्रगुप्ति १६, समाधि १७, संबर १८ यशोधर १९,
विजय २०, मल्लि २१, देव २२, अनन्तवीर्य २३,
नईकर २४॥
॥ एते नावितीर्थकराः जिनाः॥ शान्ताः शा
न्तिकरा नवंतु मुनयो मुनिप्रवरा: रिपु विजयडर्न
दकान्तारेषु पुर्गमागर्गेषु रहंतुवो नित्यं ॥ श्रीना
नि १. जितशत्रु २. जितारि ३, संबर ४. मेव ५.
धर ६: प्रतिष्ट ७. महसेन नरेश्वर ८. मुग्रीव ९: दृ
टरथ १०, विष्णु ११: वसुपुज्य १२, कृतवर्म १३,
सिंहसेन १४. नानु १५, विश्वसेन १६, सूर १७, सु
दर्शन १८, कुंन १९. सुमित्र २०, विजय २१, स
मुद्रविजय २२, अश्वसेन २३: सिद्धार्थ २४, ।।
॥ इति वर्तमान चतुर्विंशतिजिनजनकाः॥
॥ श्रीमहदेवा १: विजया २, सेना ३. सिधार्थी
४: सुमंगला ५. सुसीमा ६, पृथिवीमाता ७. लक्ष्म
णा ८, रामा ९. नंदा १०, विष्णु ११, जया १२. श्या
मा१३: सुयशा १४: मुव्रता १५, अचिरा १६. श्री
१७: देवी १८. प्रत्नावती १९: पद्मा २०, वमा २१:
शिवा २२, वामा २३. त्रिशला २४, ।।
॥ इति वर्तमान जिनजनन्यः ।।
॥ गोमुख १, महायत २, त्रिमुख ३. यवनाय
(१५४)
२१ शिवकर २२, स्यन्दन २३, संप्रति २४.
एते अतीत चतुर्विशतितीर्थकराः॥
॥ श्रीषन १, अजित २, संजव ३, अनिनं
दन ४, सुमति ५, पद्मप्रन्न ६, सुपार्श्व ७, चंद्रप्रन ८,
सुविधि ९, शीतल १०, श्रेयांस ११, वासुपूज्य १२१
विमल १३, अनन्त १४, धर्म १५, शान्ति १६:
कुंथु १७, अर, १८, मलि १९; मुनिसुव्रत २०
नमि २१, नेमि २२, पार्श्व २३, वर्धमान २४,
एते वर्तमानजिनाः॥
॥ॐ श्रीपद्मनान १, सूरदेव २, सुपार्श्व ३, स्वयं
प्रन ४, सर्वानुभूति ५, देवश्रुत ६, नुदय ७,
पेढा
ल ८, पोट्टिल ९, शतकीर्ति १०, सुव्रत ११, अम
म १२, निष्कषाय १३, निप्पुलाक १४, निर्मम १५,
चित्रगुप्ति १६, समाधि १७, संबर १८ यशोधर १९,
विजय २०, मल्लि २१, देव २२, अनन्तवीर्य २३
नद्रंकर २४॥
॥ एते नावितीर्थकराः जिनाः॥ शान्ताः शा
--
(१५७)
स्त्र महाज्वाला ११: मानवी १२, वैरोट्या १३, अनुप्ता
१४, मानसी १५. महामानसी १६, एताः षोडश वि
द्यादेव्यो रदंतु मे स्वाहा ॥ आचार्योपाध्यायप्रति
चातुर्वर्णस्य श्रीश्रमणसंघस्य शांतिनवतुन तृष्टिनवतु
पुष्टिनवतु , ग्रहाच सूर्यांगारक बुध बृहस्पति शु
शनैश्चरराहुकेतुसहिताः सलोकपालाः सोमयमवरु
णकुवेरवासवादित्यस्कन्दविना यका ये चान्यपि त्राम
नगर क्षेत्रदेवतादय स्तेसर्वे प्रीयंतां २ ॥ अहीण को
शकोष्टा गारा नरपत यश्च लवंतु स्वाहा ॥ पुत्र
मित्र भ्रातृ कलत्र सुहृत् स्वजन संबंधि बंधुवर्ग सहिताः
नित्यं चामोद प्रमोद कारिणो नवंतु ॥ अस्मिश्च
नृममने आयतन निवासिनां साधु माध्वी श्रावक
श्राविकाणां, रोगो पसर्ग व्याधि माख दोर्मनन्यो प
शमनाय शान्तिवतु॥ तुष्टि पुष्टिशादिवृद्धिमाङ्गल्यो
त्सवा नवंतु ॥ सदा प्राप्तानि फुरितानि पापा
नि शाम्यंत. शत्रवः पराङ्मुग्दा नवंतु स्वाहा ।। श्री
मने शान्तिनाथाय नमः शान्तिविधायिने ।। त्रेतोक्ये
(१५६)
क ४, तुंबुरु ५, कुसुम ६, मातंग ७, विजय ८, अजि
त ९, ब्रह्मा १०, यतराज ११, कुमार १२, षण्मुख १३,
पाताल १४, किन्नर १५, गरुड १६, गंधर्व १७, यहारा
ज १८, कुबेर १९, वरुण २०, नृकुटि २१, गोमेध २२॥
पार्श्व २३, ब्रह्मशांति २४ इति वर्तमानजिनयवाः ।।
॥ॐ चक्रेश्वरी १, अजितबला २, पुरितारी ३,
काली ४, महाकाली ५, श्यामा ६, शांता ७, नृकुटि
८, सुतारका ९, अशोका १०, मानवी ११, चंमा १२.
विदिता १३, अंकुशा १४, कंदर्पा १५, निर्वाणी १६,
बला १७, धारिणी १८, धरणप्रिया १९, नरदत्ता २०,
गांधारी २१, अंबिका २२, पद्मावती २३, सिद्धायिका
२४ वर्तमानचतुर्विंशति तीर्थकरशासनदेव्यः॥
॥जी श्री ति, कीर्ति, कांति, बुद्धि, लक्ष्मी,
मेधाः विद्या, साधन, प्रवेशनिवेशनेषु, सुगृहीतनामा
नो जयंति ते जिनेवाः॥ रोहिणी १, प्राप्ती २, व
शंखला ३, वज्रांकुशा ४, चक्रेश्वरी ५, पुस्पदत्ता,
काली ७, महाकाली ८, गोरी ९, गांधारी १०, सर्वा
(१५८)
स्यामराधीश, मुकुटाभ्यर्चितांहये ॥१॥ शान्तिः शां
तिकरः श्रीमान, शान्ति दिशतु मेगुरुः ॥ शान्तिरेव
सदा तेषां, येषां शांतिग्र्हे गृहे ॥२॥ नन्मृष्टरिष्ट,
पुष्ट, ग्रहगतिपुःस्वप्न मुनिमित्तादि ॥ संपादित हित
संपत्. नामग्रहणं जयति शांतः॥३॥ श्रीसंवपौरज
नपद. राजा धिपराज संनिवेशानाम् ॥ गोष्टीपुरमुख्या
नां, व्याहरणे या॑हरेडांतिम् ॥४॥श्रीश्रमणसंघस्य
शांतिर्नवतु, श्रीपौरलोकस्य शांतिर्नवतु ॥ श्रीजन प
दानां शांतिवतु। श्रीराजाधिपानां शांतिवतु। श्रीरा
जसंनिवेशानां शांतिर्नवतु, श्रीगोष्टिकानां शांतिर्नवतु,
स्वाहा ॥२॥शी श्री श्री पार्श्वनाथाय स्वाहा।
एषा शांतिः प्रतिष्टायात्रास्नात्रावसानेषु, शांतिकलशं
गृहीत्वा कुंकुम चंदन कर्पूरा गरुधूपवास कुसुमांजलिस
मेतः, स्नानपीठे श्रीसंघसमेतः, शुचिः शुचिवपुःपुष्पव
ख श्रंदनाजरणालंकृत चंदन तिलकं विधाय पुष्पमाला
कंठे कृत्वा, शांतिमुधोपयित्वा शांतिपानीयं मस्तके
दातव्यमिति ।। नृत्यति नृत्यं मणिपुष्पवर्ष, सृजति गा
यति च मंगलानि ॥ स्तोत्राणि गोत्राणिपति मंत्रान्- कल्याण जाजोहि जिनानिषके ॥१॥ अहं तिच्यरमा या शिवादेवी, तुम्ह नयरि निवासिनी ॥ अम्ह शिवं तुझ शिवें, असुहोवसमं शिवं भवतु स्वाहा ॥१॥ शि वमस्तु सर्वजगतः, परहितनिरता लवंतु नूतगणाः॥ दोषाः प्रयांतु नाशं सर्वत्र सुखी नवतु लोकः॥२॥ उपसर्गाः वयं यांति-नियंते विघ्नवक्षयः ।। मन प्रसन्न तामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे ॥ ३॥ इति श्रीवृधशांतिः समाप्ता॥ ।। अथ जिनपंजरस्तोत्रं लिख्यते ॥ ॥शी श्री अह अहंदभ्यो नमोनमः तुझी श्री अंह सिद्धेभ्यो नमोनमः ॥ी श्री अहं प्राचार्य भ्यो नमोनमः ॥झी श्री अहं उपाध्यायेभ्यो नमो नमः उही श्री अहं श्री गौतमस्वामिप्रमुखमर्वसाधु भ्यो नमोनमः ॥१॥ एष पंच नमस्कारः: सर्व पापदाय करः॥ मंगलानां च सर्वपां, प्रथमं नवति मंगलं ।। २।। सुक्षी श्री जयोविजये: अर्ह परमात्मने नमः ।। कमन्त प्रजमींची नाप जिनपंज॥ ३॥ एकनकोपवासेन विकानं यः पठदिन ॥ मनोनिलपितं संव, फल मा नीयं ॥ ४॥ नृशय्या ब्रह्मचर्यण, कोपलोनविन देवताम पवित्रात्मा गएमासेननते फलें ॥५॥ न स्थापयन्मृनि, सिकं च लाटके ॥ प्राचार्य श्री यामध्ये नपाध्यायं तु प्राणके ॥६॥ साधुवृन्दं मुख साग, मनः शुवं विधाय च ॥ सूर्यचंतनिरोधेन. मुवी सनाथ शिष्ये ॥७॥ दकिणे मदनपी, वामपा वि तो जिनः ॥ अंगसंधिपु सर्वज्ञः, परमेष्ठी शिबंकरः ॥८॥ पूर्वाशां श्रीजिनो रक्त दानेवी विजिश्विः ॥ दाई पाशां परं ब्रह्मा नेतिं चकर
(१६१)
पावदेवोयं, तानु चंद्रप्रनो विजुः॥१३॥ कंठं श्रीसुविधी
रकेत, हृदयं श्रीसुशीतलः॥श्रेयांसो बाहुयुगलं, वासु
पूज्यः करप्रयं ॥१४॥ अंगुलीविमलो रके, दनंतोऽसो
स्तनावपि ॥ सुधर्मोप्पुदरास्थीनि, श्रीशांति निमं
कलं ॥ १५ ॥ श्रीकुंथुर्गुह्यकं रके, दरो रोमकटीतटं।
मलिसस्पृष्ठिवंशं जंघे च मुनिसुव्रतः॥ १६ ॥ पादां
गुलीनमी रकेत, श्रीनेमिश्चरणाश्यं ॥ श्रीपार्श्वनाथः
सर्वांगं, वर्धमानश्चिदात्मकं ॥ १७ ॥ पृथिवीजलतेज
स्क. वाय्वाकाशमयं जगत् ॥ रददशेषपापेभ्यो, वीत
रागो निरंजनः॥१८॥राजद्वारे श्मशाने वा. संग्रामे
शत्रुसंकटे ॥ व्याघ्रचौरा निसर्पादि. नूतप्रेतनयाश्रिते ।।
॥९॥ अकालमरण प्राप्ते. दारिद्रयापत्समाश्रिते ॥
अपुत्रत्वेमहादोपे: मूर्खत्वे रोगपीमिते ॥ २० ॥ माकि
नीशाकिनीग्रस्ते, महाग्रहगणार्दिने ॥ नात्तारेववे
पम्ये व्यसने चापदि स्मरेत् ॥ २१॥ प्रातरेवममुबार.
यः स्मरेझिनपंजरं ।। तस्य किंचिजयं नालि लभ्यते
सुखसंपदं ॥२२॥ जिनपंजरनामेदं यः स्मल्यनुवा
९
(१६०) मनसूरी, नापते जिनपंजरं॥३॥ एकनक्तोपवासेन त्रिकालं यः पठेदिदं ॥ मनोनिलषितं सर्व, फलं सल जते ध्रुवं ॥ ४॥ जूशय्या ब्रह्मचर्येण, क्रोधलोनविव तिः देवताग्रे पवित्रात्मा, पामार्लनते फलें ॥५॥ अर्हतं स्थापयेन्मूर्ति, सिचं चकुर्ललाटके ॥ आचार्य श्री त्रयोर्मध्ये, नपाध्यायं तु प्राणके ॥६॥ साधुवृन्दं मुख स्याग्रे, मनः शुच विधाय च ॥ सूर्यचंतनिरोधेन, सुधीः सर्वार्थसिधये ॥७॥ दक्षिणे मदनप्रेषी, वामपार्थे स्थि तो जिनः॥ अंगसंधिषु सर्वज्ञः, परमेष्ठी शिवंकरः ॥८॥ पूर्वाशां श्रीजिनो रके, दाग्नेयीं विजितेंघियः॥ ददि णाशां परं ब्रह्म, नैतिं च त्रिकाल वित्॥९॥ पश्चिमा शां जगन्नाथो वायवीं परमेश्वरः ॥ उत्तरां तीर्थकृत सर्वा, मीशानी च निरंजनः॥१०॥ पातालं जगवा नह, नाकाशं पुरुषोत्तमः॥रोहिणीप्रमुखा देव्यो, रदंतु सकन कुलं ॥११॥षनो मस्तकं रक्के, दजितोपि विलो चने॥संभवः कर्णयुगलं, नासिकां चानिनंदनः॥१२॥ जष्टौ श्रीसुमतीरदेव, दंतान्पद्मप्रनो विनुः ॥ जिह्वां मु
(१६१)
मावदेवोयं, तानु चंद्रप्रनो विनुः॥१३॥ कंठश्रीसुविधी
रक्वेत, हृदयं श्रीसुशीतलः॥श्रेयांसो बाहुयुगलं, वासु
पूज्यः करप्रयं ॥१४॥अंगुलीविमलो रके दनंतोऽसौ
स्तनावपि ॥ सुधर्मोप्पुदरास्थीनि, श्रीशांति निम
मलं ॥ १५ ॥ श्रीकुंथुर्गुह्यक रके, दरो रोमकटीतटं।
मखिसस्पृष्ठिवंश, जंघे च मुनिसुव्रतः॥ १६ ॥ पादां
गुलीनमी रकेत, श्रीनेमिश्चरणप्रयं ॥ श्रीपार्श्वनाथः
सर्वांगं, वर्षमानश्चिदात्मकं ॥ १७ ॥ पृथिवीजलतेज
स्क. वाय्वाकाशमयं जगत् ॥ रदशेषपापेभ्यो, वीत
रागो निरंजनः॥१८॥राजद्वारे श्मशाने वा. संग्रामे
शत्रुसंकटे ॥ व्याघ्रचौरा निसादि नूतप्रेतनयाश्रिते ॥
॥९॥ अकालमरण प्राप्ते. दारिद्रयापत्समाश्रिते ॥
अपुत्रत्वेमहादोपे, मूर्खत्वे रोगपीमिते ॥ २० ॥ माकि
नीशाकिनीग्रस्ते, महाग्रहगणार्दिते ॥ नद्युत्तारेऽध्ववै
पम्ये व्यसने चापदि स्मरेत् ॥ २१॥ प्रातरेवसमुहाय,
यः स्मरेजिनपंजरं ॥ तस्य किंचिनयं नास्ति लभ्यते
सुखसंपदं ॥ २२ ॥ जिनपंजरनामेदं यः स्मरत्यनुवा
(१३२) सरं॥ कमलप्रजराजेंद्र, श्रियं स लाते नरः॥ २३ ॥ प्रातः समुचायपठेत् कृतज्ञोः यः स्तोत्रमेतद्धिानपंजरा ख्यं ॥ प्रासादयेत्मः कमलानाख्यां लक्ष्मी मनोवां वितपूरणाय ॥ २४॥ श्रीरुद्रपक्षीयवरेण्यगठे, देवाना चार्यपदाञ्जहंसः ॥ वादींद्रचूमामगिरेपजेनो जीयाद् गुरुः श्रीकमलप्रमाख्यः॥२५॥ ॥६॥ ॥ ॥ इति श्रीजिनपंजरस्तोत्रं संपूर्णम् ॥ ३ ॥ ॥अथ श्रीश्रावककी नित्य करणी॥ ॥ चोपाई ॥श्रावक तुं कठे परजात, चारघडी ले पिग्ली रात ॥ मनमां समरे श्री नवकार, जिम पामे जव सायर पार ॥ १ ॥ कवणदेव कवण गुरुधर्म, कवण अमारु ने कुलकर्म, कवण अमारो जे व्यवसाय, एवुचित वजे मनमांय ॥२॥सामायिक लेजे मन शुद्ध, धर्म तनीहडे धर बुद्ध ॥ पमिकमणुं करे रयणी तणु, पातक आलोए आपणुं ॥ ३ ॥ कायाशक्ति करे पञ्चरकाण, सूधी पाले जिनवर आण ॥ मुणजे गणजे स्तवन सि शाय, जिणहुंती निस्तारोथाय ॥ ४॥ चीतारे नित्य
(१६३)
चनदे नीम, पालेदया जीवतां सीम ॥ देहरे जाइ जु
हारे देव, द्रव्यमावथी करजे सेव ॥५॥ पोसालें गुरु
वंदन जाय, सुणो वखाण सदा चित्त लाय ॥ निर्दू
षण सूऊतो आहार, साधुने देजे सुविचार ॥६॥सहा
मीवत्सल करजे घj: सगपण मोहोटुं साहमीतणुं ॥
पुःखीया हीणा दीनने देख, करजे तास दया सुवि
शेष ॥७॥ घर अनुसारें देजे दान, मोटाशुं म करे अ
निमान ॥ गुरुने मुख लेजे पाखडीः धर्म न मूकीश
एकाघमी ॥८॥वार शुद्ध करे व्यापार: मा अधिका
नो परिहार ॥ मरिश केनी कूमी साख, कूमा जनशं
कथन म नाख ॥९॥अनंतकाय कही ये वत्रीश: अन
क्य वावीशे विश्वावीश ॥ ते जण नवि कीजें किम:
काचा कवला फल मत जिमे ॥१०॥रात्रीनोजनना
बहु दोष, जाणीने करजे संतोष ॥ साजी साबू लोह
नेगुली. मधु धावडी मत वेचो बली ॥ ११ ॥ वलीम
करावे रंगण पासः दूषण वणां कह्या तास ॥ पाणी
गलजे वे वे वार: अणगल पीतां दोष अपार ॥ १२
--
(१६४) जीवाणीनां करजे यन, पातक उमी करजे पुण्यं ॥3 णां इंधणचूलो जोय, वावरजे जिम पाप न होय॥१३॥ घृतनी परें वावरजे नीर, अणगल नीर मधौइश ची।। बारैव्रत सूधा पालजे, अतीचार सगला टालजे॥१४॥ कही या पन्नरे कर्मादान, पापतणी परहरजे खाणाशीश म लेजे अनरथ दम, मिथ्या मेल म मरजे पिंग ॥१५॥ समकित शुध हैमेराखजे, बोल विचारीने जाखजे ॥ नुत्तम ठामें खरचो वित्त पर नपगार करो शुजचित्त ॥१७॥ तेल तक घृत दूधने दही, ऊवाडा मत मेलो सही ॥ पांचे तिथि मकरो आरंन, पालो शीयल तजो मन दंन ॥१६॥ दिवस चरिम करजे चोविहार चारे आहार तणो परिहार ॥ दिवस तणां आलोए पाप जिम नांजे सघला संताप ॥ १८॥ संध्याये आवश्यक साचवे, जिनवर चरण शरण नवनवे ।। चारे शरण क री दृढ होय, सागारी अणसण ले सोय ॥ १९ ॥ करे । मनोरथ मन एहवा, तीरथ शत्रुजे जेहवा ॥ समेतशि खर ओबू गिरनार, नेटीश कब हुं धन अवतार ॥२०॥ १ (१६५) श्रावकनी करणी ने एहः एहथी थाये नवनो नेह ॥ पाठे कर्म पडे पातलाः पाप नणा बूटे प्रामला ॥२१॥ वारलहिये अमर विमान-अनुक्रम पामे शिवपुर धाम।। कहे जिनहर्ष वणे समनेह,करणी पुःखहरणी ने पह॥२२ इति श्री श्रावकनी करणीनीसा |||| ॥ अथ अपुहरी पोसह विधि लिख्यते ।। ॥राविनी पाउली वडिये निद्रा दूर करीन- पंचपर मेष्टि स्मरण करी- गृहचिंता परिहरी- पर्व दिवमयकी प थम दिवम पडितही राख्या- जे पोमहनानपगरण ने लेई. पोमहशालायें थापनाचार्य ममी. अथवा गुल्नो संयोग हुवे तो गुरुनी पाने प्रावी. नूमि प्रमाजी एक खमानमा देई. इरिचावहि पडिहनी पीउ समानमत देई । इवाका ॥०॥न ॥ पोलह नहपनि पनि लेहु ? गुरु कहे. पडितह. ६ कही समावमा दे। नहपत्ति पनि पाउ बनो यई. मानन डा काः ॥ नं. ॥ ज । पानह मंदिला गुरु संद. में दिल्लाह. पीई कसरी समानमः", ?
(१६४)
जीवाणीनां करजे यत्न, पातक मी करजे पुण्य ॥
णां इंधणचूलो जोय, वावरजे जिम पाप न होय।।१३॥
घृतनी परें वावरजे नीर, अणगल नीर मधौइश ची।।
बारैव्रत सूधा पालजे, अतीचार सगला दालजे॥१४॥
कही या पन्नरे कर्मादान, पापतणी परहरजे खाण॥शीश
म लेजे अनरथ दम, मिथ्या मेल म जरजे पिंम ॥१५॥
समकित शुच है राखजे, बोल विचारीने माखजे ॥
नत्तम ठगमें खरचो वित्त, पर नपगार करो शुन्नचित्त
॥ १७॥ तेल तक घृत दूधने दही, वाडा मत मेलो
सही ॥ पांचे तिथि मकरो आरंन, पालो शीयल
तजो मन दंन ॥१६॥ दिवस चरिम करजे चोविहार
चारे आहार तणो परिहार ॥ दिवस तणां आलोए पाप
जिम नांजे सघला संताप ॥१८॥संध्याये आवश्यक
साचवे, जिनवर चरण शरण नवनवे ॥ चारे शरण क
री दृढ होय, सागारी अणसण ले सोय ॥ १९ ॥ करे
} मनोरथ मन एहवा, तीरथ शर्बुजे जेहवा ॥ समेतशि
खर आबू गिरनार, नेटीश कब हुँ धन अवतार ॥२०॥
(१६७)
वीजी खमासमण देई मुहपत्ति पडिलेहे. पोनें दोय ख
मासमणे सामायिक संदिस्सा? सामायिक ठान?
कही खमासमण देई. अर्धावनतगात्र ऊनो थको तीन
नवकार, गुणी तीन करेमि नंते नचरी दोय खमासमणे
बसणो संदिस्सान? बसणो वगन? कही. पीनें दोय ख
मासमणे सिज्ञाय संदिस्सानी सिझाय करूं? कही खमा
समण देई कनो थको आठ नवकारनो सिज्ञाय करे.
शीतादि परीसहें दोय खमासमणे: पांगरणुं संदिस्सावं ?
पांगरण पडिग्घावं ? कहे. ए सर्व सामायिकविधि
पूर्व कहीं ने. तिमहीज करवीः पण इतनो वि
शेष उ. पहिला परियावही पमिकमी . ते माटे
इहां सामायिक दंगक कचरयां पीने इरियावही नहीं
पडिकमीजें ।। पी चैत्यवंदन, जयवीयराय सूधी करी
कुमुमिण पुस्समिण कानस्सग्ग करे, पी पडिकमणवे
लासीमसिझाय ध्यान करे. पी- पूर्वोक्त रीतें पडिकमण
करे, पण इतरो विशेष के चारे थुईएं देव वांद्या पीयें
खमासमण देई कहे ॥ इलाका ॥ सं०॥ ॥ बहु
देई. इचाका ॥ सं॥ ॥ गोमह गर्ने ? गुरु कहे गएह. गोरकही समासमण देई सुनो थई, प्राधो शरीर नमावी मुलें मुहपत्ति देई, मधुर स्वरें तीन नवकार गुणी कहे. इधकार जगवन् पसान करी, पोसह दंगक ननरावो? गुरु कहे नबरावेमो । पी करेमि नंते पोसह ॥ इहांसें ले के अप्पाणं वोसि रामि ॥ तक कहे सो लिखते हैं। ॥अथ पोसहका पचक्खाण प्रारंजः ॥ करेमि ते पोसह, आहार पोसह, देसन, सबन वा सरीरसकार पोसहं, सब बनचेर पोसह. सबनवावार पोसह. सबन चनविहे पोसहे, सावळ जोगं पञ्चक्खामि, जावदिवसं अहोरत्तिं वा पञ्जवासामि, पुविहंतिविहेणं. मणेणं वायाए काएणं, न करेमिन कार वेमि, तस्सनंते पडिकमामि निंदामि, गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ ॥ ए पाठ तीन वार गुरुवचन अनुनाषण करतो न बरे॥ पीनें एक खमासमणें ॥ इच्छाका सं॥०॥ सामायिक मुहपत्ति पडिलेहुँ ? गुरु कहे. पडिलेहेह,
(१६९)
देई ॥ इलाका ॥ सं०म०॥नुपधि मुहपत्ति पडिले
हुँ ? गुरु कहे, पडिलेहेह. पीनें श्वं कही, मुहपत्ति पडि
लेही दोय खमासमणे॥ इचाका०॥सं०॥०॥नही
पडिलेहण संदिस्सा ? गुरु कहे, संदिस्सावेह. नही
पडिलेहण करूं ? गुरु कहे, कोह. पीवें क
ही, कंबल वस्त्रादि पमिलेही पोसहशाला प्रमार्जी का
जो विधिशुं परठवी, एक खमासमण देई इरियावही
पडिकमे. इहां आचार दिन करमें कह्यो . दोय खमा
समणे इचाका०॥ सं०॥न॥ वसती संदिस्सा ?
वसती पमिलेहुं ? कही वसती मात्रो प्रमुख प्रमा.
इत्यादि पण विधि प्रपा प्रमुखमें न कह्यो॥ ॥॥
॥हवे एक खमासमणें । इहाका संन । सि
झाय संदिस्सान ? गुरु कहे. संदिस्सावेह. बीजे खमास
मणे । इचाका॥सं॥ ॥सिज्ञाय करुं ? गुरु
कहे करेह. पीठे कही नवकार एक कथन पूर्वक न
पदेशमाला प्रमुख सिझाय करी: नवकार एक कही
धर्मध्यान करे. जणे, गुणे, वखाण सुणे. इम करतां
(१६८)
वेलं संदिस्सा ? गुरु कहे, संदिस्सावेह. पीनें इवं कही,
खमासमण देई कहे. इचाका०॥सं०॥०॥ वहुवेलं
करूं ? गुरु कहे, करेह ॥ पीछे इछ कही, तीन खमास
मणे श्रीआचार्यजी मिश्र १, श्रीनपाध्यायजी मिश्र २,
त्रीजे सर्वसाधु वांदी, कम्मनूमिहिं कम्मन्नृमिहि, इत्या
दि नमस्कार नणे, जो पडिलेहणवेला नही हुवे, तो
सीमंधरस्वामीनू चैत्यवंदनादि करी, सिज्ञाय करे. हवे
पडिलेहण वेला पडिलेहण करे, ते विधिपूर्वे लिख्यो जे.
तो पण संपें फेर लिखीयें जै. दोय खमासमणे, इ
डाका० ॥ सं०॥०॥पडिलेहण करूं ? कही मुहपत्ति
पडिलेहे. पीवें दोय खमासमणे अंग पडिलेहण संदि
स्सानं ? अंग पडिलेहण करूं ? कहे पीलें गुरुवचनें इई
कही. धोतियो कणदोरो पडिलेही वस्त्र पहिरी, खमास
मण देई. इकार जगवन् पसान करी, पडिलेहण क
रावो जी ॥ एम कही, स्थापनाचार्य पडिलेही स्थापे,
अने जो गुर्वादिक स्थापनाचार्य पडिलेहे, तो पण ख
मासमण देई. नक्त रीतें आग्या मागे. पी- खमासमण
(१७१)
चेयाणं करेमि कानस्सगं वंदणवत्ती० अन्नबु० कहीं.
एक नवकारनो कानस्सग्ग करे. पारी एक थुईकी
गाथा कहे ॥ पीनें लोगस्स० सबलोए अरि० वंदणव
अन्नदु कही एक नव० पारी, दूसरी थुईकी गाथा क
हे, पी- पुक्खर वरदी सुअस्स नग वंदण अन्नबु०
कही एक नवकार पारी, तीसरी थुई की गा०पी सि
दाणं बुद्धाण वेयावच्च गराणं० अन्नबु' इत्यादि
कथन पूर्वक चोथी थुइकी गाथा कहकर वैठके न
मोबुणं कहे. फेर अरिहंतचेई कहे. इसी तरें चार थु
इयें देव वांदी वेसे ॥ नमोगुणं कहे. न मोर्हत्सिद्धाचा
ोपाध्याय इत्यादि कही पीठे स्तवन कहे. पी ज
यवीराय कही. नमोबुणं सधे तिविहेण वंदामि पर्यंत क
हे ॥इम पांचे शकस्तवे देववंदन विधि जाणवी ॥
।। ए विधि प्रवचनसारोद्धार प्रमुख ग्रंथमें कही
, तथा चैत्यवंदन बृहनाप्यमें एम कह्यो रे ॥ नम
स्कार कथन पूर्वक शकस्तव कही, इरियावही प्रतिक
मणादि करेः वली नमस्कार कथनपूर्वक शकस्तब कही
(१७०) पूण पहुर दिन चढ्यां. नग्घाडा पोरिसी अथवा. बहु पमिपुन्ना पोरिसी कही, खमासमण देई. इरियावही पडिकमी दोय खमासमणें ॥ इचाका०॥सं०॥०॥ पडिलेहण करूं ? गुरु वचनें इवं कही, मुहपत्ति पडिले ही पान जोजन पात्र पमिलेही राखे. पावें सिझाय ध्यान करे। ॥3॥ ॥॥ ॥ हवे कालवेलायें आवस्सही पूर्वक देहरे जई पां चे शकस्तवें देववांदण विधि दो प्रकारसे लिखते हैं । ॥ तीन प्रदक्षिणा देई, तीन वार नमस्कार करी नूमि प्रमार्जी. पुरुष हुवे तो प्रनुजीके दक्षिण पासे बेसे, स्त्री हुवे ते वाम पासें बेसे. पी ॥ इवा का०॥ सं० ॥ ॥ चैत्यवंदन करूं ? इठं कही, वै त्यवंदन करै ? पीछे नमोबुणं कहे. खमासमण देई ३ रियावही पमिकमें. एक लोगस्सनो कानस्सग्ग करे. मुखें लोगस्स कहे. संमासाप्रमा र्जी बेसे. चैत्यवं दन करके जं किंचि नाम तिवं । इत्यादि कही पीनें नमोबुणं कहे. ननो थई अरिहंत (१७३) तबो. पीसें तहत्ति कहीः अमुक पच्चरकाण चनविहार करयो- एम कही एक नवकार गुणी पचरकाण फासियं पालियं. सोहियं तीरियं, किट्टियं आराहियं, जंच न आराहियं, नम्म मिहामि मुक्कडं कही। चैत्यवंदन करे. मात्र मिजाय करी यथा संभवे, अतिथिसंविजाग करी पाणी पीवे॥ ॥३॥ ॥१॥ ॥ तथा नपधानवाही हुवे तो पोरिसी प्रमुख पञ्च रकाण पारी अाहार करे. पीठे पासण वेठो थकोहीज दिवस चरिम पञ्चरके पीरियावही पडिकमी चैत्यवं दन करे. ए चेत्यवंदन आहार संवरण निमित्तें ॥ इति पञ्चरकाण पारणेकी विधि। ॥॥ ॥ पीनें जो बहिनूमि जावणो हुवे. तो आवस्सही कही उपयोगी थको निर्जीव थंमिले जई. अणुजाणह जस्सुग्गहो कही पूर्व, नुत्तरसूर्यः ग्रामादिकनें पृति प्रण देई मलमूत्र परिलवेः प्राशुकजले शुद्ध ई तीन बार वोसिरामि- एहवू कहिवे करी मल मूत्र वो सिरावी, पोसहशालायें निस्सही पूर्वक पेमी इरियावही
(१७२)
दोय वार चार थुईसें देव वांदे. फेर शकस्तब कही जा
वंति चे याईगाथा नणी खमासमण पूर्वक जावंति
के बीजी गाथा कही, स्तवन कहे. वली नमोवुर्ण
कही, जयवीयराय कहे ॥ इति देववंदण विधिः ॥
॥पी- निस्सही पूर्वक पोसहशाला मांहि आवी.
इरियावही पमिक्कमे. पी सिझाय ध्यान करे, जो ति
विहार नपवास कियो हुवे. तो पच्चरकाण वेला पूर्ण
हुवां जलपीणेकू पञ्चरकाण पारे॥
॥हिवे पञ्चक्खाण पारवा विधि लि० हैं।
॥ खमासमण देई इरियावही पमिक्कमे. फिर एक
खमासमण ॥ इला० ॥ सं० ॥ जर ॥ पच्चरकाण
पारवा मुहपत्ति पमिलेहुं ? गुरु कहे, पमिलेहेह ॥
पी इचं कही खमासमण देई. मुहपत्ति पडिलेहे, फेर
एक खमासमण देई, इचाका०॥२०॥०॥ पाण
हार अमुक पच्चरकाण पारुं ? गुरु कहे, पुणोवि कायबो.
पीने यथाशक्ति कही, खमासमण देई ॥ इबाका०॥
सं०॥०॥पाणहार पारुं ? गुरु कहे, आयारो न मो
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(१७४)
पडिकमे. खमासमण देई कहे ॥ इचाका० ॥ सं० ॥
ज०॥ गमणागमणं आलोयहं ? गुरु कहे, आलोएह.
पी इठं कही गमणागमण पालोवे॥ ते इम आवस्स
ही करी, प्राशुक देश जई. संमासा पूंजी, थंडिला प
डिलेही, नचार प्रश्रवण वोसिरावी, निस्सही करी, पो
सहशालायें आव्यो॥आवंति जंतेहिं जं खंडियं, जं
विराहियं तस्स मिहामि उकडं ॥ एम कही बेसे, पीनें
पडिलेहण वेला सीम सिझाय करे।
॥ हवे पाउले पहुर इरियावही पडिकमीखमासमण
देई कहे. इचाका० ॥ सं॥न पडिलेहण करूं ? गुरु
कहे. करेह. इवं कहीदूजे खमासमणे इचाका०॥सं०॥
न०॥॥ पोसहशाला प्रमाणु ? गुरु कहे, प्रमार्जह.
पी- इवं कही, मुहपत्ति पमिलेही दोय खमासमणे
* अंग पडिलेहण संदिस्सान ? अंग पडिलेहण
करूं ? कहे पीछे गुरु वचने, इ@ कही मुहपत्ति
पमिलेही दमासणो पूंजणी प्रमुखसे प्रमार्जी, पोस
हशाला प्रमार्जे. पीनें काजो शुद्ध करी, नदरी, एकांतें
(१७५)
विखरतो परिठवीइरियावही पडिकमी, खमासमण पूर्व
क कहे ॥श्वकार नगवन् पसान करी पडिलेहणा पडि
लेहावोजी॥ पीवें स्थापनाचार्य पडिलेहीस्थापे. गुरु
समीपे अथवा थापनाचार्य समीपें एक खमासमण देई
इलाका० सं०॥०॥ मुहपत्ति पडिलेहं ? गुरु कहे,
पडिलेहेह. पीठे श्वं कही खमासमण देई, मुहपत्ति
पडिलेहे. पीनें दोय खमासमणें ॥ इचाका सं०॥ना
सिझाय संदिस्सा ? सिझाय करूं ? नुक्त रीतें
कणमात्र सिझाय करी तिविहार नपवास कीधो हुवे तो
गुरु साखें पाणिहार पञ्चखे ॥ नपधानवाही प्रमुख
आहार कीधो हुवे, तो वांदणां दोय देई पचरकाण करे
पीछे एक खमासण देई ॥ इवाका ॥ सं० ॥ ना॥
नपधि मिला पमिलेहण संदिस्सा? बीजे खमास
मणे । इलाका ॥सं०॥ ॥नपधि थंडिला पनि
लेहुँ ? गुरुवचनें कही: दोय खमासमणे॥ इहाका.
सं०॥ ॥ वेसणो संदिस्सा ? बेसको गन? कही
बसे. वस्त्र कंवलादि पडिलेहे. पुंजणी हुवे तो ते
(१७३)
मुहपत्तिशुं पडिलेहे. नपवासी तो तेमाटें सर्व पाने
कडिपट्टो धोतीयो कणदोरो पडिलेहे, उपधानवाही प्र
मुख नोजन कीधो हुवे तो कडिपट्टादि पडिलेह्यां पी।
वस्त्र कंबलादि पडिलेहे. ए विशेष रे ॥ पी काल
वेला सीम सिझाय ध्यानकरे पीठे नचार प्रश्रवण २४
थंमिलां पडिलेहे, जो चन्दश हवे, तो पाखी चनमासी
पडिक्कमणो करे, संवहरीये संवहरी पडिकमणो करे.
तिहां देवसी पडिक्कमणो पूर्वे लिख्यो तिमहीज करे.
पण इतरो विशेष ॥इचादेवसियं आलोएमि ३
त्यादि देवसी आलोयां पीनें “गणे कमणे चंकमणे
इत्यादि पाठ कहे. खुद्दोवदव कानत्सग्ग कियां पीठे
दोय खमासमणें ॥ इनाका॥सं०॥०॥ सिझाय
संदिस्सानं ? सिझाय करूं ? कही बैगे थको तीन नव
कार प्रमुख सिझाय करै ॥ इति ॥
॥पादिकादि तीन पमिकमणविधि पूर्वे लखी हे
वहांसें जान लेनां.
॥ हवें पडिक्कमणो हुवा पीढ़ें साधुकी वेया वच्च को
॥
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(१७७)
पोरसी सीम सिझाय ध्यान करे. जो लघुनीति प्रमुख
करवी हुवे, तो आसज कह तो थको, नूमि प्रमाजे थं
मिल स्थानकें जई, देहशंका निवारे, प्रश्रवण वोसरा
वी, स्वथान के प्रावे. जगवन् बहु पमिपुन्ना पोरसी
एम कही खमासमण देई इरियावही पमिक्कमे. पी-
राईसंथारा विधि करे ।। ॥१॥ ॥॥
॥ हवे राई संथारा विधि कहे ॥
॥ खमासमण देई॥ इलाका० ॥सं०॥ ना॥
राई संथारा मुहपत्ति पमिलेहुं ? गुरु कहे पमिलेहेह.
पाउँ इवं कही: खमासमण देई मुहपत्ति पमिलेहे. एक
खमासमणें ॥ इलाका ॥सं०॥ न ॥राई संथारो
संदिस्सा ? वीजे खमासमणें ॥ इवाका० सं०॥
राई संथारो गवू ? पी गुरु वचनें इहं कही, चनक
साय पडिमल्लुखुरण इत्यादि नमस्कार कथन पूर्वक
जयवीयराय सूधी चैत्यवंदन करे. नृमि प्रमार्जी. सं
थारो नत्तर पट्टो पाथरे.पी शरीर प्रमार्जी नित्मही नि
सही एम कही संधारे वेसी. तीन नवकार तीन करे
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(१८१) मि, एहवो पाउ कहे. अने जो अह पहरी करखो हुवे, तो जाव अहोरत्तिं पञ्जवासामि एहवो पाठ कहे. पी सामायिक विधि सर्व करी चैत्यवंदण कुसुमिण उस्स मिण कानस्सग्ग करी पडिक्कमणो करीदोय खमासमणे बहुवेलं संदिस्साये २: अने जो पूर्व पडिकमणो गुरु सा थे करयो हुवे. तो पडिक्कमणाने अंतें पडिलेही राख्या. जे वस्त्र ते पहरी पोसह सामायिक सर्व विधि करी दोय खमासमणे बहुवेलं संदिस्साये २. तया जो गुरुमें दो पडिकमणो करयो हुवे तो गुरूपासें प्रावी पोसह सा मायिक सर्व विधि करी-पालोयण खामणादि निमित्त मुहपत्ति पडिलेही बे वांदणां देई । इचाका॥4॥ ना॥राश्यं पालो ? गुरु कहे.पालोएह. पी राई आलोवे. फेर एक खमासमण देई । इवाकाः ॥ नंः ।। जा॥ अनुनिमि अप्निंतर-राईचं खामेमि ! गुरु कहे. खामेह. पीठे सर्व पाठ कहे. राई खामे. पडिलां पडिक मणाम नवकारनी पचल्यो थो तेमाटे पी गुत्नाले पक्षरकाण अवामनो करे. पीठे दोष समानम बहु
(१८२)
वेलं संदिस्सावे ॥ए तीन प्रकारका विकल्प जाणनां.
हवे पडिलेहण तो पूर्वं करी तो पण आदेश मागवो.
ते एम खमासमण देई॥इछाका०॥ सं॥॥प
डिलेहण संदिस्सान ? बीजे खमासमणे पडिलेहण करूं?
कही मुहपत्ति पडिलेहे. पीनें इमहीज दोय खमासमणे
अंग पडिलेहण संदिस्सावी मुहपत्ति पडिलेहे. पीठे
वली खमासमण देई. इहकार नगवन् पसान करी प
डिलेहण पडिलेहावो जी. एम कहे. पीठें एक खमास
मण देई ॥ इचाका ॥सं॥०॥ नुपधि मुहपत्ति
पडिलेहुं ? कही कोई वस्त्र प्रण पडिलेद्यो राख्यो हुवे
तो पडिलेहे. नहीं तो वली पासण पडिलेहे. दोय ख
मासमणे सिशाय संदिस्सावी उपदेशमाला प्रमुख सि-
शाय करे. आगे सर्व क्रिया पूर्व अठ पुहरी पोसहमें लि
खी है, तिमहीज जाणवी, पण इहां अठ पुहरी पोसही
तो पाउली रातें वली सामायिक न लेवे. जिणे दिवस
संबंधी चन पुहरी पोसह लीधो हुवे, ते पाउले पुहर प
चरकापा. किया, पीनें दोय खमासमणे नही पडिलेहण
(१८३)
संदिस्सा नही पडिलेहण करूं? कहे. पण थंमिला पद
न कहे. अने थंमिला नही पडिलेहे. यह निकेवल दिन
संबंधी पोसह ग्रहण करणेमें विशेष विधि ही सो बताई।
इति दिनसंबंधी पोसह ग्रहण विधि ॥
॥अथ रात्रि संबंधि चउ पुहरी पोसहनी
विधि कहे ॥
॥ तिहां जिणे प्रथम चन पुहरी दिवस पोसो ऊच
स्यो है- पीछे संध्यानी पडिलेहण करतां रात्रि पोसहनो
नाव थयो तो पञ्चरकाण कियां पीठे दोय खमासमणे
पोसह मुहपत्ति पमिनेही तीन नवकार गुणी तीन वार
पोसहदंमक नच्चरे. पीरें सामायिक विधि पुर्व लिखी
है: तिम करे पण सामायिक कचरयां पीनें दोय समास
मणे सिज्ञाय संदिस्सावी आठ नवकार कही वेसमो
संदिस्सावी. पांगरणो संदिस्सावी. पीनें दोय खमास
मणे ॥ श्वाका॥सं॥॥नही मिला पडिले
हण संदिस्सान? नही मिला पन्लेिहण कहें. गुरु कहे,
करेह. इदं कही नपधि पडिलेहे. आगें सर्व क्रिया
६.
(१८४)
लिखी तिम जाणवी. तथा जे श्रावक नपवासी तोव्यत्र
पणे दिवसें पोसह न करी शक्यो, ते रात्रि पोसहनो
भाव थयां, पाउने पहुर धर्मस्थानके आवे. जो वसती
प्रमार्जी हुवे, तो सरयो, नहीं तो वसती प्रमाजी का
जो परिठवी सर्व नपगरण पडिलेही इरियावही पडि
कमें. पी- चनविहार पच्चरकाण करी दोय खमासमण
देई पोसह संदिस्सावे. फेर खमासमण देई, तीन नव
कार गुणी, तीन वार पोसह दंमक कचरे. तिहां दिवसे
संरत्तिं पझुवासामि कहे संध्या हुवे, तो रत्तिं पञ्जवासा
मि कहे, पी बिहुँ खमासमणे सामायिक मुहपत्ति पडि
लेहे. दोय खमासमण देई, सामायिक संदिस्सावे. फेर
खमासमण देई, तीन नवकार गुणी, तीन करेमि जंते
कचरे. दोय खमासमण देई सिज्ञाय संदिस्सावी, आठ
नवकार कहे. फेर दोखमासमण देई.वेसणो संदिस्सावी
सीतादिकें वे खमासमण देई, पांगरणं संदिस्सावे, पीनें
बे खमासमण देई, अंग पमिलेहण संदिस्सावी, मुहप
त्ति पमिलेहे. फेर वे खमासमण देई, नही मिला पडि
(१८५)
लेहण सांदिस्सावी जो अणपमिलेह्यो नपगरण हुवे, तो
पमिलेहे. जो सर्व नपगरण पमिलेह्या हुवे, तो पण था
नकशून्यता टालवा नणी वली आसण पमिलेही, प
मिकमण वेला सीम सिशाय ध्यान करे. पीनें उच्चार
प्रश्रवणना २४, थंमिला पमिलेही पडिक्कमणो करे.
तथा पाउली रातें वली सामायिक न लेवे. इतना नि
केवल रात्रिसंबंधि पोसह लेवाना विकल्प जाणवा ॥
इति रात्रि पोसह विधि संपूर्णम् ॥ ॥हो॥
॥अथ गणेकमणे चंकमणे ॥
॥ गणेकमणे चंकमणे आनत्ते अणानत्ते ॥ हरित्र
काय संघट्टे बीयकायसंघट्टे थावरकायसंघट्टे उप्पश्यासं
घट्टे सबस्सवि देवसिम, पुचिंतिय पुनासिय चिठिया
॥श्चाकारेणसंदिस्सह, इवं तस्स मिठामि पुक्क ॥ १
संथारान्वट्टणकी,आनट्टणकी परिअट्टणकी, पसारणकी
उप्पझ्यासंघट्टणकी अच्चरकुविसयकायकी सबस्सविरा
इन, चिंतिम, पुनासिम, चिठियः इलाकारण
सांदिस्सह: इठंतस्स मिठामि मुक्कडं ॥१॥इति ॥है।
(१८६) ॥अथ २४थंमिला पडिलेहण पाठ लि०॥ ॥ आगाडे आसन्ने नच्चारे पासवणे अणहियासे ॥ १ ॥ आगाडे मज्ञे म्वारे पासवणे अणहियासे ॥२॥आगाढे दूरे नचारे पासवणे अपहियासे ॥३ आगाढे अासन्ने पासवणे अणहियासे ॥ ४ ॥आगाढे मझे पासवणे अणहियासे ॥५॥ आगाढे दूरे पासवणे अणहियासे ॥६॥आगाढे आसन्ने नबारे पासवणे अ हियासे ॥७॥आगाढे मझे नच्चारे पासवणे अहियासे ॥८॥आगाढे दूरे नचारे पासवणे अहियासे ॥९॥ आगाढे आसन्ने पासवणे अहियासे ॥१०॥ आगाढे मझे पासवणे अहियासे ॥११॥आगाढे दूरे पासवणे अहियासे ॥ ॥१२॥णागाढे आसन्ने नचारे पासव णे अणहियासे ॥१३॥ अणागाढे मझे नच्चारे पासव णे अणहियासे ॥१४॥णागाढे दूरे नच्चारे पासवणे अणहियासे ॥ १५ ॥ अणागाढे आसन्ने पासवणे अणहियासे ॥१६॥ अणागाढे मझे पासवणे अण हियासे ॥१७॥ अणागाढे दूरे पासवणे अणहियासे (१८७) ॥१८॥ प्रणागाढे आसन्ने न्चारे पासवणे अहियासे ॥ १९ ॥ अणागाडे मझे नबारे पासवणे अहियासे ॥२०॥अणागाढे दूरे नबारे पासवणे अहियासे॥२१॥ अणागाढे आसन्ने पासवणे अहियासे ॥२२॥ प्रणागाढे मझे पासवणे अहियासे ॥ २३॥ अणागाढे दूरे पासव णे अहियासे ॥ २४ ॥ए थंमिलपमिलेहण पाठ कह्या।। ॥ यह चोवीस थंमिला कहां कहां करना। सो लिखते हैं. ॥६ थंडिला शय्याके दोनुं तरफ दहिणे पासे ३, वामपासे ३, पमिलेहे ॥६, थंडिला दरवओके भीतर पासे दहिणे ३: वामें ३, पमिलेहे॥६ थंडिला दरखसके बाहर दोनुं पासे पडिलेहे ॥६ थंडिला जिहां नचार प्र खवणकी जगा होवे ते दोनुं तरफ पडिलेहे ॥ ॥ इति २४ थंमिला पडिलेहणविधिः संपूर्णः ॥ ॥अथ देव वांदणामें अथवा प्रातःकाल संध्याका लके प्रतिक्रमणमें कहनेकी स्तुति ॥ ॥ तत्र प्रथम वीजकीस्वति ।। ॥ महीमंझणं पुन्नसोवन्नदेहं जणाणंदणं वान' ॥ - (१९०) ॥२॥शेजा शिखरें, जाणी लान अपारः॥ चनुमासे रहिया, गणधर मुनि परिवार ॥ नवियणने तारे, देई धरम नपदेश ॥ दूध साकरथी पण, वाणी अधिक वि शेष ॥३॥पोसो पडिक्कमj, करिये व्रत पञ्चरकाण ॥ आठम तप करतां, आठ करमनी हाण ॥ आठः मंगल थाये, दिन दिन कोडि कल्याण ॥ जिन सुखसूरि कहे, इम जीवत जनम प्रमाण ॥ इति अष्टमी स्तुति ॥ ॥अथ मौनेकादशीस्तुतिः॥ ॥ अरस्य प्रव्रज्या नमिजिनपतेनिमतुलं, तथा मल्लेर्जन्म व्रतमपमलं केवलमलं ॥ वलकैकादश्यां स हसि लसद्दाममहसि, किती कल्याणानां कृपतु वि पदः पंचकमदः ॥१॥ सुपर्वेदश्रेण्यागमनगमनैमिव लयं सदा स्वर्ग त्येवाहमहमिकया यत्र सलयं ॥ जिना नामप्यापुः कृणमतिसुखं नारकसदः, किती० ॥२॥ जिना एवं यानि प्रणिजगारात्मीयसमये, फलं यत्कर्तृ पामिति च विदितं शुधसमये ॥अनिष्टारिष्टानां विति रनुभवेयुर्वहुमुदः, वि०॥३॥ सुरा सेंद्राः सर्वे सकल
(१९१)
जिनचंद्रप्रमुदिता, स्तथाच ज्योतिष्काखिलनवनना
थाः समुदिताः, तपो यत्कर्तृणां विदधति सुखं विस्मित
हृदः, दिती० ॥ ४॥ इति मौनेकादशीस्तुतिः ॥
॥ अथ चतुर्दशीस्तुति ॥ हरिगीतमंद ॥
॥कि धपमप घुधुमि धोंधों धसकिधर धपबोरवं
दोंदोंकि दोंदों दाग्मिदि दाग्डिदिकिमकिषण रणद्रे
एवं ॥ मामलोंक में जगणरणरण निजकि निजजन
रंजनं सुरशैल शिखरे नवतु मुखदं पार्थजिनपतिम
जानं ॥ १॥ कटरेंगिनि थोगिनि किटति गिग्मदा धु
धुकि धुट नटपाटवं, गुणगुणण गुणगण रणकि गणे
गुणणगुणगणगौरवं ॥ जजि कि केंफ्रें जणण रणररण
निजकि निजजन सजना, कलयंति कमलाकलितक
लमल मुकलमीशमहेजिनाः॥२॥कि कि-ठे उनि
गज्ञक ठपिट्टा ताज्यते: तललोंकि लोलोपि
षिनि मेंषिपिनि वाद्यते॥ कि थुगि थु
गिनिधोंगिधोंगिनि कलरवे: जिनमतमनंतं महिम त
नुता नमति सुर नरमुठवे ॥३॥पुद्रांकि पुदां पुपुइदि
(१९२)
पुंदा घुपुइदि दोदों अंबरे, चाचपट चचपट रणकि णे
डणण मेंमें मंबरे ॥ तिहां सरगमपधुनि निधपमगर
स सस ससस सुरसेवता, जिननाट्यरंगे कुशलमुनि
शं दिशतु शासनदेवता ॥ ४॥ इति श्रीजिनक
शलसूरिजीकृत पार्श्वजिनस्तुतिः॥
||
॥ अथ नवपद स्तुतिः॥
॥ निरुपम सुखदायक जगनायक लायक शिवग
ति गामी जी, करुणासागर निजगुण आगर शुन सम
ता रस धामी जी॥ श्रीसिद्धचक्र शिरोमणि जिनवर
ध्यावे जे मन रंगे जी ते मानव श्रीपालतणी परि पामे
सुख सुर संगें जी॥१॥अरिहंत सिद्ध आचारिज पा
ठक साधु महा गुणवंता जी, दरिसण नाण चरण तप
उत्तम नवपद जग जयवंता जी॥ एहनो ध्यान धरतां
लहिये अविचल पद अविनाशी जी, ते सबला जिन
नायकनमियें जिणे एनीति प्रकाशीजी॥२॥आसूमा
स मनोहर तिमवलि चैत्रक मास जगीशेजी, नजवाली
सातम थी करिये नव आंबिल नव दिवसें जीतेर स हस
।
(१९३)
वलिगुणिये गुणऍनवपद केरोसारो जी॥इण परि निर
मल तप आदरिय, आगम साख उदारो जी ॥३॥
विमल कमलदल लोयण सुंदर श्रीचक्केसरि देवी जी,
नवपद सेवक नविजन केरा विघ्न हरो सुर सेवी जी॥
श्रीखरतर गड नायक सद्गुरु श्रीजिननक्ति मुनिंदा
जी, तासु पसायें इणपरि पन्नणे श्री जिनलान सुरिंदा
जी॥४॥ इति श्रीनवपद०॥ ॥ ॥॥
॥अथ पजूसणकी स्तुति॥
॥ वलि वलि हुं ध्याईं गानं जिनवर वीर, जिनपर्व
पजूसण दाख्या धरमनी शीर ॥आषाढ चौमासे हुती
दिन पञ्चास, पडिक्कमण संवन्चरी करियें त्रण नपवास
॥१॥ चन्वीशे जिनवर पूजा सतर प्रकार: करिये न
लनावें जरिये पुण्य नंमार ॥ वलि चैत्य प्रवामें फिरतां
लान अनंतः इम परव पजूसण सहमें महिमावंत ॥२॥
पुस्तक पूजावी नव वाचनायें वचाय, श्रीकल्पसूत्र जि
हां सुणतां पाप पुलाय ।। प्रतिदिन परनावन धूप अग
र नरकेव, इमानवियण प्राणी परव पजुसण सेव ॥३॥
(१९४) वलि साहमी वबल करिये वारंवार, केइ नावना जावे के तपसी शीलधार ॥ अडदीह पजसण इम सेवत आ णंद, सुयदेवी सांनिध कहे जिन लाल सुरिंद ॥४॥ इति श्रीप!षणपर्वस्तुति॥ ॥ अथ नेमनाथजीकी स्तुति ॥ सुर असुर वंदिय पाय पंकज मयणमल्ल अकोनि तं, घनसघनश्याम शरीर सुंदर शंख लंजन शोजितं । शिवादेवि नंदन त्रिजग वंदन जविक कमल दिनेश्वर गिरनार गिरिवर शिखर वंदू नेमिनाथ जिनेश्वरं ॥१॥ अष्टापदें श्रीआदि जिनवर वीर जिन पावा पुरे, वासु पूज्य चंपापुरिय सीधा नेमि वय गिरिवरे ॥ समेत शिखरे बीस जिणवर मुगति पहुता मुनिवरू, चनवीस जिणवर तेह वंदू सयल संधै सुख करू ॥२॥ ग्यार अंग नपांग बारे दश पयन्ना जाणि यें, न वेद ग्रंथ पसल अन्डा चार मूल वखाणियअनु.योग धार नदार नंदी सूत्र जिनमत गाइये, एह वृत्ति चूर्णी नाष्य पेंतालीश आगम ध्याइयें॥३॥ पुहं दिसें बालक
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(१९४) वलि साहमी वञ्चल करिये वारंवार, केइ नावना जावे केइ तपसी शीलधार ॥ अडदीह पजसण इम सेवत आ णंद, सुयदेवी सांनिध कहे जिन लान सुरिंद ॥४॥ इति श्रीप!षणपर्वस्तुति ॥ ॥ अथ नेमनाथजीकी स्तुति ॥ ॥ सुर असुर वंदिय पाय पंकज मयणमल्ल अकोनि तं, घनसघनश्याम शरीर सुंदर शंख लंजन शोनितं ॥ शिवादेवि नंदन त्रिजग वंदन नविक कमल दिनेश्वर गिरनार गिरिवर शिखर बंदूं नेमिनाथ जिनेश्वरं ॥१॥ अष्टापदें श्रीआदि जिनवर वीर जिन पावा पुरे, वासु पूज्य चंपापुरिय सीधा नेमि वय गिरिवरे ॥ समेत शिखरें बीस जिणवर मुगति पहुता मुनिवरू, चनवीस जिणवर तेह वंदू सयल संधै सुख करू ॥२॥ इग्यार अंग नपांग बारे दश पयन्ना जाणि यें, उछेद ग्रंथ पसल अहा चार मूल वखाणियें॥अनु.योग धार नदार नंदी सूत्र जिनमत गाइये, एह वृत्ति चूर्णी जाण्य पेंतालीश आगम ध्याइयें॥३॥ पुहं दिसें बालक
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॥
॥॥
(१९६)
क्रधरा सुरासुरनता पायादपायादसौ ॥अर्हन् श्रीजिन
चंगीस्सुमतिनो जव्यात्मनः प्राणिनौ, याचक्रेऽवमक
ष्टहस्तिनिधने शार्दूलविक्रीडितं ॥
॥४॥ इति दीपमालिका स्तुतिः॥
॥अथ पञ्चतिथीका स्तवन॥
॥सुगुण सनेही साजण श्रीसीमंधरस्वाम, अरज
सुणो एक जगगुरु मुझ आशाविसराम ॥ पूरख
विदेहें विजय नली पुष्कलावई नाम, जिहां विचरे
जिनवरजी धन ते नयरी गाम ॥१॥ धन ते लोक
सुणे जे जोजनगामिनी वाण, धनते महियल चरण
धरे जिहां जिनवर नाण ॥धन ते विजन जे रहे प्रनु
ताहरे परसंग, वदनकमल निरखी नित माणे नवव
अंग ॥२॥ सुगुरु मुखें प्रनु सुजस तुझीणो सांजल
कान, मिलवाने जलसे मन माहरु धलं एक ध्यान ॥
नगति जुगति करवानी ने मुझ सवली जोम, पण प्रनु
लग पहचीजें तेह नहीं पग दोड ॥३॥आमा डूंगर
अति घणा विच वहे नदियां पूर, किम मुमयी अवराये
(१९७) प्रनुजी एटली दूर ॥आंखडली ननकों करे जोयवा मु ख जिनराज, पांखडली पाई नही ते विन किम सरे काज॥४॥ वाटडली वहतो कोई न मिले सेंगू साथ कागनियो लिख आपूं हूं जिम तेहने हाथ ॥ जाणूं शशिहर साथें कहुं संदेशा जेह, पण अलगो थई ऊपरि वाडे निकले तेह ॥५॥जो कोई रीतें प्रनुजी तुमथी एथ अवाय, तो इण भरतना वासी नवि जन पावन थाय ।। साहिबनी तो सुनजर सगले सरिखी होय. पण पोतानी प्राप्ति सारूफल प्रतिजोय ॥६॥ अलगो पण माहरे तुमशुं साची प्रीतः गुण गुणवंतना आवे हि यडे खिण खिण चित्त ॥ हुँ सेवक तुं ने माहरो प्रातम राम, नहिंय विसालं जी ज्यांलगिताहरु नाम॥७॥ साचे दिलथी मुमशुं धरजो धरम सनेह, करूणाकर मनु करजो मोपरि महिर अह ॥ दूसम काल तणो मुःख टालो दीन दयाल पालो बिरुद संजालो निज सेवकशुं कृपाल ॥ ८॥पाशविलुदा अलग थकी पण कर अरदास. पm मोटोटानी महिर उतां नविधाय ॥॥ (१९८) राश॥केई वसे प्रनुपासे केई वसे ने दूर, राजमहिरनी रीतें सकलने जाणे हजूर ॥९॥ शिव सुखदायक नाय कलायक स्वामि सुरंग, ध्यायक ध्येय स्वरूपलहे निज आत्म नमंग ॥ सहिजें एक पलकजो थाय प्रनु तुझ सं ग,लान नदयजिन चंश्लहे नित प्रेम अन्नंग ॥१०॥ ॥ इति श्रीसीमंधर स्वामी स्तवनं ॥ ॥अथ बीजका स्तवन ॥ ॥ सफल संसार अवतार ए हुंगणुं, सामिसीमंधरा तुम्ह नगते नणं ॥ नेटवा पायकमल नाव हियो घणो. करीय सुपसाय जे वीनवू ते सुणो ॥ १ ॥ तुम्हशुं कूड अरिहंत शुं राखियें, जिसो अने तिसो कर जोडि करि नाखियें ॥अति सबल मुफ हिये मोह माया वणी, एक मन जगति किम करूं त्रिनुवन धणी ॥ १ ॥ जीव आरति करे नव नवी परिगडे; रीश चटको चढे लोन वयरी नडे ॥ नयण रस वयण रस काम रस रसीयो, तेम अरिहंत तूं हियडेनवि बसी यो॥३॥ दिवस ने राति हियडे अनेरो धरूं, मूढ ( १९९) मन रीवा वलिय माया करूं ॥ तूंहिज अरिहंत जाणे जिसो आचरूं, तेम कर जेम संसार सागर तरूं ॥४॥ कम्मवसि सुखने पुःख जे हुं सहूं, मन तणी वात भरि हंत किणनें कहूं ॥ करि दया करि मया देव करुणा परा पुःख हरि सुरक करि सामि सीमंधरा ॥ ५ ॥ जाण संयोग आगम वयण पण सुj, धर्म न कराय प्रनु पाप पोतें घणु ॥ एक अरिहंत तूं देव बीजो नही, एह आधा र जगजाणजो अम्ह सही ॥६॥धण कणय मायपिय पुत्त परियण सहू, हस्यो बोल्यो रम्यो रंग रातो बहू ॥ जय जयो जगगुरु जीव जीव न धरा, तुम्ह सम वड नही अवर वाव्हेसरा ॥७॥अमिय सम वाणि जाणुं सदा सांगखें, बारवर परषदा मांहि आवी मिलुं ॥ चित्त जाणं सदा सामि पाय ननगुं, किम करं गम पुं मरगिरि वेगलं॥ ८॥जोलिडा जगति तूं चित्त हारे किस्ये पुण्य संयोग प्रन्नु दृष्टिगोचर हुस्ये ॥ जेहने ना म मन वयण तन उखस्ये, दूर थी इकडा जेमी वसे ॥९॥जल नलो एणि संसार सहु ए अत्रे, (२००) सीमंधरा ते सहु तुम पडे ॥ध्यान करतां सुपन मांहि आवी मिले, देखियें नयण तो चित्त आरति टले॥१०॥ साम सोहामणा नाम मन गहगहे, तेहशुं नेह जे वात तुझ ची कहे ॥ तुझ पाय नेटवा अति घणं टलवलु, पं ख जो होय तो सहिय प्रावी मिलं ॥ ११ ॥ मेरुगिरि लेखणी आल कागल करूं, कीरसागर तणा दुध खडि या जरूं। तुम मिलवा तणां सामि संदेशडा ; इंद्र पण लखिय न शके अने एवडा ॥१२॥ आपणे रंग गरि वात मुख जेटली, ऊपजे सामि न कहाय मुख तेटली ॥ सुणो सीमंधरा राजराजेसरा, लाड ने कोड प्रनु पूर सवि माहरा ॥ १३ ॥ पुत्र नविमोह वशि नेह हुवे जे हनेसमरिये एणि संसार नित तेहने ॥ मेहने मोर जि म कमल नमरो रमे, तेम अरिहंत तूं चित्त मोरे गमे ।। ॥१४॥ खरुं अरिहंतनुं ध्यान हियडे वस्यु, बापर्डे पाप हिव रहिय करशे किस्युं ॥ ठाम जिम गरुडवर पंखि आवे वही ततखिण सर्पनी जाति न शके रही ॥१५॥ पाप में कड़ा सावऊ सह परिहरी, सामि सीमंधरा तुह्म
(२०१)
पाय अणुसरी॥शुद्ध चारित्र कहिये मनु पालशं: पुःख
भंडार संसार नय टालशुं॥ १६ ॥ तुझ हुं दास हुँ
तुमसेवक सही एह में वात अरिहंत पागल कही।
एवंडी माहरी जगति जाणी करी, आपजो बापजी सा
र केवल सही ॥१७॥ कलश ॥ इम षिवृद्धि समृद्धि
कारण पुरित वारण सुख करो, नुवमाय वर श्रीक्तिला
ने थुपयोश्रीसीमंधरो॥जय जयो जगगुरु जीवजीवनक
रो सामि मया घणी, कर जोडि वलि वलि वीनg
प्रनु पूर आशा मन तणी ॥ १९ ॥ इति श्रीसीमंधर
जीनी स्तुति संपूर्ण ॥
॥॥
॥अथ पंचमी वृद्ध स्तवन प्रारंनः ।।
॥ प्रणमुं श्रीगुरु पाय, निरमल न्यान नपाय ।।
पांचमि तप नणं ए: जन्म सफल गिर्खा ए ॥१॥ चन
वीसमों जिनचंद, केवल न्यान दिणंद ॥ त्रिगडे गह
गह्यो ए, नवियणने कह्यो ए॥२॥न्यान बडो मंसार
न्यान मुगति दातार ॥ न्यान दीवो को ए, नाचो
सर्दह्यो ए॥ ३॥ न्यान लोचन मुक्लिानः लोकानो
॥
।
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(२०६) रे। केवल ज्ञान समुं नहि कोई, लोकालोक प्रकाश रे॥पां०॥४॥ पार्श्वनाथ प्रसाद करीने, महारी पूरो नमेद रे॥ समय सुंदर कहे हुं पण पामुं, ज्ञाननो पंच मो नेद रे॥ पां०॥५॥ इति श्रीपार्थजि०॥ ॥अथ पार्श्वजिनअष्टमीस्त० ॥ ॥अमल कमल जिमधवल विराजे, गाजे गोडी पास॥सेवा सारे जेहनी, सुरनरमन धरिय नखास ॥१॥ सोनागी साहिब मेरा बे, अरिहां सुग्यानी पास जिणंदा बे॥ए आंकणी ॥ सुंदर सूरति मूरति सोहे, मोमन अ धिक सुहाय ॥ पलक पलकों पेखतां मानु, नव नविन वीय देखाय ॥२॥ सोना॥०॥नव दुःख भंजनज नमनरंजन, खंजन नयन शुरंग ॥श्रवण सुणी गुण ताहरा, माहरा विकस्या अंगोअंग ॥३॥ सो० ॥ ॥ दूरथकी हुँ आयो वहिने, दे वहिलो दीदार ॥ पार थियां पहिडे नही, साहिबा एह नत्तम आचार ॥४॥ सो० ॥०॥प्रनु मुखचंद विलोकित हरखित, नाचत नयन चकोर ॥ कमल हसे रवि देखिने, जिम जलधर
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(२०८)
॥ ३ ॥ पाच ते कुण काचनें जी, अलवे पसारे
हाथ ॥ कुण सुरतस्थी कठिन जी, वांवल घाले बाथ
॥वि०॥४॥ देव अवर जोह करूंजी, तो प्रनु तुम
ची आण ॥ श्रीजिनराज. नवो भवें जी, तुहीज. देव
प्रमाण ॥ वि०॥५॥इति ॥
॥॥
॥अथ एकादशी वृहस्तवन।
॥समवसरण वेग नगवंत, धरम प्रकाशे श्रीअरिहं
त॥बारै परषदा बैठी जुमी, मागशिर शुदि इग्यारस
वडी॥१॥ मल्लिनाथना तीन कल्याण, जनम दीदा
ने केवल ज्ञान ॥ अर दीक्षा लीधी रूवडी॥ मा ॥
॥२॥ नमिनें ऊपर्नु केवल ज्ञान, पांच कल्याणक
अति परधान ॥ ए.तिथिनी महिमा एवमी ॥मा०॥
॥३॥ पांच जरत ऐरवत इमहीज, पांच कल्याणक
हुवे तिमहीज ॥ पंचासनी संख्या परगडी ॥मा०॥
॥४॥अतीत अनागत गणतां एम, दोढशें कल्या
क थाये तेम ॥ कुण तिथ जे ए तिथि जे वडी॥ मा
॥५॥ अनंत चोवीशी इण परिगिणो, लान अनंत
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( २१०) पलमें ॥ पास जिणेसर अन्तरजामी सेव करुं उिन उिन में ॥तुं० ॥१॥ काहूको मनतरुणीशुं राच्यो काइको चित्त धनमें ॥ मेरोमन प्रनु तुमहीशुं राच्यो, ज्युं चात क चित्त घनमें॥ तुं० ॥२॥जोगीसर तेरी गति जाणे अलख निरंजन जिनमें ॥ कनक कीर्ति सुख सागर तुमही, साहिब तीन नुवनमें ॥ तुं० ॥ इति ॥ ॥ अथ निर्वाणकल्याणक स्तवनः॥ ॥ मारगदेशक मोनो रे, केवल ज्ञाननिधान ॥ जाव दयासागर मनू रे, पर नपगारी प्रधानोरे॥१॥ वीर प्रनु सिचथया संघ सकल आधारो रे॥ हिव इण भरतमा, कुण करशे नपगारो रे ॥वीरः ॥ ॥२॥नाथ विहूणुं सैन्य ज्यु रे, वीर विहूणो रे संघ ॥ साधे कुण आधारथी रे, परमानंद अनंगो रे॥ वीर०॥३॥मात विहूणां बाल ज्यु रे, अरहा परहा अथडाय ॥ वीर विहूणा जीवडा रे, आकूल व्याकुल थायो रे॥वीर०॥४॥संशय बेदकवीरनो रे, विरह ते केम खमाय, जे. दीनें सुख ऊपजे रे ते विण किम (२११) रहिवायो रे। वीर०॥५॥ निर्यामक जवसमुनो रे, जव अटवी सठवाह ॥ ते परमसर विण मिल्यां रे किम वा नचाहो रे॥ वीर०॥६॥ वीर थकां पणश्रुत तणो रे. इंतो परम आधार ॥ हमणां श्रुत आधार के रे ए जिन आगम सारो रे॥ वीर०॥७॥ इण कालें सब जीवने रे, आगमथी आनंद ॥ध्यावो सेवो वि जना रे जिन पडिमा मुख कंदो रे।। वीर० ॥ ८ ॥ गणधर आचारिज मुनी रे, सहुनें इण परिसिम ॥न व नव आगम संगथी रे देवचं पद लीयो रे॥ वीर ॥९॥इति निर्वाणकल्याणक स्तव० ॥ ॥ अथ श्रीतीर्थमालास्तवनम् ॥ ॥शवंजय स्मन समोसस्थाः नला गुणन्नरचा रे।। सीधा साधु अनंत. तीरथ ते नमुं रे, तीन कल्याण कतिहां थयां: मुगर्ने गया सानेमीसर गिरनार ॥ती. ॥१॥ अष्टापढ़एक देहरो, गिरिमेहरो रे॥जरते जराव्या विव ॥ ती॥आबु चौमुख अति जनोः त्रिनुवनतिलो रे॥ विमल वसइवस्तुपाल॥ती० ॥२॥समेतशिखर (२१०) पलमें ॥ पास जिणेसर अन्तरजामी, सेव करुं निन उिन में ॥ तुं० ॥१॥ काइको मनतरुणीशुंराच्यो, काहूको चित्त धनमें । मेरोमन प्रनु तुमहीशुं राच्यो, ज्युं चात क चित्त वनमें॥ तुं०॥२॥जोगीसर तेरी गति जाणे अलख निरंजन जिनमें ॥ कनक कीर्ति मुख सागर तुमही, साहिब तीन नुवनमें ॥ तुं० ॥ इति॥ ॥ अथ निर्वाणकल्याणक स्तवनः॥ ॥ मारगदेशक मोदनो रे, केवल ज्ञाननिधान । नाव दयासागर प्रनू रे, पर नपगारी प्रधानो रे॥ १॥ वीर प्रनु सिघ थया संघ सकल आधारो रे॥ हिव इण भरतमां, कुण करशे नपगारो रे ॥वीर० ॥ ॥२॥नाथ विहूणुं सैन्य ज्यु रे, वीर विहूणो रे संघ ॥ साधे कुण आधारथी रे, परमानंद अनंगो रे॥ वीर०॥३॥ मात विहूणां बाल ज्युं रे, अरहा परहा अथडाय । वीर विहूणा जीवडा रे, आकूल व्याकुल थायो रे॥वीर०॥४॥संशय बेदकवीरनो रे, विरह ते केम खमाय, जेदीलें सुख ऊपजे रे ते विण किम .
(२११) रहिवायो रे॥वीर०॥५॥ निर्यामक जवसमुनो रे, नव अटवी सबवाह ॥ ते परमेसर विण मिल्यां रेकिम वाधे नवाहो रे॥वीर०॥ ६ ॥ वीर थकां पणश्रुत तणो रे, हुंतो परम आधार ॥ हमणां श्रुत आधार ने रे ए जिन आगम सारो रेः॥ वीर०॥७॥ इण कालें सब जीवन रे, आगमथी आनंद ॥ध्यावो सेवो नवि जना रे, जिन पडिमा मुख कंदो रे। वीर० ॥ ८ ॥ गणधर आचारिज मुनी रे, सहुनें इण परिसिध ॥ व नव आगम संगथी रे, देवचं पद लीधों रे॥ वीर ॥९॥इति निर्वाणकल्याणक स्तव० ॥ ||| ॥ अथ श्रीतीर्थमालास्तवनम् ॥ ॥शत्रुजय झपन समोसरया जला गुणनरया रे।। सीधा साधु अनंत, तीरथ ते नमुं रे, ॥ तीन कल्याण क तिहां थयां, मुगतें गया रे॥नेमीसर गिरनार ॥ती. ॥१॥ अष्टापदएक देहरो, गिरिसेहरो रे॥जरतें जराव्या विव ॥ ती० ॥आबु चौमुख अति नलो त्रिनुवनतिलो रे॥ विमल वसइ वस्तुपाल॥ती० ॥२॥समेतशिखर (२१०) पलमें ॥ पास जिणेसर अन्तरजामी, सेव करुं जिन जिन में ॥ तुं० ॥१॥ काहूको मनतरुणीशुं राच्यो, काहूको चित्त धनमें । मेरोमन प्रनु तुमहीशुं राच्यो, ज्युं चात क चित्त घनमें॥ तुं०॥२॥जोगीसर तेरी गति जाणे अलख निरंजन जिनमें ॥ कनक कीर्ति सुख सागर तुमही, साहिब तीन जुवनमें ॥ तुं० ॥ इति॥ ॥अथ निर्वाणकल्याणक स्तवन॥ ॥ मारगदेशक मोहनो रे, केवल ज्ञाननिधान ॥ नाव दयासागर प्रनू रे, पर नपगारी प्रधानोरें॥ १॥ वीर प्रनु सिघ थया संघ सकल आधारो रे॥ हिव इण परतमां, कुण करशे नपगारो रे ॥ वीर० ॥ ॥२॥नाथ विहूणुं सैन्य ज्युं रे, वीर विहूणो रे संघ ॥ साधे कुण आधारथी रे, परमानंद अनंगो रे॥ वीर०॥३॥मात विहूणां बाल ज्युं रे, अरहा परहा अथडाय ॥ वीरविहूणा जीवडा रे, आकूल व्याकुल थायो रे॥वीर० ॥४॥संशय बेदकवीरनो रे। विरह ते .. केम खमाय, जे. दीठे सुख ऊपजे रे, ते विण किम (२११) रहिवायो रे॥वीर०॥५॥ निर्यामक जवसमुन्नो रे, नव अटवी सबवाह ॥ ते परमसर विण मिल्यां रे, किम वाधे नचाहो रे॥वीर०॥ ६ ॥ वीर थकां पणश्रुत तणो रे: हुंतो परम आधार ।। हमणां श्रुत आधार ने रे ए जिन आगम सारो रे ॥ वीर०॥७ ॥ इण कालें सब जीवने रे, आगमथी आनंद ॥ध्यावो सेवो नवि जना रे, जिन पडिमा सुख कंदो रे॥ वीर० ॥ ८ ॥ गणधर प्राचारिज मुनी रे, सहुनें इण परिसिध ॥न व नव आगम संगथी रे, देवचं पद लीधो रे॥ वीर ॥९॥ति निर्वाणकल्याणक स्तव०॥ ॥॥ ॥ अथ श्रीतीर्थमालास्तवनम् ।। ॥शठंजय रूपन्न समोसरया, नला गुणनरथा रे॥ सीधा साधु अनंत, तीरथ ते नमुं रे, ।। तीन कल्याण क तिहां थयां: मुगतें गया रे॥नेमीसर गिरनार ॥ती. ॥१॥ अष्टापदएक देहरो, गिरिसेहरो रे॥जरतें जराव्या विच॥ ती० ॥प्रावु चौमुख अति जलो त्रिनुवनतिलो रे॥ विमल वसइ वस्तुपाल॥ती० ॥२॥समेतशिखर -ri ... * (२१०.) पलमें ॥ पास जिणेसर अन्तरजामी, सेव करुं जिन दिन में ॥ तुं०॥१॥ काहूको मनतरुणीशुंराच्यो, काहूको चित्त धनमें ॥ मेरोमन प्रनु तुमहीशुं राच्यो, ज्युं चात क चित्त घनमें ॥ तुं० ॥२॥जोगीसर तेरी गति जाणे अलख निरंजन जिनमें॥ कनक कीर्ति मुख सागर तुमही, साहिब तीन जुवनमें ॥ तुं० ॥ इति॥ ॥अथ निर्वाणकल्याणक स्तवनः॥ ॥मारंगदेशक मोदनो रे, केवल ज्ञाननिधान ॥ जाव दयासागर प्रन्नू रे, पर नपगारी प्रधानो रे॥१॥ वार प्रनु सिचथया संघ सकल आधारो रे॥ हिव इण जरतमां, कुण करशे नपगारो रें। वीर० ॥ ॥२॥ नाथ विहू[ सैन्य ज्युं रे, वीर विहूणो रे संघः॥ साधे कुण आधारथी रे, परमानंद अजंगो रे ॥ वीर०॥३॥ मात विहूणां बाल ज्युं रे, अरहा परहा अथडाय ॥ वीर विहूणा जीवडा रे, आकूल व्याकुल थायो रे॥वीर० ॥४॥संशय वेदकवीरनो रे, विरह ते केम खमाय, जे. दीठे सुख ऊपजे रे, ते विण किम .
(२११) रहिवायो रे॥वीर० ॥५॥ निर्यामक नवसमुनो रे, नव अटवी सबवाह ॥ ते परमसर विण मिल्यां रे किम वाधे नहाहो रे।।वीर०॥ ६ ॥ वीर थकां पणश्रुत तणो रे: हुंतो परम प्राधार ॥ हमणां श्रुत आधार ने रे ए जिन आगम सारो रे॥ वीर० ॥ ७ ॥ इण कालें सब जीवने रे, आगमधी आनंद ॥ध्यावो सेवो प्रवि जना रे: जिन पडिमा सुख कंदो रे॥ वीर० ॥ ८ ॥ गणधर आचारिज मुनी रे, सहुनें इण परिसिध ॥न व नव आगम संगथी रे देवचं पद लीधो रे॥ वीर ॥९॥इति निर्वाणकल्याणक स्तव०॥ ॥२॥ ॥ अथ श्रीतीर्थमालास्तवनम् ॥ ॥ शत्रुजय खन्न समोसरया- नला गुणनरया रे।। सीधा साधु अनंत: तीरथ ते नमुं रे.॥तीन कल्याण क तिहां थयां मुगतें गया रे॥नेमीसर गिरनार ॥ती. ॥१॥ अष्टापदएक देहरो, गिरिसेहरो रे॥जरतें जराव्या विव ॥ ती॥आबु चौमुख अति जनो त्रिनुवनतिलो रे॥ विमल वसइ वस्तुपाल॥ ती० ॥२॥समेतशिखर
साधे कुण अाधारथी रे, परमानंद अगंगोरे॥
( २१०)
पलमें॥ पास जिणेसर अन्तरजामी, सेव करं विन जिन
में ॥ तुं०॥१॥ काहूको मनतरुणीशुं राच्यो, काहूको
चित्त धनमें । मेरोमन प्रनु तुमहीशुं राच्यो, ज्युं चात
क चित्त घनमें॥ तुं॥२॥जोगीसर तेरी गति जाणे
अलख निरंजन उिनमें ॥ कनक कीर्ति मुख सागर
तुमही, साहिव तीन नुवनमें ॥ तुं०॥इति॥
॥अथ निर्वाणकल्याणक स्तवन ।।
॥ मारगदेशक मोक्नो रे, केवल ज्ञाननिधान ।
नाव दयासागर प्रन्नू रे, पर नपगारी प्रधानो रे॥?
१॥
वीर प्रनु सिप थया संघ सकल आधारो रे॥ हिव
इण भरतमां, कुण करशे नपगारो रे ॥ वीर० ॥
॥२॥नाथ विहू[ सैन्य ज्युं रे, वीर विहूणो रे संघ ॥
वीर०॥३॥ मात विहूणां वाल ज्यु रे, अरहा परहा
अथडाय ॥वीर विहूणा जीवडा रे, आकूल व्याकुल
थायो रे॥वीर० ॥४॥संशय बेदकवीरनो रे विरह ते
केम खमाय, जे. दीठे सुख ऊपजे रे, ते विण किम
(२४०) नी सुणीदेशना । शांतिनाथ सुत सुविचारोजी। चक्र धर राय करावीयो । ए दशमो नद्धारोजी॥से० ॥११॥ दशरथसुत जगदीपतो । मुनि सुब्रत स्वामी वारोजी श्रीरामचंद्र करावीयो । ए इग्यारमो नद्धारोजी ॥से. ॥१२॥ पांवकहै अम्हेपापीया किमबूटां मोरीमायोजी। कहैकुंतीसेजतणी । यात्राकीयां पाप जायोजी ॥ से० ॥१३॥ पांचपांडव संघकरी। सेठेज नेव्यो अपारोजी। काष्टचैत्य बिंबलेपना। एबारमो उघारोंजी । से० ॥१४॥ मभ्माणी पाषाणनी । प्रतिमां सुंदरसरूपोजी । श्रीसे बुजैनो संघकरी। थापी सकल सरूपोजी। से॥१५॥ अठोत्तर सोवरसांगयां । विक्रमनृपथी जिवारोजी । पो खाडजावड करावीयो। एतेरमो नद्धारोजी।से॥१६॥ संवत वार तिमोत्तरै । श्रीमाली सुविचारोजी। वाहडदे मुहते करावीयो । ए चवदमो नारोजी॥से ॥१७॥ संबत ते इकोत्तरे। देसल हर अधिकारोजी । समरै साहकरावीयो । ए पनरमो नद्धारोजी। से०॥ १८ ॥ संवत पनर संत्यासीयै। वैशाखवदि सुन्नवारो जी।
(२४१) करमेंमोसी करावीयो । एसोलमो उधारोजी ।। से० ॥ ॥ १९॥ संप्रतिकाले सोलमो। एवरतेनद्धारोजी । नितनित कीज वंदना। पामीजै नवपारोजी ।। से० ॥ ॥२०॥ दूहा । वलिसत्रुज महातमकहुं । सनिलो जि मने तेम । सूरिधनेसरइमकहै । महावीरकह्यो एम ॥ ॥१॥ जेहवो तेहवो दरसणी । सेजै पुजनीक । जग वंतनो बेस वांदतां । लामहुवैतहतीक ॥२॥ श्रीसेट जाऊपरै । चैत्यकरावैजेह । दलपरमाण. समोलहे । पल्योपमसुखदेह ॥ ३ ॥ सत्रुज ऊपर देहरो। नवो नीपावैकोय । जीर्णोधार करावतां । आग्गुणो फलहो इ॥ ४ ॥ सिरपरि गागरधरी । स्नात्र करावै नारि। चक्रवत्तिनी स्त्रीथई । सिवमुख पामेंसार ॥ ५ ॥ काती पूनिम सेठंजे। चढिनै करै नपवास । नारकी सोसागर समो। कर फरमनोनास ॥ ६ ॥कातीपद मोटो कह्यो । जिहां सीधा दशकोमि । ब्रह्म वी वान कहत्या । पापथी नाखेडोम ॥७॥ सहलातार श्रा वग नणी। भोजन पुन्यविशेष । सेहज साधु प (२४२) जतां । अधिको तेहथी देख ॥ ८॥ * ढाल.॥५॥ ॥ॐ॥धन २ अयवंतीसुकुमालने एहनी ॥ ॥ सेQजैगयां पाप वटीयै । लीजै आलोयण एमोजी । तप जप कीजै तिहां रही । तीथंकर कह्यो तमोजी ॥ ॥१॥से । जिणसोनानी चोरीकरी । ए आलोयण तासोजी । चैत्रीदिन सेठेज चढी । एककरै नपवासो जी:॥ २ ॥ से०॥ वस्तु तणी चोरीकरी । सात आं बिल सुध थायोजी । काती सातदिन तपकीयां । रतनहरण पाप जायो जी ॥ ३ ॥ से० ॥ कांसी पी तल तांबा रजतनी। चोरी कीधी जेणोजी। सातदिः वस पुरमढकरै । तो छूटै गिरि एणोजी ॥ ४ ॥ से० । मोती प्रवाला मुंगीया। जिण चोरया नरनारोजी। आंबिलकरि पूजाकरै । त्रिणटंक सुद्ध आचारोजी ॥ ॥५ से० ॥ धान पाणी रसचोरीया । जे नेटै सिच क्षेत्रोजी । सेठेज तलहटीसाधुनें । पडिलानें सुध चित्तोजी ॥६॥से । वस्त्रानरण जिणेहरया। ते बूटै इण मेलोजी । आदिनाथनी पूजाकरै । प्रहकठी --- (२४३) बहुवेलोजी ॥ ७ ॥ से० ॥ देवगुरुनो धनजेहरै । तेसुद्धथायेएमोजी । अधिकोद्रव्य खरचै तिहां । पा त्रपोले वहुप्रेमोजी ॥ ८॥ से०॥ गायनेंसघोमामही । गजनोचोरणहारोजी । चैतेवस्तु तीरथे । अरिहंत ध्यान प्रकारोजी ॥ ९ ॥ से० ॥ पुस्तक देहरापार का । तिहां लिखै अपणो नामोजी। बूटै उम्मासीतप कीयां । सामायक तिणगमोजी ॥ १० ॥ से ॥ कुंवारी परिव्राजकाः सधव अधव गुरु नारोजी । व्रत मांजै तिणनें कह्यो । उम्मासी तप सारोजी ॥११॥ से०॥गौ विप्र स्त्री वालक रिपी। एहनोघातक जेहो जी। प्रतिमा प्रागै पालोवतां । बूटे तप करि तेहोजी ॥ १२ ॥ से० ॥ ॥ ढाल ६ कुंमरनले प्रावी योए ॥ एहनी ॥ ॥ संप्रतिकाले सोलमोए । एवरतेनचार । सेठेज यात्राकला ॥ से० ॥ उहरी पालतां चालीयए । सेवेज केरी वाट।। सेापातीता णें पहुचीयैए । संघ मिल्या बहुधाट ॥ २ ॥ ने ॥ ललित- पेपीयैए । वांलि सन्तानीवार । ने (२४४) तिहां विसरामोलीजियेए । वडनै चौतरै प्रावि ॥३॥ से०॥ पाली ताणें पाजडीए । चढीय नप्रिजात॥ से ॥ सेजनदीय सोहामणीए । दूरथकी देखत ॥ ॥ ४ ॥ से॥ चढियै हिंगुलाजनें हडैए । कलिकुंड नमीयै पास । से॥वारीमांहे पैसीयैए । आणी अंग नवास ॥ ५ ॥ से० । मरुदेवी ढूंक मनोहरूए । गज चढी मरुदेवी माय । सेा शांतिनाथ जिनसोलमोए। प्रणमीजैतसुपाय ॥ से॥६॥वंस पोरवाम परगमो ए । सोमजीसाहमल्हार । से। रूपजी संघवी करावी योए । चौमुख मूलघार से॥७॥ चौमुखप्रतिमा चरचीयैए। जमतीमांहि जलाबिंब। पांचेपांमवपूजियैए। अदनुतादिप्रलंब ॥ से० ॥ ९ ॥ खरतरवसहीखां तिसुंए । बिंब जुहारुं अनेक ॥ से० ॥ नेमिनाथ चवरी नमुंए । टालूं अलगनरेग। से०॥९॥ धरम वार महिनीसरुंए । कुगतिकरुं अतिदूर ॥से० ॥ आईं आदि नाथदेहरैए । करमकरुं चकचूर ॥से० ॥१०॥ मूलनायक, प्रणमुंमुदाए। आदिनाथ नमवंत । से० (२४५) देवजहारं देहरैए । जमतीमांहि नमंत ॥ से० ॥११॥ सेजेकपरि कीजीयेए । पांचेठाम सनात्र । से। क जश अठोत्तरसो करुंए । निरमल नीरसुगात्र ॥ से० ॥ प्रथम आदीसर आगलेए । पुमरीक गणधार ॥ से० ॥ रायणतलपगलानमुंए । शांतिनाथ सुखकार ।। से० ॥ ॥१३॥रायणतलपगलानमुंए । चौमुखप्रतिमाच्यार ॥ से०॥ बीजीचूमि बिंबावलीए । पुमरीकगणधार । से० ॥१४॥ सूरजकुंमनिहालीयैए । अतिनलीनलका जोल ॥ से०॥ चेलणातलाई सिसिलाए । अंगफरनुं नहोल ।। से०१५॥ आदिपुरपाजे कतरुंए । सिचत्र मनुविसरांम ।। से०॥ चैत्यप्रवाड इणपरि करीए । सी धावंतिकाम ॥से० ॥१६ ।। जात्राकरी मेनुज तणी ए । सफलकीयो अवतार ॥ से ॥ कुसलखेमप्रावी योए । संवसहूपरिवार ॥ से ॥ १७॥ लेझंजरास सो हामणोए । सांजलज्यो सहुको।से। वर देवांन ऐनावसुंए । तमुजावाफलहोइ । मे॥१८॥ नंवत सोल वयांसीयए । सावणवदिससकार । ने० ॥
यनरेस रिलदल बलखंमण ॥धणवर गुवर गामनाम
(२४६)
नएयो सेQजतणोए । नगर नागोर मझार ॥ से० ॥
॥१९॥ गिस्वोगउखरतरतणाए । श्रीजिनचंदसुरीस
। से० । प्रथमसिष्य श्रीपूजनाए । सकलचंद सुजगीस
॥से०॥२०॥ ताससीसजगजाणीयए। समैसुंदरनव
जाय । से० । रासरच्यो तिणरूवडोए । सुणतां आएं
दथाय ॥ से० ॥२१॥ ॥ इति श्रीसेजेजरास सं०॥
॥अथ गौतम रास लिख्यते॥
॥वीर जिणेसर चरण कमल कमलाकय वासो, प
एमवि पत्नणिसु सामि साल गोयम गुरुरासो॥ मण
णतणु वयणे कंत करवि निसुणहु जो नविया, जिम
निवसे तुम देह गेह गुण गण गह गहिया ॥१॥जंबू
दीव सिरिजरहखित्त खोणी तल मंगण, मगहदेस सेणि
..
जिहां गुणगणसझाः विप्प वसे वसुजूइ तब तमु पुहवी
जङा ॥२॥ ताणपुत्त सिरिइंद नूय जूवलयपसिधो,
चवंदह विजा विवहरूव नारी रस लुचो, विनय विवेक
विचार सार गुण गणह मनोहर, सात हाथ- सुप्रमाण
(२४७)
देह रूवहि रंनावर ॥३॥ नयणक्यण करचरण जणवि
पंकजालपाडिय: तेजहि तारा चंद सूरि प्राकास जमा
डिय ॥ रूवहि मयण अनंग करवि मेल्यो निरधाडिय,
धीरम मेरु गंजीर सिंधु चंगम चयचाडिय ॥ ४॥ पेख
वि निरुवम रूव जास जण जपे किंचियः एकाकी किल
नित्त इव गुण मेल्या संचिय ॥ अहवा निच्चयपुत्व जम्म
जिणवर इण अंचिय, रंगा पनमा गवरि गंग रतिहा
विधि वंचिय ॥५॥ नय वुध नय गुरु कविण कोय
जनु आगल रहियो पंचसयां गुण पात्रगन हीं परव
रियो॥ करय निरंतर यज्ञ करम मिथ्यामति मोहिया
अणचल होस्ये चरमनाण दंसह विसोहिय !! ६ ॥व
स्तु ॥ जंबूदीव जंबूदीव सरह वासंमिः खोणीतल में
मणः मगह देस सेणिय नरेसर- वरगुबरगाम तिहां, विप्प
वसे वसनूप: सुंदर तमु पुहवि लजा: सयलगुणग गरूव
निहाण ताणपुत्त विज्ञानिलो, गोयम अतिहि सुजाण
॥७॥ नास॥ चरम जिणेसर केवलनाणी, चोविहमवप
छाजाणी॥ पावापुर सामी संपत्तो. चनविह देव निका
यहिंजुत्तो ॥८॥ देवहि समवमरण तिहां की जिगदी
(२५०) ॥२०॥ इण अनुक्रम गणहररयण थाप्या वीर इग्यार तो उपदेसे नुवन गुरु, संयममुं व्रत वार तो। विहुं उपवासें पारणो ए, आपण विरहंत तो ॥ गोयम संयम जग सयल जय जयकार करत तो ॥२१॥ ॥ वस्तु ॥ इंश्नू इंश्यूइ चढियो बहुमान: हुंकारो क रिकंप तो, समवसरण पहुतो तुरंत तो ॥ जे संसा सामि सवे, चरमनाहं फेडे फुरंत तो ॥ बोधवीज सं डायमनें, गोयम वहि विरत्त. ॥ दिरक लेई सिरका सही, गणहरपयसंपत्त ॥२२॥नास ॥ आज हुनसु विहाण, आज पचेलमां पुण्य नरो॥ दीग गोयम सा मि, जो नियनयणे अमिय करो ॥ समवसरण. मजा र, जे जे संसा ऊपजे ए॥ते ते पर नपगार, कारण पूछे मुनिपवरो ॥ २३ ॥ जीहां दीजें दीख, तीहां के वल ऊपजे ए॥ आप कनें अणहंत, गोयम दीजै दान इमः ॥ गुरु नपर गुरु भक्ति सामी गोयम ऊपनिय ॥ अणचल केवल नाण, रागज राखे रंग भरे ॥ २४॥ जो अष्टापद सेला वंदे चढ चनवीस जिण. ॥ आतम
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(२५४)
होसे सिवपुर ठान॥ ३७ ॥ जास॥ जिम सहकारें
कोयल टहुके, जिम कुसमावन परिमल महको जिमचं
दन सोगंधनिधि ॥ जिम गंगाजल लहिस्यां सहके
जिम कणयाचल ते जे फलके, तिम गोयम सोनागनि
धि ॥ ३८ ॥ जिम मानसरोवर निवसे हंसा, जिम
सुरतरुवर कणयवतंसा, जिम महुअर राजीववनें। जि
मारयणायररयणे विलसे, जिम अंबर तारागण विकसे,
तिम गोयम गुरुकेल घने ॥ ३९ ॥ पूनमनिसि जि
म ससियर सोहे, सुरतरु महिमा जिम जगमोहे, पूर
व दिसि जिम सहसकरो ॥ पंचानन जिम गिरिवर
राजे, नखइ घर जिम मेंगल गाजे, तिम जिनशासन
मुनि पवरो॥४०॥जिम गुरु तस्वर सोहे साखा जिम
नत्तम मुख मधुरी भाषा, जिम वन केतकि महमहेए॥
जिम नूमीपति नुयवध चमके, जिम जिनमंदिर बंटा
रणके गोयमलबधे गहगह्यो ए ॥४१॥. चिंतामणि
कर चढीयोआज, सुरतरु सारे वंगिय काज, कामकुंन
सहु वशि हुआ. ए॥. कामगवी पूरे कामी, अष्ठमहो
(२५५) सिद्धि प्रावे धामी, स्वामी गोयम अणुसरो ए ॥ ।। ४२ ॥ पणवरकर पहिलो पनणीजें: मायावीजो श्र वण सुणी जें, श्रीमिति सोना संभवो ए॥ देवां धुर अ रिहंत नमीजें, विनय पहु उवज्ञाय थुणीजें. इण मंत्रे गोयम नमो ए ॥४३॥ परघर वसतां कांय करीजें. देस देसांतर काय नमीजें: कवण काजआयास करो। मह कठी गोयम समरीजें, काज समग्गल ततखिण सीके नवनिध विलसे तिहां घरे॥४४॥ ववदयसय वारोत्तर वरसें, गोयम गणहर केवल दिवसें कीयो क वित्त उपगारपरो॥आदहिमंगल ए पनपीजें. परन महोहव पहिलो दीजें: रिद्धि वृद्धि कल्याण करो। ॥४५॥ धन माता जिण न्यरे धरियोः धन्य पिता जि एकुल अवतरियो. धन्य मुगुरु जिण दीरिकयो ए॥ विनयवंत विद्या अंगार- तमु गुण पुहवीन सय पार- वडजिम साखा विस्तरोए । गोपलवामिनो रामन पीजें चनविह संघ रखियायत कीजें रिदिदिक ख्याण करो ।। ४६ ।। इंकम वंदन जो दिवरावो.
(२५४)
होसे सिवपुर ठगन॥ ३७ ॥ जास॥ जिम सहकारें
कोयल टहुके, जिम कुसमावन परिमल महके जिमचं
दन सोगंधनिधि ॥ जिम गंगाजल लहिस्यां लहके
जिम कणयाचल ते जे फलके, तिम गोयम सोनागनि
धि ॥ ३८ ॥ जिम मानसरोवर निवसे हंसा, जिम
सुरतरुवर कणयवतंसा, जिम महुअर राजीववनें। जि
म रयणायररयणे विलसे, जिम अंबर तारागण विकसे
तिम गोयम गुरुकेल घने ॥ ३९ ॥ पूनमनिसि जि
म ससियर सोहे, सुरतरु महिमा जिम जगमोहे, पूर
व दिसि जिम सहसकरो ॥ पंचानन जिम गिरिवर
राजे नरखा घर जिम मेंगल गाजे, तिम जिनशासन
मुनि पवरो॥४०॥जिम गुरु तस्वर सोहे साखा जिम
नत्तम मुख मधुरी भाषा, जिम वन केतकि महमहेए ।
जिम नूमीपति नुयवध चमके, जिम जिनमंदिर बंटा
रणके, गोयमलबधे गहगह्यो ए॥४१॥ चिंतामणि
कर चढीयो आज, सुरतरु सारे वंगिय काज, कामकुंज
सहु वशि हुआ. ए. कामगवी पूरे कामी, अष्ठमहा
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(२५५)
सिद्धि प्रावे धामी, स्वामी गोयम अणुसरो ए ॥
॥ ४२ ॥ पणवरकर पहिलो पनणीजें. मायाबीजो श्र
वण सुणी जें, श्रीमिति सोना संभवो ए॥ देवां धुर अ
रिहंत नमीजें, विनय पहु उवज्ञाय थुणीजें. डण मंत्र
गोयम नमो ए ॥ ४३ ॥ परघर वसतां कांय करीजें.
देस देसांतर काय नमीजें: कवण काज आचास करो ।।
मह कठी गोयम समरीजें. काज समग्गल तततिण
माझे नवनिध विलसे तिहां घरे ॥ ४४ ॥ वदपाय
वारोत्तर वरसें. गोयम गणहर केवल दिवमें कीदो क.
वित्त नपगारपरो ।। पादहिमंगल ए पनपीने. परख
महोहव पहिलो दीजें रिद्धि इदि वयात पता ।।
॥ ४५ ॥ धन माता जिण दररे धरिलो. पन्य किमि
पाकुल भवतरियो. धन्य सुगर निक दीजिए।
पिनपत विधामा नन्स महीन
हनिम माला दिलाए । गोपनन्दामिन
म. पठदिर संघ रशियन इ. .
ल्पाल को ।। १६॥ नहि
. णक मोतीना चोक पूरावो, रयण सिंहासण वेसणो ए॥ तिहां बेठी गुरु देशना देसी, नविक जीवनां काज सरे सी, नित नित मंगल नदय करो श्रीसंघसकल आनंद करो॥४७॥ इति श्रीगोतम स्वामीनो रास संपूर्णम् ॥ ॥ राग प्रजाती जे करे, प्रह ऊगमते सूर ॥ जूखां जोजन संपजे, कुरला करे कपूर ॥१॥ अंगूठे अमृत बसे लंब्धि तणानंमार ॥ जे गुरुगोतम समरिये, मन वंचित दातार ॥२॥ पुंमरीक गोयम मुहा, गणधर गुण संपन्न ॥ मह कठीनें प्रणमतां, चवदेसे बावन्न । ॥३॥ खंतिखमंगुणकलियं, सुविणियं सबलद्धि सं पए । वीरस्स पढमसीसंगोयम सामी नमसामी॥४॥ सर्वारिष्टप्रणाशाय, सर्वानीष्टार्थ दायिने ।। सर्व लब्धि निधानाय, गोतमस्वामिने नमः॥५॥ इति ॥ * ॥ ॥ इति श्री श्रावकस्य पंच प्रतिक्रमणादि सूत्राणी समाप्तानिः॥
॥॥अथ श्रीदादाजी स्तवन ।। ।। ॥ ॥ निरखणदो असवारी। इस चालमें ॥ ॥ यारा दरशणकी वलिहारी, कुशल गुरु, दरशग दो नु- सकारी । में तो वारी जाउं बार हजारी ॥ कु० ॥ टेर ।। मलमण्डल समियाणा ग्राम में । मंत्रि जिल्लागर भारी । जैवतिरी सती कूखे उपना । प्रगव्या जग दिनकारी । कु. ॥ ॥ तन् तेरेसै तीसे जनम्या । द्वितिय चंद्र मनुहारी। रेले सेताले संजम । तप जप ध्यान संभारी ॥ कु० २ ॥ श्रीजिनचंद सूरि गुरु पट्टे । पाटणमें हितकारी । सूरिपद तहत्तर वरपे । कुशल सूरिंद अवतारी ॥ कु०३॥ नाम न- गरपुर पट्टण विचरी । बहु भाविकाज सुधारी । समकिन श्रावक केईव्रत धारक । ज्ञान क्रिया चितधारी !! कु. ४ ॥ बहुत रूप अनोपन महिमा । वचन कला उपगारी ! सत्य शील संतोष महागुण । लहुजग जानंद कारी ॥ . . !! सन् तेरेसे नयांती फागुण दर्श देवपदधारी । गु दुइ पूनम दिन संघने । दरश दियो उपगारी !! कु. : ग्राम नगर सह संपने पतित । परना देना पक्ष देवा देशमें चरण थापना । पानी नन्ति वारी :: ::- समेत सह संदिपाये जल की
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