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सन्ध्या हवनमन्त्र
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सन्ध्या-हवनमन्त्र
स्वास्तवाचन
तथा
शान्तिप्रकरण
jantin
सन्ध्या-हवनमन्त्र
स्टाक :... पथ
सन्ध्या-हवन सम्बन्धी भजन
रस्मथा १८४ - ११८
...
CHI
प्रकाशक
राजपातम्या
आर्य-पुस्तकालय, लाहौर
आर्य सम्वत् १९७२६४६०२८ विक्रमी सं० १९८५
57
29
प्राषाढ़, दयानन्दाब्द १०४
छठी वार ५०००]]
[ मूल्य)॥
भारद्वाज प्रेस, सैदमिठा बाजार लाहौर में
पं०
छज्जुराम
के अधिकार से छपा ।
.
* हवनसामग्री
बसन्त, १ छलीरा, २ तालीस पत्र, ३ पत्रज, ४ दाख,
५ लजावती, ६ शीतल चीनी, ७ कर्पूर, ८ चोड़, ६ देवदार,
१० गिलोय, ११ अगर, १२ तगर, १३ केसर, १४ इन्द्रजौ,
१५ गुग्गल, १६ कस्तूरी, १७ तीनों चन्दन, १८ जावित्री,
२६ जायफल, २० धूप सरस, २१ पुष्करमूल, २२ कमलगट्टा,
२३ मजीठ, २४ वनकचूर, २५ दालचीनी, २६ गूलर की छाल,
२७ तेजफल, २८ शंखपुष्पी, २६ चिरायता, ३० खस, ३१ गोखरू
३२ खाण्ड, ३३ गोघृत, ३४ ऋतुफल, ३५ भात या मोहनभोग,
३६ जड़ समिधा।
.
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१
भक्ति मार्ग की पुस्तकें
भक्ति दर्पण ॥2) गीता १) अानन्द संग्रह १) सन्यापदेश
माला १) ओंकार उपासना ३) प्राणायाम विधि :) सन्ध्या
रहस्य ।) गीता गुटका ) सत्संग गुटका)
आर्य सिद्धान्तों पर पुस्तकें
पुनर्जन्म १) ऋषि के सिद्धान्तों पर तुलनात्मिकविचार ।)
गुरुदत्त लेबावलि २) आर्य समाज क्या है।)
इनके अतिरिक्त वैदिक धर्म सम्बन्धी हर प्रकार की
पुस्तकें हमसे मिल सकती है।
राजपाल अध्यक्ष
आर्य्य पुस्तकालय लाहौर।
ओ३म् । * सन्ध्या आचमन मन्त्र। ओं शन्नो देवीरभिष्ठय, आपो भवन्तु पीतये। शंयोरभित्रवन्तु नः॥१॥ यजुर्वेद अ० ३६ ॥ १२ ॥ सर्वव्यापक और सर्वप्रकाशक परमेश्वर चाहे हुए फल और अानन्द की प्राप्ति के लिये हमको कल्याणकारी हो और हम पर सुख की सर्वथा वृष्टि करें ॥१॥ इन्द्रियस्पर्श मन्त्र ओं वाक् वाक् । ओं प्राणःप्राणः। ओं चक्षुः चक्षुः । ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्। ओं नाभिः । ओं हृदयम् । ओं कंठः। ओं शिरः। ओं बाहुभ्यां यशोबलम् । ओं करतलकरपृष्ठे ॥ २॥ हे ईश्वर ! मेरी वाणी, प्राण, आँख, कान, नाभि, हृदय, कंठ और शिर को बलवान कीजिये । हमारी दोनों बाहों मे यश और बल हो और हाथ के ऊपर और नीचे के भाग से हम धर्मयुक्त कार्य करें ॥२॥ मार्जन मन्त्र ओं भूः पुनातु शिरसि। ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः। ओं स्वः पुनातु कंठे। ओं महः पुनातु .
( ४ ) ! . हृदये । ओं जनः पुनातु नाभ्याम् । ओं तप पुनातु पादयोः। ओं सत्यं पुनातु पुनः शिरसि । ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र ॥ ३ ॥ हे ईश्वर ! श्राप मेरे शिर, नेत्र, कंठ, हृदय, नाभि, पैर, शिरादि सबको पवित्र करके बलवान् कीजिये ॥ ३ ॥ प्राणायाम मन्त्र ओं भूः। ओं भुवः । ओं स्वः । ओं महः । ओं जनः । ओं तपः । ओं सत्यम् ॥ ४॥ ईश्वर प्राणस्वरूप, पवित्र करने हारा, श्रानन्दस्वरूप, सब से बड़ा, सबका पिता, सबका जानने वाला अविनाशी है ॥४॥ अघमर्षण मन्त्र ( ईश्वर रचनाचिन्तन मन्त्र) ओं ऋतञ्च सत्यश्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत, ततः समुद्रो अर्णवः ॥१॥५॥ ज्ञानमय और अनन्त सामर्थ्य वाल ईश्वर से वेद और कार्य्यरूप प्रकृति उत्पन्न हुई। उसीकी सामर्थ्य से प्रकृति की दुसरी विकृति अवस्था और उसीकी सामर्थ्य से सूक्ष्म जल ॥१ ओ३म् समुद्रादर्णवादधि, संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद, विश्वस्य मिषतो वशी॥२॥६ ( ५ ) जगत् को वश में रखने वाले परमेश्वर ने अपने सहज स्वभाव से उस सूक्ष्म जलके पीछे, कालके विभाग अर्थात् दिन और रात बनाने वाली गतिको उत्पन्न किया ॥२॥६॥ ओं सूर्याचन्द्रमसौ धाता, यथा पूर्वमकल्पयत्। दिवश्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः ॥३॥७॥ ऋ० मगडल १० सूक्त १६० । मन्त्र १-३॥ विधाता ने पहले कल्पके समान सूर्य चन्द्र दिव्य लोक, पृथिवी लोक अन्तरिक्ष और सब लोक लोकान्तर बनाए ॥३॥७ मनसापरिक्रमा मन्त्र ओं प्राची दिग्, अग्निरधिपति,रासितो रक्षिता, आदित्या इषवः । तेभ्यो नमो,ऽधिपतिभ्यो नमो, रक्षितृभ्यो नम, इषुभ्यो नम, एभ्यो अस्तु । यो३ ऽस्मान् द्वेष्टि, यं वयं द्विष्मस्, तं वो जम्भे दध्मः।११८ हे सर्वज्ञ परमेश्वर ! आप हमारे सम्मुख की ओर विद्य- मान है । स्वतन्त्र राजा और रक्षा करने वाले हैं । आपन सूर्य को रचा है, जिसकी किरणों के द्वारा पृथिवी पर जीवन प्राता है। आपके आधिपत्य, रक्षा और जीवन प्रदानके लिए प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है। जो हमस द्वेष करता है अथवा जिस से हम द्वेष करते हैं, उसे हम आपके जबड़े में डालते हैं ।रा॥ . .
( ६ ) ओं दक्षिणा दिग्, इन्द्रोऽधिपतिस्, तिरश्चि- राजी रक्षिता, पितर इषवः । तेभ्यो नमो, ऽधि- पतिभ्यो नमो, रक्षितृभ्यो नम, इषुभ्यो नम, एभ्योअस्तु । यो३ऽस्मान् द्वेष्टि, यं वयं द्विष्मस्, तं वो जम्भे दध्मः ॥२॥६॥ हे परमेश्वर ! आप हमारे दक्षिण की ओर व्यापक आप ही हमारे राजाधिराज हैं । टेढ़े चलने वाले प्राणियों से हमारी रक्षा करते हैं और ज्ञानियों के द्वारा हमें ज्ञान प्रदान करते हैं। आपके० । २६ ॥ ओं प्रतीची दिग्, वरुणोऽधिपतिः, पृदाकू रक्षिता, अन्नमिषवः । तेभ्यो नमो, ऽधिपतिभ्यो नमो, रक्षितृभ्यो नम, इषुभ्यो नम, एभ्यो अस्तु। यो३ ऽस्मान् द्वेष्टि, यं वयं द्विष्मस्, तं वो जम्भे दध्मः ।३।१०॥ हे सौन्दर्य के भण्डार! आप हमारे पृष्टकी ओर है । हमारे महाराज है, और बड़े २ विषधारी प्राणियों से हमारी रक्षा करने वाले हैं। आप हमारे प्राण अन्न द्वारा रखते है । आपके० ओं उदीची दिक्, सोमोऽधिपतिः, स्वजो रक्षिता, ऽशनिरिषवः। तेभ्यो नमो, ऽधिपतिभ्यो नमो, ( ७ ) रक्षितृभ्यो नम, इषुभ्यो नम,एभ्यो अस्तु।यो३ऽ. स्मान् द्वेष्टि, यं वयं द्विष्मस्, तं वोजम्भे दध्मः।४।११ हे पिता! आप हमारे बांई ओर व्यापक है, और हमारे परम स्वामी हैं। श्राप स्वयम्भू और हमारे रक्षक हैं। श्रापही बिजली द्वारा हमारे रुधिर की गति और प्राण की रक्षा करते हैं। ओ३म् धुवा दिग्, विष्णुरधिपतिः, कल्माषग्रीवो रक्षिता, वीरुध इषवः। तेभ्यो नमो, ऽधिपतिभ्यो नमो, रक्षितृभ्यो नम, इषुभ्यो नम, एभ्यो अस्तु। यो३ऽस्मान् द्वेष्टि, यं वयं द्विष्मस्, तं वो जम्भे दध्मः ॥ ५॥१२॥ है सर्वव्यापक ईश्वर! आप हमारे नीधेकी ओर विद्यमान है। आप हमारे राजा हैं । श्राप हरे रंगवाले वृक्षों और बेलों के द्वारा हमारे प्राणों की रक्षा करते हैं। प्राप० ॥ ५॥ १२ ॥ ओ३म् ऊर्ध्वा दिग्, बृहस्पति रधिपतिः श्वित्रो रक्षिता, वर्षमिषवः । तेभ्यो नमो, ऽधि- पतिभ्यो नमो, रक्षितृभ्यो नम, इषुभ्यो नम, एभ्यो अस्तु।यो३ऽस्मान् द्वेष्टि, यं वयं द्विष्मस्, तं वो जम्भे दध्मः ॥६॥१३॥ अथ०३।२७१-६॥ हे महान् प्रभो! आप ऊपरकी ओर व्यापक, पवित्र आत्मा ( ८ ) हमारे स्वामी और रक्षक हैं। आप मेंह बरसाकर हमारी कृषि को सींचते हैं। जिससे हमारा जीवन होता है। आप०६१३॥ उपस्थान मन्त्र ओं उद्वयं तमसस्परि, स्वः पश्यन्त उत्तरम् । देवं देवत्रा सूर्य, मगन्म ज्योतिरुत्तमम्।।१४॥ यजु० अ०३५ । मन्त्र १४॥ हे प्रभो! आप अनन्त अन्धकार से परे सुख स्वरूप प्रलय के पश्चात् रहने वाले दिव्यगुणों के साथ, सर्वत्र विद्यमान देव और हमको जन्म देने वाले हैं। आपको इस प्रकार देखते हुए हम लोग आपकी उत्तम ज्योति को प्राप्त होवें ॥१॥ १४ ॥ ओं उदुत्यं जातवेदसं, देवं वहन्ति केतवाः । एशे विश्वाय सूर्यम् ॥ २ ॥ १५ ॥ यजु० अ०३३ मन्त्र ३१ ॥ हे जगदीश्वर! श्राप वेदों के उत्पादक और प्रकाश स्वरूप है । श्राप की महिमा सबको दिखाने के लिये संसार के पदार्थ पताका का काम देते हैं ( जिस प्रकार झंडियां मार्ग दिख- लाती है उसी प्रकार सबको स्वाभाविक बस्तुएँ आपकी प्रतीति कराती हैं ) ॥२॥.१५ ॥ ओं चित्रं देवानामुदगादनीकं, चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्यानेः। आप्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा ॥३॥१६॥ यजु० अ०७ मन्त्र ४२॥
(६ ) हे ईश्वर ! श्राप विद्वानों में अद्भुत और श्रेष्ठ है और मित्र वरुण तथा अग्नि श्रादि विद्वानों की आंख हैं । द्यूलोक, पृथिवीलोक और अन्तरिक्ष लोक के धारण करने वाले और चलाने वाले तथा न चलन वाल प्राणियों के उत्पादक तथा आत्मा श्राप है। हम श्राप को प्राप्त होवे ॥३॥ १६ ॥ ओं तच्चक्षुर्देवहितं, पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शत, शृण- याम शरदः शतं, प्रबवाम् शरदः शतं, अदीनाः स्याम शरदः शतम् ,भूयश्च शरदः शतात् ४-१७ यजुर्वेद अ० ३६, मन्त्र २४ ॥ हे सब के देखने वाले ! श्राप अनादि काल से विद्वान और संसार के हितार्थ शुद्ध वर्तमान हैं । प्रभो! हम आप को मौ वर्ष सुने, श्राप के नाम का सौ वर्ष व्याख्यान करें. सौ वर्ष से अधिक आयु हो, तो भी इसी प्रकार विचरें ॥४॥ १७ ॥ - गायत्री, सावित्री) गुरु मंत्र: ओ३म् भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गों देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥१८॥ य० । ३६ । ३। ऋ०३। ६२ ११० ॥ साम० उत्तर संहिता . प्र०७। म १०॥
( १० ) हे प्राण पवित्रता और अानन्द के देने वाले प्रभो! जो श्राप सर्वक्ष और सकल जगत् के उत्पादक हैं, हम आप के उस पूज- नीयतम पाप विनाशक विज्ञान स्वरूप तेज का ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों का प्रकाश करता है । हे पिता! श्राप से हमारी बुद्धि कदापि विमुख न हो । श्राप हमारी बुद्धियों में सदैव प्रकाशित रहे और हमारी बुद्धियों को सत्कर्मों में प्रेरित करते रहें ॥१॥ समर्पण मन्त्र ओं नमः शंभवाय च, मयोभवाय च । नमः शंकराय च, मयस्कराय च। नमः शिवाय च, शिवतराय च ॥१६॥य० १६६४१॥ नमस्कार है कल्याण के और सुख के स्रोत ( चश्मे ) को, कल्याण के देने वाले और सुख के देने वाल को नमस्कार है, कल्याण स्वरूप और अत्यन्त कल्याण स्वरूप श्राप को बारंबार हमारा नमस्कार है ॥ १६ ॥ ओ३म् शान्तिः शान्तिः !! शान्तिः !!! . सन्ध्या समाप्त ( ११ ) * ओ३म् * ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना के मंत्र ओ३म् विश्वानि देव सवितर्, दुरितानि परासुव । यद्भद्रं तम आसुव ॥१॥ यजु० अध्याय ३० । मं० ३॥ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे, भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं चामुतेमां, कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥२॥ यजु० अ० १३ । मं०४॥य आत्मदा वलदा यस्य विश्व, उपासते प्रषिशं यस्य देवाः । यस्य- च्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः, कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ३ ॥ यजु० अ० २५ । मं० १३ ।। यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः, कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ४॥ यजु० अ० २३ । मं०३ ॥ येन द्यौरुया पृथिवी च दृढा, येन स्वः स्तमितं येन नाकः । यो अन्तरिचे रजसो विमानः, कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ५ ॥ यजु० अ० ३२ । मं० ६ ॥ प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो, विश्वा जातानि परिता बभूव । यत्कामास्ते जुहूमस्तनो अस्तु, वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ ६॥ ऋ० मं० १० । सू० १२१ । मंत्र १० ॥ स नो वन्धुर्जनिता स विधाता, ( १२ ) धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यत्र देवा अमृतमान- शानाम्, तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥ ७ ॥ यजु० अ० ३२ । मन्त्र १० । अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् , विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो, भूयि- ठान्ते नम उक्ति विधेम ॥८॥ यजु० अ० ४० । मंत्र १६॥ स्वस्तिवाचन अग्निमीके पुरोहितं, यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥१॥ ऋ० मं० १ सू०१ । मन्त्र १। स नः पितेव सूनवे, ऽने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये ॥ २॥ स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भगः, स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः । स्वस्ति पूषा असुरो दधातु ना, स्वस्ति द्यावा पृथिवी सुचेतुना ॥३॥ स्वस्तये वायुमुप बवामहै सोम, स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः । बृहस्पति सर्वगणं स्वस्तये, स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः ॥४॥ विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये, वैश्वानरो वसुराग्निः स्वस्तये । देवा अवन्त्वभवः स्वस्तये, स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः ॥ ५ ॥ वस्ति मित्रावरुणा, स्वस्ति पथ्ये रेवति । खस्ति न इन्द्रश्चाग्निच, स्वस्ति नो अदिते ( १३ ) कृधि ॥ ६ ॥ स्वस्ति पन्थामनुचरेम, सूर्याचन्द्रमसाविव । पुनर्ददतानता, जानता सङ्गमेमहि ॥ ७ ॥ ऋ० मं० ५। सू० ५१ ।। ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां, मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः । ते नो रासन्तामुरुगायमद्य, यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥८॥ ऋ० मं० ७ । सू० ३५ ॥ येभ्यो माता मधुमत्पिन्वते पयः, पीयूषं द्यौरदि- तिरद्रिबर्हाः । उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वमसस्तां, आदित्यां अनुमदा स्वस्तये ॥ ६ ॥ नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा, बृहद्देवासो अमृतत्वमानशुः । ज्योती रथा अहिमाया अनागसो, दिवो वणिं वसते स्वस्तये ॥ १० ॥ सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययु, रपरिघृता दधिरे दिवि क्षयम् । तां श्रा विवास नमसा सुवृक्तिभि, महो आदित्यां अदिति वस्तये ॥ ११॥ को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ, विश्वे देवासो मनुषो यति ठन । कोवोऽध्वरं तु विजाता अरं करद् यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये ॥१२॥ येभ्यो होत्रांप्रथमा- मायेजे मनुः, समिद्धाग्निर्मनसा सप्तहोतृभिः । त आदित्या अभय शर्म यच्छत, सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये ॥१३॥ य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो, विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः । ते नः कृतादकृतादेन सस्पर्य द्या देवासः पिता स्वस्तये ॥ १४ ॥ भरेष्विन्द्रं सुहवं हवामहेऽहोंमुचं ( १४ ) सुकृतं दैव्यं जनम् । अग्निं मित्रं वरुणं सातये भग, द्यावा- पृथिवी मरुतः स्वस्तये ॥ १५ ॥ सुत्रामाणं पृथिवीं धामनेहसं, सुशर्माणमदिति सुप्रणीतिम् । दैवी नावं खरित्रामनागस, मस्रवन्तीमा रुहेमा स्वम्तये ॥१६॥ विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये, त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिहुतः । सत्यया वो देवहूत्या हुवेम, शृण्वतो देवा अवसे स्वस्तये ।। १७ । अपामीवामप विश्वामनाहुति, मपाराति दुर्विद- त्रामघायतः । आरे देवा द्वेषो अस्मायोतनोरुणः शर्म यच्छता स्वस्तये ॥ १८ ॥ अरिष्टः स मों विश्व एधते, प्रप्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि । यमादित्यासो नयथा सुनीतिभि,रति विश्वानि दुरिता स्वस्तये ॥१६॥ ये देवा- सोऽवथवाजसातौ, यं शूरसाता मरुतो हि ते धने । प्रातर्यावाणं रथमिन्द्रसानसि, मरिष्यन्तमा रहेमा स्वस्तये ॥ २०॥ स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु, स्वस्त्यप्सु जने स्वर्वति । स्वस्ति नः पुत्रकथेषु योनिषु, स्वस्ति.राये मरुतो दधातन ॥२१॥ स्वस्ति रिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्ण स्वत्यमि या वाममेति । सा नो अमासो अरणे निपातु, स्वावेशा भवतु देवगोपा ॥२२॥ ऋ० मं० १० सू०६३ ।। ईक्षे त्वोर्जे त्वा वायवस्थ, देवो वः सविता प्रार्पयतु, श्रेष्ठतमाय कर्मण, आप्यायध्वमध्न्या, इन्द्राय भार्ग, ( १५ ) प्रजावतीरनमीवा अयमा, मा वस्तेन ईशत, माघश मो, ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात, बह्वीर्यजमानस्य पशून् पाहि ॥२३॥ यजु० अ० १। मन्त्र १॥ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु, विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । देवा नो यथा सदमिवृधे असन- प्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे ॥२४॥ देवानां भद्रा मुमतिर्ऋजूयतां, देवानाए रातिरमि नो निवर्त्तताम् । देवानाए मख्यमुपसेदिमा वयं, देवा न आयुः प्रति- रन्तु जीवसे ॥ २५ ॥ तमीशानं जगतस्तस्थुषष्पति, धियजिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेद- सामसदृधे, रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ।। २६ ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः, स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्यो अरिष्टनेमिः, स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥२७॥ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा, भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा, सस्तनूभि, र्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥२८॥ यजुः अ० २५ । मन्त्र १४।१।१८१६॥२६॥ अन्ना याहि वीतये, गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि ॥२६॥ त्वममे यज्ञानां, होता विश्वेषां हितः। देवेभिर्मानुषे जने ॥३०॥ साम आ० प्रपा० १ मंत्र १२
ये विषप्ताः परियन्ति, विश्वा रूपणि विभ्रतः ।
वाचस्पतिर्बला तेषां, तन्वो अद्य दधातु मे ॥६१॥
अथव० कां० १। अनु० १ । सू० १ । मन्त्र १॥
इति स्वस्ति वाचन
शान्ति प्रकरण
शन इन्द्रानी भवतामवोभिः, शन्न इन्द्रावरुणा
रातहव्या । शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः, शन्न इन्द्रा
पूषणा वाजसातौ ॥१॥ शं नो भगः शमु नः शंसो
अस्तु, शन्नः पुरन्धिः शमु सन्तु रायः । शं नः सत्यस्य
सुयमस्य शंसः, शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु ॥ २ ॥
शं नो धाता शमु धर्ता नो अस्तु, शं न उरूची भवतु
स्वधाभिः। शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः, शं नो देवानां
सुहवानि सन्तु ॥ ३॥ शं नो अग्निज्योतिरनीको अस्तु,
शं नो मित्रावरुणावश्विना शम् । शं नः सुकृतां सुकृतानि
सन्तु, शं न इपिरो अभिवातु वातः ॥ ४ ॥ शं नो द्यावा-
पृथिवी पूर्वहतो, शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु । शं न ओष-
धीर्वनिनो भवन्तु, शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः ॥ ५ ॥
( १७ ) शन्न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु, शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाषः, शं नस्त्वष्टानाभिरिह शृणोतु ॥६॥ शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः, शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः । शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु, शं नः प्रस्वः शम्बस्तु वेदिः ॥ ७॥ शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु, शं नश्चतस्रः प्रदिशो भवन्तु । शं नः पर्वताः ध्रुवयो भवन्तु शं नः सिन्धवः शमु सन्त्वापः | ८ | शं नो अदितिर्भवतु व्रतभिः, शं नो भवन्तु मरुतः स्वः। शं नो विष्णुः शमु पूषा नो अस्तु, शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः ।। ३॥ शन्नो देवः सविता त्रायमाणः, शं नो भवन्तुषसो विमातीः । शं नो पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः, शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः ॥ १० ॥ शं नो देवा विश्वदेवा भवन्तु, शं सरस्वति सह धीभिरस्तु । शमभिषाचः शमु रातिषाचः, शं नो दिव्याः पार्थिवा:शं नो अप्याः॥११॥शं नः सत्यस्य पतयो भव- न्तु, शं नो अन्तिःशमु सन्तु गावः । शं नः ऋभवः सुकृताः सुहस्ताः, शं नो भवन्तु पितरो हवेषु ॥११॥ शं नो अज एकपाद्देवो अस्तु, शं नोऽहिर्बुध्न्यः शं समुद्रः।शं नो अपां नपात्पेरुरस्तु, शं नः पृश्निर्भवतु देवगोपाः ॥ १३॥ ऋ० मं ७ । सू०६५। मं०६-१२।। इन्द्रो विश्वस्य राजति । शं नो अस्तु द्विपदे शं शतुष्पदे ( १८ ) ॥१४॥ शं नो वातः पवता १, शं नस्तपतु सूर्यः । शं नः कनिक्रददेवः, पर्जन्यो अभिवर्षतु ॥ १५॥ अहानि शं भव- न्तु नः, श ५ रात्रीः प्रतिधीयताम् । शं न इन्द्राग्री भवता- मवोभिः, शं न इन्द्रा वरुणा रातहव्याः। शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ, शमिन्द्रासोमा सुविताय शयोः ॥१६ ॥शं नो देवीरभिष्टय, आपो भवन्तु पीतये। शय्योरभि स्रवन्तु नः ॥१७॥ द्यौः शान्ति, रन्तरिक्ष , शान्तिः, पृथिवी शान्ति, रापःशान्ति, रोषधयः शान्तिः। वनस्पतयःशान्तिर्, विश्वे- देवाःशांति, ब्रह्म शान्तिः, सर्व शान्ति, शांतिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि ॥ १८॥ तचक्षुर्देवहितं, पुरस्ताच्छुक्र- मुचरत् । पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतं, शृणुयाम शरदः शतं, प्रबवाम शरदः शतं, अदीनाः स्याम शरदः शतं, भूयश्च शरदः शतात् ॥ १६ ॥ ( यजु० अ०३६ । मंत्र - १०।११।१२।१७।२४)॥ यज्जाग्रतो दरमुदति दैवं, तदु सुप्तस्य तथैवेति । दुरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं, तन्मे मनः शिव सङ्कल्पमस्तु ॥२॥ येन कर्माण्यपसो मनीषिणो, यज्ञ कृण्वन्ति विदथेषु धीराः यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां, तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥२१॥ यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च, यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु । यस्मान ऋते किश्चन कर्म क्रियते, तन्मे मन शिव-
( १६ )
संकल्पमस्तु ।।२२॥ येनेदं भृतं भुवनं भविष्यत, परिगृही-
तममृतेन सर्वम् । येन यज्ञस्तायते सप्तहोता, तन्मे मनः शिव
संकल्पमस्तु ॥ २३ ॥ यस्मिन्नृचः साम यजूंषि, यस्मिन्
प्रतिष्ठितारथनाभाविवाराः । यस्मिँश्चित ५ सर्वमोतं प्रजानां,
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ २४ ॥ सुपारथिरश्वानिव
यन्मनुष्याननीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव । हत्प्रतिष्ठं यदजिरं
जविष्ठं, तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। २५ ॥
( यजु० अ० ३४ । मन्त्र १-६)
स नः पवस्व शं गवे, शं जनाय शमर्वते । शं राजन्नो-
पधीभ्यः ।। २६ ।। ( साम० उत्तराचिके० प्रपा० १ । मं०
१)॥अभयं नः करत्यन्तरिक्ष, मभयं द्यावापृथिवी उभे
इमे । अभय पश्चादभयं पुरस्ता, दुत्तरादधरादभयं नो अस्तु
। २७ ॥ अभयं मित्रादभयममित्रा, दमयं ज्ञातादभयं
पात
पुरोअभयं नक्कमभयं दिवा नः, सर्वा आशा मम
मित्रं भवन्तु ।। २८ । (अथर्व० कां० १६ । मू०१५ ।
मन्त्र ५।६)॥
.
शान्ति प्रकरण समाप्त ।
( २० ) आचमन मंत्र १-ओं अमृतोपस्तरणमास स्वाहा। २-ओं अमृतापिधानमसि स्वाहा । ३–ओं सत्यं यशः श्रीमयि श्रीःश्रयतां स्वाहा। इनसे तीन आचमन करें। इन्द्रिय स्पर्श मन्त्र ओं वाङ्मऽास्येऽस्तु । ओं नसोम प्राणो ऽस्तु । ओं अक्ष्मोमें चक्षुरस्तु । ओं कर्ण- योर्मे श्रोत्रमस्तु। ओं बाह्वोम बलमस्तु । ओं ऊर्वोम ओजोऽस्तु । ओं अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा में सह सन्तु ॥ इस मन्त्र से दाहिने हाथ से जल स्पर्श करके मार्जन करना । अब समिधा चयन वेदी में करें, पुनः- ओं भूर्भुवः स्वः। इस मन्त्र का उच्चारण करके ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य के घर घर से अग्नि ला, अथवा घृत का दीपक जला, उस से कपूर लगा, किसी एक पात्र उसमें छोटी छोटी में में धर, ( २१ ) लकड़ी लगा के यजमान वा पुरोहित उस पात्र को दोनों हाथों से उठा, यदि गर्म हो, तो चिमटे से पकड़ कर अगले मन्त्र से अग्न्याधान करें- ओं भूर्भुवः स्वौरिव भूम्ना, पृथिवीव व्व. रिम्णा । तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि, पृष्ठे ऽग्नि- मन्नादमन्नाद्यायादधे ॥१॥ (यजु० अ०३०५) इस मन्त्र से वेदी के बीच में अग्नि को धर, उस पर छोटे २ काष्ठ और थोड़ा कपूर धर, अगला मन्त्र पढ़ कर व्यजन से अग्नि को प्रदीप्त करें। ओं उबुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि, त्वमिष्टा- पूर्ते ससृजेथामयं च । अस्मिन्त्सधस्थेऽअध्यु- त्तरस्मिन् , विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥२॥ (यजु० अ०१५ । मन्त्र ५४) जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे, तब चन्दन की अथवा पलाश-श्रादि की तीन लकड़ी पाठ २ अंगुल की घृत में डुबा, उनमें से एक २ समिधा को अग्नि में डालें। वे मन्त्र ये हैं- ओं अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्, तेनेध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्द्धय, चाम्मान् प्रजया .
( २२ ) पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनानायेन समेधय, स्वाहा । इदमग्नये-जातवेदसे-इदन्न मम ॥१॥ इससे पहली- ओं समिधानिं दुवस्यत, धृतैर्बोधयतातिथिम्। अास्मिन् हव्या जुहोतन, स्वाहा । इदमग्नये- इदन्न मम ॥२॥ इससे और ओं सुसमिद्धाय शोचिषे, घृतं तीव्र जुहोतन । अग्नये जातवेदसे स्वाहा । इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम ॥३॥ इस मन्त्र से अर्थात् इन दोनों मन्त्रों से दूसरी- ओं तन्वा समिद्भिरङ्गिरो, घृतेन वर्द्धया- मसि। बृहच्छोचायविष्ट्य स्वाहा । इदमग्नये- ऽङ्गिरसे-इदन्न मम ॥४॥ (यजु० अ० ३ मं० १-३) ॥ इस मन्त्र से तीसरी समिधा की आहुति देवें। इन मन्त्रों से समिदाधान करके होम का शाकल्य जो कि यथावत् विधि से बनाया हो, सुवर्ण, चांदी, कांसी आदि धातु के पात्र अथवा काष्ठपात्र में वेदी के पास सुरक्षित -
( २३ )
धरे, पश्चात् उपरि लिखित घृत आदि जो कि उष्ण कर
छान पूर्वोक्त सुगन्ध्यादि पदार्थ मिलाकर पात्रों में रक्खा है,
उस (घृत वा अन्य मोहनभोग आदि जो कुछ सामग्री हो)
में से कम से कम ६ मासा भर, अधिक से अधिक छटांक
भर की आहुति देवें, यही पाहुनि का प्रमाण है । इस घृत में
से चमसा, कि जिसमें ६ मासा ही घृत श्रावे, ऐसा बनवाया
हो, भर कर नीचे लिख मन्त्रों से पांच आहुति देवें ।
ओं अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्,
तेनेध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्द्धय, चास्मान् प्रजया
पशुभिर्ब्रह्मवर्चसे, नान्नाद्येन समेधय, स्वाहा।
इदमग्नये-जातवेदसे-इदन्न मम ॥
तत्पश्चात् अञ्जलि में जल लेकर वेदी के पूर्व दिशा श्रादि
चारों ओर छिड़कावें, इस के मन्त्र ये हैं-
ओं अदितेऽनुमन्यस्व ॥१॥ इस मन्त्र से पूर्व,
ओं अनुमतेऽनुमन्यस्व ॥२॥ इस मन्त्र से पश्चिम,
ओं सरस्वत्यनुमन्यस्व ॥३॥ इस से उत्तर और
( गोभिलगृ० प्र० खं० ३ । मू०१-३।)
ओं देव सवितः प्रसुव यज्ञं, प्रसुव यज्ञपति
( २४ )
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भगाय । दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतन्नः, पुनातु
वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु ॥४॥ (यजु० ३० । १) ॥
इस मन्त्र से वेदी के चारों ओर जल छिड़कावें । इसके
पश्चात् सामान्य होमाहुति गर्भाधान प्रादि प्रधान संस्कारों में
अवश्य करें। इस में मुख्य होम के श्रादि और अन्त में जो
आहुति दी जाती हैं, उनमें से यज्ञकुण्ड के उत्तर भाग में
जो एक आहुति और यज्ञकुण्ड के दक्षिण भाग में दूसरी
आहुति देनी होती है, उसका नाम 'आधारावाज्याहुति
है। और जो कुण्ड के मध्य में आहुतियां दी जाती है,
उनको "अाज्यभागाहुति" कहते हैं । घृत पात्र में से चुवा
को भर अंगूठा, मध्यमा,
अनामिका से
नुवा
को
पकड़ कर-
ओं अग्नये स्वाहा । इदमग्नये इदन्न मम ॥१॥
इस मन्त्र से वदी के उत्तर भाग, अग्नि में-
ओं सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय-इदन्न मम ॥२॥
इस मन्त्र से वेदी के दक्षिण भाग में प्रज्वलित समिधा
पर आहुति देवें । गो० गृ० १८४॥ पश्चात्-
ओं प्रजापतये स्वाहा । इदंप्रजापतये-इदन्नमम॥१
ओं इन्द्राय स्वाहा । इदमिन्द्राय-इदन्न मम ॥२
इन दोनों मंत्रों से वेदी के मध्य में दो पाहुति देवें । पुनः-
ओं भूरग्नये स्वाहा । इदमग्नये-इदन्न मम ॥१॥
( २५ )
ओं भुवायवे स्वाहा । इदं वायवे-इदन्न मम ॥
ओं स्वरादित्याय स्वाहा । इदमादित्याय-
इदन्नमम ॥३॥
ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः स्वाहा ।
इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः इदन्न मम ॥४॥
गो० गृ०१।८।१५॥
ये चार घी की आहुति देकर स्विष्टकृत होमाहुति एक
ही है । यह घी अथरा भात की देनी चाहिए ।
ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं, यद्वा न्यून-
मिहाकरम् ।अग्निष्टत्विष्टकृद्विद्यात् , सर्व स्विष्टं
सुहृतं करोतु मे । अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते,
सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां, समर्द्धयित्र
सर्वान्न: कामान्त्समर्द्धय स्वाहा । इदमग्नये
स्विष्टकृते-इदन्न मम ॥ (शतपथ कं० १४।६।४।२४)
इससे एक आहुति करके प्राजापत्याहुति नीचे लिखे
मन्त्र को मन में बोल के देनी चाहिए।
ओं प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये-
इदन्न मम ॥ श्रा० १॥३॥
( २६ ) इससे मौन करके एक प्राहुति देकर चार भाज्याहुति घृत की देवें, परन्तु जो नीचे लिखी आहुति चौल समावर्तन और विवाह में मुख्य हैं, वे चार मन्त्र ये है- ओं भूर्भुवः स्वः । अग्न आयूंषि पवस, आ सुवोर्जमिषं च नः । आरे वाधस्व दुच्छनां स्वाहा॥ इदमग्नये पवमानाय-इदन्न मम॥१॥ ओं भूर्भुवः स्वः। अग्निर्ऋषिः पवमानः, पाञ्चजन्यः पुरोहितः । तमीमहे महागयं स्वाहा॥ इदमग्नये पवमानाय-इदन्न मम ॥२॥ ओं भूर्भुवः स्वः। अग्ने पवस्व स्वपा, अस्मे वर्च: सुवीर्यम् । दधद्रयिं मयि पोषं स्वाहा ॥ इदमग्नये पवमानायइदन्न मम ॥३॥ (ऋ० ६ । ६६ । १६-२१) ओं भूर्भुवः स्वः। प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो, विश्वा जातानि परि ता बभूव । यत्कामास्ते जुहु- मस्तन्नो अस्तु, वयं स्याम पतयो रयीणां स्वाहा। इदं प्रजापतये इदन्न मम ॥ ४॥ ऋ०१०।१२।१०॥ इससे घृत की चार आहुति देकर नीचे लिखे मन्त्रों से आठ भाज्याहुति सर्वत्र मंगल कार्यों में देवें।
( २७ ) ओं त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडोऽअवयासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वहितमः शोशु- चानो, विश्वा द्वेषांसि प्र मुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा। इदमग्निवरुणाभ्याम् इदन्न मम।। ओं सत्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती, नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ। अव यक्ष्व नो वरुणं रराणो, वीहि मृडीकं सुहवो न एधि स्वाहा । इदमग्निवरुणाभ्याम् इदन्न मम ॥२॥ ओं इमं मे वरुण श्रधि हवमया च मृळ्य । त्वामवस्युरा चके स्वाहा । इदं वरुणाय इदन्न मम ॥३॥ ओं तत्त्वायामि ब्रह्मणा वन्द- मानस्, तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः । अहेळ- मानो वरुणेह बोध्युरुशंस, मा न आयु: प्रमोषी: स्वाहा । इदं वरुणाय इदन्न मम ॥४॥ ओं येते शतं वरुण ये सहस्त्रं, यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः । तेभिनों अद्य सवितोत विष्णु, विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्कॉकीः स्वाहा। इदं वरुणाय ( २८ ) सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यः इदन्न मम ॥५॥ ओं अयाश्चाग्ने- ऽस्यनाभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वमयासि । अया नो यज्ञं वहास्ययानो धेहि भेषज स्वाहा । इदमग्नेश्अयसे-इदन्न मम ॥६॥ ओं उदुत्तम वरुण पाशमस्मदवाधर्म विमध्यमं श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम खाहा । इदं वरुणायाऽऽदित्यायाऽदि- तये च इदन्न मम ॥ ७॥ ओं भवतन्न: स- -मनसौ, सचेतसावरेपसौ । मा यज्ञ ५ हि ५ सिष्टं मा यज्ञपति। जातवेदसौ शिवौ भवतमद्य नः खाहा । इदं जातवेदोभ्यां इदन्न मम ॥८॥ सब संस्कारों में मधुर स्वर से मन्त्रोच्चारण यजमान ही करे, न शीघ्र न विलम्ब से, किन्तु जैसा जिस वेद का उच्चारण है, वैसा करें, यदि यजमान न पढ़ा हो, तो इतने मन्त्र तो अवश्य पढ़ लेवे । यदि कोई कार्यकर्ता जड़ मन्दमति, काला अक्षर भैंस बगवर जानता हो, तो वह शूद्र है अर्थात् शुद्र मन्त्रोच्चारण में असमर्थ हो, तो पुरोहित ही मन्त्रोच्चारण करें और अन्य कर्म उसी मूढ़ यजमान के (: २६ ) : हाथस करावे । पुनः निम्नलिखित मन्त्रों से प्रातःकाल हवन करें। ओं सूर्यो ज्योतिज्योतिः सूर्यः स्वाहा ॥१॥ ओं सूर्यो वर्ची ज्योतिर्वचः स्वाहा ॥२॥ ओं ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योति स्वाहा ॥३॥ ओं सजूदेवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा ॥४॥ अब नीचे लिखे हुए मन्त्र सायकाल में अग्निहोत्र के जानो। ओं अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा ॥१॥ ओं अग्निवों ज्योतिवर्च: स्वाहा ॥२॥ ओं अग्निज्योतिर्योतिरग्निः स्वाहा ॥३॥ इस मन्त्र को मन में उच्चारण करके तीसरी आहुति देनी। ओं सनर्देवेन सवित्रा सजूराव्येन्द्रवत्या जुषाणो अग्नि वेतु स्वाहा ॥४॥ अब इन मन्त्रों से दोनों समय आहुति देवे- ओं भूरग्नये प्राणाय स्वाहा । इदमग्नये प्राणाय-इदन्न मम ॥१॥ओं भुवर्वायवे ऽपानाय स्वाहा। इदं वायवेऽपानाय इदन्न मम ॥२॥ ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा । इदमादि- ( ३० ) त्याय व्यानाय-इदन्न मम ॥३॥ ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा । इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापान- व्यानेभ्य इदन्न मम ॥४॥ओं आपो ज्यो- तीरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरों स्वाहा ॥५॥ ओं यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा । ओं विश्वानि देव सवितर्, दुरितानि परासुव । यद्भद्रं तन्न आसुव, स्वाहा ॥दी ओं अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् , विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो, भूयिष्ठान्ते, नम उक्ति विधेम स्वाहा ॥ ॥ ओं सर्वं वै पूर्ण ५ स्वाहा ॥ इसे तीन वार पढ़ें। सन्ध्या की महान्ता- पर निम्न लिखित पुस्तकें अवश्य पढ़ें। सन्ध्या योग।) सन्ध्या रहस्य ।) सन्ध्या प्रदीपका |) सन्ध्या पर व्याख्यान ।) सन्ध्या उपासना १॥) भक्ति दर्पण।-) राजपाल-भार्य पुस्तकालय लाहौर।
( ३२ ) हवन सम्बन्धी भजन गह हवन सुगन्धित पवन मेरे मन भावे । है धन्य भाग जो हवन व यज्ञ करावे ॥१॥ भारत में अविद्या अन्धकार जो छाया। मूर्खता से यह वैदिक धर्म भुलाया ॥ २ ॥ वायु को शुद्धि यही हवन करता है। यही वर्षा द्वारा जल जंगल भरना है ॥ ३ ॥ बिन विद्या के नहीं उसका भेद काई पावे । कहें मूर्ख वर्षा कैसे हवन बरसावे ॥ ४ ॥ सब जाने धुएं का पानी हो जाता है। फिर भी मूर्ख के नहीं समझ पाता है ॥ ५॥ कर सूर्य आकर्षण धुश्रां हवन ले जावे । वायु हो सुगन्धित जल ही जल बरसावे ॥६॥ कैसे न हो वर्षा वया जगत में प्राव । यही बात से हर दिन पाप और रोग बढ़ाव ॥७॥ नित्य करो महाशयो हवन धर्म रीति से । सुख भोगो परस्पर रहा सदा प्रीति से ॥८॥ प्रभु भक्ति का भजन ईश्वर का जप जाप रे मन, वृथा काहे को जन्म गवावे ॥२॥ दीनानाथ दयालु स्वामी, प्रकट सब जा पाप रे ॥२॥ सर्व व्यापक की पूजा कर, दूर होवें दुःख ताप रे ॥३॥ कर सन्ध्या और पढ़ गायत्री, मिट जावे संताप रे ॥४॥ छोड़ असत् को सत् ग्रहण कर, नष्ट होवे सब पाप रे ॥५ खुश होकर प्रभु बिनती सुन ले, 'बेकस' करे विरल' . जसब सन्ध्या सम्बन्धा मेजन (करो सन्ध्या दो काल जी छुट जान बुराइयां) प्रातःकाल उठ जंगल जाकर, शुद्ध पवित्र वैठो नहा कर । करियो दृढ़ खियाल जी, छुट जान बुराइयां ॥१॥ राग द्वेष को त्याग के भाई, प्राणायाम कर मन ठहराई । यह ऋषियों की चाल जी, छुट जान बुराइयां ॥२॥ श्रद्धा प्रीति नाल पियारे, सन्ध्या करनी बैठ किनारे । नारी नर वृद्ध बाल जी, छुट जान बुराइयां ॥ ३ ॥ धर्मशास्त्र विच आज्ञा पाई, जो सन्ध्या को त्यागे भाई । द्विजां थों देवो निकाल जी, छुट जान बुराइयां ॥ ४॥ गायत्री सन्ध्या विच भावे, ओ३म् नाम सन्ध्या सिखलावे । के रक्षपाल जी, , छुट जान बुराइयां ॥५॥ स्तुति प्रार्थना करीं कराई, कर उपासना मुक्ति पाई। जीवन भर निभे नाल जी, छुट जान बुराइयां ॥ ६ ॥ मन तन कपड़ा साफ़ करावी, सन्ध्या भक्ति दा रङ्ग चढ़ावी । हो जावी लालो लाल जी, छुट जान बुराइयां ॥ ७ ॥ प्रभु भक्ति का भजन शरण प्रभु की आवारे यी समय है प्यारे ॥१॥ छल कपट और के. गो, सत्य में चित्त लगानी रे॥२ उदय हुश्रा श्राम नाम का भानु, श्रावो दर्शन पात्रो रे ॥३॥ पान करो इस अमृत फल को, उत्तम पदवी पाओ रे ॥an की भक्ति बिन नहीं मुक्ति, दृढ़ विश्वास जमावो रे ॥५॥ 4 जन्म अमोलक है यह, वृथा न इसको गंवायो रे ॥६॥ को नाम हरि का सिमरन, अन्त को न पछताओ रे ॥७॥ गा जो सबको पाले, मत उस को बिसरावो रे || व मिलकर खुशी से, गुण ईश्वर के गाओ रे ॥१ - . -
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