Adarsh Library, Jaipur
Kal Hogi Hadhtal
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हड़तालकलहोर
अभिमन्युअनत
सरस्वती विहार
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सोमदत्त वकोरी को सप्रेम
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झिल्लीदार परदे में छनकर भीतर पहुंचता हुआ बारीक प्रकार । उसकी गिरफ्त में वह । उमका उसी तरह अपने ही में मिमी बैठे रह जाना और दम मयाल में हूया रहना कि उसका अपना कमग कोई गुफा हो और उसके दरवाजे को चुन दिया गया हो, उसके मिर को बोझिल किए रहना । उसे लगता, खिड़की के शीशो से भीतर आना हुआ सूरज का वह उजाला, जिगका कोई रंग नहीं था, कमरे में डबाडव भरकर जैसे उफनने वाला हो... अगर ऐमा भी हो जाता तो शायद गेदानी की उम धारा के माप वह इस चारदीवारी के बाहर हो जाता; पर ऐमा होता नब तो 'उमकी आंखों के सामने वह रोगनी एक काली रोशनी थी वह उसके अपने भीतर की स्याही रही होगी जिममें विन रंग वाली वह रोशनी काली हो चली थी। उसने कही पड़ा होगा कि अलाहट का रंग भी काला होता है तो फिर यह भी तो हो सकता है कि उसको अकुलाहट में ही रोशनी उफनकर काली हो गई हो। उम गेमनी के काले झाग न हो। वह बैठा रहा "उमको अपनी मामें भी फेनिल होती रही और और वाहर मे मानेवाली आवाजो के सहारे वह उन बाहरी स्यों का वासनिक निर्माण करता रहा वाहर-~~-गली में बच्चों का कोलाहल । आजाद मुल्क के बच्चों को छुट्टी थी। इंग्लैंड की महारानी के जन्मदिन के कारण । अभी कुछ ही दिन पहले की तो वात है। नये साल के अवसर पर आजाद मुल्क की महारानी ने अपने फरमाबरदार सेवकों को उपाधियों से सम्मानित किया था। आजाद देश न अपनी स्वामिनी को भूलना चाह रहा था और न ही स्वामिनी अपनी आजाद प्रजा को। घनिष्ठता का वंधन बना हुआ था। बच्चों का आपस में खेलते हुए झगड़ जाना, फिर खेल शुरू कर देना, फिर झगड़ जाना, फिर घुलमिल जाना 'इस खयाल से उसकी अकुलाहट और भी बढ़ जाती "आखिर बड़े लोग भी इसी तरह क्यों नहीं जी लेते? फिर बड़े लोगों को बच्चा और बच्चों को बड़ा समझ लेने के अलावा उसके पास कोई दूसरा चारा न वचता। सिगरेट के दो-तीन कशों के बाद उसे राखदान के हवाले करके वह कमरे के चारों ओर देखने लग जाता । एक सूराख 'कहीं एक दरार मिल जाए और वह उससे बाहर हो जाए। 'परं वाहर ? सूराखों और दरारों से संघर्ष करके निकलने के बाद भी अगर सामने वही गली मिले जो दरवाजे से निकलने पर मिलती हो तो फिर उसे अपना कमरा ही पसंद था । इस तरह का खयाल उसे गोलियां लेने के बाद ही आता था। वह बैठा रहा । आंखें बंद कर ली। सामने के काले उजाले के भय से अपने को बचाने के लिए उसने एक मध्यम रोशनी की कल्पना की.. उसे अपने से लपेटकर वह सोना चाहता था, पर तभी खयाल आया मंड्रेक्स की दो गोलियां'''दो ? दो नहीं, तीन गोलियां'नींद की तीन गोलियां तो वह ले चुका था "तीन घंटे 'इससे भी ज्यादा घंटे हो चुके , थे। थी। उसकी नींद अंव भी दूर बहुत सारी चीजें उससे दूर थीं।''वह चीजों से दूर था "मित्रों से तो दूर नहीं था। उन लोगों का आना-जाना तो होता ही रहता था। ८ / हड़ताल कल होगी अवदार और टेलीविजन भी कई चीजों को उसके पाम ला ही देते थे। फिर भी एक लंवे दुराव की ऊब उसके इर्द-गिर्द मंडराती रहती। दो दिन पहले अखबार मे पढ़ चुका था : 'गावों में तीन नई सभाएं बनी थी-मजदूरों की विराट सभा तीन हिस्मों में बंट गई थी। कोई मुक्ति का दावा करने वाली ममा थी जिसने गांव के मंदिर को जंजीर में बाय लिया था। दीवाली के लिए मंदिर में वर्ग और जाति विशेष के लोगों को ही आमंत्रण था । हैरत की बात तो यह थी कि वह काली दीवाली, दीवानी के तीन दिन बाद मनाई गई थी।' और अभी कल ही वह टेलीविजन पर एक मंत्री महोदय को वकील की मी आवाज में चिल्लात सुनता रह गया था। उसको चोट भर आई थी पर डाक्टर का कहना था कि उसे अनी पंद्रह दिन चारपाई पर रहना है । उसे डाक्टर की परवाह नहीं थी पर अपनी मां की थी जिमने यह कह दिया था कि पंद्रह दिन से पहले अगर वह घर मे बाहर निकला तो वह छोडकर चली जाएगी। वह जानता था कि उसकी मा कही नहीं जा सकती। लेकिन अपनी मा को यह विश्वाम दिला देना चाहता था कि वह चाहे तो अपने बेटे से मुड़िया पर्वत भी तुरवा सकती है। और इसी बात का खयाल उसे और सभी बातों से ज्यादा था। दूसरे कमरे से मा की आवाज रह-रहकर आ जाती थी--और जब भी आती थी, अमित को तंद्रा टूट जातो । घंटा पहले उसको मा भीतर आई थी यह बताने कि किशोर और सुरेन के फोन आए थे। वह उसके पास बैठ गई थी। राधिका को आवाज देकर अपना नाता अमित के कमरे में मंगवा लिया था । जब तक उसकी मां कमरे में थी, मूरज की रोमनी के चकाचौंध कर देने वाले उजाले की गिरफ्त से उसने अपने को मुक्त रखा था। फिर मा का चला जाना, उसका उजाले की गिरफ्त में आ जाना और उसमे मुक्त होने की कसमका का जारी हना उसके तनाव को और भी बहा गया था। ममी ताकत के साथ आसो को किचकिचाकर मूंद लता और तब एक अलग रोशनी में कुछ स्य मितमिला उठते फिर - हड़ताल कल होगी | .. , किसी एक कड़ी के टूट जाने से सभी कुछ तितर-वितर होकर रह जाते। वह अपनी आंखों को खोल लेता और असमंजस में पड़ जाता कि अपनी आंखों को कहां टिकाए । कमरे के वे ही घिसे-पिटे इने-गिने पुराने दृश्य' वे ही दीवारें "वे ही सामान वे ही चीजें। और उन्हीं चीजों के बीच दीवार के वे चित्र । उन चित्रों का हिलना ''अमित के अपने हृदय के स्पंदनों के साथ चित्रों को उन धड़कनों का मिलकर घड़ी के टिक-टिक की तरह हो जाना 'और''। चार दिन की हड़ताल के बाद वहां का मालिक मजदूरों के सामने आया था। गोरे मालिक का वह तमतमाया हुआ चेहरा एक बार फिर पूरे माहौल को लाल रंग का कर गया--कोई पच्चीस मजदूर थे जो उस रंग के कारण और भी झांवर पड़ गए थे। सभीके पार्श्व में ईख का कारखाना । कारखाने की चिमनी थी."चिमनी का धुआं थाअमित की आंखें उस चित्र पर टिकी रहतीं और चिमनी का धुआं हिलने लगता, ऊपर को उठने लगता '''और कमरे में फैलते हुए धुएं के धुंधलके में अमित अपने को बेतहाशा दौड़ता हुआ पाने लगता।'अधिक रोशनी वाली तस्वीर को तरह वह दृश्य धुंधला होता."। और, चकाचौंध रोशनी के सामने का अंधेरा, उसी तरह का एक छलने वाला उजाला था देश के मजदूरों के सामने । उसी तरह की चकाचौंध रोशनी में वे अपने हिस्से के प्रकाश को मुट्ठी में कसते जाने के प्रयास में अंधेरे को मुट्ठी में संजोए हुए थे। अमित सोच उठा-मजदूर की इस हालत का कारण तो ये जमींदार भी हैं, यह सरकार भी है और काफी हद तक मजदूर खुद भी हैं, लेकिन मजदूरों को इतना भोले-भाले बनाए रखने की यह साजिश किसकी थी? अपनी कार दुर्घटना से तीन महीने पहले अमित दक्षिण प्रांत के उस गांव से लौट रहा था जहां मजदूरों को विभाजित करने के लिए एक दूसरे यूनियन की वात चल रही थी। ओलिव्या की उस वस्ती का वह धुआंधार वातावरण कोलाहल'''आग की लपटें.."चीत्कार और। टुकड़े-टुकड़े जोड़कर भी अमित उस दिन के उस दृश्य को सही और संपूर्ण रूप में अपने सामने नहीं ला पाता । बीच-बीच में कड़ियों की कमी रह जाती."उस घटना को बार-बार सजीव करने का प्रयास करके भी १०/ हड़ताल कल होगी वह कभी भी उसे पूरा नहीं कर पाया । झिलमिल रूप से उसे जो कुछ याद था, वह बस इतना ही था'"आग की लपटों में कई झोपड़िया ध्वस्त हो रही थी"उन लपटों के बीच से उसने तीन गायों की रस्सिया काटी धी.. दो ममनों को बाहर किया था"एक सात वर्षीय लड़की की जान बचाई थी "सुद आग की लपटों में आते-आते वचा था और और फिर वह अंधेरा। दूसरे ही दिन उसने उन पीडित लोगो के लिए पैसे उगाहने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेकर आसपास के गावो और कोठियों में लोगों को तहसील के लिए इकट्ठा किया था। तीन दिन बाद सात हजार की राशि के बीच पाच सौ रुपये के एक अलग बहल के साथ उसे फ्रेंच में लिखा एक छोटा-सा अनाम पर्चा मिला था। और फिर वही अधिक तेज रोशनी के सामने खड़े व्यक्ति के सामने का अंधेरा। उसके सामने अभी और पद्रह दिन थे। अपनी मां के सामने उसका यह बहाना भी नहीं चला कि दफ्तर में काम पिछड़ा चला जा रहा था। उसरी मां उसकी दोस्त भी थी और उसी दोस्त के स्वर में वह कह जाती, "तुम पागल हो अमित। अमित अपनी मा की ओर एकटक देखने लगता। 'तुम सचमुच ही पागल हो । इतना पड़-लिसकर भी तुमने अच्छी- खासी नौकरी छोड़ दी। यूनियन के चक्कर में पड़ गए हो, इसके बाद अब तुम्हारा यह दूसरा पागलपन ! यह कहा ले जाकर छोडेगा तुम्हें ? तुम पडे-लिखे हो इतना भी नहीं समझते कि यह असमय है ?' बस, यही एक अवसर होता था जब अपनी मा की उपस्थिति में भी अमित के सामने का उजाला स्याही में डूबा हुआ होता । मा बोली थी, 'इमपर अच्छी तरह सोच लेना।' और वह मोचता रह गया था। उसकी मा की आवाजें उसके कानों में बजती रह गई थीं। उनके अपने भीतर नीद की गोलिया पिघलकर पानी हो गई पों। वह एकटक छत के फानूम के नकली होरो को गिनता रह गया था। अब वे त्रिकोण टुकड़े काच की गोलियों की तरह प्रतीत होकर उसकी माखों में धंसी चली आती फिर भी उसकी पली झपकतीं। सामने के तखते पर की पुस्तकों के बीच उसकी आंखें टिकतीं. "व्हे गेवारा 'कोहेन वेंडित 'फांज फेतन "एलरिज क्लीवर''और उन सभी के बीच से एकदम थके-मांदे से मन बहलाने के लिए वह जॉर्ज सिमेनो या स्टेनले गार्डनर की पुस्तक हाथ में लेकर बैठ जाता । तीन-बार पृष्ठ के वाद उसे भी बंद करके चारपाई पर फेंक देता । एकाग्रता नहीं बन पाती। ऊपर की पंक्तियों को नीचे की पंक्तियों से जोड़ नहीं पाता। कुछ समझ में नहीं आता। उसकी ऐसी ही दशा कई बार परीक्षा की तैयारी के दौरान भी हुई थी। मस्तिष्क का वही खालीपन-~वही शून्यता ! वही सिरदर्द । अमित के इस्तीफे की बात सुनकर उसका वाप सिर धुनकर रह गया था। अपनी पत्नी पर यह कहता हुआ बरस पड़ा था कि उसीका विगाड़ा हुआ वह इस तरह उफनता फिर रहा था : 'तुम जानती हो, आज बाजार में नौकरी का क्या भाव है ? लाले पड़े हैं उसके । और ऐसे समय में तुम्हारा बेटा अच्छी-खासी नौकरी को लात मारकर अकड़ता फिर रहा है । उस प्रतिष्ठित काम को छोड़कर अब क्या करने का इरादा है ? दो काम अच्छे पड़ेंगे उसके लिए-या तो प्रधानमंत्री की जगह ले ले या सिर पर भाजी की टोकरी लेकर गलियों में निकल पड़ें । उसे क्या मालूम, यह नौकरी मैंने उसे कैसे दिल- वाई थी। अमित जव इंटरव्यू के लिए जाने लगा था, उस समय उसके बाप ने सीढ़ियां उतरते हुए उसे रोक लिया था, 'इस तरह जाओगे इंटरव्यू में ? विना कोट, बिना टाई ?' 'बोर्ड के सदस्यों को तो पता है ही कि मैं आपका वेटा हूं।' 'ढंग से कपड़े पहनकर जाओ। वोर्ड के अध्यक्ष को मैंने यह बताया है कि तुम बड़े स्मार्ट हो।' अमित हंसता हुआ उसी तरह चला गया था। नौकरी मिल जाने के बाद अमित ने अपने बाप को सुनाते हुए मां से कहा था, 'मैंने तो पहले ही कहा था मां कि पापा के एक फोन के बाद १२ / हड़ताल कल होगी तो इंटरव्यू करने वालों की नजर मेरो गरदन दर पहुंचेगी ही नहीं। नाहक तोम-चालीस सयं को वाईसरीदती यही यो।' उसके इस्तीफे के दूसरे दिन उनी मां बोली थी, 'सी सरकारी नौकरी के कारण आज तुम्हारे बाप की टननी इज्जत है।' और अमित अपने मस्तिष्क के भीतर पूछ बैठा पा-कमी इग्नत? प्रमोसन की चाह रखनेवाले दो-चार कामगारों की ओर से दिखाई जाने वाली यह इज्जत ? इसके साथ ही अमित को दे दिन याद आ गए ये जद उसके बाप को भी प्रमोशन की चाह थी और उमसे सम्बद्ध लोगो को उसने भी इज्जत की थी। उन समय उसकी मा परम पडी थी, 'मैं तुम्हारे मित्रों के आने-जाने पर आपत्ति नहीं करती, सेक्नि...' इससे आगे की वा यमित की समझ में नहीं आई थी। उसके बाप ने लोगों के चक्कर काटे थे। पार्टिया दी थी। सुशामदें की थी। रतनी सक्रियता फिर उसने अपने वाप में कभी नहीं पाई। उससे पहले भी नहीं पाई थी। उसके बाप के जीवन की वे ऐसी घड़ियां पी जब उसके सामने दो-चार व्यक्तियों को सुग रखने के सिवाय कोई दूसरा काम ही नहीं था। खरगोश खरीदकर यह कहते हुए मॅट करना कि उसने शिकार किया था। अमित ने बहुत कुछ देखा था और देखकर दुखी था। अमित अपने त्यागपत्र के बाद सुश था । उसकी उस खुशी को उसकी मा उसकी उम्र की खुमारी समझ दुनी थी। उसका बाप पोषित था, वहद क्रोधित । उसका यह मोघ उस समय सीमा पार कर गया था जब अमित यूनियन से जा मिला था। वह अपनी पली पर झुंझला उठा था, 'नेतागीरी के और भी तो तरीके होते हैं।' अमित अपनी मां से बोला था, 'मेरे सामने काम करने के लिए तोस- शनीस साल हैं मां-चालीस साल एक लवा समय होता है । इतने लंबे समय के लिए मैं वह काम नहीं कर सकता जो मुझे पसंद नहीं । उसको करते रहने का मतलब होगा, अपनी आत्मा को गिरवी रखकर सोनों को चताना । यह मुझंने नहीं हो सकता इसीलिए मुझे अपनी पसंद के काम की - ओर झुकना पड़ा। सरलता के साथ अच्छा पैसा पा लेने से काम की प्रतिष्ठा कैसे बन जाती है, इसको समझने की कोशिश मैंने उस घड़ी से की थी जव से वह काम शुरू किया था। आज भी नहीं समझ पाया ।' 'अपने बाप के अनुभवों और सुझावों का भी तो खयाल रखा होता ?' 'मां, पापा के अनुभव और उनके सुझाव उनके अपने सत्य हैं। एक आदमी का सत्य दूसरे आदमी का भी सत्य हो, यह जरूरी नहीं। मेरा सत्य तो वह होगा जो मुझे वोझ न लगे। उसे अपने बाप पर उस दिन तरस आया था जब उसने उसे मंत्री के लिए भापण लिखते पाया था। एक ही विपय पर उसे दो भाषण लिखने पड़े थे--एक मजदूरों की ओर से आयोजित स्वागत समारोह में पढ़ने के लिए और दूसरा, रात को जमींदारों की पार्टी में पढ़ने के लिए: अमित ने तखत से पुस्तक उठा ली। उसे उलट-पलटकर रख दिया। दूसरी उठा ली. 'मजदूर और उसकी हस्ती पूंजीपति और उसकी साजिशें ..'नव साम्राज्यवाद और तीसरी दुनिया "अविकसित देशों को आर्थिक सहयोग और उसकी सच्चाई.."क्रांति का गर्भपात । उसका विस्तर पुस्तकों से भर गया । जिस पुस्तक को उसने पढ़ना शुरू किया, वह थी वाल्ट डिस्ने कृत 'मिकी माउस' की कहानी । फिर धीरे-धीरे रोशनी लुप्त हो गई और वही अंधेरा 'पहली दुनिया ""दूसरी दुनिया 'तीसरीदुनिया''पूंजीपतियों की दुनिया 'साम्यवादियों की दुनिया 'अविकसित देशों की दुनिया और अब चौथी दुनिया चकाचौंध रोशनी से छला जाना, वह अंधेरा, और नींद की गोलियां... २ शाम को गली के बच्चे कहीं और खेलने चले जाते थे। उनके कोला- हल की जगह फेरीवालों की ऊंची आवाज होती। गिरजाघर के घंटे १४ / हड़ताल कल होगी होते--मस्जिद से आती अजान और अगल-बगल के घरों से रेडियो, मंगीत के नाम वही जेहन के भीतर झनझनाहट पैदा कर देने वाली आवाजें... आवाजें..."आ.. आ."आ..'या'वा'"वा'"वा." "जें ..."जें.."जें.. जे. जें !! किशोर असवारों के साथ पहुंचता । उन्हें पड़ते हुए अमित उन विषयों पर • किशोर से बातें भी करता जाता । अमित की टिप्पणिया सुनने का धंयं किशोर के पास अधिक ममय का नहीं होता । उसे ऊब गया जान अमित अखबारों को एक ओर रख विषय बदल देता फिर दोनो घंटो बातें करते रह जाते । दोनों के बीच का चल पड़ा यह विषय किसी दूसरे के आने पर ही बदलता। अमित से बातें करते हुए किशोर मन ही मन यही सोचता रहता कि इस जीव की कभी तस्वीर बनानी पड़ गई तो उसके लिए रेखाओ और रंगों के निर्धारित मूल्य जाते रहेंगे। अमित का अध्ययन करते-करते किशोर को अपनी आखें और अपना मस्तिष्क कमरे को उस लेन्स की तरह प्रतीत होने लगते जिमपर घूल की मोटी परत आ गई हो । अमित के चेहरे पर पोई विशेष प्रतिक्रिया कभी नही उभरती थी"न खुशी की,न उदासी की। और जब इरा प्रश्न के साथ कि क्या यह मादमी भीतर से भी इतना ही सपाट हो सकता है, किशोर उसके भीतर झांकने की कोशिश करता तो उसे अपनी कला के अधूरेपन का एहसास होने लगता। अखबारों में कोई विशेप बात नही थी । थकी हुई आखें एक शीर्षक से दूसरे दीपक पर फिमलती गई: विदेश यात्रा से लौटे मंत्री की झोली में विकास कार्यों के लिए पंद्रह करोड रुपये। विधानसभा के एक सदस्य ने सरकार को धमकी दी है कि अगर उमे मंत्री का पद नहीं मिला तो वह इस्तीफा दे देगा । उस पद का वह अकेला हकदार था क्योकि इससे पहले उस पद पर जो मंत्री था, वह उसी. की जाति का था।
हवाई जहाज की हाईजैकिंग "आंटेबे में इजराइली सफलता... प्रेटोरिया में अश्वेतों का विद्रोह"हानोई "विश्व मंडी में चीनी के भाव की आंखमिचौली। वैकार युवक की नगरपालिका की ऊंची इमारत से कूदकर आत्म- हत्या की कोशिश धमकी (कोष्टक) अमित का अपना था । बाजार से तेल और चावल गायव (गोदाम में भाव के बढ़ने तक सुरक्षित)। 'वन्दरगाह के मजदूरों की हड़ताल का गर्भपात ! विधानसभा के दो सदस्यों को दल-बदली (मंत्री-पद के लिए) "पुलिस धावा के बाद एक प्रतिष्ठित घर से सात नाविकों के साथ दस वेश्याओं की गिरफ्तारी।.."बाकी विज्ञापनों पर विज्ञापन थे। विटिश चाकलेट, ब्रिटिश कपड़े, फ्रांसीसी जूते, फ्रांसीसी परफ्यूम, रूसी वोडका, चीनी बरतनें, अमरीकी जीन्स, दक्षिण अफ्रीकी फुडस्टफ, जापानी कारें, जापानी टेलीविजन, जापानी फ्रिज, जापानी वाशिंग मशीन, जापानी ट्रांसिस्टर, जापानी कैमरे, जापानी घड़ियां। हर सौ रुपये से ऊपर के माल खरीदने वाले को हजारों रुपये इनाम पाने के अवसर। मारीशसस्टेट कमर्शियल बैंक की ओर से महत्वपूर्ण व्याज़ की व्यवस्था और... 'इस देश में व्यापार राज है।' 'इसीलिए कहता हूं कि यूनियन के चक्कर से बाज आकर कोई दुकान खोल बैठो । तुम्हारे लिए साइनबोर्ड में बहुत प्यारा तैयार कर दूंगा।' यार, यह देश कहां जा रहा है ?' 'क्यों ? तुम्हें दिशा गलत लग रही है क्या ?' 'किसी तरह दो पैसे अधिक पाकर आदमी सीधे दुकान ही को दौड़ जाता है । इन दुकानदारों की तो जैसे सातों दिन फसल ही होती है।' इसके बाद किसीने बात नहीं की। दोनों जैसे देश की किसी बहुत बड़ी समस्या पर सोचते रहे। फिर कोई पंद्रह मिनट बाद "अमित ने तीनों अखबारों को सामने की छोटी मेज पर रखकर किशोर की ओर देखा, 'कल टेलीविजन के पानोरामा में किसी फ्रांसीसी कलाकार का इण्टरव्यू चल रहा था । मुझे १६ / हड़ताल कल होगी उमकी पेंटिग्म कोई खाम नहीं लगी।' किमोर ने बोझिल नजर में अमित की ओर देखा और कड़वाहट-मरे स्वर में बोला, 'पेंटिंग्स सास नहीं होती तो हमारी सरकार अपने दफ्तरों के लिए उसके पंद्रह चित्र थोडे ही सरीदती ?' 'उसके पंद्रह चित्र खरीदे गए ?' "पच्चीस हजार रुपये में।' 'तुमने भी तो उन लोगो से पत्र-व्यवहार किया था।' 'किया तो था।' 'उतर क्या रहा ?' 'उत्तर थोडे ही मिला। 'घर की मुर्गी साग वरावर।' दोनों चुप रहे। अमित अपने को स्थिति का गुनहगार महसूस करने लगा था । किशोर जब अपनी प्रदर्शनी की तैयारी में लगा हुआ था, उस समय अमित ने एक बार नहीं, कई बार कहा था कि ये चित्र तो हाथो-हाथ बिक जाएगे। किशोर हर बार पूछता रह गया था, 'अपने लोगो के बीच ?' 'तुम्हारा सिनिमिजम अभी तक खत्म नहीं हुआ ?' किशोर ने कोई उत्तर नहीं दिया। अमित उमे देखता रहा । पर का याटा गीला करके किशोर ने पेंटिंग्म के सामान खरीदे थे। अमित ने उसे ऐसा करने दिया था क्योकि उमको विश्वास था कि इस प्रदर्शनी के वाद किशोर अपने को संतुलित कर पाएगा। पचहत्तर तैलचित्र थे उसके । आधे के बिक जाने पर भी उमको स्थिति में परिवर्तन आ जाने की पूरी संभावना थी । अमित ने हमेशा यही चाहा था कि किशोर को अपने उस लंबे परिश्रम का अच्छा फल मिले । उमने कई लोगों से अनुरोध किया था कि वे किशोर के भीतर की प्रतिभा को विकसित होने का अवसर दें। वह उसके लिए रियायत नहीं चाहता था। कला पारखी न होते हुए भी उमे यकीन या कि किशोर की कला में दम है । पांच दिन की उस प्रदर्शनी में केवल चार चित्र सरोदे गए थे। वे • सात मौ रुपये पेंटिंग्स के सामान की लागत से भी कम थे । .
प्रदर्शनी के उद्घाटन के दूसरे दिन बाद एक्सप्रेस के कला संपादक से बातें करते हुए अमित ने पूछा था, 'किशोर के चित्रों के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है ?' 'से मेरवेये ! इल आ जी जेनी से गारसों ला।' अमित भी यह मानता था कि किशोर के चित्र बहुत सुन्दर थे और वह प्रतिभाशाली था। फिर तो अमित बहुत सारे प्रश्न अपने-आपसे करता रह गया था, 'कला की परख हमारे अपने लोगों को नहीं आती क्या ? किशोर अगर गोरा होता तो क्या उसकी कला इसी तरह अर्थहीन रह जाती? इसमें दोष किसका था ? जन्म के संयोग का या सामाजिक मनोवृत्ति का ?' किशोर का यह कहना कहां तक अर्थ रखता था कि जिस तरह सूर्य सभी फूलों को रंग देता है, उसी तरह कला जीवन को रंगती है ? रंगने वाले के अपने निजी जीवन में कहां था वह रंग? उसकी कला उसके अपने जीवन को रंगने में क्यों चुक गई थी ? किशोर कई बार हंसकर कह चुका था, 'कला का तो यही तकाजा होता है कि कलाकार अपना सबसे महत्वपूर्ण क्षण अपने समय के हवाले कर दे।' और फिर एकांत में वह खुद अपने से प्रश्न कर उठता, 'तो क्या, वदले में समय कलाकार को कुछ न दे ?' एक किशोर दूसरे किशोर से कहता, 'आदान-प्रदान तो व्यवसाय में होता है।' 'तो फिर कला में क्या होता है ?' किशोर किशोर को जवाब नहीं दे पाता । उसी शाम फ्रेंच पत्रों में किशोर की प्रदर्शनी का बहुत अच्छा विवरण आया था । अमित उन सुन्दर वाक्यों से जितना खुश हुआ था, उतना ही झुंझला उठा था। 'क्या करेगा किशोर इन लंबेचौड़े वाक्यों का? और कुछ न करके इन शब्दों से पेट ही भर लेता। सराहना करने वालों ने अगर चित्र नहीं खरीदे तो उसका अलग ही कारण था...' १८/ हड़ताल कल होगी डाक्टर आया । अमित को आखिरी मुई देकर दस मिनट साय रहा फिर चला गया। मल्टीविटामिस की कुछ गोलियों के साथ-माय फजि- विक्म की छोटी शीशी भी छोड़ गया था। जाते-जाते उसने कहा था, 'मैंने मड्रोनेक्जील का इंजेकान दे दिया है । कल वाली दलोडिंग अब नहीं होगी। यह फजिविक्स की गोलियां नसों की पुष्टि के लिए हैं । जव तक नसों की कमजोरी मिटती नहीं, तुम्हें तनाव से बचना होगा।' डाक्टर के चले जाने के बाद अमित फिर से चित्रों और प्रदर्शनी की चर्चा न कर बैठे इसलिए किशोर ने अमित से पूछा, 'चीनी उद्योग के तुम्हारे मजदूरों को महंगाई भत्ता अभी तक नहीं मिला है। कल के अन- बार में इसके लिए काफी स्याही वहाई गई यो।' 'इमी वान के लिए सुरेन सभी कागजातों के साथ पहुंचनेवाला है::: खैर, इमे छोड़ो, तुम यह बताओ कि इस निराशा के बाद तुम्हारी पॅटिंग्स...' 'उसमें शिथिलता क्यों आने लगी? अभी अपनी सांसों की रफ्तार को बनाए रखने की इच्छा बाकी है।' इससे अमित को खुशी हुई। अमिन की यह खुशी भावुकता से बोझिल थी। दीवार की घड़ी ने छः बजने की सूचना अपने जापानी संगीत से दो। अमित ने राधिका को आवाज दी। उसके आने पर बोला, 'सुबह तुम यहां से सभी गितास उठा ले गई और लोटाना भूल गई।' फिर किमोर से, 'शायद वीयर की एकाध वोतल वचो हो।' किशोर पर इस वाक्य की कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं हुई। वह अपनी अंगुलियों से नाखूनों को कुतरता हुआ सामने की ओर देयता रहा। राधिका बीयर की दो ठंही वोतलों के साथ भीतर आ गई। उसके हाय मे दो बोतलें देपकर अमित ने जानना चाहा कि घर पर और कितनी बोतलें थीं। राधिका गाव की लडकी थी । क्रिओली दोलने में उसे कठिनाई होती पी, इसलिए अमित हमेशा उमसे भोजपुरी मे ही बातें करता । अमित की भोजपुरी पर किशोर ने उस दिन कहा था, 'एक बात मेरी समझ में नहीं आती। तुम्हारी मां की तरह मेरी मां भी घर पर भोजपुरी बोलती है फिर भी मुझे यह जवान नहीं आती।' 'शहरी होकर कुछ लोगों को अपनी पहचान जाती रहती है।' अमित ने कहा था। 'तुम्हारा मतलब है कि सारे लोग जो भोजपुरी नहीं बोलते, अपने को नहीं पहचानते ? 'मैं नहीं जानता, भापा को तुम क्या समझते हो; लेकिन जो मैं समझता हूं, वह तुम्हें बताए देता हूं। भापा कुछ लोगों के लिए मात्र अभिव्यक्ति होती है, कुछ लोगों के लिए यह इससे आगे की चीज होती है, किशोर ! भापा आदमी को भीतर से जोड़कर एक शक्ति को बनाए रखने का साधन होती है। 'तुम तो हर बात में फिलासफी ठूसते रहते हो।' 'और तुम अपनी ही बातों को भूल जाया करते हो।' 'क्या भूल जाता हूं मैं ?' 'मुझे अपनी मां से भोजपुरी में बात करते पाकर तुम कहते हो कि इस तरह की आत्मीयता क्रिओली तथा अन्य बोली बोलकर शायद न आती हो। क्या तुम भी वात-बात में फिलासफी ढूंसते हो? खैर, तुम तो भोजपुरी समझ भी लेते हो, इसलिए उस आत्मीयता को परख पाए । तुम मेरी वात को पता नहीं कहां तक समझोगे, पर मैं उसे कहे देता हूं."जानते हो, इस देश में कुछ लोगों का अभियान आज भी अभियान बना हुआ है । वे यहां पर पचास प्रतिशत से ऊपर हैं पर कभी-कभी ऐसा लगता है कि वे ही यहां • सबसे कम संख्या में हैं । इस आभास की एक ही वजह है 'वे कभी जुड़ नहीं पाए । भापा संगठन का साधन होती है । यहां पर ये लोग जो अपनी अभिव्यक्ति भोजपुरी में करते हैं, उनकी संख्या पैंतीस प्रतिशत होगी। यही पैतीस हर वक्त एक सूत्र में सामने आते हैं । वाकी पंदह-बीस प्रतिशत अपने को इस लड़ाई से काटकर अलग राग अलापते रह जाते हैं। मेरी मां से बात करके देख लो कभी कि इस देश में भोजपुरी के बल हिन्दू- मुसलमान किस तरह जुड़े हुए थे। आज क्या हालत है ? सच पूछो तो २० / हड़ताल कल होगी उम समय मेरे भीतर कुछ खोलने लगता है जब भोजपुरी अच्छी त जानने वाले नौजवान भी उसे न जानने का बहाना कर जाते हैं। का बोली के प्रति इस तरह की हीन भावना ? आज बात-बात पर आइडेंटि की दुहाई देते हुए भी हम अपनी बोली को गंवारों की बोली समझते जाएं, यह बात मेरी समझ में नहीं आती "सर, तुम इसका बुराम मानना "तुम तो भोजपुरी न बोलते हुए भी उसे समझ तो लेते हो।' उमीक्षण किशोर ने विषय बदल दिया था। आज फिर अमित को राधिका से बाते करते पाकर उसने आत्मीयत का अनुभव करना चाहा । उसे लगा कि शायद क्रिओली या अन्य बोल में अमित अपने घर की नौकरानी के सग इतनी आदमीयत के सायर न आ पाता । उसने उस बोली में एक कोमलता, एक स्नेह, एक सादर्ग का अनुभव किया था और पहली बार इस बात का उसे हलका-मा दुध हुआ था कि उसने उसे बोलने की कमी चेप्टा नही की थी। उसे लग कि कितना स्वाभाविक होता है कभी अपनी चीजो को बाहर रख जान और बाहरी चीगो को अपना समझ अपने से चिपकाए रहना बीयर की एक बुसकी ले चुकने के बाद किशोर ने अमित में पूछा ''तुम कुछ नहीं पियोगे ?' 'तुम्हारे पहुचने से कुछ ही मिनट पहले मैंने चाय पी थी।' राधिका ने सुरेल के आने की सूचना दी। दूसरे ही क्षण वह फिर भीतर आई। यह बताने कि जानीन का फोन बाया था। अमित को अपने वार का पत्र मिला। उनम हरविन्द्र थे। पूरे पत्र में घूम-फिरकर वही करें दो दिन रहने वो विदा हो जाता कि कमी किन आना जाना व्यक्तित्व को खो देता है और दफ्तरशाही की शल्यक्रिया किस तरह उसे नये हाड़-मांस का बनाकर छोड़ देती है। किशोर की पेंटिंग्स से अर्थ निकालने के प्रयास में अमित के सामने गैलरी मेक्स बूले के चित्र उभर आते "किशोर के चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन ''उस अस्त-व्यस्त वातावरण में कोलाहल के बीच की वह एक अलग आवाज, 'पेंटिंग्स अच्छी है।' अमित ने मुड़कर देखा था । जानीन थी वह । गोरा चेहरा... ललछंव वाल... नीली आंखें "एक स्थायी-सी गंभीर मुस्कान । वह बिना झिझक और बिना किसी औपचारिकता का स्वाभाविक क्षण था। दोनों मिल गए थे, रोज मिलते रहने वाले कालेज के सहपाठियों की तरह। चित्रों को एक कतार से दूसरी कतार तक एकसाथ चले थे। एक साथ ठिठके थे । जानीन ने चित्रों पर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की थीं, अमित ने सुना था। नुमाइश की उस आखिरी तस्वीर तक पहुंचते-पहुंचते जानीन ने कहा था, 'ओलिव्या के उस अग्निकाण्ड में...' अमित की आंखें हैरत से विस्तार पा गई थीं। उसके मुंह से बस इतना निकल सका था, 'तो आप ही हैं वह वह हंस पड़ी थी। उस हंसी में एक कशिश थी। अमित को ऐसा लगा था कि उतनी प्यारी चीज उसने आज तक देखी ही नहीं थी। मंत्रमुग्ध-सा वह खड़ा. रह गया था। तभी दूसरी ओर से जानीन की दोनों साथिनें आ गई थीं। उनके साथ अपनी सफेद पेजो तक जाती हई जानीन वोली थी, 'मुझे भी टिंग्स का शौक है।' चारपाई से सोफे पर और सोफे से चारपाई पर । कभी वैठा रहता, कभी उठंग जाता। कभी लेटे-लेटे सुस्ती आ जाती और पलकों का बोझ असा प्रतीत होने लगता । दिन में सो लेने के बाद फिर रात को नींद के लिए करवटें बदलते रहना पड़ता था, इसलिए झपकी माने पर वह उठकर कमरे में चहलकदमी करने लग जाता। गोलियों का भी कोई असर नहीं । २२ / हड़ताल कल होगी होता । चहलकदमी करते हुए वह आफिस के पिछले फाइलों के बारे में सोचने लगता । मिल मालिकों और मजदूरों के बीच का तनावगत... समझोता । स्थिति का बनना, फिर बिगड़ना। रस्साकशी के बाद ही तनाव कम होता पर गिथिलता नीद की नहीं होती थी। पिठनी शाम सुरेन उन फाइलों के साथ पहुंचा या जिनमें उद्योग- पतियों के पत्रो के उत्तर पर विचार करने थे। यूनियन के सदस्यो के प्रतिनिधियो की मीटिंग का विवरण भी यह देस चुका था । उसकी अनुरस्थिति में काम कही भी गिथिल नहीं हुआ था फिर भी अमित को ऐमा ही लगता कि सभी काम अधूरे पड़े हुए थे। चीनी उद्योग के मजदूरों को महंगाई भता? उसे अब भी मालिकों के उत्तर की प्रतीक्षा थी। मजदूरों को एक मीटिंग से लौटते हुए अमित की मोटर की दुर्घटना हुई यो । ग्रेक में गड़बड़ी आ जाने वाली वह वात अमित के कुछ मित्रों को स्वाभाविक नहीं लगी थी । सुरेन ने तो पूरे विश्वास के माय कहा था कि उमके ग्रेक का मावोताज हुआ था। अमित को यूनियन के क्षेत्र में आदोलनों • से हटाने की बात बहुत पहले ही से चल रही थी। पुलिस को बयान देते हुए अमित ने कहा था कि मोटर के नेक का चुक जाना स्वाभाविक होता है । जो वात उमने बयान में कही थी, वह उसके अपने विश्वास की बात नही थी लेकिन उसे उस बात को वही समाप्त करना था। वह माबोताज वाली बात से असहमत नहीं था पर उसके मित्रो की जो धारणा थी, वह उसकी अपनी धारंणा से अलग थी। मावोताज अगर हुआ भी होगा तो यूनियन के आदोलन के कारण नहीं, बल्कि पर यह उसका वहम भी हो सकता है। दुर्घटना के तीन दिन पहले उसे अनाम फोन और चिट्ठी मिली थी। फोन में उमसे कहा गया था कि वह जानीन से मिलना वद कर दे वरना उमे पछताना पड़ेगा। चिट्ठी में यह धमकी और नी सख्त थी । उसमे यहा तक कहा गया था कि सफेद दूध से काली मक्खी को जिस तरह से निकालकर फेंका जाता है, उमी तरह उसे भी ममुद्र मे फेंक दिया जाएगा। फोन और चिट्ठी की चर्चा अमित ने केवल आशा से की थी । आशा ने चाहा था कि वह चिट्ठी पुलिस के हवाले करे। अमित ने बात नहीं मानी थी । जानीन तक को उसने यह बात नहीं बताई थी। उसके मस्तिष्क में वे धमकियां और वह दुघर्टना कहीं न कहीं जुड़ जाती थीं। वे अपने-आप जुड़ती और फिर अलग हो जातीं। अमित अपने- आपसे तर्क करके दोनों को दो अलग चीजें समझता। कभी चहलकदमी करते समय अपने को फाइलों की परतों से रिहा करने का प्रयास करता । खिड़की के नीले परदे को हटाकर बाहर की ओर देखता । सामने की इमारतों की ऊंची दीवारों से वह क्षितिज छिपा हुआ था जिसे मापने की आवारा चाह उसके भीतर पैदा हो जाया करती थी। गाढ़ा मेलापन । उसका हमेशा अपने-आपसे यही कहना होता कि आदमी को उस क्षितिज तक दौड़ना है। दौड़ने वाले आदमी को कोई कितना रोक सकता है ? कव-कव रोक सकता है ? कहां-कहां रोक सकता है ? कितनी लम्बी हो सकती है वह लपक ? उसके क्वीन एलीजवेथ कालेज में इकोनोमिक्स पढ़ाना छोड़ दिया था। फे का खत लिखते समय उसके मन में आया था कि सभी शिष्टाचार क साथ वह खत में यह प्रश्न कर ही ले कि आदमी को कब तक पीछे से खींचता रहा जाएगा। लेकिन फिर यह खयाल आ जाने पर कि यह प्रश्न गूगों से होगा, उसने प्रश्न नहीं किया था। आशा ने आत्मीयता के साथ कह ही दिया था, 'तुम डरपोक हो अमित ! स्थिति का सामना नहीं कर सकते।' 'नहीं, आशा !' नौकरी से हटकर उसने चाहा कि वह भी सत्येन्द्र की तरह राजनीति में कूद जाए । राजनीति हमेशा उसका विषय रही थी। उसका अध्ययन ही था वह जो उसे उस चीज से अलग रह करके ही सक्रिय रहने का सुझाव दे गया था। जिस बदतर की स्थिति को मिटाने की वह कोशिश करना चाहता था, उसे वह राजनीतिक झमेले से अलग रहकर भी कर सकता था । इसीलिए वह अलग रहा । वह एक ऐसे ठौर पर था जहां से खड़े होकर वह उधर की घांधलेबाजी को सही ढंग से परख पाता था। भीतर से वह उस गिजगिजाई और बलवलाई रूप को नहीं देख सकता २४ / हड़ताल कल होगी पा। म निजनिबेसन को देखने के निए सका दूर रहना जरूरीया। उसका बाप पहना,'मैं तुमने पूरी दुनिया की बात कर रहा हूं अन्ति! यहा वही बादमी आगे जानता है जिनका संबंध नियामत के नाय बच्छा अन्ति के नमूचे शरीर में रिल भर गाडी । हंसकर कहता, 'तुएं की मुंडेर पर खड़े हा आदनी के लिए नाग बाने में तो पीछे को नुटा जाना ही बेहतर रहेगा।' दूसरे दिन पोड़ी देर के लिए दातर जाने की बात पर अमित ने बोनी मां को मना लिया था। उनके निचले हों के नीचे के बाद में स्टिन बनी निकाले नहीं गए थे।मा ने पूछा था, 'इन धागों के निकलने तक का इंतजार तो नुन हुआ होता। 'अब तो में विना लंगडाए चल पा रहा हूं।' अपनी मां के सामने अमिन के वै वान के पुराने हाज भी चन जात। 'एक गर्न पर में उन्हें जाने दूगी तुर लवन को टैक्मी ने जाओगे, उमीन लोटॉग बोर वह भी दो घंटे के भीतर ।' अग्नि ने गतं माननी दी। गर्न मानकर वह अपने मरे को लौटा ही था कि जानीन का फोन आ गया । अमित के मुंह में यह सुनकर कि उसे दो घंटे की छुट्टी मिल पाई है, जानीन ने तपाक में रहा था कि वह मे लेने पहुंच रही है। 'तुम्हारे आने में छुट्टी रद हो जाएगी। मां को विश्वास ही नहीं होगा कि मैं दफ्तर जा रहा हूं। वही कठिनाई मे मिले हैं ये दो घंटे।' 'आफिन पहुंचना मत्रमुच बहुत उरी है का?' 'बहुत जरूरी है जानीन, पर इसका यह मतलब दो नहीं कि तुम्हारे आय आप घंटा भी न बिता मर्के।' 'तो फिर कहा इंतजार करं?' 'टीक है।
.. -- 'पहले तुमसे मिलकर फिर दफ्तर जाऊंगा। इसका मतलव है, ठीक दस बजे मैं वहां पहुंच जाऊं।' 'तुम्हें मेरी चिट्ठी मिली थी ?' 'तुम्हारी रूमानियत मुझे पार कर गई है उसमें ।' प्रोपिकाना की भव्यता से उसे चिढ़ थी पर फिर जानीन की हैसियत का भी खयाल रखना होता था। जानीन से प्रदर्शनी की उस पहली भेंट के वाद अमित से उसकी एक दूसरी भेंट क्यूपिप की पुस्तकों की एक दुकान में हो गई थी । जानीन पूछ बैठी थी, 'तुम्हें मालूम है, हमारी पहली भेंट कहां हुई थी ?' 'मेक्स वूले गैलरी में किशोर की प्रदर्शनी 'नहीं।' 'इससे पहले भी हम मिल चुके हैं क्या ? ओह, शायद ओलिव्या के उस अग्निकांड में...' 'नहीं। हमारी पहली भेंट महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट में हुई थी।' 'गांधी संस्थान में ? 'हां । भारत से आए कुछ कलाकारों के संगीत का कार्यक्रम था।' 'तुमने मुझे अपनी जगह दे दी थी। एकदम मंच के पास ।' 'ओह...' अतीत के उस क्षण की एक गुदगुदी को अमित ने अपने भीतर मह- सूस किया था। पुस्तकों की दुकान से दोनों साथ वाहर आए। जानीन के हाथ में देली के उपन्यास थे । अमित ने हंसकर कहा था कि देली को तो वे लड़कियां पढ़ती हैं जो सुपर रोमांटिक होती हैं । उसी तरह हंसकर जानीन ने पूछ लिया था कि रोमांटिक होना बुरी बात होती है क्या ? 'सुपर होना कमजोरी होती है।' 'सुपर रोमांटिक तो केवल विर्जीनी थी और शायद पाल भी रहा हो।' वाक्य के अंतिम भाग का वह व्यंग्य अमित को बहुत अच्छा लगा था । जानीन ने अपने घर का पता बताते हुए शनिवार को उसे अपनी . । २६ / हडताल लदोगी पंटिंग्स देखने के लिए बुला लिया था। 'उम वक्त अमित ने उम दावत को मामानी से स्वीकार कर लिया पा, पर जाने के समय वह सहम-मा गया था । क्यूपिप के उस इलाके को तो, जहा जानीन का घर था, अमित बहुत अच्छी तरह जानता था, लेकिन एक गोरे के घर जाने की बात और वह भी उसकी लड़की से मिलने अमित को किसी जेड में जाने से कम नहीं लगा। फिर अमित को सपाल आया था कि माहम का अभाव तो उमे इसमे पहले कभी नहीं हुआ." फिर उसका निर्णय ''अगर कभी नहीं हुआ तो कभी नहीं होगा। और वह वहा पहुच ही गया था। जानीन की केंचुली याद को मस्तिष्क से मिटाकर वह यूनियन की गतिविधियों के बारे में सोचना चाह रहा था। उन सभी कुछ मंत्रस्त और अस्त-व्यस्त-मा लग रहा था । कुछ स्थिर नहीं हो पा रहा था। उसे लगता कि 'कुछ मुद्दों पर सरकार की हमदर्दी मजदूरों में अधिक जमीदारो और मिल मालिकों की ओर हो गई थी। व्यवस्था को नीति स्पष्ट नहीं हो पाती और धुधलके में यूनियन का काम कठिन होकर रह जाता। आठ महीनों से चीनी उद्योग के मालिको का एक ही उमर अब तक रेंगता हुआ चला आ रहा था "मामले पर विचार किया जा रहा है। मामले पर विचार किया जा रहा है "एक बार मामले पर विचार किया जा रहा है''दो बार मामले पर विचार किया जा रहा है"तीन वार वायदे की परतो पर परतें जमी चली गई थी। आठ महीने में विचार होते चले आ रहे हैं। चीनी उद्योग संघ के प्रधान ने अमित के लगातार फोन के जवाब में फोन पर यताया था कि विचार जारी है। उगे भी तीन महीने होने को थे। होर पैने पाले मूनियन फी मोर में गांवों में अफवाह फैला दी गई पी फि मजदूर्ग को पुल भी नहीं मिलने का । सोगों को इसका यकीन हो जाए, इग निा या- कर दिया गया था कि अमिन उपर गे यहुन भाग रकम पारर घट है । हम यात को लेकर ईमती और कारगानों में थी। . हरनाम पर होगी। २७ उस दिन अपने बंद कमरे के अंधेरे में अमित.ने अपने पांव के घाव पर हाथ रखकर देखा था । वह ताजा था। पर वहां के दर्द से कहीं अधिक दर्द किसी और जगह पर था । कमरे के उस अंधेरे को फांदकर वह उसी में अकुलाता रह गया था। अलाव की धधकती लपटों से अव वह झुलसने लग जाता। वह जिस हैसियत पर था, वहां लांछन का कभी अभाव नहीं रहा है । कभी नहीं। अमित को लांछन का उतना दुख नहीं था जितना कि अपने मुंहचोर होने का । वह मुंहचोरी ही तो थी । बीस दिन से अधिक होने को थे, वह मजदूरों से दूर था। उसकी अनुपस्थिति उसके ऊपर से लांछन को बल दे सकती थीं। सुरेन और बाकी लोगों को गांवों के दौरे पर भेजकर भी वह निश्चित नहीं था। नुकीले दुराव के खरोंचों से वच पाना दुश्वार था। उसकी उस अस्थिरता को कई दिन होने को थे । कल दफ्तर जाने की अनुमति पाकर उसने उस छड़ी को अपनी चार- पाई के नीचे फेंक दिया जिसके सहारे वह अपने कमरे के भीतर-बाहर 'चला करता । टेलिफोन की जगह से लेकर रसोईघर तक वह बिना लकड़ी • सहारे चला गया । उसे लगा, एक ही दिन में उसकी टांग अच्छी हो गई थी। उस घाव की कल्पना भी उससे नहीं हुई जिसने उसे चारपाई का कैदी बना दिया था। राधिका के भोजन लेकर आने पर अमित ने उसे रोक लिया, 'कल मैं अपने दफ्तर जा रहा हूं राधिका !' 'जानती हूं।" और परसों तुम्हारे गांव ।' 'गांव जाना तो पंद्रह दिन बाद ही होगा।' 'यह किसने कहा तुमसे ?' 'मौसी तुम्हें थोड़े ही जाने देंगी।' 'अब तो पांव अच्छा हो गया।' 'कल दफ्तर जाने के लिए तुम दाढ़ी कैसे बनाओगे ? तुम्हारे चेहरे के घाव अभी अच्छी तरह भर नहीं पाए हैं।' 'दाढ़ी के साथ जाऊंगा।' - . २८ / हड़ताल कल होगी 'और उससे मिलने मी दमी तरह जाओगे क्या?' 'तुममे रिसने कहा 'करो, अब नहीं बोलोग गांव की लडकी बुद्ध होती है ?' 'वह तो तुम हो ही। 'तो फिर में भौमी को...' वह जाने को हुई। अमित ने उने रोगलिश । अमित जानता या कि उमरी मा उसे जानीर से मिलने ने नही रोकेगी, पर मनी इन दानों को फिर दोहरा जाएगी, 'तुम सचमुच ही पागल हो" ''अव नुहागहमरा पागलपन यह रहा कि तुम एक ऐसे प्यार को धार मनाने को हो त्री प्यार हो ही नहीं सकता। यह दो दिन का क्षकि सबंध अवश्य ही माना • है, पर प्यार नहीं । तुम आर इसे मानने को तैयार नहीं पर कल अपने- आप मानोगे । तुमने तो हम देश का इतिहास मी पदा है। मुझे कहते हो कि तुम इस देश का मही इतिहास लिन भी रहे हो। इतना दुर होने पर भी तुम इस देश को मवन अनमव बान के पादे पद गए ? इम देग में हर एक दूसरी जाति के बीच तुम्हें चार और विवाह की वा मिन सरती हैं। लेकिन एक ही बात है जो इस देश में न कभी हुई है और न कभी होगी । गोरे की लड़की के माय तुम्हारी दोनी गायद हो मके पर वह तुम पार भी करे, यह न कभी दुआ है और न कभी होगा। रही शादी की बात, तुम्हें तुम्हारा पूरा जीवन दे रही हैं, "कनी तो भाकर बता देना कि रिमी गोरे की दंत्री विमो दूसरी जाति वा वन मका हो।' गरिका हाय छुड़ाकर कमरे में बाहर हो गई। अन्ति के कानों में मा का स्वर गुरता रहा, 'तुम्हें तुम्हारा पूरा जीवन दे रही हूं" भी तो मार दना देना हि विमा गोर की देठी शिनी दूसरी जाति को बन मको है."तुम्हें तुम्हारा पूरा जीवन "तुम्हें तुम्हारा पूग जीवन"पूरा जीवन को तो याकर बता देना"वता देना... बता देना गोरा"काला "गोरा"काला कमी तो कभी तो...' यह नमीमा के पदों को लिए हुए बानी ही मावान ना करती था। ये एक बहन भारी भन्नाट के चौतार होत जो उमई, ममूचे बग्नितुल्लो सनसना ।
पर इसके बावजूद भी वह तटस्थ था। अमित गोलियों की खुमारी को अब भी लिए हुए था जव उसकी मां आशा के साथ ऊपर आ गई थी। कुछ देर आशा से बातें करके वह नीचे को उतर गई । आशा के हाथों की दोनों पुस्तकों को अपने हाथों में लेते हुए अमित ने कहा, 'सिमोन द वुमा आज भी तुम्हारे लिए पुरानी नहीं हुई ?' 'मैं तो धीरे-धीरे चलने वालों में हूं। मैं उतना अधिक आगे अभी कहां सकी हूं जहां से सिमोन द बुआ की दुनिया मेरे लिए पीछे छूट जाए ? अभी तो मैं वहां पहुंच भी नहीं पाई।' . 'तुम वहां नहीं पहुंची हो? यह क्या वोलने लगीं?' 'ठीक ही तो बोल रही हूं।' मुस्कराकर अमित ने दूसरी सिगरेट सुलगाई । राधा चाय लेकर आई और चली भी गई। सिगरेट के एक अनचाहे कश के बाद अमित चोला, 'राधा और तुम्हारी दुनिया के बीच का फासला दो युगों से कम .. थोड़े ही हो सकता है।" 'राधा भी औरत है, मैं भी औरत हूं।' अमित ने तुरंत कुछ नहीं कहा। फिर सिमोन द बुआ पुस्तक के पृष्टों को पलटते हुए, 'राधा तो आज भी वहीं है जहां सौ-दो सौ साल पहले की राधा थी। 'फासले को इतना लंवा मत करो।' 'फासला तो बहुत लंबा है । तुमने तो हमेशा अपने को स्वतंत्र माना है।' 'जहां तक अपने को स्वतंत्र मानने की बात है, वह तो हर औरत अपने को मान सकती है। राधा भी।' 'मानना और जीना...' 'वस, यहां थोड़ा-सा अंतर अवश्य आ जाता है। मैं स्वतंत्रता को जी लेने की कोशिश जरूर कर लेती हूं। खैर, छोड़ो इस रोज-रोज की बहस को । तुम्हारी जानीन का क्या हाल है ?' 'अच्छी है।' 'शी इज मंड आफ्टर यू ।' बुआ की ३०/ हड़ताल कल होगी
"पुराने सवालों की लड़की है।'
भाशा को यह व्यंग्य-सा लगा, फिर नी वह मुस्करा गई।
जानीन बहुत छोटी थी। उस समय प्राइमरी स्कूल से पकी हुई लौटी
पी, 'मां हमारे पड़ोस ही में तो स्कूल है फिर पापा मुझे उतनी दूर के
स्कूल में छोड़ने क्यों जाते हैं ?
'यह स्कूल हम जैसे लोगो के लिए थोड़े ही है ?'
'क्यो नहीं है मां ?"
'यह काले लोगों का स्कूल है।'
'काले लोग क्या होते हैं मां?'
'वे हमारे लोग नहीं होते।
'क्यों?'
'चलो दूध पी ली। मैंने उसमे चाकलेट डाल दिया है।'
जानीन जिस माध्यमिक स्कूल में पढ़ी थी, वह भी उसके अपने
लोगो का विशेष स्कूल था। और जानोन आज भी विना चाकलेट का दूध
नहीं पीती।
.
दफ्तर पहुंचकर अमित अपने बंद कमरे की उस अकुलाहट को एक लबी
सांस के साथ बाहर कर पाया । अपने निजी आफिस की सीली हुई गंध
के बावजूद वह कमरा उसे अपने घर के कमरे से अधिक आत्मीय लगा।
आफिन के हर सामान, हर चीज पर एक सरमरी नजर दौड़ाकर वह
खिड़की के पास पहुंचा। पोटलुई का पश्चिमी भाग हमेशा की तरह
मामने था। बंदरगाह मे जहाजों की संख्या अधिक थी। बंदरगाह के
कामगारो की हड़ताल समाप्त होकर भी 'गो-स्लो' चल रहा था ।
- वेनेशियन ब्लाइंड को ऊपर करके वह खड़ा रहा । फाइलों से थक- कर वह इसी तरह खड़ा होता था। नीचे गलियों के आते-जाते लोगों को देखता रहता। वही लोग होते थे, जिन्हें वह देश के इस छोर से उस छोर तक देखता आया था-दुकानदार, ग्राहक, मजदूर, विद्यार्थी, भिखारी, क्लर्क, अफसर, पादरी, वेश्या, राजनेता, चोर, रोगी, डाक्टर, शराबी, चीनी, मुसलमान, क्रिओल, गोरा, हिंदू-बस, वे ही चेहरे । वही आपा- धापी। दुनिया के दूसरे शहरों में भी ये ही चेहरे देखे थे। नौकरी की तलाश में निकला वही झुकी कमर वाला युवा । पर्यटकों की आंखों में झांकती हुई वही लड़की । पुलिस का वही सिपाही, वही ठग, वही चोर । और उनके बीच से निकल जाती कई साइकिलें, कई मोटर साइकिलें, कई कारें रंग-विरंगी। कभी-कभार कोई छोटा-सा बच्चा भी इन सरगर्मियों के बीच से निकल जाता एकदम अनजान सामने की चीजों को घूरता हुआ, जैसे सभी चीजें पहली बार देख रहा हो। वह कोई बूढ़ा होता एक- दम भिन्न मुद्रा में । कभी हॉर्न की जोरदार आवाज होती, कभी ब्रेक का ) चीत्कार । कभी कोई दुर्घटना होती, कभी कोई जुलूस । गलियों में कुछ न कुछ होता ही रहता। अमित के लिए दुनिया की सभी गलियां एक जैसी थीं.. एक जैसे लोग 'एक जैसे दृश्य । इस गली का आदमी उस दूसरी गली में सैलानी था तो उस गली का आदमी इस गली में कैमरा लिए घूमता मिल जाता। अमित अपनी मेज के पास लौट आया । अभी कुर्सी पर बैठा ही था कि फोन बज उठा । सुरेन ने बताया कि डॉकर्ज यूनियन का मंत्री उससे मिलने आया था। उसे भीतर भेजने को कहकर अमित अपनी कुर्सी से उठकर आगे आ गया। मिशेल ने भीतर आते ही कहा, 'देजोले मों शेर' में शमिंदा हूं कल रोडिग से लौटने पर पता चला कि तुम्हारा एक्सिडेंट हुआ था।' अमित ने हंसकर कहा, 'टूर से बचना पड़ा। 'तुम्हारी गाड़ी?' 'मैकेनिक के पास है । कल फोन किया था। अभी और कुछ दिन लगेंगे।' . ३२ / हड़ताल कल होगी
'वह तो इन्श्योरेंस चुकाएंगा।'
'मुझे चुकाना पड़ेगा। अपना इन्श्योरेंस फुल कमप्रिहेंसिव तो पा
नहीं।'
'कमप्रिहेमिव इन्दयोरेंस क्यो नही लिया था ?'
'हर साल २,००० रुपये कहा से लाता?'
'अव तीन-चार हजार तुम्हे अपनी जेब से सर्च करने पड़ेंगे।'
'क्या करें?
"सुना, तुम्हारा द्रेक फेल हो गया था?'
'पेड़ मे नही टकराता तो गाड़ी खाड़ी में चली जाती। खैर, डाक्स
की क्या स्थिति है ?'
'मेरीन आयोरिटी की मीटिंग हो रही है कल । मागें नहीं मानी गई
तो हडताल जारी रहेगी । तुम लोगो का क्या हाल है ?'
'इघर तो अभी तक महंगाई-भत्ते के लिए जूझना पड़ रहा है।'
यह तो गैर-सरकारी संस्थाओं ने भी दे दिया है।'
'म्युनिसिपलिटी वाले भी दे चुके ।'
'तो फिर क्या कारण है कि तुम्हारे लोगो को अभी तक नहीं मिला?'
"मैं आज पहले दिन आफिम आया हू । आज एक आखिरी मेमोरेंडम
इशू करने जा रहा हूँ।"
'इन सालो को सुप्रीम कोर्ट में घसीट लाना चाहिए।'
• 'सात दिन को मुहलत देकर में आम हड़ताल करवाने को सोच
.
दोनों एक ही युवासंघ के सदस्य थे, मिशेल और अमित । संयोग से
एक बार जब अमित संघ का प्रधान था तो मिशेल मंत्री और जब मिशेल
प्रधान निर्वाचित हुआ था तो अमित मंत्री । अमित अपने मंघ में टेबल
टेनिस का चैपियन था और मिगेल रंगमंच का । युवा मंत्रालय की ओर
से आयोजित नाट्य-प्रतियोगिता में तीन बार लगातार प्रथम अभिनेता के
रूप में पाया था। उसका फेंच का उच्चारण अद्वितीय था।
फाम सरकार की ओर मे जब छात्रवृत्ति प्राप्त होने की यारा हुई
पी, उस ममय हर आदमी उसे ही सवसे योग्य ममझ थे। लेकिन
. जिस मापदंड से योग्यता नापी जाती है, उसकी उचित कसौटी पर मिशेल इसलिए नहीं उतरा क्योंकि जो उतर सका था, उसका रंग गोरा था जवकि मिशेल अपनी सभी प्रतिभाओं के बावजूद क्रिओल था । उस घटना के बाद अमित ने बहुत चाहा कि मिशेल अपने को रंग- मंच की दुनिया से अलग न करे, पर मिशेल उस दुनिया से सिर्फ अलग ही नहीं हुआ वल्कि उससे हमेशा के लिए घृणा कर बैठा। कई अवसरों पर अमित ने उसे नाटक की ओर फिर से ले आने की कोशिश की लेकिन नाटक की ओर झुकने की वात तो दूर रही, उसने फिर कभी कोई नाटक देखा ही नहीं। काफी देर तक दोनों के बीच बातें होती रहीं। सिंडीकेट लीडरों की आगामी मीटिंग का एजेंडा तैयार करके मिशेल चला गया । पंद्रह मिनट तक अपनी मेज के फाइलों के अध्ययन के बाद अमित ने नंवर मिलाए । एक के बाद एक उसने कई फोन किए। राविया को बुलाकर तीन पत्र डिक्टेट किए। यूनियन के नये सदस्यों की लंबी सूची देखी । सुरेन और वाकी लोगों के साथ आधे घंटे की मीटिंग से निवृत्त होकर घड़ी की ओर देखा तो हैरान रह गया। मां ने उससे बारह बजे से पहले लौट आने को कहा था ।. ढाई वजने को था। सुरेन से टैक्सी मंगवाने को कहकर उसने राविया को कुछ बातें समझाई । जव तक टैक्सी नहीं पहुंची, वह सिंडीकेट की पिछली मीटिंग के विवरण देखता रहा । आफिस छोड़ते हुए उसने सुरेन से कहा कि अगले सोमवार से वह काम पर आ रहा है। इमारत से बाहर आकर अमित पटरी पर क्षण-भर के लिए ठिठक गया । सामने से अमरीका के राजदूत की गाड़ी गुजरी । उसके बाद दाल- पूरी वाला अपनी साइकिल की घंटी बजाता और 'दाल-पूरी दाल-पूरी-शो' चिल्लाता हुआ निकल गया। उसके बाद था गोरा मसैदेज । शहर का रईस दुकानदार । वह चेहरा अमित का जाना-पहचाना था। उस आदमी पर पुलिस ने तेरह वार मुनाफाखोरी के मुकदमे चलाए थे। हर वार अदालत ने उसे निर्दोष प्रमाणित किया था। एक तीसरी गाड़ी गुजरी नगरपालिका का मुहर लिए । अखवार वाला लड़का उस गाड़ी के नीचे ३४ / हड़ताल कल होगी । आते-आते रचा मड़क पार करने में पहले अमित ने तीन और शारों को निकल जाने दिया। 'दपतर से उमका घर आठ मील के फामले पर पो। टेक्मी पोटलुई की गलियों से होती हुई रोज-हील को चल पड़ी। अमित को अपने पाव में हल्ला-मा ददं महमूम हुआ, पर उसे भूलकर वह जानीन के बारे में मोचने लगा। रास्ते में वर्षा हो रही थी। वह ममाप्त होती मर्दी की लजीती वर्षा थी जो बिन जताए होने लगी थी। आकाश साफ था और पानी की बूदें टेक्सी के गीरों से टकराकर वही जा रही थी। उस दिन की वर्षा मूमला. धार थी जब जानीन अपनी पेजो चला रही थी। वाइपर आगे के धीमों को मुसा ही नहीं पाता या । जानीन ने गाड़ी रोक दी थी। 'हाइव नहीं कर पा रही क्या ?' 'नहीं तो।' "एक क्यों गई?' 'वर्षा का आनंद चलती गाड़ी मे कहीं अधिक रके होने पर आता है।' दोनों घंटे तक रके रह गए थे। जानीन से अपने सयाल को हटाकर वह फिर में सिडीकेट की अगली मीटिंग के कार्यक्रम के बारे में मोचने लगा। मिडीकेट के प्रधान के नाते वह स्थिति की गिरफ्त में था। आफिस मे निकल आने पर उसकी उधेड़बुन और भी बढ गई थी। यूनियन की रक्षा के लिए वह हमेगा व्यवस्या को 'हनी' कहता आया था। इस बार उमे हां कहना था। हां कहने ही में उसके अपने उद्देश्य को साकार करना पा; पर क्या उसका यह उद्देश्य यूनियन का भी उद्देश्य था? वह तो हो कह गया था, लेकिन सिंडीकेट के बाकी सदस्य उसकी राय के नहीं थे, इगे वह अच्छी तरह जानता था। मटके के साथ दफ्तरी बात को अलग करके उमने फिर से जानीन के बारे में मोचने की कोशिश की, पर कर न सका । उसे लगा, वह वान गिर्फ दपतरी नहीं थी। वह उसके अपने अस्तित्व और समूचे वातावरण से संबद्ध घी । यूनियन की दुनिया में प्रवेश करने से पहले ही उसने यह प्रण किया था कि यह मंसार उसके लिए मात्र जीविका का नहीं होगा। भाज! - - उसे ऐसा प्रतीत होने लगा था कि अगर अपने बाकी साथियों की तरह वह भी सरकार के निर्णय को 'नहीं' कह दे तो इसका यह मतलब होकर रह जाएगा कि उसने भी यूनियन को जीविका मात्र समझा है। श्रम और उद्योग मंत्रालय की ओर से यह निर्णय विधानसभा में पहुंचने वाला था कि यूनियन की ओर से मजदूरों के वेतन में जो चेक- आफ की व्यवस्था चली आ रही थी, उसे मिटा देना चाहिए। सरकारी निर्णय से बहुत पहले अमित उस सिद्धांत का विरोधी. था । उसके अपने दृष्टिकोण में यूनियन इस चेक-आफ के कारण. एक व्यवसाय वनकर रह गया था । मजदूरों से उनकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती उनसे पैसे वसूल किए जाते थे, इससे अमित सहमत नहीं था। यह सही था कि इस चेक-आफ से यूनियन की शक्ति बढ़ती थी; पर इस सच्चाई के साथ एक दूसरी सच्चाई भी जुड़ी थी। यह दूसरी सच्चाई पहली सच्चाई से बड़ी सच्चाई थी- मजदूरों की उनकी अपनी स्वतन्त्रता। उनसे जवरदस्ती वसूली करके उन्हें एक वेचारगी की स्थिति में ढकेल दिया गया था। उनकी पसंद-नापसंद का खयाल उस संस्था को भी नहीं गा जो उनके रक्षक और हितैपी होने का दावा करती है । अमित ने हमेशा यही चाहा था कि मजदूर अपनी पसंद से यूनियन के सदस्य बनें और ताकत की उस तहसील में भाग लें-मजबूर होकर नहीं। उनकी उस वेवसी से उनके अधिकारों में से एक का हनन हो जाता था। अमित अपने मित्रों के इस तर्क को भी महत्व देता कि इस तरह वसूली की अनिवार्यता को मिटा देने से यूनियन की शक्ति क्षीण हो जाएगी। यूनियन की शक्ति तो सदस्यों की संख्या से होती है । अव तक संख्या अगर अच्छी थी तो सिर्फ इसलिए कि उनकी तनख्वाह से पैसे काटकर उन्हें सदस्य बनाने को विवश किया जाता था। यह विवशता उनके अपने ही भले के लिए थी। अगर उनकी पसंद पर तहसील की उम्मीद रखी गई तो यह यूनियन का दिवालियापन हो जाएगा। मजदूर अगर अपनी पसंद से एक सूत्र में बंध पाए होते तो आज उनकी स्थिति कुछ और ही होती। इन्हें तो इनकी अपनी निजी भलाई के लिए विवश करके ही एक सूत्र में बांधना होगा।
इन दलीलों को अमित नकारता नहीं था, लेकिन इम सत्य से बड़े मत्य के सामने यह नतमस्तक या । उसके लिए तो मजदूरों की अस्मिता ही इस यात में थी कि उन्हें स्वतंत्र छोडा जाए । इससे यूनियन भी अपने को बाजारू होने से बचा पाती। कुरुमण्डल की चढाई चढ़ते हुए पुरानी टैक्सी कराहने लगी थी। आगे की वम से छूटते धुएं के कारण टैक्मी को अपनी रफ्तार और भी कम कर लेनी पड़ी। वारिस थम गई थी। दूर का आकाश सूरज की हलकी चमक से तर होने लगा था। उसने अपने भीतर एक भारी कमजोरी अनुभव की । वह कमजोरी जितनी शारीरिफ थी उतनी ही मानमिक भी थी। जानीन उससे अलग होती हुई बोली पी, 'तुम्हें अभी कुछ और दिनी तक अपने को मानसिक और शारीरिक थकान से बचना है।' चढ़ाई पार कर चुकने के बाद पुरानी टैक्सी का कराहना बंद हो गया। ड्राइवर मांवला मद्रासी था। उसके व्यूमिरर के सामने ईमा और मरियम की तस्वीरें थीं । वर्षा रक जाने के बावजूद सामने के शीगे पर वाइपर इधर से उपर चल रहा था। मूखे शीशे पर उसकी क्वीक-क्वांक की आयाज भी ड्राइवर को स्वीच आफ करने की याद नहीं दिला पा रही थी। अमित को अपने सभी मित्रों के विरुद्ध जाना था"वह अवश्य जाएगा। पर अपने इस निर्णय पर वह लड़खडा भी जाता था। चेक-आफ को समाप्त करने के लिए श्रम सलाहकारी संघ की राय नहीं ली गई थी । यह खटकने वाली बात थी । इन मभी बातों के बावजूद सरकार का निर्णय गलत नहीं था."यह अमित के भीतर के तर्क को निष्कर्ष था। यह निष्कर्ष उमे उगके उमूल से हटाता-मा प्रतीत होने लगा था। मजदूरों के नेता की हैमियत से यह मजदूरों का पक्षधर या; पर यह निर्णय उसे सरकार का पक्षधर बनाता जा रहा था। फिर सोचता, क्या किसी एक अच्छी बात के लिए मरकार का पक्ष ले बैठने मे वह मजदूरों का शत्रु बन जाता है'"और ऐमी बात नहीं थी तो फिर उसके भीतर यह शिक्षक क्यो थी? वह तो यूनियन को पंरासाइट और कमगियल होने से बचाना चाहता था । साथ-साथ मजदूरो की अपनी इज्जत और आजादी की बात थी उसमे । यूनियन हडताल कल होगी। ३७ मजदूरों का मित्र होता है. 'जोंक और सौदागर नहीं होता। रोज-हील पहुंचकर उसने ड्राइवर को दाहिनी ओर की पहली गली लेने को कहा । एक मिनट से कम की ड्राइव के बाद मोटर उसके घर के सामने रुकी। गाड़ी से उतरकर उसने किराया चुकाया। घर का फाटक खोलते उसकी नजर वाल्कनी पर खड़ी मां पर पड़ी। अपनी घड़ी की ओर देखता हुआ वह सीधे अपने कमरे में पहुंच गया । मां जब भीतर आई, अमित जूते का फीता खोल रहा था। वह आंखें झुकाए ही रहा। अमित दफ्तर से लौटा था। गलियों को देखता हुआ लौटा था । हेनरी मिलर के किसी पात्र की तरह उसने गलियों को अपने में समेट लिया था। उन सारे दृश्यों को पीठ पर लादे लौटा था। वह सारा कुछ उसके साथ चिपक गया था। वह उसका अपना बोझ था । वे उसके अपने चेहरे थे । गलियों की वह सम्मिश्रित गंध भी उसकी नाक में चिपकी हुई थी । वह गंध भी उसके अपने ही शरीर की गंध जैसी थी। उसने कमजोरी महसूस की। चक्कर-सा आया उसे, पर अपनी मां के सामने वह बैठा रहा उसके पास ही चारपाई पर बैठकर उसकी मां ने पूछा, 'खाना मंगवा दूं ?' अमित को हैरानी हुई। उसने तो सोचा था, मां बरस पड़ेगी। साहस पाकर बोला, 'मां, खा चुका हूं।' 'क्या पिओगे? 'कुछ भी ठंडा मंगवा दो।' उसकी मां खुद नीचे गई और गिलास में अंगूर का रस लिए भीतर भाई। कुछ देर बाद जूठे गिलास लेकर कमरे के बाहर होती हुई उसकी मां ने कहा, 'अव देखती हूं, तुम घर से बाहर कैसे होते हो।' उनके चले जाने के बाद अमित मुस्करा उठा। जब वह घर से निकलना चाहेगा, उस समय उसकी मां सामने आ जाएगी और उस समय भी वह इसी तरह मुस्करा उठेगा। कपड़े बदलकर वह सोफे पर जा बैठा । अपने कमरे में एक सीली गंध का आभास पाकर वह खिड़की के पास पहुंचा । सफेद झिलमिल परदे . - ३८ / हड़ताल कल होगी को हटाकर उमने खिड़की सोल दी। पश्चिम के सूरज की धूप बाहर पत्तों से उनकर भीतर आ गई। वह कमरे की चारपाई अन्य सामान और दीवार पर टुकड़ों में छिटक गई। धूप के एक छोटे-से टुकड़े को अपने माये पर लिए वह मोफे पर बैठ गया । उस पेमे वरावर की धूप का स्पर्श उमे अच्छा लगा । अपने हृदय की धड़कनों की अनुभूति हुईं। लगा, वे घडकनें कुछ तेज थी । लग रहा था, जैसे वै धड़कनें तेजी से उसके खून को धमनियों में पहुंचा रही यो । धमनियो में खून की धाराओं के विद्रोह में उमका अमर मस्तिष्क में होता-सा प्रतीत हुआ। दुर्घटना से पहले इस तरह का असर उसके दिमाग में कभी नही हुआ था । वह पैरों की झुनझुनी-मी थी जो जेहन के भीतर होने लगती थी। उसके मामने का माहौल झालरो मे लिपटकर धूमिल हो जाता था। अस्त-व्यस्त खयालों में डुबकी लेता हुआ वह आखें बंद कर लेता। ऐसी स्थिति में डाक्टर उमे ग्लूटामेक्स को गौलिया लेने को कह गया था। वह ग्लूटाप्लक्म न लेकर वैल्यम या मेट्रॅक्म की गोलियो लेकर मोने की कोशिश करता। पिछली बार उमने कोई गोली नहीं ली थी। इस बार भी उसने कोई गोली नहीं ली । धमनियो का खून दौडता रहा। वह हर जगह दौड़ता रहा-बस, उसके मस्तिष्क को छोडकर । उसके मस्तिष्क को खून वितरण करने वाली वह नस चिपक गई थी। अमिन ने अपने को शिथिल कर लिया "वह आखें भूदे बैठा रहा । एक मिनट "दो मिनट "तीन मिनट और फिर उस चिपकी हुई नस में स्पंदन हुआ 'खून ऊपर पहुंचा। - अमित ने अपने मामले के झालर को हटते पाया"चीजें स्पष्ट हुई। अपने माये मे हायों को हटाकर वह मीधा बैठ गया । मस्तिष्क की उस क्षणिक शून्यता के मिटते ही जो पहला चित्र उसके मस्तिष्क में उभरा, वह या पांच घंटे पहले का योपिकीना में मेज के सामने बैठा हुआ जानीन का। गुलाबी फाक में जानीन, होटल के गुलावी माहौल में मिल गई जानीन, उसका स्वर, फिर उसकी प्रतिध्वनिया । मादडर मे वृहासे-भरे मिलाम पर दौड़ती उसकी पतली अगुलिया । और फिर वही मुस्कान" वही किशोर के चित्रों को प्रदर्शनी वाली।
५ आशा बोली थी, 'औरत की भी तो कोई संपत्ति होनी चाहिए। कम से कम उसकी देह तो उसकी अपनी रहे । विवाह के बाद आशा का यह तर्क गूंगा हो गया था। उसकी चुप्पी से अमित को आश्चर्य नहीं हुआ था। अमित के अपने एक खयाल की पुष्टि हो गई थी। सेक्स को अस्थायी ही रहना चाहिए ताकि प्यार स्थायी रह सके ।' जानीन को याद नहीं कि पिछले किन अवसरों पर उसे कालेज के दिनों की वह पुरानी घटना याद आई थी, पर इतना याद जरूर था कि वह घटना उसे एक से ज्यादा बार याद आई थी। इस समय भी उसी झटके के साथ वह याद आ गई थी। वह केवलं उसके कालेज की दीवारें थीं, वाग के फूल थे जो एक से अधिक रंग के थे। रंग की यह विविधता वहां के अध्यापक और विद्यार्थी के बीच नहीं थी। वे सभी एक रंग के थे, एक रंग विशेष के । आदमियों में दूसरे रंग के अगर कोई थे तो या तो वे तीनों चपरासी थे या वे दोनों माली । उन्हीं दिनों मालियों में से एक की अचानक मृत्यु के बाद जो दूसरा माली आया था, वह अधेड़ था और धोती पहनता था । जिस दिन वह घटना घटी थी, जानीन कुसुम के पेड़ के नीचे बैठी हुई शेक्सपीयर के टेम्पेस्ट से अवतरण कंठस्थ कर रही थी। वह उसीकी कक्षा का जां-दे-मार्गो था जिसने नये माली की धोती को पीछे से खींच दिया था। अपनी धोती को थामकर माली उसे संभालने लगा था जव लेई लगे गत्ते के एक टुकड़े को किसी दूसरे लड़के ने माली की पीठ पर चिपका दिया था, जिसपर लिखा हुआ था : मालवार लांगूची न्वार कुमां लांची ४० / हड़ताल कल होगी देखते ही देखते लड़के-लड़कियों ने माली को घेर लिया था और सभी समवेत स्वर में गत्ते के दोनों वाक्यों को राग में गाने लगे ये: लंगोटी पहने हिंदू गंवार रंग होवे मसूर की दाल माली की धोती दोबारा खोची गई थी और उसके चेहरे को खड़ी के बारे रो पोत दिया गया था । जानीन में वह दृश्य देखा नहीं गया तो न जाने किम माहम और सश्यिता के साथ वह बीच में आकर चिल्ला पड़ी थी। उमको उस चीख को सुनकर रैक्टर को अपने दफ्तर छोडकर थाहर आ जाना पड़ा था। उस घटना के बाद वह माली फिर कभी नहीं दिखाई पड़ा। उसके बारे में जानीन ने कई लोगों से पूछताछ की थी। कुछ पता नहीं चला। आज अचानक उसे माली की याद फिर आ गई थी। और आज उम याद के साथ ही उसके भीतर पहली बार प्रश्न पैदा हुआ : -वह माली अगर गोरा होता तो क्या उसके साथ उस तरह का व्यवहार किया जाता ? इस प्रश्न के उत्तर मे वह दूसरा प्रश्न था जो अपने-आप पैदा हो गया। --पर यह प्रश्न आज क्यो पैदा होने लगा ? अमित के बारे में मोचते हुए वह पुरानी घटना याद आई थी। इन प्रग्नों की परिक्रमा के बाद फिर अमित की याद आकर ठिठक गई। और वह जां-दे-मार्गों को याद थी तो अमित की याद को पीछे ढकेलकर जानीन से कहना चाह रही थी-अंतर का तो खयाल किया होता । जानीन अपनी खामोशी को मुनती रही, 'कौन-सा अंतर ? कसा अंतर "रंग का, हैमियत का, और...' उसकी दादी कहती, जां जमा लड़का लाखो में एक होता है । जितना मुंदर है उतना ही धनी, उतना ही पढ़ा-लिखा, उतना ही अच्छा। जा माता-जाता रहता था और उसके जाने पर हर वार दादी उन्ही बातो को दोहराती रह जाती। जानीन को स्टूडियो मे उस दिन उसकी दादी भी थी जब जां-दे-मागों के प्रश्न के उत्तर में जानीन ने कह दिया था, 'जां, मैं तुम्हें प्यार नहीं करती।' उस सपाट उत्तर से उसकी दादी जरूर चौंकी थीं, पर जां नहीं। महीनों से जानीन की मौन मुद्रा इस बात को कहती चली आ रही थी। जां ने उसपर विश्वास नहीं किया था। इसपर भी उसे विश्वास नहीं हुआ था और उसने कहा था: 'मैं तुम्हें प्यार करता हूं।" 'तुम भी मुझे प्यार नहीं करते।' 'यह तुम कैसे कह सकती हो ?' 'मैंने कभी महसूसा नहीं।' 'कोशिश नहीं की तुमने ।' 'जरूरत नहीं समझी। उसकी दादी वीच में बोल पड़ी थीं, 'क्या कह रही हो जानीन ?' 'मैं ठीक कह रही हूं। ग्रां मेर, मैं इससे प्यार नहीं करती।' 'ठीक है, आज नहीं करती हो, कल करने लग जाओगी वह तो धीरे-धीरे होता है।' 'नहीं दादी, वह एकाएक हो जाता है । और मुझे किसी दूसरे से प्यार हो गया है।" 'वह प्यार नहीं हो सकता जानी 'क्यों ग्रो मेर, वह प्यार क्यों नहीं हो सकता ?' 'प्यार अपनी बरावरी के लोगों के साथ होता है।' 'वरावरी केवल रंग-जाति और पैसों की होती है क्या ?' जानीन की दादी के चुप रह जाने पर जां-दे-मागों ने कहा था, तो उस बात को अफवाह मानता था।' 'आज पहली वार तुम उस बात को होंठों पर लाए इसीलिए आज पहली बार मैंने सच्चाई तुम्हारे सामने रख दी। और जव कि सभी . गलतफहमियां दूर हो गई, क्या मैं तुमसे यह उम्मीद कर सकती हूं कि तुम आइन्दा फिर कभी मुझसे वह बात नहीं करोगे ?' 'तुम बिना सोचे-समझे गलत कदम उठा रही हो।' . मैं ४२ / हड़ताल कल होगी जानीन अपनी स्टूडियो से बाहर हो गई थी। दूसरे दिन जां-दे-भागों की बहन उससे मिलने आई थी, 'तुम अपने परिवार के साथ-साथ हम सभी लोगों को नीचा दिपलाकर रहोगी। इस बात का मुझे दुख है जानीन !" 'मेरे परिवार के साथ यह 'हम लोगों का क्या मतलब है ?' 'हमारी पूरी जाति का।' 'तुम कपटी हो सिमोन !' 'क्यों ? 'याद है, किमी लेखक के लेक्चर के एक वाक्य को नुमने अपनी नोट- बुरु मे लिग लिया था और महीनो तक यह कहती रह गई थी कि वह किननी बड़ी बात थी। कितना छोटा-मा निश्छल वाक्य था वह"जाति से अधिक महत्व आदमी को मिलना चाहिए। मिभोन में इसके उत्तर में कुछ नहीं कहा था। बगीचे के एकदम पश्चिमी भाग मे गुलाधो को क्यारिया थी। उसके पास ही अगर को बेलो का छाजन था जिसके नीचे के पत्थर की कुर्सी पर बैठकर बानोन पटा करती थी। आज वह बिना पुस्तक वहा बैठी थी। कुछ ही दूरी पर आपाया गुलाब के पौधों के बीच निराई कर रहा था। बास्तरिक पीछे की ओर से आकर जानीन के सामने पूछ हिलाने लगा। अपने को बयानों में हटाकर जानीन उसकी चिकनी पीठ पर हाथ फेरने . गी। कौभिम की किताबों में आस्तेरिक कभी उसका प्रिय हीरो था। जानीन के यहा इससे पहले जो कुत्ता था, उसका नाम भी उसने यही रक्षा था। आतंरिक को वह मों पेची गोल्वा कहकर भी पुकारतो यो। यह गोला मन्द उमके परिवार में बहुत गंभीर शब्द था। उसका बार कहता कि उसका परिवार शुद्ध रक्तों का गोल है । अपनी जड़ों को गोल के साथ जोड़ते हुए कहता कि वह फ्रांस की पवित्र और श्रेष्ठ जाति के लोग थे। वह चाहता कि जानीन अपने उस वंशज का गवं अनुभव करे। पर गोला सद आनोन के लिए कोमिक्स की पुस्तकों से बाहर हो ही नहीं पाता। वह जब अाने कुत्ते को पैची गोलिया कहकर पुकारती तो उसका वार भौहें तान सेता । जानीन हंसकर कुत्ते को आस्तेरिक नाम से पुकारने मैं जां-दे-मागों के प्रश्न के उत्तर में जानीन ने कह दिया था, 'जां, प्यार नहीं करती।' उस सपाट उत्तर से उसकी दादी जरूर चौंकी थीं, पर जां महीनों से जानीन की मौन मुद्रा इस बात को कहती चली आ रही जां ने उसपर विश्वास नहीं किया था। इसपर भी उसे विश्वास हुआ था और उसने कहा था : 'मैं तुम्हें प्यार करता हूं।' 'तुम भी मुझे प्यार नहीं करते।' 'यह तुम कैसे कह सकती हो ?' 'मैंने कभी महसूसा नहीं। 'कोशिश नहीं की तुमने ।' 'जरूरत नहीं समझी।' उसकी दादी बीच में बोल पड़ी थीं, 'क्या कह रही हो जानीन 'मैं ठीक कह रही हूं। ग्रां मेर, मैं इससे प्यार नहीं करती।' 'ठीक है, आज नहीं करती हो, कल करने लग जाओगी धीरे-धीरे होता है। 'नहीं दादी, वह एकाएक हो जाता है। और मुझे किसी प्यार हो गया है।' 'वह प्यार नहीं हो सकता जानी...' 'क्यों ग्रां मेर, वह प्यार क्यों नहीं हो सकता ?' 'प्यार अपनी बरावरी के लोगों के साथ होता है।' 'वरावरी केवल रंग-जाति और पैसों की होती है क्या ?' जानीन की दादी के चुप रह जाने पर जां-दे-मार्गों ने कहा १ तो उस बात को अफवाह मानता था।' 'आज पहली बार तुम उस बात को होंठों पर लाए इसीलिए पहली बार मैंने सच्चाई तुम्हारे सामने रख दी। और जव कि गलतफहमियां दूर हो गईं, क्या मैं तुमसे यह उम्मीद कर सकती तुम आइन्दा फिर कभी मुझसे वह बात नहीं करोगे ?' 'तुम विना सोचे-समझे गलत कदम उठा रही हो।' ..- ४२ / हड़ताल कल होगी जानीन अपनी स्टूडियो से बाहर हो गई थी। दूसरे दिन जां-दे-मार्गों को वहन उससे मिलने आई थी, 'तुम अपने परिवार के साथ-साथ हम सभी लोगों को नीचा दिखलाकर रहोगी। इस बात का मुझे दुख है जानीन !" 'मेरे परिवार के साथ यह 'हम लोगों का क्या मतलब है ?' 'हमारी पूरी जाति का।' 'तुम कपटी हो सिमोन !' 'को?' 'पाद है, किसी नेदक के लेक्चर के एक वाक्य को तुमने अपनी नोट- बुक में लिव लिया था और महीनों तक यह कहती रह गई थी कि वह स्तिनी बडी दात थी। कितना छोटा-सा निश्छल वाक्य था वह "जाति से अधिक महत्व आदमी को मिलना चाहिए।' मिमीन ने इसके उत्तर में कुछ नहीं कहा था। बगीचे के एकदम पश्चिमी भाग में गुलावों को क्यारियां थी। उसके पान ही मंगूर की बेलों का छाजन था जिसके नीचे के पत्थर को कुर्मी पर बैठकर जानीन पटा करती थी। आज वह विना पुस्तक वहा बैठी थी। कुछ ही दूरी पर आपाया गुलाब के पौषो के बीच निराई कर रहा था। यास्तरिक पीछे की ओर से माकर जानीन के सामने पूछ हिलाने लगा। अपने को खयालों से हटाकर जानीन उसकी चिकनी पीठ पर हाथ फेरने लगी। कौमिक्स की किताबो मे आस्तरिक कभी उसका प्रिय हीरो था। जानीन के यहां इससे पहले जो कुत्ता था, उसका नाम भी उसने यही रखा पा। आतेरित को वह मो पेची गोल्वा कहकर भी पुकारती थी। यह गौचा शब्द उनके परिवार में बहुत गंभीर शब्द पा। इसका वार कहता कि उनका परिवार शुद्ध रक्तो का गोल है । अपनी जडों को गोल के साथ जोड़ते हुए कहा कि यह मास को पवित और श्रेष्ठ जाति के लोग थे। वह चाहता कि जानीन अपने उम वंशज का गर्व अनुभव करे। पर गोल्ला र रानान के लिए कौमिक्म की पुस्तकों से बाहर हो ही नहीं पाता। वह जब अपने कुत्ते को पेची गोलिया कहकर पुकारती तो उसका बाप भौह तान लेता । जानीन हंसकर कुत्ते को आस्लेरिक नाम से पुचकारने - नग जाती। जिस दिन अमित यहां आया था, आस्तेरिक कूद-कूदकर अपनी दोनों अगली टांगों को इस तरह अमित की छाती पर पहुंचा रहा था, गोया वह उसका पुराना परिचित था। जानीन दंग रह गई थी क्योंकि इससे पहले आस्तेरिक किसीसे इस तरह पेश नहीं आया था। अमित ने कहा था, 'कुत्ता जनम-जनम का दोस्त होता है।" 'और आदमी?' जानीन ने तपाक से पूछा था । 'विरले ही। पर...' 'पर क्या ?' 'जनम-जनम के संबंध को तुम नहीं समझोगी।' 'क्यों?' 'तुम्हारे धर्म में...' 'जनम-जनम का संबंध क्या सिर्फ धार्मिक विश्वास से हो सकता है ?' 'तुम मानती हो?' 'उसे समझना चाहती । बहुत बड़ा संयोग रहा यह ।' कैसा संयोग ?' 'कल ही मैंने डा० जीना कर्मिनारा की पुस्तक पढ़ी । यह पुस्तक न्म पर सोचने को विवश कर देती है।' 'कौन है यह डा० जीना कर्मिनारा ?' 'मेनी मेनशन और जी वर्ल्ड विजइन की लेखिका।' 'पुनर्जन्म के पक्ष में लिखा है या...?' 'उसका इतना दमदार वैज्ञानिक पक्ष शायद ही कोई ले सका हो । उन प्रमाणों पर तो विश्वास करना ही पड़ता है।' 'लगता है, तुम्हें प्रभावित करके रही यह पुस्तक 'पुस्तक पढ़ चुकने के बाद मैं इस बात पर हैरान हूं कि पुनर्जन्म की लोग इस तरह कतराते क्यों हैं । मुझे नहीं लगता कि इसे सत्य करार देने से किसी सिद्धांत, किसी संस्कृति या किसी धर्म पर आघात पहुंचता हो।' 'एक बात कहूं जानीन, मुझे अधिक रोमांटिक न समझो तो एक वात करते ४४ / हड़ताल कल होगी सच्चाई तुम्हें बता दूं, मैंने इन दात को उन मनप महमूमना शुरू किया जब तुम मिनी । मात्र में हर क्षण ऐमा ही अनुभव करता हूँ कि हम दोनों..." वह चुर हो गया था । फिर जमे दुछ सवाल आ जाने के बाद बोला, 'मापद तुम्हारा मह बार-बार बला ही ठौर रहा है जानीन कि हम दोनों के बीच के ये मार सग नये नहीं हो सकते "जिम तरह में तुम्हारे जाने गहबाने हैं, उसी तरह मेरे भी।' जानीन आस्तरिक को नहलाती रही। कुछ देर बाद अनी जगह में उठी और आपाया के पास पहुँची । उपर दावार ने सामान लिए चंग भी आती दिखाई पड़ी। जानीन ने में भी पास बुला लिया। उसने दोनों से पूछा, 'तुम दोनों मानते हो कि आदनी के इस जनम में पहले कोई दूमरा जनम भी होता है ? मापामा चुप रहा, पर चंपा ने उमी क्षण पहा, 'मैं मानती हूं मामबेन।' 'और तुम बापाया ?" शिमकते हुए बापाया ने कहा, 'मैं पहले मानता था।' 'इमका क्या मतलब?' उमने अग्ने गले के मसीव को छूते हुए कहा, 'अब नहीं मानता।' जानौन मुस्कराती हुई अपने कमरे में लौट आई। मरने कमरे को बंद करके वह चारपाई पर लेट गई। उनने आयें मूंद ली। अपनी मामगियों को गियिल हो जाने दिया। कुछ धन उनी तरह पड़े रहने के बाद उनको घेतना दो हिस्मों में सक्रिय हो गई। एक मोर वह अपने बाप से तर्क करती रही। दूसरी ओर उनके अपने आप जूमती रही । स्वयं को उसने निर्णायक रखा । इनमें उने दिशात तो हुई लेकिन बीच के निर्णायक ने अपने मारे फैमले को उनके पक्ष में दिया। जानीन ने नहीं चाहा कि उनके काने भीतर का वह न्यायाधीश उनका पक्षघर बनकर रह जाए । उसने दोनों पक्षो को युक्तियों को किन फिर अपने बीच के उन तीनरे अंघ का आह्वान किए विवेचनों पर गौर करने के बाद आना फैमला मुद्र, । उसीके पक्ष में रहा। उसने आंखें खोल लीं। इस बार छत पर आंखें टिकाए वह फिर से दो कोणों से सोचती रही; फिर तीसरे की आवश्यकता हुई और इस बार भी निर्णय वही रहा । इसके बाद उसने तय कर लिया, अपनी मां के लाख रोकने पर भी वह इस आंतरिक तर्क को ऊपर लाकर रहेगी। उसे अपने को कुछ बताने से पहले उससे कुछ पूछना था-देखना था कि उसके क्या उत्तर होंगे। उसने अपनी सांसों के ऊपर यह निर्णय किया । वह पलंग से उठ खड़ी हुई। अपने सिर को ऊपर करके लंबी सांस ली। अपने सिर को उसी तरह ऊपर बनाए रखा । आगे बढ़ी । खिड़की के परदे को हटाकर वाहर की ओर झांका । उसकी आंखें किसी विशेष चीज पर नहीं थीं। वाहर के समूचे दृश्य को अपनी आंखों में समेटकर भी वह कुछ नहीं देख पा रही थी। इसी प्रकरण में एक खयाल आ गया उसे—यह रोशनी । वह विस्तृत फैली हुई रोशनी, जिसमें सभी देख पाते हैं, खुद कहां तक देख पाती है अपने को ? उसे अपनी पेंटिंग्स याद आ गईं। बहुत सोचते रहने के बाद उसने उसका शीर्षक 'अंधा उजाला' रखा था। यही वह चित्र था जो उसके वाप को सबसे अधिक पसंद था । जानीन सोचती रही 'कैसी उलझी हुई वात थी वह ! सुलझाते-सुलझाते उसकी सभी शक्तियों के क्षीण हो जाने का भय था उसके भीतर। खिड़की से हटकर वह वीच कमरे में आ खड़ी हुई। उसने आंखें बंद कर लीं-और अपने कमरे को विस्तृत होने दिया। वह कमरा विस्तृत होता गया "विस्तृत होता गया और जानीन उसमें एक विंदु मात्र रह गई। दूर गिरजाघर के दो घंटे टन-टन वजते रहे। उसकी मां ने नीचे से आवाज दी, 'जानी ! तुम्हारा फोन ।' गिरजाघर के घंटों की झनझनाहट के बोझ को अपने मस्तिष्क में लिए वह नीचे को दौड़ गई। . - ४६ / हड़ताल कल होगी ६ । : मेडिकल कान्फरेल्म मे आए हुए विदेशी प्रतिनिधि मंडल के सदस्यो से -ओ-चीय होटन में मिलकर लौटते हुए सत्येंद्र अमित से मिलने आ गया पा । वाती के दौरान उसने कहा था, 'यह तो एक और ही प्रवृत्ति होती है कि देश लास माफ-सुथरा हो पर कुछ लोगों के दिल और दिमाग में : फूडे-करकट की बातें चिपकी ही रहती हैं।' अमित ने अपने बाप की ओर देखा था फिर सत्येंद्र की ओर और हंगकर बोला था, 'देश को माफ-सुथरा कहने के दो तरीके होते हैं। एक तो सभी कूहे करकटों को गलीचे के नीचे डालकर और दूसरा कूड़े- करकों को वुहारकर । तुम जिस क्षेत्र के हो सत्येंद्र, वहा प्राय: पहले तरीके का ही सहयोग लिया जाता है । गलीचे हटाकर देखने की तो जरूरत ही नहीं समझी जाती।' जाते हुए सत्मेंद्र अमित के वाप के लिए ड्यूटी फ्री की तीन बोतल हिस्सी छोड गया था। शेफ को अपनी पुस्तको के बीच से अपनी पुरानी डायरी ढूढते हुए अमित के हाय यह पुराना चित्र आ गया था । सारनाथ के खडहरों के चौर यह आशा के साथ खडा था। दोनों की मुद्राओं से वहा को उस वक्त भी ठंडक स्पष्ट पी। फोटो सत्येंद्र ने ली थी। चित्र में दोनों पांव के थे। अमित हंस रहा था 1 आसा गंभीर थी। तीनों अलग विश्वविद्यालयो से यहा पहुंचे थे । छुट्टियों के दौरान तीनो दिल्ली मे मिले थे। यहा से अपने अपने विद्यालय लौटने तक तीनों मजुराहो, महबलीपुरम और अनंतर की गुफाओ तक साथ ही साथ रहे थे। कई दृश्य कौंधकर ओझल हो गए। वह सजुराहो का दृश्य था जो अमित के जेहन पर चिपका रहा। उसने हड़ताल कल होगी/४७ उसीके पक्ष में रहा । उसने आंखें खोल ली। इस बार छत पर आंखें टिकाए वह फिर से दो कोणों से सोचती रही; फिर तीसरे की आवश्यकता हुई और इस बार भी निर्णय वही रहा। इसके बाद उसने तय कर लिया, अपनी मां के लाख रोकने पर भी वह इस आंतरिक तर्क को ऊपर लाकर रहेगी। उसे अपने को कुछ बताने से पहले उससे कुछ पूछना था--देखना था कि उसके क्या उत्तर होंगे। उसने.अपनी सांसों के ऊपर यह निर्णय किया। वह पलंग से उठ खड़ी हुई। अपने सिर को ऊपर करके लंबी सांस ली। अपने सिर को उसी तरह ऊपर वनाए रखा । आगे बढ़ी। खिड़की के परदे को हटाकर वाहर की ओर झांका | उसकी आंखें किसी विशेष चीज पर नहीं थीं। वाहर के समूचे दृश्य को अपनी आंखों में समेटकर भी वह कुछ नहीं देख पा रही थी। इसी प्रकरण में एक खयाल आ गया उसे—यह रोशनी । वह विस्तृत फैली हुई रोशनी, जिसमें सभी देख पाते हैं, खुद कहां तक देख पाती है अपने को ? उसे अपनी पेंटिंग्स याद आ गई । वहुत सोचते रहने के बाद उसने उसका शीर्पक 'अंधा उजाला' रखा था। यही वह चित्र था जो उसके वाप को सबसे अधिक पसंद था। जानीन सोचती रही. "कैसी उलझी हुई बात थी वह ! सुलझाते-सुलझाते उसकी सभी शक्तियों के क्षीण हो जाने का भय था उसके भीतर। खिड़की से हटकर वह वीच कमरे में आ खड़ी हुई। उसने आंखें बंद कर लीं-और अपने कमरे को विस्तृत होने दिया। वह कमरा विस्तृत होता गया "विस्तृत होता गया और जानीन उसमें एक बिंदु मात्र रह गई। दूर गिरजाघर के दो घंटे टन-टन वजते रहे। उसकी मां ने नीचे से आवाज दी, 'जानी ! तुम्हारा फोन ।' गिरजाघर के घंटों की झनझनाहट के बोझ को अपने मस्तिष्क में लिए वह नीचे को दौड़ गई। ४६ / हडताल कल होगी मेडिकल कान्फरेन्म में आए हुए विदेशी प्रतिनिधि मंडल के कुछ सदस्यो से त्रु-ओ-बीय होटल में मिलकर लौटते हुए सत्येंद्र अमित से मिलने आ गया था । वातों के दौरान उसने कहा था, 'यह तो एक और ही प्रवृत्ति होती है कि देश लाख साफ-सुथरा हो पर कुछ लोगो के दिल और दिमाग में कूड़े-करकट की वातें चिपकी ही रहती हैं ।' अमित ने अपने बाप की ओर देखा था फिर सत्येंद्र की और और हमकर बोला था, 'देश को माफ-सुथरा कहने के दो तरीके होते हैं। एक तो सभी कूडे-करकटों को गलीचे के नीचे डालकर और दूसरा कूड़े- करकटों को वुहारकर । तुम जिम क्षेत्र के हो सत्येंद्र, वहा प्रायः पहले तरीके का ही महयोग लिया जाता है । गलीचे हटाकर देखने की वहा तो जरूरत ही नही समझी जाती।' जाते हुए मत्येंद्र अमित के बाप के लिए ड्यूटी फ्री की तीन बोतल व्हिस्की छोड़ गया था। शेल्फ को अपनी पुस्तकों के बीच से अपनी पुरानी डायरी ढूढते हुए अमित के हाप वह पुराना चित्र आ गया था। सारनाथ के खडहरो के बीच वह आशा के साथ खड़ा था। दोनो की मुद्राओ से वहां की उस वक्त की ठंडक स्पष्ट पी। फोटो मत्येंद्र ने ली थी। चित्र में दोनों बेपांव के पे। अमित हंस रहा था । आशा गंभीर थी। तीनो अलग विश्वविद्यालयों से वहा पहुंचे थे। छुट्टियों के दौरान तीनों दिल्ली में मिले थे। वहां से अपने-अपने विद्यालय लौटने तक तीनों खजुराहो, महबलीपुरम और अजंता की गुफाओं तक साथ ही साथ रहे थे। माई रय काँधकर ओझल हो गए। यह सजुराहो का दृश्य था जो अमित के जेहन पर चिपका रहा। उसने हड़ताल कल होगी/४७
उसे धीरे-धीरे आंखों में उतारा।
हड्डियों तक को छू जाने वाली ठंड थी।
खजुराहो के मंदिर से कुछ ही कदमों पर था वह होस्टल जिसमें
छात्र टिके हुए थे। उस ठंड में रात का भोजन सभीने आंगन के घ
के नीचे किया था। आकाश पर चांद अपनी पूरी गोलाई लिए हुए
ममित आशा का हाथ थामे दोबारा मंदिर की ओर दौड़ गया था ।
उस समय दोनों मुख्य मंदिर के आगे बैठे हुए थे, जब आशा ने :
से कहा था, 'मैं उस समय के बारे में सोच रही हूं जब इस मंदि
निर्माण हुआ होगा।'
'या जब ये मूर्तियां बनाई गई होंगी ?'
'एक ही बात है।'
'एक ही बात नहीं हो सकती।'
'खैर, मूर्तियां ही सही "वह हमारे स्वतंत्र युग से अधिक स्वतं
रहा होगा।'
'लगता तो ऐसा ही है।'
'तुम इसके यथार्थ को मानते हो ?'
'किसके यथार्थ को ?'
'इन मूर्तियों के ?'
कला के यथार्थ को कैसे नकारा जा सकता है ?'
अमित की आंखों में यह दृश्य इस ठौर पर पहुंचकर स्विच
कर गया। झपकी के वाद एलोरा का दृश्य उसके मस्तिष्क से हो
आंखों में उतर आया।
'बड़ा अजीब सवाल है तुम्हारा ।'
'मैं नहीं मानती।'
'क्या मानती हो तुम?'
'मैं हृदय और बदन को दो अलग चीज मानती हूं।'
'मैं संदर्भ नहीं समझ रहा हूं।'
और यह दृश्य भी झटके के साथ अंधेरे में लुप्त हो गया था।
उसकी जगह ले ली थी दिल्ली की वापसी के दृश्य ने ।
४८ / हड़ताल कल होगी
वयोमा एकमपि हो फिर माग
र पर जाने को सराही पी
मममम्मा पर हरमोनीमा जाने दिया।
दग:मह रामनि गोली पी,
में टीमन र कापी बनना चाहो यो ।
कन्नाकार पकनिन कोमीको
हुई।
में नन्ही बाजना को पांच मोजोर टकलती हुई
भागमस रहा था, 'हृदय देह मे और देह हृदय से
उड़ी हदों है कन्ट'
पर दोनों दो ओटमी जानी चोनें होती है।'
'हां, मनी टोरेंस कर रहे हैं।'
और फिरउनान"
उन मान जीवन में पहनी शा. अमित ने औरत को देह खरीदने की
जोगिन की थी।
उम नादी लडकी की देह तो थी पर दिल नही था। बंगले पर
मत्येंद्र मी माय पा । उसने हनकर कहा था, 'सेक्स के साथ दर्शन की
मिलावट कड़वाहट पैदा कर जाती है।' ड्यूटी फ्री व्हिस्की की बोतल भी
खाली हो चली थी। अमित ने नहीं पी थी । इसलिए नहीं कि यह हिम्पी
नहीं पीता या बलि दमलिए कि वह ड्यूटी फ्री बोतल थी।
अमित अग्नी पुन्नकों के बीच से हटकर मेज के मामने बैठा था ।
अपने निर के दर्द को वह कन्दवंटना का आपटर एफेक्ट मान बैठा था।
उमने इस तरह के दर्द को पहले कभी नहीं जाना था। यह पुद नहीं
ममल पाता या किडा का कहकर उस ददं को जाहिर की।
मिर का भारी लगना याकाना-पानी लगना । कभी तो उसका गिर टनगर
के वोज की तरह होता और की एकदम साली, कभी कमजोरी अनुमय
करता, कभी उनका अपना ममूचा गरीर पराया-मा लगता। नगर्ने नीद
गोलिया लेनी छोड़ दी थी फिर भी उमकी हालत मे
हडताल कल होगी/४६
था। - डाक्टर उसे ग्लूटापलेक्स की गोलियां दे गया था। कह गया था, इन गोलियों से मानसिक थकान दूर हो जाएगी । वह नहीं हुई। उन पुरानी यादों को मस्तिष्क में लिए अमित काफी देर तक गलियों में घूमता रह गया था । लोग सिकुड़े-सिकुड़े चल रहे थे। अमित को भी ठंड लग रही थी, पर उसके जेहन की ठंड और भी अधिक थी। वहां खजुराहो की वह ठंड जमी हुई थी। आज भी एकदम उसी तरह वह गलियों को निकल पड़ा था। ठंड नहीं थी। विजली की चमक एक-दूसरी तरह की गरमी का माभास दे रही थी। वह गरमी उसके सिर के भीतर भी थी और उसे कुछ भी याद नहीं था कि दिन के दौरान उसने क्या-क्या किया था। उसने जानीन के साथ फोन पर हुई वातों को याद करने का प्रयल किया। कठिनाई से बातें याद माई, उन्हीं सुखद खयालों के साथ वह एक गली से दूसरी गली को होता रोज-हील की आम गली में आ पहुंचा जहां भीड़ थी, आपाधापी थी। उसने पीछे की ओर देखा । लंबी सड़क थी। आगे की ओर देखा। आगे भी सड़क लंबी थी। मन में आया कि सड़क के दोनों छोरों को पकड़कर रास्ते को खींच कर और भी विस्तृत कर दे ताकि सफर समाप्त न हो। वह चलते रहना चाह रहा था। उसने अपने शरीर की थकान और कमजोरी को भुला दिया था। चलते रहने की प्रबल इच्छा जाग उठी थी उसके भीतर । शारीरिक थकान से वह अपने मस्तिष्क की थकान को मार डालना चाहता था। लोगों की सांसों के बीच से होता हुआ उनकी अलग-अलग गंघों से अकुलाता हुआ भी वह चलता रहा। यातायात के लाल निशान को देखकर वह ठिठक गया, फिर खयाल आया कि वह तो गाड़ी नहीं लाया था। ऐसा भ्रम आदमी को कई बार हो जाता होगा। सभी गाड़ियां रुकी रहीं। लाल रोशनी की अवहेलना करके वह आगे बढ़ गया । सोचता रहा । मशीन के कानून को आदमी अपना कानून क्यों बनाए ? आदमी अगर हरी रोशनी का ही इंतजार करे तो फिर हो गई यात्रा। ५० / हड़ताल कल होगी चाह थी। आदमियों की गहनता वाती गई। रोशनी तेज होती गई। प्राया फोपाल में बदलती गई। आदमी की गंध के माप-माप मांस-मछलियों मी गंध भी माती ही पर अमित को मूस नहीं थी। उममें वम पनने रहने ही वह चलता रहा। यामा को अपनी गाड़ी में मरने पति के साथ निकल जाते देसा उमने। वह भीड़ में था, इमलिए माशा ने उसे नहीं देखा । सभी होटलो, दुसरानो, हिस्फोथिकों और पलवों के मामने भीड़ पी, पॉज मंगीत का कोलाहल था। कुछ ही दूरी पर गिरजापर थे। दो गिरजाघर "दोनो के इर्द-गिर्द मन्नाटा था । मुनमान था । उम सन्नाटे मे डरकर अमित पीछे लोट पड़ा। दाहिनी ओर की एक गली के मोड़ से एक व्यक्ति अमित के पास मा गया, 'लड़की चाहिए माय ?' अमित ने उमे देसा और आगे बढ़ गया, 'जोली-जोली चीफी मिन्ये। हिन्दू, मुसलमान, क्रिओल, मिलाम, हर तरह की लड़की है, माहब... सोलह साल, मत्रह साल, अठारह साल ।' अमित बिना कुछ कहे चलता रहा । आदमी रक गया । उसने कोई गाली दी । अमिन ने नहीं मुना, पर अनुमान लगाकर जान लिया कि उस आदमी ने उसे नपुसक कहा होगा। अमित ने पुलिस के सिपाही को जिन दो औरती से बातें करते पाया, उनकी माखें चंचल पी। अमित को समझते देर नहीं लगी कि वे ग्राहको की तलाश में थी। मामने की ताबाजी से अमित ने गिगरेट खरीदी। उसीके मामने गड़े होकर सिगरेट मुलगाई। पहला का लिया। दो क्षण के लिए जानी हालीडे को मुनता रहा । मूगफली वाले से आठ आने की भूगफली नी और चल पड़ा। चलता रहा । एक गली मे दूमरी गली को "आकाश से पाच दिन फा चाद ओझल हो गया था जब अमित अपनी गली में पहुंचा। वह अपनी खिड़की के थोड़े से हटे हुए पर्दे से बाहर के दृश्यों से ताकता रहता । जहा पटरी ममाप्त होती थी, वहा बैठी नमीन देर . हड़ताल कल होगी/५१ वाली मद्रासी औरत का सिर्फ सिर दिखाई पड़ता था। दूसरे मोड़ के आगे चौराहा यातायात का केंद्र बना रहता । उसके घर से वहां का दृश्य ओझल रहता था, पर गाड़ियों के रुकनें और स्टार्ट होने की आवाजें इतनी स्पष्ट होती कि लगता, सारा कोलाहल घर के पास ही था। दूधवाले के बाद रोटीवाले और रोटीवाले के बाद सब्जीवाले की आवाजें होतीं। बाद में अखबारवाले की वारी होती और अमित विना घड़ी देखे जान जाता कि आठ बज चुका है । इसके बाद घंटों तक गली सुनसान रह जाती। यह सन्नाटा अमित को कभी बहुत भाता और कभी खलने लगता । फिर दिन का आधा सफर पूरा होते-होते वह गिरजाघर के घंटे की घनघनाहट होती या मस्जिद के लाउडस्पीकर से आती आजान होती जो उसे किसी अकारण भूकंप की तरह दहला जाती। डाक्टर उससे कह गया था कि वह नींद की गोलियां न ले । वह उसकी बात मान जाता और गोलियां नहीं लेता पर दांत का हल्का दर्द शुरू हो गया था और अपने को उससे बचाने के लिए उसने तीस मिलिग्राम की एक गोली ले ही ली थी। पहली बार नींद की अकेली गोली उसपर इतनी जल्दी असर कर गई थी। एक ही नींद में पूरी रात बीत गई, लेकिन सुवह उसका एक अलग-सा असर उसके ऊपर होता रहा । पहले तो सोचता रहा कि संभवतः बहुत देर तक सोते रह जाने के कारण ही ऐसा हुआ होगा । सिर-दर्द के साथ-साथ एक कमजोरी भी महसूस की उसने । चारपाई से उठने को जी नहीं किया। किसी तरह उठकर वह मेज के पास पहुंचा था। सिगरेट का पैकेट खाली पाकर उसने लंबी सांस ली थी। शीशे के सामने पहुंचकर अपना चेहरा देखा था। लगा उसके अपने कंधे पर किसी दूसरे का सिर रख दिया गया था। अंगुलियों से कंधे के सिर के बालों को पीछे करके उसने अपने को और भी गौर से देखा था। उसके शरीर की सभी कमजोरी थकान के रूप में उसकी आंखों में छाई थी। अपना सिर उसे टन भर का लगा था। उसे दोनों हाथों में थामे वह चारपाई पर बैठ गया था। गिरजाघर का घंटा बज ही रहा था कि उस घनघनाहट के बीच नीचे से टेलीफोन की घंटी की झिझकती हुई आवाज, फिर उसके तुरंत बाद . ५२ / हड़ताल कल होगी ।' राधिका की आवाज आई । अमित नीचे पहुंवा । दीवार से भूनने हुए फोन को अपने हाथ में लेने में पहले राधिका की उम मुम्कान ने उसे बता दिया था कि वह जानीन का फोन था। 'हेलो जानीन ! कमी हो ?' "जातां आमोर नोंक दे फिल।' 'जे स्वी देजोले मा शेर पर मैंने तुम्हें फोन करने की कोशिश जरूर की, लाइन ही नहीं मिल रही थी और जब मिली तो तुम्हारे बाप की आवाज थी यह, जिममे फोन तुरंत रप देना पड़ा ।' 'तुम्हारी हालत कमी है ?' "जमी छोड़ गई थी। 'उम ममय तो एकदम अच्छे नहीं थे तुम 'तुम्हारी और मेरी मां को आंमें एक ही जमी हैं ।' 'आफिम में ममा रहा ?' 'पोड़ा-बहुत काम हो ही गया।' 'स्तिने समय तक यहा रहे ? "जितना समय तुम्हारे साथ रहा उनमें आधा।' जानीन को हंसने मुना उसने । 'तुम हंस रही हो।' 'मेरी एक माधी ने मुझे तुम्हारे साथ देख लिया था।' 'क्या बोली?' 'मह रही थी, तुम ओमर शरीफ के छोटे भाई हो।' 'यह ओमर परीफ कौन है ?' "हमारे शहर में जूते बनाता है।' "तुमने अच्छी याद दिलाई।' 'क्या?' 'मेरे जूने फट चने हैं। पर पता नही तुम्हारे शहर का मोची हम लोगों के जूते सीना चाहेगा भी या नहीं।' 'तुमने फिर वही यात शुरू की न ? सुनो अमित, शनिवार यो तुम्हें मेरे घर आना होगा। हड़ताल कल होगी/५३
'तुम्हारे घर?'
'क्यों, क्या हो गया तुम्हें ?'
'पहली बार तो तुमने अपनी मां के सामने मुझे पत्रकार बनाया था।
उसपर भी तुम्हारी मां और दादी ने मुझे शक की नजर से देखा । उस
बार तो तुम्हारे चित्रों पर लेख लिखने की बात थी, इस बार क्या कहेंगे?'
'मेरी गाड़ी तुम्हें लेने पहुंच जाएगी ।'
'लेकिन जानीन...'
'मेरा घर तुम्हें अच्छा नहीं लगता क्या ?'
'तुम समझती क्यों नहीं?'
'सभी लोग समुद्र किनारे बंगले पर होंगे।'
'मैं इसलिए नहीं कह रहा।
'तो फिर ?'
'यह तो मिलने पर ही बताऊंगा । शनिवार को मैं तुम्हें पिक-अप कर
लूंगा । बैल-मार की ओर किसी शांत समुद्री जगह पर बैठ सकेंगे।'
'तुम्हारी गाड़ी बन गई क्या ?'
'नहीं' 'मैं अपने चचेरे भाई की टैक्सी उससे ले लूंगा।'
'इससे बेहतर तो यही रहेगा कि मैं तुम्हें अपनी गाड़ी में पिक-अप
'जो तुम रोज करती हो, वह मुझे भी तो एकाध बार करने दो।'
'ठीक है अमित ! मैं दस बजे तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी।'
'लेकिन...
लेकिन क्या?'
'शनिवार को मेरा बाप लौट रहा है।'
'कान्फरेन्स समाप्त हो गई ?'
'तभी तो।'
'पर एअर फांस तो शाम को पहुंच रहा है ?'
'ठीक है जानीन "जे व्येद्रे ते प्रांद आ जीज़ एअर ।'
'साढ़े नौ अधिक अच्छा रहेगा।'
'पर तुम्हीं ने तो दस कहा।
५४ / हड़ताल कल होगी
'वह तो तब अब तुम्हारे हवाईप जाने की बात नहीं हुई थी।' 'मैं टोक माडे नो तुम्हारे यहा पहुंच जाऊगा।' 'दादव तो कर मकोगेन?' 'तुम जो माप रहोगी।' उम दिन प्रोपिकाना के गुलावी माहौल में अमित ने फल के रस की चुमकी लेकर जानीन को देखा था। उसके गोरे हायों को अपने हाथो में लेकर अपने और उममे रंग के अंतर पर गौर किया था; फिर उम अंतर से आंखें हटाकर जानीन को आसों में करीब से देखा था। वे नीली आखें विगोर भी पटिग्म को आंघों की तरह पी।""उतनी ही बड़ी-बड़ी, उतनी ही गहराई लिए हुई। किशोर ने अमित के एक प्रश्न के उत्तर में एक बार पहा था: 'मेरी पेंटिंग्म के चेहो पर आये इसलिए अनुपात तोड़ती हुई बड़ी- बड़ी होनी है क्योकि आंखों में बहुत कुछ होता है। इतनी सारी चीजें कि छोटी आवों में भरना कठिन हो जाता है । तुम जानते हो अगर वान गांग होता तो यहता कि वह गिरजाघरो की तस्वीरें न दनाकर आखो की तस्वीरें इमलिए बनाना पसद करता है क्योंकि उनमें कोई चीज होती है। वही वह चीज है जिसे व्यक्त करने के लिए मैं अपनी आखो को इतना विस्तृत होने देता हूं।' अमित को लगा था कि जानीन की आंखों में भी वही चीज थी जो गिरजापर या पहाड़ से भी बडी थी । वह चीज इतनी बड़ी थी कि उमसे जानीन की आयें तबलया आई थी। उनमे आकार का रग या समुद्र का रंग पा'"पूरे आलम का रंग था। उसकी उन आसों में देखने और निहारने वाला पायद वह पहला न हो । वह जानता था कि उन आखों को हजारो लोगों ने देखा होगा "निहारा होगा सराहा होगा। लेकिन शायद ही कोई रहा हो जो उनमें डुबकियां लेता हुआ उनमें डूबने लगा हो, या उस हबने के आनंद को शायद ही कोई महसूम मका हो। उमने मोवा पा, दिन बीत जाता होगा. वर्ष बीत जाता होगा.'' युग बीत जाता होगा पर संभवतः वह समय जानीन के पलक झपकने के . समय से भी छोटा हो और झपकी में न जाने अब तक कितने युग समा गए होंगे । और कभी ऐसा भी होता कि कई झपकियां हो जाती और अमित को लगता कि सारा कुछ ठिठक गया है. अभी कुछ भी नहीं हिला, कुछ भी नहीं डोला। एक बार अपनी एक चिट्ठी में अमित ने लिख दिया, जानीन, तुम अपनी पलकों को झपकने न देना' 'न जाने उस झपकी में कब किसी का अतीत, वर्तमान और भविष्य सारा कुछ समाकर शून्य में परिवर्तित हो जाए । उत्तर में जानीन ने कहा था, मैं अपनी झपकी हुई पलक को उठा- ऊंगी ही नहीं 'न जाने उसमें बस गया कोई कब उससे निकालकर ओझल हो जाए और उसकी जगह आंखों को आंसुओं से भर जाए। इसपर ग्री-ग्री के दहाड़ते ज्वारभाटे के झंझावत को अपने-अपने चेहरों पर टकरा जाने से दोनों ने एक ही साथ आंखें बंद कर ली थीं। जानीन से फोन पर बातें करके अमित अपने कमरे में लौटा तो लखन पहले ही से वैठे मिला । अमित उसके पास ही बैठते हुए बोला, 'तुम्हें तो याद करने की देर होती है कि तुम अलादीन के जिन की तरह सामने आ जाते हो।' 'परसों मैं तुम्हें लेने पहुंचा तो पता चला कि तुम टैक्सी में घर लौट 5 आए।' 'शनिवार को मुझे तुम्हारी गाड़ी चाहिए।' 'एअरपोर्ट जाने के लिए न ?' "उससे पहले भी।' 'कितने बजे?' 'सुबह आठ बजे।' 'ठीक है, मैं छोड़ जाऊंगा।' 'मां को मत बताना।" 'प्लेजांस के लिए यहां से कितने बजे निकलोगे ?' 'वह तो तुम जानो।' 'क्यों, तुम नहीं जाओगे क्या ?' 'मैं तो चलूंगा पर गाड़ी तो तुम्हें चलानी होगी। मां मुझे गाड़ी थोड़े ५६ / हड़ताल कल होगी ही चलाने देगी?' 'तुम्हें मालूम है, चाची ने मुझे क्यों बुलाया है ?' 'मोचता हूं, इसीलिए। अमित ने छोटी मेज ने बखबार उठा लिया। उसे इस तरह पढता रहा, जमे कोई बच्चा मंगजिन से तस्वीरें देखता हो। लखन यह कहकर नीचे उतर गया कि वह चाची मे मिलने जा रहा है। अमित ने मेज से यह द्रुमरा बराबार उठा लिया जो स्कूप के लिए प्रसिद्ध था । संपादकीय की बगल ही में जो सबर थी, उसपर अमित की आखें टिक गई । शीपंक के बाद उसने अनुगीपंक पढा फिर आगे की पक्तिया: विधानमभा की आखिरी मीटिंग में 'चेक-आफ' पर बहस नहीं हो सकेगी क्योकि इस समय सात मंत्री मिशन पर बाहर गए हुए हैं । सात सप्ताह बाद विधानसभा के अगले सत्र की पहली बैठक में इसपर बहस को शुरू किया जाएगा। अमित ने आगे नहीं पढा । यह उसके लिए एक खुशखबरी थी । इपर बहन अधिक सोचते रहने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि इस विषय पर मजदूरों की राय जरूरी थी । इसके लिए समय चाहिए था और वह मिल गया था। एक सर्वेक्षण द्वारा वह 'चेक-आफ' के प्रति मजदूरो के निर्णय को फेडरेशन के सामने रखकर अपने को सरकार का पक्षधर होने से बचा सकता है। इस बात में उमका विरोध अधिक दमदार भी हो सकता है । उसी क्षण मेज से कागज लेकर सर्वेक्षण पत्र का नमूना तैयार किया और बुछ कर जाने का मंतोष लिए कमरे में चहलकदमी करने लगा। उसके जूने बीच में पड़े हुए थे। उन्हें चारपाई के भीतर किया। कांच की सुराही से गिलाम में पानी उड़ेल कर पिया । बाहर किमी लारी की जोरदार ब्रेक को आवाज सुनकर वह खिड़की के पास पहुंचा। लारी का ड्राइवर उन लड़को को गाली दे रहा था जो रास्ते में गेंद खेल रहे थे। लारी के स्टार्ट होते ही सहके चिल्ला पड़े। गालियों के उत्तर देते रहे । लारी चली गई अमिन खिड़की के पास पड़ा रहा। चुनाव के दौरान लिखे गए दीवार-साहित्य के वे लाल-नीले-काले वाक्य अब भी सामने की दीवार पर स्पप्ट थे:
डाकुला और वेम्पायर को वोट मत दो।"परिवारपरस्तों को वोट 1 दो। "डियेगो गासिया? ''मजदूर दल "नों आ नेपोचिज़्म' 'जनता [ कल्याण जनता के हाथों में है। दीवार रंगों और वाक्यों से भरी हुई थी। गोलियों पर काला रंग ढ़ा दिया गया था, पर नारे अब भी उसी तरह थे। फिल्मों के पोस्टर फाड़ दिए गए थे । ऊपर के एक पोस्टर का वह भाग बचा हुआ था जिसमें हंदी के मोटे-मोटे अक्षर स्पष्ट थे-चोर मचाए शोर । ऊपर के इश्तहार भी पानी में धुल गए थे, पर उस टुकड़े को बचा रहना था। वह बचा हुआ था। नीचे से लखन की आवाज आई, 'अमित, मैं जा रहा हूं।' लखन की गाड़ी के आगे चार-पांच कुत्ते एक कुतिया को घेरे खड़े थे। अनाज की दुकानों वाली गलियों से विखरे दाल-चावल वटोरकर वह बुढ़िया ठीक समय पर सामने से गुजरी । नोत्र दाम दे लुर्द के पादरी ने अमित के अभिवादन से पहले सिर झुकाकर उसका उत्तर दिया और आगे बढ़ गया । घंटे भर वाद । अमित ने चाहा कि वह कमरे से बाहर हो जाए । कमरे में कुछ करना नहीं था। वह वाहर आकर कुछ कर आना चाहता था। चाहे कुछ भी । इस कमरे में योंही पड़े रहने से तो यही बेहतर था कि वह इर्द-गिर्द की सड़कों पर घूम आए । घूम आने से उसके अपने जेहन का सीलापन तो कम से कम धुल जाएगा। उसका जी किशोर से भी मिल आने को करता था। पर किशोर से मिलकर एक बार फिर उससे कुछ नहीं कहा जाएगा। उसके सामने गूंगा खड़ा रह जाएगा । किशोर एक बार फिर उससे कहेगा, 'अमित, मुझे अपने मां-बाप की जितनी चिता नहीं है उतनी अपनी दोनों बहनों की है । अब तक तुम्हारा यह कहते रहना कि सरकारी नौकरी में अपने को बांधकर मैं अपनी प्रतिभा को विकसित होने से रोक लूंगा, मुझे खलने लगा है । यह उस वक्त तो ठीक रहा जब तक कि मेरे वाप को नौकरी से रिटायर होना नहीं पड़ा था, पर अब यह बहुत कठिन हो चला है।' . ५८ / हड़ताल कल होगी उससे यह कहा नहीं जाएगा कि अमित, तुम्हारा बाप तो इतने ऊंचे ओहदे पर है उससे कहलाकर तुम मुझे किसी नौकरी मे लगा तो सकते ही हो । यमित से यह भी नहीं पूछा जाएगा कि-किशोर, तुम न सिफा- रिश चाहते हो और न रियायत "मेरे यहां यूनियन के दफ्तर में छोटी- मोटी नौकरी तुम्हें मिल ही सकती है उसे भी तुम रियायत समझ इंकार पार जाते हो। जिस नौकरी को बिना किसी सिफारिश और विना परिवार- परस्ती से तुम पाना चाहते हो, वह कब मिलेगी ? शुरू में ही अगर नौकरी में लग गया होता तो अब तक अपनी कुछ हैसियत तो बनाई ली होती पर अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमित काफी हर तरु जिम्मेवार था। अमित भारत से अर्थशास्त्र की डिग्री लेकर लोट भी आया और किशोर अपने रंगों के बीच जीवन के सही रंग को ढूढने में लगा रहा। उससे प्रदर्शनी का आयोजन करवा के अमित उसके वाप के भीतर भी उसके लिए कडवाहट पैदा कर गया था । किमोर को किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मदद संभव नहीं हो पा रही थी। किशोर के घर की ओर जाने का इरादा उसने छोड़ दिया। सूरज छत के ऊपर आ चुका था। ७ गत्येंद्र का फोन था, 'तुमने एक बार फिर मेरी दावा ठुकरा दी, अमित !' 'तुमने एक बार फिर मुझे आमंत्रित कर देने की मूल की।' 'तुम इतने अनसोगल क्यों होते जा रहे हो? आखिर पारियों में भाय लेने में क्या नुकसान पहुचता है तुम्हें ? टाई बांधकर तुम साम्राज्य- वादियों के दनाल नहीं बनना चाहतं, पर पार्टियों से दूर भागने का तुम्हारा करा कारण है ?' 'तुम तो मंत्री बना दिए जाने के बाद मिलने भी नहीं । कभी मिलो तो बनाऊं। एक बात तो अभी बताए देता हूं। एक पार्टी में भाग लेने
की मेरी बहुत बड़ी इच्छा है ।'
'तो फिर इस एक में तो आ जाओ।'
'इसमें नहीं, उस दूसरी में।'
'उस दूसरी में ?'
'हां'मैं पहला आदमी आऊंगा और विश्वास रखो, उस दिन टाई
बांधकर आऊंगा।'
'पर उस किस दूसरी पार्टी की बात कर रहे हो ?'
'उसमें "जिसमें तुम देश के मजदूरों को आमंत्रित करोगे। जीवन में
एक वार तो ऐसी कोई पार्टी दी जा सकती है ?
'तुम पागल तो नहीं हो गए ।'
'गनीमत है, अभी नहीं हुआ हूं।'
तव से अमित को सत्येंद्र की आवाज सुने काफी समय हो गया था।
-
लंबे अंतराल के बाद सत्येंद्र का फोन आया, 'कल चाचाजी से बातें
हुई थीं।
फिर तो आगे की बातों का आभास अमित को अपने-आप हो गया
था। सत्येंद्र की एकदम वहीं स्टीरियोटाइप आवाज, 'मेरे अपने मंत्रालय
में लायज़ा आफीसर की बहुत ही अच्छी जॉव है । बस, तुम कहो और मैं
अपने पी० एस० को कहकर नियुक्ति पत्र भिजवा दूं ।'
'मेरे बाप ने और क्या कहा ?'
'तुम आज शाम को फ्री हो ?'
'यह भी मेरे बाप ने ही कहा क्या ?'
पूछ रहा हूं।'
'क्यों, क्या बात है?'
'इधर आ क्यों नहीं जाते ? कई दिन से हम मिले नहीं । जमकर
बातें करेंगे।
'तुम तो जानते हो कि ड्यूटी फ्री चीजें हलक के नीचे उतरती ही
नहीं।'
६० / हडताल कल होगी
"एक कर चाय पीने में क्या आपत्ति है तुम्हें ?' "सर, चाय पीने आ जाऊंगा अमित के मन में कई बार यह बात आई थी कि कभी सत्येंद्र अपने मंत्री के लवाद को अपने कार से उतारे और दोनों पुराने मित्रों की तरह उमी पुरानी भाषा में बातें कर सके। ये दोनों आज एक-दूसरे से निओली में दान करते हैं। इससे पहले क्लब में लेकर शहर की गलियों की आपा- धापी के बीच तक ये दोनों भोजपुरी में बातें किया करते थे। मह आदत दोनों के आने वीच के अपनेपन की वह स्वाभाविकता थी जो अब नही रही । अमित को याद है, उन दिन सत्येंद्र के मंत्रालय में पहली बार यह स्वाभाविकता सहिन हुई थी। अमित ने वाले भोजपुरी में शुरू की थी, भोजपुरी में हो अंत किया था। अपनी उस कुर्सी पर झूलते हुए सत्येंद्र में अपनपन की उम भादत को करार नहीं रखा जा सका था। जिस गांव में दोनों ने जन्म लिया था, उसे तो सत्येंद्र ने चुनाव जीतने के बाद हो छोड़ा था जबकि अमित बहुत पहले ही छोड़ चुका था। सत्येंद्र के उस दिन के उस अप्रत्याशित व्यवहार से उसे ऐसा लगा कि उमने गाव बहुत पहले होता था; इतना पहले कि वहा की बोली तक भूल गया था। कारबोने के बुद्धिजीवियो के इलाके में सत्येंद्र ने अपने लिए पर द्रा था। अमित के घर मे उपका पर दो अलग शहरों में होते हुए भी अधिक दूर नहीं था। यह भौगोलिक सामीप्य अमित के लिए एक मानसिक दुराव था । अपने उस घनिष्ठ मित्र के यहां पहुंचना चाहकर भी वह पहुंच नहीं उम दुराव को ममेटकर उसने उसे कम किया। उसकी कार की आवाज सुनकर सत्येंद्र ने खिड़की से मातो को पुकारा था। माली दौड़कर पहुंचा। फाटक खोला लौर अमित को सलाम किया था। घर का दरवाजा भी खुद उनौने खोला था। सोफे पर बैठकर अमित मेज पर को फांसीसी पत्रिकाओं के पन्ने उलटता रहा। अमित को मत्येंद्र का गाववाला घर याद आ जाना बड़ा ही स्वाभाविक था। कहा तो उसके पहुचते ही सत्येंद्र सोमा, जसका बाप, उसकी दोनों वहन मभी घेर लेते थे । उसका पहुंचना रोज होता था, पर लोग इस तरह मिलते थे, जैसे वह वर्षों बाद वहा पहुंचा हो । कानयोन के घर में सन्नाटा था । वे लोग यहां नहीं थे। पीछे छूट गए थे गांव में । सत्येंद्र यहां पर अपनी पत्नी और उसी साली के साथ रहता था, जिससे शादी के लिए सत्येंद्र की पत्नी अमित के पीछे पड़ी हुई 'थी। बाद में अगर वह चुप हो गई थी तो इसलिए नहीं कि अमित चुप रहा था, बल्कि इसलिए कि लड़की ने खुद कह दिया था कि वह किसी और को चाहती थी। अपने को मानहानि से बचाने के लिए उसने ऐसा कहा था । उससे पहले अमित ने उससे कहा था, 'हम दोस्त ही रहें तो अधिक अच्छा रहेगा, रीना !' कोई बीस मिनट बाद ही सत्येंद्र सामने आया था। आते ही बोला था, 'तुम्हारी भाभी रीना के साथ अपने वाप के यहां गई हुई है । बोलो, क्या पीओगे ?' 'चाय।' 'यार, वनो मत । यह चाय पीने का वक्त थोड़े ही है ।' 'चाय के लिए भी कोई वक्त होता है क्या ?' 'हो या न हो, पर यह समय तो किसी जोरदार चीज का है ।' 'मुझे तो चाय चाहिए।' 'मजा किरकिरा मत करो।' उसने नौकरानी को आवाज देकर बुलाया था। वह आई और दो गिलास के साथ बर्फ, सोडा और व्हिस्की की बोतल छोड़ गई थी। सत्येंद्र जब गिलासों में व्हिस्की उड़ेलने लगा था तो अमित ने अपने सामने के गिलास को खींच लिया था, 'नहीं सत्येंद्र !' 'क्या बात है ?' 'मैं तो चाय लूंगा।' 'तुम आज भी वही हो।' उसने नौकरानी को दोबारा आवाज देकर चाय लाने को कहा था। अमित की चाय आते-आते सत्येंद्र अपना गिलास खाली कर चुका था दूसरी बार उसे भरकर उसने उठाया था। अमित ने भी अपने कप ऊपर करते हुए कहा था, 'चियर्स ।' गिलास से चुसकी लेकर सत्येंद्र ने उसे सामने की छोटी मेज पर र दिया था। तली हुए मूंगफलियों को चुटकी से लेकर मुंह तक पहुंचा ६२ / हड़ताल कल होगी हुए उमने कहा था, 'उस दिन तुम्हारे पर पर मासा मिल गई थी। मुद्दत बाद मिली थी, पर स्मार्टनेस उमको वही थी। पाप की प्यासी को मेज पर रखते हुए अमित बोला था, 'उमकी शादी हो गई है। बरे, मैं उम नमूने को भी जानता हूं जिसके साथ उसकी गादी हुई है । मैं गोचता हूं, आगा ने जानबूझकर उस तरह के आदमी को अपना पति बनाया है।' 'तुम गलत भी तो मोच सकते हो।' 'मही हो या गलत, पर आता के पाम जो शारीरिक लावण्य है, वह तो प्रतियोगिता की वस्तु है ।' 'सत्यें, यह बताओ कि इस साल तुम्हारी यात्राओ पर कितना खर्च आया होगा?' 'लो, तुम भी विरोधी पक्ष के नेता की तरह वोलने लगे । यार, अगर हम लोग यात्राएं न करें तो यह देश कही का नहीं रहेगा। हम लोग मिशन पर जाते हैं। नेगोमिएशन के लिए जाते हैं।' 'यह बातचीत क्या यहा से नहीं हो सकती? कोई भी तो ऐमा देश नहीं, जहां हमारा उच्चायोग न हो।' 'उन लोगों से ही कुछ होता तो फिर रोना ही किस बात का था ?' 'तो फिर ऐमे वेकार लोगों को क्यों वहा बैठाया गया है ? वे लोग वहां राजाओं की गद्दी पर बैठे हुए हैं । इस फिजूलखर्ची ।' "मुझे लगता है, तुम विरोधी पक्ष के अखबार पढकर आ रहे हो।' 'यो नगरिक प्रश्न भी नहीं कर सकता?" 'नागरिक मिर्फ धुराइया ही देखने-यूछने के लिए होता है ?' 'चलो, तुम इमे बुराइयां तो मानते हो।' 'सरकार चलाना एक बात है और चिल्लाना दूसरी बात ।' 'चलने चलाने के ढंग भी तो कई तरह के होते हैं। रेंगना तो चलना ही होता है। 'होड़ो इन बातों को, मैं तुम्हारे बाप के...' "उमे भी छोड़ो। मैं सिफारिग का बकरा होना नहीं चाहता।'
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बोर की सक्रियता देश को अपनी जड मे काटे जा रही थी। अमित की
महाई मजदूरों की हैमियत और हम्नी की लड़ाई थी, पर उस लड़ाई के
माय-माय अम्मिता की लड़ाई भी जुड़ी हुई थी। विमंस्कृतिकरण और
मास्कृतिक माम्राग्य वह दीमक था जो भीतर ही भीतर एक शक्ति को
चाटे जा रहा था। उसे खोरता दिए जा रहा था।
पर आदमी किन-किन मोडों पर लड़े?
८
.
"
माशा का फोन आया था।
'क्रा हाल है आगा?'
'अमित, आखिर तुम्हारे मित्र ने मुझे समझा क्या है ?
'कपा हुआ ? किम मित्र की बात कर रही हो
'तुम्हारा एक ही तो मित्र है, मत्री।'
'वी, का किया सत्येंद्र ने
'इधर कई दिनों में लगातार वह मुझे फोन कर रहा है और हर वार
मुझे अपने समुद्री इलाके के बंगले पर दावत दे रहा है।'
'पार्टी तो तुम्हारी जिंदगी का...'
'अमित, बात पार्टी की नहीं है । वह चाहता है कि मैं अकेले में उसे
मिनूं। मैं हर बार उन यही कहती रही हूं कि वह गंग नम्बर पर फोन
कर रहा है । कृपया मेरी ओर से तुम उसे इतना तो कह दो कि मैं अपने
को प्यार के बाद ही किनी को मुपुर्द करती हूं और वह उन लोगों मे
कतई नहीं, जिससे आशा पार कर सके ।'
पर आगा, मैं यह कमें कह सकता हूँ ? तुम्हें खुद कहना होगा।'
'कहते रहते थक गई।
'तो फिर उसे भी यक जाने दो।'
९ जानीन के घर को देखकर अमित अवाक रह गया था। वह जितना भव्य वाहर से दिखता था, उससे कहीं अधिक भव्य अंदर से था। उसकी बाहरी हस्ती को भी अमित ने भीतर से ही देखा ! जानीन की चित्रशाला की खिड़की से खड़े होकर उसने वाहर के उस विस्तार को देखा जो झुरमुटों के कारण वाहर से दृश्य नहीं था। पूरे दो बीघा जमीन के बीच था वह घर । बगीचे के किनारे-किनारे आम और गुलमोहर के ऊंचे पेड़, उनसे लिपटी हरी लताएं और लताओं के वे सिंदूरी फूल । जमीन पर इस छोर से उस छोर तक हरी घास की समतल कालीन । वहां के फूलों में कई फूल अमित ने पहली बार देखे थे । जलाशय में पुरेन और कुमुदिनी, उनपर मंडराती हुई मधुमक्खियों और भौंरों को देखकर अमित ठिठक गया था। वातावरण में मृदुलता और शांति का अनुभव करके भी भीतर ही भीतर वह कांपे विना नहीं रहा । उस माहौल ने उसे दहला दिया था। इस अंतर की कोई सीमा न पाकर वह भीतर ही भीतर तिलमिलाकर रहा गया । इस अंतर को तो महसूसते हुए भी कठिनाई हो रही थी। वह अंतर जितना बाहर था, उससे अधिक भीतर था। घर के भीतर जाने से पहले अमित को लगा था, उसके और दो पग पर स्थित उस घर के बीच क्षितिज तक का फासला था । उतना ही विस्तृत जिसमें खो जाने का भय था । अमित खुद बड़े घर में नहीं रहता था, लेकिन किशोर के घर के सामने उसे अपना घर वड़ा लगा था । उसे वह अंतर पसंद नहीं था, लेकिन उसने तो कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि उसके देश में दूर से बहुत विशाल न दिखने वाले घर भीतर से इतने विस्तृत हो सकते हैं । जानीन का वह घर तेईस कमरों का था । जानीन की जो चित्रशाला थी, वह अमित का आधा घर था। जानीन के सभी चित्रों को देखकर भी वह उनपर बातें नहीं कर सका - ६६ / हड़ताल कल होगी - - . पा । उमर अपने भीतर प्रश्नों पर प्रश्न उठ्ने रह गए थे। इस पर के भीतर मी इतनी कीमती चीजें ? ये आउँपहा से? उन मूल्यवान धोनों के बीच चलते हुए उसे र लगना था। कुछ चीजें तो ऐमी पी जो उनरी मामों से शायद यरोंच पा मरती पी। यह जानीन से मूक मवाल पग्ना रह गया था। ये मारी चीजें तो तुम्हारा दास शाम में नहीं ला सका होगा तो फिर ये आई कहा मे? उसके मामने डेढ़ सौ माल कापुराना इतिहारा मिलमिलाकर रह गया। गूरज के धपकने उजाले में उमने मजदूरों को पमीने में तर देशा। महमूना उन मजदूरों के जन्म फो, उनके जीवन को, उम म्पिनि परिस्थिति को- उनकी मौत को । मो माल बाद यह मजदूर विरामत में कुदाली और गहांसा पाकर माज भी मजदूर था। लगभग वही लिवाम--वही होरली. यही हालात-उस लंबी यात्रा के बाद भी यही मंजिल "यह लंगम्ने यी यात्रा नहीं थी। एक बहुत यही गोलाई की यात्रा थी, जहा आदमी यही को लौट आता है, जहां से यात्रा गुरू करता है। जानीन के प्रति अमित के भीतर कोई भी अनुचित सयाल नहीं पंदा हुआ। सेपिन जानीन के घर की चीजें उसको भीतर तक चुभ गई पी। वे चीजें उसे ऐतिहामिक यात्रा की लाश-मी प्रतीत हुई । एक गंघाती हुई सास । यह इतिहाग मा मुनहरा कद्र था। जानीन ने पूछा था, 'कैसा लगा मेरा पर?' 'जमा लगा, वंमा पहदू 'हा।' 'अपना तो दम घुटने लगा। 'ययों?' 'जानीन, तुम मेरी बातों का पुरा न मानो तो रहूं।' बुरा नहीं मानेगी। 'आदमी को जीने के लिए क्या इतनी मागे चीजें जरूरी है "जनीन ने म प्रश्न का उत्तर नहीं दिया था। अमिन भी ऊपर गे चुप रह " गया था। उस दिन प्रोपिकाना में मिलने पर जानीन बोली पी, 'तुम्हारे ग हडताल कन होगी। ६७ दिन के प्रश्न पर गौर करने के बाद सोचती हूं कि आदमी को जीने के लिए: वस थोड़ा-सा प्यार, खुशी और थोड़ी-सी आशा पर्याप्त हो सकती है।' अमित उसे देखता रह गया था। . जानीन के घर का वह नीला फाटक पूरा खुला हुआ था। भीतर न जाकर अमित ने फाटक के सामने गाड़ी खड़ी कर दी। हान देना चाह रहा था कि उसकी नजर वाग के माली पर पड़ी। उसे इशारे से अपने पास बुलाया। अपने हाथ की वांस की टोकरी के साथ वह गाड़ी के पास आ गया। जानीन के बारे में उससे पूछते हुए अमित को झिझक हुई। उसने पूछा, 'साहव हैं घर पर ?' 'साहब और मादाम दोनों यहां नहीं हैं।" 'कोई नहीं है ?' 'सिर्फ छोटी मामजेल हैं।' अमित को जानीन के बारे में पूछने की कठिनाई हो रही थी कि वह सामने से आती दिखाई पड़ी। उसके हाथ में गुलाबी रंग की पिकनिक किट थी। उसी रंग का उसका झगला भी था और केन्वेस की टोकरी का रंग लाल और गुलाबी के बीच का था ! आते ही उसने कहा, 'अमित, तुम मान जामो तो तुम्हारी यह गाड़ी यहीं छोड़ दें । मैं...' अमित कुछ नहीं बोला पर उसके चेहरे की प्रतिक्रिया बहुत कुछ बोल गई। जानीन हंस पड़ी। गाड़ी का दरवाजा खोलने में उसे कठिनाई हुई। अपनी सीट से झुककर अमित ने दरवाजा खोला । कार में बैठकर जानीन ने माली से कहा, 'मां का फोन आए तो कह देना, मैं मारीज के यहां गई हूं।" जानीन के इतना न कहने पर भी अगर जानीन की मां का फोन आता तो आपाया यही कहता कि जानीन मारीज के यहां गई है। यह विश्वास जानीन को था। गाड़ी स्टार्ट करने में अमित को कठिनाई हुई। तीन-चार बार चाभी घुमाने के बाद जब गाड़ी कराहकर रह गई तो उसने जानीन की ओर देखा। जानीन हंस रही थी। अमित तभी गांभीर्य के साथ बोला, 'तुम ६८ / हड़ताल कल होगी हंमना बंद नहीं मरोगी तो यह स्टार्ट नहीं होगी। जानीन ने अपने फैले हुए होठों को जल्दी में मिकोड़ लिया। अमित ने पाभी धुमाई । एक लंबी परपराहट के बाद इंजन स्टार्ट आ । उपने जानीन की ओर देसा । यह उसी तरह गंभीर मुद्रा बनाए हुए पी उमरी गोरी वाह में एक हल्की चिकोटी देकर अमित ने गाडी चना दी। दूसरे क्षण जब रमने जानीन को बाह देसी तो चिकोटी वाला भाग लाल हो गया था। अमित को दुघ हुआ पर जानीन मुस्करा रही थी। दो मिनट बाद यह पूपिन को उम बाम गली में था, जहां से गुजरते हुए उमे कभी एंमा लगता था कि यह शहर विगेप लोगो का पहर था। में विशेष लोग उसके जैसे रंग के नहीं थे, उमकी जेमी स्थिति के नहीं है। वे दिन उनके कालेज के दिन थे। यहां के रायन कालेज में यह मीनियर कैम्ब्रिज की परीक्षा देने आया था। परीक्षा भवन में उसके इर्द-गिर्द के चार-पाच परीक्षार्थी गोरे गड़के थे । उमने उनमे बातें करने की कोगिन की थी। उमके प्रश्नों के उनर तक उन लडकों में नहीं दिए थे। अमित अपने-आपमे पूछता रह गया पा-यह वहिकार क्यों ? धन या रग के कारण ? उमी कालेज के मामने से उसकी कार गुजरी। जिस आदमी ने कार के आगे ने रास्ता पार किया, उमे अमित पहचान गया। यह वर्दी में नहीं था, पर उमकी चाल वही थी। हड़ताल करनेवालों के माथ गिरफ्तार होकर अमित भी जेल पहुंचा था। यही वह आदमी है जो इंस्पेक्टर की वर्दी में उसके मामने आया था और आते ही पूछा था, 'तुम मिनिस्टर आप हेल्प के पी० ए० के बेटे हो न?' 'मैं यूनियन से संबंधित हूं।' 'तुम्हारा बाप मेरे अच्छे दोनों में है।' अमित तीन दिन तक जेल में था । जमानत पर भी उमने उस वक्त तक पंद मे बाहर नहीं होना चाहा था जब तक कि मभी मजदूर्ग री रिहाई नहीं हुई थी। एस. रेनाल्ट मिटीन उमरी बगल में मा गई। गोरे हाइयर ने अस्पष्ट वान्दों में कहा, 'मे फोममा के घी कोज्यो? मैयत के जलून में हो हड़ताल कल होगी | ६८ । क्या ? अगर सही रफ्तार में चलाना नहीं है तो कम से कम दूसरों का रास्ता तो रोके मत रहो।' अमित ने उसका उत्तर देना चाहा था, पर तभी जानीन ने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया था। उस घटना को भूलने में अमित को थोड़ा समय लगा, 'कहां चलते ?' 'बेल मार की बात हुई थी न ?' 'उधर ही चलते हैं।' फिर तो शहर की ओर जाने वाले रास्ते से कटकर अमित ने गाड़ी को गांवों की ओर मोड़ दिया। जानीन ने अपने को अमित के वायें कंधे से लग जाने दिया । उस स्थिति में उसके लिए चुप्पी से बेहतर शायद कोई भी दूसरी चीज नहीं हो सकती थी। अमित को जो अनुभूति हुई, वह एक जीत के बाद के आनंद की थी। उसके अपने जीवन में हार के साथ कई जीत की भी यादें थीं। वह जीत के आनंद से भली भांति परि- 'चित था । पर यह जीत किस खेल की थी, किस लड़ाई की थी ? तो फिर वह आनंद जीत का सा आनंद क्यों था ? कहीं वह खेल और लड़ाई के इस आरंभ को ही परिणाम तो नहीं समझ बैठा था? उसे अपनी सांसों के साथ अपना हृदय भी हुआ। लगा, उसके अपने कंधे पर फिर किसी दूसरे व्यक्ति का सिर आने लगा है जो कुछ विपरीत ढंग से सोच रहा था । कुछ ऐसी बातों पर तर्क शुरू हो गया था जो नई थीं। वह उसके अपने मस्तिष्क की वात-सी नहीं लग रही थी। उसने सुना अपने ही स्वर को अपने ही से प्रश्न करते हुए, 'यह आनंद असंभव के संभव हो जाने का तो नहीं ?' और फिर उत्तर भी प्रश्न ही के रूप में, 'क्या असंभव ? क्या संभव ?''अपने सही उद्देश्य से यह कतरा जाना या कन्नी काट जाना तो नहीं था ? आज उसका बाप फिर मिशन से लौट रहा था। फिर अमित से पूछेगा, 'अभी तक तुम्हारी संवेदना की सनसनी समाप्त नहीं हुई ?' फिर उसी दपतर वाले स्वर में कहेगा, 'देखो अमित, तुम्हारे भीतर एक चीज है, एक ऐसी चीज जो मुझे तुम्हारे भविष्य के बारे में सोचने को विवश वड़ा-सा प्रतीत । - ७०/ हड़ताल कल होगी कर जाती है । तुम्हारी आज की मनक तुम्हारे भविश्य को अंधारमय करती जा रहा है और तुम्हें इसका पता तक नहीं । तुम कोई भी काम करो, मुझे इममे कुछ लेना-देना नही, लेकिन तुम प्रांति का लबादा पढ़ने अपने व्यक्तित्व की नुमाइश में लगे रहो, इसे मैं तुम्हारी मूर्खता मानता हूं। अपने को अलग बताकर अपने को चमकाने का तुम्हारा यह ढंग एक- दम घटिया है। कभी-कभार व्यवस्था के विरुद्ध दताकर अपने को पहली पंक्ति में खड़ा करना बड़ा नामान होता है पर बाद में यह मूसंता ही प्रमाणित होकर रहती है । तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि अपने मामने के मजदूरो को तुम झूठा और सोतला आश्वासन देते रहते हो? वह क्षणिक अमृत जिन दिन विप बन जाएगा, उस दिन तुम्हारी क्या दमा होगी ! भोले-भाले मजदूरो की नजर में देवता बन जाना अधिक कठिन नहीं होता पर उम दायित्व को निभाना कठिन होता है, अमित ! एक दूमरी बात यह भी है कि इस तरह के आंदोलन से तुम उन लोगों की नजर में घृणा के पात्र बनकर रह जाते हो जिनके हाप में मत्ता है। पानी में रहकर मगरमच्छ से वंर को तुम बुद्धिमानी कैसे समझ रहे हो' 'मैं तुम्हें उस घडी के लिए आगाह कर देना चाहता हू जब तुम किसी शोरी के सामने खड़े होकर अपने को देखोगे और तुम्हे ऐमा लगेगा कि वह चेहरा तुम्हारा नहीं, बलि एक ऐमै उखड़े हुए व्यक्ति का है जो जीवन-भर के लिए अमफल रह गया । उस वक्त तुम्हारा अपना अस्तित्व तुम्हें बोझ लगेगा। तुम अपने-आपसे भागना चाहोगे। लोग तुम्हे देख- कर अविश्वान और नफरत में मुह फेर लेंगे। अमित, क्या तुम यही चाहते हो ?' उमका कहना तो यहा तक भी होता कि यह उम्र अलग ढंग में काम करने की होती है। उत्तेजना के समाप्त होते ही फिर लौट आना पड़ेगा इन्ही मूल्यो पर । जाते हुए उसने कहा था, 'अमित, मैं पाच सप्ताह बाद लौट रहा हूं। अवधि लंबी है । लौटने पर तुम्हें सही रास्ते पर वापस पाकर हैरानी नहीं होगी मुझे।' अमित जो उतर अपने बाप को नहीं दे पाता, उसे अपने-आपको सुनाता व्हता-मैं मजदूरों को आपदामन नहीं दे रहा । मैं उन्हें लड़ाई से जाहना चाहता हूं। वह लड़ाई जो उनकी अपनी है और जिसे लड़े हड़ताल कल हागो!७१ ? बिना उनकी अस्मिता अरक्षित है। ऐसा करते हुए मेरा भविष्य घटाटोप अंधेरे में डूबकर रह जाए, इसकी मुझे परवाह नहीं। मैं इस लड़ाई को आखिरी सांस तक लड़गा.। फिर तर्क करने लगता : 'अपने को भिन्न बताते रहने से बाज नहीं आओगे क्या? कब तक नेतागीरी की बोली वोलोगे ?' 'मैं अपने को उस दुनिया का नहीं बना पाता जहां हर चीज सरल है, हर चीज के लिए सुविधा है। धारा के साथ वह जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा इसीलिए मैंने यह रास्ता चुना है।' 'यह मेरा आदेश है...' 'मैं आदेशों के लिए नहीं जनमा।' अपने वाप के हवाई जहाज पर सवार हो जाने के बाद अमित ने अपने से पूछा था "मोझल हो गए अपने वाप से ? सही क्या है गलत क्या है ? क्या यह जरूरी है पापा, कि तुम्हारी सच्चाई मेरी सच्चाई हो? मेरी अपनी भी तो सच्चाई हो सकती है। तुम यह क्यों चाहते हो कि मैं अपनी सच्चाई को रौंदकर तुम्हारी सच्चाई को गले लगा लूं ? अमित नहीं चाह रहा था कि उसे किसी आनंद का भ्रम हो । उसके भीतर एक हिलोर अवश्य थी, पर वह उसे आनंद की व्याख्या देना नहीं चाह रहा था । यह सही था कि जानीन का सामीप्य उसे अच्छा लगता था। उसके पास होने से उसका हीसला बढ़ जाता था और उसे यहां तक आभास होने लगता कि उसकी लड़ाई कठिन नहीं रही. पर इसका यह तात्पर्य थोड़े ही था कि अभियान सफल रहा । उसका सबसे बड़ा संघर्ष तो मजदूरों की मौजूदा हालत में सुधार लाना था। वर्तमान स्थिति उसकी शत्रु थी। उससे लड़कर उसमें परिवर्तन लाने में सफल हो जाना उसकी जीत होगा, और जानीन ? वह एक आवारा खयाल होता; एकदम वेबुनियाद जो कभी-कभार उससे यह पह जाता कि जानीन उसे उसके निर्णय से डगमगा जाएगी। उसका यह पक्ष अधिक दमदार प्रमाणित हो जाता कि जानीन भी उसके अभियान, उसके संघर्ष का एक अंग थी। जानीन को न अपना सकना भी उसके लिए बहुत बड़ी हार होगी। - ७२/हड़ताल कल होगी उसे इतिहास की दरार और साई को पाटना था और जानीन ही वह पुल थी, 'जानीन, तुम्हारी सामोगी चुभ रही है।' 'कोई गाना मुना क्या ?' 'वह तो तुम्हे आता ही नहीं।' 'मैंने तुम्हें मोरेय माध्ये और नाना मुस्कुरी के जो कामेत दिए थे, वे अच्छे लगे तुम्हें ?' "पहले तुम बताओ कि आनद शंकर तुम्हे कैसा लगा ?' 'कमाल है।' 'क्या? । 'मैं तो पहले ही बता चुकी हूँ ।' 'क्या बता चुकी हो 'कि आनंद शंकर के संगीत मुझे कितने अच्छे लगे।' 'कब बताया तुमने " 'इसका मतलब है कि तुम मेरी चिट्ठी को जिस तरह पढना चाहिए, नहीं पढते ।' 'अरे हा पर चिट्ठी की बात तो कुछ और होती है । इस बार में तुम्हें रविशंकर के रेकार्ड दे रहा हूं ईस के सेतो के बीच से होते हुए अमिन बिस्तृन फैली हरियाली को देखता रहा, मोचता रहा. कितनी विराट कटनी होगी इम माल ! कटाई शुरू होने में कुछ ही दिन तो बाकी थे। देश की पूरी समृद्धि खुली हवा में फैली हुई थी। कमल के बाद वह ममृद्धि चार तिजोरियो मे वद हो जाएगी। खेतों के ये सारे मजदूर अपनी बूद-बूद देकर उभी थोडे- बहुत ऐतिहासिक हक से सतुष्ट हो जाएंगे । एक वार उमने एक मजदूर को कहते सुना था, चीनी निगोडी गोरी होती है, इसलिए गोगे की हो जाती है । यही परपरा थी। डेढ मो साल में चला आ रहा नियम था । द्वीप का यही धर्म हो गया था। गन्ना खाए गोरवन सीटी खाए हम लोगन । जानीन ने अमित के खयालो को नोड़ दिया, 'कल मैने मागेज को तुम्हारी चिट्टियों के बारे में बता दिया।' हताल कालरोगी।
'नहीं कहा 'और उसने फिर वही कहा होगा न कि 'तों आमूर ए तें आमूर कांजी ?" 'नहीं। इस बार उसने कुछ और कहा था।' कि तुम्हारा प्यार एक निपिद्ध प्यार है ?' 'नहीं।' 'फिर ?' 'बोली कि वही प्यार सबसे अधिक मूल्यवान होता है जो बड़ी कठि- नाई से सफल होता है।' 'क्या मारीज भी तुम्हारी तरह देली के उपन्यास पढ़ा करती है ?" 'देली के उपन्यास वही पढ़ती है, मैं नहीं।' 'तुम क्या पढ़ती हो ?' 'एकोनोमिक्स की वोझिल कितावें नहीं पढ़ती।' 'फिर तो कोंफिदांस, एंचीरमिते और नू-दे पढ़ती होगी।' 'क्यों, मैं नाताली सारोत, फांस्वाज सागां मिशेल बितोर, और रोब निले नहीं पढ़ सकती क्या ?' 'अंग्रेजी की एक कहावत है जानीन ।' 'क्या ?' . 'यह किसीक्रेटिव एक्टीविटी केन नोट बी दि एविडस आफ सिसे- रिटि ।' 'तुम्हारा मतलब है, मैं तुमसे बातें छिपाती रही हूं? स्टीयरिंग व्हील से बायां हाथ हटाकर अमित ने जानीन को जकड़ लिया । वेल मार का वह समुद्रतट अधिक दूर नहीं था, जहां के घने झावे के पेड़ों की गीतलता में लोरियों की थाकियां होती हैं। जहां के समुद्र का नीलापन विविधता लिए आंखमिचौली खेलता प्रतीत होता है । दूध के शाग-सी फेनिल प्यार के गीत गुनगुनाती लहरें जो आदमी की सांसों के साय तत्काल जुड़कर आत्मीय बन जाती हैं । बालू का यह विस्तृत किनारा अब अधिक दूर नहीं था जो कपास के गलीचे की तरह स्वच्छ होता है। जहां पर पदचिह्न लहरों से धुल कर भी चमकते रहते हैं । और जब समुद्र फे हरे-नीले पानी पर सूरज कांच के अणु टुकड़ों की तरह झिलमिलाता ७४ / हड़ताल कल होगी रहता है, उन समय आदमी युग के कोलाहल और संत्रास को भूलकर एक अखंड गांति की गोद मे अपने को सौंप देता है। अमित ने अपने वा कान में जानीन की स्वर-लहरी को अनुभव किया, 'अमित जे तेम"'जे तेम ..."जे तेम दे तू मों केर।' उघर बैल मार के समुद्रतट पर भी लहरें किनारे से सिर टकराती हुई यही कहे जा रही थी, 'मुझे तुमसे प्यार है"मुझे तुमसे प्यार है." मुझे तुमने देहद प्यार है।' १०. सत्येंद्र ने आशा से कहा, 'हमारे देश के लिए यह कान्फरेंस बहुत अधिक महत्वपूर्ण है । यूरोपीय देशों के सैकड़ों प्रतिनिधि इममें भाग लेने आ रहे हैं । हम इन्हें अपनी मेहमाननवाजी का मबूत देना चाहते हैं।' 'मैंने तुम्हें पहले ही कह दिया, भाड में जाए देश का भविष्य ।' 'ये लोग आठ दिन में ज्यादा तो टिकेंगे नहीं । आठ दिन के लिए तुम्हें चार हजार रुपये...' "रुपये भी भाड में जाएं।' 'यह होस्टेस की बात है, तुम इमे कुछ और क्यों समझने लगी।' इसपर आशा ने फोन रख दिया था। - अपना नास्ता पूरा करके जानीन मेज के सामने से उठती कि तभी उसके बाप ने टोस्ट पर जाम की छुरी चलाते हुए विना उसकी ओर देखे उससे कहा, 'जानीन, जे वे ते पार्ने। दस मिनट में मैं तुमसे अपने कमरे में मिलना चाहता हूँ। जानीन ने अपनी मां की ओर देखा और सीडिया चहती हुई अपने कमरे में चली गई । टोस्ट पर जाम लगा चुकने के बाद जानीन के वाप हडताल कल होगी ने उसे जूल्य के प्लेट में रख दिया। जूल्य मानी से बड़ा था। उसने जाम वाले टोस्ट को आनी की प्लेट में रख दिया। आनी ने अपनी मां से उसकी 'शिकायत की। उसकी मां ने मुस्कराकर कहा, 'मांज तों पे शेरी । मेरी अच्छी बेटी है-अपनी रोटी खा ले तू । काफी बना चुकने के बाद कप पति की ओर बढ़ाती हुई बोली, 'उसके साथ तुम सख्ती से पेश न आना।' जानीन का वाप चुपचाप गरम काफी की चुसकियां लेता रहा। उघर जानीन अपने कमरे में पहुंचकर चुसकियां पर बैठ गई। बाहर का माहौल गुमसुम होने के कारण उसका अपना कमरा भी धुंधलापन लिए हुए था । चारपाई पर अमित के दिए हुए रविशंकर के दो लौंग-प्ले थे, अमित को चिट्ठी थी। कमला मार्कण्डेय का उपन्यास था-फ्रांसीसी में। जानीन ने तीनों चीजों को चारपाई से उठाकर अलमारी में बंद कर 'दिया। अमित के नाम वह पत्र जो उसने रात में लिखना शुरू किया था, मेज पर अधूरा पड़ा हुआ था। उसके अंतिम वाक्य थे--अमित मों आमूर, तुम विश्वास नहीं करोगे अगर मैं कहूं कि यह संगीत मेरा परिचित-सा लगा। ऐसा लगा कि वहुत-बहुत पहले से मैं इस संगीत को सुनती रही हूं। हो सकता है कि वह यही संगीत न होकर इसी तरह का संगीत हो. पत्र में जानीन अपने भीतर की उस बात को नहीं कह पाई थी, इसलिए चिट्ठी अधूरी रह गई थी। उस चिट्ठी को भी उसने दराज में बंद कर 'दिया। उसके भीतर एक भावना थी, जिसे वह अमित को बताना चाह रही थी पर उन वाक्यों से बता नहीं पाई थी। वह क्या चीज थी, यह तो वह जानती थी, पर शब्दों से व्यक्त नहीं कर पाई थी। सोचा था, अमित सामने हो तो शायद वह उसको उस अभिव्यक्ति को समझ सके । लोगों से उसने सुना था, भापा अभिव्यक्ति के लिए हुआ करती है । उसके पास भी तो शब्द थे, भापा थी, फिर भी अपनी भावना की अभिव्यक्ति उससे नहीं हो सयी थी। उसके भीतर जो खयाल पैदा होते, उन्हें महसूसते हुए भी वह उन्हें पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती । कुछ न कुछ बाकी रह ही जाता था-उसे लगता, भापा अभी उतनी समृद्ध नहीं हो पाई थी। उस दिन समुद्र किनारे लखन की टैक्सी के हनुमान के चित्र पर जब जानीन ने .... - ७६ / हड़ताल कल होगी जिज्ञासा प्रकट की थी और अमित ने उत्तर में रामामण की संक्षिप्त कथा ही उसे मुना डाली थी, उस समय भी जानीन को ऐसा लगा था कि वह उस कया को पहली बार नहीं सुन रही थी। अपनी याददाश्त पर पूरा जोर देकर भी जानीन उस रहस्य को नही सुलझा पाई थी। फिर उस दिन भी... अमित उसे गांव के जीवन दिखाते हुए एक मजदूर की बेटी के ब्याह मैं अपने साथ ले गया था । कार से उतरते ही जानीन ने अपने चारों ओर देखा था। पडाल-तोरणो से सजा हुआ। गाव के उन लोगों ने उसे और अमित को बडी ही आवभगत के साथ एकदम माड़ों के पास का स्थान दिया था । जानीन से दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद दिलवाया गया था। उसी क्षण जानीन ने आंखें मूद ली थी। उसकी धुंधली पड़ी स्मृति को परतों के नीचे से स्पंदन हुआ था। द्वारपूजा "दूल्हे की आरती... महिलाओं का मंगलाचरण"पंडित के श्लोक''इमली घोटाई 'कन्या- दान "लवा मिलाना 'अग्नि की परिक्रमा माग का सिंदूर"कोहबर की खीर विदाई.. और जानीन अपनी स्मरणशक्ति पर जोर देती रह गई थी। उसके सिर में जोरों का दर्द शुरू हो गया था। गाव से लौटते वक्त उसने अमित से कहा था, 'अमित, मैं किसी साइक्याट्रिस्ट से मिलना चाहती हू ।' 'क्यो?" 'मुझे लगता है कि तुम्हारे साथ की बहुत सारी चीजों से में मैं बहुत पहले से परिचित हूं।' 'तुम बहुत अधिक रोमांटिक हो जानीन !" 'अमित' मेरा सिर चकराने लगता है।' 'तुम हाइपर सेंसिटिव हो।' 'अमित, ये सारी चीजें मेरी जानी-पहचानी हैं।' 'तुम्हें नोवेल कम पढ़ना चाहिए ।' 'कालेश की मेरी सहेलियां कहती हैं कि मैं दिन दोपहर सपने देखा करती थी। 'उन सपनों में मैं ही होता या क्या ?' इटाली.
'मुझे वह शादी बहुत प्यारी लगी।' 'वह तो गरीव लड़की की शादी थी, वहुत ही सादी-सी।' से ते मेये।' अमित ने उसे अपने से बांध लिया था। वह सिमटकर उस बंधन में खो गई थी। बारित होने लगी थी। इस समय भी बाहर वारिश शुरू हो गई थी। अपने कमरे से निकलकर वह अपने बाप के कमरे में पहुंची। उसका वाप अभी अपने कमरे में नहीं लौटा था। जानीन सोफे पर बैठ गई। अपने भीतर की आशंका को बाहर फेंकने की कोशिश की । उसंका वाप बहुत कम बातें करने वाले लोगों में था । वह जानीन ने दो-तीन प्रश्न ही करेला । जानीन नहीं चाहती थी कि वह अपने बाप के प्रश्नों के सामने निरुत्तर खड़ी रहे । वह उन प्रश्नों के उत्तर देगी । वे प्रश्न क्या होंगे, वह जानती थी; पर उत्तर क्या होने चाहिए, यह वह नहीं समझ पा रही थी। उस समय उसकी मां का भी बगल में होना जरूरी है, अन्यथा उसका अपना मुंह उत्तर के लिए नहीं खुल सकेगा। जानीन का बड़ा भाई अगर फ्रांस में पढ़ता न होकर यहां होता तो जानीन को डरने की आवश्यकता नहीं होती । इधर कुछ दिनों से उसे गायेतां की याद बहुत आती थी । अपने पिछले पत्र में उसने लिखा था, मैया, मुझे समझने वाले तो केवल तुम थे। स्कूल में पेंटिंग्स करते समय उसका रंग-भरा हाथ वालों की लट को हटाते हुए माथे से छू गया था। मारीज हंसने लगी थी। उसने अपने बटुवे से आईना निकालकर जानीन के सामने कर दिया था। तभी आर्ट टीचर सिस्टर सोलाज भी सामने मा गई थी। जानीन के माथे के उस लाल विदु को देखकर बोली थी, 'फब रहा है तुम्हारे ऊपर ।' जानीन ने उस टीके को नहीं मिटाया था । उसके साथ ही घर लौटी थी। उसकी मां वोली थी, 'यह क्या जंगलीपना है ?' उसका भाई गायेतां उसे एकटक देखता रह गया था। 'क्या देख रहे हो ?' 'बहुत प्यारी लग रही हो। मुझे ऐसा नहीं लगता कि कोई दूसरा --- ७८/हड़ताल कल होगी ऐसा माया होगा जहां यह टीका इतना सुन्दर लग सके।' सच?' 'एक चीज की कमी है।' यह कहकर गायेता ने सामने से तौलिया लेकर उसके मिर पर ओढनी की तरह रख दिया था। 'पूरब का सारा सौंदर्य तुम्हारे ऊपर बा गया है।' जानीन अपने कमरे के शीशे के मामने दौड़ गई थी। फास से शुरू-शुरू के अपने पत्रों में गायेता जानीन को 'मा जोली ऐज्येन' कहकर सबोधित करता था। जानीन को मेरी प्यारी हिंदू छोकरी का संवोधन बहुत अच्छा लगा था। सोफे से उठकर वह कमरे में चहलकदमी करने लगी। उसका बाप आने में देर कर रहा था, यह भी हो सकता है कि वह दम मिनट से पहले ही आ गई हो। उसने अपनी घडी की राय ली। उसके यहा पहुंचे ही तो दम मिनट से ज्यादा हो गया था । मुबह ठड लिए हुए थी, पर जानीन को कमरे में चिपचिपाहट का आभास हो रहा था। दीवार पर माचिम, मोने और वानगाग के रिप्रोडक्ान सात और स्तब्ध थे । नेपोलियन के जमाने की वे चारों दुर्मिया अपने में मिमटी हुई प्रतीत हो रही थी। दीवार के पूर्वी ओर जो खिडकी मृग कुण्ड की ओर खुलती थी, उनकी बगल में जानीन की अपनी पेंटिग्स थी। कभी अन्य चित्रो के बीच उसका अपना बनाया हुआ चित्र बीना-मा लगता था, आज वह उसे पूरे कमरे को घेरे हुए लग रहा था। चित्र में वह बडी-बड़ी आखों वाली जो स्त्री थी, केनवम और फेम को तोड़कर बाहर आ जाना चाह रही थी। उसकी आखों का वह कौतुहल भय का रूप ले चुका था। उघर से आंखें फेरकर जानीन फिर से सोफे पर बैठ गई। नीचे से आनी और जुल्य के झगड़ने को आयाज आई। जानोन फिर कुर्मी छोडकर उठ गई । वह खिडकी के पास पहुची । जलाशय के सामने पाल और विजिनी की मूर्ति पत्तो की आड़ में आ गई थी। महीने-मर उसके हाथ मे पाल और विजिनी की पुस्तक देखकर गायेता ने उममे पूछा था, "कितने दिन लगते हैं तुम्हें एक पुस्तक पढने में' हरताल कल होगी/08 - 'क्यों?' 'जब से देख रहा हूं, तब से इसी एक पुस्तक को पढ़ती दिखाई पड़ती हो।' 'सातवीं बार पढ़ रही हूं।' 'सातवीं बार ? पागल तो नहीं हो गई ?' 'पागल क्यों होने लगी ?' 'तो होकर रहोगी । उन्नीसवीं शताब्दी की प्रेम कहानी।' गायेतां यह भी बोल गया था कि उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के प्यार में अंतर होता है । उन्नीसवीं सदी के प्यार के सपने देखना पागल- पन के सिवाय और कुछ हो ही नहीं सकता। और जानीन यह नहीं समझ पाई थी कि प्यार कैसे पुराना और नया हो सकता है। उसने अपने-आप से प्रश्न किया था, क्या उन्नीसवीं शताब्दी में ये सारे पक्षी दूसरी तरह के गाने गाते थे क्या ? कालेज में उसकी साहित्य की अध्यापिका कह गई थी कि पाल और विजिनी का प्यार तो शाश्वत प्यार है । तव से आज तक यह शाश्वत प्यार उसके लिए अनुत्तरित प्रश्न था । उसकी नजर अपनी हथेली पर पड़ गई। वहां अब भी अमित का नाम लिखा हुआ था। चाहते हुए भी उसे जल्दी उस नाम को मिटा देना पड़ा। उस दिन भी उसकी हथेली पर अमित का नाम लिखा हुआ था। उसकी हथेली को अपने दोनों हाथों में लेकर अमित ने कहा था, 'तुम वहुत अधिक सपने देखती हो जानी !' 'तुम विलकुल नहीं देखते ? 'समय ही कहां मिलता !' अमित हंस पड़ा था । जानीन ने सीढ़ियां चढ़ने की आवाज सुनी। उसके साथ ही उसने हृदय की धड़कनों को भी सुना । वह सहमी हुई खड़ी रही । उसकी मां थी । आते ही बोली, 'तुम अपने बाप से तर्क मत करना । वह अच्छी री में नहीं है।' जानीन चुप रही। कमरे में प्रवेश करके उसका बाप सीधे खिड़की के पास जा खड़ा हुमा । पाइप को हथेली पर ठोंकते हुए उसने कहा, 'जानीन, मैं तुम्हारा मेरी बेटी । इस घर की हर समृद्धि की तुम हकदार हो, वाप हूं.''तुम ८० / हड़ताल कल होगी -r । लेकिन इसका यह मतलब नहीं हो जाता कि तुम जब चाहो, जहा चाहो, मेरी प्रतिष्ठा को उछालती फिरो। मैं सभ्य लोगों के बीच उठने-बैठने वाला आदमी हू । आज मैं तुम्हें दूसरी बार यह कहने जा रहा हूं कि हमारे अपने लोगों के बीच सभी लड़के मर नही गए, जिनमे तुम दोस्ती कर मकती हो। तुम्हारी शिकायतें मेरे पास कहा-कहा में आई हैं, मैं यह कहना नहीं चाहता; पर इतना जरूर कहूगा कि मैं इस बात के लिए तैयार नहीं हूँ कि मेरी अपनी ही कोठी का मलादार सरदार मुझे तुम्हारे बारे में आकर सुनाए । जानीन चुप बैठी रही । उमकी आखें नीचे थी। उसकी मां एकटक अपने पति को देख रही थी। उसकी आखो में एक पावना थी, जिसे उसके पति ने कोई महत्व नहीं दिया। वह कहता गया। कम बोलने वाला आदमी आज अपनी आदत से बाज आ गया था । पाइप के कश के बाद दरवाजे तक जाते हुए उसने कहा, 'जो इस देश में कभी नहीं हुआ है और न कभी होगा, उसे करने की कोशिश तुम नहीं कर सकती।' वह कमरे में बाहर हो गया। जाते-जाते दरवाजे को जोर मे दे मारा । पूरा कमरा दहल गया । अकुलाहट लिए उसकी आवाज कमरे में गूजती रही अपनी इज्जत को मिट्टी में इस तरह मिलने की नौबत कभी नहीं आई थी। यह भी अपनी बेटी के हाथो ? मेरा मवध केवल इस घर में नहीं है। मेरे घर में जो कुछ होता है, उमसे और भी कई लोग मंबंधित है । क्या मुह दिखाऊंगा उन लोगो को काश, इस घर को मेरी हैसियत का भान होता। 7 ११ जो बात जानीन अपने वाप से नहीं पूछ सकी वह थी: 'फास से कई डाक्टर, कई वैरिस्टर, कई ग्रेजुएट लडकियो से शादी करके उन्हें अपने साथ जब यहां तक ले आ सकते हैं तो फिर क्या कारण है कि इस देश में डेढ़ सौ वर्ष में भी एक गोरी लड़की एक दूसरी जाति के लड़के को व्याह नहीं पाई ? क्या हम फ्रांस के गोरों से भी अधिक गोरे अपने वाप के इस प्रश्न का कि इसका परिणाम क्या होगा, अमित ने हमेशा की तरह कोई उत्तर नहीं दिया । इसलिए कि उसके पास उत्तर नहीं था, बल्कि इसलिए कि उसके उत्तर से उसके वाप के भीतर कोई भी विशेष प्रतिक्रिया नहीं होती। वह उत्तर अमित अपने-आपको ही सुनाता रहता. परिणाम ? सबसे बड़ा परिणाम तो यह होता है कि लड़ने वाले को यह जानकारी हो जाती है कि जीवन लड़ने के योग्य है, इसलिए कि वह मुफ्त की वेकार चीज नहीं हुआ करता । उसके बाप का यह कहना भी अनुत्तरित रह जाता कि संघर्ष से अगर आदमी के अपने भविष्य बनने की उम्मीद न रहे.तो संघर्ष का अर्थ ही क्या रह जाता है। अपने को आश्वासित कर जाने के लिए इसका उत्तर भी उसके अपने-आप से ही होता. 'जव संघर्प एक पूरे वर्ग के लिए हो तो फिर यह क्यों आवश्यक हो कि उससे आदमी विशेष का कल्याण हो तभी उसकी सार्थकता मानी जाए। अपने कालेज के दिनों से वह अपने घर में एक ही धुन सुनता आ रहा था कि आदमी अपने लिए आने वाले कल की रोटी का प्रबंध कर ले फिर औरों की भूख का खयाल रखे । इस बात को अमित ने कुछ इतना अधिक वह उससे ऊब गया था। एकाध- बार वह अपनी मां से कह भी जाता कि आज को भूलकर आदमी कल को क्यों महत्व दे । अपनी-अपनी बारी होती है। आज की अपनी बारी है, कल की अपनी होगी। और इन सारी बातों के बाद उसके बाप की जो बात उसके कानों तक पहुंचती, वह होती. ''तुम्हारी भर्ती किसी पागलों के अस्पताल में होनी चाहिए । इस वाक्य की प्रतिध्वनियों से अमित अपने को हजारों वर्ष का थका हुआ पथिक महसूसने लगता और उसके अपने कंधे पर सिर का बोझ पहाड़-सा लगने लगता। सुना था कि - - ८२ / हड़ताल कल होगी - कभी वह वाहर होने के लिए छट्पटाने लगता । कामका में उमा कोई अंग, उमके उन प्राण के दायरे मे जब मचमुच बाहर आने लगता, उन ममय वह दहलकर रह जाता । अपने को किमी नरह से भीतर कर लेता."उसे भीतर रहना या। भीतर मे मंघर्ष होता है, बाहर मे नही । मंघर्ष के बाद ही वह अपने को उन गिरफ्त ने मुक्त कर सकता था, जिममें वह मुद्दत ने चला ना रहा था। उसके बाप के स्वर में लवन का बाप भी यही कह जाता कि वह अपनी योग्यता से नीचे आ गया था। वह अपने चाचा को कोई उत्तर नहीं देता । योग्यता के मुपोटे को अलग करके ही उमै वर्ग के लिए जूझना था जो तीसरे दर्जे के नागरिक की गिनती में पड़े रह गए थे। उन्हीं लोगों के लिए संघर्ष करके उमे अपनी मासे आजाद लगती। उसीमे निहित था उसकी सुशियो का एक बहुत यहा भाग । इसके लिए वह बहुत कुछ भुगत चुका था और उन्हें भूल भी गया था । न उसे आने वाले कल के लिए अधिक मोह या न बीत जाने वाले कल के लिए । जीनेवा लेबर कनन्दान का विवरण पढ़ते हुए उन दिन एकाएक एक विचार उमके भीतर घर कर गया था. अगर आदमी के भीतर यह इच्छा भी पैदा हो जाए कि उसका आनंवाला कल बेहतर पड़ियों का हो तो उसे अपने वर्तमान को मजबूत करने में लग जाना चाहिए क्योंकि वर्तमान की नींव पर वह आने वाले कल का बोझ टिकेगा। जितना सशक्त वर्तमान होगा उतना ही उज्ज्वल भविष्य हो सकता है, इसलिए मजदूरो के वर्तमान की चोरी हो जाने का डर उसे हमेगा रहता। सरकारी स्तर पर हुई एक मभा में उमने इसलिए यह कहा था कि राजनीति जिम भविष्य का आश्वासन दिए चली आ रही है, मैं उम- पर कम विश्वास करता हूं। मैं वर्तमान की बात करता हूं। भविष्य में जो होगा, वह होगा: अभी जो होना है, वह हो जाना चाहिए । राजनीति की वैवसी को वह जानता था, इसलिए उसके तकाजे को महत्व न मिलने में वह हताग नहीं हुआ था । चीनी उद्योग के मालिक ने उसपर व्यन्य कमा था, पैगम्बर की मुट्ठी में होता है आदमी का भाग्य । अमित ने उत्तर दिया था, यह तो मैं नहीं जानता, पर जो मैं जानना हड़ताल कल होगी/६३ हूं, वह यह है कि मालिकों की मुट्ठियों में जो बंद है, वह मजदूरों की सांसें हैं। यूनियन के सदस्यों की संख्या के अंदाज से सर्वेक्षण-पत्र की नौ हजार प्रतियां निकाली गई थीं। उन्हें उसी क्षण वितरण की आज्ञा देकर अमित ने तीन विशेष बैठकों के दिन तय किए। विधानसभा की अगली बैठक से सात दिन पहले ही वह चाहता था कि सर्वेक्षण का परिणाम यूनियन की बैठक में पहुंच जाए । काम शुरू करते ही उसने भी दौरा शुरू कर दिया। चेक-आफ की समस्या से पहले उसे महंगाई-भत्ते की समस्या को सुलझा लेना था । मालिकों की ओर से उत्तर अभी नहीं पहुंचा था । उसकी प्रतीक्षा किए बिना अमित ने मजदूरों के बीच की बैठकों को जारी रखा। पहले ही गांव में उसपर प्रश्नों की बौछार शुरू हो गई, 'महंगाई- भत्ता हमें अभी तक क्यों नहीं मिला ?' 'यूनियन में रहने से क्या फायदा ?' 'हम लोगन के भाग में हमेशा तावा के पछला रोटी का हे होवेला?' 'पिछली मीटिंग में आपने कहा था कि खेतों में काम करने वाले मजदूरों की यूनियन सबसे ताकतवर यूनियन हैं, फिर भी क्या कारण है कि हमारी मांग की कोई कदर नहीं होती ?' 'पढ़ल-लिखल ना होवल से इहे हाल होवे ला भैया।' सभी कुछ सुन चुकने के बाद अमित ने एक-एक प्रश्न का उत्तर दिया। डेढ़ घंटे तक बोलते रहने के बाद अंत में उसने बैठक के उपस्थिर डेढ़ सौ के करीव मजदूरों को वचन देते हुए कहा, 'महंगाई-भत्ता आपर्क पंद्रह दिन के भीतर मिलकर रहेगा । लेकिन याद रहे, हमारी लड़ाई सिप इतनी ही नहीं है । खेतों में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति में जद तक वे सारे सुधार नहीं होते, जिनकी हम लोगों ने मांग की है, तव तक हमें एक सवसे खतरनाक बात से अपने को बचाए. रखना है। वह है छोटी-मोटी बातों को लेकर आपस में झगड़ जाना । कुछ लोग इसीमें लगे हुए हैं कि आप लोगों को विभाजित कर दें। अगर ऐसा हो गया तो फिर अब तक का सारा किया-कराया मिट्टी में मिल जाएगा । आप लोगों ८४ / हड़ताल कल होगी
का विश्वास हमारे ऊपर नहीं, अपने-आपपर बना रहना चाहिए।'
तीन दिन के भीतर लखन के माथ उसीकी गाड़ी में पंद्रह गावों के
लोगों से मिलने के वाद अमित महीने के आखिरी शुक्रवार को दफ्तर ही
में बिताने के सयाल से रुक गमा था । वह मजदूरो और मालिकों के बीच
पिछले आरविदान की फाइलें देस रहा था कि मिगेल का फोन आ
गया था, 'क्या कर रहे हो अमित "
"पिछले आबिट्रेशन की रिपोर्ट देख रहा हूं।'
'साना सा चुके ?'
'अभी नहीं।'
'तो फिर में आर्क-आ-स्येल में तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। दस
मिनट में पहुंच आओ।'
'कौन-कौन हैं ?'
'सिर्फ हम दोनो होंगे।'
'तो फिर आधे घटे का समय दे ही डालो।'
"मुझे जोर की भूख लगी है।'
'भूस मुझे भी जोरो की लगी है, पर...'
'सर, मैं यहा तुम्हारी राह देलूंगा।'
कोई चालीस मिनट बाद ही अमित याकं-आ-म्येल पहुंच सका । अपने
सामने बीयर का गिलास रखे मिशेल अमित का इंतजार कर रहा था । वह
उमी छोटे-से आक्वेरियम के पास वाली मेज के सामने था, जहा गेडिग
जाने से पहले, यह अमित के साथ वीयर ले चुका था । अमित के बैठते ही
"मिगेल ने पूछा, 'क्या पीओगे?'
"पूरे महीने बाद आज पहला वीयर लूगा ।' मिशेल ने वेयरे को
इशारे से पास बुलाया, 'एक और स्टेला से आओ।
अमित और मिशेल की मेज के ठीक सामने हिंदी का वह कवि दो
भारतीय मित्रों के साथ बैठा हुआ खाने के बाद काफी ले रहा था। अमित
उसे इसलिए जानता था, क्योकि अभी कुछ ही महीने हुए इस कवि को
इंगलैण्ड की महारानी एलीजवेय की ओर से एम० बी० ई० की परी
मिली थी। अमित ने उस अवसर पर इस कवि का टेलीविजन पर
हड़ताल कल होगी८५
भी देखा था। पहले तो अमित को यह बड़ा ही अजीव लगा कि स्वतंत्र हुए देश के नागरिकों को अब भी इंग्लण्ड की रानी उपाधियों से सम्मानित किए जा रही थीं। पर हिंदी के कवि को सम्मानित होते पाकर अमित को ऐसा आभास हुआ था कि जिस साहित्य-सेवा के लिए कवि को उसके देश की ओर से न कोई आदर मिला था और न ही भारत की ओर से, • तो फिर इंग्लैण्ड का यह सम्मान ही सही। हिन्दी में लिखने वालों की कदर तो हुई । अमित ने इधर महीनों से हिंदी की कोई पुस्तक नहीं पढ़ी थी। भारतीय उच्चायोग का पुस्तकालय भी तो कंकाल की तरह था। इधर आशा से भी मेंट नहीं हो रही थी, जिससे एक-दो अच्छी पुस्तकें मिल । जाती। बीयर आ जाने पर अमित ने पहली चुसकी ली। एक्वेरियम के शीशे से बाहर की ओर देखा । दो बच्चे पर्यटकों के सामने हाथ फैलाए चल रहे थे । मिशेल ने उसके ध्यान को अपनी ओर आकर्षित कर लिया, 'अमित, मैं सोचता हूं, 'चेक-आफ सिस्टम' से हमें वंचित करके सरकार हमारी ताकत को कम करना चाह रही है। ऐसी हालत में तुम खुद सरकार के पक्षधर हो गए तो हमारी स्थिति नाजुक हो सकती है।' 'किसने कह दिया तुमसे कि मैं सरकार का पक्ष ले रहा हूं ?' 'आवें सेकी मो कोने। 'तुम गलत सोचते हो। छोड़ो इस बात को। तुम देखोगे कि मेरा निर्णय वही रहेगा जो मजदूरों का होगा।' 'मजदूरों को अपने भले-बुरे का ज्ञान होता तो आज यह हालत क्यों होती? 'पहले मैं भी यही सोचता था।' 'अव क्या सोचते हो ?' 'मजदूर अपना बुरा-भला बहुत अच्छी तरह समझता है।' 'खैर, क्या खाओगे ?' 'म वस दो सेंडवीचेज लूंगा।' 'वस?' 'हेवी ब्रेकफास्ट लेकर घर से निकला हूं।'
'तुम्हारी कार कब आ रही है ?' 'कल।' मेज में मीनू उठाकर मिशेल ने आखें दौड़ाई । अमित की ओर देखा, 'सा एन वेज सा।' 'क्या हुआ ?' 'तुम भी देख लो, झींगों और लामटर खाने के लिए जेब में आठ गुन्ने ज्यादा पैसे होने चाहिए। 'मैलानियों की कृपा है और क्या ।' 'माथ-साथ चीजो के दाम पर कोई खास निगरानी भी तो नहीं । लूट का बाजार खुला हुआ है, लोग लूट रहे हैं।' 'व्यापारियो का पो हमेगा वारह रहता है । आजकल तो धनी होने का मत्रमे आमान तरीका यही है कि आदमी दुकान खोलकर बैठ जाए।' दोनों खाकर बाहर निकले । जुम्मा होने के कारण मुमलमानों की सभी दुकानें बंद थीं। न्यूटन गली से होते हुए दोनों आगे बढ गए। गलियां खचाखच भरी थी। अफ्रीकन बैंक के कान्फरम में आए हुए प्रतिनिधियों का झुण्ड शापिंग के लिए निकले हुए थे। लगता था, पूरा शहर ही खरीद लिया जाएगा। पिछले चुनाव में आनी कुर्सी हार चुकने वाला, वह लंगड़ा मंत्री सामने से गुजरा। बहुत कम लोगों की नजर उमपर पड़ी । बैंकों के पाम पैसों की गंध लेते हुए दो-चार भिखारी खडे थे । समोसे वेचने वाले लड़के ने जो कमीज पहन रखी थी, उमपर एक मछली के पंजर के साथ फ्रेंच का यह वाक्य या पूरी मछली किमने खा ली? दोनों आपस में बात करते हुए नारतीय उच्चायोग के सामने में गुजरे। उच्चायोग के दो अफसर आपम में जिस भाषा में बातें कर रहे थे, वह अंग्रेजी थी। इसका पता दोनों को दो मिनट सुनने के बाद ही लग मकता था। अमित ने कभी नहीं सोचा था कि मिशेल उममे इमी बात को लेकर प्रश्न कर उठेगा, 'इन लोगो को हिन्दुस्तान को मापा नहीं आती । . क्या ?' 'आती तो, होगी।' 'तो फिर इस तरह की घटिया अंग्रेजी क्यो बोलते हैं ?' हड़ताल कल होगी |८७ 'आत्मगौरव की भी तो बात होती है।' दोनों आगे बढ़ गए। मिशेल के उस सवाल से अमित को घाव-सा लगा था । और जब उसने अपने-आपसे पूछा तो उसका कोई उत्तर नहीं मिला उसे । चीनी दुकानों पर लाल चीनी अक्षरों पर उसकी नजर पड़ते ही दूसरा प्रश्न उसके दिमाग में कौंध गया, 'इसके पीछे कौन-सी शक्ति है ?' समूचे द्वीप में कोई भी ऐसी चीनी दुकान नहीं थी, जिसपर लाल चीनी अक्षरों में दुकान का नाम न लिखा हुआ हो। कभी दो ऐसे चीनी नहीं मिलते जो आपस में किसी दूसरी भाषा में वोलते मिल जाते । कौन-सा संगठन था इसके पीछे, क्या राज था इसका ? इसपर, इससे पहले भी अमित कई बार सोच चुका था। एक बार उसने आह-पियांग की पीठ ठोंकते हुए कहा था, 'तुम ठीक कहते हो आपी कि हमारे पास अपनी जबान में कोई भी दैनिक पत्र नहीं। मैं तो तुम लोगों के संगठन की दाद देता हूं। तुम लोग आठ हो और चार पत्र निकलते हैं तुम्हारे।' यह बात यूनियन की उस मीटिंग में हुई थी, जब मजदूरों के अखवार की चर्चा हो रही थी। अमित ने कहा था कि यूनियन के अखबार के लिए दो ही भाषाएं हो सकती हैं-भोजपुरी या हिंदी । ये ही दो भाषाएं हैं, जिन्हें गांव के मजदूर सौ प्रतिशत जानते हैं । इसके बाद तो अखबार निकालने की बात ही मर गई । पाप हेनेसी गली के बाद दोनों अपने-अपने दफ्तर चले गए। पर अलग होने से पहले मिशेल ने फिर एक बार कहा था, 'तुम चेक-आफ के वारे में एक बार फिर सोच लेना।' मिशेल अमित के कालेज का सहपाठी था। यह संयोग ही रहा कि दोनों का क्षेत्र भी एक ही बना । क्षेत्र एक होने पर वहुत कम अवसरों पर अमित और मिशेल के विचार मेल खाते थे। जिस मुद्दे पर मिशेल समझौता कर लेता था, उस मुद्दे पर अमित से समझौता कभी नहीं हो सका था। दफ्तर पहुंचकर अमित ने सुरेन को पांच आदमियों से बातें करते पाया । पता चला कि उन पांचों में से तीन व्यक्तियों को बनारस की कोठी से निकाल दिया था। उनमें से एक व्यक्ति को अमित बहुत अच्छी तरह ८८ / हड़ताल कल होगी जानता था । बनारस के मजदूरों के बीच वह बहुत सक्रिय नेता था। अमित ने उससे प्रश्न किया, 'कब से तुम्हारे मित्रो को काम से निकाला गया है ? 'आज पाचवा दिन है । 'वजह ?' , 'पुरानी कहानी है।' 'मतलब?' 'चुनाव के समय की खीस अभी निकाली जा रही है।' 'खैर, तुम पूरी बात तो वताओ।' चुनाव के दौरान मालिक ने सभी मजदूरो की एक मीटिंग बुलाई थी । उममे उसने हम ममीको यह कहा था कि हम जिस दल के साथ नल रहे हैं, वह दल हमको खाई में ले डूबेगा। हमारा देश अमी आजादी के लिए तैयार हुआ है । अपनी औकात से बडे बोझ को अपने ऊपर लेकर यह डूब जाएगा, उमके माथ-माथ हम ममी तबाह हो जाएंगे। वह चाहता था कि हम उम दूसरे दल के माथ चलें, जो मारिशस की रक्षा के लिए, उमे झांस के साथ जोड़ना चाहता था। हम सभी इसके खिलाफ थे पर मेरे इन साथियों ने खुलकर विरोध किया था। रामदेव से तो मालिक की कहा-मुनी मो हो गई थी। इसी बात का बदला मालिक ने इतने दिनों बाद लिया। 'कोई वहाना ?' 'सरदार से इनका झगड़ा हो गया था।' 'क्यों?' 'गाव की एक लडकी को लेकर ।' 'देखो मैं मंगलवार को तुम लोगो के यहां आ रहा है। लौटकर तुम लोग कोई भी ऐसी हरकत मत करना जिससे कोठी वालो को दूसरा वहाना मिल जाए। कोई कारण नहीं है कि वे तुमको इस तरह नौकरी से अलग कर दें। पाचों आदमियों के चले जाने पर अमित सुरेन को साथ लिए श्रम मंत्रालय चल पड़ा। हड़ताल कल होगी / ८१ उसके दिमाग में जो कौंधती रही, वह परसों सुबह की घटना थी। सवाना गांव के मजदूरों के दो दल । एक संतुष्ट, दूसरा असंतुष्ट । असंतुष्ट दल से उस युवक ने चिल्लाकर कहा था, 'ये अपने को संतुष्ट बताने वाले वे लोग हैं, जिन्हें धनी मालिकों की मेज की बची हुई जूठन हजम करने को मिल जाती है। एक अच्छा घर, दो अच्छे कपड़े और शाम के वक्त थोड़ी-सी शराब । बस, इसी नशे में वे अपने को अपने मजदूर भाइयों से अलग बताने लगे हैं । मुझे ऐसे लोगों से घृणा है।' तभी बीच में अमित को बोलना पड़ा था, 'हम अपने उद्देश्य को घृणा के साथ न जोड़ें। हमारा उद्देश्य न मालिकों से घृणा है, न दिशाहीन मजदूरों से । हमारा उद्देश्य अपने अधिकारों की सुरक्षा है। इसके लिए यह जरूरी हो जाता है कि हम पूंजीपतियों की साजिशों को अच्छी तरह समझ लें। इनकी मनोवृत्तियों को समझ लें । ये लोग यही चाहते हैं कि हमारे लोग हमेशा वैसे ही रहें, जैसाकि पच्चीस वर्ष पहले थे और आज भी लगभग वही हैं । ये पूंजीपति नहीं चाहते कि मजदूर में संगठन रहे । ये नहीं चाहते कि हमारे लोग शिक्षित हों, वे यह भी नहीं चाहते कि मज- दूरों के दिन सुधरें। वे जो चाहते हैं, हम वह नहीं चाहते और जो वे नहीं चाहते, वही हमें- करना है, अपनी प्रतिष्ठा और अपने अधिकारों के लिए । हम यह नहीं चाहते कि जो-जो सुविधाएं उन्हें नसीव हैं, वे सभी हमें रातोंरात नसीब हो जाएं; पर हम यह भी नहीं चाहते कि हमारी अपनी स्थिति में कोई सुधार आए ही नहीं । 'मजदूरों को न तो मोटरगाड़ी चाहिए, न चार-पांच नौकर और न ही वैज्ञानिक सुविधाओं से भरा हुआ महल । ये सब चीजें न चाहते हुए भी मजदूर को अपनी इज्जत चाहिए, अपना हक चाहिए । उन संतुष्ट लोगों में से तीन मजदूर आज सुबह अमित से मिलने आ , गए थे। ६० / हड़ताल कल होगी १२ सात दिन हो चुके थे अमित को दिगोर में मिले । पिछली बार क्यिोर बोल गया था, 'कलाकार एक अकेला जीव होता अकेला जुझते रहने के बाद जब वह किमी कृति को जन्म देता है, तब उसी क्षण उसके भीतर यह आगा भी जन्म लेती है कि उसकी रचना को कोई देखें और अपनी प्रतिक्रिया दे। ऐमा नहीं होने पर कलाकार फिर एक अवेला जीव होकर रह जाता है, अपनी यातनाओं के बीच । किगोर अकेला कोने में पड़ा रहा। अमित की जाने की इच्छा नहीं थी। वह अपने दफ्तर में बैठा हुआ उधेड़बुन से बाहर होने की चेप्टा में उमीमें डूबा रहा । दगल के कमरे से राविया की अंगुलियों की रफ्तार टाइप राइटर पर बोल रही थी। बीच-बीच में नुरेन के अन्य लोगों के साथ बात करने की आवाज भी आ रही थी। अभी पाच ही मिनट पहले आशा का फोन माया था कि कालेज के सभी विद्यार्थी को देमद्री यो। फोन रख चुकने के बाद अमित ने अपने आप मे पूछा था-वेसद्री किसलिए ? उमे सुनने के लिए या ट्रेड यूनियन के बारे में जानने के लिए? दोनों बातें उसे निरर्थक लगी थी। पंद्रह दिन पहले वे दोनों लड़के जो उममे मिलने पाए थे, वे उसके वही शिष्य थे, जिन्होंने अमित के इस्तीका पर कालेज में हडताल करने की ठानी थी । इसका पता अमित को आशा से चला था। उसी क्षण कालेज पहुचकर उमने दोनों से वात को घी और हडताल नहीं हुई थी। अमित को उस कालेज में जाना बढ़ा कठिन लग रहा था; पर चूकि वह दोनों लड़की को वचन दे चुका था, इसलिए उसका अपना अतिम निर्णय जाने के पक्ष मे हुआ। हडताल कल होगी | , - उसके दिमाग में जो कौंधती रही, वह परसों सुबह की घटना थी। सवाना गांव के मजदूरों के दो दल । एक संतुष्ट, दूसरा असंतुष्ट । असंतुष्ट दल से उस युवक ने चिल्लाकर कहा था, 'ये अपने को संतुष्ट बताने वाले वे लोग हैं, जिन्हें धनी मालिकों की मेज की बची हुई जूठन हजम करने को मिल जाती है। एक अच्छा घर, दो अच्छे कपड़े और शाम के वक्त थोड़ी-सी शराब । बस, इसी नशे में वे अपने को अपने मजदूर भाइयों से अलग बताने लगे हैं । मुझे ऐसे लोगों से घृणा है।' तभी बीच में अमित को बोलना पड़ा था, 'हम अपने उद्देश्य को घृणा के साथ न जोड़ें। हमारा उद्देश्य न मालिकों से घृणा है, न दिशाहीन मजदूरों से । हमारा उद्देश्य अपने अधिकारों की सुरक्षा है। इसके लिए यह जरूरी हो जाता है कि हम पूंजीपतियों की साजिशों को अच्छी तरह समझ लें । इनकी मनोवृत्तियों को समझ लें। ये लोग यही चाहते हैं कि हमारे लोग हमेशा वैसे ही रहें, जैसाकि पच्चीस वर्ष पहले थे और आज भी लगभग वही हैं । ये पूंजीपति नहीं चाहते कि मजदूर में संगठन रहे । ये नहीं चाहते कि हमारे लोग शिक्षित हों, वे यह भी नहीं चाहते कि मज- दूरों के दिन सुधरें। 'वे जो चाहते हैं, हम वह नहीं चाहते और जो वे नहीं चाहते, वही हमें- है, अपनी प्रतिष्ठा और अपने अधिकारों के लिए । हम यह नहीं चाहते कि जो-जो सुविधाएं उन्हें नसीब हैं, वे सभी हमें रातोंरात नसीव हो जाएं; पर हम यह भी नहीं चाहते कि हमारी अपनी स्थिति में कोई सुधार आए ही नहीं। 'मजदूरों को न तो मोटरगाड़ी चाहिए, न चार-पांच नौकर और न ही वैज्ञानिक सुविधाओं से भरा हुआ महल । ये सब चीजें न चाहते हुए भी मजदूर को अपनी इज्जत वाहिए, अपना हक चाहिए।' उन संतुष्ट लोगों में से तीन मजदूर आज सुबह अमित से मिलने आ , गए थे।
१२ सात दिन हो चुके थे अमित को किशोर से मिले । पिछली बार किंगोर बोल गया था, 'कलाकार एक अकेला जीव होता अकेला जूझते रहने के बाद जब वह किमी कृति को जन्म देता है, तव उसी क्षण उसके भीतर यह आगा भी जन्म लेती है कि उमकी रचना को कोई देखें और अपनी प्रतिक्रिया दे। ऐसा नहीं होने पर कलाकार फिर एक अकेला जीव होकर रह जाता है, अपनी यातनाओं के बीच । किमोर अकेला कोने में पटा रहा। अमित की जाने की इच्छा नही थी। वह अपने दफ्तर में बैठा हुआ उधेड़बुन से बाहर होने की चेष्टा में उसीमे ढूवा रहा । बगल के कमरे से राविया की अंगुलियों की रफ्तार टाइप राइटर पर बोल रही थी। बीच-बीच में सुरेन के अन्य लोगों के साथ बातें करने की आवाज भी आ रही थी। अभी पाच ही मिनट पहले आशा का फोन आया था कि कालेज के सभी विद्यार्थी को चेमनी थी। फोन रख चुकने के वाद अमित ने अपने-आप से पूछा था-देसद्री किमलिए ? उसे सुनने के लिए या ट्रेड यूनियन के बारे में जानने के लिए ? दोनों बातें उसे निरर्थक लगी थी। पद्रह दिन पहले वे दोनों लड़के जो उससे मिलने आए थे, वे उसके वही शिष्य थे, जिन्होने अमित के इस्तीफा पर कालेज में हड़ताल करने की ठानी थी । • इसका पता अमित को आमा से चला था। उसी क्षण कालेज उसने दोनों से बातें की थी और हडताल नहीं हुई थी। अमिह कालेज में जाना बड़ा कठिन लग रहा था; पर चूकि वह दोनों वचन दे चुका था, इसलिए उसका अपना अतिम निर्णय जाने- । हड़ताल कल होगी | . 'फोन पर मिशेल से कुछ जरूरी बातों के बाद अपने दफ्तर से बाहर होकर उसने सुरेन से बातें की और कालेज को चल पड़ा। उससे केवल इतना ही कहा गया था कि वह यूनियन के बारे में बोले वह खुद नहीं समझ पा रहा था कि वास्तव में उसे बोलना क्या था। कुछ समय पहले आशा ने उसे बताया था कि उसका विपय ट्रेड यूनियनिज्म था। कार चलाते हुए वह सोचने लगा, इसके किस पहलू पर वोलूं ? जो हर जगह बोलता रहा हूं, क्या उन्हीं बातों को छात्रों के सामने भी रखा जा सकता है ? आधे घण्टे बाद उसने कालेज के कान्फरेंस हाल में खुद को डेढ़ सौ छात्रों के सामने पाया। वह कोई घण्टे तक आज के संदर्भ में श्रमिक -संघवाद की भूमिका पर बोलता रहा। इसके तुरंत बाद एक विद्यार्थी ने हाथ ऊपर उठाते हुए पहला प्रश्न किया, 'राजनीतिक हस्तक्षेप को ट्रेड यूनियन कहां तक स्वीकारने को तैयार है ?' अमित ने हंसकर कहा, कहां तक नहीं स्वीकारने को तैयार है, मैं इसका उत्तर देना चाहूंगा । ट्रेड यूनियन राजनीतिक सहयोग को नहीं 'नकारता, उसके हस्तक्षेप को नकारता है। राजनीति में प्रायः उद्देश्य की भिन्नता और विविधता होती है, जवकि श्रमिक संघ का एक मात्र उद्देश्य श्रमिकों की स्थिति को बेहतर बनाना होता है।' इस एक उद्देश्य के कारण ही संघ को सक्रिय होना पड़ता है। इस सक्रियता का रूप कोई हो, पर उद्देश्य वही रहता है, मेहनतकशों का खयाल ‘रखना । जवकि राजनीति अपने भिन्न उद्देश्यों के कारण कभी संघ के इस उद्देश्य में वाधक हो जाती है, इसलिए संघ को इस मामले में बहुत ही सावधानी बरतनी पड़ती है। राजनीतिक हस्तक्षेप के आगे सहम जाने का मतलव यूनियन के लिए मौत होता है। हस्तक्षेप प्रायः धमकियों के वल हुमा करता है। इसलिए कभी-कभार ट्रेड यूनियन इस धमकी के सामने ठिठकता जरूर है, पर उसे सहम जाना नहीं कहा जा सकता। दूसरे छात्र ने फ्रेंच में पूछा, 'यह भी तो कहा जाता है कि यूनियन सौदेवाजी के लिए हुआ करती है।' इस बार भी अमित ने हंसकर कहा, 'यह उतना ही सच है, जितना ६२ / हड़ताल कल होगी कि तुम्हारी पीढी के बारे में यह कहा जाना कि वह बिना सोचे-समगे आन्दोलन की मशीन है। श्रमिक संघो की नीव, इस सयाल से शायद डाली गई होगी। यह भी हो सकता है कि इमी वान को लेकर उसका उदय पर आज के इस आन्दोलन को माग सौदेवाजी का विशेषण दे डालना लाधन के विश्राम और कुछ नहीं हो सकता । आज का यह संघ मजदूरों को ममस्याओं को हल करके उसको लाभ पहुंचाने के लिए है। अब इमीको अगर मौदेवाजी कहा जाए तो दूसरी बात हुई। मैं फिर से दोहरा दूं कि संघ का एकमात्र उद्देश्य श्रमिको का हित है ।' श्रमिक संघ का दूसरा अर्थ हडताल भी तो हो सकता है।' 'ठीक उसी तरह जिस तरह युवा क्राति का दूमरा अर्थ वाझ क्रांति हो सकता है।' 'मिस्टर अमित, आप अपने हर उत्तर के लिए हमारी पीढ़ी को जिरबस्तर क्यों बना रहे हैं ?' 'कवव मोम का नहीं, लोहे का बनाया जाता है, इसीलिए ।' तालियों के बाद अगला सवाल एक लडकी का था, 'दुनिया का सबसे बडा ट्रेड यूनियन कहाँ पर है ।' 'अभी तक तो पश्चिम जर्मनी का मंटल वर्क यूनियन विश्व का सबसे बड़ा यूनियन माना जाता है। इसके सदस्यों को संस्था पच्चीन साल से ऊपर है।' उसी लड़की ने दूसरा प्रश्न किया, 'मिस्टर अमित, विश्व का सबसे पुराना यूनियन कौन-सा है ? 'लगता है, किसी क्विज प्रोग्राम मे आ गया हूं। खैर, दुनिया का सबड़े पुराना भूनियन मेरे खयाल में ब्रूश बनाने वालो का संघ था, जिसको स्थापना १८६०-७० के आस-पास हुई थी। 'सबसे पहली हड़ताल कहा पर हुई यो ?' अमित एक बार फिर हंसा, 'वह तो शायद कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन ने किया था। इस उत्तर पर केवल वे ही लोग हस सके जिन्हे मंदम की जानकारी थी। हंसी के बाद ही अमित ने सही उत्तर दिया, 'कहा जाता है कि ईसा से ३०६ वर्ष पूर्व रोम शहर में आरिसतीस नामक यूनानी संगीतज्ञ ने किया था। इससे पहले कि इस तरह के और भी प्रश्न किए जाएं, मैं यह बता देना चाहता हूं कि विश्व की सबसे लंबी हड़ताल अभी हाल ही में १६६१ में समाप्त हुई है ३३ वर्प वाद । यह हड़ताल डेनमार्क के नाइयों की थी। सबसे बड़ी समूह हड़ताल १९२६ में हुई थी और इसमें तीस लाख के करीव मजदूरों ने भाग लिया था। और कोई प्रश्न ? इसके बाद भी प्रश्न हुए पर लेक्चर हाल से बाहर । आखिरी सवाल आशा का था, 'क्या हाल है तुम्हारी जानीन का ?' छात्रों के बीच बोल चुकने के बाद अमित ने यह नहीं सोचा था कि प्रेस कान्फरेंस के दौरान उसे ट्रेड यूनियन की परिभाषा देनी पड़ेगी। फिडेल कांस्ट्रो शैली की दाढ़ी थी उस पत्रकार की, जिसने सबसे अधिक प्रश्न 'किए थे। उसीके एक अप्रत्याशित प्रश्न पर अमित को क्रोध आ गया था, पर उसे दबाकर उसने धीरे से कहा था, अगर कोई ट्रेड यूनियन का ऐसा लीडर होगा तो मैं उससे यही अनुरोध करूंगा कि वह अपने व्यक्तित्व को निखारने के बदले उन हजारों मजदूरों की स्थिति सुधारने में अधिक समय 'विताए । सही बात तो यह है कि ट्रेड यूनियन के आंदोलन में कोई नेता नहीं हुआ करता । वे एक उद्देश्य के नौकर होते हैं । उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही उन्हें सांसें लेनी पड़ती हैं । यूनियन को अपने लोगों और .ो समय का खयाल रखना पड़ता है। अपना खयाल रखने वाला ट्रेड नियनिस्ट ओझा हो सकता है, डाक्टर नहीं । मेरे ऊपर यह आरोप वे- बुनियाद है कि मैं सत्ता का साथ लेने लगा हूं । यूनियन मजदूरों की अमानत होती है, सत्ता की नहीं। उसे आम आदमी के लिए लड़ना होता है । उसकी रक्षा करनी पड़ती है । मुंह बाए भेड़ियों से मुट्ठी-भर लोगों के यहां सारी सुविधाएं बंद हैं। यूनियन उन सुविधाओं को वहां से रिहा करके मजदूरों के बीच बांटने के लिए लड़ती है। पर इसका यह मतलब नहीं कि यूनियन सत्ता की उन बातों की भी अवहेलना करे जो उसे मजदूरों के हित में प्रतीत हों। इसका यह तात्पर्य नहीं हो जाता कि कल अंगर सत्ता मजदूरों की मुट्ठी से उसके हक को छीनना चाहे तो भी हम उसके साथ होंगे । इस तरह के खयाल दो ही तरह के लोगों के हो सकते हैं, एक तो उस आदमी के जो यूनियन का अर्थ नहीं जानता और दूसरा उस व्यक्ति के जिसे हर ६४ / हड़ताल कल होगी हालत में हमारे आदोलन को कमजोर करना है.।' अमित के लिए वह दिन इधर का उसका मवसे व्यस्त दिन रहा । उनी शाम उमे मजदूरो के बीच उसी स्वर मे बोलना पड़ा, 'मेरे दोस्तो, हमें अपने इस आदोलन से अब तक जो सीस मिली है, वह यही है कि हम किसी भी हालत में अपनी एकता को खंडित न होने दें। विभाजित होने का मतलव हमारे लिए लडाई मे निहत्थे हो जाना है । वे लोग, जिन्होने औरो के हको को मारकर अपने को हम लोगों से अलग जीव प्रमाणित कर दिया है, अपनी हर सांम के साथ यही चाहते हैं कि हम विभाजित हो । इसके लिए वे लोग कई तौर-तरीकों को अपनाएंगे । हमे उन सभी बातो मे बचना है । हमारे ही वीच से, प्रलोभन मे आकर, कोई उन लोगों के प्रयोजन को जाने विना, हमें भड़काने और अलग-अलग वांटने का प्रयल कर रहा है । हमे सचेत रहना है । आदमी जो कुछ करता है, अपने हाथ- पाव-आखें-दिमाग मभीके माथ करता है और सफल रहता है। अपने. गरीर के उन अंगों को अलग-अलग करके हम कुछ नहीं कर सकते। यह दह ममय है, जब हमें अपनी छोटी-छोटी बातो को महत्व देकर, उस वही बात मे मुकरना नहीं है । आज के उखड़े हम फिर नही पनप सकते। एक वाढ "बहुत बडी बाद, कल हमें डुवा जाने के लिए उठने की कोशिश में है, उमे अभी से ही रोकने की कोशिश नहीं की गई तो फिर देर हो जाएगी और हम वहा लिए जाएंगे। यूनियन आपके लिए कुछ नही कर सकती अगर आप खुद अपने हक को पहचानने हुए उसके लिए खड़े नहीं होंगे।' एक गांव के लोग थे, जिनके सामने वह वोल रहा था। देश-भर में मैकड़ो गाव थे, जहा उमे बोलना था। चेतना लानी थी। लोगों को एक श्रमिक सूत्र में बाधना था । कई दिन के बाद अमित ने अनुभव किया कि उसकी शक्ति वापस आ गई थी। एक रात पहले अमित ने अपनी डायरी मे लिखा था. वह लडका गोरा था । आखें नीली थी उसकी । मुश्किल मे २०-२१ साल का होगा। उसके पास कृषि विज्ञान का डिप्लोमा था, जो उसे दो-तीन साल के अध्ययन के बाद मिल गया था। उसीके बल, वह कृषि मंत्रालय में सलाहकार
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था। उसके लिए उसे साढ़े तीन हजार रुपया माहवार मिलता था। आठ
साल के एक मजदूर के सामने खड़ा होकर उसने कहा, 'ए बूढ़े, तुम्हारे
कुदाली पकड़ने का ढंग अच्छा नहीं है।' बूढ़े ने आंखें उठाकर उसकी ओर
देखा, 'सलाम साहेब !'
'मैं कह रहा हूं, तुम्हारे कुदाली पकड़ने का ढंग अच्छा नहीं है।'
पचास साल से वह आदमी खेतों में जूझ रहा था। पचास साल से
वह उसी तरह कुदाली थामे आ रहा था। उसी तरह कुदाली थामकर
वह सभी से अधिक काम कर लेता था। उसने चुपचाप कुदाली को दूसरे
ढंग से पकड़ने की कोशिश की । लड़का दूसरे मजदूर को सुझाव देने आगे
बढ़ गया । साठ साल का वह मजदूर कुदाली को सही ढंग से पकड़ने की
कोशिश करता रहा ।'
१३
कालेज के दिनों में अमित और किशोर एक रंग की कमीज पहनते थे।
एक ही तरह की पतलून, एक ही तरह के जूते । दोनों की दोस्ती पर बाकी
दोस्त दोनों को जोड़ा-जोड़ी कहकर चिढ़ाते ।
'जब हम दोनों एक-दूसरे के इतने करीब हैं तो फिर क्या वजह है
कि स्वभाव हमारे इतने भिन्न हैं ?'
'भिन्न तो नहीं है।' किशोर ने कहा।
'हम दोनों का सोचना कभी एक जैसा नहीं रहा । तुम एकदम शांत
रहते हो और मैं चंचल स्वभाव का हूं।'
चंचल नहीं लगते ।'
'तुम लड़कियों से दूर भागते हो।'
कुछ देर चुप रहने के बाद किशोर बोला था :
'मुझे लड़कियां पसंद नहीं ।'
जब अमित भारत जाने को हुआ था, तब किशोर ने उसे रोकने का
'मुझे तो
तुम
६६ / हड़ताल कल होगी
बहुत प्रयल किया। 'हममें कभी न जुदा होने की बात हुई थी अमित !' 'यह जुदाई स्थायी थोड़े ही है। और फिर मैं तो चाहता हूं कि तुम भी साथ चलो। कला की ओर तुम्हारी रझान है । डिग्री लेकर लौटो।' 'तुम तो ऐसे कहते हो, जैसे भारत पड़ोस का ही कोई गांव हो, जहां दो पैसे में भी आदमी पहुंच सकता है।' अमित के प्रस्थान के दिन तक किशोर कहता रह गया था, 'वड़ा असह्य होगा यह अकेलापन।' 'दोस्ती और मुहब्बत तोपास रहकर जितनी गहरी नही होती, वह दुराव से उससे दुगनी गहरी हो जाती है और फिर यह दो-तीन वर्ष कौन-सा बड़ा समय होता है ? तुम देखना, कितनी जल्दी लौट आऊंगा।' इसके बाद किशोर उदास रह गया था। १४ अमित को धीरे-धीरे होश आया । होश आ जाने पर भी उसे अपनी पलकें भारी ही लगी। आंखों के सामने एक झालर-सी झिलमिलाती रही। आसों को छत से हटाकर उसने अगल-बगल देखा। वही धुंधलका--कापता हुआ। गर्दन में दर्द महसूस कर उसने अपने हाथ को उस जगह पर पहुंचाने की चाह में पाया कि उसके हाथ पीछे की ओर बंधे हुए थे। उसके पाव भी बंध हुए थे। किसी तरह करवट बदलकर फिर बैठने में सफल रहा । उसके ठीक सामने तेज रोशनी का बल्ब जल रहा था। उसने आंखें मूंद लीं । कुछ देर बाद आंखें खोलकर चारों ओर देखा। तीन ओर सीमेंट की दीवार थी। चौथी और शीशे की बंद खिड़कियो थी। सलाखें थी। सिड़की के ऊपर के भाग खुले हुए थे। यहां भी लोहे की छड़ें थी 1 बीच की खिडकी के पास पहुंचकर अमित ने बाहर झांकने की कोशिश की । वाहर अंधेरा था। चट्टानों से टकराती हुई लहरों की आवाजें थीं। उसने अपने हाथ के बंधनों को आजमाया। रस्सी नुकीली दांतों की तरह चुभकर रह गई। उसकी कलाई की घड़ी ज्यों की त्यों बंधी हुई थी। रात के साढ़े दस बज रहे थे। लहरों की आवाज को भेदती हुई सेगा की आवाज भाई : रोजाना सो मारी फिर न्वाये मे रोजाना लिपा तू सेल जामें ली भीजेर जीमून पू दोरमी आवेक ली (रोजाना का पति डूब गया पर रोजाना अकेली नहीं उसे सोने के लिए मदों का अभाव कभी नहीं हुआ।) उसके बाद ढपली की आवाज थी।.. और कोयले पकने की गंध । कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था, फिर भी अमित को समझते देर नहीं लगी कि यह आवाज बहुत ही पास से आ रही थी। हो सकता है कि वह किसीके बंगले का रखवार गा रहा था या वह जिस स्थान पर था, वह मछुओं की कोई वस्ती हो। उस कमरे को चारों ओर से देखते हुए अमित ने अपने-आपसे पूछा, पर मैं यहां पहुंचा कैसे ? -शाम को छ: बजे के करीब रहा होगा। वह मजदूरों से मिलकर लौट रहा था। उसकी गाड़ी का एक मोड़ पर रोका जाना.. तीन आदमियों का उसकी कार में जबरदस्ती आ वैठना। उसे ड्राइविंग सीट से हटाकर एक व्यक्ति का उसी जगह पर आ जाना। पिछली सीट के एक दूसरे व्यक्ति द्वारा दबोचा जाना और फिर अपने कंधे पर किसी प्रहार से तिलमिला जाना । अमित को लगा कि वह किसी स्टंट फिल्म का ट्रेलर देख रहा था। उस भारी दर्द को उसने चुपचाप महसूस लिया था । "सूरज अभी डूबा नहीं था, फिर भी घटाटोप अंधेरा छा गया। अमित कैद था, पर वह अपने को किसका कैदी समझे ? चोर-डाकू होते तो उसकी जेबें खाली कर ली गई होती। उसकी घड़ी खोल ली गई होती। ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ था। मजदूरों के बारे में सोचा, जिनके यहां से वह लौट रहा था। उन लोगों के बारे में सोचा, जिनके ६८/हड़ताल कल होगी साथ मजदूरों के अधिकारों के लिए वह नड़ रहा था। जानीन के बारे में सोचा । उसका खयाल जानीन के बाप पर रका । कुछ समझ में नहीं आ रहा था उसको कि कौन थे वे तीनों लोग? उमको यहां बंद कर जाने में उनका क्या प्रयोजन या? यह स्थान कौन-सा था? समुद्र-किनारे किसी- का बंगला हो सकता है, किसका ? कही पास ही तंदूर मे कोयले पक रहे थे। कोयले की गंध से माहौल भारी था। दरवाजे के पास उसने आवाजें सुनी। दरवाजा खुला। वे ही तीनी आदमी फिर सामने आ गए। एक ने आगे बढकर उसके बंधन खोले । धुंघराले बाल वाले व्यक्ति ने सिगरेट के लंबे कश के बाद कहा, 'तुम्हारी कार का पेट्रोल खत्म हो गया था । हम भरवा लाए।' 'कौन हो तुम लोग ? मैं यहां क्यो लाया गया हूं?' 'तुम्हारे पहले सवाल का जवाब हम जरूरी नहीं समझते । दूसरे का दे रहे हैं--तुम यहा इसलिए लाए गए हो कि तुम्हे मालूम हो जाए कि एक दिन तुम इसी तरह कहीं से उठा लिए जाओगे और गरदन में पत्थर 'का बोझ लिए समुद्र में डुबो दिए जाओगे । जिस तरह आज किसीको कुछ नही मालूम हुआ, उसी तरह तुम्हारे डूब जाने के बाद भी लोग यही सोचेंगे कि उडनतश्तरी वाले तुम्हें अपने यहा उठा ले गए।' "मुझे इस तरह उठा लाने का कारण क्या है ?' 'कहा न, जो हम आने वाले दिनों में करने को विवश हो जाएंगे, उसी- की यह एक झलक थी।' 'मैं यहां से बाहर होना चाहता हूं--यह कौन-सी जगह है ?' 'यह स्थान कुछ भी हो, हम तुम्हें बड़े आदर के साथ तुम्हारे शहर तक छोड़ आएगे; पर इससे पहले तुम हमारी एक बात ध्यान से सुन लो।' इसके साथ ही उस व्यक्ति ने क्रिमोली में एक बडी-सी गाली दी। अमित चुप रहा। 'अगर तुमने उस लडकी का पीछा नहीं छोड़ा तो फिर इस बार की तरह यहा से लौटकर नही जायोगे।' 'कोन होते हो तुम...?' अमित की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि दाहिनी ओर के । आदमी ने उसपर थप्पड़ चला दिया । धुंधराले बाल वाले काले व्यक्ति ने फुर्ती से उस थप्पड़ को रोक लिया। दोबारा अमित की मां को क्रिओली में गाली देकर बोला, 'हम अभी तो नहीं, पर कल तुम्हारी मौत हो सकते है।' 'किसके आदेश पर तुम लोग..?' 'चोंच बंद कर, नहीं तो हमेशा के लिए बोलना बंद कर जाओगे।' 'यह बंगला उसीका होगा, जिसका तुम लोग काम कर रहे हो।' 'यह तुम्हारा कब्रिस्तान हो सकता है, अगर तुमने यह आखिरी चेता- वनी नहीं मानी। उसने अपनी बगल के व्यक्ति से इशारे में कुछ कहा । वह आदमी आगे आया। अपने हाथ के रूमाल को अमित की आंखों पर ले जाकर पट्टी बांध दी । आपत्ति का कोई अर्थ नहीं था, इसलिए अमित चुप रहा। अपने सामने के अंधेरे में उसने सुना, 'हम तुम्हारी गाड़ी में तुम्हें तुम्हारे शहर तक छोड़ आते हैं।' अमित कुछ नहीं बोला। कोई चालीस कदमों के बाद वह अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर था । गाड़ी स्टार्ट हो जाने पर भी तंदूर से कोयले की गंध आती रही। उस जगह से हटते हुए अमित कम से कम एक निष्कर्ष पर पहुंच चुका था। जिस स्थान में वह कोई चार घंटे तक बेसुध पड़ा रहा, वह समुद्री इलाके का बंगला ही था पर वह बंगला जानीन के बाप का नहीं हो सकता। वहां की लहरों की आवाज भिन्न थी और फिर उस इलाके में कोयले नहीं पकाए जाते । रास्ते में अमित ने अपनी आंखों से पट्टी हटाने की एक-दो कोशिशें की, पर सफल नहीं हुआ। चक्करदार रास्ते के ढलानों का आभास पाकर वह इलाके का अनुमान लगाना चाह रहा था, पर कुछ निर्धारित नहीं हो पाया था। अपने स्कूल के दिनों में बस से यात्रा करते समय वह प्रायः आंखें बंद करके जगहों को पहचानने की कोशिश करता और काफी हद तक सफल भी रहता'पर वह शायद इसलिए कि वह रास्ता रोज का जाना- पहचाना था और हर वस स्टाप पर रुकने से जगह का अनुमान लगाना १००/ हड़ताल कल होगी । आसान हो जाता था । इस समय तो उससे समय का भी अंदाजा नहीं लगाया जा रहा था। लग रहा था, वह घंटे से अधिक की यात्रा थी। तीनों आदमियों के वार्तालाप में भी वह उनके बारे में अधिक नहीं जान सका था। उसे सभी कुछ विचित्र-सा लग रहा था। उसे कैद रखा भी गया तो सिर्फ पाच-छ: घंटों के लिए ही क्यों ? वह धमकी तो रास्ते में रोककर भी उसे दी जा सकती थी। कुछ भी रहा हो, अमित इस बात पर विश्वाम किए बिना नहीं रह सका कि यह सभी कुछ जानीन के बाप की ओर से किया जा रहा था । जिस द्विविधा में वह पड़ा रहा कि इसके बारे में जानीन को बताए या न बताए । सोच रहा या, बताने से क्या लाम ? वह जानीन को दुखी नही करना चाह रहा था पर फिर एक वात यो । जानीन को कम से कम उस मनोवृत्ति का पता तो चले। कार के झटके के साथ स्कने पर अमित को लगा कि उसकी गाड़ी को बड़ी बेरहमी और लापरवाही के साथ चलाया जा रहा था। उसने अपनी आंखों पर हार्यों का स्पर्श महसूसा । उसकी पट्टी खोल दी गई। अमित ने चारों ओर देखा । वह अपने घर से अधिक दूरी पर नही था। उसके साथ बैठे हुए व्यक्ति ने धीरे से कहा, दूसरे ने और भी धीरे से कहा, 'यह सिर्फ एक चेतावनी थी। तुमसे एक बार फिर कहे जा रहे हैं । खबरदार, तुमने उस लड़की से मिलने की कोशिश की!' अमित चुप रहा । मन मे आया कि पूछ ही ले-उससे मिलता रहूं तो क्या कर लोगे । यह प्रश्न उसके भीतर ही रह गया। तीनों व्यक्ति कार से नीचे उतर गए। लंबे काले व्यक्ति ने कहा, 'हम तुम्हें जाते हुए देखेंगे।' जिस जगह पर कार रोकी गई थी, वह सुनसान थी। कुछ ही दूरी पर फिलिंग स्टेशन था। वहां पर चार-पाच गाडियां खड़ी थी। अपनी कार स्टार्ट करते हुए अमित के मन में आया कि इनकी कार इधर ही कही आस-पास में होगी। इनका पीछा किया जाए फिर उसे यह खयाल उतना अच्छा नहीं लगा। ऐसा करना, मामले को और भी उलझाना था। विना कुछ कहे उसने कार आगे बढ़ा दी। वह व्यू-मिरर में देखता रहा। काफी दूर निकल आने पर भी उसने तीनों आदमियों को उसी तरह खडे हडताल कल होगी."
पाया। घर पहुंचने पर उसने अपनी मां को बेसब्री से अपनी प्रतीक्षा करते पाया, 'यह कोई समय है घर लौटने का ?' 'गांव में लोगों से मिलते बात करते देर हो जाती है।' 'इतनी दूर । कहीं से फोन करके हमें चितित होने से तो बचा सकते थे। अमित ने अपनी मां को बांहों में बांध लिया । अपने कमरे में पहुंचकर उसने सिगरेट जलाई। दो कश के बाद उसने उसे राखदान के हवाले कर दिया । वह अपने को स्थिर नहीं कर पा रहा था। नीचे से राधिका ने खाने के लिए आवाज दी। अमित नीचे उतरा । एक गिलास दूध पीकर ऊपर आ गया। जानीन को फोन करने की चाह उसके भीतर पैदा हो गई थी। पर इतनी रात गए जानीन को फोन करना उचित नहीं समझा । और फिर फोन पर क्या कहना था उससे ? वह अपने पंलग पर उठंग गया । अपने को स्थिर करना उसे बड़ा कठिन प्रतीत हो रहा था। इस प्रक्रिया को वह भय मानने को तैयार नहीं था, पर उसका इस तरह विचलित होना पहले कभी नहीं हुआ था। वह अपने को किसी प्रचंड आंधी द्वारा झकझोरा-सा पा रहा था। कोई घंटे बाद उसने अपनी अलमारी खोली। दराज से नींद की गोलियां निकाली। उन्हें गौर से देखा और उनमें से एक को चुटकी में लेकर डिविया को दराज में बंद कर दिया । मेज की कांच की सुराही से उसने गिलास में पानी उंडेला और गोली गले के नीचे उतार ली। , पलंग पर लेटकर उसने आंखें मूद लीं। अपनी अस्थिर पलकों द्वारा वह किसी ववण्डर के बीच से नींद को पकड़ लाना चाह रहा था । पर नींद' थी कि पकड़ में आ ही नहीं रही थी। उसने दूसरी सिगरेट जलाई। छोटी-सी मेज को राखदान के साथ पलंग के पास खींच लिया। उसी तरह पड़ा हुआ कश लेता रहा । बेड-लाइट के स्विच को आफ करके उसने अपने शरीर को शिथिल करने की कोशिश की पर मस्तिष्क के तनाव के. साथ शरीर की पूरी मांसपेशियां तनी हुई थीं। ऊपर से स्थिर रहकर १.०२/ हड़ताल कल होगी ..
भी वह आन्तरिक स्थिरता के लिए कशमकश में पड़ा रहा। पलको के भारी होने के साथ-साय माना कमरा उसे सिी तरल पदार्थ से डबाइव भरा हुआ प्रतीत होने लगा था। वह पदार्थ का नाड़ा था, जिसमें बड़ी ही कठिनाई के साथ वह सुबकियां लेता हता। कभी ववण्डर से बाहर आने की कोशिश में उसको सांतें फूलने तर मारी। किसी बहुत ही लम्बी कन्द्ररा से जानीन को आवाज आती। उसे प्रतिध्वनियां होती और फिर वह प्रतिध्वनि अनुध्वनियों में छिटक बाजी। अमित उन टुकड़ों का सहारा लेकर कार आना चाहता पर बने बोझिन शरीर से नीचे ही की ओर सुड़का चला जाता। वह चिल्ला उता, जानीन .""जानीन. "जानीन... और अपनी ही आवाज की प्रतिध्वनियों में लिपटकर वह सन्दनहीन होकर एक बहुत भारी शून्य में सोकर रह जाता । वह गुन्द विन्तार पाता गया और.. उस विस्तृत फैले शून्य में एक बोर मजदूरों का जतन या। युद्ध- प्यासे, थके-मादे, टूटे-उसड़े मजदूरों के बुलन की दगत में टाई के पेड़ को तरह लम्बी आकृतियां"बाहर को निकली हुई मोटी-मोटी आंदों दादी मालिको की आकृतियां और बहुत सारी अल-अन्त चौरें और उन चीजों के बीच जानीन का झिलमिलाता चेहरा। अमित की खुमारी बहकर फिर एकाएक कम हो बाई और उन नीले होश में उसने पहले मजदूरों की आवाजें सुनी, प्रगति के हकदार हर मी हैं । "हम भी हैं. "हम भी हैं। फिर मरी वादार भी वही । मुंबटीही। अमित के कान बज उठे । उनले कानों पर हाय रख लिए। तीसरी आवाज जानीन की पौ। धीमी बौर काल"अन्ति... अमित, कुहासे मे. एकाएक चकाचर्चाध कर देर वाली रोगनी फली दी और प्रलयकर धमाके के साथ उसकी वह कार-दुर्घटना। समृधों में वह गाड़ी के कार आ गए पहिये को घुमाता हुआ देखता रह गया था। उस सन्नाटे को तोड़ा था जानीन के चोलार ने,'अमित... अमित" अमित...
पिछले ही दिनों मुड़ियां पहाड़ के नीचे एक गांव के मजदूरों के बीच अमित को पहुंचना था । उस विस्तृत फैले पहाड़ के नीचे फूलों के खेत थे। वही दृश्य अमित को बोझिल आंखों के सामने कौंध गया। मुड़िया पहाड़ का ऊपरी हिस्सा जो कि किसी आदमी के सिर की तरह था, टूटकर उन फूलों के ऊपर गिरने ही वाला था। वह उन फूलों का चीत्कार था, जिसे अमित ने सुना । अपने दाहिने हाथ को आगे बढ़ाए अमित दौड़ पड़ा। पहाड़ को फूलों पर गिरने से रोकने के लिए। वह गिर पड़ा। उठकर फिर दौड़ा। फिर गिर पड़ा और इस बार उससे उठा न जा सका। उससे हाथ-पांव भी न मारे जा सके । अमित को आखिर नींद आ ही गई। १५ किशोर ने मन्त्रालय से प्राप्त अपने पत्र के उत्तर को जो कि चालीस दिन बाद उसे मिला था, अमित के सामने रख दिया था। पत्र पढ़कर अमित ने पूछा था, 'इसका क्या मतलब कि तुम्हारे चित्रों में देश का कोई भी सही रंग नहीं उभर पाया है ?' किशोर ने कोई उत्तर नहीं दिया था। अमित मन ही मन सोच उठा था, 'देशभक्ति के लिए क्या यह जरूरी है कि कलाकार देश के झण्डे की तस्वीर बनाता रहे ?' इस प्रश्न को उसने जानीन से भी किया था और जानीन ने प्रश्न का उत्तर प्रश्न से दिया था, 'दफ्तरों में फला-पारखी कब से बैठने लगे?' यह जानकर कि वह किशोर के चित्र न खरीदने का वहाना था, जानीन । शाम को अमित के साथ किशोर के घर पहुंची थी। तीन चित्र पसन्द करके बोली थी, 'आज के जूझते हुए जीवन के रंग हैं सभी चित्रों में । ये तीन मैं खरीदने जारही हूं। अमित से राशि भिजवा दूंगी। १०४ / हड़ताल कल होगी दूसरे दिन अपने हाथों पर तीन हजार रुपये पाकर किशोर को प्रश्न करने की शक्ति जाती रही। उसने अपने भीतर एक आवाज सुनी, 'तो नौवत दया और भीख तक मा गई!' इसके बाद गहरे कुएं का सन्नाटा। पहली बार लखन ने भय के कीटाणुओ को अपने भीतर रेंगता-सा महसूस किया। उसकी अपनी गाडी की रफ्तार कोई खास नहीं थी फिर भी स्टीयरिंग व्हील उसके हाथो मे तिलमिलाया और उसने एकसिलरेटर से पाव हटा लिया। कार को एक झटका-सा लगा क्योकि उसके गीयर बाक्स का एक पुर्जा ढीला हो चला था। उसने न्यू-मीरर मे देखा। रास्ते के दोनों तरफ के झावे के घने पेडो के कारण पीछे का अंधेरा और भी गहरा था। वेक पर पाव पहुंचाकर उसने गाडी रोक ली। लाइट आफ कर दी। उस अंधेरे को महसूसा, उसे अपनी लम्बी सास में खीचा । झावे के पेड़ों की दाहिनी कतार के पीछे दस-पन्द्रह कदमो पर दहाड़ता हुआ समुद्र था। अंधेरे में आवाजें सीधी नहीं आया करतीं। वह गम्भीर गर्जन टेढा-मेढ़ा आ रहा था। उसके बायें ओर से किसी का शक हो रहा था। सिगरेट सुलगाकर लखन ने बाई ओर देखा । आवाज दिखाई नहीं पड़ी। वह उस घटाटोप अंधेरे को ताकता रहा । वह टैक्सी ड्राइवर था। उसके जीवन मे इस तरह ताक लगाए रहना रोज का काम होता है लेकिन उस ताक ओर इम ताक मे अन्तर था । यह स्थान उसके अपने अड्डे से चौबीस मील की दूरी पर था । उस दुराव के चावजूद इलाका उसका अपरिचित नहीं था। अंधेरे की उस गलना में उसने टटोला । वह तीन मील दूर था तभी किसी गिरजाघर का घण्टा चारह बजा रहा था। इस समय सभी बंगलों में नीद गहराई लिए होगी, सभी पहरेदार भी सो रहे होगे। आदमी और कुतै भो । काली चट्टानों से अश्य ज्वार-भाटे अपने माथे धुने जा रहे थे। उसके मन मे सपाल बाय घरती सो जाती है पर समन्दर कभी नहीं सोता : को उसने गाड़ी की रोशनी जलाई और दूसरे ही क्षण बुझा दी। उसके कान सजग थे । समुद्र गर्जन के अलावा वे दूसरी आवाज सुनने की ताक में थे। एक क्षण, दो क्षण-कोई आवाज नहीं आई। वह ऊंघने की स्थिति में आने वाला था पर एक लम्बी जम्हाई के बाद वह अपने दोनों हाथों की अंगुलियों से खेलता रहा । ऊपर के कंजूस आकाश पर इने-गिने तारों की झिलमिलाहट थी। जगह को चारों ओर अच्छी तरह देख उसने गाड़ी स्टार्ट की। उसे कुछ कदम आगे ले जाकर फिर रोक लिया। सागर के उस चीत्कार के साथ-साथ झावे के पत्तों की सांय-सांय की आवाज भी मिल गई थी। पीछे से रोशनी आई। वह अपनी सीट पर संभलकर बैठ गया। सात टन की लारी दस टन के बोझ के साथ लड़खड़ाती हुई सामने से निकल गई। अभी चार-पांच महीने पहले ही लखन भी इसी तरह बालू ढोने का धंधा कर चुका था । वह उसे चोरी नहीं मानता था क्योंकि हर खेवे के लिए इंस्पेक्टर को पचास रुपए दिए जाते थे। चुनाव की सरगर्मी के दौरान जब कई लोगों को टैक्सी की पर्मिट मिलने लगी थी, उस समय लखन को भी मिल गई थी। उसने तो सुन रखा था कि एक पर्मिट के लिए कुछ लोगों को पांच हजार रुपये तक देने पड़े थे,। उसे एक पैसा भी देना नहीं पड़ा था। तभी उसके भीतर यह विचार कौंध गया था कि आखिर ये चुनाव हर साल क्यों नहीं होते ? सामने के मोड़ के बाद लारी की आवाज और रोशनी के मिटते ही लखन ने दाहिनी ओर से आती हुई आकृति को देखा । अमित को पहचानने के लिए उसकी चाल काफी थी। लखन ने अपनी वगल का दरवाजा खोल दिया। भीतर आते ही अमित ने पूछा, 'बहुत पहले आ गए थे ?' 'दस मिनट हुए, होंगे।' लखन ने आधा समय बताया। उसने गाड़ी स्टार्ट की । सात वर्ष की पुरानी टोयोटा अपने साइलेंसर के छेद के कारण घरघराहट के साथ आगे बढ़ गई। काफी निकल आने पर लखन ने जम्हाई ली, फिर कहा, 'कल अगर चाची फिर मेरे ऊपर बरस पड़ी तो क्या जवाब दूंगा.?' 'इस बार यह कह देना कि हम लोग...' १०६ / हड़ताल कल होगी
'सतनारायण स्वामी की कथा सुनने गए थे।'
'तुम गाडी इतनी तेज क्यो चला रहे हो?'
'अपनी नीद और अधिक हराम करना नहीं चाहता और फिर कला
सुवह तुम्हारी तरह पर पर नौ बजे तक ठहरना योई ही है।'
अमित ने चुप्पी साध ली, लेकिन सखन को अपने को नीद से बचाने
के लिए बात करना जरूरी था। उसने कहा, 'जानते हो, जिस झांसीसी
को हवाई अड्डे पर छोड़कर आ रहा हूं, उसने का कहा ? उसके जाने
विचार में हमारे इस द्वीप को अपनी समस्याओं से बचने के लिए मांग
से अधिक गहरा सम्बन्ध स्थापित कर लेना चाहिए। वह रहा था कि
हम लोग फास की भाषा बोलते ही हैं, इस बात के लिए वहा के लोग हमारे
प्रति काफी उदार हो सकते हैं । तुम्हारा क्या खयाल है ?'
अमित चुप रहा। लखन को इन बातों से अलग गाड़ी की रोशनी
में झलककर ओझल हो जाने वाले उन मछेरो को देखकर सोचता रहा.
'ये बस्तियां, ये झोपड़िया"इनको हर चौसट एक अतर मौना बनकर
रह जाती है"वयों ?' जिस रास्ते पर गाड़ी मागी जा रही थी, वह दो
दुनिया के बीच विभाजन-रेखा की तरह था। एक दुनिया यो गोरे मानियों
को, दूसरी दुनिया थी मछुए और मजदूरी की। बारह फट चौडा यह
रास्ता जमीन आसमान का फासला बनाए हुए था।
लखन पूछ बैठा, 'बंगले का पता चला ?'
'सिका है?
'जानीन के चाचा का।'
'जान चुकने के बाद अब क्या करोगे?'
अमित ने इसका उत्तर नहीं दिया।
तीन दिन तीन रात के संघर्ष के बाद ही दह मनमान्दा
लगा पाया था, जहां उसे बन्द रखा गया। काट टिन्टना
ही निकला था कि किसी भी हाल में वह दंना वाटर
पा। दो चीजें यो जो उसको यह विन्दार दे गई मन्नि
गर्जन और वहा को हवा की दहला
दोन
को ला सकी थीं। तंदूर से माती कोयले की गंध और सेगा की वह धुन । इस बात की उसे हैरानी नहीं थी कि यह वंगला जानीन के चाचा का “निकला । जानीन का बाप इतना मूर्ख नहीं था कि वह अपने ही बंगले में उसे कैद रखता। लखन का यह प्रश्न कि अब वह क्या करेगा, अमित को उधेड़बुन में ‘डाल गया था। उसे उस ठौर को हर सूरत में जानना था। वह उसे "जान गया, इसका उसे आत्मसंतोष था। पर अब जान चुकने के बाद वह क्या करे, यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था। कुछ करने के इरादे से वह तलाश में नहीं निकला था। जगह को खोज निकालना बस उसका उद्देश्य था । खोज निकालने के बाद उसका यह संदेह तो कम से कम मिट गया था कि वह काम यूनियन के प्रतिद्वंद्वियों का नहीं था। रास्ते-भर 'लखन उससे यही कहता रहा कि वह मामले को पुलिस के हाथ सौंप दे अन्यथा आगे चलकर यह भयंकर रूप ले सकता है। पहले तो वह यह चाहता रहा कि अमित उसे उन तीनों आदमियों के बारे में ठीक-ठीक बताए । अमित को खुद हुलिया. अच्छी तरह याद नहीं था। याद भी रहता तो वह लखन को न बताता। वह लखन को बहुत अच्छी तरह जानता 'था। अपने टैक्सी चालक मित्रों को साथ लेकर वह हंगामा खड़ा कर सकता था। अमित इस बात को सोच ही रहा था कि लखन बोल पड़ा, 'मैं सालों के दिमाग ठिकान लगा दूं तो मेरा नाम नहीं।' कालेज के दिनों से ही लखन ऐसा था। परिवार के लोगों की नाक में दम कर जाता था। साल भी नहीं हुआ, कैद जाते-जाते बचा था। अभी तो पिछले दिनों की बात है, किसी रेस्तरां के जापानी नाविकों के साथ उलझ पड़ा था। अगर वह चार साथियों के साथ न होता तो उसकी हड्डी-पसली एक होते देर नहीं होती। अमित के बाप के हस्तक्षेप पर 'ही पुलिस से मामले को रद्द किया जा सका था। पढ़ने का सभी अवसर 'पाकर भी नहीं पढ़ पाया। किसी तरह सरकार में अच्छी नौकरी मिल गई थी। वहां तीन महीनों से अधिक टिक ही नहीं सका । नौकरी से हटा दिया गया था उसे । दूसरी बार नगरपालिका में उसे नौकरी दिलाई - . . १०८ / हड़ताल कल होगी गई। यहां भी सात महीनों से ज्यादा नहीं रहा। टक्सी की दुनिया को अपनी दुनिया बनाकर वह खुश था। टक्सी की दुनिया से उसे हटाने की कई कोशिश की गई थी, पर लखन को उस जीवन के सभी सतरों से प्यार था। 'इन सालों को तुम इसी तरह छोड दोगे तो ये इससे भी सतरनाक वार कर सकेंगे।' लसन का यह वाक्य अमित को भीतर से भयभीत कर गया । उस रात की वह धमकी उसके कानों में बज उठी। इसके साथ ही जानीन का वह वाक्य भी गूजा, 'कोई तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकेगा अमित !' दोनो क्षितिज मे ओझल होते सूरज को अन्तिम लालिमा को निरस रहे थे जब जानीन ने यह वाक्य कहा था। उसके वाप ने उसे धमकी दी पी, 'सा वा ते कूते लावी दे से मालाबारलला । तुम्हें तुम्हारा यह हठ महंमा उत्तरेगा जानीन ! इसका दाम कही तुम्हारे उस मालाबार को जान से चुकाना न पड़ जाए। जानीन ने पहले कहा था, 'तुम्हे सावधान रहना होगा अमित !' 'क्यो?' इस क्यों का उत्तर जानीन ने नही दिया था। सूरज की अंतिम लालिमा को निरखते हुए बोली थी, 'कोई तुम्हारा बाल बाका नहीं कर सकेगा अमित !' जानीन का यह वाक्य अमित के लिए अमयदान था। वह उसका जिरहवखतर या। 'लेकिन...' जानीन का वह पत्र अभी भी अमित को जैद में था। उस चिट्ठी के अंगुलियों से छू जाने पर वह भय से सिहर उठा। 'आज मुझे मेरी दादी बता रही थी कि मेरा बाप तुम्हें अपने रास्ते से हटाने के लिए कुछ भी बाकी नहीं छोड़ेगा । कल दादी ने अपने कानों उसे कुछ लोगो से बातें करते सुना था। इस काम के लिए वह हजारों देने को तैयार है"अमित, तुम्हे अपना खयाल रखना होगा, अपने लिए न सही, मेरे लिए ।' पत्र का अन्तिम वाक्य भो यही था, 'मेरा प्यार दोपही कहता है कि कोई तुम्हारा वाल वांका नहीं कर सकता। मेरा प्यार तुम्हारी "रक्षा करेगा।' अंधेरे में पुरानी गाड़ी की घरघराहट और हवा के सांय-सांय के बीच जानीन का यह अन्तिम वाक्य प्रतिध्वनित होता रहा। लखन बोले जा रहा था। अमित का ध्यान कहीं और था। उसके कानों में एक आवाज बजती रही, 'अमित, मैं तो बस एक ही चीज चाहती हूं। मिट्टी के चिराग की तरह मैं सूरज के तेज प्रकाश में खो जाना चाहती हूं। वह सूरज तुम हो, बस तुम । जब भी तुम हैसियत की बात करते हुए मुझे सामन्ती बताने का प्रयत्न करते हो, मैं पीड़ा से अकुला जाती हूं। तुम मुझे सिर्फ उसी रूप में देखा करो जिसमें मैं तुम्हारे सामने हुमा करती हूं। प्यार के अथाह सागर में एक बूंद की तरह विलीन होकर ही मैं अपने को खुशी पा सकती हूं।' अमित को ऐसा एहसास हुआ था कि हृदय प्रायः वही मांगता है, जिसे देने में जीवन अपने को असमर्थ पाता हो। उसने जानीन से पूछा था, 'तुम्हीं बताओ, हृदय का तकाजा आदमी को भावुक वना जाता है या भावुकता हृदय से तकाजा कराती है ?' जानीन ने कोई उत्तर नहीं दिया था। प्रश्न को अच्छी तरह सुनकर वह समझ नहीं पाई थी। १६ किशोर उन पुस्तकों को कभी नहीं पढ़ पाया, जिन्हें उसके लिए किसी और ने पाठ्यक्रम में लाद रखा था। अपनी पसन्द की पुस्तकों की तलाश में वह अनायास ही कला के जगत में खो गया था। कमरे बन्द करके 'पढ़ने का बहाना करता हुआ वह चित्र बनाने में लगा रहता. और इसके लिए अपने वाप से खरी-खोटी भी सुनता रहता। और तभी से एकान्त और बहुत बड़ी खामोशी के बीच ही वह जीता आ रहा था और सृजन करता आ रहा था उसी खामोशी काउस अथाह खामोशी का। ११०/ हड़ताल कल होगी अमित ने उससे कहा था, 'किशोर, मजन का जन्म विटोह से होता है । तुम हो कि अपने आप में बाटे की लोई की तरह हो, इस तरह अपने को आटे की लोई मान लेने के बदले तुम आवाज तो उठाओ । कई बार कलाकार को जनता के सामने चिल्लाकर अपनी कला समझानी पड़ती है।' किशोर हंसकर बोला था, 'मैं मजदूरों का नेता नही हूं अमित ! मेरा विद्रोह शारीरिक नहीं हो सकता। अगर मेरे चित्रों में तुम्हें विद्रोह नहीं दिखाई पड़ता तो फिर समझ लो कि सचमुच ही उन चिों का कोई मोल नही । ऐसी हालत में उसके लिए चिल्लाने से क्या होता है।' यमित को हमेशा ऐसा ही लगा था कि किशोर में लड़ने की शक्ति नहीं थी । मक्ति होती तो मेनका उसके जीवन से इस तरह लुप्त नहीं हो जाती। फिर अमित सोचता कि कही मेनका से वंचित हो उसकी यह दशा तो नहीं थी। मेनका उसका परित्याग कर गई थी। वह उसे छोड़- कर भाग गई थी। ममित उसे उसके चित्रो के नीले रंग के लिए कोसा करता, 'नीले रंग का बहुत अधिक उपयोग करते हो तुम । उससे ज्व पैदा होती है।' 'नीला एक विशेष रंग है अमित । विस्तृत आकाश और सागर की तरह यह भी विस्तृत है । यह विस्तृत वेदना का रग है । यह अथाह का रंग है । रोज का रंग है । गोरे रंग की तरह यह सयोग का रंग नहीं । यह अभिव्यक्ति का रंग है । इमको सीमा नहीं होती, मोर जिमको मीमा नही होती, वह सत्य होता है।' अमित कुछ नही समझकर चुप रह जाता। उसकी चुप्पी पर हंसकर किशोर बोलता, 'कलाकार सभी पागल होते हैं । उनके लिए गुजर चुका कल कभी ओझल नहीं होता, आने वाला कल एकदम स्पष्ट न होकर भी रहस्य नहीं हुआ करता। इन दोनो के बीच की सच्चाई के क्षण के लिए कलाकार को अपना सभी कुछ त्यागना पड़ जाता है और एक तरह के नवनिर्माण लाने में वह 'वह लग जाता किशोर के लिए चित्रकारी संवाद यी। वह चाहता था कि अपने पटिंग्स के माध्यम से वह दर्शकों से बातें कर सके। उसके मभी चित्र - चल्ला-चिल्लाकर लोगों से बातें करना चाहते थे पर सारा कुछ मोना- ताग बनकर रह गया था । प्रतिक्रिया के अभाव को वह असफलता मान ले ? तो फिर अंधाधुंध चलते रहने का क्या अर्थ रह गया था। वह अपनी आत्मशान्ति या अपने को सुख पहुंचाकर खुश करने के लिए सृजन नहीं करता था, उसका आविष्कार दूसरों को कुछ दे सके, इस उद्देश्य से उसने तूलिका थामी थी, रोटी कमाने के तो कई रास्ते होते हैं। फिर पाब्लो पिकासो का वह वाक्य होता जो उसके अपने इर्द-गिर्द के शून्य में प्रतिध्वनित होने लग जाता : .. मैं जब भी एक नई तस्वीर शुरू करता हूं, ऐसा महसूस होता है कि मैं अपने को एक बहुत बड़े शून्य में ढकेले जा रहा हूं। अकुलाता हुआ उस शून्य के ववण्डर से बाहर आकर किशोर अपने सभी चित्रों को देखने लग जाता। एक-एक चित्र उसके जीवन के संघर्ष के साथ जुड़ा था। एक-एक उसके अपने जीवन के दारुण दण्ड और यन्त्र- णाओं का गवाह था। वह अपने उस पहले चित्र को देखता। वह उस समय का चित्र था जब वह मोनेत और सेनाज का अध्ययन कर रहा था। किशोर ने भी अपने उस प्रथम तैलचित्र में मानेत की तरह प्रकृति के स्पंदन को सपाट और परछाइयों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। फिर उसका वह नया चित्र था। दोनों चित्रों के वीच लम्बी यात्रा थी। आर्ट नूवो की रूमानियत के बाद क्यूबिजुम का भी उसने सहारा लिया था। फिर उसको भी त्याग कर रेन्वार के निकट पहुंचने का प्रयल किया था। उसके कुछ चित्रों पर आन्द्रे, नेतो का प्रभाव स्पष्ट था पर स्यूरीएलिज्म की शैली ने उसे अपनी बातें नहीं कहने दी थीं। पिकासो के बाद वह सबसे अधिक प्रभावित दाली से था । एक पत्र के कला- समीक्षक ने उसे दाली का नक्काल तक कह दिया था। उसके पिछले चित्रों से रंगों की गंध अभी गई नहीं थी। उन्हें गौर से देखते हुए वह अपने भीतर एक गर्व-सा अनुभव करता। वह उसकी अपनी शैली थी। अपने रंग अपनी रेखाएं.''उसकी वह खुशी क्षणिक हुआ करती थी। वह अपनी उम्र का खयाल करता फिर एक चित्र से दूसरे चित्र के बीच a ११२/ हड़ताल कल होगी 1 ममयान्तर का खयाल करता। हर एक दूसरे चित्र के बीच युग-युग का अन्तर था । उसे लगता कि वह वहुन बूढा आदमी है । और इमी खपाल के साथ वह अपने चित्रों सामने बैठ जाता, कोई दो-तीन घण्टे बाद ही वहां मे उठने के लिए । एक दिन मनायाम उसके मन में एक विचार आया था। दूसरे ही दिन एक नमे चित्र के साथ वह अमित के मामने पहुंचा। वह उसका पहला चित्र था, जिसमें नीले रंग का अभाव था। चित्र अमित की समझ में नही आया या । उमने पूछा था, 'क्या है यह ?' 'तुमने अच्छा किया अमित, मरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया । नौकरी तुम्हें इस्तीफा देती, इससे तो यही बेहतर रहा कि तुमने खुद पिंड छुड़ा लिया उससे । यह उमी इस्तीफा का चित्र है। जीवन से इस्तीफे का चित्र है" । सरकार की नौकरी और जिन्दगी एक-सी हुआ करती है । दोनों कभी न कभी आदमी को इस्तीफा दे हो जाती हैं। इस चित्र में एक आवृति है, एक काली आकृति । जीवन उसे इस्तीफा दे, इससे पहले वह खुद जीवन से इस्तीफा लिए जा रही है। क्या तुम यह नहीं सोचते अमित कि जीवन आदमी को त्यागपत्र दे, इससे पहले ही मादमी त्याग- पत्र देकर उमसे मुक्त हो जाए।' किमोर की ये बातें अमित को अजीव-भी लगी थी। वह एक अज्ञात आशंका मे भीतर ही भीतर कांपकर रह गया था । किगोर दो कदम पीछे जाकर अपनी रचना देखने लगता, खडा रहता। उमे लगता, उमकी रचना उमे ही देखने लगी थी और वह भी विस्फारित नेत्रों में । और जब उभे अपनी रचना के रंग दहकते हुए प्रतीत होने लगते, तब उसे विश्वास हो जाता कि उसकी रचना में दम था। उसे उमकी सजीवता का भी विश्वाम हो जाता पर फिर भी उसे लगता कि वह कृति संपूर्ण नहीं थी। वह उन कमियो को ढूढने लग जाता और उदास मन से कैनवस के सामने खड़ा रह जाता था। कई अवमरों पर ऐसा भी होता कि वह रचना को दीवार की और उलट देता। इतने पर भी जब उसकी उदासी नहीं जाती तो वह काले रंग से चित्र को लीप देता।
अपने नये चित्र को वह गौर से देखता रहा। उसके मन में कई शीर्पक आए। एक उसे पसंद आ गया था। निराशा पर तभी आशा आ गई थी। 'यह तुम्हारी नई कृति है ?' हां।' 'बहुत सुन्दर है.।'. 'तुम्हारे बारे में तो यह कहा जाता है कि तुम झूठ कभी बोलती ही नहीं। 'मैं झूठ नहीं बोल रही। 'सचमुच यह चित्र तुम्हें पसंद है ?' 'तभी तो कह रही हूं। 'तब तो इसका शीर्षक बदलना पड़ेगा।' 'क्यों ? क्या शीर्पक रखा है इसका ?' 'रखने की सोच ही रहा था ।' 'क्या?' । 'निराशा' । पर यह नाम अच्छा नहीं।' 'मुझे तो 'निराशा' असम्बद्ध लग रहा है।' ''आशा' कैसा रहेगा ?' आशा मुस्करा कर रह गई थी। 'कोई तीन सप्ताह बाद ही आशा उसके पास पहुंची। किशोर अपनी नई रचना पर काला रंग पोत रहा था। 'यह क्या कर रहे हो किशोर ?' 'असफलता का मुंह काला कर रहा 'असफलता कैसी?' 'यह रचना सफल नहीं रही। 'तुम लोग कलाकार हो, खुद पारखी क्यों बन जाते हो ?' 'यही तो एक उपाय है कल के अच्छे चित्र के लिए । अगर मैं इससे मोह कर बैठा तो फिर सफलता दूर ही रह जाएगी।' 'अपने सृजन के साथ इतनी बेरहमी ?' ११४ / हड़ताल कल होगी 'यही बेरहमी तो वह कार वाला भी करता रहा है। कितनी अपूर्ण और असफल कृतिया उसने बनाई हैं।' 'भगवान को क्यों कोसने लगे? 'कोम नही रहा हूं। समीक्षा कर रहा हूं।' इसके साथ ही वह जोर से हम पड़ा। उसकी वह हंसी आमा को हैरत में डाल गई । वह हंसी जैसे किशोर की अपनी हंसी नहीं थी। उम हंसी मे एक गूज यो" "हृदय विदारक गूज । वह आशा को एक डर-सा दे गई। १७ क्यूपिप छोड़ते ही अमित ने ड्राइवर की सीट ले ली थी। बगल में जा बैठने पर जानीन को उस ठंड का खयाल आया। अमित को उस बारीक कमीज में पाकर पूछना चाहा कि कोट या कोई पुल-ओवर क्यों नहीं लिया था उसने । चाहकर भी उसने नहीं पूछा । न पूछने का बस यही कारण था कि वह अमित के उत्तर का अन्दाजा लगा सकती थी। दो पिछले अवसरों पर उसने अमित से टाई न वापने का कारण पूछा था और दोनों अवसरो पर अमित ने फांस फेनन के स्वर में कहा था कि टाई बांधकर वह अपने को नवसाम्राज्यवाद का कठपुतला बनाना नहीं चाहता था । दोनों बार जानीन हंसकर रह गई थी। जानीन की पेजो को अमित पहली बार नहीं चला रहा था, फिर भी उसके चलाने से ऐसा लगता था कि अभी दो दिन पहले वह ड्राइविंग लाइसेन्स लेकर माया हो । उसको उस तरह सावधानी बरतते देय जानीन वजह पूछ बैठी थी। और अमित ने कहा था कि प्रोलेटेरियट के हाथ में जब बुर्जुआ गाड़ी आ जाती है तो ऐसा ही होता है । इसपर भी जानीन रग- कर रह गई थी । अमित अपनी गाडी क्यूपिप के फिलिंग स्टेशन पर छोड आया था । मेकेनिक के यहां से निकल आने के बाद अमित को अपनी पा गाड़ी अपनी गाड़ी-सी नहीं लगती थी। इंजन में एक गड़बड़ी रह ही गई थी। इस पेजो को चलाते हुए अमित के जेहन में खयाल कौंध गया । अपने अन्तर को हर जगह बनाए रखने के लिए आदमी ने अपनी बनाई हुई चीजों के बीच भी भारी अन्तर पैदा कर दिया है। हर चीज की अलग जाति थी, अलग हैसियत थी, जिससे आदमी के बीच का वह अन्तर और भी विस्तृत होता चला जा रहा था । अमित को अपना यह खयाल अच्छा नहीं लगा। उसने उसे पीछे छोड़ दिया। गाड़ी की रफ्तार बढ़ आई थी। आधे घण्टे की ड्राइविंग के बाद कार तोम्बो-वे ने उस ठौर पर रुकी जहां इलाके का बस-टर्मिनस था। कार को मूलमोहर के नीचे छोड़कर दोनों ने उस ऊंचाई से खाड़ी पर एक सरसरी नजर दौड़ाई और मिट्टी काटकर बनी सीढ़ियों से नीचे उतरे। ढिठोड़ी के पेड़ के पास बैठा वह आदमी उनके पास आ गया । उसीकी उस पुरानी नाव में चढ़ कर दोनों ने नदी को उस स्थान पर पार किया जहां वह समुद्र के पानी से मिलकर अपने को अस्तित्वहीन कर गई थी । नाविक के हाथ में एक रुपया रखकर अमित ने जानीन का हाथ थाम लिया। बाल पर चलते हुए दोनों उस स्थान पर पहुंच गए, जहां कुछ बच्चे किनारे उतरी हुई छोटी मछलियां फंसाने में लगे हुए थे। कुछ ही दूरी पर दोनों बैठ गए। कार वहां अदृश्य थी पर मुड़िया पहाड़ सामने था। जानीन ने अमित से पूछा कि इतने सुन्दर स्थान का नाम मौत की खाड़ी क्यों पड़ा। फिर उसे याद आया कि यही वह स्थान था जहां वर्षों पहले इतिहास के उन प्रथम नाविकों में पीटर वोथ की नाव फंसकर डूब गई थी। अपने साथ लाए ट्वीस्टीज के दोने को जानीन ने अमित के हाथों पर रख दिया । उसे खोलकर अमित ने चार-पांच ट्वीस्टीज अपने हाथों में रखे और जानीन को थमा दिया। आधे घण्टे के बाद दोनों ऊपर आए। वहां से आगे का रास्ता लिया। प्वेत-ओ-पिमां के समुद्री इलाके से होते हुए वे त्रु-ओ-बीश पहुंचे। वहां की सैलानी वस्ती के चक्कर के बाद वे मों स्वाजी रुके । जानीन ने घड़ी देखी, दस बजने को था। डिकी से तौलिये निकालकर जानीन ने झावे की छाया में बिछाया। अमित ने कोकाकोला की बोतल खोली। जानीन को -- थमाते हुए बोला, 'घूम आते हैं फिर बंगे।' दोनों अपने-अपने हाथों में कोकाकोला की बोतलें थाम वान पर चल पड़े। ममन्दर शीशे की तरह साफ था। छोटी-छोटी लहरें उठ रही थी। मेडिटरेनियन क्लब की रंगीन पाल वाली नावें दौड़ी चली जा रही थी स्को का प्रशिक्षण लेने वाला व्यक्ति हर दूसरे क्षण पानी में उलट जाता था। जानीन को हंसी आ रही थी। अमित गम्भीर रहा । उसकी नजर उन पाच औरतों पर चली गई थी जो मोस्वाजी के विशाल मैदान की एक पगडंडी से सिर पर पास के वोझ लिए वस्ती को लौट रही थीं। एक और ये औरतें थी, दूसरी ओर मेडिटेरेनियन क्लब के सामने वीच पानी का वह छोटा-सा द्वीप जिसमें तैरने के उन हलके कपड़ों के वोझ को भी त्यागकर लोग मुक्त थे। उम न्यूडिस्ट कैम्प की औरतों के साथ जानीन ने सिर पर पास के बोन लिए औरतों की तुलना की । लगा कि तुलना की कोई वजह ही नहीं थी। वे दो अलग दुनिया पी-दो अलग दुनिया के लोग 1 दोनो अपनी चप्पलें गाड़ी के पास छोड़ आए थे । फेनिल तरंगें उनके पांवों में टफरा-टकराकर टूट रही थी । पानी बर्फ की सी ठंडक लिए हुए था । नमित से हाथ छुड़ाकर जानीन दो कदम दौड़ी और दूध-नी सफेद बालू पर बैठ गई । अमित भी उसके पास बैठ गया । बैठ जाने से अमित को मामने का समुद्र और भी विस्तृत जान पडा । जानीन ने अपनी बाहें अमित की गरदन में डाल दी । अमित के हाथ की खाली बोतल को उसमे लेकर उसने उसे अपनी बोतल थमा दी। दो पर्यटक किसी भाषा में शात करते हुए मामने से गुजरे। 'अमित, हम दोनों एक बार रोयुनियन टापू धूम आए।' 'इन मलनियों को देखकर ऐसी इच्छा जागी क्या ?' 'यही सोच लो।' 'तुम तो नकल पसन्द नही करती।' 'एक दीप में दो अजनबियों के रूप मे हम अपने को अलग और अकेले महसूसते । 'वह तो यहां भी महमूस सकते हैं।' हड़ताल कल होगी/ ११७ 'यहां वह पूरी स्वतन्त्रता कहां? कल मेरा वाप मुझपर फिर विगड़ रहा था।' - 'तुम भी तो असम्भव करना चाह रही हो।' 'अमित, जे तां प्री । कृपया ऐसी बात मत करो।' 'जानीन, सच्चाई को नकार कर उसके लिए लड़ने से क्या होता है ? उसे स्वीकारती हुई लड़ो। 'अमित, तुम फिर असम्भव-अन्तर और न जाने कौन-कौन सी बातें करोगे । 'तुम वह चिट्ठी देखना नहीं चाहोगी जो कल की डाक से मुझे मिली है ? 'फिर?' 'हां?' अनाम ?' 'हां, अनाम ।' 'देखू ? 'अभी नहीं जानीन...।' 'मैं देखू अमित !" 'हमारे खाने का प्रोग्राम कहां है ?' 'रोश-न्वार।' 'तुम्हारे बंगले में ?' 'हां।' 'तो फिर वहीं खाने के बाद उसे पढ़ना।' ग्रां की वस्ती में कार की रफ्तार को कम करके अमित ने कहा, 'देख रही हो जानीन ! दाईं ओर की ये झोंपड़ियां ! ये उन लोगों की दुनिया है जो हमेशा से यहां रहकर जूझते रहे। और यह बाई ओर समुद्र की गोद के ये आलिशान बंगले । यह उन लोगों की दुनिया है जो कहीं और रहते हैं और यहां बस अवकाश के क्षणों में आते हैं।' गाड़ी की रफ्तार और भी कम हो जाने पर गीयर को सेकण्ड में डालते हुए अमित ने उसी गम्भीर स्वर में आगे कहा, 'गली के दाहिने ११८ / हड़ताल कल होगी छोर मे बायें तक फामला चार पगो का है, पर इम छोर के और उस छोर के बीच का फासला जमीन-आसमान का है। यह फासला रवड़ के फीते की तरह है। समय के माथ यह और भी बढता जाता है। इन बंगलों के कारण इन छोटी कुटियो को जो सब से बड़ा फायदा पहुंचता है, वह जानती हो, क्या है ? गुरु के आधे दिन इन कुटियों के आंगन में धूप पहुंच ही नहीं पाती। इधर के बच्चे बंगलों की छाया में पलते हैं।' इन अन्तिम वाक्य को अमित ने ठंड के कंपन के साथ कहा । प्रांवे के नीले समुद्र की उन रंग-विरंगी नावो को देखते हुए जिनके मूल्य से द्वीप के गरीबों को वर्षों तक सिलाया जा सकता था। अमित सिहर उठा था । कार फिर से अपनी स्वाभाविक रफ्तार ले चुकी थी। दो मिनट के लिए वे दोनो पेरेवेर के पब्लिक बीच के पास रुके। विविध नीलापन लिए समुद्र काच के टुकड़ों की तरह झिलमिला रहा था । जानीन को इस ठौर का एक सूर्यास्त का दृश्य याद आ गया। उस दिन उसका भाई भी बगल में था । बोला था, 'इतना सुन्दर मूर्यास्त संसार मे कही नही होता होगा।' दोनो आगे बढे । केप मालेरे में पहले के स्थान पर ठिठककर दक्षिणी सागर के छोटे द्वीपों को देखते रहे । जानीन ने कुछ फोटो भी लिए। वहा से आस लारे और ग्रा गोब होते हुए वे सीधे जानीन के वाप के बंगले पहुंचकर रुके। झावे और नारियल के पेडो के झुरमुट के बीच था वह बंगला । गाड़ी के फाटक मे प्रवेश होते ही दो तरफ से दो कुत्ते भोंकते हुए गाडी के आगे आ गए। जानीन पर नजर पडते ही दोनो पूंछ हिलाने लगे । बंगले का रखवार भी सामने आ गया । कार से उतरते हुए जानीन ने रखवार से कहा, 'जगलाल, डिकी से सामान निकाल लो।' सामने काली चट्टानों में समुद्र को भारी-भरकम लहरें दहाडती हुई आवाजो के साथ टकराकर तितर-बितर हो रही थी। अमित को उन ज्वारभाटों की ओर एकटक ताकते पाकर जानीन ने 'मैं घुटनों के बल चलती थी। तब से इस सगीत को सुनती आ रही हूं। ये मुझे सुलाती थी थपकिया दे-देकर । कुछ और बड़ी होकर उन लोरियों में कुछ और ढूढने लगी थी। उस सगीत का अथं मुझे बहुत देर से मिला । अब तो यहा अकेले आने पर अपने भीतर कुछ विस्फोट होना कहा, हड़ताल कल होगी/ १११ चाहता है । आज तुम साथ आए हो, देखती हूं इन लहरों में संगीत आज क्या कहेगा।' बंगले की भव्यता देख कर अमित आश्चर्यचकित था । भीतर पहुंच- कर हर चीज को शहर पहुंच आए गंवार की तरह घूर रहा था और जानीन अपनी धुन में अपनी ही कहे जा रही थी, 'यहां के तट पर नंगे पैर दौड़ने में आनंद आता है । लहरों के दूधिया झाग पांवों में गुदगुदी कर जाते हैं। आटे की तरह चिकनी सफेद बालू की ठंडक सिहरन दे जाती है और..." अमित ने उसकी बातें काटकर पूछा, 'जानीन, इतना बड़ा बंगला साल में सिर्फ बीस-तीस दिन रहने के लिए? तुम इसमें खो नहीं जातीं? अपना होता तो बोझ-सा लगता।' जानीन हंस पड़ी, 'अपना भी होता तो बोझ ही सा लगता।' 'पर है तो तुम्हारा ही। 'मेरे वाप का है। 'तुम्हारे वाप की चीजें तुम्हारी नहीं क्या ?' 'जरूरी नहीं कि वे मेरी भी हों।' 'इन सारी चीजों को नकार जाने की शक्ति है तुममें ?' 'क्यों नहीं।' 'आदी हो जाने पर...' 'वह बहुत कमजोर आदमी होगा जिससे आदत नहीं छूटती।' 'तुम मुझे यहां क्यों लाई ?' 'रास्ते में पड़ता था। सोचा...' 'आराम से बैठकर खाना खा ले''जानीन, इस तरह का माराम सभीको नहीं भाता है। कुछ लोगों को इससे छाती फटने लगती है। सारा कुछ खाई दरार-सा प्रतीत होने लगता है।' अमित की गरदन में बांहें पहुंचाकर जानीन ने अपने होंठों से उसकी आवाज को जब्त कर दिया। वंगले से कुछ दूरी पर जहां चट्टानें विस्तृत नहीं थीं और ज्वार- भाटे प्रलयंकर नहीं थे, दोनों ने स्नान किया। धूप में बैठे रहे । बंगले को १२०/ हड़ताल कल होगी लौटने पर दोनों ने साने की मेज को सजा हुआ पाया । जगलाल ने सारा कुछ गरम कर दिया था। घर पर खाना तयार करते समय राधिका ने अमित में कहा था, 'उसने पूछना मत भूलना कि कौन-सी बीज उमे मवसे अच्छी लगी। इसीलिए माने समय अमित पूछना नही मूला, कैसा है ?' 'चम्पा भी हमारे यहा ये चीजें कभी-कभार पकाती है पर इतना अच्छा कभी नहीं। साने के तुरन्त बाद जानीन ने अमित से बह चिट्ठी मांगी निमकी चर्चा वह मों स्वानी में कर चुका था । जंगली धादाम की धनी छाया के नीचे बैठकर जानीन ने यह चिट्ठी पढी। अमिन उसके चेहरे को लाल होते देखता रहा । पत्र ममाप्त करके उसने अमित की ओर देखा । दोनो चुप रहे, फिर जानीन ही पहले बोली, 'इसमें तो धमकिया भी है । इन धमकियों के लिए पुलिस में...' "मुझे धमकियों की चिन्ता नहीं है"इममें जो गालियां हैं, वह एक व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि एक पूरी जाति को हैं"सच पूछो तो मुझे इससे घाव लगा है जानीन, इसमे तो यही लगता है कि बीमवी सदी के इस वैज्ञानिक युग में भी कुछ आदमियों को आदमी नहीं समझा जाता। कुछ बातें कभी तो ऊपर आ ही जाती है।' जानीन की आंखें एकाएक डबडबा आई थी। अमित ने उसके हाथ से वह चिट्ठी लेकर उसे फाड दिया। 'मुझे अपने बाप में इस तरह की उम्मीद नहीं थी अमित ! 'यह पत्र कोई और भी तो लिख सकता है।' अपने आंसुओं को टपका देने के लिए जानीन ने आंखें दूसरी ओर धुमा ली। ठीक एक बजे दोनो वंगला छोडकर आगे बढ़ें। मेवर्ग के रास्ते में ममुद्री इलाके की छोटी-छोटी बस्तियो की उन झोपड़ियों की ओर जानीन का ध्यान आकर्षित कराते हुए अमित कह रहा या, 'मायद इन दृश्यों को तुमने न देखा हो। यहां से गुजरी तो जरूर होगी पर ऐमा होता है जानीन कि हम पास मे गुजरकर भी इन दृश्यो को नहीं देख पाते। मेवगं तक जानीन कुछ नहीं बोली। हडताल कल होगी/१२१
घण्टे-भर वाद वह ग्री-ग्री का क्रूर दृश्य था, जहां जानीन ने अपनी
बामोशी तोड़ी, 'मैं छोटी थी तो यहां आने से डरती थी। लगता था, ये
पहाड़ से उफनते ज्वारभाटे मुझे दवोचकर सागर में विलीन हो जाएंगे।'
ज्वारभाटे की झटास दोनों के ऊपर से निकल गई।
उस झंझावात्. के पानी से जानीन एकदम भीग गई। अमित थोड़ा
पीछे था इसलिए उसके केवल पतलून का कुछ भाग भीगा था। गीले
कपड़ों में जानीन सिमट गई। अमित को वह बेहद अच्छी लगी । अमित
उसे एकटक देखता ही रह जाता अगर उसे यह खयाल न आता कि
जानीन भीगे कपड़ों से बीमार हो सकती थी। चट्टान की आड़ में जानीन
ने ऊपर के कपड़े उतारे और अपने को तौलिये से लपेट लिया। सागर
दहाड़ता रहा। दोनों चट्टान के ऊपर धूप में बैठे रहे : 'अमित, इन लहरों
के प्रण को कोई तोड़ सकता है क्या ?'
'उनके प्रण को कोई नहीं तोड़ सकता, पर."
'चुप क्यों हो गए ?'
'ये लहरें इन चट्टानों को भी कभी नहीं तोड़ सकतीं।'
'चट्टानों में कन्दराएं तो बना देती हैं ?'
'यह सही है।'
'हमें भी कोई नहीं रोक सकता अमित क्यों, तुम इस तरह चुप क्यों
हो ?' बादलों की मोटी परतें सूरज के ऊपर आकर ठिठक गई । जानीन
को ठंड लगी। वह अमित से चिपक गई, 'अमित...'
इस एक शब्द में अमित को जैसे अपने समूचे भविष्य की हिलोरें
मिल गई हों।
१८
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किशोर की मेज पर ताश के पत्ते विखरे पड़े थे।
वह उन पत्तों से स्काइस्क्रैपर बनाने में लगा हुआ था ! पत्तों की वह
१२२ / हड़ताल कल होगी
इमारत दो वार लुढक चुकी थी। वह तीमग प्रयाग कर रहा था। अपने गिलाम का कोकाकोला पी चुकने के बाद अमित उमे एकटक देना रहा । उसके तीनों प्ररनो में मे विभोर ने एक का भी उत्तर नहीं दिया था। अपनी सिगरेट के टुकडे को अपफूटे रासदान में छोड़ते हुए उगने पिछले प्रश्न को दोहराना चाहा पर वैमा करता कि इससे पहले विभोर नै सिर उठाकर उसकी भोर देसा, 'अमित, तुम जानते हो, मैं कौन 1 'एक बहुत अच्छे कलाकार हो तुम ।' 'विना मान्यता वाला।' 'जरूरी नहीं कि मान्यता और कला के बीच विशेप मम्बन्ध हो । किशोर ने नीचे के ताग के पत्तों की कतार में एक पने को गोर दिया । बाकी सभी पत्ते मेज पर लुढ़क गए। मुम्कराते हुए उसने वहा 'मैं चिड़ी का ग्यारह नम्बर हू ।" 'चिड़ी का ग्यारह नम्बर ताश के पनी में होता ही नहीं।' 'मैं वही हूं, जो नहीं हुमा करता । वही नहीं हुमा करना।' 'यह तुम्हारे हताग-निराश होने की प्रतिक्रिया को नहीं हो सकता ममत्व प्रेम की प्रक्रिया है क्या ?' किशोर फिर से ताग के पत्तों का स्का:-स्पर बनाने में लग गया अमित और जानीन की उस दिन की यात्रा -ओ-शेफ के पास ममार हुई थी। वह मृगकुण्ड ज्वालामुखी की याद दिलाता या । जानीन : अमित में पूटा था, 'इम प्रमुप्त ज्वालामुमी में भी धगर बंगारे निकल लग जाएं तो?' 'टमी दिन भेद-भाव मिटेगा 1 उसी दिन मनी एक स्वर में रक्षा गुहार करेंगे । कोई गरीव न होगा, कोई धनी नहीं होगा। सौ., न कोई वहा । उस दिन की यह प्रलय विनोको नहीं दगा। वह रंग देवेगान हैमिस्त, न बद देखेगा न पद देनगा ...।' जानीन हैरत के माप अमित को देगती रह गई दी। टा हड्तान पल होनी उत्तर को वह समझ न सकी। उस समय ढलते हुए सूरज की लालिमा पश्चिमी आकाश को तर किए हुई थी। ठंड बढ़ आई थी। जानीन की अमित से विलग होने की इच्छा नहीं हो रही थी। विलग होने से क्षण-भर पहले की जानीन की उन बातों से अमित को भी उतनी ही हैरानी हुई थी जितनी कि उसकी बातों से जानीन को हुई थी, मैं तुम्हें प्यार करती हूं अमित, इसलिए मेरी बात को भावुकता और संवेदना का विशेपण बड़ी आसानी से दिया जा सकता है, लेकिन अगर मैं तुम्हें प्यार न भी करती तो यह प्रश्न मेरे समूचे जीवन की नींद को हराम कर जाने के लिए पर्याप्त था कि आखिर क्या कारण है कि इतने लम्बे इतिहास के दौरान रंग के भेद को इस तरह बरकरार रखा गया है ? विश्व-भर के इतिहास और साहित्य में जब प्यार ने किसी दीवार को अपने सामने टिकने नहीं दिया, तो फिर यह कैसा अपवाद है कि यहां की वह दीवार आज भी ज्यों ही त्यों है ? तुम तक पहुंचने के लिए अगर मैं इस दीवार को नहीं फांद सकी तो उसे अपनी लाश पर ढह जाने दूंगी।' अमित अवाक् उसकी ओर देखता रह गया था। भर्राई हुई होकर भी वह आवाज किसी और की न होकर जानीन की ही थी। 'अमित एक बात मेरी समझ में नहीं आती। सुना है और पढ़ा भी है कि हर धर्म, हर साहित्य में प्यार को पवित्र कहा गया है तो फिर इस पवित्र वस्तु को लोग इस तरह दुत्कारते क्यों रहते हैं ? दुनिया भर की जो प्यार-कथाएं हैं, सभी दारुण यन्त्रणाओं की कथाएं हैं. ऐसा क्यों ?' 'इसीलिए तो वह पवित्र माना जाता है।' जानीन अमित के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुई थी, पर चुप रह गई थी। उसी रात अमित की मां काफी देर तक अमित के कमरे में बैठी रही थी। उसने कहा था, 'मैं तो तुम्हारी सभी बातें मान चुकी और अब भी मैं उस बात पर विश्वास नहीं करती. 'मैं तो अभी भी यही फहूंगी कि यह न कभी हुआ है और न कभी होगा।' 'मां, तुमने कभी माना था कि आदमी चांद पर भी पहुंच सकेगा ?' . १२४ / हड़ताल कल होगी 'यह दूसरी बात है अमित!' 'नही मां, वही सम्भव और असम्भव वाली बात है।' 'सर, तुम भी असम्भव को सम्भव बनाकर दिखाओ तो सही मैं अगर एक क्षण के लिए इसे सम्भव भी मान लूं तो क्या मेरे एक प्रश्न का उत्तर दोगे?' 'पूछो।' 'और तुम 'वह लड़की तुम्हारे घर आकर किस धर्म को मानेगी ?' 'जो उमकी मर्जी।' ?' 'जो मेरा धर्म है, वही। "और तुम्हारा बच्चा ?' अमित चुप रहा। उसकी मा ने अपने प्रश्न को दोहराया, 'उसका क्या घमं होगा? 'दोनों धर्मों के प्रति आदर ही उसका अपना धर्म होगा।' 'वह हिन्दू कहां तक रहेगा।" 'हम कहां तक हिन्दू हैं मा संर, मां, मैं तुम्हें सही बात बता ही दूं। अभी कहूं तो वह हिन्दू धर्म अपनाने को तैयार है, पर में नहीं मानता कि धर्म बाजार का कोई कपड़ा है कि आदमी जब चाहे उतार या पहन ले । मैं चाहता हूं कि जानीन हिन्दू बनने का वह दिखावा न करे जो बन एक साड़ी पहनकर माथे मे टीका लगा लेने से होता है। वह उस हिन्दुत्व को जीए, जो ऊपर की नहीं, भीतर की चीज होती है।' 'बेटा, युछ लोग कालेपन और सांवलेपन को बदसूरती मानते हैं, उसी तरह कुछ लोग वस गोरेपन को ही सुन्दरता मानते हैं।' 'नही मा, मैंने गोरेपन को सौन्दर्य नहीं माना है। मैंने प्यार को सुन्दर माना है।' 'ठीक है अमित!' वह अपने कमरे को लौट गई थी। उसके चले जाने पर अमित को ऐमा लगा था कि उसकी मा के सामने बातें अधूरी रह गई थी । जाती हुई अपनी मा की आतों में उसने झांक लिया था। वह नाराज नहीं थी। - . हड़ताल कल होगी/ १२५ । उन आंखों में वही भाव था, जो अमित हमेशा से देखता आ रहा था। वह छोटा था "सर्दी के मौसम में मां के सामने आईसक्रीम का हठ करने पर उसकी मां की आंखों में यही भाव हुआ करता था ! अमित के आईस- क्रीम खा चुकने के बाद उसकी मां उसे घी-मधु पिला देती थी। जानीन को अब तक वह अपनी मां के सामने सिर्फ इसलिए नहीं लाया था कि वह चाहता था कि उसकी मां अपनी ओर से यह इच्छा प्रकट करे । सुबह अमित चारपाई पर ही था, जब उसकी मां भीतर आ गई थी। अमित को लगा था कि मां रात-भर सोई नहीं होगी। उसकी आंखों में एक हलकी लाली थी। आते ही वह बोली थी, 'मैं उस लड़की को देखना चाहती हूं।' 'जानीन को?' 'कोई दूसरी लड़की भी है क्या ?' 'तुम कहो तो आज ही शाम उसे तुम्हारे सामने ला खड़ा करूं ।' 'मंगल की शाम उसे ले पाना।' मां यह कहकर चली गई थी। अमित खुश हो गया था। राधिका जब चाय लिए ऊपर आई थी तो अमित ने उसके दोनों कंधों को पकड़- कर झकझोर दिया था। चाय छलक गई थी। चादर और फर्श की ओर देखती हुई राधिका वोली थी, 'यह तुम्ही साफ करोगे ।' राधिका की उस मुस्कान को उसने नहीं देखा जो कमरा छोड़ते समय उसके होंठों के बीच थिरक आई थी। राधिका के चले जाने पर अमित अपनी अस्त-व्यस्त पड़ी चारपाई पर बैठ गया। सोचा' 'प्यार भी विचित्र .''नहीं, प्यार नहीं प्यार कैसे विचित्र हो सकता है ? पर हां, उसका असर विचित्र होता है । अमित उस असर की गुदगुदी को महसूसता रहा। वह बस महसूसने के लिए ही थी। उसकी कोई अभिव्यक्ति सम्भव नहीं थी। किशोर को भी वह शायद अपने ऊपर के इस असर के भाव को न बता सके । किशोर कलाकार था । अमित अगर थोड़ा भी बताता तो वह समझ जाता, पर क्या बताना था, यह तो उसे मालूम होता? कभी तो वह सोचता था कि प्यार के लिए उसके पास समय ही कहां है । और जव समय मिला तो पहला प्रश्न जो उसके भीतर पैदा हुआ था. वह यह . १२६ / हड़ताल कल होगी था कि अब कही यही मेरा ममय न ले बैठे । बब उमे लगता कि उनमें एक ताजगी मा गई घो"सक्रियता और स्फूति आ गई यो। उसका होमला बढ़ आया था। अपने मजदूर मित्रों के लिए लड़ने का हौसला। नमित ने जानीन में कहा था, 'मेरी लड़ाई जिन लोगों के साथ है, उनमें तुम्हारे बाप का नाम भी आता है।' 'जानती हूं।' 'बुरा नहीं मानती?' 'वह लड़ाई तो तुम्हें करनी ही थी "इम वहाने नहीं तो दूसरे बहाने।' अमित ने प्यार की कहानियां देखी थी'"सुनी थी, जिया नहीं या और जब तक जिया नहीं था, यही सोचता था कि एक वार किमी लड़की को चाह लेने पर आदमी अपने को अलग चीजों में काट लेता है "दुनिया पीछे छूट जाती है और वह उस लड़की के साथ या तो किसी बहुत बड़े जंगल में खो जाता है या किसी बहुत बडे रेगिस्तान में पहुंच जाता है, जहां में अपनी दो परछाइयों के मिवाय कुछ और दिखाई ही नहीं पड़ता। उनकी वह धारणा कितनी गलत थी, आज वह अपने माहौल को और भी स्पष्ट पाकर ममझ सका था । यह जूझना भी उसे अच्छा लगता था। उसकी मां कहती तुम्हारा प्यार एक असम्भव प्यार है । वह दुबी होकर कहती थी । अमिन को असम्भव का दुख नहीं था। हर असम्भव मे ही तो उमे जूझने का अवनर मिलता था। मम्भव के लिए क्या जूझना पा? और फिर आदमी को अगर जूझना न पड़े तो यह जी कैमे सकता है ? दम घुटने लगेगा । अकुलाहट पैदा हो जाएगी और... १९ जिस कमरे में भरकर की कोठी और मिल-मालिकों की बैठक हुई, वह जानीन के कमरे की दगल में पड़ता था। बाल्कनी की ओर खिड़कियों के खुले रहने के कारण उधर की सभी बातें जानोन सुन पाई थी। बातें हड़ताल कल होगी/१२७ इसलिए भी स्पष्ट सुनाई पड़ी थीं क्योंकि कभी कुछ आवेश में और जोरों के साथ बोला जा रहा था। सभी कुछ सुन चुकने के बाद जानीन ने सोचा था कि ये सारी बातें वह नहीं सुन पाती तो अधिक अच्छा होता । शैम्पेन की बोतल के खुलने की आवाज के साथ ही वह अपने कमरे से बाहर हो गई थी। पश्चिमी वाल्कनी के ताम्बे की छड़ों के सहारे खड़ी वह सूरज को ओझल होते देखती रही । एकाएक बहुत दिनों के बाद उसे घर के प्यानो के सामने बैठने की इच्छा हुई । नीचे पहुंचकर वह उस काले चमकीले प्यानो को गौर से देखती रही फिर उसके सामने जा बैठी । यह वाद्य उसके घर की सबसे पुरानी चीजों में था । इटली के फ्लोरेन्स में बना हुआ यह प्यानो इस घर में एक वाद्य के रूप में न होकर सौन्दर्य प्रसाधन के रूप में अधिक था। प्यानो के नोटों पर उसकी अंगुलियों के पहुंचने से पहले कई धुनें उसके कानों में गूंज गई । एक धुन उसके मस्तिष्क में आकर चिपक गई। वह थी एगन एण्ड वाइटिंग की 'टिल वी मीट एगेन'। और जानीन की अंगुलियां प्यानो पर थिरक उठीं। चम्पा ने पीछे से आकर कहा कि मादाम उसे प्यानो से हट जाने को कह रही हैं । जानीन घर के दूसरे प्यानो के सामने पहुंची। यह नया प्यानो उसका वाप फ्रांस से खरीद लाया था। प्यानो के सामने क्षण-भर खड़ी रहने के बाद जानीन के अपने भीतर की चाह ही शिथिल पड़ने लगी। वह लौटकर फिर से अपने कमरे को आ गई। मीटिंग रूम की बातें अब तक कोलाहल का रूप ले चुकी थीं और सात व्यक्तियों की आवाजें साठ की आवाजें-सी लग रही थीं। जानीन ने अपनी दोनों खिड़कियां बन्द कर लीं-कोलाहल से अधिक ठंड से बचने के लिए। उसे लगा कि आज हमेशा से अधिक ठंड थी। बाहर हलकी वारिश थी इसलिए वह मेजों ब्लांस नहीं जा सकी थी। दो सप्ताह से वह विलकुल क्लव नहीं गई थी। उसके कई साथी उससे मिलने घर आ गए थे। जानीन की अनुपस्थिति की वजह से रीयुनियन टीम के साथ वह वाली-बाल का मैच भी नहीं हुआ था। कल जब उसकी सहेलियां उसे घसीटे मेजों ब्लांस ले १२८ / हड़ताल कल होगी जाना चाह रही पी, उस समय उसने आज पहुंचने की बात कहकर उन लोगों में पीछा छुड़ाया था। पिछली बार वह अमिन को अपने माप लिए वहा गई यो। उमके गायियों की प्रतिक्रिया ने स्पष्ट था कि मभीको यमित की उपस्थिति बटकी थी। उमी सन में वह स्थान जानीन को चलने-मा लगा था । आज न जा मरने का दमे दुव नहीं था । होटर बॉन करके यह अपने कमरे में बैठी रही। घंटे पहले मीटिंग रूम में जो आवाजे माई यीं, उनकी प्रतिध्वनिया उनके दं-गिदं होती रही। वह उमके अग्ने वाप ही का स्वर या, 'मरवार को धमकाने के लिए एक मरल आय ते. वही होगा कि हम उमे अपने दिवालियेपन की सूचना दे दें। 'मका एक उनटाप यह भी हो मकता है कि सरकार मिल परीदने पर उतर आए और यगर ऐमा हो गया तब तो फिर लेने के देने पड़ जाएंगे।' 'सरकार के पास इतना दम कहा ?' 'अगर मरवार इस बात में महन मकती है तो फिर मुझे कोई एतराज नहीं।' जानीन दम दार्तालाप के मंदर्न को अच्छी तरह जानती पी। सभी क्षेत्रों के मजदूर्ग की तनख्वाह में वृद्धि हुई थी। वह केवल शक्कर उद्योग पा, जहा मजदूर याज भी उसी हालत में थे जिनमें वर्षों पहले थे, जय आदा- चावल आधे दाम में आते थे। बहुन मारी बातें न ममा मकने के बावजूद भी जानीन कम मे कम एक बात तो अच्छी तरह ममा गई थी। शक्कर उद्योग के पास धन का कोई अभाव नहीं था। इधर विश्व मंडी में पक्कर के दाम बढ़ने मे दनकी आमदनी नात-आठ गुनी अधिक हो चली थी। मजदूर्ग के हक को ये लोग सुगी-चुनी दे सकते थे, इसमे दनको तिजोरिया ज्यों की त्यों भरी पड़ी न्ह मरती थी। पर न देने का एक ही कारण था। इन लोगों की अपनी हानि पी कोई बात तो पी ही नहीं तो फिर ? सम्बे तर्क के बाद अन्न में जानीन को एक उत्तर तो मिल ही गया था । वह यह मानने को विवश थी कि चीनी उद्योग की ये हस्तियां यह नहीं चालीं कि मजदूर की दशा में कोई मुधार आए। उसमें सुधार लाने का मतलव होगा, एक दूसरे वर्ग का इन्न । यही बात उन्हें गवारा नहीं थी। हडताल कल होगी। १२६ पागकार उद्योग को इन लोगों ने जिरा वर्ग को गंदा गिया था, वह सिर झुकाए आज्ञा पालन पारने वाला वर्ग था । एक ऐसा वर्ग जो हर बांट-उपट पर हाथ जोड़गार सामने खड़ा हो जाता था। दशा सुधार के बाद यह वर्ग मालिक और नौकर गो अन्तर 'गो पाम पारणे पगार उद्योग की हस्ती फो गटिगागेट कर सकता है । इरा आशंगा की गई जानीन पहले भी अपने वाप रो सुन तुगी थी। उधर अगित भा। उधर जानीनarn दोनों का संघर्ष के बीच भी यह । और बीच से दोनों छोरों को देखती हुई यह अपने-आपरो प्रश्न पर बैठती, 'अगर अमित नहीं होता उस दूसरे छोर पर तो क्या यह मेरा अपना गाहौल गुझे ऐसा ही लगता, जैसा आज लग रहा है ? इरा एकाएक गोपिनीनेपन का आभारा नया संवेदना है ? तो फिर ?' जिरा तरह उराके गाई प्रश्नों को उत्तर नहीं हुभा मारते, ठीक उसी तरह इराका भी कोई उत्तर नहीं रहा । उत्तर के अभाव में भी प्रश्न पैदा होते ही गए । अमित पा यह पाहना गया सही नहीं कि मजदूरों को गाम उनके अधिकारों से वंचित नहीं रखा जाता बल्लिा, उन्हें भीतर से गार डाला जाता है ? उनने हुदय और उनकी आत्मा की हत्या कर दी जाती है ? जानीन के भीतर जो पहला विचार पैदा हुआ था, पह था अपने लोगों को समझाने का प्रयत्न करना उनसे यह कहना कि उस पहली पड़ी रो जो पूठ मजदूरों के साथ बोला जा रहा है, उसे रोक दिया जाए। पर कौन सुनता उरो ! उसकी दादी ने तो यहां तक कह दिया था कि गधे पा यो गधा होता है, पोड़ा नहीं । दूरारा खयाल जो उराको आया था, पापा अमित के साथ होकार उसके संघर्ष को अपना संपर्प बना जाना और और फिर। इससे आगे यह सोच ही नहीं पा रही थी। जिरा रामय जानीन को यह ज्ञात हुआ था कि यह अगित मो प्यार करती है, उस समय उसने यह सोचा था कि उसे एक दीवार गो तोड़ना भा'"रंग के भेद को मिटाना था। पर इधर अगित मे बहुत अधिक परीव पहुंमगार यह सोचने लगी थी कि दीवार एक ही नहीं थी. अनेक १३० / हड़ताल पाल होगी थी। किस-किस को तोड़े ? इससे पहले भी तो इन दीवारों को गिराने के प्रयास होते रहे हैं. ये तो टूटती और बनती रहती हैं। अमित उमे उन व्यक्तियों के बारे में बताता जिन्होंने इस देश की दासता की दीवारों को तोड़ा । बाज जानीन ने अपने-आपको सुना तो क्या उस दीवार के ढहते ही गुलामी सत्म हो गई ? यह वह नाज भी मौजूद है नया जामा पहने ? कमरा गर्म हो चला था । जानीन कोच पर उसी तरह बैठी रही। वह इन सारे प्रश्नों को किसीके मामने रखना चाहती थी। किसके मामने रखे ? अपने बाप के सामने रखने का कोई मतलब ही नहीं था। मां के सामने रखे तो वह बरस पड़ेगी-दुनिया भर की चिंता को अपने मिर क्यों लिए फिर रही हो? सचमुच वह उन चिंताओं से मुक्त रहकर भी तो जी सकती है, फिर ? जो तो मकती है पर शायद उसे उस आनंद से वंचित रह जाना पड़े जो वह चाह रही थी, यह तो अपने जीवन में अमित को पाने से पहले ही वह सोचा करती कि हर एक को खुशी देखकर जो खुगी होगी, वह कितनी बड़ी होगी ! एक दिन उसने अपने-आपसे पूछा था कि चम्पा के पास अपनी जमीन का एक टुकडा, अपना एक छोटा-सा घर होता तो ? कितनी खुशी होती चम्पा को और उसकी उस खुशी से खुद वह कितनी खुश होती ! लेकिन चम्पा की वह खुशी किसके हाथों गिरवी थी? कम से कम एक बात तो स्पष्ट थी "एक आदमी का घर दम वीघा जमीन घेरे हुए था और दूसरे आदमी को पांव रखने की जगह नहीं थी । उसकी मा उससे कहती, 'अपने हाथ देस, तुम्हारी सभी अगुलिया वरावर नहीं।' अपनी मा की इन दलीलो के सामने वह चुप रह जाती, उन्हें बच्चो की दलील मानकर । और उसकी मा उसकी चुप्पी पर खुश हो जाती । सोचती, वह जानीन को प्रभावित कर सकी थी। सूरज डूब चुका था। उसका मध्यम प्रकाश अब भी वातावरण में लिपटा हुआ था। नारियल के झुके पत्तो के छोर पर चोचे अपने ग्योतो में झूल रहे थे । जानीन भी अपने को उमी तरह अनिश्चित मे झूलती पा हड़ताल कल होगी। १३१ रही थी। चम्पा ने दरवाजे के पास से आवाज दी, 'मामजेल तेलेफोन !' जानीन ने दरवाजा खोला और चम्पा के आगे-आगे दो-दो करके सीढ़ियां उतर गई। अमित का ही फोन था वह । 'जानीन, तुम्हारी लाइन खराब थी क्या ?' 'नहीं तो।' 'तीन बजे से लगातार तुम्हें ट्राई कर रहा हूं।' 'शायद...।' 'खैर, छोड़ो' 'कल मुझे नौकरी से हटाए गए कुछ मजदूरों की समस्या पर जांच करने निकलना है तुम मेरा इन्तजार न करना।' शनिवार को।' 'मैं फोन करूंगा । आज रात क्या कर रही हो?' 'कुछ नहीं। घर पर हूं।' 'आज रात टेलीविजन पर एक सुन्दर हिन्दी फिल्म आ रही है। जरूर देखना।' 'कौन-सी फिल्म ?' उस दिन तुम पूछ रही थीं न कि इण्डियन फिल्मों के कौन-कौन-से प्रतिवद्ध डायरेक्टर हैं जो अपनी फिल्मों में मानव मूल्यों को उकेरने में सफल रहे हैं ? सम्भवतः यह फिल्म देखने के बाद तुम्हें...'. 'पर अमित, मैं समझ पाऊंगी?' 'जिन चीजों को मैं चाह रहा हूं, तुम समझो, उन्हें समझने के लिए भापा दीवार नहीं बन सकती है। तुम फिल्म देख तो लो फिर उसपर बात करेंगे।' 'नाम नहीं बताया तुमने ?' ''वन्दिनी'।' ''वन्दिनी' का क्या अर्थ होता है ?' 'ला प्रिजोन्येर । इसका संगीत भी तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा।' 'जरूर देखूगी।' टेलीविजन के हिन्दी कार्यक्रम के समय जानीन के घर स्थानीय कार्य- क्रम की जगह पर रीयूनियन के कार्यक्रम देखे जाते थे। कभी भूल से - १३२./ हड़ताल कल होगी अगर हिन्दी कार्यक्रम सामने आ जाता तो जानीन का बाप, उसकी मां तया उमकी दादी तक नाक मिकोड़ने लग जाते और जानीन म बात को कभी नहीं ममझ रुकी थी कि हिन्दी के प्रोग्रामों में उन लोगों को इतनी चिढ़ क्यों थी। मापा न समझने के कारण ? अगर ऐसा होता तो फिर दुनिया भर के अन्य संगीन चाव से क्यों सुने जाते थे? उमका नाई जब यहा पा तो हर वक्त मेक्मीकन, इटालियन और स्पेनिग गानों को गुनगुनाता रहता था जबकि उन गानों का एक शब्द भी वह नहीं समझता था। रात को जिम समय स्थानीय टैली पर हिन्दी फिल्म थी, ठीक उनी ममय बो० आर० टी० एफ० पर एलफेड हिचकाफ को कोई फिल्म थी। जानीन के लिए यह आसान नहीं या कि वह टी० वी० सेट के नामने बैठे अपने मां-बाप की हाजिरी में हिन्दी फिल्म देख सकती, पर उमने तय कर लिया था कि वह उस फिल्म को अवश्य देखेगी। २० जानीन का वाप कैनवस के जिन मफेद जूतो को पहनकर टेनिस खेलने जाता, वे एक सौ पचहत्तर रुपये के थे । खेल-कूद के सामान वाली विशेप दुकान मे उसने उन्हें खरीदा था । जानीन गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठी नाताली सारोत का उपन्यास पढ रही थी। अपाया साद रुपये के सफेद जूते पहने काम पर ना गया था। जानीन का वाप सुबह के टेनिम के रियाज बाद लौटा था। सपाया के पाव के जूतो पर नजर पड़ते ही उसने कडककर पूछा था: 'ये जूते कहां से मिले तुम्हें ?' 'साहब, चीयीन की दुकान मे खरीदे हैं।' इसपर जानीन के बाप ने जेब से अठन्नी निकालकर उसके सामने फेंक दी थी, 'उठा लो इमे । मैं चाहता हूं कि तुम इससे काले रंग का । हड़ताल कल होगी /.१३३ शू-पालिश खरीदो। और कल मैं तुम्हारे जूतों को सफेद देखना नहीं चाहता । समझे या नहीं ? अपाया सकपका गया, जानीन चुप रह गई । एक खोलने वाली चुप्पी थी वह। वह किशोर के उस नये चित्र को देखता रहा । रंगों की अस्पष्टता के बीच एक बैंगनी आकृति 'लम्बी गर्दन और अनुपात से बहुत अधिक बड़े-बड़े उसके दो हाथ । अपनी ही गर्दन दबोचते हुए वाहर आ गई आंखें, फिर भी होंठों पर बुद्ध जैसी मुस्कान। अमित ने किशोर से पूछा, 'क्या है यह 'मेरा नया चित्र।' 'यह तो मैं भी देख रहा हूं, पर ?' 'यह इस्तीफा है'जीवन से इस्तीफा यानी कि आत्महत्या ।' अमित दहल गया। ?' अपाया. फूतों की क्यारियों के बीच निराई में व्यस्त था । गुलमोहर के पत्तों के बीच की नन्ही खिड़कियों से शाम की किरणें जहां-तहां वेसुधी की हालत में पड़ी हुई थीं । आस्तेरिक की पीठ पर हाथ फेरती हुई जानीन गौरैया की जोड़ी को जलाशय की मुंडेर पर जमा पानी में नहाते देख रही थी । गरमी के मौसम की खामोशी शाम बोझ की सी प्रतीत हो रही थी । आमड़ा के नंगे पेड़ पर इने-गिने पीले पत्ते वाकी थे। वाग के फूल भी गरमी की अकुलाहट लिए थे। पिछवाड़े के काले पेड़ के सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट स्पष्ट थी। जानीन उसीको सुन रही थी। हवा थम जाती। खड़खड़ाहट बन्द हो जाती। फिर एकाएक आवारा हवा के झोंके से खड़खड़ाहट नुकीली सुई की तरह उसके कानों में चुभ जाती और उसके सोचने की प्रक्रिया में झटका लग जाता। फिर हवा बन्द हो जाती। गरमी की शाम की वह खामोशी गहरी बन जाती और वह उसमें गहराई १३४ / हड़ताल कल होगी . । तक डूब जाता कल रात उसके बाप के ये थप्पड़.."उसके गाल गरम हो गए है.. उमके यहां पार्टी थी। कोटी को आमदनी दुगनी हुई थी । उगयी दो खुगियां कही और मनाई जा चुकी थी । ईश की कटाई अभी पराकाष्ठा पर थी फिर भी फसल के इतने शानदार होने की सुशी इतनी सीमित नहीं हो सकती थी। यह तोमरी पार्टी थी। पिछली दोनों में अपनी मां के बहुत विवश करने पर जानीन को जाना पड़ा था। वह यहां से ऊब- कर लौटी थी। तीन ही दिन बाद उसके अपने ही घर उसके ऊबने का दूमरा अवमर था । वह विशाल कमरा भरा हुआ था। वे सभी एका तरह के लोग थे."एक तरह की सासें थी उनकी । जानीन अपने से बस इतना पूछकर रह गई थी कि क्या वह भी उन्ही लोगो में से थी? पार्टी से पहले ही उसकी माबोल पड़ी थी कि दावत अधिक लोगों को दी जा चुकी थी। सभी आ गए थे। जानीन उस भीड़ की चिपचिपाहट में अकुला उठी थी। तीन-तीन, चार-चार की टोलियों मे लोग इस तरह बातें कर रहे थे, जैसे सुनने वाले बहरे हो। हंसी से छत हिलती-सी प्रतीत हो जाती । एअर कडिमान्ड कमरे में भी लोगो को पसीना आ रहा था। पसीने की गन्ध से सौन्दयं-प्रसाधन की सभी गध दब गई थी। बहुत अधिक आवाजें थी, बहुत अधिक उल्लास, बहुत अधिक चहलपहल । जानीन वहा से हटकर वरामदे आ गई थी। बरामदे के स्तम्भो से चिपकी बेलो के पास खड़ी हो गई थी। वह तीमरा व्यक्ति जामुनी रंग के कोट में उमी रग की टाई बांधे उसके सामने आ खड़ा हुआ था । जानीन उसे जानती थी। जान्दे मार्गों ने उसका परिचय जानीन से कराया था। तीन महीने पहले मुलाकात के पहले अवसर पर ही उसने जानीन के होंठो को चूम जाने की कोशिश की थी। उस घडी से अब तक उसने कई कोशिशें की थी। उसकी सासों से आती हुई फासीसी सिगरेट की गंध से जानीन को सामें भारी हो जाती । वह दूर भाग जाती । जानीन फिर मे भीड़ के बीच लौट गई थी। उसका मन बार-बार अपने कमरे को लोट जाने को करता रहा था। उसके बाप ने पहले ही कह दिया था, 'पार्टी के समाप्त होने से पहले तुम उसे नहीं छोड़ सकती।' । हड़ताल कल होगी| १३५ कठिनाई से लोगों के बीच चलने-फिरने का रास्ता था। कठिनाई से किसीकी बात समझ में आ रही थी। कठिनाई से वह सांस ले पा रही थी। वह एक जगह रह रुकना नहीं चाहती थी। हाथ में सेंडविच का प्लेट लिए वह इधर से उधर टहल रही थी। उसकी कोई सात-आठ सहेलियां थीं लोगों के बीच, पर सभी व्यस्त थीं । मेहमानों की देखभाल और परोसने के लिए लाफलोर से सात आदमी आए हुए थे। सफेद लिबास में ये ही सात व्यक्ति थे जो लोगों के रंग से भिन्न रंग के थे। जानीन सोच उठी थी इसीलिए तो वे जश्न में शरीक न होकर सेवा में लगे हुए थे। गोरा रंग सेवा लेने के लिए होता है, काला रंग सेवा करने के लिए। अच्छा कानून था यह ! सेवा करने वाला सबसे बूढ़ा आदमी था वह, जिसके हाथ से ट्रे छूट गया था। गिलास के टुकड़ों को उठाते हुए उसकी अंगुली कट गई थी। खून वह चला था। जानीन ने दौड़कर उसके हाथ को अपने हाथ में ले लिया था। उसके कंधे के तौलिये से वह खून पोंछने लगी थी कि तभी उसका वाप सामने आकर उस व्यक्ति पर बरस पड़ा था। जानीन को खींचकर उसने अलग कर दिया था । कल रात का यही दृश्य जानीन के जेहन में चिपका हुआ था। हट ही नहीं पा रहा था। उस व्यक्ति की उस पीड़ा को वह जूझ रही थी। वह आदमी चुप रह गया था पर उसके भीतर बहुत बड़ी पीड़ा थी। जानीन उस पीड़ा को देख चुकी थी । अव भी देख रही थी। जानीन के लिए वह स्थिति एक बहुत बड़ी चुनौती थी। किसी दूसरे व्यक्ति की पीड़ा को सहने की चुनौती। उसकी अपनी आंखों के सामने जो घना अंधेरा रह-रहकर छा रहा था, वह कुछ न होकर उस काले आदमी की वह पीड़ा ही थी। अब उससे जूझते हुए जानीन की छोटी-बड़ी सभी धमनियों में वही पीड़ा होने लगी थी। रात उसे नींद नहीं आई थी। न जाने किस अकारण खयाल के साथ वह काला आदमी अमित की यादों के साथ जुड़ गया था। यह उस पीड़ा को अन्त तक झेलना चाह रही थी। उसे अन्त तक झेलकर वह अमित के साथ जुड़ सकती थी। वह सोचने को विवश हो गई थी कि उसे उस लड़ाई में शामिल होना था जिसे आदमियत के नाम होना ही है। वह होता भी रहा हो। और १३६ / हड़ताल कल होगी हर बार किसी बड़े शून्य में खो जाती होगी। उसकी जीत की कभी चर्चा ही नहीं होती या तो"। कुछ भी हो, कल रात का वह दृश्य उसकी हड्डियों तक को भेदता हुआ भीतर प्रवेश कर गया था। वह अपमान उमका अपना भी था । वह उम निरीह आदमी के साथ जुड़ गया था। इससे पहले न जाने कितने लोग इस तरह पीड़ित हुए होंगे । बाज उस आदमी की पीड़ा को वह वाट पाई थी। समझ सकी थी कि वह दर्द कितना बड़ा ददं था। उसका संकल्प शक्ति पा गया था। चम्पा सामान की टोकरी लिए दुकान को जाती दिखाई पड़ी। आस्तरिक को नीद आ गई थी। आपाया घूप को माथे पर थामे निराई किए जा रहा था । पत्तों की खडखडाहट रह-रहकर हो ही जाती थी। गौरया की जोड़ी डैनी से पानी झाडने लगी थी। जानीन अपने खयातों में खोई रही। उमके भीतर ज्वारभाटे-सी कोई चीज उठती रही, उसकी यादों से टकराती रही। उसके मस्तिष्क से टकराकर वे खयाल टुकड़े होकर छितर जाते और उसका हर अणु टुकड़ा ज्वारभाटे की तरह उसे विचलित कर जाता । विचलित होकर ही मजग हो पाती और उसमें देखने-समझने की चेतना आ जाती, यथार्थ को पहचान की स्थिति में आकर वह अशान्त हो चली थी। जिस दायरे में वह थी, उससे बाहर आकर खड़ा होना चाहती थी। उसका अपना ही स्वर था वह, जो उसे सुनाई पड़ने लगा था, 'आदमी को आदमी के हाथ इतना दण्डित होना पड़े ? इसलिए कि जो दमदार हो, उसके लिए कमजोर को दबाना नियम बनकर रह गया है ? यह कानून कंब तक रहेगा? और फिर यह रंग की प्रमुता क्या आज भी पुरानी नहीं हुई ? तो फिर कव होगी? चांद पर वसेरा के बाद? 'कही ये सारी बातें में केवल इसलिए तो नही सोच रही कि अमित का पक्ष लेना है मुझे ?' तर्क का एक पहलू और सामने आता। पर तभी कई पुरानी घटनाओं को याद के माथ उसे स्मरण होता कि इस तरह की भावना तो अमित को जानने से पहले से उसके भीतर थी। उसने अपने को अमित के हवाले इसलिए थोडे ही कर दिया था कि उसका रंग । हड़ताल कल होगी/१३७ .. । उससे भिन्न था। अमित में उसने जो भिन्नता पाई थी, वह रंग की न होकर व्यक्तित्व की थी। उसने उस व्यक्ति को दूसरों के लिए आंग में कूदते देखा था। इस भिन्नता को उसने महत्व दिया था। यह एक ऐसी भिन्नता थी जो उसने अव तक नहीं देखी थी। इसीलिए इस भिन्नता के आदरस्वरूप उसने रंग का अन्तर नकार दिया था । अपनी दादी से वह बारम्बार पूछती रह गई थी कि आखिर. इसमें भावुकता की क्या बात थी। अंधेपन का क्या प्रश्न था । इज्जत के बनने- बिगड़ने की क्या नौवत थी। जो प्रश्न वह अपने वाप से नहीं कर सकी, उन्हें अपनी दादी से करती रह गई थी। गोरा होना अगर देवता होनी है तो फिर गोरे आदमियों के बीच चोर, खूनी क्यों होते हैं ? अत्याचारी और हक मारने वाले क्यों होते हैं ? काला आदमी नफरत के काविल होते हैं तो फिर अपने मालिकों के प्रति उसकी वफादारी और उसके परिश्रम के फल को भी नफरत कहकर नकारा क्यों नहीं जाता ? जानीन रात सोई नहीं थी। दिन-भर भी वह सोचती रह गई थी। अपाया की स्वामिभक्ति को मूर्खता समझने लगी थी । उसके अपने भीतर तनाव-से आ गए थे। उसके सोचने का ढंग अपने संतुलन को खो चुका था, फिर भी वह अपने को सोचे जाने से रोक नहीं पा रही थी। उसने अपनी मां से पूछा था, 'अमित के पास अगर वह सभी कुछ होता जो हमारे पास है तो क्या उस समय तुम उसे हमारे परिवार के योग्य समझ सकती ?' उत्तर में उसकी मां बोली, 'मक्खी हाथी के बरावर हो जाने के बाद भी दूध में गिरकर मक्खी ही रहेगी और उसे उसी तरह निकाल फेंकने में ही बुद्धिमानी है।' जानीन ने उस बुद्धि मानी को समझने के प्रयास में अपनी सभी बुद्धि खपा दी थी। उसके उसी प्रश्न के उत्तर में उसके चाचा ने कहा था, 'तुम कुछ भिन्न कर जाने के चक्कर में अनर्थ पर तुल गई हो।' उसी शाम उसे पादरी के सामने खड़ा कर दिया गया था । पादरी ने उससे कहा था, 'तुम नादान हो वेटी "इस उम्र की यह छोटी-सी भूल । १३८ / हड़ताल कल होगी
बाद में तुम्हें पहाड़-मी प्रतीत होगी।'
उसने अपने-आपमे पूछा था, 'कनी नादानी, कमी मूल ?'
पादरी उमे परमात्मा के उपदेश सुनाने लग गया था।
उमकी चाची कह गई थी, 'इनकी झाड़-फूंक होनी चाहिए। कोई
मलामत मवार है इसके कार।'
जानीन को ऐमा लगा कि चारों ओर मे लोग उसे पकड़े हुए थे। वह
अपने को छुड़ाकर भागना चाहती थी। उसकी निगाह आया पर टिकी
रही । उसके जनम मे पहले में वह उसके परिवार की खिदमत में था।
चालीम माल पहले माली या, साज भी माली था।
गौरया की जोडी उड़ गई।
बसाया के शरीर पर पनीने की बूदें चमकती रही।
पार्टी में एक दिन पहले जानीन ने अपनी मां को जीतने का प्रयास
किया था। वह चाहती थी कि उसकी मां उसकी दात को स्वीकार जाए
और उसकी वकालत कर जाए उसके सामने। घर में उसकी मां की बातें
कई अवनरों पर चल जाती थी, वह इसलिए कि आज जानीन के बाप के
पाम जो कुछ या, उसकी तीन-चौयाई में ऊपर जानीन की मां को अपने
बाप की मृत्यु पर मिला था।
'अमित से मुझे विलग करना असम्भव है मामा !'
'अठारह माल की मभी लड़कियां यही भाषा बोलती हैं।'
'पर सभीकी माया झूठी नहीं होती होगी मा !
'झूठी नहीं हुआ करती 1 भावुकता की क्षणिक्ता लिए होती है।'
'सभी तो नहीं हुआ करती मामा !'
'तो फिर वह एक एंमा छ होता है जो उसे वही का नहीं छोडना।'
'मामा, तुम मब एक बात जान लो" मैं किसी भी हालत में तुम
लोगों की आपत्ति को नहीं मानूगी।'
'तुम भी यह जान लो जानीन कि तुम्हारा काप भी किमी भी हालत
में वह नहीं होने देगा जो तुम चाह रही हो।'
'तुम भी वही करोगी मामा ?'
'और क्या कर सकती हूं"तुम्हें खाई में कूदने दू?'
हड़ताल कल होगी/१३६
'तुम मेरी एक बात समझने की कोशिश तो करो। मैं अमित को प्यार करती हूं और मुझे कोई रोक नहीं सकता।' 'तुम्हें केवल वही मिला था ?' 'लगता तो ऐसा ही है मामा ! मेरी समझ में एक बात नहीं आती "कि उसमें क्या कमी देख ली है तुम लोगों ने ?' 'और तुमने क्या खासियत देख ली है उस दो कौड़ी के आदमी में ?' 'मैंने तो तुम्हें पापा से भिन्न समझा था । तुम तो उसीकी भाषा बोलने लगी।' 'जो इस देश में कभी नहीं हुआ, उसे तुम क्यों करना चाहती हो ?' 'यही तो मैं तुमसे पूछना चाहती हूं मां कि इस देश में आज तक ऐसा क्यों नहीं हुआ ? क्या वजह है इसकी ? किसने किसको अपने योग्य नहीं समझा ? किसने किससे घृणा की है और क्यों ?' 'तुम मुझसे बहस करना चाहती हो क्या ?' 'नहीं मामा मैं तो वह पूछ रही हूं जो मैं नहीं जानती।' 'जानीन, आखिर तुम्हें हो क्या गया है ?' 'मुझे कुछ नहीं हुआ है मां, मैं तो सिर्फ यह चाहती हूं कि तुम मान जाभो न मेरी बात को।' 'मैं तुम्हारी उस बात को कैसे मान जाऊं जिससे तुम्हारा अहित हो ? मुझे अगर किसी बात की चिन्ता है तो वह केवल तुम्हारे भविष्य की है और कुछ नहीं । तुम्हें मेरी बात अजीब भी लग सकती है क्योंकि आज- कल की औलादें अपने बड़ों को अब वह महत्त्व नहीं देतीं जो हमने कभी अपने बड़ों को दिया था। फिर भी जानीन, मैं तुम्हारा अहित नहीं होने दूंगी। मैं...' उसकी आवाज एकदम वदल गई थी। जानीन से तुरन्त नहीं बोला गया। कुछ थमकर ही उसने आगे कहा, 'प्यार से किसीका अहित कैसे हो सकता है मां ? मैं तुम्हें दुख नहीं पहुंचाना चाहती । सिर्फ अपनी खुशी मांग रही हूं। तुमसे "तुम मेरी मां हो।' 'काश सचमुच वह तुम्हारी खुशी होती ! 'फिर तो मेरे लिए जानना अभी वाकी रह गया कि खुशी क्या होती १४० / हड़ताल कल होगी है। जिसमे आदमी प्यार करे, उसे खोखली इज्जत और बेबुनियाद अन्तर के लिए मुला देना हो खुनी होती है क्या? मा, मैं तुम्हें दुप नहीं पहुंचाना चाहती, पर..' 'तुम मुझे दुखी नहीं कर रही पर कल खुद अपने को दुसी करके मुझे दुख पहुंचा जाओगी। एक तो पहले ही से मुझसे दूर है और तुम पाम होकर भी। मैंने मोचा या और तुम्हारे पाप से कहा भी था कि मैं तुम्हें मना लूगी।' 'किस चीज के लिए मामा ?' 'अपने जीवन को एक ग्रासदी बना जाने से ।' 'अपना जीवन तो उस वक्त त्रासदी बन जाएगा जब सचमुच ही तुम लोग मुझमे अमित को छीन लोगे।' इस वाक्य को जानीन ने बच्चे का सा स्वर में कहा था। 'बचपन से तुम ऐमी थी जानीन, कभी भी तुमने अपनी हैसियत को पहचानने की कोशिश नहीं की। तुम छोटी थी, रघुनाथ को हमें नौकरी से इस बात के लिए अलग करना पड़ा था कि तुम उसकी लड़कियों के साथ सभी अन्तरों को पाटकर खेला करती थी। यह वात घर में किसीको पसन्द नहीं थी । तुम अपने जूठे उन बच्चों को खिलाती थी और उनके जूठे खुद साती थी । अपने को तुमने कभी नहीं पहचाना जानीन ! यही कारण है कि तुम आज इतनी दूर भटक आई हो । अभी भी देर नहीं हुई है, तुम अपने जीवन को विपाक्न होने से रोक लो।' 'मत्र तो हो चुकी मामा 'मेरा जीवन अव मेरा नहीं रहा।' 'तुम हम सभीको ले डुबोगी।' 'मैं दूंगी नहीं मां "इतना विश्वास तो मुझे है।' सामने आमड़ा का निपाती पेड़ या । जानीन को विश्वास था, पेड़ को वह स्थिति स्थायी नही थी। उसे विश्वास था, उसमें पत्तों से पहले फूल आएंगे।
२१ 'किशोर, मैं जानीन. को अपना सर्वस्व मानता हूं। सोचता हूं, अगर मेरे जीवन में नहीं आई तो मेरा जीवन न जाने क्या बनकर रह वह जाएगा।' 'तुम उससे शादी करना चाहते हो ?' 'हां किशोर, चाहे इसके लिए कुछ भी करना क्यों न पड़ जाए।' 'शादी इतनी जरूरी होती है क्या ?' अमित उसे देखता रह गया था। उसकी उन उदास आंखों में अमित जो पढ़ पाया, वह जानीन और उसके अपने सम्बन्ध की स्वीकृति नहीं थी ''कुछ और था। किशोर अमित को पत्र लिखने बैठ गया। 'अमित, हम एक-दूसरे के. कितने पास हैं ! पर कभी ऐसा भी लगता है कि हम एक-दूसरे से बहुत अधिक दूर हैं। तुम्हें ऐसा नहीं लगता क्या ? आज अचानक एक चित्र बनाते-बनाते ऐसा खयाल आ गया। कई बार ऐसा भी हुआ है कि विना जताए हम एक-दूसरे की भावना को परख गए हैं और कभी उसे समझने में इतने असमर्थ रहे हैं गोया हम सात समुद्र पार के फासले में रहते हों । वही बात कभी मुझे अपने और अपने चित्रों के बीच भी महसूस होती है। मेरे अपने ही चित्र मेरी अपनी आत्मा से जुड़े होने पर भी मुझे समझ में नहीं आते । क्या हैं ये चीजें ? इसके साथ ही सभी कुछ अर्थहीन हो. जाता है। ऐसी ही अर्थहीन अवस्था में मैं आशा के निकट पहुंचा था। मैंने यात्रा का एक-चौथाई भाग तय किया था और आशा तीन-चौथाई पूरा करके मेरे पास आ गई थी। उसे अपनी यात्रा निष्फल लगी फिर भी वह जाती रही, आती रही। हर बार एक नई आशा के साथ । १४२ / हड़ताल कल होगी इस एक बात को तुमसे जरूर छिपाना रहा । पर क्या सचमुच तुम इनमे अनभिज्ञ रहे ? मुझे ऐसा नहीं लगता । लगता है, तुम्ही कुछ छिपा गए। आज आशा फिर आई थी। फिर वह चारपाई एक दीवार बन गई। वह दीवार, जिसे आमा तो फांद सकती थी पर मैं नही फाद सकता था। वह दीवार के उस पार रही, मैं इस पार । अमित, तुम सम्भवतः मैरी इम कमजोरी को मेरे इस अधूरेपन, इम अपूर्णता को जानते भी होगे। पर तुमने जताया नही, शायद इसलिए कि कहीं उससे मेरी मान-हानि न हो जाए । तुम्हें याद है, हम दोनो साय गए ये महात्मा गांधी संस्थान उस यमरीकन कवि की कविताएं सुनने ? यस, उसकी वह कविता, जिसमे उस अंधे का जिक्र है, जो सुना करता था बड़ी लगन से संगीतकार के संगीत को जबकि उसकी पत्नी इस चाह में कि कोई उसे देख सके, खिड़की के पास खड़ी अपने कपड़ो को उतारा करती थी। उन लोगो के लिए जो गलियों से निहार तो सकते थे, पर उसे छू नही सकते थे। आशा मेरे एकदम पास थी, पर मैं दूर था उतनी ही, जितना गली के वे लोग थे, नगे की पत्नी के स्ट्रीपटीज देखने वाले...' मैं आशा को छू नहीं पाता । और...।' किशोर ने लिखना रोककर चिट्ठी पढ़ी। मन मे न जाने क्या आया, उनने उसे टुकड़े-टुकड़े फाड़कर हवा के हवाले कर दिया। जानीन के बहुत कहने पर ही अमित बंगले पर पहुचा था । उसने यह नहीं चाहा था कि जानीन उससे दुबारा कहे कि किसीकी क्या मजाल कि मेरे होते तुम्हें कुछ कह सके । जानीन ने उससे यह कहकर फोन रख दिया था कि वह बंगले पर उसकी प्रतीक्षा करेगी, वह शीघ्र ही पहुचे । कार स्टार्ट करते हुए अमित ने यही सोचा था कि वह वहा पहुचकर जानीन को उस नादानी से रोक ले । जानीन अपने बाप की चेतावनी की अवहेलना कर रही थी और अमित उसे नादानी समझने को वाध्य था ।
। अपनी गाड़ी से उतरते ही उसने जानीन से कहा था, 'चलो, यहां से लौट चलें। और जानीन ने उसी स्वर में पूछा था, 'क्यों ?' 'तुम्हारा वाप यहां पहुंच सकता है और...' 'और क्या ?' 'यहां से कुछ ही दूरी पर एक बहुत ही सुंदर जगह है। वहां हम शान्ति से एकाध घंटे बैठकर बातें कर सकते हैं।' 'और यहां?' अमित के चुप रह जाने पर जानीन खुद बोली थी, 'यहां भी शान्ति से बातें कर सकते हैं अमित !' 'कर तो सकते हैं और शायद नहीं भी कर सकते।' 'तुम इतमीनान रखो, यहां कोई भी हमारी शान्ति भंग के लिए नहीं आएगा।" 'अगर उलटा हुआ तो...?' 'मुसीवत उठानी पड़ेगी। 'मुझे अपनी नहीं, तुम्हारी चिन्ता है।' 'कुछ नहीं होगा अमित !' बंगले के आगे जंगली वादाम के पेड़ तले दोनों जा बैठे थे। सागर की हिलती-डोलती तरंगों के टुकड़ों पर सूरज की किरणें कांच की तरह चमक रही थीं। समुद्र का रंग विविधता लिए हुए था। नीलापन कहीं गहरा था, कहीं हलका । कहीं हरापन था कोमल पत्तों का रंग लिए हुए तो कहीं सफेदी और कहीं पीलापन की छाप लिए । मूंगों और चट्टानों की लंबी- सीधी कतार से टकराती हुई बड़ी-बड़ी लहरें थीं । वहुंत दूर तीन नावें थीं, सफेद पालों वाली। आकाश विना वादलों का था। लहरों की आवाजें थीं। 'बंगले का रखवारा?" 'जगलाल हमारे लिए खाने का प्रबंध करने गया है।' 'जानीन, तुम... । कब तक यहां रहने का इरादा है ?' १४४ / हडताल कल होगी 'यहां से पूर्णमासी का चाद परात की तरह बड़ा दिखता है।' 'देखने का इरादा रखती हो क्या ?' 'हमेगा उसे अकेली देखती आई हूं। आज दोनों साय देखेंगे।' 'वह तो सात-आठ से पहले नहीं दिखेगा।' 'टिके रहेंगे तब तक ।' 'जानीन, 1, तुम स्थिति को और भी नाजुक कर रही हो।' 'तुम मुझे अपने घर ले जाने वाले थे। मां से मिलाने वाले थे।' 'तुमने अवसर ही कहा दिया।' 'तुम जानते हो अमित, समुद्र की गहराई किस बात का प्रतीक है ?' 'नहीं तो।' 'प्यार की गहराई का प्रतीक होती है समुद्र की गहराई । जिस 'तरह समुद्र की गहराई अथाह होती है, उसी तरह प्यार भी अयाह होता है।' 'समुद्र जब अयाह था तव था, अब थोड़े ही है ?' 'दो डुबकियां लगाकर विज्ञान ने जो पाया है, वह बहुत बड़ी गहराई हो सकती है, पर वह समुद्र की थाह नही हो सकती । उसको नही पाया जा सकता। 'और प्यार की थाह अमित ने हंसकर पूछा, 'क्या वह भी नही पाई जा सकती? तो फिर इसमे गोता लगाने से क्या फायदा?' "प्यार में फायदे और नुकसान की वात थोड़े ही हुआ करती है।' 'लगता है, तुम मुझे भी सनकी बनाकर रहोगी। तुम जमीन पर उतरो तो मैं एक बात कहूं।' जानीन ने अमित की आखो में झांका और मुस्करा दिया। 'जानती हो जानीन, आदमी चाहे कितने ही बड़े असंभव काम को शुरू करे, वह जैसे-जैसे उसके साथ आगे बढता है, उसे यह उम्मीद बंधती जाती है कि वह असंभव धीरे-धीरे सभव में परिवर्तित हो रहा है। हम इतने आगे बड आए हैं फिर भी हमे ऐसा आभास नहीं होता, क्यों ? "मुझे होता है।' 'तुम्हें आभास होता है कि अमंभव संभव में परिवर्तित हो रहा है ?'
'यह सांत्वना तुम अपने-आपको दे रही हो या मुझे ?' 'विश्वास सांत्वना नहीं हुआ करता।' 'तुम्हें विश्वास है ?' और जानीन ने अपने दोनों हाथों का हार बनाकर अमित की गर्दन में डाल दिया। कुछ ही देर बाद दोनों लहरों के बीच थे। जानीन अमित से अच्छी तैराक थी। उथलते सागर में तैरने का अमित आदी नहीं था। जानीन को बहुत भीतर तक जाते देख वह सहम जाता और चिल्लाकर उसे किनारे पहुंच आने को कह जाता। कोई घंटे बाद ही दोनों पानी से वाहर निकले । जंगली बादाम के पेड़ के नीचे से दोनों तौलिये उठाकर जानीन ने एक अमित को थमा दिया और दूसरे में खुद लिपट गई । अमित उस स्वाभाविकता और सादगी को देखता रहा । वह सौंदर्य की पराकाष्ठा को देख रहा था। देखता रहा । उसके शरीर से पानी की बूंदें टप-टप टपकती रहीं। अपने शरीर पोंछने का खयाल भी जाता रहा। सिगरेट सुलगाने को जी चाहा पर तभी याद आया कि उसके पास सिगरेट नहीं थी। उसे इसका दुख नहीं हुआ । जानीन ने उसे कभी सिगरेट पीने से रोका नहीं था, पर अमित जानता था कि जानीन को सिगरेट की गंध नहीं भाती थी। जगलाल सामान लेकर आ चुका था। रसोई से मसाले की गंध आने लगी थी। मछली पकाने में जगलाल अपना सानी नहीं रखता था। वह भव भी होटल में काम करता होता अगर दक्षिण अफ्रीका के गोरे सैलानी के पैसे चोरी होने का अभियोग उसपर न लादा गया होता तो। जानीन के यहां की नौकरी उसे इसलिए मिल गई थी क्योंकि उसका बाप जानीन के घर कभी रसोईया रह चुका था। वह बंगले का रखवारा भी था और अवसर आ जाने पर रसोइये का काम भी कर जाता था। उसे अपने काम में व्यस्त छोड़ जानीन और अमित बंगले के भीतर पहुंच गए। बड़े कमरे की गोल मेज के फूलदान में जगलाल ने रेनमार्गेरित के फूल सजा रखे थे। सभी खिड़कियां खुली हुई थीं। स्प्रे की गंध के बावजूद - । १४६ / हड़ताल कल होगी भी कमरे की सीती गंध गई नहीं थी। गलियारे का वह माखिरी कमरा जानीन का अपना कमरा था। वहां की खिड़की सीर्घ ममुद्र पर सुलनी थी। उसमें भी जगतात नै फूलों का गुलदस्ता रख दिया था। जानीन कोच पर बैठ गई । उसके पास ही जगह लेते हुए अमित ने कहा, 'मुझे डर लग रहा है। 'किस बात का डर?' "गर कोई आ गया तो।' 'कोन आएगा?' "तुम तो ऐसे कहती हो, जैसे, सभीको घर पर बाधकर आई हो।' "अमित, ऐसा तो सोच सकते हो कि हम किसी दूसरे देश को पहुंच गए हैं, जहां वे नहीं पहुंच सकते जिनका हमें डर है।' जानीन ने उसके भीगे सिर को थामकर उसे अपनी गोद में रख लिया । अपने कंधे के तौलिये से उसके सिर को पोछती हुई बोली, 'तुम चुप क्यों हो गए ?' अमित ने उसकी गरदन में हाथ पहुंचाकर उसे अपने एकदम पाम झुका लिया।। दोनों की सासे टकराती रही और फिर एक-दूसरे में सो गई। तीन मिनट बाद जानीन बोल सकी, 'अमित, मैं तुम्हें प्यार करती अमित ने फिर में उसे नीचे झुका लिया। इस बार तीन मिनट के चाद अमित बोला, 'तुम्हें खो बैठने की कल्पनामात्र से मैं दहल जाता 'तुम्हारी कल्पना इतनी वेबुनियाद क्यों होती है ?' 'जानीन, अगर यह नौवत पा ही गई तो?' जानीन ने उसके होठों पर हाथ रख दिया। अमित को नजर दीवार की पेंटिंग्स पर चिपकी रही। इधर कई दिनों बाद पिछली रात अमित को फिर से नीद की गोलियो का सहारा लेना पड़ा था। इस समय भी उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि की गोलियों की खुमारी लिए हुए है । दीवार के जानीन के चित्र दे रख रहताल मलटोगी/१४.
की लहरों में भी वह खुमारी थी । वही कांपती हुई खुमारी । उसको इस तरह खोए हुए पाकर जानीन ने पूछा : 'क्या वांत है अमित ?' 'कभी-कभार जब यह खयाल आता है कि तुम मेरे लिए नितांत असंभव हो और तुम्हें पाना बड़ा कठिन है तो लगता है कि मेरी सारी शक्ति चली गई, मेरा आंदोलन मर गया। यूनियन के सभी उद्देश्य बोझ बनकर मेरे ऊपर लुढ़कने लगते हैं और मैं उसके नीचे दवता जाता हूं। पर जब कभी क्षण-भर के लिए मेरे भीतर यह विश्वास पैदा हो जाता है कि तुम मेरी हो, हर हालत में मेरी रहोगी तो लड़ने की ताकत दुगनी हो जाती है । उस समय यूनियन को अपने उद्देश्यों के साथ पराकाष्ठा पर पहुंचा पाता हूं।' 'तुम ऐसा कैसे सोच लेते हो कि मैं तुम्हारे लिए असंभव हूं ?' 'मेरे अपने भीतर की लाघव भावना...' 'अमित, मैं तुम्हारी हूं।' 'जानता हूं।" 'तुम्हारी रहूंगी। 'यह भी जानता हूं।' 'तो फिर ?' 'यह विश्वास रह रहकर लड़खड़ा जाता हैं।'. 'विश्वास संदेह से लड़खड़ाता है अमित ?' सामने की मेज की सीपियों के साथ अमित खेलने लंगा। कुछ मिनट बाद उसने जानीन से पूछा, 'तुम मेरी मां से मिलने कब आ रही हो ?' 'जब चाहो?' अमित सीपियों से खेलता रहा। खाने के बाद दोनों फिर से जंगली बादाम के नीचे आ गए। बालू पर उलटी पड़ी नाव से जगलाल कुछ छुड़ा रहा था। अमित ने उससे कहा, 'तुम खाना बहुत अच्छा पकाते हो जगलाल !' उसने यह बात भोजपुरी में कही थी, इसलिए जानीन ने मुस्कराकर - १४८ / हड़ताल कल होगी पूछा, 'क्या कहा तुमने ?' 'कह रहा हूं कि यह साना बहुत अच्छा पकाता है।' बादाम को छाया में दोनों बैठ गए। समुद्र का गर्जन तेज हो चला या। दो बच्चों को बालू पर सीपियां बटोरते पाकर जानीन ने अमित ने पूछा, 'तुम भाग्य के सेल पर विश्वास करते हो ?' अमित ने प्रश्न का मतलब. नहीं समझा। उसे अपनी ओर देखते पाकर जानीन फिर से बोली, 'माग्य का खेल...' 'क्या होता है यह ?' 'नहीं जानते ?' अमित ने सिर हिला दिया । 'यह खेल मैंने मा से सीसा था। जब हम क्रिसमस के लिए किसी नये खिलौने की कामना करते तो मां हमें बालू पर भेजकर चितकबरी कौड़ी ढूंढ लाने को कहती । जिसको कौड़ी मिल जाती, उसके माथे को घूमकर मां कहती कि क्रिसमस में उसे मनचाहा खिलौना मिलकर रहेगा। चलो, हम भी सेलकर देखें।' अमित हंस पड़ा, 'हम क्या देखें ?' 'देखें कि हमारा प्यार सफल रहेगा या नही ?' 'इसका मतलब है कि तुम्हारा विश्वास भी लड़खड़ा गया है ?' 'नंही अमित, बात यह नहीं।' 'खैर, चलो, खेलकर देख लें। दोनों उठ खड़े हुए । जानीन बोली, 'अगर कौड़ी मुझे मिली तो मेरा प्यार सफल रहेगा अगर तुम्हें मिली तो...' 'तो?' 'तुम्हारा प्यार सफल रहेगा।' दोनों जोर से हंस पड़े। चमकती घूप पर मांखें टिकाए रखना दोनो के लिए कटिन था, फिर भी दोनों दो कदमों के फासले पर कौड़ियो की तलाश में लगे रहे । अमित को इस बचपने पर आनंद आ रहा था। उसकी नजर कौड़ियो की तलाश में उतनी नहीं थी, जितनी जानीन की उस विश्वास भरी हडतालकलोमी.
- मुद्रा पर । जानीन एक बच्चे के सभी भोलेपन को अपने में समेटकर उस खजाने की खोज में थी । अमित को अपनी पलके झपकते पाकर उसने अपनी आंखों से काला चश्मा उतारकर अमित को थमा दिया। दोनों सड़े हो गए। 'तुम बड़ी होशियार हो।' 'क्यों?' 'तुमने यह काला चश्मा मुझे इसलिए थमा दिया ताकि कौड़ी मेरी नजर में न आ सके।' जानीन हंस पड़ी। धूप मैं अमित का शरीर पसीने से तर हो गया था और जानीन का अपना पूरा शरीर लाल हो गया था। कोई घंटे बाद अमित ने कहा, 'यह कौड़ी मिलने से रही। 'तुममें स्तामिना का अभाव है अमित !' 'तुम्हें विश्वास है, वह कौड़ी मिलेगी?' 'मुझे अपने प्यार की सफलता का विश्वास है।' 'ठीक है तो फिर जब तक वेहोशी नहीं आ जाती, तलाश जारी रहे।' समुद्र किनारे की तपती दोपहरी पराकाष्ठा पर थी। दोनों बंगले से डेढ़ मील दूर आ गए थे। कई सीपियों और कौड़ियां उठा-उठाकर दोनों फेंक चुके थे। वह चितकबरी कौड़ी अभी तक हाथ नहीं आई थी। अमित थक चुका था, हार चुका था । जानीन अभी नहीं थकी थी, न ही हारी थी । एक जगह पर पुराने शावे के दरख्त की छाया पाकर अमित उस टुकड़े पर जा बैठा। जानीन उसके पास पहुंची और उसका हाथ थामकर उसे उठा लिया। दोनों फिर चल पड़े। अमित की आंखें दुखने लगी थीं। उसे जोरों की प्यास लग आई थी। 'जानीन, चलो! लौट चलें।' 'नहीं अमित !' और दोनों चलते रहे। । १५० / हड़ताल कल होगी २२ 'अमित, में तो बस एक ही चीज चाहती हूं। मिट्टी के चिराग की तरह मैं मूरज के तेज प्रकाश में पो जाना चाहती हूं। वह मूरज तुम हो, बस तुम । जब भी तुम हैसियत की बात करते हुए, मुझे मामंती बताने का प्रयत्न करते हो, मैं पीड़ा से बकुला जाती हूं । तुम मुझे मिर्फ उसी रूप में देखा करो, जिममें में तुम्हारे सामने हुआ करती हूं। प्यार के अथाह सागर में एक बूंद की तरह विलीन होकर ही मैं अपने को सुवी पा सकती हूं।' अमित को ऐसा एहसास हुआ था कि हृदय प्रायः वही मांगता है जिमे देने में जीवन अपने को अममयं पाता हो । उसने जानीन में पूछा था, 'तुम्ही बताओ, हृदय का तकाजा आदमी को भावुक बना जाता है या भावुकता हृदय से तकाजा कराती है ?' जानीन ने कोई उत्तर नहीं दिया था। प्रश्न को अच्छी तरह सुनकर भी वह समझ नहीं पाई थी। अमित की ओर फोन बढाती हुई राधिका वोली : "घर का फोन है।" 'मां!' 'हा।' चोंगे को हाथ में लेकर मुंह तक पहुंचाते हुए बोला, 'क्या बात है मां?' उसकी मां ने जवाब देने में दिलंब किया। और जब बोली तो प्राण- हीन सी, "किशोर के घर से सबर आई है।' 'कसी खबर?' वही विलंव, फिर वही स्वर, किशोर ने आत्महत्या कर ली। हड़ताल कल होगी | १५१ 'मां... 'अभी-अभी खबर मिली है । लखन आया था।' 'नहीं...' उघर से उसकी मां न जाने क्या-क्या बोलती रही। चोंगे को हाथ में थामे अमित वहरा-गूंगा खड़ा रहा। सन्नाटा। यह सन्नाटा आश्चर्य का नहीं था। अमित को आश्चर्य नहीं हुआ था । इस क्षण का पूर्वाभास उसे पहले ही हो चुका था, पर यह आघात अप्रत्याशित था । अमित की सांसें क्लोरोफोर्म से तर थीं। उस बेसुधी से उसे वह स्वर सुनाई पड़ा : 'जीवन मेरे लिए रंग है। जव तक ये रंग हैं, तब तक जीवन है।' अमित किशोर के घर पहुंचता तब तक किशोर की लाश अस्पताल से लौट आई थी। नींद की वे ही गोलियां जो अमित को नींद देने में असमर्थ रह जाती थीं, किशोर को चिरनिद्रा दे गई थीं। उस लाश के सामने वह खड़ा रहा और आंसुओं के साथ ही उसके मुंह से निकला, 'किशोर ! तुम तो बहुत साहसी थे।' किशोर अमित को जो चिट्ठी लिख गया था, उसमें उसने अपने सभी चित्र यह कहते हुए अमित के हवाले कर दिये थे कि उसके अपने अणु टुकड़े थे । मैं चाहता हूं कि ये सारे चित्र तुमसे जुड़ जाएं अमित ! दो दिन अमित अपने घर से बाहर नहीं हुआ था। उसके अपने कमरे में बहुत सारे जमे हुए क्षण थे। हर क्षण उससे छूकर उसे मौत की सी ठंड दे जाता। किशोर के साथ के वे क्षण उसकी सांसों से चिपककर उन्हें भारी कर गए थे। बड़ी कठिनाई से वह सांसों को बाहर-भीतर कर रहा था। उसकी मां कह गई थी कि वह किशोर के घर जाकर कुछ समय उसके मां-बाप के बीच विता आए। उससे नहीं हो सका था। मां को ही भेजकर उसने अपने को कमरे में बन्द कर लिया था । राधिका चाय के साथ भीतर आई थी और अमित ने उससे पूछा था, 'किशोर ने ऐसा क्यों किया?' और जव राधिका ने उसके गालों पर वह आए आंसू की दोनों धाराओं १५२ / हड़ताल कल होगी को पोंछने के लिए उसके हाथों में तौलिया रखना चाहा था तो अमित ने उसके दोनों हाथों को थामकर अपने सिर से दे मारा था । राधिका ने अपने मांसुओ को दोनों कंधों पर टपक जाने दिया था। 'उसने ऐसा क्यों किया राधिका ? उसकी कला को मान्यता नहीं मिली, इसलिए ? मैं किगीर को तो अपने से अधिक पहचानता हूं। इस तरह की कोई बात उसकी मृत्यु का कारण नहीं बन सकती।' बात करते समय अमित की जवान कांप रही थी। वह दुख और पश्चाताप के कंपन के साथ-साथ भय का भी कंपन था। उसे अपने-आपसे हर लगने लगा था। श्मशान से लौटने के बाद से अमित की वह दशा पी जो किसी भयंकर सपने के देखने के बाद आदमी की होती है । उसके चेहरे का पसीना गरमी को तरलता नही था, वह भय की उपज था। भयंकर सपना देखने के बाद जव आदमी की नीद टूटती है तो क्षण-भर की घबराहट के बाद उसे इस बात का संतोप हो जाता है कि वह तो सपना था । पर अमित की स्थिति को वह संतोप असम्भव था। वह सपना नहीं था। मभी कुछ वास्तविक था, उसका भय बना रहा । वह भय वढता जा रहा था। अकेले में वह सभी शक्ति के साथ किगोर को पुकारने को सोचता। फिर खयाल आता, वह तो बहुत दूर जा चुका है। वह जहा गया है, वहा आवाजें नही हुआ करती। फिर तो आवाज पहुचकर भी अनसुनी रह जाती । पर क्या सचमुच किशोर इतनी दूर चला गया था ? अगर ऐसा था तो फिर वह उसकी सांसों में विधा हुआ क्यो था ? उसे इतने करीब तो पहले कभी नहीं पाया । अमित को सभी कुछ रहस्य-सा लग रहा था। अमित ने राधिका से कहा था, 'तुम जानती हो राधिका, मैं इस समय एक बहुत बड़ी लड़ाई मे जूझा हुआ हूं, पर अव तो लगता है कि लड़ाई हार जाऊंगा। जीत का कोई आधार ही नहीं दिखता।' राधिका उसे तो ममझ रही थी पर उसकी बातों को नहीं । उसमे काम करने का हौसला बाकी था न लोगों से मिलने का। जानीन का फोन आया था। उससे भी उसने वातें नही की। बड़े साहस के साथ उसने चाहा कि किशोर के घर एक बार तो हो माए । शाम के धुंधलके . में वह घर से निकला, अपने-आपमें सिमटा हुआ आगे बढ़ा। रास्ता के मिलने वाले किसी भी व्यक्ति से आंखें मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं थी। उसे ऐसा लग रहा था कि लोग उसे भीतर ही भीतर घूर रहे थे। कोस रहे थे । पर क्यों ? गली के लोगों से कतराकर वह क्यों निकल जाना चाहता था ? कौन-सा गुनहगार छिपा हुआ था उसके भीतर ? अपने से प्रश्न पर प्रश्न करता हुआ अमित अधिक आगे नहीं जा सका था। वह उलटे पांव घर लौट आया था। अमित जानता था कि किशोर की मौत का कारण उसकी वेकारी भी नहीं थी। उसकी दयनीयता नहीं थी। उसका अभाव नहीं था। वह एक रहस्य था। किशोर उस रहस्य को सुलझाने में लग गया था । वह था कि उलझाता ही चला जा रहा था । किशोर भयहीन कलाकार था । वह इतनी सस्ती मौत नहीं मर सकता, पर अगर वह मौत सचमुच ही सस्ती होती तो फिर इतने सारे कलाकारों ने उसे क्यों अंगीकार किया ? 'राधिका ! किशोर अपने साथ एक अनकही वात लिए मर गया।' किशोर की मृत्यु का आज सातवां दिन था। किशोर का उदास घर । उसकी मां से वातें कर चुकने के बाद अमित उसके उन सभी चित्रों के बीच जा खड़ा हुआ । अस्त-व्यस्त रखे हुए सौ के लगभग थे वे चित्र । चुभन को आंखें मूंद कर अमित ने सह लिया फिर आंखें खोलीं। चित्रों के रंगों ने हिलने-डोलने की कोशिश की, चिल्लाने का प्रयत्न किया । वे सभी किशोर की कृतियां थीं। कृतियां उसके जीवनकाल में मौन रहीं पर अब चिल्ला रही थी। चिल्ला-चिल्लाकर किशोर के अस्तित्व का बोध करा रही थीं। एक-एक चित्र की रेखाएं कृतज्ञता लिए हुई थीं। अपने श्रेष्ठों के प्रति कृतज्ञता । एक बीत चुकी अवधि के साक्षी के रूप में वे तस्वीरें अपनी गवाही देना चाह रही थीं। उन चित्रों में किशोर था। उन चित्रों में सच्चाई थी। वह सच्चाई, जिसे कलाकार के जीवनकाल में बड़ी कठिनाई से सच्चाई माना जाता है अमित एक पुराने चित्र के सामने ठिठक गया। एक मरे हुए प्यार का चित्र था वह । पहली बार अमित ने मृत्यु में भी स्पन्दन पाया। एक बार किशोर ने उससे कहा था कि मृत्यु जैसे विजेता को प्राणहीन क्यों *1 ।
।' माना जाता है। वही तो एक वस्तु है जो जीवन में भी जीवन्त होती है। किगोर की उम बात की गवाही दे रही थी सामने को वह तस्वीर : 'अमित, मैं चाहता हूं कि मेरी कला आदमी को द्विविधा में डाकि उसके पास समय-असमय विपकी रहती है, मुक्त कर गये । यह अविश्राम और द्विविधा के बीच एक विश्वास पैदा कर सके । विश्वास तो गाधारण सन्द हुआ, मैं तो पाहता हूं कि यादमी को आस्था दे सके। मेरी पता के मत्य को तुम एक मीमित सत्य कह जाओ, पर में इतना कह दूं कि एक न एक दिन इस मत्य को तुम एक स्थायी और विस्तुत्य गत्य मानने को विवश हो जाओगे । कला केवल कलाकार की आकृति नहीं हुआ करतो, वह निरगने वाले को भी आकृति होती है।' अमित एक दूगरी पेंटिंग के आगे जा खडा हुआ। मे रंगने हर कशोर ने कभी कहा था, 'इमका शीर्षक 'मपना' रागा अमित को शीर्षक पसन्द नहीं आया था और उगने पर कहा था, 'मुझे 'मपना' पमन्द नहीं।' 'तुम शायद उस मरने की बात कर रहे हो जो आदमी अपने नित मात्र अपने लिए देखता है। यह चित्र तो उस मपने को उजागर पाना है, जी कलाकार मभीके लिए देखता है।' उस चित्र की सिमकिया मुनाई पडी अमित को । नहीं, वे गिरप्रिया नहीं थी, अट्टहास था। सभी चित्रो ने एकगाय दहावा लगाया ) फोन में कोरे कैनवम थे। उन कोरे श्वेत कनवमी ने मिमरिया मगे। fuutsar और अट्टहास का कोलाहल अमित के कानो में बजना रहा 'अमित.."अमित "अमित.. सिमकियां आती रही। 'किशोर' 'किमोर.. किशो...'
अमित कुछ नहीं वोला । लम्बी चुप्पी के बाद किशोर की मां ने आगे. कहा, 'तुम इन चीजों को उठा ही ले जाओगे तो अच्छा रहेगा। काटने को दोड़ती हैं।' किशोर के घर की सभी उदासी को अपने में लिए अमित घर लौट •आया। अपने वन्द कमरे में बैठा रहा । घण्टे बाद राधिका ऊपर आई। 'मौसी कह रही हैं, तुम नीचे उसके साथ खाना खाओ।' 'मां से कह दो, मुझे भूख नहीं।' 'दिन में भी तुमने कुछ नहीं खाया।' 'मैं बाहर से खाकर आया हूं।' जानीन की चिट्ठी को अमित के हाथ में रखती हुई राधिका बोली, "दो वार उसका फोन आया था।' अमित ने चिट्टी खोली। गुलाबी कागज पर जानीन के छोटे-छोटे -अक्षरों की कोई दस-बारह पंक्तियां थीं : 'मों आमूर, ये सात दिन मुझे सात वर्ष से भी लम्बे प्रतीत हुए। यहां की पाबन्दी और निगरानी के बावजूद भी तुमसे मिल सकती थी, पर इसलिए ऐसा किया क्योंकि मैं जानती थी कि तुम अपने आयोजनों में व्यस्त हो। हारी उद्विग्नता और व्यग्रता के पक्ष में न होते हुए भी मैं यह नहीं चाहती कि उसमें किसी तरह का हस्तक्षेप हो। तुम्हारी सफलता की 'कामना करती हूं । तुम फोन पर भी नहीं मिल रहे हो। मैं अधीर हो चली हूं। पत्र मिलते ही मुझे फोन करना, मैं हर वक्त उसकी प्रतीक्षा में रहूंगी-बात तुम्हें बता दूं । बस, और तीन दिन हैं। शनिवार को मैं उस उम्र की हो जाऊंगी जिससे मुझे अपने निर्णय का पूरा अधिकार मिल 'जाएगा। तीन दिन अमित, और "फिर तो तुम्हारे साथ चाहे वह जीवन हो या मौत, दोनों सहर्ष स्वीकार लूंगी। कुछ बातें हैं अमित, जिससे मैं तुम्हें हड़ताल के लिए नहीं रोक सकती, पर अपने लिए तुमसे मांग करती हूं। अपना खयाल रखना। तुम्हारी आवाज सुनने की वेसनी लिए हूं। फोन जरूर करना । -तुम्हारी जानीन' । १५६ / हड़ताल कल होगी पत्र पढकर अमित ने राधिका की ओर देखा, 'पापा कहा है ?" "अपने कमरे में। 'तुम मां से कह दो, वह खाना खा ले । मैं बाहर से खाकर आया 1 अपनी जगह राधिका के चले जाने के कुछ मिनट बाद तक वह चुपचाप बैठामोचता रहा। फिर उठा और सीढिया उतरकर सीधे फोन के पास पहुंच गया। जानीन का नम्बर मिलाया। उधर फोन की घंटी बजती रही। बजती रही। कई मिनट बीत गए । कोई नही उठा रहा था । यह सोचकर कि कही उसने गलत नम्बर नही मिला लिया था, उसने लाइन काटकर फिर डायल किया। उघर फिर घंटी वजनी शुरू हुई। यह सुनता रहा। वह बजती रही। फिर कई मिनट बीत गए । उसने फोन रख दिया । तीमरी बार नम्बर मिलाया । कोई उत्तर नहीं मिला। चोगे को उसकी जगह पर रखकर वह ऊपर पहुंचा। अपने कमरे का दरवाजा बंद करके वह चारपाई पर बैठ गया। कमरे में अकुलाहट थी। सभी कुछ अस्थिर था। अमित लेट गया। कई घंटे के बाद वह से उठा। मेज की दराज खोलकर उसमें कुछ ढूढता रहा। कठिनाई में उसे वेलियम की दो गोलिया मिली। गिलास से पानी लेकर उसने दोनो गोलियों को गले के नीचे उतार लिया। बत्ती बुझाकर पलंग पर जा लेटा। और घंटों तक उसी तरह लेटा रहा। सिंडिकेट को मीटिंग हुई । हडताल का प्रस्ताव पास हो गया । सात दिन की बात करके यूनियन ने तीन महीने की प्रतीक्षा की थी। उत्तर हर वार यही रहा कि विचार किया जा रहा है। शक्कर उद्योग संघ को मीटिंग का विवरण और हड़ताल को सूचना देकर अमित अपने सभी साथियों के साथ आयोजन में जुट गया । सात दिन का समय उस बृहत आयोजन के लिए बहुत कम था पर अमित को अपने अधिक मजदूरों पर विश्वास था। उसे विश्वास था कि हडताल की सफलता पचास प्रतिशत से ऊपर रहेगी। छत्तीस गांव इस अभियान में शामिल थे पर पिछली खबरों के अनुसार छ: गांव हड़ताल में भाग लेने को तैयार नहीं थे। उस . दिन पहाड़ी इलाके की उस कोठी का वह दुबला-पतला मजदूर सामने आ खड़ा हुआ था । चेहरे से वह साठ से ऊपर का लग रहा था पर अमित जानता था कि वह साठ का नहीं था । ईख के खेत के कठिन काम ने उसे कुछ वर्ष ज्यादा ही दे दिए थे । उसने अमित से कहा था : 'जव काम ना होवे ला त सब कोई छछनल फिरेला और जव काम रहेला त देह चुरावल जाला।' अमित ने भोजपुरी ही में कहा था, 'नहीं चाचा, यह देह चुराने की वात नहीं। 'ए बाबू' हड़ताल हम लोगन से ना होई। कुछ होवे हम लोग त काम करव स ।' 'अपने हक को इस तरह जाने दोगे ?' 'दू पैसा से का होवेला ?' 'नहीं चाचा यह दो पैसे का सवाल नहीं है।' कोठी में डेढ़ सौ मजदूर थे पर उनमें सिर्फ तीस ही यूनियन के सदस्य थे। मुखिया बार-बार यही बोलता रह गया था कि हड़ताल अच्छी चीज नहीं हुआ करती । कहीं एक पैसे के लोभ में नौकरी से ही हाथ धोना न पड़ जाए। उससे बहस न करते हुए भी अमित ने उसी स्वर में कहा था: 'यह ठीक है चाचा, कि हड़ताल अच्छी चीज नहीं हुआ करती, उससे मजदूर-मालिक दोनों को हानि होती है, पर मजदूर के पास कोई दूसरा हथियार भी तो नहीं। घी जब सीधी अंगुली नहीं निकलता तो टेढ़ी अंगुली से निकाला जाता है । और फिर एक बात है चाचा, कल अगर हड़ताल के वाद काम की शर्ते सुधर जाएं, उनके साथ एक-दो पैसे अधिक मिलने लगें तो क्या हड़ताल में भाग न लेने वाला आदमी उसे ठुकरा जाएगा ? क्या वह उस लाभ का हिस्सेदार नहीं बनेगा ?' अमित ने उत्तर की प्रतीक्षा की थी। उस आदमी ने कोई उत्तर नहीं दिया था। उसकी चुप्पी अमित को यह विश्वास दिला गई थी कि इस कोठी में भी हड़ताल होगी। रविवार की शाम को सभी गांवों के प्रतिनिधियों का एक जुटाव हुआ - १५८ / हड़ताल कल होगी, । पा । आधे से अधिक प्रतिनिधि कोसी के मालिस मौके थे। उन्हे यह कहकर धमकाया गया था कि हमने इमलिए हड़ताल में भाग लेने पालों को नौकरी हातिसर। इस समस्या के लिए अमित पहले ही से तंपार था । तर यूनियन के वकील ने लोगो को आश्वासन दिया और बताया कि हर किसी भी हालत में गैरकानूनी नहीं हो सकती, इसके नगर पतिले नापियो ने हड़ताल के अनुशासन पर बातें को यो । तीन बन्न मन के अध्यक्ष भी उपस्थित थे । उन्होंने भी हड़ताल को जानकार और यह आश्वासन दिया था कि तीन दिन को हड़ताल के बाद हर कोई परिणाम सामने नहीं आया तो उनके यूनियन भी हमदर्दी के रूप में हड़ताल में भाग लेंगे। इमपर सभी उपस्थित प्रतिनिधियों ने खुशी जाहिर की थी। हडताल के तीन दिन बाकी रह गए थे। राविया को जल्दी-जल्दी कुछ पत्र डिक्टेट कराके भनित : निकलने ही वाला था कि फोन की घंटी बज की थी। मुरेन ने फ़ोन उठाया और जानना चाहा कि पर जो अमित से बातें करना चाह रहा था? मावि . नाम नही बताना चाह रहा था। चाँगे पर हम की ओर देखा । कुछ बोलता कि इसने पहले हाय से फोन ले लिया। 'हेलो, में अमित बोल रहा हूं।' उघर से बनावटी नावाज नाई, रही है। 'चेतावनी किस बात के लिए: 'हर बार यही सवाल कगेंद: 'तुम कोन होते हो... 'आखिरी बार सुन नो दिए जाओगे।' 'यह हड़ताल होगी।
. और इतना कहकर अमित ने झटके के साथ फोन रख दिया। राविया और सुरेन उसे देखते रहे। यह कोई पांचवां फोन था। हर बार भिन्न आवाज होती थी। इस- पर बहुत सोचने के बाद अमित इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि फोन करने वाले व्यक्ति को आपत्ति हड़ताल से नहीं थी। हड़ताल को एक बहाना जरूर बनाया जा रहा था । अव तक उसे मिली वे तीनों चिट्ठियां इस बात की सबूत थीं। सुरेन ने पूछा, 'फिर वही ?' अमित ने सिर हिलाकर हामी भरी । राबिया वोली, 'पुलिस को इत्तिला क्यों नहीं करते ?' मेज से इग्निशन को उठाकर अमित दफ्तर से बाहर हो गया । दो मीटिंगों से होकर अमित को उस गांव में पहुंचना था, जहां हड़ताल के दोनों आयोजकों पर वार किया गया था। एक को हलकी चोट आई थी, पर दूसरा अस्पताल में था। पिछली रात वहुत दिनों के बाद अमित का बाप अमित के कमरे में पहुंचकर सोफे पर बैठ गया था । जव तक अमित ने अपने सामने की फाइलों को वन्द नहीं किया, वह उसी तरह चुपचाप बैठा रह गया था। सिगार के कश लेता रह गया था। अमित के फाइल बन्द करते ही उसने कहा था : 'तुम स्ट्राइक करवाने जा रहे हो ?' 'कोई दूसरा चारा नहीं।' - 'स्ट्राइक इल्लीगल है।' 'स्ट्राइक इल्लीगल नहीं हो सकती।' 'जानते हो, किन लोगों से दुश्मनी मोल ले रहे हो?' 'जानता हूं।' 'जानते हो फिर भी बेवकूफी कर रहे हो ?' 'साहस कर रहा हूं।' 'मैं उसे वेवकूफी कहता हूं।' 'और मजदूरों के अधिकार को हड़पकर जब्त किए रहने को तुम क्या कहोगे पापा ?' १६० / हड़ताल कल होगी 'तुम्हारे बाप-दादे का होनस अमित मुस्कराकर उसका बाप पटे तक बंद! 'हडताल में देश से हानि हो है। मार हड़ताल देवा के लिए सालों सरेको होती है।' 'हडताल से देश को हानि होती है और क्या इसमे देश को कोई हानि नहीं होने और करना देश आदमियों का नहीं, पत्यरो का होगा। 'तुम मुझे भी कहीं का नहीं हो। उसकी मां कार का गई दी। पमित से यही कहा था कि इसके बारे। कार चलाते हुए अन्तिमरलेन । अवसर था, उनकी मां ने अपने पति नई या। पहला अवसर था, वह अपने पति कार ह गई थी। सुबह दपतर आने से पहले करने कर धीरे बोनापा: 'खतरे में भी आनन्द हुआ है। वह घर से बाहर हो गया ई थी । वह मुरेन या, विनेद:: 'मौनी मुझे डाटती हपई में। इवा कर लौटे थे, इस बार का हंगा पिछली रात को मुनापार का काम जए हुए था। सवालों में होरहर नगद Inा जव स्टीयरिंग व्हीन सरे हातदिन ल्दी में एक्सीलरेटर से पार कर करता। सम्बद्ध गाव तीन मील के पामरा तीन दिन वाली ये हहताल के।
4
२३
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'हेलो अमित, मैं सत्येन बोल रहा हूं। देखो मैं कल चीन जा रहा हूं
मिशन पर । पर जाने से पहले तुम्हें आगाह किए जा रहा हूं कि कल कैबिनेट
• मीटिंग में तुम्हारी काफी चर्चा हुई है । तुम जो कुछ कर रहे हो, उससे
कोई भी खुश नहीं था ।'
'कोई भी खुश नहीं था से क्या मतलब ? पूरा मॉरिशस ?'
'यह क्यों भूल रहे हो कि वह
वैठक अखिल मॉरिशस के प्रतिनिधियों
की बैठक थी ? मैं तुमसे मिलने तुम्हारे घर पहुंचने वाला था, पर समय
नहीं मिला । मैं कल सुवह की फ्लाइट से जा रहा हूं। तुम अच्छी तरह
सगझ लो कि तुम्हारी हड़ताल गैरकानूनी है । मीटिंग में पुलिस कमिश्नर
की भी उपस्थिति थी । अगर तुम हड़ताल का खयाल नहीं छोड़ते हो तो
गिरफ्तार कर लिए जाओगे ।'
'लगता है कि तुम व्यवस्था की ओर से बोल रहे हो।'
'नहीं । मैं दोस्त की हैसियत से बोल रहा हूं।'
'फिर तो यह धमकी नहीं हुई।'
'मैं तुम्हें आगाह कर रहा हूं।'
'यानी कि सावधान कर रहे हो ?
'क्यों, कहने के ढंग से तुम्हें इन दो शब्दों में कोई फर्क नजर नहीं
आता क्या ?'
'कहने के ढंग से तो नहीं आ रहा ।'
'देखो अमित, मैं तुमसे बहुत ही गम्भीर बात कर रहा हूं।'
'मेरे गिरफ्तार कर लिए जाने की ?'
'क्यों, तुम इसे मजाक समझते हो क्या ?'
'मजाक तो नहीं समझता, पर...'
'चुप क्यों हो गए ?'
.
१६२ / हड़ताल कल होगी
'तुम्हारी बातों से सौदे की यू आती है।'
'क्या कहना चाहते हो ?'
'वही जो तुम कहना चाहते हो।'
'मैं तुम्हें अनयं से रोक रहा हूं।'
'तुम मुये हड़ताल से रोकना चाह रहे हो इसके बदले में तुम्हारी
मरकार मुझे मुक्त रहने का अवसर दे रही है । दाम अच्छा है।'
'ओ के इट्स अप टू यू ?'
आवाज' अमित के कान में चुभ गई। क्षण-भर को चोंगे को कान
के पास उसी तरह रखे रहने के बाद उसने उसे उसकी जगह पर रख
दिया । मुड़कर अपने कमरे को जाने को हुआ कि उसकी नजर अपने बाप
पर पड़ गई।
'तुम सत्येन से बातें कर रहे थे ?'
अमित ने सिर हिलाकर हामी भर दी।
'तुम जा कहां रहे हो ?'
'दफ्तर ।'
'साढ़े छः बजे ?'
'जरूरी काम है, इसीलिए सवेरे जा रहा हूं।'
'क्या है वह जरूरी काम ?'
अमित ने कोई जवाब नहीं दिया।
'मैं पूछ रहा हूं, क्या है वह जरूरी काम ? अमित, तुम काफी
बचपना कर चुके । अव इस बेवकूफी से बाज आओ। कल मुझे सत्येन
मिला था। तुम्हारी गिरफ्तारी की पूरी तैयारी हो चुकी है। इस बार
मामला संगीन है, अमित ! तुमने अपने हठ से अपनी मा को गूगी बना
दिया है। रात-भर वह रोती रही है।'
अमित सिर झुकाए आगे बढ़ गया ।
'अमित मैं तुमसे बातें कर रहा हूं।'
'मुझे देर हो रही है।'
'अमित...' उसने पीछे से अपनी मां का स्वर सुना । ठिठक गया ।
'तुम अपने बाप की बातें तो सुनते जाओ।'
N
'मां, मुझे पन्द्रह मिनट पहले दफ्तर पहुंच जाना चाहिए था। पहले ही से देर हो चुकी है।' 'जाने दो इसे ।' यह आवाज अमित के बाप की थी। २४ .. हुआ। पैंतालीस कल सुबह के लिए हड़ताल तय थी। प्रतिनिधियों का एक आखिरी जुटाव दफ्तर ही में प्रतिनिधि उपस्थित थे । हर तीसरे आदमी के लिए एक पुलिस सिपाही था । गली की बस्तियों के जल जाने तक बातें होती रहीं। केवल तीन मिनट बोलने के बाद अमित ने चाहा कि हर प्रतिनिधि अपनी-अपनी बात कहे । धोती पहने, सिर पर रूमाल बांधे उस अधेड़ व्यक्ति को सबसे पहले बोलने का अवसर दिया गया। उसने पहले अपने इलाके का विवरण दिया, फिर बोला: 'हमारे यहां कोई चिन्ता नहीं। सभी लोग संकल्प के साथ तैयार हैं। जहां सभी इस तरह संकल्प के साथ तैयार हैं, वहां कोई भटियारा किसीको बहकाने की हिम्मत ही नहीं कर सकता । उन स्थानों पर लोगों के डराने-धमकाने की कोशिश की जा रही है जहां लोग अब भी द्विविधा में हैं।' .इसपर दूसरे प्रतिनिधि ने कहा : 'यह सही है । हमें उन इलाकों में अधिक ध्यान देना होगा जहां लोग झिझक रहे हैं।' धोती वाले आदमी ने आगे कहा, 'आज रात-भर पूंजी- पतियों के चमचे लोगों को भड़काने में लगे रहेंगे । मुझे इस बात का डर है कि कहीं लोग प्रभावित होकर और डरकर खेतों में न पहुंच जाएं।' इस आशंका को सभी ने महसूस किया। अमित की बगल में बैठे प्रतिनिधि ने कहा, 'अगर ऐसा हो गया तो देखा-देखी सभी लोग डरते- झिझकते काम पर पहुंच ही जाएंगे. ऐसा हुआ तो हड़ताल असफल हो १६४ / हड़ताल कल होगी जाएगी। तभी ऊंचे स्वर में अमित ने कहा : 'नहीं, हड़ताल असफल नहीं हो मकती। हमें भी यहा से छूटकर रात भर काम करना होगा। ईस के सेतों के मजदूर भोले-भाले होते हैं । उन्हें फमलाया जा सकता है, ठगा जा सकता है, डराया जा मरता है पर हमें ऐमा नहीं होने देना है। हमें एक बार फिर इन द्विविधा में पड़े लोगों से समझाना है । उन्हें विश्वास दिलाना है कि यह लड़ाई केवल उनके लिए नहीं लड़ी जा रही। मगर यह हडताल सफल नहीं हुई तो कल उनकी औलादों का हक मारा जाएगा। यह तड़ाई मजदूरों के बच्चों की लड़ाई है। यह अपनी उस शक्ति को बताने की लड़ाई है जिसमे हम अपनी सन्तानों के अधिकारों की रक्षा कर म। इस देश के डेढ सौ माल के इतिहाम में यह रक्षा बहुत कम हुई है। हक दिया नहीं जाता, भीर दी जाती है । अधिकार लिया जाता है। इन देश में अन्य विभागों में लोगों ने हटकर अपना हरु अपनाया है। सेतों के मजदूर आज भी वहीं हैं, जहां में कल ये चले थे। गन्ना इस देश का धन है और इमी गन्ने को पैदा करने वाला आज भी हक का मुहताज है । उन्हें आज भी तीसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। उनके माप इस तरह पेदा आया जाता है जैसेकि वे आदमी न होकर कुछ और हों''यहा मशीन की देख-भाल होती है । वैलो के माय बच्छा व्यवहार किया जाता है, पर मजदूर की कोई परवाह नहीं करता। यह हडताल सिर्फ दो पैसे के लिए नहीं है बल्कि यह एक इन्सानियत के तकाजे की लड़ाई है। सभी कुछ आप ही लोगों पर निर्भर है । यह हड़ताल मजदूरो की प्रतिष्ठा की है।' उसके चुप होने के कुछ देर बाद तक सामोगी छाई रही। धोती वाले प्रतिनिधि ने उस सामोशी को तोडा : 'एक उपाय है।' सभी लोगों ने उस अधेड़ व्यक्ति को देखा जिसके चेहरे पर ममय से पहले झुरिया आ गई थी। 'हम सभी लोग हमेशा की तरह सुबह 7 बजे वनो में पहुंच जाए 'तब तो हो गई हड़ताल ?' किमीने कहा । -- हडताल कल होगी/१६५ 'हां, हड़ताल को सफल बनाने का एक ही उपाय है।' अधेड़ व्यक्ति ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा : 'खेतों में पहुंचना।' 'हां, हम सभी अपने-अपने गांवों में हमेशा की तरह एकसाथ एक निर्धारित समय पर अपने-अपने गड़ांसे के साथ खेत पहुंचे। रोज हर • आदमी तीन टन ईख काटता है। कल हर आदमी तीन ईख काटे सिर्फ तीन और एक जगह पर जुटकर बैठ जाएं।' अमित उछल पड़ा। उसकी आंखों में रोशनी तैर गई। उन्मादित स्वर में उसने कहा, 'आप सही कह रहे हैं । ऐसा ही करना होगा।' हड़ताल के सभी पहलुओं पर विचार चुकने के बाद अमित ने अपने उन चार साथियों से बातें की जिनके जिम्मे दूर के प्रतिनिधियों को उनके घर पहुंचाने का काम था। इसके बाद उसने अपनी कार में भी उत्तर प्रांत के पांच व्यक्तिवों को लिया। गाड़ी में उसने लोगों से फिर से कहा, 'हर कोशिश की जाएगी। हमें उत्तेजित करने के लिए । उत्तेजित होकर हमने अगर कुछ इधर-उधर का किया तो इसका असर सीधे हड़ताल पर पड़ेगा, इसलिए कुछ भी हो जाए, हमें अपने को संयमित रखना है।' अमित को जानीन की सलाह याद आ गई थी, 'जे ते देमांद दे गार्दे. तों काल्प। उसीके शब्दों में उसने भी सभीको कहा कि वे अपने धैर्य को बनाए रखें। जानीन ने अमित से यह बात दो बार कही थी। एक बार जब वह अमित के न चाहने पर भी उसे अपने साथ लिए जीमखाना क्लव चली गई थी। वहां जव एक अंग्रेज अमित से टकराकर बिन माफी मांगे आगे को निकल गया था और अमित ने उसे रोककर उसे क्षमा याचना के लिए विवश कर दिया था। उस दिन पहली बार जानीन ने अमित की आंखों में क्रोध को याद करके उसने अजीजी के साथ कहा था, 'तुम आपे से वाहर मत होना अमित !' शुरू में तो जानीन ने चाहा था कि कहीं अमित यह न समझ बैठे कि उसके लिए खून और रंग का नाता प्यार से अधिक घनिष्ठ तो नहीं १६६ / हड़ताल कल होगी
पा, उसने चुप्पी साध ली थी और अल में वन इतना ही वह मरी पो,
'अपना सयाल रखना।
गाड़ी चलाते हुए अमिन के मामने जानीन का वह चेहरा जिनपिना
उठा जो आज सुबह उसने देखा था। जानीन निर पर रैदानी रमान वा
हुई आई थी । अमित को वह अच्छा नहीं लगा था। उसने मान को
उसके निर से खीच लिया था, 'मह क्या? तुम्हारे वाल?'
'शुक्र है कि काटे नहीं गए।
अमित की समझ में बात नहीं आई थी।
'बाल कटवाने का यह कौन-मा तरीका रहा ?'
'दुगी मे थोडे ही कटवाए हैं !'
'तो फिर?'
'मेरे बाप ने मेरे बालो को मुट्ठी में लेकर जड़ से काट लेने की
कोशिश की थी।'
'पर क्यो ?'
'मा और दादी उस समय नहीं जाती तो...'
'पर क्यो ?'
'ताकि मैं तुमसे मिलने के लिए घर से निकलना बन्द कर दू
'तुम्हारा बाप ऐसा कर मकता है ।'
जानीन चुप रही । कठिनाई के माथ उसने मुस्कराना चाहा ।
'अभी तुम्हें और क्या-क्या महना पडेगा जानीन ?...'
जानीन से छुटकर अमित बन्दरगाह के दगल वाले वाग में अकेला
जा बैठा था।
जानीन को लेकर पहली बार उसने अपने-आपसे उतने प्रश्न किए
थे : मैं जानीन के जीवन में जहर तो नहीं घोल रहा ? सम्भव है, हम
दोनो का सम्बन्ध ? कव? कैसे ?.."हम बीच... पर कब नकः १...
और परिणाम ? परिणाम के बाद का परिणाम ? ...
फोन पर जिस आदमी ने अमित से दाते की थी, उसने अपने को
जानीन का रिश्तेदार बताया था पर अमित जानता था कि वह आवाज
जानीन के बाप की थी।
।'
तुम तो 'यह तो अजीव प्यार हुआ कि जिस लड़की को आदमी चाहे, उरों अपनी खुदगर्जी के लिए सभीकी आंखों से गिरा दे। जानीन का तुमसे पहले एक परिवार था । एक अतीत था । एक दुनिया थी। आज वह इन चीजों से दुत्कारी जा चुकी है । यह तो और भी अजीब बात हुई कि तुम भाज भी अपने परिवार, अपने अतीत और अपनी दुनिया से जुड़े हुए हो और जानीन...? प्यार का हक एक-पक्षीय कैसे हो सकता है ? यह कैसे हो सकता है कि एक उसे संजोए रखे और दूसरा गंवा बैठे ? पढ़े-लिखे आदमी हो। तुम्हीं इन प्रश्नों का कोई उत्तर ढूंढ निकालना।' अमित थक चुका था। वह थक चुका था अपने सामने के मंडराते वेशुमार प्रश्नों के उत्तर तलाशते हुए । उत्तर उसे अवश्य मिल जाते पर उनमें कोई भी ऐसा नहीं होता जो दमदार होता और जो टिक पाता। उसके मस्तिष्क की गरमी से उत्तर पिघलकर बह जाते । फिर वह गौर करने लग जाता अपनी मां की बातों पर : 'मैं मानती हूं अमित, कि वह हमें इस घर में अजनवी की तरह नहीं प्रतीत होगी। वह पच जाएगी हमारे बीच में इन सभी बातों को मानती हूं, तुम्हारे बाप को भी मना लूंगी । मैं तो उसकी सारा के रूप में उसकी बगल में चलते हुए गर्व अनुभव करूंगी। सचमुच ही वह बहुत प्यारी, बहुत अच्छी लड़की है पर जो प्रश्न है, वह तो प्रश्न ही बना रह जाता है। वह कोई अनाथ लड़की तो नहीं जिसे उठा लामो और यहीं शादी कर लो । उसका तो एक ऐसा परिवार है जो जमीन-आसमान एक कर देगा।' 'कोई जमीन-आसमान एक करके भी मुझसे अलग नहीं कर सकता।' 'पर अभी वह तुम्हारी हुई ही कहां है ?' 'पया सिर्फ शादी के बाद कोई किसीका हुमा करता है ?' 'मैं कानूनी बात कर रही हूं।' सामने की अंधेरी रात को कार की रोशनी चीरती हुई चली जा रही थी। अमित को ऐसा नहीं लग रहा था कि वह गाड़ी चला रहा था। बस, गाड़ी चल रही थी। उसके भीतर के पांचों आदमियों का आभास भी - १६८ / हड़ताल फल होगी
उमे कम था। वे बातें किए जा रहे पे, अमित उनको सुन नहीं पा रहा
था। उसका खयाल दो मीमाओं की दीवारो में टकराकर इधर से उपर
हो रहा था । हड़ताल और जानीनजानीन और हड़ताल !
सुरेन खबर ले आया कि मोसूमो कोठी के मजदूरों को धमकी दी गई
है कि अगर उनमे से किसी ने हड़ताल में भाग लेने की चेष्टा होतो
उनके घर के सारे सामान को बाहर फेंज दिया जाएगा । जनित बन्ने
क्षग वहा पहुंचा । कोठी के मालिक से मिलने की कोशिश को।मान्नों,
ने खबर भिजवाई कि उनके पान ननद नहीं, वह नहीं मिला।
अमित को खेत के उस भाग में जाने में भी र दिनहर
काम कर रहे थे। उनने मजदूरों के देशभियावह
शाम को पाच पजे चीनी दुकान के नागनेन्द्र
चाहेगा। इसपर भी प्रतिगेन सा दिक
इंस्पेक्टर को बताया कि जोती के मदर है-
उनने मिलने का उने पूरा नापार है।
नहीं मिली। अमित ने जानो पन्नीलामंगर!मन्टन्दा
मे उसने इंस्पेक्टर ने कहा, 'हमा
'आप कानून के दिनार
'कोई नहीं रोक सदा ।
'हम आपको हिन्दी
'ठीक है, पर ऐसा टन्टन्ट
ऐमा करना आई
दिईन् ।
'मन नोवदे हैं कि
"मुसने दो नहों, भार
लगा मोबिर।'
पुनित इन्भर
बी पात्रटि-ers
खट्टाहा।
ईर-14
दिखाई... #zrFN
कोई दो सौ मजदूर सामने आ खड़े हुए। और पांच मिनट अमित चुप रहा । इसके बाद मजदूरों को सम्बोधित करते हुए बोला : 'किसी बड़े आदमी की मृत्यु पर उसकी आत्मा की शान्ति के लिए एक मिनट का मौन धारण किया जाता है । मैं चाहता हूं कि इससे पहले कि मैं आप लोगों से कुछ कहूं, हम सभी एक मिनट के लिए मौन खड़े रहें। क्योंकि इस कोठी में इन्साफ की मौत हो गई है। इन्साफ बड़ी चीज होती है। उसकी मौत पर हमारे लिए यह जरूरी हो जाता है कि हम इस परिपाटी को निभा लें।' और सचमुच लोगों ने एक मिनट का मौन धारण किया । इसके बाद अमित ने कहना शुरू किया तो उस वक्त तक कहता रह गया जब तक कि अंधेरा गहन न हो गया। शहर छोड़ते वक्त से ही अमित को ऐसा लगा था कि कोई कार लगातार उसकी अपनी कार का पीछा करती आ रही थी। मजदूरों के अधिकार के लिए तो अमित हड़ताल करने जा रहा था । वह आखिरी हथियार था इस लड़ाई का । उसे विश्वास था कि इस हथियार का वार खाली नहीं जा सकता पर उसका अपना यह विश्वास एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर रह गया था । हड़ताल को उसका पूरा जीवन मिल पाए तब तो वह सफल होगी और अगर ऐसा नहीं हुआ तो... ? यह एक लम्बी खामोशी होती, विना स्पन्दन की। इसके साथ अमित की अपनी सांसें भी ठिठक जातीं। और प्रश्न के उत्तर में प्रश्न का ही गूंजन होता : 'कहीं हड़ताल की सम्पूर्णता के पहले मेरी गिरफ्तारी हो गई और.' फिर वही स्पन्दनहीन खामोशी । • आशा भोली थी। उसने कहा था, 'नहीं अमित वह तो तुम्हारी गिरफ्तारी के बाद भी चलेगी। मुझे तो ऐसा भी नहीं लगता कि सरकार तुम्हें गिरफ्तार कर जाने का कच्चा साहस कर पाएगी।' आशा ने यह भी कहा था, 'मजदूरों की लड़ाई को तो तुम हड़ताल करके लड़ रहे हो । अपनी निजी लड़ाई को कैसे लड़ोगे ?' 'निजी लड़ाई ? क्या यह मेरी अपनी लड़ाई नहीं ?' १७० / हड़ताल कल होगी 'मैं उन लड़ाई की बात कर रही हूं जो दितनी तुम्हारी है, उतनी हो जानीन की भी, या उसके लिए भी कोई हड़ताल करके पार पा सकोगे?' 'आमा, बादमी का तो पूरा जीवन ही लड़ाई है। हर और पर एक मोर्चा लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मभी लड़ाइयों को आदमी एक ही वार लहे। इतमीनान रखो वह हड़ताल भी होगी, आज न सही, कस।' आशा के प्रश्न ने उसे विचलित कर दिया पा पर चूकि एक याप्त पो वह प्राथमिकता दे चुका था इसलिए तव तक के लिए उसने उन दूसरी बात को बिसार देना ही ठीक समझा। उसके पीछे की गाड़ी अब भी उसका पीछा किए आ रही थी। ब्यू-मिरर में वह उस रोशनी को देखते आ रहा था । अमित जव आसिरी व्यक्ति को छोड़ने काटेज गांव में प्रविष्ठ हुआ तो पीछे की गाड़ी गाव भी सीमा पर ही रुक गई। काटेज के मजदूरों के उस नेता से विदाई लेने हुए अमित ने कहा, 'कल सबसे पहले मैं यही आऊंगा देवराज ! जानते हो, क्यों ? क्योकि यह गांव बलिदान का गांव है । यहां मजदूरों पर गोलिया चली हैं । इतिहास इस इतिहास को भूल सकता है, लेकिन आंदोलन इस इतिहाम को नहीं भूल सकता । तुम्हे इस बात के लिए गर्व होना चाहिए कि तुम ऐम स्थल में जन्मे हो, जहां गर्भवती स्त्री ने भी मजदूरो के हक के लिए जान दी है । इस ऐतिहासिक गांव में अगर एक मजदूर भी महन- कर काम के लिए तैयार हो जाता है तो मानमिक स्तर पर हड़ताल को असफल समझो।' "ऐमा नही होगा अमित भैया, हड़ताल मफल होगी।' गाव के कुत्तों का आंकना शुरू हो गया था। अमित ने अपने उस स्वर को सुना जो उसके भीतर पर था, 'जानीन, मैं तुम्हें दुनिया की हर चीज से अधिक लिए तुममे अधिक मूल्यवान कोई खजाना है ही नहीं।' यह अमित का वह स्वर था जो कई बार बाहर पर जानीन के सामने होते ही वह दब जाता उसे अकेला सुनता रहता। जानीन की ओर से तर्क के रूप में उसने शिर ने हरको हडताल कल होगी १७१ सुना, 'लेकिन तुम तो इस लड़ाई के सामने उस लड़ाई को कोई महत्व ही नहीं दे रहे हो।' "इस लड़ाई की जीत ही मेरी उस लड़ाई की शक्ति होगी।' रात भोझल थी एक काले अंधेरे में । देवराज उस वक्त तक रास्ते पर खड़ा रहा जब तक अमित ने कार को घुमा नहीं लिया। कल सुबह के लिए उसे समस्त शुभकामनाएं देते हुए अमित ने एक्सीलरेटर को दबा दिया । गाड़ी ने अभी आधे मील का ही फासला तय किया था कि अमित ने अपने सामने विन लाइट वाली एक गाड़ी को स्टार्ट होते देखा । यह कार रास्ते के एकदम बीच में चल रही थी। कुछ दूर और जाने के बाद ही उसकी रोशनी जली । कार के नम्बर प्लेट के ऊपर हथेली की चौड़ाई काले कागज का टुकड़ा चिपका हुआ था। यह एक पुरानी डेटसन थी। उसकी चाल इतनी धीमी थी कि अमित को हॉर्न देना पड़ा। कार उसी तरह रपतार में बीच रास्ते चलती रही। अमित ने दूसरी बार हॉर्न दिया । गुछ देर और कार उसी तरह से चली और फिर एकाएक बीच रास्ते में एक गई। दोनों तरफ के बचे हुए रास्ते इतने तंग थे कि उनसे निकल जाना नितान्त असम्भव था। कार को छिपे नम्बर देखते ही स्थिति अमित की समझ में आ गई थी फिर भी भयहीन वह अपनी सीट पर बैठा रहा। फार की तरफ से दो-दो आकृतियां सामने आई। अमित के भीतर जो पहली धारणा बनी थी, गलत निकली। पुलिस नहीं थी। उन आकृतियों की एक धुंधली याद अमित के मस्तिष्क में अब, भी थी। चारों आदमी उसकी ओर बढ़ने लगे। अमित ने पूरी स्फूर्ति के साथ कार की गीयर बदलकर पीछे ले जाने की कोशिश की पर इससे पहले ''उसकी अपनी कार के आगे का शीशा चकनाचूर हो चुका था । लाइट जलती रही पर अमित के लिए वह रोशनी काली हो चुकी थी। एक जानी-पहचानी काली रोशनी जो उसके लिए उजली रोशनी से भी अधिक जानी-पहचानी थी। नींद की गोलियां लेने के बाद के से वे असर... एक काला बवण्डर" फई काली तरंगें... १७२ / हड़ताल कल होगी
काले वातावरण में लिपटे एक काले सामीप्य से एक श्वेत सामोशी
उसने सुनी:
'अमित...
"जानीन?'
'हां. अमित...
सरस्वती विहार (उत्कृष्ट साहित्य का एकमात्र प्रकाशन गृह) 'हिन्द पॉकेट बुक्स' की सहयोगी संस्था 'सरस्वती विहार' अल्प समय में ही अपने विशिष्ट प्रकाशनों के कारण काफी ख्याति अर्जित कर चुकी है। प्रकाशन क्षेत्र में इतनी विविधता और श्रेष्ठता आपको अन्यत्र प्राप्त नहीं होगी। श्रेष्ठ साहित्य के प्रकाशन में अग्रगण्य सरस्वती विहार द्वारा प्रकाशित कुछ श्रेष्ठ कृतियां उपन्यास सर्पगंधा शैलेश मटियानी १६.०० कामकली १०.०० पारू ने कहा था मणिका मोहिनी ६.०० पटाक्षेप मालती जोशी १०.०० वेगाने घर में मंजुल भगत १०.०० सुरंगमा शिवानी १५.०० किशनुली १०.०० माणिक विषकन्या कंजा रति विलाप अपराधिनी गैडा रथ्या ७.०० एक खाली जगह अमृता प्रीतम १०.०० विरुद्ध मृणाल पांडेय ११.०० तपती दोपहरी अभिमन्यु अनत १०.०० ८.०० ७.०० " गिरते महल " " ८.०० ८.०० " ८.०० कंदी मानामार १२.०० लाजो पड्यंत्र गुरदन !.... क्षितिज भैरवी चक्र धूप-छांह महाकाल १०.०० प्रतिशोध मागर और मरोवर जागृति प्रवंचना १०.०० पड़ौमी ८.०० प्रारब्ध और पुग्पार्थ परिमल कंचे मकान अपने पराये प्रगति के पथ पर नदी तीरे कुमाग्नंभव मागर-तरंग शुमा वर्मा ... अनुपमा बलराज मधोक, आहों की वैमासियां दिनेश नंदिनी डालमिया 15 .. लह पुकारता है परमोरीलाल जाकिर ५:० विविध मलानी की डायरी (यात्रा वृतात) गजेन्द्र अवस्थी १.०० मफरनामा (संस्मरण) अमृता प्रीतम १००० अपने-अपने चार बरस वेद पुप्पांजलि सत्यकाम विद्यालंकार १.०० " SOO . ००० " .. कोई एक ०. " अज्ञेय २००० विशिष्ट आशुलिपि गोपालदत्त विष्ट १०.०० वे दिन वे लोग राजेश्वर प्रशाद नारायणसिंह १८.०० मुगल वंश के डूबते सितारे (इतिहास) १०.०० नज़रबंद लोकतंत्र (जेल-संस्मरण) लालकृष्ण आडवानी ३०.०० एक मुख्यमंत्री की जेल डायरी शांताकुमार १२.०० मेरी जेल डायरी चन्द्रशेखर ६०.०० मेरी कहानी (आत्मकथा) कमलादास २०.०० अद्यतन (निबंध और विचार) वातायन (संस्मरण) शिवानी झरोखा १० अंधकार में एक प्रकाश : जयप्रकाश डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल-१३.०० स्वामी श्रद्धानन्द इन्द्र विद्यावाचस्पति १६.०० मेरी धारणाएं और इष्टिकोण बलराज साहनी ११.०० दुनिया रंग-रंगीली अनंत गोपाल शेवड़े १८.०० मोरारजी देसाई (जीवनी) जी० एस० भार्गव १८.०० क्या नेताजी जीवित हैं ? समर गुह ३०.०० काव्य अज्ञेय ३५.०० चौथा सप्तक हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं बच्चन ३०.०० कैदी कविराय की कुंडलियां अटलबिहारी वाजपेयी २२.०० आंख से भी छोटी चिड़िया इन्दु जैन १५.०० नीरज सं० सुदर्शन चोपड़ा ८.० रहीम विविध रंग की श्रेष्ठ पुस्तकों को प्रकाशित करना सरस्वत विहार की अपनी विशिष्टता है। विस्तत विवरण के लिए लिखें ८.०
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