Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Tatvarth Sutra Teeka
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कालाध्ययन तस्वार्थसून-सिद्धांत पुस्तक रात्रौ वाचनेसे अकाल अध्ययन करनेका दोप भासा, ऐसे कित्येक लोक कहते हैं, परंतु जिसपुस्तकमैं स्वाप्यायके कालका निर्णय कीया है, ऐसे जे मूलाचारनामा सर्व- मान्य पुस्तक इस पुस्तकमैं पांचमाअधिकार मै स्वाध्यायका काल कहां है, सो इहां कहनेसे लोकौंकी शंका निवृचि होपगी, ऐसा मानि ओ पुस्तककी गाथा और संस्कृतअर्थ इहा लिखते हैं ॥ गाथा ॥ ॥ पादोसियवेरत्तिय गोसग्गियकालमेव गेण्हिता ॥ ॥ उवधो कालहिपुणो सज्जाओहोदि कायवो ॥ ७३ ॥ 215 सस्कृतमर्थ प्रादोपिक, वैरात्रिक,गोसर्गिक, कालमेव गृहीत्वा,॥उभयकाले पुन स्वाध्यायो भवति कर्तव्य ॥ हिंदुस्थानीअर्थ-इसीमैं स्वाध्यापकौ वर्जकाल कहियेतो, प्रात कालके चारघडी, मध्यान्हिके चार घडी, शामके चार घडी, और मध्येरात्रीके चारघडी, इतनाही काल वयं कया हैं इतना काल छोटके फेर याफीके कालमें स्वाध्याय करनेकौं कहिये सिन्हातपुस्तक यांचनेकी चिलफूल हरकत नहीं गा पुस्तक मीम निर्णपसागर सापेरवाने में नाना रामचंद्र नाग ने छपया प्रसिद्ध किया संपत १९५१ सन् १८९६ पेक्षाकरिती सिद्धक्षेत्रमेही सिद्धहोयहे तात अल्पबहुत्वनाहीहै । भूतपूर्वनयकी अपे क्षाचितवनकरिये तो क्षेत्रसिद्ध दोयप्रकारहैं।एक जन्मतै, अर एक संहरणतै॥अन्यक्षे त्रमै हरेगयेसिअल्पहे इनते संख्यातगुणै जन्मसिद्धहैं, क्षेत्रकाविभागकरि ऊईलो कतै भये सिद्धअल्पहै, तिनतै सख्यातगुणा अधोलोकतै सिद्धमयेहैं, तिनतै सख्या तरणा तिर्यगलोकतै सिद्ध भये हैं, सर्वतै थोरा समुद्रते सिद्ध भये हैं, तिनते सख्यात गुणा द्वीपतैसिद्धमयेहैं।ऐसे सामान्यकया।विशेषकरि सर्वतैथोरा लवणसमुद्रतैभये सिद्ध, तिनतै संख्यातगुणा कालोदधितै सिद्ध भये हैं, तिनतै सख्यातगुणा जंबूही पतेसिद्ध भये हैं, तिनते सख्यातगुणा धातुकीखडतै सिद्धभयेहें, तिनतै संख्यातगुणा पुष्करार्धते सिद्धभयेहैं ॥ ऐसही कालादिकका विभागते अल्पवहुत्वजानना ॥ १२॥ ऐसेंही हादशअनुयोगकरि सिद्धमै भेद हैं, अर स्वरूपमै भेद नहीहैं ॥९॥ इतित त्वार्थाधिगमेमोक्षशास्त्रेदशमोध्याय ॥१०॥ ॥ ॥चौपाई छंद ॥ ॥ संवत उगणीसै दस शुद्धि ॥ फागुण बुधि दशमी तिथि बुद्धि ॥ ॥लिख्यो सूत्र टीपण गुणथान ॥ नमै सदासुख नित धरिध्यान ॥१॥ लोकसंख्या दो हजार. आवत्ति १ ली ॥ ना X स्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसापराय, यथाख्यात,ये पचप्रकारचारित्रत सिद्धहोय है तथा परिहारविशुद्धिविना चारीतेही सिदहोयहे ॥६॥ अब प्रत्येक बुद्धवोधित भेद कहेहें ॥ प्रत्येकबुद्धतो अपनीशक्तिहीकरि स्वयमेव ज्ञानपावै अर बोधितकहिये परकेउपदेशतै ज्ञानपावै सो बोधितबुद्धहै । केईतो प्रत्येकबुद्ध मोक्षपावैह केई वो धितबुद्धि मोक्षपाहे ॥७॥ अव ज्ञानते भेद कहैहैं। प्रत्युत्पन्ननयकीअपेक्षातै एक केवलज्ञानतेही सिद्धहोयहैं।भूतग्राही नयतै केई मति, श्रुति, दोयज्ञानकरि केवलज्ञा न उपजाय मोक्षपाहें । केई तीन, केई च्यारिज्ञानकरि केवलज्ञान उपजाय मोक्ष पावैहै ॥ ८॥ अव अवगाहनाकरि भेदकहेहें ॥ जघन्यतो साढातीन हाथकी काय कुछघाटि अवगाहनाते सिद्धहोयहें ॥ उत्कृष्ट पाचसैपचीस धनुषकी अवगाहनातै सिद्धहोयहें । मध्यप्रदेशोत्तर अनेक अवगाहनेके भेदतै सिद्धहोयह ॥ ९॥ अव अ तरकरि भेदकहेहे ॥ सिद्धहोय? तिनकै जघन्यअतर नहींहोयतो दोयसमय, अर उ त्कृष्टअतर लगता मोक्षजायतौ अष्टसमयका हैं बहुरि अंतर, जघन्यतो येकसमय हैं। उत्कृष्ट छह महिने हैं, छह महिनेताई कोऊ सिद्ध नहीहोय हैं ॥१०॥अब सख्या करि भेदकहैहैं। जघन्यतौ एकसमयमै एक सिद्धहोयहै। अर उत्कृष्ट एकसमयविषै एक सौआठ जीव मोक्षपावै ॥११॥ अव अल्पवहुत्वकरि भेद कहैहैं। प्रत्युत्पन्ननयकी अ का क्षेत्र (अढाईद्दीप) अर दोयसमुद्रत नस्तक्षेत्र सिद्धहोयहै ॥ १॥ अब काल भेद कहेंहैं । प्रत्युत्पन्ननयतै एकसमयमेही सिद्दहोयहें ॥ भूतपूर्वनयकीअपेक्षाकरि सामान्यतौ उत्सर्पिणी अवसर्पिणी दोऊकालमें सिद्धहोयहैं, विशेपकरि अवसर्पिणी का सुखमादुखमा जो तीसराकाल ताका अंतभागमैउपज्या अर दुखमासुखमा जो चौथाकाल तिससबमै उपज्या सिद्धहोय, तथा चौथाकालका जन्म्या पंचमकालमैभी सिद्धहोय है अर पचमकालमै उपज्या सिद्धनहींहोयहै अर देवलेगया समस्त उत्सर्पि णीअवसर्पिणीमे सिन्धहोयहे ॥२॥ अब गतिकरि भेद कहेहे ॥गतीअपेक्षातै सिद्धगती मेही सिबहीय वा मनुष्यगतीमेही सिबहोय ॥३॥ अव लिंगभेद कहैहैं । लिंगकरि के प्रत्युत्पन्ननयकीअपेक्षा अवेदपणातै सिद्धहोयह ॥ भूतग्राही नयकीअपेक्षातै तीन वेदमै क्षपक श्रेणीचढी मोक्षपावेह, द्रव्यवेदकरि पुरुषवेदतेही सिहोय ॥४॥अव तीर्थभेद कहेहें। केईतो तीर्थकरहोय सिबहोयहें । केई सामान्यकेवलीहोय सिद्ध होय, सोभी दोयप्रकारहैं ॥केईतो तीर्थकरविद्यमानहोते सिद्धहोय, केईतो जिसका लमै तीर्थकरनहीहोय तदि सिद्धहोयहें ॥५॥॥ अव चारित्रकरिके भेद कहेहे ॥प्र त्युत्पन्ननयकीअपेक्षातै चारित्रकाअभावतेही सिद्धहोयहें ॥ भूतग्राही नयकीअपेक्षा लगताही यथाख्यातचारित्रकरि सिद्धहोयह ॥ अतरकीअपेक्षा सामायिक, छेदोप कर्मरहित आत्माका ऊईगमन ही स्वभाव है ॥ ४॥ऐसें ये चार हेतुके चारदृष्टांत करि जीवको कर्मतै छूटतेही ऊर्द्धगमम निश्चयकरना ॥ फेर कोऊकहे मुक्तभयेपीछे आत्माका ऊर्द्धगमन स्वभावहीहै, तो लोकके अतमैही कैसेठहया,ऊचा फिरक्यो नही जाय, ताका हेतुरूप सूत्र कहेहें ॥७॥ सूत्र॥धर्मास्तिकायाभावात् ॥८॥ अर्थ॥ लोक केअंत ऊपरगत उपकारका कारण जो धर्मास्तिकाय है ताका अभावहै, तातै धर्मास्ति कायका सहायविना जीव ऊर्द्धगमनकरि लोकाकाशके बाहर अलोकाकाशमै नहिजाय ॥ आलोकाकाशमै धर्मास्तिकायका सन्नावमानीयेतो, लोक अलोकके विभागका अभावका प्रसंगआवै, ये मुक्तिजीवहै तिनकै गतिजात्यादिकके भेदका कारणनही तातें भेदव्यवहार नहीहै, समस्तमुक्तिजीव समान हीहैं। कथचित् भेदभीहै सो काहे ते है सो कहेहैं ॥ ८ ॥ सूत्र ॥ क्षेत्रकालगतिलिंगतीर्थचारित्रप्रत्येकबुन्दवोधितज्ञा नावगाहनातरसख्याल्पवहुत्वत साध्या ॥९॥ अर्थ ॥ क्षेत्रादिक द्वादशअनुयोग ते सिद्धको भेदरूप कहें । अब क्षेत्रकरि भेद कहेहै ॥ प्रत्युत्पन्ननयकीअपेक्षा सिद्ध क्षेत्रमैही सिबहें तथा आपकेप्रदेशमैही सिद्ध है वा आकाशका प्रदेशमैही सिद्धहैं अर भूतग्राहिनयकीअपेक्षा पंद्रह कर्मभुमीका जनम्या जीव तहाही सिद्धहोय, ।। अर कर्मभूमीमै जनम्याको कोई देवादिक अन्यक्षेत्रमै लेयजायतो समस्तमनुष्य नहि, तातै ऊर्द्धगमनको हेतु कहेहे ॥५॥ सूत्र ॥ पूर्वप्रयोगात्संगत्वाधच्छेदात्तथा गतिपरिणामाच ॥६॥अर्थ ॥ पूर्वकेप्रयोगते, असंगपणातै, बधकेछेदतै, तथा ग तिपरिणामतै, ये चारि हेतुतै ऊर्द्धगमनका निश्चयकरना ॥ अव ये चारि हेतुका स माधान करनेको चार दृष्टात कहै हैं ॥६॥ सूत्र ॥ आविद्धकुलालचक्रवद्यपगतले पालाबुवदेरंडबीजवदग्निशिखावञ्च ॥७॥ अर्थ ॥ छहे सूत्रमै कहे जे चार हेतु तिनकाअनुक्रमते चार दृष्टात जानना ॥ जैसे कुभकार चाककू दडते भ्रमणकराव ता रहिजाय तोह पहलेप्रयोगतै जहापर्यंत चाककै फिरवेका सस्कार नहीमिटै तहा ताई फिरवोहीकर, तैसें संसारअवस्थामै जीव ऊई मुक्तीमै गमनकरनेकै अर्थी बहुत वार परिणाममै अभ्यास कर रह्याथा सो कर्मके छूटेपीछह पूर्वले अभ्यासके सस्कार ते ऊर्द्धगमन करे, ॥ १॥ बहुरि जैसे माटिका लेपकरि व्याप्ततुंबा जलमै इब्याहुवा भी माटिका लेप उतरिजाय तब जलमै ऊचाआजाय तैसें कर्मके लेपकरि संसारमै इवा आत्मामी कर्मलेप दूरभये ऊर्द्धगमन करेंहैं ॥२॥ बहुरि जैसे एरंडकाबीज डामै वंध्याहुवा तिष्ठेथा अर जब एरडका डोडा सूकिकरि फाटै, तदि बीज ऊचाही उछलै, तैसें कर्मबंधन टूटतेही जीव ऊर्बुगमन करैहें ॥३॥ बहुरि जैसे पवन रहि त अग्नीकी ज्वालाका ऊर्द्धगमन ही स्वभावहै, पवनकरि अन्यदिसामै गमनकरेहै, तैसे ॥ अथतत्वार्थसूनदशमाध्यायप्रारभ ॥ सूत्र ॥ मोहक्षयात्ज्ञानदर्शनावरणातराय क्षयाचकेवल ॥१॥अर्थ ॥ पहले मोहका क्षय क्षपक श्रेणीमै करि वहुरि अंतरमुहू तमै क्षीणकपायनामपाय पाछै युगपत् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अंतराय, इन कर्मका क्षयकरि केवलज्ञान उपजे हैं ॥१॥ सूत्र॥ बधहेत्वभावनिर्जराभ्याकृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्ष ॥२॥अर्थ ॥ नवीन वधके हेतु जे मिथ्यात्व अविरतादिक तिनका तौ अभाव भया अर पूर्वके वधेहुये कर्मथे तीनकी निर्जरा ये दोऊतें समस्तकर्मका अत्यतअभा व होना सो मोक्ष हैं॥२॥ सूत्र । औपशमिकादिभव्यत्वानाच ॥३॥ अर्थ। उपश मीकआदिभाव अर परिणामिकमै भव्यत्व, इनका अभावतै मोक्ष है॥३॥ सूत्र॥अन्य बकेवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्य ॥४॥ अर्थ॥सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, सिद्धत्व, ये भावविना सिद्धके अन्यमावका अभाव हैं, जीवत्वभावको सिद्धत्वभावकरि जान ना, अनतवीर्य अनतसुखहै ते अनतज्ञान दर्शनमै अतर्भूत है, जातै अनतवीर्या दिककरि हीनतै अनतज्ञानादिक नाहीहोय अर सुखमै अर ज्ञानमै भिन्नता है नहीं ॥४॥ सूत्र ॥ तदनतरमूर्द्धगच्छत्यालोकातात् ॥५॥ अर्थ॥ समस्तकर्मका अभावभ ये पीछे जीव उर्द्धगमन करै है, सो लोककाअत पर्यंत जाय है।अव कोऊ या कहै, उर्द्धग मन करनेको कारण कौन है, कर्मतो रह्यानही, ताते हेतुकह्याविना निश्चयकियाजाय सयमकी लब्धिके स्थान असंख्यात है ॥ तिनमै सर्व जघन्य सयमलब्धिस्थान पुला क अर कषायकशील ये दोऊकै होते असंख्यात स्थानताई यो युगपत् लारिजाय, पाछै पुलाककीतौ व्युछित्त होय अर पाछै कषायकशील असख्यात स्थान एकाकी जाय, पाछै कषायकुशील अर प्रतिसेवनाकुशील अर वकुश ये युगपत् लारही असख्यातस्थान गमन करे, पाछे वकुश व्युछित्तनै प्राप्तहोय, तीठापाछै असंख्यात स्थान जाय प्रतिसेवनाकशील व्युछित्तने प्राप्तहोय हैं, तीठापाछै असंख्यातस्थानजा य कषायकुशील न्युछित्तनै प्राप्तहोय हैं, यातै ऊपर कषाय रहितस्थान हैं ते निग्रंथके हीहैं सोमी असंख्यात सयमलब्धिस्थान जाय व्युछित्तनै प्राप्तहोय है, यातै ऊपर एकस्थान जाय स्नातक निर्वाणनै प्राप्तहोय हैं, ऐसे ये सयमलब्धिस्थान असंख्यात हैं तोह अविभागपरिच्छेदकी अपेक्षा अनतका गुणाकार हैं॥१॥ ऐसें पुलाकादिक मुनीका स्वरूप कहा सो अप्टप्रकारकरि समझने योग्य है ॥४७॥ ॥ इतितत्वा र्थाधिगमेमोक्षशालेनवमोऽध्यायः॥९॥ ॥ ॥
त्त लेह, कोऊ दोप नहीलगाव है, कोऊ आचार्य हैं, कोज उपाध्याय हैं, कोऊप्रवर्तक कोऊ निर्यापक हैं, कोऊ वैयादृत्य करैहै, कोऊ ध्यानविषै श्रेणीका आरंभ करहै, कोऊके केवलज्ञान उपजै हैं ॥ इत्यादि मुख्य गौण वाह्यप्रवृत्तिकी अपेक्षा लिंगभेद है। दिगर है ते नमहै, वस्त्र आमरण शस्त्रादि रहित हैं, ऐसे लिंग कह्या ॥ १॥ अब लेश्या कहेहै । पुलाकमुनीकै तीन शुभही लेश्या हैं । वकश तथा प्रतिसेवना कुशील इनके पट्लेश्या हैं । अन्यआचार्यके अभिप्रायते तीन शुभही लेश्या हैं। कपायकुशीलकै उत्कृष्ट चारलेश्या है, अन्यआचार्यके अभिप्रायते तीनू शुभही लेश्या है। निर्यथ और स्नातक इनके केवल शुक्ललेश्या हैं । अयोगी भगवानके लेश्या नहीहें ॥१॥ अव उपपाद जो उत्पन्नहोना सो कहैहैं॥पुलाकका उत्कृष्ट उपपाद उत्कृष्ट स्थितिके धारक सहस्रारस्वर्गके देवमै उपजै हैं, अठारहसागर प्रमाण आयु पावै॥बकु स अर प्रतिसेवनाकशीलको उत्कृष्टउपपाद आरण अच्युतस्वर्गमै बावीससागरकी आयुपावनेवालेमै हैं । कपायकुसील अर निर्मथ का उत्कृष्ट उपपाद सर्वार्थसिद्धिवि पे तेतीससागर आयु प्रमाणके धारकमै है ॥ अर इनि पचप्रकारके मुनीका जघन्य उपपाद दोयसागरकी आयुके धारक सौधर्मस्वर्गविपै हैं ॥ सातककै निर्वाणमैही उपपाद है ॥ ऐसें उपपाद कह्या ॥ १॥ अव स्थान कहेहे ॥ कपायके तीव्रमदपणात चारागमे पचसमिति तीनगुप्तिका व्यार यान पर्यत होय है । स्नातक है ते केवलज्ञा नी है, तिनके श्रुत नहीहें ॥१॥ अव सेपना कहह। बहुरि प्रतिसेचना जो विराधना सो पुलाकके तो पचमहाव्रत अर एक रात्रिभोजनत्याग इनि छहनतमे परके वसते परकी जपरीते एककोई व्रतकी विराधना होये है । बहुरि बकुश टोयप्रकार है, एक उपकरणपकुश दूजा शरीरयकुश ॥ तिनमै उपकरण बकुशकै बहुत सोभादि सहि त कमडलादिक राखनेकी इच्छा याही विराधना हैं ॥ अर शरीरवकुशकै शरीरस स्कार करना, सवारना, सोभनीक रहनेमै परिणाम सोही विराधना है । अर प्रतिसे वना कुशीलके मूलगुणमे विराधना नहीलगे अर उत्तरगुणमे कोइक विराधना लगे हे सो प्रतिसेवना है। अर कपायकुशील, निग्रंथ, स्नातक, इनकै विराधना नाहीहै। ॥ १॥ बहुरि तीर्थकहै है ॥ ये पंचप्रकारकेमुनी समस्त तीर्थकरके तीर्थमै होय है ॥१॥अब लिंग कहहै । लिंग दोयप्रकार है । एकद्रव्यलिंग एकमावलिग ॥ भाव लिंग करिके तो पचप्रकारके मुनी निर्मथही हैं सम्यक्त्वसहित है मुनिपणामै निराद रभाव कोऊकै नाही है॥अर द्रव्यलिंगकरि तिनमै भेद हें, कोऊ आहार करहै, कोऊ अनशनादितप करै है, कोऊ उपदेश करैहै, कोऊ अध्ययन करैहे, कोऊ तीर्थ विहार रहे, कोऊ ध्यान करहै, कोऊ अनेक आसन करैहे,कोऊके दोपलागेहै, कोऊ प्रायश्चि गका चलना मदमद भया, व्यक्त अनुभव गोचर नही अर अतर्मुहूर्तते ऊपर केव लज्ञान जिनको उपजे ते निर्मथ हैं॥४॥ अर जिनकै घातियाकर्मका अत्यंत नाश भया ऐसे सयोगकेवली अयोगकेवली इनको स्नातक सज्ञा हैं ॥५॥ स्नातवेदसमाप्तौ ऐसा धातुका सातशब्द बने हैं सो ज्ञानके सपूर्णताके अर्थमै हैं। ऐसे ये पांचही मुनी चारित्र परिणामकी हानि रद्दीतै भेदहोते भी नैगम सग्रहादि नयकी अपेक्षाकरि निर्य थहीहै॥ ४६ ॥ सूत्र ॥संयमश्रुतसेवनातीर्थलिंगलेश्योपपादस्थानविकल्पत साध्या ॥४७॥ अर्थ॥ये पुलाकादिक मुनीहै तेसंयमादिक अष्ट अनुयोग साध्यकहिये जान ने, व्याख्यानकरने॥अव संयम कहेहें॥पुलाक वकुश प्रतिसेवनाकुशील ये तीन मुनी तो सामायिक, छेदोपस्थापना ये दोयसयममैही वर्तेहैं।कपायकुशील हैं ते सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसापराय ये च्यारी सयमविषै वर्ते हैं । निग्रंथ, स्नातक ये दोयमुनी यथाख्यातसयमहीमे प्रवर्ते हैं ॥१॥ अव श्रुति कहैहैं ।वहुरि पुलाक, वकुश, प्रतिसेवनाकशील, इन तीनकै उत्कृष्ट श्रुतकाज्ञान दशपूर्व पर्यंत होय हैं, कपायकुशील अर निर्मथकै उत्कृष्ट श्रुतकाज्ञान चौदहपूर्वपर्यंत होय हैं। अर जघन्य श्रुतज्ञान पुलाककैतौ आचारागमै आचारवस्तु है तहा पर्यंत हैं। बहुरि वकुश, कुशील, निर्यथ, इनके जघन्य श्रुतज्ञान अष्ट प्रवचन माटका पर्यंत हैं, आ विपेहू कोऊक्षेत्र कालादिकमै विराधना मलरूप परालसहित हैं तातै पुलाककह्या हैं ॥१॥ बहुरिवाह्य अभ्यतर परिग्रहका सर्वथा अभावरूपमै तो उद्यमीमया तिष्ठे हैं व्रतजिनकै अखढित हैं, मूलगुणखंडित नाहीकरे हैं, अर शरीर उपकरण इनकी भूषा सुदरतामै जिनकै अनुराग हैं, जातै सघके नायक आचार्यहोय तिनकै प्रभावनादिकमै अनुरागहोयही तिसप्रभावनाके निमित्तकरि सुदरशरीर कमडलु पिच्छिका स्थाना दिककी सुदरतामै अनुरागकरें हैं वहुरि सघकेमुनीमै अनुराग तथा धर्मकी प्रभावना दिककेवास्ते ऋद्धिमै, शरीरके संस्कारमै, यशमै, प्रभावमै, तत्परता है, परमार्थते परिग्रहही हैं जातैरागमलसहित आचरणकर्तृरीत धारै हैं अर वकुशनाम कबूतरका हैं तातै इनको वकुश कहें।वहुरि कुशील दोयप्रकार हैं, एक प्रतिसेवनाकुशील, दूजा कपायकुशील,तहा जिनकै मूलगुण उत्तरगुणौ परिपूर्ण हैं अर शरीर कमडल पुस्तक शिप्य येही परिग्रह, इनते भावजिनकै न्यारे नहीभये, कोईप्रकार कारणविशेषतैउत्त रगुणकी विराधना करनेवाले, ऐसे मुनी प्रतिसेवना कुशील हैं।बहुरि जाने अन्यक पायका उदयतो वशकीया अर संज्वलन मात्र कषायकै आधीन हैं सो कषायकुशील हैं ऐसे दोयमेदरूप कुशील कहै ॥ ३ ॥ बहुरि जिनकै समस्तमोहका उदयकाती अभावभया अन्यकर्मका उदयजिनकै मद होगया अर आत्मप्रदेशका तथा उपयो गुणनिर्जरा ॥४५॥ अर्थ ॥ कोऊ भव्य पचेंद्री सज्ञीपर्याप्तक, प्रथमोपशम सम्य तकी उत्पत्तिहोनेकैअर्थ, तीन करणके परणामके चरण समयमै, वर्तमान विशुद्ध तासहित मिथ्यादृष्टी ताकै आयुकर्मविना सप्तकर्मकी निर्जरा होयहै, तातै असयत सम्यग्दृष्टीकै गुणश्रेणि निर्जरा असख्यातरणा होयहै तातै देशव्रतीकै, तातै सकलसयमीमहाव्रतीकै, तातै अनतानुबधी कषायके विसयोजन करनेवालेके, तातै दर्शनमोह क्षपावनेवालेकै, तातै उपशमक तीनगुणस्थानवालेकै, तातै उपशांत मोह ग्यारमा गुणस्थानवालेके, तातै क्षपकनीके तीनगुणस्थानवालेकै, तातै क्षीण मोहनाम वारमा गुणस्थानवालेकै, तातै जिनकेवलीकै, इनि दशस्थाननीमै जो कर्म निर्जरैहे सो असंख्यातगुणा गुणश्रेणीरूप समय समय निर्जरैहै, कालअंतरमुहूर्तत्र माण समस्तस्थानमै गुणश्रेणि निर्जरा करै है परतु ऊपर ऊपर घाटिघाटि प्रमाणरूप अतरमुहर्त हैं ॥४५॥ सूत्र ॥ पुलाकवकुशकुशीलनिग्रंथस्नातकानिथा ॥४६॥ ॥ अर्थ ॥ ये पाचप्रकारके मुनी है तिनके सम्यदर्शन हैं अर वस्त्र आभूपण आयु धादिक परिग्रह रहित हैं तातै निZथ संज्ञा पांचौहीकै हैं। वहुरि जे उत्तरगुणकी भावना रहित हैं अर जिनके व्रतमैह कोऊ क्षेत्रवि कोऊकालविणे परिपूर्णतानही है तातै पुलाक ऐसी सज्ञा हैं ॥ पुलाकनाम परालसहित शालीकाहै तातै मूलगुण काययोगायोगानां ॥४॥अर्थ ॥ प्रथमशुक्लध्यान तीनू योगमै है ॥ द्वितीयशुक्ल ध्यान तीन योगतै एकयोगमैं हैं। तृतीयशुक्लध्यान काययोगमै हैं॥चौथा शुक्लध्यान अयोगकेवलीकै होय हैं॥४०॥सूत्र ॥ एकाश्रयेसवितर्कविचारपूर्वे ॥४१॥अर्थ।। आदिके दोऊ शुक्लध्यान श्रुतकेवलीके आश्रय होय हैं । ते वितर्ककहिये श्रुत अर विचारकहिये पलटने सहित हैं ॥४१॥ सूत्र ॥ अविचारंद्वितीय ॥४२॥ अर्थ ॥ दू जा एकत्ववितर्क ध्यान हैं सो विचार जो पलटना ताकरि रहित है॥४२॥ सूत्र ॥ वितर्क श्रुत ॥ ४३ ।। अर्थ ॥ वितर्कनाम श्रुतिका हैं । ४३ ॥ सूत्र । विचारोर्थव्यज नयोगसंक्राति ॥४४॥ अर्थ ॥ अर्थ जो द्रव्य तथा पर्याय हैं, व्यजन वचन हैं, यो ग मन वचन काय इनकी क्रिया हैं, पलटणा ताको सक्राति कहिये, सो प्रथमशुक्ल ध्यानमै द्रव्यतैपर्यायमै पर्यायतैद्रव्यमै पलटना होय है, तथा श्रुतका एकवचन अ वलबन करिकै अन्यवचनको अवलबन करै सो व्यजनका पलटना है। मन वचन काय इनके योगमैते येकयोगको छोडि अन्यको ग्रहणकरै है सो अर्थ व्यजन योग इनका पलटना है सो पहले शुक्लध्यानमे है । दूजामै पलटनेका कारण मोहनीकर्मन ही तातै मणीके दीपकसमान अचल हैं ॥४४॥ सूत्र ॥ सम्यक्दृष्टिश्रावकविरतान तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशातमोहक्षपकक्षीणमोहजिना क्रमशोसल्येय युक्ति तामै तत्परहुवा सर्वज्ञकी आज्ञा प्रकाशनेको वारंवार चितवन करै सो आज्ञा विचय धर्मध्यान हैं ॥ १॥ बहुरि ये प्राणी सर्वज्ञकी आज्ञातै पराङ्मुख है ते समस्त अंधकीज्यो मिथ्यादृष्टी हैं अर मोक्षके अर्थीहे परंतु सम्यक्मार्गतै दूरही प्रवर्ते हैं । ऐसें समीचीन मार्गका उपाय चितवन करना सो अपायविचय हैं अथवा ये प्राणी मिथ्यादर्शन ज्ञान चारित्रतै कैसे रहितहोय ऐसा चितवन करना सो अपायविचय धर्मध्यान हैं ॥२॥ज्ञानावरणादि कर्मका द्रव्य क्षेत्र काल भव भाव इनकेनिमित्त ते भया जो फलकाअनुभव ताका चितवन करना जो ये कर्मते उपज्या कर्मकाफल मोते भिन्न है मेरा स्वरूपनाही ऐसाचितवन सो विपाकविचय धर्मध्यान हैं ॥३॥ लोकका सस्थानादिकका चितवन सो सस्थानविचय धर्मध्यान हैं ॥४॥ ऐसे धर्मध्या नके चारिभेद कहे ॥३६॥ सूत्र । शुक्छेचायेपूर्वविद ॥३७॥ अर्थ॥ आदिके दो य शुक्लध्यान पूर्वके जाननेवाले श्रुतकेवलीकै होय हैं ॥ ३७॥ सूत्र ॥ परेकेवलिन ॥३८॥ अर्थ॥ तीजा चौथा ये दोय शुक्लध्यान सयोगकेवली अयोगकेवलीकै होयहै ॥३८॥ सूत्र॥ एथक्त्वेकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरतक्रिया निवर्तीनि॥३९॥ ॥अर्थ ॥ एथक्त्ववितर्कविचार १ एकत्ववितर्कविचार १ सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति १ व्यु परतक्रियानिवर्तिनि १ ये च्यार प्रकारके शुक्लध्यान हैं ॥ ३९ ॥ सूत्र ॥ध्येकयोग स्थानके ऊपरके गुणस्थानमै आर्तध्यान नहीहोय परतु प्रमत्तसयत सहावे गुणस्था नमें निदाननामा आर्तध्यान नहीहोय अन्य तीन आर्तध्यान कदाचित होयहें ॥३४॥ ॥ सूत्र ॥ हिंसान्तस्तेयविपयसंरक्षणेभ्योरौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥३५॥ अर्थ॥ अब रौद्रध्यान कहै । हिंसा जो प्राणकाघात अर अन्त जो असत्य अर स्तेयकहि ये चोरी परधनहरण, अर विपयसंरक्षण जो परिग्रहका ग्रहण रक्षण इनविपै जो वा रवार चितवन सो रौद्रध्यान हैं ये ध्यान अविरतकै होय अर आरभ हिंसा धनरक्षणा दिकरि देशवतीकैहूं कदाचित होय ॥सयमीकै नहीहोय अर होयतौ सयमतै छुटिजा य ॥३५॥ सूत्र ॥ आज्ञापायविपाकसस्थान विचयायधम्म ॥३६॥अर्थ ॥ धर्मध्यानके भेद कहेहै । बहुज्ञानी उपदेशदाताके अभावते, अपनीमदबुद्धीते, कर्मउदयकेवसते, पदार्थकेसूक्ष्मपणातै, हेतु दृष्टात जानैविना, सर्वज्ञके आगमको प्रमाणकरिअर चिंत वन करे जो इसआगममे यह पदार्थका स्वरूप सर्वज्ञने कह्याहै तैसेही हैं अन्यप्रकार नहीं हैं, सर्वज्ञवीतरागदेव अन्यथा कहनहीं ऐसा गहन पदार्थके अन्दानते अर्थका निश्चय करना सो आज्ञा विचय धर्मध्यान हैं अथवा आप पदार्थका स्वरूपजाने तैसाही परको कहनेकी इच्छाजाकै ऐसे पुरुपकै अपनेसिन्दातके अविरोधकरि तत्वार्थको दृढकरनेका जाकै प्रयोजन होय सो तर्क नय प्रमाणकी कपाय मल रहित उजलपरिणाममै उपजै सो शुक्लध्यान हैं ॥४॥२८॥ सूत्र ॥ परेमो क्षहेतू ॥२९॥ अर्थ ॥ परेकहिये धर्मध्यान अर शुक्लध्यान ये दोऊ मोक्षके कारण हैं ॥ २९ ॥ सूत्र ॥ आर्तममनोज्ञस्यसप्रयोगेतद्विप्रयोगायस्मृतिसमन्वाहार ॥३०॥ अर्थ ॥ अमनोज्ञ जो आपकै वाधाका कारण दुष्टजन विप कटक शस्त्र शत्रु इनका संयोगहोते जो वारंवार ऐसाचितवन होय जो मेरै इनका वियोग कैसेहोय ऐसा अ भिप्राय सो प्रथम आर्तध्यान हैं ॥ ३० ॥ सूत्र ॥ विपरीतमनोज्ञस्य ॥३१॥ अर्थ ॥ अपना धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, वांधव, जीविका, इनका वियोग होते इनकै संयोगकै अर्थि वारंवार चिंतवन करना सो दूसरा आर्तध्यान हैं ॥ ३१॥ सूत्र ॥ वेदनायाश्च ॥३२॥अर्थआपको रोगकी पीडाहोते ताका वारंवार चितवन करना तथा मेरे इस वेदनाका अभाव कैसैहोय ऐसा चितवन सो तीसरा आर्तध्यान हैं ॥३२॥ सूत्र ॥ निदानच ॥३३॥ अर्थ ॥ भोगकी वाछाकरि आतुर जो पुरुष मी कालमै विषयभोगकी प्राप्तिवास्ते वारवार संकल्प रहै सो चौथा आर्तध्यान हैं। ॥ ३३॥ सूत्र ॥ तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयताना ॥ ३४॥ अर्थ ॥ये आर्तध्यान अविरत जे मिथ्यात्वादिक च्यार गुणस्थानवालेकै अर देशव्रती पचमगुणस्थानव तीकै अर प्रमत्त संयत सहावेगुणस्थानवालेकै च्यारही आर्तध्यान होय हैं सहायण ताकै आगा ग्रथअर्थदोऊका अन्य बहुज्ञानीको प्रश्नकरना सो प्रच्छना हैं॥२॥जानेहुये अर्थ का वारवार चितवन करना सो अनुप्रेक्षा हैं ॥३॥ शब्दका शुद्धघोषना (बोलना), सो आम्नाय हैं॥४॥ धर्मवर्निद्धी कथाका उपदेश देना सो धर्मकथा हैं॥५॥ ऐसें पाचप्रकार स्वाध्यायतप कह्या ॥ २५॥ सूत्र । वाह्याभ्यतरोपध्यो ॥२६॥ अर्थ ॥ अब कायोत्सर्गके दोयप्रकार कहें ॥धनधान्यादिक तौ वाह्य परिग्रह हैं अर क्रोध मानादिक अभ्यतर परिग्रह हैं ॥ कायकी ममता हूं अंतरपरिग्रह हैं । ये दोऊ उपा घि परिग्रहका त्याग सो दोप्रकार व्युत्सर्गतप हैं ॥ २६ ॥ सूत्र ॥ उत्तमसंहननस्ये काग्रचिंतानिरोधोध्यानमातर्मुहूर्तात् ॥ २७॥ अर्थ ॥ अव ध्यानके लक्षण कहेंहैं । वजम्पभनाराच, वजनाराच, नाराच, ये तीनि उत्तमसंहनन हैं, इनका धारक पु रुपके चित्तका येकाग्रचितवनमै (रुचीकरना ) रोकना सो ध्यान हैं । अनेक पदा थेके अवलवनतै चलायमान नहींहोय तदिध्यान हैं, सो उत्कृष्टपणे अंतर्मुहूर्त पर्यंत रहै अधिक नहीठहरे हैं ॥ २७॥ सूत्र ॥ आर्तरौद्रधर्मशुलानि ॥ २८ ॥ अर्थ ॥ अव ध्यानके मेद च्यार कहेहे ॥ ऋतु जो दुःख ताविषै जो चितवन उपजै सो आर्तध्यान हैं ॥१॥ रुद्र जो क्रूर अभिप्राय ताविषै जो उपजै सो रौद्र ध्यान हैं ॥ २॥ धर्मपरिणामरूप चितवन मै उपजै सो धर्मध्यान हैं ॥३॥ आत्माके ना सन्मुखगमन करना अजुलीकरना इत्यादि उपचार विनय है ॥४॥ ऐसे न्यारत्र कार विनयतप है ॥२३॥ सूत्र ॥ आचार्योपाचायतपस्वीशैक्षग्लानगणकुल्स घसाधुमनोज्ञाना ॥ २४॥ अर्थ ॥ अब वैयाट्त्यके दसप्रकार कहेहे ॥ जिनते व्रता दिक आचरणकरिये सो आचार्य है ॥१॥ जिनकै निकट मोक्षका कारण शास्त्रप ढिये सो उपाध्याय है॥२॥ महान् उपवासादि आचरणकरनेवाला तपस्वी हैं॥३॥ शिक्षाका अधिकारि सो शैक्ष है॥४॥रोगादिकरि क्लेशरूप होय सोग्लान हैं ॥५॥ उद्धमुनीश्वरके परिपाटीका होय सो गण है ॥६॥ दीक्षादेनेवाले आचार्यके शिष्य होय सो कुल है ॥७॥ ऋषी मुनी यती अनगार ये च्यारप्रकारके मुनीका समूह सो सघ है ॥८॥ वहुतकालका दीक्षितहोय सो साधु है ॥९॥ लोकमै मान्य होय सो मनोज्ञ है ॥ १० ॥ इन दशप्रकारके मुनीश्वरकै रोग परीषह मि घ्यादिका सवध आवै तव अपनी कायकरि तथा अन्यद्रव्यकरि तथा उपदेशादिकरि तिनका प्रतिकार इलाज करै सो वैवाढत्य है ॥२४॥ सूत्र वाचनाटन्छनानुप्रेना नारनौपदेशा ॥२५॥अर्थ। अब स्वाध्यायके पाचमेद कहै हैं ॥ निदोषग्रथ अर अर्थ अर शब्दअर्थ दोऊका जो भव्यजीवको शिखावना पढावना सो वाचना है ॥ १॥ वहुरि संशय दूरक्रनेकौ निर्वाध तत्वके निश्चयकरनेको ग्रथकेअर्थका तथा ॥ २१ ॥ सूत्र ॥ आलोचनाप्रतिनमणतदुमयविवेकव्युत्सर्गतपच्छेदपरिहारोप स्थापना ॥ २२॥ अर्थ ॥ अव नवप्रकार प्रायश्चित्त कहे हैं ॥ प्रमादतै आपको दोपलाग्याहोय तदि दसदोप रहितहुवा गुरुको अपना दोष निवेदन करना सो आलोचना है ॥१॥ मोको दोषलाग्या ते मिथ्याहोऊ नि फल होऊ ऐसे वचनकरि प्रगटकहना सो प्रतिक्रमण हैं॥२॥ आलोचना अर प्रतिक्रमण दोऊ क रना सो तदुभय हैं ॥३॥ दोषतेसहित अन्नपान उपकरणका संसर्ग भयाहोयतो तिनका त्याग करना सो विवेक है ॥४॥कायोत्सर्गादि करना सो व्युत्सर्ग हैं ॥५॥ अनशनादि अगीकार करना सो तप हैं॥६॥ दिवस पक्ष मासादिककी दीक्षाका घटावना सो छेद हैं ॥७॥पक्ष मास आदिका विमागतै संघवार करना सो परि हार हैं।॥ ८॥ पीछली दीक्षाछेदी नवीनदीक्षादेना सो उपस्थापना हैं॥९॥ ऐसें न वप्रकार प्रायश्चित्त कह्या ॥ २२॥ सूत्र ॥ ज्ञानदर्शनचारित्रोपचारा ॥२३॥अर्थ। अव विनयके च्यार प्रकार कहेहे ॥ बहुत सन्मानसहित मोक्षकेअर्थि ज्ञानकाग्रहण अभ्यासस्मरण इत्यादिक करना सो ज्ञानविनय हैं ॥१॥शंकादि दोषरहित तत्वा र्थका श्रद्धान सो दर्शनविनय हैं ॥२॥ ज्ञानदर्शन सहित चारित्रमै समाधानरूप चित्तकरना सो चारित्रविनय हैं॥३॥ आचार्यादिकको प्रत्यक्षहोतै उठि खडारह धाकाअभाव, ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, ध्यान, इनकी सिदिहोय हैं ॥५॥ ग्रीष्मऋतुमै पर्व तके शिखरपर अर वर्षाऋतुमै रक्षकेतलै अर सीतऋतुमै चौहटै नदीकेकिनारे बहुत प्रकार कायोत्सर्गकरना सो कायक्लेशतप है ये तप करनेसे देहको कष्टआवते कायर ताका अभावहोय, सुखियास्वभाव रहनेका अभाव, भोगते छूटनेका अभाव होय हैं। ॥६॥ऐसे छहप्रकार बाह्यतप हैं ॥१९॥ सूत्र ॥ प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्या यव्युत्सर्गध्यानानुत्तर ॥२०॥अर्थ ॥ अव छहप्रकार अंतर तप है सो कहेहे ॥ प्र मादतै टत्तको दोपउत्पन्न होजाय ताके दूरकरनेको जो क्रियाकरिये सो प्रायश्चित्त तप हैं ॥१॥ पूज्यपुरुपका आदरकरना सो विनय तप हैं॥२॥ कायकरि तथा आ हार वस्तिकादिकरि धर्मात्माकी उपासना करना टहलकरना सो वैयाटत्यनामातप है ॥३॥ ज्ञानकीभावनामै आलस्यका त्याग सो स्वाध्यायतप हैं ॥४॥ देहमै तथा देहका संवधमै आपना माननेरूप सकल्पका त्याग सो व्युत्सर्गतप हैं ॥५॥ चित्तके विक्षेपका त्याग सो ध्याननामातप हैं॥६॥ ऐसें छहप्रकार अभ्यतर तप कह्या ॥ ॥२०॥ सूत्र ॥ नवचतुर्दशपचद्विभेदायथाक्रमप्राग्ध्यानात् ॥२१॥ अर्थ ॥ प्राय श्चित्त नवप्रकार हैं ॥ विनय च्यारप्रकार हैं। वैयात्य दशप्रकार हैं ॥ स्वाध्याय पा चप्रकार हैं। कायोत्सर्ग दोयप्रकार है ॥ध्यानकेमेद सूत्र २७ में आगे कहसी ॥
सापरायसंयम हैं ॥४॥ वहुरि मोहनायकर्मकेक्षयतै तथा उपशमते जैसा आ त्माका स्वभाव तथा विकाररहित शुद्धस्वभाव इनका प्रगटहोना सो यथाख्यातचारि त्र है ॥५॥१८॥ सूत्र ॥ अनशनावमोदर्यत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविवि क्तशय्यासनकायलेशबाह्यतप ॥ १९॥ अर्थ ॥ अब छहप्रकारवाह्यतप कहेहैं। इस लोकका फल जो धनप्राप्ति लोकप्रशसा रोगकाअभाव भयकाअभाव मत्रसाध नादि फल, तथा विषयसाधनादिरूप स्वर्गादिकके सुख ये परलोकफल इत्या दिककी वाछा रहित सयमकीसिद्धि रागकाउच्छेद कर्मका विनाशकध्यान स्वा ध्यायादिककी सिद्धिकेअर्थि एकदिनादि प्रमाणकरि भोजनका त्याग करना सो अनशनतप हैं ॥ १॥ सयमके सिद्धीकैअर्थि, निद्राके जीतनेअर्थि, वात पित्तकफादिदोपप्रशमकेअर्थि, संतोष स्वाध्यायकीसिद्धिके अर्थि,अल्पभोजन करना सो अवमोदर्यतप हैं॥२॥ आशाकेअभावकेअर्थि भिक्षाकैअर्थि साधुके येकगृहादि कका तथा भाजन भोजनादिकका नियम करना सो वृत्तिपरिसख्यातप हैं ॥३॥ इद्रियकेदर्पका निग्रहकेअर्थि, निद्राकाविजय,स्वाध्यायकी सुखरूपसिद्धीकैअर्थि, घृता दिक रसका परित्याग सो रसपरित्यागनामातप हैं॥४॥जीवकीपीडारहित एकात शुन्यग्रहादिकमै शयन आसन करना सो विविक्तशय्यासननामातप हैं ॥ यातै बा लापुरुप जन्मतै तिसवपैकाहोय सर्वकाल सुखीहुवासंता आप दीक्षाग्रहणकरि एथ क्तवर्प (३९)पर्यंत तीर्थकरभगवानके चरणके निकट प्रत्याख्याननामा नवमापूर्व पढ्याहोय सो परिहारविशुदिसयमको अंगीकारकरै ॥ तीनुसंध्याविना समस्त कालमै दोयकोसप्रमाण विहार करहै।रात्रि विहार नहीकर, वर्षाकालमै नियमसहि। त होय जीवकीउत्पत्ति, मरणकेठिकाणे, कालकीमर्यादा, जन्मयोनीकेभेद, द्रव्यक्षेत्र केस्वभाव, विधानकाजाननहारा, प्रमादरहित, महावीर्यवानहोय ताकै परिहारविशु दि होयहें ॥ परिहारविशुद्धिसयमका जघन्यकाल अतरमुहूर्त है जाते अतरमुहूर्त मै गुणस्थान पलटि जाय तो छूट है। छठे सातमै दोयगुणस्थानहीमै रहेहैं। उत्कृ टकाल अडतीसवर्पघाट कोटपूर्वका है। जैसें कमलपत्र जलकरि नहीलीपै तैसे पट्कायके जीवकरिव्याप्त जगत इनमै विहार करताह पापते नहींलीपै हैं॥३॥ बहुरि जो सूक्ष्म स्थूल प्राणीकी पीडाकापरिहारमै प्रमाद रहित अर आत्मानुभव विषै उत्सा हयुक्त अखंडक्रियायुक्त सम्यकदर्शन ज्ञानरूप प्रचड पवनकरि प्रज्वलितमई जो विशुद्धिअभिप्रायरूप अग्निकीशिखा इनकरि दग्धमयाहे कर्मरूप इंधन जाकै अर ध्यानकेविठोपकरि क्षीणकियेहै कपायरूप विषके अकुर जानै अर नाशकै स न्मुखभया है मोहकर्मजाकै, याते पायाहै सूक्ष्मसापरायनाम जानै, ऐसा सूक्ष्म आक्रोश १ याचना १ सत्कार १ पुरस्कार १ ये सातपरीषह होय हैं ॥१५॥ सूत्र॥ वेदनीयशेषा ॥ १६ ॥ अर्थ ॥ ये ज्ञानावरणादि निमित्तते कहेजे परीषह, तिनते अवशेष रहे परीषह जे क्षुधा १ तृषा १ शीत १ उष्ण १ दशमसक १ चा १ शय्या १ वध १ रोग १ तृणस्पर्श १ मल १ ये ग्यारहपरीपह वेदनीयके होते होय हैं ॥ १६ ॥ सूत्र ॥ एकादयोभाज्यायुगपदेकस्मिन्नेकोनविंशति ॥ १७ ॥ अर्थ॥ एकात्माकै युगपत् (एकैकाल) उगणीसपर्यंत परीषह आवैहै ॥ जाते शय्या १ गमन १ बैठना १ इन तीनमै युगपत् येकही परीषह होयहै अर सीत १ उष्ण १ इनदोनमै येकही होयहै । ऐसें उगणीस परीषह युगपत् होयहें ॥१७॥ सूत्र ॥सामा यिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसापराययथाख्यायतमितिचारित्र ॥१८॥ अर्थ॥अव पांचप्रकारे चारित्र कहेहैं। समस्तसावद्ययोगका अभेदकरि जामैत्यागहो य सो सामायिकचारित्र है॥ १॥ प्रमादकेवसतै उपज्या जो दोष ताकरि सयमका लोपभया होय ताका प्रायश्चित्तादि इलाजकरि संयमको स्थापन करना सोछेदोप स्थापना है। तथा आहिंसादिक तथा समित्यादि भेदकरना सो छेदोपस्थापना चा रित्र हैं ॥२॥बहुरि प्राणिके पीडाका परिहारकरि जहा विशुद्धताविशेषहोय सो परिहारविशुद्धि संयमहै ॥ परिहारविशुद्धिविषै ऐसाविशेषहै, इसको धारणकरनेवा अरिहत ताकै ग्यारह परिपह हैं भगवान्कै घातियाकर्मकेअभावते एकहू परीषह जो ग्यारमा बारमा गुणस्थानवरती जीवकै चौदह परीषह होयह ॥ क्षुधा १ तृपा १ शीत १ उष्ण १ दशमसक १ चर्या १ शय्या १ वध१ अलाम रोग १ तृणस्प शं १ मल १ प्रज्ञा १ अज्ञान १ ये चौदह परीषहहें ॥ अन्य परिपहका अभाव है। ॥ १०॥ सूत्र ॥ एकादशजिने ॥११॥अर्थ ॥ घातियाकर्मका नाशकरि जिन नहीहै तथापि वेदनीकर्मके सदावतै उपचारकरि ग्यारह परीष कहेहै ॥ये ग्यार ह परीपाके नाम इसआध्यायमे सोलहवासूत्र में आगेकहसी ॥ मुख्यपणा करि वेदनीकर्ममै शक्तिकेअभावतै भगवान्कै परीसहदेनेकौ शक्ती नहीहैं ॥ ११॥ ॥ सूत्र ॥ वादरसापरायेसर्वे ॥ १२ ॥ अर्थ ॥ बादरसापरायकहिये प्रमत्तयणस्था नसे अनितिकरण जो नवमगुणस्थान पर्यंत समस्त वाईस परीपहही हैं ॥१२॥ सूत्र ।। ज्ञानावरणेप्रज्ञाज्ञाने ॥ १३॥ अर्थ ॥ ज्ञानावरणकेहोते प्रज्ञापरीषह अर अज्ञान परीपह होयह ॥ १३ ॥ सूत्र ॥ दर्शनमोहातराययोर्दर्शनालाभौ ॥ १४॥ अर्थ ॥ दर्शनमोहकेहोते अदर्शन परीषह होयहै ॥ अतरायकर्मकेउदयते अलाभप रीपह होयहै ॥ १४ ॥ सूत्र ॥ चारित्रमोहेनाम्यारतिस्त्रीनिषद्याशय्याकोशयाचना सत्कारपुरस्कारा ॥ १५॥ अर्थ ॥ चारित्रमोहहोते नम अरति १ स्त्री निषद्या यामै प्रधान है ॥ ममत्वका त्याग परिग्रहका त्याग याका अवलबन हैं। इस धर्मका लामविना अनादिसंसारमै परिभ्रमण करते जीव दुष्टकर्मके उदयतै उपजै नानादुख को अनुभवै हैं । इस धर्मका लामहोते नानाप्रकारके स्वर्गादिकके सुखकी प्राप्तिपूर्वक मोक्षकी प्राप्तिहोयहें । तातै धर्मभावनाको चितवन करनेते धर्ममै अनुरागतै प्रट त्ति होयहें ॥१२॥ ऐसें बारह भावनातै महान्सवर होयहें ॥७॥ सूत्र ॥ मार्गाच्यवन निर्जरार्थपरिपोढव्या परिषहा ॥८॥अर्थ ॥ सवरकेमार्गतै नही चिगनेके अर्थि अर कर्मनिर्जराके अर्थि, क्षुधा वृषादि परीषह सहना योग्य हैं ॥८॥सूत्र ॥ क्षुत्पिपासा सीतोष्णदशमसकनाम्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रोशवधयाचनालाभरोगणस्प मिलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाज्ञानादर्शनानि ॥ ९ ॥ अर्थ ॥ मोक्षकेअर्थि क्षुधादि वाईस परीषहसहना योग्य हैं। क्षुधाका परीषह/ तृषा सीत/१ उष्ण १ दंशम सक १ नग्न १ अरति १ स्त्रीगमन १ बैठण १ शयन १ कोध १ मारनका १ याचना नहींकरना १ लाम १ रोग १ तृणादिक स्पर्शका १ शरीरके मलादिकका १ सत्कार पुरस्कार करनेका १ बुद्धि नही होनेका १ अज्ञानताका १ अदर्शनका १ ये बाइस परीषहका सममावतै सहना परमसंवर हैं ॥९॥ सूत्र ॥ सूक्ष्मसापराय छदमस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ॥ १० ॥ अर्थ ।। सूक्ष्मसापराय अर छस्थवीतराग में पड़ी वजकणिकाकीज्यो अतिदुर्लभ है अर कदाचित् सपणापावै तिनमै वि कलेंद्रियका प्रचुरपनातै पचंद्रियपणा पावना जैसे गुणवतमै कृतज्ञपणा पा वनेकी ज्यौ दुर्लभ है ॥ पचेंद्रियमेंहू तिर्यचकी वाहुल्यतातै, चोहटमै रत्नरास पावना ज्यौ मनुष्यपना पावना अत्यतदुर्लभ है ॥ अर मनुष्यभवपायकरिकेहू जो छुटिजाय तो फेर मनुष्यपणाकी उत्पत्ति अतिदुर्लम है जैसे दग्ध भया रक्षका फिर हरितहोना जैसे दुर्लभ है तैसे मनुष्यपनापावना अतिदुर्लभ हैं । मनुष्यभवह पावै तो उसमै उत्तमदेश उत्तमकुल इद्रियपरिपूर्णता सपदा निरो गपणा वुदि वल सत्सगति इनका पावना उत्तरोत्तर दुर्लभ है अर समस्त येऊपा वै अर जो साधर्मका अवलबन नहीहोय तो नेत्ररहित मनुष्यकी ज्यो जन्म व्यर्थ जाय है अर इतनेकप्टतै धर्महू पाजाय अर फेरडू भोगमै रागीहोना भस्मकेअर्थि गो सीरस चदनको दग्धकरनेकी ज्यौ निष्फल है अर विषयसुखमै विरक्तकैहू तपमाव ना धर्मप्रभावना समाधिमरण अत्यतदुर्लभ है, समाधिमरण होतेही बोधलाभ फ लवान् है । ऐसें चितवन करनेते बोधपाय प्रमादी रहना नहीहोयह ॥ ११ ॥ अव धर्मानुप्रेक्षा कहेहे ॥ ये जिनेंद्रको उपदेश्योधर्म अहिंसालक्षण हे सत्यके आधारहें। विनय याका मूल हैं। क्षमा याका वल हैं। ब्रह्मचर्य याकी रक्षा हैं । कषायका अभाव य अर वाछित देशको प्राप्तहोयहै ।। तस कर्म आवनेकेहार जे आश्रय ताको रो कतैसते अकल्यान नहीहोय ॥ ऐसे चितवनकरनेते संवरानुप्रेक्षा होयहें ऐसे चितवन करनेसे संवरमै नित्यही उद्यमीपणा होयहै तदि मोक्षपदकी प्राप्तिहोयह ॥ ८॥ अव निर्जरानुप्रेक्षा कहैहैं। निर्जरा दोयप्रकार हैं, एकतो आपणा रसदेय निर्जरै है सो स विपाक निर्जरा है, अर तपश्चरण करणेते, परीषहके जीतनेते, जो निर्जरा होय सो अविपाक निर्जरा है। सविपाक निर्जरा तौ समस्तसंसारी जीवकै होयहै अर अगामी वधको कारण है,तातै त्यागने योग्यहै अर अविपाक निर्जरा मोक्षका कारण है तातै ग्र हण करनेयोग्य हैं। ऐसें निर्जरानुप्रेक्षा चितवन करनेते कर्मके निर्जराकेअर्थिही प्रवृत्ति होयहै ॥ ९॥अव लोकानुप्रेक्षा कहेहे ॥ लोकसस्थानादिकका चितवन तथा पापका फल नरक, पुन्यका फल स्वर्ग, इत्यादिक चितवन तथा पद्मव्यका गुणप र्यायात्मक स्वरूपका चितवन सो लोकानुप्रेक्षा है। याके चितवनतै समस्त परद्रव्य ते अपनास्वरूपको भिन्नअनुभवकरि पुन्यपापात्मक लोकतै मिन्न ऐसा मोक्षसाधन यत्न करै ॥ १० ॥ अव बोधदुर्लभानुप्रेक्षा कहेहैं । एक निगोदशरीमै सिद्धरासी ते अनतरणे जीव है अर निगोदजीवतै समस्तलोक अतररहित मन्या है तथा प चप्रकार स्थावर जीवकरि निरतर भय है तिनमै त्रसपणा पावना, वालुके समुद्र मलवत् अशुचिका भाजन है, चामकरिढक्या अतिदुर्गंध रस नवद्वारकरि झरै आश्रितवस्तुकू हू अगाराकाज्यौ आपसमान अशुचि करहै, स्नान अनुलेपन धू प पुष्पमालादिकरिहूं इस शरीरका अशुचिपणा दूरकरनेको नहीसमर्थ होयहें, अनु भवकीयाहुवा सम्यक्दर्शनादिक आत्माकै अत्यतशुद्धिता प्रगट करहै ऐसे चितवन करनेते शरीरतै विरक्तता होयहै अर विरक्तहोयतदि संसारसमुद्रकै तरनेकेआर्थि चित्त धारण करहें ॥६॥ अव आश्रवानुप्रेक्षा कहें। कर्मकेआश्रव इसलोकपरलोकमै नाश करनेवाले है, महानदीके प्रवाह्वत् तीक्ष्णइद्रिय कषाय अव्रतादिक है, तिनमै स्प र्शनादिक इद्रियकी आताप करिकही वनकाहस्ती, वायस, सर्प, पतग, हरिणादिक, कप्टसमुद्रमै प्रवेश करैहै तथा कपाय अवतादिकई इसहीलोकमै वध, वध, अयश, शादिको उपजावैहे अर परलोकमै बहुत खकरि प्रज्वलित नानागतिमै परिम्र मण करावेहे ॥ ऐसें आश्रवके दोपको चिंतवन करना सो आश्रवानुप्रेक्षा है ॥ ऐसें चितवन करनेतै जीवकै उत्तमक्षमादिक परमधर्मविषै कल्याणरूप बुद्धि नही छूटे हैं। ॥७॥ अव सवरानुप्रेक्षा कहेहें ॥ इद्रिय कषायादिककरि सकुचित जो आत्मा ता के समस्तदोष काछवाकीज्यो नहींहोयहें। जैसे महान्समुद्रमै प्रवेशकरती जो नाव ताके छिद्रकौढाकते जलप्रवेश नही करै, तदि नावमै तिष्ठतापुरुषका नाश नहीहो त्वानुप्रेक्षाकहेहें॥ जन्ममरणके महादु खभोगनेको मै एकहीड कोऊ मेरास्वजन परि वार नाहीहै,एकाकी नरकादिकनिमै जन्मग्रहणकरूह अरमरणमै रोगमै दरिद्रमै महा घोर संकटमै एकाकीहु अर स्वर्ग राज्यादिक विभव भोगनेमैट मै एकाकीहूं,व्याधि ज न्ममरणादि दुखहरनेम कोऊसहाई नहीहै बधुमित्रादि स्मशानते अधिक नहीजाय है, एक अविनासी धर्मही सहाई सहगामी है ऐसे चिंतवनकरना सो एकत्वानुप्रेक्षा ॥४॥ ऐसें चितवनकरनेते स्वजननमै प्रीति राग नही वधैहे परमै हेषनही उपजै तदि परमवीतरागताको प्राप्तिमया मोक्षके अर्थि यत्न करे. ॥ अव अन्यत्वानु प्रेक्षा कहैहें ॥ ये शरीर वधनप्रति मोते येक है अर लक्षणभेदतै मै भिन्नहू, शरीर इद्रियरूप है मै अतींद्रियरूपई, शरीरअज्ञानीहै मै ज्ञानीहू, शरीरअनित्यहे मै नित्यह, शरीरआयतवानहै मै अनादिअनतहू, संसारमै अनवस्थितरूप परिभ्र मणकरता जो मै ताकै बहुतशरीर व्यतीतभये सोही मै हु, जो शरीरहीतै मेरा अन्य पणा है तो बाह्यपरिग्रह मेरा अन्यपणा कैसनहीहोय ऐसे मनविषै धारन करनेते शरीरादिकमै वांछा नहीउत्पन्नहोयहै तदि तत्वज्ञान पूर्वक वैराग्यकीरबिहोते अवि नासी मोक्षसुखकी प्राप्तिहोयहै ॥ ५॥ अव अशुचिलानुप्रेक्षा कहेहें। ये शरीर अत्यतअशुचि है अतिदुर्गंधरुधिर वीर्यते उपज्या है अशुचि आहारकरिही वध्या कोऊ देव दानव मत्र यंत्र तत्रयोगिनी यक्ष क्षेत्रपालादि शरण नहीहैं, पुष्टशरीर भो जनप्रतिसहाइहै, कटआये आत्माको महादु खउपजावेहै अर बडेयनकरि सचयकी या धन परलोक नहीजायहै, वाधव मित्रादिकहू रोगकौआवते तथा मरणकोआवते नहीरक्षाकरै है, विषयभोग भोजनादिक वढावैहै और दु खमे कोऊअपना नही, कर्म केउदयतै रोकनेको कोऊसमर्थ नहीं हैं, सम्यक्आचरणकिया धर्मही एक शरण है। मृत्युकेआवतै इब्रादिक कोऊशरणनही ऐसी भावनाकरना सो अशरणानुप्रेक्षा है । ॥२॥मै अशरणहू ऐसें चितवन करनेसे संसारकेपदार्थमैं ममत्वकानाशहोय तदि अर्हत् (सर्वज्ञ) प्रणीतमार्गमै युक्त होयहै ॥ अव संसारानुप्रेक्षा कहेहैं। कर्मके वश ते ससारी अनादिकालते पचपरावर्तनरूपकरि परिभ्रमणकरैहे अनेकयोनि जन्म कुलकोडके सकटमै कर्मकाप्रेा जीव, पिताहोय माईहोयहै पुत्रहोयह पोताहोयहै माता भगनी स्त्री पुत्री होय है, शत्रुकामित्र मित्रकाशत्रुहोयहै राजाकारंक रककारा जा देवकातिर्यंच तिर्यंचकादेव इत्यादिक अनेक परिभ्रमणरूपससारमें कहू स्थिर ता हैनही अनंतानतकालसू उलट पलटहोय अनेकदु खमोगवैहै ऐसे ससारकास्वरूप चितवनकरना सो ससारानुप्रेक्षाहै ॥ ३ ॥ ऐसे संसारमावनाकूभावनेते ससा रकेदुःखतै भयउपजैहै तदि विरक्तहुवा ससारके हननेकेअर्थि यत्न करेहे ॥ अव एक वचन कहना सो सत्य है ॥५॥ धर्मकी दृद्धिकैअर्थि, छह इंद्रियके विपय अर षटका यके जीवकी विराधनाकाअभाव सो सयम है ॥६॥ कर्म क्षयकै आर्थि, तपीये सो तप है ॥णा संयमीकैयोग्य ज्ञानादिककादान देना सो त्याग है ।।दा शरीरादिकमै ममत्व काअमाव सो अकिंचन्य है ॥९॥ पूर्वीअनुभवी स्त्रीकास्मरण, कथाश्रवण, अवलो कनादिकका त्याग सो ब्रह्मचर्य है। स्वस्त्रीमै सतोष, परस्त्रीकात्याग सोही ब्रह्मचर्य है।स्वस्त्री तथा परस्सी दोनूका त्याग सो उत्तमब्रह्मचर्य है॥१०॥ये दशधर्मपरम संवरके कारण हैं ॥ ६॥ सूत्र ॥ अनित्याशरणससारेकत्वान्यत्वाशुच्याश्रवसवर निर्जरालोकवोधिदुईमधर्मस्वाख्यातत्वानुचिंतनमनुप्रेक्षाः॥७॥अर्थ ॥ अव द्वाद शअनुप्रेक्षाका वर्णन करेंहैं । अब अनित्यमावना कहेहें। ये शरीर, इद्रिय विषयो पभोग, द्रव्य, है ते जलके बुदबुदावत् है अस्थिर है, मोहते अज्ञानीस्थीरमानेहै, संसारमै कोऊवस्तुध्रुवनही है, एक आत्माका ज्ञान दर्शन स्वभावही ध्रुव हैं ॥ ऐसे ध्रुवपणा चितवनकरना सो अनित्यमावना हैं ॥१॥ ऐसें अनित्यताचितवन कर से, भोगकरिछांछे ऐसे पुष्पमाल्यादिकका वियोगकालमे दुःखनहीउपजे है। अब अशरणभावना क है । जैसे, वनमै बलवान क्षुधावान व्याघ्रकरिपकन्या मृगकाबञ्चा इसको कोऊशरणनही तैसें जन्ममरण व्याघ्रके संकटरूप परिभ्रमणकरते प्राणीको, स्थान योनिस्थानका जाननहारा साधुकै सूर्यका उदय होते,नेत्रनिते च्यारहस्तप्रमाण भूमिको अवलोकनकरि, हस्ती घोडा बलध गाडा गाडी मनुष्यकरि मईलीभुमिविषै, आहार विहार निहारि गुरुवदना तीर्थवंदना इनके निमित्त गमनकरना सो इर्यास मिति हैं ॥ १॥ बहुरि पृथ्वीकायकादिकमै आरंभकी प्रेरना रहित, कठोरता निष्ठुरता परपीडादि रहित, हित मित मधुर ऐसा वचनबोलना सोभाषासमिति हैं ॥१॥छीया लीस दोप, बतीस अतराय, चौदहमल, इनतै रहित, निर्दोष आहारका ग्रहणकरना सोयेपणासमिति हैं ॥१॥ वहुरि शरीर उपकरणादिकको देखी सोधि, मेलना लेना सो आदाननिक्षापना समिति हैं ॥१॥ बहुरि नख केश मल मूत्र कफादिककी शुद्ध मिको देखी क्षेपणकरना सो उत्सर्गसमिति हैं, इसको क्षेपणासमिति कहेंहूँ ॥१॥५॥ ॥ सूत्र । उत्तमक्षमामाईवआर्जवसत्यशोचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणिधर्म ॥२६॥अर्थ॥भव दशधर्म कहेहें। शरीरकीस्थिति जो आहार ताके अर्थि परघरप्रति गमनकरते जे साधु ताको, दुष्टके क्रोधकेवचन हास्य अवज्ञा ताडन शरीरकाघात इत्या दिक होतेहू परिणाममै कलुपताकाअभाव सो उत्तमक्षमा हैं ॥१॥जातिआदि आठ मदका अभाव सो मार्दव है ॥२॥ मन वचन कायकी वक्रताकाअभाव सो आर्जन है ॥३॥ लोभ जनित मलिनताका अमाव सो शौच हैं ॥४॥ मुनि श्रावकको सुदर अथतत्वार्थसूत्रनवमअध्यायप्रारम ॥ सूत्र ॥ आश्रवनिरोधःसंवर ॥१॥अर्थ ॥ नवीनकर्म आवनेके कारण सो आश्रवह ॥ आश्रवका रोकना सो संवर हैं। तिनमै संसारपरिभ्रमणकू कारण ऐसी, मिथ्यात्व रागादि परणतिरूप क्रियाकात्याग सो मावसवर हैं॥अर भावसंवरपूर्वक कर्मपुद्गलके ग्रहणकरनेका अभावरूपक्रिया सोद्र व्यसंवर हैं ॥१॥ सूत्र ॥ सगुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरिपहजयचारित्रै ॥अर्थ ॥ ससा रकेकारण मिथ्यात्व, रागादिक, इनतै आत्माका रक्षण सो एप्ति हैं॥प्राणीके पीडाका परित्यागकरिकै आहार विहारादिकके अर्थि,सम्यक्प्रति सो समित्ति है। शरीरादि ककास्वभाव चिंतवन करना सो अनुप्रेक्षा है। क्षुधाादिक वेदनाकीउत्पत्तिहोते कर्मनि र्जराके अर्थि,समभावतै परिपहका सहनासो परिषहजय हैं। ससारपरिभ्रमणका का रण जो क्रिया ताको त्याग सो चारित्र हैं। ये गुप्ति १ समिति १ धर्म १ अनुप्रेक्षा १ परिपह १ चारित्र १ यह छहमावतै संवरहोय हैं ॥२॥ सूत्र ॥ तपसानिर्जराच ॥३॥ अर्थ ॥ तपकरि निर्जराहोय हैं, च शब्दतै संवरमी होय हैं ॥३॥ सूत्र ॥ सम्य म्योगनिग्रहोरप्ति ॥४॥ अर्थ॥ संसारसुखकी वाछारहित इद्रियसंयमकै अर प्राण संयमकै निमित्त मन वचन काय इनकी क्रियाका रोकना सो गुप्ति हैं ॥४॥ सूत्र॥ ईर्याभापैषणादाननिक्षेपोत्सर्गा समितय ॥५॥अर्थ। अब पांच समिति कहे हैं ॥जीव १ पूर्वी १ देवगत्यानुपूर्वी १ अगुरुलघु १ परघाती उच्छास आतापपउद्योतीप्रशस्त विहायोगति १ बादर१पर्याप्त प्रत्येकशरीर१ सुभत्रसशुभगस्थिर सुस्वर १ आदेय १ यशकीर्ति १ निर्माण १ तीर्थकरनाम १ ये सैतीस नामकर्मकी है ।। बहुरि उचगोत्र १ सातावेदनीय १ ये ४२ पुण्यप्रकृती हैं ॥२५॥ सूत्र ॥ अतोन्यत्पापं ॥ ॥२६॥अर्थ ॥ इन पुन्यप्रकृतीतै अन्य पापप्रकृति है ॥ ज्ञानावरणकी ५ दर्शना वरणकी ९ मोहनीयकी २६ अतरायकी ५ अर नरकगति, तिर्यंचगति, ऐसी गती २ अर पचेंद्रियविनाजाति ४ संस्थान ५ संहनन ५ अप्रशस्तवर्ण १ रस १ गध १ स्पर्श १ नरकगत्यानुपूर्वी १ तिर्यंचगत्यानुपूर्वी १ उपघात १ अप्र शस्त विहायोगति १ स्थावर १ सूक्ष्म १ अपर्याप्त १ साधारणशरीर १ अस्थिर १ अशुभ १ दुर्भग १ दु स्वर १ अनादेय १ अयशकीर्ति १ ये चवतीस नामकर्मकी अर असातावेदनीय १ नरकआयु १ नीचगोत्र १ ये ८२ पापप्रकृती हैं ॥ २६ ॥ इतितत्त्वार्थाधिगमेमोक्षशास्त्रे अष्टमोध्याय ॥८॥ ॥ ॥ । चारित्रमोएकी २५ दनमोरकी १ ऐसी २३ वर्जनमोरकी सत्वमै । है परंतु पंधमै दर्भनमोएकी १ गणी कर्म रसदीये पीछे निर्जराहीने प्राप्तहोय है ॥२३॥ सूत्र ॥ नामप्रत्यया सर्वतोयोग विशेपात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिता सर्वात्मप्रदेशेष्वनतानंतप्रदेशा ॥२४॥ अर्थ ॥ अब प्रदेशवध कहेहे ॥ नाम जे समस्तकर्मकी प्रकृति होनेको कारण, ऐसें सर्वभाव नमै मन वचन कायके योग इनके विशेषते सूक्ष्म एकक्षेत्रमै अवगाहकरि तिष्ठते स मस्तआत्मप्रदेशमै अनत प्रदेशहें। भावार्थ॥ एकआत्माका असंख्यातप्रदेश हैं तिस येकयेक प्रदेशप्रति अनंतानत पुद्गलके स्कघ एकएकसमयमै बधरूपहोय तिष्ठै सो प्र देशवध हैं। ते पुद्गलस्कघ कैसे है,समस्तज्ञानावरणादिक मूलप्रकृति तथा उत्तरोत्तर प्रकृति होनेको कारण हैं, बहुरि ते पुद्गलस्कद कैसे है समस्तत्रिकालवर्ती मावनमै मन वचन कायरूप योगके निमित्ततै आवैहै अर सुक्ष्महै इंद्रियगोचर नाही ॥ वहुरि आत्माकेप्रदेश अर कर्मकेप्रदेश क्षीरनीरकी ज्यों एकक्षेत्र अवगाहकरि तिष्ठे हैं ॥२४ सूत्र ॥ सद्वेधशुभायुर्नामगोत्राणिपुण्य॥२५॥अर्थ॥सातावेदनीय १शुभआयु ३ शुभनाम ३७ शुभगोत्र १ ये पुण्यप्रकृति ४२ है सो कहेहैं । तिनमै तिर्यंचआयु १ मनुष्यायु १ देवायु १ ये तीनशुभआयु प्रकृति हैं ॥ अर मनुष्यगति १ देवगति १ पचेंद्रियजाति १ पाचशरीर ५ तीनआगोपाग ३ समचतुरसंस्थान १ वज ऋपमनाराचसंहनन १ प्रशस्तवर्ण १ रस १ गंध १ स्पर्श १ मनुष्यगत्यानु ( रसागरकी । पर्याप्तअवस्थामै उत्कृष्टस्थिति हैं ॥ १५ ॥ सूत्र ॥ विंशतिनामर्गा त्रयो ॥ १६ ॥ अर्थ ॥ नामकर्म अर गोत्रकर्मकी उत्कृष्टस्थिति वीसकोडा कोडीसागरकी हैं॥१६॥ सूत्र ॥ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमान्यायुप ॥ १७॥अर्थ ॥ आयुकर्मकी उत्कृष्टस्थिति तेतीससागरकी हैं ॥१७॥ अव कर्मकी जघन्य स्थितिवध कहेहे ॥ सूत्र ॥ अपराद्वादशमुहूर्तावेदनीयस्य ॥ १८॥ अर्थ ॥ वेदनीयकर्मकी ज घन्यस्थिति द्वादशमुहूर्तकी हैं ॥ १८॥ सूत्र ॥ नामगोत्रयोरप्टौ ॥ १९ ॥ अर्थ ॥ नामकर्म अर गोत्रकर्मकी जघन्यस्थिति अष्टमुहूर्तकी है ॥१९॥ सूत्र ॥ शेषाणामतर्स हुर्ता ॥२०॥अर्थशेप जे ज्ञानावरण १ दर्शनावरण १ मोहनीय १ आयु १ अतराय १ ये पाचकर्मकी जघन्यस्थिति अंतरमुहूर्त प्रमाण हैं । ऐसें एकसमयमै जो कर्मवधैहे ताकी उत्कृष्टस्थिति तथा जघन्यस्थिति कहीं ॥२०॥ अव अनुभाग कहै हैं । सुत्र । विपाकोनुभव ॥२१॥ अर्थ ॥ जो कर्मप्रकृतिउदयमै आवै ताका रस अनुभवमैआवे सो अनुभवहे ॥२१॥ सूत्र ॥ सयथानाम ॥२२॥ अर्थ ॥ जैसा प्रकृतिकानाम ताका तैसाही रस देनेका स्वभाव है जैसें ज्ञानावरणका उदय जिसआत्माकोआवै तिसको ज्ञानकाअभावहोय अर दर्शनावरणीय कर्मके प्रकृतिका उदयआवै तो दर्शन नही होनेदे तैसें समस्तकर्मका स्वभाव हैं ॥ २२॥ सूत्र ॥ ततश्चनिर्जरा ॥२३॥ अर्थ ॥
तोह उत्साहका सामर्थ्य नहींहोय सो वीर्यातरायकर्म है ॥ १॥ऐसे अंतरायकर्मकी पाचप्रकृति है। ऐसी कर्मोकी मूलप्रकृति आठ अर उत्तरप्रकृति एकसौअठतालीस कहीं ॥ १३ ॥ अव एकसमयमै जो कर्मवधैहै ताकी स्थितिके कालको कहेहैं ॥ सूत्र॥आदितस्तिसृणामतरायस्यचत्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्य परास्थितिः ॥१४॥ अर्थ ॥ ज्ञानावरण १ दर्शनावरण १ वेदनीय १ अर अंतराय१ये च्यारकर्मकी उत्कृ एस्थिति तीसकोडाकोडीसागर प्रमाण हैं। सो उत्कृष्टस्थितिवद मिथ्यादृष्टि सज्ञीप चेंद्रिय पर्याप्तजीवकै होय हैं। एकेंद्रियपर्याप्तकै एकसागरके सातमाग कीजे तिनमै तीनमाग स्थिति हैं। पचीससागरके सातभागमै तीनमागस्थिति हिंद्रीयपर्याप्तकै हैं॥त्रींद्रियपर्याप्तकै पचाससागरके सातभागमै तीनभाग हैं ॥ चतुरिंद्रियपर्याप्तकै सो सागरकै सातभागमै तीनभाग हैं। असंज्ञीपचेंद्रीके एकहजारसागरके सातमा गमै तीनभाग हैं ॥ पर्याप्तिसज्ञीपचेंद्रीके अंत कोडाकोटीसागर प्रमाण हैं। एके द्रियादिकके पूर्वोक्त पल्यकै असंख्यातमाग हीन जानना ॥१४॥ सूत्र ॥ सप्ततिर्मोह नीयस्य ॥ १५॥अर्थ ॥ मोहनीकर्मकी उत्कृष्टस्थिति सत्तरकोडाकोटीसागरकी मि ध्यादृष्टीसज्ञीपर्याप्तीकै ।। येकेंद्रियकै येकसागरकी है ॥ हींद्रियकै पच्चीससागरकी। त्रींद्रियकै पचाससागरकी ॥ चतुरिंद्रियकै सो सागरकी ॥ असैनीपचेद्रियकै हजा स्थानविपै स्थिरमावरूप (आंगोपांग दृढ) होय सो स्थिरनाम है।॥ १॥जाकै उदयते रसादि धातु उपधातु अस्थिर होय सो अस्थिरनामकर्म है ॥१॥जाकै उदयतै प्रमा सहित शरीरहोयसो आदेयनामकर्म है ॥ १ ॥ जाकै उदयतै प्रभारहित शरीरहोय सो अनोदय नामकर्म है ॥१॥ जाकै उदयतै पवित्रगुण लोकमैप्रगट होय सो यशस्कीर्तिनाम है ॥१॥ जाकै उदयतै अवगुण प्रगटहोय सो अयशकी तिनाम है ॥ १॥ जाके उदयतै अचिंत्यविभूति विशेषसहित अर्हतपणाका कारण प्राप्तहोना सो तीर्थकरनाम है ॥ १॥ ऐसें तिराणवैप्रकार नामकर्मकी प्रकृति कहीं ॥ ११॥ सुत्र ।। उच्चैच्चैिश्च ॥ १२॥ अर्थ जाकै उदयतै लोकपूज्यकुलमै जन्महो य सो उच्चगोत्र है॥१॥ जाकैउदयतै निंद्यकुलमै जन्महोय सो नीचगोत्र है॥१॥ ऐसे दोयप्रकार गोत्रकर्म कह्या ॥१२॥ सूत्र ॥ दानलामभोगोपभोगवीर्याणा ॥१३॥ अर्थ॥ अव अंतरायकर्मकी पांचप्रकृतीकहेहे ॥जाकैउदयतै देनेकी इच्छाकर तोह दी यानहीजाय सो दानातराय है ॥१॥ जाकै उदयतै लेनेकी इच्छाहोय तोहू लाभ नहीं होय सो लाभातराय है ॥ १॥जाकैउदयते मोगनेकी इच्छाकरे तोहू भोगीनहीसकै सो भोगातराय है॥१॥जाकै उदयतै उपमोग करनेकी इच्छा करै तोह उपभोगन हिकरिसके सो उपमोगातराय है ॥१॥ जाकै उदयतै कोऊ कार्य करनेकौ उत्साहकरै ति हैं ॥ बुरीरीति गमन सो अप्रशस्तविहायोगति हैं ॥ जाके उदयते एकशरी येकआत्मातैमोगिये ऐसाशरीरपावे सो प्रत्येक शरीरनामकर्म है ॥१॥ जाके उद यतै वहुतजीवकै भोगनेयोग्य एकशरीरपावै सो साधारण शरीरनामकर्म है ॥३॥ जा कै उदयतै द्विइंद्रयादिकमै जन्म होय सो सनामकर्म हैं ॥१॥ जाकै उदयतै एकेंद्रि यमै उत्पत्तिहोय सो स्थावरनाम हैं ॥१॥जाकै उदयतै अन्यको प्यारालागै प्रीतिउ पजावै सो सुभगनाम है ॥१॥ जाकैउदयतै रूपादि सुदरगुणहोय तोऊ अन्यकै अप्रीतिउपजावै सो दुर्भगनाम है ॥१॥ जाके उदयतै मनोज्ञस्वर होय सो सुस्वरना म है ॥१॥ जाकै उदयतै अमनोज्ञ स्वर होय सो दुःस्वरनाम है ॥१॥ जाकै उदयते मस्तक मुख हस्त पादादि शरीरकेअवयव रमणीक सुंदर होय सो शुभनाम है ॥१॥ जाकैउदयतै मस्तकादि शरीरके अवयव असुदरहोय सो अशुमनाम है॥१॥जाकै उद यतै पृथ्वी, पहाड, अग्नि, जल, वस्त्र, पटलादिकमै प्रवेशकरते नहीरुकनेवाला सूक्ष्म शरीरउपजै सो सूक्ष्मशरीरनाम है ॥१॥ जाकै उदयतै अन्यको बाधाकरै रोकै ऐसा शरीरउपजे सो वादरशरीरनामहै॥॥जाकै उदयतै आहारआदिक छहपर्याप्त पूर्ण करे सो पर्याप्तनाम है ॥१॥जाकै उदयतै एकहू पर्याप्त पूर्णनहीकरै अपर्याप्तअवस्थामै मरणकरै सो अपर्याप्तनाम है ॥१॥जाकै उदयतै रसादिक धातु उपधातु अपनेअपनै ।
धीशरीर योग्यपुद्गल नहीग्रहणकरे तवतक कर्मसहित आत्माका आकार, पूर्वला मनु प्यशरीरसदृश रहता देवपर्यायके सन्मुख होय है, ताको देवगत्यानुपूर्वी कहिये ॥ ऐसे नामकर्मकी पिडप्रकृति६५कही॥ अव नामकर्मकी अपिंडप्रकृति२८कहेह।जाकैउ दयतै लोहपिंडकी ज्यो मान्यहोयकरि तलै गिरपडेनही तथा आकके फूफदाकी ज्यो हलकाहोय उडिजायनही सो अगुरुलघु नामकर्मप्रकृती हैं ॥१॥यो अगुरु लघु शरी रसवधी नामकर्मको भेद हैं । अगुरुलघुनामा स्वाभाविक द्रव्यका स्वभाव नाही हैं। जाके उदयतै अपनेशरीरके अगकरि अपनाशरीरका घात होय सो स्वघात नाम प्रकृति है ॥१॥ जैसे बडेशृग, लंबेस्तन, बडाउदर, इनितै आपकाही घात होय है। जाकै उदयते अपने अगते परका घात होय सो परघात नामकर्म हैं ॥१॥ जैसे तीक्ष्णशृग, तीक्ष्णनख, सर्पकैडाढ, विंचू, ये परके घातक है ॥ जाके उदयते आताप मय शरीरपावै सो आतापनामप्रकृती है ॥१॥सो सूर्यकै विमानकै है एथ्वीकाय जी वकेही होय हैं ॥ जाकै उदैते उद्योतरूपशरीर पावै सो उद्योतनामकर्म है १॥ सो चद्रविमानकेहै पृथ्वीकाय जीवकै तथा आग्याआदिजीवकै हैं ॥ जाकैउदयते उल्लास आवे सो उछासनामकर्म है ॥१॥ जाके उदयतै आकाशविर्षे गमनविशेपहो य सो विहायोगति है ॥ १ ॥ शोमनीक गमन होय सो प्रशस्तविहायोग रि जामे हाडकी सधि, छोटे कीलेकरि सहित होय सो कीलकसहनन हैं ॥१॥ बहुरि जामे हाडकी सधिमै अतरहोय, चौगिरद वही छोटी नस लिपटीहोय, मासादि कतै आच्छादित होय सो असप्राप्तासृपाटिक संहनन है ॥१॥सो ये सहनन मनु प्य अर तिर्यंचनिकै होय है ।। देव नारकी एकेंद्रिय इनके हाड नही, तदि सहनन होय ॥ जिसके उदयतै शरीरकै स्पर्शउपजै सो स्पर्शनामकर्म आठप्रकार हैं सो ॥ कर्कश १ कोमल १ भायो १ हलको १ सचिकण १ रूक्ष १ शीत १ उष्ण १॥ जाकै उदयते शरीरमै रस निपजै सो रसनामकर्म पाचप्रकार है सो कहेहें तीक्ष्ण,१कटुक,मधुर,आम्ल,१कषाया जाकै उदयतै शरीरमै गंध निपजे सोगं धनामकर्म दोयप्रकार है । सुगध,१दुर्गंध १॥ जाकैउदयते शरीरको वर्ण प्रगटहोय सो वर्णनामकर्म पाचप्रकार हैं ।। सो कहेहैं। कृष्ण,नील, स्वेत,रक्त,हरित ॥ अव आनुपूर्वीनामकर्म च्यारप्रकार हैं सो कहेंहें। जाकैउदयते मरण हुवा पाछै नवी नशरीरकै योग्यपुद्गलवर्गना ग्रहण नहीकरै जवतक पूर्वलाशरीरका आकार बन्यार है सो आनुपूर्वनामाफर्म च्यारप्रकार हैं। नरकगतिअनुपूर्वी १ तिर्यंचगति अनुपूर्वी १ मनुष्यगतिअनुपूर्वी १ देवगतिअनुपूर्वी १॥इन आनुपूर्वीकाउदय तीनसमय उत्कृष्ट रहेहैं। जैसे, मनुष्य मरणकरि देवगतीके सन्मुखजाय तदि जबतक देवसंबं औदारिका दि शरीरकै आकृति उपजै सो संस्थाननाम छहप्रकार हैं ॥ जो ऊपरि नीचे समान विमागरूप शरीरके अंगउपागमे आकारहोय सो सुदर मर्यादरूप अंग होय सो समचतुरसंस्थान हैं ॥१॥ जिस शरीरकेपुद्गल ऊपरले बडेहोय नीचेकेछोटे (वडके रक्षकी ज्यौ) होय सोन्यग्रोधपरिमंडल सस्थान हैं॥१॥ जिस शरीरके पुद्गल बाबीकी ज्यो नीचे विस्ताररूप होय ऊपर सकोचरूप होय सो खातिकसस्थान हैं। ॥१॥ जाकी पीठ बीचमै बडीहोय, ऊपर, नीचे, हलकाहोय सो कुजकसंस्थान हैं। ॥ १॥ जाके हस्तपादादिकअग छोटेहोय उदर मस्तक बडाहोय सो वामनसंस्थान ॥१॥ जिस शरीरकै समस्त अग उपाग नीचे ऊचे घाटिवादि विडरूप होय सो हुड कसस्थान हैं ॥१॥जिसके उदयतै हाडका वधानमै विशेष होय सो सहनननाम हैं। सो ठहप्रकार हैं । जिसशरीरमै सहननकहिये हाड अर ऋषभकहिये नसके वेष्टन अर नाराचकहियेकीले ये वजमय होय सोवनऋषभनाराचसहनन हैं ॥१॥अर जामै हाड अर सधिके कीलातौ वजमय होय अर नशके वधन वनमय नहींहोय सो वजना राचसहनन हैं॥१॥बहुरिजाकैवबविशेषणरहित नाराचकहिये कीली, तिनकरि कीलि त हाडकी सधिहोय सो नाराचसहनन है ॥१॥बहुरि जामै हाडकीसंधिमै कीलेआधे होय एकतरफ होय, दूजे तरफ नही होय सो अर्द्धनाराचसहनन हैं ॥ १ ॥ बहु हे और अपिंडप्रकृति २८ है ॥ अब पिडप्रकृतीकेनाम कहेहें॥जाकै उदयतै आत्मा भवातरको जाय सो गति हैं।गति च्यारप्रकार हैं। नरकगति १ तिर्यंचगति १ मनु प्यगति १ देवगति १ बहुरि जिसविषै अव्यभिचारिसमान भावकरि एकतारूप भया जो अर्थका स्वरूप सो जाति हैं ॥ जाति पाचप्रकार हैं। एकइद्रियजाति १ बेइ द्रियजाति १ तीन इद्रियजाति १ चार इंद्रियजाति पाच इंद्रियजाति १ जाकैउदयते आत्माकै शरीरउपजै सोशरीरनामकर्म है सो शरीर पाचप्रकार हैं।औदारिकशरीर १ वैक्रियकशरीर १ आहारकशरीर १ तेजसशरीर १ कार्माणशरीर १ जाकैउदैते अग उपाग उपजै सो आगोपाग हैं सो तीनप्रकार हैं। औदारिकआगोपाग १ वैक्रियक आगोपाग १ आहारकआगोपाग १ जाकैउदयते नेत्र करणादिक यथास्थानहोय सो स्थान कर्म हैं ॥१॥ यथाप्रमाणहोय सो निर्माणकर्म हैं ॥जाकै उदयते औदारिकादि क शरीरकेपुद्गलका परस्परप्रवेशरूप वधान होय सो बधन हैं।ताके पाचभेद हैं।औ दारिकवधन १ वैक्रियवधन १ आहारकवधन १ तैजसबधन १ कार्माणबधन १ जाकै उदयते औदारिकादि शरीरके पुद्गल परस्पर अनुप्रवेशते इकसार साफ होजाय छिद्र रहित मिलिजाय सो सघातनामकर्म हैं।संघात पांचप्रकार हैं। औदारिकसंघात वैक्रियकसघात १ आहारकसंघात १ तैजससंघात १ कार्माणसंघात १ जाकैउदयतै करावनेवाला, अनतानुवधीहै, जातै अनत ससारका कारण मिथ्यात्वमाव होय सो अनतानुवधी है सो क्रोध, मान, माया, लोम, ऐसै च्यार प्रकार हैं ॥४॥ जाकै उदयतै एकदेशत्यागरूप (श्रावककेत्रत) किंचितमात्रभी नहीकरनेदे सो अप्रत्या ख्यानावरणी क्रोध मान माया लोम ये चारकपाय हैं ॥४॥ बहुरि जाकैउदयतै स कलसयमको नहीग्रहणकरिसकै सो प्रत्याख्यानावरणी क्रोधमान माया लोम हैं ॥४॥ जाकेउदयतै सयमभी रहै अर शुद्धस्वभावमै लीन नहीहोयसकै सो संज्वलन क्रोध मान माया लोम है ॥४॥ ऐसें सोलहप्रकार कपाय कहें ३।९।१६ ऐसे अठाईसप्र कार मोहनीकर्मकी प्रकृती कहीं ॥ ९॥ सूत्र ॥ नारकर्यग्योनिमानुपदेवानि ॥१०॥ अर्थ ॥ आयुकर्मके चारभेद कहेहे ॥ नरकविष उपजेनेका कारण सो नर कआयु हैं ॥ १॥ तिर्यंचभवमै उपजनेका कारण तिर्यंचआयु हैं ॥१॥ मनुष्यभवमै उपजनेका कारण मनुष्य आयु हैं ॥ १ ॥ देवभवमै उपजनेका कारण देवआयु हैं। ॥१॥१०॥ सूत्र ॥ गतिजातिशरीरागोपागनिर्माणवधनसघातसंस्थानसहनन स्पर्शरसगधवर्णानुपूप्यरुलघूपधातपरघातातपोद्योतोच्छासविहायोगतय प्रत्येक शरीरबससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेययश कीर्तिसेतराणितीर्थकरत्वच ॥ ॥ ११॥ अर्थ ॥ अव तिराणवैप्रकार नामकर्मकी प्रकृतीकहे हैं । पिंडप्रकृति ६५ सो मिथ्यात्व हैं ॥१॥ तत्वार्थका अदान अश्रद्धान दोऊमिल्याहुवा होय सो सम्यमिथ्यात्व हैं ॥ १॥ सम्यक्तको विगाडने समर्थतो नहीं, परतु श्रन्धानको मलीन करे सो सम्यक्प्रकृतिमिथ्यात्व हैं ॥ १ ॥ अव अकषायके नवप्रकार कहै है। जाकैउदयतै हास्यप्रगटहोय सो हास्य हैं ॥ १॥ जाकैउदयतै वस्तुमें आसक्त होना सो रति हैं ॥१॥ जाकैउदयतै कही सुहावै नहीं सो अरति हैं ॥१॥ जाकैउद यतै इष्टका वियोगादितै परिणाममै खेदितहुवा शोचकरना सो शोक हैं॥१॥ जाकेउदयतै दु खकारी पदार्थतै उद्वेगरूप डरना सो भय हैं ॥१॥ जाकैउदयते आपना दोप छिपावना अर परकादोप देखि परिणाम मलीन करना सो जुगुप्सा हैं ॥१॥ जाकैउदयते स्त्रीसंवधीभाव पावना सो सीवेद हैं॥१॥ जाकैउदयतै पुरुपसंवधीभाव होना सो पुरुपवेद है ॥१॥ जाकेउदयतै नपुसकसबंधीभाव पाव ना सो नपुसकवेद है ॥१॥ अव चारित्रमोहनीके सोलहप्रकार कहेहैं ॥ जाकैउदयते सर्वथा एकातरूप असत्य तत्वमै प्रीति होय, अनेकातरूप सत्य तत्वते द्वेषभाव होय, असत्यको सत्यथापि पक्षकरै, अपनाअसत्यार्थ तत्वको सत्यार्थ माननेमै अभिमान करै, पर्यायादिकामै ममताकरावने वाला, अन्यायमै न्यायरूप प्रतीतिकरावनेवाला, अपनाठापदस्थ,कुत्सितआचरण, विपरीतज्ञान इनमै सत्यपणाका उखपणाका मद माने चलायमानकरै तथा वैठेहूंके नेत्रमै शरीरमै विकारकरै सो प्रचला हैं॥१॥वहुरि सोई फेरिप्रवत सो प्रचलाप्रचला हैं॥१॥ जिसमै सोवतैहु पराक्रमसामर्थ्य प्रगटहोय, सूताहि उठि कछुकार्यकरफेरसोवै अर कार्यकीया ध्यानमै नहिरहै जो मैं कछुकिया,ऐसें निद्राको स्त्यानग्रही कहीयेसोस्त्यानग्रद्धिदर्शनावरण हैं॥॥ऐसें नवप्रकार दर्शनाव रणीय प्रकृति जो स्वभाव कह्या ॥७॥ सूत्र ॥सदसदेथे॥॥अर्थ ॥ वेदनीकर्मकी दोय प्रकृती है सो कहेहें।एक सातावेदनीय एक असातावेदनीय ॥जाकाउदयतै देवादिक गतीमै,शरीर,मन, इनसंवधी सुखप्राप्तहोय सो सातावेदनीय हैं। जाकेउदयते नरका दिकमे अनेकप्रकार दुख अनुभवै सो असातावेदनीय हैं॥८॥ सूत्र॥ दर्शनचारित्र मोहनीयाकपायाकपायवेदनीयाख्यास्त्रिविनवपोडशभेदा सम्यक्त्वमिथ्यात्वनदुमया न्यापायकपायौहास्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्सास्त्रीपुनपुंसकवेदा अनतानुबध्यप्रत्या स्यानप्रत्यारयानसंज्वलनविकल्पाश्चैकश कोधमानमायालोमा ॥९॥ अर्थ ॥ अ व मोहनीयकर्मकी अठाईसप्रकृती है सो कहेहैं ॥ दर्शनमोहनीयके तीनप्रकार हैं अर च्यारित्रमोहनीयके पचवीसप्रकार हैं। च्यारित्रमोहनीम अकपायवेदनी नव प्रकार है, कपायवेदनी सोलहप्रकार हैं ॥ अव दर्शनमोहनीके तीनप्रकार कहै है ॥ मिथ्यात्व, सम्यमिथ्यात्व, सम्यक्प्रकृतीमिथ्यात्व ॥ तत्वार्थका श्रदान नाही त्वारिंशद्विपचभेदायथाक्रम ॥ ५॥ अथ॥ज्ञानावरणके पाचभेद हैं। दर्शनावरणके नवभेद हैं ॥ वेदनीयकर्मके दोयमेद हैं ॥ मोहनीकर्मके अठाईसभेद है ॥ आयुक मके च्यारभेद हैं।नामकर्मके तिरानवैभेदहै ॥गोत्रकर्मके दोयभेद हैं ॥अतरायकर्म के पाचभेद है ॥ ५॥ सुत्र ॥ मतिश्रुतावधिमन पर्ययकेवलाना ॥६॥ अर्थ ॥ अव ज्ञानावरणके पाचमेद कहेहूँ।मतिज्ञानक्कू आच्छादन करैसो मतिज्ञानावरण हैं ॥१॥ श्रुतज्ञानको आच्छादन करै सो श्रुतज्ञानावरण हैं ॥१॥ अवधिज्ञानको आच्छादन करै सो अवधिज्ञानावरण हैं ॥१॥ मन पर्ययज्ञानको आच्छादन करे सो मन पर्य यज्ञानावरण हैं ॥१॥ केवल ज्ञानको आच्छादन करे सो केवलज्ञानावरण हैं ॥१॥ ॥६॥ सूत्र ॥ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानानिद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यान गृद्धयश्च ॥७॥ अर्थ॥ दर्शनावरणीय कर्मके नवभेद कहैहें । नेत्रइद्रियद्वारै दर्शन को रोकै सो चक्षुदर्शनावरण हैं ॥१॥ अन्य च्यारइद्रियहारे, रसन स्पर्शन घ्राण कर्ण, इनके विषयको रोकै सो अचक्षुदर्शनावरण हैं॥१॥ अवधिदर्शनको रोके सो अवधिदर्शनावरण हैं ॥ १॥ केवलदर्शनको रोके सो केवलदर्शनावरण हैं ॥१॥ मद खेद ग्लानि दूरकरनेको सोवना सो निद्रा हैं ॥१॥बहुरि तिसनिद्राका ऊपरा ऊपर आवना सो निद्रानिद्रा हैं ॥१॥जोशोक श्रम मद ग्लानि इनतें उपजी निद्रा आ दुखरूप वेदना करानेका हैं। दर्शनमोहनीयकर्मका स्वभाव स्वतत्वका परतत्वका श्रदान नहींहोनेदे॥ चारित्रमोहनीयकर्मका स्वभाव संयमरूप नहींहोनेदे ॥ आयु कर्मका स्वभाव भवमै स्थिरकरनेका हैं। नामकर्मका स्वभाव नारकादिकका शरीरा दिरूप नामधरानेका हैं।गोत्रकर्मका स्वभाव ऊच नीच स्थानादिक कहावनेका हैं। अतरायकर्मका स्वभाव दानादिकमै विघ्न करनेका हैं। बहुरि जो कर्म जितनेकाल अपनाकर्मका स्वभावको नहीछोडे ताको स्थितिकहीये ॥(उदाहरण)॥ जैसे छेली गाय, भैसी, इत्यादिकका दुग्ध जितनेकाल अपनेमधुरस्वभावको नहींछोडे सोही स्थि ति है ॥ तैसें ज्ञानावरणादिक अर्थकेनहिजाननेरूपस्वभावते नहींछ्टै सो स्थिति हैं। बहुरि कर्ममै रस देनेकी शक्ति सो अनुभाग हैं, जैसे छेली गाय भैसी इत्यादिकका दुग्धमै तीन मद जो रस चिक्कणता मिष्टता होहैं, तैसें कर्ममै जो तीव्र मदादिसा मर्थ्य सो अनुभागवध हैं। याहीको अनुभव कहिये हैं ॥ बहुरि कर्मभावरूप परि गये जे पुद्गलस्कंध तिनके परमाप्युकी जो गिणती सो प्रदेशवध हैं ॥ ३ ॥सूत्र ।। अयोज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रातराया ॥४॥अर्थ ॥ आयजो प्रकृतिवध, सो ज्ञानावरण १ दर्शनावरण १ वेदनीय १ मोहनीय १ आयु १ नाम १ गोत्र १ अतराय १ ऐसे अष्टमेदरूप हैं ॥ ४॥ सूत्र ॥ पंचनवद्यष्टाविंशतिचतुर्द्धिच अथतत्वार्थसूत्रअष्टमअध्यायप्रारभ ॥ सूत्र ॥ मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययो गानधहेतव ॥१॥ अर्थ ॥ मिथ्यादर्शन १ अविरत १ प्रमाद १ कषाय १ योग १ ये पाच, बंधके कारण हैं ॥ तत्वार्थका अश्रदान सो मिथ्यात्व है, मिथ्यात्वभाव पाच प्रकार है ॥ सो कर्मवघका कारण है ॥ पांचइद्रियकाविषय अर छहामनका विपय इनको नहि रोकना अर छहकायकेजीवकीदयाकाअभावये बाहरअविरत हैं-, ते अविरत कर्मबंधके कारण हैं। अर विकथादिक प्रमाद करके स्वरूपकाभूलना सो वधका कारण हैं। अर क्रोध मान माया लोम ये चारप्रकारकेकषाय ते वधके कारण हैं। अर मन वचन कायके योग ते कर्मबंधके कारण है ॥१॥ सूत्र ॥ सकपायत्वा जीर कर्मणोयोग्यानपुद्गलानादत्तेसबंध ॥२॥अर्थ ॥ कषायसहितपनातै यो जीव कर्मके होनेयोग्य पुद्गलको ग्रहणकरे सो वध हैं ॥२॥ सूत्र ॥ प्रकृतिस्थित्यनुभागत देशास्तद्विषय ॥३॥ अर्थ ॥जीव जो कर्मबंधको प्राप्तहोय हैं सो प्रकृति जो स्वभाव ताकौलिये वधै हैं, जैसी निवकी प्रकृति कडवी हैं गुडकीप्रकृती मिठी हैं, तैसाही आठोकर्मके प्रकृतीका स्वभाव जूदाजूदा हैं ॥ज्ञानआवरणीयकर्मके प्रकृतीका स्वभाव ऐसाहै, पदार्थका जानपना नहीहोनेदे ॥ अर दर्शनावरणीयकर्मके प्रकृतीका स्वभाव ऐसाहै, पदार्थका सामान्यअवलोकन हु नहींकरनेदे॥वेदनीकर्मका स्वभाव, सुखरूप K नेवाली उत्तमवस्तु पात्रदानदेनयोग्य द्रव्य हैं। अव दातारके सातगुणकहै हैं। दान देय, इसलोकपरलोकमै धन, सपदा, यश, कीर्ति इनकी नहीवाछाकरना सोये निरपेक्ष नामा दातारका प्रथम गुण है १क्षमा १ कपटरहितता १ आदेशभावकाअभाव १ विपाद रहितपणा १ हर्पितपणा १ निर्हकारीपणा १ ये सप्तगुण दातारके हैं। अब पात्रके तीनभेद कहेंहें ॥रत्नत्रयके धारकमुनी, उत्कृष्ट पात्र है ॥बतसहित श्रावक,म ध्यमपात्र है॥व्रतरहित सम्यक्तसहित अव्रतसम्यकदृष्टी, जघन्यपात्र हैं।।दानदेनेके योग्य तीन प्रकारके पात्र हैं। ऐसे दानयोग्य विधि, द्रव्य, दात्र, पात्र, कहैं। इनमै जो नानाप्रकारके विशेपहै तिनके विशेषतै पुण्यमै विशेष है ॥ उदाहरण ॥ जैसै पृथ्वी जल पवनादि विशेपतै फल विशेष होय तैसें जानना ॥३९॥ इतितत्वार्थाधिगमेमो क्षशास्त्रेसप्तमोध्याय ॥७॥ । ॥
च अतीचार कहेंहें। संन्यासग्रहणकरके जीवनेकीइच्छा सो जीविताशसानामाअती चार हैं ॥१॥ शीघ्र मरण चाहना सो मरणाशसाअतीचार हैं ॥१॥पूर्वकालमै जिस मित्रसहित क्रीडाकरीथी तिसका स्मरणकरना सो मित्रानुरागनामाअतीचार हैं ॥१॥ पूर्वेअनुभव किये जे इद्रियजनितसुख तिनका वारंवार चितवन करना सो सुखानुबंधनामाअतीचार हैं ॥१॥ आगै भोगनेकी वांछारूप चितवन करना सो निदान बंधनामाअतीचार हैं॥१॥ ऐसें पांचअतीचार सल्लेखनाके कहें ॥३७॥ सूत्र॥ अनुग्रहार्थस्वस्यातिसर्गोदान ॥ ३८॥ अर्थ ॥ अपना अनुग्रहती पुन्य संचयकरना हैं अर परजो पात्र तिसकै सम्यग्ग्यानादिककी दृद्धिहोनाहै, ऐसे अपने अर परके उपकारकेअर्थि द्रव्यका त्याग करना सो दान जाननां ॥३८॥ सूत्र॥ विधिव्यदात पात्रविशेपात्तद्विशेष ॥३९॥अर्थ॥ नवप्रकार विधि कहेहें॥पात्र आये तिसकौ ति छतिष्ठ ऐसे आदरपूर्वकवचन कहना सोप्रतिग्रह हैं १ उच्चस्थानदेना १ चरणको प्रासु क प्रमानीक जलतै घोवना १ प्रासुकद्रव्यतै पूजना १ नमस्कारकरना १ मनकीशुद्धता १ वचनकीशुद्धता १ कायकीशुद्धता १ भोजनकीशुद्धता १ ये नवप्रकार मक्तितै देना सो विधि हे॥वहुरि जिसवस्तुतै राग, द्वेष, असंयम, मद, दुख, भय,प्रमाद, रोगादिक नहीउपजै ऐसी वस्तु तपस्वीको देना अर तपकी स्वाध्यायकी वीतरागताकी दरिकर - सो स्मृत्यनुपस्थानअतीचार हैं ॥ १॥ये पाचअतीचार प्रोषधोपवासके हैं ॥३४॥ सूत्र ॥ सचित्तसंबंधसन्मिाभिपवदु पक्काहारा ॥३५॥अर्थ जीवसहितवस्तु सो सचित्तवस्तु हैं सचित्ततै भिड्यारह्याहोय सो सचित्तसबंध हैं, स चित्तसू मिल्याहोय सो सन्मित्र हैं, इनिविषै प्रमादते सेवन ॥१॥ तथा अतीभूखते सेवन ॥ १॥ तथा तीव्र प्रीतिते सेवनेमै प्रशत्तिकरै ॥१॥ तीनज तीचार तो ये हैं ॥ अर पुष्टरसका भोजनकरना ॥ १ ॥ अर भलेप्रकार प क्यानही ऐर्सेआहारादिकका भोजनकरना ॥१॥ये पाचअतीचार भोगोपभोगपरि माणवतके है ॥३५॥ सूत्र ॥ सचितनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिकमा ॥३६॥ अर्थ ॥ सचित्त जो कमल पनादिकमै धरयाहुवा आहार देना सो सचित्त निक्षेपनामाअतीचार हैं॥१॥सचित्ततै ढक्याहुवा भोजन साधुकौदेना सो सचित्त पिधानअतीचार है॥१॥ अन्यपुरुपकादान आपनेनामसे देना सो परव्यपदेशना माअतीचार हैं ॥१॥ अन्यदातारकेरण सहसकैनाही तथा आदररहित देना सो मात्सर्यनामअतीचार हैं ॥१॥ कालका विलवकरि अकालमै देना सो कालातिक्रम नामाअतीचार है ॥१॥ ये पाचअतीचार अतिथिसंविभागवतके हैं॥३६॥ सूत्र॥जी वितमरणाशसामित्रानुरागसुखानुवधनिदानानि ॥ ३७ ॥ अर्थ ॥ सल्लेखनाकेपा माअनर्थदहें ॥१॥धीटपणातै बहुतप्रलाप बकवादकरना सो मोखर्यनामाअती चार है॥१॥विचाररहित प्रयोजनतै अधिकपनाकरि दौडना खोदना कूदना चा लना सो असमीक्ष्याधिकरणनामाअतीचार हैं ॥१॥ जितना अर्थकरि अपना भोग उपभोग सधै सो अर्थ, तातै अधिकका सग्रहकरना सो उपभोगपरिभोगनर्थक्यना माअतीचार हैं ॥१॥ ये पाचअतीचार अनर्थदड विरतिनामावतके हैं॥३२॥ सूत्र। योगदु प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३३ ॥अर्थ॥ मन वचन कायके योग इनतीनकी खोटीप्रतिरूपकरना सो तीनअतीचार तो ये हैं ॥३॥ उत्साह रहित अनादरतै सामायिक करना सो अनादर अतीचार ॥१॥अर पाठकरनेका तथा क्रियाका भुलजाना सो स्मृत्यनुपस्थाननामाअतीचार हैं ॥१॥ ये पांचअतीचार सामायिकके हैं ॥३३॥ सूत्र॥ प्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसस्तरोपक्रमणाना दरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३४॥ अर्थ॥ यहा जीवहै कि नहीं, ऐसे विनादेख्या तथाको मल उपकरणते विनाझाच्या भूमिविषै मलादिक शरीरादिकका क्षेपणा ॥१॥उपकर णादिक बिनाझाच्या ग्रहणकरना ॥१॥ विनादेख्या बिछावना ॥ १॥ तीनअतीचार तो ये भये अर क्षुधादि पीडितहोय उपवासमै अनादरपना आवश्यकादि क्रियाम उत्साह नहीकरना सो अनादरअतीचार हैं ॥१॥किया आवस्यकादि भूलिजाना उतरना सो अधोतिक्रमनामाअतीचार हैं ॥ १॥ गुफा विलादिक सुरंगादिकमै प्रवे श करना सो तिर्यग्नामाअतीचार है ॥१॥ लोमका वसते क्षेत्रका वधावना सो क्षे वरदिनामा अतीचार हैं ॥१॥प्रमादतै संख्याका भूलाना सो स्मृत्यतराधाननाम अतीचार हैं ॥ १॥ये पाचअतीचार दिगव्रतके हैं ॥३०॥ सूत्र ॥ आनयनप्रेप्यत्र योगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः॥३१॥ अर्थ॥ आप मर्यादरूपकीया क्षेत्रमै तिष्टता पुरुप, प्रयोजनका वसतै मर्यादावाहरके पुरुपको बुलावना सो आनयन नामअतीचा र हैं ॥१॥ मर्यादा वाह्य क्षेत्रमै, पुरुषको कहै तुम ऐसैकरो सो प्रेष्यप्रयोगनामा आतीचार हैं॥ १॥ मर्यादावाहरके क्षेत्र में व्यापारकरनेवाले पुरुषको शब्द सुनादेना तथा खखारा इत्यादिक करना सो शब्दानुपात नामा अतीचार हैं ॥ १॥ मर्यादावा हर व्यापारमे प्रवर्तनेवालेको अपना रूप दिखाना रूपतै समस्याकरना सो रूपानु पात अतीचार हैं ॥१॥मर्यादके वाह्यक्षेत्रविपै पापाण वस्त्रादिक पुगलक्षेपणा सो पुद्गलक्षेप नामा अतीचार है ॥२॥ये पाचअतीचार देशविरति व्रतकेहे ॥३१॥सूत्॥ करप्र्पकौत्कुन्यमोखर्यासमिक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ॥३२॥अर्थ ॥ रागभावकी अधिकताते हास्यसहित नीचवचन बोलना सो कदर्पनामाअतीचार दोपह॥ १॥अर हास्यरूप नीचवचनसहित शरीरकी कुचेष्टा करना सो कौत्कुच्यना मनानगक्रीडाकामतीब्राभिनिवेशा ॥२८॥ अर्थ ॥ अपनेसतान विना, अन्यका वि वाहकरना सो परविवाहनामाअतीचार है॥१॥ इत्वरिका जो व्यभिचारनी सो व्य भिचारनी दोयप्रकार हैं ॥ येक परिगृहीताकहिये एकमर्तृका अर दूजी अपरिग्रही ताकहिये गणिका इत्यादिक तिनकै जावना आवना लेनादेना सो इत्वरिका गमन हैं । येक इत्वरिका परिग्रहीता गमननामाअतिचार हैं॥१॥ अर येक इत्वारिका अपरिग्रहीता गमननामाअतीचार हैं।॥ १॥बहुरि कामके अंगछोडि अन्य अंगते कामक्रीडा करना सो अनंगक्रीडानामाअतीचार है॥१॥बहुरि कामकी तीव्रताका अभिप्राय सो कामतीब्राभिनिवेशनामाअतीचार हैं ॥१॥ ये पाचअतीचार स्वदा रासतोषव्रतके हैं ॥२८॥ सूत्र ॥ क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यभा डप्रमाणातिकमा ॥२९॥अर्थ॥ क्षेत्र वास्तु, हिरण्य सुवर्ण, धनधान्य, दासीदास, कृप्य भाड, इनका जो प्रमाणकियाथा जो हमारे एताही परिग्रहहै अन्यनाही पछे अ तिलोभकेवसते प्रमाणछोडि अधिककरलेना सो परिग्रहत्यागवतके पाचअतीचारहें सो कहूँ ॥२९॥ सूत्र ॥ ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिकमक्षेत्रद्धिस्मृत्यतराधानानि ॥३०॥ ॥ अर्थ ॥जो दिशाका प्रमाणकियाथा ताका उल्लंघन करना सो अतिक्रम है, तहां पर्वतादिक ऊपर चढि चलना सो ऊर्ध्वातिक्रमनामाअतीचार हैं॥१॥ रूपादिकमै परके ठिगनेके निमित्त लिखदेना सो कूटलेखक्रिया हैं॥१॥ कोऊपुरुप सुवर्णादिक वस्तु आपको सोपिगया ताकी गिणती ओ भूलगया पाछै अल्पसख्याकरि मागने ल ग्या तदि कहै तुमाराहै सो लेजावो ऐसे वचनका कहना सो न्यासापहार हैं ॥१॥ प्रयोजनका प्रकरण, अगविकार भ्रकुटीक्षेपादिकतै परकै अभिप्रायको जानिकरकै जो ईर्पाभावतै प्रगट करना सो साकारमत्रभेदनामाअतिचार हैं ॥१॥ऐसे पाचअतीचार सत्यअणुव्रतके हैं ॥२६॥ सूत्र ॥ स्तेनप्रयोगस्तदाहतादानविरुद्धराज्यातिकमहीना रिस्मानोन्मानप्रतिरूपक्व्यवहारा ॥२७॥ अर्थ॥कोऊपरधन चोरताहोय ताको प्रेरणाकरना तथा चोरकी अनुमोदना करना सो स्तेनप्रयोगनामाअतीचार हैं॥१॥ चोरकू आप प्रेरनाहू नहीकरै भलाह नहीजानै परंतु चोरको ल्यायोधन ग्रहण करे सो तदाहतादाननामाअतीचार हैं॥१॥ उचितन्यायतै छोडि अन्यप्रकारकै देना लेना सो ही अतिक्रमहै अर राज्यते विरुद्ध जो अतिक्रम सो विरुद्ध राज्यातिक मनामाअतीचार है ॥ १॥ बहुरि न्यून तोलकरि तोलदेना अधिककरिलेना सो ही नाधिकमानोन्माननामाअतीचार हैं ॥१॥ कृतमसुवर्णादिक शुद्धमैमिलाय ठिगने रूप व्यवहारकरना सो प्रतिरूपकव्यवहारनामाअतीचार हैं ॥१॥ऐसे पाचअतीचार अचौर्यअणुव्रतके हैं ॥ २७॥ सूत्र॥ परविवाहकरणेलरिकापरिगृहीतापरिग्रहीताग शीलेपुपचपचयथाक्रम ॥२४॥ अर्थ॥ पांचअणुव्रतके अर तीनगुणव्रतके च्यार शिक्षाबतके इनि सप्तशीलके पाचपाच अतीचार हैं सो कहैहै ॥२४॥ सूत्र ॥वध वधछेदातिमारारोपणान्नपाननिरोधा ॥२५॥ अर्थ॥ मनुष्य वा तिर्यंचकौ शाकल जेवडी इत्यादिकतै बाधना वा जुडना पीजरेमै देना सो वधनामाअतीचार हैं ॥१॥ दड वेत चाबूक इत्यादिकतै मनुष्य वा तिर्यंचनीको मारना सो वधनामाअतीचारहें ॥१॥ कर्ण नाशिका हस्तादिक अग उपाग इनका छेदना सो छेदनामाअतीचार हैं ॥ १ ॥ न्यायरूप भारते मनुष्य वा तिर्यंचको अधिकभार लादना सो अतिमारारोप णअतीचार है॥१॥ मनुष्यका वा तिर्यंचका खान पानको रोकना तथा अपनेस्वाधिन जे मनुष्य वा तियेच तिनको विलवतै अन्न पानादि देना सो अन्नपाननिरोधनामा अतीचार है॥१॥ ऐसें पाचअतीचार अहिंसाअणुव्रतके कहै ॥ २५ ॥ सूत्र ॥ मि श्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमत्रभेदाः ॥ २६ ॥ अर्थ ॥ स्वर्ग मुक्तीका साधन करनेवाली क्रियाको छोडकै, परजीवको अन्यथा प्रवर्तन कराव ना सो मिथ्योपदेश नामाअतीचार हैं॥१॥ जो स्त्री पुरुषके एकांतमें हुवा आचरण को प्रगटकरना सो रहोभ्याख्यान नामाअतीचार हैं ॥१॥ अन्यपुरुषतो आपको कह्यानही परंतु परकीचेष्टाते जानिकरि ऐसेंयाने कपाहै वा ऐसे याने फियाहै ऐसे वक है सोमरणके अवसरमै सल्लेखनामै प्रीतिकरै ग्रहणकरै सल्लेखनानाम कृशकरने का है, सो सल्लेखना दोयप्रकार है। एककायासल्लेखना ॥ एककषायसल्लेखना ॥ अब कायसल्लेखना कहेहें।शोक काम निद्रा मन इद्रिय आलस्य प्रमाद इनके जीतनेको, वात पित्त कफादिकके प्रकोपके अभावकरनेको, सुखियास्वभाव दूरकरनेको, मार्गतै नहिचिगनेको, परिसह सहनेको, उपवास नीरसआहार कजिका वेला तेला इत्यादि जिनसूत्रके अनुकूल शरीरको कृशकरना सो कायसल्लेखना हैं ॥अर क्रोध मान माया लोभ तथा राग द्वेपादिकको घटाय परम वीतरागता धरना सो कषायसल्लेखना हैं। जो शरीरसल्लेखना अर कपायसल्लेखनाते परम वीतरागतारूपहोय पंचपरमगुरुको स्मरणकरना परमात्मभावना भावता देहको त्यागना सो सल्लेखना हैं ॥२२॥ सूत्र॥ शकापामाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशसासस्तवासम्यग्दृष्टेरतीचारा ॥२३॥ अर्थ। जि नभापित तत्वमैं शकाकरना सो शंका हैं ॥१॥जिनधर्म सेवनकरि इसलोक परलो कम भोगचाहना सो कांक्षा हैं ॥२॥ अशुभको देखि मनका मलीनपना करना सो विचिकित्सा हैं ॥३॥ मिथ्यादृष्टीका ज्ञान चारित्र इनमै मनकरि वचनकरि गुणकावि चारना सो अन्यदृष्टिप्रशसा है॥४॥ मिथ्यादृष्टीके गुणका वचनते प्रकाश करना सो मिथ्यादृष्टीसंस्तव हैं ॥५॥ये पाचअतीचार सम्यक्तके हैं ॥२३॥ सूत्र ॥ व्रत धर्मध्यानमै लीन तथा पचपरमेष्ठीगुणमे एकाग्रहोय तीनकालमै तिष्टना सो सामा यिक शिक्षाव्रत है ॥१॥वहुरि एक महिनामै दोय अष्टमी दोय चतुर्दशी ये च्यारपर्वमै स्नान विलेपन भूपन गधमाल्यादि समस्तत्यागि येकातमै वा साधुकेनिकट वा चै त्यालयमै वा प्रोपधोपवासके गृहमै समस्तगृहकार्यादिछोडि आहारादिक पच इद्रि यके विपयको त्यागि पचपापनिका षोडश प्रहरपर्यंत त्यागकरि धर्मध्यानसहित सोलहप्रहर व्यतीतकरै सो प्रोपधोपवासनामा द्वितीयशिक्षाव्रत है॥२॥ बहुरि जि नमै विपय कपाय सधै अर अनेकप्रकार अनत जीवका घात होय ऐसें मदिरा मास लोणी कद मूल आदो जमीकद केवडो केतुकी निंवपुष्पादिक इनकाती जिवेपर्यंत त्यागही करना अर योग्यविषय इद्रियाकी लोलपता आकाक्षा (इच्छा) घटावनेके अर्थ अर अभिमान घटावनेनिमित्त भोग उपभोगइनका प्रमाणकरना सो भोगो पभोगनामा तिसराशिक्षाव्रत हैं॥३॥वहुरि अतिथि जे मुनिश्वरादिक पात्र, तिनको अपने अर परकै उपकारकैअर्थि भक्तिपूर्वक योग्यविधितै निर्दोष आहार औषधिवस्ति का पुस्तक इनका देना तथा उपकरण देना सो अतिथि संविभागनामा चौथाशिक्षाब त हैं ॥४॥ ऐसें तीनगुणव्रत च्यारशिक्षाव्रत इन करिसंयुक्त पाच अणुव्रत गृहस्थधार णकरे सो व्रती हैं ॥२१॥ सूत्र ॥ मारणातिकीसल्लेखनायोपिता ॥२२॥अर्थ ॥ वतीश्रा णातिथिसविभागवतसपरश्च ॥२१॥ अर्थ॥ यावत्जीव पूर्वादिकदिशामै जावनेका भेजनेका वस्तुमगावनेका प्रमाणकरना सो दिगविरति व्रत हैं ॥१॥ अर यावत् जीव जो दिशाका प्रमाणकीया तिसमै घटाय कालकी मर्यादरूप त्याग करना सो देशत्र त हैं॥२॥अर प्रयोजनविना जो पापके आवनेका कारण तेअनर्थदड पाचप्रकारहें। सो कहेहैं ।। परजीवकी जीति, हार, वध, बधन, अगछेदन, सरवस्वहरणादिक अपने परीणाममै चितवन करना सो अपध्यान अनर्थदड हैं॥ अथवा परकेदोप ग्रहणकरना परकीलक्ष्मीकी वाछाकरना परकेस्त्रीकारूपादिक अवलोकनकरना परका कलहदेखना इत्यादिकहू अपध्याननामा अनर्थदंड हैं ॥ १॥ वहुरि प्राणीको पीडा हिंसाकाउपदे शकरना सो पापोपदेश अनर्थदड हैं ॥२॥प्रयोजनादिविना रक्षादिक छेदना भूमि कुटन जलसेचनादि निंद्यकर्मकरना सो प्रमादचरित अनर्थदड है ॥३॥ विष कटक शस्त्र अग्नि चावकादिक हिंसाका उपकरन देना सो हिंसादाननाम अनर्थ दड हैं॥४॥ रागादिक वधावनेवाली हिंसाको पोपनेवाली दुष्टकथा श्रवण सो दु श्रुतनामा अन थेदढ हैं ॥५॥ये पाचप्रकार अनर्थदडका त्याग सो अनर्थदड विरतिनामा तीसरा गुणव्रत है ॥ ३ ॥ बहुरि समस्तद्रव्यमै रागद्वेषछोडि समतारूपहोय देशकालकी मर्यादा करकै समस्तसवाद्य योग त्याग, परमात्माका स्वरूप चिंतवन करना तथा अर वैराग्यके निमित्त जगतका अर कायाका स्वमाव चितवन करना श्रेष्ठहै ॥१२॥ सूत्र ॥ प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणहिंसा॥१३॥ अर्थ ॥ कषायसहित आत्माका प रिणाम सो प्रमत्त हैं, प्रमत्तके योगते प्राणीकै प्राणका वियोग करना सो हिंसा ॥ १३ ॥ सूत्र । असदभिधानमन्त ॥ १४॥अर्थ ॥ असमीचीन वचनका कहना सो अमृत हैं असत्य हैं ॥१४॥सूत्र । अदत्तादानंस्तेय ॥१५॥अर्थ ॥ विनादि ई वस्तुका ग्रहण करना सो स्तेयकहिये चोरी हैं ॥१५॥ सूत्र ।।मैथुनमब्रह्म ॥१६॥ अर्थ ॥ मेथुन हैं सो अब्रह्म हैं ॥ १६ ॥ सूत्र ॥ मूर्छापरिग्रह ॥ १७॥ अर्थ ॥ रा गादिक अभ्यतर परिग्रह हैं अर चेतन अचेतन वस्तुमै ममता सो बायपरिग्रह हैं ॥१७॥ सूत्र॥नि शल्योव्रती ॥१८॥ अर्थ ॥ मायाशल्य १ मिथ्याशल्य १ निदान शल्य १ ये तीन शल्यरहितहोय सो व्रती हैं ॥१८॥ सूत्र ॥ अगार्यनगारश्च ॥१९॥ अर्थ ॥ व्रती दोयप्रकारके हैं। अगार जो गृह तामें वसनेवाला अगारी व्रती हैं अर ग्रहके त्यागी अनगारी व्रती ॥ १९॥ सूत्र ॥ अणुनतोगारी ॥२०॥अर्थ ॥ अणुकहिये अल्पव्रतकेधारी गृहस्थीअगारी हैं जाकै त्रस हिंसाका त्याग ॥ स्थूल झुठकात्याग ॥ परधनका त्याग ॥ परकी स्त्री त्याग॥ परिग्रहका परमाण सो अनुव्रती हैं॥२०॥ सूत्र ॥ दिग्देशानर्थदंडविरतिसामायिकतोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरमा ॥९॥ सूत्र ॥ दु खमेववा ॥१०॥अर्थ ॥ ये हिंसादिक पाचपाप दुखहीहैं इनको दुखरूपही भावना करना ॥ १०॥ सूत्र ।। मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थानिचसत्वर णाधिकक्किश्यमानाविनयेपु॥११॥ अर्थ ॥ परजीवकै दु खनहींहोनेका अभिलाप ताई मेत्रीकहिये । मुखकी प्रसन्नतादिकते अंतःकरणमै भक्तिरूप प्रीतिहोना ताको प्रमोदकहिये ॥ दीन दुखित जनकै उपकार होनेका परिणाम सो कारुण्य हैं ॥ राग द्वेप पूर्वक पक्षपातको अभाव ताको माध्यस्थ कहिये ॥ समस्तप्राणीके मैत्री भावना भावना ॥ सम्यक्ज्ञानादिक करि अधिकहोय तिनगुणवतकै प्रमोदभावना भावना॥ केशरूपप्राणीकै कारुण्यभावना भावना ॥ अविनयी जे तीवकषायी व्यसनी पापी इनमे मध्यस्थभाव रखना ॥११॥ सूत्र ॥ जगत्कायस्वभावौवासवेगवैराग्याथै ॥१२॥अर्थ ॥ यो जगत् अनादिनिधनहै, वेत्राशन, झल्लरी, मृदगकै सदृश हैं, इस अनादिसंसारमै अनतकालते नानायोनीमै परिभ्रमणकरते जीव अनते दु ख भोगवे है, कोऊ नित्यनहीं हैं, जीवना जलके बुदबुद समान है, विजुलीवत् मेघवत् भोगकी स पदाचचलहै इत्यादि जगत्का स्वभाव चिंतवन करनेतै ससारते सवेगभाव होय हैं। अर ये काया हैं, सो अनित्य है, दुखका कारण हैं, नि सार हैं, अशुचि है, पोषणकरते ही नष्टहोय हैं, इत्यादि चितवनतै, विपयतै देहते वैराग्य उपजे हैं।यातै व्रतीको संवेग के अप्रतीति योग्यहोय है, कोऊप्रतीति नहीकरै है, इसलोकमै जिन्हाच्छेदन सर्वस्व हरणादिकने प्राप्तहोयह जिसतै झुटकहा तिसतै वडावैर बंधैहे अर परलोकमै निंद्य गतीकू प्राप्तहोयहै तातै असत्यवचनते विरक्तहोय त्यागकरना सोही जीवकाकल्या णहे ॥२॥ तैसेही परद्रव्य हरनेवाला चोर, समस्तकै पीडाकरनेवाला होयहै इसलो कमे नानाप्रकार घात वधन हस्त पाद नाशिका ओष्ठकाछेद सर्वस्व हरनादिकनै प्राप्तहोयहे अर परलोकमै अशुभगति प्राप्तहोयह अर महानिंद्यहोयहै ताते चोरीते विरक्तहोय त्यागकरना सोही श्रेष्ठहै ॥३॥ तैसेही कुशीलीहू मोहते नष्टकार्यकरैहै कार्यअकार्यका विचाररहित निंद्यचेष्टाने प्राप्तहुवा अपनाहितका नाशकरेंहै अर पर की स्त्रीका आलिंगनमै रतिकरनेवाला इहा वैरनै प्राप्तहोयहै लिंगछेदन वध वधन सर्वस्वहरनादिकनै प्राप्तहोयहै परलोकमै अशुभगतीने प्राप्तहोयहै ताते अब्रह्मतै विरक्तहोना जीवकाकल्याण हैं॥४॥ तैसेंही परिग्रहवान् परिग्रह सचयकरनेमै रक्ष ण करनेमे क्षयहोनेमै बहुत खने प्राप्तहोयह अर जैसे इधनकरि अग्निकीप्ति नही होय तैसे परिग्रहत तृप्ति नाहीहोयहै अर परिग्रहवान् लोभी, कार्य अकार्य योग्य अयोग्य नहीजानहै अर परलोकमै निंद्यगतीने प्राप्तहोयहै अर यो लोभीहै ऐसें निं यहोयहै तातै परिग्रहते विरक्तहोना सोही कल्याणहै, ऐसे व्रती भावना भावै हैं॥५॥ ) प बैठे तहां परकोईआवै ताका वर्जन नहीकरना तथा आपको कोईमनैकरै तहा न हीवैठना १ आचारागकी आज्ञाप्रमाण शुद्धभिक्षाग्रहण करना १ ये स्थान, उपकरण, शिप्य, हमारे ये तुमारे ऐसा विसवाद नहीकरना १ ये अचौर्यव्रतकी पाच भावना हैं ॥६॥ सूत्र ॥ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहरागनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणदृष्येष्टरस स्वशरीरसस्कारत्यागा पंच ॥७॥अर्थ ॥ स्त्रीमै प्रीतिभाव करनेवाली कथाकेश्रव णका त्याग १ स्त्रीके मनोहर अग अवलोकनका त्याग १ पूर्वे भोगभोगे तिनके स्म रणका त्याग १ पुष्ट इप्टरसरूप भोजनका त्याग १ अपने शरीरका शृगारादिरूप सस्कारका त्याग १ ऐसे ब्रह्मचर्यव्रतकी पाच भावना है ॥७॥ सूत्र ॥ मनोज्ञा मनोजेंद्रियविपयरागद्वेपवर्जनानिपच ॥८॥॥अर्थ ॥ स्पर्शनादिक पचइद्रियके इष्ट विपयमै प्रीतीका त्याग, अनिष्ट विषयमें द्वेषका त्याग ये पाचभावना परिग्रहत्याग व तकी है ॥८॥ सूत्र ॥ हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शन ॥९॥ अर्थ॥ हिंसादि पाच पाप करनेमै अपने कल्याणका नाश हैं, इसलोक परलोकमै निंद्यपणाहै, हिंसाकरने वाला नित्यही उद्वेगरूप रहैहै अर निरतर वैरानुवध होय है अर इसलोकमैवध वध क्ले शादिकने प्राप्तहोय हैं अर परलोक, अशुभ गतीने प्राप्तहोय हैं, निंद्यहोय है तातें हिंसातें विरक्तहोय त्यागकरना इसजीवका कल्याण है १ तैसेंही असत्यवादी समस्त दन ॥ अथतत्वार्थ सूत्र सप्तमअध्यायप्रारभ ॥ सूत्र ॥ हिंसानृतस्तेयोब्रह्मपरिग्रहेन्यो विरतिव्रत ॥ १॥ अर्थ ॥ हिंसा १ असत्य २ चोरी ३ अब्रह्म ४ परिग्रह ५ ये पाच पापकी विरक्तता सो व्रत हैं ॥१॥ सूत्र । देशसर्वतोणुमहती ॥२॥ अर्थ ॥ ये हिंसा दिक पाचपापका एकोदेशी त्याग सो अणुव्रत हैं ॥ अर सर्वप्रकारते त्याग सो म हावत है ॥२॥ सूत्र ॥ तत्स्थैर्यार्थभावना पचपच ॥३॥ अर्थ ॥ इन अहिंसादि क पचव्रतको स्थिरिकरणकै अर्थि एकएकवतकी पांचपांच मावना हैं ॥३॥ सूत्र । वादानोराप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानमोजनानिपंच ॥४॥ अर्थ ॥ वचन राप्ति १ मनोसप्ति १ ईयासमिति १ आदाननिक्षेपनासमिति १ अलोकित पानभो जन कहिये देखि सोधि भोजन पान करना १ ये अहिंसावतकी पाच भावना हैं । ॥४॥ सूत्र ॥क्रोधलोमभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणचपच ॥५॥ अर्थ॥प्रत्याख्यान कहिये त्याग, क्रोधकात्याग १ लोभकात्याग १ भयकात्याग १ हास्यकात्याग १ ये च्यारकाती त्यागकरना अर जिनसूत्रके अनुकूल वचन बोलना १ ये सत्यव्रतकी पाच भावना हैं ॥५॥ सूत्र ॥ शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधा करणभैक्ष्यशुद्धिसधर्माविसंवादा पच॥६॥ अर्थ ॥ सूनाघर तथा पर्वतकी गुफादि कमै वसना १ परके छोरेहुवेघर विमोचितावास हैं तामै वसना १ जिसठिकाने आ नेयोग्यभक्ष्य भोजनकरनेयोग्यभोज्य पीवनेयोग्यपेय आस्वादनेयोग्यलेह इत्यादि कनिमै विघ्नकरनेते अतरायकर्मका आश्रवहोय हैं। विभव तथा विभवसमृद्धिदेखि मात्सर्यकरनेते तथा अपनेद्रव्यहोतेह नहीखरचनेते द्रव्यकी अतिवाछाते, देवकै च डीवस्तुके ग्रहनकरनेते अतरायकर्मका आश्रवहोय है ॥ निर्दोप उपकरणके त्यागने ते परकीशक्ति विनासनेते धर्मकाछेदकरनेते सुदरआचारके धारक तपस्वी गुरुका घातकरनेते जिनप्रतिमाकी पूजाकेविगाडनेते तथा दीक्षित तथा दरिद्री दीन अ नाथ इनको कोऊ वस्त्र पात्र स्थान देतेहोय तिनके निषेधकरनेते परको वदिग्रहमै रो कनेते वाधनेते गुह्यअगछेदनेतै कर्ण नासिका ओष्ठ काटनेते जीवकैमारनेते अंतराय नामाकर्मके आश्रवहोय हैं । जैसै कोऊमधपानी अपनीरुचितै मद मोह भ्रम करने वाली मदिरापीयकरिकै अर तिसके उदयकेवसते अनेक विकारको प्राप्तहोय है, तथा जैसे रोगी अपथ्यभोजनकरिअनेकवात पित्त कफादिजनित विकारको प्राप्तहोय हैं,तेसैं आश्रवविधिकरि ग्रहणकिया अष्टप्रकारकर्म तथा एकसौअडतालीस तथा असख्या तलोकप्रमाण कर्मप्रकृतिते उपजेविकारको प्राप्तहोय हैं ॥ २७ ॥ इतितत्वार्थाधिग मेमोक्षशास्त्रेपाठोध्याय ॥६॥ ॥ ॥ ॥
अनज्ञा नहीकरना, अन्यजीवतै उद्दतपना छोडना, परकीनिंदा ग्लानि हास्य अपवाद का त्यागकरना, अभिमान रहितरहना, धर्मात्माजनकी पूजा सत्कार करना, देखतेही उठि खडारहना अजुलीजोडना नम्रीभूतहोना वदनाकरना, अवारके अवसरमै अ न्यपुरुपकै ऐसेंगुणहोना दुर्लभ तैसे गुण आपमैहोतेहूं उछतपना नहीकरना, अहकार काअभावकरना जैसें भस्ममै ढक्याअग्निकीनाई अपना महात्म नहीप्रगटकरना, धर्म के कारणमै परमहर्पकरना सो समस्त उच्चगोत्रके आश्रवके कारण हैं ॥ २६ ॥ सूत्र ॥ विघ्नकरणमतरायस्य ॥२७॥ अर्थ दानदेतेमै विघ्नकरनेतै दानातरायकर्मके आश्रव होय हैं। कोकै लाभहोताहोय तिसलाभके कारणको विगाडै तातै लामा तरायकर्मका आश्रवहोय हैं। परकेमोग बिगाडनेते मोगातरायकर्मका आश्रवहोय ॥ उपभोगविगाडनेते उपभोगांतरायकर्मका आश्रवहोय हैं। परकीशक्ति बिगाड नेते वीयर्यांतरायकर्मका आश्रवहोय हैं । कोऊज्ञानाभ्यासकरताहोय ताका निषेधकर नेते कोऊ जिनधर्म जिनशास्त्र प्रसिद्धकरताहोय ताका निषेधकरनेते जीर्णोद्धारकर ताहोय ताका निपेधकरनेसे अंतरायनामाकर्मका आश्रवहोय हैं । कोऊका सत्कार होताहोय तिसका विनाशकरनेते तथा दान लाभ भोग उपभोग शक्ती सान विलेपन अत्तरसुगध पुष्पमाल्यादिक, वस्त्र आमरण शय्या आसन भक्षणकर विपें विद्यमान् वा अविद्यमान गुणके प्रगटकरनेकी इच्छा सो आत्मप्रसंसा हैं। पर केसत्यगुणको आच्छादन करना अर अपने झूटे गुणहू प्रगटकरना सो ये परनिंदा आत्मप्रससा है सो नीचगोत्रके आश्रवके कारण हैं। तथा जाति कुल बल श्रुत आज्ञा ऐश्वर्य रूप तप, इनका मद करना परकी अवज्ञाकरनी परकी हास्यकरना पर के अपवादकरनेका स्वभावरखना धर्मात्मापुरुषकी निंदाकरना अपनी उच्चता दिखा वना परके यशको विगाडदेना असत्यकीर्ति उपजावना सत्यगुरुका तिरस्कारकरना गुरुके दोप प्रगटकरना गुरुकास्थान विगाडना अपमानकरना गुरुकौपीडाउपजा वना अवज्ञाकरना गुणकौलोपना गुरूकौमजुलीनहींजोडना गुरुकीस्तुतीनहींकरना गुरुकेगणनहीप्रकाशना सुरुकोआवर्तेनहीखडाहोना तीर्थकरादिककी आज्ञाका लो पना ये समस्त नीचगोत्रके आश्रवके कारण हैं ॥२५॥ सूत्र ॥ तद्विपर्ययोनीचैर्ट त्यनुत्सेकोचोत्तरस्य ॥ २६ ॥ अर्थ ॥ अपनी निंदाकरना परकीप्रसंसाकरना परके भलेगुणको प्रगटकरना औरणको ढाकना गुणवतविपै विनयतै नयीभूतरहना आ पमै ज्ञानादिकगुणकी अधिक्यताहोतेह ज्ञानादि मदको प्राप्तनहींहोना अहकार नहीकरना ये उच्चगोत्रके आश्रवके कारण हैं। जाति कुल रूप वीर्य ज्ञान ऐश्वर्य तप अधिकार इनते हीनहोय इनसे आपकी उच्चता नहीचिंतवनकरना अन्यजीवकी भक्तिपूर्वकदेना सो शक्तितस्त्याग ह॥६॥ अपनाशक्ती• नछिपविता जिनंद्रका मार्गके अनुकूल अनशनादिक (उपोपणादिक) तपकरना सो शक्तितस्तप हैं॥७॥ मुनीश्वरादिक च्यारसघकै कोऊकारणतै व्रत शील तप सयम इनमैविघ्नआवे ति नका विघ्नदूरकरके रक्षाकरना सो साधुसमाधि हैं ॥ ८॥ गुणवतकै दुखआवते निर्दोपविधिकरके उनका दु खदूरकरना टहलकरना सो वैयाटत्य है ॥९॥ केवली केगुणमै अनुराग (प्रीति) करना सो अर्हतभक्ति हैं ॥१०॥ आचार्यादिककेगुणमे प्रीतिकरना सो आचार्यमक्ति हैं ॥ ११॥ बहुश्रुतिके गुणमै प्रीति करना सो बहुश्रुतभक्ति हैं ॥१२॥ श्रुतज्ञानके गणमै अनुराग (प्रीति) सो प्रवचनभक्ति हैं। ॥१३॥ पटआवश्यकका यथाकाल प्रवर्तनकरना सो आवश्यकापरिहानि हैं॥१४॥ ज्ञानके प्रकाशते तथा महातपकरके जिनपूजाकरके जिनधर्मका उद्योतकरना सो मार्गप्रभावना हैं ॥ १५॥ धर्मके आयतनमै धर्मात्मापुरुषमै प्रीतिकरना सो प्रव चनभक्ति हैं ॥ १६॥ ये षोडशभावना हैं ते उपमारहित अचिंत्यविभूतिका कार ण प्रभावजाका त्रैलोक्यमै विजयरूप तीर्थकरनाम पुन्यकर्मको आश्रवके कारण हैं। ॥२४॥ सूत्र ॥ परात्मनिंदाप्रशसेसदसद्गुणोछादनोजावनेचनीचैर्गोत्रस्य ॥ २५ ॥ ॥अर्थ परकेदोषहोते वा अनहोते प्रगटकरनेकी इच्छा सो परनिंदा हैं ॥ अर आप नताशीलवतेष्वनतीचारोमीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौशक्तितस्त्यागतपसीसाधुसमाधि वैयारत्यकरणमर्हदाचार्यवहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिमार्गप्रभावनाप्रव चनवत्सलत्वमितितीर्थकरत्वस्य ॥ २४॥ अर्थ ॥ अव सोलाभावनाके नाम कहेहें। दर्शनविशुद्धि १ विनयसंपन्नता १ शीलवतेष्वनतीचार १ ज्ञानोपयोग १ सवेग १ शक्तितस्त्याग १ शक्तितस्तप१ साधुसमाधि १ वैयासत्य १ अर्हतभक्ति १ आचार्यम क्ति १ प्रवचनभक्ति १ आवश्यकापरिहाणि १ मार्गप्रभावना १ प्रवचनवत्सलत्व १ अब सोलाभावनाके लछन कहेहे ॥ जिनेंद्रका उपदेश्या मोक्षमार्गमै रुचि अर निःसकितादिअष्टअगकीउज्ज्वलता सो दर्शनविशुद्धि हैं ॥१॥ दर्शन ज्ञान चारित्रमै अर इनके धारन करनेवालेमै आदर तथा विनयकरना सो विनयसंपन्नताहे ॥२॥ शील जो वीतरागतारूप अपना स्वभाव अर अहिंसादिक व्रतमै मन वचन कायतै निर्दोपप्रत्तिकरना सोशीलव्रतेष्वनतीचार हैं ॥३॥ ज्ञानकी भावना पढना पढावना उपदेशकरना इत्यादि जिनोपदेशश्रुत ज्ञानके अर्थमै निरतर उपयोग रखना सो अभीक्ष्णज्ञानोपयोगहे ॥४॥ संसारके दु खनीतै नित्यभयभीत रहना सो संवेगहें ॥५॥धर्मात्मापुरुपको उपकारकै अर्थि आहार औषधी शास्त्र अभयदान देना, सम्यक्भावकै उपकारकैअर्थि आहार औपधि शास्त्र अभयदान सम्यक्भावते उपअंग काटना स्पर्श रस गध वर्ण इनकी विपरीतताकरना अनेक जीवको दुखदेने वालेजन पीजरे बनावना कपटकीअधिकता परनिंदा अपनीप्रससाकरना झुठवचन बोलना परकाद्रव्यग्रहणकरना महाआरंभ महापरिग्रहका मदकरना उज्चलआमरण वल वेषका मदकरना रूपका मदकरना कठोरवचन निंद्यवचन असत्यप्रलाप क्रोध केवचन धीठताके वचनकहना सौभाग्यमै उपयोगकरना वशीकरणके प्रयोगकरनापर जीवनकै कौतूहल उपजावना आभरणपेरनेमै आदर अनुरागकरना जिनमंदिरके चदनादि गंध अर पुष्प माल्यादिकका चोरना हस्यकरना ईटके पकावनेके प्रयोग दावाग्निके प्रयोगकरना देवकीप्रतिमाकाविनाशकरना प्रतिमाकेस्थानजे मदिरा दिकताका नाशकरना मनुष्य वा तिर्यंचके बैठनेके रहने के स्थानको मल मूत्रादिक ते विगाडना वाग बगीचे वन इनका विनाशकरना क्रोध मान माया लोभ इनका तीन पणा पापकर्मतै जीविकाकरना इत्यादिकते अशुभनामकर्मके आश्रव होय हैं ॥२२॥ सुत्र ॥ तद्विपरीतशुभस्य ॥२३॥ अर्थ।मन वचन काय इनकी सरलता अर पूर्वे कहै तासू उलटे परिनाम ते शुमनामकर्मके आश्रवके कारणहें तथा धर्मात्माको दे खि हरखकोप्राप्तहोना सम्यक् भावराखना ससारम्रमनतै भयभीतरहना प्रमाद वर्ज ना इत्यादि शुमनामकर्मके आश्रवके कारणहैं ॥२३॥ सूत्र ॥दर्शनविशुरिर्विनयसंप ।
र्जरा वालतपये देवआयुके आश्रवके कारणहैं। तहां सरागसंयम तो महाव्रतीमुनीका हैं। संयमासंयम देशव्रती श्रावकका हैं । तिनको तौ कल्पवासी देवकीआयुका निय महें।बहुरि पराधीनहुवा क्षुधातृषाकरि बाधा भोगना तथा वंदिग्रहादिमै ब्रह्मचर्य भु मिशयन मलधारन करना दुर्वचनादिककी आतप सहनकरना दीर्घकाल रोगदरिद्र घारन सो आकामनिर्जरा हैं,यातेंहूं व्यतरादिकमै तथा मनुष्यमै तिर्यंचमै उपजना हो यहें । मिथ्यादृष्टीका तप करनासो बालतपहें, ते बालतपके धारक, भवनवासी व्यतर ज्योतिषीइनमैतथा बारमा स्वर्गपर्यंत उपजै हैं तथा मनुष्यमै तिर्यंचमै हु उपजैहै, तथा धर्मात्मापुरुषतै मित्रताका संवध, धर्मकेस्थान आयतनकी सेवा, सत्यार्थधर्मकाश्रवण धर्मकीमहिमाहोई तैसें प्रवर्तन,प्रोषधोपवासादिककाकरना शीलवानपणा दयापणा अतिअल्पक्रोधादिक येडू देवायुके आश्रवके कारण हैं ॥२०॥सूत्र॥सम्यक्तुंच॥२३॥ ॥ अर्थ ॥ सम्यक्त्वते कल्पवाशी देवहीका आयुका आश्रव होय हैं ।। २१॥ सूत्र॥ योगवक्रताविसंवादनंचाशुभस्यनाम्नः ॥ २२॥ अर्थ मन वचन कायकी कुटिलता अर संवादकरना इनितै अशुभनामकर्मके आश्रव होय हैं । अशुभयोगनिका ऐसा विशेषजानना ॥मिथ्यादर्शनधरना परकीपूठिपाछै खोटीकहना चित्तकाअस्थिरपना ताखडी वाटघाट रखना, खोटीवस्तु आछीमे मिलाय वेचना, खोटीसाखभरना अंग केपरिणाम आर्तध्यानते मरनकरना इत्यादि तिर्यंचआयुके आश्रवके कारणहै ॥१६॥ सूत्र ॥ आल्पारभपरिग्रहत्वमानुषस्य ॥ १७॥अर्थ ॥ अल्पआरंभ अल्पपरिग्रहम परिणाम सो मनुष्यआयुके आश्रवके कारणहें ॥बहुरि मिथ्यादर्शनसहितवुद्धि विन यवानस्वभाव सरलप्रकृति साचेआचरणमै सुखमानना अपनासुखजनावना अल्प क्रोध व्यवहारमै सरलप्रकृति सतोषमै रति प्राणीकाघातमै विरक्तता कुकर्ममै नियत्ति होना समस्तसैमिष्टवचन स्वभावहीतैमधुरता लौकिकव्यवहारमै उदासीनता ईर्षारहि तपणा अल्पसलेशपणा देवगुरुअतिथिका दानमै पूजामै अपनेद्रव्यते विभागकरना कपोतलेश्याकेपरिणाम मरणकालमैधर्मध्यानीपणा ये मनुष्यआयुके आश्रवके कार गहें ॥ १७॥ सूत्र ॥ स्वभावमार्दवच ॥ १८ ॥ अर्थ ॥ विना सिखाया स्वभावतेही कोमलपणा ये हू मनुष्यआयुके आश्रवके कारणहें ॥ १८॥ सूत्र ॥ निःशीलवतत्व चसापां ॥१९॥अर्थ॥ चशब्दतै अल्पारंभी अल्पपरिग्रहीपणा शीलरहितपणा ये समस्त (च्यारूं) आयुके आश्रवके कारणहें ॥ प्रश्न ॥ सीलनतरहितको देव आयुका बध कैसाहोय॥प्रश्नकासमाधानरूपउत्तर ॥ भोगभूमीमें उपजेजीव शीलवतरहितहै तोभी मदकपायके प्रभावतै देवहीहोयहें ॥१९॥सूत्र ॥ सरागसयमसंयमासंयमाका मनिर्जरानालतपासिदैवस्य॥२०॥अर्थसरागर्सयम तथा संयमासंयम अकामनि वतीकोदु खदेना एणवतकामथनकरना दीक्षाग्रहणकरनेवालेको दुखदेना परस्त्रीके संगमकेनिमित्त तीनरागकरना आचाररहित निराचारिहोना सो नपुंसकवेदके आ श्रवके कारणहैं ॥ १४ ॥ सूत्र ॥ वव्हारभपरिग्रहत्वनारकस्यायुष ॥१५॥ अर्थ ॥ बहुतआरंभकरना परिग्रहमै वहुतममत्वकरना सो नरकआयुके आश्रवके कारणहै ॥ मिय्याआचरण अतिअभिमान शिलाभेदसमानक्रोध तीव्रलोभकेपरिणाम निर्दयप णा परजीवकै संतापउपजावनेके परिणाम परके घातकरनेके परिणाम परके बंधन होनेकाममिप्राय प्राणीकाघातकरनेवाला असत्यवचन परद्रव्यके हरनेमै परिनाम मेथुनमै अतिराग अभक्ष्यभक्षण दृढवैर साधुकीनिंदा तीर्थंकरकीआज्ञाभग कृष्णले श्याकेपरिणाम रौद्रध्यानकरिमरण इत्यादिक नरकआयुके आश्रवके कारणहें ॥ ॥१५॥ सूत्र ॥ मायातैर्यग्योनस्य ॥ १६॥ अर्थ ॥ मायाचारकेपरिणाम तिर्यंचआ युके आश्रवके कारणहै ।। बहुरि मिथ्याधर्मकाउपदेश बहुआरभ बहुपरिग्रहमैपरि णाम कपटक्डमैतस्परपना पृथ्वीभेदसमानक्रोध शीलरहितपना वचनते चेष्ठाते ती नमायाचारकरना परकेपरिणामनीमें भेदउपजावना अतिअनर्थप्रगटकरना वर्ण गध रस स्पर्श इनकाविपरीतकरना जाति कुल शीलमै दूपणलगावना विसंवादमैप्रीति रखना परकेउत्तमगुणकाछिपावना विनाहोते औरणप्रगटकरना नील कपोत लेश्या कर्मके आश्रवके कारणहैं।अन्यजीवके अरति प्रगटकरना परके रतिका विनाश करना पापीकी सगती करना खोटीक्रियामै उत्साहकरना ए अरतिवेदनीकर्मको आश्रवकरे हैं।अपने शोकहोय तामै विखादीहोय चितवन करना परकै दु खप्रगटकरना अन्यको शोकमैदेखि आनदधरना सो शोकवेदनीकर्मके आश्रवको कारन हैं ।बहुरि अपना भयरूप परिनामकरना परकै भयउपजावना निर्दयपनाकरि परको त्रासदेना इत्या दिक भयवेदनीके आश्रवको कारणहैं । बहुरि सत्यधर्मकौप्राप्तभये, जे च्यारवर्णके धारक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, तिनके कुलकी क्रिया आचारकी ग्लानिकरना, परकाअपवादकरना सो जुगुप्सावेदनीके आश्रवके कारणहें ॥बहुरि अतिक्रोधकेप रिणाम अतिमानीपना ईर्षाकाव्योहार असत्यवचन अतिमायाचारमै तत्परपणा अति रागभावका करना परस्त्री सेवनकरना परस्त्रीका रागभावतै आदरकरना स्त्रीकैसेभाव आलिंगनादिकरना इनिभावतै स्त्रीवेदको आश्रवहोयहें ॥ अल्पक्रोध कुटिलताकाअ भाव विषयमै उत्सुकताकाअभाव निर्लोमता स्त्रीकेसंबंधमेअल्पराग अपनेस्त्रीमेस तोप ईर्षाकामभाव अर स्नान गंध पुष्पमाल्य आमरणमै अनादर इत्यादिक पुरुषवे दके आश्रवके कारणहें । बहुरि चार कषायका प्रबलपना तथा गुपईद्रियकाछेदना स्त्री पुरुषके, कामकेअगछोटि अन्यसंगमै व्यसनीपना, शीलवंतको उपसर्गकरना ।
मासमक्षनादिक्को निर्दोपकहना सो श्रुतकाअवर्णवाद हैं।मुनीकेसंघको अशुचित्वा दिरूप कहना सो सघकाअवर्णवाद हैं।च्यारनिकायकेदेव मांसभक्षणकरै मद्यपानकर ऐसाकहना सो देवावर्णवाद हैं।धर्मकाफल असुरादिहोना ऐसाकहना सो धर्मकाअव र्णवाद हैं। इनकरि दर्शनमोहनीयकर्मके आश्रवहोइहैं ॥१३॥सूत्र ॥ कपायोदयातीव्र परिणामश्यारित्रहोयस्य ॥१४॥अर्थ॥ कपायकेउदयतै तीव्रपरिणामहोना सो चारि त्रमोहनीके आश्रवके कारणहैं। तथा जगतके उपकारकरनेमै समर्थ जे शीलवत तिनकीनिंदाकरना आत्मज्ञानी तपस्वीकी निंदाकरना धर्मकाविध्वसकरना धर्मके सा धनमे अतरायकरना शीलवानको शीलतैचिगावना देशव्रती महाव्रतीको व्रततेचला यमान करना मद्य मास मधुके त्यागिको चित्तमै भ्रमउपजावना चारित्रमै दूषणलगा वना लेशरूपलिंग (भेषधरना ) केशरूपव्रतधरना आपकै अर परकै कषायउपजा वना इत्यादि कपायवेदनीयके आश्रवके कारणहें । बहुरि उत्कट हसना दीन दु खित अनाथकी हास्यकरना कामकथा कामचेप्टाकरि हास्यकरना स्थाप्रलापकरना ये परिनाम हास्यवेदनीयकर्मके आश्रव करेंहें ॥ बहुरि परकोई क्रीडाकरे तिसक्री डामै आप तत्परता अन्यकै क्रीडाकी सामग्रीमै उद्यमकरना, उचितक्रियाका वर्ज नही करना, परकेपीढाका अभावकरना, देपादिकम उत्सकपनाकाअभाव सो रतिवेदनी न करना तथा विश्वासघात वनस्वभावता पापकर्मकरिजीवको निरर्थकदडदेना विष पोवना तथा फासी जाल पिंजर इत्यादि वनावनाजीवको पकडनेको मारनेको यत्रकाउ पाय तथा खोटेप्रयोग शस्त्रदानदेना पापतैमिलेभाव इत्यादिक असतावेदनीयकर्मके आश्रवकेकारणहें।।११॥सुत्र॥भूतटत्त्यनुकपादानसरागसंयमादियोग क्षातिशौचमि तिसदेद्यस्य ॥१२॥ अर्थ॥ भूतकहिये सामान्यप्राणी अर व्रतीकहिये अहिंसादिपां चव्रतकेधारक इनकै पीडाजानि आपजैसैदु खआया तैसैपरिणामहोना सो भूतत्र तीमै अनुकपा हैं।परजीवके उपकारकैअर्थि अपनाधनादिकदेना सो दान हैं।धर्मा नुरागसहित सयम सोसरागसयम हैं। आदिशदतै सयमासयम अकामनिर्जरा बाल तपभी समझलेना। निर्दोषक्रियाविशेषको योग कहियेहैं।बहुरि क्रोधकौअभाव सो क्षांति ॥ अर लोभकेप्रकारकात्याग सो शौचहें ॥ सो भुत व्रतीमै अनुकपाकादानदे ना॥ संयमकाधारना ॥क्षमाकरना॥ निर्लोभीरहना॥इनीतै सातावेदनीकर्मके आश्रव होयहें। तथा अरिहतकीपूजाकरनेमैतत्परता वालवृद्ध तपस्वी इनकै वैयारत्यकरनेमै उद्यमीरहना सरलपरिणामधरना विनयादिरूपरहना॥येही सातावेदनीयके आश्रव केकारणहै ।। १२॥ सूत्र॥ केवलिश्रुतसघधर्मदेवावर्णवादोदर्शनमोहस्य ॥१३॥अर्थ केवलीको कवलाआहारकहना क्षुधातृषा रोगादिदोषकहनासो केवलीका अवर्णवाहें कारणहैं । वहुरि परकेदेखनेमै मात्सर्य तथा अंतराय तथा नेत्रकाउत्पाटन दृष्टिका गर्व बहुतनिद्रा दिवसमैशयन आलस्य नास्तिक्यताकाग्रहण, सम्यक्ष्टिको दूषण लगावना, कुतीर्थकीप्रससा प्राणीकाघात परजनकी निंदा इत्यादिक दर्शनावरणकर्म के आश्रवको कारणहें ॥ १० ॥ सूत्र ॥ दुखशोकतापादनवधपरदेवनान्यात्मपरो भयस्थानान्यसवेद्यस्य ॥११॥ अर्थ ॥ पीडारूपपरिणाम सो दुखहें ॥ अपनेउप कारका वियोगहोते जो परिणामका मलीनपणा तिसमै लीनअभिप्रायरूपहोय चिं ताखेदरूपहोना सो शोक हैं ॥ बहुरि अपवादकेनिमित्ततै अत करणकी कलुषताते तीव्रपश्चात्ताप करना सो ताप हैं। बहुरि पर तापते उपज्या अश्रुपातपूर्वक विलापादि रूप प्रगट रुदनकरना सो आकंदन हैं । बहुरि आयुवल इद्रियवल प्राणादिककावि योग करना सो वध है । बहुरि ऐसाविलापकरै जो श्रवणकरनेवालेकै करुनाउपजि आवै सो परिदेवन हैं ।सो दुख, शोक, ताप, आक्रदन, वध, परिदेवन, ये आपकरै तथा परकै दु खादिकरै तथा आपकै अर परकै दोऊकैकरै ताकै असातावेदनीयकर्मके आश्रव आवैहें। बहुरि अशुभयोग परकामपवाद परकीचुगली निर्दयता परकैआ तापकरना अगोपागकाछेदन भेदन ताडन त्रासन तर्जन घर्षण इत्यादिक तथा परकीनिंदा अपकीप्रससाकरना तथा संक्लेसप्रगटकरना महाआरभ महापरिग्रह धार दर्शनावरणयो ॥१०॥अर्थ ॥ कोऊपुरुष मोक्षका कारण ऐसा तत्वज्ञानकी कथ नी करताहोय ताको सुनिकरि ईर्षामावतै प्रससा नहीकरै मौनराखै ताको प्रदोष कहि ये॥बहुरि आपको जाका ज्ञानहोय अर जाननेकेअर्थि वाकू कोऊपछै इसवस्तुका स्वरूप कैसाहै तदि आप नटजाय, जो मैतौ नहीजानू ताको निन्हव कहिये॥ वहुरि आपको शास्त्रकाज्ञानहोय अर शिखावने योग्यभीहोय तौह पैलेको शिखावैनाही जो शीखजायतो मेरीबराबरीकरेगा ऐसा अभिप्रायको मात्सर्यकहिये । बहुरि कोऊ ज्ञानाभ्यासकरताहोय तिसमेविघ्नकरदे, पुस्तक तथा पढावनेवालाका तथा स्थानक का वियोगकरदे सो अंतराय हैं। बहुरि परनै प्रकाशकिया ज्ञानको वर्जना सो असा दना हैं ।। बहुरि प्रशस्तज्ञानको दूषणलगावना सो उपघात हैं । सो ये प्रदोष १ निन्हव १ मात्सर्य १ अंतराय १ असादना १ उपघात १ ये दोषत ज्ञानावरण अर दर्शनावरण इन कर्मके आश्रवहोयहें ।। और कहेहे ॥ आचार्य उपाध्यायतै द्वेष अर अकालमेअध्ययन श्रद्धानकाअभाव विद्याकेअभ्यासमैआलस्य तथा अनादर ते सूत्रकेमर्थकाश्रवण धर्मतीर्थकालोप बहुश्रुतिपणाकागर्व तथा मिथ्याउपदेशदेना तथा बहुश्रुतिनिकाअपमानकरना असत्यप्रलाप उत्सूत्रवाद खोटेशालकावेचना खोटेशास्त्ररचने हिंसादिकमैप्रवर्तना इत्यादिसमस्त ज्ञानावरणकर्मके आश्रयको ४॥ ऐसेंच्यारप्रकार निक्षेपकह्या ॥ अव दोयप्रकार निर्वर्तना कहेहें। निपजाईये सो निर्वर्तना हैं। शरीरतै कुचेष्टा उपजावना सो देहदु प्रयुक्तनाम निर्वर्तना हैं ॥१॥ हिंसाके उपकरण अर शस्त्रादिककीरचना सो उपकरण निर्वर्तना हैं॥२॥ तथा एक मूलगुणनिर्वर्तना एकउत्तरगुणनिर्वर्तना ऐसेंही दोयमेदहें ॥ पचप्रकारशरीर वचन मन उच्छास निश्वास इसका निपजावना सो मूलगुणनिर्वर्तना॥अर काष्ठ पाथर चि त्रामादि निपजावना सो उत्तरराणनिर्वर्तना हैं। बहुरि संयोजना कहेहैं ॥ सो संयोज ना दोयप्रकारहैं । शीत स्पर्शरूप जो पुस्तक कमडल तथा शरीरादिक तिनको ता वडातै तप्तजो पीछिका, ताकरि पूछना सोधना सो उपकरणसयोजना हैं ॥ १॥ बहु रि पान जो जलादिक तिनका अन्यपानमै मिलावना तथा भोजनमै मिलावना तथा भोजनको पानमै मिलावना तथा अन्यभोजनमै मिलावना सो भुक्तपानसंयोजना है ॥२॥ अन निसर्गाधिकरण तीनप्रकारहै सो कहें] ॥दुष्टप्रकार कायाका प्रवर्तन क रना सो कायनिसर्गाधिकरणहें ॥१॥ दुष्टप्रकार वचनकाप्रवर्तन करना सो वाकनिस गर्गाधिकरणहैं ॥२॥ दुष्टप्रकार मनकाप्रवर्तन करना सो मनोनिसर्गाधिकरणहें । ॥ ३ ॥ भावार्थ ॥ जीव अजीव दोऊद्रव्यके आश्रयतै कर्मकाआगमन होय, तिनमा वकै विशेषणकर्हेहैं ॥९॥ सूत्र ॥ तत्प्रदोपनिन्हवमात्सल्तरायासादनोपघाताज्ञान १ ये तीन, अर मन १ वचन १ काय १ ये तीनयोग, अर कृत १ कारित १ अनुमो दना १ ये तीन, अर क्रोध १मान १ माया १ लोभ १ ये च्यार॥इनको परस्परगुणीये तव एकसोआठभेद होयहें ॥८॥ सूत्र ॥ निर्वर्तनानिक्षेपसंयोनिसर्गाद्विचतुर्हित्रिभेदा पर॥९॥ अर्थ॥ निक्षेपकहिये धरना॥ निपजाइये सो निर्वर्तना हैं। मिलावना सो सयोजना हैं॥जो प्रवर्ताइये सो निसर्ग हैं। निक्षेपके चारभेदहें सो कहेहैं। अना भोग निक्षेपाधिकरण १ सहसा निक्षेपाधिकरण १ दु प्रमृष्ट निक्षेपाधिकरण १ अप्र त्युवेक्षित निक्षेपाधिकरण १॥ ऐसें निक्षेपच्यारप्रकारहें । अब इनकाअर्थ कहैहैं ॥ भयादिकतै वा अन्यकार्यकै उतावलीतै, जो सीघ्रतातै पुस्तक कमंडलु शरीर तथा शरी रकामल इत्यादिक उतावलीसो क्षेपिये सो सहसा निक्षेपाधिकरण हैं ॥ १ ॥ उताव ली नहींहोताहु, इहाजीवहै वा नहींहै, ऐसा विचार नकरते अर न अवलोकन करते पुस्तक कमडलु शरीर अर शरीरसंबंधीमल इत्यादिक पदार्थ निक्षेपणकरिये तथा वस्तु जहांधरनाचाहिये तहां नहीधरना जैसैतैसे अनेकजागा धरदेना सो अ नाभोगनिक्षेपाधिकरण हैं ॥२॥ बहुरि जो दुष्टतातै वा यन्नाचाररहिततै जो उप करण शरीरादिक क्षेपणा सो दु प्रमृष्ट निक्षेपाधिकरण हैं ॥३॥ बहुरि जो विनादे ख्या, वस्तुका निक्षेपणकरना स्थापनकरना सो अप्रत्युवेक्षित निक्षेपाधिकरण हैं।
वके कारण कहेहैं । इद्रियपाच कषायच्यार अव्रतपाच क्रियापच्चीस ये सापरायिक । (भावार्थ) कपाहकरिसहित जीवकै जे कर्मके आश्रवआवैहे तिनमें ऐसीस्थितिप जाकरि दीर्घकाल ससारपरिम्रमणकरिये ।। अर कपायरहित जीवकै आश्रवस हे परतु स्थितिनहीपडै आवैजिसहीसमय निर्जर जायहें ॥४॥सूत्र ॥ इंद्रियकषा याव्रतक्रियापचचतु पचपचविंशतिसख्या पूर्वस्यभेदा ॥५॥ अर्थ ॥ अब पापाश्र आश्रवके कारणहें।।।सूत्र।तीव्रमदज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेपेभ्य स्तद्विशे प ॥६॥ अर्थ॥ कपायकी उत्कटताते जो परिणामहोय सो तीव्रभावहें। कषायकीमद तातै जो परिणामहोय सो मदभावहैं। मैं इसप्राणीकौमारू ऐसे जानिकरि मारनेमै प्रत्तिकरना सो ज्ञातमावहै । विनाजानै प्रमादतै प्रतिकरना सो अज्ञात भावहैं । पुरुषकाप्रयोजन जाकैआधारहोय सो अधिकरणहैं। द्रव्यकीशक्ती सो वीर्यहैं।याते जीकै असख्यातलोकप्रमाण परिणामहोहै॥जैसाजैसापरिणामहोय तैसातैसा कर्ममै रस पड़े है स्थितिपढेहैं ।सोही आश्रवकेमेद जानना॥६॥सूत्र ॥अधिकरणजीनाजी वा ॥७॥अर्थ।। आश्रवकाआधार जीवद्रव्य, अजीवद्रव्य ऐसे दोयमेदह ॥७॥ सूत्र ॥ आद्यसरमसमारभयोगकृतकारितानुमतकपायविशेषेत्रित्रिलिश्चतुश्चैकश ॥८॥ ॥ अर्थ॥जीवाधिकरणके १०८ भेदहै सो कहेहैं । सरंभ १ समारंम १ आरभ अथतत्वार्थसूत्रषष्ठअध्यायप्रारंम ॥ सूत्र ॥ कायवाल्मन कर्मयोगः॥१॥अर्भक कायकी वचनकी मनकी क्रिया सो योग हैं ॥१॥ सूत्र ॥ सआश्रय ॥२॥ अर्थ। जो मनका वचनका कायका योग सो आश्रय हैं। उदाहरण ॥ जैसे नौकरी होय, उसछिद्रमेसे जलआवै, सो छिद्र जलआवनेका हार हैं, तैसें मन वचन, योगे सो कर्मआवनेके द्वार हैं ॥२॥ सूत्र ॥शुभ पुण्यस्याश्रुम पापस्य ।। ॥ अर्थ ॥ शुभयोगते पुण्यका आप्रवहोय, अशुभयोगते पापका मात्रमहोहै। अशुभयोग के नाम कहेहैं।जीवका घात, अदत्तका ग्रहण (पोरी) मेएन सेक्न दिक अशुभ काययोग हैं॥अर कर्कश कठोर निंप असत्य इत्यादि सो अशुभ वचनयोग हैं। परजीवकापात वर्मा मनयोग है।भव ग कहे हैं। महिसाविक मायपोगों। चनपोनरें।
गुणहोय सो हीनराणवालीपरमाणको आपरूप परणमन करावेहें। एकमै दोयगुणनि
ग्धताकेहोय अर दुजीमै च्यारगुणरूक्षपणाकेहोय तो दोऊमिलतदि अधिकगुणरूप
जो रूक्षपारमाए तिसरूप होयहें । ऐसैंही रूक्षतैस्निग्धमिलैतौ अर रूक्षसैरुक्षमिले
वा निग्धतैनिग्धमिले वा निग्धतैरूक्षमिलैतौ अधिकगुण जिसपारमाणमै होय ति
सरूप हीनगुणरूप परमाण परिणमि जायहें ॥३७॥ सूत्र ॥ गुणपर्ययवद्रव्य ॥३८॥
अर्थ ॥ द्रव्यहै सो गुणवान् अर पर्यायवान् है ॥ गुणपर्यायविना द्रव्यनही ।। द्रव्य
अनेकपरणतिरूप अनेकपर्यायरूपहोतेहूं गुणकाअभाव नहींहोयहें, तातै गुणकास
मुदायही द्रव्यहें ॥अर समयसमय जो परिणतिहोयहै सोही द्रव्यमैपर्यायहै, सो पर्या
य रहित किसीकालमै नही ॥३८॥ सूत्र ॥कालश्च॥३९॥ अर्थ ॥ कालभी द्रव्यहै गुण
पर्यायवान्हे॥३९॥ सूत्र। सोनतसमयः॥४०॥ अर्थ । कालजो है सो अनतहै समय
जाका ऐसाह॥४०॥सूत्र ॥ द्रव्याश्रयानिरीणागुणा ॥४१॥अर्थ ॥ जिनका द्रव्यको आ
अय अर आपअन्यगुणते रहित ते गुण हैं। इससूत्र में गुणकालक्षणकह्या ।। गुण हैते
द्रव्यसूं तन्मय है, तातै द्रव्यकैआश्रयकह्या अर गुणमैअन्यगुण नाही, तति निर्गुण कहै
॥४१॥ सूत्र ॥ तद्भाव परिणाम ॥४२॥अद्रिव्य जिसस्वरूपते परिणमै ताकौतद्भाव
कहिये, तद्भाव है सो परिणाम है॥४२॥इतितत्वार्थाधिगमेमोक्षशास्त्रेपचमोध्याय ॥५॥
- परमाण्ई दोयको आदिलेय अनेकरूक्षपरमाएको तथा मिग्षणकेपरमा बंधे है ॥ ३४॥ सूत्र ॥ गुणसाम्यसदृशानां ॥३५॥ अर्थ ॥ गणते सखयोलमा । सरसहोय तिनकैहूंबंध नहींहोय ॥ दोयगण स्निग्धकेधारकपरमापके पार गण धारकपरमापक संघ नहीहोय ॥ तथा तीन प्यार पाच संस्पात तगण जे भविमगपरिच्छेद समानहोप तिनके धंध नाहीहोय । सो कौनके सो सूत्रको हैं ॥३५॥ सूत्र । यषिकादिगणानात् ॥३६॥ अर्यक पअधिक होय, एकमै छोपाणपटतीहोय, सिनसंघ पो। भरपारम्पत्रिग्यता वास्तारोप.सो निगमकैया रक्षके,पाषाणसिग्पनाको विपरम्सले सम्पत्रिमणपरमा रुक्षपरमाणका सचिकणहोयहें । ये रुक्षपणाकै तथा सचिकणताकै अविमागपरि त् इत्यादि अनेकधर्मात्मक (गुणात्मक) वस्तुकहनेमै येकातीके विरोधादि अष्ट दूपए दिखाये सो जानलेना ॥ ३२॥ सूत्र ।। निग्धरूक्षत्वावधः ॥ ३३ ॥ अर्थ ॥ पुद्गलपरमापक सचिकणपणाते तथा रूखापणातै परस्परबंधहोयहै । पुद्रलपरमाणमै सचिकणपणा तथा दुखापणा सदावतेहैं । किसीपरमाणमै सचिकनपणाका एक अविभागपरिच्छेदहै, किसीमै दोय किसीमैतीन च्यार संख्यात असंख्यात अ नंतताई अविभागपरिच्छेद हैं ।। अर समयसमय पट्टणी हानीटचीरूप सचिकण गुण तथा रूक्षगुण निरतर घटै वधै हैं। ऐसे सचिकणपरमाएका रूक्षहोय हैं अर च्छेदके निमित्तते, एक परमाणु तथा द्वाणकादि स्ककै परस्पर बंधहोय है ॥३३॥ सूत्र ॥ नजघन्यगुणानां ॥ ३४॥ अर्थे । जघन्यगुणकेधारक परमाणहै तिनकैबंध नहींहोय॥ जिसपरमाणमे रूक्षपणाका वा सचिकणपणाका एकअविमाग परिच्छे द रहिजाय सो बधकोप्राप्त नहींहोय है ॥ जो एकगुणनिग्धहोय तिसपरमाएको एकगुणस्निग्धपरमापते तथा दोयगुणस्निग्धतै तथा संख्यात असख्यात अनतति ग्धते वध नहींहोयह ॥ तैसेही येकगुणक्षिग्धपरमायुको एकरणरुक्षपरमाएतै तथा संख्यात असख्यात अनतरणरुक्षपरमापतै वध नहीहोय, ।। ऐसे ही एकगुणरूक्ष
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। सो अष्टदूषण दिखावे हैं।
। " एकवस्तुमै सत्असत् दोऊ विरोधीधर्म (गुण) कहनेते विरोधदूषण लगेगा..
१ एकवस्तुमै सत् असत् दोऊका एकआधार कैसेंहोय तति वे अधिकार
१ सत्, असत्के आश्रयकहियेतो पहलेअसतहोय तव सत्केमामय
असत्को सत्केआश्रयकहियेतो, पहलै सतनाही ऐसे दोसका अभावरूप
राभय दूषण हैं
१ सत् फाहेकरिहै, तहाँक्दै मसत्कार, फेरको असत् महकारित
दि ऐसें इंटरना नाहीहोप ताते मनाल्यावर
सदमे मसम्मिले असतमै सम्मिले
सस्ते मस
भर मसतते
उनकाभेदहोय अन्यस्कयते मिलनेते नेत्रगोचरहोय हैं ॥ २८॥ सूत्र॥ सद्गव्यलक्ष ण ॥२९॥ अर्थ ॥ द्रव्यका लक्षण सत् हैं जो सत्रूपहै सो द्रव्य है ॥२९॥ सूत्र ॥ उत्पादव्ययधौव्ययुक्तसत् ॥३०॥अर्थ ॥ अपने जातीको नहिछोडते, जे चेतन अर अचेतनद्रव्यके निमित्तते, एकपरणति छोडि, अन्यपरणतीको प्राप्तहोना सो उत्पाद हैं ॥ अर पूर्वपरणतीका अभावहोना सो व्यय हैं नाश है ॥ अर पूर्वपरणतीका नाश अर उत्तरपरणतीका ग्रहणहोतेहूं अपनेजातीको नहीछोडना सो धौव्य है । उदाहरण जैसे महीके पिंडका घट करना सो उत्पाद हैं।अर पिंडपर्यायका अभाव सो व्यय हैं। अर पिंडपर्यायमै तथा घटपर्यायमै माटिका अभाव नहीहोना सो ध्रौव्य हैं।उत्पाद १ व्यय १ ध्रौव्य १ ऐसें तीनपरणती जामैहोय सो सत्कहावैहे अर सत्है सो द्रव्यहे, ॥३०॥ सूत्र ॥ तनावाव्ययनित्य ॥३१॥ अर्थ॥जो पहलैसमयमैहोय सोही दुजै समयमैहोय ताकी तद्भावकहिये ॥ तद्भावका नाशनहींहोना सोही नित्य हैं ॥ ३१॥ सूत्र॥अर्पितानर्पितसिडे ॥३२॥ अर्थ ॥जाको मुख्य करिये सो अर्पित है ॥ जाको गौन करिये सो अनर्पित है।सो ये दोऊ नयकरि अनेक गुणस्वरूपी वस्तुका कहना सिद्धहोयहें। अनेकगुणात्मकवस्तु कहनेमै एकातीको विरोधादि अष्टदूषण आवै है।
स्वमावतहीं होयहै। जैसे मेघपटलादिक क्रियाको कालका उपकार हैं। बहुतकालजा मै लगे सो परत्व अर अल्पकालजामलगै सो अपरत्व सो समस्त कालद्रव्यका उप कारहें ॥ २२॥ सूत्र ॥ स्पर्शरसगंधवर्णवंत पुद्गला ॥ २३॥अर्थ ॥ स्पर्श १ रस १ गध १ वर्ण १ ये च्यारगुण पुद्गलद्रव्यके है। स्पर्श रसगंध वर्ण ये च्यारगुणज्याकहो य सो पुद्गल हैं ॥ २३॥ सूत्र ॥ शब्दबघसोक्षम्यस्थौल्यसंस्थानमेदतमच्छायातपोद्यो तवतश्च ॥२४॥ अर्थ ॥ शब्दबंध सूक्ष्मपणा स्थूलपणा संस्थानभेद अंधकार छाया आताप उद्योत इनि अष्टपर्यायकरिसहित पुद्गलद्रव्य हैं । ये शब्दबंधादिक समस्त पुद्गलकेपर्याय हैं ॥२४॥ सूत्र ॥ अणवस्कघाश्च ॥२५॥ अर्थ।अणुअरस्कध येही पुद्ग लद्रव्यके पर्याय हैं ॥२५॥ सूत्र । मेदसंघातेभ्यः उत्पद्यते ।। २६॥ अर्थ ।। युगल केस्कद सघाततैउपजे हैं ॥ वाह्य अभ्यंतर निमित्तते स्कदविदारैजाय सो भेद हैं। अर जे भिन्नभिन्नथे तिनका येकहोना सो संघात है।॥ २६ ॥ सूत्र ॥ भेदादणु ॥ ॥ २७॥ अर्थ ॥ परमाणु हैते मेदहीत होयहें संघाततै नहींहोय ॥ २७ ॥ सूत्र ।। भेदसघाताश्याचाक्षुष ॥ २८॥ अर्थ ॥ स्कंध हैते अनतानत परमापके समुदायतै होयहें । तिनम केइस्कप नेत्रतै ग्रहणमैआवैहे ते चाक्षुष हैं । अर केतेकस्कंध नेत्रते ग्रहणभैनहीआवै ते अथक्षुष हैं। परंतु फेतेक स्कंध, सूक्ष्म परिणामते नहीं है, तपापि सूत्र ॥ सुखदु खजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥ २० ॥अर्थे।सुख दुख जीवन मर उपकार जीवअरपुद्गलद्रव्यौहे सोधर्मद्रव्यअरअधर्मद्रव्यका ॥जीवद्रव्यअरपुनलद्र व्य एकक्षेत्रतै अन्यक्षेत्रमैगमनकरै तहा वाह्यसहकारी कारण धर्मद्रव्यहें ॥ अर स्थि तिकरते वाह्यसहकारी कारण अधर्मद्रव्य हैं ॥ १७॥ सूत्र ॥ आकाशस्यावगाह ॥ ॥ १८॥अर्थ ॥ सर्वद्रव्यको अवगाहदेना यो आकाशद्रव्यका उपकार हैं ॥१८॥ सूत्र ॥ शरीरवाशन प्राणापाना पुद्गलानां ॥ १९॥ अर्थ ॥ शरीर वचन मन प्राणकहियेउछास अपानकहिये निःश्वास ये पुद्गलद्रव्यकृत जीवकै उपकार हैं ॥१९॥ ण येमी उपकार पुद्गलके किये जीवको होय हैं ॥२०॥सूत्र ॥ परस्परोपग्रहोजीवाना ॥२१॥ अर्थ ॥ जीव जीवको परस्परभी उपकार करै हैं ॥ २१॥ सूत्र ।। वर्तनापरि णामक्रियापरत्वापरत्वेचकालस्य ॥ २२॥ अर्थ ॥ समस्तद्रव्य अपने पर्यायकी र चनाको अपना स्वभावसेही वर्तना है तिस वर्तनाको बाह्यनिमित्त कालद्रव्य हैं। द्र व्य अपने एकपर्यायको छोडि अन्यपर्यायको प्राप्तहोना सो परिणाम हैं। जैसे जीव को क्रोधादिपरिणाम, पुद्गलके वर्णआदिकगुण, धर्मअधर्मके स्थिति गमन गुण, अर आकाशकै अगुरु लघु गुण, इनकी हानिरद्धिरूप होना सो परिणामहें । बहुरि एकक्षेत्रतै अन्यक्षत्रमै चलनेरूपक्रिया सो परके प्रयोगते हु होयहै अर अपने -- अनंतप्रदेशहें ॥९॥ सूत्र ॥ संख्येयासंख्येयाचपुगलाना ॥१०॥अर्य, देश संख्यात, असंख्यातमीहें अर पशब्दकार अनेतप्रदेशहीहैं। सूत्र णो ॥१॥ अर्थ॥ परमाप्प (आप) के बहुत प्रदेश नही येकप्रदेशहहै। लोकाकाशेवगाह ॥१२॥ अर्थ। ये कहे जे धर्म अधर्मादिस्य ते लोकाशके बाहेरनहीहै। अलोककाशमै एफआचशमाहीहे ॥१२स सूत्र धर्मयोहरो ॥१३॥अर्थ धर्मद्रव्य भर अधर्मद्रव्य इनन्न मैहै जैसे तिलवितेल सर्वम्याप्तहे तैसें खेधकाशके समस्तक्षत्रने द्रव्य ति। १३॥ सूत्र । एक द्रव्यच अवगाह लोकाशके एकप्रदेशले समान प10 ॥अथतत्वार्थसूत्रपचममध्यायप्रारंभः ॥सूत्र ॥ अजीवकायाधर्माधर्माकाशपुद्गला ॥ ॥१॥ अर्थ ॥ धर्मद्रव्य १ अधर्मद्रव्य १ आकाशद्रव्य १ पुद्गलद्रव्य १ ये च्यारद्रव्य चेतनारहितहे तातेंअजीवहें अर वहुप्रदेशीहैं ताते काय हैं ॥१॥ सूत्र ।। द्रव्याणि ॥२॥अर्थ ॥ ये कहे जे धर्म अधर्म आकाश काल इनके द्रव्यसंज्ञा हैं॥जे अपने गुण अर पर्यायरूप समयसमयपरिणमै ते द्रव्य हैं ॥२॥सूत्र ॥जीवाश्च ॥३॥ ॥अर्थ ॥ जीवमी द्रव्यहै ॥३॥ सूत्र ॥ नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥४॥ अर्थ ।। जीव, धर्म, अधर्म, आकाश, काल, ये पांचद्रव्य नित्यकहिये अविनासीहैं। अर अवस्थित कहिये अपनेद्रव्यस्वभावको छोडेनही । अर अरूपीकहिये अमूर्तीक है ॥४॥ सूत्र ॥ रूपिण पुद्गलाः ॥५॥ अर्थ ॥षद्रव्यमै पुद्गलद्रव्य रूपीहे दीखैहै और द्रव्य अ रूपीहें ॥ ५॥ सूत्र ॥ आआकाशादेकद्रव्याणि ॥६॥ अर्थ ॥धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य अर आकाशद्रव्य ये तीनद्रव्य एकएकही वहुत नहीहैं॥६॥ सूत्र ॥ नि किगणि च ॥७॥ अर्थ ॥ धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य आकाशद्रव्य ये तीनद्रव्य नि क्रिय है।अप नेस्थानते कदाचित् चलायमान नहीहोय ॥७॥ सूत्र ॥ असंख्येया प्रदेशा धर्मा धर्मकजीवाना ॥८॥ अर्थ ॥ धर्मद्रव्यके अर अधर्मद्रव्यके एकजीवद्रव्यकेवराबर असंख्यातप्रदेश हैं ॥ ८॥ सूत्र ॥ आकाशस्यानता ॥९॥अर्थ ॥ आकाशद्रव्यके
ल्योपममधिक ॥ ३३ ॥ अर्थ ॥ सौधर्मस्वर्ग अर ईशानस्वर्गके देवर
आयु एकपल्यतैकहअधिक है ॥ ३३॥ सूत्र ॥ परत परत पूर्वापूर्वनवसः॥३४
॥ अर्थ॥ सौधर्म ईशान ये दोयस्वर्गमै जोउत्कृष्ठआयुहे सो मागेपुल
जघन्यमायुहै। ऐसेहीआगेआगैजाननां ॥ ३४॥ सूत्र ॥
॥३५॥ अर्थ ॥ नारकीके पहलेनरकमै जोउलष्टमारह नित
म्पमायहे । दुसरेनरकमै उत्कृष्ट सो तिसरानरकम जघन्य । ऐसें जानना।
" सूत्र ॥ दशवर्षसहस्रामिप्रयमा ॥३६॥ अर्थ प्रपन्ना
बाजारवर्षका ॥३६॥ सत्रमा
५.३७५
पायापु वश्वजारवर्षको ३७ पत्र।
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अधिक॥२९॥ अर्थ । सौधर्मस्वर्गअर ईशानस्वर्गके देवका उत्कृष्ट आयु दोयसागरक छुअधिकहे ॥२९॥ सूत्र ॥ सनत्कुमारमाहेद्रयो सप्त ॥३०॥ अर्थ ॥ सनत्कुमार स्वर्ग माहें स्वर्गके देवका आयु सप्त सागर” कछअधिकहें ॥ ३०॥ सूत्र ॥ त्रिस तनवैकादशत्रयोदशपचदशभिरधिकानितु ॥३१॥ अर्थ॥ ब्रह्मस्वर्ग ब्रह्मोत्तरस्वर्गके देवकाआयु दशसागरतें कछुअधिकहें। लातवस्वर्ग कापिष्टस्वर्गकेदेवकाआयु चतुर्द श सागरतेकछुअधिकहें । शुक्रवर्ग महाशुक्रस्वर्गकेदेवकाआयु शोडशसागरतेकछु अधिकहें ॥ शैतारस्वर्ग सहस्रारस्वर्गकेदेवकाआयुअष्टादशसागरतेंकछुअधिकहें ॥ आणतस्वर्गप्राणतस्वर्ग देवकाआयुवीससागरतेंकछुअधिकहें। आरणस्वर्ग अच्युत स्वर्गकेदेवकाआयु वावीससागरतेंकछुअधिकहें ॥ ३१॥ सूत्र ॥ आरणाच्युतादूर्द्धमे केकेननवसुवेयके विजयादिपुसर्वार्थसिद्दीच ॥३२॥ अर्थ ॥ सोलास्वर्गकेऊपर ९वेयक हैं तहाके देवकाआयु एकएकवेयकमै, एकएकसागरवधतांआयुह ॥२३॥ २४।२५।२६।२७।२८।२९।३०।३१ नवमात्रैवेयककेदेवकाआयु इकतीससागरकाहे ॥ नवअनुदिशविमानम देवकाआयु वत्तीससागरकाहे ॥अर विजय वैजयंत जयत अप राजित ये चारविमानमै देवकाआयु तेतीससागरकाहें ॥ अर सर्वार्थसिद्धिविर्षे उत्कृ एआयु तेतीससागरका, सर्वार्थसिद्धिजघन्यआयुनहीं] ॥ ३२॥ सूत्र ॥ पराप - पर्वत कल्पसंज्ञाहें ॥२३॥ सूत्र ॥ ब्रह्मलोकालयालोकांतिकाः॥२४॥ ममलोक जो पांचमास्वर्ग तहां सैकातिकदेवका स्थान ।२४॥ स्यवन्यरुमगर्दतोयतुषिताव्यायाधारिष्टाश्च ॥२५॥ अर्थ ॥ प्रकारहे सो कहे ।। सारस्वत । आदित्य १ पनि अरुण गईतीय अव्यावाच ! अरिष्ट १ इनमे अवांतर और मनेकप्रकायें, रीनता सर्वसमानरें।येसम देवगिरावणंगलेचार सुंचकर मनुष्यहोय निर्वाणही ॥ मन्यमब नहीमा २५७ विहिवरमा २६॥अर्थ विजय मान इनकदवमतुष्पकवापनाकरन म्यायोतिरोन,१०० १९१mअगसौधमईशान(सनत्कुमाराशिमाहंद्राब्रह्मा ब्रह्मात्ताप लांतव कापिष्ट॥१॥शुक्राा। महाशुक्राशता|शासहस्रार ||॥आणत ॥१॥ प्राणता आरण||||अच्युतायो|सोलास्वर्गही॥सोलास्वर्गकेऊपरा।नवविमानायै वेयक होतिनकेऊपराअनुदिशिविमान नवहाँ। तिनकेऊपर॥अनुत्तरविमानपाचहें॥॥ ऐसवैमानिकादेवलोकहें।॥१९॥सुत्रा स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धींद्रि यावधिविपयतोधिका:२०अर्थागस्वर्गवासी॥वैमानिकदेवकी। पटल|| पटल प्रतिआयुवतीहैं।॥ ॥सापानुग्रहाशक्तिरूप॥प्रभाव॥अधिकााहे॥॥॥इद्रियकै विपयका सुखअधिकहें॥॥॥शरीरा॥ वस्त्र॥आमरणादिककी॥ कांतिअधिकाहीं। ॥ लेश्याकीउजलताअधिकहैं। इद्रियकाविषयजाननेक शक्तिअधिकहाअवधिज्ञान काविषयाअधिक.।।२०॥ सूत्रमगतिशरीरपरिग्रहाभिमानतोहीना ॥२१॥अर्थ ॥ वैमानिकदेवानीचेकेदेवनीतीऊपरकेदेवापटलापटलप्रती अन्यक्षेत्रमैगमनार शरी रकीऊचताअपिहिग्रहकाअभिमानायो घटतीघटतीहीum२१सूत्र पीतपद्मशु छलेश्याद्वित्रिशेपेषु ॥२२॥ अर्थ । स्वर्गकोदोययुगलकाच्यारस्वर्गमापीतलेश्याहैं अरातीनयुगलको छहस्वर्गमा पद्मलेश्याहाशेप रहौतिनमौशुकलेश्याह||२२|| सूत्रा प्राग्वेयकेन्य कल्प ।।२३।अर्थाmपहिला सौधर्मस्वर्गसौ|सोलमास्व णाकरहें। मेरुको ग्यारासैदकवीसजोजन छोरकै विचरे, शाम्पतागमनकरों। लोक जो अढाईडीप अर दोयसमुत्रमै पंचप्रकारके ज्योतिषीदेवहें मेरुके क्षिणाकरहें ॥ १३ ॥ सूत्र ॥ तत्कृत कालविभागः॥१२॥अर्य। मनकर, तास कालकाविभागमया ॥काल ॥१२॥ स्थिता ॥ १५॥ अर्य। मनुष्यलोकके बारे नहीकरै जहाँतहास्पिरहें अवस्थितहें। १५५ ज्योतिषीदेवकै रुपर स्वगहें तहां मानिको सीतब।१७॥अर्य।बैमासिक, स्पातीत । सोलास्वर्गदेवमै छाविक दे। भर सोडावर्गके उपर रमाआणतस्वर्ग चौदमाप्राणतस्वर्गपद्रमाारणस्वर्ग सोलमाअच्युतत्वर्ग येच्यारस्व र्गके देवदेवांगनाका मनमेचिंतवन करनेतेही कामकी तप्तहोय.।।८॥सूत्र।परेप्रवीचा रा ॥९॥अर्था।सोलास्वर्गके ऊपरके समस्त अहमिंद्रदेवकै कामवेदनाका लेशहीनहीहै। ताते अप्रवीचारहे मैयुनरहित हैं ॥९॥सूत्रा। भवनवासिनोसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवात स्तनितोदधिद्वीपदिकुमारा ॥१०॥अर्थामवनवासीदेवमै दशप्रकार, सो कईहै। सुरकुमार १ नागकुमार १ विद्युतकुमार १ सुपर्णकुमार १ अग्निकुमार १ वातकुमार १ स्तनितकुमार उदधिकुमार १ दीपकुमार दिकुमार१ये दशप्रकारके भवनवासीदेवहैं। तिनका वेपभूषण आयुध वाहनगमनक्रीडनइत्यादि कुमारवत्।।तति तिनकैकुमारस ज्ञाहै।।१०॥ सूत्र ।। व्यतरा किंनरकिंपुरुषमहोरगगधर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचा ॥११॥ ॥अर्थ॥ व्यतरदेवमै अष्टप्रकार,सोकहेहे ॥ किंनर १ किंपुरुष १ महोरग १ गधर्च १ यक्ष १ राक्षस १ भूत १ पिशाच १ ये अष्टप्रकारके व्यतरदेवहें सो नानादेशनी मै निवासकरनेवाले गमनकरनेवाले व्यतरहें ।। ११॥ सूत्र । ज्योतिषका सूर्याचद्रम सौग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥ १२॥ अर्थ ॥ ज्योतिष्कदेवमें पचप्रकारहँसोकहै ॥ सूर्य १ चद्र १ ग्रह १ नक्षत्र १ तारा १॥ १२॥ सूत्र ।। मेरुप्रदक्षिणानित्य गतयोनलोके ॥ १३॥ अर्थ ॥ ये पचप्रकारके ज्योतिपीदेव, सो मेरुकैनित्यप्रदक्षि मात्मरक्षकदेवहे ? अर द्वारपालसमान जे देवहें सो लोकपालदेव ॥१॥से मानदेवहें ते आनीकदेवहे॥१॥जे देव नगरनिवासी प्रजाकेसमानसो देवहें ॥१॥जे देव वाहनादिककर्ममें प्रवर्तनेवाले] सो अमियोपदेवमें बालादिसमान, इंद्रकीसभामे नप्रवेशकरनेवाले सो कित्विषिदेवा। देवमै दशप्रकार॥४॥ सत्रापसिंशोकपालपाध्यंतरज्योतिकाः । अर्थ ॥ध्यंतरदेव अर ज्योतिषिदेवमै प्रायविंशत् अर लोकपालदेव नहीं सूत्र : पूर्वयोबा ॥६॥ अर्थ । भवनवासीदेव मरम्मतरवासीदेवलम कड६॥ सुत्रमयप्रकीरामनाद ॥७॥अर्स स्वासीदेव म्योतिषीदेव सोधर्मस्वर्ग भरपनामदेव ॥७॥सूम कर ॥ अथतत्वार्थसूत्रचतुर्थअध्यायप्रारंम ॥ सूत्र ॥ देवाश्चतुर्निकाया ॥१॥अर्था देवके॥च्यार प्रकार हैं। सूत्रआदितत्रिपुपीतांतर्लेश्याअर्थ ॥ भवनवासीदेव,व्यतरदेवा ज्योतिषीदेव, इनातीनकायमा कृष्ण, नीलकापोता पीतापर्यंताच्याराही लेश्याही॥२॥सूत्र॥॥॥दशाप्टपचद्वादशविकल्पा कल्पोपपन्नप यंता॥ ॥३॥॥॥अर्थभवनवासीदेव।।दशाप्रकाराहाव्यतरदेवमै|अष्टप्रकार हiunाल्योतिपीदेव|पंचप्रकार, कल्पवासीकहियेस्वर्गवासीदेवमीबाराप्रकारह।।।। mसुनाइद्रसामानिकत्रायस्त्रिंशत्पारिपदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्णकाभि योग्यकिल्विपिकाश्चैकश-४अर्थादेवमैदशप्रकारहासोकही।इद्रदेवः | समानिकदेवाशनायस्त्रिंशत्देवाशापारिषददेवताआत्मरक्षकदेवालोकपालदेवा।। अनीकदेवा शप्रकीर्णकदेवाअभियोग्यदेवाकिल्विपदेवापऐसे दशाभेदही समस्त देवऊपरमजाकीआज्ञा हुकुमहोयासोइद्रहों।ammailदेवकीस्थानआयुशक्ती, मोग, उपभोगापरिवारा इत्यादिक इद्रकेसमानहोयापरंतु।आज्ञा ऐश्वर्यइद्रकेसमाननहींहोय ऐसादेव,।इद्रकेपितासमान गुरूसमानाउपाध्यायसमानाह।सोसामानिकदेवह ॥m जोदेवामत्रीसमानापुरोहितसमानही सोत्रायविंशत्देवहीmamसभामैवैठनेवाले जोदेवाहीसोपारिपददेवहें।maunजोदेवाशस्त्रधारनकरनेवाले।सुभटसमानहै।।सो सरा ॥३०॥ अर्थ॥ उत्तरकेक्षेत्र हैरण्यवत,रम्यक, उत्सरकरु, इनमै उपजे घआयु एकपल्य, दोयपल्य, तीनपल्य, प्रमाणहें ॥३०॥ सूत्र। ला ॥३॥ अर्थ ॥ विदेहक्षेत्रविष मनुष्यका संख्यातकालका आयुहे । भरतस्याविष्कमोजमहीपस्य नवतिशतभाग ॥३२॥अर्थ॥जपूरीपका मागकरना उसीमै एक भागप्रमाणभरतक्षेत्रहै ॥३२॥ सूत्र। अर्थ ॥धातकीडीपमै भरतादिकक्षेत्र दोपदोयहैं ॥ ३॥ अर्थ पुष्करीपका मर्षमागमैमी मरतादिकक्षेत्र १३१५ समस्या ३५० अर्थ।मानुपोचर पर्वतताईही मन त्रमै मनुष्य नाही ॥३५॥सूत्र। दोपत्रकारकेम रक्तानदीकै अर रक्तोदानदीकै चौदह चौदहहजार नदीकापरिवारहें ॥२३॥ सूत्र ॥ भरतःपड्विंशतिपचयोजनशतविस्तार षट्चैकोनविंशतिमागायोजनस्य ॥२४॥अर्थ॥ भरतक्षेत्रका दक्षणउत्तरविस्तार पाचसैलबीसयोजन अर छहकलाहै ॥२४॥सूत्रातद्वि गुणद्विगुणविस्तारा वर्पधरवर्षाविदेहाता ॥२५॥अर्थ॥ भरतक्षेत्रतै द्विगुणविस्तार हि मवन्पर्वतका अर हिमवन्पर्वततै हिमवनक्षेत्रका दूनाविस्तारहें ॥ ऐसें विदेहपर्यंत पर्वत अर क्षेत्रकाविस्तार दूना दूना ॥ २५॥ सूत्र । उत्तरादक्षिणतुल्य ॥२६॥ अर्थ विदेहतैपरै उत्तरदिशाके पर्वत क्षेत्र नदी द्रह कमलादिकहेसो॥दक्षिणदिशाके भरता दिकक्षेत्र अर हिमवन्आदिकपर्वतके समान हैं।२६॥सूत्र। भरतैरावतयोर्टचिन्हासौ पट्समयाभ्यामुत्सर्पिणवसर्पिणीभ्या॥२७॥अर्थ भरतअरऐरावतक्षेत्रमै उत्सर्पिणी अवसर्पिणी कालकेनिमित्तकरि मनुष्यअरतियचका आयु कायादिक घटेंहें वा बढे हैं। १२णासूत्र॥ ताभ्यामपराभूमयोवस्थिता ॥२८॥अर्थाभरतक्षेत्रअरऐरावतक्षेत्रतै अ न्यक्षेत्रकीभुमी अवस्थितहै,तहा कालकरि घटति वधति नहींहैं ॥२८॥ सूत्र ॥ एक द्वित्रिपल्योपमस्थितयोहैमवतकहारिवर्पकदेवकुरुषका ॥ २९॥ अर्थ ।। हिमवनक्षेत्र मै उपजै मनुष्यनिकाआयु एकपल्यका प्रमाणहै। हरिक्षेत्रमै मनुष्यकाआयू दोय पल्य का प्रमाणहें ।। देवकुरूमै उपजै मनुष्यकाआयु तीनपल्यका ॥ २९॥ सूत्र ॥ तथो सभानिवासीनी देवकरियुक्त वसॆहे॥१९॥ सूत्र ॥गगासिंधुरोहिद्रोहितास्याहरिवरिया तासीतासीतोदानारीनरकातासुवर्णरूप्यकुलारक्तारक्तोदासरितस्तन्मध्यगा ॥ ॥ अर्थ ॥ ये सप्तक्षेत्रकेमध्य गमनकरनेवाली चतुर्दश नदीहैं ॥ गंगा १ सिंह ३ रोहितास्या ४ हरित् ५ हरिकांता ६ सीता ७ सीतोदा ८ नारी ९ नरकातो सुवर्णकूला ११ रूप्यकला १२ रक्ता १३ रक्तोदा १४॥ ये चौदामहानदी हैं । सूत्र ॥ द्वयोर्डयो पूर्वा पूर्वमा २१ ॥ अर्थ ॥ चतुर्दशनदीमे, दोपदोपनदीम.. प्रथमनदीकही सो पूर्वसमुद्रमै गमनकरनेवाली है ॥२१॥ सूत्र ॥ शेतातल्या ॥२२॥ अर्थ ॥ दोयदोयनदीमै पीनदीकही सो पा पालीहे ॥ २२ ॥ सूत्र ॥ अर्थ॥गंगानदीमरसिंधूनही १ अर मध्यमै ।। भीतकेसमान चौडेहैं ॥ १३॥ सूत्र ॥ पद्ममहापद्मतिगंलकेशरिमहा पुडरीकपुटरीका हृदास्तेपासुपरि॥१४॥अर्थ । हिमवनादि छहपर्वतकेऊपर छ हसरोवर हैं । तिनकेनाम कहें।। पद्मसरोवर १ महापद्मसरोवर १ तिगिछसरोवर १ केशरीसरोवर १ पुडरीकसरोवर १ महापुडरीकसरोवर १ ये छह हद (ब्रह) जलके भरेहे ॥ १४॥ सूत्र ॥ प्रथमोयोजनसहस्रायामस्तदईविष्कभोन्हद ॥ १५॥ अर्थ पद्मनामका प्रथमद्रह पूर्वपश्चिम हजारयोजनलबाहै अरदक्षिणउत्तर पाचसैयोजन चौडाहैं । वबमय तल है नानामणिसुवर्णकरि विचित्रतटहै ॥ १५॥ सूत्र ॥ दशयो जनावगाह ॥१६॥ अर्थ ॥ पद्मनामका प्रथमद्रह दसयोजन उडा (खोल) है ॥१६॥ ॥ सूत्र ॥ तन्मध्येयोजनपुष्कर ।। १७॥अर्थ ॥ पद्मनामनहविर्षे एकयोजनका कम ल है ॥ १७॥ सूत्र ॥ तद्विगुणद्विगुणाहदा पुष्कराणिच ॥ १८॥ अर्थ ॥ द्वितीयम हापद्मद्रहकी लवाईचौडाईउडाईकाप्रमाण पद्मद्रहते दूना, अर महापद्मद्रहकाप्रमा णते तिगिछद्रहकाप्रमाण दूना॥ ऐसेही कमलकाप्रमाण दूनाहें ॥१८॥सूत्र तन्नि वासिन्योदेव्य श्रीन्हीतिकीर्तिबुदिलक्ष्म्य पल्योपमस्थित्तय ससामानिकपरिपत्का ॥१९॥ अर्थ।वो कमलनीमै वसनेवाली छहदेवीहै ॥ श्रीदेवी हीदेवी धृतिदेवी की तिदेवी बुदिदेवी लक्ष्मीदेवी ।। येछह भवनवासिनी देवी, ते अपने सामानीकदेव अर
जनकाचौटा सूर्यमडलकेआकार गोल जाहीपहै ॥ अर जंजूदीपकैमभ्य मेरुपर्वतई।
मनुष्यकेशरीरके मध्यभागमै नाभिहे तैसा रहीपकेषिच मध्यमेरुपर्वतहै । सो मे
रुपर्वत मूलमै दसहजारयोजनका मोठाहें ॥९॥ सूत्र भरतहेमवतह
रण्यवतैरावतवर्षा क्षेत्राणि ॥१०॥ अर्थ ॥ भरत हेमवत २हरि
१ रम्यक ५ हेरण्यवत ६ ऐरावत ७ ये सप्तक्षेत्र जमूहीपमे ॥१०॥सूत्र
भाजिन पूर्वापरायताहिमवनमहादिमनमिषधनीलरूस्मिाधि
॥१॥अर्थ। ये सप्तक्षेत्रके मागकरनेवाले हपर्वत
या वर्षयरपर्वतही कहते हैं। उसीकानाम । हिमवानपर्वत
पपर्वत, नीलपर्वत, रुक्मिपर्वत, शिखरीपनाये
पूर्वपम्पिमतले पछे। सूब
अर्ष
राय दु खउपजाहें तिसरानरकपर्यंतहीअसुरकुमारदेवजाय आगैनहीजाया।५।।सूत्र। तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमासत्वानापरास्थिति ॥६॥ ॥अर्थ ॥ नरककी सप्तप्टथ्वीविष नारकीजीवका उत्कृष्टआयु कहें । पहिलानरकमै एकसागर ।। दुसरानरकमै तीनसागर ॥ तिसरानरकमै सप्तसागर॥चौथानरकमै दश सागर॥पाचवानरकमै सत्रहसागर॥छछानरकमै बाईससागर॥सातमानरकमै तेती ससागरहै। ऐसा प्रमाण अनुक्रमतेहैं। [अब जघन्य आयुकहें।पहिलानरकमै दश हजारवर्प ॥ दुसरानरकमै एकसागर ॥ तीसरानरकमै तीनसागर ॥ चौथानरकम सा तसागर ॥ पाचमानरकमै दससागर ॥छद्यानरक सत्रहसागर॥सातमानरकमै बाई ससागरहै ]॥६॥ सूत्र ॥जदीपलवणोदादय शुमनामानोद्वीपसमुद्रा ॥ ७ ॥ अर्थ ॥ मध्यलोकमें जबूढीपादिकहीप अर लवणोदादिकसमुद्र शुभनामकेधार क ऐसे असख्यातहीप अर असख्यातसमुद्रहैं ॥७॥ सूत्र ॥ द्विििर्वष्कमा पूर्वपूर्वपरि क्षेपिणोवलयाकृतय ॥८॥ अर्यु॥ ये द्वीपअरसमुद्र दूनेद्वनेंहें ॥ द्वीपसे समुद्रदूना है। अर समुद्रसे द्वीपदूना ॥ द्वीपको समुद्रवेदैहें अर समुद्रको द्वीपवेढेहे ॥समस्त द्वीप अर समुद्र कणकेआकार गोलाकार हैं ॥८॥सूत्र ॥ तन्मध्येमेरुनाभिर्द्रतोयो जनशतसहस्रविप्कभोजबूद्वीप ॥९॥अर्थ ॥ समस्तद्वीपसमुद्रकैमध्य एकलक्षयो A ॥ अथतत्वार्यसूत्रसृतीयअध्यायप्रारंभ ॥ सूत्र ॥ रत्लशर्करावालुकापंकघूमतको महातम प्रभाभूमयोधनांबुवाताकाशप्रतिष्ठा सप्ताधोधा ॥१॥ अयं ॥ रत्नत्र मा शर्करप्रभा २ वालुकप्रभा ३ पंकप्रमा ४ धूमप्रभा ५ तमप्रमा प्रभा ७ ये सप्तभुमी नीचेनीघेअवस्थितहैं । भर घनोदधिपवन १ धनपयन पवन १ अर आकाश इनिकरि वेष्टितहें ॥१॥ सूत्र ॥ तासुत्रि चदशवशत्रिपंचोनेकनरकशतसहस्रामिपंचवयपाक्रम ॥२॥ अनुक्रमते चौरासीलास बिल में तीसलाम॥२ पंद्रहलाख ॥ १ में दशलाख ५ में वीनास ॥६ ॥७ में पांच॥ ऐसें सबमितिके पोरासमोर आहारकशरीर कोऊपदार्थते रुकैनाहि तातै अव्याघाति ॥४९॥ सूत्र ॥ नारकसन्मू छिनोनपुसकानि। अर्थ॥ नारकीजीवकै अर सन्मूर्छनजन्मवालेजीवकै नपुसकलिंग हीहोयहै और दोयलिंग नहींहोय ॥ ५० ॥ सूत्र॥नदेवा ॥ ५१ ॥अर्थ ॥ देवनी के नपुसकलिंग नहीहोयहै ॥५१॥ सूत्र ॥ शेषास्त्रिवेद ॥५२॥अर्थ ॥ शेषकहिये नारकी अर सन्मूछन अर देव इनिवीना कर्मभूमीके गर्भजमनुण्य अर गर्भजतिर्यंच इनीकै तीनौवेद होयह ॥ अर भोगभूमीके मनुष्य तथा तिर्यचनीकै पुरुपवेद अर स्त्रीवेद ये दोयवेदहीहैं ॥५२॥ सूत्र ॥ औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येयवायुपोनप वायुप ॥५३॥ अर्थ ॥ देव अर नारकी अर चरमोत्तमदेहकेधारि अर असख्या तवर्षके आयुकोधारि भोगभूमीकेमनुष्यअरतिर्यंच इनकाआयु विषशस्त्रादिकवाह्य निमित्ततॆनाहीछीदेहे ।। ५३ ॥ इतितत्वार्थाधिगमेमोक्षशास्त्रेद्वितीयोध्याय ॥२॥ १ सावनरककेनाम प्रमा, पना, मेपा, अंजना, अरिष्टा, मघवी, मापनी होयगा तहाताईरहेगा ॥४१॥ सूत्र ॥ सर्वस्य ॥४२॥ अर्थ । तैजस अरकार्माण के दोऊशरीर समस्तसंसारीजीवकेंहें ॥४२॥ सूत्र ॥ तदादीनिमाग्यानियुगपदेकस्मिना चतुर्म्य ॥ ४३ ॥ अर्थ॥ एकजीवकै एककालमें तैजस कार्माणाविलेप शरीराईहोयहैं । कोउफै तैजसशरीर अर कार्माणशरीर ऐसे दोय कोऊकै औदारिक, तेजस, कार्माण, ऐसेतीनशरीरहोयहें । तया कोजके तेजस, फार्माण, ऐसेंहूं तीनशरीरहोयहें ॥ ौटक भोपारिक, मारक कर्माण, ऐसेंच्यारशरीरहोयहें ॥१३॥ सूत्र । निरुपममोगल अंतकाजोकार्माणशरीर ताकै ईनिपटारे शब्दादिकविषयमीर सत्र ॥गर्भसन्मूलनजमार्य । मौचारिको १५॥ ।
देवनारकाणामुपपाद ॥३४॥ अर्थ ॥ देवकै अर नारकीनीकै उपपादजन्महे ॥३४॥ सुत्र ॥ शेपाणासन्मूर्छन ॥ ३५ ॥ अर्थ ॥ गर्भज अर उपपादविना उपजैहै ते सन्मूर्छन जन्म हैं ॥ ३५ ॥ सूत्र ॥ औदारिकर्वेक्रियकाहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ॥३६॥ अर्थ ।। औदारिक १ वैकियक १ आहारक १ तेजस १ कार्माण १ऐसें पचप्रकारके शरीर हैं ॥३६ ॥ सूत्र ॥ परंपरंसूक्ष्म ॥३७॥ अर्थ ॥ ये पचप्रकारके शरीर कहे सो एकतैएकसूक्ष्महे ॥ औदारिकतै वैक्रियकशरीरसूक्ष्म है । वैक्रियकशरीरतै आहारकशरीरसूक्ष्महै ॥ आहारकशरीरतै तैजसशरीरसूक्ष्महै ।अर तैजसशरीरतै कार्माणशरीरसूक्ष्महे ॥ ३७ ॥ सूत्र ॥ प्रदेशतोसख्येयगणंप्राक् तेजसात् ॥ ३८॥ अर्थ । औदारिकशरीरतै वैक्रियकशरीरके असख्यातराणे प्रदे शअधिक हैं अर वैक्रियकशरीरते आहारकशरीके असख्यातगुणे प्रदेशअधिकहें ॥३८॥ सूत्र ॥ अनतराणेपरे ॥ ३९॥ अर्थ ॥ आहारकशरीरते तैजसशरीरके अनतगुणे प्रदेशअधिक हैं । तैजसशरीरते कार्माणशरीरके अनतगुणे प्रदेशअधि क है ॥ ३९ ॥ सूत्र ॥ अप्रतीघाते ॥४०॥ अर्थ ॥ तैजसशरीर अर कार्माणशरीर समस्तत्रैलोक्यमे वनपटलादिकमेंहू नहीकहें ॥४०॥सूत्र॥अनादिसबधेच ॥४१॥ अर्थ । इसजीवकै तैजस अर कार्माणशरीरका सबध अनादिकालते. अर मुक्ती नही
आहार विग्रहगतीमें नहीं, तातै अनाहारक हैं । अन्यअवसरमै समस्तसंसारीजी
आहारक हीहैं ॥ अर कर्मवर्गनाकाग्रहण विग्रहगतीमैमीहें ॥ ३० ॥ सूत्र ॥स
मूर्छनगर्मोपपादाजन्म ॥३१॥ अर्थ ॥ त्रैलोक्यविषे ऊपर नीचे तिर्यक
प्रमैं नो (नवीन) पुलकाग्रहणकरि देहका उपजना सो सन्मूर्छन जन्म है।
स्त्रीकेउदरविषे माताकारुधिर पिताकावीर्यको ग्रहणकरि देहका उपजना सो
जम्मा॥भर देवनीके तयानारकीनीकै उपपादपाननीम फालम
उपपादजन्म हैं। ऐसें तीनप्रकारजन्म ॥३॥ मसूम।
तरामिमा पोनमः ॥ ३२॥अर्यसचिन
का मिश्र३ शीत १ उप ५शीसमोपीय
दोसामिम९ऐसेंनवप्रभारणास
पंक्तीरूपअधः पक्तीरूपतिर्यक् गमनकरै ॥ २६ ॥ सूत्र ।। अविग्रहाजीवस्य ॥२७॥ अर्थ ॥ कर्मरहितहोयकै जो जीव सिद्धालयकोजायहै ताकै कुटिलतार हित (सुधा) उर्द्धगमन हीहै ॥२७॥ सूत्र ॥ विग्रहवतीचसंसारिण प्राकचतुर्थ्य ॥२८॥ अर्थ ॥ संसारीजीव मरनकरि नवीनशरीर ग्रहनकरनेकैअर्थ गमनकरैहै। तहाकोउज्जीवती सूधाहीगमनकरि जायउपजैहै ॥ कोईएकमोडालेयजायउपजैहै ॥ कोईजीवकै दोयमोडालीये उपजना होयहैं, कोऊजीव तीनमोडालेयउपजेहै ।। चतु थेमोडालेयनहीं चतुर्थमोडालेनेयोग्य कोऊदूरलवाक्षेत्रही नहींहैं ॥ २८॥ सूत्र । एकसमयाविग्रह ॥ २९ ॥ अर्थ ॥ जो जीव मोडारहित सूधीगती योग्यक्षेत्रमै उपजै है ताकाकाल एकसमयकाहे ॥ २९ ॥ सूत्र ॥ एकद्वौत्रीन्वानाहारक ॥ ३०॥ ॥ अर्थ ॥ जो जीव सूधा जाय उपजैहै सो आहारकहे । अरजो एक मोडा कोलाटी उडी (गिरकी) लेय उपजेहे सो एकसमय अनाहारकहै, दूजैसमै आहारग्रहण करें। दोयमोडालेयकरि उपजै सो दोयसमय अनाहारक है, तीजेसमय आहारग्रहण करै। तीनमोडालेयउपजैसो तीनसमय अनाहारक है, चतुर्थसमय आहारग्रहण करे। इहा आहारका अर्थ ऐसासमजना, जो जीवमरनकरि दूसरे गतीमें उपजैतहा माता केगर्भमै पटपर्याप्तिकाग्रहण तथा योग्यपुद्गलका ग्रहणकारणा सो आहार हैं । सो
॥
श्रुतज्ञानहै
सोमनकाविषयहें
॥२१
॥
सुत्र
।
मोत्राणि ॥ १९ ॥ अर्थ ॥ स्पर्शन, रसन, प्राण, पशु, श्रोत्र,
॥ १९ ॥ सूत्र ॥ स्पर्शरसगघवर्णशम्दास्तदर्थाः ॥ २०॥ अर्ष ।
गंध, वर्ण, शम्द, ये पंचईद्रियनके पंचविषयहें ॥२०॥ सूत्र।।
॥२२॥ अर्थ॥ एप्वीकाय, जलकाय, अनिकाय, वायुकाय, वनस्पतिमा
प्रकारके स्थावरजीवकै एक स्पर्शन ईत्रिपडीहै । २२॥सूब।
अमरमतुष्पादीनामेकानि । २३ अर्ष मी
दोपईदिया। पिपीलिकादिकनिक
विकनीके
इद्री पचेंद्री ॥ ऐसें च्यार प्रकारके सह ॥ १४॥ सूत्र ॥ पंचेंद्रियाणि ॥ १५॥ र्थ ॥ इंद्रियपाचहीहैं ॥ १५ ॥ सुत्र ॥ द्विविधानि ॥ १६ ॥ अर्थ ॥ पांचूइद्रियमें दोयप्रकारहै ॥ एकद्रव्येद्रिय एकमाद्रिय ॥ १६ ॥ सूत्र ॥ निर्दृत्युपकरणेद्रव्येंद्रियं ॥ १७॥ अर्थ ॥ द्रव्येंद्रियमेंदोयमेदहें ॥ एकनिरर्टतिअरएकउपकरण ।। अरनिरर्ट तिमंदोयभेदहे ॥ अध्यंतरनिर्टति ॥ वाह्यनिर्टति ॥ अवअभ्यंतरनिर्टतिकहें ॥ उत्सेधअगुलकेअसख्यातमेंभागप्रमाण शुद्धआत्माकाप्रदेश नेत्रादिकहद्रियकेआ कारहोयके इद्रियकेस्थानमेंतिष्टै सो अभ्यतरनिर्टतिहै । अरपाचइद्रियआकारपरण तिरूप आत्मप्रदेशनिविषे नामकर्मकेउदयकरि इद्रियनीकेआकारपुद्गलसमूहतिष्टे सो वाह्यनिर्दृतिहे ॥ बहुरिजो निर्वृतिकों उपकारकरनेवालाहोय सो उपकरणकहिये सो उपकरणहू दोयप्रकारहें । नेत्रनीमेशुक्लकृष्णमडळहे सो अभ्यतर उपकरणहै। अरवाफणी (पापण्या) पक्ष (भवैया) येवाह्यउपकरणहें ॥ ऐसेंसमस्तइद्रियनीका स्व रूपजानना ॥ १७॥ सूत्र॥ लब्ध्युपयोगौमावेंद्रिय॥ १८॥ अर्थ ॥ भावेंद्रियमें दो यभेदहें ।। एकलब्धिअरएकउपयोग ॥ इद्रियज्ञानावरणीय कर्मका क्षयोपशमकाहो ना सो लब्धिहै ॥ अरलब्धिकेसामर्थ्यतें आत्मा द्रव्येंद्रियकेरचनाप्रति प्रवर्तन करे सो उपयोगहे ॥ ऐसेंदोयप्रकार भावेंद्रियहें ॥ १८॥ सूत्र ॥ स्पर्शनरसनघ्राणचक्षु
प्रगटनहीमया परंतु मातका संकल्पकरिके कार्यकरेहे तातेसंकल्पमात्राम
नयहै ॥१॥ अपनीजातिकों प्रगटकर पर्यापकामेद नकरि समस्तान
ग्रहणकरनेवाला संग्रहनयहें । उदाहरण ॥बगीचाहना बाजारात
॥२॥ संग्रहकरि कपावस्तूका विशेषजानेबिना प्रसुत्तिनहिहोप
दूसराभेदनहीहोय तहाताई एयक्षककाइना सोव्यवहारनप प्रयतहा॥
त्रिकालविषयकोंठोरि वर्तमानविषयमात्रकामहणकरनेवाला
सतोपिनसीगया मरमनागतउत्पानीमातातें मतीत
हैं॥४॥लिंग संस्था सामन्यादिको दमनकाशा
अर्थकोंगरिकरिएकमर्थनप्रभानकी
जिसस्पस्परिपदाच होय तिसतस्पति
॥२८॥ सूत्र ॥ सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥ २९॥ अर्थ ॥जीवादिकसमस्तद्रव्य अरसमस्तद्रव्यनिकी भूत भविष्य वर्तमान त्रिकालवर्ती अनंतपर्यायनीविषैजाननेका केवलज्ञानकानियम, ॥ २९ ॥ । सूत्र ॥ एकादीनिमाज्यानियुगपदेकस्मिन्ना चतुर्म्य ॥३०॥ अर्थ ॥ एकआत्माविर्षे युगपत् एकज्ञानकोआदिले चारपर्यंत ज्ञान होयहें ॥ एकहोयतदि केवलज्ञानहोय ॥ दोयहोयतहांमतिज्ञान अरश्रुतज्ञानहोयह ॥ तीनज्ञानहोयतहां मति, श्रुति, अवधि, होय वा मति, श्रुति,मन पर्यय, होय॥च्यार ज्ञानहोयतहा मति, श्रुति, अवधि, मन पर्यय, होयहें ॥ ३० ॥ ॥ सूत्र ॥मतिश्रुताव धयोविपर्ययश्च ॥३१॥अर्थ ॥मति श्रुति अवधि येतीनज्ञानमिय्यामीहोयहें जैसे कडवीतुविमें रखाहुवादुग्धकटुकहोयहे तैसें मिथ्याश्रद्दानीकाज्ञानहमिथ्याहोयहें ३१ ॥ ॥सुत्र ॥ सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥ ३२॥ अर्थ ॥ सत् अस त्यका विच्यारनकरिके जोइच्छाकरि उन्मत्तकीनाई ग्रहणकरनेतें ज्ञानकैविपर्ययपणा होयहै ॥३२॥ ॥सुत्र॥ नैगमसग्रहव्यवहारऋजुसूत्रशब्दसमभिरूढैवंभूतानया ॥ ॥ ३३ ॥ अर्थ ॥ जोअर्थतो परिपूर्णनहीभया अरतिसविसंकल्पमात्रकाग्रहणकर नेवाला नैगमनयहै । उदाहरण॥जैसैंकोऊपुरुष इधनजलादिकसामग्री ग्रहणकरैथा तिसको कोऊपूच्यातुमकहाकरोही तदिवोकहै में भात पकाऊंडू, तहाभातकापर्याय मतिमन पर्ययज्ञानहवाफेरछुटैनही केवलज्ञानही उपजावै ॥२४॥ सूत्र विद्यारि क्षेत्रस्वामिविषयेयोवधिमन पर्ययो ॥२५॥ अर्थ ॥ अवधिज्ञानते मनःपर्ययज्ञान की शुद्धताअधिकह ॥ अर क्षेत्रमवधिज्ञानकाअधिक है ॥ अबस्वामित्वको। वधिज्ञानतो संयमी होयहै अरअसंयमीकेहीहोय. ॥ अर मनः संयमीके होयनही॥संयमीकेहीहोयहें ॥ परंतु सप्तहरिमेंकोजारिजाकै ऐसेंविशेषचारिप्रयुक्तसंयमी (मुनि) हीकै मन पर्ययज्ञानहोय ॥ मन-पर्पयज्ञानका जानपनाविशेषसुक्ष्महें।मनका सूक्ष्मसंबंध मन ऐसेंबवधिअरमनःपर्ययमें विशेष १२५।। पर्वतु॥ ६॥ अर्य।मतिज्ञान पर म ॥ अर्थ ॥ श्रुतज्ञानहोयहेसोमतिज्ञानपूर्वकहोयहै ॥ श्रुतज्ञानकाकारणमतिज्ञानहे। श्रुतज्ञानके दोयभेदहै तथाद्वादशभेदहें तथा अनेकमेद ॥२०॥ ॥सूत्र ॥ म वप्रत्ययोवधिदेवनारकाणा ॥ २१॥ अर्थ ॥ देवनिकैतथानारकिनिकैअवधिज्ञानहै ताकोभवकहियेदेवनारककीपर्यायहीकारणहै ॥ जोदेवकीअरनारककी पर्यायधरैगा ताकै अवधिज्ञानावरणकाक्षयोपशमहोय नियमअवधिज्ञानउपजेहीगा ॥ मिथ्यादृष्टी देव तथा नारकीकै विमगाअवधिहोय ॥ अर सम्यग्दृष्टीदेवतथानारकीकै सम्यग्र अवधिहोयहै॥२१॥ ॥ सूत्र ॥ क्षयोपशमनिमित पहविकल्प शेषाणा ॥२२॥ ॥ अर्थ॥ शेपकहिये मनुण्य अरसज्ञीतिर्यंच इनिमै कोईकैअवधिज्ञानहोयहै सो अव विज्ञानावरणकर्मके क्षयोपशमतैअवधिज्ञानहोयहै ।। ताकैछहभेद: ॥ अनुगामि १ अननुगामि २ वर्धमान ३ हियमान ४ अवस्थित ५ अनवस्थित ६ ऐसै अवधि ज्ञानके छहभेदकहें ॥ २२॥ ॥ सूत्र ॥ ऋजुविपुलमती मन पर्यय ॥ २३ ॥ ॥ अर्थ ॥ ऋजुमतिमन पर्यय अरविपुलमतीमन पर्यय ऐसैदोयप्रकारकामन पर्यय ज्ञानहें ॥ २३ ॥ सूत्र ॥ विशुधप्रतिपाताभ्यातहिशेष ॥ २४ ॥ अर्थ ॥ अजुमतिमन पर्ययसे विपुलमतिमन पर्ययमै विशुद्धताअधिकहै सो द्रव्य क्षेत्र काल भाव करि अधिकहें ॥ अरऋजुमतिमन पर्ययज्ञानछुटैतो छूटहीजायहै अरविपुल मरएकप्रकारकेवस्तुकाढू अवग्रहहोयहें ॥शीघ्रकाअवग्रह अर चिरकालकरि भवन हहोय. ॥समस्तवस्तु बाह्यप्रगटनहीनिकली ताका अवग्रहहोपहें। अर समस्तव स्तु बायनिकली ताका अवग्रह होयहें । बहुरि विनाकयाका अभिप्रायसे माहो यहें ॥ अरका वाकाहू अवग्रहहोयहे॥बहुरि वस्तूकोजसास्पहोयतैसानिरंतर ग्रहहोय. ॥ अर क्षणक्षणमै मिमभिमई अवग्रहहोपहें ॥ ऐसें गदशप्रकार अब मा मतिज्ञानकेमेदफहें ॥ तैसेंहीयदशप्रकार इहानामामविज्ञानमेव से पक्का कार मावायकेमेद॥ तैसेंही हादशप्रकार धारणाकेमेवजाननासपनिमे समेदमये॥ऐसेही एक एकाईद्रियारे सवामीस के अरतालीसमेदहें।पंचाईविपके मरमनके ॥१६॥ ॥ सूत्र बडे सोपविधी .
वहुरि लिंगको (भेपको) देखी मेखका जानना सो अनुमानहै याकी अभिनिवोध कहे है।। यद्यपि मति, स्मृति, सज्ञा, चिंता, अभिनिवोध, इनके शब्दभेदतें अर्थभेद दीखेहैं। तथापि एकमतिज्ञानावर्णकर्मके क्षयोपशमतें उपजैहै तातें ये मतिज्ञानहीहै अन्यना हीहे ॥१३॥ ॥ सूत्र ॥ तदिद्रियानिद्रियनिमित्त॥१४॥ अर्थ ॥ सोमतिज्ञान, पचइ द्रिय अर अनिद्रिय जे मन ताकै निमित्ततै उपजेहे ॥१४॥ ॥सूत्र ॥ अवग्रहावाय धारणा ॥१५॥ अर्थ ॥ पदार्थ अर इद्रिय इनका जोडहोतेही जो सामान्य सत्तामात्र काग्रहणहोय सो दर्शनहै । वहुरि यो शुलहै ऐसाविशेष ग्रहणहोना सो अवग्रहना मामतिज्ञानहै । वहुरि अवग्रहकरि ग्रहणकीयाजो शुक्लरूप तिसविषै जो विशेष जा नवाकी इच्छा जोशुक्लदीखैहे सोधुजाहे वा बकपक्ती जानिजायहै ऐसाज्ञान सो इहाना मामतिज्ञानहै ।बहुरि ताका निर्णयहोना या ध्वजाहिहै ऐसा निश्चमया सो आवाय नामा मतिज्ञानहे । वहुरिजाकानिश्वयमयाताको अन्यकालमै विस्मरणनहीहोना सो धारणानामा मतिज्ञानहै ॥ १५॥ ॥सूत्र ॥ बहुवहुविधक्षिप्रानि सृतानुक्तधुवाणा सेतराणां ॥ १६॥ अर्थ ॥ पदार्थ अरइद्रियनीकै संबंधहोतेही जो आद्यम पदा र्थका स्वरूप ग्रहणहोय सो अवग्रहज्ञानहे ॥ सो (बहुतवस्तुका अवग्रहहोयहै ॥ अर अल्पवस्तुकाई अवग्रहहोयहै ॥ वहुरि बहुप्रकारकेवस्तुनिका) अवग्रहहोयहें ॥
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मर्यादा॥अंतरकहिये विरहकाल॥भावकहिये क्षयोपशमादिक परिणाम ॥ अर
हुत्व कहिये परस्परकीअपेक्षाकरि हीनपणा अधिकपणा ॥ये अष्टप्रकार
म्यग्दर्शनादिकानको तथा जीवादिकनिकी जानना ॥८॥॥अब
सूत्र।मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानिज्ञान॥९॥अर्थ।मतिज्ञान, श्रुतान,
ज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, केवलज्ञान॥येपचप्रकार ज्ञानकेमेदहें सोये पंचप्रकार
ही प्रमाणसंज्ञा१॥९॥ ॥सूत्र ॥ तत्रमाणे ॥१०॥ अर्थ येमविज्ञानवादिक
नहें तेही प्रमाणहें ॥१०॥ ॥ सूत्रम्॥१॥ अर्थ माविक
ज्ञान ये दोय परोक्षप्रमाणहें ॥12सस
श्रुतविना अन्य जे अवषि, मन-पर्या
॥ सूत्र ममाविक
,
रावर्तनकीहै पाईं निर्वाणहीहोय।।अरजघन्यस्थिति अंतरमुहूर्तकीहै पानिर्वाणहोजा य॥ क्षायकसम्यक्तकीजघन्यस्थिति ससारीजीवकै अंतर्मुहूर्तकीहैं। अंतरमुहूर्तपाठे निर्वाणहोहीजायअर उत्कृष्टस्थिति तेतीस सागर अतरमुहर्तसहित अष्टवर्षहीन द्वय पूर्वकोटिअधिक हैं । अरमोक्षकेजीवके क्षायक सम्यकीस्थिति आदिसहितहै अरअंत नहीहैऐसीहै ॥क्षयोपशमिकसम्यक्तकी जघन्यस्थिति अतर्मुहर्तहै अरउत्कृष्टस्थि तिच्यासठिसागरकीहै । ऐसी स्थितिकही॥ ॥ अवसम्यक्तके प्रकारकहेहैं ॥ सा मान्यतैतो सम्यक्त एक प्रकारहै । और निसर्ग अधिगम भेदते दोय प्रकार, ।। उप शम क्षायक क्षयोपशम भेदतें तीनप्रकारहैं ॥ ऐसें सख्यात भेदहें ॥अरश्रद्धान करनेवाला अर श्रद्धानकरनेके योग्यपनाकेमेदते असख्यात भेदहें अर अनत भेदहें ॥ ऐसेभेदकहें ॥ ऐसें सम्यग्दर्शनका निर्देशादिक छहप्रकारकरिवर्णनकिया ही ज्ञानमें चारित्रमें तथा जीवादिक तत्वनमें निर्देशादिक छहप्रकार परमाग मके अनुसारकरि युक्त करने योग्यहे ॥७॥ औरहू सम्यग्दर्शनादिक तथा जीवादि कके जाननेकाउपायकहहै। ॥सूत्र ॥ सत्सख्याक्षेत्रस्पर्शनकालातरभावाल्पवहुवै श्य॥८॥ अर्थ ॥ सत् कहिये अस्तित्व ॥ सख्याकहिये भेदनकी गणना ॥ क्षेत्रकहिये वर्तमानकालमनिवास ॥स्पर्श कहिये त्रिकालगोचरनिवास ॥ कालकहिये समयकी जातिस्मरणते कहकनिके वेदनाका अनुभवकार सम्यक्त होयहातिसरीएवीतारही धर्मकामयण कारणहै नीनहीहै ।। अर तिर्पचकै जातिस्मरण, कोकनीके धर्ममता कनिके जिनविदर्शन ये सम्पत उपजने के कारणहे ॥ भर तीन कारमहें। देवनिमें कितनेक देवनके जातिस्मरण कितनेकनके किसनेकले जिनेंद्रपंचकल्याणककरमहिमाके देखनेकार कितनेककै देवनकीतादिदेखनेकरि सम्पग्दर्शन उत्पम होपह गारमावर्गलाई मानते प्रणित औरण अच्युतानि देवनिक देवाविवर्तनपिना नत्येषेपकनिवासी किसनेकनिक माविस्मरणमा धर्ममपयोग अविश करके निवासीनिया तीनों सम्यक्तहे । दर्शनके अनुवादकरि चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन इन तीनुदर्शनविपै तीनों सम्यक्त है अर केवलदर्शनविपै एकक्षायक सम्यक्तहै । लेश्या के अनुवादकरि छह लेश्यानिमै तीनों सम्यक्तहै अर लेश्यारहितमै क्षायक सम्यक्त है ॥ भव्यकेअनुवादकरि भव्यकै तीनों सम्यक्तहै अर अभव्यके सम्यक्तनहींहै।सम्य तके अनुवादकरि जहा जैसा सम्यग्दर्शनहै तहा तैसाही जानना ॥ संज्ञीके अनु वादकरि संज्ञीके तीनों सम्यक्तहै अर असंज्ञीकै सम्यक्त नहीं है अर सज्ञीअसंज्ञी दोऊ पनारहितनके क्षायकसम्यक्तहीहै ॥ आहारकके अनुवादकरि आहारकनके तीन सम्यक्तहै अर अनाहारकनके कहिये छदमस्थनके तीनू सम्यक्तहै समुद्घातगत अनाहारककै क्षायकसम्यक्तही है। ऐसे सम्यक्तकास्वामित्वकहा ॥ अव सम्यक्तका सा धन जो कारण सो कहेहैं।सोसाधन दोय प्रकारहै एक अभ्यतर एक वाह्य ॥ अभ्यतर साधनतो दर्शनमोहका उपशम क्षय तथा क्षयोपशम येतीन हैं अर बाह्य कारण तीसरे नर्कताई नारकीनकै कितनेकके जातिस्मरणते सम्यक्त होय अर कितनेक नारकीनकै धर्मश्रवणतें सम्यक्त होय अर कितनेककै वेदनाके भोगनेते सम्यग्द र्शन उपजैहै ॥ अर चोथेनर्कको आदिलेय सप्तमनर्कपर्यन्त नारकीनिमें केइकनिके १ उपचममें उपचमसम्पक, सयोपशममें लयोपचमसम्पक, सापक क्षापकसम्पक ऐसा मानना जातिस्मरणते केइकनिके वेदनाका अनुभवकरि सम्यक्त होयहातिसरीएवीताईसे धर्माश्रवण कारणहै नीचेंनहीहै । अर तिर्यचकै जातिस्मरण, केईकनीके धर्मश्रवण कोकनिके जिनविदर्शन ये सम्यक्त उपजनेके कारणहै ॥ अर मनुष्योगपी तीन कारणहैं। देवनिमें कितनेक देवनके जातिस्मरण कितनेकनके धर्ममा कितनेककै जिनेंद्रपंचकल्याणककीमहिमाके देखनेकरि कितनेककै महर्दिक देवनकीशरि देखनेकरि सम्यग्दर्शन उत्पन्न होयह धारमास्वर्गताई ये कारणोपर माणते प्रौणत औरण मेध्यतइनि देवनि के देवरिवर्शनविना तीनहीकारमा कर नामेषेपकनिवासीकै कितनेकनिके जासिस्मरण वा धर्ममयण दोयहीकार भविश समुचरके निवासीनिके या करपन्समही उनके पूर्वजन्ममें का उत्पाद है ॥ ऐसेंस त्वकोपूछेसो कहह । सामान्यकरिकतो जीवके होय है ।। विशेपकरिकेकहें। गतिके अनुवादकरि नर्कगतिविपै कोईजीवके सम्यक्तहोयतो समस्तनविपै नारकीनके पर्या प्तअवस्थाविपै उपशम वा क्षयोपशमसम्यक्त होय।।अरप्रथमनर्कविपै पर्याप्त अपर्या प्त अवस्थाविपै क्षायिक क्षायोपशमिक होयहै ॥ द्वितीयादि नरकमें अपर्याप्त अवस्थाविपै सम्यक्त नहीहोयहै । और तिर्यंचविपै सम्यक्तहोयतो उपशमसम्यक्त तो पर्याप्ततिर्यंचहीके होय है ॥ अपर्याप्तकैनहींहोयहै ॥ अर क्षायक क्षयोपशमिक पर्याप्त अपर्याप्त दोनोंअवस्थामें होय परंतु अपर्याप्त अवस्थामै भोगभूमिके तिर्यच हीकै होय ॥ कर्मभूमिकेतिर्यंचके पर्याप्तअवस्थाहीमै उपशम क्षयोपशम होय । क्षायक नहीं होय ॥ अरक्षायक सम्यक्त तिर्यंचणीकेहोयही नही अर उपशम क्षयो पशम सम्यक्त पर्याप्तअवस्थामें तिर्यंचणीकेहोय अपर्याप्तअवस्थामें नहींहोय ॥ बहुरि मनुष्यगतिविपै क्षायक क्षयोपशमिक दोयसम्यक्त तो पर्याप्त अपर्याप्त दोऊ अवस्थाविप होजाय अर उपशमसम्यक्त पर्याप्तअवस्थाहीमें होय अपर्याप्त अवस्थामें नही होय ॥ मनुष्यणीकै (स्त्रीकै) पर्याप्त अवस्थाहीमै सम्यक्त होय, अपर्याप्तअवस्थामै नही होय॥क्षायकसम्यक्त द्रव्यस्त्रीकैनहींहोय ॥भावस्त्रीके होय॥ देवगतिमै सम्यक्त होय तो कल्पवासीनमें पर्याप्त अपर्याप्त दोऊ अवस्थाविपे तीनों है राजाकहना॥ऐसेंच्यारनिक्षेपनिकर जीवादिकनिकोस्थापनकरिये।नामनिक्षेपमेतो नाममात्रहीव्यवहारकेमर्थ कहनाहै औरप्रयोजननाही॥जैसेकिसीको रिषभपाती नामकहदेनेमात्रही प्रयोजनहै।अरजहां रिषभकी स्थापनाकरितां तदा दाकारमैसाक्षात् रिषभहीमानिकार आदर स्तवन दर्शन पूजन करना रेसेपारनिक्षेपनितें पदार्यनिका व्यवहार प्रयतहें सोयधावतजानना।।ऐसेंना निक्षेपनिकरि अंगीकारकीये पदार्थनिका स्वरूपकाज्ञान काहे होय ताते पूत्र ॥प्रामाविमः ॥६॥ अर्थ॥ प्रमाणऔरनयनिकार नानपनाहोयहें ॥६॥ बहुरि सम्यग्दर्शनाविक देहें॥ ॥सूत्र॥ शिकहिये रूपामा स्वामिल ग्दर्शनकै उपजैहैसोहहासुनपातन्निसर्गादधिगमावा||अर्थागजोसम्यग दर्शनवाह्यउपदेशविनमप्रगट होय सोनिसर्गसम्यक्तह।।अरजोपरकोउपदेशोंजीवा दिकपदार्थीकाश्रन्हानाहोयसोअधिगमसम्यक्तहै।। ॥ ॥३॥ ॥ अवतत्वोंकेनामह।। सुत्र॥जीवाजीवाश्रववधसवर निर्जरामोक्षास्तत्वासाअर्थचेतनालक्षणजीवीं॥ चेतना रहितहोयसोअजीवहै ।शुभअरअशुभकर्म आवनेकेदारासोआअवहे आ माकेप्रदेशाअरकर्मकेप्रदेशनिकामिलनासोवधावते कर्मकारोकना सोसवरहे। एकदेसकर्मकाक्षयहोनासोनिर्जराहै।समस्तकर्मका नाशहोनासोमोक्षहै।एसप्ततत्व हैं॥४ाव||सम्यग्दर्शनादिक वा जीवअजीवादिक पदार्थ निकायथावत्व्यवहारके अर्थचारनिक्षेपकहहे सूत्रनामस्थापनाद्रव्यमावतस्तन्न्यासः॥५॥अर्थ॥जि सवस्तुका जैसा नाम होतसागुणतोनहीहोयाअयाव्यवहारकी प्रवृत्तिकेअर्थनामसज्ञाक हियोसोनामनिक्षेपही जैसेकिसीमनुष्यकानामाइद्रराजाकह।।बहुशिधातुपाषाण अरकाष्ठामृत्तिकादिकनिमसोयो हो ऐसास्थापनकरनासोस्थापनाह जैसे सतरंजके ख्यालमोकाष्ठकेरोणानिक हस्तमघोटकोकहैहै औरआगामीकालमै|जिसरूपहोय गाताकातिसरूपाकहना सोद्रव्यनिक्षेपही। जैसेंराजाके पुत्रको राजा कहना॥बहुरिव र्तमानजैसीपर्यायसहितहोयाताकूतैसाकहनासोभावनिक्षेपहै। जैसेंराज्यकरताहोयता
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