Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Mai Bhul Na Saku
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SC-SCAR- ICE "मैं भूल न सकू" *SHCECASSESARICS सम्पादक-जयन्त प्रथम सस्करण जून १६४० { एकरुपया H
प्रसाराम
पिजय पुस्तक भण्डार
ध्रद्धानन्दयानार
मुद्रका-
'अर्जन' प्रिण्टिग प्रेस,
प्रशानद यानार,
देहजो।
लेखकों का परिचय- - - १ श्रीयुत श्रीनाथसिंह एक प्रसिद्ध साहित्यिक व पत्रकार । इन्डियन प्रेस से प्रकाशित होने वाले लगभग सभी पत्र आपके हाथों में से होकर गुजरते हैं। 'यालससा' व 'हल' के सम्पादक। २ श्री सच्चिदानन्द हीरानाद वात्सायन 'श्रशेय' भमण, चित्रकला, फोटोग्राफी यादि आपके शौक हैं। कवि व उप. न्यास लेखक के तौर पर अधिक प्रसिद्ध हैं | arrrrt ३ श्री विष्णु प्रभाकर हिसार के एषा मात्र साहित्यिक । कहानी लेखक के तौर पर प्रसिद्धि प्राप्त । ५ श्रीयुत देवीदत्त जी शुक्ल सरस्वती के वर्तमान सम्पा- दक । एक पुराने, अनुभवी साहित्यिक । () ५ श्री 'पहाडी -युवक कहानीकार । पर्वतीय साहित्यिकों में आपका श्रन्छा स्थान है। ६ श्रीमती ऊया मित्रा -आप यगाल प्रान को है, हिन्दी को आपने अपनाया है। आपके पिया' उप यास को जनता ने बहुत पसद क्यिा है। --
-
७ श्री सामोरयारपयो युवर पहाना लेनका गधगात
नगरों में भापका अन्दा स्मन है।
- श्री मायामार जैन युवा कहाना लेखा। भाप
कहानी-समह 'परित्यता सुन्दर है।
६ पृथ्योनाथ शमा पजाय के प्रसिद्ध उपन्यास लेख
व कहानीC पजाय में आपका स्थान यदुत ऊ चा है।
१० कुमारी दमयता प्रभाकर नारी जागरण सम्बघा कहा
निय व लेप, मापने जो लिने हैं, जनता की दृष्टि में घरे
उत्तरले हैं।
११ श्रीमती हामवतो • पारिवारिक मनोविज्ञान के अध्ययास
पूर्ण आपकी कहानियें होता है, प्रतिभा य सगोत से पूर्ण
श्रापकी कविताए।
१२. श्री भगवताप्रसाद याजपई - कहानी व उप यास मापने
दोनों लिये हैं, परन्तु कहा लेखक के तौर पर आपका
स्थान काफी ऊचा है।
१३. श्री विनोदशकर पाठक युवक विचारक व साहित्यिक ।
wa भालोचनात्मक लेय प्रापन यहुन सु दर लिये हैं।
१८ श्री श्यामसुदर दीक्षित श्रागरे से निकलने वाले पन
'मराल' के वर्तमान सम्पादक है। आप कवि है, परन्तु
एकाकी नाटक लिखने में सिद्धहस्त हैं।
-
१५. श्री कृष्णवद शर्मा 'चद्र' यहुत हो कम समय में श्राप
ने हिन्दी के अच्छे कवियों में अपना स्थान बना लिया है।
१६ श्री यलराज साहनी श्राप शान्तिनिकेतन में हिन्दी अध्या
पक है । अपना नवीन व मौलिक शैली के लिये माप प्रसिद्ध
हैं। आपका विदेशी साहित्य का अध्ययन बहुत ऊ चा है।
-
७ कुमारी रत्नकुमारो माथुर
भावुक, कवियित्री व कहानो
लेखिका। सांभरलेक की ओर से श्राप साहित्य-सप्लार में
प्रतिनिधित्व करती हैं।
-
१८ श्री यज्ञदत्त शर्मा युवक पन्यास लेखक व एकाकी
नाटक लेखक। आज कल के एकाकी नाटक लेखकों में
आप का अच्छा स्थान है।
-
१६ श्री श्रचल' 'मधूलिका' नामक पद्य-काव्य के सफल
लेखक । कवि के रूप में आप प्रसिद्ध हैं, परन्तु यहाँ जो
चीज उन्होंने दी है वह यहुन ऊचे पाये की है।
२० कुमारी कृष्णाकुमारी माथुर -कुमारी रत्नकुमारी-माथुर की
छोटी बहिन हैं। एक उदीयमान कवियित्री हैं।
.
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-
२१ श्रीयुत अयोध्यासिंह जो हरिनीध. हिन्दी के कवि
समाट। आपकी पुस्तक प्रिय प्रयास हिन्दी साहित्य की
स्थायी निधि है।
२० प्रयुत काश पालेलकर राष्ट्रमा मगर ममिति और
नि सुधार समिति के पायम पो भागे यदाने का मार
सोय है । गुमगती य मराठी मादित्यम भापनियों
पा स्थान याहुन चाहै।
२३ घी एम० द्वारकानाराममो० -मार एक नयी
लेषक है।गाको पाप से ग्राशाय है।
२५ धीयुत पिनार
याप ग्यासिपर के १५ उटते हुए
लेगक है। मराठी माहित्य से आपने दई मुर अनुयाय
हिन्दी को दिये हैं।
२४ धी जयन्त- भूमए, कहानी सिगना, चित्रकारी प्रादि
अापके शौक है । सानाधिक यौर मधुम' के पर्नमान सा
1
--
२६ श्रीयुत लेम्पराम पी० ए० पर समय के प्रसिद्ध सिनेमा
पर 'रगभूमि' के मम्पादन प भूतपूर्व सम्पादक 'धीर
अर्जुम' सानाहिक । 'मानि' पहानी-सग्रह, जो जग्न हो
चुका है। उस में प्रापकी पर कहानिय थीं।
मैं
भूल न सकूँ
यह वाक्य स्वय अपना परिचय देता है। यह देता है,
में जो कहने जारहा है यह सब स्मरणोय है, प्रयत्न करने पर
भो मानस पटल से अलग न दिया जा सकेगा।" जो यहा है,
यह सत्य है । सत्य मधुर भो होता है, स्केन्डल भी यनाता है।
परन्तु, स्केण्डल का भय, साहित्यिक के लिए दूर को चीज
होनी चाहिए। ससारी का काम है वात का बतगड बनाना,
और साहित्यिक का काम है उसे कह देना मात्र ।
जोवन घटनाओं का जोड है । यदि वह यह नहीं है तो
उसका माधुर्य समाप्त हो जाता है। इनमें से कुछ कहने सुनने
में मधुर होती हैं, हृदयग्राही और मार्मिक भी, असाधारण होती
ह, इस कारण याद रहती हैं।
जीवन का प्रति पल अपनी कथा लिखता जाता है । धड़ो
को प्रत्येक टिकटिक में उसका गान होता है। स्मृतिये उन पलों
फा सकलन होती हैं। कुछ कम, कुछ अधिक, महान रखती
हुई यह स्मृतिय मानस के हृदय पटल पर अकित होती जातो
हैं। कुछ का प्रभाय स्थाई होता है, कुछ धुघप्ती होती हैं,
भाप की तरह, विस्तृत में आने पर लीन हो जाती है। जो
स्थाई हो। यह धीरे धीरे अस्पष्ट सो होती, हृदय की
गहराइम ठ मौन हो जाती हैं। उनका लघु सा भार मनुष्य
पो पलकों पर भार यहा देता है, यह अलसाया सा, सोया सा
दोस्खता है।
समय मनुष्य से सेलता है। घटना उमपी गिनी है।
उसके विधा समय का महत्व ही नहीं। कभी कभी यह अपना
सगिनी को लिये मनुष्य के समीप पाता है। मनुष्य पलक
सम्पुटों में मदिरा सी भरे स्वप्निल जग में डोलता सा दीपता
है। सगिनी उसी अलकों को उठाता है, उसके हृदय में
सलपली मच जानी है, सोइ स्मृतिय जाग उटती है, यह चौक
उरता है । देखता है, उसकी स्मृतियों में लीन कहानियें सुनने
याला मिला । वह कह उठता है जो उसके लिए बहुत पवित्र है,
उसको अपनी यात है। और फिर, उस गाथा के अन्त में यह
एक एडी सास लेकर सिर्फ यह देना है, "मैं भूल न सफ
उनमें से ही कुछ गाथाओं का सकलन इस पुस्तक में है।
जनता इस पुस्तक को अपनाएगी, इसश मूल्य समझती
और प्रोत्साहन देगी, इसका मुझे विश्यास है। चाहता
दूसरा समह भी शीघ साहित्य प्रेमियों को भेंट किया जा सके।
यस! इतना ही
-जयन्त
मल
न सक
एक
सन् १९२१ या २२ को बात है, में श्रमहयोग श्रादो
लन की याधी में पड़ गया । इलाहाबाद से उडकर यम्बई में इस
तरह जा गिरा जैसे पेट से कोई कमजोर पत्ता याडर में पटकर
अपनी शाख से बहुत दूर चला जाता है । कालेन छोड़ा था
जेलसाना जाने के लिए, मगर एकाएक असहयोग भादोलन
भूनन 8
भ्यागत हो गया। ताजा यद एमआ कि म म जेजगाने हो जा
सरा नकानेर योहीनीट मामा यार के तिरस्कार कर
सामना न करता पटे, इस उद्देश से पामर पर चा।
अब मै इस शहर म पहुचा मेरे पाम एष पंता मीनहीं
था। अपवार पदाका शौक था थी ये फटेयर समाचार का
नाम मुरा ग, उसके यायालय परने के इरादे मैं
पहुचा। १५) मदाने पर एर अगह मिल गई। सीन दिन
यदा काम किया, महर पी पटरी पर गोया और भूग रहा।
तीसरे दि जय भूप की ज्याला सरदारत हामी तय उस
पति से, जो मेरा असपर था, उप पेरागो दिलाने का प्रार्थना
को। परन्तु उसने एक न सुनी । लाचार होकर, मुमै यहा से
हटना पड़ा।
उसी दिन मुझे एक होटल में पट भर सान के यदले में
तश्तरिया और प्याने धोने का काम मिल गया । मोरे ७ यजे
से रात को २ धजेता मैं यह काम करता। होटल का मालिक
मेरे काम से खुश हुया और जर उसने यह जाना रिमं अमेजी
फी अच्छी योग्यता रखता ह तय उसने मुझ भागन्तुको के
सत्कार का काम दिया । तश्तरिया धोने का काम बैठेब करना
पड़ना था, यह काम पटे पडे करना पड़ा। इसमें थकान ज्यादा
लगती थी पर इज्जत भी ज्यादा । और इज्जत, मान के लिए
अपने यौवन के प्रारम्भिक दिना म मनुष्य क्या नहीं पर
सक्ता?
में भूल न मकून
इस होटल में एक परम सुन्दरी युवती कभी किसी के
साथ और कभी फिमी के साथ चाय पीने श्रातीयो। वह जिस
किसी व्यक्ति को भी लाती थी, उससे होटल के मालिक को
अच्छी आमदनी होती थी और उसका सत्कार भी विशेष रूप
से होता था।
मेरे व्यवहार से यह युवता प्रसन्न हुई और एक दिन
जब होटल का मालिक फही गया हुआ था, उसने मुझसे पूछा-
"तुम्हारा घर कहा है "
"इलाहाबाद ।"
“यहा कर से हो ?"
"जब से श्राप देख रही है।"
"क्या तनख्वाह पाते हा?"
"कुछ नहीं । केवल पेट भर साना।"
"इससे अच्छी नोकरी मिले तो करोगे?"
"आपको यही कृपा होगी अगर श्राप दिला सकें।"
उसने मुझे अपने मकान का पता यताया और कहा-
"यह मान ग्लोय सिनेमा के पास गोलपीठा में है। घड़ी मश
हर जगह है। किसी से भी पूछोगे तो यह यता देगा।
दूसरे दिन मैं उस मुहरने में जा पहुंचा। यह वेश्यामा
का मुहल्ला था! रूप का यानार था। नारी का प्रेमागि में
अपने धन और यौवन की आहुति देने सारा बम्बई यहा पहु-
चता था। सड़क के दोनों ओर सीकचेदार भरोपों के पास ये
३]-
मुदरिया अपने रूपया जाल फैलार येतो थी, और मेरा
पयाल था, उन दिना जो भी पुरष उस सटर से निकलते थे वें
उस रूप आराम सने के ही लिए निरलते थे।
यम्बई के इसी स्वर्ग या नरक में मुझे पनाह मिली।
जिस युवता ने मुझे यहा बुलाया था यह एक चालासाने का
मालिकिन की छोटी बहन थी ! उसकी मातृभाषा मराठी थी,
लेकिन यह टूटी फूटी हिदी भी बोल सकती थी । अपनी बड़ी
बहन से मेरी सिफारिश करते हुए उसने मेरे समय में क्या
पहा यह ता में समझ नहीं सरा, पर मैंने अनुमान किया कि
पुरमच्या ही कहा होगा, क्योंकि उसकी बहन मुझे २५)
महीना नकद तनरवाद देने पर रानी हो गई।
मेगकाम चक्लाखाने के अन्दर के श्राफिस में इस
छोटी बहन के पास बैठना, रातो का जवार लिखना और
हिसार फ्तिार रसना था। घलासाने में करीव १० युवतिया
थी। जिनमें ३ ईसाई सी, ४ मराठिन मी ओर ५ गुनरातिन
सो लगती थीं। ये सभी १५ से लेकर ३० तक की आयु की
थी और शाम को जब सू गार वरती पो तर उनके प्रार्पण की
कल्पना करना कठिन हो जाता था।
आगन्तुकों के सामने चरलापाने की मालिकिन इन
समों को धारी पारी से उपस्थित करती थी और उनकी पीस
स्थय लेकर उन्हें भाग तुको की कर लिप्सा का शिकार
अनने के लिए. उनके हवाले कर देती थी । जय फोश्रागन्तुक
-मैं भूल न सकू
उन बारहों के रूपजात में नहीं फस सकता था और उमसे
फुछ वसूल कर लेने के सय प्रयत्न जय व्यर्थ जाते थे, तव मालि.
किन की इस छोटी यहिन की पुकार हाती था और यह उनको
फांसही लेनी थी।
एक हफ्ता नौकरी करने के बाद मुझे उस चकलानाने
का सारा रहस्य मानूम हो गया । ये सभी म्निया सुन्दरी,
युवती और प्यार करने लायक यो। वे पुनी, पत्नी, गृहिणी,
माता, के रूप में पूजने योग्य थीं। उस मकान में आफतो पी
मारी हुई वे भी पहुची, पिनकुल उसी तरह जैसे कि म
पहुचाया।
मेरे हृदय में चरलासाने की मालिकिन और उसकी
परम सुन्दरी छोटी बहिन के प्रति घोर घृणा का भाव उदय
हुा । उनका सारा जीवन मुझे नारकीय जान पडा ओर
हिन्दुस्तान म स्त्रिया को पवित्रता किम बेरहमी से नाटक
जाती है उसका भी मुझे वहीं अनुभर हुया । मने निश्चय
किया कि इस नौकरी से भूयो मरना अच्छा है और मैं विदा
लेने के उद्देश्य से मालिकिन के पास पहुचा।
उस समय वहा दूसरा ही दृश्य उपस्थित था। सयुक्त
प्रात के जौनपुर जिले सी एक युवती यहा फंसाकर लाई गई
यो। उसकी पापो से मरमर श्रासू रह रहे थे और यह भय
भीत हरिणी सी चकित होगाचारी श्रोर देप रही थी। उसे
जबरदस्ती शराब पिलाई गई और वह तुरन्त एफनर राक्षस के
[ ५ ]
---में भूलना
दयाल की गई। उस माय उसकी सहायता कर सकने का
ধনী প্লশনযন দা গামান মা গা না
r! गया था स्तीफा दे, लेपिन मालिदिन को एक ही डाट
म मेरे हगम दुरस्त कर दिये और मैं अपने काम पर लौट
श्राया।
বিল বয় 8 এর অঙ্গ স্যভিকির ী বা
डोटी यदिन दाना नहीं चली गई थी, मैन इस युवती से मैंट
पो। उसने रोरो पर अपनी कहानी कही-में परहार की
लमोहइसी सान मेरागोनाहानयाना था। इस माममा ने
मेर ऊपर जादू पर दिया। भुमे थम्यई भगा लाया । कहना
थानुमसे प्यार करता यह मुझसे ही, न जान किम ।
का प्यार करता है। हाय ! पर मुझे यहा डाल गया। पर क्या
दरियापन करने पर मालूम हुया कि यह आदमी जो
उस औरत को भगा लाया या, यम्यई फी किसी मिल में नोरर
था और जौनपुर का हो रहनेगाना था। लही को उस से प्रेम
हो गया था और इमो से यह उसकी यादों म पड़कर चली आई
थी। पर उसने उसके माय दगा की थी। इससे उस हदय
पटा जाता था।
मैंने कहा-"कहो तो पुलिस को खबर कर दू तुम्हारी
मी के खिलाफ ये लोग तुम्हें यहा जबरदस्तीनहीं रप सफ्ते।"
[६]
-मे भूल न सक
"यह ठीक है, पर पुलिस में समर करने से मेरे मा-
याप और साम-ससुर पो भी पयर हो जायगी। वे क्या
पहेंगे। दोनों पुल की नाक कटेगी। हाय ! में क्या करू ?"
यह श्मिी नगह इस यान पर राजी न हुई कि पुलिस
यो गर को जाय। मेरो सहानुभूति पाकर यह मुझसे कहने
लगी- "तुम मेरे साथ शादी करलो। मुझे लेकर यहा से
कही भाग चलो। मेरोरता करो। तुम मर्द हो। मुझे यचाओ।"
मने पहा-"म विहिता, और अगर न होता तो भी
इस परिस्थिति म नहीं है कि तुम्हें यहा कहीं टिका सक और
अपना और तुम्हारा दोनों का गुजर चला मत
"हाय राम! अब क्या हो ?" उसने मेरी ओर निराशा
भरे जलपूर्ण नेत्रों से देना। उस समय मुझे ऐसा जान पडा
जैसे में कोई पत्थर का देवता है और वह युवती भक्तिभाव से
श्रोत प्रोत हो मेरो व्यर्थ पूजा में लगी है।
श्रत में यह योली-"अच्छा। मुझे यहा से फिसी
तरह जोनपुर ले चलो। अपनी मा के पैरों पड़ गी। शायः
यह फिर से घर में रय ले।"
"हा, यह कर सकता है ।" दूसरे ही क्षण म उस बदनाम
घर से उस स्त्री का लेकर निकन मागने के उपाय नोचने लगा।
मध्या हुई। गोल पीठा जगमगा उठा। सीकचों में
युवतियों के हृदय का रदत निम हाश बनकर उनके होठों
[ ७
..
--
मनन मा
1
कोमला दरने लगा। निशार लोग माने लागे। पक की
दृष्टि उम पुवनी पर पड़ गई। उसके सार फिर जयरदस्ती
थाने तगी।
उस समय में अपने मोममान सामीभागे याद
कर पदा-"श्रीमती जायगा। माप राते में इस औरत
+ साय ज्यादती र हाने दगा।"
"पदमाश' निया मेरे घर से।" मालिकिन गरम कर
योली। मैंने उस युक्तो का हाथ पया और पक्षा -"यानो,
चले।
वह मेरे पीछे चल दी। मालिदिन आगे यदी योर उसने
उसका रास्ता रोका। पर हम दो थे और मालियिन अनी।
हमारे हदयों में हिम्मत थी और उसे भएकाफोट हो जाने का
भय । इसलिए उसका विरोध हमारो गति रोष न सका। साथ
हो हल्ला मचने मे तमाशीन जमा हो गए और सभों ने हमारा
पक्ष लिया। पर इसका एक कुपरिणाम यह भी हुया कि हम
दोनों परीय के थाने में पट चाए गए।
थाने बालों ने उस युवती को मुम से अलग करने यो
कोशिशे की, पर मुभार्म न जाने यहा से अद्भुत यल और
साहस श्रागया था। अन्त मे पुलिस वालों को हार माननी
पडी और में उस युवती को लेकर स्टेराम श्राया।
माह में एक उदार पारसोथा। शायद धनी भी था और
याल भी। उसने सारा किस्सा सुनकर हम पर दया की ओर
-मैं भूल न सह- कुछ कानूनी बातें बतलाई । इतना ही नहीं उसने जौनपुर तक का टिकट फटा फर दम गाही पर घेठाल दिया। तीसरे दिन हम जौनपुर पहुचे। दिन स्टेशन पर गुनारा। जर रात हुई तय अन्धकार के श्रापरण में उस युवती के घर पहुचे । उसके मा बाप उसकी चिता में उदास बैठे थे। परतु उसे देखते ही उसका फोर भडक उठा। मा तो पुछन योली, पर याप ने गरज फर कहा-"हरामजादी निकन हमारे घर से। तेरे लिये यहा जगह नहीं है।" मैंने उस युवतो को सम्बोधित करके कहा-'रामकली मैं जाता है" "हा तुम जाओ।" में उसी क्षण स्टेशन को लोटा। उस समय मेरे कानों में उम युक्ती की पीठ पर उसके पिता के जूतों की नडात योवार और उसका चोट से चीत्कार सुन पड रहा था। एक बार तो मन में पाया कि लौट कर कुछ उसे समझाऊ पर हिम्मत न हुई। उसके बाद उस युवती का क्या हुआ, यह मे आज तक जान नहीं सका। -श्रीनाथसिंह
में भूल न सर
--
दो
भलनेयानो धात मी याद करके लिपी या लिम्गाई
जामनी है। और जो बात मुझे याद आई रमका रिश्लेपण का
के देयता तो पानि म एक नहीं दो भान है। फिर भी पता
लगता है कि दोनों ही याने कद बिना पनी पूरी नहीं होती,
इसलिये जिमग से यात याद याद है उसी ढग से सुनाए
देना। कहानी, १ लेपाकी हैसियत से, मेरे बडे भारी
सौभाग्य और उतने ही दुभाग्य की काहानी है।
पहिले सौभाग्य की पान का, क्योकि मामाग्य क्षणिक
होता है, दुभाग्य हमेशा साथ चलता है। सुना है प्रानल्ड बेनेट
थी पहिलो पुस्ता की कापोराइट के मूल्य स्वरूप जर पाच
पाउण्ड का एक नाट उनके पास पहुंचा तर अपनी जीनियसक
प्रति श्रद्धा से भरकर उन्होंने मन में धार लिया कि वह नोट बे
उस “यति को भेंट करेगे, जिसे पहिले पहिल अपनी रचना
पढ़ते हुए संगे।
में भूल न सकू
सुनते है जब वे मरेता यह नोट उनके पास था।
"भग्नदूत" जर छा तव उसके लिये मुझे कुछ मिला
नहीं और न मैंने कोई मनोती ही मानी। लेकिन यह कहना सच
नहाँ होगा कि उसके भविष्यत पहिले पाठक यानी मेरे देखे
हुए पहिले पाठक की कल्पनाम भी नहीं करता था। लेकिन तय
में जेल मे या और जेल ले पाने तक पहिली रचना के प्रकाशन
का चमत्कार बहुत कुछ नष्ट हो चुका था। कौन उसे पढता
होगा इस बात की ओर ध्यान कभी नहीं जाता था। जेल से
श्राने के दो ही दिन बाद लाहौर की एक सडक पर चला जारहा
था। जेल का भादी हो जाने के बाद बाहर के जीवन से नया
सम्बन्ध अभी कायम नहीं कर सका था, इसीलिये अपने श्राप
में निरा हुआ सिर झुकाये चल रहा था। एकाएर न जाने किम
प्रेरणा से मने सिर उठा फर एक तागे की ओर देखा, जो नभी
मेरे पास से निकल कर आगे जा रहा था । उसमें यह आश्वस्त
भार से बैठी हुई एक महिला उछ पढ़ती चली जा रही थी।
सामने ही मोड था। तागा मुग्ने पर उस महिला के हाय की
पुस्तक का फरर मुझे दीग गया। आनल्ड वेनेट की प्रामा
मुझसे ईप्या न करे और श्राप भी अविश्वास न करें यह पुस्तक
थो "भग्नदून"।
लाहौर में मोरीगेट के सामने से एसिड निकलता है,
जिस पर कितारों की बहुत सी दुकानें हैं। जो लोग अपनी
परिस्थिति में अपने को फिट नहीं पैठा सक्ते वे ही प्राय इस
-
में भूज २ सम.
मडक के चार का करते हैं, ग्याकि इसमें समोदना की
दुकाने हैं । ऐसी भी है जो दुकानों की दुनिया में 'पेरिस्टोक मी
कहलायेंगी भार एमी मा महा 'डेमोक्रेसी' की ठेलमठेल में
सड़ी, गला और फटी चियडी पिना, अन्य पिता के साथ
ही नहीं, चरिक पुराने टीन के डिब्बों, साली बोतलों, हिरन के
इक्के दुक्के सोंगों के सार धूप सेंस परतो ह। उपयुक्त
घटना के दो ही तीन दिन पाद मैं भी इसो सडक पर चस्कर
फाटरहा था।
'डेमोकनी की निचली सीमा तक पहुची हुई एक
पाह की दुकान पर मेरी तर अटक गई । सामने की ही पात
में हटा सुधा घनदण्ड थामे पराजय दूत का चित्र दीरय रहा
था-'मेरा भग्नदत'।
घटना तो इतनी ही है, लेकिन कक्षाना का महत्व घटना
से नहीं, घटना के प्रति 'रिस्सा (Response) से होता है।
भग्नटूत' को यहा देशपर सबसे पहिली निझासा मेरे मन में
यह कि यह प्रति किमी की गरीदी हुई है या मेरा ही भेंट
की हुई १ यही देयने के लिये मन पुस्ता उदार प्लाई लीफ'
।
-
सोला।
उस पर जदा पुस्तक पर्गदने वाले का राम या भेट
परा पाने की ओर से समयण का कोई याश्य लिम्बाको
साता है, उतनी जगह मेष्टी अस्तरे में प्लेए से काटकर
निकाल दी गया।
-[२]
में भूल न स- यह अतृप्त फोतृहल जीवन भर बना रहेगा, लेकिन इससे भी पढकर न भूलने वाली बात जो है वह यह कि इस 'काइसिस' के वक्त में अयोग्य मारित हुआ, गिअपना ही लिया हुआ कराड खुद खरीद लेने का यात नहीं सूझी। --अशेय -- 30
में भून न सर
'श्राप कहते हैं, मरकार ! अच्छा प्रायो माई।'
वाला हस पडा--'देखा न ।
थालिन याच ही में योल उठी-'चुप रह!
लेकिन वान अल्हड या, तागेकाले यो चिडाता हुआ
पर कोने मे डटकर बैठ गया। बालिका न जाने क्यों मिमी।
मन तनिस सरक जगह को-'तुम यहा पैठ जानो।'
यह नहीं बैठी, लिल याला से वाली'तुम यहा बैठो।
में इस कोने में बैठूगी।'
बालक नहीं माना-'नही बैटता! तुम्ही यहा येठो।'
थालिया की उमर कोई यारह तेरह को होगी । उसो
पुरमा श्रोदा था। जब उसने देखा कि बालक नहीं उठता, तो
नई सोच ले मेरे पास पेठ गई। फिर उसने पुरका उठाकर
मेरी ओर देखा। मैंने भी देखा-चालिका बडी सुन्दर, भोली
और लज्जा की मानो तस्वीर थी।
तागा अपनी रफ्तार से चलता रहा। पालक न जाने
पया क्या कह रहा था, पर यालिका शान्त थी। यह क्षण क्षण
मेरी ओर देखती। में सोवता-चालिग बडी सजग है।
इतनी छोटी उमर में इतना जागृत भार पि एक हिन्दू पुरप
के पास नहीं बैठेगी
कि सहमा चालिस योली-भाई! श्राप पहा जारहे हैं ?
में तागे में वैटा पैठा हिल उठा। न जाने
-[ १६ }-
-में
भूल न सहन
उस भाई शब्द में क्या था। मरा रोम रोम अचरज से प्रतिहत
हो पाया-इतनी सजगता! इतनी शीलता!
सभल कर म योला-'काजी होज!'
वालिका ने कहा-'यही हम रहते हैं, भाई ! लाल पुष
के पास
वागा टोकी के पास से गुजरा। बालक बोला-'मैं एक
पैसे में तमाशा देखू गा। और वह बहे जोर से इस पड़ा।
पालिका बोली-'धुपरह, कहीं पैसेमे भी तमाशा देखा जाता है।'
'म देसूगो'-वालफ फिर पोला।
लडकी ने फिर मेरी ओर देखा। में सोचने लगा-यह
भल्दा चालक ओर यह पालिका! दोनों में कितना अतर है !
मुझे उस पालिका ने जैसे मथ डाला। होजकाजी के पास
श्राने तक उसने कई यार मुझे 'भाई' कहा और प्रत्येक यार उस
भाई शन्द ने मुझे एक वडी भावना दी। में ग्रेटागार्या को न
जाने कहा छोड आया। उसके स्थान पर इस जीवित ऐक्टिग
ने मुझे जकड लिया। अाखिर तागा रुका। पालिका ने पुरका
डाल लिया और बालक की उमली पकड कर बली। मने
कहा-'मैं छोड आऊँ?
पालका ने पुरका उठाकर मेरी ओर देसा--'नहीं, माई!
हम तो रोज ही पाते हैं।
वह मुस्करा उठी। फिर हाथ उठाकर चोली-'सलाम
भाई और वह चली गई। मैं क्षण भर तकठिठक कर देखता
-मै
-
रहा-कितना म्यिर कदम, विननी सजगता, तिनी शिपठा
इस मुसलमान पालिसमें
साय: मे पक्षा--'चलो भाई, क्या सोच रहे हो ?'
मै चाल पहा, लेकिन दिलमें एक धीमारद सा उठा-
में उसे अपने घर ले चलता, पति की तरह । हिन्दू भाई की
एष मुसलमान यदि होतो
हा भाई में आप ही हिल उठा--असम्भव है। यह
असम्मर है। और मैं सोचता २ अपने रास्ते पर बढ़ गया।
उसो मुझे माई कदा १ घद माई के थर्थ जानती थी ?
श्रीराज चार वर्ष पोत चले हैं। मैंने फिर उस
थालिका को नहीं देखा। काश! मैं उसे देख पाता।
उसने मुमे भाई कहा था
भाई
-
}
-विष्णु प्रभाश्य
-[१८]
मैं भूल न सक
चार
साप्ताहिक चार अर्जुन' के सम्पादक ' श्रीयुत
जयन्त जी की श्राशा है कि में अपने जीवन की कोई ऐसी बात
लिख दू जिसे में अपना भूल न सका होऊ । परन्तु यदि यही
बात होती तो उसका लिख देना उतना कठिन न था । में एक
पक्ति में लिस देता कि जय में सात वर्ष का था तय में अपने
साथियों से 'गगा की कसम खाना सीख गया था। एक दिन
मैंने अपनी मा के सामने 'गगा की कसम' कह दी । तत्क्षण
एक तमाचा लगा और साथ ही यह डांट कि फिर कभी कोई
फमम साई तो ठीक तरह दुरस्त कर दूगी । और आज तक
मुझे वह नमावा याद है, क्योकि मैंने फिर कभी कोई कसम
नहीं पाई। बस, इतना लिस फर छुट्टी पा जाता। परनु नहीं,
इतनी ही बात नहीं है । उस बात की भार में श्री जयन्त जी
पुछ और चाहते हैं। ये चाहते हैं कि यह यान भी मा की
हो, साथ ही यह लिखीभी ऐसे दग से जाय कि उसमें 'रस'
-[१६]
में भूल न स- या जाय । परतु ऐना कुछ लिमने को मुम में पहले भी भारश्यफ क्षमता नहीं रही है और इधर गत दस वर्ष का दफ्तरथाजी ने, जो पुरशक्ति थी मी उसश एकदम अस्तिव ही मिटा सा दिया है। पर धोयुन जयन्त जो ने एक स्नेह शील यालक सा श्राग्रह फिर किया है, इसी से यहा में अपना एक पात लिगने के लिए बाध्य हो रहा है। मेरे चाचा पडित डिका सदाय शुक्ल प्रतापी पिता के प्रतापी पुत्र थे। ये फियामिद्ध तात्रिक और पीयूषपाणि वैध थे। इसके मिया एक राजपश के राजगुरु थे । सौभाग्यवश सनकी मुझ पर विशेष प्रीति थी, और स्कूल का छुट्टियों जर मैं घर पाता तब उनके पलंग के पास बैठ कर चँवरी से मश्यिया उड़ाया करता था । ऐसे समय के प्राय अपने पूर्वजों तथा अपने सम्बन्ध में पाये हुए लोगों के गुणों की तथा दोपों की कथायें सो कहा परते थे, जो यही रोचक होती थीं। चावाजी कहते थे कि उनके पितामह मुन्नालालजी शास्त्र पारगत थे और उनका अपने यहनोई पण्डित शिवप्रसाद याज- पेयी से जो पट शास्त्री थे, नित्य शाम को घंटों सस्कृत में वादचियाद होता रहता था वे यकसर में श्राकर अपने बहनोई के घर के पास हो, जहां उनकी ससुराल भो थी, यस गये थे। जब वे रावतपुर छोड कर यक्सर याये थे तब यहा के चरिडका क्षेत्र में नवदिन के अनशन व्रत के साय उन्होंने चण्डी का -[20]
-में
भूल न मान
-
प्रयोग किया था, जिसके फलस्वरूप भगवती प्रसन हुई थी
और प्रयोग को समाप्ति के ही दिन यहा के तालुफदार ठाकुर
अचलसिंह ने अचानक श्राफर आग्रहपूर्वक उनसे दीक्षा ली थी
और वे राज्यमान्य हुए थे।
अपने पिता पण्डित मगलप्रसाद के मम्बन्ध में कहते थे
कि वे उतने पण्डित तो नहीं ये, किन्तु रडे भारी तपस्सी
साधक थे और वाद को तो वे दिन रात पूजास्थान में ही पडे
रहने लगे थे। जब गदर के समय में एक दिन सध्या समय
चकसर में एकाएक यह खबर पहुँचो कि फल सनेरा होते ही
यफसर फूक दिया जायगा और यहा जो मिलेगा वह मार
डाला जायगा तर गावों के ठाकुरों ने सर से कहा कि भाग
जायो । यही नहीं, गाव के सर से वृद्ध ठाकुर देशराजसिंह
गांव घूमने निकले कि लोग भाग रहे हैं या नहीं ।
चाचा जी कहते थे कि जब वे मेरे दरवाजे पर आये तय
मैं घरराया हुआ अकेला दरवाजे पर बैठा ग। उन्होंने पूछा कि
सुषुल जी कहा हैं और तुमने भागने का अच्छा प्रबन्ध किया
है? तब मैंने कहा कि चन्द्रमणि खेरा से चैलगाडिया मगवाई हैं,
पर यापू तो अपनी पूजा में ही बैठे है और भाग चलने के
सम्मध में अभी तक कुछ नहीं कहा है। यह सुन कर ठाकुर
देशराजसिंह दडदडाते हुए भीतर घुसते चले गये और जहा
= बापू बैठे पूजा कर रहे थे, जाकर कहा-"जोन तीन हमी लोग
जानते हैं कि मगलप्रसाद सिद्ध महात्मा हैं। गोरे यह नहीं
२१
आनने । उठो, पाका बामन छोटो।" उनके ऐसा कहते ही,
यापू ने आसन छोड़ दिया और माला जपते हुए एक मोर जाकर
राहे हो गये । तर उन्होंने के मौकर से कहा-"इनका
पूना का सामान जन्दी या थोर घर के सय लोगों से यह दे
कि भाग निकासी की जल्दी तैयारी परें।" फिर बाहर आकर
चाचा मे कहा कि अगर गादिया न पायें तो हमें स्वयर देना।
लेकिन दम यजते बजते दो गादियां आ गई भोर सप मालमता
श्यों का त्यों जहा का तहाड र घर के सय स्त्री-यच्चे जो
सख्या में १६ ये उन्दी गाड़ियों में लद फर माग खडे हुप,
और रातोंरात पास के गांव चहीतर में जाकर अपने पक मित्र
के यहा ठहरे। दूसरे दिन यसरक्क दिया गया और जो
भी वहा मिला मार डाला गया, क्योंकि यक्सर के गगा तट
के एक शिवालय में ७ अंगरेज मारे गये थे। यह शिगलय भा
तोपों से उद्या दिया गया।
चाचाजी अपने ससुर पडित माधवसिंह कप्तान की भी
फ्था कहा करते थे। उहोंने सातापुर के युद्ध में शरणागत
अगरेज अस्सरी का जान हो नहीं बचाई थी, वितु रातोरात
बहुत दूर ले जाकर मुरक्षित स्थान में उन्हें पहुचा भी आये
थे। परन्तु घे अन्त तक बेगम साहर के ही पक्ष मे लड़ते रहे
उई नमक का पयान था। बादशाह वाजिदालो मी उनक
आदर करते थे। उनके समय में वे सेना में कन्तान थे।
[२२]
-मे भूल न मा
कप्ता माधवसिंह के मकान के पास ही हमारे पितामह
परिडत मगलप्रसाद एक मकान में लखनऊ जाने पर ठहरा
करते थे। इस कारण दोनों भादमियों में स्नेह हो गया था।
चाचा कहते थे कि एक बार उन्होंने अपने शिष्य, पहो के ठाकुर
भूपसिंह को जमानत कर ली। पहो से ठीक समय पर जन
रुपये नहीं पहुचे तब वे कैद, कर लिये गये । जव कप्तान
माधवसिंह फौज से घर आये और उनके फैद हो जाने का हाल
सुना तब वे सीधे यादशाह के पास पहुचे और कहा कि
जहापनाह, जर हमारे नातेदार विना अपराध के कैद हो
जायगे तय हम सरकार की कैसे सेवा कर सकेंगे ? यादशाह
पूछा, क्या बात है, तर उहोंने यार के कैद होने का हाल
कहा और निवेदन किया कि यदि तालुकदार ने स्पया नहीं
दिया है तो हम लोगों को क्या हुक्म नहीं होता कि सड़े खडे
रुपया ले था।
ने
यादशाह ने उसी क्षण वापू को बोड देने का हुक्म दे
दिया। इस बात से यापू उनके बड़े स्तर हुए। चाचाजी कहते
थे कि यही नदी, उन्होंने एक दिन मेरी ओर इशारा करके उनसे
यह प्रस्ताव किया कि तुम इस लड़के को व्याव लो ताकि
छमारा तुम्हाय और निकट का सम्यन्ध हो जाय । इस पर
उन्होंने कहा कि मेरी व्याह योग्य लडकी तो इनसे पाच वर्ष
बडी है । गापू ने कहा, कोई हर्न नहीं है । और व्याह हो गया।
----[ २३ ]-
में मूल न सक्-
चाचाजी अपने यापू की अनेक विलक्षण यातों की
चर्चा किया करते थे और पहा करते थे कि यह
म्वाधीन विचार के थे। उन्होंने भोजन यनाने के लिये एक
रसोइया रख लिया था जो सर्वथा समाज के नियम के विरुद्ध
था। एक यार अकाल पड गया था। लखनऊ से लौटते समय
उहे मार्ग में दो छोटे छोटे बच्चे पडे मिले। उन्हें वे अपने
साय लेते आये । रूपरेया से वे लोगों को लोध अँचे। उनका
घर में लालन-पालन हुआ। लडका जय सयाना हुश्रा तय धर
तो कानपुर भाग गया, पर लडको कहा जानी। गाय के लोग
उसे चिढ़ाया फरते कि उसका विवाह पौन करेगा। एक दिन
यह चुरिद्वार के घर गई और यहा से लास की चूडिया पहन
आई । जाचाजी कहते थे कि घर आने पर जब मा ने उससे
पूछा कि ये नई चूडिया क्यों पह है तर उसने कहा कि लोग
मुझे चिढ़ाते रहते हैं कि तेरे से व्याह कौन करेगा, इससे मैंने
पाया के नाम की ये चूड़ियाँ पहन ली हैं, जिससे लोगों का मुह
अय याद हो जायगा। यह सुनने पर मा' ने थापू से जाकर
उसकी गत कह दी। यापू ने पाकर पूछा कि क्या यात है।
उसो वही बात दोहरा दो । तव धापू ने मा से कहा-तो घर
पीचामियां अब इसे दे दो।मा ने तत्काल चामिया उसके
आगेफेंक दी और उसने उन्हें उठा लिया। और जर नक
जीवित रही, घरकी मालकिन की तरह रही । वह आजम कुमारी
रही, और उसने व्याह करने को कभी इच्छा नहीं प्रकट की।
-[ २४ ]-
-मैं
भूल न मा-
।
चाचा जो अपने यापू की एक और महत्व को
पात प्राय पहा करते थे। उन्होंने अपने भाई का च्याद
नजफगढ़ में मित्रों के यहा किया था। जय ध्याहने गये तय
मिथ जी यारान को भोजन तक न दे सके। लाचार होकर
- यापतियों को जामुन याकर चार दिन गुजारने पड़े। लड़की को
जिस तरह विदा किया, विदा करा लाये और लेनदेन का नाम
तक न लिया। इससे उनका वडा नाम हुआ। पास्तव में
पडे त्यागो, बडे उदार और तपोनिष्ठ ब्राह्मण थे । पाववर्तियों
को छोड कर कोई कमी नहीं जान सका कि वे किस फो उपा
सना करते हैं और क्या साते पीते हैं।
चाचाजी अपने पूर्वजों के महत्व और उनकी मान मर्यादा
फा जय जिक करने लगते थे तब कमी २ उनके पास आ जाते
थे। वे कहते थे कि वद्यराडे में उनके घर की मान मर्यादा
स महात्मामो जैसी थी। डौडियाखेरा के राज दरयार में
राज्यवैद्य का मान था ही, उधर लखनऊ में अमीर उमरा में भी
उनका बढा-चढ़ा आदर-सत्कार होता था । और पदो के
यह २ अनेक ठाकुर लोग तो शिप्यवर्ग में थे ही। सचमुच घे
दिन हमारे घराने के सोने के दिन थे। परन्तु नयावी का प्रस्त
होते ही हमारा भी अस्त होगया। सारी जमीन जायदाद छिन
गई। जिनके यहा मान मर्तया या उनका ही अब नाम निशान
तक न रहा तब हम लोगों को को पूछता? केवल
-[२५]
-में भूत RRE
पदो का श्राश्रय शेष रह गया था और उसी की महायता से
दमारे चाचाजो अपनो स्थिति विमोनर नये सिरे से फिर
पना मके थे। परन्तु पहले फामा यान भामकी- घर
समय हो नहीं रहा।
चाचा जो कहते थे कि जय गदर की अशान्ति मिट गई
और अगरेजी श्रमलदारी कायम होगा तय मरफारी ऐलान
दुधा कि अपनी जमीन जायदाद के सम्यध में जिसको गलिश
परियाद करनी हो यह थमुक नारोप तर अाकर जिले के
हाकिम के पास करे, नहीं तो फिर कोई सुनाई नहीं होगी।
जर हे इसकी पर मिली और हाफिम का पडाय पास के
एक कस्बे में धार पदा, तप ये घपने पिय पुरवा घोडे पर
सवार होकर यहा गये। पगर में अपने हलके के कानूनगो से
भेंट हुई। उन्होने कहा---पुलन, श्राप पिस फेर में है ?
श्रापका गार सागर के यहा थागी गान मारा गया है। यदि
भागीदाने के देश में घेर लिये जानोगे तो यही जहमत में
पड जाओगे। नगर जिन्दा रहोगे तो अपनी योग्यता से ऐसी
जमी और मौज फिर प्राप्त कर लोगे। चाचा जी ने कहा-
कि यह समय ऐसा ही भीषण था। जरा से सदेह पर रहे।
रईस मिट्टी में मिला दिए गए थे । अतएर यह पहाव से चुप
चाप लौट आये ओर गार य जमीनों का मागन की।
इसी तरह चाचा जा अपने घराने की मान मर्यादा की
माय चर्चा दिया करते थे जिनको सुन सुन कर हृदय को एक
-[ २६ ]
-मैं भूल न सा अभूतपूर्व तृप्ति हुआ करती थी। यद्यपि मैने उन्हें मैकड़ों घार सुना था और उनका वर्णन पार २ उन्हीं शदों में हुश्रा करता पा, तथापि उनके सुनने से जी कभी नहीं उकताता था, परन्तु उनको मैंने कभी महत्व नहीं दिया। उनका परम श्रद्धा भाजन महन्थ तो मुझे उम दिन मालूम हुआ जय राय यहादुर पण्डित राजनारायण मिश्र ने मुझसे कहा कि उनके पितानी भोजन फरते समय और माता जी सध्या का सोते समय उनसे अपने पूर्वजो के गौरव को गाथायें मुनाया करती थीं और अपनी परम्पराओं पोर सस्कृति की रक्षा को शिक्षा के लिए यही हमारे शिक्षा क्रम का प्रथम पाठ होता ग। रायबहादुर सादर की यह यात मेरे मन में बैठ गई और अपने चाचा जो द्वारा कही गई अपने पूर्वजो को गौरव गाया के महत्व को मैने मले प्रकार हृदयगम किया, यहा तक कि अर मैं उनको कमी नहीं भूल सकृगा। -देवीदत्त शुक्ल । -[ २७ ]
मननमा
"FAIR को की मेयर
गोमा पुरामा fir
me, wोगमा ARTIOnा और मिटा
पने में ना करते थे। यो पो और
मापदापमा धारदा
ही ने गाया! मी मागे गम्मरमा
उवापस मुमाले मी
या मिस्टर पने यो-"पूमने योगा।"
मसीके मेन लोटा पा पर्न गया।
रिमो पानी- "mi"
मिया कोमोरिपरी रहका गौक था
दिन पानी देर में माया गायापोटी
पर engी नार गुलाए भी पली घोमा
HAM
भूल न सकू
गई थी, यालों से भूतनाथ तेल की तेज महक आरही थी।
फैल्ट हैट ठीक करते घे योले- "गगा के किनारे जाना है।"
हौकी पटक फर मैं उनके साथ हो लिया। घूमते २ हम
सुलगाडियों को पार कर रहे थे। मिस्टर कने ने उगली से
श्शारा किया, बोले-"पहिचानता है।"
"वह तो चमार की लड़की है।"
"है तो पूयसूरत । मुझसे पव्या लड़ाया करती है।"
"तुमसे ! याद तुम पर कौन नहीं मरता है।"
"साइनों की स्कूल में आजकल पढ़ रही है।"
कुछ अंधियारा हो पाया था। यह हाथ में पानी की
गगरी लिए धाट की ओर पानी भरने जा रही थी। हम धारे २
आगे पढ़ गए। मिस्टर फने में सिगरेट सुलगा ली। इस योच
यह हमको छूते आगे निकल गई।
"मुझे धक्का दे गई है।" मिस्टर क्ने योले । मुझे
नारी का कुछ भी भान नहीं था। समझा कि थात कुछ
है
हम भी घाट पर पहुच ही गए। यहां अभी तक दूर २
अटी औरते पानी मर रही थीं। मिस्टर फने गगा से लगी एक
अची चट्टान पर बैठ गए। इतमीनान से उन्होंने एक रेशमी
कमाल की पधी पोटली निकाली। मैंने पूछा- इसमें क्या है।
"मिठाई और दो का जोड़ा।"
२६ 1
मैं भूलना
में पोटली को देखता २ ही रह गया।
"उसके लिए लाया है। जादे श्रा।"
मैं भला ऐसी बात पर ना कैसे करता। फिर अनजान
था हो। पोटली ले ली। आगे बढ़कर देखा कि वह बडी है।
भरी गगरी अकेले उठती नहीं थी। मुझे देखकर बोली-
"इसे उठा देना।"
मेंने गगरी उठाई। पोटली उसे सोपते, उगली से मिस्टर
फने को दिपनाते कहा, "उन्होंने दी है।"
उसने पोटली फेंक दी, तपाक से बोली, "उन पहना,
अपनी माहिन को दे देना।"
वह थागे २ बढ़ गई । मैमे मि० कने को मय सुनाया
तो वे चोले, "सुसरी नखरे करती है।"
आखिर क्या समझता । यह गाली और ये नखरे।
फौनसी बात ठीक थी। उलभान में था कि हम लोग उसके
पास पहुच गये।
मि० कने, यह प्यार और पुवकार से योले, "रब क्यों
नहीं लिया।"
तर जो उसने ऊचे २ स्वर में गाली देनी शुरू की तो,
मिस्टर फने भाग गये । टोप टूट गया। में उनके पछि २ टोप
और पोटली लेकर, गेह की यही पसलको चीरता हुश्रा
भागा।
नारी-प्रेम का मार और मिस्टर पाने की मारी जीपन
सीपहिनी हरियाली है।
--- 3.
M
७
५
।
में
मुल नस
[२]
एक दिन सुबह की यात है। हमारे मेजमान की ग्यारह
साल की लडकी प्रमीला ने आकर कहा "श्राप यह लापरवाह
।
"क्यों " यात समझ में नहीं आयी थी।
"चाय पीने नीचे सब इन्तजार कर रहे हैं।"
मुझे बडी हेमी आई। क्तिनी परवाह थापिर करूँ।
मन न भी परे, फिर भी घर का मान रम्य कर चाय पीनी क्या
जरूरी है। मानो कि नींद नहीं टूटती तव क्या होता।
और नोचे कमरे में मेज पर बैठ भी नहीं पाया था,
निर्मला बोली- चाय पायोगे या कोको।"
"कुछ भी नहीं। एक गिलास ठडा पानी।"
"ठडा पानी।" माजी मुझे देखती देसती बोली।
'"हा! प्रमिला कहती है, में लापरवाहतब निर्मला
पूछती है में क्या पीऊँगा।"
"भाई साहर यह सिगार मुंह से छूटेगा भी या नहीं।"
भारतीय नई सभ्यता के मुताबिक निर्मला मुझे समझा
चुकी है, सिगार उस कमरे में नहीं पीना चाहिए, जहा नारी
माय में हो । सिगार वुमा था, चुपके से जेब में सिसका दिया।
सोचा भी यदि वह निर्मला चाहता तो, क्या बात अपने में ही
दवाकर नहीं रख सकती
सुबह साढ़े सात बजे चाय, 'इस पर साना खाना, तीन
बजे फिर को को। साथ ही शाम को या तो घरकी औरतों के
7
.
" 1.
में भून न सा-
साथ खरीददारी करने याजार चलो, या फिर सिनेमा, घूमने
भी कम्पनी पाग कभी कभी जाना लाजिम है। पेटीकोट-सरकार
का हुक्म टाला नहीं जा सकता है।
मामी को जरूरत से ज्यादा फिक रहा करता है। एक
दिन सुबह जरा तीन दफे खासा कि माजी ने सुन लिया ।
कमरे में श्राफर पूछा "तबीयत खराब है क्या?
तभी प्रमिला सिर हिलाते चोली-ठडे पानी से नहाया
करते होना।"
"ठडे पानी से" मा जी ने दुहराया। "एफ लड़के फी
हिफाजत तुम से नहीं हो सकती है। जा, थर्मामीटर लाना!
टेम्परेचर देख लो। जवान लड़के लडकियों को जुकाम लगना
ठीक नहीं होता है।"
फिर जबरदस्ती मामीटर लगाया गया । टेम्परेचर ६॥
डिगरी था । वस जास्टर लगाने को व्यवस्था की गई। हरका
पुपार और भी खरार चाज है।
निर्मला वो फौरन बोली-लिर सगर है, मिगार
पीना भी ठीक नहीं। सब बन्द कर दो। सुबह नौ बजे नो उठा
ही करते हो।"
मा जी ने कहा-घड़ी घडी रात तक मत पढ़ा
करोग"
"यह तो छुटने का थोडे ही है।" निर्मला को कुछ कहना
[ ३.1
मैं भूल 7 सबू
छोटी सी बात है, निर्मला को उम् सिर्फ अठारह साल
की है। पर के एफ०५० का इनहान देगी। कोलेज में पढ़ती
है, और सुना है, उसको शादी का इन्त नाम भी किसी तालुके
दार के लड़के के साथ तय हो गया है, जो कि अग्नेपिता के मर
जाने पर रियासत का मालिक हुआ है। यह पुल सभ्यता मीस
लेन नगरकी पफनामी तवायफ के पास रात दिन पडा रहता है।
मा जी कहती है-“जवानी में सर ऐसे हा हाते हैं।
मर्दा की जात ही ठहरो।"
प्रमिला को अपनी जीजी को चिडाा में पड़ा मजा आता
है। निर्मला तो अपनी सगाई की बात सुनकर गुलानी पड़
जाती है। जैसे उसे कुछ योलना ही नहीं पाता।
तर मै अपने मन में सोचता, न हुए हमारे नाप करोड
पति और न छोड गये एक यडी जायदाद । तब हम भो मर्द की
पूरी जात पहचान लेते, नगर की किमा गण्य माय महिला के
मागे सारा वसीयत' पटक यह देते, "लीजिये जबतक चले
चलाइये, फिर वो जवानी मागी जा रही है।"
'पहाडी
में भूल न सक यात है श्राकाश के अद्भुत सप्तरग । रामधनुष के नीचे प्रति के नित नवीन अनोखेपन में बसे हुए हम मनुष्यों का जोपन भी उस विचित्रता से खाली रह नहीं मरता है- स्वाभाविफ, सीधी, सरल । कदाचित मनुष्यमान के जीवन में कमी एक दिन अया- चित रूप से कोई ऐसी घटना घट जाती है जो रह जाती है चिरस्मरणीय हो कर। जीवन में कभी ऐसे विराट विस्मय का सामना भी करना पड़ जाता है, जबकि प्रथम परिचय को छोटी बेला में रह जाना पड़ता है-विमूद, मागक। और भी जीवन में अन्त तक वह विस्मय एकविस्मय ही होकर रहा नाता है, विर- स्मरणीय होकर। सन् तो स्मरण नहीं, किन्तु उस घटना को प्राय युग सा फीन गया हनना मही ही है। लिख लिया या घगला म प्रथम M R
-में भूल जमा
उपन्यास-"सम्मोहिता" धान मुठ नहीं है कि लेराफ अपनी
रचना को लोने से बाहर रपना चाहता है। उसे लज्जा व
सकोच को प्रवृत्ति में छिपाने की वृत्ति रहती है, प्रयल । रहता
है एक प्रल आकर्षण, एक मोह अपनी उस रचना पर । कदा
चित उस स्थिति में उसका भावना, कल्पना, लेग्वनशक्ति,
सीमित रहती है। शायद इसलिये मोद उत्पन्न हो जाता हो।
चाहे यह कुछ भी रहा हो । यात यह है कि इन मर बातों से
मंसाली नहीं थी।
उस समय थी कनकता में । मेरे मामा अमर कवि
अचय सप्ते द्रनाथ की दृष्टि पारुष्ट हो गई
सध्या वेला में---उपन्यास पर । थोर इसके बाद जो होना था
चही होकर रहा। प्रचुर पाशीर्वाद और उत्साह से मेरी लेखनी
भर दी गयी। मामा जी ने स्वयं पायाम को सशाधित
किया।
उपन्यास जिस दिन प्रेम में दिया जा रहा था-उस
दिन मे जबलपुर लोट रहो यो । प्रणाम करते समय मामा
अशान्त स्निग्ध हमे । वोले "घबराना मत रिटिया, यदि में न
रह । फिर भी तेरा उपन्यास गुमेगा नहीं।"
विस्मित, रोमाचित, म स्तब्ध हो रहो--यह साहित्य के
भुयतारा मेरे मन का यात ज्ञान हो कैसे गये ? क्या यह वास्तव
मैं ही अन्तयामी है ? प्रश्न उठा पल पल में और and me
३५ ।
-मैं भूपन
कुछ सहमी सी घोली-धापन जाने क्या कह रहे है---यीच
हो मे यह इसे। यही शान, उदार, स्ने सो - तेरी रचना
मुझे अपने में भी प्रिय है।"
घर लौटी। एक नवीन उत्पाद लिए लेतीको संमारा।
रान-रात भर घेठो लिपती रहती । लगता मेग लेमनी पर उनका
पाशीवाद घुथा पड़ रहा है।
शायद साठ दिन भीम पटे होंगे। यत अधिक निकता
चुका था। घर मेरा निदा की गोद में अचेतन था। पलग पर
घेठी लिस रही थी। लेम्प के मन को रोकने के लिए. उसके
सामने एक किवाय र दी थी। तद्रासे ने मुक रहे थे।
फ्लान्ति से कलम रस पर मिर उठाया। फिर उस
दृश्य के सामन, चिमूद विस्मय मे नेत्र, अपने पाप सिफारित
हो रहे । अनतिदूर की दीवाल पर एक छाया थी। हा, और यह
मेरे मामाजमो हो प्रारति थी। अस्पष्ट, धुधनो सी। परतु
मेरी पुस्तक को उस काण्डुलिपि को मने स्पष्ट देखा। उसे रह
छाया जैसे मेरी ओर यढ़ाए हुए थी।
मने देखा और फिर देणा। नहीं, यहा पर पुछ भी नहीं
था। अपस्या उस समय कुछ कम होने के कारण शायद भय
कुछ ज्यादा था । जय माता जी को नीद से जगाया, तब मैं कॉप
-
यात सुन कर वह हसी, बोली "तू दिन रात पिता
पी ही सोचती रहती है, इस लिये ऐमाया होगा।'
[ ३६ ]-
में भूल न सक्न
कितु प्रात कान जर वह तार पहुंच गया मामा की मृत्यु
का सदेश ले फर, तब घर वालों के विस्मय की सीमा न रही।
और मेरा विस्मय तर सीमा रेखा को भी लांघ गया,
जब कलकत्ता पहुच कर मैने सुना, मृत्यु के एक दिन पहले
मेरा उपन्यास उन्होंने प्रेस से मगवा लिया था और उसे सुर
क्षित रख दिया था।
इस यान को जाने कितने ही दिन बीत गये। किन्तु फिर
भी यह घटना, वह दृश्य, नित नवीनता के साथ रात को अकेली
में मेरे मन को कभी भाछन भी कर लिया करता है।
--ऊपा मिना।
N
में भूल न सक
सात
व्य धनो, सजग अधेरी रानि है। चारों और
सनाटा है। मूसलाधार पानी पह रहा है । और उस लम्चे,
एमाफी कमर में हमारी बैलगाटो, धीमी गति से, आगे की
ओर बढ़ रहा है। कभी कमो, जर चंचल यायु वृक्षों से
गलया डाल, पाप मिनौती पेलनी है, तो पत्तियों का गम्भीर
स्वर, एक विचित्र प्रकार कामय उत्पन्न कर देता है। हम
लोग काप उठने हैं। -गाडोयान परेशान है।रास्ता ममता
नहीं। लेकिन मालिक के भग के भागे अन्धकार का भय उम
के निकट युद्ध नहीं है। मामजामा ऊपर तना हुआ है, परन्तु
फिर भी घायु के साथ नहीं नन्हीं बूदे हम लोगों के निकट श्रा
जानी हैं।
अय हम लेग एक ऐसे स्थान से गुजर रहे हैं, जहां
करत जगल ही जगल है। अधेरिया यहा और भी सना हो
उठी है। मुझे अपना हाथ नहीं सुमता। यल आगे नहीं
।
में
भूल मस
पढ़ते। गाडीगान उन्हें परायर पार रहा है। और यदि वे
यहते भी हैं, तो १० गत के फापले पर फिर ठहर जाते हैं।
रह योला-'भैया, भय, इस समय, श्रागे यदना ठीक नहीं।
ऐसी बरसाती, कालो रात में रास्ता नहीं समता।" मने अपनी
'टार्च की रोशनी से काम ले चाहा, पर व्यर्य । परसाती रात
में वह कोम न देगी, ऐसा मालूम हुआ। मेन गाहीनान को चैर्य
यघाते हुए पाहा--
"नहीं, नहीं चल । यलों को बढ़ा। पेमी गत
में यहां पड़ा क्या करेगा? कहीं कोई बदमाश ?"
श्रमी मेरी यात पूरी भी न हो पाई कि बगल में बैठे मेरे
मामा के सिपाही-- ठाकुर मादय योल उठे- 'और यह भवानी
किस लिये है ?' उन्होंने अपनी यन्दूक की ओर इशारा किया।
हसकर मैने कहा 'इससे न इन्द्र भगवान ही डरेंगे
और न यरसात ही याद होगो "
'मतलय
'मतलय यह कि तुम्हारे छरें रहा तक नहीं जा सकेंगे।'
'बदमाशों तर तो जा सकेंगे?'
'लेकिन ऐसो रात्रि में तुम उन्हें अपना शिकार
ही किस प्रकार बना सकोगे ?'
वे चुप होगए । कुछ देर ठहर कर बोले मैं फौजी आदमी
६) सममे आप ? चीन की उस लड़ाई में, में श्रदमाशों बदमाश
की परवाह नहीं करता! -बदारे आगे को गाडी।' कहकर,
तम्यासू वाली से पीट, अन्धेरे में प्रोठों के नीचे रस लिया।
.
३६]
-~~में भूजन मक
इम ऊमर के सम्बध में कई बार, अनेक किस्म की
घटनाय सुन चुका ह पिभी किसी ने कहा, 'यहा बदमाश लगते
है। किसी से सुा- 'रात को वहां से कोई उयर ही नहीं
पया। लोगों के इस प्रकार के वाक्य, इस समय, मेरे अन्दर
अवश्य नात्र रहे हैं, भले ही ठाकुर साहर मस्त बैठे हो, निडर ।
कारण, तोप का गडगडाहट और भीषण रक्तपान की अपेक्षा
इस एकात से न डरना स्वाभाविक है। परन्तु में तो अन्दर
ही अन्दर काप रहा है पर बाहर से ऐसा बहादुरह, मानो
महाराणा प्रताप!
किमकी गाडी है ? ठहरो-एक ओर से श्रावाज आई।
गाडीमान काप उठा। पोतो-'भैया, बदमाश लगते हैं।'
मैंने कहा-ठापुर सादर, गोलीभरिए।
बन्दूक में गोली भरी गयो। टापुर साहय हद थे। योले-
'पाप पीछे भाइये, मुझे आगे येउने दीजिये।' मेरी जान में जान
श्राई।
कडक कर ठाकुर साहय योने-'होशियार रहना दोस्त
में क्षत्री । तुम्हारी नान गतरे में है। इतना कह लेने के
पश्चात् गाडोगान से कहा--"पढ़ा गाडो ! श्राने दो सालों को।
देशल गा! मैं भी चार यन्दूकों के साथ हू ।"
गाडी आगे बढ़ी। -पढ़ती ही गयी। अकुर साहब
घोने-'साने कच्चे धदमाश थे, भैया।'
'नहीं। सो तो हैं, पातिल'
-[४०]
--
'भैया की यात, मैंने सेकडों को देखा है। आप भी उनके
सामने बदमाश बन जाय, फिर उनकी नानी भर डायगो। कभी
आगेन श्रायगे।
पानी और झमाझम यरसने लगा।
ठापुर घोले-'बढ़ाए चल, बढ़ाए चल ।'
'थय ! यह क्या" अचकचा फर मैंने पूछा।
'चौंकते हो क्या ?' ठाकुर साहय योले ।
'नहीं-नहीं, इधर से यह कैसी आवाजे पा रही है "
'रोक दे गाठी!' ठाकुर साहब ने गाड़ीवान को हुक्म
दिया।
गाहीरक गयो । सपने मुना, ऊपर क एक ओर से
"पन्ट, सट्ट, चट्ट-चट्ट !"
'फौजदारी हो रही है। गाड़ीवान योला !
'मुझे भी ऐसा ही लगता है। ये लाठी पर लाठी टूटने
की धापागे लगती हैं। मैंने पहा ।
ठाकुर र.योले- तुम रास्ता भूल गये ।' ..
कि इसी समय, हम लोगों ने देखा
एर फाली मूनि
जैमा मनुष्य हम लोगों के आगे सहा है। उसके हाथ में लालटेन
है। येल यिदक गये। मैं अपने आप को उस ममय मृयु में
पद्धत निष्ट पा रहा था, पर दोश भय मी कायम थे। अपर
साइय योले- 'कौन ? तुम दोन ? दूर हो, बना अमी
"
--
पन्दूप के पाट मे
.
-मैं भूल न सा
'प्रच्छा! एक तो रास्ता बताऊ और दूसरे ।
। तुम
यहा पहा पा गए ? आनो इधरानो' कह कर यह थैलों
के नथुनों में पड़ा रस्सी को अपनी ओर खींच ले चला।
टाय, ठाय!! - ठाकुर साहब ने दो फायरें की।
श्रार देया-लालटेन एक वृक्ष की डाल पर जा टॅगी
है। मनुष्य मूति गायव है।
ठाकुर साहब वोले-"घयराना नहीं भैया, देखे जायो।
में तुम्हारे साथ हु । ये साले भी क्या कहेंगे किसी क्षत्री का
वच्चा में।
गाडीवान के जैसे पाठ मार गया हो। बहुत डाट इटने
पर वह आगे बढ़ा।
'ठाकुर हो, ठाकुर हो 'सेकडा पाराजों ने जैसे
हम लोगो को घेर लिया।
'यहा मर टाकुर ही ठाकुर हैं । फिस टापुर की चाह
कोइ उत्तर नहीं। फिर वही-
चट्ट-चट्ट, पट्ट पट्ट !
श्रार 'ठाकुर हो, ठाकुर
हो ।
अब हम लोग एक ऐसे स्थान पर पहुच चुके है, जहान
तो परसात है, और न जगल हो । १५० गज की दूरी पर एक
टेण्ट-सा लगा है। सूर्य श्वेत प्रकाश है। श्रास पास की धरती
{ ४२ -
में भून मस- तक जगमगा रही है। हम लोग स्टेशन की राह खोजने के चक्कर में है और आगे बढ़े फि गाडीगान चिल्ला उठा-'अरे बाप रे यापयहुन बचे। श्रागे तो कुआ है।' भय के कारण मैंने अपने मारे विस्तर अपने ऊपर श्रोह लिये थे। अन्दर से सब कुछ सुन रहा था। तय ज्यादा श्रायु न थी। पढ़ता था। और अनायास ही, उस दिन,स्टेशन केलिये चल देना पड़ा था, यद्यपि चलो समय मामा ने कहा या-मानसिंह उस नगरवाले ऊसर से न जाना। क्योंकि रात को वहा ।' घेल खोल दिये गये। रात भर उसी स्थान पर डेरा डला रहा- तो सो गया था। ठाकुर माहन व गाढापान रातभर रक्षा के लिए जागते रहे। सुबह हुआ तो देखा कही पुश्रा , श्रागे लोगों से मालूम हुअा - यह स्थान बहुत खतरनाक है।पई व्यक्तियों को भूतों ने मार डाला है। अक्सर ऐसा होता ही रहता है।-पहले-पुराने समय में बहा एक बहुत बडो फौजदारी हुई थी। कई व्यक्तियों की जानें गई थीं। अपने पति को पचाते समय एक स्त्री भी काम थाई थी। यात काटकर मने पूछा-"और 'ठाकुर हो, ठाकुर हो' फ्या यात है ?" हा, यह फौजदारी दो क्षती दलों में हुई थी। मैंने कहा न कि एक स्त्री अपने पति को बचाते समय मारी गयी थी । वह -[ ४३ ]-- -~~-गै भून न सम- प्रेत के रूप में प्रस्ट हुई है, ऐसा हो लोगों का विश्वास है, और अक्सर वह अपने पति का नाम ले लेकर धुलाती रहती है-'ठाकुर हो । मंदिन में भी सनसा सहा रह गया । रोमाच हो श्राया। डर के मासू छलछला श्राये। फिर उस दिन हमें गाड़ी नहीं मिल सको। परतु उस दिन वह चीज मिली, जो शायद जोवन भर मिल सके धाम भी रात्रि के घने अधिकार को देखकर यह घटना श्रायों के समत नर्तन कर उठती है और कानों से पूछिये उन्हें क्या सुनाई देता है-ठाकुर हो -लक्ष्मीचद वाझपयी। [ ४४
मैं मूल न सकू
आठ
"घटना सन् ३३ को है। ११ जुलाई को मैने याया
से कहा कि कालेज को शिक्षा के लिये में काशी विश्व विद्यालय
जाना चाहताह । उत्तर वडा विचिन था-
"तुम जाते तो हो पर हम शायद तुम्हे फिर न देस
"ऐसा कही हो सकता है, गाग?" पोर में इसे उनके
वात्सल्य की कोई सनक ही समझा था।
काशी पहुच फर विश्व विद्यालय में पड़ी फठिनता से
मेरा दाखवा हो सका। यह मय झमेले थोर दिक्कतें एक
स्कूली विद्यार्थी के लिये बेशक पहाद हैं। मैं श्रव भी कभी उन
दमी की, पर तत्थ्यमय, घटनायो को प्रेम के माथ याद पर
लेता है । पुलपति मालवीय जी का याासन, प्राचार्य भय
पी दया, धी दे का गुरुत्व, इस जीत मे भुलाये न भूलू गा।
तो यह घटना कहना शेष ही है।
१-
में
भूल न मई
ठीक तारीख स्मरण नहीं। सम्भवत २४ जुला रही
होगी, मुझे पहले जाडा-चुगर भाया और धीरे २ वही टाय
फारडम बदल गया। प्रतिदिन सुबह शाम डास्टर का श्राना
और सारे दिन मेरा दानालय में ही रहना होता था।
चिरला छानालय के 'बी' क्लास के ५५ नम्बर पमरे का
जीवन मेरे सारे जीवन से अलग पड़ा है।
३० जुलाइ की मध्या, शाम को टेम्परेचर १०२ डिग्री
था और डाक्टर ने दिन गिन कर कहा- "श्रमी १ सप्ताह
यार भी लग सकता है।" दवा की व्यवस्था कर के डाक्टर
चला गया।
रात को जल्दी ही मैं सोगया था। एशएक नाख पुल
गई। दया ३ बजा है । और, साथ हो सरहाने की सुली खिड़की
म से मने देखा कुत्र पुछ पानी भी गिर रहा है। रात विनकुल
अधेरी हा थोर माथ ही मैन देखा, वास का कटा सिर, यही
चश्मा शोर श्रा, मुह, मू, सब कुछ वही, यहाँ उस खिडकी
कठोर बीच में लटक रहा है, और में भयभीत सा होकर भी
हद बना रहा। मने चाहा वि पास में मोये अपने साथी को
जगाल, पर घर स्वप्न लोक में भूमण कर रहा था। और न
जग मा। यह क्टा सिर लगभग ५ मिनिट तान मेरी
जगती थाग्यों के मामने लटका रहा। मैं रहता और विश्वास
से बह माना' फिनय में रिलाल जाग रहा था, मोया न था।
-[ ४५ ]-
मैं भूल न त
फिर में सो न सका । घर पर अनिष्ट की यात मेरे मन
में रह-रह कर थाने लगी और थोडी देर पढे रह कर म उठ
पड़ा। शौच हो कर माघो को पुकारा। माधो मेरा यदा सास
और श्रद्धालु सेवक था यह सन् ३४ में मेरे काशी से पाने के १
मास बाद ही मर गया। योर जिसकी याद मुझे अब तक
छेदती रहती है।
मैने स्वामित्व से कहा
माधो घबरा गया। मैं अपने श्राप उठ-बैठ नहीं सकता
था और तर में वराडे में घूम रहा था। उसने कहा "धावू
अन्दर चलिये-" उसे मेरी अवस्था पर भय हो रहा था, पर
"मेरे नहाने को गरम पानी, श्राधा
घंटे में, वाथरूम में पहुच जाना चाहिये।" माधो यह भी जानता
था कि छानालय का डाक्टर ७ बजे से पूर्व न श्रावेगा तथा उसके
अतिरिक कोई भी नहाने से रोकेगा तो भी में न मानू गा। और,
किसी तरह जिद और नादानी से में नहा लिया। ६ वजे टेम्प्रे
चर १०३ डिगरी था। अलोगढ़ को पाने राली ट्रेन १ बजे
चलती थी और डाक्टर के मना कर देने पर भी में उसी ट्रेन
से चल देने को रिलकुल तैयार था।
अलीगढ़ सुबह ५ बजे वह ट्रेन पहुची और ट्रेन में
टेम्प्रेचर १०४ डिगरी तर हो गया था। अलीगढ़ उतर फर में
अपने एक मित्र के यहा चला गया। अलीगढ़ से मेरा गान
विजयगढ़ केवल १८ मील है। पर ७ मील कच्चा रास्ता है, और
म तो हमारा गाव एक टापू बन जाना है, इसी कारण
घया भूतु
--
में भूल न सा
से में सोच रहा था शिपिस प्रकार अपने गाय में जल्दी से
जरदो पहुँच सस्ता । युमार इतना तेज था कि उठी में भी
मुझे चपथर माते थे और भी मुझे लगता था कि कहीं यात्र
पन में बताए पर प्रामीण ज्योतिषीको भविष्यवाणी, फि मैं यही
उमर 7 पाऊगा, सत्य ही न निस्ने । मुम अलीगढ़ में घर की
पुशल देने वाला योहन मिला। यहा से तागे पर चल कर
परीव २ यजे मैं घर पहुचा।
घर में पड़ी थग्यस्था थो । याहर के,याया और पिताजी
के बैठने के, पमरे गाली पड़े थे। मुझे अनिष्ट का मान म जाने
क्यों बढ़ता ही गया कि रिना पूरी में बुरी तरह से रोने
लगा था। अन्दर से पिता जा, दादी, चाचा और सब आप
और यिना पुच कहे वह भी अपने शार नरोर सके। यात भर
साफ था
पीछे मुझे पता लगा कि ठीक उसी समय कल रात ३०
जुलाइ को ३ बजे बाना इस दुीिया से यात्रा पर गए। जय कि,
उन अन्तिम दर्शन मने अपने घर से ५०० माल दूर चैठ पर
भी कर लिये थे।
श्रर भी लिखते २ मेरा मन भारी हो पाया है।
-अक्षयकुमार
[४]-
-pan
मैं भूल न सक 3 नौ एक पुरानी कहानी कहने चला । पात उन दिनों की है जर भावों को तोड-मरोड कर शब्दों का माया जाल रचना नहीं सीखा था। कथा कारों के स्वप्निल ससार में भटकने की भी कमी कोशिश नहीं की थी। लेकिन पता नहीं किस देवीशक्ति में एक दिन सहसा मुझे उसी ससार में जा पटका। फौलिज के दूसरे साल में पढ़ता था। उपन्यास और कहानियां पढ़ने का शौक लग चुका था और कल्पना भी पर फड़फड़ाने लगी थी। लेकिन फलम पकड़ना तो एक नौसिखिये का मांति भी सीख न पाया था। इस लिये कभी टूटी-फटी लकीरें सींचने कामी साहस न फिया था। उस दिन मुझे लाहौर से अमृतसर अपने एक निक्ट- सम्बधी के यहा जाना था। गाड़ी के जिस डिम् में में सवार हुआ, उस में भीड़ कुछ अधिक नहीं थी। इस लिये मेरी इच्छा. नुसार मूझे सिटको के पास पैठने की जगह मिल गई। मेरे [ ४८ ---
में मूल न म
पास वाले डिरे में हर भीतर बहुत चहल-पहल थी । एक
दुक्ला-पतला युवक फलो से लदा पहा था। उसके इर्द गिर्द
पुछ स्त्रिया और पुरुष थे सिर पैर की हाक रहे थे। उनमें से
एक-दो बडे बूढे चिल्ला चिल्ला कर शिक्षा और उपदेश के
वाक्य दुहरा रहे थे। ऐसा मालूम देता था कि युवक महोदय
विलायत याना के लिये जा रहे हैं। एक-दो क्षण में उस दृश्य
पो देखता रहा। फिर सहना मेरी दृष्टि उन से कुछ ही दूरी
पर राडे एक कुली पर आ पड़ी। उसके कपड़े थे तो पुलियों
के से लाल-लान, पर थे बहुत ही स्वच्छ भार ,निसरे हुए।
उसका रंग गोरा था, श्राय यडी पड़ी और ललाट उन्नत । वह
मुस्कराते हुए नेत्रों से विलायत याना और उसके साथियों को
भोर देख रहा था। उसके होठों पर एक व्यग्य-पूर्ण हसी खेल
रही थी। पेमा मालूम देता था मानो यह उस दृप्य को एक
दिल्लगी समझा रहा हो। ऐसा अनूठा कुली मने कभी नहीं
देखा था। इस लिये उत्सुकता उससे बातचीत करने के लिये
तड़प उठी। मने सकेन से उसे अपनी पोर जुलाया। इस से
पहले कि वह मेरी थोर बढ़े, एकाएक झटका देकर गाडी हो
चल दी। यह जहा का तहा खटा मेरी ओर देखता रह गया।
रेलगाड़ी पटरीको चीरती यल सती हुई भागने लगी।
-सकी घरघराहट के शद ने चारों ओर नाधिपत्य जमा लिया।
पर तु मेरा ध्यान तो उस कुली पर ही अटका हुया था। उसके
-[ ५०]----
-मैं भूल न मा व्यक्तित्व के ईगिर्द मेरा मस्तिष्क रोमास के ताने बाने चुनने लगा। उसके घर और बाहर के धुधले से चित्र मेरे चारों ओर मडराने लगे। श्राहिस्ता आहिस्ता वित्र स्पष्ट होते गये और अपने माप ही एक खला में बंध गये। गाडी अभी कुछ ही मील गयी थी कि उन चित्रों ने एक रोचक कहानी का रूप धारण कर लिया। गाडी के अमृतसर पहुचते पहुचते तो उस कहानी का एक-एक वाश्य, एक-एक शब्द निमित हो कर मेरे मन पर अकित हो चुका था। उसे झट-पट लेखनी-बद्ध करने के लिये में बेचैन हो रहा था। अमृतसर स्टेशन पर गाडी के ठहरते ही म भाग कर बाहर निकला। टागा पकड कर सीधा अपने साथियों के यदा पहुचा। योग्य अभिवादन के याद में उतारली से कलम- दयात और कागज दूढने लगा। 'क्या द्द रहे हो ?' सम्यन्धी महोदय ने पूछा। 'फागज और फलम दवाव ।' 'फ्यों ? "कुछ लिखना चाहता है।' 'तुम्हारे सिर पर कोई भूत तो सयार नहीं हो गया? जर दम तो ते लो। कुछ सा पी तो लो। 'नहीं। खाना-पीना सप पीछे होगा। रुपा करके मुझे कागज, पलम दवात ददाजिये।' [ ५१
-मैं
भूल न सत्र
कहा से दूर कर एक टूटी-फूटी पेंसिल और एक कापी
जिनके पृष्ठों के एक श्रोर यचों ने ड्राइ ग कर रखी थी उहोंने
मेरे हवाले कर दी। मेरे लिये यही गनीमत थी। उस कापी
श्रार पंसिल को ले कर म मकान के एक कोने में छिप कर जा
बेटा और अपनी कहानी लिपो लगा।
मेरी फ्लम सरपट दौडने लगी। शद और वाक्य विना
प्रयास किये ही उपयुक्त स्थान पर बैठने लगे। कहानी अपने
श्राप विकसित होने लगी। प्रधान घटना (Climax) कर
पायी और चली गयी, मुझे पता भी न लगा। कोई घटे, डेढ
घटे श्रदर मैने सारी कहानी समाप्त कर दी।
अब में कहानी ले कर उस एकांत कोने से निकला तो
मेरे चेहरे पर शान्ति के वि इ आ चुके थे। सम्बधी महोदय
मुस्करा कर बोले, 'अथ तुम कुछ होश में मालूम देते हो । क्या
लिख कर लाये हो"
"एक कहानी।"
'पहानी" उन्होंने चकितनेत्री से मेरी पोर देगा 'तुम
कब से बहानी कहने लगे हो"
'श्राम से ! सुनोगे?
अब मैने कहानी शुरू की तो गृह-स्वामिनी भी था गई।
म पानी पहता चला गया और वे दोनों मत्र मुग्ध की तरह
भूिल म पेठे उसे सुनने रहे। कहानी सत्म होने पर दोनों के चेहरों पर श्राश्चर्य नाच रहा था। अनायास दोनों के मुह से निकला- 'यह कहानी सचमुच तुमने लिया है, क्या ? 'हा श्रापके सामने ही तो लिख कर लाया है।' 'सूब रोचक है।' गृहम्यामी ने कहा । 'इसे किसी अपार में मेज दो। गृहस्वामिनी योली। 'क्या छप भी सातो है ?" मन शकित सर में पूटा । 'श्रवश्य । श्रापिर यही तय हुआ कि कहानी किसी पत्रिका में मेषी जाए। उन दिनों कानपुर की 'प्रभा' यहुत सुदर निकल रही थी। इसलिये निश्चय यह हुआ कि पहले उसे ही आज माया जाए। इस से दो तीन दिन बाद उस कहानी की ठीक तरह से पाट लिपि धना और “कुली" शीर्षक दे कर मने उसे 'प्रभा' के सम्पादक महोदय के पास भेज दिया। चाये पाचवे रोज ही उसकी स्वीति का पत्र आ पहुचा और फरवरी १९२२. की 'प्रमा' में यह प्रकाशित भी हो गई। इस घटना को आज श्रठठारह वर्ष होने को आये हैं। इस लम्बी अर्याय में मैंने कई कहानिया, नाटक, समालोचना आदि लिखीं, पर जिस सहज-स्वाभाविकता के साथ मेरे मस्ति फम दल कर मेरी यह पहली कहानी निकली थी वैसा फिर -[ ५३] V-
मैं भूल न सक
सास सिर पटकने पर भी न हो सका अविश्वसनीय
स्मृति पहा से और कैसे मा गई, यह रहस्य आज तक भी
सुलभा नहीं पाया है। उस कहानी की निर्माण गाया न भूला
हम फी भूल सरना । और उस कहानी के लिये जो
ममता मेरे हृदय में है यह वर्णन से परे को चीज है।
"दि यह यात है" मेरा यह लेख सुन पर श्रीमती शर्मा
योली, "तो यह पदानी तुम्हारे सग्रह में स्थान क्यों नहीं पा
"इसलिये कि उसकी हल्की से हरकी विपरीत समा.
लोचना भा मेरे मन में हाहाकार छेड़ सकती है। फिर उसे
समालोचकों के निर्दय हाथों में कैसे सोप दू, तुम्ही बताओ।"
"याल अची नहीं" यह सिलखिला कर इसी, “यपि
इसमें कनित्य श्रवश्य है।"
मेरे लिये यही बहुत था।
-पृथ्वीनाथ शर्मा
m
-[ २४
मैं
मूलन सक
7
-
उस घटना को हुए बरसों बीत गये, पर यह दिन
क्या कभी मुझे भूलेगा। दिन ढल चला था और उसके साथ साथ
ही मुझे अपनी आशा भो ढलता जान पडती थी। पक्षी गण
अपने अपने घरो को लौट रहे थे। उस सूने जगल के पास
गली में जो धु धला प्रकाश चमक रहा था, यह भी धीरे-धीरे
मन्द पडने लगा। मुझे ध्यान आया फि दूकानदार पाना याने
के लिये घर लोट रहे होंगे। भाजी की टोकरियोंवाली, टोकरिया
ले कर अपने घरों को चल दी थीं। उस शून्यता में में हो एक
पुष्टरीय यालिका के साथ यही अपने सूने पथ को निहार
रही थी। राधिके अधकार के साथ-साथ मेरे हृदय का अन्ध
कार भी धना होता जा रहा था। दूर क्षिनिज पर दृष्टि डालने
से यह निक्ट जान पडता है, पर जितना ही हम उसके समीप
पहुंचने की चेष्टा करते हैं, यह उतना ही दम से दूर होता
जाता है। इसी प्रकार मेरा घर मुझे बिरकुल पास जान पडता,
-[ ५५ ]-
में भूत न सई- पर जितना अधिक म उसके निकट पहुचने की चेष्टा करती थी, उतना ही अधिष बद्द मुझसे दूर होता जा रहा था। यद्यपि वनमाली में ग्रीष्म का मध्याकालीन हप्य बहुत ही लुमा वना लगता है, और उस दिन भी वैसा ही रहा होगा, उसी तरह श्राशश में चन्द्रमा मुस्कराया होगा, तारे भी पिलखिलाये होगे, परन्तु मेरा ध्यान इधर कहा ? धीम धीमी ठडी हवा चल रही थी, पर मुझे तो ऐसा प्रतीत होता था, मानों मेरा दम घुट जायगा। दूर से भयभर शब्द सुनाई देने लगे थे। चाहे यह पापाज साधारण ही हो, पर उस दिन तो मेरा मन रह-रह कर फाप उठता था। मैं स्वय थक कर चूर-चूर हो रही थी, और 'चालिमा यह तो मुझ से भी छोटी थी। मैंने कहा- शाति घलो तुम्हारे घर ही लौट चलें। मुझे रास्ता दिखाने श्रा कर तुम भी आफत में फस गयीं। दोनों चल दिये । १ घना हो गया। न जाने कहा कहा हमने चक्कर लगाया, औरतिदिन गलियों की ग्याक छानी । पर हमें उसका घर भी न दिपाई दिया। मेरा दिल इय रहा गा, और हम दोनों में ही योलने की शक्ति नहीं रह गयी थी। सपेरे १० बजे से ले कर हम घरावर इधर से उधर घूम रहे थे। और दिन भर की धूप हमने अपने सिरों पर ली थी। मुझे क्या करना चाहिये ? मेरे दिल मे प्रश्न उठा, पर कोई सन्तोष जना उत्तर न मिला। मेरे छोटे से मस्तिष्कने सोचना बन्द -[ ५६ ]
न सक
कर दिया था और मैं शान्ति का हाथ पकड मशीन की तरह
चली जा रही थी। सहसा सामने को तरफ रेल को लाइनें देख
फर मैं चौक पडी। हम शहर पार करके जगल में श्रा गये थे।
सूर्य पश्चिम में डूब रहा था, और वृता पर पक्षियों का क्लरव
सुनाई दे रहा था। हमने न खाना पाया था, न पानी पिया था।
और न सारे दिन में जरा भी विश्राम लिया था। शान्त रोने
लगी। मेरी भासों के आगे अधेरा छा गया। इस जीवन में
क्या कमी घर पहुच सहगी, मने सोचा, और मुझे भी रोना
आ गया। माता पिता और भाई बहिनों की सुरते मेरो पाखों
के धागे घूमने लगो, और जो में आता किसी तरह उठ कर
उनके पास पहुच जाऊ । पर कोई पाय न था। हमारे पैरों म
हाले पट पड कर फूट गये थे, होठ सूप रहे थे और मुह पर
याइया उद रही थीं। पग पग पर ठोकरें साते हम दोनों चले
जा रहे थे, रेल की लाइन के साथ साथ! सोचा
स्टेशन श्रा
जायेगा। फिर सयाल आया कि यदि गलत दिशा में चल रहे
होंगे, तो तो क्या होगा? मेरे मस्तिष्क की नसें चटपती
जा पहने लगीं। मुझे ऐसा अनुभव होने लगा, जैसे मेरे दिल
की धड़कन बन्द हो जायगी, और मै वहीं गिर पड गी। पर
विपत्ति के समय मनुष्य में गजर की ताक्त या जाती है । मैंने
अपने को सभाला और लौट पडी। और फिर उसी गली के
फोने पर श्राफर हमारे पैर रक गये। पर अन्दर जाने का साहस
ने हुन जाने हम कितनी बार पागलों की तरह वहा से स्टे
-[५७
,
।
मभूषन
शा की तरफ गये और पाये। दूकानदार सानामा कर वापिस
या धुके था यह मर के मय मुसलमान थे और मुसलमानों के
प्रति पर भयानक श्राशया मेरे दिल में समायी थी। कपा
परम उन दोटी छोटी धानों में दीपक जल गये, पर मुझे ऐसा
लग रहा था मानों, अन्धयार रूपी राक्षम अपनी लाल-लाल
निशान था फैलाये में निगलने को दीपा चला आ रहा हो।
यह जगल जिसने बिनने ही पशु पक्षियों को शरण दे रफ्नी थी,
बद्दी छोटी सी दुकानों वाली गली, हमें लोहे के पिंजरे के समान
दिसायी देता या, उनमें से निकलने का कोई मार्ग दृष्टिगोचर
न होता था।
दम छोटी छोटी यच्चियों का यहा कोश न थापर
मुझे ऐसा अनुभव होता था, कि सर की प्रास हमारी तरफ
लगी है, और यह हमें उक्षा ले जाने के बारे में कानाफूमी पर
रहे हैं। पर जय कोई चारा न रहा, तो मैं साहस करके उस
गली के पदर घुसी। सब लोग आश्चर्यभरी भाग्दों से हमारी
तरफ देखने लगे। मैं एक बूढ़े दूकानदार के पास था पर टदर
गयी। पर मुम में रास्ता पूछने की भी शशि नहीं रह गयी थी।
उसने स्थय ही पूछा -- "तुम इतनी घबरायी हुई क्यों हो बेटी ?
तुम्हारा घर कहा है "
सहानुभूति के दो शद सुनते ही मुझे रोना 'या गया।
मेरी हिचकिया यध गयीं और मेरे मुह से एक भी, शन्द में
-[ ५-]-
.
-
-
मैं भूल न सक
निकला। यह अपने सादी से धीरे धीरे कुछ बातें करने लगा।
मेरे दिल में फिर सन्देह का ज्वार भा गया। जरूर यह हमें
उडा ले जाने के लिये पश्यत्र रच रहा है। मेरे पैरों तले की
धरती खिसकने लगी। इतने में बूढ़े ने फिर मेरी तरफ देखा
और मुझे समझाते हुए बोला
"रोमो मत बेटी । चलो, में
तुम्हें पहुचाये देता है । कहा जानोगी?"
पड़ी मुश्किल से फापती हुइ थानाज में मने रहा
'नहर का पुल' और शान्ति का हाथ पकडे हुए में उसके पीछे
पीछे चल दी। श्राशा और निराशा की तग घाटी में अन्धकार
का सहारा लिये म चुपचाप चली जा रही थी। पल पल पर
शका उठती थी यदि उसने घर न पहुचाया तो
। ठगों को
जयान बड़ी मीठी होती है।
थाखिरकार नहर के पुल पर बिजली की रोशनी मुझे
दिखायी दे ही गयी। मेरा दिल यासों उछलने लगा। उस
रोशनी, उस सडक, स पुल फो में रोज ही देखती थी, पर
आज उन में जो विचित्र श्राकर्षण या, उस की समता न थी।
मुझे उस समय इतनी खुशी हुई, जितनी जीवन में कभी न हुई
होगी
पूढे ने "अब तो यतादो, कि तुम यहा अकेली
पैसे पहुच गयी थीं। तुम्हारा घर कहा है ?"
श्रय फहीं मेरी जवान खुली पोर मैने यताया फि डाऊ
-[ ५६ ]
में भूल न मा
घगले के मामने हमारा यगला था, और जैनियों के मेले में मैं
नौकर से अलग हो गई थी।" वह इस फर योला
"अटी वारली हो पिटिया। पहले ही हमसे रास्ता क्यों
नहीं पूछ लिया था।"
सचमुच ही यदि मेरे हृदय में मुसलमानों के प्रति इतना
सदेह न होता, तो मुझे इस प्रकार सारे दिन भटफ्ना न
पडता। श्रर भी जय कभी साम्प्रदायिक दगा होता है, और
मुसलमानों के प्रति विद्रोही भागों से हृदय भर उठना है, तो
मुझे यह घटना याद ग्राए बिना नहीं रहती। उस दिन मने
समझा कि मानव हृदय प्रेम का स्थान है, और कोई धर्म रिसा
जाति विशेष को इस देवी गुण से यश्चित नहीं कर सकता।
युमारी दमयन्ता
watime
M
न
और थे दो शरीर एक प्राण, जैमाnिtra
गर्मी है एक गिलास पानी
मैं
से वचफर सुखी रहना, यह दोनों ही पान
काटन
परन्तु जीवन में कौन सुखी है और hिak
श्रवश्य है । वाह्य जीवन में, अधिकांग,
का निणेय करना सरल नहीं। मममदाने
को अपने ऊपर सतोप के सायन्सयम
भूल न सकू
ग्यारह
-व्यावहारिक जीवन में कुमfarent
या सफल दाम्पत्य जीयन में इंटरमुख
शि
ससार में यदि प्रेम
दुप के साथी, क्षण भर का
उठता
उसकी पराकाष्ठा थी।
1
उस दिन कमरे में प्रेरणा
-
मन दमा उदय यो पर अधिक उलाम, अध
को मुमराहट और भागों की अनामे घमर किमी अभूतपूर्व,
प्रानन्द या मरना दे रही थी। पर नीने रगका लिका र
से मिपाल पर मेन पर जानते हुए यह तुरन्त पुध सिमने
के लिए उनी गीर मेज पर जा बैठे।
मुम एमा तगा जैसे मरे मम्निक के प्रतियोमल
नतुओं म दुध विकार सा उपा हो गया है।मिर भारी और
हत्य में नाम ज्या के सायनमाय टीम मोहोने लगी
"इतने रनों के बाद मिलने पर भी प्राप्त इन प्रयाश क्यों
दी है. इस विरहिया धारण ?' कौतूदमयश मज पर पहा
हुप्रा लिफाफा मने उठा लिया, पर था उनी पूर्वपरिचिता
पिसी एक रमणी था। मेरा मस्तिष्र घूमने सा लगा, यह
तमय भार से लिपन में व्यस्त थे। पर पिमा विशेष धाशय
यदुत दिनों से पुशल समाचार न पाने का
शिकायन तथा अपनी का एक पुस्तिका शाध ही लौटा देने
का श्रादेश, साथ ही उन पुस्तिका के ऊपर पाठक को समति
भी मानी गई थी। पत्र पढ़ कर धीरे से मैने ज्यों का त्यों यथा
स्थान रख दिया। फिर देपा
यह इसी पन का उत्तरतनी
तरनीनता के साथ लिख रहे हैं। कुछ विशेष नहीं
ही पत्र लिपने को विवशता, लेखिकों की स्मृति में मराधन
नया पुस्तिरा से मोह उत्पन्न हो जाने के कारण ही अर तक
से पूर्ण न था
-
-
में भूल न सा
लौटा सके इत्यादि । भविष्य में परन्थ्यवहार में श्रुटि न होने
देने का वचन भी देना न भूल सके थे, अन्त में उक्त पुस्तिका
की प्रशसा करते हुए पत्र समाप्त कर दिया गया।
उस दिन का वातावरण जीवन में प्रथम पार ही मेरे
लिये इनना भारी और कठोर सिद्ध हुआ कि किसी भी कार्य
में मन न लग सका और न किसी से एक भी शब्द
थोलने की इच्छा हुई, दम घुटा सा जाता था और जी भर
कर रो लेने की इच्छा पल पल बढ़ती ही जाती थी। उहीने इस
दशा को लक्ष्य किया या नहीं- यह म नहीं जानती - शायद
नहीं, और तभी मैने निष्कर्ष निकाला कि या तो यह भावुक ही
नहीं, पर फिर कोरे अनभिज्ञ अथवा आरश्यक्ता से अधिक
विचारशीय और लापरवाह है, और इसीलिये अनधिकारी तो
है. दी।
-
अपने अपर बड़ी ग्लानि और आत्मसमर्पण पर पश्चा
त्ताप इतना अधिक हुआ कि उसे कभी भूल न सगी, जीवन
अन्य के इस प्रथम पृष्ठ को।
दूसरा :-
भोजन से निवृत्त हो पर जब हम दोनों बैठे
समय मन और मस्तिष्क वडे शान्त पार प्रफुल्ल थे। जीवन
की श्रनेरु प्रिय और अप्रिय घटनायें अतीत के गर्भ में मौन
पड़ी थीं। इस समय किमी के लिये भी कोई स्थान शेष न बचा
-[६३ 7-
उस
में भूत ने सा
--
था 1 मानो वर्तमाका यही एक क्षण हमारे समस्त अस्तित्व
को समेटे बेठा है, कभी कुछ था भी नहीं, और न धागे
होगा ही।
पन्चे ने सफेद रग का लिफाफा ला कर मेरे सामने रख
दिया, - 'श्रापका यह पर श्राया था। मैंने उसे खोला और
पहिली ही केवल दो लाइनें पढ़ कर पत्र लापरवाही से माल
दिया, उसम पर मम्बन्धी के किमी पार्य सम्पन्न होने की
निराशा प्रगट की गई थी लेषक थे मेरे एक परिचित
सज्जन । अस्तु, पन्न रख कर में विसी श्रावश्यक कार्य में लग
गदा इतनी ही देर में मने देखा कि उनकी भाव भगी उग्र रूप
धारण कर मुझे सशरीर निगल जाना चाहती है,-
'क्या यात
है " कह कर मने उनके मनोगन भावों को समझने और जानने
की चेष्टा की। कोई उत्तर न दे पर वह मीधे उठ कर पड़े हो
जैसे कि इस समय के दूपित चातावरण में उनका दम घुटा
जा रहा हो - और यह कहीं दूर, यहुत दूर भाग जाना चाहते
हैं। मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा-
बींच पर बैठाते हुए मैंने तीन स्वर में पहा-
"अाखिर घात क्या है, बतलाते क्यों नहीं ? विना यत
लाए एक पदम भी न उटा पाश्मोगे।"
अमला कर ने कहा "मुझे कुछ नहीं मालमा
गदी ज्ञानता तुमको ही पता होगा यह सय
[६४]
पल पूर्वक उन्हें
में
भूल न मम
भाहत पती के समान तिलमिला कर मने पल भर में
परिस्थिति को भाप लिया, तरसे यहुत दिन पहले की एक
घटना ने सहसा ही मेरा ध्यान आकपित किया । भाउस्ता
चीत्कार पर उठी, वह चुपके चुपके प्रासू यहा रहे ये, और मैने
आद्योपान्त वह पन पढ़ डाला, उपन्त सजनन ने फेल किसी
कार्यवश अपने श्राने की बात लिखी थी-पार कुछ नहीं ।
मेरे लिये यद्यपि यह रिपुल साधारण रात थी किन्तु
उनके लिये सचमुच असाधारण, फिर भी मैंने उनके मनोगत
भारों को समझा योर स्रागत किया।
यद्यपि थव वह सर यातें दूर की रह गई हैं, अनुभूति
। के आधार पर केरल परपना का विषय मात्र, किन्तु फिर भी न
जाने क्यों ? मैं इन दो पृष्ठों को आज भी जब तय सूने में पढ़
कर सिहर उठती है।
म भूल न सत्र वारह श्राज नाद-दस दिन से यरायर उनकी याद मा रही है। सफेद पागल पर, हा बाली रेसाभों में, उनको उता. रने में पुछ विशेष भान द का अनुभव नहीं कर रहा हू । उन को तो मानस पट पर देखने में ही में अपने जायन की चरम मार्थफ्ता मानता भाया ।किन्तु श्राज साहित्य को ऐसी भाष श्यक्ता या पढ़ी है। इसी से विवश हो गया। मेरे पर सुहृद हैं। उनकी भी याद, इस सम्यध को ले फर, इस समय हो श्रायो। श्रोक यार उन्होंने, कुछ सो विस्मय के भाव से और कुछ अविश्वास और उपहास के भार से भी मुझ से कह डाला है-"तुम्हारे जीवन में तो मि० वाजपेयी, ऐसी कोई यात है नहीं, जिसे देखकर में सिहर उठता, किंतु तुम्हारे साहित्य में यह अथाह रसासव कैसे लहराता है ! मैं तो इसे कृत्रिम समझता है ।" सदा ही उनके इस श्राप पर मैंने इस दिया है। श्रात्मा के यधन स्रोलकर वै मुझे देख नहीं पाये, -[ ६६ ] mpan ---मैं भूल 7nt --- . समझ नहीं मझे। नहीं तो ऐसी पान पद्दते हुए टनकी याणी प्रसिद्ध हो जाती माहित्य में रम के अगाध को देखकर भो ये यद करना चाहते कि पद धिम है। थोर, उनके भर का दम्म मान लेता है कि उन्होंन मुझे इतना देखा है कि श्रय कुछ भी ऐपने को उन्हें शप नहीं रह गया है। उन्होंने इतना भी समझने की चेप्टा नहीं पी कि सप्टा का पहले देय पर याद में ये सृष्टि देगना चादने है ।-पितु सृष्टा को देय पाने की क्षमता फ्या मनुष्य प्राप्त कर माता है ? पर इस यात को अय यहीं ममान रिये देता। हा, तो इन दिनो उाफी याद यराबर या रही है। उनका नाम में नहीं थनाऊगा । परिचय भी ग्नका वालकर न दूगा। इतना ही कहना चाह गाफि उनसे मेरा कुष्ट एमा नाता था कि वे अपने यात्मीय जना के सामने भी, म्यत तापूरक, मुझ से इस घोल मरती थीं । वियाह उनका उसी वर्ष हो गया था और मसुराल से लौटयर आये हुए थोडे ही दिन हुए थे। पहली बार उन्हें उस रूप में देखा था। यों देना तो अनेक पार पहले भी था फितु उतने निकट से नहीं । याने भी पदले कमी नही हुइया । यह यात उस समय की है, जर मैं, मन् १९२१ के लग- भग, कानपुर में 'ससार' नामक एफ मासिक पत्र का सम्पादक प्रारम्भिक शिष्टाचार के बाद, उस अपने फोलाहलपूर्ण -[ ६७ ]
घर माथे पर मार से मेरे पाम मा पदी हु । मैंने ध्यान
सदमा - तो मुझे बहुत प्रसन्नता हु। योला-बार
तो पति हन"
उम समर ताममुपा पत्रपत्रिकामों में, मरी पुण
पारिता प्रशित थी । गद्य लेग दोहा चार निकले थे।
में। दमा प्रश्न के माथ ये थाहा मयुचायी । तभी जो
क्छ धागे करना चाना था, पद नही मकी और उनी यह
पहना हो पान अधूरा रा गयी। फिर तुरन्त मैने और भी कुछ
रेगा, उनके श्रधर पर ही नहीं, उया और म चाप पर मी.
मरहम पेन रहा है।
और उसीरियप में मने कह दिया-मे वा !"
उनकी रूप राशि का यान नदी-गा। जिसने मुझे
पाणी म धेग दिया है, यल दिया है, माण और प्रतिष्ठा दी है,
जीरन भर थमन ।। अमृत मुझे पान पराया है. उसके रूप या
पर्णन करते मुझे समोर होता है। यद्यपि मेरे साहित्य में यह
कहीं कहीं शायद मना भी पड़ा है, जयपि उसे साष्ट करने का
प्रयत्न मैने कभी नहीं किया।
उन्होंने मेरा बहुत स्वागत-सत्कार पिया। अपने हाथ से
शरयत यनाकर पिलाया, साना तैयार किया और भोजन करते
समय, पान ही धैठ पर, पे मुझ पर या झलती रहा । उस
समय और कान पौन-सी घातें उदोंन की, पूछी और मुझसे
[६८ -
-में
भूल नसा
सुनी, इस समय वे सर विस्मृति के गर्भ में जा पही है। कौन
जानता था कि एक ऐसा भी समय भायेगा, जर इन बातों का
भी कोई महत्व माना जायगा । कौन जानता था कि उनकी उन
गातो की धूमिल स्मृतियां ही मेरी भट्टना को भारती के थाल
पर, दाप शिवा की भाति, जगमगा उठेगो। नहीं तो उन्हें भी
ज्या-का-त्यों उतार लेता, कागज की इन किम रेखाओं पर।
दोपहर दल चुकी थी और मुझे उसी दिन, योडी हो
देर बाद, लोट थाना था । ट्रेन पकड़ने का समय भी निकट
थारहा था। घर के यार लोग विभिन्न म्याना पर मो रहे थे।
मैं चलने को तैयार बैठाया । उसा क्षण वे मानुम नहीं किधर
से पायीं और मेरी पीठ से लग कर उन्होंने मेरी यासों की
पलकों पर अपनी कमल-नाल सी उगलिया रख दी। मेंने हाथ
स्टोले और कह दिया-"जानता हूँ ! तुम कौन हो।"
फ्लहासमयी, वे, स्वर बदल कर बोलीं-"यतलाश्रो न ?"
मैने तुरन्त कह दिया-"कल्पना ।"
और वे सिलखिला कर तालिया बजाती हस पड़ी।
वह खिलखिलाहट भोर वे तालिया, उस समय कौन
जानता था, एक जागृत स्वप्न फी भाति मेरे अन्तरपट पर सदा
के लिए मुद्रित होकर रह जायगी।
पलग पर से उठने ही वाला था कि वे मेरे राम कच
से लग गयीं। उनके वे शरण कपोल उस समय मेरी घाई
पनपटी पर थे। उस समय में मन ही मन जिम स्थिति पर जा
पटु धा, उसे श्राजता पद भूल समाज भी ये शीतल
पोल मेरे प्राणों के म्पन है थोर सदा रहंगे । जानता है।
सरति क्या वस्तु है, धर्माधर्म का मयादा का दाना भी सम
मता, क्तिना है । साहित्य-ममीक्षायों में ग्राण्यामि प्रेम
से मर्म पर वासना के श्रारोप की फक्किकारे भी गूप देखी हैं।
मन्तु वह सग्ल-चपल श्रात्मदान निरा पासना मूल था, कमी
नहीं मान सपना-कमी नहीं।
हा, नो मेरे वाम सर से लिपट पर उन्होने पूछा---
"अन्दाधर परायोगे ?"
मौजे पहन चुका था और जूतों में पैर हाल ही रहा था
कि अनायास मेरे मुह से निकल गया-"यह नहीं सकता।
श्राज हो मुश्किल से इतना समय निकाल सका।"
इसके बाद में चला पाया । याद शाता है,शायद चलते
समय मी एक गर उन पर दृष्टि गयी । श्राखों को पुतलियों
पर एक मलमल मलमल ज्योति मी चमक उठी।
इसके याद फिर कभी उई देख नहीं सका मिहीनां याद
मुना था- यामार हैं और ससुराल म है। न वैसी सुविधा
थी, न वैमा मन, कि उस दशा में भी उन्हें देख सकता । दिन
चलते गये और तीसरे वर्ष मेंने यह भी सुन लिया कि वे इस
मसार म नहीं है।
-[७]-
में भूल न सक- लेस्नि म आज तक, कभी, यह अनुभव नहीं कर पाया कि वे सचमुच नहीं हैं। क्या आप विश्वास करेंगे ?-जयकि, मैं उन्हें भूल नहीं सकता-भूल नहीं सकता, और -भगवतीप्रसाद बाजपेयी। ना मैं भूल न सक तेरह -जीवन में जो अनायास श्राह और मधु निखेर क चली गइ, उससे ही एक कहानी कहने चला हू । उसरी या आती है तो चित्त भारी और दिल सजन होने लगता है। मान यदि वह रार यार पाती रही तो दुख या सागर जो र- पडा है, फट कर यह निरलेगा । और तर में श्राकुल हो- उसे भूलन का प्रयत्न कर लेना चाहता है। मेरे जीवन गागर में उसने अपने सम्पूर्ण प्रेम उहल दिया कि मुझे लगा मानो परिवार की उपेक्षा श्री जगत का तिरस्कार इस पाचन प्यार के भागे टिक न सके उसे हट टू पर विपर जाना होगा। और भोर जीवन म ांधी की भाति प्राकर और प्रलय के उप चाले हाहाकार पव पास की तरह जाकर उसने जीवन को और शन्य बना दिया है। [२] - -मैं मूल न सक यह जीयन की प्रेयसी थी या कौन थी-यह श्राजतक मैं नहीं जानता। स्मृतियों के लेख को देखता ह तो लगता है कि उसने मेरे जीवन में अपना यह रोल दिया है, जिसे कोई सक्षा नहीं दी जा सकती। जो भाषा से परे है और 'एक्स प्रेशन' से भी आगे को श्रोर जिसकी मुकुमार गति है, चालना जिसने जीवन में मस्ती का प्याला दुलका दिया और जेससे जीवन के अणु अणु में नेहोशा थोर प्रलय जैसो मतता फैल गयी-उसके विक्षिप्त उत्सग को उन्मादकारी २. उदभात गाथा को कैसे भूल सकता ह । सुनसान रज में अब भी यह कहानी वायु के प्रकम्पन से पीपल के पत्तों को नरह डहर उठती है और तव में काप उठता ह ! श्राज वह इस दुनिया में नहीं है और तर म अाप मय के समक्ष उसके एक पत्र को पढ़कर सुनाये देता है मिसमे उसने प्रेम के बारे में अपने स्वतन्त्र विचार प्रकट किये हैं। बुनिये- "जीवन में अनायास ढग से मुझे तुम मिले। तुम्हारी नेयसी तो नहीं लेकिन प्यार की प्रतीक नारी का कुछ ऐसा -प तुम्हारे सामने रखकर तुमसे कृतार्थ ले अपनी सारी पृत- इना को दे देना चाहती थी । तुमने मेरी तपता को लेकर नुझे कृतार्थ क्यिा? यह मने क्यों किया ? क्यों अपने को तुम्हें दे डाला ? इसलिए कि यदि तुमको मेरा प्यार नहीं मिलता तो जीवन का घात तुम कर बैठते ७३ - ?
-म भूल नम
"पोर दरसल इसलिये अपने जीवन की ओर जब मैने
गया तो मुम ऐसा लगा कि जीवन की शाश्वतता का यही अर्थ
है कि नारो पर से और नर नारी से निरवर प्रेम पाये । यह
प्रेम ही हो जिसे गमकर मानव सृष्टि के प्रारम्भ से जीवन की
पीडामयी मंजिल को तय करना या रहा है। यह प्रेम की लो
जर तक उसम जलती रहेगी वह जीवन को पालोस्ति करता
रहेगा-जगत को प्रकाशमान यमा सकेगा। जिस क्षण यह
घुमी नि मानो नर और नारी प्रास्मान म उड़ जायेंगे। यह
पृथ्वी त्वरा चाहने लगेगी।"
पत्र को 'फिनिशिग टच' देते हुए उसने प्रेम की विश्य
ध्यापक्ता एन मानवता के प्रति अपनी अनुरागशीलता के बारे
मे श्रमजी के अमर कवि शैली के प्रति मानवता के अनन्य
पुजारी स्वर्गीय देशमधुचितरअन दाम द्वारा समपिन पनिता-
धद्धाजलि की कुछ पनिया लिखकर भेजी है
O God! Whose heavenward face beamings
With Passionate Loveliness, is a light
For all eyeg! Thou whose angel heart
Has wept many a bitter tear
The wronge of much oppressed humanity
और श्राज जय में इस पत्र को लेकर जीवन के श्रापुल
क्षयों में अपना वर्तमान सतप्त दशा पर पुछ सोचता है,
तो
मानो जीरन की उस प्रेयसी के माय हो माता और पिता के
[७४ ---
over
में भूनन मह
ये सुनहले दिन भी मन में फिर आने है जो अब केवल एक
स्मृति मर रह गये हैं। पितु सुनहले दिन उन्हें कैसे पह, जय
मैं उनके जीवित रहते उनके प्यार को नहीं पा मया-जो मुझे
मेम के यारे में इतना भी नहीं दे पाये, जितना में उनसे आशा
फरता था और जो मुझे रुलाफर मृत्यु के अन्तरिक्ष में समा गये
है। यह सब में जय याद करता है तो दिल में एक पोटा
और दुरा दिए जाता है। और तय में जीवन की उस अंगात
मेयसी के पावन स्नेह को कोमल एय स्निग्ध स्मृतियों को याद
पर के कुछ दलका हो लेता ह-यथा के अञ्चल में अपने
विपादग्रस्त भारी चेहरे को छिपा कर रो उठता है ।
-विनोदशकर पाठक।
।
-[ ७५]
मैं मूल न मक
"
चौदह
-"तुम्हारी तो शादी हो रही है न?"
"हा"
"पिर रोती क्यों हो?"
"म इस शादी से राजी नहीं है।"
"क्यो ?"
"जीजा जी मुझे मारते हैं, तग करते हैं और
"और शायद यह बूढ़े भी हैं।"
लड़की की नजर नीची हो गई। उसकी प्राखों में श्रास
हलछला उठे।
"रोयो मत। ऐसा कभी नहीं होगा
"भय्या!"
इस से आगे यह न बोल सका, नो न बोल सकी, इस
पाच फूटे मरान में से कुछ औरने उस मे पूजन कराने
श्रा धमकी। गराय लडकी मेरी श्रोर कातर दृष्टि डाल
"
-[७५ ]-
मे भून सा
चलो गई। उमग"भय्या" शब्द मेरे दिमाग में घर कर गया,
माथा मनमना गया । मुझ जैमा ५ साल का यालक फ्या पर
सकता है, यह विचार मुझे परेशान कर रहा था । सोवना
मममना हुधा में पापाने मकान में स्नान करने चला। हमारे
मशन में, जिसमे हम रिराये पर रहते थे, नन नहीं था और
जिस नल का हम इस्तेमाल करते थे यह हमारे 'गुरु' जी का
था।
"क्यों माइ ! तुम शादी तो पर रहे हो लेकिन किसी
जाति वाले ने पुरा भला माना तो?" एक हकीम जी ने लडकी
के यदनोई से कक्षा ।
"यद सोलहवा (जूता ) पडा है, उन साले जाति यालों
के लिए--यन्दा तो मोहर याध फर ठाठ से शादी करेगा।"
मेरे सामने ही यह पात हुई । क्रोध को पी जाा पडा।
शाम को हम लोगों की पचायत थी। मैंने एक पन लिपपर
सर मामला पचों के सामने रख दिया। चाचा जी (पिता जी)
फो कानों धान भी पर नहीं पड़ी। पचायत में सलबली मच
गई । चाचा जी सशक्ति हुए। चिपय पर बोले और जोर
से इस प्रकार के विगद का विरोध किया। मेरे ददिया ससुर
१० ख्यालीराम जी बडे दयग श्रादमियों में से थे, फौरन ही
दराडा सभाल कर उठ खडे हुए। भीड चल पडो। मकान पर
पहुच कर एक आदमी ने लडकी को हृदय से लगा लिया :-
[७]
2
अंग'धरम ने ग्यिो न जामा क माय शादी करेगी या
न'लसपी ने सिर दिनाकर पदा-"ही"
शादीनदयो यमाली गयी। ०४-२०२१ की
डान भर की इस घर से उस पर मै, कमी उम घर से इस
या में लश्का शरण आता रहा।
2
सदशा फ भाइ पौजदारी दाश दायर किया, सेरह
ग्यशियों पर मागों 74हा तरद यादमी अन्दे मर्दा होते ।
रोगह पनों पर, यदनोद पी राय से स्नगागा दायर दुधा।
भाइ या निमोनिया हो गया और नियदिन इस्तगासा गरिन
दुमा गरीय उसी दिन चल यमा ।
पहनोइ ने भादोरानी में दावा चल गया । लडकी ।
जन मिनट के सामने स्पष्ट शादों में शादी से इनकार पर
दिया । श्रर पाया प्रशसरपरस्ती या लक्ष्मो की यडी बद्दन
दरम्यान दा "म नमदीया रिश्तेदार इलिये मुझे घली
घनाया जाय । और मैं इनती गरी शि अदालत का सचं
परदाश्त नहीं कर सकती हू, लिहाजा सरकार मेरी तरफ से
तुद पैरवी करे।'
हम लागा की ओर से लडकी के पासाने दरवास्त
दी। मामला रखा उलझ गया।
हमारे यफोल माय ने कहा -"हजूर । जो औरत
इतनी गरीय है कि ४-५ रपये श्रदानापर्च भी घरदाश्त
में भूल
नहीं कर माती, यह भला शादी मे तां दो मो स्पया कैसे सर्च
कर सकती है ?"
चात यदुत मा की रही । जज मि० नट ने (जो शायद
प्राजक्ल इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज है) यहिन की दररयाम्न
खारिज कर दी। लडफी ताऊ के यहा पहुचा दो गयो ।
*
*
प० गोपालप्रमादजी रापत के इलारा फरीन करोय सभी
साथ छोड गये। चाचा जी-धी० ५० देवीप्रसाद जी दीक्षित के
सिर श्राया शादी का भार । मुझे खुशी यो, एक घहन मिल
गयी। मेरे कोई यहिन थी भी नहीं। लडका सोजा गया।
शक्लोशगदत का अच्छा और यरमरे रोजगार । डिस्ट्रिक्ट योर्ड
के पर स्कूल में नोकर :-प० दशरथममाद शर्मा । सारी रस्में
अदा की गइ और शादी कर दो गई । जिस बहिन को इतनी
मुश्किल से पाया उसे सिर्फ तीन दिन में दूसरे का गृहलक्ष्मी
बनाकर विदा कर दिया।
लोग जो देखते ये ताज्जुय करते थे, हम दोनों को शक्लें
एक दम मिलतो थीं । यह अपने इस भाई से क्तिना प्रेम करती
धी यह लिख कर नहीं बताया जा सकता। एक यार ऐसा हुश्रा
किमास ने 'विष्णु' को मारा-हम उसे रिश्ना' न कह कर
विष्णु ही रहते थे। इसी दौरान में यह भी कहा कि त् मर जा,
-- --
में भूल नए
तेरा मय्या मर जाय, तेरै चाया पार चाची मर जाये । “विष्णु
ने उत्तर दिया "मेरा भग्या मर जाय सो तेरा लड़का नहीं मर
जाय" -क्तिनी मोनी यो गरीय ! यह भी न सोचा कि वह
फ्या वात स्मिके लिए कह रही है ! जय ५० दशरथ जी ने इस
यान की शिकायत मेरे चाचा जी से की तो उहोंने "पहिन
विष्णु" को फटकारा । यहिन ने रो-रो कर कहा-"वह (सासु)
तुम्हारे पार चाची के लिए चाहे जो पुछ कह लें, मेरे भग्या से
कुछ भी कहेंगी तो अन्दा न होगा।" उसकी निस्वार्थ मिट्टी
भावना का यह उदाहरण कैसा प्यारा था। हम साथ-साथ
मेलते खाते एक दूसरे को मारते और विदा होते समय रोते
भी । मुझे सन्तोप था कि यहिन मिल गयी है, मैं ससार में
अकेला नहीं । भाइ वाला नहीं सही, बहिन वाला ही सही ।
*
सुनहले पस वाले पक्षियों की तरह समय न जाने का
उद्द गया। विष्णु इस समय अपनी गृहस्थी सम्हाल घुफी
थी। वह मसार के रगमच पर श्रय एफ पन्या को माना हो
चुकी थी और में एक मामा । मूल-नक्षत्र में पैदा होने के कारण
२७ दिन बाद उसकी शाति हुई और उसी दिन जय में चादी
सोने की चीज लेकर विष्णु के घर गयाउम समय हर्ष के मारे
जमीन पर पैर नहीं पड़ रहा था। नन्ही सी "भुनी' को
जेर पहिनाए-गालिया सुनी और न जाने क्या-क्या सुना।
-[२०]
भूल न सक
परन्तु इन सब के याद जो कुछ भी सुना वह कभी कोई न सुने
पही मेरी हादिकन्छा है।
*
-
विष्णु यीमार हो गई। प्रसव के बाद से हो वह जरा
मान्त हो गई। अन्तिम समय में उमफा पेट फूलने लगा। वैध
और हकीमों ने हाथ खींच लिया। में भी कई मर्तया उसे देखने
गया थोर 'मुझे रोते देख फर उसने कई धार मुझे धीरज
येधाया
उस छोटी सी विष्णु ने अपने यह भय्या कोशान्ति
देने की व्यर्थ चेष्टाय कीं। पी-कभी वह मेरे माथ स्वय भी
रापडती । सुदिन के चित्र हमारी नजरों के सामने पिच जाते,
हम एक दूसरे की प्रतिमूर्ति होते हुए भी एक दूसरे से अलग
रए जारहे थे, इस भीषण श्राशका से मेरा हृदय काप उठता था।
शायद मेरे भाग्य में 'यहिन' का सुय था ही नहीं। जिस विष्णु
ने अपने सहोदर यंधु की मौत पर दोवू दास भी नहीं गिराए
थे और मेरे लिये अपने सुहाग-सर्वस्य पर भी ,ठोकर मारने की
चात फद्द दी धो यही विष्णु मेरे सामने से चली जा रही
था और में दो हाथ और दो पैर रसते हुए भी कुछ नहीं कर
पा रहा था।
चाचाजाने और बेचारे ५० दशरथ शर्मा ने परिश्रम के
इसमें रात दिन एक कर दिया, रपया के ढेर के ढेर सर्व कर
दये । मनौतिए योली, दीपक प्रचलित किये, परन्तु उस दीपक
- मनन
को कोई मी मागी प्रवलित नहीं कर सका जिमा पुन जाने
में मेरे हृदय फपर कोने में मार भी गहरा है।
-
पुरुष याद है। मेरी दियगनाधर्मपलो (धोमती कपूर
यो) शायद चौर-पून्दे को महालने में व्यस्त थी, इसी
समय षिमी ने श्राफर--'
-'विष्णु मर गा।"
"मर गयी !!!" शरीर मनमाना चाचा जी और
चागे दोनो यदी थे। घर पर था और मेरी पतो। पत्नी के
साब से थाली घट पड़ी। एसा जान पड़ा मानो मारा दिर्गादगी
मनमना उठा हो । मफा में पोर में यने हुये तुमसी स्तम्म के
सहारे में यहाकायदा ही रह गया। पासों के मांस रुक
गये थे। हृदय गति पय मद सी होती जान पड़ी। कहा तो
मुझे अपनी पत्नी को धीरज देना चाहिये था, पहा मेरे ही
धीरज या पाच टूट गया। चाचा जा जय श्मशा से लौट कर
घर आए सो पार, पद कोहराम मया कि यस । हम लोग
मासुओं मे नहा उठे।
**
2
.
अपने मोटे से जीरन में इसके बाद अपने चाचा जी को
सोपा, पुत्रो का विछोह देपा, धर्मपत्नी काययोग मिला और
न जाने कितरिन घटनामों का सामना करा पड़ा।
यिस्मृति के गर्त में प्रमशः सभी घटनाए विलीन होती
जा रही है और हो भी जानी चाहिये क्योंकि यही विश्य का
में भूलन नियम है। मुम में भी बहुत से परिवर्तन हुए हैं। भाज, मेरे पास निज की फोठी है, पैसा है, यश है, फयिता है थोर न जाने क्या-यया है। दूसरी सुयोग्य धर्मपत्नी (श्रीमती कमला यती) भी सौभाग्य से मिल गई है, जो एफ सैशन जज की सुपुत्री हैं और छोटा मा यच्चा, कुमार श्री देवेन्द्र दीक्षित भी है, साथ ही मा की छपव्याया भी। सन् १६२८ से श्राज तक कास की सेवा के कारण और राष्टीय कविताओं की वजह से मुझे प्रेम करने याले भी कम नहीं हैं, परन्तु ज्योंही किसी 'देवी को में 'बहिनजो' कहकर पुकारना चाहता है ,तो एक भीषण विभीषिणा, विष्णु का चित्र नेत्रों के सामने था जाता है। शायद मेरे भाग्य से किसी को नुकसान पहुचा हो तो --तो क्यो न माता जी' कह कर पुकारा कर । इसी लिये जब पिसी को हिन कह कर पुकारने की इच्छा होती है तो विष्णु सामने श्रा जाती है। उसने कुछ प्रभाव हो पेमा छोड़ा है, मेरी अन्तरात्मा पर,कि म उसे भूल ने सकू। -श्यामसुन्दरलाल दीक्षित, मैं भूल न सर पन्द्रह -सनातनधर्म कालेज के विद्यार्थियों के स्नान के लिये तिवारी घाट एक प्रसिद्ध जगह है। मैं भी उन दिनों वर्धा पिननी धार न गया हगा । म्याम यसा रमणीक - शास्त- और पाचन स्मृतियों को जागृत करने वाला है। कभी-कभी हम देखते वहा पुराने पानपुर क बहुत से यालक, सभी उम्र के लड़के लफ्यिा स्नान करने आते और विमा पिसी सकोच के वे सभी साथ साय गगा स्नाम करते, तैरते और यद-यद कर गोते लगाते। उममें एक लडकी अधिक चचल, और सुन्दर थी-क्तुि, सजीली सी, (शायद यह उन सय में बड़ी होगी) मेने अनेक दिनों में उसे का यार देखा था। उस दिन रमायधन का दिन था। इस से पहिले मेरी यहिम ने एक लिफाफे में याद करके मेरे लिये रक्षा और तिलक रोली चायल मेज दिये थे। तव -[४]
में भूलन सक
लिफाफा मिलने पर मुझे थोड़ा दर्ष हुश्रा था, किन्तु उसके अन
न्तर में पुछ क्षण के लिये चिन्तामग्न हो उठा था। अपने माय
पर स्वय रोली घोल फर तिलक चढ़ाने का भाव मुझ पुछ
अधिक पसाद न पाया। थस्तु, ज्यों त्यां फरक याच का रात
पटी।
अगले दिन धावलो फर्म के लिये में फिर तिवारी घाट
गया, और धोती, तौलिये के साथ मैंने यह लिफाफा भी रख
लिया।
घाट पर पहुच फर देखा, मो दृष्टि सूने में घूम फर
लौट आई । मैंने अपने मन को, यह कहकर कि शायद में सवेरी
श्रा गया ' कुछ श्राश्वासन दिलाया। और स्नान आदि को
थोडो देर के लिये टालता रहा। फिन्तु, फिर निराश हो कर
मैंने हा डाला और तय मेंने देखा फि, जिसमें प्रमो चर्चा
पर पाया ह, यहो लड़को घाट के बराबर वाले मन्दिर में जा
रही है। मेरा मन खिल उठा। परन्तु फिर मुझे एक मकोच ने
सोचने लगा
मैं इस पर अपना प्राशय किन
शब्दों में प्रगट करू फि यह ठोक ही समझ जाय, पर समय
विचार के लिये अधिक नहीं था। मैंने देग्या यह जाने को थी,
और तभी मैं तुरन्त ही उसके सामने जा पर योला
'यहिन!
यह रोली चावल मेरी यहिन ने मेजे हैं, क्या तुम टीका फाद
पर यह राणी मेरे हाथ में न पाध दोगो ?'
[५]
श्रा दयाया
-
---में भूत ने मत
पद मुन पर लडको कुए महमी और मैंने याद लिफाफा
भागे पढ़ा दिया। उसने निशद मेरे माथे पर टीका कर रासी
गाध दी।
मैं एनम हो गया।
उम समय कन्या की मुद्रा और मेरे मनोमाय विचित्र
थ। मुझे आज भी यह सब याद है, किन्तु शब्दों में कदाचित
प्रगट करमा
कारण दि यह अनुभूति को यात अधि
है। इस घटना को पोई १० वर्षे योत घुफे होंगे, रितु ममे
भआज भी यह कल पी-सी पात याद है। मैं उसे भूलन सफगा।
-छप्पचन्द्र शर्मा चन्द्र
-
मैं भूल न सकू
सोलह
.
शायद अफ्ट्यर सन् १९३७ के दिन थे । (ठीक
तारीख भी मेरे पास कहीं पड़ी है, लेकिन उसे दूदना पड़ेगा।
अगर यह दास्तान पढ़ने के याद भी आपका श्रौत्सुक्य जाप्रत
रहा तो घेशक मुझे लिप्पिये, मैं ठीक तारीख, वक्त और जो भी
जानना चाहेंगे यता दूगा।)
में रात को दस बजे की गाहो पर रावलपिंडी से मवार
होकर सुपह सात बजे के करोय लाहौर पहुचा । सामान मेरे
पास ज्यादा नहीं था, केवल एक महा मा पिस्तर, क्योंकि
तीन चार दिन के लिए ही घरपालों से मिलने लाहौर मे याहर
गया था। इसलिये मैंने तागे पर पाठ श्राने जाया करने की
यज्ञाय सोचा कि क्यों न मानसरोवर यस सविन का उपयोग
परू ।(यम सर्विस का पास्तविक नाम दूसरा है)।
उन दिनों जहा तक मेरा सयाल है, यह यस सरिस नई
शुरू हुई थी। लाहौर की श्रायादी छैलाप से ऊपर है, ऐसा
[01-
TT
।
म भूल न सक
T
सुनते हैं। लेकिन वहा ट्राम या यम की मुविधा नहीं है।
सिर्फ यह एक नाम मात्र सर्विस शुरू हुई थी, जो सिर्फ स्टे
शन से शहा होतो हुई गिला पचहरी के मोड पर माल रोडको
छुपाता में नहीं जानता जारी है या याद
अस्ता मने इस यम का उपयोग नहीं किया था।
यानी श्रमीरता लोगों की तरह चाहे भोशात हो या न हो, मैं
भी सिविल लाइन्स में ही रहा करता था। तांगे पर यावर ही
गाहर से घर पहुंच जाने को श्रादत थी । जहा तक "सम्भव
होता या शररे अन्दरं घुसने की, गस्तविक लाहौर देखने
को, भी कोशिश नहीं की थी।
लेफिन थाज सयानफ किया और 2 पाने धना लेने की
पातिर ड्राइवर के वराघर धाली सीट पर, बिस्तर पैरों के नीचे
जमार, बैठ गया और शहर की तरफ श्याना हुश्रा।
लाहौर को ऐतिहासिक पडक, जो पाश्मीरी, काबुली,
शाद प्राली, लाहौरी धार भारो दबाजों को जोडती है, गदगी-
यदयू और गागुज्यार में अपना सानी नहीं रखती। राजधानी
पी एर शाहा सहक होने की हैग्नियत म यह एतया उसे मुना
सिरही है। सपर चलते हुए मेरा कसना के लिये अपनी
चौगिरद से बहुत दूर भाग जाना अनिवार्य हो गया।
मुझे याद नहीं 'स' आहिस्ता जा रही थी या तेज़
अगर सडर पर श्रात नात ज्यादा होती तो शायद यही रफ्तार
तेश मालुम पहनी, लेशिन बाजार तकराचन साली था।
-[2]
२
मैं
भूल न मई
• पक गर मेरी समाधि ट्टी,क्योंकि मैने देखा,सामने सडक
कोदाइ तरफ, एक यारह चौदह माल का होक्रा, अपने सिर
कलिहान से बहुत वही टोपी पहने, अपनो टागों के लिहाज़ में
बहुत ऊची साइकल चलाये जा रहा था, पक मजाक अगेन
अदा से । में कुछ मुस्कराया । लडके ने घूमकर पीछे देखा।
मने पर घमा सा महसूस किया। व्रकों को किच किच हुई,
साइकल सिनेमा के क्लोज-अप की तरह नजदीक ना, लडा
श्रोमल हो गया, एक और धक्का सा लगा, पहियों ने जैसे
अपने दातों के नीचे कोई मान चीज चवाई हो। लेकिन लारी
रुकी नहीं। एक फुट, दो फुट, चार फुट, दस फुट । पहियो में
से फिर कडकने की थापाज श्राई । लारी रुकी।
"मने पालसा ड्राइवर की ओर देखा, उसका चेहरा
फागज हो रहा है । मुझे उसके अभी तक वहा धैठे रहने से
नफेरत हुई। में उठा, लेकिन साथ ही सयाल पाया कि श्रय
उठने से फायदा मया फिर मी सडक पर उतर कर मैने
अपनी श्राखो को पहिया के नोचे झुकने पर यावित किया!
लडका पिछले पहियों के पास साइफल के तुढे मुडे
लोहे में उलमा पहा था। लहू पहना शुरू हो रहा था। इर्द गिर्द
लोगों की टाग और पैर इकट्ठे हो रहे थे । लेकिन जिस
तयाही की धाशा था यह नहीं थी।
मलारी के दूसरी तरफ भाग फर पहुचा । अमी तक
किसो ने लड़के को हाथ लगाने की कोशिश न की थी । मने ..
-
मैं भुनन
ड्रायर की मदद से घसीट कर उसे निकाला। जितनी समम्
मुझ में धी उसके मुतापिर मो उसके जिस्म को स्टोला।
देया कि यह यान को वजह से यहोश हो गया है, लेकिन
चौट ऐसी नहीं थी, कि यच न सके। लेशिन उसे फौरन अप
साल पहुचाना लाजमी है।
मैं ड्राइवर से यात कर रहा था कि एक पपी उमर का
थादमी हमारे पास मा खटा [श्रा और चुपचाप हमारी तरफ
देखने लगा।
अचानक मेरित होकर मैंने उससे पूछा-
"ए जातक तुहाडा ए ?"
"मेरा पुत्तर ए।"
यह कह पर भी न उसने मुफ्र लडके के मिस्म
को हाथ ही लगाया और न ही कोई थायेग ही प्रकट किया।
स्तग्ध सा होकर घर जमीन पर पड़े हुए ढेर की तरफ देखता
रहा, जैसे सोच रहा हो “या सुदा! इतनो सवेरे भी ऐमा हो
सकता है।"
मने उसे समझाना शुरू किया।
"मिया जी" में उसकी शक्ल सुरत से पहचान गया था
कि यह मुसलमान है । 'हाइपरदा कोई कसूर नहीं। ए जानक
दी विस्मत सी। लेकिन एयक्त सोचन दा नहीं । इस नू
फौरन अस्पताल पहुचाना चाही दे। इश्वर करेगा यच जायगा।
तुसी वी नारी बिच बैठ जाओ और साथ चलो।"
-में
भूल न मा
,
न जाने क्यों, बूढ़े की आखों से ऐसा लगने लगा मानो
उसने अपनी सारी श्राशाए मुझ हो पर छोड़ दो हैं । कहने
"हा, जैसा तुसी कहो।"
लेकिन अभी हमारी यात सतम नहीं हुई थी कि मैंने
पेसा योसियों भादमी, अधिकर मुसलमान, दौडे पा रहे हैं ।
सौरी के मुसाफिर पहिले हो तमाशाइयों की तरह छोकरे के
गिर्द घेरा डालफर खडे थे, श्रय और भी भीड़ जमा होने लगी,
जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं था। परिस्थिति दार्थों
से निकलने लगी।
my
.
तरह तरह की श्रावाने उठने लगी । "क्या हुश्रा है ?
पैसे हुया १ अन्धों की तरह चलाते हैं, हरामजादे । मर गया
है यह तो। देखते क्या हो ले चलो सुभर को थाने । कौन है,
हाइवर? पर हमेशा तेज चलाता है।"
मैं इस तरह की बात में पहली यार पड़ा था, इसलिये
उसकी सम्भावनाओं की पूरी कल्पना न कर सका। अब तक
मुझ आशा थी,अाखिर यह लोग यही फ्रेंगे जो इस हालत में
साफ उनका पर्तव्य है, यानी यच्चे को अस्पताल में पहुंचाना ।
मैंने पारी बारी उन्हें समझाना चाहा।
अब तक कभी मैंने ऐसा हौसला नहीं दिया। एक लम्या
मास भर फर हुजूम के घेरे के बाहर दो से चुपचाप सरप
जाताrI
१]-
-मैं भूल न सकू
यफरारत पर नौजवान लडके ने बढ़ कर ड्राइवर के मुह
पर एक घूसा रमीद कर दिया। श्रान की प्रान में तीचार
और लोगों ने मिल पर ड्राइवर की चौतरफी मरम्मत कर दी।
उम दिन मुझे दिखाई दिया रि फसाद होते
हैं। इस घास्ते नहीं कि लोगों में नफरत होती है, बल्कि इस
लिये फि उन्हें इसानियत के जाने की तालीम ही नहीं दी
जाती। ऐसे अवसरों पर क्या करना चाहिये, क्या नहीं, यह यह
जानते ही नहीं।
लारी के यात्री योय लोग अब भी खडे तमाशा देख रहे
थे। धम्के धुपके मार पर मैने डाघर को छुड़ा लिया, और
लारी के फुटगोर्ड पर गडे हो कर जीवन में पहली बार तकरीर
की। चिल्लाया, मजमे को बुरा भला कहा, यताया कि ड्राइवर
को मार देने से उस मासूम बच्चे की जान नहीं बोगी। अगर
ड्राइवर को पुलिस में देना हो, या मारना हो तो यह धालय
को हस्पताल में पहुचाने के याद भी हो सकता है।
श्रमूमन अगर मैं अपनी मा के साथ भी पजायी में यात
चीत करू नो प्रतिवाक्य में दो चारशद अग्रेजी के कह डालता
है। लेकिन जहां तक मुझे याद है कि इस तफरीर में में फहीं
नहीं रखा कहाँ मेरा अात्मविश्वास खोलत नहीं हुया ।
में सफल हुश्रा। तमाम चेहरे मेरी तरफ मुड गये, न
जाने क्यों ? शायद वह मेरे पहरावे को देख कर प्रभावित हो
-मैं भूल न सा
रहे हों कि एक अमीर तबके का श्रादमी, मी निचले दर्जे के
लोगों के झगडे में पड़ने की कृपा कर रहा है।
लोग मेरे कहने पर हट गये । मुख प्रादमिया ने लो
को उठा कर लारी में डाला। उसका बाप और दो और दिशा
साथ बैठे। मैंने थाकी समारियों से अनुरोध किया fair
फा परस्पताल वालो सडक पर नही पडेगा, उनकी
रुपा करें।
-मे भून ने
आएं। लदशा गलत हाय पर आ रहा था। साइकल उससे
सहलता नहीं था, इत्यादि।
आपिर दम सरकारी हस्पताल पहुचे। रास्ते में लड़के
को होश या गया था हमने उसे गाम-गरम दूध पिलाया।
श्राउट-डोर यार्ड (Outdoor ward) में हमने एक
मेज पर चालक को लिटा दिया, और खुद भी पुछ कसूरवार
पालों की तरह ही दीयार के साथ पहो फर इन्तजार करने
लगे।
मुझे हैरानगी राके के धाप पर था । पाकी लोगों का
रवैया देख कर मुझे अन विश्वास हो चला था कि यह भी
डाक्टर का दामन पकड कर सव्ये हिदुस्तानी दंग से गिद
गिलाना शुरू कर देगा (जैसा मन पिछना शाम मिनेमा में एक
हिन्दुस्तानी अभिनत्री को करते देखा था), "डाक्टर साहब
मेरा यच्चा । मेरा बच्चा आपके इवाले देखापटर साहय। इसे
राजो कर दो। में तुम्हारा जुग जुग दास । डाक्टर साहय मेरा
घर उजड़ जायगा।"
नहीं। सयर पा युत यन कर यह शेर उस ललुहान
पुतले को देसरहा था। उसने एक बार भी ड्राइवर को दुरालभा
महीं कहा। एक यार नहीं पूछा, कि यह सर
क्यों
सुथा
हुआ।
दस मिनट गुजर गये, पन्द्रह मिनट गुजर गये । डाक्टर
और कम्पाउन्डर अपनी चमश्ती हुई सफेद पोशाकों में मीठी
-में भूल न सा-
मोठी नरसों के साथ बातें करते हुए इधर से उधर निकल
जाते। कीमती, मौसम से पहले हो निकाल लिये हुए छल
छीले सूटों में मलयूस, मैडिकल कालेज के नवयुवक, बगल में
कापिया लिये आपरेशन थियेटर में जमा हो रहे थे। हर बार
हमारी यह आशा कि अव पट्टी शुरू होगी, अब सून बन्द
होगा, श्रर होगा, हैरान हो कर रह जाती।
साढ़े पाठ यज चुके थे। न मैं रात को ही सो सका था
और में सुबह से मुह हाथ तक हो धोया था। तयियत में कम
जोरी भाने लगी। एक के बाद दूसरा सिगरेट पी कर सवर
फरता रहा। आखिर मुझ से न रहा गया। मैंने डाक्टर को
सचेत किया।
मुझे याद में पता चला कि वह डाक्टर मेरे एक मित्र
का ही एक घनिष्ट मिन है, और एक निहायत शानदार प्रादमी
है। अगर यह वाफियत पहले से होती तो शायद अब तक
तिजार हो न करना पड़ता। लेकिन उस वक्त डाक्टर एक
निहायत चेलिहाज लहजे में मुम पर अप्रेजी में यरस पदा-
"लुक हियर माई डियर मैन ! यू सो आई एम यिजी।
मैं कोई अपना दफ्तर ले कर नहीं येठा । How can I?
मैं इसके जख्मों को कैसे धो सकता हू, जब तक कि पुलिस
अपनी तफतीश न कर ले। में कानून के यरपिलाफ कैसे जा
सक्ता हु ?"
में भर न सह
कि जर तर पुलिस नहीं पाएगी तर ता घोगरे के
जम्मा तो हाथ नहीं लगाया जामाता, मेरे लिये एक नया
अनुमन था। अय तक मेरा यह सपाल था कि हम क विरोध
पर फतह पा करमा यानक के नीरन पट से परमात्र रफापट
परे कर दी है।
लोग रहते हैं लेपसा या कल्पना विशाल होता है। यह
स देह पो थात है। अगर मुम में पल्पा होती तो मैं अपनी
जिन्दगी के कई भनुभयों के आधार पर इस विलम्ब का पदले
से हो अनुमान परगा। पहों मुददाय धो लेता, एक प्याला
चाय का दी पी लता । शादियों में, माताम, पचहरियों में, में
पर यार देख चुश था, महसूस कर चुका था, कि इस भूखा
पर कोई काम नासानी से नहीं हो सपना गिमार यर्तमान
समाज में व्यरि पापाई महत्व है नहीं। एक जीवन की
श्रापद और सपद उम्मा एक जोपन की जायदाद नहीं, यह
थारियों के जीरना में भी कुछ उमग लाती है, उसे सार्थक
करती है।
मैने लड़के के पाप की ओर दया। यह लडके के पास
एक स्टून पर येठ पर उस के माथे के उस हिस्से पर जो जम्मी
नहीं या हाथ फेर रहा उसकी श्राप दीवार पर गढ़ी थीं।
कभी कभी उसके होठ फुरफराते और मैं देपता कि पद दुमा
कर रहा है । सून की ११ बून्द सफेद मोमजामे पर लुढ़कती
हुई भाई किनारे पर पहुच कर यह मोटी हुई और टप से फर्श
-मैं भूल न सा
पर परसने लगी। कम्पान्डर नेई का एक फायामीन में
भिगोकर धाय पर रमा। मैं धयराइट से तिलमिला उठा।
प्राधे घन्टे के बाद इन्टर हाथ में लिये हुए दयालदार
साहय तशरीफायर हुए। जेप में से उन्होंने फीता निकाला
और भरदली को लिखाते गये नफसोल । दाई डाग,
२, पटी से ६ च ऊपर। पाई टाग, घुटना छिल
गया है। पैर जयर, कुछ घसरो को छोडकर । पेट घेज़बर,
छाती, साइकल का डण्डा चुभने की वजह से एक पसली दय
गई है। दाया गया औरणठ चुरी तरह छिल गई है। माथा
११ १६ । सिर की पिछाड़ी REME |
जसम कारी नहीं हैं । लडके का नाम, पालिद का नाम । बबल
दार दसखत, शफ्टर के दसपत । भरदला ने अधमुर्दा लड़के
से युद्ध मवाल किये।
इस लम्नी रमम अदायगी के याद पट्टी शुरू हुई।
लरके को पीड़ा होती होगी लेफिन वह चीखता चिल्लाता नहीं
था। इसके दो ही कारण हो सकते थे। या तो यह एक ऐसे
पुलीन घर का बच्चा था जो गरीष होने पर भी अपनी धान
नहीं छोडते, या यह सून निश्ल आने की यजह से अशक्त था।
लेकिन अब एक ऐसा मजर पेश हुया कि मेरी नजर उस
पच्चे की तरफ से हमेशा के लिये दूर हो गए।
मेरे नीले डवल-नेस्ट कोट और प्रे फ्लैनता को पतलन
कई जगह मिट्टी के दाग धम्बे लग गये थे। मैने सोचा
[0]
में भूल न मां- रहे बाहर जाकर झाडयाऊ और कहीं से अगर एक प्याला चाय का भी मिल सके तो पीलू । लेफिन जूही में दरवाजे के पास पहुचा मुमे एक बूढ़े थादमी को, जिसे तीन चार नौजवान थाम कर अन्दर ला रहे थे, रास्ता देने के लिये हट जाना पड़ा। चूदे की दाई थाह पून से तर यतर थी, और दद से वेकरार था। बूढ़े को उहोंने धेश्च पर बिठाया। मने एक मोमवान से पूछा, क्या माजरा है। पता चला एक पागल कुत्ते ने काट खाया। मैं अग्तक इतना देख चुका था कि मुझे पार खोज- पाज परने की इन्छा न थी। में यह पहले से जानता था कि घूढ़े आदमी के लिये पागल कुत्ते का काटमा गतरनाक होता है। में फिर दरवाजे की ओर चला- एक, काला कोट पहिने, सुन्दर, गठीला नौजवान दो दोस्तों के सहारे लपडाता हुआ दासिल हुधा। उसी यावले फुत्त ने उसका निचला होठ पूरे का पूरा चपा लिया था। उसके निचले दात और मसूड़े मगे होगये ये और कपडे खून से तर यतर थे। जीवन में न भूल सक्ने घाली घटनाओं की परिभाषा यह हो सकती है कि यह घटनाऐ इस तेमी और इस खूबसूरती से पाती है जैसा उनका श्रम और व्यवस्था पहले से किसी में निश्चित कर दी हो। थाम घटनाओं कोसी रनमें असलग्नता और निरहे श्यता नहीं होती। १८]-
मैं भूल न ।
श्रय मे याहर न जा सका। कमरा भरता हुश्रा महसूस
होने लगा, जैसे किप्ती स्वप्न में, जैसे किसी सैलाब का फाटफ
खोल दिया गया हो । लडका और उसकी चोटें, जिन पर मैंने
इतना समय और शक्ति पर्च को थो, निरर्थक और दूरवर्ती
महसूस होने लगीं।
गाई तरफ कोने में देखता कि एक नवयुवक, चश्मे
लगाये, सदा कांप रहा है। उसके चेहरे पर, हवाइया उड
रही हैं। मशीन सा, में जाकर उससे कारण पूछता हू। यह
अपनी पत्नी को परदे में पीछे पड़ा कर थाया है ! उसकी पली
के गाल को भी उसी पारले कुच ने फाट खाया है। उनको
शादी को अभी तीन महीने हुए हैं।
मुझसे रहा न गया। "मूरख" मेंने कहा, "यह परदा
करने का मौका है १ देसता नहीं एक डाक्टर है थोर बीसियों
मरीज । इस तरह कापने से तेरी वारी क्रय श्रायेगी? सामते
ला उसे। घरके दे दूसरे को और भागे होजा। इश्वद्वार
3
एक धज मित्र ने मुझसे शिकायत की थी कि
हिन्दुस्तानी साधारणत जबरव से यहुत ज्यादा ऊंचा बोलते हैं।
अब सममा, क्यों।
जिस साहौर से में परिचित या उसमें अगर फिसी का
पालतू कुत्ता भी पट्टे में से सिर निकाल कर सड़क पर
वाजाये तो मार दिया जाता था। लेकिन अब पता चला कि
भारयिष लाहोरलया है और उसके पागियों को किन हालातों
मे धास्ता पहा है। मिपिरा सार बालों में रहने वाला
मुसलिम रेता हिन्दुओं से, और हिंदु नेता मुमसमानों से
अपन सहधर्मियों के अधिकार सुरक्षित करन लिये कोमिन में
घन्टो नारी परता रहा, लेकिन शहर की पलोर गलियों में
स्वच्दमोटापरले पान, धीमारी के चलते फिरने गोदामा
बाजारी कुत्तों से, नागरिकों की रक्षा करनी किमी मे जहरीम
ममी। शायद इसमें गौरव मया।
सहक पी पट्टी गसम गुर और उसे इस्पताल में
दासिल कर लिया गया। घानदार माहप ने लक्ष्य के पालिद
से पला "लारी पाले का चालान परवाना चादते हो?"
बड़ा मुसलमान योला, "उमस कोर पर महाँ है।
खुदा ने मेरा लड़का यचा दियामुझे और कुछ नहीं चाहिये।"
यसदार सामने अपनी उपस्थिति को कुछ और
कारगर बनाने के लिये ड्राइवर से कहा
"यो सर्दार, सहक के इलाज के लिये दस रुपए याथा
को दे दो।"
"हा, हा, यजा है। बेटा दस रुपये में जान-सलासी हो
गई। पड़े की शगपत है, धरना पर लिये आते।" कुछ औरों में
1- "लोरिया थालों ने साहव अधेर मचा दिया है। उस
-[१००
मैं भुज्ञ न सकन
दिन अमृतसर वाली सड़क पर
.
'किसी दूसरे ने कहानी-
शुरू की।
-
"इन्हें छोड देना गलती है" पफ तीसरे व्यक्ति ने कहा।
झाइयर ने फौरन एक नोट निकाल कर बूढ़े के सामने
किया। यढ़े ने बड़ी सादगी के साथ उसका हाथ वापस फेर
दिया और लडके के सिरहाने जा बैठा।
मेरा माथा उस जईफ इन्सान के धागे झुक गया। दिल
में कुछ पाइलाद, कुछ प्राशा की जुम्यश हुई । लेकिन भूखे पट
रहुत से मिगरेट पी लेने ने शायद, या भीड, दवाइयों की यदय
और खून ने उस जुम्यश को दयोच दिया। नीचे, और नीचे,
यहुत नीचे।
हवलदार साहय ने मुझ से कुछ सवाल पूछे । मने जगाय
दिये या नहीं, याद नहीं । मेय मिर अकस्मात चकराने लगा,
टागे लरजने लगी, पसीना श्राने लगा। मेरा पेंच पर बैठ जाना
जरूरी था, एकदम जरूरी था, मैंने मोचा । मैं गिर गया।
लेकिन यह दोशी नहीं थी। किसा ने मुझे उठाया। यह
मेरा एक दोस्त हो था। मुझे एक ग्राण्डी का तेज घुट पिलाया
गया। कुछ देर बाद मैं किसी की मोटर में घर रवाना हुआ।
मोटर में बैठने वन मैंने देखा कि, हस्पतान को डेपदो
में एक बूबसूरत क्यो श्रा कर सकी है। यग्नी का मालिक
सफेद फीज, सलवार पहने, खुद लगाम थामे है। उसको
-[१०]-
में भूल नसा गर्दन और मुह मून से तरयनर है। बाजू मी जख्मी है। यह मी उमी एक पत्ते का शिकार हुआ है। अस, इसके याद में सिविल लाइन्स को सुच्ची चौगिरद में चला पाया। शाम को एक बार खपान पाया इस्पताल में जा कर पना करू कुल कितने प्रादमी पाए, लेकिन पैर न उठे। दूसरे दिन मने तमाम अखबार देखे । किसी में इस चारदात का जिक तक न था। क्यों होता? कोई साम्प्रदायिक पलगा थाडे ही फूटा था कि मुखिया मरता । इन महत्व रहित घटनात्रों से किसी सवाददाता को क्या काम? "लेकिन अगर निकर होता भी तो परवाह किसने करनी यो। पेसो खबरें मैंने खुद पढ़ने की भी कोशिश नहीं की थी। अलबत्ता, उसके कुछ ही दिन याद मैंने एक दिन अप- धार में देखा कि गुजरात शहर में एक यावले कुत्ते में इक्कीस लोगों को काटा। धानले पुत्त द्वारा फाटे हुए भादमी के इलाज पर ठीक तिना पर्च होता है, मैं नहीं जानता । लेकिन डेढ सौ से कम किसी हालत में नहीं। चाहे वह खुद स करे चाहे सरकार यस्पताल करे । अगर हिसार लगाश जाय तो पता चले कि पजाब में पी साल वायले कुत्तों का शिकार होनेवालों के इलाज पर एक गरीव प्रान्त का कितना धन सर्फ होता है । या दुसरे शब्दों में पजाब सरकार पाजारी कुत्तों की परवरिश पर और उन
का पेल, कूद का इन्तजाम करने के लिये, कितना धन की सोल
सर्च करनी है।
लेकिन सभी यव थोडे जाते हैं । यानले कुते ने जो
शुरू किया उसे गरीरी और प्रशिक्षा तोड चढ़ाना है।
शायद इसके योस दिन बाद मुझे फिर सरकारी अस्प
ताल में जाने का इत्तिफाक हुमा । जिस दोस्त ने मुझे प्राडो
पिलाई थी, उसी ने मेरी याद ताजा करते हुए कहा-"एक
हाइड्रोफोयिया (कुत्ता मिरगी) का केस पाया है। देखोगे?"
वह मुझे एक बन्द दरवाजे के सामने ले गया, जिसके
शोशा (और लोहे की सिलापों के मी-शायद) के पीछे एक
- विभूम पीडित नौजवान बडा हाथ हिना रहा था। हमें देख कर
पद बार पर हाथ जोडने लगा और हमें अपनी तरफ घुलाने
के इशारे करने लगा। तदन्तर उसने श्राखों से और
इशारों से हमें कुछ समझाना शुरू किया। मेरे मित्र ने उस केस
की 'हिस्ट्री' बतानी शुरू की, लेकिन इसको जबरन न थी।
मरीज की यान मुझे माफ समझ में श्रा रही थी।
"म फिमी का घरेलू नौकर । लेकिन मत मममा में
किसी अदना जात का श्रादमी इ । अपने गार में हमारी
काफी सेतो गाडी है, लेकिन सय होते हुप मी नकद पैसा नहीं
था। इसीलिये मैंने नौकरी को । कुछ दिन हुए में साइकल
पर, सजी परीद कर, घर लौट रहा था। एक कुत्ते ने मुझ पर
-[१०३]
.
.
-मैं भूत नस
धमला किया। लेकिन में तेजी से माल भगा ले गया ।
पाब में कत का पर दति लगा था, यहुन मानी । उस दिन
घर में बहुत से मेहमान भाये हुए थे। मैं घर पहुचते ही काम
में लग गया, और पतरात गये नक व्यस्त रहा । सोते वक्त
कुछ दर्द महसूस हुमा, लेकिन मैं यछत या हुश्रा था । पुष
हफ्ते बाद मुझे मिरगी पड़ी और घायू जो नै फोरा यहा मेज
दिया।
"मेरा अगाभग टूट रहा है। लेकिन मैं बेहोश नहीं है ।
मैं तुम्हें कुछ समझाना चाहता ह । तुम्हें भी कोई व्यक्तिगत
पाम यतलाना नहीं चाहता, पयोकि तुम नहीं करोगे। तुम मेरे
घरवालों को मेरी मौत कीरायर भी पयां देने लगे? लेकिन एक ।
यात है-मुनो,
"मैं अनपढ़ था, निम्म्मा था, ठी। लेकिन मेरी
जिन्दगी पया एक पायले कुत्त हाथों यो सनम हो जाने
के लायक थी ? सोचो याबू, शहरों में श्रापारा कुत्ता का क्या
जरूरत है ? शायद तुम मेरो जिन्दगी की भी कुछ जरूरत नहीं
समझने, लेकिन मेरा योयो तो समझती है, मेरे मा याप तो
सममने है।
"अन्यान मही, न सही, लेकिन अगर में इस हालत में
थायू जी के नन्हे बच्चे को हो काट लेता ?
। “तुम खडे हो, धावू । तुम्हें मेरी श्राों से, मेरे सले हुए
मुहकी भाग में डर लग रहा है ।'तुम्हें मेरे ना जीवन पर
-- १०४
A
-मैं भूल न
और मेरी नाहक मौत पर तरस आ रहा है । लेकिन में बता
दू । तुम भूल जानोगे। मेरे जाते ही यह कमरा फिर भर
जायगा। जायो, हटो यहा से, हट जाओ। यह तमाशा
।"
उसने एक भयानक शकल बना लो, जिसे देखना
असह्य था, और हाथ से दरवाजे का हर शीशा चूर चूर
कर डाला।
मैंने अपने मित्र से कहा, "इसे मार्फिया दे कर सतम
पयों नहो कर देते। इसका बचना तो असम्भव है।" उसने
जवार दिया, “The law does not allow"
श्राप सोचेंगे, अब यह घटना भी क्या पदने लायक था ?
-बलराज साहनी।
५
मैं भूल न सर
सत्रह
-सन् १९३७ को यात पदतो।
ऐशरयाल बीत चुका या, धारे से मैंने पद्रह वर्ष में
पाय रया ही था कि माता जी के मुप से अपने रिगाह का निक
सुना। वहा आश्चर्य हुश्रा। प्रामा म सन्द विचरण
परने याना होने के कारण में अपनी अवस्था के विश्य में कोई
शारा नहीं रखती थी। मैं तो धमी मा पी वही नहीं बच्ची थी।
एक दिन मा ने कहा- 'देहली चलेंगे, तुम्हारी मौसी
की शादी है।' -में रहुन मस हुई। कर पार देहली गई
जरूर थी पर उसकी स्मृति लगभग मिट चुकी थी। इधर
देवानों में रहने के कारण में शहर की हलचल देगने को
लालायित भी था और सरसे यही बात यह थी कि मैंने भी
अपनी याद में लडको की विदा नहीं देखी यो- में फली नहीं
समाई। अपनी उस क्रपना को याद करके में श्राज भी इस
पड़ती।
१०६]-
में भूल नम
३
हम देहली पहुचे, दूसरे दिन मौसी का साया था, मौसी
के साथ मामा का भी विवाद था। यह विवाह का पहला दिन
में बडेप से सय कार्य देख रही थी कि यमायक एक
घरायर को मोसी ने भाकर चुपके से कहा- "मानी ! यहा एक
हमारे भाई 'भायेंगे- तुम उन्हें देप लेना। जी जी
(हमारी मां) उनसे तुम्हारी शादी करेंगी।' -अरे राम, ग्रह
क्या गड्या है-मुझे मन-मन में माता पर क्रोध भाया और
मनमें ही सूर यडाडाती रही "जाने क्या होगया है, इन्हें ।
हम शादी नहीं करेंगे।" इस भाव में बचपन का अधिकार
ही था। कुछ देर में मोसी ने श्रारर फिर इशारे में एक युवक
को दिसाफर कहा- 'यहीं हैं वे' ~म झल्ला उठी- हमें
नहीं देखना है।" -धार में वहा से हट गई।
शहर के युवकों और सासकर कालेज के डिग्री प्राप्त
जैरिटलमैनों की चिचवृत्ति से मैं अभीतक अपरिचित था।
दुर्भाग्य वश किसी ने उन महाशय से भी कह दिया मेरे विषय
में। बस, यहीं से यह प्रसग शुरू होता है । वे महाशय
निर्लज्जता की प्रतिमूर्ति थे। श्रय देखिये-- जहा में वहीं
पाप-अपनी दो रहिनों के सग । विवाह के घर में इतनास्सिको
ध्यान था? मुझे बड़ा क्रोध आया। मैं धैठी हुई बहिन को
सुला रही थी- फोने से दवी हसी सुनी, देसा-पाच में वे
महाशय और इधर उधर उनको दो यहिने-श्रोक, वह त्रिमूति
कय मेरा पीठा छोडेगो ? म इन सब बातों से अपरिचित थी।
[ १०७ ]
-म भूजनमा
मैने मन ही मन शपय खाई कि श्रर कमी शहर में नहीं
आऊगी। मेरे ये मरल ग्रामीण भाइ-बहिन हो भले ।
इस नाटफ का यही अत नहीं हुआ, उसी रात मामी को
देखने में कई बहिनों के साथ जनवासे में गा
'-माता ने हाथों
में तोडे (पक गहना ) पहना दिया। मैं एक ओर बैठी थी, मेरी
दायीं ओर गैस का लैम्प जल रहा था। अचानक सामने के द्वार
पर जो दृष्टि गई तो देखा। महाशय उगली से इशारा
परके मुझे दिपा रहे हैं, पार यार तोडे'- फह पर आप अपने
साथ के मित्र को मुझे दिखाते थे। । मिनट ठहर कर फिर
चले गये • इसी प्रकार वे ४-५ पार अपने एक एक साथी को
ले पाते और दिया फर फिर लौट जाते । श्राज भी में नहीं भूल
सक्ती उस जलन को जो मेरे हृदय में उस समय हो रही थी।
मैं द्वार की ओर पीठ फेर कर बैठ गई, साय की फयाओं ने
कई बातें पूछी पर में नहीं योली। मैं लज्मा, क्षोम, ग्लानि से
दबी जा रही थी। ४ घण्टे चार मास की तरह रिता कर में
जनवासे से लोटी और सीधी अपने कमरे में जा कर पलग पर
पड गई और रोने लगी पकान्त कमरे में हृदय का श्रावेग
पानी धन कर नेनों से यहने लगा। इसती हुइ गई और रोती
हुइ लोटी। किसी काम से माता जी कमरे में प्राइ, मुझे ऐसे
पहा देख कर योली
"अरी पगली, यों क्यों पड़ी है ?"
मैने मा कोखा, पुछ योलना चाहा पर क्रोधावेश से फराठ
रक गया। माता जी ने घर पर यूला "क्या बात है?"
-[१०८]-
-
में
भूल न सक
-
-
मने रो कर कहा
से हगिज शादी नहीं करू गो
"श्रौ अपनी पीती सुनाइ । माता जी ने कहा
"श्रच्छा,
श्रय तू चुप हो जा। में भी ऐसे नालायक का नाम नहीं लूगी।"
- कहते-कहते उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा तो देखा मैं
चुसार में भुन रही थी
१०३ डिग्री पर पहुचा हुश्रा ज्वर!
यह थी शहर की देन !! उसके बाद मुझे पूरे तीन दिन
तक जोर का पर चढ़ा और माता जैसे तैसे विवाह समाप्त
होते ही घर आने को मजबूर हुई । ट्रेन में ही मेरा घुखार उतर
गया और हृदय हरका हुया। देहलो के विवाह भी न देख पाई।
यह घटना चाहे शहर की बहिनों के लिये साधारण हो
पर मेरे छोटे से जीवन में इस प्रकार की यह पहली और
अन्तिम घटना है। अपने इस अपमान को में जीवन के अन्तिम
पण तक नहीं भुला सकती।
-रत्नकुमारी माथुर ।
मैं
भूल न सक
.
अठारह
गगा के तट पर एक भिखारिन को देखा और
सब मिया से कुछ अधिर अाकर्षक थी यह भिखारिन । मैंने
उसकी ओर देखा और कुछ देर यरायर देखता रहा, पैर रुक
गये न जाने क्यों, अपने श्राप । एक प्रकार का मेला सा लगा
हुश्रा था तट पर । काफी भीडभाड थी। मेरे मित्र राकेश ने
जो एक सु दर पवि है, मुझे हाथ पकड़ कर भागे चलने को
चा परतु मेने उहे रोग लिया। में मिपारिन को थोर
'राकश' का हाथ पकड़े हुए हो आगे बढ़ गया। मिपारिन ने
भी मेरी पोर देखा, साधारण दृष्टि से नहीं, बड़ी तोसी दृष्टि
से, मम्भरत उममे कुछ घृणा की मात्रा भी मिश्रित थी। सभी
घाट पर घूमने वानों को भोर वा करणा को दृष्टि से देख रही
थी। में भी अपनी योर उसको वही दृष्टि देखने का इच्छा से
मागे रहा था। कोई अपने लिये घिरोर बार में उससे नहीं
1
चाहता था। परन्तु ससार में इच्छित वस्तु बहुत कम प्राप्त
-
होती है।
?
भिक्षा कीथाला उसके हाथ में थी। उसने मेरी पार से
अपना मुख फेर लिया। नहीं जान सफा में कुछ भी। राकेश
भी मेरे रस किये गये अपमान पर मुस्करा दिया यह कर कह
कि "चलो यार क्या रीमे तुम भी एफ भिखारिन पर ? अजीय
आदमी हो तुम भी।" को जगाय नहीं दे सका में उस समय,
क्योंकि वास्तव म यान कुछ ऐसी ही थी कि यदि उस मेरे
भिपारिन के प्रति होने वाले श्रार्पण को रोमने को उपाधि भी
नदी जा सके तो इतना तो सत्य ही था कि मैं उससे कुछ
यातें अवश्य करना चाहता था। मने यड़े धैर्य से काम लिया।
कुछ और भागे बढ़कर चार पैसे उसकी थाली में डाल दिये।
पैसों का थाली में गिरना था कि उस भिखारिन ने अपने हाथ
की थाली, जिसमें काफी पैसे थे, पृथ्वी पर टाल दी। में सन्न
सा रह गया, एक दम ठगा सा । वास्तव में मैने फोई अनर्थ
किया। काल एक भिखारिन की थाली में चार से ही तो डाले
थे। यह अनर्थ नहीं होता। मैंने भिखारिन से कुछ भी नहीं
कहा, एक शब्द भी मेरे मुख से नहीं निकला, 'राकेश' इसका
साक्षी था। मेरा इसम कोई दोष नहीं थो। फिर उसने फ्यों
थाली पृथ्वी पर डाल दी?
कुछ देर मन इन्हीं भावनाओं में उलझा रहा कि यह
भिखारिन पापों से ओझल हो गई । मैने सारी भीड़ छान डालो
1 १११ ]
में भूल न सात
परतु फिर उसका कहीं कोई पता नहीं चला। श्रय भी अफ्सर
उस योर नहाने जाता है परतु यह मिपारिन फिर नहीं दिख
लाई दी।
*
म विवाहितह, देटियही सो उत्तर था इस पापोए
हृदय वाले मनुष्य का । उस कोमल हृदय पर धज गिरा दिया।
स्तिना कठोर है मेरा हृदय भी ? उसका यह भोला मुग मेरे
कठोर शहों को सुनकर फूल सा कुम्हला गया था । झुलसा गई
थी फोमा पसड़िया। लोग मुझे भी भायुफ करते है, कवि
कहते हैं, क्तिने भूरी हैं सभी ? कितनादिया मैं नहीं जानते
घेइम रहस्प फो। पिनमा पठोर व्यवहार था मेरा उस देवि
के साथ, जिमने अपना सर्वस्व यिला किसी इच्छा के इस
प्रकार समर्पण कर दिया था ? कितनी निर्दयता थी उम मेंट
को इस प्रकार ठुकरा देना केवल विवाहित होने के वचन मात्र
पर क्या इस प्रकार निर्दयता का पालन करना ही मेरा कर्तव्य
या? नहीं सुलझा सकूगा जीवन भर इस प्रन्थि को । उसका
मने अपमान किया निश्चय है केवल इतना ही।
y
शान्ता और उस भिखारिन में कितना साम्य था।
फैसे भूल जाये मेरा यह पागल हृदय ?
यशदत्त शमा ।
-
-[ ११२ ]
मैं भूल न सह
उन्नीस
शुरू से ही जीयन में पाखें खोल कर चलने का
अभ्यासी रहा । मदेय यह मानता आया है कि ससार यहुत
वहा है जिसका और चोर भो कल्पना में श्रटने से इन्कार करता
है। उससे भी एक पहा चीज है-अधिक महान, अस्थिर दुरुह
और अतल श्रफूल । वह है जीवन । परन्तु जीवन से भी यह
फर महान है मनुष्य । जीवन विश्व की जड में अपने को सींच
का श्रधात ही रह जाता है और मानय समझ में न पाने वाले
जीरन के मूल में पठ कर एक अधी, अप्रतिरोप्य गति से
सघप होता है। तय तो यही सब से पड़ा ठहरान।
कहानी एक चरित्रहीना विधा की है। मेरे जीवन में
सच पूछा जाय तो एक भी ऐसी घटना नहीं है जिसे मैं महिमा.
मंडित जान कर पाठकों के सम्मुख रफ्खू । परन्तु आज जो
लिखने येहा यह भी मेरे जीवन में बड़ी प्रचंडता ले कर आई
है। संसार की फठोरता और उत्पीड़न का योग अपने ऊपर
-[ ११३]
ले पर चलने वाली एक श्रमागी मानी फी यह कथा है जो
श्राजीयन यू द-यद दर्द इक्ट्ठा करके अपने भीतर भरती गई
और अन्त में सारा दु खरिधाता का ही दुरा मान पर प्रम में
ही जीवन की इतिश्री बोल गह। एक विधा के लिये प्रेम
करना और यह मा एक ब्राह्मण विधया के लिये एक ठाकुर से
मम करना और पाजावन मस्ता ऊचा करके चलते जाना उस
रूढ़िग्रस्त देहानी-ममाज में जहा शाडग्यर और रूपक ही
थादमो को पुजनाता है सुनने में चाहे जितना भी साधारण लगे
परतु है एक महान प्रयोग ही।
असल में वे मुझ से पाठ साल बडी थीं। दूर के रिश्ते
फी दिन भी कहें यह लिया जा सकता है। मुझे उनके पास
चैठ कर घटा उन से बात करने का सयोग प्राप्त हुआ था । उस
ममय ता ओरत मेरे लिये एक बेमानी चीज थी। कवि पच्चन
के शदों में सेक्स की चेतना पूर्ण रूप से जागृत होते हुए भी
और "वासना पूर्णतम होते हुए भी तय में मयमी था।" भाज
तो मैं बडा से बडा पातर पास ढक र ज्यों का त्यों निगल
मरता है और उन्हीं का भीतरी चल मेरे जीवन म उठती हुइ
प्राधियों को थामे भी रहता है। परतु उस समय तो मैं सच्चा
हो कर किसी के प्रति निवेदित और ममपित होने का मूल्य भी
नहीं जानता था। शहर में होस्टल में रह कर पढ़ना या और
जय छुट्टियों में गार जाता था तब कुती दीदी पी गाथा सुन
-[१४]-
मैं भूल न सक
सुन कर, गाव वालों के मुह से उनका और ठाकुर का रास
विलास सुन-सुन कर मन ही मन नारी की इस कमजोरी पर
दग्ध होता था। सती का श्रादर्श तन देना अवश्य है परन्तु एक
भूये मानय की भूग्वी वासनानों को नहीं वरन् पाप और पुण्य
एकाकार कर देने वाली अग्नि की रक्तिम लपटों को। समाज से
अलग रह कर भी कोई इस प्रकार उसकी फल्याण-कामना और
मगलाकाता में जुट सकता है, यह सव में उस समय कहा
समझ पाता। समाज का जूठन पनना पसन्द कर के भी और
जीवन के साथ एक नया प्रयोग करके, जो जीवन भर एक
अनिर्वचनीय सुपमा श्रार सान्त्वना पाती रही अपनी ऐसी दीदी
को में उनके जीते जी तो समझ ही न सका।
नो वर्ष की अवस्था में घे विधरा हुइ थीं। विधवा हो
जाने से जीवन की साधे, क्षुधा, तृष्णा, द्रोह, मोह प्रवृत्तियों
और प्रेरणायें कहा चली जायें। उन्हें भी तो इसी हृदय के
घोसले में रहना और मानव का जीवन बनाना या विगाहना
होता है। दीदी माल की थरस्था म विधवा हो कर जब बढ़
कर १३ साल की होने आई , तभी उन्हें यह मालूम पडने लगा
जैसे उनका कुछ खो गया है। उन्होंने मुझे कई बार बताया भी
था कि कैसे धीरे-धीरे उनके अन्दर यही भावना जोर पकड़ती
रही थी कि उन के अन्दर न तो विचार ठहरता था और न
अविचार, न पाए और न पुण्य । १३ वर्ष की उमर की उस
,
११५
में भूत नमक- अधपती निधया ने जय ग्रामण परिवार में होने वाला सारा पूजा पाठ, धर्मधर्म और उपदेश सयम की पातों को मानने से प्यार करना शुरू पिया तो सारे गांय में तहलका मच गया। एक विधया जो अपने पूर्वजन्म के एसे ही पापों से इस जीयन ममसन दी गई। फिर मा या नहीं सोलती न जाने फिर तो मितने जमां तक उमे ऐसे ही जलना और सूराना पगा। परतु दादी की मुम्का तो पसी थी जिसे श्रादमी भूल नहो सफा था। क्षण भर हा कर उसा क्षण युझने वाला अनयम मुस्सा देपने पाले के अन्तर में कभी पो दुयी हुर छिपी हुइ पाडा यो धनीभूत परतो या। उस समय समधेदना का पक ऐसा पुतक प्रनाद पूरी देह में फूटना था जो देपने वाले को अभिभूत पर दीदी को उनकी सप्ट में अति माननी बना देता था। उनकी यागो की गोली घेदना मर्म को स्मृती थी और उनकी मुस्कान की सुश्खी अन्तर को भिगो देने घाली चट रसतो एक यान और पूछना चाहता । श्रापिर जीया में पाप-पुण्य की समीक्षा करने के पान हैं कौ7 से और कहा। यदि हम अपने भीतर के सत्य को स्वीकार नरें और बाहर से असत्य को अग्राहा पर दे तो जीवन के कितने अमौख्य और प्रभाव मिट न यि । उठती हुइ ली सी जिनी जिंदगी हो और अगार मी जिनका श्रात्मा हो, उनके सामने मी जय हम [११६] में भूल न सक कर्तव्य और अकर्तव्य के ऊपर अपना मन्तव्य देने लगते हैं और पाप फन्द की परिधि में ला कर उन्हें सताने लगते हैं तय हमारी मज्जा में टिका हुश्रा पशुता का कोडा म्याद में खोखला नहीं कर चलता। यही बात रह रह कर मेरे मन में आया करती है । दोदी को समाज ने कितना गलत समझा। मैंने भी उन से कितने समय तक कितनी घृणा नहीं को । उनके मुह पर उन्हें कामुकी और वेश्या तक कह डाला । बार बार उनके बुलाने पर भी नहीं गया। यही नहीं ठाकुर की स्त्री से मी मने कई बार यह भी कहा कि दयो कुन्ती का दोष इस में जो है वह तो है ही, परन्तु तुम्हारा दोप भी इस में कम नहीं है। तुम क्यों नहीं ठाकुर को समझाती और उसे कुन्ती पान जाने से, उसे म्पया और जेपर देने से मना करती । कुन्ती तो पदमाश है ही, परन्तु तुम कैसे अपने पति को इस पापकन्ट में जाने दे रही हो। तुम्हारे सामने तुम्हारे विवाहित पति पर एक गे औरत कब्जा किये है, तुम्हारे घर का सारा सामान और जेवर उसके यहा पहुचता जा रहा है फिर भी तुम काइ ध्यान नहीं देती। परन्तु अाज तो म उतना छोटा और पची बुद्धि का नहीं ह । श्राज सोचता कि वह बेचारो करती भी तो क्या ? ठाकर पुरुष या, इसका स्वामी था। उसके शरीर का दिल, दिसग का, उसको प्रवृत्तियों और इच्छाओं पर उसे पूरा
-
*-
धनियार था। यह सब चाहे अपनी पाना पनी पारस्ने
मान पर और जय गद गय उस निसोय जर माश्य
पर धूल में पर। उस समय ट्युगान मेचारो मेरी यात
सुनती और रो पर रहना। में उनी मोदशा और मनी
प्यथा पानो न सममता श परतुभुती दीदी की तरफ से
गेगमन घण्णा मे धार मा मर जाता
पुन्सी फ और टार के इस मुग सम्बध से पार खुले
टुप पापागार से, उसके माता पिता, घचा, मा जय भय ऊय
उठ तय उप पी म्येच्दना और उच्य पलना मे परेगार mar
उन लोगों ने से घर से निशा दिया। उस परीक्षा के समय
ठार मामो भाया और उसने गांव में एक मराग मपाल ले
पर पुती को उम में रपासारे गाय में नहलका मर गया।
दिन-दहाड़े एक ग्रामणी जा युवा और विधया हा, इस प्रभार
एक ठाकुर द्वारा रगली जाय। गार ग्रामों में सोम पल
गया। मैं भी नय गर्मा को छुट्टी म गाय गया और यहा बार
यह मब गुग तो मारे शोध के उपल पड़ा। शाम को पुन्ती के
यहा जाने की सोच हो रहा था कि नोकराना ने था कर कहा-
"छोटे भैया, विटिया ने श्रापको युलाया है।"
यह दु माहस ? बेशर्मों को भा पद हाती है। मैंने
सोया कि यो गो शायद मैं न भी जाना परन्तु अय तो जरूर
जाना चाहिये।
घर में भीतर पहुचते ही उस
-[१९८1
मचला।
मैं भूल न सकू एकहरी, वशीभूत और स्निग्ध नारी ने दोपक की लौ सो फुटते हुए कहा बैठो, छोटे भेया। शायद तुम रिना बुलाये यहा श्राना पसन्द न करते, इसो से मने सुनरो को भेजा था। देखो यह घर तुम्हें पसाद हैन।' में उस साल हाइस्कूल की परीक्षा देकर गया था। शहर में रहने वाला भोर तुका र तुर्की जवाब देने में कुशल । कुछ पुढ़ते हुए बोला- 'मकान तो बुरा नहीं है परन्तु यहां जो कुकर्म होता है यह दम लोगों को गाव में मिर नहीं उठाने देता।' फिर वही सौहार्द भरी हसा जैसे भाग्य के साथ और जीवन को विभापिकायों के साथ एक गहरा समझौता होगया हो। जो झेला है सर पोगई है और जो झेल रही है यह सर रस बनता जाता है। वोली क्यों भैया कुकर्म यहा क्या होता है ? जो धर घर में होता हे वहा तो यहा भा द्वाता है। मसार में पक पति के होने से मेरा कोई नहीं है, यो माता पिता, चाचा चाची सर है। फोन पेसा है मनमे जो मेरा जहर धारण करे। मिठास तो सभी चाहते हैं। वे भी चाहते है, हम भी चाहते हैं। परन्तु मेरो जो ज्यालायें है, जो अधड है, उहें कौन सहन करेगा। और जो यह सब बरदाश्त करता है- सहर्ष मेरा माज और अन्दाज उठाता है, उसे मैं यदि घण्टे दो घण्टे के लिये अपने शरीर पर पूरा अधिकार दे देती है तो क्या बुरा करती है।'
मैं भूल नसत
एक निर्भय स्नेह से मेरी ओर देखते हुए उन्होंने यहुन
सी गते यही थीं। यही मेरी उनकी प्रापिरी मैंट थी।
उन्हाने याद में यह यार बुलवाया मी परतु में न गया। समते
समय तक मैंने उन जाने स्तिनो यात पद डालो थी, चलने
के पहिले उन्होंने कहा था-
दिगो छोटे मैया औरत और मई
में कोई विशेष मेद नहीं होता। परन्तु फिर भी एक दूसरे के
लिये एक दूसरा श्रायश्या है। फिर मेरे लिये प्रेम करना
और मम पररमा पनना यह गलती फैसे है। प्रेम है क्या?
अपने को पूर्ण से पूर्ण करने का यत्न करता। जिससे मिल
कर हम पूर्ण पाने चले यही हमारा प्रेमी है। फिर दान तो
स्त्री का धर्म है उसी मूलत्ति है। मैं कैसे अपने पास इतना
रूप, इतना यौवन और भावनाओं का एक अपना ही ससार
लिये अकेली जी सक्ती ह । मुझे भी तो पफ सम्बल चाहिये।
थानरण श्रार निवारणता का प्रश्न हो जहान रह जाय। मेरा
मारा अस्तित्व जो भगोकरण के लिये है अस्वीकरण की भोर
जाय भी तो से"
पसी ही न जाने कितनी यातें होने कही थी और में
उनकी उच्छखलता और नीचता पर प्रचलित होता घर लौट
थाया था।
*
*
छुद्री सतम होने ७-८ दिन ही रह गये थे। इसके
याद फिर मैं पुन्ती के यहा नहीं गया। यधपि जाने की इश
-[ १२० ]-
यदा कदा होती थी परन्तु फिर भी जा नहीं पाता था । सहसा
एक दिन सुबह उठकर जो सुना उससे बहा विचित्र कौतुक
हुश्रा। इधर दो तीन दिन से ठाकुर बीमार था और आज ही
रात को तीन बजे चल बसाया। श्रासिर शत शत ब्राह्मणों के
अभिशाप साली कैसे जाते।
प्रश्न माया-श्रर कुन्ती का क्या होगा? परन्तु तत्काल
उत्तर मौजूद। उसके लिये क्या है ? यह तो चरित्रहीना है।
उस पार । एक ठाकुर था-श्रव की बार कोई पनिया सही।
जो तन बेचने वाली है उसे कैसा भय और विधेक । फौरन में
घर से निकल कर ठाकुर के दरवाजे पर पहुचा। लोगों की
भीड लगी यो। घर में भीतर जाकर देखा- एक और गाट
पर ठाकुर का स्वस्थ सुन्दर शरीर पडा है और ठकुराइन रह २
पर मर्म भेदी चीत्कार कर उठती है । भाइ यधु और रिश्तेदार
सय खडे समझा रहे हैं। यह भी ज्ञात हुआ कि ठाकुर ने
एक पैसा भी नहीं छोड़ा। यहा तक कि ठकुराइन के पास
जितना जेवर था सब उसने उतरया फर कुत को दे डाला था।
ठकुराइन के दो तीन भाई थे जो सब आगये थे। यह सब
कच्चा चिट्ठा जिसे ठकुराइन रो रोकर गाव के समग्र जनी के
सामने सुना रही थी सुनकर उन्हें यहा तैश पाया। योले-हम
लोग अभी उसके यहा आते हैं और उसका सब जेपर छीने
लाते हैं । ठाकुर साहन के जीते जी उसने खूय मौज कर लिया।
[१२१]
मस
श्रयम उमेर सकिान पर पार करो हमारा
ही है।
उभगइन ने पगनहीं भैया। तुम लोग मरे यहां
न जायो। यद ये हम समय दुप
मं
व्याल
होगा। पिर
उनि मेनादिया यह नो मर गन्दा पाथा। मेरा उसके
ऊपर क्या अधिकार है और नुम्हें ही क्या अधिकार है जो
तुम उस जा पलायो। उनी मी में भारतात
और में यह मय नहा हाने देशाचाह में कमी न किमी
प्रकार था और अपने बच्चों का गुसर पर दो लू गा।',
परन्नु चे तो टापुर थे। पुगप मी। मागे हदय के भीतर
फो श्रापाज कैसे सुन लते ताप युयर उनित तो यन्ती के
मकान की तरफ चलदिये। पाछर दस-यारह भादमियों की भाष
होनी । वो दिन काग दाहिने पायें, चल रहे थे, उनमें एक में
भी था। सोचा थान पुन्सी पो ममाज, ननिषता, मर्यादा चौर
नारीत्य से द्रोद्द करने का फल मिलेगा। तय में ऐमाही मोचता
था और मेरे विचार ऐसे ही थे। जीया यहुन सकुचित
रूप हा देख पाता था यद्यपि उसे पाय खोलकर देखने का पूरा
प्रयाय करता था । पुन्ती काघर यहां से लगभग १फाना ग पर
था। गम्ने म ठकुराइन के एक भार ने थाने पर से दो पुलिस
वालों को भी साथ ले लिया। शायद अपने कृत्यों वो भ्याय
और श्राईल से परिचित करके उनका औचित्य कायम करने के
[१२]
मैं भूल न सक
लिये । उधर गार के लग ठाकुर की मिट्टी उठाने जा रहे ये
भोर घर हम लोग कुन्ती के दरवाजे पर पहुचे। दरवाजा
गुला था ! पाहर से आवाज दा गइ। जब कुन्तो न गेली तो
नाहर ५-६ मिनट तक प्रतीक्षा करने के बाद सर लोग भौतर
घुसे । नोकरानी भी शायद कुन्ती को ठाधुर की मृत्यु का हाल
सुना कर फिर अपनी पुरानी मालकिन के पास लोट गई थी।
प्रागन में पहुचते ही सब लोग चाक पडे। मामने का दृष्य
वडा ही भयानक था। मैं तो सब से पोरे था और यहा तक
श्राने में एक प्रकार की ग्लानि और आत्म सकोच सा हो रहा
या। प्रेरणा फिर भी पींच लाइ थी। इस लिये मैं मय से गद
में चौका, यद्यपि मेरा चाकना जोवन भर के लिये था। हम
लोगों ने जो देखा उसे कह ही देना होगा। सामने दालान म
कुन्ती धनी से रस्मी यांध कर निर्जीव, निप्पाण लटकी हुई था।
उसफी बडी-बड़ी निर्दोष पाखें रोते-रोते सूज गइ था पोर
मृत्यु की भयानक यत्रणा से अति विकृत हो गइ नीं। जीभ
याहर निकल आई थी, परतु चेहरे पर एक अति मानवीय
सौन्दर्य था। एक अनुपम नारी भाव था मानो मर फर भी अपने
मानवी होने का प्रमाण दे रही हो।
तीनों नवयुवकों की आखों से ज्यालायें निकलने लगीं।
परन्तु अत में न जाने कहा से पानी पा कर छलक ही पडा।
पुलिस पाले थाने की प्रोर चले दारोगा को
[ १२३ ।
Pr
Human
याने ए ममगर र पिम्नार देने के लिये मन पर।
रा गया और गम मैंन पायोका
गेगा शुक्रकिया जान पर माने
जाना।
मेगे जिसमा शान थी-रामूक मोर प्रा में
दया गया था। इस माम-रक्षा में मोपा यहो में
मेरा पदनाममामालिये मी जान पाती थी।
इसकीने माहिम से जाना कियाोगा।
मी मग मे योगा कामे पर शरारे गाने केंगे।
लेशिन या मी जर मी नट लगा पा गा|
जिमपी गोदरा मरना मना रही। मुझे या
भी याद प्रापा- उपने उस दिन कितनी गच्चा हो यह का
धादि-गोटे भैया, तुम याद रमोलीकमा वेश्यान
कर तुम लोगा मुसवाना दोरेगी।"HIKाम शुभ
मग मी पर उचाई और महता थी। मानो उसे
লা শ্মীন দিয়া।
तप से मानता यद मप धारों में मामने घूमा परता
है। अभी तो धार ताजा है। ज्यादा दिशमी ही हुए। पल
मान को घटना है। गोपन में तय से एक गाठ पगा।
श्रापले की तरद यद सब उटा एदय में और भार मासूर
पन पर बहना जाता है। जैसे सृष्टि, समाज, जापन धौर मृत्यु
सभी अर्थहीन वृधे और तर्क सति से दिन हो । पाइ यात
-~-[ १२४
में भूल न सकून
पकड़े नहीं मिलती। मन धुटा करता है। दुनिया को देखने की
निगाह ही बदल गई है। जिंदगो की एक एक जड जेसे इस
महाविपाद और प्रतारणा से सिंच जाती है । हम किसे क्या
कहें और सममें। किस के मानस की गहराई तक हमारी पहुच
है। किसके जीवन की अन्तशिखा हम देख पाते हैं । जीवन की
गलियों में भटकता हुआ म उमे भूल न सक् यही मेरो
पुकार है।
।
-अचल
में भूलनमा
वाम
१५ घाटे में जान अधिर
FAFT परनामा घटी हैं। यही गेश का मोगा,
গ্রা থানা, শ্যামল এ মামা একান্ত মুম্বাই
पराया गयामागरण गाते। लेपिन पर पा-
हा, पयल एक हो याग या हो गई-जिमका मुझे भी
सप्न मेंमा पान था । घान्तर में म उसे अपने जीवन में
पभी नहीं भूा साती- मनूगा।
लगभग पर्ष भर की पान तो होगी। यही सदियों के
दिन थे। उन दिनां में प्य मत थी। '' पपा पास करणे
नासाल से धाये थाहा दिए थे। माता पिता गुप 'सार'
परने में माता जी का प्रमा'चाटी थेटो', भैया यदि को
'छोटी जीजी' और मामा मौगियों को 'छोटा मात्री' ही यनी हुई
था। हालांकि मुझ से छोटे और परमा-पहिा है--पर फ्याँ
कि में और जीजी (श्री रत्नकुमारी माउर) सदा सग रहे.
[ १२५
-मैं भूल न सई- इसलिये मैं छोटी और जीजी यही कहलाती रहीं। इसलिए कई भाई बहिनों से घडी होकर भी मेरे 'छोटेपन' में कोई कार्क न श्राया । श्रर भी मेरी छोटी कहलाने की हास्यास्पद श्रादत नहीं गई है। यदि कोई श्रभो भी मुझे बहुत बडी' कह दे या सोच ले, तो माहो मन यही चिढ लगती है । पर इस श्रादत में---उसी एक घटना ने अन्तर तो डाल हो दिया है। हा तो में सूय स्वतन्त्र, लाडलो और चचल गो, उन दिनों न किसी की फिफ, न किसी का भार । इसी मस्ती में दिन पीत रहे थे कि- यहा के 'डाक्टर' की यदली हुइ और उाके स्थान पर 3 आये सर्जन श्री मापुर श्राप मेरी नाते की एक दिन के पति हैं। इसलिए में उनका श्राना सुनकर सूर खुश हुई। फिर जर एक दिन वे मपत्नीफ हमारे घर खाना साने पाये तो यातचीत के सिलसिले मे मालूम हुआ कि सन्न साहब के भाइयों में से दो भाई २४ और २० सालकी श्रायु के है, अविवाहित । दोनों BSC और पटना कालिज में इजीनिय रिंग के विद्यार्थी है। फिर क्या था--- -~वही हुश्रा जो आम तौर पर होता है। बड़े भाई श्री जी से हमारी जीजी की शादी करने का माता पिता ने विचार फर डाला । सैर साहब ! Apply किया गया सर्जन साहय के माता पिता के पास । और इस धातचीत के सन्देश-वाइफ चन गये हमारे एक -[ १२७ ]------
-मे भून न १
स्नेही मामा जी ! प्रार्थना करने के बाद यही घ्याकुलता और
उत्सुक्ता। मेरे माता पिता सर्जन साहय के माता पिता के
निर्णय की प्रतीक्षा करने लगे।
फिर एक दिन मामा जी पाये ! उनके प्रसन मन्त्र से
धान होता था कि ये कुसुशगरी लाये है। इसी अनुमान के
आधार पर मने जीजी को सूर ही बनाया । पर मुझे नहीं मालूम
था कि इस विषय में मामा जी और माता पिता में क्या यात
चीत हुई। चाय श्रादि पीकर मामा जी लौट गये।मैं निश्चिन्त
चित्त से धीरे धीरे रसोइघर से माता जी के कमरे की तरफ
जा रही थी। मैं भी बरामदे में ही पहुच पाई था कि सुना-
माता जी जीजी से कह रही थीं-"उन्होंने कहा है कि घड़े
लड़के की तोकहीं और बातचीत हो रही है, छोटे की हम प्या
से करने को तैयार हैं इतना सुनकर मेरे श्राश्चये का
सीमा न रहा। इस तरह उछल पर कमरे में आ पड़ी जैसे
बिजली ने पैरेपट मार दिया हो। उसाअसीम श्राश्चर्य में अन
जाने मेरे मुह से निकल गया है मेरे लिये ?"
माता जी और जीमी पिलसिला पड़ीं। बड़े हाल को गुआते
हुए जीजी चोलीं-"हाँ पगली तेरे लिये।" तर मुझे होश
हुआ कि में किसके आगे क्या कह गई । उफ तब तो मारे. लज्जा
केक्ट सी गह।
६ जुलाइ सन् १९३६ को स्वर्ण-सन्या
- १२८
,
उसके याद
में भूल न सकू
ने मेरी मल्हड़ता का उपहास करते हुए मुझे भारी गुरुतर भार
की सूचना दी । और सब लोगों ने कहा-"कृष्णा की सगाई हो
गई। साथ ही मामा जी के अत्यधिक प्रयलों से उसी दिन
जीजी की भी सगाई श्री के साथ हो गई।
सब कुछ हो गया और सब कुछ ही हो जायगा। पर में
नहीं भूल सकती नहीं भूल सकती
अथाह विस्मय को-माता जी के शब्दों को और अपने पागल.
पन फो! श्रोह ! मेरे छोटे जीवन में वही एक महान् विस्मय
फारी घटना हुई है। वह वादे किसी के लिये साधारण हो-पर
मेरे लिए उसे भूल सरना एकदम असम्भव है-जीवन के
थन्त तक
--कृप्याकुमारी माथुर
अपने उस
-
M
मैं भूल न सकू
-
इक्कीस
-पडित यावा, तमी पानी पिया देता, बहुत पुन
होई, रोना रोया जस गइये यात्रा" पहते हुए एक अद्भूत
गिडगिड़ाने लगा। उसका मुह सूसा जा रहा था। योलना
पठिन था, तिस पर भी पडित जी न पसीजे। वे गोले, "कौत
जात हउए"
हाथ जोड पर अछून ने डरते डरते कहा, "दास भगत
हई महाराजा"
"चल, चल सार भगत धनत हउऐ । का दम पानी
पियारा के लोटा भरस्ट परी। श्रागे यदा, दम ना पिनाइय
उआइय।"
"बाया हम लोटवा थोडे मागत हह । अरे, दूर से पिया
देता, हम चिरुमा से पी लेइत कोनों लोटया थोडो जुठारव
"नाही, नाहाँ, ई सय मा होई। वाह! दूरै से पिया दा,
अरे धरिया, तुमरे मुह में जाई ना तय भला हमार लोटा
-[ १३०]
”
.
-मैं भूल न स कइसे सुद्ध रह सफैला। हम लोग याम्हन हई, पडे फरची से रहोला । पानी पियारल त दूर रहल हम लोग अछूतन लाई से घबराइलाजा जा नग मत फरा।" के पर- सारी पृथ्वी कुम्हार के थावा सा तप रही थी। पशु पक्षी तक अपने धर्टी में जा छुपे थे। श्रादमी का नो मापारण तया बाहर निकलने का साहस नहीं होता था। चरवाहे अपने मुडासे का तकिया बनाए पड़ों के नीचे सोने का प्रयत्न कर रहे थे। पास ही, गाय वेल पीपल के नीचे बैठे जुगाली कर रहे थे। परन्तु मुझे एक आवश्यक कार्य से बाहर निकलना ही पड़ा। घोडे पर आ रहा था। में पसीने से तर था सो तो था ही, बेचारा घोटा, उसका भी सारा शरीर भीग गया था, मुहसे फेन छूट रहा था, नथुने फूल आये थे। भागे ही पेड़ की छाया देख फर वह हिनहिनाने लगा। पेट को छाया में पहुचने पर मने रास सींची । घाडे की तो असे इच्छा हो यह थी, वह एक दम रुक गया। में उतरा और पड़ा अपने साफे के छोर से पसीना पोच रहा था कि सुनाई पड़ा, “पडित घाया, तनि पानी पिया देता।" और साथ ही मैंने देखा, एक अस्त- गिडगिटा कर पानी माग रहा है और पण्डित उसे झिड़क रहे हैं। मुझ से यह न देखा गया, मैंने कहा, "पण्डित जी, काहे नहीं श्रोके पानी पिया देता ? पानी पिउले से लोटवा थोडे असुद्ध हो जाई।" F'१३११'
मैं भूल न सक
"वाह ! तू के हऊया। हम पानी पिमा पातिर श्रापन
धरम भरस्ट परी। हमार एक रुपया क लोटा असुद्ध हो जाइ
त कोई देरी याला न होई।"
“पडित जी, गुनमा मत ओ, बिचारे के पानी पियादा,
भरत हो, तुम्हें एक रुपया न चाही ? पियाग महाराज।"
पडित जी ने पानी काढा और पिलाना शुरू पिया।
देयते-देखते प्यासा, गरोय श्रन्यून एक लोटा पानी पो गया ।
पर भी यूद पानी पृथ्वी पर न गिरा ! पानी पिलाने के याद
उस ब्राह्मण ने कहा, "रुपया दिहल जाय याबू ।"
मैने जेर से एक रुपया निगल कर उस प्रामण के
सामने फेंक दिया और उसने चील को तरह झपट कर उसे
उठा लिया । तर मैंने कहा, "अच्छा, पंडित जी, असुद्ध लोटवा
मो के देदाना। ऊ त श्रय तुहरे कौनो काम क न रहल ।
घेचारा ले जाइ।श्रो के कोनो कार्म देई।"
ग्राह्मण योला, "हे, हे, महाराज! यो के रहन दिल
जाय। हम भागी श्रोगी में डाल के सुद्ध के लेव। घमार
सियार ससुर का करी। याबू, प्रा के हो ?"
मैंने कहा, "पडित जी, बहुत दुरा फ यात हो। अथ दिन
तो आपक पानी पिघउले मे लोटा असुद्ध होत रहल और
धरम भरस्ट होत रहल, अय लोटवा की से ले जाइल । जाई
यही के दे दिहल जाय।"
।
--
301
मैं भूल न सन्
"नाही, नाही सरकार, रहन दिहल जाय, हम विधी से
सुद्ध के लेवन।" श्रव परित जी गिडगिडाने लगे।
पडित के इस ढाग को मुम से अव न सहा गया। मैंने
कहा, "चुप रहा पडित जो, हमऊ ब्राह्मण हई पर कोई दुपिया
के जल देहेले भान तक लोटा श्रसुद्ध होत न सुनली। आप
लोग बहुत बुरा करीला | अइसन घरम फर तक चली। श्रय
देखल जाय आपक धरमवा एकै रुपया में हवा हो गैल। अगर
गरीय दुखिया के खुशी खुशी पानी पियउले होती त रोगों
रोओं सयार देत । इतना कठोर ना हा के चाही। पडित जी,
जे तू हैं यनउले हौ उहे ऊ गरीय के भी बनवले हौ। दुखियन
पर हमेशा दया करै के चाही।"
पडित जी भौचक्के से हो कर मुह ताकने लगे, वे कुछ
बोल न सके । घर चमार प्रसनता के मारे गद्गद् हो उठा और
योला "धना ई धरमावतार, श्राप लोगन के पुन्न परताप
से धरतिया थमल ही नहीं त कौ परलय हो गयल होत । तुमह
देखा पटित याचा सरकारो त बामन हुउऐ । बाबू इसपर श्राप
के बरक्कत दें। श्राप चाल यच्चा फूले फलें ।" पडित जी ने
धीरे से लोटा रख दिया। मेरा इशारा पाते ही उस अछूत
ने लोटे को उठा लिया और बोला "यावू इसपर तू है सुखी
रपखें ।" मैंने लगाम खींची, लगाम खिंचते ही घोडा हवा से
र यात करने लगा।
हरि श्रीघ
-
-[ १३३ ]
मैं भूल न स
वाइस
गोर्ण महायलेश्वर कारवार और अकोला पनदो
यदरों के बीच, तडी घदर से ६ मील दक्षिण में ठीक समुद्र के
किनारे पर है। दक्षिण में इसका माहात्म्य काशी से भी ज्यादा
है। लिंग जमोन के अन्दर है। जलहरी में बीचोबीच एक
छेद कर दिया है। उस धेद के अंदर हाय का गठा डालने
से लिंग या स्पर्श होता है। दर्शन करने का तो कोई सवाल
ही नहीं उठता। पुजारो लोग कहते है कि लिंग की शिला
श्रत्य त कोमल है। भक्तों के साश से उसके शीध्र पिस जाने
का डर है। अन पुराने लोगा ने यह व्यवस्था कर रक्खी है
कि दुत समय के बाद अच्छा सा शान हुआ कि जलहरी
शिल ली, यास पास का कूडा-पचडा दूर पर दिया प्रोर, मूल
शिवलिंग को दो ती हाय गहरा गुला रपया। इस तरह
पुरमाम तर खुला रखने के बाद सफेद चूने से उसे श्रासपास
भरवा कर चिनमा देते है। इस क्रिया को, अगर मैं भूलता
--[ १३४ ] ---
-में भूलन
.
नहीं है, तो वहा 'श्रष्ट पध'याऐसा ही कोई नाम दे रक्या है।
हम जप कारवार में थे तो एक बार कपिला पाठी'
जैसा एक दुर्लभ अष्टबध का योग पाया। पिताजी, मा और
में, हम तोनों इस यात्रा के लिये गये। मुझे तदडी यन्दर पर
बुलाने के लिये 'कुली' मेजा गया। में उसकी पीठ पर सवार
होकर गोकर्ण की ओर चल दिया। कोटि तीर्थ में नहाया।
गोकर्ण महायलेश्वर का दर्शन किया। स्मशान भूमि और उसकी
रसवाली करने वाले हरिश्चद्र का दर्शन कियाऐसा भी
एक तीर्थ देखा जिसके पानी में दिया डालने से चे गल जाती
हैं। अहित्यालाई के भन्न क्षेत्र में उस साध्यो की प्रतिमा भी
देखो। भारी माथा योर दो हाथ वाले गजानन महाराज का भी
दर्शन क्यिा। ब्रह्मा जी की एक मूर्ति देखी। और सबसे
महत्व की बात तो यह कि रारण द्वारा की हुई लघुशका का एक
कुण्ड भी देखा! अाज भी वह भरा हुआ है और नाक को फाड
साने वाला दुर्गध युरी तरह यसाता है। और भी बहुत कुछ
देखा होगा, पर अब वह याद नहीं रहा। हा, इस प्रदेश को
खासियत यतलाना तो भूल हो गया। घर गरोय का दो या
धनवान का, जमीन गारे की, लेकिन काले सगमर्मर जैसी
सरत, चिकनी और चमकीली होती है। ऐसी कि उसमें अपना
प्रतिविम्ब देखा जा सक। गर्मी के दिनों में दोपहर के
समय विना कुछ विलाये आदमी उस जमीन पर बादमी श्राराम
से सो सकता है। समय २ पर गोबर और काजल को मिलाकर
-[१३५
.
-
में भून न सा
लोपी पोती जाती है। मगर यह सीपना हाथ से नहीं होता।
सुपारी के पद के उपर एर तरह का पुट्ठा-सा निकलता है।
उसी से जमीन घिस घिस फर चिम्नी को जाती है । इस पुढे
का वहा की भाषा में 'पोचलो' कहते हैं।
गोकर्ष से वापस पाने समय तदडी तर समुद्र
के
रास्ते स्टीमलाच में बैठ कर जाने का विचार था। तूफान का
तुफान शुरू होने में बहुत ही योडे दिन रह गये थे। स्टीमर
एक हफ्ते के दो याद यद हो जाने वाला था, इसलिए लौटने वाले
यरियों की भीड़ भी येशुमार थी। वदडो बन्दर से बढ़ने
पाने लोगों को स्टीमर में जगह मिलेगी या नहीं, यही शफा
थी। इसी से स्टीमलाच में बैठकर स्टीमर तक जल्दी जा
पहुचना हमने ज्यादा पसन्द दिया।
गोकर्ण का यदर कुछ बाधा हुश्रा नहीं है। फिनारे से
छाती जितने गहरे पानी में चलकर जाना पड़ता था। फिर वहा से
डोंगी में बैठकर स्टीमलाच तक जाना होता था। जवान नादमी
तो उस डोंगी तक चलकर ही जाते, और औरत बच्चे फुली के
कंधे पर बैठकर या दो पुलियों के हाथों की पालफी बनाकर
उस पर बैठकर जाने।
शुरू में ही एक अपशकुन होगया। ए गरीय धुढिया
ने, जो बेहद मोटी थी, लेकिन जिसके पास दो पुलियों को देने
लायक पैसे न थे, एक लोभी कुली को मामूलो से कुछ ज्यादा
मजदूरी देने का लालच दिलाकर पंधे पर ले जाने के
-[१३६7
-मैं भूल न सक्
लिये राजी कर लिया। यह था कमजोर। किनारे पर घेठ
गया। विधवा धुढिया उसके कन्धे पर सवार हुई। पर कुली
ज्योही उठने लगा कि दोनों, अपना वजन न सभाल सकने के
कारण, तले ऊपर उलट गये। इसी समय अचानक एक बड़ी
सी लहर ने आकर दोनों को जल समाधि दे दी।
जहाज लगभग आसिरी होने के कारण गोकर्ण में भी
यात्री यहुत थे। वे सर स्टीमलाच में किस तरह समाते ?
इसलिए सौ श्रादमी जिसमें चैठ सकें इतनी बडी किश्ती स्टीम
लाच के पोछे याध दी गई थी। और उसके पीछे कस्टम विभाग
के एक हाकिम को सफेद डोंगी भी गाध दी गई। मैंने देखा
फि जा रवानगी किश्तियों के बल्ने करछुल की तरह गोल
होते हैं, वहा फस्टमवालों के बल्ले क्रिकेट के बल्ले की तरह
लम्बे २और चपटे होते हैं।
हमारा काफिला वक्त पर चल दिया। एक दो मील गये
होंगे कि आकाश यादलों से घिर गया, हवा जोर से चलने
लगी। जैसे कोई बहुत बडी दावत हो, इस तरह लहरें जोर
से उछलने लगीं, फिश्तिया डगमगाने लगी, और स्टीमलांच
पर भी हलचल यढने लगी। अरे! यह क्या ? वृदें।
परसात की घदें। घेर जैसी यही २ वू ! अब क्या होगा?
लहर जोर से उछलने लगीं। स्टीम लाच तूफानी घोडे को
तरह ऊपर नीचे क्दने लगा। पीछे की किश्ती की डोरियां
फर की आवाज फरने लगी। इतने में स्टीमलाच और
-[ १३७
4
विश्ती के यीच में पर घड़ी हिलोर बाई फि पिरती लापता!
में स्टीमलाच में यायलर के पास के लकड़ी के फर्श पर
पेठामा था। हमारे पन्नान यो जिता जल्दी हो सके स्टीमर
तर पहुंचा था। उसने स्टीमलार पागल की तरह रे जोश
मोड़ दिया। नरते गरम होगए। मैं जलने लगा। पछ
गदी मूमता था पि क्या करू? जरा भी पिसपूतो 'ममुद्रा
मप्यतु' होजाय ! और यैठना तो लगभग नामुमकिन ही हो
रहा था! यही मुश्किल से इस मुसीया से छुटकारा मिला।
समुद्र पी एफ मचा लहर ऊपर चढ़ था और उसने मुझे
नसशिपात स्नान परवा दिया। अय पर्श गरम रह ही कैसे
सरता था ? पिताजी प्रवडाए। मा को कल देवता का स्मरण
मूमा । "भगलेश! भद्वारद! मा वाप! तुम्हीं में पार
लगायो।" परमात मूसलधार पडो लगो। हम स्टीमलाच
वाले कुछ सुरक्षित थे। पर उस रिश्ती म जो लोग थे गा
क्या ? शुरू शुरू में स्टीमलाच पो पानी पाटपर चलना पड़ता
या इमसे उसमे अन्दर पानी प्रासानो से थानोता, लेकिन
विश्ती को हरपक ऊपर उठने पाली लहर पर भी सवार होना
पहता था । इसलिये चाहे जितनी हिलती हलतो फिर भी पानी
उसके अन्दर न पाता। परतु जर या भोर वर्षा में स्पर्धा
शुरू हुइ, श्रोर दोनों का अटूट हास्य यदा तो एक ही हिलोर के
साथ थाधो किश्नी पानी से भरने लगी। लहरेंजवतम सामने
1. १३८ ।
17ल गपार या
गिर पडते।
में भूल न सक
से प्राती तबतक तो ठोक रहना, किश्ती लहरों पर चढकर
आगे पढ़ती, कभी यह लदरों के शिखर पर, नो कभी दो लहरों
के योच के समतल में। पभी २ पक लहर पर से किश्ती
लुढ़क पडतो कि तुरन्त नीचे से नई हिलोर अकड कर पाती
और नाव को श्रवर में लेती। ऐसी प्रचितित हलचल से
भीतर पड़े हुए लोग टकराकर धड़ाधड़ एक दूसरे के ऊपर
लेकिन लहरें पक याजू से खूय थपेडने लगीं। नार के
अदर की औरतो और बच्चों के पामचिरला चिल्ला कर रोनेके
सिवाय दुसरो उपाय हो न था। वहा जितने जवा मर्द थे, घे
समी डोल, गागर,घडा, पाल्टी, जिसके हाथ में जो पाया, उसे
ले ले कर पानी भर भर पर याद्दर उलीचते थे। फायर पजिन
के पम्प इससे ज्यादा क्या काम कर सकते थे ? यडी कठिनाई से
पानी निकाल पाते कि दूसरी फर लहर निफ्ट से हास्य करती
हुई किश्ती से टकराती और अदर श्रा जाती। इस समय की
चौ और पुकारें कान के परदे फाड रही थीं, फलेजे को चाक
कर रही थीं। कुछ यात्री अवधूत दत्तात्रेय स्वामी के भजन गाने
लगे, तो कोई पढरपुर के विठोवा को बुलाने लगे। किसी ने
श्रया भवानी मनायो तो किसी ने विघ्नहर्ता गणेश का आव्हान
किया। शुरू शुरू में स्टीमलाव के कप्तान और पलासी इम
सन को धीरज यधाते, सममाते
'अरे तुम भरते क्यों हो?
जिम्मेदारी तो हमारी है, इमो ऐसे कितने हो तफान ने ॥
(१३६
लेकिन देखते-देयने मामला इतना बेढय हो गया कि कप्तान
का भी मुह पीला पड़ गया। यह कहने लगा, "भाई ! श्रय शेने
से क्या लाभ ' मनुप्य को एक न एक दिन मरना ही है, फिर
पद विछौने पर हो या घोडे की पीठ पर, शिकार में या दरिया
में । तुम देखते ही हो, हम से जितना कुछ हो सकता है उपाय
कर ही रहे हैं। मगर इन्सान के हाथ में है ही क्या ? जो मालिक
फरे वह ठीक।" उसके मुह की तरफ ताक रहा था। चलने
से पहले जो यति गाजर की तरह सुर्य था, यही भय लजपती
के पत्तों की तरह मुरझाया हुमा किषर्तव्य विमूढ पड़ा था।
मैं इस वक्त निरा यालक तो था ही, लेकिन कोई कठिन
बुधवसर आ पडने पर बालक भी तो उसकी गहराई को समझ
सकता है। पल पल पर अपनी जगह से डिग रहा था, स्थान
भूष्ट हो रहा था। बडी पठिनतापूर्वक दोना हाथों से पकड़ कर
अपनी जगह थामे हुए था। हमारा सारा सामान एक कोने में
पहा हुथा या । उसका कौन फिक करता ? मगर पूजा की तमाम
देव मूतिया पोर नारियल बन की एक छोटी सी पिटारी में
रखे हुए थे, उसे मैं अपनी गोदो में ले घर घेठना नहीं भूला
मेरे मन में से कैसे विचार उठ रहे थे। यह मेरी
भोली माती भक्ति का काल था। सुबह सवेरे रोज दो घटा तक
मेरा भजन चलता। जनेऊ नहीं हुश्रा था, अत: सध्या-पूजा तो
पहा से भरता ? फिर भी जय पूज्य पिता जी पूजा करने बैठते
-[ १४०
१
-में भून न सा---
तो उनके पास बैठ कर उरें मदद करने में मुझे बडा आनन्द
मिलता था।मन में विचार आया कि श्राज जो भाग्य में इवना
बदा होगा तो इन देवताओं की पिटारी को अपनी छाती से
सदा कर दी ड्य जाऊगा। दूसरे ही क्षण विचार आया, अगर
मा के देखते लाच में से पानी में उलट पहा तो मां की क्या
दशा होगी। यह विचार तो इतना असा हो गया कि गला
रुघ गया, दम घुटने लगा, छाती में पत्थर लगा हो इस तरह
दर्द होने लगा। मैंने परमात्मा से प्रार्थना की कि डुयाना ही हो
तो इनना करना फि मा और मुझे, एक दूसरे को हृदयालिंगन
करते हुए डूबने देना।
प्रत्येक यालक मन में इतना तो विश्वास रखता है कि
उसका पिता धीरज का समुद्र है। चाहे आसमान टूट पड़े,
परन्तु पिता अपना धैर्य न खोयेगा। और जब ऐसा मौका श्रा
जाता है, पिता को हफ्कायक्का और, घबराया हुश्रा देखता है
तय बालक की हालत कुछ की कुछ हो ही जाती है। मैं
तूफान
से इतना न रा था, बरसात से भी इतना डरा न था। मनुष्य
की वू श्रावे तो उसे खाने के लिये अपना मुह फाड फर पाती
हुई लहरों को देख कर भी मैं इतना नहीं डरा, जितना कि उस
दिन पिता जी का गमगीन चेहरा देख कर और उनकी द्रवित
दया पाणी सुन कर डरा।
सय कोई कप्तान से पूछते, 'प्रय कहीं आ पहुचे हैं ?
चारों तरफ, जहा नजर डाले यहा बरसात, हवा. --
[१४१]-
।
पदला मौका
में भून में मह
जायें । अारियर ऊपर ही से लगर फेंक दिये गये और खलासी
लाच की छत पर पडे हो गये, शोर लये-सरे यासों से स्टीमर
की दीवार के साथ टकराने यालो हिलोरों की टक्कर रोकने
लगे। जहा बहरे लांच को फेंकने लगी कि मलासी अपने
लरेलने पामों को नोकपी दाल यना पर मारा भार अपने
हाथों और परी पर मेन लेने। फिर भी अत में स्टीमर की
सीढी के साथ स्टीमलाच की छत टपरा गयो और एक लम्या
तकता पडडड टूट कर समुद्र में गिर पड़ा।
मैं पास ही में था। इसलिये स्टोर में श्रदर जाने का
को मिला। जाना कैसा? गेंद की तरह फैश
जाने वाला था। पप्तान गुद और एक दूसरा पलासी स्टीम
लाच में पड़े रह कर एक एक आदमी को पक्त कर, स्टीमर
की नसैना की सब से निचली सीढी पर नई दुप, खलासी के
हाथ में पक्ता जाता। इस में सावधानी यही रखी जाती कि
लहरी की तली में जब लाच उतर गया हो तय प्रतीक्षा में रहते
और ज्योही दूसरे ही क्षण लहरों के शिखर पर लांच
या जाता और सीढ़ी भी विपुल निकट या जाती कि झट से
भाभो को फेंक देते। अगर दोनों तरफ के सलासी यात्री के
हाथ पकडे ही रहें, दूसरे ही क्षण लाच तली में उतर आय तो
उस श्रादमी के टुपडे टुकड़े हो जाय । मैं ऊपर घट गया और
पोछे मुह कर मा पा रही है या नहीं, यह देखने लगा । एक
-[१४]
मैं
भूल न सक
बिलकुल अपरिचित मुसलमान को मा फे धाय की कुहनी थामे
श्वाते देख मरे मन में न जाने क्या थाया। परन्तु यह तोश्नपने
प्राण बचाने का समय था। ऐसे समय क्या कोमल भावुकता'
काम श्राती? थोडे थमे ही थे कि पिताजी भी आ गये।।
देवताओं की पिटारी,सोमने कधे पर रख ली थी। ऊपर अच्छी
सी जगह खोज कर हमें बिठा फर पिता जी फिर अपना सामान
लेने के लिये वापस गये। में धचालु बालक जरूर था, लेकिन
पिता जी पर उप समय मुझे सचमुच गुस्मा या गया,--भाद"
में जाय यह सामान! अपने प्राणों को फिर से सफट में डालने'
के लिये ये फिर क्यो जा रहे हैं पर वे तो तीन यार गये पोर
चापस आए । भाषिरी चार वापिस श्रााकर बोले, गोकर्णमहा-
यलेश्वर के प्रमाद का नारियल पानी में गिर ही पडा। उसी
क्षण मा और म, योल उठे, मा ने कहा-'अरे रे" और मैंने
कहा, 'यस इतना ही
लाच वाले यात्रियों के, चढ़ जाने के बाद, अय विश्ती
बालों को पारो श्राई। वे सब चढ़े। उसके बाद लाच और
पिश्ती निशाचर भूतों की तरह चौपती चिल्लाती तदडी के
किनारे की तरफ गयीं और किनारे पर तपस्या करते वैठे हुए
यात्रियों को पारी-बारी से लाने लगी । श्रय तूफान युछ शात हो
चला था। लेकिन अधेरी रात और उछलती लहरों के बीच में इन
लोगों की जो हालत हुई उसका वर्णन फर ही कौन सकता है ?
-[१४५ }----
J
-
में मन नमा
स्टीमर यात्रियों से माटम मर गयी। ओ को मी
योगता, यहो पात सुना पटती कि उसका सामान समुद्र में घर
गया है, क्ष्य गया है। आधिर सप यायो भा गये। प्रभु की
कृपा कि एक भी प्राण हानि नहीं हुई। स्टीमर पल पडा और
लोग अपनी अपनी पुरानी यात्रा के पेसे दो सटपूर्ण स्मरण
एक दूसरे को सुना तुना कर पान के दुध को भुलाने लगे।
को यही देर किसी को नीद महीं आयी। मैं कर सो
गया, कय कारवार पदरमा गया और इम कय घर पहुचे,
मुझे यह पुछ भी याद नहीं है। लेकिन उस दिन के सूफान की
घटना तो मानो फल हो हो हो, ऐसी याद स्मृनिपट पा
तासी पनीर है-
दुमत सत्य, सुख मिथ्या दुसजन पर धनम् ।
-काका कालेलकर
.
-
- १४६ ].mama
मैं भूल न सकू
"
7
~
तेईस
सन १६३८ की बात है। जगत्प्रसिद्ध पहलवान
गामा मैसूर आये थे, अपने परिवार समेत। शहर में हर श्रादमी
को जान पर उन्हीं का नाम नाच रहा था। वे मैसूर के सुप्रसिद्ध
हएड फोट रोड पर सीता विलास, धर्मशाला में उतरे थे।
धर्मशाला के सामने सूर भीड लगी रहती थी।
"५ ग्यारह बजे का समय होगा। म कालेज जा रहा था,
साइकल पर । मरे घर से कालेज जाने के रास्ते पर हराडूड
फीट रोड पहना था। यहां पहुच कर मने देखा कि धर्मशाला
के सामने सूब भीड़ लगी है। कारण तो मालूम था ही। फिर
भी कुतूहलवश भीड की तरफ देखते देखते साइकल पेटल कर
।
रदा था।
F
--
इतने में एक दुर्घटना होगई। मैने माइकल किसी
प्रादमी पर चला दी। जब घराहट के साथ मैंने सामने देखा
मैं भूनन ।
तो कालेज के मर अध्यापक सामने थे। उस समय में कितना
शमिन्दा हुआगा और मेरे मा में से करें माप उठे छाँगे,
यह फल्गना परी पी चीन है। अध्यापक जी को घोट तो
लगी हो, लेकिन गरी पूरीदार धोती मरगाई से अटक
कर फट गइ थी। ये अपनो फटी हुा धोती को एफडे हुए उसे
समाल रहे थे। मुझसे यह महा नहीं गया। में उम सरफ
शरम के मारे गहा जा रहा था, एक तरफ पता रहा था कि
मैंने कैसी मूर्पता की मोर माय ही साथ अपने मान्य को कोस
रहा था फि घे सज्जन पयों मरे दी अध्यापकले।
प्रय सो ओ होना था, हो हो गया। सोचने के लिये
समय ही कहा था ? मैंने सादम पटार कर सिर्फ इतना पहा-
"क्षमा फोजिये मो, मैंने मामूद करसाइकल चलाकर
महज धेयकूफी की।" इससे ज्यादा में दुख नहीं बोल सका।
धे कालेज भर में अपने भोनेपन के लिए मशहर थे। यद्यपि
उनके वर्ग में कोई अनुशामन नहीं रहता था। क्योरि वे बहुत
ही उदार थे, फिर भी साधारणतः सभी विद्यार्थी उनमें बड़ी
श्रद्धा और भक्ति ररात थे। मेरी याने सुनकर उन्होंने कहा
फोह यात नहीं जी, यह तो मेरी सुद अपनी ही गल्ती है कि मैं
बीच सड़क से थारहा था। मुझे तो फुट पाथ पर जाना चाहिए
था।" उनकी ये यातें सुनकर मुझे पहले तो आश्चर्य हुना।
क्योंकि मैंने उनसे इस तरह के परताय की प्राश ही नहीं की
- १-]
.
मे भून न सर
थी। मैं सोच रहा था कि कालेज के अध्यापकों के से
स्वाभाविक व्यग के साथ ये मुझे दो चार बातें सुनायेंगे।
लेकिन उनकी उस अप्रतीक्षित उदारता ने मुझे चकित
कर दिया।
अब तो मुझे कुछ साहस हुथा। मैंने और भो दयनीय
अवस्था बनाकर उनसे क्षमा मागी। हम दोनों अलग हुए।
मेरा सौभाग्य था कि उस घटना के तीन दिन याद
उनकी क्लास पडा । उस वर्ग का विषय था नियन्य लिखना।
उन्होंने पिछले हफ्ते के निवन्ध पर टीका टिप्पणो का और
"The greatest incident in your life " अर्यात 'जीवन
की सबसे महत्वपूर्ण घटना' पर निबन्ध लिखने को कहा। मुझे
उस दिन इतनी खुशी हुई मानो एक सामाज्य हाथ लग गया
हो। मैंने अपने निवन्ध में उपयुक्त घटना का हो सविस्तार
वर्णन किया। मैंने उसमें अपना हृदय गलाकर रख दिया था।
उसे पूरा लिख जाने पर मेरा हृदय बिलकुल दलका मालूम
होने लगा।
मेरी सहन शक्ति की परीक्षा करता हुधा दूसरा हफ्ता
धीरे २ श्रा पहुचा। उस दिन मेरे मन की उद्विग्नता अपनी
चरम सीमा पर थो। मैं इस यात को जानने के लिये कातर
हो रहा था कि अध्यापक जी ने उस निय य के बारे में क्या
टिप्पणी दी है और उसके लिये कितने अक दिप है। यंग
[१६]-
Hemanta का समय ज्यांच्या निकट माता या रशेपो मग पातरम पहनी थी। रिसा प्रकार जय पुस्तक मरे हाथ में आगई तो देखा किनियर के नीचे Gool लिया है और उसके लिए मुझे यक मिले हैं । अध्यापक के शादय में मुझे वशीभूत कर लिया। पर घटमा मरेदय की या स्मृतियों में से एक है, मरे हदय पटल में किन उसका प्रतिषिय भोगही मिट एमदारमानाया सकस w mmon-
मैं भूल न सकू
चौबीस
कैसे भुलाई जा सकती है यह घटना जो हृदय
पटल पर पत्थर को लकीर मी खिंच गई हो, हमारे पास ही एक
परियार रहा करता था, घर में एक पुढिया और उसकी विधव.
यहू थी, हरेक परिवार में कुछ न कुछ कमी रहती है, वैसी है
कमी इस परिवार में भी थी। वार्षिक आय शहर के मकान
गाव, गाव की कोठी इत्यादि मिला फर ८-१० हमार थी, भाग्य
से पफ ही लड़का था जिसकी शादी भी श्रायु के १४ वर्ष में
करा दी गई थी। बहू को आयु केवल १० वर्ष की थी।
हमारे परिवार का व उस परिवार का कईयों से काफी
सम्बन्ध रहा था, इसी लिये मुझे उनके यहा आने-जाने में
कोई रोक टोक नहीं थी। उस वृद्धा को हम मासी नाम से
सम्बोधित किया करते थे। यह लड़का (मेरा मित्र) स्वस्थ
सुदर था व विद्याध्ययन में भी तेज था, भायु के २० वर्ष ही में
- [१५१ ]
~
- भूल न सक
+
यह थी० ए० में प्रवेश कर चुका था। स्त्री को भायु भी १६ वर्ष
की हो गई थी, जीवन श्रानन्द का श्रीगणेश हुथा ही था,
थी० ए० को परीक्षा देने के २५ दिन याद ही मोटर अपघात से
उस नपयुवक की मृत्यु हो गई, घरमें हाहाकार मच गया। वृद्धा
पर तो मानो पिजती हो गिर पड़ी। मुझे अपात का पता
लगा, में अस्पताल पर चा, मुझे देखते ही उसके नेत्रों से आंसू
यह उठे, मैंने उसे धैर्य रखने को कहा, पर उसकी आत्मा उस
से शायद कह रही थी कि वह अप नहीं बचेगा। मुमले उसने
सिर्फ इतना ही पहा
( उसको स्त्री) को
सहायता करते रहना। मेरी इच्छा है, परतु उसको इच्छा हो
तो " याम्य' पूरी भी न होने पाया था कि उसका
गली पद हो गया, उसी क्षण एक जोर की सांस के साथ उसकी
श्रात्मा पचभूत में विलीन होने निकल गई।
"उपरोक्त घटना को १ वर्ष से अधिक हो गया था, इस
'यीच एक नई बात यह हुई कि वृद्धा का एर भान्जा जो
२०० मील से विद्याध्ययन के लिये यहां श्राया था,
पालिज में पढ़ा करता था। इन दिनों मेरा घेद्यम का कार्य
भी श्रारम्म हो गया था, इसलिये मुझे उनके यहा जाने का
समय नहीं मिला करता था, फिर भी महीने में दो, तीन यार हो
आया करता था। वद नवयुवक (मासी का भामा) मेरी नजरों में
मुझे यात रगोला दिखाई दिया । इच्छा भी हुई कि कहा
[१५२
.
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परायो, मुझे तो पुष भर या मालूम दिया, शायद ग्रह मोचता दोगा कि यह तो अशिक्षित येव है" शिदिन मययुयों को प्रशिक्षित ही प्रतीत होने चाहे यह या यो० ५०, एम० ए० क्यों मह,--मने पहा "नहीं, ऐसा नहीं है, आपदा उन से विशेष परिचयन होने से बापने यह मोच लिया। से स्वभाय के घडे माथे हैं, दिन भर घर में यपहाया करते हैं। मैंने कहा "चलो अच्छा है, फिर भी कुफर पैर रखना चाहिये।" यह सुनते हो यद धुप हो गई, मैं भी चुप था यह पली गा, मेरे मन को एक क्षणिक मानन्द का अनुभव हुन कि भने उसे सूचित कर दिया था। पुछ ही दिनों के बाद उन दोनों के साय पृद्धा मामी के भी विचार मेरे धिपय गये, उन रगीले ने अपनी सोग मिड लाइन इस प्रकार तैयार कर ली थी कि जिस से उस की स्यात्रता में याधान पहुचे। मैं भी अपने कार्या में अधिक धिरु व्यस्त होता जा रहा था, या मासो यह सहित, ५-५ महीने हो गये, अपने गार की कोठी पर चली गई थी। ६-७ महीन पश्चात पर दिन मुझे पर तार मिला जो वृक्षा मामी ने मेजा था, उसने लिया था कि "तार पाते ही यहा चले भाइये", नयियत सराय है। मैं उसी दिन मासी के गाय • चल दिया। सायफाल का समय था, आधाश यादलों से घिरा हुमा था। मैने घर में प्रवेश पर मासी को प्रणाम किया। ये फूट फूट -[१५४ - प्रमmarvaanganam-
उन
मैं भूल ने सर्व
कर रोने लगी, मैंने कहा "मासी दुख में क्या होता है",
को शांत करने की कोशिश कर रहा था, पर में स्वतः कहा शांत
या। दुख का एक वेग निकल जाने पर मासी चोली--"बेटा
मेरा तो सर्व नाश हो गया" मैंने पूछा "विधा यह कहां है ?"
मासी ने कमरे की ओर इशारा कर दिया। में उस कमरे में
गया, • यह पड़ी थी, मैंने श्रावाज दी उसने नेत्र सोले
और मुझे देखते ही उसके नेत्रों से अ यह उठे, में भी अपने
अधुओं को न रोक सका । उसका श्वास उर्घ हो उठा था, मेरी
विचिन श्रयस्था थी। बिल्कुल इमी समय में अपने मित्र के
पास पहुचा था, जब कि यह अपनी जीवन यात्रा समाप्त करने
को या । यही दृश्य आज मेरे मामने या, अस्तु १-२॥ घण्टे याद
ही यह भी इस संसार को छोड गा, अय ३-४ दिन मुझे यहा
रहना श्रावश्यक हो गया था।
समय क्ट नहीं रहा था, साथ लाए हुए 'अर्जुन साप्ता
'हिक' के अंक भी पढ डाले थे, टहलते हुए सोचा अपने पक
“चैध मित्र को पयर कर दू कि में ३-४ दिन नहीं था मगा।
पत्र लिखने के लिए कमरे में रपी एक टेरल के पास गया।
फागज के दस्ते को उठा कर उसमें से कागज फाडने को हो था
कि उसमें से एक लिफा टपफ पहा, उस पर मेरा नाम
था, न मालूम फ्यों यह डाफ में नहीं छोडा गया । भने सोल पर
। पढा, यह मृत निधवा यह फा लिखा एक पत्र था, उसका
-[ १५५ ]
.
A
मैं भूल न सक
साराश इस प्रकार है रगोले ने श्रापके विषय में मेरे
और मासी के विचार कनुपित कर दिये थे, उसके पहिले मेरा
इरादा था कि में अपना दूसरा विवाह कर लू, परन्तु मासी से
में अपने रिचार स्पष्ट न कह सकी, न श्राप से ही इस यात में
मैंने कुछ कहा। जिस समय इन विचारों के वेग मेरे मन में श्रा
रहे थे, उसी समय उस नराधम ने घर में प्रवेश किया, उसकी
यातों में मैं सोपसे भूल गई। उसने कहा भी था कि हम शादी
पर लेंगे, अगर मासी ने विरोध किया तो हम यहा से भाग
चलेंगे। मैं भापनापश उसको यानों में फंस गई। पहिले उसने
सति न होने के साधनों का उपयोग किया, परन्तु क्षणिका सुप
के थावेश में उन साधनों की साधना में दुर्लक्ष हो जाया करता
धादि।
मासी पश्चाताप दग्ध हो वह रही थी,-"ग्रेटा मेने उसे
यह कटु शरद रहे जिसस परिणाम यह हुमा मि मालूम
उसने क्या साया जिससे आज उसी मृत्यु मुई। मुझे पता
चलने हो भने इलाज करवाया, परन्तु गर्भ में पालर मर धुपा
था, उसे निकालने धादि में अति पर दुश्रा और तभी से उम
ফালৰ বাৰ ।
३-४ दिन पहो रह पर मैं अपी घर लौट आया, परतु,
यह घटना पया जीवन पर्यन्त मुलाई जा सकता है ? कदापि
-रविनाय
1
-[१५६ ]-
मैं न मल म
का
पच्चीस
"उसे यहा गोपाल ही कहेंगे।
गोपाल के माता पिता नहीं थे, उसके चाचा उसका
पालन पोपण कर रहे थे। यह देहली कालिज में पढ़ने के लिये
ही पाया हुश्रा था। कालेज की फीम व रहने के खर्च के अति
रिक उसके चाचा उसे १५) महीना जेय सर्च के लिये दिया
करते थे।
गोपाल एक सकरी सी गली मे, पफ ५) महीने के मकान
में रक्षा करता था। मेरी समझ में नहीं पाया कि वह होस्टल मे
क्यों नहीं रहता । और
एक दिनाराव के साढ़े नो यजे थे । सिनेमा 'से लोट
रक्षा था। घर पर कोई नहीं था, इस कारण बाजार में साना सा
रहा था। सोचा गोपाल से मिलता चलू, उसके पास मेरी कुछ
किता थी यह भी ले लूगा।
गोपाल का मकान गली के धासीर में था । गली में
-[ १५७ ]-
में मन न -
घेरा था, इस वारण सम्हला सम्हलामा यागे को धड़ा।
गोपात के मकान के समीप हा पहुचा था कि किसी भी को
पहुन दगी सो चीख सुनाई दी। पान चेतन हो गये, पाय यफ
गये। अधेरे में ददने का प्रयत्न करने लगा कि यह शायास
पिधर से पाइ । फिर पाया भाई। यह गोपाल की कोरी मे
लगी, एक कोठरी में से पा रहा थी। दरवाजा थदर से बन्द
किया दुभा था। आगे यहा, दरवाजे कोदयरों में से देखा।
एक छोटी सी कोठरी थी, उसरी दीयोरों पर जाने
क्य मे सफेदी नहीं हुई थी। मामने पाले में दीया जला रहा था,
उसकी फलाम मे शाला काला हो गया था। सामने ही दीवार
पर सूटी पर पड़ मैले पुचल फपड ₹गे हुए थे। और,
उसी थाने के पास दीनार से लगी एक स्त्री पटी थी । उरी
सी, साई के सामने गाय सी। उसके चेहरे पर भय के भार
दीरा रहे थे, उसकी यड़ी यडी मायें पूरी खुली थीं। मुह अध
खुला था, जैसे अय चोय निकली और भर किलो । स्त्री
युवती थी, आयु शायद १७ मे अधिक नही होगी। यह
मन्दर थी, परन्तु असाधारण नही ।
उसके शरीर पर एक दुर्ती और पटीकोट के अतिरिक
और पुछ नही था। धोती पास ही कुछ दूर पर जमीन पर
पड़ी थी। उसके सामने पर श्रादमी पड़ा था। पतला दुपला,
सिरके याल उड गये थे, रग काला था। उसकी वाहे सूखी
( १५८ ]
.
-
मैं भूल न
फिडो सी, झुरियोयाली, शुष्क थीं। उसने धोतीघ यनियाइन
पहनी थी। उसने आगे बढ़ते हुए कहा, "श्रय की यार देर क्यों
हुई। उस हरामशाद पासून कर डालु गा, पर पहले तुमसे
सुलट लू । "स्त्री ने अपने हाथों में अपने चेहरे को ढक लिया,
श्ररि उमो धीरे से कहा, "मुझे मार डालो, उनको मत छेडना,
उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, सय तुम्हारी ही मरजी से तो
हथा। तुम मचाहत तो कुछ नही होता। और भय की धार
ही तो देर हुई है।"
"मैं कुछ नहीं जानता। एक तो उसने वक्त पर पसे नहीं
दिये और फिर धमकी देता है। तू उसकी तरफ से योलती है?
मैं क्या करू, यनिया दिन रात दोकता है, कपडे याला अलग
जान माये है। सप धमकी देते हैं कि अगर उनका स्पया मैंने
क्ल नहीं दिया तो यद पुलिस पालों को हमारा फिस्सा बता
देंगे। म क्या करू, अगर इस वक्त उसके पास पैसा नहीं है।
मैने सोच लिया है, अगर उसने अभी रपया नहीं दिया तो पहले
तेरा सून करू गा, फिर उसका और फिर अपना गला काट के
मर जाऊगा।" कह कर उस मौत की सी शक्ल घाले आदमी ने
ऊपर के एक पाले में हाथ धडा फर एक चडासाचा निकाला।
रह स्त्री की ओर बढ़ा।
मेरे पांच काप रहे थे, चेहरा जल सा रहा था, आखों के
सामन अधेरा सा पाया । बाजू फडकने रागे । "क्या मेरे देखते
,
1 १५६ -
भूलन
देखते एक स्त्री कासून हो जाधेगा? नहीं यह नहीं हो सकता।"
मी मोचा और दरवाजे को धक्का देने वो याला था कि मैंने
अनुभव किया, कोइ मेरे पास मे निपला चला जा रहा है।
अधेरे में भीम पहचान पाया कि यह गोपारा था।
मैंने फिर झाका, यह श्रादमी खड़ा चाकू से खेल रहा।
था। एकाएक यह बोला, "पाच मिनट का वक्त और देता हू
तू उसके पास जा और उसे यह कि जैसे भी हो, यह रुपया हा
फर दे।"
घहुत हिम्मत स्टोर कर ही, जैसे उस युवती ने कहा,
"और तुम अाज रात मे हो उससे शराय पी डालना। सुबह
फिर तकाजे वालों का विस्सा होगा। में तग भाग जिदगी से।
मुझे मार डालो।
मौत की सजीर मूति ने चाकू यद पर के श्रादी में पोस
लिया। यह धागे घढा, उसने स्त्री के समीप जोपर एक तमाचा
उसके गाल पर माग, स्त्री चीय ही देती, उसने अपने हाथ से
उसका मुह दबा दिया।
में सहायता करना चाहता था। परन्तु मैंने सोचा, एक
से दो बच्चे होंगे। गली के बाहर को लपका। गोपाल जली
अरदी चला जा रहा था, मालुम होता था यह अभी भागना हो
प्रारम्भ कर देगा।
पौधे में जाकर उसके कंधे पर मैंने हाथ रसा। उसके
मुह से पक चीस निकली। उसने अपना मुह हाथों से ढक
[१६० ।
न
मैं भूल न मह
-
लिया। योच पाजार था, म लोगों की उचर को प्राप्त उठो।
मैं कुछ समझ नहीं सका। गोपाल के हाथ पात्र ढोले हो गये।
मैंने उसे महाग दिया और पाम की एक यनिये की दुकान में
उसे ले गया।
यहा यैठने के दो मिनट बाद गोपाल बोला, "तुम थे, मैं
"वह श्रागे नहीं बोल सका।
मैने पूछा, "क्या बात है
तीन मिनट तक वह कुछ नहीं बोना। फिर एकाएक
उसने मेरा हाथ अपो हाथों में दवाते हुए कहा, "तुम्हारे पास
दस रुपये हैं
में अगक था । गोपाल को पाखों में पाये। वह
उठना चाहता हो, दयो सो आवाज से उपने कहा, "मुम पर
यहुत बडा अहसान होगा।"
मैंने जेब में से बदला निकाल दस रपये उसको दे दिए।
जैसे उसमें जीवन श्रागया हो उसने कहा, "मी पाया और
यह रुपये लेकर, उठा और भागा हुग्रा गली में धुम गया।
कुछ देर में वह लौटा। अहसास से दया सा, प्रायें
नीचे जमीन में गाये वह मेरे पास आया और बोला,
चलो।"
यह मेरे साथ मेरे घर आया। एक गिलास पानी उसने
पिया। मैंने पूछा, "क्या बात थी ?"
-[ १६१]-
I
-
स
मैं भूल ने मक
"तुमने मुझे जीवादिया है, जयन्त ।"और वह रापडा।
पशपक मुमे स्याल आया कि उसके पडौस में एक
स्त्री का जीयन खतरे में था। मैं तो भूल हो गया था। मैंने
कहा, "गोपाल यह तुम्हारे पडौसम ?"
"उसी को रुपया देनाथा । तुमसे कुछ नहीं छिपाअगा!
उसी को रुपये दो थे।"
"तुमने " मैने चकित होकर पहा । "वह लडकी, उसे
उसे तो उसे उस आदमी ने मार ही डाला होगा।"
"उसे रुपये मिल गये न । श्रय सर ठीक है।"
"यह कोन है ?"
"उस । पति।"
"और रुपये "
"उसे देने थे। में उसे प्यार करता है। यह मेरे पास
रहती है। उसका पति तो कभीरमा शाता है।"
मैं समझ गया । "शायद स्त्री के शरीर का मूल्य लेने।"
"श्रव की ही देर होगा। नहीं तो समय पर रुपये दे।
देता था"
"तुमने उसे किराये पर रखा है।"
पुरुष अपनी स्त्री को भी किराये पर दे सकता है ?
पशुता, नीचता, इससे अधिक क्या होगा?
मेरे रपये पापिस नहीं मिले। मुझे उनका पहुत दुख
-[१२]
मैं भूल न सकू
है, यह एक ऐसे काम में लगे जिस पर विचार कर के में कांप
जाता.
अगने दिन हो गोपाल का मकान मेंने जपरदस्तो
यदलगा दिया। परन्तु कुछ ही दिन याद मने गोपाल के साथ
उसको भोमिका के पति को देखा। गोपाल ने मुझे देखा और
रास्ता काट कर निकल गया।
पया मनुष्य का यह रूप देराने पर कोई उसे भूल
सकता है?
।
d
-जयन्त
-[ १६३ 1.
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में मूल म मा
*-
दि करवट भी बदल नहीं सकती थी, तब भी उसके चेहरे पर
पांति थी और यह कहना मुश्किल था कि वह कितने कष्ट में है।
थोड़ी थोड़ी देर याद उसके हॉट भीतरी बेचेनी से फड
फड़ा उठते । मैं उसके मुह के पास अपना फान ले आता।
'पानी मागने' या 'करवट बदलवा देने को कहते, पक घाट दिए
से गले से, उसको अावाज घर-घर सुनाई देती और में उसे पानी
पिला देता या करवट बदलया देता। इसके याद फिर अपनी
आखें उपकी प्रांखों पर टिका देता, ताकि हल्का सा इशारा
या थोडी सी हिलन जुलन भी मरी ओम्ब से ओझल न हो जाय।
सध्या के बाद रात व तती चली जा रही थी। लगभग
धारद बज गये ये और हम सय पहाड के नीचे बसे हुए एक
घडे स्टेशन के प्लेटफार्म पर गाही बदलने के लिये टिके हुए
थे । 'स्टे चर' पर वह लेटी हुई थी और पास ही उसकी देख
भाल में में बैठा हुआ था। पाकी सब लोग इस समय परेशानी
और थकावट के कारण ऊघ रहे थे।
अचानक उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले अपने माये
पर रख लिया था। इसे वह अपनी हथेली से सिर पर घरे धरे
हो दयाने लगी थी। उसकी बातों की तरलता बढ़ गयी थी।
कई मासपश्चात् हुई इस प्रथम मेंट में सहसा मेरे मुह से
निकल गया- "कैसी तबियत है ?" और उसका सूनापन
जैसे योल उठा-"अच्छी।" और इसके अननर फिर शाति
-[१६५ ]
.
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मूल मसा 1 बह करवट भी बदल नहीं सकती थी, तब भी उसके चेहरे पर शांति थी और यह कहना मुश्किल था कि वह कितने कष्ट में है। थोडी थोड़ी देर बाद उसके हौट भीतरी घेचैनी से फड- फड़ा उठते । मे उसके मुद्ध के पास अपना कान ले पाता। पानी मागने' या करपट बदलवा देने को कहते, एक घोट दिप से गले से, उसको आवाज घर्घर सुनाई देती और मै उसे पानी ।। पिला देता या करवट बदलवा देता। इसके बाद फिर अपनी श्राखें उखको मांखों पर टिका देता, ताकि हल्का सा इशारा या थाडी सी हिलन जुलन भी मेरी शांख से श्रोझल न हो जाय। सभ्या के बाद रात व तती चली जा रही थी। लगभग धारद बज गये थे और हम सय पहाट के नीचे बसे हुए एक यो स्टेशन के प्लेटफार्म पर गाडी यदलने के लिये टिके हुए थे । 'स्ट्रेचर' पर वह लेटो हुई थी और स ही उसकी देख भाल में मैं बैठा हुमाया। शाकी सब लोग इस समय परेशानी और थकावट के कारण ऊघ रहे थे। अचानक उसने मेरा हाय अपने हाथ में ले अपने माथे पर रख लिया था। इसे यह अपनी द्वयेलो से सिर पर घरे धरे हो याो लगी थी। उसकी श्राखों की तरलता पढ गयी थी। कई मास पश्चात् हुई इस प्रथम भेंट में सहसा मेरे मुंह से निकल गया किसी तबियत है ?" और उसका सूनापन जैसे पोल उठा--"प्रन्यो"और इसके प्रातर फिर शाति - १६५
म भूल न मक'
पहाड,
छब्बीस
टेलीकन
और हम उसे ले पहाड से वापिस लौट रहे थे। रेल पूरी
रफ्नार मे उही जा रही थी। रात भर का में जगा था और अब
फिर रात होने वाली थी। इस बीच ए मिनिट भी धाराम
नहीं मिला था। लेकिन नींद या ऊय तनिक भी नाती नहीं प्रतीत
होती थी। बिल्कुल चैतय, उसके सामने वाली 'बर्थ परमैं पैठो
हुआ था। भारों उसी की तरफ लगी हुई थीं कि इशारा पाऊ
और हुस्म बजा लाऊ । एक कर्तव्यनिष्ठ का सा मार मेरे
सदय में था।
और यह उसका भावों में, फष्ट और असीम वेदना
छा रही थी। उसकी प्राखों का भोलाएन और भी पिघल गया
था। फिर मी उस दिम्मत और साहस का अमायन था। उस
के शरीर का निचला भाग बिल्ल बेकार हो गया था और स्वय
A
न
-मैं मूल न मा-
घद करवट भी बदल नहीं सकता थी, तेचे भी उसके चेहरे पर
शाति थी और यह कहना मुश्किल था कि वह कितने कष्ट में है।
थोडी थोड़ी देर बाद उसके हॉट भीतरी बेचैनी से फड.
कड़ा उठते । मैं उसके मुह के पास अपना कान ले आता ।
'पानी मागने' या 'करवट बदलवा देने को कहते, एक घोट दिए
से गले से, उसको अावाज घर घर सुनाई देती और में उसे पानी
1 पिला देता या परवट बदलवा देता। इसके बाद फिर अपनी
पाखें उसकी आँखों पर टिका देता, ताकि हल्का सा इशारा
या थोडी सी हिलन जुलन भी मेरी शास्त्र से बोर्मल न हो जाय।
सम्या के बाद रात व तती चली जा रही थी। लगभग
धारह बज गये थे और हम सय पहाड के नीचे बसे हुए एक
बडे स्टेशन के प्लेटफार्म पर गाही बदलने के लिये टिके हुए
थे । 'स्टेचर' पर यह लेटी हुइ थी और पास ही उसकी देख
भाल में मैं या हुआ था। याकी सब लोग इस समय परेशानी
और थकावट के कारण ऊघ रहे थे।
अचानक उसने मेरा हाथ अपने द्वाथ में ले अपने माथे
पर रख लिया था। इसे वह अपनी हथेली से सिर पर घरे घरे
ही दयाने लगी थी। उसकी शासों की तरलता चढ गयी थी।
कई मास पश्चात् हुई इस प्रयास मेंट में सहसा मेरे मुह से
निकल गया - "कैसी तबियत है " और उसका सूनापन
जैसे योल उठा--"अच्छी ।" और इसके अनतर फिर शाति
-[१६५]
त
मैं भूल न सक
-
छा गइ । मेरा हाथ सय उमके वालों में रोलने लगा। मानो
उतिया उनसे योते हुए दिनों को एक पर बात पूछ रही हो।
नार दूसरो गाडी रतने में आ गई। स्ट्रेचर' भार
किये में ले जा उसे श्राराम सैलिनदिया गया और मैं फिर सामने
बैठ गया । सब लोग फिर ऊधने लगे और उसकी भानों में भी
पर बालसमा दीखने लगा। रसको हथेली को मैंने अपने हाथ
में ले लिया और उसे धोरे धीरे सहलाने लगा। उसने एक बार
जाने क्या अपनी प्राख से कहते हुए मेरी ओर देखा और
फिर श्रा धीरे धीरे बद करती में चैठा-बैठा उसके पोले
पडे मुह को देखता रहा । उसके गोल चेहरे और यडी बडी
पाखों पर एक शान्ति सी दौड रही थी। घेदना और फष्ट के
भाव अब बहुत हल्के पड गये थे। मैंने स नोप को एक गडी
मास ली।
तीन चार घण्टे और त गये। मयेरा हाने लगा।
गाडी में उजेला सा होगया। चारों तरफ की दुनिया इस उजेले
में से यकायक जग पडी सी दिखाई देने लगी और सर कुछ
स्पष्ट सा गजर भाने लगा। उसके चेहरे का पीलापन भी
और अधिक स्पष्ट हो पाया। मानो वह मुर्दा हो और
उसमें खून का एक कतरा भी न हो।
धूप मुह पर पड़ने से सहसा वह जग पकी। उसकी
रोशनी ने नजाने उस पर क्या प्रभाव डाला, यह, चौकी सी
एकटक न जाने किस शून्यता को देखने लगी।
मैं भूलन
क्या है " बडे पाहिस्सा से उसे झकमोरते हुए मैंने
उससे पूधा! 'पुष भी तो नहीं।' उत्तर आया और पद
फिर शान्त हो गई। मेरे दिल में न जाने क्या भर का समावेश
हो गया।
सब लोग मायाज सुन चोंक कर जाग गये और
प्रश्नसुनकग से मेरी ओर देखने लगे। उसकी मा अपनी
जगह से उठकर मेरे पास ही उसके सिरहाने यायी।
'वयों, बिटिया क्या है?' उसने स्नेह पूर्ण सर में
सिर पर हाथ फेरते हुए पूदा। श्राप साल मा को शु य हरिट
से देखती हुई, मानो कह रही हो कि कुछ नहीं, उस फिर
आप मोच ली। मा ने उसके सिरहाने २ठने हुए उसके सिर
को अपनी गोद में छिपा लिया और धीरे धीरे सिर पर हाथ
फरने लगी।
पन्द्रह मिनट और गुजर गये। अचानक फिर चौकार
व उटने के लिए फरफाने लगी। उसकी आखें फिर शून्य
की तरफ तक्ती सी स्थिर हो आई ।
"पा है, क्या यात है?" एक साथ ही हम सबका स्वर
निकला। यह कुछ क्षण तक कुछ न योली और सिर्फ देखा की।
इसके अनन्तर हरे हुए भाव से वह चिल्ला उठी-- "मा, यह
देखो, वह मुझे लेने पा रहे हैं।"
और मा की आखों में नास्मर पाए और तब ही श्रास
उठाकर मैंने देखा कि सपही रो रहे थे। मेरी भासों से भी
आसु यह मेरे होठों और नएनों पर भटक रहे थे। पास से
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मरे काल से ही मां उसे सानया ने भी कोशिश कर रही थी
पिहां कोई मदों है। और अगर भी तपम मार
भागे।"
और भोले बच्चे के माई ही मर TV समझ गई जैसे
भाव से उमी अपनी गर्दन मा को गोद में रषदी थी भोर घडी
शान्ति से लेट गई थी। अगले दो पण मा आँचल से अपने
भासू पोंछ रही थी।
दुध मिनिट फिर शान्ति से गुजर गए। लेकिन मा के
दिल में उठा तूफान शायद अभी तक उम हो रहा था,
इसीलिये उद्दोंने अचानक म जाने क्या सोचपर उसके सिर
पर हाय पेरते पेरत मेरी तरफ उगती उठाते हुए उससे पूछा-
"न्हें जानती अंटी, ये कौन है ?"
और उसने गोद में से धीरे से गर्दन उठाकर मरी तरफ
देखा और फिर धीरे से माकी गोद में सिर रखते हुए जोयग
में पहिली पार कहा-'मां, ये मेरे पति है।'
और मैंने देखा एक यार फिर मा को पास उमड़ भाई
और सबकी मी फिर श्रास उठा पर पाया कि सय रो रहे
और में भी रो रहा है।
गाड़ी चली जा रही थी और मेरे दिल में प्रथम बार ये
भाष उठ खरे हुए थे कि मैं उसे प्यार करता और इस
पत्थर दिल को किसी ने छेद दिया है।
-लेसराम
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