Adarsh Library, Jaipur

Andolan In India

Mitra Vimal · 2011/03

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ঈর্ষনীয়
विमल मिव
৫
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goom,

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बाई

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તારું

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प्रिय सुचेता चट्टोपाध्याय, तुम्हारा पन मिला । अपने बारे में कहानी लिखने को फर्माइश करके, तुमने मुझे भयंकर मुसीयत में डाल दिया है। मैंने कुछेक फर्माइशी कहानियां लिखी जरूर हैं, लेकिन यह कोई जूता तो है नहीं कि 'मेड टू आर्डर', चटपट तैयार कर दिया जाये। अपने खत मैं तुमने अपना पता भी नहीं दिया। लिफाफे पर पोस्ट आफिम की मुहर देखकर मैंने तुम्हारा ठिकाना खोज निकालने की कोशिश की । तुम्हारे लिफाफे पर शिवपुर डाक- खाने की मुहर थी। शिवपुर ? शिवपुर क्या यहां है ? लेकिन तुम यह मत सोच लेना कि मैं तुम्हारा पता खोजकर तुम्हें ढूंढने निकलूंगा । तुमने पोड़े में ही जो लिखा है, मैंने सारा कुछ समझ लिया है। हां, यह बात भी समझ में आ गयी है कि नितात असहाय होकर ही तुमने मुझे पत्र लिखा है कि शायद मैं तुम्हारी कोई मदद कर सक् । सर, मैं तुम्हारे कितने काम आ सकता हूं, मुझे नहीं मालूम तुम्हारा पन पढ़ते-पढ़ते मेरा एक फायदा जरूर हुआ है। वर्षों पुराती किसी और को कहानी याद आ गयी। वह शर्वती वाई नहीं, वनलता थी। वनलता की कहानी । वनलता मेरी कोई रिश्तेदार नहीं थी। जब वह भी छन्वीस साल की थी, ठीक तुम्हारी तरह, उसकी भी जिंदगी में ऐसी ही - एक भयंकर समस्या आ पड़ी । सच, छब्बीससाला उम्र की समस्या शायद परम वीहड़ होती है। तुमने लिखा है, तुम जिस लड़के को प्यार करती हो, उम्र में वह तुमसे तीन साल छोटा है यानी तेईस साल का है। तेईस की उम्र भला छब्बीस का दर्द क्या समझे, बोलो! 'छब्बीस वर्षीया वनलता ने भी एक दिन तमककर कहा था, 'तुम्हारा दुस्साहस तो कम नहीं !' तेईस वर्षीय सुधामय ने जवाब दिया, 'असल में पंख देखकर ही हम मोरनी पहचान लेते हैं, मेम साहब !' वनलता एकदम से बिफर पड़ी, तो फिर लीजिए, अब और अच्छी तरह पहचान लीजिए"।' इतना कहते हुए, न कोई बात-न-चीत, अपने पैरों से चप्पल उतारकर, उसने सुधामय के गाल पर तड़-तड़ जड़ दी। वनलता की चप्पल के तलवे सुधामय के गाल पर बरसते हुए फटकर दो टुकड़े हो गये। मेडिकल कालेज के तमाम नर्स-डाक्टर, छात्र-छात्राएं सब- के-सव दौड़े हुए आये । आपरेशन थियेटर के सामने विशाल भीड़ जम गयी । मेहतर, जमादार, हाउस-सर्जन-कोई बाद नहीं गया । माजरा क्या है ? यूं पिटाई क्यों हो गयी ? हाउस-सर्जन पर यूं बेभाव जूते पड़ गये ? मामूली-सी नर्स का ऐसा भयंकर दुस्साहस ? मेट्रन से पूछताछ । एकदम से हंगामा मच गया। वनलता गुस्से से हांफ रही थी। अगर उसका वश चलता तो वह उस कम्बख्त डाक्टर के गाल पर दो-चार तमाचे और जड़ देती । भरपूर सजा के लिए मानो इतनी-सी पिटाई काफी न हो। मेट्रन ने पूछा, 'क्या हुआ था, मिस राय ?' वनलता ने सारी घटना बयान कर दी। ४/ शर्वती वाई ""लेकिन, वह वात अभी रहने दो । छब्बीस की उम्र का दर्द, और कोई भले न समझे, शायद तुम समझ सको । हां, शायद तुम महमूस कर सको, वनलता राय का यह अपमान । उस दिन उस तेईसवर्षीय नौजवान मुधामय ने सचमुच कोई गलती की थी या नहीं, इसका भी फैमला शायद तुम सद ही कर लोगी। लेकिन "वह किस्सा भी बाद में बताऊंगा। तुमने लिखा है, तेईस साल का एक नौजवान तुम्हारे साथ गृहस्थी बसाना चाहता है। क्या हुआ, अगर वह तुमसे तीन साल छोटा है ? घर बसाने के लिए क्या किसी पास उम्र की जरूरत होती है ? नहीं, किसी भी उम्र में घर बसाया जा सकता है। सासकर तेईस की उम्र में वसूची गृहस्थी शुरू की जा सकती है । तेईस की उम्र को न कभी थकान आती है, न नींद । यह उम्र तो अक्लांत क्षमता से भरपूर होती है । तेईस की उन्न क्या कोई मामूली बात है ? अच्छा, चलो, तुम्हें शुरू से ही बताता हूं। बहुत माल पहले, एक बार में ओखा पोर्ट गया था-राजस्थान की सरहद के पार हिंदुस्तान का विल्कुल आखिरी छोर! मेहराना, अहमदाबाद, जामनगर । महात्मा गांधी की जन्मभूमि पोरवंदर से गुजरकर हिंद महासागर के तट पर बसा हुआ वंदरगाह । वहां खडी हुई हिंद महामागर के पार, अफ्रीका महादेश के तट पर मस्तूल उठाये हुए कतार-दर-कतार व्यापारिक नावें, जहां इस पार के मामी- मल्लाह खरीद-फरोख्त करने जाते हैं । अपना मौदा वेचकर, वहां की खरीददारी से लदे-फदे, ये पिर अपने देश लौट आते हैं। वहां से लाया हुआ सामान, वे यहां वेच लेते हैं। उनका धंधा ही यहो है । समुद्र के किनारे-किनारे बसे हुए मधेरे-इम छोर से उस छोर तक मछेरों की वस्ती। ईश्वरी प्रसाद पडे ने ही बताया था, 'चूकि यह बहुत बड़ा शवंती बाई/५ तीरथ अस्थान है, बाबू साहब, इसीलिए सेठ-महाजन लोग यहां आते हैं। उनके अलावा, वाकी सब तो "वही मांझी-मल्लाहों का कुनबा !' मैंने दरयाफ्त किया, 'तुम्हारे यहां "यानी इस तरफ कोई बंगाली नहीं है ? 'बंगाली ?' ईश्वरी प्रसाद ने अपने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा, 'एक वंगाली वावू भी रहते थे यहां, हुजूर! यहां के बाती-घर में नौकरी करते थे। तीन साल हुए, उनकी भी वदली हो गयी-इसके अलावा, और एक जन भी...' अचानक उसे याद आ गया, 'हुजूर, एक बंगालिन भी रहती है यहां !' 'कौन ?' 'वह भी यहां से करीव तैंतीस मील दूर । डाग्दर है !' 'कोई बंगाली डाक्टर हजारों-हजार मील दूर, इस उजाड़ गंवई-गांव में डाक्टरी करने आयी है ? ये मांझी-मल्लाह पैसे- वैसे भी देते हैं ?' ईश्वरी प्रसाद ने ही प्रस्ताव किया, 'आपको मैं वहां ले जा सकता हूं, हुजूर! डाक्टर-मां ने बड़ा अस्पताल बनवा दिया है। वहां एक पैसा भी नहीं लगता, हुजूर !' 'अच्छा, नाम क्या है ?' 'वनलता मित्र, वैसे लोग उन्हें डाक्टर-मां कहकर पुकारते itics .. वनलता मित्र! वहुत दिनों 'बहुत सालों पहले, मेडिकल कालेज का हादसा, अचानक याद आ गया । उसका नाम भी वनलता राय था ! यह नाम दुनिया में सब लड़कियों का तो होता नहीं। मैंने दरयाफ्त किया, 'अच्छा, जरा उनका हुलिया बताओ?' ६ / शर्बती वाई मैंने जिस वनलता को देखा था, वह भी तुम्हारी तरह ही, यही कोई छब्बीस साल की रही होगी। लेकिन वह क्या आज की बात है ! उस वक्त भी आखिर क्या उम्र रही होगी! मैं हर शाम मेडिकल कालेज जाया करता था। टुकू मोसी के गालस्टोन का आपरेशन होने वाला था। वह हर वक्त लेटी रहती थीं। मैं उनके लिए घर से खाना ले जाया करता और उन्हें देकर लौट आता । यहीं मैने वनलता को पहली बार देखा था। सफेद पोशाक में वह हाथ में थर्मामीटर लिये, इस कमरे से उस कमरे में दौड़ती-घूमती रहती। मासूम-सा चेहरा। 'कुल छब्बीस साल की है, तो क्या हुआ, मोसी कहतीं, 'मरीजों को बड़े प्यार से देखभाल करती है." .."ईश्वरी प्रसाद बताने लगा, 'वहां के मांझी-मल्लाह माम तौर से भयंकर पारा-रोग के शिकार रहते हैं । सो, डाक्टर-मां ने पारा-रोग के इलाज के लिए अस्पताल बनवा दिया है । वहां लोगों को एक पैसा भी नहीं लगता, देखभाल भी बढ़िया। डाक्टर-मां रोगियों की जी-जान से देखमाल करती हैं।' "मुझे याद है, जव सारीजगहें देख डाली-रुक्मिणी-मंदिर, द्वारका-मंदिर, ओखा-मंदिर कहीं कुछ देखना बाकी नहीं रहा, तब किराये की बैलगाडी में बैठकर, डाक्टर-मां का अस्पताल देखने चल पड़ा । ओखा-मदिर से करीब तैतीस मील लंबा रास्ता । लेकिन बेहद खराव रास्ता । मोटर नही जा सकती, इसलिए बैलगाड़ी से हिचकोले खाते-खाते चल पड़े हम दो राह- गीर''मैं और पंडा ईश्वरी प्रसाद । ईश्वरी प्रसाद रास्ते भर बात करता रहा वैसे वनलता को लेकर कोई कहानी गढ़ना मुश्किल है । वन- लता की जिंदगी की शुरुआत और अत विल्कुल सपाट इकसार हैं। कम-से-कम उस वक्त मेरा यही खयाल था। मुझे लगा था, शर्बती बाई।

- वनलता की जिंदगो में उगे हुए सवालों की तरह उनके जवाब भी बेहद सहज और सीधे हैं । सीधी-सपाट धरती की तरह सरल । शुरू-शुरू में थोड़ी-बहुत चढ़ाई भले हो, लेकिन अंत में फिस्स ! सवाल चाहे जैसा हो, उसका जवाब अगर मुश्किल न हो तो उसे लेकर कोई कहानी गढ़ना भी अजीव लगता है। .."उस दिन भी यथारीति ठीक चार बजे अस्पताल पहुंच गया। वही-वही दृश्य । चारों तरफ मरीजों के कतार-दर-कतार विस्तर । कातर आंखें। कमरे में कदम रखते ही टुक मौसी ने छूटते ही कहा, 'पत्ता है, आज यहां एक अजीव कांड हो गया! जिंदगी में होने वाली तीन घटनाओं में, कम-से-कम दो घटनाएं आम तौर पर अस्पताल में ही घटती हैं । जन्म और मृत्यु का नियम सनातन है । ऐसी आम घटनाओं में कोई सिर भी नहीं खपाता । सच तो यह है कि इसे किसी कांड के रूप में लिया ही नहीं जाता। मैंने यूं ही पूछ लिया, 'कौन-सा कांड ?' टुकू मौसी ने कहा, 'हमारे यहां की एक नर्स ने, किसी डाक्टर को जूता जड़ दिया !' 'कौन-सी नर्स? 'अरे वही वो रही !' उस वक्त वनलता को मैंने पहली बार देखा था। सिर पर स्कार्फ, हाथ से टेम्परेचर-चार्ट । हां, उस औरत को देखकर यह विल्कुल नहीं लगा कि वह किसी मर्द को जूते मार सकती है। मैंने महसूस किया, सब चोर-निगाहों से उसे ही घूर रहे हैं। और वह डाक्टर ? डाक्टर सुधामय मुझे कहीं नजर नहीं आया । लेकिन अस्पताल में, इस सिरे से दूसरे सिरे तक, सिर्फ वही चर्चा ! . ,

महीन-सी खुसुर-पुसुर और फुसफुसाहटें मानो चर्चा के लिए कोई
चटपटा मसाला मिल गया हो।
टुकू मौसी करीव महीने भर उस अस्पताल में रही । बाद
की सारी कहानी उन्होंने ही बतायो ।
सुधामय जव वनलता से मिला था, तब उसने यही बताया था।
उसने कहा, 'अव मैं किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं
रहा, आपने मेरा बहुत बड़ा नुकसान कर दिया !'
वनलता ने जवाब दिया, 'आपका क्या खयाल है, मैं भी क्या
किसी को मुंह दिखाने लायक रह गयी हूं?'
'आप, खर, औरत हैं ! अगर घर से बाहर न भी निकलें,
तो भी काम चल जायेगा । लेकिन मैं...?'
किसी के दरवाजा खटखटाने पर उसने दरवाजा खोल दिया।
सामने मुधामय को देखकर वह भौचक्की रह गयी। कुछेक पलों
तक उसके मुंह से मानो आवाज ही नहीं निकली
जिन दो प्राणियों में सुबह-सवेरे ऐसा भयंकर झगड़ा हो
चुका हो, दो दिनों बाद हो, वे ही लोग भला इतनी अंतरंगता
से कैसे बातचीत कर सकते हैं ? खर! जिन लोगों को इंसान
के स्वभाव-चरित्र के बारे में इत्ती-सी भी जानकारी होगी, वे
लोग उनकी दोस्ती पर हरगिज अवाक् नही होंगे।
आपस में एक-दूसरे से माफी मांगने का पर्व खत्म होने के
बाद, पहले सुधामय ने ही अपनी तरफ से बातचीत की पहल
• को, 'अच्छा, अव में चलू"?' और वह उठ खड़ा हुआ।
अचानक वनलता ने पूछा, 'आप मेरा एक काम कर देंगे?'
शवंती बाई/६

? !" सुधामय ठिठक गया । उसने पलटकर वनलता की ओर देखा । उसकी आंखों में अचरज झलक आया, 'काम ? कौन-सा काम बताइएन 'मेरी बीस दिन को तनखाह बाकी है। आप ला देंगे ?' 'क्यों ? आप खुद भी तो ला सकती हैं ?' 'मैंने नौकरी छोड़ दी है." पल-भर चुप रहने के बाद उसने अगला वाक्य जोड़ा, 'जो हादसा हो गया, उसके बाद मेरा वहां नौकरी करना शोभन नहीं था।' सुधामय विस्मय से गूंगा हो आया। थोड़ी देर बाद जब उसे होश आया, तब उसने शिथिल आवाज में कहा, 'लेकिन नौकरी तो मैंने भी छोड़ दी है । अब मैं भी कालेज नहीं जाता।' अव वनलता के चौंकने की बारी थी । एकाध पल की खामोशी के बाद उसने फिर कहा, 'आपका क्या ? आपने डाक्टरी तो पास कर ही ली है. कहीं और नौकरी कर लेंगे।' 'इसीलिए तो माफी मांगने आया था...' 'ना। माफी मांगने की भी जरूरत नहीं थी। मेरी भी तो कम गलती नहीं थीं ! असल में उस दिन सुबह से मेरा मन ठीक नहीं था। उसपर से दो महीने का घर-भाड़ा सिर पर चढ़ गया था। वात यह है कि आप "मुझ-जैसों की हालत का सही-सही अंदाजा नहीं लगा सकते...' सुधामय दुवारा धम्म से बैठ गया, 'आपको भी शायद मेरी हालत का ठीक-ठीक अंदाजा न हो । पता है, उस वारदात के बाद से, मैं अपने घर ही नहीं गया" 'तव, आप दो दिनों तक रहे कहां?' 'सड़क पर, पार्क में । अखवारों में यह खवर प्रकाशित होने के बाद, किसी दोस्त के घर जाने में भी शर्म आयी ..' अचानक वह दुवारा उठ खड़ा हुआ, 'अच्छा, अब मैं चलूं..' - १०/ शर्वती बाई

'जायेंगे कहां?"
'यह नहीं मालूम । अव तो न घर जा सकता हूं, न होस्टल..."
'फिर...?'
'मुझे पता है, डाक्टरी पास कर चुका हूं, भूखों नहीं मरूंगा,
लेकिन इस वक्त मेरे हाथ में अगर थोड़े से भी पैसे होते, तो कहीं
और चला जाता "आज ही !'
सुधामय ने जाने के । .ए कदम बढ़ाया। वनलता खामोश
निगाहों से उसे जाते हुए देखती रही । सुधामय जव नीचे,
बिल्कुल आखिरी सीढ़ी तक उतर गया, तब उसने आवाज दी,
'सुधामय जी, जरा सुनिए...'
सुधामय ने निगाहें उठाकर उसकी तरफ देखा, 'आपने मुझसे
कुछ कहा?'
वह दुबारा सीढियां चढ़कर ऊपर आया। वनलता दरवाजे
पर ही खड़ी थी।
उसने कहा, 'आप मेरी एक बात मानेगे?'
'कौन-सी बात?'
वनलता ने चटपट अपनी एक चूड़ी उतारकर सुधामय को
जबरन थमाते हुए कहा, 'यह गिलट नही, निखालिस सोना है।
मुमकिन है, आपके काम आ जाये...'
सुधामय सचमुच हैरान रह गया । उसको जुबान पर मानो
ताला पड़ गया हो।
वनलता ने दुबारा कहा, 'उम्र में आप मुझसे छोटे हैं, लेने
में एतराज न करें...'
'इससे तो बेहतर था, आप मुझे दो जूते और मार लेती!
यहां तो कोई देख भी नहीं रहा, मैं वह भी बर्दाश्त कर लेता,
लेकिन
वनलता की आंखें अनायास ही झुक गयीं। उसने झिमकते
शर्वती बाई/११

हुए कहा, 'सुनिए, मेरी माली हालत बहुत अच्छी है, ऐसा भी नहीं है। लेकिन 'यानी आप मुझे मुआवजा दे रही हैं ? 'मान लीजिए, यह सच भी हो ! मैं तो किसी तरह खोज- खाज कर अपने लिए कोई-न-कोई नौकरी जुटा ही लूंगी ! लेकिन आपकी उम्र अभी कच्ची है."रास्ता लंबा है ! अभी तो बहुत कुछ होना है...' 'छोड़िए ! लेकिन आप यह चूड़ी वापस ले लें, चूड़ी वनलता के हाथ पर रखकर उसने जाने के लिए कदम बढ़ाया। वनलता ने लपककर उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, 'सुनिए, मैं आपसे विनती करती हूं, इसे ले लीजिए.' सुधामय ने हैरत से वनलता का चेहरा पढ़ने की कोशिश की । इस लड़की को उसने पहले भी कितनी बार देखा है, लेकिन आज पहली बार उसके चेहरे पर मानो कोई नयी भाषा उभर आयी हो, जिसका अर्थ भी बिल्कुल नया-नया हो ! सुधामय ने इस बार हाथ छुड़ाने की कोशिश नहीं की। उसी तरह हाथ- पर-हाथ रखे हुए किया, 'आप चाहती हैं, यह चूड़ी मैं ले लूं?' 'मैं आपसे उम्र में बड़ी हूं। आपको मेरी बात माननी है होगी।' 'लेकिन आपके सिर पर भी तो दो महीने का किराया चर उसने सवाल हुआ है ? 'मैं औरत हूं! औरतें मर्दो से कहीं ज्यादा सहन कर सका ।' .. और उसके मुंह पर ही उसने अपने कमरे का दरवाजा कर लिया था। १२ / शर्वती वाई ईश्वरी प्रसाद ही बताता रहा, 'इस नाहरगढ़ में उस बंगाली डांग्दर बाबू के आने तक, लोग बीमार पड़ने पर, टोना-टोटका . करते, देवी-देवताओं की मनौतियां मानते और जो लोग पैसे वाले थे, वे वैद्य जी की शरण में जाते। राज-वैद्य के दरबार में- पहले पूरे पंद्रह रुपये नजर करो, दवा का दाम अलग..!' ईश्वरी प्रसाद मानो कोई किस्सा सुना रहा हो, 'नाहरगढ़, छोटा-सा शहर है, तो क्या हुआ? यहां का राजा विल्कुल खानदानी बादशाह था। राजा की तीन रानियां थीं। हर रानी की खिदमत के लिए तेरह दासियां। छब्बीस बांदियां । लाव- लश्कर, खोजा, राजकुमार, लाल जी साह्न वगैरह-वगैरह। बिल्कुल शाही ताम-झाम। 'हां, तो किसी एक सुबह, इसी अजमेर स्टेशन के प्लेटफार्म पर, कोई छोकरा-सा डाक्टर उतरा ! संग में न कोई सूटकेस, न बोरिया-विस्तर ! हां, चेहरे से, तेईस-चौवीस की उम्न का अंदाजा जरूर लग जाता था।' जब मैं अजमेर में था, इस कहानी का थोड़ा-बहुत हिस्सा सदानंद बाबू से भी सुन चुका था। सदानंद बाबू ने बताया था, 'अरे साहब, यह जो राजस्थान नामक मुलुक देख रहे हैं न! जिसका कहीं ठौर-ठिकाना नहीं, उसे यहां जरूर पनाह मिल जाती है।' सदानंद वाबू ने यहां बंगाली मिठाइयों की दुकान खोल रखी है। अगर कोई बंगाली जीव अजमेरशरीफ आता है, तो उसका इस दुकान पर आना विल्कुल निश्चित है। बंगाल से इतनी दूर शवंती बाई/१३ .. ! आकर भी, छेने की मिठाइयां, बंगाली रसगुल्ला, मछली- भात एकमात्न यहीं मिलता है । बीकानेर, जोधपुर, जयपुर, चित्तौड़-चार दिशाओं में बसे हुए चार अलग-अलग राज्य- बीच में यह अजमेर शहर । सदानंद वाबू ही बता रहे थे, 'नाहरगढ़ के राजमहल में व्याह पड़ा । संदेश और रसगुल्लों का जिम्मा मुझ पर । उस पर से यह हुक्म भी जारी किया गया कि मंझली रानी को रसगुल्ला बनाना सिखाना भी होगा। वहीं जाकर देखा, राजवैद्य भी वंगाली है ! कमसिन उम्र । लेकिन मैंने उसे देखते ही पहचान लिया। मैंने पूछा, 'आप यहां ?' ""हां, यह बहुत साल पहले की घटना है ! एक छोकरा-सा डाक्टर "स्टेशन से सीधे मेरे यहां आ धमका । उस वक्त मैं दुकान बंद करने जा रहा था। उसने आते ही मुझसे दरयाफ्त किया, 'यहां किसी धर्मशाला का पता बता सकते हैं ?' मैंने पूछा, 'आप आ कहां से रहे हैं ?' 'कलकत्ता। 'आपके साथ और कौन-कौन हैं ?' उसकी चुप्पी से मैं समझ गया, जब वह अकेला आया है, तब तीर्थयात्री तो हरगिज नहीं है। मैंने दुवारा पूछा, 'आप करते क्या हैं ?' 'मैं डाक्टर हूं।' मैं अचरज में पड़ गया। डाक्टरी करने के लिए बंगाल छोड़- कर यहां क्यों? जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है। मैंने फिर पूछा, 'पास में कुछ रुपये-पैसे भी हैं या बिल्कुल ठनठन गोपाल हो ?' 'नहीं, पैसे हैं।' १४ | शर्वती वाई लेकिन मैं फौरन ताड़ गया, यह झूठ बोल रहा है । गांठ में पैसे होते तो चेहरे की रंगत कुछ और होतो । शायद घर से गहने-वहने चुराकर भाग आया है । यहां तो ऐसे जाने कितने- कितने छोकरे आते हैं। मैं भी तो एक दिन अपनी मां से झगड़ कर, इस रेतीले देश में भाग आया था। मुमकिन है, यह भी मेरी ही तरह कोई भगोड़ा हो। मेरे हाथ में छेने की मिठाई की ट्रेथी। उसे बगल वाले मकान में देना था। मैंने कहा, 'तुम जरा बैठो, मैं आता हूं।' थोड़ी ही देर बाद मैं वापस लौटा। भला कितनी-सी देर हुई थी? यही कोई दो या तीन मिनट । दुकान में आकर देखा, चारों ओर, मांय-भांय सन्नाटा। कहीं कोई नही था । लगता है, मेरी पूछताछ के ढंग से उसे कुछ शक हो गग। दुकान से बाहर निकलकर मैंने इधर-उधर नजर दौडायो । अभी जहां सिंधियों को दुकानें नजर आ रही हैं, उन दिनों बिल्कुल खाली मैदान था। सामने की रेल लाइन तक साफ नजर आती थी। उस तरफ आज खड़े होने पर, पता पाना भी मुश्किल । दूर-दूर तक मुझे उसका कोई अता-पता नहीं मिला। हां, तो साहब नाहरगढ के राजमहल में उससे दुवारा मुला- कात हो गयी । नाहरगढ़ इस्टेट कोई ऐसी-वैसी रियासत नही है। शहर छोटा है तो क्या हुआ? नाहरगढ के राजा खानदानी वादशाह थे । राजा की तीन रानिया । हर रानी के लिए तेरह- तेरह दासियां, तेतीस वांदिया, लाव-लश्कर, खोजा, राजकुमार, लालजी साहब, लालजी वाई-बिल्कुल शाही ताम-झाम ! ऐसे खानदानी बादशाह की नेक नजर मे पड़ना क्या आसान बात सदानंद बाबू की आंखों और जुबान से मानो कहानियां रही हौं, 'लोग कहते हैं, बगाली-बच्चा बड़ा घरघुसरा होता शवंती बाई/१५ . लेकिन, साहब, आप समूचा राजस्थान घूम आइए, जितने भी स्टेट हैं, वहां के दीवान, नायब, डाक्टर, कानूनी सलाहकार- सव-के-सव बंगाली। उससे पहले नाहरगढ़ रियासत में एक विहारी राजवैद्य नियुक्त थे। कोई बीमार होता, वह हरे की गोलियां खिलाते । लेकिन डाक्टर मिन के आने के बाद से अब किसी को भी वैद्य जी की गोलियां रास नहीं आतीं।' मैंने सवाल किया, 'डाक्टर ने इस राजा को कैसे पटा लिया ? - 'डाक्टर ने बताया था-मंझली रानी यशोदा बाई सख्त बीमार थीं । राजवैद्य का इलाज भी चल रहा था, लेकिन बीमारी दूर होने का नाम ही नहीं ले रही थी। रानी बिल्कुल मरणासन्न । इधर मैं अजमेर से पैदल-पांव भटकता हुआ, नाहर- गढ़ आ निकला। राजमहल के पाइक-बरकंदाज यानी गुलाम- चाकर, दुकानों पर सौदा-सुलुफ खरीदने आते, बाइस्कोप में सनीमा देखने आते या फिर रास्ते में धूमते-फिरते मिल जाते। उन्हीं की जुबानी यह खबर सुनकर मैंने दावा किया, मैं यशोदा वाई को रोगमुक्त कर सकता हूं। लेकिन रानी साहिबा को देखू कैसे ? राजा के अंदरमहल में घुसने कौन देगा? बादशाह का पंजा यानी निशानी चाहिए । राजा न सही, कम-से-कम दिलखुशा सिंह का पंजा चाहिए ! दिलखुशा सिंह था-अंदरमहल का खास खोजा । अंदरमहल का खास पहरेदार । हर ओर उसकी गति-विधि । रानी साहिवा से लेकर बड़ी रानी लाल बाई, बांदी, नौकरानी तक को, अंदर- महल से बाहर आने के लिए दिलखुशा सिंह का पंजा यानी इजाजत चाहिए। मैंने पूछा, 'तव क्या उपाय है ?' उन्हीं लोगों ने बताया, 'आप रेजिडेंट साहव से मुलाकात १६ / शर्बती वाई कीजिए।' रेजिडेंट साहब ने राजा साहब के नाम एक खत लिखकर दे दिया। अब राजा साहब से भेंट होना भी इतना आसान तो नहीं था। राजा आखिर राजा ठहरा! राजा दलजीत सिंह बहादुर । दरवारी,तावेदार, कर्मचारियों का कहना है, महासागर से लेकर दूर हिमालय तक उनका साम्राज्य फैला हुया है। नाहरगढ़ के पूर्वज राजा हिकमत सिंह बहादुर ने मुगल सल्तनत के खिलाफ युद्ध करके, खुद शहशाह अकबर से अपनी बहादुरी के लिए वाह- वाही हासिल की थी। लेकिन अब वहादुरी दिखाने का मौका ही नहीं आता। जरूरत पड़ने पर, अव राजा साहव रेजिडेंट साहब या वड़े लाट साहब के साथ कभी-कभार शिकार पर जरूर चले जाते हैं । नौकर-तावेदार ढाक-ढोल पीटकर, बाघ-भालुओं को खदेड़ते हुए, राइफल के निशाने के सामने ले आते और राजा साहब हाथी के हौदे में बैठे-बैठे धांय से गोली दाग देते। हां, तो मंझली रानी की बीमारी की वजह से वह भी उदास रहा करते। रेजिडेंट साहब की चिट्ठी पढ़कर उन्हें कोई दुविधा नही रही। पंजा छापकर, उन्होंने तानेदार को हुक्मनामा थमा दिया, लेकिन यह भी कह दिया कि डाक्टर जब मरीज को देखकर लौटे, तव उससे राजा की निशानी छीन ली जाये । जितने दिन बीमारी ठीक नही होती, उसे अंदरमहल में जाने के लिए निशानी अता की जाये, वापसी में ले ली जाये। अंदरमहल में दाखिल होने के लिए यथारीति मुझे भी पंजा दिखाना पड़ा । खोजा दिलखुशा सिंह ने काफी गौर से उस निशानी की जांच-परख को। उसके बाद मंझलो रानी के महल में ले गया। इसी तरह तीन दिन गुजर गये । डाक्टर को तीन बार मंदर- शवंती बाई/१७

महल में जाना-आना पड़ा। इलाज चलता रहा। रानी साहिबा
की सारी दवाएं अजमेर से मंगवायी गयीं। डाक्टर ने दिलखुशा
सिंह को अच्छी तरह समझा भी दिया। उसके बाद राजा की
निशानी दिखाकर, उसे राजकोष से रुपये भी दिलवा दिये गये।
लेकिन अभी तक कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं घटी थी।
.''अचानक जैसे धमाका हुआ । राजा साहब के पास खबर
पहुंची कि नये बंगाली डाक्टर ने रानी साहिबा को रोगमुक्त कर
दिया। उसे राजा साहब के आम-दरबार में तलब किया गया।
सदानंद
बाबू
ने ही बताया, 'साहब, इसी को कहते हैं
तकदीर का सिकंदर! यह मामूली-सा छोकरा, मुमकिन है
अपनी मां की चूड़ियां चुराकर भाग आया हो यहां आकर
एकदम से राजवैद्य बन गया। पुराने राजवैद्य की छुट्टी हो
गयी। उनसे सिर्फ जागीर नहीं छीनी गयी । राजे-रजवाड़ों का
मुआमला ठहरा! किसकी किस्मत में तीन हजारी जागीर बदी
है कौन जाने ! यानी कब किसकी तकदीर में फूलों की माला है
और कब जूतों की, कौन बता सकता है ?
मैंने उस डाक्टर से पूछा, 'आपने तो डाक्टरी पास की है न ?
आपको नौकरी की क्या कमी ? इतने दिनों में, अपने बंगाल में
कोई नौकरी नहीं जुटा सके ?'
डाक्टर ने जवाब दिया, असल में किसी वजह से अपने देश
में मुंह दिखाने लायक नहीं रहा ''इसीलिए लाचार होकर आना
पड़ा, वरना...'
मैंने फिर पूछा, 'क्यों! क्या हुआ था ?'
१८/ शर्वती वाई

डाक्टर चुप रह गया।
इधर राजा साहब ने उसके लिए विशाल हवेली वनवा दी।
हवेली के सामने लंबा-चौड़ा वाम । सिर्फ राजसी ठाट-बाट ही
नहीं, राजकन्या भी...'
'सो, कसे?'
सदानंद बाबू ने दुवारा वातों की कड़ी जोड़ दो, 'तो फिर
मुनिए..
हां, वह निहायत अजीबोगरीव इतिहास था! कम-से-कम
हमारी आंखों के लिए वह इतिहास ही था। नाहरगढ़ के इतिहास
में भी लंबी दास्तान वन गयो। नाहरगढ का राजा भयंकर
विलासी था । साहब, काम-धाम के बजाय हर वक्त सिर्फ
अय्याशी में डूबा रहता। तभी तो मैं गया था रसगुल्ले बनाने
और इनाम में ऐंठ लाया हीरे की पांच-पांच अंगूठियां, टसर की
धोती और पूरे सात सौ रुपइये । राजमहल के नौकर, तावेदार,
दरवारी-मभो रसगुल्ले की वाहवाही में पचमुख हो उठे । ऐसी
मिठाई उन्होंने पहले कभी नहीं पायी थी । बड़ी रानी ने अपने
हाथ की पन्ने की अंगूठी इनाम देकर, अपनी तारीफ भेजी।
वैसे उन्हें रसगुल्ला वनाना क्या खाक आता? अरे साहब, यह
मिठाई बनाना क्या इतना आसान है ? तव तो हर कोई इस
पकवान में विशारद हो उठता । हां, तो, साहव होते-होते
मामला यहां तक आ पहुंचा कि वह डाक्टर राजा साहब का
अत्यंत दुलारा हो उठा। चाहे कोई बीमारी हो या न हो, डाक्टर
साहव को जब-तब तलब किया जाता। अदरमहल में वढ़िया
शवंती बाई/१६

शर्बत बना है, बुलागो डॉक्टर साहब को ! इधर डाक्टर को भी
भला क्या काम ? राजवैद्य तो हो ही गया, तीन हजारी जागीर
फा भी मालिक बन गया। राजा के हुक्म पर हुजूर के दरबार में
हाजिरी देना ही तो राजवैद्य का असली काम है।
"लेकिन उन दिनों भी जब वह फुर्सत में होता या रेगिस्तान
की तपती हुई रातों में जब वह अपने कमरे में अकेला लेटा होता
या नींद न आने पर बेचैनी से करवटें बदल रहा होता, तब उसे
किसी की बेतरह याद आती। आते वक्त उसने जबर्दस्ती उसके
हाथों में सोने की चूड़ी थमा दी थी।
सुधामय ने कहा था, 'सुनो, किसी-न-किसी दिन तुम्हारा
उधार जरूर चुका दूंगा इस वक्त इस वादे के अलावा मैं और
कुछ देने की स्थिति में नहीं हूं। पता है...?'
वनलता ने कहा, 'इसे उधार क्यों मानते हो? मान लो, मैंने
तुम्हें दिया है.'
उस दिन सुधामय उसकी बातों पर खूब-खूब हंसा था।
वनलता ने पूछा था, 'अब क्या यह भी याद दिलाना होगा
कि खत बराबर देते रहना...'
सुधामय ने पहुंच का एक खत भी डाला था। उसने लिखा
था-'राजपुताने के इस बंजर रेगिस्तान में, अभी तक किसी द्वीप
की तलाश में भटक रहा हूं। रास्ते-रास्ते भुने चने फांकता हूं
और सिर्फ कुएं के पानी का आसरा-भरोसा है। तुम्हारी चूड़ी,
खर्च करने में आज भी डर लगता है। बस, उसे हर वक्त अपने
पास रखता हूं। इसी बहाने तुम भी कहीं मेरे पास बिल्कुल
करीब हो''यह तसल्ली बनी रहती है।'
ना, उस खत में कहीं भी वनलता से चले आने का आग्रह
नहीं था। वनलता वह खत कई-कई बार पढ़ गयी। थोड़ी देर
बाद खत को आंचल में बांधकर, उसने चल्हे पर चावल चढ़ा
२०/ गवती बाई

दिये। छब्बीस साल की औरत अगर मन की सच्ची बात लिखने पर उतर आये, तो कहीं उसके आत्माभिमान को ठेस पहुंचती है । अभी तक उसे कहीं नौकरी नहीं मिली, लेकिन उसने लिखा-- 'एक नये अस्पताल में नौकरी मिल गयी है । कलकत्ते से जरा दूर जरूर है । सो, अगर वक्त पर मेरा पत न मिले, तो तुम परेशान न होना...' दोपहर को खाने के बाद, वह जमीन पर ही पड़ गयो-ऊंह, - सुधामय तो देखने आ नहीं रहा! लेकिन राजस्थान तो कलकत्ते में नहीं, न ही नाहरगढ़ में कलकत्ता शहर! डाक्टर सुधामय की उम्र अभी कुल तेईस साल है । वह भला छब्बीस की उम्र का दर्द क्या समझता ? सुबह-सवेरे नींद से जागकर उसका पहला काम होता-सजना-सवरना । राज- दरवार में जाकर राजा दलजीत सिंह वहादुर को कोनिस करके, बैठे रहना । दरवार खत्म होते ही, घर लौटकर किसी तरह खाना गले से नीचे उतारकर, उसे फौरन राजमहल के तहखाने की ड्यूटी के लिए भागना पड़ता । दोपहर की गहरी नीद के वाद, राजा जुआ सेलने बैठते । पहले कोई दूसरा साथी था, अब उसकी जगह हैं, डाक्टर साहब । कभी राज्य के राजमन्त्री, दीवान, रानी जी, वजीर, पागवान-सभी जुए के सेल में शामिल होते थे, लेकिन अब सिर्फ डाक्टर! राजा साहब एक दिन एकाएक पूछ बैठे, 'तुम जुआ खेलना जानते हो, डाक्टर?' राजा-महाराजाओं के सामने कभी 'ना' नहीं करनी चाहिए। सुधामय ने जवाब दिया, 'जानता हू हुजूर !' हां, कभी सुधामय भी जुआ खेला करता था। उन दिनों उसे अड्डेबाजी का शौक जो चर्राया था। लेकिन अब तो अपनी शांती.वाई.२१ - नौकरी कायम रखने के लिए जुआ खेलना जरूरी हो गया। जुआ खेलते-खेलते ही, एक दिन उसकी जिंदगी में चरम उपलनि के क्षण भी आ पहुंचे । वैसे इसे आत्म-विभ्रम भी कहा जा सकत है। सुधामय अगर यूं जुआ न खेलता, तो वनलता की जिंदगं भी यूं अभिशप्त न होती और कहानीकार की हैसियत से मैं भी शर्बती वाई की कहानी से अनजान रह जाता। 'यह कहानी भी सदानंद बाबू ने ही बतायी थी, 'साहब मैं वहां गया तो था रसगुल्ले बनाने, लेकिन वाई की कहानी...' ... सुन आया शर्बत राजे-रजवाड़ों के अंदरमहल के किस्से ! पहले कभी देखा नहीं और जिसने देखा न हो, उसके लिए कुछ समझना भी नामुमकिन । अंदरमहल में चारों ओर गुलाबी ओढ़नी और असूर्यम्पश्याओं की चकित निगाहों की भीड़ । कहीं घुमावदार सुरंग, कहीं नैनों के कटाक्ष-वाण ! सैकड़ों ढंग के भोग-विलास और लालची उसांसों के मेले ! घाघरा और काजल-सुरमे का रहस्य ! बाहरी दुनिया की कोई खवर यहां तक नहीं पहुंचती। यहां ज्यादातर ऐसी ही औरतों की कहानियां मशहूर हैं, जो इसी अंदरमहल के अंदर जन्मी और यहीं मर गयीं। तीज-त्योहारों और होली-दीवाली पर यहां नगर के सेठ-साहूकार, जमींदारों की ठकुराइनें मिलने आतीं । उत्सव के बाद, उनमें से कुछेक अपनी हवेली लौट पातीं, जिन पर खास राजा साहब की नजर गड़ जाती, वे फिर कभी वापस नहीं जातीं। ऐसे ही जाने कितनी-कितनी औरतों की ऊंची-ऊंची महत्त्वाकांक्षाएं, ताल- - २२ / शर्वती वाई कटोराके कैदखाने में दम तोड़ गयीं । वसे जिस पर एक वार राजा की नजर गड़ गयी, उसकी जिंदगी को कोई माघ अधूरी नहीं रहती । उसके लिए जाने कितनी-कितनी तदवोर-कोशिशें की जाती। महारानी की खुशामद करो, राजमाता, पर्दानगीनें, पाशवानजी-हर किसी के तलुए चाटो, सबसे ज्यादा अंदरमहल के एकमात्र पहरेदार खोजा दिलखुशा सिंह की आरजू-मिन्नत करो। शर्यती वाई भी उन्हीं औरतों में से एक थी, लेकिन फिर भी उन सबसे कहीं बिल्कुल अलग और मनोखी ! "वैसे जुए के खेल में ज्यादातर राजा साहब ही हारते ।, सर, हारने में हो तो खेल का असली मजा है। राजा साहब उत्साह से गद्गद हो पाते। सदानंद वानू ने हो आगे की कहानी भी सुनायी थी । 'वात यह है, साहब, उस जमाने के राजा-महाराजाओं के पास ढेर-ढेर काम-काज थे। युद्ध थे, समझौते थे। लेकिन आज- कल के राजाओं के पास कौन-सा काम है ? अव तो, बस, कहां कौन खूबसूरत लड़की है, उठा लाओ! किसकी बीवी अप्सरा है, पकड़ लाओ! हर राजा का अंदरमहल, ऐसी ही सैकड़ों- हजारों औरतों से भरा हुआ है। इस अंदरमहल में राजा साहब ही एकमात्र मर्द । लेकिन यह सब रास-रंग भी हर वक्त मला नहीं लगता । इसीलिए बीच-बीच में शिकार-टिकार का आयोजन भी किया जाता है, जुआ-पाशे के खेल भी चलते हैं। इसके अलावा नाहरगढ के राजा साहब की उम्र भी बहुत कम है। तीन-तीन रानियां लेकिन वे रानियां भी राजा साहब से उम्र में काफी बड़ी । महाराजा साहब की उम्र जव कुल बारह साल की थी, तब बड़ी रानी बीस साल और मंझली रानी सोलह साल की थी। छोटी रानी साहिवा तो तब आयो भी नहीं थी। व्याह के समय हर रानी के साथ दहेज में आयी हुई तेरह-चौदह ।

दासियां । वे सव भी जवान-जहान ! इसके अलावा अंदरमहल में रानी की सखियां, उपहार में मिली हुई लड़कियां । कुछेक औरतें तो स्वेच्छा से चली आयी हैं, बहुत-सी औरतों को वहका-फुसला- कर लाया गया है। रात वाले गाने-बजाने के जलसे में अगर उनमें से कोई औरत राजा के मन भा गयी तो उसकी तो मानो तकदीर ही खुल गयी! इसी तरह जाने कितनी-कितनी औरतें साजिश की शिकार होकर तालकटोरा के तहखाने में हमेशा- हमेशा के लिए गुम कर दी गयो हैं, ताकि वे राजा साहब की नजर में न पड़ें। यूं भी, खूबसूरत औरतों की तकदीर में ज्यादा- 'तर दु:ख ही लिखा होता है ! खैर साहव, मंझली रानी को रसगुल्ला बनाना सिखाने के लिए कई बार अंदरमहल में गया, लेकिन कभी किसी हसीना की एक झलक तक नहीं मिली ! खोजा साहब का कानून बेहद सख्त था। लेकिन डाक्टर की बात विल्कुल अलग थी। एक तो राज- वैद्य, उस पर से राजा साहब का दुलारा! खेल में डाक्टर ने राजा को आगाह किया, 'हुजूर, आपका हाथी तो कैद हो गया। राजा साहब ने खुश-खुश आवाज में जवाब दिया, 'तुम बस, देखते रहो, डाक्टर, तुम्हारे वजीर की क्या दुर्गत करता हूं!' राजमहल की सतह से, बहुत नीचे गड़ा हुआ तहखाना। इसीलिए गर्मियों में वहां बड़ा आराम रहता है । अंदरमहल से यहां तक आने-जाने के लिए लंबी सुरंग । जरूरत के वक्त राजा साहब के ताली बजाते ही, फौरन उनके हुक्म की तामील की जाती । घाघरा नचाती हुई दासी-वांदियां फर्माइश के मुताबिक पानी या शर्वत या अन्य पेय पेश करती राजा साहब, अपने मातहत कर्मचारियों को सुनाकर कहते, 'इस डाक्टर की बुद्धि वाकई बड़ी तेज है ! २४ । शर्बती बाई मैंने पूछा, 'उसके बाद क्या हुआ, यताइए न!' सदानंद बाबू ने कहानी को आगे बढ़ाते हुए कहा-उसके बादही तो शर्वती वाई आयो । उस दिन दोपहर से हो वाजी विछ गयो । एक के बाद एक यह वार राजा साहव हार गये । सातवों बार भी वह हारने ही वाले थे यानी बाजी मात होने वाली थी। उफ! इस कमवस्त डाक्टर से जीतने का कोई उपाय नहीं। ठीक उसी वक्त एक अजब कांड हो गया। उस दिन भयंकर गर्मी थी। तहखाना था तो क्या हुआ? चत की जला देने वाली गर्मी । वाहर लू चल रही थी। चिल. चिलाती धूप में सांस आकुल-व्याकुल हो रही थी। प्यास के मारे गला मूखकर बिल्कुल काठ । डाक्टर को प्यास लग पायो । लेकिन उसे किसी तरह के अर्क या नदीले पेय का व्यसन नहीं। उसने सिर्फ एक गिलास पानी की फर्माइश की। पानी! राजा साहब ने ताली बजायी। इस ताली का मतलव खास- खास लो। ही समझ सकते थे। तालियों की आवाज पर सुरंग की राह प्रकट हुई-शर्वतो वाई! खेल छोड़कर डाक्टर की निगाहें एकटक शर्वती वाई पर गड़ गयीं । गुलाबो रंग का बूटेदार घाघरा । वक्ष पर वित्ते भर को कंचुकी और जरीदार जाफरानो रंग की महीन ओढ़नी ! अंगों को ढंकने के लिए, बस, इत्ते से कपड़े। सिर पर सोने का घड़ा। अपने दोनों नाजुक हाथों में पड़ा थामे हुए, वह कमरे में आ खड़ी हुई-मानो वह जमीन पर चलकर नहीं, पानी में तैरती हुई आयी हो। पानी पीकर डाक्टर ने दुबारा चाल चली। लेकिन उस दिन फिर सेल जमा ही नहीं। राजा साहब अवाक रह गये। डाक्टर पहली बार हार गा शवंती बाई/२५ था। उठने से पहले, राजा ने सिर पर पगड़ी रखते हुए कहा, 'तुम्हें मैं एक उपहार दूंगा, डाक्टर !' 'उपहार ? राजा साहब ने सवाल किया, 'तुमने तो अभी ब्याह नहीं किया न ?' 'नहीं...' 'चलो, अब तुम व्याह कर लो !' डाक्टर ने हैरत-भरी आवाज में पूछा, 'किससे ?' 'शर्बती से तुम्हारा व्याह कराये देता हूं...' इधर मीलों दूर कोई लड़की अस्पताल में ड्यूटी करते- करते अक्सर अनमनी हो आती। ना, उसका कहीं कोई नहीं! इतनी बड़ी दुनिया में उसका कहीं ठिकाना नहीं ! अपनी एक अदद सोने की चूड़ी देकर उसने कभी किसी भटके हुए राहगीर की मदद की थी । शायद वह भी अव किसी नयी नौकरी में मस्त हो गया। वनलता ने खत लिखा-इस नौकरी में बिल्कुल फुर्सत नहीं मिलती। वक्त से अगर खत न दे पाऊं, तो परेशान न होना। नयी-नयी जगह है ! खूब दूध पिया करो और उस देश में शुद्ध घी भी जरूर मिलता होगा, तुम अपने लिए घी का भी इंतजाम कर लेना । आजकल बाजार में ईलिश मछली आने लगी है... तुम्हारे बिना मन उदास रहता है" हां, वनलता के खतों में छब्बीससाला उम्र की तमाम कम- - - २६ / शर्वती बाई जोरियां भी साफ जाहिर थी, लेकिन जब यह सीध देने पर उतर आतो, तो ऐसा रागता मानो आगने-सामने खड़े होने के बजाग वह कहीं ऊंची जगह पर खड़ी है और अपने से नीची जमीन पर खड़े इंसान को निहार रही है। सुधामय भी अपने पतों में लिखता रहा-गुनो, तुम्हाली मोरे को चूडी बेचने को अब जरूरत नहीं रही, फिर भी जरो हर वक्त अपने पास रयता हूं गता है, जैसे तुम भी गरे येतद करोब हो “विल्युल दिरा पे परीव । वनलता उन यतों को बार-बार गलती, घुमा-फिराकर गाई- कई अर्थ भी निकालती । ममी-पगी तो खाना बनाते हार जी, उन खतों को खोल-घोलकर पढ़ती रहनी। निकिन उसने गो जाने के लिए कहीं एक गंपित भी नहीं लिपी । गुगनिज है कभी नका वह ठीक तरह व्यवग्थित नहीं हो पाया हो, बुलाने से पहले वह चाहता होगा वह अपना घर अशी नाह मजाले । मागनिजाम पक्का कर ले । बननमा मी, जंग-नंग या जहानन्हा नो मी ग मुक्ता न ! इधर यनपना पद धानी जुवान गर्नग मह किनन्द्र या रही है?" मंदिन, नागने की दी थाने को नही लिया। काम, बहमित नेरला--सुम भणी शायरी, बदलना! नारे लिए घर मराव बेटाई। ए छोटी शादी दी दोहे ही! मैं दृन्हें होकरीसीमा देगा उमरगावाही दिवसायटाल बदल्दी नीमही इसकी . बड़ी जरी विकारही दिन भर मला भारत sam श्रीनिमय यात्रारा ना दारी मभनाई गई नहीं ना 'बंगाल ! यह कौन-सी जगह है ?' शर्वती बाई ने पूछा । 'यहां से ब-हो-त दूर !' सुधामय ने समझाया । उस दूरी का अंदाजा लगाते हुए शर्वती बाई की आंखें अचरज से फैल गयीं। दूर के आदमी से उसे बहुत डर लगता है ! शर्वती बाई की आंखों में भी डर की छाया उतर आयी। "ना, राजा साहब ने कहीं कोई कसर नहीं उठा रखी। अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, जयपुर से आने वाले नाते-रिश्तेदारों का तांता लग गया। अंदरमहल में मेहमानों की भीड़। राज- पुरोहित ने मंत्र पढ़कर उनका ब्याह संपन्न किया । व्याह चाहे बंगाली रस्मों-रिवाज के अनुसार हो या राजपूती आन-बान- शान से, व्याह तो आखिर ब्याह ही होता है न ! व्याह, प्रीतिभोज, सुहागरात-सभी कुछ राज्योचित! राजा साहब ने सिर्फ एक बार पूछा था, 'अपने किसी नाते- रिश्तेदार को आमंत्रण नहीं भेजोगे ? लेकिन उसका इस दुनिया में आखिर है ही कौन, जिसे वह निमंत्रण भेजे ! जो लोग उसका व्याह कराते, वे सभी तो अभी जिंदा हैं, लेकिन सुधामय ने जब उनसे कभी कोई वास्ता नहीं रखा, तव अब जरूरत भी क्या है ! इसके अलावा राजा साहब अकेले ही सौ के बरावर हैं ! एक अकेले राजा साहब मौजूद हों, तो और किसी की मदद की जरूरत भी क्या है ! लेकिन शर्वती बाई ने सुहागरात के दिन ही उसे रोक दिया था-'ना, मुझे छूना मत !' अभी तो शुरुआत है। शायद उसे शर्म आ रही होगी! लेकिन वह औरत राजघराने के अंदरमहल में पली-बढ़ी बड़ी हुई। जवानी के तमाम खेल-खिलवाड़ उसे अंगुलियों के पोर पर याद होने चाहिए। तरुणाई कैसे दुनिया भर को जीत लेती है, उसने अपनी आंखों से देखा होगा। मामूली किसान की बेटी २८/ शर्वती वाई -

कैसे महारानी से भी कंचा पद हासिल कर लेती है, इसका भी
उसे तजुर्वा होगा।
उन दिनों सुधामय काफी छोटा ही था, जब उसके बापू ने
कहा, 'अब तुम कोई नौकरी चाकरी ढूंढ लो। अब मैं तुम्हें और
आगे नहीं पढ़ा सकता।
उस दिन सुधामय ने हाल ही में आई. एस-मो० पास
किया था। उसने साफ जवाब दे दिया, 'क्ली मेरे वश की
वात नहीं।'
बापू ने एकदम से भड़ककर कहा, 'तब फिर तुम्हारे जो मन में
आये, करो। लेकिन अब मुझमें तुम्हें और मागे पढ़ाने का वृता
नहीं।'
उसने काकालोगों के दरवार में फरियाद की।
उन लोगों ने भी यही राय दी, 'मई, डाक्टरी पढ़ना कोई
मासान बात नहीं ! सिर्फ रुपये से ही तो काम नहीं चलने का,
इसके लिए दिमाग भी चाहिए...'
हालांकि उसके बापू उसे डाक्टर नहीं देख पाये। मां भी
बहुत पहले ही चल बसी, लेकिन कवका ने उसे हाक्टर बनते
देखा था। उसके बाद ही तो उसके माथे पर कलंक का दाग लग
गया"मारे शर्म के देश छोड़कर भाग माना पड़ा। अब बंगाल
से उसका कोई संबंध ही नहीं रहा। सिर्फ बनलता से ही थोड़ा-
बहुत संबंध बचा रहा है । लेकिन वह वनलता को भी यह खबर
कैसे दे सकता है ? अभी इतवार को ही बनलता का खत आया
है। लिखा है-'नोकरी ने वेद व्यस्त कर रखा है, विer
मार्बती बाई/२६

कुर्सत नहीं मिलती। सोचती हूं, किसी और अस्पताल में नौकरी
ले लूं । यहां की मेट्रन मुझे फूटी आंखों नहीं सुहाती::'
रहने दो, वनलता को अब नौकरी में ही व्यस्त रहने दो !
और 'सुधामय भी जहां है, वहीं पड़ा रहे । यहां शर्बती वाई है,
राजा साहब हैं ! उसे डर किस बात का ?
सुधामय ने पूछा था, 'तुम्हें क्या मुझसे डर लगता है ?'
शर्वती बाई ने कोई जवाब नहीं दिया। बूटेदार गुलाबी
घाघरा, वित्ते भर की इत्ती-सी कंचुकी और जाफरानी रंग की
महीन ओढ़नी में उसने अपने को इतनी-इतनी खूबसूरत और
आकर्षक बना रखा था, मानो छूने से भी मैली हो जायेगी।
लेकिन सच ही. शर्बती वाई अंत तक मैली नहीं हुई।
उसने सुधामय से सिर्फ इतना ही पूछा था, 'तुमने मुझसे
व्याह क्यों किया, बाबू साहेब ?'
'क्यों? तुम सुखी नहीं हो ?'
?
राजा साहब नहीं रहे ! तीनों रानियां विधवा हो गयीं ! रियासत
की रंगत ही बदल गयी । डाक्टर का भी पहले जैसा रौब-दाव
और दबदबा नहीं रहा, सिर्फ जागीर भर बच रही । खैर, वह तो
खुद राजा साहव हो, उसे तीन हजारी से पचास हजारी बना
गये थे, इसीलिए थोड़ा-बहुत रुतवा बचा-खुचा रहा।
३०/शवंती बाई

पर्वतिया की हालत शोचनीय हो उठी । अव तो उसे हाय भी नहीं लगाया जामकता । सुधामय उसे इंजेक्शन पर इंजेक्शन दिये जाता है। उसकी आंखों से नोंद रह चुकी है। हर वस्त भारी-भरकम किता खोले बैठा रहता । इतना लंबा-चौड़ा डाक्टरी शास्त्र है. इतनो-इतनी दवाइयां हैं । क्या इस रोग का कोई इलाज नहीं मिलेगा? क्या सच ही यह रोग कभी ठीक नहीं हो सकता? मुधामय हौले-हौले से शवंतो वाई के घावों पर मलहम लगाता । कहां उड़ गया सर्वती बाई का वह अनिंद्य रूप? अब तो वह इतनी लाचार हो गयी है कि उसका हाथ-मुंह भी दूसरे को धोना-पोटना पड़ता है। गवंती वाई वन, हर पल भयंकर दर्द से छटपटाती रहती। कभी-कभी उसकी कातर आंखें सुधामय के चेहरे पर टिक जाती, मानो सवाल कर रही हो, 'मुझसे तुमने व्याह क्यों किया, बाबू साहेब ?' लेकिन मुधामय अब किससे कैफियत मांगने जाये ? जिससे जवावतलव किया जा सकता था, अब वह इस दुनिया में नहीं रहा। लाल साहबों के पड्यंत्र के गिकार राजा साहब कत्ल कर दिये गये। अब सिर्फ उनकी प्रेतात्मा अंत:पुर के महल-कगूरों, तालकटोरा के कोठरी-कुप्पियों, मुरंग की संकरी अली-गली- अलिंदों में मंडराती रहती है । उनकी प्यासी आत्मा राजमाता, महारानी, पर्दानगीनों, पागवानों के कमरों में नि:गब्द हाहाकार करती हुई भटक रही है। सुहागरात को उस निर्जन एकांत में गवंती बाई का पागल कर देने वाला मादक रूप आंधी-तूफान की तरह एकबारगी हहरा पार्वती बाई । ३१ उठा। सुधामय उस अनिंद्य सौंदर्य को जीने के लिए पागल हो उठा । जुआ खेलते समय वह इसी तरह होशोहवास खो बैठा था। बाहर रेगिस्तान पर बरसती हुई रात, मानो किसी जादू-मंतर से और ज्यादा नशीली हो उठी। राजा साहब के हुक्म पर वह कमरा सजावट से जगमगा उठा था। इन, गुलाब जल, फूल, पानी-कहीं कोई कमी नहीं । अंतःपुर की औरतें उत्सव का आखिरी समूह-गीत गाकर रुखसत हो चुकी थीं। महल के बाहर उत्सव का शेषांश अभी जारी था, हवा में तैरते हुए मीठे गीत- स्वर अंदर कमरे तक सुनायी दे रहे थे। शर्वती बाई चीख उठी, 'आपके पैर पड़ती हूं, बाबू साहेब ! मुझे हाथ मत लगाइए !' ... क्यों?' व्याह की पहली रात, किसी नववधू का ऐसा अजीबोगरीव व्यवहार आज तक किसी ने नहीं सुना । लेकिन वह रात: बस, इसी तरह गुजर गयी । सारी रात दोनों चुपचाप बैठे रहे- एक पलंग के ऊपर और दूसरा पलंग के नीचे, जमीन पर ! रात के ताजा खिले फूल, सुवह मुरझाकर बासी पड़ गये। इन और गुलाबजल की तीखी सुगंध भी रेगिस्तान की रेत में घुलमिल कर जाने कब हवा में उड़ गयी। पौ फटते ही शर्बती बाई सुरंग की राह अंतःपुर में समा गयी और सुधामय सामने वाले दरवाजे से बाहर निकल आया। - जाने कितने-कितने सालों पहले का हादसा है ! यह सुनी-सुनायी कहानी दुवारा याद भी नहीं आती, अगर आज तुम्हारा खत न मिला होता। वैसे असली कहानी उसी वनलता के इर्द-गिर्द ही ३२/शर्वती चाई

धूमती है, लेकिन, शर्बती वाई की कहानी के विना बनलता को
कहानी पूरी नहीं हो सकती।
सरला दी ने पूछा, 'यह स्वेटर किसके लिए वुन रही हो,
वनलता दी?'
वनलता को सुधामय का नाम लेते हुए शर्म आयी। उसने
कहा, 'कोई न कोई तो आयेगा ही, उसी को थमा दूंगी !'
सरला दी ने लंबी उसांस भरकर कहा, "किसी को आना
होता, तो अभी तक आ ही जाता, बहना ! इधर हम सबकी उम्र
तोहहराकर बढती जा रही है
कभी-कभी सरला दीदी कहतो, 'तुम राजपुताना जाने की
वात कर रही थीं, जाओगी नहीं ?'
वनलता ने कहा, 'अरे हट्ट ! वो तो यू ही कह दिया था!'
उसके बाद?
वनलता पूरा खत शुरू से आखिर तक पढ़ जाती । नहीं, कही
भी यह नहीं लिखा होता-तुम नौकरी छोड़कर चली आओ!
अब तुम्हें नौकरी करने की जरूरत नहीं ' अच्छा, एक यही वात,
वह साफ-साफ लिखता क्यों नहीं?
रात के निर्जन एकांत में सर्वतो बाई से फिर मुलाकात हुई । कुल
एक दिन में ही उसका चेहरा बेहद करुण हो उठा था। अब वह
राजप्रासाद का अंतःपुर छोड़कर सुधामय की हवेली में रहने लगी
थी। राजा साहब ने दोनों प्राणियों की एक विशाल आयल-पेटिंग
बनवा दी थी। वह पेंटिंग कमरे की दीवार पर टांग दी गयी थी।
वाकई, शर्वती वाई बेहद खूबसूरत लग रही थी। लेकिन सुधामय
ने महसूस किया, शर्वती वाई अपना चेहरा मानो जानबूझकर
शबंती बाई। ३३

धूंघट में छिपाये हुए है। हाथ पकड़ते ही शर्वती वाई ने पीछे हटते हुए कहा, 'मुझे तुम छूना मत, वावू साहेब !' अपनी बीवी को भी वह नहीं छू सकता ? सुधामय को उसका यह अनुरोध बेहद अजीव लगा। शर्वती बाई ने बताया, 'नहीं ! मुझे वहुत भयंकर रोग है ? बाबू साहेव !' कैसी बात ? रोग? सुधामय सचमुच दो कदम पीछे हट गया। लेकिन शर्बती वाई अगर बीमार है, तो वह भी तो आखिर डाक्टर है ! ऐसी कौन-सी बीमारी है ? कैसा रोग है ? आजकल तो सभी बीमारियों की दवा है, इलाज भी है । वह उसे रोगमुक्त कर देगा। वीमारी से क्या डरना? लेकिन, डाक्टर मरीज को हाथ न लगाये, यह शर्वती बाई ने कहा, 'मुझे छूने से मेरा रोग तुम्हें भी लग जायेगा, वाबू साहेब !' अव सुधामय ने सीधे-सीधे ही सवाल किया, 'ऐसा कौन-सा रोग है ?' शर्वती वाई ने जवाब दिया, 'तुम्हें नीचा दिखाने के लिए, उन लोगों ने मुझे तुम्हारे खेल की महफिल में भेजा था। वे लोग तुमसे वेहद नाराज हैं, वावू साहेब !' 'नाराज हैं ? भला क्यों ?' 'राजा साहेब जो तुम्हारी मुट्ठी में थे, इसीलिए...' 'अच्छा ? लेकिन उन लोगों ने मुझे नीचा कैसे दिखाया, जरा यह भी तो सुन !' 'तुमसे मेरा ब्याह कराकर, उन्होंने तुम्हारी जिंदगी जो वर्वाद कर दी..." 'अरे भई, तुमसे व्याह करके, भला मेरी जिंदगी क्यों वर्वाद ३४/ शर्वती वाई होने लगी?' शबंती वाई ने जवाब दिया, 'हां, वावू माहेब,हो गयी ! मेरो जिंदगी तो सर, विल्कुल तबाह हो चुकी है।' मारा किस्सा सुनकर सुधामय सन्न रह गया। गवंती बाई ने बताया, 'मुझ जैसी ढेरों-ढेरों लड़कियां हैं, बाब माहेब ! किसी को नीचा दिखाना हो या जड़ से मिटाना हो, हमारे जरिये उन्हें भरमाकर, उनकी जवानी तवाह कर दी जाती है। 'और वे लड़कियां?' शवंती के होंठों पर फोकी-सी हंसी खिच गयी, 'वे लोग इसी अंदरमहल में एक दिन भयंकर दर्द से तड़पती हुई, कोढ़ से सड़- कर मर जाती हैं।' 'राजा साहब ये सब बातें जानते हैं ?' गवंती बाई ने जवाब दिया, 'आलाहुजूर को सव वातों को जानकारी है, सिर्फ मेरे ही वारे में कुछ नहीं मालूम । यह भी खोजा दिलखुशा सिंह को करतूत है ! लाल साहेब की माजिश और बड़ी रानी चंद्रावती को सलाह से यह जाल रचा गया।' ! .."खर, ये मब वो पुरानी बातें हैं । अगले दिन विल्कुल सुबह- सुबह ही वह राजामाहब से मुलाकात की अनुमति मांगने के लिए दरवार में गया था। उनके गुलामों ने बताया, 'राजा साहब तो नाज दग्धार नहीं करेंगे, हुजूर !' 'क्यो?' 'उनकी मर्जी!' पावंती बाई। ३५ लेकिन राजा साहव अगले दिन भी नहीं आये । खवर उसके अगले दिन जारी की गयी। रेजिडेंट साहव तशरीफ लाये, कुछ दिन जांच-पड़ताल चली । अरावली की गिरी-कंदराओं से होकर ढेरों पानी गुजर गया। थैली-थली मोहरें, गड्डी-गड्डी रुपये, वेशुमार इनाम- अकराम अंधेरी सुरंग की राह पंख लगाकर उड़ते रहे । उस दिन समूची रियासत में तहलका मच गया था। जाने कितनी-कितनी अफवाहें उड़ीं। जाने कितनी-कितनी कहानियां वनीं। किसी ने कहा-जरूर यह लाल जी साहब की करतूर है ! किसी ने कहा--इसमें राना चंद्रावती की सलाह थी! किसी का खयाल था-इसमें दिलखुशा सिंह का हाथ है ! रेजिडेंट साहव की रिपोर्ट पहुंची-नाहरगढ़ के शासक का हार्टफल हो गया। शर्वती वाई ने पूछा, "मेरे लिए आप इतनी तकलीफ क्यों उठा रहे हैं, वावू साहेव ?' ... अव शर्वती बाई ज्यादा वात भी नहीं करती। बस, अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से टुकुर-टुकुर ताकती रहती। कभी-कभी उसके होठों की गुलावी पंखुरियां हल्के-से कांपकर रह जाती। 'इस व्याह को व्याह नहीं कहते, बाबू साहेव ! आप मुझे भूल जाइए" उस वक्त सुधामय की निगाहें किसी खुली किताव पर गड़ी हुई थीं। आजकल वह दिन-रात किताबें पढ़ता रहता है और तरह-तरह के सवाल पूछता रहता। उसने पूछा, 'तुम्हें भूख लगी है, शर्बती वाई?' । ३६ / शर्वती वाई

किताब पढ़ते-पढ़ते उसके मन में फिर कोई संदेह जाग
उठता। वह पूछता, 'देखो, मुझसे शरमाना नही, मैं डाक्टर हूं,
जो-जो पूर्छ, सच-सच जवाब देना..'
अद्भुत जिंदगी ! ऐसी अद्भुत जिदगी का परिचय उसे
डाक्टरी किताबों में भी कभी नहीं मिला । जाने कहां-कहां से
चुन-चुनकर लाई गयी लड़कियां ! सव-की-सब गांव की भोली-
भाली किशोरियां । शायद कोई कुएं पर पानी भरने आयी थी,
उसके बाद उसका अता-पता ही नहीं चला। कोई वेमतलब ही
एकदम से लापता । उसके बाद उन्हें दिलखुशा सिंह के हाथों
सौंप दिया जाता । उन लड़कियों में जो जरा ज्यादा खूबसूरत
थी, उन्हें चुन लिया गया और उनको देह में गुप्त रोग का जहर
भर दिया गया। जब किसी को नीचा दिखाना होता या किसी
की जिंदगी तबाह कर देने की जरूरत पड़ती, उन्हें ये लड़कियां
एकाध रातों के लिए उपहार में भेज दी जाती । इतिहास-प्रसिद्ध
विप-कन्या द्वारा दंशित दुश्मन तो तुरत मर जाता था, लेकिन
इस विपकन्या को भोगने वाला तिल-तिल कर मरता । उसके
वाद यंत्रणा । सिर्फ एक रात की फिसलन आदमी को जिंदगी
भर के लिए तवाह कर देती। भयंकर यंत्रणा और तकलीफ से
छटपटाता हुआ आखिर वह दम तोड़ देता।
सालों पुरानी बात है।
उस रात भी राजमहल के मुख्य द्वार पर प्रहरी उसी तरह
खड़ा था। दिलखुशा सिंह खुद हाय मे मशाल लिये दरवाजे पर
आ खड़ा हुआ।
'जरा मुखड़ा तो देखू""!
शर्वती बाई। ३७

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रानो साहिया ने कहा, 'हाय मां, कैसी ठंडी-ठंडी शर्वत जैसी सूरत है। यहां के राग-रंग देखकर मोहर वाई भौचक्को रह गयो । कहां आ गयी वह ? राजा का महल दिखाने का लालच देकर, उन लोगों ने उसके वापू को सौ रुपये पकड़ाये और उसे खरीद लाये। उन लोगों ने कहा था -'तुम्हारी बेटी सुख से रहेगी, भाई ! अच्छा साना-पीना मिलेगा, आराम से जिएगी। इसके बाद अगर कही राजा साहब की मेहरवान नजरों में पड़ गयी तो समझो, उमकी तकदीर खुल जायेगी !' उसके बाद वे उसे बैलगाड़ी में बैठाकर ले आये, लेकिन यह कहां पहुंचा गये । वह तो मानो कोई परी-देश में आ पड़ी। अचानक रानी साहिबा की आवाज सुनकर उसे होगा आ गया। बड़ी रानी ने कहा, 'ठंडी गवंत-जैसी सूरत 'इसे हमने शर्वती वाई नाम दिया।' अब दार्वती बाई अंत:पुर मे इस महल से उस महल में घूमती-फिरती-खेलती नजर आने लगी। होली के दिन रंग खेलती, शादी-ब्याह में मिठाइयां सातो । दीवाली पर नये कपड़े पहनती, नौटंकी-ठेठर देखती। गाने सुनती,स्वांग देसतो, तोज- त्योहारों के रस-रंग में शामिल होती । जैसे वाकी लड़कियां रहती थी, वह भी उसो रंग में रंग गयी। उसके बाद एक दिन वह जवान हो गयी। दिलखुशा सिंह ने समझाया, 'शरवतिया जी, अब हुड़दंग मचाना छोड़ो, तुम अब जवान हो गयी हो।' शायद यह जवानी ही उसके लिए काल वन गयी। उसके पांवों में जरीदार जूतियां पहना दो गयौं । सीने के उभारों पर शर्बती वाई/३६ कंचुकी चढ़ायी गयी, माथे पर ओढ़नी का पल्ला लहराने लगा। वालों की लंबी वेणी, पांवों में पायजेव, कानों में झुमके, गले में हार- वह सिर से पांव तक लद गयी । इस राजघराने की यही रीत है। यह रीत अनादि काल से चली आ रही है। अब जो पर्दा- नशीन औरतें बन गयी हैं, वे भी इसी तरह कहीं-कहीं से उठा लायी गयी थीं। अब बाहरी दुनिया से उनके सारे नाते-रिश्ते खत्म हो चुके हैं । उन औरतों के लिए दुनिया में एकमात्र मर्द यही राजा साहब रह गये हैं। उनके अलावा और कहीं कोई मर्द नहीं ! यानी इस दुनिया में राजा साहब ही एकमात्र नर, वाकी सब मादा! इतनी सारी अनगिनत औरतों का जीवन, यौवन, मान- सम्मान सारा कुछ एकमात्र उस पुरुष के दिलबहलाव के परवान चढ़ चुका है। लेकिन अचानक शर्बती वाई की जिंदगी में अभिशाप की छाया मंडराने लगी। होली का उत्सव । चारों तरफ झाड़-फानूस, फूल-पत्ते, लड्डू, मिठाइयों की भरमार। त्योहारी पर मिले हुए नये-नये कापड़े-जूती, ओढ़नी-घाघरा । लोग-बाग का आना भी शुरू हो गया । दूर बसे, खानदानी घरानों के अमीरों को दावत भेजी गयी है । खानदानी लोग अपने पूरे कुनवे, दास-दासियों, बहू-बहनों के साथ तशरीफ ले आये। लेकिन हर कोई शर्वती बाई को देख- कर अचकचा जाता। सब एक-दूसरे से सवाल करती, 'वह कोन है, बहना ?' 'शवंती बाई !' 'सर्वनाश ! रूप की ऐसी आग राजा साहब की निगाहों में नहीं पड़नी चाहिए! इस रूपमती को अगर यहां से हटाया नहीं गया, तो यह औरत सबकी इज्जत उतार लेगी ।' बड़ी रानी चंद्रावती ने दिलखुशा सिंह को चोरी-चोरी तलब किया । उनमें ४०/शवंती बाई - क्या बातें हुई, कोई नहीं जानता। किसी को कानोकान भनक नहीं लग पायी। लेकिन उसके बाद उस दिन के उत्सव में गर्वती वाई कहीं दिखायी नहीं दी। शवंती बाई उस वक्त तालकटोरा के शाही अंधेरे कंदखाने में पथरायो हुई-सी चुपचाप बैठी थी... जाने कितने साल गुजर गये ! महल में इस काम के लिए और भी बहुत सारी औरतें तैनात हैं--मोतिया वाई, अख्तरी बाई, गुलब्बो वाई । ऐसी औरतें बहुत दिन नहीं जीती. फिर भी उन्हें जिलाए रखना पड़ता है। उन्हें खिलाना-पहनाना पड़ता है, उन्हें बेहतरीन साज-पोशा भी देते हैं । उसके बाद दिलखुशा सिंह प्रकट होता है । अक्सर काफी रात गये, वह हाय में मगाल लिये माता, दरवाजे का ताला खोल देता। उस झुटपुटे अंधेरे में कोई विकलाग मूरत टुप्प से अंदर दाखिल होती। आते ही सांप की तरह अपनी कुडली में कस लेता। नगीली रात का रोमांच कटने में कुल पाच या सात सेकंड लगते । दिलसुगा उसे निकालकर, दुवारा अपने साथ वापस ले जाता । उसके बाद, फिर वही हरकत ! अगली रात फिर वही"उसके अगली रात भी वही... यानी खून के कण-कण में जहर अच्छी तरह फैल जाये । अच्छी तरह हाड-माम-मज्जा में जड़ें जमा जाये। कही कोई कसर न रहे। मोतिया वाई, अख्तरी वाई, गुल्लवो वाई-हर औरत की जिंदगी में इसी तरह का हादसा हो चुका है। शबंती वाई की जिंदगी में भी यही हादसा दोहराया गया। वडे गाजी का महाजन यासा यानदानी अमीर है, लेकिन अंदर-ही-अंदर वह तरह-तरह के पढ्यंत्र रच रहा है । रतनगढ़ शबंती बाई/४१ के नवाव के यहां जा-जाकर नाहरगढ़ के राजा साहब की निंदा करता है । जमींदारी में प्रजा लोगों पर अत्याचार करता है। उसे सबक देना होगा। रेजिडेंट साहब के दरबार में दरखास्त भेजकर अपील-अदालत तो खैर करेंगे ही, उस महाजन के बच्चे को सजा भी देना जरूरी है। सेठ जी को दावत देकर बुलाया गया। जब रात गहरा आयी, तो गुलव्वो बाई को हाजिर किया गया। उस रात महाजन वाई के साथ हमविस्तर हुए, उसकी बाहों में जिंदगी की छूट चखकर मस्त हो गये । नतीजा यह हुआ कि गुलब्बो बाई की तमाम लालसा-कामना महाजन के हाड़-मांस-मज्जा के रेशे- रेशे में प्रतिहिंसा और प्रतिशोध बनकर हमेशा-हमेशा के लिए चिरस्थायी हो गयीं। उसके बाद हद-से-हद चार या पांच साल की जिंदगी! हां तो, राजा साहब के तमाम शत्र, इसी तरह सड़-गलकर निश्चिह्न हो जाते। शर्वती वाई सिर्फ कातर निगाहों से उसे देखा करती और कमजोर-सी आवाज में बार-बार यही-वही सवाल दोहराती, 'मुझसे तुमने व्याह क्यों किया, बाबू साहेब? हम लोग शादी के काविल नहीं होती...' .. लेकिन इस बार बिल्कुल अलग मामला था। राजा साहब भी नहीं जानते थे। यह तो दिलखुशा सिंह, बड़ी रानी और लालजी साहब की साजिश थी। कहां का बंगाली डाक्टर ! धूर्तता के बल-बूते पर तीन हजारी से, एकदम से पचास हजारी जागीर हथिया बैठा। राजा साहब का यह आलम कि अब वह उस कम्बख्त डाक्टर के कहने पर उठते-बैठते हैं। उसे सबक देना ही होगा! तहखाने में रोज जुए का अड्डा बैठता । अब राजा साहब जव पानी लाने के लिए ताली बजायें, पानी पेश करेगी-शवती वाई! "दिलखुशा सिंह सुवह-सवेरे ही आकर्षक साज-पोशाकें ४२ / शवंती बाई गया । मरन, सुशबूदार तेल-मुजेता पहुंचो-संचन- रिलो ! बान खूब मर-संवरपर मोहिनी जसरा रा स धारण करना होगा। जादू चलाना होगा, सेत कानमा तोड़ देना होगा।ना, कोई उज-जापत्ति नहीं मानी जायेगी। रिसाततलो भलाई के लिए स्वार्य त्याग करना बहुत जरूरी है। ना. रोने का भी कोई असर नहीं होगा। गवंतो वाई को सजा-संवारफर मोहिनी मूरत में गदन दिमा गया और उसे बगल वाले कमरे में तैनात कर दिया गए। दिलखुशा सिंह ने समझाया था, 'राजा साहब पर तीन बार ताली बजायें तो समझना, पानी चाहिए; दो बार साली बजायें तो अर्क और एक बार ताली बजे तो तमाए।' राजा साहब ने तीन बार ताली बजायो... सदानंद वावू ने अपनी कहानी जारी रखो, उसके बाद फिर एक मतवा नाहरगढ जाने का मौका मिला था । उस बार भी यही" रसगुल्ला बनाने की फर्माइश । शवंती बाई के व्याह के समय जो रसगुल्ले खिलाये गये थे, बेहद स्वादिष्ट लगे, इसीलिए फिर एपण हुआ। मो साहब, जाना ही पड़ा । उन दिनों दलजीत सिंह परस हो चुके थे। राजमहल में खोजा दिलसुशा सिंह और बड़ी रानी का राज-प्रसार । राजगद्दी पर बड़े राजकुमार को बैठाया गया था। लेकिन अब उस विचारे डाक्टर की पहले-जैमी गान-गोक्त नहीं रही। इधर डाक्टर भी एक कांड कर बैठा । साहर, काड था वह ! जिंदगी में ऐसा कांड न कभी किसी मैंने पूछा, 'और वनलता?' शवंती बाई/४३

'वनलता कौन ?' सदानंद बाबू के दिमाग से वनलता का
ख्याल विल्कुल ही उतर चुका था, 'हां'एक महिला को देखा
तो था...'
“शर्वती बाई ने जिस दिन संसार से विदा ली, सुधामय
उसका दाह-संस्कार करके, नदी तट से सीधे अपनी हवेली में
चला आया । उस दिन जो अपने कमरे में घुसा, जिंदगी में फिर
कभी वाहर नहीं निकला । कब सुबह हुई, कब शाम, कव सारा
नाहरगढ़ नींद में बेहोश हुआ - अब उसे कोई खबर नहीं। हां,
कभी-कभी किसी को उसकी झलक भर मिल जाती। रास्ते के
किनारे-किनारे जाते लोगों की नजर अक्सर उसके कमरे की
तरफ उठ जाती। डाक्टर अपने कमरे में बैठा-बैठा जाने क्या-
क्या लिखने में डूबा होता । वह दिन-रात पन्ने-पर-पन्ने रंगता
रहता।
लोग बीमार पड़े हैं, दवा मांगने आये हैं ।
उन्होंने नौकर से पूछा है, 'डांग्दर साब घर में हैं ?'
'नहीं! साहब ने डाक्टरी छोड़ दी है !' जवाव मिलता।
।
पढ़ते-पढ़ते काफी रात गुजर गयो । अचानक उसकी निगाहें एक
पन्ने पर विल्कुल थिर हो गयीं, मानो वह किसी गहरे ध्यान में
डूब गया हो।"शर्वती वाई ने दर्द से तड़पते हुए दम तोड़ दिया।
डाक्टर की दवा भी उसे नहीं बचा पायो । डाक्टरी विद्या किसी
काम नहीं आयी । दुनिया की कोई दवा उसका रोग नहीं दूर कर
पायी।
--
कभी-कभी वह शर्वती वाई के सिरहाने बैठा-वैठा, बड़े गौर
से सिर्फ देखता रहता।
४४/शर्वती बाई

उसकी तरफ गहरी निगाहों से देखते हुए सिर्फ इतना भर पूटता, 'आज कैसी हो?' इन दिनों शर्वती बाई की बातें सिर्फ उसकी आंखों में सिमट- कर रह गयो हैं । आखिरी दिनों में वह बोलने को ताकत भी खो बैठी थी। उसकी आंखों में फिर-फिर वही कातर सवाल, 'तुमने मुझसे व्याह क्यों किया था, डाक्टर साहेब? सुधामय ने तसल्ली देते हुए कहा, 'मैं तुम्हें एक और इंजेक्शन दे रहा हूं। बताना, इसके बाद कैसा लगता है ?' कलकत्ता । बम्बई । एक-से-एक नयी दवा मंगाफर, वह शर्वती बाई का देता रहा । नयी-नयी किताबें परीदता, पढ़-पढ़- कर ढेर लगाता जा रहा था। रेगिस्तान की धरती में मानो यह कोई विचित्र रोग है। इससे पहले इस रोग के बारे में कभी किसी ने जिक्र नहीं किया। शर्वती बाई को देह अब धीरे-धीरे झर-झरकर वियरने लगी है। सबसे पहले आवाज बंद हुई, उसके बाद आंगों की रोशनी जाती रही । भीषण दर्द और तकलीफ से छटपटाती हुई दार्वती बाई । उसको हालत अब देयी नहीं जाती। लेकिन, वह शर्वती बाई की लाचार देह अपनी बांहों में लेकर, होले-होले उसके घावों को धोता-पोंछता । उफ ! समूची देह में कैसी भयंकर दुगंध । जो औरत कभी अनिंद्य सुंदरो थी, जिसका सौंदर्य देखकर सुधामय कभी अपनी सुध-बुध खो बैठा था अब वह सारा कुछ व्यतीत बन चुका है । कुछेक महीने उसकी हालत में खासा सुधार भी नजर आया. लेकिन कुछ दिनों बाद, रोग दुवारा उभर आया। कुछ दिनों बाद वह फिर ठीक होने लगी... लेकिन फिर-फिर उसी रोग के हमले" ..."उस दिन समूचे घर में अजीव-सा सन्नाटा छाया हुआ था !' शबंती बाई, ४५ चारों तरफ मातमी खामोशी ! सिर्फ पश्चिम में खड़े खजूर के दरख्त से टकराती हुई हवाओं में पत्तों को खड़खड़ाहट भर मुखर थी। आकाश में भटकते हुए किसी अकेले खामोश पंछी ने हठात् अपने पंख फड़फड़ाये और उल्टी दिशा में उड़ चला। शर्बती बाई जिस कमरे में लेटी रहती थी, आज वह खाली पड़ा था। लेकिन सुधामय की अपलक निगाहें उस खाली जगह को अगोरती रहीं। उसे लगा, पास ही कोई सिसकियां भर रहा है। बिल्कुल वही आवाज-- 'तुमने मुझसे व्याह क्यों किया, बाबू साहेब?' अस्फुट आवाज धीरे-धीरे फिर कहीं दूर जा मिली। समूचा नाहगरढ़ मानो पत्थर हो आया हो... - झील के किनारे वाले बंगले में कोई नये रेजिडेंट साहब आये हैं। नये साहब ! राजप्रासाद से उनके लिए नजराने भेजे गये। राजा साहब भी नये-नये, रजिडेंट साहब भी नये-नये ! लेकिन बड़ी रानी अब भी जिंदा है, खोजा दिलखुशा सिंह भी मौजूद है। राजप्रासाद में पलते हुए षड्यंत्र और उन्हें साहब की नजरों से बचाये रखने की वही-वही कोशिशें । शर्बती बाई नहीं रही, मुमकिन है मोतिया बाई, अख्तरी बाई और गुलब्बो बाई भी संसार से विदा हो चुकी हों। सुधामय किताब पढ़ते-पढ़ते अचानक उठ खड़ा हुआ। इधर फई दिनों से उसने हजामत नहीं बनायी। कमरे में टिमटिमाता हुआ दीपक। वह आइने के सामने जा खड़ा हुआ। आइने में घूरता हुआ कोई बीभत्स चेहरा। शर्वती बाई की अदृश्य छाया मानो फिर-फिर वही सवाल दुहराती हुई–'तुमने मुझसे ब्याह क्यों किया, वायू साहेब ?' ४६ / शर्यतीचाई

इस 'क्यों' का उत्तर अधूरा ही रह गया । सुधामय कभी
जवाब नहीं दे पाया। उस वक्त. शवंती बाई को समूची देह पंगु
हो चुकी थी। न वह बोल पाती, न किसी को पहचान पाती।
चेहरा-नाक-कान सारा कुछ बेजान-निश्चल । यहां गया यह
रूप? कहां गयो शवंती बाई ? रात के घुप्प अंधेरे में पार्वती बाई
का विकृत, बदसूरत चेहरा आंगों के आगे तैर जाता। सिर्फ
दीवार को आयल-पेंटिंग निर्वाक आंखों से उसे देयती रहती।
उस दिन भोर फूटते ही डाक्टर ने माधोलाल को बुलाकर
मादेश दिया, 'आज से जो कोई भी आये, कहना मुलाकात नहीं
होगी।'
'अगर राजा साहब इत्तला भेजें ?'
'तब भी नहीं
'मगर रानी साहिबा तलव फरमाएं ?'
'तब भी नहीं."
'अगर...'
'ना, कोई नही !' अव सुधामय का कही कोई नहीं । राती
वाई के अलावा इहलोक-परलोक में उसका कही कोई अपना
नहीं।
।
तंतीस मील लंवा रास्ता। बैलगाडी झकोले देती हुई चलती
रही। जव चला था, रात कुछ-कुछ वाको थी। जंगली कांटों के
झोर-झाड भरी पगडंडो से गुजरकर, अब हमने कच्ची गदक
पकड ली। धूपछांही दिन ! हिंद महासागर के किनारे-किनारे,
नमक की ढेरियां सहेजे हुए नहर-दरिया का पानी धूप की
रोशनी में चमक रहा था। पंडा ईश्वरीप्रसाद एक-पर-एक
शवंती बाई/७
,

कहानियां सुनाये जा रहा था। यह सब, जाने कितने सालों पुरानी बात है। अब तो ठीक- ठीक याद भी नहीं! "आज तुम्हारे खत का जवाब देते हुए सारा कुछ दुवारा याद करने की कोशिश कर रहा हूं, सुचेता! अजमेर के सदानंद बाबू से सुधामय की पूरी कहानी नहीं सुन पाया। उन्हें पूरी कहानी शायद मालूम भी नहीं थी : रसगुल्ले का वयाना पाकर जव वह नाहरगढ़ गये थे, तब डाक्टर को जैसा देखा था, मेरे सामने ज्यों-का-त्यों वयान कर दिया । इस कहानी का शुरू का हिस्सा कलकत्ते में टुक मौसी ने सुनाया था। उसके बाद कुछ हिस्सा अजमेर में सुना। टुकड़ों- टुकड़ों में सुनी घटनाओं से एक आधी-अधूरी-सी कहानी भर वन पायी । आज उसका आखिरी हिस्सा सुन रहा था-वनलता राय से, उसके वनलता मित्र वनने की कहानी ! ईश्वरीप्रसाद ने ही बताया, 'पैसे तो डाक्टर-मां लेती नहीं, डाक्टर-मां के अस्पताल में किसी को भी पैसे नहीं देने पड़ते।' हालांकि यही वनलता कभी पैसे-पैसे के लिए किस कदर मोहताज थी! "सरला दी ने पूछा था, 'सारी खरीद-फरोख्त हो गयी, वनलता दी?' 'अव तो पैसे ही नहीं बचे, बहना! 'अच्छा, सुनो, पहुंच का खत जरूर डाल देना।' लेकिन सरला दी के जाते ही उसे फिर कुछ याद आ गया। सुधामय के लिए उसने धोती खरीदी है। दीवाली वाले दिन ही वह नाहरगढ़ पहुंच जायेगी। रेल के किराये के अलावा, अब उसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं वची। अचानक उसे कुछ याद आ गया। वह दुवारा वाजार चल पड़ी। - - । ४८ /शर्वती वाई

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- वनलताने पूछा, 'क्यों ? मुलाकात क्यों नहीं होगी?' 'डांग्दर बाबू का हुकुम !' वनलता ने कहा, 'तुम जाकर कहो, मुलाकात किये बिना यहां से नहीं टलूंगी ! मैं बहुत दूर से आ रही हूं, कलकत्ते से !' माधोलाल ने फिर कहा, 'डांग्दर बाबू किसी से नहीं मिलते, हुजूर! सिर्फ दवाई खाते हैं और लिखते रहते हैं...' 'क्या लिखते रहते हैं ?' 'अरे, लिख-लिखकर कापियां रंगते रहते हैं ! समूचे घर में कापियों का पहाड़ जम गया ईश्वरीप्रसाद के साथ जिस दिन डाक्टर-मां के अस्पताल पहुंचा, उस दिन वनलता मित्र ने मुझे वे कापियां भी दिखायी थीं। उस दिन वनलता मित्र को भी मैं सालों बाद देख रहा था। सिर के सारे वाल आज सफेद हो चुके हैं। कोरी साड़ी, सफेद ब्लाउज । अस्पताल के तमाम रोगियों पर उसकी चौकन्नी नजर! सारे मरोज वनलता को डाक्टर-मां कहकर बुलाते हैं"दूर धूप की किरणों में चमकता हुआ सागर-जल । वनलता के ड्राइंग- रूम से नजर आता हुआ सागर-जल और डाक्टर-मां के चेहरे में कहीं कोई अद्भुत समानता थी। उसका चेहरा भी सागर की तरह ही विराट, प्रशांत और प्रशस्त ! वनलता बताने लगी, 'डाक्टर मित्र अपना सारा तजुर्वा इन कापियों में लिख गये हैं। इस रोग के बारे में पहले दिन से लेकर अंत तक की छोटी-से-छोटी बातें, स्थितियां, प्रतिक्रियाएं-सव इन कापियों में दर्ज हैं। मैंने उन कापियों की प्रतियां बनवाकर जर्मनी भेजी हैं। उन लोगों ने खत लिखकर सूचित किया है कि ५०/शर्वती वाई इन कापियों के जरिये बहुत सारे नये-नये तथ्यों का आविष्कार हुमा है । देखिए न, यह रहा वह सत" इस बीच हमारा नाश्ता भी आ गया। मैंने गौर किया, इतने दिनों वाद वनलता जिंदगी में कहीं बेहद स्थिर हो आयी है । इतने दिनों मानो मन की समूची एकाग्रता के साथ तप और माधना की राह इसी परिपूर्णता की ओर अग्रसर थी, मानो उसके जीवन का यही परम और एकमात्र लक्ष्य हो। अव उसके हाव-भाव या दृष्टि में शुरू दिनों के उस नशीले आवेग का कहीं नामोनिशान तक नहीं रहा। जिस दिन वह पहले-पहल नाहरगढ़ में दाखिल हुई, उस दिन भी उसका चित्त कहीं से अस्थिर था। उसे देखकर सुधामय ने कहा था, 'तुम क्यों आयी, वनलता?' वनलता ने जवाब दिया, 'मुझसे बहुत देर हो गयी, जी । अव मैं और इंतजार नहीं कर सकी ! तुम्हारे बुलाने के इंतजार में रुके रहना मेरे लिए असहनीय हो उठा था!' 'लेकिन मैं तो" वनलता ने उसे बीच में ही रोक दिया, "ना, अब मैं तुम्हारी एक भी बात नहीं सुनूंगी । कलकत्ते से आते वक्त मैं अपने साथ सिंदूर भी लेती आयी हूं.' सुधामय कोई आपत्ति करे, इससे पहले ही बनलता ने उसका हाय कसकर थाम लिया। सुधामय ने एक बार कहना भी चाहा, 'मुझे मत छुओ, वनलता!' लेकिन इससे पहले ही वनलता ने सुधामय के हाथों में चुटकी भर सिंदूर लगाकर उसे जबरन अपनी माग में रगड़ लिया। उसके बाद, उसका पर छूकर माथे से लगाते हुए कहा, 'सुनो, आज तुमसे जबरन अपनी मांग में सिंदूर लगवाते हुए भी मुझे कहीं से भी सम-लाज नहीं आ रही। ना, अव शरमाने का वक्त शवंती वाई| ५१ नहीं रहा..." सुधामय की अंगुलियां अब धीरे-धीरे झरने लगी थीं। समूची देह में घाव, घावों से रिसता हुआ मवाद । अब वह आंखों से ठीक तरह देख भी नहीं पाता। कुछ दिनों बाद शायद कान भी जवाब दे जायें! "लेकिन उस दिन सुधामय की पलकों की कोरों में हंसी की महीन-सी रेखा खिल उठी। उसने सिर्फ इतना ही पूछा, 'तुम इतनी देर से क्यों आयीं, वनलता?' बनलता ने सुधामय का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, 'हां, देर हो गयी, लेकिन आयी तो सही ! वो तो कहो, तकदीर अच्छी थी, जो और ज्यादा देर नहीं की !' 'लेकिन, सुनो, उस चुटकी-भर सिंदूर के अलावा हममें- तुगमें और कोई नाता नहीं होगा...' 'कौन कहता है, नहीं होगा ?' 'नहीं, सच ! और कोई नाता नहीं होगा, वरना इतने दिनों की मेरी सारी तपस्या झूठी पड़ जायेगी। शर्बती वाई जिस भयं- कर कप्ट में तड़प-तड़प कर मरी, मैं खुद भी वे तमाम तकलीफे झेलते हुए मरना चाहता हूं। हां, अगर हो सके तो मेरे ये सारे लेख देश-विदेश, कहीं भी भेज देना। मुमकिन है, वे लोग अव किसी और शर्वती बाई को ऐसी भयंकर मौत मरने से बचा लें!' ईश्वरीप्रसाद ने अपनी कहानी उसी तरह जारी रखी, 'उराके वाद डाक्टर-मां ने पचास हजारी जागीर वेचकर, यहां अस्पताल खोल लिया। पारा-रोग के शिकार जितने मरीज आते हैं, बिना किसी खर्च-पानी के, डाक्टर-मां इलाज का मुफ्त प्रबंध करती हैं । वैसे यहां और डाक्टर भी हैं । वे खुद भी ५२/ शवंती बाई - , खुद उनके तो इस विद्या के कुगल जानकार हैं। जैसे उन्होंने मुधामय की मोन के आखिरी दिनों तक जी-जान से सेवा को पी, उनी तरह अब वे यहां के मरीजों की सेवा में दिन-गत जुटी रहती हैं। बंगाल का ख्याल अब वह जैसे मूल ही गयी हैं ! अब तो यह राजपुताना ही डाक्टर-मां का अपना देश बन चुका है।' मैंने ईश्वरीप्रसाद से सवाल किया, लेकिन सावंती बाईका रोग डाक्टर को कैसे लग गया?' 'उस डाक्टर ने जान-बूझकर वे इंजेक्गन अपनी देह में भी चुभो लिये थे।' 'कसे इंजेक्शन ?' 'अरे, उसी पारा-रोग के!' आज जो तुम्हें यह खत लिख रहा हूं, पता नहीं, तुम्हें इसमें अपने भावी जीवन को परिणति का वाभास मिलेगा या नहीं। लेकिन एक बात मैं खुद भी आज तक नहीं समझ पापा, आज इतने दिनों बाद मुझे याद आ रहा है । उस दिन बैलगाड़ी पर सवार होकर जब हम ओखा-पोटं से चले थे, जब कंटीले मोप- भाड़ पार करके, कच्ची सड़क से गुजरते हुए मैंने ईश्वरीप्रमाद से यह कहानी मुनी थी, तब खुद अपने मन से ही यह मवाल पूछा या-'सुधामय ने शवंती वाई के रोग का इंजेक्शन अपनी देह में क्यों लिया?' दुनिया से सिफलिस' नामक रोग मिटाने की साधना के लिए? यावंती बाई का सारा रोग-गोकः अपने पारीर में चुनकर, किसी स्वस्थ, सूबसूरत गवंतो वाई को पाने के लिए? सर, छोड़ो ! अब सवाल यह है कि मैंने यह कहानी आपिर किसके बारे में लिखी है, मेरे लिए यह बताना भी शायद सवंती बाई। ५३

-
माज मुश्किल है।
आखिर इसकी नायिका कौन है ?शर्वती बाई या वनलता?
खैर, पाठक चाहे जो सोचें, तुम्हें भी क्या इस बारे में कोई
संशय है ?
वैसे यह कहानी अगर यहीं खत्म हो जाती, तो शायद वेहतर
था! लेकिन, तब शायद यह मेरी कहानी नहीं होती। उस दिन
आते समय वनलता ने कहा, 'आप लोगों को एक चीज और
दिखाना बाकी है। चलिए, दिखाऊ...'
वनलता हमें बगल वाले कमरे में ले गयी । ईश्वरीप्रसाद
उस वक्त समुंदर-किनारे हाथ-मुंह धोने चला गया था। यह कमरा
और ज्यादा प्रशस्त और सजा हुआ था। चारों तरफ करीने
से सामान लगा हुआ था।
वनलता ने कहा 'यह देखिए , यहां डाक्टर मित्र की सारी
चीजें सजा कर रखी हुई हैं। ये रहे उनके जूते, ये कपड़े, यह
कुरता-उनका सारा कुछ यहां संजोया हुआ है। उनकी कंघी,
चश्मा, नकली दांत तक सहेजकर रख छोड़े हैं मैंने ! और यह
रही-डाक्टर मित्र की तस्वीर...'
मेरी निगाह दीवार पर टंगी हुई आदमकद पेंटिंग पर जा
पड़ी। सुनहरे फ्रेम में सजी-सजायी तस्वीर । एक तरफ डाक्टर
सुधामय-सिर पर पगड़ी, दूल्हे के वेश में ! और उनकी बगल
मेंशर्वती वाई-जाफरानी ओढ़नी, गुलाबी घाघरा! राजपुतानी
दुल्हन का वेश! सदानंद बाबू ने भी तो इसी तस्वीर का जिक्र
किया था। यह तस्वीर नाहरगढ़ के राजा साहब ने उनके व्याह
के मौके पर तैयार करायी थी।
कुछ देर को मेरी निगाहें उस तस्वीर पर स्थिर हो गयीं।
वनलता ने पूछा, 'मुझे पहचान रहे हैं ?' मैं अचकचा
.
गया।
५४/शवंती बाई

वनलता ने कहा, 'डाक्टर मिन की बगल में "यह में ही तो
"अरे! आप तो बिल्कुल पहचानी ही नहीं जाती!'
वनलता ने आहिस्ते से कहा, 'उन दिनों मेरी उम्र भी तो
कम थी। उस उम्र में चेहरा भी खूबसूरत लगता पा, काफी
गोरी भी थी! राजा साहब को बेहद चाव उमड़ा, में राजपूत
औरतों की वेश-भूषा में तस्वीर उतरवाऊ! असल में खुद राजा
साहब ने ही तो बड़े होकर हमारान्याह कराया था..."
मेरे गले तक एक सवाल उभरा। हठात् यह पूछने का मन
हो आया, 'आप शवंती बाई को पहचानती हैं ?'
मेरे चेहरे-मोहरे का भाव देखकर शायद उसे भी संदेह हो
गया।
उसने बेहद भरोसेदार लहजे में बातों को अगली कड़ी जोड़ी,
'इसके अलावा, उन दिनों, हम दोनों को उम्र भी तो बहुत कम
पी...'
उसकी तीखी निगाहें मेरे चेहरे पर पड़ गयीं, मानो वह मुझे
अंदर तक पढ़ लेना चाहती हो। लेकिन अगले ही पल उसने अपने
को संभाल लिया।
मैंने पूछा, 'क्या उम्न थी?'
'उनकी उम्र कुल छच्चीस साल थी, और मेरी तेईस...'
शर्यती बाई

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एक
राजाकी
:
रानियां

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सोचा था, इस कहानी का नाम दूंगा-'एक तन, छः दुश्मन',
लेकिन काफी सोच-विचार के बाद, मुझे लगा, दुश्मन और
रानी ये दोनों एक जैसे हैं ! दोनों का आकर्षण भी एक जैसा
ही है। खास कर रायगढ के ठाकुर साहब की छोटी रानी का
आकर्षण। छोटी रानी के खत ने दामोदर पांडे को क्या कम
आकर्षित किया था?
लेकिन शुरू में हो कहानी का अंत क्यों वताळं?

- वाद एक जाने कितने-कितने हादसे झेल चुकी है। किसी-किसी हादसे ने मुझे बिलकुल मटियामेट भी कर दिया है, लेकिन थोड़ा वक्त गुजर जाने पर मैं दुवारा उसी दम-खम से उठ खड़ा हुआ हूं ! और संपत्ति ? संपत्ति मुझे सच ही, सहज सुलभ है ! हां, चूंकि मैं सहज ही सुखी हो लेता हूं, इसलिए हर पल अमीर हूं। परम दु:ख के पलों में भी मुझे सुख की बूंद का अहसास हुआ है, क्षति और क्षय में भी चरम तसल्ली और ताकत महसूस की है, यही मेरी सबसे बड़ी दौलत है। जिंदगी में इससे बड़ी दौलत और कौन-सी है ? पुष्कर के दामोदर पांडे ने बताया था, 'भोजन के माध्यम से मैं परमेश्वर की पूजा करता हूं, बाबू साहब ! आप लोग तीर्थ करते हैं, ढेरों रुपये खर्च करके देश-भ्रमण करते हैं, पुण्य कमाते हैं, लेकिन मैं भोजन करके ही पुण्य कमाता हूं! उस ऊपरवाले परमपिता परमेश्वर के नाम पर भोग लगाता हूं ! अपनी आत्मा तुष्ट रहे, तो परमेश्वर भी परम तुष्ट होगा" खैर, मैंने अजमेर, द्वारका, पुष्कर, प्रयाग, मथुरा, वंदावन जाकर कौन-कौन-सा पुण्य अजित किया, उसका हिसाब-किताव शायद उस ऊपरवाले के खाते में दर्ज हो रहा होगा ! वह मेरी समूची जिंदगी का लेखा-जोखा होगा। कोई पुण्य-फल मिला तो सार्थक हो जाऊंगा; नहीं मिला तो भी कोई शिकायत नहीं होगी। लेकिन तीर्थ यात्रा के दौरान घाट-बाट, रेल-तांगा, वेटिंग- रूम वगैरह में मौजूद अख्यात, अज्ञात, अनादृत लोग ! उनके दर्शनों से भी पुण्य मिलता है, यह वात आज मैं निःसंकोच कह सकता हूं। इन्हीं लोगों के दम पर तो मेरो कला-कारीगरी है; ये लोग ही मेरी सृष्टि की पूंजी हैं । मैं दरगाह शरीफ पर मत्था टेक आया, पृथ्वीराज का ढाई दिन का झोंपड़ा भी देख लिया, तारागढ़, अजायबघर, दौलत- ६० / शर्वती वाई - - बाग, अन्नामागर--सारा कुछ देख डाला। अब कही कुछ भी देखना वाकी नहीं रहा । मेरा ख्याल था, मैंने मारा कुछ देय हाला। लेकिन रवाना होने के समय ही बाधा पडी। पंडा महाराज यानी डी० एन० काले साहब ने पूछा, 'तीर्थ- स्थान मे आकर आपने ब्राह्मण-भोजन नहीं कराया. बाबू जी ?' वाकई, यह सोचने की बात थी। पूरे अनुष्ठान में मैंने कही कोई टि नहीं रखी। पुष्कर में प्रसाद-पूजा चढाया. सावित्री पहाड़ पर देवी-दर्शन भी कर आया, कछुओ को चने पिलाये, देर-देर तक व्रत करके दान-ध्यान-पूजा, गोदान, पकवान चढ़ावे --सारे अनुष्ठान ही पूरे किये। चूंकि काफी देर हो गयी थी, इसलिए ग्राह्मण भोजन नहीं करा पाया। मैंने सोचा, बाद में रुपये टिका देने से ही काम पूरा हो जायेगा, या फिर अजमेर वापस लौटकर कोई इंतजाम किया जायेगा । ग्राह्मण तो भापिर वहां भी होंगे। लेकिन वहां भी यह संभव नहीं हो पाया ! पंडा महाराज की बात सुनकर मैं फिक्र में पड़ गया। मैंने पूछा, 'कितना खर्च पड़ेगा?' डो० एन० काले ने कहा, 'पांच ब्राह्मणों को भोजन कराने में आपको.... उपाध्याय इतनी देर से हमारी बातचीत चुपचाप सुन रहा था। अब उसने जुबान खोली, 'पांच क्यों? सिर्फ एक ब्राह्मण को खिला-पिला देना हो काफी होगा।' पंडा महाराज के चले जाने के बाद उपाध्याय ने कहा, 'सुनिए, इन सब पंडित-पंडों की बातों में मत आइए । जाने कहां. कहां के आलतू-फालतू ग्राह्मण लाकर हाजिर करेगा और वीच में मोटा कमीशन मारेगा! आप ब्राह्मण को जो दक्षिणा देंगे, यह भी आधी से ज्यादा हड़प लेगा। इससे तो बेहतर है, एक राजा की रानियां /११

!
दामोदर पांडे को भेज दूंगा ! विशुद्ध भोजपुरी ब्राह्मण ! शरीफ
और सदाचारी। पांच ब्राह्मणों का खाना वह अकेला ही खा
लेगा ! सो, एक जन को खिलाकर पांच ब्राह्मण-भोजन का
लाभ विलकुल पक्का।'
मैंने कहा, 'तो फिर यही इंतजाम कर दीजिए।'
मामूली-सी बात थी ! एक ब्राह्मण को खाना खिलाना है।
इसमें परेशानी जैसी कोई बात नहीं थी। पुरी, अयोध्या, वंदा-
वन, प्रयागधाम-हर जगह यह आयोजन निभा चुका था। सारी
जिम्मेदारी पंडों ने ही अपने कंधों पर ले ली, मैंने सिर्फ रुपये
गिनकर ही छुट्टी पा ली थी। लेकिन अजमेर में पहली बार
मुझे कहानी भी मिली। हां, इससे पहले कभी किसी पेटू पंडित
के जीवन-चरित्न की तरफ ध्यान नहीं गया था। शायद अजमेर
में भी इसकी जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि तय यही हुआ था कि
इसकी सारी जिम्मेदारी उपाध्याय के सिर पर होगी।
अगले दिन सुबह जब सोकर उठा तो सिंहद्वार की बगल में
लोहे की बेंच पर पूरी वांह की बनियान पहने किसी अजनवी पर
नजर पड़ गयी।
मुझे देखते ही वह उठकर खड़ा हो गया और उसने विनम्र
लहजे में कहा, 'भोजन कराने के लिए आपने किसी ब्राह्मण को
भेजने को कहा था, वावू जी ? मैं दामोदर हूं-भोजन करता
-
मैं इस स्थिति के लिए कतई तैयार नहीं था।
लेकिन पांडे जी ने खुद ही बातों की पहल की, 'आप मेरा
जनेऊ देख लीजिए, बाबू जी, मैं विशुद्ध कन्नौजिया ब्राह्मण हूं।
चूंकि मैं यहां के पंडों को कमीशन नहीं देता, इसलिए उन लोगों
ने मुझे वर्वाद कर डाला है। लेकिन यहां जो बंगाली तीर्थयात्री
आते हैं, वे मुझे हो भोजन कराते हैं । उपाध्याय जी को सारा
६२/ शबंती बाई

किस्सा मालूम है।
'आप यहां करते क्या है?'
पांडे जी को मेरा सवाल समझ में नहीं आया । वे भौचक्की
आंखों से मुझे डवर-डवर ताफते रहे।
मैंने अपना सवाल स्पष्ट करते हुए कहा, 'आप यहां कोई
नौकरी-चौकरी या किसी और काम में भी लगे हैं या सिर्फ
ग्राह्मण-भोजन ही करते हैं ? मेरा मतलब है, आप करते क्या
-
पांडे जी ने सिर हिलाकर कहा, 'नहीं बाबू जी, और कुछ
नहीं करता, सिर्फ भोजन करता हूं। पुष्कर जी की किरपा से
भोजन ही मेरा पेशा है।' दामोदर पांडे का चेहरा मानो अपने
पेशे के गर्ववोध से चमक उठा।
उसने दुवारा कहा, 'आप नंदकिशोर जी को पहचानते हैं ?
कलकत्ते के नंदकिशोर बाबू?'
मैंने इंकार की मुद्रा में सिर हिलाया।
पांडे ने कहा, 'अरे, वो तो कलकत्ते के इत्ते बड़े सेठ साहर
हैं । आप उन्हें नहीं पहचानते ? बड़े बाजार में उनकी गद्दी है।
यहां आये, तो मुझे भोजन करा गये । उनको अउरत बड़ी भक्तिन
है, बाबू जी ! पूरे पांच सेर दही, आधा मन आटे को पूटियां,
सड्डू, दही-बहे--मेरा भोजन देयकर सूब तारीफ की ! यत में
पूरे दस रुपइये दक्षिणा में दिये...'
पांडे जी शायद और लंबी फेहरिस्त गिनाते, लेकिन मैंने
उनको वात वीच में ही काटते हुए कहा, 'अच्छा | अध्या!
उपाध्याय जी को आ लेने दीजिए। मैंने उनसे सारा इंतजाम
करने को कह दिया है।'
रात को उपाध्याय जी ने पूछा, 'सुवह पाहे बाया था?
धर्मशाला के प्रबंधक उपाध्याय जी उस वक्त यटिया विटा-
एक राजा की छः रानिया/११

i . कर सोने की तैयारी में थे। उन्होंने दुवारा कहा, 'तब मैं कल ही सारा इंतजाम किये देता है। क्यों, ठीक है न ?' मैंने कहा, 'कल शाम को तो मैं चित्तौड़ चला जाऊंगा।' :.. उपाध्याय ने कहा, 'अरे, तो गाड़ी तो रात की है ! सुबह ही खिला देंगे। अगर आप ग्यारह बजे खाने को बुलायें तो दो बजे तक वह पत्तल चाट-पोटकर विलकुल साफ कर देगा ! आप खुद ही देख लीजिएगा। वैसे मैंने उससे कह दिया है कि आज दिन भर वह उपवास रखे। मैं अवाक रह गया, "उपवास ? कल खायेगा, इसके लिए: आज से उपवास ?' 'जी, उपवास नहीं करेगा, तो कल पांच ब्राह्मणों का खाना अकेला खायेगा कैसे ? आखिर आदमी का ही पेट है ! हर दिन क्या एक जैसी भूख रहती है ? इसके अलावा, आजकल तो खाने की हर चीज में मिलावट रहती है ! इसी अजमेर में कभी हम कुल चार आने सेर के हिसाब से भैंस का घी खरीदा करते थे। वंवइया आम जैसे बड़े-बड़े लड्डू, एक पैसे में एक गंडा । खाओ न, कितना खाओगे ? आजकल तो दही-बड़े तक में मिलावट रहता है । खैर विचारे पांडे जैसे लोग, अब सचमुच कष्ट पाते हैं। खाने में पहले जैसा करतब नहीं दिखा पाते । खाने के बाद हजम करने के लिए छोटे लाल की पाचक-गोलियां भी खानी पड़ती हैं। सचमुच ऐसे लोगों के खासे बुरे दिन आ गये हैं। मैंने पूछा, 'भई, दुनिया में इतने-इतने पेशों के रहते हुए पांडे; ने भोजन का पेशा ही क्यों अपनाया है ?' वंगाली धर्मशाला के वाकी सब कमरे बिलकुल खाली पड़े. थे। थोड़ी-बहुत ठंड भी पड़ने लगी थी। शाम से ही चारों तरफ सन्नाटा छा जाता है । उपाध्याय को भी खास काम नहीं होता। ! ६४/ शवंती, बाई:

इन कई दिनों में उसने बहुत से किस्से सुनाये। उपाध्याय ने ही बात गुरू की, 'आप यही इनी टिए पर आ जाइए, वायू माहब ! आपको एक मजेदार किस्मा मुनाऊं...' । हां, उस सुदूर राजपुताना के धर्मशाला में वितायी हुई रात मुझे आज भी याद है । उस दिन कहानी सुनते-सुनते काफी रात हो गयी थी । दूर, जोधपुर के पहाडों ने पश्चिम के आकाश को ढंक रखा था। इधर दक्षिण में तारागढ़ के ऊंचे-ऊंचे मकानों में जलती हुई रोगनी एक-एक करके बुझती जा रही थी। अजमेर जवदान पर आने-जाने वाली ट्रेनों की चीख-पुकार उस रात को निस्तब्धता को चीरकर टुकड़े-टुकड़े किये दे रही थी. लेकिन मैं उस वक्त वहां से काफी दूर पहुंच चुका था। यहां भोजपुर, कहां कन्नौज! कुछ होश नहीं पश्चिमी रियासत के किसी गांव में शायद रामगढ़ के राजा ठाकुर साहब पधारे हैं। ठाकुर साहब को शिकार का बेहद मौका । नर्मदा नदी के तट पर पड़ाव भी पड़ चुका है। अपने बंधु-याधव और सुशामदी यार- दोस्तों के साथ शिकार पर निकले हुए ठाकुर साहब, दो-दो बाप मारकर, अपने दरवारे पास में लौट आये हैं। इस वक्त उसी का उत्सव चल रहा है। जो लोग ढाक-ढोल, कनस्तर पीट-पीटकर बाघ को घर-धारकर, बंदूक को नली के सामने ले आये थे, उन्ही लोगों को पिलाने-पिलाने का दौर चल रहा है। लगभग तीन सौ लोगों की भीड़। पुलाव, लड्डू, तरकारी, दही, गुलाव- जामुन-कहीं किसी चीज की कमी नही रयो । सब-के-मव मर- मुक्के पटमलों की तरह पत्तल चाट-पोटकर साफ कर गये। एक राजा को छ रानियां | ६५ ।

नर्मदाप्रसाद ने हुक्म दिया था जो जितना खा सके, पेट भरकर खाये। जो जितना मांगे, उसे खिलाया जाये। सभी लोग खाने पर टूट पड़े। किसी को भी किसी तरफ देखने की फुर्सत नहीं। अंत में सवका पेट भर गया। भंडार खाली हो गया। सभी लंबी-लंबी डकारें लेते हुए, ठाकुर साहब को सलाम ठोंककर अपनी-अपनी राह लगे। लेकिन एक आदमी अभी तक डटा हुआ था। उसे और खाना चाहिए । लड्डू या गुलाब जामुन या पेड़ा या दही-कुछ भी मिल जाये। लेकिन अब तो भंडार में कुछ भी नहीं बचा। कहां से दिया जाये ? सारा कुछ तो खत्म हो चुका। ठाकुर साहब को खबर भेजी गयी, 'एक जन अभी अतृप्त रह गया। ?' 'हुजूर, कोई गंवई आदमी है ! इस मुहल्ले में रहता है। हुजूर की परजा है।' हां, चलकर देखना चाहिए, कैसी प्रजा है ! कैसा हैरतंगेज खवैया है, जो सारा कुछ खा-पीकर उजाड़ कर सकता है ! नर्मदाप्रसाद ने उसके सामने हंटर घुमाते हुए पूछा, 'कौन हो तुम? क्या नाम है ? हुजूर की परजा यानी वह गंवई आदमी उस वक्त खाली पत्तल के सामने चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठा था। उसने जवाब दिया, 'हुजूर, मैं दामोदर पांडे हूं ! जात का 'कौन है वह , ? ब्राह्मण !' 'हूंs..' नर्मदाप्रसाद ने लंबी-सी हुंकारी भरी । शायद वे किसी सोच में पड़ गये थे। कुछेक पल बाद उन्होंने पूछा, 'क्यों, तुम्हारा पेट नहीं भरा?' । ६६ /शर्वती वाई 'जीना! हुजर!' 'और गाओगे?' 'जी हां!' 'और कितना खा सकते हो?' 'आप जितना गिला, हुजूर!' हुजूर फिर किमी मोच में गुम हो गये । ठेठ गांव के अंदर उनकी कचहरी। आम-पास रही हलवाई की दुकान भी नहीं। महर यहां से तीस कोस दूर । मुसाहिब, दोस्त, यारवस्ती भी पास ही बड़े थे। वे लोग मो सारी बातचीत सुन रहे थे। हुजूर ने सवाल किया, 'मेरे साथ राजमहल में चलोगे? नौकरी करोगे उन दिनों दामोदर पांडे वेकार या। सिर्फ अपना पेट पालना भी पहाड़ हो उठा था। दोनों जून याना भी मयस्सर नहीं। सारी दुनिया को हजम कर जाने वाली दावानल-सी भूव ! ऐसे इंसान को नौकरी कालोम दिवाना? यह तो वही हाल हुआ- पाने का बुलठा, पेट में वंठा हा दामोदर ने मिर्फ इतना ही पूछा, 'काम क्या करना होगा, हुजूर? मैं तो पड़ा-निना भी नहीं हूं। अपना नाम तय नहीं लिय सकता।' ठाकुर मार ने कहा, 'नही! लिखने-पटने का काम नही करना होगा। सिर्फ भोजन करना होगा भोजन ! मला यह भी कोई काम है ? ठाकुर मार के लाप-नन्कर के साथ दामोदर पाडे भी रवाना हो गया। यहां से तीम कोम दूर रायगड के ठाकुर साह्य का राजमहल । राजमहल तो आधिर राजमहल ठहरा। चारों तरफा हंगामा मच गया। ठाकुर माहब भी निहायत कम-उन्न थे। अटूट पंसा, अटूट दौलत ! मुसाहिब और यार-दोस्तो का एक राजा की रानियो । ६७

-
~
दल मुफ्त की रोटी तोड़ा करता । गाने-बजाने वालों की अलग
मंडली । जरूरत पड़ने पर मुजरा करने के लिए बाई जी भी
बुलायी जाती थीं। नाच-गान की महफिल गर्म हो उठती। कभी-
कभार शिकार का भी आयोजन होता। ठाकुर साहब के पास
हाथी है, कुत्तों का झुंड है, हिरण, वाघ, सिंह, पंछी - सभी तरह
के जानवर हैं । वंदूक, रायफल, मोटरगाड़ी, पालकी, साइकिल
सभी कुछ है ! ये सब चीजें पुश्तैनी हैं--पहले भी थीं, आज भी
हैं। सिर्फ एक ही चीज की कमी थी। अब वह भी आ गयी । भई,
यह आदमी करता क्या है ? " भोजन करता है ।
ठाकुर साहब की नींद सुवह देर से टूटती । दीवान ,जी ही
सारा कामकाज निपटाते हैं । ऐसे भी दो-एक काम निकल ही आते,
जो ठाकुर साहब के बिना नहीं हो सकते थे। वह भी दीवान जी
ही पूरा करके, उनके सामने रख देते । कागज पर कहां दस्तखत
करना होगा, वह भी उन्हें अंगूठा रखकर बताना पड़ता है।
काम-काज में देर हो गयी तो महफिल का मिजाज ही चौपट !
सारा मजा किरकिरा हो जायेगा। उसके बाद राजा साहब
अपने अड्डे खाने में आ विराजते। यह कोठी राजमहल से
विलकुल अलग है। ऊपर-नीचे कई कमरे। ठेकेदारों ने काफी
सारे रुपये हजम करने के एवज यह कोठी बनवा दी!
पहले दिन ही परीक्षा ली गयी। ठाकुर साहब को दामोदर
पांडे का खयाल आ गया। उसे तलब किया गया। राजमहल में
एक अजीव घनचक्कर आया है । समूचा कमरा तमाशवीनों से भर
गया। ऐसा मरगिल्ला-सा आदमी भला कितना खाता होगा?
ठाकुर साहब नर्मदाप्रसाद तकिये से पीठ टिकाये बैठे थे।
पान-किमाम की जैसे लूट मची हुई थी।
दामोदर पांडे हाजिर हुआ। रस्म के मुताविक सलाम करके,
हुक्म के इंतजार में खड़ा रहा।
६८ / शर्वती बाई

नर्मदाप्रसाद ने पूछा, 'क्यों, वीन सेर जलेबी गानकोगे पांडे? । दामोदर हाय जोड़े, उसी तरह गड़ा रहा। वहृत दिनों से जलेबी नहीं पायी, मन-ही-मन उसे लोभ भी हो आया। सबकी वाखों में अचरज मलक उठा। पूरे आधा मन जलेबी या जायेगा? हलवाई को खबर दी गयी । पक्का वीस सेर जलेवी ! हां, रस निचोड़ लिया जाय। ठाकुर साह्न के खास मुलाजिम के सामने जलेबी का सामान तराजू पल्ला पर तौला जायेगा, ताकि हिमाय में कहीं कोई गोल- माल न रहे । शाम को राजमहल में दरवार बेठगा। यहीं दामोदर अपना मेल दिवायेगा। शाम को आंगन में चांदनी बिछा दी गयो । मेतिहर, मजूर, चाकर, वायू, मुनाहिय - विशाल भीड जम गयी। हर ओर अथाह भीड़। ठाकुर नर्मदाप्रमाद पांव-पर-पाव चटाये बीच में विराजमान ।हाथों-हाय पान-किमाम की गिनोरियां । दामोदर पांडे दरवार के बीचोबीच जाकर बैठ गया। उसके मामने जलेबी का हंडा रख दिया गया । दामोदर ने एक बार चारो तरफ नजर दौड़ाकर देग लिया। उसने टाकुर माह्य को दुबारा मलाम किया । बनगिनत उत्सुफ लांसें उसके चेहरे पर जा टिफो। उसके बाद मुरूहो गया मेल ! दामोदर एक-एक जलेवी मुह में रखता गया और बिना किमी सोस-डकार के गले से नीचे उतारता गया। मुनहरे रंग की नरम-मुलायम गलेवियां ! अभी तक हल्की-हल्की गर्म भो। इन्हें चवाने या दात मे काटने की जरूरत नहीं पड़ी, मिर्फ नागप मुह में डालते जाओ। एक राजा पीछानित/६९ खाने का खामोश सिलसिला जारी रहा। सव-के-सव उद्ग्रीव होकर उसे ही देख रहे थे । दामोदर एक-एक करके जलेवियां मुंह में डालता और भीड़ की आंखें भी उसके हाथ के साथ-साथ उठती-झुकती रहीं। मोटी-मोटी साइजों की वीस सेर जलेबी ! सेर भर में करीव तीस जलेवियां ! कुल मिलाकर छ: सौ जलेवियां । जलेवियां खाने का सिलसिला दोपहर तीन बजे शुरू हुआ और खत्म होते-होते शाम हो आयी। आखिरी जलेबी मुंह में डालते ही ठाकुर साहब ने पूरी शाबाशी दो, 'शावाश, उस्ताद ! शावाश ! जीते रहो !' दामोदर ने सिर झुकाकर दुवारा सलाम किया। ठाकुर साहब ने दामोदर को ईनाम देने का ऐलान किया । उन्होंने उसके सिर पर कीमती सिल्क की पगड़ी रखी। उसके लिए शहर से वादामी रंग का नागरा जूता मंगवाया गया। सभा के तमाम लोग ताज्जुव में पड़ गये । ठाकुर साहब ने उसे दुवारा वुला भेजा । दामोदर पांडे से दरयाफ्त किया, 'कोई हाजमी गोली-वोली खाओगे ? मेरे पास है।' दामोदर ने जवाब दिया, 'इसकी जरूरत नहीं, हुजूर 'काफी रात गये, वावर्चीखाने से किसी ने आकर पूछा, 'पांडे जी, आज खाना खायेंगे ?' दामोदर ने छूटते हो जवाव दिया, 'खाऊंगा नहीं तो क्या उपवास करूंगा? इसके वाद चारों ओर दामोदर की ख्याति फैल गयी। नर्मदा प्रसाद को भी काफी यश मिला। सवने कहा, 'ठाकुर हो तो ठाकुर नर्मदाप्रसाद जैसा !' सभी दामोदर को देखने के लिए उतावले । कभी-कभार जिल्ला-हाकिम भी इधर आ निकलते। सर-जमीन की जांच-पड़ताल के लिए रात को !" ७० / शर्वती वाई

उन्हें अक्सर दौरे पर आना पड़ता था।
यह कहानी मुनकर उन्होंने भी हैरानी प्रकट की, 'याकई !
घोर ताज्जुब की बात है ! आधा मन जलेबी ? आप उस आदमी
फो मुझे दिखा सकते हैं ?
ठाकुर साहब ने कहा, 'सर, जिस दिन आप चाहें, दिया
सस्ता हूं।'
दामोदर को तलब किया गया। दामोदर आकर दोनों को
सलाम बजा लाया। मरगिल्ला-सा चेहरा ! साहब ने उसे सिर से
पांव तक पूरते हुए अंग्रेजी मे कहा, 'चिडियाघर का कोई जानवर
लगता है।'
चूंकि यह वाक्य अग्रेजी में कहा गया था, इसलिए यह समझ
नहीं पाया।
ठाकुर नर्मदाप्रसाद ने कहा, 'लेकिन साता बिलकुल राक्षमों
जैसा है, सर!'
राक्षम ! ठाकुर साहब के चेहरे पर गवं-भरी हंसी चमक
उठी।
साहव ने पूछा, 'भात-दाल भी खाता है ?'
'जी, सर, भात-दाल तो सर पाता ही है, लेकिन जरूरत
पडने पर, पेट को बिल्कुल संदक बना सकता है। जाने कैसे
इतना सा पाता है ! गपागप बस पाये चला जाता है। पेट में
जाते हो मारा-चा-सारा गाना जाने कहां छूमंतर हो जाता
'ऐसा अजूबा आपको मिला कहाँ, ठाकुर साहय ?'
मजिस्ट्रेट ने भी देखने की इच्छा व्यक्त की। इस बार जलेबी
की जगह लड्डू बनवाये गये। पूग आधा मन
মুনি
होगा ! अगर उसने सा लिया, तो सुद मजिस्ट्रेट साहब की तरफ
से उसे पूरे पांच रुपये वख्शीश मिलेंगे!
एक राजा की छः रानियां/७१

?
खाने का फिर वैसा ही आयोजन ! हलवाई बुलाकर
फर्माइश की गयी-शाम तक आधा मन लड्डू तैयार करना
है। माल भी सामने-सामने तोल लिया गया। चारों तरफ फिर
लोगों की भीड़ जम गयी। इस बार चवा-चवाकर खाना था।
काफी मुश्किल मामला था। लेकिन दामोदर पांडे भी पीछे नहीं
रहा। लोगों के देखते-ही-देखते आधा मन लड्डू चबा-चबाकर
खा गया । मजिस्ट्रेट साहब ने उसे पांच रुपये ईनाम दिये। चारों
तरफ धन्य-धन्य मच गया।
ऐसा क्या एकाध वार ही हुआ? आज मजिस्ट्रेट साहब,
कल ठाकुर साहब का भतीजा, परसों पड़ोसी जमींदार ! जो
सुनता, वही एक बार उसे देखने की फर्माइश कर बैठता । उसे
फिर-फिर वही खेल दिखाना पड़ता। ईनाम ही ईनाम बरसने
लगा। खातिर भी बढ़ने लगी।
ऐसे ही इस राजमहल के सिंहद्वार पर कभी मोटर गाड़ी आ
लगी थी। उस दिन भी ऐसी ही धूम मच गयी थी । मोटर देखने
वालों का तांता बंध गया। गाड़ी का हार्न सुनते ही बच्चे, बूढ़े,
जवान-राव-को-सब सड़क पर आ खड़े होते । कभी जब बाघ का
शिकार करके लाया जाता, तब भी ऐसी भीड़ लग जाती; ऐसी
ही तारीफें होती । ठाकुर साहव के चिडियाखाने में जब पहली
बार जूनागढ़ का सिंह लाया गया, तब भी भीड़ को रोकना
मुश्किल हो आया था । दामोदर पांडे भी उन्हीं जीवों की तरह
मानो कोई अजूबा था। ठाकुर साहब ठहरे खामख्याली आदमी !
शुरू-शुरू में उसकी खूब खातिर तवज्जो हुई; खूब-खूब वाहवाही
मिली । एकदम से सिर पर ही बैठा लिया गया। उसके खाने-
रहने में कहीं कोई कमी न रह जाये ! तदवीर-तदारक में भी
कहीं कोई भूल न रह जाये!
उन्हीं दिनों एक और कांड हो गया । ऐसी ही एक अजीबोगरीव
७२/ गवंती बाई
।

घटना लाला बाबू के जीवन में भी पटी थी । जो लोग भविष्य में महापुरुप बनते हैं, उन तमाम लोगों की जिंदगी में ऐसी हो कोई घटना जरूर घटती है ! चाहे पावा तुलसीदास हों या सूरदास या भक्त कवीर या रामदास भगवान पर विम पर, किस रूप में 'किरपा कर बैठें, कौन बता सकता है ? भगवान का ही एक और नाम जनार्दन भी है। इसीलिए शायद शास्त्रों में लिखा है-'भोजनेच जनार्दनः'। उपाध्याय पल-भर को चुप हो रहा। थोड़ी देर बाद उसने दरयाफ्त किया, 'रात के कितने बजे होंगे?' मुझे याद है, उस वक्त अजमेर जंक्शन की आगिरी देन धुआं उगलती हुई प्लेटफार्म छोड़ रही यो। आम-रास्ते पर सिंधियो की पाव रोटो की दुकान पूरी तरह बंद हो चुकी थी। उपाध्याय ने कहा, 'पांडे को तो आपने भी देखा होगा । उसे देसकर गगता है कि वह कोई ऐसा-वमा मामूली पेटू ग्राह्मण होगा। खाने को अधातुर । लेकिन ।' उपाध्याय ने बातों को कड़ी दुवारा जोडते हुए कहा, 'यह मय मैंने पांडे फे मुह से ही मुना है ! उन दिनो उसमे ज्यादा जान- पहचान नहीं हुई थी। जब जान-पहनान गहगे हुई, यह बड़ा हो चुका था, बाल भी कुछ-कुछ मफेद होने लगे थे। आयू पहाड़ के अच्छलगढ़ के अपर स्वामी पूरियानंद का अपाड़ा है । . ? एक राजा की छ. रानिया७३ सालों में वहां अक्सर ही वह गांजे का दम लगाता हुआ या शंखिया खाता हुआ नजर आता था। कभी वहां बदन पर राखं लपेटे धूनी रमाये पड़ा रहता था। मैंने सवाल किया, 'शंखिया क्या चीज है ?' उपाध्याय ने बताया, 'शंख का भभूत! साधु लोग शंख जलाकर राख बनाते हैं और उसी राख की गोली चढ़ाकर धुत् पड़े रहते हैं । शंखिया खाकर वदन इतना गर्म रहता है कि माघ महीने की कड़कड़ाती सर्दी में भी पुष्कर-तीर्थ में अगर नहाया जाये, तो भी पसीना नहीं मरेगा। आप यह समझ लीजिए कि भूख मिटाने के लिए दामोदर पांडे मानो कोई तपस्या कर रहा था। - मैंने पूछा, 'क्यों ?' उपाध्याय ने ही बताया, 'चलिए, आपको शुरू से ही सारा किस्सा सुनाता हूं, बाबू जी ! कहानी सुनकर मेरा तो सिर ही घूम गया। अखाड़े में जो लोग आते हैं, अक्सर भगवान को ही प्राप्त करने के लिए आते हैं । वे लोग भजन-पूजन करते हैं । भव- संसार को त्याग करके, विश्व-संसार को हासिल करना चाहते हैं । लेकिन ऐसा अजूबा मैंने पहली बार देखा, हुजूर ! दामोदर को और कोई चाह नहीं थी, वह सिर्फ अपनी भूख को भूल जाना चाहता था। भूख की धधकती हुई आग ! सर्वनाशी भूख का ऐसा गहरा नशा कि वह दिन-रात छटपटाया करता। खैर, मैं भी साधु बनने के इरादे से ही उस अखाड़े में गया था । वहां पांडे को देखकर मैं अवाक् रह गया । दुनिया में ऐसी समस्याएं भी होती हैं ? मैं हैरान था कि ऊपर वाले का यह कैसा अद्भुत एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया। उसे गांजे और शंखियां का तीन-तीन चिलम दम लगवाकर, मैंने उसे धर दवाया- खेल है। - ७४ / शर्वती बाई आज तुम्हें अपनी पूरी कहानी बतानी ही पड़ेगी, पांडे जी! उम दिन पहली बार मुझे पांडे जी का सारा किस्सा मालूम इमीलिए तो मैंने कहा, वावू जी, पुष्कर जी कब किस भक्त पर, कौन-सी कृपा कर बैठे, इमपी महिमा कौन नमानमकता है ' पांडे उन दिनों ठाकुर माहब के यहां ही रहता था। ऐश मे माता-गीता और काफी मस्ती में दिन गुजार हा का। कभी जलेबी, कभी लड्डू, कमी पड़े, कभी गुलाब जामुन, कलासंद~~ हर रोज, हर वक्त, मिर्फ माना और वाना ! जब तक वा- साकर हजम करता रहा, तब तक नोकरी पर यहाल ।" गांजे का लंबा दम लगाने के बाद पांडे ने दुवारा अपनी कहानी गुरू की : कुछ ही दिनों के अंदर दुवाग एक कांड हो गया। इस वार खास रानीमहल से बुलावा आ पहुंचा कि रानीमहल की गनी साहिबा मुझे अपने सामने बैठाकर मिलायेंगी यानी दामोदर को उनके सामने सेल दिखाना होगा। गनी का शौक जो ठहरा! ठाकुर माहब ने तो महज हुक्म मुना दिया, लेकिन मैं अजीव मुसीबत में फंम गया । उस यक्न दिन के तीन बज रहे थे। ठाकुर माहय का आदमी मुझे बुलाने आ पहुचा । मेरी आखों पर दोहरी पट्टी बांधकर मुझे अदरमहल में ले जाया गया। अदरमहल के मुख्य द्वार पर मुझे किसी वादी के हाय गुपुर्द कर दिया गया। बांदी का हाथ थामे-यामे, अधेरे में ही इधर-उधर टकराते-लड- पड़ाते में आगे बढ़ता रहा । कही कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. सिर्फ कानों को साय-माय आवाजे सुनायी दे रही थी। कुछ दूर एक राजा की गनिया 31 ! जाने के बाद एकवारगी सन्नाटा । अचानक मुझे आभास हुआ, अब हम रानीमहल में दाखिल हो चुके हैं ! उफ ! आवाज थी... कि बांसुरी! आवाज सुनकर ही मैंने उम्र का अंदाजा लगाने की कोशिश की। नर्मदाप्रसाद शौकीन जीव ठहरे । उनके शौक का अंत नहीं । हजारों तरह के शौक ! सिर्फ बाघ, सिंह, शिकार, रुपये, नौकर या दौलत का ही शौक नहीं था, औरतों का भी शौक था । शौक की झोंक में कई-कई शादियां रचाते रहे। खूव- सूरत और हसीन औरतें! लेकिन आज तक किसी ने उनकी सूरत नहीं देखी। कहीं उनकी एक झलक तक नहीं मिलती थी। किसी की नजर पड़ जाती तो उनकी इज्जत चली जाती। हां, चांद-सूरज-तारे-उन्हें कोई नहीं देख सकता। खास कर मर्दो की नजर में पड़ना तो सरासर गुनाह है । उन्हें देखने का हक सिर्फ एक ही मर्द को था । वह था उनका मालिक-सिरताज-मालिक ठाकुर साहब नर्मदाप्रसाद ! रात दस बजे के बाद एकमात्र नर्मदाप्रसाद ही रानीमहल में दाखिल होते । उनके रानीमहल में कुल मिलाकर छः रानियां । मैंने यह भी सुना था, छः रानियों के छः अलग-अलग महल थे। हर रानी के लिए दो-दो बांदियां और एक नौकरानी! नर्मदाप्रसाद के सोने का कमरा बिलकुल अलग महल में था। वहां का सारा इंतजाम विलकुल अलग । ठाकुर साहब बारी-बारी से हर रानी के पहलू में रात गुजारने आते। दो महीने खत्म होते ही रानी बदल जाती; कोई दूसरी रानी उनका पहल गर्म करने के लिए हाजिर होती। ऐसे ही पूरा साल गुजर जाता। लेकिन उन दो महीनों रानी के ऐशो-आराम का भरपूर इंतजाम। रानी गुलाव जल में नहा- कर, राजा के साथ विहार पर निकलेगी। पान में कस्तुरी डालेगी। चांदी की थाली में खाना खायेगी; हाथी-दांत के पलंग ७६ / शर्वती बाई

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हाथ धोने के लिए पानी आ पहुंचा । तारीफ करने वाली सिर्फ एक जन । मैं खाना खत्म करके लौट आया । वांदी मेरा हाथ पकड़कर बाहर के दरवाजे तक छोड़ गयी। वहां किसी नीकर ने मेरी आंखों की पट्टी खोल दी। मैं कहां गया था, किस तरफ से गया, किसे खेल दिखाया, उसकी सूरत-शक्ल कैसी थी, मुझे कुछ नहीं मालूम ! ..'कुछ दिनों बाद ठाकुर साहब ने मुझे बुलाकर कहा, 'पांडे, अव मंझली रानी पीछे पड़ी हैं । वह भी तुम्हारा खाना देखना चाहती हैं ! वह भी तुम्हें गुलाब जामुन खिलायेंगी। लेकिन बीस सेर की जगह इक्कीस सेर खिलायेंगी यानी सेर-भर ज्यादा ! तुम खा सकोगे न?' मुझे राजी होना ही पड़ा । इसके अलावा और कोई उपाय भी तो नहीं था। उस दिन भी वही सब दोहराया गया । उसी तरह आंखों पर दोहरी पट्टी बांधकर, वांदी का हाथ पकड़े-पकड़े मैं रानीमहल में पहुंचा। यह ठाकुर साहब का महल नहीं था। यहां हवा में वैसी खुशबू भी नहीं थी। माहौल में वैसी खामोशी भी नहीं थी। इस वार भी किसी ने कोई वातचीत नहीं की, न कहीं कोई आहट सुनायी दी। पूरे इक्कीस सेर गुलाब जामुन खाकर मैं चुपचाप लौट आया। नौकरी ज्यों-की-त्यों कायम रही। इसी तरह रानीमहल में तीसरी वार बुलावा आया। इस वार संझली रानी ने बुलाया था और मुझे वाईस सेर गुलाब जामुन खाना था यानी एक सेर और ज्यादा! कोई किसी के मुकावले हारने को तैयार नहीं। चलो, न हारे । मैं भी बाईस सेर गुलाव जामुन सपोटकर चुपचाप लौट आया। मेरे लिए जैसे बीस सेर वैसे बाईस सेर ! इसी तरह पांच रानियों के यहां खाने के वाद, अव छठी रानी ७८/ शक्ती वाई

की यारी थी।
इसी छठी रानी के यहां ही हादसा हो गया । छोटी रानी ने
पच्चीस सेर गुलाब जामुन पिलाया।
पाना-पीना यत्म करने के बाद, जब मैं हाय घोकर लौटने
वाला था, मुझे लगा, छोटी रानी कुछ कह रही है-
'पान लीजिए, वावू साहब !'
आह, कान जैसे तृप्त हो आये ! वेहद मीठी आवाज । किमी
रानी की आवाज इतनी मीठी नहीं थी। मुझे लगा, छोटी रानी
देखने में भी शायद सबसे ज्यादा सूबसूरत है । उमकी आवाज के
सहारे ही मैंने उनकी झलक भी पा ली।
पान का बीड़ा मुंह में डालने ही वाला था कि फिर यही
आवाज सुनायी दो, 'यहां नही ! बाहर जाकर इसे योलकर
देखिएगा,
इतना कहकर यह चली गयी। जाते-जाते उसने चांदी को
आवाज देकर मुझे बाहर तक छोड़ आने को कहा।
वाहर आने पर मेरी पट्टी पोल दी गयी। अपने कमरे में
आकर मैंने वह पान का बीड़ा योल डाला। थोड़े में एक टुकड़ा
कागज । मैं तो सन्न। पान के बीड़े के अंदर तह किया हुआ फागज!
मैंने कागज सोलकर देया, कागज पर कुछ लिसा हुआ था। मेरी
कुछ समझ में नहीं आया, हुजूर! लिखने-पढ़ने की बात तो दूर,
अपना नाम तक नहीं लिय सकता। अब किससे पढाने जाऊ ?
इसमें आखिर क्या लिखा है ? अगर कहीं कोई भेद की बात
हो? मैंने वह कागज मोड़कर अपनी फतुही में रस लिया। पता
नहीं, कब किसी की नजर पड़ जाये।
"उस दिन ठाकुर साहब ने पूछा, 'क्यों, सारा पा लिया था
साहय !
।
न, पांड?'
'जी हा!"
एक राजा की धारानिया | Ut

? ? ठाकुर साहब खुश हो गये, 'शाबाश उस्ताद, जीते रहो !':- रात को अपने कमरे में लौटकर मैंने वह खतनुमा पान का बीड़ा दुवारा खोला। स्याही से लिखे हुए कुछेक अक्षर। मेरे लिए इनका कोई अर्थ नहीं । हुजूर, उस दिन मैं पहली बार रोया था। मुझे बार-बार यह अफसोस होता रहा कि मैंने लिखना- पढ़ना क्यों नहीं सीखा। अब भला मैं इस खत का क्या जवाब दूं? जवाब मांगा भी हो, तो मुझे लिखना कहां आता है ? मैं वह खत अपनी जेब में रखे-रखे सो गया। अगला दिन भी गहरी सोच में गुजर गया। ना, मुझे कोई कूल-किनारा नहीं मिला। वस, मैं सोचता रहता सोचता रहता ! कभी-कभी यह ख्याल भी आता कि आखिर इस खत में क्या लिखा होगा? जरूर कोई गोपनीय बात है, इतना तो. समझ में आ गया था। राजमहल की रानी ने पान के अंदर खुद कोई खतं दिया है। इसमें कोई मामूली बात नहीं हो सकती। लेकिन कौन पढ़ देगा इस खत को? जैसे-जैसे दिन गुजरते गये, मैं फिक्र में घुलता गया। हर वक्त घबड़ाहट से मेरी छाती धड़कती रहती-अगर कहीं एक और खत आ पहुंचा, तो? क्या कहूंगा? किससे सलाह लूं? हुजूर, मारे चिंता के मेरी खुराक सूखने लगी । अब पेट में भूख की वैसी आग भी नहीं धधकती। मन-मिजाज, तबीयत, दिमाग- सव चौपट! ठाकुर साहब ने मेरा दिनों-दिन सूखता हुआ चेहरा देखकर दरयाफ्त किया, 'क्यों, तबीयत तो ठीक है न, पांडे जी ?' मैं ठाकुर साहब के मुंशी के सामने जाकर गिड़गिड़ाया, 'मुझे थोड़ा-सा लिखना-पढ़ना सीखा देंगे, मुंशी जी ?' मुंशी जी हंस पड़े। उन्होंने पूछा, 'अरे, तुम लिखना-पढ़ना सीखकर क्या करोगे, पांडे जी ? इसके बजाय अगर तुम मुझे . -350/ शर्बती, बाई का अपना हुनर सिया देते अब क्या करूं? मैं खुद ही बाजार जाकर हिंदी की पहली पोयीचरोद लाया। मैंने सीखने की बहुत कोशिश की, हुजूर! बहुत मुश्किल काम था! ना, यह अपने-आप नही सीखा जा सकता। फिर मैंने पत के अक्षरों के साथ, पोथी के अक्षर मिला- मिलाकर पढ़ने की कोशिश की, शायद कुछ समझ में आये ! लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। दिन-रात वह खत अपने सीने से चिप- काये, मैं भगवान को याद करने लगा। इससे पहले अपनी जुवान पर भगवान का नाम लाने की कभी जरूरत नहीं पडी। जिंदगी में पहली बार मैं भगवान को याद कर रहा था, हुजूर ! लेकिन भगवान भी क्या इतना सीधा-सादा है ? वह तो हमेशा टेढी- मेढी राहों से ही आता है । सीधी राह आये, तो आदमी सहज ही दर्शन पा जाये। लेकिन जो चीज आसानी से मिल जाती है, यह उतनी जल्दी खो भी जाती है। रात के वक्त, जव समूचा शहर नीद मे वेहोश हो जाता, तब कही कोई आहट सुनायी देती, उस वक्त भी सिर्फ में जागता रहता था। अक्सर मैं अपने कमरे की खिड़की खोलकर, आकाश की तरफ टकटकी लगाये भगवान को ढूंढ़ता रहता, शायद उसके दर्शन पा जाऊ ! खैर, भगवान का दर्शन अगर इतना ही आसान होता, तब तो कोई परेशानी ही नहीं होती। वैसे भी इतने-इतने भक्तों के रहते, भला वह मुझे ही दर्शन क्यों देने लगा? मैंने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है ? मुझे मालूम था, मैं कितने पानी में हूं। मुझमें ऐसी कोई खूबी नहीं। न मेरे पास रुपये-पैसे, न रूप-जवानी, न वाड़ी-गाड़ी। यहां तक कि लिखना-पढ़ना भी नही जानता! 'क' तक बोलते हुए जुवान कांपने लगती है । भक्त प्रह्लाद से बिलकुल उल्टा । आप लोग हिरण्यकश्यप के बारे में जानते हैं न, उसी का बेटा प्रह्लाद ! प्रह्लाद को जुवान से 'क' की जगह कृष्ण निकलता एक राजा की छ. रानियां। १ था। 'क' वोलते हुए मेरे सिर पर तो मानो गाज ही गिर पड़ती है। खैर! उस रात भी खिड़की के पार आकाश की ओर अपलक निहारते हुए, अचानक मेरी निगाह ठाकुर साहब के महल पर जा पड़ी। आकाश छूती हुई हवेली ! विल्कुल धुंधली परछाईं। ठाकुर साहब के खास महल में रोशनी जरा देर से बुझायी जाती है । खैर, उन दिनों राजा साहव की जो खास रानी होती उसी की किस्मत बुलंद होती। दो महीने तक वही अपने पिया की सुहागिन बनी रहती। बाकी रानियों का महल उस वक्त अंधेरे में डूवा होता । इतनी दूर से ही, मैं आंख फाड़े उस विशाल राज- महल की तरफ देखता रहता। इस महल के किसी कमरे में, कोई अपने खत के जवाव की उम्मीद में बैठा होगा। मेरा मन होता, काश, आसमान के सितारों में इस खत के अक्षर-अक्षर स्पष्ट हो उठते, तो उनका मतलव समझना आसान हो आता! लेकिन हर वक्त सिर भन्नाया रहता। नर्मदाप्रसाद हमेशा की तरह कभी शिकार पर, कभी पिकनिक पर निकल जाते । अक्सर हम सब भी उनके साथ होते । हम सव यार-दोस्तों की जमात उनके 'फुर्सत के पलों में अपने करतब दिखा-दिखाकर उनकी दिल- वस्तगी करते । जिंदगी की नीरसता मिटाने के लिए ही तो हमें नौकरी दी गयी है-वाघ, सिंह, हिरन, दोस्त, मुसाहिब, चमचे, छ:-छः रानियां और मैं । इस वार हरिद्वार में कुंभ मेला पड़ा । उस मेले में हम सभी गये थे। नर्मदाप्रसाद का तंबू तन गया। उस दल में मैं भी शामिल था। लाव-लस्कर, नौकर-चाकर, खाना-पीना, खान- सामा-बावर्ची-सभी थे । बाबू लोग ठाकुर साहब को घेरकर गाने-बजाने में व्यस्त थे। हारमोनियम, रेडियो, तबला, सितार, सारंगी और कितना कुछ ! मैं भी दिन-भर वहीं बना रहता था। - ८२ / शर्बती वाई

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! काश, किसी साधु-वावा को घेरकर उनके चेले-चामुंडे गांजा पी रहे थे। साधु-वावा भभूत रमाये बैठे थे ! 'उन्हें देखकर अचा- नक मन में अगाध भक्ति उमड़ पड़ी, हुजूर मैं भी इनकी तरह कोई साधु होता ! काश, मैं भी सव कुछ त्याग पाता! पापी पेट की खातिर झूठ-मूठ ठाकुर साहब की नौकरी करताहूं! चूंकि वे जलेवी, लड्डू खिलाते हैं, इसीलिए उनके यहां चाकरों की तरह पड़ा रहता हूं। मामूली-से-मामूली कीड़े-मकोड़े भी आजाद जिंदगी बिताते हैं । किसी की तावेदारी में नहीं रहते। अपने प्रति वेहद नफरत हो आयी। एक ये लोग हैं, किसी की परवाह नहीं करते। इन्हें न कपड़े-लत्तों की जरूरत है, न मालिश के लिए तेल-फुलेल की। किसी बात के लिए ये किसी पर निर्भर तो नहीं रहते । खाना मिल गया, तो खा लिया, वर्ना फाका ! एक मैं हूं, हर वक्त खाने के लिए लार टपकाता रहता हूं। पेट है या कुआं, कभी भरता ही नहीं ! मैं भी साधुओं के जत्थे में जा बैठा । साधु मुझे चिमटा लेकर मारने दौड़े, 'भाग वेटा, भाग यहां से ! चल भाग !' मैं वहां से हट आया लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। अब मैं रोज नियम से उन साधुओं की मंडली में बैठने लगा। सुबह-शाम-रात हर वक्त वहीं पड़ा रहता । अपने साथ थोड़ा- बहुत खाना भी ले जाता। मलाई या दही या आटा-कुछ-न-कुछ ले ही जाता। उन साधुओं को भोग चढ़ाता, लेकिन फिर भी किसी का मन-मंह नहीं मिला। वे लोग जब भजन गाते, मैं ताली बजाता, ताल दे-देकर मुग्ध भाव से सिर हिलाता। कभी- कभी उनके सुर में सुर मिलाकर गाने की भी कोशिश करता- काहे उमतइला हे तेलक नाथ नित उगारिय नित भसम साथ ! - ८४/ शर्वती वाई हे लोक्य नाप, तुम चावलों की तरह, तन पर हमेगा भस्म लिपटाये, निरावृत्त क्यों फिरते हो ? पर, इन सबको बजह आमिर कोन यताता? तुम्हारा कोई आकर्षण भी नहीं है । तुम्हें न राग व्याप्त है, न विराग ! तुम तो यस भोलेनाथ हो । ये साधु भी तुम्हारी तरह माया-मोह भूल गये ! ...मैं गाते-गाते मस्त हो जाता । मेरी तरफ देखने की किसी को फुसंत भी नहीं थी। योड़ी देर बाद मैं चुपचाप लौट आता और ठाकुर के तंबू में घुस जाता। तंबू में ठाकुर साहब अपने यार-दोस्तों के माथ गाने वजाने और गाने-पीने में व्यस्त रहते । सबकी आंखें लाल-लाल ! यहां भी मुझपर किसी की निगाह नही पड़ी। उस दिन सबसे छिप-छिपाकर, रात के वक्त में तंबू से बाहर निकला। रात काफी जा चुकी थी। शायद दूसरा प्रहर बीत रहा था। मैं पैदल ही अकेले-अकेले साधुओं के अड्डे में जाकर हाजिर हुआ। उस वक्त मय सो चुके थे। अकेले साधु महाराज अलाव के सामने बैठे-बैठे भगवद्गीता पाठ कर रहे थे- 'मव्वं धर्मान् परित्यज्या मामकेम् शरणम् बजः अहं त्वाम् सव्र्वपापेभ्या मोक्षयिष्यामि मा शुचः' मुझे देखकर साधु जी ने पूछा, 'कौन हो तुम?' मैंने बताया, 'मैं दामोदर पांडे हूं, वावा! ग्राह्मण हूं!' साधु वाया ने जलती हुई धूनी मे से एक चुटकी राग निकाल- कर मेरे हाथ में रखते हुए कहा, 'ले, भाग । मुझे उसी तरह बैठा देखकर साधु यावा ने दुवारा सवाल किया, 'बच्चा, कुछ और चाहिए ?' मैंने कहा, 'योहो-गी किरपा चाहिए, बाया!' साधु याया को मानो दया आ गयी। उन्होंने कहा, 'बोल" जल्दी बोल, यच्चा!' , एक राजाको रानिया |८५

मैंने कहा, 'एक खत पढ़ देना होगा वावा! मैं लिखना-
पढ़ना नहीं जानता ! निरक्षर भद्र हूं...'
साधु ने कहा, 'कैसा खत? किसका खत ? अच्छा, जा, ले
आ।
मैंने खत निकालने के लिए जेब में हाथ डाला, लेकिन खत
गायव था। सामने, अगल बगल-सारी जेनें देख डाली । मैं
बौखला गया। चप्पा-चप्पा ढूंढ़ डाला। सारी जेबें उलट डालीं।
वेकार ! खत आखिर गया कहां ? मेरा खून खौल गया। ऐसी
अनमोल अमानत ! दिन-रात अपने सीने से चिपकाये घूमता
रहा; जब जरूरत पड़ी तो गुम हो गया! मैं जाने कैसे-कैसे
संभव खयालों में भटक गया। जब अपना कुर्ता धो रहा था, तब
मैंने वह खतं अपने फेंटे में खोंस लिया था। जव गीला कुर्ता
सुखाकर दुवारा पहना, तब उस खत को दुवारा अपनी जेब के
हवाले किया। आखिर गया कहां ? अव क्या करूं ? कहीं तंबू में
ही तो नहीं गिर गया? रात तंबू में भी चप्पा-चप्पा छान मारा।
अंधेरे में कहीं किसीकी आंख न खुल जाये ! अच्छा, किसीने
चुरा तो नहीं ली ? किसीने पढ़ तो नहीं लिया ? तब तो वह
खत का मजमून भी जान गया होगा। सारी रात खत की चिंता
में जागते हुए कट गयी, हुजूर ! मुझे नींद ही नहीं आयी।
अगले पल वेभाव रुलाई आने लगी। अगर मैं खुद लिख-पढ़
सकता, तो ऐसा नहीं होता। मारे रुलाई के मेरी छाती टूक-टूक
?
हो गयी।...'
उपाध्याय ने थोड़ा दम लेकर कहा, 'इस तरह पांडे से वह खत
गुम हो गया। जव साधु-मंडली अपना खेमा उखाड़कर जाने लगी
८६ / शर्वती बाई

तो जाने क्या सोचकर वह भी उनके पोरेगीधे हो लिया।ना! अव राजमहल में लौटकर क्या करना है ? उसे अपनी जिंदगी पर ही विरक्ति हो मापी । उमने मन-ही-मन फैसला कर लिया, अब वह ठाकुर साहब के तंबू में लौटकर नही जायेगा। यहां जाकर फिर वही सुगामद या मुगाहिवी ! मुशामद अगर करनी ही है तो बेहतर है यह भगवान को गुशामद करे ताकि कुछ विद्या-भुद्धि, मान प्राप्त हो ! जरा धर्म-कर्म का पुण्य मिले । पता है, बाबू जी, बड़े-बड़े महापुरुषों के जीवन में कोई अहम् मोद शायद ऐसे ही भाता है ! यावा तुलसीदाग की जिदगानी भी शायद ऐसे ही बदल गयी थी। पर, साहब, साधुओं के दन में पांडेराम भिड़ तो गये; लेकिन गाधु वाया ये चैने भला उसे अपने साथ क्यों लेने लगे? वे तो उसे चिमटा उठाकर मारने दौड़े। लेकिन उमने साथ नहीं छोड़ा। वे लोग रेल पर गवार हुए, दामोदर भी उनके साथ-साथ रिव्ये में धुमकर बैठ गया। मिनी की उम पर नजर ही नहीं पडी ! दामोदर मन-ही-मन तप कर चुका था, अब वह वाकी जिंदगी इन साधनो के अगाड़े में रहकर धर्म-चर्चा में बिता देगा । खैर, साहब ट्रेन चलती रही; स्टैगन पीछे छूटते रहे। साधु लोग गाजे का दम लगाने बैठ गयै ! लोग- वाग उनके लिए तरह-तरह के पकवान ले आये । वे लोग पक- वान उडाने में जुट गये ! साहब, हुआ यह कि दामोदर को भी जोरों की भूग लग आयो । भूव भी कोई ऐसी-बसी बिल्कुल राक्षसो जैसी भूय! सामने फेरी वालों को धक्कर लगाते देयकर उसको आखों तक मे भूव लपलपा उठी। भूय के मारे जीम एटने लगी। उसने धोती से पेट को कसकर बांध लिया, ताकि भूख की आग कुछ कम हो सके। लेकिन भूय को भला मांसा दिया जा सकता है? उसका नाम दामोदर पा, हुजूर. पेट को भूख मला वह भूल पाता ! प्रहाद क्या भगवान का नाम मूल एक रामारोह रानिस /८७ पाया था? उसके बाप ने तो कितनी कोशिश की, भूल सका वह ? बताइए ! दामोदर पांडे शायद इसी तरह साधुओं के पीछे-पीछे केदारनाथ-बद्रीनाथ या नेपाल-तिब्बत पहुंच जाता, लेकिन विचारा अजमेर स्टेशन पर पकड़ा गया। चेलों की नजर पड़ गयी, फालतू-सा आदमी संग लग लिया है। सबने मिलकर उसे जोर-जबर्दस्ती अजमेर जंक्शन पर उतार दिया। दुनिया में ऐसा कोन महाबली है, जो भगवान की महिमा समझ सके ? अनजान-अपरिचित जगह ! खैर, तीर्थयात्रियों के साथ चलते-चलते एक दिन वह पुष्कर जी के चरणों में जा पहुंचा! फिर वही जस का तस ! फिर वही पेट की फिक्र ! पेट की आग में छटपटाने लगा। पुष्कर जी पहुंचकर खाने के अभाव में गऊ घाट पर अंजुरी-अंजुरी पानी ही गटक गया। पानी पीकर उसने सो जाने की कोशिश की। वह घाट-किनारे ही सो गया। जाने किसने तो आकर उसे जगाया-यहां क्यों सोये हो ? यहां कछुआ काट खायेगा या मगरमच्छ निगल जायेगा । वह उठ- कर रास्ते पर आ निकला। लेकिन पुष्कर तीर्थ को दुनिया का श्रेष्ठ तीर्थ कहा जाता है । आप तो पढ़े-लिखे हैं, आप तो सब जानते ही हैं। यहां हर दिन पंजावी, सिंधी, गुजराती, मराठी, वंगाली सभी जातियों के तीर्थयात्रियों की भीड़ लगी रहती है ! यहां आकर लोग पूजा चढ़ाते हैं, पिंडदान करते हैं, ब्राह्मण को अन्न-वस्त्र देते हैं ; गोदान भी करते हैं। पुष्कर जी में तीर्थयात्रियों का अभाव नहीं। हर महीने हजारों-हजार लोग पुष्कर ताल में 'जय ! पुष्कर जी की जय' कहकर डुबकियां लगाते हैं, फिर ब्रह्म-मंदिर, सावित्री पहाड़ पर देवी मइया के मंदिर-दर्शन को चल पड़ते हैं। दामो- दर पांडे भी उन तीर्थयात्रियों के पीछे-पीछे लगा रहा। भोर १८/शवंती बाई -

फूटते ही बम और तांगों के बड्डों पर हाजिरी भरने लगा। उमने
वहां के पंडों से भी हाथ मिलाया। दक्षिणा में मिली हुई पन
में आधा हिस्सा उनका!
रोज रास्ते में खड़े होकर यह आवाजें लगाता-बाह्मण हैं,
हुजूर ! ब्राह्मण को भी कुछ भोजन के लिए दिया जाये, हजूर !...
भगवान की लीला देखिए ! हर युग में भगवान भातों की
कौन-कौन-मी परीक्षा नहीं लेते? इस तरह जाने कितने महीने,
वर्ष बीत गये, दामोदर ने कोई हिमाय नहीं रसा। उम पार कोई
जमींदार साहव तीर्थ पर आये थे। पंडा महाराज ने मवर
भेजी~कल धर्मशाला में मौजूद रहना, पांडे, ग्राह्मण-भोज
होगा।
यथाममय दामोदर पांडे ठाकुर साहब का दिया हुआ
नागरा जूता और सिल्क की पगडी जमार्य, हाजिर हुना। वहीं
भरपेट पूरी तरकारी, लड्डू-मलाई गाने के बाद उसने दक्षिणा
की आधी रकम पंडे महाराज को पमा दो और अपने घर लौट
माया। गर, दिन किसी तरह गुजरते जा रहे थे। मनानक
फिर एक घटना घटी।
इसे भगवान की लीला नहीं तो और मया कहूं,
बाबू जी।
!
उपाध्याय पल-भर को फिर चुप हो रहा ! अचानक उसने
पूछा, 'कितनी रात हो गयी । आपको मोने में देर तो नहीं हो
रही, बापूजी ?
मैंने कहा, 'नहीं, नहीं, पाप कहते जाइए
उपाध्याय नही जानता कि मैं इतनी दूर तीर्य करने नहीं
आया। यहां असली कहानियां सुनने का पुष्प-सचय करने आया
हूं। राजपुताना फी अली-गलियों में नये नये चरित्र देगने को
मिलेंगे, इसीलिए तो इतनी तकलीफ उटाकर आया। अपने
एक रागामी रानि |

वही
योतिषी की भविष्यवाणी नजर अंदाज करते हुए, दुर्घटना की
भावना के
वावजूद
मैं दौलत वटोरने का लोभ-संवरण नहीं
कर पाया।
उपाध्याय ने कहा, 'सुनिए पांडे की जुवानी जैसा सुना,
वताता।'
कराएंगे!
तुम
पांडे ने गांजे का दम लगाने के बाद कहना शुरू किया : एक
दिन पंडा महाराज आकर मुझे सूचना दे गये कि रायगढ़ के
ठाकुर साहब आये हैं; धर्मशाले में ठहरे हैं ! ब्राह्मण-भोज
ठीक वक्त पर पहुंच जाना!
मेरा मन वेचैन हो उठा। वही रायगढ़ के ठाकुर साहब
नर्मदाप्रसाद ! वे पुष्कर तीर्थ पर आये हैं । उनका ही दिया हुआ
नागरा जूता, पगड़ी पहनकर मैं उनके यहां हाजिर हुआ। पुष्कर
का कोई ब्राह्मण नहीं छूटा था। हर किसी को आमंत्रित किया
गया था । धर्मशाले में काफी शोर-गुल मचा था। पूरे पांच सौ
ब्राह्मण इकठे थे । महाभोज का आयोजन ! जो जितनाखा
सके, इत्मीनान से खाये। समूचे धर्मशाले में ठाकुर साहब के
आदमी भरे हुए! कोई वाद नहीं गया। मैं जाकर एक कोने
में बैठ गया। खाने का बुलावा आ पहुंचा। मुझे सिर्फ यही डर
था कि कहीं ठाकुर साहब से टक्कर हो गयी, तो मैं क्या
कहूंगा?
मैं खाने वैठा। वही पहले की तरह मलाई,पेड़ा, गुलाब जामुन,
मालपूआ, पूरी-तरकारी! विल्कुल इलाही कांड ! सवने पेट
भरकर खाया। लेकिन ठाकुर साहब नर्मदाप्रसाद नहीं दिखे। मैं
वस, यह जानना चाहता था कि उनके साथ क्या छोटी रानी भी
९०/शर्बती वाई

तारीफ लायी हैं ?
सब या-चाकर उठ गये। में उस वक्त भी पसन के मामने
हटा रहा ! मेरा पेट मानोतप्त ही नहीं होना चाहता पाहत
दिनों बाद ऐना पकवान मिला था।
मुझे बार-बार लग रहा था, अभी नर्मदाप्रसाद प्राट होकर
कहेंगे, 'अरे? तुम पांडे जी हो न ? दामोदर पांडे ?' लेकिन
कहीं कुछ नहीं हुआ। गाने का सारा इंतजाम पंदा महाराज ने
हो किया था। ठाकुर साहब बाहर भी नहीं लाये। संर, मैं
खाना खाकर उठ गया, लेकिन घर नहीं गया।
वही चुपचाप खड़ा रहा ! अचानक मुशी जी से टकार हो
गयी, 'अरे, तुम ? पाडे जी ?'
मैंने पूछा, 'मुशी जी, ठाकुर साह्य नहीं आये?'
मुमी जी ने जवाब दिया, 'ना! ये तो स्वर्ग चले गये! सनके
बेटे और विधवा गनियां आयी हैं !'
मुझं मानो चैन नहीं आया। मैं ट और सुनने को भी
बैचन था।
मैंने दुवारा पूछा, 'ममी रानियां आयी हैं ?'
'हा, महारानी जी और वाकी पांच रानियां!'
'पाव क्यों? रानियां तो थी!'
'लेकिन एक रानी तो चल बसी! छोटी रानी। तुम्हें नहीं
मालूम।
'कौन-मी रानी?'
'छोटी रानी ने आत्महत्या कर ली। बहन दिन हा-मान
बरस पहले । यह सब क्या आज की बातें हैं ? पिटनेमात राजा
साहब भी जंगल में शिकार करते हुए राम को पारेहए।'
सात वर्ष ! मैंने मन-ही-मन हिसाव नगापा. मुझे मी
पुष्कर जी लाये सात वर्ष हो गये।
एक राजा को हरानिरा/

मैं उसी वक्त वहां से चल पड़ा, हुजूर ! पैदल-पैदल चलते- चलते पुष्कर जी से अजमेर चला आया। उसके बाद सारी रात मुसाफिरखाने में बिताकर, सुबह ट्रेन पर सवार हो गया। यहां आवू पहाड़ चला आया। सब झूठ-मूठ की माया है। इसे त्याग करना होगा । भूख-प्यास, लोभ-सब! सब-कुछ ! यही सारे अनर्थों की जड़ है! . - ? मैंने पूछा, 'उसके बाद ?' उपाध्याय ने बताया, 'उसके बाद दामोदर पांडे तूरियानंद जी के अखाड़े में गांजे का दम लगाने लगा। हर वक्त शंखिया के नशे में धुत्त ! वह अपनी भूख भूलना चाहता था। हां, वह पेट की भूख भूलकर कोई ऐसी चीज चाहता था, जिसे हासिल करने के बाद किसी तरह की भूख-प्यास नहीं रहती। आपके ही बंगाल के थे- लटू महाराज ! आपने उनका नाम नहीं सुना साक्षात् जगन्नाथ महाप्रभु ने स्वयं उन्हें दर्शन दिये थे। लटू महाराज भी क्षुधा-पीड़ित थे। महाप्रभु ने वरदान दिया-तुझे जो मिले, सव खाना ! सव हजम हो जायेगा। हमारे इसी धर्म- शाले में एक सिद्ध योगी आया था। वह कहा करता था -- मेरा नाम है गोविंद भोजन में मिले आनंद। तुरियानंद ने एक दिन दामोदर को बुला भेजा। उन्होंने कहा-क्या मांगता है, बेटे ? ... पांडे ने कहा-प्रभु मैं भूख की आग में जलता रहता हूं, मेरी भूख भुला दीजिए।" --- ६२/शवंती बाई

दूरियानंद ने कहा--जा, अव तू निर्भय होकर खाता रह ।
लोग पूजा-उपासना करते हैं; तेरे लिए भोजन ही सबसे बड़ी
भजन-उपासना है। जा वेटा, जो तू चाहता था, तुझ दिया।"
पांडे ने उनकी बातों का क्या अर्थ लगाया, वहीं जाने। जब
में इस धर्मशाले का मैनेजर वहाल हुआ, उसे भी अपने साथ लेता
माया। यहां वह कुछ नहीं करता, सिर्फ भोजन करता है। यही
उसका भजन-पूजन है। छ:-छः रानियों का मोह क्या मामूली
मोह है, माहब ? जो इन छ: दुश्मनों को खत्म कर पाता है, उसे
सब कुछ मिल जाता है । इसीलिए तो हमारे शास्त्रों में कहा गया
है-मोजने च जनार्दनः । अच्छा, अब, सोने जाइए । काफी गत
हुई। कितने बज गये, कौन जाने !'
मैंने पूछा, "और उस सत्त का क्या हुआ छोटी गनी दा
रात?'
उपाध्याय ने कहा, 'सरे, वह बन तो महज दसवमा
था। जिसने स्वयं भगवान को पा लिया, नमक लिएर
अतितुच्छ वस्तु है । लाला वाब को ही लें। निमदिन बन्ट
भगवान मिल गये, टमी दिन में उनका गह-या, --
सब झूठ पड़ गये। नटू महाराज जिम दिन
अगले दिन मुबह, दामोदर पार
पहुंना। मैंने गोर में जमा हर
अपनी जवानी के दिनों
फीट संवा पद' मोग
सान नजर में रहा।
मानो मांगन

देवता का प्रसाद ग्रहण करता है, वह भी उसी तरह दत्तचित्त
होकर भोजन कर रहा था। वैसी ही अविचल भक्ति ! भरपूर
विश्वास !
जाते समय दामोदर पांडे ने कहा, "भगवान परम तुष्ट हुए,
बावू साहब ! भगवान करे, आपका मंगल हो ! कल्याण हो !'
लेकिन मुझे अपने ज्योतिषी मित्र की बात याद है। मेरा
मंगल मकर में है, यह जानते हुए भी मैं यात्रा पर निकल पड़ा
था। मुझे कौन-सी दौलत मिली, यह न उपाध्याय जान पाया, न
दामोदर पांडे!

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Andolan In India

Author
Mitra Vimal
Title
Andolan In India
File name
Andolan In India
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OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
102
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Poetry
DLI number
552103
Barcode
4990010032829.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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Copyright permitted
VMLT id
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