Prakrit Bharati Academy, Jaipur
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अहलदावादस्थ दाताओं की शुभनामावली
५०१) श्री खरतरगच्छ सघ तरफसे वहीवटदार कोठारी
चदुलाल मोहनलाल
१०१) खरतरगच्छना सेठ कोठारी भाई मणीलाल मोहनलाल
१०१) खरतरगच्छ ना मेठ भाई चदुलाल मोहनलाल,
ख०गच्छना वहीवटदार
२०१) शंठ हीराचन्द्रजी देवेन्द्रकुमार गोलेछा
१०१) गेठ सरदारमलजी' पावुदानजी
५१) गेठ धनाजी रत्नाजी
५१) गेठ परीख मगलदास नगीनदास
८१) गेठ गोकलदासजी माणेकजी .
४१) गेठ राणाजी भारताजी
८१) गेठ मूलचदजी वद्रीदासजी
११) गेठ हीरालालजी लूणिआ
उरसि मे च्या सिक्तं स्नेहदुग्धं तपोमयम् ।
श्यामायै मातृरूपाय सूनुनेदं समर्प्यते ।।
श्यामासून
विनय
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भूमिका
उपाध्याय श्रीवल्लभ रचित अरनाथ-जिनस्तव वृत्ति-
सलि पाटको के सामने है । इसमे अठारहवे तीर्थङ्कर
श्रीअरनाय का स्तवन किया गया है । कुल मिलाकर इसमे
५५ छन्दो मे स्तुति की गई है, जिनमें से प्रत्येक पर लेखक ने
स्वय वृत्ति लिखी है, जैसा कि वृत्ति के अन्तिम पद्य से पता
लगता है
यंपा स्फुरत्प्रतापाधिक्यजित सन्निरन्तर भानु ।
भ्रमतितमावियति हि ते, ज्ञानविमलवाचका नन्धु ।।
तत्पादाम्बुजमधुकरगिप्यश्रीवल्लभेन गणिना वै ।
विहिता स्तववृत्तिरिय, यदनृतमिह तद्वधै शोध्यम् ।।
इस पुस्तक की विशेपता यह है कि इसमे एक सहस्र रकारो का
प्रयोग किया गया है। एक रकार यहाँ एक कमलदल
का प्रतीक है, अत सहस्र रकारों के प्रयोग द्वारा एक
सहस्रदल कमलरूप स्तवन की कल्पना की गई है। ऐसा
करने में सचमुच बडे प्रयत्न, पाण्डित्य और प्रतिभाकी
आवश्यकता थी । अतएव लेखक ने एक प्रकार की गर्वोक्ति के
रूप मे प्रारम्भ मे ही कहा है
१ अरनाथका चरित देखनेके लिये देखे, हेमचन्द्राचार्य प्रणीत
त्रिशष्ठिगलाकापुरुषचरित ।
स्वकीयविद्यागुरुसत्प्रसादात्, करोमि वृत्ति स्तवनस्य चार्वीम् । अर जिन हर्षकर प्रणम्य, सहस्रपत्राम्बुजगभितस्य ।। सहस्रदलकमल का सम्वन्ध इस देश मे योगशास्त्र से रहा है; वस्तुतः यह कल्पना उद्भूत ही वहाँ से हुई । योग मे उच्चतम अनुभूति को विभिन्न पद्धतियों मे शतदलकमल या सहस्रदलकमल के प्रतीक द्वारा व्यक्त किया गया है । वैदिक- साहित्य मे इसे कभी कभी सहस्राक्षरा वाक् या सहस्रधार- पवमान भी कहा गया है । यह सहस्राक्षरा वाक् ही सभवतः पुद्गल - परमाणुओ के आत्यन्तिक निरसन के पश्चात् अवशिष्ट गुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मा है जिसके इस रूप को ही “सहस्रमुख शेष"के प्रतीक मे मूर्तिमान किया गया हो । यही कल्पना सहस्रारचक्र के मूल मे भी है, क्योकि इसमे सन्देह नहीं कि जैन, बौद्ध तथा वैदिक वाडमय मे विविधरूप में प्रयुक्त चक्र अन्त मे कमल के साथ तादात्म्य करने लगा था; अशोक स्तम्भो पर निर्मित चक्र की रचना इसका सव से बड़ा प्रमाण है। अस्तु, सहस्रदलकमलगभित स्तवन का प्रयोग एक तीर्थङ्कर के लिये अत्यन्त ही उपयुक्त है। 'तीर्थङ्कर' शब्द का अर्थ प्राय चतुर्विधसंघकर्ता किया जाता है । यद्यपि इस अर्थ को अव्यवहार्य नहीं कहा जासकता, परन्तु इसका एक अर्थ ओर भी है जो 'तीर्थ' शब्द की मूलधातु 'तृ' के प्रकृत अर्थ को ध्यान में रखकर संस्कृत-साहित्य मे किया गया है । इसके अनुसार तीर्थ एक घाट है, एक मार्ग है जिसके द्वारा भव-सरिता को जीव पार कर सकता है। इसी मार्ग को दिखलाने वाले तीर्थङ्कर है, और इस मार्ग पर चलने के लिये समाज को चतुर्विध सङ्घ के रूप मे सगठित किया, अत. वाह्य सामाजिक दृष्टि से यह चतुर्विध सङ्घ ही वस्तुत. उस तीर्थ या मार्ग का स्थूलतम रूप है । परन्तु इसमे सदेह नही कि इस स्थूल तीर्थ का सूक्ष्मरूप और चरमलक्ष्य वह आध्यात्मिक तीर्थ या मार्ग ही था जिसके द्वारा उस आध्यात्मिक सिद्धि को प्राप्त किया जा सकता था जिसका प्रतीक सहस्रदलकमल है । इसी मार्ग को जानने वाले ‘गातुविद' तथा बनाने वाले 'पथिकृत' नाम से वेदो मे आये है। इसी मार्ग को ससार के लिये प्रकट करने के कारण ऋषभदेव आदि महापुरुष ‘तीर्थङ्कर' नाम से अभिहित हुये । अत तीर्थकर और सहस्रदलकमल का स्वा- भाविक सवन्ध है। काव्य की दृष्टि से, यह स्तवन वस्तुत एक चित्रकाव्य है जो साहित्यशास्त्र मे एक अधम काव्य माना गया । परतु इसमे सन्देह नही कि चित्रकाव्य की रचना मे छन्दशास्त्र, व्याकरण, निर्वचन तथा कोष आदि पर पूर्ण आधिपत्य होना आवश्यक है। यही कारण है कि इस प्रकार की रचनाएँ साहित्य मे नहीं के बराबर है। श्रीवल्लभ उपाध्याय ने भी अपने ग्रथ की रचना मे ऐसे ही पाण्डित्य का परिचय दिया है, जैसा कि परिशिष्ट घ से स्पष्ट है। इतने सीमित काव्य मे सहस्र रकारों का प्रयोग इस पाण्डित्य से ही सभव हो सका । अत.
चाहे भावाभिव्यक्ति या रस-निष्पत्ति की दृष्टि से इसे उत्कृष्ट काव्य न माना जाय, परन्तु विचार-वदग्थ्य, रचना-कौशल तथा उक्ति-वैचित्र्यकी दृष्टि से प्रस्तुत काव्य एक सर्वोत्कृष्ट चित्रकाव्य है और जो पण्डित काव्य-प्रेमी इस प्रकार के काव्यो में निपुण और अभ्यस्त है उनके लिये एक उच्च- कोटि का मनोरजनकारी स्तवन है । जो पाण्डित्य और पाटव लेखक ने रकारो के विविध प्रयोग मे दिखलाया है उसके कुछ उदाहरण देना यहाँ असगत न होगा । प्रथम दो छन्दो के रकार-गभित शव्दो को ही ले लीजिये असुरनिर्जरवन्धुरशेखर-प्रचुरभव्यरजोभिर पञ्जिरम् । क्रमरजं शिरसा सरस वर, जिन रमेश्वर । मेदुरशङ्कर ॥१॥ प्रवरवर्णरसागरचन्दिर-जठररागरसाविरसङ्गर । । मुचिरकृन्नरभीतरभद्रर । कुरु रम भर मामरहत्यर | ॥२॥ इन दोनो श्लोकोमे कुल ३२ रकार है । इनमे आमरहत्यर, चन्दिर आदि शब्दो को रकार गर्भित करने के लिये जिस प्रतिभा और पाण्डित्य की आवश्यकता थी वह उनकी स्वो- पज्ञवृत्ति से भलीभाति प्रगट है । इस सम्बन्ध मे विशेष विवेचन अरजिनस्तव-वृत्ति प्रकरण मे आगे करेगे । श्रीवल्लभ ने अपनी इस पुस्तक मे जिस पाण्डित्य का परिचय दिया है, वह केवल उनही तक सीमित नही थी। उनकी गुरु-परम्परा मे जैसा कि हम देखेगे बड़े-बड़े माने हुए विद्वान् उपाध्याय हुए, और इसमे सदेह नही कि ऐसी - .० ज्ञान-समृद्ध परम्परा मे जिसका व्यक्तित्व विकसित हुआ हो वह अपने कृतित्व और व्यक्तित्वके लिये उस परम्परा का सब से अधिक ऋणी होगा । इसीलिये कवि के परिचय से पूर्व ग्रन्थ के माहात्म्य की पृष्ठभूमि को समझने के लिये सर्वप्रथम गुरु-परम्परा को जान लेना आवश्यक है। गुरु-परम्परा प्रस्तुत पुस्तक के रचयिता कवि श्रीवल्लभ वाचनाचार्य उपाध्याय श्रीज्ञानविमल गणि के शिष्य थे । आपकी गुरु- परम्परा बहुत ही उच्चकोटि के विद्वानो तथा गीतार्थो अलकृत रही है, जैसा कि आपने अपनी टीका ग्रन्थो की प्रशस्तियो में दिखलाया है गुशुभिरे जिनराजमुनीश्वरा, खरतराह्वगणाभ्रदिवाकरा । तदनु भूरिगुणा जयसागरा, जगति रेजुरनुत्तमपाठका.॥७॥ तेषा शिख्या मुख्या दक्षा आसन्नदूष्यगुणलक्षा । श्रीरलचन्द्रनामोपाध्याया साधुपरिधाया ।।८।। तत्पट्टस्फुटपद्मप्रकाशनोदारसूरसङ्काशा । श्रीभक्तिलामनामोपाध्याया शास्त्रकार ।।६।। धीमन्तोऽन्तिषदस्तेषा कलाकौशलपेशला । समजायन्त राजन्ती ग्रन्थार्याम्भोधिपारगा ॥१०॥ चारित्रसारपाठक-भावाकर-सद्गणीश्वरा दक्षा । श्रीचारित्रचन्द्रवाचकधुर्या स्मार्या मुनीशानाम् ।।११।। तेपा क्रमश पट्टव्योमागणशीतरश्मिसङ्काशा । श्रीभानुमेरुवाचक-जीवकलश-कनककलशाहा. ।।१२।।
तत्र चारित्रसारख्या उपाध्यायाः महाशयाः । बभूवुः श्रुतपाथोधिपारणाः साधुवृत्तयः ।।१३।। तत्पट्टे समभूवन् विलसत्सवेगरङ्गसल्लीनाः । वाचकपदप्रधाना श्रीमन्तो भानुमेर्वाह्वा ।।१४।। सौभाग्यौघ निविडजडतां व्यञ्जयत्यन्तयन्ती, यद्वक्त्राम्भोरुहसु वसतिं प्राप्य गोर्लालसीति । गम्भीरा ये बृहदुदधय स्फूर्तिमन्तो महान्तो, गाम्भीर्यादिप्रवितसुगुणैर्वर्ण्यलावण्यपुण्या. ।।१५।। जयन्ति क्ष्माया समयकथित ज्ञानविमला- श्चिर चञ्चत्पाठकपदवरा ज्ञानविमलाः । लसत्तत्पट्टे वचनरचनारञ्जितजना, महावा दिवाजप्रमितिकथनावाप्तविजयाः ।।१६।। वैराग्यरससॅल्लीना तद्गुरुभ्रातरोऽधुना । विजयन्ते महान्त श्रीतेजोर रङ्गगणीश्वरा ॥१७॥ तेषा जयन्ति जयिन. सुनया विनेया , सद्भागधेयमतिमत्प्रतिवाद्यजेया । श्रीज्ञानसुन्दरसुधी-जयवल्लभाद्या , वाग्देवताप्रतिमसत्प्रतिभाप्रधाना. ॥१८।। श्रीज्ञानविमलपाठकसत्पादाम्भोजचञ्चरीकेण । श्रीवल्लभेन रचिता शिलोञ्छनास्त्रे शुभा टीका ।।१६।। शीलोञ्छनाममालावृत्ति-प्रशस्ति ।
११
राजच्छ्रीजिनराजसूरिगुरवोऽभूवन् पुरा भूतले,
विख्यातामलकीतिपूरितचतुर्दिडमण्डला सर्वदा ।
मानोन्मत्तवदावदप्रवरवीवाद्योघदुर्दन्तिना,
सिहवाननिभा प्रणाशनविधौ लब्धप्रतिष्ठोच्चया ।।७।।
तत्पट्टे विवुधार्चिताहिकमलाबाम्याप्तचञ्चद्वरा ,
नानाशास्त्रपवित्रवृत्तिरचनाविख्यातसद्बुद्धय ।
रेजुस्ते जगतीतले वरगुणाजीवावतारा इवो-
पाध्याया जवसागरा. सुयशस सत्पात्रशोभावहा ।।८।।
तत्पट्टोदयशैलवालविलसत्सूर्योदया पाठका,
आसन् वाग्जितदेवसूरिकवय. श्रीरत्नाचन्द्राह्वया ।
तेपामन्तिषदो दिदीपिर इह क्ष्मायास्तले पाठका,
नानागास्त्रकृतोवदातयास श्रीभक्तिलाभाया. ।।६।।
चारित्रसार-भावाकर-चारशुद्धांशुनामका शिष्या ।
पाठक-गणीश-वाचकमुख्यास्तेषामजायन्त ।।१०।।
श्रीभानुमेरुवाचक-जीवकलश-कनककलशनामान. ।
समजायन्त महान्तस्तेषा पट्टे क्रमेणैते ।।११।।
श्रीभक्तिलाभपाठकशिष्याश्चारित्रसारनामान ।
वेदेन्दुसङ्खथाविद्यापारीणा पाठका आसन् ।।१२।।
सिद्धान्तानुगतक्रियालयलसत्सम्प्राप्तशोभोदया,
दुर्मिथ्यात्वमतोत्कटोत्पलवनव्याघातसूर्योदया ।
तत्पट्टे विलसज्जगज्जनितमुच्चारित्रलक्ष्मीधरा',
श्रीमद्वाचक भानुलेरुगुरवो धात्र्या विरेजुश्चिरम् ।।१३।।
,
१२ वेदग्रन्थविदन्यशास्त्रजडधीरायणोऽय पुन- विज्ञायेति सरस्वती भगवती सम्यग्गुणान्वेषिणी । सार्द्ध यन्मुखपङ्कजेऽखिलगुणे: कि लालसीति वसत्, तर्क-व्याकरणाद्यनेककठिनग्रन्थावलीपाठका ।।१४।। जगन्द्वन्द्यास्तेजोपति हि सतत पाठकवरा, इदानी तच्छिष्या मुनिवरगुणा ज्ञानविमलाः । यश शीतज्योतिर्धवलितलसत्क्षोणिवलया स्फुरत्तेज पुञ्जग्रहपुष मुष. पुण्यवपुष. ।।१५।। युग्मम् । तत्सतीर्थ्या विराजन्ते तेजोरङ्गगणीश्वरा. । साम्प्रत स्थविरा नित्य तपोजपपरायणा ॥१६॥ श्रीज्ञानसुन्दरसुधी-जयवल्लभाचा, शिष्या जयन्ति च भुविप्रथितावदाता । विद्वत्तमा वरगुणाः सुवचस्विनश्च, तेषा स्फुरद्गुणमणिप्रवरोदधीनाम् ।।१७।। तेषां विख्यातकीर्तीना गुरुणामन्तिषदाणुना । कता श्रीवल्लभेनेय शेषसडग्रहदीपिका ॥१८॥ शेषसडग्रहदीपिका-प्रशस्तिः । * " इन प्रशस्तियो के आधार पर यदि इनका वगवृक्ष बनाया जाय तो इस प्रकार होगा-
१३
जिनराजसूरि
उपाध्याय जयसागर
रत्नचन्द्रोपाध्याय
मेघराज' सोमकुञ्जर सत्यरुचि
भक्तिलाभोपाध्याय
चारित्रसारोपाध्याय भावसागरगणि चारुचन्द्र वाचक
भानुमेरुउपाध्याय जीवकलग
कनककलश
जानविमलोपाध्याय तेजोरङ्गगणि
श्रीवल्लभोपाध्याय
ज्ञानसुन्दर
जयवल्लभ
यहा पर सक्षेप मे इन मनीषियों का परिचय देना
असङ्गत न होगा । अत प्रत्येक के विषय मे कुछ शब्द लिखे
जा रहे है
१ मेघराज, सोमकुजर और सत्यरुचि ये तीनो नाम 'विज्ञप्ति
त्रिवेणी' के आधार पर।
or १४ जिनराजसूरि युगप्रधानाचार्य गुर्वावली के अनुसार श्रमण भगवान महावीर की पट्ट-परम्परा मे जिनराजसूरिजी ५४ वे पट्ट पर हुए है । आपकी जीवनी के सम्बन्ध में विशेष ज्ञात नही होता । स १४३३ फाल्गुन कृष्णा षष्ठी के दिवस अणहिलपुर ( पाटण ) मे श्रीलोकहिताचार्य ने इन्हे आचार्य-पद प्रदान कर जिनोदयसूरि का पट्टधर घोषित किया । पट्टाभिषेक का पद-महोत्सव सा धरणा ने किया था । आपने अपने कर- कमलो से सुवर्णप्रभ, भुवनरत्न और सागरचन्द्ररे इन तीन मनीषियों को आचार्य-पद प्रदान किया था। आपने सं १४४४मे चितोडगढ पर आदिनाथ मूर्ति की प्रतिष्ठा की थी। स. १४६१मे देवकुलपाटक ( देलवाडा ) मे आपका स्वर्गवास -आपको जिनोदयसूरि ने आचार्य-पद प्रदान किया था । २ -सागरचन्द्राचार्य ने, जेसलमेर के चिन्तामणि पार्श्वनाथ के मदिर मे श्रीजिनराजसूरि के आदेश से, म १४५९मे जिन विम्बकी स्थापना की थी- नवेषुवा/न्दुमितेथ (१४५९) वत्सरे, निदेशत श्रीजिनराजसूरे । अस्थापयन् गर्भगृहेत्र विम्ब, मुनीश्वरा सागरचन्द्रसारा ॥२१॥ जेसलमेर का तत्कालीन राजा लक्ष्मणदेव राझुल सागरचन्द्राचार्य का वहुत कुछ प्रशनक और भक्त था, जैसा कि निम्नलिखित पद्य से जाना जाता है गाम्भीर्यवत्वात्परमोदकत्वाद्दधार य. सागरचन्द्रलक्ष्मीम्। युक्त म भेजे तदिदं कृतज्ञ सूरीश्वरान् सागरचन्द्रपादान् ॥ १४ ।। (वि० त्रि० प्र०) आपकी रचित नारचन्द्रटिप्पन प्राप्त है। or १५ हुआ था। भक्तिवश आराधनार्थ देलवाडा के सा नान्हाक श्रावक ने आपकी मूर्ति बनवाकर उनके पट्टधर श्रीजिनवर्धनसूरि से प्रतिष्ठा करवाई थी, जो आज भी देलवाडा मे विद्यमान है । इस मूर्ति पर निम्नलिखित लेख उत्कीर्ण है " स १४६६ वर्षे माघ सुदि ६ दिने ऊकेशवणे सा० सोपा सन्ताने सा० सुहडापुत्रेण सा० नान्हाकेन पुत्र वीरमादिपरिवारयुतेन श्रीजिनराजसूरिमूर्ति कारिता प्रतिष्ठिता श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनवर्द्धन- सूरिभि । आपके करकमलो से प्रतिष्ठित मूर्तियाँ आज भी अनेक नगरो मे बडी संख्या में प्राप्त होती है । or उपाध्याय जयसागर अर्बुदगिरि ( आवु ) खरतरवसही (चौमुखजी का मन्दिर ) के लेखो से ज्ञात होता है कि आप ओसवाल वंश के दरडागोत्रीय थे। आपकी माता का नाम सोखू था और पिता का नाम था आसराज । आपके भाई श्री मण्डलिक ने प्रस्तुत खरतरवसही ( जिनालय ) वनवाकर, स.१५१५ आषाढ कृष्णा प्रतिपदा को जिनभद्रसूरिके पट्टधर जिनचन्द्रसूरि से प्रतिष्ठा कराई । ओसवाल दरडागोत्रीय होने से आप राज- स्थान के निवासी हो यह अधिक सम्भव है । किन्तु यह १ आबू खरतरवसही के लेखो मे मण्डलिक को 'श्री जयसागर- महोपाध्यायवान्धवेन' लिखा है जो अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण उल्लेख है।
१६ ज्ञात नही कि कव और किस स्थान पर जन्म हुआ और कब दीक्षा ग्रहण की । आपने स १५०३ मे प्रह्लादनपुर (पालनपुर ) मे शिष्य सत्यरुचि की अभ्यर्थना और निष्य गणि रत्नचन्द्र की सहायता से पृथ्वीचन्द्रचरित्र नामक कथानक काव्य की सृष्टि की; जिसकी प्रगस्ति से कुछ उल्लेख अवश्य प्राप्त होते है तत्पट्टशाड्वलवृक्ष , स्थलकौस्तुभसन्निभ । श्रीजिनराजसूरीन्द्रो, योऽभूद्दीक्षागुरुर्मम ।।३।। तदनु च श्रीजिनवर्धसूरि श्रीमानुदैदुदारमना । लक्षणसाहित्यादिग्रन्थेषु गुरुर्मम प्रथित ॥४॥ श्रीजिनभद्रमुनीन्द्रा , खरतरगणगगनपूर्णचन्द्रमस । ते चोपाध्यायपदप्रदानतो मे परमपूज्याः ।।५।। श्रीजयसागरगणिना तेन मया वाचकेन शुचिवाच्यम् । पृथ्वीचन्द्रचरित्र विरचितमुचितप्रविस्तारम् ॥६॥ प्रह्लादनापुरनगरे त्रिविन्दुतिथिवत्सरे कृतो ग्रन्थः । माल्हाश्रावकवसतौ समाधिसन्तोषयोगेन ॥७॥ अभ्यर्थनया सत्यरुचेर्बभूव, साहाय्यकारी गणि-रत्नचन्द्र । उपक्रमोऽय फलवान् ममाभूत्, क्रिया हि साहायक- सव्यपेक्षया ।।८।। आपके दीक्षागुरु थे जिनराजसूरि, और विद्यागुरु थे जिनवर्धनसूरि, जो जिनराजसूरि के ही पट्टधर थे । आपको उपाध्याय पद श्री जिनभद्रसूरि ने प्रदान किया था । जिनराजसूरि के करकमलो से निप्पादित आचार्य सागरचन्द्र ने १७ जिनराजमूरि के पट्टधर आचार्य जिनवर्धन को, जिन पर देवीका प्रकोप हो गया था, गच्छ की उन्नति के निमित्त पट्ट से उतारकर स. १४७५ मे जिनभद्रसूरि को स्थापित किया था । जिन जिनवर्धनसूरिजी ने खरतर गच्छ की पिप्पलक शाखाका प्रादु- र्भाव हुआ था, उनके पक्ष से हटाकर अपने पक्ष में लेने के लिये सभवत स १४७५ मे इनको उपाध्याय पद दिया होगा, क्योकि स १४७८ मे रवप्रणीत ‘पर्वरत्नावली' १ मे जयसागरजी ने स्वयं अपने को उपाध्याय पद से व्यक्त किया है । आचार्य जिनभद्रसूरि ने जो ग्रन्थोद्धार का महत्त्वपूर्ण कार्य प्रारम्भ किया था उसमे उ जयसागरजी का सहायक- रूप से पूर्ण सहयोग था । आपने भी अपने उपदेशो से बहुत से ग्रन्थ लिखवाये, जो जेसलमेर, पाटण आदिके भण्डारो मे आज भी उपलब्ध है। आप साहित्य के उच्चकोटि के मर्मज्ञ थे । आपने कई मौलिक ग्रन्थो, टीकाओ एव स्तोत्रो की रचना की, जिसमे से कई तो काल-कवलित हो चुके है २ और कई शोध के १ श्रीखरतरगच्छेगा , श्री जिनराजसूरय । तच्छिप्य श्रीउपाध्याय किचिज्जो जयसागर ।। अपिच दिग्गजसप्तचतु सितद्युतिमिते परित परिवत्सरे। नगरपत्तनमेत्य समथिता, जयतु धर्मकथा जिनशासने । (पर्व रत्नावली प्रशस्ति) २ अ पके स्तवन, स्तोत्रादि सग्रहकी कई प्रतिया अवलोकन में आई, परन्तु वे सभी अपूर्णरूप में मिली है। १ जयचदजी भडार बीकानेर, २ पुण्यविजयजी सग्रह, ३ और मेरे सग्रहकी,ये तीनो प्रतिया समकालीन होने पर भी अपूर्ण मिली है।
१८ अभाव मे अभी तक उपलब्ध नहीं हुए है। वर्तमान मे जो कुछ साहित्य उपलब्ध है उसकी तालिका निम्नलिखित है मौलिक रचना १ पर्व रत्नावली कथा' (र स १४७८ पाटण ) २ विज्ञप्ति त्रिवेणी२ ( स १४८४ सिन्धुदेश मलिकवाहण- पुर से पाटण श्रीजिनभद्रसूरि को प्रेषित ) ३ पृथ्वीचन्द्र चरित्र (स १५०३ प्रह्लादनपुर, शि. सत्यरुचि के आग्रह से, माल्हा श्रावक की वसति ( उपाश्रय ) मे ) टीका-ग्रन्थ ४. सन्देहदोलावली लघुवृत्ति ( स १४६५, श्लो. १५५०, इसका प्रथमालेखन शि. सोमकुञ्जर ने किया था और सशोधन स्वय आ. जिनभद्रसूरि ने५ ) १ इसकी १६वी शतीकी लिखित एक प्रति मेरे सग्रहमे है। २ जैन आत्मानद सभा भावनगर से प्रकाशित ,मुनि जिनविजयजी द्वारा सम्पादित, ३ जयपुर खरतरगच्छ ज्ञानभण्डार मे प्राप्त। ४ प० हीरालाल हसराज जामनगर द्वारा प्रकाशित ५ देखिये, जैनेन्द्रागमतत्त्ववेदिभिरभिप्रेतार्थकल्पद्रुभि , सद्भि श्रीजिनभद्रसूरिभिरिय वृत्तिविशुद्धिकृता।
१९ ५. गुरुपारतन्त्र्य वृत्ति ७ भावारिवारणस्तोत्रवृत्ति ६. नेमिजिनस्तुति टीका ६ उपसर्गहर स्तोत्र वृत्ति ८. रघुवश सर्गाधिकार १ भाषा-साहित्य १०. जिनकुशलसूरि छन्द (म. १४८१ मलिकवाहणपुर) ११ वयरस्वामी रास पद्य ३६ ( स १८८६ जूनागढ ) १२ गौतमरास पद्य १२ १३. नगरकोट महातीर्थ चैत्य परिपाटी १७ १४. अष्टापद तीर्थ वावनी ५३ १५. चौवीसी १६ चैत्य परिपाटी २१ १७. वीतराग वीनती १५ १८. वीतराग स्तोत्र १६ १६ शत्रुजय आदिनाथ वीनती १३ २० शान्तिनाथ वीनती ( स. १५०३ ) ११ " तद्वत्तार्किकचक्रिभि श्रुतपथाध्वन्यैर्महावादिभि , प्रामाण्य गमिता विचार्य च तपोरत्न पुरा वाचकै ।। सोमकुजर नामास्ति, विनेयो विनयी हि न । न्यधित प्रथमादर्श, ग्रन्थमेनमनाकुल ॥ विक्रमत पचनवत्यधिकचतुर्दशशतेषु वर्षेसु । ग्रथितेय श्लोकैरिह, पचदशशतानि सार्दानि ।। १ प० ही० ह० द्वारा प्रकाशित, २ तपागच्छ भडार जेसलमेर, पत्र३ ३ पाटणभडार पत्र १२ १६ १६ २१ २६ १५ २० २१. नेमिनाथ वीनती (गिरनार ) २२. नेमिनाथ वीनती २३. ( गिरनार ) २४ नेमिनाथ मनोरथमाला २५ नेमिनाथ विवाहलउ २६ नेमिनाथ भावपूजा स्तोत्र २७ नवपल्लव पार्श्व लघु वीनती २८ पार्श्वनाथ लघु स्तोत्र २६ अजितनाथ वीनती (खभात ) ३०. महावीर वीनती ३१, सीमन्धर स्तवन ३२. चतुर्विंशति जिनस्तोत्र ३३. पञ्चतीर्थी नमस्कार स्तोत्र ३४ अर्बुदतीर्थ विज्ञप्तिस्तव ७ १७ १३ १५ १४ १६ १३ स्तोत्र-साहित्य पद्य १२ لس ३५ तीर्थयात्रा स्तव ३६. पञ्चपरमेष्ठिस्तव ३७. वीतराग स्तव ३८ वीतराग विज्ञप्ति ३६. तीर्थराजी स्तव ४० पञ्चजिना ४१. नगरकोट आदिजिनस्तव ( हारबद्ध ) ४२ अजितशान्ति लघु स्तव १६ १५ २५ १५ द्भुत स्तव " २४ १३ २१ १५ १५ ४ ४ " ७ ४ " " ५ ४ ५ ४३ शान्तिजिन स्तोत्र ४४. नेमिनाथ पूजा स्तव ( माण्डव ) ४५ नेमि स्तुति ४६ नेमि स्तुति ४७ पार्श्वनाथ लघु स्तव ४८ पार्श्वनाथ लघु स्तव ४६ पार्श्वनाथ स्तोत्र ५० पाश्र्वस्तोत्र ५१ पार्श्व लघु स्तव ( यमकमय ) ५२ पार्श्व स्तुति ५३. पार्श्वस्तोत्र (खभात ) ५४ पार्श्वनाथ स्तोत्र ( शखेश्वर ) यमकमय (खभात) ५६ पार्श्वनाथ स्तोत्र (मरुकोट ) ५७ पार्श्वस्तोत्र ( नागद्रह) ५८. पार्श्वनाथ स्तोत्र ( जीरावली ) ५६. पार्श्वस्तोत्र (पञ्चवर्गपरिहार ) ६० पार्श्वनाथ विज्ञप्ति ६१ महावीर विज्ञप्ति ६२ विहरमान जिन स्तव ६३ विहरमान जिन स्तुति ६४ अष्ट प्रातिहार्य स्तोत्र " ७ ५५ ७ " " ७ ५ ४ " ७ ७ १६ ५ ४
२२
आपने अपने जीवन मे अनेक तीर्थयात्राएँ की थी,
जिनका वर्णन 'विज्ञप्तित्रिवेणी' जैसे आलङ्कारिक ग्रन्थो मे
पाया जाता है । आपकी शिष्य परम्परा भी विपुल थी,
जिनमे उ० रत्नचन्द्र, प. मेघराज गणि, सोमकुञ्जर',
स्थिरसयम, सत्यरुचि गणि, प मतिशील गणि, प हेमकुञ्जर,
प समयकुञ्जर, कुलकेशरि, अजितकेशरी आदि मुख्य थे ।
उपाध्याय रत्नचन्द्र
उ० जयसागर प्रणीत ‘विज्ञप्ति त्रिवेणी 'मे जिसकी
रचना स १४८४ मे हुई थी, रत्नचन्द्र को 'क्षुल्लक ३ ' पद से
अभिहित किया है और आगे चलकर " रत्नचन्द्रक्षुल्लक
चाधीयमानस्वाध्याय शब्दब्रह्मव्याकरणमधिजिगापयिषन्त ४"
से ज्ञात होता है कि उपाध्यायजी स्वय इनको व्याकरण
शास्त्र का अध्ययन करवा रहे थे । इस क्षुल्लक (नवदीक्षित)
विशेषण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि स.
१४८४ के आस-पास ही आपकी दीक्षा हुई होगी । आपने
क्रमश स्वशास्त्र और परशास्त्र का अध्ययन कर अच्छी
विद्वता प्राप्त की । पृथ्वीचन्द्र चरित्र की प्रशस्ति के ८वे
पद्य के अनुसार 'साहाय्यकारी गणिरत्नचन्द्र ' से व्यक्त
१ आपकी प्रणीत ‘खरतरगच्छपट्टावली प्राप्त है।
२ उपाध्यायजी के सम्बन्ध मे विशेष जानने के लिओ देखे
विज्ञप्ति त्रिवेणी की प्रस्तावना
३ देखे, विज्ञप्ति त्रिवेणी पृ० १७
४ देखें, वि० त्रि० पृ० २१
२३ मे के होता है कि चरित्र की रचना आप अपने गुरु सहायकारी थे और उस समय तक उन्हे 'गणि' पद भी प्राप्त हो चुका था । विशेष योग्यता प्राप्त करने पर तत्कालीन गणनायक श्रीजिनभद्रसूरि के पट्टधर आचार्य श्रीजिनचन्द्रसूरिने आपको उपाध्याय पद प्रदान किया था । पाटन वाडीपुर-पार्श्वनाथ मन्दिर के भण्डार मे स्थित सिद्धहेम- व्याकरण की लेखन प्रगस्ति५ 'श्रीरत्नचन्द्रोपाध्यायाना' से स्पष्ट है कि स १५२१ के पूर्व ही आपको उपाध्याय पद प्राप्त हो गया था । उ० भक्तिलाभ-भानुमेरु उ० रत्नचन्द्र के शिष्य उपाध्याय भक्तिलाभ हुए । इनके सवध मे कोई विशेष उल्लेख प्राप्त नहीं होते । आपके लिये स १५३२ मे प्राकृतव्याकरण लिखा गया था, जिसकी लेखन पुष्पिका इस प्रकार है :- १५३२ वर्षे श्रीजयसागरमहोपाध्याय- शिष्य-रत्नचन्द्रोपाध्यायराजानामुपदेशेन शिष्य-भक्ति- "स " ५ पद्मा १० १५२१ वर्षे शीरोही वास्तव्य उकेगवशीय माल्हूगोत्रीय साह महसा भार्या सोनलदे पुत्र साह ईला सुश्रावकेण भातृ सेला चापा जिनदास प्रमुखपरिवारसहितेन श्रीखरतरगच्छे श्रीजयसागर- महोपाध्याय-शिष्य-श्रीरत्नचन्द्रोपाध्यायानामुपदेशेन श्रीसिद्धहैमलक्षणबृहद्- वृत्तिकक्षापट्टग्रन्थोलेखि॥ देखे वि० त्रि० प्र० पृ० ७८ पाटण संघ के भण्डार में सुरक्षित है। w २४ लाभाय [पठनार्थ ] स्तम्भतीर्थवास्तव्य श्रीमालवशे फोफलियागोत्रे श्रे. वाछा भा. देल्हू पुत्र लाखाकेन भार्या लीलादे जागा जेसिघादिपरिवारेण स्वपुण्यार्थ लिखापितम् ।।" इससे यह निश्चित है कि आपकी भी दीक्षा सं. १५३२ के पूर्व हो चुकी थी । आप भी उपाध्याय-पदधारी थे, जैसा कि उपाध्याय ज्ञानविमल द्वारा प्रणीत शब्द- प्रभेदवृत्ति प्रशस्ति के १५वे पद्य से ज्ञात होता है तच्छिष्या सकलाचलावलयसत्प्रख्यातकीर्युच्चया , सिद्धान्तोदधिगाहर्नकरसिका. कारुण्यपाथोधय । सद्भाग्योदयदीप्तपाठकपदश्रीराजिता रेजिरे, दपिष्ठप्रतिवादिमानमथना श्रीभक्तिलाभाभिधा ।।१५।। आपकी निम्नलिखित रचनाये अभी तक प्राप्त हुई है १ वालशिक्षा व्याकरण २. लघुजातक टीका ( स. १५७१ वीकानेर ) ३. कल्पान्तर्वाच्य२ ४ वरकाणा पार्श्वनाथ स्तव १ जेसलमेर सघ भडार, डा ५५ न १०८३ पत्र ८ अपूर्ण, जिसका प्रारभ इस प्रकार है प्रणम्य स्वगुरून् भक्त्या, व्यात्वा देवी सरस्वतीम् । हितार्थ भक्त्तिलाभेन, बालशिक्षा विधीयते ।। २ मेरे सग्रहमे
२५
२
८
५ जीरावला पार्श्वनाथ स्तव
६ सीमन्धर स्तव ( सफलससार)
७ रोहिणी तप स्तव
जिनहससूरि गुरुगीतम्
आपके दो प्रधान शिष्यो का उल्लेख मिलता है, प्रथम
उपाध्याय चारित्रसार और दूसरे गणि चारुचन्द्र । प्रधान
गिप्य उ चारित्रसार के सम्बन्ध मे कुछ भी उल्लेखनीय
सामग्री प्राप्त नहीं है । केवल शब्दप्रभेदवृत्ति प्रशस्ति पद्य
१६वे के आधार पर ही यह निश्चित है कि आप उपाध्याय
पद धारक थे । यथा
सर्वप्राजवराङ्गशेखरसदृग्वाक्सूरवाराग्रणी,
प्रागल्भ्यप्रवरास्तपो विधिपरा सद्वद्धयुदारागया ।
तेपामन्तिपदो बभूवुरजिता दृप्यत्प्रवादिनज ,
श्रीमत्पाठकशेखरा मुनिवराश्चारित्रशाराह्वया ।।१६।।
द्वितीय शिष्य वाचक चारुचन्द्र के जीवन के सम्बन्ध
ने तो सामग्री प्राप्त नही है, किन्तु आपकी निम्नलिखित
रचनाये ज्ञात हुई है
१ उत्तमकुमार चरित्र (१५७२ वीकानेर)
२ हरिवल चौपाई (स १५८१)
३ नन्दन मणियार सधि (स १५८७)
४ रतिसार केवली चतुष्पदी
१ प्रकाशित
२ ऐ जै का स में प्रकाशित
२६
५ महावल मलयसुन्दरी रास
६. पञ्चतीर्थी स्तवन. (स १५९८)
७ भाषा विचार प्र० सावचूरि.
८ युगमन्धर गीत
आपके गिष्य वाचनाचार्य ज्ञानविमल के गुरुवर उपाध्याय
भानुमेरु हुए । आश्चर्य है कि आपके गिष्य ज्ञानविमल
और प्रशिष्य श्रीवल्लभ ने केवल श्रद्धापूर्ण स्तुत्यात्मक पद्यो के
अतिरिक्त अपने साहित्य मे किञ्चित् भी उल्लेख नही
किया । वे केवल स्तुति करते हुए कहते है--
वैराग्य प्रवल शमेऽतिविमल शास्त्रौघवातीद्भता,
सिद्धान्तकरुचिमनोरमतमा भव्योपकार पर
चारित्र च जगत्यनुत्तरतर तत्पट्टशोभावहा,
येषा श्रीयुतभानुमेरुगुरवस्ते वाचका भ्रजिरे ।।
आपकी किसी साहित्य सर्जना का भी पता नही
चलता । आपके प्रधान दो गिष्य थे
ज्ञानविमल और दूसरे थे तेजोरङ्ग गणि ।
वाचनाचार्य ज्ञानविमल
एक वाचनाचार्य
एव स्वरचित
जानविमलजी की 'विमल' नन्दी
शब्दप्रभेदवृत्ति (र स १६५४ ) को देखते हुए (यु
श्रीजिनचन्द्रसूरि के नन्दिपत्र के अनुसार छट्ठी नन्दी
विमल' है, तो) नन्दी क्रमानुसार सभव है कि आपकी
दीक्षा १६१५ और १६१८ के मध्य मे हुई हो । आपके
२७ निप्य श्रीवल्लभ द्वारा रचित 'गिलोच्छ व्याख्या' ( र स १६५४) और स्वय रचित शब्दप्रभेदवृत्ति में " श्रीज्ञानविमल- पाठक' पाठक पद को देखने से यह तो स्वत सिद्ध सा हो जाता है कि स १६५४ के पूर्व ही आप उपाध्याय पद मे अलङ्कृत हो चुके थे । आपको पाठक पद तत्कालीन गच्छ- नायक युगप्रवान श्रीजिनचन्द्रसूरि ने ही दिया था । १ साहसाचरितकार श्रीमहेश्वर कवि प्रणीत 'टाब्दप्रभेद' नामक कोप पर आपने स १६५४ आपाढ शुक्ला द्वितीया को विक्रमनगर (बीकानेर) नरेश श्रीरायासहजी के विजय राज्य मे ३७०० ग्रन्थाग्रन्थमय विस्तृत टीका पूर्ण की। इसमे उनके शिष्य श्रीवल्लभ का पूर्ण सहयोग भी था और इसका प्रथमादर्श आपके शिष्य श्रीज्ञानसुन्दर और जयवल्लभ ने लिखा था, जैसा कि प्रगस्ति से ज्ञात होता है अस्मदन्तिषदो गाढसाहाय्यात् सिद्धिमागता । विद्वच्छीवल्लभाह्वस्य युक्तायुक्तविवेचिन ।।२०।। प्रथमादर्श लिखिताऽस्मच्छिष्य ज्ञानसुन्दराढेन । जयबल्लभगणिनाऽपि च विचारविज्ञेन भक्तेन ।। २३ ।। १ श्रीसाहसाकचरितप्रमुखाए गद्यपद्यप्रवन्धरचनासु वितन्वतैव । व्युत्पत्तिमुज्ज्वलतमा परमा च शक्तिनुल्लासिता जगति येन सरस्वतीयम॥
२८ श्रीमद्विक्रमनगरे राजच्छीराजसिंहनृपराज्ये । सल्लोकचक्रवाकप्रमोदसूर्योदये सम्यक् ।।२४।। चतुराननवदनेन्द्रियरसवसुधासम्मिते लसद्वर्षे । श्रीमद्विक्रमनपतोऽतिक्रान्तोऽतीब-कृतह ॥२५।। शुभोपयोगे शुभयोगयुक्ते, वरे द्वितीयादिवसेतिशुद्धे । आषाढमापस्य विशुद्धपक्षे, पुष्यर्कसयुक्तगभस्तिवारे ।।२६ ।। * अस्यास्त्रीणि सहस्राण्यधिकानि सप्तभि. शतै । इत्येव प्रमिति या, श्लोकमानेन निश्चिता ।।२७।। ५ इस टीका को देखते हुए ज्ञात होता है कि पाठक जी की प्रतिभा विगाल थी । व्याकरण और कोष साहित्य पर तो उनका एकाधिपत्य सा नजर आता है । स्थान-स्थान पर प्रायः सभी व्याकरणों और अनेकार्थादि कोषो के उद्धरण प्रचुर-परिमाण मे दृष्टि गोचर होते है । गव्दप्रभेद के प्रारम्भिक मङ्गलाचरण पद्य की भूमिका देखने से ही उनके वैयाकरणत्व का परिचय प्राप्त हो जायगा -- " इह हि प्रेक्षापूर्वकारिणां महाकवीना ग्रन्थारम्भे यथाभीष्टदेवतासस्तवन-मभ्युदयनिदान तथैवोत्कृष्टप्रशब्दग्रहणं सकलमङ्गलनिदानमस्तीति स्वमनसि निधाय श्री मन्महेश्वर- प्रशब्द' आदौ प्रयुञ्जत । उक्तञ्च प्रशब्दश्चाथ शब्दश्च, द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठ भित्त्वा विनिर्यातौ, तस्मात् मङ्गलवाचकौ ।। कवय २९ - - इति । यथा च श्रीकात्यायनाचार्या नित्ये शव्दार्थसम्बन्ध इति वक्तव्ये 'सिद्ध शब्दार्थसम्वन्ध.' इत्युक्तवन्त । यथा श्रीपाणिन्याचार्या अपि पाणिनीयव्याकरणादी आदैच् वृद्धि इति वक्तव्ये वृद्धिशब्दमादी प्रयुज्य वृद्धिरादैच्' इत्य- भिहितवन्त । यथा कुमारा अपि वर्णसमाम्नाय सिद्ध इति वक्तव्ये पालापव्याकरणादौ 'सिद्धो वर्णसमाम्नाय इति प्रयुक्तवन्त । यथा इन्द्रा इन्द्रव्याकरणादौ रूढेरनुक्ताना सिद्धि इति वक्तव्ये 'सिद्धिरनुक्ताना रूढे ' इति रचित- वन्तः । यथा श्रीहेमचन्द्राचार्या अपि सिद्धहेनचन्द्रव्याकरणादौ स्याद्वादात् सिद्धिरित्यभिधेये 'सिद्धि स्याद्वादात्' इति कथितवन्त । यथा श्रीहेमशब्दोपदेव विद्वासोऽपि मुग्धबोध- व्याकरणादौ शब्दै गमिति वक्तव्ये 'श शब्दै ' इति कृति- वन्त.। यथा श्रीशाकटायनाचार्या स्वोपन शब्दानुशासनवृत्ता- वादी ‘श्रीवीरममृत ज्योतिर्नत्वादि सर्ववेदसाम्' इति मङ्ग- लार्थ श्रीशब्दप्रयोग सन्दृव्धवन्त । यथा श्रीअनुभूतिस्वरूपा- चार्या अपि सरस्वती प्रक्रिया ऋजुकुर्वाणा 'प्रणम्य परमा- त्मान' इति मङ्गलार्थ प्रशब्दप्रयोग धृतवन्तस्तथा धीमन्त श्रीमहेश्वर कवयोऽपि शप्रसदनामा ग्रन्थादौ प्रशब्दलक्षण मङ्गल हृद्यवधार्य प्रशब्दप्रयोग न्यस्तवन्त इत्यवसेयम् । सिद्धि स्याद्वादात् कवि-परिचय ? किस उपाध्याय श्री वल्लभ कहाँ उत्पन्न हुए सवत मे उनका जन्म हुआ उनका बाल्यपन का क्या नाम था ? उनके माता-पिता का क्या नाम था? उन्होने ? ?
३० ? कब दीक्षा ग्रहण की? और कब उनका स्वर्गवास हुआ इत्यादि वातो का तो कुछ भी पता नहीं लगता। उनके ग्रन्थो एव तत्कालीन अन्य रचनाओ से इस सम्बन्ध मे कुछ भी ज्ञात नही होता। किन्तु इनके मौलिक एवं टीका ग्रन्थो के अवलोकन करने से उपाध्याय जी के विषय में जिन कुछ ज्ञातव्य बातो का पता चलता है, वे उपस्थित की जा रही है जन्मस्थान अभिधान चिन्तामणि नाममाला की सारोद्धार नाम्नी टीका मे एव हैमलिङ्गानुशासनविवरण की दुर्गपदप्रबोधवृत्ति मे कई स्थलो पर गब्दों के पर्याय देते हुए ‘इति भाषा इति प्रसिद्ध' से जो प्रचलित प्रान्तीय शब्द प्रयुक्त किये है, उनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि वे किस प्रान्त के निवासी थे। उदाहरण के लिये यहाँ कुछ शब्द दिये जाते है उद्योत = उजवाला, तावड विवाद =झखडा मरीचिका = झाझूआ अन्योन्यविरुद्धवचन = अण- पारिपार्श्वक = पासवाण मिलता वचन वर्षा : वरिखा तत्काल = तिवारइज असदोषारोपण = अणहुतो कादम्बिनी = कलाइणि दोष जलकण% बाछट छूट उच्चैघुष्ट =घोषणक आह्वान = तेडण, बुलावण, अशुभवचन = भूडा वचन निहुंतरा प्रलाप-झखण पृष्ठमासादन = चाडी भक्ष्यपिण्ड = कवा कूर्पास = काचली धान्यागार = कोठार निचुलक = उतरणा, खाट, पछेवड़ी भित्तिनिखातकीलक - घोड- हल्लीसक - घूमरी वादित्रादि = वाजा, रवाव, खूटी, खीली, ढोल, वरघू, नफेरी, ढोलादिक बजावणरा डाडिया, मनाक स्मित = मुरकणउ महतिहास = खड खड हसणो स्वपक्षभय = ग्रासियारउ भय लप्सिका लापसी अवपुजित = ऊकरडओ उपालम्भ = ओलम्भओ सस्तव = ओलखाण, पिछाण लओ, खूटा शमीवृक्ष = खेजड़ी गमीफल = सागरी सन्दर्भ -गूथणउ चुलुक - चलू वस्त्र-लूगडा इन शब्दो को देखने से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि कवि का जन्म एव बाल्यकाल राजस्थान प्रान्त मे ही व्यतीत हुआ है । राजस्थान प्रान्त मे विशेष कर उपरि उल्लिखित 'भुडावचन, ऊकरडओ, ओलभओ, कवा, काचली खेजडी, सागरी, लूगड़ा' आदि गन्दो को देखते हुए वे जोधपुर राज्य के ही निवासी हो, अधिक सभव है । यहाँ यह सभावना की जा सकती है कि दीक्षा के पश्चात् इनका जीवनकाल राजस्थान मे अधिक व्यतीत हुआ हो और वहा निरतर जन-सम्पर्क के कारण उनकी भाषा मे देशी शब्दो का प्रयोग अधिक हुआ हो, परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि जिन घरेलू शब्दो का व्यवहार उन्होने ३२ किया है वे बाल्यपन के संस्कार के विना भापा मे नही आ सकते । दीक्षा खरतरगच्छालङ्कार' आचार्यप्रवर श्रीजिनमाणिक्य- सूरि के पट्टधर शाह अकबर द्वारा प्रदत्त युगप्रधान १ इनका खरतरगच्छ का होना निम्नलिखित प्रमाणोसे सिट्ट है तत्रासीद् विवाग्रणीर्गणगुरुश्रीवर्तमानान्तिपद्, सूरीन्द्र स जिनेश्वरो दगगतागीत्यामिते सवति । जित्वा श्रीअणहिल्लपत्तनपुरे दुर्वादिनो दुर्लभ - क्ष्मापास्याद्विरुद वर खरतरेत्याख्य यक प्राप्तवान् ।।२।। अ चि ना वृ प्र. श्रीमति खरतरगच्छे, स्वच्छेभूवन्नवानवृत्तिकरा । श्रीमदभयदेवाख्या, आचार्या लक्षगुणदक्षा “१॥ शी ना टी प्र श्रीमत्खरतरगच्छे चक्रे यै सन्नवाङ्गवरवृत्ति । श्रीमन्तोमयदेवाचार्या ज्याया विरेजुस्ते ॥ १॥ गे म टी प्र श्रीजिनेश्वरसूरीन्द्रैविख्याति प्रापिते क्षिती। गच्छे खरतरे स्वच्छ, वर्द्धमाने मुमुक्षुमि । १ ।। दु प्र प्र २ इनका स्मरण उपाध्याय श्रीवल्लभ ने कई स्थानो पर किया है खरतरगणजलधिसमुल्लासनरजनीपतिप्रकाराणाम्। नम्रानेकनराणा, श्रीजिनमाणिवयसूरीणाम् । १ ।। अ स्त वृ प्र विरुदधारक आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरि ने अपने ५८ वर्ग विध्यातासम्नेपा, पट्टझमेण नूरय । श्रीमच्छीजिनमापिट्याचार्या माया विगिरे।। ३ ॥ भी ना वृप श्रीजिनमाणिायमूरि का जन्न ग १५४९ में हुआ। पिता कृपद चोपडा गोत्रीय मवपति रामदेव थे और माता श्री रयणादेवी। म १५६० मे ११ वर्ष की अल्पायु में उन्होंने आचार्य जिनहससूरि ने पान दीक्षा ग्रह्ण की। न १५८२ माघ शुक्ल पञ्चमी को गच्छनारक जिन- हमसूरि ने उन्हें जानार्य पद प्रदान किया । ल १५१३ माघ शुक्ला प्रतिण्दा गुरुवार को उन्होने विक्रमपुर (बीकानेर) के मत्री कर्मसिंह द्वारा निर्मापित नपिनाथ चैत्य की प्रतिष्ठा की। तत्कालीन गच्छ के माधुलो मे मिथिलाचार देखकर वे क्रियान्दार का विचार कर रहे थे। इसीलिय वे देरावर मे 'दादा' की यात्रा करने गये और वहा से जेमलमेर आते हुए मार्ग ही न १६१२ आपाद शुक्ला ५ को उनका स्वर्गवास हो गया था। १ इनको श्रीवल्लभजी ने श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है एव सूरिपरम्परागत इह श्रेळे गणे दीपिते , म श्रीमज्जिनचन्द्रमूरिसुगुरुचारित्रपाविन्यभृत् । तेज श्रीमदकन्वराभिचनृप श्रीपातिसाहिर्मुदा- वादीद्यत्सु युगप्रधान इति सन्नाम्ना यथार्थेन वै ।।४।। श्रीमन्त्रीश्वरकर्मचन्द्रविहितोद्यत्कोटिटड्कव्यय, श्रीनन्द्युत्सवपूर्वक युगवरा यस्मै ददी स्व पदम् । श्रीमल्लाभपुरे दयादृढमतिश्रीपातिसाह्याग्रहा- नन्द्याच्छीजिनचन्द्रसूरिसुगुरु सस्फीततेजोयशा ॥ ५॥ अ, चि ना वृ प्र - ३४ भव्या हस्ततिभूमिजौघदहनोद्यद्धव्यवाह शुभा - नड्वाह सुखकारिसयमयुरावाहे सुपुण्यस्नुह । धर्मध्यानकलास्निह कुमतिना नाशे सदानुन्मुह , कुर्यु श्रीजिनचन्द्रसूरिगरव श्रीधर्मराज्य चिरम ।।२।। दु प प्र वृ प्र युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि के माता-पिता वीसा ओसवाल श्रीवत और सियादे खेतमर (मारवाड) के निवासी थे। उनका जन्म म १५९५ मे हुआ था और दाल्यावस्था का नाम था सुलतान। आचार्य श्री जिनमणिक्यसूरि के उपदेश से प्रभावित होकर ९ वर्ष की अवस्था में उन्होने स १६०४ मे दीक्षा ग्रहण की और दीक्षा नाम रखा गया मुमतिधीर । स १६१२ भाद्रपद शुक्ला ९ गुरुवार को जेसलमेर के राउल श्रीमालदेव जी ने उत्सव करके वेगडगच्छ (खरतगच्छ की ही एक शाखा) के आचार्य गुणप्रभसूरि ने उन्हे आचार्यपद प्रदान कर तथा जिनचन्द्रसूरि नाम प्रख्यात कर गच्छनायक घोषित किया। स १६१४ चैत्र कृष्णा सप्तमी को प्रचलित शिथिलाचार को दूर करने के लिये उन्होने क्रियोद्धार किया। स १६१७ मे पाटण मे जिस समय तपगच्छीय उद्भट विद्वान कदाग्रही उ धर्मसागरजी ने गच्छविद्वेषो का सूत्रपात किया उस समय उनको आचार्यश्री ने शास्त्रार्थ के लिये आह्वान किया और उनके उपस्थित न होने पर अन्य तत्कालीन समग्र गच्छो के आचार्यों के समक्ष धर्मसागरजी को उत्सूत्रवादी घोषित किया था। सम्राट अकबर के आम- त्रण से मूरिजी १६४८ फाल्गुन शुक्ला १२ के दिवस ३१ साधुओ के परिवार सहित लाहोर मे सम्राट से मिले और स्वकीय उपदेशो से प्रभावित कर उन्होने तीर्यो की रक्षा एव अहिंसा प्रचार के लिये कई फरमान प्राप्त किये थे और १६४९ फाल्गुन वदि १० के दिवस सम्राट के हाथ से ही युगप्रधान पद भी प्राप्त किया जिसका विशाल महोत्सव करोडो रुपये व्यय कर महामती कर्मचन्द्र वच्छावत ने किया था। स
३५
अत
विशद आचार्य काल में ४४ --- नन्दिओ' (नामान्तपदो)
की स्थापना की थी। उसमे २६वी सख्या की नन्दि
वल्लभ' नाम की है, जिस मे १६वी नन्दि 'सिह' की
स्थापना स १६२३ मे हो चुकी थी। अनुमानत
'वल्लभ' नन्दि की स्थापना स १६३० एव १६४० के
मध्यकाल में हुई होगी। इस अनुमान का मुख्य कारण
एक यह भी है कि श्रीवल्लभ ने शीलोञ्छनाममाला पर
स १६५४ चैत्र कृष्णा सप्तमी को नागोर मे वृत्ति की
रचना पूर्ण की। किसी भी ग्रन्थ पर लेखनी चलाने के
लिये, विशेषकर व्याकरण एव कोप पर विशेष अध्ययन
ओर योग्यता की अपेक्षा है । अत शीलोञ्छनाममाला जैसी
पुस्तक पर वृत्ति रचने के लिये दीक्षा के पश्चात् १५-१८
वर्ष का समय तो उन्हे अवश्य ही तैयारी के लिये लगा
होगा । यहाँ यह सभावना भी की जा सकती है कि
दीक्षापूर्व ही वे सस्कृत साहित्य के विद्वान हो ।
प्राय जैन-समाज में देखने में यह आता है कि
,
पर
१६७० आश्विन कृष्णा द्वितीया को विलाडा में उनका स्वर्गवास
हुआ था। स १६१७ विजयदसमी के दिवस पाटण मे आचार्य जिन
वल्लभसूरि प्रणीत पौषधविधिप्रकरण पर ३५५४ श्लोक परिमाण की
उन्होने विशद टीका की रचना की थी। विशेप परिचय के लिये
देखे, श्रीअगरचन्द्र भंवरलाल नाहटा द्वारा लिखित
युगप्रधान
जिनचन्द्रसूरि"
१ देखे युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि का प्रथम परिशिष्ट
हुए इने-गिने गार्हस्थ्य-जीवन मे रहे हुए इने-गिने ही सस्कृत- साहित्य के विद्वान प्राप्त होते है। हाँ, जैन धार्मिक माहित्य एव कर्म सम्वन्धी साहित्य के उच्चकोटि के मर्मज्ञ अवश्य मिलेगे। अत यह अनुमान उपयुक्तसा ही प्रतीत होता है कि युगप्रधान ने १६३० और १६४० के बीच मे आपको दीक्षा प्रदान कर श्रीवल्लभ नाम प्रदान किया हो। श्रीवल्लभ-प्रतिभा-परिचय श्रीवल्लभ की प्रतिभा वहुमुखी थी । उनमे अगाध पाडित्य था और था उनका सस्कृत एव प्राकृत साहित्य पर पूर्ण अधिकार । वैसे तो उन्होंने किन किन शास्त्रो का अध्ययन किया और किनके पास किया, ऐसा कही कोई उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु आपकी गुरु 'पाठक' परम्परा एक विद्वत्परम्परा थी एव आपके गुरु स्वसाहित्य और पर- साहित्य के निष्णात थे । इसलिये यह अनुमान किया जा सकता है कि विद्याभ्यास आपने अपने श्रीगुरु-चरणो मे ही रहकर किया होगा । २ २ - वेदग्रन्यविदन्यशास्त्रजडधीनारायणोय पुन- विज्ञायेति सरस्वती भगवती सम्यग्गुणान्वेषिणी । सार्द्ध यन्मुखपङ्कजेखिलगुण किं लालसीति वसत्, तर्कव्याकरणाद्यनककठिनग्रन्थावली पाठका ॥१४॥ (शे स. वृ प्र) ३७ आपके टीका-ग्रन्थो के अवलोकन से यह भली भाति मिद्ध हो जाता है कि आप केवल जैन-साहित्य के ही विद्वान नहीं थे, अपितु समग्र सस्कृत साहित्य के जानकार थे। मस्कृत-साहित्य में टीकाकारो की बहुलता रही है किन्तु इनके समान टीकाकार विरले ही हुए है। एक अभिधानचिन्ता- मणिनाममाला की टीका मे ही लगभग १७० ग्रन्थो के उद्धरण - वे भी एक दो नही - किन्तु सैकडो की संख्या मे देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आपने इन इन विपयो के निम्नलिखित ग्रन्थो का भली-भाति अवलोकन अवश्य ही किया था । उद्धृत व उल्लिखित ग्रन्थो की तालिका इस प्रकार है व्याकरण ---सिद्धहेमशब्दानुशासन, बृहद्वृत्ति, लघुन्यास', न्यास', ढुण्ढिका', धातुपारायण (हेमचन्द्रीय), हैम- लिङ्गानुशासन और स्वोपज्ञ टीका, प्राकृतव्याकरण (हेमचन्द्रीय) टीका सहित, देशीसूत्र टीका सहित १ निवृत्त्वर्थ इति द्वितीय ग श्रवण न स्यात् इति न वाच्यम्, स्वमेव हि भिद्यते न श्रुति , शब्दस्य श्रोत्रग्राह्यत्वात् इति, पूर्वन्यासापेक्ष इनि, निवृत्तमिति लघुन्यास (अ २४,१) २ गर्भिणी पुवद्भावे सप्तमाध्याय-चतुर्थपादवृत्तिपचाशत्तम- सूत्रेण 'सयोगादिन ' इत्यन्तलोपप्रतिषेव , गर्भवती स्त्रीवचनात्तु इकणो- प्राप्तरीत्सर्गिकवचनाण, इति न्यासकार (अ १३०,१) ३ 'अणु ' रालकादिधान्यविशेष , इति तद्वितढूढी। शम्बशब्द स्तिर्यगर्थ , इति तद्धितढूढी। ४ यद्देशीसूत्रे 'सिड्डोसलहपिशल्ला' इति, शलभ पिशाचञ्च इति तट्टीका।
३८ ५ - पाणिनीय व्याकरण, पाणिनीय शिक्षा, महाभाष्य', काशिकाकार', शाकटायन, सारस्वत, कविकल्पद्रुम (बोपदेवीय), कृष्ण पण्डित कृत प्रक्रिया कौमुदी वृत्ति, माधवभट्ट, उज्ज्वलदत्त', गणरत्नमहोदधि टीका सह, न्यायमञ्जूषा टीका सह, दुर्गलिङ्गानुशासनवृत्ति चन्द्राचार्य, श्रीकण्ठपुरुपोत्तमदेवादयः" आदि । कोष - अमरकोष टीका सहित, क्षीरस्वामी (अमरकोप टीका- कार), अभिधान चिन्तामणि नाममाला टीका सहित, अनेकार्थ सग्रह (हेमचन्द्रीय) टीका सहित, श्रीजिन- भद्रसूरिपादाः ( अपवर्ग नाममाला ), अमरमाला, १ प्रसवयोगिता पुस्त्व, मस्त्यानयोगिता स्त्रीत्व, स्थितायोगिता नपुसकत्व इति शाब्दिकाना स्थिति । इति महाभाष्यवचनात् । (दु०प० १३३), उक्त भाष्यकारेण-भिक्षादिषु • (अ १३०,१) २ काशिकाकार युवतिशब्दोत्र न पठ्यते। तस्य ग्रहण- सामर्थ्यात् प्रवद्भावो न भवति। (अ १३०,१) ३ जोपमास्ते जोषमिति गाकटायन । (अ १४२ २) ४ यदुज्ज्वलदत्त -कृदीति डीषि श्रीयमित्यपि भवतीति दुर्घटे रक्षित , इति (अ १६,१) ५ कृतयुग त्रेतायुग द्वापरयुग कलियुग चत्वारि नपसके इति दुर्गलि- गानुशासनवृत्तौ। (दु प २७) ६ युवतिशब्दसन्वन्धिनस्तवर्गप्रथमस्य तृतीयस्वरलोपे योक्त चन्द्रा- चार्याभिप्रायेग। (अ १३०, १) ७ स्त्रीजातिविशेषवाचीशव्दस्तस्मादूङ इति श्रीकण्ठपुरुषोत्तमदेवादय (अ ३८, १) ८ वहिरुत्य इति अमरमाला ३९ ४ घनपाल कात्य १, गौड', देशीनाममाला३ टीका सहित, ध्वनिमज्जरी (एकाक्षरी नाममाला) निघण्टुशेषनाममाला ( (हेमचन्द्रीय) टीका सहित, पुरुषोत्तमदेव, भागुरि", महेश्वर ( or यत्कात्य समान्याद्यान पौराश्च, सद्भि प्रकृतय स्मृता । (अ ६०-१), कात्यस्तु प्रच्छन्नमन्तप्र्र यत्पक्षद्वार तदुच्यते । (अ ६९-२) २ गोटस्तु -- नुक्त्ताशुद्धी पुमास्तारो, ननानहक्षक्षिमध्ययो । (अ ४६-१), यद्गौड - स्त्रीनपुसकयो क्रोडा-बक्षसि स्यात् किरी पुमान् । कोडे पीनपयोधरे मृगइश क क्रीडितु नेच्छति । (अ ४२-१) आदि ३ यद्देगी - मादिपु गव्देषु अनेकार्येषु मड्डा बलकार आणातु मड्डा बलात्कार आना च इति तटीका कार्येषु पदेषु बलकारम्मि पिणालो इति । (अ६०-२) ४ धनणल यदाह ऋत्र्यानायातवो यातुधान, इति (अ १४-१), धनपालस्तु आसदी दिष्टर पीठमासनमिति। (अ ५७-२) ५ पटोले तु पाण्डुफल , कुलक कर्कगरछद । राजीफल कफहरो, राज- मान्योटमृताफला । इति हेमनिघष्टुशेष । ६ कूर्मासनस्त्वर्द्धचोलक , इति पुरुपोतमदेव । (अ५६-२), यदाह- पुरुषोत्तमदेव प्रेतादिभिर्गृहीतो य, स आविण्टो नमत् वहिरिति। (अ.३७-१) ७ भागुरिस्तु -- कुकुदरी समाचप्टे, जनो जघनकूपकी, इति (अ ४९-२) -- - ४० (एकाक्षरी टीका सहित, मालाकार', लिङ्गयसूरि२, व्याडि.', विश्व, विश्वशम्भु (एकाक्षरी नाममाला), वाचस्पति, वैजयन्ती, शाश्वत", श्रीधर टीका सहित, श्रीभोज', शेषसग्रह (हेमचन्द्रीय), सुधाकला नाममाला) सौभरि (एकाक्षरी नाममाला), हलायुध टीका सह, हारावली आदि. लक्षण -- काव्यादर्श, काव्यशिक्षा, भानुदत्त (रसतरङ्गिणी) विदग्धमुखमण्डन, छन्दोनुशासन, छन्दश्चूडामणि, वृत्तरत्नाकर, छन्द -- १ मालाकारस्तु मृत्वत्सा स्रवद्गर्भा, इति (अ ११५-२), माला- कारस्तु ---- चुण्डी विवरोत्साश्च कूपका, इति । (अ ९८-१) २ श्रील्डियसूरिस्तु -- धातकीपुष्पमिश्रगुडसहितधान्याम्बुकृतमबनाम- मैरेय, पक्वेक्षुरमकृतमद्यनाम शीधु , अपक्वेक्षुरसकृतमद्यनाम आसव, इति त्रीण्यपि भिन्नति। (अ ८१-१), लाजादिकरणार्थ कृतम्य घटकपालस्य नाम्नी, इति लिडयसूरि । (अ ९१-१), आदि ३ यद्व्याडि पितृसवर्मा य सन्ताना) मनोजव । (अ ३७-१) ४ सन्धिन्यकालदुग्धागौर्वृषाक्रान्ता च सन्धिनि, इति शाश्वत (अ ११५-२) ५ धुदिनम् इति श्रीभोज.। (शी ५४-१) ६ केकिरवच्छन्द , तल्लक्षण चेद स्यौ स्यौ केकिरवम्। (अ ६७-१) दुर्भाग्य है कि आचार्य हेमचन्द्र का यह ग्रन्थ अप्राप्य है। जन -- ४१ काव्य-रघुवश, कुमारसभव, किरातार्जुनीय, शिशुपालवध टीका सहित, नैपध चरित टीका सहित, नरहरि (नैषधटीकाकार), मेघदूत टीका सहित, द्वयाश्रय काव्य (हेमचन्द्रीय) टीका सहित (टी अभयतिल- कोपाध्याय), महाभारत२, हलायुध काव्य टीका सहित, रूपनाधवीय, भट्टि., गीतगोविन्द, आदिनाथ चरित्र (हेमचन्द्रीय), नेमिनाथ चरित्र (हेमचन्द्रीय), चम्पू, त्रिशतीकार', सौन्दर्यलहरी, महिम्नस्तोत्र टीका सहित, बोपालिन ", आदि -- 3 १ जल्दै रितरक्षुपन्नग, इति वर्ष , तरक्षवचित्रमृगा पनगा मोच यत्र तम् । इति नरहरि (११७-१), उद्भिदास्तु गुत्माहा इति नरहरि (अ १२४-१) । २ यद्भारतम् पत्त्यगस्त्रिगुणं गर्व, क्रमादास्या यथोत्तरम् । सेनामुत गुत्मगणो, बाहिनी पृतना चमू । अनीकिनीदशगुणा- माहुरक्षोहिणी बुधा । इति (दु ३७) तया रूपमाधवीये -स्वरि कमपि न चाल रूपलावभाजो, वपुष उगवलाढयनीयते दृश्यते वा। इति ४ सतीगन्धिकप्रसारा विराजन्ते अन्तेविपणयो वहिन सलिलाश्रया इति चन्पूगद्यम् (ज १०५-१) ५ यथा च त्रिशतीकार --पञ्चाहतैश्चतुभिर्वराटकै काकणी चैकिनी (अ १३७-२) ६ धनुष्पाणेर्यानदिवयभिसपत्त्राकृतमम्' इति महिम्नस्तोत्र। कि दिव अमु ? ' सपत्त्राकृत' पत्र सह वर्तमानेन शरेण शरीरे अन्त प्रविश्य उत्पादितमहाव्यथमित्यर्थ । इति तट्टोका (अ १२६-१) ७ वातप्रमी समीरमृग, इति वोपालिन (अ ११८-२) ४२ नाटय नाटक --- मुरारि (अनर्घराघव), हनुमन्नाटक' भरतनाट्यगास्त्र, रूपावतार, सङ्गीत -- सङ्गीत रत्नावली, रङ्गोदय, त्रिविक्रम " गकुन वसन्तराज, कामशास्त्र कामशास्त्र", -- ७ समन्तादुत्ताने सुरसहचरीचामरमरु -- त्तरडगरून्मीनद्भुज- परिघसौरभ्यशुचिना। इति हनुमान् (अ ९-१) ८ रूपावतारे इति रूपावतारनास्निग्रन्थे (दु ७१) ९ यदाह सहगीतरत्नावलीकार ततो वीणादिके वीणा, पिनाकी किन्नरीमुखा । पिनाकी साधनस्तुम्बा, किन्नरी द्वित्रितुरिबका । इति (गी २४-२) १० तथा च रङगोदय सार्द्धहस्तत्रय मान, भेरीणा समुदाहृतम् । पिण्डे पडङ गुला प्रोक्ता, वादयेन् मुखफुड' कयो । ११।। धेरिरे भ्रजिगरे भुगतुङ्गेगिरे, अगिरे ग्रगिरे ग्रगिने भुभुसे । पञ्चतालेषु भेरी बुधै प्रोच्यते, सा महावाद्ययुक्त्ता जनैर्वाद्यते । (अ २०-१) ११ यदाह --निपाद काकलीमतो द्विश्रुत्युत्कर्षणाद् भवेत्। शुष्काङ्गी धनचा गया , सुवाच काकलीस्वरा । इति त्रिविक्रम (अ १२९-१) १२ यदृसन्तराजस्तृतीयवर्गादौ ---- पोदकी सपणकाकपिङगला जम्बक प्रियतमा च पञ्चमी, इति (दु २५) १३ कामशास्त्रोक्तलक्षणे नरभेटे यथा शशो वृपोश्व , इति लिङगतो नायकभेदा । इति (दु ९७) --
नीति कौटिल्य' (अर्थशास्त्र), जय२, मुनि', चाणक्य
(चाणिक्यनीति)
सामुद्रिकशास्त्र,
धनुर्वेद धनुर्वेद',
--
.
१ यत्कौटिल्ल --ये द्रव्यहतोलि हस्तिन चापि योधयेयुस्ते तीक्ष्णा ,
(दु ९७), यत्कौटिल्य
कर्मणामारम्भोपाय , पुरुषद्रव्यसम्पत्,
दगकालविभाग , विनिपातप्रतीकार, कार्यसिद्धिश्चेति पञ्चाको
मन्त्र । (अ६२ २), उर्व हन्यते अनेन इति उद्घातन इति
पौटिल्य । (अ ९८-२)
गल्को घट विवाहाय वराद् गाम्ये च वस्कनि इति
(अ ६१-१)।
३ यन्मुगि --- पुगद्वितीय प्रामङ्ग (६४-२), यन्मुनि -- अधियाङ्ग
माररान इति (अ ६५-२), यन्मुनि --- विघसाशीभवे नित्य, नित्य
चामृतभोजन । विवमो भुक्त्तशेप स्यात्, यज्ञशिष्टमथामृतम् ।
(अ ६३-१)
यज्गय
--
,
८ प ४२-२, प ५
५ यद् धतुर्वेद अनतो वामपाद तु, तीक्ष्ण चैदानुकुञ्चितम् ।
पालीट तु प्रकर्त्तव्य, हस्तद्वयमविस्तरम् ।।१। पादी सविस्तरी
कायों, ममहत्तप्रमाणन । वैशाग्वस्थानके वत्स्य, कूटलक्षस्य
बेधने ।२। प्रत्यालीढे तु कर्त्तव्य , सव्यस्तीक्ष्णोनुकुञ्चित ।
तिर्यग्वाम पुरस्तत्र, दूरापाते विशिष्यते ।३। समपादे सम पादौ
निष्कम्पी च सुसड्गती। मण्डले मण्डलाकारी, वाह्यतीक्ष्णो
विशेषत ।४। (अ ६६-२)
४४ १ वास्तुशास्त्र वास्तुसुत', राजवल्लभमण्डन, ज्योतिष --श्रीपति, वराहमिहिर, भास्कराचार्यः, खण्डखाद्य गणित लीलावती, वैद्यक चरकसहिता, सुश्रुतसहिता, माधवनिदान, वाग्भट टीका सहित, मदनपाल, भोज, पथ्यापथ्यकार', आदि, स्मृति -- मनुस्मृति, याज्ञवल्कस्मृति, वेदानुशासन', १ तथा च वास्तुनुतनाम्निग्रन्ये चतुष्कोणा तु या वेदी, सनिका सा सुखाप्तये । विवाहेष्टासने याज्ञे, राजा देदानादिषु ।। इत्यादि (अ. ८९-२) २ यदुक्त वास्तुशास्त्र राजवल्लभमण्डने गेहोदय तु विभजनववा पडश , स्तम्भोद्धभागसनक भरण निरश्न। कुम्भी हयुदुम्ब- रसहविनागतुल्या, पट्टग्न तत्रि व युतोग समान एव ।। (अ ९०-१) ३ विक्रमादित्य राज्यस्य, सञ्चत्रिशोत्तर गतम् । पातयित्वा भवेच्छाक वैत्रशुक्लादितस्तिथे ।। इति गणितमार्गेण शुक्लपक्षस्य पूर्व प्राप्त- त्वात् इति खण्डखाद्यकोक्त्ते (गी ८-२) ४ यदाह भोज महान्त शोथमन्य वा, हनुमन्या गलाश्रयम् । लम्वन्त मुष्कवद् दृप्टवा, गलगण्ड विनिदिशेत् । इति (अ ३४-२) ५ महीलता किञ्चुलको, भूस्थो गण्डूपदपदोमत । इति पथ्यापथ्यकार. (अ १०८-२), अष्टापदो महाशृड्गी गरभञ्चतुरूर्वपात् । उप्ट्रप्रमाणो द्विरदारातिश्चैव महामृग । इति पथ्यापथ्यकार: (अ. ११७-१) आदि ६ आत्मा वै जायते पुत्र, इति वेदानुशासने ।
४५ पुराण गरुडपुराण, नारदपुराण, पद्मपुराण, भविष्योत्तर- पुराण, विष्णुपुराण टीका सहित, हरिवंशपुराण, भागवत टीका सहित, जैनागम साहित्य --- आवश्यकमूत्र', आवश्यकचूर्णि', आद- श्यकसूत्र वृहद्वृत्ति ( (हारिभद्रीय), आचारागसूत्र सवृत्तिक", सूत्रकृताङ्गसूत्र सवृत्तिक, समवायाङ्गमूत्र वृत्ति सहित, राजप्रश्नीयसूत्र आ मलयगिरि टीका सहित", प्रज्ञापनासूत्र वृत्ति सहित, उपदेगमाला कणिका टीका सहित', तत्त्वार्थसूत्र, तिलकाचार्य १० शीलतरङ्गिणी (गीलोपदेशमाला वृत्ति), भक्तामर आदि १ अ ५८ -- । २ गो ४९-१। ३ अ ५७-२। 6 अ ८२-२, अ-२६ अ६-२।७ ज ५४-२। ८ अ १०९-? ९ यदुगदेशमालाकणिकाटीका नदा तस्लिन् पेतुरक्ष, विन्दोर्मनि माजका । आजगागाजिहीपना, कुड्यमत्स्योन्थ मस्गृत । त प्रत्ययोपदुद्राव, प्रतिसूर्यगयानक । इति (अ ११८-२) १० यदुक्न तिलकाचार्य उसभेत्यादि व्याख्याने ऊर्वो ऋषभला- ञ्छनत्वात् मातुश्चतुर्दशम्वप्नेषु प्रयस ऋषभदर्शनाचा क्रपभ इति (अ ५-२), अथोत्थाय मखीना सा, प्रेक्ष्यालक्ष्य दिशोठखिला । अदर्शयत् करामहणहेला पथ्यतर। इति तिलकाचार्य , (अ २३-१)। नवोल्यकुपित स्वाह्री, कुशीमादाय भग्नवान्, इति तिलकाचार्य. (अ ९३-१) ११ कोपात् सम्मुख मायात, प्रसारितरय करात् । हाहारवपरै लोक , पेचके हतवान् द्विपम् । इति शीलतरडिगणी (अ. ११-१) ४६ २ इन ग्रन्थों के नामोल्लेख तथा उद्धरणो के अतिरिक्त कई स्थलो पर “इति ऋग्वेदकाण्डे १, इति श्रुति इति स्मृति ३, इति आगम , इत्याचार्या ", यल्लध्यं६ यद्वैद्या आदि कहकर उन्होने प्रचुरमात्रा उद्धरण अपने टीका-ग्रथो मे दिये है। r , मे उपाध्याय पद गणि, वाचनाचार्य और उपाध्याय पद उन्हे कब और किसके द्वारा प्राप्त हुये इसका कुछ भी पता नहीं है । इनकी सर्व प्रथम कृति गीलोञ्छनाममाला टीका (र स १६५४) मे १ अ ७०-२ २ कामे मासि सूते वै, इति श्रुतेः (अ १८३-१) । ३ नदमे दशमे वापि प्रवलै सूतिमारुतै । निस्सार्यते वाण इव, यन्त्र- छिद्रेण सज्ज्वर । इति स्मृतेश्च ।। पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात्, पितर त्रायते सुत । तत पुत्र इति प्रोक्न , स्वयमेव स्वयम्भुवा। इति स्मृति (अ. ४३-१)। ८ कर्पूरागुरुकस्तूरी कक्कोलर्यक्षकम । एतै पिण्डीकृतैर्यक्षप्रिय पङक सकुकु मैरित्यागम । (अ५२-२)। यदागम -~-अभिचरन् श्येनेन यजेत इति, (अ ७२-२)। ५ अवेक्षणं अवेक्षा अवधान इत्यर्थ , इत्याचार्यान्च। अतिसर्जन समर्प- गमित्यर्य , इत्याचार्या (अ १४१-१)। यथा एकमेव वरपुमा मुतराज्यमनाश्रम , इति हस्माहुराचार्या , (अ १४३-२) ६ यल्लक्ष्यम् --- उपाजितानामर्थाना, त्याग एव हि रक्षणम। तडागो- डरसस्थान परीवाह इवाम्भसा । (अ ९७-२) ७ यवैद्या --कृष्ण सोवर्चलगुणा लवणे गन्धवजिते। (अ ८४-१)।
८७ . श्रीज्ञानविमलपाठक-सत्पादाम्भोजचञ्चरीकेण । श्रीवल्लभेन रचिता, शीलोञ्छशास्त्रे शुभा टीका ।।१६॥" श्रीवल्लभेन पद आता है और द्वितीय रचना शेपराडग्रह दीपिका (र स १६५४ श्रा कृ ८ ) मे भी “गुरूणामन्तिषदाऽणुना श्रीवल्लभेन पद प्राप्त होता है । यही नही किन्तु इनके गुरु उ श्रीज्ञानविमल रचित शब्दप्रभेद वृत्ति मे, जो इनके गाढसहायता से पूर्ण हुई थी; 'अस्मदन्तिपदो विदृच्छ्रीवल्लभ शव्द ही आता है । इनके नाम के साथ मे स १६५४ तक किसी प्रकार की उपाधि या विपण प्राप्त नही होता । किन्तु तदनन्तर की समग्र रचनाओ मे गणि और वाचनाचार्य पद का प्रयोग देखने मे आता है। स १६५४ के एक वर्प पश्चात् ही की रचना (उपकेश गब्द व्युत्पत्ति' (र स १६५५) मे ‘पण्डितश्रीवल्लभगणि- विरचिता' उल्लेख है । अत सभव है कि स १६५४ के अन्त मे ही अथवा १६५५ मे के प्रारम्भ मे ही आपको गणि पद प्राप्त हुआ हो । पच्चात् अरजिनस्तववृत्ति मे श्रीवल्लभेन गणिना वै' दुर्गपदप्रबोधवृत्ति (र सं १६६१) मे 'वाचक', अभिधान चिन्तामणि नाममाला टीका (र स १६६७), विद्वत्प्रबोधकाव्य और सारस्वत सूत्र के केगा पद्य की टीका मे क्रमश 'तच्छिष्यो वाचनाचार्यो वादि श्रीवल्लभ ' 'वाचनाचार्यधुर्यश्री-श्रीवल्लभगणीश्वरै तथा वाचनाचार्य' लिखा प्राप्त होता है । उपाध्याय पद का डल्लेख हमे सर्वप्रथम चतुर्दशस्वर- स्थापन वादस्थल (रस १६७४ से १६६०) मे ' श्रीवल्लभ
८८
पाठक ' पद मिलता है और विजयदेव माहात्म्य (जिसकी
रचना अनुमानन . १६८७ के आस-पास हुई थी, जो नारद
उनकी अन्तिम रचना थी) मे 'श्रीवल्लभोपाध्याय विरचिते
मिलता है। अत संभव है कि स १६६७ और १६८७ के
मध्य मे आचार्य जिननिहरि ने या आचार्य जिनराजरि
ने उन्हें ग्रह पद प्रदान किया हो !
साथ ही अभिधान चिन्तामणि नाममाला-वृत्ति की
प्रगस्ति में " वादि श्रीवल्लभ :' शब्द से यह अनुमान
लगाया जा सकता है कि इन्होने म १६६७ पूर्व ही कही
पर किसी विद्वान से नास्त्रार्थ किया और उसे पराजित
कर स्वयं ने विजय पताका प्राप्त की हो । अन्यथा हमे
उदारमना महर्पि अपने लिये व्यर्थ की उपाधि का प्रयोग
न करते ।
विशालहृदयता
उस समय खरतरगच्छ और तपगच्छ मे विविवाद
विपयक विवाद प्रवल वेग से चल रहा था और उसमे दोनों
गच्छों के प्रमुख-प्रमुख व्यक्ति भाग ले रहे थे । इधर
तपगच्छ की ओर से उ० धर्मसागर, नेमिसागर, लब्धिसागर
और खरतरगच्छ की तरफ से महोपाध्याय वनचन्द्र,
महो साधु नीति उ. जयसोम उ. गुणविनय, मतिकोनि
आदि लगे हुये थे। यहीं नहीं किन्तु सर्व गच्छ के
माननीय गान्तमना महर्षि उपाध्याय समयसुन्दर
जैसे भी (किसी पूर्वाभिनिवेश या दुराग्रह के वशीभूत
१९ होकर नही किन्तु वस्तु-निरूपण की दृष्टि से) अपने ग्रन्थो म उ धर्मसागर प्ररूपित प्रश्नो को सरलता पूर्वक खण्डन कर स्वाच्छ की आचरणाओ का मण्डन कर रहे थे। इन दोनो गच्छो के विवाद ही नही, किन्तु विजयदेवसूरि (जिनके लिये उ श्रीवल्लभ ने विजयदेवमहात्म्य की रचना की) के समय मे तपगच्छ मे भी 'विजय' और 'सागर के विवाद समाज मे ऐसे विपेले बीजो का वपन कर रहे थे, जिससे समाज का सगठन छिन्न-भिन्न हो जाय । किन्तु तत्कालीन गच्छनायकों की चातुरी से समाज छिन्न-भिन्न तो नही हुआ परन्तु दो टुकडे अवश्य हो गये, जो आज भी मौजूद है। ऐसे विक्षेप के समय मे 'वादी' होते हुए भी श्रीवल्लभ का इन प्रपञ्चो मे फसना प्रतीत नही होता और न किसी ग्रन्थ मे इनका इस विषय मे कोई उल्लेख ही प्राप्त होता है । अत यह निश्चित है कि श्रीवल्लभ दोनो गच्छो के संघर्ष मे तटस्थ ही रहे थे। वे किसी प्रकार के वादो मे पडकर स्वसमय को नष्ट करना नही चाहते थे। जिस समय तपगच्छ के साधु खरतरगच्छ के आचार्यों की प्रशसा करना तो दूर उनकी कीर्ति का श्रवण करना भी अच्छा नही समझते थे और इसी प्रकार खरतरगच्छ के साधु भी तपगच्छ के प्रभाविक पुरुषो का कीर्तिगान करने मे सकुचाते थे। यद्यपि उ. समयसुन्दरजी ने पार्श्व- १ देखे-विजयतिलकसूरि रास चन्द्रगच्छीय पूजा ऋपि का गुणवर्णन मुक्तकण्ठ से किया है तथा खरतर, तपा, अञ्चल इन तीनों गच्छों के आचार्यो का सुललित पद्यों मे " भट्टारक तीन भए वड़भागी कहकर गुणगान किया है; जो तत्कालीन समग्र साहित्य मे अपवादरूप ही समझना चाहिए । ऐसे समय मे तप- गच्छीय प्रसिद्ध आचार्य विजयदेवसूरिजी महाराज के चारि- त्रिक गुणो से प्रभावित होकर कवि ने १८ सर्गात्मक विजय- देवमाहात्म्य नामक महाकाव्य की रचना की और इससे अपनी माध्यस्थता, उदारता, विशालहृदयता का परिचय दिया। इसके सम्बन्ध मे मुनि जिनविजयजी 'विज्ञप्ति त्रिवेणी' की प्रस्तावना मे लिखते है: " श्रीवल्लभोपाध्याय की कृतियों में से एक कृति वडी ध्यान खीचने लायक है । इसका नाम है विजयदेव- महात्म्य । इसमे तपगच्छ के प्रसिद्ध आचार्य श्रीविजयदेव- सूरि का सविस्तर जीवन-चरित्र वर्णन किया गया है। (ध्यान मे रहे कि चरित्रनायक और चरित्रलेखक दोनो समकालीन हैं और विजयदेवसूरि अपने महात्म्य के निर्माण के समय मे विद्यमान थे।) उस समय परस्पर साम्प्रदायिक विरोध इतना बढा हुआ था कि एक गच्छ वाले दूसरे गच्छ के प्रतिष्ठित व्यक्ति के गुणानुवाद करना तो दूर रहे परन्तु श्रवण मे भी मध्यस्थता नही दिखला सकते थे। अर्थात् तपागच्छ वाले खरतरगच्छीय व्यक्ति के प्रति अपना बहुमान नहीं दिखा सकते थे और खरतरगच्छानुयायी तपागच्छ के प्रसिद्ध पुरुष की प्रशंसा करते दिल मे दुख
५१
मनाते थे। ऐसी दशा मे, खरतरगच्छीय एक विद्वान
उपाध्याय के द्वारा नपागच्छ के एक आचार्य के गुणगान
मे बडा ग्रन्थ लिखा जाने वाला काम अवश्य आश्चर्य
उत्पन्न करता है। समाज की यह विरोधात्मक प्रकृति,
श्री वल्लभ पाठक के ध्यान से बहार न थी । वे इस बात
को अच्छी तरह जानते थे कि मेरे इस – भिन्न गच्छ के
आचार्य की प्रशसा और स्तवना करने वाले ग्रन्थ के
लिखने रूप - कार्य से बहुत से दुराग्रही और स्वसाम्प्रदायिक
असन्तुष्ट होकर मुझ पर कटाक्ष करेगे । इसलिये इन्होने
ग्रन्थ के अन्त मे, सक्षेप मे परन्तु असरकारक शब्दो मे
लिख दिया है कि
यदन्यगच्छप्रभव कवि कि , मुक्त्वा स्वसूरि तपगच्छसूरे ।
कथ चरित्र कुरुते पवित्र, शङ्ख्यमार्यन कदापि कार्या ।।
आत्मार्थसिद्धि किल कस्य नेष्टा
सा तु स्तुतेरेव महात्मना स्यात् ।
आभाणकोऽपि प्रथितोऽस्ति लोके,
गङ्गा हि कस्यापि न पैतृकीयम् ।।
तस्मान्मया केवलमर्थसिद्धयै - जिह्वापवित्रीकरणाय यद्वा ।
इति स्तुत श्रीविजयादिदेव , सूरिस्सम श्रीविजयादिसिंहै ।।
अर्थात् - अन्य (खरतर) गच्छ वाला कवि अपने
गच्छ के आचार्य को छोडकर तपागच्छ के आचार्य का
चरित्र कैसे बनाता है, यह शका विद्वान् मनुष्यो को न
लानी चाहिए। क्यो कि आत्मसिद्धि किसे अभीष्ट नही
५२ है?- सभी को इष्ट है। यह आत्मसिद्धि महात्माओं की स्तुति द्वारा होती है। और महात्माओ के लिये यह कोई नियम नही है कि वे अमुक पथ या समुदाय मे ही उत्पन्न हुआ करते हैं और यह भी कोई प्रतिबन्ध नही है कि अमुक मतानुयागी अमुक ही महात्माओ की स्तवना करे। जैसे गगा किसी के बाप की नही है - सब ही उसके अमृतमय जल का पान कर सकते है- वैसे महात्माओ भी किसी के रजिष्टर्ड नही किये हुए हैं, सव ही मनुप्य अपनी अपनी इच्छानुसार उनके गुणगान कर अपनी उन्नति कर सकते है। इसलिये मेने - खरतर- गच्छानुयायी होकर भी - अपनी जिह्वा को पवित्र करने के लिये तपागच्छ के महात्मा श्रीविजयदेवसूरि और (उनके शिष्य) विजयसिहसूरि का यह पवित्र चरित्र लिखा है। इस विषय में किसी को उद्वेगजनक विकल्प करने की जरूरत नही है। वाह कैसी उदार दृष्टि और गुणानुराग ।। यदि केवल इन ही ३ पद्यों का स्मरण और मनन हमारा आधुनिक जैन-समाज करे तो थोड़े ही दिनो मे वह उन्नति के शिखर पर आरूढ हो सकता है । गासनदेव वह दिन गीघ्र दिखावे । (पृ. ८२-८४)" इनके उदारहृदय का परिचय देने वाली एक घटना और हुई । श्वेताम्बर जैनों मे एक गच्छ है जिसका नाम है उपकेश । श्रीवल्लभजी के समकालीन उपकेगगच्छनायक श्रीसिद्धसूरि ने चाहा कि उनके गच्छ के नाम की एक सुन्दर व्युत्पत्ति हो जाय ।' इस काम के लिये उन्होने --
श्रीवल्लभजी से आग्रह किया । इस पर उन्होने उनके
आग्रह को स्वीकार कर
" ओकेश-उपकेग-पद-दशार्थी
की स १६५५ मे विक्रमनगर (बीकानेर) मे बडे विलक्षण
ढग से रचना की । इससे भी स्पष्ट है कि इनके हृदय
में साम्प्रदायिक भावो का लवलेग भी नही था, अपितु वे
सहृदय उदार थे।
विहार और शिष्यपरम्परा
इनके ग्रन्थो के अवलोकन से ऐसा प्रतीत होता है
कि इनका वाल्यजीवन और प्रौढावस्था का समय राजस्थान
मे ही व्यतीत हुआ है । किन्तु विजयदेव महात्म्य को
देखते हुए यह कल्पना की जा सकती है कि कवि वृद्धा-
वस्था मे ‘गुर्जर' देश पहुँचे और वही पर विजयदेव के
चारित्र और तप से आकृष्ट होकर विजयदेव महात्म्य की
रचना की । इसलिये वहुत सभव है कि उनकी वृद्धावस्था
वही पूर्ण हुई हो, और उनका स्वर्गवास भी उसी प्रदेश
मे हुआ हो।
सब से बडी आश्चर्य की वस्तु यह है कि कवि की
परम्परा चली हो-- ऐसा प्रतीत नही होता, और न इस
सम्बन्ध में किसी प्रकार के उल्लेख ही मिलते है । अथवा
उनके स्वय के शिष्य हो तो भी यह निश्चित है कि इनकी
परम्परा दीर्घकाल तक नही चली अन्यथा उनमे से कोई
तो विद्वान आदि भी होता जिनका कोई न कोई उल्लेख
अवश्य मिलता।
५४ साहित्य - सर्जना उपाध्याय श्रीवल्लभ का अरजिनस्तव उनके अनेक ग्रन्थो मे से एक ग्रन्थ है । इस ग्रन्थ के अतिरिक्त उन्होने अनेक ग्रन्थ लिखे जिन मे से कुल मिलाकर छोटे-मोटे १४ ग्रन्थ अबतक उपलब्ध हो चुके है। इनमे से ५ तो मौलिक कृतियाँ है और अन्य व्याकरण एव कोषो पर टीकाएँ । चाहे इनके काव्यो को देखिए अथवा टीका ग्रन्थो को, प्रत्येक पृष्ठ पर लेखक का प्रकाण्ड-पाण्डित्य और सौजन्यपूर्ण औदार्य प्रस्फुटित हो रहा है । सब रचनाओ का तो पूर्ण परिचय करवाना यहाँ सभव नही है, केवल उनका सक्षिप्त परिचय मात्र यहाँ दिया जा रहा है जो, मेरी समझ मे, लेखक की प्रतिभा और निपुणता को प्रकाशित करने के लिये बहुत कुछ पर्याप्त है । मौलिक-ग्रन्थ विजयदेवमाहात्म्य-महाकाव्य १७वी शती के तपगच्छ साम्राज्य के अधिपति आचार्य विजयदेवसूरि के माहात्म्य का वर्णन होने से इस महा- काव्य का नाम भी विजयदेव माहात्म्य महाकाव्य रखा गया। साहित्यदर्पणकार के मतानुसार महाकाव्य के जो लक्षण षष्ठ परिच्छेद मे विश्वनाथ ने दिये है उन लक्षणो १ विजयदेवसूरीणा, माहात्म्य अधिक सदा ।।२।। विजयदेवमाहात्म्य, वर्ण्यतेत्र यतोद्भुतम् । विजयदेवमाहात्म्य, नामकाव्य तत स्मृतम् ॥ ३ ॥ or से तुलना करने पर यह 'माहात्म्य' भी महाकाव्य की कोटि मे आता है । इसके नायक, विजयदेवसूरि धीरोदात्त और देवत्व गुण से परिपूर्ण है । इसमे शान्तरस मुख्य । इसका कथानक महात्मा के जीवन-चरित पर आश्रित है ओर तत्कालीन परिस्थितियो का सॉगोपाङ्ग वर्णन होने से ऐतिहासिक भी है । इसमे धर्मफल की प्रधानता है । आदि मे नमस्कार और कथानक-वस्तु का निर्देश भी है। इसमे १६ सर्ग है, सर्गस्थ श्लोको की संख्या मध्यम है, हॉ, नवम सर्ग के श्लोको की सख्या अन्य सर्गों की अपेक्षा अधिक है । इसमे ३६६ पद्य है। प्रत्येक सर्ग एक ही छन्द मे अनुस्यूत है, तथा अन्तिम वृत्त अन्य छन्द मे ग्रथित है । इसमे कई स्थलो पर 'सागर २ ' आदि खलो की निन्दा और महापुरुपो का गुणगान भी किया गया है । प्रसङ्गोपात पुत्र जन्म, विवाह (दीक्षा), मुनि, स्वर्ग, सूर्य, चन्द्र, सागर आदि का वर्णन भी है । स्थान- स्थान पर अनुप्रास, श्लेष, यमक, वक्रोक्ति, अर्थान्तरन्यास, अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, विरोध, उपमा, रूपक आदि अलकारो का इसमे अच्छा समावेश किया है। अत यह काव्य केवल महात्म्य ही नहीं है किन्तु लक्षणसिद्ध घटना वहुल महाकाव्य है। इसका रचना समय अज्ञात है । महाकवि ने प्रशस्ति मे इसका कोई उल्लेख नही किया है, किन्तु इस महात्म्य का आलोडन करने पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता २ देखे, एकादश सर्ग ५६ है कि इसकी रचना स १६८७ के पश्चात् ही कवि ने की है । इसका आधार यह है कि कवि चरितनायक के जन्म काल १६३४ से लेकर १६८७ तक की क्रमवद्ध घटनाओं का वर्णन सागोपाङ्ग करता है । नायक का देहावसान १७१३ मे हुआ है। कवि उनके देहावसान का तो क्या, किन्तु चरितनायक के १६८० के वाद दक्षिण देश मे पधारने और काफी समय तक इस प्रदेश मे विचरण करने का उल्लेख भी नही करता । १६८४ मे विजयदेव- सूरि ने विजयरित्यूरि को भट्टारक पद दिया और १६८६ में स्वर्णगिरि (जालोर) मे प्रतिष्ठा करवामी १ । स. १६८७ मे मेदिनीतट२ (वर्तमान-मेड़ता सिटी ) मे प्रतिष्ठा करवाई और उसके पश्चात् करवाया गगाणी तीर्थ का जीर्णोद्धार । इसके पश्चान् काव्य मे कोई जीवन की उल्लेखनीय घटना नही है, किन्तु जहाँगीर पर प्रभाव, तपवर्णन, चारित्रवर्णन, और गुणवर्णनों मे ही आगे के सर्ग पूर्ण किये गये है। इसमे एक और घटना का उल्लेख है १ पोडगल्य गतस्यास्मिन्, पङगीतितमेव्दके। प्रथमापाढपक्षस्य, कृष्णे पञ्चमवासरे। ॥१६॥ प्रत्यतिष्ठ जिनेन्द्राणा, प्रतिमा प्रतिमाग्रिमा। विजयदेवसूरीन्द्र श्री जावालपुरेवरे ॥ १७ ॥ त्रयोदश सर्ग । २. पोडगस्य गतस्यास्मिन्, सप्ताशीतितमेन्दके। प्रतिमाना प्रतिष्ठाऽभूदेव श्रीमेदिनीतटे ।। ७२ ।। १३ स. ३. देखें, १४ वा सर्ग
५७
मेघजी? आदि मुख्य श्रावकवर्ग ने 'सागरमत' का त्याग
कर, पुन . गुरु से वासक्षेप प्राप्त कर वोधिलाभ उपार्जन
किया । इसका भी समय अवचूरिकार ने स १६५७
दिया है । अत
यह अनुमान ठीक ही प्रतीत होता है
कि इसकी रचना १६८७ ने अन्त मे ही हुई है । अन्यथा
१६८८ की भी कोई घटना का उल्लेख अवश्य किया जाता।
कवि ने काव्य के प्रथम और द्वितीय सर्ग मे
चरितनायक का जन्म, विद्याभ्यास, वैवाहिक बन्धनो को
न स्वीकार कर ब्रह्मचारी रहने की अत्युत्कट अभिलापा
और सयम के प्रति आकर्पण का वर्णन किया है। ३-४
सर्ग मे आचार्य हीरविजयसूरि का प्रभाव वर्णन और
विजयमेनसूरि का जीवन-चरित है। ५-७ सर्गो माता
सहित चरितनायक की दीक्षा, शास्त्राभ्यास, विजयसेनसूरि
के साथ सम्राट अकबर से मिलाप तथा चरितनायक के
गणि और आचार्य पद प्राप्ति का वर्णन किया गया है ।
८ वे सर्ग मे कनकविजयादि शिष्यो का और ९-१० मे
प्रतिष्ठा, चातुर्मास, दीक्षाप्रदान और विजयसिहसूरि को
स्व पट्ट पर अभिषिक्ति करने का वर्णन मिलता है ।
११ वे मे 'सागरपक्षीय' प्रतिवादियो को पराजित करने
का उल्लेख है । १२-१४ मे पाली नवलक्ष प्रसाद पार्श्वनाथ,
१ सागरीय मत त्यक्त्वा, मेघाद्या श्राद्ध मुव्यका ।
बोधि प्राप्ता गुरो रेव, वासक्षेपमकारयन् ।। १९७ ॥ १ स
२ xxx १६८० वर्षे यन्मतकर्षित तत्सागरीय मत त्यक्त्वा सा
मेघाद्या वहव श्रावका x x x देखे पृष्ठ १२६
५८ जालोर, मेडता आदि प्रतिष्ठाओ का विशद वर्णन तथा तथा गॅगाणी तीर्थ के जीर्णोद्धार का प्रसग कवि ने सुन्दर शब्दो मे व्यक्त किया है। १६ मे तपवर्णन, १७ वे मे स्तम्भतीर्थ चातुर्मास वर्णन, १८ वे मे सम्राट जहाँगीर पर प्रभाव और महातपा विरुद प्राप्ति तथा सागर पराजय का वर्णन है और १९ वे सर्ग मे नायक के औदार्यादि गुणों का व्याख्यान है । यह कवि की अन्तिम रचना है । इसके पश्चात् की कोई भी कृति प्राप्त नही होती है । इस काव्य के ऊपर सम सामयिक प्रसिद्ध साहित्यकार उपाध्याय श्रीमेघ- विजयजी प्रणीत अवचूरि प्राप्त है । इस काव्य की दो सुन्दर प्रतियाँ जयचन्द्रजी भण्डार बीकानेर व हरिसागरसूरि भण्डार लोहावट मे है । विद्वप्रबोध काव्य के अन्त मे निर्माण काल का उल्लेख न होने से समयनिर्धारण नही किया जा सकता। किन्तु यह रचना अत्यन्त प्रौढ, क्लिष्ट एव पाण्डित्य पूर्ण होने के कारण स १६६० के पश्चात् की ही लगती है। इसकी रचना वलभद्रपुर (सभव है उसे ही आज-कल 'बालोतरा' कहते हो, जो जोधपुर स्टेट मे पचपदरा परगने मे है) मे श्रीबलभद्र की विशिष्ट विद्वद्गोष्टी मे प्रयोजन उपस्थित होने पर मेधावियो के अभिमान को मथन करने के लिये की गई है ५९ विद्वत्प्रबोधनामाय, ग्रन्थो विद्वत्प्रबोधकृत् । स्फूर्जच्छी बलभद्रे, श्रीबलभद्रपुरे बरे ॥२॥ विद्वद्गोष्ठयां विशिष्टाया, सजताया प्रयोजनम् । एतद्ग्रन्थस्य मेधाव्यभिमानोन्मथनाय वे ।। ३ ।। सयोगिवर्ण निगृणाति विद्वान्, योऽय तमादौ च विधाय विद्वान् । दिव्येषु पादेषु चतुर्वशङ्क , सद्य सुपद्य विदधातु हृद्यम् ।।४।। इसमे तीन परिच्छेद है और प्रत्येक मे क्रमश ५६,६० तथा २१ पद्य है । प्रथम परिच्छेद मे चतुष्पादधारी गज, अश्व, वृषभ, सिह और उष्ट्र का वर्णन है । द्वितीय परिच्छेद मे द्विपदधारी शुक, तित्तिरि, हस, वक, चक्रवाक, सारस, टिटिभ, मयूर ओर चाष पक्षियो का वर्णन है तथा तृतीय परिच्छेद मे साधु, पण्डित और वीर का सयोगि वर्गों को ग्रहण कर वर्णन किया है । सयुक्त वर्णो के आधार पर इस प्रकार की विद्वतापूर्ण रचना जैन-साहित्य मे ही नहीं अपितु भारतीय साहित्य मे भी इनी-गिनी ही प्राप्त है । इस दृष्टि से यह काव्य कवि की ऊज्वल कीति को भारतीय वाडमय मे अमर रखने के लिये पर्याप्त है । यह काव्य जिनदत्तसूरि ज्ञान भण्डार सूरत द्वारा महावीर स्तोत्र के साथ प्रकाशित हो चुका है । चतुर्दशस्वरस्थापनवादस्थल इस ग्रन्थ मे सारस्वत व्याकरण मे उल्लिखित १४ चौदह स्वरो की स्थापना की गई है। किसी 'कूर्चाल सरस्वतीविरुदं मन्यमान' प्रतिवादी ने पाच विकल्पो के ६० है 4 द्वारा, ज्योतिष तथा मातृका नाममाला के आधार पर १६ सोलह स्वरो की स्थापना की। उस प्रतिवादी को यथोचित शास्त्रीय प्रमाणो-पाणिनीय, सिद्धहेम, सारस्वत, श्रीकण्ठ आदि व्याकरणो के आधार पर उत्तर देकर, १४ स्वरो की ही स्थापना कर, वादक्षेत्र से उसे पराङमुख किया हो। इसीलिये इस पुस्तिका का नाम भी वादी श्रीवल्लभ ने चतुर्दशस्वरस्थापन बादस्थल रखा प्रतीत होता है। जैसा कि इसकी अवतरणिका से स्पष्ट होता है सन्ति स्वरा के कति च प्रतीता, सारस्वतव्याकरणोक्तयुक्त्या । समस्तशास्त्रार्थविचारवेत्ता, कश्चित् विपश्चित् परिपृच्छतीति । पुरातनव्याकरणाद्यनेक-ग्रन्थानुसारेण सदादरेण । तदुत्तर स्पष्टतया करोति, श्रीवल्लभः पाठक उत्सवाय ।।३।। तद्यथा--इह केचिदहड्तारशिखरिसमा समारूढा , सारासारविचारकरणचातुरीव्यामूढा , कूर्चालसरस्वतीति विरुदमात्मन पाठयन्त , स्वगल्लझल्लरीझात्कारेण अविद्यानटी नाट्यन्त, सकलगाव्दिकचक्रचक्रवर्तिचूडामणिमात्मानं मन्यमाना , स्वराणां चतुर्दशसङ्घयासना विप्रतिपाद्यमाना, अतुच्छमात्सर्यादिअनणुगुणमत्कुणतल्पकल्पा , सङ्कलिताऽल्प- विकल्पा प्रजल्पन्ति जल्पका. स्वरा कियन्त ? इति वदन्तो वादिनः यह वाद किस प्रतिवादी के साथ हुआ? कहाँ पर हुआ ? किसकी सभा मे या अध्यक्षता मे हुआ ? इस
६१
पुस्तिका से ज्ञात नहीं होता । यह रचनां श्रीजिनराजसूरि के
राज्य में हुई है, इव इसमे अपने लिये कवि ने उपाध्याय
पद का उपयोग किया है । अत यह रचना स १६७४ के
पश्चात् की है । यह वादस्थल बहुत ही छोटा है ।
इसकी प्रेसकॉपी मेरे संग्रह मे है ।
अभिधान चिन्तामणि नाममाला टीका की प्रगस्ति
में कवि के नाम के साथ 'वादी श्रीवल्लभ वादी
विशेपण का प्रयोग देखने में आता है । अत यह स्पष्ट
है कि स. १६६७ के पूर्व मे ही आपने किसी वादी के साथ
गास्त्रार्थ कर उसे पराजित कर विजयलक्ष्मी प्राप्त कर
अपने लिये ‘वादी' विशेपण का उपयोग किया हो ओर स.
१६७४ के पश्चात् यह १४ स्वरो विषयक वाद दूसरी
वार हुआ हो ।
उपकेशशब्दव्युत्पत्ति
स १६५५मे विक्रमनगर (बीकानेर) मे उपकेगगच्छीय
ककुदाचार्य सन्तानीय श्रीसिद्धसूरि के आग्रह से उदारता
पूर्वक ओकेश और उपकेग इन दोनो शब्दो के ५ - ५ अर्थ
व्युत्पत्ति प्रदर्शन पूर्वक बहुत ही सुन्दर पद्धति से लिखे है
"स १६५५वर्षे श्रीमद्विक्रमनगरे सकलवादिवृन्दकन्द-
कुद्दालककुवाचार्यसन्तानीय श्रीमच्छी सिद्धसूरीश्वराणामालहतः
श्रीमद्वृहत्खरतरगच्छीय वाचनाचार्यधुर्यश्रीज्ञानविमल-
१ श्रीजिनराजसूरीन्द्रे, धर्मराज्य विधातरि ।
अस्मिन् खरतरे गच्छे, धर्मराज्य विधातरि ॥ १ ॥
६२ गणिशिष्य पण्डित श्रीवल्लभगणिविरचिता ओकेग-उपकेश- पदद्वयदशार्थी समाप्ता ।" उपकेशशब्दव्युत्पत्ति की प्राय प्रत्येक प्रतियों के साथ मे ही "खरतरशब्दव्युत्पत्ति' भी लिखी हुई प्राप्त होती है । सभव है यह कृति भी आपकी ही हो । टीका-ग्रन्थ अरजिनस्तववृत्तिः अरजिनस्तव पर ही आप की यह स्वोपज्ञ टीका है। सहस्रदलात्मक इस चित्रकाव्य पर आप की यह टीका न होती तो इस की मार्मिकता समझने मे काफी असुविधाएँ रहती । इस टीका का निर्माण काल लेखक ने प्रशस्ति मे नही दिया है, फिर भी प्रशस्ति से कुछ अनुमान किया जा सकता है खरतरगणजलधिसमुल्लासनरजनीपतिप्रकाराणाम् । नम्रानेकनराणा, श्रीजिनमाणिक्यसूरीणाम् ।। १ ।। पट्टे वरे[ऽधि]विजयिषु, कुमतिलतावातनाशनहिमेषु । श्रीमच्छ्रीजिनचन्द्राभिधानसूरिष्वधीशेषु ।। २ ।। येषा स्फुरत्प्रतापाधिक्यजित सन् निरन्तर भानु । भ्रमतितमावियति हि ते, ज्ञानविमलवाचका नन्धु ।।३।। तत्पादाम्बुजमधुकरशिष्यश्रीवल्लभेन गणिना वै । विहिता स्तववृत्तिरिय, यदनृतमिह तद्बुधै. शोध्यम् ।।४।।
इस मे अपने लिये श्रीवल्लभ ने श्रीवल्लभेन गणिना" गणि शब्द का प्रयोग किया है । उपाध्याय पद प्रकरण मे हम देख चुके है कि स १६५५ मे आप को गणि पद प्राप्त हुआ था, स १९५४ तक तो आप केवल मुनि श्रीवल्लभ ही थे । अत इस की रचना १६५५ के वाद की ही है । और दूसरी वात, 'श्रीमच्छी जिनचन्द्राभिधान- सूरिष्वधीशेषु' श्रीजिनचन्द्रसूरि के विजय राज्य मे आता है । आचार्य जिनचन्द्र का १६७० मे स्वर्गवास हुआ था, अत. १६५५ और १६७० के मध्यकाल में इस की रचना हुई है, स्पष्ट है । साथ ही यह मानना भी अनुपयुक्त न होगा कि मूल और टीका की रचना साथ-साथ ही हुई है। यह लेखक के प्रौढावस्था की रचना है, अत इस की भापा भी बहुत ही प्राञ्जल और प्रवाहपूर्ण है । इस स्तोत्र मे लेखक को अनिष्पन्न और अप्रचलित शब्दों को रकारगर्भित करने के लिये जिस योजना-कौशल और पाण्डित्य की आवश्यकता थी वह इसमे पूर्णरूपेण विद्यमान है । जहाँ १००० रकार प्रधान काव्य की रचना करना हो, वहाँ उस काव्य मे प्राय अधिक शव्द तो अप्रसिद्ध ही प्रयुक्त होते है उन्हे सिद्ध करने के लिये उणादिसूत्र और अनेकार्थी तथा एकाक्षरी नाममालाओ का आश्रय लेना पडता है । टीकाकार ने भी इसमे हैमव्याकरण, उणादिसूत्र, धातु- पारायण, कविकल्पद्रुम, अनेकार्थनाममाला, सौभरि, सुधा- कलश, विश्वशभु, ध्वनिमञ्जरी आदि एकाक्षरी नाममालाओं - ६८ -- दुख के आधार पर ही गब्दो की निप्पत्ति की है। उदाहरण के लिये देखिए :- पच ४१ मे 'कठोरकालूरविदारसायुः' पद की व्याख्या- "कठोरकालू रविदारमायु." कठोर-दृढ कं-दुखं येपां ते कठोरका , "कं गिर कं सुख तोयं, पयो [सौ. ए. २०] इत्युक्ते , कठोरकाश्च ते आलूराश्च-विटाः कठोरकालूरास्तेपा विगतो दारः- भय यस्मात् स कठोर- कालूरविनारः, आलूरशब्द उणादिविटवाची, साया:-लक्ष्म्याः आयु:-जीवन यस्मात् सायुः, द्वाभ्या कर्मधारये कठोरकालूर- विदारसायुः, “ ईण्क् गतौ" " कृवापाजिस्वदिसाध्यगौदृस्ना- सनिजानिरहीणभ्य उण्" [सि है. उ सू १] इति सूत्रेण उण् प्रत्यये आयुरिति, पुरुपः गकट औपध जीवन पुरुरवः पुत्रो वा” इति आकारः पादपूरणार्थ ।।१४।। इसी प्रकार पच ४१ के कुछ अंशो का रसास्वादन करिए संसार. ॥ श्री अरनाथजिन 'संसरणनीरधितीरं' ससरणं- ससरण त्वसम्बाधचमूगतौ । ससारे" [अने सं कां. ३ श्लो. १४६३-६४] इति हैमानेकार्थोक्तेः, संसरण- मेवनीरधि:--- संसारसागरः, नीरशब्दो जलवाची औणादिक, तस्य तीरं-प्रान्तं तटं वा संसरणनीरवितीरं 'पस्फार' प्राप्तवान्, “स्फर स्फलत् स्फुरणे, चलने [इत्येके]" इति वातुपारायणवचनाद्, गत्यर्थानां प्राप्त्यर्थत्वात् परोक्षाया णवि ६५ [ नरा, रूपम् । किम्भूत. [मुश्री ] ? , इत्वरनोद्धारपुष्करसुसूरविदार- जित्वर.' "इण्क् गतौ" ज्ञानार्योऽत्र, यत्नीत्येवशीला. “सृजी- नगष्ट्वरप्" [सि हे. ५-२-७७] इत्यनेन ट्वरपि इत्वरा - पण्डिता दा नो नरे च सनाथेऽपि [वि ए ७६] इति विश्वगम्भूक्ते , तेपॉ उद्धार -उद्धरण ससारपातादिति येषा ते नोद्धारा , इत्वराश्च ते नोद्धाराश्च इत्वरनोद्धारा , त एव पुष्कराणि-पद्मानि तेपा विकासेन सुसूर इव - प्रधानभानुरिव योऽसौ इत्वरनोद्धारपुष्करसुसूर. विदारे-सडग्रामे “विदारो युधि" [अने स का ३ श्लो १२०३] इति वचनप्रामाण्यात्, शत्रून् जयतीत्येवशील: सृजीनगष्ट्वरप्" [सि हे ५-२-७७] इति ट्वरपि विदारः, इत्वरनोद्धारपुष्करसुसूरश्चासौ विदार- जित्वरश्चेति कर्मधारये इत्वरनोद्धारपुष्करसुसूरविदार- जित्वर । पुन किम्भूत सुश्री ? 'अकन्तु ' निष्कामः, कन्तु कामकुसूलयो." [अने स का २ श्लो १७५] इत्युक्ते । पुन किम्भूत सुश्री. ? ' रपकौ' “रप भाषणे अकचि रपन्ति-भापन्ते स्याद्वादमिति रपकास्तान् अवति- रक्षति योऽनौ तथा।" - शिलोछनाममाला-वृत्ति कलिकाल सर्वज्ञ आचार्यप्रवर श्रीहेमचन्द्राचार्य प्रणीत अभिधानचिन्तामणिनाममाला की 'शिलो-छ' करने की
इच्छावाले' लघुखरतरशाखीय मुहम्मदतुगलकप्रतिवोधक
आचार्य जिनप्रभसूरि के शिष्य आचार्य जिनदेवसूरि२ ने
स १४३३ ३ मे इसकी रचना की । उस पर श्रीवल्लभ
ने हैमव्याकरण, हैमोणादि, हैमकोष नाममाला आदि ग्रंथों
का अवलोकन कर स १६५४ चैत्र कृष्णा सप्तमी के
१ तत्र प्रथममनेककोविदवदारुप्रवरनरविन्दवन्दितपादारविन्दविलमद्-
वाग्युक्त्तिव्यक्तिशक्तिविजितरामस्तप्रगस्तग्रन्थपरमार्थसमविगतपना-
र्थसार्थश्रीमत्पुरन्दरसूरयस्तर्कव्याकरणसाहित्यालङकारछन्दोज्योतिप-
नाटकपेटकप्रमुखानेकनन्यकोटयम्भोनिधय श्रीमद्बद्धतरवर-
तरगच्छालङ्कारस्फारहारप्रकारसारश्रीजिनप्रभसूरिशिष्यश्रीजिनदेव -
सूरय
श्री हेमचन्द्राचार्यविरचिता-
भिधानचिन्ताणिनाममालाशिलोञ्छवार्तुमिच्छव
(शिलोच्छटीकाया भूमिका)
२ जिनदेवसूरि के मातका नाम वीरिणी था और पिता का नाम था कुल-
धर। आचार्य जिनप्रभ सूरि के पास आपने दीक्षा ग्रहण की थी।
जिनप्रभसूरि ने आपको अपने पट्ट पर स्थापित किया था। सुलतान
मुहम्मद तुगलक से जव सूरिजी मिले थे उस समय भी आप साथ
थे। सूरिजी के विहार करने के पश्चात् आप सुलतान के पास बहुत
अर्से तक रहे थे और इनका सुलतान पर प्रभाव भी अच्छा था।
आपकी रचित दो ही कृतियाँ प्राप्त होती है, शिलोञ्छनाममाला और
कालिकाचार्य कथा। ये दोनो ही प्रकाशित हो चुकी है। आपका
विशिष्ट परिचय जानने के लिए लालचन्द्र भगवानदास गाधी
लिखित 'आचार्य जिनप्रभसूरि अने मुहम्मद तुगलक' एव नाहटा वधु
लिखित 'शासनत्रभावक जिनप्रभमूरि' निवन्ध देखना चाहिये।
३ वैक्रमेन्दे त्रिविश्वेन्दुमिते राधाद्यपक्षतो।
ग्रन्योन्य ददृभे श्रीमज्जिनदेवमुनीश्वरै ॥५७ ॥
६७ दिवस मूलार्क मे नागपुर (वर्तमान-नागोर) मे टीका की रचना पूर्ण की। इसका ग्रथमान १३०० श्लोक परिमाण है । सभव है इस टीका का प्रारम्भ फलवर्द्धि पार्श्वनाथ (मेडतारीड) मे किया हो, कारण कि मङ्गलाचारण मे 'श्रीमच्छी फलवर्द्धिकाभिधपुरी' स्थित 'पार्श्वनाथ' को नमस्कार किया है । जैसा कि प्रगस्ति से स्पष्ट है श्रीज्ञानविमलपाठकसत्पादाम्भोजचञ्चरीकेण । श्रीवल्लभेन रचिता गिलोञ्छशास्त्रे शुभा टीका ॥१६॥ हेमव्याकृति-हेमोणादिग्रथादिनामकोशॉश्च । दृष्ट्वा विमृश्य वाढ, प्रसादमासाद्यपूज्यानाम् ।।२०।। वेदेन्द्रियरसपृथ्वीसङ्खये वसु नागपुरनगरे । मधुमासाद्ये पक्षे मूलार्के सप्तमीतिथ्याम् ।।२१।। * त्रयोदशशतान्येव, ग्रन्थमान विनिश्चितम् । अस्या गिलोञ्छटीकाया , अनुमित्या कृत शुभम् ।। २८ ।। यह आप की सर्वप्रथम टीकाकृति है । शेषसंग्रह दीपिका अशिधानचिन्तामणिनाममाला मे कथित शब्दो के अतिरिक्त शब्दो का संग्रह आचार्य हेमचन्द्र ने 'शेपसग्रह- नाममाला' के रूप मे किया । इस की टीका 'दीपिका' के नाम से, हैमव्याकरण, हैमोणादि, धातुपारायण, विश्व- कोष, अनेकार्थकोष, वैजयन्ती, वाचस्पति, मार्कण्डेयपुराण आदि ग्रन्थो का अवलोकन कर, स १६५४ श्रावण शुक्ला ६८ अष्टमी को बीकानेर मे, नृपति श्रीरायसिहजी के विजय राज्य मे, १९०० ग्रन्थ परिमाण रचना पूर्ण की तेषा विख्यातकीर्तीणा, गुरूणामन्तिपदाऽणुना । कृता श्रीवल्लभेनेय, शेषसग्रहदीपिका ।। १८ ।। हैमव्याकरणोणादिधातुपारायणानि च । विश्वकोषाद्यनेकार्थनामकोशकदम्बकम् ।। १६ ।। वर्षे शतानन्दमुखेन्द्रियेशपुत्राननाब्जप्रमिते वरिष्ठे । अष्टम्यहे मासि नभस्य कृष्ण श्रेष्ठे पुरे विक्रमनामधेये ॥२०॥ श्रीविक्रमवशोद्भवसद्विक्रमराजसिहनृपराज्ये । सल्लोककोकसम्मदविधानभानू परे रम्ये ।। २१ ।। अभिधानचिन्तामणिनाममाला-सारोद्धार-टीका आपने आचार्य हेमचन्द्र प्रणीत अभिधानचिन्तामणि- नाममाला पर स १६६७ मे, जोधपुर मे, महाराजा श्रीशूरसिंहजी के राज्यत्वकाल मे 'सारोद्धार' नामक विस्तृत टीका की रचना पूर्ण की --- तथा योधपुरद्रङ्गे, सूरसिंहन रेशितुः । राज्ये च वत्सरे सप्तषष्ठिषट्चन्द्रसम्मिते ॥ ७ ॥ * तच्छिष्यो वाचनाचार्यों वादी श्रीवल्लभोऽदृभत् । श्रीहेमनाममालायाः, नाम्नां सारोद्धृतिशुभाम् ।। ११ ।। हैमव्याकरणोणादिपाणिनीयादिक भृशम् । दृष्ट्वैषोऽत्रोद्यमश्चक्रे, नामकोशाश्च भूयसः ।। १२ ।।
६९
मूत्रवृत्त्यो सहस्राणि, नवपञ्चशतानि च ।
ग्रन्थमानमिह ज्ञेय, सर्वमेव विचक्षण ।।१८।।
यह टीका बहुत ही प्रौढ ओर विशाल है । इसमे
टीकाकार ने शब्दो के पर्याय मात्र देने के चक्कर मे न
फसकर विशिष्ट शब्दों की सिद्धि और व्युत्पत्ति तथा
भूरिन ग्रन्थो के उद्धरणो द्वारा टीका को स्पष्ट और सरस
बनाने का प्रयत्न किया है । इस टीका मे उद्धरणो की
अत्यधिक बहुलता हे जो सामान्य-विद्वान् के अधिकार की
वस्तु नहीं किन्तु प्रौढ-प्रतिभाशाली के निपुणता की द्योतक
है । व्याख्या में लगभग एकसौ सत्तर ग्रन्थों के उद्धरण
दिये है, वे भी एक दो नही किन्तु प्रचुर परिमाण मे ।
साथ ही इसकी एक विशेषता यह भी है कि सस्कृत
शब्दो का व्यवहार देश्यशब्दो में किस प्रकार होता है
इसको दिखलाने के लिये उन्हों ने प्राय " इति भाषा
कहकर राजस्थानी भाषा के घरेलु और साहित्यिक लगभग
२५०० शब्दो का प्रयोग किया है, जो राजस्थानी भाषा
तथा साहित्य की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है ।
भविष्य मे यदि सभव हो सका तो श्रीवल्लभजी के टीका-
ग्रन्थों मे उद्धृत सम्पूर्ण राजस्थानी शब्द कोष तैयार कर
साहित्य-मनीषियो की सेवा मे रखने का प्रयत्न करूँगा।
कही कही किसी शब्द की व्युत्पत्ति की मान्यता मे
और साधना मे अन्तर है वही व्याख्याकार ने कई
वैयाकरणो एव कोषो द्वारा अपने मत को सिद्ध करने
७० न्यासकारः का प्रयत्न किया है जो कि निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट हो जायगा पडिक्तसमूहनामैकं गाभिणम् ‘गभिण्या क्षेत्रपडक्तय- स्तासां गाभिणम्' इति गणरत्नमहोदधिवृत्ति । अत्र गर्भिणी शब्दो मेघमालाशालापडक्तयादिवाचकत्वात् अचित्तविशेषवचन इति इकण प्राप्तौ तद्वाधको 'भिक्षादे : ‘इति सूत्रेण अन् ततो 'जातिश्चणि' इति पुवद्भावे, सप्तमाध्यायचतुर्थपाद- वृत्तिपञ्चाशत्तमसूत्रेण 'सयोगादिन.' इत्यन्तलोपप्रतिषेध । गर्भवतीस्त्रीवचनात्तु इकणोऽप्राप्तेरौत्सर्गिकवचनाण् इति । अतो गर्भवतीनां स्त्रीणां वृन्दानामपि गाभिणामिति । . . . तरूणीना स्त्रीणा वृन्दनामैकं “यौवतम्" चतुर्थवर्गाद्यान्तोऽयम् । युवतिगव्दस्य भिक्षादिगणमध्ये पाठात् पुवद्भावो न भवति । यत् काशिकाकार . 'युवतिशब्दोऽत्र पठ्यते । तस्य ग्रहणसामर्थ्यात् पुवद्भावो न भवति।' अतो ' अवर्णवर्णस्य' इति, युवतिशब्दसम्बधित- स्तवर्गप्रथमस्य तृतीयस्वरलोपे योवतं चन्द्राचार्याभिप्रायेण । वस्तुतस्तु तद्धितप्रत्ययोत्पत्ते. प्रायेण पुवद्भावेन भवितव्यम् । ततो युवतीना समूहं यौवन, 'भिक्षादे ' इत्यण्, 'जातिश्चणि' तद्धित-'यस्वरे' इति पुवद्भावे तीतिवर्णलोपे यौवन चतुर्थवर्गपञ्चमान्तोऽयम् । यतः उक्तं भाष्यकारण- भिक्षादिषु युवतिग्रहणानर्थक्य पुवद्भावस्य सिद्धत्वात् प्रत्ययविधात् इति । सुरूपमतिनैपथ्य कुशलयौवनम् । यस्य पुण्यकृत प्रैष्यं सफलं तस्य यौवनम् ।। इति, यस्य पुण्यकृत.- पुण्यकर्तु. पुरुषस्य कलाकुगलयौवन- यथा कला- ७१ भाव " कलाचतुरतरुणीवृन्द प्रेष्य-आज्ञाकारि तस्या यौवन-यूनो सफल इत्यन्वय । कीदृश स्वरुप ? अतिनेपथ्य यस्य तत् अतिनेपथ्य इति श्लोकार्थ । यौवत चतुर्थवर्ग- प्रथमान्त' स्वमते, परमते तु यौवन चतुर्थवर्गपञ्चमान्त , इत्युभय तरुणीवृन्दवाचक ज्ञेयम् ।" (का, ६ श्लो ५१ की टीका, पृ १३०-१) इससे इनका शव्द व्युत्पत्ति ज्ञान और कोश-काव्य- ज्ञान का परिचय मिलता है । दुर्भाग्य है कि इस प्रकार की महत्त्वपूर्ण टीका साहित्य-जगत मे प्रकाश मे अभी तक नही आई है । जैन सस्थाओ का कर्तव्य है कि इस प्रकार की टीकाओ का प्रकाशन शीघ्र और अवश्य करे । इसमे का ६ पद्य १७१ की व्याख्या मे सवत् शब्द का उदाहरण देने के लिये श्रीवल्लभजी 'सिद्धहेमकुमार सवत् ' का उल्लेख करते है जो ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्व का है। इससे यह तो निश्चित है कि इस सिद्धहेमकुमार सवत् का नाम प्रचलन १७ वी शती के उतरार्द्ध तक अवश्य था - तदनन्तर तो सभवत इस नाम का उल्लेख भी प्राप्त नहीं होता । निघण्टुशेषनाममाला टीका अमिधानचिन्तामणि नाममाला का ४ पद्य २०८ की टीका "रायणिनामानि श्रीहेमचन्द्राचार्यकृतहेमनिघण्टुशेषो- क्तानि ज्ञेयानि । तद्यथा - राजादने तु राजन्या आदि । एतेषा व्युत्पत्तिस्तु अस्मत्कृत निघण्टुशेषटीकातो ज्ञेया ।"
७२
से स्पष्ट है कि आपने निघण्टुशेषनाममाला पर टीका की
रचना की, पर दुर्भाग्य है कि आज वह प्राप्त ही नही
है, सभव है नष्ट हो गई ।
सिद्धहेमशब्दानुशासनवृत्ति
आचार्य हेमचन्द्र प्रणीत सिद्धहेमशव्दानुशासन पर
आपने वृत्ति की रचना है । इस की एक मात्र प्रति
'विजयधर्म-लक्ष्मी-ज्ञानमन्दिर, आगरा' मे सुरक्षित है ।
पत्र संख्या १४३ है । इस प्रकार की सूचना भाई श्री
भंवरलालजी नाहटा से स २००२ मे प्राप्त हुई थी ।
टीकाकार ने कब इस की रचना की? यह इन के प्रारम्भिक
काल की रचना है अथवा प्रौढावस्था की? इस विषय मे
प्रति के सन्मुख न होने के कारण कुछ भी निश्चय से
नहीं कहा जा सकता। परन्तु इस की पत्र सख्या १४३
होने से यह अनुमान अवश्य होता है कि टीका विशद
और प्रौढ होनी चाहिये ।
दुर्गपदप्रबोधवृत्ति
श्री हेमचन्द्राचार्य प्रणीत हेमलिङ्गानुगासनविवरण पर
दुर्गपदप्रबोध नामक टीका की रचना आचार्य जिनचन्द्रसूरि
एव तत्पट्टधर श्री जिनसिहसूरि के धर्मराज्य मे विचरण
करते हुए आपने वि. स १६६१ कार्तिक शुक्ला सप्तमी को
जोधपुर मे नरेश सूरसिंहजी के विजय राज्य मे अनेक शास्त्रो
का अवलोकन कर २००० ग्रन्थ परिमाण मे की
मोहद्रोहवनप्लुप स्मरपिष प्रध्वस्तदोपद्विप , पापक्लेशमुप सनद्गतरुप चारित्रलक्ष्मीपुप । पुष्पश्रीपजुप प्रशान्तवपुप स्फूर्जद्यशोज्योतिप , तत्पट्टे जिनसिहसूरिगुरवो नन्दन्ति दिव्यौजस ।।३।। J श्रीमद्योधपुरे द्रडगे सूरसिंहमहीपतौ । प्राज्यराज्य श्रिय शश्वच्छास्तरि प्रभुतोदये ।।५।। भूमिपड्रसतुङ्गीशसङ्खये वर्षे सुखाधिके । मासि कातिकिके कान्ते, सुदिने सप्तमीदिने ।।६।। तेषा शिष्यवरैश्चक्रे, श्रीश्रीवल्लभवाचक । दुर्गपदप्रबोधोऽय, प्रकटज्ञानहेतवे ।।६।। श्रीहेमचन्द्रसूरीन्द्रकृते लिङ्गानुशासने । विद्यते या शुभावृत्तिस्तस्यदुर्गार्थवोधद ॥१०॥ सहस्रद्वितय ग्रन्थमानमत्रोदित शुभम् । गणनया च वर्णानामनुमित्यावसीयते ।।११।। वृत्ति की रचना मूल लिङ्गानुशासन पर नही की गई । इसमे ‘या शुभावृत्ति विद्यते तस्य दुर्गार्थबोधद से स्पष्ट है कि आ० हेमचन्द्र का ही जो लिङ्गानुशासन के ऊपर स्वोपज्ञ विवरण है उसमे जिन-जिन स्थानो मे जहाँ दौर्गस्य या काठिन्य है उन ही स्थलो पर इसमे विवेचन किया गया है । इसीलिये इस विवरण का नाम दुर्गपद- प्रबोध रखा गया है ।
७४
यह टीका भी बहुत सुन्दर है । इसमें भी 'इति
प्रसिद्धे' कहकर लगभग १४०० देश्य शब्दों का प्रयोग
किया गया है । इसका सम्पादन भी सुन्दर रूप से होकर
'श्री अमी सोम जैन ग्रन्थमाला, बम्बई द्वारा प्रकागित
हो चुका है।
सारस्वतप्रयोगनिर्णय
जिनराजसूरि के राज्य मे (स. १६७४ से १६९०)
इसकी रचना हुई है। इसकी एक मात्र २३ पत्र की
अपूर्ण प्रति ‘भावहर्षीय खरतर. भंडार, वालोतरा' मे
है । ऐसी सूचना भाई श्रीअगरचन्दजी नाहटा ने दी है।
जैसा कि नाम से ही स्पप्ट है कि भारस्वतव्याकरण के
प्रयोगो का इसमें निर्णय-साधन किया गया है। प्रौढावस्था
की कृति होने के कारण संभवत : यह भी महत्वपूर्ण हो,
पर प्रति के नन्मुख न होने के कारण विशेष कुछ भी नहीं
कहा जा सकता।
केशा :- पदव्याख्या
केगा'
सारस्वत व्याकरणस्थ
इस पद्य की व्याख्या
इसमें सुन्दरतम पद्धति से की गई है। इस एक श्लोक की
व्याख्या में भी टीकाकार ने सिद्धहेम, पाणिनीय, विश्वगम्भु,
अमर हेमनिघण्ट, श्रीधर इत्यादि के उद्धरणो के साथ
१. केगा: कंजलिका गाभा ., करकारिपिनाकमा .।
विविनोगत यो दय , शंबोजांबुनगौकन ॥६॥
७५
आ-म
अ-
स
इसको सरल और सरस बनाने का प्रयत्न किया है ।
इसकी रचना कब हुई निश्चित नहीं कहा जा सकता ।
इसकी एकमात्र प्रति महिमा भक्ति जैन ज्ञान भण्डार,
वीकानेर, पो ७० ग्र १८६० मे सुरक्षित है। पत्र संख्या
केवल एक ही है । इसका आद्यन्त इस प्रकार है
सारस्वतस्य सूत्रे यत्, केशा इति पद स्फुटम्
तच्छ्लोकटीकामाचष्टे,
श्रीश्रीवल्लभवाचक ॥१॥
कृतश्चाय श्रीज्ञानविमलमहोपाध्यायमिश्राणा शिष्य
वाचनाचार्यश्रीवल्लभगणिभि , च शिष्यादिभिर्वाच्य-
मानश्चिर नन्द्यात्, श्रीशारदाप्रसादात् ।
चतुर्दशगुणस्थानस्वाध्याय
यह स्वाध्याय (सज्झाय) भाषा मे गुफित है ।
इसमे १४ गुणस्थानो का क्रमश वर्णन है । इसके २३
पद्य है । इसका आद्यन्त इस प्रकार है
आदि
समरवि वीर जिणेसर देव, जसु सुरपति सवि सारइ सेव ।
सुगुरुतणा बचन निसुणेवी, पभणिसु गुणठाणानु भेवी ।।१।।
अन्त
एय कुसलकारक दुखनिवारक चउद थानिकी जाणीइ,
जिन तणी वाणी हीइ आणि सुमतिमान वरनाणीइ ।
जे सुणिअ निव्रत करि एक चित्त सुथिर समकित तेह तणओ,
श्रीवल्लभ मुनिवर भणि जिनवर तिहा घरी हुई सुखघणो
॥२३॥
परिशिष्ट परिचय
क
?
है
भारतीय वाडमय मे सहस्रदलात्मक चित्र-काव्यो मे
यह दूसरी कृति है। इसका रचना समय अज्ञात है।
इसके कर्ता कौन है? इस स्तोत्र की पंक्तियों से अस्पष्ट
है । 'श्रीरत्न श्रीलघरज' नाम आते है पर निश्चित
नहीं कहा जा सकता कि किस कवि ने इसका प्रणयन
पर हाँ, इतनी वात निश्चित है कि कवि
खरतर" [पद्य ३७ ] गच्छीय विद्वान था । इस स्तोत्र
की विशेषताएँ निम्नलिखित है --
किया है।
यह स्तोत्र चौवीसवे गासनपति श्रीमहावीर को लक्ष्य
में रखकर बनाया गया है। इसमे ३८ पद्य है। अनेक
प्रकार के छन्दों का कवि ने स्वतन्त्रता से प्रयोग किया
है । 'अरजिनस्तद' की तरह कवि ने 'र" का प्रयोग
किया है। अरजिनस्तवकार ने दो अक्षरों के पश्चात् र
का प्रयोग किया है किन्तु इस स्तोत्रकार ने एक अक्षर के
पश्चात् ही र का प्रयोग किया है और वह भी १०१६
रकार। एक अक्षर के पश्चात् ही कार होने के कारण
तथा वृत्ति का अभाव होने से इसकी मार्मिकता को
समझने में हम असफल रहे है । अतः सभव है यत्र तत्र
अशुद्धियाँ रह गई हों।
७७
ख
शतदलकसलमय
पान-स्तव के कर्ता उपाध्याय
सहजनीत्ति खरतरगच्छीय क्षेमशाखा के वाचक रत्नसार
के शिष्य थे। संस्कृत-साहित्य के विशेषत व्याकरण,
कोष और साहित्य के आप प्रकाण्ड विद्वान थे, साथ ही
थे कवि भी । इनके ऋजुमाझ नामक व्याकरण, नामकोष
नामक कोप, सारस्वत वृत्ति, फल्पसूत्र वृत्ति (कल्पमजरी)
आदि उल्लेखनीय रचनाएँ प्राप्त है। वैसे रास और
छोटी-मोटी टीकाएँ आदि मिलाकर लग पग २८ ग्रन्थ
उपलब्ध है।
इस स्तोत्र की रचना स १६७५ मार्गशीर्ष शुक्ला
द्वादशी को लोद्रपुर (वर्तमान-लौद्रवा, जेसलमेर से ३ कोस)
मे हुई है । लोद्रपुर पत्तन मे जिनेश्वर प्रसाद (जो जीर्ण
हो गया था ) का जेसलमीर निवासी शाह थाहरु ने
जीर्णोद्धार करवाकर खरतरगच्छाचार्य जिनराजसरि से
इसी दिवस प्रतिष्ठा सम्पन्न करवाई थी। उसी के
उपलक्ष मे उसी दिवस कवि ने इसकी रचना पूर्ण की है।
ऐसा कमलस्थ बहि लेखन से प्रकट है ।
उपर्युक्त दोनो चित्रकाव्यो से इसकी रचना-पद्धति
भिन्न है। इसमे “म” को मध्यबिन्दु मे रखा है और
अक्षरों के पश्चात् म का प्रयोग न करके प्रत्येक पाद के
अन्त मे म का प्रयोग किय है। साथ ही प्रत्येक पाद के
७८
प्रथमाक्षर का सयुक्त और मुक्तक रूप से स्वतन्त्र ही ३
पद्यो मे कवि ने रसास्वादन करवाया है । काव्य बहुत ही
सुन्दर बन पड़ा है। इससे कवि की उच्च प्रतिभा का भी
आभास प्राप्त होता है । इस काव्य में २५ पद्य यन्त्रस्थ
और एक पद्य प्रशस्ति रूप मे तथा ५ पद्य लोद्रपुर
प्रतिष्ठा समय के सूचना देने और रचना का कारण
बतलाने के लिये लिखे गये है जो यन्त्र के बाहिरी भाग मे
उत्कीर्ण है।
यह शिलापट्ट आज भी लोद्रवा पार्श्वनाथ मन्दिर मे
अवस्थित है ।
प्रकाशन का इतिहास
मेरे शिरच्छत्र पूज्यश्वर गुरुदेव श्रीजिनमणिसागरसूरिजी
महाराज का सं २००४ का चातुर्मास कोटा मे था ।
उस वर्ष मै नेमिदूत का सम्पादन कर रहा था । उस
समय परमपूज्य गुरुदेव की यह अभिलाषा और आदेश
था कि 'तू अपने गच्छ के स्तोत्र-साहित्य एवं छोटे-मोटे
काव्यग्रन्थों का सम्पादन कर प्रकाश मे ला ।' इसी विचार
से प्रभावित होकर मैने श्रीनाहटाजी को बीकानेर लिखा
• और नाहटाजी ने भी तत्काल ही इस ग्रन्थ की प्रेसकॉपी
मुझे प्रकाशनार्थ भेज दी । वह प्रेसकॉपी पद्धति से नही
की गई थी इसलिये नाहटाजी के द्वारा ही पूना से प्रति
मगवाकर उसी वर्ष मैने प्रेसकॉपी तैयार की । मुद्रणार्थ
कॉपी को प्रेस मे देने का विचार था, परन्तु इस उच्चकोटि के
. : - ful दिनन.mansitTRAसाद मिटhिuRELAR Aftermacarrzr भन्सार नाम Tamrakarma IFEमरानामानरमनMPETAITRIP- नकलनमrnataलान Traमरमरमान कपुर जमरनाantrun am 41Farmistry HIपरावामपन्msमय सम्म म म स.न... -ar REATREसरममार-मारवानाsair-n-Torrn PHRASHREE म यसमागरबाटरमयसम्मarsसिरना-रारammarrrrrr-A garcatमिटि रटान #marमम्मamar Tarirmware ARET Trmanad रसामुETITINxream meaninm Rafar सोपnिth RATOMYantriनगिन Hear, Writr:शुगरमा न मानar Exrammaar Repal गरननननमान:-पुरमानना Er. srir रयता-स्तरदिरoprबिन AirparanART RAILEReqयादेशापापभिर धर्म Marrierrera seart रनरमरकर याहानामाnaadmemerier लमहरनामाचार FEER नरहनाविनामारmarTREEमानिकतार Ramtirtan पm मा नष्ट पारगमन कल्म Antibiनार भरा, नारत्नविनलसम्मारिकाननाद मामबाट Entries निम्ननिरम अन्तरक्कमभिमान मनमनमदEDEnaren मानामविनायरतिबर गरमाकानन मानिननम्र Arya Aaमर mes विसमरालेवनेनाkhegraर्षया नाamarathi प्रति का आविम पत्र
३
Trrearch
दिसा मात्र
मान्न
4
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अशाfoulanaनतान्त सनाsrFrtant
Pramogसतानाचा प्रामा
सन्दीकालयनिपामिमगमनबारसमा
१
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rera Tryan sixx markmr.
1
प्रतिका अन्तिम पत्र
म
काव्य ग्रन्थ के प्रकाशन मे अशुद्धि बाहुल्य न रह जाय
(कारण कि उस समय मेरा ज्ञान साधारण ही था) अिस
लिये कॉपी शुद्ध करवाने की दृष्टि से गणि श्रीवुद्धिमुनिजी
म० को भेज दी गई । उन्होने भी अवकाश निकाल कर
उसे शुद्ध करके वापिस लौटा दिया ।
इसी बीच मै परीक्षाओ के निमित्त अध्ययन कार्य
जुट गया । फलत प्रकाशन का कार्य बन्द हो गया ।
गत वर्ष मेरा चातुर्मास अहमदावाद था । परीक्षाओ के
चक्र से विनिर्मुक्त हो चुका था । वल्लभभारती की
प्रेसकॉपी बनाने मे सलग्न था । उस समय पुन. इस
स्तोत्र-काव्य की स्मृति आई, प्रकाशन के लिये हृदय
लालायित हो उठा । श्रावक वर्ग को उपदेश देकर मुद्रण के
लिये द्रव्य की व्यवस्था भी की और मुद्रणार्थ पुन. प्रेस
कॉपी तैयार कर ' नवजीवन कार्यालय 'को मुद्रणार्थ देदी।
प्रति-परिचय
प्रस्तुत अरजिनस्तव का सम्पादन करने से हमे एक
ही प्रति प्राप्त हुई है और वह भी 'भाण्डारकर ओरिएन्टल
रिसर्च इन्स्ट्रीच्यूट, पूना' से । यद्यपि प्रति के अन्त मे
लेखक ने लेखन सवत नही दिया है किन्तु प्रति को
देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि यह रचना के कुछ
समय पश्चात् ही लिखी गई है । प्रति प्राय शुद्ध है,
परन्तु कई स्थलो पर काव्यस्थ शब्दों की टीका प्रमाद से
रह गई है, तो कही लेखन मे अशुद्धि भी रह गई है,
८०
जिसकी सूचना टिप्पणी मे दे दी गई है । प्रति के १५
पत्र है । प्रत्येक पत्र मे २१-२१ पक्तियाँ है और प्रत्येक
पक्ति मे ६२-६५ अक्षर है । प्रति की दीर्घता १०।।
इच है, और पृथुता ।।। इच है । प्रति अभी तक
अच्छी हालत मे है ।
परिशिष्ट क-शतदल स्तोत्र का सम्पादन श्रीपूर्णचन्द्रजी
नाहर के जैन लेख संग्रह भाग ३, और प लालचन्द्र
भगवान् गान्धी द्वारा सम्पादित ‘जेसलमीर भाण्डागारीय
ग्रन्थानां सूचि' के आधार पर किया गया है ।
और परिशिष्ट ख सहस्रदलात्मक वीर स्तोत्र
श्रद्धेय भाई-मुनिराज श्रोपुण्यविजयजी महाराज से प्राप्त
हुआ है । इसका एक ही पत्र है । किनारे खडित हो
चुके है । पत्र भी जीर्ण-शीर्ण दशा को प्राप्त हो रहा
। अनुमान है यह पत्र १७वी गती के अन्त मे अथवा
१८वी के प्रारभ पे लिखा गया हो ।
आभार-प्रदर्शन :---
इस ग्रथ के प्रकाशन मे मुझे जिन जिन श्रद्धेय
मनीषियो का और इष्टमण्डली का सहयोग प्राप्त हुआ
है उसके लिये मै हृदय से उनका
कृतज्ञ हूँ। उनके
सहयोग के विना इस काव्य-रत्न का प्रकाश मे आना ही
मुश्किल था ।
सर्वप्रथम मै श्री अगरचन्द्रजी नाहटा को धन्यवाद
देता हूँ जिनकी प्रेरणा से ही इस काव्य के सम्पादन का
The
८१
विचार हुआ ओर सम्पादन के लिये समय-समय पर यथोचित
मामग्री तथा परामर्ग भी प्राप्त हुआ । दूसरे, गणिवर
श्री बुद्धिमुनिजी महाराज का भी मै आभारी हूँ जिन्होने
इसकी कॉपी को मेरे आग्रह पर शुद्ध कर भेजने का
कष्ट उठाया । तीसरे, श्रद्धेय मुनिराज श्री पुण्यविजयजी
म भी धन्यवाद के पात्र है जिन्होने सारे ग्रन्थ के प्रूफ
देखने का कष्ट उठाया । चीथे, मेरे विद्यागुरु डा श्री
फतहसिहजी एम ए डी लिट, का भी मै कृतज्ञ हूँ
जिनके परामर्श से मुझे सम्पादन में बडी सफलता मिली
साथ ही भाण्डारकर ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्ट्रीच्यूट
के क्यूरेटर श्री पी के गोडे को भी मै धन्यवाद दिये
विना नहीं रह सकता, जिनकी कृपा से ही सम्पादनार्थ
इस प्रति को ८ मास तक मैं अपने पास रख सका ।
सूत्रधार एव आर्टिस्ट भाई श्री अमृतलाल सूलशकर
त्रिवेदी भी धन्यवाद के पात्र है जिनने मेरे आग्रह को
स्वीकार कर प्रेम से इस सहस्त्रदलकमल का चित्र बनाया ।
और अहमदावाद का खरतरगच्छ सघ भी धन्यवाद का
भाजन है जिसने की इसके प्रकाशन के लिये द्रव्य की
व्यवस्था की ।
श्रावणी अमावस्या २०१०
कोटा
श्यामासूनु-
दिनयसागर
- 11 1 ॥ अ. अभि. चि. का. अ. चि. ना. वृ.प्र. अने.स. का. अ. स्त. वृ.प्र. ऐ.ज. का. म. कवि. क. जे. - दु.प्र. दु. प्र.प्र. ना. संकेतसूची अभिधान चिन्तामणि नामकोष अभिधान चिन्तामणि काण्ड अभिधान चिन्तामणि नाममाला वृत्ति प्रगस्ति अनेकार्थ सग्रह नाममाला काण्ड अरजिनस्तव वृत्ति प्रशस्ति ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह कवि कल्पद्रुम जेसलमीर भाण्डागारीय ग्रन्थाना सूची दुर्गपदप्रबोध दुर्गपदप्रवोध प्रशस्ति = जैन लेख संग्रह भा. ३ (नाहर) पाणिनीय सिद्धान्त कौमुदी रचना सवत् विश्वशभु एकाक्षरी नाममाला विज्ञप्ति त्रिवेणी विज्ञप्ति त्रिवेणी प्रस्तावना शीलोछनाममाला वृत्ति गीलोछ नाममाला टीका प्रगस्ति शेष सग्रह टीका प्रशस्ति सिद्ध हेम गन्दानुशासन सिद्ध हेम उणादि सूत्र सुधाकलश एकाक्षरी नाममाला सौभरि एकाक्षरी नाममाला पा. सि.को र.स. वि.ए. वि.त्रि. वि.त्रि.प्र. शी. गी.ना. टी.प्र. शे.स टी.प्र. सि. हे. सि.हे. उ. सू. सु. ए. सी. ए. ८२
:
स्वोपनवृत्तिविभूषितः
श्री अरजिनस्तवः
(सहस्रदलकमलमय • )
No text on this page.
अहम्
श्रीमज्जिनमणिसागरसूरिपादपद्मभ्यो नमः
उपाध्यायप्रवरश्रीश्रीवल्लभोपाध्यायविहित :
स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः
श्रीअरनाथजिनस्तवः
(सहस्रदलकमलमयः)
0
[वृत्तिकारमङ्गलाचरणम् ]
स्वकीयविद्यागुरुसत्प्रसादात्,
करोमि वृत्तिं स्तवनस्य चार्वीम् ।
अरं जिनं हर्षकरं प्रणम्य,
सहस्रपत्राम्बुजगभितस्य ॥१॥
तस्य चायमादिः
असुरनिर्जरबन्धुरशेखर-
प्रचुरभव्यरजोभिर पञ्जिरम् ।
क्रमरजं शिरसा सरसं वरं,
जिन! रमेश्वर! मेदुरशङ्कर! ॥१॥
२ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः व्याख्या प्रवरवर्णरसागरचन्दिर! जठररागरसाबिरसङ्गर! । मुचिरकृन्तर भीतरभदर!, कुरु रमं भरमामरहत्यर! ॥२॥ [युग्मम् ] हे 'जिन! हे तीर्थकर हे अरनाथ! तवेति शेष., 'क्रमरज' रात्-जलाज्जात रज-कमलं, क्रम.-चरण ,स एन रजं क्रमरज 'शिरसा' मस्तकेन [वन्दे] इत्यध्याहार्यम् । किम्भूतं क्रमरज? 'पञ्जिरम्' पीतम्, के ? 'असुरनिर्जरवन्धुर- शेखरप्रचुरभव्यरजोभि.' असुरा:-असुरकुमाराः निर्जरा.-वैमा- निकत्रिदशास्तेषा ये बन्धुरशेखरा:-मनोहरापीडास्तेषा यानि प्रचुरभव्यरजासि-बहुलचारुपरागास्तैः । 'अ' पादपूरणार्थमव्य- यम् । पुनः किम्भूत क्रमरज? 'सरस' रसयुक्तम् । पुनः किम्भूत क्रमरज? 'वर' प्रधानम् । किम्भूत हे जिन! ? 'रमेश्वर!' लक्ष्मीनाथ! । पुन. किम्भूत जिन! ? 'मेदुरशङ्कर।' प्रमोदेन मेद्यन्तीत्येवशीलाः "भजिभासिमिदो घुर" [सि हे ५।२७४] इतिधुरः, मेदुरा.-प्रमोदपिच्छिलास्तान् प्रति श-सुख करोतीति मेदुरशङ्करस्तस्यामन्त्रणम् ।।१।। हे आमरहत्यर! "रह त्यागे" "इकिस्तिव स्वरूपार्थे" [सि. हे. ५।३।१३८] इति तिवि रहति -त्यजनं, आमाना- रोगाणा रहतिर्यस्य यस्माद्वा आमरहतिः, स चासौ अर - अरजिनस्तस्यामन्त्रण हे आमरहत्यर! त्व 'रम भर' प्रधान पोषण 'कुरु' विधेहि । किम्भूत हे आमरहत्यर! ? 'प्रवरवर्णर- ..
सहस्रदलकमलम्यः अरजिनस्तवः । त्व सागरचन्दिर प्रवरा -प्रकृष्टा ये वर्णा -शौर्यगाम्भीर्यादयो गुणा., यदुक्त हेमसूरिभि.-- "वर्ण. स्वर्णे मखे' स्तुती । रूपे द्विजादौ शुक्लादौ, कुथायामक्षरे गुणे ।।" [अने स कां. २ श्लो १६६] इति, त एव राणि-रत्नानि "र रत्न रोदन धनम्" [सौ ए श्लो ८३] इति वचनात्, तेषा सागर - समुद्रस्तस्याह्लाददाय- कत्वात् चन्दिर इव-चन्द्रमा इव य स सम्बोध्यते । किम्भूत ? 'जठररागरसावि:' जठर -कठिन. “जठर कुक्षिवद्धयो., कठिने [च]" [अने. सं का ३ श्लो. ११५६] इत्युक्तेः, प्रस्तावाद् दृढोऽत्यन्तकरणादयो रागरस -नर्म तस्य आवि -व्रजनं यस्मात् स तथा, “स्यात्तु नर्मणि, सुखोत्सवो रागरस." [शेष स. श्लो ११५] इति शेष । पुन किम्भूत हे आमरहत्यर' ? 'असगर!' सङग्रामरहित । पुन किम्भूत आमरहत्यर ? 'मुचिरकृन्नर- भीतरभद्रर!' मुचिर-धर्म कुर्वन्तीति मुचिरकृतस्ते च ते नराश्च मुचिरकृन्नरास्तेषां भीतरभद्रे-भयतरमङ्गले राति-ददाति य. स तथा स सम्बोध्यते । यदुक्तमुणादिवृत्त्याम्-"मुचिरो धर्म सूर्यो मेघश्च" [सि हे. उ सू ४१६] ।।२।। प्रदरपार्परदन्तुरभूधर- भिदुरतुल्य! रसासर! कं कर । कुनरकाकरदादरकस्वर! विदुरजेसरभक्तरमुत्कर! ॥३॥ ? १. "व्रते" इति मुद्रिते ।
४ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः व्याख्या--हे 'रसासर!' रसायां-वसुन्धराया सरति- गच्छति रसासर -पुमान् तत्सम्बोधन हे रसासर! हे पुरुष हे अर | त्व 'क' सुख 'कर' कुरुष्व । “कृञ् कृती" इति धातो- राशी प्रेरणयोहिरूपम् । अथ सम्बोधनविशेषणयोविशेष्यते-- किम्भूत हे रसासर ! ? 'प्रदरपार्परदन्तुरभूधरभिदुरतुल्य !' प्रदराः-रोगा महाव्रणादय “प्रदरः शरे ।। भङ्गे रोगे" [अने सं. का. ३ श्लो ११७२-७३] इति वचनात्, पार्पर -यमः कालरूपः “पार्परो भस्मनि यमे" [अने. सं. का. ३ श्लो. ११७६] इति वचनात्, तेषा द्वन्द्वे प्रदरपार्पराः, त एव दन्तुरभूधरा -विषमपर्वता. "दन्तुर , उन्नतदन्ते विषमे' [अने. सं का. ३ श्लो ११६३] इत्युक्ते , तेषां भजने भिदुर-वज्र तत्तुल्य -तत्समानो य स तथा स सम्बोध्यते । पुन किम्भूत रसासर ? 'कुनरकाकरदादरकस्वर !' कु:-कुत्सितः नरक - निरय. कुनरकस्तस्मिन् यत् अक-दु.ख तद् रदन्ति-उत्पाटयन्ति ये ते कुनरकाकरदास्तेषु आदर-पूजाविशेष “कस गतौ" कसती- त्येवशीलो य. स:, “स्थेशभासपिसकसो वर."[सि हे ५।२।८१] इति वरः, कुनरकाकरदादरकस्वरः तत्सम्बोधनम् । पुन किम्भूत रसासर! ? 'विदुरजेसरभक्तरमुत्कर!' विदुरेषु-धीरेषु जेसरा शूराः "जेसर शूर." इत्युणादौ [सि हे उ सू ४३६] विदुर- जेसरा , ते च ते भक्तराश्च-भक्तनरास्तेषा मुत्कर-हर्षकरो यः स तथा, स सम्बोध्यते ॥३॥ ? मुहिरगर्वरदुर्द्धरसिन्धुर- विशरणाकरसिंहरहोऽगरम् ।
५ सहनदलकमलमय अरजिनत्त । चतुरनं जरसाऽधरमं स्मर, शिवरमं वरसंवरबुद्धिरम् 1॥४॥ व्याख्या -हे जन इति पदमध्याहार्यम् । त्व 'अ' अर्हन्त अरनाथलक्षण 'रमर' मनसि चिन्तय । किविशिष्ट अ ? 'मुहिरगर्वरदुर्द्धरसिन्धुरविशरणाकरसिहरहोऽगरम्' मुहिर.- कामः "मुहिरो मूर्खकामयो." [अने स का ३ श्लो ११६५] इति हेमाचार्याः, तस्य यो गर्वर -अहवार , यदुक्तमुणादौ-- "गर्वरोऽहकार [महिपश्च]" [सि हे उ सूत्र ४४१] स एव दुर्द्धरसिन्धुर - उत्कटमातङ्गस्तस्य विगरण-व्यापादन तस्य आकर -समन्ताद् विधान तत्र सिह इव-व्याघ्र इव य स मुहिरगर्वरदुर्द्धरसिन्धुरविशरणाकरसिह , रह -अज्ञान तद् न गृणाति-न शब्दयति यः स रहोऽगरः, “गश् शब्दे" द्वाभ्या कर्म- धारये मुहिरगर्वरदुर्द्धरसिन्धुरविशरणाकरसिंहरहोऽगरस्तम् । पुनः किम्भूत अ? 'चतुरन' चतुरा -विद्वासो ना-नरा यस्य स तथा तम् । “नो नरे" [वि ए ७६] इति विश्वः । पुनः किम्भूत अ? 'जरसाऽधरम्' जरसा-वृद्धत्वेन अधर-हीन रहित- मित्यर्थः । “अधरोऽन्तद्धिहीनोष्ठेषु" [अने स का ३ श्लो. १११७ ] इति वचनप्रमाणात् । पुन. किम्भूत अ? 'शिवरम' शिवे-मुक्तौ रमते य स तथा तम् । पुन किम्भूत अ? 'वरसवर- बुद्धिर' "वृ वरणे" वरन्ति धर्मश्रिय इति वरा:-श्रावकास्तेषां सवरवुद्धी:-वैराग्यमती राति-प्रयच्छति य स तथा तम् ।।४।। ? ? १ अधरोऽनूद्धहीनोष्ठेषु” इति मु० ६ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः सुहीरसच्चीरविहारसीवर- प्रत्तारसाधारणकारवादर! जनौर! निमरणधोरणीस्फिरं, मनोरमास्वारवतो रतक्षर ! ॥५॥ व्याख्या--हे 'अ' जिन | तवेति शेष :, 'निर्मेरणधो- रणीस्फिर' निर्मेराश्च' - निर्मर्यादा ये णाश्च - प्रस्तुता ये ते निर्मेरणा - गुणास्तेषां धोरणी - श्रेणि गुणावली स्फिर - वृद्धि प्राप्नोतीति शेष । कस्मात् ? 'मनोरमास्वारवत.' मनसा रमन्ते इति मनोरमा - पण्डितास्तेषु आ- समन्तात् स्वारव:- प्रधानशब्दस्तस्मात् । निर्मेरणधोरणी किंविशिष्टा ? 'सुहीर- सच्चीरविहारसीवरप्रतारसाधारणका' सुहीर' - प्रकृष्टहीरः विशेषशुभ्रत्वात्, सच्चीर-प्रशस्तवासोविशेष , विहारः-विशि- ष्टमुक्तावली , सीवर -समुद्रः प्रस्तावात् क्षीरसमुद्र., प्रतार - निर्धाररूप, एषा द्वन्द्वे सुहीरसच्चीरविहारसीवरप्रतारा , तेषा साधारण एव – समाना एव ग्राह्यतया, स्वार्थे क. । किम्भूत हे अ | ? 'आरवादर ।' आराणि-देवसमूहास्तेषु वार्दर-वचन धर्मरूप यस्य स तथा, तत्सम्बोधनम् । “वादर कृमिजे जले ।। काकचिम्व्याश्वबीजे वाग्दक्षिणावर्त्तशङ्खयो.।" [अने. स. का. ३ श्लो. १२००,१२०१] इति हैमानेकार्थवचनात् । पुनः किम्भूत अ? 'जनौ ।' जनान्-लोकान् अवति-प्रीणयति य स तथा तत्सम्बोधनम् । पुन किम्भूत [अ]? 'रतक्षर!' रतात्- सम्भोगात् क्षरति-चलति यः स तथा, तत्सम्बोधनम् ।।५।। - सहस्रदलफमलमय. अरजिनस्तवः । डमरदुर्बरतस्करभीभर- प्रहरणाविरहः किरताद् दरम् । सुकुरतीर्णरदस्तरधीधरः प्रसरकीत्तिरजाहरनिर्दरः ॥६॥ व्याख्या-'प्रसरकीति' "सृ गतौ" प्रसरति-सर्वत्रविस्त- रयति या सा प्रसरा, एवविधा कीत्ति -यशो यस्य स प्रसर- कीति.-अरनाथ 'दर' भय 'किरतात्' क्षिपतात् । किंविशिष्टः प्रसरकीत्तिः? 'डमरदुर्वरतस्करभीभरप्रहरणाविरह' दुष्टो ज्वर, दुलर तस्करा -चीरा भीभरो-भयवृन्द प्रहरण-युद्ध, एपा द्वन्द्व. दुर्वरतस्करभीभरप्रहरणानि, डमराणि-भीष्यानि दुर्वरतस्करभीभरप्रहरणानि, तेषा अ [?आ] विरह -समन्ता- द्विरहो यस्य स तथा । पुन किम्भूत प्रसरकीत्ति ? 'सुकुरतीर्णर- दस्वरधीघर' "कुरत् शब्दे" अलन्त , सुकुरेण-समस्तजनप्रिय- त्वात् विशिष्टशब्देन तीर्ण -अभिभूतो रदस्वरो धी -बुद्धिस्त- स्या घर -गृह धीघर , द्वयोः कर्मधारये सुकुरतीर्णरदस्वर- धीघर । "हने रन् (त्)घ च” हन्ति हन्यते । “घरो गृहमिति प्रासादे"। पुन किविशिष्ट प्रसरकीर्ति ? 'अजाहरनिर्दरः' अज -नित्य. न हरतीति अहर., स चासौ निर्दर -निर्भयो यः स , त्रयाणा कर्मधारय. ।।६।। चकार हिंसीरविशारणं गिरः, उदारसम्भारसुधारकेकरः। अमारमन्दारसमीरकन्धर- प्रकार आचारविदीरनीवरः ॥७॥ ?
4 स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः ? - व्याख्या--'उदारसम्भारसुधी' उदारा:-दातारस्तेषां सम्भार:-गणः “सम्भारः सम्भृतौ गणे" [अने. स. का. ३ श्लो. १२१६] इत्युक्तेः, तेन सुष्ठु ध्यायते य स उदारसम्भारसुधी:- श्रीअरनाथजिनः 'हिसीरविशारण' हिसीराः-हिंस्रा प्रकरणात् कर्माणि तेषा विशारण-व्यापादन हिसी रविशारण कर्मनाशं 'चकार' कृतवान् । किम्भूत उदारसम्भारसुधी. ? 'गिर' "गृ निगरणे" गिरतीति गिर. "नाम्युपान्त्यप्री-कृ-गृ-ज्ञ. क"[सि हे. ५।१।५४] इत्यनेन कप्रत्यय । पुन किम्भूत उदारसम्भारसुधी? 'अकेकरः' न केकर. अकेकर -अवक्रदृष्टिरित्यर्थ । पुन. किम्भूत उदारसम्भारसुधी ? 'अमारमन्दारसमीरकन्धरप्रकार ' मार - कन्दर्पन मार.-अमार , नशब्दस्य कुत्सार्थत्वाद् अमार कुत्सितकन्दर्प , स एव मन्दार-मन्दारवृक्षस्त समीरयति- सम्यक् प्रेरयति य. स अमारमन्दारसमीर , कन्धर -जलदस्त- त्प्रकार.-तत्समानो दानेनेति गम्यते य स कन्धरप्रकार , द्वाभ्या कर्मधारये अमारमन्दारसमीरकन्धरप्रकार । पुन किम्भूत उदा- रसम्भारसुधी ? 'आचारवित्' आचार वेत्तीति स तथा । पुन' किम्भूत उदारसम्भारसुधी ? 'इ' दीप्त “इल् कान्तौ" क्वि- बन्त , ईरयति-क्षिपति पापमिति वा ईर्, “ईरण क्षेपे" क्विब- न्त., पापनाशक इत्यर्थ । पुन. किम्भूत उदारसम्भारसुधी ? 'अ- नीवर' न विद्यते नीवर -पुरुषाकारो यस्य स तथा, सिद्धत्वात्, उणादिकोऽयम्, “णीड प्रापणे" नीमीकुतुचेर्दीर्घश्च' [सि हे उ. सू ४४३] इत्यनेन वरट् प्रत्यय , "नीवर पुरुषाकारः" ॥७॥ विभोरमोमोरमगोरगोचर- विकारसंहारकरोरडिङ्गरः। ? ?
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः । ९ - ? ? जहार कण्ठीरववारसत्तर!, स वीरकः स्मेरमुखो रसातिरम् ।।८।। व्याख्या--हे 'कण्ठीरववारसत्तर!' कण्ठीरवाना-सिहाना वार -निवारण तस्मिन् सत्-प्रशस्त तर -बल यस्य स कण्ठी- रववारसत्तर। । हे सुहृत् । , स 'वीरक' वीर एव वीरक.- सुभट' अरनाथजिनो 'जहार' अपनयति स्म । कि तत् ? 'अ' व्याधि "अ मान्तो ब्रह्मसवादे, परब्रह्मप्रवाचक । व्यसने व्या- धिते व्याघ।" [वि ए १६] इत्युक्ते । स क ? यत्तदोनि- त्याभिसम्वन्धाद् यस्माद्विभो -स्वामिन 'अमोमो' हर्ष कृत- वान् । क ? 'अडिङ्गर' न विद्यन्ते डिगरा -दासा यस्य स अडिङ्गर. प्रकरणात् साधुजन । किम्भूताद्विभो ? 'अमगो' न विद्यते मा-मान येषा ते अमा -निष्प्रमाणा गाव -दीप्तयो यस्य स अमगुस्तस्मात्तथा । पुन किम्भूताद्विभो. ? 'अगोचर- विकारसहारकरो' न गोचरो यस्मिन् स अगोचर -अलक्ष्य इत्यर्थ , “विकारो विकृती रोगे" [अने स का ३ श्लो १२०३] इति वचनात्, विकाराणा-रोगाणा सहार-विनाश करोतीति विकारसहारकरः, अगोचरश्चासौ विकारसहारकरश्च अगोचर- विकारसहारकरः, एवम्भूत आ-धर्मो यस्य स अगोचरविकार- संहारकरास्तस्मात्तथा । "ऋशब्द पावके सूर्ये धर्मे" [ए श्लो ११] इति विश्वशम्भुवचनप्रामाण्यात् । किम्भूतो वीरक ? 'स्मेरमुख' स्मेर-विकस्वर मुख यस्य स तथा । पुन किम्भूतो वीरक ? 'रसाति' रस्य-धनस्य "र रत्न रोदन धनम्" [सौ. ए. श्लो ६३] साति -दान यस्य स तथा, “षणूयी दाने" इति धातो. क्तिप्रत्यये रूपम् ॥८॥ ? ?
१० स्वोपज्ञवृत्तिविभूपितः भ्रमरवृत्तिरनन्तरमक्षरं वितर से हरणः सुरकन्नर! । इपिरवागरभन्दरचत्वरः, कमरतामरसाक्षिरमाधरः ॥९॥ व्याख्या--हे 'सुरकन्नर!' सुराणां-देवाना क-सुखं नरयति-नयति य. स सुरकन्नरस्तस्यामन्त्रणं हे सुरकन्नर', “न नीतौ” अजन्त', हे अरजिन! 'मे' मम 'अक्षर' मुक्ति 'वितर' प्रयच्छ । 'हि' इति निश्चये । किम्भूतं अक्षर? 'अनन्तर' न विद्यन्ते अन्तराणि-रन्ध्राणि यस्मिंस्तत्तथा तत् । किम्भूतस्त्वम् 'भ्रमरवृत्ति.' भ्रमर.-मधुकरस्तद्वद् वृत्ति –वर्तन यस्य स तथा । पुनः किम्भूतस्त्व? 'अरण' सङग्रामहीन , शत्रूणामभावात् । पुनः किम्भूतस्त्व? 'इपिरवागरभन्दरचत्यर.'इषिरा:-सेव्याः, यदुक्तमुणादिवृत्त्या "इषिर. अग्निः आहार. क्षिप्र. सेव्यश्च" [सि. हे. उ. सू ४१६] इति, वागरा.-विद्वांसोऽन्तिपद , यदुक्तं हैमानेकार्थे -- "वागरो वारके शाणे, निर्नरे वाडवे वृके ।। मुमुक्षौ पण्डिते चापि, परित्यक्तभयेऽपि च । [अने. सं. कां ३ श्लो. ११६६, १२००] इति, इषिराश्च ते वागराश्च इपिरवागरास्तेषां भन्दरचति- भद्ररचन? इत्ति यः स तथा, रचण् कृत्या इकिस्तिव स्वरूपार्थे" [सि हे ५।३।१३८] इति तिवि सिद्धम् । पुन किम्भू- तस्त्वं? 'कमरतामरसाक्षिः' कमर-कोमल “कमरो मूर्ख . कार्मुक भन्द कल्याणे सौख्ये च" [अने स. का. २ श्लो २४३ ] ? व्याख्या सहलदलकमलमय. अरजिनतवः। ११ कोमल चौर [कान्तश्च" सि हे उ सू ३६७]इति हैमोणादि- वृत्तिवचनात्, यत्तामरस-पद्म ततुल्ये अक्षिणी-नेत्रे यस्य स तथा । पुन. किम्भूतस्त्व ? 'अमाधर' न मा अमा-अमाया ता घरति य. स तथा । “मा माया" इति गोपालभट्टीवचन- प्रामाण्यात् ॥६॥ चटरविघ्नरवरिरसाहरः, स्वतरसा स्परणं करताद् गरः । सुनर आदरतः स्मरतीदरः, स विरसः सरलस्वरणस्तरः ॥१०॥ 'स' अरनाथजिन 'स्परण' रक्षण करतात्' क्रियात् । “स्मृ स्पृ प्रीतिरक्षाप्राणने" अनट्प्रत्ययान्त. । किम्भूत. सः? 'स्वतरसा'स्ववलेन-स्वकीयवीर्येण चटरविघ्नरवैरिरसाहर' चटरा-तस्कराः, "चटण वेष्टने" उणादिकोऽरप्रत्यय , चटर तस्कर विघ्न-उपद्रव रातीति विघ्नरा तेच ते वैरिणश्च विघ्न- रवैरिण , चटराश्च विघ्नरवरिणश्च चटरविघ्नरवैरिणस्तेषा "र तीक्ष्णे कर्कटे दृढे" [वि.ए. १०१.] इत्युक्ते रा-दृढा या सा- लक्ष्मीस्तस्या हर-हरण यस्य स तथा । किम्भूत स ? 'गर "गृ घृ सेके" गरति-भविकजन देशनाजलेन सिञ्चति य स तथा । स इति क य 'सुनर' शोभनपुमान् ‘आदरत.' आदरात् ‘स्मरति' ध्यायति, जातावेकवचनम् । पुन. किम्भूत स ? 'इदर '[इ - कामस्त दुगिद्दन्नियि (?) दृणाति य स तथा । पुन किम्भूत स ? 'विरस' विगतरस ।पुनः किम्भूत. स. 'सरलस्वरण.' सरला.-अकुटिलास्तेपु स्वरण-अतिशयेन गमन ? ?
१२ ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः यस्य यस्माद्वा स तथा । पुनः किम्भूत. स. ? 'तर:' तरति दुस्तरं ससारसागरमिति स तथा ।।१०।। सुचरणं चरतः किरतः कर, प्रहरतः करणं धरतः सुरम् । व्रतरतश्चिरमाशरणाङ्गरः, सुनुरक क्षुरतादुरगादरः ॥११॥ व्याख्या--'अर.' अरजिनः 'अक' दु.ख क्ष-[? क्षु रतात्' छिन्द्यात् । कस्मात् ? 'उरगात्' उरग.-सर्पस्तत्प्रायत्वाद् उरगः ससारस्तस्मात् । कस्य ? 'सुनु' श्रावकस्येति यावत् । किम्भूतस्य सुनु? 'सुचरण' सुष्ठु चारित्र देशविरतिलक्षण 'चरत' सेव- मानस्य । पुन. किम्भूतस्य सुनु ? 'कर' "कृञ् वधे" अलन्त, कर-वध 'किरतः क्षिपतस्त्यजत इति यावत् । पुन. किम्भूतस्य सुनु ? 'करण' इन्द्रिय प्रहरत । पुन. किम्भूतस्य सुनु ? 'सुर' सुष्ठु रा-दीप्तिर्यस्य स सुरस्तं सुर - जिन 'धरत.' बिभ्रत, मनसीति गम्यम् । पुन. किम्भूतस्य सुनुः ? 'चिर' चिरकाल 'व्रतरत. व्रतानि द्वादशसङ्खयाकानि, तेषु रमते इति व्रतरत् तस्य, “गमा क्वी" [सि हे ४।२।५८] इति सूत्रेण क्विपि सिद्धम्। अकार. पादपूरणार्थः । किम्भूतोऽर ? 'अशरणागरस्' "शृश् हिसने" अनटप्रत्ययान्त , न विद्यते शरण-हिसन येषां श्रवणात् तानि अशरणानि, एवम्भूतानि यानि अगानि-आचारागाद्यका- दशाङ्गानि तानि, “रस् शब्दे" क्विबन्त , रसति-शब्दायते यः स तथा ॥११॥ ? ? ?
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। १३ ? धीरैरमारिरमृतं रडामरं सभ्यरभाणि रसनं रतान्तरम् । उच्चैरभीतिरनगारशिशिरः, पातूरनूतिरनपूरघृष्टि रम् । ॥१२॥ ललिता-छन्दः१ व्याख्यास इति पदमध्याहार्यम् । 'अनगारशिशिरः' न विद्यते अगारं-गृह येपां ते अनगारा --साधवस्तेपा शिशिरः- पुञ्जो यस्मिन् सोऽनगारशिशिर -श्रीअरनाथतीर्थकरः पातु' रक्षतु । क ? 'अ' जन "अः कृष्ण शङ्करो ब्रह्मा, शक्र सोमो- ऽनिलोऽनल । सूर्य प्राणो जनः" [सौ ए. २] इति सौभरि- वचनात्। स क ? यस्य 'रसन' ध्वनित “रसन ध्वनिते"[अने सं. का. ३ श्लो. १००१] इति वचनात् । 'अमृत' सुधासम ‘उच्चै' अतिशयेन 'अभाणि' कथित, अमृतमपि सर्वजनतुष्टिपुष्टिकर तथेदमपि । कै: ? 'धीरै.' विद्वद्भि । किम्भूतं. धीरे ? 'सभ्यै' सभायोग्य । किम्भूत रसन? 'रडामर' "रय गती" "क्वचित्" [सि हे पा ५१११७१]ड इति,रयन्ते-तीर्थकरविलोकनादपि नष्ट्वा यान्ति ये ते रा.-दौर्भव्यास्तेषा डामरं-भयङ्करं यत्तत्तथा तत् । पुन किम्भूत रसन ? 'रतान्तर' रताना-वचनश्रवणाऽऽसक्ताना अन्तर-अवधिर्धर्ममर्यादा यस्मात्तत्तथा तत् । अन्तर रन्ध्रावकाशयो । मध्ये विनार्थे तादर्से विशेषेऽवसरेऽवधौ । [अने स. का ३ श्लो १११४-१११५] १ "धीररभाणि ललिता तभी जरौ" ३१५७ इति वृत्तरत्नाकर.। २ "स्यादागारमगारवत् । शब्दरत्नाकर का ४श्लो ४ ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः इति हेमसूरय : । किम्भूतोऽनगारशिशिर. ? 'अमारि.' न विद्यते मारि -मरण यस्मिन् स तथा । पुन किम्भूतोऽनगारशिशिर ? 'अभीति.' निर्भय. । पुनः किम्भूतोऽनगारशिशिर. ? ' 'ऊ निशाकरः, तद्वदाह्लादकत्वात् । “ऊ परेतो जडत्वष्टा, विवस्वा- नग्निसारथि । वह्निनिशाकर" [सौ. ए ७] इति वचनात् । पुन: किम्भूतोऽनगारशिशिर ? 'अनूति.' न विद्यते नति.-स्तवन अन्येषा देवाना यस्मिन् स तथा, अस्तोता इत्यर्थ. । पुनः किम्भूतोऽनगारशिशिर ? 'अनपू.' "पुरस् अग्रगमने" क्विपि पू.-अग्रेसरः, न पू. अपू , न अपू. अनपू , अग्रेसर इत्यर्थ । पुनः किम्भूतोऽनगारशिशिर ? 'अघृष्टिः' न विद्यते घृष्टि.- स्पर्धा यस्य स तथा, “घृष्टि स्प‘घर्षणयो." [अने स. कां. २ श्लो. १०३] इति हैमानेकार्थोक्ते. ।। १२ ।। अररतात् परणं जरणं भर- मररहच्च र आमरपा खरः । नघरणं शरणं बरताद् घुरः, सुखरयोऽमरदो सरतस्परः ॥१३॥ द्रुतविलम्बितच्छन्दः व्याख्या-स इति पदमध्याहार्यम् । 'सुखरय.' सुखस्य रयः-प्राप्तिर्यस्मात् सुखरयः :-श्रीअरनाथजिन' 'शरण' त्राण- रक्षण 'वरतात्' द्रियात् । कथम्भूतं शरण ? 'नघरण' "घृ- भासि" अनटि घरण, नाना-नराणा घरण-भासनं यस्मात्तत् तया तत्, “नो नरे च सनाथेऽपि" [वि ए ७६] इत्युक्तेः। कस्य १ "द्रतविलम्बितमाह नभौ भरौ" [३।४८] वृत्तरत्नाकर.। ४ १ ?
१५ . . ? सहनदलकमलमय. अरजिनस्तवः । 'र' "रा दानाऽऽदानयो" इत्युक्ते. राति-पञ्चमहाव्रतभार गृह्णाति य स रास्तस्य र.-साधो , जातावेकवचनम् । स क ? य. 'परण' "पृट् प्रीती" अन्प्रत्यय , परण-प्रीति 'अररतात्' अनिर्मापयत् । 'च' पुनरर्थे, य 'जरण' त्यक्कार 'अररहत्' अत्यजयत् । कथी 'भरम्' अतिशयेन, केन? 'आभरपा' आ- लक्ष्मी वित्ति-पुण्णाति योऽसौ आभर , पाति-ससारदु ख- जरामरणतो जगत्त्रय रक्षति योऽसौ पा -धर्म , आभरश्चासौ पाश्च आभरपास्तेन आभरपा । किम्भूत सुखरय ? 'खर' धर्मव्यवहारपटु "सत्यसन्ध खरो ज्ञेय , खरोऽपि पुरुषो मत । खरो रासभ इत्युक्तो, व्यवहारे पटु खर• ॥१॥ इति ध्वनि- मञ्जर्याम् । पुन: किम्भूत. सुखरय ? 'घुर' “घुरश् ध्वनी भीमार्थे" अजन्त , घुरति--शब्दयति स्याद्वादमिति असकौ तथा । पुन किम्भूत सुखरय ? 'अमरद ' "अस रोगे" अमा रोगास्तान् “रद विलेखने” रदति योऽसौ तथा । पुन किम्भूतः सुखरय ? 'मरतस्मर' मरता -प्राणिन., यदुक्तमुणादौ-- "मरत. मृत्यु अग्नि प्राणी च" [सि. हे उ सू. २०७] इति तै' स्मर्यते य स तथा ।।१३।। चुकार भट्टारकपौरयोः पुरः, शमारवाहारमदौरघर्षरः । कठेरकान्तारसुवारणस्थिरः, कठोरकालू रविवारसायुरः ॥१४॥ व्याख्या--'अघर्घर' न विद्यते घर्घर.-हास्य यस्याऽसौ अघर्घर.-श्रीअरनाथजिन 'शमारवाहार' श-सुख [त]स्य 'आरः' प्रापण यस्मात् स शमार , ऊ -रक्षा "ऊ शब्दो रक्षणे" इति ? ? १६ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः १ विश्वशम्भक्तेः, त आहारयति-आनयति यः स वाहार'-धर्मः, शमारश्चासौ वाहाराश्च शमारवाहारस्त शमारवाहारं-धर्म 'चुकोर' कथयाञ्चकार, “कुरत् शब्दे" इत्यस्य परोध या णपि रूपम् । क्व ? 'पुरः' अग्रे, कयो ? 'भट्टारकपौरयो' भट्टारका.- पूज्याः प्रस्तावाद् गणधरा देवा वा, पौर--नागर , भट्टारकश्च पौरश्च भट्टारकपौरौ तयोः, . अत्र जातावेकवचनम् । किम्भूतोऽघर्घर ? 'अदौ' न दुनोति जनान् विचि अदौः । पुन. किम्भूतोऽघर्घर ? 'कठोरकान्तारसुवारणस्थिर ' कठोर - दरिद्र. भावप्रधाननिर्देशात् कठोर.-दारिद्रयम्, उणादिकोऽयं शब्दः, स एव कान्तार-वन[तत्र]सुवारणा -शोभनगजास्तेष्वपि स्थिर -दृढो य. स. सुवारणस्थिर , तद्भञ्जने सुवारणस्थिर इव सुवारणस्थिरो यस्य[? यः स] तथा । पुन किम्भूतोऽघर्घरः ? कठोरकालूरविदारसायुः' कठोरं-दृढं कं-दुख येषा ते कठोरका , "क शिर. क सुख तोय, पयो दु.खम्" [सौ ए २०] इत्युक्ते , कठोरकाश्च ते आलूराश्च-विटाः कठोर- कालूरास्तेषा विगतो दार -भय यस्मात् स कठोरकालूरविदार., आलूरगब्द उणादिविटवाची, सायाः-लक्ष्म्या आयु: -जीवन यस्मात् सायुः, द्वाभ्या कर्मधारये कठोरकालूरविदारसायु , "इण्क्गतौ" "कृवापाजिस्वदिसाध्यशौ स्नासनिजानिरहीणभ्य उण्" [सि हे. उ. सू. १] इति सूत्रेण उण् प्रत्यये आयुरिति, "पुरुष शकट औषध जीवनं पुरुरवः पुत्रो वा" इति । अकारः पादपूरणार्थ ॥१४॥ १ उद्धरणमिद विश्वशम्भुप्रणीतकाक्षरनाममालाया "ऊ -रक्षार्थ- वाचक. ॥११॥” इति रूपेण विद्यते । ? .
सहस्रदल कमलमय. अरजिनस्तव.। १७ - ? ? - विज्ञैरमानैरसितैरकारि र- मच्यैरनाकैरहतेररुड्भिर। देवरसानैरसनेरसंहर! लक्ष्मी ररौ धीरकुटेर ! सोऽध्वरः ॥१५॥ व्याख्या--हे 'अकुटेर ।' कुटेर -गठ , न कुटेर अकुट- रस्तत्सम्बोधन हे अकुटेर । -हे पण्डित । 'स' अरजिन 'लक्ष्मी' श्रिय 'ररौं' ददौ । किम्भूत स ? 'धी' "ध्ये चिन्तायाम्" ध्यायतीति किपि धीः, ध्यातेत्यर्थ । पुन किम्भूत स 'अध्वर.' "ध्वृ कौटिल्ये" न ध्वरति य स तथा । स क यस्य 'विज्ञै' विद्वद्भि 'र' "रै गदे' डे प्रत्यये रायते- शब्दचते जनैरिति गुणगान 'अकारि' कृतम् । किम्भूतैविज्ञै ? 'अमान' निरहङ्कारै । पुन किम्भूतैविझै ? 'असितै ' अव? । पुन किम्भूतैविज्ञैः 'अहते' अवधकस्य 'अन्य' अर्चनीयै । पुनः किम्भूतैविज्ञ ? 'अनाकै ' "अन प्राणने" अनन्ति-जीवन्तीति अना -प्राणिनस्तेपा आ-समन्तात् क-सुख येभ्यस्ते अनाकास्तै पुन किम्भूतैविज्ञै ? 'अरुड्भि' न विद्यते रुट-ईर्ष्या येषा ते अरुपस्तै । अत्राकार सम्बोधनार्थमव्ययम् । पुन किम्भूतैविज्ञै ? 'देवै ' "दिवु क्रीडाविजगीपाव्यवहारद्युतिस्तुति [मोदमदस्वप्न- कान्ति] गतिषु" इति वचनात्, दीव्यन्ति-स्तुवन्तीति देवास्तै , स्तोतृभिरित्यर्थ । पुन किम्भूतैविज्ञे ? 'असानै ' "पोच् नाशे" अनटि सानम्, न विद्यते सान-नाशो येषा ते असानास्तै । किम्भूत हे अकुटेर । ? "पण सम्भक्तौ", "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे" [सि हे ५।३।१३८] इति इप्रत्यये सनि -भक्तिः, न विद्यते सनिर्यस्य ? ? - ? । २ १८ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित. स असनिस्तस्य असने -अभक्तस्य ‘असहर' न विनाशक | निरीयत्वाद् भक्ताभक्तयोरुपरि समचेता ।।१५।। ववार लक्ष्मीररतीरधीश्वरः, समौरकण्डूरसुधीरकटवरः । सुधारभृत्पूरतुषारदीप्तिरः, सुनारशौण्डीरकुटीरतुष्टिरः ॥१६॥ व्याख्या--'अधीश्वर' श्रीअरनाथ जिन. 'लक्ष्मी' श्री: 'ववार' वृतवान् । लक्ष्मीरित्यत्र बहुवचन नानाप्रकारत्वात् सङ्गतमेवेति । किम्भूतोऽधीश्वर ? 'अरती' अरति-असुखता एति-क्षिपति योसौ तथा, "इण् क्षेपे" किबन्त । पुन. किम्भू- तोऽधीश्वर. ? 'समौ' सह मया-लक्ष्म्या वर्तन्ते ये ते समास्तै. अवति-वर्द्धते य स तथा, अत्र अवधातुर्वृद्धयर्थो ज्ञेय । पुनः किम्भूतोऽधीश्वर ? 'अकण्डूरसुधी' न कण्डूरा अकण्डूरा - अकण्डूमन्त सुधिय -पण्डिता यस्य स तथा । कण्डूर इति कथं शव्दनिष्पत्ति ? उच्यते-“मध्वादिभ्यो र" [सि हे ७।२।२६] मध्वादिभ्यो मत्वर्थे र प्रत्ययो भवति इति सिद्ध रूपम् । पुन किम्भूतोऽधीश्वर ? 'अकबर' "कट्वरस्त्वतिकुत्सित" [अभि चि का ३ श्लो १४] इति हेमसूरयः, न कट्वरो अकट्वर , अकुत्सित इत्यर्थ । पुन किम्भूतोऽधीश्वर ? 'सुधार- भृत्पूरतुषारदीप्तिर.' "धारोत्कर्षे खङ्गाद्यग्रे, मन्याने वाजिनां गतौ ।। जलादिपाते सन्तत्या" [अने स का. २ श्लो. ४३८. ४३६] इति हैमानेकार्थवचनात् सु-गोभना धारा-सन्ततिः शिष्यप्रशिष्यादिका येपा ते सुधाराः, “डुभृञ् धारणपोपणयो" ? ?
सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तवः। १९ ? विभ्रति-धारयन्ति गणमिति भृत –णधरास्त्रयस्त्रिगत्सङ्ख्या- का , सुधाराश्च ते भृतश्च सुधारभृतस्तेपा पूर -सुधारभृत्पूर तदाह्लादकत्वेन तुपारदीप्ति.-चन्द्रमास्तद्वद् राजते-शोभते य. स तथा । पुन. किम्भूतोऽधीश्वर ? 'सुनारगौण्डीरकुटीर- तुष्टिर' नराणा समूहो नार, सुष्ठु नार सुनार, तस्मिन् गौण्डीरा -सत्यवन्तो ये ते सुनारगौण्डीरास्तेपा कुटीर -राशि- स्तस्य तुष्टे -सन्तोपत्य रा-दान यस्य स तथा । कुटीरशब्द औणादिकोऽस्ति राशिवाचक ।।१६।। भव्यैरगोभिरहितरयुतरकह्वरं, हीनैरधीभिरमितैरकरैरदुर्मुरः । सुस्वैरमाररमणैरजितैरकार्यरं, पुष्टर नूतिरगदैरनरीरतेः पुरः ॥१७॥ मृदङ्गकच्छन्द ।' व्याख्या--'अदुर्मुर' “मूर्वी हिसाया" क्विबन्त , दुष्टा मू - दुर्मू , न विद्यते दुर्मू -जीवहिसा यस्यासौ अदुर्मूस्तस्य अदुर्मुर - श्रीअरनाथजिनस्य 'अर' अत्यर्थ 'नूति' स्तुति -गुणोत्कीर्तनं 'अकारि' कृता । कै ? 'भव्य' भविकजीव इति सम्वन्ध । कथमकारि? 'अकह्वर' "तू कौटिल्ये' अलन्त , अकाद्- दु खाद् ह्वर -कौटिल्य यस्मातत् अकबर-ससुखमित्यर्थ , एव यथा स्यात्तथा । अथ भव्याना विशेपणानि-किम्भूतैर्भव्य ? 'अगोभि' न विद्यते गाव -किरणा येषा ते अगाव -अदीप्तास्तै अगोभि. 'अहित ' शत्रुभि 'अयुत' न सहित , निस्तेज शत्रु- १ "त्भी जौ रो मृदङ्गा।" [२-२६१] छन्दोनुशासनम् । - -- २० ? ? ? ? ? स्वोपलवृत्तिविभूषितः रहितैरित्यर्थ । पुन किम्भूतैर्भव्य ? 'अधीभि ' न धिय. अधियः, नशब्दस्य कुत्सार्थत्वाद् अधिय -कुबुद्धयस्ताभि अधीभि - कुबुद्धिभि. 'हीनै ' रहित.,सुमतिभिरित्यर्थ । पुन किम्भूतैर्भव्य 'अमितै ' न प्रमित , प्रचुरेरित्यर्थ । पुनः किम्भूतैर्भव्य ? 'अकर' दण्डरहित । पुन किम्भूतैर्भव्य ? 'सुस्वै ' शोभनद्रव्य , धर्मोपार्जितधनत्वात् । पुन किम्भूतैर्भव्य. ? 'अमाररमण ' न विद्यन्ते मारा -विघ्ना येपा ते अमारा -निर्विघ्ना , अत एव रमणा -रमणीया ये तेऽमाररमणास्तै । पुन किम्भूतैर्भव्य. 'अजितै ' अपराभूतै । पुन किम्भूतैर्भव्य ? 'पुष्ट' पुष्टिमद्भि , अकार पादपूरणार्थमव्ययम् , अत एव 'अगदै' नीरोग । किम्भूतस्य अदुर्मुर ? 'अनरीरते' न अरय -न शत्रव इति अनरय -मित्राणि तेषा ईरति -धर्मादिकार्येषु प्रेरणा यस्य स तथा तस्य । “ईर् प्रेरणे" "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे" सि. हे. ५।१११३८] इति तिवि ईरति सिद्धम् । पुन किम्भूतस्य अदुर्मुर ? 'पुर' “पुरत् अग्रगमने" किबन्त , पू -अग्रेसर- स्तस्य ॥१७॥ कठरकदरभङ्ग रम्यसारङ्गसारं, मठरविसरनाशं रण्डभारण्डचारम् । अमरनिकरपूज्यं रङ्गकारङ्गपारं, वमरकृदरसङ्घारक्तमारं सुतारम् ॥१८॥ १ मालिनीच्छन्द'. । १ "ननमयययुतेय मालिनो भोगिलोके" [३।८१] वृत्तरत्नाकर ।
सहनदलकमलमय. अरजिनस्तवः। २१ ? व्याख्या—'सुतार' सुप्ठ तार-उच्चै थमि[? ध्वनि] र्यस्य स [त] सुतार-श्रीअरनायजिन अह 'आर' प्राप्तवान्, देवत्वेनेति गम्यम् । किम्भूत सुतार ? 'कठरकदरभङ्गे रम्यसारङ्गसार' कठर -दरिद्र भावप्रधाननिर्देगात् कठर -दारिद्रय स एव कदर -बृक्षविशेपस्तस्य भङ्ग -भञ्जन तस्मिन् कठरकदरभङ्गे रम्यसारङ्गसारभिव-प्रधानहस्तिवलमिव रम्यसारङ्गसारस्तम् । कठरकदरशव्दावीणादिकौ । पुन किम्भूत सुतार ? 'मठर- विसरनाश' मठरा -अज्ञानिन ,यदुक्तमुणादिवृत्ती-“मठर ऋषि अज्ञानी गोत्र च” [सि हे उ सू ३६७] इति, तेपा विसर समूहस्तस्य नाशो यस्मात् स मठरविसरनाशस्तम् । पुन विम्भूत सुतार ? 'रण्डभारण्डचार' रण्डा -निस्त्रीका भरण्डा -भण्डा भरण्डाना समूहो भारण्ड, रण्डाथ भारण्डानि च रण्डभारण्डानि चरण चार , रण्डभारण्डाना चार -गमन यस्मात् स तथा तम् । पुन किम्भूत मुनार? 'अमरनिकरपूज्य' अमरा -देवास्तेपा निकर -वृन्द तस्य पूज्य -पूजनीयो य स तथा तम् । पुन किम्भूत सुतार ? 'रङ्गकारङ्गपार' करङ्गा-कर्मशीला , करना एव कारङ्गा , स्वार्थे अण, रङ्गस्य-हर्पविशेषस्य कारङ्गा ये ते रङ्गकारङ्गास्तेपा पार -पालन यस्य स तथा तम् । पुन किम्भूत सुतार ? 'वमरकृदरसङ्घारक्त' वमरा -दुर्मेधसो ये कृदरा -सर्वकर्मप्रवृत्तदस्युजनास्तेषां सवो वमरकृदरस वस्तत्र अरक्त -अनासक्तो य स तथा तम् ।।१८।। ? ? १. स्तस्मान्नाशो यस्य इति मूलादर्श पाठ. ॥
२२ स्वोपज्ञवृत्तिविभूपित. विभुरनकरसङ्घारञ्जितारक्ष्णशूर- प्रपुरजदरहोभी रक्षक रज्यसेर ! यतिरदितिरहङ्कारक्षितेरक्षधार- मकरमुदिरसुश्रीरदृसंरम्भवारः ॥१६॥ व्याख्या-हे 'अर !' अरनाथ ! त्व 'रज्यसे' रङ्ग कुरुषे । के ? 'रक्षक' रक्षन्तीनि रक्षकास्तै रक्षक , साधु- भिरित्यर्य । किम्भूतं रक्षकै ? 'अनकरसवारजितारक्ष्णशूर- प्रषुरजदरहोभि' न विद्यते अकं-दु खं यस्मिन् सोऽनक: एवम्भूतो रसव-घनसमूहो यस्या सा अनकरसडा, सा चासौ आ च-लक्ष्मी अनकरसवा, तया रञ्जिता-रसीकृता आरक्ष्णशूरा.- समन्ताज्जीवपालनमुभटा ये ते अनकरसङ्घारजितारक्ष्णशूरा "पुर् सुरत् ऐश्वर्यदीप्त्यो प्रपुरति-प्रकर्षेण सर्वज्ञानोत्तमत्वाद् यत्तत् प्रषुर-केवलज्ञान तेन जत्-अत्यर्थं जायमान अरह- अच्छन्न येपां ते प्रषुरजदरहसः,अनकरसङ्घारञ्जितारक्ष्णगूराश्च ते प्रपुरजदरहसश्च अनकरसङ्घारञ्जितारक्ष्णशूरप्रपुरजदरहस- स्तै । जत् इति कथ निष्पत्तिरिति ? “जनैचि प्रादुर्भावे” इति धातो गतरि जञ्जन्तीति वाक्ये “जाज्ञा-" [मि हे ४।२।१०४] इति सूत्रेण जादेशे "नश्चात" [सि हे. ४।२।९६] इत्याल्लुकि जत् इति सिद्धम् । किम्भूतस्त्व हे अर | ? 'विभु.' स्वामी, सामान्यकेवलिनामिति गम्यते । पुन किम्भूतस्त्व ? 'यति.' माधु । पुन किम्भूतस्त्व ? 'अदिति' अखण्डन । पुन. किम्भूतस्त्वं ? 'अहङ्कारक्षितेः' अहड्वारस्य-स्मयस्य क्षित-क्षय एति-प्राप्नोति य स तथा । पुनः किम्भूतस्त्व ? 'अक्षधारम- ?
सहस्रदलफमलमयः अरजिनस्तव.। २३ ? करमुदि.' अक्ष -ज्ञान, “अक्षो रथस्यावयवे, व्यवहारे विभीतके। १प्रासके शकट कर्षे, तुषे ज्ञानात्मयोरपि ॥" [अने स. का २ श्लो ५६०] इति हैमानेकार्थोक्ते , अक्ष-जान धरतीति अक्षधार., कर्मण्यण, मकर -निधिविशेष , स इव मुदि -प्रमोदो यस्मात् स मकरमुदि , यथा हि दरिद्राणा निधिविलोकनात्प्रमोदस्तथा अस्मादपीति, “मुद् ह" "इकिश्तिव् स्वरूपार्थ" [सि हे ५।३।१३८] इति इप्रत्ययः, अक्षधारश्चासौ मकरमुदिश्चैति कर्मधारय । पुन किम्भूतस्त्व ? 'असुश्री:' एपु-जनेषु सुश्री शोभनश्रीर्यस्यासौ तथा, "अ कृष्ण शङ्करो ब्रह्मा, शक्र सोमो- ऽनिलोऽनल । सूर्य. प्राणो जन" [सौ ए २] इति वचन- प्रामाण्यात् । पुन किम्भूतस्त्व ? 'अट्टसरम्भवार' अट्ट-अत्यर्थ सरम्भ -परीरम्भोऽर्हता यस्मिन् स अट्टसरम्भ –नि श्रेयस, तस्य वार-वरण यस्य स तया, अट्टो हट्टाट्टालकयो गे"। अने स का. २. 'लो ६४] इति वचनात् ।।१६।। नाथैरनुत्तरनरैरभिहारसत्वर- भद्ररदैररहरैरमलैरघाशरः । देवरवस्कररहेरवहारकूत्कर- नष्टरपाठि रसिकैरदरैरवल्लरः ॥२०॥ मृदङ्गकच्छन्दः। व्याख्या-अनुत्तरा -प्रधाना ये नरा -मनुष्या अनु- त्तरनरास्तै अनुत्तरनर , अय गुरुरिति शेष , 'अघागर' "श, हिंसने" अलन्त , अघाना-पापाना आ-समन्तात् शर -हिसनं . " १ पाशके शकट कर्षे, ज्ञाने चात्मनि रावणी"। इति मुद्रिते
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स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः
यस्मात् स 'अवाशर -पापनाशक 'अपाठि' पठित इति सम्वन्ध ।
किम्भूतोऽघाशर ? 'अवल्लर
'अवल्लर' "वल्लर कुञ्जमझर्यो. क्षेत्रे
[ऽनम्भसि शाद्वले ।]" [अने स. का ३ श्लो. ११९८] इति
भणनाद्, न विद्यन्ते वल्लराणि-क्षेत्राणि धान्यवपनस्थानानि
यस्यासी तथा, त्यक्तगृहवासत्वात् । अथ सर्वाणि तृतीयाविशेष-
णानि-किम्भूतैरनुत्तरनरै ? 'नाथै ' स्वामिभि । पुनः किम्भूतै-
रनुत्तरनरै ? 'अभिहारसत्वरभद्रै.' "अभिहार सन्नहने, चौरि-
कोद्यमयोरपि' [अने स का ४ श्लो, १६०८] इत्युक्ते अभिहारेण-
उद्यमेन सत्वर-त्वरित भद्रं-मङ्गल येभ्यस्ते तथा तै । पुन
किम्भूतैरनुत्तरनरै.? 'अदै.' न द्यन्ति जीवानिति अदास्तै ,
दयावद्भिरिर्थ । पुन किम्भूतैरनुत्तरनरैः ? 'अरहरै.' ऋणन्ति-
प्राणिनोऽत्यन्तदु.ख प्राप्नुवन्ति येभ्यस्तानि अराणि-घातिकर्माणि,
तानि हरन्तीति अरहरास्तै । पुन
किम्भूतैरनुत्तरनरै ?
'अमलै ' निर्मलै , गुणोज्ज्वलैरित्यर्थ । पुन किम्भूतैरनुत्तरनरै?
'देव' दीव्यन्ति-धर्मे रमन्ते इति देवास्तै , अथवा 'देव' सुरै ।
किम्भूतै. सुरै ? 'अवस्कररहै ' "रह त्यजि" अलन्त , अव-
स्करस्य-गूथस्य रह -त्यजन येषा ते तथा तैः, “अवस्करो
गूथगुह्ययो" [अने स का ४ श्लो. १६०७] इत्युक्ते', देवाना-
माहाराभावे नीहारस्याप्यभाव इति । पुन किम्भूतैरनुत्तरनरै ?
अवहारकूत्करनष्ट ' “अवहारस्तु युद्धादिविश्रान्तौ ग्राह-
चौरयो.। [अने स का ४ श्लो १६०८] इत्युक्ते अव-
हाराणा-चौराणा य कूत्कर -कुत्सितसमूहस्तस्मान्नष्टा गता ये
ते तथा तै । पुन किम्भूतैरनुत्तरनरै ?'रसिक' इति सुगमम् ।
पुनः किम्भूतैरनुत्तरनरैः ? 'अदरै' निर्भीकैः ॥२०॥
सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तवः। २५ रञ्जना.-रञ्जका खरुरभिमरनाशं रञ्जनारन्तिभूर- हमुर दधर बाढं रकनारङ्गमौर !। प्रखरमिहिरकान्तेरन्धकारक्षयोर- समररिपुरनिष्टारक्षसोऽरम्भधूर ! ॥२२॥ मालिनीच्छन्द.। व्याख्या, हे 'रञ्जनारन्तिभू ।' "रञ्जन रजके" [रक्तचन्दने]" [अने स का ३ श्लो १००२] इति वचनात्, [तेवा] या आ-लक्ष्मीस्तया रम्यादिति रञ्जना- रन्ति , "तिक्कृतौ नाम्नि" [सि है, ५।१।७१] इत्यनेन सूत्रेण सिद्धिर्भवति, भद्र यस्मात् स भू , क्विवन्त , रञ्जनारन्तिश्चासी भूश्च रञ्जनारन्तिभूस्तत्सम्बोधन हे रञ्जनारन्तिभू । हे अरनाथ अह 'वाढ' अत्यर्थ 'दधर' कृतवान् । किं तत् ? 'अभिमरनाश' "अभिमरो ववे ।। स्वबलात् साध्वसे युद्ध]" [अने स का ३ श्लो. १६०५, १६०६] इति हैमानेकार्थवचनात्, अभिमरस्य- साध्वसस्य नाश अभिमरनाशस्त अभिमरनाश-भयनिर्माश, कस्मात् ? 'उ' धर्मात् । "ऋगब्द पावके सूर्ये धर्मे दाने धने पुमान्]" [ए ना ११] इति विश्वशम्भुवचनात् । 'अ' पादपूर्ती। किम्भूतो हे [रञ्जनारन्तिभू I ?] 'खरु' निर्दोषत्वान्निर्मल "खरु. सौदर्याहरयोर्ददन्तसितेषु च ।" [अने स का २ श्लो ४१४] इति वचनात् । किम्भूत हे रञ्जनारन्तिभू । ? 'रङ्कनारङ्गमौ ।' रङ्कानि-कृपणानि यानि नारङ्गानि-जन्मिन "नारङ्ग विटजन्मिनो" [अने स का ३ श्लो ७२१] इति १. "खरु. स्यादश्वहरयो." इति मुद्रिते।
२६ ? ? शत्वोपवृत्तिविभूषितः वचनात्, तेषा मा-लक्ष्मी अवति-नाशयति योसौ रकनार- ङ्गमौ , तस्य सम्बोधन हे रङ्कनारङ्गमी ।। एवविधोऽत. अकारो निषेधार्थ {पुनः किम्भूत हे रञ्जनारन्तिभू.! ? 'ओ.' प्राणक. । पुन किम्भूत हे रञ्जनारन्तिभू । ? 'अरम्भधूर ।' न विद्यन्ते रम्भा-देवाङ्गनास्तत्सदृशत्वात् रम्भा-रूपसुन्दर्य सुन्दर्यो येपा ने अरम्भा -त्रैरङ्गिका , “धूरेड गतौ" अलन्त , गत्यर्थाना प्राप्त्यर्थत्वात्, अरम्भाना धूर -प्राप्तिर्यस्यासी तथा, स सम्बो- ध्यते । किम्भूतोऽह ? 'असमररिपु' न विद्यन्ते समररिपव.- युद्धगत्रवो यस्य स तथा । किम्भूतस्य उ ? 'प्रखरमिहिरकान्ते' प्रखर -अत्यन्नकठोर , "प्रखर. पुन. ॥ वेसरे हयसन्नाहे, कुक्कुरेऽतिभृश खरे ।" [अने स का ३ श्लो ११७०-७१] इति वचनात्, स चासौ मिहिर -सूर्यस्तस्य कान्तिरिव-रोचि- रिव य स प्रखरमिहिरकान्तिस्तस्य, कस्मिन् ? 'अन्धकारक्षे' अन्धकारस्य-अज्ञानतमम. भ-क्षय अन्धकारक्ष तस्मिन्, अज्ञानतमोविनाशने सूर्यस्येत्यर्थ. । पुन किम्भूतस्य उ ? 'अनि- प्टारक्षस' अनिष्टानि-अनभीष्टानि आ-समन्ताद् रक्षासि- राक्षसा यस्मात् स तथा तस्त्र, राक्षस्यभयाभावत्येत्यर्थ ॥२१॥ विदारह रमकारशाङ्करं, विहारकर्तारमशारभास्वरम् । बभार चित्ते रमणीरसानरः ककारकं तारकधारके उरः ! ॥ २२ ॥ व्याख्या--हे 'तारकधारके उर.!'तारका -ससाराब्धि- पारगा तान् धारयति इति तारकधारकस्तस्मिन् तारकधारके- ५ २७ ? - ? सहस्रदलकमलमय. अरजिनस्तव.। साधुजने उर -मुख्य., "उरो वक्षसि मुख्य स्यात्" [अने स का २ श्लो ५८०] इत्युक्ते , हे साधुजनोत्तम ! 'रमणीरसानर' रमण्य -स्त्रियस्तासु रस -रागस्त न नरति-न नयति योसौ रमणीरसानर प्रस्तावात् साधुजन 'चित्ते' हृदि 'वभार' धृत- वान् । क ? 'विदारहरि' विदार्यन्ते नरा अस्मिन् स विदार युद्ध, तस्य हर्ता-हारको य स विदारहर्ता त विदारहर्तार- श्रीअरनाथजिनम् । किम्भून विदारहरि ? 'अकारणाङ्कर' न विद्यते कार-प्रस्तावात् ससारकारागार येषा ते अकारा सामान्यजिनास्तेषु मध्ये विशिष्टत्वात् गाङ्कर इव-वृषभ इव अकारशाङ्करस्तम् । पुन किम्भूत विदारहरि ? विहारकर्तार' विहार -लीला निम्पममयमश्रीविलसनरूपा, "विहारस्तु जिना- लये, लीलाया" [अने स का ३ श्लो १२०३] इति हेमाचार्या , तस्य कर्ता विहारकर्ता, तम् । पुन किम्भूत विदारहरि ? अशारभास्वर' "गारण् दौर्बल्ये' अलन्त , न शारोऽशार:- अदौर्बल्य, तेन भास्वर-मनोज्ञो य स तथा तम् । पुन किम्भूत विदारहार ? ककारक' सुखविधायकम् ।। २२ ।। तनुरवसरवित्तेरकसेरस्तदार!, प्रसुरति मुरविष्टरहतेरभ्रतेर । प्रवरभृदररे! भारत्यमेरस्यवेर! नवरजतरणरेरङ्ककारण्डजेर ॥२३॥ मालिनीच्छन्द । व्याख्या-'अररे।' सम्बोधनार्थमव्ययम् । हे 'प्रवरभृत् ।' "प्रवर सन्तती [गोत्रे श्रेष्ठे च]" [अने स का ३ श्लो ११७०] ? २८ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित. इति हेमानेकार्थोक्ते प्रवर-सन्तति पुत्रपौत्रादिकां विभति- पुष्णाति योऽसौ प्रवरभृत्, तस्य सम्वोधन हे प्रवरभृत् !- हे मित्र! 'तनु' गरीर 'प्रसुरति' प्रशोभते । कस्य? 'अवसरवित्ते' "अवसरो वत्सरे क्षणे" [अने स का. ४ श्लो. १६०६] इति वचनात्, अवसर –अतीतानागतवर्तमानकाललक्षणस्तस्य "वि- त्तिस्तु सम्भवे । जाने लाभे विचारे च]" [अने. स का ३ श्लो २०६] इति वचनाद्, वित्ति - ज्ञान यस्य यस्माद्वा स अवसरवित्तिस्तस्य अवसरवित्त - श्रीअरनाथ जिनस्य । किम्भू- तस्य अवसरवित्ते ? 'अर्कसे' "अर्क स्तुतौ" अय॑ते-स्तूयते जनैरिति अर्क , सह इना-इन्द्रेण वर्तते यः स से -सेन्द्र , "इ काम स्थाणुरिन्द्र' सौ. ए ४] इति वचनात्, अर्कश्चासौ सेश्च अर्कसेस्तस्य । किम्भूत हे प्रवरभृत् !? ? 'अस्तदार ।' अस्ताः दारा.- परकलत्राणि येनासौ अस्तदारस्तस्यामन्त्रणम् । पुन. किम्भूतस्य अवसरवित्ते ? 'मुरविष्टे ' "मुर वेष्टने” इति धातो अचि मुरन्ति-आत्मान आच्छादयन्ति पापैरिति मुराणि-कर्माणि तेषा विष्टि – प्रेपण मुञ्चनं यस्मात् स तथा तस्य, “विष्टिः कर्मकरे मूल्ये, भद्राया' प्रेषणेऽपि च ।” [अने. स का २ श्लो. ११४] इति वचनप्रामाण्यात् । पुन किम्भूतस्य अवसरवित्ते? 'अहते. अभ्रते' "अहतिस्त्यागरोगयो" [अने स. का. ३ श्लो. ८४०] इत्युक्तत्वात्, अहते -रोगस्य, जातावेकवचन, "अभ्र गती" गत्यर्थाना प्राप्त्यर्थत्वात् "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे" [सि हे ५।३। १३८] इति तिवि अभ्रति - प्राप्तिस्तस्य अभ्रते ,'अ'न, अकारो निषेधार्थः, रोगाना नागकस्येत्यर्थ । पुन किम्भूतस्य अवसर- १. “भद्राऽऽजूप्रेषणेषु च" इति मुद्रिते । . १ सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तव.। २९ वित्ते? 'भारत्यमे' भारत्या -वाग्देव्या अमि -भजन सेवन यस्मिन् स तथा तस्य, अम् गतौ भजने शव्दे” इति कविकल्पद्रुमधातुपाठोक्ते , “इकिश्तिव०" [सि हे ५।३।१३८] इति सूत्रेण इप्रत्यये सिद्धि । पुन किम्भूत हे प्रवरभृत् । ? 'अस्यवेर ।' भजनीयगरीर । । किम्भूता तनु ? 'नवरजतरणे' "रण गतौ" रणयति-सरमि जन्म प्राप्नोति यत्तत् रण-पद्म नव-जूतन यद् रजत-स्वर्ण तस्य रण नवरजतरण-नवीनस्वर्ण- कमल, तदिव एति-शोभते या सा तथा, स्वर्णवर्णगौरीत्यर्थ , "इल् (?इण्) कान्तौ" किवन्त , यदुक्त श्रीहेमसूरिपादः अभिधानकोपे-- "सुवर्णं पुन । स्वर्ण हेम हिरण्यहाटकवसून्यष्टापद काञ्चन, कल्याण कनक महारजतरंगाङ्गेयरुक्मीण्यपि ।। कलधौतलौहोत्तमर्वाह्रबीजान्यपि गारुड गरिकजातरूपे । तपनीयचामीकरचन्द्र भर्मा-र्जुननिष्ककार्तस्वरकव॑राणि ।। जाम्बूनद शातकुम्भ, रजत भूरि भूत्तमम् ।" [का ४ श्लो १०६-११] पुन किम्भूतस्य अवसरवित्ते ? 'ए.' “एधग् (? इण्क् ) गतौ" गत्यर्थाना ज्ञानार्थत्वाद् विचि एति-सर्वजनमनोगत जानाति य स ए, तस्य ए । पुन. किम्भूतस्य अवसरवित्ते ? ['अङ्ककारण्डजेर'] "अकि गत्या" अङ्कन अङ्क -ज्ञान स एव कारण्ड -असिस्तेन ' जयतीति विचि, अङ्ककारण्डजेस्तस्य, अकार पादपूर्ती, "कारण्डो मधुकोशेऽसौ” [अने. स का ३ श्लो ७७५] इति वचनात् ।।२३।। ?
३० स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः पूज्यरधोरै रमदैर! जेतरं, नेतारमायोरनयैरपांसुरम् । धारमंहेरगसो रषं त्वरं, पातारमस्तेरकलेरमुष्करम् ॥२४॥ व्याख्या-'अ' इति सम्वोधने, भो जना.! इति पद- मध्याहार्यम्, प्रणमतेत्यपि शेष । कं? 'जतरं' "जि अभिभवे" जयतीति विचि जे-जेता प्रकृष्टो जे जेतरस्त जेतर-श्रीअरनाथ- जिन "कित्याद्येऽव्ययादसत्त्वे तयोरन्तस्याम्" [सि. हे ७।३।८] इत्येनन सूत्रेण तरप् । किम्भूत जेतर? 'पूज्य ' पूजाह -साधुभिरि- त्यर्थोपलक्षितमित्यर्थ । किम्भूतै पूज्य ? 'अघोरै ' अभयङ्करै । पुन किम्भूतैः पूज्य ? 'अमदै 'निरहङ्कारै । पुन किम्भूतै पूज्य ? 'अनयै ' "अन प्राणने" अनन्तीत्यचि अना -प्राणिनस्तेषां या- लक्ष्मीर्येभ्यस्ते अनयास्तै । पुन किम्भूत जेतर' 'आयो ' जीवनस्य 'नेतार' दातारमित्यर्थ , दयापालकत्वात्। “इएक गतौ" ए[ती] त्यायु “कृवापाजिस्वदि [साध्यशीदृस्नासनिजानिरहीणभ्य उण]" [सि.हे उ सू १] इत्यनेन उणप्रत्यये सिद्धम् । पुन किम्भूत जेतर? 'अपासुर'पासू-रेणुस्तत्प्रायत्वात् पासव.-गठास्ते विद्यन्ते यस्य स. पासुरः, “मध्वादिभ्यो र" [सि हे. ७।२।२६] इति र , पासुरोऽपासुरस्तम् । पुन किम्भूत जेतर ? 'धार' धारकम् । कस्य ? 'अहे.' भास "अहिक भासि" "इकिश्ति" [सि हे ५।३।१३८] इति इप्रत्यय. । पुन किम्भूत जेतर ? 'रषं' १ ---"बूलि-धूल्यो पाशु-पासू, रजो ना सान्तपण रज" इति शब्दरत्नाकर का ४ श्लो. ३३ न -- सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तव.। ? ? . "रलयो सावर्ण्यम्" इत्युक्त 'लप' "लषा स्पृहि" लपति- स्पृहतीति किपि लक्('ट्) त लप-वाञ्छकम् , कस्य ? 'अगस शाश्वतक्षेमस्य, "अज क्षेपणे अञ्ज्यजियुजिभृजेर्ग च' [सि हे उ सू ६६६] इत्यनेन औणादिकसूत्रेण अस्प्रत्ययो गकारश्चान्ता- देशो भवतीति निष्पन्न अग -क्षेममिति । पुनः किम्भूत जेतर? त्वरं' "त्वर स्यदि" अचि त्वरयति धर्मार्थ जनानिति त्वर- स्तम् । पुन किम्भूत जेतर ? 'पातार' पालकम् , कस्य 'अस्ते.' अस्त -क्षिप्त इ-कामो येन स अस्ते , तस्य अस्ते. साधो । किम्भूतस्य अस्ते ? 'अकले' कलहरहितस्य । पुन किम्भूत जेतर? 'अमुष्कर' मुष्का -अण्डका विद्यन्ते येपा ते मुष्करा -पशव , "मध्वादिभ्यो र' [सि. हे ७।२।२६] इति र , न विद्यन्ते मुष्करा यस्यासौ तथा त, वृतव्रतत्वात् ।।२४।। अवरहसरथाङ्गारव्यवारण्डरोर- वृषरवणरसालौरम्यलेरङ्कदूरम् । गुरुरवलिरधृत्योरङ्गन्नो रश्मिदोर- गिरिरशिथिरबुद्धि रक्षतात् रच्यगूरः ॥२५॥ व्याख्या--'रच्यगूर' “गूर उद्यमे' अलन्त , रच्य रचनीयो गूर -उद्यमो धर्माद्यर्थ यस्यासौ रच्यगूर -श्रीअर- नाथजिन 'रक्षतात्' पातु । 'रक्षतात्' अग्रे 'रच्यगूर' इत्यत्र "न सन्धि" [सि हे १।३।५२] इत्यनेन सूत्रेण सन्ध्यकरणम- दुष्टम् । क ? अशिथिरबुद्धि' न शिथि रा-न श्लथा बुद्धिर्यस्यासी अशिथिरबुद्धिस्तमित्यन्वय.। किम्भूतो रच्यगूर ? 'अवरह- सरथाङ्गारव्यवारण्डरोरवृषरवणरसालौ' अव-हीन रह - . - ?
३२ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः अप्रकाश्य यस्मात् सोऽवरहस , यद्वा अव-हीनो रहसा' य स. अवरहस , “तप्तान्ववाद्रहस'[सि हे ७।३।८१] इति सूत्रेण समा- सान्त अप्रत्यय , अवरहसा -साधवस्त एव रथाङ्गा-चक्रवाका- स्तेषा आह्लादकत्वेन रविरिव-भानुरिव योसौ अवरहसरथा- गारवि , “वरण्डो वदनामये" [अने स का ३ श्लो. ७८१] इति वचनाद्, बरण्ड एव वारण्ड , स्वार्थे अण्प्रत्ययः, न विद्यते वारण्ड -वदनामयो यस्यासौ अवारण्ड रोर -दरिद्र निर्ध- नत्वात्, यद्वा न वारण्डो अवारण्ड , नगब्दस्य कुत्सार्थत्वाद् अवारण्ड -कुत्सितवदनामयस्तेन रोर.-दरिद्रो य स अवारण्ड- रोर, वृष-पुण्यं रौनीत्येवंशीलो वृपरवण -धर्मवक्ता, “रसाला दूर्वाविदार्योजिह्वामाजितयोरपि।" [अने स का ३ श्लो. १२८०] इति वचनाद, रसालया-जिह्वया अवति-दीप्यति जिह्वाया अत्यन्तरक्तत्वेन तनुत्वेन च य. स रसालौ., चतुर्णा कर्मधारये अवरहसरथाङ्गारव्यवारण्डरोरवृषरवणरसालौ । पुन किम्भूतो रच्यगूर ? 'अम्यले' " ? 'अम्यले' "अम गतौ भजने" अम ज्ञान विद्यते येपा ते अमिन -पण्डितास्तेषा अल –भूपा येभ्यस्ते अम्यला, "अल वारणपर्याप्तिभूपासु" इति वचनात्, अलन्त , अम्यला -सुरगुरुमानमातङ्गमर्दनसारङ्गनाव (गाव) निभा गतनिभा (?) वादिन षोडगशतसङ्खयाकास्तैरिति दीप्यते योसौ तथा । कथ भवति? 'अङ्कदूर' - "अङ्को भूपा रूपकलक्ष्मसु ।। चित्राजीनाटकाद्यशे, स्थाने क्रोडेऽन्ति- कागसो ।" [अने स का २ श्लो १७,१८] अङ्कात्- आगसो दूर यत्तत् अङ्कदूर, एवं यथा स्यात्तथा । पुन किम्भूतो रच्यगूर ? 'गुरु.' गरिष्ठ गुणैरिति गम्यते । पुन ?
. सहस्रदलकमलमय अरचिनस्तवः। किम्भूतो रच्यगूर ? 'अङ्गन' “अगि गतौ" गत्यर्थाना प्राप्त्यर्थ- त्वाद् अङ्गयति-प्रापयति अङ्गन , कर्तर्यनट् । कयो ? 'अव- लिरधृत्यो' न वलिरा अवलिरा -अवक्रदृष्टय , धृतिश्च- सुख धृतिश्च-सन्तोप "स्यादावसङ्खयेय" (सि हे ३।१।११६) इति सूत्रेणैकशेष धृती, अवलिराणा-अवक्रदृष्टीनां धृती अव- लिरघृती तयो , "धृतिर्योगविशेषे स्याद् धारणाधैर्ययो सुखे । सन्तोषाध्वरयोश्चापि" [अने स का २ श्ला. १८६] इत्युक्ते , अमुना विशेषणेन शीलव्रतधारिणा पुसा सुखसन्तोषयो प्रापक इत्यर्थः । पुन किम्भूतो रच्यगूर ? 'रश्मिदौ ' "दु उपतापे” विच्प्रत्ययान्तः, रश्मिभि शत्रून् दुनोति-उपतापयति योऽसौ तथा । पुन किम्भूतो रच्यगूर ? 'अगिरि ' "गिरि.,पूज्येऽक्षिरुजि कन्दुके । शैले गिरियके २ गीर्णावपि" अने. स. का २. श्लो ४१६] इति वचनाद् न विद्यते गिरि.-अक्षिरुग् यस्यासौ तथा, प्रधानाक्ष इत्यर्थ ।। २५ ।। कारोरनीतेरधृतेरदोषर! दारोरवाचो रजनीरभीरुरम् । सद्दोरनर्तेरभृतेरनम्बरः, सन्नोररिष्टरभतेरकर्करः ॥२६॥ व्याख्या--हे 'अदोषर ।' न दोषा अदोषा तेषा रा -दान यस्यासी अदोपरः तत्सम्बोधन हे अदोषर !- हे ? , २ "गिरियक -गिरिगुडः काष्ठादिमय क्रीडनकम्" इति टीकाया उद्धरण टिप्पने । ३ ३४ - ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित श्रीअरनाथजिन | त्वं 'अवाच' अत्यर्थ अन्नवी. । कि तत् ? 'अं परब्रह्म, "अ मान्लो ब्रह्मस वादे, परब्रह्म प्रवाचक ।" [वि ए १६] इति वचनप्रामाण्यात् । कस्य ? 'कारो' इन्द्रस्य, जातावेकवचनं, "डुकृग् करणे कृग्ट् हिंसाया वा" निरनुबन्यग्रहणे सामान्य- ग्रहणात् करोति करति कृणोति वा “कृवापाजि स्वनिसाध्यगौदृ- स्नासनिजानिरहीणभ्य उम्" सि हे उ सू १] इति सूत्रेण उणप्रत्यये “कार कारी नापितादि. इन्द्रश्च" | किम्भूतस्य कारो ? 'अनीते.' “णीग् प्रापणे' क्तिप्रत्यये नीति -प्रापणं, न विद्यते नीति -प्रापणं यस्यासौ तथा तस्य । कस्य ? 'अधृते.' असुखस्य । पुनः किम्भूतस्य कारो. ? 'दारो.' ददाति दयते यच्छति चति दाति दापयति वा इत्येवशीलो दारु- स्तस्य, “दाधेसिगदसदो रु." [सि हे ५।२।३६] इति रु- प्रत्यये सिद्धि । किम्भूतस्त्वं ? रजनी-निशा कान्तात्वेन एति- प्राप्नोति योऽसौ रजनी -चन्द्रस्तद्वत् गीतलत्वाद् रजनीरिव रज- नीर्य स तथा । पुन. किम्भूतस्त्वं ? 'अभीरु.' न विद्यन्ते भीरव स्त्रियो यस्यासी तथा । पुन. किम्भूतस्त्व ? 'सद्दो.' सन्तौ शोभनौ अचितौ वा दोपौ-[बाम दक्षिणभुजौ यस्यासौ तथा । पुन किम्भूतस्य कारो ? 'अनर्ते.' न विद्यते अति.-पीडा यस्यासी अनत्तिस्तस्य । पुन किम्भूतस्य कारो ? 'अमृतेः' अमरणस्य । पुनः किम्भूतस्त्व ? 'अनम्बर' न विद्यते अम्बर- वासो यस्यासी तथा । पुन. किम्भूतस्य कारो ? 'अभृते' न विद्यते भृति -पोपण यस्यासौ तथा तस्य । कस्यो 'अरिष्टे अशुभस्य । कस्य? 'सन्नो.' सती-विद्यमाना नु.-स्तुतिर्जनेपु ? ?
सहनदलकमलमय अरजिनस्तव । રૂ૫ " - . यस्य स सन्नु -भक्तस्तस्य । पुन किम्भूतस्त्व ? 'अकर्कर अकर्कग इत्यर्थ ।। २६ ।। समरमुदिरसेरोरर्थधेरखिखीरं, नगर निगरणारच्छपेरम्बगारम् । सुपरठिकरटीतेरस्तजारण्डमार- मधुरनविरलक्षे रथ्यदेरस्त्रपेर ॥२७॥ व्याख्या-अह 'ननर' प्राप्तवान्, “नृश् नीतौ” परोक्षाया उत्तमपुरुषरूपम् । कि तत् ? 'अत्खिखीर' "अत सातत्यगमने" किवन्त , गत्यर्थाना ज्ञानार्थत्वाद् अद्-ज्ञान तस्य खिखीरा- बहुत्व यस्मात् स तथा तं अत्खिखीर-जिनप्रणीतधर्मम् , "खिखीरा वद्१ वहुत्वे च" [अने सं का ३ श्लो ११५०] इत्युक्ते । कस्मात् ? 'सृमरमुदिरसेरो' सरन्ति-मैथुननिमित्त वेश्यादिषु गच्छन्ति ये ते सृमरा , “सृघस्यदो मरक्” [सि हे. ५।२।७३] इत्यनेन मरक् , अत एव "मुदिर कामुके मेघे" [अने स का ३ श्लो ११९६] इति वचनप्रामाण्याद् मुदिरा.- कामुका , "षिग्ट् बन्धे" सिनोति-बध्नातीत्येवशीलो य स सृमरमुदिरसेरु , “दाधे सिगदसदो रु” [सि हे ५।२।३६] इति रु , तस्य [? तस्मात् सृमरमुदिरसेरो , श्रीअरनाथजिना- दित्यर्थ । किम्भूत अखिखीर ? 'अम्बगार' "अम्ब च गतौ”(?) अम्ब्यते-ज्ञायते योग्यायोग्यमार्गमेभ्यो लोकैरिति अम्बा-जिन- प्रणीतैकादशाङ्गानि, तेषा गार -विज्ञायो यस्मात् स तथा तम्, ? १. "खि विरा खिङ्खिरी" इत्यपि पा० ॥
३६ स्वोपक्षवृत्तिविभूषितः "गृक्ड विज्ञाये” इति कविकल्पद्रुमधातुपाठोक्ते । किम्भूतस्य सृमरमुदिरसेरो ? 'अर्थधे' अर्थ-ज्ञानदर्शनचारित्ररूप धन धियति योऽसौ अर्थधेस्तस्य, "धित् धृतौ" विच्प्रत्ययान्त. । पुन. किम्भूतस्य सृमरमुदिरसेरो ? 'निगरणाश्रे' "गृत् निगरणे" नितरा गरण-अदनं येषा ते निगरणा.-प्राणिन , ते आ- समन्तात् श्रयन्ति-सेवन्ति यमिति निगरणाश्रेस्तस्य, प्राणिभि. सेवितस्येत्यर्थ , "श्रिग् सेवने" विच्प्रत्ययान्त. । पुन किम्भू- तस्य सृमरमुदिरसेरो ? 'अच्छपे' "पित् गतौ” ज्ञानार्थ. विजन्त , अच्छ -निर्मल. पे.-ज्ञानं केवलजान यस्यासी तथा तस्य । पुन. किम्भूतस्य सृमरमुदिरसेरो. ? 'सुमरठिकरटीते' मरठा -प्राणा , यदुक्तमुणादिवृत्तौ-"मरठ दध्यतिद्रवीभूत कृमिजाति कण्ठ. प्राणश्च ।" [सि हे. उ. सू १६७] इति, ते विद्यन्ते येषा ते मरठिन , सुष्ठु मरठिन सुमरठिन., तेषां मध्ये करटिन इव-गजा इव ये ते सुमरठिकरटिन , तेषा इति शोभा यस्मात् स तथा तस्य, “इण् कान्तिगतिव्याप्तिक्षेप- प्रजनखादने" इति वचनात् । पुन किम्भूतस्य सृमरमुदिर- सेरो: ? 'अस्तजारण्डमारमधुरनविरलक्षे' जरण्ड -अतीतव- यस्क., भावप्रधाननिर्देशाद् जरण्डशब्देन वृद्धत्वम्, जरण्ड एव जारण्ड., स्वार्थे अण्प्रत्यय , अस्त -क्षिप्त जारण्ड -वृद्धत्व- मेव येभ्यस्ते अस्तजारण्डा -युवानः, मार -कन्दर्पस्तद्वत् सुन्द- ररूपत्वाद् मधुरा-सर्वजनप्रियाः मारमधुरा, अस्तजारण्डाश्च मारमधुराश्च अस्तजारण्डमारमधुरा, ते च ते नाश्च-नरा अस्तजारण्डमारमधुरना -कामिपुमास., “नो नरे" [७६] इति विश्वगम्भुवचनात्, तेभ्यो विरला -असहता ये ते अस्तजारण्ड- ते ३७ सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तव । मारमधुरनविरला , तै “क्षि क्षयैश्वर्ययो” विचि क्षयति - ईष्टे य. स अस्तजारण्डमारमधुरनविरलक्षेस्तस्य । पुन किम्भूतस्य सृमरमुदिरसेरो ? 'रथ्यदे' "रथ्यो रथाशे रथवोढरि" [अने. स.कां. २ श्लो. ३८६] इति वचनाद् रथ्या -रथवोढार , प्रस्ता- वाद् धर्म रथवोढार , तान् "देड पालने" विचि दयते-पालयति योऽसौ रथ्यदेस्तस्य । पुन किम्भूतस्य सृमरमुदिरसेरो ? 'अस्त्रपे अ' “अस्त्र चापे प्रहरणे" [अने स का २ श्लो ४००] इति वचनात् "पित् गतौ" "ये गत्यर्थास्ते प्राप्त्यर्था" इति वचनाद् अस्त्राणा-चापाना पे -प्राप्तिर्यस्य सोऽस्त्रपेस्तस्य अस्त्रपे , एवविध 'अ' न, अकारो निषेधार्थ ॥२७।। लोकरशोभि रपनरपनरखिङ्किरः, पूतैरमातिरतरेरकदैरघस्मरः । सुश्रीरनेमिरनतैरसुधेरतोमर- प्रष्ठेरदुःखरजकैरवनैरमत्सरः ॥२८॥ मृदङ्गकच्छन्द व्याख्या-'अखिङ्खिरः' "खिटिरस्तु शिवाभेदे, खट्वाङ्गे वारिवालके" [अने स. का. ३ श्लो ११४६] इति वचनाद् न विद्यते खिसिर -वालक सुगन्ध्यर्थं यस्य स अखि सिर -श्रीअर- नाथतीर्थकृत् 'लोकै.' श्रावकजनै. साधुजनैर्वा 'अशोभि' गोभित । किम्भूतैर्लोक. ? 'रपन.' “रप भाषणे" कर्त्तर्यनटि रपन्ति-शुभवार्ता भाषन्ते ये ते रपनास्तै । पुन किम्भूतैर्लोक ? 'अपनै ' "नो बुद्धौ ज्ञानबन्धयो' [२७] इति सुधाकलशवचनाद् - ३८ ? . ? ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित अप-गतो न -वन्धोऽकरणार्हवस्तुवातजो येभ्यस्तेऽपनास्तै । पुन किम्भूतैर्लोक ? 'पूर्त' पवित्रै । किम्भूत अखिसिरः 'अतरे अमाति' "अत सातत्यगमने" गत्यर्थाना ज्ञानार्थत्वाद् अतस्य-ज्ञानस्य "रित् गतौ" विजन्त रे -प्रापण यस्मात् स अतरे, तस्य अतरे -धर्मस्य 'अमाति' न विद्यते माति -मान यस्मात् स तथा । पुन किम्भूतोऽखिसिर ? 'अकदै ' "देव शोधने' किवन्त , अकस्य-पापस्य दै -शोधन यस्मात् स तथा । पुन किम्भूतोऽखिबिर ? 'अघस्मर' अनदनशील । पुन किम्भूतोऽखि विर 'सुश्री' "श्रिग् सेवाया" सुष्ठु श्रयति पुण्यकर्माणमित्येवशील सुश्री , “दिद्युद्ददृ" [सि. हे ५। २१८३] इति सूत्रेण शीलादौ सत्यर्थे कियो निपात । पुन किम्भूतोऽखिड्डिर ? 'अनेमि ' नमतीत्येवशीलो नेमि , न नेमि अनेमि , तीर्थकृत्त्वात्, “सस्त्रिच क्रिदघिजजिनेमि" [सि हे ५२। ३९] इत्यनेन सूत्रेण शीलादौ सदर्थे युक्तिमान् ङयन्तो निपा- त्यते इति नेमिगन्दनिष्पत्ति । पुनः किम्भूतैर्लोक' ? 'अनते' अनम्रीभूत परतीर्थेषु । पुन किम्भूतोऽखिङ्खिर ? 'असुधे' असून्-प्राणान् धियति विचि असुधे, "धित् धृतो" । पुन किम्भूतों ? "अतोमरप्रष्?' न विद्यन्ते तोमरा --शस्त्राणि येषा ते अतोमरास्तेषा मध्ये प्रष्ठा.-विशिष्टा अतोमरप्रष्ठा- स्तैः । पुन किम्भूतैलोके ? 'अदु खरजक ' दु ख नास्ति येभ्य- स्ते अदु खास्तान् “रजी रागे" रञ्जतीति अकि अदु खर- जकास्ते , सुखकरजनरञ्जकैरित्यर्थ । पुन किम्भूतैर्लोक ? 'अवनै ' अवन्ति-लक्ष्मी वर्द्धयन्ति ये ते अनटि अवनास्तै । पुन. किम्भूतोऽखिङ्खिर ? 'अमत्सर.' मत्सररहित ।।२८।। . ?
सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तव । ३९ - । अकरणिरररस्यौरस्तु कारण्डकोः! रो, बधिरविखुरणाधोरश्च दारङ्गतोर । रुचिरखदिरदीप्तेरऱ्याखोरतिहार!, स्वदरवृदरपल्लूरल्य धैरङ्ग! पूर!॥२६॥ व्याख्या-'हे कारण्डक करण्डक एव कारण्डक., स्वार्थे अण्प्रत्यय , हे कारण्डक । कस्य? 'र.' "ऋशव्द पावके सूर्ये धर्मे' [वि ए ११] इति वचनप्रामाण्याद् आ-धर्म , "ऋ दीर्घो देवमाता स्यादृभवस्तेन ते सुरा ।। स्त्रीलिङ्गोऽय धने बह्रौ, वासवे वरुणालये । वि ए १२-१३] इति वचनाद् आ- धर्म स एव ऋ ऋ, तस्य र -धर्मधनस्य, अमुना विशेप- णन धर्मवतालय इत्यर्थ । ऋ अग्रे ऋ इति सन्चौ "समानाना तेन दीर्घ " [सि हे १।२।१] इति दीर्घ ऋ, तदनु पष्ठयेक- वचने 'र' इति निष्पत्ति । 'हे र कारण्डक ! ' हे धर्मधनालय । हे मित्र | 'अररस्य' भ्रमणस्य प्रस्तावात् ससारभ्रमणस्य, यदुक्त- मुणादौ-"अरर कपाट वुध भ्रमण" [सि हे उ सू ३८७] इति, 'अकरणि' अविधानमेव 'अस्तु' भवतु, जन्मस्येति शेप । , अकरणिरित्यत्र "नोऽनि मापे" [सि हे ५।३।११७] इति सूत्रेणानिप्रत्यये न करण अकरणिरिति, न विधानमेवेत्यर्थ । कस्मात् ? 'ओ' "उड शब्दे विचि अवति-दानशीलतपोभाव- नारूप धर्म परिपदि गव्दयति योऽसौ औ , तस्माद् ओ -श्रीअर- नाथजिनात् । किन्भूत हे र कारण्डक I ? 'औ ।' हे प्रीणक!। किम्भूताद् ओ ? 'वधिरविखुरणाप्रो' बधिरा -श्रुतिविकला , स्वोपजवृत्तिविभूषित. विशेषेण खुरणस -लघुनासिकावन्त पुमासः, वधिराश्च विखुर- णसश्च बधिरविखुरणस , “ध्रु गतिस्थैर्ययो" विचि ध्रौ , तेपा धौ -स्थैर्य यस्मात् स बधिरविखुरणाघ्रौ , तस्माद् बधिरवि- खुरणाघ्रो , एवविधो 'अ' न । पुनः किम्भूताद् ओ ? चकारः पादपूर्ती, 'वारङ्गतो अ' "वारङ्ग काण्डखड्गयो" [सि. हे उ. सू ६६] इति उगादिवृत्त्याम्, वारङ्ग -खड्ग काण्डैर्वा तौति- हिनस्ति योऽसौ वारङ्गतौ तस्मात्, एवविध. 'अ' न, “तुल्यवृत्ति- हिसापूर्तिः" इति वचनाद् विजन्त । पुन किम्भूताद् ओ.? 'रुचिरखदिरदीप्ते' "खदिरो दन्तधावनचन्द्रयोः". अने. स. का ३ श्लो. ११४६] इति हैमानेकार्थोक्ते रुचिर:-मनोहरो यः खदिर -चन्द्र तद्वद् दीप्ति.-कायकान्तिर्यस्यासौ तस्मात् । पुनः किम्भूताद् ओ ? 'अ-ग्रं-खो' "खुड ध्वनौ” विजन्त , अर्ध्या - पूजास्तेि खुवन्ति-ध्वनयन्ति गीतादिभिरिति यं स अर्ध्य- खोस्तस्मात् । [पुन.] किम्भूत हे र कारण्डक I ? 'अतिहार ।' पीडानाशक ! । पुनः किम्भूत हे र. कारण्डक ! ? 'वै. !' "ओवे शोपे" किपि वायति-गोषयति योऽसौ वै., तत्सम्बोधनं हे वै । हे शोषक ! , कस्य ? 'स्वदरवृदरपल्लूरस्य' सु-अतिगयेन अद- रवृदरावेव-स सङ ग्रामभयावेव पल्लूर-सित पयो-निर्मलपय. स्व- दरवृदरपल्लूर तस्य तथा । अदरवृदरशव्दी औणादिको सङ ग्रा- मभयवाचकौ, “पल्लूर तु सितं पय" [शेप सं. श्लो. १६३] इति शेषः, जलवाचक. । पुनः किम्भूत हे र: कारण्डक ! ? अङ्गेति कोमलामन्त्रणे, 'हे पूर !' "पूर पूत्र्ती" अजन्तः, पूरयति अभीष्ट- मिति पूर , तत्सम्वोधन हे पूर! , पूरकेत्यर्थ ।। २६ ।। ?
सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तव । ४१ यक्ष्यरचोकू रपठे रमव्यरः, सत्कारभूनीरनयेरगत्वरः। सभ्यरधीशेरधनैरपदमरः, कप्टरनन्तरदशैरकच्छुरः ॥ ३० ॥ . व्याख्या-'सत्कारभूनी !' कारो-निश्चय तत्र तेन वा भवतीति कारभू -अग्रेसर , सन्नश्च–साधव कारभ्वश्व-अग्रेसराः सत्कारभ्व , तेभ्योऽपि विशिष्टत्वेन अग्रेसरत्व नयति-प्राप्नोति योऽसौ तथा, तत्सम्बोधने हे सत्कारभूनी. I -श्रीअरनाथजिन | त्व "यक्ष पूजाया" यक्षे-पूजाया अहीं यक्ष्यास्तैर्यक्ष्य -साधुभि 'अचोकू.' अत्यर्थ ज्ञानक्रोडामकार्की । किम्भूतैर्यध्यै ? 'रप?' विद्वद्भि , यदुक्तमुणादी-“रपठ विद्वान् मण्डूकश्च' [मि हे. उ. सू.१६७]। किम्भूतस्त्वं? 'रमठयर' रमठा -क्रीडनशीला विद्यन्ते येषा ते रमठिनः-चक्रवत्तिनस्तेषा अर -सेवार्थ प्रापण यस्य स तथा, “ऋश् गत्या" अलन्त । यदुक्तमुणादिवृत्त्या-"रमठ देश कृमिजाति. क्रीडनशील. म्लेच्छ देवश्च चिलातानाम्" [सि हे. उ. सू १६७] । पुनः किम्भूतस्त्व ? 'अनये' अनयस्य-कुनयस्य ई:-क्षेपो यस्माद् यस्य वा स तथा, “इल् क्षेपे" किबन्त । पुन किम्भूतस्त्व ? 'अगत्वर' अगमनशील , परदारादिष्विति गम्यते। पुन किम्भूतैर्यक्ष्य ? 'सभ्य ' सभाहैं । पुन किम्भूतैर्यक्ष्य ? 'अवीशै' स्वामिभिः, शिष्यादीनामिति गम्यते । पुन किम्भूतै- र्यक्ष्य ? 'अधन' निर्वनै , यतित्वात् । पुन किम्भूतस्त्व? 'अप- "क्मर कौटिल्ये" अलन्त., अपगत. क्मर -कौटिल्य कमर , ४२ १ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित यस्मात् स तथा । पुन किम्भूतैर्यक्ष्य ? 'अनन्तै ' न विद्यते अन्त -विनाशो येषा ते अनन्तास्तै अनन्तै -नाशरहित । कै. ? 'कष्टै ' अशुभै । पुन किम्भूतैर्यक्ष्य ? १'अदशै.' अवस्थाहीनै । पुन किम्भूतस्त्व ? 'अच्छुर '२ खर्जूरहित.३ ॥३०॥ गुरुरनपरथा के रक्षादीरटयपारः, खलु रचय रतीसारक्षकारण्यवीरः। विमरणपरमात्माऽऽरब्धनीरन्ध्रकोर- घनरससुरभिरब्जदृग्रत्ननूरः ॥३१॥ व्याख्या-हे विभो । त्व 'खलु' निश्चित 'क' सुख ‘रचय' विधेहि । कथं ? 'अनपरथा' "प्रकारे था" [सि हे ७।२।१०२] इति थाप्रत्यये अपरथा-अतथा, न अपरथा अनपरथा-न अन्यथा प्रकारेण, प्रस्तावाद् एकयैव सेवया सुख कुरु इत्यर्थ । किम्भूत- स्त्व ? 'गुरु' गरिष्ठ । पुन. किम्भूतस्त्व ? 'रङ्घदीरटयपार "रघिड गमने" रजो-ज्ञान अलन्त , त ददति ये ते रवदिय - ज्ञानदा , “दा दाने' किबन्त , “रट भाषणे” अत एव रटन्ति- भाषन्ते इत्येवशीला रड्वदीरटिन , तेषा न विद्यते पार -प्रान्तो यस्य स तथा । पुन किम्भूतस्त्व ? 'रतीसारक्षकारण्यवीर' "रति. स्मरस्त्रिया रागे" [अने. स का २।२०३] इत्युक्त. रति -राग , तस्या ई -प्रापण वस्या सा रती , रतीश्चासौ मा च-लक्ष्मी ? ? - . १. “अवस्था तु दशा स्थिति" अभि. चिन्ता. का ६ श्लो १३। २' "कच्छुर पुश्चले पामासहिते" अने. स का ३ श्लो. १११३ । ३ “कण्डू. कण्डूयनं खजूं" अभि चिन्ता का. ३ श्लो. १२८ ।
सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तवः। ४३ रतीसा, आरक्ष -रक्षको यः स रतीसारक्ष , "आरक्षो रक्षके" [अने स का ३ श्लो १२३०] इति हैमानेकार्थोक्ते , “कारण घातन हेतो" [अने स का ३२लो ७६५] इति वचनात् कारण-घातन विद्यते येपा ते कारणिन -घातका , तेपा ई -नाशो यस्मात् स कारणी , “इल क्षेपे' वियन्त , “वीरा गम्भारिकारम्भाताम- लक्येलवालुपु ।” [अने स का ३ श्लो ४६३] इति वचनाद् न विद्यन्ते वीरा - रम्भाप्रायत्वात् स्त्रियो यस्यासौ अवीर , त्रयाणा कर्मधारये रतीसारक्षकारण्यवीर । पुन किम्भूतस्त्व? 'विमरण- परमात्मा' विगत सरण-मृतिर्यस्मात् स विमरण , परमश्चासौ आत्मा च परमात्मा, विमरणश्चासौ परमात्मा च विमरणपर- मात्मा । पुन किम्भूतस्त्व ? 'आरधनीरन्ध्रकोरधनरससुरभि "कुरत् गन्दे' घान्त , आरब्ध -प्रारब्धो नीरन्ध्र -दृढ कोर - गव्दो व्याख्यानावसरे येन स आरधनीरन्ध्रकोर , घनरस कर्पूरस्तद्वत् सुरभि –सुगन्धो य स धनरससुरभि , आरव्ध- नीरन्ध्रकोरश्चासौ धनरससुरभिश्च तथा । पुन किम्भूतस्त्व 'ने' "नी प्रापणे" नयति शर्म योऽसौ न -नेता विजन्त । पुन किम्भूतस्त्व ? 'अब्जदग्रत्ननू ' अब्जदृशि-कमलनयनानि यानि रत्नानि-स्वजातिश्रेष्ठा , "रत्न स्वजातिश्रेष्ठ स्यात् ” [अने स का २ श्लो २६१] इति हैमानेकार्थोक्ते., अव्जदृग्रत्नै नूयते- स्तूयते योऽसौ तथा । 'अ' पादपूतौ ॥३१।। संसारदुस्तरसुनीरधितारकानुर- दूढयैरपातिरसितैरहसरखपरः । ?
४४ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित सिद्धरगायि रमतीरसितेरहोऽध्वरः, ख्यातरदातिर शतरगतीरकूबरः ॥३२॥ व्याख्या-अध्वरशब्दस्तीर्थकरनामवाची जिनसहस्रनाम- मध्ये पठितोऽस्ति, 'अध्वर' श्रीअरनाथजिन 'सिद्धे.' प्रसिद्ध श्रावकै 'अगायि' प्राप्त , "सिद्धो व्याड्यादिके देवयोनौ निष्पन्नमुक्तयो । नित्ये प्रसिद्ध" [अने स. का २ श्लो. २६७] इति हैमानेकार्थोक्ते. । किम्भूतोऽध्वर ? 'ससारदुस्तरसुनी- रवितारकानु.' संसार.-भव स एव दुस्तरसुनीरधि -गोभन- जलराशिस्तस्मात् तारयन्ति ये ते संसारदुस्तरसुनीरधितारका , तेषु आ-समन्ताद् नु -स्तवनं यस्य स तथा । किम्भूतैः सिद्धे ? 'अदूढय' दुष्ट ध्यायन्तीति "स्यादिभ्य क" [सि. हे ५।३।८२] इति के दूढया -दुर्जनाः, न दूढया अढ्यास्तैः तथा, सज्जनैरित्यर्थः, अत्र हि पृषोदरादित्वाद् दुसो दूभावो घस्य ढत्वे दूढय इति । पुन किम्भूतोऽध्वर. .? 'अपाति' "पा पाने" पाति.-पानम्, न विद्यते पातिः-मदिरापान यस्य स तथा । पुन. किम्भूतं. सिद्ध ? 'असितै.' दीप्त । पुन किम्भूतं. सिद्ध ? 'अहसै' "हसे हसने" अलन्त , न विद्यते हस -हसन येषु ते अहसास्तै. । पुन किम्भूतोऽध्वर.? 'अखर्पर' न सन्ति खर्पराः- धूर्ता यस्य स तथा, "खर्परस्तस्करे भिक्षापात्रे धूर्त-कपालयो [अने स का. ३ श्लो. ११४७] इत्युक्ते । पुन किम्भूतोऽध्वर ? 'रमती' "रमु क्रीडे" "इकिन्तिव् स्वरूपार्थे" [सि हे ५।३। १३८] इति तिवि रमति.-रमणं, प्रस्तावाद् मुक्तिश्रिया समं रमति-क्रीडन एति-प्राप्नोति योऽसौ तथा । पुन किम्भूतो- ? - सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। ४५ 7 वर ? 'असिते' न सिता असिता-अबद्धा ई-लक्ष्मीर्यस्यासो तथा, अत्यन्तलक्ष्मीदानदायक इत्यर्थ , धर्मकार्यसावधानत्वेन । पुन किम्भूतै सिद्ध ? ख्यात' प्रसिद्ध । 'अहो ।' इत्याश्चर्ये । पुन किम्भूनोऽध्वर ? 'अदाति' "दाव्क् लूनी" क्तिप्रत्ययान्त , न विद्यते दाति -लवन यस्य स तथा । अकार. पादपूरणार्थ । पुन किम्भूतोऽध्वर ?'गतरगती' गतेर -वायुस्तद्वद् गतिर्येपा ते शतेरगतय -साधव तेपा ई-लक्ष्मीर्यस्मात् स तथा, शतेर- शब्द औणादिको वायुवाचक. । पुन. किम्भूतोऽध्वर ? 'अकूबर' अकुन्ज., “कूवर पुन । कुब्जे [युगन्धरे रम्ये ।" अने स का. ३ श्लो ११४३] इति वचनात् ॥३२।। ? " अविरतमर ! तुष्टोरस्कतौरहदीरः, प्रचुरय विरजं कारम्भभूरर्जसोरः । यतिरकुचररासेरस्यवैरप्रजौर- स्तिभिरखिदिरतम्यारत्विडा रक्षितारः ॥३३॥ -- व्याख्या-हे ‘अर !' हे अरनाथजिन ! त्व 'अविरत' निरन्तर 'विरज' विगत रज.-पापमलो यस्मात् स विरज धर्मस्त विरजं 'प्रचुरय' बहुलीकुरु । किम्भूतस्त्व? 'तुष्टोरस्क- तौ' तुष्ट उरो यस्मात् स तुष्टोरस्क , “दध्युर.सपिमधूपान- च्छाले.' [सि हे ७।३।१७२] इति सूत्रेण बहुव्रीहे. कच् समा- सान्तः प्रत्ययो जात , तुष्टोरस्क -धन , त तौति-पिपति विचि तुष्टोरस्कतौ , धनपूरक इत्यर्थ । पुन किम्भूतस्त्व' 'अहंदीर.' 7 .. ? स्वोपक्षवृत्तिविभूषित. रागहेपकपायपरीपहोपसर्नेन्द्रियकण्टिकादिरूपाणामान्तराणा- मरीणा वध्यमानकर्मरूपम्प रजसो वा हन्तारो ये ते पृपोदरा- दिसाद अर्हन्त , तया ई-लक्ष्मीस्तया राजते योऽसौ तथा । पुन. किम्भूतत्व ? 'कारम्भभू' "आरम्भस्तु वधदर्पयो । त्वरायामुद्यमें चारि" [अने. स का. ३ श्लो. १०४६, १०५०] इनि हेमानेकार्थोक्तेः कं सुख तद्धेतुत्वान् क-सयमस्तस्य य आरम्स. करणायोचम तस्य भू-उत्पत्तिस्थान यः स कारम्भभूः । पुन. किम्भूतस्व? 'अर्जसोर.' "अर्ज सर्ज उपार्जने" अजन्तः, अर्जयन्ति-धर्मवनमुपार्जयन्ति ये ते अर्जा- श्रावकास्तेपां सोर:-ऐश्वर्य यस्मात् स तथा, “सुरत् ऐश्वर्ये" घनन्त । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'यति' साधु । पुनः किम्भू- तस्त्व ? 'अकुचररासेरसी' “कुबारकुचरौ समौ" [अ. चि. ३।१२] इति वचनात् कुचरा-कुत्सितवक्तार, न कुचरा अकुचरा:-सम्यग्वक्तारः, तै. सह रासे रसः-गोष्ठी विद्यते यस्य स तथा, “रासेरसो रससिद्धिवलौ शृङ्गारहासयो । षष्ठी- जागरके रासे गोष्ठ्याम्" [अने. स. का ४ श्लो. १७०५] इति वचनप्रामाण्यात् । पुन. किम्भूतस्त्व ? 'अवरप्रजौ.' न विद्यते वैर-विरोधो यस्यां सा अवैरा, सा चासौ प्रजा च- सन्नतिर्गणधरादिका तां अवति-वर्द्धयति योऽनी तथा, "प्रजा लोक सन्तती च" [अने. सं का. २. श्लो. ८७] इति वचनात् । पुन . किम्भूतस्त्वं ? 'अ.' अर्हन्, “अः स्यादर्हति सिद्धे च" इति वचनप्रामाण्यात् । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'तिमिरखिदिर- तम्यारत्विट्' तिमिराणि-रोगाः कामश्वासभगन्दरज्वरादयः, "तिमिर तमः तोय रोगश्च" [सि. हे. उ. सू. ४१६] इति उणादि- सहस्रदल कमलमय अरजिनस्तव.। ४७ ? वृत्तौ, खिदिर -वाम गत्रुसमुद्भव , "खिदिर त्रास” [सि हे उ सू ४१६] इति उणादिवृत्त्या, तिमिराणि च खिदिरश्च तिमिरखिदिरी, तावेव तमी-रात्रिस्तस्या "असूच क्षेपे” क्वि- वन्त आ-समन्ताद् अस् आ , तत्र रविड् इव-तीबरोचिरिव योऽमी तिमिरखिदिरतम्यारत्विट् । पुन किम्भूतस्त्व ? आकार पादपूरणार्य , 'रक्षितार ' रक्षिता-पालिता आ-समन्ताद् रा - समृद्धियन स तथा, "रा लक्ष्मी रा समृद्धि स्यात्" [सौ ए. ८२] इति सौभरि ।।३३।। वृन्दारकागरजिनोरसमौरक रः, प्रारसारि रदमौरशरैरनिर्वरः । भव्यरसालिरभसैरनिभैरजर्जर- दुर्वारकङ्करदिदैरजितैरसंस्तरः ॥ ३४ ॥ ? व्याख्या-'प्राजै' विद्वनि 'असारि' प्राप्त । क ? 'वृन्दार- कागरजिनोरसमौ' वृन्द-यतिवृन्द श्रावकवृन्द वा देववृन्द वा राजवृन्द वा विद्यते यस्यासी वृन्दारक , "वृन्दादारक” [सि हे. ७।२।११] इति सूत्रेण मत्वर्थे आरकप्रत्यय , न विद्यते गर -विष विषयविप यस्मात् स अगर , जिनाना-अष्टावि- शतिशतसङ्ख्याकाना सामान्यकेवलिना उर -[मुख्य ]जिनोरस , केवलिनामुत्तम इत्यर्थ , "उरसोऽग्रे' [सि हे ७।३।११४] इति सूत्रेणोरस्शब्दात् तत्पुरुषादट् समासान्तो जात , मा-शोभा अवति-विदधाति योऽसौ मौ -शोभाकर , अत्र अवधातु करणा- र्थो ज्ञेय , वृन्दारकरचासौ अगरश्चासौ जिनोरसश्चासौ मौश्च ४८ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित. वृन्दारकागरजिनोरसमौ.-श्रीअरनाथजिन गुरुत्वेन देवत्वेन वा। किम्भूतो वृन्दारकागरजिनोरसमौ ? 'अकर्वर.' “कर्वरो राक्षसे पापे” [अने. स. का. ३ श्लो. ११२८] इत्युक्तेः नास्ति क्र्वर- पाप यस्यासौ तथा। [पुन] किम्भूतो वृन्दारकागरजिनोरसमो.? 'रदमौ' रत-सुरतं करोति,"तत्करोति तदाचष्टे" इति पाणिनि- गणसूत्रेण] रतयते रतयतीति णिजि तल्लुकि क्विपि तल्लुकि च रत्, तत्मादमति-गच्छति योऽसौ रदम., औ -पालक , रदमश्चासौ औरचेति कर्मधारये रदमौ. । किम्भूतै. प्राज्ञै ? 'अगरै' वाण- रहित , निष्क्रोधत्वात् । पुन. किम्भूतोवृन्दारकागरजिनोरसमौ ? 'अनिर्वर' “निर्वरं तु गतत्रपे” [अने. स. का ३. श्लो. ११६६] इति वचनाद् न निर्वरः अनिर्वर., सलज्ज इत्यर्थः । पुनः किम्भू- तैः प्राज्ञै ? भव्य' मनोहरै. । पुन. किम्भूतैः प्राज्ञैः? 'अमालि- रभसै' "अम गतौ” गत्यर्थानां ज्ञानार्थत्वाद् अमस्य-ज्ञानस्य आलि. श्रेणिः अमालि तया रभसः-औत्सुक्य वादार्थं येषा ते तथा तैः । पुन किम्भूतैः प्राजै ? 'अनिभै.२ निर्व्याजै. । पुन. किम्भूतै. प्राज्ञ.? 'अजित ' अपराभूतै, के ? 'अजर्जरदुर्वारक- दूरविर्दै' "जर्जरस्तु, वासवध्वजजीर्णयो." [अने. स. का. ३ ग्लो. ११५७] इत्युक्ते. न जर्जरा अजर्जरा:-अजीर्णाः, नवीना इत्यर्थः, दुर्वारा -वारणागक्या करा.-कुत्सिताः, मिथ्याकथ- कत्वात्, “कङ्करं कुत्सिते" [अने. सं. का. ३ श्लो. ११३०] इति वचनप्रामाण्यात्, त्रयाणां कर्मधारये अजर्जरदुर्वारकङ्कराश्च ते । ? १ "उरो दक्षसि मुख्ये स्यात्” इति अने स कां. २ श्लो. ५८० । २. "निम. स्यात् सदृशे व्याजे" अने. सं. का. २ श्लो. ३२२ ।
सहस्रदल कमलमय अरजिनस्तवः। ४९ न विदाश्च-विदन्ति-जानन्तीत्यचि विद्वासस्तै अजर्जरदुरिकङ्क- रविदै. । पुन किम्भूतो वृन्दारकागरजिनोरसमौ ? 'असस्तर "सस्तर. प्रस्तरे मखे" [अने स का ३ श्लो १२१५] इत्युक्ते न विद्यते सस्तर.-यज्ञ यस्य स तथा ।।३४।। प्रभुरचतुरवित्तारक्षवैरङ्गिकारः, शुभरथविरहक्षोऽरम्रशारण्यसौरः । अनरणिरिररिष्टरङ्गरेऽरङ्घजूरः, प्रदुरकृतिरराकाऽऽरक्षपूरम्यखोर ! ॥३५॥ व्याख्या-'अगरे' !' इति सम्वोधनार्थमव्ययम् । 'हे अम्यखोर !' "अम भजे" अमतीत्येवशीलोऽमी-भजक., खोर अखोर -अखञ्ज , अमी चासौ अखोरच अम्यखोर- स्तदामन्त्रण हे अम्यखोर | -हे मित्र | , ‘पटु' रोगविहीन श्री- अरनाथजिन , “पटुस्तीक्ष्ण-पटोलयो । स्फुटे रोगविहीने च" [अने स का २ श्लो. १०८] इत्युक्ते , 'अरिष्टे ' "अरिप्ट मूत्यगारेऽन्तचिह्न तके शुभे” [अने स का. ३ श्लो. ७५०] इति वचनप्रामाण्याद् अरिष्टस्य-शुभस्य ई -क्षेपो यस्मात् स अरिप्टे- स्तस्य अरिष्ट:-पापस्य 'अनरणि' न अरण अनरणि ,"नाऽनि शापे" [सि हे ५।३।११७] इति अनिप्रत्यय , अनरणि -अत्राण- मेव विदधातु इति शेप । किम्भूत पटुः ? 'प्रभु' स्वामी। पुन किम्भूत पटु ? 'अचतुरवित्तारक्षवैरङ्गिकार' अविद्य- मानानि अदृश्यानि वा चत्वारि घातिकर्माणि येषा ते अचतुरा नसुव्युपत्रेश्चतुर." [सि. हे ७।३।१३१ ।] इत्यनेन नत्र - प्रत्ययात् परस्य चतुर्शव्दस्य वहुव्रीहेरप्समासान्तप्रत्यये अच- ?
५० ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः तुरा -केवलिन द्वाविशतिशतसङ्खयाका , “वित्त विचारिते ख्याते, धने" [अने. स का. २ श्लो. २०६] इति वचनात् तेपां वित्त-धन सयमलक्षणं तस्य आरक्षा-समन्ताद् रक्षण यस्य स अचतुरवित्तारक्ष , वेरगिका -विरागाहस्तैि आरज्यतीति "क्वचिडु"१ [सि हे. ५।१११७१] इति डे वेरङ्गिकार , अचतुरवित्तारक्षश्वासौ वैरङ्गिकारश्च तथा । पुन किम्भूत. पटु ? 'शुभरथविरहक्ष' “रथस्तु स्यन्दने पादे" [अने. स का २ श्लो २३३] इति वचनात् शुभौ-भद्रौ रथौ क्रमौ यस्यासौ शुभरथ , विरह क्षयतीति विरहक्ष., शुभरथश्चासौ विरहक्षश्च तथा । पुन किम्भूत पटु ? 'अरम्रशारण्यसौर.' "रमि क्रीडाया" "भीवृधिरुधिवज्यगिरमि" [सि हे उ सू. ३८७] इत्यौणादिके रप्रत्यये रम्र -कामुक , न रम्र अरम्र अकामुक , शरण्यमेव शारण्यम् , स्वार्थे अण्, शरणयोग्यम्, सूरीणा समूह सौरम्, गारण्य च तत् सौर च यस्यासौ शारण्य- सौर , अरम्रश्चासौ शारण्यसौरश्च तथा । पुन किम्भूत पटु 'इ' पवित्र, गुणवत्त्वात्, “इ. काम. स्थाणुरिन्द्रोऽर्को, वरुणः पादपो द्विप । शुचि" [सौ ए ४] इत्युक्तेः । पुन. किम्भूतः पटु ? 'अरवजूर.' "रषिक् भासि' अलन्त , रघो-दीप्ति "जुर्य इज्यानी वधे" ("जूरैच हानौ वधे'), तेन जूर्यते-हीनो भवति योऽसौ रवजूर, न रवजूर. अरवजूर , प्रत्यह प्रत्यह दीप्त इत्यर्थ । पुन. किम्भूत पटु ? 'अकृति.' "कृन वधे" क्तिप्रत्ययान्त', नास्ति कृतिर्यस्यासौ तथा । पुनः किम्भूत पटु + ? ? १. “क्वचित्” इति सूत्र, ड इत्यस्य त्वनुवृत्ति ।
सहलदलकमलमय अरजिनस्तवः । ५१ न 'अराकारक्षपू' राका -दातार., न राका अराका -कृपणास्तेषा आ-लक्ष्मीस्ता रक्षति-पालयति या सा अराकारक्षा, एवविधा पू.-गरीरं यस्य स अराकारक्षपू ।। ३५ ।। पपर प्रकरणावेरीपूरण्यभेर- जितरवपरपुष्टाः ! रद्धधीरङ्गयधेर !। सुनुरशिखरदप्यरर्थ्यधोरप्रभोर- कनिरतवरधारः कपारय्यदोर ॥३६॥ व्याख्या-अकार सम्बोधनार्थमव्ययम् । हे 'अर्द्धपूरण्यभे- रजितरवपर पुष्टा ।' "ऋधूच् वृद्धौ" घअन्त , अर्द्धन-ममृद्ध्या "पूरैचि आप्यायने" पूरणशीला -वर्द्धनशीला येते अर्द्धपूरणा - व्यवहारिण , ते विद्यन्ते येपा ते अर्द्धपूरणिन , भेरा -कातरा , भेरा. अभेरा -शूरा , जित -अभिभूतो रवेन-शब्देन परपुष्ट कोकिलो यैस्ते जितरवपरपुष्टा , अर्द्धपूरणिनश्च ते अभेराश्च ते जितरवपरपुष्टाश्च अर्द्धपूरण्यभेरजितरवपरपुष्टास्तेषा आमन्त्रण हे अर्द्धपूरण्यभेरजितरवपरपुष्टा ।-हे राजान | यूय 'पपर' प्रीता अभूत, “पृट् प्रीतो" इति धातो परोक्षाया मध्यम- पुरुपवहुवचनेषु रूपम् । कस्मात् ? 'प्रकरणावे' प्रकरणस्य- प्रस्तावस्य अवि -जान यस्मात् स तथा, तस्मात् प्रकरणावे - श्रीअरनाथतीर्थकृत , “अव गतौ” गत्यर्थाना ज्ञानार्थत्वात् "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे' [सि हे ५।३।१३८] इति इप्रत्यय । किम्भूतात् प्रकरणावे ? 'रद्धधीरङ्गयधे' "रधौच हिंसा- सराद्धयो" वेट्त्वात् क्तयोर्नेट, रद्धा-पक्का धी -बुद्धि येषा ते रद्धधिय , "रगि गतौ" गत्यर्थाना प्राप्त्यर्थत्वाद् रङ्गया -प्राप्तु ५२ ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः योग्या , रद्धधियश्च ते रगयाश्च रद्धधीरगयास्तान् धियति- दधाति योऽसौ रद्धधीरङ्गयधेस्तस्मात् , “धित् धृतौ" विजन्त । पुन किम्भूतात् प्रकरणावेः ? 'सुनु.' सुप्ठु ना सुना, तस्मात् सुनु -गोभनपुरुषात् । पुन किम्भूतात् प्रकरणावे ? 'अशिखर- दप्ये' शिखराग्रमिव दन्ता येषां ते शिखरदन्त , "वाऽग्रान्त- शुद्धशुभ्रवृपवराहाहिमूपिकशिखरात्" [सि हे. ७।३।१५४] इत्यनेन सूत्रेण शिखरशब्दात् परस्य दन्तशब्दस्य बहुव्रीही दत्रादेशे समासान्ते शिखरदन् , न शिखरदन्तोऽशिखरदन्त , "प्यैड वृद्धौ" विचि तै. प्यायते योऽसौ अशिखरदप्यैस्तस्मात् । पुन. किम्भूतात् प्रकरणावे ? 'अर्घ्यधोरप्रभो' "धोऋ गति- चातुर्ये" अचि धोराः-चतुरा , अाश्च ते-पूजनीया धोराश्च चतुरा अर्घ्यधोरा , तेषा प्रभु -स्वामी योऽसौ तथा तस्मात् । किम्भूता. अर्द्धपूरण्यभेरजितरवपरपुष्टा ? 'अकनिरतवरधर्त्तार' "कं सुखं तोयं पयो दु ख” [सौ. ए. २०] इत्युक्ते क- दुख, न क अक-सुख, तत्र निरता -आसक्ता ये ते अकनिरता. "वृडर सम्भक्तौ” वृणन्तीति वरा.-सेवका , अकनिरताश्च ते वराश्च अकनिरतवरास्तेषा धर्त्तारो ये ते तथा । पुन किम्भूतात् प्रकरणावे ? 'कपारय्यदो' क-सुख पारयन्ति-पूरयन्तीति कपारया -भव्यजनास्ते श्रावकत्वेन विद्यन्ते यस्य स कपारयी, "टुदुट् उपतापे" विचि न दुनोतीति अदौ , कपारयी च अदौश्च कपारय्यदौस्तस्मात् । अकार पादपूरणार्थमव्ययम् ।। ३६ ॥ सोऽकारयद् वरक समै रमण्यरणतेरपचारकषिरः। ! हारकदारजीवरः सहस्रदलकमलमय. अरजिनस्तव.। ५३ नेतार आशिरपमारय आरदन्त्यर- मोर प्रत्युरसनौरलभूरशावरः ॥३७॥ व्याख्या-'हे वरक !' हे मित्र | , यदुक्तमुणादिवृत्तौ- "वरक वधूजानि सहाय वाजसनेयभेदश्च" [सि हे उ सू २७] इति । 'नेतार' प्रस्तावात् सुखप्रापका पुरुपा 'अर' गीघ्र 'आरवन्ति' समन्तात् गव्दयन्ति । कि तत् ? 'स' अरनाथजिन. 'सम' सुख, यदुक्तमुणादौ-“सर्म' स्नान रे सुख च" [सि हे उ सू ३३८] इति, 'अकारयत्' अकरोदित्यर्थ , स्वार्थे णिजन्तत्वाद् णिगर्थो न प्रतिपाद्यते, यथा-"रामो राज्यम- कारयत्" । कस्य? 'रमण्यरणते' रमण्या-शोभना, "रमण्य शोभन" [सि हे उ सू ३७६] इति उणादिवृत्ती, "रा लक्ष्मी [सौ ए ८२] इत्युक्ते रमण्या-गोभना रा-लक्ष्मीर्यस्यासौ रमण्यर , “ण प्रकटे” [सु ए २२] इति सुधाकलगोक्ते "पूजाया ति स्त्रिया" [वि ए ६१] इत्युक्ते णा -प्रकटा तय पूजा यस्यासौ णतिः, रमपरश्चासौ णतिश्च रमण्यरणतिस्तस्य रमण्यरणते -श्रावकजनस्य । किम्भूत स ? 'हारकदारजीवर' हारकस्य-कितवस्य "हारको गद्य विज्ञानभिदो कितवचौरयो [अने स का ३ श्लो ७०६] इति वचनप्रामाण्यात् , दार - विदारण यस्मात् स हारकदार , जीवर -दीर्घायु , यदुक्त- मुणादौ-"जीवर दीर्घायु" [सि हे. उ सू ३६७] हारक- दारश्चासौ जीवरच हारकदारजीवर । पुन किम्भूत स ? - १ “सर्म-समें नान्ताऽदन्ते, दन्ततालव्याचे मते ॥४॥" शब्द- रत्नाकर का ६ २ "स्थान" इति मुद्रिते ।
? ५४ स्वोपनवृत्तिविभूषितः 'अपचारकर्षिर' अप-गतश्चारक -कारो येषा ते अपचारका, "चारकोऽश्वादिपाले स्याद् बन्धे" [अने स का ३ श्लो ६४५] इति वचनप्रामाण्यात् , अपचारकाश्च ते ऋपयश्च-साधव. अप- चारकर्षयस्तै राजति-दीप्यते योऽसौ तथा। किम्भूता नेतार ? 'आशिरपमारय' आशिरा इव-आदित्या इव येते आशिरा, यदुक्तमुणादौ-"आशिर [विष्णु.] आदित्यश्च" [सि हे उ सू ४१५] अप-गता मारिर्येभ्यस्ते पमारय., यदुक्त-“वष्टि भागु- रिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयो." [पा सि को. पृ १०६] इति, आशिराश्च ते पमारयश्च आशिरपमारय । पुन किम्भूत स 'अर्हो ' "बस निवासे” क्विबन्त., अर्ह -योग्य , उस्-वासो मुक्तिगृह यस्यासौ तथा । अकार पादपूतौ । पुन किम्भूत स ? 'प्रत्युरसनौ' उरसि वर्तते देवत्वेन येषा ते प्रत्युरसा , यद्वा उरसि देवत्वेन प्रतिष्ठितो यैस्ते प्रत्युरसा -श्रावकास्ते- भ्यो नौ -स्तुतिर्यस्मात् स तया । पुन किम्भूत स 'अलभू ' "अल वारणपर्याप्तिभूपासु' इति वचनाद् अलन्त , अलस्य-भूपाया भू -स्थान य स तथा । पुन किम्भूत स ? 'अशावर' "शावरों रोध्रपापयो." [अने स का ३ श्लो. १२०६] इत्युक्ते , न विद्यते गावर -पाप यस्य यस्माद्वा स तथा।।३७॥ सज्जूरनश्वर ! सुसोर किशोरभास्वरः, कर्पूरहृत्करगुणोऽरथकारमेधिरः । सच्छारदीनरधनैरविशारदागर- प्राग्भारविड्वरवियुक् रदनौरमन्थरः ॥३८॥ ? , - सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। ५५ अन- व्याख्या-'हे अनश्वर | ' "नशौच अदर्शने” नश्यती- त्येवशीलो नश्वर , "सृजीण्नगण्ट्वरप्" [सि हे ५।२७७] इत्यनेन गीलादिसदर्थे ट्वरप् प्रत्यय , न नश्वर श्वर , तत्सम्बोधन हे अनश्वर | -हे सखे ! 'सज्जू' "जु गतो" सौत्रो धातु , सत्सु-साधुपु जुवति-गच्छतीत्येवशील सज्जू , दिद्युद्ददृज्ज." [सि हे ५।२।८६] इत्यादिसूत्रेण शीलादौ सत्यर्थे क्विप् निपात , 'सुसोर' शुशुभे । किम्भूत सज्जू ? 'किशोर- भास्वर' किगोरा -तरुणा प्रस्तावाच्छिप्यास्तै भास्वर मनोज्ञो योऽसौ तथा, शिष्यशोभन इत्यर्थ । पुनः किम्भूत सज्जू ? 'कर्पूरहृत्करगुण' कर्पूरश्च-घनसार हृत्करश्च-ईश्वर- स्तद्वद् निर्मला गुणा यस्य स कर्पूरहृत्करगुण । पुन किम्भूत सज्जू 'अरथकारमेधिर' "रथकारस्तक्षणि स्यान्माहिष्यात् करणीसुते ।" [अने स का ३ श्लो १६४६] इति वचन- प्रामाण्याद् रथकारा –क्षत्राद् वैश्याया जातो माहिष्य , वैश्या- च्छूद्राया जाता करणी, तयो सुत रथकार , न रथकारा अरथकारा - उभयपक्षशुद्धा मेधिरा -मेधाविनो यस्यासी तथा, मेधिर इत्यत्र “मेधारथान्नवेर' [सि हे ७।२।४१] इत्यनेन सद [मत्व]ये इरप्रत्यये मेधिर इति निष्पत्ति । पुन किम्भूत सज्जू २ 'सच्छारदीनरधनै ' शरदि भव गारदीन -चन्द्र सता- सज्जनाना आह्लादकत्वेन शारदीन इव शारदीन सच्छारदीन , "रधौच हिंसासराध्यो रध्यन्ति-घ्नन्ति जीवान् इति अनटि रधना -हिंसकास्तेभ्य एति-याति योऽसौ रधन , सच्छारदीन- श्वासौ रधनैश्च सच्छारदीनरधनै । पुन किम्भूत सज्जू ? 'अविशारदागरप्राग्भारविड्वरवियुक्' आ -जना “अ कृष्ण. ! ~ ५६ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः शङ्करो ब्रह्मा गक्र. सोमोऽनिलोऽनल. । सूर्य प्राणो जन. सौ ए २] इति वचनात्, तेषा मध्ये विशारदा -विद्वासो ये ते अविशारदास्तान् आगरयन्ते-समन्ताद् विजानन्ति ये ते अविशारदागरा “गृकड् (गृणि) विज्ञाये विज्ञाने च" तेपा प्राग्भार -आधिक्य यस्मिन् स अविशारदागरप्रारभार., विड्वर -शत्रूद्भवस्तेन वियुग-रहितो योऽसौ विड्वरवियुक्. अविगारदागरप्राग्भारश्वासी विड्वरवियुक् चेति कर्मधारय. । पुन. किम्भूत सज्जू ? 'रदनौ ' रदन -दन्तै अवति-दीप्यते योऽसौ तथा । अविशारदागरप्राग्भारविड्वरवियुक् अग्रे रदनौरित्यत्र “न सन्धि." [सि हे. ११३५२] इत्यनेन सूत्रेण सन्ध्यकरणमदुष्टम् । पुन किम्भूत. सज्जू. ? 'अमन्थर' अवक्र , सरल इत्यर्थ , “मन्थर. सूचके कोशे, वक्रे" [अने. सं का. ३ श्लो ११६०] इति वचनप्रामाण्यात् ॥३८॥ बुद्धैरबोधि रतिभूरशनैरनार- नरसूतिरयमेरदरैरदुर्द्धरः ।। सेव्यैरकच्चरवरैरमभैरसेश्वरः, साक्षरनूतिरदहैरपरैरमुर्मुरः ॥३६॥ व्याख्या--'बुद्ध' पण्डितै 'अय' साम्प्रत वर्ण्यमानो गुरुजिन. 'रतिभू.' राश्च-दृढा तयश्च-पूजा रतयस्तासा भू-स्थानं रतिभू 'अबोधि' जात , श्रीअरनाथजिन पण्डितै- पूजास्पदं ज्ञात इत्यर्थ. । कथं ? 'अगनै.' शीघ्रम् । किम्भूत 'अनमरननै.' "अद प्साक् भक्षणे' अदन्तीत्येवशीला “सृघस्यदो मरक्” [सि हे. ५।२।७३] इत्यनेन शीलादिसदर्थे मरक्प्रत्यये 7 सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः । ? ? ? ? ? अमरा.-भक्षणगीला , न अझरा अनमरा ,नम्रा -नमनगीला, अनबराश्च ते नम्राश्च अनझरनम्रास्तै । किम्भूतोऽय 'असूति' न विद्यते सूति -जनन यस्य स तथा । पुनः किम्भूतोऽय ? 'ए' एति-शिवश्रिय प्राप्नोति योऽसौ तथा, "इण् गती" विजन्त । पुन किम्भूतैर्युद्धे ? "अदरै ' भयरहित । पुन किम्भूतोऽयम् ? 'अदुर्द्धर' नोत्कट इत्यर्थ । पुन किम्भू- तैबुद्ध ? 'सेव्य ' सेवाहैः । पुन किम्भूतैर्बुद्धै ? 'अकच्चरवरै' "मलिन कच्चर" [अ चि ६१७१] इत्युक्ते न कच्चरा अकच्चरा -गुणनिर्मला , अत एव वरा -श्रेष्ठा ये ते अक- च्चरवरास्तै । पुन किम्भूतैर्बु? ? 'अमभै ' "अम गती" गत्यर्थाना ज्ञानार्थत्वाद् अलन्त , अमेन-ज्ञानेन भाति-शोभते अमभास्तैः । पुन किम्भूतोऽय ? 'असेश्वर' “असूच क्षेपे" अचि अस्यन्ति चत्वारि घातिकर्माणि क्षिपन्ति ये ते असा सामान्यकेवलिनस्तै ईण्टे योऽसौ, "स्थेशभासपिसकसो वर [सि हे ५।२।८१] इत्यनेन शीलादिसत्यर्थे वरप्रत्यये असेश्वर । पुन किम्भूतैर्वृद्ध ? 'साक्ष' सह अझै -इन्द्रिय वर्तन्ते इति साक्षास्तै । पुन किम्भूतोऽयं ? 'अनूति' "अव वधे" क्तौ ऊति , न विद्यते ऊति -वधो यस्मिन् स तथा । पुन किम्भूतैर्यु?. ? 'अदहै " दहो-दाह , न दहन्तीति अदहास्तै । पुन किम्भूतैर्वृद्ध ? 'अपरै ' अप-गतो र कामो येभ्यस्ते तया ते , “र कामे" [सु ए ३६] इत्युक्ते , गत- कामै । पुन किम्भूतोऽय ? 'अमुर्मुर' निर्मन्मथ , “मुर्मुरो मन्मये" [अने स का श्लो ११९७] इति वचनप्रामा- ण्यात् ।। ३६ ।। - ?
? “५८ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः कविरमसुरसंस्कारः पदारप्रभारः, प्रसुर उदरभूसीरः कुटारः कुबेरः। चतुरकदरकेदारप्रनग रद्विचारः, शबरविधुरशृङ्गारक्षरोरङ्गयहोरः॥ ४० ॥ व्याख्या-'प्रसुर.' "सुरत् ऐश्वर्यदीप्त्यो” प्रसुरति- प्रदीप्यते जगति यतिषु [वा] योऽसौ अचि प्रसुर -श्रीअर- नाथजिन भद्र क्रियाद् इति शेष । किम्भूत प्रसुर ? 'कवि' विद्वान् । पुन किम्भूत प्रसुर. 'अमसुरसस्कार.' "मसूरो मसुरोऽपि च । मसुरा च मसूरा च, चत्वार पण्ययोषिति ।। तथा व्रीहिविशेषेऽपि" [अने सं का. ३ श्लो ११६१, ११९२] इति वचनप्रामाण्याद् न विद्यन्ते मसुरा.-पण्ययोषितो येषा ते अमसुरा -सुशीला श्रावकास्तै सह संस्कार –अनुभवन यस्य स तथा, “सस्कार प्रतियलेऽनुभवे" [अने स का ३ श्लो. १२१६ ] इत्युक्ते । पुन 'किम्भूत प्रसुर ? 'पदार- प्रभार' [पदारे-] पादालिन्दे-पादपीठे, “पदार पादधूलिपु । पादालिन्दे" [अने स का ३ श्लो. ११७४] इति हैमानेका- र्थोक्ते , प्रभया-कान्त्या राजते-दीप्यते योऽसौ तथा। पुन किम्भूत प्रसुर ? 'उदरभूसीर' उदरमेव-व्याधिरेव भू उदरभू -व्याधिपृथ्वी, तस्या विदारणे सीर इव-लाङ्गलमिव योऽसौ तथा । पुन. किम्भूत. प्रसुर ? 'कुटार' रत., अर्थात् शिवथ्यासक्त इत्यर्थ , "कुटार' केवले रते” इत्युक्ते वाच्य- लिङ्ग । पुन किम्भूत प्रसुर ? 'कुबेर' धनेन कुबेर इव- १ "कुटीर कम्बले रते” इति पाठा अने स का ३ श्लो ११४२। ?
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः । ? धनद इव योऽसौ तया। पुनः किम्भूत प्रमुर ? 'चतुरकदर- केदारप्रनग्' चतुराणा-विदुष स्तुतिकर्तृणा कदर -क्षुद्ररोग कुप्ठादि. स एव केदार -आलवालस्तस्य "नशौच अदर्शने' कि- वन्त., प्रनशन प्रनक, प्रनग-अदर्शन-नशन यस्मात् स चतुर- कदर केदार प्रनग्, “कदर श्वेतखदिरे, क्रकचक्षुद्ररोगयो ।" [अने स का ३ श्लो ११२६] इत्युक्ते., "केदार क्षेत्रभिद्याल- वाले" अने स का ३ श्लो ११४५] इत्युक्ते । पुन. किम्भूत प्रसुर ? 'रद्विचारः' "रम क्रीडाया" “गमा को" [सि हे ४।२। ५८] इति क्विपि [मकारलुकि रमन्ते ज्ञानश्रिया सम ये ते रत -पण्डितास्तै सह विचारो-विचरण यस्य स तथा । पुन किम्भूत प्रसुर ? 'गवरविधुरशृङ्गारक्षरो' शवराः-म्लेच्छा. विधुरा -विकलाः, ग्रथिला इत्यर्थ , “विधुर स्यात् प्रतिश्लेषो (प्रविश्लेषे), विकले" [अने स का. ३ श्लो १२०४] इत्युक्ते शृङ्गार -सुरत , "शृङ्गारो गजमण्डने, सुरते" [अने स का ३ श्लो १२१४] इत्युक्ते , शबराश्च विधुराश्च शृङ्गारश्च शवरविधुर- शृङ्गारा , तेभ्य क्षरन्ति-चलन्ति ये ते शवरविधुरशृङ्गारक्ष- रास्तेपा उ -पालन यस्य स तया, "रक्षार्थवाचकावेतौ, व्या- ख्यातौ लघुदीर्घकौ।" [वि ए ११] इति विश्वशम्भूक्ते । पुन किम्भूत प्रसुर ? 'अङ्गयहोर ' "अगि गतौ" यवन्त , अङ्गया प्रापणीया होरा:-गास्त्राणि प्रस्तावाद् आचारागादीनि सिद्धा- न्तानि यस्यासौ तथा, "होरा तु लग्ने राश्यद्धे, शास्त्ररेखा- प्रभेदयोः।।" [अने स का ३ श्लो ४७६] इति हैमानेकार्थ- वचनात् ।। ४० ।। - ?
६० . - स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः पस्फार संसरणनोरधितीरमित्वर- नोद्धारपुष्करसुसूरविदारजित्वरः । सुश्रीरकन्तुरसकौरपकौ रशान्त्यरः, शान्तोरयोनिररतेरहतेरधूसरः ॥४१॥ व्याख्या-'असको सुश्री' शोभनलक्ष्मीक श्रीअर-- नाथजिन 'संस रणनीरधितीर' ससरण-ससार , “ससरण त्वस- म्बाधचमूगती । संसारे" [अने स का ३ श्लो १४६३-१४६४] इति हैमानेकार्थोक्त , ससरणमेव नीरधि. ससरणनीरधि - ससारसागर , नीरशब्दो जलवाची औणादिक , तस्य तीर-प्रान्त तट वा संसरणनीरधितीर, तत् ससरणनीरधितीर ‘पस्फार' प्राप्तवान् , “स्फर स्फलत् स्फुरणे, चलने [इत्येके]" इति धातु- पारायणवचनाद्, गत्यर्थाना प्राप्त्यर्थत्वात् परोक्षायां णवि रूपम् । किम्भूत [सुश्री] ? 'इत्वरनोद्धारपुष्करसुसूरविदारजित्वर' "इण्क् गतौ" ज्ञानार्थोऽत्र, यन्तीत्येवशीला "सृजीण्नशष्ट्वरप्" [सि हे ५।२१७७] इत्यनेन ट्वरपि इत्वरा -पण्डिता ना -नरा , "नो नरे च सनाथेऽपि” [वि ए ७६] इति विश्वशम्भूक्ते , तेषा उद्धार -उद्धरण ससारपातादिति येपा ते नोद्धारा , इत्वराश्च ते नोद्धाराश्च इत्वरनोद्धारा', त एव" पुष्कराणि-पद्मानि तेषा विकासने सुसूर इव-प्रधानभानु रिव योऽसौ इत्वरनोद्धारपुष्करसुसूर , विदारे-सडग्रामे “विदारो युधि" [अने स का ३ श्लो. १२०३] इति वचनप्रामाण्यात्, शत्रून् जयतीत्येवशील "सृजीनशष्ट्वरप्" [सि हे ५।२१७७] इति ट्वरपि विदारजित्वर., इत्वरनोद्धारपुष्करसुसूरश्चासौ ?
? सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तव.। विदारजित्वरश्चेनि कर्मधारये इत्वरनोद्धा आरपुष्करसुसूरविदार- जित्वरः । पुन. किम्भूत सुश्री: ? 'अवन्तु' निष्काम , "कन्तु कामवुसूलयो" [अने स. का २ श्लो १७५] इत्युक्ते । पुन किम्भूत. सुश्री. ? 'रपको' "रप भापणे" अकचि रपन्ति-भापन्ते स्याहादमिति रपकास्तान् अवति-रक्षति योऽसौ तथा । पुन. किम्भूत सुश्री ? 'अशान्त्यर' न शान्ति -अशान्ति , अगान्ते न विद्यते रा -दान यस्मिन् स तथा। पुन किम्भूत सुश्री ? 'शान्तो ' गान्नाना-उपशमवता उ - पालन यस्य स तया। पुन किम्भूत सुश्री ? 'अयोनि' अकारण, कस्य 'अरते ' असुखस्य, कस्य ? 'अहते ' अहिं- सकस्य । पुन किम्भूत सुश्री ? 'अधूसर' निर्दोपत्वाद् निर्मल इत्यर्थ ।।४।। विजर ! विकर शुभ्रेरं नसारण्डझार- गमिरटगरगान्धारप्रहरस्वपोरः । छिदिरविधरदण्डारस्वभूरमंदीर, प्रवरपदरविन्दो रम्बसूरथ्यधूरः ॥४२॥ व्याख्या---'ई विजर ।' विगता जरा यस्मात् स विज- रस्तत्सम्बोधनं हे विजर | -हे श्रीअरनाथजिन ! 'अ' परब्रह्म 'विकर' विशेषेण कुरु, "अ मान्तो ब्रह्मसवादे, परब्रह्म- प्रवाचक ।" [वि ए १६] इत्युक्ते । कस्य 'शुभ्रेः যু निर्दोषत्वाद् धर्मोपार्जितत्वाद्वा इ-लक्ष्मीर्यस्यासी शुभ्रे , तस्य शुभ्रे -भक्तश्रावकस्य । किम्भूतस्त्व रण्डझारगमि' सरण्डा --धू, "सरण्ड स्यात् कृकलासे, ? 'तसा- टगर अटगर-अवक- ६२ 'स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः भूषणान्तरधूर्तयो ।' [अने. सं का. ३ श्लो. ७८४] इत्युक्तेः, सरण्डा एव सारण्डा', स्वार्थे अण्, , नेषु-नरेषु सारण्डा , नसारण्डा , तेषा झार.-हानिर्यस्माद् यस्य वा नसारण्ड- झार , "श् हानौ", गमि.--आचार्य , गमिशव्द औणादिक नसारण्डझारश्चासौ गमिश्चेति कर्मधारय । पुनः किम्भू- तस्त्व ? 'अटंगरगान्धारप्रहे'. न दृष्टि', "टगरष्टङ्कणे केकराक्षके ।।" [अने स का ३ श्लो. ११५६] इति वचनप्रामाण्यात्, 'गान्धारेण' "गान्धारो राग- सिन्दूरस्वरेषु" [अने. स का ३ श्लो. ११:५१] इति वचनात् प्रस्तावाद् विदुषा स्तुतिरूपेण "हिट् वर्द्धने गती" विचि प्रहिण्वन्ति-प्रकृष्टप्रकारेण वर्द्धन्ते गुणा यस्यासौ गान्धारप्रहे, अटगरश्चासौ गान्धाराहेश्चेति कर्मधारये अटगरगान्धारप्रहे । पुन किम्भूतस्त्वं ? 'अस्वपोर' नास्ति स्व-द्रव्य येषा ते अस्वा -साधवस्तेभ्य पोर -अग्रे गमन यस्य स तथा, “पुरत् अग्रगतौ" घनन्त । पुन किम्भूतस्त्व ? 'छिदिरविधरदण्डा रस्वभू' छिदिराणा-खङ्गाना “छिदिरोऽग्नौ परश्वधे ।। करवाले च" अने स का. ३ श्लो ११५५-११५६] इत्युक्ते , “धृग् धारणे" अलन्त., वि-गतो धर -धरण यस्मात् स छिदिरविधर दण्डाराश्च-वाहनानि “दण्डारो वाहने" [अने स. का ३ श्लो. ११३५] इति वचनप्रामाण्यात्, स्वानि च-द्रव्याणि नानाविध- त्वाद् बहुवचन दण्डारस्वानि, तेषा भू -प्रापण यस्मात् स दण्डार- स्वभू , छिदिरविधरश्चासौ दण्डारस्वभूश्च छिदिरविधरदण्डा- रस्वभू । पुन. किम्भूतस्त्व? 'अय॑दी' “दीडच् क्षये" क्वि- वन्त., दीयन्ते-कषायाः क्षयन्ति यस्मात् स दी -धर्मः,, अर्यः , ?
सहस्रदलकमलमय मरजिनस्तवः । उपार्जनाहों दीर्यस्यासी तथा । अकार पादपूरगार्यमव्ययम् । पुन किम्भूतस्त्व ? 'प्रवरपदरविन्द' प्रव-प्रधानं यत् पदरविन्द-चरणकमल यस्यासी तथा । पुन किम्भूतन्त्वं? 'रम्वसूरथ्यधूर' "रवि व्रजे" अलन्त , रम्दा-जान तेन सूरथा.- दान्ता रम्वसूग्या , सूरथगद ीणादिके दान्तवाची, रम्त्र- सूरथा विद्यन्ते यस्यासौ रम्बसूरथी, “घूरडमरी हिंस्यावली कवि क. श्लो] इति कविकल्पद्रुमोक्तेः अनन्त , नास्ति घूरा-हिसा यस्यासी अघूर , रम्वसूरथी चासी अघूर- उचेति कर्मचारय ।।४२।। हृष्टैरकान्तिरमहरजदैरपामरः, कान्तैर! सौषि रचयै रमथेरमुद्गरः । काश्मीरजाचिरकुठेरकथेरपीवर- निश्चौरकः करचनोरलधूरभङ्गरः ॥४३॥ व्याख्या-'हेअ ' हे अर्हन् । “अ स्यादर्हति सिद्धे च" इत्युक्ते , त्व सौपि, ई (?) शब्दे । के. ? 'रचय' राणा- नराणा चया -समूहा रचयास्तै रचय -वहुभिर्मनुष्यसर्छ । किम्भूतै रचयै ? 'हृष्ट' जातहरौं । किम्भूतस्त्व ? 'अका- न्ति' नास्ति कान्ति - वाञ्छा भोगादौ यस्यासी तथा। पुन किम्भूतै रचयै ? 'अमहै ' रोगनाशकै । पुन. किम्भूतै रचय ? 'अजदै ' कन्दर्पावखण्डकै , “अजश्छागे हरे विष्णौ, रघुजे वेधसि स्मरे।" [अने स का २ श्लो ८०] इति हैमानेकार्थोक्ते । पुन. किम्भूतस्त्व ? 'अपामर' पामरलोकरहित । पुन किम्भूत * “कान्ति. शोभाकामनयो" अने स का २ श्लो १७६ ? ?
-- ? ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः रचय.? 'कान्त' वल्लभै. । पुन किम्भूतस्त्व? 'रमथे.' रमथस्य-प्रहर्षस्य ई -क्षेपो यस्मात् स तथा, “रमथ. प्रहर्ष." [सि. हे उ. सू २३२] इत्युणादिवचनात् । पुन. किम्भूतस्त्व? 'अमुद्गर' प्रहरणविशेषरहित । पुनः किम्भूतस्त्व ? 'काश्मीर- जाचि.' काश्मीरजेन-घुसृणेन अचि -पूजा यस्यासी तथा । पुन किम्भूतस्त्व ? 'अकुठेरकथेरपीवरनिश्चौरक' कुठेर.- निस्सृतसार , न कुठेर अकुठेरः, कथेर-कथक धर्मवक्ता इत्यर्थ., कुठेरकथेरशब्दो औणादिकौ, पीवर -पुष्ट शरीरेणेति गम्यते, न तु कृशतनु., निर्गत चौरकं-चौरिका यस्मात् स निश्चौरक , चतुर्णा कर्मधारय , “चोरादे." [सि हे ७।११७३] चोरादिभ्यस्तस्य भावे कर्मणि चाकञ्प्रत्यये चौरकम् । पुन किम्भूतस्त्व ? 'करचनोरलधू' कस्य-सुखस्य रचना-विरचनं यस्य स करचन , उरला -उत्कटा -मदोत्कटास्तान् धुवति योऽसौ उरलधू , “धूत् कम्पे' किबन्त , करचनश्चासौ उरलधू- श्रेति कर्मधारय.। पुन: किम्भूतस्त्व ? 'अभङ्गर' न भङ्गरः अभङ्गरः-न नश्वर इत्यर्थ , “भङ्गौ वक्रनश्वरौं" [अने सं. का ३ श्लो ११८४] इत्युक्ते ।। ४३ ।। बन्धुरनागरकौरवचोरडस्फरः, कर्जूरवाशुरविमीरखटूरकर्परः । पिण्डारशावरमसूरनिकारशाक्वरः, साधून ररक्ष रजतीरवनारदर्वरः ॥४४॥ व्याख्या-'अदर्वर' नास्ति दर्वर -वज्र यस्य सोऽदर्वर श्रीअरनाथजिन 'साधून्' मुनीन् 'ररक्ष' पालयामास ।
सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तव.। ६५ ? किम्भूतोऽदर्बर ? 'बन्धूरनागरकभैरवचोरडस्फर' "बन्धूरो रम्यनम्रयो ।” [अने स का श्लो ११८१] इत्युक्ते बन्धूरा - नम्रा रम्या वा नागरा -लोका चस्मिन् स वन्धूरनागर , केन- दु खेन भैरवा.-घोरा करवा ते च ते चोरडाच-तस्करा कभैरवचोरडा ,तेषा स्फर --गमन यस्मात् स कभैरवचोरडस्फर , "स्फर स्फलत् स्फुरणे, चलने इत्येके” इति धातुपारायण- वचनाद् अलन्त , वन्धूरनागरश्चासौ कौरवचोरडस्फरश्चेति कर्मधारय । पुन किम्भूतोऽदर्वर ? 'कर्जूरवाशुरविमी कर्जूरा -मलिना पापमलिनाः, अत एव शठत्वाद् वाशुरा इव- गर्दभा इव ये ते कर्जूरवाशुरा , तेषा विशिष्टा मी -मतिर्यस्मात् स कर्जूरवाशुरविमी , कर्जुरवाशुरशब्दौ औणादिको, “मीकि गत्या मत्या" कवि क श्लो] इति कविकल्पगुमोक्ते किबन्त । पुन किम्भूतोऽदर्वर ? 'अखटूरकर्पर' खटूर -मणिविशेष , "खटूरो मणिविशेष" [सि हे उ सू ४२७] इत्युणादिवृत्तौ, कर्पर -शस्त्रविशेष , खटूरश्च कर्परश्च खटूरकर्परौ, तौ न स्त यस्य स तथा, “कर्परस्तु कटाहे स्याच्छस्त्रभेदकपालयो ।" [अने स का ३ श्लो ११३०] इति वचनप्रामाण्यात् । पुन किम्भूतोऽदर्वर ? 'पिण्डारशावरमसूरनिकारगाकरः' पिण्डार भिक्षुक , “पिण्डारो भिक्षुके” [अने स का ३ श्लो ११७८] इति हेमाचार्याः, शार्वरा -घातुका “शार्वर घातुके" [अने स का ३ श्लो १२०६] इत्युक्ते , मसूरा -पण्ययोषित , “मसूरो मसुरोऽपि च । मसुरा च मसूरा च, चत्वार पण्ययोषिति ।। तथा व्रीहिविशेषेऽपि” [अने स का ३ श्लो ११६०, ११६१] इत्युक्ते , शार्वराश्च मसूराश्च शार्वरमसूरास्तेषां निकार -पराभवो येषा ? ५ ६६ ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः ते “निकारस्तु पराभवे ।। धान्योत्क्षेपे" [अने स का ३ श्लो. ११६६, ११७०] इत्युक्ते शावरमसूरनिकारा., पिण्डाराश्च ते शार्वरमसूरनिकाराश्च पिण्डारगार्वरमसूरनिकारा., तेपा मध्ये गाकर इव-वृपभ इव योऽसौ तथा । पुन. किम्भूतोऽदर्वर ? 'रजती' "रजी रागे" "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे" [सि. हे ५। ३।१३८] इति तिवि, रजति -राग प्रस्तावाद् धर्मराग तम्य इ -प्रापण यस्मात् स तथा । पुन. किम्भूतोऽदर्वर ? 'अवनो' अव-निश्चितो नो -स्तुतिर्यस्मात् स तथा , “णुक् स्तुतौ" विजन्त ।। ४४ ।। मृदरनिकरहारी रन्ध्रहोऽरक्षदाऽरः, शिबिरभिदिरकृद् गौरप्रजीरः पवीरः । बठरवमरवित्ती रम्भतीरम्मदा रः, सदुरसिलररुरक्षपारक्कुरीरः॥४५॥ व्याख्या—'मृदरनिकरहारी' मृदराणा-व्याधीना निकर - समूह. मृदरनिकर , तद् हरतीत्येवशीलो मृदरनिकरहारी 'अर.' अरनाथजिन 'अरक्षत्' अपालयत् सेव[कानिति शेप. । किम्भूतोऽर ? 'रन्ध्रह', रन्ध्राणि प्रस्तावात् पापच्छिद्राणि तानि हन्ति योऽसौ रन्ध्रह -पापच्छिद्र भञ्जक इत्यर्थ. । आकार सम्बोधनार्थमव्ययम् । पुन किम्भूतोऽर ? 'शिविरभिदिर- कृत्' शिविरस्य-सैन्यस्य भिदिर-भेद तत् करोतीति य स तथा, "भिदिर वज्र भेदश्च" [सि हे उ सू ४१६] इत्युणादौ । ? १. "शाकरस्तूक्षा” इति अने स का ३ श्लो १२१० । २. "भिदिर यानि . भेदश्च" इति मुद्रिताया हैमोणादिवृत्तौ ४१६ ।
सहस्रदलकमलमय. अरजिनत्तव । ६७ ? पुन. किम्भूतोऽर ? 'गो' "गुड गब्दे" विचि गुवति-धर्म गब्दयति योऽसौ तथा । पुन किम्भूतोऽर ?'अप्रजीर' प्रकृष्टा जीरा प्रजीराः-प्रधानाश्वा , यदुक्तमुणादिवृत्ती-" जीर अजाजी अग्नि स्नायु अश्वश्च" [सि हे उ सू ३९२] इनि, न सन्ति प्रजीरा यस्यासौ तथा, त्यक्तगृहस्थावासत्वात् । पुन किम्भूतोऽर ? 'पवीर ' धर्मेण निर्मल , यदुक्तमुणादिवृत्तौ- "पवीर रङ्गस्थान फल पवित्र च" [सि. हे उ सू ४१८] इति । पुन किम्भूतोऽर ? 'बठरवमरवित्ति' २वठरा -बृहदेहा ये वमरा -मूर्खा दुर्मेधस , यदुक्तमुणादौ-“वमरा. दुर्मेधस" [सि. हे उ सू ३९७] बठरवमरास्तेषा वित्ति -ज्ञान यस्मात् स तथा, बृहद्देहगठाना ज्ञानप्रद इत्यर्य । पुन किम्भूतोऽर ? 'रम्भती- रम्मदा' "रभिड, शन्दे" "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे " [सि हे ५।३।१३८] इति तिवि, रम्भति - शब्दनम्, त एति-व्या- ख्यानक्षणे प्राप्नोति योऽसौ। रम्भती, इरा-सुरा तया माद्यन्ति- हृष्यन्ति ये ते इरम्मदा -मद्यपानकरा , तेभ्योऽस् गमन-व्रजन यस्य स इरम्मदा , “असञ् अबार्थे" "अबार्थे दीप्तिग्रहणगतिषु" इति कविकल्पद्रुमधातुपाठोक्ते , रग्भतीश्चासौ इरम्मदाश्चेति कर्म- धारय । पुन किम्भूतोऽर ? 'र' रवति शुभ योऽसौ ३डेर, शुभरवक इत्यर्थः । पुन किम्भूतोऽर ? 'सदुरसिल' सन्त प्रशस्ता ये उरसिला सदुरसिला -प्रशस्तोरस्वन्तस्तान् आचष्टे १ "वायु" इति मुद्रितोगादिवृत्ती। २ "वठर -मूर्ख बृहद्देहश्च" इति हेमोगादिवृत्ती सू ३९७ । अनेकार्थे तु "बठरो मूर्खशठयो” १८१॥ इति ३।११ ३ 'डे' ऽप्रत्यये कृते इत्यर्थ.। ?
६८ स्वोपतवृत्तिविभूषित. इति सदुरसिलयति, सदरमिलयतीति णिजि तल्लुकि विवपि तल्लुकि च मदुरसिल । पुन. किम्भूतोऽर: ? 'अररुक्रूरक्ष- पारक्कुरीर' अरवः- असुरा, यदुक्तमुणादिवृत्त्याम् "अररु असर आयुधं मण्डलं च” [सि. हे उ सू. ८१२] तद्वत् क्रूरा ये ते अररुक्रूरा -दुन्निा गत्रवस्तान् अयति योऽसौ अररुक्रूरक्ष , "क्षि क्षयश्वर्ययो.' इत्युक्ते , पारज.-रत्नानि, प्रस्तावाद् गुणरत्नानि, यदुक्मणादिवृत्ती- "पारण कर्मसमाप्तौ” 'पारेरज्" [सि हे उ. नू ८७३] इति सुत्रेणाप्रत्यो “पारक् शाकविशेष प्राकार. सुवर्ण गुणरत्न च", इति, पारजा-गुणरत्नाना कुरीर-आलयो योऽसौ पारक्कुरीर., अररुक्रूरक्षश्चासौ पारक्कुरीरश्चेति कर्मधारय ॥४५।। शर्माररं नुररणेरमतेरभर्भर !, खेतेरभर्मरनुतेरमतेरपत्सर !। धीस्थूरकर्बरभजेरजजेरनातुर !, न्यक्कारहानिररपूरप्रतारणाघर ! ॥४६॥ व्याख्या--हे 'अभर्भर ! न भर्भरोऽभर्भरस्तत्सम्बोधनं हे अभर्भर !-हे अच्छद्मवन् ! , “भर्भर छद्मवान्" [सि हे उ. सू. ६] इत्युणादिवचनप्रमाणात्, अह 'गर्म' भद्रं 'आरर' अत्यर्थ अत्रापम् । कस्मात् 'नुः' मनुष्यात् श्रीअरनाय- लक्षणात् । किम्भूतान्नु ? 'अमते' कालस्य 'अरणे.' "रण गतो" गत्यर्थानां प्राप्त्यर्थत्वाद्, न विद्यते रणि.-प्रापणं यस्मात् स अरणिस्तस्मात् अरणे । पुनः किम्भूतान्नुः ? 'खेते खस्य-सुखस्य इति -प्रापणं यस्मात् स खेतिस्तस्मात्, “खमिन्द्रिय ?
सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तब.। ६९ ? -- स्वर्ग शून्य, भूपाऽऽकागसुखेषु च ।" [सु,ए ११] इति सुधाकलश- वचनप्रामाण्यात् । पुन किम्भूतान्नु ? 'अमर्मरनुते' न विद्यन्ते मर्मरा -दानवा शत्रुत्वेन येपा ते अमर्नरा , यदुक्तमुणादिवृत्तौ- "मर्मर शुष्कपत्रप्रकर तद्धर्माऽन्योऽपि क्षोदासहिष्णुर्दानवश्च" [सि. हे उ सू ६] इति, अमर्मरा-चनु पण्ठिरिन्द्रास्तेभ्यो नुति --स्तुतिर्यस्य स तथा तस्मात् । पुन किम्भूतान्नुः ? 'अगते' नास्ति गति. प्रस्ताबान्नरकगतिर्यस्मात् स तथा तस्मात् । किम्भूत हे अभर्भर | ? 'अपत्सर ।' "त्सर छद्मगतौ” अलन्त , अपगत त्सर -छद्मगतिर्यस्य स तथा तत्सम्बोधनम् । पुन किम्भूतान्नु ? 'धीस्थूरकर्वरभजे ' धिया-बुद्ध्या स्थूरा -उच्चा ये ते धीस्थूरा -विद्वास , "स्यूर विधिर उच्चश्च" [सि हे उ सू ४२६] इति उणादिवचनात्, धीस्थूरेषु कर्वरा इव-व्याघ्रा इव ये ते धीस्थूरकर्बरास्तेपु भजि -सेवा यस्य स तया तस्मात्, “भजनौ भागसेवयो इत्युक्ते , “इकि- श्तिव स्वरूपार्थे' [सि हे ५१३।१३८] इति इ प्रत्यय पुन किम्भूतान्नु ? 'अजज' निर्युद्धात्, “जज जजि युद्ध" इ- प्रत्ययान्त । पुन किम्भूत हे अभर्भर | ? 'अनातुर ।' न आतुर अनातुरस्तत्सम्बोधनम् । पुन किम्भूतोऽह ? 'न्यक्कारहानि' न्यक्कारस्य-न्यक्करणस्य हानि -क्षति यस्य स तथा। पुन किम्भूतोऽह ? 'अरपू' "ऋक् गतौ” ये ते सुखमपि य प्राप्नुवन्ति, अविअरेमितष्णव (?)! पुन किम्भूत हे अभर्भर ! ? 'अप्रता- रणाघर । ' "वञ्चन तु प्रतारण” [अभि चि ३।४३] इत्यभिधान- कोपवचनाद्, नास्ति प्रतारण-वञ्चन यस्मिन् स अप्रतारण , १ 'बठर' इति मुद्रितोणादिवृत्तौ । 7 ?
७० ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः “घृ भासि” अचि, अया-लक्ष्म्या जित्ति-भासते योऽसौ आघर , अप्रतारणश्चासौ आघरचेति कर्मधारये अप्रतारणाघर- स्तत्सम्बोधनम्।।४६।। लक्ष्मीरबीभरदभीरतनेरटेतरः, साधूरकर्तृरगुरोरहरेरदुष्करः। सोरसूकरमनोरथपारभुर्भुरः, सह्रीरऽमर्झरसवीरतरेरगह्वरः ॥४७॥ व्याख्या—'अभी ' न विद्यते भी -भय यस्मात् सोऽभी - श्रीअरनाथजिन 'लक्ष्मीः' थिय 'अवीभ रत्' अत्यर्थं अपोषयत् । कथ ? 'अकर्तृ' "अत सातत्यगमने” अत्यन्ते-ज्ञायन्ते धर्माधर्म- फलानि एभ्य इति “कचिड्ड" [सि. हे. ५।१।१७१] इति डे, आ -सिद्धान्तानि तेषां कर्तृ अकर्तृ एव यथा स्यात्तया । कस्य लक्ष्मी अवीभरत् ? 'अगुरो' "अज क्षेपे गतौ" क्विनन्न , अक्- ज्ञानं तेन उरु -गरिष्ठो योऽसौ अगुरुस्तरय अगुरो -श्रावकस्य । अकर्तृ अग्रे अगुरोरित्यत्र "इवर्णादेरस्वे स्वरे यवरल" [सि हे १।२।२१] इति सूत्रस्य पञ्चमीव्याख्यानत ऋकारात्पर- स्याकारस्य रकारादेशे जाते अकर्तृरगुरोरिति निष्पत्तिः । किम्भूतोऽभी ? 'अतवेरटेतर' अतन्ति-जिनोक्तवर्मादपर धर्म सातत्येन प्राप्नुवन्ति येभ्यो ये ते अता -हरहरिब्रह्मात्यो देवाः, ते च ते वेरटाश्च-नीचा अतवेरटा , “अथ वेरट || मिश्रीकृते च नीचे च" [अने स का. ३ श्लो. ७६७, ६८] इति हैमानेकार्थ- वचनात्, अतवेरटेभ्य इतर -अन्यो य. स तथा । पुन. किम्भू- तोऽभी ? 'साधू' साया -लक्ष्म्याः धू-धुराभारो यस्यासौ तथा।
सहस्रदलकमलमय. अरजिनस्तवः।
किम्भूतस्य अगुरो ? 'अहरे 'हरति परद्रव्याणि य स हरि , न
हरि अहरिस्तत्य तथा, माधोरित्यर्थ । पुन किम्भूतोऽभी ?
'अदुष्कर' न विद्यते दुष्कर किमपि यस्यासी तथा । पुनः
किम्भूतोऽभी ? 'सह्यो' "सह्यो नीरुजि" इत्युक्ते सह्या-नीरु-
जस्तपा उ-पालन यस्मिन् स तथा । पुन किम्भूतोऽभी ?
'अमूकर मनोरथपारभुर्भुर' मूकरप्रायत्वात् सूकरा -गठा , न
सूकरा असूकरा -चतुरास्तेपा मनोरथपारा.-कामितपूरका
"कर्मणोऽण्" [सि हे ५।११७२] इत्यण, असूकरमनोरथपारा -
देवास्तेषा भुर्भुर -निचयो भवत्यर्थ यस्य स तथा, भुर्भुरशब्द
औणादिक । पुन किम्भूतोऽभी. ? 'सही' सलज्ज । पुनः
किम्भूतोऽभी ? 'अमर्जरसवीरतरे ' न सन्ति झर्झरा -वाद्यवि-
शेषा आत्मनो वादनार्थ येपा ते अझर्झरा , सह वीरतरै
वीरश्रेप्ठे वर्तन्ते ये ते सवीरतरा , “वीरतरो वीरश्रेष्ठे" [अने.स
का ८ श्लो १६५३] इत्युक्ते , अझर्झराश्च सवीरतराश्च अझर्झ-
रमवीरतरा -राजानस्तेपा ई -लक्ष्मीर्यस्मात् स तथा। पुन
किम्भूतोऽभी ?
'अगह्वर' नास्ति
गह्वर -दम्भो यस्मिन् स
तथा, "गह्वरो बिलदम्भयो" [अने स का ३, श्लो ११५०]
इत्युक्ते ॥४७॥
वन्दारवो! निरयदारव! आं ररास रः,
कञ्चारवो ! धरणधारण एरपञ्जरः ।
श्रीसारसासरणिपूरणसारणासिर-
विस्तारकोऽगिरणचूरणजारतत्परः ॥४८॥
७२ ? ? स्वोपत्रवृत्तिविभूषितः व्याख्या--भो 'वन्दारव!' वन्दनशीला येते वन्दारवस्त- त्सम्बोधने हे वन्दारव |-भो सुहृद ! 'र.' रम्भयति लोकान् योऽसौ र.- श्रीअरनाथजिन: 'आ' श्रिय-धर्मलक्ष्मी 'रगम' अब्रवीत्, व्याख्यानक्षणे इत्यध्याहार्यम् । किम्भता हे वन्दारव ? 'निरयदारव ।' निरयस्य-नरकस्य दारव -दारका ये ते निरय- दारवस्तत्सम्बोधनम् । पुन किम्भूता हे वन्दारव ? 'कञ्चारव.' सुखप्रधानास्तत्सम्बोधनम् । किम्भूतोऽरः ? 'धरणधारण धरणान्-लोकान् समारतागरपतनाद् धारयति योऽसौ तथा, "धरणोऽहिपती लोके" [अने. स. का ३ श्लो. ८०५] इति हैमानेकार्थात् । पुन किम्भूतोऽर ? 'ए' कृतार्थ , “ए कुमारो- ऽसुरोऽरातिर्जातीयोऽहित उद्धत । आत्मा शेपो विवस्वाश्च कृतार्थो मध्वरि गर ।" [सौ. ए १२] इति सौभरिवचनात् । पुन: किम्भूतोऽर. ? 'अपञ्जर' नास्ति पञ्जर -जीववन्धन- स्थान यस्मिन् स तथा । पुन किम्भूतोऽर ? 'श्रीसारसास- रणिपूरणसारणासि.' श्री-शोभा लक्ष्मीर्वा सा एव सारस- पद्म तद्विकाशनार्थ आ-समन्तात् सरणिरिव-भानुरिव ये ते श्रीसारसासरणय , तेषा पूरण-प्रकरणात् सुखस्य पूरण यस्मात्स श्रीसारसासरणिपूरण , सारण -अतीसाररतस्य असि -क्षेपो यस्मात् म सारणासि , “सारण स्यादतीसारे" [अने. स. का. ३ श्लो ८२७] इति वचनप्रामाण्यात् , श्रीसारसासरणिपूरण- चासौ सारणासिश्चेति कर्मधारय । पुन किम्भूतोऽर: ? 'अविस्तारक' आ -सुखितस्तेपा विस्तार एव विस्तारको यस्मिन् स तथा, "अ कृष्ण शङ्करो ब्रह्मा गक्र सोमोऽ- रोऽनल.। सूर्य प्राणो जनः कालो वसन्त प्राणत सुखी ।।"
सहस्रदलकमलमय. अरजिनस्तव । [सौ ए २] इति वचनप्रामाण्यात् । पुन किम्भूतोऽर ? अगि- ग्णचूरणजारतत्पर' गिरणा:-आचार्याः, यदुवतमुणादिवृत्तौ- "गिरण मेघ. आचार्यो ग्रामश्च" [सि. हे उ सू १८८] इति, न गिरणा अगिरणा , नशब्दस्य कुत्सार्थत्वाद् अगिरणा- कुत्सिताचार्यास्तेपा चूरण-नागो येभ्यस्ते अगिरणचूरणा बौद्धास्तेषां जार.-न्यक्का रस्तकरण गार -मावधानो योऽसौ अगिग्णनूरणजारतत्पर ।।४।। पुस्फोर कीतिरदनारतमेरमन्दिर- रन्तरतूबरचकोरनिशारमण्यर ! । रैहारयो हरय औरसवारकातर- कंसेरवो मरकशूरणनीरवित्युर ! ॥४६॥ व्याख्या--हे 'अत् ।' “अत सातत्यगमने" किवन्त , अतति-सातत्येन जिनप्रणीत धर्म प्राप्नोति योऽसौ अत्, तत्सम्बो- धन हे अत् । -हे श्रावक | 'हय' इन्द्राश्चतु पष्ठिसङ्खयाका रवन्ति इति शेष । तत् कि ? 'पुस्फोर' चचाल, का ? 'कीर्ति यग , कथ ? 'अनारत' निरन्तर कस्य । 'ए' "इ गतौ" विचिम्, अयति-वेत्ति शुभाशुभमिति ए तस्य ए । 'अमन्दिररन्ते' न सन्ति मन्दिराणि-गृहाणि येपा ते अमन्दिराः- यतिनस्ते सह रन्ति -क्रीडा यस्यासौ अमन्दिररन्तिस्तस्य । किम्भूत हे अत् 'अतूबरचकोरनिशारमण्यरः'तूबरा -अजननीका कुमातृकत्वेन, यदुक्तमुणादौ-"तूबर मन्दश्मथू अजननीकश्च" [सि हे उ - , ? - १ 'तूवर" इति मुद्रिते ७४ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः तू ४४३] इति, न तूवरा अतूवरा -उभयपक्षशुद्धा पुमासस्त एवं चकोरास्तेषां आलादकरणाय निशाया रमणो निशार- नणः- चन्द्र म इव ये ते अतूवरचकोरनिगारमणा., ते विद्यन्ते येषां ते अतूवरचकोरनिगारमणिनः, ते. रलयोरैक्याद्, अलति- गोसते योऽसौ अनूवरचकोरनिशारमण्यरस्तत्सम्बोधनम् । किम्भूता हरय ? 'रैहारय.' राया-द्रव्येण हारयश्चारवो ये ते तया, "चारु हारि" [६ । ८०] इति अभिधानकोपवचनात् । पुन किम्भूता हरय ? 'औरसवारकातरकसेरव' उरसा- हृदा ननसा कृतानि सेवकजनाना वाञ्छितानि यैस्ते औरसा सामान्यदेवा., "उरसो याणौ" [सि हे ६।३।१९६] इति सूत्रेण उरस्मदात् तेन कृते यणप्रत्यये औरस इति निष्पत्ति., वार एव वारक , समूह एवेत्यर्थ , औरसानां वारको येषु ते औरसवारका., "तृ तारे ऽभिभवे प्लुत्या" इत्युक्ते. अलन्त , आ-सामस्त्येन तर.-अभिभवो येषु ते आतरा.-दानवास्तेषा क-युख []स्य सेरव -वन्धका ये ते आतरकसे रख , औरस- वारकाश्च ते आत रकसेरवश्चेति कर्मधारय । पुन. किम्भूत हे अत् ? 'मरकशूरणनीरवित्युर' “मरको मारि" [२।२३६] इत्यभिधानकोषोक्त. मरकस्य-मारे शूरण-नागो यस्मात्स मरकरण , “चूर् पूर्य डी स्तम्भे हिसे" इति कविकल्पद्रुमधातु- पाठोक्ते , “रु वधे गत्या" क्तेप्रत्यये रवित, निर्गत रवित वधो येभ्यस्ते नीरविता., मरकशूरणाश्च ते नीरविताश्च मरकशूरणनीरवितास्ते सन्ति येषा ते मरकशूरणनीरवितिनः- आचार्या , तान् उरति-प्राप्नोति गुरुत्वे योऽसौ तथा, तदा- मन्त्रणम् " उर् गतौ” सौत्रो धातुः अजन्त ७५ सहस्रदलकमलगय. अरजिनस्तवः। व्याख्या ? किर्मीरचकरनुगौरवकेरडस्परः, काण्डीरयोद्धरवतार र! तत्तार भास्करः। कल्हारदृष्टिरनवीरनुदारथित्वरः, कासारसच्छरगतीरजनीरमन्दरः॥५०॥ हे 'अवतार'अवतार -अवतरण ससारस्य यन्य न अवतार ,तल्लम्बोधन हे अवतार । - हे गुरो ' , “अब- तारन्तु नचादितीर्थेऽवतरणेऽपि ।" [अने स. का ४ श्लो. १६१०] इत्युक्ते । 'भास्कर 'सूर्य जानालोकप्रकाशकारकत्वात्, भास्कर इव भास्कर - श्रीअन्नाथ जिन. 'ततार' जितवान् । कि तत् ? 'काण्डीरयोद्धृ,' काण्डा -वाणा विद्यन्ते येपा ते काण्डीरा , "काण्डाण्डभाण्डादीर [मि ७।२।३८] इति सूत्रणेरप्रत्यये काण्डीर , काण्डीरा योद्धारो विद्यन्ते यस्मिस्तत् काण्डीरयोद्ध तत् काण्डीरयोद्ध-प्रस्तावाद वादयुद्धम् । काण्डी- रयोद्धृ अग्रे अवतार इत्यत्र "डवर्णादेरस्वे स्वरे यवरल' [सि हे १०२।२१] इत्यस्य सूत्रस्य पञ्चमीव्याख्यानाद् ऋका- गत्परस्याकारस्य रकारादेगे काण्डीरयोद्धरवतारेति सिद्धि । किम्भूतो भास्कर ? 'किर्मीरचकुरनुगौरवकेरडस्पर' किर्मीरा इव-दैत्या इव येते किर्मीरा , प्रस्तावात् शत्रव , "किर्मीर शवले दैत्ये" [अने स का ३ श्लो ११३८] इति वचनात् किर्मीरा कषायचतुष्कलक्षणा गत्रवस्ते चकुरा -अनवस्थिता यस्मात् स किर्मीरचकर , चङ्करशब्द औणादिकोऽनवस्थितवाची, नो-स्तुते. गौरव-गुरुत्व येषां ते नुगौरवा , केरडा -त्रैराज्ये राजान "केरड त्रैराज्ये राजा” [सि हे उ. सू १७२] इत्यु- ७६ ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः णादिवचनात् , नुगौरवाश्च ते केरडाश्च नुगौरवकेरडा , तान् स्पृणोति-प्राणयति योऽसौ नुगौरवकेरडस्पर , "स्मृ स्पृ प्रीति- रक्षाप्राणने” इति वचनात्, किर्मीरचकुरश्चासौ नुगौरवकेर- डस्परश्चेति कर्मधारय । पुन किम्भूतो भास्कर ? 'कल्हार- दृष्टि' कमललोचन , कल्हारशद औणादिक उत्पलविगेप- वाची । पुन किम्भूतो भास्कर ? 'अनवी' न विद्यन्ते अव्य स्त्रियो यस्यासौ तया, यदुक्तमुणादौ-"अवी प्रकाश आदित्य. भूमि पगु राजा स्त्री च" [सि हे उ सू ७११] इति । पुन किम्भूतो भास्कर ? 'अनुदारथित्वरः' न विद्यते उदारथि - विष्णु देवत्वेन येषा ते अनुदारथय -जैनास्तेषु त्वरा यस्यासौ तथा, यदुक्तमुणादी-- "उदारधि विष्णु" [सि हे उ सू ६७२] । पुन किम्भूतो भास्कर ? 'कासारसर्च्छरगतीरजनी' कसारा -हिस्रा , “कसार हिस्र" [सि हे उ सू ४०५] इति उणादिवृत्ते , कसारा एव कासारा, ऋच्छरा.-वेश्या कुलटा वा, यदुक्त मुणादौ-'ऋच्छरा वेश्या कुलटा त्वरा [अङ्गलिः] च" [सि हे उ. सू ३९७] इति, सह ऋच्छराभिर्वर्तन्ते ये ते सर्च्छराः, कासाराश्च ते सर्छराश्च कासारसर्च्छरा -हिसक- लम्पटा., तेभ्यो गति.-गमन येषां ते कासारसर्च्छरगतय श्रावकाः, तेषा ई -लक्ष्मीस्तस्या ह्लादकारित्वाद् रजनि- यामिनी अयति-प्राप्नोति योऽसौ रजनी.-चन्द्र , रजनीरिव- चन्द्रमा इव योऽसौ तथा । रजनिशब्दस्य उणादिवृत्तौ इका- रान्तत्वान्नात्र पौनरुक्त्यम् । पुन किम्भूतो भास्कर 'अमन्दर' अमन्द , 'मन्दरो मन्थपर्वते । स्वर्गमन्दारयोर्मन्दे" [अने स का ३ श्लो ११८७] इति हैमानेकार्थोक्ते ॥५०।। ? ?
७७ सहस्रदलकमलमय अरजिनस्तव.। ? अ ? सनिरपुनरग) रम्फसूरं ननार, जयिरकररलोकरकितोऽरलिधीरः । पदिरविदिरतप्रारम्भदौरम्ब्यगीर, विहरणिमरणीमीरर्कसूरः प्रटारः ॥५१॥ व्याख्या-'अ' अर्हन् श्रीअरनाथ जिन 'ननार' प्राप्त- व:, "नृ नीती" । किं तत् ? 'रम्फसूर' "रफि गतौ" गत्यर्थाना जानार्थत्वाद् अलन्त , रम्फ -ज्ञान केवलज्ञान तेन "शूर्- पूर्वी स्तम्भे हिसे" इत्युक्ते अलन्त , सूरो-हिसन चतुर्णा कपायाणा यस्मात् स रफसूर -यतिधर्मस्त रम्फसूर । किम्भूत 'सनि' सम्भक्ता, " १ सनि सम्भक्ता" [सि हे उ. सू ६०७] इत्युणादि , तपसा मिति, तप कर्तेत्यर्थ । पुन किम्भूत अ ? 'अपुनरगह ' पुन अगन्ति-पुन मुक्तिमार्गात् कुटिल यान्ति ये ते पुनरग -मिथ्यादृष्टिन , “अक [अग कुटिलाया गतौ" विवन्त , न पुनरगोऽपुनरग , तेषा अर्हः- योग्यो य स तथा । पुन स तथा । पुन किम्भूत अ माधूना इत्यवगन्तव्यम् । पुन किरभूत अ ? 'अकित' स्तुत , "अर्कण् स्तुती" अलन्त , के ? अकररलौकै' न कररा अकररा -अदीना , “करर खगे, करीरे क्रकचे दीने" [अने. स का ३ श्लो ११२७, ११२८] इति हैमानेकार्थात्, अकरराश्च ते लोकाश्च अकररलोकास्तै अकररलोक --अदीन- जनै । पुन किम्भूत अ ? 'अरनिधी' अरलि -शमस्तं १ "सनि सम्भक्ता पन्था दान म्लेच्छ नदीतट च" इत्यु- णादिवृत्तौ ॥ ? ? 'जयिः' राजा, . - ७८ ? - ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित. ध्यायतीति योऽसी तथा, यदुक्तमुणादी-"अरनि वाहुमध्यं शम. उत्कनिष्ठश्च हस्त ।" [सि. हे उ. सू. ६८२] पुन. किम्भूत.अ.? 'पदिरविदि ' "पदिर मार्ग:"[सि हे. उ. सू ४१२] इत्युणादिवृत्तेः पदिर -मार्ग प्रस्तावान्मुक्तिमार्गस्तस्य विदि.- ज्ञानं यस्य स तथा, 'विद ज्ञाने" "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे" मि हे ५।३।१३८] इति इप्रत्यये सिद्धि । पुन किम्भूतः अ 'अतप्रारम्भदौ.' अत्यते-सातत्येन जायते धर्मो येभ्यस्ते अता एकादशाङ्गानि, तेषां प्रारम्भ.-प्रारम्भण तेन यति-दुख द्यति योऽसौ विचि अतप्रारम्भदौ । पुन किम्भूत. अ 'अम्व्यगी' "अम्ब च गतौ" गत्यर्थानां प्राप्त्यर्थत्वाद्, यपि अम्ब्या-प्रापणाऱ्या गी -वाणीर्यस्यासौ तथा। अकार पूरणार्थ. । पुन किम्भूत. अ.? 'विहरणिमरणिमी' हरणि - मृत्युः, यदुक्तमुणादी-"हरणि कुल्या मृत्युश्च" [सि. हे उ सू ६३८] इति, मरणी-रात्रि , औणादिक , हरणिरेव मरणी हरणिमरणी, विगता हरणिमरणी यस्या सा विहरणिमरणी- सिद्धि तामयति-प्राप्नोति योऽसौ तथा,"मीकि गत्यां" किवन्त । पुन किम्भूत अ ? 'अर्कसू' स्तुतिजनक । पुन किम्भूत अ ? 'अस्' दीप्त इत्यर्य , "अस दीप्तौ" किवन्त । पुन किम्भूत अ.? 'प्रटार' "टारो लिङ्गतुरङ्गयो" [अने स का. २ श्लो ४२६] इत्युक्ते प्रगता: टारा.-तुरङ्गा यस्मात् स तथा ॥५१॥ पाद- . ? १ "अत्तरत्नि ॥६८२।। ऋक् गतावित्यस्मादनि प्रत्ययो भवति। इत्युणादिवृत्ती ।
सहस्रदलकमलमय. अरजिनस्तवः। ७९ स्थविरमुनिरधीवा रण्टगत् रहखोरः, सरिरजकरदीप्रो रङ्कुचोरप्रघोरः । चमरजितिरखर्जूरः सुसौरभ्यकारः, सुपरमपरमेष्ठी रम्बतीरः पपार ॥५२॥ व्याख्या-'सुपरमपरमेष्ठी' सु-अतिगयेन परम.-प्रकृष्ट सुपरंम , स चासी परमेष्ठी च सुपरमपरमेष्ठी-श्रीअरनाथजिन 'पपार' प्रीति अजनयत्, जनानामिति गम्यते । किम्भूत सुपरम- परमेष्ठी ?. 'स्थविरमुनि' स्थविरा -वृद्धा मुनयो यस्यासौ तथा। पुन. किम्भूत सुपरमपरमेष्ठी ? 'अधीवा' निर्व्याधि, यदुक्तमुणादौ--"धीवा मनीपी निपाद व्याधि भत्स्यश्च" [सि हे उ ६०८] इति । पुन किम्भूत. सुपरमपरमेष्ठी ? 'रण्टगत्' "रटि स्तेये" सौत्रो धातु -अलन्त , रण्टात्-चौरिकाया गच्छति-दूर याति योऽसौ तथा। पुन किम्भूत सुपरम- परमेष्ठी ? 'रहखोर' "रहि गत्या" ज्ञानार्थ अलन्त , रह - जान प्रस्तावाद् मिथ्याज्ञान तस्य खोर -खोटन यस्मात्स तथा, "खो खोटने" अलन्त । पुन किम्भूत सुपरमपरमेष्ठी ? 'सरिरजकरदीप्र' १ मरिरे-पानीये जायते सरिरज-पद्म, तद्वत् करौ-पाणी ताभ्या दीप्रो य स तथा । पुनः किम्भूत सुपरम- परमेष्ठी?'रङचोरप्रथोर.' रङ्कव-मृगास्ते इव रङ्कबस्ते च ते चोराश्च रकचोरास्तेषु प्रघोर -भयङ्करशब्दो यस्य स तथा, “घुरस् ध्वनी भीमार्थे" घनन्त । पुन. किम्भूत १ "जल जड चसलिर, सरिल सलिल र (?) तथा ॥९३।। सरिर" इति शब्दरत्नाकर, का० ४।
८० . ? स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः सुपरमपरमेष्ठी ? 'चमरजिति.' चमर -दैत्य , "चमरश्चामरे दैत्ये" [अने स का. ३ श्लो ११५४] इत्युक्ते , चमर इव चमर -कषायादिचतुप्कलक्षण शत्रुस्तस्य जिति -जयो यस्मात् स तथा । पुन किम्भूत सुपरमपरमेष्ठी ? 'अखर्जूर' नास्ति खजूर -रूप्य यस्यासौ तथा। पुनः किम्भूत. सुपरमपरमेष्ठी? 'सुसौरभ्यकार' “सौरभ्यं गुणगौरवे" [अने० स० का ३.श्लो १११] इत्युक्तेः सुष्टु “सौरभ्य-गुणगौरव तस्य कार -यत्नो यस्य स तथा, “कारो बले वधे यत्ने" [अने सं का २ श्लो ४०६] इत्युक्ते । पुन. किम्भूत सुपरमपरमेष्ठी? 'रम्बती' "रम्व गतौ" तिवप्रत्ययान्त , रम्बति -गति प्रस्तावात् स्वर्गा- पवर्गगतिस्तस्य ई -प्रापण यस्मात् स तथा । पुन किम्भूत सुपरमपरमेष्ठी? 'अस्' अस्यति-क्षिपति कर्माणि यौऽसौ क्विपि अस् ।।५२॥ सत्पूरशर्करविभूरकडार ! वासरं, भण्डीरकिङ्करकटीरगभीरकः किर । वापीरचाररणतीरपटीरसुन्दर- कोटीरपुष्यरथहेरसहोरकुञ्जरः ॥५३॥ व्याख्या--हे 'अकडार !' न कडार -न विषमदन्तो य सोऽकडार , “कडार पिङ्गल विषमदशनश्च' [सि हे. उ सू ४०५] इति उणादिवचनात्, तत्सम्बोधन हे अकडार हे मुदन् ! हे श्रीअरनाजिन ! त्व 'किर' क्षिप । किं तत् 'वासर' कन्दर्पम्, यदुक्तमुणादौ--"वासर. दिवस काम अग्निः प्रावृट् च” [सि हे उ सू ३९७] । किम्भूतस्त्व ? 'सत्पू' ? -- ?
सहस्रदलकल्लमयः अरजिनस्तव.। ८१ ? ? स प्रधानकाय । पुन किम्भूतस्त्व ? 'अगरपिभूः' न गर्करा - कर्कमा प्रस्तावात् साधनो यस्य रा जगकर , यदुक्तमुणादी- "रा भत्स्यपि उकादि कर्कग क्षुद्रपापाणावयवच" [सि हे उ सू ३५] इति, विशिष्टा भू --उम्पत्तिर्यस्य स विभू , अगररचासो विभूरचेति कर्मधारय । पुन किम्भूतस्त्व' 'भण्डीरकिङ्करकटीगभीरक ' १"भडीर-मण्डीरी योद्धृविगेप- वाचको औणादिको, भण्डीरा -योद्ध थिोपा किङ्करा -दासा यस्यामी भण्डीरकिक', कटीर-जल तद्धेतुत्वात् कटीर समुद्रस्त गभीरो य कटीरगभीर . कटीरगभीर इव स्टीगभीरक, स्वार्थ क, मण्डीरकिङ्करश्चासौ कटीरगभीरतश्चेति कपधारय । पुन किरभूतत्त्व ? 'वापीर- चारुरणती' वापीर --मेघस्तद्वन् चारु -प्रधानो यो रणति - शव्दस्तेन इ-शोमा यस्मासौ तथा। वापीरशव्द औणादिको मेघवाची । पुन किम्भूतस्त्व ?' 'अपटीरसुन्दरकोटीरपुष्यरथहे.' नास्ति पटीर -कामो येषा ते अपटीरा , यदुक्तमुणादौ-“पटीर कन्दर्प” [सि हे उ सू ४१८] अपटीराणा सुन्दरकोटीर इव- प्रधानमुकुट इव योऽसौ अपटीरसुन्दरकोटीर , पुष्यरथ -क्रीडा- रथ प्रस्ताबाद् धर्मपुष्परथ ,तेन हिनोति-याति योऽसौ विचि पुप्यरथहे , "हि वर्द्धने गतौ" अपटीरसुन्दरकोटीरश्चासौ पुष्य- स्थहेश्चेति कर्मधारय । पुन. किम्भूतस्त्व ? 'असहोरकुञ्जर.' सहोर -विष्णु , नास्ति सहोरो देवत्वेन येषा ते. असहोरास्तेषु ? ? १. " भडीर भण्डीरश्च योद्धृवचने" इति हैमोणादिसूत्र ४२२ वृत्तौ । ६ ८२ स्वोपनवृत्तिविभूषितः कुञ्जर इव योऽसौ तथा, "सहोरः विष्णु. पर्वतश्च" [सि हे उ. सू. ४३३] इति उणादिवचनात् ॥५३।। प्रसरसुपरवाणेरं ददार प्रखौरः सुगिरयरभारः परीरः स्वनेरः। कनिरसनरवृद्धरय॑धीरंभ्यगोरः, पतिरचिकुरलाधोरर्बसंरग्यलीरः ॥५४॥ व्याख्या-सुष्ठ गिरय.-पूज्या ये ते मुगिरय -विद्वांस, वदन्तीत्यध्याहार्यम्, “गिरि. पूज्ये" [अने. सं. का २ श्लो ४१६] इत्युक्ते । चतुर्थपादान्ते 'अ.' सिद्ध.-श्रीअरनाथ जिन 'ददार' अदारयत् । किं तत् ? 'अ' व्याधि “अं मान्तो ब्रह्मसवादे परब्रह्मप्रवाचकः ।। व्यसने व्याधिते व्याधी १६-२०] इनि वचनप्रामाण्यात् । कस्य? 'प्रसरसुपरवाणे.' प्रसर.- प्रेमस्तद्धेतुत्वात् प्रसरः, “प्रसरस्तु सङ्गरे प्रणये” [अने स. का ३ श्लो. ११७३] इति हैनानेकार्थोक्ते, सु-अतिगयेन परवाणि:- धर्माध्यक्षो यः सः सुपरवाणि., “परवाणिधर्माध्यक्षे" [अने. सं. का. ४ श्लो. १४५.७] इति वचनप्रामाण्यात्, प्रसररुचासौ सुपरवाणिश्च प्रसरसुपरवाणिस्तस्य । तथा किम्भूत. अः? 'प्रखौ' प्रगता खौ.-उत्पत्तिर्यस्मात् स तथा। कस्य ? 'र' पापस्य, “ऋनिपेवो भवः पूपा, वरुणोऽमरराडज । करी तरुनरः पाप्मा” [सौ. ए. ६] इत्युक्ते, “खव् भूतिपूत्युत्पत्तौ" किवन्तः । किम्भूताः सुगिरय. ? 'ऋरभार' आ-धर्म. “ ऋगब्द पावके ? [वि ए ? १ 'अम्यगोर' इत्यस्य व्याख्यान लेखकप्रमादात् पतितमाद”।
सहनदलकमलमयः अरजिनस्तव.। ८३ सूर्ये धर्मे" [वि ए. ११] इति वचनात्, रं-धन, "र रत्न रोदन धनं" [सौ ए ८३] इत्युक्ते , आ च र च ऋरे, तयोर्भरि पोपका ये ते नथा । पुन किम्भूत अ ? 'परीर' परीरहेतुत्वात् परीर , यदुक्तमुणादी--"परीरं बल" [सि. हे उ सू ४१८] । पुन. किम्भूत अ: ? 'स्वनेर' न मनिन एरा.-एडका यस्थासौ अनेर , सुप्छु अनेर. स्वने । पुन किम्भूत अ ? 'कनिर- सनरवृद्धे' केन-दुखेन निरसना -निरासाः कनिरसना, निरसन निसूदने । निष्ठीदने निरासे च” [अने स का ४ ग्लो १५५०] इत्युक्ते रा-जरा , कनिरसनाश्च ते राञ्च कनिरसनरास्तेपा वृद्धि -हर्षो यस्मात् स तथा, तस्य कनि- रसनरबुद्धे.-यतिन पति.' स्वामी । पुन किम्भूत अ.? 'अय॑धी' उपार्जनाहध्यान । किम्भूतस्य कनिरसनरवृद्धे ? 'अचिकुरसायो ' "चिकुरोऽहौ गृहे वभ्रौ, केगे चञ्चलगलयो ।" [अने स का. ३ श्लो ११५५] इत्युक्ते न चिकुर. अचिकुर.- अचञ्चल , माधु -मनोज , अचिकुरश्चासौ साधुश्च अचिकुर- साधुस्तस्य । पुन किम्भूत.अ ? 'अर्वसंरचली.' "अर्ब गतौ" अर्वन्ति-धर्माद् दूर यान्ति ये ते अर्वा.-नास्तिकमतिन , “रंगक स्वादाऽऽप्त्यो. तान् संरागयन्ति-प्राप्नुवन्तीत्येवंगीला अवसर- गिन., तेन लीयन्ते-नाश्लिष्यन्ते यत्रासौ अर्वसंरग्यली. ||५४।। अयोपसहारमाह- इत्थं देवेन्द्रसङ्घप्रगतनरपतिलाददस्तीर्थनाथो, भद्रं दद्यादरः सोऽभिमतधतिततिप्राप्तिदःप्राप्तमुक्तिः।
7 स्वोपत्रवृत्तिविभूपितः ख्यातीवाचकज्ञानविनलसुगुरूणां प्रसादादि यस्य, बन्ने श्रीवल्लभन्न प्रलदशशताम्भोजगर्भस्तकोऽयम् ॥५५। माख्या--स. 'अर' श्रीअरनाथ जिन ‘भद्र' मङ्गल 'दद्यात्' प्रयच्छतु । स. क यल्य 'अय' प्रत्यक्ष 'इत्य' अमुना प्रकोरण 'प्रबलदगमताम्भोजगर्भनव' प्रकृष्ट दलाना पत्राणा दगत-महत्त्र यस्मिन्त प्रदलदगतं, तच्च तद् अम्भोज च-पनं प्रदलगताम्भोज, नद्गर्भो यस्मिन् स प्रदल- गगनाम्भोजार्भ ,स चालीस्तवञ्च-तवन प्रहलढगगताम्भो- जगर्भस्तव 'चक्रे' अकारि । केन ? ['श्रीवल्लभेन'] श्रीवल्ल- भास्येन साधुना इत्यर्थ । कस्मात् ? ख्यातश्रीवात्रकनानविमल- सुगुरूणा प्रसादात् 'हि' इति निश्चये । किम्भूतोऽर. ? 'देवेन्द्र- सप्रशतनरपतिद्वादनः सुरेन्द्रनिकन्नम्रमनुजेश्वरप्रमोद- दायक । पुन किम्भूतोऽर.? 'नीर्थनाथ' चतुविधसङ्घनाथ. । पुनः किम्भूतोऽर: ? 'अभिमतवृतिततिप्राप्निद' अभिमता:- वाञ्छिना धृतय -सन्तोपसुखानि तासा तति -श्रेणि अभिमत- धृतिततिस्तन्या प्राप्तिदो य. स तथा । पुन. किम्भूतोऽर: ? 'प्राप्तमुक्ति' अबाप्तसिद्धि. ॥५५।। । ? ? ? इति श्रीसहस्रदलकमलगभितथीअरनाय- जिनस्तववृत्तिः समाप्ता ।
८५ सहनदलकमलनय. अरजिनस्तवः। [वृत्तिकार-प्रशस्तिः। खरतरगणजलधिसमुल्लासन रजनीपतिप्रकाराणाम् । नमानेकनराणां, श्रीजिनमाणिदयसूरीणाम् ॥१॥ पट्टे वरे [ऽधि] विजयिषु, कुमतिलतावातनाशनहिमेषु । श्रीमच्छीजिनचन्द्राभिधानसूरिनधीशे ॥२॥ युगमम् । येषां स्फुरत्प्रतापाधिक्ष्यजितः सन् निरन्तरं भानुः । भ्रमतितमांदियति हिते,ज्ञानविसलवाचकानन्धुः॥३॥ तत्पादाम्बुजमधुकरशिण्यश्रीवल्लभेन गणिना वै। विहिता स्तववृत्तिरियं, यदनृतमिह तद्बुधैः शोध्यम् ॥४॥ युग्नम्। ।। इति वाचनाचार्यधुर्यस्मानेकवादीन्द्र करीन्द्रवार- पुण्डरीकप्रकारनिर्मलदिमण्डलव्यापियश पुज- श्रुताब्धिपारीण-बाचनाचार्यश्रीज्ञानविमलगणि- प्रवराणां शिष्य-पण्डित श्रीवल्लभगणिना कृता [स्वोपन]सहलदलकमलगभितश्री- अरनाथ जिनस्तववृत्तिः समाप्तिमगमत् ।
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षोडशोत्तर सहस्रदल पद्ममय वीर स्त्रोत्र مه ام وليد له با د به لو مهمید ور مد کبر د الصماد عل تعلم ما همهمه زما I يط با مر مرا لي I got و مهم گے ۔ 1 الر فی کم بر امام مادام . . دهه ر کنمئی و همه می f و به ملی لب ه ع سر جه سد با پوشال لهااه مه ۳۲ تمل من المهم و دهه ی ۱۰ : بلخ د امداد په دا با معلم، وهما 10..1 ها در همه ی دنیا که کمتر در تو و معده مهمانی و ملیر ماه برای راه ها با مردم و دلم مور د مال و مرد را به باهم جمع می ادعاها و در داد امام، دلمه معوrلم و به لا د دې اند در مت یم مر م معلميحيه هه مما فعله معه عمده ممم २ 1 SparrorinkaitrinarinaamsancharsiMATASANAMATERatan Anand १६. Antiritriminatixxnawran REENAKArmanixx11 areix.३३ . NRAILatellitwRADESATARELP Aanematurint dieirain away rat indi Notaksararu TARPERMItihare REAnitatistinatantantinue Aaichotreaminateria Tripatra . Romantaritratertainmentrancientialatkarpakyiantratmanirai uttakar Marathitadium alternetsuriSanstha krt.it. +' Aurairmiriteratistrativatmazanevartaken G F *rnatr want to akhnautankita bharti kart . २ - 1 10 w A अन्तिम पत्र प्रतिका द्वारा लिखित उपाध्याय श्रीवल्लभ की जिनस्तुति चतुविशति सवृत्तिः विरचित श्री सुन्दर परिशिष्ट क . श्रीवीरजिनस्तोत्रम् । (षोडशोत्तरसहस्रपत्रपद्ममयम् ) परम्परपरम्पारपूरपारपरपरम् । परम्परपुरस्पार पौर परपर परम् ॥ १ ॥ तारकं रतिरन्तार-तूरतारतरस्वरम् । निरन्तरमुरस्तार तार तारकरत्नरम् ।। २ ॥ निरवरं निरम्वार निर मेरं निरस्तार, चर चौरचर चिरम् ।। ३ ।। सुरची रचर नार, वर चार विरञ्चरम् । निरच्चिरच्चिररिं, निरञ्चार निरन्तरम् ।। ४ ।। सालङ्कार व्यलटारमलङ्करणलक्षरम् । हारवारवरक्षीरशीलनीरस ॥ ५ ॥ रहरस्थूरघोरक्रूरकलङ्करम् । खुरखुरखलक्षार-कारस्करमुरश्वरम् ।। ६ ।। पुरन्दरपुरद्वार-द्वारपालनरपरम् । धुरक्षरकलङ्कालव्यालवारण रत्नरम् ।। ७ ।। नरकारण्यरथ्यार, चरणारन्तु जुर सार, सारसौरपुरस्सरम् ।। ८ ।। चौरजारकरस्फार, द्वार-दूरचर चिरम् । सारङ्गलक्ष्मरं धीर-वीर वीरहर स्मर ।। ६ ।। -
८८
सहनदलकमलमयं वीरजिनस्तोत्रम् ।
.
सारदारदरक्षारवारपार दुरन्तरम् ।
तारयार तरस्तार-तरसा रक्तरक्त ।। १० ।।
लस्य लजारं, मारज्वरज्वलत्पुरम् ।
स्फुरद्विरतिरत्नार-नारवर पुरन्दर! ।। ११ ।।
घोरचार चलद्घोर, सरवारभरस्वरम् ।
निरन्तरसर नीरसार तारय रन्ध्ररम् ।। १२ ।।
वीरधीररफुरच्छीलशैलसारङ्गरगर ।
गारवो रतर
रतरस्तर ।। १३ ।।
सार सारङ्गरङ्ग रविरतरतिर सारसारं सुरङ्ग,
रम्यं रम्यं रमार मरकरमरक रक्तरक्तारवारम्
वार वार विरक्तं रविरविरमर मारमार निरस्तं,
रक्ष्या रक्षारखारक्षरखरखरक खारम् ।। १४ ।।
स्मारं स्मार सुरश्मि रसरस रसरं सारसार गिरस्थं,
रङ्कारङ्कोरगारस्थिरचरसुरसा रन्त्ररक्तारत रम् ।
आरम्भारम्भरम्भेरमरपरपर वारपार परत्र,
श्वरश्वरचुरच लव्धरकार
स्वर स्वैर शरण्य रणरणरणिर कारणारण्यरण्या,
रण्यारण्यं रसार सरसरसरसा रन्दरस्फारसीरम् ।
गोरं गोरङ्गिर ता रगरगरगिरं गौरगौरङ्गिरन्त,
रङ्गारङ्गारगारं करगिरमुरसा रङ्गिरऑरगौरम् ।। १६ ।।
सारं सारस्फुरद्गीरसरपरपर वारणरन्तरस्या-,
रब्धारम्भारमारं करणरणरणं रङ्गिरऑरगारम् ।
यो रम्भा रन्तु रम्भोरवरवरतरस्पेरणोरं धरस्या,
रक्ते रक्तोरजोर विरतिरविरतेरङ्कुरं स्मारयारम् ।। १७ ।।
.
. सहस्रदलकमलमय वीरजिनस्तोत्रम् । ८९ सौरभ्यारम्भलम्भरविरस सौरसारङ्गरङ्ग, रक्षो रक्ष रमार परपरपुरतो रन्ध्रिरन्धरहारम् । तार तार तरण्डं रथिरथरतिर स्थूरसारङ्गलष्ट, लक्ष्यालयरपार परमलयलयं लब्धलक्ष रदूरम् ।। १८ ।। गरमागरगर-सुरसरसरमर, -खरतर-खरतर-खलखुर । परवल-परदर-परवलपरदर, शरभरगरभर-सरभरगरगर ।। १६ ।। परमलपरमलनरनिरपरनल - किरणरचरणरतरणिरशरणर । नरपुर-सुरपुर-सुरपुरजिर नरविरसरविरसरविरसर ।। २० ।। निरकल-नरकुल-कलतरदरवर, करणर-तरणर-विरतर-णरणर । गिरधर-गिरकल-गुरबुर-सिरतिर, निरमर-निरजर-परपुर-मुरसर ।। २१ ।। निरघर-निरवर-थ जलजर, चिरमर-मुरतर-दुरतर-दुरहर । नरकर-नरकर-करनर-निरकर, सरसर-सुरपुर-परयुर-मरसर ॥ २२ ॥ वरकरदुरमरदरलरनिरमल- शरदिरवररलकिरकरसुरविर । सुरनर . र हरकुरनिरचर, अरररदरसरचरकुरधुरतर ।। २३ ।।
९० प . . सहस्रदलकमलमयं वीरजिनस्तोत्रम् । गरधरचरकरवरतरसुरवर, चरटरचरटरवरटरकरटिर । जरठरनरवरजरठरपरठिर, सरडरसरडरकरटरटरहर ।। २४ ।। रसुरवरवरपर, परकरणरपरणरवरणरहर । निरजिरनिरजिरनिरजिरनिरजिर, दुरशिरदुरशिरदरहरनिरसुर ।। २५ ।। दुरसुरनिरधरनरधरचरधर, चरदरसरदरदर रसर । स्वरचलचलनरकुलसरकलकल, भरतरभरतरवरतिलतिलकर ॥ २६ ।। कुरकुरङ्करकीरकर करं, दर पुरन्दरदूरदर दरम् । हरविरञ्चिरमारवर चिरं, चिरतर चर चौरचरं वरम् ।। २७ ।। धर धरणोरधर, विरतेरतरन्तरणीरतिरम् । किल कालहरं कुलकारकरं, स्मर वीरवरं शरणोरतरम् ।। २८ ।। वरशीलवर वरनीरवरं, सुरचीरसर सरसीरसरम् । करवीरकरं करणैरकर, स्मर व स्मर वीरहरम् ।। २६ ।। ध . .
सहलादलकमलमयं. वीरजिनस्तोत्रम् ।
९१
वीर वरं वरतर वरवरवार,
धीरं धर धर धुरन्धरधीरधीरम् ।
सारस्वरं स्मर सरस्थिरसारसीरं,
धीर धर धर धर वर वेरवेरम् ।। ३० ।।
दरभरदरदार दूरदार दुरन्त,
रदिरदरद र भारभारम् ।
भर भरभरभारं भैरवारम्भरहो,
रहरहरहर हीर हर हीरहीरम् ।। ३१ ।।
सुरवर-सुरवर-सुरवर-सुरव,
रविरथ रविरथरविरथरथर ।
करतरकरतरकरकरचरण,
रविरलरविरलरविरलरवल ।। ३२ ।।
वीर पर वरपर परवारवार,
हीर हर हर हर हरहार हूरम् ।
कीर कर कर कर करकारकार,
नीर निरङ्करकर निरगारसारम् ।। ३३ ।।
सुरद्रुर सुरसुरं सुरशैलसार,
सारङ्ग रतर हर सैरसारम् ।
सारत्वर दरतर गरयैरहार,
हार हिरण्यरपुर परमेरपारम् ।। ३४ ।।
श्रीरत्नरत्नरमर नरवारण र,
हैरण्यर वरकर करमालवारम्
हार सुरस्युरसिर गरमालचाल,
व्यार बरकर वर वीरवीरम् ।। ३५ ।।
.
९२ सहस्रदलकमलमयमयं वीरजिनस्तोत्रम् । वीर स्मरन्त्युरतर नरनीरजोर, पारस्पर परपर परमोरसारम् । तेरन्त्यर सुरपुर सुसैरसाल, सारस्वरस्वरबल सुरतैरपारम् ।। ३६ ।। कैरक्षरखरत रक्षरनीरसीर- रस्थिर स्थिरतर सुरतैरतारम् । पार दुरन्तरजलस्यरसारसार, श्रीलब्धरङ्गरसर सुरसालसालम् ।। ३७ ।। आरम्भरङ्गरतरङ्करजोरहार, हेरम्वर वरतुरङ्गरसूरचारम् । सरम्भरम्भरसलम्भ रसालवार, सारं शरण्यरवरं सुलयोरसारम् । शार सुर तुरघर तुर र सार, वीरं स्मर स्थिरकर चरणोरचारम् ।। ३८ ।। पड्पदी, अत्र बन्धे १०१६ षोडशोत्तरसहस्रपत्रबन्धमिदम् । श्रीः ॥
परिशिष्ट ख उपाध्यायधीसहजकोक्तिगणितन्वृधः श्रीपार्श्वनाथ जिनस्तवः (बतटलकमललयः) श्रीनिवास सुरश्रेणिसेव्यत्राम, बामकामाग्निसतापनीरोपमम् । साववेगादिदेवाधिकोपक्रम, तत्त्वस ज्ञानविज्ञान भव्याश्रमम् ।। १ ।। नव्यनी गगताकेलिकर्मक्षम, [य]ल्य भव्यर्भजे नाम सम्पद्रमम् । नीरस पापह स्मर्यते सत्तम, लिग्ममोहात्तिविध्वसतापानमम् ॥ २ ॥ लव्यामोदजनकादरसोस्वधाम, तापाधिक प्रमदसागरमस्तकामम् । घण्टारवप्रकटितादुतकीतिराम, नक्षत्रराशिरजनानी] जनताभिरामम् ।। ३ ।। घण्टापथप्रथितकीत्तिरमोपयाम, नागाधिप परमभक्तिवशात् सवामम् । गंभीरधीरसमतामयमातङ्गम" (?), म मानत नमत त जिनप निकामम् ॥ ४ ।। ? १ तायाभ्रम' इति ना. । २ 'तापाधिक -' इति जे । ३ °रजनायलताभिरामम्' इति जे । ४ माजगाम' इति ना ।
९४ शतदलकमलमयः पाश्र्वनाथ जिनस्तवः। - संसारकान्तारसपास्य नाम कल्याणमालास्पदमस्तसामम् । लाभाय बभ्राम तवाविराम, लोभाभिभूत. श्रितरागधूमः ।। ५ ।। कर्मणा राशिरस्तोकलोकोद्गम- संसृते. कारण मे जिनेशावमम् । पूर्णपुण्याढ्य दु ख विधत्तेऽन्तिम, णा? नक्षमस्त्वां विना कोऽपि त दुर्गमम् ।। ६ ॥ कार्मण निर्वृतेर्हन्तुमन्योऽसम यं[? य]क्षराट्पूज्य तेनोच्यते निर्मम । श्रीपते ! त जहि द्राग् विधायोद्यम, दानशौण्डाद्य मे देहि ऋद्धिप्रमम् ।। ७ ।। यस्य कृपाजलधेविश्राम कण्ठगताशुसुभटसडग्रामम् । भयजनकव्याया म, जेतार जगत श्रितधामम् ।। ८ ।। कक्षीकृतवसुभृतपुर्णाम, लापोच्चारमहा मम् । केशोच्चयमिह नयने क्षामं, लिङ्गति कमला' कुरु ते क्षेमम् ।। ६ ।। कलयति जगता प्रे . मं, लम्भयति सौख्यपटलमुद्दामम् । काल हन्ति च गतपरिणाम, मह तं महिमस्तो मम् ।। १० ॥ १ 'कमला' इति जे । . १ . .
शतदलकमलमयः पार्श्वनाथजिकस्तवः।
९५
३
?
रसंन[न]येप्सितदानसुरद्रुम,
हितमहीरुहवृद्धिजलोत्तमम् ।
तं? तरुणपुण्यरमोदयसङ्गम,
समरसामृतसुन्दरसयमम् ।। ११ ।।
हिनस्ति सद्धचानवशात् २ स्म मध्यम,
तं तीर्थनाथ स्वमत प्लवङ्गमम् ।
सुरासुराधीशममोघनयम,
रैः नाथ सम्पूजितपद्युग स्तुमम् ।। १२ ।।
संसारमालाकुलचित्तमादिम,
सा[? शास्त्रार्थसवेदनशून्यमश्रमम् ।
रम्याप्तभावस्थितपूर्णचिद्धन,
सङ्कित शोषितपापकर्दम ।। १३ ।।
रत्नत्रयालङ्कतनित्यहेम ।
सीमाद्रिसारोपमसत्त्वसोम! ।
शोभामयो ज्ञानमय विसाम,
षड्वर्ग मा देव विधेह्यकामम् ॥ १४ ।।
भावविभासकनष्टविलोम,
स्कन्दितस्कन्दलत प्रणमाम ।
रङ्गपतङ्गनिवारणसुभीम,
कम्बुदान (गल) जिनप हत ते भीमम् ॥ १५ ।।
१ ‘त सदापुण्य ---' इति जे ।
'सब्दयानावस्थितस्य' इति जे ।
३ ‘स्मरप्लवङ्गम' इति जे ।
शतदलदामलमयः पार्थनायजिनस्तवः। मन्त्रेश्वर पार्थपति परिश्रम, लाभाश्रितस्यापनया मनोरमम् । कर्मोत्थित मे जिन साधु नेगम, ररभाविलासालसने त्रनिर्गमम् ।। १६ ।। समितिसारगरीरमविभ्रम, हरिनतोत्तगभरिगमागमम् । श्रयत तं नितमानभुजङ्गम, फलसमृद्धिविधानपराक्रपम् ।। १७ ।। पर्यश सृजति श जिनसार्वभौम , तारस्वेरण विबुधैः श्रित होम । शोकारिमारिविरहयतवात्तदाम, (?) भव्य स्तुत निहतदुर्मतदण्डख मम् ।। १८ ।। माद्याम्वुजध्वसविधौ महद्धिम, न वाजयत्यागमनस्तुरडगमम् । मन्त्रोपम ते जिन राम[? ग]पञ्चम, स्तवेन युक्तं गुणरत्नकुट्टिमम् ॥ १६ ।। कलिलोरव्याधाम- माहात्म्य हृदयडगमम् । लब्धथितवसुत्राम, यन्तिवर्गस्तुत नुमम् ।। २० ।। लोकोत्पत्तिविनाशसंस्थितिविदा मुख्य जिन वै स्तुमं, द्रव्यारक्तसमाधर नमत भो । पूजा वरा पाश्चिमम् । परपक्षस्य तव स्तवं त्वन्निमित्त करीन्द्रग तत्तद्भावमयं बस वदतस्त्रैकाभ्यस्तर्वदमम् (?) ॥ २१ ।। ?
शतदलकमलमय पार्श्वनाथ जिनस्तवः। ९७ नयनाननसद्रोम, सन्ततिं तव जडगम । स्थावराशुसुमता स्याम, (?) नयते शककृत्रिमम् ।। २२ ।। दासानुदासस्य मम, नवानन्दविहङ्गमम् । माद्यति प्राप्य सुप्रमं(?) नंपा [?नया] क्षत्ता महाद्रुमम् ।। २३ ।। क्षमाबोहित्यनिर्याम, मानवाच्यं महाक्षमम् । गुणिपूज्यं प्रीणयाम , रुचि[? रुचिस्तौमि नम नमम् ।। २४ ।। स्मरन्ति य सुन्दरयक्षकर्दम, रागात् समादाय महन्ति कौङ्कुमम् । मियो मिलित्वा मबु(?) जाड्यकुङ्कुम, चन्द्रानन तं प्रविलोकताद्रमम् ॥ २५ ।। इत्थ पार्श्वजिनेश्वरो भुवनदिक्कुम्भ्यङगचन्द्रात्मके, वर्षे वाचकरत्नसारकृपया राकादिने कात्तिके । मासे लोद्रपुरस्थित शतदलोपेतेन पद्मनस- नूतोऽय सहजादिकीर्तिगणिना कल्याणमालाप्रद ।। २६ ।। श्रीवामातनय नीतिलताघन घनागमम् । सकलालोकसपूर्णकाय श्रीदायक भजे ।। १ ।। कलाकेलिं कल कामरहित सहित सुरै । ससारसरसीशोपभास्कर कमलाकरम् ।। २ ।। सहस्रफणताशोभमानमस्तकमालयम् । लोद्रपत्तनसस्थानदानमान क्षमागुरुम् ।। ३ ।। स्मरामि च । [शतदलकमलबहि स्थो लेख ] - ९८ शतदलकमलमयः पार्श्वनाथजिनस्तवः। ऐ नम. । श्रीसाहिर्गुणयोगतो युगवरेत्यत्थं पद दत्तवान्, येभ्यः श्रीजिनचन्द्रसूरय इलाविख्यातसत्कीर्तय । तत्पट्टेऽमिततेजसो युगवरा श्रीजनसिहाभिधा- स्तत्पट्टाम्बुजभास्करा गणधराः श्रीजनराजा श्रुता ।। १ ।। तैर्भाग्योदयसुन्दरैरिपुसरस्वत्षोडशाब्दे (१६७५) सित- द्वादश्या सहस. प्रतिष्ठितमिद चैत्य स्वहस्तश्रिया । यस्य प्रौढतरप्रतापतरणे. श्रीपार्श्वनाथेशितु , सोयं पुण्यभरा तनोतु विपुला लक्ष्मी जिन सर्वदा ।।२।। पूर्वं श्रीसगरो नृपोऽभवदलड्कारोन्वये यादवे, पुत्रौ श्रीधरराजपूर्वकधरौ तस्याऽथ ताभ्या क्षितौ । श्री मल्लोद्पुरे जिनेशभवनं सत्कारितं खीमसी, तत्पुत्रस्तदनुक्रमेण सुकृती जात. सुत· पूनसी ॥ ३ ।। तत्पुत्रो वरधर्मकर्मणि रतः ख्यातोऽखिलैस्सद्गुणै , श्रीमल्लस्तनयोऽथ तस्य सुकृती श्रीथाहरूनामक । श्रीशत्रुञ्जयतीर्थसङ्घरचनादीन्युत्तमानि ध्रुव, य कार्याण्यकरोत्तथा त्वसरफी पूर्णा प्रतिष्ठाक्षणे ।। ४ ।। प्रादात् सर्वजनस्य जैनसमय चालेखयत् पुस्तक, सर्व पुण्यभरेण पावनमल जन्म स्वकीय व्यधात् । तेनाय भवनस्य यस्य जिनपस्योद्धारकः कारितः, साद्धं सद्धरराजमेषतनयाभ्यां पार्श्वनाथो मुदे ।। ५ ।। श्री. ।
परिशिष्ट ग -मूलपद्यानामकाराद्यनुक्रमणिका श्लो स श्लो स. पूज्यरघोर ३ २ - ४० ५४ . अकरणिररवस्यो २६ अररतात १३ अवरहसर २५ अविरतमर! ३३ असुरनिर्जर- इत्थ देवेन्द्रसङ्घ ५५ कठरकदरभडगे १८ कविरमसुर- कारोरनीते- २६ किर्मीरचकुर- ५० खरुरभिमरनाश २१ गुरुरनपरथा ३१ चकार चटरविघ्नर- १० चुकोर १४ डमरदुज्ज्वर- तनुरवसरवित्ते २३ धीररमारै १२ नार्थरनुत्तरनरैः २० पपर ३६ पस्फार ४१ पुस्फोर ४९ २४ प्रदरपापर- प्रभुरचतुर ३५ प्रवरवर्णर- प्रसरसुपरवाणे बुद्धेरवोधि ३६ बधूरनागरक- भव्यैरगोभि- १७ भ्रमरवृत्ति- & मुहिरगर्वर- मृदरनिकरहारी ४५ यक्ष्य रचोकू ३० लक्ष्मीरबीभरत्- ४७ लोकरशोभि २८ ववार १६ विजर ४२ ४४ ७ ४ ६ १०० परिशिष्ट ग कलो. स ૨૨ ५१ है ८ १५ विदारहर्ता- विभुरनकर- विभोरमोमो- विज्ञरमान- वृन्दारकागर- वदारवो गरिरं सज्जूर सत्पुरशर्कर- श्लो स सनिरपुनर- स्थविरमुनि ५२ सुचरण चरत. ११ सुहीरसच्चीर- सृमरमुदिरसेरो २७ सोऽकारयद् ३७ संसारदुस्तर ३२ हृष्टरकान्ति ३४ ४८ ४६ m ४३ ५३
परिशिष्ट घ
वृत्तिकारोधृतग्रन्थानां तालिका
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अनेकार्थनाममाला ३-४, ३-१०, ४-७, ४-८, ४-१०,
५-६, ५-१७, ६-१६, ८-२, ९-१५, १०-१५,
१३-११, १३-२२, १४-१२, १८-२२, २३-३,
२३-१४, २४-३, २४-८, २४-१८,२४-२१,२५-७,
२५-१४, २५-१६, २५-२२, २६-११, २७-२,
२७-१२, २८-१,२८-४,२८-६, २८-१७, २८-१६,
२६-२३, ३२,-५, ३२-११, ३२-२२, ३३-७,
३३-१२, ३५-११, ३५-१४, ३७-४, ३७-८,
३७-१८,४०-१०,४२-१८,४३-२, ४३-३,४३-६,
८३-१६, ४४-६, ४४-२०, ४५-१०, ४६-५,
४६-१६, ४६-२०, ४८-३, ४८-१०, ४८-१७,
४८-२०, ४६-३, ४६-१४-१५, ५०-२, ५०-७,
५४-२, ५४-१७, ५५-१३, ५६-१२, ५७-२२,
५८-१०, ५८-१३, ५८-१६, ५६-६, ५६-७,
५९-१३, ५९-१४, ५६-२२, ६०-७, ६०-२०,
६१-३, ६२-१, ६२-७, ६२-६, ६२-१७, ६२-१६,
६१-२१, ६४-१६, ६५-२, ६५-१७, ६५-१६,
६५-२१, ६५-२३, ६६-१, ७०-२१, ७१-१३,
७१-१७, ७२-६, ७२-१६, ७५-७, ७५-१६,
१०२
परिशिष्ट घ
७६--२४,७७-१६,७८-१६, ८०-२,८०-६, ८०-८,
८२-८, ८२-१४, ८२-१५, ८३-८, ८३-१४
अभिधानचिन्तामणिनाममाला २६-२०, ४६-१२, ५७-८,
६६-२२, ७४-७, ७४-१७
कविकल्पद्रुम २६-३, ३६-१, ६३-७, ६५-१२, ६७-१६,
७४-१८
गोपालभट्टी ११-४
ध्वनिमञ्जरी १५-१०
धातुपारायण ६०-११, ६५-६
पाणिनीयव्याकरण ५४-८
पाणिनी गणसूत्र ४८-५
विश्वगम्भुनाममाला ५-१५, ६-८, 8-२०, ११-१६,
१४-२२, १६-१, २५-१७, ३४-२, ३६-२४,
३६-७, ३६-६, ५३-१४, ५६-१८, ६०-१६,
६१-२०, ८२-११, ८३-१
शेषसग्रह ३-१२, ४०-२०
सिद्धहेम-उणादिसूत्र-सवृत्ति ३-१८, ४-१६, ५-८, ८-२१,
१०-१४, ११-१, १४-१५, १६-२०, २१-६,
३०-१६, ३१-४, ३४-६, ३६-१२, ३६-१५,
४०-६, ४१-११, ४१-१५, ४६-२४, ४७-२,
५०-११, ५३-४, ५३-७, ५३-११, ५३-२०,
५४-६, ६४-३, ६५-१४, ६६-२१, ६७-४, ६७-६,
६७-६, ६८-३,
६८-७,
६८-१७,
६६-३,