Government College, Kota

Kalidas Granthawali Granthamala-260

Shastri, Pt. Sriramtej · 2012/04

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॥श्री ॥
चौखम्बा सुरभारती ग्रन्थमाला
२६०
कालिदास-ग्रन्थावली
(महाकवि कालिदास को रचनाओं का सर्वांगपूर्ण सस्करण)
व्याल्याकार
पण्डित श्रीरामतेज शास्त्री
LTERAR
Arer 100
Number
सम्पादक
N
डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी
साहित्य-आयुर्वेद-ज्यौतिष-आचार्य
एम० ए०, पी-एच० डी०, डी० एस-सी० ए.
OCVT
VE,
दमदितव्यम्
स्वाध्यायान
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
वाराणसी

प्रकाशक
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
(प्राच्यभारती के प्रकाशक एव वितरक)
के० ३७/११७, गोपालमन्दिर लेन
पो. पा० न०११२९
वाराणसी २२१००१
३३३४३१
ििधकार प्रकाशकाधीन
प्रथम सस्करण १९९६ ई०
मूल्य ४००-००
अन्य प्राप्तिस्थान
चौखम्बा
सस्कृत
प्रतिष्ठान
३८ यू० ए०, जवाहरनगर, बैंगलो रोड
पो० बा० न० २११३
दिल्ली ११०००७
२३६३९१
*
प्रमुख वितरक
चौखम्बा विद्याभवन
चौक (बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे)
पो० बा० न० १०६९
वाराणसी २२१००१
है ३२०४०४
कम्प्यूटर टाइप प-सेटर्स
सरस्वती टाइप फाउण्ड्री, इलाहाबाद
मुद्रक
ए० के० लिथोग्राफर, दिल्ली

U. G. C. BOOKS सम्पादकीय FIRRARY कविकुलकमलदिवाकर, कविताकामिनीकान्त तथा सरस्वती के वरदपुत्र महाकवि कालिदाम परमशैव थे। उनकी द्राक्षापाकशालिनी अमर कृतियाँ दिग्-दिगन्तों तक व्याप्त है। समय-समय पर इनकी कृतियों, के देशी एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं। जनसमाज दो प्रकार का होता है, एक गुणग्राही और दूसरा दोषदर्शी। इस प्रकार के लोगों की भी इनकी रचनाओं की ओर दृष्टि गयी. फलत इन लोगों ने इनके बारे में अपने-अपने चरित्र के अनुरूप बहुत कुछ लिख डाला, जिस पर आज का विद्वत्समाज विचार कर रहा है, अगला समाज भी विचार करता रहेगा। इस ओर जब आलोचकों की दृष्टि पड़ी' तो उन्होंने अपने अज्ञान के कारण महाकवि की रचनाओं के बारे में अनेक प्रकार की छींटाकसी की है। हम यहाँ इस प्रकार के कतिपय स्थलों को उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं। दोषदर्शन-यथा-'त्रियम्बक समिन ददर्श' (कुमार०) को इस पद्याश में 'श्यम्बक' पद के स्थान पर अपाणिनीय 'त्रियम्बक' पद का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के अन्य अनेक प्रयोग इनके काव्य-नाटकों मे आये हैं, जिनका स्पष्ट रूप से उल्लेख हमने परिशिष्ट मे दिये गये 'कालिदास एवं अश्वघोष एक ऐतिहासिक गवेषणा' शीर्षक निबन्ध में किया है। उसे आप ध्यान से पढ़ें। जिस महाकवि ने अनेक प्राचीन व्याकरणों को अपने जीवनकाल में आत्मसात् कर सरस्वती के भण्डार को भरने का सफल प्रयल किया हो वह किसी एक व्याकरणशास्त्र के नियमों पर कैसे निर्भर रह सकता है ? भला आप ही विचारिए। वास्तव में महाकवि के इस प्रकार के प्रयोग इनके कालनिर्णय में प्राचीनता के परिपोषक हैं। आचार्य मम्मट ने कालिदाम की कृतियों को आधार मानकर अपने 'काव्यप्रकाश' मे जिन दोषों की चर्चा की है, उनका प्रतिवाद 'कालिदासीय कृतियों को निर्दोषता' नामक एक लेख इसी ग्रन्थावली के आलोचनात्मक परिशिष्ट में प्रकाशित है, उसे मनोयोगपूर्वक पढ़ें और मनन करे। मम्मट ने 'अविमृष्टविधेयाश दोष' के लिए जिस 'न्यक्कारो' इत्यादि पद्य को उद्धृत किया है, वह अपने में एक विचारणीय विषय है। क्या उक्त पद्य में सचमुच उक्त दोष है ? विवेकशील एव निर्मत्सर विद्वान् इस पर विचार करें। रचना-सम्बन्धी मतभेद—सुकृती महाकवि कालिदास की कृतियों के सम्बन्ध में विद्वानों में जो मतभेद है, तदनुसार कतिपय आलोचकों को मान्यता है कि 'ऋतुसहार' नामक खण्डकाव्य इनकी कृति नहीं है। इस मान्यता को दूर करने के लिए आप निम्नलिखित स्थलों पर दृष्टिपात करें। 'अभिज्ञानशाकुन्तल' नाटक के आरम्भ मे महाकवि ने जिस ग्रीष्म ऋतु के सन्ध्याकाल की इस प्रकार चर्चा की है- 'सुभगसलिलावगाहा पाटलससर्गिसुरभिवनवाता । प्रच्छायमुलभनिद्रा दिवसा परिणामरमणीया' ॥ (शाकुन्तल ) उसी ग्रीष्म ऋतु के वर्णन को लेकर महाकवि ने उक्त 'ऋतुसहार' का प्रारम्भ इस प्रकार किया है। दोनों पद्यों के भावसाम्य पर दृष्टिपात करें- 'प्रचण्डसूर्य स्पृहणीयचन्द्रमा सदावगाहक्षतवारिसञ्चय । दिनान्तरम्योऽभ्युपशान्तमन्मथो निदाघकालोऽयमुपागत प्रिये ॥ (ऋतु०) ४ इसके अनन्तर 'मधुरेण समापयेत्' इस सरस परम्परा का अनुसरण करते हुए महाकवि ने उक्त खण्डकाव्य की परिसमाप्ति 'वसन्त-वर्णन' द्वारा की है, जो महाकवि की भावनाओं के सर्वथा अनुरूप प्रतीत होता है। इस अन्त साक्ष्य से यह सिद्ध होता है कि 'ऋतुमहार' भी इन्हीं की कृति है, क्योंकि ये निसर्ग कवि कहे जाते हैं। मेघदूत-कुछ आधुनिक विद्वान् जिन्हें लक्षण-ग्रन्थों का ज्ञान नहीं है, वे कालिदास की कृति को 'गीतिकाव्य' मानते हैं, माना करें, हमें इस विषय में कुछ कहना नहीं है। खण्डकाव्य अथवा दूतकाव्य परम्परा में अनुपम 'मुरारेस्तृतीय पन्या का उज्ज्वल उदाहरण तथा 'निरङ्कुशा कवय ' इस सूक्ति का पूर्णरूपेण पोषक यह खण्डकाव्य विप्रलम्भ शृगार का अप्रतिम निदर्शन है। इसके अतिरिक्त भी प्रस्तुत सण्डकाव्य में भाव तथा विषय सम्बन्धी ऐसी अनेक विशेषताएं हैं जो अन्य दूतकाव्यों में सुलभ नहीं हैं। उन सबसे बढ़-चढ़कर महाकवि की यह सूझ-बूझ अत्यन्त प्रशसनीय एव मार्मिक है, जिसका अनुभव प्रत्येक विरही नर-नारी का हृदय करता है- 'वामालिख्य प्रणयकुपिता धातुरागै शिलाया- मात्मान ते चरणपतित यावदिच्छामि कर्तुम् । अप्रैस्तावन्मुहुरुपचितैदृष्टिरालुप्यते मे क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते सगम नो कृतान्त' । (उत्तरमेघ ) उक्त पद्य में महाकवि ने एक-दूसरे से बिछुड़े हुए अतएव विरहविधुर उस यक्षदम्पति का 'नो' इस एक अक्षर से वर्णन किया है, जो तन से बिछुड़ जाने पर भी मन से तथा विचारों से सर्वथा अभिन्न थे। इस प्रयोग के लिए महाकवि की जितनी भी प्रशसा को जाय वह कम ही है। 'नो' के स्थान पर उसी अर्थ का वाचक 'आवयो' पद उस अभिन्नता की अभिव्यञ्जना कदापि नहीं कर सकता, सहृदय विद्वान् इस तथ्य की ओर ध्यान दें। यह स्थल कालिदास के सूक्ष्मदर्शन, वर्णनचातुर्य एव विचार- गाम्भीर्य का स्फुट उद्घोषक है। ग्रन्थावली-परम्परा-किसी महाकवि की सभी रचनाएँ एक स्थान पर पाठकवृन्द को उपलब्ध हो सकें, इसी पवित्र सकल्प से प्रेरित हो विद्वानों ने इस परम्परा का सूत्रपात किया। तदनन्तर यह रुचिकर एव उपयोगी परम्परा देखते-देखते उभर आयी। इसे हम उस-उस कवि के सुयश की जीवातु ही कहेंगे। इसी पवित्र परम्परा का यह अन्यतम सुवासित मुनस्तबक 'कालिदास-ग्रन्थावली' भी हैं। सुप्रसिद्ध एव यशस्वी महाकवि कालिदास के ग्रन्यरलो की आवली (रलहार ) से अपने कठ तथा वक्ष स्थल की सुषमा-वृद्धि कौन सरसहृदय व्यक्ति करना नहीं चाहेगा? उक्त रलहार को पिरोना विद्वानों के लिए इसलिए अत्यन्त कठिन हो गया था कि कालिदास की कृतियों के सम्बन्ध में सुधीसमाज एकमत नहीं हो पाया था, क्योंकि समय-समय पर हुए अनेक कालिदास नामधारी विद्वान् उस सुप्रसिद्ध कविशेखर के प्राशुलभ्य सुयश को प्राप्त करने की इच्छा से कुछ-न-कुछ लिखते गये। उन सबका साहित्य परस्पर होड़ लगाता हुआ सामने आया। ऐसी विषम स्थिति में काव्यमर्मज्ञ विद्वानों ने अन्त साक्ष्यों के आधार पर जिन काव्य-नाटकों को इनकी अमर एव अनुपम कृति के रूप में सादर स्वीकार किया है, प्रस्तुत ग्रन्थावली मे उन्हीं कृतियों का मादर सग्रह किया गया है। टीकाकारों के प्रमाद–महाकवि की कृतियों पर अनेक सुकृती विद्वानों ने समय-समय पर टीकाएँ लिखीं, किन्तु 'गच्छत स्खलन क्वापि भवत्येव प्रमादत' प्रस्तुत उक्ति के अनुसार टीकाकारों से भी अनेक प्रकार के प्रमाद हुए हैं। प्रमाद होना मानव-स्वभावसुलभ धर्म है। बुद्धिगम्य न होने के कारण COLLEGLI STA (५) मूल पाठों को बदल देना तथा अर्थ का अनर्थ कर देना आदि घोर अपराध हैं। इस प्रकार के प्रमादों को यथार्थ समझकर अन्धानुकरण-सम्प्रदाय के आचार्यों ने मक्षिकास्थाने मक्षिका' की उक्ति को चरितार्य किया है। इनके इन सहज अपराधों का दण्ड जिज्ञासु एव सुकुमार बुद्धि वाले पाठकों को भुगतना न पड़े इसलिए उदाहरणार्थ कतिपय भ्रामक अर्थयुक्त स्थल यहाँ उद्धृत किये जा रहे हैं, पाठक इस ओर ध्यान दें। १ 'नूपुर' शब्द का 'बिछुआ' अर्थ करके उममे सम्बन्धित 'सिञ्जितानि' की ओर टीकाकार ने ध्यान ही नहीं दिया, भला बिछुए में 'सिंजन' गुण कैसे आ सकता है ? २ 'घोषवृद्ध' का अर्थ 'घोसीगाय' करके टोकाकार कृतार्थ हो गये, जब कि इसका अर्थ 'अहोरों के मुहल्ले में रहने वाले बूढ़े मनुष्य' होता है। ३. "हेयङ्गवीन' का अर्थ 'तुरत निकाला हुआ मक्खन' किया गया है, जब कि इसका अर्थ होता है 'कल गाय को दुहकर प्राप्त दूध को जमाकर दूसरे दिन उस दही को मयकर निकाला गया मक्खन'। ४ कुछ टीकाकारों ने अपनी टोका में 'अनिर्वाणत्य' पद का अर्थ हो छोड़ दिया है, कारण क्या था ? वे हो जानें। ५ 'विदूरभूमि' का अर्थ 'विदूरपर्वत' किया है। आप देखें विदराज्य सूत्र को व्याख्या में स्पष्ट लिखा है कि विदूरभूमि वह है, जहाँ वैदर्यरल पाये जति हाल्मोकाम' शब्द का अर्थ मल्लिनाथ आदि सभी प्रसिद्ध प्राचीन एव अर्वाचीन टोकालरों ने बबिी का अगला भागेर किया है, जो सहृदयजनसवेद्य नहीं है। इसका वास्तविक एव प्रमगोचित अर्थ आप हमारे द्वारा सम्पादित मेघदूत को टीका में यथास्थान देखें। ७ 'पाटल' का एक अर्थ अमरमिह से अपने कोश में वर्ण-विशेष का बोधक लिखा है, किन्तु 'पाटलसर्गिसुरभिवनवाता' में 'पादल' शब्द का अर्थ है-इस नाम के वृक्ष के फूलों को सुगन्ध से मुगन्धित उद्यानपवन । इस प्रकार के और भी अनेक स्थल हैं, जिनको ग्रन्थविस्तार के भय से यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है, किन्तु उन सभी को परिमार्जित- ग्रन्थावली में देखने को मिलेगा। इस प्रकार के टीकाकारों में विशेष रूप से मल्लिनाथ कृत व्याख्या के स्खलनों को दृष्टि में रखकर मेघदूत पर सुप्रसिद्ध विद्युल्लता नामक टीका के कर्ता पूर्णसरस्वती ने इस प्रकार का प्रचण्ड आक्षेप किया है। देखें- 'सुकविवचसि पाठानन्ययाकृत्य मोहाद् रमगतिमवधूय प्रौढमर्थ विबुधवरसमाजे व्याक्रियाकामुकाना गुरुकुलविमुखाना धृष्टतायै नमोऽस्तु ॥' पाठभेद-इस प्रसगोचित आक्षेप को ध्यान में रखकर पाठकों में एक निवेदन यह भी करना है कि आपके सामने कालिदास की कृतियों से सम्बन्धित अनेक प्रकार के पाठभेदों के संग्रह आयेंगे, उनमें से आपको यह विचार करना होगा कि इनमें से कौन-सा पाट कालिदाम का हो सकता है? किन्तु इस कार्य में सक्षम वे ही हो सक्ते हैं, जो सहृदय हों, काव्यरसममज्ञ हों, वैदर्भीरीति मे सुपरिचित हों तथा जिन्होंने सरमसाहित्यम्रोतस्विनी में बहुश अवगाह्न किया हो। इनके विपरीत जिनका स्मरण भर्तृहरि ने अपने नीतिशतक में 'यदा किश्चिज्जोऽह द्विप इव मदान्ध समभवम्' इस प्रकार किया है, वे कदापि कथमपि इस विवेचन के अधिकारी नहीं हो सकते। सम्पादकीय दृष्टिकोण-आचार्य प० रामतेज शास्त्रीजी अपने समय के विद्यानुरागियों में अन्यतम थे। आपके द्वारा सम्पादित एव प्रकाशित 'कालिदास-ग्रन्यावली' में १ रघुवश,२ कुमारसम्भव, ३. मेघदूत विहाय ।

तथा ४ अभिज्ञानशाकुन्तल, इन्हीं चार ग्रन्थों का ही समावेश था। शेष काव्य-नाटकों का अनुवाद कराकर सुरभारती प्रतिष्ठान ने प्रस्तुत ग्रन्थावली का नये ढग से समुवित साज-सज्जा के साथ इस बार प्रकाशन किया है। प्रस्तुत ग्रन्थावली की अधिकाधिक उपादेयता हो, इस दृष्टि से इससे सम्बन्धित जो-जो विषय अपेक्षित समझे गये उन-उन का समावेश यथामम्भव इसके परिशिष्ट भाग में कर दिया गया है। साथ ही इसके अन्त में पारिभाषिक शब्दकोष भी दे दिया गया है, जिसमें कालिदास की कृतियों में आये हुए व्यक्तियों, प्राणियों, वस्तुओं, नदियों, पर्वतों तथा भौगोलिक स्थानों के नामो का सन्दर्भ सहित उल्लेख प्रथम बार प्रस्तुत किया गया है, जिसकी शब्दमख्या प्राय एक हजार है। परिशिष्ट के अन्त में 'कालिदासकालीन भारत का मानचित्र' भी दे दिया गया है, जिसमें तत्काली। भारत के स्थानों, देशों, पर्वतों तथा नदियों के सकेत दिये गये हैं। प्रत्येक नाटक के आरम्भ में सम्बन्धित पात्र-परिचय भी दिया गया है। हमारे इस प्रयास से पाठकवृन्द को सन्तोष का अनुभव हो, यही इसकी चरितार्थता आभार---अन्त में उन सभी मनीषियों, टीकाकारों, महाकवि प० वसन्तत्र्यम्बक शेवडेजी तथा सहयोगियों के प्रति मैं सादर नतमस्तक हूँ, जिनके कारण प्रस्तुत ग्रन्यावली का सुचारु रूप से सम्पादन हो सका। इसके सम्पादन मे कालिदासीय कृतियों के विभिन्न मस्करणों के पर्यालोचन की आवश्यकता पड़ी, अत उन-उन सस्करणों के सम्पादकों का भी मैं आभारी हूँ । साथ ही अपनी विदुषी धर्मपत्नी का भी मुझे इस कार्य मे कायेन वाचा मनमा महान् सहयोग मिला, एतदर्थ मैं उनके उत्तम स्वास्थ्य एव दीर्घायुष्य की सदैव कामना करता हूँ। अपने चारों पुत्रों को शुभाशीर्वाद प्रदान करता हूँ, जिनकी तत्परता मे मुझे इसके सम्पादन में पर्याप्त सहायता मिली है। समर्पण- इस ग्रन्थावली का समर्पण भास, कालिदास तथा बिल्हण आदि के प्रतिस्पर्धी महाकवि पण्डित वसन्तत्र्यम्बक शेवडेजी को किया गया है, जिनका व्यक्तित्व एव कृतित्व आज के युग में अत्यन्त श्लाघनीय है, जो परममाहेश्वर हैं और जिनकी दृढ़ धारणा है- 'शरण तरुणेन्दुशेखर शरण मे गिरिराजकन्यका' । धन्यवाद-ज्ञापन-चौखम्बा मुरभारती के अधिकारियों ने इस ग्रन्थावली को संजोने-सँवारने में तन-मन-धन से जो तत्परता दिखलायो, उसी का मुपरिणाम है कि ग्रन्थावली का यह अभिनव स्वरूप आपके समक्ष प्रस्तुत है। आशा है यह सरस एव सहृदय पाठको के मानस को अनुरञ्जित करने में सफल होगी। भगवान् इनके उत्माहशक्ति को वृद्धि करे, जिससे ये भारतीय संस्कृत-वाङ्मय के अभ्युत्थान में सदैव इसी प्रकार प्रसरत्पद होते रहे। विनीत डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी समर्पण LI प्राच्य-पाश्चात्य उभयविध विद्याम्भोधिमन्थनसमुपलब्ध प्रज्ञारत्नप्रभाभास्वर, विविध महाकाव्यो के रचयिता अभिनव कालिदास, न्यायपञ्चानन, अप्रतिम- वैयाकरण, शेवडेकुलकमलदिवाकर श्रद्धेय पण्डित-प्रवर वसन्तत्र्यम्बक महोदय के करकमलो मे कालिदासग्रन्थावली रूपी सुवासित सुमन-स्तबक सादर समर्पित। समर्पक डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विषयानुक्रम काव्य खण्ड ३ रघुवशम् कुमारमम्भवम् मेघदूतम् ऋतुसहारम् १७५ २९९ ३२१ नाटक खण्ड अभिज्ञानशाकुन्तलम् विक्रमोर्वशीयम् मालविकाग्निमित्रम् ३४५ ४७३ ५६९ समीक्षात्मक निबन्ध महाकवि कालिदास सक्षिप्त परिचय कालिदान का पात्रचयन-वैशिष्ट्य महाकवि कालिदास को रम-योजना कालिदास की कृतियो की निर्दोषता कालिदासीय मेघदूत के उपजीव्य सन्दर्भ चिद्गगनचन्द्रिका के रचयिता कालिदाम महाकवि कालिदाम का 'स्थिरभक्तियोग' कालिदास एव अश्वघोष एक ऐतिहामिक गवेषणा विक्रम ओर के नवरत्न कालिदाम की कृतियो मे छन्द -प्रयोग महारवि कालिदाम को वृतियो पर आधारित मुभाषित ६५५ ६५८ ६६९ ६७४ ६७९ ६८२ ६८७ ६९० ६९७ ७०२ परिशिष्ट पारिभाषिक शब्दकोष श्लोकानुग्रमणिका सम्पादक-परिचय ७०६ ७४५ ७९५ प्रशस्ति-पद्य वा जायते॥ चर्विता । सूक्तय ॥ पुरा कवीना गणनाप्रमड़े कनिष्ठिकाऽधिष्ठितकालिदासा। अद्याऽपि ततुल्यकवेरभावादनामिका साऽर्थवतो बभूव ।। (सुभाषितसुधारलभाण्डागार) निर्गतासु न कस्य कालिदासस्य सूक्तिपु। प्रीतिर्मधुरसान्द्रामु मञ्जरीष्विव (बाणभट्ट हर्षचरित) अमृतेनेव ससिक्ताश्चन्दनेनेव चन्द्राशुभिरिवोद्धृष्टा कालिदासस्य (जयन्त न्यायमञ्जरी) अस्पृष्टदोषा नलिनीव हृष्टा हारावलीव ग्रथिता गुणौधै । प्रियाङ्कपालीव विमर्दहृद्या न कारिदासादपरस्य वाणी। (श्रीकृष्णकवि) माहिष दधि, सशर्कर पय , कालिदासकविता, नव वय । शारदेन्दुरबला च कोमला सम्भवन्तु मम जन्म जन्मनि ।। (उद्भट) अनभ्रवृष्टि श्रवणामृतस्य सरस्वतीविभ्रमजन्मभूमि । वैदर्भरीति कृतिनामुदेति सौभाग्यलाभप्रतिभू पदानाम् ।। (सुभाषितसुधारलभाण्डागार ) देवानामिदमामनन्ति मुनय क्रतु चाक्षुष रुद्रेणेदमुनाकृतव्यतिकरे स्वाङ्गे विभक्त त्रैगुण्योद्भवमत्र लोकचरित नानारम दृश्यते भिन्नरचेर्जनस्य बहुधाप्येक समाराधनम्॥ (सुभाषितमुधारत्नभाण्डागार) वासन्त कुसुम फलञ्च युगपद् ग्रीष्मस्य सर्वञ्च यद्- यच्चान्यन्मनसो सन्तर्पण मोहनम्। एकीभूतमभूतपूर्वमथवा स्वर्लोकभूलॊकयो- रैश्वर्य यदि वाञ्छसि प्रियमसे। शाकुन्तल मेव्यताम्।। (जर्मनकवि गेटे) कान्त द्विधा। नाट्य रसायनमत

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'राजा प्रकृतिजनात्'
रघुवंशम्

॥श्री ॥ रघुवंशम् प्रथम सर्ग वागर्थाविव सम्पृक्तो वागर्थप्रतिपत्तये। जगत पितरौ वन्दे पार्वतोपरमेश्वरी॥१॥ क सूर्यप्रभवो वश क्व चाल्पविषया मति । तितीर्घkस्तर मोहादुडुपेनास्मि सागरम्॥२॥ मन्द कवियश प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् । प्राशुलभ्ये फले लोभादुदाहुरिव वामन ॥३॥ अथवा कृतवाग्द्वारे वशेऽस्मिन्पूर्वसूरिभि । मणौ वज्रसमुत्कोर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गति ॥४॥ सोऽहमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् । आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवर्मनाम्॥५॥ यथाविधिहुताग्नीना यथाकामार्चितार्थिनाम् । यथाऽपराधदण्डाना यथाकालप्रबोधिनाम्॥६॥ त्यागाय सम्भृतार्थाना सत्याय मितभाषिणाम् । यशसे विजिगीषूणा प्रजायै गृहमेधिनाम्॥७॥ शैशवेऽभ्यस्तविद्याना यौवने विषयैषिणाम् । वार्द्धके मुनिवृत्तीना योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥८॥ जैसे वाणी और अर्थ अलग होते हुए भी एक ही कहलाते हैं, वैसे ही पार्वतीजी और शिवजी भी कहने को दो रूप हैं, परन्तु वस्तुत हैं वे एक ही। अत वाणी और अर्थ को ठीक मे समझने और उनका उचित उपयोग करने के लिए मैं ममार के माता-पिता पार्वती और शिवजी को प्रणाम करता हूँ, जो शब्द और अर्थ के ममान एकरूप हैं।॥१॥ कहाँ सूर्य से उत्पन वह तेजस्वी वश, जिसमें रघु और राम जैसे पराक्रमी राजा उत्पन हुए हैं और कहाँ स्वल्प बुद्धिवाला मैं। मुझे यह भलीभाँति ज्ञात है कि मैं रघुवश का पार नहीं पा सफ्ता, फिर भी मूर्खतावश छोटी-सी नाव द्वारा अपार समुद्र को पार करने की इच्छा कर रहा हूँ॥२॥ यद्यपि में निपट भूर्ख हूँ, परन्तु चाह यह है कि मैं बड़े-बड़े कवियों में गिना जाऊँ। यह सुनकर लोग अवश्य मेरी हँसी उड़ायगे, क्योंकि मेरी यह करनी ही ऐमी है, जैसे कोई बौना अपने नन्हें-नन्हे हाथों को उठाकर उन फलो को तोड़ना चाहे, जहाँ केवल लम्बे पुरुषों की ही पहुँच हो सकती है।।३।। तथापि मुझे बहुत बडा भरोमा यह है कि वाल्मीकि आदि प्राचीन कवियों ने मूर्यवश पर सुन्दर काव्य लिखकर वाणो का द्वार पहले ही खोल दिया है। इसलिए उम द्वार से प्रवेश कर उस वश का फिर से वर्णन करना मेरे लिए वैमा ही हो गया है, जैसे बिधे हुए मणि मे डोरा पिरोना मरल होता है ।।४॥ जिनके चरित्र आद्योपान्त पवित्र रहे, जो किमी काम को उठाते थे तो उसे पूरा करके ही छोडते थे, जिनका राज्य समुद्र के इस पार से उम पार तक फैला हुआ था और जिनके रथ पृथ्वी से सीधे स्वर्ग तक आया-जाया करते थे॥५॥ जो शास्त्रानुसार यज्ञ करते थे, जो याचकों को अभिलषित वस्तु दान देते थे, जो अपराध के अनुमार अपराधियों को दण्ड देते थे और जो अवसर देखकर जगा करते थे॥६॥ जो त्याग करने के लिए धन जुटाते थे, सत्य की रक्षा के लिए बहुत कम बोलते थे, अपना यश बढाने के लिए ही दूमरे देशों को जीतते थे और भोग-विलाम के लिए नहीं, अपितु मन्तान उत्पन्न करने के लिए विवाह करते थे॥७॥ जो बाल्यकाल में पढ़ते थे, तरुणाई मे मसार के भोगों भोगते थे, बुढापे में मुनियों के ममान जगलों मे रहकर तपस्या करते ४ 80 रघुवशे , रघूणामन्वय वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन्। तद्गुणै कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदित ॥९॥ त सन्त श्रोतुमर्हन्ति सदसद्वयक्तिहेतव । हेम्न सलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धि श्यामिकाऽपि वा।। वैवस्वतो मनु म माननीयो मनीषिणाम् । आसीन्महीक्षितामाद्य प्रणवश्छन्दसामिव ॥११॥ तदन्वये शुद्धिमति प्रसूत शुद्धिमत्तर । दिलीप इति राजेन्दुरिन्दु क्षीरनिधाविव ॥१२॥ व्यूढोरस्को वृषस्कन्ध शालनाशुर्महाभुज । आत्मकर्मक्षम देह क्षात्रो धर्म इवाश्रित ॥१३॥ सर्वातिरिक्तसारेण सर्वतेजोभिभाविना । स्थित सर्वोन्नतेनोर्वी क्रान्त्वा मेरुरिवात्मना ॥१४॥ आकारसदृशप्रज्ञ प्रज्ञया सदृशागम । आगमै सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदय ॥१५॥ भीमकान्तैनूपगुणै स बभूवोपजीविनाम् । अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णव ॥१६॥ रेखामात्रमपि क्षुण्णादामनोर्वमन परम् । न व्यतीयु प्रजास्तस्य नियन्तुमिवृत्तय ॥१७॥ प्रजानामेव भूत्यर्थ स ताभ्यो बलिमग्रहीत् । सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रस रवि ॥१८॥ थे और अन्त मे योग द्वारा शरीर छोडते थे।।८।। स्वल्प शब्दवैभव रखते हुए भी मैं मन्दमति उन प्रतापी रघुवशियों का वश-वर्णन करने को मन्नद्ध हूँ। क्योकि रघुवशियों के ये गुण जब मेरे कान में पड़े, तब इन्होंने ही मुझे यह काव्य लिखने की दिठाई करने को बढ़ावा दिया॥९॥ इस काव्य को सुनने के अधिकारी वे ही सज्जन हैं, जिन्हे भले-बुरे की परख है। क्योकि सोने का खरा या खोटापन आग मे डालने से ही जाना जा सकता है।। १० ॥ जैसे वेदों में सबसे पहले प्रणव (ॐ) आता है, वैसे ही राजाओ मे मबसे पहले मूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु हुए। उनका आदर बडे-बड़े विद्वान् भी करते थे। ११ ।। उन्हीं वैवस्वत मनु के उज्ज्वल वश में राजाओं मे चन्द्रमा के मदृश सबको सुख देने वाले तथा अत्यन्त शुद्ध चरित्रवान् राजा दिलीप ने वैसे ही जन्म लिया, जैसे क्षीरसागर मे चन्द्रमा जनमे थे।॥ १२॥ उनकी चौड़ी छाती, मॉड के सदृश ऊँचा कधा, शाल वृक्ष जैसी लवी भुजाएँ और उनका अपार तेज देखकर ऐमा लगता था कि मानो क्षत्रियों का धर्म (वीरत्व) उनके शरीर मे यह ममझकर आ टटा है कि सज्जनो की रक्षा और दुर्जनो का नाश करने का काम इम शरीर से ही पूरा हो मकेगा ॥ १३ ॥ जैसे मुमेरु पर्वत ने अपनी दृढता मे मसार के सब दृढ पदार्थो को दबा दिया है, अपनी चमक मे सब चमकीली वस्तुओ की चमक घटा दी है, अपनी ऊँचाई मे सब ऊँची वस्तुओं को दबोच दिया है और अपने फैलाव मे सारी पृथ्वी को ढक लिया है, वैसे ही राजा दिलीप ने भी अपने बल, तेज और शरीर से मबको नीचा दिखलाकर मारी पृथ्वी को अपनी मुट्ठी मे कर लिया था।॥ १४॥ उनका जैसा सुन्दर रूप था, वैसी ही उनकी प्रग्वर बुद्धि भी थी। जैसी तीखी बुद्धि थी, तदनुसार ही शीघ्रता से उन्होंने सब शास्त्र पढ डाले थे। इसलिए वे शास्त्र के अनुसार ही किसी काम में हाथ डालते थे। अतएव उन्हे वैमी ही बड़ी सफलता भी मिलती थी।। १५ ।। मगरमच्छों जैसे भयानक जल-जन्तुओ के डर से जिम तरह लोग ममुद्र में पैठने मे डरते हैं, वैसे ही राजा दिलीप मे भी उनके मेवक डरते थे। क्योकि वे न्याय मे बड़े कठोर होने के कारण किमी के माथ पक्षपात नहीं करते थे। किन्तु समुद्र के मुन्दर एव मनोहर रलों को पाने के लिए जैसे लोग समुद्र में पैठ ही जाते हैं, वैसे ही राजा दिलीप इतने दयालु, उदार और गुणी थे कि उनके मेवक उनकी कृपा पाने के लिए मदा उसका सहारा लिया करते थे।॥ १६ ॥ जैसे कुशल सारथी रथ चलाता है तो रथ के पहिए बालभर भी लोक मे बाहर नहीं जाते, वैमे ही राजा दिलीप ने इतने अच्छे ढग से प्रजा का पालन किया था कि प्रजा का कोई भा व्यक्ति मनु के बतलाये हुए नियमों से हटकर बाहर चलने का माहम नहीं कर सकता था। सभी लोग वर्णो और आश्रमों के नियमों के अनुसार अपने धर्म पर दृढ रहते थे।॥ १७॥ जैसे सूर्य अपनी किरणो मे धरती का जितना जल सोखता है, उमका हजार गुना बरसा देता है। वैसे ही राजा दिलीप भी अपनी प्रजा से जितना कर लेते थे, वह सब प्रजा की भलाई में ही खर्च कर दिया करते थे।॥ १८॥ जैसे अन्य राजाओ के पाम बडो भारी सेना प्रथम सर्ग से ५ सेना परिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम् । शास्त्रेष्वकुण्ठिता बुद्धिौर्वी धनुषि चातता ॥१९॥ तस्य सवृतमन्त्रस्य गूढाकारेगितस्य च । फलानुमेया प्रारम्भा सस्कारा प्राक्तना इव ॥२०॥ जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुर । अगृनुराददे सोऽर्थमसक्त सुखमन्वभूत् ।। २१॥ जाने मौन क्षमा शक्ती त्यागे श्लाघाविपर्यय । गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव ।। २२ ॥ अनाकृष्टस्य विषयैर्विद्याना पारदृश्वन । तस्य धर्मरतेरासोबृद्धत्व जरसा विना ॥२३॥ प्रजाना विनयाधानाद्रक्षणाद्भरणादपि । स पिता पितरस्तासा केवल जन्महेतव ॥२४॥ स्थित्यै दण्डयतो दण्डयान्परिणेतु प्रसूतये । अप्यर्थकामौ तस्यास्ता धर्म एव मनीषिण ॥२५॥ दुदोह गा स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम्। सम्पद्विनिमयेनोभो दधतुर्भुवनद्वयम् ॥२६॥ रहती है, वैसे ही राजा दिलीप के पास भी बड़ी भारी सेना थी। किन्तु वह केवल शोभा के लिए ही थी, वे उमसे कोई काम नहीं लेते थे। शास्त्रों का उन्हें बहुत अच्छा ज्ञान था और धनुष चलाने में भी अद्वितीय थे। अतएव वे अपना सब काम अपारी तीक्ष्ण बुद्धि और धनुष पर चढ़ी हुई डोरी इन दोनों से ही निकाल लेते थे॥१९॥ न तो वे अपने द्वारा विचारी हुई बात को किमी को बतलाते थे और न अपनी भावभगो से किसी को यह जताते थे कि वे क्या करने वाले हैं। जैसे इस जन्म मे किसी को सुखी या दुखी देखकर लोग यह समझ लेते हैं कि उमने पिछले जन्म मे अच्छे या बुरे कर्म किये थे, वैसे ही राजा दिलीप के मन की बात भी लोग तभी जान पाते थे, जब वह काम पूरा हो चुकता था, उमसे पहले नहीं ॥२०॥ वे निडर होकर आत्मरक्षा करते थे, बड़े धैर्य के माथ अपने धर्म का पालन करते थे, नि स्पृहभाव से धन इकट्ठा करते थे और अनासक्त भाव मे सामारिक सुखो को भोगते थे।। २१ ।। जो लोग लिख-पढ़ लेते हैं, वे अपनी विद्या का ढिंढोरा पीटते हैं। जो बलवान होते हैं, वे दूसरों को सताने में अपनी बड़ाई ममझते हैं। जो लोग दान देते हैं या किमी के लिए कुछ त्याग करते हैं तो यह चाहते हैं कि चारों ओर हमारा नाम हो। किन्तु राजा दिलीप मे ये बाते नहीं थी। वे सब कुछ जान करके भी चुप रहते थे, शत्रुओं से बदला लेने की शक्ति रहते हुए भी उन्हे क्षमा कर देते थे और दान देकर भी वे अपनी प्रशमा कराने की कामना नहीं करते थे। उनके इम लोकोत्तर व्यवहार को देखकर ऐमा लगता था कि चुप रहने, क्षमा करने और प्रशमा मे दूर भागने के गुण भी उनमे ज्ञान, शक्ति और त्याग के साथ ही माथ उपजे थे॥२२ ।। सामारिक भोगों को वे अपने पास नहीं फटकने देते थे। मारी विद्याओं को उन्होंने हृदयगम कर लिया था और वे अपना जीवन दिन-रात धर्म के कामो में ही लगाये रहते थे। छोटो अवस्था मे ही वे इतने चतुर हो गये थे कि बिना बुढापा आये ही उसकी गिनती बड़े-बूढ़ों में होने लगी थी॥२३ ।। पिता जैसे अपने पुत्रो को बुरे कामो से रोकता है, अच्छे काम करने की सीख देता है, सब प्रकार मे उनकी रक्षा करता है और उनको पाल-पोमर बड़ा करता है, वैसे ही राजा दिलीप भी अपनी प्रजा को बुरे मार्ग पर जाने से रोकते थे, अच्छा काम करने को उत्साहित करते थे, विपत्तियों में उनकी रक्षा करते थे और उनके लिए अन्न, वस्त्र, धन तथा शिक्षा का प्रवन्ध करके उनका पालन-पोषण करते थे। इस प्रकार वे ही अपनी प्रजा के मच्चे पिता थे। उनके वास्तविक पिता तो केवल जन्म देने के कारण थे॥२४॥ अपराधी को दण्ड देना राजा ना धर्म है, क्योंकि अपराधी को दण्ड दिये बिना राज्य ठहर नहीं मफता। जतएव वे अपराधियो को उचित दण्ड देते थे। वश चलाना भी मनुष्य का धर्म है। अतएव मन्तान उत्पत करके वश चलाने की इच्छा से ही उन्होने विवाह किया था, भोग-विलाम के लिए नहीं। इस प्रकार यद्यपि दण्ड और विवाह वास्तव मे अर्थशास्त्र के विषय हैं, फिर भी उम् विद्वान् राजा दिलीप के लिए वे अर्थ-काम धर्म ही थे।। २५ ॥ राजा दिलीप प्रजा से जो कर लेते थे, वह इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ मे लगा देते थे। क्योंकि उनका यह विश्वास था कि यज्ञ करने से देवता प्रमन और पुष्ट होते हैं। इससे इन्द्र भी प्रसन्न होकर ur क रघुवशे न किलानुययुस्तस्य राजानो रक्षितुर्यश । व्यावृत्ता यत्परस्वेभ्य श्रुतौ तस्करता स्थिता ॥२७॥ द्वेष्योऽपि सम्मत शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम्। त्याज्यो दुष्ट प्रियोऽप्यासीदमुलीवोरगक्षता॥ त वेधा विदधे नून महाभूतसमाधिना । तथा हि सर्वे तस्यासन्परार्थकफला गुणा ॥२९॥ स वेलावप्रवलया परिखीकृतसागराम् । अनन्यशासनामुर्वी शशासैकपुरीमिव ॥३०॥ तस्य दाक्षिण्यरूढेन नाम्ना मगधवशजा। पत्नी सुदक्षिणेत्यासीदध्वरस्येव दक्षिणा ॥३१॥ कलत्रवन्तमात्मानमवरोधे महत्यपि । तया मेने मनस्विन्या लक्ष्म्या च वसुधाधिप ॥३२॥ तस्यामात्मानुरुपायामात्मजन्मसमुत्सुक । विलम्बितफलै काल स निनाय मनोरथै ॥३३॥ सन्तानार्थाय विधये स्वभुजादवतारिता । तेन धूर्जगतो गुर्वी सचिवेषु निचिक्षिपे॥३४॥ अथाभ्यर्च्य विधातार प्रयतौ पुत्रकाम्यया । तौ दम्पती वसिष्ठस्य गुरोर्जग्मतुराश्रमम् ॥३५॥ स्निग्धगम्भीरनिर्घोषमेक स्यन्दनमाश्रितो । प्रावृषेण्य पयोवाह विद्युदैरावताविव ॥३६॥ मा भूदाश्रमपोडेति परिमेयपुर सरो । अनुभावविशेषातु सेनापरिवृताविव ॥ ३७॥ आकाश को दुहते थे और जल बरसाते थे। जिससे खेत अन्न से भर जाते थे। इस प्रकार राजा दिलीप और इन्द्र एक-दूसरे को महायता करके प्रजा का पालन करते थे॥२६॥ राजा दिलीप के सिवाय और कोई भी राजा अपनी प्रजा की रक्षा करने में इतना यश नहीं कमा मका। क्योकि सबके यहाँ कभी न कभी चोरी-डकैती हो ही जाती थी। परन्तु दिलीप का राज्य में ऐमा प्रभाव था कि चोरी का केवल नाम ही शेष रह गया था। उनके राज्य में कोई किसी का धन नहीं चुरा पाता था ॥ २७॥ जैसे रोगी यह ममझकर औषधि पी लेता है कि इससे मैं अच्छा हो जाऊँगा। वैसे ही राजा दिलीप उन बैरियों को भी अपना लेते थे, जो भले होते थे। जैसे मॉप के काटने पर लोग अपनी उँगली भी काट डालते हैं, वैसे ही राजा दिलीप अपने उन मगे-सम्बन्धियों को भी राज्य से निकाल देते थे, जो दुष्ट होते थे।॥२८॥ ब्रह्माजी ने निश्चय ही महाराज दिलोप को पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश–इन पाँचो तत्त्वों से बनाया था। क्योंकि जैसे ये तत्त्व निरन्तर सारी सृष्टि की गन्ध, रम, रूप, स्पर्श और शब्द गुणों से सेवा करते हैं, वैसे ही राजा दिलीप के मब गुणों से केवल दूसरों का ही उपकार होता था।॥२९ ।। जैसे कोई राजा किसी ऐसी नगरी पर शासन करे, जिसके चारों ओर परकोटा और खाई बनी हुई हो, वैसे ही दिलीप पूरी पृथ्वी पर एक नगरी की भाँति अकेले राज्य करते थे, जिमका परकोटा समुद्र का तट था और जिमकी खाई स्वय समुद्र था।॥३०॥ जैसे यज्ञ की पली दक्षिणा है, वैसे ही मगधवश में उत्पन्न सुदक्षिणा उनकी पत्नी थी, जो समार मे अपनी चतुरता के लिए विख्यात थी ।। ३१ ।। वैसे तो राजा दिलीप की अनेक रानियां थीं, परन्तु वे यदि अपने को स्त्रावाला समझते थे तो लक्ष्मी के समान मनस्विनी केवल अपनी पत्नी सुदक्षिणा मे ही॥३२॥ उनकी बड़ी इच्छा थी कि मेरी प्यारी पत्नी की कोख मे मेरे जैमा पुत्र उत्पन्न हो, परन्तु दिन बीतते चले जा रहे थे और मन की साध पूरी नहीं हो रही थी॥३३॥ तब उन्होंने मोचा कि सन्तान उत्पन्न करने का कोई उपाय करना ही चाहिए। तदनुसार उन्होने पृथ्वी-पालन का सारा भार अपने कधों से उतार कर मत्रियो को दे दिया।॥३४॥ राज्य की चिन्ता से मुक्त होकर पवित्र मन मे राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा ने पुत्र की इच्छा करके पहले ब्रह्माजी की पूजा की, फिर वे दोनो पति-पली वहाँ मे अपने कुलगुरु वसिष्ठजी के आश्रम की ओर चल पडे ॥ ३५ ॥ जिम रथ पर वे दोनो बैठे थे, वह मीठी-मीठी घनघनाहट करता चला जा रहा था। उस पर बैठे दोनो ऐसे लगते थे, मानो वर्षा के बादल पर ऐरावत और बिजली चढे चले जा रहे हो॥३६ ।। उम ममय उन्होंने अपने साथ अधिक सेवक नहीं लिये थे। क्योकि उन्हे ध्यान था कि बहुत भीड़-भाड साथ ले जाने से आश्रम के काम मे बाधा पडेगी, परन्तु उनका प्रताप और तेज इतना अधिक था कि जिमसे ऐसा लगता था कि मानों उनके माथ बड़ी सेना चली जा रही हो ।। ३७॥ मार्ग में साल की गोंद को ॐ प्रथम सर्ग 0 ७ सेव्यमानी सुखस्पर्श शालनिर्यासन्धिभि । पुष्परेणूत्किरैर्वातैराधूतवनराजिभि ॥३८॥ मनोभिरामा शृण्वन्तौ रथनेमिस्वनोन्मुखै ।षड्जसवादिनी केका द्विधा भिन्ना शिखण्डिभिः॥ परस्पराक्षिसादृश्यमदूरोज्झितवम॑सु। मृगद्वन्द्वेषु पश्यन्तो स्यन्दनाबद्धदृष्टिषु ॥४०॥ श्रेणीबन्धाद्वितन्वद्भिरस्तम्भा तोरणसजम् । सारसे कनिदैि क्वचिदुन्नमिताननौ ॥४१॥ पवनस्यानुकूलत्वात्प्रार्थनासिद्धिशसिन रजोभिस्तुरगोत्कीर्णरस्पृष्टालकवेष्टनौ ॥४२॥ सरसोष्वरविन्दाना वीचिविक्षोभशीतलम् । आमोदमुपजिघन्तौ स्वनि श्वासानुकारिणम्।। ग्रामेष्वात्मविसृष्टेषु यूपचिहेषु यज्वनाम्। अमोघा प्रतिगृह्णन्तावानुपदमाशिष ॥४४॥ हैयङ्गवीनमादाय घोषवृद्धानुपस्थितान् । नामधेयानि पृच्छन्तौ वन्याना मार्गशाखिनाम्॥४५॥ काऽप्यभिख्या तयोरासीद् व्रजतो शुद्धवेषयो । हिमनिर्मुक्तयोोंगे चित्राचन्द्रमसोरिव ॥ ४६ ।। ततमिपति पल्यै दर्शयन्प्रियदर्शन । अपि लवितमध्वान बुबुधे न बुधोपम ॥४७॥ स दुष्प्रापयशा प्रापदाश्रम श्रान्तवाहन । साय सयमिनस्तस्य महर्षेहिपीसख ॥४८॥ बनान्तरादुपावृत्त समित्कुशफलाहरै । पूर्वमाणमदृश्याग्निप्रत्युद्यातैस्तपस्विभि ॥४९॥ गन्ध से सुवासित फूलों के रज-पराग को उड़ाता और वा के वृक्षों को धीरे-धीरे पाता हुआ पवन उनके शरीर को सुख देता हुआ उनको सेवा करता था।॥ ३८॥ राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा ने देखा कि रथ को गडगडाहट सुनकर बहुत से मोर अपना मुंह ऊपर उठाकर दुहरे मनोहर षड्ज शब्द मुना रहे थे॥३९॥ कहीं उन्होंने देखा कि हिरणों के जोड़े मार्ग मे कुछ हटकर रथ को एस्टक देख रहे हैं। उनकी सरस चितवन देखकर राजा दिलीप ने उन्हें मुदक्षिणा के नेत्रो के समान और मुदक्षिणा ने राजा दिलीप के नेत्रों के समान समया।॥ ४०॥ जब वे ऑख उठाकर ऊपर देखते तो आकाश में उड़ते हुए मोठे बोलने वाले बगुले भी उन्हें दिखलाई पड़ जाते थे, जो एक पति मे उडते हुए ऐसे दीखते थे कि मानो खम्भे के बिना ही आकाश में बन्दनवार टॅगी हो॥४१॥ उम ममय पवन भी अनुकूल चलकर यह मकेत दे रहा था कि उनके मन को इच्छाएँ अवश्य पूरी होंगी। वह ऐमी दिशा से चल रहा था कि घोडों के खुरों से उडी हुई धूल न रानी मुदक्षिणा के बालों को और न राजा दिलीप की पगड़ी को ही छू पाती थी॥४२॥ मार्ग मे जो मरोवर पडते थे, उनमे लहर को झकोरों में जो कमलो को ठडी मुगन्ध उडती थी, उमरी गन्ध लेते हुए वे चले जा रहे थे। वह मुगन्धित पवा उनकी सॉस के ममान ही मुवासित था॥४३ ।। जो गाँव उन्होंने दान करके ब्राह्मणों को दिये थे और जिनमें स्थान-स्थान पर यज्ञ के खम्भे गड़े हुए थे, वहाँ के ब्राह्मणों ने पहले तो अर्घ्य भेंट करके उनकी पूजा की और फिर ऐसे आशीर्वाद दिये, जो कदापि निष्फल नहीं हो सकते थे॥४४॥ अहीरों के मुहल्ले के निवामी जो बडे-बूढ़े तुरत निकाला हुआ मक्वन लेकर उनको भेट करने आये थे, उनसे राजा दिलीप और रानी मार्ग मे छाया के लिए लगाये गये वृक्षों का नाम पूछते जाते थे।॥४५ ।। चैत को पूर्णिमा को जैसे चित्रा नक्षत्र के साथ सुशोभित चन्द्रमा आँखों को अत्यन्त भला लगता है, वैसे ही मार्ग में जाते हुए शुभ्रवस्त्रधारी राजा दिलीप भी रानी सुदक्षिणा के साथ बडे सुन्दर लग रहे थे।। ४६ ।। चन्द्रमा के पुत्र बुध के सदृश मुरुप राजा दिलीप मुदक्षिणा को मार्ग को विविध वस्तुएँ दिखलाते चलते थे। अतएव उन्हें कुछ पता ही नहीं चला और बडा लम्बा रास्ता तै हो गया ।। ४७ ।। सोंझ होते-होते यशस्वी राजा दिलीप सुदक्षिणा के साथ सयमी महर्षि वसिष्ठजी के आश्रम के पास जा पहुंचे। उम समय उनके घोडे भी थक चुके थे॥४८॥ वहाँ पहुँचकर वे देखते क्या हैं कि मध्याकालीन अग्निहोत्र की अदृश्य अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए बहुत से तपस्वी हाथ मे समिधा, कुश और फल लिये हुए जगलों से आश्रम को लौट रहे थे। ४९ ॥ बहुतेरे मृग आश्रम मे इधर-उधर पर्णकुटियो के द्वार रोके खडे थे, जो ऋषि-पलियो ८ । रघुवशे आकीर्णमृषिपल्लीनामुटजद्वाररोधिभि अपत्यैरिव नीवारभागधेयोचितैमूंगै ॥५०॥ सेकान्ते मुनिकन्याभिस्तत्क्षणोज्झितवृक्षकम् । विश्वासाय विहङ्गानामालवालाम्बुपायिनाम् ।। आतपात्ययसङ्क्षिप्तनीवारासु निषादिभिः । मृगैर्तितरोमन्थमुटजागनभूमिषु॥५२॥ अभ्युत्थिताग्निपिशुनैतिथीनाश्रमोन्मुखान्। पुनान पवनोद्धृतधूमैराहुतिगन्धिभि ॥५३॥ अथ यन्तारमादिश्य धुर्यान्विधामयेति स । तामवारोहयत्पली रथादवततार च॥५४॥ तस्मै सभ्या सभार्याय गोत्रे गुप्ततमेन्द्रिया । अर्हणामर्हते चक्रुर्मुनयो नयचक्षुषे ॥५५॥ विधे सायन्तनस्यान्ते स ददर्श तपोनिधिम् । अन्वासितमरुन्धत्या स्वाहयेव हविर्भुजम्।।५६ ।। तयोर्जगृहतु पादान् राजा राज्ञी च मागधी । तो गुरुर्गुरुपत्नी च प्रोत्या प्रतिननन्दतु ॥५७॥ तमातिक्रियाशान्तरथक्षोभपरिश्रमम् । पप्रच्छ कुशल राज्ये राज्याश्रममुनि मुनि ॥५८॥ अथाथर्वनिधेस्तस्य विजितारिपुर पुर । अर्थ्यामर्थपतिर्वाचमाददे वदता वर ॥५९॥ उपपन्न ननु शिव सप्तस्वङ्गेषु यस्य मे। दैवीना मानुषीणा च प्रतिहर्ता त्वमापदाम् ॥६० ॥ तव मन्त्रकृतो मन्त्रैर्दूरात्प्रशमितारिभि । प्रत्यादिश्यन्त इव मे दृष्टलक्ष्यभिद शरा ॥ ६१ ।। हविरावर्जित होतस्त्वया विधिवदग्निषु। वृष्टिर्भवति सस्यानामवग्रहविशोषिणाम् ॥ ६२॥ के बच्चों की भॉति तिन्नी के दानो को साया करते थे। ५० ।। वृक्षो की जडो में पानी दे-देकर ऋषि-कन्याएँ वहाँ मे इसलिये हट गयो थीं कि जिमसे आश्रम के पक्षी निडर होकर उन वृक्षो के थालो का जल पी सकें ।। ५१ ।। धूप मे सुसाने के लिए जो तिती का अन फैलाया हुआ था, वह दिन छिपते ही समेटकर कुटिया के जॉगन मे ढेर लगा दिया गया था। उन ऑगनों मे ही बहुत-मे हरिण सुख मे बैठे हुए जुगाली कर रहे थे।। ५२ ।। हवन-मामग्री की गध से मुगन्धित अग्निहोत्र का धुओं पवन के कारण चारों ओर फैल गया था और अब वह धुओं आश्रम की ओर आते हुए अतिथियो को भी पवित्र कर रहा था।॥ ५३॥ वहाँ पहुँचकर राजा दिलीप ने सारथी को आज्ञा दी कि 'घोड़ों दो आराम करने दो' । उसके बाद सहारा देकर पहले उन्होंने पत्नी को रथ मे उतारा और फिर स्वर उतरे।। ५४॥ यह ममाचार जब आश्रमवालों को मिला, तब वहाँ के मभासद एव मयमी मुनियो ने रक्षक, आदरणीय तथा नीतिशास्त्र के अनुमार चलने वाले मपत्नीक राजा दिलीप का मसम्मान स्वागत किया ॥५५ ।। जब सध्या की मब क्रियाएँ सम्पन्न हो चुकी, तब उन्होंने तपस्वी महामुनि वमिष्ठ को देखा। जिनके पीछे देवी अरुन्धतीजी उसी प्रकार बैठी थीं, जैसे अग्नि के पीछ स्वाहा विराजमान रहती है ।। ५६ ।। राजा दिलीप और मगध की राजकुमारी मुदक्षिणा ने उन दोनों के चरण छूकर प्रणाम किया। तब गुरु वसिष्ठ और उनकी पली अरुन्धती ने वढे प्यार से उन दोनों का आशीर्वाद आदि द्वारा अभिनन्दन रिया॥५७ ।। वसिष्ठजी ने उनका ऐमा आतिथ्य-सत्कार किया कि रथ को हवा से उन्हे जो थकावट हुई थी, मो सब दूर हो गयी। तब राज्याश्रम के मुनि दिलीप से तपोवन के मुनि ने पूछा कि आपके राज्य मे सब कुशल तो हैं ? || ५८ ॥ राजा दिलीप जिस प्रकार अपनी वीरता से शत्रुओं के नगर जीतकर धनाधीश बने थे, वैमे ही वे बातचीत करने की कला में भी बडे निपुण थे। इसलिए उन्होंने अथर्ववेद के ज्ञाता वमिष्ठजी के प्रश्न का अर्थभरी वाणी द्वारा उत्तर दिया। ५९ ॥ आपकी कृपा मे मेरे राज्य मे राजा, मनी, मित्र, राजकोश, राज्य, दुर्ग और मेना--ये मातों अग सकुशल हैं। और फिर अग्नि, जल, महामारी, अकालमृत्यु आदि दैवी विपत्तियो तथा चोर, डाकू, शत्रु आदि मानुषी आपत्तियो को दूर करने वाले आप तो हैं ही॥६०॥ क्योंकि आप मत्रो के रचयिता हैं। आपके मत्र इतने शक्तिशाली है कि मुझे अपने बाण चलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। अपने बाणो मे मैं केवल उन्हे ही बेध मफता हूँ, जो मेरे आगे आते हैं। किन्तु आपके मन तो दूर मे ही शत्रुओ को नष्ट कर देते हैं।। ६१ ॥ हे यज्ञर्ता शास्त्रीय विधि मे आप जब अग्नि ।

छ प्रथम सर्ग 2 . पुरुषायुषजोविन्यो निरातड़ा निरोतय । यन्मदीया प्रजास्तस्य हेतुस्त्वब्रह्मवर्चसम्॥६३॥ त्वयैव चिन्त्यमानस्य गुरुणा ब्रह्मयोनिना । सानुबन्धा कथ न स्यु सम्पदो मे निरापद ॥६४ ।। किन्तु वध्वा तवैतस्यामदृष्टसदृशप्रजम्। न मामति सद्वीपा रत्नसूरपि मेदिनी ॥६५॥ नून मत्त पर वश्या पिण्डविच्छेददर्शिन । न प्रकामभुज श्राद्धे स्वधासङ्ग्रहतत्परा ॥६६॥ मत्पर दुर्लभ मत्वा नूनमावर्जित मया। पय पूर्व स्वनि श्वासै कवोष्णमुपभुज्यते ॥६७॥ सोऽहमिज्याविशुद्धात्मा प्रजालोपनिमीलित.। प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोक इवाचल ॥ लोकान्तरसुख पुण्य तपोदानसमुद्भवम्। सन्तति शुद्धवश्या हि परह च शर्मणे ॥१९॥ तया हीन विधातर्मा कथ पश्यन्न दूयसे । सिक्त स्वयमिव स्नेहाद्वन्ध्यमाश्रमवृक्षकम्॥७०॥ असह्यपीड भगवन्नृणमन्त्यमवेहि मे। अरुन्तुमिवालानमनिर्वाणस्य दन्तिन ॥७१॥ तस्मान्मुच्ये यथा तात सविधातु तथाऽर्हसि । इक्ष्वाकूणा दुरापेऽर्थे त्वदधीना हि सिद्धय ॥ इति विज्ञापितो राजा ध्यानस्तिमितलोचन । क्षणमात्रमृषिस्तस्थौ सुप्तमीन इव ह्रद ॥७३॥ सोऽपश्यत्प्रणिधानेन सन्तते स्तम्भकारणम् । भावितात्मा भुवो भर्तुरथैन प्रत्यवोधयत्॥७४।। मे घी का हवन करते हैं तो आपको आहुतियों अनावृष्टि मे मूखते हुए धान के खेतों पर जल बरसाने लगती हैं।। ६२॥ यह आपके ब्रह्मतेज का ही तो बल है कि मेरी प्रजा में मब लोग कप्टरहित मौ बरस जीते हैं और किसी को बाढ़, सूखा, चूहा, टिङ्दी, तोता, राज-कलह आदि किमी प्रकार की विपत्ति का डर नहीं रहता ।। ६३ । जब माक्षात् ब्रह्माजी के पुत्र आप ही कुलगुरु होकर हमारे कल्याण की बात मोचते रहते हैं तो हमारी सम्पति निर्विघ्न क्यों न रहेगी । ।।६४॥ किन्तु हे देव । आपकी इतनी कृपा होते हुए भी जब आपको पतोहू के गर्भ मे बहुत समय बाद भी मेरे ममान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ तो ममस्त रलों को पैदा करने वाले और कई द्वीपों में फैली हुई अपने राज्य की यह पृथ्वी मुझे नहीं मोहाती ।। ६५ । अब तो ऐसा लगता है कि मेरे बाद कोई हमें पिण्ड देने वाला भी नहीं रह जायगा। इमी दुख मे हमारे पितर मेरे दिये हुए श्राद्धान को भरपेट न खाकर उमका अधिक भाग आगे के लिए सचित करने लग गये हैं। ६६ ।। तर्पण के समय जब मैं जलदान देने लगता हूँ, तब मेरे पितर यह सोचकर दुख को सॉमें लेने लगते हैं कि 'मेरे पीछे उन्हें जल भी नहीं मिलेगा' और वे उन उमॉसों से गुनगुने जल को ही पी लेते हैं। ६७ ॥ जैसे लोकालोक पर्वत एक ओर मूर्य का प्रकाश पड़ने से चमकता है और दूसरी ओर प्रकाश न पड़ने के कारण अंधियारा रहता है, उसी प्रकार सदा यज्ञ करने मे मेरा चित्त प्रसन रहता है, फिन्तु पुत्र न होने मे सदा शोकाकुल भी रहा करता है । ६८ ॥ हे देव! तपस्या तथा दान से जो पुण्य मिलता है, वह केवल परलोक में मुख देता है। किन्तु अच्छी सन्तान मेवा-शुश्रूषा करके इस लोक में तो मुख देती ही है, तर्पण और पिण्डदान आदि के द्वारा वह परलोक मे भी मुख देती है ।। ६९ ॥ हे गुरुदेव । अपने हाथों प्रेम मे सींचे हुए आश्रम के वृक्षा न लगता देखकर जैसे आपको दुःख होता है वैसे ही जब मुझ कृपापात्र को सन्तानहीन देखते हैं तो आपको दु ख क्यों नहीं होता? ॥ ७० ॥ हे भगवन् । मेरे इम अन्तिम (पैतृक) ऋण को उम प्रकार कष्टदायक समझिये, जैसे बिना स्नान किया हुआ और खूटे पर बँधा हार्थी मर्मान्तक कष्ट का अनुभव करता है।।७१।। अतएव हे प्रभो। अब कोई ऐमा उपाय कीजिये जिममे मेरे पुत्र-रल उत्पन्न हो और मैं पितृमण मे मुक्त हो जाऊँ। क्योंकि इक्ष्वाकुवशी राजाओं की मभी कठिनाइयों आपकी कृपा से मदा दूर होती आयी हैं।। ७२ ॥ राजा की इस बात को सुनकर वमिष्ठजी ने नेन बन्द करके क्षण भर के लिए ध्यान लगाया। उम समय वे उस तडाग के ममान निश्चल हो गये, जिमको सब मछलियाँ मो गयी हो ॥७३॥ वसिष्ठजी ने अपने योगबल मे ध्यान द्वारा देखा कि इस राजा की सन्तानोत्पत्ति मे स्कावट क्यो आ गयी। उसके २ का० - रघुवशे पुरा शक्रमुपस्थाय तवोत्री प्रति यास्यत । आसीत् कल्पतरुच्छायामाश्रिता सुरभि पथि।।७५॥ धर्मलोपभयाद्राज्ञीमृतुस्नातामिमा स्मरन्। प्रदक्षिणक्रियाएया तस्या त्व साधु नाचर ॥७६॥ अवजानाति मा यस्मादतस्ते न भविष्यति । मत्प्रसूतिमनाराध्य प्रजेति त्वा शशाप सा॥७७॥ स शापो न त्वया राजन्न च सारथिना श्रुत । नदत्याकाशगङ्गाया स्रोतस्युद्दामदिग्गजे ।।७८।। ईप्सित तदवज्ञानाद्विद्धि सार्गलमात्मन । प्रतिबध्नाति हि श्रेय पूज्यपूजाव्यतिक्रम ॥७९॥ हविषे दीर्घसत्रस्य सा चेदानी प्रचेतस । भुजङ्गपिहितद्वार पातालमधितिष्ठति ॥८॥ सुता तदीया सुरभे कृत्वा प्रतिनिधि शुचि ।आराधय सपत्नीक प्रीता कामदुधा हि सा॥८१॥ इति वादिन एवास्य होतुराहुतिसाधनम्। अनिन्द्या नन्दिनी नाम धेनुराववृते वनात् ॥८॥ ललाटोदयमाभुग्न पल्लवस्निग्धपाटला। बिभ्रती श्वेतरोमाङ्ग सन्ध्येव शशिन नवम् ।। ८३॥ भुव कोष्णेन कुण्डोनी मेध्येनावभृथादपि। प्रसवेनाभिवर्षन्ती वत्सालोकप्रवर्तिना ॥८४॥ रज कणे खुरोद्भूतै स्पृशद्भिर्गात्रमन्तिकात्। तीर्थाभिषेकजा शुद्धिमादधाना महीक्षित ॥८५॥ ता पुण्यदर्शना दृष्ट्वा निमित्तजस्तपोनिधि । याज्यमाशसितावन्ध्यप्रार्थन पुनरब्रवीत् ॥८६॥ बाद वे राजा को समझाने लगे।।७४॥ उन्होने कहा- हे राजन् । बहुत दिन हुए, जब एक बार तुम इन्द्र की मेवा करके स्वर्ग से पृथिवी को लौट रहे थे, तब मार्गवर्ती कल्पवृक्ष की छाया मे सुरभी (कामधेनु) बैठी हुई थी।७५ ।। तुम्हारी पली ने उस समय रजस्वला होने के बाद चौथे दिन स्नान किया था, अत तुम सोच रहे थे कि यदि इस समय उसके साथ सम्भोग न करूंगा तो गृहस्थधर्म बिगड जायगा। इस धर्मलोप के भय से तुमने कामधेनु की ओर ध्यान नहीं दिया। यह तुमने ठीक नहीं किया, क्योंकि तुम्हें चाहिए था कि उस ममय उमकी पूजा और प्रदक्षिणा करते॥७६ ।। इमी से रुष्ट होकर कामधेनु ने तुम्हें शाप दे दिया कि 'तुमने जो मेरा तिरस्कार किया है, इसका दड यही है कि जब तक तुम मेरी मन्तान की सेवा नहीं करोगे, तब तक तुम्हे पुत्र नहीं प्राप्त होगा' ॥७७॥ उस ममय बड़े-बड़े मतवाले दिग्गज आकाशगङ्गा में जलक्रीडा करते हुए चिग्घाड रहे थे और आकाशगङ्गा के प्रवाह का भी कोलाहल व्याप्त था। इसलिए उस शाप को न तो तुमने मुना और न तुम्हारा सारथी ही सुन सका ।। ७८ ॥ सो तुम्हारे पुत्र न होने का कारण उस कामधेनु का तिरस्कार ही है। क्योकि जो पुरुष अपने पूज्यो की पूजा नहीं करता, उमके शुभ कार्यो में विघ्न पडता ही है॥७९॥ किन्तु इस समय तो कामधेनु मिल नहीं सकती। क्योकि वरुणदेव पाताल में एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। उस यज्ञ में आहुति की हवि जुटाने के लिए कामधेनु भी पाताललोक गयी हुई है। उस लोक के द्वारों की बड़े-बडे विषधर सर्प रखवाली कर रहे हैं।।८०॥ इमलिए तुम उमकी पुत्रो नन्दिनी को ही उसकी प्रतिनिधि समझकर अपनी रानी के माथ शुद्ध मन से उसकी सेवा करो। यदि वह प्रसन्न हो जायगी तो तुम्हारी कामना पूर्ण कर देगी॥८१॥ वमिष्ठजी यह कह ही रहे थे कि उसके लिए घृत आदि हवनसामग्री जुटानेवाली सुन्दर नन्दिनी गाय वन से लौटकर आ पहुँची ।। ८२ ।। उम नन्दिनी की देह नवपल्लव के समान कोमल और लाल थी। उसके माथे पर सफेद बालों को टेढी रेखा बनी थी। इससे वह ऐमी दीखती थी, जैसी लाल सन्ध्या के माथे पर नया (द्वितीया का) चन्द्रमा विद्यमान हो। ८३॥ अपना बछडा देखते ही उसके कुण्ड जैसे बड़े-बड़े थनों मे गरम-गरम दूध निकलकर पृथ्वी पर टपकने लगा, जो यज्ञीय स्नान के जल से भी अधिक पुनीत था॥८४॥ नन्दिनी के आते समय उसके खुरों से उडी हुई धूल के लगने से राजा दिलीप वैसे ही पवित्र हो गये, जैसे किमी तीर्थ मे स्नान करके लौटे हो। शकुनशास्त्र के वेत्ता तपस्वी वसिष्ठजी ने जब उस गौ को देखा—जिसके दर्शन से ही पुण्य मिलता है, तब वे अपने यजमान राजा दिलीप से बोले, जो उस समय अपनी प्रार्थना सफल कराने के लिए वहाँ आये हुए थे।।८५-८६ ।।

के प्रथम सर्ग ,
अदूरवर्तिनी सिद्धि राजन्विगणयात्मन । उपस्थितेय कल्याणी नाम्नि कोर्तित एव यत्।। ८७॥
वन्यवृत्तिरिमा शश्वदात्मानुगमनेन गाम्। विद्यामभ्यसनेनेव प्रसादयितुमर्हसि ।।८८॥
प्रस्थिताया प्रतिष्ठेथा स्थिताया स्थितिमाचरे । निषण्णाया निषीदास्या पीताम्भसि पिबेरप ॥
वधूभक्तिमती चैनार्चितामातपोवनात्। प्रयता प्रातरन्वेतु साय प्रत्युव्रजेदपि ॥९०॥
इत्याप्रसादादस्यास्त्व परिचर्यापरो भव । अविघ्नमस्तु ते स्थेया पितेव धुरि पुत्रिणाम्।।९१ ।।
तथेति प्रतिजग्राह प्रीतिमान्सपरिग्रह । आदेश देशकालज्ञ शिष्य शासितुरानत ॥९२॥
अथ प्रदोषे दोषज्ञ सवेशाय विशाम्पतिम्। सूनु सूनृतवाक्सष्टुर्विससोर्जितश्रियम्॥९३॥
सत्यामपि तप सिद्धौ नियमापेक्षया मुनि । कल्पवित्कल्पयामास वन्यामेवास्य सविधाम् ॥१४॥
निर्दिष्टा कुलपतिना स पर्णशालामध्यास्य पतपरिग्रहद्वितीय ।
तच्छिष्याध्ययननिवेदितावसाना सविष्ट कुशशेयने निशा निनाय ROKS
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये वसिष्ठा-
श्रमाभिगमनो नाम प्रथम सर्ग |॥१॥
वे बोले- हे राजन् । तुम्हारा मनोरथ बहुत शीघ्र पूरा होगा। क्योंकि यह क्ल्याणमयी नन्दिनी
नाम लेते ही आ पहुंची है।। ८७॥ विद्यार्थी जैमे अभ्याम से विद्या को प्राप्त करता है, वैसे ही तुम
भी कन्द-मूल-फल खाते हुए इस गौ को सेवा करके इमो प्रमत करो॥८८ ॥ जब यह चले तब तुम
भी इसके पीछे-पीछे चलना, जब खड़ी हो जाय तब तुम भी खड़े हो जाना, जब बैठे तो तुम
बैठ जाना और जब यह पानी पीने लगे तभी तुम भी पानी पीना ।। ८९॥ तुम्हारी पत्नी सुदक्षिणा भी
नित्य प्रात काल बड़ी भक्ति से इसकी पूजा करे और जब यह वन को जाने लगे, तब वह भी तपोवन
के बाडे तक इसके पीछे-पीछे जाय और सायकाल को लौटते ममय वहीं से अगवानी करके आश्रम
लाये ॥१०॥ इस प्रकार तब तक तुम इसकी सेवा करते रहो, जब तक यह गाय प्रसन्न न हो जाय ।
ईश्वर करे, तुम्हें कोई बाधा न हो और जैसे तुम अपने पिता के योग्य पुत्र हो, वैसे ही तुम्हे भी सुयोग्य
पुत्र मिले॥९१ ॥ तब बडी नम्रतापूर्वक उन्होंने वमिष्ठजी मे कहा कि 'हम ऐसा ही करेगे'। यह कहकर
उन्होंने और उनकी पत्नी ने गुरुजी मे इस व्रत के लिए आज्ञा प्राप्त की। ९२ ॥ विद्वान्, मृदुभाषी और
ब्रह्मा
के पुत्र वसिष्ठजो ने परम तेजस्वी राजा दिलीप को रात के समय मोने की आज्ञा दो॥९३ ॥
यद्यपि वसिष्ठजी चाहते तो अपनी तपस्या के प्रभाव राजा दिलीप के योग्य राजसी भोजन और शयन
का उचित प्रबन्ध कर सकते थे, परन्तु व्रत के नियमों को जानने के कारण उन्होंने राजा के व्रत के
योग्य वन्य कन्दमूल का भोजन और चटाई का ही प्रबन्ध क्यिा ॥९४।। कुलपति वमिष्ठजी ने जो पर्णकुटी
बतलायी थी, उसी मे राजा दिलीप ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए रानी सुदक्षिणा के साथ कुशा की
चटाई पर सोये। प्रात काल वसिष्ठजी के शिष्यो ने जब वेदपाठ प्रारम्भ किया, तब उसकी ध्वनि सुनते
ही वे उठ बैठे ॥१५॥
इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में राजा दिलीप का वसिष्ठाश्रमगमन
नामक पहला सर्ग समाप्त॥१॥

द्वितीय सर्ग अथ प्रजानामधिप प्रभाते जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्याम्। वनाय पीतप्रतिबद्धवत्सा यशोधनो धेनुमृषेर्मुमोच ॥१॥ तस्या खुरन्यासपवित्रपासुमपासुलाना धुरि कीर्तनीया। मार्ग मनुष्येश्वरधर्मपत्नी श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् ॥२॥ निवर्त्य राजा दयिता दयालुस्ता सौरभेयी सुरभिर्यशोभि । पयोधरीभूतचतु समुद्रा जुगोप गोरूपधरामिवोर्वीम्॥३॥ व्रताय तेनानुचरेण धेनोन्य॑षेधि शेषोऽप्यनुयायिवर्ग । न चान्यतस्तस्य शरीररक्षा स्ववीर्यगुप्ता हि मनो प्रसूति ॥४॥ आस्वादवद्धि कवलैस्तृणाना कण्डूयनैर्दशनिवारणैश्च । अव्याहते स्वैरगतै स तस्या सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ॥५॥ स्थित स्थितामुन्वलित प्रयाता निषेदुषीमासनबन्धधीर । जलाभिलाषी जलमाददाना छायेव ता भूपतिरन्वगच्छत् ॥६॥ स न्यस्तचिह्नामपि राजलक्ष्मी तेजोविशेषानुमिता दधान । आसीदनाविष्कृतदानराजिरन्तर्मदावस्थ इव द्विपेन्द्र ॥७॥ दूसरे दिन सवेरे रानी मुदक्षिणा ने फूल-माला-चन्दन आदि मे नन्दिनी की पूजा की। तदनन्तर जब नन्दिनी के बछडे ने दूध पी लिया, तब यशस्वी राजा दिलीप ने उसे बाँध दिया और ऋषि की गाय को जगल मे चराने को ले जाने के लिए खोला ॥१॥ नन्दिनी चली तो उसके खुरो से उड़ी हुई धूल मार्ग को पवित्र करने लगी। उम मार्ग पर नन्दिनी के पीछे-पीछे चलती हुई राजा दिलीप को धर्मपत्नी और पतिव्रताओं मे सर्वश्रेष्ठ रानी सुदक्षिणा ठीक वैसी ही लगती थी, जैमे श्रुति के पीछे-पीछे स्मृति चल रही हो ॥२॥ दयालु एव यशस्वी राजा दिलीप ने आश्रम के द्वार से ही रानी सुदक्षिणा को लौटा दिया और स्वय नन्दिनी की रक्षा करने लगे। जो ऐमी लग रही थी, जैसे माक्षात् पृथ्वी ने ही गौ का रूप धारण कर लिया हो और जिसके चारों थन ही मानो पृथ्वी के चार ममुद्र हो॥३॥ कुछ दूर जाकर राजा दिलीप ने सब नौकर-चाकरों को भी लौटा दिया। क्योंकि उन्होंने तो गौ की सेवा का व्रत हो ले लिया था। रही अपने शरीर की रक्षा की बात, सो उसके लिए उन्होंने किसी सेवक की आवश्यक्ता ही नहीं समझी। क्योंकि मनु के वश मे उत्पन्न राजा अपनी रक्षा स्वय कर लेता है॥४॥ राजा दिलीप बडी लगन मे नन्दिनी की मेवा करने लगे। कभी वे स्वादिष्ट घाम के ग्राम बनाकर अपने हाथों मे सिलाते, कभी उमकी देह सुजलाते, कभी टॉम उडाते और वह जिधर भी जाना चाहती थी, उधर जाने देते थे॥५॥ जब वह खडी होती तो राजा भी खडे हो जाते और ज्यों ही वह चलने को पग बढाती, त्यों ही वे भी चल पडते थे। वह बैठती तो स्वय भी बैठ जाते और जब वह जल पीने की इच्छा करती, तब राजा भी जल पीते थे। इस प्रकार वे छाया के ममान उसके पीछे-पीछे चल रहे थे॥६॥ जैसे किमी मतवाले हाथी के माथे मे मद की धारा न बहती हो तो भी उमको देखते ही उसके तेज का अनुमान हो जाता है, ठीक यही हाल राजा दिलीप का भी था। यद्यपि उन्होंने गोमेवा-व्रत के कारण छत्र-चैवर आदि सब राजसी वेश छोड दिये थे, फिर भी उनके सुगठित शरीर और मुख के तेज को देखकर कोई भी कह सकता था कि ये मम्राट् हैं ।। ७॥ व्रती होने के कारण उनके छ द्वितीय सर्ग . लताप्रतानोद्ग्रथिते स केशरधिज्यधन्वा विचचार दावम्। रक्षापदेशान्मुनिहोमधेनोर्वन्यान्विनेष्यन्निव दुष्टसत्त्वान्॥ ८ ॥ विसृष्टपाश्र्वानुचरस्य तस्य पार्श्वद्रुमा पाशभृता समस्य। उदोरयामासुरिवोन्मदानामालोकशब्द वयसा विरावै ॥ ९ ॥ मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्सखाभ तमय॑मारादभिवर्तमानम्। अवाकिरन्बाललता प्रसूनैराचारलाजैरिव पौरकन्या ॥१०॥ धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रभावमाख्यातमन्त करणैर्विशझै । विलोकयन्त्यो वपुरापुरक्ष्णा प्रकाविस्तारफल हरिण्य ॥११॥ स कोचकारुतपूर्णरन्फ्रे कूजद्विरापादितवशकृत्यम्। शुश्राव कुजेषु यश स्वमुच्चैरुद्रीयमान वनदेवताभि ॥१२॥ पृक्तस्तुषारैििरनिराणामनोकहाकम्पितपुष्पगन्धी तमातपक्लान्तमनातपत्रमाचारपूत पवन सिवे ॥१३॥ शशाम वृष्टयाऽपि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धि । ऊन न सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन्वन गोप्तरि गाहमाने ॥१४॥ सञ्चारपूतानि दिगन्तराणि कृत्वा दिनान्ते निलयाय गन्तुम् । प्रचक्रमे पल्लवरागताम्रा प्रभा पतङ्गस्य मुनेश्च धेनु ॥१५॥ ता देवतापित्रतिथिक्रियार्थामन्वग्ययो मध्यमलोकपाल । बभौ च सा तेन सता मतेन श्रद्धेव साक्षाद्विधिनोपपन्ना ।।१६।। मिर के बालों की लटें जगल की लताओं के ममाा उलझ गयी थीं। हाथ में धनुष लेकर जब वे जगल में घूमते थे, तब उन्हें देखकर ऐमा प्रतीत होता था कि मानो नन्दिनी की रक्षा के बहाने वे जगल के दुष्ट जीवों को शान्त रहने की शिक्षा दे रहे हैं।॥८॥ आस-पाम के वृक्षों पर अगणित मतवाले पक्षी चहक रहे थे। उनके कलरव को मुनकर ऐमा लगता था कि मानो मार्ग के वृक्ष वरण जैसे तेजस्वी राजा दिलीप की जय-जयकार कर रहे हों। क्योंकि उनकी जय-जयकार करने वाला कोई भी मेवक उनके साथ नहीं था।॥९॥ जिधर-जिधर वे जाते थे, उधर-उधर की लताएँ अग्नि के ममान तेजस्वी और पूजनीय राजा दिलीप के उपर उमी प्रकार फूलों की वर्षा कर रही थी, जिस प्रकार राजा के स्वागत में नगर की कन्याएँ उनके ऊपर धान का लावा बरसाती थीं॥१०॥ राजा दिलीप के हाथो में धनुष देखकर के भी वन की हरिणियों नहीं डरी। क्योकि वे उन्हें देखते ही ममझ गयीं कि ये बड़े दयालु हैं। राजा दिलीप के सुन्दर शरीर को वे एकटक देखती रहीं। ऐमा करने मे मानो नेत्रों के बडे होने का उन्हें मच्चा फल प्राप्त हो गया॥ ११ ॥ राजा दिलीप मुन रहे थे और वा-देवियाँ वन की कुँजो में ऊँचे स्वर से उनका यश गा रही थीं। उम गीत के माथ वे बॉम भा बोमुरी बजा रहे थे, जिनके छेदों मे वायु भर जाने के कारण बडे मधुर स्वर निकल रहे थे।। १२ ।। पहाड़ी झरनों की ठडी फुहारो से लदा और मन्द-मन्द कम्पित वृक्षों के फूलों को गन्ध से मुवासित वायु उन मदाचारी राजा दिलीप की मेवा करता था, जिन्हे छत्र के बिना धूप मे कष्ट हो रहा था ॥१३॥ प्रजापालक राजा दिलीप के जगल में प्रवेश करने पर वर्षा के विना ही वन को आग ठटी हो गयी। वहाँ के पेड़ फलों और फूलों से लद गये और बड़े जीवों ने छोटे जीवो को मताना त्याग दिया॥१४॥ सॉय के समय नये पत्तों की ललाई के समान मूर्य की लाली चारों ओर फैलकर तथा मब दिशाओं को पवित्र करके विधाम करने के लिए घर को लौट रही थी। उधर लाल रग की नन्दिनी भी अपने खुरो के स्पर्श से मार्ग १४ स क रघुवशे पल्वलोत्तीर्णवराहयूथान्यावासवृक्षोन्मुखबर्हिणानि। ययौ भृगाध्यासितशावलानि श्यामायमानानि वनानि पश्यन् ॥ १७॥ आपीनभारोद्वहनप्रयत्नाद् गृष्टिगुरुत्वाद्वपुषो नरेन्द्र । उभावलञ्चक्रतुरश्चिताभ्या तपोवनावृत्तिपथ गताभ्याम् ॥ १८॥ वसिष्ठधेनोरनुयायिन तमावर्तमान वनिता वनान्तात्। पपो निमेषालसपक्ष्मपक्तिरुपोषिताभ्यामिव लोचनाभ्याम् ॥१९॥ पुरस्कृता वमनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपल्या। तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या ॥२०॥ प्रदक्षिणीकृत्य पस्विनी ता सुदक्षिणा साक्षतपात्रहस्ता। प्रणम्य चानचं विशालमस्या शृङ्गान्तर द्वारमिवासिद्धे ॥२१॥ वत्सोत्सुकापि स्तिमिता सपर्या प्रत्यग्रहीत् सेति ननन्दतुस्तौ। भक्त्योपपन्नेषु हि तद्विधाना प्रसादचिहानि पुर फलानि ॥२२॥ गुरो सदारस्य निपीड्य पादौ समाप्य साध्य च विधि दिलीप । दोहावसाने पुनरेव दोग्ध्रीं भेजे भुजोच्छिन्नरिपुर्निषण्णाम् ॥२३॥ तामन्तिकन्यस्तबलिप्रदीपामन्वास्य गोप्ता गृहिणीसहाय । क्रमेण सुप्तामनु सविवेश सुप्तोत्यिता प्रातरनूदतिष्ठत् ॥ २४ ॥ को पवित्र करती हुई तपोवन की ओर लौट पडी।। १५ ।। पृथ्वी का पालन करने वाले राजा दिलीप भी वसिष्ठ ऋषि के यज्ञ, श्राद्ध एव अतिथि-पूजा आदि धर्म के कामों के लिए दूध देनेवाली उस नन्दिनी के पीछे-पीछे चल रहे थे। उस ममय वह गाय ऐमी मुन्दर लग रही थी, जैसे ब्रह्मा की पुत्री श्रद्धा के माथ मदाचार शोभित हो रहा हो॥१६॥ राजा दिलीप यह देखते हुए चल रहे थे कि कहीं छोटे-छोटे तालाबों में सूअरों के झुड निकल रहे हैं, कहीं मोर अपने बसेरों की ओर उडे जा रहे हैं, कहीं हरिण थककर हरी घासों पर बैठे हुए हैं और साँझ होने के कारण धीरे-धीरे वन की मब धरती धुंधली होती जा रही है।। १७॥ उस समय नन्दिनी और दिलीप दोनों धीरे-धीरे चल रहे थे। नन्दिनी अपने थन के बोझ से धीरे-धीरे चलती थी और राजा दिलीप भारी शरीर होने के कारण धीरे-धीरे चलते थे। इस प्रकार अपने मन्द-मन्द गमन से वे दोनों उम मार्ग को अलकृत कर रहे थे॥१८॥ राजा दिलीप जब सायकाल के समय नन्दिनी के पीछे-पीछे लौटे, तब सुदक्षिणा अपलक नेत्रों से उन्हें इस प्रकार देखती रही, मानो उसकी आँखे बहुत दिनों से राजा दिलीप के रूप की प्यासी रही हो। १९ । अब आश्रम के मार्ग मे गाय के पीछे राजा दिलीप थे और आगे अगवानी के लिए रानी सुदक्षिणा खडी थीं। इन दोनों के बीच मे वह लाल रग की नन्दिनी ऐमी शोभा दे रही थी, जैसे दिन और रात के वीच में सॉझ को लाली खडी हो॥२०॥ पहले सुदक्षिणा ने हाथ मे अक्षत-चन्दन आदि सामग्री लेकर नन्दिनी की पूजा और प्रदक्षिणा की। फिर प्रणाम करके उसके मांगों के बीच में चन्दन-अक्षत लगाया। मानो वे सींग नहीं, अपितु पुत्रकामना पूरी करने के द्वार थे॥२१॥ यद्यपि नन्दिनी उम समय अपना बछडा देखने को बहुत उतावली थी, फिर भी वह रानी से पूजा पाने के लिए खड़ी हो गयी। नन्दिनी का यह प्रेम देखकर वे दोनों बहुत प्रसन्न हुए। क्योकि नन्दिनी के ममान मनोरथ पूर्ण करने वाले देवता यदि भक्त पर प्रमन्न हो जाये तो काम पूरा हो गया ही समझना चाहिए।।२२।। अपने हाथों शत्रुओं के सहारक राजा दिलीप ने गाय की पूजा हो जाने पर पहले वसिष्ठ और अरुन्धतीजी के चरणों की वन्दना की और फिर अपने सायकालीन नित्य कर्मो को ममाप्त किया। जब नन्दिनी का दूध दुह लिया द्वितीय सर्ग 2 १५ कर इत्य व्रत धारयत प्रजार्थ सम महिष्या महनीयकोर्ते । सप्त व्यतीयुस्त्रिगुणानि तस्य दिनानि दीनोद्धरणोचितस्य ॥२५॥ अन्येदुरात्मानुचरस्य भाव जिज्ञासमाना मुनिहोमधेनु । गङ्गाप्रपातान्तविरूढशष्प गौरीगुरोर्गद्वरमाविवेश ।। २६॥ सा दुष्प्रधर्षा मनसापि हिसैरित्यद्रिशोभाहितेक्षणेन । अलक्षिताभ्युत्पतनो नृपेण प्रसह्य सिह किल ता चकर्ष ॥२७॥ तदीयमाक्रन्दितमार्तसाधोर्गुहानिबद्धप्रतिशब्ददीर्घम् रश्मिष्विवादाय नगेन्द्रसक्ता निवर्तयामास नृपस्य दृष्टिम्॥२८॥ स पाटलाया गवि तस्थिवास धनुर्धर केसरिण ददर्श। अधित्यकायामिव धातुमय्या लोध्रद्रुम सानुमत प्रफुल्लम्॥२९॥ ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शर शरण्य । जाताभिषङ्गो नृपतिर्निषङ्गादुद्धर्तुमैच्छत्प्रसभोद्धृतारि ॥३०॥ वामेतरस्तस्य प्रहर्तुर्नखप्रभाभूषितकङ्कपत्रे। सक्ताङ्गुलि सायकपुस एव चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे॥३१॥ बाहुप्रतिष्टम्भविवृद्धमन्युरभ्यर्णमागस्कृतमस्पृद्धि राजा स्वतेजोभिरदातान्तर्भोगीव मन्त्रीपधिरुद्धवीर्य ॥३२॥ गया और वह बैठ गयी, तब राजा दिलीप फिर उमको मेवा करने लगे।। २३ । इस प्रकार प्रजापालक राजा दिलीप पूजादीप सामने रखकर अपनी पत्नी के माय बहुत देर तक न्दिनी की मेवा करते रहे। जब वह मो गयो, तब वे दोनों भी मोने चले गये और ज्यों ही वह सोकर उठी, त्यो हो ये दोनों भी उठ गये ॥२४॥ इस प्रकार अपनी पत्नी के साथ सन्तान-प्राप्ति के लिए वह कठोर व्रत पालन करते हुए दोनों के रक्षक तथा असाधारण यशस्वी राजा दिलीप के इक्कीम दिन बीत गये ।। २५ ।। राजा दिलीप जब बाईमवे दिन उमे वन में ले गये, तब नन्दिनी अपने मेवक राजा दिलीप को परीक्षा के लिए गौरी के पति हिमालय की उम गुफा मे धुम गयी, जिसमें गगाजी की धारा गिर रही थी और जिसके तट पर घनी हरी-हरी घाम उगी हुई थी। २६ ।। महाराजा दिलीप ने भी उमे उधर जाने से नहीं रोका। क्योंकि उन्हे यह विश्वास था कि कोई भी हिमक जन्तु नन्दिनी पर आक्रमण करने की बात भी नहीं सोच सकता। इतने में ही अचानक एक मिह गाय को दबोच बैठा। उस समय राजा दिलीप पर्वत की शोभा देख रहे थे। इसलिए उन्हें यह दिखलाई नहीं पटा कि उम पर सिह ने कब आक्रमण किया ॥२७ ।। उस मिह के आक्रमण से नन्दिनी चिल्लाने लगी और उसकी ध्वनि गुफा मे गूंज उठी। राजा दिलीप की दृष्टि उम समय पर्वत की शोभा निहारने मे उलझी थी, परन्तु इम चीत्कार ने उनकी दृष्टि को उसी प्रकार खींच लिया जैसे किसी ने रस्सी मे बाँधकर उन्हे खींचा हो ॥ २८ ॥ धनुषधारी राजा दिलीप ने देखा कि उस लाल गाय पर बैठा हुआ मिह ऐमा लग रहा है कि जैसे गेरू के पहाडी को ढाल पर बहुतेरे पीले फूलोंवाला लोध का पेड फूला हुआ हो॥ २९ ॥ उम समय मिह के ममान चलनेवाले, शरणागतरक्षक और बलपूर्वक शत्रुओं का सहार करने वाले राजा दिलीप ने समझा कि यह सिह गाय को मारकर मेरा अपमान करना चाहता है। बम, तुरन्त उन्होंने उस मिह को मारने लिए तूणीर मे बाण निकालने को हाथ बढ़ाया ॥ ३० ॥ ज्यो ही राजा दिलीप उम मिह को मारने जा रहे थे उमो समय उनके दाहिने हाथ की उंगलियों नसों से चमकनेवाले बाणों के पसों मे चिपक गई। उन्हें देखकर ऐसा लगा कि जैसे उनके बाण निकालने का प्रयत्न करने का किमी ने चित्र ले लिया ह रघुवर तमार्यगृह्य निगृहीतधेनुर्मनुष्यवाचा मनुवशकेतुम् । विस्मापन्विस्मितमात्मवृत्तौ सिहोरुसत्व निजगाद सिह ॥३३॥ अल महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् । न पादपोन्मूलनक्तिरह शिलोच्चये मूर्च्छति मारुतस्य ॥ ३४॥ कैलासगौर वृषमारुरुक्षो पादार्पणानुग्रहपूतपृष्ठम्। अधेहि मा किङ्करमष्टमूर्ते कुम्भोदर नाम निकुम्भमित्रम् ॥ ३५ ॥ अग्मु पुर पश्यसि देवदारु पुत्रीकृतोऽसौ वृषभध्वजेन । यो हेमकुम्भस्तननि सृताना स्कन्दस्य मातु पयसा रसज ॥३६॥ कण्डूयमानेन कट कदाचिद्वन्यद्विपेनोन्मथिता त्वमस्य । अथैनमद्रेस्तनया शुशोच सेनान्यमालीढमिवासुरास्नै ॥३७॥ तदाप्रभृत्येव वनदिपाना त्रासार्थमस्मिन्नहमद्रिकुक्षौ । व्यापारित शूलभृता विधाय सिहत्वमशागतसत्त्ववृत्ति ॥ ३८॥ तस्यालमेषा क्षुधितस्य तृप्त्यै प्रदिष्टकाला परमेश्वरेण । उपस्थिता शोणितपारणा मे सुरद्विषश्चान्द्रमसी सुधेव ॥ ३९ ॥ सत्व निवर्तस्व विहाय लज्जा गुरोर्भवान्दर्शितशिष्यभक्ति । शस्त्रेण रक्ष्य यदशक्यरक्ष न तद्यश शस्त्रभृता क्षिणोति ॥ ४०॥ हो ।। ३१ ।। इस तरह हाय बँध जाने से पास ही खड़े अपराधी पर प्रहार न कर सकने के कारण राजा दिलीप तमतमा उठे और अपने तेज से भीतर ही भीतर वैमे जलने लगे, जैसे मन्त्र और औषधि से बँधा हुआ मॉप लाचार हो गया हो।। ३२ ॥ मज्जनों के आदरणीय, मनुवश के पताका स्वरूप और मिह के समान पराक्रमी राजा दिलीप बड़े विस्मय मे पड़े थे और जब वह मिह मनुष्य की वाणी में बोलने लगा, तब तो उनके आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रह गया ॥ ३३ ॥ सिह कहा- हे राजन् । तुम मुझे मारने का प्रयास मत करो। तुम मुझ पर जो भी अस्त्र चलाओगे, वह व्यर्थ हो जायगा। क्योंकि वायु का जो वेग वृक्षो को जड से उखाड़ देने की शक्ति रखता है, वह पर्वत का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाता ।।३४।। मैं कोई माधारण मिह नहीं हूँ। मैं अष्टमूर्ति शारजी का कृपापात्र और उनका सेवक कुम्भोदर नामक गण और शिवजी के शक्तिशाली गण निकुम्भ का मित्र हूँ। शकरजी जब कैलास पर्वत के समान अपने उजले नन्दी पर चढते हैं, तब वे पहले अपने चरणों को रसफर मेरी पीठ पवित्र करते हैं ।। ३५ ।। यह जो तुम्हारे मामने बड़ा-सा देवदारु का पेड दिख रहा है, इसे शारजी अपने पुत्र के समान मानते हैं। क्योंकि स्वय पार्वतीजी ने अपने सोने के घडे जैसे स्तनों के दूध मे सोच-सींचकर इसे पाला है ।। ३६ ।। एक बार एक जगली हाथी इसके तने में रगड़-रगट अपनी कनपटी खुजलाने लगा। उमसे इमको तनिक-सी छाल छिल गयी। इतने से ही पार्वतीजी को उतना ही शोक हुआ, जितना दैत्यों के बाणों से घायल कार्तिकेय को देखकर हुआ था ॥ ३७॥ तभी से शकरजी ने जगली हाथियो को डराने के लिए मुझे यहाँ पहाड की इस कन्दरा मे सिह के रूप मे रखवाला बनाकर बैठा दिया है और मेरा पेट भरने के लिए आज्ञा दे दी है कि यहाँ जो जीव आये, उमे तुम मारकर खा लिया करो ॥ ३८ ॥ चन्द्रमा का अमृत जैसे राहु को मिलता है, वैसे ही शिवजी की कृपा से ठीक भोजन के समय पर मुझे अपना रक्त पिलाने के लिए यह गाय आ गयी है, जो मेरे आज के भोजन के लिए पर्याप्त है।॥ ३९ ॥ अतएव अब तुम लाज छोडकर अपने घर लौट जाओ। तुमने अपनी गुरुभक्ति तो दिखला ही दी, किन्तु जब शस्त्र से किमी वस्तु की रक्षा हो ही न सके तो इसमे शस्त्र धारण करने वाले का क्या दोष ? इससे उस शस्त्रधारी द्वितीय सर्ग र १७ इति प्रगल्भ पुरुषाधिराजो मृगाधिराजस्य वचो निशम्य । प्रत्याहतास्त्री गिरिशप्रभावादात्मन्यवज्ञा शिथिलोचकार ॥४१॥ प्रत्यब्रवीच्चैनमिषुप्रयोगे तत्पूर्वभङ्गे वितथप्रयत्न । जडीकृतस्त्र्यम्बकवीक्षणेन वज्र मुमुक्षन्निव वज्रपाणि ॥४२॥ सरुद्धचेष्टस्य मृगेन्द्र ! काम हास्य वचस्तद्यदह विवक्षु । अन्तर्गत प्राणभृता हि वेद सर्व भवान्भावमतोऽभिधास्ये॥४३॥ मान्य स मे स्थावरजङ्गमाना सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतु । गुरोरपीद धनमाहिताग्नेर्नश्यत्पुरस्तादनुपेक्षणीयम्॥४४॥ स त्व मदीयेन शरीरवृत्ति देहेन निवर्तयितु प्रसीद । दिनावसानोत्सुकबालवत्सा विसृज्यता धेनुरिय महर्षे ॥४५॥ अथान्धकार गिरिगहराणा दष्ट्रामयूखै शकलानि कुर्वन् । भूय स भूतेश्वरपार्श्ववर्ती किञ्चिद्विहस्यार्थपति वभाषे॥ ४६॥ एकातपत्र जगत प्रभुत्व नव वय कान्तमिद वपुश्च । अल्पस्य हेतोर्बहु हातुमिच्छन्विचारमूढ प्रतिभासि मे त्वम्॥ ४७।। भूतानुकम्पा तव चेदिय गौरेका भवेत्स्वस्तिमती त्वदन्ते। जीवन्पुन शश्वदुपप्लवेभ्य प्रजा प्रजानाथ पितेव पासि ॥४८॥ अथैकधेनोरपराधचण्डाद् गुरो कृशानुप्रतिमाद्विभेषि। शक्योऽस्य मन्युर्भवता विनेतु गा कोटिश स्पर्शयता घटोनी ॥४९॥ की अकीर्ति नहीं होतो॥४०॥ मिह की ऐसी ढिठाई भरी बाते सुनकर जब राजा दिलीप को यह विश्वास हो गया कि 'शकरजी के प्रभाव से ही मैं अस्त्र नहीं चला मका' तब उनकी आत्मग्लानि कुछ कम हो गयो।। ४१ । एक समय इन्द्र ने शिवजी पर वज्र तान दिया था। तब शिवजी ने उनकी ओर केवल देख भर दिया। बस, इतने ही से जैसे इन्द्र को काठ मार गया। आज वही दशा दिलीप की भी हुई। बाण चलाने में असमर्थ एव हाथबॅधे राजा दिलीप ने मिह मे कहा-॥४२॥ हे सिह । हाथ बँध जाने के कारण मैं कुछ नहीं कर सकता। इसलिए जो कुछ भी मैं कहूँगा उसकी सिल्ली हो उडायो जायगी। फिर भी तुम मबके मन की बात जानते हो, इसीलिए मैं तुममे कहता हूँ॥४३॥ जड-चेतन सभी प्राणियों के जन्मदाता, पालक, पोषक और सहारक शिवजी का मैं मम्मान करता हूँ, तथापि में अपने अग्निहोत्री गुरु के इस गौरूपी धन को अपनी आँखों के आगे नष्ट होते नहीं देख सकता ।।४४ । अतएव तुम मुझे ही खाकर अपनी भूख मिटा लो और महर्षि धमिष्ठ की इस गाय को छोड दो। क्योंकि इसका नन्हा-सा बछड़ा सॉझ के समय इमकी राह देख रहा होगा ॥४५॥ यह मुनकर शिवजी का मेवक सिह गुफा के अँधेरे में अपने दाँत की चमक से उजाला करता हुआ तनिक हँसकर राजा मे बोला--॥४६॥ हे राजन् । ऐसा लगता है कि तुममें यह सोचने की शक्ति भी नहीं रह गयो है कि तुम्हे क्या करना चाहिए। क्योंकि एक माधारण गाय के पीछे तुम इतना बटा एकछत्र राज्य, यौवन और ऐमा मुन्दर शरीर छोड़ने को उद्यत हो गये हो।। ४७ ।। प्राणियों पर दया करने के विचार मे ही यदि तुम ऐसा कर रहे हो तो भी देह-त्याग उचित नहीं है। क्योकि यदि तुम मेरे भोजन बन जाते हो तो केवल एक गाय को ही रक्षा होगी, परन्तु यदि जीते रहोगे तो पिता के समान तुम अपनी मारी प्रजा की रक्षा कर सकोगे॥४८॥ यदि एकमात्र इस गाय के स्वामी और अगि के ममान तेजस्वी अपने गुरुजी से डरते हो तो घड़े जैसे बड़े-बड़े थनोंवाली करोड़ों गायें देकर तुम उन्हे राजी कर सकते हो।।४९ ।। अभी तुम्हारे खेलने-खाने ३ का० । १८ के रघुवशे को तद्रक्ष कल्याणपरम्पराणा भोक्तारमूर्जस्वलमात्मदेहम्। महीतलस्पर्शनमात्रभिन्नमृद्ध हि राज्य पदमैन्द्रमाहु ॥५०॥ एतावदुक्त्वा विरते मृगेन्द्रे प्रतिस्वनेनास्य गुहागतेन। शिलोच्चयोऽपि क्षितिपालमुच्चै प्रोत्या तमेवार्थमभाषतेव ॥५१॥ निशम्य देवानुचरस्य वाच मनुष्यदेव पुनरप्युवाच । धेन्वा तदध्यासितकातराक्ष्या निरीक्ष्यमाण सुतरा दयालु ॥५२॥ क्षतात्किल त्रायत इत्युदन क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढ । राज्येन कि तद्विपरोतवृत्ते प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ॥५३॥ कथ न शक्योऽनुनयो महर्विश्राणनाचान्यपयस्विनीनाम्। इमामनूना सुरभेरवेहि रुद्रौजसा तु प्रहृत त्वयाऽस्याम्॥५४॥ सेय स्वदेहार्पणनिष्क्रयेण न्याय्या मया मोचयितु भवत्त । न पारणा स्याहिहता तवैव भवेदलुप्तश्च मुने क्रियार्थ ॥५५॥ भवानपीद परवानवैति महान्हि यलस्तव देवदारौ। स्थातु नियोक्तुर्न हि शक्यमग्ने विनाश्य रक्ष्य स्वयमक्षतेन ॥५६ ।। किमप्यहिस्यस्तव चेन्मतोऽह यश शरीरे भव मे दयालु । एकान्तविध्वसिषु मद्विधाना पिण्डेष्वनास्था रुनु भौतिकेषु ।। ५७ ।। सम्बन्धमाभाषणपूर्वमाहुर्वृत्त स नो सङ्गतयोर्वनान्ते। तद्भूतनाथानुग नासि त्व सम्बन्धिनो मे प्रणय विहन्तुम् ॥५८॥ के दिन है। अत तुम अपने इस बलवान् शरीर की रक्षा करो। क्योकि विद्वानों का कथन है कि सुख और समृद्धि से सम्पन्न राज्य पृथ्वी पर ही स्वर्ग बन जाता है। उम स्वर्ग मे इस स्वर्ग मे अन्तर इतना ही है कि यह भूमि का और वह देवलोक का स्वर्ग होता है ।।५०॥ राजा दिलीप से इतना कहकर सिह जब चुप हो गया, तब पर्वत की कन्दरा से भी उमको प्रतिध्वनि सुनायी पडी। इमसे ऐमा लगा कि जैसे उस पर्वत ने भी प्रसन्न होकर मिह की ही बातों को दुहरा दिया हो।।५१ । उधर राजा ने सिह की बाते सुनी और इधर देखा कि मिह के नीचे दबी हुई गाय कातर नेत्रों से निहार रही है। इससे अत्यन्त दयालु राजा दिलीप का जी भर आया और वे बोले ॥५२॥ हे सिह । क्षत्रिय शब्द का अर्थ ही यह होता है कि दूसरों को नष्ट होने से बचाया जाय। यदि मैंने यह नहीं किया तो मेरा राज्य करना और अपयश लेकर जीते रहना हो किस काम का होगा।॥५३ ।। तुम कहते हो कि इसके बदले दूसरी गायें देकर मैं महर्षि वसिष्ठजी को राजी कर लूं, ऐमा नहीं हो सकता। तुम इस गाय को नहीं पहचानते। यह कामधेनु से किसी प्रकार कम नहीं है। आज शकरजी के प्रभाव हो तुमने इस पर आक्रमण किया है, नहीं तो तुम इमकी ओर देख भी नहीं सकते थे।।५४॥ अतएव मुझे अपना शरीर खो करके भी इमे छुड़ाना चाहिए। क्योकि ऐसा करने से तुम्हारी भूख भी मिट जायगी और गाय के न रहने मे वसिष्ठजी की जो यज्ञ-क्रियाएँ स्क जाती, वे भी न रुकेगी॥५५॥ देखो, तुम भी दूसरे के सेवक हो और बडी लगन से इस देवदारु को रक्षा कर रहे हो। तुम यह तो जानते ही हो कि जिसकी रक्षा का भार सेवक पर रहता है, यदि वह नष्ट हो जाय और मेवक के शरीर पर ऑच भी न आये तो वह अपने स्वामी के आगे कैसे जायगा ? ॥५६॥ किमी कारण यदि तुम मेरे ऊपर दया करना चाहते हो तो मेरे यश शरीर की रक्षा करो। क्योंकि मेरे जैसे लोग पञ्चतत्त्व से बने नश्वर शरीर पर तनिक भी मोह नहीं करते॥५७ ।। देखो, बातचीत से ही मित्रता प्रारम्भ होती है। सो इस जगल में बातचीत - ॐ द्वितीय सर्ग तथेति गामुक्तवते दिलीप सद्य प्रतिष्टम्भविमुक्तवाहु । स न्यस्तशस्त्रो हरये स्वदेहमुपानयत्पिण्डमिवामिषस्य ॥५९॥ तस्मिन्क्षणे पालयितु प्रजानामुत्पश्यत सिहनिपानमुग्रम्। अवाड्मुखस्योपरि पुष्पवृष्टि पपात विद्याधरहस्तमुक्ता॥ ६०॥ उत्तिष्ठ वत्सेत्यमृतायमान वचो निशम्योत्थितमुत्थित सन्। ददर्श राजा जननोमिव स्वा गामग्रत प्रसविणी न सिहम्॥६॥ त विस्मित धेनुरुवाच साधो माया मयोद्भाव्य परीक्षितोऽसि। ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोऽपि प्रभु प्रहर्तु किमुतान्याहस्रा ॥६२ ॥ भक्तया गुरौ मय्यनुकम्पया च प्रोताऽस्मि ते पुत्र वर वृणीष्व । न केवलाना पयसा प्रसूतिमवेहि मा कामदुधा प्रसन्नाम्॥६३ ॥ तत समानीय स मानितार्थी हस्ती स्वहस्तार्जितवीरशब्द । वशस्य कर्तारमनन्तकोर्ति सुदक्षिणाया तनय ययाचे ॥ ६४॥ सन्तानकामाय तथेति काम राजे प्रतिश्रुत्य पर्यास्वनी सा। दुग्ध्वा पय पत्रपुटे मदीय पुत्रोपभुक्ष्वेति तमादिदेश ॥६५॥ वत्सस्य होमाविधेश्च शेषमृषेरनुज्ञामधिगम्य मात । औधस्यमिच्छामि तवोपभोक्तु पठाशमुर्त्या इव रक्षिताया ॥६६॥ इत्य क्षितीशेन वसिष्ठधेनुर्विज्ञापिता प्रोततरा बभूव । तदन्विता हेमवताच कुक्षे प्रत्याययावाश्रममश्रमेण ।। ६७॥ चलाने के नाते अब हम दोनों मित्र हो गये हैं। अतएव हे शिव के मेवक । अपने इस नये मित्र की प्रार्थना न ठुकराना ॥ ५८ ।। मिह ने कहा—अच्छी बात है। उसके ऐमा कहते ही तत्काल दिलीप का हाथ खुल गया और अपने अस्त्र फेंकर उन्होंने मासपिंड के ममाअपो शरीर को मिह के सामने सौंप दिया॥५९।। नीचा मुँह करके राजा दिलीप जब मिह के भीषण आक्रमण की प्रतीक्षा कर रहे थे उसी समय प्रजापालक राजा दिलीप के ऊपर आकाश मे विद्याधरों के हाथों मे फूलों की वर्षा होने लगी।। ६० ।। उसी समय उन्हे अमृत के ममान ये मीठे वचन सुनागरी दिये- 'उठो बेटा। उठो। राजा दिलीप ने मिर उठाया तो देखते क्या हैं कि दूध चुआती हुई माता के समान नन्दिनी आगे खड़ी है और सिह न जाने कहाँ चला गया है।६१॥ राजा दिलीप विस्मयभरे नयनों में यह सब देख रहे थे। तभी नन्दिनी मनुष्य की वाणी में बोली-हे माधो । मैंने माया रचकर तुम्हारी परीक्षा ली थी। वसिष्ठ ऋषि के प्रभाव से यमराज भी मुझ पर प्रहार नहीं कर सकते, फिर अन्य हिंमक जीवों को तो बात ही क्या है।। ६२ ।। हे पुत्र तुमने जो अपने गुरु में भक्ति और मुझ पर दया दिसलायो है, उससे मैं बहुत प्रमन्न हूँ! अब जो चाहो, मो वर मॉग लो। तुम मुझे केवल दूध देने वाली साधारण गाय मत समझना। मै यदि प्रमन हो जाऊँ तो मुझसे जो मांगा जाय, वह वर दे सकती हूँ।। ६३ ।। तब याचकों को मनचाहा दान देनेवाले और अपने पराक्रम से वीर कहलाने वाले राजा दिलीप ने हाथ जोड़कर यह वर माँगा कि 'मेरी प्यारी रानी मुदक्षिणा के गर्भ से ऐमा यशस्वी पुत्र उत्पन्न हो, जिममे सूर्यवश बराबर बढ़ता जाय' ।। ६४॥ सन्तान चाहनेवाले राजा दिलीप से नन्दिनी ने प्रतिज्ञा की कि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगी और आज्ञा दी कि 'पुत्र तुम एक दोने में मेरा दूध दुहकर पी लो' ॥६५॥ राजा ने कहा--माता मेरी यह इच्छा है कि बछड़े के पी लेने और हवन से बचने पर ऋषि की आज्ञानुमार मैं उसी प्रकार आपका दूध ग्रहण करूंगा, जैसे राज्य की रक्षा करके उसका षष्ठाश ग्रहण किया करता हूँ॥६६॥ राजा २० • रघुवशेछ तस्या प्रसन्नेन्दुमुख प्रसाद गुरुनृपाणा गुरवे निवेद्य। प्रहर्षचिहानुमित प्रियायै शशस वाचा पुनरुक्तयेव ॥ ८॥ स नन्दिनीस्तन्यमनिन्दितात्मा सद्वत्सलो वत्सहुतावशेषम् । पपो वसिष्ठेन कृताभ्यनुज्ञ शुभ्र यशो भूमिवातितृष्ण ॥ ६९ ॥ प्रातर्यथोक्तवतपारणान्ते प्रास्थानिक स्वस्त्ययन प्रयुज्य । तौ दम्पती स्वाप्रति राजधानी प्रस्थापयामास वशी वसिष्ठ ॥७॥ प्रदक्षिणीकृत्य हुत हुताशमनन्तर भर्तुररुन्धतीं च। धेनु सवत्सा च नृप प्रतस्थे सन्मङ्गलोदग्रतरप्रभाव ॥७१॥ श्रोत्राभिरामध्वनिना रथेन स धर्मपत्नीसहित सहिष्णु । ययावनुद्घातसुखेन मार्ग स्वेनेव पूर्णेन मनोरथेन।॥७२॥ तमाहितोत्सुक्यमदर्शनेन प्रजा प्रजार्थव्रतकर्शिताङ्गम्। नेत्र पपुस्तृप्तिमनाप्नुवनिर्नवोदय नामिवौषधीनाम्॥७३॥ पुरन्दरी पुरमुत्पताक प्रविश्य पौरैरभिनन्द्यमान । भुजे भुजङ्गेन्द्रसमानसारे भूय स भूमे(रमाससञ्ज ।।७४॥ को यह बात सुनकर नन्दिनी बहुत प्रसन्न हुई और राजा दिलीप के साथ हिमालय की उम कन्दरा से अनायाम वह आश्रम को लौटी॥६७॥ निर्मल चन्द्रमा के सदृश सुन्दर मुखवाले महाराजा दिलीप जब वमिष्ठजी के पास पहुंचे तो उनकी प्रसन्नता को देखकर वमिष्ठजी सब बाते पहले से ही समझ गये। इसीलिए राजा ने जो समाचार मुनाया, वह उन्हें ऐमा लगा मानो बात दुहरा दी गयी हो। तदनन्तर उन्होने यह समाचार महारानी सुदक्षिणा को भी सुनाया ॥ ६८॥ शाम को जब बछडा दूध पी चुका और बन भी सम्पन्न हो गया, तब सज्जनों के प्रिय और प्रशमनीय राजा दिलीप ने गुरु वसिष्ठ की आज्ञा से नन्दिनी के दूध को ऐमे पिया, मानो उन्हे बड़ी प्यास लगी हुई हो। उस ममय ऐसा लगा कि जैसे उनका उजला यश ही दूध बनकर वहाँ चला आया था॥६९ ॥ दूसरे दिन सबेरे व्रत की पारणा हो जाने पर जितेन्द्रिय वसिष्ठजी ने राजा और रानी दोनों को आशीर्वाद दिया कि 'तुम्हारा मार्ग सुखमाध्य हो' और उन्हे राजधानी (अयोध्या) के लिए विदा कर दिया।॥ ७० ॥ वहाँ से चलते समय राजा ने अग्निसहित हवन-कुण्ड की, गुर वसिष्ठ की, माता अरुन्धती को और बछडे के साथ बैठी नन्दिनी को परिक्रमा की। महर्षि का आशीष पा लेने से उनका तेज और भी अधिक निखर उठा था।॥७१ ॥ सहनशील राजा दिलीप अपनी धर्मपली के साथ जिस रथ पर चढकर अयोध्या चले, उसकी ध्वनि कानों को बड़ी मीठी लग रही थी। वह रथ ऐमा अच्छा था कि उममें नाम की भी बक नहीं लगती थी। इसलिए उस पर सुखपूर्वक चढकर जाते हुए वे दोनों ऐसे लगते थे कि मानो अपने सफलमनोरथ पर ही बैठे हुए जा रहे हों।॥७२॥ राजा को अयोध्या मे गये बहुत दिन बीत चुके थे। अतएव प्रजा उनके दर्शन को तरम रही थी। पुत्र की उत्पत्ति के लिए उन्होंने जो व्रत किया था, उससे वे कुछ दुबले हो गये थे। अब बहुत दिनों पर लौटने से उनकी प्रजा उन्हे इस तरह देखने लगी, जैसे उदय होने पर लोग द्वितीया के चन्द्रमा को ध्यान मे देखते हैं ।।७३ ।। इन्द्र के सदृश सम्पत्तिशाली राजा दिलीप ने प्रजा का आदर पाकर अयोध्या नगरी में प्रवेश किया। उनके स्वागत के लिए वहाँ स्थान-स्थान पर झड़ियाँ फहरा रही थी। तदनन्तर उन्होने शेषनाग जैमी अपनी बलवती भुजाओ पर फिर राज-काज मॅभाल लिया ।।७४।। अत्रि ऋषि के नेत मे निकली हुई चन्द्रमारूपिणी ज्योति को जैसे आकाश ने धारण किया था और जैसे कार्तिकेय को उत्पन्न करने वाले शकरजी के उस तेज को गगाजी ने धारण किया था,

द्वितीय सर्ग
अथ नयनसमुत्य ज्योतिरत्रेरिव द्यौ सुरसरिदिव तेजो वहिनिष्ठयूतमैशम्।
नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञो गुरुभिरभिनिविष्ट लोकपालानुभावै ।।७।।
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये नन्दिनी-
वरप्रदानो नाम द्वितीय सर्ग ॥२॥
जिसे अग्नि भी नहीं संभाल सकी थी, वैसे हो राती सुदक्षिणा ने राजा दिलीप का वश चलाने के लिए
आठों दिशाओं के लोकपालों के तेज से परिपूर्ण प्रतापी गर्भ को धारण किया।।७५ ।।
इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में राजा दिलीप को नन्दिनी का
वरदान नामक दूसरा सर्ग समाप्त ॥२॥

लतेव तृतीय सर्ग अथेप्सित भर्तुरुपस्थितोदय सखीजनोद्वीक्षणकौमुदीमुखम् । निदानमिक्ष्वाकुकुलस्य सन्तते सुदक्षिणा दौर्हृदलक्षण दधौ ॥ १॥ शरीरसादादसमग्रभूषणा मुखेन साऽलक्ष्यत लोध्रपाण्डुना । तनुप्रकाशेन विचेयतारका प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी ॥२॥ तदानन मृत्सुरभि क्षितीश्वरो रहस्युपाधाय न तृप्तिमाययौ । करीव सिक्त पृषते पयोमुचा शुचिव्यपाये वनराजिपल्वलम् ॥३॥ दिव मरुत्वानिव भोक्ष्यते भुव दिगन्तविश्रान्तरथो हि तत्सुत । अतोऽभिलाषे प्रथम तथाविधेमनो बबन्धान्यरसान्विलवय सा॥४॥ न मे हिया शसति किश्चिदीप्सित स्पृहावतो वस्तुषु केषु मागधी। इति स्म पृच्छत्यनुवेलमादृत प्रियासखीरुत्तरकोसलेश्वर ॥५॥ उपेत्य सा दोहददु खशीलता यदेव वक्रे तदपश्यदाहृतम्। न हीष्टमस्य त्रिदिवेऽपि भूपतेरभूदनासाद्यमधिज्यधन्वन ॥६॥ क्रमेण निस्तीर्य च दोहदव्यथा प्रचीयमानावयवा रराज सा। पुराणपत्रापगमादनन्तर सन्नद्धमनोज्ञपल्लवा ॥७॥ दिनेषु गच्छत्सु नितान्तपीवर तदीयमानीलमुख स्तनद्वयम् । तिरश्चकार भ्रमराभिलीनयो सुजातयो पङ्गजकोशयो श्रियम् ॥८॥ कुछ ही समय बाद रानी सुदक्षिणा के शरीर मे उम गर्भ के ऐसे लक्षण दीखने लगे, जो राजा दिलीप की इच्छा पूरी होने का संकेत दे रहे थे। जिन्हे देसकर रानी की सखियो के नेत्रों को ऐसा सुख मिल रहा था कि मानो वे चाँदनी देखकर मगन हो रही हों और जो इस बात के प्रमाण थे कि अब इक्ष्वाकुवश बराबर चलता रहेगा ।। १ ।। गर्भिणी होने के कारण रानी दुबली हो गयी थी। इसलिए उन्होने अपने कितने ही गहने उतार डाले। उनका मुंह लोध के फूल जैसा पीला पड़ गया और वे पौ फटते समय की उस रात जैसी लगने लगी, जब थोडे से तारे बचे रहते हैं और चन्द्रमा पीला पड़ जाता है॥२॥ गर्मी के अन्त में पहली वर्षा से जैसे जगल के छोटे-छोटे तालों की मिट्टी मोंधी हो जाती है और हाथी उमे बार-बार सूंघते हैं, वैसे ही मिट्टी साने मे रानी मुदक्षिणा का भी मुँह सोंधा हो गया था। राजा दिलीप उसे एकान्त मे बार-बार मूंघ करके भी तृप्त नहीं होते थे॥३॥ रानी होते हुए भी सुदक्षिणा ने सब पदार्थ छोडकर मानो मिट्टी इमलिए खाना आरम्भ किया था कि जिससे भविष्य में उसका पुत्र भी सारी पृथ्वी पर वैमे ही राज करे, जैसे इन्द्र स्वर्ग पर राज करते हैं॥४॥ राजा दिलीप जानते थे कि मुदक्षिणा बडी लजीली होने के कारण अपनी इच्छा प्रकट नहीं करती। इसलिए वे बार-बार उसके पास रहनेवाली सखियों से पूछते रहते थे कि रानी कौन-कौन-मी वस्तुओं को चाहती है।।५।। गर्भिणी रानी मुदक्षिणा को जब जिस वस्तु की इच्छा होती थी, वह उमो समय उसे मिल जाती थी। क्योंकि धनुर्धर राजा दिलीप को स्वर्ग की भी वस्तुएँ प्राप्य थीं, फिर इस लोक को वस्तुओं की तो बात ही क्या थी॥६॥ धीरे-धीरे गर्भ के प्रारभिक कष्ट बीत गये, तब रानी वैसे ही हृष्ट-पुष्ट और मुन्दर दीखने लगी, जैसे वसन्त ऋतु मे पुराने पत्ते गिरकर गये और कोमल पत्तों से लदी हुई लताएँ सुन्दर दीखने लगती हैं॥७॥ थोडे ही दिनो बाद उसके बडे-बडे स्तनों की धुड़ियाँ तनिक काली पड़ - 113754 • तृतीय सर्ग 0 २३ निधानगर्भामिव सागराम्बरा शमीमिवाभ्यन्तरलोनपावकाम्। नदीमिवान्त सलिला सरस्वती नृप ससत्त्वा महिषीममन्यत ॥ ९ ॥ प्रियानुरागस्य मन समुन्नतेर्भुजार्जिताना च दिगन्तसम्पदाम्। यथाक्रम पुसवनादिका क्रिया धृतेश्च धीर सदृशीय॑धत्त स ॥१०॥ सुरेन्द्रमात्राश्रितगर्भगौरवात्प्रयत्नमुक्तासनया गृहागत । तयोपचाराअलिखिन्नहस्तया ननन्द पारिप्लवनेत्रया नृप ॥११॥ कुमारभृत्याकुशलैरनुष्ठिते भिषम्भिराप्तैरथ गर्भभर्मीण। पति प्रतीत प्रसवोन्मुखी प्रिया ददर्श काले दिवमभितामिव ॥१२॥ ग्रहैस्तत पञ्चभिरुच्चसश्रयैरसूर्यगै सूचितभाग्यसम्पदम् । असूत पुत्र समये शचीसमा त्रिसाधना तिरिवार्थमक्षयम्॥१३॥ दिश प्रसेदुर्मरुतो ववु सुखा प्रदक्षिणार्चिविरग्निराददे। बभूव सर्वं शुभशसि तत्क्षण भवो हि लोकाभ्युदयाय तादृशाम् ॥१४॥ अरिष्टशय्या परितो विसारिणा सुजन्मनस्तस्य निजेन तेजसा । निशीथदीपा सहसा हतत्विषो बभूवुरालेख्यसमर्पिता इव ।। १५ ।। जनाय शुद्धान्तचराय शसते कुमारजन्मामृतसम्मिताक्षरम्। अदेयमासीत्रयमेव भूपते शशिप्रभ छत्रमुभे च चामरे ।।१६।। गयीं। इसमे रानी के स्तन ऐमे सुन्दर लगने लगे कि उनकी शोभा के ममक्ष कमलयुगल पर बैठे हुए भौरों की शोभा भी हार गयी॥८॥ राजा दिलीप गर्भिणी रानी मुदक्षिणा को वैसी ही महत्त्वशालिनी समझने लगे, जैमे बहुमूल्य रलो से भरी तथा समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी, अपने भीतर अग्नि छुपाये शमीवृक्ष या भीतर ही भीतर जल बहाने वाली मरस्वती नदी होती है ॥९॥ राजा दिलीप रानी को जितना प्यार करते थे, जितनी उन्हें प्रमन्नता थी और भुजबल मे जर्जित जितना बड़ा उनका राज्य था, उतने ही ठाट-बाट से उन्होंने उमके पुमवन आदि मस्कार सम्पन्न रिये ॥१० ।। धीरे-धीरे रानी सुदक्षिणा का वह गर्भ बढ़ने लगा, जिसमें लोकपालों के अश विद्यमान थे। उसके भार से रानी को उठने-बैठने मे भी कठिनाई होने लगी। इसलिए जब राजा रनिवास मे आते थे, तब वे बडी कठिनाई से उनके स्वागत के लिए उठ पाती थीं। उनको प्रणाम करने लिए जब वे हाथ जोड़ती थी तो हाथ ढीले पड़ जाते थे और थकावट से उनकी ऑखे नाचने लगती थी। यह सब देखकर राजा दिलीप बहुत प्रसन्न होते थे। ११ ।। बच्चो की चिकित्सा करने में निपुण बहुत-से विश्वसनीय वैद्य उन सब उपायों को कर रहे थे, जिनसे गर्भिणी का गर्भ पुष्ट होता है। दमवे महीने मे राजा ने देखा तो शीघ्र ही पुत्र को जन्म देने वाली रानी ऐसी लग रही थी, जैसे बरमने वाले बादलों में घिरा आकाश हो।।१२।। जैसे कोई राजा अपने तेज, उत्माह और मन्त्रणाशक्ति से अचल सम्पत्ति पा लेता है, वैसे ही इन्द्राणी के समान तेजस्विनी सुदक्षिणा ने ठीक समय पर पुत्र उत्पन्न किया, जिसके सौभाग्यशाली होने की सूचना वे पॉच शुभ ग्रह दे रहे थे, जो उस समय सूर्य से दूर उच्च स्थान पर बैठे थे॥१३॥ उस बालक के जन्म के समय दिशाएँ प्रमत हो गयीं, शीतल-मन्द-मुगन्ध वायु वढे लगी और अग्नि की लपटें दक्षिण की ओर से घूमकर हवन की सामग्रियों ले रही थीं। सभी अच्छे शकुन हो रहे थे और ऐमा होना उचित भी था, क्योंकि ऐमे बालक ससार के कल्याण के लिए ही जन्म लेते हैं।॥१४॥ उम भाग्यशाली बालक का तेज सौरीघर में चारों ओर ऐसा फैला हुआ था कि आधी रात के समय घर में रखे हुए दीपकों का प्रकाश भी एकाएक फीका पड़ गया और वे ऐसे लगने लगे मानो चित्र मे लिये हों।॥ १५॥ तत्काल २४ रघुवर निवातपद्मस्तिमितेन चक्षुषा नृपस्य कान्त पिबत सुताननम्। महोदधे पूर इवेन्दुदर्शनाद् गुरु प्रहर्ष प्रवभूव नात्मनि ॥१७॥ स जातकर्मण्यखिले तपस्विना तपोवनादेत्य पुरोधसा कृते। दिलीपसूनुमणिराकरोद्भव प्रयुक्तसस्कार इवाधिक बभौ ॥१८॥ सुखश्रवा मङ्गलतूर्यनिस्वना प्रमोदनृत्यै सह वारयोषिताम् । न केवल सनि मागधीपते पथि व्यजृम्भन्त दिवौकसामपि ॥१९॥ न सयतस्तस्य बभूव रक्षितुर्विसर्जयेद्य सुतजन्महर्षित । ऋणाभिधानात्स्वयमेव केवल तदा पितॄणा मुमुचे स बन्धनात्॥२०॥ श्रुतस्य यायादयमन्तमर्भकस्तथा परेषा युधि चेति पार्थिव । अवेक्ष्य धातोर्गमनार्थम वच्चकार नाम्ना रघुमात्मसम्भवम् ॥२१॥ पितु प्रयत्नात्स समग्रसम्पद शुभै शरीरावयवैर्दिने दिने। पुपोष वृद्धि हरिदश्वदोधितेरनुप्रवेशादिव बालचन्द्रमा ॥२२॥ उमावृषाङ्गो शरजन्मना यथा यथा जयन्तेन शचीपुरन्दरी। तथा नृप सा च सुतेन मागधी ननन्दतुस्तत्सदृशेन तत्समौ ॥२३॥ रथाङ्गनाम्नोरिव भावबन्धन बभूव यत्प्रेम परस्पराश्रयम् । विभक्तमप्येकसुतेन तत्तयो परस्परस्योपरि पर्यचीयत ॥२४॥ अन्त पुर के भेवक ने जाकर राजा दिलीप को पुत्र होने का समाचार मुपाया। यह सुनकर वे इतने प्रसन्न हुए कि छत्र और दोनों वर ये तीन वस्तुएँ तो वे नहीं दे सकते थे, क्योंकि वे राजचिह्न थे, शेष सब आभूषण उतारकर उन्होंने उमे दे दिये॥१६॥ तत्पश्चात् वे तत्काल भीतर गये और जैसे वायु के रुक जाने पर कमल निश्चल हो जाता है, वैसे ही अपने स्थिर नयनों से पुत्र का मुंह देखने लगे। चन्द्रमा को देखकर जैसे महाममुद्र मे ज्वार आ जाता है, वैसे ही पुत्र को देखकर राजा को इतना अधिक आनन्द मिला कि वह उनके हृदय में नहीं ममा मका ॥ १७॥ इम शुभ ममाचार को पाकर तपोवन से आकर पुरोहित वसिष्ठजी ने स्वभावत मुन्दर उस बालक के जातकर्म आदि मस्कार किये। तदनन्तर वह बालक वैसा सुन्दर लगने लगा, जैसे खान से निकालकर खरादा हुआ हीरा मुन्दर लगता है।॥ १८॥ उम बालक के जन्म लेने पर केवल राजा दिलीप के ही राजमहल में बाजो के माथ वेश्याओं के नाच आदि उत्सव नहीं हो रहे थे, अपितु स्वर्ग में देवताओं के यहाँ भी उत्सव मनाया जा रहा था॥१९।। राजकुमार का जन्म होने पर बन्दीगृहो से बैदी छोड़े जाते हैं, परन्तु राजा दिलीप के राज्य मे मुप्रबन्ध के कारण कोई बन्दी ही नहीं था कि जिसे वे पुत्र-जन्म की प्रमतता में छोडते। इसलिए पुत्र न होने से पितरों के ऋण के बन्धन मे आबद्ध स्वय को ही उन्होने उम बन्धन से मुक्त मान लिया ।।२०।। उन्होंो यह सोचकर उस बालक का नाम रघु रखा कि वह मम्पूर्ण शास्त्रों मे और युद्धक्षेत्र मे शत्रुओ के व्यूहों को तोड़कर उनके पार चला जायगा। रघु' शब्द संस्कृत के 'रघि' धातु से बनता है, जिसका अर्थ होता है—आगे बढना ।। २१ ।। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा का चन्द्रमा जैसे मूर्य की किरणे पाकर दिन-दिन बढ़ता है, वैसे ही बालक रघु के अग भी सम्पत्तिशाली पिता की देख-रेख मे दिन-दिन बढने लगे।।२२।। जैसे पुत्र कार्तिकेय को पाकर शकर-पार्वती और प्रतापी पुत्र जयन्त को पाकर इन्द्र और शची प्रसन हुए थे, वैसे ही राजा दिलीप और रानी मुदक्षिणा भी उन दोनो ही जैसे तेजस्वी पुत्र को पाकर बहुत प्रसन्न हुए ।। २३ ।। उन राजा और रानी मे चकवा-चकई के समान जो गाढ स्नेह था, वह अब उन दोनों का स्नेह यद्यपि एकमात्र पुत्र पर बॅट गया था, फिर भी उनके पारस्परिक प्रेम में कमी नहीं आयी, ॐ तृतीय सर्ग 0 २५ उवाच धात्र्या प्रथमोदित वचो ययौ तदीयामवलम्ब्य चाङ्गुलिम्। अभूच नम्र. प्रणिपातशिक्षया पितुर्मुद तेन ततान सोऽर्भक ॥२५॥ तममारोप्य शरीरयोग सुनिश्चिन्तमिवामृत त्वचि । उपान्तसम्मीलितलोचनो नृपश्चिरात्सुतस्पर्शरसज्ञता ययौ ।। २६॥ अमस्त चानेन पराय॑जन्मना स्थितेरभेता स्थितिमन्तमन्वयम्। स्वमूर्तिभेदेन गुणाप्रयवर्तिना पति प्रजानामिव सर्गमात्मन ॥२७॥ वृत्तचूलश्चलकाकपक्षकैरमात्यपुत्र सवयोभिरन्वित । लिपेर्यथावद्ग्रहणेन वाङ्मय नदीमुखेनेव समुद्रमाविशत्॥२८॥ अथोपनीत विधिद्विपश्चितो विनिन्युरेन गुरवो गुरुप्रियम्। अवन्ध्ययत्नाश्च बभूवुरन ते क्रिया हि वस्तूपाहता प्रसोदति ॥२९॥ धिय समग्रै स गुणैरुदारधी क्रमाचतसश्चतुरर्णवोपमा । ततार विद्या पवनातिपातिभिर्दिशो हरिदिर्हरितानिवेश्वर ।।३०॥ त्वच स मेध्या परिधाय रोरवीमशिक्षतास्त्र पितुरेव मन्त्रवत् । न केवल तद्गुरुरेकपार्थिव क्षितावभूदेकधनुर्धरोऽपि स ॥ ३१ ॥ महोक्षता वत्सतर स्पृशनिव द्विपेन्द्रभाव कलभ श्रयन्निव । रघु क्रमाद्यौवनभिन्नशैशव पुपोष गाम्भीर्यमनोहर वपु ॥३२॥ अपितु वह दिन-दिन बढ़ता ही गया ॥२४]] जब बालक रघु कुछ बड़े हुए, तब धाय के सिखाने पर वे तोतली बोली बोलने लगे, उसकी उँगली पकड़कर चलने लगे और बड़ों को सिर झुकाकर प्रणाम करना भी सीख लिया। इस प्रकार उम बालक ने पिता को आनन्दित किया ॥२५॥ राजा जब उमे गोद में उठाते, तब उसके शरीर का स्पर्श करने से उन्हें ऐमा लगता था कि मानो उनके शरीर पर अमृत की फुहारें बरम रही हों। उस समय दोनों ऑसें बन्द करके वे बड़ी देर तक इम आनन्द के रम का स्वाद लेते थे॥२६॥ जैसे प्रजापति ब्रह्मा ने अपने मतोगुण के अश से विष्णु के प्रकट होने पर यह समझ लिया था कि अब हमारी सृष्टि अमर हो गया। वैसे ही मर्यादापालक दिलीप ने भी यह समझ लिया कि रघु मे हमारा मूर्यवश स्थायी बना रहेगा।। २७ ।। मुण्डनमस्कार हो जाने पर रघु ने चचल लटों से युक्त तथा समान आयु वाले मत्रिपुत्रों के माय पहले वर्णमाला को लिखना-पढना सीखा और उसके बाद इस तरह साहित्य का स्वाध्याय प्रारम्भ कर दिया, जैसे नदी मुहाने से वे ममुद्र में प्रवेश कर गये हों॥२८॥ यज्ञोपवीत हो जाने पर रघु को विद्वान्, पण्डित-गण और भी मब विद्याएँ पढ़ाने लगे। इसमें गुरुओं को विशेष परिश्रम नहीं करना पड़ा, क्योंकि चतुर शिष्य को दी हुई शिक्षा बहुत शीघ्र सफल होती है।। २९ ।। जैसे सूर्यनारायण अपने पवनवेग से दौडने वाले घोदों द्वारा थोड़े ही समय में चारों दिशाओं को पार कर लेते हैं, वैसे ही बुद्धिमान् रघु ने अपनी तीव्र बुद्धि की महायता से चार समुद्रों के समान विस्तृत आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता तथा दण्डनीति- इन चारों विद्याओं को शीघ्र सीख लिया ॥३०॥ रुरु मृग का पवित्र चर्म पहनकर रघु ने मन्त्रयुक्त अस्त्रों की शिक्षा अपने पिता से ही प्राप्त की। क्योंकि उनके पिता दिलीप केवल चक्रवर्ती राजा ही नहीं थे, अपितु अद्वितीय धनुर्धर भी थे।।३१ ।। जैसे गाय का बछडा बड़ा होकर मॉड और हाथी का बच्चा बढार गजराज बन जाता है, वैसे ही जब रघु ने बचपन बिताकर युवावस्था में पदार्पण किया, तब उनका शरीर और भी खिल उठा।। ३२ ।। बाईसवे वर्ष में गोदान-मस्कार करके राजा दिलीप ने उनका विवाह भी कर दिया। जैसे दक्ष की अश्विनी आदि कन्याएँ चन्द्रमा जैसे पति को पाकर प्रसन्न हुई थी, वैसे ही वे राजकुमारियों भी ४का० तदास्पद २६ ॐ रघुवशे अथास्य गोदानविधेरनन्तर विवाहदीक्षा निरवर्तयद् गुरु । नरेन्द्रकन्यास्तमवाप्य सत्पति तमोनुद दक्षसुता इवाबभु ॥३३॥ युवा युगव्यायतवाहुरसल कपाटवक्षा परिणद्धकन्धर । वपु प्रकर्षादजयद् गुरु रघुस्तथापि नीचैर्विनयाददृश्यत॥३४॥ तत प्रजाना चिरमात्मनाधृता नितान्तगुर्वी लघयिष्यताधुरम् । निसर्गसस्कारविनीत इत्यसो नृपेण चक्रे युवराजशब्दभाक् ॥ ३५ ॥ नरेन्द्रमूलायतनादनन्तर श्रीर्युवराजसज्ञितम्। अगच्छदशेन गुणाभिलाषिणी नवावतार कमलादिवोत्पलम् ॥३६॥ विभावसु सारथिनेव वायुना घनव्यपायेन गभस्तिमानिव । बभूव तेनातितरा सुदु सह कटप्रभेदेन करीव पार्थिव ॥ ३७॥ नियुज्य त होमतुरङ्गरक्षणे धनुर्धर राजसुतैरनुद्रुतम्। अपूर्णमेकेन शतक्रतूपम शत ऋतूनामपविघ्नमाप स ॥३८॥ तत पर तेन मखाय यज्वना तुरङ्गमुत्सृष्टमनर्गल पुन । धनु तामग्रत एव रक्षिणा जहार शक्र किल गूढविग्रह ॥३९॥ विषादलुप्तप्रतिपत्ति विस्मित कुमारसैन्य सपदि स्थित च तत्। वसिष्ठधेनुश्च यदृच्छयाऽऽगता श्रुतप्रभावा ददृशेऽथ नन्दिनी ॥४०॥ तदङ्गनि स्यन्दजलेन लोचने प्रमृज्य पुण्येन पुरस्कृत सताम् । अतीन्द्रियेष्वप्युपपन्नदर्शनो बभूव भावेषु दिलीपनन्दन ॥४१॥ रघु जैसे प्रतापशाली पति को पाकर बहुत प्रसन्न हुई।। ३३ ।। रघु की भुजाएँ युवावस्था के कारण हल के जुए के समान दृढ और लम्बी हो गयीं, छाती चौडी हो गयी और कन्धे फैल गये। इस प्रकार डोल-डौल बढ जाने पर रघु यद्यपि अपने बूढे पिता मे ऊंचे और तगड़े दिखलायो देते थे, फिर भी वे इतने विनम्र थे कि कभी भी अपना बड़प्पन नहीं प्रकट होने देते थे॥३४॥ जब राजा दिलीप ने देखा कि शिक्षा आदि सस्कारो से रघु मुशिक्षित हो गये हैं और राज्य भली-भाँति संभाल सकते हैं, तब उन्होने गुरुतर राज्यभार हलका करने के विचार से रघु को युवराज बना दिया।। ३५ ।। जैसे सुन्दरता की देवी मुरझाये हुए कमल को छोडकर नये कमल पर चली जाती है, वैसे ही राज्यलक्ष्मी भी अब बूढे दिलीप को छोडकर धीरे-धीरे रघु के पास जा पहुँची ।। ३६॥ जैसे अपने मारी वायु की सहायता से अग्नि, शरद ऋतु के खुले आकाश को पाकर सूर्य और मद बहने के कारण हाथी प्रचड हो जाता है, वैसे ही प्रतापी रघु की सहायता से दिलीप इतने शक्तिशाली हो गये कि उनमे उनके शत्रु कोंपने लगे॥३७ ।। तदनन्तर इन्द्र के समान प्रभावशाली दिलीप ने यज्ञ के घोडे की रक्षा का भार रघु तथा अन्य धनुर्धर राजकुमारों को सौंपकर निन्यानबे अश्वमेध यज्ञ निर्विघ्न पूरे कर लिये ॥ ३८॥ जब दिलीप ने सौवॉ यज्ञ करने के लिए घोडा छोड़ा तो इन्द्र ने धनुषधारी रक्षकों के देखते-देखते उन्होंने अलक्षित रूप से उस घोडे को चुरा लिया॥३९॥ घोडे की रक्षा करने वाली रघु को मेना ने जब देखा कि घोडा देखते-देखते अदृश्य हो गया, तब वे बहुत घबराये और उन्हें आश्चर्य भी हुआ। उमी ममय वसिष्ठ ऋषि की प्रभावशालिनी गाय नन्दिनी धूमती-घामती वहाँ आ पहुँची॥४०॥ मजनों के पूज्य रघु ने तत्काल नन्दिनी के मूत्र को अपनी आँखों में लगाया। जिससे उन्हें उन मब वस्तुओं को देख सकने की शक्ति प्राप्त हो गयी, जो सामान्य इन्द्रियों से किसी को नहीं दीख मकती थी॥४१॥ इस प्रकार दिव्य दृष्टि प्राप्त करके रघु ने देखा कि पर्वतों के पस काटने वाले इन्द्र स्वय उम घोडे को चुरा ले जा रहे हैं।

ॐ तृतीय सर्ग , २७ स पूर्वत पर्वतपक्षशातन ददर्श देव नरदेवसम्भव । पुन सूतनिषिद्धचापल हरन्तमश्व रथरश्मिसयतम्॥४२॥ शतैस्तमक्ष्णामनिमेषवृत्तिभिहरि विदित्वा हरिभिश्च वाजिभि । अवोचदेन गगनस्पृशा रघु स्वरेण धीरेण निवर्तयन्निव ॥४३॥ मखाशभाजा प्रथमो मनीषिभिस्त्वमेव देवेन्द्र सदा निगद्यसे। अजसदीक्षाप्रयतस्य मद्गुरो क्रियाविघाताय कथ प्रवर्तसे ॥४४॥ त्रिलोकनायेन सदा मखद्विषस्त्वया नियम्या ननु दिव्यचक्षुषा। स चेत्स्वय कर्मसु धर्मचारिणा त्वमन्तरायो भवसि च्युतो विधि ॥४५॥ तदङ्गमग्रय मघवन्महाक्रतोरमु तुरङ्ग प्रतिमोक्तुमर्हसि। पथ श्रुतेर्दशयितार ईश्वरा मलीमसामाददते न पद्धतिम्॥४६॥ इति प्रगत्भ रघुणा समोरित वचो निशम्याधिपतिर्दिवौकसाम्। निवर्तयामास रथ सविस्मय प्रचक्रमे च प्रतिवक्तुमुत्तरम्॥४७॥ यदात्य राजन्यकुमार तत्तथा यशस्तु रक्ष्य परतो यशोधनै । जगत्प्रकाश तदशेषमिज्यया भवद्गुरुर्लयितु ममोद्यत ॥४८॥ हरिर्यथैक पुरुषोतम स्मृतो महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापर । तथा विदुर्मा मुनय शतक्रतु द्वितीयगामी न हि शब्द एष न ॥४९॥ अतोऽयमश्व कपिलानुकारिणा पितुस्त्वदीयस्य मयाऽपहारित । अल प्रयत्नेन तवात्र मा निधा पद पदव्या सगरस्य सन्तते ॥५०॥ वह घोड़ा भी उनके रथ के पीछे बंधा हुआ भागने का यत्न कर रहा था, जिसे दन्द्र का सारथी बार-बार सँभाल रहा था ॥ ४२ ॥ रघु ने टकटकी लगाकर देखा तो घोड़े को हरने वाले के शरीर पर सैकड़ो ऑखें ही ऑखे हैं। उन आँखों की पलकें नहीं गिरती थीं और उनके रथ के घोडे भी हरे-हरे थे। इमसे रघु ने समझ लिया कि वे इन्द्र है। तब ऊँचे एव गम्भीर स्वर मे रघु इस प्रकार इन्द्र से बोले कि मानो उन्हे लौटने को ललकारते हो।। ४३ ॥ उन्होंने कहा- हे देवेन्द्र । विद्वानों का कहना है कि यज्ञ का भाग सर्वप्रथम आपको ही मिलता है। मेरे पिताजी भी सदा यज्ञ करते हैं, फिर आप उममे विघ्न क्यों डाल रहे हैं।॥४४॥ दिव्यदृष्टिमम्पन्न आपको तो यह चाहिए कि जो कोई यज्ञ मे विघ्न डाले, उसे आप स्वय दण्ड दें। क्योंकि आप तीनों लोकों के स्वामी हैं। जब स्वय आप ही यज्ञ में विघ्न डालने लगेंगे तब तो धर्म लुप्त ही हो जायगा ॥४५।। अतएव हे इन्द्रदेव । आप मेरे पिता के अश्वमेध महायज्ञ के लिए आवश्यक इम घोड़े को छोड दीजिए। आप तो वेद का मार्ग दिखलानेवाले महापुरुष हैं। ऐमा तुच्छ काम आप जैसों को शोभा नहीं देता ॥४६॥ रघु के अभिमान भरे इन वचनो को सुनकर देवेन्द्र को बहुत आश्चर्य हुआ और रथ घुमाकर उनकी बात का उत्तर देते हुए बोले ॥४७॥ हे राजकुमार । तुम्हारा कथन यथार्थ है, किन्तु हम यशस्वियों का यह भी तो कर्तव्य है कि जो अपने से होड़ करे, उससे अपने यश की रक्षा करें। मैंने सौ यज्ञ करके जो यश पाया है, उमे तुम्हारा पिता मुझमे छोन लेना चाहते हैं।। ४८ ॥ जैसे पुरुषोत्तम केवल विष्णु और त्र्यम्बक केवल शकरजी ही हैं, वैसे ही मुनि लोग सौ यज्ञ करने वाला शतक्रतु केवल मुझे ही मानते आये हैं। जिन नामों मे हम लोग विख्यात हैं, उस नामों को दूसरे लोग नहीं रख सकते॥४९॥ अतएव जैसे कपिल मुनि ने तुम्हारे पूर्वज सगर के घोड़े को हर लिया था, वैसे ही मैंने भी तुम्हारे पिता के इस घोड़े को हर लिया है। तुम इसे छुडाने का प्रयल मत करो। नहीं तो जैसे कपिल मुनि के क्रोध मे मगर के माठ सहन पुत्र भस्म हो गये थे, वैसे ही हमारे क्रोध से तुम भी जलकर भस्म हो जाओगे॥५०॥ यह सुना तो अश्व के रक्षक रघु ने हँसकर और निडर होकर इन्द्र से कहा- यदि आपका यही निश्चय हो तो शस्त्र उठाइए और युद्ध करिए।

२८ छ रघुवशे तत प्रहस्यापभय पुरन्दर पुनर्वभाषे तुरगस्य रक्षिता। गृहाण शस्त्र यदि सर्ग एष ते न खल्वनिर्जित्य रघु कृती भवान् ।। ५१॥ स एवमुक्त्वा मघवन्तमुन्मुख करिष्यमाण सशर शरासनम्। अतिष्ठदालीढविशेषशोभिना वपु प्रकर्षेण विडम्बितेश्वर ॥५२॥ रघोरवष्टम्भमयेन पत्रिणा हृदि क्षतो गोत्रभिदप्यमर्षण । नवाम्बुदानीकमुहूर्तलाञ्छने धनुष्यमोध समधत्त सायकम्॥५३॥ दिलीपसूनो स बृहद्भुजान्तर प्रविश्य भीमासुरशोणितोचित । पपावनास्वादितपूर्वमाशुग कुतूहलेनेव मनुष्यशोणितम् ॥५४॥ हरे कुमारोऽपि कुमारविक्रम सुरद्विपास्फालनकर्कशाङ्गुलौ। भुजे शचीपत्रविशेषकाड़िते स्वनामचिह निचखान सायकम् ।। ५५॥ जहार चान्येन मयूरपत्रिणा शरेण शक्रस्य महानिध्वजम् । चुकोप तस्मै स भृश सुरश्रिय प्रसह्य केशव्यपरोपणादिव ॥५६॥ तयोरुपान्तस्थितसिद्धसैनिक गरुत्मदाशीविषभीमदर्शने । बभूव युद्ध तुमुल जयैषिणोरधोमुखैरुर्ध्वमुसैश्च पत्रिभि ॥५७॥ अतिप्रबन्धप्रहितास्त्रवृष्टिभिस्तमाश्रय दुष्णसहस्य तेजस । शशाक निर्वापयितु न बासव स्वतश्च्युत वहिमिवाद्विरम्बुद ॥५८॥ तत प्रकोष्ठे हरिचन्दनाङ्गिते प्रमथ्यमानार्णवधीरनादिनीम् । रघु शशाङ्काधमुखेन पत्रिणा शरासनज्यामलुनाद्विौजस ।।५९॥ रघु को जीते बिना आप घोड़ा नहीं ले जा सकते॥५१॥ ऐमा कहकर रघु ने धनुष पर बाण चढाया और पैंतरा माधकर इन्द्र की ओर मुंह करके खडे हो गये। उस समय वे अपने तगडे शरीर से ऐसे लग रहे थे, मानो इन्द्र मे युद्ध करने के लिए स्वय शकरजी वहाँ आ पहुंचे हो॥५२॥ तभी रघु ने खभे के समान दृढ एक बाण इन्द्र की छाती में मारा। इमसे इन्द्र भी क्रुद्ध हो गये और अपने धनुष उन्होंने ऐसा बाण चढ़ाया, जिमका प्रहार कभी चूकता नहीं था। इन्द्र का वह धनुष इतना मुन्दर था कि थोड़ी देर के लिए उमने नये बादलों में इन्द्र-धनुष जैमा रग भर दिया था।॥५३॥ बड़े-बडे भीषण राक्षसों का रक्त पीनेवाले उस वाण ने रघु की छाती मे घुमकर वहाँ का रक्त बड़े चाव से पिया। क्योंकि उसे अब तक मनुष्य के रक्त का स्वाद नहीं मिला था॥५४॥ तब कार्तिकेय के समान पराक्रमी रघु ने भी अपना नाम खुदा हुआ एक बाण इन्द्र की उस बायीं भुजा मे मारा, जिसकी उँगलियों बार-बार ऐरावत को थपथपाने से ३ डी हो गयी थी और जिस पर शची ते कुकुम आदि से चित्रकारी कर रक्खी थी॥५५॥ मोर की पखवाले दूसरे बाण से रघु ने इन्द्र की वज्राङ्कित ध्वजा को भी काट डाला। इससे इन्द्र को ऐसा क्रोध हुआ, जैसे देवताओं की राज्यलक्ष्मी के सिर के केश काट लिये गये हो॥५६॥ उम सग्राम में रघु और इन्द्र दोनों अपनी-अपनी जीत चाहते थे। अत दोनों सूर्य के समान तीखे बाणों से भयकर युद्ध कर रहे थे। रघु को लक्ष्य बनाकर इन्द्र नीचे की ओर अपने बाण चलाते थे और इन्द्र को ताककर रघु ऊपर बाण चला रहे थे। ऊपर सिद्धगण और नीचे रघु के मैनिक इस विस्मयजनक युद्ध को देख रहे थे ।। ५७ ।। जैसे बादल घोर वर्षा करके भी अपने आप में उत्पन्न बिजली को नहीं बुझा सकता। वैसे ही इन्द्र भी अपने अश से उत्पन्न रघु को अपने बाणो की वर्षा से नहीं हरा मके ॥५८ ॥ तब रघु ने अपने अर्द्धचन्द्राकार बाण से इन्द्र की ठोक कलाई के पास वाली धनुष की वह डोरी काट दी, जिसमें से बाण चलाते समय ऐसा प्रचण्ड शब्द निकलता था कि जैसे मथे जाने के समय क्षीरसागर २९ के तृतीय सर्ग 8 स चापमुत्सृज्य विवृद्धमत्सर प्रणाशनाय प्रबलस्य विद्विष | महीध्रपक्षष्यपरोपणोचित स्फुरत्प्रभामण्डलमस्त्रमाददे॥६०॥ रघु श वक्षसि तेन ताडित पपात भूमौ सह सैनिकाधुभि । निमेषमात्रादवधूय तद्वयथा सहोत्थित सैनिकहर्षीन स्वने ॥६१ ॥ तथापि शस्त्रव्यवहारनिष्ठुरे विपक्षभावे चिरमस्य तस्थुष । तुतोष वीर्यातिशयेन वृत्रहा पद हि सर्वत्र गुणैनिधीयते ॥६॥ असङ्गमद्रिष्वपि सारवत्तया न मे त्वदन्येन विसोढमायुधम्। अवेहि मा प्रीतमृते तुरङ्गमात्किमिच्छसोति स्फुटमाह वासव ॥६३ ॥ ततो निषङ्गादसमग्रमुद्धृत सुवर्णपुसद्युतिरञ्जितागुलिम्। नरेन्द्रसूनु प्रतिसहरनिषु प्रियवद प्रत्यवदत्सुरेश्वरम् ।। ६४॥ अमोच्यमश्व यदि मन्यसे प्रभो। तत समाते विधिनैव कर्मणि। अजस्रदीक्षाप्रयत स मद्गुरुः क्रतोरशेषेण फलेन युज्यताम् ॥६५॥ यथा च वृत्तान्तमिम सदोगतस्त्रिलोचनकाशतया दुरासद । तवैव सन्देशहराद्विशाम्पति शृणोति लोकेश' तथा विधीयताम् ।। ६६ ।। तथेति काम प्रतिशुश्रुवान् रघोर्यथागत मालिसारथिर्ययो। नृपस्य नातिप्रमना सदोगृह सुदक्षिणासूनुरपि न्यवर्तत ॥ ६७॥ तमभ्यनन्दत्प्रथम प्रबोधित प्रजेश्वर शासनहारिणा हरे । परामृशन्हर्षजडेन पाणिना तदीयमङ्ग कुलिशवणाङ्गितम् ॥ ६८।। मे भीषण निनाद होता था॥५९॥ इस प्रकार धनुष की डोरो कट जाने से इन्द्र को बड़ा क्रोध आया। अत उन्होंने धनुष को दूर फेंका और अपने प्रबल शत्रु रघु को मारने के लिए पर्वतों के पख काटने वाले और अग्नि के समान चमकीले वज्र को उठाया ॥६०॥ उम वज्र की मार से रघु पृथ्वी पर गिर पडे। उनके गिरते ही सैनिकों ने रोना-पीटना आरम्भ कर दिया। किन्तु क्षण भर मे ही वे सँभलकर फिर उठ खड़े हुए और उनके सैनिकों की जय-जयकार आकाश तक गूंज उठी।। ६१ ॥ वज्र के आघात से क्षण भर में ही मॅभलकर रघु फिर लड़ने के लिए आ डटे। उनकी इम अद्वितीय वीरता को देखकर इन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। ऐसा होना ठीक भी था, क्योंकि गुणों का सर्वत्र आदर होता है ।। ६२ ।। इन्द्र बोले- हे राजकुमार । पर्वतों के पख काटने वाले मेरे इम कठोर वज्र को चोट को तुम्हें छोडकर आजतक कोई नहीं मह सका। मैं तुम्हारी वीरता पर प्रमन्न हूँ। इस घोडे को छोड़कर तुम और जो कुछ भी मुझ से माँगना चाहो, मोंगो॥ ६३॥ इन्द्र के वचन सुनकर रघु ने तरकस मे आधे निकाले हुए बाण को फिर मे उसमें डाल दिया। जिसके सुनले पख की चमक मे रघु की उंगलियों के नख चमक रहे थे। फिर वे इन्द्र से बोले ॥६४॥ हे देवेन्द्र । यदि आप घोड़े को नहीं देना चाहते तो यही वरदान दीजिए कि मेरे पिताजी विधिपूर्वक यज्ञ समाप्त करके इस घोडे के बिना ही सौ अश्वमेघ यज्ञ करने का फल पा जायें ॥६५॥ हे लोकेशा मेरे पिता इस ममय यज्ञ-मडप मे अष्टमूर्ति शिवजी के एक अश के रूप में बैठे हुए हैं। अत वहाँ इस समय हम लोगों में से कोई नहीं पहुंच सकता। इसलिए आप कोई ऐमा उपाय कीजिए कि जिसमे आपका हो कोई दूत जाकर उनको यह समाचार मुना दे॥६६॥ 'ऐसा ही होगा' यह कहकर इन्द्र जिस मार्ग मे आये थे, उसी मार्ग से चले गये। तब सुदक्षिणा के पुत्र रघु भी अपने पिता राजा दिलीप की सभा लौट आये। वे बड़े खिन्न थे, क्योकि युद्ध में इन्द्र से जीतने पर भी अश्वमेघ यज्ञ का घोडा न लौटा पाने का उन्हे बडा सेद था॥ ६७ ॥ रघु के पहुंचने से पहले ही - ३० ॐ रघुवशे इति क्षितीशो नवति नवाधिका महाक्रतूना महनीयशासन । समारुरुक्षुर्दिवमायुष क्षये ततान सोपानपरम्परामिव ॥ ६९ ॥ अथ स विषयव्यावृत्तात्मा यथाविधि सूनवे नृपतिककुद दत्त्वा यूने सितातपवारणम् । मुनिवनतरुच्छाया देव्या तया सह शिश्रिये गलितवयसामिक्ष्वाकूणामिद हि कुलव्रतम् ।।७०॥ इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये रघुराज्याभिषेको नाम तृतीय सर्ग ॥३॥ के दूत ने राजा दिलीप को मब समाचार सुना दिया था। अतएव ज़ब रघु-वहाँ पहुँचे, तब राजा दिलीप ने उनकी बड़ी प्रशसा की और जहाँ वन लगा था, उम अङ्ग को धीरे-धीरे महलाने लगे।। ६८ ॥ इस तरह जिमको आज्ञा कोई टाल नहीं मकता था, उन महाराज दिलीप ने मानो स्वर्ग जाने के लिए निन्यानबे यज्ञों की सोढी तैयार कर ली॥६९|| तब मासारिक विषयों मे मुँह मोड़े हुए राजा दिलीप ने अपने नवयुवक पुत्र रघु को विधिवत् छत्र-चेंबर आदि राजचिह्न दे दिये और देवी सुदक्षिणा के साथ तप करने के लिए मुनियों के आश्रमों की राह ली। क्योंकि इक्ष्वाकुवंश के राजाओं मे यह बात कुलपरपरा से चली आयी कि वे बूढ़े होने पर जगल मे जाकर तप करने लगते हैं।॥ ७० ॥ इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में रघु का राज्याभिषेक नामक तीसरा सर्ग समाप्त ।।३।।

चतुर्थ सर्ग स सज्य गुरुणा दत्त प्रतिपद्याधिक बभौ। दिनान्ते निहित तेज सवित्रेव हुताशन ॥ १ ॥ दिलीपानन्तर राज्ये त निशम्य प्रतिष्ठितम् । पूर्व प्रधूमितो राजा हृदयेऽग्निरिवोत्थित ॥ २ ॥ पुरुहूतध्वजस्येव तस्योन्नयनपङ्क्तय । नवाभ्युत्थानदर्शिन्यो ननन्दु सप्रजा प्रजा ॥ ३ ॥ सममेव समाक्रान्त वय द्विरदगामिना। तेन सिहासन पित्र्यमखिल चारिमण्डलम् ॥ ४ ॥ छायामण्डललक्ष्येण तमदृश्या किल स्वयम् । पद्मा पद्मातपत्रेण भेजे साम्राज्यदीक्षितम् ॥ ५ ॥ परिकल्पितसान्निध्या काले काले च बन्दिषु । स्तुत्य स्तुतिभिरर्थ्याभिरुपतस्थे सरस्वती।। ६ ।। मनुप्रभृतिभिर्मान्यैर्भुक्ता यद्यपि राजभि । तथाऽप्यनन्यपूर्वेव तस्मिन्नासीद्वसुन्धरा ।। ७ ॥ स हि सर्वस्य लोकस्य युक्तदण्डतया मन । आददे नातिशीतोष्णो नभस्वानिव दक्षिण ॥ ८ ॥ मन्दोत्कण्ठा कृतास्तेन गुणाधिकतया गुरी। फलेन सहकारस्य पुष्पोद्गम इव प्रजा ॥ ९ ॥ नयविद्धिर्नवे राज्ञि सदसच्चोपदर्शितम्। पूर्व एवाभवत्पक्षस्तस्मिन्नाभवदुत्तर ॥१०॥ पञ्चानामपि भूतानामुत्कर्ष पुपुषुर्गुणा । नवे तस्मिन्महीपाले सर्व नमिवाभवत् ॥११॥ यथा प्रह्लादनान्चन्द्र प्रतापातपनो यथा। तथैव सोऽभूदन्वर्थो राजा प्रकृतिरञ्जनात् ।।१२।। अपने पिता से राज्य पार रघु और भी अधिक तेजस्वी हो गये। जैसे मायकालीन मूर्य का तेज लेकर अग्नि चमक उठता है।। १ ।। दूसरे राजाओ ने जब मुना कि दिलीप के बाद रघु राजा हो गये हैं, तब उनके हृदय में वैर की जो धूमिल आग धीरे-धीरे सुलग रही थी, वह जैसे सहमा भड़क उठी ।।२।। राज्य के सब लोग रघु की ओर आँख उठाकर देखते हुए वैसे ही प्रमन्न होते थे, जैसे आकाश में उदित नवीन इन्द्रधनुष को देखकर लोग प्रमन्न होते हैं।।३।। गजराज के ममान मस्ती मे चलने वाले राजा रघु ने पिता के मिहासन और समस्त शत्रुओं पर एक साथ अधिकार जमा लिया ।।४|| जब वे मिहासन पर बैठते थे, उम समय उनके चारों ओर प्रकाश का एक घेरा जैमा बा जाता था। उमे देखकर ऐमा लगता था कि मानो लक्ष्मी स्वय प्रच्छन्न भाव से प्रकाशमान कमल का छत्र लेकर उस नये सम्राट् के पीछे खड़ी रहती हों॥५॥ समय-समय पर मरस्वती भी उनके चारणो के कण्ठों मे बैठकर सार्थक प्रशसा- परक शब्दों द्वारा यशोगान करके उन प्रशमनीय राजा रघु की सराहना किया करती थीं॥६॥ वैसे तो रघु से पहले मनु आदि अनेक प्रतापी राजा पृथ्वी का भोग कर चुके थे, परन्तु रघु के शामा काल में वही पृथ्वी ऐमी नयी जान पड़ती थी कि जैसे पहले-पहल रघु के हाथों में आयो हो॥७॥ जैसे वासन्ती वायु बहुत ठढी या बहुत गरम न होने के कारण मबके मन को भाती है, वैसे हो रघु भी किसी को आवश्यकता से अधिक कठोर या कोमल दड़ नहीं देते थे। ऐमे न्याय से उनकी प्रजा उनसे बहुत प्रमन्न रहती थी॥८॥ जैमे आम के मुन्दर फल देखकर लोग उसके बौरों को भूल जाते हैं, वैमे ही रघु में राजा दिलीप से अधिक गुण देखकर लोग दिलीप को भूल गये।।९।। नीतिज्ञ मन्त्रियों ने रघु के सरल और कुटिल दोनों प्रकार की नीतियों से राज्य चलाने की विधियाँ सिखा दी, परन्तु उस धर्मात्मा राजा ने सरल नीति ही अपनायी और कुटिल नीति छोड दी॥१०॥ नये राजा रघु के मिहासन पर बैठते हो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-इन पाँचों तत्त्वो के गुण बढ़ो लगे। उस समय ऐसा लगा कि मानो नये राजा को पाकर मभी वस्तुएँ नवीन हो गयी हो॥११ ॥ जैमे सबको आनन्द देकर चन्द्रमा ने अपना नाम सार्थक किया और सबको तपाफर मूर्य ने अपना तपन नाम सार्थक किया था, वैसे ही रघु ने भी प्रजा को प्रसन्न करके और उन्हे सुख देकर अपना 'राजा' यह नाम सार्थक के रघुवशे के काम कर्णान्तविश्रान्ते विशाले तस्य लोचने । चक्षुष्मता तु शास्त्रेण सूक्ष्मकार्यार्थदर्शिना ॥१३॥ लब्धप्रशमनस्वस्थमथैन समुपस्थिता। पार्थिवश्रीढितीयेव शरत्पङ्कजलक्षणा ॥१४॥ निर्वृष्टलघुभिर्मेधैर्मुक्तवा सुदु सह । प्रतापस्तस्य भानोश्च युगपढ्यानशे दिश ॥१५॥ वार्षिक सञ्जहारेन्द्रो धनुर्जेत्र रघुर्दधौ। प्रजार्थसाधने तो हि पर्यायोद्यतकार्मुको ॥१६॥ पुण्डरीकातपत्रस्त विकसत्काशचामर । ऋतुर्विडम्बयामास न पुन प्राप तच्छ्रियम् ॥ १७ ॥ प्रसादसुमुखे तस्मिश्चन्द्रे च विशदप्रभे। तदा चक्षुष्मता प्रीतिरासीत्समरसा द्वयो ॥१८॥ हसश्रेणीषु तारासु कुमुद्वत्सु च वारिषु। विभूतयस्तदीयाना पर्यस्ता यशसामिव ॥१९॥ इक्षुच्छायानिषादिन्यस्तस्य गोप्तुर्गुणोदयम् । आकुमारकयोद्घात शालिगोप्यो जगुर्यश ॥२०॥ प्रससादोदयादम्भ कुम्भयोनेर्महौजस । रघोरभिभवाङ्कि चुक्षुभे द्विषता मन ॥२१॥ मदोदना ककुमन्त सरिता कूलमुगुजा । लीलाखेलमनुप्रापुर्महोक्षास्तस्य विक्रमम् ॥२२॥ प्रसवै सप्तपर्णाना मदगन्धिभिराहता । असूययेव तन्नागा सप्तधैव प्रसुसुवु ॥२३॥ सरित कुर्वती गाधा पथश्चाश्यानकर्दमान् । यात्रायै चोदयामास त शक्ते प्रथम शरत्॥२४॥ तस्मै सम्यग्घुतो वहिर्वाजिनीराजनाविधौ। प्रदक्षिणार्चिाजेन हस्तेनेव जय ददौ ॥२५॥ कर दिया॥१२॥ यद्यपि रघु के नेत्र कानों तक फैले हुए और बहुत बडे-बड़े थे परन्तु उन्हें अधिक भरोसा अपने उम शास्त्रज्ञानरूपी नेत्रों पर था, जिनसे वे मूक्ष्म मे सूक्ष्म कामों को भी शीघ्र देख लेते थे।॥ १३॥ रघु ने जब अपने राज्य में शान्ति स्थापित कर ली और उनका चित्त ठिकाने हुआ, उसो ममय दूसरो लक्ष्मी के ममार शरद् ऋतु आ गयी, जिमसे चारों ओर सुन्दर कमल खिल गये ॥१४॥ वर्षा बोत चुकी थी, बादल हट गये थे और जिस तरह खुले आकाश में चमकते हुए सूर्य का प्रकाश चारों ओर फैल गया था, वैसे ही शत्रुओं के नष्ट हो जाने पर राजा रघु का प्रताप भी फैल गया ॥ १५ ॥ इन्द्र ने जब अपना वर्षाऋतुवाला इन्द्रधनुष हटाया, तब रघु ने अपना विजयी धनुष हाथ मे उठा लिया। क्योंकि ये दोनो ही बारी-बारी से प्रजा को भलाई किया करते थे॥१६॥ रघु के छत्र और चॅवर को देखकर कमल के छत्र और फूले हुए कॉस के चंवर लेकर शरद् ऋतु रघु मे होड करने चली, सब कुछ करके भी रघु की शोभा नहीं पा सको ॥१७|| शरद् ऋतु मे उजले चन्द्रमा तथा रघु के खिले हुए मुख दोनों को देखकर दर्शकों को एक-सा आनन्द मिलता था॥१८॥ उजले हमों को उडती हुई पॉतों, रात में खिले हुए टिमटिमाते तारे और तालो में खिली हुई कोई को देखकर ऐसा लगता था कि रघु की कीर्ति ही इतने रूपों मे फैली हुई है ॥१९ ॥ प्रजा को वे इतने प्रिय थे कि धान के खेतों की रखवाली करने वाली किसानों की स्त्रियों भी ईस की छाया मे बैठकर प्रजापालक राजा रघु को बचपन मे अब तक की कथाओं के गीत बना-बनाकर गाया करती थीं॥२०॥ इधर चमकीले अगस्त्य तारे का उदय होने से जल निर्मल हो गया, उधर शत्रुओ के मन मे यह सोचकर खलबली मच गयी कि अब न जाने कब रघु चढाई कर दे।। २१ ।। ऊँचे-ऊँचे कधो वाले मतवाले मॉड नदियो के कगार ढहाते हुए ऐसे लगते थे कि मानो वे रघु के लडकपन के वीरताभरे खिलवाडों का अनुकरण कर रहे हों ॥ २२ ॥ उन दिनों चारों ओर छतिवन के फूल फूले हुए थे। उनकी मतवालो गन्ध पाकर रघु के हाथियों ने सोचा कि ये भी हाथी हैं और हममे होट करके मद बहा रहे हैं। इसलिए वे भी ईर्ष्यावश सूंड के नथनों, दोनों कपोलों, लिग और दोनो आँखों से मद बहाने लगे।॥ २३ ॥ शरद्-ऋतु के आते ही नदियो का पानी उतर गया और मार्ग का कीचड भी मूख चला। जैसे शरद् ऋतु ने रघु के मोचने से पहले ही उन्हे दिग्निजय-यात्रा करने को प्रेरित कर दिया ||२४|| उस यात्रा के लिए चलने से पहले घोडो की पूजा के लिए हवन होने लगा। हवन को आग दाहिनी ओर घूमती हुई उम तरह उठ रही थी कि मानो ॐ चतुर्थ सर्ग 0 स गुप्तमूलप्रत्यन्त शुद्धपाणिरयान्वित । षड्विध बलमादाय प्रतस्थे दिग्जिगोषया ॥२६॥ अवाकिरन् वयोवृद्धास्त लाजै पौरयोषित । पृषतैर्मन्दरोद्भूतै क्षीरोर्मय इवाच्युतम् ॥ २७॥ स ययौ प्रथम प्राची तुल्य प्राचीनबर्हिषा । अहिताननिलोधूतैस्तर्जयन्निव केतुभि ॥२८॥ रजोभि स्यन्दनोधूतैर्गजैश्च धनसन्निभै । भुवस्तलमिव व्योम कुर्वन्व्योमेव भूतलम् ।। २९ ॥ प्रतापोऽग्ने तत शब्द परागस्तदनन्तरम्। ययौ पश्चाद्रयादीति चतु स्कन्धेव सा चमू ।। ३०॥ मरुपृष्ठान्युदम्भासि नाव्या सुप्रतरा नदी । विपिनानि प्रकाशानि शक्तिमत्त्वाच्चकार स ॥३१॥ स सेना महती कर्षन्पूर्वसागरगामिनीम्। बभौ हरजटामष्टा गङ्गामिव भगीरथ ॥३२॥ त्याजितै फलमुत्खातैर्भग्नैश्च बहुधा नृपै । तस्यासीदुल्यणो मार्ग पादपैरिव दन्तिन ॥ ३३ ॥ पौरस्त्यानेवमाक्रामस्तास्ताञ्जनपदाञ्जयो। प्राप तालीवनश्याममुपकण्ठ महोदधे ॥३४॥ अनम्राणा समुद्धर्तुस्तस्मात्सिन्धुरयादिव । आत्मा सरक्षित सुहौवृत्तिमाश्रित्य वैतसीम् ।। ३५ ।। वङ्गानुत्साय तरसा नेता नौसाधनोद्यतान्। निचखान जयस्तम्भान्गङ्गास्रोतोऽन्तरेषुस ॥३६ ।। आपादपद्मप्रणता कलमा इव ते रघुम्। फले सवर्धयामासुरुत्वातप्रतिरोपिता ॥ ३७॥ अपने हाथ उठाकर रघु को विजय का आशीर्वाद दे रही हो।।२५ ।। वीर रघु ने पहले राजधानी और सीमा के किलों की रक्षा का प्रबन्ध किया। फिर शुभ मुहूर्त मे घुड़मवार, हायी. रथ, पैदल, गुप्तचर और शत्रु के राज्य के मार्ग को जानने वाली-इन छ प्रभार को मेनाओ को लेकर वे दिग्विजय के लिए चले ॥ २६ ॥ जैसे मन्दराचल से मथते समय क्षीरमागर को लहरां की उछलती हुई उजली फुहारें विष्णु भगवान के ऊपर बरस रही थीं, वैसे ही नगर की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों ने विजय-यात्रा के लिए प्रस्थित रघु के ऊपर धान की खोलें बरमाई ॥ २७॥ इन्द्र के मामान प्रतापी राजा रघु दिग्विजय के लिए पहले पूर्व की ओर चले। वायु लगने से सेना की जो झड़ियाँ फरफराती थीं, वे मानो शत्रुओं को डपट रही थीं।। २८॥ रघु के रथों मे जो धूल ऊपर उड़ी, उमने आकाश को पृथ्वी बना दिया। इधर पृथ्वी पर चलती हुई सेना के काले-काले हाथी बादल जैसे लग रहे थे। उनके कारण पृथ्वी आकाश जैमी दीख रही थी॥ २९ ॥ आगे-आगे रघु का प्रताप चलता था, उसके पाछे उनसरी मेना का कोलाहल सुनायी पड़ता था, तब धूल उडती दिखलायी देती थी और मबके पीछे रथ आदि की सेना चली जा रही थी। इस प्रकार रघु की मेना मानो चार भागों मे बॅटकर चल रही थी॥३०॥ रघु के पाम ऐमी शक्ति तथा ऐसे साधन थे कि मरभूमि में भी जल को धाराएँ बहो लगी, गहरी नदियो पर पुल बँध गये और घने जगलो मे स्वच्छ मार्ग बन गये।। ३१ । जब वे अपना विशाल सेना के माथ पूर्वी ममुद्र की ओर चले तो ऐसे लग रहे थे, मानो शकरजी को जटा मे निक्ली हुई गगाजा को साथ लिये भगीरथ पूर्वी समुद्र की ओर चले जा रहे हों।॥३२॥ कोई जगली हाथा जैसे फलों को गिराता और बडे-बडे पेड़ों को उखाडता-तौटता अपना मार्ग बनाता चलता है, वैसे हो रधु ने भी किसी राजा मे कर लिया, रिमी का राज्य छीना और किमी को लड़ाई मे हराया। इस प्रमार शत्रुओ को नष्ट करके उन्होंने अपने मार्ग के सब रोड़े दूर कर दिये ॥ ३३ ॥ विजयी राजा रघु विभिन पूर्वी राज्यों को जीतते हुए उम समुद्र के किनारे पर पहुंचे, जो तट पर खडे ताट के वृक्षों की छाया पटने से काला दीस रहा था॥३४।। जैसे बेत की शाखाएँ नदी की धारा मे झुरकर खडी रह जाती है, वैसे ही मुह्य देश के राजाओं ने अभिमानियों को उसाड फेकनेवाले रघु की अधीनता चुपचाप स्वीकार कर ली और अपने प्राण बचा लिये॥ ३५॥ तदनन्तर रघु ने उन बगीय राजाओं को हराया, जो जलमेना लेकर लडो आये थे। उन्हे जीतकर रघु ने गङ्गासागर के द्वीप में अपना विजयस्तम्भ गाड दिया ॥३६॥ किमान जैसे धान के पौधों को एक खेत मे उखाडकर दूमरे खेत मे रोपते हैं और फिर वे धान के पौधे किसान का घर अन ५ का ३४ * रघुवशे स तो| कपिशा सैन्यैर्वद्धद्विरदसेतुभि । उत्कलादर्शितपथ कलिङ्गाभिमुखो ययौ॥३८॥ स प्रताप महेन्द्रस्य मूनि तीक्ष्ण न्यवेशयत्। अड्कुश द्विरदस्येव यन्ता गम्भीरदिन ॥३९॥ प्रतिजग्राह कालिगस्तमस्त्रैर्गजसाधन । पक्षच्छेदोद्यत शक्र शिलावर्षीव पर्वत ॥४०॥ द्विषा विषह्य काकुत्स्थस्तत्र नाराचदुर्दिनम् । सन्मङ्गलस्नात इव प्रतिपेदे जयश्रियम् ।। ४१ ।। ताम्बूलीना दलैस्तत्र रचिताऽऽपानभूमय | नारिकेलासव योधा शात्रव च पपुर्यश ॥४२॥ गृहीततिमुक्तस्य स धर्मीवजयी नृप । श्रिय महेन्द्रनाथस्य जहार न तु मेदिनीम् ॥४३॥ ततो वेलातटेनैव फलवत्पूगमालिना। अगस्त्याचरितामाशामनाशास्यजयो ययौ ॥४४॥ स सैन्यपरिभोगेण गजदानसुगन्धिना। कावेरी सरिता पत्यु शङ्कनीयामिवाकरोत् ॥४५॥ बलरध्युषितास्तस्य विजिगीषोर्गताध्वनः । मारीचोद्धान्तहारीता मलयातरुपत्यका ॥ ४६ ।। सस रश्वक्षुण्णानामेलानामुत्पतिष्णव । तुल्यगन्धिषु मत्तेभकटेषु फलरेणव ॥४७॥ भोगिवेष्टनमार्गेषु चन्दनाना समर्पितम्। नाम्रसत्करिणा ग्रैव त्रिपदीच्छेदिनामपि ॥४८॥ दिशि मन्दायते तेजो दक्षिणस्या रवेरपि । तस्यामेव रघो पाण्ड्या प्रताप न विहिरे ॥ ४९ ।। भर देते हैं, वैसे ही रघु ने जिन राजाओं को हराकर उन्हें फिर राजगद्दी पर बैठा दिया, उन बगीय राजाओ ने रघु के चरणकमलो को प्रणाम कर बहुत-मा धन-धान्य देकर उनका मत्कार किया ।। ३७ ।। वहाँ मे चलकर रघु ने हाथियों का पुल बनाकर अपनी पूरी मेना को कपिशा नदी के पार उतार दिया। वहाँ उदीमा के राजाओं ने तो अधीनता स्वीकार को ही थी साथ ही आगे का मार्ग भी बतलाया। तदनुमार रघु कलिङ्गदेश जीतने के लिए आगे बढे ॥ ३८ ॥ जैसे हायीवान् मतवाले हाथी के माथे पर अकुश गडाता है, वैमे ही रघु ने महेन्द्र पर्वत पर पहुंचकर उसकी चोटी पर अपना शिविर स्थापित कर दिया ।। ३९ ।। जैसे प्रस्तरवर्षी पर्वतों ने पत्थर बरमाकर पहाड़ों के पख काटनेवाले इन्द्र का सामना किया था, वैसे ही हाथियों की मेना माय लेकर अस्त्र बरमाते हुए कलिइनरेश ने रघु का मामा किया ॥ ४० ॥ तीर्थो के जल से स्नान कराके जैसे राजाओं का राज्याभिषेक होता है और उन्हे राज्यलक्ष्मी मिलती है, वैसे ही रघु ने भी शत्रुओं के बाणों की वर्धा में स्नान करके विजय प्राप्त को॥४१॥ लडाई के बाद रघु के वीर मैनिकों ने महेन्द्र पर्वत पर पान के पत्तों को छवार मदिरालय बनाया और वे वहाँ नारियल की मदिरा के माथ-माय शत्रुओं का यश भी पी गये॥ ४२ ॥ राजा रघु मदा धर्मयुद्ध करते थे, इसलिए उन्होने कलिद-नरेश को बन्दी तो बना लिया, परन्तु जब उसने इनकी अधीनता स्वीकार कर ली तब छोड़ दिया। इसी प्रकार उन्होने कलिङ्गनरेश की राज्यश्री तो ले ली, परन्तु राज्य उमी को लौटा दिया ।। ४३ ।। इस प्रकार पूर्व दिशा को जीतकर विजयी रघु समुद्र के तट पर होते हुए दक्षिण दिशा को चले, जहाँ फलो से लदे हुए सुपारियो के अनेक वृक्ष थे।॥ १४॥ जव कावेरी के तट पर पहुचे, तब राजा रघु के सैनिकों तथा हाथियों ने जी भरकर उम नदी में नहाया और उममा जल मथ दिया। हाथियों के नहाने से जल मे मद की गन्ध आने लगा। जब वह अपने पति समुद्र के पास गयी तो उमे कावेरी के चरित्र पर सन्देह होने लगा ।। ४५ ॥ वहाँ से चलकर वे बहुत दूर निकल गये और विजय चाहने वाले रघु के सैनिक मलयाचल की उम तलहटी मे उतरे, जहाँ काली मिर्च को याडियों में से हारीत पक्षी उड रहे थे।।४ । उहाँ पृथ्वी पर गिरे हुए इलायची के बीज घोटो को टापो से पिमार वायु के सहारे जाकर हाथियो के उन गालो पर चिपक गये, जहाँ उन्हीं के गन्ध जैसे मद की गन्ध पहले मे निकल रही थी। ४७ ।। मॉपो के लिपटे रह्ने मे चन्दावृक्षों के चारो ओर गहरी रेखाएँ बन गयी थीं, जिनमे बँधे हुए रस्मों को वे हाथी भी नहीं तोड़ सके, जो पैर के रस्मो को एक झटके मे तोड डालते थे। ४८ । दक्षिण दिशा मे महाप्रतापशाली मूर्य का तेज भी मन्द पड़ जाता है, परन्तु रघु का तेज इतना प्रबल था कि वहाँ के पाण्ड्य राजा भी उनके आगे नहीं ठहर मके) ४९ ॥ दक्षिण के ॐ चतुर्थ सर्ग 8 ३५ ताम्रपर्णीसमेतस्य मुक्तासार मदोदधे । ते निपत्य ददुस्तस्मै यश स्वमिव सञ्चितम् ॥५०॥ स निर्विश्य यथाकाम तटेष्वालोनचन्दनौ। स्तनाविव दिशस्तस्या शैलौ मलयदर्दुरौ ।।५१ ॥ असहाविक्रम सा दूरान्मुक्तमुदन्वता। नितम्बमिव मेदिन्या सस्ताशुकमलङ्घयत् ।। ५२ ।। तस्यानोकैर्विसर्पद्विरपरान्तजयोद्यते । रामास्त्रोत्सारितोऽप्यासोत्सालग्न इवार्णव ॥५३।। भयोत्सृष्टविभूषाणा तेन केरलयोषिताम्। अलकेषु चमूरेणुश्शूर्णप्रतिनिधीकृत ॥५४॥ मुरलामारुतोद्भूतमगमत्केतक तद्योधवारवाणानामयलपटवासताम् ॥५५॥ अभ्यभूयत वाहाना चरता गात्रशिञ्जितै । वर्मभि पवनोद्भूतराजतालीवनध्वनि ॥५६॥ खर्जूरीस्कन्धनद्धाना मदोद्गारसुगन्धिषु। कटेषु करिणा पेतु पुन्नागेभ्य शिलीमुखा ॥५७॥ अवकाश किलोदन्वान् रामायाभ्यर्थितो ददौ। अपरान्तमहीपालव्याजेन रघवे करम् ॥५८ ।। मत्तेभरदनोत्कीर्णव्यक्तविक्रमलक्षणम्। त्रिकूटमेव तत्रोच्चैर्जयस्तम्भ चकार स ॥५९ ॥ पारसीकास्ततो जेतु प्रतस्थे स्थलवर्त्मना। इन्द्रियाख्यानिव रिपूस्तत्वज्ञानेन सयमी ॥६०॥ यवनीमुखपद्माना सेहे मधुमद न स । बालातपमिवान्जानामकालजलदोदय ॥६१॥ पाडय राजाओं ने ताम्रपर्णी और समुद्र के मगम मे जितने मोती बटोरे थे, वे सब उन्होंने रघु को ऐसे सौंप दिये कि जैसे अपना बटोरा हुआ यश ही उन्होने दे डाला हो॥५०॥ उन्हे जीतकर महाप्रतापी रघु ने उन मलय और दर्दुर नाम की पहाडियो पर बहुत दिनो तक पड़ाव डाल रक्क्षा, जिन पर चन्दन के पेड़ लगे हुए थे। जो ऐमे दिखायी पडते थे, मानो चन्दन लगे हुए दक्षिण दिशा के दो स्तन हो । ५१ ।। तदनन्तर वे मह्य की उम पहाडी को पार करके आगे बढ़े जो ममुद्र के दूर हट जाने मे ऐमी दिखलायी पड़ती थी, मानो वह पृथ्वी का नितब भाग हो और उम पर मे कपडा हट गया हो॥५२॥ यद्यपि परशुराम ने अपने फरमें मे समुद्र को मह्य पर्वत मे दूर हटा दिया था, फिर भी उसके पाम से जाती हुई रघु की मेना ऐसी लगती थी कि जैसे ममुद्र फिर सह्याद्रि के पास चला आया हो ॥ ५३ ।। केरल देश की जो स्त्रियों साज-मिगार तथा घर छोडकर रघु के भय मे भाग खड़ी हुई थीं, उनके बालो पर रघु की मेना के चलने मे उडी हई जो धूल बैठ गयी थी, वह ऐमी लगती थी कि जैमे कस्तूरी का चूरा लगा हुआ हो॥५४॥ मुरला नदी की ओर से आओवाली वायु कारण जो केवडे के फूलो को धूल उड़ रही थी, वह मैनिकों के कवचों पर बैठकर विना यल के ही मुगन्धित चूर्ण का काम देने लग गयो।। ५५ ॥ चलते ममय घोडों के शरीर के कवच एमे उँचे स्वर मे खनसमा रहे थे कि वायु चलने से जो बड़े-बड़े ताड़ के पेडों मे मे ध्वनि विफल रहा थी, वह भी उसके आगे मन्द पड गयी॥५६ ।। नागकेमर के फूलों पर बैठे हुए भौंरों को जैसे ही खजूर के वृक्ष मे बंधे हुए हाथियों के कपोलों से टपकते हुए मद की गन्ध मिली, तैमे ही वे उन्हें छोड़कर इन पर ट्ट पड़े।। ५७ ॥ पश्चिम के राजाओं ने रघु के अधीन होकर जो उन्हे, कर दिया, वह मानो उन्होंने नहीं, बल्कि उम प्रतापी समुद्र ने कर दिया था, जिसने बहुत प्रार्थना करने पर परशुरामजी को थोडी-मी जगह दी थी॥५४॥ रघु के मतवाले हाथियों ने अपने दाँतों की चोटों से त्रिकूट पर्वत पर जो रेखाएँ बना दी, उनसे वह पर्वत ऐमा लगने लगा कि जैसे रघु की विजय का स्मरण दिलानेवाला जय-स्तम्भ खडा हो और उम पर रघु की विजयगाथा लिखी हुई हो ॥५९।। जैसे इन्द्रियरुपी शत्रुओ को जीतने के लिए कोई योगी तत्त्वज्ञान का महारा लेता है, वैसे ही रघु ने भी पारमी राजाओं को जीतने के लिए स्थल का मार्ग पकडा।। ६०॥ असमय में उठे बादलों मे जैसे प्रभात की धूप में खिले हुए कमलो को चमक जाती रहती है, वैसे ही रघु ने अचानक आक्रमण करके मदिरा मे लाल गालोवाली यवनियो के मुसकमलो को मुरझा दिया॥ ६१ ॥ वहाँ पश्चिम देश के धुडमवार राजाओ में रघु की भीषण लडाई हुई। उम ममय सेना के चलने में इतनी धूल उड़ी . • रघुवशे सङ्ग्रामस्तुमुलस्तस्य पाश्चात्यैरश्वसाधने । शाहकूजितविजेयप्रतियोधे रजस्यभूत् ॥६२॥ भल्लापवर्जितैस्तेषा शिरोभि श्मश्रुलैर्महीम्। तस्तार सरघाव्याप्तै स क्षौद्रपटलैरिव ॥ ६३॥ अपनीतशिरस्त्राणा शेषास्त शरण ययु । प्रणिपातप्रतीकार सरम्भो हि महात्मनाम् ॥६४ ॥ विनयन्ते स्म तद्योधा मधुभिर्विजयश्रमम् । आस्तीर्णाजिनरत्नासु द्राक्षावलयभूमिषु॥६५॥ तत प्रतस्थे कौबेरी भास्वानिव रघुर्दिशम्। शरैरुसैरिवोदीच्यानुद्धरिष्यन् रसानिव ॥६६॥ विनीताध्वश्रमास्तस्य सिन्धुतीरविचेष्टनै । दुधुवुर्वाजिन स्कन्धॉल्लग्नकुइकुमकेसरान् ॥६७॥ तत्र हूणावरोधाना भर्तृषु व्यक्तविक्रमम्। कपोलपाटलादेशि बभूव रघुचेष्टितम् ॥ ६८॥ काम्बोजा समरे सोदु तस्य वीर्यमनीश्वरा । गजालानपरिक्लिष्टुरक्षोटै सार्धमानता ॥६९॥ तेषा सदश्वभूयिष्ठास्तुङ्गा द्रविणराशय । उपदा विविशु शश्वन्नोत्सेका कोसलेश्वरम् ॥७॥ ततो गौरीगुरु शैलमाररोहाश्वसाधन । वर्धयन्निव तत्कूटानुभूतैर्धातुरेणुभि ॥७१ ॥ शशस तुल्यसत्त्वाना सैन्यघोषेऽप्यसम्भ्रमम् । गुहाशयाना सिहाना परिवृत्यावलोकितम् ॥७२॥ भूर्जेषु मर्मरीभूता कीचकवनिहेतव । गङ्गाशीकरिणो मार्गे मरुतस्त सिविरे ॥७३॥ विशश्रमुर्नमेरुणा छायास्वध्यास्य सैनिका । दृषदो वासितोत्सङ्गा निषष्णमृगनाभिभि ॥४॥ सरलासक्तमातङ्गवेयस्फुरितत्विष । आसन्नोषधयो नेतुनक्तमस्नेहदीपिका || ७५॥ कि आस-पाम कुछ भी नहीं दिखलायी पडता था। केवल धनुष की टङ्कार मे ही सैनिक लोग शत्रु. को पहचान पाते थे॥१२॥ मधुमक्त्रियों से भरे छत्ते जैसी दाढियो वाले यवनो के सिरों को भल्ल नाम के बाणों से काट-काटकर रघु ने मारी पृथ्वी पर फैला दिया ॥६३ ।। उनमे मे जो जीते बचे, उन्होने अपने लोहे के टोप उतार-उतारकर रघु के चरणों मे रख दिये। क्योकि महापुरुषों की कृपा प्राप्त करने का एकमात्र यही उपाय है कि उनकी शरण ले ली जाय ॥ ६४॥ रघु के मैनिक वहा अगूर की लताओ से घिरी हुई पृथ्वी पर सुहावनी मृगछालाए बिछाकर चैन मे बैठ गये और मदिरा पी-पीकर लडाई की थकान मिटाने लगे॥६५॥ जैसे मूर्य अपनी तीखी किरणों से पृथ्वी का जल खींचने के लिए उत्तर की ओर घूम जाता है, वैसे हो रघु भी उत्तर के राजाओ को जीतने के लिए उधर ही चल पडे ।। ६६ ।। मिन्धु नदी के तट पर पहुंचकर रघु के घोडे वहाँ की रेती मे लोट-लोटकर अपनी थकावट मिटाने लगे। लोटने से उनके शरीर में जो केमर लग गयी थी, उसे उन्होंने देह हिलाकर झाड दिया ॥६७ ।। अपने प्रचण्ड पराक्रम से वहाँ रघु ने जिन हण राजाओ को मार डाला था, उनकी स्त्रियाँ सिर पीट-पीटकर इतनी रोयीं कि उनके गाल लाल हो गये। ६८ ॥ कबोज (काबुल) के राजे लडाई मे रघु के आगे नहीं टिक मके। हाथियो के बाँधने मे जैसे वहाँ अखरोट की डलियाँ झुक गयी थी, वैसे ही वहाँ के राजे भी रघु के आगे झुक गये।। ६९ ।। हारे हुए उन कबोज के राजाओं ने रघु को बहुत-से घोड़ और बहुत-सा धन दिया, परन्तु उतना धन पार भी कोशलेश्वर रघु को अभिमान नहीं हुआ ।। ७० । वहाँ से वे अपने घोडों की मेना लेकर हिमालय पहाड पर चढ गये, जैसे अपने घोडो की टापों द्वारा उठी हुई गेरू आदि धातुओं की लाल-लाल धूल से वे हिमालय की चोटिया को और भी उँचो करना चाहते हो।७१ ।। मैनिको के समान ही बलवान् सिहाँ ने गुफाओ में लेटे-लेटे ही आँखे धुमाकर रघु की सेना को देखा। उनकी सेना के कोलाहल मे उन सिहों को तनिक भी घबराहट नहीं हुई ॥७२॥ वहाँ पर भोजपत्रों मे मर्मर करता, पहाडी बॉसो के छेदों मे घुमकर बॉमुरी-सी बजाता और गगाजी की फुहारो से ठण्डा होता हुआ वायु रधु की मेवा कर रहा था।।७३ ।। रघु के सैनिक वहाँ नमेर वृक्षों के नीचे उस पथरीली चट्टानों पर बैठकर मुस्ताने लगे, जिनमे से कस्तूरी मृगो के बैठने के कारण सुगन्ध आ रही थी।७४।। देवदार के पेड़ों में बँधे हुए हाथियों के गले मे पटी सॉकले रात को चमकनेवाली बूटियों के प्रकाश के चतुर्थ सर्ग ३७ तस्योत्सृष्टनिवासेषु कण्ठरज्जुक्षतत्वच । गजवर्ज़ किरातेभ्य शशसुर्देवदारव ॥७६ ॥ तत्र जन्य रघो?र पर्वतीयैर्गणैरभूत्। नाराचक्षेपणीयानिष्पोत्पतितानलम् ॥७७॥ शरैरुत्सवसङ्केतान्स कृत्वा विरतोत्सवान् । जयोदाहरण बाह्वोर्गापयामास किन्नरान् ॥७८॥ परस्परेण विज्ञातस्तेषूपायनपाणिषु। राजा हिमवत सारो राज सारो हिमाद्रिणा ॥७९॥ तत्राक्षोभ्य यशोराशि निवेश्यावरुरोह स । पौलस्त्यतुलितस्याद्रेरादधान इव ह्रियम्॥८॥ चकम्पे तोर्णलौहित्ये तस्मिन्प्राग्ज्योतिषेश्वर । तद्गजालानता प्राप्त सह कालागुरुद्रुमै ॥८१॥ न प्रसेहे स रुद्धार्कमधारावर्षदुर्दिनम्। रथवर्मरजोऽप्यस्य कुत एव पताकिनीम् ॥ ८२।। तमोश कामरूपाणामत्याखण्डलविक्रमम्। भेजे भिन्नकटै गैरन्यानुपरुरोध यै ॥८३॥ कामरूपेश्वरस्तस्य हेमपीठाधिदेवताम्। रत्नपुष्पोपहारेण छायामानर्च पादयो ॥८४॥ इति जित्वा दिशो जिष्णुवर्तत रथोद्धतम्। रजो विश्रामयन् राजा छत्रशून्येषु मौलिषु॥८५॥ स विश्वजितमाजहे यज्ञ सर्वस्वदक्षिणम्। आदान हि विसर्गाय सता वारिमुचामिव ।। ८६ ।। सत्रान्ते सचिवसख पुरस्क्रियाभिर्गु:भि शमितपराजयव्यलीकान् । काकुत्स्थश्चिरविरहोत्सुकावरोधान्राजन्यान् स्वपुरनिवृत्तयेऽनुमेने ॥८७।। मे चमचमा उठीं। इस प्रकार 7 बृटियों ने रघु के लिए बिना तेल के ही दीपक का काम कर दिया। ७५ ।। रघु ने जब वहाँ मे अपनी मेा का पडाव हटा लिया, तब देवदार की ऊंची-ऊँची शाखाओं पर हाथियो के गले की माझ्लों को रगड मे बनी हुई रेखाओं को देखकर ही जगलो किरातों ने रघु के हाथियो की ऊँचाई का अनुमान कर लिया।। ७६ ।। वहाँ पहाडी गणों के माय रघु की घनघोर लडाई हुई। रघु की सेना बाण चलाती थी और पहाडी लोग पत्थर बरमाते थे। इस प्रकार लोहे और पत्थर की भिडन्त हो जाने पर तो बराबर आग उत्पन्न हो जाती थी॥७॥ रघु न धुआँधार बाण बरमाकर उत्सवमकेत नामक पहाडियो के छक्के छुड़ा दिये। इस पर किन्नरों ने मिलकर रघु के बाहुबल के अनेक गीत गाये।।७८॥ 7 पहाडी राजाओं ने रत्नों के ढेर रघु को भेट मे दिये, जिन्हे देखकर रघु ने हिमालय के अतुलित धन का और हिमालय ने युद्ध मे रघु के पराक्रम का अनुमार कर लिया ॥७९॥ इम प्रसार हिमालय पर अपना यशस्वी झडा गाडकर रघु आगे कैलाम की ओर न बढकर लौट पड़े। इसमे कैलास पर्वत को यह सोचकर लज्जा हुई कि एक बार रावण ने मुझे उठा क्या लिया कि सभी लोग मुझको मदा के लिए हारा हुआ समझो लगे॥८०॥ वहाँ मे लौहित्या नदी पार करके रघु प्राग्ज्योतिषपुर (आमाम के लोहित पदेश) में पहुंचे। वहाँ पर हाथियों के बँधने मे जैमे कालागुरु के वृक्ष कॉपते थे, वैसे ही प्राग्ज्योतिषपुर का राजा भी रघु के भय । कॉप उठा॥८१॥ वहाँ के राजा ने देखा कि बादलो के बिना केवल ग्घु की मेना की धूल से ही सूर्यमण्डल छिप गया। जब मेना को धूल मे हो वह इतना घबरा गया तब वह उम सेना से कैमे लडता ।। ८२ ॥ तदुपरान्त कामरूप के राजा ने जिन हाथियों को लेकर बड़े-बड़े शत्रुओं को हराया था, उन्हीं हाथियों को उमने इन्द्र मे भी अधिक पगमी रघु को भेट में दे दिया ॥८३ ।। कामरूप के नरेश ने मोने के पीढे पर पड़ी हुई महाराज रधु के चरणो की छाया को देवता जैमा समझकर रत्नों में पूजा॥८४|| इस प्रकार विजयी रघु जब सारी पृथ्वी को जीतकर अपनी राजधानी अयोध्या की ओर लौटे, तब उनके रथ के पहियों से उड़ी हुई धूल पीछे-पीछे चलोवाले पराजित राजाओ के छत्र-विहीन मुकुटो पर बैठकर विश्राम करने लगी॥८५॥ दिग्विजय मे लौटकर रघु ने विश्वजित् नाम का यज्ञ किया, जिसमे उन्होंने अपनी मारी सम्पदा दक्षिणा मे दे डाली। जैसे बादल ममुद्र मे जल लेकर फिर पृथ्वी पर बरसा देते हैं, वैसे ही महात्मा लोग भी धन को दान करने के लिए ही जुटाते हैं।। ८६ ।। यज्ञ समाप्त हो जाने पर रघु और उनके मन्त्रियों ने पराजित राजाओं का बड़ा मत्कार किया और उनके

- ३८
रघुवशे
ते रेखाध्वजकुलिशातपचिह्न सम्राजश्चरणयुग प्रसादलभ्यम् ।
प्रस्थानप्रतिभिरङ्गुलीषु चक्रुर्मालिसक्च्युतमकरन्दरेणुगौरम् ॥८॥
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये
रघुदिग्विजयो नाम चतुर्थ सर्ग ॥४॥
मन मे हारने को जो लाज थी, उसे दूर कर दिया। फिर बहुत दिनों मे अपनी रानियों से बिछुडे हुए
उन राजाओ को उन्होने अपने-अपने देश जाने की आज्ञा प्रदान की।८७।। अयोध्या मे जाते समय
राजाओ ने रघु के उन कृपाप्राप्य चरणों में झुककर प्रणाम किया जिन पर ध्वजा, वज्र और छत्र आदि
की रेखाएँ बनी हुई थीं। उस समय उन राजाओ के मिर की मालाओं मे जो पराग गिरा, उमसे रघु
के चरणों की उंगलियों पहले की अपेक्षा और भी गोरी हो गयीं ।। ८८॥
इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में रघु-दिग्विजय नामक
चौथा सर्ग समाप्त ॥४॥

पञ्चम सर्ग तमध्वरे विश्वजिति क्षितीश नि शेषविश्राणितकोषजातम् । उपाविद्यो गुरुदक्षिणार्थी कौत्स प्रपेदे वरतन्तुशिष्य ॥१॥ स मृण्मये वीतहिरण्मयत्वात्पात्रे निधायायमनर्धशील । श्रुतप्रकाश' यशसा प्रकाश प्रत्युजगामातिथिमातियेय ॥२॥ तमर्चयित्वा विधिवद्विधिज्ञस्तपोधन मानधनाग्रयायो। विशाम्पतिर्विष्टरभाजमारात्कृताञ्जलि कृत्यविदित्युवाच ॥३॥ अप्यग्रणीमन्त्रकृतामृषीणा. कुशाग्रबुद्धे । कुशली गुरुस्ते। यतस्त्वया ज्ञानमशेषमाप्त लोकेन चैतन्यमिवोष्णरश्मे ॥४॥ कायेन वाचा मनसाऽपि शश्वद्यत्सम्भृत वासवधैर्यलोपि। आपाद्यते न व्ययमन्तरायै कच्चिन्महर्षेत्रिविध तपस्तत्॥५॥ आधारबन्धप्रमुखै प्रयत्न सर्धिताना सुतनिर्विशेषम् । कच्चिन्न वाग्वादिरुपप्लवो व श्रमच्छिदामाश्रमपादपानाम्॥६॥ क्रियानिमित्तेष्वपि वत्सलत्वादभग्नकामा मुनिभि कुशेषु । तदशय्याच्युतनाभिनाला कच्चिन्मृगोणामनघा प्रसूति ॥७॥ निर्वय॑ते यैर्नियमाभिषेको येभ्यो निवापाञ्जलय पितॄणाम्। तान्युञ्छषष्ठाङ्गितसैकतानि शिवानि वस्तीर्थजलानि कच्चित् ॥८॥ नीवारपाकादि कडङ्गरोथैरामृश्यते जानपदैर्न कच्चित् । कालोपपन्नातिथिकल्प्यभाग वन्य शरीरस्थितिसाधन व ॥९॥ महाराज रघु जब विश्वजित् यज्ञ में अपना मब प्रकार के कोश दान कर चुके, उमी ममय वरततु के शिष्य कौत्स ऋषि गुम्दक्षिणा के लिए धन मांगने के निमित्त उनके पास पहुँचे ।। १ ।। तब उत्पन्न शीलवान और यशस्वी रघु मिट्टी का पात्र लेकर विद्वान् कौत्म ऋषि की पूजा करो चले। क्योंकि मोने-चाँदो के सब पात्र तो उन्होने पहले ही दान कर दिये थे।॥२॥ तपस्वी कौत्म कुश आमन पर बैठे हुए थे। शास्त्र के विज्ञ एव सबमे श्रेष्ठ मम्माननीय रघु ने बडी विधि मे उनको पूजा को और हाथ जोडकर बोले ।। ३ ।। हे बुद्धिमान् । सूर्य जैसे अपने प्रकाश मे समस्त मसार को चैतन्य प्रदान करता है, वैसे ही जिनसे आपने समस्त ज्ञान प्राप्त क्यिा है और जो मन्त्रद्रष्टा ऋषिया मे मर्वश्रेष्ठ हैं, वे आपके गुर वरतन्तु तो कुशल में हैं||४|| उन्होंने शरीर, मन और वचन मे तीनों प्रकार का जो कठिन तप करना प्रारम्भ किया था और जिसे देखकर इन्द्र भी घबरा उठे थे, उनका वह तप तो निर्विघ्न चल रहा है ॥५॥ आप लोगो ने आश्रम के जिन वृक्षों के थाले बाँधकर उन्हें पुत्र के ममान बड़े जतन से पाला है और जिनसे पथिको को छाया मिलती है, उन वृक्षों को ऑधी-पानी आदि उपद्रवो मे कोई हानि तो नहीं पहुंची है ? ॥६॥ हरिणियो के वे छोटे-छोटे बच्चे तो कुशल से हैं, जिन्हे ऋषि लोग बड़े प्यार से गोद में बैठाकर खेलाते हैं ? जिनकी नाभि का नाल ऋषियो की गोद मे ही सूखकर गिरता है और जिन्हे ऋषिलोग यज्ञ के लिए मचित कुशा को भी साने मे नहीं रोकते ? ॥ ७॥ उन नदियों का जल तो ठीक है, जिनमें आपलोग प्रतिदिन स्नान, मन्ध्या, तर्पण आदि करते हैं और जिनकी रेती पर आप लोगों ने अपने चुने हुए अन का छठा भाग राजा का अश ममझकर छोड रक्या है॥८॥ जिन तिन्नी अन्नो और फलो आप लोग अतिथियों का सत्कार करते हैं और जिन्हे खाकर ही आप लोग रह ? ?

४० गा यतिष्ये। की रघुवशे अपि प्रसन्नेन महर्षिणा त्व सम्यग्विनीयानुमतो गृहाय । कालो ह्यय सङ्क्रमितु द्वितीय सर्वोपकारक्षममाश्रम ते॥१०॥ तवाहतो नाभिगमेन तृप्त मनो नियोक्रिययोत्सुक मे। अप्याज्ञया शासितुरात्मना वा प्राप्तोऽसि सम्भावयितु वनान्माम् ॥११॥ इत्यर्यपात्रानुमितव्ययस्य रयोरुदारामपि निशम्य। स्वार्थोपपत्ति प्रति दुर्बलाशस्तमित्यवोचद्वरतन्तुशिष्य ॥१२॥ सर्वत्र नो वार्तमवेहि राजन्नाथे कुतस्त्वय्यशुभ प्रजानाम् । सूर्ये तपत्यावरणाय दृष्ट कल्पेत लोकस्य कथ तमिस्रा ॥१३॥ भक्ति प्रतीक्ष्येषु कुलोचिता ते पूर्वान्महाभाग तयाऽतिशेषे। व्यतीतकालस्त्वहमभ्युपेतत्त्वार्थिभावादिति मे विषाद ॥१४॥ शरीरमात्रेण नरेन्द्र! तिष्ठन्नाभासि तीर्थप्रतिपादितर्द्धि । आरण्यकोपात्तफलप्रसूति स्तम्बेन नीवार इवावशिष्ट ॥१५॥ स्थाने भवानेकनराधिप सन्नकिञ्चनत्व मखज व्यनक्ति । पर्यायपीतस्य सुरैर्हिमाशो कलाक्षय श्लाघ्यतरो हि वृद्धे ॥१६॥ तदन्यतस्तावदनन्यकार्यों गुर्वर्थमाहर्तुमह स्वस्त्यस्तु ते निर्गलिताम्बुगर्भ शरद्घन नादति चातकोऽपि ॥१७॥ एतावदुक्त्वा प्रतियातुकाम शिष्य महर्नृपतिर्निषिध्य । कि वस्तु विद्वन् । गुरवे प्रदेय त्वया कियद्वेति तमन्वयुक्त ॥१८॥ जाते हैं, उन्हे आस-पास वाले गाँवो के पशु तो नहीं चर जाते है ? ॥९॥ क्या ऋषि वरतन्तु ने आपकी विद्वत्ता से प्रसन्न होकर आपको गृहस्थ बन जाने को आज्ञा दे दी है ? क्योंकि अब आपकी इतनी अवस्था भी हो गयी है कि आप विवाह करें और सबका उपकार करनेवाले गृहस्थाश्रम मे प्रविष्ट हो ॥१०॥ आप जैसे पूज्य महात्मा के आने से मेरा जी नहीं भरा है। मुझे अपनी सेवा करने की भी कोई आज्ञा दीजिए और यह बतलाइए कि आपने केवल अपने गुरुजी की आज्ञा मे ही यहाँ आकर मुझे कृतार्थ किया है या अपनी इच्छा से आने की कृपा को है ।। ११ ।। कौल्म ने बड़े ध्यान से रघु को उदार बाते सुनी, परन्तु देखा कि उनके पास केवल मिट्टी के पात्रभर बचे हैं। इसी से उन्होंने समझ लिया कि अब रघु के पास कुछ भी नहीं है। इससे उनका मुंह उतर गया और उन्होने समझ लिया कि यहाँ हमारा काम नहीं बनेगा। यह सोचकर कौत्म बोले ।। १२ ।। हे राजन् । आपके राज्य मे हमे मब प्रकार का मुख है। जैसे सूर्य के रहते अँधेरा नहीं ठहर पाता, वैसे ही आपके राजा रहने पर प्रजा में दुख कहीं नहीं है ।। १३॥ हे भाग्यशालिन् । बड़ों की पूजा करना तो आपके वश का धर्म ही है और फिर आप तो इस बात मे अपने पूर्वजो से भी आगे बढे हुए हैं। मैं आपके पास कुछ मांगने आया था, परन्तु मेरे आने में कुछ विलम्ब हो गया, इसी का मुझे दु ख है।॥१४॥ हे राजन् । आपो अपना सब धन मुपानों को दे डाला है और केवल शरीरभर आपके पाम बचा है। इसमे अब आप तिन्नी के पौधे के उस ढूंठ जैसे रह गये हैं, जिसके दाने तपस्वियों ने झाइ लिये हो॥१५॥ चक्रवर्ती होते हुए भी यज्ञ मे सब कुछ दान दे देने के बाद दरिद्र होकर आप उम चन्द्रमा जैसे बड़े सुन्दर लग रहे हैं, जिसकी सारी कलाएं धीरे-धीरे देवताओं ने पी ली हो ॥ १६ ॥ आपके पास तो कुछ है नहीं, अतएव मैं अब गुरुदक्षिणा प्राप्त करने के लिए किसी दूसरे धनी का द्वार खटखटाऊँगा। क्योकि पपीहा भी बिना जलवाले बादलो पानी नहीं मांगता| आपका कल्याण हो ॥१७॥ ऐमा कहकर कौत्स जाने के लिए र पञ्चम सर्ग ४१ ततो यथावद्विहिताध्वराय तस्मै स्मयावेविवर्जिताय । वर्णाश्रमाणा गुरवे स वर्णी विचक्षण प्रस्तुतमाचचक्षे ॥१९॥ समाप्तविद्येन मया महर्षिर्विज्ञापितोऽभूद्गुरुदक्षिणायै। सभे चिरायास्खलितोपचारा ता भक्तिमेवागणयत्पुरस्तात्॥२०॥ निर्बन्धसञ्जातरुषाऽर्थकार्यमचिन्तयित्वा गुरुणाऽहमुक्त । वित्तस्य विद्यापरिसङ्घयया मे कोटीश्चतम्रो दश चाहरेति ॥२१॥ सोऽह सपर्याविधिभाजनेन मत्वा भवन्त प्रभुशब्दशेषम्। अभ्युत्सहे सम्प्रति नोपरोद्धमल्पेतरत्वाच्छुतनिष्क्रयस्य ॥२२॥ इत्य द्विजेन द्विजराजकान्तिरावेदितो वेदविदा वरेण । एनोनिवृत्तेन्द्रियवृत्तिरेन जगाद भूयो जगदेकनाथ ॥२३॥ गुर्वर्थमर्थी श्रुतपारदृश्वा रघो सकाशादनवाप्य कामम्। गतो वदान्यान्तरमित्यय मे मा भूत्परीवादनवावतार ॥२४॥ स त्व प्रशस्ते महिते मदीये वसश्चतुर्थोऽग्निरिवाग्न्यगारे। द्वित्राण्यहान्यर्हसि सोढुमर्हन् यावद्यते सार्धायतु त्वदर्थम् ।। २५।। तथेति तस्यावितथ प्रतीत प्रत्यग्रहोत्सगरमग्रजन्मा। गामात्तसारा रघुरप्यवेक्ष्य निष्क्रष्टुमर्थ चकमे कुबेरात् ॥ २६ ॥ वसिष्ठमन्त्रोक्षणजात्प्रभावादुदन्वदाकाशमहीधरेषु मरुत्ससस्येव बलाहकस्य गतिर्विजघ्ने न हि तद्रथस्य ॥२७॥ खड़े हो गये। तब रघु ने उन्हे रोका और पूछा- हे विद्वन् । आप गुरुजी को कौन-सी वस्तु या कितना धन देना चाहते हैं ? सो बतलाइए ।। १८ ॥ ब्रह्मचारी कोत्म ने देखा कि विश्वजित् यज्ञ करने पर भी रघु को अभिमान छ नहीं गया है। इसलिए वे वर्ण और आश्रम की रक्षा करने वाले रघु मे अपने मन की बात बतलाते हुए कहने लगे ॥ १९॥ हे राजन् । विद्या पढ़ चुनने पर मैने गुरुजी से कहा कि आप मुझसे गुरु-दक्षिणा मॉगिए' । गुरुजी ने कहा- 'मैं तुम्हारी गुरभक्ति मे बहुत प्रमन हूँ। तब गुरु-दक्षिणा लेकर क्या होगा'। मैंने बड़ी भक्ति मे उनकी मेवा की थी। उमे ही उन्होने गुरदक्षिणा समझ लिया था ।।२०।। किन्तु जब मैो बार-बार दक्षिणा मांगने के लिए उनमे आग्रह किया तो वे क्रुद्ध हो गये और मेरी आर्थिक दरिद्रता का विचार किये बिना ही बोल उठे- 'मैंने तुम्हे चौदह विद्याएँ पढ़ायी हैं, इसलिए तुम मुझे चौदह करोड स्वर्णमुद्राएँ लाकर दो' ॥२१ ।। पूजा के लिए आपके हाथ मे मिट्टी का पात्र देखकर ही मैं समझ गया कि आपके पाम 'राजा' शब्द के मिवाय और कुछ भी नहीं बचा है। इधर मेरी गुरु-दक्षिणा भी बड़ी भारी है। अतएव अब मेरा मन ही नहीं करता कि आपसे कुछ मॉD ।। २२ ।। वैदिक ब्राह्मणों मे श्रेष्ठ कौत्म के यह क्ले पर चन्द्रमामदृश सुन्दर, निष्पाप तथा जगतीतल के एकमात्र प्रभु रघु फिर बोले ।। २३ ।। आप जैसे वेदपाठी ब्राह्मण गुरुदक्षिणा के लिए हमारे पास आये और यहाँ से निराश लौटकर किसी दूसरे का द्वार देखें, ऐसा नहीं हो माता। ऐसा अपयश मैं नहीं होने दूंगा।।२४।। अतएव आप हमारी यज्ञशाला मे चलिए। वहाँ पर गार्हपत्य, दाक्षिणात्य और आहानीय-ये तीन पूजनीय अग्नियों स्थापित हैं। आप भी चौथी अग्नि के ममान पूजनीय होकर दो-तीन दिन ठहरिए। तब तक मैं आपको गुरु-दक्षिणा के लिए कोई उपाय करता हूँ।। २५ ।। यह सुनकर कौत्स बहुत प्रमन हुए और उन्होंने सत्यवादी रघु की बात मान ली। रघु ने भी देखा कि पृथ्वी पर तो धन है नहीं, इसलिए उन्होंने कुवेर मे धन लेने का निश्चय किया॥ २६ ॥ जैमे वायु के झोको द्वारा मेघ कहीं ६ का० 8. रघुवशेस अथाधिशिश्ये प्रयत प्रदोषे रथ रघु कल्पितशस्त्रगर्भम्। सामन्तसम्भावनयैव धीर कैलासनाथ तरसा जिगीषु ॥२८॥ प्रात प्रयाणाभिमुखाय तस्मै सविस्मया कोषगृहे नियुक्ता । हिरण्मयी कोषगृहस्य मध्ये वृष्टिं शशसु पतिता नभस्त ॥२९॥ त भूपतिर्भासुरहेमराशिं लब्ध कुबेरादभियास्यमानात्। दिदेश कौत्साय समस्तमेव पाद सुमेरोरिव वभिन्नम् ॥३०॥ जनस्य साकेतनिवासिनस्तौ द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्त्वो। गुरुप्रदेयाधिकनि स्पृहोऽर्थी नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ॥३१॥ अथोष्ट्रवामीशतवाहितार्थ प्रजेश्वर प्रोतमना महर्षि । स्पृशन्करेणानतपूर्वकाय सम्प्रस्थितो वाचमुवाच कौत्स ॥ ३२।। किमत्र चित्र यदि कामसू वृत्ते स्थितस्याधिपते प्रजानाम्। अचिन्तनीयस्तु तव प्रभावो मनोषित द्यौरपि येन दुग्धा ॥ ३३॥ आशास्यमन्यत्पुनरुक्तभूत श्रेयासि सर्वाण्यधिजग्मुषस्ते। पुत्र लभस्वात्मगुणानुरूप भवन्तमोड्य भवत पितेव ॥३४॥ इत्थ प्रयुज्याशिषमग्रजन्मा राजे प्रतीयाय गुरो सकाशम् । राजाऽपि लेभे सुतमाशु तस्मादालोकमर्कादिव जीवलोक ॥३५॥ भी जा सकता है, वैसे ही वसिष्ठजी के मन्त्रों से पवित्र रिया हुआ रघु का रथ अबाधरूप से समुद्र, आकाश और पर्वत कहीं भी जा सकता था अर्थात् उनके रथ की गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी।। २७ ।। उन्होंने सोचा कि उम रथ पर चढकर मैं अकेला ही महाप्रतापी और कैलाम के स्वामी कुबेर को एक छोटे से सामन्त राजा के समान महल में जीत लूंगा। ऐमा निश्चय करके वे मॉझ होते ही अस्त्र-शस्त्र रखकर रथ में मोये ॥ २८ ॥ दूसरे दिन मबेरे जैसे ही रघु चलने को उद्यत हुए, तैसे ही राजकोष के रक्षको ने आकर यह विस्मयभरा समाचार दिया कि आज रात को कोश मे आकाश मे बहुत देर तक मोने की वर्षा हुई है ॥२९ ।। बात यह हुई कि रघु को चढ़ाई को बात सुनकर कुबेर ने रात को ही सोने की वर्षा कर दी थी। सोने का वह ढेर ऐमा चमक रहा था कि जैसे रिमी ने वज्र मे मुमेरु पर्वत का एक टुकड़ा काटकर धरती पर गिरा दिया हो । रघु ने वह मारा सोना कौत्म को दे दिया ॥३०॥ उसे देखकर कौत्म ने कहा- मैं इतना ज्यादा सोना लेकर क्या कागा ? मुझे तो गुरुदक्षिणा चुकाने भर को धन चाहिए। इस पर रघु बोले- यह नहीं हो सकता। आप यह सारा धन ले जाइए। यह देखकर अयोध्यानिवामियो ने उन दोनों को बड़ी प्रशमा की! क्योकि उन दोनो मे एक इतना मन्तोषी था कि आवश्यकता से अधिक लेना नहीं चाहता था और दूमरा इतना बड़ा दाता था कि मॉग मे भी अधिक धन देने को सन्नद्ध था ॥ ३१॥ उम धन को रघु ने सैक्टो उँटों और खच्चरों पर लदवा दिया और जब कौत्म चलने लगे, तब राजा ने बटी नम्रता मे उन्हें प्रणाम किया। कौत्म भी बडे प्रसन्न थे। उन्होने विनम्र राजा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ॥३२॥ धर्मात्मा राजाओ के लिए यदि पृथ्वी उनकी इच्छा अनुसार धन दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु तुम्हारे प्रभाव को देखकर सचमुच बड़ा आश्चर्य होता है। क्योकि तुमने तो स्वर्ग मे भी जितना चाहा, उलना धन ले लिया । ३३ ।। ममार की सभी वस्तुएँ तुम्हे मुलभ हैं। अतएव उनके लिए आशीर्वाद देना व्यर्थ है। तथापि मैं तुम्हें यह आशीर्वाद देता हूँ कि जैसे तुम्हारे पिता दिलीप को तुम्हारे जैमा श्रेष्ठ पुत्र मिला है, वैमा ही प्रतापी पुत्र तुम्हे भी प्राप्त हो॥३४॥ राजा रघु को यह आशीर्वाद देकर ब्राह्मण कौत्म अपने गुरुजी के पास चले गये।

स ॐ पञ्चम सर्ग है ब्राह्मे मुहूर्ते किल तस्य देवी कुमारकल्प सुपुवे कुमारम्। अत पिता ब्रह्मण एव ,नाम्ना तमात्मजन्मानमज चकार ॥३६॥ रूप तदोजस्वि तदेव वोर्य तदेव नैसर्गिकमुन्नतत्वम्। न कारणात्स्वादिभिदे कुमार प्रवर्तितो दीप इव प्रदीपात्।। ३७ ॥ उपात्तविद्य विधिवद्गुरुभ्यस्त यौवनोद्भेदविशेषकान्तम्। श्री साभिलाषाऽपि गुरोरनुजा धोरेव कन्या पितुराचकाइक्ष ॥३८॥ अथेश्वरेण क्रयकैशिकाना स्वयवरार्थ स्वसुरिन्दुमत्या । आप्त कुमारानयनोत्सुकेन भोजेन दूतो रघवे विसृष्ट ॥३९॥ त प्लाध्यसम्बन्धमसौ विचिन्त्य दारक्रियायोग्यदश च पुत्रम्। प्रस्थापयामास ससैन्यमेनमृद्धा विदर्भाधिपराजधानीम्॥४०॥ तस्योपकारिचितोपचारा वन्येतरा जानपदोपदाभि । मार्गे निवासा मनुजेन्द्रसूनोर्बभूवुरद्यानविहारकल्पा ॥४१॥ नर्मदारोधसि सीकरा!मरुद्धिरानर्तितनक्तमाले। निवेशयामास विलसिताध्वा क्लान्त रजोधूसरकेतु सैन्यम् ॥ ४२॥ अथोपरिष्टाभ्रमरैर्भमद्धि प्रायमूचितान्त सलिलप्रवेश | निर्धातदानामलगण्डभित्तिर्वन्य सरित्तो गज उन्ममज ॥४३॥ तदनन्तर जैसे मूर्य से ममार को प्रकाश मिलता है, वैसे ही ब्राह्मण के आशीर्वाद से थोड़े ही दिनों बाद रघु को पुत्र-रल प्राप्त हुआ।॥३५॥ रघु की रानी को कोख मे बडे तडके ब्राह्ममुहूर्त मे कार्तिकेय के समान तेजस्वी पुत्र पैदा हुआ। ब्राह्ममुहूर्त में जन्म लेने के कारण पिता रघु ने ब्रह्मा के नाम पर अपने लड़के का नाम 'अज' रक्वा ॥३६ ।। जैसे एक दीपक मे जलाये जाने पर दूमरे दीपक मे भी ठीक वैसी ही लौ और वैमी ही ज्योति प्रकट होती है, वैसे ही अज भी रूप, गुण और बल-मभी बातों में रघु के जैसा ही था॥३७॥ जैसे कोई शीलवती कन्या अपनी इच्छा के अनुरूप स्प-गुणवाले वर को चुन करके भी विवाह के लिए पिता की आज्ञा ले लेना चाहता है, वैसे ही राज्यलक्ष्मी भी यद्यपि सुन्दर और युवा अज को स्वामी बनाना चाहती थी, तथापि वह रघु की आज्ञा की बाट जोह रही थी कि वे कब अज को राज्य सौंपते हैं॥३८॥ इसी बीच क्रयकैशिष (विदर्भदेश) के राजा भोज ने अपनी बह्न इन्दुमती के स्वयवर मे अज को बुलाने के लिए अपना एक विश्वस्त दूत महाराजा रघु के पास भेजा ।। ३९ ॥ रघु ने भी भोजवंश के साथ अपने कुल का मम्बन्ध करना ठीक समझा और कुमार अज भी विवाह के योग्य हो गये थे। अतएव उन्होने सेना के माथ अज को विदर्भनरेश की राजधानी मे भेज दिया।॥४०॥ मार्ग मे अज के ठहरने के लिए ओक ऐमे पितानों का प्रबन्ध मिया गया था, जिनमें सब प्रकार के सुख को सामग्री एकत्र कर दी गयी और आम-पास के गांववालों ने अज के लिए अच्छी-अच्छी वस्तुएँ भेट मे लाकर दी। इन मबमे वे ग्रामीण-स्थान भी ऐसे लगने लगे, मानो अज राजमो विलाससम्पन्न उद्यानों मे टिके हुए हो॥ ४१ ।। आगे चलकर अज ने नर्मदा नदी के किनारे अपनी उम थकी हुई सेना का पड़ाव डाला, जिमको पताकाएँ मार्ग को धूल लगने मे मटमैली हो गयी थीं। वहाँ बड़ा शीतल वायु बह रहा था और उसके झोकों से करज के पेड़ झूम रहे थे॥४२॥ तभी एक जगली हाथी झूमता हुआ नर्मदा के जल मे मे निकला। जल में घुसने से पहले ही मद के कारण झुण्ड के झुण्ड भौरे उम पर मंडरा रहे थे। जल में स्नान करने के कारण उसके माथे के दोनो ओर का मद धुल गया था।॥४३ ।। नहाने से यद्यपि उसके दाँतों मे लगी गेरू की लाली छूट गयी थी, फिर भी पत्थर की रघुवर नि शेषविक्षालितधातुनाऽपि वप्रक्रियामृक्षवतस्तटेषु। नीलोवरखाशवलेन शसन्दन्तद्वयेनाश्मविकुण्ठितेन || ४४॥ सहारविक्षेपलघुक्रियेण हस्तेन तीराभिमुख सशब्दम्। बभौ स भिन्दन्बृहतस्तरङ्गान्वार्यर्गलाभग इव प्रवृत्त ॥४५॥ शैलोपम शैवलमञ्जरीणा जालानि कर्षन्नुरसा स पश्चात् । पूर्व तदुत्पीडितवारिराशि सरित्प्रवाहस्तटमुत्ससर्प ॥४६॥ तस्यैकनागस्य कपोलभित्योर्जलावगाहक्षणमात्रशान्ता। वन्येतरानेकपदर्शनेन पुनर्दिदीपे मददुर्दिनी ॥४७॥ सप्तच्छदक्षीरकटुप्रवाहमसह्यमाघाय मद तदीयम्। विलङ्गिताधोरणतीव्रयला सेनागजेन्द्रा विमुखा बभूवु ॥४८॥ स च्छिन्नबन्धद्रुतयुग्यशून्य भग्नाक्षपर्यस्तरथ क्षणेन । रामापरित्राणविहस्तयोध सेनानिवेश तुमुल चकार । ४९ ।। तमापतन्त नृपतेरवध्यो वन्य करीति श्रुतवान्कुमार । निवयिष्यन्विशिखेन कुम्भे जघान नात्यायतकृष्टशार्ङ्ग ॥५०॥ स.विद्धमात्र किल नागरूपमुत्सृज्य तद्विस्मितसैन्यदृष्ट । स्फुरत्प्रभामण्डलमध्यवर्ति कान्त वपुर्योमचर प्रपेदे ॥५१॥ अथ प्रभावोपन कुमार कल्पद्रुमोत्थैरवकीर्य पुष्यै । उवाच वाग्मी दशनप्रभाभि सवर्धितोर स्थलतारहार ॥५२॥ की रगड़ से उसके दोनों दॉतो पर जो नीली-नोली रेखाएँ बन गयी थीं, उनसे ऐसा लगता था कि जैसे उमने ऋक्षवान् पर्वत की शिलाओं मे टक्कर मारी हो॥४४॥ वह हाथी ज्यों-ज्यों तट की ओर आगे बढा त्यो-त्यों अपनी मूंड फैला और मिकोड कर चिग्घाडता हुआ जल को लहरो को चीरने लगा। उम समय ऐसा प्रतीत होता था कि मानो वह आलान की मॉकले तोड रहा है।४५ ।। तभी वह पहाड जैसा लम्बा-चौडा हाथी छाती से सेंवार को अपने माथ सींचता हुआ तट पर आ पहुँचा। इममे जल में जो लढे उठी, वे उमसे भी पहले तट पर आ पहुँची ।। ४६ ।। नदी में नहाने मे यद्यपि उस हाथी के माथे का मब मद धुल चुका था, फिर भी अज की मेना के पालतू हाथियों को देखकर वह बलवान् और युद्ध हाथी फिर माथे से मद बहाने लगा ॥४७॥ जब अज के हाथियो को उसके छतिवन के दूध जैसे कसैले मद को गन्ध मिली, तब वे हाथीवानों के बार-बार रोकने पर भी इधर-उधर भागने लगे॥४८॥ उस विशाल जगली हाथी को देखा तो सब घोड़े भी रस्मा तुडा-तुडाकर भाग चले। इस भगदड मे जिन रथों के धुरे टूट गये थे, वे जहाँ-तहाँ गिरे पडे थे। मैनिक लोग अपनी स्त्रियों को छिपाने के लिए सुरक्षित स्थान ढूँढने लगे। इस प्रकार उम एक हाथी ने सारी मेना में भगदड मचा दी॥४९॥ वह हाथी अज की ओर बढा चला आ रहा था, किन्तु अज ने मोचा कि यह जगली हाथी है, इसको मारना ठीक नहीं है। मो उन्होने अपने धनुष को थोडा-मा खीचकर एक बाण उसके मस्तक में इस ढग से मारा कि जिसमे वह लौट जाय ॥५०॥ बाण लगते ही वह हाथी का शरीर त्यागकर ऐसा सुन्दर और तेजस्वी हो गया, जैसे देवता होते हैं। यह देखकर अज के समस्त सैनिक आँखे फाड-फाड़कर देखते हुए जहाँ के तहाँ खडे रह गये ।। ५१ ॥ उम देववेषधारी पुरुष ने अपने प्रभाव से कल्पवृक्ष के फूल मॅगाकर अज के ऊपर बरसाये और जब उसने बोलने के लिए मुंह खोला, तब उसके दांतों की दीप्ति से उसके गले मे पड़ा हुआ हार चमक उठा ।।५२।। वह बोला—में गन्धर्वो के राजा प्रियदर्शन का पुत्र प्रियवद हूँ।

ह पञ्चम सर्ग ४५ मतगशापादवलेपमूलादवाप्तवास्मि मतङ्गजत्वम्। अवेहि गन्धर्वपतेस्तनूज प्रियवद’ मा प्रियदर्शनस्य ।। ५३॥ स चानुनीत प्रणतेन पश्चान्मया महर्षिर्मूदुतामगच्छत् । उष्णत्वमग्न्यातपसम्प्रयोगाच्छैत्य हि यत्सा प्रकृतिलस्य ॥५४॥ इक्ष्वाकुवशप्रभवो यदा ते भेत्स्यत्यज कुम्भमयोमुखेन । सयोक्ष्यसे स्वेन वपुहिम्ना तदेत्यवोचत्स तपोनिधिर्माम्॥५५॥ सम्मोचित सत्ववता त्वयाऽह शापाच्चिरप्रार्थितदर्शनेन । प्रतिप्रिय चेद्भवतो न कुर्या वृथा हि मे स्यात्स्वपदोपलब्धि ॥५६॥ सम्मोहन नाम सखे। ममास्त्र प्रयोगसहारविभक्तमन्त्रम्। गान्धर्वमादत्स्व यत प्रयोक्तुर्न चारिहिसा विजयश्च हस्ते ॥५७।। अल ह्रिया मा प्रति यन्मुहूर्त दयापरोऽभू प्रहरन्नपि त्वम् । तस्मादुपच्छन्दयति प्रयोज्य मयि त्वया न प्रतिषेधरौक्ष्यम् ॥५८॥ तयेत्युपस्पृश्य पय पवित्र सोमोद्भवाया सरितो नृसोम । उदइमुख सोऽस्त्रविदस्त्रमन्त्र जग्राह तस्मानिगृहीतशापात्॥५९ ॥ एव तयोरध्वनि दैवयोगादासेदुषो सख्यमचिन्त्यहेतु। एको ययौ चैत्ररथप्रदेशान् सौराज्यरम्यानपरो विदर्भान्॥६०॥ त तस्थिवास नगरोपकण्ठे तदागमारढगुरुप्रहर्ष । प्रत्युज्जगाम क्रयकैशिकेन्द्रश्चन्द्र प्रवृद्धोमिरिवोर्मिमाली॥६१ ॥ एक बार मैंने अभिमानवश मतग ऋषि का अपमान कर दिया था। अतएव उन्ही के शाप मे मैं हाथी हो गया ॥ ५३ ।। जब मैंने उन ऋषि से बहुत अनुनय-विनय किया तब उन्हें दया आ गयो। क्योंकि जल तो आग या धूप की गर्मी पाकर ही गरम होता है, उसका स्वभाव तो ठडा ही रहता है।। ५४।। तब प्रमन्न होकर उन मतग मुनि ने कहा-इक्ष्वाकुवश में उत्पन अज नाम के कुमार जब तुम्हारे माथे पर लोहे के फलवाला बाण मारेगे, तब उनकी महिमा मे तुम्हे फिर मे अपना वास्तविक शरीर प्राप्त हो जायेगा ।। ५५ ॥ तब मैं हाथी हो गया और आपके आने की बाट जोहो लगा। आज बडे भाग्य से आप आ गये और मुझे शाप मे छुड़ा दिया। इस उपकार के बदले यदि मैंने आपका कोई प्रत्युपकार न किया तो मेरा पुन शरीर पाना ही व्यर्थ है।। ५६ ॥ हे मित्र । मेरे पाम यह मम्मोहन नाम का गन्धर्वास्त्र है, जिसके चलाने और रोकने के अलग-अलग मन्त्र हैं। इस दुर्लभ अस्त्र को आप ले लीजिए। इसमे विशेषता यह है कि जब आप इसे चलायेगे, तब आप शत्रुओ के प्राण लिये बिना ही उन्हे जीत लेंगे ।। ५७ ।। आपने जो मेरे ऊपर बाण चलाया है, उममे जैसे आपके मन में कुछ मकोच हो रहा है। परन्तु लजाने की क्या बात है ? क्योंकि बाण चलाते समय भी आपके मन मे मुझे मारने की इच्छा तो थी नहीं, बल्कि आपने तो दया करके ही बाण चलाया था। अत में प्रार्थना करता हूँ कि आप यह अस्त्र ले लीजिए। इसमें आना-कानी मत करिए।। ५८ ॥ तब चन्द्रमा के ममान सुन्दर अज ने गन्धर्व का कहना मानकर पहले चन्द्रमा मे उत्पन नर्मदा के जल का आचमन क्यिा और फिर उत्तर की ओर मुंह करके शापमुक्त उम गन्धर्व मे वह अस्त्र और उमके चलाने-रोकने का मत्र भी ले लिया ।। ५९॥ इस प्रकार दैवयोग से अज और प्रियवद की मार्ग मे ही अकारण मित्रता हो गयी। वहाँ से प्रियवद कुबेर के चित्ररथ नामक उपवन की ओर और अज उस विदर्भ देश की ओर चल पडे, जो सुन्दर शामा के कारण बड़ा रमणीक था।॥६०॥ विदर्भननरेश को जब यह समाचार मिला कि अज आ गये हैं, तब वे बहुत प्रसन्न त क रघुवशे प्रवेश्य चैन पुरमग्रयायो नीचैस्तथोपाचरदर्पितथी । मेने यथा तत्र जन समेतो वैदर्भमागन्तुमज गृहेशम्॥६२॥ तस्याधिकारपुरुष प्रणतै प्रदिष्टा प्रारद्वारवेदिविनिवेशितपूर्णकुम्भाम् । रम्या रघुप्रतिनिधि स नवोपकार्या बाल्यात्परामिव दशा मदनोऽध्युवास ॥३॥ तत्र स्वयवरसमाहृतराजलोक कन्याललाम कमनीयमजस्य लिप्सो । भावावबोधकलुषा दयितेव रात्रौ निद्रा चिरेण नयनाभिमुखी बभूव ॥६४ ॥ कर्णभूषणनिपीडितपोवरास शय्योत्तरच्छदविमर्दकृशाङ्गरागम्। सूतात्मजा सवयस प्रथितप्रबोध प्राबोधयन्नुषसि वाग्भिरुदारवाच ॥६५॥ रात्रिर्गता मतिमता वर । मुश्च शय्या धात्रा द्विधैव ननु धूर्जगतो विभक्ता। तामेकतस्तव बिभर्ति गुरुर्विनिद्रस्तस्या भवानपरधुर्यपदावलम्बी ।। ६६ ॥ निद्रावशेन भक्ताऽप्यनवेक्षमाणा पर्युत्सुकत्वमवला निशि खण्डितेव । लक्ष्मीविनोदयति येन दिगन्तलम्बी सोऽपि त्वदाननरुचि विजहाति चन्द्र ॥६७ ।। तद्वल्गुना युगपदुन्मिषितेन तावत् सद्य परस्परतुलामधिरोहता द्वे। प्रस्पन्दमानपरुषतरतारमन्तश्चक्षुस्तव प्रचलितभ्रमर पद्मम्।। ६८॥ वृन्ताच्छ्लथ हरति पुष्पमनोकहाना ससृज्यते सरसिजैररुणाशुभिन्ने । स्वाभाविक परगुणेन विभातवायु सौरभ्यमीप्सुरिव ते मुखमारुतस्य ॥६९ ॥ हुए और जैसे समुद्र अपनी लहरों को उचें उठार चन्द्रमा का स्वागत करता है, वैसे ही उन्होंने भी के बाहर अज के पड़ाव पर जाकर उनका स्वागत किया ।। ६१ ॥ तदनन्तर राजा भोज अज को अपने साथ नगर में ले गये और वहाँ उन्हें अपना सब कुछ भेट करके ऐसी नम्रता के साथ उनका सत्कार किया कि लोग यह ममझने लगे कि अज इस घर के स्वामी हैं और भोज अतिथि हैं।। ६२॥ वहाँ मे राजा भोज के मेवक अज को बड़ी नम्रता मे उम मनोहर राजमहल मे ले गये, जिसके द्वार की चौकियों पर जल से भरे मङ्गल-कलश रक्से हुए थे। उस भवन में रघु के प्रतिनिधि अज ऐमे रहने लगे, मानो कामदेव ने अपना बचपन बिताकर जवानी में प्रवेश किया हो ॥६३ ।। अब अज की यह इच्छा हुई कि किसी प्रकार उस कन्या को प्राप्त करे, जिसे पाने के लिए मैकडों राजा स्वयंवर में आये हुए हैं। इसी उलझन मे पडे रहने के कारण अज की आँखों मे रात को उसी प्रकार बहुत विलम्ब से नींद आयो, जैसे पति के स्वभाव मे अनभिज्ञ नयी बहू उसके पाम विलम्ब से जाती है।। ६४॥ एक करवट सोने के कारण अज के भरे हुए कन्धों पर कुडल के दबाव मे उमका चिह्न पड गया था और बिछौने की रगड़ से उनके शरीर का अगराग पुंछ गया। दिन निकलते ही उनकी ममान अवस्था के और मुदुभाषी सूतपुत्र स्तुति करके बुद्धिमान् अज को जगाने लगे। ६५ ।। हे परम बुद्धिमान् । रात बीत गयी, अब शय्या छोडिये। ब्रह्मा ने पृथ्वी का भार केरल दो भागों में बाँट रक्खा है, जिसे एक ओर तो तुम्हारे पिता सदा मजग रहकर मॅभालते हैं और दूसरी ओर का मार जागकर आपको सँभालना है॥६६॥ जब तुम्हारी मौन्दर्यलक्ष्मी ने यह देखा कि तुम निद्रामपिणी दुमरी स्त्री के वश मे हो गये हो, तब वह चाहती हुई भी रुट होकर तुम्हारे ही मुख के समान मुन्दर चन्द्रमा के पास चली गयी, परन्तु इम समय चन्द्रमा भी मलिन हो गया है, इसलिए वह बेचारी निराधार हो गयी है। क्योकि तुम्हारे मुख की बराबरी करनेवाला और कोई सुन्दर स्वरुप वाला तो है नहीं कि जिमके पाम वह जा सके। अतएव जागकर तुम उमे फिर मे अपना लो॥ ६७ ।। तुम्हारी बन्द आँसो मे पुतलियाँ घूम रही हैं और तालाबों में कमलों के भीतर भीर गूंज रहे हैं। यदि इस समय उठो तो सूर्य के निकलने पर तुम्हारे नेत्र और कमल एक साथ मिलकर एक जैसे सुन्दर लगने लगेगे॥६८॥ प्रात कालीन पवन वृक्षो की नगर

४७
ॐ पञ्चम सर्ग 8
ताम्रोदरेषु पतित तरुपल्लवेषु निर्धातहारगुलिकाविशद हिमाम्भ ।
आभाति लब्धपरभागतयाऽधरोष्ठे लोलास्मित सदशनार्जिरिव त्वदीयम् ॥ ७० ॥
यावत्प्रतापनिधिराक्रमते न भानुरहाय तावदरुणेन तमो निरस्तम्।
आयोधनाग्रसरता त्वयि वीर! याते कि वा रिऍस्तव गुरु स्वयमुन्छिनति ॥७१ ॥
शय्या जहत्युभयपक्षविनीतनिद्रा स्तम्घेरमा मुखरभृङ्खलकर्पिणस्ते।
येषा विभान्ति तरणारुणरागयोगाद्विन्नाद्रिगरिकतटा इव दन्तकोशा ॥७२॥
दीर्घष्वमो नियमिता पटमण्डपेषु निद्रा विहाय वनजाक्ष | वनायुदेश्या ।
वक्त्रोष्मणा मलिनन्ति पुरोगतानि लेह्यानि सैन्धवशिलाशकलानि वाहा ॥७३॥
भवति विरतभक्तिानपुष्पोपहार, स्वकिरणपरिवेषोदेदशून्या प्रदीपा ।
अयमपि च गिर नस्त्वत्प्रबोधपयुक्तामनुवदति शुकस्ते मझुवास्पारस्थ ॥४॥
इति विचितवाग्भिन्दिपुरै कुमार सपदि विगतनिद्रस्तल्पमुज्झाञ्चकार ।
मदपटुनिनर्बोिधितो राजहसे सुरगज इव गाङ्ग सैकत सुप्रतीक ॥५॥
विधिमवसाय्य शास्त्रदृष्ट दिवसमुखोचितमश्चिताक्षिपक्ष्मा।
कुशलविरचितानुकूलवेष
क्षितिपसमाजमगात्स्वयवरस्थम् ।। ७६ ।।
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये अजस्त्रयवरा-
भिगमनो नाम पञ्चम सर्ग ॥५॥
अथ
शाखाओं पर झूलोवाले तथा ढीली कोर के फूले को गिराता और सूर्य की किरणा मे खिले हुए कमलों
को छूता हुआ चल रहा है। जैसे तुम्हें जागा हुआ 7 देसफर वह तुम्हारे मुख की स्वाभाविक भुगन्ध
को औरों से लेने का प्रयास कर रहा हो ।। ६९ ।। वृक्षों के लाल-लाल पत्तों पर गिरकर हार के उजले
मोतियों के ममान निर्मल ओम-कण वैसे हा मुन्दर लग रहे हैं, जैसे हमते ममय तुम्हारे लाल-लाल
होठों पर पड़ी हुई दाँतो की दीप्ति मुन्दर लगती है।। ७० ।। मूर्य क उदय होो से पहले ही उसके चतुर
मारथी अरुण ने ममार से अँधेर को भगा दिया। यह ठीक भी है, क्योंकि जब सेवक चतुर होता है,
तब स्वामी को स्वय कार्य करने का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। रमा प्रकार जब तुम्हारे जैमे योग्य पुत्र
युद्ध मे जाकर लड़ते हैं, तब क्या तुम्हारे पिताजी को शत्रुओ को माग्ने का मष्ट उठाना पड़ता है ? ॥७१ ।।
तुम्हारी मेना के हाथी दोनों ओर करवटे बदलकर सनसनाती हुई पॉरलों को सींचते हुए उठ खड़े हुए
हैं। लाल मूर्य की किरण पड़ने मे उनने दाँत ऐमे लगते हैं रि मानो वे अभी गेट का पहाइ बहाकर
चले आ रहे हों।॥७२॥ हे कमल मदृश नेत्रवाले अज। बड़े-बड़े पट-मडयों में बंधे तुम्हारे बनायु (पारम)
देश के घोडे नाद छोडकर मेधानमक के उन टुकड़ों को अपने मुंह को भाप मे मैला कर रहे हैं, जो
चाटने के लिए उनके आगे रक्खे हुए हैं ।। ७३ | इस ममय रात को मजावट के फूल मुरझाकर टूक-टूक
हो गये हैं। उजाला हो जाने के कारण दीपक का प्रकाश अब अपनी लौ से बाहर नहीं जाता और
पिंजरे में बैठा तथा मीठी बोली बोलनेवाला तुम्हारा यह तोता भी हमारी ही बातों को दुहरा रहा
है।।७४।। आकाशगगा को रेती मे लेटा हुआ देवताओं का मुप्रतीक नामक हाथी जैमे राजहतों का शब्द
सुसकर जाग जाता है, वैसे ही चारणों की मीठी वाणा मुनकर राजकुमार अज उठ बैठे ।। ७५ ।। मुन्दर
पलकोंवाले राजकुमार अज ने उठकर प्रात काल की मब शास्त्रविहित क्रियाएँ सम्पन्न की। बाद में उनके
चतुर सेवकों ने उन्हें बहुत सुन्दर वस्त्र पहनाये। इस प्रकार समुचित वेषभूषा मे मज-धजकर वे स्वयवर
के लिये आये हुए राजसमाज की ओर चल पटे॥७६ ॥
इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में अज का स्वयदर-गमन नामक
पांचवा सर्ग समाप्त।॥५॥

स काम स । षष्ठ सर्ग तत्र मश्चेषु मनोजवेषान्सिहासनस्थानुपचारवत्सु । वैमानिकाना मरुतामपश्यदाकृष्टलीलानरलोकपालान्॥१॥ रतेहीतानुनन प्रत्यर्पितस्वामिवेश्वरेण। काकुत्स्थमालोकयता नृपाणा मनो बभूवेन्दुमतीनिराशम् ॥२॥ वैदर्भीनर्दिष्टमसो कुमार क्लृप्तेन सोपानपथेन मञ्चम्। शिलाविभडै{गराजशावस्तुङ्ग नगोत्सङ्गमिवारुरोह ॥३॥ परार्ध्यवर्णास्तरणोपपन्नमासेदिवान् रलवदासन भूयिष्ठमासीदुपमेयकान्तिमयूरपृष्ठायिणा गुहेन ॥४॥ तासु श्रिया राजपरम्परासु प्रभाविशेषोदयदुर्निरीक्ष्य । सहस्रधात्मा व्यरुचद्विभक्त पयोमुचा पङ्क्तिषु विद्युतेव ॥५॥ तेषा महार्हासनसस्थितानामुदारनेपथ्यभृता स मध्ये । रराज धाम्ना रघुसूनुरेव कल्पद्रुमाणामिव पारिजात ॥६॥ नेत्रव्रजा पौरजनस्य तस्मिन्विहाय सर्वान्नृपतीन्निपेतु । मदोत्कटे रेचितपुष्पवृक्षा गन्धद्विपे वन्य इव द्विरेफा ॥७॥ अथ स्तुते बन्दिभिरन्वयज्ञै सोमार्कवश्ये नरदेवलोके। सञ्चारिते चागुरुसारयोनौ धूपे समुत्सर्पति वैजयन्ती ॥८॥ पुरोपकण्ठोपवनाश्रयाणा कलापिनामुद्धतनृत्यहेतौ। प्रध्मातशये परितो दिगन्तास्तूर्यस्वने मूर्च्छति मङ्गलार्थे ॥९॥ स्वयवर की सभा मे जाकर अज ने देखा कि मुमज्जित मचों पर बैठे हुए राजालोग ऐसे मुन्दर लग रहे हैं, जैसे विमानों पर देवता बैठे हुए हों॥१॥ वहाँ जब दूसरे राजाओं ने अज को देखा, तब उन्होने इन्दुमती को पाने की मब आशाएँ छोड दीं। क्योंकि अज ऐसे लग रहे थे कि जैसे कामदेव हो और रति की प्रार्थना पर शिवजी ने उसे पुन जीवित कर दिया हो ॥२॥ जैमे मिहशावक एक-एक शिला पर पैर रखता हुआ पहाड पर चढ़ जाता है, वैमे ही राजकुमार अज भी सुन्दर सीढियों पर चढ़कर भोज के बतलाये हुए मच पर जाकर बैठ गये ॥३॥ जिम मिहासन पर वे बैठे, वह मोने का बा। हुआ था। उममे रत्न जड़े थे और रग-बिरगे वस्त्र बिछे थे। उस पर बैठकर वे ऐसे सुन्दर लग रहे थे, जैमे कात्तिकय अपने मोर की पीठ पर बैठे हुए हों॥४॥ उम सभा में बैठे राजाओं का ठाट-बाट और तडक-भडक देखकर आँखे चौधियाँ जाती थी और ऐसा लगता था कि मानों लक्ष्मी ने अपनी शोभा वैसे ही उन लोगो मे वॉट दी हो, जैसे बिजली अपनी दीप्ति बादलों में बॉट देती है।।५॥ नन्दावन के वृक्षो मे जैसे पारिजात का वृक्ष सबमे सुन्दर होता है, वैसे ही वहुमूल्य मिहासनों पर बैठे और ठाट-बाट से सजे हुए राजाओं के बीच मे अकेले अज ही जंचते थे॥६॥ जैसे भौंरे फूलवाले वृक्षों को छोडकर मदवाही जगली हाथियों की ओर झुक पड़ते हैं, वैसे ही नगरवासियों की आँखे सब राजाओं से हटकर अज पर जा टिकी।।७।। उसी समय मब राजाओ के वशों को जाननेवाले भाटों ने सूर्य और चन्द्रवशी राजाओं की बिस्दावली बखानी और अगर के मार मे बनायी हुई धूप-बत्तियों का धुआँ चारों ओर से उडता हुआ फहराती हुई पताकाओं तक जा पहुँवा ॥८जिन शखो और मगलवाद्यों के बजने पर के पाठ सर्ग 2 Arren E मनुष्यवाहा चतुरस्रयानमध्यास्य कन्या परिवारशोभि । विवेश मश्चान्तरराजमार्ग पतिवरा क्लृप्तविवाहवेषा ॥१०॥ तस्मिन्विधानातिशये विधातु कन्यामये नेत्रशतैकलक्ष्ये। निपेतुरन्त करणेनरेन्द्रा देहै स्थिता केवलमासनेषु॥११॥ ता प्रत्यभिव्यक्तमनोरथाना महीपतीना प्रणयाग्रदूत्य । पवालशोभा इव पादपाना शृङ्गारचेष्टा विविधा बभूवु ॥१२॥ कश्चित्कराभ्यामुपगूढनालमालोलपताभिहतद्विरेफम् रजोभिरन्त परिवेषवन्धि लोलारविन्द समयाञ्चकार ॥१३॥ विसस्तमसादपरो विलासी रत्नानुविद्धागदकोटिलग्नम् ।। प्रालम्बमुत्कृष्य यथावकाश निनाय साचीकृतचारुवक्त्र ॥१४॥ आकुश्चिताग्राङ्गुलिना ततोऽन्य किश्चित्समावर्जितनेत्रशोभ । तिग्विसर्पिनखप्रभेण पादेन हैम विलिलेख पीठम् ।। १५ ।। निवेश्य वाम भुजमासनार्धे तत्सन्निवेशादधिकोन्नतास । कश्चिद्विवृत्ततिकभिन्नहार सुहृत्समाभाषणतत्परोऽभूत् ॥१६॥ विलासिनोविभ्रमदन्तपत्रमापाण्डुर केतकबर्हमन्य । प्रियानितम्बोचितसन्निवेशैर्विपाटयामास युवा नखाग्रे ॥१७॥ कुशेशयाताम्रतलेन कश्चित्करेण रेखाध्वजलाञ्छन। रत्नामुलीयप्रभ्याऽनुविद्धानुदोरयामास सलीलमक्षान् ।। १८॥ नगर के आम-पाम को अमराइयो के तिवामी मोर उसे बादल मी गा ममयकर पाचने लगते हैं, उन वाद्यों की ध्वनि मे दमों दिशाएं गूंज उठीं ॥ ९॥ दमी बीच विवाह के समय का वेष धारण किये इन्दुमती वर चुनने के लिए पाल्की पर चढकर मचो के बीचवाल गजमार्ग मे आया। उम पालकी को मनुष्य चल रहे थे और उसके चारों ओर दामियों पैदल चल रही था॥१०॥ वह कन्या ब्रह्मा की रचना का एक बहुत ही सुन्दर नमूना थी। उमे मैक्डा आँखे एक्टर देख रही था। उममी सुन्दरता देखते ही मब राजाओं का मन तो उस पर चला गया केवल के शरीरभर मचों पर रह गये ।।११।। राजाओं ने अपना प्रेम प्रदर्शित करने के लिए वृक्षों के पत्तो को भांति अना प्ररार मे भौंह आदि चलाकर जा शृङ्गारमयी चेष्टाएँ कों, वे ही मानो उसके प्रेम यो इन्दुमती तक पहुंचाो वाली अग्रदूतियों थां ।। १२ ।। जैसे-कोई राजा कमल की डठल पक्डकर घुमाने त्या। उमरे 'घूमने म भोर तो भाग गये, परन्तु उममें जो पराग भरा हुआ था, उसके फैलने मे कमल के भीतर चारो और एक मण्डल-मा बन गया ।। १३ ।। द्मा विलामी राजा थोडा-मा मुंह घुमाकर कन्धे मे मरती और पाजूबध मे उलझी हुई रत्नों को माला को उठाकर ठीक मे गले मे पहनने लगा ॥१४॥ तोमरा राजा भोंहे चलकर तथा पैर की उँगली मिकोडकर पैर के नसों को कान्ति तिरछी डालते हुए मोने के पॉव-पीढ़े पर पैर मे कुछ लिखने लगा ।। १५ ।। एक राजा मिहामन पर बॉयों भुजा टेककर बैठ गया और अपने पाम बैठे हुए मित्र मे बाते करने लगा, जिसमे उमका बायाँ कन्धा उठ गया और गले को माल पीठ पर लटक गर्या ॥ १६॥ एक दूसरा युवा राजा था, जिसके नस मानो प्रियतमा के नितम्बो पर चिह्न बनाने के लिए ही बो हुए थे। वह उन नसों से केतकी के उन पीले पत्तो को नोचने लगा, जो क्मिी विलामिनी स्त्री के शृङ्गार के लिए कान के आभूषण के रूप में क्टे थे॥१७ ।। एक दूसरे राजा ने, जिमको हथेलियाँ कमल के ममान लाल थों और जिन पर ध्वजा की रेखाएं बनी हुई थी, वह अपने हाथो मे पासे उछाल रहा था और उमको ७का० ५० के रघुवशे कश्चिद्यथाभागमवस्थितेऽपि स्वसन्निवेशायतिलविनीव । वज्राशुगर्भाङ्गुलिरन्ध्रमेक व्यापारयामास कर किरीटे ॥१९॥ ततो नृपाणां श्रुतवृत्तवशा पुवत्प्रगल्भा प्रतिहाररक्षी। प्राक्सन्निकर्ष मगधेश्वरस्य नीत्वा कुमारीमवदत् सुनन्दा ।।२०।। असो शरण्य शरणोन्मुखानामगाधसत्त्वो मगधप्रतिष्ठ । राजा प्रजारञ्जनलब्धवर्ण परन्तपो नाम यथार्थनामा॥२१ ।। काम नृपा सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम्। नक्षत्रताराग्रहसकुलाऽपि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रि ॥२२॥ क्रियाप्रबन्धादयमध्वराणामजसमाहूतसहस्रनेत्र शच्याश्चिर पाण्डुकपोललम्बान्मन्दारशून्यानलकांश्चकार ॥ २३ ॥ अनेन चेदिच्छसि गृह्यमाण पाणिं वरेण्येन कुरु प्रवेशे। प्रासादवातायनसश्रिताना नेत्रोत्सव पुष्पपुराङ्गनानाम् ।। २४॥ एव तयोक्ते तमवेक्ष्य किश्चिद्विसिदूर्वाङ्कमधूकमाला। ऋजुप्रणामक्रिययैव तन्वी प्रत्यादिदेशैनमभाषमाणा ।।२५।। ता सैव वेत्रग्रहणे नियुक्ता राजान्तर राजसुता निनाय । समीरणोत्येव तरङ्गलेखा पद्मान्तर मानसराजहसीम् ॥२६॥ जगाद चैनामयमङ्गनाथ सुराङ्गनाप्रार्थितयौवनश्री। विनीतनाग किल सूत्रकारैरैन्द्र पद भूमिगतोऽपि भुङ्क्ते ॥२७॥ अगूठी की झलक उन पासों पर पड़ रही थी॥१८॥ एक राजा बार-बार अपने हाथ मे उस मुकुट को सीधा कर रहा था, जो पहले से ही सीधा था। ऐसा करने में उसके हाथों की उंगलियों का मध्य भाग रलों की किरण से चमक उठता था॥ १९ ॥ उसी समय पुरुषों जैसी ढोठ और राजाओं के वशो का वृत्तान्त जानने वाली रनिवास की प्रतिहारी सुनन्दा इन्दुमती को सबसे पहले मगधारेश के सामने ले गयी और उससे कहने लगी-॥२०॥ ये महाराज बडे पराक्रमी हैं और शरण मे आनेवालों को रक्षा करते हैं। अपनी प्रजा को सुख देकर इन्होंने बडा यश कमाया है। इनका नाम परतप है और ये वास्तव मे परतप (शत्रुओं) को ताप देने वाले हैं।। २१ ।। जैसे अगणित तारों, ग्रहों और नक्षत्रो से भरी रहने पर भी रात तभी चाँदनी रात कहलाती है जब कि चन्द्रमा सिला हुआ हो। वैसे ही यद्यपि ससार में सहस्रों राजा है, किन्तु इन्हीं के रहने मे पृथ्वी राजायुक्त कहलाती है ।। २२ ।। इन्होंने क्रमश अनेक यज्ञ करके बार-बार इन्द्र को अपने यहाँ बुलाया है। जिममे इन्द्राणी के सिर की चोटी कल्पवृक्ष के फूलों का शृङ्गार न होने से उनके पीले-पीले गालों पर झूलने लगी। क्योंकि पति के अपने पाम न रहने मे उन्होने शृङ्गार करना ही छोड़ दिया था।। २३॥ यदि इसके माथ तुम विवाह कराा चाहो तो अवश्य करो। क्योंकि इनके माथ विवाह करके जब तुम इनकी राजधानी पाटलिपुत्र मे पहुँचोगी, तब वहाँ की स्त्रियाँ झरोखों मे बेठकर तुम्हें निहारेंगी। जिससे उसकी आँखों को सुख मिलेगा॥२४॥ मुनन्दा की बाते सुनी तो इन्दुमती ने तनिक ऑस उठाकर उस राजा को देखा तो दूब मे गुंथी हुई उसके हाथ को महुए को माला कुछ सरक गयो और बिना कुछ कहे-मुने मीधा-सा पणाम करके उसे अस्वीकार करती हुई वह चुपचाप आगे बढ गयो।। २५ ।। जैसे मानसरोवर की राजहसिनी वायु से उठी हुई लहर के सहारे एक कमल से दूसरे कमल पर पहुंच जाती है, उसी तरह सुनन्दा ने राजकुमारी इन्दुमती को दूसरे राजा के आगे पहुंचा दिया ।। २६ ॥ वह बोली- ये अंग देश के राजा हैं। इनके छ षष्ठ सर्ग ५१ तत अस्य अनेन पर्यासयताऽश्रुबिन्दून्मुक्ताफलस्थूलतमान् स्तनेषु। प्रत्यर्पिता शत्रुविलासिनीनामुन्मुच्य सूत्रेण विनैव हारा ||२८॥ निसर्गीभन्नास्पदमेकसस्थर्मास्मिन्द्वय श्रीश्च सरस्वती च। कान्त्या गिरा सूनृतया च योग्या त्वमेव कल्याणि । तयोस्तृतीया ॥२९॥ अथागराजादवतार्य चक्षुर्याहीति जन्यामवदत्कुमारी। नासो न काम्यो न च वेद सम्यग्द्रष्टु न सा भिन्नरुचिर्हि लोक ॥३०॥ पर दुष्पसह द्विदिप नियुक्ता प्रतिहारभूमौ । निदर्शयामास विशेषदृश्यमिन्दु नवोत्थानमिवेन्दुमत्यै ॥ ३१॥ अवन्तिनाथोऽयमुदग्रबाहुर्विशालवक्षास्तनुवृत्तमध्य आरोग्य चक्रमममुष्णतेजास्त्वष्ट्रेव यलोल्लिखितो विभाति ॥३२॥ प्रयाणेषु समनशक्तेरग्रेसरैर्वाजिभिरत्थितानि । कुर्वन्ति सामन्तशिखामणोना प्रभाप्ररोहास्तमय रजासि ॥३३॥ असौ महाकालनिकेतनस्य वसन्नदूरे किल चन्द्रमौले । तमिसपक्षेऽपि सह प्रियाभिर्योत्स्नावतो निर्विशति प्रदोषान् ॥ ३४॥ अनेन यूना सह पार्थिवेन रम्भोरु । कच्चिन्मनसो रुचिस्ते। शिप्रातरङ्गानिलकम्पितासु विहर्तुमुद्यानपरम्परासु ॥ ३५ ॥ यौवन को देवताओं की स्त्रियाँ भी चाहती हैं। हाथियों को मधाने की विद्या जानने वाले बड़े-बड़े लोग इनके हाथियों को सिखाते हैं। पृथ्वी पर रहते हुए भी ये इन्द्र के समान सुख भोगते हैं।॥ २७॥ जिन राजाओं को इन्होने युद्ध में मार डाला था, उनकी स्त्रियों ने अपने दिवगत पति के शोक मे मोतियो का हार उतार फेंका। परन्तु रोने के कारण उनके स्तनों पर गिरती हुई अश्रुबिन्दुओं को धाराएँ ही मोतियों के हार जैमी लगने लगीं। उन्हे देखकर ऐसा लगता था कि मानो इन्होने शत्रुओं की स्त्रियों के गले से मोतियों के हार उतारकर उन्हे ऑसुओं के हार पहना दिये हैं।। २८ ।। यों तो लक्ष्मी और सरस्वती दोनों में कभी नहीं पटती, परन्तु इनके पास वे दोनों ही मिल-जुलकर रहती हैं। हे कल्याणी । तुम सुन्दर हो और तुम्हारी वाणी भी मधुर है। अत केवल तुम उन दोनो के साथ तीसरी सहचरी बनकर रह सकती हो ॥ २९॥ इन्दुमती ने उम अगदेश के राजा मे आयें हटा ली और सुनन्दा से कहा- -आगे चलो। यह बात नहीं थी कि वह राजा सुन्दर नहीं था और न यही बात थी कि इन्दुमती ने उसे ठीक से देखा नहीं था। लेकिन अपनी-अपनी रुचि ही तो है, किमो को काई अच्छा लगता है और किसी को कोई भाता है।। ३० ॥ वहाँ से आगे बढकर प्रतिहारी सुनन्दा ने एक दूसरे राजा को दिखलाया, जो शत्रुओं को कॅपानेवाला वीर था—जिमका रूप और जिसका यौवन पूर्णिमा के नवोदित चन्द्रमा जैमा सुन्दर था ।। ३१ ।। उसे दिखाकर सुनन्दा बोली- देखो, ये जो लम्बी भुजा, चोडी छाती और पतली एव गोल कमरवाले राजा सूर्य के समान चमक रहे हैं, ये अवन्ति देश के राजा हैं। ऐमा लगता है कि विश्वकर्मा ने अपने शान धरने के चक्र पर इन्हे बड़े यल से खरादा है।॥३२॥ जब ये मारी शक्ति के साथ शत्रुओं पर चढ़ाई करते हैं, तब मेना के आगेवाले घोडो की टापो से उड़ी हुई धूल से शत्रुओ मुकुटस्थ मणियों की चमक धुंधली पड जाती है ॥ ३३ ॥ महाकाल-मन्दिर मे बैठे हुए और मिर पर चन्द्रमा धारण करने वाले शिवजी के पाम ही इनका राज-भवन है। अतएव अंधरे पास मे भी शिवजी के सिर पर विद्यमान चन्द्रमा की चॉदनी से ये अपनी स्त्रियों के माथ सदा उजेले पास का आनन्द लिया करते हैं। केले के खम्भे के समान जॉघवाली हे इन्दुमती । क्या तुम उज्जयिती के उन उद्यानो के -

क रघुवशे से
तस्मिन्नभिद्योतितबन्धुपझे प्रतापसशोषितशत्रुपद्धे।
बबन्ध सा नोत्तमसौकुमार्या कुमुद्वती भानुमतीव भावम् ।। ३६ ।।
तामग्रतस्तामरसान्तराभामनूपराजस्य गुणैरनूनाम्।
विधाय सृष्टि ललिता विधातुर्जगाद भूय सुदतीं सुनन्दा ॥ ३७॥
सङ्ग्रामनिर्विष्टसहस्रबाहुरष्टादशद्वीपनिखातयूप
अनन्यसाधारणराजशब्दो बभूव योगी किल कार्तवीर्य ॥३८॥
अकाचिन्तासमकालमेव प्रादुर्भवश्चापधर पुरस्तात्।
अन्त शरीरेष्वपि य प्रजाना प्रत्यादिदेशाविनय विनेता॥३९॥
ज्यावन्धनिष्पन्दभुजेन विनि श्वसद्वक्त्रपरम्परेण ।
कारागृहे निर्जितवासवेन लड्डेश्वरेणोषितमाप्रसादात्॥४०॥
तस्यान्वये भूपतिरेष जात प्रतीप इत्यागमवृद्धसेवी।
येन थिय सश्रयदोषरूढ स्वभावलोलेत्ययश
प्रमृष्टम् ॥४१॥
आयोधने कृष्णगति सहायमवाप्य य क्षत्रियकालरात्रिम्।
धारा शिता रामपरश्वधस्य सम्भावयत्युत्पलपसाराम् ।। ४२॥
अस्याङ्कलक्ष्मी
व दीर्घबाहोर्माहिष्मतीवनितम्बकाञ्चीम् ।
प्रासादजालैजलवेणिरम्या रेवा यदि प्रेक्षितुमस्ति काम ॥४३॥
यस्य
में विहार करना चाहती हो, जिनमें दिन-रात शिप्रा नदी को टवी वायु बहती रहती है।। ३४-३५ ।।
मुनन्दा की ये बाते मुन करके भी मुकुमारी इन्दुमती को मित्रों को प्रसन्न करने और शत्रुओ को माग्नेवाला
वह प्रतापी राजा अच्छा नहीं लगा, जैसे कुमुदिनी को मूर्य नहीं भाता। जो कमल को तो खिलता
है, किन्तु शत्रु म्प फीचट को मुखा दिया करता है ।। ३६॥ कमल जैनी मुन्दरी, अमाधारण गुणवती,
विधाता को सुन्दर रचना और मुन्दर दॉतोवाल इन्दुमती को मुनन्दा वहा मे हटाकर अन्प देश के राजा
के आगे ले जाकर बोली-॥३७॥ बहुत दिनों पहले वार्ता नाम के एक बहुत बड़े योगी हो गये
हैं। उनमे विशेषता यह थी कि जब वे लडने जाते थे, तब उनके महम्रो हाय निरल आते थे। उन्होंने
अठारह द्वीपों में जाकर यज्ञ के खम्भे गाडे थे। वे ऐसे प्रतापी थे कि उनके मामने कोई अपने को राजा
नहीं कह पाता था॥३८॥ उम ममय यदि कोई पाप करने का विचार करता था तो वे धनुष-बाण
लेकर उसके ममक्ष जा पहुँचते थे। ऐसा करके उम दण्टधारी गजा ने मब लोगों मन मे पापभावना
निकाल डाली थी।॥३९॥ जिम रावण ने इन्द्र को जीत लिया था, उनमो भी उन्होंने अपने कागगार
मे बन्द कर दिया और उसकी भुजाएँ इस प्रकार धनुष को डोरी मे क्मर बाँध दी कि वह बेचारा
दिन-रात गरम मोसे लेता रहा और जब ता कार्तवार्य उम पर पमन्न नहीं हुए तब तक उसे नहीं
छोड़ा ॥ ४० ॥ उन्हीं कार्तवीर्य नाम से प्रसिद्ध राजा के वश मे ये उत्पन हुए हैं। ये वेदो और वृद्धों
को बडी सेवा करते हैं। लक्ष्मी पर लोग चचलता का दोष लगाते थे, परन्तु उनका वह दोष भी तब
मे
धुल गया, जब मे वे इनके माथ रहने लगी। क्योकि लक्ष्मी तो उनी पुरुष को छोड़कर जाती हैं,
जो व्यमनी होते हैं। इनमे कोई व्यमन नहीं है, तब वे इन्हें छोडार क्यों जायें ।।४ ॥ ये इतने बलवान्
हैं कि अग्नि की महायता पा लेने में परशुरामजी के उम फरमे को तेज धार को भी पसुडोदार कमल
के समान कोमल ममझते हैं, जिसने युद्ध मे क्षत्रियजाति का महार कर दिया था॥४२॥ यदि तुम राजमहल
के झरोखों से उम मुन्दर लहरोंवाले नर्मदा का सुन्दर दृश्य देखना चाहती हो, जो माहिष्मता नगरी
के चारों ओर करधनी जैसी घूमी हुई है तो इम महाबाहु राजा के साथ विवाह कर ले॥४३॥

के षष्ठ सर्ग
तस्या प्रकाम प्रियदर्शनोऽपि न स क्षितीशो रुचये बभूव ।
शरत्प्रमृष्टाम्बुधरोपरोध शशोव पर्याप्तकलो नलिन्या ॥४४॥
सा शूरसेनाधिपति सुषेणमुद्दिश्य लोकान्तरगीतकीर्तिम्।
आचारशुद्धोभयवशदीप शुद्धान्तरक्ष्या जगदे कुमारी॥४५॥
नीपान्वय पार्थिव एष यज्वा गुणैर्यमाश्रित्य परस्परेण ।
सिद्धाश्रम शान्तमिवैत्य सत्त्वैनैसर्गिकोऽप्युत्ससृजे विरोध ॥४६॥
यस्यात्मगेहे नयनाभिरामा कान्तिर्हिमाशोरिव सन्निविष्टा ।
हाग्रसस्तृणाकुरेषु तेजोऽविषह्य रिपुमन्दिरेषु॥४७॥
यस्यावरोधस्तनवन्दनाना प्रक्षालनाद्वारिविहारकाले।
कलिन्दकन्या मथुरा गताऽपि गङ्गोर्मिससक्तजलेव भाति ॥४८॥
त्रस्तेन ताात्किल कालियेन मणि विसृष्ट यमुनोकसा य ।
वक्ष स्थलव्यापिरुच दधान सकौस्तुभ हेपयतोव कृष्णम्।। ४९ ॥
सम्भाव्य भर्तारममु युवान मृदुप्रवालोतरपुष्पशय्ये ।
वृन्दावने चैत्ररथादनूने निर्विश्यता सुन्दरि। यौवनश्री ॥५०॥
अध्यास्य चाम्भ पृषतोक्षितानि शैलेयगन्धोनि शिलातलानि ।
कलापिना प्रावृषि पश्य नृत्य कान्तासु गोवर्धनकन्दरासु ॥५१॥
नृप तमावर्तमनोजनाभि सा व्यत्यगादन्यवधीवत्री।
महीधर मार्गवशादुपेत स्रोतोवहा सागरगामिनीव ॥५२॥
जैसे बादलविहीन आकाशवालो शरदऋतु का पूर्ण चन्द्रमा भी कमलिनी को नहीं भाता, वैमे ही
वह मुन्दर राजा भी इन्दुमती को नहीं जेंचा ॥४४॥ तब रनिधाम की प्रतिहारी सुनन्दा राजकुमारी
को मथुरा के राजा सुषेण के आगे ले गयी, जिसकी कीर्ति स्वर्ग के देवता भी गाते थे और जिमने
अपने शुद्ध चरित्र से माता और पिता दोनों के कुलों को उज्ज्वल पर दिया था। उसे दिखलाती हुई
सुनन्दा बोली-॥४५॥ ये मथुरा के महाराज बड़ी विधि मे यज्ञ करते हैं और प्रशमनीय वश मे उत्पन
हुए हैं। जैसे ऋषियों के शान्त आश्रमों मे मब जीव वैर छोड़कर एक साथ रहते हैं, वैसे ही विद्वत्ता
और मौनता-ये परस्पर विरोधी गुण भी इनमे माथ-माथ रहते हैं।॥ ४६॥ चन्द्रमा की चाँदनी की
तरह आँखों को सुखदायी इनका प्रकाश तो घर मे रहता है, स्न्तुि मूर्य के समान प्रचण्ड तेज शत्रुओं
के उन राजभवनों पर छाया रहता है, जिनके उजड जाने पर उनमे घाम जम गयी रहती है।। ४७।।
जल-विहार के समय इनकी रानियों के स्तनो पर लगा हुआ चन्दन जल में मिलकर जब यमुना में बहता
है, उस समय यमुनाजी का रंग ऐमा हो जाता है कि मानो मथुरा मे ही उनका गगाजी की लहरों
से सगम हो गया हो॥४८॥ अपने गले में जब ये उम मणि को पहन लेते हैं, जो इन्हें उस कालिय
नाग से मिली थी, जो गरुड़ के डर से यमुना के जल मे रहने लगा था। उस समय इनकी शोभा कौस्तुभ
मणि पलकर मुशोभित श्रीकृष्णजी की शोभा को भी लजा देती है ।। ४९ ॥ हे मुन्दरी' इनके साथ विवाह
करके आप कुबेर के चैत्ररथ उद्यान से भी मुन्दर वृन्दावन मे कोमल पत्तों और फूलों की शय्याओ पर
इच्छानुसार विहार करें ।।५० । वर्षा के दिनों में गोवर्धन पर्वत को गुफाओं में पानी के फुहारों से भीगी
शिलाजीत की गन्धवाली पत्थर की चट्टानों पर बैठकर मोरों का नाच देखें ।। ५१ ॥ पानी की भंवर जैसी
गहरी नाभिवाली और अन्य किमी से विवाह न करने वाली इन्दुमती राजा मुषेण को छोडकर वैसे ही
आगे बढ़ गयी, जैसे समुद्र की ओर जानेवाली नदी बीच में पड़नेवाले पहाडों को छोड़ देती है ॥५२॥

बभाषे॥५३॥ ॐ रघुवशे अथागदाश्लिष्टभुज भुजिष्या हेमाङ्गद नाम कलिङ्गनाथम्। आसेदुषी सादितशत्रुपक्ष बालामबालेन्दुमुखी असो महेन्द्राद्रिसमानसार पतिर्महेन्द्रस्य महोदधेश्च । यस्य क्षरत्सैन्यगजच्छलेन यात्रासु यातीव पुरो महेन्द्र ॥५४॥ ज्याघातरेखे सुभुजौ भुजाभ्या बिभर्ति यश्चापभृतां पुरोग । रिपुश्रिया साञ्जनबाष्पसेके बन्दीकृतानामिव पद्धती द्वे॥५५॥ यमात्मन सद्मनि सन्निकृष्टो मन्द्रध्वनित्याजितयामतूर्य । प्रासादवातायनदृश्यवीचि प्रबोधयत्यर्णव एव सुप्तम्॥५६॥ अनेन सार्ध विहराम्बुराशेस्तीरेषु तालोवनमर्मरेषु । द्वीपान्तरानीतलवङ्गपुष्पैरपाकृतस्वेदलवा मनि ॥५७॥ प्रलोभिताप्याकृतिलोभनीया विदर्भराजावरजा तयैवम् । तस्मादपावर्तत दूरकृष्टा नीत्येव लक्ष्मी प्रतिकूलदैवात् ॥५८॥ अथोरगाख्यस्य पुरस्य नाथ दौवारिकी देवसरूपमेत्य । इतश्चकोराक्षि । विलोकयेति पूर्वानुशिष्टा निजगाद भोज्याम्॥५९॥ पाण्डयोऽयमसार्पितलम्बहार क्लृप्ताङ्गरागो हरिचन्दनेन । आभाति बालातपरक्तसानु. सनिर्झरोद्गार इवाद्रिराज ॥६॥ विन्ध्यस्य सस्तम्भयिता महानि शेषपीतोज्झितसिन्धुराज । प्रोत्याश्वमेधावभृयामूर्ते सौस्नातिको यस्य भवत्यगस्त्य ॥ ६१ ।। वहाँ से आगे बढ़कर दामी सुनन्दा पूर्ण चन्द्रमा जैसी मुखवाली इन्दुमती को उस कलिङ्गनरेश हेमाङ्गद के समक्ष ले गयी, जो अपनी बाँह में भुजबन्ध पहने हुए थे और जिन्होंने अपने शत्रुओं को नष्ट कर दिया था। उन्हें दिखलाती हुई सुनन्दा ने कहा--- ॥ ५३॥ ये महेन्द्र पर्वत के समान शक्तिशाली हैं और महेन्द्र पर्वत तथा समुद्र दोनो पर इनका अधिकार है। जब ये युद्ध करने चलते हैं, उस समय इनके आगे-आगे चलने वाले मतवाले हाथी ऐसे लगते हैं, मानो हाथियों का वेष बनाकर स्वय महेन्द्र पर्वत चल रहा हो ॥५४॥ इनको देखो, कैसी सुन्दर इनकी भुजाएँ हैं। धनुषधारियों में इनसे बढकर कोई नहीं है। इनकी भुजाओं पर जो दो काली-काली रेखाएँ धनुष को डोरी सोचने से बन गयी हैं, वे ऐसी लगती हैं कि मानो ये शत्रुओं की उस राज्यलक्ष्मी के आने को दो पगडडियाँ हैं, जो इन्होंने शत्रुओ से छीन ली हैं और जिनके कजरारे नेत्रों से बहे हुए ऑसुओं के कारण ये काले पड़ गये हैं। इनके राजभवन के नीचे ही समुद्र हिलोरे लेता है। उसकी लहरे राजभवन के झरोखों से साफ दिखलाई देती हैं। जब ये अपने राजमहल मे सोते हैं, तब वह ममुद्र ही नगाड़े की ध्वनि से भी गभीर अपने गर्जन द्वारा सबेरे इन्हे जगाता है।। ५५-५६ ।। तुम्हारी इच्छा हो तो इनके साथ विवाह करके ममुद्र के उन तटों पर विहार करो, जहाँ दिन-रात ताड के जगलो की तड़तडाहट सुनाई देती रहती है। वहाँ जब तुम्हे पसीना होगा, तब लौंग के फूलों को सुगन्ध मे सुवासित एव दूसरे द्वीपो से आया हुआ शीतल पवन तुम्हारा पसीना पोंछ दिया करेगा।।५७ ।। अपनी दामी को लुभावनी बातों को मुनकर भी विदर्भराज की छोटी बहन सुन्दरी इन्दुमती उस राजा को छोडकर उसी प्रकार आगे बढ़ गयी, जैसे पुरुषार्थ प्राप्त सम्पदा भाग्य के फेर से छोडकर चली जाती है।। ५८ ।। उसके बाद सुनन्दा उमे देवता सदृश मनोहर नागपुर के राजा के पास ले जाकर बोली-हे चकोरनयनी। इधर देखो-||५९॥ ये पाड्य देश के राजा हैं। इनके कंधे पर हार लटकता है और शरीर पर हरिचन्दन का लेप किया हुआ है। इस वेश मे ये उस हिमालय के शिसर जैसे सुन्दर दीख रहे हैं, जो प्रात काल को धूप से लाल हो गया हो और जिस पर से पानी के अनेक झरने गिर रहे हो। ६० ॥ अश्वमेध यज्ञ करके जब ये स्नान करते - ॐ षष्ठ सर्ग 2 ५५ अस्त्र त्व त हरादाप्तवता दुराप येनेन्द्रलोकावजयाय दृप्त । पुरा जनस्थानविमर्दशनी सन्धाय लङ्काधिपति प्रतस्थे॥६२॥ अनेन पाणी विधिवद्गृहीते महाकुलोनेन महीव गुर्वी । रत्नानुविद्धार्णवमेखलाया दिश सपत्नी भव दक्षिणस्या ॥६३॥ ताम्बूलवल्लीपरिणद्धपूगास्वेलालतालिङ्गितचन्दनासु तमालपत्रास्तरणासु रन्तु प्रसीद शश्वन्मलयस्थलीषु॥४॥ इन्दीवरश्यामतनुनपोऽसौ रोचनागौरशरीरयष्टि । अन्योन्यशोभापरिवृद्धये वा योगस्तडित्तोपदयोरिवास्तु॥६५॥ स्वसुर्विदर्भाधिपतेस्तदीयो लेभेऽन्तर चेतसि नोपदेश । दिवाकरादर्शनबद्धकोशे नक्षत्रनायाशुरिवारविन्दे ॥६६॥ सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्री मय व्यतीयाय पतिवरा सा। नरेन्द्रमार्गा? इव प्रपेदे विवर्णभाव स स भूमिपाल || ६७॥ तस्या रघो सूनुरुपस्थिताया वृणीत मा नेति समाकुलोऽभूत् । वामेतर सशयमस्य बाहु केयूरवन्धोच्छ्वसितैर्नुनोद ।। ६८॥ प्राप्य सर्वावयवानवद्य व्यावर्ततान्योपगमात्कुमारो। न हि प्रफुल्ल सहकारमेत्य वृक्षान्तर काइक्षति षट्पदाली॥ ६९ ।। तस्मिन्समावेशितचित्तवृत्तिमिन्दुप्रभामिन्दुमतोमवेक्ष्य प्रचक्रमे वक्तुमनुक्रमज्ञा सविस्तर वाक्यमिद सुनन्दा ॥ ७० ॥ हैं, तत्र महाप्रतापी वे महर्षि अगस्त्य इनमे कुशल-क्षेम पूछने आते हैं, जिन्होंने विन्ध्याचल को आगे बढने से रोका था और पूरे ममुद्र को पोरर फिर निकाल दिया था ।। ६१ ।। महाप्रतापी रावण जब इन्द्र को जीतने चला, तब उसने इस डर मे इनके साथ मन्धि कर ली थी कि कहीं ऐमा न हो कि ये मेरे देश को नष्ट-भ्रष्ट कर दे। क्योकि इन्होंने शिवजी से बड़ा प्रतापशाली अत्र प्राप्त किया है।। ६२ ।। ये बड़े अच्छे कुल में उत्पन हुए हैं और तुम भी पृथ्वी के समान महिमामयी हो। इनके साथ विधिवत् विवाह करके तुम रत्नों मे भरी उम दक्षिण देश को पृथ्वी को मौत बन जाओ, जिमकी मेखला रलों से भरा हुआ ममुद्र है।। ६३ ।। यदि तुम मलय पर्वत की उन घाटियों मे मदा विहार करना चाहो, जिनमे पान की बेलो मे ढंके हुए सुपारी के पेड़ खडे हैं, इलायची की बेलों मे लिपटे हुए चन्दन के पेड़ लगे हुए हैं और स्थान-स्थान पर ताड़ के पत्ते फैले हुए हैं तो तुम इनके माथ विवाह कर लो। ६४।। और फिर ये नीलकमल के समान सॉवले हैं और तुम गोरोचन सदृश गोरी हो। अतएव यदि तुम दोनों का विवाह हो जायगा तो तुम ऐमी मुन्दर गोगी, जैसे बादल के साथ बिजली चमकती है॥६५॥ किन्तु सुनन्दा की ये बातें इन्दुमती के मन में वैसे ही घर नहीं कर सकी, जैसे सूर्य के अस्त हो जाने पर बन्द कमल के भीतर चन्द्रमा की किरणें नहीं पहुंच पाती।। ६६ ।। रात को लोग जब दीपक लेकर चलते हैं, तब राजमार्ग के जो-जो भवन पीछे छूटते हैं, वे अंधेरे मे पडते जाते हैं। उसी प्रकार जिन-जिन राजाओं को छोड़कर इन्दुमती आगे बढ गयी, उनका मुंह उदास हो गया॥६७।। क्रमश जब वह रघु के पुत्र अज के आगे आयी, तब अज के मन मे भी मशय होने लगा कि यह मुझे वरेगी या नहीं। किन्तु उसी समय भुजबन्ध के पाम उनको दाई भुजा फडकने लगी, जिमसे उनकी शमा निवृत्त हो गयी।॥ ६८ ॥ इन्दुमती ने सर्वाङ्गमुन्दर राजा अज को जब देखा, तब वह वहीं रुक गयी और फिर रिसी राजा के आगे नहीं जा पायी। क्योंकि जब भौरों का झुण्ड आम के वृक्ष पर पहुँचता है, तब उसे दूसरे वृक्षों के पास जाने की इच्छा नहीं रहती ॥ ६९ ।। बात करने में बड़ी चतुर मुनन्दा ने जब देखा कि चन्द्रमा य की रघुवशे इक्ष्वाकुवश्य ककुद नृपाणा ककुत्स्थ इत्याहितलक्षणोऽभूत्। काकुत्स्थशब्द यत उन्नतेच्छा श्लाघ्य दधत्युत्तरकोसलेन्द्रा ॥७१ ॥ महेन्द्रमास्थाय महोक्षरूप य सति प्राप्तपिनाकिलोल । चकार बाणैरसुराङ्गनाना गण्डस्थली प्रोषितपत्रलेखा ॥७२॥ ऐरावतास्फालनविश्लय सङ्घट्टयनगदमङ्गदैन। उपयुष स्वामपि मूर्तिमज्यामसिन गोत्रभिदोऽधितस्थौ ॥७३॥ जात कुले तस्य कुलोरुकीर्ति कुलप्रदीपो नृपतिर्दिलीप । अतिष्ठदेकोनशतक्रतुत्वे शक्राभ्यसूयाविनिवृत्तये य ॥७४॥ पस्मिन्महीं शासति वाणिनीना निद्रा विहारार्धपथे गतानाम् । वातोऽपि नाससयदशकानि को लम्बयेदाहरणाय हस्तम्॥७५ ।। पुनो रघुत्तस्य पद प्रशास्ति महाक्रतोर्विश्वजित प्रयोक्ता। चतुर्दिगावर्जितसम्भृता यो मृत्पात्रशेषामकरोद् विभूतिम्॥७६ ॥ आरढमद्रीनुदधीन्वितीर्ण भुजगमाना वसति प्रविष्टम्। ऊर्ध्व गत यस्य न चानुबन्धि यश परिच्छेत्तुमियतयालम् ।। ७७॥ असो कुमारस्तमजोऽनुजास्त्रिविष्टपस्येव पति जयन्त । गुर्वी धुर यो भुवनस्य पित्रा धुर्येण दम्य सदृश बिभर्ति ॥७॥ कुलेन कान्त्या वयसा नवेन गुणैश्च तैस्तैर्विनयप्रधान । त्वमात्मनस्तुल्यममु वृणीष्व रत्न समागच्छतु काञ्चनेन ।। ७९ ।। के समान मुखवाली इन्दुमती अज के रूप पर मुग्ध हो गयी है, तब वह बहुत विस्तार के साथ बात बनाती हुई बोली ।। ७० ।। देखिए इक्ष्वानुवश के मब राजाजी मे श्रेष्ठ तथा मुन्दर लक्षणों से युक्त ककुत्स्थ नाम के राजा हो गये है। जिसके कारण उनके वादवाले उत्तरमोशल के मभी राजा अपने को काकुत्स्थ कहते हैं ।।७१ ।। उन राजा काकुत्स्थ ने युद्ध मे जब असुरो रो मारा था, तब वे बैल पर सवार शिवजी के समान लगते थे। उस समय स्वय इन्द्र भगवान् उनके बैल बने थे और उस युद्ध में उन्होंने जिन असुरों को मार डाला था, उनकी स्त्रियों ने पतियों से बिछुड़ जाने के कारण अपने कपोलो पर चित्रकारी करना छोड़ दिया था ॥७२॥ युद्ध को ममाप्ति पर जब इन्द्र अपने सही रूप में ऐरावत पर चढकर स्वर्ग जाने लगे, तब उनके साथ ककुत्स्थ भी बैठे थे। उम ममय वे इन्द्र की देह मे ऐसे सटे हुए थे कि ऐरावत को बार-बार अकुश लगाने से इन्द्र के जो भुजबन्ध ढीले पड गये थे, वे ककुत्स्य के भुजबध से बराबर रगट साते चलते थे।। ७३ ।। उन्ही प्रतापशाली ककुत्स्थ के वश मे यशस्वी राजा दिलीप जनमे। जो केवल निन्यानवे यज्ञ करके ही इमलिए चुप हो गये कि कहा सौ यज्ञ पूरा करने से इन्द्र को दुस न हो ।। ७४ || गजा दिलीप ऐलान्छे ढंग से अपना राजकार्य चाते थे और उनका ऐमा प्रभाव था कि मद पीकर उपवनो में मोई हुई रित्रयों के वस्त्रो को वायु भी नहीं छू सकता था, फिर उन्हे हटाने मा साह्म भला कोई कैमे करता।।७५ || बाद में उन्हीं के पुत्र गजा रघु हुए। जिन्होने मब देशों को जीतकर अपार सम्पदा जुटायी और विश्वजित् यज्ञ मे अपना मब धन खर्च कर दिया। इससे वे ऐसे अस्चिन हो गये कि केवल एक मिट्टी का पात्रभर उनके पाम शेष रह गया ॥७६ ॥ उनका यश कहाँ तक फैला है, उसकी थाह ही नहीं है। पर्वतो पर, ममुद्र-पार, पाताल मे, नागों के देश मे, आकाश मे, सब दिशाओं मे और भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीनो काले मे मर्वत्र उमका यश फैला हुआ है।।७७ ।। जैमे देवराज इन्द्र के परम प्रतापी पुत्र जयन्त हुए थे, वैसे ही ये कुमार अज भी उन्हीं पतापी रघु के पुत्र हैं और अपने प्रतापा पिता के समान ही ये भी राज्य का मब काम सँभाले हुए हैं।। ७८ ॥ इनका ५७ प्रसादामलया षष्ठ सर्ग तत सुनन्दावचनावसाने लज्जा तनूकृत्य नरेन्द्रकन्या। दृष्ट्या कुमार प्रत्यग्रहीत्सवरणसजेव॥८॥ सा यूनि तस्मिन्नभिलाषबन्ध शशाक शालीनतया न वक्तुम् । रोमाञ्चलक्ष्येण स गात्रयष्टि भित्त्वा निराक्रामदरालकेश्या ॥८१॥ तथागताया परिहासपूर्व सख्या सखी वेत्रभृदाबभाषे। आर्ये। व्रजामोऽन्यत इत्यथैना वधूरसूयाकुटिल ददर्श ।। ८२॥ सा चूर्णगौर रघुनन्दनस्य धात्रीकराभ्या करभोपमोरू । आसञ्जयामास यथाप्रदेश कण्ठे गुण मूर्तमिवानुरागम्॥८३॥ तया भ्रजा मङ्गलपुष्पमण्या विशालवक्ष स्थललम्बया स । अमस्त कण्ठार्पितबाहुपाशा विदर्भराजावरजा बरेण्य ॥८४॥ शशिनमुपगतेय कौमुदी मेघमुक्त जलनिधिमनुरुप जहुकन्याऽवतीर्णा । इति समगुणयोगप्रीतयस्तत्र पौरा श्रवणकटु नृपाणामेकवाक्य विवव ।। ८५ ।। प्रमुदितवरपक्षमेकतस्तत् क्षितिपतिमण्डलमन्यतो वितानम्। उपसि सर प्रफुल्लप कुमुदवनप्रतिपन्ननिद्रमासीत् ।। ८६ ॥ इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये स्वयवरवर्णनो नाम षष्ठ सर्ग ॥ ६॥ इव कुल, दनका रूप, इनका यौवन और इनकी नम्रता—ये सब गुण ठाक तुम्हारे जैसे हैं। तुम इनसे अवश्य विवाह कर लो। जिममे रल और मोने का मही-मही मयोग हो जाय ॥ ७९ ॥ इस प्रकार जब सुनन्दा कह चुकी, तब इन्दुमती ने नि मकोच भाव अपनी हँसती हुई आँखे अज पर डाली और आँखों ही आँखो मे उन्हे वर लिया। जैसे वह दृष्टि ही स्वयवर की माला थी॥८०॥ लाज के मारे इन्दुमती अपने प्रेम की बात अज को तो नहीं जता सकी, परन्तु उम प्रेम के कारण उमे रोमाच हो आया। जिससे घुघराले बालोवाली इन्दुमती के हदय का वह प्रेम छिपाये नहीं छिप सका। जैसे उन खड़े रोगटों के रूप मे वह प्रेम ही शरीर फोड़कर बाहर निकल आया हो।।८१ ॥ जब मुान्दा ने इन्दुमती की यह दशा देखी तो ठठोली करते हुए उसने कहा-आर्ये । चलिए, आगे बढ़िए। तब ऑखे तरेरकर इन्दुमती ने सुनन्दा की ओर निहारा ॥८२ ॥ तदनन्तर हाथी को सूंड जैमी जघाओवाली इन्दुमती ने वह स्वयवर को माला सुनन्दा के हाथों रघुतनय अज के गले मे पहावा दी। उम ममय माला के डोरे मे लगी हुई रोली माक्षात् अनुराग के समान दौरा रही थी।। ८३ ।। अज के गले मे जब वह फूलो की मगलमयी माला पड़ी और उनकी चौडी छाती पर झूलने लगी, तब उमे दराकर अज ने यही समझा कि मानो इन्दुमती ने मेरे गले में अपनी भुजाएँ ही डाल दी है।।८४॥ वहाँ के नगरवासियो ने जब देया कि ममान गुणवाले अज और इन्दुमती का सम्बन्ध हो गया, तब वे एक माथ बोल उठे। वे कहने लगे कि यह तो चॉदनी और चन्द्रमा का मेल हुआ है अथवा गगाजा ममुद्र में जा मिला हैं। उनकी इन बातों को सुन-सुनकर अन्य राजा मन ही मन कुढ रहे थे।।८५।। उम स्वयवर-मडप मे एक ओर अज के पक्षवाले लोग हंसते हुए खड़े थे और दूमरी ओर उदाम मुँवाले राजा थे। उस समय वह मण्डप प्रात काल के उम मरोवर सरीखा दीखने लगा, जिममे एक ओर विकमित कमल हों और दूसरी ओर सम्पुटित कुमुदों का झुण्ड खडा हो ।।८६ ॥ इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में स्वयवर-वर्णन नामक छठा सर्ग समाप्त।॥६॥ ८ का० सप्तम सर्ग अथोपयन्त्रा सदृशेन युक्ता स्कन्देन साक्षादिव देवसेनाम्। स्वसारमादाय विदर्भनाथ पुरप्रवेशाभिमुखो बभूव ॥१॥ सेनानिवेशान् पृथिवीक्षितोऽपि जग्मुर्विभातग्रहमन्दभास । भोज्या प्रति व्यर्थमनोरयत्वाद्रूपेषु वेशेषु च साभ्यसूया ॥२॥ सान्निध्ययोगात्किल तत्र शच्या स्वयवरक्षोभकृतामभाव । काकुत्स्थमुद्दिश्य समत्सरोऽपि शशाम तेन क्षितिपाललोक ॥३॥ तावत्प्रकीर्णाभिनवोपचारमिन्द्रायुधद्योतिततोरणाङ्कम् . वर स वध्वा सह राजमार्ग प्राप ध्वजच्छानिवारितोष्णम् ॥४॥ ततस्तदालोकनतत्पराणा सोधेषु चामोकरजालवत्सु। बभूवुरित्य पुरसुन्दरोणा त्यक्तान्यकार्याणि विचेष्टितानि ॥५॥ आलोकमार्ग सहसा व्रजन्त्या कयाचिदुद्वेष्टनवान्तमाल्य । बधु न सम्भावित एव तावत्करेण रुद्धोऽपि च केशपाश ॥६॥ प्रसाधिकालम्बितमनपादमाक्षिप्य काचिद्वरागमेव। उत्सृष्टलीलागतिरागवाक्षादलक्तकाडा पदवी ततान॥७॥ विलोचन दक्षिणमञ्जनेन सम्भाव्य तद्वञ्चितवामनेत्रा। तथैव वातायनसन्निकर्ष ययौ शलाकामपरा वहन्ती॥८॥ स्वयवर के बाद योग्य वर से युक्त अपनी बहिन इन्दुमती को लेकर विदर्भ-नरेश नगर की शोर चले। उस समय अपनी पली इन्दुमती के साथ जाते हुए अज ऐमे दीख रहे थे, जैसे देवसेना के माथ साक्षात् कार्तिकेय जा रहे हों।।१॥ अन्यान्य राजा भी प्रात कालीन तारों के समान अपना उदास मुँह लिये अपने-अपने डेरो पर चले गये। वे सब कह रहे थे कि जब इन्दुमती नहीं मिली, तब हमारा यह रूप और यह वेश व्यर्थ है।।२।। उस स्वयवर मे साक्षात् इन्द्राणी उपस्थित थीं, इसी से वहाँ किमी राजा का साहम नहीं हुआ कि कुछ गडबडी करे। यों तो वे हारे हुए मभी राजा अज से मन ही मन जलते थे, किन्तु इन्द्राणी की उपस्थिति से उनका भी क्रोध शान्त हो गया ॥३॥ अज अपनी पत्नी के साथ उस समय नगर के बीच वाले राजपथ पर चल रहे थे। जगह-जगह उन पर सुन्दर ताजे फूल बरमाये जा रहे थे और इन्द्रधनुष जैसे रग-बिरगे तोरण उनके स्वागतार्थ मजाये गये थे। नगर में इतनी झण्डियाँ लगी थी कि उनसे धूप रुक गयी थी॥४॥ उन्हे देखने के लिए नगर की सुन्दरियों अपना सार काम छोड़कर अपने भवनों के झरोखों की ओर दौड पडीं॥५॥ उनमे से एक मुन्दरी उन्हें देखने के लिए जब झरोखे की ओर बढी, तब सह्मा उमका जूडा खुल गया। किन्तु उस हडबडी मे उसे अपना जूडा बाँधने की भी सुधि नहीं रही और वह केश हाथ मे थामे ही सिडको पर जा पहुंची। बालों के ढोले पड जाने से उनमें गुंथे हुए फूल बराबर गिरते जा रहे थे॥६॥ एक दूसरी स्त्री शृङ्गार करने वाली अपनी दामी से पैर मे महावर लगवा रही थी। वह पैर खींचकर गीले पैरो से ही झरोखे की ओर दौड़ पड़ी। जिससे झरोखे तक उसके लाल-लाल पैरों की छाप की पॉत-सी बन गयो।॥७॥ एक तीमरी स्त्री आँखो में ऑजन लगा रही थी। वह दाई ऑख में तो अजन लगा चुकी थी, परन्तु बॉई आँख में 4 सप्तम सर्ग ५९ जालान्तरप्रेषितदृष्टिरन्या प्रस्थानभिन्ना न बबन्ध नीवीम् । नाभिप्रविष्टाभरणप्रभेण हस्तेन तस्थाववलम्ब्य वास ॥ ९ ॥ अर्धाञ्चिता सत्वरमुत्थिताया पदे पदे दुर्नीिमते गलन्ती। कस्याश्चिदासीद्रशना तदानीमड्गुष्ठमूलार्पितसूत्रशेषा ॥१०॥ तासा मुखैरासवगन्धगर्भप्तिान्तरा सान्द्रकुतूहलानाम् । विलोलनेत्रभ्रमरैर्गवाक्षा सहसपत्राभरणा इवासन्॥११॥ ता राघव दृष्टिभिरापिबन्त्यो नार्यो न जम्मुर्विषयान्तराणि । तथा हि शेपेन्द्रियवृत्तिरासा सर्वात्मना चक्षुरिव प्रविष्टा ॥१२॥ स्थाने वृता भूपतिभि परोक्ष स्वयवर साधुममस्त भोज्या । पद्येव नारायणमन्यथासौ लभेत कान्त कथमात्मतुल्यम् ॥१३॥ परस्परेण स्पृहणीयशोभ न चेदिद द्वन्द्वमयोजयिष्यत् । अस्मिन्वये रुपविधानयल पत्यु प्रजाना वितथोऽभविष्यत् ॥ १४ ॥ रतिस्मरौ नूनमिमावभूता राजा सहस्रेषु तथा हि बाला। गतेयमात्मप्रतिरूपमेव मनो हि जन्मान्तरसङ्गतिज्ञम् ।। १५ ।। इत्युद्गता पौरवधूमुखेभ्य शृण्वन्कथा श्रोत्रसुखा कुमार । उद्भासित मडलसविधाभि सम्बन्धिन सद्म समाससाद ॥१६॥ लगाये बिना सलाई हाय में लिये हुए ही झरोखे को ओर चली गयी ॥८॥ एक और स्त्री झरोखे में ऑखे गडाये खड़ी थी। सहसा उमका नारा खुल गया, परन्तु उसको बाँधने की उसे सुधि हो नहीं थी। वह कपडे हाथ मे थामे इस प्रकार खड़ी थी कि उमके हाथ के आभूषणो की चमक उसकी नाभि तक जा पहुँचती थी॥९॥ एक स्त्री बैठी-बैठी मणियों की तागडी गूंथ रही थी। मो उसका एक छोर उसने एक पैर के अंगूठे में बाँध रक्खा था। अभी आधी ही तागड़ी पिरो पायी थी कि सहमा उठकर अज को देखने के लिए झरोखे की ओर दौड़ी। जिमका फल यह हुआ कि वहाँ पहुँचते-पहुँचते मणियों तो निकल-निकल कर बिखर गयीं और केवल उसका डोराभर पॉव में बँधा रह गया।॥१०॥ मदिरा की गन्ध से सुवासित मुखों वाली और झरोखों में उत्सुकता से झॉफती हुई वे स्त्रियों ऐसी लगती थी, जैसे उन झरोखो मे बहुत-मे कमल सजे हों और उन पर बहुत मे भीरें बैठे हुए हों। क्योंकि उनके सुन्दर मुखों पर ऑसे ऐसी लगती थीं, जैमे कमलों पर भौरे बैठे हों।।११।। वे स्त्रियों टकटकी लगाकर अपने नेत्रो से अज का रूप इस तरह पी रही थीं कि उनका ध्यान किमी अन्य काम की ओर गया ही नहीं। जैसे उनकी सब इन्द्रियों की शक्ति एकमात्र आँखों मे ही जुट गया हो॥१२॥ वे स्त्रियों आपस कह रही थीं-वैसे तो बहुत-से राजाओं ने स्वत आकर इन्दुमती मे विवाह की प्रार्थना की थी, किन्तु राजकुमारी ने स्वयवर करके ही अपना विवाह करना उचित ममझा और यह ठीक भी था। जैसे स्वयवर मे लक्ष्मी ने नारायण को वरा था, वैसे ही इन्दुमती ने अज को दर लिया है। बिना स्वयवर के उसे ऐसा वर कैमे मिल सकता था। १३ ।। ब्रह्मा यदि परस्पर शोभा को होड़ करने वाली इम मुन्दर जोड़ी को न मिलाते तो इनको सुन्दर बनाने का उनका सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाता ॥ १४॥ पिछले जन्म में ये दोनो रति और कामदेव हो रहे होंगे। तभी तो महनों राजाओं के बीच मे इन्दुमती ने इन्हे पा लिया। क्योंकि मन पिछले जन्म के सम्बन्ध को भलीभाँति पहचानता है।॥ १५॥ नगर को उन महिलाओं के मुँह से ऐसी मीठा बाते सुनते हुए कुमार अज अपने सम्बन्धी भोज के उम राजमहल में पहुंचे, जो मगलमयी मामग्रियों की सजावट मे जगमगा रहा था॥१६॥ वहाँ पहुँचपर वे तुरन्त हथिनी से नीचे प्राप्येव चूत चकासे। ६० श्री रघुवर ततोऽवतीर्याशु करेणुकाया स कामरूपेश्वरदत्तहस्त । वैदर्भीनर्दिष्टमयो विवेश नारीमनासोव चतुष्कमन्त ॥१७॥ महार्हसिहासनसस्थितोऽसौ सरत्नमर्यं मधुपर्कमिश्रम्। भोजोपनीत च दुकूलयुग्म जग्राह सार्ध वनिताकटाक्ष ॥१८॥ दुकूलवासा स वधूसमीप निन्ये विनीतैरवरोधरौ । वेलासकाश स्फुटफेनराजिनवैरुदन्वानिव चन्द्रपादे ॥१९॥ तत्रार्चितो भोजपते पुरोधा हुत्वाऽग्निमाज्यादिभिरग्निकल्य । तमेव चाधाय विवाहसाक्ष्ये वधूवरौ सङ्गमयाञ्चकार ॥२०॥ हस्तेन हस्त परिगृह्य वध्वा स राजसूनु सुतरा चकासे। अनन्तराशोकलताप्रवाल प्रतिपल्लवेन ॥२१॥ आसोद्वर कण्टकितप्रकोष्ठ स्विन्नामुलि सववृते कुमारी। तस्मिन्वये तत्क्षणमात्मवृत्ति सम विभक्तेव मनोभवेन ।। २२।। तयोरपाङ्गप्रतिसारितानि क्रियासमातिनिर्तितानि । हीयन्त्रणामानशिरे मनोज्ञामन्योन्यलोलानि विलोचनानि ॥२३॥ प्रदक्षिणप्रक्रमणात्कृशानोरुदर्चिषस्तन्मिथुन मेरोरुपान्तेष्विव वर्तमानमन्योन्यससक्तमहस्त्रियामम् ॥२४॥ नितम्बगुर्वी गुरुणा प्रयुक्ता वधूर्विधातृप्रतिमेन तेन। चकार सा मत्तचकोरनेत्रा लज्जावती लाजविसर्गमग्नौ ।। २५ ॥ हवि शमीपल्लवलाजगन्धी पुण्य कृशानोरुदियाय धूम । कपोलससर्पिशिख स तस्या मुहूर्तकर्णोत्पलता प्रपेदे ॥ २६ ॥ उतरे और कामरूप के राजा के हाथ में हाथ डालकर विदर्भराज के बतलाये भीतरी चौक में ऐसे पैठे, जैसे वे वहाँ की स्त्रियों के मन मे पैठ गये हों॥ १७ ॥ बहा वे एक सुन्दर और बहुमूल्य मिहामन पर जाकर बैठे। तब भोज ने उन्हे रेशमी वस्त्रों के एक जोडे के साथ जो दही, मधु और घी मिला हुआ मधुपर्क भेंट किया, उमे उन्होंने वहाँ की स्त्रियों की बॉको चितवन के साथ-माथ ले रिल्या॥१८॥ चन्द्रमा को नयी किरणे जैसे ममुद्र के उजले फेन वाली लहरो को किनारे तक खींच ले आती है, वैसे ही रनिवास के विनम्र सेवक युवराज अज को इन्दुमती के पास ले गये ॥ १९ ॥ वहाँ अग्नि के ममान तेजस्वी विदर्भराज के पुरोहित ने घी आदि सामग्रियों मे हवन करने के बाद उमी अग्नि को साक्षी बनाकर वर और वधू का ग्रन्थिबन्धन कर दिया ।।२०।। जैसे आम्रवृक्ष अपनी पत्तियो के माथ अशोकलता की लाल पत्तियो के साथ मिल जाने से मनोहर लगता है, वैमे ही जब अज ने अपनी पत्नी इन्दुमता का हाथ थामा, तब वे बहुत सुन्दर दिखने लगे थे॥२१॥ पत्नी का हाथ थामने मे अज के गट्टे पर रोमाच हो आया और इन्दुमती की उँगलियों मे पसीना आ गया। उस समय ऐसा लगा कि मानो कामदेव ने अपना प्रेमभाव उन दोनों में समान रूप से बॉट दिया हो ॥ २२ ॥ वे दोनों कनखियो मे एक-दूसरे को देखते थे और ऑखे मिलते ही लज्जा से ऑसें नीची कर लेते थे। उनका वह लाजभरा मकोच दर्शकों को बड़ा मुन्दर लग रहा था ।। २३ ।। जब अज और इन्दुमती हवन के अग्निकुण्ट का फेरा देने लगे, उस समय ऐसा लगा कि जैसे रात और दिन का जोडा मिलकर दोनों मुमेरु पर्वत को फेरी कर रहे हो ॥२४।। तदनन्तर बडे-बडे नितम्बो मे युक्त एव मल चकोर जैसी आँखो वाली लजाली इन्दुमती ने ब्रह्मा के सदृश पूज्य पुरोहित के कहने से अग्नि में धान की खोले डाली॥ २५ ॥ घी, शमी के पत्तों तथा धान की खोलो ॐ सप्तम सर्ग तदअनक्लेदसमाकुलाक्ष प्रम्लानबीजाइकुरकर्णपूरम् । वधूमुख पाटलगण्डलेखमाचारधूमग्रहणादभूव ॥२७॥ तौ स्नातकैर्वन्धुमता च राजा पुरन्ध्रिभिश्च क्रमश प्रयुक्तम्। कन्याकुमारी कनकासनस्थावाक्षतारोपणमन्वभूताम् ॥२८॥ इति स्वसुर्भोजकुलप्रदीप सम्पाद्य पाणिग्रहण स राजा। महीपतीना पृथगर्हणार्थं समादिदेशाधिकृतानधिश्री ॥२९॥ लिङ्गैर्मुद सवृतविक्रियास्ते ह्रदा प्रसन्ना इव गूढनक्रा । वैदर्भमामन्त्र्य ययुस्तदीया प्रत्यर्प्य पूजामुपदाछलेन ॥३०॥ स राजलोक कृतपूर्वसविदारम्भसिद्धौ समयोपलभ्यम्। आदास्यमान प्रमदामिष तदावृत्य पन्थानमजस्य तस्थौ ।। ३१ ।। भर्ताऽपि तावत्क्रथकैशिकानामनुष्ठितानन्तरजाविवाह । सत्वानुरुपाहरणीकृतश्री प्रास्थापयद्राघवमन्वगाच॥३२॥ तिम्ररित्रलोकप्रथितेन सार्धमजेन मार्गे वसतीरुषित्वा। तस्मादपावर्तत कुण्डिनेश पर्वात्यये सोम इवोष्णरश्मे ॥३३ ।। प्रमन्यव प्रागपि कोसलेन्द्रे प्रत्येकमात्तस्वतया बभूवु । अतो नृपाश्चमिरे समेता स्त्रीरत्नलाभ न तदात्मजस्य ॥ ३४॥ तमुद्वहन्त पथि भोजकन्या रुरोध राजन्यगण स दृप्त । बलिप्रदिप्टा श्रियमाददान विक्रम पादमिवेन्द्रशनु ॥ ३५॥ की गध मे भरा पवित्र धुओं अग्नि से निकलकर जब इन्दुमती के कपोल तक पहुंचा, तव ऐमा प्रतीत हुआ कि मानो इन्दुमती ने नीलकमल का वर्णपूल पहन रक्षा हो ।। २६ । उम विवाह की अग्नि का धुओं लगने मे इन्दुमती को ऑसों मे जनमिश्रित ऑमू निकलने लगे, उनमे उनके कानों के कर्णफ्ल कुम्ला गये और गाले लाल हो गयी ॥ २७ ॥ फेरे हो चुक्ने के बाद मोने ये मिहामा पर बैठे हुए वर-वधू के ऊपर स्नातको ने, कुम्बियों ने, भोजराज और पुरोहित ने बारी-बारी से गीले अक्षत छोडकर आशीर्वाद दिये ॥ २८ ॥ भोजकुल के दीपक लक्ष्मीवान् उम राजा ने अपना बहन का विवाहमस्कार पूरा करने के बाद मेवको को आज्ञा दी कि वे अलग-अलग मभी राजाओं का आदर-मत्कार करें ।। २९ ॥ जिसके निर्मल जल में घडियाल छिपा बैठा हो, उम मरोवर के ममान दमरे राजा ऊपर मे तो बडे प्रमन दिखलाई देते थे, परन्तु मन ही मन फूढे हुए थे। अत वे मब विदर्भराज से आज्ञा ले और उनकी दी हुई मामग्री भेंट के बहाने लौटाकर अपने-अपने देशों को लौट गये ॥३० ।। उन राजाओं ने पहले निश्चय कर लिया था कि अज इन्दुमती को लेकर चले तो उन्हे घेर लिया जाय और उनसे मुन्दरी इन्दुमती को छीन लिया जाय। मो वे सब अज का मार्ग गेकार बीच मे स्क गये ॥ ३१ ॥ इधर छोटी बहन का विवाह करके विदर्भराज ने अपनी मामयं के अनुमार धन देकर रघु के पुत्र अज को विदा किया और उनके माथ कुछ दूर तक जाकर पहुँचाने गये ॥ ३२ ॥ कुण्डिनपुर के राजा भोज ने त्रिलोकविख्यात अज के साथ मार्ग मे तीन राते बितायी और उसके बाद वैसे ही लौटे, जैसे अमावस्या को मूर्य के पाम मे चन्द्रमा लौट पडता है ॥ ३३ ॥ जो गजा मार्ग रोककर सटे थे, उनका कोशलपति रघु ने दिग्विजय के समय सब धन ले लिया था। इसलिए वे पहले मे ही उनसे वैर रसते थे। इसी कारण वे यह नहीं सह मके कि रघु का पुत्र हम लोगो के रहते स्त्रियों मे रलस्वस्पा इन्दुमता को ले जाय ।। ३४॥ अज जब इन्दुमती को लिये जा रहे थे, उस समय उन अभिमानी राजाओं ने अज को उसी प्रकार रोक लिया, ६२ के रघुवशे तस्या स रक्षार्थमनल्पयोधमादिश्य पित्र्य सचिव कुमार । प्रत्यग्रहीत्यार्थिववाहिनीं ता भागीरथी शोण इवोत्तरङ्ग ॥३६॥ पत्ति. पदाति रथिन रथेशस्तुरङ्गसादी तुरणाधिरूढम् । यन्ता गजस्याभ्यपतद्गजस्थ तुल्यप्रतिद्वन्द्वि बभूव युद्धम्॥३७ ।। नदत्सु तूर्येष्वविभाव्यवाचो नोदीरयन्ति स्म कुलोपदेशान्। बाणाक्षरैरेव परस्परस्य नामोर्जित चापभृत शशसु ।। ३८॥ उत्थापित सति रेणुरश्वै सान्द्रीकृत स्यन्दनवशचक्रे । विस्तारित. कुजरकर्णतालत्रक्रमेणोपरुरोध सूर्यम् ॥ ३९॥ मत्स्यध्वजा वायुवशाद्विदीर्णैर्मुखै प्रवृद्धजिनीरजासि। अभु पिबन्त परमार्थमत्स्या पर्याविलानोव नवोदकानि ॥४०॥ रथो रथाङ्गध्वनिना विजज्ञे विलोलघण्टाक्वणितेन नाग । स्वभर्तृनामग्रहणादभूव सान्द्रे रजस्यात्मपरावबोध ॥४१॥ आवृण्वतो लोचनमार्गमाजो रजोऽन्धकारस्य विजृम्भितस्य। शम्बक्षतावद्विपक्षीरजन्मा बालारुणोऽभूदुधिरप्रवाह ॥४२॥ स च्छिन्नमूल क्षतजेन रेणुस्तस्योपरिष्टात्पवनावधूत । अङ्गारशेषस्य हुताशनस्य पूर्वोत्यितो धूम इवाबभासे ।। ४३ ॥ प्रहारमूपिगमे रथस्था यन्तृनुपालभ्य निवर्तिताश्वान्। ये सादिता लक्षितपूर्वकेतूंस्तानेव सामर्पतया निजघ्नु ॥४४॥ जैसे इन्द्र के शत्रु वृत्रासुर ने वामन के चरण को उस समय रोक लिया था, जब बलि की राज्य-लक्ष्मी लेकर चले जा रहे थे।। ३५ ॥ तब अज ने अपने पिता के मत्री को आज्ञा दी कि आप थोड़े-से योद्धा लेकर इन्दुमती को रक्षा करें। स्वय उस राजसघ की सेना को रोककर उसी प्रकार खडे हो गये, जैसे बाद के दिनों में ऊँची तरगों वाला शोणनद गङ्गाजी की धारा को रोक लिया करता है।॥ ३६॥ बस, लड़ाई छिड़ गयो। पैदल पैदलों से, रथवाले रथवालों से, धुडसवार सवारों मे और हाथीसवार हाथीमवारों से भिड़ गये। इस प्रकार बराबर जोड़े की लड़ाई होने लगी ।। ३७ ।। उस समय वहाँ इतनी तुरुहियों बज रही थी कि कुछ सुनाई ही नहीं देता था। इमलिए धनुषधारीगण अपना कुल और नाम भी नहीं बतला पाते थे। वहाँ वे जो बाण चला रहे थे, उन पर सुदे हुए अक्षरों में उनके नामों का पता लग पाता था ।। ३८।। उस युद्धक्षेत्र मे घोड़ों की टाप से जो धूल उडी थी, उसमे रथ के पहियो मे उठी हुई धूल मिलकर और भी धनी हो गयी। हाथियों के कानों के डुलाने मे बह धूल चारों तरफ इस तरह फैल गयी कि जैसे सूर्य को कपड़े से ढॉक दिया गया हो ॥३९॥ वायु के झोंके मे सेना की मछली के आकार वाली झण्डियों के मुँह सुल गये थे। उनमे जब धूल घुमने लगी, तब वे ऐसी जात पडती थीं कि मानो वर्षा का गॅदला पानी पीने वाली सच्ची मछलिया हों॥४०॥ उम युद्ध में इतनी धूल उडी कि वहाँ पर सैनिकों ने पहियों का शब्द सुनकर ही जाना था कि रथ आ रहा है। अपने-पराये का ज्ञान उन्हे तब होता था, जव दोनों ओर के मैनिक अपने-अपने राजाओ का नाम ले-लेकर लडते थे॥४१॥ आँखो के आगे अन्धेरा करने वाली और युद्धभूमि मे फैली हुई उस धूल के अंधियारे में शस्त्रो से घायल घोडो, हाथियों और योद्धाओं के शरीर से निकला हुआ रक्त प्रात कालेन सूर्य को लाली जैसा दिखने लगा॥४१॥ उस समय पृथ्वी पर इतना रक्त बहा कि नीचे की धूल दब गयी और धूल ऊपर उठ चुकी थी, वह वायु के सहारे इधर-उधर फैलकर उम धुएं जैसी लगने लगी, जो अग्नि से उठकर फैल गयो हो और नीचे केवल अगारे भर बचे रह गये हों॥४३॥ जो योद्धा चोट लगने मे मूर्छित हो गये थे, उनको ।

सप्तम सर्ग अप्यर्धमार्गे परवाणलूना धनुर्भूता हस्तवता पृषत्का । सम्प्रापुरेवात्मजवानुवृत्या पूर्वार्धभागे फलिभि शरव्यम्॥४५॥ आधोरणाना गजसन्निपाते शिरासि चक्रैर्निशितै क्षुराग्रे । हतान्यपि श्येननखाग्रकोटिव्यासक्तकेशानि चिरेण पेतु ॥ ४६॥ पूर्व प्रहर्ता न जघान भूय प्रतिप्रहाराक्षममश्वसादी। तुरङ्गमस्कन्धनिषण्णदेह प्रत्याश्वसन्त रिपुमाचकाइक्ष ।। ४७॥ तनुत्यजा वर्मभृता विकोशैर्वृहत्सु दन्तेष्वसिभि पद्धि । उद्यन्तमग्नि शमयाम्बभूवुर्गजा विविग्ना करशीकरेण ॥४८॥ शिलोमुखोत्कृतशिर फलादया व्युतै शिस्त्रैश्चषकोत्तरेव । रणक्षिति शोणितमद्यकुल्या रराज मृत्योरिव पानभूमि ॥४९॥ उपान्तयोर्निष्कुषित विहङ्गैराक्षिप्य तेभ्य पिशितप्रियापि। केयूरकोटिक्षततालुदेशा शिवा भुजच्छेदमपाचकार ।।५०॥ कश्चिद्विषत्खड्गहृतोतमाङ्ग सद्यो विमानप्रभुतामुपेत्य । वामागससक्तसुराङ्गन स्व नृत्यत्कवन्ध समरे ददर्श ॥५१॥ अन्योन्यसूतोन्मथनादभूता तावेव सूतो रथिनी च कौचित्। व्यश्वौ गदाव्याहतसम्प्रहारो भग्नायुधौ बाहुविमनिष्ठो ॥५२॥ उनके सारथी रथ मे डालकर लौटा लाये। परन्तु जब उनकी मूर्छा दूर हुई तो वे अपने सारथियों को बहुत बुरा-भला कहो लगे और जिनकी मार मे वे घायल हुए थे, उन्हें रथ के झण्डों से पहचान-पहचान कर मारने लगे॥४४॥ जिन धनुषधारियों के हाय बाण चलाने मे मधे हुए थे, उनके बाण यद्यपि शत्रुओं के बाणों से बीच में ही दो टूक हो जाते थे, तयापि उनमें इतना वेग होता था कि फल लगा हुआ उनका अगला भाग लक्ष्य पर पहुँच ही जाता था ॥ ४५ ॥ हाथियों के युद्ध में पैो छुरे वाले चक्रों से जिन हाथीवानो के सिर कट जाते थे, र सिर बहुत देर बाद पृथ्वी पर गरते थे। क्योकि उनके लम्बे-लम्बे बाल बाजों के नखों मे उलझ जाने से बहुत देर तक ऊपर ही टेंगे रह जाते थे। ४६ ।। एक घुड़सवार ने अपने शत्रु घुडमवार पर चोट की। चोट खाते ही वह घोड़े के कन्धे पर झुक गया और उममें इतनी भी शक्ति नहीं रह गयो कि सिर उठा सके। जिस घुड़मवार ने प्रहार किया था, उसने यह देखकर फिर उस पर हाथ नहीं चलाया, बल्कि मन ही मन यह मनाने लगा कि वह फिर से जो जाय तो दो-दो हाथ युद्ध और हो॥४७॥ जो कवचधारी योद्धा हथेली पर प्राण लिये लड रहे थे, उन्होने जब नगी तलवार से हाथियों के दांतों पर चोटें की, तब उनमे आग निकलने लगी। उस आग मे हाथी हर गये और वे अपनी मूंड के जल से उस आग को बुझाने लगे॥४८॥ उम समय वह युद्धक्षेत्र मृत्युदेव 'मदिरालय जैमा दिख रहा था। जिसमे बाण से कटे हुए सिर ही फल, उलटकर गिरे हुए लौहटोप ही प्याले और बहता हुआ रक्त ही मानो मदिरा थी।॥४॥ एक जगह किसी के बॉह का टुकड़ा पड़ा था, जिसे गिद्ध आदि पक्षियों ने नोच डाला था। उसे मास के लोभ से एक सियारिन सींच ले गयी, किन्तु ज्यों ही उमने उम पर मुँह मारा त्यों हो बॉह मे बंधे भुजबन्ध की नोक से उमका तालू छिद गया और वह उसे वहीं छोड़कर चली गयी ॥५०॥ क्मिी योद्धा का मिर शत्रु की तलवार मे कट गया। युद्ध में मृत्यु होने मे वह देवता बन गया और अपनी बॉयीं ओर एक अप्सरा लिये हुए विमान पर चढकर आकाश से अपना नाचता हुआ धड़ देखने लगा॥५१॥ दो योद्धाओं के सारथी मारे जा चुके थे। इसलिए वे स्वय रथ चला रहे थे और लड़ भी रहे थे। परन्तु जब उनके घोडे भी मार डाले .

की रघुवशे परस्परेण क्षतयो प्रोत्क्रान्तवावो समकालमेव। अमर्त्यभावेऽपि कयोश्चिदासोदेकाप्सर प्रार्थितयोर्विवाद ॥५३॥ व्यूहावुभौ ताक्तिरेतरस्माद्ग जय चापतुरव्यवस्थम्। पश्चात्पुरोमारुतयो प्रवृद्धौ पर्यायवृत्त्येव महार्णवोर्मी ॥५४॥ परेण भग्नेऽपि बले महौजा ययावज प्रत्यरिसैन्यमेव । धूमो निव]त समीरणेन यतस्तु कक्षस्तत एव वहि ॥५५॥ रथी निपनी कवची धनुष्मान्दृप्त स राजन्यकमेकवीर । निवारयामास महावराह कल्पक्षयोवृत्तमिवार्णवाम्भ ॥५६॥ स दक्षिण तूणमुखेन वाम व्यापारयन्हस्तमलक्ष्यताजौ। आकर्णकृष्टा सकृदस्य योद्धा:व बाणान्सुषुवे रिपुम्नान् ॥५७॥ रोषदष्टाधिकलोहितोष्ठळक्तोर्ध्वरेखा भुकुटीर्वहद्धि । तस्तार गां भल्लनिकृत्तकण्ठे झारगर्भेषिता शिरोभि ॥५८॥ सर्वैर्वलाङ्गैर्द्विरदप्रधान सर्वायुधै कवटभेदिभिश्च। सर्वप्रयत्लेन च भूमिपालास्तस्मिन्प्रजहुर्युधि सर्व एव ।। ५९ ॥ सोऽस्त्रव्रजैश्छन्नरथ परेषा ध्वजाग्रमात्रेण बभूव लक्ष्य । नोहारमग्नो दिनपूर्वभाग किश्चित्प्रकाशेन विवस्वतेव ।।६०॥ प्रियवदात्प्राप्तमसौ कुमार प्रायुक्त राजस्वधिराजसूनु । गान्धर्वमस्त्र कुसुमास्त्रकान्त प्रस्वापत स्वप्ननिवृतलौल्य ॥ ६१ ।। गये तब वे रथों मे कूदकर पैदल ही गदा लकर लडने लगे और जब उनकी गदाएँ भी टूट गयीं, तब वे मल्ल-युद्ध करने लगे॥५२॥ दो वीर एक-दूसरे के प्रभाव मे एक माय मारे गये। दोनो देवता बनकर जब स्वर्ग पहुंचे, तब वहाँ एक ही अप्सरा पर दोनो गंझ गये और वहाँ भी वे उसके लिए आपस में लडने लगे।। ५३ ।। समुद्र की दो लहरे जैसे आगे-पीछे बहो वा वायु के झोके मे हटती-बढ़ती रहती है, वैसे ही दोनो मेनाएँ भी कभी जीतती और कभी हारर आगे-पीछे हटती-बढती रहती थीं।। ५४॥ यद्यपि उन प्रबल शत्रुओं ने अज की मेना को मार भगाया था, परन्तु महापराक्रमी अज शत्रु की सेना मे बढते ही चले गये। क्योंकि वायु धुएं को भले हा उडा दे, परन्तु आग को तो जहाँ तक घास-फूस मिलती है, वहाँ तक बढ़ती ही चली जाती है।॥५५॥ प्रलयकाल में जैसे वाराह भगवान् समुद्र के बढे हुए जल को चीरते हुए आगे बढ रहे थे, वैसे ही घोडे पर चढे जोर तूणीर बाँधे स्वाभिमानी वीर अज अकेले ही शत्रुसेना को चीरते हुए चले जा रहे थे!॥५६॥ उम ममय वे इतनी फुर्ती से बाण चला रहे थे कि पता ही नहीं चलता था कि कब अपना हाथ तृणार मे डाल्ते और कब बाण निकालते थे। बल्कि ऐमा लगता था कि जब वे कान तक धनुष की टोरी साचते थे, तब उमा मे मे शत्रुओं का नाश करने वाले बाण स्वत तिम्लते जा रहे थे।५७ ।। जिन राजाओ ने होटो को क्रोध मे चबा-चबाकर लाल कर लिया था और जो भौहे तानकर हुकार करते हुए आगे बढ़ रहे थे, उनके सिर काट-काटकर अज ने पृथ्वी ढॉक दी।। ५८ ॥ उन राजाओ ने जज पर इतने अस्त्र वरमाये कि उनका रथ ढक गया। कुहरे के दिन जैसे प्रभात होने का ज्ञान धुंधले सूर्य को देखकर होता है, वैसे ही उसके रथ की पताका के मिरे को देखकर ही अज का पता लगता था ।।६०॥ तदनन्तर महाराज रघु के पुत्र, कामदेव के ममान मुन्दर और मावधान अज ने प्रियवद का दिया हुआ वह गान्धर्व अस्त्र उन राजाओं पर छोडा, जिसमे निद्रा आ जाती थी।। ६१ ॥ वह अस्त्र छोडते ही उन राजाओं की सेना के हाथ ऐसे बँध गये छ सप्तम सर्ग ततो धनुष्कर्षणमूढहस्तमेकासपर्यस्तशिरस्त्रजालम् । तस्थौ ध्वजस्तम्भनिषण्णदेह निद्राविधेय नरदेवसैन्यम् ॥ ६२॥ तत प्रियोपातरसेऽधरोष्ठे निवेश्य दध्मो जलज कुमार | तेन स्वहस्तार्जितमेकवीर पिबन्यशो मूर्तमिवावभासे ॥६३ ।। शङ्खस्वनाभिज्ञतया निवृत्तास्त सन्नशत्रु ददृशु स्वयोधा । निमीलितानामिव पङ्कजाना मध्ये स्फुरन्त प्रतिमाशशाङ्कम्॥६४॥ सशोणितैस्तेन शिलीमुखानेनिक्षेपिता केतुपु पार्थिवानाम् । यशो हृत सम्प्रति राघवेण न जीवित व कृपयेति वर्णा ॥६५।। स चापकोटोनिहितैकबाहु शिरस्त्रनिष्कर्षभिन्नमौलि । ललाटबद्धश्रमवारिविन्दुर्भाता प्रियामेत्य वचो बभाषे॥६६॥ इत परान कहार्यशस्त्रान्वैदर्भि। पश्यानुमता मयाऽसि। एविधेनाहवचेष्टितेन त्व प्रार्दासे हस्तगता ममैभि ॥७॥ तस्या प्रतिद्वन्द्विभवाद्विषादात्सद्यो विमुक्त मुखमाबभासे। नि श्वासवाष्यापगमात्प्रपन्न प्रसादमात्मीयमिवात्मदर्श ।।६८॥ हृष्टापि सा होविजिता न साक्षाद्वाग्भि सखीना प्रियमभ्यनन्दत् । स्थली नवाम्भ पृषताऽभिवृष्टा मयूरकेकाभिरिवाभवृन्दम् ।। ६९ ।। इति शिरसि स वाम पादमाधाय राज्ञामुदवहदनवद्या तामवद्यादपेत । रयतुरगरजोभिस्तस्य रुक्षालकाग्रा समरविजयलक्ष्मी सैव मूर्ता बभूव ॥ ७० ॥ कि वे अपना धनुष तक नहीं सोंच मके। उनकी पगड़ियों गिरकर कन्धों पर झूल गयीं और सारी सेना पताकाओं के डडों के सहारे सो गयी ।। ६२॥ इन्दुमती के चुम्बन का रम लेने वाले अपो होठों मे शख फूंकते हुए अज उस समय ऐमे लग रहे थे कि जैसे अपने बाहुबल मे अर्जित मूर्तिमान् यश को ही पी रहे हों।। ६३ ।। शख की ध्वनि पहचान कर अज के योद्धा लौट आये। सोते हुए शत्रुओं के बीच अज उन्हें ऐमे लगे, जैसे सम्पुटित कमलों के बीच में चन्द्रमा चमक रहा हो।।६४।। उन मूर्छित पड़े हुए राजाओं की ध्वजाओं पर रुधिर मे सने बाणों की नोरों थे यह वाक्य लिख दिया गया- हे राजाओ। इस समय राजकुमार अज ने तुम लोगो का यश तो ल लिया, परन्तु दया करके उन्होने तुम्हारे प्राण नहीं लिये हैं॥६५॥ उसके बाद जब अज ने अपने सिर का लौहटोप उतारा तो उनके बाल छितरा गये, उनके माथे पर पसीना छा गया और वे इन्दुमती के पाम जा तथा धनुष के एक छोर पर हाथ टेककर भयभीत प्रिया से कहने लगे।। ६६ ।। इन्दुमती । घलो तुम्हे दिसाये कि इम ममय उन राजाओं के शस्त्र बालक भी छीन मकते हैं, इम प्रसार वे मब युद्धभूमि मे मोये हुए हैं। देखो तो इसी बूते पर ये तुम्हें मेरे हाथों मे छीनने को सन्नद्ध थे॥६७ ।। जब इन्दुमती को विश्वाम हो गया कि शत्रु हार गये, तब उसका विषादमुक्त मुँह उस दर्पण जैमा मुन्दर लगने लगा, जिम पर पड़ी हुई मॉम को भाप पोंछ डाली गयी हो ॥ ६८ ॥ अपने पति अज का पराक्रम देखकर इन्दुमती बहुत प्रमन्न हुई, परन्तु वह इतनी लजा गयी थी कि उसके मुंह से उनके अभिनन्दन के लिए शब्द ही नहीं निकल मके, परन्तु जैसे नये बादलों की बूंदों मे भीगी हुई पृथ्वी मोर के शब्दो मे मेघों का स्वागत करती है, वैसे ही उसकी मखियो ने जो अज की प्रशमा की, मो जैमे इन्दुमती ने ही उमका अभिनन्दन किया था। ६९ । इस प्रकार पूतात्मा अज उन राजाओ के मिर पर अपना बॉयाँ पैर रप और मुन्दरी इन्दुमती को लेकर चले। उनके रथ के घोडों की टापों द्वारा उडी हुई धूल मे इन्दुमती के केश भर गये थे और वह मूर्तिमती विजयलक्ष्मी ९का०

कि रघुवशे
पथमपरिगतार्थस्त रघु सन्निवृत्त विजयिनमभिनन्द्य श्लाघ्यजायासमेतम्।
तदुपहितकुटुम्ब शान्तिमार्गोत्सुकोऽभून्न हि सति कुलधुर्य सूर्यवश्या गृहाय ॥७॥
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये अजस्वय-
वराभिगमनो नाम सप्तम सर्ग ||७||
जैमी दीख रही थी॥७० ॥ महाराजा रघु को यह समाचार पहले ही मिल चुका था। इसलिए उन्होंने
सुन्दरी पली के साथ आये हुए विजयी अज का स्वागत किया। फिर उन्हें कुटुम्ब का भार सौंपकर
वे मोक्ष की साधना में लग गये। क्योकि सूर्यवंशी राजाओं का यह नियम था कि जब पुन कुल का
भार संभालने योग्य हो जाता था, तब वे घर में नहीं रहते थे।७१ ।।
इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में अज का इन्दुमती के साथ
पाणिग्रहण नामक सातवाँ सर्ग समाप्त ॥७॥

अष्टम सर्ग न कथयामास कृतार्थतामिछ। 0.C. BOD स नव सदय स अथ तस्य विवाहकौतुक ललित बिभ्रत एव पार्थिव । वसुधापि हस्तगामिनीमकरोदिन्दुमतीमिवापराम्॥१॥ दुरितैरपि कर्तुमात्मसात्प्रयतन्ते नृपसूनवो हि यत्। तदुपस्थितमग्रहीदज पितुराजेति भोगतृष्णया ॥२॥ अनुभूय वसिष्ठसम्भृतै सलिलैस्तेन सहाभिषेचनम्। विशदोच्छ्वसितेन मेदिनी बभूव दुरासद परैर्गुरुणाऽथविदा कृतक्रिय । पवनाग्निसमागमो ह्यय सहित ब्रह्म यदत्रतेजसा ॥४॥ रघुमेव निवृत्तयौवन तममन्यन्त नवेश्वर प्रजा । स हि तस्य न केवला श्रिय प्रतिपेदे सकलान्गुणानपि ॥५॥ अधिक शुशुभे शुभयुना द्वितयेन द्वयमेव सङ्गतम्। पदमृद्धमजेन पैतृक विनयेनास्य च यौवनम्॥६॥ बुभुजे महाभुज सहसोद्वेगमिय व्रजेदिति। अचिरोपनता मेदिनी नवपाणिग्रहणा वधूमिव ॥७॥ अहमेव मतो महीपतेरिति सर्व प्रकृतिष्वचिन्तयत्। उदधेरिव निम्नगाशतेष्वभवन्नास्य विमानना क्वचित्॥८॥ जब कि अज ने अभी विवाह का मुन्दर मगलमूत्र भी नहीं उतारा था, तभी रघु ने अज के हाथों मे मारो पृथ्वी इम प्रकार सौंप दी. जैसे वह भी दूसरी इन्दुमती हो।। १ ।। राजपुत्रजन जिस राज्य को पाने के लिए पापमय उपायों तक का प्रयोग करने में भी नहीं मकुचाते, उमी राज्य को अज ने दूमरे दिन केवल अपने पिता को आज्ञा मानकर स्वीकार कर लिया, भोग को इच्छा मे उमे नहीं अपनाया ।।२।। जब अज का राज्याभिषेक हुआ, उस समय वमिष्ठजी ने उनके ऊपर जो पवित्र जल छिड़का, वह पृथ्वी पर भी गिरा। उसके पड़ने पर पृथ्वी से जो भाप निकली, वह मानो यह मृचित कर रही थी कि वह भी अज के राजा होने में प्रसन्न है॥३॥ अथर्ववेद के विज्ञ वमिष्ठजी ने जब उनका राज्याभिषेक कर दिया, तब वे इतने तेजस्वी हो गये कि सहमा उनके मब शत्रु काँप उठे। क्योंकि जब क्षात्रतेज के साथ ब्रह्मतेज मिल जाता है, तब वह वैमा ही सशक्त हो जाता है, जैसे वायु का महारा पाकर अग्नि भभक उठता है।।४।। अयोध्या की प्रजा ने भी अज के राजा होने पर यही ममझा कि मानो रघु ही फिर से युवा हो गये हों। क्योकि अज ने रघु को केवल राज्यलक्ष्मी हा नहीं पायी थी, बल्कि रघु के सब गुण भी उन्होंने प्राप्त कर लिये थे।।५।। समार में उम ममय केवल दो ही एक-दूसरे से मिलकर सुन्दर जेंचे, एक तो पिता का भरा-पूरा राज्य पाकर अज और दृमरे अज को विनम्रता पाकर उनका नवयौवन ॥ ६ ॥ महाबाहु जज ने यह ममझकर दयालुता के माथ नवप्राप्त पृथ्वी का भोगना प्रारम्भ किया कि अधिक कठोरता का व्यवहार करने मे कहीं वह नयी ब्याही हुई बह के ममान घबरा न उठे।।७।। राजा अज अपनी प्रजा को बहुत प्यार करते थे। इससे सभी लोग यही मोचते थे कि वे हमे ही मबसे अधिक मानते हैं। जेमे ममुद्र मैकडों नदियो से एक-मा व्यवहार करता है, वैसे ही वे भी किसी का बुरा नहीं - की रघुवशे न खरो न च भूयसा मृदु पवमान पृथिवीरुहानिव । स पुरस्कृतमध्यमक्रमो नमयामास नृपाननुद्धरन् ॥ ९ ॥ अथ वीक्ष्य रघु प्रतिष्ठित प्रकृतिष्वात्मजमात्मवत्तया। विषयेषु विनाशधर्मसु त्रिदिवस्थेष्वपि नि स्पृहोऽभवत् ॥१०॥ गुणवत्सुतरोपितश्रिय परिणामे हि दिलीपवंशजा । पदवीं तरुवल्कवाससा प्रयता समिना प्रपेदिरे ॥११॥ तमरण्यसमाश्रयोन्मुख शिरसा वेष्टनशोभिना सुत । पितर प्रणिपत्य पादयोरपरित्यागमयाचतात्मन ॥१२॥ रघुरथुमुखस्य तस्य तत्कृतवानीप्सितमात्मजप्रिय । न तु सर्प इव त्वच पुन प्रतिपेदे व्यपवर्जिता श्रियम्॥१३॥ स किलाश्रममन्त्यमाश्रितो निवसन्नावसथे पुरादहि । समुपास्यत पुत्रभोग्यया स्नुषयेवाविकृतेन्द्रिय श्रिया॥१४॥ प्रशस्थितपूर्वपार्थिव कुलमभ्युद्यतनूतनेश्वरम्। नभसा निभृतेन्दुना तुलामुदितार्केण समारुरोह तत्॥१५॥ यतिपार्थिवलिङ्गधारिणी ददृशाते रघुराघवौ जनै । अपवर्गमहोदयार्थयोर्भुवमशाविव धर्मयोर्गतौ ॥१६॥ अजिताधिगमाय मन्त्रिभिर्युयुजे नोतिविशारदैरज । अनपायिपदोपलब्धये रघुराप्त समियाय योगिभि ॥१७॥ चाहते थे और न किमी से वैर रखते थे॥८॥ वे न बहुत कठोर थे और न बड़े कोमल । उन्होंने बीच का मार्ग अपनाया था। अपने शत्रु राजाओं को उन्होंने राजगद्दी से उतारे बिना ही उमी प्रकार विनम्र बना दिया, जैसे मध्यम गति से बड़े वाला वायु वृक्षों को उखाडता नहीं, परन्तु झुका तो देता ही है।॥९॥ जब रघु ने देखा कि मेरे पुत्र अज का प्रजा में बड़ा आदर है और वह भलीभाँति राज-काज कर रहा है, तब उन्हे इतना आत्मज्ञान हो गया कि स्वर्ग के उन मुखों की अभिलाषा भी उन्होंने छोड दी, जो कभी न कभी नष्ट हो ही जाते हैं।। १० । अब तक दिलीप के वश मे जायमान सभी राजा वृद्धावस्था मे सब राज-काज अपने गुणवान् पुत्र को सौंपकर वन में चले जाते थे॥११ ।। अतएव जब गजा रघु जगत को जाने लगे, तब अज ने सुन्दर पगडी वाला अपना सिर उनके चरणो पर रखकर प्रार्थना की कि 'आप मुझे छोडकर मत जाइए' ।।१२।। रघु अपने पुत्र अज को बहुत चाहते थे। इसलिए अज की आँखों मे ऑसू देखकर वे रुक तो गये, परन्तु जैसे माप अपनी केचुली छोटकर फिर उसे नहीं धारण करता, वैसे ही उन्होंने जिस राज्य-लक्ष्मी को एक बार छोड़ दिया था, उसे फिर नहीं अपनाया।।१३।। अब मन्याम लेकर वे नगर के बाहर एक कुटिया मे रह्ने लगे। जिम भूमि पर उनके पुत्र राज्य कर रहे थे, वह जितेन्द्रिय रघु को फल-फूल देकर पतोहू के ममान उनकी मेवा कर रही था॥१४।। उस ममय मूर्यवश उस आकाश जैसा लग रहा था, जिममे एक ओर चन्द्रमा छिप रहे हों और दूसरी ओर मूर्य निकल रहे हो। क्योंकि एक ओर राजा रघु सन्याम लेकर शान्तिमय जीवन बिता रहे थे और दूसरी ओर ऐश्वर्यशाली अन नये गजा बनकर गद्दी पर विराजमान थे।।१५।। इस प्रकार मन्यामी बने हुए रघु और राजा बने हुए अज को देखकर लोगों ने समझा कि मोक्ष और ऐश्वर्य देने वाले धर्म के दो अश पृथ्वी पर एक माथ उतर आये हैं।।१६।। एक ओर अज नातिज्ञ मत्रियो के माय दिग्विजय का मसूबा बाँधने लगे, दूसरी ओर रघु मोक्ष पद पाने के लिए तत्त्वदर्शी योगियों के माथ शास्त्रचर्चा में न नव ॐ अष्टम सर्ग नृपति प्रकृतीरवेक्षितु व्यवहारासनमाददे युवा। परिचेतुमुपाशु धारणा कुशपूत प्रवयास्तु विष्टरम्॥१८॥ अनयत्प्रभुशक्तिसम्पदा वशमेको नृपतीननन्तरान्। अपर प्रणिधानयोग्यया मरुत पञ्च शरीरगोचरान्॥१९॥ अकरोदचिरेश्वर क्षितौ द्विपदारम्भफलानि भस्मसात्। इतरो दहने स्वकर्मणा विवृते ज्ञानमयेन वहिना ॥२०॥ पणबन्धमुखान्गुणानज षडुपायुक्त समीक्ष्य तत्फलम्। रघुरप्यजयद्गुणत्रय प्रकृतिस्थ समलोष्ठकाञ्चन ॥२१॥ प्रभुराफलोदयात्स्थिरकर्मा विरराम कर्मण । योगविधेर्नवेतर स्थिरधोरापरमात्मदर्शनात्॥२२॥ इति शत्रुषु चेन्द्रियेषु च प्रतिषिद्धप्रसरेषु जाग्रतो । प्रसितावुदयापवर्गयोरुभयों सिद्धिमुभाववापतु ॥२३॥ अथ काश्चिदजव्यपेक्षया गमयित्वा समदर्शन समा । तमस परमापदव्यय पुरुष योगसमाधिना रघु ॥२४॥ श्रुतदेहविसर्जन पितुश्चिरमभूणि विमुच्य राघव । विदधे विधिमस्य नैष्ठिक यतिभि सार्धमनग्निमग्निचित्॥२५॥ अकरोत्स तदौर्बदैहिक पितृभक्त्या पितृकार्यकल्पवित् । न हि तेन पथा तनुत्यजस्तनयावर्जितपिण्डकाइक्षिण ॥२६॥ तल्ली। हो गये ।।१७।। एक तरफ युवा राजा जनता के कामों को देखभाल के लिए न्याय के आमन पर बैठता था, उधर बूढे राजा रघु अपने मन को माधने का अभ्याम करने के लिए अकेले में कुशा के पवित्र आमन पर बैठते थे॥१८॥ अज ने अपने प्रभुत्व मे आम-पाम के मभी शत्रु राजाओं को मुट्ठी मे कर लिया। उधर रघु ने अपने योगबल से शरीर के भातर रहने वाले प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान-दन पाँचों पवनों को अपने वश मे कर लिया ॥१९॥ अज ने पृथ्वी पर के शत्रुओं की मब चाले नष्ट कर दी और रघु ने ज्ञान को अग्नि से अपने मारे कर्मो को भस्म कर डाला ।।२०।। अज सधि, विग्रह, यान, आमन, आश्रय और द्वैधीभाव-दन छ नीतियों का परिणाम समसार प्रयोग करते थे, दूसरी ओर मिट्टी और सोना बराबर समझने वाले रघु ने प्रकृति के सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणो पर विजय पा ली।। २१ ।। दृढप्रतिज्ञ अज' जब क्मिी काम मे हाथ लगाते थे तो उसे तब तक नहीं छोडते थे, जब तक वह पूरा नहीं हो जाता था। वैसे ही स्थिरचित्त रघु ने भी तब तक योगक्रिया नहीं छोडी, जब तक उन्हे भगवान का दर्शन नहीं मिल गया ॥ २२ ॥ एक ओर राजा अज सारे ससार का ऐश्वर्य प्राप्त करने मे जागरूक थे और दूसरी ओर रघु मोक्ष प्राप्त करो में तन्मय थे। इस प्रकार अज ने अपने शत्रुओं का बढाव रोककर और रघु ने इन्द्रियों को काबू में करके दोनो ने अपनी-अपनी सिद्धियों प्राप्त कर ली।।२३।। समदर्शी रघु ने अज के कहने मे ममार मे कुछ वर्ष और बिताये। उसके बाद योगबल से सदा प्रकाशमान और अविनाशी परमात्मा मे विलीन हो गये ॥२४॥ इस तरह अपने पिता के देहान्त का समाचार पाकर अग्निहोत्री अज बहुत रोये। पिता के शरीर का दाहमस्कार उन्होने नहीं किया, बल्कि योगियों के माथ उनके शरीर को ले जाकर पृथ्वी मे समाधि दे दो॥२५॥ रघु जैसे जो महात्मा अपने योगबल से शरीर को त्याग कर मुक्त हो जाते हैं, उन्हें यद्यपि अपने पुत्रो मे पिण्डदान की आवश्यकता नहीं रहती, तथापि अज यह जानते थे कि पिता का मस्कार कैसे करना चाहिए। अत ७० स पार्थिव । ह रघुवशे परागतेरशोच्यता पितुरुद्दिश्य सदर्थवेदिभि । शमिताधिरधिज्यकार्मुक कृतवानप्रतिशासन जगत्॥२७॥ क्षितिरिन्दुमती च भामिनी पतिमासाद्य तमनथपौरुषम्। प्रथमा बहुरत्नसूरभूदपरा वीरमजीजनत्सुतम्॥२८॥ दशरश्मिशतोपमद्युति यशसा दिक्षु दशस्वपि श्रुतम्। दशपूर्वरथ यमाख्यया दशकण्ठारिगुरु बिदुर्बुधा ।।२९।। ऋषिदेवगणस्वधाभुजा श्रुतयागप्रसवै स अनृणत्वमुपेयिवान् बभी परिधेर्मुक्त इवोष्णदीधिति ॥३०॥ बलमार्तभयोपशान्तये विदुषा सत्कृतये बहु श्रुतम्। वसु तस्य विभोर्न केवल गुणवत्ताऽपि परप्रयोजना ॥३१॥ स कदाचिदवेक्षितप्रज सह देव्या विजहार सुप्रजा । नगरोपवने शचीसखो मरुता पालयितेव नन्दने ॥३२॥ अथ रोधसि दक्षिणोदधे श्रितगोकर्णीनकेतमीश्वरम् । उपवीणयितु ययो रवेरुदयावृत्तिपथेन नारद ॥३३॥ कुसुमैथितामपार्थिवै सजमातोद्यशिरोनिवेशिताम्। अहरत् किल तस्य वेगवानधिवासस्पृहयेव मारुत ॥ ३४॥ भ्रमरै कुसुमानुसारिभि परिकोर्णा परिवादिनी मुने । ददृशे पवनावलेपज सृजती बाष्पमिवाञ्जनाविलम् ॥ ३५ ।। उन्होने बड़ी भक्ति से अपने पिता के श्राद्ध आदि मस्कार सम्पन्न किये ॥२६ ।। जब तत्त्वज्ञानी पण्टितो ने अज को समझाया कि तुम्हारे पिता ने मोक्ष पा लिया है, तब उन्हे धीरज बँधा और उनका शोक घटा। तदनन्तर हाथ मे धनुष-बाण लेकर वे सारे समार पर एकछत्र राज्य करने लगे।। २७ ।। पृथ्वी और इन्दुमती दोनों ही अज जैसे महापराक्रमी को पति के रूप मे पाकर बहुत प्रसन्न हुई। अतएव पृथ्वी ने बहुत-मे रत्न उत्पन्न किये और इन्दुमती ने एक वीर पुत्र को जन्म दिया ॥ २८॥ ये अज पुन दस सौ (हजारो) किरणों वाले मूर्य के समान तेजस्वी थे। जिनमा यश दमो दिशाओ मे व्याप्त था, जो उन रामजी के पिता थे जिन्होंने दस सिर वाले रावण को मारा था और जिन्हें पडित लोग 'दशरथ' कहते हैं ।। २९ । इस प्रकार वेदों का अध्ययन करके ऋषिकण से, यज्ञ करके देवगण मे और पुत्र उत्पन करके पितृऋण से मुक्त होकर राजा अज वैसे ही शोभित हुए, जैमे मण्डल (ग्रह्ण) मे छूटकर मूर्य शोभित होता है।॥३०॥ राजा अज ने केवल अपने धन मे ही दूसरो को लाभ नहीं पहुँचाया, बल्कि अपने गुणों से भी लोगों का उपकार किया। क्योकि अपने पराकम से तो उन्होंने दीनों और दुर्बलो का डर दूर किया और अपने शास्त्रज्ञान मे विद्वानों का सत्कार क्यिा।। ३१ । एक दिन की बात है, सुन्दर प्रजा (सन्तान) वाले तथा प्रजापालक राजा अज अपनी रानी इन्दुमती के साथ नगर के उपबन मे उमी प्रकार विहार कर रहे थे, जैसे देवताओं के राजा इन्द्र नन्दन वन मे इन्द्राणी के साथ विहार करते हैं ।। ३२॥ उसी समय दक्षिणी समुद्र के किनारे गोकर्णनिवामी शकरजी को वीणावादन के साथ गाना मुनाने के लिए नारदजी आकाशमार्ग से चले जा रहे थे ॥ ३३ ॥ उनकी उम वीणा के सिरे पर स्वर्गीय फूलो से गुंथी हुई एक माला लटकी थी। उस समय वेग से चलनेवाले वायु के कारण वह माला इस प्रकार खिमक कर नीचे गिर गयी, जैसे वायु ने ही सुगन्ध के लोभ से उसे वहाँ मे उतार लिया हो ॥३४॥ यद्यपि वह माला गिर गयी, परन्तु पुष्परस के लोभी भौंरें अब तक उम वीणा पर मॅडरा रहे थे। उन्हे देखकर 113254 • अष्टम सर्ग ७१ सा Ac:33900 GOVT. --- यदि। अभिभूय विभूतिमार्तवीं मधुगन्धातिशयेन वीरुधाम्। नृपतेरमरसगाप दयितोरुस्तनकोटिसुस्थितिम्॥३६॥ क्षणमात्रसखों सुजातयो स्तनयोस्तामवलोक्य विहला। निमिमील नरोत्तमप्रिया हृतचन्द्रा तमसेव कौमुदी॥ ३७॥ वपुषा करणोज्झितेन सा निपतन्ती पतिमप्यपातयत्। ननु तैलनिषेकविन्दुना सह दीपार्चिरुपैति मेदिनीम् ॥ ३८॥ उभयोरपि पाववर्तिना तुमुलेनातरवेण वेजिता । विहगा कमलाकरालया समदु खा इव तत्र चुक्रुशु || टा ITBRAR नृपतेयंजनादिभिस्तमो नुनुदे सा तु तथैव सस्थिता।। प्रतिकारविधानमायुष सति शेषे हि फलाय कल्पते || Nuraber प्रतियोजयितव्यवल्लकीसमवस्थामथ सत्त्वविप्लवात्। स निनाय नितान्तवत्सल परिगृहोचितमङ्कमङ्गनाम् । पतिरनिषण्णया तया करणापायविभिन्नवर्णया। समलक्ष्यत बिभ्रदाविला मृगलेखामुषसीव चन्द्रमा ॥ ४२ COLLEURS विललाप स बाष्पगद्गद सहजामप्यपहाय धीरताम्। अभितप्तमयोऽपि मार्दव भजते कैव कथा शरीरिषु ।। ४३ ॥ कुसुमान्यपि गात्रसङ्गमात्प्रभवन्त्यापुरपोहितु न भविष्यति हन्त साधन किमिवान्यत्प्रहरिष्यतो विधे ॥४४॥ ऐमा लगता था कि मानो वायु से अपमानित होकर वह वीणा काजल मिले हुए ऑसू बहा रही थी॥ ३५ ॥ उस स्वर्गीय माला में इतना अधिक मधु और इतनी अधिक सुगन्ध थी कि उसके आगे वमन्त के वृक्षो और लताओं का मधु और सुवाम लजा जाता था। समा वह माला रानी इन्दुमती के बडे-बडे स्तनो के बीच में आ गिरी ॥ ३६॥ अज की प्रियतमा इन्दुमती ने क्षणभर के लिए अपने स्तनो को सखी उस माला को देखा और देखते ही उसने व्याकुल होकर उमी तरह आँखे मूंद ली, जैमे चन्द्रमा को राहु ने ग्रम लिया हो॥३७॥ प्राणहीन होने मे इन्दुमती धरती पर गिर पड़ी और उसके साथ-साथ अज भी गिर पड़े। क्योंकि गिरते हुए तेल की बूंदो के साथ दीपक की लौ भी तो पृथ्वी पर गिर पडती है।। ३८॥ यह देखकर उन दोनों के जिन सेवकों ने रोना-चिल्लाना प्रारम्भ कर दिया था, उनसे डरकर तालाबों में रहने वाले पक्षी भी इस प्रकार चिल्ला उठे, जैसे वे भी उनके दु ख से दुखी हो गये हो।।३९ ।। पखा डुलाने आदि उपायो मे किसी प्रकार अज की मूर्छा तो दूर हो गयी, परन्तु रानी इन्दुमती वैसे ही पड़ी रही। क्योंकि उपचार तो तभी काम करता है कि जब आयु शेष हो॥४०॥ तदनन्तर उस अत्यन्त प्यारे राजा ने अपनी मृत पत्नी इन्दुमती को अपनी गोद मे उठापर वैसे ही रख लिया, जैसे तार मिलाने के लिए वीणा गोद में रख ली जाती है।। ४१ ॥ प्राण निकल जाने से इन्दुमती के शरीर का रंग पीला पड़ गया था। उसे गोदी मे लिटाये राजा अज उम प्रात कालोन चन्द्रमा के ममान दीख रहे थे, जिसकी गोद मे मृग की धुंधली छाया विद्यमान हो॥४२॥ शोक मे उनका स्वाभाविक धीरज जाता रहा, गला भर आया और वे घिधियाकर रोने लगे। क्योंकि तपने पर लोहा भी नरम हो जाता है, तब देहधारियों की बात ही क्या है।॥४३॥ वे रोते हुए कह रहे थे- हाय । यदि फूल भी शरीर को छूकर प्राण ले सकते हैं, तब तो दैव जब किमी को मारना चाहे तब किमी भी वस्तु से मार सकता है।॥४४॥ यह भी सभव है कि कोमल वस्तु को मारने के लिए देव कोमल वस्तु का ही उपयोग करता ७२ र रघुवशे अथवा मृदु वस्तु हिसितु मृदुनैवारभते प्रजान्तक । हिमसेकविपत्तिरत्र मे नलिनी पूनिदर्शन मता ॥४५॥ सगिय यदि जीवितापहा हृदये कि निहिता न हन्ति माम्। विषमप्यमृत क्वचिद्भवेदमृत वा विषमीश्वरेच्छया॥४६॥ अथवा मम भाग्यविप्लवादशनि कल्पित एष वेधसा। यदनेन तरुन पातित क्षपिता तद्विटपाश्रिता लता॥४७॥ कृतवत्यसि नावधोरणामपराद्धेऽपि यदा चिर मयि । कथमेकपदे निरागस जनमाभाष्यमिम न मन्यसे॥४८॥ ध्रुवस्मि शठ शुचिस्मिते । विदित. कैतववत्सलस्तव। परलोकमसन्निवृत्तये. यदनापृच्छय गताऽसि मामित ॥ ४९ ।। दयिता यदि तावदन्वगाद्विनिवृत्त किमिद तया विना। सहता हतजीवित मम प्रबलामात्मकृतेन वेदनाम्॥५०॥ सुरतश्रमसम्भृतो मुखे ध्रियते स्वेदलवोद्गमोऽपि ते। अथ चास्तमिता त्वमात्मना धिगिमा देहभृतामसारताम् ॥५१॥ मनसाऽपि न विप्रिय मया कृतपूर्व तव कि जहासि माम्। ननु शब्दपति क्षितेरह त्वयि मे भानिवन्धना रति ॥५२॥ कुसुमोत्खचितान् वलोभृतश्चलयन् भृगरुचस्तवालकान् । करभोरु। करोति मारुतस्त्वदुपावर्तनति मे मन ॥५३ ।। तदपोहितुमर्हसि प्रिये। प्रतिबोधेन विषादमाशु मे। ज्वलितेन गुहागत तमस्तुहिनादेरिव नक्तमोषधि ॥५४॥ हो। क्योंकि पहले ही देखा गया है कि कमलिनी यो नष्ट करने के लिए पाला ही पर्याप्त होता है ।। ४५ ।। यदि यह माला ही प्राण लेने वाली हो तो मैं भी इमे छाती पर रख लेता हूँ, परन्तु यह हमें क्यो नहीं मार डालती। ईश्वर की इच्छा ही तो है। कहीं विष भी अमृत और अमृत विष बन जाता है ।।४६ ॥ अथवा यह मेरा दुर्भाग्य है कि विधाता ने इस माला को वह वज्र बनाकर भेजा है, जिसने पेड को तो छोड दिया, किन्तु उसके माथ लिपटी हुई लता को नष्ट कर डाला ।। ४७ ।। हे इन्दुमती । मैंने बहुत अपराध किये, परन्तु तुमने कभी मेरा तिरस्कार नहीं किया। फिर आज एकाएक बिना अपराध के ही तुम मुझे बात करने योग्य भी क्यों नहीं समझती? || ४८ ।। हे मोठी हमी हमने वाली पिये | क्या तुमने मचमुच यह समझ लिया है कि मैं तुमसे झूठा प्रेम करता हूँ? दमामे तो मुझसे बिना पूछे तुम मदा के लिए परलोक चलो गयो॥४९॥ मेरे ये नीच प्राण जब प्रिया के साथ चले गये थे, तब फिर लौट क्यों आये ? जब इनको करनी ही ऐमी है, तब ये दारण दु ख भोगें। मैं कर ही क्या मकता हूँ॥५०॥ हे प्रिये । अभी तुम्हारे मुंह पर से सम्भोगकालीन थकावट के पमाने को बंदे भी नहीं मूसी और तुम चल बमी! मनुष्य की ऐमी नश्वरता को धिक्कार है।। ५१ ॥ मैंने कभी मन मे भी तुम्हारी बुराई नहीं की, फिर तुम मुझे क्यो छोड रही हो? मैं पृथ्वी का पति तो नाम मात्र का हूँ, मेरा सच्चा प्रेम तुमसे ही है ।।५२ ।। हे मुजधने । फूलों से गुंथी और भौरों जैमी काती तुम्हारी लटें जब वायु से हिलती हैं, तब मेरे मन को यह आशा होने लगती है कि अब तुम अवश्य ही उट बैठोगी।। ५३ ।। अतएव हे प्रिये । जैसे रात मे चमकने वाली बूटियों हिमालय की अँधेरी गुफा में भी प्रकाश कर देती हैं, वैमे ही तुम भी फिर मे जागकर मेरा दुख दूर कर दो ॥५४॥ मौन भौरा से भरे और रात मे मुंदे अकेले क अष्टम सर्ग 0 ७३ त्वा तव इदमुन्छ्वसितालक मुख तव विश्रान्तकथ दुनोति माम् । निशि सुप्तमिवैकपङ्कज विरताभ्यन्तरषट्पदस्वनम्॥५५॥ शशिन पुनरेति शर्वरी दयिता द्वन्द्वचर पतत्रिणम् । इति तो विरहान्तरक्षमो कथमत्यन्तगता न मा दहे ॥५६॥ नवपल्लवसस्तरेऽपि ते मृदु दूयेत यदङ्गमर्पितम्। तदिद विहिष्यते कथ वद वामोरु | चिताधिरोहणम् ।। ५७॥ इयमप्रतिबोधशायिनी रशना प्रथमा रह सखी। गतिविभ्रमसादनीरवा न शुचा नानु मृतेव लक्ष्यते॥५८॥ कलमन्यभृतासु भापित कलहसीषु मदालस गतम्। पृषतीषु विलोलमीक्षित पवनाधूतलतासु विभ्रमा ॥५९ ॥ त्रिदिवोत्सुकयाऽप्यवेक्ष्य मा निहिता सत्यममी गुणा वया। विरहे तव मे गुरुव्यथ हृदय न त्ववलम्बितु क्षमा ॥६॥ मिथुन परिकल्पित त्वया सहकार फलिनी च नन्विमौ । अविधाय विवाहसक्रियामनयोर्गभ्यत इत्यसाम्प्रतम्॥६१॥ कुसुम कृतदोहदस्त्वया यदशोकोऽयमुदीरयिष्यति। अलकाभरण कथ नु ततव नेष्यामि निवापमाल्यताम्॥६२॥ स्मरतेव सशब्दनूपुर चरणानुग्रहमन्यदुर्लभम्। अमुना कुसुमाश्रुवर्षिणा त्वमशोकेन सुगात्रि। शोच्यसे ॥३॥ नि श्वसितानुकारिभिर्बकुलैरचिता सम मया। असमाप्य विलासमेखला किमिद किन्नरकण्ठि। सुप्यते ॥ ६४॥ कमल जैसा तथा बिसरी अलकों मे ढंका तुम्हारा मौन मुस देखकर मुझे बडा दुस हो रहा है।। ५५ ।। चन्द्रमा को राति फिर मिल जाती है और चक्वे को चस्वी प्रात काल मिलती है। इसलिए उन्हें बिछोह का दु ख थोड़ी ही देर रहता है, परन्तु तुम तो मदा के लिए चली जा रही हो। फिर बतलाओ, मुझे विरह को आग जलाकर क्यों न भस्म कर देगी ॥५६ ।। कोमल पल्ल्वो का बिछौना भी जिस शरीर में गडता था, हे सुन्दर जघाओं वाली ' तुम्हीं बतलाओ कि तुम्हारा वहीं शरीर चिता पर कैसे रक्सा जा सकेगा? ॥५७ ।। क्या तुम नहीं देखती कि तुम्हारी भावभरी चाल के बन्द हो जाने मे तुम्हारी प्रिय सखी यह करधनी भी तुम्हे मदा के लिए मोती देसपर तुम्हारे शोक में मरी-मी दीस रही है।। ५८ ।। तुम्हारी मीठो बोली कोयलों ने और तुम्हारी मन्दगति कलहमिनियो ने ले ली। तुम्हारी चचल चितवन हरिणियों को मिल गयी और तुम्हारा चुलबुलापन वायु मे हिलती हुई लताओं मे जा पहुंचा है।। ५९ ॥ यद्यपि स्वर्ग जाने की उतावली मे मुये बहलाने के लिए तुम अपने गुण यहीं छोड गयी हो, परन्तु तुम्हारे बिछोह मे में इतना अधीर हो गया हूँ कि इन मबमे मेरे हृदय को तनिक भी मन्तोष नहीं मिलेगा ॥६० ॥ हे प्रिये । तुमने इस आम और प्रियगुलता का विवाह ठीक किया था। मो इन दोनो का विवाह किये बिना तुम्हारा जाना उचित नहीं है । ६१ ।। देसो, जिस अशोक को तुमने अपने चरणों की ठोकर लगायी थी, वह जब आगे चलकर फूलेगा, तब तुम्हारे केशों को मजाने वाले उन फूलों को मैं तुम्हारे लिए जलदान की अञ्जलि मे कैमे ले पाऊँगा ।। ६२ ।। हे मुन्दरी । तुम्हारे झुनझुनाते बिछुओं वाले चरण की ठोकर किसी को नहीं मिलती थी, परन्तु तुमने बडी कृपा करके उम अशोक को ठोकर लगाई थी। अब उन तुम्हारे चरणो की कृपा का स्मरण करके यह अशोक वृक्ष फूलो के ऑमू बरमाकर तुम्हारे लिए रो रहा है ।। ६३॥ हे किन्नरों जैमी मधुरभाषिणी । अपने खाम मदृश मुगन्धवाले मौलमिरी के फूलों १० का० ?

७४
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रघुवशे
समदु खसुख सखीजन प्रतिपच्चन्द्रनिभोऽयमात्मज ।
अहमेकरसस्तथापि ते व्यवसाय प्रतिपतिनिष्ठर ॥६५॥
धृतिरस्तमिता रतिश्च्युता विरत गेयमृतुर्निरुत्सव ।
गतमाभरणप्रयोजन परिशून्य शयनीयमद्य
मे॥६६॥
गृहिणो सचिव सखो मिय प्रियशिष्या ललिते कलाविधौ।
करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वा वद कि न मे हृतम् ॥ ६७॥
मदिराक्षि मदाननार्पित मधु पीत्वा रसवत्कथ नु में।
अनुपास्यसि बाष्पदूषित परलोकोपनत जलाञ्जलिम्॥ ६८॥
विभवेऽपि सति त्वया विना सुखमेतावदजस्य गण्यताम् ।
अहृतस्य विलोभनान्तरैर्मम सर्वे विषयास्त्वदाश्रया ॥ ६९॥
विलपन्निति कोसलाधिप करुणार्थग्रथित प्रिया प्रति ।
अकरोत्पृथिवीरुहानपि चुतशाखारसबाष्पदूषितान् ॥७०॥
अथ तस्य कथञ्चिदत स्वजनस्तामपनीय सुन्दरीम्।
विससर्ज
तदन्त्यमण्डनामनलायागुरुचन्दनैधसे ॥१॥
प्रमदामनु सस्थित शुचा नृपति सन्निति वाच्यदर्शनात् ।
न चकार शरीरमग्निसात् सह देव्या न तु जीविताशया।।७२ ।।
अथ तेन दशाहत परे गुणशेषामुपदिश्य भामिनीम् ।
विदुषा विधयो महर्द्धय पुर एवोपवने समापिता ॥७३॥
की जो सुन्दर माला तुम मेरे माथ गूंथ रही थी, उमे अधगुंथी ही छोडर इस तरह क्यों मो रही
हो ? ॥ ६४॥ तुम्हारे सुख-दुख को साथिन ये सखियों खडी हैं, शुक्लपक्ष के चन्द्रमा जैमा प्रमन्न मुख
वाला तुम्हारा पुत्र भी यहीं है और तुम्हारा आन्य प्रेमी मैं भी तुम्हारे पास हूँ। तब म लोगो को
छोडकर चले जाते की जो तुमने ठान ली है, यह तुम्हारी बडी निर्दयता है ।। ६५ । आज मेरा धीरज
छूट गया, आनन्द जाता रहा, गाना-बजाना दूर हो गया, ऋतुएँ फीकी पड़ गयी, पहनना-ओढना बेकार
हो गया और मेरो शय्या सूनी हो गयो। ६६ ।। एकमात्र तुम्ही मेरी स्त्री थी, सम्मति देने वाली मित्र
थी, एकान्त की सखी थी और गानविद्या आदि ललित कलाओं में मेरी शिष्या थी। बतलाओ तो सही,
तुम्हे मुझसे छीनकर निर्दयो विधाता ने मेरा क्या नहीं छीन लिया ।। ६७ ।। हे मदभरे नयनोवाली । तुमने
मेरे मुंह से छूटा हुआ स्वादिष्ट आसव पिया है, तो अब तुम परलोक मे आँसुओं के जल से मिली हुई
गॅदली जलाञ्जलि को कैसे पी पाओगी॥ ६८।। इतना विशाल ऐश्वर्य होने पर भी तुम्हारे बिना अज
का सारा सुख जाता रहा। क्योंकि मुझे और किमी वस्तु से प्रेम नहीं है, मेरे तो सब मुखों का केन्द्र
केवल तुम्ही थी।। ६९ । कोसलनरेश अज जब अपनी प्रिया के लिए इस प्रकार विलाप कर रहे थे,
उस समय उन्हें देखकर उपवन के वृक्ष भी मानो अपनी शाखाओं मे रम वहा-बहाकर रुदन करने लगे॥७॥
कुटुम्बियो ने किसी प्रकार अज की गोद से इन्दुमती के शरीर को हटाया और उमी पुष्पमाला से उनका
शृगार करके अगर तथा चन्दन की लकड़ियों मे उमका दाह-मस्कार सम्पन्न किया।॥७१ ॥ अपनी पली
के वियोग से राजा अज इतने दुखी हो गये कि उन्हे जीने को माघ नहीं रह गयो, किन्तु वे इन्दुमती
के साथ चिता पर इसलिए नहीं चढे कि कहीं लोग यह न कह्न लगे कि राजा अज विद्वान् होकर
भी अपनी स्त्री के शोक में मर गये।७२ ।। शास्त्रज्ञ अज ने जिम इन्दुमती के केवल गुण शेष रह गये
थे, उम प्रिया के सब क्रिया-कर्म दम दिन बीत जाने पर उसी उपवन मे बडे धूम-धाम से पूर्ण किये ॥७३॥

8 अष्टम सर्ग ७५ 1 स जन स विवेश पुरी तया विना क्षणदापायशशाङ्कदर्शन । परिवाहमिवावलोकयन् स्वशुच पौरवधूमुखाश्रुषु ।।७४॥ अथ त सवनाय दीक्षित प्रणिधानाद्गुरुराश्रमस्थित । अभिषगजड विजजिवानिति शिष्येण किलान्वबोधयत् ॥ ७५॥ असमाप्तविधिर्यतो मुनिस्तव विद्वानपि तापकारणम्। न भवन्तमुपस्थित स्वय प्रकृती स्थापयितु पथश्च्युतम्॥७६॥ मयि तस्य सुवृत्त। वर्तते लघुसन्देशपदा सरस्वती। शृणु विश्रुतसत्त्वसार । ता हृदि चैनामुपधातुमर्हसि ॥७॥ पुरुषस्य पदेष्वजन्मन, समतीत च भवच्च भावि च। स हि निष्प्रतिघेन चक्षुषा त्रितय ज्ञानमयेन पश्यति ।। ७८॥ चरत किल दुश्चर तपस्तृणबिन्दो परिशङ्कित पुरा। प्रजिधाय समाधिभेदिनी हरिरस्मै हरिणी सुराङ्गनाम्॥७९॥ तप प्रतिबन्धमन्युना प्रमुसाविष्कृतचारुविक्षमाम् । अशपद्धव मानुषोति ता शमवेलाप्रलयोर्मिणा भुवि ।। ८०॥ भगवन्परवानय प्रतिकूलारित क्षमस्व मे। इति चोपनता क्षितिस्पृश कृतवानासुरपुष्पदर्शनात् ॥८१॥ क्रयकैशिकवशसम्भवा तव भूत्वा महिपी चिराय सा। उपलब्धवतो दिवश्व्युत विवशा शानित्तिकारणम् ।। ८२॥ इन्दुमती के वियोग में महाराज अज ऐसे उदाम लगने लगे, जैसे रात बीत जाने पर चन्द्रमा मन्द पड़ जाता है। जब वे नगर मे घुमे, तब उन्हे देखकर गिरभर की स्त्रियों इस तरह फूट-फूटकर रोने लगों जैसे अज का मारा शोक उनकी ऑसों मे बह रहा हो।७४ । उन दिनों महर्षि वसिष्ठ यज्ञ कर रहे थे। आश्रम मे ही उन्होंने योगबल मे राजा के शोक का कारण जान लिया और एक शिष्य द्वारा शोकाकुल अज के पास मन्देश भेजा। तदनुमार शिष्य ने आकर अज से कहा--||७५॥ वसिष्ठ मुनि का यज्ञ समाप्त नहीं हुआ था, इसलिए आपके दु ख को जानते हुए भी न तो वे यहाँ आ सके और न शोक से पथभ्रष्ट आपको धीरज ही बँधा मके || ७६ ॥ हे मदाचारित्। मैं उनका एक छोटा-सा सन्देश लाया है, उमे आप धीरज धर के मुनिए, ममझिए और हृदयङ्गम करिए।।७।। वे अपने ज्ञान के अप्रतिहत नेत्रों से तीनो कालों को बीती हुई, होती हुई और होने वाला सभी बातों को जानते हैं।७८ ।। एक ममय तृणबिन्दु मुनि कठोर तप कर रहे थे। उनकी तपस्या मे डरकर इन्द्र ने उनका तप भग करने के लिए हरिणी नाम की एक अप्मरा उनके पास भेजा ॥७९॥ प्रलयकाल की लहर जैसे समुद्र को ढहा देती है, वैमे ही ऋषि का तप टिगाने के लिए वह अप्मरा वहाँ गयो। उसे देखते ही मुनि ने क्रुद्ध होकर शाप देते हुए कहा कि जा, तू समार मे मनुष्य की स्त्री हो जा ॥८०॥ शाप सुनते ही वह घबरा उठी और धरती पर लोट तथा गिडगिडाकर बोली--- भगवन् । मैं पराधीन हूँ और मैंने दूसरो के कहने से यह काम किया है। मेग इसमें कुछ भी दोष नहीं है, मुझे क्षमा कीजिए। तब ऋषि ने कहा-~- जब तक तुझे स्वर्गीय पुष्प नहीं दीखेंगे, तब तक तुझको पृथ्वी पर रह्ना ही होगा ।।८१ ।। वह हरिणी अप्सरा क्रयकैशिक (विदर्भ) राजा के वश मे जन्म लेकर तुम्हारी रानी हुई थी और इतने दिनों पर जैसे ही उमे स्वर्गीय पुष्प दिखलायी दिया, तैसे ही वह शापमुक्त हो तथा शरीर छोडकर के तट तदल ७६ ॐ रघुवशे तदपामचिन्तया विपदुत्पत्तिमतामुपस्थिता। वसुधेयमवेक्ष्यता त्वया वसुमत्या हि नृपा कलत्रिण ॥८३॥ उदये मदवाच्यमुज्झता श्रुतमाविष्कृतमात्मवत्त्वया। मनसस्तदुपस्थिते ज्वरे पुनरक्लीयतया प्रकाश्यताम् ।। ८४॥ रुदता कुत एव सा पुनर्भवता नानुमृतापि लभ्यते। परलोकजुषा स्वकर्मभिर्गतयो भिन्नपथा हि देहिनाम् ।। ८५॥ अपशोकमना कुटुम्बिनीमनुगृह्णीष्व निवापदत्तिभि । स्वजनाश्रु किलातिसन्तत दहति प्रेतमिति प्रचक्षते ॥८६॥ मरण प्रकृति शरीरिणा विकृति वितमुच्यते बुधै । क्षणमप्यवतिष्ठते श्वसाद जन्तुर्ननु लाभवानसौ॥८७॥ अवगच्छति मूढचेतन प्रियनाश हृदि शल्यमर्पितम् । स्थिरधोस्तु तदेव मन्यते कुशलद्वारतया समुद्धृतम्॥८८॥ स्वशरोरशरीरिणावपि श्रुतसयोगविपर्ययो यदा। विरह किमिवानुतापयेद्वद बाहीविषयैर्विपश्चितम्॥८९।। न पृथग्जनवच्छुचो वश वशिनामुत्तम गन्तुमर्हसि । द्रुमसानुमता किमन्तर यदि वायो द्वितयेऽपि ते चला ।।१०।। स तथेति विनेतुरुदारमते प्रतिगृह्य वचो विससर्ज मुनिम्। तदलब्धपद हृदि शोकघने प्रतियातमिवान्तिकमस्य गुरो ॥११॥ देवलोक चली गयी ।। ८२ ।। इमलिए अब आप उमकी मृत्यु का शोक न करे। क्योकि जो जम लेता है, वह मरता ही है। अतएव अब शोफ का त्याग तथा सावधान होकर आप पृथ्वी का पालन करिए। क्योंकि राजाओं की सच्ची सहधर्मचारिणी तो पृथ्वी ही होती है।। ८३ ।। ऐश्वर्य पाकर क्तिने ही राजा मतवाले हो जाते हैं, किन्तु आप सुख के दिनों में भी इस अपयश से बचे रहे और अभिमान छोडकर आपने अपने आत्मज्ञान का परिचय दिया था। उसी तरह इस दु ख के समय भी धीरज धर के आप फिर उमी ज्ञान का प्रकाश कीजिए।। ८४॥ रोने की बात ही क्या, यदि आप मर जायें तब भी इन्दुमतो अब आपको नहीं मिल मरुती। क्योकि मरने के बाद मब प्राणी अपने-अपने कर्म के आशुमार अलग-अलग मार्ग मे जाते हैं।। ८५॥ मो अब आप शोक त्यागकर पिण्डदान आदि के द्वारा अपनी पत्नी का परलोक सुधारिए । क्योंकि शास्त्र कहते हैं कि जिमके कुटुम्बी बहुत रोते हैं, उम प्रेतात्मा को बड़ा मन्ताप होता है।॥८६॥ जिमने देह धारण किया है, उसका मरना तो स्वाभाविक हैं। विद्वानों का तो कहना है कि जीना ही बडा भारी विकार है। अत प्राणी जितने क्षण जी जाय, उतने मे ही वह मन्तोष कर ले।। ८७ ॥ मूर्स लोग प्रियजन की मृत्यु को वैमा ही कष्टकारक मानते हैं, जैसे छाती मे कोल गड गयी हो। किन्तु विद्वान् लोगों की समझ मे मृत्यु वैमा ही मुख देती है, जैसे हृदय मे गड़ी हुई कोल निक्ल जाने पर मुख होता है ।। ८८ । जब कि शरीर और आत्मा भी बिछुटने वाले माने गये हैं, तब पुत्र-स्त्री आदि बाहरी सम्बन्धियों के बिछोह से विद्वानो को क्यों दु रा होगा ।। ८९ ॥ और फिर आप तो जितेन्द्रियो मे सर्वश्रेष्ठ हैं। तब माधारण लागों के समान शोक मत कीजिए। यदि पर्वत भी वृक्ष के समान आंधी से हिल उठे तो उन दोनों मे अन्तर ही क्या रहेगा? ॥१०॥ उदारबुद्धि एव विद्वान् शिक्षक वसिष्ठ का उपदेश राजा ने स्वीकार किया और उनके शिष्य को दम तरह विदा दी, जैसे अज के शोकभरे

७७
20 अष्टम सर्ग र
तेनाष्टौ परिगमिता समा कश्चिद्वालत्वादवितथसूनृतेन सूनो ।
सादृश्यप्रतिकृतिदर्शनै प्रियाया स्वप्नेषु क्षणिकसमागमोत्सवैश्च ॥९२।
तस्य प्रसह्य हृदय किल शोकशड्कु प्लक्षप्ररोह इव सौधतल विभेद ।
प्राणान्तहेतुमपि त भिषजामसाध्य लाभ प्रियानुगमने त्वरया स मेने॥९३।।
सम्यग्विनीतमय वर्महर कुमारमादिश्य रक्षणविधौ विधिवत्प्रजानाम्।
रोगोपसृष्टतनुदुर्वसति
मुमुक्षु प्रायोपवेशनतिर्नृपतिर्बभूव ।।९४ ।।
तीर्थे तोयव्यतिकरभवे जझुकन्यासरय्वोर्देहत्यागादमरगणनालेख्यमासाद्य सद्य ।
पूर्वाकाराधिकतररुचा सङ्गत कान्तयाऽसौ लीलागारेष्वरमत पुनर्नन्दनाभ्यन्तरेषु ॥१५॥
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये
अजविलापो नामाष्टम सर्ग ॥८॥
हृदय में स्थान न पाने में उनका उपदेश ही लौटकर चला गया हो ॥९१ ।। प्रिय तथा सत्यभाषी राजा
अन ने अपने पुत्र के बचपन का ध्यान करके और प्रियतमा के चित्र को देव-देख तथा स्वप्न मे उममे
क्षणभर के समागम का आनन्द ले-लेकर किसी प्रकार आठ वर्ष काटे ।।९२ ॥ जैसे वटवृक्ष को जटाएँ
भवन की तलहटी को छेदकर नीचे घुम जाती हैं, वैसे ही शोक की बर्ची ने राजा अज के हृदय
को
बलपूर्वक आरपार बांध दिया था। परन्तु अपनी प्रिया के लिए प्राण दे देने को वे इतने उतावले थे
कि उन्होने प्राण लेने वाली और वैद्यों में अच्छी न होनेवाली उस शोक को वर्टी को भी अपना सहायक
ही माना ।।९३ ।। तदनन्तर सुशिक्षित तथा कवचधारी कुमार दशरथ को शास्त्रानुमार प्रजा-पालन करने
का उपदेश देकर वे उस रुग्ण शरीर मे छुटकारा पाने के लिए उपवास करने लगे॥९४॥ थोडे ही दिनो
बाद गगा और मरयू के मगम पर उन्होने अपना तन त्याग दिया और तत्काल ता बनकर पहले
से भी अधिक मुदरी भार्या के साथ नन्दन वन के विलाममय भवनों में रमण करने लगे।।९५ ।।
इस प्रकार रघुवश महाकाव्य में अज-विलाप नामक
आठवा सर्ग समाप्त॥८॥

के नवम सर्ग
७९
उदयमस्तमय च रघूढहादुभयमानशिरे वसुधाधिपा ।
स हि निदेशमलनयतामभूत्सुहृदयोहृदय प्रतिगर्जताम् ।। ९ ॥
अजयदेकरथेन स मेदिनीमुदधिनेमिमधिज्यशरासन ।
जयमघोषयदस्य तु केवल गजवती जवतीव्रहया चमू ॥१०॥
अवनिमेकरथेन वरथिना जितवत किल तस्य धनुर्भूत ।
विजयदुन्दुभिता ययुरणवा घनरवा नरवाह्नसम्पद ॥११॥
मितपक्षबल शतकोटिना शिरिणा कुलिशेन पुरन्दर ।
स शरवृष्टिमुचा धनुषा द्विषा स्वनवता नवतामरसानन ॥१२॥
चरणयोर्नखरागसमृद्धिभिर्मुकुटरत्नमरीचिभिरस्पृशन्
नृपतय शतशो मरतो यथा शतमख तमखण्डितपौरपम्॥१३॥
निववृते स महार्णवरोधस सचिवकारितबालसुताञ्जलीन् ।
समनुकम्प्य सपत्नपरिग्रहाननलकानलकानवमा पुरीम् ॥ १४॥
उपगतोऽपि च मण्डलनाभितामनुदिताासतातपवारण ।
श्रियमवेक्ष्य स रन्ध्रचलामभूदनलसोऽनलसोमसमद्युति ॥ १५॥
तमपहाय ककुत्स्थकुलोद्भव पुरुषमात्मभव च पतिव्रता।
नृपतिमन्यमसेवत देवता सकमला कमलाघवमर्थिषु ।। १६ ।।
को भी कभी कोई कठोर बात नहीं कहीं ॥ ८॥ रघुवश मे श्रेष्ठ राजा दशरथ के हाथों अनेक राजा
बने और अनेक बिगडे। क्योकि जो उसका कहना मान लेते थे तो वे दया करके उन्हें छोड़ देते थे,
पर जो ऐठरर उनसे टक्कर लेने के लिए मामना करते थे, उन्हे वे मिटाकर ही दम लेते थे।॥९॥ केवल
धनुष लेकर तथा अकेले ही एक रथ पर चढकर उन्होंने ममुद्र तक फैला हुई मारी पृथ्वी जीत ली।
वेग मे चल्नेवाले हाथी-घोड़ों वाली उनकी मेना तो जय-जयकार मात्र करती चलती थी॥१०॥ जब
अकेले रय पर चढ़े हुए कुबेर के ममान सम्पत्तिशाली एव धनुषधारी दशरथजी पृथ्वी को जीतते हुए
चलते थे, तब बादल के जैमा गरजता हुआ ममुद्र उनको विजय-दृदुभी बजाता था॥११॥ इन्द्र ने जैसे
नोकोवाले वज्र मे पर्वतों के पत्र काटे थे, वैसे ही नवीन क्मल जैसे मुन्दर मुखवाले दशरथजी ने बाणवर्षा
करने वाले अपने धनुष मे शत्रुपक्ष को मार दिया ।। १२ ।। देवता लोग जेमे इन्द्र के चरण छूते हैं, वैसे
ही सैकडो राजाओं ने दशरथ के चरणों पर अपने उन मुमुटा से मुशाभित सिर रख दिये, जिनके मुकुटमणि
दशरथजी के पैर के नसा की लाल कान्ति मे चमक उठे थे॥१३॥ जिन-जिन देशों के राजाओ को
उन्होंने मार डाला था, उनको रानियाँ अपने पुत्रो को लेकर राजा दशरथ के आगे आयी ओर उन देशो
के मन्त्रियों ने उन राजपुत्रों को राजा दशरथ के आगे हाथ जोडवार खड़ा कर दिया। उन सुले केशो
वाली शत्रुओं की रानियो के माथ दशरथजी ने बहुत ही दयापूर्ण व्यवहार पिया और उम महाममुद्र
के तट से वे अपनी उम अयोध्या राजधानी को लौट आये, जो कुबेर की राजधानी अलकापुरी से किमी
तरह कम नहीं थी ।।१४। इस प्रकार चारो ओर के राजाओ का मण्डल उनरी मुट्ठी में आ गया,
जिससे वे अग्नि और चन्द्रमा जैमे तेजस्वी लगो लगे। उसका पताप इतना बढ़ गया कि उनके आगे
कोई भी दूसरा राजा श्वेत छत्र नहा लगाता था। किन्तु चक्रवर्ता हो जाने पर भी वे आलस्य को अपने
पाम नहीं फटक्ने देते थे। क्योकि वे जानते थे कि अपने मे जहा एक भी दोष आया कि लक्ष्मी हमे
छोडकर चली जायगी ।। १५ ।। फिर भगवान् विष्णु तथा दशरथ को छोडकर दूमरा राजा ही कौन ऐमा
था कि जिमके यहाँ हाथ मे कमल धारण करने वाली एव पतिव्रता लक्ष्मी जाकर नित्राम करती ॥१६॥

८० क रघुवशे के तमलभन्त पति पतिदेवता, शिखरिणामित्र सागरमायगा । मगधकोसलकेकयशासिता दुहितरोऽहितरोपितमार्गणम्॥१७॥ प्रियतमाभिरसौ तिसृभिर्बभौ तिसृभिरेव भुत्र सह शक्तिभि | उपगतो विनिनोपुरिव प्रजा हरिहयोऽरिहयोगविचक्षण || १८॥ स किल सयुगमूर्ध्नि सहायता मघवत. प्रतिपद्य महारथ, स्वभुजवीर्यमगापयदुन्छ्रित सुरवधूरवधूतभया शरैः॥१९॥ क्रतुषु तेन विसर्जितमौलिना भुजसमाहृदिग्वसुना कृता. । कनकयूपसमुच्छ्यशोभिनो वितमसा तमसासरयूतटा ॥२०॥ अजिनदण्डभृत कुशमेखला यतगिर मृगभृङ्गपरिग्रहाम्। अधिवसस्तनुमध्वरदीक्षितामसमभासमभासयदीश्वर ॥२१॥ अवभृथप्रयतो नियतेन्द्रिय: सुरसमाजसमाक्रमणोचित.। नमयति स्म स केवलमुन्नत वनमुचे नमुचेररये शिर ॥२२॥ असकृदेकरथेन तरस्विना हरिहयाग्रसरेण धनुर्भूता। दिनकराभिमुखा रणरेणवो रुरुधिरे रुधिरेण सुरद्विषाम् ॥२३॥ अथ समाववृते कुसुमैर्नवैस्तमिव सेवितुमेकनराधिपम्। यमकुवेरजलेश्वरवजिणा समधुर मधुरश्चितविक्रमम् ॥२४॥ जिगमिषुर्धनदाध्युषिता दिश रथयुजा परिवर्तितवाहन । दिनमुखानि रविर्हिमनिग्रहैविमलयन्मलय नगमत्यजत् ।। २५ ।। पर्वतों से निकलने वाली नदियों जैसे ममुद्र पा लेती है, वैसे ही कोसल, मगध और केकय देश के राजाओं की कोमल्या, मुमित्रा और कैकेयी नाम को राजकन्याओं ने शत्रुओं पर बाण बरसाने वाले दशरथजी को पति के रूप मे पा लिया ॥ १७॥ शत्रुओ को नष्ट करने वाले दशरथ अपनी तीनों रानियों के साथ ऐसे लगते थे, जैसे स्वर्ग पर राज्य करने वाले स्वय इन्द्र ही प्रभाव, उत्साह और मत्र नाम की अपनी तीनों शक्तियों के माथ अवतरित हो गये हों॥ १८ ॥ महारथी दशरथ ने युद्ध में इन्द्र की सहायता करते हुए अपने बाणों में उनके शत्रुओं का नाश करके देवताओ की स्त्रियों का सब डर दूर कर दिया था। इमीलिए वे सब दशरथजी के बाहुबल के गीत ऊँचे स्वरों से गाने लगी थीं ॥ १९ ॥ अपने बाहुबल से उन्होंने चारों ओर का धन लाकर एकत्र कर लिया था और उनमे नाम को भी ताममी भाव नहीं था। उन्ही महाराज दशरथ ने अश्वमेध यज्ञ करते समय अपना मुकुट उतारकर तममा और सरयू के तट पर मोने के अनेक यज्ञस्तम्भ खड़े कर दिये ॥२०॥ जब वे मृगछान पहनकर, हाथ में दण्ड लेबर, कुश की मेखला बाँधकर चुपचाप हरिण को मोग हाथ मे लिये यज्ञ की दीक्षा लेकर बैठे, उस समय अटमूर्ति महादेव उनके शरीर मे प्रविष्ट हो गये, जिसमे उनकी शोभा बहुत बढ़ गयी ॥२१ ।। जब यज्ञ समाप्त हो गया और वे स्नान करके पवित्र हुए, तब देवताओं के साथ बैठने योग्य सयमी राजा दशरथ ने केवल नमुचि राक्षम के शतु एव जल बरसाने वाले देवराज इन्द्र के आगे ही अपना में उनत मस्तक झुकाया ।।२२।। रथ पर चढकर एवारी युद्ध करने वाले, पराक्रमी, धनुर्धर और युद्ध इन्द्र मे भी आगे चलने वाले दशरथ ने मूर्य पर छायी हुई युद्ध की धूल को कई-कई बार राक्षमों के रक्त मे मींच-मीचार दबाया था।॥२३॥ यम, कुबेर, वरण और इन्द्र सदृश पराक्रमी उन एक्छत्र राजा दशरथ का अभिनन्दन करने के लिए वमन्त ऋतु भी नये-नये फूलो की भेट लेकर आ उपस्थित हुई ॥२४॥ उस समय ये उत्तर की ओर घूम जाना चाहते थे. अतएव उनके मारथी अरुण ने घोड़ों की राम उधर नवम सर्ग है ८१ कुसुमजन्म ततो नवपल्लवास्तदनु षट्पदकोकिलकूजितम्। इति यथाक्रममाविरभून्मधुमवतोमवतीर्य वनस्थलीम् ॥ २६ ॥ नयगुणोपचितामिव भूपते सदुपकारफला श्रियर्थिन । अभिययु सरसो मधुसम्भृता कमलिनीमलिनीरपतत्रिण ॥२७॥ कुसुममेव न केवलमार्तव नवमशोकतरो स्मरदीपनम्। किसलयप्रसवोऽपि विलासिना मदयिता दयिताश्रवणार्पित.॥२८॥ विरचिता मधुनोपवनश्रियामभिनवा इव पत्रविशेषका । मधुलिहा मधुदाविशारदा कुरवका रवकारणता ययु ॥२९॥ सुवदनावदनासवसम्भृतस्तदनुवादिगुण कुसुमोद्गम । मधुकरैरकरोन्मधुलोलुपैर्बकुलमाकुलमायतपक्तिभि ॥३०॥ उपहित शिशिरापगमश्रिया मुकुलजालमशोभत किशुके । प्रणयिनीव नखक्षतमण्डन प्रमद मदयापितलजया॥३१॥ व्रणगुरप्रमदाधरदु सह जघननिर्विषयोकृतमेखलम्। न खलु तावदशेषमपोहितु रविरत विरल कृतवान्हिमम् ।। ३२॥ अभिनयान् परिचेतुमिवोद्यता मलयमारुतकम्पितपल्लवा । अमदयत्सहकारलता मन सर्कालका कलिकाजितामपि ॥३३॥ प्रथममन्यभृताभिरदीरिता प्रविरला इव मुग्धवधूकथा । सुरभिगन्धिषु शुश्रुविरे गिर कुसुमितासु मिता वनराजिषु ॥ ३४ ॥ ही मोड़ दो। तदनन्तर मर्दो दूर करके प्रात काल का पाला हटा तथा उमे और भी अधिक चमकाते हुए सूर्य ने मलय पर्वत मे विदा ली।।२५।। पहले फूल खिले, फिर नयी कोपले फूटी, फिर भौरे गूंजने लगे और तब कोयल को कूक सुनायी देने लगी। दम क्रम मे धार-धीरे वनस्थली मे वसन्त छाया हुआ दीखने लगा॥२६॥ राजा दशरथ की चतुराई मे अके पाम बहुत धन एकत्र हो गया था और उस धन मे वे अपनी प्रजा का बहुत उपकार करते थे। अत जैसे उनरी लक्ष्मी के समक्ष अनेक याचक हाय फैलाया करते थे, वैसे ही वसन्त की शोभा में सम्पन तालाब की कमलिनी के भी आस-पास भौरे और हम मॅडराने लगे॥ २७ ॥ उम समय वमन्त मे फूले हुए अशोक के फूल ही कामोद्दीपन नहीं करते थे, बल्कि कामियों को मस्त बना देने वाले जिन कोमल कोपलों के गुच्छों को स्त्रियो ने अपने कानों पर रख लिया था, उन्हें देखकर लोगो का मा भी विचल्ति हो जाता था ।। २८ ।। वन मे खड़े कुरबक के पेड ऐमें लगते थे कि जैसे वमन्त वनधी के शरीर पर बेल-बूटे बनाकर उसका शृगार किया हो। उन वृक्षों से इतना मधु बह रहा था कि भौंरे मस्त होकर उन्हीं पर गुञ्जार रहे थे। २९ ।। बकुल (मौलमिरी) के जो वृक्ष सुन्दरी स्त्रियों के मदिरा के कुल्ले में फूल उठे थे और जिनमे उन्हीं स्त्रियों जैसे गुण भरे थे, उन्हें झुण्ड बनाकर उडते हुए मधु के लोभी भौरों ने बहुत तग किया।॥३०॥ वसन्त आगमन मे पलास में भी कलियों फूट पडी। वे ऐमी लगती थी कि मानो काम के आवेश में आकर तथा लाज छोडकर किसी प्रणयिनी ने अपने प्रियतम के शरीर पर नखक्षत करके उसकी शोभा बढा दो हो॥३१॥ जब पतियों के दाँतों से घायल स्त्रियों के ओंठ दु ता करते हैं और ठडी होने के कारण स्त्रियाँ अपनी कमर को करधनी भी उतार डालती हैं, वह ठड अभी भली प्रकार दूर नहीं हुई थी। हाँ, मूर्य ने अपने तेज मे कुछ जाडा अवश्य कम कर दिया था।॥३२॥ सहसा नये बौरे हुए आम के वृक्षों की डालियाँ मलय वायु से ऐसी झूम उठी, जैसे उन्होने अभिनय सीखना प्रारम्भ कर दिया हो। उन्हें देखकर राग-द्वेष से दूर रहने वाले योगियों का मन भी मस्त हो गया। ३३ ।। जब मनोहर सुगन्धमयी ११ का० मन । रघुवशे की श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतय कुसुमकोमलदन्तरुचो बभु । उपवनान्तलता पवनाहते किसलये सलयैरिव पाणिभि ॥ ३५ ॥ ललितविभ्रमबन्धविचक्षण सुरभिगन्धपराजितकेसरम्। पतिषु निर्वीिवशुर्मधुमगना स्मरसख रसखण्डनवर्जितम् ॥३६ ।। शुशुभिरे स्मितचारुतरानना स्त्रिय इव श्लञ्जितमेखला । विकचतामरसा गृहदीर्घिका मदकलोदकलोलविहङ्गमा ॥ ३७॥ उपययौ तनुता मधुसण्डिता हिमकरोदयपाण्डुमुखच्छवि । सदृशमिष्टसमागमनिति वनितयाऽनितया रजनीवधू ॥३८॥ अपतुषारतया विशदप्रभ सुरतसङ्गपरिश्रमनोदिभि । कुसुमचापमतेजयदशुभिर्हिमकरो मकरोर्जितकेतनम् ॥ ३९॥ हुतहुताशनदीप्ति बनश्रिय प्रतिनिधि कनकाभरणस्य यत्। युवतय कुसुम दधुराहित तदलके दलकेसरपेशलम्॥४०॥ अलिभिरञ्जनविन्दुमनोहरै कुसुमपक्तिनिपातिभिरङ्गित । न खलु शोभयति स्म वनस्थली न तिलकस्तिलक प्रमदामिव ॥४१॥ अमदयन्मधुगन्धसनाथया किसलयाधरसङ्गतया कुसुमसम्भृतया नवर्माल्लका स्मितरुचा तरुचाविलासिनी॥४२॥ अरुणरागनिषेधिभिरकै श्रवणलब्धपदैश्च यवाड्कुरै । परभृताविरुतैश्च विलासिन स्मरबलैरबलैकरसा कृता ॥ ४३ ।। कुसुमित का की लताओं पर बैठकर कोयल कूकी तो ऐसा लगा कि जैसे कहीं कोई मुग्धा नायिका बोल रही हो ॥ ३४॥ वन के किनारे बढ़ी हुई लताएँ ऐमी सर्जाव दीसती थी कि मानो कानों को सुखदायी भौरों की गुजार ही उनके गीत हों और विकसित कोमल फूल ही उनकी हॅमी के दाँत हों तथा वायु से हिलती हुई शाखाओं वाले हाथों से वे तरह-तरह के हाव-भाव दिसाती हो ॥ ३५ ॥ कटाक्ष आदि मधुर हाव-भाव करने को उकमाने और बकुलों को भी अपनी मुगन्ध से हरा देने वाले कामदेव के माथी मद्य को स्त्रियो ने पति के प्रेम में बिना कोई बाधा डाले ही पी लिया॥३६ । नागरिकों के घरों मे बनी हुई बावलियों में जो कमल खिले हुए थे और वहाँ मधुर शब्द करते हुए जो जल-पक्षी तैर रहे थे, उनसे वे बालियाँ ऐसी मुन्दर लगती थी कि मानो उनमे मुस्कुराती हुई मुन्दर मुखवाली और ढीली होने से बजती हुई करधनी वाली स्त्रियाँ सुशोभित हो ।। ३७ ॥ अपने प्रियतम से समागम न होने के कारण जैसे खडिता नायिका दुबली होती जाती है. वैसे ही रात्रिरूपिणी नायिका भी वसन्त के आगमन मे छोटी होती चली गयी और उसका चन्द्रमुख भी पीला पड़ता गया ।। ३८ ॥ तुषार (पाला) दूर हो जाने मे चन्द्रमा निर्मल हो गया और सभोग की थकावट दूर करने वाली उसको ठढी किरणों में कामदेव के पुष्पमय धनुष को जैसे और भी अधिक बल मिल गया ॥ ३९ ॥ आहुति-प्राप्त जग्नि के ममान दमक्ते हुए कनैर के फूल वनलक्ष्मी के कामो के कर्णफूल जैसे लगते थे। अपने प्रियतमो के हाथों जूडों में लगाये हुए वे सुन्दर पखुड़ी तथा पराग वाले फूल स्त्रियो के केशों मे बड़े ही मुन्दर लग रहे थे।। ४० । उम ममय तिलक के वृक्ष ने भी वनस्थली की शोभा कम नहीं बढायो। जैसे किसी युवती के के श्रृंगार लिए उसका मुंह चित्रित किया जाता है, वैसे ही तिलक वृक्ष के फूलों पर मॅडराते हुए काजल की बुंदकियो जैसे सुन्दर भौर ऐसे जान पडते थे कि जैसे वनस्थली का मुख चित्रित कर दिया गया हो। ४१ ।। वृक्षों को सुन्दर नायिका विमल्लिका लता थी। वह अपने मकरन्दरूपी मद्य के गन्ध मे भरी लाल-लाल पत्तों रूपी होठों पर फूलों को मुमकान देखने वालो को आत्मविभोर बना देती थी॥ ४२ ॥ उम समय ध्वजपट वनमालया नवम सर्ग : उपचितावयवा शुचिभि कणैरलिकदम्बकयोगमुपेयुषी। सदृशकान्तिरलक्ष्यत मञ्जरी तिलकजालकजालकमौक्तिकै ॥४४॥ मदनस्य धनु तश्छविकर मुखचूर्णमृतुश्रिय । कुसुमकेसररेणुमलिव्रजा सपवनोपवनोत्थितमन्वयु ॥४५॥ अनुभवनवदोलमृतूत्सव पटुरपि प्रियकण्ठजिपक्षया। अनयदासनरज्जुपरिग्रहे भुजलता जलतामबलाजन ॥४६॥ त्यजत मानमल बत विग्रहर्न पुनरेति गत चतुर वय । परभृताभिरितीव निवेदिते स्मरमते रमते स्म वधूजन ॥४७॥ अथ यथासुखमार्तवमुत्सव समनुभूय विलासवतीसख । नरपतिश्चकमे मृगयाति स मधुमन्मधुमन्मथसन्निभ ॥४८॥ परिचय चललक्ष्यनिपातने भयरुषोश्च तदिङ्गितबोधनम् । श्रमजयात्प्रगुणा च करोत्यसो तनुमतोऽनुमत सचिवैर्ययो॥४९॥ मृगवनोपगमक्षमवेषभृद् विपुलकण्ठनिषक्तशरासन गगनमश्वखुरोद्धतरेणुभिसविता स वितानमिवाकरोत्॥५०॥ ग्रथितमौलिरसौ तरपलाशसवर्णतनुच्छद । तुरगवल्गनचञ्चलकुण्डलो विरुरुचे रुरुचेष्टितभूमिषु ॥५१॥ प्रात काल की लाली से भी अधिक लाल वस्त्रों ने, कान पर रखे हुए जौ के अकुरो ने और कोयल की कूकों को सेना लेकर कामदेव ने ऐमा जाल बिछाया कि सभी विलासी पुरुष युवती स्त्रियों के प्रेम मे अपनी मुध-बुध खो बैठे॥४३॥ उजले पराग मे भरे तिलक वृक्ष के फूलों के जो गुच्छे बहुत बढ़ चुके थे, अपने ऊपर मॅडराते हुए भौरों के झुण्ड मे वे ऐसे सुन्दर लगने लगे कि जैसे किसी स्त्री ने अपने सिर पर मोतियों की जाली ओढ ली हो॥४४॥ जब वायु ने उपवन के फूलों का पराग उड़ाया तो भौरों के झुण्ड भी उसके पीछे-पीछे उड़ने लगे। वह उडता हुआ पराग ऐमा लगता था कि मानो धनुर्धारी कामदेव की पताका हो अथवा वमतश्री के मुख पर लगाने का शृगारचूर्ण हो। ४५ ।। वसन्तोत्सव मे जो स्त्रियां नये झूलो पर मावधानी के माथ झूला झूल रही थीं, वे भी अपने हाथ की रस्मी को इसलिए छोड़ देती थीं कि हाथ छूटने पर हमारे प्रियतम हमको याम हा लेगे और इसी बहाने हम उनके गले मे लग जायेगी ॥४॥ उन दिनो कूरूती हुई कोपल मे कामदेव का यह आदेश मुना रही थी कि 'हे स्त्रियो । अब रूठना छोड़ दो। लडाई-झगडा मत करो, बीता हुआ चतुर यौवन फिर हाथ नहीं आयेगा'। यह मन्देश सुनकर सभी स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों के साथ फिर विहार करने लगीं। ४७ ॥ भगवान् विष्णु जैसे पराक्रमी, वसत ऋतु के सदृश प्रमन्न और कामदेव के ममान सुन्दर दशरथजी ने भी सुन्दरी स्त्रियों के साथ वमत ऋतु का आनन्द लिया। फिर उनके मन में आसेट करने की इच्छा जाग गयी ॥ ४८ ।। क्योंकि आखेट से बडे लाभ होते हैं। उमसे चलते हुए लक्ष्य को बींधने का अभ्याम हो जाता है, जोत्रो के भय और क्रोध आदि भाव पहचाने जाते हैं और परिश्रम करने से शरीर भी सूब बन जाता है। अतएव मत्रियों मे मलाह करके वे आखेट के लिए चल पडे।। ४९ ।। जब शिकारी का वेष बनाकर अपने ऊँचे कन्धे पर धनुष टॉगे हुए तेजस्वी राजा दशरथ घोड़े पर चढकर चले, तब उनके घोडो की टापो मे इतनी धूल उडी कि उससे आकाश मे चंदोवा-मा तन गया ॥ ५० ॥ उनके केशों मे वनमाला गुयी थी। वे वृक्ष के पत्तों जैसा गहरे हरे रंग का क्वच पहने थे और घोडे के वेग से चलने के कारण उनके कानों के कुण्डल हिल रहे थे। इस वेष मे चलते हुए वे उम जगल मे जाकर पहुंचे, जहा ह जाति रघुवशे तनुलताििनवेशिविग्रहा भ्रमरसमितेक्षणवृत्तय । ददृशुरध्वनि त वनदेवता सुनयन नयनन्दितकोसलम्॥५२॥ श्वगणिवागुरिकै प्रथमास्थित व्यपगतानलदस्यु विवेश स । स्थिरतुरङ्गमभूमिनिपानवन्मृगवयोगवयोपचित वनम्॥५३॥ अथ नभस्य इव त्रिदशायुध कनकपिड़तडिद्गुणसयुतम्। धनुधिज्यमनाधिरुपाददे नरवरो रवरोषितकेसरी॥५४॥ तस्य स्तनप्रणयिभिर्मुहुरेणशावैाहन्यमानहरिणीगमन पुरस्तात् । आविर्वभूव कुशगर्भमुख मृगाणा यूथ तदग्रसरगर्वितकृष्णसारम् ॥५५ ।। तत्प्रार्थित जवनवाजिगतेन राज्ञा तूणीमुखोद्धृतशरेण विशीर्णपक्ति । श्यामीचकार वनमाकुलदृष्टिपातैर्वातेरितोत्पलदलप्रकरैरिवार्दै ॥५६ ।। लक्ष्यीकृतस्य हरिणस्य हरिप्रभाव प्रेक्ष्य स्थिता सहचरी व्यवधाय देहम्। आकर्णकृष्टमपि कामितया स धन्वी बाण कृपामृदुमना प्रतिसाहार ॥५७॥ तस्यापरेष्वपि मृगेषु शरान्मुमुक्षो कर्णान्तमेत्य बिभिदे निबिडोऽपि मुष्टि । त्रासातिमात्रचटुले स्मरत सुनेत्रै प्रौढप्रियानयनविभ्रमचेष्टितानि ॥५८॥ उत्तस्थुष सपदि पल्वलपङ्कमध्यान्मुस्ताप्ररोहकवलावयवानुकीर्णम्। जग्राह स दुतवराहकुलस्य मार्ग सुव्यक्तमापदपङ्क्तिभिरायताभि ।।५९ ।। के हरिण घूमा करते थे।।५१ ॥ कोमल लताओं का स्प धारण करके वनदेवता भी भौरो की ऑखो जैसे सुन्दर नेत्रवाले और अपनी नीति मे कोसल की प्रजा को मदा मुख पहुँचाने वाले राजा दशरथ को देखने के लिए वहाँ जा पहुँचे ।।५२ ॥ तदनन्तर वे उम जगल मे पहुँचे, जहाँ उनके मेवक पहले से ही जालो और शिकारी कुत्तो को लेकर पहुंच चुके थे। वहाँ न अग्नि का भय था, न चोरों का। वहाँ की पृथ्वी घोडों के लिए अच्छी थी। वहाँ बहुत-मे ताल थे, जिनके चारो ओर बहुत-मे हरिण, पक्षी और नीलगाएँ चरा करती थीं ॥५३॥ तब उस सुन्दर तथा स्वस्थ राजा ने अपना वह चढा हुआ धनुष उठाया, जिमकी टकार सुनकर सिह भी गरज उठे। उस समय वे उस भादो के महीने जैसे लग रहे थे, जिसमे इन्द्रधनुष निकला हुआ हो और उसमे मोने के रग को पीली बिजली की डोरी बंधी हुई हो ॥५४॥ तभी उन्होंने देखा कि हरिणों का एक झुण्ट चला आ रहा है, जिसमे बहुत-सी हरिणियाँ भी हैं। जो अपने उन बच्चो के कारण रुकती चलती हैं, जो कुशा का अकुर चबाते-चबाते अपनी माँ के स्तनो का दूध पीने के लिए बीच-बीच मे रुक जाते हैं। उस झुण्ड के आगे-आगे एक गीला काला हरिण भी चल रहा था॥ ५५ ॥ राजा दशरथ ने ज्यो ही अपने द्रुतगामी घोडों पर चढ और तूणीर मे से बाण निकाल कर उसका पीछा किया कि वह झुण्ड छितरा गया और उनकी घबरायी हुई आँखो से भरा हुआ वह सारा जगल ऐसा लगने लगा जैसे वायु ने वहाँ नोले कमलों को भीगी पखुड़ियों बिखेर दी हो ।।५६ ।। तभी इन्द्र के समान शक्तिशाली एव चतुर धनुर्धर राजा दशरथ ने देखा कि वे जिम हरिण को मारना चाहते थे, उसकी स्त्री हरिणी बीच में आकर खड़ी हो गयी। वे स्वय भी येमी थे। अतएव अपने हरिण के प्रति हरिणी का यह प्रेम देखकर उनका हृदय दया से भर आया और उन्होंने कान तक खींचा हुआ अपना बाण उतार कर तूणीर मे रख लिया ||५७ ।। उसके बाद वे दूसरे हरिणों पर बाण चलाना चाहते थे और उन्होंने बाण की चुटकी तक खींच भी ली थी, परन्तु जब उन्होंने उन हरिणों की डरी हुई आँखे देखी तो उन्हे अपनी युवती प्रियतमा के चचल नेत्रों का स्मरण हो आया और उनके हाथ ढीले पड गये।। ५८ ॥ अब उहें छोकर राजा दशरथ उधर घूम पड़े, जिधर आधे नवम सर्ग त वाहनादवनतोत्तरकायमीषद् विध्यन्तमुद्धृतसटा प्रतिहन्तुमीषु । नात्मानमस्य विविदु सहसा वराहा वृक्षेषु विद्धमिषुभिर्जघनाश्रयेषु॥६०॥ तेनाभिधातरभसस्य विकृष्य पत्री वन्यस्य नेत्रविवरे महिषस्य मुक्त । निर्भिद्य विग्रहमशोणितलिप्तपुङ्खस्त पातया प्रथममास पपात पश्चात् ॥ ६१ ॥ प्रायो विषाणपरिमोक्षलघूतमाङ्गान्खड्गाश्चकार नृपतिनिशितै क्षुरप्रे । शृङ्ग स दृप्तविनयाधिकृत परेषामत्युच्छ्रित न ममृषे न तु दीर्घमायु ॥२॥ व्याघानभोरभिमुखोत्पतितानगुहाभ्य फुल्लासनानविटपानिव वायुरुग्णान्। शिक्षाविशेषलघुहस्ततया निमेषात् तूणीचकार शरपूरितवक्त्ररन्ध्रान् ॥ ३॥ निर्घातो? कुञ्जलीनाभिघासुानि?थै क्षोभयामास सिहान् । नून तेषामभ्यसूयापरोऽभूद् वीर्योदये राजशब्दो मृगेषु ।। ६४ ॥ तान्हत्वा गजकुलबद्धतीववैरान्काकुत्स्थ कुटिलनसाग्रलग्नमुक्तान् । आत्मान रणकृतकर्मणा गजानामानृण्य गमिव मार्गणैरमस्त ॥६५॥ चमरान्परित प्रवर्तिताश्व क्वचिदाकर्णविकृष्टभल्लवर्षो। नृपतोनिव तान्वियोज्य सद्य सितवालव्यजनैर्जगाम शान्तिम् ॥६६॥ चाबे हुए मोये की घास के मुझे स्थान-स्थान पर बिखरे पड़े थे और पैर की गीली छापों की पॉत देखकर ऐमा जान पड़ता था कि तालों के कीचड मे निकल-निकलकर बनैले सुअरों का झुण्ड उधर ही गया है।५९॥ ज्यों ही उन्होने घोड़े पर स्थित अपना शरीर आगे झुकाकर उन सुअरो पर बाण चलाया, त्यों हो वे सूअर भी अपने कडे बाल खड़े करके राजा दशरथ पर झपटे। किन्तु राजा ने तत्काल ऐसे कमकर बाण मारे कि उन मूअरों का पता ही नहीं चला कि कब वे बाण के माथ उन पेडों में चिपक गये, जिनके महारे खडे थे। ६० ।। महमा उन्होंने देखा कि एक जगली भैंसा उनकी ओर दौडता चला आ रहा है। तत्काल उन्होंने उमको ऑख में एक ऐमा बाण मारा कि वह भैंसे के शरीर में से बड़ी फुर्ती से पार हो गया। किन्तु बाण के पुख मे तनिक-मा भी रक्त नहीं लगा। विशेषता यह थी कि बाण तो देर मे गिरा, किन्तु भैमा पहले ही धराशायी हो गया ॥ ६१ ।। इतने में उन्हे गैंडों का झुण्ड दिखलाई पड़ा। तुरन्त राजा दशरथ ने अपने अर्द्धचन्द्र बाणों में उनकी मांग काटकर उनके मिर का बोग हलका कर दिया। क्योकि वे सिर उठाकर चलने वालो का दमन अवश्य करते थे। इसी से उन्होंने अकड़कर चलने के साधन उनको सींगों को काट डाला और उन्हें उनके दीर्घायु प्राणों से तो कोई वैर था ही नहीं।। ६२ ।। बाघ जब अपने मादों मे से निकल कर उनकी ओर झपटे, तब निर्भय राजा दशरथ इतनी शीघ्रता से उन पर बाण चलाये कि उनके सुले हुए मुंह बाणों का तूणीर बन गये और वे ऐसे दीखने लगे कि जैमे आँधी से उखडे और फूले हुए अमन (सर्ज) वृक्ष की शिखर की टहनियों हों।। ६३ ॥ तदुपरान्त झाडियों में लेटे हुए सिहों को मारने के लिए उन्होंने पहले वज्रपात के समान भयकर शब्द करने वाले अपने धनुष की डोरी से टकार किया। उसे सुनते ही वे सिह भड़क उठे। क्योकि राजा दशरथ को उन अत्यन्त शक्तिशाली सिहों की इस बात मे चिढ थी कि वे मृग आदि वन्य जीवों के राजा क्यों कहे जाते हैं ।। ६४॥ बस, हाथियों से वैर रखने वाले उन सिहों को उन्होंने मार डाला, जिनके नुकीले नों में अब तक गजमुक्ताएँ अटकी हुई थीं। इस प्रकार उन ककुत्स्थवशी राजा दशरथ ने अपने बाणों से उन हाथियों का ऋण चुका दिया, जो उनकी सेना मे युद्ध के समय काम कर रहे थे॥६५॥ चमरमृगों के चारों ओर अपना घोडा दौड़ाते हुए राजा ने भाले की नोकवाले बाण बरसाकर उन मृगों को चैवर वाली पूँछे काट ली। इसमे उन्हे ऐसा सन्तोष हुआ कि जैसे चैवरधारी राजाओ के श्वेत चॅवर ही उन्होंने छीन लिये हों।॥६६॥ उनके पास से कभी-कभी सुन्दर और चमकीली पूंछों वाले मोर भी उड़ जाते तस्य स के रघुवशे हो अपि तुरगसमीपादुत्पतन्त मयूर न स रुचिरकलाप बाणलक्ष्योचकार। सपदि गतमनस्कश्चित्रमाल्यानुकोणे रतिविगलितबन्धे केशपाशे प्रियाया ॥ ६७ ॥ कर्कविहारसम्भव स्वेदमाननविलग्नजालकम्। आचचाम सतुषारशीकरो भिन्नपल्लवपुटो वनानिल ॥६८॥ इति विस्मृतान्यकरणीयमात्मन सचिवावलम्बिधुर धराधिपम्। परिवृद्धरागमनुबन्धसेवया मृगया जहार चतुरेव कामिनी ॥६९ ॥ स ललितकुसुमप्रवालशय्या ज्वलितमहौषधिदीपिकासनाथाम् । नरपतिरतिवायाम्बभूव चिदसमेतपरिच्छदस्त्रियामाम् ॥७॥ उपसि स गजयूथकर्णताले पटुपटहध्वनिभिर्विनीतनिद्र। अरमत मधुराणि तत्र शृण्वन्विहर्गावकूजितबन्दिमङ्गलानि ।।७१॥ अथ जातु रुरोर्गृहीतवां विपिने पार्श्वचरैरलक्ष्यमाण । श्रमफेनमुचा तस्विगाढा तमसा प्राप नदी तुरङ्गमेण ॥७२॥ कुम्भपूरणभव पटुरुच्चैरुच्चचार निनदोऽसि तस्या । द्विरदबृहितशङ्को शब्दपातिनमिपु विससर्ज ॥७३॥ नृपते प्रतिषिद्धमेव तत्कृतवान्पक्रियो बिलङ्घय यत् । अपथे पदमर्पयन्ति हि श्रुतवन्तोऽपि रजोनिमीलिता ॥ ७४ ॥ हा तातेति न्द्रितमाकर्ण्य विषण्णस्तस्यान्विष्यन्वेतसगूढ प्रभव स । शल्यप्रोत प्रेक्ष्य सकुम्भ मुनिपुत्र तापादन्त शल्य इवासोत्क्षितिपोऽपि ॥७५ ॥ थे। परन्तु वे उन पर बाण नहीं चलाते थे। क्योंकि उन्हें देखकर राजा दशरथ को रग-बिरगी मालाओ मे गुंथे और सभोग के कारण सुले हुए अपनी प्रियतमा के केशों का स्मरण हो आता था ।। ६७ ।। कठोर परिश्रम मे उनके मुंह पर जो पसीना आ गया था, उसे उम वन्य वायु ने मुखा दिया, जो जल के कणो मे शीतल होर पत्तों और कलियो को गिराता हुआ बह रहा था ।। ६८ ॥ इस प्रकार अपना सब काम भूल और राज्य का भार मत्रियों पर छोडकर वन मे आये हुए राजा दशरथ का मन आसेट के व्यसन ने वैम ही लुभा लिया, जैसे कोई स्त्री अपने पति को मेवा करके उसे अपनी मुट्ठी में कर लेती है।। ६९॥ आसेट का व्यमन उन्हें ऐमा लगा कि कभी-कभी उनका मारी रात फूल-पत्तो की शय्या पर रात को चमकने वाली बूटियों के प्रकाश में बिना किसी सेवक के अकेले ही काटनी पड जाती थो१७०॥ सबेरे जब नगाडो के ममान शब्द करने वाले हाथियों के कानो की फट-फट ध्वनि होती थीं, तब उनकी नींद सुलती थी। उस समय वन के पक्षी चारणो के समान जो मगलगीत गाते थे, उन्हे मुनकर वे मस्त हो जाते थे।। ७१ ।। एक दिन राजा दशरथ जगल में एक रुर मृग का पीछा करते हुए अपने साथियों मे दूर निकल गये। थकावट के कारण उनका घोडा मुँह में पेन फेंकने लगा। उमी पर चढे हुए वे तममा नदी के तट पर जा पहुंचे, जहाँ बहुत-से तपस्वियों के आश्रम थे॥७२॥ उम ममय वहाँ कोई जल मे घडा भर रहा था। मो सुनकर उन्होंने समझा कि यह हाथी है। बम, बाण निकाला ओर शब्द पर लक्ष्य करके राजा ने तुरन्त शब्दबेधी बाण चला दिया ॥७३ ।। हाथी को मारना शास्त्रविरुद्ध है । इमलिए दशरथ ने जो किया, वह उनके लिए अनुचित था, परन्तु कभी-कभी विद्वान् लोग भी आवेश मे आगर अधे हो जाते हैं और उलटा काम कर डालते हैं ।।७४॥ तत्काल कोई चिल्ला पडा--'हाय पिता ।' यह सुनकर राजा का माथा ठाका और वे उसे ट्ढने चले। आगे जाकर उन्होंने देखा कि नरकट की झाटियो मे बाणो से विधा और घडे पर झुका हुआ एक मुनिपुत्र पड़ा हुआ है। उसे देखकर उनको ऐसा कष्ट हुआ कि मानो अपने ही तन में बाण चुभ गया हो । ७५ ।। जब श्रेष्ठवंशज -- नवम सर्ग कि तेनावतीर्य तुरगात्प्रथितान्वयेन पृष्टान्वय स जलकुम्भनिषण्णदेह । तस्मै द्विजेतरतपस्विसुत स्खलद्धिरात्मानमक्षरपदै कथयाम्बभूव ॥७६॥ तच्चोदित स तमनुधृतशल्यमेव पित्रो सकाशमवसन्नदृशोर्निनाय । ताभ्या तथागतमुपेत्य तमेकपुरमज्ञानत स्वचरित नृपति शशस ।। ७७ ।। तौ दम्पती बहु विलप्य शिशो पहा शल्य निखातमुदहारयतामुरस्त । सोऽभूत्परासुरथ भूमिपति शशाप हस्तार्पितैर्नयनवारिभिरेव वृद्ध ॥७॥ दिष्टान्तमाप्स्यति भवानपि पुत्रशोकादन्त्ये वयस्यहमिवेति तमुक्तवन्तम् । आक्रान्तपूर्वमिव मुक्तविष भुजङ्ग प्रोवाच कोसलपति प्रथमापराद्ध ॥७९ ।। शापोऽप्यदृष्टतनयाननपद्मशोभे सानुग्रहो भगवता मयि पातितोऽयम्। कृष्या दहन्नपि खलु क्षितिमिन्धनेद्धो बीजप्ररोहजननी ज्वलन करोति ।। ८०॥ इत्यङ्गते गतवृण किमय विधत्ता वध्यस्तवेत्यभिहितो वसुधाधिपेन। एधान्हुताशनवत स मुनिर्ययाचे पुत्र परासुमनुगन्तुमना सदार ॥८१ ॥ प्राप्तानुग सदि शासनमस्य राजा सम्पाद्य पातविलुप्ततिनिवृत्त । अन्तर्निविष्टपदमात्मविनाशहेतु शाप दधज्वलनमौमिवाम्बुराशि ॥८२॥ इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये मृगयावर्णन नाम नवम सर्ग ॥९॥ राजा दशरथ ने घोड़े से उतरकर घड़े पर झुके मुनिपुन से उसका वश-परिचय पूछा, तब उसने लड़खडाती वाणी में बतलाया कि मैं ब्राह्मण नहीं हूँ। मेरे पिता वैश्य और माता शूद्रा है।। ७६ ।। तदनन्तर उसने राजा दशरथ से कहा यि मुये मेरे अधे माता-पिता के पास ले चलो । तर राजा दशरथ ने उस बाण से विधे मुनिपुत्र को उठाया और उसके माता-पिता के पास ले गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उाको सब बात बता दी कि मैंने भूल से आपरे इकलौते पुत्र पर किम प्रकार बाण चला दिया है।।७७॥ यह सुनते ही वे दोनों अन्धो-अन्धे विलाप कर रोने लगे और उन्होंने अपने पुत्र के हत्यारे को आज्ञा दी कि मेरे पुत्र की छाती में से बाण निकाल लो। बाण निकलते हा उम मुनिकुमार के प्राण निकल गये। इस पर उस बूढ़े तपस्वी ने अपने ऑमुओं से ही अजली भरकर राजा दशरथ को शाप देते हुए कहा-- ॥८॥ हे राजन् । जाओ, तुम भी हमारे ही समान बुढापे मे पुत्रशोक मे मरोगे। जैसे पैर मे दबने पर सर्प विष उगल कर शान्त हो जाता है, वैसे ही शाप देकर जब वे बृढे मुनि शान्त हो गये, तब पहले-पहल के अपराधी राजा दशरथ ने उनसे कहा--॥७९॥ हे मुनि' मुझे तो आज तक पुत्र के मुखकमल का दर्शन ही नहीं मिला है। इसलिए मैं आपके शाप को भी वरदान ममझता हूँ। क्योंकि इसी बहाने मुझे पुत्र तो प्राप्त होगा। जगल की लकडी को आग चाहे तो एक बार पृथ्वी को भले ही जला दे, किन्तु वह पृथ्वी को इतनी उर्वरा बना देती है कि आगे चलकर उममे बड़ी अच्छी उपज होती है।।८।। तदनन्तर राजा ने फिर उनसे कहा-मैं तो इसी योग्य हूँ कि आप मेरा वध कर दे। अब मुझ नीच के लिए आपको क्या आज्ञा होती है? यह सुनकर उस मुनि ने कहा कि अब हम और हमारी स्त्री दोनों ही अपने पुत्र के माथ मर जायेगे। अतएव हमारे लिए तुम ईंधन और अग्नि जुटा दो।८१ ॥ तब तक राजा दशरथ के अनुचर भी वहां पहुंच चुके थे। मुनि के आज्ञानुसार तत्काल ईधन और अग्नि जुटा दी गयो। तदुपरान्त जैमे ममुद्र के उदर मे वड़वानल जला करता है, वैसे ही अपने पाप से अधीर हृदय में मुनि का शाप लिये हुए अवधेश अपने घर लौटे ॥ ८२ ।। इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में मृगया-वर्णन नामक नवा सर्ग समाप्त||९|| ६ दशम सर्ग योगनिद्रान्तविशदै पावनैरवलोकनै । भृग्वादीननुगृह्णन्त सौखशायनिकानृपोन्॥१४॥ प्रणिपत्य सुरास्तस्मै शमयित्रे सुरद्विषाम् । अथैन तुष्टुवु स्तुत्यमवाङ्मनसगोचरम् ।। १५॥ नमो विश्वसृजे पूर्व विश्व तदनु बिभ्रते । अथ विश्वस्य सहर्ने तुभ्य त्रेधास्थितात्मने ।। १६ ।। रसान्तराण्येकरस यया दिव्य पयोऽश्नुते । देशे देशे गुणेष्वेवमवस्थास्त्वविक्रिय ॥१७॥ अमेयो मितलोकस्त्वमनर्थी प्रार्थनावह । अजितो जिष्णुरत्यन्तमव्यक्तो व्यक्तकारणम्॥१८॥ हृदयस्थमनासन्नमकाम त्वा तपस्विनम्। दयालुमनघस्पृष्ट पुराणमजर विदु ॥१९॥ सर्वज्ञस्त्वविज्ञात सर्वयोनिस्त्वमात्मभू । सर्वप्रभुरनीशस्त्वमेकस्त्व सर्वरूपभाक् ॥२०॥ सप्तसामोपगीत त्वा सप्तार्णवजलेशयम् । सप्तार्चिर्मुखमाचख्यु सप्तलोकैकसश्रयम् ॥२१॥ चतुर्वर्गफल ज्ञान कालावस्थाश्चतुर्गुणा । चतुर्वर्णमयो लोकस्त्वत्त सर्व चतुर्मुखात्॥२२॥ अभ्यासनिगृहीतेन मनसा हृदयाश्रयम् । ज्योतिर्मय विचिन्वन्ति योगिनस्त्वा विमुक्तये ॥२३ ।। अजस्य गृहतो जन्म निरीहस्य हतद्विष । स्वपतो जागरकस्य याथार्थ्यं वेद कस्तव ॥२४॥ शब्दादोन्विषयाभोक्तु चरितु दुश्चर तप । पर्याप्तोऽसि प्रजा पातुमौदासीन्येन वर्तितुम् ॥२५॥ धारण किये हुए गरुड़जी बड़ी नम्रता से हाथ जोडकर उनके ममक्ष सड़े थे॥१३ ॥ योगनिद्रा से उठकर वे अपनी स्वच्छ और पवित्र दृष्टि से उस भृगु आदि ऋषियों को अनुगृहीत कर रहे थे, जो उनसे पूछ रहे थे-'भगवन् । आप सानन्द सो चुके ?" ॥ १४॥ तब देवताओं ने दैत्यों को नष्ट करने वाले विष्णु भगवान् को प्रणाम किया और उन प्रशमनीय विष्णु को स्तुति करने लगे, जिन तक न वाणी की पहुँच होती है और न मन ही वहां पहुंच सकता है। वे बाले— ॥ १५ ।। हे प्रभो। पहले विश्व को बनाने वाले, फिर उसका पालन करने वाले और अत में उममा महार करने वाले- ये तीन रूप आप धारण रिये रहते हैं। आपको हमारा प्रणाम है।।१६।। एक ही स्वाद वाला वर्षा का जल अलग-अलग देशों में बरम कर जैसे अलग-अलग स्वादवाला हो जाता है, वैसे ही आप सब प्रकार के विकारों से दूर रहते हुए भी सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों के महारे अनेर रूप धारण कर लेते हैं।। १७ ॥ हे भगवन् । आप कितने बड़े हैं, यह कोई नहीं जाप मस्ता। किन्तु आपने मब लोक नाप डाले हैं। आपको कोई नहीं जीत सक्ता, परन्तु आपने मबको जीत लिया है। आप मिमी को नहीं दीखते, परन्तु आपने ही इम दृश्यमान ससार को उत्पन्न रिया है।।१८।। हे भगवन् । विद्वानों का कहना है कि आप सबके हृदय में रहते हुए भी मबमे दूर हैं। आपको कोई इच्छा नहीं है, फिर भी नर-नारायण के रूप से बदरिकाश्रम में तपस्या करते हैं। आप दयालु हैं, परन्तु आपको शोक नहीं होता | आपको लोग पुराणपुरुष कहते हैं, परन्तु आप कभी भी बूढे नहीं होते॥१९॥ आप सबको जानते हैं, परन्तु आपको कोई नहीं जानता। आपने सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न को है, परन्तु आपको फिमी ने नहीं उत्पन्न किया है। आप सबके स्वामी हैं, परन्तु आपका कोई भी स्वामी नहीं है और एक रूप होते हुए भी आप सारे ममार के मब रूप धारण किये हुए हैं॥२०॥ विद्वानो का कथन है कि सामवेद के सातो प्रकार के गीतो मे आपके ही गुण गाये गये हैं। आप ही सातों समुद्रों के जल मे निवास करते हैं। मातो प्रकार की अग्नियाँ आपके ही मुख हैं और सातों लोकों के आधार एकमात्र आप ही हैं ।। २१ ।। आपके ही चारों मुखों से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला ज्ञान उत्पन्न हुआ है। चारो युगो मे बँटा हुआ समय भी आपने ही उत्पन्न किया है और चार वर्णो वाला यह समार भी आपका ही बनाया हुआ है।। २२ ॥ प्राणायाम आदि के द्वारा मन को वश मे करके मुक्ति पाने के लिए योगी लोग अपने हृदय मे बैठे हुए ज्योतिस्वरूप आपकी ही सदा सोज करते रहते हैं॥२३॥ हे भगवन् ! आप अजन्मा कहलाते हुए भी जन्म लेते हैं और अकर्मा होकर भी शत्रुओं का सहार करते हैं। योगनिद्रा मे सोते हुए भी आप जागते रहते हैं। तब आपका यथार्थ स्वरुप भला कौन जान सकता है ? ॥२४॥ कृष्णा आदि के रूपों मे आप शब्द, १२ का० ।

९० र रघुवशे बहुधाऽप्यागमैर्भिन्ना पन्थान सिद्धिहेतव । त्वय्येव निपतन्त्योचा जाह्नवीया इवार्णवे ॥२६॥ त्वय्यावेशितचिताना त्वत्समर्पितकर्मणाम् । गतिस्त्व वीतरागाणामभूय सन्निवृतये॥२७॥ प्रत्यक्षोऽप्यपरिच्छेद्यो मह्यादिहिमा तव । आप्तवागनुमानाभ्या साध्य त्वा प्रति का कथा।। केवल स्मरणेनैव पुनाति पुरुष यत । अनेन वृत्तय शेषा निर्वेदितफलास्वाय ॥२९॥ उदधेरिव रत्नानि तेजासीव विवस्वत । स्तुतिभ्यो व्यतिरिच्यन्ते दूराणि चरितानि ते॥३०॥ अनवासमवासव्य न ते किञ्चन विद्यते । लोकानुगह एवैको हेतुस्ते जन्मकर्मणो ॥३१॥ महिमान यदुत्कीर्त्य तव संहियते वच । श्रमेण तदशक्त्या वा न गुणानामियत्तया ॥३२॥ इति प्रसादयामासुस्ते सुरास्तमधोक्षजम् । भूतार्थव्याहृति सा हि न स्तुति परमेष्ठिन ॥३३ ।। तस्मै कुशलसम्प्रश्नञ्जितप्रीतये सुरा । भयमप्रलयोलादाचल्युर्नेक्रतोदधे ॥३४॥ अथ वेलासमासन्नशैलरन्ध्रानुनादिना । स्वरेणोवाच भगवान् परिभूतार्णवध्वनि ।।३५ ।। पुराणस्य कवेस्तस्य वर्णस्थानसमीरिता । बभूव कृतसस्कारा चरितार्थव भारती॥ ३६ ।। बभौ सदशनज्योत्स्ना सा विभोर्वदनोद्गता । निर्यातशेषा चरणाद्गङ्गेवोर्ध्वप्रवर्तिनी ॥ ३७॥ स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि का भोग करते हैं। नर-नारायण स्प से कठोर तप करते है। राम आदि का रूप धारण करके प्रजा का पालन करते हैं और शान्त स्प धारण करके आप उन सबसे उदासीन भी बन जाते हैं ।। २५ ।। जैसे गगाजी की सभी धाराएं समुद्र में जा गिरती हैं, उसी प्रकार सिद्धि (परमानन्द) पाने के जितने मार्ग बतलाये गये हैं, अलग-अलग शास्त्रो मे अलग-अलग रूप से बतलाये जाने पर भी वे सब मार्ग आपके ही पास जाते है।।२६ || जो लोग सदा आपका ही ध्यान धरते हैं, जिन्होने अपने सब कर्म आपको ही अर्पित कर दिये हैं और जो राग-देव मे दर हैं, उनको आय ही जन्म-मरण के बन्धन से छुड़ाते हैं ।। २७ । यद्यपि पृथ्वी आदि को देखने से आपकी महिमा प्रकट होती है, परन्तु उतने से ही आपका वर्णन नहीं किया जा सकता। तब वेदों के वर्णन तथा अनुमान से आपका ज्ञान कैसे हो सकेगा ? ॥२८॥ आपके स्मरणमात्र से लोग पवित्र हो जाते हैं। फिर यदि उन्हे आपका दर्शन मिल जाय, वे आपका चरण छूकर तथा आपरी वाणी सुनकर जो उन्हें पुण्य होगा, उसका वर्णन कौन कर सकता है ? ॥२९ ।। जैसे समुद्र के रल और सूर्य की किरणे नहीं गिनी जा सकती, वैसे ही स्तुति करके आपके पूरे चरित्र का वर्णन नहीं किया जा सकता ।।३०।। ससार में प्राप्त करने योग्य ऐमो कोई भी वस्तु नहीं है, जो आपके हाथ मे न हो। फिर भी आप जो जन्म लेते और कर्म करते हैं, उसका उद्देश्य यही है कि आप ससार पर कृपा करना चाहते हैं॥३१ ।। आपके महत्व की प्रशसा करके जो हम चुप हो रहे हैं, सो इसलिए नहीं कि हमने आपके सब गुण बखान डाले, बल्कि इसलिए कि हम अब थक गये और आगे बोलने की शक्ति हममे नहीं रह गयी है ।१३२॥ जो भगवान् किसी भी इन्द्रिय से नहीं प्राप्त होते, उनकी स्तुति करके देवताओ ने उन्हे प्रसन्न कर लिया। वह स्तुति भी उनकी झूठी प्रशसा नहीं थी, अपितु सब बाते यथार्थ थीं ।। ३३ ।। तब विष्णु भगवान् से प्रसन्न होकर उनमे कुशल-मगल पूछा। जिमके उत्तर में देवताओ ने कहा कि आजकल ऐसे-ऐसे राक्षसरूपी समुद्र उत्पन्न हो गये हैं, जिन्होंने बिना प्रलयकाल के ही सारे ससार की मर्यादा भग करके चारों ओर हाहाकार मचा रखा है॥३४॥ यह सुना तो समुद्र में भी बढकर गभीर ध्वनि मे भगवान् बोले। तब क्षीरसागर के तट पर विद्यमान पहाडों की गुफाओं मे पहुँचकर उनके शब्द गूंज उठे ।। ३५ ! भगवान् विष्णु तो सबसे पुराने कवि हैं। इसलिए जब उनके कण्ठ, तालु, दाँत तथा होठ आदि उच्चारण के स्थानों से भली-भाँति वाणी निकली, तब जैमै सरस्वतीजी अपने जन्म लेने का फल पा गयीं।। ३६ ।। उनके दांतों की युति से जगमगाती हुई उनकी वाणी जब मुस से निकली, तब वह ऐमी मुन्दा लगी कि जैसे उनके चरणों से निकलकर गगाजी ऊपर आकाश को चली जा रही हों ।। ३७ ॥ विष्णु भगवान् ने कहा--हे देवताओ। जैसे ससार दशम सर्ग को जाने वो रक्षसाक्रान्तावनुभावपराक्रमी । अङ्गिना तमसेवोभौ गुणौ प्रथममध्यमौ ॥ ३८॥ विदित तप्यमान च तेन मे भुवनत्रयम् । अकामोपनतेनेव साधोर्हृदयमेनसा ॥ ३९ ॥ कार्येषु चैककार्यत्वादभ्योऽस्मि न वजिणा। स्वयमेव हि बातोऽग्ने सारथ्य प्रतिपद्यते॥४०॥ स्वासिधारापरिहृत काम चक्रस्य तेन मे । स्थापितो दशमो मूर्धा लभ्याश इव रक्षसा ॥४१ ।। स्रष्टुवरातिसर्गातु मया तस्य दुरात्मन । अत्यारुढ रिपो सोढ चन्दनेनेव भोगिन ॥४२॥ धातार तपसा प्रोत ययाचे स हि राक्षस । दैवात्सर्गादवध्यत्व मर्येष्वास्थापराइमुख ॥४३॥ सोऽह दाशरथिर्भूत्वा रणभूमेलिक्षमम् । करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैस्तन्छिर कमलोचयम्॥४४॥ अचिराद्यज्वभिर्भाग कल्पित विधिवत्पुन । मायाविभिरनालीढमादास्यध्वे निशाचरै ॥४५॥ वैमानिका पुण्यकृतस्त्यजन्तु मरुता पयि । पुष्पकालोकसङ्क्षोभ मेघावरणतत्परा ॥४६॥ मोक्ष्यध्वे स्वर्गवन्दीना वेणीवन्धानदूषितान् । शापयन्त्रितपौलस्त्यबलात्कारकचाहै ॥४७॥ रावणावग्रहक्लान्तमिति वार स । अभिवृ मरुत्सस्य कृष्णमेघस्तिरोदधे ॥४८॥ पुरुहूतप्रभृतप सुरकार्योद्यत सुरा । अशैरनुयपुर्विष्णु पुष्पैर्वायुमिव द्रुमा ॥४९ ।। अथ तस्य विशाम्पत्युरन्ते काम्यस्य कर्मण । पुरुष प्रबभूवाग्नेर्विस्मयेन सहविजाम् ।।५०॥ के जीवों के सतोगुण और रजोगुण को उनरा तमोगुण दबा देता है, वैसे ही आपके तेज और बल को रावण ने दना दिया है।३८ ।। जैसे अनजान में किये हुए पाप मे मज्जन का मन घबरा जाता है, वैसे ही रावण के अत्याचारों में तीनों लेक घरा उठे हैं।।३९ ।। अतएव रावण को मिटा डालने का काम जैमे इन्द्र का है, वैमा ही मेरा भी है। एतदर्थ इन्द्र ने जो मेरा प्रार्थना की है, उसकी मैं कोई आवश्यकता नहीं ममझता। क्योंकि आग की महायता के लिए वायु मे कहता नहीं पडता, वह तो स्वय आग को भड़का देता है॥४०॥ शिवजी का प्रमन्न करा के लिए रावण ने पूर्वकाल में अपने नौ मिर काटकर चढ़ा दिये थे। अब एमा लगता है कि उस राक्षम ने अपना दमवॉ मिर मेरे चक्र से कटने के लिए ही बाकी रख छोडा ॥४१॥ ब्रह्माजी ने जो उमे वरदान दे दिया था, उमी मे मैंने उम दुष्ट का दिन-प्रतिदिन उपर चढना उमा प्रसार मह लिया है जैसे अपने ऊपर चढते हुए मॉप को चन्दन का पेड सह लिया करता है ।। ४२ ।। ब्रह्माजी जब उसकी तपस्या में प्रमन हुए, तब उमने यही वरदान मांगा था कि मैं देवताओं के हाथ मे न मारा जा म।। क्योंकि मनुष्यों को वह कुछ समझता ही नहीं है।। ४३ ॥ दीलिए मैं राजा दशरथ के यहाँ पुत्रम्प मे जन्म लेकर अपने तीखे बाणो से उसके मिरो को कमल के मदृश उतार कर रणभूमि मे भेट चढागा ॥ ४४।। हे देवताओ ! यजमानो द्वारा विधि से तुम्हे दिया हुआ यज्ञभाग अब राक्षम लाग नहीं खा मरेंगे। वह आप ही लोग पायेगे।। ४५ ।। अब निडर होकर आप लोग अपने-अपने विमानों पर चदार आकाश मे घुमिए और रावण का पुष्पक विमान देख और उममे डरकर बादलों में छिपना छोड दीजिए॥४६॥ स्वर्ग की जिन स्त्रियों को रावण ने अपने यहाँ बन्दी बना लिया है, उनके जूटों पर नल-कूबर के शाप के डर मे उमने हाथ नहीं ल्गाया है। अब आप ही लोग उन स्त्रियों के पवित्र जूडे अपने हाथों मे खोलिएगा ॥४७॥ जैसे मूखे के ममय कोई बादल धान के खेत पर जल बरमारर चला जाय, वैसे ही रावण के डर मे सूखे हुए देवताओ पर अपना मधुर वचनामृत बरमार विष्णु भगवान् अन्तर्धान हो गये॥ ४८ ॥ वायु के चल्ने पर जैसे वन के वृक्ष स्वय उसके पीछे न जाकर अपने फूल उसके साथ भेज देते हैं, वैसे ही जब भगवान् विष्णु देवताओ का कार्य करने को चले, तब इन्द्र आदि देवताओं ने भी अपने-अपने अश उनके माय भेज दिये ॥४९॥ इधर जैसे राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त हुआ, वैसे ही यज्ञ के अग्निकुण्ड से एक पुरुष प्रकट हुआ, जिसे देखकर यज्ञ करने वाले मभी ऋत्विक बड़े आश्चर्य मे पड़ गये।।५० ।। उम पुरुष के हाथो । ९२ क रघुवशे से हेमपात्रगत दोभामादधान पयश्चरम् । अनुप्रवेशादाद्यस्य पुसस्तेनापि दुर्वहम् ॥५१॥ प्राजापत्योपनीत तदन्न प्रत्यग्रहीनृप । वृषेव पयसा सारमाविष्कृतमुदन्वता ॥५२॥ अनेन कथिता राज्ञो गुणास्तस्यान्यदुर्लभा । प्रसूति चक्रमे तस्मिस्त्रैलोक्यप्रभवोऽपि यत्॥५३॥ स तेजो वैष्णव पल्योविभेजे चरुसजितम् । द्यावापृथिव्यो प्रत्यग्रमहर्पतिरिवातपम् ।।५४ ।। अर्चिता तस्य कौसल्या प्रिया केकयवशजा । अत सम्भाविता ताभ्या सुमित्रामैच्छदोश्वर ॥ ते बहुज्ञस्य चित्तज्ञे पन्यो पत्युर्महीक्षित । चरोरर्धार्धभागाभ्या तामयोजयतामुभे ॥५६॥ सा हि प्रणयवत्यासीत्सपल्योरुभयोरपि । भ्रमरी वारणस्येव मनिस्यन्दरेखयो ॥५७॥ ताभिर्गर्भ प्रजाभूत्यै दधे देवाशसम्भव । सौरोभिरिव नाडीभिरमृताख्याभिरम्मय ॥५८॥ सममापन्नसत्त्वास्ता रेजुरापाण्डुरत्विष । अन्तर्गतफलारम्भा सस्यानामिव सम्पद ॥ ५९॥ गुप्त ददृशुरात्मान सर्वा स्वप्नेषु वामनै । जलजासिगदाशार्ङ्गचक्रलाञ्छितमूर्तिभि ॥६० ॥ हेमपक्षप्रभाजाल गगने च वितन्वता । स्म सुपर्णेन वेगाकृष्टपयोमुचा॥ ६१॥ विभत्या कौस्तुभन्यास स्तनान्तरविलम्बिनम् । पर्युपास्यन्त लक्ष्म्या च पद्मव्यजनहस्तया ॥ ६२॥ कृताभिषेकैर्दिव्याया त्रिस्रोतसि च समभि । ब्रह्मर्षीिभ पर ब्रह्म गृर्णाद्धरुपस्थिरे । ६३ ।। ताभ्यस्तथाविधान्स्वप्नाञ्छुत्वा प्रीतो हि पार्थिव । मेने परायमात्मान गुरुत्वेन जगद्गुगे ।। विभक्तात्मा विभुस्तासामेक कुक्षिष्वनेकधा । उवास प्रतिमाचन्द्र प्रसन्नानामपामिव ।। ६५ ।। में खीर से भरा हुआ स्वर्णपात्र था। उस खोर मे सारे ब्रह्माण्ड को संभालने वाले विष्णु भगवान समाये हुए थे। इसलिए वह दिव्य पुरुष उस पात्र को बडो कठिनाई से संभाले हुए था॥५१ ।। इन्द्र ने जैसे समुद मे से निकले अमृतकलश को ले लिया था, वैसे ही राजा दशरथ ने भी उम दिव्य पुरुष के हाथ से वह खीर ले लो ॥५२ ।। उम पुरुष ने राजा के असाधारण गुणो को ऐसी प्रशसा को कि त्रिलोकी के जनक विष्णु को भी उनके यहा जन्म लेने की इच्छा हो गयी ।। ५३ ।। मूर्यनारायण जैसे अपनी नयी धूप पृथ्वी और आकाश दोनों मे बॉट देते हैं, वैसे ही खीर के रूप मे पाये हुए विष्णु के तेज को राजा दशरथ ने कौमत्या और कैकेयी में बराबर-बराबर बॉट दिया॥५४॥ कौसल्या उनकी बड़ी रानी और कैकेयी उनकी प्यारी थी। अतएव वे चाहते थे कि दोनों रानियाँ स्वय अपो-अपो भाग में से कुछ अश देकर सुमित्रा का सम्मान करे ॥ ५५ ॥ तदनुसार सर्वज्ञ राजा दशरथ की इच्छा जानकर उन दोनो रानियों ने अपनी-अपनी खीर का कुछ भाग सुमित्रा को दे दिया ॥ ५६ ।। हाथी के दोनों कपोलो से बहने वाले मद की दोनों धाराओ से जैसे भ्रमरी प्रेम करती है, वैसे ही सुमित्रा भी अपनी दोनों सौतों से बराबर प्रेम करती थी॥ ५७ ॥ जैसे जल बरसाने वाली अमृता नाम की मूर्य की किरणे मसार के कल्याणार्थ जल धारण किये रहती हैं, वैसे ही उन तीनो रानियों ने लोककल्याणार्थ विष्णु के अशस्वरूप गर्भ को धारण किया ॥५८॥ एक साथ गर्भ धारण करने वाली वे रानिया गर्भ से पीली पड़कर दानाभरे अनाज की बालों जैमी पीली लगती थीं ॥ ५९ ।। वे यह स्वप्न देखती थी कि कमल, तलवार, गदा, शाई धनुष और चक्र लिये हुए कोई बौना-मा पुरुष उनकी रक्षा कर रहा है।। ६० ॥ अपने स्वर्णपसों से प्रकाश फैलाता और वेग के कारण बादलों को भी साथ खींचकर ले जाता हुआ गरुड हमे आकाश मे उड़ाये लिये जा रहा है।। ६१ ॥ अपने वक्ष स्थल पर लटकने वाला कौस्तुभमणि पहने हुए लक्ष्मी हाथ मे कमल का पखा लेकर हमारी मेवा कर रही हैं। ६२ ।। उनके अतिरिक्त आकाशगङ्गा में स्नान करके सप्तर्षि भी वेद-पाठ करते हुए हमारी ही उपामना करते हैं। ६३ । रानियों ने जब राजा को अपने ये स्वप्न सुनाये, तब वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने समझ लिया कि अब ससार मे मुझसे बढ़कर भाग्य वान् कोई नहीं है। क्योंकि में विष्णु भगवान् का भी पिता बनूंगा।। ६४॥ यद्यपि विष्णु भगवान् का ॐ दशम सर्ग ९३ अथाग्यमहिषी राज्ञ प्रसूतिसमये सती । पुत्र तमोपह लेभे नक्त ज्योतिरिवौषधि ॥६६॥ राम इत्यभिरामेण वपुषा तस्य चोदित । नामधेय गुरुश्चक्रे जगत्प्रथममङ्गलम् ।। ६७ ।। रघुवशप्रदीपेन तेनाप्रतिमतेजसा । रक्षागृहगता दीपा प्रत्यादिष्टा इवाभवन् । ६८॥ शय्यागतेन रामेण माता शातोदरी बभौ । सैकताम्भोजबलिना जाहवीव शरत्कृशा ॥ ६९ ।। कैकेय्यास्तनयो जज्ञे भरतो नाम शीलवान् । जयित्रीमलञ्चक्रे य प्रश्रय इव श्रियम्॥७०।। सुतौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्रा सुषुवे यमौ । सम्यगाराधिता विद्या प्रबोधविनयाविव ॥७१ ॥ निर्दोषमभवत्सर्वमाविष्कृतगुण जगत् । अन्वगादिव हि स्वर्गो गा गत पुरुषोत्तमम्॥७२॥ तस्योदये चतुर्मूर्त पौलस्त्यचकितेश्वरा । विरजस्कैर्नभस्वनिर्दिश उच्छ्वसिता इव ।।७३ ।। कृशानुरपधूमत्वात् प्रसन्नत्वात् प्रभाकर । रक्षोविप्रकृतावास्तामपविद्धशुचाविव ।।७४ ।। दशाननकिरोटेभ्यस्तत्क्षण राक्षसश्रिय । मणिव्याजेन पर्यस्ता पृथिव्यामश्रुबिन्दव ।।७५।। पुत्रजन्मप्रवेश्याना तूर्याणा तस्य पुत्रिण । आरम्भ प्रथम चक्रुर्देवदुन्दुभयो दिवि ।। ७६ ।। सन्तानकमयो वृष्टिर्भवने चास्य पेतुषो । सन्मङ्गलोपचाराणा सैवादिरचनाऽभवत् ।। ७७।। कुमारा कृतसस्कारास्ते धात्रीस्तन्यपायिन । आनन्देनाग्रजेनेव सम ववृधिरे पितु ॥७८॥ स्वाभाविक विनीतत्व तेषा विनयकर्मणा । मुमूर्छ सहज तेजो हविषेव हविर्भुजाम् ॥७९॥ एक ही स्प है, परन्तु जैसे निर्मल जल मे चन्द्रमा के बहुत-मे प्रतिबिम्ब दीखते हैं, वैसे ही वे भगवान् भी तीनों रानियों के गर्भो मे अलग-अलग रह रहे थे।। ६५ ।। जैसे पर्वत की अनेक जडी-बूटियों मे रात को अंधेरा दूर करो वाला प्रकाश आ जाता है. वैसे ही राजा को पटरानी कौमत्या ने तमोगुण को दूर करने वाला एक तेजस्वी पुन उत्पन्न क्यिा ।। ६६॥ उम बालर के सुन्दर शरीर को देखकर वसिष्ठजी ने उमका मसार में प्रथम मङ्गलकारी 'राम' नाम रख दिया ।। ६७ ।। रघुवश को उजागर करने वाले उम बालक का इतना प्रसर तेज था कि उमरे ममक्ष मौरीघर के दापकों को ज्योति मन्द पड़ गयी।। ६८॥ प्रमव मे दुबली माता कौमत्या नन्हे-से राम को लिये पलग पर लेटी हुई ऐमी सुन्दर दीखती थी, जैसे शरद् ऋतु में पतली धारावाली गगाजी के तट पर पूजारूप मे चढाया हुआ नीलकमल रसा हो॥६९ ॥ उधर कैकेयी ने भरत को जन्म दिया। उन्ह पाकर वह ऐमी मुन्दर लग रही थी, जैसे लक्ष्मी के माथ विनय शोभित होता है।।७० ॥ जैसे अभ्याम से प्राप्त विद्या द्वारा ज्ञान और विनय दोनों मिल जाते हैं, वैसे ही मुमित्रा के लक्ष्मण और शत्रुघ्न नाम के दो जुड़वों पुत्र उत्पन्न हुए।।७१ ।। उम ममय मारे समार के दोष भाग गये और चारों ओर गुण ही गुण फैल गये। जैसे विष्णु भगवान के साथ-माथ स्वर्ग भी पृथ्वी पर उतर आया हो।।७२ ।। दमों दिशाओं में बिना धूल की जो स्वच्छ हवा चलने लगी, वह ऐसी लगती थी कि जैसे रावण से भयभीत कुबेर आदि दिक्पाले ने पृथ्वी पर चार स्पों में अवतरित भगवान् को पाकर सन्तोष की मॉस ली हो ॥७३ ॥ रावण द्वारा मताये हुए अग्नि का धुआं निकल गया और सूर्य भी निर्मल हो गये। जैसे उन दिनों उनका शोक दूर हो गया हो।७४।। उमी ममय महसा रावण के मुकुट से निकल कर कुछ मणि पृथ्वी पर ऐसे गिर पडे जैस राक्षसो को राजलक्ष्मी के ऑसू चू पडे हों।७५ ॥ पुत्रवान् दशरथ के घर पुत्र-जन्म के समय नगाडे आदि बाजे बाद में बजे, उमके पहले देवताओं ने स्वर्ग में बधाई की दुदुभी बजा दी।।७६॥ उनके राजमहल पर आकाश मे कल्पवृक्षो के फूलों की जो वर्षा हुई, उसी से उन चारो पुत्रों के माङ्गलिक मस्कारों का श्रीगणेश हुआ।। ७७ ।। जातकर्म आदि सस्कार हो जाने पर धाय का दूध पी-पोकर जेमे-जैसे वे राजकुमार बढो लगे, वैसे ही वैमे राजा का आनन्द भी बढ़ने लगा। जैसे वह आनन्द भो उन चारों भाइयों का बड़ा भाई हो ॥ ८ ॥ जैमे घी आदि को आहुति पड़ने से हवन को अग्नि का तेज बढ जाता है, वैसे ही शिक्षा पाने मे उन

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के रधुवशे
परस्परविरुद्धास्ते तद्रघोरनघ कुलम् । अलमुद्द्योतयामासुर्देवारण्यमिवर्तन ॥८॥
समानेऽपि हि सौमात्रे ययोभौ रामलक्ष्मणौ । तथा भरतशत्रुघ्नौ प्रीत्या द्वन्द्व बभूवतु ॥८१॥
तेषा द्वयोईयोरैक्य विभिदे न कदाचन । यथा वायुविभावम्बोर्यथा चन्द्रसमुद्रयो ॥८२॥
ते प्रजाना प्रजानाथास्तेजसा प्रश्रयेण च । मनो जहर्निदाघान्ते श्यामाधा दिवसा इव ।। ८३ ।।
म चतुर्धा बभौ व्यस्त प्रसव पृथिवीपते । धर्मार्थकाममोक्षाणामवतार इवाङ्गभाक् ।। ८४ ॥
गुणैराराधयामासुस्ते गुरु गुरुवत्सला । तमेव चतुरन्तेश रलैरिव महार्णवा ॥८५।।
सुरगज इव दन्तैर्भग्नदैत्यासिधारैर्नय इव पणबन्धव्यक्तयोगैरुपायै ।
हरिरिव युगदीर्घर्भिरशैस्तदीयै पतिरनिपतीना तैश्चकाशे चतुर्भिः ॥८६॥
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये
रामावतारो नाम दशम सर्ग ॥१०॥
चारों राजकुमारों की स्वाभाविक विनम्रता और भी अधिक बढ़ गयी ॥७९ ॥ जैसे छहों ऋतुएँ नन्दन
वन को देदीप्यमान कर देती हैं, वैसे ही पारस्परिक प्रेम मे उन चारों कुमारो ने पवित्र रघुकुल को
जगमगा दिया।। ८०॥ यद्यपि चारो भाइयों में परस्पर बहुत प्रेम था, फिर भी विशेष प्रेम के कारण
जैसे राम और लक्ष्मण की एक जोडी बन गयी थी, वैसे ही भरत और शत्रुघ्न को भी जोडी बन गयी १८१ ।।
जैसे वायु और अग्नि का तथा चन्द्रमा और ममुद्र का जोटा कभी नहीं बिछुड़ता, वैसे ही राम और
लक्ष्मण का तथा भरत और शत्रुघ्न का माथ कभी नहीं छूटता था ।। ८२ ।। पजाजनों के स्वामी उन
राजकुमारों ने अपने तेज और नम्र व्यवहार में अपनी प्रजा का मन उसी प्रकार हा लिया, जैसे गर्मी
के अत में काले बादल लोगों का मन हर लेते हैं।।८३ ।। राजा को वे चारों सताने ऐमी सुन्दर लग
रहीं थीं जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-- ये चारो पदार्थ अवतरित हो गये हो ।। ८४॥ उन चारा
पितृभक्त राजकुमारों ने राजा दशरथ को अपने गुणों से उसी प्रकार मोह लिया, जैसे चारों समुद्रो रे
विविध रल देकर चारो दिशाओं के स्वामी राजा दशरथ को मोह लिया था।॥८५ ।। असुरों की तलवारों
की धार कुठित करने वाले अपने चार दातो से जैसे ऐरावत शोभित होता है, जैसे साम, दाम, दण्ड
और भेद--
-~-इन चार उपायो से राजनीति शोभित होती है और रप के जुए के समान अपनी लम्बी-लम्बी
चार भुजाओ मे जैसे विष्णु भगवान् शोभित होते हैं, वैसे ही दशरथ भी अपने चारों सुयोग्य पुनो से
मुशोभित हुए।। ८६ ।।
इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य मे रामावतार नामक
दशवा सर्ग समाप्त॥१०॥

एकादश सर्ग राघव नृप । भास्करस्य कौशिकेन स किल क्षितीश्वरो राममध्वरविघातशान्तये। काकपक्षधरमेत्य याचितस्तेजसा हि न वय समीक्ष्यते॥१॥ कृच्छ्रलब्धमपि लब्धवर्णभाक् त दिदेश मुनये सलक्ष्मणम् । अप्यसुप्रणयिना रघो कुले न व्यहन्यत कदाचिदर्थिता ॥२॥ यावदादिशति पार्थिवस्तयोर्निर्गमाय पुरमार्गसस्क्रियाम्। तावदाशु विदधे मरुत्सरी सा सपुष्पजलवर्षिभिर्घने ॥३॥ तो निदेशकरणोद्यतो पितुर्धान्वनौ चरणयोर्निपेततु । भूपतेरपि तयो प्रवत्स्यतोर्नम्रयोरुपरि बाप्यबिन्दव ॥४॥ 'तो पितुर्नयनजेन वारिणा किञ्चिदुक्षितशिखण्डकावुभौ । धन्विनौ तमृषिमन्वगच्छता पौरदृष्टिकृतमार्गतोरणी॥५॥ लक्ष्मणानुचरमेव नेतुमैच्छदृषिरित्यसो आशिप प्रयुयुजे न वाहिनी सा हि रक्षणविधी तयो क्षमा॥६॥ मातृवर्गचरणस्पृशौ मुनेस्तो प्रपद्य पदवीं महौजस । रेजतुर्गीतवशात्प्रवर्तिनी मधुमाधवाविव ॥७॥ वीचिलोलभुजयोस्तयोर्गत शैशवावपलमप्यशोभत। तोयदागम इवोद्धयभिद्ययोर्नामधेयसदृश विचेष्टितम् ।।८॥ तदनन्तर एक दिन विश्वामिनजी राजा दशरथ के पाम आये और उन्होंने कहा कि मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए आप कारुपमधारी राम को हमारे माथ भेज दे। क्योकि जो तेजस्वी होते हैं, उनके लिए यह नहीं सोचा जाता कि वे उम्र मे छोटे हैं या बडे॥१॥ यद्यपि राजा दशरथ ने राम और लक्ष्मण को बड़ी तपस्या मे पाया था, किन्तु वे विद्वानों के इतो भक्त य कि उन्होंने तत्काल राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेज दिया। क्योकि रघुकुल को मदा मे यह गैति रही है कि यदि कोई उनमे प्राण भी मागे तो उमे विमुख नहीं करते थे॥२॥ गजा दशरथ उनको विदाई के लिए सडक सजाने को आज्ञा दे हो रहे थे कि इतने में वायु ने फूल और बादलों ने जल लार उन सडको पर बरसा दिया ॥३॥ अपने पिता की आज्ञा का पालन करने को प्रस्तुत होकर दोनों धनुर्धर राजकुमार राम-लक्ष्मण अपने पिता के चरणों मे पणाम करने को झुके, वैसे ही दशरथजी की आपों मे उन दोनों पर ऑसुओ की बूंदें टपक पडी ॥४॥ उन आँसुओं से दोनो राजकुमारों की चोटियों भीग गयीं। धनुष लेकर जब दोनो भाई विश्वामित्रजी के पीछे-पीछे चले, उस समय उन्हे देखते हुए पुरवामियो की आँखे ऐमी लग रही थी, जैसे उन नेत्रों की बदाबारे बाँध दी गयी हो॥५॥ महर्षि विश्वामिा केवल राम और लक्ष्मण को ही ले जाना चाहते थे। अतएव राजा ने उनकी सहायता के लिए केवल अपना आशीर्वाद दिया, सेना नहीं। क्योकि उनका आशीर्वाद ही उनकी रक्षा के लिए पर्याप्त था।॥६॥ जपनी माताओ के चरण छकर दोनों राजकुमार उन तेजस्वी मुनि के पीछे चलते हुए ऐसे शोभित हो रहे थे, जैम मूर्य के पीछे-पीछे चैत्र और वैशाख माम चले जा रहे हों। बचपन के कारण लहरो के ममान चचल वॉहो वाले उन दोनो प्राप्य रघुवशे तो बलातिबलयो प्रभावतो विद्ययो पथि मुनिप्रदिष्टयो । मम्लतुर्न मणिकुट्टिमोचितो मातृपावपरिवर्तिनाविव ।। ९ ।। पूर्ववृत्तकथित पुराविद सानुज पितृसखस्य राघव । उद्यमान इव वाहनोंचित पादचारपि न व्यभावयत्॥१०॥ तो सरासि रसद्धिरम्बुभि जिते श्रुतिसुखै पतत्त्रिण । वायव सुरभिपुष्परेणुभिश्छायया च जलदा सिविरे ॥११॥ नाम्भसा कमलशोभिना तथा शाखिना च न परिश्रमन्छिदाम्। दर्शनेन लघुना यथा तयो प्रीतिमापुरुभयोस्तपस्विन ॥१२॥ स्थाणुदग्धवपुषस्तपोवन दाशरथिरात्तकार्मुक । विग्रहेण मदनस्य चारणा सोऽभवत्प्रतिनिधिर्न कर्मणा ॥१३॥ तो सुकेतुसुतया खिलोकृते कौशिकाद्विदितशापया पथि। निन्यतु स्थलनिवेशिताटनी लीलयैव धनुषी अधिज्यताम् ।।१४।। ज्यानिनादमय गृह्णती तयो प्रादुरास बहुलक्षपाछवि । ताडका चलकपालकुण्डला कालिकेव निविडा बलाकिनी ॥१५॥ तोव्रवेगधुतमार्गवृक्षया प्रेतचीवरवसा स्वनोग्रया। अभ्यभावि भरतानजस्तया वात्ययेव पितृकाननोत्थया ॥१६॥ राजकुमारो का चुलवुलापन ऐमा मुन्दर लग रहा था, जैसे वर्षा ऋतु मे दो उद्धय और भिद्य नदियों ल्हाती, इठलाती और तटों को ढाती हुई वहती चली जा रही हो।।७-८॥ अब तक उन बालको ने कभी घर से बाहर पैर नहीं रखा था। अतएव विश्वामित्रजी ने मार्ग मे ही उन्हे बला और अतिबला नाम की दोनो विद्याएँ मिखा दी। जिससे ऊबड़-खाबड़ वन्य मार्ग मे चलते समय उन्हे वैमा ही मुख हो रहा था, जैसे वे अपने मणिजटित भवनों में अपनी माता के आम-पाम घूम रहे हो।॥९॥ जो राम और लक्ष्मण मदा दिव्य रथों पर चढकर चलते थे, उन्हें पैदल चलने में तनिक भी थकावट नहीं हुई। क्योकि उनके पिता के मित्र विश्वामित्रजी उन्हें मार्ग मे अनेक पुरानी क्याएँ मुनाते चलते थे।॥ १० ॥ मार्ग के मरोवरों ने अपना मीठा जल पिलाकर, पक्षियो ने मधुर गीत मुनाकर, वायु ने सुगन्धित पराग फैलाकर और बादलों ने शीतल छाया देकर उन दोनों की बहुत बडो मेवा की॥११ ।। कमलो से भरे सरोवरों तथा थकावट हरने वाले वृक्षो की छाया को देख करके भी आश्रम के तपम्बी उतने हर्षित कभी नहीं हुए थे, जितो इन दोनों राजकुमारों को देखकर हर्षित हुए।॥ १२॥ शिवजी ने जिम तपोवन मे कामदेव को भस्म किया था, वहाँ मुन्दर शरीर वाले राम धनुष लिये हुए जब पहुंचे, तब ऐसा लगा कि जैसे वे वहाँ कामदेव की केवल सुन्दरता के प्रतिनिधि बनकर आये हों, उसके कार्यो के प्रतिनिधि नहीं ॥ १३॥ मार्ग में उन्हे सुकेतु की कन्या वह ताटका राक्षमी मिली, जिमने सारा मार्ग उजाड बना डाला था और विश्वामित्र ने जिमके शाप की कथा पहले ही राम को मुना दी थी। उसे देखा तो उन दोनो भाइयों ने अपने धनुषों को पृथ्वी पर टेक कर प्रत्यचा चढ़ा ली।॥ १४॥ उसके धनुष की प्रत्यचा को टकार सुनते ही कानो में लटकती हुई मनुष्य की खोपड़ियों का कुण्डल हिगती हुई और अमावास्या की रात्रि के ममान काली-कलूटी ताडका उनके समक्ष आकर इस तरह सडी हो गयी, जैसे बगुलों की पांतो से भरी काली बदली छा गयी हो॥१५॥ बडे वेग से मार्ग के वृक्षों को ढाती, प्रेतों के वस्त्र पहले, भयकर गर्जन करने वाली तथा श्मशान मे उठे हुए बवडर के समान आकृति वाली ताडका राम पर महसा टूट पड़ी ॥ १६॥ वृक्ष की शाखा जैसी अपनी बॉह उठाये और कमर में आंतों की करधनी १७ वामनाश्रमपद पर उन्मना एकादश सर्ग उद्यतैकभुजयष्टिमायती श्रोणिबिपुरुषान्त्रमेखलाम्। ता विलोक्य वनितावधे घृणा पत्रिणा सह मुमोच राघव ॥ १७ ॥ यच्चकार विवर शिलाघने ताडकोरसि स रामसायक । अप्रविष्टविषयस्य रक्षसा द्वारतामगमदन्तकस्य तत्॥१८॥ बाणभिन्नहृदया निमंतुषी सा स्वकाननभुव न केवलाम्। विष्टपत्रयपराजयस्थिरा रावणश्रियमपि व्यकम्पयत्।। १९॥ राममन्मथशरेण ताडिता दु सहेन हृदये निशाचरी। गन्धवद्रुधिरचन्दनोक्षिता जीवितेशवसति जगाम सा॥२०॥ नैर्ऋतघ्नमय मन्त्रवन्मुने प्रापदस्त्रमवदानतोषितात्। ज्योतिरिन्धननिपाति भास्करात्सूर्यकान्त इव ताडकान्तक ॥२१॥ तत पावन श्रुतमृषेरुपेयिवान्। प्रथमजन्मचेष्टितान्यस्मरन्नपि बभूव राघव ॥२२॥ आससाद मुनिरात्मनस्तत शिष्यवापिरिकल्पिताहणम्। बद्धपल्लवपुटालिद्रुम दर्शनोन्मुखमृग तपोवनम् ॥ २३ ॥ तत्र दीक्षितमृषि ररक्षतुर्विघ्नतो दशरथात्मजौ शरै । लोकमन्धतमसात्क्रमोदितो रश्मिभि शशिदिवाकराविव ।। २४॥ वीक्ष्य वेदिमथ रक्तबिन्दुभिर्बन्धुजीवपृथुभि प्रदूषिताम् । सम्भ्रमोऽभवदपोढकर्मणामृत्विजा च्युतविकङ्कतसुचाम् ॥ २५॥ पहने उम ताडका को देसर राम ने स्त्री को मारने की धृणा और अपना बाण दोनों एक साथ छाड दिया। १७ ।। राम के उम बाण ने पत्थर की चट्टाा जैमी कठोर ताइका की छाती मे जो छेद किया, वह मानो राक्षमों के उम देश मे यमराज को प्रविष्ट होने के लिए द्वार खोल दिया, जहाँ अभी वे जा नहीं सके थे॥१८॥ रामबाण के आघात मे ताडका की छाती फट गयी और वह जब नीचे गिरी, तब उसके गिरने से वह जगल ही नहीं, बल्कि तीनों लोगों को जीतकर प्राप्त रावण की राजलक्ष्मी भी कॉप उठी ॥ १९॥ राम के बाण मे बिधार दुर्गन्धित रुधिर मे लिपटी ताडका इस प्रकार मीधे यमलोक चली गयी, जैसे काम के बाण से घायल कोई अभिमारिका चन्दन का लेप करके अपने प्रेमी के घर जा पहुंची हो॥२०॥ मूर्य जैसे लकडी जलाने का तेज मूर्यकान्त मणि को दे देता है, वैसे ही ताड़का के मरने से प्रसन्न महर्षि विश्वामित्र ने राक्षसों का महार करने वाला मत्रमहित दिव्य अस्त्र राम को दे दिया ॥२१॥ वहाँ से चलकर रामचन्द्र भगवान् वामन के उम पवित्र आश्रम मे गये, जिसके विषय में विश्वामित्रजी ने उन्हे पहले ही मब बता दिया था। वहाँ अपो पूर्वजन्म के वामनावतार की लीलाओ का ठीक-ठीक स्मरण न होने पर भी वे कुछ उत्कठित जमे हो उठे ॥ २२ ॥ वहाँ मे विश्वामित्र अपने आश्रम पहुंचे, जहाँ शिष्यो ने पूजा की सब मामग्री इकट्ठी कर रखी थी। वहाँ के वृक्ष पत्तों की अञ्जली बाँधे खडे थे और मृग बड़ी उत्सुक्ता से उन्हे निहार रहे थे।॥ २३ ॥ सूर्य और चन्द्रमा जैमे बारी-बारी मे अपनी किरणों द्वारा पृथ्वी का अंधेरा दूर करते हैं, वैसे ही आयम में राम और लक्ष्मण बारी-बारी से यज्ञ करने वाले ऋषि विश्वामित्र के विघ्नो को दूर कर रहे थे॥२४॥ उसी समय यज्ञ की वेदी पर के जैसी बड़ी-बड़ी रक्त की बूंदे देखकर ऋषिया को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होने यज्ञ बन्द करके अपने-अपने घर के मुवे धरती पर रप दिये ॥२५॥ तत्काल गम ने अपने तृणीर से वाण निकाला और ऊपर मुंह करके आपाश की ओर देखा लो गिद्ध के पखों की वायु में हिलती हुई १३ का० दुपहिया के

९८
रघुवशे
उन्मुख सपदि लक्ष्मणाग्रजो बाणमाश्रयमुखात्समुद्धरन् ।
रक्षमा बलमपश्यदम्बरे गृध्रपक्षपवनेरितध्वजम् ।। २६॥
तत्र यावधिपती मखद्विषा तौ शरव्यमकरोत्स नेतरान् ।
कि महोरगविसपिविक्रमो राजिलेषु गरुड प्रवर्तते ॥२७॥
सोऽस्त्रमुग्रजवमस्त्रकोविद सन्दधे धनुषि वायुदैवतम्।
तेन शैलगुरुमप्यपातयत् पाण्डुपत्रमिव ताडकासुतम् ॥२८॥
य सुबाहुरिति राक्षसोऽपरस्तत्र तत्र विससर्प मायया।
त क्षुरपशकलीकृत कृती पत्त्रिणा व्यभजदाश्रमादहि ॥२९॥
इत्यपास्तमखविघ्नयोस्तयो सायुगीनमभिनन्ध विक्रमम्।
ऋत्विज कुलपतेर्यथाक्रम वाग्यतस्य निरवर्तर्यान्क्रया ॥३०॥
तो प्रणाममचलकाकपक्षको भ्रातराववभृथाप्लुतो मुनि ।
आशिषामनुपद समस्पृशद् दर्भपाटिततलेन
पाणिना।।३१॥
त न्यमन्त्रयत सम्भृतक्रतुथिल स मिथिला व्रजन्वशी।
राघवावपि निनाय बिभ्रतौ तद्धनु श्रवणज कुतूहलम् ॥ ३२॥
तै शिवेषु वसतिर्गताध्वभि सायमाश्रमतरुष्वगृह्यत।
येषु दीर्घतपस परिग्रहो वासवक्षणकलत्रता ययौ ॥३३॥
प्रत्यपद्यत चिराय यत्पुनश्चारु गौतमवधू शिलामयी।
स्व वपु स किल किल्बिर्षाच्छदा रामपादरजसामनुग्रह ॥३४॥
ध्वजाओं वाली राक्षमों की सेना खडी दिखलायी दी॥२६ ।। तब राम ने और सबको छोड़कर उन्हीं दो
राक्षसों को बाण मारे, जो उम मेना के मेनापति थे और यज्ञ मे घृणा करते थे। बडे-बडे सर्पो पर
आक्रमण करने वाला गाड क्या कभी जल के छोटे-छोटे मॉपों पर आक्रमण करता है ? ॥२७॥ दिव्य
अस्त्रों को चलाने मे राम का हाथ ऐसा मधा हुआ था कि उन्होंने तुरन्त अपने धनुष पर वायव्य अस्त्र
चढाया और पर्वत से भी बड़े ताडका के पुत्र मारीच को उम बाण मे इस तरह उठा दिया, जैमे कोई
सूखा पत्ता उडा दे।। २८ ।। सुबाहु नाम का दूमरा राक्षस अपनी माया से इधर-उधर घूम रहा था। उसे
राम ने अपने बाणों से टुकडे-टुकडे करके आश्रम के बाहर फेंक दिया, जिसे पक्षियों ने आपस में बॉटकर
खा लिया ॥ २९ ॥ यज्ञ करने वाले ऋषियों ने जब देखा कि थाडे ही समय मे राम ने सारे विघ्न दूर
कर दिये तो उन्होंने राम और लक्ष्मण के पराक्रम की भूरि-भूरि प्रशसा की और मौन धारण किये हुए
महामुनि विश्वामित्र ने विधिवत् अपना यज्ञ सम्पन्न कर लिया॥३०॥ यज्ञ ममाप्त हो जाने पर अवभृथ
स्नान करके महर्षि विश्वामित्र ने उन राम और लक्ष्मण को बहुत बड़ा आशीर्वाद दिया, जिनके बालो
की लटे प्रणाम करते समय हिल रही थी। कुशा मे छिली हुई अपनी टेली उनके सिर पर रखकर
ऋषि ने अपना स्नेह दिसलाया ॥३१ ।। उन्हीं दिनों मिथिलेश जाफ ने धनुषयज्ञ का आयोजन कर रखा
था। उममें उन्होने मुनियों को भी आमत्रित किया। धनुषयज्ञ की बात सुनकर दोनो राजकुमारों को बड़ा
कुतूहल हुआ। अतएव विश्वामित्रजी उन दोनो को माय लेकर मिथिलापुरी की ओर चल पडे ॥३२॥
वे कुछ ही दूर चले थे कि सॉझ हो गयो, जिममे वे उम आश्रम के सुन्दर वृक्षो के नीचे टिक गये,
जहाँ महान् तपस्वी गौतम की स्त्री अहल्या थोडी देर के लिए इन्द्र को पली बन गयी थी॥३३॥
राम के चरणों को धूल सब पापो को हरने वाली थी। इसलिए उसके छ्ते ही पति के शाप मे पत्थर
बनी हुई अहल्या को इतने दिनो बाद फिर वही पहले वाला सुन्दर शरीर प्राप्त हो गया॥३४॥

/1325 कर्म दुष्करम्। छ एकादश सर्ग छ ९९ राघवान्वितमुपस्थित मुनि त निशम्य जनको जनेश्वर । अर्थकामसहित सपर्यया देहबद्धमिव धर्ममभ्यगात्॥३५॥ तो विदेहनगरीनिवासिना गा गताविव दिव पुनर्वसू। मन्यते स्म पिबता विलोचने पक्षमपातमपि वञ्चना मन ॥३६॥ यूपवत्यवसिते क्रियाविधौ कालवित्कुशिकवशवर्धन । राममिष्वसनदर्शनोत्सुक मैथिलाय कथयाम्बभूव स ॥३७॥ तस्य वीक्ष्य ललित वपु शिशो पार्थिव प्रथितवशजन्मन । स्व विचिन्त्य च धनुर्दुरानम पीडितो दुहितृशुल्कसस्थया ॥३८॥ अब्रवीच भगवन्मतङ्गजैर्यबृद्धिरपि तत्र नाहमनुमन्तुमुत्सहे मोघवृत्ति कलभस्य चेष्टितम् ।।३९ ॥ हेपिता हि बहवो नरेश्वरास्तेन तात धनुषा धनुर्भूत । ज्यानिघातकठिनत्वचो भुजान्स्वान्विधूय धिगिति प्रतस्थिरे ॥४०॥ प्रत्युवाच तमृपिनिशम्यता सारतोऽयमथवा गिरा कृतम्। चाप एव भवतो भविष्यति व्यक्तशक्तिरनिर्गिराविव ॥४१॥ एवमाप्तवचनात् स पौरुष काकपक्षकधरेऽपि राघवे। श्रद्दधे त्रिदशगोपमात्रके दाहशक्तिमिव कृष्णवमनि ।। ४२ ॥ व्यादिदेश गणशोऽथ पार्श्वगान्कार्मुकाभिहरणाय मैथिल । तेजसस्य धनुष. प्रवृत्तये तोयदानिव सहस्रलोचन ॥४३॥ राजा जनक को जब यह समाचार मिला कि विश्वामित्रजी के माथ राम और लक्ष्मण भी आये हुए हैं, तब वे पूजा की सामग्री लेकर उनकी अगवानी करने चले। जनकजी को वे दोनो भाई ऐमे लगे, मानो मूर्तिमान् धर्म के माथ अर्थ और काम भी चले आये हो ॥३५ ।। वे दोनों राजकुमार ऐसे सुन्दर लग रहे थे, जैसे दो पुनर्वसु नक्षत्र पृथ्वी पर उतर आये हों। जनकपुर के निवामी तो ऐसे मगन होकर अपनी आँखों से उनका रूपामृत पी रहे थे कि पलकों का गिरना भी उन्हे बहुत अखर रहा था ||३६ ॥ धनुषयज्ञ को यज्ञसम्बन्धी सब क्रियाएँ जब ममाप्त हो गयीं, तब ठीक अवसर समझकर मुनि विश्वामित्र ने जनक से कहा कि राम भी वह धनुष देखना चाहते हैं ।। ३७॥ किन्तु जनक ने जब एक ओर प्रसिद्ध वश में उत्पन्न बालक राम का कोमल शरीर देखा और दूसरी ओर अपने उस धनुष पर दृष्टि डाली, जिसे बड़े-बडे वीर भी नहीं झुका सके थे, तब उन्हे इस बात का बडा पछतावा हुआ कि मैंने अपनी कन्या के विवाह के निमित यह धनुष तोडो की प्रतिज्ञा क्यों की॥३८॥ उन्होंने विश्वामित्रजी से कहा-भगवन् । बडे-बडे मतवाले गजराज जो काम नहीं कर सकते, उमे हाथी के बच्चे से कराना व्यर्थ की बात है। अतएव मेरा मन तो नहीं चाहता कि इनसे धनुष उठवाया जाय ।। ३९ ॥ इस धनुष को उठाने मे बड़े-बड़े धनुर्धारी राजा भी लजाकर रह गये और अपनी उन भुजाओं को धिक्कारते हुए चले गये, जिन पर धनुष की डोरी के बड़े-बड़े घटे पड़े हुए थे।॥ ४० ॥ यह सुनकर मुनि बोले- राजन् । इनकी शक्ति मैं आपको बतलाऊँगा, परन्तु कर्ते से क्या होता है। जैसे वज्र की शक्ति की परीक्षा पहाड पर होती है, वैसे ही इनकी शक्ति को परीक्षा उम धनुष पर ही हो लेने दी जाय ॥४१॥ मुनि के कथन से जनकजी को कुछ-कुछ विश्वास हो चला कि जैसे वीरबहूटी के बराबर छोटी-मी चिनगारी में भी जलाने की महती शक्ति छिपी रहती है, वैसे ही काक्पक्षधारी राम मे भी धनुष उठाने की शक्ति हो सकती है।॥ ४२ ॥ अतएव जनकजी ने उमी प्रकार अपने सेवकों को धनुष लाने की आज्ञा धनु । १०० क रघुवशे तत्प्रसुप्तभुजगेन्द्रभीषण वोक्ष्य दाशरथिराददे धनु । विद्रुतक्रतुमृगानुसारिण येन बाणमसृजद् वृषध्वज ॥४४॥ आततज्यमकरोत् स ससदा विस्मयस्तिमितनेत्रमीक्षित । शैलसारमपि नातियलत पुष्पचापमिव पेशल स्मर ॥४५॥ भज्यमानमतिमात्रकर्षणात् तेन वज्रपरुषस्वन भार्गवाय दृढभन्यवे पुन क्षत्रमुद्यमिव न्यवेदयत्॥४६॥ दृष्टसारमथ रुद्रकार्मुके वीर्यशुल्कमभिनन्द्य मैथिल । राघवाय तनयामयोनिजा सपिणी श्रियमिव न्यवेदयत्॥४७॥ मैथिल सपदि सत्यसङ्गरो राघवाय तनयामयोनिजाम्। सन्निधौ द्युतिमतस्तपोनिधेरग्निसाक्षिक इवातिसृष्टवान् ॥ ४॥ प्राहिणोच महित महाद्युति कोसलाधिपतये पुरोधसम्। भृत्यभावि दुहितु परिग्रहाद्दिश्यता कुलमिद निमेरिति ॥४९॥ अन्वियेष सदृशी स च स्नुषा प्राप चैनमनुकूलवाग्विज । सद्य एव सुकृता हि पच्यते कल्पवृक्षफलधर्मि काक्षितम् ॥५०॥ तस्य कल्पितपुरस्क्रियाविधे शुश्रुवान् वचनमग्रजन्मन | उच्चचाल बलभित्सखो वशी सैन्यरेणुमुपितार्कदीधिति ॥५१॥ आससाद मिथिला स वेष्टयन्पीडितोपवनपादपा बलै । प्रीतिरोधमसहिष्ट सा पुरी स्त्रीव कान्तपरिभोगमायतम्॥५२॥ दी, जैसे देवराज इन्द्र बादलो को अपना धनुष पक्ट करने की आज्ञा देते हैं।। ४३॥ तदनुसार धनु लाया गया। वह ऐसा दीखता था कि मानो कोई बड़ा भारी अजगर मोया हुआ हो। राम ने देखते-देखते उस शिवधनुष को उठा लिया, जिमे हाथो मे लेकर शङ्करजी ने मृग का रूप धरकर भागने वाले यज्ञदेवता के ऊपर बाण बरसाये थे।॥४४॥ यह देखार मभी सभामदो को बड़ा आश्चर्य हुआ कि राम ने इस पर्वत जैसे विशाल धनुष पर वैसी ही मरलता मे डोरी चढा दी, जमे कामदेव अपने फूलों के धनुष पर डोरी चढाता है ॥ ४५ ॥ तदनन्तर राम ने धनुष को इतनी जोर मे ताना नि वह वज्र के समान भयङ्कर शब्द करके कडकडाता हुआ टूट गया। ऐमा करके जैसे उमो महारोधी परशुराम को यह सूचना दे दी कि क्षत्रिय लोग अब फिर मिर उठाने लगे हैं।॥४६॥ जब राजा जाक ने देखा कि धनुष तोडकर राम ने अपना पराक्रम दिखला दिया है, तब उन्होंने उनका बड़ा आदर किया और पृथ्वी में उत्पन्न अपनी कन्या जानकी उमी प्रकार राम के हाथों सौंप दी, माना साक्षात् अपनी राज्यलक्ष्मी ही उन्हे दे डाली हो॥४७॥ अपनी प्रतिज्ञा मत्य करने वाले जनक ने विश्वामित्रजी को ही विवाह का साक्षी अग्नि समझ लिया और उन्हीं के आगे राम को सीता समर्पित कर दी॥४८॥ तब राजा जनक ने अपने पूज्य पुरोहित द्वारा दशरथजी के पास यह मन्देश भेजा कि मेरी पुत्री सीता को स्वीकार करके आप इम निमि-कुल पर वैसी ही कृपा कीजिये, जैसे अपने सेवकों पर कृपा करते हैं।। ४९ ।। उधर राजा दशरथ यह मोच ही रहे थे कि योग्य पतोहू मेरे घर में आये। इतने मे ही जनकजी के पुरोहित उनकी इच्छा पूर्ण होने का समाचार लेकर जा पहुंचे। ठीक ही है, पुण्यवानो की अभिलाषा कल्पवृक्ष के समान तत्काल फल देती है।। ५८ ॥ इन्द्र के मित्र और जितेन्द्रिय दशरथ ने जनक के पुरोहित का बड़ा सत्कार किया। अकी बाते सुनकर वे अपने माथ इतनी बड़ी मेना लेकर चले कि उममे उठी हुई धूल ने मूर्य को भी ढेंक दिया ॥ ५१ ।। वे ऐमे ठाट-बाट मे मिथिला पहुंचे कि मानो उमे घेरते हुए आये हो । मिथिला • एकादश सर्ग सो १०१ तो समेत्य समये स्थितावुभौ भूपती वरुणवासवोपमौ । कन्यकातनयकौतुकक्रिया स्वप्रभावसदृशी वितेनतु ॥५३॥ पार्थिवीमुदवहद् रघूहहो लक्ष्मणस्तदनुजामथोर्मिलाम्। यौ तयोरवरजौ वरोजसो तो कुशध्वजसुते सुमध्यमे ॥५४॥ ते चतुर्थसहितास्त्रयो बभु सूनवो नववधूपरिग्रहा । सामदानविधिभेदनिग्रहा सिद्धिमन्त इव तस्य भूपते ॥५५॥ ता नराधिपसुता नृपात्मजैस्ते च ताभिरगमन्कृतार्थताम् । सोऽभवद् वरवधूसमागम प्रत्ययप्रकृतियोगसन्निभ ॥५६॥ एवमातरतिरात्मसम्भवास्तान्निवेश्य चतुरोऽपि तत्र स । अध्वसु त्रिषु विसृष्टमैथिल स्वा पुरों दशरथो न्यवर्तत ॥५७॥ तस्य जातु मरुत प्रतीपगा वर्त्मसु ध्वजतरुप्रमाथिन । चिक्लिशु शतया वरूथिनोमुत्तटा इव नदीरया स्थलीम् ।।५८॥ लक्ष्यते तदनन्तर रविर्बद्धभीमपरिवेषमण्डल । वैनतेयमितस्य भोगिनो भोगवेष्टित इव च्युतो मणि ॥५९ ॥ श्येनपक्षपरिधूसरालका सान्ध्यमेघरुधिरावासस । अङ्गना इव रजस्वला दिशो नो बभूवुरवलोकनक्षमा || ६०॥ भास्करश्च दिशमध्युवास या ता श्रिता प्रतिभय ववासिरे। क्षत्रशोणितपितृक्रियोचित चोदयन्त्य इव भार्गव शिवा ॥६१ ॥ के उपवनों को तो उनकी सेना ने रौंद ही डाला। परन्तु इस प्रेम के घेरे को उम नगरी ने वैसे ही सह लिया, जैसे स्त्री अपने प्रियतम के कठोर मम्भोग को मह लेती है।॥५२॥ तदनन्तर वरण और इन्द्र के समान प्रतापी उन दोनों राजाओ ने मिलकर शास्त्रीय विधि से ऐश्वर्य के अनुरूप अपने-अपने पुत्रों और कन्याओं का विवाह सम्पन्न कर दिया ।। ५३ ।। राम का सीता मे और लक्ष्मण का सीता की छोटी बहन उर्मिला मे विवाह हुआ। जनकजी के छोटे भाई कुशध्वज की माण्डवी और श्रुतकीर्ति नाम की कन्याओं मे भरत और शत्रुघ्न का विवाह हो गया॥५४॥ वे चारों भाई उन नयी बहुओ के साथ ऐसे मुशोभित हुए, जैसे राजा दशरथ को साम, दाम, दण्ट और भेद- इन चारों उपायों की सिद्धियों मिल गयी हो ॥५५॥ उन चारों राजकुमारो को पार राजकन्याएँ और राजकन्याओं को पाकर वे राजकुमार निहाल हो गये। वरों और वधुओं का वह मिलन ऐमा अँचा कि जैसे शब्द के मूलरूप मे प्रत्यय जुड़ गये हो।।५६ ।। इस प्रकार महाराज दशरथ ने चारों बेटों का विवाह करके मार्ग मे तीन पडाव आगे पहुँच कर वहाँ से जनकजी को लौटा दिया और स्वय बडे पसन्न मन मे अयोध्या की ओर चल पडे।। ५७ ।। बढी हुई नदी की धारा जैसे आस-पास की भूमि को उनाड देता है, वैसे ही एक दिन मार्ग में सेना के ध्वजास्पी वृक्षों को झकझोर देने वाली वायु ने मारी सेना का बहुत क्लेश दिया ।। ५८ ॥ तदनन्तर सूर्य के चारो ओर एक बड़ा भारी मण्डल बन गया। वह ऐमा लगने लगा कि जेसे गरुड द्वारा मारा हुआ कोई सॉप अपने मिर मे गिरे हुए मणि के चारो ओर कुण्डला मारकर बैठा हुआ हो ॥ ५९॥ जैसे स्से और मैले बालों तथा रक्त मे लाल कपडो वाली रजस्वला स्त्री देखो मे अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार उम ममय वे चारों दिशाएँ भी आँखों को अच्छी नहीं लग रही था, जिनमे मटमैले बाजों के पख उड रहे थे और सन्ध्या के लाल बादल छाये हुए थे। ६०॥ महसा सूर्य की ओर मुख करके सियारिने रोने लगीं। जैसे वे क्षत्रियों के रक्त से अपने पिता का तर्पण करनेवाले परशुराम को पुकार रही हो ॥६१ ।।

१०२ के रघुवशे तत्प्रतीपपवनादि वैकृत प्रेक्ष्य शान्तिमधिकृत्य कृत्यवित्। अन्वयुक्त गुरुमीश्वर क्षिते स्वान्तमित्यलघयत्स तयथाम्॥३२॥ तेजस सपदि राशित्थित प्रादुरास किल वाहिनीमुखे। प्रमृज्य नयनानि सैनिकैर्लक्षणीयपुरुषाकृतिश्चिरात् ॥ ६३॥ पित्र्यमशमुपवीतलक्षण मातृक च धनुरूर्जित दधत् । य ससोम इव धर्मदीर्धाित सद्विजिह इव चन्दनद्रुम ॥६४॥ येन रोषपरुषात्मन पितु. शासने स्थिति भदोऽपि तस्थुषा। वेपमानजननीशिरश्छिदा प्रागजीयत घृणा ततो मही॥६५॥ अक्षबीजवलयेन निर्बभौ दक्षिणश्रवणसस्थितेन क्षत्रियान्तकरणकविशतेाजपूर्वगानामिवोहहन् त पितुर्वधभवेन मन्युना राजवशनिधनाय दीक्षितम्। बालसूनुरवलोक्य भार्गव स्वा दशा च विषसाद पार्थिव ॥६७॥ नाम राम इति तुल्यमात्मजे वर्तमानमहिते च दारुणे। हृद्यमस्य भयदायि चाभवद् रत्नजातमिव हारसर्पयो ॥६८॥ अयमीमति वादिन नृप सोऽनवेक्ष्य भरताग्रजो यत । क्षत्रकोपदहनार्चिष तत सन्दधे दृशमुदग्रतारकाम् ॥ ६९॥ तेन कार्मुकनिषक्तमुष्टिना राघवो विगतभी पुरोगत । अगुलीविवरचारिण शर कुर्वता निजगदे युयुत्सुना ॥ ७० ॥ विपरीत वायु आदि अशकुन देखकर उसकी शान्ति के लिए दशरथजी ने अपने गुरु से पूछा- "अब क्या करना चाहिए ?" गुरुजी ने कहा-"चिन्ता की कोई बात नहीं है। इसका फल अच्छा ही होगा।" यह मुनकर दशरथजी के मन को कुछ ढाढम बंधा ।। ६२ ।। उसी ममय महमा एक ऐमा प्रकाशपुञ्ज मेना के आगे उठता दिखलाई दिया, जिसे देखकर सब मैनिको की आँखें चौंधिया गयीं। जब उन्होंने आँखें मलकर देखा, तब वर प्रकाशपुञ्ज एक पुरुष के रूप मे परिवर्तित दीखा ।। ६३ ।। उम तेजस्वी पुरुष के शरीर पर ब्राह्मण पिता के अश का सूचक यज्ञोपवीत और कन्धे पर क्षत्रिय माता का अशसूचक धनुष लटका हुआ था। इस वेश मे वह ऐसा लगता था कि जैसे मूर्य के माथ चन्द्रमा हो या चन्दा के पेड मे सॉप लिपटे हो ।। ६४ ।। उन्होंने जब क्रोध मे क्टोरहृदय और उचित-अनुचित का विचार छोड देने वाले पिता की आज्ञा मानकर अपनी कॉपती हुई माता का मिर काट लिया था, उस समय उन्होंने पहले घृणा को जीता और फिर सम्पूर्ण पृथ्वी जीत ली॥६५॥ उनके दाहिने कान पर इकोस दाने की रुद्राक्ष की माला लटक रही थी। जैसे इकोम बार क्षत्रियों के विनाश की गिनती करने के लिए ही उन्होंने वह माला पहन ली हो। ६६ ।। दशरथजी ने जब उन परशुराम को देखा, जिन्होंने अपने पिता के मारे जाने पर कोध से क्षत्रियो का नाश करने की प्रतिज्ञा कर ली थी, तब उन्हें अपनी दशा देखकर बड़ी चिन्ता हुई। क्योंकि उनके पुत्र अभी निरे बच्चे ही थे।। ६७ ॥ उनके पुन राम और परशुराम दोनों में राम नाम विद्यमान था। इसलिए जैसे गले के हार और सर्प दोनों में रहने वाला मणि आनन्द भी देता है और भय भी, वैमे ही अपने पुष और परशुराम दोगों मे आये हुए राम नाम मे उन्हे भय भी हुआ और आनन्द भी ।। ६८ ॥ यद्यपि दशरथजी कहते ही रह गये कि आपके मत्कार के लिए यह अर्घ्य है, किन्तु परशुरामजी ने उधर ध्यान न देर क्षत्रियों को जलाने वाली अपनी टेढी नजर से राम को देखा ।।६९॥ युद्ध के लिए उद्यत और मुट्ठी में धनुष पकडकर उँगलियों मे बाण नवाते हुए परशुरामजी १०३ शम गत । छ एकादश सर्ग है क्षत्रजातमपकारवैरि मे तनिहत्य बहुश सुप्तसर्प इव दण्डघट्टनाद्रोपितोऽस्मि तव विक्रमश्रवात्॥७१ ।। मैथिलस्य धनुरन्यपार्थिवैस्त्व किलानमितपूर्वमक्षणो । तन्निशम्य भवता समर्थये वीर्यशृङ्गमिव भग्नमात्मन ॥७२॥ अन्यदा जगति राम इत्यय शब्द उच्चरित एव मामगात्। ब्रोडभावहति में स सम्प्रति व्यस्तवृत्तिरुदयोन्मुखे त्वयि ॥७३॥ बिभ्रत्तोऽस्त्रमचलेऽप्यकुण्ठित द्वौ रिपू मम मतो समागसौ। धेनुवत्सहरणाच्च हैहयस्त्व कीर्तिमपहर्तुमुद्यत ॥७४॥ क्षत्रियान्तकरणोऽपि विक्रमस्तेन मामवति नाजिते त्वयि। पावकस्य महिमा स गण्यते कक्षवज्ज्वलति सागरेऽपि य ॥५॥ विद्धि चातबलमोजसा हरेरैश्वर धनुरभाजि यत्त्वया । खातमूलमनिलो नदीरयै पातपत्यपि मृदुस्तरद्रुमम्॥७६॥ तन्मदीयमिदमायुध ज्यया सङ्गमय्य सशर विकृष्यताम् । तिष्ठतु प्रधनमेवमप्यह तुल्यबाहुतरसा जितस्त्वया ॥७७॥ कातरोऽसि यदि वोद्गतार्चिषा तर्जित परशुधारया मम। ज्यानिधातकठिनाङ्गुलितथा वध्यतामभययाचनाञ्जलि ।। ७८॥ ने अपने आगे निडर खडे राम मे कहा-॥७०॥ मेरे पिता का वध करके क्षत्रियों ने मुझमे शत्रुता मोल ले ली है। उन्हे बहुत बार मारकर मुझे कुछ शान्ति मिली थी। परन्तु जैसे डडे मे छेड़ देने पर सॉप फुफकार उठता है, वैसे ही तुम्हारे पराक्रम का हाल मुनकर मेरे शरीर में क्रोध की आग भडक उटी है ।। ७१ ॥ राजा जाफ के जिम धनुष को कोई राजा झुका भी नहीं सका था, उमो को तुमने तोड़ डाला है। यह सुनकर मैने यही समझा है कि आज तक जो मैं सबमे बढकर बलवान् समझा जाता था, वह मेरा यश आज नष्ट गया।।७२ ।। ममार मे पहले राम कहो मे लोग मुझे ही समयते थे, परन्तु ज्यों-ज्यों तुम उचे चढते चले जा रहे हो, त्यो-त्यों वह अर्थ तुम्हारे गाम के माथ लगता चला जा रहा है। यह देखकर मुझे लज्जा आने लगी है।।७३ ।। जिम परशुराम के अरब पहाडों से टकरा करके भी कुण्ठित नहीं होते, उसके दो ही शत्रु आज तक ममान अपराधी हुए है। उनमे मे पहला तो था सहस्रबाहु, जो मेरे पिता से कामधेनु का बछड़ा छीन ले गया था और दूसरे तुम हो, जो मेरी कीर्ति छीनने को उद्यत हो॥७४॥ अत क्षत्रियों को नष्ट करने वाला मेरा पराक्रम तब तक मुझे अच्छा नहीं लगेगा, जब तक मैं तुम्हे न जीत लूँ। क्योंकि आग का प्रताप तभी सराहनीय होता है, जब वह ममुद्र में भी वैसे ही भडककर जले, जैसे सूखी धाम के ढेर मे जलती है॥७५ ।। और फिर शिवजी के जिस धनुष को तोड़कर तुम इतरा रहे हो, उसको कठोरता तो भगवान विष्णु ने पहले ही हर ली थी, उसे तोडकर तुमने कोई वीरता नहीं की है। क्योकि जिम वृक्ष की जड नदी की प्रचण्ड धारा ने पहले ही खोखली कर दी हो, वह तो वायु के तनिक-मे झोंके मे ही ढह जाता है।।७६ ।। देसो राम युद्ध तो बाद में होगा, पहले तुम मेरे धनुष पर डोरी चढा तथा बाण रखकर इसे खींचो । यदि तुम इतना भी कर लोगे तो मैं ममझेंगा कि तुम मेरे ही ममार बलवान् हो। बम, मैं इतने मे ही हार मान लेंगा ।। ७७ ।। और यदि तुम मेरे फरमे को चमकती हुई धार को देखकर डर गये होओ तो अपने उन हाथो को जोड़कर मुझसे अभय को भीख माँगो, जिाकी उंगलियो मे धनुष की डोरी चढाने से व्यर्थ घटे पड़े हुए हैं॥७८ ॥ भयङ्कर वेश वाले परशुरामजी ने जब यह कहा तो राम ने हेमते-हँसते राघव , १०४ रघुवशे एवमुक्तवति भीमदर्शने भार्गवे स्मितविकम्पिताधर । तद्धतुर्ग्रहणमेव प्रत्यपद्यत समर्थमुत्तरम्॥७९॥ पूर्वजन्मधनुषा समागत सोऽतिमानलघुदर्शनोऽभवत्। केवलोऽपि सुभगो नवाम्बुद कि पुनस्त्रिदशचापलाञ्छित ॥८॥ तेन भूमिनिहितैककोटि तत्कार्मुक च बलिनाऽधिरोपितम्। निष्प्रभश्च रिपुरास भूभृता धूमशेष इव धूमकेतन ॥८१ ॥ तावुभावपि परस्परस्थिती वर्धमानपरिहीनतेजसौ। पश्यति स्म जनता दिनात्यये पार्वणो शशिदिवाकराविव ।। ८२॥ त कृपामृदुरवेक्ष्य भार्गव राघव स्खलितवीर्यमात्मनि। च सहितममोघमाशुग व्याजहार हरसूनुन्निभ ॥८३ ॥ न प्रहर्तुमलमस्मि निर्दय विप्र । इत्यभिभवत्यपि त्वयि । शस कि गतिमनेन पत्रिणा हन्मि लोकमुत ते मखार्जितम् ।। ८८ ॥ पत्युवाच तषिर्न तत्त्वतस्त्वा न वेद्मि पुरष पुरातनम् । गा गतस्य तव धाम वैष्णव कोपितो झसि मया दिदृक्षुणा ॥८५।। भस्मसात्कृतवत पितृद्विष पात्रसाच्च वसुधा ससागराम् । आहितो जयविपर्ययोऽपि मे श्लाघ्य एव परमेष्ठिना त्वया ।। ८६ ।। तद्गति मतिमता वरेप्सिता पुण्यतीर्थगमनाय रक्ष मे। पीडयिति न मा खिलीकृता स्वर्गपद्धतिरभोगलोलुपम् ॥ ८७ ॥ इस तरह वह धनुष हाथ में ले लिया, मानो परशुरामजी के वचनो का वही उचित उत्तर हो ।।७९ ।। जैसे ही राम ने वह अपने पिछले जन्म वाला धनुष हाथ में लिया, वेमे ही उनकी शोभा और भी बढ गयी। क्योकि एक तो नया बादल यो हो सुन्दर लगता है फिर यदि उसमे इन्द्र-धनुष भी उदित हो जाय, तब तो उसकी शोभा का कह्ना ही क्या है।। ८० || पराक्रमी राम ने उम धनुष की एक छोर पृथ्वी पर टेकार जैसे ही उस पर डोरी चढायी, वैसे ही क्षत्रियों के शत्रु परशुरामजी उस अग्नि के समान निस्तेज हो गये, जिसमे केवल धुओं भर शेष रह गया हो ।। ८१ ॥ आमने मामने खडे राम और परशुराम मे से एक का तेज बढा और दूसरे का घट गया। इस प्रकार वे दोनो ऐसे दीखो लगे, जैसे सन्ध्याकाली चन्द्रमा और सूर्य हो ॥८२॥ कार्तिस्य के समान तेजस्वी एव दयालु रमचन्द्रजी ने एक बार उन निस्तेज परशुरामजी को और उसके बाद धनुष पर चढे हुए अपने अचूक बाण को देखकर फिर बोले- ।। ८३ ।। यद्यपि आपने हमारा बहुत बड़ा अपमान निया है, परन्तु आप ब्राह्मण है, अतएव मैं निर्दयी होकर आपको मारूंगा नहीं। किन्तु यह तो बताइए कि अब दम बाण से मैं आपकी गति रोकूँ या आपके उन दिव्य लोकों को नष्ट कर दें, जो आपने यज्ञ कर-करके जीते हैं।। ८४|| परशुरामजी बाले-ऐसी बात नहीं है कि आपको देखते ही मैंने न पहचाना हो कि आप ही माक्षात् पुरातन पुरुष हैं, किन्तु मैंने यह जानने के लिए आपको कुपित क्यिा था कि दे, जाप विष्णु भगवान् का कितना तेज लेकर पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।। ८५ ॥ पिता के शत्रुओं को नष्ट करने ओर मागर तक फैली हुई पृथ्वी ब्राह्मणों को दान दो वाले मुझ परशुराम के लिए आप परम पुरुष के हाथो हारना भी बड़े महत्त्व की बात है ।। ८६ ॥ अतएव आप मेरा गति न गपिए, जिममे मैं पवित्र तीर्थो में आ जा सकूँ। मुझे भोग की इच्छा नहीं है। अतएव यदि स्वर्ग न भी मिले तो मुझे कुछ भी दु स नहीं होगा ।।८७ ।। यह सुना तो राम ने परशुरामजी का कहना मानकर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके वह बाण छोड दिया।

एकादश सर्ग १०५ प्रत्यपद्यत तथेति राघव प्राङ्मुखश्च विससर्ज सायकम्। भार्गवस्य सुकृतोऽपि सोऽभवत्स्वर्गमार्गपरिघो दुरत्यय ।।८८॥ राघवोऽपि चरणो तपोनिधे क्षम्यतामिति वदन्समस्पृशत् । निर्जितेषु तरसा तरस्विना शत्रुषु प्रणतिरेव कीर्तये ।। ८९॥ राजसत्त्वमवधूय मातृक पित्र्यमस्मि गमित शम यदा। नन्वनिन्दितफलो मम त्वया निग्रहोऽप्ययमनुग्रहीकृत ॥९०॥ साधयाम्यहमविघ्नमस्तु ते देवकार्यमुपपादयिष्यत । ऊचिवानिति वच सलक्ष्मण लक्ष्मणाग्रजमृपिस्तिरोदधे ।।९१॥ तस्मिन्गते विजयिन परिरभ्य राम स्नेहादमन्यत पिता पुनरेव जातम्। तस्याभवत्क्षणशुच परितोपलाम कक्षाग्निलचिततरोरिव वृष्टिपात ||९२ ।। अथ पथि गयित्वा क्लृप्तरम्योपकार्ये कतिचिदनिपाल शर्वरी शर्वकल्प । पुरविशदयोध्या मैथिलीदर्शनीना कुवलयितगवाक्षा लोचनैरङ्गनानाम् ॥१३॥ इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये सीता- विवाहवर्णन नामैकादश सर्ग ॥११॥ - यद्यपि परशुरामजी ने बहुत पुण्य रिये थे, तथापि वह ब्राण मदा के लिए परशुरामजी के द्वारा अर्जित स्वर्ग का मार्ग रोस्कर खड़ा हो गया ।। ८८ ॥ तदनन्तर राम ने परशुराम मे क्षमा मांगते हुए उनके श्रीचरणो का स्पर्श स्यिा। क्योंकि कोई भा पराप्रमा जब अपो बल मे शत्रु को जीत लेता है, तब वह यदि नम्रता भी दिखलाये तो उममी कीर्ति ही बढ़ती है ।। ८९ ।। परशुराम ने कहा—मुझे यह दण्ड देकर आपो मेरा बहुत बड़ा उपचार किया है। इसमे मेरा मबम बढा लाभ तो यह हुआ कि आपने क्षत्रिय माता ने प्राप्त मेरे रजोगुण को दूर करके मुने मेरे पिता का मतोगुण दे दिया है।९० ॥ अब मैं जाता हूँ। आप देवताओं का जो कार्य करने धरती पर आये हैं वह बिना विघ्न के पूरा हो। राम और लक्ष्मण में यह कहकर परशुरामजी तकाल अन्तर्धान हा गये ।। ९१ ।। दम प्रभार परशुराम के चले जाने पर विजी राम को दशरथजी ने गले में लगा लिया और वे स्नहमिक्त होकर यह ममझने लगे कि राम का दूसरा जन्म हुआ है। दम अल्पकालीन दुख के पश्चात् उन्ह ऐमा मतोष मिला, जैम जङ्गल की आग में झुन्मे हुए वृक्ष को वर्षा का जल मिल जाय ॥ २ ॥ तब शिव ने ममान राजा दशरथ ने बुछ राते तो उम मार्ग में ही बिताया, जहा उनके लिए मुन्दर डेरे बने हुए थे। तदनन्तर वे उम अयोध्या नगरी मे पहुंचे, जहाँ मीताजी को देखने के लिए उत्सुक नगर को मुन्दरी रित्रयों को ऑसे झरोखो मे क्मल जैमी दीख रही थी॥९३ ।। इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में सीताविवाह-वर्णन नामक ग्यारहवा सर्ग समाप्त ॥११॥ १४का० द्वादश सर्ग निर्विष्टविषयस्नेह स दशान्तमुपेयिवान् । आसीदासननिर्वाण प्रदीपार्जिरिवोपसि ॥१॥ त कर्णमूलमागत्य रामे श्रीय॑स्यतामिति। कैकेयीशङ्कयेवाह पलितच्छद्मना जरा ॥२॥ सा पोरान्पोरकान्तस्य रामस्याभ्युदयश्रुति । प्रत्येक हलादयाञ्चक्रे कुत्येवोद्यानपादपान् ॥ ३ ॥ तस्याभिषेकसम्भार कल्पित क्रूरनिश्चया। दूषयामास कैकेयो शोकोष्णै: पार्थिवाश्रुभि ॥ ४ ॥ सा किलाश्वासिता चण्डो भ; तत्सश्रुतौ वरौ । उद्ववामेन्द्रसिक्ता भूर्बिलमग्नाविवोरगौ॥ ५ ॥ तयोश्चतुर्दशैकेन राम प्रावाजयत्समा । द्वितीयेन सुतस्यैच्छवैधव्यैकफला श्रियम् ॥ ६ ॥ पिना दत्ता रुदनराम प्राडूमही प्रत्यपद्यत । पश्चाद्वनाय गच्छेति तदाज्ञा मुदितोऽग्रहीत्॥ ७ ॥ दधतो मङ्गलक्षौमे वसानस्य च वल्कले । ददृशुर्विस्मितास्तस्य मुखराग सम जना ॥ ८ ॥ स सीतालक्ष्मणसख सत्याद्गुरुमलोपयन् । विवेश दण्डकारण्य प्रत्येक च सता मन ॥ ९ ॥ राजाऽपि तद्वियोगात स्मृत्वा शाप स्वकर्मजम् । शरीरत्यागमात्रेण शुद्धिलाभममन्यत ॥१०॥ विप्रोषितकुमार यदाज्यमस्तमितेश्वरम् । रन्ध्रान्वेषणदक्षाणा द्विषामामिषता ययौ॥११॥ अथानाथा प्रकृतयो मातृबन्धुनिवासिनम् । मौलैरानाययामासुर्भरत स्तम्भिताश्रुभि ॥१२॥ जब राजा दशरथ ने सब मुख भोग लिये और बूढ़े हो चले, तब उनकी दशा प्रात काल के उम दीपक जैसी हो गयी, जिसका तेल चुक गया हो और वह बुझने ही वाला हो ॥ १ ॥ उनकी कनपटी के पामवाले बाल पक गये थे, जिसमे ऐमा प्रतीत होता था कि मानो बुढापा कैकेयी से मशक होकर राजा के कान कह रह था कि अब राम को राज्य मौंप दीजिए॥२॥ जैसे पानी की गूल से सिचार पूरे उद्यान के वृक्ष हरे-भरे हो जाते हैं, वैसे ही लोकप्रिय राम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर अयोध्या का प्रत्येक निवासी फूला नहीं ममाया ॥३॥ किन्तु निष्ठुर कैकेयी ने ऐमा चक्र रचा कि राज्याभिषेक का सारा उत्माह शोकमन्तप्त राजा दशरथ के आसुओ मे बह गया ॥४॥ उस कठोर स्वभाववाली कैकेयी को जब राजा दशरथ ने बहुत समझाया, तब उसने वे दो वर माँगे, जिनके लिए राजा दशरथ पहले से ही वचन दे चुके थे। वे दोनों तर ऐसे ही थे, जैसे वर्षा मे भीगी हुई पृथ्वी के छेदो मे से महसा दो मॉप निकल आये हों॥५॥ उनमे मे कैकेयी ने एक वर तो यह माँगा कि चौदह वर्ष के लिए राम वन को चले जायें। दूसरा यह कि मेरे बेटे भरत को राज्य मिले। किन्तु ये वर मांगने का एकमात्र फल यही हुआ कि कैकेयी विधवा हो गयी॥ ६॥ दशरथजी राम को जब राजगद्दी दे रहे थे, तब राम ने आँखो मे ऑम भरके उसे स्वीकार किया था, किन्तु जब उनमे कहा गया कि 'वन चले जाओ', तब उन्होंने इस आज्ञा को हॅमते-हॅमते अगीकार कर लिया ॥७॥ यह देखकर लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि राम के मुँह का भाव राज्याभिषेक के रेशमी वस्त्र पहनते समय जैसे था, ठीक वैसा ही भाव बन जाने के लिए पेड़ की छाल के वस्त्र पहनते समय भी था।॥८॥ अपने पिता की बात मत्य करने के लिए वे सीता और लक्ष्मण के माथ केवल दण्डक वन मे ही नहीं, बल्कि अपने इस शुभ व्यवहार से सज्जनों के मन मे भी पैठ गये॥९॥ उनके वियोग में राजा दशरथ को बड़ा दुख हुआ। उमो समय उन्हें श्रवण के पिता का शाप स्मरण हो आया और उन्होंने ममझ लिया कि अब प्राण देकर ही मेरी आत्मा की शुद्धि होगी॥१०॥ उनके शत्रु तो ऐमे अवमर की ताक मे थे ही। जब उन्होने देखा कि अवधेश स्वर्ग चले और राजकुमार भी राज्य छोडकर चल दिये तो उन्होने झट अयोध्या पर आक्रमण करने का निश्चय कर लिया ।।११। तब अयोध्या की अनाथ प्रजा ने उन कुल-मत्रियों को भेजकर भरत द्वादश सर्ग १०७ श्रुत्वा तथाविध मृत्यु कैकेयोतनय पितु । मातुर्न केवल स्वस्या श्रियोऽप्यासीत्पराङ्मुख ॥ ससैन्यश्चान्वगादाम दर्शितानाधमालये । तस्य पश्यन्ससौमित्रेदश्रुर्वसतिद्रुमान् ।।१४।। चित्रकूटवनस्थ च कथितस्वर्गीतर्गुरो । लक्ष्म्या निमन्त्रयाञ्चक्रे तमच्छिष्टसम्पदा ॥१५॥ स हि प्रथमजे तस्मिन्नकृतश्रीपरिग्रहे । परिवेत्तारमात्मान मेने स्वीकरणाद्व ॥१६॥ तमशक्यमपाक्रष्टु निदेशात्स्वर्गिण पितु । ययाचे पादुके पश्चात्कर्तु राज्याधिदेवते॥१७॥ सविसृष्टस्तथेत्युक्त्वाधात्रा नैवाविशत्पुरीम्। नन्दिग्रामगतस्तस्य राज्य न्यासमिवाभुनक्॥१८॥ दृढभक्तिरिति ज्येष्ठे राज्यतृष्णापराङ्मुख । मातु पापस्य भरत प्रायश्चितमिवाकरोत् ॥१९॥ रामोऽपि सह वैदेह्या वने वन्येन वर्तयन् । चचार सानुज शान्तो वृद्धेष्वाकुव्रत युवा ॥२०॥ प्रभावस्तम्भितच्छायमाश्रित स वनस्पतिम् । कदाचिदड़े सीताया शिश्ये किश्चिदिव श्रमात ॥ ऐन्द्रि किल नखैस्तस्या विददार स्तनौ द्विज । प्रियोपभोगचिहेषु पौरोभाग्यमिवाचरन् ॥२२॥ तस्मिन्नास्थविधीकास्त्र रामो रामावबोधित । आत्मान मुमुचे तस्मादेकनेत्रव्ययेन स ॥२३॥ रामस्त्वासनदेशत्वादरतागमन पुन । आशङ्कयोत्सुकसारङ्गा चित्रकूटस्थली जही॥२४॥ को उनके ननिहाल से बुलवाया, जिन्होंने अपने आँसू रोक रखे थे।। १२ ।। भरतजी को जन्न अपने पिता की मृत्यु का ममाचार मिला, तब वे केवल अपनी माँ मे ही नहीं, बल्कि अयोध्या को राजलक्ष्मी तक से उदासीन हो गये॥१३॥ अपने माय मेना लेकर वे राम को ट्रैढने निकल पड़े। मार्ग के आश्रमवामियो ने जब उन्हें वे वृक्ष दिसलाये, जिनके नीचे राम और लक्ष्मण जाते ममय टिके थे, तब उनकी आँखों में ऑसू उमड़ पड़े।।१४।। उन दिनों राम चित्रकूट के वन मे रहते थे। वहाँ पहुचकर भरतजी ने उन्हें दशरथजी की मृत्यु का ममाचार मुनाया और कहा कि अयोध्या की राजलक्ष्मी का मैंने स्पर्श भी नहीं किया है। अब आप ही चलकर उभे सम्हालिए।१५।। क्योकि बडे भाई ने जिम राज्य को स्वीकार नहीं किया, उसे लेना मैं उतना ही बड़ा पाप ममझता है, जितना कि बड़े भाई के अविवाहित रहने पर छोटे भाई का अपना विवाह कर लेना ॥ १६॥ चिन्तु राम अपने स्वर्गीय पिता की आज्ञा से तनिक भी विचलित नहीं हुए। तब भरतजी ने उनसे प्रार्थना की कि आप मुझे अपनी खटाऊँ दे दीजिए, जिन्हें मैं अयोध्या का अधिदेवता बनाकर राज्य का काम चलागा ॥१७॥ तब राम ने अपनी खड़ाऊँ दे दी। उमै लेकर भरतजी लौट पड़े, परन्तु वे अयोध्या नहीं आये। उन्होने नन्दिग्राम मे डेरा डाला और वहीं मे अयोध्या के राज्य की उमी प्रकार रक्षा की, जैसे अपने भाई को धरोहर मम्हाल रहे हो॥१८॥ इस प्रकार अपने बड़े भाई में भक्ति करके और राजपद ठुकराकर भरतजी ने अपनी माता के पाप का प्रायश्चित्त कर लिया।॥ १९॥ उधर राम भी मीता तथा लक्ष्मण क माथ कन्द-मूल साते हुए युवावस्था में ही व्रत को करने लगे, जिमे इक्ष्वाकुवशवाले राजा बुढ़ापे मे किया करते थे॥२०॥ एक दिन थके हुए राम सीताजी की गोद में मिर रखकर एक ऐसे वृक्ष के नांचे लेटे थे, जिमको छाया को उन्होंने अपने अलौकिक प्रभाव मे बांध दिया था॥२१॥ उमी ममय इद्र का पुत्र जयन्त कौवा बाकर आया और उमने अपने नखों से मीताजी के स्तनों पर चोंच मारी, जैमे वह मीताजी के स्तनों पर राम के हाथ मे निर्मित नखक्षतों को प्रकट करके अपनी यह आदत बतला रहा हो कि मेरा काम दूसरों का दोष दूँढना ही है॥२२॥ तब तुरन्त मीताजी ने राम को जगाया, उमी ममय राम ने उम पर मीक का एक बाण छोड़ा। उमसे बचने के लिए उम कौवे ने इधर-उधर बहुत चक्कर काटा, परन्तु जब तक उसने अपनी एक आँख नहीं दे दी तब तक वह विपत्ति मे नहीं छूटा ॥ २३ ॥ थोडे ही दिन बाद राम ने चित्रकूट का वह आश्रम छोड दिया, जहाँ के हरिण राम से इतने रिल-मिल गये थे कि दिन-रात उन्हें ही देखा करते थे। राम ने इस डर से चित्रकूट छोटा था कि अयोध्या पास में ही है, कही ऐमा न १०८ के रघुवशे प्रययावातिथेयेषु वसन् ऋषिकुलेषु स । दक्षिणा दिशमृक्षेषु वार्षिकेष्विव भास्कर ॥२५॥ बभी तमनुगन्छन्ती विदेहाधिपते सुता । प्रतिषिद्धाऽपि कैकेय्या लक्ष्मीरिव गुणोन्मुखी ॥२६॥ अनसूयाऽतिसृष्टेन पुण्यगन्धेन काननम् । सा चकाराङ्गरागेण पुष्पोर्चालतषट्पदम् ॥२७॥ सन्ध्याकपिशस्तस्य विराधो नाम राक्षस । अतिष्ठन्मार्गमावृत्य रामस्येन्दोरिव ग्रह ॥२८॥ स जहार तयोर्मध्ये मैथिली लोकशोषण । नभोनभस्ययोवृष्टिमवग्रह इवान्तरे ॥ २९॥ त विनिष्पिष्य काकुत्स्थौ पुरा दूषयति स्थलीम् । गन्धेनाशुचिना चेति वसुधाया निचख्नतु ॥ पञ्चवटधा ततो राम शासनात्कुम्भजन्मन । अनपोढस्थितिस्तस्थौ विन्ध्याद्रि प्रकृताविव ॥ रावणावरजा तत्र राघव मदनातुरा । अभिपेदे निदाघार्ता व्यालीव मलयद्रुमम् ॥३२॥ सा सीतासन्निधावेव त वने कथितान्वया । अत्यारढो हि नारीणामकालज्ञो मनोभव ॥३३॥ कलत्रवानह बाले । कनीयास भजस्व मे । इति रामो वृषस्यन्तीं वृषस्कन्ध शशास ताम् ॥ ३४॥ ज्येष्ठाभिगमनात्पूर्व तेनाप्यनभिनन्दिताम् । साऽभूद्रामाश्रया भूयो नदीवोभयकूलभाक् ॥ ३५।। सरम्भ मैथिलीहास क्षणसौम्या निनाय ताम्। निवातस्तिमिता वेला चन्द्रोदय इवोदधे ॥३६॥ फलमस्योपहासस्य सद्य प्राप्स्यसि पश्य माम् । मृग्या परिभवो व्याघ्रयामित्यवेहि त्वया कृतम्॥ हो कि भरत फिर यहाँ आ पहुँचे ।। २४ ।। जैसे वर्षा के दम नक्षत्रो मे ठहाता हुआ मूर्य दक्षिण को धूम जाता है, वैसे ही अतिथि-मत्कार करनेवाले ऋषियो के आश्रमों में टिकते हुए राम भी वहां से दक्षिण दिशा की ओर मुड पडे ।। २५ ।। यद्यपि राम को कैकेयी ने राजलक्ष्मी से हटा दिया था, तथापि उनके पीछे-पोछे चलनेवाली सीता ऐमी जान पडती थीं कि जैसे गुणो के पीछे चलनेवाली माक्षात् लक्ष्मी ही चल रही हो। २६ ।। जब वे अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचे, तब उनकी पत्नी अनसूया ने सीताजी के शरीर मे ऐसा सुगन्धित अङ्गराग लगाया कि उसकी पवित्र मुगन्ध पाकर भौरे भी जगती फलो मे उट-उइकर उधर ही दौड आये ॥२७॥ जैसे राहु चन्द्रमा का मार्ग रोक लेता है, वैसे ही सन्ध्या के बादल के समान लाल रगवाला विराध राक्षम एकाएक राम का मार्ग रोककर खड़ा हो गया ।। २८ ।। जैसे कोई सोटा ग्रह सावन और भादों महीनों की वर्षा ले बीतता है, वैसे ही उम राक्षस ने और लक्ष्मण के बीच से मीताजी का अपहरण कर लिया ।। २९ ॥ तब राम-लक्ष्मण ने उसे तुरन्त मार डाला और यह मोचार उमे पृथ्वी मे गाड दिया कि कहीं इसके शरीर को दुर्गान्ध इस प्रदेशभर मे न फैल जाय ।। ३० ।। अगस्त्यजी की आज्ञा मे जैसे विन्ध्याचल अपनी मर्यादा में रह गया था, वैसे ही राम भी मर्यादापूर्वक पञ्चवटी में रहने लगे।।३१।। कोई नागिन जैसे धूप से घबराकर चन्दन के पेड़ के पास पहुँच जाय वैमे ही काम मे पीडित रावण की छोटी बहन शूर्पणखा एम दिन राम के पास जा पहुँची ।। ३२ ।। उसने पहले तो अपने कुल का परिचय दिया, फिर मीताजी के मामने ही वह राम से कहने लगी कि 'मैं तुम्हें अपना पति मानती हूँ।' क्योंकि जब स्त्रियाँ बहुत अधिक कामामक्त हो जाती हैं, तब उन्हें समय का ध्यान नहीं रहता कि कब क्या करना चाहिए॥३३॥ कामामक्ता शूर्पणसा की बाते मुनकर माड के जैसे ऊँचे कन्धोंवाले राम बोले-बाले। मैं विवाहित हूँ, तुम मेरे छोटे भाई मे मिलो॥३४॥ तब वह लक्ष्मण के पास पहुंची। लक्ष्मण ने कहा-तृ पहले मेरे बड़े भाई के पाम विवाह की इच्छा मे जा चुकी है। अत तू मेरी माता के समान है। मैं तुझमे विवाह नहीं कर सकता। यह सुनकर वह फिर राम के पाम लौटी। इस प्रकार राम और लक्ष्मण के पाम आती-जाती हुई शूर्पणखा उस नदी के जैमी हो गयी, जो बारी-बारी में अपने दोनों तटों को छूती हुई बह रही हो ॥३५ ।। वायु के रुके रहों से शान्त समुद्र का जल जैने चन्द्रमा के निकलने पर हिलरे लेने लगता है, वैसे ही मीताजी को हुमते हुए देसकर क्षणभर के लिए मुन्दर रूप धारण करनेवाली कुरुपा शूर्पणसा एकदम निगड गयो।।३६ ॥ वह बोली-'इधर देखो। तुम्हे दम हॅमी का फल बहुत शीघ्र मिलेगा। यह समझ लो राम द्वादश सर्ग १०९ इत्युक्त्वा मैथिली भर्तुरः निविशती भयात् । स्प शूर्पणखा नाम्न सदृश प्रत्यपद्यत ॥३८॥ लक्ष्मण प्रथम श्रुत्वा कोकिलाम वादिनीम् । शिवाघोरस्वना पश्चाबुबुधे विकृतेति ताम् ।। पर्णशालामय क्षिप्र विकृष्टासि प्रविश्य स । वैरुप्यपौनरुक्त्येन भीषणा तामयोजयत् ॥ ४०॥ सा वक्रनखधारिण्या वेणुकर्कशपर्वया । अकुशाकारयाऽगुल्या तावतर्जयदम्बरे ।। ४१ ॥ प्राप्य चाशु जनस्थान खरादिभ्यस्तथाविधम् । रामोपक्रममाचख्यौ रक्ष परिभव नवम् ।। ४२ ॥ मुखावयवलूना ता नैर्ऋता यत्पुरो दधु । रामाभिधायिना तेषा तदेवाभूदमङ्गलम्।। ४३॥ उदायुधानापततस्तान्दृतान्प्रेक्ष्य राघव । निदधे विजयाशसा चापे सोता च लक्ष्मणे ॥४४॥ एको दाशरथि काम यातुधाना सहस्रश 1 ते तु यावन्त एवाजी तावाश्च ददृशे स ते ॥४५॥ असञ्जनेन काकुत्स्थ प्रयुक्तमथ दूषणम् । न चक्षमे शुभाचार स दूषणमिवात्मन ॥४६॥ त शरै प्रतिजगाह खरत्रिशिरसौ च स । क्रमशस्ते पुनस्तस्य चापात्सममिवोद्ययु ॥४७॥ तैस्त्रयाणा शितैर्बाणैर्यथापूर्वविशुद्धिभि । आयुर्वेहातिगै पोत रुधिर तु पतत्त्रिभि ॥४८॥ तस्मिन्रामशरोत्कृत्ते बले महति रक्षसाम् । उत्थित ददृशेऽन्यच्च कबन्धेभ्यो न किञ्चन ।। ४९ ।। सा बाणवर्षिण राम योधयित्वा सुरद्विषाम् । अप्रबोधाय सुष्वाप गृध्रच्छाये वरथिनी।।५०॥ कि तुमने वैसे ही मेरा अपमान क्यिा है, जैसे कोई हरिणा मिमी बाघिन का अपमान करें'।। ३७ ।। यह सुनते ही सीताजी डर के मारे राम के पीछे जा छिपी और शूर्पणखा ने अपने नाम के अनुमार मूप के समान बड़े-बड़े नखोंवाला अपना विकराल रूप दिखलाया ॥ ३८ ॥ लक्ष्मण ने जब देखा कि अभी तो कोयल के समान मधुर बोलो बोल रही थी और अब मियाग्नि मदृश हुऑ-हुओं करने लगी, तब समझ गये कि यह कोई कपटी स्त्री है॥३९॥ यह समझते ही वे अपनी कुटिया मे गये और वहाँ मे तलवार लाकर शूर्पणखा के नाम -कान काट लिये। नाक-कान कट जाने मे वह और भी कुरुप दोखने लगी।। ४० ।। इस प्रकार नफ्टी होकर वह आकाश मे उडी । वहाँ मे अकुश जैसे टेढे नखो और बॉम के से भद्दे पोरोंवाली अपनी उँगलियाँ चमया-चमकाकर वह राम-लक्ष्मण को धमकाने लगी॥४१॥ तत्काल वहाँ मे चलकर वह जनस्थान में जा पहुंची और उमो खर आदि राक्षसों को यह कहकर उभाडा कि आज पहली बार राम ने इस तरह राक्षमो को अपमानित किया है।। ४२ ।। तदनन्तर आगे-आगे नकटी शूर्पणखा और उसके पीछे-पीछे वे राक्षम राम मे लदो के लिए चले। इस प्रकार उम नकटो को आगे करके ही उन लोगों ने अपना सगुन बिगाड लिया॥४३॥ जब राम ने दूर से देखा कि हाथ मे शस्त्र लिये घमडी राक्षम आगे बढ़े चले आ रहे हैं तो उन्हें विश्वाम हो गया कि इन्हे तो हम स्वय अपने धनुष मे ही जीत लेगे। अतएव उन्होने मीता की रक्षा का भार लक्ष्मण को सौंप दिया ॥४४॥ यद्यपि राम अकेले और राक्षस हजारों थे, परन्तु राम ऐसे लट रहे थे कि वहाँ जितने राक्षम थे, उन्हे उतने ही राम दीख रहे थे॥४५॥ जैसे सदाचारी राम अपने ऊपर नीच पुरुषो द्वारा लगाया हुआ दूषण नहीं सह मकते थे, वैसे ही वे युद्ध मे दूषण राम का आगमन भा नहीं मर सके । ४६ ।। उन्होने दूषण, ग्यर और त्रिशिरा पर एक-एक करके बाण चलाये, किन्तु अत्यन्त शाघ्रता मे चलये हुए वे बाण ऐमे जान पड़ते थे कि मानों वे एक माथ धनुष से छूटे हुए हो॥४७॥ राम के वे बाण उनका शरीर छेदकर इतने वेग मे बाहर निकल गये कि उनम रक्त भी नहा लग मया । क्योकि वाण तो उनकी आयु पीने के लिये गये थे, उनका रक्त तो पशियो ने पिया ।। ४८ ॥ उन राम ने अपने बाणों मे राक्षमा की पूरी मेना को इस प्रकार काट डाला कि युद्धभूमि मे राक्षमो के धड़ों के मिवार कुछ नहीं दासता था॥९॥ इस प्रकार बाण बरमानेवाले राम से लडकर राक्षमो को वह मेना गिद्धों के पसी की छाया मे सदा .

११० के रघुवशे के राघवास्त्रविदीर्णाना रावण प्रति रक्षसाम् । तेषा शूर्पणखैवैका दुष्प्रवृत्तिहराऽभवत् ॥५१॥ निग्रहात्स्वसुराप्ताना वधाच्च धनदानुज । रामेण निहित मेने पद दशसु मूर्धसु ॥५२॥ रक्षसा मृगरूपेण वश्चयित्वा स राघवौ । जहार सीता पक्षीन्द्रप्रयासक्षणविनित ॥५३॥ तो सीतान्वेषिणो गृध्र लूनपक्षमपश्यताम् । प्राणैर्दशरथप्रीतेरनृण कण्ठवर्तिभि ॥५४॥ स रावणहृता ताभ्या वचसाऽऽचष्ट मैथिलीम् । आत्मन सुमहत्कर्म व्रणैरावेद्य सस्थित ॥५५॥ तयोस्तस्मिन्नवीभूतपितृव्यापत्तिशोकयो । पितरोवाग्निसस्कारात्परा ववृतिरे क्रिया ॥५६॥ वनिधूर्तशापस्य कबन्धस्योपदेशत । मुमूर्च्छ सख्य रामस्य समानव्यसने हरी ॥५७॥ स हत्वा वालिन वीरस्तत्पदे चिरकाक्षिते । धातो स्थान इवादेश सुग्रीव सन्न्यवेशयत् ॥५८॥ इतस्ततश्च वैदेहीमन्वेष्टु भर्तृचोदिता । कपयश्चेरुरातस्य रामस्येव मनोरथा ॥५९॥ प्रवृत्तावुपलब्धाया तस्या सम्पातिदर्शनात्। मारुति सागर तीर्ण ससारमिव निर्मम ॥६॥ दृष्टा विचिन्वता तेन लङ्काया राक्षसीवृता । जानको विषवल्लीभि परीतेव महौषधि ॥६१ ॥ तस्यै भतुरभिज्ञानमगुलीय ददौ कपि । प्रत्युद्गतमिवानुष्णैस्तदानन्दाश्रुबिन्दुभि ।।२।। निर्वाप्य प्रियसन्देशै सीतामक्षवधोद्धत । स ददाह पुरी लङ्का क्षणसोढारिनिग्रह ॥६३॥ के लिए मो गयी।५० ।। राम के अस्त्र में मारे हुए उन राक्षमों की मृत्यु का समाचार रावण के पास पहुँचाने के लिए अकेली शूर्पणखा ही बाकी बची ॥५१ ।। अपनी बहन का अपमान और खर-दूषण आदि अपने मगे-सबन्धियों का वध रावण को इतना अपमानजनक जान पड़ा कि जैसे राम ने उसके दसों सिरो पर एक साथ पैर रख दिया हो ॥५२॥ तब उमने मारीच को मायामृग बनाया और राम-लक्ष्मण को धोखा देते हुए सीताजी को चुराकर लड्डा में ले गया। मार्ग में गृद्धराज जटायु कुछ क्षण उससे तड़ा भी, परन्तु वह कुछ नहीं कर सका ।। ५३ ।। अब राम और लक्ष्मण सीता को ढूँढने चले। मार्ग मे उन्होंने जटायु को देखा। उसके पख कटे हुए थे और प्राण कण्ठ तक आ गये थे, परन्तु उसने मीता को चुरानेवाले रावण से लड़कर अपने मित्र दशरथ का ऋण चुका दिया था॥५४॥ उसने राम-लक्ष्मण से कहा कि मीताजी को रावण चुरा ले गया है। बेचारे जटायु के घावों को देखकर ही यह स्पष्ट हो गया कि वह रावण मे कितना लड़ा था॥५५॥ केवल इतना कहकर ही जटायु मर गया। उसके मरने से राम-लक्ष्मण को उतना ही शोक हुआ, जितना अपने पिता के मरने पर हुआ था। पिता के ही सदृश विधिवत् दाहमस्कार करके उन्होंने उसका श्राद्ध आदि भी किया ।।५६ ।। वहाँ से आगे चलने पर उन्हे कबन्ध मिला, जो किमी ऋषि के शाप से राक्षम हो गया था। राम ने उसकी भुजाएँ काट डाली, जिससे शापमुक्त होकर वह फिर देवता बन गया। उसने प्रमन्न होकर मुग्रीव का पता बतलाया। उस मुगोव के राज्य और स्त्री को उसके भाई वाली ने छीन लिया था। सो उमने स्त्री मे बिछुड़े हुए राम से शीघ्र मित्रता कर ली ।। ५७ ।। तन्त्र पराक्रमी राम ने वाली को मारकर उसके सिंहासन पर सुग्रीव को वैसे ही बैठा दिया, जैसे कोई वैयाकरण लिट्-लुट् आदि लकारों मे अस् धातु के बदले भू आदि धातुओं का मनिवेश कर दे।। ५८ ।। मुग्रीव ने वानरों को आज्ञा दी कि 'जाओ मीताजी का पता लगाओ'। जैसे विरही राम का मन मीताजी की खोज मे भटकता था, वैसे ही वानर भी सर्वत्र धूम-घूमकर सीताजी की खोज करने लगे॥५९।। मार्ग मे जटायु के भाई मम्पाती मे वे मिले। उसने कहा कि समुद्रपार लङ्काद्वीप का राजा रावण सीताजी को चुरा ले गया है। यह मुनकर हतुमान्जी वैसे ही समुद्र को लॉघ गये, जैसे निर्मोही पुरुष ससार-सागर को पार कर लेता है।। ६० ।। लड्डा मे पहुँचकर दूंढते-ढूँढते उन्होंने एक स्थान पर सीताजी को देखा। चारों ओर राक्षसियों में घिरी हुई वे ऐसी दीख रही थी, जैसे विषबेलि के बीच मे सजीवनी बूटी जगमगा रही हो ॥६१ ।। उनके पास जाकर हनुमानजी ने राम की अगूठी दी। मीताजी ने उमका स्वागत उमडे हुए आनन्द के ठढे ऑमुओं मे किया ॥६२॥ पहले तो हनुमानजी । ॐ द्वादश सर्ग १११ प्रत्यभिज्ञानरत्न च रामायादर्शयत्कृती । हृदय स्वयमायात वैदेह्या इव मूर्तिमत् ॥ ६४ ॥ स प्राप हृदयन्यस्तमणिस्पर्शनिमीलित । अपयोधरससर्गा प्रियालिङ्गननिर्वतिम्॥६५॥ श्रुत्वा राम प्रियोदन्त मेने तत्सङ्गमोत्सुक । महार्णवपरिक्षेप लड़ाया परिखालधुम् ।। ६६ ॥ स प्रतस्थेऽरिनाशाय हरिसैन्यैरनुद्रुत । न केवल भुव पृष्ठे व्योम्नि सम्बाधवमभि ॥६७॥ निविष्टमुदधे कूले त प्रपेदे विभीषण । स्नेहाद्राक्षसलक्ष्म्येव बुद्धिमादिश्य चोदित ॥६८॥ तस्मै निशाचरेश्वर्य प्रतिशुश्राव राघव । काले खलु समारब्धा फल बध्नन्ति नीतय ॥ ६९॥ स सेतु बन्धयामास प्लवगैलवणाम्भसि । रसातलादिवोन्मग्न शेष स्वप्नाय शाणि ॥ ७० ॥ तेनोत्तीर्य पथा लड़ा रोधयामास पिङ्गलै । द्वितीय हेमप्राकार कुद्भिरिव वानरै ॥७१॥ रण प्रववृते तत्र भीम प्लवगरक्षसाम् । दिग्विजृम्भितकाकुत्स्थपौलस्त्यजयघोषण ॥७२॥ पादपाविद्धपरिघ शिलानिष्पिष्ट मुद्गर । अतिशस्त्रनखन्यास शैलरुग्णमतङ्गज ॥७३॥ अथ रामशिरश्छेददर्शनोद्धान्तचेतनाम् । सीता मायेति शसन्ती त्रिजटा समजीवयत् ।।७४ ।। काम जीवति मे नाया इति सा विजहो शुचम्। प्राड्नत्वा सत्यमस्यान्त जीविताऽस्मोति ललिता।। ने रामचन्द्रजी का प्यारभरा सन्देश मुनाकर मीताजी को ढाडम बैंधाया। फिर रावण के पुत्र अक्षकुमार को मार कर तथा थोड़ी देर के लिए शत्रुओं के हाथ बन्दी बनकर उन्होंने लड़ा में आग लगाकर उसे जला डाला ।। ६३ ।। फिर पहचान के लिए मीताजी मे चूडामणि लेकर वे राम के पास लौट आये। वह मणि पाकर राम को इतना आनन्द हुआ कि जैसे साक्षात् मीताजी का मूर्तिमान् हृदय ही चला आया हो॥६४।। उस मणि को हृदय से लगा तथा मुध-बुध भूलकर वे आनन्दविभोर हो गये। उन्हें उस समय ऐमो प्रसनता हुई कि जैमे स्तन के स्पर्श के मिवाय स्वय सीताजी ही हृदय से आ लगी हों।। ६५ ।। अपनी प्रियतमा का सन्देश सुनकर राम उससे मिलने के लिए अधीर हो उठे। उसी उत्साह मे उन्हें लङ्का के चारों ओर का चौड़ा और गहरा ममुद्र साई मे भी कम चौड़ा जॅचने लगा ।। ६६ ।। बम, वे वानरों को अपार सेना माय लेकर शत्रु का सहार करने चल पडे। वह सेना इतनी अधिक थी कि पृथ्वी की कौन कहे, आकाश मे भी बड़ी कठिनाई से चल मकती थी।। ६७॥ राम जब समुद्रतट पर पहुंचे तो रावण का भाई विभीषण उनमे मिलने आया। उम समय ऐसा लगा कि जैसे राक्षसों को राजलक्ष्मी ने ही उसकी बुद्धि मे पैठकर यह समझा दिया हो कि अब राम को शरण मे जाने पर ही तुम्हारा कल्याण हो सकेगा ।। ६८ ॥ राम ने तत्काल उममे यह प्रतिज्ञा कर ली कि 'हम तुम्हे राक्षसों का राजा बना देंगे।' ठीक भी है। समय पर काम में लायी हुई कूटनीति आगे चलकर अवश्य फल देती है ।। ६९ ।। राम ने वानरों के द्वारा समुद्र पर जो पत्थरो का पुल बँधवाया, वह ऐमा लगता था कि मानो विष्णु को अपने ऊपर मुलाने के लिए स्वय शेषनाग धरती पर उतर आये हों।७० ।। उस पुल से समुद्र पार करके पोले-पीले वानरों ने लड़ा को चारों ओर से घेर लिया। उनसे घिरी हुई लड़ा ऐसी दीखती थी कि जैसे लड़ा के चारों ओर सोने का एक और परकोटा बन गया हो ॥७१ ॥ तदनन्तर वहाँ वानरो और राक्षसो का ऐमा भयङ्कर युद्ध होने लगा कि राम और रावण की जय-जयकार से दिशाएँ फटने लगी ।।७२ ।। उम युद्ध मे वानर पेडों मे मार-मारकर राक्षसों को लोहे की गदाएँ चूर कर देते थे, पत्थर बरमाकर उनके मुद्गर पीस डालते थे, अपने नसों मे वे इतने भयङ्कर घाव कर देते थे कि शस्त्रों से भी वैसे घाव नहीं किये जा सकते थे और हाथियों के मिरों पर चट्टाने पटक-पटक कर उनको मार डालते थे।।७३ ।। उमी समय एक मायावी राक्षम ने मायामय राम का मिर बनाकर मीताजी के आगे ला रखा । उमे देखते ही सीताजी मूर्छित होकर गिर गयीं। परन्तु जब त्रिजटा ने उन्हे समझाया कि 'यह सब राक्षसी माया है', तब मीताजी को शान्ति मिली।।७४॥ यह जानकर उनका शोक तो दूर कि मेरे पतिदेव जीवित है', परन्तु उन्हे इस बात को बडी लज्जा हुई कि पति के मारे जाने का समाचार हो गया ११२ रघुवशे गरुडापातविश्लिष्टमेघनादास्त्रबन्धन । दाशरथ्यो क्षणक्लेश स्वप्नवृत्त इवाभवत्।।७६॥ ततो बिभेद पौलस्त्य शक्त्या वक्षसि लक्ष्मणम् । रामस्त्वनाहतोऽप्यासीद्विदीर्णहृदय शुचा। स मारुतिसमानीतमहौषधिहृतव्यथ । लङ्कास्त्रीणा पुनश्चक्रे विलापाचार्यक शरै ॥७८॥ स नाद मेघनादस्य धनुश्चेन्द्रायुधप्रभम् । मेघस्येव शरत्कालो न किञ्चित्पर्यशेषयत्॥७९॥ कुम्भकर्ण कपीन्द्रेण तुल्यावस्थ स्वसु कृत । रुरोध राम शृङ्गीव टच्छिन्नमन शिल ॥८॥ अकाले बोधितो भात्रा प्रियस्वप्नो वृथा भवान् । रामेषुभिरितोवासौ दीर्घनिद्रा प्रवेशित ॥८१॥ इतराण्यपि रक्षासि पेतुर्वानरकोटिषु । रजासि समरोत्यानि तच्छोणितनदीष्विव ॥८२॥ निर्ययावथ पौलस्त्य पुनर्युद्धाय मन्दिरात् । अरावणमराम वा जगदद्येति निश्चित ॥८३॥ राम पदातिमालोक्य लद्देश च वरूथिनम् । हरियुग्य रथ तस्मै प्रजिघाय पुरन्दर ॥८४॥ तमाधूतध्वजपट व्योमगङ्गोर्मिवायुभि । देवसूतभुजालम्बो जैत्रमध्यास्त राघव ।। ८५॥ मातलिस्तस्य माहेन्द्रमामुमोच तनुच्छदम् । यत्रोत्पलदलक्लैव्यमस्त्राण्यापु सुरद्विषाम् ।। ८६॥ अन्योन्यदर्शनप्राप्तविक्रमावसर चिरात् । रामरावणयोर्युद्ध चरितार्थीमवाभवत् ॥८७॥ भुजमोरुबाहुल्यादेकोऽपि धनदानुज । ददृशे यथापूर्वो मातृवश इव स्थित ॥८॥ सुनकर भी मैं जीवित क्यों रह गयी, मरी क्यों नहीं ? ॥७५ ।। मेघनाद ने उसी समय राम और लक्ष्मण को नागपाश में बाँध लिया, परन्तु तत्काल गरुड ने आकर वह फन्दा काट दिया। पाश मे बँधने का वह क्षणिक क्लेश उन दोनो भाइयो को ऐसा लगा कि मानो स्वप्न मे वैमा हुआ हो।।७६ ।। तब मेघनाद ने लक्ष्मण की छाती में शक्ति-वाण मारा, जिसके आघात मे लक्ष्मण गिर गये। उन्हें देसकर राम का हृदय शोक से फटने लगा। तत्काल हनुमान्जी जाकर हिमालय मे सजीवनी बूटी ले आये, जिसे पिलाते ही लक्ष्मण की पीडा जाती रही और फिर उठकर उन्होने अपने बाणों से अमख्य राक्षमों को मारा, जिससे लड़ा की स्त्रियों को फिर विलाप करने के लिए विवश कर दिया॥७७-७८ ।। जैसे शरद् ऋतु आने पर न बादल का गर्जन रह जाता है और न इन्द्रधनुष ही दिखलायी देता है, वैसे ही लक्ष्मण ने भी मेघनाद के गर्जन और उसके इन्द्रधनुष सदृश धनुष को क्षणभर मे ममाप्त कर दिया ।। ७९ ।। तभी सुग्रीव ने कुम्भकर्ण की नाक काटकर उसे भी शूर्पणसा जैसा बना दिया। तब वह राम का मार्ग रोककर ऐमे खड़ा हो गया, जैसे छेनी से कटी हुई मैामिल की चट्टान आ गयी हो।। ८० ।। तब राम के वाणों से घायल होकर वह मर गया। जैसे उन बाणों ने उसे यह कहकर गहरी नींद मे सुला दिया हो कि 'तुमको नींद बर्डी प्यारी है, तुम्हारे भाई ने व्यर्थ तुम्हे अममय मे जगा दिया ।। ८१ । उन करोडों वानरों को मेना में बहुत-मे राक्षस इस प्रकार मर-मरकर गिर रहे थे कि जैसे राक्षसों के रक्त की नदी में रणक्षेत्र से उठी हुई धूल गिर रही हो ॥८२॥ रावण ने जब सब हाल सुना, तब वह स्वयं अपने राजमहल मे निकलकर रणभूमि मे आया। उसने ठान लिया था कि आज मसार मे या तो रावण नहीं रहेगा या राम ही नहीं रहेगे।। ८३ ।। रावण को रथ पर और राम को पैदल देखकर इन्द्र ने उनके लिए अपना वह रथ भेजा, जिसमें बड़े अच्छे घोडे जुते हुए थे। ८४॥ उम रथ की पताका आकाशगङ्गा की लहरो के पवन से फहरा रही थी। इन्द्र के मारथी मातलि का हाथ थामकर राम उम पर चढे ।। ८५ ।। तब मातलि ने उन्हें इन्द्र का वह कवच भी पह्ना दिया, जिम पर राक्षमो के अस्त्र का पहार कमल के फूल जैसा लगता था ॥८६॥ बहुत दिनों बाद राम और रावण ने एक-दूसरे को देखा और उन दोनों को अपनी वीरता दिखलाने का अवसर मिला। तीनों लोरो मे राम-रावण का जो युद्ध प्रसिद्ध था, वह अब चरितार्थ हुआ॥८७॥ अमख्य राक्षसों के मारे जाने में रावण अकेला रह गया था, फिर भी अपनी अनेक बोहों और ओक मुसो के कारण वह एमा लगता था कि मानो उसके माथ बहुत-से द्वादश सर्ग जेतार लोकपालाना स्वमुखैरर्चितेश्वरम् । रामस्तुलितकैलासमराति बहमन्यत ॥ ८९ ॥ तस्य स्फुरति पौलस्त्य सोतासङ्गमशसिनि । निचखानाधिकक्रोध शर सव्येतरे भुजे ॥ ९० ॥ रावणस्यापि रामास्तो भित्त्वा हृदयमाशुग । विवेश भुवमाख्यातुमुरगेभ्य इव प्रियम् ॥ ९१ ।। वचसैव तयोर्वाक्यमस्त्रमस्त्रेण निघ्नतो । अन्योन्यजयसरम्भो ववृधे वादिनोरिव ।। ९२ ॥ विक्रमव्यतिहारेण सामान्याऽभूद्वयोरपि । जयश्रीरन्तरा वेदिमत्तवारणयोरिव ॥ ९३ ॥ कृतप्रतिकृतप्रोतैस्तयोर्मुक्ता सुरासुरै । परस्परशरवाता पुष्पवृष्टि न सेहिरे ॥ ९४ ।। अय शकुचिता रक्ष शतघ्नीमथ शत्रवे । हृता वैवस्वतस्येव कूटशाल्मलिमक्षिपत् ॥ ९५ ॥ राघवो रथमप्राप्ता तामाशा च सुरद्विषाम् । अर्धचन्द्रमुखैर्बाणैश्चिच्छेद कदलोसुखम् ॥ ९६ ॥ अमोघ सन्दधे चास्मै धनुष्येकधनुर्धर । ब्राह्ममस्त्र प्रियाशोकशल्यनिष्कर्षणौषधम् ॥ ९७ ॥ तयोम्नि शतधा भिन्न ददृशे दीप्तिमन्मुसम् । वपुर्महोरगस्येव करालफणमण्डलम् ॥ ९८ ॥ तेन मन्त्रप्रयुक्तेन निमेषार्धादपातयत् । स रावर्णाशर पक्तिमज्ञातव्रणवेदनाम् ॥ ९९ ।। बालार्कप्रतिमेवाप्सु वीतिभिन्ना पतिष्यत । रराज रक्ष कायस्य कण्ठच्छेदपरम्परा ॥१०॥ राक्षम हैं।।८८|| जिमने इन्द्र आदि लोक्पालो को जीत लिया था, जिसने अपने मिर काट-काटकर शिवजी को चढ़ा दिये थे और जिमने कैलाम पर्वत को उँगलियो पर उठा लिया था, उम रावण को देखकर राम ने ममझा कि यह बहुत बडा पराक्रमी है।। ८९॥ नभी रावण ने बडे क्रोध के माथ राम की दाहिनी भुजा मे बाण मारा, जो फटककर यह मृचना दे रहा थी कि अब माता की प्राप्ति में देर नहीं है ।।९०॥ तब राम ने जो बाण छोड़ा, वह रावण की छाता छेदकर पाताल मे चला गया। जैसे पातालवामियों को रावण के मरने की शुभ मूचना देन के लिए वह वहाँ गया हो ॥ ९१ ।। वे दोनों क्रोध से एक-दूसरे को ललकारते और अस्त्र को शस्त्र मे काटते हुए जूय रहे थे। उनका ब्रोध वैसे ही बढ़ता जा रहा था, जैसे विजय के लिए शास्त्रार्थ करोवाले का बोध बढ़ता जाता है ।। ९२॥ कभी राम अपना पराक्रम दिखलाते थे और कभी गवण दिसलाता था। अत विजयश्री कभी राम के पाम जाती तो कभी रावण के पाम । उम विजयश्री की दशा वैमी ही थी, जेमे लड़ते हुए दो मतवाले हाथियों के बीच मे स्थित दीवार हो ॥९३ ।। राम जब बाण चलते या रावण का वार रोकते, तब देवता उनके ऊपर फूल बरसाने लगते और जब राम पर रावण प्रहार करता या उनका वार रोकता, तब अमुर उम पर फूल बरमाने लगते थे। परन्तु राम के अस्त्र रावण के ऊपर बरसने वाले फूलों को ऊपर ही तितर-बितर कर देते और रावण के बाण राम पर बरमनेवाले फूलों को आकाश मे ही छितरा दिया करते थे।।९४ ।। तभी रावण ने लोहे की कोलो मे जटित वह शतघ्नी राम पर चलायो, जो यमराज के अस्त्र कूटशाल्मली के ममान भीषण थी ।। ९५ ।। उमे देखकर राक्षमो को पूरा आशा हो गयी कि दम अस्त्र में राम अवश्य समाप्त हो जायेगे, परन्तु राम ने उम शतघ्नी को रथ तक पहुंचने के पहले ही अपनी तिरछी नोकवाले बाणों द्वारा ऐमी मरलता मे सण्ड-खण्ड कर डाला, मानो केले का छिलका उतार रहे हो। यह देखकर राक्षमों की रही-सही आशा भी जाती रही ।।९६॥ राम माधारण धनुषधारी नहीं थे। उन्होंने रावण को मारने के लिए धनुष पर वह ब्रह्मास्त्र चढाया, जो कभी व्यर्थ नहीं जाता था। वह मीता के शोकरूपी कॉटो को निकालने की अचूक औषधि जैमा था॥ ९७ || आकाश मे जाते ही वह ब्रह्मास्त्र दम भागो मे बॅट गया और उममे मे निकलनेवाली आग फणों का चमसीला मडल लिये हुए शेषनाग जैमी दीस रही थी॥९८॥ मन्त्रचालित उस ब्रह्मास्त्र मे राम ने रावण के दमों मिर आधे पल मे काट कर पृथ्वी पर गिरा दिया और रावण को तनिक भी कष्ट नहीं हुआ ॥ ९९ ।। क्ट-कटकर गिरते हुए रावण के मिर ऐमे अच्छे लगते थे, जैसे चचल लहरों में प्रात काल के मूर्य का प्रतिबिम्ब सुन्दर लगता है ।। १०० ।। १५ का के रघुवशे मरुता पश्यता तस्य शिरासि पतितान्यपि । मनो नातिविशश्वास पुन सन्धानाङ्कनाम्॥ अथ मदगुरुपर्लोकपालद्विपानामनुगतलिवृन्दैर्गण्डभित्तीर्विहाय । उपनतमणिबन्धे मूनि पौलस्त्यशत्रो सुरभि सुरविमुक्त पुष्पवर्ष पपात ॥१०२।। यन्ता हरे सपदि सहृतकार्मुकज्यमापृच्छय राघवमनुष्ठितदेवकार्यम् । नामाङ्करावणशराङ्कितकेतुष्टिमूर्ध्व रथ हरिसहायुज निनाय ॥१०३ ॥ रघुपतिरपि जातवेदोविशुद्धा प्रगृह्य प्रिया प्रियसुहृदि विभीषणे सङ्गमय्य श्रिय वैरिण रविसुतसहितेन तेनानुयात ससौमित्रिणा भुजविजितविमानरत्नाधिरूढ प्रतस्थे पुरीम् ।। १०४॥ इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये रावणवधो नाम द्वादश सर्ग ॥१२॥ रावण के कटे हुए उन सिरों को देख करके भी देवताओं को विश्वास नहीं हो रहा था। क्योंकि उन्हें यह डर था कि कहीं ये फिर मे न जुड़ जाये ॥१०१॥ जिन राम पर राज्याभिषेक का जल छिडका जानेवाला था, उन्हीं के मिर पर देवताओं ने वे फूल बरसाये, जिनकी सुगन्ध पाकर मद से भीगी हुई पॉखोंवाले भौरे दिग्गजों के मद बहनेवाले कपोलो को छोडकर रम लेने के लिए उनके पीछे-पीछे दौड पडे ।। १०२॥ अब राम ने अपने धनुष की डोरी उतार दी। क्योंकि वे देवताओं का काम पूरा कर चुके थे। इन्द्र का सारथी मातलि उनसे आज्ञा लेकर अपने सहस्रों घोडेवाला रथ लेकर स्वर्ग चला गया। उस रथ के ध्वजदण्ड पर अब तक रावण के नाम खुदे हुए बाणों के चिह्न विद्यमान थे।॥ १०३ ।। बाद में राम ने रावण को राज्यश्री विभीषण को दे दी और सीताजी को अग्नि मे शुद्ध करके सुग्रीव, विभीषण तथा लक्ष्मण के साथ अपने बाहुबल से जीते हुए पुष्पक विमान पर चढकर अयोध्या को लौट पडे ।। १०४।। इस प्रकार रघुवंशमहाकाव्य में रावण-वध नामक बारहवाँ सर्ग समाप्त।१२।। take । त्रयोदश सर्ग अथात्मन शब्दगुण गुणज्ञ पद विमानेन विगाहमान । रत्नाकर वीक्ष्य मिथ स जाया रामाभिधानो हरिरित्युवाच ॥ १ ॥ वैदेहि। पश्यामलयाद्विभक्त मत्सेतुना फेनिलमम्बुराशिम्। छायापथेनेव शरत्प्रसन्नमाकाशमाविष्कृतचारुतारम् ॥ २ ॥ गुरोर्यियक्षो कपिलेन मेध्ये रसातल सङ्क्रमिते तुरङ्गे। तदर्थमुरूमवदारयद्धि पूर्व किलाय परिवर्धितो न ॥ ३ ॥ गर्भ दधत्यर्कमरीचयोऽस्माद् विवृद्धिमत्राश्नुवते वसूनि । अबिन्धन वहिमसौ बिभर्ति प्रहलादन ज्योतिरजन्यनेन ॥ ४ ॥ ता तामवस्था प्रतिपद्यमान स्थित दश व्याप्य दिशो महिम्ना । विष्णोरिवास्यानवधारणीयमोदृक्तया रूपमियत्तया वा॥ ५ ॥ नाभिप्ररूढाम्बुरुहासनेन सस्तूयमान प्रथमेन धात्रा अमु युगान्तोचितयोगनिद्र सहृत्य लोकान्पुरुषोऽधिशेते॥ ६ ॥ पच्छिदा गोत्रभिदात्तगन्धा शरण्यमेन शतशो महीध्रा । नृपा इवोपप्लविन परेभ्यो धर्मोत्तर मध्यममाश्रयन्ते ॥ ७ ॥ रसातलादादिभवेन पुसा भुव प्रयुक्तोद्वहन क्रियाया । अस्याच्छमम्भ प्रलयप्रवृद्ध मुहूर्तवक्त्राभरण बभूव ॥ ८ ॥ विमान पर चढ़े और शब्दगुणात्मक आकाश मे जाते हुए गुणी राम कहलाने वाले विष्णु भगवान् सीताजी से बोले-॥१॥ हे मीते ममुद्र को तो देखो, जिसे मेरे बनाये हुए पुल ने मल्य पर्वत तक दो भागों में इस प्रकार बॉट दिया है, जैसे मुन्दर तारो से भरे हुए शरद् ऋतु के खुले आकाश को आकाशगङ्गा दो भागों में विभक्त कर देती है ॥ २॥ तुम्हे मालूम है कि समुद्र कैसे बना है? जब हमारे पुरखे महाराज सगर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब कपिलजी उनका घोडा लेकर पाताल-लोक में ले गये। उस समय महाराज सगर के पुत्रों ने घोड़े की खोज करने के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी खोद डाली, उनकी खुदाई मे यह इतना लम्बा-चौडा ममुद्र बन गया ॥३॥ यह समुद्र बडे काम का है। इसी में मे सूर्य की किरणे जल खीच-खींचकर पृथ्वी पर बरमाती हैं। इसी मे रत्न मिलते हैं, अपने शत्रु वडवानल को यह अपनी गोद मे पालता है और मुखदायक प्रकाश वाला चन्द्रमा भी इमी मे से उत्पन हुआ है।॥ ४॥ यह सदा अपना रूप बदलता रहता है और यह इतना बड़ा है कि दसों दिशाओ मे दूर-दूर तक फैला हुआ है। अत जैसे विष्णु भगवान् के विषय में नहीं कहा जा मकता कि वे ऐसे और इतने बटे हैं, वैसे ही इसके विषय मे भी यह नहीं कहा जा सकता कि यह कैमा है या कितना बड़ा है।।५।। आदिपुरुष विष्णु भगवान् जब तीनों लोगों का महार कर चुकते हैं, तब यहीं पहुंचकर योगनिद्रा मे सोते हैं और उनकी नाभि से जायमान कमल मे उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी सदा इनके गुण गाते रहते हैं।॥६॥ शत्रुओ से डरकर जैसे राजे किसी धर्मात्मा और तटस्थ राजा की शरण लेते हैं, वैसे ही उन सैकडों पहाडों ने भी इसकी शरण ली थी, जिनके पख इन्द्र ने काट दिये थे और अभिमान चूर कर दिया था।॥७॥ सृष्टि के आरम्भ मे जब वाराह भगवान् पृथ्वी को पाताल मे ले आ रहे थे, इस फेन घनेन। वय के रघुवशे के मुखार्पणेषु प्रकृतिप्रगल्भा स्वय तरङ्गाधरदानदक्ष । अनन्यसामान्यकलत्रवृत्ति पिबत्यसो पाययते च सिन्धू ॥ ९ ॥ ससत्त्वमादाय नदीमुखाम्भ सम्मोलयन्तो विवृताननत्वात्। अमी शिरोभिस्तिमय सरन्धेरुवं वितन्वन्ति जलप्रवाहान् ॥१०॥ मातङ्गन सहसोत्पतद्भिर्भिन्नान्द्विधा पश्य समुद्रफेनान्। कपोलससर्पितया य एषा व्रजन्ति कर्णक्षणचामरत्वम्॥११॥ वेलानिलाय प्रसृता भुजङ्गा महोर्मीिवस्फूर्जथुनिर्विशेषा । सूर्याशुसम्पर्कसमृद्धरागैर्व्यज्यन्त एते मणिभि फणस्थै ॥१२॥ तवाधरस्पर्धिषु विद्रुमेष पर्यस्तमेतत्सहसोर्मिवेगात्। अड्कुिरप्रोतमुख कथञ्चित्क्लेशादपक्रामति शङ्खयूथम् ॥१३॥ प्रवृत्तमात्रेण पयासि पातुमावर्तवेगाद्धमता आभाति भूयिष्ठमय समुद्र प्रमथ्यमानो गिरिणेव भूय ॥१४॥ दूरादयश्चक्रनिभस्य तन्वी तमालतालीवनराजिनीला। आभाति वेला लवणाम्बुराशेर्धारानिबद्धेव कलङ्करेखा ।। १५ ।। वेलानिल केतकरेणुभिस्ते सम्भावयत्याननमायताक्षि। मामक्षम मण्डनकालहानेर्वेत्तीव बिम्बाधरबद्धतृष्णम् ।।१६।। एते सैकतभिन्नशुक्तिपर्यस्तमुक्तापटल पयोधे । प्राप्ता मुहूर्तेन विमानवेगात् कूल फलार्जितपूगमालम्॥१७॥ उम समय प्रलय से बढा हुआ इसका स्वच्छ जल क्षणभर के लिए उनका घूघट बन गया था।॥ ८॥ दूसरे लोग केवल स्त्रियो का अधरपान करते हैं, अपना अधर उन्हे नही पिलाते। किन्तु ममुद्र इम बात मे भी औरो मे बढ़कर है। क्योंकि जब नदियाँ ढीठ होकर चुम्बन के लिए अपना मुख इमरे आगे बढाती है, तब यह बड़ी चतुराई से अपना तरङ्गरूपी अधर उसको पिलता है और उनका अधर स्वय पीता हे॥९॥ इधर देखो, ये बडे-बड़े मगरमच्छ अपना मुँह खोलकर मछलियो के माथ-साथ ममुद्र का जल भी पी जाते हैं और फिर मुंह बन्द करके मस्तक के छेदो मे जल की धाराएँ छोडो लगते हैं।॥ १० ॥ मगरमच्छो के अचानक उठ जाने से ममुद्र की फटी हुयी पेन को तो देखो। इनके गालों पर क्षणभर लिए लगी हुयी फेन ऐमी दीसती है कि मानो इनके कानों पर चँवर टॅगे हुए हो। ११ ।। ये जो बड़ी-बडी लहरों जैसे दिखलायी दे रहे हैं, ये मॉप हैं। जो तट का वायु पीने के लिए बाहर निकल आये हैं। परन्तु जब मर्य की किरणों में इनकी मणियाँ चमक उठती हैं, तब ये पहचान लिये जाते हैं।॥ १२॥ देखो, लहरो के झोके मे तुम्हारे अधरों जैसे लाल-लाल मूंगे की चट्टान मे टकरा जाने से इन जीवित शखों के मुंह छिद गये हैं और उस पीडा मे ये बेचारे बडी कठिनाई मे चल रहे हैं ।। १३ ।। इधर देखो, ये काले-काले बादल समुद्र का पानी लेने आये हैं और ममुद्र की भंवर के माथ-साथ बडी तीव्र गति से चक्कर काट रहे हैं। इसमे यह ममुद्र ऐमा दीय रहा है कि जैसे मन्दराचल फिर इसे मथ रहा हो।।१४।। देसो । दरी के कारण पटेि की हाल जैमा बहुत पतला और ताड तथा तमाल आदि वृक्षों जैमा दोसने वाला नीला समुद्रतट ऐमा लगता है कि जैसे चक्र की धार पर मुर्चा लग गया हो।।१५।। हे मुनयनी । ममुद्रतट का बायु तुम्हारे मुख पर केतकी का पराग छिक रहा है। जैसे उभे पता न हो कि मैं तुम्हारे अधरों को चूमने हा वाल हूँ और अब अधिन शृगार की बाट नहीं जोहूँगा ।। १६ ।। यह देखो, हम लेग विमान को तीव्र गति के कारण क्षणभर मे हा ममुद्र के दूमरे तट पर पहुँच गये, .

. ॐ त्रयोदश सर्ग ११७ कुरुष्व तावत्करभोरु । पश्चान्मार्गे मृगप्रेक्षिणि । दृष्टिपातम्। एया विदूरीभवत समुद्रात्सकानना निष्पततीव भूमि ॥१८॥ कचित्पथा सञ्चरते सुराणा कचिद्धनाना पतता कचिच्च । यथाविधो मे मनसोऽभिलाष प्रवर्तते पश्य तथा विमानम्॥१९॥ असो महेन्द्रद्विपदानगन्धिरित्रमार्गगावीचिविमर्दशीत । आकाशवायुर्दिनयौवनोत्थानाचामति स्वेदलवान्मुखे ते॥२०॥ करेण वातायनलम्बितेन स्पृष्टस्त्वया चण्डि । कुतूहलिन्या। आमुञ्चतीवाभरण द्वितीयमुद्भिन्नविद्युद्वलयो घनस्ते ॥२१॥ अमी जनस्थानमपोढविघ्न मत्वा समारब्धनवोटजानि । अध्यासते चोरभृतो यथास्व चिरोज्झितान्याश्रममण्डलानि ।। २२ ।। सैषा स्थलो यत्र विचिन्वता त्वा भ्रष्ट मया नूपुरमेकमुाम्। अदृश्यत त्वच्चरणारविन्दविश्लेषदु खादिव बद्धमौनम् ॥२३॥ त्व रक्षसा भीरु । यतोऽपनीता त मार्गमेता कृपया लता मे। अदर्शयन्वक्तुमशक्नुवत्य शाखाभिरावर्जितपल्लवाभि ॥२४॥ मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनियंपेक्षास्तवागतिज्ञ समबोधयन्माम्। व्यापारयन्त्यो दिशि दक्षिणस्यामुत्पक्ष्मराजीनि विलोचनानि ॥२५॥ एतद्रेिर्माल्यवत पुरस्तादाविर्भवत्यम्बरलेखि शृङ्गम्। नव पयो यत्र घनैर्मया च त्वद्विप्रयोगाश्रु सम विसृष्टम् ।। २६ ।। जहाँ बालू पर मोपो के फैल जाने मे मोती विसरे पड़े हैं और फलों के भार मे मुपारी के पेड झुक गये हैं।। १७ ।। हे हाथी की तूंट जैमी जाँघो वाली मृगनयना । पाछे की ओर तो देखो । दूर निकल आने मे यह जङ्गलो मे भरी हुई भूमि ऐमा दीख रही है, जैसे ममुद्र में मे अचानक निकल आयी हो ॥१८ ।। देखो, मैं जिधर चाहता हूँ, उधर ही यह विमान घूम जाता है। यह कभी देवताओं के मार्ग मे, कभी बादलों में और कभी पक्षियों के मार्ग मे ही उटो लग जाता है ।। १९ ॥ ऐरावत के मद की गन्ध से सुवामित और आकाशगङ्गा को लहरों मे शीतल हुई आगशवाय तुम्हारे मुख पर दोपहर को गर्मी से छहरी हुई पमीने की बूंदो को पीती चल रही है।॥ २०॥ हे चण्डा ! जब तुम खेल-खेल में अपना हाथ विमान से बाहर निराल कर बादल को छू लेती हो तो तुम्हारे मणिबन्ध के चारो आर बिजली कौंध जाती है। उम ममय ऐमा लगता है कि मानो बादल तुम्हार हाथ मे बिजली का दूसरा क्गन पहा रहे हैं।। २१ ।। नीचे की ओर देखो। रावण आदि राक्षमों के मारे जाने की बात सुनकर इन वत्कल-वसनधारी तपस्वियों ने समझ लिया है कि अब कोई भय नहा रहा। इमलिए नयी कुटिया बना-बनारर तपोवन मे मुस से रहने लगे हैं।॥ २२॥ इधर देसो, यह वही स्थान है कि जहाँ तुम्हे देंढते हुए मैंने पृथ्वी पर पड़ा हुआ तुम्हारा बिछुआ देखा था। चुपचाप पड़ा हुआ वह ऐमा लगता था कि मानो तुम्हारे चरणो से अलग होने के दु ख मे चुप हो गया हो ॥२३॥ हे भीरु | तुम्हें जिस मार्ग मे रावण ले गया था, उम मार्ग की लताएँ मुये कृपा करके तुम्हारे जाने का मार्ग बतलाना चाहती थी। किन्तु बोल 7 मरने के कारण इन्होंने अपनी पत्तो युक्त डालियों उधर झुकार मुझे तुम्हारा मार्ग बतला दिया था ।।२४।। हरिणियो ने भी जब देखा कि मुझे तुम्हारे जाने का मार्ग पता नहीं है, तब वे कुश के अर चरना छोड तथा उभरी हुई पलकों वाली आँखे दक्षिण दिशा की ओर करके मुझे मार्ग बतलाने लगी थी ।। २५ ॥ यह जो आगे माल्यवान् पर्वत की ऊंची चोटी दीसती है, यहा जब बादलो ने नया जल बरमाना आरम्भ गन्धश्च मया त्वया ११८ र रघुवशे धाराहतपल्वलाना कादम्बमोद्गतकेसर स्निग्धाश्च केका शिखिना बभूवुस्मिन्नसह्यानि विना त्वया मे॥२७॥ पूर्वानुभूत स्मरता च यत्र कम्पोत्तर भीरु । तवोपगूढम्। गुहावितारोण्यतिवाहितानि कश्चिद्धनर्जितानि ॥२८॥ आसारसिक्तक्षितिबाष्पयोगान्मामक्षिणोद् यत्र विभिन्नकोशै । विडम्ब्यमाना नवकन्दलैस्ते विवाहधूमारुणलोचनश्री ॥२९॥ उपान्तवानीरवनोपगूढान्यालक्ष्यपारिप्लवसारसानि दूरावतीर्णा पिबतीव खेदादमूनि पम्पासलिलानि दृष्टि ॥३०॥ अत्रावियुक्तानि रथाङ्गनाम्नामन्योन्यदत्तोत्पलकेसराणि । द्वन्द्वानि दूरान्तरवर्तिना ते मया प्रिये सस्पृहमीक्षितानि ॥३१॥ इमा तटाशोकलता च तन्वीं स्तनाभिरामस्तबकाभिनमाम्। त्वत्प्राप्तिबुद्धया परिरब्धुकाम सौमित्रिणा साश्रुरह निषिद्ध ॥३२॥ अमूर्विमानान्तरलम्बिनीना श्रुत्वा स्वन काश्चनकिङ्किणीनाम्। प्रत्युवजन्तीव खमुत्पतन्त्यो गोदावरीसारसपतयस्त्वाम् ।। ३३ ।। एपा पेशलमध्ययाऽपि घटाम्बुसर्धितबालचूता। आनन्दयत्युन्मुखकृष्णसारा दृष्टा चिरात्पञ्चवटी मनो मे॥३४॥ किया, तब तुम्हारे वियोग में मेरी आँसे भी जल बरमाने लगी थीं।। २६ ।। उस समय वर्षा के कारण पोखरों से उठी हुई माधा-सोधी गन्ध, अधखिली मञ्जरियो वाले कदम्ब के फूल और मोरों के मनोहर स्वर तुम्हारे बिना मुझे बहुत अखरे थे॥२७॥ जब बादल गरजते थे और गुफाओं मे उनको प्रतिध्वनि होने लगती थी, तब मुझे वे दिन स्मरण हो आते थे कि जब बादलो के गर्जने से डरकर तुम मुझमे लिपट जाती थी। इस प्रकार माल्यवान् पर्वत पर पात्रम के दिन मैंने बटे कष्ट मे बिताये थे।॥ २८ ॥ वर्षा के कारण वहाँ की धरती में जो भाप निकली, उममे क्न्दरियो की कलियाँ खिल उठी और वैसी ही लाल-लाल हो गयौं, जैसे विवाह के समय, हवन का धुआँ लगने से तुम्हारी आँखें लाल हो गयी थीं। अत उन्हें देखकर तुम्हारा स्मरण हो आने से मैं बेचैन हो उठा था।॥ २९ ॥ देखो, बहुत उँचाई और बेंत के जगलों मे ढंके होने के कारण कठिनाई मे दीसनेवाले एव चचल मारमों मे युक्त पम्पा के जल को बहुत नीचे उतरकर मेरी विन्न दृष्टि जैसे पी रही है ।। ३० ॥ हे प्रिये । यहाँ चकवा-चकवी के जोडे एक-दूमरे को बडे प्रेम मे कमल का केसर दिया करते थे। तुममे बहुत दूर होने के कारण उन्हे देख-देखकर मैं यही मोचता रहता था कि मुझे भी ऐमे दिन कब देखने को मिलेगे ॥३१॥ उन दिनों तुम्हारे वियोग मे मैं ऐसा पागल हो गया था कि एक दिन स्तन जैसे गुच्छों वाली इस पतली अशोकलता को मैंने यह समझ कर गले लगाना चाहा था कि तुम्ही हो। जैसे ही मैं ऐमा करने चला, वैसे ही मेरा पागलपन देखकर लक्ष्मण ने मुझे वहाँ मे हटा लिया। उम ममय मैं रो रहा था ।। ३२ ।। इधर देखो, विमान के नीचे लटकने वाली मोने की किङ्किणियों का शब्द मुनकर गोदावरी नदी के सारसो को पातें उडती हुई उपर चली आ रही है। जैसे ये तुम्हारी अगवानी करने आती हों ।। ३३ ।। बहुत बाद आज पञ्चवटी को देखकर मेरा मन खिल उठा है। यह देखो, यहाँ के मृग ऊपर मिर उठाकर विमान को देख रहे हैं। यहीं तो तुमने अपनी पतली कमर पर घटे रख-रखकर आम के वृक्षो को मींचा त्रयोदश सर्ग - अत्रानुगोद मृगयानिवृतस्तरङ्गवातेन विनीतखेद । रहस्त्वदुत्सङ्गनिषण्णमूर्धा स्मरामि वानीरगृहेषु सुप्त ॥ ३५॥ भूभेदमात्रेण पदान्मघोन प्रभ्रशया यो नहुष चकार। तस्याविलाम्भ परिशुद्धिहेतो मो मुने स्थानपरिग्रहोऽयम्॥३६॥ त्रेताग्निधूमाग्रमनिन्द्यकीर्तेस्तस्पेदमाक्रान्तविमानमार्गम् घ्रात्वा हविन्धि रजोविमुक्त समश्नुते मे लघिमानमात्मा ॥३७॥ एतन्मुनेर्मानिनि। शातकर्णे पश्चाप्सरो नाम विहारवारि । आभाति पर्यन्तवन विदूरान्मेघान्तरालक्ष्यमिवेन्दुबिम्बम् ।। ३८॥ पुरा स दर्भाङ्कुरमात्रवृत्तिश्चरन्मृगै सार्धमृषिर्मघोना। समाधिभीतेन किलोपनोत पश्चाप्सरोयौवनकूटबन्धम् ॥ ३९ ॥ तस्यायमन्तर्हितसोधभाज प्रसक्तसङ्गीतमृदङ्गघोष । वियद्गत पुष्पकचन्द्रशाला क्षण प्रतिश्रुन्मुखरा करोति ॥४०॥ हविर्भुजामेधवता चतुर्णा मध्ये ललाटन्तपसप्तसप्ति । असो तपस्यत्यपरस्तपस्वी नाम्ना सुतोष्णचरितेन दान्त ॥४१॥ अमु सहासप्रहितेक्षणानि व्याजार्धसन्दर्शितमेखलानि । नाल विकर्तुं जनितेन्द्रशङ्क सुराङ्गनाविभ्रमचेष्टितानि ॥४२॥ एषोऽक्षमालावलय मृगाणा कडूयितार कुशसूचिलावम् । सभाजने मे भुजमूर्ध्वबाहु सव्येतर प्राध्वमित प्रयुक्ते ।। ४३ ॥ और पाला-पोसा था॥३४॥ मुझे वे दिन अब याद आते हैं, जब मैं यहाँ उम एकान्त वाली बेत को झोपडी में तुम्हारी गोद मे मिर रसकर मोता था और गोदावरा की ठण्डी हवा आखेट की थकावट मिटाती थी।। ३५ ।। यह देखो, आगे उन तपस्वी अगस्त्य ऋषि का आश्रम है। जिन्होंने केवल भौं तानकर राजा नहुष को इन्द्र के पद से च्युत कर दिया था। ये ही उदय होकर वर्षा का सब गॅदला जल स्वच्छ कर देते हैं ।। ३६ ।। उन्हीं यशस्वी ऋषि की गार्हपत्य, दाक्षिणात्य और आवहीय अग्नियों का हवन-सामग्री की गन्ध से मिला हुआ धुओं मेरे विमान के पाम तक उड़ा चला आ रहा है। जिसे मूंघते ही मेरी आत्मा पवित्र हो गयी है।। ३७ ॥ हे मानिनि । यह शातकर्णि ऋषि का पञ्चाप्मर क्रीडासरोवर है। चारो ओर काले-काले जगलो मे घिरा हुआ यह दूर मे ऐमा दीख रहा है, जैसे बादलो के बीच मे कुछ-कुछ दीखो वाला चन्द्रबिम्ब हो॥ ३८ ॥ पहले ये महर्षि तपस्या के ममय मृगों के माथ कुश चरा करते थे। इनकी ऐमी कठोर तपस्या देखकर इन्द्र को भय हुआ कि कहीं ये हमारा इन्द्रामा न छीन ले। अतएव इनका तप भग करने के लिए इन्द्र ने इन पर एक साथ पाँच अप्सराओं का जाल फेंका और ये बेचारे उममें फंस गये।। ३९॥ यह जो गाना सुनायी दे रहा है, यह जल के भीतर बने हुए उन्हीं के भवन का है। वहीं के मृदङ्ग की ध्वनि आकाशचारी पुष्पक-विमान को छतरी से टकरा कर गूंज रही है।॥ ४० ॥ यह जो चार अग्नियो के बीच मे और ऊपर सूर्य की किरणों मे तपते हुए तपस्वी बैठे हैं, इनका नाम तो सुतीक्ष्ण है, परन्तु ये चरित्र के बडे ही उदार हैं। ४१ ॥ इनके तप से भी डरकर इन्द्र ने इनके पास भी अप्सराओं को भेजा था। वे मुस्कुरा-मुस्कुराकर इन पर तिरछी चितवन चलाती और किसी न किसी वहाने अपनी करधनी उघाड़कर इन्हे दिखा देती थीं, पर उनकी यह मारी चटक-मटक इन्हे नहीं मोह सकी॥२॥ देखो, मुझे देखकर वे रुद्राक्ष की माला बंधी तथा मृगों को खुजलाने और कुश - - १२० छ रघुवशे वाचयमत्वात्प्रणति ममैष कम्पेन किञ्चित्पतिगृह्य मूर्ध्न । दृष्टि विमानव्यवधानमुक्ता पुन सहमा»िष सन्निधते॥४४॥ अद शरण्य शरभङ्गनाम्नस्तपोवन पावनमाहिताग्ने । चिराय सन्तर्प्य समिद्भिरग्नि यो मन्त्रपूता तनुमप्यहौषीत् ॥ ४५ ॥ छायाविनीताध्वपरिश्रमेषु भूयिष्ठसम्भाव्यफलेष्वमीषु। तस्यातिथीनामधुना सपर्या स्थिता सुपुत्रेष्विव पादपेषु ॥ ४६॥ धारास्वनोदारिदरीमुखोऽसौ शृङ्गाग्रलग्नाम्बुदवप्रपङ्क । बध्नाति मे बन्धुरगात्रि । चक्षुर्दृप्त ककुद्मानिव चित्रकूट ॥४७ ।। एषा प्रसन्नस्तिमितप्रवाहा सरिद्विदुरान्तरभावतन्वी। मन्दाकिनी भाति नगोपकण्ठे मुक्तावली कण्ठगतेव भूमे ॥४८॥ अय सुजातोऽनुगिर तमाल प्रवालमादाय सुगन्धि यस्य । यवाङ्कुरापाण्डुकपोलशोभी मयाऽवतस परिकल्पितस्ते ॥४९ ।। अग्निग्रहवासविनीतसत्त्वमपुष्पलिङ्गात्फलबन्धिवृक्षम् वन तप साधनमेतदराविष्कृतोदग्रतरप्रभावम् ।। ५०॥ अत्राभिषेकाय तपोधनाना सप्तर्षिहस्तोद्धृतहेमपद्माम्। प्रवर्तयामास किलानुसूया त्रिसोतस त्र्यम्बकमौलिमालाम्॥५१॥ उसाडनेवाली अपनी दाहिनी भुजा उठाकर मेरा स्वागत कर रहे हैं। ४३ ॥ ये मदा मौन रहते हैं। अत केवल मिर हिलाकर ही इन्होने मेरा प्रणाम स्वीकार क्रिया है। विमान के बीच मे आ जाने से जो इनकी दृष्टि मूर्य मे अलग हो गयी थी, फिर उमे इन्होंने मूर्य मे ल्गा दी है।। ४४, यह शरणागतों की रक्षा करने वाले अग्निहोत्री शरभङ्ग ऋषि का तपोवन है। जिन्होंने बहुत दिनों तक अग्नि को ममिधा मे तृप्त करके अन्त में मर मे पवित्र अपना शरीर भी उममे बन कर दिया था।॥ ४५ ॥ जैसे सुपुत्र अपने पिता के धर्म का पालन करते हैं, वैमे ही जत्र अतिथिमेवा का काम उनसे बदल ये आश्रम के वृक्ष करते हैं, जिनको छाया मे बैठकर पथिक थकान दूर करते हैं और जिनमे बडे मोठे-मीठे फल लदे रहत हैं ।।४।। हे सुन्दरी । मस्त मॉड जैमा यह चित्रकूट पर्वत मुझे बडा मुहावना लग रहा है। गुफा ही इसका मुस है, इससे निकलने वाले जल की धारा का शब्द हा माड की डकार है, दमकी चोटी ही उमकी मांगें हैं और इम पर छाये हुए बादल ही मानों मांगों पर लगी हुई कीचड है॥४७॥ यह लो, गङ्गाजी आ गयीं। इनका जल कैमा स्वच्छ है और कैसे धीरे-धीरे बह रहा है। यहाँ मे दूर होने के कारण ये कितनी पतली दीख रही हैं। चित्रकूट पर्वत के नीचे बहती हुई ये ऐसा लगता हैं, जैसे पृथ्वीरूपिणी नायिका के गले में मोतियो की माला पडा हुई हो।। ४८ ॥ इस पहाड़ की ढाल पर तमाल का वृक्ष दीख रहा है। यह वहीं है जिसके प्रवाल का कर्णफूल बनाकर मैने तुम्हारे कान पह्नाया था और जो तुम्हारे जौ के अकुर जैसे पीले गालो पर लटक्ता हुआ बटा ही मुन्दर लगता था ।। ४९ ।। यह अत्रि मुनि का तपोवन है, जहा के मिह आदि पशु त्रिना मार-पाटे ही इतने मांचे हो गये हैं कि किमी से कुछ नहीं बोलते। यह तपोवन ऐमा प्रभावशाली है कि यहाँ बिना फूल आये ही वृक्षों मे फल लग जाते हैं।॥ ५० ॥ महर्षि अत्रि की पत्नी अनमूयाजी ऋषियों के स्नान के लिए उन त्रिपथगा (गङ्गाजी) को यहाँ ले आयी हैं, जिनमें से मप्तर्षिगण स्वर्णम्मल चुाते हैं और जो शिवजी के मिर पर माला जैसी मुन्दर लगती हैं।। ५१॥ इम आश्रम के वृक्षों के नीचे वदियों पर तपस्वी लोग वारामन लगा-लगाकर ध्यान निया - अन्यत्र माला अन्यत्र श्री त्रयोदश सर्ग १२१ वीरासनानजुषामृपोणाममी समध्यासितवेदिमध्या । निवातनिष्कम्पतया विभान्ति योगाधिरढा इव शाखिनोऽपि ॥५२॥ त्वया पुरस्तादुपयाचितो य सोऽय वट श्याम इति प्रतीत । राशिर्मणीनामिव गारुडाना सपद्मराग फलितो विभाति ॥५३ ।। क्वचित्प्रभालेपिभिरिन्द्रनीलैर्मुक्तामयी यष्टिरिवानुविधा। सितपङ्कजानामिन्दीवरैरुत्सचितान्तरेव ॥५४॥ कचित्खगाना प्रियमानसाना कादम्बससर्गवतीव पक्ति । कालागुरुदत्तपत्रा भक्तिर्भुवश्चन्दनकल्पितेव ।।५५॥ क्वचित्प्रभा चान्द्रमसी तमोभिश्छायाविलीनै शबलीकृतेव । अन्यत्र शुभा शरदभलेखा रन्धेष्विवालक्ष्यनभ प्रदेशा॥५६॥ क्वचिच्च कृष्णोरगभूषणेव भस्माङ्गरागा तनुरीश्वरस्य । पश्यानवद्याङ्गि। विभाति गङ्गा भिन्नप्रवाहा यमुनातरङ्गै ।।५७॥ समुद्रपल्योर्जलसन्निपाते पूतात्मनामत्र किलाभिषेकात् । तत्त्वावबोधेन विनापि भूयस्तनुत्यजा नास्ति शरीरबन्ध ।।५८॥ पुर निषादाधिपतेरिद तस्मिन्मया मौलिमणि विहाय । जटासु बद्धास्वरुदत्सुमन्त्र कैकेयि । कामा फलितास्तवेति ॥५९ ॥ पयोधरै पुण्यजनाङ्गनाना निर्विष्टहेमाम्बुजरेणु यस्या । ब्राह्म सर कारणमाप्तवाचो बुद्धेरिवाव्यक्तमुदाहन्ति॥६०॥ करते हैं और यहाँ के वृक्ष भी वायु न चलने के कारण ऐमे स्थिर सड़े हैं, जैसे ये भी योगामन कर रहे हों॥५२॥ वही यह काला-काला बरगद का पेट है, जिमको तुमो मनौती मानी थी। इसमे जो लाल-लाल फल लगे हैं, उनमे यह पेड ऐमा लग रहा है कि जैसे मरकत मणियो की ढेरी मे बहुत-मे पद्मराग मणि भरे पडे हो॥५३ ।। इधर देखो, यमुना को मावली ल्हगें से मिली हुई उजली लहरों वाली गङ्गाजी कैमी सुन्दर दीस रही हैं। रही ये चमको वाली इन्द्रनीलमणियों में गुथी हुई माला जैसी लगती हैं और कहीं नीले तथा श्वेत कमलों को मिला हुई माल जैमी दीसती है॥५४॥ कही यह सॉबले रग के हमों में मिले हुए उजले रंग के मानमरोवरप्रेमी राजमो की पात जैमी शोभित हो रहा है और कहीं श्वेत चन्दन मे चित्रित पृथ्वी पर बीच-बाच मे काले अगर मे रगी हुई-मी दीखती है।। ५५ ।। कहीं-कहीं वृक्ष की नीचे वाली उम चॉदना के मदृश लगती है, जिसके बीच-बाच मे पत्ता की छाया पड़ रही हो। कहीं पर शरद् ऋतु के उन उजले बादलो जैसी है, जिनके बीच-बीच मे नाला जामाश दीख रहा हो और कहां पर ये भस्म लगाये हुए शिवजी के उम शरार जैमा दीख रही है, जिस पर काले-काले मर्प लिपटे हुए हो। हे शोभने । यमुनाजी की तरगो मे मिलकर गगा का प्रवाह विभिन रूपों में दीख रहा है।। ५६-५७ ॥ ममुद्र की इन दो पत्नियो के मगम मे स्नार करके जो पवित्र होते हैं, वे तत्त्वज्ञानी न होने पर भी माया के बन्धन मे छूट जाते हैं।। ५८ ।। यह वहीं निषादराज का नगर है, जहाँ मैंने मुकुटमणि उतार कर जटा बाँधी था और जिसे देखकर मुमन्त्र यह कहते हुए रो पडे कि 'कैकेयो । तेरी इच्छा पूरी हो गयो' ।। ५९ ।। ऋषि लोग कहते हैं कि जैमे अव्यक्त अर्थात् प्रकृति मे बुद्धि उत्पन्न हुई, वैसे ही यह मरयू नदी भी उम मानमरोवर मे निकली है, जिसके कमलो का पराग यक्षिणियाँ अपने स्तनों में लगाती हैं।।६० ॥ यह नदी इक्ष्वाकुवशी राजाओ की राजधानी जयोध्या मे मटकर बहती १६ का० १२२ के रघुवशे जलानि या तीरनिखातयूपा वहत्ययोध्यामनु राजधानीम् । तुरङ्गमेधावभृथावतीर्णरिक्ष्वाकुभि पुण्यतरीकृतानि ।। ६१॥ या सैकतोत्सङ्गसुखोचिताना प्राज्यै पयोभि परिवर्धितानाम्। सामान्यधात्रीमिव मानस मे सम्भावयत्युत्तरकोसलानाम् ॥२॥ सेय मदीया जननीव तेन मान्येन राज्ञा सरयूर्वियुक्ता। दूरे वसन्त शिशिरानिलैर्मा तरङ्गहस्तैरुपगृहतीव ।। ६३॥ विरक्तसन्ध्याकपिश पुरस्ताद्यतो रज पार्थिवमुज्जिहीते। शङ्के हनूमत्कथितप्रवृत्ति प्रत्युद्गतो मा भरत ससैन्य ।। ६४।। अद्धा श्रिय पालितसङ्गराय प्रत्यर्पयिष्यत्यनघा स साधु । हत्वा निवृत्ताय मृधे खरादीन्सरक्षिता त्वामिव लक्ष्मणो मे ॥६५॥ असौ पुरस्कृत्य गुरु पदाति । पश्चादवस्थापितवाहिनीक । वृद्धरमात्यै सह चीरवासा मामग्रंपाणिर्भरतोऽभ्युपैति ॥६६॥ पित्रा विसृष्टा मदपेक्षया य श्रिय युवाऽप्यङ्कगतामभोक्ता। इन्ति वर्षाणि तया सहोग्रमभ्यस्यतीव व्रतमासिधारम् ॥ ७॥ एतावदुक्तवति दाशरथौ तदीयामिन्छा विमानमधिदेवतया विदित्वा । ज्योतिष्पथादवततार सविस्मयाभिरुद्वीक्षित प्रकृतिभिर्भरतानुगाभि ॥ ६८॥ तस्मात्पुर सविभीषणदर्शितेन सेवाविचक्षणहरीश्वरदत्तहस्त । यानादवातरददूरमहीतलेन मार्गेण भगिरचितस्फटिकेन राम ॥६९॥ है। इसके तट पर यत्र-तत्र यज्ञों के खम्भे गडे हुए हैं, जिनमें बाँधकर पशुओ की बलि दी जाती थी। अश्वमेध करने के बाद मूर्यवंशी राजाओ ने जो इममे स्नान किया है, उससे इसका जल पवित्र हो गया है॥ ६१ ॥ मैं इस नदी का बड़ा आदर करता हूँ। क्योकि यह उत्तरकोमल के राजाओं की धाय है। इसी की बालू मे खेल-खेलकर वे पलते हैं और इसा का मीठा जल पीकर परिपुष्ट होते हैं ।। ६२ ।। माननीय महाराज दशरथ मे बिछुडी हुई मेरी माता के ममान यह मरय अपने ठडे वायु वाले तरग रूपी हाथ उठा रही है, जैसे इतने ऊँचे मे ही मुझे गले लगा लेना चाहती है ।। ६३ ।। उधर लाल मन्ध्या के समान जो धूल पृथ्वी से उठ रही है, उससे ऐमा जान पडता है कि हनुमानजी के द्वारा मेरे आगमन का समाचार सुनार भरत मेना के साथ मेरा स्वागत करने आ रहे हैं।। ६४।। सर-दृषण आदि राक्षसों को मार कर मैं जब लौटा था, उस समय जेसे लक्ष्मण ने तुम्हे मेरे हाथो मुरक्षित रूप मे मोप दिया था, वैसे ही अब मैं वन वाम की अवधि पूरी करके लौटा हूँ तो ऐमा ल्गता है कि मज्जन भरत मुझे मुरक्षित राज्यलक्ष्मी अवश्य ही मौंप देगे। ६५ ।। गेरुआ वस्त्र पहने, पैदल चलते हुए तथा हाथ मे पूजन-सामग्री लिये हुए मन्त्रियो के साथ भरत मेरी ही ओर आ रहे हैं। देसो, उनके आगे-आगे वमिष्ठजी और पीछे-पीछे सेना चल रही है।। ६६ ।। जैसे कोई मुन्दर स्त्रो क्मिी युवा पुरुष की गोद मे आकर बैठ जाय जऔर वह उसके माथ भोग न करके तल्वार की धार पर चलने के समान कठोर इन्द्रियो को वश में रखने का व्रत ले ले, वैसे ही भरत ने भी पिता की दी हुई राज्यलक्ष्मी को भोगने की शक्ति रहते हुए भी मेरे कारण उसका भोग न करके कठिन अमिधार व्रत का पालन किया है।। ६७ ।। राम ऐसा कह ही रहे थे कि राम की इच्छा को ही विमान का चालक मानकर वह विमान आकाश मे नीचे उतर आया और भरतजी के पीछे चलने वाली मारी विस्मित जनता आख फाड-फाडकर उसे देखने लगी ।। ६८।। तब सेवा मे चतुर सुग्रीव के हाथों का सहारा लेकर स्फटिकमणि-जटित मीढी द्वारा रामचन्द्रजी विमान से नीचे उतरे और प्रणम्य र त्रयोदश सर्ग १२३ इक्ष्वाकुवशगुरवे प्रयत सभातर भरतमर्थ्यपरिग्रहान्ते। पर्यश्रुरस्वजत मूर्धान चोपजघ्रौ तद्भक्त्यपोढपितृराज्यमहाभिषेके ॥ ७० ॥ श्मश्रुप्रवृद्धिनिताननविक्रियाश्च प्लक्षान्प्ररोहजटिलानिव मन्त्रिवृद्धान् । अन्वग्रहोत्प्रणमत शुभदृष्टिपातैर्वार्तानुयोगमधुराक्षरया च वाचा॥७१॥ दुर्जातबन्धुरयमृक्षहरीश्वरो मे पौलस्त्य एष समरेषु पुर प्रहर्ता। इत्यादृतेन कथिती रघुनन्दनेन व्युत्क्रम्य लक्ष्मणमुभो भरतो ववन्दे ।।७२।। सौमित्रिणा तदनु सससृजे स चैनमुत्थाप्य नम्रशिरस भृशमालिलिङ्ग। रूढेन्द्रजित्पहरणव्रणकर्कशेन क्लिश्यनिवास्य भुजमध्यमुर स्थलेन ॥७३॥ रामाजया हरिचमूपतयस्तदानों कृत्वा मनुष्यवपुरारुरुहुर्गजेन्द्रान् । तेषु क्षरत्सु बहुधा मदवारिधारा शैलाधिरोहणसुखान्युपलेभिरे ते॥७४ ।। सानुप्लव प्रभुरपि क्षणदाचराणा भेजे रथान्दशरथप्रभवानुशिष्ट । मायाविकल्पचितैरपि ये तदोयैर्न स्यन्दनैस्तुलितकृत्रिमभक्तिशोभा ।।७५ ॥ भूयस्ततो रघुपतिर्विलसत्पताकमध्यास्त कामगति सावरजो विमानम् । दोषातन बुधबृहस्पतियोगदृश्यस्तारापतिस्तरलविद्युदिवाभवृन्दम् ।।७६ ॥ तनेश्वरेण जगता प्रलयादिवोर्वी वर्षात्ययेन रुचमभ्रघनादिवेन्दो । रामेण मैथिलसुता दशकण्ठकृन्ट्रात् प्रत्युद्धृता धृतिमती भरतो ववन्दे ॥७७॥ विभीषण उनके आगे-आगे मार्ग दिसलते हुए चले ॥६९ ॥ मुशिक्षित राम ने पहले इक्ष्वाकुवश के कुलगुरु वमिष्ठजी को प्रणाम क्यिा। फिर अर्घ्य ग्रहण करके आँसो मे आँसू भरकर उन्होंने पहले शत्रुघ्न समेत भरतजी को छाती मे लगाया, फिर उना वह मस्तर मूंघा, जिसने राम के भक्तिवश राज्याभिषेक भी अस्वीकृत कर दिया था।॥ ७० ॥ मूंछ और दाढी बढ़ जाने मे मत्रिगण ऐसे दीख रहे थे कि जैसे घनी जटा वाले बरगद के वृक्ष हों। तब राम ने प्रेमभरी आँखो द्वारा मूक भाषा मे उनसे कृपापूर्वक कुशल-क्षेम पूछा ।।७१ ।। भरतजी को सुग्रीव का परिचय देते हुए राम ने कहा कि ये वानरों और भालुओ के सेनापति हैं और बड़े गाढे दिनों में ये हमारे काम आये हैं। फिर विभीषण का परिचय देते हुए कहा कि ये पुलस्त्यकुल में उत्पन विभीषण हैं। ये युद्ध के समय हममे आगे बढ़कर शत्रुओ पर प्रहार करते थे। यह सुनकर भरतजी ने लक्ष्मण को छोडकर पहले उन्हीं दोनों की वन्दना की।७२ ।। तब भरतजी लक्ष्मण से मिले और प्रणाम के लिए झुके हुए लक्ष्मण का मस्तक उठाकर मेघनाद के प्रहारों से कठोर उनको छाती को अपनी भुजाओ मे महलाते हुए उन्हें अपनी छाती मे लगा लिया ।। ७३ ॥ राम के कथनानुमार वानरों और भालुओ के सेनापति मनुष्यो का वेश धारण करके हाथियों पर चढ गये। उन हाथियो के मस्तक से मद को धारा बह रही थी, अत मूंट की ओर से चढते समय उसको ऐसा आनन्द मिला कि मानो झरने वाले पहाडो पर चढ़ रहे हो।।७४॥ राम की जाज्ञा से विभीषण और उनके माथी रथों पर चढ गये। वे रथ यद्यपि मनुष्यों के बनाये हुए थे, फिर भी इतो मुन्दर थे कि राक्षसों की माया से निर्मित रथ भी उनकी सुन्दरता के आगे फीके लगते थे।।७५ ।। जैसे बुध और बृहस्पति के साथ चन्द्रमा मन्ध्या को बिजली वाले बादलो पर बैठता है, वैसे ही राम भी भरत और लक्ष्मण के साथ पताकाओं से अलत और इच्छानुसार चलने वाले पुष्पक विमान पर फिर चढ गये।।७६ ।। आदिवराह ने जैसे प्रलय से पृथ्वी को उबार लिया था और जैसे वर्षा बीतने पर शरद् ऋतु बादलों से चाँदनी छीन लेती है, वैसे ही राम ने रावणरूपी मकट से जिन्हे उबार लिया था, विमान मे बैठी हुई उन सीताजी को भरतजी ने जाकर प्रणाम पिया॥७७॥ सीताजी के जिन पवित्र चरणो १२४ क रघुवशे लद्देश्वरप्रणतिभङ्गदृढव्रत तद्वन्द्य युग चरणयोर्जनकात्मजाया । ज्येष्ठानुवृत्तिजटिल च शिरोऽस्य साधोरन्योन्यपावनमभूदभय समेत्य ।।७८॥ क्रोशार्ध प्रकृतिपुर सरेण गत्वा काकुत्स्थ स्तिमितजवेन पुष्पकेण। शत्रुघ्नप्रतिविहितोपकार्यमार्य साकेतोपवनमुदारमध्युवास ॥७९॥ इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये दण्डकात् प्रत्यागमनो नाम त्रयोदश सर्ग ॥१३॥ ने रावण की प्रणय-प्रार्थना को दृढता से ठुमरा दिया था, उन पर जब भरतजी ने बड़े भाई को भक्ति के कारण बढ़ी हुई जटावाला अपना मस्तक रखा तो उन दोनो ने आपस में मिलकर एक-दूसरे को पवित्र कर दिया ।। ७८ ।। उस समय आगे-आगे अयोध्या की जनता चल रही थी और पीछे-पीछे वह पुष्पक विमान धीरे-धीरे चला जा रहा था, जिम पर राम विराजमान थे। इस प्रकार आधे कोस तक चलकर उन्होंने अयोध्या के उम मुन्दर उपवन मे डेरा डाला, जिसे पहले से ही शत्रुघ्न ने भलीभाँति सजा रखा था।॥७९॥ इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य मे दण्डक वन से प्रत्यागमन नामक तेरहवाँ सर्ग समाप्त ॥१३ ।।

चतुर्दश सर्ग भर्तु प्रणाशादथ शोचनीय दशान्तर तत्र सम प्रपन्ने। अपश्यता दाशरथी जनन्यौ छेदादिवोपनतरोतत्यौ ॥१॥ उभावुभाभ्या प्रणतो हतारो यथाक्रम विक्रमशोभिनौ तौ। विस्पष्टमसान्धतया न दृष्टौ ज्ञातौ सुतस्पर्शसुखोपलम्भात् ॥२॥ आनन्दज शोकजमश्रु बाष्पस्तयोरशीत शिशिरो बिभेद । गङ्गासरय्वोर्जलमुष्णतप्त हिमाद्रिनिस्यन्द इवावतीर्ण ॥३॥ ते पुनयोनैर्ऋतशस्त्रमार्गाना निवाड़े सदय स्पृशन्त्यौ। अपोप्सित क्षत्रकुलाङ्गनाना न वीरसूशब्दमकामयेताम् ॥ ४॥ क्लेशावहा भर्तुरलक्षणाऽह सोतेति नाम स्वमुदीरयन्तो। स्वर्गप्रतिष्ठस्य गुरोमहिष्यावभक्तिभेदेन वधूर्ववन्दे ॥५॥ उत्तिष्ठ वत्से ! ननु सानुजोऽसौ वृत्तेन भर्ता शुचिना तवैव । कृच्छ्र महत्तोर्ण इति प्रियार्हा तामूचतुस्ते प्रियममिथ्या ॥६॥ अथाभिषेक रघुवशकेतो प्रारब्धमानन्दजलैर्जनन्यो । निर्वर्तयामासुरमात्यवृद्धास्तीर्थाहृतै काञ्चनकुम्भतोयै ॥७॥ सरित्समुद्रान् सरसीश्च गत्वा रक्ष कपीन्द्ररुपपादितानि। तस्यापतन्मूर्ध्नि जलानि जिष्णोविन्ध्यस्य मेघप्रभवा इवाप ॥८॥ उपर्युक्त उपवन मे पहुँचकर राम अपनी दोनों माताओ मे मिले, जो पति के मर जाने से वैसे ही उदास लग रही थीं, जैसे वृक्ष के कट जाने पर उसके सहारे मटी हुई ल्ताएं कुम्हला जाती हैं।। १ ।। पराक्रमी राम और लक्ष्मण ने बारी-बारी मे कौमल्या और मुमित्रा को प्रणाम किया। अपने पुत्रों को देखते ही दोनों माताओ की आँखो मे ऑमू उमड आये, इमलिए वे ऑस भर उन्हें देख भी नहीं सकी, परन्तु पुत्रों के स्पर्शजनित आनन्द से उन्हे पहचान गयी ॥२ जैसे गर्मा के दिनों में हिमालय का शीतल जल गङ्गा और सरयु के गर्म जल को ठडा कर देता है, वैसे ही उन दोनो रानियों की ऑसों मे बहे हुए आनन्द के टटे ऑसुओं ने शोक के गरम ऑमुओ को ठडा कर दिया ।। ३ ।। पुत्रों के शरीर के जिन अगों पर राक्षमो के शस्नों के घाव लगे थे, उन्हे वे दोनो माताए इस प्रकार महलाने लगी, मानो वे धाव अभी ताजे ही हों। उस समय अपने पुत्रो की चोटे देसकर वे इतनी व्याकुल हो गयी कि उन्हें वीर पुत्र की माता कहलाना भी अच्छा नहा ल्गा॥४॥ 'मैं ही पति को कष्ट देने वाली कुलक्षणा मीता हूँ यह कहते हुए सीताजी ने एक जैसी भक्ति के माय स्वर्गवामी समुर को दोनों रानियों के चरण छुए।।५।। उन माताओं ने सीताजी को उठाते हुए बडो प्यारी और मच्ची बात कही—'उठो बेटी। । तुम्हारे ही पातिव्रत के प्रभाव मे राम और लक्ष्मण इम बडे भारी मकट को पार कर मके हैं।॥ ६॥ राम के जिस राज्याभिषेक का आरम्भ माताओं के हर्षभरे जॉमुजो मे हुआ था, वह अभिषेक सोने के घटों मे भरे और तीर्थो मे लाये हुए जल से राम को नहला कर बूढे मन्त्रियों ने मम्पन्न कर दिया ॥७॥ राक्षसों और वानरों के नायकों ने नदियों, ममुद्रो और मरोवरो मे जो जल लाकर दिया, वह अभिषेक के ममय राम के मिर पर वैमे ही गिर रहा था, जैसे विन्ध्याचल की चोटी पर बादलो का जल बरमता है।॥ ८॥ तपस्वी के वेश में भी जो राम बहुत मुन्दर लगते थे, वे अब राजमी वस्त्र पहनकर और भी १२६ रघुवशे तपस्विवेषक्रिययाऽपि तावद् य प्रेक्षणीय सुतरा बभूव । राजेन्द्रनेपथ्यविधानशोभा तस्योदिताऽऽसीत्पुनरुक्तदोषा |॥ ९ ॥ मौलरक्षोहरिभि ससैन्यस्तूर्यस्वनानन्दितपोरवर्ग । विवेश सौधोगतलाजवर्षामुत्तोरणामन्वयराजधानोम्॥१०॥ सौमित्रिणा सावरजेन मन्दमाधूतबालव्यजनो रथस्थ । धृतातपत्रो भरतेन साक्षादुपायसवात इव प्रवृद्ध ॥११॥ प्रसादकालागुरुधूमराजिस्तस्या पुरो वायुवशेन भिन्ना। वनान्निवृतेन रघूत्तमेन मुक्ता स्वय वेणिरिवाबभासे ॥१२॥ श्वभूननानुष्ठितचारवेषा कीरथस्था रघुवीरपत्नीम्। प्रासादवातायनदृश्यबन्धै साकेतनार्योऽअलिभि प्रणेमु ॥१३॥ स्फुरत्प्रभामण्डलमानुसूय सा बिभ्रती 'शाश्वतमगरागम्। रराज शुद्धेति पुन स्वपुर्यं सर्शिता वह्निगतेव भा॥१४॥ वेश्मानि राम परिबर्हन्ति विश्राण्य सौहार्दनिधि सुहृद्य । बाष्पायमाणो बलिमनिकेतमालेस्यशेषस्य पितुर्विवेश ॥ १५ ॥ कृतालिस्तत्र यदम्ब सत्यान्नाभश्यत स्वर्गफलाद्गुरुर्न । तच्चिन्त्यमान सुकृत तवेति जहार लज्जा भरतस्य मातु ॥१६॥ तथैव सुग्रीवविभीषणादीनुपाचरत्कृतिमसविधाभि सङ्कल्पमात्रोदितसिद्धयस्ते क्रान्ता यथा चेतसि विस्मयेन ।। १७ ।। सुन्दर लगने लगे॥९॥ तदनन्तर वृद्ध मन्त्रियों, राधामों और वानरो को साथ लेकर राम अपनी सेना के साथ उस राजधानी अयोध्या मे गये, जो बन्दनवारों से सजायी गयी थी। जहाँ के श्वेत भवनों पर से धान का लावा बरस रहा था और जहाँ के निवामी तुरही आदि वाद्य मुन-सुनकर प्रमन्न हो रहे थे।। १० ।। उस समय लक्ष्मण-शत्रुघ्न राम पर चॅवर डुला रहे थे और भरत हाथ में छत्र लिये हुए थे। इस प्रकार जब राम भाइयों के साथ अयोध्या में प्रविष्ट हुए, तब चारों भाई ऐसे लग रहे थे कि जैसे साम, दाम, दण्ड और भेद--ये चारो उपाय एकत्र हो गये हो॥ ११ ॥ वहाँ के भवनो पर वायु से छितराया हुआ काले अगर का धुआँ ऐमा लग रहा था कि जैसे लौटकर राम ने अयोध्यापुरी का जूडा अपने हाथ मे खोलकर बिखेर दिया हो।।१२।। उन भवनो के झरोखों मे आँस पसारे दोसने वाली अयोध्या की महिलाओ ने हाथ जोडकर उन सीताजी को प्रणाम किया, जो उम ममय पालकी पर चल रही थीं और जिन्हे कौसल्या आदि सामुओं ने बड़े मनोहर ढग मे वस्त्र और आभूषणो द्वारा सजाया था ।। १३ ।। सीताजी के तन पर अब भी वह अमिट कान्ति वाला अङ्गराग ल्गा हुआ था, जो अनसूयाजी ने उनके शरीर मे लगाया था। उममे अग्नि के मदृश देदीप्यमान उनका शरीर ऐसा दीस रहा था कि जैसे पुरवासियो को सीताजी की पवित्रता दिखलाने के लिए राम ने उन्हें फिर अग्नि में बैठा दिया हो।।१४।। मिनषेमी राम ने पहले सुग्रीव आदि मित्रो को सभी मामग्रियो से सजे भवनों मे ठहराया। तब वे अपने पिताजी के निजी घर में गये। वहाँ दशरथजी का चित्रमात्र देसकर राम की आँखों में ऑसू उमड पडे ॥१५॥ कैकेयी उदास बैठी थी। राम ने हाथ जोडकर कहा--- -~-'मा । तुम्हारे ही पुण्य-प्रताप से हमारे पिताजी अपने उस सत्य से नहीं डिगे, जिससे स्वर्ग मिलता है। यदि तुम उनमे वरदान 7 मॉगती तो उन्होंने जो तुम्हे वरदान देने की प्रतिज्ञा की थी, वह झूठी हो जाती।' मो मुनकर कैकेयी के मन मे जो आत्मग्लानि भरी हुई थी कि 'राम मेरे विषय मे न जाने क्या सोचते होगे और मैं उन्हें कैसे मुँह दिखलाऊँगी।' वह मब ग्लानि दूर हो गयी॥१६॥ वहाँ मे लौटकर उन्होंने सुग्रीव-विभीषण आदि मित्रों का भलीभांति ॐ चतुर्दश सर्ग १२७ सभाजनायोपगतान्स दिव्यान्मुनीन्पुरस्कृत्य हतस्य शत्रो । शुश्राव तेभ्य प्रभवादि वृत्त स्वविक्रमे गौरवमादधानम्।। १८॥ प्रतिप्रयातेषु तपोधनेषु सुसाविज्ञातगतार्धमासान् । सीतास्वहस्तोपहृताग्यपूजान्रक्ष कपोन्द्रान्विससर्ज राम ॥१९॥ तच्चात्मचिन्तासुलभ विमान हत सुरारे सह जीवितेन। कैलासनाथोहहनाय भूय पुष्प दिव पुष्पकमन्वमस्त ॥२०॥ पितुर्नियोगाद्वनवासमेव निस्तोर्य राम प्रतिपन्नराज्य । धर्मार्थकामेषु समा प्रपेदे यथा तथैवावरजेषु वृत्तिम् ॥ २१॥ सर्वासु मातृष्वपि वत्सलत्वात्स निर्विशेषप्रतिपतिरासीत्। षडाननापीतपयोधरासु नेता चमूनामिव कृत्तिकासु॥२२॥ तेनार्थवाल्लोभपराङ्मुखेन तेन घ्नता विघ्नभय क्रियावान् । तेनास लोक पितृमान्विनेत्रा तेनैव शोकापनुदेव पुत्री॥२३॥ स पोरकार्याणि समीक्ष्य काले रेमे विदेहाधिपते१हित्रा। उपस्थितश्चारु वपुस्तदीय कृत्वोपभोगोत्सुकयेव लक्ष्म्या ।। २४ ।। तयोर्यथाप्रार्थितमिन्द्रियार्थानासेदुषो सद्मसु चित्रवत्सु । प्राप्तानि दु खान्यपि दण्डकेषु सञ्चिन्त्यमानानि सुसान्यभूवन् ॥२५॥ अथाधिकस्निग्धविलोचनेन मुसेन सीता शरपाण्डुरेण । आनन्दयित्री परिणेतुरासीदनक्षरव्यञ्जितदोहदेन ॥२६॥ स्वागत-सत्कार किया। उन मित्रों को यह देखकर बडा आश्चर्य हुआ कि 'हम जो चाहते हैं, वह तुरन्त मिल जाता है'।।१७।। तदनन्तर राम ने उन अगस्त्य आदि ऋषियो का मतार पिया, जो उन्हें बधाई देने आये थे। उन ऋषियों को बैठाकर उन्होंने अपने शत्रु रावण के जन्म से लेकर मृत्यु तक का वह सब वृत्तान्त मुना, जो राम का गौरव बढाने वाला था।॥ १८ ॥ ऋषियो के चले जाने पर राम ने उन राक्षसों और सेनापतियों को विदा किया, जो अयोध्या में इतने आनन्द मे रहे कि उन्हे पता ही नहीं चला कि आधा महीना क्व बीत गया। चलते ममय सीताजी ने स्वय अपने हाथों से उनकी पूजा की॥१९॥ तब राम ने उस स्वर्ग के फूल जैमे पुष्पक विमान को भी कुबेर के पाम जाने की आज्ञा दे दी, जो इच्छा करते ही उनकी सेवा के लिए आ जाता था और जिमे उन्होंने रावण मे उसके प्राण के साथ-साथ छीन लिया था॥२०॥ इस तरह पिता वो आज्ञा मे वनवाम को अवधि बिताकर राम ने अपने पिता का राज्य पाया । जैसे वे धर्म, अर्थ और काम के माथ ममान व्यवहार करते थे, वैसे ही वे अपने भाइयो के माथ भी ममान प्रेम का बर्ताव करते थे॥२१॥ वे निर्लोभ थे, इसीलिए उन्होने प्रजा पर कोई कर नहीं लगाया। जिमका फल यह हुआ कि थोडे ही दिनों मे प्रजा धनी हो गयी। वे कहीं भी विघ्न नहीं आने देते थे, इसलिए सब लोग प्रमचता से यज्ञ आदि मत्कर्म करने लगे। वे सबको ठीक मार्ग पर चलाते थे, अतएव मब उन्हे पिता के समान मानते थे और विपत्ति पड़ने पर वे सबकी सहायता करते थे, इसलिए वे प्रजा के पुत्र भी थे॥ २२-२३ ॥ वे ठीक ममय पर प्रजा का मब काम देख-भालकर सोताजी के साथ रमण भी करते थे। इसी मे ऐसा लगता था कि मानो राज्यलक्ष्मी ने ही गम के साथ रमण करने की इच्छा से सीता का मुन्दर रूप धर लिया है।॥ २४॥ उम भवन म वे दोनों इच्छानुसार भोग-विलास करते थे, जिसमें वावासकालीन चित्र टंगे थे। उन चित्रो को देख-देखकर दण्डक वन के दुखों का स्मरण करके भी उन्हें मुख ही मिलता था॥२५ ।। अब धीरे-धीरे सीताजी के नेत्रों की शोभा बढने लगी और उनका मुख पके सरपत (मूज) जैसा पीला पड़ने लगा। गर्भ के इन लक्षणों को देखकर ॐ चतुर्दश सर्ग 2 १२९ स सन्निपात्यावरजान् हतौजास्तढिक्रियादर्शनलुप्तहर्षान् कौलीनमात्माश्रयमाचचक्षे तेभ्य पुनश्चेदमुवाच वाक्यम् ।। ३६ ॥ राजर्षिवशस्य रविप्रसूतेरुपस्थित पश्यत कीदृशोऽयम्। मत सदाचारशुचे कलङ्क पयोदवातादिव दर्पणस्य ॥३७॥ पौरेषु सोऽह बहुलीभवन्तमपा तरङ्गेष्विव तैलबिन्दुम् । सोदु न तत्पूर्वमवर्णमीशे आलानिक स्थाणुमिव द्विवेन्द्र ॥३८॥ तस्यापनोदाय फलप्रवृत्तावुपस्थितायामपि निर्व्यपेक्ष । त्यक्ष्यामि वैदेहसुता पुरस्तात् समुद्रनेमि पितुराजयेव ॥ ३९ ॥ अवैमि चैनामनघेति किन्तु लोकापवादो बलवान्मतो मे। छाया हि भूमे शशिनो मलत्वेनारोपिता शुद्धिमत प्रजाभि ॥ ४० ॥ रक्षोवधान्तो न च मे प्रयासो व्यर्थ स वैरप्रतिमोचनाय । अमर्षण शोणितकाझया कि पदा स्पृशन्त दशति द्विजित ॥४१॥ तदेष सर्ग करुणाचतैर्न मे भवद्धि प्रतिषेधनीय । यद्यर्थिता निर्हतवाच्यशल्यान्प्राणान्मया धारयितु चिर व ॥४२॥ इत्युक्तवन्त जनकात्मजाया नितान्तरक्षाभिनिवेशमोशम् । न कश्चन भ्रातृषु तेषु शक्तो निपे मासोदनुमोदितु वा ॥४३॥ स लक्ष्मण लक्ष्मणपूर्वजन्मा विलोक्य लोकत्रयगीतकीर्ति । सौम्येति चाभाष्य यथार्थभाषी स्थित निदेशे पृथगादिदेश ।। ४४ ॥ ही इस क्लङ्क को मिटाया जाय। क्योंकि यशस्वियों को अपना यश शरीर से भी अधिक प्रिय होता है। फिर स्त्री आदि भोग की वस्तुओं की तो बात ही न्यारी है॥३५ ।। निस्तेज राम ने तुरन्त भाइयो को बुलाया। वे भी इनकी दशा देखकर मत रह गये। कलक की बात बतलाते हुए राम ने कहा-- ॥३६ ।। 'यद्यपि मैं मदाचारी और पवित्र हूँ, फिर भी जैसे बरमाती हवा लगने मे स्वच्छ दर्पण भी धुंधला हो जाता है, वैसे ही सूर्यवंशी राजर्षियों के कुल पर मेरे कारण कैमा कलक लग रहा है।। ३७ ॥ पानी की लहरों पर जैमे तेल की बूंद फैल जाती है, वैसे ही इस ममय धर-घर मेरी निन्दा हो रही है। मो जैसे हाथी अपने बन्धन के खूटे से साचार उसे उखाडने की चेष्टा करता है, वैमे ही मैं भी इम कलक को नहीं सह मकूँगा ॥ ३८ ॥ यद्यपि इम समय मीता गर्भिणी है, तथापि अपो कलक को मिटाने के लिए मैं मब मोह तोडकर उसे वैसे ही छोड दूंगा, जैसे पिताजी की आज्ञा मे मैंने राज्य त्याग दिया था।॥ ३९॥ मैं जानता हूँ कि वह निर्दोष है, परन्तु बदनामी मत्य मे भी अधिक बलवती होती है। देखो न, निर्मल चन्द्रविम्ब पर पड़ी हुई पृथ्वी की छाया को लोग चन्द्रमा का क्लङ्क कहते हैं और झूठ होने पर भी सारा ममार इसे ठीक मानता है॥ ४० ॥ अब तुम शायद यह कहोगे कि 'यदि ऐमा ही था तो राक्षमों को क्यों मारा?' उनका उत्तर यह है कि मीता को छुडाने के लिए मैंने जो राक्षमो को मारा, मेरा वह प्रयत्न मीता को निकाल देने से बेकार नहीं कहा जायगा। क्योंकि वह तो मैंने अपनी स्त्री के अपहरण का उन राक्षमों से बदला लिया था। क्योरि जब मॉप पैर मे दब जाता है, तब वह रक्त के लोभ से नहीं, बत्कि बदला लेने के लिए ही डमता है।। ४१ ॥ अतएव यदि तुम लोग इस कलक रूपी बाण को मेरे हृदय निकालकर मुझे जीवित रखना चाहते हो तो केवल मोता की दशा पर दया दिखलाते हुए उमका पक्ष लेकर मेरे इम निश्चय का विरोध न करो॥४१॥ जब भाइयो ने देखा कि राजा राम नितान्त निठुराई करना चाहते हैं, तब भाइयों में से न तो किमी ने उनका समर्थन ही किया और न विरोध ॥ ४३ ।। तीनों लोसे प्रसिद्ध यशस्वी और अपनी बात के धनी राम १७ का० सा १३० • रघुवशे , प्रजावती दोहदशसिनी ते तपोवनेषु स्मृहयालुरेव। सत्व रथी तद्वयपदेशनेया प्रापय्य वाल्मीकिपद त्यजैनाम्॥४५॥ स शुश्रुवान्मातरि भार्गवेण पितुर्नियोगात्महत द्विषद्वत्। प्रत्यग्रहीदग्रजशासन तदाज्ञा गुरुणा विचारणीया ॥४६॥ अयानुकूलश्रवणप्रतीतामत्रस्नुभिर्युक्तधुर तुर । सुमन्त्रप्रतिपन्नरश्मिमारोप्य वैदेहसुता प्रतस्थे॥४७॥ सा नीयमाना रुचिरान्प्रदेशान्प्रियङ्करो मे प्रिय इत्यनन्दत् । नाबुद्ध कल्पद्रुमता विहाय जात तमात्मन्यसिपत्रवृक्षम् ॥४८॥ जुगूह तस्या पथि लक्ष्मणो यत्सव्येतरेण स्फुरता तदक्ष्णा । आख्यातमस्यै गुरु भावि दु खमत्यन्तलुप्तप्रियदर्शनेन ॥४९॥ दुनिमित्तोपगताद्विषादात्सद्य परिम्लानमुखारविन्दा। राज शिव सावरजस्य भूयादित्याशशसे करणैरबाही ॥५०॥ गुरोर्नियोगानिता वनान्ते साध्वी सुमित्रातनयो विहास्यन्। अवार्यतेवोत्थितवीचिहस्तै होहित्रा स्थितया पुरस्तात् ॥५१॥ रथात्स यन्त्रा निगृहीतवाहात्ता भ्रातृजाया पुलिनेऽवतार्य। गङ्गा निषादाहृतनौविशेषस्ततार सन्धामिव सत्यसव ॥५२॥ अथ व्यवस्थापितवाकश्चित्सौमित्रिरन्तर्गतबाष्पकण्ठ औत्पातिको मेघ इवाश्मवर्ष महीपते शासनमुजगार ॥५३॥ ने जब देखा कि लक्ष्मण उनकी आज्ञा मानो को तैयार हैं, तब वे उनसे बोले- 'लक्ष्मण | तुम बडे अच्छे हो'। यह कहकर उन्हें एकान्त मे ले गये और कहने लगे--॥४४॥ तुम्हारी गर्भिणी भाभी तपोवन देखना चाहती ही हैं। सो तुम उन्हें इसी बहाने रथ पर बिठाकर वाल्मीकिजी के आश्रम पर छोड़ आओ॥ ४५ ॥ लक्ष्मण ने सुन रखा था कि पिता की आज्ञा से परशुरामजी ने अपनी माता को वैसे ही निर्दयतापूर्वक मार डाला था, जैसे कोई अपने शत्रु को मारे । सो उन्होने पिता के ममान राम की आज्ञा मान ली। क्योंकि बड़ों की आज्ञा मे मीन-मेस निकालना ठीक नहीं होता ॥४६ ।। उधर सीताजी यह सुनकर प्रसन्न हुई कि लक्ष्मण हमे तपोवन दिखाने ले जायेंगे। तदनुसार लक्ष्मणजी उन्हे ऐसे रथ पर चढाकर ले चले, जिमे स्वर मुमत हॉक रहे थे और जिमके घोडे ऐसे मुशिक्षित थे कि रथ के चलते ममय गर्भिणी मीता को तनिक भी हचक नहीं लगती थी।॥४७॥ मनोहर घदेशों में होकर रथ पर जाती हुई मोताजो यह सोचकर बड़ी प्रसन्न थीं कि मेरे प्राणप्रिय पति मदा मेरे मन की ही बात करते हैं। उन्हें क्या पता कि इस समय वे मेरे लिए मनोरथ पूरा करने वाले कल्पवृक्ष के बदले उम अमिपत्र के वृक्ष सदृश कष्टदायक हो गये हैं, जिसके पत्ते तलवार की धार जैमे तीक्ष्ण होते हैं।। ४८ । लक्ष्मण ने मीताजी को मार्ग में कुछ नहीं बतलाया कि 'तुम पर क्या विपत्ति आने वाली हैं' पर तु सीताजी के दाहिने नेत्र ने फडक कर आने वाले दु ख को सूचना दे ही दी॥४९॥ यह अमगुन देसते ही उसका मुंह उतर गया और वे मनाने लगी कि भाइयों के साथ राम मदा मुखी रहे।।५०॥ मार्ग मे गङ्गाजी पां। उनमे जो लहरें उठ रही थीं, वे बड़े भाई को जाज्ञा मे पतिव्रता सीता को वन मे छोडने के लिए ले जाते हुए लक्ष्मण से मानो हाथ हिला हिलाकर कह रही थी कि 'ऐमा न करो' ।। ५१ ॥ गङ्गातट पर पहुँचकर सारथी ने रास खींच ली। तब प्रतिज्ञा के सच्चे लक्ष्मण ने सीताजी को रेती पर उतारा और केवट जो भाव लाया, उस पर चढकर मोताजी के साथ गङ्गाजी से पार हो गये। साथ ही उस प्रतिज्ञा से भी पार हो गये, जो उन्होंने सीता को गङ्गापार छोड़ने के लिए राम मे की थी॥५२॥ उस पार पहुँच तथा त्वा ॐ चतुर्दश सर्ग 0 ततोऽभिषङ्गानिलविप्रविद्धा प्रभ्रश्यमानाभरणप्रसूना। स्वमूर्तिलाभप्रकृति धरित्री लतेव सोता सहसा जगाम ॥५४॥ इक्ष्वाकुवशप्रभव कथ त्यजेदकस्मात्पतिरार्यवृत्त । इति क्षिति सशयितेव तस्यै ददौ प्रवेश जननी न तावत्॥५५॥ सा लुप्तसज्ञा न विवेद दु ख प्रत्यागतासु समतप्यतान्त । तस्या सुमित्रात्मजयललब्धो मोहादभूत्कष्टतर प्रबोध ॥५६॥ चावदद्वर्तुरवर्णमार्या निराकरिष्णोजिनादृतेऽपि। आत्मानमेव स्थिरदु खभाज पुन पुनर्दुष्कृतिन निनिन्द ॥५७।। आश्वास्य रामावरज सती तामाख्यातवाल्मीकिनिकेतमार्ग । निम्नस्य मे भर्तृनिदेशरीक्ष्य देवि । क्षमस्वेति बभूव नम्र ॥५८॥ सोता तमुत्थाप्य जगाद वाक्य प्रीताऽस्मि ते सौम्य चिराय जीव । विडोजसा विष्णुरिवाग्रजेन भात्रा यदित्य परवानसि त्वम्॥५९ ॥ श्वधूजन सर्वमनुक्रमेण विज्ञापय प्रापितमत्प्रणाम । प्रजानिषेक मयि वर्तमान सूनोरनुध्यायत चेतसेति ॥६० ॥ वाच्यस्त्वया मवचनात्स राजा वही विशुद्धामपि यत्समक्षम्। मा लोकवादश्रवणादहासी श्रुतस्य कि तत्सदृश कुलस्य ॥ ६१ ।। कल्याणबुद्धेरथवा तवाय न कामचारो मयि शङ्कनीय । ममैव विपाविस्फूर्जथुरपसा ।। ६२ ।। जन्मान्तरपातकाना आँसू रोककर लक्ष्मण ने रुंधे हुए गले से मीताजी को राजा राम की आज्ञा इस तरह सुनायी, जैसे कोई भयकर बादल ओले बरमाता हो ॥५३॥ लू लगने मे जैसे लता के फूल झड जाते हैं और लता सूखकर पृथ्वी पर गिर पडती है, वैसे ही यह अपमानजनक बात सुनकर मीता के आभूषण गिर गये और वे स्वय अपनी माँ पृथ्वी की गोद मे गिर पड़ीं॥५४॥ पृथ्वी ने उस समय सीताजी को जैसे इस दुविधा मे अपने भीतर नहीं ममेट लिया कि इक्ष्वाकुवशी और मदाचारा पति राम इस प्रकार सोताजी को अचानक क्यों छोड़ेगे ॥५५॥ मूर्छा आ जाने से उन्हे उम ममय तो दुख नहीं हुआ, परन्तु जब वे मूर्छा से जागी, तब उनके हृदय मे बड़ी व्यथा हुई। जब लक्ष्मण ने प्रयत्न करके उनकी मूर्छा दूर की तो वह बात उन्हे मूर्छा मे भी अधिक अखरी ॥५६ || माताजी इतनी माध्वी थी कि निरपराध पत्नी को घर से निकालने वाले अपने पति को उन्होंने कुछ भी नहीं कहा, बल्कि बार-बार वे नित्य दुखदायी अपने आप को ही कोमने लगीं ॥५७ ॥ तब लक्ष्मण ने उन्हे बहुत ममझाया और वाल्मीकि के आश्रम का मार्ग दिखाकर कहा-'देवि । मैं पराधीन हूँ। अतएव स्वामी की आज्ञा से मैंने आपके साथ जो कठोर व्यवहार किया है, उसे क्षमा कीजिए'। इस प्रकार कहकर वे सीता के पैरों पर लोट गये।। ५८॥ सीताजी ने लक्ष्मण को उठाया और बोलीं- 'हे मौम्य । मैं तुम पर प्रमन्न हूँ। तुम बहुत दिनों तक जियो । क्योंकि जैसे इन्द्र के छोटे भाई विष्णु मदा अपने बड़े भाई की आज्ञा मानते हैं, वैसे ही तुम भी अपने बड़े भाई की आज्ञा मानते हो।।५९॥ यहाँ से जाकर तुम सभी सामुओं से मेरा प्रणाम कहकर कह्ना कि 'मेरे गर्भ मे आपके पुत्र का जो तेज है, आपलोग हृदय से उसका कुशल मनाते रहियेगा' ।। ६० ।। बाद मे अयोध्या के राजा मे मेरी जबाना कला कि-"आपने अपने सामने हो मुझे अग्नि में शुद्ध किया था। सो इस समय अपयश के डर मे जो आपने मुझे छोड दिया है वह क्या उस प्रसिद्ध कुल के अनुरूप है, जिसमें आपने जन्म लिया है । ॥६१ ॥ परन्तु नहीं, आप तो सबकी तस्या रघुवशे उपस्थिता पूर्वमपास्य लक्ष्मी वन मया सार्धमसि पपन्न । तदास्पद प्राप्य तयाऽतिरोधात्सोढास्मि न त्वद्भवने वसन्ती॥ ६३॥ निशाचरोपप्लुतभर्तृकाणा तपस्विनीना भवत पसादात्। भूत्वा शरण्या शरणार्थमन्य कथ प्रपत्स्ये त्वयि दीप्यमाने॥६४॥ कि वा तवात्यन्तवियोगमोघे कुर्यामुपेक्षा हतजीवितेऽस्मिन् । स्याद्रक्षणीय यदि मे न तेजस्त्वदीयमन्ततिमन्तराय ॥६५॥ साऽह तप सूर्यानविष्टदृष्टिल प्रसूतेश्चरितु यतिष्ये। भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोग ॥ ६६ ।। नृपस्य वर्णाश्रमपालन यत्स एव धर्मो मनुना प्रणीत । निर्वासिताऽप्येवमतस्त्वयाऽह तपस्विसामान्यमवेक्षणीया॥ ६७॥ तथेति तस्या प्रतिगृह्य वाच राजानुजे दृष्टिपथ व्यतीते। सा मुक्तकण्ठ व्यसनातिभाराचक्रन्द विग्ना कुररीव भूय ॥ ६८॥ नृत्य मयूरा कुसुमानि वृक्षा दर्भानुपातान्विजहीरण्य । प्रपन्ने समदु खभावमत्यन्तमासीद्रुदित वनेऽपि ॥६९ ।। तामभ्यगच्छदितानुसारी कवि कुशेध्माहरणाय यात | निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्य श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोक ॥७॥ तमभु नेत्रावरण प्रमृज्य सीता विलापाद् विरता ववन्दे । तस्यै मुनिर्दोहदलिङ्गदर्शी दाश्वान् सुपुत्राशिमित्युवाच ॥ ७१ ।। भलाई करते हैं। आप अपने मन में हमारे साथ ऐसा व्यवहार नहीं कर सकते। यह सब मेरे पूर्वजन्म के पापो का ही असह्य फल है।६२॥ कुछ समय पहले आप जिम राज्यलक्ष्मी को ठुकराकर मेरे माथ वन मे चले गये थे, वह राज्यलक्ष्मी मुझमे रूठ गयी है और उसे आपके घर मे मेरा रहना असह्य हो गया है ।। ६३ ।। पिछली बार वनवास के समय आपकी कृपा से मैंने बहुत-सी ऐमी तपस्विनियो को अपने आश्रम मे आश्रय दिया था, जिनके पतियों को राक्षसों ने मार डाला था। अब आप ही तलाइये कि आपके रहते में शरणार्थिनी बनकर किम मुँह मे उन्ही तपस्विनियों के पास जाऊँगी?॥६४॥ मेरे गर्भ मे आया हुआ आपका वह तेज यदि बाधक न होता, जिमकी रक्षा करना आवश्यक है, तो मैं आपमे सदा के लिए बिछुडे हुए अपने प्राण भी त्याग देती ।। ६५ ।। किन्तु पुत्र हो जाने पर में सूर्य मे दृष्टि लग्णार ऐमी तपस्या करूँगी कि अगले जन्म मे भी आप ही मेरे पति हों। तब आपसे मुझे अलग न होना पड़ेगा ।। ६६ ।। मनु ने कहा है कि राजाओ का धर्म वर्णा और आश्रमो की रक्षा करना है'। इसलिए घर से निकाल देने पर भी आप यह ममझकर मेरो देख-भाल करते रहियेगा कि सीता भी एक साधारण तपस्विनी हैं॥६७॥ यह सुनकर लक्ष्मण ने कहा- 'मैं सब कुछ कह दूंगा'। यह कहकर वे ज्यों ही वहाँ से चलर ऑसो मे ओझल हुए, त्यों ही उम महती विपत्ति के भार से व्याकुल होकर सीताजी डरी हुई कुररी के समा। रोने लगीं ।। ६८ । उसका रदन मुनकर मोरो ने नाचना बन्द कर दिया, वृक्ष फूल के ऑसू गिराने लगे और हरिणियो ने मुँह मे भरी हुई धाम का ग्राम त्याग दिया। इस प्रकार महारानी सीताजी के दुख मे दुखी होकर माग वा रोने लगा।।६९ ॥ जिन वाल्मीकि ऋषि का शोक व्याध के हाथ से मारे हुए क्रौंच को देखकर श्लोक बनकर निकल पटा था, वे उस समय कुशोत्पाटन को निकले थे। रोदन का शब्द मुनार वे माताजी के पाम आये॥५०॥ उन्हे देखा तो सीताजी ने आँसू पोछकर चुपचाप प्रणाम किया। गर्भ के चिह्न देखकर मषि ने उन्हे आशीर्वाद दिया कि 'तुम पुत्रवती । चतुर्दश सर्ग है जाने विसृष्टा प्रणिधानतस्त्वा मिथ्यापवादक्षुभितेन भर्ना । तन्मा व्यथिष्ठा विषयान्तरस्थ प्राप्तासि वैदेहि । पितुर्निकतम्॥७२॥ उत्खातलोकत्रयकण्टकेऽपि सत्यप्रतिज्ञेऽप्यविकत्यनेऽपि। त्वा प्रत्यकस्मात् कलुषप्रवृत्तावस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे मे॥७३॥ तवोरुकोर्ति श्वशुर ससा मे सता भवोच्छेदकर पिता ते। धुरि स्थिता त्व पतिदेवताना कि तन्न येनासि ममानुकम्प्या ।।७४॥ तपस्विससविनीतसत्त्वे तपोवने वीतभया वसास्मिन् । इतो भविष्यत्यनघप्रसूतेरपत्यसस्कारमयो विधिस्ते।।७५॥ अशून्यतोरा मुनिसन्निवेशैस्तमोपहन्त्री तमसा वगाए । तत्सैकतोत्सङ्ग लक्रियाभि सम्पत्स्यते ते मनस प्रसाद ॥६॥ पुष्प फल चार्तवमाहरन्त्यो बीज च बालेयमकृष्टरोहि। विनोदयिष्यन्ति नवाभिषङ्गामुदारवाचो मुनिकन्यकास्त्वाम् ।।७७ ॥ पयोघटैराश्रमबालवृक्षान् सवर्धयन्ती स्वबलानुरूमै । असशय प्राक्तनयोपपत्ते स्तनन्धपप्रीतिमवाप्स्यसि त्वम्।।७८॥ अनुग्रहप्रत्यभिनन्दिनी ता वाल्मीकिरादाय दयार्द्रचेता । साय मृगाध्यासितवेदिपार्श्व स्वमाश्रम शान्तमृग निनाय ॥७९॥ तामर्पयामास च शोकदीना तदागमप्रोतिषु तापसीषु । निर्विष्टसारा पितृभिर्हिमाशोरन्न्या कला दर्श इवौषधीषु ।। ८०॥ होओ' । उमके बाद वे बोले-॥७१॥ "बेटी वैदेहि । मैंने योगबल मे जान लिया है कि तुम्हारे पति ने झूठे अपयश से डरकर तुम्हे घर से निकाल दिया है। पुत्री। तुम अपने पिता के ही घर आ गयी हो, अब शोक त्याग दो॥७२॥ यद्यपि राम ने तीनों लोकों का दुख दूर कर दिया है, वे अपनी प्रतिज्ञा के पक्के हैं और कभी अपने मुँह से अपनी बडाई नहीं करते, फिर भी तुम्हारे साथ उन्होंने जो यह अनुचित व्यवहार किया है, इसे देखकर मुये उन पर बड़ा क्रोध आ रहा है ।।७३ ।। तुम्हारे यशस्वी ममुर दशरयजी मेरे मित्र थे और तुम्हारे पिता जनकजी भी ज्ञानोपदेश देकर बहुत मे सज्जनों को समार के बन्धन मे छुदाते रहते हैं। तुम स्वय भी पतिव्रताओं मे सर्वश्रेष्ठ हो। तब फिर क्या कारण है कि जिसमे मैं तुम्हारे ऊपर कृपा न करूंगा।।७४॥ तपस्वियों के समर्ग में रहते-रहते यहाँ के सभी जीव बड़े मीधे हो गये हैं। ये किमी का नहीं छेडते। मो इमी आश्रम मे तुम भी निर्भय भाव मे रहो। तुम्हारी पवित्र सन्तान का जातकर्म आदि मस्कार यहीं होगा ।। ७५ ॥ तमोगुण मिटानेवाली जिम तममा के तट पर तपस्वी लोग सदा रहते हैं, उममें स्नान करके तुम उमकी रेती पर देवताओं की पूजा करो। इससे तुम्हारा मन प्रसन्न रहा करेगा॥७६ ॥ आश्रम की मुनि-मन्याएँ तुम्हे मब ऋतुओं के फूल-फल और पूजा के योग्य तिनी आदि अन्न लफर दिया करेंगी और मीठी-मीठी बाते करके तुम्हारा मन बहलायेंगी ॥७७|| जो तुमसे उठ सके, ऐसे घड़े लेकर तुम आश्रम के पौधों को प्रेम से सींचो । इममे लाभ यह होगा कि बच्चा पैदा होने के पहले ही तुम यह सौख लोगो कि बच्चों को प्यार कैसे करना चाहिए"॥७८ ।। उनको कृपा को सराहती हुई सीता को दयालु वात्मीकि अपने माथ आश्रम मे ले गये। मॉझ हो जाने के कारण बहुत से मृग वहाँ वेदो को घेरे बैठे थे और मिह आदि जन्तु चुपचाप आँखे मूंदे हुए पडे थे॥७९॥ अमावास्या जैसे जटी-बूटियों और लता-वृक्षो को चन्द्रमा को वह मारहीन एत अन्तिम कला सौंप देती है, जिसका अमृत पितर साच चुके रहते हैं, वैसे ही ऋषि ने भी शोक में व्याकुल मोता -

पञ्चदश सर्ग
कृतसीतापरित्याग स रत्नाकरमेखलाम् । बुभुजे पृथिवीपाल पृथिवीमेव केवलाम्॥ १ ॥
लवणेन विलुप्तेज्यास्तामिस्रेण तमभ्ययु । मुनयो यमुनाभाज शरण्य शरणार्थिन ॥२॥
अवेक्ष्य राम ते तस्मिन्न प्रजहु स्वतेजसा । त्राणाभावे हि शापास्त्रा कुर्वन्ति तपसो व्ययम् ॥३॥
प्रतिशुश्राव काकुत्स्थस्तेभ्यो विघ्नप्रतिक्रियाम् । धर्मसरक्षणार्थव प्रवृत्ति वि शाणि ॥ ४ ॥
ते रामाय वधोपायमाचल्युर्विबुधद्विष । दुर्जयो लवण शूली विशूल प्रार्यतामिति ॥ ५ ॥
आदिदेशाथ शत्रुघ्न तेषा क्षेमाय राघव । करिष्यन्निव नामास्य यथार्थमरिनिग्रहात्॥ ६ ॥
य कश्चन रघूणा हि परमेक परन्तप । अपवाद इवोत्सर्ग व्यावर्तयितुमीश्वर ॥ ७ ॥
अग्रजेन प्रयुक्ताशीस्ततो दाशरथी रथी । ययौ वनस्थली पश्यन्पुष्पिता सुरभीरभी ॥ ८ ॥
रामादेशादनुगता सेना तस्यार्थसिद्धये । पश्चादध्ययनार्थस्य धातोरधिरिवाभवत्॥ ९ ॥
आदिष्टवा मुनिभि स गच्छस्तपता वर । विरराज रथप्रष्ठलिखिल्यैरिवाशुमान् ॥१०॥
तस्य मार्गवशादेका बभूव वसतिर्यत । रथस्वनोत्कण्ठमृगे वाल्मीकीये तपोवने ॥११॥
तमृषि पूजयामास कुमार क्लान्तवाहनम् । तप प्रभावसिद्धाभिर्विशेषप्रतिपत्तिभि ॥१२॥
तस्यामेवास्य यामिन्यामन्तर्वत्नी प्रजावतो । सुतावसूत सम्पन्नौ कोशदण्डाविव क्षिति ॥१३॥
सीताजी को छोड़ने के बाद राजा रामचन्द्रजी ने केवल ममुद्रों से परिवेष्टित पृथ्वी का ही भोग
किया, किसी दूसरी स्त्री के सम्पर्क की बात भी नहीं मोची ॥ १॥ तभी एक दिा यमुनातटनिवासी कुछ
तपस्वी शरणागतवत्सल राम के पास शरण मांगने आये। क्योकि तामसी लवणासुर नामक राक्षस के
उपद्रवों से उनकी यज्ञ आदि क्रियाएँ बन्द हो गयी यो॥२॥ यदि तपस्वी चाहते तो अपने तेज से
ही लवणासुर को नष्ट कर डालते, किन्तु उन्होंने ऐसा करना ठीक नहीं समझा। क्योकि जिनमे शाप
देकर नष्ट करने की शक्ति होती है, वे तपस्या मे अर्जित तेज को तभी ऐसे काम में लगाते हैं, जब
कोई उनका दूमरा रक्षक मुलभ न हो॥३॥ राम ने उनके विघ्न दूर करने का वचन दे दिया। क्योकि धर्म
की रक्षा के लिए ही तो भगवान् समार में अवतार लेते हैं॥४॥ उन्हीं मुनियों ने राम को उसके वध
का उपाय बतलाते हुए कहा कि जब तक लवणासुर के हाथ मे त्रिशूल रहेगा, तब तक उसको मारना
कठिन है। अत उम पर ऐसे समय प्रहार करना चाहिए कि जब उसके हाथ मे त्रिशूल न रहे॥५॥
तब राम ने शत्रुघ्न को उन मुनियों को रक्षा का आदेश दिया। जैसे उनके हाथों में शत्रु का महार
कराकर वे उनका 'शत्रुघ्न' नाम सार्थक करना चाहते थे॥६॥ जैसे व्याकरणशास्त्र में कोई अपवादवाला
सूत्र व्यापक नियमवाले सूत्र को भी उलट देता है, वैसे ही रघु के वश का प्रत्येक व्यक्ति शत्रु को पछाड़
सकता था।॥७॥ निर्भय शत्रुघ्न जब रथ पर चढ़कर चले, तब राम ने उन्हे आशीर्वाद दिया और वे
सुगन्धित वनों की शोभा निहारते हुए चले॥८॥ शत्रुघ्न के माथ राम की आज्ञा में जो सेना गयी थी,
वह वैसे ही व्यर्थ थी, जैसे अध्ययन शब्द में इड् धातु मे लगा हुआ अधि उपमर्ग व्यर्थ होता है। इसी
प्रकार लवणासुर को अकेले शत्रुघ्न जीत सकते थे॥९॥ रथ पर चढ़े हुए सूर्य को जैसे बालखिल्य ऋषि
मार्ग दिखलाते हुए चलते हैं, वैसे ही रथ पर बैठे शत्रुघ्न को भी वे मुनि लोग मार्ग दिखलाते हुए चल
रहे थे॥१०॥ मार्ग मे जाते समय उन्होंने पहली रात वाल्मीफिजी उस आश्रम पर वितायी, जहाँ
मृग रथ का शब्द सुनकर बड़े चाव से उनको देखने लगे थे॥११ ।। शत्रुघ्नजी के घोडे थक गये थे।
इसलिए रुकना आवश्यक हो गया था। अपनी तपस्या के प्रभाव म आतिथ्य की विशिष्ट मामग्री जुटाकर
वाल्मीकिजी ने शत्रुघ्न का बड़ा सत्कार किया ॥ १२ ॥ उसी रात मे उनकी गर्भिणी भाभी मीता ने दो
तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया, जैसे पृथ्वी अपने राजा के लिए धन तथा मेना उत्पन्न करता है ॥ १३ ॥

की रघुवशे सन्तानश्रवणाद्धातु सौमित्रि सौमनस्यवान् । प्रालिमुनिमामन्त्र्य प्रातर्युक्तरथो ययौ ॥१४॥ स च प्राप मधूपघ्न कुम्भीनस्याश्च कुक्षिज । वनात्करमिवादाय सत्वराशिमुपस्थित ॥१५॥ धूमधूम्रो वसागन्धी ज्वालाब शिरोरंह । क्रव्याद्गणपरीवारश्चिताग्निरिव जङ्गम ॥१६॥ अपशूल तमामाद्य लवण लक्ष्मणानुज रुरोध सम्मुखोनो हि जयो रन्ध्रप्रहारिणाम् ॥१७॥ नातिपर्याप्तमालक्ष्य मत्कुक्षेरा भोजनम् । दिष्टया त्वमसि मे धात्रा भीतेनेवोपपादित ॥१८॥ इति सन्तयं शत्रुघ्न राक्षसस्तनिघासया । प्राशुमुत्पाटयामास मुस्तास्तम्बमिव द्रुमम् ॥१९॥ सौमिनेर्निशितैर्बाणैरन्तरा शकलीकृत । गात्र पुष्परज प्राप न शाखी नैर्ऋतेरित ॥२०॥ विनाशात्तस्य वृक्षस्य रक्षस्तस्मै महोपलम् । प्रजिघाय कृतान्तस्य मुष्टि पृथगिव स्थितम्॥२१॥ ऐन्द्रमस्त्रमुपादाय शत्रुघ्नेन स ताडित । सिकतात्वादपि परा प्रपेदे परमाणुताम् ।। २२॥ तमुपाद्रवदुद्यम्य दक्षिण दोर्निशाचर । एकताल इवोत्पातपवनप्रेरितो गिरि ॥२३॥ कार्णेन पत्रिणा शत्रु सा नहृदय पतन् । आनिनाय भुव कम्प जहाराश्रमवासिनाम् ॥२४॥ वयसा पड़तय पेतुर्हतस्योपरि विद्विष । तत्प्रतिद्वन्द्विनो मूर्ध्नि दिव्या कुसुमवृष्टय ॥२५॥ स हत्वा लवण वीरस्तदा मेने महौजस । भातु सोदर्यमात्मानमिन्द्रजिधशोभिन ॥२६॥ तस्य सस्तूयमानस्य चरितार्थस्तपस्विभि । शुशुभे विक्रमोदन व्रीडयाऽवनत शिर ॥२७॥ भाई के पुत्र होने की बात सुनकर शत्रुघ्न बहुत प्रमन्न हुए और अगले दिन तडके ही उन्होने हाथ जोडकर मुनि से आज्ञा ती तथा रथ जोतकर आगे बढे ।।१४। जिस समय वे लवणपुर मे पहुँचे, उसी समय रावण की बहन कुम्भीनसी का पुत्र लवणामुर अनेक पशुओं को मारकर वन से इस प्रकार लौटा था, जैसे वा ने उसे वह मब कर के रूप मे दिया हो॥१५॥ उसकी देह धुएँ जैसी काली थी, उसमे में चर्बी को गन्ध निकल रही थी, आग की लपटो के समान लाल और उसके बाल विखरे हुए थे। मामाहारी कुत्ते, गिद्ध, मासभक्षी पशु-पक्षी उसके चारों ओर चल रहे थे। इस तरह वह उस चिता की जगम अग्नि जैमा लग रहा था || १६ || शत्रुघ्न ने देखा कि यह अवमर ठीक है। क्योंकि इसके हाथ में निशूल नहीं है। बम, तुरन्त उन्होंने लवणासुर को घेर लिया। क्योंकि शक्तिहीन'शत्रु पर प्रहार करने वाला बीर अवश्य विजयी होता है ।।१७।। शत्रुघ्न को देखकर रवणामुर बोला--आज मेरे भोजन की सामग्री कम थी, यह देख विधाता ने डरकर मेरा भोजन पूरा करने के लिए ही तुम्हें यहा भेजा है ।।१८ऐमा कहकर उसने शत्रुघ्न को मारने के लिए अनायाम एक बड़ा भारी पेड़ उखाड़ लिया, जैसे मोथा घास का मुट्ठा उखाड लिया हो॥१९ ।। ज्यो ही लवणासुर ने वह वृक्ष शत्रुघ्न पर फेका, त्यों ही अपने बाणो मे शत्रुघ्न ने उसे बीच में ही काटकर टुकडे-टुकडे कर डाला। इस प्रकार वह वृक्ष तो उनके शरीर पर नहीं पहुंच मका, केवल उसके फूलो का पराग भर उन तक पहुंच पाया ।। २० । वृक्ष के टूक-टूक हो जाने पर उम राक्षम ने एक ऐमी भयकर शिला शत्रुघ्न पर फेंकी, जैसे वह यमराज का घूमा हो ।। २१ ।। किन्तु शत्रुघ्न ने अपना ऐन्द्र अस्त्र चलाकर उसे धूल से भी महीन चूर्ण कर डाला ।। २२ ॥ 'तब वह अपना दाहिना हाथ उठाकर शत्रुघ्न की ओर लपका। उम समय वह ऐसा लगा, जैमे बवडर द्वारा उडाया हुना कोई ऐमा पहाट् चला आ रहा हो, जिमको चोटी पर ताड का एक पेड़ खटा हो ।। २३ ।। किन्तु शत्रुघ्न-प्रेरित वैष्णव बाण लगते ही लवणासुर धराशायी हो गया। उसके गिरने से ऐमी धमक हुई कि धरती कॉप उठी, किन्तु आश्रमवामियों का भय से कॉपना दूर हो गया॥२४॥ उम मरे हुए शशु के ऊपर गिद्ध आदि मासभक्षी पक्षी टूट पड़े और उसके प्रतिद्वन्द्वी शत्रुघ्न पर फूलों की वर्षा होो लगी ।। २५ ।। जब शत्रुघ्नजो लवणासुर को मार चुके, तब उन्हे यह मन्तोष हुआ कि अब मैं मेघनादघाती तेजस्वी लक्ष्मण का सगा भाई हूँ।। २६ । जब तपस्वियो का काम पूरा हो गया, तब वे वीर शत्रुघ्न तमभ्यनन्दप्रणत लवणान्तकमग्रज । ॐ पञ्चदश सर्ग १३७ उपकूल स कालिन्द्या पुरी पौरुषभूषण । निर्ममे निर्ममोऽर्थेषु मथुरा मधुराकृति ॥२८॥ या सोराज्यप्रकाशाभिर्वभौ पौरविभूतिभि । स्वर्गाभिष्यन्दवमन कृत्वेवोपनिवेशिता ।।२९॥ तत्र सौधगत पश्यन्यमुना चक्रवाकिनीम् । हेमभक्तिमती भूमे प्रवेणीमिव पिप्रिये ॥३०॥ सखा दशरथस्यापि जनकस्य च मन्त्रकृत् । सञ्चस्कारोभयप्रीत्या मैथिलेयो यथाविधि ॥३१॥ स तो कुशलवोन्मृष्टगर्भक्लेदो तदाख्यया । कवि कुशलवावेव चकार किल नामत ॥३२॥ साङ्ग च वेदमध्याप्य किश्चिदुत्क्रान्तशैशवौ । स्वकृति गापयामास कविप्रथमपद्धतिम्॥३३॥ रामस्य मधुर वृत्त गायन्तो मातुरग्रत । तद्वियोगव्यथा किञ्चिच्छिथिलीचक्रतु सुतौ ॥ ३४ ॥ इतरेऽपि रघोर्वश्यास्त्रयस्त्रेताग्नितेजस । तद्योगात्पतिवलीषु पत्नीष्वासन्द्रिसूनव ॥३५॥ शत्रुघातिनि शत्रुघ्न सुवाही च बहुश्रुते । मथुराविदिशे सून्वोर्निदधे पूर्वजोत्सुक ॥३६॥ भूयस्तपोव्ययो मा भूद्वाल्मीकेरिति सोऽत्यगात् । मैथिलीतनयोद्गीतनि स्पन्दमृगमाश्रमम् ॥ वशी विवेश चायोध्या रथ्यासस्कारशोभिनीम् । लवणस्य वधात्पौरैरोक्षितोऽत्यन्तगौरवम्॥ स ददर्श सभामध्ये सभासविरुपस्थितम् । राम सीतापरित्यागादसामान्यपति भुव ॥ ३९ ॥ । कालनेमिवधात्प्रोतस्तुरापाडिव शाङ्गिणम् ।। ४० ।। को प्रशसा करने लगे। अपनी बडाई मुाफर शत्रुघ्न का मिर लाज मे झुककर मुशोभित हुआ।। २७ ।। तदनन्तर पराक्रमी, मयमी और धन मे निस्पृह शत्रुघ्न ने यमुना के तट पर मधुरा (मथुरा) नाम की नगरी बमायी ॥ २८॥ अच्छा राजा पार उम नगरी के लोग ऐसे धी और मुखी हो गये कि जैसे स्वर्ग में जनसख्या बढ जाने मे वहाँ के कुछ लोग यहाँ लाकर बमा दिये गये हों।॥ २९ ॥ तब शत्रुघ्न ऊंचे भवन पर चढ़कर उम नीले जल वाला यमुना को देखा, जिसमें अनेक चकवे चहक रहे थे। उम ममय यमुना उन्हे ऐमी सुन्दर दौसी कि जैसे वह पृथ्वी की मुनहरी फन्दोंवाली चोटी हो॥३०॥ इधर दशरथ के मित्र और जनक के परामर्शदाता होने के कारण मन्त्रद्रया वाल्मीकिजी ने सीताजी के दोनों पुत्रों के विधिवत् जातकर्म आदि मस्कार मम्पन किये ॥ ३१ ॥ ज्येष्ठ पुत्र लव के उत्पन्न होते समय मोताजी की प्रमव-पोड़ा गाय के पूछ के बाल से और छोटे पुत्र की उत्पत्ति के समय वह पीडा कुशा मे दूर हुई थी। इसीलिए वाल्मीकिजी ने दोनों बच्चो का नाम इन्हीं दोनो वस्तुओं के नाम पर लव और कुश रखा ॥ ३२।। जब वे बच्चे कुछ बड़े हुए, तब ऋषि ने उन दोनों को वेद-वेदान पढाकर अपनी रचना आदिकाव्य रामायण का गायन मिसाया ||३३॥ अब उन दोनों बालका ने अपनी माता सीता के आगे राम का यश गा-गार उनी वियोगजनित व्यथा कुछ कम कर दी॥३४॥ दाक्षिणात्य, गार्हपत्य और आह्वनीय, इन तीनो अग्नियो के मदृश तेजस्वी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न-इन तीनों भाइयों ने भी अपनी-अपनी पलियों मे दो-दो पुत्र उत्पन पिये।। ३५ ।। अधिक समय बाहर रहने के कारण शत्रुघ्न अपने बड़े भाइयों से मिलने को आतुर थे। अतएव उन्होने शत्रुघाती बहुश्रुत और सुबाहु नामक अपने दो पुत्रों को मधुरा और विदिशा का का राज्य मौंप दिया ॥३६॥ शत्रुघ्नजी लौटते समय वाल्मीकि के उम तपोवन में नहीं गये, जहाँ के मृग शान्तभाव मे लव और कुश के गीत सुना करते थे। क्योंकि शत्रुघ्न ने सोचा कि मेरे जाने पर वाल्मीक्जिी अपनी तपस्या के बल मे मेरे सत्कार की मामग्री जुटाने लगेगे, जिसमे व्यर्थ उनका तपोबल क्षीण होगा ।। ३७ ।। इस प्रकार वहाँ से चलकर जितेन्द्रिय शत्रुघ्न उस अयोध्या में पहुंचे जहों को सडके उनके स्वागत में बड़े अच्छे ढंग से सजायी गयी थीं। वे लवणासुर को मारकर लौटे थे, इसलिए सभी पुरवासी उन्हे बटे आदर को दृष्टि से देख रहे थे॥३८ ।। उन्होंने राजमभा में पहुंचकर देखा कि राम बैठे हैं और बहुत मे मभामद उस्को स्तुति सीताजी को छोड़ देने पर अब वे एकमात्र पृथ्वी के ही पति रह गये थे॥३९॥ जैसे कालनेमि को मारनेवाले विष्णु का इन्द्र ने प्रमन्नतापूर्वक स्वागत किया था, वैसे ही लवणासुर को मारनेवाले शत्रुघ्नजी १८ का० ने मधुरा १३८ के रघुवशे स पृष्ट सर्वतो वार्तमाख्यद्राज्ञे न सन्ततिम् । प्रत्यीयष्यत काले कवेराद्यस्य शासनात्॥४१॥ अथ जानपदो विप्र शिशुमप्राप्तयौवनम् । अवतार्याङ्कशय्यास्थ वारि चक्रन्द भूपते ॥४२॥ शोचनीयाऽसि वसुधे । या त्व दशरथान्च्युता । रामहस्तमनुप्राप्य कष्टात्कष्टतर गता॥४३ ।। श्रुत्वा तस्य शुचो हेतु गोप्ता जिहाय राघव । न ह्यकालभवो मृत्युरिक्ष्वाकुपदमस्पृशत् ॥४४॥ स मुहूर्त क्षमस्वेति द्विजमाश्वास्य दु खितम् । यान सस्मार कौबेर वैवस्वतजिगीषया॥४५॥ आतशस्त्रस्तदध्यास्य प्रस्थित स रघुबह । उच्चचार पुरस्तस्य गूढरूपा सरस्वती ॥ ४६॥ राजन् । प्रजासु ते कश्चिदपचार प्रवर्तते । तमन्विष्य प्रशमयेभीवतासि तत कृती॥४७॥ इत्याप्तवचनाद्रामो विनेष्यन्वीक्रियाम् । दिश पपात पत्त्रेण वेगनिष्कम्पकेतुना ॥४८॥ अथ धूमाभिताम्राक्ष वृक्षशाखावलम्बिनम् । ददर्श कश्चिदेवाकस्तपस्यन्तमधोमुखम् ।। ४९ ॥ पृष्टनामान्वयो राजा स किलाचष्ट धूमप । आत्मान शम्बुक नाम शूद्र सुरपदार्थिनम् ।।५०॥ तपस्यनधिकारित्वात्प्रजाना तमघावहम् । शीर्षच्छेद्य परिच्छिद्य नियन्ता शस्त्रमाददे ॥५१॥ स तद्वक्त हिमक्लिष्टकिञ्जल्कमिव पङ्कजम् । ज्योतिष्कणाहतश्मश्रु कण्ठनालादपातयत्॥५२॥ कृतदण्ड स्वय राज्ञा लेभे शूद्र सता गतिम् । तपसा दुश्चरेणापि न स्वमार्गविर्तावना ।। ५३ ।। जब उन्हें प्रणाम करने को झुके, तब राम ने भी उनका महर्ष अभिनन्दन किया ॥४०॥ राम के पूछने पर उन्होंने और सब हाल तो मुना दिया, परन्तु पुत्र होने की बात नहीं कही। क्योकि वाल्मीकिजी ने कह दिया था कि समय आने पर हम दोनों पुत्र राम को मौंप देगे, तुम मत कहना ।। ४१॥ कुछ समय बाद एक दिन उसी जनपद का निवासी एक ब्राह्मण अपना मृत वालक राजा की ड्योढी पर गोद मे उतारकर यह कहता हुआ फूट-फूटकर रोने लगा॥४२॥ हे पृथ्वी । तुम दशरथ के हाथ से छूटकर तथा राम के हाथो में आकर बड़े मकट में पड़ गयी हो और तुम्हारी दशा बडी शोचनीय हो गयी है ।। ४३ ॥ प्रजापालक राम ने जब उसके शोफ की बात सुनी, तब उन्हे बड़ी लज्जा आयो। क्योंकि इक्ष्वाकुवशी राजाओ के राज्य मे क्मिी को भी अकाल मृत्यु नहीं होती थी।॥४४॥ उस दुसी विप्र को राम ने यह कहकर बाढस बंधाया कि तुम थोड़ी देर ठहरो, मैं अभी तुम्हारा शोक दूर करता हूँ। यह कहकर यमराज को जीतने की इच्छा मे उन्होंने कुबेर के पुष्पक विमान का स्मरण किया ॥४५॥ इस प्रकार जब वे अस्त्र-शस्त्र मे सुसज्जित होकर पुष्पक विमान पर बैठकर चलने लगे, तब यह आकाशवाणी सुनायो दो-~||४६॥ 'हे राजन् । आपनी प्रजा में वर्णधर्म सम्बन्धी कुछ दोष आ गया है। उसे खोजकर दूर करो, तभी तुम्हारा उद्देश्य पूर्ण होगा' ॥ ४७ ।। इस विश्वमनीय वचन को सुनकर वेग से चलने के कारण निष्कम्प ध्वजा वाले पुष्पक विमान पर चढकर राम यह देखने के लिए सभी दिशाओं मे चक्कर काटने लगे कि कहाँ वर्णधर्म में दोष आया है।॥४८॥ घूमते-घूमते एक स्थान पर राम ने देखा कि एक पेड़ की शाखा पर उलटा लटका हुआ एक मनुष्य नीचे जलती हुई आग का धुआं पी-पोकर तप कर रहा है और धुओं लगने से उसकी आँखें लाल हो गयी हैं।। ४९॥ उससे राम ने पूछा-'आपका नाम क्या है और आप किस वंश के है?' वह तपस्वी बोला---'मै देव पद पाने के लिए तप कर रहा हूँ। मेरा नाम शम्बुक है और मैं शूद्र हूँ' ॥५०॥ शूद्रों को तप करने का अधिकार नहीं है। यही अनधिकृत कार्य करने से प्रजा मे पाप फैल रहा था। अत राम ने निश्चय कर लिया कि दमका सिर काटना ही होगा और शस्त्र उठा लिया॥५१॥ फिर उमका मिर वैमे ही गले से काटकर अलग कर दिया, जैसे डडी से कमल उतार दिया गया हो। आग को चिनगारियों से झुलसी दाढी वाला उसका सिर ऐसा लग रहा था कि जैसे पाले से जली हुई केमरवाला कमलगट्टा हो ।। ५२ ।। इम पकार साक्षात् राजा राम से दण्ड पाकर उस शूद्र को वह सद्गति मिली, जो वह अपने उस कठोर तप मे कभी भी न पाता, जिमे वह वर्णाश्रम धर्म का उल्लङ्घन करके प्राप्त करना चाहता था।।५३ ।। जैसे चन्द्रमा शरद् ॐ पञ्चदश सर्ग - १३९ रघुनाथोऽप्यगस्त्येन मार्गसन्दर्शितात्मना । महौजसा सयुयुजे शरत्काल इवेन्दुना ॥५४॥ कुम्भयोनिरलङ्कार तस्मै दिव्यपरिग्रहम् । ददौ दत समुद्रेण पीतेनेवात्मनिष्क्रयम् ॥५५॥ त दधन्मैथिलीकण्ठनियापारेण बाहुना । पश्चान्निववृते राम प्राक्परासुर्द्विजात्मज ॥५६॥ तस्य पूर्वोदिता निन्दा द्विज पुत्रसमागत । स्तुत्या निवर्तयामास त्रातुर्वैवस्वतादपि ॥५७ ।। तमध्वराय मुक्ताश्व रक्ष कपिनरेश्वरा । मेघा सस्यमिवाम्भोभिरभ्यवर्षनुपायने ॥५८॥ दिग्भ्यो निमन्त्रिताश्चैनमभिजग्मुर्महर्षय । न भौमान्येव धिष्ण्यानि हित्वा ज्योतिर्मयान्यपि ॥ उपशल्यनिविष्टैस्तैश्चतुरमुखो बभौ । अयोध्या सृष्टलोकेव सद्य पैनामही तनु ॥६०॥ श्लाघ्यस्त्यागोऽपि वैदेह्या पत्यु प्राग्वशवासिन । अनन्यजाने सेवासीद्यस्माज्जाया हिरण्मयी। विधेरधिकसम्भारस्तत प्रववृते मख । आसन्यत्र क्रियाविघ्ना राक्षसा एव रक्षिण ॥ ६२॥ अथ प्राचेतसोपज्ञ रामायणमितस्तत । मैथिलेयो कुशलवो जगतुर्गुरुचोदितौ ॥ ६३॥ वृत रामस्य वाल्मीके कृतिस्तो किन्नरस्वनी । कि तद्येन मनो हर्तुमल स्याता न भृण्वताम्।। रूपे गीते च माधुर्य तयोस्तनिवेदितम् । ददर्श सानुजो राम शुश्राव च कुतूहली ॥६५॥ तद्गीतश्रवणैकाग्रा ससदश्रुमुखो बभौ । हिमनियन्दिनी प्रातर्निर्वातेव वनस्थली ।। ६६ ।। वयोवेषविसवादि रामस्य च तयोस्तदा । जनता प्रेक्ष्य सादृश्य नाक्षिकम्प व्यतिष्ठत ॥६७ ॥ ऋतु मे मिलता है, वैमे हो राम को मार्ग मे महमा अगस्त्य ऋषि मिल गये ।। ५४ ।। कषि ने राम को वह सुन्दर आभूषण दिया, जो उन्हें समुद्र ने उम ममय दण्ड के स्प में दिया था, जब उन्होने समुद्र को पिया था। ५५ ।। राम ने वह आभूषण लेकर अप उम भुजा मे बाँध लिया, जो सीताजी के वन चले जाने पर उनके गले मे पड़ने मे वचित हो गया था। जब गम अयोध्या लौटे, तब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके आने से पहले ही ब्राह्मणपुर जी उठा है॥५६॥ पुत्र के जो जाने पर ब्राह्मण ने राम की बड़ी स्तुति को और पहले जो न्दिा को थी, उमे उमने अपनी इन स्तुतियों से धो डाला। क्योंकि राम ने उसके पुत्र को यमराज के हाथ से छुड़ाया था॥५७ ।। कुछ ममय बाद राम ने अश्वमेध यज्ञ के लिए घोडा छोड़ा। तब जैसे बादल धान के खेत पर जल बरमाते हैं, वैसे ही मुग्रीव, विभीषण तथा अन्य राजाओं ने आकर राम के आगे उपहार के रूप मे धन की वर्षा की॥५८ ॥ उग यज्ञ मे विभिन्न देशो के ऋषियों को आमन्त्रित किया गया था। वे ऋषि पृथ्वी से ही नहीं, बल्कि सप्तर्षि-मण्डल आदि दिव्य स्थानों से भी राम के पाम आये॥५९॥ वे लोग वहाँ आकर नगर के आम-पामवाले देहातो मे टिक गये थे। जब वे अयोध्या के चारों द्वारो मे नगर में प्रविष्ट हुए, तब चार द्वारो वाली वह अयोध्या ऐमी दीखो कि जैसे ब्रह्माजी की चतुर्मुसी देह हो ।। ६० ।। माता के त्याग राम की इमलिए भी प्रशमा हुई कि उन्होने किसी दूसरी स्त्री से अपना विवाह नहीं किया था। अतएव यज्ञ मे सोने की सीता बनवाकर राम ने अपनी पत्नी के स्थान पर उसे बैठा दिया था ।। ६१ ।। इस प्रकार वह प्रसिद्ध यज्ञ प्रारम्भ हुआ, जिसमें आवश्यकता से अधिक मामग्री इकट्ठी हुई थी। विशेषता यह था कि यज्ञकार्य मे विघ्न डालने वाले राक्षस ही उसकी रखवाली कर रहे थे॥२॥ उमा ममय वाल्माकिजी की आज्ञा से मीताजी के पुत्र लव और कुश वाल्मीकिरचित रामायण गाते हुए वहाँ घूमने गे॥ ६३ । एक तो राम का चरित्र, उम पर वाल्मीकिजी उसके रचयिता और फिर कितरों के ममान मधुर कण्ठ वाले लव और कुश उसके गायक । तब बतलाइये कि उममे क्या कमी रह गयी थी, जिममे लोग उसे सुनकर मोहित न हो जाते ॥ ६४।। यह बात राम के कानों तक पहुंची। उन्होने उन दोनों बालकों को बुलाया और अपने भाइयो के माथ उन बालकों के रूप और गीत की मधुरता को आश्चर्य के माथ देखा और मुना ।। ६५ ।। सारी सभा एकाग्र मन मे उनका गीत मुनती और जाखो मे आसू बहाती जा रही थी। उस समय वह मभा प्रात काल को उम वनस्थली जैसी दीख रही थी, जिसमें वृक्षो मे ओम की बूंदे टपक रही हों॥६६॥ लोगों ने - १४० की रघुवशे उभयोर्न तथा लोक प्रावीण्येन विसिष्मिये । नृपते पोतिदानेषु वीतस्पृहतया यथा ।। ६८॥ गेये को नुविनेता वा कस्य चेय कृति कवे । इति राज्ञा स्वय पृष्टौ तौ वाल्मीकिमशसताम् ॥ ६९ ॥ अथ सावरजो राम प्राचेतसमुपेयिवान् । ऊरीकृत्यात्मनो देह राज्यमस्मै न्यवेदयत्॥७०॥ स तावाख्याय रामाय मैथिलेयौ तदात्मजौ । कवि कारुणिको ववे सीताया सम्परिग्रहम् ॥ तात! शुद्धा समक्ष न स्नुषा ते जातवेदसि । दौरात्म्यादक्षसस्ता तु नात्रत्या श्रधु प्रजा ॥ ता. स्वचारित्रमुद्दिश्य प्रत्याययतु मैथिली । तत पुत्रवतीमेना प्रतिपत्स्ये त्वदाजया॥७३॥ इति प्रतिश्रुते राज्ञा जानकीमाश्रमान्मुनि । शिष्यैरानाययामास स्वसिद्धि नियमैरिव ।।७४॥ अन्येधुरथ काकुत्स्थ सन्निपात्य पुरौकस । कविमाहाययामास प्रस्तुतप्रतिपत्तये ।। ७५ ।। स्वरसस्कारवत्याऽसौ पुत्राभ्यामथ सोतया । ऋचेवोर्चिष सूर्य राम मुनिरुपस्थित ॥७६॥ काषायपरिवीतेन स्वपदार्पितचक्षुषा । अन्वमीयत शुद्धेति शान्तेन वपुषैव सा॥७७॥ जनास्तदालोकपथात्प्रतिसहृतचक्षुष । तस्थुस्तेऽवाड्मुखा सर्वे फलिता इव शालय ॥७॥ ता दृष्टिविषये भर्तुर्मुनिरास्थितविष्टर । कुरु नि सशय वत्से । स्ववृत्ते लोकमित्यशात् ॥ ७९ ॥ अथ वाल्मीकिशिष्येण पुण्यमावर्जित पय ।आचम्योदोरयामास सीता सत्या सरस्वतीम् ॥८०॥ बाइमन कर्मीभ पत्यो व्यभिचारो यथा न मे। तथा विश्वम्भरे देवि । मामन्तर्धातुमर्हसि ।। ८१ ॥ राम और उन दोनों बालकों का चेहरा एकदम मिलता-जुलता देखा। जिममे इतना ही अन्तर था कि वे दोनों अभी बच्चे थे तथा वनवासियों के जैसे वस्त्र पढे थे और राम प्रौढ थे तथा राजसी वस्त्र पहने हुए थे।। ६७ ।। जनता को उनके गायन का कौशल देखकर उतना आश्चर्य नहीं हुआ, जितना इस बात पर विस्मय हुआ कि राजा ने उन्हे प्रेम से जो दान दिया था, वह भी उन्होंने लौटा दिया ।। ६८ ।। राम ने जब उनसे पूछा कि तुमने सगीत किससे सीखा हे और यह किम कवि की रचना है, तब उन्होंने वाल्माकिजी का नाम बता दिया ।। ६९ ॥ तब अपने भाइयो को साथ लेकर रामचन्द्र वाल्मीकिजी के पास गये। उन्होंने वहाँ जाकर अपने शरीर के सिवाय शेष मम्पूर्ण राज्य वाल्मीकि को भेट कर दिया ।। ७० ।। तब दयालु ऋषि ने राम मे कहा-'ये दोनों गायक कुमार मीताजी के गर्भ मे उत्पन्न हुए हैं और तुम्हारे पुत्र है। अब तुम मीताजी को स्वीकार कर लों॥७१ ।। राम बोले- आपको पतोह सीता हमारे मामने ही अग्नि मे शुद्ध हो चुकी हैं, परन्तु रावण की दुष्टता का विचार करके यहाँ की प्रजा को विश्वास नहीं होता ॥७२ ।। अत यदि मीता अपनी शुद्धता का प्रमाण देकर प्रजा को विश्वास दिला दे, तब मैं आपकी आज्ञा से पुत्रों के साथ उन्हें ग्रहण कर लूंगा ॥७३॥ राम की यह प्रतिज्ञा मुनकर वाल्मीकि ने शिष्यो को भेजकर सीताजी को आश्रम से इस प्रकार बुलाया, जैसे वे नियमो के द्वारा अपनी सिद्धि को बुलवा रहे हों ।। ७४ ।। दूसरे दिन राम ने इस काम के लिए अयोध्या को सम्पूर्ण प्रज्ञा को एकत्र करके वाल्मीकिजी को बुलवाया ।। ७५ ।। तदनुमार वाल्मीकिजी लव, कुश और सीताजी को माथ लेकर राम के ममक्ष आ उपस्थित हुए। पुत्रों के साथ राम के पाम जाती हुई मीताजी ऐमी लगती थीं, जैसे स्वर और मस्कारो के साथ गायत्री देवी सूर्य के पास जा रही हों ।। ७६ ॥ गेरुए वस्त्र पहने और आवे नांची किये हुए सीताजी अपने शान्त शरीर से ही पवित्र दिखलाई देती थीं।।७७ ॥ उन्हें देखते ही सब लोगों ने उसी प्रकार आँखें नीची कर ली, जैसे फले हुए धान के पौधे झुक जाते हैं। क्योकि उन्हे लज्जा लगी कि हम लोगो ने व्यर्थ इस माध्वी पर कलक लगाया ||७८ ।। तब राम के समक्ष आमन पर आमीन वाल्मीकि ने माताजी मे कहा-'बेटी जनता के मन मे तुम्हारे चरित्र पर सन्देह है, उसे तुम मिटा दो' ॥७९॥ तभी वाल्मीकिजी के एक शिष्य ने पवित्र जल लाकर सीताजी को दिया, उममे आचमन करके मीताजी ने यह सत्य वचन कहा-८०॥ 'यदि मैंने मन, वचन और कर्म मे अपना पातिव्रत भग न किया हो तो हे धरती माता। .

पञ्चदश सर्ग को एवमुक्ते तया साध्या रन्ध्रात्सद्योभवाद्भुव । शातह्रदमिव ज्योति प्रभामण्डलमुद्ययौ ॥ ८२ ।। तर नागफणोत्क्षिप्तसिहासननिषेदुषी । समुद्ररशना साक्षात्प्रादुरासोद्वसुन्धरा ।। ८३ ।। सा सीतामङ्कमारोप्य भर्तृप्रणिहितेक्षणाम् । मा मेति व्यवहरत्येव तस्मिन् पातालमभ्यगात् ।। धराया तस्य सरम्भ सीताप्रत्यर्पणैषिण । गुरुर्विधिबलापेक्षी शमयामास धन्विन ॥८५॥ ऋषीन्विसृज्य यज्ञान्ते सुहृदश्च पुरस्कृतान् । राम सीतागत स्नेह निदधे तदपत्ययो ॥८६॥ युधाजितश्च सन्देशात्स देश सिन्धुनामकम् । ददौ दत्तप्रभावाय भरताय भृतप्रज ॥८७॥ भरतस्तत्र गन्धर्वान्युधि निर्जित्य केवलम् । आतोद्य ग्राहयामास समत्याजयदायुधम् ॥८८॥ स तक्षपुष्कलो पुत्रौ राजधान्योस्तदाख्ययो । अभिषिच्याभिषेका) रामान्तिकमगात्पुन ॥ अङ्गद चन्द्रकेतु च लक्ष्मणोऽप्यात्मसम्भवौ । शासनाद्रघुनाथस्य चक्रे कारापथेश्वरौ ।।९०॥ इत्यारोपितपुत्रास्ते जननीना जनेश्वरा । भर्तृलोकप्रपन्नाना निवापान्विदधु क्रमात्॥९१ ॥ उपेत्य मुनिवेषोऽथ काल प्रोवाच राघवम् । रह सवादिनौ पश्येदावा यस्त त्यजेरेति ॥९२। तथेति प्रतिपन्नाय विवृतात्मा नृपाय स । आचख्यौ दिवमध्यास्व शासनात्परमेष्ठिन ।।९३ ।। विद्वानपि तयोर्दा स्थ समय लक्ष्मणोऽभिनत् । भीतो दुर्वासस शापाद्रामसन्दर्शनार्थिन । स गत्वा सरयूतीर देहत्यागेन योगवित् । चकारावितथा भ्रातु प्रतिज्ञा पूर्वजन्मन ॥९५।। तुम मुझे अपनी गोद में छिपा लो' ।। ८१ ॥ पतिव्रता मीता के ऐमा कहते ही पृथ्वी फट गयी और तुरन्त उममे मे बिजली के ममान चमकील एक तेजोमण्डल निकला ।। ८२॥ उसमे से नाग के फण पर रखे सिहामा पर बैठी और ममुद्र की करधनी पहने माक्षात् धरती माता प्रकट हो गयीं।। ८३ ।। उन्होंने उन मीताजी को अपनी गोद में ले लिया, जो राम पर आँखे ल्गाये हुए थीं। राम कहते हो रह गये—'हे, यह क्या करती हो यह क्या करती हो?' परन्तु वे मबके देखते-देखते पाताल मे ममा गयीं।। ८४। इससे राम पृथ्वी पर क्रुद्ध हो गये और पृथ्वी मे मीता को लौटा लेने के लिए उन्होंने धनुष उठाया। परन्तु वमिष्ठजी तो मब कुछ जानते थे, उन्होंने ही राम को समझाया और उनका कोप शान्त किया ॥८५।। वह यज्ञ ममाप्त हो जाने पर राम ने ऋषियो तथा अभ्यागतों को पुरस्कृत करके विदा किया। तदनन्तर वे मीता पर रहने वाला प्रेम उनके पुत्रो पर रख कर राजरार्य करने लगे॥८६ ।। भरत के मामा युधाजित के कर्मों पर प्रजापालक राम ने सिन्धु देश का राज्य प्रभावशाली भरत को दे दिया ।। ८७ ॥ वहाँ भरत ने गन्धर्वो को युद्ध में जीतकर उनके हाथा मे वीणा दे दी और शस्त्र छुड़वा दिया।८८॥ वाद में उन्हाने तक्ष और पुष्यल नामक अपने योग्य पुत्रो को तक्ष और पुष्कल की राजधानियो का राजा बना दिया और स्वय राम के पाम जयोध्या लौट आये।। ८९॥ राम की आज्ञा से लक्ष्मण ने अगद और चन्द्रकेतु नाम के अपने दोनो पुत्रों को कारापथ का राजा बना दिया ॥९० ॥ इस प्रकार पुत्रो को राज्य देकर उन चारों भाइयों ने क्रमश अपनी स्वर्गीया माताओ के श्राद्ध आदि सस्कार सम्पन्न क्येि॥९१ ।। कुछ ममय बाद एक दिन राम के पाम मुनि के वेश में काल आया और कह्न लगा— आपमे एकान्त में कुछ बातें करेगे। हम लोगो की वार्ता मे जो आये, उमे देश-निकाला दे दें॥१२॥ राम ने कहा-'अच्छी बात है'। तब उमने अपना अमली म्प दिसलाया और कहा कि 'ब्रह्माजी की आज्ञा है कि अब आप चलकर स्वर्ग मे रहे' ॥९३ ।। उन दोनो म बात हो ही रही थी कि इसी बीच दुर्वामा मुनि आ गये। उन्होने द्वार पर बैठे हुए लक्ष्मण मे कहा-'अभी जाकर राम से कहो कि मैं आया हूँ' । लक्ष्मण तो जानते ही थे कि जो इम ममय राम के पाम जायेगा, उसका देश-निकाला होगा। फिर भी मुनि के शाप मे डरकर उन दोनों की बात-चीत के बीच मे ही पहुँचकर उन्होो वह शर्त तोड़ दी॥९४॥ वहाँ से चलकर योगमार्ग के विज्ञ लक्ष्मण मरयू के तट पर गये और योगबल से शरीर 'हम ॥ ।

के रघुवशे
तस्मिन्नात्मचतुर्भागे प्राइनाकमधितस्थुषि । राघव शिथिल तस्थौ भुवि धस्त्रिपादिव ॥९॥
स निवेश्य कुशावत्या रिपुनागाड्कुश कुशम् । शरावत्या सता सूक्तैर्जीनताश्रुलव लवम्॥९७॥
उदक्प्रतस्थे स्थिरधी सानुजोऽग्निपुर सर । अन्वित पतिवात्सल्याद्गृहवर्जमयोध्यया ॥९८॥
जगृहस्तस्य चित्तज्ञा पदवी हरिराक्षसा । कदम्बमुकुलस्थूलैरभिवृष्टा प्रजाश्रुभि ॥१९॥
उपस्थितविमानेन तेन भक्तानुकम्पिना । चक्रे त्रिदिवनि श्रेणि सरयूरनुयायिनाम् ॥१०॥
यद्गोप्रतरकल्पोऽभूत्सम्मर्दस्तत्र मज्जताम् । अतस्तदाख्यया तीर्थ पावन भुवि पप्रथे॥१०१॥
स विभुर्विबुधाशेषु प्रतिपन्नात्ममूर्तिषु । त्रिदशोभूतपौराणा स्वर्गान्तरमकल्पयत् ।। १०२॥
निर्वत्यैव
दशमुखशिरश्छेदकार्य सुराणा
विष्वक्सेन स्वतनुमविशत्सर्वलोकप्रतिष्ठाम् ।
लडानाथ पवनतनय चोभय स्थायित्वा
कोर्तिस्तम्भद्वयमिव गिरौ दक्षिणे चोतरे च॥१०३॥
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये राम
स्वर्गारोहणो नाम पञ्चदश सर्ग ॥१५ ।।
जनता के
छोडकर उन्होने बड़े भाई के प्रतिज्ञा की रक्षा कर लो।।१५। इस प्रकार अपने चौथाई अश लक्ष्मण
के स्वर्गवासी हो जाने पर राम वैसे ही ढीले पड़ गये, जैसे त्रेतायुग में पृथ्वी पर तीन पैर वाला धर्म
ढीला पड जाता है।।९६ ।। तदनन्तर स्थिरबुद्धि राम ने शत्रुरूपी हाथियों के लिए अनुश सरीखे भयदायक
कुश को कुशावती का राज्य दे दिया और अपने मधुर वचनो द्वारा सजनों की ऑखो में आँसू ला देने
वाले लव को उन्होंने शरावती का राजा बनाया ।।९७।। तदनन्तर अग्निहोत्र की अग्नि आगे करके अपने
भाइयों के माथ राम उत्तर की ओर चल पडे। अयोध्यावामियो ने जब यह सुना तो प्रेमवश वे सब
भी घरों को छोड़कर उसके साथ हो लिये ॥ ९८ ॥ राम के मन की बात जानने वाले वानर और राक्षम
भी उनके पीछे-पीछे चल दिये। जिस मार्ग से वे चल रहे थे, वह मार्ग राम के पीछे-पीछे जाने वाली
स्थूल अश्रुविन्दुओ से भीग गया ॥ ९९ ॥ इस प्रकार भक्तवत्सल राम विमान पर चढकर स्वर्ग
चले गये। सरयू को उन्होंने अपने पीछे आने वालो के लिए स्वर्ग की सीढी बना दिया। अर्थात् जो
सरयू मे स्नान करता था, वह तुरन्त स्वर्ग चला जाता था ।। १०० ॥ अतएव वहाँ पर स्नानार्थियों की
वैसी ही भीड हुई, जैसे गायों को नदी पार कराते ममय होता है। इसीलिए वह पवित्र स्थान समार
में 'गोप्रतरतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हो गया ॥१०१ ॥ तदनन्तर देवताओ के अशधारी रीछ-वानरों ने
भी अपना देवरूप धारण कर लिया। इसलिए स्वर्ग मे इतने लोग पहुँच गये कि मामर्थ्यशाली राम को
देवपद-प्राप्त अयोध्यावामियों को रह्न के लिए एक दृमरा हो स्वर्ग बनाना पडा ।।१०२।। इस प्रकार
विष्णु भगवान् ने रावण का वध करके देवताओ का कार्य पूरा किया। फिर उत्तरगिरि (हिमालय)
पर हनुमानजी को तथा दक्षिणगिरि (त्रिकूट पर्वत) पर विभीषणजी को अपने दो कीर्तिस्तम्भों के रूप
में स्थापित करके वे अपने विराट् शरीर मे लीन हो गये ।। १०३ ।।
इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य मे राम -स्वर्गारोहण नामक
पन्द्रहवाँ सर्ग समाप्त॥१५॥

षोडश सर्ग अथेतरे सप्त रघुप्रवीरा ज्येष्ठ पुरोजन्मतया गुणैश्च । चक्रु कुश रत्नविशेषभाज सौभात्रमेषा हि कुलानुसारि॥१॥ ते सेतुवाागजबन्धमुख्यैरभ्युच्छ्रिता कर्मभिरप्पवन्ध्यै। अन्योन्यदेशप्रविभागसीमा वेला समुद्रा इव न व्यतीयु ॥२॥ चतुर्भुजाशप्रभव तेषा दानप्रवृत्तेरनुपारतानाम्। सुद्विपानामिव सामयोनिर्भिन्नोऽष्टधा विप्रससार वश ॥३॥ अयार्धरात्रे स्तिमितप्रदीपे शय्यागृहे सुप्तजने प्रबुद्ध । कुश प्रवासस्थकलत्रवेषामदृष्टपूर्वा वनितामपश्यत्॥४॥ सा साधुसाधारणपार्थिवः स्थित्वा पुरस्तात्पुरुहूतभास । जेतु परेषा जयशब्दपूर्व तस्याञ्जलि बन्धुमतो बबन्ध ।। ५॥ अथानपोढार्गलमप्यगार छायामिवादर्शतल प्रविष्टाम्। सविस्मयो दाशरथेस्तनूज प्रोवाच पूर्वार्धावसृष्टतल्प ॥६॥ लब्धान्तरा सावरणेऽपि गेहे योगप्रभावो न च लक्ष्यते ते। विभर्षि चाकारमनिवृताना मृणालिनी हैममिवोपरागम्॥७॥ का त्व शुभे । कस्य परिग्रहो वा कि वा मदभ्यागमकारण ते। आचक्ष्व मत्वा वशिना रघूणा मन परस्त्रीविमुखप्रवृत्ति ॥८॥ तदनन्तर लव आदि मात रघुवशी वारों ने अपने मबमे बड़े भाई गुणवान् कुश को अग्रणी बनाया। क्योंकि भ्रातृप्रेम उनके कुल का धर्म था॥१॥ वे मभी कर्मठ भाई पुल बाँधने, कृषि की रक्षा करने और हाथियों को पकड़ने मे कुशल थे। तथापि जैसे ममुद्र अपने तट का उल्लघन नहीं करता, वैसे ही उनमें मे किमी ने भी अपने राज्य की मीमा लघर दूसरे भाई के राज्य की सीमा में प्रवेश करने का प्रयत्न नहीं किया ॥२॥ जैसे मामवेद के कुल मे उत्पन्न मतवाले दिग्गजों का वश आठ भागों में बॅट गया था, वैसे ही विष्णु के अश से उत्पन्न राम का त्यागी कुल भी आठ भागों मे फैल गया ॥३॥ एक दिन आधी रात के समय जब शयनकक्ष का दीपक टिमटिमा रहा था और सब लोग सोये हुए थे, तब कुश को एक ऐसी स्त्री दिखलायो दी, जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। उसके देश को देखकर ऐमा लगता था कि जैसे उसका पति परदेश चला गया है।४॥ अपनी सम्पत्ति मे मजनों का उपकार करने वाले, इन्द्र के समान तेजस्वी और शत्रुओं को जीतने वाले कुश के आगे वह स्त्री उनकी जय-जयकार करती हुई हाथ जोडपर खड़ी हो गयो॥५॥ दर्पण मे जैसे मुंह का प्रतिबिम्ब प्रविष्ट हो जाता है, वैसे ही वह स्त्री द्वार बन्द रहने पर भी घर के भीतर आ पहुंची थी। उसे देखकर कुश को बहुत विस्मय हुआ। वे शय्या पर आधे शरीर मे उठकर उममे बोले-॥६॥ तुम हमारे इस बन्द भवन में महमा घुस आयी हो, परन्तु तुम्हारे मुख मे यह नहीं प्रकट होता कि तुम कोई योगिनी हो। क्योंकि तुम पाले में मारी हुई क्मलिनी जैमी उदास दीख रही हो ॥७॥ हे शुभे। तुम कौन हो? तुम्हारे पति का क्या नाम है और मेरे पास किस काम से आयो हो ? लेकिन तुम यह ममझकर कुछ मत कहना कि रघुवशियों का चित्त परायी स्त्री की ओर आकृष्ट नहीं होता ॥८॥ स्त्री बोली-भगवान् राम जब छ रघुवर्श तमब्रवीत्सा गुरुणाऽनवद्या या नीतपौरा स्वपदोन्मुखेन। तस्या पुर सम्प्रति वीतनाथा जानीहि राजन्नधिदेवता माम् ॥ ९ ॥ वस्वीकसारामभिभूय साह सौराज्यबद्धोत्सवया विभूत्या। समग्रशक्तो त्वयि सूर्यवश्ये सति प्रपन्ना करुणामवस्थाम् ॥१०॥ विशीर्णतल्पादृशतो निवेश पर्यस्तशाल प्रभुणा विना मे। विडम्बयत्यस्तनिमग्नसूर्य दिनान्तमुग्रानिलभिन्नमेघम् ॥११॥ निशासु भास्वत्कलनूपुराणा य सञ्चरोऽभूदभिसारिकाणाम्। नन्दन्मुखोल्काविचितामिषाभि स वाह्यते राजपथ शिवाभि ॥१२॥ आस्फालित यत्प्रमदाकरागैर्मृदङ्गधीरनिमन्वगच्छत्। वन्यैरिदानी महिपैस्तदम्भ शृङ्गाहत क्रोशति दोर्घिकाणाम् ॥१३॥ वृक्षेशया यष्टिनिवासभङ्गान्मृघङ्गशब्दापगमादलास्या । प्राप्ता दवोल्काहतशेषबर्हा क्रीडामयूरा वनबर्हिणत्वम्॥१४॥ सोपानमार्गेषु च येषु रामा निक्षिप्तवत्यश्चरणान्सरागान्। सद्योहतन्यङ्कुभिरसंदिग्ध व्याघ्र पद तेषु निधीयते मे ॥१५॥ चित्रद्विपा पद्मवनावतीर्णा करेणुभिर्दतमृणालभङ्गा । नखाइकुशाघातविभिन्नकुम्भा सरब्धसिहप्रहृत वहन्ति ॥ १६ ॥ स्तम्भेषु योषित्प्रतियातनानामुत्कान्तवर्णक्रमधूसराणाम् । स्तनोत्तरीयाणि भवन्ति सङ्गानिर्मोकपट्टा फणिभिर्विमुक्ता ॥ १७ ॥ वैकुण्ठ जाने लगे, तब इम निर्दोष अयोध्यापुरी के निवासियो को भी माथ लेते गये। हे राजन् । मैं उमी अनाथिनी अयोध्यापुरी की अधिष्ठात्री देवी हूँ॥९॥ पहले मशामन के कारण मैं इतनी ऐश्वर्यशालिनी हो गयी थी कि मेरे आगे कुबेर की अलकापुरी भी फीकी लगता थी। अब तुम्हारे जैसे प्रतापी राजा के रहते हुए भी मेरी बडी हीन दशा हो गयी है ।। १० । स्वामी के अभाव में सैकडों तल्लो वाली अट्टालिकाओं के टूट जाने से मेरी निवासभूमि अयोध्या ऐसी उदाम लगती है, जैसे सूर्यास्तकालीन वह सन्ध्या कि जिसमे वायु के झोंके से छितराये हुए वादल कहीं-कहीं दिखलायी देते हो॥ ११ ॥ रात के समय पहले जिन सडकों पर चमकीले बिछुओंवाली अभिमारिकाएँ चलती थी, उन पर आजकल माम खोजनेवाली वे सियारिने धूमती हैं, जिनके मुख से चिल्लाते समय आग की लपटे निकलती हैं।। १२ ।। पहले नगर की जिन बावलियों का जल जलक्रीडानिरत मुन्दरियों के हाथ के थपेडों मे मृदङ्ग के ममान गम्भीर ध्वनि करता था, वही आजकल जङ्गली भैमों की मांगों की चोट सा-साकर चिल्लाता रहता है।। १३ ।। अड्डो के टूट जाने से यहाँ के मोर अब वृक्षों पर बैठते हैं और मृदङ्ग न बजने के कारण उन्होंने नाचना भी छोड़ दिया है। वे अब उन जगली मोरों जैसे लगते हैं, जिनकी पूछे वन की आग मे झुलस गयी हो ॥१४॥ जिन सीढियो पर पहले सुन्दरियाँ अपने महावर लगे लाल-लाल पैर रखती हुई चलती थीं, उन्हीं पर मृगघाती बाघ अपने रक्तलिप्त लाल पैर रखते हुए चलते हैं।।१५।। जिन चित्रों में दिखलाया गया था कि हाथी कमल के सरोवर में उतर रहे हैं और हथिनियाँ उन्हें मूंड मे कमल का डण्ठल तोड-तोडकर दे रही है, उन चित्रलिखित हाथियों के मस्तकों को मच्चे हाथी का मस्तक समझकर सिंहों ने अपने नसो मे फाड डाला है॥१६॥ जिन खम्भो मे स्त्रियों को मूर्तियाँ बनी हुई थी, आज-कल उन मूर्तियो का रंग उड गया है और वे धुंधली पड गयी हैं। उन खम्भों मे जो मॉप लिपटे उनमे से उनकी केंचुले छूटकर उन मूर्तियों में मॅटकर ऐमी लगती हैं कि जैमे उन पत्थर की स्त्रियों ने स्तन ढंकने के लिए छ षोडश सर्ग , १४५ शशस। सा नागे । कालान्तरश्यामसुधेषु नक्तमितस्ततो रुढतृणाङ्कुरेषु। त एव मुक्तागुणशुद्धयोऽपि हर्येषु मूर्द्धन्ति न चन्द्रपादा ॥१८॥ आवर्ण्य शाखा सदय च यासा पुष्पाण्युपात्तानि विलासिनोभि । वन्यै पुलिन्दैरिव वानरस्ता क्लिश्यन्त उद्यानलता मदीया ॥१९॥ रात्रावनाविष्कृतदीपभास कान्तामुखश्रीवियुता दिवाऽपि। तिरस्क्रियन्ते कृमितन्तुजालेविच्छिन्नधूमप्रसरा गवाक्षा ॥२०॥ बलिक्रियावर्जितसैकतानि स्नानीयससर्गमनाप्नुवन्ति। उपान्तवानीरगृहाणि दृष्ट्वा शून्यानि दूये सरयूजलानि ॥२१॥ तदर्हसीमा वसति विसृज्य मामभ्युपेतु कुलराजधानीम्। हित्वा तनु कारणमानुषी ता यथा गुरुस्ते परमात्ममूर्तिम् ॥२२॥ तथेति तस्या प्रणय प्रतीत प्रत्यग्रहीत् प्राग्रहरो रघूणाम् । पूरप्यभिव्यक्तमुखप्रसादा शरीरबन्धेन तिरोबभूव ।। २३॥ तदद्भुत ससदि रानिवृत्त प्रातर्हिजेभ्यो नृपति श्रुत्वा त एन कुलराजधान्या साक्षात्पतित्वे वृतमभ्यनन्दन्॥२४॥ कुशावती श्रोत्रियसात् स कृत्वा यानानुकूलेऽहनि सावरोध । अनुदुतो वायुरिवाशवृन्दै सैन्यैरयोध्याभिमुख प्रतस्थे ॥२५॥ केतुमालोपवना बृद्धिर्विहारशैलानुगतेव सेना रथोदारगृहा प्रयाणे तस्याभवज्जङ्गमराजधानी॥२६॥ कोई कपड़ा डाल लिया हो ॥१७॥ पहले भवनो पर माती की माला जैमी शुभ्र चादनी चमकती थी, उन पर अब वह नहीं चमकती। क्योंरि बहुत दिनों से चना न लगने मे उन कोठो के चूने का रग काला पड़ गया है और उन पर जहाँ-तहाँ घाम उग आपा है।।1८॥ पहले उद्यानों को जिन लताओं को धारे मे झुकाकर मुन्दर स्त्रियां फूल तोडती थी उन मेरा प्रिय लताओ को वन्य भीलो के ममार उन्पाती बन्दर झकझोरते हैं॥१९॥ अत्र अटारियो के सरायो मे 1 गत को दीपको की फिरणे निकलती हैं, न दिन में मुन्दरियों का मुख दीखता है और न हा वहीं में अगर का धुओं ही निकलता है। अब वे झरोखे माडियों के जालों मे भर गये हैं।॥ २०॥ यह देखकर मुझे बढा दु स होता है कि अब न मरयू की रेती पर देवताओं की पूजा को जाता है और न रिश्या के स्नान करने पर उनके शरीर से अगराग आदि की मुगन्ध निकलता है। मरयू तट पर बनी हुई बेत की झोपड़ियाँ भी मूनी पड़ी रहती हैं।। २१ ।। अतएव तुम्हारे पिता राम ने राक्षमो को मारने लिए जो मानव शरीर धारण क्यिा या, उमे छोडकर जैसे वे परमात्मा मे लंन हो गये, वैसे ही तुम भी यह नयी राजधानी कुशावती त्यागकर अपनी कुल-परम्परा की राजधानी अयोध्या मे चल्चर निवाम रो॥२२॥ कुश ने उसकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए कहा—'ऐमा ही करेंगे'। यह मुनगर प्रमन्न मन मे अयोध्या को अधिष्ठात्री देवी अन्तर्धान हो गयौ ॥ २३॥ रात को वह विस्मयजाक घटना राजा ने सबेरे मभा में ब्राह्मणों से कही। मो मुनकर ब्राह्मणां ने कुश की प्रशमा की और कहा कि 'आप धन्य हैं, जिम कुल को राजधानी ने स्वेच्छा से अपना पति चुना हैं ॥२४॥ तदनन्तर उन्होन कुशावर्ती नगरी वेदपाठी ब्राह्मणों को दान करके दे दो और जैसे वायु के पीछे-पीछे बादल चल्ते हैं, वैसे ही अपनी मेगा माथ लेकर वे शुभ मुहूर्त में अयोध्या की ओर चल पडे ।। २५ ।। उम यात्रा क ममय चल्ली हुई कुश को मेना मचल राजधानी जैसी लगती थी। क्योंकि उमका ध्वजाओं वाला भाग ल्तायुक्त उपवतो जैमा, बडे-बडे हाथी बनावटी १९ का व छ रधुवशे , तेनातपत्रामलमण्डलेन प्रस्थापित पूर्वनिवार बभौ बलौघ शशिनोदितेन वेलामुदन्वानिव नी तस्य प्रयातस्य वरूथिनीना पीडामपर्याप्तवतोव वसुन्धरा विष्णुपद द्वितीयमध्यारुरोहेव उद्यच्छमाना गमनाय पश्चात्पुरो निवेशे पथि च । सा यत्र सेना ददृशे नृपस्य तत्रैव सामग्रधर्मात तस्य द्विपाना मदवारिसेकात्खुराभिघाताच तुरङ्गम रेणु प्रपेदे पथि पङ्कभाव पड़ोऽपि रेणुत्वमियाय मागैषिणी सा कटकान्तरेषु वैध्येषु सेना बहुधा वि चकार रेवेव महाविरावा बद्धप्रतिश्रुन्ति गुहामु स धातुभेदारुणयाननेमि प्रभु प्रयाणवतिमि व्यलयद्विन्ध्यमुपायनानि पश्यन्पुलिन्दैरुपपादि तीर्थे तदीये गजसेतुबन्धात् प्रतोपगामुत्तरतोऽस्य ग अयलबालव्यजनीबभूवुर्हसा नभोलवनलोलप स पूर्वजाना कपिलेन रोपाइस्मावशेषोकृतविग्रहा सुरालयप्राप्तिनिमित्तमम्भस्त्रैसोतम नौलुलित इत्यध्वन कैश्चिदहोभिरन्ते कूल समासाद्य कुश सरर वेदिप्रतिष्ठान्वितताध्वराणा यूपानपश्यच्छतशो रघूण आधूय शाखा कुसुमद्रुमाणा स्पृष्ट्वा च शीतान्मरयूतरङ्ग त क्लान्तसन्य कुलराजधान्या प्रत्युञ्जगामोपवनान्तवा पर्वतों जैसे और ग्थ ऊँचा-उंची अटारिया मरी लगते थे।।२६ ।। जेमे चन्द्र तट तक सींच लाता है, वैसे ही श्वेत छत्रधारा कुश अपनी सेना का रघुगुल नो की ओर लेकर चले जा रहे थे।। २७ ।। जब कुश चले तो उनकी मेना का भ अतएव उडती हुई धूल एमी लगती थी कि जेमे पृथ्वी विष्णु के दमरे पद हो ॥ २८॥ कुशावती में चलने की तैयारी करती हुई, आगे के पड़ाव पर पहु पाल कुश को सम्पूर्ण मेनिक- क-टुकड़ियाँ पूरी मना ही मालूम देती था।। २९ ।। कु' मे मिचक्र मार्ग को धूल कीचट बनो और वह कोचर भी घोडो की टापों मे जन गयी ।। ३०॥ मार्ग भूत माने में वह मेगा विन्ध्याचल के आम-पास मार्ग वट गयी। नर्मदा के ममान उम नेना के गम्भीर गी मे पर्वत की गुफाएं गूंज धातुओ मे जिसके रथ के पहिये लाल हो गए ये ओर जिमको चन्ती हुई मेन शब्द भी दब गये थे, वे राजा कुश बिन्ध्याचलनिवासी किरातो में प्राप्त भेंट को विन्ध्य मे जागे बढे ।।३२॥ वहाँ ही पश्चिम की ओर बहो वाली गगाजी पर ह जब वे पार उतरने लगे, तब आमाश में उड़ते हुए चचल पसा वाले हम कुश चेंबर के ममान दोसो लगे॥३३॥ वहाँ कुश ने नाबो के यातायात से चचल प्रणाम किया। क्योंकि कपिल मुनि के कोप मे जले हुए उनके पूर्वज (मगरपुत्र मे स्वर्ग गये थे||३४|| दम तरह मार्ग में कुछ दिन वितार कुश मरयू के तट बडे-बडे यज्ञ करने वाले रधुवंशी राजाओ के गारे हुए मैका यजम्तम्भ दिसलागी एक घोडश सर्ग छ १४७ अथोपशल्ये रिपुमग्नशल्यत्तस्या पुर पौरसख स राजा। कुलध्वजस्तानि चलध्वजानि निवेशयामास चली बलानि ॥३७ ।। तो शिल्पिसवा प्रभुणा नियुक्तास्तथागता सम्भृतसाधनत्वात्। पुर नवीचक्रुरपा विसर्गान्मेघा निदाघग्लपितामिवोर्वोम् ॥ ३८॥ तत सपर्या सपशूपहारा पुर परार्ध्यप्रतिमागृहाया । उपोषितैर्वास्तुविधानविद्धिर्निर्वर्तयामास रघुप्रवीर ॥३९॥ तस्या स राजोपपद निशान्त कामीव कान्ताहृदय प्रविश्य । यथार्हमन्यैरनुजीविलोक सम्भावयामास यथाप्रधानम्।। ४०॥ स मन्दुरासश्रयिभिस्तुरङ्गै शालाविधिस्तम्भगतैश्च नागे । पूराबभासे विपणिस्थपण्या सर्वाङ्गनद्धाभरणेव नारी ॥४१ ।। वसन् स तस्या वसतो रघूणा पुराणशोभामधिरोपितायाम्। न मैथिलेय स्पृहयाम्बभूव भर्ने दिवो नाप्यलकेश्वराय ॥४२॥ अथास्य रत्नग्रथितोतरीयमेवान्तपाण्डुस्तनलम्बिहारम् । नि श्वासहार्याशुकमाजगाम धर्म प्रियावमिवोपदेष्टुम् ।। ४३ ।। अगस्त्याचबादयनात्ममीप दिगुतरा भास्वति सनिवृते। आनन्दशीतामिव बाष्पवृष्टि मिमुति हैमवतों ससर्ज ।। ४४॥ प्रवृद्धतापो दिवसोऽतिमात्रमत्यर्थमेव क्षणदा च तन्त्री। उभौ विरोधक्रियया विभिन्नौ जापापती सानुशधाविवास्ताम् ॥ ४५ ॥ के उपवनों में वायु ने फूले हुए वृक्षो की डालियों कॅपा कर मरयू के शातल जल का स्पर्श करके थकी हुई मेना के माथ आये हुए कुश को अगवाना को॥३६॥ शत्रुविनाशक और प्रजाहितैषी राजा कुश ने फहराती हुई ध्वजावाला अपनी मेना का नगर के आम-पाम वाले स्थाना मे ठहरा दिया।॥ ३७॥ जैसे बादल इन्द्र की आजा मे जल बरमार गरमा मे तपा धरना से हरी-भरी कर देते हैं, वैसे ही कुश की आज्ञा में कारांगगे ने अपने यन्त्रो के महारे अयोध्या का रास्प दे दिया ।। ३८॥ तदान्तर रघुकुलवीर कुश ने व्रती, उपवामी एव वास्तु विद्या मे निपुण पाडतो द्वारा अनमोल मूर्तियों से भरे घरो वाली अयोध्या का विधिवत् पूजन क्गके पशुआ को बलि दा॥३१॥ जैसे कोई कामी पुरुष स्त्री के हृदय में प्रविष्ट हो जाता है, वैम हा कुश भा अपग या + राजमहल म पविष्ट हो गये और उन्होंने अपो मन्त्रियो आदि को रहने के लिए दबरे अनेक भवन दिन ।। 0 || अमोध्या की बाजारो मे सुन्दर वस्तुएँ सजी हुई यी घुटमाल मे घाडे वध थे और हस्तिशालाना मे यम्भो मे हाथी बधे हुए थे। इस प्रभार वह नगरी ऐमी मुन्दर लगती थी, जसे मारे शरार में गहना पहन कोई सा खडा हो॥ ४१ ।। अब अयोध्या फिर पहले जेमी मुन्दर लगने लगा। उपम निवाम मते हुए जानकोजी के पुत कुश को ऐमा मुख मिला कि न तो उन्हें सुन्दरा अप्मराओ मे भरे स्वर्ग के स्वामा बनने की इच्छा रह गयी और न जमध्य रलों वाली अलकापुरी ही पाने की चाह रहा ।। ४२ ॥ तभी ग्रीष्म ऋतु आ गया, जिसने मानो इन्हें अपनी उम प्रिया का स्मरण करा दिया-जिमकी ओडनी मे रत्ल जडे हो, जिमके गोरे-गोरे स्तनों पर मोतियो का हार लटका हुआ हो और जो माम को हवा मे उद्धा वाले महान कपडे पहले हा॥४३ ।। गर्मी स जो बर्फ गलने लगी, वह ऐमी लगा नि जैम दक्षिण दिशा मे मूर्य के लोट आने को प्रमनता में उत्तर दिशा ने हिमाल्य मे आन्द के ठडे ऑमुओं जैमा पानी की ठही धारा बहा दी हो॥४४॥ उम ममय अत्यन्त ताप मे भरे दिन भार बहुत छोटा-छोटा राते-ये दोनो उन पछताते १४८ क रघुवशे दिने दिने शैवलवन्त्यधस्तात्सोपानपर्वाणि विमुञ्चदम्भ । उद्दण्डपद्म गृहदीर्घिकाणा नारोनितम्बद्वयस बभूव ॥४६॥ वनेषु सायन्तनमल्लिकाना विजृम्भणोगन्धिषु कुड्मलेषु । प्रत्येकनिक्षिप्तपद सशब्द सङ्खयामिवैषा भमरश्चकार ।। ४७॥ स्वेदानुविद्धानखक्षताङ्के भूयिष्ठसन्दष्टशिष कपोले। च्युत न कर्णादपि कामिनीना शिरीषपुष्प सहसा पयात ॥४८॥ यन्त्रप्रवाहै शिशिरै परीतानसेन धौतान्मलयोद्भवस्य । शिलाविशेषाधिशय्य निन्युर्धारागृहेष्वातपमृद्धिमन्त ॥४९॥ स्नानामुक्तेष्वनुधूपवास विन्यस्तसायन्तनर्माल्लकेषु। कामो वसन्तात्ययमन्दवीर्य केशेषु लेभे बलमङ्गनानाम् ॥५०॥ आपिञ्जरा बद्धरज कणत्वान्मञ्जर्युदारा शुशुभेऽर्जुनस्य। दग्ध्वाऽपि देह गिरिशेन रोषात्खण्डोकृता ज्येव मनोभवस्य ॥५१॥ मनोजगन्ध सहकारभङ्ग पुराणशोधु नवपाटल च। सम्बध्नता कामिजनेषु दोषा सर्वे निदाघावधिना प्रमृष्टा ॥५२॥ जनस्य तस्मिन्समये विगाढे बभूवतुर्दो सविशेषकान्तौ। तापापनोदक्षमपादसेवौ स चोदयस्थो नृपति शशी च ॥५३॥ अथोर्मिलोलोन्मदराजहसे रोधोलतापुष्पबहे सरय्वा । विहर्तुमिच्छा वनितासखस्य तस्याम्भसि ग्रीष्मसुखे बभूव ।। ५४ ।। हुए पति-पली सदृश दीखने लगे, जो आपस मे झगडा करके एक-दूसरे मे रूठ गये हो ।। ४५ ।। अतिशय गर्मी से घर की बावलियाँ सेवार जमी हुई मीढियों छोडकर पीछे हटने लगी और उनका पानी सूखने लगा। उनमे कमल की डडियों दीखने लगा और पानी घटकर स्त्रियो की कमरभर रह गया ॥४६॥ वनो में चमेली खिल गयी और उसकी सुगन्ध मब ओर फैलनी लगी । सन्ध्या को गुनगुनाते हुए भारे एक-एक फूल पर बैठकर जैसे उनकी गिनती करने लगे। ४७॥ स्त्रियों के गालो पर प्रियतम के हाथों द्वारा बने हुए रखक्षतो पर पमी को बूदे फैल जाती थी और कान पर रखे हुए मिरम के फूलों की केमर उन पर मट जाती थी। अतएव जब वे फूल कान पर मे सिमरते भी थे तो मह्मा पृथ्वी पर नहीं गिर पड़ते थे॥४८॥ धनी लोग गर्मी में ठडी रह्ने वाली उन साम तरह की शिलाओ पर मोकर दुपहरी बिताते थे, जो चन्दनमिश्रित जल मे धुली होती थी और जिाये चारो ओर जल की धाराएँ छूटती रहती थीं।॥ ९॥ वमन्त बीत जाने मे जो कामदेव मन्द पड गया था, वह स्त्रियों के उन केशों में जा वसा, जो स्नान करने पर सोल दिये जाते थे और जिनमें धूप मे मुगन्धित करने के बाद शाम को फूलने वाली चमेली के सुगन्धित फूल सोस लिये जाया करते थे ।। ५० ॥ पराग मे परिपूर्ण कुछ पीली-पीली अर्जुन की मञ्जरी ऐमी लगती थी कि जैमे कामदेव का शरीर भम्म करने के पश्चात् शिवजी के हाथ टूटी हुई कामदेव के धनुष की डोरी पड़ी हो ॥५१॥ उम ममय मनोहर गन्ध वाला आम का बौर, पुराती मदिरा और नये पाटल के फूल लाकर ग्रीष्म ऋतु ने कामी पुरुषो की भव न्यूनता पूर्ण कर दी॥५२॥ उस भीषण ग्रीष्म काल में उदित होकर ही दोनों प्रजा को बहुत प्रिय लगे। एक तो मेवा मे प्रसन्न होने पर निर्धनता आदि सन्तापों को दूर करने वाले राजा कुश और दुसरे शीतल फिरण में गर्मी का सन्ताप दूर करने वाले चन्द्रमा ॥५३ ।। एक दिन कुश की यह इच्छा हुई कि जल की लहर से मतवाले हमों मे युक्त तट की लताओं के फूल बहाने वाली और गर्मी मे मुखदायिनी सरयू के जल में रानियो आसा षोडश सर्ग १४९ स तीरभूमौ विहितोपकार्यामानायिभिस्तामपकृष्टनक्राम् । विगाहितु श्रीमहिमानुरूप प्रचक्रमे चक्रधरप्रभाव ॥५५॥ सा तीरसोपानपथावतारादन्योन्यकेयूरविट्टिनीभि सनूपुरक्षोभपदाभिरासीदुद्विग्नहसा सरिदगनाभि ॥५६॥ परम्पराभ्युक्षणतत्पराणा तासा नृपो मज्जनरागदर्शी। नौसश्रय पार्श्वगता किरातीमुपातबालव्यजना बभाषे॥५७।। पश्यावरोधै शतशो मदीयैर्विगाहमानो गलिताङ्गरागै । सन्ध्योदय सान इवेष वर्ण पुष्यत्यनेक सरयूप्रवाह ॥५८॥ विलुप्तमन्त पुरसुन्दरोणा यदञ्जन नौलुलिताभिरद्धि । तघ्नतीभिर्मदरागशोभा विलोचनेषु प्रतिमुक्तमासाम्॥५९॥ एता गुरुश्रोणिपयोधरत्वादात्मानमुद्वोढुमशक्नुवत्य गाढाङ्गदैर्बाहुभिरप्सु बाला क्लेशोत्तर रागवशात् प्लवन्ते ॥६०॥ अमी शिरीषप्रसवावतसा प्रभ्रशिनो वारिविहारिणीनाम्। पारिप्लवा स्रोतसि निम्नगाया शैवाललोलाश्छलन्ति मोनान् ॥६१ ॥ जलास्फालनतत्पराणा मुक्ताफलस्पर्धिषु शीकरेषु । पयोधरोत्सर्पिषु शीर्यमाण सलक्ष्यते न च्छिदुरोऽपि हार ॥६२॥ आवर्तशोभा नतनाभिकान्तेर्भङ्गो भुवा द्वन्द्ववरा स्तनानाम्। जातानि रूपावयवोपमानान्यदूरवर्तीनि विलासिनीनाम् ॥ ६३॥ के साथ विहार किया जाय ॥५४॥ ऐमा निश्चय करके विष्णु जैसे प्रभावशाली कुश सरयू के जल में विहार करने को चले। तदनुमार सरयू के तट पर डेरे तन गये और मल्लाहो ने ग्राह आदि जन्तुओ को मरयू से निकाल दिया।॥ ५५॥ कुश की रानियों मीढियो मे जब पानी मे उतरने लगी, उम समय उनके भुजबन्द एक-दूमरे से टकराने लगे, पैर के बिछुए बजने लगे ओर इन शब्दों को मुनकर सरयू के हस उद्विग्न हो उठे ॥५६ ।। तभी वे रानियों जल में उतरकर एक-दूमरे के ऊपर छोटे डालने लगीं। उन रानियों के स्नान की वह शोभा देखकर नाव पर बैठे हुए राजा कुश पास ही चंवर लेकर खड़ी किरातिनी से बोले॥५७ ।। देखो, मेरे रनवाम की मैकडों रानियों के स्नान करने और उनके शरीर से धुले हुए अगराग के मिल जाने से सरयू की धारा बादलों मे भरी सन्ध्या जैसी रग-बिरगी दीख रही है॥५८॥ नावों के चलने से जल मे उठने वाली लहरों ने इन मुन्दरियों की आँखों का अञ्जन धोकर उसके बदले मंदपान के समय की लाली लेकर इनकी आँखों मे भर दी है।। ५९ ।। बोझिल नितम्बों तथा स्तनों के कारण ये भलीभाँति तैर नहीं पाती, तथापि सेल मे मम्मिलित होने के कारण ये अपने मोटे-मोटे भुजबन्दों वाली बाँहों मे जल में बड़ी कठिनाई से तैरती हैं।। ६० ।। इन जलक्रीड़ानिरत रानियों के कानों से गिरे हुए सिरम के कर्णफूल नदी मे तैर रहे हैं। इन्हें देखने वाली मछलियों को सेवार का भ्रम होता है और वे इन पर मुँह मार रही हैं।। ६१ ॥ देखो, जलप्रीड़ा में मलग्न रानियों को यह भी नहीं मालूम कि इनके हार टूट गये हैं और मोती बिखर गये हैं। वे मोतियों के ममान दोराने वाले जलबिन्दुओं को ही मोती समझ बैठी हैं और इनका ख्याल है कि हार नहीं टूटा है ।। ६२ ॥ देस, सुन्दरी स्त्रियो के शरीर के अगो की तरह जो वस्तुएँ प्रसिद्ध हैं वे मब इन मुन्दरियों के पाम स्वत जुट गयी है। पानी की भंवर इनकी गहरी नाभि के सदृश, लहरें भौंहो के ममान और चकवा-चकवी इनके स्तों जैसे १५० के रघुवशे तोरस्थलीबर्हिभिरत्कलाप प्रस्निग्धकेकैरभिनन्द्यमानम् । श्रोत्रेषु सम्मूर्छति रक्तमासा गीतानुग वारिमृदङ्गवाद्यम् ।। ६४ ।। सन्दष्टवस्त्रेष्वबलानितम्बेष्विन्दुप्रकाशान्तरितोडुतुल्याः अमो जलापूरितसूत्रमार्गा मौन भजन्ते रशनाकलापा ॥६५॥ एता करोत्पीडितवारिधारा दत्सिखीभिर्वदनेषु सिक्ता । वक्रेतराग्नेरलकैस्तरुण्यश्चूर्णारुणान् वारिलवान् वन्ति ॥६६॥ उन्धकेशश्च्युतपत्रलेखो विश्लेषिमुक्ताफलपत्रवेष्ट । मनोज्ञ एव प्रमदामुखानामम्भोविहाराकुलितोऽपि धेष ॥ ६७ ॥ स नौविमानादवतीर्य रेमे विलोलहारः सह ताभिरप्सु। स्कन्धावलग्नोद्धृतपद्मिनीक, करेणुभिर्वन्य इव द्विपेन्द्रः॥८॥ ततो नृपेणानुगता स्त्रियस्ता भाजिष्णुना सातिशय विरेजु । प्रागेव मुक्ता नयनाभिरामा प्राप्येन्द्रनील किमुतोन्मयूखम् ।। ६९ ॥ वर्णोदकै काननशृङ्गमुक्तैस्तमायताक्ष्य, प्रणयासिञ्चन् । तथागत सोऽतितरा बभासे सधातुनिष्यन्द इवादिराज. ॥७॥ तेनावरोधप्रमदासखेत विगाहमानेन सरिद्वरा ताम्। आकाशगङ्गारतिरप्सरोभिव॒तो मरुत्वाननुयातलील ॥७१ ॥ यत्कुम्भयोनेरधिगम्य राम कुशाय राज्येन सम दिदेश । तदस्य जनाभरण विहर्तुरज्ञातपात र्सालले ममज्ज ।। ७२ ॥ हैं। ६३ ।। गाता हुई ये जो मृदग बजाने के ममान थपकी दे-देकर जल पीट रहा हैं, उमे मुनकर तट पर बैठे हुए मोर अपनी पूंछ उठार और बोलकर उनका अभिान्दन करत हे ।। ६४ || अपने नितम्बो पर रानियो ने श्वेत वस्त्र लपेट लिया है, उमो नीचे करधी के धुघर चाँदनी से ढंके हुए तारे जैसे दीखते हैं। उनके डोगे मे जल भर जाने मे दन रित्रयों इधर-उधर दौडने पर भी ये बजते नहीं हैं।। ६५ ।। इनकी मलियाँ जब इनके मुंह पर पाना टालती हैं और ये भी. अहकार में अपनी सखियों पर पानी उछालती हैं, तब इनके मांधे लटके हुए बालों मे तुकुम-मिथित लाल रंग की बूंदे टपकने लगती हैं ।। ६६ ।। यद्यपि स्नान के कारण बाल सुल जाने, मुँह और स्तनो पर बनी हुई चित्रकारी धुल जाने तथा मोतियों के कर्णफूल कान मे निकल जाने पर स्त्रियो का वेश अस्त-व्यस्त हो गया है, तथापि ये स्तिनी सुन्दर लग रही हैं।। ६७ ।। ऐमा कहकर कुश मा नौका म पानी मे उतर पडे और जैमे कमलिगियों को कन्धे पर लटकाये हुए जगली हाथी हथिनियो के माथ जलक्रीडा करते हैं वैसे ही हिलते हुए हारवाले कुश भी उन स्त्रियो के माथ जल-विहार करने लगे॥ ६८ ॥ उम कान्तिमान् राजा के माथ जलप्रीटा करती हुई वे रानियों ओर भी अधिक मुन्दर लगने लगी। क्योकि मोती यों ही मुन्दर होते हैं, फिर यदि वह इन्द्रनीलमणि के माथ मिल जाय, तब उमको शोभा का क्या कहना ॥ ६९ ॥ तव वे स्त्रियाँ मोने को पिचकारियो मे रग छोड-छोडकर राजा कुश को भिगोने लगी। उम ममय वे ऐसे दीखने लगे, जैमे पर्वतराज हिमालय पर मे गेर का झरना झर रहा हो। ७० ।। उन स्त्रियों के माथ मरयू मे जलप्रीडा करते समय कुश ऐसे लगते थे, जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गाय अप्मराओ के माथ आमाशगगा में जलनीडा कर रहे हो ।। ७१ ।। अगस्त्य ऋषि ने राम को जैत्र (मदा जीतो वाला) जो आभूषण दिया था, उमे राम ने राज्य के माथ ही कुश को दे दिया था। जल्कोड़ा करते ममय महमा वह आभूषण पानी में गिर गया और किमी १५१ तत षोडश सर्ग स्नात्वा यथाकाममसी सदारस्तोरोपकार्या गतमात्र एव । दिव्येन शून्य वलयेन वाहमपोढनेपथ्यविधिर्ददर्श ॥७३॥ जश्रिय सवनन यतस्तदामुक्तपूर्व गुरुणा च यस्मात् । सेहेऽस्य न भ्रशमतो न लोभात्स तुल्यपुष्पाभरणो हि धीर ॥७॥ तत समाज्ञापयदाशु सर्वानानायिनस्तद्विचये नदीष्णान् । वन्ध्यश्रमास्ते सरयू विगाह्य तमूचुरम्लानमुखप्रसादा ॥७॥ कृत प्रयत्नो न च देव लब्ध मग्न पयस्याभरणोतम ते। नागेन लोल्यात्कुमुदेन नूनमुपातमन्तर्हदवासिना तत्॥७६ ॥ स कृत्वा धनुराततज्य धनुर्धर कोपविलोहिताक्ष । गारुत्मत तोरगतस्तपस्वी भुजङ्गनाशाय समाददेऽस्त्रम् ॥ ७७ ॥ तस्मिन् ह्रद सहितमान एव क्षोभात्समाविद्धतरङ्गहस्त । रोधासि निघ्नन्नवपातमग्न करोव वन्य परुष ररास ।। ७८॥ तस्मात् समुद्रादिव मथ्यमानादुदवृत्तनक्रात् सहसोन्ममज्ज। लक्ष्म्येव सार्ध सुरराजवृक्ष कन्या पुरस्कृत्य भुजङ्गराज ॥७९॥ विभूषणप्रत्युपहारहस्तमुपस्थित वोक्ष्य विशाम्पतिस्तम्। सौपर्णमस्त्र प्रतिसाहार प्रद्वेष्वनिर्बन्धरुपो हि सन्त ॥८॥ त्रैलोक्यनाथप्रभव प्रभावात्कुश द्विपामङ्कुशमरविद्वान् । मनोनतेनाभिवन्द्य मूर्ना मूर्धाभिषिक्त कुमुदो बभापे ॥८॥ को इस बात का ज्ञान हा नहीं रहा ।।७२ ।। म प्रा गरियो र माथ यथेच्छ जलग्रीडा करक कुश जब जल मे बाहर निपले और दर पर गय तर कपडे बदला के पहले हा उन्होने देसा कि भुजा पर मे वह दिव्य आभूषण गाया है।। ३ ।। यद्यपि बुद्धिमान राजा कुश फूल और आभूषण दो को बराबर ममन्नते थे, अतएव आभूषण के या जाा का दमाला द य नहीं हुआ कि वह बहुमूल्य था, बल्कि इसलिए दुस हुआ रि वह लाभूषण विजयलक्ष्मा प्राप्त कगा वाला आर अपो पिता गम का चिह्न था॥७४।। अतएव उन्हो। मत्र धावग । वह आभूषण हटने को आज्ञा दा। बहुत देर तक उन लोगों ने पानी मे टटोला, परन्तु उनका मब परिश्रम व्यर्थ हा गया। तब वे कुश के पाम आर बाले–||७५॥ हे देव । बहुत परिश्रम करने पर भी हम लोग जल मे गिरे हुए जापरे आभूषण को नहीं पा मरे। ऐना लगता है कि इस जल मे रहन वाले कुमुद राम + नाग न लोभवश चुरा लिया है॥७६ ॥ यह मुना वैसे ही कुश की आखे ब्राध मे लाल हो गयीं। तट पर खड हार उन्होंने अपना धनुष मम्हाना और नाग को नष्ट करने के लिए उम पर गास्तास्त्र चढ़ा लिया ।। ७७ ।। उनरे धाष चहाते हो उम मरोवर का जल खलबलाता हुआ अपना तरग रूपी हाय उठार तट को तोदता हुआ इन तरह गरजन लगा, जैमे गढ्ढे में गिरा हुआ कोई हाथी चिपाड रहा हो ॥ ७८ ।। ममुद्र के ममान उम जल को मथा जाता देवर ना-घडियाल आदि जीव घबरा ठ। इतने मे उम जल म मे एक कन्या को आगे किये नागराज कुमुद इस प्रकार निकना, जैसे लक्ष्मा को माय लेकर कल्पवृक्ष निरल हो ॥७९ ।। गजा कुश ने देखा कि कुमुद के हाथ मे वरी आभूषपा विद्यमान है, इमलिए उन्होंने धनुष पर मे गारुटारर उतार लिया। क्योंकि मञ्जन लोग ऐसे लोगो पर पोप नहीं करते हैं, जो विनम हार उनके ममक्ष पहुँच जाते है ।।८।। त्रिलोकीनाथ राजा राम के पुत्र तथा शत्रुओं को अनुश मदृश दु स देन वाले कुश को अभिमान मे उठा हुआ अपना मिर नवाकर कुमुद ने प्रणाम किया। क्योकि वह कुश के बाण की शक्ति को भलीभाति १५२ ॐ रघुवशे अवैमि कार्यान्तरमानुषस्य विष्णो सुताख्यामपरा तनु त्वाम् । सोऽह कथ नाम तवाचरेयमाराधनीयस्य धृतेर्विधातम् ।।८२॥ कराभिघातोत्थितकन्दुकेयमालोक्य बालाऽतिकुतूहलेन। हदात्पतज्योतिरिवान्तरिक्षादादत्त जैत्राभरण त्वदीयम् ।।८३॥ तदेतदानानुविलम्बिना ते ज्याधातरेखाकिणलाञ्छनेन । भुजेन रक्षापरिघेण भूमेरुपैतु योग पुनरसलेन ॥८४॥ इमा स्वसार च यवीयसी मे कुमुद्वतीं नार्हीस नानुमन्तुम् । आत्मापराध नुदती चिराय शुश्रूषया पार्थिव पादयोस्ते॥४५॥ इत्यूचिवानुपहृताभरण क्षितीश श्लाघ्यो भवान्स्वजन इत्यनुभाषितारम्। सयोजया विधिवदास समेतबन्धु कन्यामयेन कुमुद कुलभूषणेन ॥८६॥ तस्या स्पृष्टे मनुजपतिना साहचर्याय हस्ते माङ्गल्योर्णावलयिनि पुर पावकस्योच्छिखस्य । दिव्यास्तूपवनिरुदचरधश्नुबानो दिगन्तान्गन्धोदन तदनु ववृषु पुष्पमाश्चर्यमेघा 11 ८७ ॥ इत्य नागस्त्रिभुवनगुरोरौरस मैथिलेय लब्ध्वा बन्धु तमपि च कुश पञ्चम तक्षकस्य । एक शङ्का पितृवरिपोरत्यजद्वैनतेयाच्छान्तघ्यालामवनिमपर पौरकान्त शशास ॥८॥ इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये कुमुद्वती- परिणयो नाम घोडश सर्ग ॥१६॥ जानता था। इस प्रकार पणाम करके वह कहने लगा ।। ८१ ।। मैं जानता हूँ कि आप राक्षसों का नाश करने के लिए मनुष्य का शरीर धारण करने वाले विष्णु के दूसरे रूप अर्थात् उनके पुत्र हैं। आप मेरे पूजनीय हैं। अत मैं भला आपमे वैर कैमे कर सकता है।॥४२॥ यह कन्या गेद खेल रही थी। इसकी थपकी से गेद उपर उछल गयी। उसे देखने को इसने जो ऊपर ऑख उठायी तो देखा कि आकाश से गिरते हुए तारे के समान आपका आभूषण नीचे चला आ रहा है। बम, इमो उसे पकड लिया ।।८३ ।। अब आप इसे ले लीजिए और अपनी उम मोटी और लम्बी भुजा मे फिर बाँध लीजिए, जिसमे धनुष की डोरी के आघात से घटे पड़ गये हैं और जो पृा की रक्षा करती रहती है।। ८४॥ हे राजन् । मेरी छोटी बहन कुमुद्वती जीवनभर आपकी मेवा करके अपने अपराध का मार्जन करना चाहती है। अतएव आप इसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर ले॥८५ऐमा कहकर कुमुद ने वह आभूषण कुश को दे दिया। कुश ने कहा माज में आप मेरे आदरणीय मम्बन्धी हुए। यह मुनकर कुमुद ने अपने कुटुम्बियो को बुलाया और बड़ी धूम-धाम मे उम कन्या का कुश के माथ विवाह कर दिया ।। ८६ ।। राजा कुश ने जब अग्नि के समक्ष उस कन्या का ऊनी कगन बँधा हुआ हाथ पकडा, उम समय तुरही आदि बाजों को ध्वनि मे दसों दिशाएँ गूंज उठी और विचित्र प्रकार के मेघों ने आ-आकर आकाश से उनके ऊपर मुगन्धित पुष्पों की वर्षा को ।। ८७॥ नागराज कुमुद ने इस प्रकार त्रिलोकीनाथ विष्णु अर्थात् राम के पुत्र कुश को अपना सम्बन्धी बनाकर गरूड मे डरना छोड दिया। क्योकि अब गरड के सम्बन्धी के पिता के वाहन मात्र रह गये थे। इधर कुश ने भी नागराज तक्षक के पांचवें पुत्र कुमुद को अपना सम्बन्धी बनाया, तभी मे मर्प शान्त हो गये और कुश पृथ्वी पर यथावत् शामन करने लगे।॥८॥ इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य मे कुमुद्वती-परिणय नामक सोलहवा सर्ग समाप्त।।१६।। ।

सप्तदश सर्ग अतिथि नाम काकुत्स्थात्पुत्र प्राप कुमुद्वतो । पश्चिमाद्यामिनीयामात्प्रसादमिव चेतना ॥ १ ॥ स पितु पितृमान्वश मातुश्चानुपमद्युति । अपुनात् सवितेवोभी मार्गावुत्तरदक्षिणौ ॥ २ ॥ तमादौ कुलविद्यानामर्थमर्थीवदा वर | पश्चात्पार्थिवकन्याना पाणिमग्राहयत्पिता ॥ ३ ॥ जात्यस्तेनाभिजातेन शूर शौर्यवता कुश । अमन्यतैकमात्मानमनेक वशिना वशी।। ४ ।। स कुलोचितमिन्द्रस्य साहायकमुपेयिवान् । जघान समरे दैत्य दुर्जय तेन चावधि ॥ ५ ॥ त स्वसा नागराजस्य कुमुदस्य कुमुद्वती । अन्वगात्कुमुदानन्द शशाङ्कमिव कौमुदी॥ ६ ॥ तयोर्दिवस्पतेरासोदेक सिहासनार्धभाक् । द्वितीयाऽपि सखोशच्या पारिजाताशभागिनी ॥७॥ तदात्मसम्भव राज्ये मन्त्रिवृद्धा समादधु । स्मरन्त पश्चिमामाज्ञा भर्तु सग्रामयायिन ॥८॥ ते तस्य कल्पयामासुरभिषेकाय शिल्पिभि । विमान नवमुद्वेदि चतु स्तम्भप्रतिष्ठितम् ।। ९ ॥ तत्रैत हेमकुम्भेषु सम्भृतैस्तीर्थवारिभि । उपतस्थु प्रकृतयो भद्रपीठोपवेशितम्॥१०॥ नद्धि स्निग्धगम्भीर तूर्यराहतपुष्करै । अन्वमीयत कल्याण तस्याविच्छिन्नसन्तति ॥११॥ दूर्वायवाङ्कुरप्लक्षत्वगभिन्नपुटोतरान् । ज्ञातिवृद्धे प्रयुक्तान्स भेजे नीराजनाविधीन् ॥१२॥ पुरोहितपुरोगास्त जिष्णु जैरथर्वभि । उपचक्रमिरे पूर्वमभिषेक्तु द्विजातय ॥१३॥ तस्यौघमहती मूर्ध्नि निपतन्ती व्यरोचत । सशब्दमभिषेकश्रीगङ्गेव त्रिपुरांद्वष ॥१४ ।। रात के चौथे पहर अर्थात ब्राह्म मुहूर्त मे जैसे बुद्धि को नवीरता प्राप्त हो जाती है, वैसे ही कुश को कुमुद्वती की कोख मे अतिथि नाम का पुत्र प्राप्त हुआ।। १ ।। जैसे तेजस्वी सूर्य अपने प्रकाश से उतर तथा दक्षिण दोनों दिशाएँ पवित्र कर देते हैं, वैसे ही जमाधारण तेजस्वी पुत्र अतिथि ने माता और पिता दोनों के कुल पवित्र कर दिये ॥२॥ पिता कुश ने पहले उमे आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता तथा दण्डनीति-ये चारों राजविद्याएँ सिखायों। फिर राजाओं की कन्याओं के माथ उमका विवाह सम्पन्न कर दिया।। ३ ।। अतिथि भी कुश के ममान ही कुलीन, वीर और जितेन्द्रिय थे। इसलिए कुश अपने पुत्र को अपना ही दूसरा स्वरूप मानते थे॥ ४॥ अपनी कुलपरम्परा के अनुमार कुश भी एक बार युद्ध में इन्द्र को महायता करने गये थे। वहाँ उन्होंने दुर्जय नाम के राक्षम को मारा और स्वय भी वीरगति को 'प्रास हो है। जैसे कुमुदिनी को विकसित करनेवाले, चन्द्रग. के. अस्तहो. छाले, पर नॉदनी भी ममाप्त हो जाती है, उसी प्रकार नागराज कुमुद की बहन कुमुद्वती भी कुश के साथ सती हो गयो।।६।। राजा कुश को तो इन्द्र के मिहामन का आधा भाग मिला और कुमुद्धती ने जाकर शची (इन्द्राणी) के पारिजात का आधा भाग बटा लिया ॥७॥ उम युद्ध मे जात ममय कुश ने जैसी आज्ञा दी थी, तदनुसार मन्त्रियों ने उनके पुत्र अतिथि को कुश का उत्तराधिकारा राजा बनाया ॥८॥ उमके अभिषेक के लिए मत्रियों ने कारीगरों से ऊंची वेदी के चार खम्भों का नया मडप बनवाया ॥९॥ तब प्रजा ने भद्रपीठ पर बैठे हुए राजा अतिथि को सोने के घडो मे भरे हुए तीर्थजल मे नहलाया ॥ १०॥ उम ममय मृदङ्ग आदि वाद्यों को बजाने पर जो मधुर और गम्भीर शब्द निकलता था, उमसे यह अनुमान हो रहा था कि राजा अतिथि का सदा कल्याण होगा ।।११।। दूब, जौ के अकुर तथा वटवृक्ष की छाल दोनों रखकर कुल के बड़े-बूढों ने जो आरती की, उमे राजा अतिथि ने सादर स्वीकार क्यिा ।।१२।। तब पुरोहित को आगे करके ब्राह्मण आये और विजयो राजा को अथर्ववेद के उन मन्त्रों को पढ़ते हुए नहलाने लगे, जिनमे विजय प्राप्त होती है।।१३ ॥ उस समय उनके मिर पर गिरती हुई अभिषेक के जल २० का० १५४ रघुवशे है स्तूयमान क्षणे तस्मिन्नलक्ष्यत स बन्दिभि | प्रवृद्ध इव पर्जन्य सारङ्गरभिनन्दित ॥१५॥ तस्य सन्मन्त्रपूताभि स्नानमद्धि. प्रतीच्छत । ववृधे वैद्युतस्यांग्नेर्वृष्टिसेकादिव द्युति ॥ १६ ॥ स तावदभिषेकान्ते स्नातकेभ्यो ददौ वसु । यावतैषा समाप्रन्यज्ञा पर्याप्तदक्षिणा ॥१७॥ ते प्रीतमनसस्तस्मै यामाशिपमुदैरयन् | सा तस्य कर्मनिवृत्तैर्दूर पश्चात्कृता फलै ॥१८॥ बन्धच्छेद स बद्धाना वधार्हाणामवध्यताम् । धुर्याणा च धुरो मोक्षमदोह चादिशद्वाम् ॥१९॥ क्रीडापत्रिणोऽप्यस्य पञ्जरस्था शुकादय । लब्धमोक्षास्तदादेशाद्यथेष्टगतयोऽभवन् ।॥ २०॥ तत कक्ष्यान्तरन्यस्त गजदन्तासन शुचि । सोत्तरच्छदमध्यास्त नेपथ्यग्रहणाय स ॥२१॥ त धूपाश्यानकेशान्त तोनिर्णिक्तपाणय । आकल्पसाधनैस्तैस्तैरुपसेदु प्रसाधका ॥२२॥ तेऽस्य मुक्तागुणोन्नद्ध मौलिमन्तर्गतमजम् । प्रत्यूपु पद्मरागेण प्रभामण्डलशोभिना ।। २३॥ चन्दनेनाङ्गराग च मृगनाभिसुगन्धिना | समापय्य ततश्चक्र पत्र विन्यस्तरोचनम् ॥२४॥ आमुक्ताभरण स्रग्वी हसचिहृदुकूलवान् । आसीदतिशयप्रेक्ष्य स राज्यश्रीवधूवर ॥२५॥ नेपथ्यदर्शिनश्छाया तस्यादर्श हिरण्मये । विरराजोदिते सूर्ये मेरौ कल्पतरोरिव ॥२६॥ स राजककुदव्यग्रपाणिभि पार्श्ववर्तिभि । ययावुदीरितालोक सुधर्मानवमा सभाम् ।। २७॥ वितानसहित तत्र भेजे पैतृकमासनम् । चूडामणिभिरघृष्टपादपीठ महीक्षिताम् ।। २८ ॥ की धारा ऐमी मुन्दर लगती थी, जैसे. शिवजी के सिर पर गङ्गाजी की धारा गिरती हो ॥१४॥ भाट जोर चारण जब अतिथि का यश गान लगे तो ऐमा ल्गा कि जैसे अनेक चातक मिलकर बादल के गुण गा रहे हैं ॥१५ ।। मन्त्रों में अभिमत्रित जल मे स्नान करते समय उनके शरीर का तेज वैसे ही बढ़ गया, जैम वर्षा के जल मे बिजली की दीप्ति बढ़ जाता है ।। १६ ।। अभिषेक के बाद राजा अतिथि ने स्नातक ब्राह्मणा को इतना धन दिया कि उस धन मे वे अच्छा दक्षिणा दे देकर अनेक यज्ञ कर मकत थे।।१७।। उन ब्राह्मणो ने प्रमन्न होकर उन्हे जो जागीर्वाद दिया, उमको मफल होने के लिए बहुत दिन प्रतीक्षा करनी पड़ी। क्योकि आशीर्वाद के ममय तो राजा अतिथि अपने पूर्वजन्म के मत्कर्मा का ही फल भाग रहे थे, आशार्वाद का फल तो उम फल की ममाप्ति पर प्रारम्भ होता ।। १८ ॥ उम राज्याभिषेक की प्रसन्नता मे अतिथि ने आज्ञा दी कि मब कैदी छोट दिये जायँ, मृत्युदण्ड पाये हुए अपराधी न मारे जायें, भारवाहा पशुओं के कन्धे मे जुए उतार लिये जायें और गोओ का दुहना बन्द कर दिया जाय ।। १९ ।। पिंजडे के मुग्गे आदि पक्षी भी उनकी आज्ञा मे छोड दिये गये, जिममे वे यथच्छ उडने लगे॥२०॥ तदनन्तर वह राजा अतिथि अपना गजमी मिगार कराने के लिए हाथीदांत के बने मिहासन पर बैठे, ओ राजमहल से एक ओर रस था और जिम र विछौला पिछा हुआ था।॥ २१ ॥ तब मिगारकलाकुशलों ने धुले हाथो से धूप ने मुगधित केशवाले गजा अतिथि को मव जलकारों मे सजाना आरम्भ किया ।। २२ ।। फूल और मोतियो को मालो मे ग्रथित गजा के मिर पर उन्होंने वह पद्मरागमणि बॉधी, जिमको मुन्दर चमक चारो ओर फैल गयी ।। २३ ।। तत्पश्चात् उन्होने कस्तूरी मे मुवामित चन्दन का अगराग लगाकर गोरोचन मे राजा के मुख पर चितारा की॥२४॥ आभूषण तथा माला पहने और हम का चित्र छपा हुआ दुपट्टा ओढे हुए अतिथि राजा उम ममय ऐसे मुन्दर लगते थे, मानो राजलक्ष्मीरूपिणी वधू के दुल्हे हो ॥ २५ ॥ मोने के चौपटेवाले दर्पण मे जब वे अपनी मजावट देखने लगे, उस समय उनका प्रतिबिम्ब ऐमा लगा कि जैसे मूर्यादयकाल मे मुमेर पर्वत पर कल्पवृक्ष प्रतिविम्बित हो रहा हो ॥२६ ।। अब वे अपना उम सभा को ओर चले, जो देवताओ को मभा मुधर्मा में भी थी। उनके पीछे-पीछे बहुत मे मेवक चंवर टुलाने तथा जय-जयकार करते हुए चल रहे थे। २७ ।। वहाँ पहुँचकर चेंदोगा लगे हुए अपने पूर्वजो के मिहामन पर वे जा बैठे। उनके पैर के नीचे जो पीढा कम मप्तदश सर्ग १५५ शुशुभे तेन चाक्रान्त मङ्गलायतन महत् । श्रीवत्सलक्षण वक्ष कौस्तुभेनेव कैशवम् ॥२९॥ वो भूय कुमारत्वादाधिराज्यमवाप्य स । रेखाभावादुपारुढ सामनयमिव चन्द्रमा ॥३०॥ प्रसन्नमुखराग त स्मितपूर्वाभिभाषिणम् । मूर्तिमन्तममन्यन्त विश्वासमनुजीविन ॥३१॥ स पुर पुरुहूतश्री कल्पद्रुमनिभध्वजाम् । क्रममाणश्चकार द्या नागेनैरावतौजसा ॥३२॥ तस्यैकस्योति छत्र मूर्ध्नि तेनामलत्विषा । पूर्वराजवियोगोष्म्य कृत्स्नस्य जगतो हतम्॥३३॥ धूमादग्ने शिखा पश्चादुदयादशवो रवे । सोऽतीत्य तेजसा वृत्ति सममेवोत्थितो गुणे ॥३४॥ त प्रीतिविशदैनॆत्रैरन्वयु पौरयोषित । शरत्प्रसनैयोतिभिर्विभावर्य इव ध्रुवम् ॥ ३५ ।। अयोध्यादेवताश्चैन प्रशस्तायतनार्चिता । अनुदध्युरनुध्येय सान्निध्य प्रतिमागते ॥३६ ।। यावन्नाश्यायते वेदिरभिषेकजलाप्लुता । तावदेवास्य वेलान्त प्रताप प्राप दु सह ॥३७॥ वसिष्ठस्य गुरोर्मन्त्रा सायकास्तस्य धन्विन । कि तत्साध्य यदुभये साधयेयुर्न सङ्गता ॥ ३८॥ स धर्मस्थसख शश्वदर्यिप्रत्यर्थिनां स्वयम् । ददर्श सशयच्छेद्यान्व्यवहारानतन्द्रित ॥३९॥ तत परमभिव्यक्तसौमनस्यनिवेदितै । युयोज पाकाभिमुखै त्यान्विज्ञापनाफलै ॥४०॥ प्रजास्तद्गुरुणा नद्यो नभसेव विर्धिता । तस्मिस्तु भूपसी वृद्धि नभस्ये ता इवाययु ॥४१।। यदुवाच न तन्मिय्या यद्ददौ न जहार तत् । सोऽभूदग्नव्रत शत्रूनुद्धत्य प्रतिगेपयन् ॥४२॥ रखा था, वह प्रणाम करने वाले राजाओं के मिर के मणियां की गड म घिम गया था ।। २८ ।। भृगु के चरण की चोट मे बो हुए धीवत्म-चिह्नवान विष्णु का वक्ष म्थल जैसे गौस्तुभमणि म चमर उठा था, वैमे ही राजा अतिथि के बैठने मे वह मभाभवन भा जगमगान लगा।। २ ।। इस प्रकार गजा अतिथि को युवराज बनो का अवमर हा नहीं मिल। क्योरि व कुमा' अवस्था के बाद तुरन्त महाराज हो गये। जैसे एक ही कलागले चन्द्रमा म तुरन्त मोल्हो कलाएं आ गयी हो । ३० ।। उनका मुस मदा प्रमन्न रहता था और वे सबमे हमर वाल्ते थे। अन उनके मवर उन्हे मूर्तिमान् विश्वाम समझते थे।॥३१॥ दन्द्र जैसे ऐश्वर्यशाली गजा अतिथि जब गवत के मदृश बल्वाा हाथी पर चढकर अयोध्या मे घूमने निकले, तब कल्पवृक्ष के ममान ध्वजाला मे अलगृत अया या गिरा स्वर्ग-मदृश दीपने ल्गा ।।३२ ।। राजछत्र यद्यपि केवल राजा अतिथि के सिर पर हा त्गा हुआ था परन्तु उम श्वेत छत्र ने मारे ममार का वह ताप दूर कर दिया, जो कुश के विधाग मे उत्पन हो गया था ॥ ३३ ॥ धुआँ निरलने के बाद आग की लपटे उठती हैं और फिरणे मूर्योदय के पश्चात् दिखलायर्या दता हैं, परन्तु अतिथि ने इन तेजस्वियो के नियमो को भी उल्ट दिया। क्योंकि सारे गुण गजा बनने के माथ-माथ प्रस्ट हो गये ॥३४॥ शरद् ऋतु को निर्मल गतो के तारे जैसे ध्रुव के चाग ओर घूमते हैं वैम ही नगर की रिश्यों की प्रेमभरी ऑखें अतिथि पर जा अटकी ।। ३५५ ।। अयोध्या में बड़े-बडे मन्दिरो मे जिन देवताओ की पूजा की गयी, उन्होने अपनी मूर्तियो मे आर कृपा के योग्य गजा अतिथि पर बहुत बड़ा कृपा की॥३६॥ अभा उनके अभिषक के जल मे भागा वेदी मूषने भा नहा पाया था कि उनका दु मह प्रताप ममुद्र के तर तक जा पहुंचा ॥३७ ।। गुरु घमिष्ठ के मन्त्र और धनुषधारा राजा अतिथि के बाण इन दोनों ने कोई भी ऐमा कार्य नहीं था, जिमे मिलकर न पूग स्यिा हो ॥ ३८ ॥ धर्मात्माओ के मित्र राजा अतिथि आलस्य छोड़कर वादी-प्रतिवादियों के पेवादे झगडे स्वय निपटाया करते थ।।३९।। जैसे वृक्ष को पुष्पित देसकर यह अनुमान हो जाता है कि दममे इतने फल मिलेगे। वैसे ही गजा अतिथि का प्रमन मुख देसर ही उनके मेवफ जान जाते थे कि हमे इतना धन मिलेगा।॥ ४० ॥ कुश के ममय मे जो प्रजा मावन को नदी के समान भरी-पूरी थी, वह अतिथि के राज्य मे भाटो को नदी के ममान और भी अधिक बढ़ गयो॥४१॥ राजा अतिथि ने मुंह मे जो कहा, वह कर दिखलया और जिमे जो दिया, उमसे फिर पर रघुवशे वयोत्पविभूतीनामेकैक मदकारणम् । तानि तस्मिन्समस्तानि न तस्योत्सिपिचे मन ॥४३॥ इत्थ जनितरागासु प्रकृतिष्वनुवासरम् । अक्षोभ्य स नवोऽप्यासीदृढमूल इव द्रुम ॥४४॥ अनित्या शत्रवो बाह्या विप्रकृष्टाश्च ते यत । अत सोऽभ्यन्तरानित्यान् षट्पूर्वमजयद्रिपून् ।। प्रसादाभिमुखे तस्मिश्चपलापि स्वभावत । निकषे हेमरेखेव श्रीरासीदनपायिनी ॥४६॥ कातर्य केवला नीति शौर्य श्वापदचेष्टितम् । अत सिद्धि समेताभ्यामुभाभ्यामन्वियेष स ॥ न तस्य मण्डले राज्ञो न्यस्तप्रणिधिदीधिते । अदृष्टमभवत्किञ्चिद्वयनस्येव विवस्वत ॥ ४८॥ रात्रिन्दिवविभागेषु यदादिष्ट महीक्षिताम् । तत्सिवे नियोगेन स विकल्पपराङ्मुख ।। ४९ ॥ मन्त्र प्रतिदिन तस्य बभूव सह मन्त्रिभि । स जातु सेव्यमानोऽपि गुप्तद्वारो न सूच्यते॥५०॥ परेषु स्वेषु च क्षिप्रविज्ञातपरस्परे । सोऽपसर्जजागार यथाकाल स्वपन्नपि ॥५१॥ दुर्गाणि दुर्ग्रहाण्यासस्तस्य रोद्धरपि द्विषाम् । नहि सिहो गजास्कन्दी भयागिरिगुहाशय ॥५२॥ भव्यमुख्या समारम्भा प्रत्यवेक्ष्या निरत्यया । गर्भशालिसधर्माणस्तस्य गूढ विपेचिरे॥५३॥ अपथैन प्रववृते न जातूचितोऽपि स । वृद्धौ नदीमुखेनैव प्रस्थान लवणाम्भस ॥५४॥ लिया नहीं। पर हॉ, शत्रुओं को उखाडकर उन्हें फिर जमाते समय उन्होंने यह नियम नहीं निबाहा ।। ४२ ।। यौवन, मौन्दर्य और ऐश्वर्य--इनमें से यदि एक भी क्मिी के पाम होता है तो वह मतवाला हो जाता है, परन्तु राजा अतिथि के पाम ये सभी वस्तुएँ थीं, तथापि उन्हें अभिमान नहीं था ।। ४३ ।। इस प्रकार प्रजा उनसे दिनोदिन अधिक प्रेम करने लगी और नये राजा होने पर भी वे दृढ जडवाले वृक्ष-मदृश अचल हो गये।। ४४॥ बाहरी शत्रु एक तो मदा होते नहीं और होते भी हैं तो दूर रहते हैं, यह सोचकर उन्होने सदा शरीर के भीतर रहोवाले काम आदि छहों शाओ को पहले जीता ।। ४५ ।। स्वभावत चचला लक्ष्मी भी प्रमन्नमुख अतिथि के पाम आपर वैसे ही अचल भाव मे बैठ गयी, जैसे कसौटी पर सिची हुई मोने की लकीर पक्की हो जाती है ।। ४६॥ मदा कूटनीति मे काम लेना कायरता है और मार-काट करके जीतना ह्मिक पशुना का काम है। इसलिए उहोंने कूटनीति और मार-काट इन दोनों नीतियो को मिलाकर शत्रुओ को जीता ।। ४७ ।। जैसे सुले आकाश में सूर्य किरणो के फैल जाने कुछ भी छिपा नहीं रहता, वैसे ही अतिथि ने चारों ओर गुप्तचरो का ऐमा जाल बिछा दिया था कि प्रजा की कोई बात उनमे छिपी नहीं रहती थी। ४८ ।। राजाओं के लिए शारत्रों ने दिन और रात के जो कर्तव्य निर्धारत रिये हैं, उन मबको राजा अतिथि नियमपूर्वक पालते थे॥४९॥ वे प्रतिदिन मन्त्रियो के माथ राज्यसम्बन्धी मन्त्रणा करते थे, परन्तु वे मरणाएँ इतनी गुप्त होती थी कि प्रतिदिन व्यवहार मे आने पर भी कोई उनको नहीं जान पाता था।।५० ।। अपने कर्मचारियो तथा शत्रुओं का भेद जानने के लिए उन्होंने ऐमी चतुराई मे उनके पीछे दृत लगा रखे थे कि वे दूत भी परस्पर एक-दूसरे को नहा पहचानते थे। उन दूतों द्वारा मब ममाचार मिलते रहो मे वे सोते हुए भी मदा जागते रहते थे ॥५१॥ यद्यपि वे युद्ध मे ही शत्रुओं का अवरोध करते थे, तथापि उन्होंने राजधानी के चारों ओर बहुत बडे-बडे दुर्ग बनवा रखे थे। क्योकि हाथियों को मारनेवाला मिह हाथियो के भय से गुफा मे नही मोता, बत्कि उमका स्वभाव ही ऐमा होता है ।। ५२ ।। राजा अतिथि जो काम करते थे, वे मब कल्याणकारी होते थे। वे कोई भी काम करने से पहले उम पर भलीभॉति सोच लेते थे। इसीलिए उसमे किमी प्रकार की कोई बाधा नहीं पटती | जैसे धान का दाना भीतर ही पकता है, वैसे ही उनका काम गुप्तर से आरम्भ होकर पूरा होता था।॥५३॥ ऐश्वर्यशाली होते हुए भी उन्होंने कभी गलत मार्ग पर पैर नहीं रखा। क्योंकि ज्वार के ममय भी समुद्र नदियों के मार्ग से ही बढ़ता है, दूसरे मार्गों में नहीं ।।५४ ।।

स सप्तदश सर्ग . १५७ काम प्रकृतिवैराग्य सद्य शमयितु क्षम । यस्य कार्य प्रतीकार स तन्नैवोदपादयत्॥५५ ।। शक्येष्वेवाभवद्यात्रा तस्य शक्तिमत सत । समीरणसहायोऽपि नाम्भ प्रार्थी दवानल ॥५६॥ न धर्ममर्थकामाभ्या बबाधे न च तेन तौ । नार्थ कामेन काम वा सोऽर्थेन सदृशस्त्रिषु ।।५७॥ होनान्यनुपकर्तृणि प्रवृद्धानि विकुर्वते । तेन मध्यमशक्तीनि मित्राणि स्थापितान्यत ।।५८॥ परात्मनो परिच्छिद्य शक्त्यादौना बलाबलम् । ययावेभिलिष्ठश्चेत्परस्मादास्त सोऽन्यथा॥ कोशेनाश्रयणीत्वमिति तस्यार्थसङ्ग्रह । अम्बुगर्भो हि जोमूतश्चातकैरभिनन्द्यते॥६०॥ परकर्मापह सोऽभूदुद्यत स्वेषु कर्मसु । आवृणोदात्मनो रन्ध्र रन्धेषु प्रहरन् रिपून् ।। ६१ ॥ पित्रा सवर्धितो नित्य कृतास्त्र साम्परायिक । तस्य दण्डवतो दण्ड स्वदेहान व्यशिष्यत ।। ६२ ।। सर्पस्येव शिरोरल नास्य शक्तित्रय पर 1 स चकर्ष परस्मात्तदयस्कान्त इवायसम्॥ ६३ ।। वापीष्विव सवन्तोषु वनेषूपवनेष्विव | सार्था स्वैर स्वकीयेषु चेरुर्वेश्मस्विवाद्रिषु ॥६४ ॥ तपो रक्षन्स विघ्नेभ्यस्तस्करेभ्यश्च सम्पद । यथास्वमाश्रमैश्चक्रे वर्णैरपि षडशभाक् ॥६५॥ खनिभि सुपुवे रल क्षेत्र सस्य वनैर्गजान् । दिदेश वेतन तस्मै रक्षासदृशमेव भू ।। ६६ ।। स गुणाना बलाना च षण्णा षण्मुखविक्रम । बभूव विनियोग साधनोयेषु वस्तुषु ।। ६७॥ उनमे इतनी प्रबल शक्ति थी कि यदि किमी कारण प्रजा मे अमन्तोष फैले तो उमे तुरन्त दूर कर दे, परन्तु उन्होंने प्रजा मे कोई ऐमा अमन्तोष उत्पन्न ही नहीं होने दिया कि जिमे दूर करने की आवश्यक्ता पडती ।।५५ ।। वे बडे शक्तिमान् थे। अतएव शक्तिशाली राजाओ पर ही चढाई करते थे, दुर्बलों पर नहीं । क्योकि वायु की महायता मिलने पर भा वन में लगी हुई दवाग्नि पानी को नहीं जलाती ॥५६॥ अर्थ और काम के लिए उन्होंने कभी धर्म को नहीं छोटा और धर्म में बंधकर अर्थ तथा काम को नहीं त्यागा और न अर्थ के कारण काम को या काम के कारण अर्थ को हा छोडा, अपितु धर्म, अर्थ और काम तीनों के साथ वे एक-मा व्यवहार करते थे।। ५७ ।। यदि नाच और धनी मित्र मिल जाते हैं तो कुछ न कुछ बाधा डालते हैं, इमीलिए उन्होो ऐमे लोगो को मित्र बनाया, जो न नीच थे और न धनी ।। ५८ ॥ चढाई करो के पहले अपने तथा अपने शत्रु का बल और त्रुटि भलीभाँति जान लेते थे। जब शत्रु मे अपना बल अधिक देखते, तभी उम पर आक्रमण करते थे, नहीं तो चुप बैठ जाते थे।। ५९ ।। उन्होंने धन इमलिए एकल दिया कि इससे दोन लोग आश्रय णते हैं। क्योंकि चातक जलभरे बादलो का ही स्वागत करते हैं।। ६० ॥ इस प्रकार शत्रुओं का उद्योग नष्ट करके वे अपने काम मे लग गये। उन्होने शत्रुओं के दोष देखकर उन्हे नष्ट कर दिया और अपने भी दोष दूर कर दिये ॥ ६१ ॥ पिता कुश के प्रयल मे बढी, शास्त्रारत्रमम्पन्न तथा युद्ध करने मे ममर्थ मेना को दटधर अतिथि अपने शरीर के समान प्यार करते थे। ६२ ।। मर्प के मिर मे जेमे मणि ही निकाली जा सकती, वैसे ही शत्रुगण इनके प्रभाव, उत्साह और मन्त्र-इन ती शक्तिया को अपना ओर नहीं खीच मके। जैमे चुम्बक लाहे को अपनी ओर सीच लेता है, वैसे ही इन्होने शत्रुओं वो उन तीनों शक्तियो को अपनी ओर खींच लिया ।। ६३ ।। राजा अतिथि का इतना प्रताप था कि व्यापारी लोग बेरोक-टोक व्यापार करते थे। उनके लिए नदियाँ बावलियों जैसे घरेलू, का उद्यान-मदृश मुसपर ओर पहाड अपने घर जैसे मुगम हो गये थे॥६४॥ अतिथि ने विघ्नों में तपस्वियो के तप की रक्षा की, चोरों मे प्रजा की सम्पत्ति बचायी और चारों जाथमो तथा चारो वर्णो मे उसपी पूंजी के अनुमार छठा भाग प्राप्त क्यिा ॥ ६५ ।। जैसे वे पृथ्वी की रक्षा कर रहे थे, वैमे ही पृथ्वी भी उन्हे उचित वेतन दे रही थी। सानों ने रल दिये, खेतों ने अन्न दिया और वनों ने हाथी दिय ॥६६॥ कार्तिकेय जैसे परास्मा राजा अतिथि यह भलीभाँति जानते थे कि मन्धि, विग्रह, यान, आमन, मधय और द्वैधीभाव-~-दन छ राजगुणों को कैसे उपयोग मे लाना १५८ रघुवशे इति क्रमात्प्रयुञ्जानो राजनीति चतुर्विधाम् । आतीर्थादप्रतीघात स तस्या फलमानशे ।। ६८।। कूटयुद्धविधिज्ञेऽपि तस्मिन्सन्मार्गयोधिनि । भेजेऽभिसारिकावृति जयश्रीर्वीरगामिनी ॥१९॥ प्राय प्रतापभग्नत्वादरोणा तस्य दुर्लभ । रणो गन्धद्विपस्येव गन्धभिन्नान्यदन्तिन ॥ ७० ॥ प्रवृद्धी हीयते चन्द्र समुद्रोऽपि तथाविध । स तु तत्समवृद्धिश्च न चाभूताबि क्षयो॥७१ ।। सन्तस्तस्याभिगमनादत्यर्थ महत कृशा । उदधेरिव जीमूता प्रापुर्वातृत्वर्थिन ॥७२॥ स्तूयमान स जिहाय स्तुत्यमेव समाचरन् । तथापि ववृधे तस्य तत्कारिद्वेषिणो यश ॥७३॥ दुरित दर्शनेन घ्नस्तत्त्वार्थेन नुदस्तम । प्रजा स्वतन्त्रयाञ्चक्रे शश्वत्सूर्य इवोदित ॥७४॥ इन्दोरगतय पझे सूर्यस्य कुमुर्देऽशव | गुणास्तस्य विपक्षेऽपि गुणिनो लेभिरेऽन्तरम् ॥७५ ।। पराभिसन्धानपर यद्यप्यस्य विचेष्टितम् । जिगीषोरश्वमेधाय धर्म्यमेव बभूव तत्॥७६ ॥ एवमुद्यन्प्रभावेण शास्त्रनिर्दिष्टवर्त्मना । वृषेव देवो देवाना राजा राजा बभूव स ॥७७॥ पश्चम लोकपालानामूचु साधर्म्ययोगत । भूताना महता पठमष्टम कुलभूभृताम् ।। ७८॥ दूरामर्जितच्छतैस्तस्याज्ञा शासनार्पिताम् । दधु शिरोभिर्भूपाला देवा पौरन्दरोमिव ॥७९॥ चाहिए। ६७ ।। दम प्रकार साम-दाम आदि चारों उपायो के माथ राजनाति का उपयोग करते हुए महाराज अतिथि ने मत्रियो आदि की महायता मे बिना किमी बाधा के उपर्युक्त उपायों का फल आयाम प्राप्त कर लिया ।। ६८ ।। रे कपटयुद्ध भी करना जानते थे, परन्तु मुद्ध मे मदा धर्म को लदाई ही लडत थे। अतएव बोर्रा की अनुचरी विजयश्री अभिमारिका की भॉति चुपके मे उनके पास चली आती थी।। ६९ ।। युद्धक्षेत्र में अतिथि को देखते ही शत्रुओं के छक्के छूट जाते थे और वे प्राण लेकर भाग खटे होते थे। इमलिए जैसे मदहीन हाथी मदवाले हाथी मे नहीं लड़ पाते, वैम ही अतिथि में लटो का कोई भी शत्रु माहम ही नहीं कर पाता था॥७० ॥ पूरी तरह बढ़ चुकने पर चन्द्रमा घटो लगता है और ममुद्र को भी यही दशा होती है, परन्तु अतिथि के माथ यह बात नहीं थी। वे चन्द्रमा और समुद्र के ममा बढे, किन्तु उनके समान घटे नहीं ।। ७१ ।। जैसे बिना पानीवाले मेघ ममुद्र के पास जाते है और वह उन्हे इतना जल दे देता है कि वे सम्पूर्ण ममार को जल बाटने लगते हैं, वैसे ही जो बहुत मे निर्धन विद्वान् राजा अतिथि के पाम जाते थे, उन्हे वे इतना धन दे देते थे कि वे विद्वान स्वय भी दूसरी को धन-दान देने लग जाते थे।।७२ ।। उनके मभी काम प्रशमनीय होते थे, परन्तु जब कोई उनकी पशमा करता था तब वे सकुचा जाते थे। प्रशमा की इच्छा न करने पर भी उनका यश बराबर बढ़ता गया || ७३ ॥ जैसे उदीयमान मूर्य के दर्शन मे पाप दूर हो जाते है, वेमे ही उनक भी दर्शन मे पाप भाग जाते थे। ज्ञानी थे, मो दूसरों को तत्त्वज्ञान मिसार अज्ञान का अंधेरा मिटाते थे। अतएव उन्होंने प्रजा को मब प्रचार मे स्वतत्र कर दिया था।॥ ७४ । चन्द्रमा की किरणे परल में तथा सूर्य की किरणे कुमुद मे नहीं प्रविष्ट हो पाता. परन्तु अतिथि के गुणा ने शो के हृदय ) मा घर कर लिया था अर्थात् शत्रु भी उनके गुणो का आदर करते थे। ३५ ।। अश्वमेध यज्ञ के लिए जब वे दिग्विजय करने को निकले, तब उसका काम यद्यपि शत्रुर्जा को किसी भी प्रकार हराा ही पा, परन्तु उम ममय भी उन्होंने धर्म से ही काम लिया, कूटनीति अथवा छल का प्रयोग नहा किया ॥७६ ।। दम तरह शास्त्रीय मार्ग पर चलने से अतिथि का प्रभाव बढ़ गया और जैसे दन्द्र देवताना के देवता है, वैसे ही वे राजाओ के राजा हो गये।।७७॥ इन्द्र आदि चारों लेकपालों के समान पराक्रमा होने के कारण रोग उन्हें पाँचवाँ लोक्पाल कहते थे। पृथ्वी-जल आदि पाचो तत्त्वों के ममान महान् होने के कारण लोग उन्हें छठा तत्व मानते थे। ह्मिाचल आदि मात कुलपर्वता के ममान विशाल होने के कारण वे आठवे कुलपर्वत कहलाते थे||७८ ॥ जैसे देवता इन्द्र की जाज्ञा मानते हैं, वैम ही मब राजे अपने-अपने छन उतारकर ।

सप्तदश सर्ग
ऋत्विज स तथाऽनर्च दक्षिणाभिर्महाक्रतो | यथा साधारणीभूत नामास्य धनदस्य च ।। ८०॥
इन्द्रावृष्टिनियमितगदोद्रेकवृत्तिर्यमोऽभूद्यादोनाथ शिवजलपथ कर्मणे नौचराणाम् |
पूर्वापेक्षी तदनु विदधे कोषवृद्धि कुबेरस्तस्मिन्दण्डोपनतचरित भेजिरे लोकपाला ॥८१॥
इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये
अतिथिवर्णन नाम सप्तदश सर्ग ॥१७॥
उनी आज्ञा को शिरोधार्य करते थे।॥७९॥ अश्वमध महायज मे जिन ब्राह्मणों ने यज्ञ कराया था, उनको
अतिथि ने इतनी दक्षिणा दी कि लोग उन्हें भी दमरा कुबेर मानने लगे॥८॥ उनके माम्राज्य पर दन्द्र
ने वर्षा की, यमराज ने गर्मा को रोर-थाम की, वाण ने नाविरो+ लिए जल का मार्ग खोल दिया
और कुबेर ने इनमा राज्योश भरा। इस प्रभार इन्द्र आदि लोक्पाल जैसे उनके प्रताप मे ही डरकर
उसकी सेवकाई किया करते थे ।। ८१ ।।
इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में अतिथि-वर्णन नामक
सतरहवा सर्ग समाप्त।॥१७॥

अष्टादश सर्ग नैषधस्यार्थपते सुतायामुत्पादयामास निषिद्धशत्रु । अनूनसार निषधानगेन्द्रात्पुत्र यमाहुनिषधास्यमेव ॥१॥ तेनोरवीर्येण पिता प्रजायै कल्पिष्यमाणेन ननन्द यूना। सुवृष्टियोगादिव जीवलोक सस्येन सम्पत्तिफलोन्मुखेन ॥२॥ शब्दादि निर्विश्य सुख चिराय तस्मिन्प्रतिष्ठापितराजशब्द । कौमुद्रतेय कुमुदावदातैार्जिता कर्मभिरारुरोह ॥३॥ पौत्र कुशस्यापि कुशेशयाक्ष ससागरा सागरधीरचेता । एकातपत्रा भुवमेकवीर पुरार्गलादीर्घभुजो पुरार्गलादीर्घभुजो बुभोज ॥४॥ तस्यानलौजास्तनयस्तदन्ते वशश्रिय प्राप नलाभिधान । यो नड्वलानीव गज परेषा बलान्यमृद्नान्नलिनाभवक्त्र ॥५॥ नभश्चरैर्गीतयशा स लेभे नभस्तलश्यामतनु तनूजम् । ख्यात नभ शब्दमयेन नाम्ना कान्त नभोमासमिव प्रजानाम्॥६॥ तस्मै विसृज्योत्तरकोसलाना धर्मोतरस्तत्प्रभवे प्रभुत्वम्। मृगैरजर्य जरसोपदिष्टमदेहबन्धाय पुनर्बबन्ध ॥७॥ तेन द्विपानामिव पुण्डरीको राजामजय्योऽजनि पुण्डरीक । शान्ते पितर्याहृतपुण्डरीका य पुण्डरीकाक्षमिव श्रिता श्री ॥८॥ क्षेमधन्वानममोघधन्वा पुत्र प्रजाक्षेविधानदक्षम्। क्ष्मा लम्भयित्वा क्षमयोपपन्न वने तप क्षान्ततरश्चचार॥९॥ स शत्रुनो को नष्ट करनेवाले गजा अतिथि की गनी निषधराज की पुत्री थी। उम रानी मे अतिथि ने निषध पर्वत के ममा बलवान् पुत्र उत्पन्न किया और उममा नाम भी निषध ही था ॥१॥ जैसे मामयिक वर्षा में फले हुए अनाज के पके खेतो को देखकर ममार के प्राणी प्रमन्न होते हैं, वैसे ही अत्यन्त प्रतापी युवराज निषध को देसर राजा अतिथि भी बहुत पमन्न हुए॥२॥ कुमद्वतीतनय अतिथि ने बहुत दिनों तक मुख भोगा। तदनन्तर निषध को राजपाट मौंपकर अपने पुण्यबल में प्राप्त स्वर्गलोक का मुख भोगने चले गये।।३|| कमल के ममा। नेत्र, समुद्र के समागम्भीरचित्त और नगर के प्रधान फाटक को अर्गला के ममान बडी-बड़ी बॉहोंवाले अद्वितीय वीर निषध ने भी मागर तक विस्तृत पृथ्वी का भोग क्रिया ॥४॥ तदनन्तर उनके अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र नल हुए। उम कमल जैमे मुन्दर मुखवाले राजा ने शत्रुओ के बल को वैमे ही तोड दिया, जैमे हाथी नरकट को तोड डालता है।।५।। राजा नल इतने यशस्वी थे रि देवलोक मे गन्धर्ष लोग उनके गुण गाते थे। डायो आकाश मदृश मॉबला नभ नाम का पुत्र प्राप्त हुआ, जो लोगों को धावण मास जैमा प्यारा ल्गा॥ ६॥ धर्मात्मा नल ने उत्तरकोमल का राज्य उस पुत्र नभ को सौंप दिया और स्वय बुढापे के कारण जगलो मे मृगों के माथ इसलिए रहने लगे कि जिममे फिर ममार में जन्म न लेना पडे ॥७॥ नभ को पुण्डरीर नामक पुत्र प्राप्त हुआ और जैसे हाथियो मे पुण्डरीक नाम का हाथी मर्वश्रेष्ठ है, वैसे हा उम ममय के राजाओं में वे ही सर्वश्रेष्ठ थे। पिता के स्वर्गवासी हो जाने पर कमलधारिणी लश्मी ने उन्हे हा विष्णु मानकर पति बना लिया ॥८॥ सफल धनुषधारी पुण्डरीक ने प्रजा का कल्याण करने मे ममर्थ ओर शान्त स्वभाववाले अपने पुत्र - ॐ अष्टादश सर्ग 0 अनीकिनीना समरेऽग्रयायी तस्यापि देवप्रतिम सुतोऽभूत् । व्यश्रूयतानीकपदावसान देवादि नाम त्रिदिवेऽपि यस्य ॥१०॥ पिता समाराधनतत्परेण पुत्रेण पुत्री स यथैव तेन। पुत्रस्तथैवात्मजवत्सलेन स तेन पित्रा पितृमान् बभूव ॥११॥ पूर्वस्तयोरात्मसमे चिरोढामात्मोद्भवे वर्णचतुष्टयस्य। धुर निधायैकनिधिर्गुणाना जगाम यज्वा यजमानलोकम् ॥१२॥ वशी सुतस्तस्य वशवदत्वात् स्वेषामिवासीद्विषतामपोष्ट । सकृतिविग्नानपि हि प्रयुक्त माधुर्यमीष्टे हरिणान् ग्रहीतुम् ॥ १३ ।। अहीनगुर्नाम स गा समग्रामहीनवाहुद्रविण शशास। यो होनससर्गपराङ्मुखत्वाद् युवाप्यनथैर्व्यसनैर्विहीन ॥१४॥ गुरो स चानन्तरमन्तरज्ञ पुसा पुमानाद्य इवावतीर्ण । उपक्रमरस्वलितैश्चतुर्भिश्चतुर्दिगीशचतुरो बभूव ॥१५॥ तस्मिन्प्रयाते परलोकयात्रा जेतर्यरीणा तनय तदीयम्। उच्च शिरस्त्वाज्जितपारियात्र लक्ष्मी सिषेवे किल पारियात्रम् ॥ १६ ॥ तस्याभवत् सूनरुदारशील शील शिलापट्टविशालवक्षा । जितारिपक्षोऽपि शिलीमुखैर्य शालीनतामव्रजदोडधमान ॥१७॥ तमात्मसम्पन्नमनिन्दितात्मा कृत्वा युवान युवराजमेव। सुखानि सोऽभुक्त सुखोपरोधि वृत हि राजामुपरुद्धवृत्तम् ॥१८॥ क्षेमधन्वा को राज्य मौंप दिया और स्वय शान्त मन से जगल मे तप करने चले गये॥९॥ उस क्षेमधन्वा को भी इन्द्र के समान प्रतापी पुत्र प्राप्त हुआ, जो युद्ध मे सेना के आगे चलता था। जिमका देव शब्द से आरम्भ और अनीक शब्द से अन्त होनेवाला 'देवानीक' नाम स्वर्ग मे भी प्रसिद्ध हो गया था ॥१०॥ उस पितृभक्त पुत्र को पाकर जैसे क्षेमधन्वा सुपुत्रवान् हुए थे, वैसे ही पुत्रप्रिय पिता को पाकर देवानोक भी पितृमान् हुए।। ११ ।। बड़े-बडे यज्ञ करनेवाले और गुणी क्षेमधन्वा अपने ही जैसे तेजस्वी पुत्र को चारों वर्णो की रक्षा का भार सौंपकर स्वर्ग चले गये ॥ १२ ॥ उनके जितेन्द्रिय पुत्र देवानीक इतने मधुरभाषी थे कि शत्रु भी उनका वैसे ही आदर करते थे जैसे मित्र करते थे, क्योकि मधुर वाणी मे ऐमा प्रभाव होता है कि एक बार के डरे हुए हिरन भी उनके वशीभूत हो जाते हैं।। १३ ॥ देवानीक के पुत्र का नाम अहीनगु था। उमकी बॉहे बड़ी शक्तिशालिनी थीं। उमने कभी नीच लोगो का माथ नहीं किया। इसलिए व्यसनों से दूर रहकर युवावस्था मे ही वह सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन करने लगा॥१४|| राजा अहोनगु बड़ा चतुर था और सबके मन की बाते जान लेता था। पिता के मर जाने पर राजा होकर वह सफलता के माथ साम-दाम-दण्ड-भेद का प्रयोग करके शीघ्र ही विष्णु के ममान चारों दिशाओ का स्वामी बन गया॥१५॥ उम शत्रुविजयो राजा के स्वर्गवामी हो जाने पर अयोध्या की राजलक्ष्मी उन्हीं के जैसे प्रतापी पुत्र पारियात्र की सेवा करने लगी, जिसने अपने मिर की ऊँचाई मे पारियात्र पर्वत को भी नीचा दिखा दिया था ॥१६॥ उन्हे शील नाम का बड़ा शीलवान् पुत्र प्राप्त हुआ, जिमकी छाती पत्थर की पटिया जैसी मोटी थी। यद्यपि उमने अपने बाणों मे शत्रुओं को जीत लिया था, फिर भी स्वय सदा विनम्र बना रहा ॥१७॥ शुद्धचरित्र पारिय बुद्धिमान् शील को युवराज बनाने के बाद ही सुख भोगना प्रारभ किया। क्योकि राजा रहते ममय उनके पास इतने अधिक काम थे कि उन्हे २१ का० .

तत ॐ रघुवशे के त रागबन्धिष्ववितृप्तमेव भोगेषु सौभाग्यविशेषभोग्यम्। विलासिनीनामरतिक्षमापि जरा वृथा मत्सरिणी जहार ॥१९॥ उन्नाभ इत्युद्गतनामधेयस्तस्यायथार्थोन्नतनाभिरन्ध । सुतोऽभवत् पङ्कजनाभकल्प कृत्स्नस्य नाभिर्नुपमण्डलस्य ॥२०॥ पर वज्रधरप्रभावस्तदात्मज सयति वज्रघोष । बभूव वजाकरभूषणाया पति पृथिव्या किल वजनाभ.॥२१॥ तस्मिन्गते द्या सुकृतोपलब्धा तत्सम्भव शङ्खणमर्णवान्ता। उत्खातशत्रु वसुधोपतस्थे रत्नोपहारैदितै खनिभ्य ॥२२॥ तस्यावसाने हरिदश्वधामा पित्र्य प्रपेदे पदमश्विरूप । वेलातटेपूषितसैनिकाश्व पुराविदो य व्युषिताश्वमाहु ॥२३॥ आराध्य विश्वेश्वरमीश्वरेण तेन क्षितेर्विश्वसहो विजज्ञे। पातु सहो विश्वसख समग्रा विश्वम्भरामात्मजमूर्तिरात्मा ॥२४॥ अशे हिरण्याक्षरिपो स जाते हिरण्यनाभे तनये नयज्ञ । द्विषामसह्य सुतरा तरूणा हिरण्यरेता इव सानिलोऽभूत् ॥२५॥ पिता पितॄणामनृणस्तमन्ते वयस्यनन्तानि सुखानि लिप्सु । राजानमाजानुविलम्बिबाहु कृत्वा कृती वल्कलवान् बभूव ॥ २६ ॥ कौसल्य इत्युत्तरकोसलाना पत्यु पतङ्गान्वयभूषणस्य। तस्यौरस सोमसुत सुतोऽभून्नेत्रोत्सव सोम इव द्वितीय ॥२७ ।। यशोभिराब्रह्मसभ प्रकाश स ब्रह्मभूय गतिमाजगाम । ब्रह्मिष्ठमाधाय निजेऽधिकार ब्रह्मिष्ठमेव स्वतनुप्रसूतम्॥२८॥ सुख भोगने का अवसर ही नहीं मिलता था॥१८।। वे अभी भागो मे वृप्त नहीं हुए थे और सुन्दरी स्त्रियों से भोग कर ही रहे थे कि उन्हे उस वृद्धावस्था ने आ दबोचा, जो स्वय अभोग्य होने पर भी सुन्दरियो से ईर्ष्या किया किरती है।। १९ ॥ शील को उन्नाभ नाम का पुत्र प्राप्त हुआ, जिसकी नाभि गहरी थी जोर जो विष्णु के समान पराक्रमी होने मे मसार के मभी राजाओं का अग्रणी बन गया ॥ २० ॥ उसके बाद उसका पुत्र वज्रनाभ हीरे की खानो का आभूषण पह्नने वाली पृथ्वी का स्वामी बना। वह इन्द्र जैसा प्रभावशाली था और युद्धक्षेत्र मे वज्र के समान गरजता था॥ २१ ।। अपने पुण्यबल से उसने स्वर्ग प्राप्त किया और उसके बाद शरगण नामक उसका शत्रुविनाशक पुत्र रत्नोपहारदात्री पृथ्वी का शामक बना।।२२।। उसके बाद उसका अश्विनाकुमार जैमा सुन्दर और सूर्य-मदृश तेजस्वी पुत्र राजा बना। जिसने सभी देशों को जीतकर अपनी मेना और घोड़ों को ममुद्र के तट पर टिकाया। इसलिए वृद्धों ने उसका नाम व्युषिताश्व (घोडो को बहुत दूर तक ले जानेवाला) रखा था॥२३॥ काशी के विश्वेश्वर की आराधना करके उमने विश्वमह नाम का पुत्र पाया, जो बडा लोकप्रिय हुआ और जिसने सारी पृथ्वी पर शासन किया ॥ २४॥ उम नीतिज्ञ विश्वसह से हिरण्यनाभ नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, जो साक्षात् विष्णु का अश था। ऐमा पुत्र पाकर विश्वसह शत्रुगो के लिए वैमा हो भयकर हो गया, जैसे वायु की सहायता पाने पर वृक्षो के लिए अग्नि भयकर हो जाती है ।।२५।। अब वह पिता के ऋण से उऋण हो गया और अनेक मुस भोगने के बाद वृद्धावस्था मे पुत्र को राज्य देकर स्वय वल्कल-वमन पह्न लिया और वन को चला गया।॥२६॥ उत्तरकोमल के स्वामी तथा सूर्यकुल के भूषण उम हिरण्यवाभ का कौसल्य नाम का पुत्र प्राप्त हुआ, जो मब की आँखों को उमी प्रचार आनन्द देता था, जैसे दूसरा चन्द्रमा हो हो । २७ ।। राजा कौमत्य का यश ब्रह्मा को मभा तक पहुंच गया। वृद्धावस्था में उसने ॐ अष्टादश सर्ग तस्मिन्कुलापीडनिभे विपीड सम्यड्महीं शासति शासनानाम्। प्रजाश्चिर सुप्रजसि प्रजेशे ननन्दुरानन्दजलाविलाक्ष्य ॥२९॥ पात्रीकृतात्मा गुरुसेवनेन स्पष्टाकृति पत्ररथेन्द्रकेतो । त पुत्रिणा पुष्करपत्रनेत्र पुत्र समारोपयदनसङ्खयाम्॥३०॥ वस्थिति वशकरेण तेन सम्भाव्य भावी स सखा मघोन । उपस्पृशन् स्पर्शनिवृत्तलौल्यस्त्रिपुष्करेषु त्रिदशत्वमाप ॥३१॥ तस्य प्रभानिर्जितपुष्पराग पौष्या तिथौ पुष्यमसूत पत्नी। तस्मिन्नपुष्यन्नुदिते समग्रा पुष्टि जना पुष्य इव द्वितीये ॥३२॥ महीं महेच्छ परिकीर्य सूनो मनीषिणे जैमिनयेऽर्पितात्मा। तस्मात् सयोगादधिगम्य योगमजन्मनेऽकल्पत जन्मभीरु ॥३३॥ तत पर तत्प्रभव प्रपेदे ध्रुवोपमेयो ध्रुवसन्धिर्वीम्। यस्मिन्नभूज्यासि सत्यसन्धे सन्धि व सन्नमतामरीणाम् ॥ ३४॥ सुते शिशावेव सुदर्शनाख्ये दर्शात्ययेन्दुप्रियदर्शने स । मृगायताक्षो मृगयाविहारी सिहादवाद्विपद नृसिह ॥३५॥ स्वर्गामिनस्तस्य तमैकमत्यादमात्यवर्ग कुलतन्तुमेकम्। अनाथदीना प्रकृतीरवेक्ष्य साकेतनाथ विधिवच्चकार ॥३६॥ नवेन्दुना तन्नभसोपमेन शावैकसिहेन च काननेन। रघो कुल कुड्मलपुष्करेण तोयेन चाप्रौढनरेन्द्रमासीत् ॥ ३७॥ ब्रह्मिष्ठ नाम के अपने ब्रह्मज्ञानी पुत्र को राज्य दे दिया और स्वय ब्रह्मप्राप्ति के निमित्त वन करने चला गया॥२८॥ अच्छी सन्तानवाला राजा ब्रह्मिठ भी अपने कुल का शिरोमणि था। उमो बड़ी योग्यता मे प्रजा पर शामन किया। उसके सुन्दर शामन को देखकर प्रजा के नेत्रों मे आनन्द के ऑसू आ जाते थे। उसके मुशासन मे प्रजा बहुत दिनों तक सुख भोगती रही॥ २९ ॥ उसके सुपुत्र ने भी उन्हे पुत्रवानों का शिरोमणि बना दिया। पिता की मेवा-शुश्रूषा करने के कारण वे बडे योग्य हो गये थे। वे गरुडध्वज विष्णु के समान मुन्दर थे और उन कमललोचन का नाम भी पुत्र था॥३०॥ सभी विषय-वासनाओं से दूर रहकर इन्द्र के भावी मित्र उस ब्रह्मिष्ठ ने अपनी कुलप्रतिष्ठा अपने पुत्र को सौंप दी और स्वय त्रिपुष्कर क्षेत्र मे स्नान करता हुआ स्वर्ग चला गया ।। ३१ ॥ उम पुत्र की पत्नी से पूस. की पूर्णिमा के दिन पद्मरागमणि मे भी मुन्दर पुष्य नाम का पुत्र पैदा हुआ। उसके जन्म से प्रजा उमी प्रकार धन-धान्य मे सम्पन्न हो गयी, मानो दूमरा पुष्य नक्षत्र ही उदित हो गया हो ॥३२॥ पुत्र बडे उदार हृदय का राजा था। वह मसार मे फिर जन्म नहीं लेना चाहता था। इसलिए उमने पृथ्वी का भार अपने पुत्र पुष्य को सौंप दिया और स्वय जैमिनि ऋषि का शिष्य बन गया। बाद मे योगविद्या सीखकर वह ससार के आवागमन से मुक्त हो गया। ३३ ।। पुष्य के बाद ध्रुव के समान निश्चल पुत्र ध्रुवसन्धि राजा बना। जिससे डरकर शत्रुओं ने सन्धि कर ली। उमा लिखा हुआ सन्धिपत्र पक्का होता था, क्योंकि वह अपनी बात का धनी था॥३४॥ उमके नेत्र मृगो के नेत्रों जैसे बड़े-बडे थे और वह पुरुषों में सिह-सदृश था। एक दिन वह जगल में आखेट करता हुआ मिह द्वारा मारा गया। तब तक द्वितीया के चन्द्रमा समान सुन्दर मुदर्शन नाम का उमका पुत्र निरा बालक ही था॥३५॥ उस दिवगत राजा के मन्त्रियों ने राजा के अभाव में प्रजा को दीन दशा देखकर मर्वसम्मति से उसके इकलौते पुत्र सुदर्शन को विधिवत् अयोध्या का राजा बना दिया ॥३६॥ उम बालक से राजा रघु का कुल वैसे ही में तप रघुवशे लोकेन भावी पितुरेव तुल्य सम्भावितो मौलिपरिग्रहास । दृष्टो हि वृण्वन्कलभप्रमाणोऽप्याशा पुरोवातमवाप्य मेघ ॥३८॥ त राजवीथ्यामधिहस्ति यान्तमाधोरणालम्बितमायवेशम् । षड़वर्षदेशीयमपि प्रभुत्वात् प्रेक्षन्त पौरा पितृगौरवेण ।। ३९ ॥ काम न सोऽकल्पत पैतृकस्य सिहासनस्य प्रतिपूरणाय । तेजोमहिम्ना पुनरावृतात्मा तयाप चामीकपिञ्जरेण ॥ ४०॥ तस्मादध किश्चिदिवावतीर्णावसस्पृशन्तो तपनीयपीठम् । सालक्तको भूपतय प्रसिद्धैर्वन्दिरे मौलिभिरस्य पादो॥४१॥ मणौ महानील इति प्रभावादल्पप्रमाणेऽपि यथा न मिथ्या। शब्दो महाराज इति प्रतीतस्तथैव तस्मिन् युयुजेऽर्भकेऽपि ।। ४२॥ पर्यन्तसञ्चारितचामरस्य कपोललोलोभयकाकपक्षात्। तस्याननादुच्चरितो विवादश्चस्खाल वेलास्वपि नार्णवानाम्॥४३॥ निर्वृतजाम्बूनदपट्टशोभे न्यस्त ललाटे तिलक दधान । तेनैव शून्यान्यरिसुन्दरीणा मुखानि स स्मेरमुखश्चकार ।। ४४ ॥ शिरीषपुष्पाधिकसौकुमार्य खेद स यायादपि भूषणेन । नितान्तगुर्वीमपि सोऽनुभावाद्धर धरित्र्या बिभराम्बभूव ।। ४५ ।। न्यस्ताक्षरामक्षरभूमिकाया कात्स्न्येन गृह्णाति लिपि न यावत् । सर्वाणि तावच्छुतवृद्धयोगात् फलान्युपायुक्त स दण्डनीते ॥४६॥ मुशोभित हुआ जैसे द्वितीया के चन्द्रमा से आकाश, मिह के बच्चे मे वन और कमल की कली से तालाब शोभित होता है ।। ३७ ।। बालक सुदर्शन ने जब सिर पर मुकुट धारण किया तभी प्रजा ने समझ लिया कि यह अपने पिता के समान ही तेजस्वी होगा। क्योंकि हाथी के बच्चे जैमा छोटा दिखलायी देनेवाला बादल भी पुरवाई के पवन का महारा पार चारों दिशाओं मे फैल जाता है ।। ३८ ॥ जब छ वर्ष का छोटा-मा वह राजा हाथी पर चढकर राज-मार्ग से निकलता था, तब हाथीवान् उसके राजसी वस्त्रो का काना थामे रहता था कि कहां वह गिर न जाय । तब भी उसे देखकर जनता उसके पिता के समान ही उसका आदर करती थी॥३९।। जब वह अपने पिता के मिहासन पर बैठता था, तब राजा से छोटा होने के कारण राज मिहासन भरता नहीं था। परन्तु उसके शरीर से जो मुवर्ण जैमा तेज निकलता था, उममे वह मिहामन भरा-मा ही दीखता था ||४० ॥ उस स्वमहामन उमके पैर लटकते रहते थे। क्योकि छोटा होने के कारण वे पादपीठ तक पहुँच नहीं पाते थे। फिर भी मामन्त राजाओं ने अपने प्रसिद्ध मुकुटों से उन महावर लगे पैरो की वन्दना की॥४१॥ छोटा होो पर भी जैसे मणि का महानोल नाम निरर्थर नहीं होता, वैमे ही बालक राजा मुदर्शन का महाराज नाम भी उमे फबता था ।। ४२॥ उसके आस-पास चॅवर डुलाये जाते थे और उसके गालों पर लटे लटकती रहती थीं। इस अवस्था में भी उमने जो आज्ञाएँ दी, उन्हे समुद्रतटवर्ती लोगों ने भी नहीं टाला, फिर पाम रह्नेवालो को तो बात ही क्या थी । ४३ ।। स्वर्णपट्ट बँधे हुए अपने ललाट पर वह स्वय तिलक लगाता और मदा हॅममुस बना रहता था। परन्तु मगाम मे शत्रुओ को नष्ट करके उसने शत्रुओं की स्त्रियों के मुख का तिलक और उनकी मुस्कुराहट दोनों ही छीन ली॥४॥ वह सिरस के फूल से भी अधिक सुकुमार था। अतएव गहने पहनने में भी उसे कट होता था। तथापि उममें आत्मबल इतना अधिक था कि उसने पृथ्वी के अत्यन्त भारी भार को भी मॅभाल लिया ।।४५|| अभी वह पटिया पर भलीभांति अक्षर भी लिया नहीं सीख ॐ अष्टादश सर्ग उरस्यपर्याप्तनिवेशभागा प्रौढीभविष्यन्तमुदीक्षमाणा। सज्जातलज्जेव तमातपत्रच्छायाच्छलेनोपजुगूह लक्ष्मी ॥४७॥ अनश्नुवानेन युगोपमानमबद्धमौर्वीकिणलाञ्छनेन। अस्पृष्टखड्गत्सरुणापि चासोद् रक्षावतो तस्य भुजेन भूमि ॥४८॥ न केवल गच्छति तस्य काले ययु शरीरावयवा विवृद्धिम्। वश्या गुणा खल्वपि लोककान्ता प्रारम्भसूक्ष्मा प्रथिमानमापु ॥४९॥ स पूर्वजन्मान्तरदृष्टपारा स्मरनिवाक्लेशकरो गुरूणाम्। तिसस्त्रिवर्गाधिगमस्य मूल जग्राह विद्या प्रकृतीश्च पित्र्या ॥५०॥ व्यूह्य स्थित किश्चिदिवोत्तरार्धमुन्नद्धचूडोऽश्चितसव्यजानु । आकर्णमाकृष्टसबाणधन्वा व्यरोचतास्त्रेषु विनीयमान ॥५१॥ अथ मधु वनिताना नेत्रनिर्वेशनीय मनसिजतरुपुष्प रागबन्धप्रवालम् । अकृतकविधि सर्वाङ्गीणमाकल्पजात विलसितपदमाद्य यौवन स प्रपेदे ॥५२॥ प्रतिकृतिरचनाभ्यो दूतिसन्दर्शिताभ्य समधिकतररूपा शुद्धसन्तानकामै । अधिविविदुरमात्यैराहृतास्तस्य यून प्रथमपरिगृहीते श्रीभुवौ राजकन्या ॥५३॥ इति महाकविकालिदासकृतौ रघुवशे महाकाव्ये वशानुक्रमो नामाष्टादश सर्ग ॥१८॥ सका था, फिर भी बड़ों के समर्ग मे उसने दण्डनीति और राजनीति की मारी बातें जान ली॥४६ ।। उम बालक राजा के हृदय को छोटा ममझकर लक्ष्मी उमके युवा होने की प्रतीक्षा कर रही थी, परन्तु बीच-बीच मे छत्र की छाया बनकर वह उसका आलिङ्गन कर लेती थी। जैसे छोटा पति होने के कारण वह उससे खुलकर गले लगाने मे लजाती हो॥४७॥ यद्यपि उसकी भुजा जुए जैसी मोटी और लम्बी नहीं थी, धनुष को डोरी खींचने मे कडी भी नहीं हो पाती थी और तलवार को मूठ भी नहीं छू सकी थी, तथापि उसने पृथ्वी की रक्षा भलीभॉति कर ली।। ४८ ।। कुछ दिनों बाद केवल उसके शरीर के अग ही नहीं बढे, बल्कि उसके वशपरम्परावाले गुण भी बढे, जो पहले छोटे ही थे और प्रजा को बहुत अच्छे लगते थे।॥४९॥ मुदर्शन ने अर्थ और काम फल देनेवाली त्रयी (तीनो वेद), वार्ता (कृषि) और दण्डनीति- इन तीनों विद्याओं को इतनी शीघ्रता से सीख लिया, जैसे जन्मते ही वह उन्हे पढ़ चुका हो। अपने पिता की प्रजा को भी उसने अपने वश में कर लिया था॥५०॥ धनुर्विद्या सीखते समय जब वह अपने शरीर का ऊपरी भाग कुछ आगे बढा देता था, बाल ऊपर बाँध लेता था, बॉयों जाँघ कुछ झुका लेता था और बाण चढार धनुष की डोरी कान तक खींचता था, उस समय वह बडा सुन्दर लगता था॥५१ ।। कुछ दिनो बाद मुदर्शन के शरीर में यौवन आ गया। जो स्त्रियों की आँखों की मदिरा, शरीर को स्वाभाविक शोभा और विलाम का पहला अड्डा होता है।।५२ ।। भिन्न-भित राजधानियो में जाकर दूतियों सुन्दर-मुन्दर राजकुमारियो का चित्र ले आयीं और उम राजा के सन्तान होने की इच्छा से मन्त्रियों ने चित्र से बढकर सुन्दरी उन राजकुमारियों का महाराज सुदर्शन में विवाह करा दिया। इस प्रकार विवाह हो जाने पर वे सब राजकुमारियों राजा की पहली रानियो की, पृथ्वी की और राजलक्ष्मी की सौत-मदृश दीखने लगीं ॥५३॥ इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में वशानुक्रम नामक अठारहवाँ सर्ग समाप्त ।। १८॥

एकोनविशः सर्गः अग्निवर्णमभिषिच्य राघव स्वे पदे तनयमग्नितेजसम् । शिश्रिये श्रुतवतामपश्चिम पश्चिमे वयसि नैमिष वशी ॥१॥ तत्र तीर्थसलिलेन दीर्घिकास्तल्पमन्तरितभूमिभि कुशे । सौधवासमुटजेन विस्मृत सञ्चिकाय फलनि स्पृहस्तप ॥२॥ लब्धपालनविधौ न तत्सुत खेदमाप गुरुणा हि मेदिनी। भोक्तुमेव भुजनिर्जितद्विषा न प्रसायितुमस्य कल्पिता ॥३॥ सोऽधिकारमभिक कुलोचित काश्चन स्वयमवर्तयत् समा । सन्निवेश्य सचिवेष्वत पर स्त्रीविधेयनवयौवनोऽभवत् ॥४॥ कामिनीसहचरस्य कामिनस्तस्य वेश्मसु मृदङ्गनादिषु । ऋद्धिमन्तमधिकर्द्धिरुत्तर पूर्वमुत्सवमपोहदुत्सव ॥५॥ इन्द्रियार्थपरिशृन्यमक्षम सोढुमेकमपि स क्षणान्तरम्। अन्तरेव विहरन् दिवानिश न व्यपेक्षत समुत्सुका प्रजा ॥६॥ गौरवाद्यदपि जातु मन्त्रिणा दर्शन प्रकृतिकाक्षित ददौ। तद्गवाक्षविवरावलम्बिना केवलेन चरणेन कल्पितम्॥७॥ त कृतप्रणतयोऽनुजीविन कोमलात्मनखरागरूषितम्। भेजिरे नदिवाकरातपस्पृष्टपङ्कजतुलाधिरोहणम् ॥८॥ यौवनोन्नतविलासिनीस्तनक्षोभलोलकमलाश्च दीर्घिका । गूढमोहनगृहास्तदम्बुभि व्यगाहत विगाढमन्मथ ॥९॥ विद्वानों मे सयमी राजा सुदर्शन ने वृद्धावस्था में अपने अग्नि जैसे तेजस्वी पुत्र अग्निवर्ण को राजा बना दिया और स्वय नैमिषारण्य मे जाकर रह्ने लगे॥१॥ वहाँ वे तीर्थजल के आगे घर की बावलियों को, भूमि पर बिछे हुए कुश के आगे राजसी पलग को तथा कुटिया के आगे बडे-बडे भव्य भवनों को भूल गये और फल की इच्छा छोडकर तप करने लगे॥२॥ पिता से प्राप्त पृथ्वी का पालन करने में अग्निवर्ण को कोई कठिनाई नहीं हुई। क्योंकि उसके पिता ने मब शत्रुओं को पहले ही हरा दिया था। अतएव इन्हे तो केवल भोग करने के लिए ही राज्य मिला था, राज्य के शत्रुओं को मिटाने के लिए नहीं ॥३॥ जिसके फलस्वरूप राजा अग्निवर्ण कामुक हो गये। कुछ दिनों तक तो उन्होंने स्वय राजकाज देखा, फिर मन्त्रियों पर राज्य का भार डालकर जवानी का रस लेने लगे॥४॥ अब वह कामी राजा दिन-रात कामिनियों के माथ उन भवनों में पड़ा रहने लगा, जिनमे बराबर मृदग बजते रहते थे और प्रतिदिन एक मे एक बढकर ऐमे उत्सव होते थे कि अगले दिन के उत्सव के धूम-धाम के आगे पहले दिनवाला उत्सव फीका पड जाता था॥५॥ उसे ऐमा चसका लग गया कि वह क्षणभर भी भोग-विलाम के बिना नहीं रह पाता था। अतएव वह मदा रनिवास के भीतर रहकर ही विहार करने लगा। उसके दर्शनार्थ प्रजा अधीर रहती थी, परन्तु वह कभी उसकी ओर नहीं देखता था ॥६॥ यदि कभी मत्रियो के कले-सुनने से वह प्रजा को दर्शन देता भी था तो बम इतना ही कि झराखे से अपना एक पैर बाहर लटका दिया करता या॥७॥ राजकर्मचारी नखों की लालीवाले उसके चरण को ही नमस्कार करके आराधना करते थे, जो प्रभात को लाल किरणों से भरे हुए कमल जैमा था॥८॥ वह महाकामी राजा उन बावलियों में सुन्दरी स्त्रियों के माथ विहार करता था, जिनमे विलामगृह भी स तत्र ® एकोनविश सर्ग है १६७ सेकहतलोचनाञ्जनर्धातरागपरिपाटलाधरे । अङ्गनास्तमधिक व्यलोभयन्नर्पितप्रकृतकान्तिभिर्मुखै ॥१०॥ घ्राणकान्तमधुगन्धकर्षिणी पानभूमिरचना प्रियासख । अभ्यपद्यत स वासितासख पुष्पिता कमलिनीरिव द्विप ॥११॥ सातिरेकमदकारण रहस्तेन दत्तमभिलेषुरङ्गना । ताभिरप्युपहृत मुखासव सोऽपिबद् बकुततुल्यदोहद ॥१२॥ अङ्गमङ्गपरिवर्तनोचिते तस्य निन्यतुरशून्यतामुभे। वल्लको च हृदयङ्गमस्वना वलगुवागपि च वामलोचना ॥१३॥ स स्वय प्रहतपुष्कर कृती लोलमाल्यवलयो हरन्मन । नर्तकीरभिनयातिलाइनो पार्श्ववर्तिषु गुरुष्वलज्जयत् ॥१४॥ चारु नृावगमे च तन्मुख स्वेदभिन्नतिलक परिश्रमात् । प्रेमदत्तवदनानिल पिबन्नत्यजीवदमरालकेश्वरौ॥१५॥ तस्य सावरणदृष्टसन्धय काम्यवस्तुषु नवेषु सङ्गिन । वल्लभाभिरुपसृत्य चक्रिरे सामिभुक्तविषया समागमा ॥१६॥ अड्गुलीकिसलयानतर्जन भूविभङ्गकुटिल च वीक्षितम् । मेखलाभिरसकृञ्च बन्धन वश्चयन् प्रणयिनीरवाप स ॥१७॥ बने हुए थे। स्त्रियों के ऊंचे-ऊंचे स्तन जब बावली के क्मलों मे टकराते थे, तब हिलने लगते थे॥९॥ जल में स्नान करने से जब उन स्त्रियों की आँखों का अञ्जन छूट जाता था और होठों पर लगी लाली धुल जाती थी, तब उनको स्वाभाविक मुन्दरता देखकर वह कामी और अधिक उत्तेजित हो उठता था ।।१०॥ जैमे हाथी विकमित क्मलिनियों की गन्ध से भरे सरोवर मे हथिनियों के साथ प्रविष्ट होता है, वैसे हो अग्निवर्ण भी सुन्दरी स्त्रियों के साथ मद्य के गध मे बमी हुई मधुशाला में पहुँचता था॥११॥ वहाँ वे स्त्रियों अग्निवर्ण का जूठा और नशीला आमव बड़े प्रेम से पीती थीं। जैसे मौलसिरी का वृक्ष स्त्रियों के मुख का आसव पीने को इच्छुक रहता है, वैसे ही अग्निवर्ण भी उनके मुंह का जूठा आसव पीता था॥१२॥ उसके समक्ष गोद में बैठाने योग्य दो ही वस्तुएँ थीं, एक तो मनोहर शब्दवाली वीणा और दूसरी मधुरभाषिणी कामिनी। इन दोनों मे उमको गोद मदा भरपूर रहती थी॥१३॥ नर्तकियों के नाचते समय जब वह स्वय मृदग बजाने लगता था, तब उसके गले की माला हिलने लगती थी। उस समय वह ऐमा सुन्दर लगता था कि नर्तक्रिया अपना आपा खोकर नाचना भी भूल जाती थी। इसका फल पह होता था कि उन्हें नृत्य सिखानेवाले उनके जो गुरु वहाँ बैठे रहते थे, उनके आगे वे इस बात मे लजा जाती थीं॥१४॥ वह नृत्य जब समाप्त हो जाता था और नाचने के परिश्रम से उनके मुख पर पसीने की बूंदे छहर जाती थीं, तब राजा अग्निवर्ण बडे प्रेम मे फूंक मार-मारकर उनका मुख चूमने लगता था। उम समय वह समझता था कि मैं इन्द्र और कुबेर मे भी मुखी और भाग्यशाली हूँ।। १५ ।। वह सदा नवीन भोग की सामग्रियों चाहता था। जिम वस्तु मे उसका जी भर जाता था, उसे छोड देता था। अत स्त्रियों मभोग के समय राजा के माथ आधी ही रति करके उठ सडी होती थीं, पूरी नहीं, क्योंकि उन्हें यह डर था कि यदि राजा पूर्णरूप से तृप्त हो जायेगा तो हमे त्याग देगा ।। १६ ।। कभी-कभी जब वह राजा उन कामिनियों को चकमा दे देता था, तब वे बिगडकर अपनी लाल-लाल उँगलियाँ चमकाकर उसे धमकाती थी, भौहे तरेरती थी और अपनी क्रधनी से बाँध दिया करती थीं। १७॥ जिम रात को उमे किमी स्त्री से मभोग करने को जाना होता था तो दृती को सब १६८ छ रघुवशे तेन दूतिविदित निषेदुषा पृष्ठत सुरतवाररात्रिषु। शुश्रुवे प्रियजनस्य कातर विप्रलम्भपरिशङ्गिनो वच ॥१८॥ लोल्यमेत्य गृहिणीपरिग्रहान्नर्तकीष्वसुलभासु तद्वपु । वर्तते स्म स कश्चिदालिखन्नगुलीशरणसन्नवर्तिक ॥१९॥ प्रेमगर्वितविपक्षमत्सरादायताच्च मदनान्महीक्षितम्। निन्युरुत्सवविधिच्छलेन त देव्य उज्झितरुष कृतार्थताम् ।।२०॥ प्रातरेत्य परिभोगशोभिना दर्शनेन कृतखण्डनव्यथा । प्राञ्जलि प्रणयिनी प्रसादयन्सोऽदुनोत्प्रणयमन्थर पुन ॥२१॥ स्वप्नकीर्तितविपक्षमङ्गना प्रत्यभैत्सुरवदन्त्य एव तम्। प्रच्छदान्तलिताश्रुविन्दुभि क्रोधभिन्नवलयैर्विवर्तनै ।। २२॥ क्लृप्तपुष्पशयनॉल्लतागृहानेत्य दूतिकृतमार्गदर्शन । अन्वभूत् परिजनाङ्गनारत सोऽवरोधभयवेपथूत्तरम् ॥२३॥ नाम वल्लभजनस्य ते मया प्राप्य भाग्यमपि तस्य काझ्यते । लोलुप ननु मनो मर्मति त गोविर्खालतमूचुरङ्गना ॥२४॥ चूर्णबभु लुलितसगाकुल छिन्नमेखलमलक्तकाभितम् । उत्थितस्य शयन विलासिनस्तस्य विभ्रमरतान्यपावृणोत्॥२५॥ बाते बता देता था और पास ही छिपकर बैठ जाता था। वह स्त्री जब आती और विप्रलब्धा नायिका के समान दृती मे विरह की बातें करने लगती कि पता नहीं वे कब आयेगे, अभी तक आये क्यों नहीं इत्यादि, तब वह उन बातों को छिपे-छिपे बडे प्रेम से मना करता था॥१८॥ जब कभी उसे रानियाँ रोक लेती थीं, तब नर्तकियों के न मिलने मे वह विरहकातर हो जाता था और हाथ मे तूलिका लेकर किमी नर्तकी का चित्र बनाने लगता था। उस समय उसे वह नर्तकी याद आ जाती थी और मात्त्विक भावोदय के कारण उमको उँगलियो में पमीना आ जाता था, जिसमे यूंची फिमल पडती थी। इस तरह वह बड़ी कठिनाई मे चित्र बना पाता था ।। १९ ॥ यदि वह किमी राना में प्रेम करता था तो वह गर्व मे फूली नहीं समाती थी। यह देखकर उसकी सौते जल उठती थी और कामातुर हो जाती थी। तब किसी उत्सव का बहाना करके वे राजा को अपने यहाँ बुलाकर उसके माथ अपने जी की तपन बुझाती थी॥ २० ॥ रात मे किमी बाहरी स्त्रो मे मभोग करके राजा जब मबेरे घर लौटता था, तब रात के भोगकालीन वेश मे उसे देखकर उसकी प्रेमिकाएँ खडिता नायिका की तरह आँसू बहाने लगती थीं। तब राजा हाथ जोडकर उन्हें मना लेता था। किन्तु जब रात को यकावट के कारण वह उनमे भरपूर भोग नहीं कर पाता था, तब वे फिर व्याकुल हो उठती थीं ।। २१ ।। वे स्त्रियाँ जब देखती कि राजा स्वप्न मे बडबडाते हुए किमी दूसरी सी की बडाई कर रहा है, तब वे कामितियाँ बिना बोले ही बिस्तर के कोने पर ऑमू गिराती हुई क्रोध से क्गन तया पीठ फेरकर मो जाती थीं ॥२२॥ दूतियों कभी-कभी राजा को मार्ग दिखलाती हुई उस स्थान पर ले जाती थी, जहाँ लताओं के बीच मे सेवको की स्त्रियो के साथ सम्भोग के लिए फूलों की सेज बिछी रहती थी। उस समय उमे यह डर होता था कि कहीं वे दासियों जाकर राशियों से न कह दे। अतएव वह उन दामियो से सम्भोग करके उन्हे प्रमन्न कर देता था ।। २३ ।। वह कभी-कभी भूल से अपनी स्त्रियों के आगे किसी अन्य प्रेमिका का नाम ले लेता था। उसे सुनकर वे स्त्रियाँ कहने लगतीं कि बड़ा अच्छा हुआ, जो आपने अपनी प्रेमिका का नाम बता दिया। उसका भाग्य धन्य है, परन्तु क्या करें, हमारा भी लोभी मन तो नहीं मानता ॥२४॥ वह जब सोकर उठता था. तब उसका पलग फैले हुए केमर के चूर्ण मे मुनहला दीखता या! उम पर फूलों एकोनविश सर्ग १६९ स स्वय चरणरागमादधे योषिता न च तथा समाहित । लोभ्यमाननयन श्लयाशुकैर्मेखलागुणपदेर्नितम्बिभि ॥२६॥ चुम्बने विपरिवर्तिताधर हस्तरोधि रशनाविघट्टने । विप्नितेच्छमपि तस्य सर्वतो मन्मथेन्धनमभूदृधूरतम् ॥२७॥ दर्पणेषु परिभोगदर्शिनीर्नर्मपूर्वमनुपृष्ठसस्थित । छापया स्मितमनोज्ञया वधू.निमीलितमुखोश्चकार स ॥२८॥ कण्ठसक्तमृदुबाहुबन्धन न्यस्तपादतलमग्रपादयो । प्रार्थयन्त शयनोत्थित प्रियास्त निशात्यविसर्गचुम्बनम् ॥२९॥ प्रेक्ष्य दर्पणतलस्थमात्मनो राजवेशतिशक्रशोभिनम्। पिप्रिये न स तथा यथा युवा व्यक्तलक्ष्म परिभोगमण्डनम् ॥ ३०॥ मित्रकृत्यमपदिश्य पार्श्वत प्रस्थित तमनवस्थित प्रिया । विद्म हे शठ। पलायनन्छलान्यासेति रुधु कचग्रहै ॥ ३१ ॥ तस्य निर्दयरतिश्रमालसा कण्ठसूत्रमपदिश्य योषित । अध्यशेरत बृहद्भुजान्तर पीवरस्तनविलुप्तचन्दनम्॥३२॥ सङ्गमाय निशि गूढचारिण चारदूतिकथित पुरोगता । वञ्चयिष्यसि कुतस्तमोवृत कामुकेति चकृपुस्तमङ्गना ॥ ३३॥ की मसली हुई मालाएँ और टूटी हुई करधनियों पड़ी रहता थीं और जहाँ-तहाँ महावर की छाप लगी रहती थी, जिसे देखकर यह प्रकट होता था कि वह कितना बटा कामुक है ।। २५ ।। कभी-कभी वह स्त्रियों के पैरों में स्वय महावर लगाने बैठ जाता था। परन्तु उमी समय उमरी दृष्टि स्त्रियों के उन नितम्बो पर पड़ जाती थी, जिन पर से कपड़ा सिमका हुआ रहता था। उन्हे देखकर वह ऐसा मुग्ध हो जाता कि जिममे महावर भी नहीं लगा पाता था ।। २६ ।। सम्भोगकाल मे जब वह स्त्रियों के होठ चूमने लगता था, तब वे मुँह फेर लेती थीं और जब कमर का नारा खोलने लगता, तब वे हाथ थाम लेती थीं। इस प्रकार वह जो करना था, स्त्रियों कुछ भी नहीं करने देती थीं। फिर भी उममा कामवेग बढता ही जाता था ॥२७॥ वे स्त्रियों जब कभी दर्पण के आगे खड़ी होकर दॉत काटने के दाग आदि सभोग के चिहों को देखने लगती थीं, तब वह राजा उनके पाछे आकर चुपके से खड़ा हो जाता था और मुस्कुरा देता था। दर्पण मे जब उसका प्रतिबिम्ब स्त्रियाँ देख लेती था, तब वे झेपकर मुँह नीचा कर लिया करती थीं ॥२८॥ मवेरे जब वह पलंग से उठकर जाने लगता था, तब स्त्रियों की इच्छा होती थी कि बिछुड़ने से पहले राजा एक बार गले मे बॉहे डालकर फिर में चूम ले ॥ २९ ॥ इन्द्र के वस्त्रों से भी सुन्दर अपने राजमी वस्त्र दर्पण मे देखकर वह राजा उतना प्रमन्न नहीं होता था, जितना कि सभोग के चिह्रो को देखकर प्रसन्न होता था।॥३०॥ अपनी रानियों के पास बैठे-बैठे यदि कभी उसके मन में किसी प्रियतमा के पास जाने की इच्छा हो जाती थी तो वह यह कर उठने लगता -'मुझे एक मित्र से मिलने जाना है। यह मुनकर वे रानियों ताड जाती और कहने लगती थीं कि 'हम भी खूब जानती हैं कि तुम स्मि मित्र के यहाँ जा रहे हो' और बाल पकडकर उसे रोक लेती थीं॥ ३१ ॥ उसके माथ बहुत देर तक निर्दय सभोग करने के कारण स्त्रियाँ जब श्रम से अलसा जाती थी, तब वे अपने मोटे-मोटे स्तनों में राजा की छाती का चन्दन पोंछती हुई उसके वक्ष स्थल पर ऐसे सो जाती थीं कि जैसे सभोग का कठमूत्र नामक आसन साध रही हो, जिसमे स्त्रियों पति के ऊपर लेटकर अपने स्तनों मे धीरे-धीरे प्रियतम की छाती को थपथपाती हुई कमकर लिपट जाती हैं।। ३२।। रात को जब वह सभोग की इच्छा से छिपकर बाहर जाने को होता था तो दृतियों द्वारा २२ का० था- १७० ॐ रघुवशे से योषितामुडुपतेरिवार्चिषा स्पर्शनितिमसाववाप्नुवन् । आरुरोह कुमुदाकरोपमा रात्रिजागरपरो दिवाशय ॥३४॥ वेणुना दशनपीडिताधरा वीणया नखपदाङ्कितोरव । शिल्पकार्य उभयेन वेजितास्त विजिह्मनयना व्यलोभयन् ॥ ३५॥ अनसत्त्ववचनाश्रय मिथ स्त्रीषु नृत्यमुपधाय दर्शयन् । स प्रयोगनिपुणै प्रयोक्तृभि सञ्जघर्ष सह मित्रसन्निधौ ॥३६॥ असलम्बिकुटजार्जुनसजस्तस्य नीपरजसाऽगरागिण । प्रावृषि प्रमदबर्हिणेष्वभूत् कृत्रिमादिषु विहारविधम ॥३७॥ विग्रहाच्च शयने पराङ्मुखो नुनेतुमबला स तत्वरे। आचकाङ्क्ष घनशब्दविक्लवास्ता विवृत्य विशती जान्तरम्॥३८॥ कार्तिकोषु सवितानहर्म्यभाग्यामिनीषु ललिताङ्गनासख । अन्वभुक्त सुरतश्रमापहा मेघमुक्तविशदा स चन्द्रिकाम् ॥ ३९ ॥ सैकत च सरयू विवृण्वती श्रोणिबिम्बमिव हसमेखलम्। स्वप्रियाविलसितानुकारिणी सौधजालविवरैर्व्यलोकयत्॥४०॥ मर्मरैरगुरुधूपगन्धिभिर्व्यक्तहेमरशनैस्तमेकत जहुराग्रथनमोक्षलोलुप हैमनैर्निवसनै. सुमध्यमा ॥४१॥ अर्पितस्तिमितदीपदृष्टयो गर्भवेश्मसु निवातकुक्षिषु । तस्य सर्वसुरतान्तरक्षमा साक्षिता शिशिररात्रयो ययु ॥४२॥ पहले ही ममाचार पाकर उसकी स्त्रियों उसके आगे खड़ी हो जाती थीं और यह कहते हुए उसे खींच लाती थीं कि 'कहिए, ह्ये चकमा देकर रात को कहाँ चले? ||३३ ।। उन स्त्रियों के स्पर्श से उसको वैसा ही आनन्द मिलता था, जैमा कि चन्द्रमा की किरणों से। अतएव वह कुमुदो की भाँति रातभर जागता और दिनभर सोता था|३४|| उसने गानेवाली स्त्रियों के होठों पर अपने दाँत के और उनकी जाँघो पर चिकोटी काटकर नखों के ऐमे घाव कर दिये थे कि जब वे अपने अधरो पर बॉमुरी और जॉघ पर वीणा रखती थीं, तब उन्हें बड़ा कष्ट होता था और वे टेढी भौंहों मे राजा की ओर यह जताती हुई देखने लगती थीं कि यह सब आपकी ही करनी है। उनकी यह भावभगिमा देखकर राजा और भी उत्तेजित हो जाता था॥३५।। एकान्त में जब वह स्त्रियों को आगिक, मात्त्विक और वाचिक तीनों प्रकार का अभिनय सिखाकर अपने मित्रों के समक्ष उनका प्रदर्शन करता था, उस समय वह बडे-बडे नाट्यशास्त्रियों को भी नीचा दिसा देता था।। ३६ ॥ वह वर्षा ऋतु मे कुटज और अर्जुन की माला पहन तथा शरीर मे कदम्ब के पराग का अगराग लगाकर मतवाले मोरो से भरे क्रीडापर्वतों पर विहार करता था ।। ३७ ।। पलग पर लेटी हुई स्त्रियाँ जब रूठकर तथा पीठ फेरकर मो जाती थीं, तब राजा उन्हे जल्दी मनाना नहीं चाहता था। बल्कि यह चाहता था कि किमी प्रकार बादल गरज उठे, जिसमे डरकर ये मेरी भुजाओं में भर जायें ॥ ३८ ॥ कार्तिक की रातो मे वह राजमहल के ऊपर चेंदवा तनवा देता था और मुन्दरियो के साथ उम चाँदनी का आनन्द लेता था, जो मभोग का श्रम दूर करती है और बादलों के अभाव मे बराबर निखरी रहती है ।। ३९ ॥ अपने राजमहल के झरोखे मे वह उम सरयू को देखता था, जिसके तट पर उजले हमों की पोते बैठी रहती थीं। वह दृश्य ऐसा था कि मानो मरय उन मुन्दरियों का अनुकरण कर रही थी, जिनके नितम्बो पर करधनी पडी हुई हो ॥ ४०॥ पतली कमरवाल वे स्त्रियों जाड़े मे ऐसे कपडे पहनती थीं, जो माडी के कारण करकराते रहते थे। जिनके नीचे झलकती हुई सोने की करधनी देख उसे बाँधने और खोलने के लिए लालायित वह राजा मुग्ध हो जाता था।। ४१ ।। सब - यत्स पपौ। एकोनविश सर्ग 8 १७१ दक्षिणेन पवनेन सम्भृत प्रेक्ष्य चूतकुसुम सपल्लवम्। अन्वनपुरवधूतविग्रहास्त दुरुत्सहवियोगमङ्गना ॥४३॥ ता म्वमङ्कमधिरोप्य दोलया प्रेवयन् परिजनापविद्धया। मुक्तरज्जु निबिड भयच्छलात् कण्ठबन्धनमवाप बाहुभि ॥४४॥ पयोधरनिषिक्तचन्दनौक्तिकग्रथितचारुभूषणै ग्रीष्मवेषविधिभि सिविरे श्रोणिलम्बिमणिमेखले प्रिया ॥४५॥ लग्नसहकारमासव रक्तपाटलसमागम तेन तस्य मधुनिर्गमात् कृशश्चित्तयोनिरभवत्पुनर्नव ॥ ४६॥ एवमिन्द्रियसुखानि निर्विशन्नन्यकार्यविमुख स पार्थिव । आत्मलक्षणनिवेदितानृतूनत्यवाहयदनगवाहित ॥४७॥ त प्रमत्तमपि न प्रभावत शेकुराक्रमितुमन्यपार्थिवा । आमयस्तु रतिरागसम्भवो दक्षशाप इव चन्द्रमक्षिणोत्॥४८॥ दृष्टदोषमपि तन्न सोऽत्यजत् सङ्गवस्तु भिषजामनाश्रवः । स्वादुभिस्तु विषयैर्हतस्ततो दु खमिन्द्रियगणो निवार्यते ॥ १९॥ तस्य पाण्डुवदनाऽल्पभूषणा सावलम्बगमना मृदुस्वना। राजयक्ष्मपरिहानिराययो कामयानसमवस्थया तुलाम्॥५०॥ प्रकार की सभोग-क्रीडा करने योग्य हेमन्त ऋतु की बड़ी-बड़ी रातों मे वह राजमहल की उन भीतरी कोठियों में विहार करता था, जहाँ उमके माक्षी केवल वे दीपक थे, वायु के न आने मे एक्टक मब कुछ देखा करते थे॥४२॥ मलय पर्वत मे आनेवाल दक्षिणी पवन मे आमो मे बौर आ गये थे। जिन्हे देखकर प्रेमिकाओं ने कामोन्मत्त होकर राजा मे रूठना छोड़ दिया और उसके विरह मे व्याकुल होकर वे स्वय उमे खोजने लगीं। ४३ ।। एक दिन स्त्रियो को गोद मे बैठाकर वह उन झूलों पर झूलने लगा, जिन्हें नौकर झुला रहे थे। सहसा राजा ने एक बार झूले को ऐमा झटका दिया कि उन स्त्रियो ने भय का बहाना करके रस्मी छोड़ दी और राजा के गले में बाहें डालकर उममे लिपट गर्द॥४४॥ ग्रीष्म ऋतु में स्तनों पर चन्दन लगाकर तथा मोतियों का आभूषण पहनकर नितम्ब पर मणिजटित करधनी लटकाये वे स्त्रियों उस राजा के माय मम्भोग करके उमे प्रमन्न करती थीं॥४५॥ वह आम की वौर और पाटल के लाल फूल से अलकृत पान मे मदिरा पीता था, जिमसे वमन्त बीतने के कारण मद पड़ा हुआ उसका काम-वेग फिर उद्दीप्त हो उठता था ।। ४६ ।। इस प्रकार वह कामी राजा राज-काज आदि अन्य काम छोडकर इन्द्रियमुखों का रस लेता हुआ ऋतुएँ बिताने लगा। काम-क्रीडा के लिए वह भिन्न-भिन्न ऋतुओं में भिन्न-भिन्न प्रकार का वेश बनाता था। अतएव उसके वेश को ही देखकर ज्ञात हो जाता था कि किम ममय कौन-सी ऋतु चल रही है।॥ ४५ ॥ इतना व्यसनी होने पर भी प्रभाववश दूसरे राजे उमके राज्य पर आक्रमण नहीं करते थे। तथापि जैम दक्ष के शाप से चन्द्रमा को क्षयरोग हो गया था, वैसे ही अधिक भोग-विलास करने के कारण उमे भी क्षयरोग हो गया और वह राजा को धीरे-धीरे क्षीण करने लगा।। ४८ ॥ वैद्यो के बार-बार रोक्ने पर भी उसने काम को उत्तेजित करनेवाली वस्तुएँ नहीं छोड़ी। क्योकि जब इन्द्रियों एक वार विषयों के मुस्वादु रम मे फॅम जाती हैं, तब उन्हें रोकना कठिन हो जाता है॥४९॥ धीरे-धीरे उसका शरीर पीला पड़ता गया। दुर्बलता के कारण उसने आभूषण पहनना कम कर दिया। बाद में वह नौकरों के महारे चलने लगा। उसकी आवाज धीमी पड़ गयो और यक्ष्मा रोग से सूखकर वह ठोक विरहियों जैसा दुर्बल दीखने लगा ॥५०॥ राजा अग्निवर्ण जो ।

१७२ क रघुवशे व्योम पश्चिमकलास्थितेन्दु वा पशेषमिव धर्मपल्बलम् । राज्ञि तत्कुलमभूत् क्षयातुरे वामनाचिरिव दीपभाजनम्॥ ५१ ॥ बाढमेष दिवसेषु पार्थिव कर्म साधयति पुत्रजन्मने । इत्यदर्शितरुजोऽस्य मन्त्रिण शश्वदूचुरघड़िनी प्रजा ॥५२॥ स त्वनेकवनितासखोऽपि सन्पावनीमनवलोक्य सन्ततिम्। वैद्ययलपरिभाविन गद न प्रदीप इव वायुमत्यगात्।। ५३ ॥ त गृहोपवन एव सङ्गता पश्चिमक्रतुविदा पुरोधसा । रोगशान्तिमपदिश्य मन्त्रिण सम्भृते शिखिनि गूढमादधु ॥५४॥ ते कृतप्रकृतिमुख्यसग्रहैराशु तस्य सहधर्मचारिणी। साधु दृष्टशुभगर्भलक्षणा प्रत्यपद्यत नराधिपश्रियम् ॥५५॥ तस्यास्तथाविधनरेन्द्रविपत्तिशोकादुष्णैर्विलोचनजले प्रथमाभितप्त । निर्वापित कनककुम्भमुखोज्झितेन वशाभिषेकर्वािधना शिशिरेण गर्भ ॥५६॥ त भावार्थ प्रसवसमयाकाक्षिणीना प्रजानामन्तगूढ क्षितिरिव नभोबीजमुष्टि दधाना। मौले सार्ध स्थविरसचिवैर्हेमसिहासनस्था राज्ञी राज्य विधिवदशिपद्धतुरव्याहताज्ञा ।। ५७ ।। इति महाकविकालिदासकृतौ अग्निवर्णशृङ्गारो नामैकोनविश सर्ग ।।१९।। समाप्तोऽय ग्रन्थ के क्षयरोगग्रस्त होने पर मूर्यकुल ऐसा क्षीण हो गया कि जैसे एक कलाभर बचा हुआ कृष्णपक्ष की चतुर्दशी का चन्द्रमा, कोचडभर बचा हुआ गर्मी के दिनों का ताल अथवा तनिक-सी बची हुई दीपक की लौ ।। ५१ ।। जब प्रजा मन्त्रियो मे पूछती थी कि राजा को कोई भयानक रोग तो नहीं है ? तब वे मन्त्री प्रजा को यह कहकर ममझाते थे कि महाराज इम ममय पुत्रोत्पत्ति के लिए व्रत आदि कर रहे हैं, इसी कारण दुर्बल होते जा रहे हैं। इस प्रकार वे राजा के रोग को बात जनता मे छिपाते रहे ||५२ ॥ अनेक रानियों के होते हुए भी वह राजा पुत्र का पवित्र मुंह नहीं देख सका और वैद्य लोग राजा को नीरोग नहीं कर सके। जैसे वायु के आगे दीपक का वश नहीं चलता, वैसे ही राजा अग्निवर्ण भी उस रोग से ही काल के गाल मे समा गया ॥ ५३ ।। तब औवंदैहिक कर्मकाण्ड के विज्ञ पुरोहित को माथ लेकर मत्रियों ने राजमहल के उपवन मे ही रोगशान्ति के बहाने धधरती हुई अग्नि में चुपचाप दिवगत राजा अग्निवर्ण का दाहसंस्कार कर दिया ॥५४॥ तदनन्तर शीघ्र ही मत्रियों ने उस राजा की धर्मपत्नी को शुभ गर्भ धारण किये देखकर उसी को राजगद्दी पर बिठा दिया ॥५५॥ राजा के मरण की कठोर विपत्ति से उमड़े हुए गरम आँसुओं द्वारा रानी के गर्भ को जो ताप पहुंचा था, वह अब स्वर्णकलश के मुख से निकले तीर्थजल के अभिषेक से शान्त हो गया ।।५६ ॥ रानी के प्रमवकाल की प्रतीक्षा करनेवाली प्रजा के कल्याणार्थ अपने उदर मे बीजमुष्टि को मॅजोये हुए धरती के ममान वह रानी गर्भ धारण किये हुए ही गज्य के स्वर्णमिहासन पर बैठी। तदनन्तर आप्तजनों के परामर्शानुमार वह शास्त्रीय विधि से अपने पति के राज्य का पालन करने लगी। उस समय उमको आज्ञा का उल्लघन कोई नहीं कर सकता था।। ५७ ।। इस प्रकार रघुवशमहाकाव्य में अग्निवर्ण-शृङ्गार नामक उन्नीसवां अध्याय समाप्त ।।१९।।

'क्लेश फलेन हि पुनर्नवता विधत्ते' कुमारसम्भवम्

Kalidas Granthawali Granthamala-260

Author
Shastri, Pt. Sriramtej
Title
Kalidas Granthawali Granthamala-260
File name
Kalidas Granthawali Granthamala-260
Text
OCR done
Citation
1996
Published
2012/04
Publisher
Varanasi, Chowkhamba Surbharati Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
178
Library
Government College, Kota
Classification
Literature
DLI number
407602
Barcode
99999990303529.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
8stf3Ly7j4h
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Kalidas Granthawali Granthamala-260