Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Haimanamamalasiloncha With A Commentary By Srivallabha
Front matter
7.
Printed by
Swami Tribhuvandas Sastri,
Shree Ramanand Printing Press
Kankaria Road
Ahmedabad-22,
and published by
Dalsukh Malvania
Director
L. D. Institute of Iậdology
Ahmedabad 9.
FIRST EDITION
November, 1974
आचार्यश्रीजिनदेवसूरिविरचितः
हैमनाममालाशिलोञ्छः
वाचनाचार्यश्री-श्रीवल्लभगणिविनिर्मितयां
'दीपिका टीकया समेतः
..
संपादक
महोपाध्याय श्री विनयसागर
maaree
भारतीय
प्रकाशक
PAPER
संस्कृति
विधामंदिर
लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामन्दिर
अहमदाबाद-९
लालमा
अहमदाबाद
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PREFACE 3 The L. D. Institute of Indology has great pleasure in publishing the present volume containing the Haimanāmamālāśiloñcha and the Dipikā. The siloñcha is a supplement to the Haimanāmamālā of Āc. Hemacandra. It consists of 139 Sanskrit verses. It is composed by Ac. Jinadevasūri (V. S. 9450) of Laghukharataragaccha. The Dipikā is a commentary on this siolñcha, written by Srivallabha Gaņi (V. S. 1625) of Kharataragaccha: Šiloñcha was included in the Abhidhāna-Sangraba (Collection of Sanskrit Ancient Lexicons) published by Nirnayasagara Press, Bombay, in the year 1896 A, D. It also iucluded in the Abhidhāna. cintāmaņikośa published by Jasavantalal G. Shah, Ahmedabad, in the year V: S. 2013 (A, D. 1957). But the text printed in these two editions was not critically edited, whereas the text printed in this volume is critically edited on the basis of three old mss.; the variants are noted in the Appendix 4. The Dipika on the ſiloñcha is published here for the first time. The editor has utilised three old mss. for the preparation of the critical edition of the text of Dipikā. The L. D. Institute of Indology is thankful to Mabopadhyaya Vinayasagraji for critically editing the texts of siloñcha and Dipikā. He has written an interesting and informative introduction to this edition. Therein he has given a detailed account of the life and works of the authors of these two works. Regarding Srivallabha he tells us that he had earned the title of vādı and that though he belonged to Kharataragaccha he wrote a mahakāvya entitled 'Vijayadevamāhātmya' whose hero is Āc. Vijaya. devasūri of Tapagaccba. Four Appendices added at the end of this volume by the learned editor enhance the value of this edition. Appendix 1 is an index of words; words found in the Dipikā alone are marked by the sign #o. Appendix 2 lists alphabetically the quotations occurring in the Dipikā. Appendix 3 lists titles of the works and names of the authors mentioned in the Dipikā. Appendix 4 records variants yielded by those three mss. of the siloncha. It is hoped that the publication of this important work will be useful to those interested in the subject of Sanskrit Lexicon. L. D. Institute of Indology Ahmedabad-380009. 15th Nov. 1974. Dalsukh Malvania Director,
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आचार्यश्रीजिनदेवसूरिविरचितः
हैमनाममालाशिलोञ्छः
वाचनाचार्यश्री-श्रीवल्लभगणिविनिर्मितया
'दीपिका टीकया समेतः
-
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प्रस्तावना नामकरण कलिकालसर्वज्ञ आचार्यप्रवर श्री - हेमचन्द्रसूरि ने अपने . अभिधान-चिन्तामणिनाम: माला नामक नामकोष के पूरक रूपसे शेष रहे एवं नवीन प्राप्त शब्दों का संकलन कर शेष- संग्रहनाममाला नाम से स्वतन्त्र कोपं की रचना की थी। फिर भी कुछ शब्द उनमें संगृहीत नहीं हुए थे । उनका संग्रह पन्द्रहवीं शताब्दी में आचार्य जिनदेवसूरि ने किया । यह संग्रह उन्होंने 'शिलोञ्छ' (कणिशादिचुण्टनम् ) अर्थात् इधर उधर बिखरे हुये धान्य-कणों के चयन के समान ही चयन कर प्रस्तुत कोप का निर्माण किया था और वह हेमचन्द्रीय अभिधान- चिन्तामणिनाममाला का पूरक होने के कारण - ग्रन्थकार ने इस कोष का नाम 'हैमनाममाला शिलोच्छ रखा है। आचार्य जिनदेवमूरि जैन श्वेताम्बर परम्परा में 'खरतगच्छ' एक प्रमुख गच्छ है । इस गच्छ की एक शाखा 'लघुखरतरगच्छ' नाम से प्रसिद्ध है । लघु खरतरः शाखा का प्रादुर्भाव पट्टावलियों के मतानुसार वि सं. १२८० पल्हूपुर में आचार्य जिनेश्वरसूरि (द्वितीय) के समय में हुआ था । इस शाखा के प्रथम आचार्य जिनसिंहसूरि थे । इनके पट्टधर मुहम्मद तुगलक प्रति- बोधक. आचार्य जिनप्रभसूरि हुये । आचार्य 'जिनप्रभ न केवल तीर्थोद्धारक या शासनप्रभावक ही थे अपितु न्याय, दर्शन, व्याकरण, काव्य, अलङ्कार, मन्त्रशास्त्र, जैनागम आदि विविध- विषयके ग्रन्थों के प्रणेता, सफल टीकाकार, विशाल स्तोत्र-साहित्य के निर्माता एवं विविध तीर्थकल्प जैसे ऐतिहासिक ग्रन्थों के रचयिता एवं अनेक भाषाओं के जानकार थे । इनका समय १३३२ से १४०० के मध्य का है । इन्ही के पट्टधर आचार्य जिनदेवसूरि थे । 'जिनदेवसूरि गीत' के अनुसार इनके पिता का नाम सा. कुलधर और माता का नाम वीरिणि था । जन्म संवत् जन्म स्थान स्थान और दीक्षा संवत् आचार्यपद संवत् एवं स्थान आदि के सम्बन्ध में कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता है । ये श्री जिनप्रभसूरि के प्रमुख शिष्यों में से थे । जिनप्रभसूरि ने स्वहस्त से ही इनको आचार्यपद प्रदान किया था । वि. सं. १३८५ में योगिनीपुर · (दिल्ली) में आचार्य जिनप्रभसूरि जिस समय सम्राट् मुहम्मद तुगलंक से मिले थे उस समय जिनदेवरि भी साथ थे और नगर-प्रवेश महोत्सव के समय ये हाथी पर भी बैठे थे । जिस समय आचार्य जिनप्रभसूरि ने देवगिरि की ओर प्रस्थान किया था उस समय उन्होंने . १४ साधुओं के साथ जिनदेवसूरि को सम्राट मुहम्मद तुगलक के पास दिल्ली में ही रखा था । जिनप्रभसूरि ने स्वरचित 'कन्यानयनीयमहावीरकल्प, में एक प्रसंग का उल्लेख करते हुये लिखा है:- "इधर दिल्ली में विराजमान जिनदेवसूरि विजयकटक (शाही छावणी) में सम्राट् से मिले । सम्राट् ने बहुत सन्मान के साथ एक सराय (मुहल्ला) जैन संघ के निवास करने के १. ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह पृ. १४. २. विविधतीर्थकल्प पृष्ठ ४५-४६ ३. विविधतीर्थकल्प पृ ४६. । - २ " लिये दी । इस सराय का नाम 'सुलतान सराय रखा गया। वहां सम्राट ने पौषधशाला और जैन मन्दिर बनवाया एवं ४०० श्रावकों को सकुटुम्ब निवास करने का आदेश दिया । पूर्वोक्त कन्यानयनीय महावीर स्वामी की प्रतेमा को इस सराय में सम्राट् के बनवाये हुये मंदिर में विराजमान किया गया । श्वेताम्बर, दिगम्बर एवं अन्यधर्मावलम्बी जन भी भक्ति- भाव से इस प्रतिमा की पूजा करने लगे। " श्री विद्यातिलक ने कन्यानयनमहावीरकल्पपरिशेष में लिखा है कि-"किसी समय मुहम्मद तुगलक को जिनप्रभसूरि से मिलने की पुनः उत्कंठा जागृत हुई और उसने आदेश निकलवा कर दौलताबाद से आचार्य को पुनः आने के लिए निवेदन किया, जिसे जिनप्रभसूरि ने सहर्ष स्वीकार किया और देवगिरि से दिल्ली के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में आते हुये अल्ला- वपुर में सूरिजी के साथिों को मल्लिकों ने परेशान किया । उस समय यह वृत्तान्त जानकर जिनदेवसूरि ने सम्राट से मिलकर इस उपद्रव का निवारण करवाया था ।" इससे स्पष्ट है कि सम्राट् के हृदय में जिनदेवसूरि के प्रति गौरवपूर्ण स्थान था। जिनदेवसूरि ने स्वरचित 'कालकाचार्य कथा' में स्वयं के लिये "स्वाङ्कपर्यङ्कलालितः विशेषण का प्रयोग किया है इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि ये बाल्यावस्था से ही जिनप्रभसूरि के संरक्षण में रहे या लघु अवस्था में ही उन्होंने दोक्षा ग्रहण कर ली थी। सं. १३८५ में इनके नाम के सोथ आचार्यपद का उल्लेख प्राप्त है ही । शिलोञ्छ का रचनाकाल जिनदेवसूरि ने १४३३ दिया है । वर्तमान समय में जिनदेवसूरि रचित केवल दो ही कृतियां प्राप्त हैं- १. कालिका- चार्यकथा और २. हैमनाममालाशिलोञ्छ । कालिकाचार्य कथा-इस कथा में जैन समाज में प्रसिद्ध आचार्य कालक का आख्यान दिया गया है । ९७ अनुष्टुप् श्लोकों में यह कथा है । शब्दों का चयन सरल और सुबोध है । इसकी भाषा संस्कृत है । आचार्य ने रचनासमय नहीं दिया है । यह कथा देवचंद लालभाई जैन पुस्तकोद्धार फण्ड सूरत से प्रकाशित सचित्र कल्पसूत्र में प्रकाशित हो चुकी है । हैमनाममालाशिलोञ्छ-प्रस्तुत ग्रन्थ में साहित्य में प्रयुक्त नूतन शब्दों का संकलन 'अभिधानचिन्तामणिनाममाला' के पूरक रूप में हैं। नाममाला के काण्डों के अनुसार यह भी छः काण्डों में विभक्त है । प्रत्येक काण्ड में निम्नांकित श्लोक है:- (१) ६. (२) १४. (३) ६२. (४) ३९३. (५) १. (६) १५ ३. और प्रशस्ति का १ । इस प्रकार समग्र *लोक संख्या १३९ है। श्रीवल्लभ ने रचनाकाल से सम्बद्ध मूलपाठ 'वैक्रमेव्दे त्रिविश्वेन्द्रमिते' दिया है । इसके अनुसार त्रि ३, विश्व ३, और इन्द्र १४ होते हैं । अंको की वामगति मानकर. टीकाकार ने रचना समय वि. सं. १४३३ माना है, जो युक्तियुक्त एवं उचित है । संवत् के सम्बन्ध में कुछ और भी पाठान्तर प्राप्त होते हैं: पु० और आ० संज्ञक प्रति में 'त्रिवस्विषुमिते' 'त्रिवस्विपुतिमे' पाठ प्राप्त है, इसके अनुसार वि. सं. ५८३ होता है । अ. संज्ञक प्रति और मुद्रित संस्करण के अनुसार 'त्रिवस्विन्दुमिते' से १८३ होता है । जो कि लिपिकार की अज्ञता एवं अशुद्ध पाठ के कारण भ्रामक है। १. वही पृ. ९५, ३ टीकाकार. श्रीवल्लभ की गुरुपरम्परा हैमनाममालाशिलोच्छ के टीकाकार वादों श्री श्रीवल्लभोपाध्याय खरतरगच्छीय श्री ज्ञान- विमलोपाध्याय के शिष्य हैं । श्रीवल्लभ, महोपाध्याय श्री जयसागरजी की उपाध्याय परम्परा में आते हैं । जयसागरोपाध्याय को परम्परा बहुत ही उच्च कोटि के विद्वानों तथा गीतार्थों से अलंकृत रही है । यही कारण है कि . श्रीवल्लभ ने अपने समस्त ग्रन्थों की प्रान्तपुष्पिकाओं में 'महोपाध्याय श्रीजयसागरसन्तानीय' एवं प्रशस्तियों में इस परम्परा का विशदता से वर्णन किया है। शिलोञ्छदीपिका, अभिधानचिन्तामणिनाममालाटीका आदि प्रेशस्तियों के आधार पर इनको गुरु-परम्परा का वंशवृक्ष इस प्रकार बनता है:- जिनराजमरि जयसागरोपाध्याय ... Tatra रत्नचन्द्रोपाध्याय मेघराज सोमकुञ्जर सत्यरुचि आदि भक्तिलाभोपाध्याय चारित्रसारोपाध्याय भावसागरगणि चारुचन्द्रवाचक --- भानुमेरु उपाध्याय जीवकलश कनककलश ज्ञानविमलोपाध्यायः । तेजोरंग गणि श्रीवल्लभोपाध्याय ज्ञानसुन्दर जयवल्लभ १ इसके लि। देखे 'निघण्टुशेपटीका'क' पुष्पिका, शेषसंग्रहदीपिका प्रशस्ति आदि । २ मेघराजरचित हास्वन्धम"नगरकोटालङ्कार आदि ज़िनस्तोत्र (जगज्जीवनं पावनं यस्य वाक्यम्) पद्य ५४ प्राप्त है। ३ सोमकुञ्जर ने जेसलमेरस्थ ... सम्भवजिनालय की प्रशस्ति का सं. १४५७. में निर्माण किया था और सं. १४८५ में जिनभद्रपूरि के उपदेश से लिखापित आचारानि का स. १४९२ में शोधन किया था । ४, विज्ञप्तित्रिवेणी के अनुसार जयनगर-जी. के प्रमुख शिप्यों में इनके भी नाम प्राप्त हैं-स्थिरसंयम, मतिशीलगणि, हेमकुजर, समयकुञ्जर, कुलकेशरी, अजितकेसरी आदि ।
टीकाकार श्रीवल्लभोपाध्याय श्रीवल्लभरचित मौलिक एवं टीकाग्रन्थों का अवलोकन करने से इनके विषय में जो कुछ जानकारी मिलती है, वह इस प्रकार है :- जन्मस्थान-अभिधानचिन्तामणिनाममाला की 'सारोद्धार' नामक टीका, हैमलिङ्गानु- शासन विवरण की 'दुर्गपदप्रबोध' नामक टोका एवं निघण्टुशेष टोका आदि स्वप्रणीत टोका ग्रन्थों में श्रीवल्लभ ने स्थान स्थान पर पद पद पर 'इति भाषा' 'इति लोके' 'इति प्रसिद्धे' शब्द से शब्दों के पर्याय देते हुये, राजस्थान में रूढ प्रचलित शब्दों का व्यापक रूप से उल्लेख किया है। इन टीकाग्रन्थों में लगभग ४५०० भाषा शब्दों का उल्लेख है । इन शब्दों का मैने स्वतन्त्र रूप से संग्रह कर लिया है जो शीघ्र ही 'राजस्थानी-संस्कृत शब्दकोश' के नाम से प्रकाशित होने वाला है। उदाहरणार्थ कुछ शब्द देखिये : तावडा, कलाइणि, तेडण, ऊकरडओ, ओलम्भओ, ओलखाण-पिछाण, कवा, खेजड़ी, सांगरी, चलू, लूगड़ा आदि । अतः यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि श्रीवल्लभ का जन्म एवं बाल्यकाल राजस्थान प्रान्त में व्यतीत हुआ हैं । साथ ही रूढ शब्दों के प्रयोग से यह भी अधिक संभव है कि राजस्थान में भी जोधपुर ‘राज्य इनका जन्मस्थान . रहा हो। यहां यह प्रश्न अवश्य ही विचारणीय हो सकता है कि श्रीवल्लभ जैन मुनि थे । मुनि होने के कारण विचरण करते रहते थे । फिर भी इनके जीवन का अधिकांश भाग राजस्थान प्रदेश में ही व्यतीत हुआ है । अतः निरन्तर जन-सम्पर्क के कारण इनकी भाषा में राजस्थानी , शब्दों का प्रयोग अधिक हुआ हो । किन्तु ध्यान देने की बात यह है कि कतिपय राजस्थानी शब्दों के प्रयोगकी बात न होकर ४५०० शब्दों का केवल राजस्थानी प्रयोग, उसमें भी आंचलिक शब्दावली का व्यवहार इन्होंने किया है, जो बाल्यपन के संस्कार के विना भाषा में नहीं आ सकते । अतः मेरे विचारानुसार जब तक कोई दूसरा पुष्ट प्रमाण प्राप्त न हो, तब तक भाषा के आधार पर इन्हें राजस्थानी मानने में किसी को संदेह नहीं होना चाहिये। जन्म-संवत-दीक्षा समय के प्रसंग में मैंने, अनुमानतः सं. १६३०-४०. के मध्य में इनका दीक्षाकाल माना है । अतः दीक्षा के पूर्व इनकी अवस्था १०-१२ वर्ष की भी मानी जाय तो इनका जन्म समय स. १६२०-१६२५ के मध्य में माना जा सकता है । दीक्षा-सम्वत्-खरतरगच्छालङ्कार आचार्यप्रवर श्रीजिनमाणिक्यसूरि के पट्टधर, सम्राट अकबर द्वारा प्रदत्त युगप्रधान बिरुदधारक आचार्य जिनचन्द्रसूरि ने अपने ५८ वर्ष के विशद गणनायक आचार्य काल में ४४ नन्दिओं (नामान्तपदों) की स्थापना की थी। इसमें २६ वी संख्या की नन्दी 'वल्लभ' नाम की है । इन ४४ नन्दिओं में से १६ वों नन्दी 'सिंह' की स्थापना सं. १६२३ में.. हो चुकी थी । अतः अनुमानतः 'वल्लभ' नन्दी की स्थापना सं.. १६३० एवं १६४० के मध्यकाल में हुई होगी । इस अनुमान का मुख्य कारण एक यह .. भी है श्रीवल्लभ ने सं. १६५४ में हैमनाममालाशिलोच्छ और शेषसंग्रहनाममाला पर टीकाओं की रचना की । इसी वर्ष इनके गुरु ज्ञानविमलजी ने भी शब्दप्रभेद टीका पूर्ण की जिसमें श्रीवल्लभ सहायक थे । किसी भी ग्रन्थ पर लेखनी चलाने । के लिये विशेषकर व्याकरण एवं कोष पर, विशेष अध्ययन और योग्यता की अपेक्षा है। अतः प्रौढ एवं पाण्डित्यपूर्ण टीका निर्माण के लिये दीक्षा के पश्चाद् १५-२०. वर्ष का समय तो. अवश्य ही अपेक्षित है । इस लिये यह अनुमान युक्तिसंगत ही होगा कि यु. जिनचन्द्रसूरिने सं. १६३० और १६४० के मध्य में आपको दीक्षा प्रदान कर 'श्रीवल्लभ' नाम प्रदान किया हो । उपाध्यायपद श्रीवल्लभ को गणिपद, वाचनाचार्य या वाचकपद और उपाध्यायपद किन किन संवतों में प्राप्त हुये, इसका कुछ भी पता नहीं है । इनके प्राप्त साहित्य में 'चतुर्दशगुणस्थान- स्वाध्याय' गाथा २३ भाषा की संभवतः प्रथम रचना है । इसमें स्वयं के लिये 'श्रीवल्लभ मुनिवर भणी' मुनि शब्द का प्रयोग किया है । इस रचना में संवतोल्लेख नहीं है । अतः कौन से संवत् तक ये मुनिपद पर रहे, निश्चय नहीं किया जा सकता । श्री ज्ञानविमलोपाध्याय ने सं. .१६५४ आषाढ शुक्ला द्वितीया को रचित शब्दप्रभेद टीका में 'विद्वच्छ्रीवल्लभाहस्य युक्तायुक्तविवेचिनः (२०), श्रीवल्लभ को विद्वान् और युक्तायुक्तविवेचक अवश्य कहा है किन्तु श्रीवल्लभ के साथ किसी पद का उल्लेख नहीं किया है । श्रीवल्लभ की संवतोल्लेखवाली प्रथम प्रौढ रचना शेषसंग्रहनाममाला टीका है । इस टीका की पूर्णाहुति ज्ञानविमलीय शब्दप्रभेद की रचना के ठीक २१ दिन बाद अर्थात् १६५४ श्रावण कृष्णा अष्टमी को हुई है । इसकी रचना-प्रशस्ति में 'गुरूणामन्तिषदाणुना श्रीवल्लभेन (१८)' लिखा है । ऐसे ही इसी वर्ष की इनकी दूसरी प्रौढ रचना हैमनाममालाशिलोञ्छ टीका है । इसकी रचना. तिथि सं. १६५४ चैत्र कृष्णा सप्तमी है । इसमें भी 'श्रीज्ञानविमलपाठकसत्पा- दाम्भोजचञ्चरीकेण श्रीवल्लभेन, (१९) लिखा है । अर्थात् नाम के साथ किसी पदं का उल्लेख नहीं है । किन्तु दोनों ग्रन्थों की प्रशस्तियों में पदोल्लेख न होते हुये भी, दोनों ग्रन्थों में प्रत्येक काण्ड की प्रान्तपुष्पिकाओं में 'वाचनाचार्य-श्रीवल्लभगणिविरचितायाम्' वाचनाचार्य एवं गणि- पद का उल्लेख प्राप्त होता है । सं.१६५५ की लिखित एवं श्रीवल्लभ द्वारा संशोधित हैम- नाममाला शिलोञ्छ की प्रति भी प्राप्त है, इसकी प्रान्तपुष्पिका में वाचनाचार्य एवं गणिपद का उल्लेख है । अतः यह मानना असंगत न होगा कि सं. १६५४ में ही या इसके १-२ वर्ष पूर्व ही इनको वाचनाचार्य एवं गणिपद प्राप्त हो गया था । सं. १६५५ में रचित ओकेश-उपकेशपदद्वयदशार्थी में 'पण्डित श्रीवल्लभगणि' उल्लेख है । इसी प्रकार बिना संवतोल्लेखवाली दो और रचनाएँ हैं, जिनमें 'खचरानन पश्य सखे खचर' पद्य की व्याख्या में 'विद्वछ्रीवल्लभाह्वो, पण्डित श्रीवल्लभगणि' तथा अत्यन्त प्रौढरचना सहस्र- दलकमलबद्ध 'अरजिनस्तव की स्वोपज्ञ टीका में श्रीवल्लभेन गणिना' (४) उल्लेख मिलता है । अर्थात् इन तीन कृतियों में पण्डित विद्वान् और गणि का उल्लेख तो प्राप्त है किन्तु वाचना- चार्य या वाचक का उल्लेख नहीं है । । अतः यहां यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सं. १६५४ की रचनाओं में वाचनाचार्य का उल्लेखं होने पर भी सं. १६५५ की रचना में केवल गणि का उल्लेख ही क्यों कर लेखक ने किया ? मेरी समझ में तो वाचनाचार्य होने पर भी लेखक ने स्वभाविक प्रवाह में स्वयं को गणि लिखा है । क्योंकि अनेक रचनाओं में वाचनाचार्य का उल्लेख करते हुये भी सं. * . १६६९ में रवित अजितनाथ स्तुति टोका में स्वयं के लिये वाचक का उल्लेख न करके केवल 'वादिश्रीश्रीवल्लभः' एवं 'वादिश्रीवल्लभगणि' का ही प्रयोग किया है । अतः यह निश्चित है कि सं १६५४ के आसपास इनको वाचनाचार्य एवं गणिपद प्राप्त हो चुका था । उपरोक्त कृतियों के अतिरिक्त संवतोल्लेख वाली एवं बिना संवतोल्लेखवाली प्राप्त समग्र रचनाओं में श्रीवल्लभ ने स्वयं के लिये गणि के साथ वाचक या वाचनाचार्य पद का सर्वत्र उपयोग किया है । देखिये :- १. मातृका श्लोकमाला (र. सं. १६५५) 'वाचकश्रीवल्लभाहेन' प्र. प. ३ २. हैमलिङ्गानुशासन दुर्गपदप्रबोध टोका (१.६६१) श्रीश्रीवल्लभवाचकैः' प्र. प. १० ३. अभिधानचिन्तामणिनाममाला टीका (१६६७) वाचनाचार्यो वादिश्रीवल्लभो' प्र. प. ११ 'वाचनाचार्यश्रीवल्लभगणि' प्रान्तपु. ४. निघण्टुशेष टीका (१६६७ से पूर्व) . 'वाचनाचार्यश्रीश्रीवल्लभगणि' प्रान्त पु. ५ अजितजिनस्तुतिटीका (१६६९) 'वादि श्रीश्रीवल्लभः' मं. प. १ ६. विद्वत्प्रबोधकाव्य 'वाचनाचार्यधुर्यश्रीश्रीवल्लभंगणीश्वरैः' प्र. प. १. ७. 'केशाः' पद्मव्याख्या 'श्रीश्रीवल्लभवाचकः' मं. १. वाचनाचार्य श्रीवल्लभगणिभिः' पुष्पिका. ८. संघपतिरूपजी-वंशप्रशस्ति (१६७५ के आसपास) 'श्रीश्रीवल्लभवाचकः' में. ५ उपाध्याय' पद का उल्लेख हमें केवल दो ग्रन्थों में प्राप्त होता है : १. चतुर्दशस्वर स्थापन वादस्थल एवं २. विजयदेवमाहात्म्य । वादस्थल की रचना जिनराजसूरि के शासनकाल में होने से स्पष्ट है कि सं. १६७४ के पश्चात् की यह कृति है और विजयदेवमाहात्म्य का रचनाकाल १६८७ के पश्चात् का है । दोनों के उद्धरण निम्नांकित है :-- 'श्रीवल्लभः पाठक उत्सवाय' मं. ३, श्रीवल्लभ उपाध्यायः' प्र.प. ३ चतुर्दशस्वरस्थापनवादस्थल : 'श्रीवल्लभ उपाध्यायः मं. ४, 'श्रीवल्लभः पाठक' सर्ग .१९. प. २०३, 'श्रीवल्लभोपाध्यायविरचिते' प्रान्तपुष्पिकामें, विजयदेवमाहात्म्य अतः यह निश्चित है कि श्रीवल्लभ को सं. १६७४ के पश्चात् श्रीजिनराजसूरि ने उपा- ध्याय पद प्रदान किया था । वादी श्रीवल्लभ ने कई स्थलों पर अपने नाम के साथ वादी विशेषण का प्रयोगः भी गौरव.. के साथ किया है । इसका सर्व प्रथम उल्लेख सं. १६६७ में रचित अभिधानचिन्तामणिनाम: माला टीका की प्रशस्ति पद्य ११ में 'वाचनाचार्यो. वादिश्रीवल्लभोऽदृभत्' प्राप्त होता है । दूसरा उल्लेख सं. १६६९ में रचित अजितनाथ स्तुति टीका के मंगलाचरण में श्रीश्रीवल्लभ- वादिभिः' और प्रान्तपुयिका में 'वादिश्रीवल्लभगणिविरचिता' मिलता है । सं. १६६७. में या इसके पूर्व कहां, किसके साथ और किस विषय पर इनका विवाद-शास्त्रार्थ हुआ ? कोई संकेत नहीं मिलता है । सं. १६६९ में रचित अजितनाथस्तुति. टीका में लिखा है कि- किसी विद्वान् के । साथं विवाद हो जाने से. साधारण जिन. स्तुति के वास्तविक अर्थ को त्याग कर, अजित- नाथ स्तुति के रूप में नवीनार्थद्योतक टीका की मैंने यथामति रचना की है :- केनापि विदुपा सार्द्ध विवादादजितार्हतः । वर्णना वर्णिता त्यक्त्वा वास्तवार्थ यथामति ॥७॥ महाराजा सूरसिंहजी के राज्यकाल में जोधपुर में यह रचना हुई है । अतः अनुमान है कि यह विवाद जोधपुर में ही हुआ हो । मेरे विचारानुसार, विद्वत्प्रबोध की रचना भी ऐसे ही किसी शास्त्रार्थ के रूप में ही कवि ने की हो ! कवि स्वयं लिखता है कि:-'बलभद्रपुर में बलभद्र के राज्य में, विशिष्ट विद्व- द्गोष्ठी में मेधावियों के अभिमान का नाश करना ही इस ग्रन्थ का प्रयोजन है: विद्वद्गोष्ठयां विशिष्टायां सञातायां प्रयोजनम् एतद्ग्रन्थस्य मेधाव्यभिमानोन्मथनाय वै ॥३॥ हालांकि इस कृति में 'वादी' शब्द का प्रयोग नहीं है 'वाचनाचार्यधुर्यश्रीश्रीवल्लभग- णीश्वरैः' शब्दों का गौरव के साथ प्रयोग किया है । चतुर्दशस्वरस्थापनवादस्थल तो स्पष्टतः वाद की कृति ही है । इसमें किसी कूर्चालसर- स्वतीविरुदधारक प्रतिपक्षी द्वारा स्थापित मान्यता का परिहार कर १४ स्वरों की स्थापना की गई है । यह वाद सं. १६७४ के पश्चात् कहीं पर हुआ है । इस प्रकार हम देखते हैं कि. १६६७ के पूर्व से लेकर १६७४ के पश्चात् तक श्री- वल्लभ ने कई विद्वद्गोष्ठियों में और कई शास्त्रार्थों में भाग लिया है और वहाँ अपने वैदुष्य की पूर्ण रूपेण प्रतिष्ठा की है । अतः अपने नाम के साथ वादी विशेषण श्रीवल्लभ के लिये सार्थक ही प्रतीत होता है । विशालहृदयता उस समय १७ वी शताब्दी में खरतरगच्छ और तपगच्छ में विधिवाद विषयक विवाद प्रबलवेग से चल रहा था और उसमें दोनों गच्छों के प्रमुख-प्रमुख व्यक्ति भाग ले रहे थे। इधर तपगच्छ की ओर से उपाध्याय धर्मसागर, नेमिसागर; लब्धिसागर आदि और खरतर- गच्छ की ओर से महोपाध्याय धनचन्द्र, महो. साधुकोत्ति, उ. जयसोम, उ. गुणविनय, मति- कीर्ति आदि लगे हुये थे । यही नहीं, किन्तु सब गच्छों के माननीय शान्तमना महर्षि महो- पाध्यायं समयसुन्दर जैसे भी (किसी पूर्वाभिनिवेश या दुराग्रह के वशीभूत होकर नहीं, किन्तु वस्तुनिरूपण की दृष्टि से) अपने ग्रन्थों में उ. धर्मसागर प्ररूपित प्रश्नों को सरलतापूर्वक खण्डन कर स्वगच्छ की आचरणाओं का मण्डन कर रहे थे । इन दोनों गच्छों के विवाद हो नहीं, किन्तु विजयदेवसूरि (जिनके लिये उ. श्रीवल्लभ ने विजयदेवमाहात्म्य की रचना की) के समय में तपगच्छ में भी 'विजय' और 'सागर' के विवाद समाज में ऐसे विषैले बीजों का वपन कर रहे थे, जिससे समाज का संगठन छिन्न-भिन्न हो जाय । परन्तु तत्का- लीन गच्छनायकों की चातुरी से समाज तो छिन-भिन्न नहीं हुआ किन्तु दो टुकडे अवश्य हो गये, जो आज भी मौजूद है । १. देखें, विजयतिलकसूरिरास ऐसे विक्षेप के समय में 'वादो' होते हुए भी श्रीवल्लभ का इन प्रपञ्चों में फंसना प्रतोत नहीं होता और न किसी ग्रन्थ में इनका इस विषय में कोई उल्लेख ही प्राप्त होता है। अतः यह निश्चित है कि श्रीवल्लभ दोनों गच्छों के संघर्ष में तटस्थ हो रहे थे । किसी प्रकार के वादों में पड़कर स्वसमय को नष्ट करना नहीं चाहते थे । जिस समय तपगच्छ के साधु खरतरगच्छ के आचार्यों की प्रशंसा करना तो दूर, उनकी कीर्ति का श्रवण करना भी अच्छा नहीं समझते थे और इसी प्रकार खरतरगच्छ के साधु भी तपगच्छ भी तपगच्छ के प्रभाविक पुरुषों का कीर्तिगान करने में संकुचाते थे, उ. समयसुन्दरजी ने पार्श्वचन्द्रगच्छोय पूंजा ऋषि का गुणवर्णन मुक्तकण्ठ से किया है तथा खरतर, तपा, अंचल इन तीनों गच्छों के आचार्यों का सुललित पद्यों में 'भट्टारक तीन भए बड़भागी' कह- कर गुणगान किया है; जो तत्कालीन समग्र साहित्य में अपवाद रूप ही समझना चाहिए। ऐसे समय में तपगच्छ के प्रसिद्ध आचार्य विजयदेवसूरि के चारित्रिक गुणों से प्रभावित होकर कवि श्रीवल्लभ ने १९ सर्गात्मक 'विजयदेवमाहात्म्य' नामक महाकाव्य की रचना कर अपनी माध्यस्थता, उदारता, विशालहृदयता का परिचय दिया । इसके सम्बन्ध में मुनिजिनजियजी 'विज्ञप्ति त्रिवेणी'की प्रस्तावना में लिखते हैं:- "श्रीवल्लभोपाध्याय की कृतियों में से एक कृति बड़ी ध्यान खींचने लायक है । इसका : नाम है विजयदेवमाहात्म्य । इसमें तपगच्छ के प्रसिद्ध आचार्य श्री विजयदेवसूरि का सवि- स्तर जीवन-चरित्र वर्णन किया गया है । (ध्यान में रहे कि चरित्रनायक और चरित्रलेखक दोनों समकालीन हैं और विजयदेवसूरि अपने माहात्म्य के निर्माण के समय में विद्यमान थे।) उस समय परस्पर साम्प्रदायिक विरोध इतना बढ़ा हुआ था कि एक गच्छ वाले दूसरे गच्छ के प्रतिष्ठित व्यक्ति के गुणानुवाद करना तो दूर, परन्तु श्रवण में भी मध्यस्थता नहीं दिखला सकते थे । अर्थात् तपागच्छवाले · खरतरगच्छोय व्यक्ति के प्रति अपना बहुमान नहीं दिखा सकते थे और खरतरगच्छानुयायी तपगच्छ के प्रसिद्ध पुरुष की प्रशंसा करते दिल में दुःख मनाते थे । ऐसी दशा में, खरतरगच्छीय एक विद्वान् उपाध्याय के द्वारा तपागच्छ के एक आचार्य के गुणगान में बड़ा ग्रन्थ लिखा जाना अवश्य आश्चर्य उत्पन्न करता है । समाज की यह विरोधात्मक प्रकृति, श्रीवल्लभ पाठक के ध्यान से बाहर न थी । वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि मेरे इस-भिन्न गच्छ के आचार्य का प्रशंसा और स्तवना करने वाले इस ; ग्रंथ के लिखनेरूप कार्य से बहुत दुराग्रही और स्वसाम्प्रदायिक असंतुष्ट, होकर मुझपर कटाक्ष करेंगे । इस लिये उन्होंने ग्रंथ के अंत में संक्षेप में परंतु असरकारक शब्दों में लिख दिया है कि- यदन्यगच्छप्रभवः कविः किं, मुक्त्वा स्त्रसूरि तपगच्छसूरेः । कथं चरित्रं कुरुते पवित्रं, शङ्केयमार्न कदापि कार्या ॥ आत्मार्थसिद्धिः किल कस्य नेष्टा, सा तु स्तुतेरेव महात्मनां स्यात् आभाणकोपि प्रथितोऽस्ति लोके, गङ्गा हि कस्यापि न पैतृकीयम् ॥
: तस्मान्मया केवलमर्थसिद्धथै, जिह्वापवित्रीकरणाय यद्वा इति स्तुतः श्रीविजयादिदेवः, सूरिस्सम श्रीविजयादिसिंहैः ॥ अर्थात्-अन्य (खरतर ) गच्छवाला कवि अपने गच्छ के आचार्य को छोड़कर तपा- गच्छ के आचार्य का चरित्र कैसे बनाता है, यह शंका विद्वान् मनुष्यों को न लानी चाहिए । क्यों कि आत्मसिद्धि किसे .अभीष्ट नहीं है ?-सभी को इष्ट है । यह आत्मसिद्धि महा - त्माओं की स्तुति द्वारा होती है । और महात्माओं के लिये यह कोई नियम नहीं है कि वे अमुक पंथ या समुदाय में ही उत्पन्न हुआ करते हैं और यह भी कोई प्रतिबंध नहीं है कि अमुक मतानुयायी अमुक ही महात्माओं की स्तवना करें । जैसे गंगा किसी के बापकी नहीं है-सबही उसका अमृतमय जल का पान कर सकते हैं-वैसे महात्मा भी किसी के रजिस्टर्ड नहीं किये हुए हैं । सत्र ही मनुष्य अपनी अपनी इच्छानुसार उनके गुणगान कर उन्नति कर सकते हैं । इसलिये मैंने खरतरगच्छानुयायी होकर भी-अपनी जिह्वा को पवित्र करने के लिये तपागच्छ के महात्मा श्री विजयदेवसूरि ओर उनके शिष्य विजयसिंहसूरि का यह पवित्र चरित्र लिखा है । इस विषय में किसी को उद्वेगजनक विकल्प करने की जरूरत नहीं है। वाह ! वाह ! । कैसी उदार दृष्टि और गुणानुराग!। यदि केवल इन्हीं ३ पद्यों का स्मरण और वर्तन हमारा आधुनिक जैन-समाज करे तो थोडे ही दिनों में यह उन्नति के शिखर पर आरूढ़ हो सकता है । शासनदेव वह दिन शीघ्र दिखावें । (पृष्ठ ८२-८४)" उपाध्याय श्रीवल्लभ के उदार हृदय का परिचय देनेवाली एक घटना और भी है। श्वेताम्बर जैनों में एक गच्छ है जिसका नाम है उपकेश गच्छ । श्रीवल्लभजी के समकालीन उपकेशगच्छनायक .श्रीसिद्धसूरि ने चाहा कि 'उनके गच्छ के नाम की एक सुन्दर और प्रामाणिक व्युत्पत्ति हो जाय ।' इस पर उन्होंने श्रीवल्लभजी से आग्रह किया । इस पर उन्होंने इस आग्रह को स्वीकार कर "ओकेश-उपकेशपदव्यदशार्थो" की सं. १६५५ में विक्रमनगर (बीकानेर) में बडे विलक्षण ढंग से रचना की । इससे भो स्पष्ट है कि इनके हृदय में साम्प्रे- दायिक भावों का लवलेश भी नहीं था, अपितु वे सहृदय एवं उदारमना थे । विहार और शिष्य-परम्परा इनके ग्रन्थों के अवलोकन से ऐसा प्रतीत होता है कि इनका बाल्यजीवन और प्रौढावस्था का समय नागोर, बीकानेर, जोधपुर, बलभद्रपुर आदि राजस्थान के नगरों में ही व्यतीत हुआ है । किन्तु विजयदेवमाहात्म्य और संघपतिरूपजीवंशप्रशस्ति को देखते हुये यह कल्पना की जा सकती है कि कवि श्रीवल्लभ वृद्धावस्था में सं. १६७५ के आसपास 'गुर्जर' देश पहुंचे और वहीं पर संघपतिरूपजीवंशप्रशस्तिकाव्य एवं आचार्य विजयदेव के चारित्र और तप से आकृष्ट होकर विजयदेवमाहात्म्य की रचना की । इसलिये बहुत संभव है कि इनकी वृद्धावस्था वहीं पूर्ण हुई हो अ.र सं. १६८७ के पश्चात् कुछ ही वर्षों में इनका स्वर्गवास भो उसी 'गुर्जर' प्रदेश में हुआ हो ।
१० a सबसे बड़ी आश्चर्य की वस्तु यह है कि श्रीवल्लभोपाध्याय की शिष्य-परम्परा चली हो-ऐसा प्रतीत नहीं होता. और न इस सम्बन्ध में किसी प्रकार के उल्लेख ही मिलते हैं। अथवा इनके स्वयं के शिष्य हों तो भी यह निश्चित है कि इनकी परम्परा दीर्घकाल तक नहीं चली । अन्यथा उनमें से कोई तो विद्वान् आदि होता जिनका कोई न कोई उल्लेख अवश्य मिलता । साहित्य सर्जना “The works of the commentator Sri Srivallabh“pādhyāya prove him to be an expert in the science of lexicography... He was master in that field." ~~-आगमप्रभाकर मुनि पुण्यविजय, निघण्टुशेष प्रस्तावना पृ. ६ उपाध्याय श्रीवल्लभ न केवल प्रामाणिक टीकाकार ही है अपितु महाकवि भी हैं । जहाँ ये व्याकरण, एकार्थी तथा अनेकार्थी कोश साहित्य के उद्भट विद्वान् हैं वहाँ ये चित्रकाव्यों के आचार्य भी हैं, जहाँ इनमें संस्कृत भाषाकी प्रौढता और प्राञ्जलता दृष्टिगोचर होती है वहाँ इनमें राजस्थानी शब्दभण्डार की सुमधुर शब्दावली भी देखने में आती है। जहाँ इनके ग्रन्थों से ऐतिहासिक स्रोत प्राप्त होते है, वहाँ वैदुष्यप्राप्ति के साधन स्रोत भी प्राप्त होते हैं । इन्होंने छोटे-मोटे अनेकों ग्रन्थों की रचना कर भारती के भण्डार को अवश्य ही समृद्धि- शाली बनाया होगा । वर्तमान समय में इनके द्वारा सर्जित साहित्य जो भी प्राप्त हुआ है, वह निम्नलिखित है :- मौलिकग्रन्थ- १. विजयदेवमाहात्म्य, २. सहस्रदलकमलबद्ध अरजिनस्तव, स्वोपज्ञ टीका सह ३. विद्वत्प्रबोधकाव्य स्वोपज्ञ टीकासह, ४. संघपतिरूपजीवंशप्रशस्ति स्वोपज्ञ टीका 'सह, ५. मातृका श्लोकमाला, “६. चतुर्दशस्वरस्थापनवादस्थल, ७. ओकेश-उपकेंशपदद्वयदशार्थी, ८. खरतरपदनवार्थी टीका ग्रन्थ- १. हैमनाममाला शेषसंग्रह टीका, २. हैमनाममालाशिलोञ्छ : टीका, ३. हैमलिङ्गानुशासन दुर्गपदप्रबोध टीका, ४. हैमनिघण्टुशेष टीका, ५. अभिधानचिन्तामणि- नाममालासारोद्धार टीका, ६. सिद्धहैमशब्दानुशासन टीका, ७. सारस्वतप्रयोगनिर्णय..८. विदग्धमुखण्डन टीका, ९. अजितनाथ स्तुति टीका, १० शान्तिनाथविषमार्थस्तुति टीका ११. 'केशाः कञालिकाशाभाः'पद्यस्य व्याख्या १२. 'खचरानन पश्य सखे खचर' पद्यस्य अर्थत्रिकम् । भापा की लघु कृति--१. चतुर्दश गुणस्थान स्वाध्याय, २. स्थूलिभद्र एकत्रीसो इस प्रकार २२ छोटी-मोटी कृतियाँ अभी तक मेरी जानकारी में आई हैं। इन कृतियों में हम चाहे इनके काव्यों को देखें अथवा टीकाग्रन्थों को, प्रत्येक पृष्ठ पर श्रीवल्लभ का प्रकाण्ड-पाण्डित्य और सौजन्यपूर्ण औदार्य ही प्रस्फुटत हो रहा है । उपर्युक्त सब रचनाओं का पूर्ण परिचय करवाना यहाँ संभव नहीं है, केवल उनका संक्षिप्त परिचय-मात्र यहां दिया जा रहा है जो मेरी समझ में, श्रीवल्लभ की प्रतिभा और निपुणता को प्रकाशित करने के लिये पर्याप्त होगा। '.
२१ . १. विजयदेवमाहात्म्य महाकाव्य १७वीं शती के तपगच्छाधिपति आचार्य विजयदेवसूरि के माहात्म्य का वर्णन होने से इस महाकाव्य का नाम भी विजयदेवमाहात्म्यं महाकाव्य रखा गया है । विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में महाकाव्य के जो लक्षण दिये हैं उन लक्षणों से तुलना करने पर यह माहात्म्य भी महाकाव्य की कोटि में आता है। इसके नायक विजयदेवसूरि धीरोदात्त और देवत्व गुण से परिपूर्ण है । इसमें शान्तरस मुख्य है। इसका कथानक महर्षि के जीवन चरित पर आश्रित है. और तत्कालीन' : परिस्थितियों का वर्णन होने से ऐतिहासिक भी है । इसमें धर्मफल की प्रधानता है । प्रारंभ में नमस्कार और कथावस्तु का निर्देश भी है। इसमें १९ सर्ग हैं। सर्ग के श्लोकों की संख्या ३६६ पद्य हैं । इसमें कई स्थलों पर 'सागर' आदि खलों की निन्दा और महापुरुषों का गुणगान भी किया गया है। प्रसङ्गोपात्त पुत्रजन्म, विवाह (दीक्षा), मुनि, स्वर्ग, सूर्य, चन्द्र, सागर आदि का वर्णन भी है। स्थान-स्थान पर अनुप्रास, श्लेष, यमक, वक्रोक्ति, अर्थान्तरन्यास, अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, विरोध, उपमा, रूपक आदि अलकारों का अच्छा समावेश किया है । केवल माहात्म्य ही नहीं है किन्तु लक्षणसिद्ध घटनाबहुल ऐतिहासिक महाकाव्य है । , - '. इसका' रचनासमय . अज्ञात है । महाकवि श्रीवल्लभ ने प्रशस्ति में इसका कोई उल्लेख नही किया है. किन्तु इस महाकाव्य का आलोडन करने पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इसकी रचना सं.. १६८७ के पश्चात् ही कवि ने की है । इसका आधार यह है कि कवि, चरितनायक के जन्मकाल १६३४ से लेकर १६८७. तक की. क्रमबद्ध घटनाओं का वर्णन सांगोपांग करता है । नायक का देहावसान १७१३ में हुआ है। कवि उनके देहावसान का तो क्या, किन्तु चरितनायक के १६७८. के बाद दक्षिण देश में पधारने और काफी समय तक इस प्रदेश में विचरण करने का उल्लेख भी नहीं करता। १६८४ में विजयदेवसूरि ने विजयसिंहसूरि को भट्टारक पद दिया और १६८६ में स्वर्ण- गिरि (जालोर) में प्रतिष्ठा करवाई । सं. १६८७. में मेदिनीतट (मेड़तासिटी) में प्रतिष्ठा करवाई और उसके पश्चात् करवाया गंगाणो तीर्थः का जीर्णोद्धार । इसके पश्चात् : काव्य में कोई जीवन की उल्लेखनीय घटना नहीं है, किन्तु जहांगीर पर प्रभाव, तपवर्णन, चरितवर्णन, और गुणवर्णनों में ही आगे के सर्ग पूर्ण किये गये हैं । इसमें एक और घटना का उल्लेख है, मेघजी आदि मुख्य श्रावकवर्ग ने 'सागरमत' का त्याग कर, पुनः गुरु के वासक्षेप प्राप्त १. देखें एकादश सर्गः २. देखें, विजयदेव माहात्म्य, सर्ग ९ ३. वही, सर्ग १३ पंद्य १६-१७ ४. वही सर्ग 1३ पद्य ७२ ५. वही सर्ग १५ ६. वही सर्ग १९ पद्य १९७ . .
कर बोधिलाभ उपार्जन किया । इसका भी समय अवचूरिकार' उपाध्याय श्री मेघविजयजी ने सं. १६८७ दिया है । अतः यह अनुमान ठीक ही प्रतीत होता है कि इसकी रचना १६८७ के अन्त में ही हुई है । अन्यथा १६८८ की भी कोई घटना का उल्लेख अवश्य किया जाता । कवि ने काव्य के प्रथम और द्वितीय सर्ग में चरितनायक का जन्म, विद्याभ्यास, वैवा हिक बन्धनों को न स्वीकार ब्रह्मचारी रहने की अत्युत्कट अभिलाषा और संयम के प्रति आकर्षण का वर्णन किया है । ३-४ सर्ग में आचार्य होरविजयसूरि का प्रभाववर्णन और विजयसेनसूरि का जीवन-चरित है । ५-७ सर्ग में माता सहित चरितनायक की दीक्षा, शास्त्राभ्यास, विजयसेनसूरि के साथ सम्राट् अकबर से मिलाप तथा चरितनायक के 'गणि और आचार्यपद प्राप्ति का वर्णन किया गया है । ८३ सर्ग में कनकविजयादि शिष्यों का और ९-१० सर्गों में प्रतिष्ठा, चातुर्मास, दीक्षाप्रदान एवं विजयसिंहसूरि को स्वपट्ट पर अभिषिक्त करने का वर्णन मिलता है । ११वें सर्ग में 'सागरपक्षीय' प्रतिवादियों को पराजित करने का उल्लेख है । १२-१४ सर्गों में नवलक्षप्रासाद पार्श्वनाथ, जालोर, मेड़ना आदि प्रतिष्ठाओं का विशद वर्णन तथा गंगाणी तीर्थ के जीर्णोद्धार का प्रसंग कवि ने सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है । १५३ सर्ग में . तपवर्णन, १६वें में स्तम्भतीर्थ चातुर्मास-वर्णन · तथा १७-१८ में सम्राट् जहाँगीर पर प्रभाव और महातपा बिरूद-प्राप्ति एवं सागर-पराजय का वर्णन है । सर्ग १९वें में नायक के औदार्यादि गुणों का व्याख्यान है । यह कवि श्रीवल्लभ की अन्तिम रचना प्रतीत होती है । इसके पश्चात् की अभी तक कोई भी कृति प्राप्त नहीं हुई है । इस काव्य की समसामयिक प्रसिद्ध साहित्यकार उपाध्याय श्री मेघविजयजी प्रणीत अवचूरि प्राप्त है । इस काव्य की दो सुन्दर प्रतियाँ उ. श्री जयचन्द्रजी भंडार (राज. प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान,) बीकानेर एवं श्रीजिनहरिसागरसूरि ज्ञान- भण्डार लोहावट में प्राप्त है । अवचूरि सहित यह काव्य मुनि जिनविजयजी द्वारा सम्पादित होकर जैन साहित्य संशोधक समिति. अहमदाबाद से.-सन् १९२८ में प्रकाशित हो चुका है। २. अरजिनस्तव स्वोपज्ञ टीका सह भारतीय वाङ्मय में यह स्तवात्मक लघुकाव्यं अद्वितीय कृति के रूप में माना जा सकता है । क्यों कि चित्रकाव्यों में अष्टदल षोडशदल शतदलात्मक कृप्तियाँ तो प्राप्त होती हैं किन्तु सहस्रदलात्मक प्राप्त नहीं होती हैं । यह एक सहस्रदलकमलगर्मित चित्रकाव्य है । जिसमें १००० रकारों का प्रयोग किया गया है । मध्यदल (गर्भ) में रकार को रखा है और प्रत्येक दल (पांखड़ी) में दो अक्षरों का निवेश किया है । प्रत्येक पाँखडी के ब्यक्षरों का मध्य में स्थित रकार से संबंध है । अर्थात् प्रत्येक पांखडी का सीधा सम्बन्ध मध्यदल के रकार से है । देखिये : असुरनिर्जरबन्धुरशेखर-प्रचुरभव्यरजोत्तिर पञ्जिरम् । क्रमरज शिरसा सरसं वरं जिन रमेश्वर मेदुर शङ्कर ॥१॥ १. वही, १६८७ वर्षे यन्मतं कर्षितं तत्सागरीयं मतं त्यक्त्वा सा० मेघाद्या: पृष्ठ १२६ -- बहवः श्रावकाः १ १३ इस पद्य में ४८ अक्षर हैं । जिनमें १६ रकारों का प्रयोग हैं । अर्थात् प्रत्येक दों अक्षर के बाद रकार का प्रयोग है । चित्रकाव्य . की रचना में. छन्दःशास्त्र, व्याकरण, निर्वचन तथा कोष आदि पर : पूर्ण आधिपत्य होना आवश्यक है । जो इस कृति में स्पष्टरूप से लक्षित होता है । विचारवैदग्ध्य,. रचनाकौशल तथा उक्तिवैचित्र्य की दृष्टि से यह काव्य एक सर्वोत्कृष्ट काव्य है । इस काव्य में अठारहवें जैन तीर्थकर अरनाथ भगवान् की स्तुति की गई है । रकार गर्भात्मक ५४ पद्य हैं और ५५ वा पद्य उपसंहारात्मक प्रशस्तिरूप है। इस स्तोत्र काव्य पर स्वयं श्रीवल्लभरचित स्वोपज्ञ टीका प्राप्त है । यदि कवि स्वयं टीका की रचना न करता तो इसकी मार्मिकता समझने में काफी असुविधायें रहती । यह काव्य और टीका श्रीवल्लभ के प्रौढावस्था की रचना है; अतः इस काव्य की भाषा भी बहुत ही प्राञ्जल और प्रवाहपूर्ण है । इस स्तोत्र में कवि को अनिष्पन्न और अप्रचलितशब्दों को रकारगर्भित करने के लिये जिस योजना-कौशल लिये जिस योजना-कौशल और पाण्डित्य की आवश्यकता थी वह इसमें पूर्णरूपेण विद्यमान है । जहां १००० रकार प्रधान काव्य की रचना करना हो, वहाँ उस काव्य में प्रायः अधिक शब्द तो अप्रसिद्ध ही प्रयुक्त होते हैं । उन्हें सिद्ध करने के लिये उणादि सूत्र, और अनेकार्थी तथा एकाक्षरी नाममालाओं का आश्रय लेना हो पड़ता. है । टीकाकार श्रीवल्लभ ने भी इसमें हैमव्याकरण, उणादिसूत्र, धातुपारायण, पाणिनीयादि व्याकरण, कविकल्पद्रुम, अनेकार्थनाममाला, सौभरि, सुधाकलश, विश्वशंभु, ध्वनिमञ्जरी आदि एकाक्षरी नाममालाओं के आधार पर ही शब्दों की निष्पत्ति कर अपने विलक्षण पाण्डित्य का परिचय दिया है । उदाहरणार्थ अकडारशब्द की व्याख्या द्रष्टव्य है:- हे अकडार ! न कडारः-न विषमदन्तो यः सोऽकडारः, 'कडारः पिङ्गलः विषमदशनश्च [सि. हे. उ. सू. ४०५] इति उणादिवचनात् तत्सम्बोधनं हे अकडार ! हे सुदन् ! हे श्री अरनाथजिन! [ पद्य ५३ ] श्रीवल्लभ ने इस काव्य में और टीका में रचना-समय का निर्देश नहीं किया है, फिर भी 'श्रीमच्छ्रीजिनचन्द्राभिधानसूरिष्वधीशेषु,' [प्र. प. र] श्रीजिनचन्द्रसूरि के राज्य में होने से स्पष्ट है कि १६७० के पूर्व की यह रचना है, क्योंकि जिनचन्द्रसूरि का . स्वर्गवास १६७० में हो चुका था। और स्वयं के लिये गणिपद का ही प्रयोग होने से स्पष्ट है कि १६५५ से १६७.० के मध्य में श्रीवल्लभ ने टीका सहित इसकी रचना की है। इस काव्य को एकमात्र प्रति भाण्डारकर ओरियन्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट पूना में, है। मेरे द्वारा सम्पादित होकर यह काव्य टोका सहित सन् १९५३ में 'अरजिनस्तव' के नाम से प्रकाशित हो चुका है । ३ विद्वत्प्रबोधकाव्य स्वोपज्ञ टीका सह श्रीवल्लभ ने विद्वत्प्रबोध की रचना बलभद्रपुर (संभव है उसे ही आजकल बालोतरा कहते जो जोधपुर प्रदेश में पचपदरा के पास हैं ) में बलभद्र नामक शासक की विशिष्ट , . . . प्राप्त विद्वत्मभा (गोष्ठी) में मेधावियों के अभिमान का मन्थन करने के लिये और विद्वानों की वैदुग्यवृद्धि के लिये रचना की है । लेखक ने स्वयं के लिये 'वाचनाचार्यधुर्यश्री-श्री- वल्लभगणीश्वरैः' विशेषणों का प्रयोग किया है । लेखक ने प्रशस्ति में रचनाकाल का उल्लेख नहीं किया है । फिर भी अत्यन्त प्रौढ और क्लिष्टतम रचना होने के कारण इसका निर्माण समय १६६०-से १६६६ के मध्य का माना जा सकता है । इस अनुमान का आधार यह है कि श्रीवल्लभ ने अभिधानचिन्तामणि नाममाला की टीका में (र. सं. १६६७) स्वयं के लिये वादी शब्द का प्रयोग किया है, जो इसः टीका रचना १६६७ के पूर्व किसी वाद प्रसंग की ओर संकेत करता है । 'विद्वद्गोष्ठ्यां विशि- टायां मेधाव्यमिमानोन्मथनाय' शब्दों से कल्पना की जा सकती है कि यह विशिष्ट विद्वद्- गोष्ठी शास्त्रार्थ की ही थी और विजयश्री प्राप्त करने के पश्चात् . श्रीवल्लभने अपनी परवर्ती कृतियों में अपने लिये वादी का प्रयोग किया हो । पिर भी निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस पंक्ति के अतिरिक्त विद्वत्-प्रबोध में कहीं भी वाद का संकेत प्राप्त नहीं है। कवि सौभरिप्रणीत यक्षरकाण्ड में वर्णित क्णा से लेकर विवपर्यन्त - संयुक्तवर्णों के माध्यम से वस्तुवर्णना की गई है । इसमें तीन परिच्छेद हैं । प्रथम परिच्छेद के ६० पद्यों में चतुःचरणधारी गज, अश्व, वृषभ, सिंह, उष्ट्र आदि का वर्णन है । द्वितीय परिच्छेद के ६० पद्यों में द्विपदधारी शुक, तित्तिरि, हंस, बक, चक्रवाक, सारस, टिट्टिभ, मयूर, चाष, खजरीट आदि पक्षियों का वर्णन है । तृतीय परिच्छेद के २१ पद्यों में साधु, पण्डित और वीरजनों का वर्णन है । अन्तमें. प्रशस्ति के ६ पद्य हैं । विशेषतः प्रत्येक पद्य में राजा को सम्बोधन करके प्रासंगिक वर्णन लिखा गया है । इस काव्य पर स्वयं श्रीवल्लभ की ही स्वोपज्ञ टीका है । द्वितीय परिच्छेद के १९ पद्य से तो टीका न होकर टिप्पण मात्र ही प्राप्त है । इस काव्य की परिचयात्मक महत्ता दिखाते हुये पहाश्री मुनि जिनविजयजी ने 'एकाक्षर नामकोपसंग्रह' के संचालकीय वक्तव्य (पृ. १०) में लिखा है:- "यह एक कुतुहल-प्रदर्शक काव्याभ्यासी पद्यमय कृति है । इसकी रचना एक जैन विद्वान् श्रीवल्लभगणि ने की है। यह एक केवलं शब्दपाण्डित्य-प्रदर्शक अनोखी रचना है । रचना- कार में शब्द-लक्षण्य की विचित्रार्थता प्रकट करने के उद्देश्य से इस विनोदात्मक पद्यरचना का गुम्फन किया है । प्रस्तुत संग्रह में सोभरिकत जो एकाक्षर नामाला' मुद्रित हुई है उसके दारका में कण, हाण, वणु, कणी आदि अनेक ऐसे संयुक्ताक्षर वाले एकस्वरीय शब्दों का संसह लिया है, जो अन्य संग्रहों में ग्लाग करके नहीं मिलते । इनमें अनेकानेक ऐसे संयुक्ता- ar-युक्त एकस्वरीय शब्द है जिनका उच्चारण भी कठिन और विलक्षण प्रतीत होना है। ही धान में तो हा, की, भा, भी, या, स्त्री आदि मन्याभरी जसा आभास होता है, पोशा ने टमको मन्त्राी के बीज रूप में नहीं लिया है, विचिन शनवनि वाले किया। अनी में ये शब्दों का प्रयोग प्रायः नहीं..सा उपलब्ध १५ " होता है । तथापि कोषकार के. इन शब्दों का अपने कोश में संकलन करने का कोई शास्त्रा- धार अवश्य रहा होगा और इसीलिये उसने इन्हीं शब्दों को अपनी रचना में विशेष रूप से संग्रहीत किया है । सौभरि- कवि--संकलित इन विचित्र शब्दों का . आधार लेकर उक्त श्रीवल्लभ गणि ने संग्रहान्तर्गत अन्तिमकृति 'विद्वत्प्रबोध' का गुम्फन किया है । इसमें उन्होंने सौभरि के संकलित क्वण, क्वाणा आदि बहुत से विचित्र शब्दों का सार्थक उपयोग. कर दिखाने की चेष्टा है । यद्यपि है यह केवल कुतूहल--प्रदर्शक रचना, तथापि संस्कृत भाषा के शब्द सामर्थ्य का इससे बोध होने जैसा है । यह रचना अर्थक्लिष्ट एवं शुष्क-पद्य-प्रवन्ध रूप है, इसलिये रचयिता ने स्वयं इसके क्लिष्ट शब्दों का अर्थ बोध कराने के लिये संक्षिप्त टिप्पण भी साथ में लगा दिये हैं। इसी 'एकाक्षरनामकोप संग्रह' पुस्तक की भूमिका लिखते हुये जैन पण्डित पं. लालचन्द्र भगवान् गान्धी ने (पृ. २३) पर लिखा है:- "यह एक अपूर्व विशिष्ट विद्वद्गम्य, अद्भुत संस्कृत काव्य है । इस एकाक्षरीकोशसंग्रह में इसका सुसम्बद्ध आवश्यक स्थान है । इस संग्रह में चतुर्थ क्रमाङ्क में सौभरिकृत द्वयक्षर नाममाला प्रकाशित हुई है, उसमें प्रदशित विविध अर्थवाले संयुक्तवर्णों को प्रत्येक श्लोक के प्रत्येक चरण में प्रयुक्त कर इस चमत्कृतिकर रसिक काव्य की रचना कवि ने की है। संस्कृत साहित्य में यह अद्वितीय कहा जाय, ऐसा काव्य है | शायद ही इस पद्धति का अन्य काव्य विद्वानोंने देखा होगा । रसास्वादन के लिये हंसवर्णन में व्र का उपयोग देखिये:- ब्र-पोडशार्चिः स्तवनीय ! सन्मते ! ब्रयुक् ! चतस्रः ककुभो विलोकयन् । ब्रभा ! वकस्त्रस्त ऋधम् ब्रवीत्यरं, बचोरभीतिं नृपते ! सुखच्छिदम् ॥ २७ ॥ द्वि. प. इस काव्य की एक मात्र प्रति १७ वीं शताब्दी की लिखित श्री अभय जैन ग्रन्थालय बीकानेर में उपलब्ध है । पहिले यह काव्य जिनदत्तसूरि ज्ञानभण्डार, सूरत से 'महावीर स्तोत्र' के साथ प्रकाशित हुआ था और पुनः राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, - जोधपुर से 'एकाक्षरनामशेषसंग्रह' में प्रकाशित हुआ है । ४ सङ्घपतिरूपजी-वंश-प्रशस्ति, स्वोपज्ञ टिप्पणीसह यह एक वंश-प्रशस्त्यात्मक ऐतिहासिक लघुकाव्य है। इस काव्य की एकमात्र प्रति राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, क्रमांक १९२५० में प्राप्त है । प्रति अपूर्ण होने से इस काव्य का नाम कवि ने क्या रखा है, निर्णय नहीं कर सकते । काव्यके प्रारम्भ में कवि "श्रीसंघाधिपरू.पजीविजयताम्' (पद्य ३) तथा 'भुवि श्रावकाधीश्वरो रूपजी सः' (पद्य ४) का उल्लेख कर, पद्य पांचवें में रूपजी के पूर्वजों का वर्णन करने का संकेत करता है। इससे स्पष्ट है कि कवि श्रीवल्लभ संघपति रूपजी की प्रशंसा में यह प्रशस्ति काव्य लिखना चाहता है, परन्तु काव्य के प्राप्तांश में केवल रूपजी के पिता संघपति सोमजी एवं चाचा संघपति शिवाजी के कतिपय सुकृत कार्यो का ही वर्णन प्राप्त है । रूपजी का जन्म और विशिष्ट . .
... १६ कृत्यों का उल्लेख भी इसमें नहीं आ पाया है। ऐसी अवस्था में मैंने इसका नाम 'संघपति रूपजी वंश प्रशस्ति' रखना ही समुचित समझा है । संघपति सोमजी ने सिद्धाचल तीर्थ पर खरतरवसही (चौमुखजी की ट्रॅक) का निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया था, किन्तु दुर्भाग्यवश मन्दिर की प्रतिष्ठा कराने के पूर्व ही संघपति सोमजी का स्वर्गवास हो गया था ऐसी अवस्था में सोमजी के पुत्र संघपति रूपजी ने सं. १६७५ में खरतरगणनायक श्रीजिनराजसूरि के करकमलों से इस खरतरवसही की प्रतिष्ठा का कार्य बड़े महोत्सव के साथ सम्पन्न करवाया । दूसरी बात, खरतरगच्छीय पट्टावलियों के अनु- सार, इस प्रतिष्ठा महोत्सव के अतिरिक्त संघपति रूपजी के अन्य विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण कार्यों का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है । अतः इस काव्य की रचना का समय प्रतिष्ठा-महो- त्सव का समय सं. १६७५ के पश्चात् का ही माना जा सकता है । काव्य में वंशावली के अतिरिक्त जिन जिन ऐतिहासिक कार्यों का इसमें उल्लेख किया है, वे इस प्रकार हैं:- प्राग्वाटवंशीय श्रेष्ठि देवराज अहमदाबाद का निवासी था । इसने सं. १४८७ में माघ शुक्ला ५ को मुनिसुव्रतस्वामी के बिम्ब को प्रतिष्ठा खरतरगणाधीश श्रीजिनभद्रसूरि के करकमलों से करवाई थी। सं. योगी की प्रथम पत्नी जसमादे ने अहमदाबाद के तलीयापाडे में सुमतिनाथ का नवीन मन्दिर बनवाया था । सं. योगी की दूसरी पत्नी नानी काकी ने जैनशास्त्रों को प्रतिलिपियां करवाकर, स्वयं के नाम से अहमदाबाद में ज्ञानभण्डार स्थापित किया था। सं. सोमजी ने सं. १६४४ में युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि की अध्यक्षता में शत्रुञ्जयतीर्थ यात्रा का विशालतम संघ निकाला था । सं. सोमजी ने सं. १६४८ में हलारास्थान के बन्दियों को द्रव्य देकर कैदखाने से छुड़वाया था । सं. सोमजी ने अहमदाबाद के सामलपाडे में सांवला पार्श्वनाथ चैत्य का नवीन निर्माण करवाया । सं. सोमजी ने सूत्रधार धना की पोल में नीचे भूमितल पर आदिनाथ भगवान् का और ऊपर चतुर्मुख (चौमुखा) शान्तिनाथ का विशाल मन्दिर बनवाया और सं. १६५३ में युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि से इस मन्दिर की बडे महोत्सव के साथ प्रतिष्ठा करवाई थी। सं. सोमजीने. इस प्रकार आठ नये मन्दिरों का निर्माण करवाया और सिद्धान्त-टीका आदि सर्वशास्त्रों की प्रतिलिपियाँ करवाकर अहमदाबाद में ज्ञानभण्डार स्थापित किया एवं खरतरगच्छ की सर्वत्र उन्नति की । प्राप्त अपूर्ण प्रति स्वोपज्ञ टिप्पणी के साथ १४० पद्य ही प्राप्त है । प्रसादगुणयुक्त रचना में क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग भी श्रीवल्लभ बड़ी सरलता के साथ करता है । उदाहरण के लिये सं. शिवाजी के वर्णन पद्य द्रष्टव्य हैं १७ "शर्वत्ववश्य शिववान् स शश्वच्छिवोऽशिवान्याऽऽशु विशां शिवोव (?) यच्छ्रेयसो विश्वसितीह विश्वं, विश्वं यशो यस्य हि शंसतीति ॥६७॥ दोदोष्टि दुष्टेषु कदापि नो यस्तोतोष्टि शिष्टेषु जनेषु नित्यम् शेश्लेष्टयभीष्टान् विदुषोऽनगारान्, रोरोष्टि ना रुष्टजने शिवोऽध्यात् ॥६८॥" यह प्रशस्ति मेरे द्वारा सम्पादित होकर राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर से प्रका- शित हो चुकी है। ५. मातृकाश्लोकमाला इस लोकमाला की रचना वि. सं. १६५५ चैत्र मास में बीकानेर में हुई है। इसमें दो परिच्छेद हैं' । प्रथम परिच्छेद में २७ पद्य है, और दूसरे परिच्छेद में २६ पंद्य हैं । तथा अन्त में रचना प्रशस्ति में ६ पद्य हैं । प्रथम परिच्छेद में अ से झ तक २५ वर्णों में आदिनाथ से महावीरस्वामी तक के चौवीसों तीर्थङ्करों की स्तवात्मक वर्णना है और द्वितीय परिच्छेद में अ से लेकर क्ष तक २६ वर्गों में विष्णु, महेश, ब्रा, कार्तिकेय, गणेश, चन्द्र, कुबेर, इन्द्र, शेष, मुनिपति, यम, राम, लक्ष्मण, वन, समुद्र आदि भिन्न-भिन्न पदार्थों की वर्णना है । श्रीवल्लभ ने कुल ५१ वर्णों की वर्णमाला स्वीकार की है, स्वर १६ और व्यञ्जन.३५ । स्वरों में-अ. आ. इ. ई. उ. ऊ. ऋ. ऋ. ल. ल. ए. ऐ. ओ. औ. अं. अः, तथा व्यञ्जनों में--क. ख. ग. घ. ङ., च. छ. ज. झ. ञ, ट. ठ. ड. ढ. ण,त. थ. द...ध. न, प. फ. ब. भ. म, य. र. ल व, श. ष. स. ह. ल्ल और क्ष का समावेश किया है। वर्णमाला की प्रसिद्धि मातृका के नाम से प्रसिद्ध ही है । मातृकाक्षरों से सम्बन्धित रचना होने के कारण इसका नाम मातृकाश्लोकमाला रखा गया है । प्रत्येक मातृकाक्षर, प्रत्येक- श्लोक के प्रत्येक चरण (पाद) के प्रारम्भ में गुम्फित किया गया है। अर्थात् प्रत्येक में प्रत्येक वर्णमाला का ४ बार प्रयोग हुआ है । उदाहरण के लिये लवर्ण का प्रयोग देखिये:- लतकनतजनानां मङ्गलानि प्रदेया, लफिडकपटहारी सार्व चन्द्रप्रभ त्वम् । लतनययतिराज्या गीतविख्यातकीर्ति- लरिव विशदतेजाः केवलज्ञानभास्वान् ॥११॥ आशुता से काव्यकलाभ्यासी को प्रवीणता प्राप्त हो, यह इस रचना का उद्देश्य है । श्रीवल्लभ की प्रारम्भिक रचना होने पर भी इस कृति में प्रौढता, और काव्यगरिमा सर्वत्र लक्षित होती है । ५९ पद्यों की रचना में श्रीवल्लभ ने शार्दूलविक्रीडित, अनुष्टुप्, उपजाति, मालिनी, द्रुतविलम्बित, दोधक, स्वागता, हरिणप्लुता, वसन्ततिलका, हरिणी, इन्द्रवज्रा, आर्या, आदि अनेक छन्दों का प्रयोग किया है । इस श्लोकमाला की एकमात्र प्रति लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामन्दिर, अहमदाबाद में मुनि श्री पुण्यविजयजी संग्रह में ग्रन्थाङ्क २८८८ पर अंकित है । श्रीमद्विक्रमनगरे प्रवरे द्रव्याख्यसभ्यजनवृन्दैः । इपुशरषोडशसंख्ये वर्षे मासे च चैत्राख्ये ॥१॥ प्रशस्ति. १.
१८ । - . ६. चतुर्दशस्वरस्थापनवादस्थल इस वादस्थल में सारस्वतव्याकरण एवं पाणिनीयादि प्रमुख-प्रमुख व्याकरणों के आधार से चौदह स्वरों की स्थापना की गई है । किसी 'कृर्चालसरस्वतीविरुदं मन्यमान' प्रतिवादीने अनुभूतिस्वरूपाचार्यकृत सारस्वतव्याकरण के 'अ इ उ ऋ ल समानाः' और 'ए ऐ ओ औ सन्ध्यक्षराणि' सूत्रों के अनुसार स्वर नव ही है, स्थापना की । उसे श्रीवल्लभ ने पञ्च- विकल्पों की स्थापना कर, सारस्वत, पाणिनीयव्याकरण, कालाप, कातन्त्र, सिद्धहेमशब्दानुशा- सन, सिद्धान्तचन्द्रिका, पाणिनीयशिक्षा, आदि व्याकरण और अमरकोष, अनेकार्थसंग्रह, विश्वप्र- काश, हलायुध, वर्णनिघण्टु आदि कोष तथा नरपतिजयचर्यादि ज्योतिष् ग्रन्थों का आधार ले कर, सारस्वत व्याकरण की दृष्टि से ही ऋ और ल के दीर्घ का अभाव मानते हुए १४ स्वरों की स्थापना कर, प्रतिवादी के मत को निरस्त किया है । इसीलिये श्रीवल्लभ ने इस कृति का नाम भी चतुर्दशस्वरस्थापनवादस्थल रखा प्रतीत होता है । जैसा कि इसकी अवतरणिका से स्पष्ट है:- सन्ति स्वराः के कति च प्रतीताः, सारस्वतव्याकरणोक्तयुक्त्या । समस्तशास्त्रार्थविचारवेत्ता, कश्चित् विपश्चित् परिपृच्छतीति ॥२॥ पुरातनव्याकरणाद्यनेकग्रन्थानुसारेण सदादरेण । तदुत्तरं स्पष्टतया करोति, श्रीवल्लभः पाठक उत्सवाय ॥३॥ यह वाद किस प्रतिवादी के साथ हुआ ? कहाँ पर हुआ ? किसकी सभा में या अध्यक्षता में हुआ ? इस कृति से ज्ञात नहीं होता। यह रचना गच्छनायक श्रीजिनराजसूरि (श्रीजिनराजसूरीन्द्रे. धर्मराज्यं विधातरि' प्र.प. १) के धर्मराज्य में हुई है और इसमें कवि श्रीवल्लभ ने उपाध्यायपद का प्रयोग किया है । श्रीजिनराजसूरि को आचार्यपद सं. १६७४ में प्राप्त हुआ था । अतः इसका रचनाकाल १६७४ के पश्चात् का ही है । इसकी प्राचीन प्रति उपाध्याय श्री जयचन्द्रजीसंग्रह, शाखा कार्यालय राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान बीकानेर में उपलब्ध है । ७ ओकेशोपकेशपदद्वयदशार्थी लेखक ने इस कृति में अनेकार्थी दृष्टि से ओकेश और उपकेश बद के पांच-पांच अर्थ निरूपित किये हैं । इस कृति की रचना उपकेश गच्छीय आचार्य श्रीसिद्धसूरिके आग्रह से सं. १६५५ में बीकानेर में हुई है । इसकी अनेकों प्रतियां बीकानेर, जयपुर, कोटा, आदि भण्डारों में प्राप्त. हैं । ८ खरतरपदनवार्थी ओकेशोपकेशपदद्वयदशार्थी के समान ही इस कृति में 'खरतर' पद के लेखक ने नव अर्थ किये हैं । इसमें लेखक का नाम प्राप्त नहीं है । शैली की दृष्टि से इसे श्रीवल्लभ की कृति मान सकते हैं । यह कृति ओकेशोपकेशपदद्वयदशार्थी के साथ ही लिखी हुई प्राप्त होती है !
टीका ग्रन्थ--- १. शेषसंग्रहनाममाला दीपिका कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्रसूरिप्रणीत शेषसंग्रह नाममालां पर श्रीवल्लभ ने 'श्रवल्लभी' नामक दीपिका की रचना वि. सं. १६५४ भाद्रपद कृष्ण ८ को, महाराजा रायसिंहजी के राज्यकाल में बीकानेर में की है। संवतोल्लेखवाली रचनाओं में श्रीवल्लभ की यह सर्वप्रथम रचना है । प्रत्येक शब्द की व्युत्पत्ति, लिङ्गनिर्वचन और शब्दों के प्रयोग सिद्धहेमशब्दानुशासन, उणादिसूत्र, धातुपारायण, विश्वाकाश, शाश्वत, वैजयन्ती, मोला, इन्दु, वनमाला, अमर, वाचस्पति, भविष्योत्तरपुराण, विष्णुपुराण, मार्कण्डेयपुराण, मत्स्यपुराण, सङ्गीतरत्नावली आदि ४६ ग्रन्थों के उद्धरण देते हुये दीपिकाकार ने सफलता के साथ स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है । दीपिका में २० शब्दों के राजस्थानी रूप भी प्राप्त हैं । ग्रन्थपरिमाण १९०० श्लोक है । दीपिका प्रकाशन योग्य है । इसकी प्रतियाँ विनयसागर संग्रह कोटा क्रमाङ्क ७७७ और महिमाभक्तिज्ञानभण्डार बीकानेर, ग्रन्थाङ्क १६३५ में प्राप्त है। जिनानकोष के अनुसार इसकी एक प्रति विमलगच्छ उपाश्रय, अहमदाबाद में डाबडा नं. ४६ ग्रन्थाङ्क ३५. पर प्राप्त है । २. हैमनाममालाशिलोच्छदीपिका प्रस्तुत दीपिका का परिचय आगे द्रष्टव्य है । ३. हैमलिङ्गानुशासनदुर्गपदप्रबोध टीका श्रीहेमचन्द्रचार्यप्रणीत लिङ्गानुशासन · के स्वोपज्ञ विवरण पर 'दुर्गपदप्रबोध' नामक टीका की रचना श्रीवल्लभने आचार्य जिनचन्द्रसूरि एवं उनके · पट्टधर श्रीजिनसिंहसूरि के धर्मराज्य में विचरण करते हुये विः सं. १६६१ कार्तिक शुक्ला सप्तमी को जोधपुर में नृपति सूरसिंह के विजयराज्य में ९० से अधिक ग्रन्थों के उद्धरण देते हुये २००० ग्रन्थः परिमाण में की। वृत्ति की रचना मूल लिङ्गानुशासन पर नहीं की गई है ! इसमें 'विद्यते या शुभा वृत्ति- स्तस्य दुर्गार्थबोधदः' [प्र. प. १० से स्पष्ट है कि आचार्य हैमचन्द्र का ही जो लिङ्गानु- शासन पर स्वोपज्ञ विवरण है, उसमें जिन जिन स्थानों में दौगम्य या काठिन्य है उन ही स्थलों पर इसमें विवेचन किया गया है । इसिलिये इस व्याख्या का नाम. श्रीवल्लभने 'दुर्ग- पदप्रबोध' रखा है । १ वर्षे शतानन्दमुखेन्द्रियेशपुत्राननाब्जप्रमिते [१६५४] वरिष्ठे । अष्टम्यहे मासि नभस्यकृष्णे. श्रेष्ठे पुरे विक्रमनामधेये ।।२१।. शेषसंग्रहदीपिकाप्रशस्ति २ श्रीमद्योधपुरे द्रङ्गे सूरसिंहमहीपतौ । X X . भूमिषड्रपतुङ्गोशसंख्ये १६६१ वर्षे सुखाधिके । मासि कार्तिकिके कान्ते सुदिने सप्तमोदिने । ॥५-६॥ प्रशस्तिः ... X २० श्रीवल्लभने विवेच्य शब्दों का विवेचन और लिङ्गनिर्वचन, विशदता एवं प्रामाणिकता के साथ किया है । संस्कृत शब्दों का व्यवहार देश्य शब्दों में किस प्रकार होता है इसको दिखलाने के लिये श्रीवल्लभ ने प्रायः 'इति भाषा' 'लौकिके' कहकर १५०० शब्दों के लगभग राजस्थानी शब्द इस टीका में दिये हैं। यह टीका 'अमो सोम जैनग्रन्थमाला' बम्बई द्वारा सन् १९४ में प्रकाशित हो चुकी है । ४. हैमनिघण्टुशेपटीका यह टीका आगमप्रभाकर मुनिराज श्री पुण्यविजयजी द्वारा सुसम्पादित होकर लालभाई दलपतभाई. भारतीय संस्कृति विद्या मन्दिर, अहमदाबाद से सन् १९६८ में प्रकाशित हो चुकी है। श्रीवल्लभ ने अपनी अभिधानचिन्तामणि नाममाला की सारोद्धार टीका (र. सं. १६६८) में काण्ड ४ पद्य २०८ की व्याख्या करते हुये लिखा है: "रायणिनामानि श्रीहेमचन्द्राचार्यकृतहैमनिघण्टुशेषोक्तानि ज्ञेयानि । तद्यथा-राजादने तु राजन्या आदि । एतेषां व्युत्पत्तिस्तु अस्मत्कृतनिघण्टुशेपटीकातो ज्ञेया ॥' इस अवतरण से स्पष्ट है कि इस टीका की रचना सं. १६६७ के पूर्व ही श्रीवल्लभने कर दी थी। इस टोका में भी श्रीवल्लभने संस्कृत शब्दों के राजस्थानी रूप ६०० से भी अधिक दिये हैं। ५. अभिधानचिन्तामणिनाममालासारोद्धार टीका आचार्य हेमचन्द्रप्रणीत अभिधानंचिन्तामणिनाममाला पर श्रीवल्लभ ने सं. १६६७ में जोधपुर में, महाराजा श्री सूरसिंहजी के राज्यकाल में 'सारोद्धार' नामक विस्तृत टीका की रचना पूर्ण कीः- तथा योधपुरद्रङ्गे सूरसिंहनरेशितुः । राज्ये च वत्सरे सप्तपेष्टिपट्चन्द्रसम्मिते ॥७॥ सारोद्धारप्रशस्तिः यह टीका बहुत ही प्रौढ और विशाल है । इसमें टीकाकार ने शब्दों के पर्यायमात्र देने एवं प्रचलित शब्दों को साधनिका देने के चक्र में न फंसकर, विशिष्ट शब्दों की सिद्धि, व्युत्पत्ति, लिङ्गनिर्वचन तथा भूरिशः ग्रन्थों के उद्धरणों द्वारा टीका को स्पष्ट और सरस बनाने का प्रयत्न किया है । शाब्दिकसिद्धि और लिङ्गभेदादि के कारण शाब्दिक-प्रयोगों को ध्यान में रखते हुये, इस टीका में श्रीवल्लभने अन्य ग्रन्थों के विपुलता के साथ उद्धरण दिये हैं । व्याख्या में लगभग एक सौ सत्तर १७० ग्रन्थों के उद्धरण प्राप्त होते हैं । इस टीका में भी श्रीवल्लभ ने हैमलिङ्गानुशासन दुर्गपदप्रबोध एवं निघण्टुशेष टीका के समान ही 'इति भाषा' 'इति लोके' 'इति प्रसिद्धे' कहकर लगभग २५०० शब्दों के राज- स्थानी भाषा के रूप प्रदान किये हैं ।
२१
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इस टीका से श्रीवल्लभ की प्रौढ एवं बहुमुखी प्रतिभा, शब्द-व्युत्पत्ति-ज्ञान एवं
कोश, काव्यादि ग्रन्थों के विशाल ज्ञान का पूर्ण परिचय प्राप्त होता है । दुर्भाग्य है कि इस
प्रकार की महत्त्वपूर्ण टीका साहित्यजगत में अभी तक प्रकाश में नहीं आई है।
इस सारोद्धार में काण्ड ६ पद्म १७१ की व्याख्या में सम्वत् शब्द का उदाहरण देते
हुए 'सिद्धहेमकुमारसम्वत् ' का उल्लेख किया है जो ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्व का
है । इससे यह तो निश्चित है कि इस सिद्धहेमकुमारसम्वत् का नाम-प्रचलन १७ वी शती
के उत्तरार्द्ध तक अवश्य था । तदनन्तर तो सम्भवतः इस नाम का उल्लेख भी प्राप्त नहीं
होता ।
इस टीका को अनेकों प्रतियाँ बड़ा ज्ञानभण्डार बीकानेर, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रति-
ष्ठान जोधपुर, एवं शारदा कार्यालय बीकानेर आदि स्थानों पर प्राप्त हैं ।
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६. सिद्धहेमशब्दानुशासन टोका
आचार्य हेमचन्द्रप्रणीत सिद्धहेमशब्दानुशासन पर श्रीवल्लभ ने इस टीका की रचना की
है । इसकी एकसौ तैयालीस १४३ पत्रों की एक मात्र प्रति 'श्रीविजयधर्मलक्ष्मी-ज्ञानमन्दिर,
आगरा, में सुक्षित है । इस प्रति का मैं आज तक अवलोकन नहीं कर पाया
७. सारस्वतप्रयोगनिर्णय
नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें सारस्वत व्याकरणस्थ कतिपय शब्दों के प्रयोग को
निर्णय किया गया है । इसको रचना श्रीजिनराजसूरि के राज्य में (सं. १६७४-१६९०)
में हुई है । साहित्यरसिक श्री अगरचन्द्रजी नाहटा की सूचनानुसार इसकी २३ पत्रात्मक एक-
मात्र प्रति 'भावहर्षीय खरतरगच्छ ज्ञानभण्डार, बालोतरा' में थी । दुःख है कि बालोतरा का
ज्ञानभण्डार अस्त-व्यस्त होकर बिक चुका है ।
८. विदग्धमुखमण्डन टीका
श्री अगरचन्द्रजी हटा की सूचनानुसार इसकी एक अपूर्ण प्रति 'पारीक संस्कृत
पाठशाला. मेड़ता सीटी' में प्राप्त है ।
९. अजितनाथस्तुति टीका
खरतरगच्छीय महोपाध्याय जयसागरजी ने चतुःपद्यात्मक साधारणजिनस्तुति की रचना
की थी, जो कि यमकालङ्कारमय एवं स्रग्विणी छन्द में निबद्ध है । सं. १६६९ में जोधपुर
में महाराजा सूरसिंहजी के राज्यकाल में श्रीवल्लभोपाध्याय का किसी विद्वान् के साथ वाद-
विवाद (शास्त्रार्थ) हुआ था । उसी शास्त्रार्थ के प्रसङ्ग में श्रीवल्लभोपाध्याय ने पूर्वोक्त
साधारणजिनस्तुति का : मूलार्थ का (वास्तविक अर्थ का) परिहार करके इसे अजितनाथ
भगवान की स्तुति सिद्ध करते हुये भिन्न-भिन्न नवीनार्थों द्वारा व्याख्या-द्वय की रचना
की । जो कि टीका की आद्यन्त-प्रशस्ति से स्पष्ट है :-
[आदि
श्रीमन्तमजितं नुत्वा श्रीश्रीवल्लभवादिभिः ।
वास्तवार्थ परित्यज्य नवोनोऽर्थः प्रकाश्यते ॥१॥
२२ स्तुतेरजितनाथस्य द्वितीयस्य जिनेशितुः । यमकस्रग्विणीछन्दःकृताया जयसागरैः ॥२॥ सर्वतीर्थकृतामेषा साधारणा स्तुतिः खलु । तथाप्यजितनाथस्य ज्ञेया भिन्नार्थतो बुधैः ॥३॥ [अन्त] श्रीजिनेश्वरसूरीन्द्राद्यः ख्यातः शोभतेतराम् । नित्योत्कृष्टक्रियाचारो गच्छः खरतराभिधः ॥१॥ युगप्रधान आभाति जिनचन्द्रस्तदीश्वरः । अकव्वशिलेमाख्य-साहिदत्तघनादरः ॥२॥ तच्छिष्यः साम्प्रतं सम्यग् युवराज भुनक्त्य[पि । वादिद्विरदसिंहो यो जिनसिंहः स सूरिराट् ॥३॥ तयो राज्ये कृता वृत्तिः स्तुतेः श्रीअजितार्हतः । ज्ञानविमलपाठकशिष्यैः श्रीवल्लभाभिधैः ॥४॥ अत्र वृत्तौ वुधैज्ञेयं व्याख्याद्वयमनिन्दितम् । यदशुद्धं भवेत्तद्धि शोध्यं सम्यक्कृपापरैः ॥५॥ स्तुतिरेषा कृता श्रीमज्जयसागरपाठकैः । यमकस्रग्विणीछन्दोमयी साधारणाहताम् ॥६॥ केनाऽपि विदुपा सार्द्ध विवादादजितार्हतः । वर्णना वर्णिता त्यक्त्वा वास्तवार्थ यथामति ॥७॥ नवरसरसादित्यसंख्ये (१६६९) वर्षे सदासुरौ । श्रीमद्योधपुरे राज्ये सूरसिंहमहीपतेः ॥८॥ स्तुतिवृत्तिरियं शश्वद् वाच्यमाना कवीश्वरैः । नन्दताच्छारदादेवीप्रसादाज्जगतीतले ॥९॥ x x X जैनागम, व्याकरण, काव्य, कोष, निघण्टु आदि के लगभग ४० ग्रन्थों के उद्धरण देते हुए, स्तुति के प्रत्येक अक्षर एवं शब्दों के श्रीवल्लभ ने जो नवीन-नवीन अर्थों की कल्पना की है वह वस्तुतः अनुपम है और इन के प्रगाढ-पाण्डित्य की द्योतक है । इसकी एकमात्र ५. पत्रों की प्रति लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामन्दिर, अहमदाबादस्थ मुनि श्री पुण्यविजयजी संग्रह ग्रन्थाङ्क ५२५० पर सुरक्षित है । १०. शान्तिनाथ विपमार्थस्तुतिव्याख्या "वाराणं वरण रणं रणरणं वारारणं वीरणम्” शब्दालंकृत, शार्दूलविक्रीडित छन्द में ग्रथित, यमक-लेयगर्भित ४ पद्यों की यह साधारण जिनस्तुति है । इस स्तुति का कर्त्ता अज्ञात है। टीकाकार ने भी कर्ता के विषय में कोई संकेत नहीं दिया है । पूर्वोक्त अजितनाथ स्तुति की तरह ही इस · साधारणजिन स्तुति को श्रीवल्लभ ने अपनी वैदग्ध्य एवं चमत्कारपूर्ण शैली द्वारा शान्तिनाथ की स्थापना कर टीका की रचना की है । अजितनाथ स्तुति टीका की २३ :: शैली में श्रीवल्लभोपाध्याय की यह दूसरी · व्याख्या है । इसका रचनाकाल भी अनुमानतः वि. सं. १६६९ के आसपास का ही संभव है । एकाक्षरी-अनेकार्थी कोषों, अनेक व्याकरणों के उणादिसूत्रों और धानुपाठों के आधार से प्रत्येक शब्द के वैचित्र्यपूर्ण अर्थों का प्रतिपादन इस व्याख्या में किया गया है । इसकी १७वों शताब्दी की ही लिखित दो पत्रों की एकमात्र प्रति श्री अभय जैन ग्रन्थालय, बीकानेर में प्राप्त है। ११. 'केशाः कब्जालिकाशाभाः' पद्यस्य व्याख्या सरस्वतव्याकरणस्थ इस पद्य' की व्याख्या में श्रीवल्लभ ने ब्रहा विष्णु महेश के वर्ण, आयुध, वाहन और स्थान का अनेकार्थी दृष्टि से सुन्दर प्रतिपादन किया है और अनेक ग्रन्थों के उद्धरण देकर इसे सरल और सरस भी बनाया है । इसकी एकमात्र प्रति महिमाभक्ति जैन ज्ञानभण्डार (बड़ा भण्डार) बीकानेर, पोथी ७० ग्रन्थाङ्क १८९० में प्राप्त होती है । इसका आद्यन्त इस प्रकार है : [आदि सारस्वतस्य सूत्रे यत् केशा इति पदं स्फुटम् । तच्छूलोकटीकामाचष्टे श्रीश्रीवल्लभवाचकः ॥ .. कृतश्चायं श्रीज्ञानविमलमहोपाध्यायमिश्राणां शिष्य-वाचनाचार्यश्रीवल्लभगणिभिः स च शिष्यादिभिर्वाच्यमानश्चिरं नन्द्यात् श्रीशारदाप्रसादात् । इस टीका में रचना का संवतोल्लेख नहीं है । १२. 'खचरानन पश्य सखे खचरः' पद्यस्य अर्थत्रिकम् श्रीवल्लभ ने इस पद्य के भीम, प्रोषितभर्तृका और मङ्गलपाठक को आधार मानकर तीन अर्थ घटित किये हैं । रचना सुन्दर है । इसकी एकमात्र प्रति ला. द. भारतीय संस्कृति. विद्यामन्दिर, अहमदाबाद में . मुनि पुण्यविजयजी संग्रह में ग्रन्थाङ्क २६९७ पर प्राप्त है । भाषा की लघृकृतियाँ- १. चतुर्दशगुणस्थान स्वाध्याय यह स्वाध्याय (सज्झाय) भाषा में गुम्फित है । इसमें १४. गुणस्थानों का क्रमशः वर्णन है । इसके २३ पद्य हैं । यह श्रीवल्लभ की मुनि अवस्था की. प्रारम्भिक कृतियों में से है १ केशाः कालिकाशाभाः करकारि पनाकभाः । विविगोगतयो दद्युः शं वोऽब्जाम्युनगौकसः ॥१।। २ खचरानन पश्य सखेऽखचरः खचराङ्कितपत्रशतः खेचरः । खचरागमने रटते खचरं, नची परिरोदिति हा. खचर ! ॥१॥ .. - ..
२४ २. स्थूलिभद्र एकत्रीसो यह ३१ पद्यात्मक भाषा कृति श्रीसाराभाई मणिलाल नवाब के संग्रह में सं. १६५८ में श्रीमहिमासागरलिखित गुटके में प्राप्त हैं । प्रस्तुत ग्रन्थ प्रस्तुत हैमनाममालाशिलोञ्छ-दीपिका (टीका) की रचना के सन्दर्भ में श्रीवल्लभो- पाध्याय ने प्रशस्ति में लिखा है :- "सुरत्राण अकबर प्रतिबोधक एवं अकबर से प्राप्त युगप्रधान पदधारक श्रीजिनचन्द्रसूरि के धर्मराज्य में तथा सम्राट् अकबर के समक्ष ही स्वकरकमलों से स्वपद पर स्थापित श्रीजिनसिंहसूरि के युवराज-धर्मसाम्राज्य में, वि. सं. १६५४ चैत्र कृष्णा सप्तमी को नागपुर (नागोर) में मैंने इस व्याख्या की रचना पूर्ण की है। अर्वाचीन विद्वान् द्वारा निर्मित इस व्याख्या को विद्व. त्गण उपेक्षा की दृष्टि से न देखें, क्योंकि मैंने हैमव्याकरण, हैमोणादि आदि व्याकरण ग्रन्थ और नामकोषों को देखकर, गहन विमर्ष कर, पूज्यों का आशीर्वाद प्राप्त कर इस व्याख्या की रचना की है।" संवतोल्लेखवाली रचनाओंमें श्रीवल्लभ की यह दूसरी रचना है। इस व्याख्या में टीका- कार श्रीवल्लभोपाध्याय का व्याकरण और कोष साहित्य पर एकाधिपत्य, विशाल एवं गहन अध्ययन, प्रौढपाण्डित्य एवं वैचारिकी गरिमा का दर्शन स्थान-स्थान पर प्राप्त होता है । इस व्याख्या की विशेषतायें निम्नाङ्कित हैं:- १. प्रत्येक शब्द की व्युत्पत्ति धातुपाठ और व्याकरण-सूत्रों द्वारा प्रदान की है । २. सिद्धहेमशब्दानुशासन, इसीका उणादि और धातुपाठ का समस्त स्थलों पर उपयोग किया है और कतिपय स्थलों पर पाणिनीय चान्द्र और इन्द्रादि व्याकरणों का भी प्रयोग किया है । शब्द-साधन में मतान्तर होने पर अन्य आचार्यों के विचारों को भी ग्रहण किया है। ३. लिङ्ग-निर्वचन और शब्द-प्रयोग की उपयोगिता को ध्यान में रखकर, अनेक नामकोष, निघण्टु, आयुर्वेद सूदशास्त्र, धर्मशास्त्र एवं व्याकरण आदि के :४५ ग्रन्थ तथा ग्रन्थकारों के अभिमत उद्धृत कर अपने मन्तव्य को पुष्ट किया है, इससे इस व्याख्या की प्राञ्जलता दीप्तिमान हो उठी है । (ग्रन्थ एवं ग्रन्थकारों के नाम परिशिष्ट में द्रष्टव्य हैं) ४. उद्धृत ग्रन्थों में विक्रमादित्यकोष (पृष्ट-३). इन्द्र (पृष्ठ-६३) एवं चन्द्र (पृ.-६३) प्रणीत कोपो के उद्धरण मिलते हैं । ये तीनों कोष सम्भवतः आज प्राप्त नहीं हैं । ५. मूलगत शब्दों की व्याख्या के साथ ही आचार्य हेमचन्द्रप्रणीत अभिधानचिन्ता- मणिनाममाला और शेपसंग्रहनाममाला में आगत शाब्दिक पर्यायों को छोड़कर, १७ वीं शती के प्रचलित शब्दों के सहस्राधिक नवीन पर्याय दिये हैं । इन नवीन शब्द-पर्यायों में अनेकों ऐसे शब्द हैं जिनका साहित्य में प्रयोग कदाचित् ही देखने में आता. १ देखें पृ. २२, २९, ५३, ७१ २. देखें, पृ. ६४ ३. देखें, पृ. ३८ १. देखें, पृ. ४६, ५२, ५४, ६० आदि है ।
२५ व्याख्या में कतिपय स्थल चिन्तनीय भी हैं, जैसे 'घर" शब्द की व्युत्पत्ति । घर शब्द 'हन् हिंसागत्योः' हन् धातु से बनाया है । धात्वर्थ हिंसा और गतिसे घर को तालमेल ही नहीं बैठता है । अतः यह व्युत्पत्ति विद्वच्चिन्त्य अवश्य है । ऐसे ही "हनेरन् घ च" यह पाणिनीय सूत्र भी चिन्तनीय एवं शोधनीय है । वर्तमान में यह सूत्र पाणिनीय-व्याकरण में प्राप्त नहीं है । यह सूत्र किसी अन्य व्याकरण का हो और टीकाकार को स्मरण पाणिनीय का रहा हो ! क्योंकि विचरणशील जैन मुनियों के लिए उस समय सन्दर्भ पुस्तकों की इतनी सुविधा ही कहां थी । अस्तु. प्रतिपरिचय. प्रस्तुत सम्पादन में टीका को तीन प्रतियों का और मूलं की तीन हस्तलिखित प्रतियों का उपयोग किया गया है । टीका की हस्त-प्रतियों का विवरण इस प्रकार है:- १ प्रा०-यह प्रति राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, शाखा कार्यालय बीकानेर में, उपाध्याय जयचन्द्रजी गणि के संग्रह की हैं । ग्रन्थाङ्क ६५० है । साइज २५४१० सेन्टी- मीटर है। पत्र संख्या २६ है और पंक्ति १७ एवं प्रतिपंक्ति अक्षर ५० है । प्रान्त में लेखन-पुष्पिकों दी हुई है:- "सम्वत् १६५५ वर्षे श्रीमद् बृहत्खरतरगच्छे युगप्रधानभट्टारकप्रभुश्रीमच्छ्री- जिनचन्द्रसरिराजशिष्यवाचनाचार्यधुर्यश्रीधर्मनिधानगणिमिश्राणां शिष्यप्रशिष्यप्रतिशिष्या- ध्ययनार्थ श्रीज्ञानविमलोपाध्यायैः श्रीशिलोञ्छनाममालावृत्तिरियं प्रदत्ता वाच्यमाना चिरं नन्दतु ॥ अर्थात् टीका की रचना के एक वर्ष पश्चात् सं. १६५५ में टीकाकार के गुरु श्री शानविमलोपाध्याय ने खरतरगच्छाधीश युगप्रधान श्रीजिनचन्द्रसूरि के शिष्य वाचनाचार्य श्री धर्मनिधानगणि को उनके शिष्य, प्रशिष्य एवं प्रतिशिष्यों के अध्ययनार्थ. शिलोञ्छनाममाला टीका की प्रति प्रदान की । यह प्रति सुवाच्य अक्षरों में लिखी हुई है । शुद्ध है एवं स्वयं टीकाकार श्रीवल्लभ द्वारा संशोधित है. । प्रति के किनारे कीटविद्ध होने के कारणं हाँसियों पर लिखे हुए कति- . पय अक्षर नष्ट हो गये हैं । यह प्रति भी राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान शाखा कार्यालय बीकानेर में उपाध्याय श्रीजयचन्द्रजी गणि के संग्रह की ही है । ग्रन्थाङ्क ६५१ है । मोप २६४११ से. मी. है । पत्र २६ हैं । और पंक्ति १६ तथा अक्षर ५ ० हैं । प्रान्त में लेखक-प्रशस्ति नहीं हैं, फिर भी अनुमानतः इसका लेखनकाले १७वीं शती का अन्तिम चरणं अथवा १८ वों शती का प्रथम चरण तो निश्चित ही हैं । पूक्ति प्राः संज्ञक प्रति की ही शुद्ध प्रतिलिपि प्रतीत होती है । दोनों प्रतियों में सामान्यतः कोई अन्तर नहीं हैं । १. देखें, पृ, ५३, २., पृ ५३, .' . २. ज० २६ ३. जे०--यह प्रति श्री जेठीबाई जैन ज्ञानशाला, बीकानेर के संग्रह की है । प्रति का माप २६४१०.५ से. मी. है । पत्र संख्या २६, पंक्तिसंख्या १७ एवं अक्षर ४८ हैं । प्रान्त पुष्पिका न होते हुये भी टीका रचनाकाल सं१६५४ के लगभग ही लिखित एवं स्वयं श्री- वल्लभद्वारा परिमार्जित शुद्धतम प्रति प्रतीत होती है । प्रा. और जे. संज्ञक प्रतियों में ङ और ड, तथा ऋ और ऋके अक्षर-न्यास में साम्य होने से अन्तर प्रतीत नहीं होता । सम्पादन-शैली में मैंने प्रा० संज्ञक प्रति को आदर्श रूप में रखा है और जे० . तथा ज० संज्ञक दोनों प्रतियों के पाठान्तर टिप्पणी में दिये हैं। प्रा० संज्ञक को मूल रूप में रखते हुये भी जो शब्द अथवा सम्बन्धित पाठ का अंश प्रा. प्रति में उपलब्ध न होने पर, जे० प्रति का अंश मूल पाठ में ही दे दिया है और टिप्पणी में उल्लेख कर दिया है कि यह शब्द या अंश प्रा० प्रति में उपलब्ध नहीं होता । टीकाकार ने प्रत्येक श्लोक की टीका न करते हुए प्रत्येक शब्द के पर्यायों को पृथक् देकर उनकी टीका की है । टीका के साथ जो मूल का अंश है वह टीकाकार के द्वारा समर्थित पाठ है । अत एव मूल-पाठ के पाठान्तर मैंने चतुर्थ परिशिष्ट में प्रदान किये हैं.। मूल-पाठ के पाठान्तरों के लिये मैंने तीन हस्त प्रतियों का उपयोग किया हैं, जिसका विवरण इस प्रकार है:- १. पु.- श्रीलालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामन्दिर अहमदाबादस्थ मुनि श्री पुण्यविजयजी के संग्रह की प्रति है । क्रमाङ्क ५१५९ है । माप २६४१०.५ से. मी. हैं। पत्रं ३, पंक्ति १४ 'अक्षर ४९ हैं । लेखनकाल अनुमानतः १६ वीं शती का अन्तिम चरण या १७ वीं का प्रथम चरण है । २. अ.--राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के संग्रह की है । ग्रन्थाङ्क ५९५० है । माप २५.५४१०:८ से. मी. है । पत्र ३. पंक्ति १७ और अक्षर ४७ है । लेख- नप्रशस्ति निम्नाङ्कित है:- "लिखितो वाचनाचार्यतिलककुशलगणिभिः स्वसंविदे ॥ श्री ॥ संवद्वाणयुगरस- चन्द्रतमे वर्षे ।। [ १६२५ ] ३. आ.-यह प्रति भी राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर के संग्रह की है । ग्रन्थाङ्क ८४४३ (२) है माप २६४१०.३ से. मी. है । पत्र संख्या ६ से १० है और पंक्ति १५ तथा अक्षर ४४. हैं । लेखनकाल अनुमानतः १८वीं शताब्दी है । वस्तुतः मूल की तीनों ही प्रतियां शुद्धतम नहीं कही. जा सकती। अतः अनुस्वारादि के पाठभेद न देकर अन्य पाठभेद ही दिये हैं । प्रथम परिशिष्ट में शब्दानुक्रमणिका दी है । इसमें शब्द के आगे दी. शब्दाकिंत शब्द टीका में प्रयुक्त नवीन शब्दों के सूचक है । द्वितीय परिशिष्ट में टीका में उद्धृत ग्रन्थान्तरों के पद्यांश दिये हैं । तृतीय परिशिष्ट में टीकाकारोल्लिखित ग्रन्थ एवं ग्रन्थकारों के नाम प्रदान किये है । चतुर्थ परिशिष्ट में मूलपाठ के पाठान्तर हैं । " - प्रस्तुत टीका में श्रीवल्लभोपाध्याय ने शब्दसाधनिका में समग्र स्थानों पर सिद्धहेमश- ब्दानुशासन के ही सूत्र दिये हैं। अतः उन सूत्रों के आगे मैंने कोष्ठक में सिद्धहेम का उल्लेख न कर केवल अध्याय, पाद और सूत्रांक ही दिये हैं । एवं उणादिसूत्रों के लिए कोष्ठक में() उ० और सूत्रांक दिये हैं । अन्य ग्रन्थों के उद्धरणों में भी मैंने यथाशक्य कोष्ठक में सूत्रांक या पद्यांक देने का प्रयत्न किया है। श्री ला. द० भारतीय संस्कृति विद्यामन्दिर, अहमदाबाद के निदेशक श्रीदलसुखभाई मालवणिया ने उक्त संस्था की प्रकाशन योजना में इस ग्रन्थ को स्वीकार कर और प्रकाशन कर मुझे जो सम्पादन का अवसर प्रदान किया है इसके लिये मैं उनका कृतज्ञ हूँ। राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर के अधिकारी गण और श्री अगरचन्द्रजी नाहटा बीकानेर भी धन्यवाद के पात्र हैं जिनके सौजन्य से सम्पादन के लिये मैं हस्तप्रतियां प्राप्त कर सका । म. विनयसागर अक्षय तृतीया, सं० २०३० ५ मई सन् १९७३ कोटा 1
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आचार्यश्रोजिनदेवसूरिविरचितः हेमनाममालाशिलोञ्छः वाचनाचार्यश्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मितया 'दीपिका'टीकया सवलितः । प्रथमो देवाधिदेवकाण्डः ऐ नमः। श्रीगुरुभ्यो नमः । श्रीमच्छ्रीफलवद्धिकाभिधपुरीनारीवरोरःस्थली- राजद्धारनिभं प्रणुत्य सततं श्रीपार्श्वनाथं जिनम् । यः शास्त्रेष्वखिलेषु पण्डितजनस्याविष्करोति स्फुट, ज्ञानं भानुरि प्रहत्य च तमः सर्वेषु सत्कर्मसु ॥ १ ॥ कुर्वाणा वरशब्दशास्त्रकठिनप्रज्ञानधाराधरै- रज्ञानोद्धुरदाववह्निशमनं या देवता राजते । तस्याः पादयुगं प्रणम्य च गुरून् वक्ष्ये शिलोच्छाभिधे, ग्रन्थे वृत्तिमहं विलोक्य विदितां ग्रन्थावली भूरिशः ॥२॥ तत्र प्रथममनेककोविदवन्दारुप्रवरनरवृन्दवन्दितपादारविन्दविलसद्वाग्युक्तिव्यक्ति- शक्तिविजितसमस्तप्रशस्तग्रन्थपरमार्थसमर्थावगतपदार्थसार्थश्रीमत्पुरन्दरसूरयस्तर्कव्याकरण- साहित्यालङ्कारच्छन्दोज्योतिषनाटकपेटकप्रमुखानेकग्रन्थकोट्यम्भोनिधयः श्रीमवृद्ध- तरखरतरगच्छालङ्कारस्फारहारप्रकारसारश्रीजिनप्रभसूरिशिष्यमुख्यश्रीजिनदेवसूरयः, श्रीपूर्णतल्लगच्छगगनाङ्गणदिनमणिप्रगुणगुणगणमणिप्रवरार्णवोपमानश्रीदेवचन्द्रसूरिविने- यसद्भागधेयमहिमामयसकललोकव्यापिनिर्मलकलामण्डलचन्द्रमःप्रतिमकी[च्चयश्रीहेम- चन्द्राचार्यविरचिताऽभिधानचिन्तामणिनाममालाशिलोग्छ कर्तुमिच्छवः स्वच्छा- तुच्छशेमुषीमन्मनीषिसमयपरिपालनायाऽविध्नेन प्रारिप्सितग्रन्थसमाप्तिविधानाय विशिष्टशिष्टाभीष्टदेवतानमस्कारपुरस्सरं मङ्गलमाचरन्ति । तद् यथा- १. जे. भानुरिवापहृत्य । २. जे. स्वच्छशेमुषी । ३. जे. विशिष्टाभीष्ट । च . २ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता . अहं बीजं नमस्कृत्य गुरूणामुपदेशतः । श्रीहैमनाममालायाः शिलोग्छः क्रियते मया ॥१॥ व्याख्या- 'मया' श्रीजिनप्रभसूरिचरणारविन्दचञ्चरीकेण श्रीजिनदेव- सूरिणा 'शिलोञ्छः क्रियते' । शिलोञ्छः इति कोऽर्थः । उच्यते- “शिलत् उञ्छे" शिल्यते शिलम् कणिशादिकम्, श्रीहेमचन्द्राचार्यकृताऽभिधानचिन्तामणिनाम- मालावृत्त्यवस्थितशब्दजातलक्षणम्, तस्य उञ्छनम्-चुण्टनम्' शिलोञ्छः । यद् वा, शिलोञ्छ:-कणिशादिचुण्टनम्, ततो विवक्षितग्रन्थोऽपि शिलोञ्छ इव शिलोञ्छः । क्रियते-विधीयत इत्यर्थः । कस्याः ? इत्याह-'श्रीहैमनाममालायाः' हेम इति "ते लग् वा" [३।२।१०८] इत्यनेन उत्तरपदस्य लोपे हेमचन्द्रः, यथा 'देवो देवदत्तः' 'सत्या सत्यभामा' इत्यादिवत् । तेन हेमेन हेमचन्द्राचार्येण प्रोक्ता हैमी "तेन प्रोक्ते" [ ६।३।१८१ ] इति अण, नाम्नां माला नाममाला । हैमी चासौ नाममाला च हैमनाममाला । "पुंवत् कर्मधारये" [ ३।२।५७ ] इति पुंवद्भावः । श्रिया युक्ता .. प्रधाना वा हैमनाममाला श्रीहैमनाममाला, तस्याः श्रीहैमनाममालायाः, श्रीहेमचन्द्रा- चार्यविरचिताऽभिधानचिन्तामणिनाममालाया इत्यर्थः । किं कृत्वा ? 'नमस्कृत्य' नम- स्कारं विधाय इत्यर्थः । किम् ? 'अहम्' अर्हति चतुःषष्टिविशिष्टसुरेश्वरकृतां पूजाम् इति अहम् । “अः" [ उ.२ ] इति अ प्रत्ययः । पृषोदरादित्वात् सानु- नासिकत्वम् । अर्हम् इति मन्तो निपातोऽप्यस्ति । ननु अर्हम् इति अव्ययम् स्वरादौ चादौ च न दृष्टम् तत् कथमव्ययम् ? सत्यम्, "इयन्त इति संख्यानं निपातानां न विद्यते । प्रयोजनवशादेते निपात्यन्ते पदे पदे ॥” इति । किंविशिष्टम् अहम् ? 'बीजम्' सिद्धचक्रस्य पञ्च वीजानि तेषु मध्ये च इदम् आदिवीजम् इत्यर्थः । यद् वा, “वीं 'प्रजननकान्तिअसनखादनेषु च" वेति जनयति सुखं ध्यातम् सत् इति, प्रारिप्सितग्रन्थसमाप्तिं वा इति वीजम् । “वियो ज" [ उ.१२७ ] इति जक् प्रत्ययः । इदं हि शास्त्रादौ पठितम् सद् अविघ्नेन शास्त्रसमाप्ति विदधाति, अत एवायमर्थः । यद् वा, इह शास्त्रे श्रीमज्जिनदेव- सूरिभिः समग्रदर्शनानुयायी नमस्कारो विदधे । तथाहि- "अकारेणोच्यते विष्णू रेफे ब्रह्मा व्यवस्थितः । हकारेण हरः प्रोक्तस्तदन्ते परमं पदम् ॥" १. जे. चुटनम् । २. ने. कणिशादिचुटनम् । ३. जे. ज. प्रजनकान्त्यसमखादनेषु ।
हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका m. इति श्लोकेन 'अहम्'शब्दस्य विष्णुप्रभृतिदेवतात्रयाभिधायित्वेन लौकिकागमेष्वपि अर्हम् इति पदं उपनिषद्भूतम् इत्यावेदितं भवति । तदन्ते परमं पदम्' इति तुर्य पादस्य अयमर्थः--तस्य अर्हम् शब्दस्य अन्ते उपरितनप्रदेशे, पदम्-सिद्धि- शिलारूपम् , तदाकारत्वात् अनुनासिकरूपा कलाऽपि परमं पदम् इत्युक्तम् । कस्मात् मया शिलोञ्छः क्रियते ? इत्याह-'गुरूणाम्' गृणन्ति उपदिशन्ति अनेकशास्त्रतत्त्वम् इति गुरवः, "कगृऋत उर् च" [उ.७३४] इति कित् उः । तेषां गुरूणाम् श्रीमच्छ्रो- जिनप्रभसूरिसूरीश्वराणाम् 'उपदेशतः' उपदेशनम् उपदेशः अनुज्ञा तस्मात् उप- देशतः-आदेशात् इत्यर्थः । इति प्रथमश्लोकार्थः ॥ १ ॥ अथ तावदादौ देवाधिदेवकाण्डस्य शिलोञ्छमाह- सर्वीय इत्यपि जिने :. सर्वेभ्यः प्राणिभ्यो हितः सर्वीयः, "तस्मै हिते". [७१।३५] इति हितेऽर्थे उपकारकेऽर्थे ईयः प्रत्ययः । जयति रागद्वेषमोहान् इति जिनः, "जीण- शीदीवुध्यविमीभ्यः कित्" [ उ.२६१ ] इति किद् नः प्रत्ययः, तत्र । विधाः वेधाश्च सान्तौ इमौ । "तृजिभूवदि" [ उ. २२१ ] इति बहुवचनाद् टित् अन्त प्रत्यये अर्हन्तोऽपि । " अर्हन्तः क्षपणको जिनः " इति विक्रमादित्यकोषः । शम्भवे सम्भवोऽपि च शम्-सुखम् भवति अस्मिन् स्तुते इति शम्भवः, तत्र । गर्भगतेऽप्यस्मिन्नभ्यधिक- विविधसस्यसम्भवात् सम्भवः । समन्ताद् भवः श्रेयो अस्माद् अस्मिन् स्तुते इति वा सम्भवः । सम्भवति सुखम् अस्माद् वा । “अच्" [५।११४९] इति अच् । श्रीसुव्रते मुनिरपि शोभनानि व्रतानि अस्येति सुव्रतः । यद् वा, अस्मिन् गर्भस्थिते जननी सुव्रता जातेति सुनतः । श्रिया-सकलत्रिभुवनजनमनश्चमत्कारकारिमनोहारिपरमार्हन्त्य- महामहिमविस्तारिस्पष्टाष्टप्रातिहार्यशोभया चतुस्त्रिंशदतिशयविभूत्या वा - समन्वितः सुव्रतः श्रीसुव्रतः, तत्र श्रीसुव्रते-मुनिसुव्रततीर्थकरनाम्नि । “मनिच् ज्ञाने" मन्यते जगतस्त्रिकालाऽवस्थाम् इति मुनिः । “मनेरुदेतौ चास्य वा" [ उ.६१२ ] इति इ प्रत्यय उपान्त्यस्य च उत्वम् । मुनिसुव्रतैकदेशो वा मुनिः । 'भीमो भीमसेन' इति न्यायात् । नेमौ नेमीत्यपीष्यते ॥ २॥ - श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता -- - .. धर्मचक्रस्य नेमिवद् नेमिः, नयति सुखम् भक्तजनानाम् इति वा नेमिः । "नीसावृयुशवलिदलिभ्यो मिः" [उ.६८७] इति मिः । नेमिः नेमिनाथो जिनः, तत्र । नेमः-संयमरूपा मर्यादा सः अस्यास्तीति नेमी । नीयते श्रेयोऽनेनेति वा नेमी' । "बहु- लम्" [ ५।१।२ ] इति वचनाद् मिन् । यथा- "वन्दे सुव्रतनेमिनी ।" [ .] इति । तथा--- "इदं किल महातीर्थं श्रीनेम्येतस्य नायकः ।" [ ] ॥२॥ षष्ठे गणेशे मण्डितपुत्रोऽपि कथितो बुधैः । षष्ठे गणेशे पण्णाम् संख्यापूरणे, गणाधिपे मण्डितनाम्नि । मण्डितस्य- मण्डितनाम्नः पितुः पुत्रो मण्डितपुत्रः वसिष्ठगोत्रीयः । कथितः-प्रोक्तः, बुधैः विद्वद्भिः । मरुदेव्यपि विज्ञेया युगादिजिनमातरि ॥ ३ ॥ मरुद्भिः-देवैः दीव्यते-स्तूयते मरुदेवी । पृपोदरादित्वात् तलोपः। “नवा शोणादेः" [२।४।३१] इति विकल्पेन ङीः । विज्ञेया-ज्ञातव्या । युगादिजि- नस्य-श्रीआदिनाथतीर्थकरस्य माता-जननी युगादिजिनमाता, तस्यां युगादिजिन- मातरि ॥ ३ ॥ चक्रेश्वर्यामप्रतिचक्राऽपि चक्रस्य ईश्वरी चक्रेश्वरी श्रीआदीश्वरजिनस्योपासिका, तस्याम् विद्यते प्रति अनुरूपम्-समानं चक्रम् यस्याः सा अप्रतिचक्रा । अजिता च कविभिरजितवला । बलेन न जितेति अजितबला । राजदन्तादित्वात् पूर्वनिपातः । अजितवलैक- देशे अजिता, 'भामा सत्यभामा' 'सेनो भीमसेन' इति न्यायात् । न जीयते स्म केना- पीति वा अजिता । कविभिः-विद्वद्भिरुक्ता इति शेषः । द्वितीयश्रीअजितनाथजिनस्यो- पासिका, तन्नाम । श्यामा त्वच्युतदेव्यपि श्यामा श्यामवर्णत्वात् , “श्य गतौ" श्यायते स्वामिभक्तिम् इति वा श्यामा । "विलिभिलिसिधीन्धि" [उ. ३४०] इति किद् मः । न च्यवते अच्युता । दीव्यते- स्तूयते दीव्यति वा जिनम् इति देवी । अच्युता चासौ देवी च अच्युतदेवी । “पुंवत् कर्मधारये" [ ३।२५७ ] इति पुंवद्भावः । श्रीपद्मप्रभजिनोपासिका तन्नाम । १. जे. ज. 'नेमी नास्ति । २. जे. 'मण्डितस्य' नास्ति । न - हैमनाममालाशिलोग्छदीपिका .. सुतारकोक्ता सुताराऽपि ॥४॥ शोभना तारका अस्याः सुतारका । सुतराम् तरति वा । "तारका-वर्णका [ २ । ४ । ११३] इति निपातनाद् णके इत्वाभावः । शोभना तारा अस्याः सुतारा। सुतराम् तारयति भक्तान् विघ्नादिभ्य इति वा । श्रीसुविधिनाथजिनोपासिका तन्नाम ॥४॥ भद्रकृत तीर्थकृद' भद्रः भद्रम् मङ्गलम् करोति भद्रकृत्, क्विम् । स चासौ तीर्थकृच्च भद्रकृत् तीर्थकृत् । आगाम्युत्सपिण्याम् चतुर्विंशस्तीर्थकरः' तन्नाम । भद्रहेतुत्वात् भद्रः । भद्रम् अस्या- स्तीति वा भद्रः । अभ्रादित्वाद् अः। भद्रकर इत्यपि । श्रमणः श्रवणोऽपि च । श्राम्यति महातपसां करणाद् इति श्रमणः । "नन्द्यादिभ्योऽनः" [ ५ । १ । ५२] इति अनः । श्रृंट् श्रवणे" “गतौ" इति अन्ये । श्रूयते सर्वलोकानामत्यन्तमान्य- त्वेन इति श्रवणः । “तृकशपभृक्श्रुरुरुहि" [उ.१८७] इति अणः । साधन्त-साध- यन्तौ अपि । भद्रे भन्द्रमपि प्राहुः प्रशस्तमपि कोविदाः ॥५॥ "भदुङ् सुखकल्याणयोः" भन्दते भद्रम्, "भन्देर्वा" [उ.३९१] इति रः न- लुक च विकल्पेन, नलोपाभावे भन्द्रम् । “शंसू स्तुतौ च” प्रशस्यते प्रस्तूयते जनैरिति प्रशस्तम् । क्त्वि वेट्त्वात् क्तयोर्नेट् । शस्तम् अपि । कोविदाः-पण्डिताः प्राहुः- कथितवन्तः । भावित्रम्, सुविदत्रम्, अगः सकारान्तोऽयम्, शुभ्रिः, मयश्च सन्तोऽयम् । यदत्र मौलाभिधानचिन्तामणिनाममालाक्रमव्यत्ययकरणम्, तत्र ग्रन्थकर्तुर्विवक्षा- भाव एव हेतुरिति । एवमग्रेऽपि यथास्थानमवसेयमिति ॥५॥ प्रव्रजनं परिव्रज्या प्रव्रजनम्-प्रव्रज्या दीक्षा । परि समन्ताद् व्रजनम्-संसाराद् गमनमिति परि- व्रज्या । उभयत्र “आस्यटिव्रज्यजः क्यप्" [५।३।९७ ] इति क्यप् प्रत्ययः । शिष्योऽन्तिपदपि स्मृतः । शासनीयः शिष्यः । "दृवृग्स्तुजुषेतिशासः" [ ५।११४० ] इति क्यपि, "इसासः शासः" [ ४।४।११८ ] इति इस आदेशः । अन्तिके-गुरूणाम् समीपे सीदति-तिष्ठतीति अन्तिषद् । अत्र सदि धातौ क्विवन्ते । “वाऽन्तमान्तितमान्ति- १. जे. तीर्थङ्करः २. जे. सान्तोऽयम् । ३. प्र. ज. प्रत्योः 'मौलाभिधानचिन्तामणिनाम- मालानामपाठक्रमापेक्षया नामपाठक्रमव्यत्ययकरणम्' इति पाठान्तरम् ।
६ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता " तोन्तियान्तिपत्" [७।४।३१ ] इति कलोपः, सस्य पत्वम् च । पक्षे अन्तिकसद् अपि स्मृतः-कथित इत्यर्थः । दमाहक-माणवौ अपि । इति प्रथमकाण्डस्य शिलोब्छोऽयं समर्थितः ॥६॥ इति अमुना प्रकारेण प्रथमकाण्डस्य श्रीहेमनाममालायाः प्रथमप्रक्रमस्य अयमसौ प्रत्यक्षः शिलोञ्छः समर्थितः-प्रकटित इत्यर्थः ॥६॥ इति श्रीमदवृहत्खरतरगच्छीययोजयसागरमहोपाध्यायसन्तानीय-वाचनाचार्य- श्रीभानुमेरुगणिशिष्यमुख्यश्रीज्ञानविमलोपाध्यायविनेयवाचनाचार्य- श्रीवल्लभगणिविराचेतायां श्रीहमनाममालाशिलोग्छ- टीकायां प्रथमदेवाधिदेवकाण्डस्य शिलोञ्छः समाप्तः। -- ..
द्वितीयो देवकाण्डः। अथ द्वितीयदेवकाण्डस्य शिलोञ्छो विप्रियते- व्योमयानमपि प्रोक्तं विमानं बुधपुङ्गवः । व्योम्नि-आकाशे यानम्-गमनमस्य व्योमयानम् । व्योम्नि-विहायसि यान्ति- व्रजन्ति अनेन वा । पुंक्लीबलिङ्गः । विमान्ति वर्तन्तेऽस्मिन् देवा इति विमानम् । पुंक्लीवलिङ्गः । बुधपुङ्गवैः-पण्डितप्रकाण्डैः प्रोक्तम्--निगदितमिति । स्यात्समुद्रनवनीतं पेयूषमपि चामृतम् ॥७॥ समुद्रस्य-क्षीरसागरस्य नवनीतमिवं समुद्रनवनीतम् । देश्यामपि । “पां पाने" पीयते पेयूषम् । “कोरदूषाटरूप" [उ. ५६१ ] इति ऊषे निपात्यते । पुंक्ली- बलिङ्गः । नास्ति मृतमत्र इति अमृतम् ॥७॥ कथ्यन्ते व्यन्तरा वानमन्तरा अपि सूरिभिः । विविधेषु शैलकन्दरान्तरवनविवरादिषु प्रति वसन्तीति व्यन्तराः । पृषोदरादि- त्वात् साधुः । वनानां समूहो वानम्, तस्यान्तरे-मध्ये भवन्तीति वानमन्तराः । पृषोद- रादित्वात् साधुः । वनान्तरेषु वनविशेषेषु भवा अवर्णागमकरणाद् वा वानमन्तराः। कथ्यन्ते-भण्यन्ते सूरिभिः-पूर्वाचार्य रिति । योतिस्तथा वृष्णिपृष्णी प्रोक्ता रश्म्यभिधायकाः ॥८॥ योतते द्योतिः । "किलिपिलिपिशिचिटित्रुटिशुण्ठि” [ उ. ६०८ ] इति आदि- शब्दाद् इः प्रत्ययः । “वृषू सेचने" वृष्यते वृष्णिः । “पृषू' सेचने" इत्यस्मादपि इच्छन्ति एके, तन्मते पृष्यते पृष्णिः । उभयत्र "ऋद्धृसृकुवृषिभ्यः कित्' [ उ. ६३५ ] इति कित् णिः। उभावपि पुंस्त्रीलिङ्गौ । प्रोक्ताः-कथिताः । रश्म्यभिधायकाः- किरणवाचकाः । शिखी, अभीषुः, स्यूमः, राजन्यः, चुनः, सूरः, द्यौत्रम् , आष्ट्रम् , आशित्रम् तालव्यमध्योऽयम् , पपीः च ॥८॥ समुद्रनवनीतं च विदुश्चन्द्रमसं बुधाः । बुधाः-पण्डिताः चन्दति-दीप्यते आह्लादयति वा चन्द्रमाः । 'चन्दो रमस्"*[उ. ९८६ ] इति रमस् । तं चन्द्रमसम्- चन्द्रम् । समुद्रस्य क्षीरसागरस्य नवनीत- १. जे. पृषु । २. जे., अशितम् । ३. जे. पपी च । * मुद्रितपुस्तके 'चन्दोरमस' इति पाठः ।
८ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता . मिव समुद्रनवनीतम् । तत् विदुः--जानन्ति कथयन्तीति यावत् । देश्याम अपि अयम् । अमृतनिर्गमः, संस्कृते देश्याम् अपि । रोचन-विरोचनाऽर्हसान-मन्दसान-संस्तवान- विशेलिमाऽऽदयोऽपि । चन्द्रिका चन्द्रिमाऽपि स्यात् चन्द्रः अस्ति अस्यां चन्द्रिका । "अतोऽनेकस्वरात्" [ ७।२।६] इति इकः । चन्द्रे निर्वृत्ता चन्द्रिमा । 'भावादिमः " [ ६।४।२१ ] इति इमः प्रत्ययः । चन्दति--दीप्यते आह्लादयति वा चन्द्रिमा । "वयिमखचिमादयः" [उ. ३५०] इति इमें निपात्यते । स्याद्-भवेत् । चन्दिर-सुक्ने अपि । इल्वला इन्विका अपि ॥९॥ इलन्ति-गच्छन्ति इल्वलाः, मृगशिरःशिरःस्थाः पञ्च तारकाः । "तुल्वलेल्व- लादयः" [उ. ५००] इति वलप्रत्ययान्तो निपात्यते । “इवु व्याप्तौ च" चकारात् प्रीणने, उदित्वाद् नकारागमे इन्वन्ति-प्रीणन्ति व्याप्नुवन्ति विहायसि वा इन्विकाः । 'णके आप्' स्त्रीलिङ्गः ॥९॥ अनुराधाप्यनुराधा "राध साधंट् संसिद्धौ" । अनुराध्नोति अनुराधा । अनुराधा, मैत्री । “घञ्युप- सर्गस्य बहुलम्' [३।२।८६] इति वा दीर्घः । गुरुः सप्तर्षिजोऽपि च। गृणाति-उपदिशति तत्त्वमिति गुरुः, बृहस्पतिः। “कगृऋत उर् च"[उ. ७३४] इति कित् उः । सप्तर्षयो मरीचिप्रमुखाः । यदाह- "मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महातेजाः सप्तमः परिकीर्तितः ॥" तेभ्यो जायते सप्तर्षिजः । अङ्गिरसो मुनेरपत्यत्वात् । “समुदाये प्रवृत्ताः शब्दा एकदेशेऽपि प्रवर्तन्ते” इति न्यायात् । सौरिः सौरोऽपि सूरस्यापत्यं सौरिः-शनिः । “अत इम" [६।१।३१] इति अपत्येऽर्थे इन् । सूरस्यापत्यं सौरः । “ङसोऽपत्ये" [६।१।२८] इति अण् । आदिदन्त्यौ उभौ । राहुस्तु ग्रहकल्लोल इत्यपि ॥१०॥ अभ्रपिशाचोऽपि तथा १. ने. 'मन्दसान' शब्दो नास्ति । २. जे. 'अनुराधा' शब्दो नास्ति । ३. जे. वर्तन्ते ।
हमनाममालाशिलोञ्छदीपिका रहति गृहीत्वा चन्द्राकौं स्वशरीरं वा इति राहुः । “कृवापाजि०" [उ. १] इत्यादिना उण् । “कलि शब्दसंख्यानयोः" ग्रहेषु कल्यते क्रूरग्रहत्वात् इति ग्रहकल्लोलः । "पिञ्छोलकल्लोल." [उ. ४९५] इति ओले निपात्यते । ग्रहेषु कल्लोल इव वा ग्रह- कल्लोलः । अभ्रे-आकाशे-पिशाच इव अभ्रपिशाचः। एतौ देश्याम् अपि । रविवैरि- भयानकशश्यरयोऽपि । नाडिका नालिकाऽपि च । "णल गन्धे" । नलति-अर्दति' नाली । ज्वलादित्वाद् णः। नाल्येव नालिका। डलयोरैक्ये नाडिका । “नडण् अवस्कन्दने" इत्यस्य धातोर्नाडीति नन्दी । रात्रौ यामवती तुझी राति सुखम् रात्रिः । “राशदि०" [उ. ६९६] इत्यादिना त्रिः । "इतोऽ- कृत्यर्थात्" [२।४।३२] इति इयां रात्री इत्यपि । "तिमिरपटलैरवगुम्फिता रात्र्यः” इति । तत्र यामा विद्यन्ते अस्यां यामवती । “तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुः" [७।२।१] । "तमूच् काङ्क्षायाम्" । ताम्यन्ति चक्रवाका अस्यां तुङ्गी । “कमितमिशमिभ्यो डित्" [उ.. १०७] इति डित् उङ्गः । देश्याम् अपि । शशिशरीरेश्वरी, किल्विषी, वसिः दन्त्यान्तोऽयम्, मरणी, क्षित्वरी च । निःसम्पातो निशीथवत् ॥११॥ निः-निःशेषार्थे निश्चयार्थे वा । निःसम्पातः-अर्थात् शयनम्-अत्र जना- नामिति निःसम्पातः । नियतं शेरते अस्मिन् निशीथः । “न्युभ्यां शीङः” [उ.२२८] इति कित् घः । अत एव कात्यो निशीथम् सुप्तजनम् आह । निशीथवत् निशीथ इव । अस्य प्रसिद्धिं विवक्षित्वोपमानत्वमुक्तम् । कथम् अवबुध्यते ? उच्यते-यथा निशीथ- शब्दोऽर्धरात्रवाचकस्तथा निःसम्पातोऽपीति । एवमन्यत्रापि 'वत्' अर्थो व्याख्येयः ॥११॥ तमः स्यादन्धातमसम् ताम्यन्ति अनेन तमः, अन्धकारः । “अस्" [उ. ९५२] इति अस् । अन्धयति [इति] अन्धम् तच्च तत् तमश्च अन्धातमसम् । “समवाऽन्धात् तमसः" [७।३।८०] इति अत् समासान्तः । बाहुलकाद् दीर्घः । सहुरिः, दन्त्यादिरयम्, काणूकम् , छाया, नभाकः, शार्वरम् तालव्यादिरयम्, तुहिनम् , मुहिरम् च । वर्षाः स्युर्वरिषा अपि। १. जे. ज. अर्दयति । २ जे. ज. अवगुण्ठिता । २ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता वियते-छाद्यते नभोऽत्र मेधैरिति वर्पाः । “वृ-कृ-तृ-मीङ्-माभ्यः पः" [उ. ५४०] इति षः । वर्षम् अस्ति आसु वर्पन्तीति वा । नित्यं बहुवचनान्तः स्त्रीलिङ्गश्च । यथा--पर्षत् , परिषत् , मार्षः, मारिषः, आर्भटी, आरभटी इत्यादि, तथा वरिपा अपि । खेऽन्तरीक्षम् खन्यते खम् । “कचित्" [५।१।१७१] इति डः । “अशौटि व्याप्तौ" । अश्नुते इति वा खम् । “अशेडिंत्' [उ. ८७] इति डित् खः, आकाशम् , तत्र अन्तावा- पृथिव्योर्मध्ये-ईक्ष्यते-विलोक्यते अन्तरीक्षम् । अन्तर्मध्ये ऋक्षाणि इति वा । पृषोदरा- दित्वात् साधुः । अनङ्गम् , वृजनम् , भृज्जनम् , गारित्रम् , रोहिषम्, वेष्पः, निवेष्पः एतौ पञ्चमवर्गीयपकारान्तौ । नभसः, वेशन्तः, सूमम्, श्यामम् , खजाकः, पतत्रम् च । सांसृष्टिकमपि तत्कालजे फले ॥१२॥ तत्कालजे-तात्कालिके फले-संसृष्टम्-प्रयोजनमस्य सांसृष्टिकम् । "प्रयोज- नम्" [६।४।११७] इति इकण् ॥१२॥ मेघमाला कालिकाऽपि मेघानाम् माला मेघमाला-मेघपङ्क्तिः । काली कालवर्णत्वात् , काली एव कालिका । कालो वर्णोऽस्ति अस्या इति वा । “अतोऽनेकस्वरात्" [७।२।६] इति इकः । कालयति वा । णकः प्रत्ययः । मेघिका देश्याम् । वार्दलं चापि दुदिनम् । वाराम्-पाथसाम्-दलम् वादलम् । देश्याम् अप्ययम् । दुष्टम् दिनम् अत्र दुर्दिनम् । मेघजम् तमः तन्नाम । यद् भागुरि:-"दुर्दिनं ह्यन्धकारोऽब्दैः" इति । सूत्रामाऽपीन्द्र सुष्टु सुतराम् वा त्रायते-पालयति सूत्रामा । “मन्" [उ. ९११] इति मन् । शोभनम् त्राम-बलम् अस्यं वा । बाहुलकात् दीर्घः । “इदु परमैश्वर्ये" इन्दति इन्द्रः । “भीवृधि" [उ. ३८७] इति रः, तत्र स्वाराट्-निषड्वर- जित्व-पचत-जघ्नु-वल्मित-शैलारि-वलह-वार्वाहवाहा अपि । शतारः शतधारोऽपि चाशनौ ॥१३॥ शतम्-बहूनि अराणि-चक्राङ्गानि अस्य शतारः । शतम्-बढ्यो धारा अस्य शतधारः । अश्नुते-च्याप्नोति-ज्वालाभिः रिपून् इति अशनिः-वज्रम् । पुंस्त्रीलिङ्गस्तत्र "सदिवृत्यमिधभ्यश्यटिकटयवेरनिः" [उ. ६८०] इति अनिः । दर्वरम् , बिलाहकः, जंसुरिः, सृणीकः दन्त्यादिरयम्, सृणिः च दन्त्यादिरयम् ॥१३॥ १, जे. जित्वर । .
१९ हमनाममालाशिलोज्छदीपिका . .. आश्विनेयौ स्वर्गवैद्यौ अश्विन्या अपत्ये आश्विनेयौ । “शुभ्राऽऽदिभ्यः" [६।११७३] इति अपत्येऽर्थे एयण् । स्वर्गस्य वैद्यौ स्वर्गवैद्यौ । हर्यक्षोऽपि धनाधिपः । हरि-पिङ्गलम्-अक्षि अस्य हर्यक्षः । “सक्थ्यक्ष्णः स्वाङ्गे" [७।३।१२६] इति टः प्रत्ययः । पिङ्गलैकनेत्रत्वात् । धनस्याधिपः-स्वामी--धनाधिपः । स्वेश्वरः, बिलः, ऐलः, ईशवयस्यः, ईहावसुः च । अजगवमजगावपि शङ्करधन्वनि ॥१४॥ अजगवः-अस्थिविकारः स विद्यते अस्य अजगवम् । अभ्रादित्वात् अः । अजः-अनुत्पन्नः शाश्वतो वा गौः-वृषभो यस्य सः अजगुः-ईश्वरः तस्य' धनु:- आजगवम्, अजगवम् वा । "तस्येदम्' [६।३।१६०] इति इदमर्थे अणि आगते तस्य च णित्त्वविकल्पात् णित्त्वपक्षे वृद्धौ आजगवम् , णित्त्वाभावपक्षे वृद्धचभावात् अजगवम् इति रूपसिद्धिरिति एके । “पिनाकोऽजगवं धनुः" [१।१।३७] इति अमरः। अजकंवम् अपि । अजगा ग्रहणस्थानम् अस्य अस्ति. अजगावम् । “मण्यादिभ्यः" [७।२।४४] इति वः । यदाहुः प्राच्याः "अजगावं धनुः प्रोक्तम्" इति । क्लीब- लिङ्गावेतौ । शङ्करस्य-महादेवस्य धन्व-चापम् शङ्करधन्व, तत्र ॥१४॥ .. गौर्या दाक्षायणीश्वरों गौरवर्णत्वाद् गौरी-पार्वती तस्याम् । दक्षस्यापत्यम् दाक्षिः, तस्यापत्यं दा- क्षायणी । अनन्तरापत्येऽपि पौत्राद्युपचारात् “यञिञः"[६।१।५४] इति आयनण् । "जातेरयान्त." [२।४।५४] इति ङीः । अश्नुते ईश्वरी, "अश्नो ते] रोच्चादेः [उ. ४४२]" इति वरटि ङ्यां सिद्धम् । ईश्वरस्य भार्या वा । "धवाद् योगात्" [२।४५९] इति ङीः । सिंहवासा सौरिस्वसा च । नारायणे जलेशयः। नरस्यापत्यं नारायणः । नडादित्वाद् आयनण् । यद् वा, नृणाते हुलकात् कर्मणि घञि, नाराः आपः ता अयनं यस्येति नारायणः । यन्मनुः- "आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः । ता यदस्यायनं पूर्व, तेन नारायणः स्मृतः ।" [मनुस्मृति अध्या. १ श्लो. १०] इति । नारम्-अम्मयम् नरसमूहो वा, अयनम् अस्येति वा, तत्र । जले शेते जलेशयः । "अ" [उ. २] इति अः । “शयवासिवासेष्वकालात्" [ ३।२।२५] इति १. जे. ज. तस्येदम् । २ जे. अस्येति । - - ૧૨ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता सप्तम्यलोपः । वारिक्षयः, वारीशशायी, श्रीशः, अहिवैरिवाहः, सुरारिहा नन्तोऽयम्, सहोरः, आशिरः च मध्यतालव्योऽयम् । कौमोदकी कोपोदकी कुमोदकस्य विष्णोरियं कौमोदकी । "तस्येदम्" [६।३।१६०] इति अण् । कूपोदके भवा कोपोदकी । “भवे" [६।३।१२३ ] इति अण् । संहितासु मेण्ठादौ चायं पाठ:--- "कूपोदकाज्जाता" इति आम्नायः। उभयत्र "अणये." [२।४।२०] इति ङीः । कृष्णगदानाम्नी । आई शब्दौ श्रियां मतौ ॥१५॥ अटति अतति वा आ । "क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः । अस्य विष्णो- र्भार्या ई । “धवाद् योगात्" [२।४।५९ ] इति ङीः । ईः इत्यपि । यदाहुः- "ई रमा मदिरा मोहे महानन्दे शिरोभ्रमे । स्त्रीलिङ्गोऽयमुणाद्यन्तो नाऽतोस्माल्लोपनं सुपः ।। ईयौँ योऽत्र जसा रूपं स्यादमा रूपमीम् शसीः ।" इति । आ+ई, इत्यत्र "न सन्धिः"[१।३।५२] इत्यनेन सन्ध्यकरणमदुष्टम् । श्रय- तीत्येवंशीला श्रीः । “दिद्युद्दद्द०" [५।२।८३] इत्यादिना क्विपि दीर्घा निपात्यते । "इतोऽक्त्यर्थात्" [२।४।३२] इति ङ्यां श्रियम् इत्यपि भवतीति दुर्घटे रक्षितः । तस्यां श्रियाम्-लक्ष्म्याम् मतौ-सम्मतावित्यर्थः । एधनुः, आजिहीर्षणिः, यशः, वारीशसूः, वला, सरोरुहावासा, हरिशरीरेश्वरी च ॥१५॥ . कन्तुः कन्द "कमूङ् कान्तौ” । काम्यते कन्तुः । “कृसिकम्यमिगमितमि०" [उ.७७३ ] इति तुन् । कम् अव्ययम् कुत्सायाम् । कम्-कुत्सितो दर्पोऽस्य कन्दर्पस्तत्र श्रेयो, सुदृत्, वर्वरः, वासरः, मुहिरः, वन्द्रः, गदयित्नुः, भिदुः, हयिः, शादः, रमतिः, श्रीसूः, शम्बरारिः च । सिद्धार्थः सुगते परिकीर्तितः। सिद्धोऽर्थोऽस्येति सिद्धार्थः" । "सर्वे गत्यर्था ज्ञानार्थाः इति वचनात् । शोभ- नम् गतं-ज्ञानमस्य सुगतः वुद्धस्तत्र । परिकीर्तितः-कथितः । मुनीन्द्रैकदेशे मुनिरपि, भीमवत् । “सन्ति पदेषु पदैकदेशाः" इति वचनात् । अङ्गे व्याख्याविवाहाभ्यां प्रज्ञप्तिरपि पञ्चमे ॥१६॥ १ जे. नान्तोऽयम् ।
हेमनाममालाशिलोञ्छदीपिका १३ . , पञ्चमे अङ्गे भगवतीनाम्नि विविधा जीवाजीवादिप्रचुरतरपदार्थविषयाः, मा- अभिविधिना कथञ्चिनिखिलज्ञेयव्याप्त्या मर्यादया वा परस्परासंकीर्णलक्षणाभिधानरूपया, ख्याः–ळ्यानानि भगवतः श्रीमहावीरस्य गौतमादिविनेयान् प्रति प्रश्नितपदार्थप्रति- पादनानि व्याख्यास्ताः प्रज्ञाप्यन्ते–प्ररूप्यन्ते भगवता सुधर्मस्वामिना जम्बूनामानमभि यस्यां सा व्याख्याप्रज्ञप्तिः । अथवा विविधतया विशेषेण वा आख्यायन्त इति व्या- ख्याः अभिलाप्यपदार्थवृत्तयस्ताः प्रज्ञाप्यन्ते यस्यां सा। अथवा व्याख्यानाम्-अर्थ- प्रतिपादनानाम् प्रकृष्टाः ज्ञप्तयः-ज्ञानानि यस्यां सा व्याख्याप्रज्ञप्तिः । विशिष्टाः वाहाः अर्थप्रवाहाः विवाहाः-सूत्रार्थविचारपद्धतयः इत्यर्थः-तेषां प्रज्ञप्तिः-प्रज्ञापनम् व्याख्यानं यस्यां सा विवाहप्रज्ञप्तिः ॥१६॥ दृष्टिपातो द्वादशाङ्गे "पत्ल पथे गतौ" । पतनम् पातः । घजन्तः । दृष्टीनाम्-दर्शनानाम् पातो यत्राऽसौ दृष्टिपातः, सर्वनयदृष्टय इह आख्याप्यन्त इत्यर्थः । तथा चाह- "दृष्टिवादेन दृष्टिपातेन वा सर्वभावप्ररूपणा आख्यायते" [नन्दिसूत्र पृ० २३८ सू० ५७ आगमो० ] इति । द्वादशानाम् संख्यापूरणं द्वादशम् । द्वादशम् च तदङ्गम् चं द्वादशाङ्गम् दृष्टिवादस्तत्र । कल्याणेऽवन्ध्यमपि कल्याणफलहेतुत्वात् कल्याणम् , तत्र कल्याणे-कल्याणनाम्नि एकादशे पूर्वे । अवन्ध्यफलहेतुत्वात् अवन्ध्यम् । न वन्ध्यं अवन्ध्यम् सफलम् इति वा । तत्र हि सर्वे ज्ञानतपःसंयमयोगाः शुभफलेन सफला वर्ण्यन्ते । अप्रशस्ताश्च प्रमादादिकाः सर्वे अशुभफला वर्ण्यन्ते, अतोऽवन्ध्यमिति । ....अथ । निन्दा गर्दा जुगुप्सा "णिदु कुत्सायाम्" । निन्दनम् निन्दा । “गर्हि गल्हि कुत्सने" । गर्हणम् गरे । उभयत्र स्त्रियाम् "क्तेटो गुरोर्व्यञ्जनात्" [ ५।३।१०६ ] इति अः प्रत्ययः । गर्डि- गर्हावपि । “गुपि. गोपनकुत्सनयोः" । जुगुप्सनम् जुगुप्सा । “शंसिप्रत्ययात्" [५।३।१०५] इति अः। अथाऽऽक्षारणा रतगालिषु ॥१७॥ "क्षर सञ्चलने" णौ । आक्षारयति आक्षारणा । रते-मैथुनविषये गालयो रतगालयस्तासु, मैथुनमुद्दिश्य गालिषु इत्यर्थः । दूषणेऽपीति एके । १. प्रा. प्रतौ 'सफलम्' नास्ति । २: प्रा०प्रतौ 'तत्र हि' इत्यतः प्रारभ्य 'भतोऽवन्ध्यम्' इति पाठो नोपलभ्यते । . - ४ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता - "तत्र त्वाक्षारणा यः स्यादाक्रोशो मैथुनं प्रति" [१।६।१५] इति अमरः ॥१७॥ समाख्यापि समाज्ञावत् समाख्यानम् समाख्यायतेऽनयेति वा समाख्या इति भागुरिः । समाज्ञायते सम्यक् आ-समन्ताद् अवसीयतेऽनयाऽसाविति समाज्ञा, कीर्तिः । वदर्थः प्राग्वत् सम्भावनीयः । कीर्तिनाम्नी । , रुशतीवद् रिशत्यपि। "रुशं रिशंत् हिंसायाम्"" । रुशति-हिनस्ति परं रुशती हिंस्रा । आश्रयलिङ्ग- श्चायम्, तेन रुशन्शब्दो रुशदच्च इत्यपि । रिशति-हन्ति परम् इति रिशतो । प्राग्वत् आश्रयलिङ्गः । तालव्यमध्यौ । इहापि वदर्थः प्राग्वद् भावनीयः । अशुभव- चननाम्नी । काल्यापि कल्या काले-कलासमूहे साधुः काल्या इति कात्याद्याः। कलासु साधुः कल्या। उभयत्र "तत्र साधौ” [ ७।१।१५ ] इति यः । शुभवचननाम्नी । सन्धायां समाधिरपि कथ्यते ॥१८॥ सन्धानम् सन्धा । "उपसर्गादातः" [५।३।११०] इति अङ् । समाधान समाधीयते मनोऽस्मिन् वा समाधिः पुंसि । “व्याप्यादाधारे" [५।३।८८] इति किः । कथ्यते-उच्यते विद्वद्भिरिति गम्यम् । अङ्गीकारनाम्नी ॥१८॥ बीडः शूका मन्दाक्ष्यं च हियाम् "व्रीडच् लज्जायाम्" वीडयते वीडनम् वा व्रीडः । घञ् प्रत्ययः । पुंलिङ्गः । ऋफिडादित्वाद् लत्वे बोलोऽपि । “शुं गतौ” शवति शूका । "धुयुहिपितुशोर्दीर्घश्च" [ उ. २४ ] इति कित् कः, हस्वस्य दीर्घश्च । मन्दं च तद् अक्षि च मन्दाक्षम् तदेव मन्दाक्ष्यम् । भेषजादित्वाद् ट्यण् । “हीक लज्जायाम्" हीयते हीः । स्त्रीलिङ्गः । क्रुत्सम्पदादित्वात् क्विप् । तत्र हियाम् लज्जानाम्नि । ऊहाऽपि चोहवत् । "ऊह वितर्के' ऊहनम् ऊहा । "क्तेटो गुरोर्व्यज्जनात्" [५।३।१०६] इति अः । ऊहनम् ऊहति वा अहः । घञ् अच् वा । युक्तिगम्यस्तर्कः । वदर्थः पूर्ववेद् भावनीयः । तन्द्रिस्तन्द्री च निद्रायाम् "द्रांक कुत्सितगतौ" कुत्सितगतिः पलायनम् स्वप्नश्च । इन्द्रियाणाम् तननम् द्राति अस्यां तन्द्रिः । “नाम्युपान्त्य०" [उ. ६०९] इति कित् 'इ' प्रत्यये पृषोदरा- १. जे. सिंहायाम् । ८ हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका १५ दित्वात् साधुः। "तन्द्रिः सादनमोहनयोः" सौत्रः । तन्द्रयते वा तन्द्रिः । पदि- पठिपचि०" [उ. ६०७] इति आदिशब्दाद् इः । [तन्द्रा आलस्ये आदन्तः । तन्द्राति अनया अस्यां वा । "नाम्युपान्त्यः" [उ. ६ ०९] इति बहुवचनात् कित् इ.] "तृस्तृ- तन्द्रितन्त्र्यविभ्य ई: "[उ. ७११ ] इति 'ई' प्रत्यये तन्द्रीः ईकारान्तोऽयम् । तन्द्री- त्यपि । नियतम् द्रान्ति इन्द्रियाणि अस्यां निद्रा तस्याम् । अहम्प्रथमिकाऽपि च ॥१९॥ अहम्पूर्विकायाम् । अहम् प्रथमम् अहंप्रथम इति । अहं प्रथमम् इत्यस्यां अहंप्रथमिका । अहम् पूर्वम् अहंपूर्व इति । अहम् पूर्व इति यस्यां सा अहंपूर्विका । मयूरव्यंसकादित्वात् तत्पुरुषसमासे निपात्यते । निपातनाद् अकञ्यपि वृद्धयभावः । अहमिति शब्दो विभक्त्यन्तप्रतिरूपको निपातः । एवं अहमग्रिका अपि । यदाह गौड: अहं पूर्वः अहंपूर्व इत्यहपूर्विका स्त्रियाम् । आहोपुरुपिका दर्पाद्या स्यात् सम्भावनात्मनि ।। अहमहमिका तु स्यात् परस्परमहंकृतिः । इति । केलिकिलोऽपि स्याद् विदूषके । केल्या-क्रीडया किलति केलीकिलः । किलत् श्वैत्यक्रीडनयोः" सन्धि विग्रहेण विग्रहम् च सन्धिना दूषयति विदूषकः-भाण्डः, तत्र । मार्पवन्मारिषोऽपि । मर्षणात्-सहनात् मार्षः । मृणाति मारिषः । “अमिमृभ्यां णित्" [उ.- ५४९ ] इति इषः । पर्षत्, परिषत् इत्यादिवद् वा । आर्यनाम्नी । इति शिलोच्छो देवकाण्डगः ॥२०॥ इति अमुना प्रकारेण, यद् वा इतिशब्दः समाप्त्यर्थस्तेन देवकाण्डम् गच्छति देवकाण्डगः- देवकाण्डानुगतः शिलोञ्छः समाप्तः ॥ २० ॥ इति श्रीमहत्खरतरगच्छीय श्रीजयसागरमहोपाध्यायसन्तानीय- वाचनाचार्यश्रीभानुमेरुगणिशिष्यमुख्यश्रीज्ञानविमलो- पाध्यायविनेयवाचनाचार्यश्रीवल्लभगणि- विरचितायां श्रीहैमनाममालाशिलोञ्छ- टीकायां द्वितीयदेवकाण्डस्य शिलोञ्छः समाप्तः । १-१ प्रा० प्रती 'तन्द्रा आलस्ये' इत्यतः आरभ्य 'बहुवचनात् कित् इ.' इतिपर्यन्तः पाठो नोपलभ्यते । २.. जे. ज. भण्डः । ३...जे. श्रीजयसागरोपाध्याय - 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- तृतीयो मर्त्यकाण्डः अथ तृतीयमर्त्यकाण्डस्य शिलोच्छो वित्रियते- स्तनन्धये स्तनपश्च क्षीरपश्चाऽभिधीयते । "धे पाने" स्तनौ धयति स्तनन्धयो बालस्तत्र । "शुनीस्तनमुञ्जकूलाऽऽस्यपुष्पात् धेः" [५ ।१।११९] इति खश् । स्तनौ पिबति स्तनपः । स्थापास्नात्रः कः" [५ । १।१४२] इति कः । क्षीरम्-दुग्धम् पिवति क्षीरपः । “स्थापा०" [५ । १ । १४२ ] इति कः । अभिधीयते-कथ्यते पण्डितैरिति गम्यम् । तारुण्यं स्याद् यौवनिका। तरुणस्य भावः कर्म वा तारुण्यम् । यूनो भावो यौवनिका । स्त्रीसलिङ्गः । "चौरादेः” [७। १ । ७३ ] इति अकञ् । “यूनोऽके" [७ । ४ । ५०] इत्यनेन अके प्रत्यये परे सति युवन्शब्दस्य अन्त्यस्वरादेर्लंगभावः । युवत्वम् युवता च । दशमीस्थो जरत्तरः ॥२१॥ दशम्याम् अवस्थायां तिष्ठतीति दशमीस्थः । “स्थापास्नात्रः कः" [५ । १ । १४२] इति कः । यदाह भागुरिः । इष्टो वयोदशोपेतः पञ्चमी सप्तमीति च । प्रवया दशमीस्थः स्यात् । इति । जरन्नेव जरत्तरः । "क्वचित् स्वार्थ' [७ । ३ । ७] इति तरप् ॥२१॥ कविताऽपि कविः स्यात् । "कवृङ् वरणे" कवते कौति वा इत्येवंशीलः कविता । "तृन् शीलधर्मसाधुषु" [५ । २ । २७] इति तृन् । कवते कौति वा कविः । “ कुङ् शब्दे" "स्वरेभ्यः इ." [उ, ६०६] इति इः । शुचिः, कृष्टिः, किकिः, पठिः, हुण्डिः, रपठो, मन्ता घीवा, वुधानः च । कृतकर्मणि कृतकृत्यकृतिकृतार्थाश्च । कृतं कर्माऽनेन कृतकर्मा-प्रवीणस्तत्र ( कृतम् कृत्यम्-कार्यम्-अनेन कृतकृत्यः। प्रशस्तं कृतम्-कर्म-अस्य कृती। कृतोऽर्थोऽनेन कृतार्थः । सूक्ष्मः, दभ्रः दक्षायः निचाकुः च । कुटिलाशयोऽपि कुचरः। कुटिल माशयोऽभिप्रायोऽस्य कुटिलाशयः । कुत्सितस् चरति कुचरः । कद्वदनानी ।
.: . हेमनाममालाशिलोग्छदीपिका १७ अन्धजडशठेऽनेडमूकः स्यात् ॥२२॥ अमति-गच्छति अनेनेति अन्धः। 'स्कन्द्यमिभ्यां धः" [उ. २.५१] इति धः । जलति न तीक्ष्णो भवति, डलयोरैक्ये जडः । “शमूच् उपशमे" शाम्यति शठः । "शमेलृक् च वा" [उ.१६५] इति ठः, लुक् चान्तस्य । शठ कैतवे च शठति वा शठो धूर्तः । अन्धश्च जडश्च शठश्च अन्धजडशठं तस्मिन् अन्धजडशठे । समाहारद्वन्द्वत्वाद् एकवद्भावः । अनेडोऽपि अवर्करोऽपि मूकोऽनेडमूकः । “अन्धो ह्यनेडमूकः स्यात्" [का. २ । प. ४५३. ६.०९] इति हलायुधः। “अनेडमूकस्तु जड" [ इति- वैजयन्ती । "शठो ह्यनेडमूकः स्यात्" [ इति भागुरिः । जड़े मुदेर-बठर-. गृहोल-हुड-होडा अपि । शठे कुटेरः, जहकः, मक्रिश्च ॥२२॥ वदान्यौ पृथगित्यन्ये दानशीलप्रियंवदौ । वदतः प्रियं ददानौ वदान्यौ "वदिसहिभ्यामान्यः" [उ.३८१] इति आन्यः । पृथग् इति भिन्नाौँ । दाने शीलम्-स्वभावोऽस्य दानशीलः । प्रियं वदति प्रियंवदः । द्वन्द्वसमासे दानशीलप्रियम्वदौ । यदाह भागुरिः "शक्लो वदान्यः प्रियवाक् वदान्यो दानशीलकः” । [ ]इति । प्रियंवदे लोकयुः, हर्षयित्नुः, शफः मन्द्रः, मन्तुः च । मूों यथोद्गतोऽपि मुह्यति कार्ये मूर्खः, “पूमुहोः पुन्मूरौ च" [उ.८६] इति खः । मुहो 'मूः' इत्यादेशश्च । यथैव उद्गतो जातस्तथैव स्थितः असंस्कृतत्वादिति यथोद्गतः । इभ्यः श्रीमानपि बुधैः स्मृतः ॥२३॥ इभम् हस्तिनम् अर्हति इभ्यः । “दण्डादेर्यः" [६।४।१७८] इति यः । श्री:- लक्ष्मीविद्यतेऽस्य श्रीमान् । “तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुः ।" [७।२।१] इति मतुः । बुधैः- पण्डितैः स्मृतः - कथितः । दधाति श्रियम् इति "स्फुलिफलिपल्याभ्य इङ्ग" [उ. १०२] इति इङ्गकि प्रत्यये धिङ्गोऽपि ॥२३॥ विवधिक-वीवधिकावपि वैवधिके विवधेन वीवधेन च भारेण पर्याहारेण वा हरति विवधिकः, वीवधिकः । पक्षे वैव- धिकः । “विवधवीवधाद्वा" [६।४।२५] इति इकट्-इकणौ प्रत्ययौ । अन्नाद्यर्थ यो भारं वहति तन्नामानि । लोके यस्य "अधोवाहिक" इति प्रसिद्धिः । स्त्रियाम् तु विवधिकी, वीवधिकी, वैवधिकी इति । १. जे. कुठेरः । ।
श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता प्रतिचरोऽपि भृत्ये स्यात् प्रतिचरति प्रतिचरः । 'प्रति' इति आभिमुख्ये । भरणीयो भृत्यः । "भृगोऽसंज्ञा- याम्" [५।१।४५] इति क्यप् । तत्र भृत्ये-किङ्करे । सम्माको बहुकरे बहुधान्यार्जक इति प्राहुः ॥२४॥ "मृजौक शुद्धौ” समन्तात् सम्यक्प्रकारेण वा माष्टिं सम्मार्जकः । “नाम्नि पुंसि च" [५।३।१२१] इति णकः । बहुधान्यम् अर्जयति -संस्करोति बहुधान्या- जंकः। "नाम्नि पुंसि च" [५।३।१२१] इति णकः । बहु करोति बहुकरस्तंत्र । इति प्राहु:-कथयन्ति पण्डिता इति गम्यम् ॥२४॥ विहडिकायां च विहङ्गमाऽपि, विहङ्गप्रतिकृतिश्चर्मादिमयी विहङ्गिका । "तस्य तुल्ये कः" [७१।१०८]. इति कः । या भित्त्यादौ लम्बमाना स्थाप्यते, प्रयाणके च संधार्यते भारोदहनाय यष्टिः, चतुर्दण्डिका इति सभ्याः । "शिक्याधारः स्कन्धग्राह्यो लगुडः" ] इति द्रमिलाः । विहायसा गच्छति विहङ्गमा । "नाम्नो गमः खड्डौ च विहायसस्तु विहः' [५।१११३१] इति खः । विहङ्गमप्रतिकृतित्वाद् वा विहङ्गमा । अधौ देहिके। और्वदैहिकमप्याहुः ऊर्ध्वं देहाद् भवं और्ध्वदेहिकं । मृतस्य दिवसे तमुद्दिश्य दानम्-पिण्डोद- कादि । अध्यात्मादित्वाद् इकण । तस्मिन् और्ध्वदेहिके अनुशतिकादिपाठमताश्रय- णाद् उभयपदवृद्धौ औ दैहिकम् । अनृजुः शण्ठ इत्यपि ॥२५॥ न ऋजुः अनृजुः । “शमूच् उपशमे" शाम्यति शण्ठः । "शमेलृक् च वा" [उ. १६५] इति ठः । विकल्पेन मकारलोपपक्षे शठोऽपि ॥२५॥ मायावि-मायिको धूर्ते माया विद्यतेऽस्य मायावी। “अस्तपोमायामेधास्रजो विन्" [७।२।४७] इति विन् । मायाऽस्यास्तीति मायिकः । “त्रीह्यादिभ्यस्तौ" [७२।५] इति 'इक' प्रत्ययः । मायावान् अपि । धूर्वति-हिनस्ति धूर्तः वञ्चकस्तत्र । "शीरी०" [उ. २०१] इति कित् तः । कपटे तूपधा मता। .
हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका १९ - कम्पयतिः अनेन कपटम् , पुंक्लीबलिङ्गस्तत्र । "कपटकीकटादयः" (उ. १४४] इति अटे निपात्यते । उपधीयते स्फटिकस्य इव सिन्दूरम् इति उपधा । "उपस-- र्गादातः" [५।३।११०] इति अङ् । चोरचौरोऽपि विज्ञेयः "चुरण स्तेये" चोरयति चोरः । अच् । चुराशीलो वा । छत्रादित्वाद् अङ् । "चर भक्षणे च, चकाराद् गतौ" चरति वा चोरः । "कोरचोरमोर." [उ.४३४] इति ओरे निपात्यते । प्रज्ञाद्यणि, चौरः । विज्ञेयः-ज्ञातव्यः । स्तेयं स्तैन्यमपीष्यते ॥२६॥ स्तेनस्य-चोरस्य भावः स्तेयम् । “स्तेनान्नलुक् च" [७।१।६४। इति यः । राजादित्वाद् व्यणि स्तैन्यम् । स्तेनत्वम् स्तेनता च इष्यते-वाञ्च्यते ॥२६॥ दाने मादेशनमपि "दिशीत् अतिसर्जने" प्रादिश्यते प्रादेशनम् । “अनट" [५।३।१२४] इत्य- नट् । दीयते दानं त्यागस्तत्र । “अनट्" [५।३।१२४] इति अनट् । .. क्षमा स्यात् क्षान्तिरित्यपि । "क्षमौषि सहने" क्षमणम् क्षमा, क्षम्यते वा । “षितोऽङ्' [५।३।१०७] इति अङ् । "क्षमौच सहने" इत्यस्य "स्त्रियां तिः" [५।३।९१] इति क्तौ क्षान्तिः । क्रोधनः कोपनः "क्रुधंच कोपे" क्रुध्यति क्रोधनः । “भूषाक्रोधार्थ०" [५।२।४२] इति अनः । "कुपच् क्रोधे" कोपशीलः कोपनः, कुप्यति वा । "भूषाक्रोधार्थ." [५।२।४२] इति अनः । तृष्णक पिपासितोऽपि कथ्यते ॥२७॥ "तृपंच पिपासायाम्" तृष्यति इत्येवंशीलः तृष्णक् । "तृषिषिस्वपो नजि” [५।२६८०] इति नजिङ् । पिपासा जाता अस्य पिपासितः । तर्षः सञ्जातोऽस्येति तर्षितोऽपि । तारकादित्वाद् इतः । कथ्यते उच्यते ॥२७॥ भक्षकः स्यादाशिरोऽपि "भक्षण अदने" भक्षयति भक्षकः । अनाति अत्ति आशिरः । “अशेर्णित्". (उ. ४१५] इति इरः । मार्जिता चापि मर्जिता।
श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता .. . - "मृजौण. शौचालङ्कारयोः" माय॒ते. माजिता । दधिसितामरिचादिकृतं रसालाख्यम् लेह्यम् । यत् सूदशास्त्रम् - "अ ढकं सुचिरपर्युषितस्य दध्नः खण्डस्य षोडशपलानि शशिप्रभस्य । सर्पिःपलं मधुपलं मरिचार्द्धकर्ष, शुण्ठ्याः पलार्द्धमथवा पलं चतुर्णाम् ॥१॥ श्लक्ष्णे पटे ललनया मृदुपाणि घृष्टा, कर्पूरधूलिसुरभीकृतभाण्डसंस्था । एषा वृकोदरकृता सरसा रसाला, या स्वादिता भगवता मधुसूदनेन" ॥२॥ "सेट्क्तयोः" [४।३१८४] इति: गेर्लक् । “मृजौक् शुद्धौ" इत्यस्य तु औदि- त्वाद् वेद॑ । मार्जिता । “मर्च मर्जण् शब्दे" मय॑ते मर्जिता । "मृजौण शौचालङ्कारयोः" इत्यस्य तु रूढेः । शिखरिणीनाम्नी । पेयूपमपि पीयूषम् . "पां पाने" पीयते पेयूषम् । "कोरदूषाटरूष." [उ. ५६१] इति ऊषे निपा- त्यते । “पीयि प्रीणने" सौत्रः । · पीयते पीयूपम् । खलिफलिवृपृकृजलम्बि- मञ्जिपीयि०" [उ. ५६०] इति ऊषः । नवीनदुग्धनाम्नी । कूचिकाऽपि च कूर्चिका ॥२८॥ "कुङ् शब्दे" कूयते कूची । “कुपूसमिण्भ्यश्चट् दीर्घश्च" [उ.११२] इति 'चंद्' प्रत्ययो दीर्घश्च । स्वार्थिके के कूचिका: । यद् वा "कूच् उभेदने?' कूचति कूचिका । "नाम्नि पुंसि च" [५ । ३। १२१] इति णकः । कुञ्चिका इत्यपि । "कूची" इति एके पेटुः । कूर्चः क्षीरमस्तु स विद्यते अस्याः कूर्चिका-विनष्टदुग्धं 'फेदरी" इंति हि प्रसिद्धिः-'अतोऽनेकस्वरात्" [७। २.। ६] इति इकः ॥२८॥ द्रप्से द्रप्स्यमपि प्रोक्तम् "पौच् हर्षमोहनयोः" दृप्यतेऽनेन द्रप्सम, दध्यग्रम् । - यन्माला- द्रप्स दध्यघनं तथा" । [ "मावावंद्यमिकमि" [उ. ५६४] इति बहुवचनात् सः । तत्र दृप्यते द्रप्स्यम् । "शिक्यास्याढ्यमध्यविन्ध्यधिष्ण्य०" [उ. ३६४] इति ये प्रत्यये निपात्यते । उभयत्र : "स्पृशादिसृपो. वा" [४ । ४ । ११२] इत्यनेनाऽकारागमः । द्रप्समेव वा द्रप्स्यम् । भेषजादित्वात् ट्यण् । प्रोक्तम्-कथितम् विद्वद्भिरिति गम्यम् । एतच्च- १ प्रा. र्चः किलाटीमस्तु । , - لا तत.
२१ हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका . -- "द्रप्सं सरम्' इति आदिदन्त्यं मालाकारः प्राह । "सरो दध्यमबाणयोः" [ ] इति च विश्वः। भागुरिस्तु-तालव्यादि शरं प्राह । यदाह दुर्ग:-"बाणद्रप्सौ शरौ” इति । विजिपिलं च पिच्छिले । विजति चलति विजिपिलम् । “स्थण्डिलकपिल." [उ.४८४] इति इलान्तो. निपात्यते । पिच्छा आचामोऽस्याऽस्ति पिच्छिलम् । “लोमपिच्छादेः शेलम्" [७ ।२।२८] इति इलः । तत्र । व्योषे त्रिकटुकम् विशेषेण ओषति दहति व्योषम् , तत्र । त्रीणि कटूनि शुण्ठीमरिचपिप्पल्या- ख्यानि समाहृतानि त्रिकटु । स्वार्थिके के प्रत्यये त्रिकटुकम् । यदाह- "महौषधं च मरिचं कणावैकीकृतं किल । व्यूषणं कथ्यते तज्ज्ञैस्त्रिकटु व्योषकं तथा" || [ जग्धौ जमनं जवनं तथा ॥२९॥ अदनम् जग्धिः । “स्त्रियां क्तिः" [५ । ३ । ९१] इति क्तिः “यपि चाऽदो जग्ध्" [४।४।१६] इति 'जग्ध्' आदेशः । तत्र। "चमू छमू जमू झमू जिमू अदने" "जम्यते जमनम् । “अनट्" [५।३।१२४] इति अनट् । “जु गतौ" सौत्रो धातुः । जूयते क्षुधया जवनम् । यद् दुर्गः- "जवनं भोजनं क्वचित्" । [ चमनम् अपि ॥२९॥ आध्राणोऽपि भवेत् तृप्तः, "बें तृप्तौ" आध्रायति स्म आध्राणः । "ऋहीघ्राध्रा०" [४।२।७६] इति क्तयोः तस्य वा नत्वम् । तृप्यति तृप्तः । “तृपौच प्रीतौ" वेट्त्वात् क्तयोर्नेट् । शौष्कलः पिशिताशिनि । शुष्कम् मांसम् लाति शुष्कलः, स एव शौष्कलः । प्रज्ञादित्वाद् अण् । पिशि- तम् मांसम् अश्नातीत्येवंशीलः पिशिताशी तस्मिन् पिशिताशिनि मांसभक्षके । मनोराज्यमनोगव्यावपि स्यातां मनोरथे ॥३०॥ मनसो राज्यं यत्र मनोराज्यम् । मनश्च तद् गौश्च मनोगवी । “विशेषणं विशेष्येणैकार्थ कर्मधारयश्च" [३।१।९६] इति कर्मधारयः, ततो 'गोस्तत्पुरुषात्" .
२२ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता [७।३।१०५] इति 'अट्'समासान्तः । मनसो गौरिति वा, दूरगामित्वात् । उभावपि स्याताम्-भवेताम् । मन एव रथो दूरगामित्वात् यत्र स मनोरथः, तत्र ॥३०॥ कामुके कमनोऽपि स्यात् कमनशीलः कामुकः । “शकमगमहनवृषभूस्थ. उकण्" [५।२।४०] इति उकण् । तत्र । कामयते कमनः । “कमूङ् कान्तौ” "रम्यादिभ्यः कर्तरि" [५।३।१२६] इति अनट् । स्यात्-भवेत् । आक्षारितोऽपि दूषिते । आ-समन्तात् क्षार्यते स्वरूपात् चाल्यते स्म इति आक्षारितः । अलीकोत्पन्न- पातकस्य व्यपदेशः । दूष्यते स्म दूषितः । "मैथुनम् प्रति' इति एके । तत्र । संशयालुः सांशयिके संशयनशीलः संशयालः । "शीशद्धानिद्रातन्द्रादयि." [५।२।३७] इति आलुः । संशयं प्राप्तः सांशयिकः । “संशयं प्राप्ते ज्ञेये" [६।४।९३] इति इकण् । तत्र। जागरिताऽपि जागरी ॥३१॥ जागर्तीत्येवंशीलो जागरिता । "तृन् शीलधर्मसाधुषु" [५।२।२७] इति तृन् । जागरो जागरणम् अस्त्यस्य जागरी-जागरूकः ॥३१॥ पूजितोऽपचायितोऽपि पूज्यते पूजितः । अपचाय्यते अपचायितः । “अपचितः" [१।४।७७] इति ते निपात्यते । चिनोतेहि पूजार्थो नास्तीतोदं निपातनात् । अर्कितोऽपि । तुन्दिभोदरिकावपि । तुन्दिल: तुन्दिः उदरम् अस्यास्ति तुन्दिभः । इति अमरः । “तुन्दिवलिवटेर्भः) [ पा. ४।२।१३९] इति पाणिनीयसूत्रेण भः प्रत्ययः । तुन्दवान् अपि । उदरम् अस्यास्ति उदरिकः । "व्रीह्यर्थतुन्दादेरिलश्च" [ ७।२।९] इति इकः । उदरवान् अपि तुन्दम् अस्यास्ति तुन्दिलः । "ब्राह्यर्थतुन्दादेरिलश्च" [७।२।९] इति इलः । वृहत्कुक्षि- नामानि । न्युब्जोऽपि कुब्जे "उब्जत् आर्जवे नीतिक्षेपार्थे" न्युजति न्युजः । “अच्" [ ५।१।४९ ] इति अच् । न्युजनम् न्युजः । घञ् । न्युन्जेन पाणिगतेन भुग्नत्वेन योगाद् वा न्युजः पुमान् । यत् शाश्वत:
हैमनाममालाशिलोग्छदीपिका २३. "विद्यादधोगतं न्युजं न्युजकुज उदाहृतः" ।। कूयते कुजः वक्रानताङ्गः । “कुवः कुब्कुनौ च". ( उ. १२९ ) इति 'ज' प्रत्ययः । कुत्सित उब्ज इति वा । पृषोदरादित्वात् साधुः । तत्र खलतोऽप्यन्द्रलुप्तिके ॥३२॥ "खल सञ्चये च, चकाराच्चलने" खलन्ति केशाः अस्मादिति खलतः । भीमा- दित्वाद् अपादाने "दृपृभृमृशीयजिखलिवलि०" [उ.२०७] इति 'अतः' प्रत्ययः । इन्द्रलुप्तम् केशघ्नम् तेन चरति ऐन्द्रलुप्तिकः । “चरति" [ ६।४।११ ] इति इकण् । । तत्र । खल्वाटनाम्नी ॥३२॥ पामरोऽपि कच्छुरः पामा अस्त्यस्य पामरः । “मध्वादिभ्यो रः" [७।२।२६] इति मत्वर्थे रः । पाति कण्डूम् इति वा । “जठरक्रकर" [उ. ४० ३] इति अरे निपात्यते । कच्छूः अस्त्यस्य कच्छुरः । “कच्छ्वा डुरः" [७।२।३९।] ति डुरः । पामवान् क छूमान् च । अतीसारक्यप्यतिसारकी। अतीसारो विद्यतेऽस्य अतीसारकी । एकदेशविकृतस्याऽनन्यत्वाद् इति अतिसारकी । "घञ्युपसर्गस्य बहुलम्" [३।२।८६] इति वा दीर्घः । उभयत्र “वाताऽतीसारपिशा- चात् कश्चान्तः” [७।२।६१] इति 'इन्' कश्चान्तो भवति । कण्ड्रतिरपि खजूं: स्यात् "कण्डूञ् गात्रकर्षणे" कण्डूय्यते गात्रम् अनयेति कण्डूतिः । "स्त्रियां क्तिः" [५।३।९१] इति क्तिः । खर्जति व्यथते खजूः । स्त्रीलिङ्गः । “कृषिचमि०" [उ.८२९] इति ऊः। विस्फोटः पिटके स्मृतः ॥३३॥ "स्फट स्फुट्ट विशरणे" विस्फोटनम् विस्फोटति पादोऽनेन वा विस्फोटः । "व्यञ्जनाद् घञ् [५।३।१३२] इति घञ् । पेटति संश्लिष्यति पिटकः । त्रिलिङ्गः । "छिदिभिदिपिटेर्वा" [उ. ३०] इति किद् ‘अकः' । क्षुद्रस्फोटकनाम्नी ॥३३॥ कोठो मण्डलकमपि "कुठिः सौत्रः" कोठयति अङ्ग कोठः, कुण्ठयति अङ्गम् इति वा । “पष्टैधि- ठादयः" [उ.१६६] इति निपात्यते । मण्डलाकृतित्वाद् मण्डलम् । स्वार्थिक के, लकम् । मण्डलप्रतिकृतिः इति वा मण्डलकम् , तदाकारसदृशत्वात्। "तस्य तुल्ये कः संज्ञाप्रतिकृत्योः" [७१।१०८] इति कः । 1.1. मण्ड- .
२४. श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता गुदकीलोऽपि चार्शसि । गुदस्य कीलः गुदकील इव गुदकीलः, गुदम् कीलति वा । इयर्ति पीडाम् अनेन अर्शः । क्लीबलिङ्गः । “अर्तेरुरा# च" [उ.९६७] इति 'अस्' प्रत्ययः अर्श इति तालव्यशकारान्तादेशः । गुदतुद् अपि । मेहः प्रमेहवत् मेहयति मूत्रयति अनेन मेहः । प्रमेहयति प्रमेहः बहुमूत्रता। आयुर्वेदिकोऽपि चिकित्सके ॥३४॥ "विदक् ज्ञाने" आयुर्विद्यते अनेन आयुर्वेदः-शास्त्रम् । “व्यञ्जनाद् घञ्" [५।३।१३२] इति घञ् । आयुर्वेदं वेत्ति अधीते वा आयुर्वेदिकः । “न्यायादेः [६।२।११८] इति इकण् । यद् वा, आयुर्वेदः अस्याऽस्तीति आयुर्वेदी । 'आयुर्वेत्ति इत्येवंशीलो वा आयुर्वेदी । स्वाथिंके के आयुर्वेदिकः । चिकित्सति चिकित्सको वैद्य- स्तत्र । जैवातृक-भिषज-भिष्णजा अपि ॥३४॥ आयुष्मानपि दीर्घायुः कथ्यते आयुर्विद्यते अस्य आयुष्मान् । दीर्घम् आयुः अस्य दीर्घायुः । कथ्यते-उच्यते । जीवन्त-जीवरौ अपि । ऽथ परीक्षकः। स्यादाक्षपाटलिकोऽपि परीक्षते परीक्षकः । मठादौ दानार्थ ब्राह्मणपरीक्षिता । अक्षपटलैः व्यवहारस- मूहैश्चरतीति आक्षपाटलिकः । “चरति" [६।४।११] इति इकण । अक्षपटलैः दीव्य- तीति वा । "तेन जितजयद्दीव्यत्खनत्सु" [६।४।२] इति दीव्यति अर्थे इकण् प्रत्ययः। अनुशतिकादित्वात् उभयपदवृद्धिः । पारिषद्योऽपि सभ्यवत् ॥३५॥ परिषदि साधुः पारिषधः । “पर्षदो ण्यणौ" [७।१।१८] इति ण्यः । पारिषद- पार्षदौ अपि । परिषदम् समवैति पारिषद्यः । "पैर्षदो ण्यः" [६।४।४७] इति परिषद्- शब्दाद् द्वितीयान्तात् समवैति समवेतेऽर्थे ण्यः प्रत्ययः इति वा । सभायां साधुः सभ्यः । “तत्र साधौ" [७१।१५] इति यः । यथा सभ्यशब्दः सदस्ये वर्तते तथा पारिषद्योऽपीति ॥३५॥ १-१ जे. प्रतौ पाठो नास्ति । २ एतत् सूत्रम् 'परिषत्' शब्दे कथं प्रवर्तते ? इति विचारणीयम् । । - हमनाममालाशिलोञ्छदीपिका २५ स्युर्नैमित्तिकनैमित्तमौहर्ता गणके निमित्तम् वेत्ति नैमित्तिकः । "न्यायादेः०" [६।२।११८] इति इकण् । निमित्तम्' मुहूर्तम् च वेत्ति नैमित्त: मौहतः । "तद्वेत्त्यधीते" [६।२।११७] इत्यनेन उभयत्र 'अण्' प्रत्ययः । गणयति गणकः ज्योतिषिकः, तत्र । लिपौ । लिखिताऽपि लिप्यते पत्रम् अनयेति लिपिः । स्त्रीलिङ्गः । “नाम्युपान्त्य०" [उ.६०९] इति किः । तत्र । लिख्यते पत्रम् अनयेति लिखिता । "कुशिपिशिपृषि०" [उ.२१२] इत्यादिबहुवचनात् किद् 'इतः' । क्तप्रत्ययो वा। लिखिरपि । मपी मेला मपति हिनस्ति औज्ज्वल्यम् मषिः । “पदिपठिपचि०" [उ.६०७] इति 'इ.' ड्याम्, मपी । मेल्यते अनया मेलनम् वा मेला । “भीषिभूषिचिन्तिपूजि." [५।३।१०९] इति बहुवचनाद् अङ् । यद् गौडः- "मेला स्त्री मेलके मशौ, पत्राञ्जनमपि" । [ "मसिः पत्राञ्जनं मेला" [ ] इति हारावली। प्रस्तावात् मेलानन्दा मसिमणिः इति मषीभाजननाम्नी-अपि ज्ञेये । "[वार्दलोऽपि । यदाह- "क्लीबं दुर्दिवसे मेलानन्दायामपि वादलः" [ ] इति । कुलिके कुलकोऽपि च ॥३६॥ कुलम् अस्त्यस्य कुलिकः । “अतोऽनेकस्वरात्" [७।२।६] इति इकः । तत्र । "कुल बन्धुसंस्त्यानयोः” कोलति कुलकः । “ध्रुधून्दिरुचितिलिपुलिकुलि." [उ.२९] इति किद् अकःः । कुलम् कायतीति वा । "क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः। इति क्षीरस्वामी । कुलश्रेष्ठिनाम्नी ॥३६॥ अष्टापदे बुधैः शारिफलकोऽपि निगधते । अष्टौ पदानि अत्र अष्टापदः । "नाम्नि" [३।२।७५] इति दीर्घत्वम् । तत्र । शारयः फलन्ति अत्र. शारिफलम् , खेलनाधारश्चतुरङ्गफलकादिः । शारीणाम् फलम् । १ जे. मुहूर्तः । २-२ च वेत्ति नैमित्तः मौहूर्तः । जे. प्रतौ नास्ति पाठः। . . ३-३ [ ] चिह्नान्तर्गतपाठो नास्ति प्रा. प्रतौ । . इति.
२६ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता , वा शारिफलम् , के शारिफलकः । शारीणाम् फलक इति वा । पुंक्लीबलिङ्गः । वुधैः- पण्डितैः निगद्यते-कथ्यते । मनोजवस्ताततुल्ये "जु गतौ" सौत्रः । मनो जवतेऽस्मिन् पिता असौ इति धावति मनोजवः । मनोजे अभिलाषे वसतीति वा "क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः । ताततुल्यः पितृसदृशः, तत्र । यदाह व्याडि:- "जनः पितृसधर्मा यः स ताता) मनोजवः ।" [ ] इति । प्रभविष्णुरपि क्षमे ॥३७॥ प्रभवति इत्येवंशीलः प्रभविष्णुः । “भ्राज्यलंकृनिराकृग्भूसहि०" [५।२।२८] इति इष्णुः प्रत्ययः । क्षमते सहते क्षमः समर्थः, तत्र ॥३७॥ जाशि के जाबाकरोऽपि च जङ्घाभ्याम् जीवति जाचिकः, तत्र । वेतनादित्वात् इकण् । जङ्घा एव करो राजदेयोऽस्त्यस्य जङ्घाकरः । जङ्घाभ्याम् आजीविकाम् करोतीति वा जङ्घाकरः । स्वार्थे अणि, जाङ्घाकरः' । लोके यस्य "कासीद" इति प्रसिद्धिस्तन्नाम । अनुगोऽप्यनुगामिनि । अनुगच्छतीति अनुगः । “नाम्नो गमः खड्डौ च०" [५।१।१३१] इति डः । अनुगच्छति इत्येवंशीलः अनुगामी सेवकः, तत्र । 'अजातेः शीले" [५।१।१५४] इति णिन् । शिलकु-लिगु-वराट-पदपदा अपि । पर्येषणोपासनापि शुश्रूपायामधीयते ॥३०॥ “इषच् गतौ" पर्येषणम् पर्येषणा । “पर्यधेर्वा" [५।३।११३] इति अने साधुः । उपासनम् उपासना । “णिवेत्यासश्रन्थघट्टवन्देरनः" [५।३।१११] इति अनः । "श्रृंटः श्रवणे," "गतौ" इत्यन्ये । शुश्रूषणम् शुश्रूषा तस्याम् । “शंसि प्रत्ययात्" । [५।३।१०५] इति अः । अभिधीयते-कथ्यते बुधैरिति गम्यम् । निषेवणम् अपि ॥३८॥ आतिथ्योऽप्यतिथौ अतति सततम् गच्छति आतिथ्यः । “शिक्यास्याढ्यमध्यविन्ध्य०" [उ.३६४] इति यान्तो निपात्यते । अतिथिरेव वा । “भेषजादिभ्यष्टयण" [७।२।१६४] इति स्वार्थे टयण । "आतिथ्थोऽतिथिरागन्तुः" [ इति माला। अतति-सततं १. जे. प्रतो- 'स्वार्थे अणि, जावाकरः, इति पाठो नास्ति । ..
- हैमनाममालाशिलोग्छदोपिका गच्छति अतिथिः । “भतेरिथिः"[उ.६७३] इति इथिः । नास्ति तिथिः अस्येति वा अतिथिः प्राघूर्णकः तत्र । "तिथिपर्वोत्सवाः सर्वे त्यक्ता येन महात्मना । अतिथिं तं विजानीयाच्छेषमभ्यागतं विदुः।" [ इति वचनप्रामाण्यात् । "अध्वनीनोऽतिथिज्ञेयः" [ ]इति च स्मृतिः । स्त्रियां च 'अतिथि' इत्याहुः । कुल्येऽभिजः कुलस्याऽपत्यं कुल्यः । “यैयकत्रावसमासे वा" [६।१।९७] इति यः । अभि- जातोऽभिजः । “क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः । कुलीननाम्नी । गोत्रं तु सन्ततिः। गूयते कथ्यतेऽनेन गोत्रम्, अन्वयः । “हुयाभा०"[उ.४५१] इति त्रः । सन्त- न्यते सन्ततिः । “स्त्रियां क्तिः" [५।३।९१] इति क्तिः । महेला योषिता च स्त्री "मह पूजायाम्" मह्यते महेला । "महेरेलः" [उ.४९२] इति एलः । “युष भजने" सौत्रः । योषति पुरुषम् योषित् । “हृसृरुहियुषि०" : [उ.८८७] इति इत् प्रत्ययः। अजादित्वाद् आपि....योषिता। "जुष परितर्कणे" "जोषयतीति जोषा"[ इति चन्द्रेण चवर्गादिरुक्तः । स्तृणाति धर्मम् , स्त्यायति अस्यां गर्भ इति वा स्त्री । "स्त्री स्यतेः०" [उ.९१५] इति त्रट् प्रत्ययः । तरुणी युवतीत्यपि ॥३९॥ तरति कौमारम् वयः तरुणी । “यम्यजि०" [उ.२८८] इति उनः । “वय- स्यनन्त्ये" [२।४।२१] इति ङीः। "युंक् मिश्रणे" यौति युवती । “योः कित्" [उ.६५८] इति अतिः । “इतोऽक्त्यर्थात्" [२।४।३२] इति वा ङीः ॥३९॥ स्ववासिनी चरिण्टी च चिरिण्टी च चरण्टयपि । वधूट्याम् स्वस्मिन् आत्मनि वसति इत्येवंशीला स्ववासिनी इति द्रमिलाः । “चिरिः सौत्रः स्वादिः" । चिरिणोति चरिण्टी चिरिण्टी च । “हिण्टश्चर् च वा" [उ.१५०] इति चिरेः डित् इण्टः प्रत्ययः, चर् इत्यादेशोऽस्य वा भवति । चरति आत्मनि चरण्टी । "कपटकीकटादयः" [उ.१४ ४] इति अटे निपात्यते । सर्वत्र "वयस्यनन्त्ये" [२।४।२१] इति ङीः । बध्नाति कटाक्षैर्वधूटी । “बन्धेः" [उ.१५७] इति कित् , ऊटः । उह्यते वा वधूः । “वहे च" [उ.८३२] इति । "वहीं प्रापणे!" इत्यस्माद् २८ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता ऊः प्रत्ययो धश्चान्तादेशो भवति । ततो वधूरेव वधूटी । लक्ष्यानुरोधात् दः । यथा स्वर्गग्रामटी कर्कटी इति पृषोदरादित्वाद् वा अटः प्रत्ययः । तस्याम् । वधूटी इत्यपि व्याडिः । पत्न्यां कराती गेहिनी सहधम्मिणी ॥४॥ सधर्मचारिणी चापि पत्नीति पतिशब्दाद् "ऊढायाम्" [२।४।५१] इति डीः, नकारश्चान्तादेशः। तस्याम् । करो हस्त आत्तोऽस्याः, करे आत्ता वा करात्ती । एवं करगृहोती, पाणि- गृहीती, पाण्यात्ती' । "पाणिगृहीतीति" [२।४।५२] इत्यनेन ड्यन्तो निपात्यते । गेहम्-गृहम् अस्त्यस्या गेहिनी । सह धर्मोऽस्त्यस्याः सहधर्मिणी । सह धर्म चरति इत्येवंशीला सधर्मचारिणी, यज्ञादौ सहाधिकारित्वात् । | ...स्नुपायां तु वधूटयपि । स्नौति अपत्यवात्सल्यात् स्नुषा । "स्नुपूसूम्बर्कलुभ्यः कित्" [उ.५४२] इति कित् षः। तस्याम् । बध्नाति वधूटी । “बन्धे" [उ. १५७] इति कित् ऊटः । "वयस्यनन्त्ये" [२।४।२१] इति ङीः । प्रेमवत्यपि कान्तायाम् प्रेम विद्यते अस्याः प्रेमवती । “तदस्याऽस्त्यस्मिन्निति मतुः" [७।२।१] इति मतुः । काम्यते. कान्ता वल्लभा प्रिया तस्याम् । पाणिग्राहो विवोढरि ॥४१॥ परिणेतोपयन्ता च पाणी गृह्णातीति . पाणिग्राहः । “कर्मणोऽण्' [५।१।७२] इति अण् । विवहति परिणयति विवोढा भर्ता, तत्र । परिणयति परिणेता । तन् । उपयच्छते उपयन्ता । अनुस्वारेत्त्वान्नेट् । यौतके दाय इत्यपि । युतयोः-वधूवरयोरिदं यौतकम् , तत्र । दीयते दायः । यत् शाश्वतः-“यौतका- दिधनं दायो दायो दानमुदाहृतम्" । [ ] इति । यौतुकम् अपि । दीधीपूर्दिधिषः "निघृषाट् प्रागल्भ्ये" धृष्णोति दीधीपू: दिधिपूश्च । “धृषेर्दिधिप् दीधीषौ च" [उ. ८४२] इति 'ऊ' प्रत्ययः, धातोश्च दिधिष् दीधीष् इत्यादेशौ भवतः । यद् । १. जे. पण्यासी।
२९ हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका वा, "दिघि धैर्यम्" इन्द्रियदौर्बल्यात् स्यति त्यजति इति दिधिषः । “अन्दूदृन्भूजम्बू." [पा. उ. ९६] इति पाणिनीयोणादिसूत्रेण निपातनात् साधुः । पुन स्त्रीनाम्नी । जीवत्पत्नी जीवत्पतिः समे ॥४२॥ ' जीवन् पतिरस्याः जीवत्पत्नी जीवत्पतिश्च । “पत्युनः'' [२।४।४८] इत्यनेन पत्यन्ताद् बहुव्रीहेः स्त्रियां ङीर्वा भवति । तत्सन्नियोगेऽन्तस्य नकारादेशश्च ॥४२॥ तुल्ये अवीरानिर्वीरे न विद्यते वीरौ-पतिपुत्रौ अस्याः 'अवीरा। निर्गतौ वीरौ- पतिपुत्रौ अस्याः निर्वीरा । निष्पतिसुता स्त्री, तन्नाम्नी । तुल्ये-समाने'। श्रवणा-श्रमणे तथा । शृणोति. श्रवणा । “तृकश्रृषभूवश्रुरुरुहि." [उ.१८७]इति अणः श्राम्यति तपसा श्रमणा । "नन्यादिभ्योऽनः" [५।११५२] इति अनः । रण्डापि विधवा रमते रण्डा । “पञ्चमाड्ड: [उ. १६८] इति डः । विगतो धवो भर्ताऽस्या विधवा । - पुष्पवती स्यात्पुष्पिताऽपि च ॥४३॥ पुष्पम् विद्यतेऽस्याः मतौ पुष्पवती । "पुष्पम् जातमस्यां पुष्पिता" इति माला। तारकादित्वाद् 'इतः ॥४३॥ पुष्पे कुसुममप्युक्तम् "पुष्पच् विकसने" देवादिकः'। पुष्यति पुष्पम् । “अच्" [५।१।४९] इत्यच् । तत्र "कुसच् श्लेषे" कुस्यति कुसुमम् । "उद्वटिकुल्यलिकुथिकुरिकुटिकु- डिकुसिभ्यः कुमः" [उ.३५१] इति किद् उमः । पशुधर्मोऽपि मोहने । पशूनाम् अविवेकिनाम् धर्मः पशुधर्मः । मुह्यन्ति इन्द्रियाणि अत्र मोहनम्- सम्भोगः, तत्र । “अनट्" [५।३।१२.४] इति अनट् । सहोदरे सगभ्यॊऽपि स्यात् सह तुल्यम् उदरम् अस्य सहोदरः, तत्र । समाने गर्भे भवः सगर्व्यः । "भवे" [६।३।१२३] इति यः प्रत्ययः । “सगर्भसयूथसनुताद् यत्" [पा.४।४। १४] पाणिनीयव्याकरणसूत्रेण 'यत्' प्रत्यये वा साधुः । छान्दसोऽपि लोकेऽभि- धानात् । यदाह अमर: १. प्रा. दिवादिः । । - ३० श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता " "समानोदर्यसोदर्यसगर्यसहजाः समाः । [अ.२।६।३४] इति । अग्रजवदग्रिमः ॥४४॥ अग्रे जातो अग्रजः । "क्वचित् " [५।१।१७१.] इति डः । अग्रे भवो अग्रिमः । “पश्चादाद्यन्ताऽग्रादिमः" [६।३।७५ ] इति इमः प्रत्ययः ॥४४॥ शण्ठः शण्डः पण्डरपि क्लीवः शाम्यति शण्ठः । “शमेलृक् च वा" [उ. १६५] इति ठः प्रत्ययः । शाम्यति शण्डः । “शमिषणिभ्यां ढः" [ उ. १७९ ] इति ढः । “पडुङ् गतौ" पण्डते पण्डुः । “पृकाहृषिधृषीषिकुहि०" [उ. १२९] इत्यादिशब्दात् कित् उः। "क्लीबृङ् अधाष्ट्ये" अचि, क्लीबते क्लीबो नपुंसकस्तन्नामानि । माता जनित्र्यपि । मान्यते माता । “मानिभ्राजेर्लक् च" [उ. ८५९.] इति तः । जायतेऽ- स्यां जनित्री । “बन्धिवहि०" [ उ. ४५९] इत्यादिशब्दाद् इत्रः। यद् वा, जनयति जनित्री । शतृप्रत्ययः । "या जनित्री त्रिलोक्या" इत्यन्त वितण्यर्थत्वात् । चिहुरा अपि केशाः स्युः चकन्ते चिहुराः । "श्वशुरकुकुन्दुर०" [ उ. ४२६ ] इति 'उर' प्रत्ययान्तो निपात्यते । यदाह हुग्रः: ( ? दुर्गः )- "कुन्तला मूर्द्धजास्त्वस्राश्चिकुराश्चिहुरा" इति । [...] क्लिश्यते एभिः केशाः । "क्लिशः के च" [ उ, ५३० ] इति शः । शिरोजः, अङ्गजः शिरोरुहः च । कर्णः शब्दग्रहोऽपि च ॥ ४५ ॥ कर्यते आकर्ण्यते अनेन कर्णः । किरति अनेन वा। "इणुर्विशावेणि." [उ. १८२ ] इति णः प्रत्ययः । शब्दो गृह्यते अनेन शब्दग्रहः । शब्दम् गृह्णाति वा अजन्तः ॥ ४५ ॥ नेत्रं विलोचनमपि नीयते दृश्यम् अनेनेति नेत्रम् । पुंक्लीवः । "नीदा०" [५।२।८८] इति त्रट् । "लोचूड् दर्शने" विशेषेण लोच्यते अनेन विलोचनम् । “अनट्[ ५।३।१२४ ] इति अनट् । प्यात्वम् पेत्वम् कणीचिः, अक्षा, तारकम् चापि । सक्वणी सृक्विणी अपि । सृजतो लालां सृक्वणी । “सृजेः स्रज् सृको च" [उ. ९०७ ] इति क्वनिप्, धातोः सृग् इत्यादेशश्च । "छविछिवि०" [उ. ७०६] इति 'वि' प्रत्यये निपातनात 1.जे. प्रती-शिरोजः नास्ति । ।
३१ हमनाममालाशिलोच्छदीपिका सृक्विणी । “प्रान्तौ ओष्ठस्य सृक्विणी" [२।६।९१ ] इति अमरः । क्लीवलिङ्गः । ओष्ठपर्यन्तनाम्नी । दाढिका द्राढिकाऽपि स्यात् दाढाप्रतिकृति ढिका । दाढाप्रतिकृति ढिका । "तस्य तुल्ये कः संज्ञा- प्रतिकृत्योः" [७१।१०८ ] इत्युभयत्र कः। कपोणिस्तु कफोणिवत् ॥ ४६ ॥ [ कीकं ] फणति-गच्छति कपोणिः कफोणिश्च । उभावपि पृषोदरादित्वात् साधू । 'वत्' अर्थः एवम् , यथा कफोणिशब्दः कूपरवाची तथा कपोणिरपीति ॥४६॥ कूपरे कुपरः कृपौङ् सामर्थ्य" कल्पते कूर्परः । “कुरत् शब्दे" कुरति कूपरः । उभावपि "जठरक्रकर०" [उ. ४०३] इति अरे साधू । तस्मिन् कूपरे भुजामध्ये । सिंहतलः संहतलोऽपि च । "तलण प्रतिष्ठायाम्" णिचोऽनित्यत्वाद् अचि तलति तलः, सिंहस्य इव तलः सिंहतलः, सिंहो हि मिलिताभ्यां चपेटाभ्यां हन्ति । संहतम्-संघट्ट लातीति संहतलः संहतलाख्यः । चलुकोऽपि चलुः चलति चलुः । पुंल्लिङ्गः । “भृमृतृ०" [ उ. ७१६ ] इति बहुवचनाद् उः "स्वार्थिके के प्रत्यये चलकः । प्रसृतद्रवाधारः । मुष्के स्यादाण्डः पेलकोऽपि च ॥४७॥ अणति शब्दायते अत्राऽऽहतः प्राणी आण्डः । "कण्यणिखनिभ्यो णिद्वा" [ उ. १६९ ] इति वा णित् डः प्रत्ययः । पेलति ऊर्ध्वम् गच्छति भयेनेति पेलम् । स्वार्थिके के, पेलकः । मुष्णाति शुक्रम् मुष्कः । पुंक्लीवलिङ्गः । “विचिपुषि०" [उ. २२] इति कित् कः । तत्र । स्याद् भवेत् ।। ४७ ॥ पत्पादङ्घ्रिश्च चरणे "पदिंच् गतौ" पद्यते पत् । “क्रुत्सम्पदादित्वात् क्विप्" [५।३।११४]। यदाह व्याडि: 'पत्पादोंऽहिश्चरणोऽस्त्री' [ ] इति पादयति पाद् । णौ क्विप् । 'द'अन्तोऽयम् पुंसि । यदाह दुर्गः- पादसमानार्थः पादप्यस्ति । 'अघुङ् गत्याक्षेपे" अङ्घते अनेनेति अछिः । पुंल्लिङ्गः । 'तङ्कवङ्किअङ्कि- मङ्किअहि." [उ. ६९२ ] इत्यनेन अवेरऽपि रिः प्रत्ययः । चरन्ति अनेन चरणः । .
३२ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता पुंक्लीबलिङ्गस्तत्र । "तृकृशपृ०" [उ. १८७ ] इत्यादिना अणः प्रत्ययः । पद् वापि दन्तोऽयम् । कीकसं हडमित्यपि । कीति कसति कीकसम् । ककन्ते अन श्वान इति वा । "फनस०" [उ.५७३] इति असे निपात्यते । “हड् सौत्रो धातुः" ह्डति हड्डम् "कुगुहुनीकुणी० [उ. १७० ] इत्यादिशब्दात् किद् डः । यदाह वैजयन्ती- "अथास्थिकीकसं हजुम्" [ ] इति । देश्याम् अपि । कपालं शकलमपि "कपिः सौत्रः" कप्यते कपालम् । पुंक्लीवलिङ्गः । "ऋकृमृ०" [उ.४७५] इति आलः । कम् पालयति वा । तच्च मूर्नोऽभस्थि, घटादिखण्डेऽप्युपचारात् । "शक्लंट् शक्तौ” शक्नोति शकलम् । "मृदिकन्दिकुण्डिमण्डिमङ्गिपष्टिपाटि शकि." [ उ. ४६५] इति अलः । पृष्ठास्थनि कशारुका ॥४८॥ पृष्ठस्याऽस्थि पृष्ठास्थि, तत्र | "कश शब्दे" तालव्यान्तः । सौत्रोऽयमिति एके । कश्यते कशारुः । “कृपिक्षुधिपीकुणिभ्यः कित्" [उ.८१५] इति बहुवच- नाद् आरुः । के, कशारुका । स्त्रीक्लीवलिङ्गः ॥४८॥ मज्जायामस्थितेजोऽपि मज्यन्तेऽनया अस्थीनि इति मज्जा । भिदादित्वाद् अङ्, “सस्य शपौ" [१।३।६१] इति "टुमसात् शुद्धौ” इत्यस्य धातोः सस्य शे, "तृतीयस्तृतीय०" [१।३।४९]इति शकारस्य जे मज्जा इति रूपसिद्भिः' । स्त्रीलिङ्गः । तस्याम् । अथनि तेजोऽस्य अस्थितेजः । मज्जति अस्थनि मज्जा इत्यपि । "उक्षितक्षि०" [उ.९००] इति अन् । पुंसि अयम् । वाचस्पतिस्तु-“अथ मज्जा द्वयोः"[ ] इति एनं स्त्रियामप्याह । नाडीपु नाडिनाटिकाः । नडस्येव एताः नाड्यः शौपिर्यात् । नडे: सौत्रस्य वा घञ्प्रत्ययस्तासु । "नडि" सौत्रः । नडन्ति नाडयः । "कमिवमिजमि०" [उ. ६१८] इति बहुवचनात् णित् इः । "नटण् अवस्यन्दने" घनि नाटयः, के, नाटिकाः । नाडय एव नाडिका इति एके पेटुः । शिङ्खाणकोऽपि शिक्षाणः १. जे. रूपसिद्धः । , . हैमनाममालाशिलोच्छदीपिका "शिघु आघ्राणे" तालव्यादिः। शिङध्यते शिवाणकः । “धालशिचिभ्यः" [उ.७०] इति आणकः प्रत्ययः । शिश्ते शिवाणः । “बहुलम्" [५।१।२] इति आणः । सिंहाणम् अपि । नासिकामलनाम्नी । मृणीका सृणिकाऽपि च ॥४९॥ सरति गच्छति मुखात् सृणीका । "सृणीकाऽस्तीक०" [उ.५०] इति इके निपात्यते । “कुशिकहृदिकमक्षिक." [उ.४५] इति इकप्रत्यये निपातनात् सृणिका लाला तन्नाम्नी ॥४९॥ शान्तः पान्तश्च विड् गूथेऽशुचि "विशंत् प्रवेशने' विशति पक्वाशये विट् । “विष्लँकी व्याप्तौ" वेवेष्टि अन्त्रम् विट् । शान्तः शकारान्तः, षान्तः पकारान्तश्च । शान्तपक्षे रूपाण्येवम्-विट्, विड्, विशौ, विशः । षान्तपक्षे यथा-विट्, विड्, विषौ, विषः । स्त्रीलिङ्गः । वैजयन्तीकारस्तु-"उच्चारो विटू नना' [ ]इति" क्लीबेप्याह । अमरस्तु-"विष्ठाविषौ स्त्रियाम्" [ २।६।६८ ] इति मूर्धन्यम् घम् आह । गूयते उत्सृज्यते गूथम् । पुक्लीवलिङ्गः । “पथयूथ०" [ उ. २३१ ] इति थे निपात्यते । तत्र । न शुचि अशुचि । क्लीबलिङ्गः। आरालम् अपि । दीर्घादिरयम् । वेशोऽपि वेषवत् । "विशत् प्रवेशे' विशति चेतोऽत्रः वेशः, तालव्यान्तः । “पदरुज." [५।३। १६] इति घञ् । वेवेष्टि अङ्गम् वेषः । वस्त्रालङ्कारमाल्यप्रसाधनैरङ्गशोभा । यथा वेष- शब्दो नेपथ्ये, वर्तते तथा वेशोऽपि । उत्सादनोच्छादनौ च "षद्ल विशरणगत्यवसादनेषु" उत्साद्यते मलोऽनेन उत्सादनम्, उद्वर्तनम् । "छंदण अपवारणे" उच्छाद्यतेऽनेन उच्छादनम् । उभयत्र “अनेट" [५।३।१२४] इति अनट् । : आप्लवाप्लावौ तथा समौ ॥ ५० ॥ ":लुंङ् गतौ" आप्लवनम् आप्लवः आप्लावः । “आङो रूप्लोः" [५।३।४९] इति वा अल् प्रत्ययः । स्नाननाम्नी ॥५०॥ वंशकं कृमिजग्धं चागुरौ स्यात् । वंशप्रतिकृति वंशकम् इति अमरटीका । "तस्य तुल्ये कः संज्ञाप्रतिकृत्योः" [७।१।१०८] इति कः । कृमिभिर्जग्धम् कृमिजग्धम् । यदाहुः ३४ । श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता "अगुरु प्रवरलोहं कृमिजग्धमनार्जकम् "। इति न गुरुः अगुरुः । पुंक्लीवलिङ्गस्तत्र । अथ वाल्हिकम् । संकोचं पिशुनं वर्ण्यमसक्संज्ञं च कुङ्कुमे ॥ ५१ ॥ "वर्हि वल्हि प्राधान्ये" वल्हते वल्हिः । “पदिपठि०" [उ.६०७] इति इः। बाहुलकाद् दीर्घ, वाल्हयः । स्वार्थिक के, वाल्हिकाः देशस्तेपु. भवं वाह्निकम् । "कोपा- त्यात्०" [६।३।५६] इति अण् । "कुच सम्पर्चनकौटिल्यप्रतिष्टम्भविलेखनेपु" संकोचति . कुटिलीभवति संकोचम् । “अच्" [५।११४९] इत्यच् । “पिशंत् अवयवेऽपि" पिशंति पिशुनम् । "पिशिमिथिक्षुधिभ्यः कित्" [उ. २९०] इति किद् उनः । वर्ण्यते वर्ण्यम् । “य एच्चाऽऽतः" [५।१।२८] इति यः। असक्संज्ञाऽस्य असृक्संज्ञम् । "कुकि आदाने" कुक्यते कुङ्कुमम् । “कुन्दुमलिन्दुमकुङ्कुमविद्रुमपट्टमादयः" [उ. ३५२] इति 'कुम'- प्रत्ययान्तो निपात्यते । क्लीबलिङ्गोऽयम् । वाचस्पतिस्तु "निदाघेऽपि कुङ्कुमः सुखः स्यात्" इति पुंस्याह । तत्र अग्निशिखम्, कश्मीरजम्, हरिचन्दनम् असृक च ॥५१॥ जापके कालानुसार्यम् । जापकाद्रिभवत्वात् जापकम् कालीयकम् , तत्र कालायाम् भूमौ अनुसार्यते कालानुसार्यम् । यावनोऽपि च सिल्हके । यवनदेशे भवो यावनः । "भवे" [६।३।१२३] इति अण् । “सिलत् उञ्छे" दन्त्यादिः । सिलति सिल्हः । “बहुलम्" [५।१।२] इति हः । सिलम् जहाति इति वा । "क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः, के, सिल्हकम् , तत्र । मकुटोऽपि च कोटीरे। "मकुङ् मण्डने" मयते मण्ड्यते शिरोऽनेन मकुटम् । “मधेर्मकमुकौ च" [उ. १५४] इति उटः, मङ्केश्च मक् इत्यादेशः । “कुटत् कौटिल्ये" कुटति कोटी- रम् । “कृशृपपूग्मञ्जिकुटि ०" [उ. ४१८] इति ईरः । बाहुलकाद् गुणः, तत्र तिरी- टम् अपि । चित्रकं च विशेषके ॥ ५२ ॥ चित्र्यते शिरोऽनेन चित्रम् , के, चित्रकम् । क्लोबलिङ्गः । विशिनष्टि ललाटम् विशेषकम् । पुंक्लीवलिङ्गः । तिलकस्तत्र ॥५२॥ वतंसोऽप्यवतंसे स्यात् । "भूष तसु अलङ्कारे" अवतंस्यतेऽनेन अवतंसः। ".
•. हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका "व्यञ्जनाद् घ" [५।३।१३२] "वाऽवाप्योस्तनिकीधाग्नहोर्वपी" [३।२। १५६] इति अवस्य 'व' आदेशे वतंसः। अवतनोति शोभाम् इति अवतंसः, तत्र । “व्य- वाभ्यां तनेरीच्च वेः" [उ. ५६५] इति सः । वीतंसोऽपि । पत्रभङ्गयां तु पण्डितः। पत्राद् वल्लरी तत्र मजरो च तथोदिता ॥५३॥ पत्राकृतिर्भङ्गिः पत्रभङ्गिः । “इतोऽक्त्यर्थात्" [२।४।३२] इति ड्याम् पत्रभङ्गी, तस्यां पत्रभङ्गयाम्-पत्रलेखायाम् । स्त्रीणां कपोल-स्तनमण्डलादिषु कस्तूरिकादिभिः पत्ररचनायामित्यर्थः । पत्रात् पत्रशब्दादने वल्लरी इति प्रयोज्यते तत एवं, पत्राकृति- वल्लरी पत्रवल्लरी । पत्राकृतिर्मञ्जरी पत्रमञ्जरी । पण्डितैः उदिता- कथिता॥ ५३ ॥ कर्णान्दूरपि कर्णान्दुः । कर्णयोः अन्यते बध्यते कर्णान्दूः । “कृषिचमितनिधन्यन्दि." [उ. ८२९] इति ऊः प्रत्ययः । इति वैजयन्तीकारः । "भृमृतृत्सरि०" [उ. ७१६] इति बहुवचनाद् 'उ'प्रत्यये कर्णान्दुः । 'उरिक्षप्तिका कर्णलाालेका इत्यन्ये । यदाहुः' "उत्क्षिप्तिकायां कर्णान्दुः कर्णपाश्यामपि स्त्रियाम्"। [] इति । द्वयोरपि यथा-"सुवर्णकर्णान्दुविलोलकर्णा ।" [ परिहार्योऽपि कङ्कणम्। परि-सर्वतोभावे हियते परिहार्यः । "ऋवर्णव्यञ्जनाद् घ्यण" [५।१।१७] इति घ्यण् । कङ्कते याति हस्तम् कङ्कणम् । “तकृशृपभ्वश्रुरुहिरु०" [उ.१८७] इति अणः । प्रतिसरः । किङ्कणी कङ्कणी तुल्ये। कङ्कते याति कटीम् किङ्कणिः कङ्कणिश्च । “कङ्केरिच्चास्य वा" [उ. ६३९] इति अणिः, धातोः अकारस्य च इकारो वा भवति । ड्याम् किङ्कणी कङ्कणी, किङ्किणीका इत्यपि । आच्छादाच्छादने समे ॥ ५४॥ आच्छाद्यतेऽनेन आच्छादः । “युवर्ण०" [५।३।२८] इति अल् । आच्छाद- नम् । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] अनट् इति अनट् । वस्त्रनाम्नी ॥५४॥ कूर्पासोऽप्यङ्गिका । 1. जे. प्रतौ. 'उत्क्षिप्तिका कर्णलालिकेत्यन्ये । यदाहुः' इति पाठो नास्ति । २. जे. 'कङ्कणी' नास्ति ।
३६ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता . "कुरत् शब्दे" कुरति कूर्पासः। "कृकुरिभ्यां पासः" [उ. ५८३] इति पासः । कूपरे अस्यते वा, पृषोदरादित्वात् साधुः । अङ्गस्य प्रतिकृतिरिति अङ्गिका । "तस्य तुल्ये कः संज्ञाप्रतिकृत्योः" [७१।१०८] इति कः । कञ्चुलिकानाम्नी । कक्षापटे कक्षापुटोऽपि च । कक्षयोः पटः कक्षापटः, कौपीनम् , तत्र कक्षयोः पुटः कक्षापुटः । कुथे वर्णपरिस्तोम इत्यखण्डं जगुः परे ॥५५॥ तत्रास्तरणमिति च कुथ्यते क्लिश्यते कुथः स्थादित्वात् के । क्रियते कार्यते वा “पथयूथ०" [उ.२३१] इति थे निपात्यते । तत्र वर्ण्यते वर्णः । परिस्तोम्यते प्रस्तीर्यते परि स्तोमः । वर्णश्चासौ परिस्तोमश्च वर्णपरिस्तोमः । अखण्डम् परिपूर्णम् जगुः-ऊचुः अपरे आचार्याः ॥५५॥ तत्र कुथे "स्तृग्श् आच्छादने" आस्तीर्यते हस्तिपृष्टम् अनेन आस्तरणम् । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९]इति अनट् । पल्यकोऽप्यवसक्थिका । पर्यञ्च्यते पर्यश्यते वा पल्यङ्कः । “परेर्धाङ्क०" [२।३।१०३] इति लत्वम् । सक्थिप्रतिकृतिः सक्थिका, यष्टिः । अव आलम्बने. अव्ययम् । अव आलम्बनार्थम् सक्थिका अत्र अवसक्थिका । अवनद्धे अवकृष्टे वा सक्थिनी अस्याम् भवसस्थिका । "सक्थ्यदणः स्वाङ्गे" [७३।१२६] इति समासान्तः टः प्रत्ययः, टित्त्वात् ङीः, ततः स्वार्थे कः प्रत्ययः ।। यमन्यपि प्रतिसीरा "यमू उपरमे" यच्छन्ति अस्याम् यमनी । यम्यतेऽनया वा अनट् । प्रति सिन्वन्ति एनाम् प्रतिसीरा । “चिजिशुसि०" [उ.३९२] इति रः । स्रस्तरः प्रस्तरोऽपि च ॥५६॥ संसते अत्रेति त्रस्तरः । “जठर०" [उ.४०३] इति अरे निपात्यते । प्रकर्षण स्तीर्यते प्रस्तरः, पल्लवपत्रादिरचिता शय्या ॥५६॥ प्रतिग्रहपतद्ग्राहावपि स्यातां पतद्ग्रहे । प्रतिगृह्णाति आवेलकादि प्रतिग्रहः । पतद् गृहणाति पतद्ग्राहः । “वा ज्व- लादि."[५।११६२] इति णः । स्याताम्-भवेताम् । पतद् गृह्णाति पतद्ग्रहः, तत्र । मुकुरोऽप्याऽऽत्मदर्शे- १. जे. स्थादित्वात् साधुः । २. प्रा. प्रत्तार्यते । ३. प्रा. "हस्तिपृष्ठम्" नास्ति । ..
हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका ३७.. मङ्कयते मण्ड्यते वपुः अनेन मुकुरः । “मधेर्न लुक् वोच्चास्य" [उ.४२४] इति । "मकुङ् मण्डने" इत्यस्य उरः प्रत्ययः नकारस्य लुक्, अकारस्य च वा उकारः स्यात् । आत्मा दृश्यते अनेन आत्मदर्शी दर्पणः, तत्र । अथ कशिपुः कसिपुः समौ ॥५७॥ कसति गच्छति क्लेशोऽनेन कसिपुः । · पुंक्लोबलिङ्गः । “कश शब्दे" कशति क्लेशम् कशिपुः । तालव्यमध्य इति अमरः। उभयत्र “कस्यतिभ्यामिपुक"[उ.- ७९८] इति इपुक् ॥५७॥ यावकालक्तकौ यावे याव एव.. यावकः । “यावादिभ्यः कः" [७३।१५] इति स्वार्थे कः प्रत्ययः । न लज्जते अलति दीप्यते वा अलक्तः । “पुतपित्त" [उ. २०४] इति ते निपात्यते । यद्वा ईपद् रक्त अरक्तस्ततो रस्य लत्वम् । "यावादिभ्यः कः" [७।३।१५] इति स्वार्थिक के, अलक्तकः । यूयते यौति मिश्रीभवति वा यवः । स एव "प्रज्ञादि०" [७२।१६५] अणि,. यावः, तत्र । यद् धनपाल:- "तद्रागो यावकोऽलक्तकः स्मृतः" । अमरादयस्तु— “यावालक्तौ लाक्षादिभिः सहैकार्थी"[ ] आहुः । तुल्ये व्यजनवीजने । व्यजन्ति विक्षिपन्ति वातम् अनेन व्यजनम् , तालवृन्तम् । अनट् । “ईजि कुत्सने च, चकाराद् गतौ" विशेषेण ईज्यते प्रेर्यते वीजनम् । “अनट् [५।३।१२४] इति अनट् । “वीजण् व्यजने" अनटि, इत्यस्य वा रूपम् । तुल्ये-समे । गिरीयको गिरिकोऽपि वालक्रीडनके मतौ ॥५८॥ गीर्यते याति च गिरीयकः । पृषोदरादित्वात् साधुः । गीर्यते गिरिः । “नाम्यु- पान्त्यकग " [उ.६०९] इति किद् इः, स्वार्थिके के, गिरिकः । बालाः क्रीडन्ति अनेन बालक्रीडनम् , स्वार्थिक के बालक्रीडनकम् , तत्र, मतौ-सम्मतौ ॥५८॥ गेण्डुकोऽपि गेन्दुकः गाते गच्छति गाः-गच्छन् ईड्यते-स्तूयते गेण्डुकः । “कञ्चुकांशुक० [उ.५७] इति उके निपात्यते । गाः-गच्छन् इन्दुकः-गुडकः गेन्दुकः, गगने इन्दुरिव वा पृषोदरादित्वात् साधुः । कन्दुः अपि । १. जे. इत्यस्मात् रः । २. जे. वातमनोन । '३. प्रा. प्रतौ-'वीजण् व्यजने अनटि इत्यस्य वा रूपम्' इति नास्ति पाठः। प्रा: ४. 'गुडकः', नास्ति । .
श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता राम- राट् मूर्भावसिक्त इत्यपि । राजते दीप्यते राट् राजा । मूर्दनि-मस्तके अवसिच्यते स्म मूर्द्धावसिक्तः । भरतः सर्वदमनोऽपि विभर्ति धरणीम् इति भरतः--दौष्यन्तिः। "दृपृभृ०" [उ. २०७] इति अतः । सर्वान् दमयति सर्वदमनः । "नन्द्यादिभ्योऽनः' [५।१।५२] इति अनः । अथ दाशरथावुभौ ॥५९॥ रामचन्द्र-रामभद्रौ दशरथस्य अपत्यम् दाशरथिः । “अत इञ्" [६।१।३१] इति इञ् । तत्र दाशरथौ रामे । रमते रामः "वा ज्वला . [५।१।६२] इति णः । चन्दवि दीप्यते आह्लादयति वा चन्द्रः । "ऋज्यजि." [उ. ३८८] इति कित् रः । श्वासौ चन्द्रश्च रामचन्द्रः । भन्दते मनोऽत्र भद्रः । “भन्देर्वा” [उ. ३९१] इति रो नलुक् । रामश्चासौ भद्रश्च रामभद्रः । हनूमानपि मारुतौ। हनुः अस्त्यस्य हनूमान् । “घञ्युपसर्गस्य बहुलम्" [३।२।८६] इति बहुलवचनात् दीर्घः । इन्द्रव्याकरणे तु "क्वचिन्मतो दीर्घः' [ ] इत्यनेन सूत्रेण दीर्घः । “हनूः इति दी|कारान्तोऽयम्" इति अन्ये । मारुतस्य अपत्यम् मारुतिः । “अत इञ्" [६।१।३१] इति इञ् । तत्र । वालौ सुग्रीवाग्रजोऽपि, वालयतीति वालिः । “स्वरेभ्य इ." [ उ. ६०६] इति इः । तत्र सुग्रीवस्य अग्रजः सुग्रीवाग्रजः । पार्थे वीभत्सुरित्यपि ॥६॥ पृथायाः-कुन्त्या अपत्यम् पार्थः अर्जुनः, तत्र बीभत्सते वीभत्सुः । “सन्- भिक्षाऽऽशंसेरुः" [५।२।३३] इति उः ॥६०॥ सातवाहनवत् सालवाहनोऽपि प्रकीर्तितः। सातम्-दत्तम् सुखम् वाहनम् अस्य सातवाहनः । सालस्य-देवदारुद्रुमस्य वाहनम् अस्य सालवाहनः । सालम्-लक्ष्मीदीप्तम् वाहनम् अस्येति वा । वदर्थः प्राग्वद् अवसेयः । प्रकीर्तितः कथितः बुधैरिति गम्यते । . परिच्छदे परिजनः परिवहणमित्यपि ॥६॥ परितश्छाद्यतेऽनेन परिच्छदः । “पुन्नाम्नि." [५।३।१३०] इति घे, "एको- पसर्गस्य." [४।२।३४] इति हत्वः । परिवारः तत्र परितो जन्यतेऽनेन परिजनः ।
हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका ३९ परिवीते-वर्द्धचते परिबीते' प्राधान्यम् भज्यते हिंस्यते वाऽनेन परिबर्हणम् । "करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अनट् । परिधायोऽपि ॥६१॥ मन्त्री बुद्धिसहायोऽपि मन्त्रः कर्तव्यावधारणम् अस्त्यस्य मन्त्री। बुद्धयाः सहायः-संखा बुद्धिसहायः । "मन्त्रिण गुप्तभाषणे" "पदिपठिपचिस्थलि०" [उ. ६०७ ] इति 'इ' प्रत्यये मन्त्रयति मन्त्रिः इत्यपि । वेत्री वेत्रधरोऽपि च । वेत्रम्-वेत्रदण्डः अस्त्यस्य वेत्री। वेत्रम् धरतीति वेत्रधरः । हेमाध्यक्षे हैरिकोऽपि । हेम्नः स्वर्णस्य अध्यक्षः हेमाध्यक्षः । तत्र हिरण्ये नियुक्तो हैरिकः, इति नैरुक्ताः। तत्र नियुक्ते" [६।४। ७४] इति इकण् । टङ्कपतिस्तु नैष्किके ॥ १२ ॥ टङ्कानाम्-दीनारादीनाम् पतिः टङ्कपतिः । निष्के-दीनारादौ नियुक्तो नैष्किकः। "तत्र नियुक्ते" [ ६ । ४ । ७४] इति इकण ।। ६२ ॥ शुद्धान्ताध्यक्ष आन्तश्मिकान्तःपुरिकावपि । शुद्धान्ते-अन्तःपुरे अध्यक्षः शुद्धान्ताध्यक्षः । अन्तर्वेश्मनि नियुक्तः आन्तर्वे- श्मिकः । अन्तःपुरे नियुक्तः आन्तःपुरिकः । उभयत्र "तत्र नियुक्ते" [ ६१४७४ ] इति इकण् । -- सहाय-साप्तपदीनौ सख्यौ । सह अयते चरति सहायः । सप्तभिः पदैः अवाप्यते साप्तपदीनः । “समांसमीन." [ ७॥ १।१०५] इति ईनजि साधुः । सनोति सनति वा सखा-मित्रम्, तत्र । "सनेर्डखिः" [ उ. ६२५ ] इति डखिः । नन्तोऽपि । असुहृदप्यरौ ।। ६३॥ न सुहृत्-मित्रम् असुहृत् । नास्ति शोभनम् हृदयम् अस्य वा । इयर्ति अरिः । "स्वरेभ्य इ." [उ. ६०६ ] इति इः । तत्र दुर्भिदः, भ्रातृव्यः, निगृहीतासिः, आत- तायी च ।। ६३॥ नये नीतिरपि । नयनम् नयः । अलं । नयति शोभाम् वा। अच्” [ ५।१। ४९:] इति अच् । तत्र । नीयते नयनम् वा नीतिः । "स्त्रियां क्तिः" [ ५।३। ९१] इति क्तिः । १. जे प्रतौ-'वद्धर्थते परिवह्यते' इति पाठो नोपलभ्यते । २. जे. सुवर्णस्य । .
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श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता
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स्कन्धाबारेऽपि शिविरो मतः ।
चतुरङ्गसैन्यस्य प्रधानभूतत्वात् राजा स्कन्धस्तम् आवृणोति स्कन्धावारः, तत्र ।
कर्मणः अण् । “शव गतौ" तालव्यादिः । शवति चतुरङ्गसैन्यम् इति शिविरः ।
"शवशशेरिच्चातः” [उ. ४१३ ] इति इरः, धातोः अकारस्य च इकारादेशः ।
जयन्त्यपि वैजयन्त्यां पटाकाऽपि प्रकीर्तिता ।। ६४ ॥
जयति जयन्ती । “तजीभूवदि०" [उ. २२१ ] इति अन्तः । विजयन्तस्य
इयम् वैजयन्ती । “तस्येदम्" [६।३।१६० ] इति अण् । “अणजेये." [२।४।२०]
इति ङीः । तस्याम् । “पट गतौ” पटति पटाका । 'शलिबलिपतिवृतिनभिपटि."
[उ. ३४ ] इति आकः । प्रकीर्तिता-कथिता । धूका, ध्वाजिः च ॥६४||
ध्वजः पताकादण्डोऽपि।
ध्वजति धूयते ध्वजः । पताकायाः दण्डः पताकादण्डः तन्नाम ।
झम्पानं याप्ययानवत् ।
"चमूछमूजमूझमूजिमू अदने" झमति. अत्ति इव झम्पानम् । “मुमुचान-
युयुधान [उ. २७८] इति आने निपात्यते । याप्यस्य अशक्तस्य यानम्-युग्या-
ख्यम् याप्ययानम् । यथा 'याप्ययान'शब्दः शिबिकावाची तथाऽयमपीति गौडः।
सादी सव्येष्ठोऽपि सूते ।
"पद्ल विशरणगत्यवसादनेषु" सीदतीति सादी। ग्रहादित्वाद् णिन् ।
सादिः अपि । सव्ये तिष्टतीति सव्येष्ठः । “स्थापास्नात्रः कः” [५।१।१४२] इति
कः । भीरुष्ठानादित्वात् षत्वम् , सप्तम्यलुप् च । सुनोति सूतः । “सुसितनि०" [ उ.
२०३ ] इति तो दीर्घत्वं च । सुवतीति वा । तत्र ।
कवचितोऽपि वर्मिते ।। ६५ ।।
कवचम् जातम् अस्य कवचितः । वर्म: जातम् अस्य वर्मितः । उभयत्र
तारकादित्वाद् इतः, तत्र ॥६५॥
कवचे दंशनं त्वक्त्रं तनुत्राणमपि स्मृतम् ।
"कुङ् शब्दे" कवते कवचम् । पुंक्लीवलिङ्गः । “कल्यविमदिमणिकुकणिकटि-
कृभ्योऽचः" [उ. ११४] इति अचः । दश्यते-बध्यते . देहे दंशनम् । “अनद"
[ ५।३।१२४ ] इति अनट् । त्वचम् त्रायते त्वक्त्रम् । "क्वचित्!' [५।१।१७१]
इति. डः । तनोः-शरीरस्य त्राणम्-रक्षणम् तनुत्राणम् । स्मृतम् उक्तम् । अरित्रम्
इत्यपि ।
अधियाङ्ग धियाङ्गं चाधिकाङ्गवदुदाहृतम् ॥ ६६ ॥
. हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका अधिकम् अङ्गात् अधियाङ्गम् । निरुक्तिवशात् कस्य यकारादेशः । यदाह मुनिः- "अधियाङ्गं सारसनम्" । [ ] इति । "धित् धरणे". धियति देहम् धिया- ङ्गम् । “पतितमितृपकृशृल्वादेरङ्गः" [ उ. ९८ ] इति अङ्गः, बाहुलकाद् दीर्घत्वम् च । यदाह हुग्रः (? दुर्गः) "तस्य सारसनं ज्ञेयं धियाङ्गं च निवन्धनम्" । [ ]इति । अधिकम् अङ्गात् अधिकाङ्गम् । यत् सकञ्चुकैढदि धार्यते तन्नामानि । वदर्थः पूर्ववद् अवसेयः ॥६६॥ शिरस्कं खोलमप्याहुः शिरसो मस्तकस्य प्रतिकृतिः शिरस्कम् । “खोल खोटने" खोल्यते बाणादि प्रतिहन्यतेऽनेन खोलम् । अल् । स्यान्निपङ्ग्यपि तूणिनि । निषङ्गोऽस्त्यस्य निषङ्गी । तूणम् अस्त्यस्य तूणी, धनुर्धरः तत्र । चापे धनूधनुशरासनान्यपि विदुर्बुधाः ॥ ६७ ॥ चपस्य-वेणोर्विकारः चापः, तत्र । "विकारे" [६।२।३० ] इति अण् । धन्यते-अर्थ्यते धनति शब्दायते ज्याघातेन वा धनः । “कृषिचमितनिधनि०" [उ. ८२.९] इति ऊः प्रत्ययः । स्त्रीलिङ्गः । “भृमृतत्सरितनिधनि" [उ. ७२६ ] इति 'उः' प्रत्यये धनुः उकारान्तः । पुंक्लीबलिङ्गः । शरस्यासनम् शरासनम् । विदुर्जानन्ति बुधाः-पण्डिताः । कालकम् , कालपृष्ठम् ; अवसम् , कमरम् च ॥ ६७ ॥ फरकस्फरको खेटे फलति विशीर्यते फलम् । स्वार्थिक के फलकम् । रलयोरैक्ये फरकम् । पुंक्लीवः । स्फरति चलति स्फरकः । कुटादिः अयमित्येके । तत्पाठवलाच्च णके वृद्धयभावः । खेटयति उत्त्रासयति खेटम्. । पुंक्लीवः । तत्र विविक्त- वसुनन्दको अपि । क्षुरिका छुरिका छुरी। क्षुरति-विखनति क्षुरिका । णके आप्....छुरति-छिनत्ति छुरिका । “अच्" [५।१।४९] इति अचि, छुरी । इल्यां तरवालिकाऽपि १. प्रा. प्रतो. 'तत्र' नास्ति। , કર श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता . . । . . भामा ईल्यते-स्तूयते ईली, एकधारोऽसिः, तुरुष्कायुधम् । तत्र' । तरस्य बलस्य वालः तरवालः अल्पः तरवालस्तरवालिका । न्युजः, खड्गः । कडतलम् इति व्याडिः। स च देश्याम् अपि । परिघः पलिघः समौ ॥६८॥ परिहन्यते अनेनै परिघः, लोहबद्धो लगुडः । "परेः" [५।३।४०] इति अलि घ'आदेशः । "परेोङ्कयोगे" [ २।३।१०३ ] इत्यनेन रेफस्य लत्वे पलिघः ॥६८॥ ऊर्जस्व्यूर्जस्वान् ऊर्ग बलमस्त्यस्य ऊर्जस्वी । " ऊर्जा विन्वलावश्चान्तः" [७२।५१ ] इति विन् प्रत्ययः, अस् च अन्तः। ऊों बलम् अस्त्यस्य ऊर्जस्वान् । “तदस्या- स्त्यस्मिन् इति मतुः" [७।२।१] इत्यनेन ऊर्जयतेरस्प्रत्ययान्तस्य मतुः प्रत्ययः । मतौ ऊर्वान् अपि । ऊर्जातिशयान्वितः । मगधो महो वोधकरोऽर्थिकः मगधः कण्ड्वादौ। मगध्यति याचते मगधः । अच् । वंशोदीरणेन यो याचते । यदाहुः-"मागधाः स्तुतिवंशजाः" इति । “मनिच् ज्ञाने" मन्यते मङ्खः । "शमिमनिभ्यां खः" [उ. ८४ ] इति खः । बोधम्-प्रबोधम् करोति मङ्गलपाठैरिति बोधकरः। अर्युव अर्थिकः । स्वार्थिकः कः । अर्थो विद्यतेऽस्य वा । "अतो- डनेकस्वरात्" [७२।६ ] इति इकः । सौखशायनिकः सौखशय्यिकः सौखसुप्तिकः ॥६९॥ सुखम् च तत् शयनं च सुखशयनम् , सुखशयनम् पृच्छति सौखशायनिकः । "सुस्नातादिभ्यः पृच्छति" [ ६।४।४२] इति इकण् । अनुशतिकादिपाठात् उभयपदवृद्धिः । सुखशय्याम् पृच्छति सौखशय्यिकः । सुखम् खुप्तम् पृच्छति सौख- सुप्तिकः । उभयत्र "सुस्नातादिभ्यः पृच्छति" [ ६।४।४२ ] इति इकण् । वैता- लिकनामानि ॥६९॥ भरणे संस्फेटसम्फेटौ "" रणन्ति शब्दायन्ते दुन्दुभयोऽत्र रणम् । पुंक्लीवः ।। "पुन्नाम्नि०" [५।३। १३० ] इति वाहुलकाद् घः । तत्र । “पट्ट स्फिटण् हिंसायाम्" संस्फेटयंति कातर- हृदयानि संस्फेटः । “पुन्नाम्नि" [५।३।१३०] इति घः । स्फेटोऽपि । १.जे. प्रतो तत्र' नास्ति । २. प्रा. प्रतौ अनेन नास्ति'३.जे. संस्फोटयति । . '. १.जे.संस्फोटः। .
, म :11 हैमनाममालाशिलोच्छदीपिका सम्फेट इति. भरतः । पृषोदरादित्वात् साधुः । णके स्फेटकोऽपि । सहुरिः दन्त्यादिरयम् , हान्त्रम् , असुरिः, घासिः, गुबेरम्, युध्मः, तिल्पम् च | बले द्रविणमूल तथा । बलति अनेन बलम् । पुंक्लीबः । “वर्षादयः क्लीवे" [५।३।२९] इति- अल्'। तत्र । “द्रु गतौ” द्रवति द्रविणम् । “द्रुहृवृहिदक्षिभ्यः इणः [उ.१९४] इति इणः । "ऊजण् बलप्राणनयोः" ऊर्जयतीति ऊर्क "दिद्युइ० वाश ८३] इति क्विप् । “रात् सः" [ २।१।९०] इति नियमादत्र संयोगान्तलोपों नास्ति । परीरम् , ऋजीकम् , माहिनम्, ताविषम् , तविषम्, विप्रः च ।। अवस्कन्दोऽपि धाटयां स्यात्, j 'FITI 929 "स्कन्दं गतिशोषणयोः" अवस्कन्दनम् अवस्कन्दः । अल । अवस्कन्दन्ति, अत्र वा । अच् । धावन्तोऽटन्ति अस्यां धाटिः । पृषोदरादित्वात् साधुः । ड्याम् धाटी, तस्याम् । 'नशनं च पलायन ॥७॥ नश्यते नशनम् । “अनट्" [५।३।१२४] इत्यनट् । पलाय्यते पला- तत्र । “उपसर्गस्याऽयौ" [२।३।१००] इत्यनेन उपसर्गसम्बन्धिनो रेफस्य लत्वम् ॥७॥ चारकोऽपि भवेद् गुप्तौ, Hasir चरन्ति अनेन चारः । स्वार्थिक के, चारकः । गुप्यते रक्ष्यतेऽस्यां पुमान् गुप्तिः । “स्त्रियां क्तिः" [५।३।९१] इति क्तिः । तस्याम् । तापसे तु तपस्व्यपि । तपः शीलम् अस्य तापसः । “अस्थाच्छत्राऽऽदे:०"" [६।४६० ] इति अञ् । तपोऽस्यास्तीति वा । ज्योत्स्नादित्वाद् अण् । तपो विद्यतेऽस्य तपस्वी । "अस्तपोमायामेधानजो विन्" [७।२।४८ ] इति विन् । गाना ! विप्रे ब्रह्माऽपि च ETER विविधं प्राति-पूरयति विप्रः । "क्वचित् [५।१।१७१] इति डा । विशेषेण पातीति वा । "खुरक्षुर०" [ उ.३९६] इति रे निपात्यते । तत्र । वृंहते ब्रह्मा । अभेदोपचारात् “हेर्नोऽच्च" [उ.९१३] इति मन्, नकारस्य चाऽकारः । आग्नीध्राऽऽग्नीध्रयपि "निइन्धैपि दीप्तौ” अग्निम् इन्द्धे अग्नीध् क्विम्, “नो व्यञ्जनस्य." [१२१४५] इति नलुक् । अग्नीधः । ऋत्विविशेषस्य इयं आग्नीधा । गृहेऽग्नीधो रण् धश्च" १. जे. इत्पम् । १. जे. 'न' नास्ति । यनम् ,
४४
श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता
[६।३।१७४] इति रण् प्रत्ययः । अन्तस्य तृतीयबाधनाथ धादेशश्च । आग्नीधा
एव आग्नीध्री : प्रज्ञादित्वात् स्वार्थे अण् इति अण् । “अणजेय." [२।४।२०]
इति डीः । अग्नीन्धननाम्नी ।
वृषी वृसी ॥७॥
ब्रुवन्तः सीदन्ति अस्यां वृषी, तपस्विनामासनविशेषः । पृषोदरादित्वात्
साधुः । गौरादित्वाद् ङोः । ब्रुवन्तः सीदन्ति अस्यां वृसी। पृषोदरादित्वात् गौरादि-
स्वाद् ङीः, बाहुलकाद् षत्वाभावः । तालव्योपान्त्योप्ययम् इति एके ॥१॥
शसने शमनं च
"शस् हिंसायाम्" शस्यते शसनम् । “अनद" [५।३।१२४] इति अनट् ।
शम्यते शमनम् । अनट् । यज्ञविषयिहिंसानाम ।
अथ दधिपाय्यं पृषातके ।
दधिभिः स्यति दधिषाय्यम् । दीव्यतेः दीधीषु इत्यादेशे दीधीषाय्यम् अपि ।
उभावपि “दधिषाय्य-दीधीषाय्यो" [उ. ३७४] इति आय्य प्रत्ययान्तौ निपात्येते ।
पृषद्भिः दधिविन्दुभिः अङ्कयते पृषातकः । दधिसंयुक्तमाज्यम् , तत्र । पृषोदरा-
दित्वात् साधुः ।
अग्निहोत्रिण्यग्न्याहितोऽपि
अग्निहोत्रम् अस्यास्ति अग्निहोत्री, तत्र । अग्नौ आहितः अग्न्याहितः ।
उपवासे समाविमौ ॥७२॥
उपवस्त्रमौपवस्तम्
उपवसनम् उपवासः, तत्र । उपवसति अत्र उपवस्त्रम् । “हुयामा०" [उ.४५१]
इति त्रः । क्लीवे माला। पुंस्यपि अरुणः । “वसूच् स्तम्भे' उपवस्यते अनेन
उपवस्तः, 'क्त' प्रत्ययः । तस्येदम् औपवस्तम् । "तस्येदम् [६।३।१६०] इति
अण् । उपवसथोऽपि । इमौ उपवस्त्रौपवस्तशब्दौ समौ-तुल्यौ ।
उपचीते प्रचक्षते ।
ब्रह्मसूत्रं पवित्रं च,
उपवीयते-प्रावियते स्म उपवीतम्, पुंक्लीवलिङ्गः, तत्र । ब्रह्मणः सूत्रं ब्रह्मसूत्रम् ।
प्यते पुनाति वा पवित्रम् "बन्धिवहि०" [उ. ४५९] इत्यादिना इत्रः प्रत्ययः ।
वाल्मीकौ द्वाविमावपि ॥७३॥
हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका मैत्रावरुण्यादिकवी वल्मीकस्य अपत्यं वाल्मीकिः । बाह्वादित्वाद् इञ् । तत्र । मित्रावरुणयोरपत्यं मैत्रावरुणिः । ऋषिसमुदायस्यानृषित्वाद् इञ् । आदौ कविः आदिकविः । इमौ. द्वौ-मैत्रावरुण्यादिकविशब्दौ । पशुरामोऽपि भार्गवे। पशुना-कुठारेण रमते पशुरामः । “वा ज्वलादि०" [५।११६२] इति णः । परशुरामोऽपि । भृगोरपत्यं भार्गवः । "ऋषिवृष्णि." [६।१।६१] इति अण् । तत्र । योगीशो याज्ञवल्क्यः योगिनामीशः योगीशः । यज्ञवल्कस्य अपत्यं याज्ञवल्क्यः । गर्गादित्वाद् यञ् । दाक्षीपुत्रोऽपि पाणिनौ ॥४॥ दाक्ष्याः पुत्रो दाक्षीपुत्रः । पाणिनस्यापत्यं पाणिनिः । “अत इ" [६।१।३१] इति इन् । तत्र ॥७४॥ स्फोटायनः स्फोटायनः स्फोटम्-शब्दस्फोटम् अयते स्फोटायनः स्फोटवादित्वात् । स्फुटस्य अपत्यं स्फौटायनः । “अश्वादेः" [६।११४९] इति आयनञ् । कात्यो वररुचौ तथा । कतस्यापत्यं कात्यः । कात्यः पिताऽस्त्यस्य कात्यः । अभ्रादित्वाद् अः। अभेदोपचारात् । वरा रुचिः अस्य वररुचिः, तत्र | कारणवः पालकाप्ये करेणो:-करिण्या अपत्यं कारेणवः । “उसोऽपत्ये" [६।१।२८] इति अण् । पालकैः-हस्तिचिकित्सकैः आप्यते-आप्तत्वेन प्राप्यते पालकाप्यः, तत्र । "ऋवर्ण-व्यञ्जनाद् ध्यण" [५।१।१७] इति ध्यण् चाणक्यश्चणकात्मजे ॥७५॥ चणकस्य ऋषेरपत्यं चाणक्यः । “गर्गादेर्य'' [६।१।४२] इति यञ् । चणकस्य ऋषेः आत्मजः चणकात्मजः, तत्र ॥७५॥ वैशेषिके कणादोऽपि '- श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषास्ते प्रयोजनमस्य वैशेषिकम् शास्त्रम् तद्वेत्त्यधीते वा वैशेषिकः, तत्र । कणान् अत्ति कणादः "कर्मणोऽ" [५।११७२] इति अण् । कणान् आदत्ते वा । 'क्वचित्' [५।१।१७१] इति डः । जैनोऽनेकान्तवाद्यपि । जिनो देवताऽस्य जैनः । अनेकान्तम्- स्याद्वादम् वदतीति अनेकान्तवादी । ग्रहादित्वाद् णिन् । चार्वाके लौकायितिकः "चर्व गतौ” चर्वति आत्मानं चार्वाकः । "मवाकश्यामाक०" [उ. ३७] इति आके निपात्यते । लोकेषु आयतं लोकायतम्, बृहस्पतिप्रणीतं शास्त्रम् तद्वेत्त्यधीते वा लौकायितिकः । “याज्ञिकौस्थिकलौकायितिकम्" [६।२।१२२] इति इकण प्रत्यये निपात्यते, निपातनाच्च यकाराकारस्य इकारः । कृषिः प्रसृतमित्यपि ॥७६॥ कर्षणम् कृषिः । “नाम्युपान्त्यकृगृ०" [उ. ६०९] इति किद् इ: । "सृ गतौ" प्रस्त्रियते प्रसृतम् । कर्षणनाम्नी ॥७६॥ न्यासार्पणे परिदानम् न्यासस्य-निक्षेपस्य अर्पणम्-निक्षेप्त्रे प्रतीपम् दानम् न्यासार्पणम् , तत्र । परिवर्ताद् दानम् परिदानम् , प्रतीदानम् अपि । स्मार्ते त्वस्य भेदोऽस्ति । "वासनस्थमनाख्याय हस्ते' न्यस्य यदर्पितं । द्रव्यं तदुपनिधिया॑सः प्रकाश्य स्थापितुं तु यत् ।। निक्षेपः शिल्पहस्ते तु भाण्डं संस्कर्तुमर्पितम् ।" इति । तत्रैवं व्याख्या-न्यासः-प्रकाश्य यत् स्थापितं तद् द्रव्यम्, तस्य अर्पणम् न्यासार्पणम्, तत्र । वणिक् प्रापणिकः स्मृतः। पणायति व्यवहरते वणिक् । 'भूपणिभ्यामिज मुखणौ च" [उ. ८७५] इति 'इज्' प्रत्ययः, पणेश्च वण् इत्यादेशः । प्रापणायति प्रापणिकः । “प्राङः पणिपनिक- षिभ्यः" [उ. ४२] इत्यनेन 'प्राङः' इत्यस्माद् उपसर्ग समुदायात् परस्य “पणि व्यवहारस्तुत्योः" इत्यस्य इकः प्रत्ययः । प्रपूर्वात् पणेरपि इच्छन्ति अन्ये । तन्मते प्रपणिकोऽपि । आपणिका, पनिका, पदिका, पतिका, अपि । एते सर्वेऽपि “आङः पणिपनिपदिपतिभ्यः" [उ. ३९] इत्यनेन इक प्रत्यये साधवः ।
हैमनाममालाशिलोज्छदीपिका ४७ लक्षे च नियुतम् दशाऽयुतानि लक्षम् "विंशत्यादयः" [६।४।१७३] इत्यनेन लक्षम् इति निपात्यते । लक्ष्यते अनेन वा लक्षम् । स्त्रीक्लीवलिङ्गः । पष्ठम् अङ्कस्थानम् , तत्र । यदाह एकं दश शतमस्मात्सहस्रमयुतं ततः परं लक्षम् । प्रयुतं कोटिमथार्बुदमकं खर्व निखर्व च ॥ तस्मान्महासरोज शङ्कु सरितांपतिः ततस्त्वन्त्यम् । मध्यं परार्धमाहुर्यथोत्तरं दशगुणं तज्ज्ञाः ॥ इति । दश अयुतानि मानम् एषामस्य वा नियुतम् । “विंशत्यादयः" [६।४।१७३] इत्यनेन नियुतम् निपात्यते । प्रयुतम् अपि । पोते स्मृतं प्रवहणं बुधैः ॥७७॥ प्यते अनेन पोतः “दम्यमि०" [उ. २००] इति तेः । तत्र स्मृतम् उक्तम् । प्रोहयतेऽनेन प्रवहणम् । “करणाधारे" [५।३।१२९] इति अनट् ।।७७॥ कर्णोऽप्यरित्रे दुर्गस्य कीर्यते अनेन नौः कर्णः । "इणुर्विशा०" [उ. १८२] इति णः । ईयर्ति अनेन नौः अरित्रम् , तत्र । "धूसुखनि०" [५।२।८७] इति इत्रः । दुर्गस्य इति दुर्गसिंहमते आह च-"कर्णः श्रोत्रमरित्रं च" ।। ] इति । गवेश्वरोऽपि गोमति । गवामीश्वरो गवेश्वरः । "स्वरे वाऽनक्षे" [१।२।२९] इत्यनेन गोशब्दस्य ओकारस्य पदान्ते वर्तमानस्य स्वरे परे सति अव इत्यादेशो वा भवति । पक्षे गवीश्वरः । गावः सन्ति अस्य गोमान् । “तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुः" [७२।१] इति मतुः। तत्र । कर्पके क्षेत्रजीवोऽपि कर्षति भुवम् कर्पकः णकः, तत्र । क्षेत्रेण जीवति क्षेत्रजोवः, क्षेत्राजीवोऽपि । कोटीशो लोष्टभेदनः ॥७८॥ कोटीभिः-कोणैः श्यति-खण्डयति कोटीशः । "क्वचित् [५।१।१७१] इति डः । अन्ततालव्यः । लोष्टान् भिनत्ति लोष्टभेदनः । “नन्द्यादिभ्योऽनः" [५।१५२] इति अनः ।।७८Maimes १. जे. प्रतौ–'दम्यमीति तः' इति पाठो नास्ति } Mir TETTE TEP : . wome श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता माकमपि मधे मृद्वीकाया विकारो मार्दीकम् । “विकारे" [६।२।३०] इति अण् । मदस्य करणं मद्यम् । “मतमदस्य करणे" [६।१।१४] इति यः । तत्र । मदयित्नुः इरासवः च । अनुतोऽपि चपके स्मृतः। अनु तृप्यति अनेन अनुतर्पः । घञ् । चपन्ति पिबन्ति अनेन चपकः । “दृक- नमसृ०" [उ. २७] इति अकः । तत्र । अमरस्तु-अनुतर्पशब्दं सुरापरिवेषणपर्या- यमाह । कुविन्दे तन्तुवायोऽपि कुं विन्दति कुविन्दः । “निगवादेर्नाम्नि" [५।१।६१] इति शः । कुत्सिता विन्दवः-जलकणा अस्येति वा . कुविन्दः, पृषोदरादित्वाद् वकारस्य वकारः । तत्र । तन्तुम्-तन्त्रातानम् वयति तन्तुवायः । “कर्मणोऽ" [५।११७२] इति अण् । वेमा वेमोऽपि कीर्त्यते ॥७९॥ "वेग तन्तुसन्ताने" चयन्ति अनेन वेमा, वानदण्डः' । पुंक्लीवलिङ्गः । "सात्मनात्मन्वेमन्०" [उ. ९१६] इति मन् प्रत्यये निपात्यते । "रुक्मग्रीष्म" [उ. ३४६] इति मे निपातनात् वेमः । कीर्त्यते---निगद्यते बुधैरिति गम्यम् ॥७९॥ रजको धावकोऽप्युक्तः "रनी रागे" रजति रजकः । “नृत्खननः ०" [५।१।६५] इति अकट् "अविनोश्च०" [४।२।५०] इति नलोपः । “धावूग् गतिशुद्धयोः" धावति वस्त्राणि धावकः । "नाम्नि पुंसि च" [५।३।१२१] इति णकः । पादत्राणं च पादुका। पादौ त्रायते अनेन पादत्राणम् । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अन्ट् । पादूरेव पादुका "ड्यादीदूतः के" [२।४।१०४] इति हस्वः । तैलिकस्तिलन्तुदोऽपि तैलम् अस्त्यस्य तैली। स्वार्थिक के, तैलिकः । तैलम् विद्यतेऽस्य वा तैलिकः । "अतोऽनेकस्वरात्" [७।२।६] इति इकः । तिलम् तुदति तिलन्तुदः । "बहुविध्व- हस्तिलात् तुदः" [५।१।१२४] इति खश् प्रत्ययः । स्थकारोऽपि वर्धकिः ॥८॥ १. प्रा. 'मानदण्ड' नास्ति । ,
• ।
हमनाममालाशिलोम्छदीपिका
-
रथम् करोति रथकारः । “कर्मणोऽण" [५।१।७२] इति भण् । वर्धयति-
छिनत्ति काष्ठानीति वर्धकिः । “वर्धरकिः" [उ.६२४] इति भकिः ।।८०॥
चित्रकरो लिखकश्च
चित्रम् करोति चित्रकरः । “संख्याऽहर्दिवा." [५।१।१०२] इति टः
प्रत्ययः । लिखति चित्राणि लिखकः । "ध्रुधून्दिरुचितिलिपुलि०" [उ.२९] इति
किद् अकः ।
लेप्यकृल्लेपकोऽपि च।
लेप्यम् करोति लेप्यकृत् । “लिपीत् उपदेहे?' लिम्पति लेपकः । "नाम्नि पुंसि
च" [५।३।१२१] इति णकः ।
कुतूहले विनोदोऽपि
कुत्सितम् तोहति कुतूहलः । "मुरलोरल०" [उ.४७४] इति अले निपात्यते।
विनोदनम् विनोदः । धजन्तः ।
सौनिकः खट्टिकोऽपि च ॥८॥
सूना प्रयोजनमस्य सौनिकः । “प्रयोजनम्" [६।४।११७] इति इकण् ।
"खट्टण संवरणे" खट्टयति खटिकः। “कुशिकढदिकमक्षिका०" [उ. ४५] इति इके
साधुः । खट्टोऽस्त्यस्य वा । “अतोऽनेकस्वरात्" [७।२।६] इति इकः ॥८१॥
कूटयन्त्रे पाशयन्त्रम्
कूटेन- छलेन यन्त्र्यतेऽनेन कूटयन्त्रम् , तत्र । पाशेन-बन्धनग्रन्थिना यन्त्र्यते
अनेन पाशयन्त्रम् ।
समौ चाण्डाकपुक्कसौ ।
चण्डते चण्डालः । "ऋकृमृ०" [उ.४७५] इति आलः। चण्डमालम् मृषा
अस्येति वा 1 यद् व्याडि:-
"चण्डमालं मृषा यस्येत्यर्थः शब्दवतां मतः" । [ ] इति ।
चण्डाल एव चाण्डालः । प्रज्ञाधण् । पुत्-कुत्सितम् कसति-याति पुक्कसः ।
पृषोदरादित्वात् दन्त्यान्तः । “चक्क चुकण् व्यथने" चुकयति चुक्कस इत्येके,
"फनस०" [उ.५७३] इति असे निपात्यते । द्वितीयवर्गाधक्षरादिरयम् । श्वपचो डोम्बः,
पुक्कसो मृतप इति अवान्तरभेदोऽत्र नाऽऽश्रितः ।
इत्थं तृतीयकाण्डस्य शिलो छोऽयं समर्थितः ॥८२॥
५० श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता इत्थम्-अमुना प्रकारेण त्रयाणाम् संख्यापूरणस्तृतीयः स चासौ काण्डश्च तृतीयकाण्डस्तस्य तृतीयकाण्डस्य श्रीहैमनाममालामर्त्यकाण्डस्यै अयम् उक्तत्वेन प्रत्यक्षः शिलोञ्छः समर्थितः-रचित इत्यर्थः ।।८२।। इति श्रीमबृहत्खरतरगच्छीयश्रीजयसागरमहोपाध्यायसन्तानीय- वाचनाचार्यश्रीभानुमेरुगणिशिष्यमुख्योपाध्यायमिश्रश्रीज्ञानवि- मलेविनेयवाचनाचार्यश्रीश्रीवल्लभगणिविरचितायाम् श्रीडमनाममालाशिलोग्छदीपिकायां तृतीय- मर्त्यकाण्डस्य शिलोब्छः समाप्तः । . १. जे. प्रतो 'श्रीहिमनाममालामयकाण्डस्य' इति पाठो नोपलभ्यते २. प्रा. ज. प्रतौ-शिष्यमुख्यश्रीज्ञानविमलोपाध्याय० इति पाठः ।
-- " चतुर्थः तिर्यकाण्डः अथ तिर्यकाण्डस्य शिलोञ्छो वित्रियते-तत्र पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिभेदेनै- केन्द्रियाः स्थावराः, द्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रियभेदेन त्रसाश्च कृमिप्रभृतयस्तिर्यञ्चो वक्ष्यन्ते । तत्र प्रथमं पृथिवीकायिकानाहे- रत्नवती भुवि रत्नानि विद्यन्तेऽस्यां रत्नवती । “तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुः" [७।२।१] इति मतुः । भवत्यस्याः सर्वम् इति भूः | "भ्यादिभ्यो वा" [५।३।११५] इति क्विम् । तस्याम् । इडा, अम्वा, उर्वरा अयं सर्वसस्यायाम्', भुवि अपि, दक्षा; स्थाया, कुडुमा, गृहतुः, सहुरिः, कर्वरी; अव्यथिषी च इत्यादयोऽपि । दिवः पृथिव्यावपि रोदसी। घौश्च पृथिवी च दिवःपृथिव्यौ । “दिवस-दिवः पृथिव्यां वा" [३।२।४५] - इति दिवः इत्यादेशः । रुदन्त्यनयोः रोदसी । “अस्" [उ.९५२] इति अस् । गौरा- दित्वाद् ङीः । क्लीवलिङ्गो द्विवचनान्तः । इदन्ताद् रोदसिशब्दाद् वा द्विवचने रोदसी । यदाह उत्पल:-"द्यावापृथिव्योर्द्विवचने रोदसिशब्दे इवर्णान्तादेशः पृषोदरादित्वात्" [ ] इति । रोदसीत्यव्ययमपि । धावाक्ष्मे जनित्वम् , नेत्वम् च । . माणिवन्धं माणिमन्तं सैन्धवे मणिबन्धे गिरौ भवं. माणिबन्धम् । मणिमन्ते गिरौ भवं माणिमन्तम् । उभयत्र, "भवे" [६।३।१२३] इति अण् । सिन्धुनधुपलक्षिते देशे भवं सैन्धवम् । “भवे" [६।३।१२३] इति अण् । पुंक्लीबंलिङ्गः । तत्र । वसुके वसु ॥८३॥ वसति वसुं । "भृमृतृत्सरितनिधन्यनिमनि०" [उ.७१६] इति उः प्रत्ययः स्वार्थिक के च, वसुकम् । वस्तकनाम लवणम् । तत्र । यदाह मालाकार:-"रोमके वसुकं वसु।" [ ] इति ॥८३॥ टङ्कनष्टङ्कणः "टकुण् बन्धने" टङ्कयति टङ्कनः । “णिवेत्त्यासश्रन्थघट्टवन्देरनः" [५।३।१११] इति अनः । टङ्कयते अनेन वा । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अनट् । "पुन्ना- म्नि" [५।३।१३०] इति धे, टङ्कोऽपि । टङ्कयति. टङ्कणः । “चिक्कण-कुक्कण- कृकण" [उ. १९०] इति अणे निपात्यते । १. पृथिवीकायकानाह। - श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता उपावर्तनं चापि नीवृति उपावर्तन्तेऽस्मिन्निति उपावर्तनम् । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अनट् । नियतम् वर्तन्ते अस्यां नीवृत् । “गतिकारकस्य.” [३।२।८५] इति क्विपि दीर्घः । स्त्रीलिङ्गः । अमरस्तु पुंस्याह । तस्याम् । अमरस्तु-"नीवृज्जन- पदौ देशविषयौ तूपवर्तनम्" [२।११८] इति भिन्नमाह । भङ्गाल-रमठे-वर्तनयश्च । जङ्गलः स्याज्जाङ्गलोऽपि जायन्ते स्थलानि अत्र जङ्गलः । “ऋजनेर्गोऽन्तश्च" [उ.४६७] इति अलः । गकारश्चान्तः । जङ्गल एव जाङ्गलः । प्रज्ञादित्वाद् अण् । निर्जलदेशनाम्नी । मालवन्मालको मतः॥८४॥ मलन्ते धरन्ति भयम् अत्र मालम् । “मांक माने, मीयते वा" "शामाश्याश- कि." [उ.४६२] इति अलः । स्वार्थिक के, मालकः । पुंक्लीवलिङ्गः । ग्रामस्यान्त- गलेऽटवी । वदर्थः पूर्ववदवसेयः ॥८४॥ पत्तने पट्टनमपि "पतल गतौ” पतन्ति विविधदेशपण्यान्यागत्य अस्मिन्निति पत्तनम् नगरम् । "पत्तनम् रत्नभूमिः" इत्याहुः अपरें । तत्र । “पट गतौ” पटन्ति अस्मिन्निति पट्टनम् । उभयत्र “वीपतिपटिभ्यस्तनः" [उ.२९२] इति तनः । पटन्ति अत्रेति पटुमोऽपि । "कुन्दुम-लिन्दुम-कुङ्कुम-विद्रुम-पटुमादयः" [उ.३५२] इति 'कुम' प्रत्ययान्तो निपात्यते । मन्दिरम् अजिरम् च । कुण्डिने कुण्डिनापुरम् । स्यात्कुण्डिनपुरमपि "कुडुङ् दाहे" कुण्ड्यते पापम् अत्र कुण्डिनम् । “श्याकठिखलिनल्यविकु- ण्डिभ्य इनः" [उ.२८२] इति इनः । तस्मिन् कुण्डिने । कुण्डिना च तत्पुरं च कुण्डि- नापुरम् । “विपिनाजिनादयः" [उ. २८४] इति इने निपातनात् । “कुण्डिन" इति वामनः प्राह । कुण्डिनम् च तत्पुरम् च कुण्डिनपुरम् । विदर्भनगरीनामानि । विपणौ पण्यवीथिका ॥८५॥ विपण्यन्तेऽस्यामिति विपणिः, वणिग्मार्गः, तत्र । यत् शाश्वतः १. ज. प्रती 'मङ्गलरपठवर्तनयश्च' इति पाठः । २. प्रा. प्रतौ 'विविधदेशपण्यान्यागत्य' इति पाठो नास्ति । ३. प्रा. प्रतौ 'पत्तनं रत्नभूमिरित्याहुरपरे' इति पाठो नास्ति । ४. जे. पट्टमः ।
हैमनाममालाशिलोज्छदीपिका "आपणः पण्यवीथी च द्वयं विपणिसंज्ञकम्" [ ] । स्त्रीलिङ्गः । “पदिपठि" [उ. ६०७] इति इः । तस्याम् । पण्यस्य वीथिः पण्यवीथिः । स्वार्थिक के, पण्यवीथिका। वणिग्वीथी, हट्टवर्तनी च ॥८५॥ सुरुङ्गायां सन्धिरपि सरति-गच्छति अनया सुरुङ्गा । “सर्तेः सुर्च" [उ. १०८] इति उङ्गः । तस्याम् । सन्धीयतेऽस्मिन् सन्धिः । “उपसर्गाद् दः किः" [५।३।८७] पुंलिङ्गः । गृहे धाममपि स्मृतम् । गृह्णाति पुरुषोपार्जितं द्रव्यम् इति गृहम् । “गेहे ग्रहः" [५।१।५५] इति कः । पुंक्लीबलिङ्गस्तत्र । दधाति आश्रयमस्मिन् . इति. धामम् । “अर्तीरिस्तुसुहु." [उ. ३.३८] इत्यादिना मः । क्लीबलिङ्गः । कुटीरः, अररः, अजिरम्, सार्त्रम्, पल्लिः अयं मुन्याश्रमव्याधयोरपि, वसिः, भविलः, विशिपम्, वैष्ट्रम् च । “हने रन् ध च" *[ ] इत्यनेन पाणिनीयसूत्रेण "हन् हिंसागत्योः" इत्यस्य 'ध' आदेशे रनि प्रत्यये धरोऽपि। उपकार्योंपकर्यापि उपक्रियते-उपष्टभ्यते उपकार्या । "ऋवर्णव्यञ्जन" [५।१।१७] इति ध्यण् । “शिक्यास्याट्यमध्य०" [उ. ३६४] इति ये निपातनात् उपकर्या। यद् वा, उपकरणम् उपकरः । अल् । तंत्र साध्वी उपकर्या । “तत्र साधौ' [७।१।१५] इति यः । पटमण्डपादि राजसदनम् । उक्तं च 'गृहस्थानं स्मृतं राज्ञामुपकार्योपकारिका' । [ ] इति । प्रासादे च प्रसादनः ॥८६॥ प्रसीदन्ति नयन-मनांसि अस्मिन्निति प्रासादः । “घञ्युपसर्गस्य." [३।२।८६] इति दीर्घः । प्रसादयति प्रसादनः । देवभूपानां गृहम् ॥८६॥ शान्तीगृहं शान्तिगृहे शान्त्यै गृहम् शान्तिगृहम् । तत्र । शान्तीगृहम् इत्यत्र बाहुलकाद् दीर्घः, "तिक्कृतौ नाम्नि" [५।११७१] इति 'तिक्' प्रत्यये "इतोऽक्त्यर्थाद्" [२।४।३२] इति ड्यां च शान्ती शान्तिस्तस्यै गृहम् इति वा । यदाह वाचस्पतिः "आथर्वणं शान्तिगृहं शान्तीगृहकमप्यदः" [ ] । इति । प्राङ्गणं त्वङ्गणं मतम् । *मुद्रितपाणिनीयसूत्रेष्विदं सूत्रं नैवावलोक्यते, भतः शोधनीयमिदं सूत्रम । , श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता "अगु गतौ' प्राङ्गन्ति अत्र प्राङ्गणम् । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अनट् । अङ्गन्ति अत्र अङ्गणम् । "तृकृश०" [उ. १८७] इति अणः । मतम्-सम्मतम्। कपाटवत् कवाटोऽपि कम्पते-चलति कपाटः । “कपाटविराट." [उ. १४८] इति-आटे निपात्यते । कम्-शिरः पाटयति प्रविशतामिति वा कपाटः । "जपादीनां पो वः। [२।३।१०५] इति पस्य वत्वे कवाटः । त्रिलिङ्गः । वदर्थः पूर्ववदवसेयः । पक्षद्वारे खटक्किका ॥८७॥ पक्षस्य द्वारम् पक्षद्वारम्, - पार्श्वद्वारम् । यदाह कात्यः "प्रच्छन्नमन्तरद्वारं पक्षद्वारं तदुच्यते" । [ ] इति । तत्र । "खंट काझे" खट्यते-काझ्यते खटका । “निष्कतुरुष्क०" [उ. २६] इति कान्तो निपात्यते। स्वार्थिक के, खटक्किका । "यादीदूतः के". [२।४।१०४] इति हस्वः ॥८७॥ कुशूलवत् कुसूलोऽपि "कुशच् श्लेषणे" कुश्यते धान्येन . कुशूलः । तालव्यमध्यः । "कुसच् प्रलेषे' कुस्यते धान्येन कुसूलः । दन्त्यमध्यः । उभावपि “कुलिपुलिकुसिभ्यः किद्" [उ. ४९०] इति किद् ऊले साधू । वदर्थः पूर्ववत् । धान्यकोष्टनाम्नी । बलतः धान्यावरोधश्च । समुद्गे तु पुटो मतः । "उब्जत् आर्जवे' समुज्यते समुद्गः । 'भावाऽकोंः" । [५।३।१८] घञ्, उद्गादित्वाद् गत्वम् । न्यङ्कवादित्वाद् वा निपात्यते। समुद्गच्छतीति वा । "क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः । तत्र । पुटयते--श्लिप्यते पुटः । "नाम्युपान्त्य." [५।११५] इति कः । भूषणाद्यावपनम् । पेटायां स्यात् पेटकोऽपि पेडाऽपि कृतिनां मते ॥८८॥ "पिट् शब्दे च, चकारात् संहतो' पेटति पेटा । लिहादित्वाद् अच् । पेटति पेटकः । “छिदिभिदिपिटेर्वा' [उ. ३०] इति अकः । पेट एव वा । 'क्लीवलिङ्गः । स्त्रियां पेटिका इत्यन्यः । केचिदेनं पेडा इति सिद्धयर्थं डान्तं पठन्ति । अमरस्तु- "पीडण् गहने” इत्यस्य पेडा इत्याह । कृतिनाम्-विदुषाम् मते ॥८८|| पवन्यपि समूहन्याम् हिमनाममालाशिलोग्छदीपिका . प्यते-शोध्यते गृहम् अनयेति पवनी । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अनट् । समुह्यते रजोऽनया समूहनी, बहुकरी । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अनट तस्याम् । अयोनि मुसलं विदुः । न विद्यते योनिः अस्य अयोनिः । अयो-लोहम् नयति-प्राप्नोति मुखे वा । पृषोदरादित्वात् साधुः । अयसा-लोहेन अनिति-प्राणितीति वा । “पदि- पठि०" [उ. ६०७] इत्यादिशब्दाद् इः । यदाह वैजयन्तीकारः- "अयोनिर्मुसलोऽस्त्री स्यात्" [] । इति । मुस्यते-खण्ड्यतेऽनेन मुसलः । "तृपिवपिकुपिकुशि०" [उ. ४६८] इत्यादिना किद् अलः । मुहुः वारंवारं स्वनम् ‘लाति, मुहुर्मुहुर्लसतीति वा मुसलः । पृषोदरादित्वात् साधुः । क्षोताऽपि । ऋकारान्तोऽयम् । मुषलोऽपि । कण्डोलके पिटकोऽपि "कडुङ् मदे" कण्ड्यते कण्डोलः । वंशदलादिमयं भाण्डम् । तत्र । "कटिपटिकण्डिगण्डि" [उ. ४९३] इति ओलः । "पिट शन्दे च" पेटति पिटम् । "नाम्युपान्त्य०" [५।१।५४] इति कः । पुंक्लीबलिङ्गः । स्वार्थिक के, पिटकः । पिटति वा पिटकः । "छिदिभिदिपिटेर्वा" [उ, ३०] इति किद् अकः। ..... चुल्ल्यामन्तीति कथ्यते ॥८९॥ "चुल्ल हावकरणे" चुल्लतीव ज्वालाभिरिति चुल्लिः । "किलिपिलिपिशि- चिटि० [उ... ६०८] इत्यादिना इः । तस्याम् “अतु बन्धने" अन्तति-बध्नाति वह्निम् अन्तिः । “पदिपठिपचि०" [उ. ६०७] इत्यादिशब्दाद् इ: प्रत्ययः । "इतोऽक्त्यर्थाद" [२।४।३२] इति झ्याम्, अन्ती । यदाह मालाकारः "अन्त्यधिश्रयणी. भवेत् ।। ] इति । केचिदेनम् इन्नन्तमिच्छन्ति, तत्रैवम्, अन्तोऽस्यास्तीति अन्ती । पुंलिङ्गः । 'इतिः' अवधारणे, कथ्यते-उच्यते विद्वद्भिरिति गम्यम् । सूर्मी इत्यपि ॥८९॥ खजः खजाकोऽपि मथि । "खज:मन्थे" खजति मथ्नाति खजः । “अच्" [५।१।४९] इति अच् प्रत्ययः । खजन्ति अनेनेति खजाकः । “शलिबलिपतिवृति०" [उ. ३४] इति .:: आकः । मथ्यतेऽनेन मन्थाः । “पथिमन्थिभ्याम्" [उ. ९२६] इति इन् । तस्मिन् । मथि मन्थाने खजपोऽपि.च.। .
अस्य मथः, . • . श्रोश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता विष्कम्भः कुटकोऽस्य तु । विष्कम्नाति-बध्नातीति विष्कम्भो दण्डको यस्मिन् बवा मन्था आकृष्यते । “कुटत् कौटिल्ये" कुटति कुटः । “नाम्युपान्त्य [५।११५४] इति कः । स्वार्थे के, कुटकः । णके प्रत्यये वा कुटादित्वाद् गुणाभावः । मन्दीरम् देश्याम् । अगोऽपि पर्वते न गच्छति अगः, स्थावरत्वात् । “क्वचित्" [५।१।१८१] इति डः । अगति वा । “अच्" [५।१।४९] इति अच् । पर्व्यते-पूर्यते शिलाभिः पर्वतः । "दृपृभृमृशीयजि." [उ. २०७] इत्यादिना अतः । तत्र । अविः, जीमूतः, बलाहकः, दईरः, माहूरः, सहिरः आदिदन्त्योऽयम्, वर्द्धसानः मध्यदन्त्योऽयम्, वटम्बः, शयानकः तालव्यादिरयम्, सहान्यः दन्त्यादिरयम्, धृत्वा नन्तोऽयम्, सद्रिः सद्रुश्च उभावपि दन्त्यादी । कौजः क्रौञ्चवद् मन्यते बुधैः ॥९॥ कुञ्जस्य-पर्वतैकदेशस्याऽयं कौञ्जः । , "तस्येदम्" [६।३।१६०] इति अण् । “कुञ्च गतौ" क्रुञ्चति क्रुञ्चः । प्रज्ञायणि, क्रौञ्चः । बुधैः-विद्वद्भिः मन्यते ॥९॥ कक्खटयपि खटिन्यां स्यात् "कक्ख हसने" कक्खतीव श्वेतत्वात् कक्खटी। "दिव्यवि०" [उ. १४२] इति अटः । खटः आकाङ्क्षकोऽस्त्यस्याः खटिनी, खटी, तस्याम् । ताम्रमौदुम्बरं विदुः। ताम्यति वह्निना ताम्रम् । “चिजिशुसि.": [उ.३९२] इति रः । उनत्ति क्लियते वह्निना उदुम्बरम् । “तीवरधीवरपीवर०" [उ. ४४४] इत्यादिना वरट प्रत्ययः । उन्देर्धातोश्च किद् उनन्तः । उद्गतं वरम् उदुम्बरम् इति नैरुक्ताः । तत उदुम्बरमेव औदुम्बरम् । प्रज्ञादित्वाद् अण् । नागमधुकेऽपि । शातकौम्भमपि स्वर्णे शंतकुम्मे गिरौ भवं शातकौम्भम् । अनुशतिकादित्वाद उभयपदवृद्धिः । शोभनो वर्णोऽस्य स्वर्णम् । पृषोदरादित्वात् वलोपः । तत्र । चाम्पेयः, अवष्ठम्भः, किरीटम्, कृपीटम्, पीयुः, पुष्कलम्, रुचिष्यः, शादः तालव्यादिरयम्, सानसिः, रीतम्, पारक् , रुक्मलम् ; नन्दयन्तः, मदयित्नुः इत्यादयोऽपि ।
.. हमनाममालाशिलोम्यदीपिका ५७ पारदश्चपलोऽपि च ॥११॥ पारम् ददाति पारदः । "चप सान्त्वने" चपति चपलः ।... "मृदिकन्दि- कुण्डि ": [उ: ४६५] इति अलः । अस्थैर्याद् वा ॥११॥ रसजातं रसायं च तुल्ये दार्वीरसोद्भवे । रसाद-दारुहरिद्राया रसाद जातम्-उत्पन्न रसजातम् । रसेन-दारुहरि- द्राक्वाथेन अग्यूम् श्रेष्ठम् रसाग्यम् । रसाने साधु वा । “तत्र साधौ" [७।१।१५] इति यः । तुल्ये-समाने । दार्वी-दारुहरिद्रा तस्या रसः-क्वाथः, तस्माद् उद्भवतीति दावीरसोद्भवस्तत्र । लोके "रसवति" इति प्रसिद्धिस्तन्नाम्नी । माक्षिके वैष्णवोऽपि स्यात् माक्षिकम् मधु तद्वर्ण माक्षिकम्, अञ्जनविशेषः । तत्र । विष्णोरयं वैष्णवः । "तस्येदम्" . [६।३।१६०] इति अण् । अत एव अजस्य विष्णोर्नाम अस्य । भजनामकः । . गोपित्तं हरितालवत् ॥१२॥ गोपित्तमिव गोपित्तम् । अत एव गोदन्तः । हरेः पीतवर्णस्य तालः प्रतिष्ठाऽस्य हरितालम् । हरिताम्-पीतत्वम् अलति भूषयति वा । वदर्थः पूर्ववदवसेयः । जैरम् मपि । यद् धन्वन्तरि:- "हरितालं च गोदन्तं पीतकं नटमण्डनम् । आलं च तालं जैरं च पिञ्जरं विनगन्धिकम् ।" ॥९२॥ मनःशिलायां नैपाली शिला च मुधिया मता। १६ :: मनोवाच्या शिला. मनःशिला, तस्याम् । नेपालदेशे भवा नेपाली । "भवे" [६।३।१२३] इति अण् । “अणजेय." [२।४।२०] इति डीः । "शिलत् उज्छे" तालव्यादिः । शिलति शिला । "नाम्युपान्त्य०" [५।११५४] इति कः । सुधिया-पण्डितेन कथितेत्यर्थः । शृङ्गारमपि सिन्दुरे शृणाति शृङ्गारम् । “द्वारशृङ्गार" [उ. ४११] इति आरे निपात्यते । शृङ्गारहेतुत्वाद् वा शृङ्गारम् । स्यन्दते सिन्दूरम्, तत्र । “सिन्दूरक,०" [उ. ४३०] इति ऊरे निपात्यते । गान्धारपत्रः, रक्तरेणुः च । यद् धन्वन्तरिः पट श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता. "सिन्दूरं रक्तरेणुश्च नागरक्तं च नागजम् । शृङ्गारभूषण श्रीमद् वसन्तोत्सवमण्डनम् ॥" कुरुविन्दे तु हिङ्गुलुः ॥९शा कुरुम् विन्दति कुरुविन्दः । “नि-गवादे म्नि" [५ाश६१] इति शः । "हिंद गतिवृद्धयोः” हिनोति हिङ्गुलुः । “गृहलगुग्गुलुकमण्डलवः" [उ. ८२४] इति वहुवंचनाद् 'आलु' प्रत्यये निपात्यते ॥९३|| बोलो गोपो रसोऽप्युक्तः बोल्यते बोलः । "वुलण निमज्जने"। गां पाति गोपः । रसति रस्यते वा रसः । भीमवद् इति वा । गोपः रसः । पिष्टोऽपि । उक्त:-कथितो विद्वद्भिरिति गम्यम् । रत्नं माणिक्यमित्यपि। रमते मनोऽत्र रत्नम् । "रमेस्त् च" [उ. २६४] इति 'न' प्रत्ययः, तश्चान्तादेशः । तच्च अष्टविधम् । यद् वाचस्पतिः- "हीरकं मौक्तिकं स्वर्ण रजतं चन्दनानि च ।. शंखश्चर्म चं वस्त्रं चेत्यष्टौ रत्नस्य जातयः॥ प्रशस्यो मणिर्मणिकः । मणिक एव माणिक्यम् । भेषजांदित्वाद् यण क्लीबलिङ्गः । "इतोऽक्त्यर्थात्" [२।४।३२] इति ड्याम्, 'मणी' इत्यपि । पारक, पुलिकः, श्वांवतानः च तालव्यादिरयम्, पुंलिङ्गा एते । पद्मरागे शोणरत्नम् पद्मस्य इवः रागोऽस्य पद्मरागः । पुंक्लीवलिङ्गस्तत्र । शोणम् च तत् रत्नम् च शोणरत्नम् । "शोणरत्नं लोहितकः पद्मरागः" [२।९।९२] इति अमरः। वैराटो राजपट्टवत् ॥९॥ विराटदेशे भवो वैराटः । “भवे" [६।३।१२३] इति अण् । पट्टेन राजते राजपट्टः । राजदन्तादित्वात् पूर्वनिपातः । वदर्थः पूर्ववज्ज्ञेयः ॥९॥ नीलमणौ महानीलम् नीलवर्णो मणिः नीलमणिः । महच्च तत् नीलम् च महानीलम् । क्लीबलियः ."इन्द्रनील महानीलम् इतिः वैजयन्ती : प्रा. प्रतौ-'प्रशस्यो मणिर्मणिक' इति पाठो नास्ति । २. जे, प्रतौ 'वदर्यः' नास्ति । "..
हैमनाममालांशिलोज्छदीपिका , - । समाप्तोऽयं पृथिवीकायः । अर्थ अप्कायमाह-- कबन्धमपि वारिणि । "के शब्दे" कायति कायते वा कम् । "क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः । बध्नाति वायुं बध्यतेऽनेन वा बन्धम् । जलवाची कशब्दोऽभिधानचिन्ता- मणिसूत्रे. उक्त एवाऽस्ति, . इह तु पुनः कशब्दकथनं कबन्धभेददर्शनार्थमिति । वार्यते वारि । क्लीबलिङ्गः । तत्र । "स्वरेभ्य इ." [उ. ६०६] इति. इः । शरम् , क्षौद्रम् , व्योम, कुशम्', वरुणः, बाहुलकात् पुंस्त्वमस्य । यदाह गौडः "पानीये यादसां पत्यौ वरुणो वरुणद्रुमे । कटीरम्, तीवरम्, मोरम्, द्रमलम्, जलापम् , खजपम्, नेपम् , उलपम्, कृषीटम् मध्यमूर्धन्योऽयम् । कृपीटम्, चन्दिरम्, सदनिः, जीवथः, जीवातुः च । धूमिका धूममहिषी धूमरी मिहिका समाः ॥१५॥--:.:. धूमो विद्यतेऽस्यां धूमिका । "अतोऽनेकखरात्" [७।२।६] इति इकः । धूम- प्रतिकृतिरिति वा धूमिका । "तस्य. तुल्ये कः संज्ञाप्रतिकृत्योः" [७।१।१०.८] इति कः । धूयतेऽनया वा । "कुशिक" [उ. ४५] इति इके निपात्यते । महिषीव महिषी ताद्रूप्यात्, घूमोपलक्षिता. महिषी. धूममहिषी । धूमो विद्यतेऽस्यां धूमरी "मध्वादिभ्यो "[७।२।२६] इति रः। मेहति मिहिकाः। “कुशिकदिकo" [उ. ४५] इति इके निपात्यते ॥९५।। अकूवारोऽपि जलधौ मकरालय इत्यपि । जलम् - धीयतेऽस्मिन् जलधिः समुद्रः । तत्र । न कुम्-पृथ्वीम् पिपर्ति अकूपारः । बाहुलकाद् दीर्घः । "जपादीनां पो. वः" [२।३।१.०.५] इति वत्वे अक्कूवारः । मकराणाम्-मत्स्यानाम् आलयो मकरालयः । कुवलयः, मीवरः, मीरः, विकुत्रः, नभसः, पथित्वम् , प्यात्वम्, स्तिभिः, तृपत्, पुरुः, धृत्वा : धेनः दल्मिः च । निम्नगायां हादिनी स्यात् निम्नम् गच्छति निम्नगा, नदी, तस्याम् । हादोऽस्त्यस्यां : हादिनी । वर्जरी, वेनिः, जित्वरी, नुविः, भुविः च, एतौ सकारान्तौ स्त्रीलिङ्गौ । 1.जे. प्रतौ कुशम्' इति नास्ति । - :::܃ ६० .. श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता जनुकन्याऽपि जाह्नवी ॥९॥ जह्रोः-सगरात्मजस्य कन्या जनुकन्या । जहनुना पीता श्रोत्रेण मुक्ता इति लौकिकाः । जह्नोरियं जाह्नवी, गङ्गा, जह्नुनाऽवतारितत्वात् । "तस्येदम्" [६।३।१६०] इति अण् । “अणजेये." [२।४।२०] इति ङीः ॥९६॥ कलिन्दपुत्री कालिन्दी कलिन्दाद्रेः पुत्री कलिन्दपुत्री, कलिन्दतनयाऽपि । कलिन्दादेरियं कालिन्दी "तस्येदम्" [६।३।१६०] इति अण् । “अणजेये." [२।४।२०] इति ङीः यमुनानाम्नी । सूर्यतनया, शमनस्वसा च । रेवा मेकलकन्यका । रेवते वेगेन गच्छति रेवा । मेकलाद्रेः कन्यका मेकलकन्यका। सोमोद्. भवाऽपि । चन्द्रभागा चन्द्रभागी चन्द्रेण भागतो न्यस्ता चन्द्रभागा, चन्द्रभागी नदी । शोणादिपाठबलाद विकल्पेन डीः । अण्प्रत्ययान्ताद् नद्याम् इति एके । तत्रैवं व्याख्या--चन्द्र इव भागो यस्य स चन्द्रभागो गिरिः, ततः प्रभवति आगता वा चान्द्रभागा, चान्द्रभागी। "प्रभवति" [६।३।१५७] इति अण् “तत आगते" [६।३।१४९] इति अण वा । अणन्तत्वात् नित्यं प्राप्ते विकल्पः । अनद्यास्तु नित्यं डीः स्यादेव । यथा--- चान्द्रभागी छाया । अन्ये तु अणन्तादेवार्थमेदेन विकल्पमिच्छन्ति । नद्याम् 'आप' प्रत्ययोऽन्यत्र 'डी' प्रत्ययः। चान्द्रभागा नदी', चान्द्रभागी, वनराजिरिति । : गोमती गौतमीत्यपि ॥९७॥ गावः जलानि सन्ति अस्यां गोमती । "तदस्यात्यस्मिन्निति मतुः [७२।१] इति मतुः प्रत्ययः । गोतमस्य ऋषेरियं गौतमी । "तस्येदम् [६।३।१६०] इति अण् । “अणजेये" [२।४।२०] इति डीः ॥९७॥ . चक्राण्यपि पुटभेदाः क्रियते तृणादिसंघातनाश एभिरिति चक्रांणि । "कृगो द्वे च" [उ. ७] इति भः प्रत्ययः धातोश्च द्वे रूपे भवतः । पुटम्-तृणांदिसङ्घातम् भिन्दन्ति पुटमेदाः । १. जे. प्रतो 'चान्द्रभागा नदी' शब्दो नास्ति । २. जे. 'चांन्द्राभागी ।
.. हेमनाममालाशिलोम्छदीपिका पड़े चिक्खल्ल इत्यपि । पञ्च्यते-विस्तार्यते जलेन पङ्कः । पुंक्लीबलिङ्गः । न्यङ्कादित्वात् कत्वम् ।। तत्र । खेलति मलम् अत्र चिक्खल्लः । "भिल्लाच्छभल्ल०" [उ. ४६४] इति ले निपात्यते । “चिक् च करोति खल्लम् च भवति चिक्खल्लः" इति नैरुक्ताः देश्याम् अप्ययम् । खञ्जनः, खलनः, प्रालेयः च । उद्घातनमुद्घाटनं घटीयन्त्रं प्रकीर्तितम् ॥१८॥ ऊर्ध्वम् हन्यतेऽनेन उद्घातनम् । “णिति घात्" [४।३।१००] इति घात् इत्यादेशः। ऊर्ध्वम् घात्यते वा अनेन उद्घातनम् । हन्तेः स्वार्थणिजन्तस्य अनटि रूपमिति कौटल्यः । उद्घाट्यते'-प्रकाश्यते . जलमनेन उद्घाटनम् । "करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अनंद । घट्यादीनां यन्त्रम्, घटयो यन्त्र्यन्ते ऽति वा घटीयन्त्रम्, मालाख्यम्, येन कूपादेर्जलमूर्ध्वम् वाह्यते ॥९४ा : सरस्तडाकस्तटाकोऽपि : सरति जलम् अत्र सरः । “अस्" [उ. ९५२] इति अस् । "तडण् आघाते" ताडयते' जलमस्मिंस्तडाकः । "तट उच्छ्राये" तटति जलमत्र तटाकः । उभावपि “शलिबलिपतिवृतिनभिपटितटितडि०" [उ. ३४] इत्यादिना आके प्रत्यये साधू । खानिः, खनिः, खात्रम् च । अथ तल्लश्च पल्वले। तत् लाति-गृह्णाति तल्लः, तलति वा । "भिल्लाच्छभल्ल." [उ: ४६४] इति ले निपात्यते । देश्याम् अप्ययम् । “पल गतौ" पल्यते पल्वलः। पुंक्लीब- लिङ्गः । “शमिकमिपलिभ्यो बलः" [उ. ४९९] इति वलः । तत्र पल्वले, अकृ- त्रिमोदकंस्थानविशेषे । । समाप्तोऽयम् अप्कायः । अथ तेजःकायमाह- आशयाश-शुष्म-बहिर्-बर्हिरुत्थ-दमूनसः ॥१९॥ अग्नौ आशयम्-आधारम् अश्नाति-अत्ति आशयाशः । “अच्" [५।१।४९] इति भच् । शुष्यति अनेन शुष्मा । यथा- १. उद्घाटप । २. जे. ताच्य ।
श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता शुष्मणिः प्रणयनाभिसंस्कृते" । [ ] इति । "सात्मन्नात्मन्वेमन्" [उ: ९.१६] इतिः सनि निपात्यते । वृहति वर्धते इति बर्हिः । “वंहिबृंहेर्नलक् च" [उ. ९९०] इति इस नकारस्य च लुक् । पुंसि । यद् माला-"बर्हिरुक्तो बृहद्.... भानुः । इति । यथा-बहिर्मुखा देवाः । बर्हिः दर्भस्तस्मादुत्तिष्ठतीति बर्हिरुत्थः । "स्थापास्नात्रः कः" [५।१।१४२] इति कः । "दमूच् उपशमे" - दाम्यति जलेन दमूनाः । "दमेरुनसूनसौ' [उ. ९८७] इति 'ऊनस्' प्रत्ययः । अगति ऊर्ध्वम् याति अग्निः । “वीयुसुवह्यगिभ्यो निः" [उ. ६७७] इति निः । तत्र । तमोहः, भास्करः, प्रभाकरः, पर्परीकः, मर्मरोकः, सृणीकः, यजतः, पचतः, पचनः, संस्पृशानः, मन्दसानः, पिङ्गलः च । क्षणप्रभा विधुतः क्षणम्-क्षणमात्रम् प्रभा अस्याः क्षणप्रभा । विद्योतते विद्युत् । दिद्युत् , सम्पा दन्त्यादिरयम् , तालव्यादिस्तु अभिधानचिन्तामणौ उक्त एव । क्षिपण्युः, क्षिपणुः, खर्जुः च । । समाप्तोऽयं तेजस्कायः । अथ वायुकायमाह- गन्धवाह-सदागती। खायौ .: गन्धस्य वाहोऽस्य गन्धवाहः, गन्धम् वहति वा । “कर्मणोऽण" [५।१।७२] इति अण् । सदा गतिः-गमनमस्य सदागतिः । “वा गतिगन्धनयोः" "उवै. शोषणे" बाति वायति वाः द्रव्याणि वायुः । "कृवापाजि०":[उ. १] इति उण । तत्र । प्राक- षिक-प्रतीक-क्षिपक-बलाहक-शलाहक-सृणीक-वीक-तरण्ड-सरण्ड-प्राणन्त-वहन्त- शतेर-धूसर-जीर-वीध्र-चुप्र-बताल--भूमल--चलष-चरण्यु-सरयु-वहति-वायति-अरति-ईष्म- जूर्णि तरुणैतश-आशुशुक्षणयोऽपि । । समाप्तोऽयंः वायुक़ायः । अथ वनस्पतिकायमाह- चरणपोऽपि द्रुः चरणैः मूलैः पिबति चरणपः । "स्थापास्नात्रः कः": [५।१।१४.२२] इति कः । “ढुं गतौ" द्रवति द्रुः । “द्रुम्याम्" [उ. ७४४] इति नुः । अधिपः, उद्भिजः, - ::: हैमनाममालाशिलोज्छदीपिका वनस्पतिः, पलक्षुः, मलक्षुः, स्फेिविः, रवणः, अरडः, सरडः, स्यमीकः, नेपाल पीतुः च । त्वक त्वचा "त्वचत् संवरणे" त्वचति सिरामांसादि त्वकू विवप् । “मजादे" [२।४।१६] इति ऑफि, त्वचा । स्तबके पुनःः ॥१०॥ गुलुम्छु-लुम्बी स्तूयते स्तबको गुच्छस्तत्र । दकनृसधृवृमृस्तु" [उ: २७] इति अक। गुडयते गुलुञ्छुः । "केवयुभुरण्य्वध्वर्वादयः" [उ..७४६] 'उ' प्रत्यये . निपात्यते । "लुबु तुबुण् अईने" लुम्बयति लुम्बिः । "स्वरेभ्य इ." [उ. ६०६] इति इः । माकन्दरसालावपि चूतवत् । "कदुङ् क्रदुङ् वैक्लव्ये" वैक्लव्यम्-कातरता. .। वैकल्यम् इति चन्द्रः। मा निषेधार्थकमव्ययम् । मा कन्दते माकन्दः । रसम् अलति : रसम् आलाति वा रसालः । च्योतति रसं चूतः । चूष्यत इति श्रीभोजो निरवोचत् । “पुतपित्त." [उ. २०४] इति उते निपात्यते । वदर्थः. पूर्ववदवसेयः । मदिरासख-सचेष्ट-कामाङ्गा •. भपि । यदाह- - "आम्रचूतो रसालश्च सचेष्टो मदिरासखः । कामाङ्गः सहकारश्च - परपुष्टो मदोत्सवः ।। किङ्किराते कुरुण्टक-कुरण्डकावपि स्मृतौ ॥१.१॥ कुत्सितम् किरति-क्षिपति किङ्किरातः । “कृवृकलि०" [उ. २०९] इति आतक् । किञ्चित् किरातः किङ्किरातः, तत्र । "रुटु स्तेये" को रुण्टति कुरुण्टकः । “को रुरुण्टिरण्टिभ्यः" उ. २८] इति अकः प्रत्ययः । को रमते कुरण्डः । “पञ्चमाड" [उ. १६८] इति डः, स्वार्थे के, कुरण्डकः ॥१०॥ कर्कन्धौं इति "डुकंग करणे" इत्य- स्मात् ककारादिः अन्धूः प्रत्ययः। यद् वा; कर्को लोहितः अन्धुः, कर्कस्य अन्धुरिष वा कर्कन्धूः । "उतोऽप्राणिनश्चायुरज्ज्वादिभ्य ऊ” [२।४।७३] इति ऊडिं दीर्घः । मीलिङ्गः। पक्षेः कर्कन्धुः, कुवली । पुंस्त्रीलिङ्गोऽयम् । तत्र | उभावपि पृषोदरादित्वात् साधू । स्निग्धपत्रा, राष्ट्रवृद्धिकरी, गोपघोण्टा, स्निग्धच्छदा, च । यदाह इन्दुः, १. प्रा. प्रतौ वैकल्य ।
श्रोश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता 13 : "बदरी स्निग्धपत्रा च राष्ट्रवृद्धिकरी तथा" । चन्द्रोऽपि- "बदरी गोपघोण्टा च घाण्टा घुट्टा च कोकिला । स्निग्धच्छदा कोलफला" ' इति । हूस्वादिश्चाटरूपकः । .: भटन्ः रूपयति अटरूषः । पृषोदरादित्वात् साधुः । हूस्वः-दीर्धेतरः अका- रोऽस्य हस्वादिः । स्वार्थिक के, अटरूषकः । वैधमाता, सिंही, सिंहमुखी च । यदाह अमरः-वैद्यमातृसिंह्यो तुः वाशिकाः। - वृषोऽटरूषः सिंहास्यो वासिको वाजिदन्तकः ॥ [२।४।१०३] बजे स्नुहि-स्नुहाऽपि स्यात् वज्र इव वज्रो भेदकत्वात् तत्र । स्नुह्यति क्षीरम् स्नुहिः । स्त्रीलिङ्गः । "नास्युपान्त्य०" [उ. ६०९] इति किद् इः । स्नुहा इति वैधाः । “नाम्युपान्त्य." [१।१२५४] इति कः । सुधा, गुडा, समन्तदुग्धा च । आह च- "स्तुक् सुधा च महावृक्षो गुडा निस्त्रिंशपत्रकः । समन्तदुग्धा गण्डीरः सिंहुण्डा वजकन्दकः" ॥ प्रियालोऽपि पियालवत् ॥१०२॥ "प्रीच् प्रीतौ" प्रीयते प्रियालः । “पींच् पाने" पीयते रसोऽस्य पियालः । उभावपि “कुलिपिलिविशिविडिमृणिकुणिपीप्रीम्यः किद्" [उ. ४७६] इति भाले साधू । चारोलीनाम्नी' । वदर्थः प्राग्वदवसेयः । खरंस्कन्धः, सन्नकद्रुः, धनुःपटश्च । यदाह--- "पियालश्च खरस्कन्धश्वारो बहुलवल्कलः । सन्नकद्रुश्चापपटो ललनस्तापसप्रियः" ॥ इति ॥१०२॥ नार्यडोऽपि नारड़े नारीम् अङ्गति-याति नार्यङ्गः । अत एव योषिद्वक्त्राधिवासनः । आह च- "नारङ्गस्त्वक्सुगन्धः स्यान्नागरगो मुखप्रियः । स चैरावतकः प्रोक्तो योषिद्वक्त्राधिवासनः" ॥ इति । "नृश नये" नृणाति नारङ्गः । “सृवृनृभ्यो णित्" [उ..९९] इति. मगः । तत्र । १ प्रा. प्रतौ राबादननाम्नी।
. , हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका. अक्षे विभेदक इत्यपि । अक्षति-व्याप्नोति अक्षः । तत्र । बिभेति बिभेदकः । यदाह---: विभीतकः कर्षणफलो वासन्तोऽक्षः . कलिद्रुमः । संवर्तको भूतवासः कर्षों हार्यो विभेदकः ।। दैन्यः, मधुबीजः, धर्मद्वेषो, कल्कः च । भवेत् तमालस्तापिच्छः ताम्यति तमालः । "ऋकृमृ० [उ. ४७५] इति आलः । तापिन छा- दयति तापिच्छः । "क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः । कालस्कन्धः, रजनः, वसुः च । निर्गुण्ठी सिन्दुवारवत् ॥१०३॥ "गुठुण वेष्टे'' “नाम्युपान्त्य." [५।१।५४] इति के गुण्ठः, निष्क्रान्ता गुण्ठाद् वेष्टनादिति - निर्गुण्ठो । स्यन्दते सिन्दुवारः । “द्वारशृङ्गार०" [उ. ४११] इति आरे निपात्यते । वदर्थः पूर्ववद् भावनीयः । सिन्दुकः, सिन्धुकः, इन्द्रसुरसः, इन्द्राणी, नीलपुष्पम् , शीतसहः च । आह च-. :) अथ सिन्दुकः। सिन्दुवारेन्द्रसुरसौ निर्गुण्डीन्द्राणिकेत्यपि ॥ अन्योप्याह- सिन्दुवारः सितपुष्पः सिन्धुकः सिन्धुवारितः । नीलपुष्पं शीतसहो निर्गुण्डी नीलसिन्दुकः ॥ ॥१०३॥ जपा जवा जपतीव जपा। "जपादीनां पो वः" [२।३।१०५] इति पस्य वत्वे जवा । ओड्रपुष्पम् । मातुलिङ्गो मातुलुङ्गोऽपि कीर्तितः ।। मा तोल्यते मातुलिङ्गः, मातुलुङ्गः । “माङस्तुलेरुङ्गक च" [उ. १०६] इत्यनेन मापर्वात् "तुलण ..उन्माने" इत्यस्माद् उङ्गक्- इङ्गप्रत्यययोः साधू । यदाह: १ प्रा. गुठिण वेष्टे । . .
८".. , . श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता फलपूरो बीजपूरः केसरी बीजपूरकः । बीजकः केसराम्लश्च मातुलङ्गस्तु पूरकः । बीजपूर्णः, अम्लकेसरः, वराम्लः, मध्यकेसरः, कृमिघ्नः, गन्धकुसुमः, शीधु- पादपः च । धत्तूर इव धुत्तरः दधाति पीतवर्णं धत्तूरः । धुनोति धातून् धुत्तूरः । उभावपि “सिन्दूर- क— रपत्तरधुत्तरादयः" [उ. ४३०वृत्तौ] इति अरे निपात्येते । “धुवो द्विरुक्तस्तोऽन्तो हवश्व" [उ. ४३०वृत्तौ] । उन्मत्तः, किंतवः, धूर्तः, मातुलः, मदनः च । यदाह- धत्तूरकः स्मृतो धूर्तो देवता कितवः शठः । उन्मत्तको मदनकतरुस्तलफलस्तथा । अमरोऽप्याह- ' उन्मत्तः कितवो धूर्तो धत्तूरः कनकाह्वयः । [२।४।७७] मातुलो मदनश्च [२६४।७८] धुधूरोऽपि । यदाह यादवः--उन्मत्तधूर्तधुधूराः । वंशस्त्वक्सार इत्यपि ॥१०४॥ वमति वंशः । “पादावमि०" [उ. ५२७] इति शः । त्वचि सारः त्वक्सारः। "अव्यञ्जनात्" [३।२।१८] इति विकल्पेन सप्तमीलुप् । कारः, तेजनः च । यदाह- वंशे त्वक्सार-कार-त्वचिसार-तृणध्वजाः । शतपर्वा यवफलो वेणु-मस्कर-तेजनाः ।। ॥१०४॥ हीबेरं केश-सलिलपर्यायैः स्मर्यते चुधैः । जिहेतीव हीबेरम्, वालकम् । “शतेरादयः" [उ. ४३२] इति केरे निपा- त्यते । केशसदृशत्वात् केशम्, वालः कच इत्यादयः । तृघ्नत्वात् सलिलम्, जलम् । तत्पर्यायैः स्मर्यते-कथ्यते बुधैः । यदाह- वालकं वारि तोयं च होबेरं जलकं रुचम् । केशं. वज्रमुदीच्यं च पिङ्गमाचमनं कचम् ।। पङ्कजिन्यां कमलिनी सरोजिनी कुमुद्वती ॥१८५।। ... पकंजम् अस्त्यस्यां पङ्कजिनी, तस्याम् । कमलम् अस्त्यस्यां कमलिनी । सरोंजम् अस्त्यस्यां सरोजिनी । एवं सरोरुहिणी, अम्भोजिनी, अब्जिनी, राजीविनी, अरविन्दिनी इत्यादि । सर्वेऽप्येते “मन्माऽब्जादेर्नाम्नि" [७।२।६७] इति 'इन् प्रत्यये साधवः ! कुमुदम् अस्त्यस्यां कुमुदती । “नडकुमुद०" [६।२१७४] इति डित् मतुः ॥१०५|| :
हैमनाममालाशिलोज्छदीपिका ६७ . विसप्रसूनं कमले बिसात् प्रसूनम् जातं बिसप्रसूनम् । बिसात् प्रसूयते वा । "सूयत्यादि०" [४।२।७०] इति क्तयोः तस्य नत्वम् । कम्-अम्भः अलति-भूषयति कमलम् । काम्यते श्रिया वा । "मृदिकन्दि०" [उ. ४६५] इति अलः, तत्र । ::: कुमुत्कुमुदवन्मतम् । को मोदते कुमुत् । किम् । को मुद्-हर्षोऽस्य वा । काम्यते वा कुमुदम् । "कुमुद-बुबुदा०" [उ. २४४] इति उदे निपात्यते । को मोदते वा कुमुदम्- श्वेतकमलम् । “नाम्युपान्त्य." [५।१।५४] इति कः । वदर्थः प्राग्वत् , मतम्- सम्मतम् । शेपालं च जलनीली शेते अम्भसि शेपालम् । “शीङस्तलक्पालवालण्वलण्वलाः" [उ.५०१] इति; 'पाल'प्रत्यये साधुः । जलम् नीलति जलनीली णीलवणे । सातीनोऽपि सतीनवत् ॥१०६॥ सीदन्तिः अनेन सातीनः, सतीनश्च । “दिननग्न०" [उ. २६८ ] इति निपात्यते । उभावपि त्रिपुटाख्यधान्यनाम । वदर्थः पूर्ववद् भावनीयः ॥१०६॥ कुल्मासवत्कुल्माषोऽपि कोलति-संस्त्यायति कुल्मासः । दन्त्यान्तः । “कलिकुलिभ्यां मासक [उ.५८४ ]इति मासक् । कुलेन मस्यति परिणमति वा पृषोदरादित्वात् । “कुल बन्धुसंस्त्यानयोः" कोलति कुल्माषः । अर्द्धस्विन्नो यवादिः, धान्यविशेष इति एके मूर्धन्यान्तः । “कुलेश्च माषक्" [उ.५६३] इति माषक् । गवेधुका गवीधुका। "गुंङ शब्दे" गूयते गवेधुका, गवीधुका च । “गुङ ईधुकधुको" [ उ. ७४] इत्यनेन पूर्वस्य एधुकः इतरस्य ईधुकः प्रत्ययः। गवा अम्भसा एधते वा गवेधुः । स्त्री-.. लिङ्गः । "भृमृतृ०" [ उ. ७१६ ] इति बहुवचनाद् उः, ततः स्वार्थिक के, गवेधुका हलादनुत्पन्नमन्नम् । कणिशं कनिशम् "कण शब्दे" कणति वातेन कणिशम्, सस्यमञ्जरी । "कन दीप्त्यादौ" कनति कनिशम् । उभावपि "कुलिकनिकणि०" [उ. ५३५ ] इति किं 'इश' प्रत्यये साधू । पुंक्लीवलिङ्गौ ।
श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता रिद्धे धान्ये त्वावासितं मतम् ॥१०७॥ राध्यति स्म रिद्धम् , सिद्धमित्यर्थः । सुसम्पन्नम् इत्येके । पृषोदरादित्वाद् इत्वम् । तस्मिन् .. रिद्धे धान्ये-सस्ये आ समन्तात् वास्यते-मील्यते स्म आवासितम्- निष्पन्नम् ॥१०७॥ हालाहलं तथा हालम् हालेव हलतीति हालाहलम्' । पुंसि, वामनः । क्लीवे लक्ष्यम् । यथास्निग्धं भवत्यमृतकल्पमहो कलत्रम् । हालाहलं विषमिवाऽप्रगुणं तदेव । एकदेशविकृतस्याऽनन्यत्वात् हालहलोऽपि । यथा "काममपायि मयेन्द्रियकुण्डै-र्यद्यपि दुष्कृतहालहलौघः" । हलति-विलिखति जठरम् हालम् । वा ज्वलादित्वाद् णः । पुंक्लीबलिङ्गावुभौ । मुस्तायां मुस्तकोऽपि च । मुस्यति---खण्डयति मुस्ता । त्रिलिङ्गः । "शीरीभूदुमूघृपा." [उ. २०१]. इति कित् तः । तत्र । स्वाथिंके के, मुस्तकम् । पुंक्लोवालङ्गः । यद् अमरः- कुरुविन्दो मेघनामा मुस्ता मुस्तकमस्त्रियाम् । [२।४।१५९] यदाह-धन्वन्तरिः- मुस्तमम्बुधरो मेघो घनो राजकसेरुकः । भद्रमुस्तो वराहोऽब्दो गाङ्गेयः कुरुविन्दकः । । समाप्तोऽयं वनस्पतिकायः । पृथिव्यादीनेकेन्द्रियानभिधाय द्वीन्द्रियानाह- ऋमिः क्रिमिरपि करोति खजूं कृमिः । “कृभूभ्यां कित्" [उ. ६९०] इति कित् मिः । "कमू पादविक्षेपे' कामति अपाने कृमिः । "क्रमितमि०" [उ. ६१३] इति कित् इः प्रत्ययः । धातोः अकारस्य च इकारः । शर्शरीकः च । कृमिनाम्नी । स्यमीकः, सीमिकः, करण्डः, सरण्डः, रमठः, मरठः च । इत्यादीनि कृमिजातिना- मान्यपि प्रक्रमात् ज्ञेयानि । गण्डूपदः किञ्चुलुकोऽपि च ॥१०८॥ गण्ड्वः-ग्रन्थयः पदानि अस्य गण्डूपदः भूलता । यस्य "अलसिक" १. प्रा. हालाहलः । १. प्रा. काम्यति ।
६९ ." हैमनाममालाशिलोच्छदीपिका इति प्रसिद्धिः। “चुलुम्प उच्छेदे" किञ्चित् चुलुम्पति किञ्चुलकः । "कञ्चुकांशुक- नंशुकपाकुक०" [उ. ५७] इति उके निपात्यते ॥१०८॥ शम्बूका अपि शाम्बूकाः शाम्यन्ति शम्बूकाः, शाम्बूकाः । “शम्बूकशाम्बूकवृधूकमधूक०" [उ. ६१] इति ऊके उभावपि : निपात्येते । “शमेोऽन्तो दीर्घश्च वा" स्यात् [उ. ६१ वृत्तौ । शङ्खः, अजपर्व, कणीचयोऽपि । । उक्ता द्वीन्द्रियाः । चतुरिन्द्रियानाह- वृश्चिको द्रुत इत्यपि । "ओवृश्चेत् छेदने", वृश्चति वृश्चिकः । "पापुलिकृषिकुशिनश्चिभ्यः" [उ. ४१] इति किद् इकः । “द्रु गतौ” द्रवति द्रुतः । द्रूयते स्म वा । शालूकोऽपि । भसलो मधुकरोऽली च: भासते गुञ्जन् भसलः । "मुरलोरल." [उ. ४७४] इति अले निपात्यते । देश्यामप्ययम् । मधु करोति मधुकरः । “अच्" [५।१।४९] इति अच् । अलति शोभते इत्येवंशीलो अली-भ्रमरः नन्तः अयम्, गदयित्नुः:, रसायुः, रवणः, मधुपः, षट्पदः, षट्चरणः च । सर्वेऽप्येते स्त्रीपुंसलिङ्गाः । । उक्तौ चतुरिन्द्रियो । अथ पञ्चेन्द्रियान् स्थलचर-खचर-जलचर भेदभिन्नान् क्रमेणाह- पिक्को विक्कः "पिजुकि सम्पर्चने" सम्पर्चनम्-मिश्रणम् । पिङ्क्ते पिक्कः । “निष्क- तुरुष्कः०" [उ. २६] इति के निपात्यते । “विचूंपी पृथग्भावे" विङ्क्ते अवयवान् विक्कः । “विचिपुषि०" [उ. २२] इति कित् कः । विंशतिवर्षों हस्ती । करिः करी ॥१०९॥ करोति प्रमोदम् करिः । "स्वरेभ्य इ" [उ. ६०६] इति इः । करः- शुण्डाऽस्त्यस्य करी । हस्ती, चन्दिरः, कूचः, कुत्रः, वधूलः, वेञ्चुलः, पीलुः, पपीः, शदिः, सद्रिः, मदारः, अङ्गुषः, पीनुः, अमतिः, काणूरः च ॥१०९॥ व्यालो व्याडोऽपि विविधम् आलम्-अनर्थोऽस्माद् व्यालः । व्यडति-हन्तुं समर्थों भवति व्याडः, दुष्टगजः । १. प्रा. वञ्चूल: ।
७० श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता उपवाह्योऽप्यौपवाये उप-समीपे वाह्यते उपवाह्यः, राजवाह्यो हस्ती । "ऋवर्णव्यञ्जना०" [५।१।१७] इति ध्यण् । उपवाह्य एव औपवाह्यः । स्वार्थे अण् प्रत्ययः । अपराऽवरा। अपरभागभवत्वात् अपरा । स्त्रीक्लीवलिङ्गः । “जपादीनां पोवः" २।३।१०५] इति पस्य वत्वे अवरा । गजस्य पश्चाभागस्तन्नाम्नी । शृखलो निगलोऽन्दश्च शृणाति बन्धेन शृङ्खलः । त्रिलिङ्गः । “श्री नोऽन्तो ह्रस्वश्च" [उ. ४९८] इति, “शशू हिंसायाम्" इत्यस्मात् खलः प्रत्ययो नकारोऽन्तो हुस्वश्च भवति । निगल्यते-बध्यतेऽनेन निगलः। अन्दति-बध्नाति अन्द्यते वा अन्दूः । “कृषिचमि." [उ. ८२९] इति ऊः । कक्षा कक्ष्यापि "कप हिंसायाम्" कषति कक्षा । "मावावदि." [उ.५६४] इति सः । कक्षायाम्-मध्यप्रदेशे भवा कक्ष्या, अयं योपान्त्यः । वस्त्रनाम्नी । वाल्हिके ॥११॥ वाल्हीका वाल्हिकेषु देशे भवो वाल्हिकः, वाल्हिकेषु देशे भवो वाल्हीकः । वाल्हिक- देशोत्पन्नो घोटकः । वल्ग-वागे च “वल्ग गतौ" वल्गति अनेन वल्गः । पुंलिङ्गः । “व्यञ्जनाद् घञ्" [५।३। १३२] इति घञ् । “वा गतिगन्धनयोः” वाति गच्छति अनया वागा । “गम्यमि- रम्यजिगद्यदि ०"[उ.९२] इति बहुवचनाद् गः । रश्मिनाम्नी । खलिनं च खलीनवत् । "खल सञ्चये च, चकाराच्चलने” खलति खलिनम् । "श्याकठिखलि०" [उ. २८२] इति इनः । पुंक्लीवलिङ्गः। खलति-चलंति खलीनम् । “खलिहिंसिभ्या- मीनः" [उ.२८६] इति ईनः । वदर्थः पूर्ववदवसेयः । कविकनाम्नी । मयुरुष्ट्रे "डमिंग्ट प्रक्षेपणे" मिनोति मयुः । “मिवहिचरिचटिभ्यो वा" [उ.७२६] इति उः प्रत्ययः । मरौ भवो मर्यः । “भवे" [६।३।१२३] इति यः, मरिशब्दस्य इदन्तत्वात् । “छन्दसि निष्टयंदेवहूयप्रणीयोन्नीयोच्छिष्यमय." [३।१।१२३] इति हैमनाममालाशिलोञ्छदोपिका ७१ पाणिनीयसूत्रेण वा "मृत् प्राणत्यागे" इत्यस्मात् 'यत् प्रत्यये मर्य इत्यपि । उष्यते- दह्यते मरौ उष्ट्रः । “सूमूखन्युषिभ्यः किद" [उ.४४९]इति कित् । । तत्र । दीर्घजधः, ग्रीवी; मेरः, धूम्रः च, स्वार्थिक के, धूम्रकोऽपि । गोपतौ तु शण्ड इत्वर इत्यपि ॥१११॥ गवां पतिः गोपतिः गोवृषः, तत्र | "शमूच् उपशमे" शाम्यति शण्डः । "पञ्चमाः" [उ.१६८] इति डः । अयनशील एति-गच्छति वा इत्वरः ।। "सृजीण्- नशष्ट्वरप्" [५।२७७] इति वरप् ॥१११॥ स्थौरी स्थूर्यपि स्थूराणाम्-पश्चाज्जङ्घाभागानामिदं स्थौरम्-बलम् तदस्यास्तीति स्थौरी । स्थूराः-जङ्घाप्रदेशाः सन्त्यस्य स्थूरी, पृष्ठवाह्यः । यत्पृष्ठे जलादिकमुह्यते । ककुदे ककुत् कुकुदमित्यपि । : ककते ककुदम् । पुंक्लीबः । 'ककेर्णिद्वा" [उ.२४३] इति, "ककि लौल्ये" इत्यस्माद् उदः प्रत्ययः । ककते ककुत् । बाहुलकाद् उद् । “कुकि वृकि आदाने" कोकते कुकुदम् । “कुमुदबुद्बुदादयः" [उ.२४४] इति उदे निपात्यते । वृषभस्कन्ध- कूटनामानि । नैचिकं नैचिकी च स्यात् : नीचैश्चरति नैचिकम् । “चरति" [६।४।११] इति इकण् “अणजेये." [२१४।२०] इति ड्याम्, नैचिकी । “प्रायोऽव्ययस्य" [७।४।६५] इति अन्त्य- 'स्वरादिलोपः । वृषभशिरोनाम्नी । - मलिनी बालगर्भिणी ॥११.२।। मलोऽस्त्यस्यां मलिनी । “मलादीमसश्च" [७१२।१४] इति इन् प्रत्ययः । बाला चासो गर्भिणी च बालगर्भिणी । मलिनी बालगर्भिणी [ ]इति माला ॥११२॥ पवित्रं गोमये : पूयतेऽनेन पवित्रम् । “ऋषिनाम्नोः करणे" [५।२।८६] इति इत्रः । पवित्रत्वाद् वा । गोः पुरीषम् गोमयम् । पुंक्लीबलिङ्गः । “गोः पुरीषे” [६।२।५०]इति मयट् । गोविट्, तत्र । छागे शुभः छ्यति छागः । “गम्यमि०" [उ. ९२]इति गः । तत्र शोभते शुभः । "नाम्यु- पान्त्य." [६।११५४] इति कः । “शुभच्छागवस्तच्छगलका अजे" [२।९।७६]इति ७२ श्रोश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता . अमरः । वृष्णिः, वरुटः, वरुडः, गण्डयन्तः, अमतिः च' अथ भपकः शुनिः । भषति भुक्कति भषकः । “तिकृती नाम्नि" [५।११७१]इति अकट् । “भष भर्त्सने" भर्त्सनम् -कुत्सितशब्दकरणम्, अतो भर्त्सने शब्दकर्मकोऽयम् । शुनति गच्छति शुनिः । “नाम्युपान्त्य०" [उ.६०९] इति किद् इः । दशेरः, भटिलः, भण्डिलः, चण्डिलः, लेहडः, गृत्सः च । सरमा देवशुन्यां च सरति गच्छति सरमा । "स्पप्रथिचरि०" [उ.३४७] इति अमः । देवानाम् शुनो देवशुनी, तस्याम् । विशेषवृत्तिरयं सामान्येऽप्यभिधीयते । यमरथोऽपि सैरिभे ॥११३॥ यमस्य रथो यमरथः । सीयते-बध्यते सैरिभः । “सि-टिकिभ्यामिभः सैर-रिद्वौ च" [उ. ३३२] इत्यनेन इभः प्रत्ययः । “पिंगट बन्धने" इत्यस्य दन्त्यादिः, 'सैर' इत्यादेशश्च । सीरिभिः-दान्तै ति सीरिभः, तस्यायमिति वा । "तस्येदम्" [६।३।१६०] इति अणू, तस्मिन् सैरिभे-महिषे गर्वरोऽपि ॥११३॥ : पारिन्द्र इव पारीन्द्रः पारिषु शक्तेषु इन्द्रः पारिन्द्रः ।। पृषोदरादित्वाद् हस्वः । हस्वाभावे च पारीन्द्रः। सिंहः, नदनुः, मृगेन्द्रः, कपिलाक्षः च । इव शब्दो वदर्थवाचकः । शरभेऽष्टापदोऽपि च । "शशु हिंसायाम्" शृणाति हस्तिनम् शरभः । “कृशगृशलिकलि" [उ.३२९] इति अभः, तत्र । अष्टौ पदानि अस्य अष्टापदः । “नाम्नि" [३।२।७५] इति दीर्घः। कर्वरोऽपि । सृगालवच्छृगालोऽपि सरति गच्छति भयेन सृगालः । “सर्तेोऽन्तश्च" [उ.४७८] इति आलः । असृगाऽऽलीयते, असृग् गिलतीति' वा सृगालः । पृषोदरादित्वात् । शृणाति शृगालः, तालव्यादिरयम् । “चात्वालकङ्काल" [उ. ४८०] इति आले निपात्यते । प्लवगः प्रवगोऽपि च ॥११४|| प्लवेन गच्छति प्लवगः । प्रवेण गच्छति प्रवगः । प्लवप्रवी गतिविशेषवाचकौ । १.. प्रा. अमन्तिश्च । . .
७३ +- , हेमनाममालाशिलोग्छदीपिका "नाम्नो गमः खड्डौ च०" [५।१११३१] इति डः । प्लवप्रवंगमौ अपि. वानर- नाम्नी ॥११४॥ वानायुरपि वातायुः वानम्-शुष्कम् अयते वानायुः, वानमेति वा । वातमेति वातायुः हरिणः । उभयत्र "कृवापाजि०" [उ. १] इति-उण् । वातमजः, हर्षलः, रौहिषः, श्येतः, सरासरः, मरूकः च । उन्दरोऽपि च मूषके। "उन्दप् क्लेदने" उनत्ति उन्दरः । “जठरऋकरमकर०" [उ.४०३] इति अरे निपात्यते । “लुष् मूष स्तेये" मूषति मूषकः । “नाम्नि पुंसि च" [५।३।१२१] इति णकः । तत्र । किरिः, मुष्मः, कुपाकुः, कर्वः च । हीकुर्वनविडालोऽपि "हीक लज्जायाम्" जिहेतीव आखुवधसङ्कोचेनेति हीकुः । “हियः किद् रो लश्व वा" [उ. ७५०] इति कित् कुः । वनस्य-अरण्यस्य बिडालो वनबिडालः । दरुटः, दरुडः, बिलालः च । गोकर्णोऽपि भुजङ्गमे ॥११५।। गावौ-दृशावेव कौँ अस्य गोकर्णः । भुजेन कौटिल्येन भुज इव वा गच्छतीति भुजङ्गमः सर्पः, तत्र । "नाम्नो गमः खड्डौ च०" [५।१।१३१] इति खः । काणूरः शृदरः, दशेरः, दश्रः, तालव्यमध्याविमौ, सृप्मा, सृत्वा, मर्कः, सूर्पः च दन्त्यादिरयम् ॥११५॥ जलव्यालेऽलीगर्दोऽपि जलस्य व्यालो जलव्यालः । अली-भ्रमर इव गर्दति--शब्दायते अलीगर्दः । शेषः स्यादेककुण्डलः। श्लिष्यति अस्मिन् धात्रीति शेषः । “श्लिषेः शे च" [उ: ५४३] इति पः । शिष्यत इति वा । शेते अस्मिन् हरिः इत्यन्ये । एक कुण्डलमस्य एककुण्डलः । आशीराशी च दंष्ट्रायाम् आशास्यते-हिंस्यते अनया आशीः । यदाह- "आशीस्तालगता दंष्ट्रा यया विद्धो न जीवति ।" इति । १० ७४ , श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता क्रुत्सम्पदादित्वात् विप् , ततः "क्वौ' [४।४।११९] इति इस आदेशः । पृषोदरादित्वाद् रकारलोपे आशी । यथा-आशीविषः । उभावपि स्त्रियाम् । दंष्ट्रायां सर्पस्येति शेषः । निमोंके निर्लयन्यपि ॥११६।। निर्मुच्यते निर्मोकः । घञ् प्रत्ययः । तत्र निर्मोके-सर्पत्वचि । नितरां लीयते अस्यां निर्लयनी । “करणाऽऽधारे" [५।३।१२९] इति अनट् । निहाकोऽपि ॥११६॥ । उक्ताः स्थलचराः पञ्चेन्द्रियाः । अथ खचरानाह विहगे पतत्रिरपि विहायसा गच्छति विहगः । “नाम्नो गमः खड्डौ च०" [५।१।१३१] इति डः प्रत्ययो विहायसो विहः च, तत्र । पतति-गच्छति पतत्रिः । “पतेरत्रिः" [उ. ६९७] इति अत्रिः । वर्वरीकः, पतेरः, कथेरः, विहडः, तिन्तिडीकः, - कवाकः, हीकः, श्येत्यः तालव्यादिरयम् , रवणः, जर्णः, किकीदिविः, कुकंणः, मणचः, रुवथः, अणसः, शररैः तालव्यादिरयम् , चपुपः, वारङ्गः च । पिच्छं पिन्छमपि स्मृतम् । पीयते पिच्छम् । “पीपूडो हस्वश्च” [उ. १२५] इति छक् । “गुलुञ्छपिलि- पिञ्छंधिच्छादयः" [उ. १२६] इति 'छेनिपातनात् पिञ्छम् । स्मृतम्-कथितम् । परपुष्टान्यभृतौ च पिके परेण पुष्यते स्म परपुष्टः । अन्येन भ्रियते-पुष्यते अन्यभृतः । काकीपुष्टत्वात् । पिवति चूतरसम् पिकः । “पापुलिकृषि०" [उ. ४१] इति किद् इकः । अपि कायति वा पृषोदरादित्वात् । तत्र । घोषयित्नुः, पोपयित्नुः, वञ्चथः, उदिञ्चः च । वहिणि बहिणः ॥११७॥ वर्हाणि सन्ति अस्य वहीं, मयूरः तत्र । “शिखादिभ्य इन्" [७२।४] इति इन् । वर्हाणि सन्त्यस्य बहिणः । “फलबर्हात्०” [७।२।१३] इति इनः । “वृह वृद्धौ" बर्हतीति वा । “द्रुहृवृहिदक्षिभ्य इणः” (उ. १९४] इति इणः । मोरः, सहसानः, जीवथः, आपतिकः, मरूकः, कमठः च ॥११७॥ वायसे वलिपुष्टोऽपि "वयि गौ" वयते वायसः । "सृयिभ्यां णित्" [उ. ५७०] इति असः । तत्र । बलिना पुष्टः वलिपुष्टः । अत एव बलिभुक्, वैश्वदेवभागार्हत्वात् । वञ्चथः, काणुकः, नभाकः, वर्विः च । - १. प्रा. शराटः ।
७५ ..३ हैमनाममालाशिलोच्छदीपिका द्रोणोऽपि द्रोणकाकवत् । "गुणत् गतिकौटिल्ययोः च" चकारात् हिंसायाम् द्रुण्यते द्रोणः । घञ् । "टुं गतौ” द्रवति वा । "ट्रोर्वा"- [उ. १८४] इति णः । द्रोणश्चासौ काकश्च द्रोण- काकः । वृद्धकाकोऽद्रिकाको, वा । यदाहु:- द्रोणकाको दम्धकाको वृद्धकाको वनाश्रयः । इति । वदर्थः प्राग्वदवसेयः । सारस्यां लक्ष्मणी सरति सारसः । “सृवयिभ्यां णित्" [उ. ५७०] इति असः । सरसि भवो वा । "भवे" [६।३।१२३] इति अण् , “अणजेये." [२।४।२०] इति चाम् सारसी, तस्याम् । लक्ष्मणस्य-सारसस्य स्त्री लक्ष्मणी । "धवाद् योगाद- पालकान्तात्" [२।४।५९] इति ङीः । . क्रौठच्यां क्रुश्चा. "कुञ्च् गतौ" क्रुञ्चति क्रुङ्, क्विप्, क्रुडेव क्रौञ्चः । प्रज्ञादित्वाद् अण् , "अणजेये." [२।४।२०] इति ड्याम् , क्रौञ्ची, तस्याम् । अजादित्वाद् आपि, क्रुञ्चा । चाषे दिविः किकिः ॥११८॥ किकिदीविरपि प्रोक्तः चष्यते -भक्ष्यते श्येनेन · चाषः, तत्र । दीव्यति दिविः । “पदिपठि०" [उ. ६०७] इत्यादिना इ: । "के शब्दे" कायति शुभम् किकिः । “कायः किरिच्च वा" [उ. ६२३] इति किः प्रत्ययो धातोश्च इकारान्तादेशः । स्त्रीलिङ्गः । किकीति कुर्वन् दीव्यति किकिदीविः । “छविछिविस्फविस्फिवि०" [उ. ७०६] इति 'वि' प्रत्ययो निपातनात् । किकिपूर्वाद् दीव्यतेः दीर्घश्च । "किकिदिविसंज्ञश्चाषः" इति वोपालितेन सर्वे ह्रस्वाः पठिताः । दीव्यतीति दीविरपि । अनेनैव 'वि' प्रत्यये निपात्यते । ..... टिट्टिभे टीटिभोऽपि च । "टिकि गतौ" टेकते टिटिभः । “सिटिकिभ्यामिभः०" [उ. ३३२] इति इभः । टिंकेश्च टिट् इत्यादेशः । टिट्टीति भाषते वा .। "क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः । टी'टीतिः कुर्वन् भाति-दीप्यते भाषते वाटीटिभः । “क्वचित्" [५।१।१७१] इति डः । उच्छीथोऽपि । .
. ७६ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता कलविके-कुलिङ्कोऽपि कलते शब्दायते कलविङ्कः । “कलेरविकः" [उ. ६५] इति 'अविङ्कः' प्रत्ययः । चटकस्तत्र । “कुल बन्धुसंस्त्यानयोः" । कोलति कुलिङ्कः । “कुलिचिरिभ्यामिकक्" [उ. ६४] इति इकक् । स्वार्थिक के, कुलिङ्कक इत्ययमुक्तोऽभिधानचिन्तामणौ । दात्यूहे कालकण्ठकः ॥११९॥ दात्योहोऽपि ददाति आनन्दम् दात्यूहः । “दस्त्यूहः” [उ.५९४] इति त्यूहः, तत्र । कालः कण्ठोऽस्य कालकण्ठः । स्वार्थिक के, कालकण्ठकः । ददाति आनन्दम् दात्योहः । वाहुलकात् 'त्योहः' प्रत्ययः । बलाका केरुका विसकण्टिका बलम् अकति बलाका । "बल प्राणनधान्यावरोधयोः" वलति वा । "शलि- बलिपति०" [उ. ३४] इति आकः । बकैरुच्यते बकेरुका। घनि, पृषोदरा- दित्वात् साधुः । बिसमिव कण्टोऽस्याः बिसकण्टिका । मेधाव्यपि शुके ...... मेधा विद्यतेऽस्य मेधावी । “अस्तपोमायामेधास्रजो विन्" [७२१४७] इति विन् । शवति शुकः । “विचिपुषि०" [उ. २२] इति कित् कः । “शुक गतौ" शोकति गच्छति वा । "अच्" [५।१।४९] इति अच् । तैलपायिकायां निशाटनी ॥१२०॥ तैलम् पिबतीति तैलपायिका-णकः प्रत्ययः-नित्यमास्यविकासात् । -निशायाम् अटति-गच्छति निशाटनी । “अनट्" [५।३।१२४] इति अनट् । वल्गुलिकानाम्नी ॥१२०॥ कपोते पारावतोऽपि "कवृड् वर्णे" कब्यते कपोतः । "कबेरोतः पुच" [उ.२१७] इति ओतः । धातोर्वकारस्य पत्वं च, तत्र । पारम् आपतति पारापतः । "जपादीनां पो वः" १२।३।१०५] इति पस्य वत्वे पारावतः । उक्ताः खचराः पञ्चेन्द्रियाः । अथ जलचरानाह मत्स्ये मच्छः माद्यति जलेन मत्स्यः । “मदेः स्यः" [उ. ३८३] इति स्यः, तत्र । “मदेच् हर्षे! माद्यति पानीयेन मच्छः । "तुदिमदिपद्यदि०" [उ. १२४] इति 'छंक्' प्रत्ययः ।
७७ हैमनाममालाशिलोम्छदीपिका अथ तन्तुणे। स्मृतो वरुणपाशोऽपि तन्तुवत् तुणति-कुटिलीभवति तन्तुणः-पृषोदरादित्वात्-ग्राहस्तत्र । वरुण- स्येव पाशोऽस्य वरुणपाशः । नक्रे शकुमुखोऽपि ॥१२१॥ न न कामति नक्रः, कुम्भीरः । “नः क्रमिगमि." [उ. ४] इति डिद् 'भः' प्रत्ययः । नखादित्वाद् एकस्य नो. लोपः अपरस्य अदभावः । तत्र । शङ्को:- कोलकस्येव मुखमस्य शङ्कुमुखः ॥१२१॥ उहारः कूर्मः . "उहतुहृदुह अर्दने" ओहति अर्दयति उहारः। "द्वारशृङ्गार०" [उ: ४११] इति आरे निपात्यते । “नाम्युपान्त्य०" [६।१।५४] इति के । उहः पीडा तम् इयर्ति-प्राप्नोतीति वा । किरति कुरति वा कूर्मः । “रुक्मग्रीष्म०" [उ. ३४६] इति 'मे' निपात्यते । पुटीरः, पीथः च । इत्येष तिर्यक्काण्डः शिलोच्छितः। इति-अमुना प्रकारेण एष-उक्तत्वेन प्रत्यक्षः तिर्यकाण्डः: श्रीहैमनाममाला- चतुर्थकाण्डः शिलोञ्छितः शिलोञ्छीकृत इत्यर्थः । इति श्रीमबृहत्खरतरगच्छीय-श्रीजयसागरमहोपाध्यायसन्तानीय- वाचनाचार्यश्रीभानुमेरुगणिशिष्यमुख्य–ोज्ञानविमलो- पाध्यायविनेय-वाचनाचार्यश्रीवल्लभगणिविरचितायाम् श्रीहैमनाममालाशिलोच्छटीकायाम् चतुर्थतिर्यकाण्डस्य शिलोन्छः समाप्तः । १ अ. भोहयति । २ जे. 'कुरति वा' नास्ति ।
.. पञ्चमो नारककाण्डः अथ पञ्चमनारककाण्डस्य शिलोञ्छो विवियते- नारकास्तु नैरयिका नरके भवा नारकाः । "भवे" [६।३।१२३॥ इति अण् । निरये भंवा नैरयिकाः । "भवे!' [६।३।१२.३] इति इकण् । यौगिकत्वात् नारंकिक-नारकोयादयोऽपि । पाताले तु तलं रसा ।।१२२॥ पतन्ति अस्मिन् पातालम् । “पतिकृलूभ्यो णित्" [उ. ४७९] इति आलः । पातम् अलतीति वा । तलति तलम् । “अच्" । रस्यते रसाः। भीमो भीमसेन इति न्यायाद्वा । तलम् रसा ॥१२२।। इति पञ्चमकाण्डस्य शिलोच्छोऽयं समर्थितः । इति अमुना प्रकारेण श्रीहैमनाममालायाः , पञ्चमनारककाण्डस्य अयम् उक्तत्वेन प्रत्यक्षः शिलोञ्छः समर्थितः-विरचित इत्यर्थः । इति श्रीमहत्त्खरतरगच्छीय-श्रीजयसागरमहोपाध्यायसन्ता- नीय-वाचनाचार्यश्रीभानुमेरुगणिशिष्यमुख्य-श्रीज्ञान- विमलोपाध्यायविनेय-वाचनाचार्यश्रीवल्लभ- गणिविरचितायां.श्रीहेमनाममालाशिलोग्छ- टीकायां पञ्चमनारककाण्डस्य शिलोञ्छ: समाप्तः । ..
.. षष्ठः सामान्यकाण्डः उक्ता देवाधिदेवा मुक्ताः, संसारिणश्चतुर्गतयो देवा मास्तिर्यञ्चो नारकाश्च क्रमादसाधारणाङ्गसहिताः पञ्चभिः-पञ्चभिः : काण्डैरिदानी तत्साधारणनामाभिधा- यिषष्ठसामान्यकाण्डस्य शिलोञ्छो वित्रियते- जीवोऽपि चेतने "जीव प्राणधारणे" जीवति जीवः । अच् । चेतनाशीलश्चेतनः । व्यञ्जना- न्तत्वाद् "इडितः०" [५।२।४४] इति अनः । चेतयते वा । "रम्यादिभ्यः" [५।३।१२६] इति कर्तरि अनट् । तत्र । अत्कः, अन्नः च । । जन्तौ प्राणी "जनैचि प्रादुर्भावे" जायते जन्तुः । पुंक्लीबलिङ्गस्तत्र । “कृसिकमि०" [उ. ७७३] इति तुन् । प्राणाः सन्ति अस्य प्राणी। प्राणवान् , मरतः, मतेः, अमतः, कणी-चिः, मन्दसानः, वयोधाः च । जन्मोऽपि जन्मनि ॥१२३॥ जायते जन्मः । "रुक्मग्रीष्म" [उ. ३४६] इति मान्तो निपात्यते । "मन्" [५।१।१४७] इति मनि जन्म उत्पत्तिस्तत्र । सुवनः, योनिः, जतः च । प्रादुः इति जन्मवाचि अव्ययम् ॥१२३॥ जीवातुर्जीविते जीव्यते अत्रेति जीवातुः । पुंक्लीबलिङ्गः "जीवेरातुः" [उ..७८२] इत्यनेन "जीव प्राणधारणे" इत्यस्माद् 'आतुः' प्रत्ययः । जीव्यतेऽत्रेति जीवितम् प्राणाः, तत्र । जिगन्तुः, जिगम्नुः मरठः, अरुः, सन्तोऽयम्, अनुः उकारान्तोऽयम् , गयः च । अथायुः पुंस्युदन्तोऽपि चायुषि । एति गच्छति अनेन गत्यन्तरमित्यायुः । “कृवापाजि०" [उ. १] इति उण्। उदन्त इति उकारान्तः । एति-आगच्छति प्रतिबन्धकतां स्वकृतकर्मावाप्तनरकादि- दुर्गतेर्निष्क्रमितुमनसो जन्तोः इति आयुः । "इणो णित्" [उ. ९९८] इति उस् । यद् वा, आयाति भवाद्-भवान्तरं संक्रामतां जन्तूनाम् निश्चयेनोदयमागच्छतीति . आयुः, जीवितकालः तत्र । पृषोदरादित्वात् साधुः । शिवानकोऽपि, तालव्या- दिरयम् ।। .
• • श्रीश्रीवल्लभगणिधिनिर्मिता सङ्कल्पे स्याद् विकल्पोऽपि संकल्पनम् सङ्कल्पः, मनसो व्यापारः, तत्र । विकल्पनम् विकल्पः । मनोऽनिन्द्रियमपि मन्यते जानाति अर्थात् मनः । “अस्" [उ.९५२] इति अस् । यदाह'- तर्के "सर्वार्थग्रहणं मनः" इति । न विद्यते इन्द्रियं अस्य अनिन्द्रियम् । स्पृशानः, संस्पृशानः, स्तिभिः, जिगम्नुः, गान्त्रम्, वीकः, कन्तुः, मर्कः च । अथ ॥१२४॥ ':... शमै सौख्यम् "शृश् हिंसायाम्" शृणाति दुःखमिति शर्मम् । पुंक्लीवः । “अतिरीस्तुसुहु- सुश०" [उ.३३८] इति मः । सरति दुःखम् याति अनेन सर्ममपि, दन्त्यादिः । सुखमेव सौख्यम् । भेषजादित्वाद् ट्यण् । स्योनम् प्रतीकः, नन्दयन्तः, मृडीकम् , गेष्णम् च । “शो तनूकरणे" श्यति दुःखम्-शातम् तालव्यादिरिति क्षीरस्वामी । पीडा बाधः पीडनम् पीडा । "भीषिभूषि०" [५।३।१०९] इति बहुवचनाद् अङ् । "बाघ रोटने" रोटनम् प्रतिधातः । बाध्यतेऽनेन बाधः । घञ् । वधिः, तृप्रम् , प्रम् , क्रूरः च । चर्चा चहॊऽपि कथ्यते । "चर्चण अध्ययने" चर्चनम् चर्चा । “भीषिभूषि०" [५।३।१०९] इति अङ् । चर्च्यते चर्चः। विप्रतीसारोऽनुशये वैपरीत्येन प्रतिसरणम् विप्रतिसारः । एकदेशस्य विकृतत्वात् विप्रतीसारः । "घञ्युपसर्गस्य बहुलम्" [३।२।८६] इति वा दीर्घः । अनुशयनम् अनुशयः पश्चात्तापः तत्र । अथार्थी अपीन्द्रियार्थवत् ॥१२५॥ अर्थ्यन्ते-विचार्यन्ते अर्थाः । इन्द्रियैरर्थ्यन्ते इन्द्रियार्थाः । वदर्थः पूर्ववदवसेयः । गोचरनाम्नी ॥१२५॥ सुशीमस्तु सुपीमोऽपि १. जे. ज. प्रती 'यदाह' नास्ति । २. जे. गात्रम् । ३. जे. ज. स्पोनम् । १.... प्रा. प्रती-'शो तन्करणे' श्यति दुःखम् शातम् तालव्यादिरिति क्षीरस्वामी' इति पाठो नोपलभ्यते ।
" 8 । हैमनाममालाशिलोग्छदीपिका ८१ "श्यैङ् गतौ" सुष्टु श्यायते सुशीमः, तालव्यमध्यः । “रुक्मग्रीष्म०" [उ.३४६] इति मान्तो निपात्यते । शोभना सीमाऽस्य सुषीमः । पृषोदरादित्वात् सस्य षत्वम् । मूर्धन्यमध्यः । शीतलनाम्नी । शतेरोऽपि । कक्खटः खक्खटोऽपि च । जरठो जरुटः "कक्ख हसने" कवख्यते कक्खटः । "दिव्यवि०" [उ.१४२] इति अटः । केचिदेनं धातुं द्वितीयादि मन्यन्ते, तन्मते खख्यते खक्खटः । "दिव्यवि० [उ.१४२] इति अटः । "जपू च जरसि" जीर्यते जरठः । “मृजशकम्यमिरमिरपिभ्यो- Sठ:" [उ.१६७] इति अठः । गजभृभ्यः उट उडश्च" [उ.१५३] इति उटे जरुटः । कठिननामानि । अम्लेऽम्ब्ल: "अम गतौ” अम्यते अम्लः । “अबुङ् शब्दे" अम्बते अम्ब्लः, रसविशेषः । उभयत्र “शामाश्याशक्यम्ब्यमिभ्यो लः" [उ.४६२] इति लः । रावो रख इव स्मृतः ॥१२६॥ "रंक् शव्दे" रवणम् रूयते अनेन वा रावः । बहुलाधिकाराद् दीर्घः । रवणम् रवः । “युवर्ण०" [५।३।२८] इति अल् । इवो वदर्थवाचकः । क्षवोऽपि ॥१२६॥ निषादो निषधः निषीदन्ति स्वरा अत्र निषादः, सप्तमः स्वरः । बाहुलकात् सोपसर्गादपि णः । यदाह- निषीदन्ति स्वरा अस्मिन् निषादस्तेन हेतुना । इति । यदाहु:- षड्ज मयूरा ब्रुवते. गाव ऋषभभाषिणः । अजा वदति गान्धारं, क्रौञ्चः क्वणति मध्यमम् । पुष्पसाधारणे काले पिकः कूजति पञ्चमम् । धैवतं हेषते वाजी निषादं बुंहते गजः । "पोच् अन्तकर्मणि" निष्यति निषधः । “नेः स्यतेरधन" [उ.२५२] इति अधक् । गजों गर्जा ८२ श्रोश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता "गर्ज अव्यक्ते' शब्दे" गर्जनम् गर्जः । अल् । “भीषिभूषि" [५।३। १०९] इति बहुवचनाद् अङि प्रत्यये गर्जा । हस्तिध्वनिनाम्नी । मद्रोऽपि मन्द्रवत् । "मदैच् ह" माद्यति मध्यताराभ्यां मद्रः । “भोवृधिरुधि०" [उ.३८७] इति रः । “मदुङ् स्तुत्यादिपु" मन्यते मध्यताराभ्यां मन्द्रः, गम्भीरस्वरः "भीवृधि०" [उ.३८७] इत्यादिना रः । वदर्थः पूर्ववद् भावनीयः । आकरो निकरे आकीर्यते आकरः । अल् । निकीर्यते निकरः समूहस्तत्र । भुभुरः, शिशिरः, समिथम् च । युग्मे जकुटः "युजिच् समाधौ” युज्यते युग्मम् । “तिजियुजेर्ग च" [उ.३४५] इति किद् मः, धातोर्जस्य च गत्वम् । जायते जकुटः । 'नर्कुटकुक्कुटो०' [उ.१५५] इति उटे निपात्यते । पुलिङ्गः । यदाह गौडः वार्ताककुसुमे क्लीबं जकुटो यमले शुनि । द्वन्द्वमपि । अथ. कनीयसि ॥१२७॥ कनिष्ठम् - अतिशयेन अल्पम् कनीयः, कनिष्ठम् । “गुणाङ्गाद वेष्ठेयसू" [७३।९] इति 'इयसु' प्रत्ययः, 'इष्ठ' प्रत्ययश्च । “अल्पयूनोः कन् वा" [७४।३३] इति अल्पशब्दस्य 'कन्' आदेशः । अत्यल्पनाम्नी । विग्रहः शब्दप्रपञ्चे विग्रहणम् विगृह्यते वा विग्रहः । अल् प्रत्ययः । शब्दस्य प्रपञ्चः-विस्तरः शब्दप्रपञ्चः तत्र । निखिले पुनः । स्यान्निःशेषमनूनं च निवृत्तम् खिलात्-शून्यात् निखिलम् समस्तम् , तत्र । निवृत्तः शेषान्नि- सर्गतः शेषोऽस्य वा निश्शेषम् । नास्ति ऊनमस्य अनूनम् । १. जे. ज. 'अव्यक्ते' नास्ति । .
हैमनाममालाशिलोज्छदीपिका ८३ खण्डलं चापि खण्डवत् ॥१२८॥ खण्डम् : लाति खण्डलम् , खण्डम् अस्त्यस्य वा । सिध्मादित्वात् लः । खण्डचते वा । "मुरलोरल" [.४७४] इति अले निपात्यते । खण्डयते खण्डः । पुंक्लीवलिङ्गः । वदर्थः पूर्ववद् भावनीयः ॥१२८॥ मलीमसे कल्मपं च मलोऽस्यस्य मलीमसम्, मलिनम् । “मलाद् ईमसश्च" [७।२ । १४ ] इति ईमसः प्रत्ययः । तत्र । "कलि शब्दसंख्यानयोः' कलते कल्मपम् । “कलेमपः" [उ: ५६२ ] इति मपः । निकृष्टे याव्यरेपसी। निकृप्यते निकृष्टम्-अधमम्, तत्र । याप्यते निर्गुणत्वात् याप्यम् । “जपा- दीनां पो वः" [२ । ३ । १०५] इति पस्य वत्वे याव्यम् । अन्तस्थीयादिः । "रींश् गतिरेपणयोः" रीयते रेपः । "रीवृभ्यां पस्" [उ. ९८१] इति पस् । सकारा- न्तोऽयम् । लडहं रमणोयं च रम्ये "ललण ईप्सायाम्" ललयति ललहः । डलयोरैक्ये लडहः । “कृपकटिपटि- मटि०" [उ. ५८९ ] इत्यादिना अटः । यदाह गौड:- "मनोज्ञ मञ्जु मञ्जुलं लडहं रमणीयं च ।" इत्यादि । रम्यते तेन रमणीयम् । “तव्याऽनीयौ" [५। १ । २७ ] इति अनोयः । रमयते मनो रम्यम्-मनोहरम् , तत्र । “भव्यगेयजन्यरम्य०" [५ । १ । ७] इति साधुः । हर्यतः, दृशीकम् रुम्रः, धुवकः, कमरः, उशिक्, भिल्मम्, शौभुशुभः, कुमुलः, शोभुशुभश्च । नित्ये सदातनम् ॥१२९॥ शाश्वतिकं च नित्यम् भवं नित्यम् । “नेधुंवे" [६।३।१७] इति त्यब् , तत्र । सदा भवं सदातनम् । “सायंचिरं०" [६।३।८८] इति तनट् । शश्वद् भवं शाश्वतिकम् । "वर्षाकालेभ्यः [६।३।८०] इति इकण् । नेदीय इत्यन्तिकतमे स्मृतम् । अतिशयेन अन्तिकम् नेदीयः। “बाढान्तिकयोः साध-नेदौ".[७।४।३७] इति " ।
श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता - . अन्तिकस्य नेद इत्यादेशः, ततो "गुणाङ्गाद्वेष्ठेयसू” [७३।९] इति 'इयसु' प्रत्ययः । अतिशयेन अन्तिकं अन्तिकतमम्, तत्र | "प्रकृष्टे०" [७३।५] इति तमप् । एकाकिन्यवगणोऽपि एक एव एकाकी, असहाय इत्यर्थः । तत्र । "एकादाकिन् चासहाये" [७।३।२७] इति साधुः । अवगतो गणो अस्य अवगणः । यद् भागुरि:- "एकाकी स्यादवगणः" । प्रागप्यादौ प्रकीर्तितम् ॥१३०॥ प्राश्चति प्राक् । नलोपः । प्राञ्चौ प्राञ्चः । आदोयते प्रथमतया इति आदिः । पुंलिङ्गः । “उपसर्गाद् दः किः" [५।३।८७] इति किः तत्र ॥ १३०॥ मध्यमे मध्यन्दिनं च मध्ये जातं मध्यमम् । “मध्यात् मः" [६।३१७६] इति मः । मध्ये भवं मध्यन्दिनम् । “मध्याद दिनण्–ण-ईया मोऽन्तश्च" [६।३।१२६] इति दिनण् प्रत्ययः, 'म'आगमश्च, मतान्तरेण वृद्धचभावः । पक्षे माध्यन्दिनम् । निरगलमनगंले । निर्गता अर्गला अस्य निरर्गलम् । नास्ति अर्गलाऽस्य अनर्गलम् । तत्र । बहुरूपपृथगुपनानाविधाः पृथग्विधे ॥१३॥ बहु रूपम् अस्य बहुरूपः । पृथक् रूपम् अस्य पृथगुरूपः । नाना-अनेकः विधः प्रकारोऽस्य नानाविधः । पृथगविधोऽस्य पृथगविधः तत्र ॥१३१।। झम्पा झम्पोऽपि "झमू अदने" झमति झम्पा । "पम्पाशिल्पादयः" [उ. ३००] इति पान्तो निपात्यते । स्त्रोलिङ्गोऽयम् । पुंसि अन्ये । यदाह - 'झम्पः सम्पातपाटवम्' [ ] इति । अथ छन्ने छादिताऽपिहिते अपि । छाद्यते स्म छन्नम् , तस्मिन् छन्ने । छाद्यते स्म छादितम् । उभावपि “णी दान्तशान्त०" [४।४।७४] इति विकल्पेन क्ते निपात्येते, निपातनाच्च इडभावे छन्नम्, पक्षे छादितम् इति । "डुवांगक् धारणे" अपिधीयते स्म अपिहितम् । “धागः" [१५] इति तादी प्रत्यये परे 'हिः' आदेशः । “वाऽवाऽप्योस्तनि०" [३।२। १५६] इति विकल्पेन 'पि' आदेशे । पिहितम् इति तु अभिधानचिन्तामणौ उक्तमेव । प्रकाशिते प्रादुप्कृतम् हमनाममालाशिलोञ्छदीपिका ८५ प्रकाश्यते स्म प्रकाशितम् , तत्र । प्रादुष्क्रियते स्म प्रादुष्कृतम् । “निर्दहि- राविः०" [२।३।९] इति षत्वम् । अवज्ञायामसूक्षणम् ॥१३२॥ बुधैरवमाननावगणने अपि कीर्तिते । अवज्ञानम् अवज्ञा, तस्याम् । उक्ष सेचने" न सुष्टु उक्षणम् अस्य असूक्ष णम् । अवमाननम् अवमानना । अवगणनम् अवगणना । "णि-वेत्त्यासश्रन्थग्रन्थ- घट्टवन्देरनः" [५।३।१११] इति अनः । अन्दोलनमपि प्रेवा अन्दोल्यते अन्दोलनम् । अनट् । प्रेङ्गणम् प्रेङ्खा । "इखु गतौ" अल् प्रत्ययः । अथोदस्तमप्युदञ्चितम् ॥१३३॥ उदस्यते स्म उदस्तम् । उदञ्च्यते स्म उदञ्चितम् । अर्ध्वक्षिप्तम् ।।१३३॥ भिदा भित् भेदनम् भिदा । "भिदादयः" [५।३।१०८] इति अङ् । मेदनम् भित् । "क्रुत्सम्पदा०" [५।३।११४] इति क्विप् । भिदिरः, भेदः, दल्लः, भेदनम् च । चोदितमपीरिते "चुदण् सञ्चोदने" सञ्चोदनम् नोदनमित्यर्थः । चोद्यते स्म चोदितम् । "ईरण क्षेपणे" ईर्यते स्म ईरितम्, क्षिप्तम् तत्र । ऽधाऽङ्गीकृते पुनः। कक्षीकृतं स्वीकृतं च अनङ्गम् अङ्गं क्रियते स्म अङ्गीकृतम्, तत्र । अकक्षा कक्षा क्रियते स्म कक्षी- कृतम् । अस्वम् स्वम् क्रियते स्म स्वीकृतम् । छिन्ने छातमपि स्मृतम् ॥१३४॥ छिद्यते स्म छिन्नम्, तत्र । "छोंच् छेदने" छायते छातम् । “छाशोर्वा" [४।४।१२] इति क्ते साधुः ॥१३४॥ . . प्राप्ते विन्नम् : प्राप्यते स्म प्राप्तम्, तत्र । “विलंत् लाभे" विद्यते स्म विन्नम् । विस्मृतं च भवेत् प्रस्मृतमित्यपि । विस्मर्यते स्म विस्मृतम्, विगतम् स्मृतमत्र वा । प्रस्मयते स्म प्रस्मृतम्, प्रगतं स्मृतम्-स्मरणम् अत्रेति वा ।
८६ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता .. अटाटाऽट्या पर्यटनम् कुटिलम् अटनम् अटाटा । "शंसि-प्रत्ययात्" [५।३।१०५] इति अः । अटनम् अट्या । "आस्यटि." [५।३।९७] इति क्यम् । यद् मनु:- "तौर्यत्रिकं वृथाऽट्या च कामजो देशको गुणः" । इति । पर्यट्यते पर्यटनम् । अनट् । आनुपूर्व्यमनुक्रमे ॥१३५॥ अनुपूर्वस्य भावः आनुपर्यम् । "वर्णदृढादिभ्यष्ट्यण च वा" [१५९] इति ट्यण् । अनुक्रमणम् अनुक्रमः, तत्र ॥१३५॥ परीरम्भोऽपि संश्लेपे स्यात् "रभि राभस्ये" परिरम्भणम् परीरम्भः । “घञ्युपसर्गस्य." [३।२।८६] इति दीर्घत्वम् । संश्लेषणम् संश्लेषः, आलिङ्गनम् तत्र । उद्घातोऽप्युपक्रमे । उद्धननम् उद्घातः । पञ् प्रत्ययः । “णिति धात्" [४।३।१.००] इति हन्तेर्घात् इत्ययमादेशः । उपक्रमणम् उपक्रमः, आरम्भस्तत्र । जातो जातमपि जायतेऽस्यां जातिः, तत्र । जायतेऽस्मिन् जननम् वा जातम् । स्पर्धा सङ्घपोऽपि "स्पर्द्धि सङ्घर्षे' सङ्घर्पः, पराभिभवेच्छा । स्पर्द्धनम् स्पर्धा । "क्तेटो" [५।३।१०६] इति अः । “वृष सङ्घर्षे' सङ्घर्षणम् सङ्घर्षः । अर्थ विक्रिया ॥१३६॥ विकारो विकृतिश्चापि विक्रियते विक्रिया । "कृगः श च वा" [५।३।१००] इति श प्रत्ययः । विकरणम् विकारः । विक्रियते. विकृतिः । 'स्त्रियां क्तिः" [५।३।९१] इति क्तिः । विलम्भस्तु समर्पणम् । "डुलभिप् प्राप्तौ” विलम्भनम् विलम्भः । घञ् प्रत्ययः । “उपसर्गात् खल- घोश्च" [४।४।१०७] इति नोऽन्तः । समर्प्यते समर्पणम् । १ ने. 'तत्र' नास्ति । -
हैमनाममालाशिलोग्छदोपिका
'८७
दिष्टया समुपजोषम्
दिशति दिष्ट्या "वृमिथिदिशिभ्यः०" [उ. ६०१] इति ष्ट्यादिः 'आ'
प्रत्ययः । यथा-दिष्ट्या ते पुत्रो जातः । “जुषी प्रीतिसेवनयोः" समुपजुष्यते
समुपजोषम् । बाहुलकाद् अम् । यदाह-दिष्टया समुपजोषं च सानन्दे ।
यथा-समुपजोष वर्तते । उपजोषमपि ।
सर्वदा सदा सनत् सनात् ॥१३७॥
सर्वस्मिन् काले सर्वदा । 'किम्यत्तत्सर्वैकान्यात् काले दा" [७।२।९५]
इति दा प्रत्ययः । सदा, अधुना, इदानीम् , तदानीम्, एतहीति सर्वशब्दाद
दा प्रत्ययः 'स'भावश्चास्य । “पणूयी दाने" सनोति सनत् सनात् । उभावपि
"संश्चदे॒हत्साक्षादादयः" [उ. ८८२] इति कत् प्रत्ययान्तौ निपात्येते । यथा-
सनत्कुमारः, सनात्कुमारः, सदमपि ॥१३६॥
निर्भरे च स्वती
निःशेपेण भरोऽत्र निर्भरम्-भृशम्, तत्र । सुनोतेः क्विपि, नागमाभावे
सु । यद् वा "शुभि दीप्तौ” “शुभेः स च वा” [उ. ७४३] इति डित्युकारे
सादेशे च सु । यथा-सुषुप्तम्, सुषिक्तम् । अततेः “पदिपठि." [उ. ६०७] इति
इ प्रत्यये अति । यथा-अतिकृतम्, अतीसारः, अतिवृष्टिः इति ।
हेती येन तेन च कीर्तितौ ।
हिनोति वर्द्धते हेतुः । पुंलिङ्गः । तत्र । हेतौ कारणे "कृसिकमि०"
[उ. ७७३] इति तुन् । येन तेन इत्येतौ विभक्त्यन्तप्रतिरूपकौ निपातौ ।
यथा-"येन दाता तेन ग्लाध्यः” इत्यादि । कीर्तितौ-कथितौ इत्यर्थः ।
अहो सम्बोधने ऽपि
नपूर्वात् जुहोतेविचि, अहो । यथा-'अहो देवदत्त' इत्यादि सम्बोधने
सम्बोधनार्थे ।
इति षष्ठः काण्डः शिलोञ्छितः ॥१३८॥
इति अमुना प्रकारेण षष्ठः-पण्णाम् संख्यापूरणः काण्डः श्रीहैमनाममाला-
शिलोञ्छस्य अधिकारः शिलोञ्छितः-शिलोञ्छो जातोऽस्येति शिलोञ्छितः, शिलोञ्छी-
कृत इत्यर्थः । तारकादित्वाद् इतः ॥१३८॥
.८८ श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता साम्प्रतं ग्रन्थकृत्स्वनामादिनिवेदिकां ग्रन्थसमाप्ति प्रतिपादयन्नाह- वैक्रमेऽन्दे त्रिविश्वेन्द्रमिते राधाद्यपक्षतौ। ग्रन्थोऽयं दद्दभे श्रीमज्जिनदेवमुनीश्वरैः ॥१३९॥ श्रीविद्यते येषां ते श्रीमन्तः, ते च ते जिनदेवाश्च श्रीमज्जिनदेवाः, मुनीनाम् ईश्वराः-अधिपतयो मुनीश्वराः । यद् वा, मुनिपु साधुषु ईशते-परमैश्वर्य सूरिपदलक्षणं भजन्तीत्येवं शीला मुनीश्वराः, सूरय इत्यर्थः । “स्थेशभसपिस- कसो वरः" [५।२।८१] इति वरः । श्रीमज्जिनदेवाश्च ते मुनोश्वराश्च श्रीमज्जिनदेवमुनोश्वरास्तैः श्रीमज्जिनदेवमुनीश्वरैः । श्रीमदवृद्धतरखरतरगच्छाल- कारोदारहारश्रीजिनप्रभसूरिशरण्यवरेण्यचरणसरसोरुहचञ्चरीकाकरस्य : प्रत्यक्षो- पलम्यमानो ग्रन्थः-शास्त्रम् ददृभे-सन्दृब्ध इत्यर्थः । कस्मिन् वर्षे ? इत्याह- विक्रमस्य-विक्रमादित्यनृपतेरयं वैक्रमः । "तस्येदम्" [६।३।१६०] इति अण् । तस्मिन् वैक्रमे' विक्रमादित्यनृपतिसम्बन्धिनि अब्दे-संवत्सरे । किम्भूते ? 'त्रिविश्वेन्द्रमिते' "अङ्कानाम् वक्रतो गतिः" इति वचनप्रामाण्यात्, इन्द्र- शब्देन चतुर्दशसंख्यायाः संज्ञा । यदुक्तम्- "शकैर्गुरुः सप्त कुभिश्च मन्दः" । इत्यत्र शनैरिति चतुर्दशभिरित्यर्थः । विश्वशब्देन भुवनम्, भुवनशब्देन त्रीणि । पुनरपि त्रीणि । ततश्च द्वन्द्वे त्रिविश्वेन्द्रास्तैर्मितः-प्रमितः त्रिविश्वेन्द्रमितस्तस्मिन् त्रिविश्वेन्द्रमिते १४३३ वर्षे । पुनः कस्याम् ? 'राधाद्यपक्षतौ' राधः वैशाख- स्तस्य आद्यपक्षतिः-कृष्णप्रतिपत् तस्यां राधाद्यपक्षतौ ग्रन्थोऽयं विरचित इत्यर्थः ॥१३९॥ इति श्रीमबृहत्खरतरगच्छोय-श्रीजयसागरमहोपाध्यायसन्तानीय वाचनाचार्यश्रीभानुमेरुगणिशिष्यमुख्यश्रीज्ञानविमलोपा- ध्यायविनेयवाचनाचार्यश्रीवल्लभगणिविरचितायां श्रीहैमनाममालाशिलोच्छटीकायां साधारण- काण्डस्य शिलोग्छः समाप्तः । तत्समाप्तौ समाप्ता चेयं श्री हैमनाम- मालाशिलोञ्छटीका छ। श्रीः ।। १. जे. 'वै क्रमे नास्ति ।
[ टीकाकारकृता प्रशस्तिः] श्रीमत्खरतरगच्छे चक्रे यैः सन्नवाङ्गवरवृत्तिः । श्रीमन्तोऽभयदेवाचार्या ज्यायां विरेजुस्ते ॥१॥ तत्पट्टे जिनवल्लभसूरिवराः सर्वशास्त्रपारीणाः । तेषां शिष्या आसन् श्रीमज्जिनदत्तसूरीन्द्राः ॥२॥ युग्मम्' । विख्यातयशसस्तेषां पट्टक्रमेण सूरयः । श्रीमच्छ्रीजिनमाणिक्याचार्याः मायां विरेजिरे ॥३॥ अकब्बराख्यक्षितिपालपर्पच्-चञ्चत्प्रमाणोक्तिसुलब्धशोभाः । लोकत्रयीव्याप्तयशोविताना राजन्ति ये साधुयुगप्रधानाः ॥४॥ श्रीधर्मराज्यं परिपालयत्सु दुर्वादिदर्प च निवारयत्सु । तत्पट्टपूर्वाचलसप्तसप्तिषु तेपूदितश्रीजिनचन्द्रसूरिषु ॥५॥ त्रिभिर्विशेषकम् । अकबराख्यक्षितिभृत्समक्षं येन प्रपेदे पदमुत्तमं महत् । गुरोः कराच्छी जिनचन्द्रनाम्नो विराजति श्रीजिनसिंहसूरौ ॥६॥ शुशुभिरे जिनराजमुनीश्वराः खरतराहगणाभ्रदिवाकराः । तदनुभूरिगुणा जयसागरा जगति रेजुरनुत्तमपाठकाः ॥७॥ तेषां शिष्या मुख्या दक्षाः आसन् अदूष्यगुणलक्षाः । श्रीरत्नचन्द्रनामोपाध्यायाः साधुपरिधायाः ॥८॥ तत्पट्टस्फुटपद्मप्रकाशनोदारसूरसङ्काशाः । श्रीभक्तिलाभनामोपाध्यायाः शास्त्रकर्तारः ॥९॥ धीमन्तोऽन्तिषदस्तेषां कलाकौशलपेशलाः । समजायन्त राजन्तो ग्रन्थार्थाम्भोधिपारगाः ॥१०॥ चारित्रसारपाठकभावाकरसद्गणीश्वरा दक्षाः । श्रीचारुचन्द्रवाचकधुर्याः स्मार्या मुनीशानाम् ॥११॥ तेषां क्रमशः पट्टव्योमाङ्गणशीतरश्मिसङ्काशाः ।। श्रीभानुमेरुवाचक-जीवकलश-कनककलशाङ्काः ॥१२॥ १ जे. ज. प्रतौ 'युग्मं नास्ति । ૧૨ ९० श्रीश्रीवल्लभगणिविनिर्मिता -- - तत्र चारित्रसाराख्या उपाध्यायाः महाजयाः । बभूवुः श्रुतपाथोधिपारीणाः साधुवृत्तयः ॥१३॥ तत्पट्टे समभूवन् विलसत्संवेगरङ्गसंलीनाः । वाचकपदप्रधानाः श्रीमन्तो माजुमेहाः ॥१४॥ सौभाग्यौघं निविडजडतां व्यञ्जयन्त्यन्तयन्ती, यद्वक्त्राम्भोरुहसुवसतिं प्राप्य गौलालसीति । गम्भीरा ये बृहदुदधयः स्फूर्तिमन्तो महान्तो, गाम्भीर्यादिप्रथितसुगुणैर्वर्ण्यलावण्यपुण्याः ॥१५॥ जयन्ति [ये] क्ष्मायां समयकथितज्ञानविमला- श्चिरं चञ्चत्पाठकपदवरा ज्ञानविमलाः । लसत्तरपट्टे [सद्वचनरचनारञ्जितजना. महावादिबाजप्रमितिकथनादाप्तविजयाः ॥१६॥ युग्मम्। वैराग्यरससंलीनास्तद्गुरुभ्रातरोऽधुना । विजयन्ते महान्तः श्रीतेजोरङ्गगणीश्वराः ॥१७॥ तेषां जयन्ति जयिनः सुनया : विनेयाः सद्भागधेयमतिमत्प्रतिवाद्यजेयाः । श्रीज्ञानसुन्दरसुधी-जयवल्लभाचा वाग्देवताप्रतिमसत्प्रतिभाप्रधानाः ॥१८॥ श्रीज्ञानविमलपाठकसत्पादाम्भोजचञ्चरीकेण । श्रीवल्लभेन रचिता शिलोन्छशास्त्रे शुभा टीका ॥१९॥ हैमव्याकृति-हैमोणादिग्रन्थादि-नामकोशांश्च । दृष्ट्वा विमृश्य बाढं प्रसादमासाद्य पूज्यानाम् ॥२०॥ वेदेन्द्रियरसपृथ्वीसंख्ये वर्षे खुनागपुरनगरे । मधुमासाद्ये पक्षे मूलार्के सप्तमीतिथ्याम् ॥२१॥ त्रिभिर्विशेषकम् १. प्रा. गाम्भीर्यस्थैर्यगुणप्रमुखैर्वर्ण्यलावण्यपुण्याः । जे० गाम्भीर्यादिप्रविततसुगुणैर्वर्ण्यलावण्य. पुण्याः । २. प्रा. विदधे ।
हैमनाममालाशिलोञ्छदीपिका शिलोब्छाभिधसन्नामकोशे वृत्ति वितन्वता । मयाऽलीकमिह प्रोक्तं यत् किञ्चिद् बुद्धिमान्यतः ॥२२।। मयि प्रसादमाधाय शोधनीयं तदुत्तमैः । कर्तव्या तत्र नोपेक्षा विद्वद्भिविशदाशयैः ॥२३॥ युग्मम् । यतः गच्छतः स्खलनं क्वापि प्रमादादेव जायते । हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥२४॥ अर्वाचीनविचक्षणविनिर्मितां व्याकृतिं विमृश्येति । नोपेक्षां कुरुत बुधा ग्रन्थान् संवीक्ष्य यव्धान् ॥२५॥ श्रीपार्श्वनाथदेवश्रीजिनदत्त-जिनकुशलसरीणाम् । सौम्यदृशाऽधीयानानां स्यादेपेह सद्बुद्धचै ॥२६॥ यावद् वार्द्धि-मही-मेरु-तारा-तारेश-भास्कराः । जयन्त्येते शिलोञ्छस्य तावन्नन्दतु दीपिका ॥२७॥ त्रयोदशशतान्येवं ग्रन्थमानं विनिश्चितम् । अस्याः शिलोच्छटीकाया अनुमित्या कृतं शुभम् ॥२८॥ । इति प्रशस्तिः समाप्ता । ग्रन्थाग्रम् ॥१३००॥ श्रीरस्तु ॥ श्रीः ॥ श्रीः ।। - . parman परिशिष्ट १ हैमनाममालाशिलोच्छान्तर्गतशब्दानां दीपिकाकारोद्धृत- पर्यायरूपशब्दानाञ्च अकाराधनुक्रमः ['टी.' शब्दाङ्किताः शब्दाः दीपिकाकारेणोद्धताः सन्ति । पद्याङ्क अजिरम् शब्द टी. टी, ९६ अटरूषः १०२ १०३ अटरूषकः टी. अटाटा टी. टी. ४६ ५ १०२ १३५ १३५ ११७ अव्या टी . अवारः अक्षः अक्षा अगस् अगस् अगुरुः अग्निः अग्निशिखम् अग्निहोत्री भनीन्धन आन्याहितः अप्रजः अग्रिमः १३८ ५१ १०० टी. ५१ ७२ टी. ३३ ३३ १२३ १२८ ७२ टी. १०९ ११८ ४४ अजजः टी. टी. १२९ ८७ ६६ १० टी. टी. अणसः अति अतिथि: अतिसारको अतीसारकी अत्कः टी. अत्यल्पम् टी. अद्मतिः अद्रिकाकः टो. अधमम् अधिकाङ्गम् अधियाङ्गम् अध्वनीनः टी. अधोवाटिक (भावा) टो. अनङ्गम् टी. अनर्गलम् अनिन्द्रियम् अनु: टी. अनुक्रमः अनुगः अनुगामी अनुतर्षः अनुराधा अनुशयः अनूनम् अनुराधा. १८ २४ १३४ अङ्गणम् अङ्गिका अङ्गिरसः अशोकारः मशीकृतम् अगषः अधिः भघ्रिपः अच्युतदेवी अजः १२ टी. १०९ १३१ ४८ १२४ टी. १०० १२१ १३.५ ३८ टी. ११३ टी. १४ ११ १४ अजवम् अजगवम् अजगावम् अजितबला भजिता अजिरम् .१० ४ १२५ ४ १२८ . टी. ८५ १०.
परिशिष्ट १ ९ ३ ही. १०० २५ १०० टी. टी. ८६ २२ टी. २२ १०५ ६३ ६६ १३० टी. टी. ६ ७८ अन्जुः भनेकान्तवादी भनेडमूकः अन्तरीक्षम् भन्तिकतमम् भन्तिकसद् भन्तिषत् भन्ती भन्दू भन्दोलनम् अन्धस् अन्धातमम् ६ १२४ ८९ टी. टी. ११० भरडा अरतिः भररः अरविन्दिनी अरिः भरित्रम् भरित्रम् अरुस् भर्कितः भर्थाः अर्थिकः अर्शः अहंन्तः अहंसान अलककः अलसिक अली अलीगर्दः ३२ १२५ १३३ २२ ६९ ३४ १२ टी. २ टी. १२३ टी. ९ ११७ ५८. अन्यमृतः अपचायितः ३२ टी. भा. १०८ ११० १०९ १३२ २२ अवगणः . ११६ १३० १३३ १३२ १०९ भवगणना टी. टी. टी. १०५ १०८ अपरा मपिटितम् भप्रतिचका अवर्करः अब्जपर्व अन्जिनी भब्दः मभिजः अभीषुः अभ्रपिशाचः अमत: अमतिः अमृतम् अमृतनिर्गमः अवज्ञा अवतंसः भवन्ध्यम् अवमानना १७ १३३ टी. ११० अवरा ११ १२३ ९१ अवष्ठम्भः टी. टी. टी. टी. ६७ ११३ टो. ९ टी. ९ टी. टी. ८३ १०८ ४३ भवसम् अवसक्थिका भवस्कन्दः अविः अवीरा भव्यथिषी भशनिः अशुचिः अष्टापदः अम्बा अम्बुधरः अम्ब्ल: अम्भोजिनी टी. ८३ १३ " टी. १२६ १०५ १२६ ३७ १०४ अम्लः अम्लकेसरः भयोनिः . ११४ ८९ अष्टापदः परिशिष्ट १. १३० टी. टी. ७०. आपणः भापणिका आपतिकः टी. टी. टी. ११७ आप्लवः .५० १३२ ५१. डी. भाप्लाव्यः आम्रः टी. असहायः भसुरिः असुहृत असूक्षणम् असूक असक्संज्ञम् अस्थितेजः अहमग्रिका भहम्पूर्विका अहम्प्रथामिका महिवैरिवाहः अहो १०१ .१२४ ..४९ आयुः भायुर्वेदिकः र. १९ ३.४ :२० भायुष्मान् आरम्भः ३५ ::१३६ : १९ टी. टी. १५ टी. १३८ टी. २० टी. ९२ ११३६ BTT टी. १५ १२७ ३५ टी. आकरः आक्षपाटलिकः १०७ ९९ १७ टी. '८ ३१ भारालम् आर्यः मालम् आलिशनम् आवासितधान्यम् आशयाशः आशिंत्रम् आशिरस आशिरस् आशीः आशीः आशुशुक्षणिः आश्विनेया आष्ट्रम् आस्तरणम् टी. . १५ आक्षारणा भाक्षारितः आग्नीध्रा आग्नीध्री आचमनम् ;.. ७१ २८ ७१ १०५ ११६ टी. आच्छादः ५४ टी. १०० ... ५४ १४ ८ टी. १४ टी. - टी. १५ इ टी. टी. . इडा इत्वरः ३९ १११ आच्छादनम् आजगवम् आजिहीर्षणिः आण्ड: आततायी आतिथ्यः आत्मदर्शः भादिः आदिकविः भाध्राणः भानुपूर्व्यम् आन्तःपुरिकः आन्तश्मिकः १३ १३० टी. .. ९५ श्री. "... ७४ १०३ टी.. १०३ इन्द्रनीलम् इन्द्रसुरसः इन्द्राणिका इन्द्राणी इन्द्रियार्थाः इन्विका श्री. १०३ १३.५ ६३ १२५ :: परिशिष्ट १ .. २३ उपवसथ: टी. टी. ७३ इरासवः इल्वला उपवस्त्रम् उपवासः उपवाह्यः ७२ ११० ई १५ उपवीतम् • उपावर्तनम् उपासना उर्वरा : उलपम् उशिक् टी. ईरितम् ईली. ईशवयस्य ईश्वरी ईष्मः ईहावसुः टी. १४ ....१५ ::३८ ८३ ....९५ टी. श्री. टी. १२९ टी. -:१११ उ : उहार: ...१२२ ऊ टी. टी. "११९ टी. ६९ श्री. ऊ ऊर्वान् ऊर्जस्वान् ऊर्जस्वी ६९ ५० ६९ १३३ १९ ही. ३२ . ऊहा ३२ उच्छादनम् उच्छीथः उत्क्षिप्तिका उत्पत्तिः उत्सादनम् उदन्चितम् उंदरवान् उदरिकः उदस्तम् उदिञ्चः उदीच्यम् उद्घाटनम् उद्घातः उद्घातनम् उद्भिः उन्दरः ऋजीकम् टी. १३३ ११७ १०५ टी. टी. ७० ए ११६ . टी. .१३६ एककुण्डलः । एकधारोऽसिः एकाकी 'एकादश-पूर्वम् एधनुः . .. १३० ९८ १७ टी. १०० ११५ • १५ टी. टी. ऐ टी. उन्मत्तः टी. टी. १०० १०४ ऐतश : ऐन्द्रलुप्तिकः -ऐरावतकः ३२ १०३ . उन्मत्तकः उपकर्या उपकार्या उपक्रमः उपजोषम् उपधा ऐल: १४ टी. .८६ ८६ १३६ १३७ २६ ४२ टी. टो. ओ टी. टी. १०४. ओड्रपुष्पम् मोष्ठपर्यन्तम् उपयन्ता ५६ ९६ परिशिष्ट १ औ कनीयम् ..१२७ ९१ ७३ टी. १६ १२४ १६ ७३ औदुम्वरम् औपवस्तम् औपवस्त्र मोपवायः औलदेहिकम् और्वदैहिकम् ११० कन्दर्पः कन्दुः कपटम् टी. २५ २५ कपाट: ८७ क ४८ ११२ टी. ११४ ११२ कपालम् कपिलाक्षः कपोणिः कपोतः कफोणिः ककुत् ककुदम् कक्खटः कक्खटी १६ १२६ १२१ ९१ ४६ कक्षा ११० क्रवन्धम् ९५ कक्षापटः ५५ कमठः टी. ११७ ५५ कमनः ३१ १३१ कमरम् . ६७ कक्षापुट: कक्षीकृतम् कक्ष्या करणम् करणी ११० कमरः टी. १२९ १०६ १०५ टी. १०५ टी. १० . १०८ ३३ ३३ ५५ १०९ टी. टी. टी. टी. ९५ १०९ ६८ १०२ १०२ ܀ ܀ १०७ कमलम् कमलिनी करगृहीती करण्ड: कराती करिः करी कर्कन्धुः कर्कन्धूः कर्णः कर्णः कर्णलालिका कर्णान्दुः कर्णान्ः करिः कर्वः कर्वरः कवरी कर्षः कच्छुरः कच्छूमान् कन्चुलिका कटीरम् कडतलम् कणादः कणिशम् कणीचयः कणीचिः कणोचिः कण्इतिः कण्डोलकः कथेरः कनकः कनिशम् कनिष्ठम् १०९ टी. टी. टी. ५४ श्री. १२३ ५४ ८९ टी. १०४ टी. . ११५ ठी. १०४ ११४ १०७ टी, टी. टी. ८५ १२८ १.३ ----Haben.
परिशिष्ट १ ९७ १३ टी. टी. ५२१ १०३ ११९ १८ कर्षक: कर्षणः कर्षणफलः कलविङ्कः कलिद्रुमः कलिन्दतनया कलिन्दपुत्री कल्कः ३८ टी. टी. १०३ ९७ २२ ११८ ९७ ११९ टी. १०३ टी. ११७ कल्मषम् १२९ ५४ कल्या ..१८ कालिका कालिन्दी कालीयकम् टी. काल्या कासोद (भाषा) टी. कितिः किकिः किकिदाविः विकीदिविः किङ्कणो किङ्किरः टी.. छिङ्किणीका किङ्किरातः किञ्चुलुकः कितवः टी. किरिः किरीटम् टो.. किल्विषी टो. कीकसम् कोत्तिः टी. २४ कल्याणम् हो. • कवचम् फवचित: १०१ ६५ १०८ कवाकः टी. ११७ १०४ टी. ११५ २२ कवाटः कविः कविक कविता ९१ डी. १११ ११ २२ १८ ४८ १८ ११२ .टी. ५१ टी. कशारुका कशिपुः कश्मीरअम् फसिपुः काणुकः काणूकम् कारः ५७. ११७ ५१ २२ ११८ १२ . टी. टी. टी. टी. टी. २८ १०९ । काणूरः ११५ कुकुदम् कुकणः कुङ्कुमम् कुचर: कुचिका फुटक: कुटिलाशयः कुटीरः फुठेरः फुडमा कुण्डिनम् कुण्डिनपुरम् कुण्डिनापुरम् २२ कात्यः टो. ११ कान्ता टी. २२. कामामः टी. १०१ ३१ कामुकः कारेणवः ८५ कालकम् टी. कारकण्ठः कालपृष्ठम् टी. ર ५२ हालानुसार्यम् * परिशिष्ट १ कुन्नः टी. १०९ .२२ १०६ • २२ २२ १०६ १०५ टी. टी. टी. २२ ९१,९५ १०८ १२१ १०१ टो. १४ १०१ ९३ टी. ११५ टी. १०८ कुमुत् कुमुदम् कुमुद्वती कुमुल: कुम्भीरः कुरण्डकः कुरुण्टकः कुरुविन्दः कुरुविन्दः कुरुविन्दकः कुपरः कुलकः कुलश्रेष्टिः कुलिकः कुलिङ्कः कुलिङ्गकः कुलीनः कुल्यः टी. १०८ टी. टो. टी... २२ ३६ १५ टी. २० १०५ १५ ११९ ११९ टी. १०४ टो. टी. कृतकर्मा कृतकृत्यः कृतार्थः कृती कृपीटम् कृमिः कृमिघ्नः कृमिजग्धम् कृषाकु: कृषिः कृषीटम् कृष्टिः कृष्णगदा केलीकिल: केशम् केशाः केसराम्लः केसरी कोकिला कोटीरम् कोटीशः कोठस् कोपन: कोलफला कौनः कौपीनम् कौपोदकी कौमोदकी क्रिमिः कुञ्चा क्रूरः क्रोधनः नौञ्चः क्रौच्ची क्लीवः १०४ ३९ ३९ .१०७ टो. टी. १०२ कुल्माषः ५२ कुल्मासः १०७ . कुवलयः टी. ३४ ९६ १०२ कुवली टी. . टी. १०२ टी. ९५ ९०. कुविन्दः कुशम् कुशल: कुषाकुः कुसुमम् cc टी. टी. ११५ १५. १५ ८८ १०८ टी. १०९ .११८ २८ . १२५ . टी. २४ ८२ कूचः कू चिका कूची कूटयन्त्रम् कूचिका कूपर कूर्यासः कूर्मः २८ ११८. ४५ . १२२ क्षणप्रभा १०० परिशष्ट १ ९९ क्षमस् टी. ९८ क्षमा खलतः खलिनम् खलीनम् १११ टी. १२६ १११ क्षवः क्षान्तिः क्षित्वरी २७ खल्वाट: टी. टी. ३र ९९ टी. ११ १०० टी. ९९ खात्रम् खानिः खेटम् . खोलम् टी. टी. टी. टी. १०० ६८ ६७ १०० १३४ ग २१ गङ्गा टी. २.९६ क्षिपकः क्षिपणुः क्षिपण्युः क्षिप्तम् क्षीरपः क्षुद्रस्फोटकः क्षुरिका क्षेत्रजीवः क्षेत्राजीवः. क्षोता टी. ३३ गणकः ६८ .. टी. टी. ११३ १०२ .७८ ७८ टी. टी. टी. १०८ १६ १०९ टी. टी. टो. क्षौद्रम् ख - १०४ ख १२ १०० खक्खटः १२६ टी. १२४ गण्डयन्त गण्डीरः गण्डूपदः गदयित्नुः गदयित्नुः गन्धकुसुमः गन्धवाहः गयस् गजः गर्जा गर्वरः गर्दा गवीधुका गवीश्वरः गवेधुका गवेश्वर गाशयः १२७ खजपः टी. ९० १२७ टो. टी. हो. १२ ११३ १७. १०७ ९० खजपम् खजाक:: खजाकः खजनः खटकिका खटिनी खट्टिकः टी. ९८ टी. १०७ १ ७८ ८१ . . १०८ खाः टी. १२४ १२८ टी. टी. टी. १२८ १२ टी. ९९ ५८ खण्डम् खण्डलम् खनिः खरस्कन्धः खर्जूः खजूं: टी.. गान्त्रम् गान्धारपङ्कः गारित्रम् । गिरिकः गिरीयकः गुडा गुदकीलः गुदतुद्. १०२ टी. १०२ ३३ १०० टी. खलतः श्री. ३४ १०० परिशिष्ट ? ७१ १०२ गुप्तिः गुवेरम् गुरुः घाण्टा घासिः टी. ७० टी. टी. टी. टी. १० १०२ घुहा . घोपयित्नुः १०१ ११७ च ८३ ९८ गुलुन्छुः गुथम् गृहतुः गृत्सः गृहम् गृहोल: टो. टी. चक्राणि चक्रेश्वरी ११३ ८६ २२ चटकः टी. ११९ टी. गेण्डकः टी. टी. टी. ११३ २५ टी. १२५ ९ ११५ चणकात्मजः चण्डिलः चतुर्दण्डिवा चन्दिरम् चन्दिरम् चन्दिरः चन्द्रभागा चन्द्रभागी चन्द्रमस् चन्द्रिका चन्द्रिमा टी. १०९ टी. ९७ १२५ ३९ ९२ टो. गेन्दुकः गेष्णम् गहिनी गोकर्णः गोचर गोत्रम् गोदन्तः गोपघोण्टा गोपतिः गोपरसः गपित्तम् गोमयम् गोमती गोमान् गोविट १ टी. १०२ १११ ९ ९४ चपलः ९१. ९२ चपुषः ११७ टी. टी. ११३ चमनम् २९. 4 चरणः ४८ ७८ चरणप: १०० टो. ११३ टी. चरण्टी चरण्युः चरिण्टी टी. १११ ९७ १००. गोवृषः गौतमी गौरी प्रहकल्लोल: प्रामान्तरालाटवी १५ १२५ चर्चः चर्चा १० १२५ टी. ८४ चलुः टी. १२१ ४७ ग्राहः ग्रीवी टी. चलुका चलुषः १११, टी. १०० घ चपकः ७९ घटीयन्त्रम् ९८ घनः १०८ चाणक्यः चाण्डाल: चान्द्रभागा टी. टी. ८२ घर:. टी.
परिशिष्ट १ १०१ टी. जग्धिः चान्द्रभागो ९७ २९. टी. चापः ६७ १३ जनुः जङ्गलः १०२ २ चापपटः चाम्पेयः टी. टी. जडः ९१ २२ चार:. टी. १०२ ४५ जनित्री जनित्वम् जन्तुः टी. ७१ टी.. १०२ ८३ १२३ ३१२ टी. जन्मः “११८ जन्मम् १२३ ३४ जपा १०४ ९८ २९ जमनम् जयन्ती ६४ ८१ जरठः १२६ जरत्तरः २१ चारक: चारोलो चार्वाकः चाषः चिकित्सकः चिक्खला चित्रकम् चित्रकरः चिरिण्टी चिहुराः चुप्रः चुनः चुलिल चूतः चूष्यत चेतनः चोदितम् चोरः चौरः १२६ . १००. जरुट: जर्णः जतः टी.. टी. ११७ टी. टी. ८ १२३ जलम ही. १०५ १०.१ टी. १०५ . टी. १०१ जलकम् जलधिः जलनीली ९६ १०६ १२३ १३४ जलव्यालः ११६ टी. जलाषम् जलेशयः १५ २९ जबनम् छगलक: टी. जपा १०४ छन्नम् जसुरिः १३ ११३ १३२ ११३ • १३४० टी. टी. छागः जटक: २२ १३२ छातम् छादितम् छाया छिन्नम् छुरिका ९६ ३१ ३१ टी. जहूनुकन्या जागरिता আণী जागरूकः जाङ्गलः १२ । टी. १३४. ६८ ६८ छुरी जा घाकरः जाविकः ज अकुट: १२७ जातम् . १३६ परिशिष्ट १ जति: १३६ ६२ ५२ टकपतिः टिटिभः टीटिभः ११९ ११९ ९६ १२४ टी. टी. १२१ तटाकः ... १३ तडाका ९९ टी. टी. तत्कालजफलम् १२ २ ६६ टो. जापकम् जाहवो जिगन्तुः जिंगम्नु: जित्व जित्वरी जिनः जीमृतः जीर: जीव: जीवत्पतिः जीवापानी जीवथः जीवथः जीवन्तः जीवरः १२१ टी. १०० तनुत्राणम् तन्तुणः तन्तुवायः तन्द्रिः तन्द्रीः तपस्वी १२३ १९ ४२ १९ तमस १२ . ११७ तमाल: १०३ टो. टी. टो. टी. टी. तमोहः टी. .१०० ३५ टी. १०० जीवातुः १२४ तरण्डः तरवालिका तरुणः : तरुणी तर्षितः टी. ६८ १००. ३९ १२४, ૧૨૪ टी. टी. २७ १७ टी. १०० तलम् तल्पम् १२२ ७०.. टी. जीवातु: जीवितः जिवितकाल: जुगुप्ता जूणिः अनः जैरम् जैवातृका जोपा ज्योतिपिकः तल्ल: ९९ ९२ टी. ३४ टी. टी. टी. टी. तविषम् ताततुल्य: तापसः तापसप्रियः तापिच्छः टी. १०२ . झ १०३ सम्प: १३२ ९१ सम्पा १३२ टी. १६ सम्पानम ६५ २१ ट तानम् तारकम् तारुण्यम् तालम् तालवृन्तम ताविपम् तिन्तिडीका टी.. टी. टमः टी. ८४ ५८ ७० ८४ . टऋणः सनः टी. ११७.
परिशिष्ट १ १०३ टी. दध्यप्रम् टी. २९ टी. ५२ दभ्रः २२ टी. टी. टो. ८० ६ ५ दमाहक दमूनसः दरुटः ९९ टी. ९५ टी. ११५ दरुडः ११ ११५ तिरीटम् तिलक: तिलन्तुदः तीर्थकृत् तीवरम् तको तुन्दवान् तुन्दिभः तुन्दिलः तुहिनम् तूणी- तृणध्वजः तृपत् टी. टी. टी. ९० टी. ૨૨ ३२ ३२ १२: ५७ १३ ३ टी. टी. . ६७ टी. १३४ १०४ दईरः दर्पणः दरम् दल्मिः दल्लः दशमीस्थः दशेरः दशेरः दश्रः दाक्षायणी दाक्षीपुत्रः दाढिका टी. टी.. २१ ९६ टी. टी. ११३ ११५ तृप्तः ३० १२५ . श्री. ११५ १५ २७ टी. १०४ १३८. ४६ तृप्रम् तृष्णक तेजन: तेन तैलपायिका तैलिकः तोयम् त्वक त्वक्त्रम् त्वकसारः १२० ११९ ८० १२० टी. १०५ २७ १०० २३ १०४ ९२ टी. १०३ ५९ १००. टी. १०० त्वक्सुगन्धः त्वचा त्वचिसारः त्रिकटुकम् त्रिपुटा टी. १०४ दात्यूहः दात्योहः दानम् दानशीलः दायः दार्वीरसोद्भवः दाशरथिः दिद्युत् दिधिषूः दिवःपृथिवी दिविः दिष्ट्या दीधीवाय्यम् दीधी: दीर्घजङ्घः दीर्घायुः दीवी: दुर्दिनम् २९ ८३ 3 टी १०६ ११८ द १३७ ७२ टी. ६६ ११६ टी. श्री. दंशनम् दंष्ट्रा. दक्षा दक्षार्यः दग्धकाका दधिषाय्यम् ४२ १११ ३५ टी. २२ ११८ .टी. टी.. ११९ १३ १०४ परिशिष्ट १ टी. A टी. ११० टी. ८८ दुर्भिदस् दुष्टगजः दूषणम् दूषितः टी. १७ ८८ ३१ ८६ ८० दृप्रः १२५ टी. टी. टी. टी. टी. २३. ६६ १२९. १७ टी. २२ श्री. १०४ १०४ टी टी. १०४ ८६ ११३ १०३ टी. टी. टी. १२९ ६४ टी. घाटी धान्यकोष्ठ धान्यावरोध: धामम् धावकः धिङ्गः धियानम् धीवा धुत्तरः धुर्कः धुवकः धूका धूममहिषी धूमरी धूमिका धूम्रः धूम्ररुः धूर्तः धूर्तः धूसरः धूत्वा धृत्वा. धेनः ध्वजः ध्वाजिस् ९५. टी. ५९ टी. ८३ दृप्रम् दृशीकम् दृष्टिपातः दृष्टिवादः देवता देवभूपगृहम् देवशुनि दैन्यः दौष्यन्तिः द्यावाक्षमा द्योतः द्योत्रम् द्रप्सम् द्रप्स्यम् द्रमलम् द्रविणम् द्राढिका द्रुः द्रुतः द्रोणः द्रोणकाकः ९५ १११ टी. टी. टी. ८ १११ २९ २६ २९ टी. १०४ टी. ९५ १००० ७० टी. टी. टी. टी. ४६ ९६ १०० १०९ ६५ ११८ टी. ६४ ११८ न टी. १२७ नकः १२१ द्वन्द्वम् द्वादशाङ्गम् ९२ टी. टी. टी. १११ १०१ नटमण्डनम् नदनुः नन्दयन्तः नन्दयन्तः. नपुंसकः ha धत्तरः धत्तरक: धनाधिपः १२५ टी. १०४ . . टी. ४५ टी. १४ टी. १२ नभसः ६७ १०२ नभसः .९६ टी. टो. धनु: धनु:पटस धनुर्धरः धनूः धम्मद्वपी १२ टी. टी. टी. नभाका नभाकः ११८. टी. १०३ नयः परिशिष्ट १ १०५ नबीनदुग्धम् टो. ૨૮ . १३८ ११६ नशनम् . ९३ ११६ टी. टी.. " ९१ टी. ९३ टी. १२ टी. १०३ १२० ११ ६७ ११ टी. १३ टी. १९ १२७ ४९ १२७ टी. :३८ .१३१ १२२ टी. १२२ टी. १०२ नागजम् 'नागमधुकः 'नांगरकम् . नागरङ्गः नाटिका. नाडिः नाडिका नाडिका नांडी नानाविधः नारकाः नारकिकाः नारकीयाः नारङ्गः नारायणः नार्यः नालिका निःशेषम् निःसम्पात: निकरः निकृष्टम् निखिलम् निगल: निगृहीतासिः टी. टी. १२२ टी. ११६ . ६४ १०३ १५ १०३ टी. १०३ निर्भरम् निर्मोकः निलयनी निर्वीरा निष्पः निशाटनी निशीथः निषङ्गी निषड्वरः निषधः निषादः निषेवणम् निष्पतिसुतास्त्री निस्त्रिंशपत्रकः निहाकः नीतिः नीलपुष्पम् नीलमणिः नीलसिन्दुकः नीवृत् नुविस् नेत्रम् नेत्वम् नेदीयः नेपम् नेपः नेमिः नेमी नैचिकम् नैचिकी नेपाली नैमित्तः नैमित्तिकः नैरीयकाः नैष्किकः न्यासार्पणम् ११ टी ९५ १०३ ८१ ९६ १२८ टी. .११ १२७ १२९ टी. १६ ८३ १३० ९५ १०० १२८ ११० टी.. टी. .६३ टी. टी. २ २२ २ : निचाकुस् ..नित्यम् १२९ १९ .११.२ ११२ .१७ ९६ निद्रा निन्दा निम्नगा नियुतम् निरर्गलम् निर्गुण्ठी निर्गुण्डी निर्जलदेशः १३१ १०३ ३६ १२२ .६२ टी. १०३ ही १०६ परिशिष्ट ? ३२ पपी: टी. न्युनः न्युनः टो. ६८ पपी: टी. १०९ प परपुष्टः टी. १०१ पक्षद्वारम् ११७ ९८ परपुष्टः परिघः परिच्छदः पजिनी ६८ ६१ १०५ १ " पचतः १३,१०० परिजनः टी. टी पचतः १०० १६ ८ पञ्चमानम् पटाका ६४ टी. ६१ ८५ पट्टनम् पटमः पढिः टी. ८५ टी. २२ ५४ ४५ टी. टी टी. परिणेता परिदानम् परिधायः परिवहणः परिव्रज्या परिहार्यः परीक्षकः परीरम् परीरम्मः पपरीकः पर्यटनम् पर्येपणा पर्वतः पशुरामः पलक्षुः पलायनम् पलिघः १२ टी. ALANDAN. o.at.C"" ११७ टी. टी १०० टो. टी. ११७ D ४८ ८५ पण्डः पण्यवीथी पण्यवीथिका पतत्रम् पतत्रिः पतद्ग्रहः पतमाहः पताकाण्डः पतिका पतेरः पत् पत्तनम् पत्नी पथित्वम् पदपदः पदिका पैरागः पंत्रभनी पंप्रमजरी पत्ररचना पत्रलेखा पत्रवल्लरी पत्रिका पनाम्जनम्, ५६ पल्यः पल्लि: ४० टी. ८६ टी. . ३८ ८९ टी. ११३. ५३ पल्वल: पवनी पवित्रम् पवित्रम् पशुधर्मः। पश्चात्तापः पाणिग्राहः पाणिगृहीती पाणिनिः पाण्यात्ती पातालम् टी १२५ टी. टी, ५३ टी. ..५३ श्री. टी, . टो. ३६ १२२ परिशिष्ट १ १०७ ४८ ८० टी. ९२ टी. १०० ८० पाद पादत्राणम् पादुका पामेरः पामवान् पारक १२२ ३३ m m पीतकम् पीतुः पीथः पीनुः पीयुः पीयूषम् पीलुः टो. टो. टी. १०९ ९१. टी. टी. टी. ९१ २८. पारक पारदः टी. १०९ ९१ पुक्कसः ८२ पारापतः टी. १२१ पुटः ८८ १२१ ११४ .. टी. टी. ३५ टी. ३५ पारावत: पारिन्द्रः पारिषदः पारिषद्यः पारीन्द्रः पार्थ: पार्षदः पार्श्वद्वारम् पालकाप्यः १२२ ४२ ९६ ९.४. ९१ टो. टी. टो. ११४. ६० ३५ टी. टो. ८७ ७५ : ८२ ४३. ४.३ ३२ १३१ :- ११७ १०९ टी. १०५ १३१ " टी. १००. ७२ पुटभेदाः पुटीरः पुनर्भूस्त्री पुरुः पुलिकः पुष्कलम् पुष्पम् पुष्पवती पुष्पिता पूजितः पृथग्रूप: पृथग्विधः पृषातकः पृष्ठास्थि पृष्णिः पेटकः पेटा पेटिका पेडा पेत्वम् पेयूषम् पेयूषम् पेलकः पोतः पोषयित्नुः प्रकाशितम् प्रतिग्रहः ११७ ४८ २९ ८८ ११७ ८८ 'टो. पाशयन्त्रम् पिकः पिक्का पिङ्गम् पिङ्गल पिच्छम् पिच्छलम् पिञ्छम् पिजरम् पिटकः पिटक पिनाकः पिपासितः पियाल पिशिताशी पिशुनम् पिष्टः विहितम् पीडा ९२ ही. ३३ .८८ टी. टी. १४ ४६ २७ १०२ २८ ७७ टी. टी. ११७ टी. १३२ १३२ १२५ १०८: . ४१ H टी. परिशिष्ट २१ प्रिया प्रियाला प्रेला १०० प्रेमवती प्यात्वम् प्यात्वम् प्लवः १०२ १३३: .४१ १४६ टी. टी. १२५. टी. ... टी. प्रतिवरः प्रतिसरः प्रतिसीरा प्रतीकः प्रतीक प्रतीदानम् प्रपणियः प्रभविष्णुः प्रभाकरः प्रेमेहः प्रयुतम् प्रवगः टी. टी. 'टी. ११४ प्लवगः ११४ टी. १०० फ फरकः .: ६८ १०४ टी. ७७ टो. फलपूरः फेदरी (भाषा) ११४ 'टी. २८ प्रवशमः टी. ११४ बकेरुका १२० २२. ur बठरः टी. टी. ६ ही. १०.० प्रवहणम् प्रयजनम् प्रवज्या प्रशस्तम् प्रसादनः प्रसृतम् प्रस्तद्रवाधार: टी. १०२ ८६ वतालः वदरी बहिः बहिणः पहिरुत्थ ..९.९. .. ११७ टी. ९९. प्रस्तर: वहीं ११७ ५६ १३५ टी. वलम् पलतः '' टी. "८८' १३० १०० है. बलह टी. टी. प्रस्मृतम् प्राक् प्रापिकः प्राघूर्णकः प्राणम् प्राणन्तः १३.. बलाका । १२०. ८५ . १००. टी. टी. टी. प्राणवान् प्राणी १२३ १२३ .१०० ११८ ११८. टी. टी. १२३ .१२० टी. टी. १३२ ८३ प्रादुः प्रादुष्कृतम् प्रादेशनम् प्रापणिकः वलाहकः बलाहकः वलिपुष्टः पलिभुक् वल्गुलिका बस्तकलवणम् बहुकरः बहुकरी बहुधान्यार्जकः बहुमूत्रता बहुरूपः यहुलवल्कलः २४. ७७ टो. ८९: २.४. ३४ टी. प्राप्तम् प्रायः प्रासादः प्रियंवदः टी. टी. १३५ ९८, ८६ २३ १३१.. टी. १०२.
परिशिष्ट १ १०९. टी. २९ भविल: बाणः टी. ८६. १२५. भषक: ११३ १०९: ११२.. टो. ट) १०३ १०३ श्री. १०० १४ १.३४ टी. टी. ११५ १३४ .. टी. टी. १३ . ही. १६..' १२० १२९.. बाघस् बालक्रीडनकम् बालाभिणी बिभीतकः बिमेदकः बिलः बिलाल: बिलाहकः विसकण्टिका बिसप्रसूनम् बीजकः बीजपूरः बीजपूरकः बीजपूर्ण: बीभत्सुः बुद्धिसहायः वुधानः वृहत्कुक्षिः बोधकरः १०६ टी. टी. १०४. टी. टी. टी. १०४ . ३४ ११५ टी. १०४ टी. टी. .१२.७. १०४ भसल: भार्गवः भावित्रम् भास्करः भित् भिदा भिदिरः भिदुः. भिल्मम् भिषजः भिष्णजः भुजङ्गमः भुर्भुरः भुविस् भूः भूतवासः भूलता भूषणाद्यावपनम् भृज्जनम् मृत्यः भृमल: मृशं भेदः भेदनम् मेरः भोजनम् भ्रमरः टी. ६० ८३. १०३ टी. ६२ २२ ३२ १०८ टी. टी. टी. टी. टी. ८८ ६९ १२ बोल: ९४ २४ ७३ ब्रह्मसूत्रम् ब्रह्मा. १०० ७१ टी. टी. टी. १३८ १३४ २८ १६ भक्षकः . भगवतीसूत्र भगालम् भटिल: टी. टी. ८१ टी. टी. टी. टी. टी. १११ २९ १०९ ११३ टी. टी. भण्डिल:. .११३ भ्रातृव्यः भद्रः ५ '५ मकरालयः भद्रम् भद्रकृत् भद्रकरः भद्रमुस्तः भन्द्रम् भरतः टी. टी. १०८ मकुटम् मगधः मङिक्रः टी. . . मङ्खः ११० বিড়ি ? मच्छः १२१ मन्था मज्जा मन्दसानः 100 मञ्जु १२९ टी. टी. मन्दसानः मन्दसान: टी. टी. टी. मजुरम् १२९ १२३ मणचः टी. ११७ मणो . मन्दाक्ष्यम् मन्दिरम् मन्दीरम् मण्ड कम् मण्डितपुनः टी. टी. टी. ३ मन्दः ૨૩ मत्स्य: १२१ मन्द्रः १२७ मदनः टी. मयर ही. ५ टी. १११ टी. ७९ मयुः मा मरणी १२४, १०८ टी. टो टी. ९.१ ११ मदनकः मदयित्नुः मदयित्नुः मदार मदिराससः मदोत्सवः . १८९ है. १२३ मरतः मरुदयो १०१ ३ टी. टी १०१ महकः ११५ मद्यम P टी. टी. टो. टी. ११७ ११५ १२७ मधुकरः १०९ १२४ टी. १०९ २८ १०३ १२३ टी. १०४ टी. टी. टी. १३१ १३१. ९३ टी. मरुकः मवर्कः मयर्कः मर्जिता मतः मर्मरीक: मलक्षुः मलिनम् मलिनी मलीमसम् मशी मपी मपीभाजनम् मसिः मंसिमणिः ११२ १२९ १२४ १२९ ३० मधुपः मधुवीजः मध्यकेसर: मध्यन्दिनम् मध्यभम् मनःशिला मनस मनोगवी मनोजवस् मनोज्ञम् मनोरथः मनोराज्यम मनोहरम् मन्ता मन्तु: मन्त्रिः मन्त्री दी. ३६ ३६ टी. १२९ टो. ३० टी. टी. टी. १२९ १०४ . २२ ९.५ टी. टी. टी. टी. टी. २३ मस्करः महानीलम् महावृक्षः महिषः महेला टी. १०२ ६२ टी. ११३ ६२. ३९ परिशिष्ट १ १११ टी. मांसभक्षकः ३० ११५ टी . १०१ ८९ ९२ टी. १०८ १०८ टी. ६. १०८. माक्षिकम् माणवः माणिक्यम् माणिबन्धम् माणिमन्तम् ९४. १२ ८३ टी. टी. ८३ ४५ २३ माता टी. टी. १०४ ११५ १०४ टी. टी. टी. ११४ १०४ . १३१ १२५ टी. टी. २६ २६ मुष्मः मुसल: मुस्तम् मुस्तकम् मुस्ता मुहिरम् मुहिरः मूखः मूर्द्धावसिक्तः मूषकः मृगेन्द्रः मृडीकम् मेकलकन्यका मेघः मेघजतमस् मेघमाला मेधिका मेधावी मेला मेलानन्दा मेहः मैंत्रावरुणी मोरः मोहनम् मौहृतः टी. १०८ टी. १३ २० १३ १३ ६० मातुल: मातुलितः मातुलुङ्गः माध्यन्दिनम् मायावान्. मायावी मायिकः मारिषः मारुतिः मार्जिता मार्दीकम् मार्षः मालम् मालकः माला माहिनम् माहूरः मिहिका टी. ૨૮ १२० ३६ २० टी m टी. ९८ ११७ टो. टी. टी. 8. . य टी. १०० मीरः ९६ ९५ टी. टो. टी. मीरम् मीवरः यजतः यथोद्गतः यमनी २३ ५६ यमरथः ११३ मुकरः टी. १०३ ૨ यमलम् यमुना टी. ९७ टी. टी. टी. टी. २ यवफल: मुखप्रियः मुद्देरः मुनिः मुनिसुव्रतः मुषल: मुष्का १०४ ही. २ १५ टी. ८९ यशस् याज्ञवल्क्यः याप्ययानम् ६५ परिशिष्ट ? यामवती ११ रवणः '१०० १०५ याचः रवण: टी. टी. टी. टी. यावक्र: ५८ ११७ यावनः .. ११ १२९ १२७ टी १११ टी. २१ रवणः रविवरिमयानका रदिमः रश्मिः रमजातम रसवति (भाषा) रसा रमाध्यम् रसायुः रसालः राजकसेरुका . ९.२ ३९ १२२ . ९२ १३८ याव्यम् युग्मम् युधाः टी. युवता युवती युवत्वम् टी. येन योगीशः योनिः टी. योपिता योपियक्वाधिवासन: टी. यौतकम् यौतुकम् टी यावनिका १०८ टी. टी. टी. ; १०८ १२३ ३०. १०३ राजन्यः . ८ . ११० राअपट्टः राजयायो हस्ती राजीविनी राद रात्रिः रात्री . १०५ २१ र ११ रक्तरेणुः ९३ टी ११ . रजकः रामचन्द्रः ६० टी. १०३ राममनः रणम् । १२६ १३ टी. .१०२ १० १०७. रतगालि रानम् रत्नभूमि रत्नवती टी. रायः राष्ट्रपतिकरी राहुः रिद्धधान्यम् रिशती रीतम् रुवमलम् रुचम् रुचियः १८ ८३ टी. टी. "८० स्थकार: पठः टी. ९१ १०५ २२ टो रमठः टी. ९१ टी. १०८ टी. टो. १२९. टी. रमठः रमतिः रमणीयम् रम्यम् १६ टी. ११७ १२९ स्थः साती रेपस् रेवा. १८ १२९ रवः १२६ ९७ परिशिष्ट १ ८५ ही. ៦ . ९. २३ रोचन रोदसी रोहिषम् रोमकः रोहिषः टी. १२ टी. १२५ टी. टो. ८३ ११५ वणिग्वीथी वतंसः वदान्यौ वधिः वधूटी वधूटी वधूलः । वनराजि क्नविडालः वनस्पतिः ४१ टी. १०९ ७७ लक्षम् लक्ष्मणो टी. ७ ११८ ११५ टी. . १९ १०२ टी. १०० ललनः टी. वनाश्रयः टी. ही. १२९ ४९ ८१ वन्द्रः वयोधाः वररुचिः ११८ १.६ १२३ टो . ७५ टी. टी. टी. टी. टी. टी. ३९ वराटः टी. سے اس س ३८ वराम्लः लडहम् लाला लिखकः लिखिः लिखिता लिगुः लिपिः लुम्बिः लेपक: लेप्यकृत् लेहडः लोकयुः “लोष्टमेदनः लोहितक: लोकायितिकः वराह वरिषा १०१ १०१ १०८ ૧૨ ११३ ११३ • ८१ वरुट: ८१ टी. टी. टी. वरुडः टी. टी. ११३ २३ १२१ . ९१ ५१ वरुणः वरुणपाशः वर्णपरिस्तोमः वर्ण्यम् वर्तनि वर्द्धकिः वर्द्धसानः ७६ टी. ८४ व ८० १०४ टी. १० वंशः वंशकम् वर्मितः वर्वरः ६५ १६ १०२ टी. वजम् वजकन्दकः बन्चथः टी. टी. १.५ १०२ टी. ११७ टी. वर्वरी वर्वरीकः वर्विस वर्षाः ११७ ११८ टी. ११८ १२ वन्चथः श्री. १०९ टी. १५ टी. टी. वला वम्वुल: वटम्मः पणि १५ वलगः वल्गुलिका १११ १२० ટી , परिशिष्ट १ १३ वाल्हीकः वाशिका १११ ४१ ही. वल्मितः वल्लभा वसन्तोत्सवमण्डनम् वसिः वसिः १०२ ९३ वासन्तः टी. टी. टी. टी. टी. टी. टी. टी. टी. १०३ ११ ८६ १०२ टी. टी. ८३ १०९ १०३ वसुः वसुः वसुकम् वसुनन्दकः वहतिः वहन्तः ८३ .१२४. १३७ ६८ टी. टी. टी. १०० टी. १०० वासरः वासिकः विशतिवों हस्ती. विकल्पः विकारः विकुस्रः विकृतिः विकः विक्रिया विग्रहः विजिपिलम् विद 'विदर्मनगरी विदूषकः विद्युत् ९६ १३७ १०९ १३६ वागा ११ टी. १०२ १२८ टी. ११५ ११५ ५० टी. ११४ टी. ११५ १०० १०० श्री. विधवा ४३ ११८ टी. टी. २ २ १०० ११७ टी. ९५ वाजिदन्तकः वातमजः वातायुः वानरः वानमन्तराः वानायुः वायतिः वायसः वायुः वारजः वारि वारि वारिशयः वारिशशायी वारीशसूः वादलः वार्दल: वार्वाहवाहः वाल: वालकम् वालिः वाल्मीकः वालिहकम वाल्हिका ८१ १३५ . ८५ टी. टी. टी. टी. १५ १५ १२५ १३ विधाः वेधाः विनोद विन्नम् विपणिः विप्रः विप्रतीसारः विमानम् विरोचन: विलम्भः विलोचनम् विवधिकः विवाहप्रज्ञप्तिः विविकः विवोढां विशिपम् विशेलिमा टी. १३७ टी. टी. टी १३ १०५ टी. १०५ १६ टी: ६० ७३ ६८ ५१ टी. टी. ११० '१ परिशिष्ट १ टी. टी. ३४ ૧૦૨ .. ९. टी :५० ९४. वैद्यः वैद्यमातृ वैराटः वैवधिकः वैष्णवः वैशेषिकः २४ १३५ : ९२ टी. ९२ विशेषकम् विष्कम्भः विष्ठा विस्फोटः विस्मृतम् विनगन्धिकम् विहगः विहङ्गमा विहडिका विहडः वीकः । वीकः वीजनम् वैष्ट्रम टी. : ८६ ११७ २५ ५८ २५ व्यजनम् व्यन्तरः व्याख्याप्रज्ञप्तिः .. ११७. १६ टी. टी. टी. १०० व्याडः ११०. १२४ ११० टी. ९५. वीतंसः ५३ टी. टी. व्याल: व्योम व्योमयानम् व्योषम् वीड: १०० २९ २४ १९ १२ वाल: टी. १९ टी. टी. ११८ श १०९ टी.. .१०२ .११ ७१ शकलम् शङ्करधन्व शखः शकुमुखः शठः टी. १०९ १२१ २५ । टी. ११३. . टी. टी. " २२ १०४ टी. .१०४ टी. . वीध्रः वीवधिक: वृजनम् वृद्धकाकः वृश्चिक वृषः । वृषी वृष्णि: वृष्णिः वृसी वेणुः वेत्रधरः वेत्री . वेनिः वेमः वेमा वेशः वेशन्तः वेपः वेष्पः वैजयन्ती वैतालिक: ६२. शण्ठः टी. ..२५ ६२ ६५. टी. ९६ शण्ड: १११ ७९ शण्डः ४५ ७९ ... ३ शतधारः शतप टी. १०४ टी. १२ १३ टी. १०० शतार: शतेरः शतेरः शद्रिः टी. १२ टी. टी. टी. १२६ १०९ ६४ टी. शफः বিহিছ 24 शान्दाहः पान्ग्रपञ्चः टी. टी. १२८ १५ दामनम् . टी. ९३ ६४ १०९ शाम्बूकाः शम्बरारिः टी. १६. ६ दाम्मयः २ टी. १०३ दायातकः टी. टी. शिरोजस् शिरोरुहः शिशिरः शिला शिविरः शिष्यः शीतयहः शीधुपादपः शुकः शुचिः. शुद्वान्ताध्यक्षः शुनिः शुभः शुध्रिः शुक्षपा गुप्मा प्रका धारमः १११ १२० टी. शारम् २२ टी. टी. ही. ११७ ११३ १.१३ ६७ १२५ टी. टी. टी. १०८ १०० टी. ११. १९ टी. ११ गाल: ११४ ११० ही. १२५ मारामनम् पार्मम पारीक दालाहकः ঘদিবি। पाइयरिः दामनम् बातम् मातकौम्भम् शान्तिगृहम् शान्तीगृहम, शादः शादः शाम्यूकाः शारिफलकः शाचरम् ९१ टी. टी. १३ ११५ ८७ १०६ . १६ ९१ ११६ १३ टी. श्री. . १०९ अलः राहारम शारभूषणम् दर: शेपालम् शेषः शेलारिः शोणरत्नम् मोमुगुमः सौभुशुमः शौकलः प्यामम् दयामा इयतः दयेत्यः १२९ हो. ठी. १२ १२९ टी. टी. १०१ १३० टी. १२ २८ टी. टी. टी. ८ ११५ पातिकम शिमारिणी शिमी নিয়োগ विषघाणकः থিল দিমু टी.. १९.. ११७ श्रमणः टी. १२१ অগ श्रवणः परिशिष्ट १ ११७ टी. १०९. ४.३ १५ सद्रिः सद्रुः सधर्मचारिणी टी. ९० ४१ २३ १५ १३७ टी. सनत् भ्रषणा श्रीः श्रीमान् श्रीशः श्रीसुव्रतः श्रीस्ः श्रेयम् दिलक: श्वावतान: श्वेतकमलम् १३७ ३९ टी. १६. १६ १८ टी. सनात् सन्ततिः सन्धा सन्धिः सन्नकद्रुः ८६ ३८ टी. १०२ टी. टी. टी. ९.४ सप्तर्षिजः १०६ ३५ १०२ टी. टी. षट्चरण:- षट्पदः षष्ठो' गणेशः १०९ १०९ टी. १३.७ १८ ३ १८ स. १८ :१२१ ७१ टी. १२७ ८८ संकल्प: संकोचम् संफेटः संशयालु संश्लेषः संस्तवानः संस्पृशानः संस्पृशानः संस्फेटः संहतलः ३१ १३.६ ९ सभ्यः समन्तदुग्धा समर्पणम् समाख्या समाज्ञा समाधिः समियम् समुद्गः समुद्रनवनीतम् समुद्रनवनीतम् समुपजोषम् समूहः समूहनी सम्पा सम्भवः सम्भोगः सम्माजका सम्वतका सरम् सरडः १३७ टी. टो. टी. .टी. १२७ १०० १२.४ ७०. टी.. ४.७ २ टी. ६३ .२४ टी. १०३. १३६ १०१ टो. २९ टी. टी. १०० १०६ ९५. सरण्ड: टी. १०० सगर्व्यः सवर्षः सचेष्टः सतीन: सदनिः सदम् सदा सदागतिः सदातनम् सद्रिः टी. टी. सरण्डः टी. १०८ १३७ १३७ सरमा ११३ टी. १०० १२९ सरयुः सरस्। सरासरः टो. टी. ९०ः . ११८ নিহিg 10" १५ दी टी. टी. ११५ टी. टी. टी. टी. टी. टी. टी. १२५ .१.०२ गंगाजी मरीमहावामा समिरिणी सपा सगम्, गचंदमनः संयंदा मलाय. गघिसम मध्यान स्यमा सहकार सम्मिणी समानः १०२ १३७ १०२ २ श्री. सिंहास सिंहमुखी तिवासा गिहाणम fare: मिही गिहुण्डा सिनपुर मिधान्यम सिद्धार्थः सिन्दुकः गिद्धपार: सिन्दूरम सिन्धुकः सिन्धुपारितः सिम्हनम गीमियः 104 . टी. टी. १०३ . १०३ ११७ टी. टी. टी. महान्यः १०३ १०३ टी. १०८ दी. टी, १२ १३८ ८३ टी. साथः साहिर महरि: महरिः महरिः सहोदरः महौर सायिकः . ग्रामटिकम मासयापन: सातीन मादिः मादी साधन्तः भुगतः सुप्रीयाममा तारका मुताग सुधा मुरारिहा १५ १०२ टी. टी. १५ ८६ ६१ १०६ . टी. .५ गुयनः मुथिदत्रम् मुशीमः मुपोमः ६५ १२.६ १२६ १०७ टी. टी. साधयन्त मानमिः सासरदाना सारमी सुसम्पन्नधान्यम् मुराहत सुश्मा टी. टी. १६ ६३ ११८ ६५ साम टी. ८६ ধাধা मासयान सिंह १२ टी. टी. टी. .१११ ८.
परिशिष्ट १ ११९ सूर्पः ११५ डी. ८३ टी. टी. ११२ .८९ ही. १.१२ स्थाया स्थूरी स्थौरी स्नानम् स्निग्धच्छदा स्निग्धपत्रा टी. ५० १०२ टी. टी. १११ १०२ सूर्मी :- सूर्यतनया सक्वणी सृक्विणी सृगालः संणिः सृणिका सृणीकः सुंणीकः सुणीका टी. १३ स्नुक टी. १०२ ४१ टी. १३ टी. १०० १०२ १०२ १३६ १९ सूत्वा टो. . १२४ टी.. टी. टी. ६८ ११५ ११५ ३८. ७३ टी. १०० ७० टी. टी. ११३ टी. ९७ ६९ सप्मा सेवकः सैन्धवम् सैरिभः सोमोद्भवा सौखशय्यिकः सौखशायनिकः सौखसुप्तिकः सौख्यम् सौनिकः सौरः सौरिः सौरिस्वसा -स्नुषा स्नुहा स्नुहिः स्पर्धा स्पृशान सफरकः स्फिविः स्फेट: स्फेटकः स्फोटायनः स्फौटायनः स्यमीकः स्यमीकः स्यूमः स्योनम् स्त्रस्तरः स्वर्गवैद्यौ स्वर्णम् स्ववासिनी स्वाराद स्वीकृतम् स्वेश्वरः ६९ १०० ६९ १०८ टी. टी. टी. टी. .१२५ ८१ १२५ १० ५६ १४ १० टी. १५ ९१ स्कन्धावारः ६४ स्तनन्धयः टी. २१ १३ १३४ स्तनप: २१ -- टी. १०० १४ टी. ह टी. टी. १२४ ८५ स्तबकः स्तिभिः स्तिभिः स्तनता स्तेनत्वम् स्तेयम् स्तैन्यम् स्त्री टी. टी. ६० २६ २६ हट्टवर्तनी हाम् हनूमान् हयिः हरिचन्दनम् हरितालम् टी. दी. २६ ९२ N १२० परिशिष्ट १ टी. ११५ हरिणः हरिशरीरेश्वरी हर्यक्षः ही. हिएगुलः हीकः १५ टी. ११७ १४ टी. २२ इर्थतः १२९ टी. टी. २२ २३ ११५ . ६२ ૬૨ १०९ टी. हुद हुण्डिः हेमाध्यक्षः हैरिकः होना हादिनी होः होकुः हीबेरम् हर्षयित्नुः हर्म्युलः हस्ती हान्त्रम् हार्यः हालम् हालहलम् हालाहलम् २२ टी. टी. टी. ९६ १९ १०३ १०८ १०८ १०८ टी . ११५ १८५ - .
२ ८८. ८४ ६५ ३२ ११ २७ १७ ५३ ४९ १७ परिशिष्ट २ हैमनाममालाशिलोच्छदीपिकायां दीपिकाकारण श्रीश्रीवल्लभोपाध्यायेनोद्- धृतानामवतरणश्लोकादीनामकाराद्यनुकमः। पृष्ठाङ्क पृष्ठाङ्क अकारेणोच्यते विष्णुः उन्मत्तः कितवो धूर्तों [यादवः मगुरु प्रवरं लोहं उन्मत्तधर्तधूराः [यादवः ૬૬ अवानां वक्रतो गतिः एक दश शतमस्मात् [ भजगावं धनुः प्रोक्तं ११ एकाकी स्यादवगणः [भागुरिः अथ मज्जा द्वयो० [वाचस्पति ૨૨ कर्णः श्रोत्रमरित्रं च [दुर्ग. अथ सिन्दुकः [ काममपायि मयेन्द्रिय [. ६८ अथास्थि कीकसं हड्डे [वैजयन्ती किकिदिविसंज्ञश्चाषः [वोपालितः ७५ भधियानं सारसनं [मुनिः कुन्तला मूर्द्ध जास्त्वत्रा० [दुर्ग. ३० अध्वनीनोऽतिथिज्ञेयः [ कुरुविन्दो मेघनामा [अमर. २. १.१५९ ६८ अनेडमूकस्त जडः [वैजयन्ती क्लीबं दुर्दिवसे मेला [ २५ अन्त्यधिश्रयणी भवेत् [माला गृहस्थानं स्मृतं राज्ञां [ ५५ अन्धो ह्यनेडमूकः स्यात् चण्डमालं मृषा यस्य [व्याडिः जनः पितृसधर्मा यः [व्याडिः २६ [हलायुध. कां. र. प. ४५३ जवन भोजन क्वचित् [दुर्ग. २१ अयोनिर्मुसलो स्त्री स्यात् [वैजयन्ती भ‘ढकं सुचिरपर्यु० [सूदशास्त्र झम्पः सम्पातपाटवं [ तत्र त्वाक्षारणा यः स्याद् महंन्तः क्षपणको जिनः [विक्रमादित्यकोष. ३ अहम्पूर्वो अहम्पूर्व [गौडः [अमर. १-६-१५ १५ तद्रागो यावकोऽलक्तकः [धनपाल. आतिथ्योऽतिथिरागन्तुः [माला भाथर्वणं शान्तिगृहं [वाचस्पति. तस्मान्महासरोज [ ५३ तस्य सारसनं ज्ञेयं [ दुर्ग. भापणः पण्यवीथी च [शाश्वत. लो. ३२५] ५३ तिथिपर्वोत्सवाः सर्वे [ भाप नारा इति प्रोका तौर्यत्रिकं वृथाऽच्या च [मनुस्मृति मनुस्मृति अ.१. श्लो.१०] दिष्टया ते पुत्रो जातः[ आम्रचूतो रसालश्च [ ६३ दिष्टया समुपजोषं च [ आशीस्तालगता दंष्ट्रा [ दुर्दिन ह्यन्धकारोऽब्दैः । इदं किल महातीर्थ [ द्यावापृथिव्योर्द्विवचने [ इन्द्रनीलं महानीलं [वैजयन्ती द्रप्स दध्ययन तथा [माला] इयन्त इति संख्यानं [ द्रप्सं सरं [माला इष्टो चयो दशोपेतः [भागुरिः द्रोणकाको दग्धकाको [ ई रमा मदिरा मोहे [ उच्चारो विद नना विजयन्ती ३३ ૬૬ उत्क्षिप्तिकायां कर्णान्दुः [ तारजस्त्वक्सुगन्धः [ २० १४ ११ ११ '८७ ८७ १० १ ५१ २० २ १२ धत्तूरकः स्मृतो धूर्ती ।
૨૨૨ परिशिष्ट २ ८१ ८१ ५४ १७ १८ निक्षेपः शिल्पिहस्ते तु [. ४६ निदाघेऽपि च कुङ्कुमः [वाचस्पति. ३४ निषीदन्ति स्वरा अस्मिन् [ नीवृज्जनपदो देश- [अमर. २. १. १८. ५२ पत्पादोऽह्रिश्चरणो [व्याडिः ३१ पादसमानार्थः पात् [दुर्गः ३१ पानीये यादसां पत्यौ [गौडः पिनाकोऽजगवं धनुः [अमर. १. १. ३५ ११ पियालश्च खरस्कन्धः [ पुष्पसाधारणे काले [ प्रच्छन्नमन्तरद्वार [कात्यः प्रान्तौ ओष्टस्य सृक्विणी [अमर. २.६.९१ ३१ फलपूरो बीजपूरः[ ६६ घदुरी गोपघोण्टा च [चन्द्र. बदरी स्निग्धपत्रा च [इन्दु. वहिरुको वृहद्भानुः [माला ६२ वर्हिमुखा देवाः [ बाणद्रप्सौ शरौ [दुर्ग. विभीतकः कर्षणफलो [ ६५ मनोज्ञ मञ्जु मजुलं [गौडः ८३ मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ[ मलिनी बालगर्भिणी [माला. मसिः पत्राब्जनं मेला [हारावली २५ महौषधं च मरिच [ २१ भागधाः स्तुतिवंशजाः [ मातुलो मदनश्च [अमर. २.४.७८ ६६ मुस्तमम्बुधरो मेघो [धन्वन्तरि. ६८ मेला स्त्री मेलके मशौ [गौडः २५.. यावालक्तौ लाक्षादिभिः । ૨૭ येन दाता तेन इलाध्यः [ ६४ ६. यौतकादिधनं दायो शाश्वत. लो. १५ २८ रौमके वसुकं. वसु [माला ५१ वंशे त्वकसार-कार वन्दे सुन्नतनेमिनौ [ वार्ताककुसुमे क्लीबं [गौडः ८२ वालकं वारि तोयं च [ ६६ वासनस्थमनाख्याय [ ४६ विद्यादधोगतं न्युज [शाश्वत श्लो. ४६१ २३ विष्टाविषौ स्त्रियां [अमर. २.६. ६८ ३३. वैद्यमातृसिंह्यौ तु [अमर. २.४.१०३. ६४ शर्केगुरुः सप्त कुभिश्च मन्दः [ शठो ह्यनेडमूकः स्यात् [भागुरिः शक्लो वदान्यः प्रियवाक् [भागुरिः शिक्याधारः स्कन्धग्राह्यो द्रमिल. शुभच्छागवस्तच्छाग [अमर. २.९.७६ ७१ शुष्मणि प्रणयनाभिसंस्कृतेः [ ६२ शोणरत्न लोहितकः [अमर. २.९.९२. ५८ लक्ष्णे पटे ललनया [सूदशास्त्र २० षड्ज मयूरा ब्रुवते [ ८१ समानोदर्यसोदर्य [अमर. २. ६. ३४] ३० समुपजोषं वर्तते [. सरो दध्यमबाणयोः [विश्व. रद्विकम् ८.] २१ सर्वार्थग्रहण मनः [तर्क. ] सिन्दुवारः सितपुष्पः । सिन्दूरं रक्तरेणुश्च धन्वन्तरि [ सुवर्णकर्णान्दुविलोलकर्णा [ स्निग्धं भवत्यमृतकल्प [वामनः स्नुक सुधा च महावृक्षो [ हरितालं च गोदन्तं धन्वन्तरि हीरकं मौक्तिकं स्वर्णे [वाचस्पति. २१ ८ ६५ ५८ ६८. ६४. ८७ .. ८८, ९० तर्के ८० परिशिष्ट ३. हैमनाममालाशिलोग्छदीपिकान्तनिर्दिष्टानां ग्रन्थानां ग्रन्धकर्तृणां विशिष्टनाम्नाञ्चाकाराधनुक्रमः अभयदेवाचार्यः ८९ जिनसिंहसरिः ८९ अभिधानचिन्तामणिनाममाला ५, ५९, ६२, जीवकलशः ८९ ज्ञामविमलोपाध्यायः ६, १५, अभिधानचिन्तामणिनाममालावृत्तिः २ अभिधानंचिन्तामणिनाममालाशिलोन्छ: १ ज्ञानसुन्दरः ९० अमरः ११, १४, २२, २९, ३१, ३३, तेजोरङ्गगणिः ९० ३७, १८, ५२, ५४, ५८, ६४, ६६, दुर्गः २१, ३०, ३१, ४१ ६८, ७२. अमरटीका. ३३ दुर्गसिंहः १७ देवचन्तरिः १ अरुणः ४४ देश्याम् ७, ८, ९, १०, ३२, १२, ५६ इन्दुः ६३. ६१, ६९. इन्द्रव्याकरण ३८ द्रमिलाः १८,२७ उत्पल: ५१ धनपाल: ३७ कनककलशः ८९ धन्वन्तरिः ५७, ६८ कात्यः ९, ११, ५१ नन्दिसूत्र १३ क्षीरस्वामी २५, ८० नन्दी ९ नैरुकाः ३९, ५६, ६१ गौडः १५, २५, ४०, ५९, ८२,.८३ पाणिनीयव्याकरण २२,२९, ५३, ७१ -चन्द्रः. २७,६३, ६१ पार्वमाथः १, ९१ चारित्रसारपाठकः ८९ पूर्णतल्लगच्छ १ चारुचन्द्रवाचकः.८९ बृहत्खरतरगच्छ ६. १५, ५०, ७७, ७८, जयवल्लभः ९० ८८, ८९ जयसागरमहोपाध्यायः ६, १५, ५०, भकिलाभोपाध्यायः ८९ ७८,८८, ८९. भरतः १३ जिनकुशलसूरिः ९१ भागुरिः १०, १४, १६, १७, २१, .८४ जिनचन्द्रसूरिः ८८ भानुमेरुवाचनाचार्यः ६, १५, ५०, ७७, जिनदत्तसूरिः ८९, ९१ ७८, ८८, ८९, ९० जिनदेवरिः १, २,८८ मनः ११, ८६ . जिनप्रभसूरिः १, २, ३, भाला. २०, २६, २९, ११, ६२, ७१ जिनमाणिक्यसूरिः ८९ मोलाकार: २१, ५१, ५५ जिनराजसूरिः ८९ मुनिः ११. जिनवल्लभसूरिः ८९ मेण्ठसंहिता १२ कौटल्यः ६१ ८८
१२४
परिशिष्ट ३
श्रीभोजः ६३
श्रीवल्लभवाचनाचार्यः ६, १५, ५०, ७७,
७८, ८८, ९०
सूदशास्त्रम् २०
स्मृतिः २७
यादवः ६६
रत्नचन्द्रोपाध्यायः ८९
वाचस्पतिः ३२, ३१, ५३, ५८
वामनः ५२, ६८
विक्रमादित्यकोषः ३
विश्वः २१
वृद्धतरखरतरगच्छ १, ८८
वैजयन्ती १७, ३२, ५८
वैजयन्तीकारः ३३, ३५, ५५
वोपालितः ७५
व्याडिः २६, २८, ३१, ४२, ४९
शाश्वतः २२, २८, ५२
हलायुधः १७
-
हारावली २५
हेमचन्द्राचार्य १
हैमनाममालाशिलोल्छः २, ६, १५, ५०
७७, ७८, ८८, ९०
हैमव्याकरण ९०
हैमोणादिः ९०
.
.. ५ १७-१. पु. दृष्टिः पातो । १७-१. पु. अ. आ: द्वादशाङ्गयां । १७-३. परिशिष्ट-४ मूलग्रन्थस्य पाठभेदाः १-३. पु.म. आ. श्रीहेमनाममालायाः । १-१. अ. शलोञ्छः । २-२. अ. सम्भवे शम्भवेऽपि च । ३-४. आ. युगादिजिनमातरम् । ४-२. अ. अजि. तारिः । पु. आ. 'च' नास्ति । ४-४. अ. सुतारिकोक्ता । ५-१. पु. अ. आ. भद्रकृद्भिद्रकरोऽपि । ५-२. आ. श्रमणोऽपि । ५-३. पु. भद्रं भन्दमपि, अ. भद्रं भद्रमपि, आ. भन्द्रं मन्दमपि । ७-३. पु. समुद्रं नवनीतं । ८-३: अ. द्योतस् । पु. आ. पृष्णिमृष्णी, म. पृष्णिमुष्णो । ९-१. पु. आ. इन्वका, अ. इंबिका। ११-३. म. तुंग्यौ । १२-१. अ. स्यादन्धतमसं । १२-३. अ. सांस- ष्टक० । १२-४ अ. तात्कालजे । १३-२. आ. वादिलं । अ. दुर्दिने । १४-२. अ.. धनाधिपे । १४-३. आ. अजगवमजागावमपि । १४-४. पु. अ. आ. शङ्करन्विनि । १५-४. पु. आ. ईः । १६-३. आ. व्याख्याव्यवाहाभ्यां । अ. जुगुप्साऽ या० । १८-२.. अ. रुशतीद्रुशत्यपि । १८-३. पु. सन्धीयां । १९-१. पु. अ. आ. सूका । १९-१. पु. अ. आ. मन्दाक्षञ्च । २०-१.२. पु. केलीकिकिलोऽपि । २१-१. पुं. आ. यौवनिको । २२-४. पु. अ. ओ. ०ऽन्धजडशठेष्वप्यने- डमूकस्तु । २३-१. अ. वदन्यौ । २३-२. अ. दानशैल० । २३-३. अ. मूर्षि । २३-३. अ. ऽपीभ्ये । २४-१. पु. आ. वैवधिकावपि । २४-३. अ. आ. सम्माजके । २४-३. पु. अ. बहुकरो । २४-४. पु. अ. आ. इतीष्यते च । २५-१.२. अ. विहङ्गिमाप्यथोर्ध्वदेहिके । २५-३. पु. अ. और्ध्वदेहिकं, आ. ऊर्ध्वदैहिकं । २५-४. अ.० रनृजो । २५-४. पु. आ. शठ । २७-१. अ. प्रदेश- नमपि । २७-३. आ. 'कोपनः' नास्ति । २७-३. पु. तृणक् । २८-२. पु. अ. आ. मजिताऽपि च मार्जिता । २९-२. पु. अ. पिच्छले । २९-४. पु. आ. जेमनं । ३०-१. अ. तृप्तौ । ३०-२. पु. पिशिताशनि । ३०-३. पु. आ. मनोराज्यामनोगव्या. । ३२-१. अ. पूजिते । ३२-४. अ. ऽप्येन्द्रलुप्तके, आ. ऽप्येन्द्रलुप्तिके । ३३-१ पु. आ. कदरो। ३३-३. ४. अ. खर्जूतिर्विस्फोटो । ३४-३. पु. मोहप्रमोहव- दायुः । ३५-४. आ. परिषद्योऽपि । ३६-१. पु. स्यु मित्तकनेमित्त० । ३६-४ आ. कुलिकोऽपि ।.३७.४. पु. प्रभुविष्णुरपि । ३८-१. पु. अ. आ. जंघाकरोऽपि । ३८-२. - आ, ऽप्यनुगामनि । ३८-३. आ. पर्येषणोपासनोऽपि । ३९.१. पु.
१२६ परिशिष्ट-४ च आतिथ्यौ० । ३९-२. ऽभियो । ३९-३, मा. श्री । ४०-१. पु. अ.. आ. सुवा. सिनी। ४०-२. पु. अ. आ. चिरण्टी । १०-२. पु. चिरट्यपि । ४०-३. पु. 'पत्न्यां नास्ति । ४०-३. पु. कत्री, आ. का | ४२-३. पु. म. आ. दिधीपू० । १३-२, पु. श्रृंवर्णा श्रवणे, अ. श्रमणा श्रवणे । ४४-२. पु. माहने । ४४-३. म, सगर्भोऽपि, पु. सगाऽपि । ४४-४. अ. स्यादग्रिज० । ४५.२. पु. ३२. जनत्र्यपि, आ. जनेत्र्यपि । ४५-४. पु. कर्णशब्दो ग्रहोऽपि । १६-४. आ. कफोणवत् । ४७-१. पु. कापूरे । ४७-१. पु. आ. सिंहतालः, अ. 'सिंहतलः' नास्ति । ४७-२. पु. म. मा. सिंहतलोऽपि । ४७.३.पु. आ. चुलकोऽपि चुलो, अ. चलकोऽपि चलौ । १८-१, पु. अ. आ. 'च' नास्ति। ४८-४ पु. पृष्ठास्थीनि । ४९-३. पु. अ. भा. सिंघाणः । ५०-२. अ. वंशोऽपि । ५०-३. अ. उत्सादनोच्छादने । ५०-३.४. पु. म. आ. पटवा०... ५१-१. पु. कृमिक जग्धं, आ. क्रमिजग्धं । ५१-१. २. पु. अ. आ. चागरौ । ५१.४. पु. कुङ्कुमः । ५२-३. पु. आ. मुकुटोऽपि । ५२-४. अ. विशेपकैः । ५३-१. पु. वसन्तोप्यवसतो । ५३-२. पु. अ. आ. तुवल्लरी । ५३- ३. ४. पु. भा. मनरी च पारितथ्या पर्यातथ्या तथैव च । म. मञ्जरी च पत्रा- त्पारितथ्या पर्या च तथ्यया । ५४-१. पु. आ. कर्णेन्दूरपि कर्णेन्दुः । ५४-३. म. आ, किंकिणी किंकणी । ५४-१. पु. आ. अच्छादात् । ५५-१. पु. आ. कुर्पासो, अ, कुर्पासे । ५५-१. पुः 'कक्षापटे' नास्ति । ५६-४. अ. संस्तरः । ५७-१. अ, पतग्राहप्रतिग्राहावपि । ५७-३. अ. ऽप्यात्मदीऽथ । ५८.३. म. गीरीयको । ५९-१. अ. गण्डकोऽपि गन्दुको । ५९-३. अ. भरथः । ६१-४. अ. परिवकर्णमित्यपि । ६२.१. म. निष्किके । ६४. २. पु. 'अपि' नास्ति । ६४-२. पु. शबरो, अ. शिवरे. । ६४-४. अ. प्रकीयते । आ' प्रकीर्तिताम् । ६५-२. अ, झम्फानं. । ६६-१- आ. वस्त्र । ६६-३ पु. 'धियाझं नास्ति । ६७-३. पु. आ. धनूर्धनुःशरा० । ६८.१. मा. खेट । ६९-१. आ. ऊर्जुस्यू ऊर्जस्वान् । ६९-१. अ. मगधों । ६१-२. अ. विधि- करो । ६९-३, ४. अ. सौख्याय्यको । ६९-४, पु. अ. आ. सौखसुप्तिके । ७०-१. प्र. आ, संस्फोटसंफेटी । ७०-२. पु. आ. बलि । ७०-२. पु. भा. द्रविणमूक । ७१.२, अ. तपस्यपि । ७१-३. ४. पु. चाग्नीध्राग्नीनाधीप्यथ, आ.
परिशिष्ट-४ २२७ - चाग्नीध्राग्नीधाप्यथ, अ. चाग्नीधा अनीध्रप्यथ । ७२.२. पु. भ.आ. दधिषाज्यं । ७२-३. पु. भा. अग्निहोत्र्यान्याहितो, म. हग्निहोत्र्यग्न्याहितो । ७३-१.पु. अ. मा. उपवस्त्रमौपवस्त्र० । ७४-१. पु. मैत्राववरण्यादि०, अ. मैत्र्यावरुण्यादि । ७४- ३. अ. योगेशो । ७४-३. अ. याज्ञवल्को । ७५-४. पु. आ. चाणाक्य. ७६- १. पु.। पु. वैशेषिको । ७६-३. पु. अ. आ. लोकायतिकः । ७७-३ पु.आ. अयुते नियुतं, अ. आयुते नियतं । ७७-३. आ. पाते । ७८ -१. अ. कर्णो पारित्रे । ७८-२. आ. गवैश्वरोऽपि । ७९-३. पु. अ. भा. तन्त्रवायोऽपि । ७९-४. पु.म. आ. व्योमापि । ७९-४.पु आ. कीर्तिता । ८०-४,मा. वर्द्धिकः । ८१-१. पु. चित्रकारो। ८१-२. म. लेपकृत् । ८२-२. पु. भा. चाण्डालवुक्कसौ । ८४-४. पु. मालवे मालको । ८६-१. पु. अ. आ. सुरंगायां । ८६-३. पु. आ. उपकार्योपकार्याऽपि, अ. उपकार्यों उपकार्यापि । ८६-४. पु. प्रसादे । ८६--१. मा. प्रसादनम् । ८७-३. पु. 'अपि' नास्ति । ८७-४. अ. खडक्किका । ८८.२. पु. पटो। ८८-२. अ. सम्पुटे पुट इत्यपि । ८८-३. पु. आ. पेटकापि । ८८-४ पु. आ. मतिः । ८९-१.२. पु. आ. समूहिन्यामयोनिः, अ. समूहिन्यामयोनि । ८९-२. पु. अ. आ. मुशलं । ९०-३. पु. अ. आ. क्रोजः । ९०-४. पु. अ. आ. क्रोञ्चवत् । ९१-३. अ. शातकुम्भमपि स्वर्ण । ९२-१. पु. रजसातं । ९२-२. अ. तुक्षे। ९२-३. अ. गौक्षिके । ९३-२, अ. सुधियां । ९३-४. पु. म. कुरविन्दे । ९३-४. पु. हिङ्गलः, अ. हिङ्गुलः । ९४-३. अ. शोणिरत्नं । ९५-२. पु. अ. आ. कमन्धमपि ।९५-४. पु. अ. महिकाः, आ. महिका । ९७-३. चन्द्रभागी, चन्द्रभागा अ. चान्द्रभागा चन्द्रभङ्गा । ९७-४ पु. अ. गोतमीत्यपि । ९८- ३. पु.आ. उद्घा- तनोप्युद्घाटनं च, अ. उद्घातनोद्घाटने च । ९९-१ पु. अ. आ. तडागस् । १०१-१. पु. लञ्छलुम्ब्यौ, अ. आ. गुलञ्छलुम्ब्यौ । १०१- ३. पु. किङ्कराते। १०१-३. पु. कुरुण्ट, अ. कुरण्टक । १०२. ३. अ. वाशा च स्नुहिः .स्नुहापि । १०३- १. पु. नार्याङ्गोपि नारङ्गोऽक्षे । अ. नार्यङ्गोपि नारङ्गोऽक्षे, आ. नार्यङ्गोऽपि च नारङ्गोऽक्षे । १०३-४. पु. अ. आ. निर्गुण्डी । १०३-४. पु. आ. संदुवारवत्, अ. सुंदुवारवत् । १०४-३. पु. आ. धत्तूर इव धत्तूरो, अ: धत्तूर इव वत्तरोः । १०५-१. पु. अ. हीबेर । १०५-२. आ. पर्यायः । १०५-४. पु. सरोजनि, म. कुमदिनी । १०६-३. आ. शेफालं च । १०७-३. कणि कनि। १०७-४. पु. धान्ये । अ. ध्यान्ये १०८-१. अ. हालाहलं हालहलं । १०८-३. म. ऋमिरपि । १०८-३.४. गण्डपदः । १०८-४. पु: आ. किञ्चलकोऽपि, अ. किञ्चुलकोऽपि । - . १२८ परिशिष्ट-४ १०९-१.. पु. आ. शाम्बूका अपि शम्बूका, अ. शम्बुका अपि शम्बूका । १०९-२. पु. वृश्चको । १०९-१. पु. करः करी । ११०-१.२. पु. अ. आ. व्याडोऽप्यौपवाह्योप्युपवाटे । ११०-३. पु. अ. आ. शृङ्खले । ११०-३. पु.. निगलेन्दुश्च, अ. निगलोंडूश्च । ११०-४. पु. आ. कक्ष्या काक्ष्यापि, अ. कक्ष्या कक्ष्यापि । १११-१. पु. वाल्हीकोपि वल्गा वा, अ. वाल्हीकोपि वल्गवागे, आ. वाल्हीकोपि वल्गावागः । १११-३. पु. आ. मयापुष्टे, म. . मार्योपुष्टे ११२-२ पु. अ. भा. ककुदमि० । ११३-३. भ. सैरमा । ११६-२. पु. शेषे । ११६-४. अ. निलयत्यपि । ११७-१ पु. आ. विहङ्गे। ११८-१. म. वायते । ११८-१. पु. विलपुष्टोपि । ११८-३. पु. अ. क्रोञ्च्यां । ११८-४. पु. आ. किकी, अ. किकीः। ११९-१ किकिदीवरपि । ११९- ३. अ. आ. कलिविके । ११९-३. पु. अ. आ. कुलिङ्गोपि । १२०-१ आ. दस्त्यूहो. पु. दास्त्यूहो । १२०-२. अ. बकेरू । १२१-१. अ. वाशवतोपि । १२१-२. पु. आ. मच्छयो, अ. मत्स्यो । १२१-२. पु. तंपुणे । १२१-३. पु. वरुणपाशेपि । १२१-४. अ. नक्रेः शङ्कमुखोपि । १२२-२. अ. शिलोञ्छतः, आ. शलोञ्छितः । १२४-४. अ. मनोनेन्द्रियम० । १२४. आ. प्रतौ १२४ पद्यांको नोपलभ्यते । १२५-१. पु. धर्म । १२५-२. पु. अ. आ. बाधा । १२६-१. पु. अ. सुसीमस्तु । १२६-२. पु. आ. करटः । १२६- २. पु. अ. आ. कक्खटोपि । १२६-३. पु. आ. ऽम्लेऽम्बो, अ. ऽम्लेऽम्लो । १.२६- ४. पु. रव इति । १२७-४, आ. कनीयसम् । १२९-१ आ. कल्मं च । १२९-२. अ. याव्यरेफसी । १३०-१. अ. नोदीय । १३२-१. अ. झषोप्यथ । १३२.१. अ.छिन्ने । १३२-२.: पु. अ. आ. छादितं । १३३-१. आ. बुद्धेर०, । अ, बुधैरवगमना० । १३३-३. पु. प्रेखो० । १३४-१.२. पु. आ. भिच्चोदितमपि च तथाङ्गीकृते । १३५-३. पु. अटाट्याट्या, आ. अटाटचटया । १३६-३. पु. जातो । १३७-२. अ. समर्प । १३७-४. संदं सनशनात् । १३.८-२. अ. कीती । १३८-४. अ. काण्ड । १३९-१. पु. त्रिवस्विषुमिते । अ. त्रिवस्विन्दुमिते. आ. त्रिवस्विषुतिमे । १३९-२. पु. राधा- पक्षतौ । १३९-३. ४. पु. अ. आ. श्रीमज्जिनदेवमुनीश्वरः । प्रान्तपुष्पिका-पु. इति हैमनाममालायाः शिलोञ्छः समाप्तः । अ. इति हैम- नाममालायाः शिलोञ्छः समर्थितः। आ. इति हैमनाममालायाः शिलोञ्छः । कृता श्रीजिनदेवसूरिभिरियं नाममाला। श्री! . ।
LALBHAI DALPATBHAI BHARATIYA SANSKRITI VIDYA MANDIR L.D. SERIES 5 81 S. NO. Name of Publications Price Rs. *1, Šivāditya’s Saptapadārthi, with a Commentary by Jinavardhana 41- Sūri, Editor : Dr. J.S. Jetly. (Publication year 1963). 2. Catalogue of Sanskrit and Prakrit. Manuscripts : Munirāja 50/- Shri Punyavijayaji's Collection. Pt. I. Compiler: Munirāja Shri Punyavijayaji. Editor : Pt. Ambalal P. Shah. (1963) 3. Vinayacandra's Kavyaśikṣā. Editor : Dr. H.G. Shastri (1964) 10/- 4 Haribhadrasūri's Yogaśataka, with auto-commentary, along with his Brahmasiddhantasamuccaya. Editor : Muniraja Shri Punyavijayaji. (1965) 5. Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts, Munirāja Shri 40/- Punyavijayaji's Collection, pt. II. Compiler : Munirāja Shri Puoyavijayaji. Editor : Pt. A.P. Shah. (1965) 6. Ratnaprabhasüri's Ratnakarāvatārika, part I. Editor : Pt. Dalsukh Malvania. (1965) *7. Jayadeva's Gitagovinda, with king Mānānka's Commentary 87. Editor : Dr. V. M. Kulkarni. (1965) 8. Kavi Lāvaṇyasamaya's Nemirangaratnakarachanda. Editor : 6/- Dr. S. Jesalpura. (1965) 9. The Natyadarpaņa of Rāmcandra and Guņacandra : A Critical study : By Dr. K.H. Trivedi. (1966) *10. Ācārya Jinabhadra's Viśeşāvaśya kabhāsya, with Auto-commen 15) - tary, pt. I. Editor : Dalsukh Malvania, (1966) 11, Akalarka's Criticism of Dharmakirti's Philosophy : A study 30/- by Dr. Nagin J. Shah. (1966) 12:.: Jinamāņikyagaại's Ratnakarāvatārikādyaślokaśatārthi, Editor : Pt. Bechardas J. Doshi. (1967) ) 13. Ācārya Malayagiri's sabdanušāsana. Editor : Pt. Bechardas J. Doshi (1967) 14. Ācārya Jinabhadra's Višeşāvaśyakabhāsya, with Auto-commentary. Pt. II. Editor Pt. Dalsukh Malvania. (1968) 15. Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts : Munirāja Shri 30%- Punyavijayaji's Collection, Pt. III. Compiler ': Muniraja Shri Punyavijayaji. Editor : Pt. A'P. Shah. (1968) 30/- 81- 30/- 201- out of print:
16. Ratnaprabhasūri's Ratpakaravatārikā, pt. II, Editor : Pt. 10- Dalsukh Malvania, (1968) 17. Kalpalataviveka (by an anonymous writer). Editor : Dr. Murari 32/- Lal Nagar and Pt. Harishankar Shastry. (1968) 18. Ãc. Hemacandra's Nighanțušeșa, with a commentary of śri. 301- vallabhagani. Editor : Muniraja Shri Punyavijayji. (1968) 19. The Yogabindu of Ācārya Haribhadrasūri with an English 10%- Translation, Notes and Introduction by Dr. K.K. Dixit. (1968) 20. Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts : Shri Āc. 40/- Devasüri's Collection and Āc. Kșäntisūri's Collection : Part IV. Compiler : Muniraja Shri Punyavijayji, Editor : Pt. A.P. Shah. (1968) 21. Ācārya Jinabhadra's Viścșāvašyakabhāșya, with Commen 21/- tary, pt. III, Editor : Pt.Dalsukh Malvania and Pt. Bechardas Dosbi (1968) 22. The śāstravārtāsamo ccaya of Ācārya Haribbadrasūri with Hindi 20/- Translation, Notes and lotroduction by Dr. K.K. Dixit (1969) 23. Pallipala Dhanapāla's. Tilakmañjarīsāra Editor : Prof. N. M. 12/- Kansara. (1969) 24. Ratnaprabhasūri's Ratnakarāvatārikā pt. III, Editor : Pt. 8/- Dalsukh Malvania. (1969.) 25. Āc, Haribhadra's Neminābacariu Pt. 1 : Editors M. C. Modi 40/- and Dr. H. C. Bhayani. (1970) 26. A Critical Study of Mahāpurāņa of Puşpadanta, (A Critical 30/- Study of the Deśya and Rare words from Puşpadanta's Mahapurāņa and His other Apabhramsa works). By Dr. Smt. Ratna Shriyan. (1970) 27. Haribhadra's Yogadrştisamuccaya with English translation, Notes, Introduction by Dr. K. K. Dixit. (1970) 28. Dictionary of Prakrit Proper Names, Part I by Dr. M. L. Mehta and Dr. K. R. Chandra, (1970) 29. Pramāņavārtikabbāşya Kārikārdhapadasūci. Cómpiled by 81- Pt. Rupendrakumar. (1970) 30. Prakrit Jaina Kathā Sāhitya by Dr. J.C. Taina, (1971) 10/= 31. Jaina Ontology, By Dr. K, K, Dixit (1971) 30/- 32. The Philosophy of Sri Svaminarayan by Dr. J. A. Yajnik. 30/- 33. Āc. Haribhadra's Neminābacariu Pt. II : Editors Shri 40/- M. C. Modi and Dr. H. C. Bhayani. 34. Up. Harşavardhana's Adhyatmabindu : Editor Muni Shri 6/- Mitranandavijayaji and Dr. Nagin J. Shah. 35. Cakradhara's Nyāyamañjarigrapthibhanga : Editor Dr. Nagin 36/- J. Shah, 8/- 32/-
3
0/4-
35/-
6/-
36. Catalogue of Mss. Jesalmer collection : Compiler : Muniraja
Shri Punyavijayaji.
37. Prakrit Proper Names Pt. II. by Dr. M. L. Mehta and
Dr. K, R. Chandra.
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Bechardasj Doshi.
40. Prācına Gurjara Kāvya Sancaya : Editor : Dr. H. C.
Bhayani and Shri Agarchand Nabata.
41. Jalna Philosophical Tracts : Editor Dr. Nagin J. Shah,
42 Sanatukumāracariya Editors Prof, H. C. Bhayapi
and Prof. Modi
43. The Jaina Concept of Omniscience by Dr. Ram Jee Singh
44. Pt. Sukbalalji's Commentary on the Tallvārthasutra Translated
into English by Dr. K. K. Dixit.
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