Sanmati Library, Jaipur

Parmatmatmprakash

Shastri, Manoharlal · 2009/11

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Front matter

Printed by Ramchandra Yesu Sbedge, at the Nirnaya-sager'
Press, 23 Kolbbat Lane, Bombay.
Published by Sha Rerasbankai Jagojeeran Jnverı Hon Vyavaslapak
Shice Paramashruta Prabhavak Mandal, Jareri Bazar,
Kharakusa, Bombay. No 2.

प्रस्तावना. आज मै मोक्षके इच्छुक पाठकोंके सन्मुख इस यथार्थ गुणवाले परमात्मप्रकाश ग्रंथको दो टीकाओसहित उपस्थित करता हूं । यह ग्रंथ साक्षात् मोक्षमार्गका प्रतिपादक है। जिस तरह श्रीकुंदकुंदाचार्यकी प्रसिद्ध नाटकत्रयी है उसी तरह यह भी अध्यात्मविषयकी परम सीमा है क्योंकि ग्रंथकर्ताने खयं इस ग्रंथके पढनेका फल लिखा है कि इसके हमेशा अभ्यास करनेवालोंको गोह कर्म दूर होकर केवलज्ञानपूर्वक मोक्ष अवश्य ही होसकती है परंतु इस अथके पात्र बनकर अभ्यास करना चाहिये अन्यथा वगलाभक्तिसे इच्छित फल नहीं मिल सकता । इसका आनंद वे ही भव्यजीव जान सकेंगे जो इसका शुद्ध मनसे साध्याय और इसके अनुसार आचरण करेंगे । वचनसे इसकी प्रशंसा नहीं होसकती। कविवर बनारसीदासजीने भी अपने नाटकसमयसारमें कहा है कि 'हे जीव यदि तू असली आत्मीकमुखका स्वाद चखने चाहता है तो जैसे विषयभोगादिमें हमेशा चित्त लगाता है वैसे आत्माके स्वरूपक विचारगे छह महीना कमसे कम अभ्यास करके देख ले तो तुझे स्वयं उस परमानंद के रसका अनुभव होजाइगा' इत्यादि । इसलिये इसका पठन मनन करनेसे इसका आनंद व फल उनको अवश्य मिल सकेगा। इस आत्माकी अनंत शक्ति है यह वात आजकलके विजली आदि अचेतन पदार्थोंको देखनेवाले व्यवहारी जीवोंको झूठी मालम पड़ती होगी परंतु जिसका "आत्मा अनंत शक्तिवाला है" ऐसा वचन है उसीने यह भी कह दिया है "जगज्जेत्रं जयेत् सर अर्थात् जगतको जीननेवाले कामदेवको जिसने जीतलिया है" इस वचनकी तरफ किसीकी भी दृष्टि नहीं पड़ती। अतएव ब्रह्मचर्यपालनेवाला ही इसका पात्र हो सकता है। इस ग्रंथके मूलकर्ता श्री योगीद्रदेव है। उन्होने अपने 'प्रभाकरभट्ट के प्रश्न करनेपर जगतके सब भव्यजीवों के कल्याण होनेका विचार रख कर उत्तररूप उपदेश प्राकृतभाषामें तीनसौ पैतालीस दोहा छंदौम दिया है। ये आचार्य इनकी कृति देखनेसे तो बहुत प्राचीन मालम होते हैं परंतु इनका जन्मसवत् तथा जन्मभूमि हमें निश्चित नहीं हुई है। इन प्राकृतदोहा सूत्रोंपर श्री ब्रह्मदेवजीने सस्कृतटीका रची। ब्रह्मदेवके समयनिर्णयके लिये बृहद्रव्यसग्रहमें मुद्रित हो चुका है कि विक्रमकी १६ वी शताव्दिके मध्यमं किसीसमय श्री ब्रह्मदेवजीने अपने अवतारसे भारतवर्षको पवित्र किया था। विशेष बृहद्रव्यसग्रहगेसे देखलेना।

२ इस संस्कृत टीकाके अनुसार ही पंडित दौलतरामनीने ब्रजभाषा वनाई । यद्यपि उक्त पंडितजीकृत भाषा प्राचीनपद्धतिसे बहुत ठीक है परंतु आजकलके नवीन प्रचलित हिंदी- भाषाके संस्कारकमहाशयोंकी दृष्टिमें वह भाषा सर्वदेशीय नहीं समझी जाती है। इस कारण मैंने पंडित दौलतरामजीकृत भाषानुवादके अनुसार ही नवीन सरल हिंदीभाषामें अवि- कल अनुवाद किया है । इतना फेरफार अवश्य हुआ है कि उस भाषाको अन्वय तथा भावार्थरूपमें वांट दिया है । अन्य कुछभी न्यूनाधिकता नहीं की है। कहीं लेखकोंकी भूलसे कुछ छूटगया है उसको भी मैंने संस्कृतटीकाके अनुसार संभाल दिया है। इस ग्रंथका जो उद्धार खर्गीय तत्त्वज्ञानी श्रीमान् रायचंद्रजी द्वारा स्थापित श्रीपरमश्नुत- प्रभावकमंडलकी तरफसे हुआ है इसलिये उक्त मंडलके उत्साही प्रबंधकर्ताओंको कोटिशः धन्यवाद देता हूं कि जिन्होंने अत्यंत उत्साहित होकर ग्रंथ प्रकाशित कराके भव्य जीवोंको महान् उपकार पहुंचाया है। और श्रीजीसे प्रार्थना करता हूं कि वीतरागप्रणीत उच्च श्रेणीके तत्त्वज्ञानका इच्छित प्रसार करने में उक्तमंडल कृतकार्य होवे । द्वितीय धन्यवाद श्रीमान् ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजीको दिया जाता है कि जिन्होंने इस ग्रंथकी संस्कृतटीकाकी प्राचीन प्रति लाकर प्रकाशित करनेकी अत्यंत प्रेरणा की। उन्हींके उत्साह दिलानेसे यह ग्रंथ प्रकाशित हुआ है। अब मेरी अंतमें यह प्रार्थना है कि जो प्रमादवश दृष्टिदोषसे तथा बुद्धिकी न्यूनतासे कहीं अशुद्धियां रह गई हों तो पाठकगण मेरे ऊपर क्षमा करके शुद्ध करते हुए पढ़ें क्योंकि इस आध्यात्मिक ग्रंथमें अशुद्धियोंका रहजाना संभव है। इस तरह धन्यवादपूर्वक प्रार्थना करता हुआ इस प्रस्तावनाको समाप्त करता हूं। अलं विज्ञेषु । खत्तरगली हौदावाड़ी जैनसमानका सेवक पो. गिरगाव-वंबई मनोहरलाल वैशाख वदि ३ वी० सं० २४४२ पाढम ( मैंनपुरी) निवासी। 4.

श्री वीतरागाय नमः। श्रीरायचन्द्रजैनशास्त्रमालाद्वारा प्रकाशित ग्रन्थोंका सूचीपत्र। १ पुरुषार्थसिद्धयुपाय भापाटीका यह श्री अमृतचन्द्रखामी विरचित प्रसिद्ध शास्त्र है। इसमे आचारसबन्धी बडे २ गूढ रहस्य हैं विशेष कर हिसाका खरूप बहुत खूबीके- साथ दरसाया गया है, यह एक वार छपकर विकगयाथा इसकारण फिरसे संशोधन क. राके दूसरीवार छपाया गया है । न्यों. १ रु. २ पञ्चास्तिकाय संस्कृ. भा. टी. यह श्रीकुन्दकुन्दाचार्यकृत मूल और श्रीअमृतच- न्द्रसूरीकृत सस्कृतटीकासहित पहले छपा था । अबकी वार इसकी दूसरी आवृत्तिमें एक संस्कृतटीका तात्पर्यवृत्ति नामकी जो कि श्रीजयसेनाचार्यने वनाई है अर्थकी सरलताके- लिये लगादी गई है तथा पहली सस्कृतटीकाके सूक्ष्म अक्षरोंको मोटा करादिया है और गाथासूची व विषयसूची भी देखनेकी सुगमताके लिये लगादी हैं । इसमें जीव, अजीव, धर्म, अधर्म और आकाश इन पाच द्रव्योंका तो उत्तम रीतिसे वर्णन है तथा कालद्रव्यका भी सक्षेपसे वर्णन किया गया है । इसकी भाषा टीका खर्गीय पाडे हेमराजजीकी भाषा- टीकाके अनुसार नवीन सरल भापाटीकामें परिवर्तन कीगई है। इसपर भी न्यों. २ रु. ३ ज्ञानार्णव भा. टी. इसके कर्ता श्रीशुभचन्द्रखामीने ध्यानका वर्णन बहुत ही उत्तमतासे किया है। प्रकरणवश ब्रह्मचर्यव्रतका वर्णन भी बहुत दिखलाया है यह एक- वार छपकर विकगया था अब द्वितीयवार सशोधनकराके छपाया गया है । न्यों. ४ रु. ४ सप्तभंगीतरंगिणी भा. टी. यह न्यायका अपूर्व ग्रन्थ है इसमें ग्रंथकर्ता श्रीविमल- दासजीने स्यादस्ति, स्यान्नास्ति आदि सप्तभंगी नयका विवेचन नव्यन्यायकी रीतिसे किया है । स्याद्वादमत क्या है यह जाननेकेलिये यह ग्रंथ अवश्य पढना चाहिये । इसकी पहली आवृत्तिमेकी एक भी प्रति नही रही, अब दूसरी आवृत्ति छपकर प्रकाशित हुई है। , न्यों. १ रु. ५ बृहद्रव्यसंग्रह संस्कृत भा. टी. श्रीनेमिचन्द्रखामीकृत मूल और श्रीब्रह्मदेवजीकृत सस्कृतटीका तथा उसपर उत्तम बनाई गई भाषाटीका सहित है। इसमें छह द्रव्योंका ख- रूप अतिस्पष्टरीतिसे दिखाया गया है। न्यों. २ रु.

२ ६ द्रव्यानुयोगतर्कणा इस ग्रंथमें शास्त्रकार श्रीमद्भोजसागरजीने नुगमतासे मन्दबुद्धि- जीवोंको द्रव्यज्ञान होनेकेलिये 'अथ, "गुणपर्ययवद्र्व्यम्" इस महागास तत्त्वार्थसूत्रके अनुकूल द्रव्य-गुण तथा अन्य पदार्थोंका भी विशेष वर्णन किया है और प्रसंगवश 'स्यादस्ति' आदि सप्तभंगोंका और दिगंबराचार्यवर्य श्रीदेवसेनस्वामीविरचित नयत्रके आ- घारसे नय, उपनय तथा मूलनयोंका भी विस्तारसे वर्णन किया है। न्यों. २ ३. ७ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगममूत्र इसका दूसरा नाम तत्त्वार्थाधिगम मोक्षगात भी है जैनियोंका यह परममान्य और मुख्य ग्रन्थ है। इसमें जैनधर्मके संपूर्णसिद्धान्त आचार्यवर्य श्रीउमाखाति (मी) जीने वडे लाघवसे संग्रह किये हैं। ऐसा कोई भी जैनसिद्धान्त नहीं है जो इसके सूत्रोंमें गर्भित न हो। सिद्धान्तसागरको एक अत्यन्त छोटेसे तत्त्वार्यरूपी घटमें भरदेना यह कार्य अनुपमसामर्थ्यवाले इसके रचयिताका ही था। तत्त्वार्थके छोटे २ सूत्रोंके अर्थगाभीर्यको देखकर विद्वानोंको विलित होना पडता है । न्यो. २ रु. ८ स्याद्वादमंजरी संस्कृत भा. टी. इसमे छहों मतोंका विवेचनकरके टीका कर्ता विद्वद्वर्य श्रीमल्लिषेणसूरीजीने स्याद्वादको पूर्णरूपसे सिद्ध किया है । न्यों. १ रु. ९ गोम्मटसार (कर्मकाण्ड) संस्कृतछाया और संक्षिप्त भाषाटीका सहित । यह महान् ग्रन्थ श्रीनेमिचन्द्राचार्यसिद्धान्तचक्रवर्तीका बनाया हुआ है । इसमें जैनतत्वोंका स- रूप कहते हुए जीव तथा कर्मका स्वरूप इतना विस्तारसे है कि वचनद्वारा प्रशंसा नहीं होसकती देखनेसेही मालूम होसकता है, और जो कुछ संसारका झगडा है वह इन्ही दोनों (जीव-कर्म) के संबन्धसे है सो इनदोनोंका खलप दिखानेकेलिये अपूर्व सूर्य है। न्यों. २ रु. १० गोम्मटसार (जीवकांड )-यह पहले मूलमात्र तो दूसरी जगह छप चुका था और इसका कर्मकांड भी छाया तथा संक्षिप्तभाषाटीका सहित पहले इसी मंडलसे प्रकाशित हो चुका है। अब इसका 'जीवकार्ड भी छाया भाषाटीका सहित छप गया है । केवल गाथा सूची विषयसूची आदि परिशिष्टके दो तीन फारम छपना वाकी हैं सो शीघ्र ही तयार कराकर पाठकोंकी सेवामें पहुंचाया जाइगा । न्योछावर लगभग पौने तीन २) रु० के होगी। ११ प्रवचनसार श्रीअमृतचन्द्रसूरिकृत तत्त्वप्रदीपिका सं. टी., "जो कि यूनिवर्सिटीके कोर्समे दाखिल है" तथा श्रीजयसेनाचार्यकृत तात्पर्यवृत्ति सं. टी. और बालावबोधिनी भाषाटीका इन तीन टीकाओं सहित छपाया गया है । इसके मूलकर्ता श्रीकुन्दकुन्दाचार्य है। यह अध्यात्मिक ग्रन्थ है। न्यों. ३ रु. १२ परमात्मप्रकाश यह ग्रंथ श्रीयोगींद्रदेव रचित प्राकृतदोहाओमें है। इसकी संस्कृत- टीका श्रीब्रह्मदेवकृत है तथा भाषाटीका पं० दौलतरामजीने की है उसके आधारसे नवीन ३ प्रचलित हिंदीभाषा अन्वयार्थ भावार्थ पृथक करके बनाई गई है। इसतरह दो टीकाओं सहित छपकर तयार है । ये अध्यात्मग्रन्थ निश्चयमोक्षमार्गका साधक होनेसे बहुत उपयोगी है । न्योछावर तीन ३) रु. है। १३ मोक्षमाळा-कर्ता मरहुमसत्वावधानी कवी श्रीमद्राजचंद्र छे. आ एक स्वाद- वाद तत्वावबोधवृक्षनुं बीज छे. आ ग्रंथ तत्व पामवानी जिज्ञासा उत्पन्न करीशके एबुं एमां कंह अंशे पण दैवत रयुं छे. आ पुस्तक प्रसिद्ध करवानो मुख्य हेतु उछरता बाळ युवानी अविवेकी विधापामी जे आत्मसिद्धीथी भ्रष्ट थाय छे ते भ्रष्टता अटकाववानो छे. आ मोक्षमाळा मोक्षमेळववानां कारण रूप छे. आ पुस्तकनी बेबे आवृतिओ खलास थइ गइछे अने ग्राहकोनी बहोळी मागणी थी आ त्रीजी आवृति छपावी छे. कीमत बार 1) आना. १४ भावनावोध-आ ग्रंथना कर्ता पण उक्त महापुरुषज छे. वैराग्य ए आ ग्रंथनो मुख्य विषय छे. पात्रता पामवानुं अने कषायमल दूर करवानुं आ ग्रंथ उत्तम साधन छे. आत्मगवेषिओने आ ग्रंथ आनंदोल्लास आपनार छे. आ ग्रंथनी पण बे आवृतिओ खपी जवाथी अने ग्राहकोनी बहोळी मागणी थी आत्रीजी आवृति छपावी छे. कीमत चार आना. आवंने ग्रंथो खास करीने प्रभावना करवासारु अने पाठशाळा, ज्ञानशाळा ते मज स्कूलोमां विद्यार्थीओंने विद्याभ्यास करवामाटे अति उत्तम छे. अने तेथी सर्व कोई लाभ लइ शके तेमाटे गुजराती भाषामां अने बालबोध टाइपमा छपावेल छे. आवश्यक सूचना । इस समय अपूर्व और अति उपयोगी दो महान् ग्रंथोंका प्रकाशन होरहा है। १ षोडशक प्रकरण—यह ग्रंथ श्वेताम्बराचार्य श्री हरिमद्रसूरिका बनाया हुआ सं. स्कृत आर्याछदोंमें है इसमें सोलह धर्मोपदेशके प्रकरण है। इसका सस्कृत टीका तथा हिदीभाषाटीका सहित प्रकाशन होरहा है । एक वर्षके लगभग तयार होजाइगा । २ लब्धिसार (क्षपणासार गर्भित)--यह ग्रंथ भी श्री नेमिचंद्राचार्यसिद्धातचक्रव- तीका बनाया हुआ है और गोम्मटसारका परिशिष्ट भाग है। इसोसे गोमटसारके खा- ध्याय करनेकी सफलता होती है । इसमें मोक्षका मूलकारण सस्यक्त्वके प्राप्त होनेकी पांच लब्धियोंका वर्णन है फिर सम्यक्त्वहोनेके वाद कर्मों के नाश होनेका बहुत अच्छा क्रम बतलाया गया है कि भव्यजीव शीघ्र ही कोंसे छूट अनंतसुखको प्राप्त होकर अवि- नाशी पदको पासकते हैं। यह भी मूल गाथा छाया तथा संक्षिप्त भाषा टीका सहित छपाया जारहा है। छह महीनेके लग भग तयार होजाइगा।

४ सादर निवेदन । चालकल्यागके इच्छुक नव्यनीयले प्रार्थना है कि इस पवित्र मारूमालाके ग्रन्पोंक प्राहक बनकर मानो चलनीको ना करें और तत्वज्ञानपूर्ण जैनासद्धान्तोंश पठन पाठन द्वारा प्रचार कर हनारी इस परमार्ययोजनाले परिचन्नो साल मैं तथा प्रत्येक सरस्वतीमण्डार, बना और पाठशालानोंने इन्न संमइ मान्य करना चाहिये । इस चालनालकी प्रशंसा नुनिनहारजोंने ज्या विद्वानोंने बहुत की है उनीहन लनामा लिख नहीं सकते। नौर रह तय किसी स्वयंचलिये नहीं है दिल परी- प्रचारकेनते है । जो न जाता है वह इसी हमलने उस रक्षाबले लगाया जाता है । इति शान्॥ ता. २०१४।१६३० योने चिलनेत पत्ता- मा. वागंकर जगीरन जोहरी, जॉनरेरी कसारक श्रीरन्तन्नाननंडर, जोहरोक जार- रून. पो० नं. २ ई.।

रायचंद्रजैनशास्त्रमाला। ॐ श्रीपरमात्मने नमः। श्रीमद्योगीन्द्रदेवविरचितः परमात्मप्रकाशः। (टीकाबयोपेतः) , ते श्रीमद्भह्मदेवकृतसंस्कृतटीका । चिदानन्दैकरूपाय जिनाय परमात्मने । परमात्मप्रकाशाय नित्यं सिद्धात्मने नमः ॥ १॥ इदानी प्रथमपातनिकाभिप्रायेण व्याख्याने क्रियमाणे ग्रन्थकारो ग्रन्थस्यादौ मंगलार्थ- मिष्टदेवतानमस्कारं कुर्वाणः सन् दोहकसूत्रमेकं प्रतिपादयति, जे जाया झाणग्गियए, कम्मकलंक डहेवि । णिचणिरंजणणाणमय, परमप्प नवेवि ॥१॥ श्रीपंडित दौलतरामजीकृत भाषाटीका । दोहा-चिदानंद चिद्रूप जो, जिनपरमातमदेव । सिद्धरूप सुविशुद्ध जो, नमों ताहि करि सेव ॥१॥ परमातम निजवस्तु जो, गुण अनंतमय सुद्ध । ताहि प्रकासनके निमित, वंदू देव प्रबुद्ध ॥२॥ 'चिदानंद' इत्यादि श्लोकका अर्थ-श्रीजिनेश्वर देव शुद्ध परमात्मा आनंदरूप चिदानंद चिद्रूप जो हैं उनकेलिये मेरा सदाकाल नमस्कार होवै । किसलिये । परमात्माके खरूपके प्रकाशनेके लिये । कैसे हैं वो भगवान् । सुद्ध परमात्मखरूपके प्रकाशक हैं अर्थात् निज और पर सबके स्वरूपको प्रकाशते हैं । फिर कैसे हैं । 'सिद्धात्मने' जिनका आत्मा कृतकृत्य है । सारांश यह है कि नमस्कार करनेयोग्य परमात्मा ही है इसलिये परमात्माको नमस्कारकर परमात्मप्रकाशनामा ग्रंथका व्याख्यान करता हू॥ १. अस्य पातनिका अप्रे द्रष्टव्या।

रायचंदजैनशास्त्रमालायाम् । २ .. ये जाता ध्यानामिना कर्मकलङ्कानि दग्ध्वा । नित्यनिरजनज्ञानमयास्तान् परमात्मनः नत्वा ॥१॥ जे जाया ये केचन कर्तारो महात्मानो जाता उत्पन्नाः । केन कारणभूतेन । झाण- ग्गियए ध्यानाग्निना । किंकृत्वा पूर्व । कम्मकलंक डहेवि कर्मकलंकमलान दग्ध्वा भस्मीकृत्वा । कथंभूताः जाताः। णिचणिरंजणणाणमय नित्यनिरचननानमयाः ते परमप्प णवेवि तान्परमात्मनः कर्मतापन्नान्नत्वा प्रणम्येति तात्पर्यार्थव्याख्यानं समुदायकथनं संपि- ण्डितार्थनिरूपणमुपोद्धातः संग्रवाक्यं वार्तिकमिति यावत् । इनो विशेपः । तद्यथा-ये जाता उत्पन्ना मेघपटलविनिर्गतदिनकरकिरणप्रभाववत्कर्मपटलविघटनममये मकलविमल- केवलज्ञानाद्यनन्तचतुष्टयव्यक्तिरूपेण लोकालोकप्रकाशनसमर्थेन सर्वप्रकारोपादेयभूतन कार्य- समयसाररूपपरिणताः । कया नयविवक्ष्या जाताः । सिद्धपर्यायपरिणतिव्यक्तरूपतया धातुपाषाणे सुवर्णपर्यायपरिणतिव्यक्तिवन् । तथाचोनं पंचालिकाये । पर्यायाथिकनयेन "अभूदपुल्वो वदि सिद्धो” द्रव्यार्थिकनयेन पुनः शक्त्यपेक्ष्या पूर्वमेव शुद्धबुद्धकखभाव- अव प्रथमपातनिकाके अभिप्रायसे व्याख्यान किया जाता है उसमें ग्रंथकर्ता श्री- योगीन्द्राचार्य ग्रंथके आदिमें मंगलकेलिये इष्टदेवता श्रीभगवानको नमस्कार करते हुए एक दोहाछंद कहते हैं;-[ये] जो भगवान [ध्यानाग्निना] ध्यानरूपी अमिसे [कर्मकलङ्कानि ] पहले कर्मरूपी मैलोंको [दग्ध्वा भस्मकरके [नित्यनिरजनज्ञानमयाः जाताः] नित्य, निरंजन और ज्ञानमयी सिद्ध परमात्मा हुए हैं [तान् ] उन [परमात्मनः ] सिद्धोंको [ नत्वा] नमस्कारकरके मै परमात्मप्रकाशका व्याख्यान करता हूं। यह संक्षेप व्याख्यान किया । इसके बाद विशेष व्याख्यान करते हैं जैसे मेघप- टलसे बाहर निकली हुई सूर्यकी किरणोंकी प्रभा प्रबल होती है उसीतरह कर्मरूप मेघसमूहके विलय होनेपर अत्यंत निर्मल केवलज्ञानादि अनंतचतुष्टयकी प्रगटताखरूप परमात्मा परिणत हुए है। अनंतचतुष्टय अर्थात् अनंतज्ञान अनंतदर्शन अनंतसुख अनंतवीर्य ये अनंतचतुष्टय सवप्रकार अंगीकार करने योग्य है तथा लोकालोकके प्रकाशनेको समर्थ है । जब सिद्धपरमेष्ठी अनंतचतुष्टयरूप परिणमे तव कार्यसमयसार हुए। अंतरात्मअव- स्थामें कारणसमयसार थे । जव कार्यसमयसार हुए तब सिद्ध पर्याय परिणतिकी प्रगटतारूपकर शुद्ध परमात्मा हुए । जैसे सोना अन्यधातुके मिलापसे रहित हुआ अपने सोलहवानरूप प्रगट होता है उसीतरह कर्म कलंकरहित सिद्धपर्यायरूप परिणमे । तथा पंचास्तिकायग्रंथमें भी कहा है-जो पर्यायार्थिकनयकर "अभूदपुन्वो हवदि सिद्धो" अर्थात् जो पहले सिद्धपर्याय कमी नही पाई थी वह कर्मकलंकके विनाशसे पाई। यह पर्यायार्थिकनयकी मुख्यतासे कथन है, और द्रव्यार्थिकनयकर शक्तिकी अपेक्षा यह जीव सदा ही शुद्ध बुद्ध परमात्मप्रकाशः। ३ स्तिष्ठति धातुपाषाणे सुवर्णशक्तिवत् । तथाचोक्तं द्रव्यसंग्रहे । शुद्धद्रव्याथिकनयेन "सब्वे सुद्धा हु सुद्धणया" सर्वे जीवाः शुद्धबुद्धकस्वभावाः । केन जाताः । ध्यानाग्निना करण- भूतेन ध्यानशब्देन आगमापेक्षया वीतरागनिर्विकल्पशुक्लध्यानं, अध्यासापेक्षया वीतराग- निर्विकल्परूपातीतध्यानं । तथाचोक्तं । "पदस्थं मन्त्रवाक्यस्थं पिण्डस्थं खालचिन्तनं । रूपस्थं सर्वचिद्रूपं रूपातीतं निरंजनम् ॥” तच्च ध्यानं वस्तुवृत्त्या शुद्धामसम्यक- श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपाभेदरत्नत्रयासकनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नवीतरागपरमानन्दसमरसीमा- वसुखरसास्वादरूपमिति ज्ञातव्यम् । किं कृत्वा जाताः । कर्ममलकलङ्कान् दग्ध्वा कर्ममल- शब्देन द्रव्यकर्मभावकर्माणि गृह्यन्ते । पुद्गलपिण्डरूपाणि ज्ञानावरणादीन्यष्टौ द्रव्यकर्माणि, रागादिसंकल्पविकल्परूपाणि पुनर्भावकर्माणि । द्रव्यकर्मदहनमुपचरितासद्भूतव्यवहारनयेन भावकर्मदहनं पुनरशुद्धनिश्चयेन, शुद्धनिश्चयेन बन्धमोक्षौ न स्तः । इत्थंभूतकर्ममलकलङ्कान दुग्ध्वा कथंभूता जाताः । नित्यनिरजनज्ञानमयाः । क्षणिकैकान्तवादिसौगतमतानुसारि- (ज्ञान ) खभाव तिष्ठता है । जैसे धातुपाषाणके मेलमें भी शक्तिरूप सुवर्ण मौजूद ही है क्योंकि सुवर्णशक्ति सुवर्णमें सदाही रहती है जब पर वस्तुका संयोगदूर होजाता है तब वह व्यक्तिरूप होता है। सारांश यह है कि शक्तिरूप तो पहले ही था लेकिन व्यक्तिरूप सिद्धपर्याय पानेसे हुआ ॥ शुद्ध द्रव्यार्थिकनयकर सभी जीव सदा शुद्ध ही है। ऐसा ही द्रव्यसंग्रह में कहा है "सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया" अर्थात् शुद्ध नयकर सभी जीव शक्ति- रूप शुद्ध हैं और पर्यायार्थिकनयसे व्यक्तिकर शुद्ध हुए । किस कारणसे ? ध्यानामिना अर्थात् ध्यानरूपी अग्निकर कर्मरूपी कलंकोंको भस्म किया तब सिद्धपरमात्मा हुए । वह ध्यान कौनसा है ? आगमकी अपेक्षा तो वीतराग निर्विकल्प शुक्लध्यान है और अध्यात्म- की अपेक्षा वीतराग निर्विकल्प रूपातीत ध्यान है । तथा दूसरी जगह भी कहा है "पदस्थं" इत्यादि, उसका अर्थ यह है कि णमोकार मंत्र आदिका जो ध्यान है वह पदस्थ कहलाता है, पिंड (शरीर ) में ठहरा हुआ जो निज आत्मा है उसका चितवन वह पिंडस्थ है, सर्व चिद्रूप ( सकल परमात्मा) जो अरहंतदेव उनका ध्यान वह रूपस्थ है और निरंजन (सिद्ध भगवान ) का ध्यान रूपातीत कहा जाता है । वस्तुके खभावसे विचारा जावे तो शुद्ध आत्माका सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक् चरित्ररूप अभेद रत्नत्रयमई जो निर्विकल्प समाधि है उससे उत्पन्न हुआ वीतराग परमानंद समरसी भाव सुखरसका आखाद वही जिसका स्वरूप है ऐसा ध्यानका लक्षण जानना चाहिये । इसी ध्यानके प्रभावसे कर्मरूपी मैल सोई हुए कलंक उनको भस्मकर सिद्ध हुए । कर्मकलंक अर्थात् द्रव्यकर्म भावकर्म इनमें से जो पुद्गलपिंडरूप ज्ञानावरणादि आठ कर्म वे द्रव्यकर्म हैं और रागादिक संकल्प विकल्परूप परिणाम भावकर्म कहेजाते है। यहां भावकर्म का दहन ४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । शिष्यं प्रति द्रव्यार्थिकनयेन नित्यटकोत्कीर्णनायकैकस्खभावपरमालद्रव्यव्यवस्थापनार्थ नित्यविशेषणं कृतं, अथ कल्पशते गते जगत् शून्यं भवति पश्चात्सदागिवे जगत्करणविषये चिन्ता भवन्ति तदनन्तरं मुक्तिगतानां जीवानां कर्मासनसं- योगं कृत्वा संसारे पतनं करोतीति नैयायिका वदन्ति तन्मतानुसारिशिष्यं प्रति भावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्माजननिषेधार्थ मुक्तजीवानां निरचनविशेपणं कृतं । मुक्तासनां सुप्तावस्थाद्वहि यविषये परिज्ञानं नास्तीति सांख्या वदन्ति तन्मतानुसारिमिप्यं प्रति जगत्रयकालत्रयवतिसर्वपदार्थयुगपत्परिच्छित्तिरूपकेवलज्ञानस्थापनार्थ ज्ञानमय-विशेषणं कृतमिति । तानित्थंभूतान् परमालनो नत्वा प्रणम्य नमस्कृत्येति क्रियाकारकर्मबन्धः । अत्र नत्वेति शब्दरूपो वाचनिको द्रव्यनमस्कारो ग्राह्यसद्भूतव्यवहारनयन नातव्यः, केवलज्ञानाद्यनन्तगुणस्मरणरूपो भावनमस्कारः पुनरशुद्धनिश्चयनयेनेति, शुद्धनिश्चयनयेन वन्द्यवन्दकभावो नास्तीति । एवं पदखण्डनारूपेण शब्दार्थः कथितः, नयविभागकथनरूपेण , , । अशुद्ध निश्चयनयकर हुआ, तथा द्रव्यकर्मका दहन असद्भूत अनुपचरितव्यवहार नयकर हुआ। और शुद्धनिश्चयकर तो जीवके बंधमोक्ष दोनो ही नही है । इसप्रकार कर्मरूपम- लोंको भसकर जो भगवान हुए वे कैसे है ? वे भगवान् सिद्ध परमेष्ठी नित्य निरंजन ज्ञानमई है । यहां पर नित्य जो विशेषण किया है वह एकांतवादी बौद्ध जो कि आत्माको नित्य नही मानता क्षणिक मानता है उसके समझानेके लिये है। व्यार्थिकनयकर आत्माको नित्य कहा है टंकोत्कीर्ण अर्थात् टांकीकासा घड्या सुघट ज्ञायक एकखभाव परम द्रव्य है ऐसा निश्चय करनेके लिये नित्यपनेका निरूपण किया है। इसके बाद निरंजनपनेका कथन करते है । जो नैयायिकमती है वे ऐसा कहते है "सौ कल्प काल चले जानेपर जगत् शून्य हो जाता है। सब जीव उससमय मुक्त होजाते है। तब सदाशिवको जगतके करनेकी चिंता होती है। उसके बाद जो मुक्त हुए थे उन सबके कर्मरूप अंजनका संयोगकरके ससारमें पुनः डाल देता है। ऐसी नैयायिकोंके श्रद्धा है। उनके सबोधनेके लिये निरंजनपनेका वर्णन किया कि भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्मरूप अंजनका संसर्ग सिद्धोंके कभी नही होता । इसीलिये सिद्धोंको निरंजन ऐसा विशेषण कहा है । अब सांख्यमती कहते है- "जैसे सोनेकी अवस्थामें सोते हुए पुरुषको बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता वैसे ही मुक्त- जीवोंको बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नही होता है। ऐसे सिद्धदशामें ज्ञानका अभाव मानते उनके प्रतिबोध करनेके लिये तीन जगत तीनकालवर्ती सब पदार्थोंका एक समयमें ही जानना है अर्थात् जिसमें समस्त लोकालोकके जाननेकी शक्ति है ऐसे ज्ञायकतारूप केवल ज्ञानके स्थापन करनेके लिये सिद्धोंका ज्ञानमय विशेषण किया। वे भगवान नित्य है निरंजन है और ज्ञानमय है ऐसे सिद्ध परमात्माओंको नमस्कारकरके ग्रंथका व्याख्यान करता हूं। यह ५ परमात्मप्रकाशः। नयार्थो भणितः, बौद्धादिमतस्वरूपकथनप्रस्तावे मतार्थोपि निरूपितः, एवंगुणविशिष्टाः सिद्धा मुक्ताः सन्तीत्यागमार्थः प्रसिद्धः, अत्र नित्यनिरञ्जनज्ञानमयरूपं परमासद्रव्य- मुपादेयमिति भावार्थः । अनेन प्रकारेण शब्दनयमतागमभावार्थो व्याख्यानकाले यथासंभवं सर्वत्र ज्ञातव्य इति ॥ १ ॥ अथ संसारसमुद्रोत्तरणोपायभूतं वीतरागनिर्विकल्पसमाधिपोतं समारुह्य ये शिवमयनि- रुपमज्ञानमया भविष्यन्त्यग्रे तानहं नमस्करोमीत्यभिप्रायं मनसि धृत्वा ग्रन्थकारः सूत्रमाह, इत्यनेन क्रमेण पातनिकास्वरूपं सर्वत्र ज्ञातव्यम्,- ते वंदङ सिरिसिद्धगण, होसहिं जेवि अणंत । सिवमयणिरुवमणाणमय, परमसमाहि भजंत ॥२॥ तान् वन्दे श्रीसिद्धगणान् भविष्यन्ति येपि अनन्ताः । शिवमयनिरुपमज्ञानमयाः परमसमाधि भजन्तः ॥ २॥ ते बंदउं तान् वन्दे । तान् कान् । सिरिसिद्धगण श्रीसिद्धगणान् । ये किं करिष्यन्ति । होसहिं जेवि अणंत भविष्यन्त्यग्रे येप्यनन्ताः । कथंभूता भविष्यन्ति । सिवमयणिरुव- मणाणमय शिवमयनिरुपमज्ञानमयाः। किं भजन्तः सन्तः इत्थंभूता भविष्यन्ति । परमसमाहि भजंत रागादिविकल्परहितसमाधि भजन्तः सेवमानाः । इतो विशेपः । नमस्कारशब्दरूप वचन द्रव्यनमस्कार है और केवलज्ञानादि अनंतगुणस्मरणरूप भावनमस्कार कहाजाता है । यह द्रव्य भावरूप नमस्कार व्यवहारनयकर साधकदशामें कहा है शुद्ध निश्चयनयकर वंद्यवंदक भाव नहीं है। ऐसे पदखंडनारूप शब्दार्थ कहा और नयविभाग- रूप कथनकर नयार्थ भी कहा तथा बौद्ध नैयायिक सांख्यादिमतके कथनकरनेसे मतार्थ कहा, इसप्रकार अनंत गुणात्मक सिद्धपरमेष्ठी संसारसे मुक्त हुए है यह सिद्धांतका अर्थ प्रसिद्ध ही है और निरंजन ज्ञानमई परमात्माद्रव्य आदरने योग्य है उपादेय है यह भावार्थ है। इसीतरह शब्दनयमतआगमभावार्थ व्याख्यानके अवसरपर सबजगह जानलेना। यह पहले दोहाका अर्थ कहा ॥ १ ॥ अब ससार समुद्रके तरनेका उपाय जो वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूप निहाज है उसपर चढके जो आगामी कालमें कल्याणमय अनुपमज्ञानमई होंगे उनको मै नमस्कार करता हूं,-["अह" ] मै [ तान् ] उन [ सिद्धगणान् ] सिद्धसमूहोंको [ वन्दे ] नमस्कार करता हूं [येपि ] जो [अनन्ताः] आगामीकालमें अनंत [ भविष्यन्ति ] होंगे । कैसे होंगे? [शिवमयनिरूपमज्ञानम- याः] परमकल्याणमय, अनुपम और ज्ञानमय होंगे। क्या करते हुए ? [ परमसमाधि ] रागादिविकल्परहित जो परमसमाधि उसको { भजन्तः ] सेवते हुए ॥ अव विशेष कहते है-जो सिद्ध होवेंगे उनको मै वंदता हू । कैसे होंगे आगामी कालमें सिद्ध ! केवलur रायचंदजैनशासमालायाम् | तथाहि-तान् सिद्धगणान् कर्मतापन्नान् अहं वन्दे । कथंभूतान । केवलमानादिमोक्ष- लक्ष्मीसहितान् सम्यक्त्वाद्यष्टगुणविभूतिसहितान अनन्तान् । किं करिष्यन्ति । ये वीतराग- सर्वज्ञप्रणीतमार्गेण दुर्लभवोधि लब्ध्वा भविष्यन्त्यग्रे श्रेणिकादयः । किविशिष्टा भविष्यन्ति । शिवमयनिरुपमज्ञानमयाः । अन शिवशब्देन स्वशुद्धामभावनोत्पन्नवीतगगपरमानन्दमुखं प्रारं, निरुपमशब्देन समस्तोपमानरहितं ग्राएं, जानशब्देन केवलज्ञान प्राय । किं कुर्वाणाः सन्त इत्थंभूता भविष्यन्ति । विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावशुद्धात्मतत्त्वसम्यनद्धानतानानुचर- णरूपामूल्यरत्नत्रयभारपूर्ण मिथ्यात्वविपयकपायादिरूपसमस्तविभावजलप्रवेशरहितं शुद्धा- मभावनोत्थसहजानन्दैकरूपसुखामृतविपरीतनरकादिदुःखरूपेण क्षारजलन पूर्णस्य मंमार- समुद्रस्य तरणोपायभूतं समाधिपोतं भजन्तः सेवमानास्तदाधारण गच्छन्त इत्यर्थः । अत्र शिवमयनिरुपमज्ञानमयशुद्धामस्वरूपमुपादेयमिति भावार्थः ।। २ ।। अथानन्तरं परमसमाध्यग्निना कर्मेन्धनहोमं कुर्वाणान् वर्तमानान सिद्धानहं नमस्करोमि,- तेहउ वंडं सिद्धगण, अत्यहिं जेवि हवंत । परमसमाहिमहग्गियए, कम्मिंधणइ हुणंत ॥३॥ तान् वन्दे सिद्धगणान् , तिष्ठन्ति येपि भवन्तः । परमसमाधिमहाग्निना, कर्मेन्धनानि होमयन्तः ॥ ३ ॥ तेहउ वंदउं सिद्धगण तानहं सिद्धगणान् वन्दे । ये कथंभूताः । अत्यहिं जवि हवंत ज्ञानादि मोक्षलक्ष्मी सहित और सम्यक्त्वादि आठगुणों सहित अनंते होंगे । कहा करके सिद्ध होंगे ! वीतराग सर्वज्ञदेवकर प्ररूपित मार्गकर दुर्लभ ज्ञानको पाके राजा श्रेणिक आदिकके जीव सिद्ध होगे । पुनः कैसे होंगे ! शिव अर्थात् निज शुद्धात्माकी भावना उसकर उपजा जो वीतराग परमानंद सुख उस स्वरूप होंगे, समस्त उपमारहित अनुपम होंगे और केवलज्ञानमई होंगे । क्याकरते हुए ऐसे होंगे? निर्मलज्ञानदर्शनेंस्वभाव जो शुद्धात्मा है उसके यथार्थ श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप अमोलिक रतत्रयकर पूर्ण और मिथ्यात्व विषयकषायादिरूप समस्त विभावरूप जलके प्रवेशसे रहित शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ जो सहजानंदैकरूप सुखामृत उससे विपरीत जो नारकादि दुःख वे ही हुए क्षारजल उनकर पूर्ण इस ससाररूपी समुद्रके तरनेका उपाय जो परम समाधिरूप जिहाज उसको सेवते हुए उसके आधारसे चलते हुए अनंत सिद्ध होगे । इस व्याख्यानका यह भावार्थ हुआ कि जो शिवमय अनुपम ज्ञानमय शुद्धात्मखरूप है वही उपादेय है ।। २॥ यह दूसरे दोहेका अर्थ हुआ। आगे परमसमाधिरूप अग्निसे कर्मरूप ईधनका होम करते हुए वर्तमानकालमें महाविदेह क्षेत्रमें सीमंधरखामी आदि तिष्ठते हैं उनको नमस्कार 4 परमात्मप्रकाशः। ७ इदानी तिष्ठन्ति ये भवन्तः संतः । किं कुर्वाणास्तिष्ठन्ति । परमसमाहिमहग्गियए कम्भिधणहि हुणंत परमसमाध्यग्निना कर्मेन्धनानि होमयन्तः । अतो विशेषः । तद्यथा- तान् सिद्धसमूहानहं वन्दे वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानलक्षणपारमार्थिकसिद्धभक्त्या नमस्करोमि । ये किंविशिष्टाः । इदानीं पञ्चमहाविदेहेषु भवन्तस्तिष्ठन्ति श्रीसीमन्धरस्वामि- प्रभृतयः । किं कुर्वन्तस्तिष्ठन्ति । वीतरागपरमसामायिकभावनाविनाभूतनिर्दोषपरमात्म- सम्यश्रद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरत्नत्रयालकनिर्विकल्पसमाधिवैश्वानरे कर्मेन्धनाहुतिभिः कृत्वा होमं कुर्वन्त इति । अत्र शुद्धासद्रव्यस्योपादेयभूतस्य प्राप्त्युपायभूतत्वान्निर्विकल्पसमा- धिरेवोपादेय इति भावार्थः ।। ३ ।। अथ स्वरूपं प्राप्यापि तेन संबंधादनुज्ञानबलेन ये सिद्धा भूत्वा निर्वाणे वसन्ति तानहं वन्दे,- ते पुणु वं सिद्धगण, जे णिव्वाणि वसंति । णाणिं तिहुयणिगरुयावि, भवसायरि ण पडंति ॥४॥ तान् पुनः वन्दे सिद्धगणान् , ये निर्वाणे वसन्ति । ज्ञानेन त्रिभुवनगुरुका अपि, भवसागरे न पतन्ति ॥ ४ ॥ ते पुणु वंदर सिद्धगण तान् पुनर्वन्दे सिद्धगणान । किं विशिष्टान् । जे णिव्वाणि वसंति ये निर्वाणे मोक्षपदे वसन्ति तिष्ठन्ति । पुनरपि कथंभूता ये । णणिं तिहुयणि- ? ? करता हू;-[ 'अहं' ] मै [ तान् ] उन [ सिद्धगणान् ] सिद्ध समूहोंको [ वन्दे ] नमस्कार करता हू [ येपि ] जो [ भवन्तः तिष्ठन्ति ] वर्तमान समयमें विराज रहे हैं। क्या करते हुए ? [ परमसमाधिमहाग्निना ] परम समाधिरूप महा अग्निकर [कर्मेन्ध- नानि ] कर्मरूप ईधनको [ होमयन्तः ] भस्सकरते हुए । अब विशेष व्याख्यान है- उन सिद्धोंको मै वीतरागनिर्विकल्पस्वसवेदन ज्ञानरूप परमार्थ सिद्धभक्तिकर नमस्कार करता हूं। कैसे है वे ? अब वर्तमान समयमें पंच महाविदेह क्षेत्रोंमें श्रीमंधरस्वामी आदि विराजमान हैं। क्या करते हुए ? वीतराग परमसामायिक चारित्रकी भावनाकर सयुक्त जो निर्दोष परमात्माका यथार्थ श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप अभेद रत्नत्रय उसमई निर्विकल्पसमा- धिरूपी अग्निमें कर्मरूप ईंधनको होम करते हुए तिष्ठ रहे हैं । इस कथनमें शुद्धात्मद्रव्यकी प्राप्तिका उपाय भूत निर्विकल्प समाधि उपादेय ( आदरने योग्य ) है यह भावार्थ हुआ ॥ ३ ॥ यह तीसरे दोहेका अर्थ कहा । आगे जो महामुनि होकर शुद्धात्मखरूपको पाके सम्यग्ज्ञानके बलसे कौका क्षयकर सिद्ध हुए निर्वाणमें वसरहे है उनको मै वन्दता हूं:-[पुनः ] फिर ["अहं"] मै [ तान् ] उन [सिद्धगणान् ] सिद्धोंको [ वन्दे ] वंदता हूं [ये जो [ निर्वाणे ] मोक्षमें [ वसन्ति] तिष्ठरहे हैं । कैसे हैं वे [ज्ञानेन ] ८ रायचंगुजैनशास्त्रमालायाम् । गरुयावि भवसायरि ण पडंति ज्ञानेन त्रिभुवनगुरुका अपि भवसागर न पनन्ति । अत ऊर्ध्व विशेषः । तथाहि-तान् पुनर्वन्देऽहं सिद्धगणान् ये तीर्थकरपरमदेवभरतराघव- पाण्डवादयः पूर्वकाले वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानबलेन शुद्धामस्वरूपं प्राप्य कर्मक्षयं कृत्वेदानीं निर्वाणे तिष्ठन्ति सदापि न संशयः तानपि लोकालोकप्रकाशकेवलज्ञानस्वमवदन- त्रिभुवनगुरून् । त्रैलोक्यालोकनपरमालस्वरूपनिश्चयव्यवहारपदपदार्थव्यवहारनयकवलनान- प्रकाशेन समाहितस्वस्वरूपभूते निर्वाणपदोपादेयमिति तात्पर्यार्थः ॥ ४ ॥ अत ऊर्ध्व व्यवहारनिश्चयशुद्धासनो हि सिद्धास्तथापि निश्चयनयन शुद्धामस्वरूपे तिष्ठंतीति कथयति,- ते पुणु वंडं सिद्धगण, जे अप्पाणि वसंत । लोयालोउवि सयलुइहु, अत्यहि विमलु णियंत ॥५॥ तान् पुनर्वन्दे सिद्धगणान् ये आत्मनि वसन्तः । लोकालोकमपि सकलं तिष्ठन्ति विमलं निश्चयन्तः ।। ५ ।। ते पुणु वंदउं सिद्धगण तान् पुनर्वन्दे सिद्धगणान् जे अप्पाणि वसंत लोयालोउवि सयलुइहु अत्थहि विमलु णियंत ये आमनि वसन्तो लोकालोकं सततस्वरूपपदार्थ निश्चयन्त इति । इदानीं विशेषः । तद्यथा -तान् पुनरहं वन्दे सिद्धगणान् सिद्धसमूह ज्ञानसे [ त्रिभुवनगुरुका अपि ] तीनलोकमें गुरु है तौभी [ भवसागरे ] संसारसमुद्र में [न पतन्ति ] नहीं पडते है । भावार्थ-जो भारी होता है गुरुतर होता है वह जलमें डूबजाता है वे भगवान् त्रैलोक्यमें गुरु है परंतु भवसागरमें नही पड़ते है उन सिद्धोंको मै बंदता हूं जो तीर्थकर परमदेव तथा भरत सगर राघव पांडवादिक पूर्वकालमें वीतराग- निर्विकल्पखसंवेदनज्ञानके बलसे निजशुद्धात्मस्वरूप पाके कर्मों का आयकर परमसमाधान- रूप निर्वाणपदमें विराज रहे है उनको मेरा नमस्कार होवे यह सारांश हुआ ॥ ४ ॥ आगे यद्यपि वे सिद्ध परमात्मा व्यवहारनयकर लोकालोकको देखते हुए मोक्षमें तिष्ठरहे है लोकके शिखर ऊपर विराजते है तौभी शुद्ध निश्चयनयकर अपने स्वरूपमें ही स्थित है उनको मै नमस्कार करता हूं;-["अहं"] मै [ पुनः ] फिर [ तान् ] उन [ सिद्ध- गणान् ] सिद्धोंके समूहको [ वन्दे ] वंदता हूं [ये ] जो [ आत्मनि वसन्तः] निश्चयनयकर अपने खरूपमें तिष्ठते हुए व्यवहारनयकर [ सकलं ] समस्त [ लोकालोकं ] लोक अलोकको [ विमलं ] संशय रहित [ निश्चयन्तः ] प्रत्यक्ष देखते हुए [ तिष्ठन्ति ठहर रहे है । विशेष—मै कर्मों के क्षयके निमित्त फिर उन सिद्धों को नमस्कार करता हूं जो निश्चयनयकर अपने स्वरूपमें स्थित है और व्यवहारनयकर सव लोकालोकको निःसं- देहपनेसे प्रत्यक्ष देखते है परंतु पदार्थों में तन्मयी नही है अपने स्वरूपमें तन्मयी है। जो पर परमात्मप्रकाशः। वंदे । कर्मक्षयनिमित्तं । पुनरपि कथंभूतं सिद्धस्वरूपं । चैतन्यानंदस्वभावं लोकालोक- व्यापिसूक्ष्मपर्यायशुद्धस्वरूपं ज्ञानदर्शनोपयोगलक्षणं निश्चय एकीभूतव्यवहाराभावे स्वामनि अपि च सुखदुःखभावाभावयोरेकीकृत्य स्वसंवेद्यस्वरूपे स्वयत्ने तिष्ठन्ति । उपचरितासद्भूत- व्यवहारे लोकालोकावलोकनं स्वसंवेद्यं प्रतिभाति आमस्वरूपकैवल्यज्ञानोपशमं यथा पुरुपार्थपदार्थदृष्टो भवति तेपां बाह्यवृत्तिनिमित्तमुत्पत्तिस्थूलसूक्ष्मपरपदार्थव्यवहारात्मानमेव जानन्ति । यदि निश्चयेन तिष्ठन्ति तर्हि परकीयसुखदुःखपरिज्ञाने सुखदुःखानुभवः प्राप्नोति, परकीयरागहेतुपरिज्ञाने च रागद्वेषमयत्वं च प्राप्नोतीति महदूषणं । अत्र यत्र निश्चयेन स्वस्वरूपेऽवस्थानं भणितं तदेवोपादेयमिति भावार्थः ॥ ५ ॥ अथ निष्कलालानं सिद्धपरमेष्ठिनं नत्वा तस्येदानी सिद्धस्वरूपस्य तत्प्राप्युपायस्य च प्रतिपादकसकलालानं नमस्करोमि;- केवलदसणणाणमय, केवलसुक्खसहाव । जिणवर बंदउँ भत्तियए, जेहिं पयासिय भाव ॥ ६॥ केवलदर्शनज्ञानमयाः केवलसुखखभावाः । जिनवरान् वंदे भक्त्या यैः प्रकाशिता भावाः ॥ ६ ॥ केवलदर्शनज्ञानमयाः केवलसुखस्वभावा ये तान् जिनवरानहं वंदे । कया । भक्त्या । यैः किं कृतं । प्रकाशिता भावा जीवाजीवादिपदार्था इति । इतो विशेपः । केवलज्ञा- नाद्यनंतचतुष्टयस्वरूपपरमात्मतत्त्वसम्यश्रद्धानज्ञानानुभूतिरूपाभेदरत्नत्रयात्मकं सुखदुःख- जीवितमरणलाभालाभशत्रुमित्रसमानभावनाविनाभूतवीतरागनिर्विकल्पसमाधिपूर्व जिनो- , पदार्थों में तन्मयी हो तो परके सुखदुःख से आप सुखी दुःखी होवे ऐसा उनमें कदाचित् नही है । व्यवहारनयकर स्थूलसूक्ष्म सबको केवलज्ञानकर प्रत्यक्ष निःसंदेह जानते है किसी पदार्थसे रागद्वेष नहीं है। यदि रागके हेतुसे किसीको जाने तो वे रागद्वेषमयी होवें यह बडा दूषण है इसलिये यह निश्चय हुआ कि निश्चयनयकर अपने खरूपमें निवास करते है परमें नही और अपनी ज्ञायकशक्तिकर सबको प्रत्यक्ष देखते है जानते है । जो निश्चयकर अपने खरूपमें निवास कहा इसलिये वह अपना खरूपही आराधने योग्य है यह भावार्थ हुआ ॥५॥ आगे निरंजन निराकार निःशरीर सिद्ध परमेष्ठीको नमस्कार करता हूं-[केवलदर्शनज्ञानमयाः जो केवलदर्शन और केवलज्ञानमयी है [ केवलसुखस्वभावाः ] तथा जिनका केवल सुख ही खभाव है और [2] जिन्होंने [ भावाः ] जीवादिक सकल पदार्थ [प्रकाशिताः ] प्रकाशित किये उनको मैं [ भक्त्या] भक्तिसे [ वंदे ] नमस्कार करता हूं । विशेष—केवलज्ञानादि अनंतचतुष्टयखरूप जो परमात्मतत्त्व है उसके यथार्थश्रद्धान ज्ञान और अनुभव इन खरूप अभेदरत्नत्रय वह जिन- २ , रायचंद्रजैनशासमालायाम् । पदेशं लब्ध्वा पश्चादनंतचतुष्टयस्वरूपा जाता ये । पुनश्च किं कृतं । यैः अनुवादपण जीवादिपदार्थाः प्रकाशिताः । विशेषेण तु कर्माभावे सति केवलजानाद्यनंतगुणस्वरूप- लाभासको मोक्षः, शुद्धालसम्यश्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपाभेदरनत्रयासको मोक्षमार्गश्च, तानहं वंदे । अत्राईद्गुणस्वरूपस्वशुद्धामस्वरूपमेवोपादेयमिति भावार्थः ॥ ६॥ अथानंतरं भेदाभेदरत्नत्रयाराधकानाचार्योपाध्यायसाधूनमस्करोमिः जे परमप्पु णियंति मुणि, परमसमाहि धरेवि । परमाणंदहकारणिण, तिण्णिवि तेवि णवेवि ॥७॥ ये परमात्मानं निर्यान्ति मुनयः परमसमाधि धृत्वा । परमानंदकारणेन त्रीनपि तानपि नत्वा ॥ ७॥ जे परमप्पु णियंति मुणि ये केचन परमासानं निर्गच्छन्ति स्वसंवेदनबानेन जानन्ति मुनयस्तपोधनाः । किं कृत्वा पूर्व । परमसमाहि धरेवि रागादिविकल्परहितं परमसमाधि धृत्वा । केन कारणेन । परमाणंदहकारणिण निर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नसदानन्दपरमसमर- सीभावसुखरसास्वादनिमित्तेन तिण्णिवि तेवि णवेवि त्रीनप्याचार्योपाध्यायसाधून नत्वा नमस्कृत्येत्यर्थः । अतो विशेषः । अनुपचरितासद्भूतव्यवहारसंबंधं द्रव्यकर्मनोकर्मरहितं तथैवाशुद्धनिश्चयसंबंधं मतिज्ञानादिविभावगुणनरनारकादिविभावपर्यायरहितं च यच्चिदा- का खभाव है और सुखदुःख जीवित मरण लाभ अलाभ शत्रु मित्र सबमें समान भाव होनेसे उत्पन्न हुई वीतरागनिर्विकल्प परमसमाधि उसके कहनेवाले जिनराजके उपदेशको पाकर अनंतचतुष्टयरूप हुए तथा जिन्होंने यथार्थ जीवादिपदार्थोंका खरूप प्रकाशित किया तथा जो कर्मका अभाव है वही केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप मोक्ष और जो शुद्धा- स्माका यथार्थ श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप अभेदरनत्रय वही हुआ मोक्षमार्ग ऐसे मोक्ष और मोक्षमार्गको भी प्रगट किया उनको मैं नमस्कार करता हूं । इस व्याख्यानमें अरहंतदेवके केवलज्ञानादिगुणखरूप जो शुद्धात्मखरूप है वही आराधने योग्य है यह भावार्थ जानना ।। ६॥ आगे भेदाभेदरतत्रयके आराधक जो आचार्य उपाध्याय और साधु हैं उनको मैं नमस्कार करता हूं;-[ये मुनयः ] जो मुनि [ परमसमाधि ] परमसमाधिको [धृत्वा ] धारण करके सम्यग्ज्ञानकर [ परमात्मानं ] परमात्माको [नियाँति ] जानते है । किस वास्ते ? [ परमानंदकारणेन ] रागादि विकल्प रहित परमसमाधिसे उत्पन्न हुए परम सुखके रसका अनुभवकरनेके लिये [ तान् अपि ] उन [त्रीन् अपि] तीनों आचार्य उपाध्याय साधुओंको भी [नत्वा] मै नमस्कार करके परमात्मप्रकाशका व्याख्यान करता हूं। विशेष- अनुपचरित अर्थात् जो उपचरित नही है इसीसे अनादि संबंध है परंतु असद्भूत (मिथ्या) परमात्मप्रकाशः। नंदैकस्वभावं शुद्धासतत्त्वं तदेव भूतार्थ परमार्थरूपसमयसारशब्दवाच्यं सर्वप्रकारोपादेयभूवं तस्माच्च यदन्यत्तद्धेयमिति । चलमलिनावगाढरहितत्वेन निश्चयश्रद्धानबुद्धिः सम्यक्त्वं तत्राचरणं परिणमनं दर्शनाचारस्तत्रैव संशयविपर्यासानद्यवसायरहितत्वेन स्वसंवेदनज्ञानरूपेण ग्राहक- बुद्धिः सम्यग्नानं तत्राचरणं परिणमनं ज्ञानाचारः, तत्रैव शुभाशुभसंकल्पविकल्परहितत्वेन नित्यानंदमयसुखरसास्वादस्थिरानुभवनं च सम्यक्चारित्रं तत्राचरणं परिणमनं चारित्रा- चारः, तत्रैव परद्रव्येच्छानिरोधेन सहजानंदैकरूपेण प्रतपनं तपश्चरणं तत्राचरणं परिणमनं तपश्चरणाचारः, तत्रैव शुद्धामखरूपे स्वशक्त्यनवगूहुनेनाचरणं परिणमन वीर्याचार इति निश्चयपञ्चाचाराः । निःशङ्काद्यष्टगुणभेदो वाह्यदर्शनाचारः, कालविनयाद्यष्टभेदो बाह्यज्ञाना- चारा, पञ्चमहाव्रतपञ्चसमितित्रिगुप्तिनिर्मन्थरूपो वाह्यचारित्राचारः, अनशनादिद्वादश- भेदरूपो बाहतपश्चरणाचारः, वाह्यस्वशक्त्यनवगूहनरूपो वाह्यवीर्याचार इति । अयं तु व्यवहारपञ्चाचारः पारपर्येण साधक इति । विशुद्धज्ञानदर्शनवभावशुद्धात्मतत्त्वसम्यक्- है ऐसी व्यवहारनयकर द्रव्यकर्मनोकर्मका संबंध होता है उससे रहित और अशुद्धनिश्चयनय- कर रागादिकका संबंध है उससे तथा मतिज्ञानादि विभावगुणके संबंधसे रहित और नरनारकादि चतुर्गतिरूप विभावपर्यायोंसे रहित ऐसा जो चिदानंदचिद्रूप एक अखंडस्वभाव शुद्धात्मतत्त्व है वही सत्य है। उसीको परमार्थरूप समयसार कहना चाहिये। वही सब प्रकार आराधने योग्य है उससे जुदी जो पर वस्तु वह सब त्याज्य है। ऐसी दृढ प्रतीति चंचलतार- हित निर्मल अवगाढ परम श्रद्धा है उसको सम्यक्त्व कहते हैं उसका जो आचरण अ. र्थात् उसस्वरूप परिणमन वह दर्शनाचार कहाजाता है। और उसी निजस्वरूपमें संशय विमोह विभ्रम रहित जो खसवेदनज्ञानरूप ग्राहक बुद्धि वह सम्यग्ज्ञान हुआ उसका जो आचरण अर्थात् उसरूप परिणमन वह ज्ञानाचार है, उसी शुद्धखरूपमें शुभ अशुभ समस्त संकल्प विकल्प रहित जो नित्यानंदमय निजरसका आखाद निश्चल अनुभव वह सम्यक्चारित्र उसका जो आचरण उसरूप परिणमन वह चारित्राचार है, उसी परमा- नंदखरूपमें परद्रव्यकी इच्छाका निरोध कर सहज आनंदरूप तपश्चरण खरूप परिणमन वह तपश्चरणाचार है और उसी शुद्धात्मखरूपमें अपनी शक्तिको प्रगटकर आचरण परिण- मन वह वीर्याचार है । यह निश्चयपंचाचारका लक्षण कहा । अब व्यवहारका लक्षण कहते हैं-निःशंकितको आदि लेकर अष्ट अंगरूप बाह्यदर्शनाचार, शब्द शुद्ध अर्थशुद्ध आदि अष्टप्रकार बाह्य ज्ञानाचार, पंच महाव्रत पंच समिति तीन गुप्तिरूप व्यवहार चारित्राचार, अनशनादि बारहतपरूप तपाचार और अपनी शक्ति प्रगटकर मुनिव्रतका आचरण यह व्यवहार वीर्याचार है । यह व्यवहार पंचाचार परंपराय मोक्षका कारण है। और निर्मल ज्ञान दर्शनखभाव जो शुद्धात्मतत्त्व उसका यथार्थश्रद्धान ज्ञान आचरण तथा परद्रव्यकी इच्छाका निरोध और निजशक्तिका प्रगट करना ऐसा यह निश्चय पंचाचार रायचंद्जैनशास्त्रमालायाम् । १२ श्रद्धानज्ञानानुष्ठानबहिर्द्रव्येच्छानिवृत्तिरूपं तपश्चरणं स्वशत्यनवगृहनवीर्यरूपाभेदपश्चाचार- रूपासकं शुद्धोपयोगभावनांतर्भूतं वीतरागनिर्विकल्पसमाधि स्वयमाचरंत्यन्यानाचारयंतीति भवंत्याचार्यास्तानहं वंदे । पञ्चास्तिकायपदव्यसप्ततत्त्वनवपदार्थेषु मध्ये शुद्धजीवास्ति- कायशुद्धजीवद्रव्यशुद्धजीवतत्त्वशुद्धजीवपदार्थसंजं स्वशुद्धालभावमुपादेयं तम्माच्चान्यद्रेयं कथयन्ति । शुद्धामस्वभावसम्यक्सद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरबत्रयासकं निश्चयमोक्षमार्ग च ये कथयन्ति । ते भवत्युपाध्यायास्तानहं वंदे । शुद्धबुद्धैकस्खभावशुद्धामतत्त्वसम्यक्रद्धान- ज्ञानानुचरणतपश्चरणरूपाभेदचतुर्विधनिश्चयाराधनात्मकवीतरागनिर्विकल्पसमाधिं ये साध- यन्ति ते भवन्ति साधवस्तानहं वंदे । अत्रायमेव ते समाचरन्ति कथयन्ति साधयन्ति च वीतरागनिर्विकल्पसमाधि तमेवोपादेयभूतस्य स्वशुद्धालतत्त्वस्य साधकत्वादुपादेयं जानीहीति भावार्थः ॥ ७॥ इति प्रभाकरभट्टस्य पञ्चपरमेष्ठिनमस्कारकरणमुख्यत्वेन प्रथममहाधिकार- मध्ये दोहकसूत्रसप्तकं गतं । ( अथ पातनिका)-श्रीयोगींद्रदेवकृतपरमासप्रकाशामिधाने दोहकछंदोग्रंथे प्रक्षे- पकान् विहाय व्याख्यानार्थमविकारशुद्धिः कथ्यते । -प्रथमतस्तावत्पञ्च- तद्यथा , साक्षात् मुक्तिका कारण है । ऐसे निश्चय व्यवहाररूप पंचाचारोंको आप आचरैं और दूसरोंको आचरवावें ऐसे आचार्योंको मैं वंदता हूं । पंचास्तिकाय पदव्य सप्त तत्व नवपदार्थ जे हैं उनमें निज शुद्ध जीवास्तिकाय निजशुद्ध जीवद्रव्य निज शुद्ध जीवतत्त्व निज शुद्ध जीवपदार्थ जो आप शुद्धात्मा है वही उपादेय ( ग्रहणकरने योग्य ) है अन्य सब त्यागने योग्य है ऐसा उपदेश कहते है, तथा शुद्धात्मखभावका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप अभेद रत्नत्रय है वही निश्चयमोक्षमार्ग है ऐसा उपदेश शिष्योंको देते हैं ऐसे उपाध्या- योंको मै नमस्कार करता हूं। और शुद्धज्ञान स्वभाव शुद्धात्मतत्त्वकी आराधनारूप वीतराग निर्विकल्प समाधिको जो साधते हैं उन साधुओंको मैं वंदता हूं। वीतराग निर्विकल्प समा- धिको जो आचरते हैं कहते हैं साधते हैं वेही साधु ऐसें अहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधु ये ही पंचपरमेष्ठी वंदने योग्य हैं। ऐसा भावार्थ है ॥ ७ ॥ ऐसे पंचपरमेष्ठीको नमस्कार करनेकी मुख्यतासे श्रीयोगीद्राचार्यने परमात्मप्रकाशके प्रथम महाधिकारमें प्रथमस्थलमें सात दोहाओंसे प्रभाकरभट्ट नामक अपने शिष्यको पंचपरमेष्ठीकी भक्तिका उपदेश दिया। यह पीठिका वर्णन की । ( अब पातनिका )-श्रीयोगीन्द्रदेवकृत परमात्मप्रकाश नामा दोहकछंद ग्रंथमें प्रक्षे- पक (उक्तं च) विना व्याख्यानकेलिये अधिकारोंकी परिपाटी कहते हैं-प्रथम ही १. वे पाचो परमेष्टी भी जिस वीतराग निर्विकल्प समाधिको आचरते हैं कहते हैं और साधते हैं तथा जो उपादेयरूप निजशुद्धात्मतत्त्वकी साधनेवाली है ऐसी निर्विकल्प समाधिको ही उपादेय जानो। (यह अर्थ सस्कृतके अनुसार किया गमा है)।

परमात्मप्रकाशः। १३ परमेष्ठिनमस्कारमुख्यत्वेन "जे जाया झाणग्गियए" इत्यादि सप्त दोहकसूत्राणि भवन्ति, तदनंतरं विज्ञापनमुख्यतया "भावि पणविवि" इत्यादिसूत्रत्रयं, अत ऊर्ध्वं बहिरंत:- परमभेदेन त्रिधात्मप्रतिपादनमुख्यत्वेन "पुणु पुणु पणविवि” इत्यादिसूत्रपञ्चकं, अथानंतरं मुक्तिगतव्यक्तिरूपपरमात्मकथनमुख्यत्वेन "तिहुयणवंदित" इत्यादि सूत्रदशकं, अत ऊर्ध्व देहस्थितशक्तिरूपपरमात्मकथनमुख्यत्वेन "जेहउ णिम्मलु" इत्यादि अंतर्भूतप्रक्षेपपञ्चकस- हितचतुर्विगतिसूत्राणि भवन्ति, अथ जीवस्य वदेहप्रमितिविपये स्वपरमतविचारमुख्यतया "अप्पा जोइय" इत्यादिसूत्रपटूं, तदनंतरं द्रव्यगुणपर्यायस्वरूपकथनमुख्यतया "अप्पा जणियउ" इत्यादि सूत्रत्रयं, अथानंतरं कर्मविचारमुख्यत्वेन "जीवह कम्मु अणाई" इत्यादि सूत्राष्टकं, तदनंतरं सामान्यभेदभावनाकथनेन "अप्पा अप्पुजि" इत्यादि सूत्रनवकं, अत ऊर्ध्व निश्चयसम्यग्दृष्टिकथनरूपेण "अप्पे अप्पु” इत्यादि सूत्रमेकं, तदनंतरं मिथ्याभा- वकथनमुख्यत्वेन "पज्जयरत्तउ" इत्यादि सूत्राष्टकं, अत ऊर्ध्वं सम्यग्दृष्टिभावनामुख्यत्वेन "कालु लहेविणु" इत्यादि सूत्राष्टकं, तदनंतरं सामान्यभेदभावनामुख्यत्वेन "अप्पा संजमु' इत्याद्यकाधिकत्रिगत्प्रमितानि दोहकसूत्राणि भवन्ति ॥ इति श्रीयोगीन्द्र- देवविरचितपरमात्मप्रकाशयाने त्रयोविशत्यधिकशतदोहकसूत्रैर्बहिरंतःपरमात्मस्वरूपकथन- मुख्यत्वेन प्रथमप्रकरणपातनिका समाप्ता । अथानंतरं द्वितीयमहाधिकारप्रारंभे मोक्षमोक्ष- पंचपरमेष्ठीके नमस्कारकी मुख्यताकर "जे जाया झाणग्गियए" इत्यादि सात दोहा जानना, विज्ञापना की मुख्यताकर "भावे पणविवि" इत्यादि तीन दोहा, बहिरात्मा अंतरात्मा परमात्मा इन भेदोंसे तीन प्रकार आत्माके कथनकी मुख्यताकर "पुणु पुणु पणविवि" इत्यादि पांच दोहा, मुक्तिको प्राप्त हुए जो प्रगटखरूप परमात्मा उनके कथनकी मुख्यता- कर “तिहुयण वंदिउ" इत्यादि दस दोहा, देहमें तिष्ठे हुए शक्तिरूप परमात्माके कथनकी मुख्यतासे "जेहउ णिम्मलु" इत्यादि पांच क्षेपकोसहित चौवीस दोहा, जीवके निजदेह प्रमाण कथनमें स्वमत परमतके विचारकी मुख्यताकर "किवि भणंति जिउ सव्वगउ"इत्यादि छह दोहा, द्रव्यगुणपर्यायके स्वरूप कहनेकी मुख्यताकर "अप्पा जणियउ" इत्यादि तीन दोहा, कर्मविचारकी मुख्यताकर "जीवह कम्मु अणाइ जिय" इत्यादि आठ दोहा, सामान्य भेद भावनाके कथन कर "अप्पा अप्पुजि" इत्यादि नौ दोहा, निश्चय- सम्यग्दृष्टिके कथनरूप अप्पे अप्पुजि" इत्यादि एक दोहा, मिथ्याभावके कथनकी मुख्यताकर "पजइ रत्तउ" इत्यादि आठ दोहा, सम्यग्दृष्टीकी मुख्यताकर "काललहेविणु" इत्यादि आठ दोहा और सामान्यभेदभावकी मुख्यताकर "अप्पा संजमु" इत्यादि इकतीस दोहा कहे हैं । इसतरह श्रीयोगींद्रदेव विरचित परमात्मप्रकाश ग्रंथमें एकसौ तेईस १२३ दोहा- ओंकर पहला प्रकरण कहा है, इस प्रकरणमें बहिरात्मा अंतरात्मा परमात्माके स्वरूपके कथनकी मुख्यता है तथा इसमें तेरह अंतर अधिकार हैं। अब दूसरे अधिकारमें मोक्ष मोक्ष- , , , रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । १४ फलमोक्षमार्गस्वरूपं कथ्यते तत्र प्रथमतस्तावत् "सिरिगुरु" इत्यादिमोक्षस्वरूपकथन- मुख्यत्वेन दोहकसूत्राणि दशकं, अत ऊर्ध्व "दसणणाणु" इत्याधेकसूत्रेण मोक्षफलं, गद- नंतरं "जीवह मोक्खह हेउवरु” इत्याद्यकोनविंशतिसूत्रपर्यतं निश्चयव्यवहारमोक्षमार्ग- मुख्यतया व्याख्यानं, अथानंतरमभेदरत्नत्रयमुख्यत्वेन "जो भत्तः” इत्यादि मूत्राष्टक, अत ऊर्ध्व समभावमुख्यत्वेन "कम्मु पुरकिउ" इत्यादिसूत्राणि चतुर्दग, अथाननरं पुण्य- पापसमानमुख्यत्वेन "बंधहं मोक्खहं हेउणिरु” इत्यादिमूत्राणि चतुर्दश, अत ऊर्च एकचत्वारिंशत्सूत्रपर्यंतं प्रक्षेपकान् विहाय शुद्धोपयोगस्वरूपमुख्यत्वमिति समुदायपाननिका । तत्र प्रथमतः एकचत्वारिंशन्मध्ये "सुद्धह संजमु” इत्यादि सूत्रपञ्चकपर्यंत शुद्धोपयोग- मुख्यतया व्याख्यानं, अथानंतरं "दाणि लगभइ" इत्यादि पंचदशसूत्रपर्यंतं वीतरागखमं- वेदनज्ञानमुख्यत्वेन व्याख्यानं, तदनंतरं "लेणह इच्छइ मृदु" इत्यादि सूत्राष्टकपर्यंत परिग्रहत्यागमुख्यतया व्याख्यानं, अत ऊर्ध्व "जो भत्तउ रयणत्तयह" इत्यादि त्रयोदग- सूत्रपर्यतं शुद्धनयेन पोडशवर्णिकासुवर्णवत् सर्वे जीवाः केवलज्ञानादिस्वभावलक्षणन समाना इति मुख्यत्वेन व्याख्यानं । इत्येकचत्वारिंशत्सूत्राणि गतानि । अत ऊर्ध्व "पर जाणंतुवि" इत्यादि समाप्तिपर्यंतं प्रक्षेपकान् विहाय सप्तोत्तरशतसूत्रैश्चूलिका व्याख्यानं । तत्र समो- त्तरशतमध्ये अवसाने "परमसमाहि" इत्यादि चतुर्विंशतिसूत्रेपु सप्तस्थलानि भवन्ति । तस्मिन फल मोक्षमार्ग इनका खरूप कहा है, उसमें प्रथम ही "सिरि गुरु" इत्यादि मोक्षखरूपके कथनकी मुख्यताकर दस दोहा, "दसण णाणु" इत्यादि एक दोहाकर मोक्षका फल, निश्चयव्यवहार मोक्षमार्गकी मुख्यताकर "जीवह मोक्खह हेउ वरु" इत्यादि उगनीस दोहा अभेदरलत्रयकी मुख्यताकर "जो भत्तउ" इत्यादि आठ दोहा, समभावकी मुख्यताकर "कम्म पुरक्किउ" इत्यादि चौदह दोहा, पुण्य पापकी समानताकी मुख्यताकर "बंधहं मोक्खहं हेउ णिरु" इत्यादि चौदह दोहा है । और शुद्धोपयोगके खरूपकी मुख्यताकर प्रक्षेपकोंके विना इकतालीस दोहा पर्यंत व्याख्यान है । उन इकतालीस दोहाओंमेंसे प्रथम ही "सुद्धह संजमु" इत्यादि पांच दोहा तक शुद्धोपयोगके व्याख्यानकी मुख्यता है, "दाणे लन्मइ" इत्यादि पंद्रह दोहा पर्यंत वीतराग वसंवेदनज्ञानकी मुख्यताकर व्याख्यान है, परिग्रह त्यागकी मुख्यताकर "लेणह इच्छइ" इत्यादि आठ दोहा पर्यंत व्याख्यान है, "जो भत्तउ रयणत्तइह" इत्यादि तेरह दोहा पर्यंत शुद्धनयकर सोलहवानके सुवर्णकी तरह सब जीव केवलज्ञानादि खभावलक्षणकर समान हैं यह व्याख्यान है। इसतरह इकतालीस दोहाओं के व्याख्यानकी विधि कही उनके चार अधिकार हैं। यहापर एकसौ ग्यारह दोहाओंका दूसरा महा अधिकार कहा है उसमें दस अंतर अधिकार हैं। इसके बाद "पर जाणतुवि" इत्यादि एकसौ सात दोहाओंमें ग्रंथकी समाप्ति पर्यत चूलिका व्याख्यान है इनके सिवाय प्रक्षेपक हैं। उन एकसौ सात दोहाओंमेंसे अंतके "परम समाहि" इत्यादि - परमात्मप्रकाशः। १५ प्रथमस्थले निर्विकल्पसमाधिमुख्यत्वेन "परमसमाहिमहासरहिं" इत्यादि सूत्रपटूं, तदनंतर- महत्पदमुख्यत्वेन "सयलवियप्पह" इत्यादि सूत्रत्रयं, अथानंतरं परमात्मप्रकाशनाममुख्यत्वेन "सयलहं दोसह" इत्यादि सूत्रत्रयं, अथ सिद्धपदमुख्यत्वेन "झाणे कम्मक्खउ करिवि" इत्यादि सूत्रत्रयं, तदनंतरं परमालप्रकाशाराधकपुरुषाणां फलकथनमुख्यत्वेन "जे परम- प्पपयास मुणि" इत्यादिसूत्रत्रयं, अत ऊर्ध्व परमात्मप्रकाशाराधनायोग्यपुरुषकथनमुख्यत्वेन "जे भवदुक्खहं" इत्यादि सूत्रत्रयं, अथानंतरं परमात्मप्रकाशशास्त्रफलकथनमुख्यत्वेन तथैवौद्धत्यपरिहारमुख्यत्वेन च लच्छणछंद” इत्यादि सूत्रत्रयं । इति चतुर्विशतिदोहकसूत्रै- कचूलिकावसाने सप्तस्थलानि गतानि । एवं प्रथमपातनिका समाप्ता । अथवा प्रकारांतरेण द्वितीया पातनिका कथ्यते । तद्यथा-प्रथमतस्तावद्वहिरात्मांतरात्मपरमात्मकथनरूपेण प्रक्षेपकान् विहाय त्रयोविशत्यधिकशतसूत्रपर्यंत व्याख्यानं क्रियत इति समुदायपातनिका तत्रादौ “जे जाया" इत्यादि पञ्चविंशतिसूत्रपर्यतं त्रिधात्मपीठिकाव्याख्यानं, अथानंतरं "जेहऊ णिम्मलु" इत्यादि चतुर्विंशतिसूत्रपर्यंत सामान्यविवरणं, अत ऊर्ध्व "अप्पा जोइय सव्वगउ” इत्यादित्रिचत्वारिंशत्सूत्रपर्यंत विशेषविवरणं, अत ऊर्ध्व "अप्पा संजमु" इत्याद्यकत्रिंशत्सूत्रपर्यंतं चूलिकाव्याख्यानमिति "प्रथममहाधिकारः” समाप्तः। अथानंतर मोक्षमोक्षफलमोक्षमार्गस्वरूपकथनमुख्यत्वेन प्रक्षेपकान् विहाय चतुर्दशाधिकशतद्वयसूत्रपर्यंत चौवीस दोहा पर्यंत परमसमाधिका कथन है उनमें सातस्थल हैं। उनमेंसे प्रथमस्थलमें निर्वि- कल्प समाधिकी मुख्यताकर “परमसमाहि महासरहि" इत्यादि छह दोहा, अरहंतपदकी मुख्यताकर "सयल वियप्पहं" इत्यादि तीन दोहा, परमात्मप्रकाशनामकी मुख्यताकर "सयलहं दोसह" इत्यादि तीन दोहा, सिद्धपदकी मुख्यताकर "झाणे कम्मक्खउ करिवि" इत्यादि तीन दोहा, परमात्मप्रकाशके आराधक पुरुषोंको फलके कथनकी मुख्यताकर "जो परमप्पपयास मुणि" इत्यादि तीन दोहा, परमात्मप्रकाशकी आराधनाके योग्य पुरुषोंके कथनकी मुख्यताकर "जो भवदुक्खहं" इत्यादि तीन दोहा और परमात्मप्रकाश- शास्त्रके फलके कथनकी मुख्यताकर तथा गर्वके त्यागकी मुख्यताकर "लक्खण छंद" इत्यादि तीन दोहा हैं । इसप्रकार चूलिकाके अंतमें चौवीस दोहाओंसे सात स्थल कहे गये हैं । इसतरह तीन महा अधिकारों में अंतर स्थल अनेक हैं एक तो इसप्रकार पातनिका कही ॥ अथवा अन्य तरह कथनकर दूसरी पातनिका कहते हैं-पहले अधिकारमें बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्माके कथनकी मुख्यताकर क्षेपकोंको छोडकर एकसौ तेईस दोहा कहे हैं। उनमेंसे “जे जाया" इत्यादि पच्चीस दोहा पर्यंत तीनप्रकार आत्माके कथनका पीठिकाव्याख्यान, "जेहउ णिम्मलु" इत्यादि चौवीस दोहा पर्यंत सामान्यवर्णन, "अप्पा जोइय सव्वगउ" इत्यादि तेतालीस दोहा पर्यंत विशेषवर्णन और "अप्पा सजमु" इत्यादि इकतीस दोहा पर्यंत चूलिका व्याख्यान है । इसतरह अंतर अधिकारों सहित पहला ,

रायचंद्रजैनशासमालायाम् ।
द्वितीयमहाधिकारः प्रारभ्यत इति समुदायपातनिका । तत्रादौ "सिरि गुरु” इत्यादि-
त्रिंशत्सूत्रपर्यतं पीठिकाव्याख्यानं, तदनंतरं "जो भत्तउ” इत्यादिपत्रिंशत्सूत्रपर्यत
सामान्यविवरणं, अथानंतर "सुद्धहं संजमु” इत्याधेकचत्वारिंशत्सूत्रपर्यंत विशेषविवरणं,
तदनंतरं प्रक्षेपकान् विहाय सप्तोत्तरशतपर्यतमभेदरत्नत्रयमुख्यतया चूलिकाब्याख्यानं,
इति द्वितीयपातनिका ज्ञातव्या ।
अथ प्रभाकरभट्टः पूर्वोक्तप्रकारेण पञ्चपरमेष्ठिनो नत्वा पुनरिदानीं श्रीयोगींद्रदेवान्
विज्ञापयति,
भावि पणविवि पंचगुरु, सिरिजोइंदुजिणाउ ।
भट्टपहायरि विष्णयज, विमल करेविणु भाउ ॥८॥
भावेन प्रणम्य पञ्चगुरून् श्रीयोगींद्रजिनः ।
भट्टप्रभाकरेण विज्ञापितः विमलं कृत्वा भावम् ॥ ८ ॥
भावि पणविवि पंचगुरु भावेन भावशुद्ध्या प्रणम्य । कान् । पञ्चगुरुन् । पश्चात्किं
कृतं । सिरिजोइंदुजिणाउ भट्टपहायरि विण्णविउ विमलु करेविणु भाउ श्रीयोगींद्रदेव-
नामा भगवान् प्रभाकरभट्टेन कर्तृभूतेन विज्ञापितः विमलं कृत्वा भावं परिणाममिति । अत्र
प्रभाकरभट्टः शुद्धात्मतत्त्वपरिज्ञानार्थ श्रीयोगींद्रदेवं भक्तिप्रकर्पण विज्ञापितवानित्यर्थः ॥ ८॥
तद्यथा,-
गउ संसारि वसंताहं, सामिय कालु अणंतु ।
पर मई किंपि ण पत्तु मुहु, दुक्खु जि पत्तु महंतु ॥९॥
,
महाधिकार" कहा। इसके बाद मोक्ष मोक्षफल और मोक्षमार्गके स्वरूपके कथनकी मुख्यताकर
क्षेपकोंके सिवाय दोसौ चौदह दोहा पर्यंत दूसरा महाधिकार है। उसमें "सिरि गुरु"
इत्यादि तीस दोहा पर्यंत पीठिकाव्याख्यान, "जो भत्तउ' इत्यादि छत्तीस दोहा पर्यत
सामान्यवर्णन और "सुद्धह संजमु" इत्यादि इकतालीस दोहा पर्यंत विशेषवर्णन है उसके
बाद उक्तंच को छोड़कर एकसौ सात दोहा पर्यंत अभेदरनत्रयकी मुख्यताकर चूलिका
व्याख्यान है । इसतरह दूसरी पातनिका जाननी चाहिये ।
अब प्रभाकरभट्ट पूर्वरीतिसे पंचपरमेष्ठीको नमस्कारकर और श्री योगीन्द्रदेवगुरूको नम-
स्कार कर श्रीगुरूसे विनती करता है;-[भावेन भावोंकी शुद्धताकर [पञ्चगुरून् ]
पंच परमेष्टियोंको [प्रणम्य ] नमस्कारकर [ भट्टप्रभाकरेण] प्रभाकरभट्ट [भावं विमलं
कृत्वा अपने परिणामोंको निर्मलकरके [श्रीयोगींद्रजिनः] श्रीयोगींद्रदेवसे [विज्ञा-
पितः] शुद्धात्मतत्वके जाननेके लिये महाभक्तिकर विनती करता हुआ ॥ ८॥

परमात्मप्रकाशः। १७ गतः संसारे वसतां खामिन् कालः अनंतः । परं मया किमपि न प्राप्तं सुखं दुःखमेव प्राप्तं महत् ॥९॥ गउ संसारि वसंताहं सामिय कालु अणंतु गतः संसारे वसतां तिष्ठतां हे स्वामिन् । कोसौ । कालः । कियान् । अनंतः पर मई किंपि ण पत्तु सुहु दुक्खु जि पत्तु महंतु परं किंतु मया किमपि न प्राप्तं सुखं दुःखमेव प्राप्तं महदिति । इतो विस्तरः । तथाहि-स्वशुद्धात्मभावनासमुत्पन्नवीतरागपरमानंदसमरसीभावरूपसुखामृतविपरीतनारका- 'दिदुःखरूपेण क्षारनीरेण पूर्णे अजरामरपदविपरीतजातिजरामरणरूपेण मकरादिजल- चरसमूहेन संकीर्णे अनाकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसुखविपरीतनानामानसादिदुःखरूपवडवान- लशिखासंदीपिताभ्यंतरे वीतरागनिर्विकल्पसमाधिविपरीतसंकल्पविकल्पजालरूपेण कल्लोल- मालासमूहेन विरायिते संसारसागरे वसतां तिष्ठतां हे स्वामिन्ननंतकालो गतः । कस्मात् । एकेन्द्रियविकलेन्द्रियपंचेन्द्रियसंज्ञिपर्याप्तमनुष्यत्वदेशकुलरूपेन्द्रियपटुत्वनिर्व्याध्यायुष्कवरबु- द्धिसद्धर्मश्रवणग्रहणधारणश्रद्धानसंयमविषयसुखव्यावर्तनक्रोधादिकषायनिवर्तनेषु परंपरदुर्ल- भेषु । कथंभूतेषु । लब्धेष्वपि तपोभावनाधर्मेषु शुद्धालभावनाधर्मेषु शुद्धालभावनालक्षणस्य वीतरागनिर्विकल्पसमाधिदुर्लभत्वात् । तदपि कथं। वीतरागनिर्विकल्पसमाधिवोधिप्रतिपक्षभू- तानां मिथ्यात्वविषयकपायादिविभावपरिणामानां प्रबलत्वादिति । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रा- वह विनती इसतरह है;-[हेस्वामिन् ] हे खामी [ संसारे वसतां] इस संसारमें रहते हुए हमारा [अनंतः कालः गतः ] अनंतकाल वीत गया [ परं] लेकिन [ मया] मैंने किमपि सुखं ] कुछ भी सुख [न प्राप्तं ] नहीं पाया उल्टा [ महत् दुःखं एव] महान् दुःख ही पाया है। यहांसे विशेष ।-निज शुद्धात्माकी भावनाकर उत्पन्न हुआ जो वीतराग परम आनंद समरसीभाव है उसरूप जो आनंदामृत उससे विपरीत नरकादि- दुःखरूप क्षार (खारी) जलसे पूर्ण ( भरा हुआ), अजर अमर पदसे उलटा जन्म जरा (वुढापा ) मरणरूपी जलचरोंके समूहकर भरा हुआ, अनाकुलता स्वरूप निश्चय सुखसे विपरीत अनेक प्रकार आधि व्याधि दुःखरूपी वडवानलकी शिखाकर प्रज्वलित, वीतराग निर्विकल्पसमाधिकर रहित महान संकल्प विकल्पोंके जालरूपी कल्लोलोंकी मालाओंकर विराजमान, ऐसे संसाररूपी समुद्र में रहते हुए मुझे हे खामी अनंतकाल वीत गया । इस ससारमें एकेंद्रीसे दोहद्री, ते इंद्री, चौइंद्री खरूप विकलत्रय पर्याय पाना दुर्लभ ( कठिन ) है; विकलत्रयसे पंचेंद्री, सैनी, छह पर्याप्तियोंकी संपूर्णता होना दुर्लभ है, उसमें भी मनुष्य होना अत्यंत दुर्लभ, उसमें आर्यक्षेत्र दुर्लभ, उसमें से उत्तमकुल ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यवर्णरूप पाना कठिन है, उसमें भी सुंदर रूप, समस्त पांचों इन्द्रियोंकी प्रवीणता, दीर्घ आयु, बल, शरीर नीरोग, जैनधर्म इनका उत्तरोत्तर मिलना कठिन है। . ३ १८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । णामप्राप्तप्रापणं बोधिस्तेषामेव निर्विघ्नन भवांतरप्रापणं समाधिरिति वोधिममाधिलक्षणं यथासंभवं सर्वत्र ज्ञातव्यं । तथाचोक्तं । "इत्यतिदुर्लभरूपां वोधिं लब्ध्वा यदि प्रमादी स्यात् । संसृतिभीमारण्ये भ्रमति वराको नरः सुचिरं ॥" परं किंतु बोधिसमाध्यभावे पूर्वोक्तसंसारे भ्रमतापि मया शुद्धालसमाधिसमुत्पन्नवीतरागपरमानंदसुखामृतं किमपि न ग्राम किंतु तद्विपरीतमाकुलत्वोत्पादकं विविधशारीरमानसरूपं चतुर्गतिभ्रमणसंभवं दुःखमेव प्राप्तमिति । अत्र यस्य वीतरागपरमानंदसुखस्यालाभे भ्रमितो जीवसदेवोपादेवमिति भावार्थः ।। ९॥ अथ यस्यैव परमात्मस्वभावस्यालाभेऽनादिकाले भ्रमितो जीवस्तमेव पृच्छति. चउगइदुक्खहं तत्ताहं, जो परमप्पा कोइ । चउगइदुक्खविणासयरु, कहहु पसाएं सोवि ॥१०॥ चतुर्गतिदुःखैः तप्तानां, यः परमात्मा कश्चित् । चतुर्गतिदुःखविनाशकः, कथय प्रसादेन सोपि ॥ १०॥ , कभी इतनी वस्तुओंकी भी प्राप्ति होजावे तो भी श्रेष्ठवुद्धि, श्रेष्ठ धर्मश्रवण, धर्मका ग्रहण, धारण, श्रद्धान, संयम, विषयसुखोंसे निवृत्ति, क्रोधादिकपायका अभाव-इनका होना अत्यंत दुर्लभ है और इन सवोंसे उत्कृष्ट शुद्धात्मभावनारूप वीतरागनिर्विकल्पसमाधिका होना बहुत मुश्किल है क्योंकि उस समाधिके शत्रु जो मिथ्यात विषय कपाय आदिक विभाव परिणाम हैं उनकी प्रबलता है। इसीलिये सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रकी प्राप्ति नही होती। और इनका पाना ही बोधि है, उस बोधिका जो निर्विपयपनेसे धारण वही समाधि है। इसतरह बोधि समाधिका लक्षण सवजगह जानना चाहिये । इस बोधि समाधिका मुझमें अभाव है। इसीलिये संसारसमुद्र में भटकते हुए मैंने वीतराग परमानंद सुख नही पाया किंतु उस सुखसे विपरीत ( उल्टा ) आकुलताके उत्पन्न करनेवाला नानाप्रकारका शरीरका तथा मनका दुःख ही चारों गतिओंमें भ्रमणकरते हुए पाया । इस संसारसागरमें भ्रमणकरते मनुष्यदेह आदिका पाना बहुत दुर्लभ है परंतु उसको पाकर कभी प्रमादी (आलसी) नहीं होना चाहिये। जो प्रमादी हो जाते हैं वे संसाररूपी वनमें अनंतकाल भटकते हैं। ऐसा ही दूसरे ग्रंथोंमें भी कहा है-"इत्यतिदुर्लभरूपां" इत्यादि । उसका अभिप्राय ऐसा है कि यह महान दुर्लभ जो जैनशास्त्रका ज्ञान है उसको पाके जो जीव प्रमादी होजाता है वह रंक पुरुष बहुतकालतक संसाररूपी भयानक वनमें भटकता है। सारांश यह हुआ कि वीतराग परमानंद सुखके न मिलनेसे यह जीव संसाररूपी वनमें भटक रहा है इसलिये वीतराग परमानंदसुख ही आदर करने योग्य है ॥ ९॥ आगे जिस परमात्मखभावके अलाभमें यह जीव अनादिकालसे भटक रहा था उसी परमात्मप्रकाशः। १९ चउगइदुक्खहं तत्ताहं जो परमप्पउ कोइ चतुर्गतिदुःखतप्ताना जीवानां यः कश्चिश्चि- दानंदैकस्वभावः परमाला । पुनरपि कथंभूतः । चउगइदुक्खविणासयरु आहारभ- यमैथुनपरिग्रहसंजारूपादिसमस्तविभावरहितानां वीतरागनिर्विकल्पसमाधिबलेन परमासो- त्यसहजानंदैकसुखामृतसंतुष्टानां चतुर्गतिदुःखविनाशकः कहहु पसाएं सोवि हे भगवन् तमेव परमासानं महाप्रसादेन कथयेति । अत्र योसौ परमसमाधिरतानां चतुर्गतिदुःखवि- नाशकः स एव सर्वप्रकारेणोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ १०॥ एवं त्रिविधासप्रतिपादक- प्रथममहाधिकारमध्ये प्रभाकरभट्टविज्ञप्तिकथनमुख्यत्वेन दोहकसूत्रत्रयं गतं । अथ प्रभाकरभट्टविज्ञापनानंतरं श्रीयोगींद्रदेवास्त्रिविधामानं कथयन्ति;- पुण पुण पणविवि पंचगुरु, भावि चित्ति धरेवि । भदृपहायर णिसुणि तुहुं, अप्पा तिविहु कहेवि ॥११॥ पुनः पुनः प्रणम्य पंचगुरून् भावेन चित्ते धृत्वा । भट्टप्रभाकर निशृणु त्वं आत्मानं त्रिविधं कथयामि ॥ ११ ॥ पुण पुण पणविवि पंचगुरु भावि चित्ति धरेवि पुनः पुनः प्रणम्य पंचगुरूनहं । किं कृत्वा । भावेन भक्तिपरिणामेन मनसि धृत्वा पश्चात् भट्टपहायर णिसुणि तुहु अप्पा तिविहु कहेवि हे प्रभाकरभट्ट ! निश्चयेन शृणु त्वं त्रिविधमामानं कथयाम्यहमिति । परमात्मस्वभावका व्याख्यान प्रभाकरभट्ट सुनना चाहता है;-चतुर्गतिदुःखैः] देवगति मनुष्यगति नरकगति तिर्यचगतियोंके दुःखोंसे [तप्तानां ] तप्तायमान (दुःखी ) संसारी जीवोंके [चतुर्गतिदुःखविनाशकः ] चारगतियोंके दुःखोंका विनाशकरनेवाला [ य: कश्चित् ] जो कोई [ परमात्मा] चिदानंद परमात्मा है [तमपि ] उसको [प्रसादेन] कृपाकरके [कथय । हे श्रीगुरू तुम कहौ । भावार्थ-वह चिदानंद शुद्धखभाव पर- मात्मा, आहार भय मैथुन परिग्रहके भेदरूप सज्ञाओंको आदि लेके समस्त विभावोंसे रहित. तथा वीतराग निर्विकल्पसमाधिके बलसे निजखभावकर उत्पन्न हुए परमानंद सुखामृतकर सतुष्ट हुआ है हृदय जिनका ऐसे निकट संसारी जीवोंके चतुर्गतिका भ्रमण दूर करने वाला है, जन्मजरामरणरूप दुःखका नाशक है तथा वह परमात्मा निज खरूप परम समाधिमें लीन महामुनियोको निर्वाणका देनेवाला है वही सवतरह ध्यान करने योग्य है सो ऐसे परमात्माका स्वरूप तुमारे प्रसादसे मै सुनना चाहता हूं। इसलिये कृपाकर आप कही। इसप्रकार प्रभाकरभट्टने श्रीयोगीदेवसे विनती की ॥ १० ॥ इस कथनकी मुख्यतासे तीन दोहा हुए । आगे प्रभाकर भट्टकी विनती सुनकर श्रीयोगीद्रदेव तीनप्रकार आत्माका स्वरूप कहते हैं;-[पुनःपुनः ] वार वार [पंचगुरून् ] पंच परमेष्ठियोंको [प्रणम्य ] नमस्कारकर और [भावेन ] निर्मल भावोंकर [ चित्ते ] मनमें [धृत्वा] धारणकरके ['अहं' ] मै [त्रिविधं ] तीनप्रकारके [आत्मानं ] आत्माको [कथयामि ] २० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । बहिरामांतरालपरमामभेदेन त्रिविधामा भवति । अयं त्रिविधामा यथा त्वया पृष्टो हे प्रभाकरभट्ट तथा भेदाभेदरत्नत्रयभावनाप्रियाः परमालभावनोत्थवीतरागपरमानंदसुधारस- पिपासिता वीतरागनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नसुखामृतविपरीतनारकादिदुःखभयभीता भव्य- वरपुण्डरीका भरतसगररामपांडवश्रेणिकादयोपि वीतरागसर्वज्ञतीर्थकरपरमदेवानां समवस- रणे सपरिवारा भक्तिभरनमितोत्तमांगाः संतः सर्वागमप्रश्नानंतरं सर्वप्रकारोपादेयं शुद्धा- सानं पृच्छंतीति । अत्र त्रिविधामस्वरूपमध्ये शुद्धामस्वरूपमुपादेयमिति भावार्थः ।। ११ ।। अथ त्रिविधालानं ज्ञात्वा बहिरामानं विहाय स्वसंवेदनज्ञानेन परं परमामानं भावय त्वमिति प्रतिपादयति,- अप्पा तिविहु मुणेवि लहु, मूढउ मिल्लहि भाउ । मुणि सण्णाणे णाणमउ, जो परमप्पसहाउ ॥ १२॥ कहता हूं सो [हे प्रभाकर भट्ट ] हे प्रभाकर भट्ट [त्वं] तू [निशृणु] निश्चयकर सुन ॥ भावार्थ-बहिरात्मा अंतरात्मा परमात्माके भेदकर आत्मा तीनतरहका है सो हे प्रभाकर भट्ट जैसे तूने मुझे पूछा है उसीतरहसे भव्योंमें महाश्रेष्ठ भरतचक्रवर्ती सगर- चक्रवर्ती रामचंद्र बलभद्र, पांडव तथा श्रेणिक वगैरः वडे२ राजा जिनके भक्तिभारकर नम्रीभूत मस्तक होगये हैं महाविनयबाले परिवारसहित समोसरणमें आके वीतराग सर्वज्ञ परमदेवसे सर्व आगमका प्रश्नकर उसके वाद सवतरहसे ध्यानकरने योग्य शुद्धात्माका ही खरूप पूछते हुए। उसके उत्तरमें भगवान्ने यही कहा कि आत्मज्ञानके समान दूसरा कोई सार नही है । भरतादि बड़े श्रोताओंमेंसे भरतचक्रवर्तीने श्रीऋषभदेव भगवानको पूछा, सगरचक्रवर्तीने श्रीअजितनाथको, रामचंद्र बलभद्रने देशभूषण कुलभूषण केवलीको तथा सकलभूषण केवलीको, पांडवोंने श्रीनेमिनाथभगवानको और राजा श्रेणिकने श्रीम- हावीरखामीको पूछा । कैसे हैं ये श्रोता कि जिनको निश्चयरत्नत्रय और व्यवहाररत्नत्रयकी भावना प्रिय है, परमात्माकी भावनासे उत्पन्न वीतराग परमानंदरूप अमृतरसकेप्यासे हैं और वीतराग निर्विकल्पसमाधिकर उत्पन्न हुआ जो सुखरूपी अमृत उससे विपरीत जो नारकादि चार गतियोंके दुःख उनसे भयभीत हैं। सो जिसतरह इन भव्यजीवोंने भगवंतसे पूछा और भगवंतने तीनप्रकार आत्माका स्वरूप कहा वैसा ही मै जिनवाणीके अनुसार तुझे कहता हूं। सारांश यह हुआ कि तीनप्रकार आत्माके स्वरूपमेंसे शुद्धात्मस्वरूप जो निज परमात्मा वही ग्रहण करने योग्य है । जो मोक्षका मूलकारण रतत्रय कहा है वह मैने निश्चय व्यवहार दोनों तरह से कहा है उसमें अपने स्वरूपका श्रद्धान, खरूपका ज्ञान और स्वरूपका ही आचरण यह तो निश्चयरत्नत्रय है इसीका दूसरा नाम अभेद भी है। और देवगुरू धर्मकी श्रद्धा, नवतत्त्वोंकी श्रद्धा, आगमका ज्ञान तथा संयमभाव ये व्यवहार- । परमात्मप्रकाशः। २१ आत्मानं त्रिविधं मत्ला लघु मूढं मुंच भावम् । मन्यख खज्ञानेन ज्ञानमयं यं परमात्मस्वभावम् ॥ १२ ॥ अप्पा तिविहु मुणेवि लहु मूढउ मेल्लहि भाउ हे प्रभाकरभट्ट आलानं त्रिविधं मत्वा लघु शीघ्रं मूढं बहिरामस्वरूपं भावं परिणाम मुंच मुणि सण्णाणे णाणभउ जो परमप्प सहाउ पश्चात् त्रिविधात्मपरिज्ञानानंतरं मन्यस्व जानीहि । केन करणभूतेन । अंतरात्मलक्षणवीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानेन । के जानीहि । यं परमात्मस्वभावं । रत्नत्रय हैं इसीका नाम भेदरत्नत्रय है। इनमें से भेदरत्नत्रय तो साधन है और अभेदरत्नत्रय साध्य है ॥ ११ ॥ आगे तीनप्रकार आत्माको जानकर बहिरात्मपना छोड़ खसवेदन ज्ञानकर तू परमात्माका ध्यान कर यह कहते हैं-[आत्मानं त्रिविधं ज्ञात्वा ] हे प्रभाकर भट्ट तू आत्माको तीनप्रकारका जानकर [ मूढं भावं ] बहिरात्मखरूप भावको [लघु ] शीघ्र ही [ मुंच ] छोड़ और [ यः] जो [ परमात्मखभावः ] परमात्माका खभाव है उसे [ संज्ञानेन] स्वसंवेदनज्ञानसे अंतरात्मा होता हुआ [ मन्यख ] जान । वह स्वभाव [ ज्ञानमयः ] केवलज्ञानकर परिपूर्ण है ॥ भावार्थ-जो वीतराग सवेदनकर परमात्मा जाना था वही ध्यानकरने योग्य है। यहां शिष्यने प्रश्न किया था जो खसंवेदन अर्थात् अपनेकर अपनेको अनुभवना इसमें वीतराग विशेषण क्यों कहा क्योंकि जो खसंवेदन ज्ञान होवेगा वह तो रागरहित होवैगा ही। इसका समाधान श्रीगुरूने दिया-कि विषयोंके आखादनसेभी उन वस्तुओंके स्वरूपका जानपना होता है परंतु रागभावकर दूषित है इसलिये निजरसका आखाद नहीं है और वीतरागदशामें स्वरूपका यथार्थ ज्ञान होता है आकुलतारहित होता है। तथा खसंवेदनज्ञान प्रथम अवस्थामें चौथे पांचवें गुणस्थान वाले गृहस्थके भी होता है वहांपर सराग देखनेमें आता है इसलिये रागसहित अवस्थाके निषेधकेलिये वीतराग वसवेदनज्ञान ऐसा कहा है । राग भाव है वह कषायरूप है इसकारण जबतक मिथ्याष्टिके अनंतानुबंधीकषाय है तबतक तो बहिरात्मा है उसके तो खसवेदन ज्ञान अर्थात् सम्यक् ज्ञान सर्वथा ही नही है और चतुर्थगुणस्थानमें अवृत सम्यग्दृष्टीके मिथ्यात्व तथा अनंतानुबंधीके अभाव होनेसे सम्यक् ज्ञान तो होगया परंतु कषायकी तीन चौकड़ी वाकी रहनेसे द्वितीयाके चंद्रमाके समान विशेष प्रकाश नहीं होता । और श्रावकके पांचवें गुणस्थानमें दो चौकड़ीका अभाव है इसलिये रागभाव कुछ कम हुआ वीतरागभाव वढ गया इसकारण खसवेदन ज्ञान भी प्रबल हुआ परंतु दो चौकड़ीके रहनेसे मुनिके समान प्रकाश नही हुआ। मुनिके तीन चौकडीका अभाव है इसलिये रागभाव तो निर्बल होगया तथा वीतरागभाव प्रबल हुआ वहापर खसवेदन- ज्ञानका अधिक प्रकाश हुआ परंतु चौथी चौकड़ी वाकी है इसलिये छठे गुणस्थानवाले रायचंगजेनशास्त्रमालायाम् । २२ किंविशिष्टं । ज्ञानमयं केवलज्ञानेन निर्वृत्तमिति । अत्र योसौ स्वसंवेदननानेन परमात्मा ज्ञातः स एवोपादेय इति भावार्थः । स्वसंवेदनजाने वीतरागं विशेषणं किमर्थमिति पूर्वपक्षः, परिहारमाह-विषयानुभवरूपस्वसंवेदनज्ञानं सरागमपि दृश्यते तनिषेधार्थ- मित्यभिप्रायः ॥ १२॥ अथ त्रिविधात्मसंज्ञां वहिरात्मलक्षणं च कथयति;- मूड वियक्खणु वंभु पर, अप्पा तिविहु हवेइ । देहु जि अप्पा जो मुणइ, सो जणु मूड हवेइ ॥ १३ ॥ मूढो विचक्षणो ब्रह्मा परः आत्मा त्रिविधो भवति । देहमेव आत्मानं यो मनुते स जनो मूढो भवति ॥ १३ ॥ मुनि सरागसंयमी हैं वीतरागसंयमीकासा प्रकाश नहीं है । सातवें गुणस्थानमें चौथी चौकड़ी मंद हो जाती है वहांपर आहारविहार क्रिया नहीं होती ध्यानमें आरूढ रहते है, सांतवेंसे छठे गुणस्थानमें आवे वहापर आहारादि क्रिया है इसीप्रकार छठा सातवां करते रहते हैं वहांपर अंतर्मुहूर्तकाल है । आठवे गुणस्थानमें चौथी चौकड़ी अत्यंतमंद होजाती है वहां रागभावकी अत्यंत क्षीणता होती है, वीतराग भाव पुष्ट होता है, खसवेदनज्ञानका विशेष प्रकाश होता है श्रेणी मांडनेसे शुक्लध्यान उत्पन्न होता है। श्रेणीके दो भेद हैं एक क्षपक दूसरी उपशम, क्षपकश्रेणीवाले तो उसी भवमें केवलज्ञान पाकर मुक्त होजाते हैं और उपशमवाले आठवें नवमें दशवेसे ग्यारवां स्पर्शकर पीछे पड़ जाते हैं सो कुछ एक भव भी धारण करते हैं तथा क्षपकवाले आठवेंसे नवमे गुणस्थानमें प्राप्त होते हैं वहां कषायोंका सर्वथा नाश होता है एक संज्वलन लोभ रह जाताहै अन्य सवका अभाव होनेसे वीतराग भाव अति प्रवल होजाता है इसलिये स्त्रसंवेदनज्ञानका बहुत ज्यादा प्रकाश होता है परंतु एक सज्वलनलोम वाकी रहनेसे वहां सरागचारित्र ही कहा जाता है । दशवें गुण- स्थानमें सूक्ष्म लोभभी नहीं रहता तव मोहकी अट्ठाईस प्रकृतियोंके जानेसे वीतरागचारित्र की सिद्धि हो जाती है । दशवेसे वारवेंमें जाते हैं ग्यारवें गुणस्थानका स्पर्श नहीं करते वहां निर्मोह वीतरागीके शुक्लध्यानका दूसरा पाया ( भेद ) प्रगट होता है यथाख्यात चारित्र होनाता है। वारवेंके अंतमें ज्ञानावरण दर्शनावरण अंतराय इन तीनोंका भी विनाश कर डाला मोहका नाश पहले हो ही चुका था तब चारों घातियाकमोंके जानेसे तेरवें गुणस्थानमें केवलज्ञान प्रगट होता है वहां पर ही शुद्ध परमात्मा होता है अर्थात् उसके ज्ञानका पूर्ण प्रकाश होनाता है निःकषाय है । चौथे गुणस्थानसे लेकर बारवें गुणस्थानतक तो अंतरात्मा है उसके गुणस्थान प्रति चढती हुई शुद्धता है और पूर्णशुद्धता परमात्माके है यह सारांश समझना ।। १२ ॥ 5 परमात्मप्रकाशः। २३ मूड वियक्खणु वंभु परु अप्पा तिविहु हवेइ मूढो मिथ्यात्वरागादिपरिणतो बहि- रात्मा, विचक्षणो वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानपरिणतोऽन्तरात्मा, ब्रह्मा शुद्धबुद्धकस्व- भावः परमात्मा । शुद्धबुद्धस्वभावलक्षणं कथ्यते -शुद्धो रागादिरहितो बुद्धोऽनंतज्ञानादि- चतुष्टयसहित इति शुद्धबुद्धस्वभावलक्षणं सर्वत्र ज्ञातव्यं । स च कथंभूतः ब्रह्मा । परमो भावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्मरहितः । एवमात्मा त्रिविधो भवति । देहु जि अप्पा जो मुणइ सो जणु मूहु हवेइ वीतरागनिर्विकल्पसमाधिसंजातसदानंदैकसुखामृतस्वभावमलभमानः सन् देहमेवात्मानं यो मनुते जानाति स जनो लोको मूढात्मा भवति इति । अत्र बहिरात्मा हेयस्तदपेक्षया यद्यप्यंतरात्मोपादेयस्तथापि सर्वप्रकारोपादेयभूतपरमात्मापेक्षया स हेय इति तात्पर्यार्थः : ॥ १३ ॥ अथ परमसमाधिस्थितः सन् देहविभिन्नं ज्ञानमयं परमात्मानं योसौ जानाति स्रोत- रात्मा भवतीति निरूपयति, देहविभण्णउ णाणमउ, जो परमप्पु णिएइ । परमसमाहिपरिट्ठियउ पंडिउ सो जि हवेइ ॥ १४ ॥ देहविभिन्नं ज्ञानमयं यः परमात्मानं जानाति । परमसमाधिपरिस्थितः पण्डितः स एव भवति ।। १४ ।। देहविभिण्णउ णाणमउ जो परमप्पु णिएइ अनुपचरितासद्भूतव्यवहारनयेन देहा- आगे तीनप्रकार आत्माके भेद तथा उनमेंसे प्रथम बहिरात्माका लक्षण कहते हैं [ मूढः] मिथ्यात्वरागादिरूप परिणत हुआ बहिरात्मा, [विचक्षणः ] वीतरागनिर्विकल्प खसवेदनज्ञानरूप परिणमन करता हुआ अंतरात्मा [ ब्रह्मपरः ] और शुद्धबुद्ध खभाव परमात्मा अर्थात् रागादिरहित अनंतज्ञानादिसहित, भावद्रव्य कर्म, नोकर्म रहित आत्मा इसप्रकार [ आत्मा ] आत्मा [ त्रिविधो भवति ] तीन तरह का है अर्थात् बहिरात्मा अंतरात्मा परमात्मा ये तीन भेद हैं। इनमेंसे [ यः] जो [ देहमेव ] देहको ही [आत्मानं ] आत्मा [ मनुते ] मानता है [ स जनः ] वह प्राणी [ मूढः ] बहिरात्मा [ हवेइ ] है अर्थात् बहिर्मुख मिथ्यादृष्टी है । भावार्थ-जो देहको आत्मा समझता है वह वीतराग निर्विकल्प समाधिसे उत्पन्न हुए परमानंद सुखामृतको नही पाता हुआ मूर्ख है अज्ञानी है । इन तीनप्रकारके आत्माओंमेंसे बहिरात्मा तो त्याज्य ही है आदर योग्य नहीं है, इसकी अपेक्षा यद्यपि अंतरात्मा अर्थात् सम्यग्दृष्टी वह उपादेय है तो भी सवतरहसे उपादेय (ग्रहण करने योग्य ) जो परमात्मा उसकी अपेक्षा वह अंतरात्मा हेय ही है, शुद्ध परमात्मा ही ध्यानकरने योग्य है । ऐसा जानना ॥ १३ ॥ आगे परमसमाधिमें स्थित, देहसे भिन्न ज्ञानमयी ( उपयोगमयी) आत्माको जानता है , , . रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । दमिन्नं निश्चयनयेन भिन्नं ज्ञानमयं केवलजानेन निवृत्तं परमात्मानं योसौ जानाति परम- समाहिपरिहियउ पंडिउ सो जि हवेइ वीतरागनिर्विकल्पसहजानंदेकशुद्वात्मानुभूतिलम- गपरमसमाधिस्थितः सन् पंडितोंतरात्मा विवेकी स एव भवति । "कः पंडितो विवेकी"ति वचनात् इति अंतरात्मा हेयरूपो, योसौ परमात्मा भणितः स एव साक्षादुपादेय इति भावार्थः ॥ १४ ॥ अथ समस्तपरद्रव्यं मुक्त्वा केवलज्ञानमयकर्मरहितशुद्धात्मा येन लन्ध स परमात्मा भवतीति कथयति,- अप्पा लघउ णाणमउ, कम्मविमुक्के जेण। मिल्लिवि सयलुवि व्वुपर, सो पर मुणहि मणेण ॥ १५ ॥ आत्मा लब्धो ज्ञानमयः कर्मविमुक्तेन येन । मुक्त्वा सकलमपि द्रव्यं परं तं परं मन्यख मनसा ॥ १५॥ अप्पा लद्धउ णाणमउ कम्मविमुकें जेण आत्मा लब्धः ग्रामः । किविशिष्टः । ज्ञानमयः केवलजानेन निर्वृत्तः । कथंभूतेन सता । ज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मभावकर्मरहितेन येन । किं कृत्वात्मा लब्धः । मिल्लिवि सयलुवि दव्यु पर सो पर मुणहि मणेण मुक्ता परित्यज्य । किं । परदव्यं देहरागादिकं । कतिसंख्योपेतमपि । समस्तमपि तमित्यंभूतमा- वह अंतरात्मा है ऐसा कहते हैं;-[यः ] जो पुरुष [ परमात्मानं ] परमात्माको [ देहविभिन्नः ] गरीरसे जुदा [ज्ञानमय ] केवलज्ञानकर पूर्ण [जानाति ] जानता [ स एव ] वो ही [ परमसमाधिपरिस्थितः ] परमसमाधिमें तिष्ठता हुआ [पंडितः] अंतरात्मा अर्थात् विवेकी [ भवेत् ] है | भावार्थ-यद्यपि अनुपचरितासद्भूत व्यवहार नयसे अर्थात् इस जीवके परवस्तुका संबंध अनादिकालका मिथ्यारूप होनेसे व्यवहार नयकर देहमयी है तौ भी निश्चयनयकर सर्वथा देहादिकसे भिन्न है और केवल ज्ञानमयी है ऐसा निज शुद्धात्माको वीतरागनिर्विकल्प सहजानंद शुद्धात्माकी अनुभूतिरूप परम- समाधिमें स्थित होता हुआ जानता है वही विवेकी अंतरात्मा कहलाता है । वह परमात्मा ही सर्वथा आराधने योग्य है ऐसा जानना ॥ १४ ॥ आगे सब परद्रव्योंको छोड़कर कर्मरहित होकर जिसने अपना स्वरूप केवल ज्ञानमय पा लिया है वही परमात्मा है ऐसा कहते हैं;-[येन ] जिसने [कर्मविमुक्तेन ] ज्ञानावरणादिकाँको नाशकरके [ सकलमपि परं द्रव्यं ] और सब देहादिक परद्रव्योंको [ मुक्त्वा ] छोड़करके [ज्ञानमयः ] केवलज्ञान मई [आत्मा ] आत्मा [लब्धः ] पाया है [तं ] उसको [ मनसा ] शुद्धमनसे [ परमात्मानं ] परमात्मा [मन्यव ] जान ॥ भावार्थ-जिसने देहादिक समस्त परद्रव्यको छोड़कर ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म परमात्मप्रकाशः। २५ त्मानं परं परमात्मानमिति मन्यस्व जानीहि हे प्रभाकरभट्ट । केन कृत्वा । मायामिथ्या- निदानशल्यत्रयस्वरूपादिसमस्तविभावपरिणामरहितेन मनसेति । अत्रोक्तलक्षणपरमात्मा उपादेयो ज्ञानावरणादिसमस्तविभावरूपं परद्रव्यं तु हेयमिति भावार्थः ॥ १५ ॥ एवं त्रिधात्मप्रतिपादकप्रथममहाधिकारमध्ये संक्षेपेण त्रिविधात्मसूचनमुख्यतया सूत्रपंचकं गतं । तदनंतरं मुक्तिगतकेवलज्ञानादिव्यक्तिरूप सिद्धजीवव्याख्यानमुख्यत्वेन दोहकसूत्रदशकं प्रारभ्यते । तद्यथा । लक्ष्यमलक्ष्येण धृत्वा हरिहरादिविशिष्टपुरुषा यं ध्यायन्ति तं परमात्मानं जानीहीति प्रतिपादयति:- तिहुयणचंदिउ सिद्धिगउ, हरिहर झायहि जो जि । लक्खु अलक्खें धरिवि थिरु, मुणि परमप्पउ सो जि ॥१६॥ त्रिभुवनवन्दितं सिद्धिगतं हरिहरा ध्यायन्ति यमेव । लक्ष्यमलक्ष्येण धृत्वा स्थिरं मन्यख परमात्मानं तमेव ॥ १६ ॥ तिहुयण चंदिउ सिद्धिगउ हरिहर झायहि जो जि त्रिभुवनवंदितं सिद्धिगतं यं केवलज्ञानादिव्यक्तिरूपं परमात्मानं हरिहरहिरण्यगर्भादयो ध्यायति । किंकृत्वा पूर्व । लक्खु अलक्खें धरिवि थिरु लक्ष्यं संकल्परूपं चित्तं अलक्ष्येण वीतरागनिर्विकल्पनि- त्यानंदैकस्वभावपरमात्मरूपेण धृत्वा । कथंभूतं । स्थिरं परीषहोपसगैरक्षुभितं मुणि परम- रागादिक भावकर्म शरीरादि नोकर्म इन तीनोंसे रहित केवलज्ञानमई अपने आत्माका लाभ करलिया है ऐसे आत्माको हे प्रभाकर भट्ट तू माया मिथ्या निदानरूप शल्य वगैरः समस्त विभाव ( विकार ) परिणामोंसे रहित निर्मल चित्तसे परमात्मा जान तथा केवल- ज्ञानादि गुणोंवाला परमात्मा ही ध्यान करने योग्य है और ज्ञानावरणादिरूप सब पर- वस्तु त्यागने योग्य है ऐसा समझना चाहिये ॥ १५ ॥ इसप्रकार जिसमें तीनतरहके आत्माका कथन है ऐसे प्रथम महाधिकारमें त्रिविध आत्माके कथनकी मुख्यतासे तीसरे स्थलमें पांच दोहासूत्र कहे । अब मुक्तिको प्राप्त हुए केवलज्ञानादिरूप सिद्ध परमात्माके व्याख्यानकी मुख्यताकर दश दोहासूत्र कहते हैं। उनमें पांच दोहामें जो हरि हरादिक बड़े पुरुष अपना मन स्थिरकर जिस परमात्माका ध्यान करते हैं उसीका तू भी ध्यान कर यह कहते हैं,- हरिहराः ] इन्द्र नारायण और रुद्र वगैरः बड़े २ पुरुष [ त्रिभुवनवंदितं ] तीन लोककर वंदनीक (त्रैलोक्यनाथ) [सिद्धिगतं ] और केवलज्ञानादि व्यक्तिरूप सिद्धपनेको प्राप्त [ यं एव ] जिस परमा- त्माको ही [ध्यायंति ] ध्यावते हैं [ लक्ष्यं ] अपने मनको [ अलक्ष्ये ] वीतराग निर्विकल्प नित्यानन्द खभाव परमात्मामें [ स्थिरं धृत्वा ] स्थिर करके [ तमेव ] उसीको ४ . रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । २६ प्पउ सो जि तमित्थंभूतं परमात्मानं हे प्रभाकरभट्ट मन्यस्व जानीहि भावयेत्यर्थः । अत्र केवलज्ञानादिव्यक्तिरूपमुक्तिगतपरमात्मसदृशो रागादिरहितः स्वशुद्धात्मा साक्षादुपादेय इति भावार्थः ॥ १६ ॥ संकल्पविकल्पस्वरूपं कथ्यते । तद्यथा-वहिव्यविपयं पुत्रकल- त्रादिचेतनाचेतनरूपे ममेदमिति स्वरूपः संकल्पः, अहं सुखी दुःखीत्यादिचित्तगतो हर्पवि- पादादिपरिणामो विकल्प इति । एवं संकल्पविकल्पलक्षणं सर्वत्र ज्ञातव्यं । अथ नित्यनिरंजनज्ञानमयपरमानंदस्वभावशांतशिवस्वरूपं दर्शयन्नाह;- णिचु णिरंजणु णाणमउ, परमाणंदसहाउ । जो एहउ सो संत सिउ, तासु मुणिजहि भाउ ।। १७ ॥ नित्यो निरंजनो ज्ञानमयः परमानंदखभावः । य इत्थंभूतः स शांतः शिवः तस्य मन्यख भावम् ।। १७ ।। णिच्चु णिरंजणु णाणमउ परमाणंदसहाउ द्रव्याथिकनयेन नियोऽविनश्वरः, रागा- दिकर्ममलरूपांजनरहितत्वान्निरंजनः, केवलज्ञानेन निर्वृत्तत्वात् ज्ञानमयः, शुद्धात्मभावनो- त्थवीतरागानंदपरिणतत्वात्परमानंदस्वभावः जो एहउ सो संत सिउ य इत्थंभूतः स शांतः शिवो भवति हे प्रभाकरभट्ट तासु मुणिजहि भाउ तस्य वीतरागत्वात् शांतस्य परमानंदसुखमयत्वात् शिवस्वरूपस्य त्वं जानीहि भावय । फं भावय । शुद्धबुद्धैकखभा- वमित्यभिप्रायः ॥ १७॥ हे प्रभाकर भट्ट तू [ परमात्मानं ] परमात्मा [ मन्यस्व ] जान चितवनकर । सारांश यह है कि केवलज्ञानादिरूप उस परमात्माके समान रागादिरहित अपने शुद्धात्माको पहचान, वही साक्षात् उपादेय है अन्य सब संकल्प विकल्प त्यागने योग्य हैं ।। अब संकल्प विकल्पका स्वरूप कहते हैं कि जो बाह्यवस्तु पुत्र स्त्री कुटुंब वाधव वगैरः जीव- पदार्थ तथा चांदी सोना रत्न मणिके आभूषण वगैरः अचेतनपदार्थ हैं इन सबको अपने समझै कि मेरे हैं ऐसे ममत्वपरिणामको संकल्प जानना। तथा मै सुखी मैं दुःखी इत्यादि हर्षविषाद परिणाम होना वह विकल्प है । इसप्रकार संकल्प विकल्पका खरूप जानना चाहिये ॥ १६॥ आगे नित्य निरंजन ज्ञानमयी परमानंदखभाव शांत और शिवखरूपपणा वर्णन करते हैं;-[ नित्यः ] द्रव्यार्थिकनयकर अविनाशी [ निरंजनः] रागादिक उपाधिसे रहित अथवा कर्ममलरूपी अंजनसे रहित [ ज्ञानमयः ] केवलज्ञानसे परिपूर्ण और [ परमा- नंदस्वभावः ] शुद्धात्मभावनाकर उत्पन्न हुए वीतराग परमानंदकर परिणत है [ य: इत्थंभूतः ] जो ऐसा है [ सः ] वही [ शांतः शिवः ] शांतरूप और शिवखरूप है [तस्य ] उसी परमात्माका [ भावः ] शुद्ध बुद्धखभाव [जानीहि ] हे प्रभाकर भट्ट तू जान अर्थात् ध्यान कर ॥ १७ ॥ .

.. परमात्मप्रकाशः। २७ पुनश्च किं विशिष्टो भवति;- जो णियभाउ ण परिहरह, जो परभाउ ण लेइ । जाणइ सयळवि णिचु पर, सो सिउ संतु हवेइ ॥ १८ ॥ यो निजभावं न परिहरति यः परभावं न लाति । जानाति सकलमपि नित्यं परं स शिवः शांतो भवति ॥ १८ ॥ यः कर्ता निजभावमनंतज्ञानादिस्वभावं न परिहरति यश्च परभावं कामक्रोधादिरूपमा- सरूपतया न गृहाति । पुनरपि कथंभूतः । जानाति सर्वमपि जगत्रयकालत्रयवर्तिवस्तुस्ख- भावं न केवलं जानाति द्रव्याथिकनयेन नित्य एव अथवा नित्यं सर्वकालमेव जानाति परं नियमेन । स इत्थंभूतः शिवो भवति शान्तश्च भवतीति । किं च अयमेव जीवः मुक्ता- वस्थायां व्यक्तिरूपेण यांतः शिवसंज्ञा लभते संसारावस्थायां तु शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन शक्ति- रूपेणेति । तथा चोक्तं । परमार्थनयाय सदा शिवाय नमोस्तु । पुनश्चोक्तं "शिवं परम- कल्याणं निर्वाणं शांतमक्षयं । प्राप्तं मुक्तिपदं येन स शिवः परिकीर्तित," अन्यः कोप्येको जगत्कर्ता व्यापी सदामुक्तः शांतः शिवोस्तीत्येवं न । अत्रायमेव शांतशिवसंज्ञः शुद्धा- सोपादेय इति भावार्थः ॥ १८ ॥ अथ पूर्वोक्तं निरंजनस्वरूपं सूत्रत्रयेण व्यक्तीकरोति,- जासु ण वण्णु ण गंधु रसु, जासु ण सहु ण फासु। जासु ण जम्मणु मरणु णवि, गाउ णिरंजणु तासु ॥ १९ ॥ जासु ण कोहु ण मोहु मउ, जासु ण माय ण माणु। जासु ण ठाणु ण झाणु जिय, सो जिणिरंजणु जाणि ॥ २०॥ आगे फिर उसी परमात्माका कथन करते हैं;-[य] जो [ निजभावं ] अनंतज्ञा- नादिरूप अपने भावोंको [न परिहरति ] कभी नहीं छोड़ता [य] और जो [ पर- भावं ] कामक्रोधादिरूप परभावोंको [ न लाति ] कभी ग्रहण नहीं करता है [ सकल- मपि] तीनलोक तीनकालकी सब चीजोंको [ परं ] केवल [नित् ] हमेशा [ जानाति ] जानता है [ सः] वही [शिवः] शिवखरूप तथा [शांतः] शांतखरूप [ भवति ] है । भावार्थ-ससार अवस्थामें शुद्धद्रव्यार्थिकनयकर सभी जीव शक्तिरूपसे परमात्मा हैं व्यक्तिरूपसे नही है। ऐसा कथन अन्यग्रंथों में भी कहा है-शिवमित्यादि अर्थात् परमकल्याणरूप निर्वाणरूप महाशांत अविनश्वर ऐसे मुक्तिपदको जिसने पा लिया है वहीं शिव है अन्य कोई, एक जगत्कर्ता सर्वव्यापी सदामुक्त शांत शिवरूप नैयायिकोंका तथा वैशेषिकवगैरसका माना हुआ नही है । यह शुद्धात्मा ही शांत है शिव है उपादेय है।

२८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अस्थि ण पुण्णु ण पाउ जसु, अस्थि ण हरिसु पिसाउ। अत्थि ण एकुवि दोसु जसु, सोजि णिरंजणु भाउ ॥२१॥ तियलं। यस्य न वर्णों न गंधो रसः यस्य न शब्दो न स्पर्शः । यस्य न जन्म मरणं नापि नाम निरंजनस्तस्य ॥ १९ ॥ यस्य न क्रोधो न मोहो मदः यस्य न माया न मानः । यस्य न स्थानं न ध्यानं जीव तमेव निरंजनं जानीहि ॥ २० ॥ अस्ति न पुण्यं न पापं यस्य अस्ति न हों विपादः । अस्ति न एकोपि दोषो यस्य स एव निरंजनो भावः ।। २१ ॥ त्रिकलं । यस्य मुक्तासनः शुक्लकृष्णरक्तपीतनीलरूपपंचप्रकारवर्णों नास्ति सुरभिदुरभिरुपो द्विप्र- कारो गधो नास्ति कटुकतीक्ष्णमधुराम्लकपायरूपः पंचप्रकारो रसो नास्ति भापासका- भाषामकादिभेदमिन्नः शब्दो नास्ति शीतोष्णस्निग्धरूक्षगुरुलघुमृदुकठिनरूपोष्टप्रकार: स्पर्यो नास्ति पुनश्च यस्य जन्म मरणमपि नैवास्ति तस्य चिदानंदैकस्वभावपरमात्मनो निरजन- संज्ञा लभते ॥ पुनश्च किंरूपः स निरंजनः । यस्य न विद्यते । किं किं न विद्यते । क्रोधो मोहो विज्ञानाद्यष्टविधमदभेदो यस्यैव मायामानकपायो यस्यैव नाभिहृदयललाटादि- ध्यानस्थानानि चित्तनिरोधलक्षणध्यानमपि यस्य न तमित्थंभूतं स्वशुद्धासानं हे जीव निरं- जनं जानीहि । ख्यातिपूजालाभदृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षारूपसमस्तविभावपरिणामान त्यक्त्वा स्वशुद्धामानुभूतिलक्षणनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वानुभवेत्यर्थः ।। पुनरपि किंस्वभावः स निरं- आगे पहले कहे हुए निरंननखरूपको तीन दोहासूत्रोंसे प्रगट करते हैं।-[यस] जिस भगवानके [वर्णः ] सफेद काला लाल पीला नीलस्वरूप पाचप्रकार वर्ण [न] नही है [गंधः रसः] सुगंधदुर्गधरूप दो प्रकारकी गंध [न] नही है मधुर आम्ल (खट्टा ) तिक्त कटु कषाय 'क्षार'रूप पांच रस नही हैं [ यस] जिसके [शब्दः न] भाषा अभाषारूप शब्द नहीं है अर्थात् सचित्त अचित्तमिश्ररूप कोई शब्द नही है सात- खर नही है [स्पर्शः न] शीत उष्ण स्निग्ध रूक्ष गुरु लघु मृदु कठिनरूप आठतरहका स्पर्श नही है [यस्य और जिसके [जन्म न] जन्म जरा नही है [मरणं नापि] तथा मरण भी नही है [तस्य ] उसी चिदानंद शुद्धखभावपरमात्माकी [निरंजनं नाम निरंजनसंज्ञा है अर्थात् ऐसे परमात्मा को ही निरंजनदेव कहते हैं । फिर वह निरजन- देव कैसा है-[यस्य ] जिस सिद्ध परमेष्ठीके [क्रोधः न] गुस्सा नही है [मोहः मदः न] मोह तथा कुल जाति वगैरः आठ तरहका अभिमान नही है [यस्य माया न मानः न] जिसके माया व मान कषाय नहीं है और [यस्य ] जिसके [स्थानं न] ध्यानके स्थान नाभि हृदय मस्तक वगैरः नही है [ध्यानं न] चित्तके रोकनेरूप ध्यान परमात्मप्रकाशः। २९ जनः । यस्यास्ति न । किं किं नास्ति । द्रव्यभावरूपं पुण्यपापं च । पुनरपि किं नास्ति । रागरूपो हो द्वेषरूपो विपादश्च । पुनश्च । नास्ति क्षुधाद्यष्टादशदोषेषु मध्ये चैकोपि दोषः स एव शुद्धाला निरंजन इति हे प्रभाकरभट्ट त्वं जानीहि । स्वशुद्धात्मसंवित्तिलक्षणवी- तरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वानुभवेत्यर्थः । किंच । एवंभूतसूत्रत्रयव्याख्यातलक्षणो निरं- जनो ज्ञातव्यो न चान्यः कोपि निरंजनोस्ति परकल्पितः । अत्र सूत्रत्रयेपि विशुद्धज्ञानदर्श- नस्वभावो योसौ निरंजनो व्याख्यातः स एवोपादेय इति भावार्थः ॥ १९॥२०॥२१॥ अथ धारणाध्येययंत्रमंत्रमंडलमुद्रादिकं व्यवहारध्यानविपयं मंत्रवादशास्त्रकथितं यत्त- निदोपपरमात्माराधनाध्याने निषेधयंति,- जासु ण धारणु धेउ णवि, जासु ण जंतु ण मंतु । जासु ण मंडलु मुद्द णवि, सो मुणि देउ अणंतु ॥ २२॥ यस्य न धारणा ध्येयं नापि यस्य न यंत्रो न मन्त्रः। यस्य न मण्डलं मुद्रा नापि तं मन्यख देवमनंतम् ॥ २२ ॥ यस्य परमात्मनो नास्ति न विद्यते । किं कि । कुंभकरेचकपूरकसंज्ञा वायुधारणादिक प्रतिमादिकं ध्येयमिति । पुनरपि किं तस्य । अक्षररचनाविन्यासरूपस्तंभनमोहनादिविषयं नही है अर्थात् जब चित्त ही नहीं है तो रोकना किसका हो । स एव ] ऐसे निजशु- द्धात्माको हे जीव तू जान ॥ सारांश यह हुआ कि अपनी प्रसिद्धता (वडाई) महिमा अपूर्व वस्तुका मिलना और देखे सुने भोग इनकी इच्छारूप सब विभावपरिणामोंको छोड़कर अपने शुद्धात्माकी अनुभूतिखरूप निर्विकल्पसमाधिमें ठहरकर उस शुद्धामाका अनुभवकर ।। पुनः वह निरंजन कैसा है--[ यस ] जिसके [पुण्यं न पापं न अस्ति ] द्रव्यभावरूप पुन्य नही तथा पाप नही है [ हर्पः विषादः न ] राग द्वेषरूप खुशी व रंज नही हैं [ यस्य] और जिसके [एकः अपि दोपः ] शुधा (भूख ) वगैरः दोषों में से एक भी दोष नही है [ स एव । वही शुद्धात्मा [निरंजनः] निरंजन है ऐसा तू [ भावय ] जान ॥ भावार्थ-ऐसे निज शुद्धात्माके परिज्ञानरूप वीतरागनिर्विकल्प- समाधिमें स्थित होकर तू अनुभव कर । इसप्रकार तीनदोहाओंगे जिसका खररूप कहा- गया है उसे ही निरंजन जानो अन्य कोई भी परकल्पित निरंजन नहीं है। इन तीनों दोहाओंमें जो निर्मल ज्ञान दर्शनखभाववाला निरंजन कहा गया है वही उपादेय है ।। १९।२०।२१ ॥ आगे धारणा ध्येय यंत्र मंत्र मंडल मुद्रा आदिक व्यवहारध्यानके विषय मंत्रवाद शास्त्रमें कहे गये हैं उन सबका निर्दोषपरमात्माकी आराधनारूप ध्यानमें निषेध किया है;-[यस्य ] जिस परमात्माके [धारणा न ] कुंभक पूरक रेचक नामवाली वायु- h the रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । ३० यंत्रस्वरूपं विविधाक्षरोचारणरूपं मंत्रस्वरूपं च अपमंडलवायुमंडलपृथ्वीमंडलादिकं गाम- डमुद्राज्ञानमुद्रादिकं च यस्य नास्ति तं परमात्मानं देवमाराध्यं द्रव्यार्थिकनयेनाननमवि- नश्वरमनंतज्ञानादिगुणस्वभावं च मन्यस्व जानीहि । अतीन्द्रियसुखास्वादविपरीतस्य जिहे- न्द्रियविषयस्य निर्मोहशुद्धात्मस्वभावप्रतिकूलस्य मोहस्य वीतरागसहजानंदपरमममरनी- भावसुखरसानुभवप्रतिपक्षस्य नवप्रकाराब्रह्मव्रतस्य वीतरागनिर्विकल्पसमाधिपातस्य मनो- गतसंकल्पविकल्पजालस्य च विजयं कृत्वा प्रभाकरभट्ट शुद्धात्मानमनुभवेत्यर्थः । तथा चोक्तं । "अक्खाणरसणी कम्माण मोहणी तह वयाण वंभं च । गुत्तीमु य मणगुत्ती चउरो दुक्खेहिं सिझंति" ॥ २२ ॥ अथ वेदशास्त्रेन्द्रियादिपरदन्यालंबनाविपयं च वीतरागनिर्विकल्पसमाधिविपयं च पर- मात्मानं प्रतिपादयंति, बेयहि सत्यहिं इंदिहि, जो जिय मुणहु ण जाइ। णिम्मलझाणहं जो विसउ, सो परमप्पु अणाइ ॥ २३ ॥ वेदैः शास्त्रैरिन्द्रियैः यो जीव मंतुं न याति । निर्मलध्यानस्य यो विषयः स परमात्मा अनादिः ।। २३ ।। वेदशास्त्रेन्द्रियैः कृत्वा योसौ मंतुं ज्ञातुं न याति । पुनश्च कथंभूतो यः । मिथ्यान्वा- धारणादिक नही है [ध्येयं नापि] प्रतिमा वगैरः ध्यानकरने योग्य पदार्थ भी नहीं है [यस्य ] जिसके [यंत्रं न] अक्षरोंकी रचनारूप स्तंभन मोहनादि विपयक यंत्र नहीं [मंत्रः न] अनेकतरहके अक्षरोंके बोलनेरूप मंत्र नहीं है [ यस] और जिसके [मंडलं न] जलमंडल वायुमंडल अग्निमंडल पृथ्वीमंडलादिक पवनके भेद नहीं हैं मुद्रा न] गारुडमुद्रा ज्ञानमुद्रा वगैरः मुद्रा नहीं हैं [तं] उसे [अनंत] द्रव्यार्थिक- नयसे अविनाशी तथा अनंतज्ञानादिगुणरूप [देवं मन्यस्ख] परमात्मादेव जानो । भावार्थ-अतीद्रिय आत्मीकसुखके आस्वादसे विपरीत जिह्वाइंद्रीके विपय (रस) को जीतके निर्मोह शुद्धस्वभावसे विपरीत मोहभावको छोड़कर और वीतराग सहज आनंद परम समरसीभाव सुखरूपी रसके अनुभव का शत्रु जो नौ तरहका कुशील उसको तथा निर्विकल्पसमाधिके घातक मनके संकल्प विकल्पोंको त्यागकर हे प्रभाकर भट्ट तू शुद्धात्माका अनुभव कर । ऐसा ही दूसरी जगह भी कहा है-"अक्खाणेति" इसका आशय इसतरह है कि इंद्रियोंमें जीभ प्रबल होती है ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंमें मोह कर्म बलवान् होता है पांच महाव्रतोंमें ब्रह्मचर्य व्रत प्रबल है और तीन गुप्तियोंमेंसे मनो- गुप्ति पालना कठिन है । ये चार वातें मुश्किलसे सिद्ध होती हैं ।। २२ ॥ आगे वेद शास्त्र इंद्रियादि परद्रव्योंके अगोचर और वीतरागनिर्विकल्प समाधिके गोचर (प्रत्यक्ष ) ऐसे परमात्माका खरूप कहते हैं,-[ वेदैः] केवली की दिव्य . .

परमात्मप्रकाशः। ३१ विरतिप्रमादकपाययोगाभिधानपंचप्रत्ययरहितस्य निर्मलस्य स्वशुद्धात्मसंवित्तिसंजातनित्या- नंदैकसुखामृतास्वादपरिणतस्य ध्यानस्य विपयः । पुनरपि कथंभूतो यः । अनादिः स पर- मात्मा भवतीति हे जीव जानीहि । तथा चोक्तं । “अन्यथा वेदपांडित्यं शास्त्रपांडित्यम- न्यथा । अन्यथा परमं तत्त्वं लोकाः क्लिश्यंति चान्यथा" । अत्रार्थभूत एव शुद्धात्मोपादे- यो अन्यद्धेयमिति भावार्थः ।। २३ ।। अथ योसौ वेदादिविपयो न भवति परमात्मा समाधिविपयो भवति पुनरपि तस्यैव स्वरूपं व्यक्तिं करोति,--- केवलदसणणाणमउ, केवलसुक्खसहाउ । केवलवीरिउ सो मुणहिं, जो जि परावर भाउ ॥ २४ ॥ केवलदर्शनज्ञानमयः केवलसुखस्वभावः । केवलवीर्यरतं मन्यस्व य एव परापरो भावः ॥ २४ ॥ केवलोसहायः ज्ञानदर्शनाभ्यां निवृत्तः केवलदर्शनज्ञानमयः केवलानंदसुखस्वभावः केव- वाणीकरके [शास्त्रैः] महा मुनियोके वचनोंसे तथा [ इंद्रियैः] इंद्रिय और मनसे भी [य] जो शुद्धात्मा [मंतुं] जाना [न याति ] नही जाता है अर्थात् वेद शास्त्र ये दोनों शब्द अर्थ खरूप हैं आत्मा शब्दातीत है तथा इंद्रिय मन विकल्परूप हैं और मूर्तीक पदार्थको जानते हैं वह आत्मा निर्विकल्प है अमूर्तीक है इसलिये इन तीनोंसे नही जानसकते । [य] जो आत्मा [निर्मलध्यानस्य ] निर्मलध्यानके [विषयः ] गम्य है [सः ] वही [अनादिः] आदि अंत रहित [ परमात्मा] परमात्मा है अर्थात् मिथ्यात्व अवृत प्रमाद कपाय योग इन पांचतरह आस्रवोंसे रहित निर्मल निज शुद्धा- माके ज्ञानकर उत्पन्न हुए नित्यानंद सुखामृतका आखाद उस खरूप परिणत निर्विकल्प अपने खरूपके ध्यानकर खरूप की प्राप्ति है । आत्मा ध्यानगम्य ही है शास्त्रगम्य नहीं है क्योंकि जिनको शास्त्र सुननेसे ध्यानकी सिद्धि हो जावे वो ही आत्माका अनुभव करसकते हैं जिन्होंने पाया उन्होंने ध्यानसे ही पाया है और शास्त्र सुनना तो ध्यानका उपाय है ऐसा समझकर अनादि अनंत चिद्रूपमें अपना परिणाम लगाओ । दूसरी जगह भी "अन्यथा" इत्यादि कहा है। उसका यह भावार्थ है कि वेद शास्त्र तो अन्य तरह ही हैं नयप्रमाणरूप है तथा ज्ञानकी पंडिताई कुछ और ही है वह आत्मा निर्विकल्प है नय प्रमाण निक्षेपसे रहित है वह परमतत्त्व तो केवल आनंद रूप है और ये लोक अन्य ही मार्गमें लगे हुए है सो वृथा क्लेश कर रहे है । इस जगह अर्थरूप शुद्धात्मा ही उपादेय है अन्य सब त्यागने योग्य है यह सारांश समझना ॥ २३ ॥ आगे कहते हैं कि जो परमात्मा वेद शास्त्र गम्य तथा इन्द्रियगम्य नहीं केवल परमस- " रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । ३२ लानंतवीर्यस्वभाव इति यस्तमात्मानं मन्यख जानीहि । पुनश्च कथंभूतो य एवं । यः परा- परः परेभ्योऽहत्परमेष्ठिभ्यः पर उत्कृष्टो मुक्तिगतः शुद्धात्मा भावः पदार्यः स एव सर्वप्रका- रेणोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ २४ ॥ अथ त्रिभुवनवंदित इत्यादिलक्षणैर्युक्तो योसौ शुद्धात्मा भणितः स लोकाग्रे तिष्ठतीति कथयति,- एयहिं जुत्तउ लक्खणिहिं, जो परुणिकल देउ । सो तहिं णिवसइ परमपइ, जो तइलोयहं सेउ ॥ २५ ॥ एतैर्युक्तो लक्षणैः यः परो निष्कलो देवः । स तत्र निवसति परमपदे यत् त्रैलोक्यस्य सेतुः ॥ २५ ॥ एतैत्रिभुवनवंदितादिलक्षणैः पूर्वोक्तैर्युक्तो यः पुनश्च कथंभूतो यः परः । परमात्मस्व- भावः । पुनरपि किंविशिष्टः । निष्कल: पंचविधशरीररहितः । पुनरपि किंविशिष्टः । देव- स्त्रिभुवनाराध्यः स एव परमपदे मोक्षे निवसति । यत्पदं कथंभूतं । त्रैलोक्यस्यावसान- माधिरूप निर्विकल्पध्यानकर ही गम्य है इसलिये उसीका खरूप फिर कहते हैं;-[यः] जो [केवलदर्शनज्ञानमयः] केवलज्ञान केवलदर्शनमई है अर्थात् जिसके परवस्तुका आश्रय (सहायता) नहीं आप ही सब वातोंमें परिपूर्ण ऐसे ज्ञान दर्शनवाला है [केव- लसुखस्वभावः] जिसका केवलसुख खभाव है और जो [ केवलवीर्यः] अनंतवीर्यवाला है [ स एव ] वही [परापरभावः] उत्कृष्ट अर्हतपरमेष्ठीसे भी अधिक स्वभाववाला सिद्धरूप शुद्धात्मा है [ मन्यख ] ऐसा मानो ॥ भावार्थ-परमात्माके दो भेद हैं एक सकल परमात्मा एक निकल परमात्मा उनमेंसे कल अर्थात् शरीरसहित तो अरहंत भगवान हैं वे साकार हैं और जिनके शरीर नही ऐसे निकल परमात्मा निराकारस्वरूप सिद्धपरमेष्ठी हैं वे सकल परमात्मासे भी उत्तम हैं वही सिद्धरूप शुद्धात्मा ध्यान करने योग्य है ।। २४ ॥ आगे तीन लोककर वंदना करने योग्य पूर्व कहे हुए लक्षणों सहित जो शुद्धात्मा कहा गया है वही लोकके अग्रमें रहता है यह कहते हैं:-[एतैः लक्षणैः ] 'तीन भुवनकर वंदनीक' इत्यादि जो लक्षण कहे थे उन लक्षणोंकर [युक्तः ] सहित [परः] सबसे उत्कृष्ट [निष्कलः] औदारिक वैक्रियिक आहारक तैजस कार्माण ये पांच शरीर जिसके नही हैं अर्थात् निराकार है [देवः] तीन लोककर आराधित जगत का देव है [यः] ऐसा जो परमात्मा सिद्ध है [सः] वही [तत्र परमपदे] उस लोकके शिखर- पर [निवसति] विराजमान है [ यत् ] जो कि [त्रिलोकस्य ] तीनलोकका [सेतुः] शिरोमणि है । भावार्थ-यहांपर जो सिद्ध परमेष्ठीका व्याख्यान किया है उसीके परमात्मप्रकाशः। ३३ मिति । अत्र तदेव मुक्तजीवसदृशं स्वशुद्धात्मखरूपमुपादेयमिति भावार्थः ॥ २५ ॥ एवं त्रिविधात्मकथनप्रथममहाधिकारमध्ये मुक्तिगतसिद्धजीवव्याख्यानमुख्यत्वेन दोहकसूत्र- दशकं गतं । अत ऊर्ध्व प्रक्षेपपंचकर्मतर्भावचतुर्विशतिसूत्रपर्यतं यादृशो व्यक्तिरूपः परमात्मा मुक्ती तिष्ठति तादृशः शुद्धनिश्चयनयेन शक्तिरूपेण तिष्ठतीति कथयति तद्यथा, जेहत णिम्मलु णाणमउ, सिद्धिहि णिवसइ देउ । तेहउ णिवसइ वंभु परु, देहह में करि भेउ ॥ २६ ॥ यादृशो निर्मलो ज्ञानमयः सिद्धौ निवसति देवः । ताशो निवसति ब्रह्मा परः देहे मा कुरु भेदं ॥ २६ ॥ यादशः केवलज्ञानादिव्यक्तिरूपः कार्यसमयसारः निर्मलो भावकर्मद्रन्यकर्मनोकर्ममल- रहित: ज्ञानमय. केवलज्ञानेन निवृत्त: केवकज्ञानांतर्भूतानंतगुणपरिणतः सिद्धो मुक्तो मुक्तौ निवसति तिष्ठति देवः परमाराध्यः तादृशः पूर्वोक्तलक्षणसदृशः निवसति तिष्ठति ब्रह्मा शुद्धबुकस्वभावः परमात्मा पर उत्कृष्टः । क निवसति । देहे । केन । शुद्धद्रव्यार्थि- कनयेन । कथंभूतेन । शक्तिरूपेण हे प्रभाकरभट्ट भेदं माकार्षास्त्वमिति । तथाचोक्तं श्रीकुंदकुंदाचार्यदेवैः मोक्षप्राभृते । "णमिएहिं जं णमिज्जइ झाइज्जइ झाएएहिं अणवरयं । थुव्वंतेहिं थुणिजइ देहत्थं किंपितं मुणहं ।" अन स एव परमात्मोपादेय इति भावार्थः ॥२६॥ समान अपना भी खरूप है वही उपादेय (ध्यान करने योग्य ) है जो सिद्धालय है वह देहालय है अर्थात् जैसा सिद्धलोकमें विराज रहा है वैसाही हंस (आत्मा) इस घट (देह ) में विराजमान है ॥ २५ ॥ इसप्रकार जिसमे तीनतरहके आत्माका कथन है ऐसे प्रथम महाधिकारमें मुक्तिको प्राप्त हुए सिद्धपरमात्माके व्याख्यानकी मुख्यताकर चौथे स्थलमें दश दोहा सूत्र कहे ॥ आगे पंचक्षेपक मिले हुए चौवीस दोहाओंमें जैसा प्रगटरूप परमात्मा मुक्तिमें है वैसा ही शुद्धनिश्चयनयकर देहमे भी शक्तिरूप है ऐसा कहते हैं,-[यादृशः] जैसा केवल ज्ञानादि प्रगटस्वरूप कार्यसमयसार [ निर्मलः ] उपाधिरहित द्रव्यकर्मभावकर्मनोकर्मरूप मलसे रहित [ज्ञानमयः ] केवल ज्ञानादि अनंत गुणरूप सिद्ध परमेष्ठी [देवः] देवा- धिदेव परम आराध्य [सिद्धौ ] मुक्तिमें [निवसति] रहता है [ तादृशः ] वैसा ही सब लक्षणोंसहित [परं ब्रह्म] पर ब्रह्म शुद्ध बुद्धखभाव परमात्मा उत्कृष्ट शुद्धद्रव्यार्थिक- नयकर शक्तिरूप परमात्मा [ देहे ] शरीरमें [निवसति ] तिष्ठता है इसलिये हे प्रमा- करभट्ट तू [ भेदं ] सिद्ध भगवानमे और अपने में भेद [मा कार्षीः] मत करै । ऐसा ही मोक्ष पाहुडमें श्रीकुंदकुंदाचार्यने भी कहा है "णमिएहि" इत्यादि-इसका यह

रायचंद्रजैनशासमालायाम् ।
अथ येन शुद्धामना खसंवेदनज्ञानचक्षुपावलोकितेन पूर्वकृतकर्माणि नश्यति तं किं न
जानासि त्वं हे योगिन्निति कथयंति,
में दिहि तुझंति लहु, कम्मई पुष्वकियाई।
सो पर जाणहिं जोइया, देहि वसंतु ण काई ॥२७॥
येन दृष्टेन त्रुट्यंति लघु कर्माणि पूर्वकृतानि ।
तं परं जानासि योगिन् देहे वसंतं न किम् ॥ २७ ।।
में दिहिं तुईति लहु कम्मई पुव्वकियाई येन परमासना दृष्टेन सदानंदैकरूपवीन-
रागनिर्विकल्पसमाधिलक्षणनिर्मललोचनेनावलोकितेन त्रुट्यंति शतचूर्णानि भवंति लघु शीनं
अंतर्मुहूर्तेन । कानि । परमात्मनः प्रतिबंधकानि स्वसंवेद्यभावोपार्जितानि पूर्वकृतकर्माणि
सी पर जाणहि जोइया देहि वसंतु ण काई तं नित्यानंदैकस्वभावं स्वात्मानं परमोत्कृष्टं
किं न जानासि हे योगिन् । कथंभूतमपि । स्वदेहे वसंतमपीति । अत्र स एवोपादेय इति
भावार्थः ।। २७॥
अत ऊर्ध्व प्रक्षेपपंचकं कथयति । तद्यथा;-
जित्थुण इंदियसुहदुहइ, जित्थु ण मणवावारु ।
सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ, अण्णु परि अवहारु ॥ २८॥ (क्षे०)
अभिप्राय है कि जो नमस्कारयोग्य महापुरुषोंसे भी नमस्कार करने योग्य है, स्तुतिकरने
योग्य सत्पुरुषोंसे स्तुति किया गया है और ध्यानकरने योग्य आचार्यपरमेष्ठीवगैरहसे भी
ध्यान करने योग्य ऐसा जीव नामा पदार्थ इस देहमें वसता है उसको तू परमात्मा
जान । भावार्थ-वही परमात्मा उपादेय है ॥ २६ ॥
आगे जिस शुद्धात्माको सम्यग्ज्ञान नेत्रसे देखनेकर पहले उपार्जन किये हुए कर्म
नाश होजाते हैं उसे हे योगिन् तू क्यों नहीं पहचानता ऐसा कहते हैं;-[येन] जिस
परमात्माको [दृष्टेन] सदा आनंदरूप वीतराग निर्विकल्प समाधि स्वरूप निर्मल
नेत्रोंकर देखनेसे [लघु ] शीघ्र ही [पूर्वकृतानि ] निर्वाणके रोकनेवाले पूर्व उपार्जित
कर्म [त्रुव्यंति] चूर्ण हो जाते हैं अर्थात् सम्यग्ज्ञानके अभावसे (अज्ञानसे) जो
पहले शुभ अशुभकर्म कमाये थे वे निजखरूपके देखनेसे ही नाश हो जाते हैं [तं]
उस सदानंदरूप परमात्माको [देहे वसंतं] देहमें वसते हुए भी [हे योगिन् ] हे योगी
[किं न जानासि] तू क्यों नही जानता । भावार्थ-जिसके जाननेसे कर्मकलंक
दूर हो जाते हैं वह आत्मा शरीरमें निवास करता हुआ भी देहरूप नही होता उसको
तूं अच्छीतरह पहचान और दूसरे अनेक प्रपंचों (झगड़ों) को तो जानता है
अपने स्वरूपकी तरफ क्यों नही देखता वह निज स्वरूप ही उपादेय है अन्य कोई
नही है ॥ २७ ॥

३ परमात्मप्रकाशः। ३५ यत्र नेन्द्रियसुखदुःखानि यत्र न मनोव्यापारः । तं आत्मानं मन्यख जीव त्वं अन्यत्परमपहर ॥ २८॥ जित्थु ण इंदियसुहदुहइ जित्थु ण मणवावारु यत्र शुद्धामस्वरूपे न संति न विद्यते । कानि । अनाकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसौख्यविपरीतान्याकुलत्वोत्पादकानीन्द्रियसुख- दुःखानि यत्र च निर्विकल्पपरमात्मनो विलक्षणः संकल्पविकल्परूपो मनोव्यापारो नास्ति सो अप्पा मुणि जीव तुहुं अण्णु परि अवहारु तं पूर्वोक्तलक्षणं स्वशुद्धात्मानं मन्यस्व नित्यानंदैकरूपं वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा जानीहि हे जीव त्वं, अन्यत्परमासस्वभावा- द्विपरीतं पंचेन्द्रियविषयस्वरूपादिविभावसमूहं परस्मिन् दूरे सर्वप्रकारेणापहर त्यज, तात्पर र्यार्थः । निर्विकल्पसमाधौ सर्वत्र वीतरागविशेषणं किमर्थ कृतं इति पूर्वपक्षः । परिहार- माह । यत एव हेतोः वीतरागस्तत एव निर्विकल्प इति हेतुहेतुमद्भावज्ञापनार्थ, अथवा ये सरागिणोपि संतो वयं निर्विकल्पसमाधिस्था इति वदंति तन्निषेधार्थ, अथवा श्वेतशंख- वत्स्वरूपविशेपणमिदं इति परिहारत्रयं निर्दोषिपरमालशब्दादिपूर्वपक्षेपि योजनीयं ॥२८॥ अथ यः परमाला व्यवहारेण देहे तिष्ठति निश्चयेन स्वस्वरूपे तमाह,- देहादेहहिं जो वसइ, भेयाभेयणएण । सो अप्पा मुणि जीव तुहुं, किं अण्णे बहुएण ॥ २९ ॥ (क्षे०) -- इससे आगे पांच प्रक्षेपकों द्वारा आत्माही का कथन करते हैं;-[ यत्र ] जिस शुद्ध आत्म खभावमें [इन्द्रियसुखदुःखानि ] आकुलतारहित अतीन्द्रियसुख से विपरीत जो आकुलताके उत्पन्न करनेवाले इंद्रियजनित सुखदुःख [न] नही हैं [ यत्र ] जिसमे [मनोव्यापारः] सकल्पविकल्परूप मनका व्यापार भी [न] नही है अर्थात् विक- ल्परहितपरमात्मासे मनके व्यापार जुदे हैं [तं] उस पूर्वोक्त लक्षणवालेको [हे जीव त्वं] हे जीव तू [आत्मानं] आत्माराम [ मन्यस्ख] मान [अन्यत्परं ] अन्य सब विभावोंको [अपहर] छोड़ ॥ भावार्थ-ज्ञानानंदखरूप निज शुद्धात्माको निर्विकल्प- समाधिमें स्थिर होकर जान अन्य परमात्मस्वभावसे विपरीत पांच इन्द्रियोंके विषयवगैरह सब विकार परिणामोंको दूरसे ही त्याग उनका सर्वथा ही त्याग । यहांपर किसी शिष्यने प्रश्न किया कि निर्विकल्पसमाधिमें सब जगह वीतरागविशेषण क्यों कहा है उसका उत्तर कहते हैं-जहांपर वीतरागता है वहीं निर्विकल्पसमाधिपना इस रहस्यको समझानेकेलिये अथवा जो रागी हुए कहते हैं कि हम निर्विकल्पसमाधिमें स्थित है उनके निषेधकेलिये वीतरागता सहित निर्विकल्पसमाधिका कथन किया गया है, अथवा सफेद शंखकी तरह खरूप प्रगट करनेकेलिये कहा गया है अर्थात् जो शंख होगा वह श्वेत ही होगा उसी- प्रकार जो निर्विकल्पसमाधि होगी वह वीतरागतारूप ही होगी ॥ २८ ॥ .

रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । . in देहादेहयोः यो वसति भेदाभेदनयेन । तमात्मानं मन्यख जीव त्वं किमन्येन बहुना ॥ २९ ॥ देहादेहयोरधिकरणभूतयोर्यों वसति । केन । भेदाभेदनयेन । तथाहि-अनुपचरिता- सद्भूतव्यवहारेणाभेदनयेन स्वपरामनोऽभिन्ने स्वदेहे वसति शुद्धनिश्चयनयेन तु भेदनयेन स्वदेहाद्भिन्ने स्वासनि वसति यः तमामानं मन्यख जानीहि हे जीव नित्यानंदैकवीतराग- निर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा भावयेत्यर्थः । किमन्येन शुद्धामनो भिन्नेन देहरागादिना बहुना। अन योसौ देहे वसन्नपि निश्चयेन देहरूपो न भवति स एव स्वशुद्धालोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ २९॥ अथ जीवाजीवयोरेकत्वं माकार्षीलक्षणभेदेन भेदोस्तीति निरूपयति:- जीवाजीव म एकु करि, लक्खणभेएं भेउ । जो परु सो परु भणमि मुणि, अप्पा अप्पु अभेउ ॥ ३० ॥(क्षे०) जीवाजीवौ मा एकौ कार्षीः लक्षणभेदेन भेदः । यत्परं तत्परं भणामि मन्यख आत्मन आत्मना अभेदः ॥ ३० ॥ हे प्रभाकरभट्ट जीवाजीवावेकौ मा काः । कस्मात् । लक्षणभेदेन भेदोस्ति । तद्यथा-रसादिरहितं शुद्धचैतन्यं जीवलक्षणं । तथा चोक्तं प्राभृते "अरसमरूवमगंधं अठवत्तं चेदणागुणमसई जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिहिट्ठसंठाणं" इत्थंभूतशुद्धामनो भिन्नमजीवलक्षणं । तच्च द्विविधं । जीवसंबंधमजीवसंबंधं च । देहरागादिरूपं जीवसंबंध, आगे यह परमात्मा व्यवहारनयसे तो इस देहमें ठहर रहा है लेकिन निश्चयनयकर अपने खरूपमें ही तिष्ठता है ऐसा आत्माको कहते हैं;-[य] जो [ भेदाभेदनयेन देहादेहयोः वसति ] अनुपचरित असद्भूतव्यबहारनयकर अपनेसे भिन्न जड़रूप देहमें तिष्ठ रहा है और शुद्धनिश्चयनयकर अपने आत्मखभावमें ठहरा हुआ है अर्थात् व्यव- हारनयकर तो देहसे अभेदरूप (तन्मय ) है और निश्चयसे सदाकालसे अत्यंत जुदा है अपने स्वभावमें स्थित है [तं] उसे [हे जीव त्वं] हे जीव तू [आत्मानं] पर- मात्मा [ मन्यस्व ] जान अर्थात् नित्यानंद वीतराग निर्विकल्पसमाधिमें, ठहरके अपने आत्माका ध्यानकर [ अन्येन ] अपनेसे भिन्न [बहुना] देह रागादिकोंसे [किं] तुझे क्या प्रयोजन है । भावार्थ-देहमें रहता हुआ भी निश्चयसे देहखरूप जो नहीं होता वही निज शुद्धात्मा उपादेय है ॥ २९ ॥ आगे जीव और अजीवमें लक्षणके भेदसे भेद है तू दोनोंको एक मत जानें, ऐसा कहते हैं; हे प्रभाकरभट्ट तू [जीपाजीवौ] जीव और अजीवको [एको] एक [मा कार्षीः] मत करे क्योंकि इन दोनों में [ लक्षणभेदेन] लक्षणके भेदसे [ भेदः] , परमात्मप्रकाशः। पुद्गलादिपंचद्रव्यरूपमजीवसंबंधमजीवलक्षणं । अत एव मिन्नं जीवादजीवलक्षणं ततः कारणात् यत्परं रागादिकं तत्परं जानीहि । कथंभूतं । भेद्यमभेद्यमित्यर्थः । अत्र योसौ शुद्धलक्षणसंयुक्तः शुद्धाला स एवोपादेय इति भावार्थः ॥ ३० ॥ अथ तस्य शुद्धामनो ज्ञानमयादिलक्षणं विशेपेण कथयति, अमणु अणिदिउ णाणमउ, मुत्तिविरहिउ चिमित्तु । अप्पा इंदियविसउ णवि, लक्खणु एहु णिरुत्तु ॥ ३१ ॥ (क्षे०) अमनस्कः अनिन्द्रियो ज्ञानमयः मूर्तिविरहितश्चिन्मात्रः । आत्मा इन्द्रियविषयो नापि लक्षणमिदं निरुक्तम् ॥ ३१ ॥ परमासविपरीतमानसविकल्पजालरहितत्वादमनस्कः अतीन्द्रियशुद्धालविपरीतेनेन्द्रियग्रा- भेद है [यत्परं] जो परके सबंधसे उत्पन्न हुए रागादि विभाव ( विकार) हैं [ तत्परं] उनको पर ( अन्य ) [ मन्यस्व ] समझ [च] और [ आत्मनः ] आत्माका [आत्मना अभेदः ] अपनेसे अभेद जान [भणामि] ऐसा भै कहता हूं ॥ भावार्थ-जीव अजीवके लक्षणोंमेंसे जीवका लक्षण शुद्ध चैतन्य है वह स्पर्श रस गंधरूप शब्दादिकसे रहित है। ऐसा ही श्रीसमयसारमें कहा है-"अरस"मित्यादि । इसका सारांश यह है कि जो आत्मद्रव्य है वह मिष्ट वगैरः पांच प्रकारके रसरहित है, श्वेतआदिक पांच तरहके वर्ण- रहित है सुगंध दुर्गध इन दो तरहके गंध जिसमें नही हैं प्रगट (दृष्टिगोचर ) नही है, चैतन्यगुणकरसहित है, शब्दसे रहित है, पुरुषलिंग वगैरः करके ग्रहण नहीं होता अर्थात् लिंगरहित है और जिसका आकार नही दीखता अर्थात् निराकार वस्तु आकार छै प्रकारके हैं--समचतुरस्त्र, न्यग्रोधपरिमंडल, सातिक, कुजक, वामन, हुंडक । इन छह प्रकारके आकारोंसे रहित है ऐसा जो चिद्रूप निजवस्तु है उसे तू पहचान ॥ आत्मासे भिन्न जो अजीव पदार्थ है उसके लक्षण दो तरहसे हैं एक जीवसबंधी दूसरा अजीवसवधी । जो द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्मरूप है वह तो जीवसबंधी है और पुद्गलादि पांचद्रव्यरूप अजीव जीवसबंधी नहीं हैं अजीवसबंधी ही है इसलिये अजीव हैं जीवसे भिन्न हैं इसकारण जीवसे भिन्न अजीवरूप जो पदार्थ है उनको अपने मत समझो । यद्यपि रागादिक विभाव परिणाम जीवमें ही उपजते है इससे जीवके कहे जाते है परंतु, वे कर्मजनित है परपदार्थ (कर्म) के सबंधसे है इसलिये पर ही समझो ।- यहापर जीव अजीव दो पदार्थ कहे गये है उनमेंसे शुद्ध चेतना लक्षणका धारण करनेवाला शुद्धात्मा ही ध्यान करने योग्य है यह सारांश हुआ ॥ ३०॥ आगे शुद्धात्माके ज्ञानादिक लक्षणोंको विशेषपनेसे कहते हैं;-[आत्मा] यह शुद्ध आत्मा [अमनाः] परमात्मासे विपरीत विकल्पजालमयी मनसे रहित है [अतीन्द्रियः] रायचंद्रजैनशासमालायाम् । ३८ मेण रहितत्वादतीन्द्रियो लोकालोकप्रकाशककेवलज्ञानेन निवृत्तत्वात् ज्ञानमयः अमूर्तामवि- परीतलक्षणया स्पर्शरसगंधवर्णवत्या मूर्त्या वजितत्वान्मूर्तिविरहितः अन्यद्रव्यासाधारणया शुद्धचेतनया निष्पन्नत्वाञ्चिन्मात्रः । कोसौ । आमा । पुनश्च किंविशिष्टः । वीतरागस्वसंवेद- नज्ञानेन प्रायोपीन्द्रियाणामविषयश्च लक्षणमिदं निरुक्तं निश्चितमिति । अत्रोक्तलक्षणपरमा- सोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ ३१॥ अथ संसारशरीरभोगनिर्विण्णो भूत्वा यः शुद्धात्मानं ध्यायति तस्य संसारवल्ली नश्य- तीति कथयति,- भवतणुभोयविरत्तमणु, जो अप्पा झाएइ । तासु गुरुक्की वेल्लडी, संसारिणि तुट्टेइ ।। ३२ ॥ (क्षे०) भवतनुभोगविरक्तमना य आत्मानं ध्यायति । तस्य गुर्वी वल्ली सांसारिकी त्रुट्यति ॥ ३२ ॥ भवतनुभोगेषु रंजितं मूर्छितं वासितमासक्तं चित्तं स्वसंवित्तिसमुत्पन्नवीतरागपरमानंदसु- खरसाखादेन व्यावृत्य स्वशुद्धात्मसुखे रतत्वात्संसारशरीरभोगविरक्तमनाः सन् यः शुद्धा- त्मानं ध्यायति तस्य गुरुक्की महती संसारवल्ली त्रुट्यति नश्यति शतचूर्णा भवतीति । अत्र येन परमात्मध्यानेन संसारवल्ली विनश्यति स एव परमात्मोपादेयो भावनीयनेति तात्प- र्थिः ॥ ३२ ॥ इति चतुर्विंशतिसूत्रमध्ये प्रक्षेपकपंचकं गतं । शुद्धात्मासे भिन्न इन्द्रियसमूहसे रहित है [ज्ञानमयः] लोक और अलोकके प्रकाशने- वाले केवलज्ञानखरूप है [ मूर्तिविरहितः] अमूर्तीक आत्मासे विपरीत स्पर्शरसगंध- वर्णवाली मूर्तिरहित है [चिन्मात्रः] अन्य द्रव्योंमें नहीं पाई जावे ऐसी शुद्धचेतना- खरूप ही है और [इन्द्रियविषयः नैव ] इन्द्रियोंके गोचर नही है वीतरागखसंवेदनकर ही ग्रहण किया जाता है [ इदं लक्षणं] ये लक्षण जिसके [निरुक्तं ] प्रगट कहे गये हैं । उसको ही तू निःसंदेह आत्मा जान । इस जगह जिसके ये लक्षण कहे गये हैं वही आत्मा है वही उपादेय है आराधने योग्य है यह तात्पर्य निकला ॥ ३१ ॥ आगे जो कोई संसार शरीर भोगोंसे विरक्त होके शुद्धात्माका ध्यान करता है उसीके संसाररूपी वेल नाशको प्राप्त होजाती है यह कहते हैं;-[यः] जो जीव [ भवतनु- भोगविरक्तमनाः] संसार शरीर और भोगोंमें विरक्त मन हुआ [आत्मानं] शुद्धा- माका [ध्यायति ] चितवन करता है [तस्य ] उसकी [गुर्वी] मोटी [वल्ली संसा- रिणी] संसाररूपी वेल [त्रुयति ] नाशको प्राप्त होजाती है । भावार्थ-संसार शरीर- भोगोंमें अत्यंत आसक्त ( लगाहुआ) चित्त है उसको आत्मज्ञानसे उत्पन्न हुए वीतराग- परमानंद मुखामृतके आखादसे रागद्वेषसे हटाकर अपने शुद्धात्मसुखमें अनुरागी कर शरी- .

९
परमात्मप्रकाशः।
तदनंतरं देहदेवगृहे योसौ वसति स एव शुद्धनिश्चयेन परमात्मा तन्निरूपयंति,-
देहादेवलि जो वसइ, देउ अणाइअणंतु ।
केवलणाणफुरंततणु, सो परमप्पु णिभंतु ॥ ३३ ॥
देहदेवालये यः वसति देवः अनाद्यनंतः ।
केवलज्ञानस्फुरिततनुः स परमात्मा निीतः ॥ ३३ ॥
व्यवहारेण देहदेवकुले वसन्नपि निश्चयेन देहाद्भिन्नत्वाद्देहवन्मूर्तः सर्वाशुचिसयो न
भवति । यद्यपि देहो नाराध्यस्तथापि स्वयं परमात्माराध्यो देवः पूज्यः, यद्यपि देह आवंत-
स्तथापि खयं शुद्धद्रव्यार्थिकनयेनानाधनंतः, यद्यपि देहो जडस्तथापि स्वयं लोकालोकप्रका-
शकत्वात्केवलज्ञानस्फुरिततनुः केवलज्ञानप्रकाशरूपशरीर इत्यर्थः । स पूर्वोक्तलक्षणयुक्तः
परमात्मा भवतीति । कथंभूतः । निर्धातः निस्संदेह इति । अत्र योसौ देहे वसन्नपि
सर्वाशुच्यादि देहधर्म न स्पृशति स एव शुद्धात्मोपादेय इति भावार्थः ॥ ३३ ॥
अथ शुद्धात्मविलक्षणे देहे वसन्नपि देहं न स्पृशति देहेन सोपि न स्पृश्यत इति प्रति-
पादयतिः-
देहे वसंतुवि णवि छिवइ, णियमें देहु जि जो जि ।
देहि छिप्पइ जो जि णवि, मुणि परमप्पउ सो जि ॥ ३४ ॥
देहे वसन्नपि नैव स्पृशति, नियमेन देहं अपि यः अपि ।
देहेन स्पृश्यते योपि नैव मन्यख परमात्मानं तमेव ।। ३४ ॥
रादिकमें वैराग्यरूप हुआ जो शुद्धात्माको विचारता है उसका संसार छूट जाता है इस-
लिये जिस परमात्माके ध्यानसे संसाररूपी वेलि दूर हो जाती है वही ध्यान करने योग्य
(उपादेय) है ॥ ३२॥
आगे जो देहरूपी देवालयमें रहता है वही शुद्धनिश्चयनयसे परमात्मा है यह कहते
हैं;-[यः ] जो व्यवहारनयकर [ देहदेवालये ] देहरूपी देवालयमें [वसति ] वसता
है निश्चयनयकर देहसे भिन्न है देहकी तरह मूर्तीक तथा अशुचिमय नही है महा
पवित्र है [देवः ] आराधने योग्य है पूज्य है, देह आराधने योग्य नहीं है [अनाद्य-
नंतः
:] जो परमात्मा आप शुद्धद्रव्यार्थिकनयकर अनादि अनंत है तथा यह देह आदि
अंतकर सहित है [ केवलज्ञानस्फुरिततनुः ] जो आत्मा निश्चयनयकर लोकअलोकको
प्रकाशनेवाले केवलज्ञानस्वरूप है अर्थात् केवलज्ञान ही प्रकाशरूप शरीर है और देह
जड़ है [ सः परमात्मा] वही परमात्मा [निभ्रांतः ] निःसदेह है इसमें कुछ संशय
नहीं समझना । साराश यह है कि जो देहमें रहता है तो भी देहसे जुदा है सर्वाशुचि-
मयी देहको वह देव छूता नही है वही आत्मदेव उपादेय है ॥ ३३ ॥

रायचंद्वजैनशास्त्रमालायाम् । , देहे वसन्नपि नैवं स्पृशति नियमेने देहमपि, देहेन न स्पृश्यते योपि मन्यम्ब जानीहि परमात्मा सोपि । इतो विशेपः–य एव शुद्धात्मानुभूतिविपरीतेन क्रोधमानमायालोभख- रूपादिविभावपरिणामेनोपार्जितेन पूर्वकर्मणा निर्मिते देहे अनुपचरितासद्भूतव्यवहारेण वस- नपि निश्चयेन य एव देहं न स्पृशति, तथाविधदेहेन न स्पृश्यते योपि तं मन्यस्व जानीहि परमात्मानं तमेवं । किंकृत्वा । वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वेति । अत्र य एव शुद्धात्मा- नुभूतिरहितदेहे ममत्वपरिणामेन सहितानां हेयः स एव शुद्धात्मा देहममत्वपरिणामरहिता- नामुपादेय इति भावार्थः ॥ ३४ ॥ अथ यः समभावस्थितानां योगिनां परमानंदं जनयन् कोपि शुद्धात्मा स्फुरति तमाह;- जो समभावपरिहियह, जोइहि कोइ फुरेइ । परमाणंदु जणंतु फुड, सो परमप्पु हवेइ ॥ ३५ ॥ यः समभावपरिस्थितानां योगिनां कश्चित् स्फुरति । परमानंदं जनयन् स्फुटं स परमात्मा भवति ॥ ३५ ॥ यः कोपि परमात्मा जीवितमरणलाभालाभसुखदुःखशत्रुमित्रादिसमभावपरिणतस्वशुद्धा- त्मसम्यश्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपाभेदरत्नत्रयात्मकवीतरागनिर्विकल्पसमाधौ प्रतिष्ठितानां पर- आगे शुद्धात्मासे भिन्न इस देहमें रहता हुआ भी देहको नही स्पर्श करता है और देह भी उसको नही छूती है यह कहते हैं;-[य एव ] जो [ देहे वसन्नपि ] देहमें रहता हुआ भी [ नियमेन ] निश्चयनयकर [ देहमपि ] शरीरको [ नैव स्पृशति ] नहीं स्पर्श करता [देहेन] देहसे [ स अपि] वह भी [नैव स्पृश्यते ] नहीं छुआ जाता अर्थात् न तो जीव देहको स्पर्श करता और न देह जीवको स्पर्श करती [ तमेव ] उसीको [परमात्मानं] परमात्मा [मन्यस्व ] तू जान अर्थात् अपना खरूप ही पर- मात्मा है। भावार्थ-जो शुद्धात्माकी अनुभूतिसे विपरीत क्रोध मान माया लोभरूप विभाव परिणाम हैं उनकर उपार्जन किये शुभ अशुभ कर्मोंकर बनायी हुई देहमें अनुप- चरित असद्भुत व्यवहार नयकर वसता हुआ भी निश्चयकर देहको नहीं छूता उसको तुम परमारमा जानो उसी खरूपको वीतराग निर्विकल्पसमाधिमें तिष्ठकर चिंतवन करो। यह आत्मा जडरूप देहमें व्यवहार नयकर रहता है सो देहात्मबुद्धिवालेको नही मालूम होता है वही शुद्धात्मा देहके ममत्वसे रहित (विवेकी) पुरुषोंके आराधने योग्य है ॥ ३४ ॥ आगे जो योगी समभावमें स्थित है उनको परमानंद उत्पन्न करता हुआ कोई शुद्धात्मा स्फुरायमान है उसका खरूप कहते हैं;-[समभावपरिस्थितानां] समभाव अर्थात् जीवित मरण, लाभ अलाभ, सुख दुध, शत्रु मित्र इत्यादि इन सबमें समभावको परिणत - परमात्मप्रकाश occi मयोगिनां कश्चित् स्फुरति संवित्तिमायाति । किं कुर्वन् । वीतरागपरमानंदं जनयन् स्कुट निश्चितं । तथाचोक्तं । "आत्मानुष्ठाननिष्ठस्य व्यवहारबहिःस्थितेः । जायते परमानंद कश्चिद्योगेन योगिनः॥" हे प्रभाकरभट्ट स एवंभूतः परमात्मा भवतीति । अत्र वीतराग- निर्विकल्पसमाधिरतानां स एवोपादेयः तद्विपरीतानां हेय इति तात्पर्यार्थः ॥ ३५ ॥ अथ शुद्धात्मप्रतिपक्षभूतकर्मदेहप्रतिबद्धोप्यात्मा निश्चयनयेन सकलो न भवतीति ज्ञापयति; कम्मणिबद्धवि जोइया, देहि वसंतुवि जो जि । होइ ण सयलु कयावि फुड, मुणि परमप्पउ सो जि॥३६॥ कर्मनिबद्धोपि योगिन् देहे वसन्नपि य एव । भवति न सकलः कदापि स्फुटं मन्यख परमात्मानं तमेव ॥ ३६ ॥ कर्मनिवद्धोपि हे योगिन् देहे वसन्नपि य एव न भवति सकलः कापि काले स्फुटं मन्यस्व जानीहि परमात्मानं तमेवेति । अतो विशेप:-परमात्मभावनाविपक्षभूतैः राग- द्वेषमोहैः समुपाजितैः कर्मभिरशुद्धनयेन बद्धोपि तथैव देहस्थितोपि निश्चयनयेन सकल: हुए [ योगिनां ] परम योगीश्वरोंके अर्थात् जिनके शत्रु मित्रादि सब समान हैं और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकचारित्ररूप अभेदरलत्रय जिसका खरूप है ऐसी वीतरागनि- विकल्पसमाधिमें तिष्ठे हुए हैं उन योगीश्वरोंके हृदयमें [ परमानंद जनयन्] वीतराग परम आनंदको उत्पन्न करता हुआ [ यः कश्चित् ] जो कोई [ स्फुरति ] स्फुरायमान होता है [ सः स्फुटं] वही प्रकट [ परमात्मा परमात्मा [ भवति ] है ऐसा जानो । ऐसाही दूसरी जगह भी "आत्मानुष्ठान" इत्यादिसे कहा है अर्थात् जो योगी आत्माके अनुभवमें तल्लीन हैं और व्यवहारसे रहित शुद्ध निश्चयमें तिष्ठते हैं उन योगियोंके ध्यान करके अपूर्व परमानंद उत्पन्न होता है । इसलिये हे प्रभाकरभट्ट जो आत्मखरूप योगीश्वरों के हृदयमें स्फुरायमान है वही उपादेय है । जो योगी वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें लगे हुए हैं संसारसे परान्मुख हैं उन्हीके वह आत्मा उपादेय है और जो देहात्मवुद्धि विषयासक्त हैं वे अपने स्वरूपको नही जानते हैं उनके आत्मरुचि नही होसकती यह तात्पर्य हुआ ॥ ३५॥ आगे शुद्धात्मासे जुदे कर्म और शरीर इन दोनोंकर अनादिका बंधा हुआ यह आत्मा है तौभी निश्चयनयकर शरीरखरूप नही है यह कहते हैं;-[योगिन् ] हे योगी [योपि ] जो यह आत्मा [कर्मनिबद्धोपि ] यद्यपि कर्मोंसे बंधा है [देहे वसन्नपि] और देहमें रहता भी है [कदापि ] परतु कभी [सकलः न भवति ] देहरूप नहीं होता [ तमेव ] उसीको तू [ परमात्मानं ] परमात्मा [ मन्यख ] जान [ स्फुटं] निश्च- ६ ४२ रायचंदजैनशासमालायाम् । सदेहो न भवति कापि तमेव परमात्मानं हे प्रभाकरभट्ट मन्यस्य जानीहि वीतरागम्यमंत्र- दनज्ञानेन भावयेत्यर्थः । अत्र सदैव परमात्मा वीतरागनिर्विकल्पसमाविरतानामुपादेयो भवत्यन्येषां हेय इति भावार्थः ॥ ३६ ॥ यः परमार्थेन देहकर्मरहितोपि मूढात्मनां मकल इति प्रतिभातीत्येवं निरूपयति. जो परमत्थें णिक्षलुवि, कम्मविभिण्ण जो जि। मूढा सयलु भणंति फुड, मुणि परमप्पड सो जि ॥ ३७॥ यः परमार्थेन निःकलोपि कर्मविमिन्नो य एव । मूढाः सफलं भणंति स्फुटं मन्यत्र परमात्मानं तमेव ॥ ३७ ।। यः परमार्थेन निःकलोपि देहरहितोपि कर्मविभिन्नोपि च एव भेदाभेदरत्नत्रयभावनार- हिता मूढात्मानस्तमात्मानं सकलमिति भणंति स्फुटं निश्चितं हे प्रभाकरभट्ट नमेव परमा- त्मानं मन्यस्व जानीहीति, वीतरागसदानंदैकसमाधौ स्थित्वानुभवेत्यर्थः । अत्र स एव परमात्मा शुद्धात्मसंवित्तिप्रतिपक्षभूतमिथ्यात्वरागादिनिवृत्तिकाले सम्यगुपादेयो भवति तदभावे हेच इति तात्पर्यार्थः ॥ ३७ ॥ अथानंताकागैकनक्षत्रमिव यस्य केवलनाने त्रिभुवनं प्रतिभाति स परमात्मा भवतीति कथयति,- यसे ॥ भावार्थ-परमात्माकी भावनासे विपरीत जो राग द्वेष मोह हैं उनकर यद्यपि व्यवहारनयसे बंधा है और देहमें तिष्ठ रहा है तौभी निश्चयनयसे शरीररूप नहीं है उससे जुदा ही है किसी कालम भी यह जीव जड न तो हुआ न होगा उसे हे प्रभाकर- भट्ट परमात्मा जान निश्चयकर आत्मा ही परमात्मा है उसे तू वीतराग वसवेदनजानकर चितवन कर । सारांश यह है कि यह आत्मा हमेशह वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें लीन साधुओंको तो प्रिय है मूढोको नहीं ।। ३६ ॥ आगे निश्चयनयकर आत्मा देह और कर्मोसे रहित है तौभी मूढो (अज्ञानियों) को शरीरस्वरूप मालूम होता है ऐसा कहते हैं;-[यः] जो आत्मा [ परमार्थेन] निश्चय- नयकर [निकलोपि] गरीररहित है [कर्मविभिन्नोपि] और कर्मोंसे भी जुना है तौभी [मूढाः] निश्चयव्यवहाररनत्रयकी भावनासे विमुख मूढ [ सकलं] शरीरलरूप ही [स्फुट] प्रगटपनेसे [भणति] मानते हैं सो हे प्रभाकरभट्ट [तमेव ] उसीको [परमात्मानं] परमात्मा [ मन्यख ] जान अर्थत् वीतराग सदानंद निर्विकल्पसमाधि रहके अनुभव कर । भावार्थ-वही परमात्मा शुद्धात्माके वैरी मिथ्यात्वरागादिकोंके दूर होनेके समय ज्ञानी जीवोंको उपादेय है और जिनके मिथ्यात्वरागादिक दूर नहीं हुए उनके उपादेय नहीं परवस्तुका ही ग्रहण है ॥ ३७ ॥ [ परमात्मप्रकाशः। ४३ गयणि अणंति जि एक उडु, जेहउ भुअणु विहाइ । मुक्कहं जसु पएविवियउ, सो परमप्पु अणाइ ॥ ३८ ॥ गगने अनंतेपि एकमुडु यथा भुवनं विभाति । मुक्तस्य यस्य पदे बिंबितं स परमात्मा अस्ति ॥ ३८ ॥ गगने अनंतेप्येकनक्षत्रं यथा तथा भुवनं जगत् प्रतिभाति । क प्रतिभाति । मुक्तस्य यस्य पदे केवलज्ञाने बिवितं प्रतिस्फलितं दर्पणे बिंबमिव । स एवंभूतः परमात्मा भव- तीति । अन्न यस्यैव केवलज्ञाने नक्षत्रमेकमिव लोकः प्रतिभाति स एव रागादिसमस्तवि- कल्परहितानामुपादेयो भवतीति भावार्थः ॥ ३८ ॥ अथ योगींद्रबुंदैयों निरवधिज्ञानमयो निर्विकल्पसमाधिकाले ध्येयरूपश्चित्यते तं परमात्मानमाह, जोइयचिंदह णाणमउ, जो झाइजइ झेउ । मोक्खहं कारणि अणवरउ, सो परमप्पउ देउ ॥ ३९ ॥ योगिदैः ज्ञानमयः यो ध्यायते ध्येयः । मोक्षस्य कारणे अनवरतं स परमात्मा देवः ॥ ३९ ॥ योगीबुंदैः शुद्धात्मवीतरागनिर्विकल्पसमाधिरतैः ज्ञानमयः केवलज्ञानेन निर्वृत्तः यः कर्मतापन्नो ध्यायते चिंत्यते ध्येयो ध्येयरूपोपि । किमर्थ ध्यायते । मोक्षकारणे मोक्षनिमित्ते अनवरतं निरंतरं स एव परमात्मा देवः परमाराध्य इति । अत्र य एव परमामा मुनि- दानां ध्येयरूपो भणितः स एव शुद्धात्मसंवित्तिप्रतिपक्षभूतातरौद्रध्यानरहितानामुपादेय इति भावार्थः ।। ३९ ॥ आगे अनते आकाशमें एक नक्षत्रकी तरह जिसके केवलज्ञानमें तीनों लोक भासते हैं वह परमात्मा है ऐसा कहते हैं,-[यथा] जैसे [ अनंतेपि ] अनंत [गगने] आका- शमें [ एकं उडु] एक नक्षत्र [ "तथा"] उसीतरह [ भुवनं ] तीनलोक [ यस्य ] जिसके [पदे] केवलज्ञानमें [विवितं] प्रतिबिंबित हुआ [ विभाति ] दर्पणमें मुखकी तरह भासता है [स] वह [ परमात्मा ] परमात्मा [ अस्ति ] है ॥ भावार्थ-जिसके केवलज्ञानमें एक नक्षत्रकी तरह समस्त लोक अलोक भासते हैं वही परमात्मा रागादि समस्त विकल्पोंसे रहित योगीश्वरोंको उपादेय है ॥ ३८ ॥ आगे अनंतज्ञानमयी परमात्मा योगीश्वरोंकर निर्विकल्पसमाधिकालमें ध्यानकरने योग्य है उसी परमात्माको कहते हैं,-[यः] जो [योगींद्रबुंदैः] योगीश्वरोंकर [मोक्षस्य कारणेन ] मोक्षके निमित्त [अनवरतं ] हमेशा [ज्ञानमयः ] ज्ञानमई [ध्यायते ] चितवन किया जाता है [ सः परमात्मा देवः ] वह परमात्मदेव [ ध्येयः ] आराधने ४४ , .. रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथ योऽयं शुद्धबुद्धैकस्खभावो जीवो ज्ञानावरणादिकर्महेतुं लब्ध्वा प्रसस्थावररूपं जग- जनयति स एव परमात्मा भवति नान्यः कोपि जगत्कर्ता ब्रह्मादिरिति प्रतिपादयति;- जो जिउ हेउ लहेवि विहि, जगु वहुविहउ जणेइ । लिंगत्तयपरिमंडियउ, सो परमप्पु हवेइ ॥४०॥ यो जीवः हेतुं लब्ध्वा विधि जगत् बहुविधं जनयति । लिंगत्रयपरिमंडितः स परमात्मा भवति ॥ ४० ॥ यो जीवः कर्ता हेतुं लब्ध्वा । किं । विधिसंजं ज्ञानावरणादिकर्म पश्चाज्जंगमस्थावररूपं जगज्जनयति स एव लिगत्रयमंडितः सन् परमात्मा भण्यते न चान्यः कोपि जगत्कर्ता हरिहरादिरिति । तद्यथा । योसौ पूर्व बहुधा शुद्धात्मा भणितः स एव शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन शुद्धोपि सन् अनादिसंतानागतज्ञानावरणादिकर्मवंधप्रच्छादितत्वाद्वीतरागनिर्विकल्पसहजा- नंदैकसुखास्वादमलभमानो व्यवहारनयेन त्रसो भवति, स्थावरो भवति, स्त्रीपुंनपुंसको लिंगो भवति तेन कारणेन जगत्कर्ता भण्यते नान्यः कोपि परकल्पितपरमात्मेति । अत्रा- यमेव शुद्धात्मा परमात्मोपलब्धिप्रतिपक्षवेदत्रयोदयजनितं रागादिविकल्पजालं निर्विकल्प- समाधिना यदा विनाशयति तदोपादेयभूतमोक्षसुखसाधकत्वादुपादेय इति भावार्थः ॥४०॥ योग्य है दूसरा कोई नही ॥ भावार्थ-जो परमात्मा मुनियोंको ध्यावने योग्य कहा है वही शुद्धात्मज्ञानके वैरी आर्तरौद्रध्यान कर रहित धर्मध्यानी पुरुषोंको उपादेय है अर्थात् जव आर्तध्यान रौद्रध्यान ये दोनों छूट जाते हैं तभी उसका ध्यान होसकता है ॥ ३९ ॥ आगे जो शुद्धज्ञानखभाव जीव ज्ञानावरणादिकर्मोके कारणसे त्रस स्थावरजन्मरूप जगत को उत्पन्न करता है वही परमात्मा है दूसरे कोई भी ब्रह्मादिक जगत्कर्ता नहीं हैं ऐसा कहते हैं:-[ यः ] जो [ जीवः ] आत्मा [ विधि हेतुं ] ज्ञानावरणादिकर्मरूप कारणोंको [ लब्ध्वा ] पाकर [बहुविधं जगत् ] अनेक प्रकारके जगत्को [जनयति ] पैदा करता अर्थात् कर्मके निमित्तसे त्रस स्थावररूप अनेक जन्म घरता है [लिंगत्रयपरिमंडितः] स्त्रीलिंग पुरुषलिंग नपुंसकलिंग इन तीन चिन्होंकर सहित हुआ [सः] वही [परमात्मा] शुद्धनिश्चयकर परमात्मा [भवति ] है अर्थात् अशुद्धपनेको परिणत हुआ जगतमें भट- कता है इसलिये जगतका कर्ता कहा है और शुद्धपनेरूप परिणत हुआ विभाव (विकार) परिणामोंको हरता है इसलिये हर्ता है । यह जीव ही ज्ञान अज्ञान दशाकर कर्ता हर्ता है और दूसरे कोई भी हरिहरादिक कर्ता हर्ता नही है ॥ भावार्थ-पूर्व जो शुद्धात्मा कहा था वह यद्यपि शुद्धनयकर शुद्ध है तौभी अनादिसे ससारमें ज्ञानावरणादिकर्मबंधकर ढका हुआ वीतराग निर्विकल्पसहजानंद अद्वितीयसुखके खादको न पानेसे व्यवहारनयकर त्रस और स्थावररूप स्त्रीपुरुषनपुंसकलिंगादिसहित होता है इसलिये जगत्कर्ता कहा जाता .

परमात्मप्रकाशः॥
४५
अथ यस्य परमासनः केवलज्ञानप्रकाशमध्ये जगद्वसति जगन्मध्ये सोपि वसति तथापि
तद्रूपो न भवतीति कथयति,
जसु अभंतरि जगु वसइ, जग अभंतरि जो जि।
जगि जि वसंतुवि जगु जि णवि, मुणि परमप्पउ सो जि ॥४१॥
यस्य अभ्यंतरे जगत् वसति जगतोऽभ्यंतरे य एव ।
जगति वसन्नपि जगत् एव नापि मन्यख परमात्मानं तमेव ॥ ११ ॥
यस्य केवलज्ञानस्याभ्यंतरे जगत् त्रिभुवनं ज्ञेयभूतं वसति जगतोऽभ्यंतरे योसौ ज्ञायको
भगवानपि वसति जगति वसन्नेव रूपविषये चक्षुरिव निश्वयनयेन तन्मयो न भवति
मन्यस्व जानीहि हे प्रभाकरभट्ट । तमित्थंभूतं परमात्मानं वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा
भावयेत्यर्थः । अत्र योसौ केवलज्ञानादिव्यक्तिरूपस्य कार्यसमयसारस्य वीतरागस्वसंवेदन-
काले मुक्तिकारणं भवति स एवोपादेय इति भावार्थः ॥ ४१ ॥
अथ देहे वसन्नपि हरिहरादयः परमसमाधेरभावादेव न जानंति स परमाला भवतीति
कथयंति,-
है अन्य कोई भी दूसरोंकर कल्पित परमात्मा नहीं है । यह आत्मा ही परमात्माकी
प्राप्तिके शत्रु तीन वेदों (स्त्रीलिंगादि) कर उत्पन्न हुए रागादि विकल्पजालोंको निर्विक-
ल्पसमाधिसे जिस समय नाश करता है उसी समय उपादेयरूप मोक्षसुखका कारण
होनेसे उपादेय हो जाता है ॥ ४० ॥
आगे जिस परमात्माके केवलज्ञानरूप प्रकाशमें जगत वस रहा है और जगतके मध्यमें
वह ठहर रहा है तौभी वह जगतरूप नहीं है ऐसा कहते हैं। [यस्य ] जिस आत्मा-
रामके [अभ्यंतरे] केवलज्ञानमें [जगत् ] संसार [वसति] वस रहा है अर्थात् प्रति-
बिंबित हो रहा है प्रत्यक्ष भास रहा है [जगदभ्यंतरे ] और जगतमें वह वस रहा है
अर्थात् सबमें व्याप रहा है । वह ज्ञाता है और जगत ज्ञेय है [जगति वसन्नपि ]
संसारमें निवास करताहुआ भी [जगदेव नापि] निश्चयनयकर किसी जगतकी वस्तुसे
तन्मय (उस खरूप) नही होता अर्थात् जैसे रूपी पदार्थको नेत्र देखते हैं तौभी उनसे
जुदे ही रहते हैं इसतरह वह भी सबसे जुदा रहता है [तमेव ] उसीको [परमात्मान]
परमात्मा [मन्यख ] हे प्रभाकरभट्ट तू जान । भावार्थ-जो शुद्ध वुद्ध सर्वव्यापक
सबसे अलिप्त शुद्धात्मा है उसे वीतराग निर्विकल्प समाधिमें स्थिर होकर ध्यान कर । जो
केवलज्ञानादिव्यक्तिरूप कार्यसमयसार है उसका कारण वीतरागखसवेदन ज्ञानरूप निज-
भाव ही उपादेय है।॥ ४१ ॥

, , रायचंद्रजैनशासमालायाम् । देहि वसंतुवि हरिहरवि, जं अजवि ण मुणंति। परमसमाहितवेण विणु, सो परमप्पु भणंति ॥ ४२ ॥ देहे वसन्नपि हरिहरा अपि यं अद्यापि न जानति । परमसमाधितपसा विना तं परमात्मानं भणंति ॥ ४२ ॥ परमात्मस्वभावविलक्षणे देहे अनुपचरितासद्भूतव्यवहारनयेन वसन्नपि हरिहरा अपि यमद्यापि न जानति । केन विना । वीतरागनिर्विकल्पनित्यानंदैकसुखामृतरसास्वादरूप- परमसमाधितपसा, तं परमात्मानं भणंति वीतरागसर्वज्ञा इति । किंच । पूर्वभवे कोपि जीवो भेदाभेदरत्नत्रयाराधनां कृत्वा विशिष्टपुण्यवंधं च कृत्वा पश्चादज्ञानभावेन निदानवंधं करोति तदनंतरं स्वर्ग गत्वा पुनर्मनुष्यो भूत्वा त्रिखंडाधिपतिर्वासुदेवो भवति । अन्यः कोपि जिनदीक्षां गृहीत्वाप्यत्रैव भवे विशिष्टसमाधिवलेन पुण्यवंधं कृत्वा पश्चात्पूर्वकृतचा रित्रमोहोदयेन विषयासक्तो भूत्वा रुद्रो भवति । कथं ते परमात्मस्वरूपं न जानंति इति पूर्वपक्षः। तत्र परिहारं ददाति । युक्तमुक्तं भवता, यद्यपि रत्नत्रयाराधनां कृतवंतस्तथापि यादृशेन वीतरागनिर्विकल्परत्नत्रयस्वरूपेण तद्भवे मोक्षो भवति तादृशं न जानंतीति । आगे वह शुद्धात्मा यद्यपि देहमें रहता है तौभी परमसमाधिके अभावसे हरिहरादिक सरीखे भी जिसे प्रत्यक्ष नही जान सकते वह परमात्मा है ऐसा कहते हैं;-[देहे ] परमात्मखभावसे भिन्न शरीरमें [वसनपि] अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नयकर वसता है तौभी [1] जिसको [हरिहरा अपि] हरि हर सरीखे चतुर पुरुष [अद्य अपि] अबतक भी [न जानंति ] नही जानते हैं। किसके विना [ परमसमाधितपसा विना वीतरागनिर्विकल्प नित्यानंद अद्वितीय सुखरूप अमृतके रसके आखादरूप परमसमाधिभूत महातपके विना नहीं जानते [तं] उसको [ परमात्मानं] परमात्मा [भणति] कहते हैं। यहां किसीका प्रश्न है कि पूर्वभवमें कोई जीव जिनदीक्षा धारणकर व्यवहार निश्च- यरूप रतत्रयकी आराधनाकर महान् पुण्यको उपार्जन करके अज्ञानभावसे निदान बंध करनेके वाद वर्गमें उत्पन्न होता है पीछे आकर मनुष्य होता है वही तीन खंडका स्वामी वासुदेव (हरि) कहलाता है। और कोई जीव इसीभवमें जिनदीक्षा लेकर समाधिके बलसे पुण्यबंध करता है, उसके बाद पूर्वकृत चारित्रमोहके उदयसे विषयोंमें लीन हुआ रुद्र (हर) कहलाता है। इसलिये वे हरिहरादिक परमात्माका स्वरूप कैसे नहीं जानते ? इसका समाधान यह है कि तुलारा कहना ठीक है । यद्यपि इन हरिहरादिक महान् पुरु. षोंने रत्नत्रयकी आराधना की तौभी जिसतरहके वीतरागनिर्विकल्परत्नत्रयस्वरूपसे तद्भव मोक्ष होती है वैसा रत्नत्रय इनके नही प्रगट हुआ सरागरत्नत्रय हुआ है इसीका नाम व्यव- हाररत्नत्रय है सो यह तो हुआ लेकिन शुद्धोपयोगरूप वीतरागरत्नत्रय नही हुआ इसलिये वीतरागरत्नत्रयके धारक उसी भवसे मोक्ष जानेवाले योगी जैसा जानते हैं वैसा ये हरि- +

परमात्मप्रकाशः।
४७
अत्रायमेव शुद्धामानं साक्षादुपादेयभूतं तद्भवमोक्षसाधकाराधनासमर्थ च ते हरिहरायो
न जानंतीति स एवोपादेयो भवतीति भावार्थः ॥ ४२ ॥
अथोत्पादव्ययपर्यायार्थिकनयेन संयुक्तोपि यः द्रव्याथिकनयेन उत्पाव्ययरहितः स
एव परमामा निर्विकल्पसमाधिबलेन जिनवरैर्देहेपि दृष्ट इति निरूपयति,
भावाभावहिं संजुवउ, भावाभावहिं जो जि।
देहि जि दिहउ जिणवरहिं, मुणि परमप्पउ सो जि ॥ ४३ ॥
भावाभावाभ्यां संयुक्तः भावाभावाभ्यां य एव
देहे अपि दृष्टः जिनवरैः मन्यख परमात्मानं तमेव ॥ १३ ॥
भावाभावाभ्यां संयुक्तः पर्यायार्थिकनयनोत्पादव्ययाभ्यां परिणतः द्रव्यार्थिकनयेन
भावाभावयोः रहितः य एव वीतरागनिर्विकल्पसदानंदैकसमाधिना तद्भवमोक्षसाधकारा-
धनासमर्थेन जिनवरैर्देहेपि दृष्टः तमेव परमात्मानं मन्यस्व जानीहि वीतरागपरमसमाधि-
बलेनानुभवेत्यर्थः । अत्र य एव परमात्मा कृष्णनीलकापोतलेश्यास्वरूपादिसमस्तविभा-
वरहितेन शुद्धात्मोपलब्धेः ध्यानेन जिनवरैर्देहेपि दृष्टः स एव साक्षादुपादेय इति तात्प-
यार्थः ॥ ४३ ॥
हरादिक नही जानते । इसीलिये परम शुद्धोपयोगियोंकी अपेक्षा इनको नहीं जाननेवाले
कहा गया है क्योंकि जैसे खरूपके जाननेसे साक्षात् मोक्ष होती है वैसा स्वरूप ये नहीं
जानते । यहांपर साराश यह है कि जिस साक्षात् उपादेय शुद्धात्माको तद्भव मोक्षके
साधक महामुनि ही आराध सकते हैं और हरिहरादिक नही जान सकते वही चितवन
करने योग्य है ॥ ४२ ॥
आगे यद्यपि पर्यायार्थिकनयकर उत्पादव्ययकर सहित है तौभी द्रव्यार्थिक नयकर उत्पाद
व्यय रहित है सदा ध्रुव (अविनाशी) ही है वही परमात्मा निर्विकल्प समाधिके वलसे
तीर्थकर देवोंने देहमें भी देखलिया है ऐसा कहते हैं। [य एव] जो [भावाभा-
वाभ्यां] व्यवहार नयकर यद्यपि उत्पाद और व्ययकर सहित है तौभी द्रव्यार्थिकनयसे
[भावाभावाभ्यां] उत्पाद और विनाशसे ["रहितः"] रहित है तथा [जिनवरैः]
वीतरागनिर्विकल्प आनंदरूपसमाधिकर तद्भवमोक्षके साधक जिनवरदेवने [देहे अपि]
देहमें भी [दृष्टः] देखलिया है [तमेव] उसीको तू [परमात्मानं] परमात्मा [मन्यख]
जान अर्थात् वीतराग परम समाधिके बलसे अनुभव कर । भावार्थ-जो परमात्मा कृष्ण
नील कापोतलेश्यारूप विभाव परिणामोसे रहित शुद्धात्मकी प्राप्तिरूप ध्यानकर जिनवर
देवने देह में देखा है वही साक्षात् उपादेय है ॥ ४३ ॥

रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । ४८ अथ येन देहे वसता पंचेंद्रियग्रामो वसति गतेनोद्वसो भवति स एव परमात्मा भव- तीति कथयति,- देहि वसंते जेण पर, इंदियगामु बसेइ । उव्वसु होइ गएण फुड, सो परमप्पु हवेह ॥४४॥ देहे वसता येन परं इंद्रियग्रामः वसति । उद्वसो भवति गतेन स्फुटं स परमात्मा भवति ।। ४४ ॥ देहे वसता येन परं नियमेनेन्द्रियग्रामो वसति येनात्मना निश्चयेनातीन्द्रियस्वरूपेणापि व्यवहारनयेन शुद्धात्मविपरीते देहे वसता स्पर्शनादीन्द्रियग्रामो वसति, स्वसंवित्त्यभावे स्वकीयविषये प्रवर्तत इत्यर्थः । उद्वसो भवति गतेन स एवेद्रियग्रामो यस्मिन भवांतर- गते सत्युद्वसो भवति खकीयविपयव्यापाररहितो भवति स्फुटं निश्चितं स एवं लक्षण- श्चिदानंदैकस्खमावः परमात्मा भवतीति । अत्र च एवातींद्रियसुखास्वादसमाधिरतानां मुक्ति- कारणं भवति स एव सर्वप्रकारोपादेयातीन्द्रियसुखसाधकत्वादुपादेव इति भावार्थः ॥४४॥ अथ यः पंचेन्द्रियैः पंचविषयान् जानाति स च तैर्न जायते स परमात्मा भवतीति निरूपयति,- जो णियकरणहिं पंचहिंवि, पंचवि विसय मुणेइ । मुणिउ ण पंचहि पंचहिवि, सो परमप्पु हवेइ ॥ ४५ ॥ यः निजकरणैः पंचभिरपि पंचापि विषयान् मनुते । मतो न पंचभिः पंचभिरपि स परमात्मा भवति ॥ ४५ ॥ यो निजकरणैः पंचभिरपि पंचापि विषयान् मनुते जानाति । तद्यथा । यः कर्ता आगे देहमें जिसके रहनेसे पाचइंद्रीरूप गांव वसता है और जिसके निकलनेसे पंचें- द्रियरूप ग्राम ऊजड़ हो जाता है वह परमात्मा है ऐसा कहते हैं;-[येन परं देहे वसता] जिसके केवल देहमें रहनेसे [इन्द्रियग्रामः] इंद्रियगाम [वसति] रहता है [गतेन] और जिसके परभवमें चले जाने पर [उद्वसः स्फुटं भवति] ऊजड़ निश्चयसे हो जाता है [स परमात्मा] वह परमात्मा [भवति] है । भावार्थ-शुद्धात्मासे जुदी ऐसी देहमें वसते आत्मज्ञानके अभावसे ये इद्रियां अपने २ विषयोंमे (रूपादिमें) प्रव- तती हैं और जिसके चले जानेपर अपने २ विषयव्यापारसे रुक जाती है ऐसा चिदानंद निज आत्मा वही परमात्मा है । अतींद्रियसुखके आखादी परमसमाधिमे लीन हुए मुनि- योंको ऐसे परमात्माका ध्यान ही मुक्तिका कारण है वही अतीन्द्रियसुखका साधक होनेसे सब तरह उपादेय है ॥ ४४ ॥ आगे जो पांच इंद्रियोंसे पांच विषयोंको जानता है और आप इंद्रियों के गोचर नही .. AN परमात्मप्रकाशः। शुद्धनिश्चयनयेनातीन्द्रियज्ञानमयोपि अनादिवंधवशात् असद्भूतव्यवहारेणेद्रियमयशरीरं गृ- हीत्वा स्वयमर्थान् गृहीतुमसमर्थत्वात्पंचेद्रियैः कृत्वा पंचविपयान जानाति इन्द्रियज्ञानेन परिणमतीत्यर्थः । पुनश्च कथंभूतः । मुणिउ ण पंचहि पंचहिं वि सो परमप्पु हवेइ मतो न ज्ञातो न पंचभिरिद्रियैः पंचभिरपि स्पर्शादिविपयैः । तथाहि-वीतरागनिर्विकल्पस्वसं- वेदनज्ञानविपयोपि पंचेद्रियैश्च न ज्ञात इत्यर्थः। स एवं लक्षणः परमात्मा भवतीति । अन य एव पंचेद्रियविपयसुखास्वादविपरीतेन वीतरागनिर्विकल्पपरमानदंसमरसीभावसुखरसा- खादपरिणतेन समाधिना ज्ञायते स एवात्मोपादानसिद्धमित्यादिविशेषणविशिष्टस्योपादे- यभूतस्यातीद्रियसुखस्य साधकत्वादुपादेय इति भावार्थः ॥ ४५ ॥ अथ यस्य परमार्थेन वंधसंसारौ न भवतस्तमात्मानं व्यवहारं मुक्त्वा जानीहि इति कथयति,- जसु परमत्थे बंधु णचि, जोइय णवि संसार । सो परमप्पउ जाणि तुहुं, मणि मिल्लहिं ववहार ॥ ४६॥ यस्य परमार्थेन बंधो नैव योगिन् नापि ससारः । तं परमात्मानं जानीहि त्वं मनसि मुक्त्वा व्यवहारम् ॥ ४६ ॥ जसु परमत्थे बंधु णवि जोइय णवि संसारु यस्य परमार्थेन बंधो नैव हे योगिन् होता है वही परमात्मा है यह कहते हैं,-[यः] जो आत्माराम शुद्धनिश्चयनयकर अतीन्द्रिय ज्ञानमय है तौभी अनादि बंधके कारण व्यवहार नयसे इद्रियमयी शरीरको ग्रहणकर [निजकरणैः पंचभिरपि] अपनी पाचों इंद्रियों द्वारा [पंचापि विषयान्] रूपादि पाचों ही विषयोंको जानता है अर्थात् इंद्रियज्ञानरूप परिणमन करके इंद्रियोंसे रूप रस गंध शब्द स्पर्शको जानता है और आप [पंचभिः] पाच इंद्रियोंकर तथा [पंचभिरपि] पांचों विषयोंकर भी [ मतो न] नही जाना जाता अगोचर है [स पर- मात्मा] ऐसे लक्षण जिसके हैं वही परमात्मा [भवति है । भावार्थ-पांच इद्रियोंके विषये सुखके आखादसे विपरीत वीतराग निर्विकल्प परमानंद समरसीभावरूप सुखके रसका आस्वादरूप परमसमाधि उसकरके जो जाना जाता है वही परमात्मा है वह ज्ञान- गम्य है इंद्रियोंसे अगम्य है और उपादेयरूप अतींद्रिय सुखका साधन अपना खभावरूप वही परमात्मा आराधने योग्य है ॥ ४५ ॥ आगे जिसके निश्चयकर बंध नहीं है और ससार भी नहीं है उस आत्माको सव लौकिकव्यवहार छोड़कर अच्छीतरह पहचानो ऐसा कहते हैं,-[हे योगिन् ] हे योगी [यस्स] जिस चिदानंद शुद्धात्माके [ परमार्थेन ] निश्चयकरके [संसारः] निज खभावसे भिन्न द्रव्यक्षेत्रकालभवभावरूप पचप्रकार परिवर्तन (भ्रमण) खरूप ससार [ नैव] ५० , रायचंगजैनशास्त्रमालायाम् । नापि संसारः । तद्यथा-यस्य चिदानंदैकस्वभावशुद्धात्मनस्तद्विलक्षणो द्रव्यक्षेत्रकालभव- भावरूपः परमागमप्रसिद्धः पंचप्रकारः संसारो नास्ति इत्थंभूतसंसारस्य कारणभूतप्रकृ- तिस्थित्यनुभागप्रदेशभेदमिन्नकेवलज्ञानाद्यनंतचतुष्टयव्यक्तिरूपमोक्षपदार्थाद्विलक्षणो बंधोपि नास्ति सो परमप्पउ जाणि तुई मणि मिल्लहिं ववहारु तमेवेत्थंभूतलक्षणं परमात्मानं मनसि व्यवहारं मुक्त्वा जानीहि वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा भावयेत्यर्थः । अत्र य एवं शुद्धात्मानुभूतिविलक्षणेन संसारेण बंधनेन च रहितः स एवानाकूलत्वलक्षणसर्वप्रकारोपादे- यभूतमोक्षसुखसाधकत्वादुपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ ४६॥ अथ यस्य परमात्मनो ज्ञानं वल्लीवत् ज्ञेयास्तित्वाभावेन निवर्तते न च शक्त्यभावेनेति- कथयति,- णेयाभावें विल्लि जिम, थक्कइ णाणु वलेवि। मुक्कहं जसु पय विवियउ, परमसहाउ भणेवि ॥४७॥ ज्ञेयाभावे वल्ली यथा तिष्ठति ज्ञानं चलेपि । मुक्तानां यस्य पदे बिंबितं परमखभावं भणित्वा ।। ४७ ॥ गेयाभावे विल्लि जिम थक्कइ णाणु वलेवि ज्ञेयाभावे वल्ली यथा तथा ज्ञानं तिष्टति व्यावृत्त्येति । यथा मंडपाद्यभावे वल्ली व्यावृत्य तिष्ठति तथा ज्ञेयावलंबनाभावे ज्ञानं व्यावृत्य तिष्ठति न च ज्ञातृत्वशक्त्यभावेनेत्यर्थः । कस्य संबंधि ज्ञानं । मुक्कहं मुक्तात्मनां ज्ञानं । नही है [बंधो नापि] और ससारके कारण जो प्रकृति स्थिति अनुभाग प्रदेशरूप चारप्रकारका बंध भी नहीं है । जो बंध केवलज्ञानादि अनंत चतुष्टयकी प्रगटतारूप मोक्षपदार्थसे जुदा है [तं परमात्मानं ] उस परमात्माको [त्वं] तू [ मनसि व्यवहार मुक्त्वा] मनमेंसे सब लौकिक व्यवहारको छोड़कर तथा वीतरागसमाधिमें ठहरकर [जानीहि ] जान अर्थात् चितवनकर । भावार्थ-शुद्धात्माकी अनुभूतिसे भिन्न जो संसार और संसारका कारण बंध इनदोनोंसे रहित और आकुलतासे रहित लक्षणवाला मोक्षका मूलकारण जो शुद्धात्मा है वही सर्वथा आराधने योग्य है ॥ १६ ॥ आगे जिस परमात्माका ज्ञान सर्वव्यापक है ऐसा कोई पदार्थ नही है जो ज्ञानसे न जाना जावे सब ही पदार्थ ज्ञानमें भासते हैं ऐसा कहते हैं;-[यथा] जैसे मंडपके अभावसे [ वल्ली ] वेलि [ तिष्ठति ] थक जाती है अर्थात् जहांतक मंडप है वहांतक तो चढते रहे और आगे मंडपका सहारा न मिलनेसे चढनेसे ठहर जाती है उसीतरह [मुक्तानो ] मुक्तजीवोंका [ ज्ञानं ] ज्ञान भी जहांतक ज्ञेय (पदार्थ) हैं वहांतक फैल जाता है [ ज्ञेयाभाव और ज्ञेयका अवलंबन न मिलनेसे [बलेपि] जाननेकी शक्ति होनेपर भी [ तिष्ठति ] ठहर जाता है अर्थात् कोई पदार्थ जाननेसे बाकी नही रहता परमात्मप्रकाशः। च कथंभूतं । जसु पय विवियउ यस्य भगवतः पदे परमात्मस्वरूपे विवितं प्रतिस्फलितं तदाकारेण परिणतं । कस्मात् । परमसहाउ भणेवि परमस्वभाव इति भणित्वा मत्वा ज्ञात्वैवेत्यर्थः । अत्र यस्येत्थंभूतं ज्ञानं सिद्धसुखस्योपादेयस्याविनाभूतं स एव शुद्धात्मोपादेय इति भावार्थः ॥ ४७ ॥ अथ यस्य कर्माणि यद्यपि सुखदुःखादिकं जनयन्ति तथापि स न जनितो न हृत इत्य- भिप्रायं मनसि धृत्वा सूत्रं कथयति,- कम्मइ जासु जणंतहिंवि, णि णिउ कजु सयावि। किंपि ण जणियउ हरिउ णवि, सो परमप्पड भावि ॥४८॥ कर्मभिः यस्य जनयद्भिरपि निजनिजकार्य सदापि । किमपि न जनितो हृतः नैव तं परमात्मानं भावय ॥ १८ ॥ कर्मभिर्यस्य जनयद्भिरपि । किं । निजनिजकार्य सदापि तथापि किमपि न जनितो हृतश्च नैव तं परमात्मानं भावयत । यद्यपि व्यवहारनयेन शुद्धात्मस्वरूपप्रतिबंधकानि कर्माणि सुखदुःखादिकं निजनिजकार्य जनयंति तथापि शुद्धनिश्चयनयेन अनंतज्ञानादिस्वरूपं न हृतं न विनाशितं न चाभिनवं जनितमुत्पादितं किमपि यस्यात्मनस्तं परमात्मानं सव द्रव्य क्षेत्र काल और सव भावोंको ज्ञान जानता है ऐसे तीनलोक सरीखे अनंते लोकालोक होवें तौभी एक समयमें ही जान लेवे [ यस] जिस भगवान परमात्माके [पदे ] केवलज्ञानमें [ परमस्वभावं ] अपना उत्कृष्टखभाव सबके जाननेरूप [बिंबितं] प्रतिभासित होरहा है अर्थात् ज्ञान सवका अंतर्यामी है सर्वाकारज्ञानकी परिणति है ऐसा [ भणित्वा ] जानकर ज्ञानका आराधन करो । भावार्थ-जहातक मंडफ वहांतक ही वेलिकी वढवारी और जब मंडफका अभाव हो तब वेलि थिर होके आगे नहीं फैलती लेकिन वेलिमें विस्तारशक्तिका अभाव नहीं कहसकते इसीतरह सर्वव्यापक ज्ञान केव- लीका है जिसके ज्ञानमें सब पदार्थ झलकते हैं वही ज्ञान आत्माका परम खभाव है ऐसा जिसका ज्ञानहै वही शुद्धात्मा उपादेय है । यह ज्ञानानंदरूप आत्माराम है वही महामु- नियोंके चित्तका विश्राम ( ठहरनेकी जगह ) है ॥ ४७ ॥ आगे जो शुभअशुभ कर्म हैं वे यद्यपि सुख दुःखादिको उपजाते हैं तौमी वह आत्मा किसीसे उत्पन्न नहीं हुआ किसीने बनाया नहीं ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर गाथासूत्र कहते हैं- [कर्मभिः ] ज्ञानावरणादि कर्म [ सदापि ] हमेशा [निजनिजकार्य ] अपने २ सुखःदुखादि कार्यको [जनयद्भिरपि प्रगट करते हैं तौभी शुद्धनिश्चयनयकर [ यस] जिस आत्माका [किमपि] कुछभी अर्थात् अनंतज्ञानादि खरूप [न जनितः ] न तो , ५२ रायचंद्रुजैनशासमालायाम् । वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा भावयेत्यर्थः । अत्र यदेव कर्मभिनं हनं न चोत्पादित चिदानंदैकस्वरूपं तदेवोपादेयमिति तात्पर्यार्थः ॥ ४८ ॥ अथ यः कर्मनिबद्धोपि कर्मरूपो न भवति कर्मापि तद्रूपं न संभवति तं परमात्मानं भावयेति कथयति; कम्मणिबडुवि होइ णवि, जो फुड कम्मु कयावि । कम्मुवि जो ण कयावि फुड, सो परमप्पउ सावि ॥४९॥ कर्मनिवद्धोपि भवति नैव यः स्फुटं कर्म कदाचिदपि । कर्मापि यो न कदाचिदपि स्फुटं तं परमात्मानं भावय ॥ ४९ ॥ कम्मणिबद्भुवि होइ णवि जो फुड कम्मु कयावि कर्मनिबद्धोपि भवति नैव यः स्फुटं निश्चितं । किं न भवति । कर्म कदाचिदपि । तथाहि-यः कर्ता शुद्धात्मोपलंभाभावे- नोपार्जितेन ज्ञानावरणादिशुभाशुभकर्मणा व्यवहारेण बद्धोपि शुद्धनिश्चयन कर्मरूपो न भवति । केवलज्ञानाद्यनंतगुणस्वरूपं त्यक्त्वा कर्मरूपेण न परिणमतीत्यर्थः । पुनश्च किंवि- नया पैदा किया और [ नैव हृतः ] न विनाशकिया दूसरी तरहका किया [तं] उस [ परमात्मानं] परमात्माको [ भावय ] तू चितवनकर । भावार्थ-यद्यपि व्यवहारनयसे शुद्धात्मखरूपके रोकनेवाले ज्ञानावरणादिकर्म अपने २ कार्यको करते है अर्थात् ज्ञानाव- रण तो ज्ञानको ढकता है, दर्शनावरणकर्म दर्शनको आच्छादन करता है, वेदनीय साता असाता उत्पन्न करके अतीद्रियसुखको घातता है मोहनीय सम्यक्त्व तथा चारित्रको रोकता है, आयुकर्म स्थिति के प्रमाण शरीरमें राखता है अविनाशीभावको प्रगट नहीं होने देता, नामकर्म नानाप्रकार गति जाति शरीरादिकको उपजाता है, गोत्रकर्म ऊंच नीच गोत्र में डालदेता है और अंतरायकर्म अनंतवीर्य ( वल)को प्रगट नहीं होने देता । इसप्रकार कार्यको करते हैं तौभी शुद्धनिश्चयनयकर आत्माका अनंतज्ञानादिस्वरूप इन कर्मोने न तो नाशकिया और न नया उत्पन्न किया आत्मा तो जैसा है वैसाही है। ऐसे अखंड परमात्माका तू वीतरागनिर्विकल्प समाधिमें स्थिर होकर ध्यानकर । यहापर यह तात्पर्य है कि जो जीव- पदार्थ कर्मोंसे न हरागया न उपजा किसी दूसरी तरह नही किया गया वही चिदानंद खरूप उपादेय है ॥ ४८ ॥ इसके बाद जो आत्मा कर्मों से अनादिकालका बंधा हुआ है तौभी कर्मरूप नहीं होता और कर्मभी आत्मस्वरूप नही होते आत्मा चैतन्य है कर्म जड़ हैं ऐसा जानकर उस परमात्माका तू ध्यानकर ऐसा कहते हैं;-[यः] जो चिदानंद आत्मा [कर्मनिवद्धोपि] ज्ञानावरणादिकाँसे बंधा हुआ होनेपर भी [कदाचिदपि] कभीभी [ कर्म नैव स्फुट] कर्मरूप नहीं निश्चयसे [ भवति ] होता [कर्म अपि] और कर्म भी [यः] जिस परमात्मप्रकाशः। ५३ शिष्टः । कम्मुवि जो ण कयावि फुड्डु आपि यो न कदाचिदपि स्फुटं निश्चितं । तद्यथा-जानावरणादिद्रव्यभावरूपं कर्मापि कर्तृभूतं यः परमात्मा न भवति स्वकीयकर्म- पुद्गलस्वरूपं विहाय परमात्मरूपेण न परिणमतीत्यर्थः । सो परमप्पउ भावि तमेवं लक्षणं परमात्मानं भावय । देहरागादिपरिणतिरूपं वहिरात्मानं मुक्त्वा शुद्धात्मपरिणतिभावनारूपें- तरात्मनि स्थित्वा सर्वप्रकारोपादेयभूतं विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावपरमात्मानं भावयेति भावार्थः ॥ ४९ ॥ एवं त्रिविधात्मप्रतिपादकप्रथममहाधिकारमध्ये यथा निर्मलो ज्ञानमयो व्यक्तिरूपः शुद्धात्मा सिद्धौ तिष्ठति तथाभूतः शुद्धनिश्चयेन शक्तिरूपेण देहेपि तिष्ठतीति व्याख्यानमुख्यत्वेन चतुर्विंशति सूत्राणि गतानि । अत ऊर्ध्व स्वदेहप्रमाणव्याख्यानमुख्यत्वेन पट्सूत्राणि कथयंति,-तद्यथा । किवि भणंति जिउ सव्वगउ, जिउ जड़ केवि भणंति। किवि भणंति जिउ देहसमु, सुण्णुवि केवि भणंति ॥५०॥ केपि भणंति जीवं सर्वगतं जीवं जडं केपि भणंति । केपि भणंति जीवं देहसमं शून्यमपि केपि भणंति ॥ ५० ॥ केपि भणति जीवं सर्वगतं जीवं केपि जडं भणंति केपि भणंति जीवं देहसमं शून्यमपि परमात्मखरूप [कदाचिदपि स्फुटं] कभी भी निश्चयकर [न] नहीं होते [तं] उस पूर्वोक्त लक्षणोवाले [ परमात्मानं] परमात्माको तू [भावय] चितवनकर ।। भावार्थ-जो आत्मा अपने शुद्धात्मखरूपकी प्राप्तिके अभावसे उत्पन्न किये ज्ञानावरणादि शुभ अशुभकाँसे व्यवहार नयकर बधा हुआ है तौभी शुद्धनिश्चयनयसे कर्मरूप नही है अर्थात् केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप अपने खरूपको छोड़कर कर्मरूप नहीं परिणमता और ये ज्ञानावरणादि द्रव्यभावरूप कर्मभी आत्मस्वरूप नही परिणमते अर्थात् अपने जडरूप पुद्गलपनेको छोडकर चैतन्यरूप नही होते यह निश्चय है। जीव तो अजीव नहीं होता और अजीव है वह जीव नहीं होता ऐसी अनादि कालकी मर्यादा है। इसलिये काँसे भिन्न ज्ञानदर्शनमयी सबतरह उपादेयरूप (आराधने योग्य) परमात्माको तुम देहरागादि परिणतिरूप बहिरात्मपनेको छोड़कर शुद्धात्मपरिणतिकी भावनारूप अंतरात्मामें स्थिर होकर चितवन करो उसीका अनुभव करो ऐसा तात्पर्य हुआ ॥ १९ ॥ ऐसे तीनप्रकार आत्माके कहनेवाले पहले महाधिकारमें पाचवें स्थल में जैसा निर्मल ज्ञानमई प्रगटरूप शुद्धात्मा सिद्धलोकमें विराजमान है वैसा ही शुद्धनिश्चयनयकर शक्तिरूपसे देहमें तिष्ठ रहा है ऐसे कथनकी मुख्यतासे चौवीस दोहासूत्र वीतगये। इससे आगे छह दोहासूत्रोंमें आत्मा व्यवहार नयकर अपनी देहके प्रमाण है यह कहते हैं;-[ केपि ] कोई नैयायिक वेदांती मीमांसक मतवाले [जीवं] जीवको [ सर्वगतं]

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रायचंद्रजैनशास्तमालायाम् ।
केपि वदंति । तथाहि केचन सांख्यनैयायिकमीमांसकाः सर्वगतं जीवं वदति । सांख्या:
पुनर्जडमपि कथयति । जैनाः पुनर्देहप्रमाणं वदंति । वौद्धाश्च शून्यं वदंतीति । एवं
प्रश्नचतुष्टयं कृतमिति भावार्थः ॥ ५० ॥
अथ वक्ष्यमाणनयविभागेन प्रश्नचतुष्टयस्याप्यभ्युपगमं स्वीकारं करोति,
अप्पा जोइय सव्वगउ, अप्पा जडवि वियाणि ।
अप्पा देहपमाणु मुणि, अप्पा सुण्णु वियाणि ॥५१ ।।
आत्मा योगिन् सर्वगतः आत्मा जडोपि विजानीहि ।
आत्मानं देहप्रमाणं मन्यख आत्मानं शून्यं विजानीहि ॥ ५१ ।।
आत्मा हे योगिन् सर्वगतोपि भवति, आत्मानं जडमपि विजानीहि, आत्मानं देहान-
माणं मन्यस्व, आत्मानं शून्यमपि जानीहि । तद्यथा । हे प्रभाकरभट्ट वक्ष्यमाणविवक्षित-
नयविभागेन परमात्मा सर्वगतो भवति, जडोपि भवति, देहप्रमाणोपि भवति शून्योपि
भवति नापि दोष इति भावार्थः ॥५१॥
अथ कर्मरहितात्मा केवलज्ञानेन लोकालोकं जानाति तेन कारणेन सर्वगतो भवतीति
प्रतिपादयति,-
अप्पा कम्मविवज्जियउ, केवलणाणे जेण ।
लोयालोउवि मुणइ जिय, सव्वगु वुच्चइ तेण ॥ ५२ ॥
आत्मा कर्मविवर्जितः केवलज्ञानेन येन ।
लोकालोकमपि मनुते जीव सर्वगः उच्यते तेन ॥ ५२ ॥
सर्वव्यापक [ भणंति ] कहते हैं [ केपि ] कोई सांख्यमतवाले [ जीवं] जीवको [ जडं
जड [ भणंति ] कहते हैं [ केपि ] कोई बौद्धमतवाले जीवको [शून्यं अपि ] शून्य भी
[भणंति] कहते हैं [ केपि] कोई जिनधर्मी [जीवं] जीवको [ देहसमं] व्यवहार
नयकर देहप्रमाण [ भणंति ] कहते हैं और निश्चय नयकर लोकप्रमाण है । वह आत्मा
फैसा है और कैसा नहीं है ऐसे चार प्रश्न शिष्यने किये ऐसा तात्पर्य है ॥ ५० ॥
आगे नयविभागकर आत्मा सबरूप है एकांतवादकर अन्यवादी मानते हैं सो ठीक
नही है इसप्रकार चारों प्रश्नोंको स्वीकार करके समाधान करते हैं;-[हे योगिन् ]
हे प्रभाकर भट्ट ! [ आत्मा सर्वगतः] आगे कहेजानेवाले नयके भेदसे आत्मा सर्वगत
भी है [आत्मा आत्मा [जडोपि] जड़ भी है ऐसा [ विजानीहि ] जानो [आत्मानं
देहप्रमाणं ] आत्माको देहके बराबर भी [ मन्यख] मानो [आत्मानं शून्यं] आत्माको
शून्य भी [विजानीहि जानो । नयविभागसे माननेमें कोई दोष नही है ऐसा तात्पर्य
है॥ ५१॥

परमात्मप्रकाशः।
५५
आत्मा कर्मविवर्जितःसन् केवलज्ञानेन करणभूतेन येन कारणेन लोकालोकं मनुते
जानाति हे जीव सर्वगत उच्यते तेन कारणेन । तथाहि-अयमात्मा व्यवहारेण केवल-
ज्ञानेन लोकालोकं जानाति, देहमध्ये स्थितोपि निश्चयनयेन स्वात्मानं जानाति तेन कारणेन
व्यवहारनयेन ज्ञानापेक्षया रूपविपये दृष्टिवत्सर्वगतो भवति नच प्रदेशापेक्षयेति ।
कश्चिदाह । यदि व्यवहारेण लोकालोकं जानाति तर्हि व्यवहारनयेन सर्वज्ञत्वं न च निश्चय-
नयेनेति । परिहारमाह-यथा स्वकीयमात्मानं तन्मयत्वेन जानाति तथा परद्रव्यं
तन्मयत्वेन न जानाति तेन कारणेन व्यवहारो भण्यते न च परिज्ञानाभावात् । यदि
पुनर्निश्चयेन वद्रव्यवत्तन्मयो भूत्वा परद्रव्यं जानाति तर्हि परकीयसुखदुःखरागद्वेषपरिज्ञातो
सुखी दुःखी रागी द्वेषी च स्यादिति महर्पणं प्राप्नोतीति । अत्र येनैव ज्ञानेन व्यापको
भण्यते तदेवोपादेयस्यानंतसुखस्याभिन्नत्वादुपादेयमित्यभिप्रायः ॥ ५२ ॥
आगे कर्मरहित आत्मा केवलज्ञानसे लोक और अलोक दोनोंको जानता है इसलिये
सर्वव्यापक भी होसकता है ऐसा कहते हैं;-[आत्मा ] यह आत्मा [कर्मविवर्जितः]
कर्मरहित हुआ [ केवलज्ञानेन] केवलज्ञानसे [येन] जिसकारण [ लोकालोकमपि ]
लोक और अलोकको [ मनुते] जानता है [तेन] इसीलिये [हे जीव ] हे जीव
[सर्वगः ] सर्वगत [उच्यते ] कहाजाता है । भावार्थ-यह आत्मा व्यवहारनयसे
केवलज्ञानकर लोकअलोकको जानता है और शरीरमें रहनेपर भी निश्चयनयसे अपने
स्वरूपको जानता है इसकारण ज्ञानकी अपेक्षा तो व्यवहारसे सर्वगत है, प्रदेशोंकी अपेक्षा
नहीं है । जैसे रूपवाले पदार्थोंको नेत्र देखते हैं परंतु उन पदार्थोंसे तन्मय नहीं होते।
यहां कोई प्रश्न करता है कि जो व्यवहारनयसे लोकालोकको जानता है और निश्चयनयसे
नहीं, तो व्यवहारसे सर्वज्ञपना हुआ निश्चयनयकर न हुआ ? उसका समाधान कहते हैं-
जैसे अपने आत्माको तन्मयी होकर जानता है उसतरह परद्रव्यको तन्मयीपनेसे नही
जानता भिन्नखरूप जानता है इसकारण व्यवहारनयसे कहा, कुछ ज्ञानके अभावसे नहीं
कहा । ज्ञानकर जानपना तो निजपरका समान है । जैसे अपनेको संदेहरहित जानता है
वैसा ही परको जानता है इसमें सदेह नहीं समझना, लेकिन निजस्वरूपसे तो तन्मयी है
और परसे तन्मयी नही । और जिसतरह निजको तन्मयी होकर निश्चयसे जानता है
उसीतरह यदि परको भी तन्मय होकर जानें तो परके सुखदुःख रागद्वेषोंके ज्ञान होनेपर
सुखी दुःखी रागी द्वेषी होवे यह बड़ा दूपण है । सो इस प्रकार कभी नहीं होसकता ।
यहां जिस ज्ञानसे सर्वव्यापक कहा वही ज्ञान उपादेय अतीद्रियसुखसे अभिन्न है सुखरूप
है ज्ञान और आनंदमें भेद नहीं है वही ज्ञान उपादेय है यह अभिप्राय जानना । इस
दोहामें जीवको ज्ञानकी अपेक्षा सर्वगत कहा है ॥ ५२ ॥

रायचंद्रनैनगास्त्रमालायाम् । ५६ अथ येन कारणेन निजबोधं लब्ध्वात्मन इन्द्रियनानं नास्ति तेन कारणेन जडो भवतीत्यभिप्रायं मनसि धृत्वा सूत्रमिदं कथयति,- जे णियबोहपरिट्ठियहं, जीवहं तुदृइ णाणु । इंदियजणियउ जोइया, तिं जिउ जड्डवि वियाणु ॥ ५३ ॥ येन निजबोधप्रतिष्ठितानां जीवाना त्रुट्यति ज्ञानं । इंद्रियजनितं योगिन् तेन जीवं जडमपि विजानीहि ॥ ५३ ॥ येन कारणेन निजबोधप्रतिष्ठितानां जीवानां त्रुट्यति विनश्यति । किं कर्तृ । बानं । कथंभूतं । इंद्रियजनितं हे योगिन् तेन कारणेन जीवं जडमपि विजानीहि । तद्यथा । छद्मस्थानां वीतरागनिर्विकल्पसमाधिकाले स्वसंवेदनज्ञाने सत्यपीन्द्रियजनितं ज्ञानं नास्ति, केवलज्ञानिनां पुनः सर्वदेव नासि तेन कारणेन जडत्वमिति । अत्र इन्द्रियनानं हेयमती- द्रियज्ञानमुपादेयमिति भावार्थः ॥ ५३ ।। अथ शरीरनामकर्मकारणरहितो जीवो वर्धते न च हीयते तेन कारणेन मुक्तञ्चरमगरीर- प्रमाणो भवतीति निरूपयति, कारणविरहिउ सुम्हजिउ, वड्डइ खिरइ ण जेण । चरमसरीरपमाणु जिउ, जिणवर वोल्लहि तेण ।। ५४ ॥ कारणविरहितः शुद्धजीवः वर्धते क्षरति न येन । चरमशरीरप्रमाणं जीवं जिनवराः वदति तेन ॥ ५४ ॥ आगे आत्मज्ञानको पाकर इंद्रियज्ञान नागको प्राप्त होता है परमसमाधिमें आत्मस्वरूपमें लीन है परवस्तुकी गम्य नहीं है इसलिये नयप्रमाणकर जड़भी है परंतु ज्ञानाभावरूप जड नहीं है चैतन्यरूप ही है अपेक्षासे जड कहा जाता है यह अभिप्राय मनमें रखकर गाथासूत्र कहते है;-[ येन ] जिस अपेक्षा [निजबोधप्रतिष्ठितानां] आत्मज्ञानम ठहरे हुए [जीवानां] जीवोंके [ इंद्रियजनितं ज्ञानं] इंद्रियोंसे उत्पन्न हुआ ज्ञान [त्रुट्यति ] नाशको प्राप्त होता है [ हे योगिन् ] हे योगी [तेन] उसी कारणसे [जीवं ] जीवको [जडमपि ] जड भी [विजानीहि ] जानो। भावार्थ-महामुनियोंके वीतरागनिर्विकल्पसमाधिके समयमें खसवेदनज्ञान होनेपर भी इंद्रियजनित ज्ञान नहीं है और केवलज्ञानियोके तो किसी समय भी इंद्रियज्ञान नहीं है केवल अतीद्रियज्ञान ही है इसलिये इंद्रियज्ञानके अभावकी अपेक्षा आत्मा जड भी कहा जासकता है । यहाँपर बाह्य इंद्रियज्ञान सवतरह हेय है और अतींद्रियज्ञान उपादेय है यह साराश हुआ ॥ ५३ ॥ आगे शरीर नामा नामकर्मरूप कारणसे रहित यह जीव न घटता है और न वढता है इसकारण मुक्त अवस्थामें चरमगरीरसे कुछकम पुरुषाकार रहता है इसलिये शरीर परमात्मप्रकाशः। ५७ कारणविरहितः शुद्धजीवो वर्द्धते क्षरति हीयते न येन कारणेन चरमशरीरप्रमाणं मुक्तजीवं जिनवरा भणंति तेन कारणेनेति । तथाहि । यद्यपि संसारावस्थायां हानिवृद्धि- कारणभूतशरीरनामकर्मसहितत्वाद्धीयते वर्धते च तथापि मुक्तावस्थायां हानिवृद्धिकारणा- भावाद्वर्धते हीयते च नैव, शरीरप्रमाण एव तिष्ठतीत्यर्थः । कश्चिदाह-मुक्तावस्थायां प्रदीपवदावरणाभावे सति लोकप्रमाणविस्तारेण भाव्यमिति । तत्र परिहारमाह-प्रदीपस्य योसौ प्रकाशविस्तारः स स्वभावज एव नत्वपरजनितः पश्चाद्वाजनादिना सायावरणेन प्रच्छादितस्तेन कारणेन तस्यावरणाभावेपि प्रकाशविस्तारो घटते एव । जीवस्य पुनरनादि- कर्मप्रच्छादितत्वात्पूर्व स्वभावेन विस्तारो नास्ति । किंरूपसंहारविस्तारौ । शरीरनामकर्मज- नितौ । नेन कारणेन शुष्कमृत्तिकाभाजनवत् कारणाभावादुपसंहारविस्तारौ न भवतश्चरमश- रीरप्रमाणेन तिष्ठतीति । अत्र य एव मुक्तौ शुद्धबुद्धस्वभावः परमात्मा तिष्ठति तत्सदृशो रागादिरहितकाले स्वशुद्धात्मोपादेय इति भावार्थः ॥ ५४ ॥ प्रमाण भी कहा जाता है ऐसा कहते हैं;-[येन] जिस हेतु [कारणविरहितः] हानिवृद्धिका कारण शरीर नामकर्मसे रहित हुआ [ शुद्धजीवः ] शुद्धजीव [न वर्धते क्षरति] न तो बढता है और न घटता है | तेन ] इसी कारण [जिनवराः] जिनेंद्रदेव [जीवं ] जीवको [चरमशरीरप्रमाणं] चरमशरीर प्रमाण [वदंति ] कहते हैं। भावार्थ-यद्यपि ससार अवस्थामें हानिवृद्धिका कारण शरीर नामा नामकर्म है उसके संबंघसे जीव घटता है और बढता है जब महामच्छका शरीर पाता है तब तो शरीरकी वृद्धि होती है और जब निगोद शरीर धारता है तब घट जाता है । और मुक्त अवस्थामें हानि वृद्धिका कारण जो नामकर्म उसका अभाव होनेसे जीवके प्रदेश न तो सिकुड़ते है न फैलते हैं किंतु चरमशरीरसे कुछ कम पुरुषाकार ही रहते हैं इसलिये शरीर प्रमाण है यह निश्चयहुआ । यहां कोई प्रश्न करै कि जबतक दीपकके आवरण है तबतक तो प्रकाश नहीं होसकता है और जब उसके रोकनेवालेका अभाव हुआ तब प्रकाश विस्तर जाता (फैलजाता ) है उसीप्रकार मुक्ति अवस्थामें आवरणके अभाव होनेसे आत्माके प्रदेश लोक प्रमाण फैलने चाहिये शरीर प्रमाण ही क्यों रहगये ? उसका समाधान यह है कि दीपकके प्रकाशका जो विस्तार है वह खभावसे होता है परसे नही उत्पन्न हुआ पीछे भाजन वगैरःसे अथवा दूसरे आवरणसे आच्छादन किया गया वह प्रकाश संकोचको प्राप्त होजाता है और जब आवरणका अभाव होता है तब प्रकाश विस्ताररूप हो जाता इसमें संदेह नहीं और जीवका प्रकाश अनादिकालसे कर्मोंकर ढंका हुआ है पहले कभी विस्ताररूप नही हुआ । शरीर प्रमाण ही संकोचरूप और विस्ताररूप हुआ इसलिये जीवके प्रदेशोंका प्रकाश संकोच विस्ताररूप शरीर नामकर्मसे उत्पन्न हुआ है इसकारण , ५८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथाष्टकर्माष्टादशदोपरहितत्वापेक्षया शून्यो भवतीति न च केवलनानादिगुणापेक्षया चेति दर्शयति, अट्टवि कम्मई बहुविहई, णवणव दोसवि जेण सुद्धहं एकुवि अस्थि णवि, सुण्णुवि वुच्चइ तेण ॥ ५५ ॥ अष्टावपि कर्माणि बहुविधानि नवनव दोषा अपि येन । शुद्धानां एकोपि अस्ति नैव शून्योपि भण्यते तेन ॥ ५५ ॥ अष्टावपि कर्माणि बहुविधानि नवनव दोपा अपि येन कारणेन शुद्धात्मनां तन्मध्ये चैकोप्यस्ति नैव शून्योपि भण्यते तेन कारणेनैवेति । तद्यथा । शुद्धनिश्चयनयेन ज्ञानावर- णाद्यष्टद्रव्यकर्माणि क्षुधादिदोषकारणभूतानि क्षुधातृपादिरूपाष्टादशदोपा अपि कार्यभूताः अपि शब्दात्सत्ताचैतन्यबोधादिशुद्धप्राणरूपेण शुद्धजीविते सत्यपि दशप्राणरूपमशुद्धजीवत्वं च नास्ति तेन कारणेन संसारिणां निश्चयनयेन शक्तिरूपेण रागादिविभावशून्यं च भवति । मुक्तात्मनां तु व्यक्तिरूपेणापि न चात्मानंतज्ञानादिगुणशून्यत्वमेकांतेन बौद्धादिमतवदिति । सुखी मट्टीके बर्तनकी तरह कारणके अभावसे संकोच विस्ताररूप नहीं होता शरीर प्रमाण ही रहता है अर्थात् जब तक मट्टीका वासन जलसे गीला रहता है तब तक जलके संबंधसे वह घट बढ जाता है और जब जलका अभाव हुआ तब बासन सूख जानेसे घटता बढता नही है जैसेका तैसा रहता है । उसी तरह इस जीवके जवतक नामकर्मका संबंध है तबतक संसार अवस्थामें शरीरकी हानि वृद्धि होती है उसकी हानि वृद्धिसे प्रदेश सिकु- डते हैं और फैलते हैं। तथा सिद्ध अवस्थामें नामकर्मका अभाव होजाता है इसकारण शरीरके न होनेसे प्रदेशोंका संकोच विस्तार नहीं होता सदा एकसे ही रहते हैं। जिस शरीरसे मुक्त हुआ उसी प्रमाण कुछ कम रहता है। दीपकका प्रकाश तो खभावकर उत्पन्न है आवरणसे आच्छादित होजाता है। जब आवरण दूर होजाता है तब प्रकाश सहज ही विस्तरता है । यहा तात्पर्य यह है कि जो शुद्ध बुद्ध (ज्ञान) खभाव परमात्मा मुक्तिमें तिष्ठ रहा है वैसा ही शरीरमें भी विराज रहा है। जब रागका अभाव होता है उस कालमें यह आत्मा परमात्माके समान है वही उपादेय है ॥ ५४ ।। आगे आठ कर्म और अठारह दोषोंसे रहित हुआ विभावभावोंकर रहित होनेसे शून्य कहा जाता है लेकिन केवलज्ञानादि गुणकी अपेक्षा शून्य नहीं है सदा पूर्ण ही है ऐसा दिखलाते हैं। [येन] जिसकारण [ अष्टौ अपि ] आठों ही [ बहुविधानि कर्माणि ] अनेक भेदोंवालो कर्म [ नवनवदोपाअपि 1 अठारह ही दोष इनमेंसे [एक: अपि ] एक भी [ शुद्धानां] शुद्धात्माओंके [नैव अस्ति ] नहीं है [ तेन ] इसलिये [शून्योपि] शून्यभी [ भण्यते] कहा जाता है। भावार्थ-इस आत्माके शुद्धनिश्चयनय- परमात्मप्रकाशः। ५९ तथाचोक्तं पंचास्तिकाये । "जेसि जीवसहावो णत्थि अभावो य सव्वहा तत्थ । ते होति भिण्णदेहा सिद्धा वचिगोयरमदीदा" । अत्र य एवमिथ्यात्वरागादिभावेन शून्यश्चिदानंदै- कस्वभावेन भरितावस्थः प्रतिपादितः परमात्मा स एवोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ ५५ ॥ एवं त्रिविधात्मप्रतिपादकप्रथममहाधिकारमध्ये य एव ज्ञानापेक्षया व्यवहारनयेन लोकालोकव्यापको भणितः स एव परमात्मा निश्चयनयेनासंख्यातप्रदेशोपि स्वदेहमध्ये तिष्ठतीति व्याख्यानमुख्यत्वेन सूत्रष्टुं गतं । तदनंतरं द्रव्यगुणपर्यायनिरूपणमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं कथयति, तद्यथा। अप्पा जणियउ केण णवि, अप्पें जणिउ ण कोइ । व्वसहावें णिचु मुणि, पजउ विणसइ होइ ॥५६॥ आत्मा जनितः केन नापि आत्मना जनितं न किमपि । द्रव्यखभावेन नित्यं मन्यख पर्यायः विनश्यति भवति ॥ ५६ ॥ आत्मा न जनितः केनापि आत्मना कर्तृभूतेन जनितं न किमपि, द्रव्यखभावेन नित्य- कर ज्ञानावरणादि आठ द्रव्यकर्म नहीं हैं, क्षुधादि दोषोंके कारणभूत कर्मोंके जानेसे क्षुधा तृपादि अठारह दोष कार्यरूप नहीं हैं, और अपि शब्दसे सत्ता चैतन्य ज्ञान आनंदादि शुद्ध प्राण होनेपर भी इंद्रियादि दश अशुद्धरूप प्राण नहीं हैं इसलिये ससारी जीवोंके भी शुद्ध निश्चयनयसे शक्तिरूपसे शुद्धपना है लेकिन रागादि विभावभावों की शून्यता ही है। तथा सिद्धजीवोंके तो सब तरहसे प्रगटरूप रागादिसे रहितपना है इसलिये विभावोंसे रहितपनेकी अपेक्षा शून्यभाव है इसी अपेक्षासे आत्माको शून्य भी कहते हैं । ज्ञानादिक शुद्धभावकी अपेक्षा सदा पूर्ण ही है। और जिसतरह बौद्धमती सर्वथा शून्य मानते हैं वैसा अनंतज्ञानादिगुणोंसे कभी नही होसकता । ऐसा कथन श्रीपंचास्तिकायमें भी किया है-"जेसि जीवसहावो" इत्यादि । इसका अभिप्राय यह है कि जिन सिद्धोंके जीवका खभाव निश्चल है जिस खभावका सर्वथा अभाव नही है वे सिद्ध भगवान् देहसे रहित हैं और वचनके विषयसे रहित हैं अर्थात् जिनका स्वभाव वचनोंसे नहीं कह सकते । यहां मिथ्यात्वरागादिभावकर शून्य तथा एक चिदानंदखभावसे पूर्ण जो परमात्मा कहा गया है अर्थात् विभावसे शून्य, खभावसे पूर्ण कहा गया है वही उपादेय है ऐसा तात्पर्य हुआ ॥ ५५॥ ऐसे जिसमें तीन प्रकार आत्माका कथन है ऐसे पहले महाअधिकारमें जो ज्ञानकी अपेक्षा व्यवहारनयसे लोकालोक व्यापक कहागया वही परमात्मा निश्चयनयसे असंख्यात- प्रदेश है तो भी अपनी देहके प्रमाण रहता है इस व्याख्यानकी मुख्यतासे छह दोहासूत्र कहेगये ॥ आगे द्रव्यगुणपर्यायके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहा कहते हैं;-[ आत्मा ] ॥

६० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । मात्मानं मन्यख जानीहि । पर्यायो विनश्यति भवति चेति । तथाहि । संसारिजीवः शुद्धामसंवित्त्यभावेनोपार्जितेन कर्मणा यद्यपि व्यवहारेण जन्यते स्वयं च शुद्धात्मसंवि- त्तिच्युतः सन् कर्माणि जनयति तथापि शुद्धनिश्चयनयेन शक्तिरूपेण कर्मकर्तृभूतेन नरनारकादिपर्यायेण न जन्यते स्वयं च कर्मनोकर्मादिकं न जनयतीति । आत्मा पुनर्न केवलं शुद्धनिश्चयनयेन व्यवहारेणापि न च जन्यते न च जनयति तेन कारणेन द्रव्यार्थि- कनयेन नित्यो भवति, पर्यायार्थिकनयेनोत्पद्यते विनश्यति चेति । अत्राह शिष्यः । मुक्तात्मनः कथमुत्पादव्ययाविति । परिहारमाह । आगमप्रसिद्ध्यागुरुलघुकगुणहानिवृद्ध्य- पेक्षया, अथवा येनोत्पादादिरूपेण ज्ञेयं वस्तु परिणमति तेन परिच्छित्त्याकारेण बानपरि- णत्यपेक्षया । अथवा मुक्तौ संसारपर्यायविनाशः सिद्धपर्यायोत्पादः शुद्धजीवद्रव्यं ध्रौव्यापे- क्ष्या च सिद्धानामुत्पादन्ययौ ज्ञातव्याविति । अत्र तदेव सिद्धस्वरूपमुपादेयमिति भावार्थः ॥५६॥ अथ द्रव्यगुणपर्यायस्वरूपं प्रतिपादयति,- यह आत्मा [ केन अपि ] किसीसे भी [न जनितः ] उत्पन्न नहीं हुआ [आत्मना ] और इस आत्माकर [ किमपि ] कोईद्रव्य [न जनितं ] उत्पन्न नहीं हुआ [द्रव्यस्खभा- वेन ] द्रव्यखभावकर [ नित्यं मन्यस्त्र ] नित्य जानो [पर्यायः विनश्यति भवति] पर्यायभावसे विनाशीक है । भावार्थ यह संसारी जीव यद्यपि व्यवहार नयकर शुद्धात्म. ज्ञानके अभावसे उपार्जनकिये ज्ञानावरणादि शुभाशुभकर्मों के निमित्तसे नरनारकादि पर्यायोंसे उत्पन्न होता है और विनसता है और आप भी शुद्धात्मज्ञानसे रहित हुआ कर्मीको उपजाता ( बांधता ) है तो भी शुद्धनिश्चयनयकर शक्तिरूप शुद्ध ही है कर्मोंकर उत्पन्न हुई नरनारकादिपर्यायरूप नही होता और आपभी कर्म नोकर्मादिकको नहीं उप- जाता और व्यवहारसे भी न जन्मता है न किसीसे विनाशको प्राप्त होता है न किसीको उपजाता है कारण कार्यसे रहित है, अर्थात् कारण उपजानेवालेको कहते हैं कार्य उपजनेवालेको कहते हैं सो ये दोनों भाव वस्तुमें नहीं हैं इससे द्रव्यार्थिकनयकर जीव नित्य है और पर्यायार्थिकनयकर उत्पन्न होता है तथा विनाशको प्राप्त होता है । यहां पर शिष्य प्रश्नकरता है कि संसारी जीवोंके तो नरनारकी आदि पर्यायोंकी अपेक्षा उत्पत्ति और मरण प्रत्यक्ष दीखता है परंतु सिद्धोंके उत्पाद व्यय किस तरह होसकता है क्योंकि उनके विभाव पर्याय नहीं है खभावपर्याय ही है और वे सदा अखंड अविनश्वर ही हैं । उसका समाधान यह है कि जैसा उत्पन्न होना मरना चारों गतियों में संसारी जीवोंके है वैसा तो उनसिद्धोंके नहीं है वे अविनाशी हैं परंतु शास्त्रोंमें प्रसिद्ध अगुरु- लघुगुणकी परिणतिरूप अर्थपर्याय है वह समय समयमें आविर्भाव तिरोभावरूप होती है " परमात्मप्रकाशः। ६१ तं परियाणहिं दव्वु तुहुं, जं गुणपज्जयजुत्तु । सहभुव जाणहि ताहं गुण कमभुय पजउ वुत्तु ॥ ५७ ॥ तत् परिजानीहि द्रव्यं त्वं, यत् गुणपर्याययुक्तं । सहभुवः जानीहि तेषां गुणाः क्रमभुवः पर्यायाः उक्ताः ॥ ५७ ॥ तं परियाणहिं दवु तुहुं जं गुणपजयजुत्तु तत्परि समंताजानीहि द्रव्यं त्वं । तत्किं । यद्गुणपर्याययुक्तं, गुणपर्यायस्य स्वरूपं कथयति । सहभुव जाणहि ताहं गुण कमभुय पजउ वुत्तु सहभुवो जानीहि तेपां द्रव्याणां गुणाः, क्रमभुवः पर्यायाः उक्ता भणिता इति । तद्यथा । गुणपर्ययवद्रव्यं ज्ञातव्यं इदानीं तस्य तद्रव्यस्य गुणपर्यायाः कथ्यते । सहभुवो गुणाः, क्रमभुवः पर्यायाः, इदमेकं तावत्सामान्यलक्षणं । अन्वयिनो गुणाः व्यतिरेकिणः पर्यायाः, इति द्वितीयं च । यथा जीवस्य ज्ञानादयः पुद्गलस्य वर्णादयश्चेति । ते च प्रत्येक अर्थात् समय २ में पूर्वपरिणतिका व्यय होता है और आगेकी पर्यायका आविर्भाव ( उत्पाद ) होता है । इस अर्थपर्यायकी अपेक्षा उत्पाद व्यय जानना । अन्य संसारी जीवोंकी तरह नही है । सिद्धोंके एक तो अर्थपर्यायकी अपेक्षा उत्पादव्यय कहा है। अर्थपर्यायमें षट्गुणी हानि और वृद्धि होती है । अनंतभागवृद्धि १ असंख्यातभागवृद्धि २ संख्यातभागवृद्धि ३ सख्यातगुणवृद्धि ४ असंख्यातगुणवृद्धि ५ अनंतगुणवृद्धि ६ । अनंतभागहानि १ असख्यातभागहानि २ संख्यातभागहानि ३ सख्यातगुणहानि ४ असल्यातगुणहानि ५ अनंतगुणहानि ६। ये घट्गुणी हानि वृद्धिके नाम कहे हैं। इनका खरूप तो केवली के गम्य है सो इस षट्गुणी हानिवृद्धिकी अपेक्षा सिद्धोंके उत्पादव्यय कहा जाता है । अथवा समस्त ज्ञेय पदार्थ उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप परिणमते है सो सब पदार्थ सिद्धोंके ज्ञानगोचर है । ज्ञेयाकार ज्ञानकी परिणति है सो जब ज्ञेयपदार्थमें उत्पादव्यय हुआ तब ज्ञानमें सब प्रतिभासित हुआ इसलिये ज्ञानकी परिणतिकी अपेक्षा उत्पाद व्यय जानना । अथवा जब सिद्ध हुए तब ससार पर्यायका विनाश हुआ सिद्ध पर्यायका उत्पाद हुआ तथा द्रव्यखभावसे सदा ध्रुव ही हैं । सिद्धोंके जन्म जरा मरण नही हैं सदा अविनाशी हैं । जो सिद्धका स्वरूप सब उपाधियोंसे रहित है वही उपादेय है यह भावार्थ जानना ॥ ५६ ॥ आगे द्रव्यगुणपर्यायका खरूप कहते हैं;-[यत् ] जो [गुणपर्याययुक्तं ] गुण और पर्यायोंकर सहित है [ तत् ] उसको [ त्वं ] हे प्रभाकर भट्ट तू [ द्रव्यं ] द्रव्य [परिजानीहि ] जान [ सहभुवः ] जो सदाकाल पाये जा नित्यरूप हों वे तो [तेषां गुणाः ] उनद्रव्योंके गुण हैं [ क्रमभुवः] और जो द्रव्यकी अनेकरूप परिणति क्रमसे हो अर्थात् अनित्यपनेरूप समय समय उपजै विनशै नानाखरूप हो वो [पर्यायाः] ६२ रायचंगजैनशास्त्रमालायाम् । द्विविधाः स्वभावविभावभेदेनेति । तथाहि । जीवस्य तावत्कथ्यते । सिद्धत्वादयः स्वभावप- र्यायाः केवलज्ञानादयः स्वभावगुणा असाधारणा इति । अगुरुलधुकाः स्वभावगुणास्तेषामेव गुणानां षड्डानिवृद्धिरूपस्वभावपर्यायाश्च सर्वद्रव्यसाधारणाः । तस्यैव जीवस्य मतिज्ञानादि- विभावगुणनरनारकादिविभावपर्यायाश्च इति । इदानीं पुद्गलस्य कथ्यते । केवलपरमाणु- रूपेणावस्थानं स्वभावपर्यायः वर्णातरादिरूपेण परिणमनं वा । तस्मिन्नेव परमाणौ वर्णादयः स्वभावगुणा इति, व्यणुकादिरूपस्कंधरूपविभावपर्यायास्तेष्वेव घ्यणुकादिस्कंधेषु वर्णादयो विभावगुणा इति भावार्थः । धर्माधर्माकाशकालानां स्वभावगुणपर्यायास्ते च यथावसर कथ्यते । विभावपर्यायास्तूपचारेण यथा घटाकाशमित्यादि । अत्र शुद्धगुणपर्यायसहितः शुद्धजीव एवोपादेय इति भावार्थः ॥ ५७ ॥ पर्याय [ उक्ताः] कही जाती हैं। भावार्थ-जो द्रव्य होता है वह गुणपर्यायकर सहित होता है। यही कथन तत्त्वार्थसूत्रमें कहा है "गुणपर्ययवद्रव्यं" अब गुणपर्यायका खरूप कहते हैं-"सहभुवो गुणाः क्रमभुवः पर्यायाः" यह नयचक्र ग्रंथका वचन है अथवा "अन्वयिनो गुणा व्यतिरेकिणः पर्यायाः' इसका अर्थ ऐसे है कि गुण तो सदा द्रव्यसे सहभावी है द्रव्यमें हमेशह एकरूप नित्यरूप पाये जाते है और पर्याय नानारूप होती है जो परिणति पहले समयमें थी वह दूसरे समयमें नही होती, समय २ में उत्पाद व्ययरूप होता है इसलिये पर्याय क्रमवर्ती कहा जाता है । अव इसका विस्तार कहते हैं-जीवद्रव्यके ज्ञान आदि अर्थात् ज्ञान दर्शन सुख वीर्य आदि अनंतगुण है और पुद्गलद्रव्यके स्पर्श रस गंध वर्ण इत्यादि अनंतगुण है सो ये गुण तो द्रव्यमें सहभावी है अन्वयी हैं सदा नित्य है कभी द्रव्यसे तन्मयपना नहीं छोड़ते । तथा पर्यायके दो भेद हैं-एक तो खभाव दूसरी विभाव । सो जीवके सिद्धत्वादि खभाव पर्याय है और केवलज्ञानादि स्वभाव गुण हैं । ये तो जीवमें ही पाये जाते हैं अन्य द्रव्यमें नहीं पाये जाते तथा अस्तित्व वस्तुत्व द्रव्यत्व अगुरुलघुत्त्व ये खभावगुण सब द्रव्योंमें पाये जाते हैं । अगुरुलघुगुणका परिणमन षट्गुणी हानिवृद्धिरूप है । यह खभाव पर्याय सभी द्रव्योंमें है कोई द्रव्य षट्गुणी हानि वृद्धि विना नही है यही अर्थपर्याय कही जाती है वह शुद्धपर्याय है । यह शुद्धपर्याय संसारी जीवोंके सब अजीव पदार्थोंके तथा सिद्धोंके पायी जाती है । और सिद्धपर्याय तथा केवलज्ञानादिगुण सिद्धोंके ही पायाजाता है दूसरोंके नहीं । संसारी जीवोंके मतिज्ञानादि विभावगुण और नर नारकी आदि विभाव पर्याय-ये संसारी जीवोंके पायी जाती है। ये तो जीवद्रव्यके गुणपर्याय कहे और पुद्गलके परमाणुरूप तो द्रव्य तथा वर्ण आदि खभावगुण और एक वर्णसे दूसरे वर्णरूप होना ये विभावगुण व्यंजन पर्याय तथा एक परमाणूमें दो तीन इत्यादि अनेक परमाणू मिलकर स्कंधरूप होना ये विभावद्व्यव्यंजनपर्याय हैं । व्यणुकादि स्कंधमें जो वर्ण आदि हैं वे परमात्मप्रकाशः। ६३ अथ जीवस्य विशेषेण द्रव्यगुणपर्यायान् कथयति; अप्पा बुज्झहि दव्यु तुहु, गुण पुणु दंसणु णाणु । पजय चउगइभाव तणु, कम्मविणिम्मिय जाणु ॥५८ ॥ आत्मानं वुध्यख द्रव्यं त्वं गुणौ पुनः दर्शनं ज्ञानं । पर्यायान् चतुर्गतिभावान् तनु कर्मविनिर्मितान् जानीहि ॥ ५८ ॥ अप्पा बुज्झहि दन्यु तुहुं आत्मान द्रव्यं बुध्यस्व जानीहि त्वं गुण पुणु दसणु णाणु गुणी पुनर्दर्शनं ज्ञानं च पञ्जय चउगइ भाव तणु कम्मविणिम्मिय जाणु तस्यैव जीवस्य पर्यायाश्चतुर्गनिभावान् परिणामान तनुं शरीरं च । कथंभूतान् तान् । कर्मविनिर्मितान् जानीहीति । इतो विशेषः । शुद्धनिश्चयेन शुद्धबुद्धैकस्वभावमात्मानं द्रव्यं जानीहि । तस्यैवात्मनः सविकल्पं ज्ञानं निर्विकल्पं दर्शनं गुण इति । तत्र ज्ञानमष्टविधं केवलज्ञानं सफलमसंडं शुद्धमिति शेपं सप्तकं खंडज्ञानमशुद्धमिति । तत्र सप्तकमध्ये मत्यादिचतुष्टयं विभावगुण कहे जाते हैं और वर्णसे वर्णीतर होना, रससे रसांतर होना, गंधसे अन्यगंध होना वह विभावपर्याय है । परमाणू शुद्धद्रव्यमें एक वर्ण एक रस एक गध और शीतउष्णमेसे एक तथा रूखे चिकनेमेंसे एक ऐसे दो स्पर्श-इस तरह पांच गुण तो मुख्य हैं इनको आदिदे अस्तित्वादि अनंतगुण है वे खभावगुण कहे जाते हैं और परमाणुका जो आकार वह स्वभावद्रव्यव्यजन पर्याय है तथा वर्णादिगुणरूप परिणमन वह खभावगुणव्यंजनपर्याय है । जीव और पुद्गल इन दोनोंमें तो खभाव और विभाव दोनों हैं तथा धर्म अधर्म आकाश काल इन चारोमें अस्तित्वादिखभावगुण ही हैं और अर्थपर्याय पदगुणी हानिवृद्धिरूप स्वभावपर्याय सभीके हैं । धर्मादिक चार पदार्थोंके विभावगुणपर्याय नहीं है । आकाशके घटाकाश मठाकाश इत्यादि कहावत है वह उपचार मात्र है । ये पट् द्रव्योंके गुणपर्याय कहे गये हैं । इन पट् द्रव्योंमें जो शुद्धगुण शुद्ध पर्याय सहित शुद्ध जीवद्रव्य है वही उपादेय है आराधने योग्य है ॥ ५७ ॥ आगे जीवके विशेषपनेकर द्रव्यगुणपर्याय कहते हैं, हे शिष्य [त्वं] तू [आत्मानं ] आत्माको तो [द्रव्यं ] द्रव्य [बुध्यख ] जान [पुनः] और [दर्शनं ज्ञानं ] दर्शन ज्ञानको [गुणो] गुण जानो [चतुर्गतिभावान् तनुं] चार गतियोंके भाव तथा शरीरको [कर्मविनिर्मितान् ] कर्मजनित [पर्यायान् ] विभाव पर्याय [जानीहि ] समझ । भावार्थ-इसका विशेष व्याख्यान करते हैं-शुद्धनिश्चयनयकर शुद्धबुद्ध अखड खभाव आत्माको तू द्रव्य जान, चेतनपनेके सामान्यखभावको दर्शन जान और विशेषतासे जानपना उसको ज्ञान समझ। ये दर्शन ज्ञान आत्माके निजगुण हैं, उनमेंसे ज्ञानके आठ भेद है, उनमें केवल ज्ञान तो पूर्ण है अखंड है शुद्ध है तथा मतिज्ञान श्रुतज्ञान ६४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । सम्यग्ज्ञानं कुमत्यादित्रयं मिथ्याज्ञानं इति । दर्शनचतुष्टयमध्ये केवलदर्शनं सकलमखंड शुद्धमिति चक्षुरादित्रयं विकलमशुद्धमिति । किं च । गुणात्रिविधा भवंति । केचन साधारणाः केचनासाधारणाः केचन साधारणासाधारणा इति । जीवस्य तावदुच्यते । असित्वं वस्तुत्वं प्रमेयत्वागुरुलघुत्वादयः साधारणाः, ज्ञानसुखादयः स्वजातौ साधारणा अपि विजाती पुनरसाधारणाः । अमूर्तत्वं पुद्गलद्रव्यं प्रत्यसाधारणमाकाशादिकं प्रति साधारणं । प्रदेशत्वं पुनः कालद्रव्यं प्रति पुद्गलपरमाणुद्रव्यं च प्रत्यसाधारणं शेपद्रव्यं प्रति साधारणमिति संक्षेपव्याख्यानं । एवं शेपद्रव्याणामपि यथासंभवं ज्ञातव्यमिति भावार्थः ॥ ५८ ॥ अथानंतसुखस्योपादेयभूतस्याभिन्नत्वात् शुद्धगुणपर्याय इति प्रतिपादनमुख्यत्वेन सूत्राष्टकं कथ्यते । तत्राष्टकमध्ये प्रथमचतुष्टयं कर्मशक्तिस्वरूपमुख्यत्वेन द्वितीयचतुष्टयं कर्मफलमुख्य- त्वेनेति । तद्यथा । जीवकर्मणोरनादिसंबंधं कथयति,- जीवहं कम्मु अणाइ जिय, जणियउ कम्मु ण तेण । कम्में जीउवि जणिउ णवि, दोहिंवि आइ ण जेण ॥ ५९॥ जीवानां कर्माणि अनादीनि जीव जनितं कर्म न तेन । कर्मणा जीवोपि जनितः नैव द्वयोरपि आदिः न येन ।। ५९ ॥ अवधिज्ञान मनःपर्ययज्ञान-ये चार ज्ञान तो सम्यक् ज्ञान और कुमति कुश्रुत कुअवधि ये तीन मिथ्याज्ञान, ये केवलकी अपेक्षा सातों ही खंडित है अखंड नहीं है और सर्वथा शुद्ध नही है अशुद्धताकर सहित हैं इसलिये परमात्मामें एक केवलज्ञान ही है। पुद्गलमें अमूर्तगुण नही पाये जाते इस कारण पांचोंकी अपेक्षा साधारण, पुद्गलकी अपेक्षा असा- धारण । प्रदेशत्व गुण कालके विना पांचद्रव्योंमें पाया जाता है इसलिये पांचकी अपेक्षा यह प्रदेशगुण साधारण है और कालमें न पानेसे कालकी अपेक्षा असाधारण है । पुद्गल द्रव्यमें मूर्तीकगुण असाधारण है इसीमें पाया जाता है अन्यमें नही और अस्तित्वादि गुण इसमें भी पाये जाते हैं तथा अन्यमें भी इसलिये साधारण गुण हैं । चेतनपना पुद्गलमें सर्वथा नहीं पाया जाता अमूर्तीकपना भी नहीं पाया जाता । पुद्गलपरमाणुको द्रव्य कहते है, स्पर्श रस गंध वर्णखरूप जो मूर्ति वह इस पुद्गलका विशेषगुण है । अन्य सब द्रव्योंमें जो उनका स्वरूप वह द्रव्य और अस्तित्वादि गुण तथा स्वभावपरिणति पर्याय है। जीव और पुद्गलके विना अन्य चार द्रव्योंमें विभाव गुण और विभाव पर्याय नहीं है तथा जीव पुद्गलमें खभाव विभाव दोनों हैं। उनमेंसे सिद्धोंमें तो स्वभाव ही है और संसारीमें विभावकी मुख्यता है। पुद्गल परमाणूमें स्वभाव ही है और स्कंधमें विभाव ही है । इस तरह छहों द्रव्योंका सक्षेप व्याख्यान जानना ॥.५८ ॥ R परमात्मप्रकाशः। ६५ जीवहं कम्मु अणाइ जिय जणियउ कम्मु ण तेण जीवानां कर्मणामनादिसंबंधो भवति हे जीव जनितं कर्म न तेन जीवेन कम्मि जीउवि जणिउ णवि दोहिंचि आइ ण नेण कर्मणा कर्तृभूतेन जीवोपि जनितो न द्वयोरप्यादिर्न येन कारणेनेति । इतो विशेपः । जीवकर्मणामनादिसंबंधः पर्यायसंतानेन बीजवृक्षवद्व्यवहारनये संबंधः कर्मताव- त्तिष्ठति तथापि शुद्धनिश्चयनयेन विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावेन जीवेन न तु जनितं तथाविध- जीवोपि स्वशुद्धात्मसंवित्त्यभावोपार्जितेन कर्मणा नरनारकादिरूपेण न जनितः कर्मात्मेति च द्वयोरनादित्वादिति । अत्रानादिजीवकर्मणोस्संबंधव्याख्यानेन सदा मुक्तः सदा शिवः कोप्यस्तीति निराकृतमिति भावार्थः । तथा चोक्तं । "मुक्तश्चेत्प्राग्भवे बद्धो नो बद्धो मोचनं वृथा । अवद्धो मोचनं नैव मुंचेरों निरर्थकः ॥" अनादितो हि मुक्तश्चेत्पश्चाद्वंधः कथं भवेत् । बंधनं मोचनं नोचेन्मुंचेरों निरर्थकः ॥ ॥ ५९॥ ऐसें तीन प्रकार आत्माका है कथन जिसमें ऐसे पहला महाधिकारमें द्रव्यगुणपर्यायके व्याख्यानकी मुख्यतामें सातवें स्थलमें तीन दोहासूत्र कहे है । आगे आदर करने योग्य अतींद्रिय सुखसे तन्मयी जो निर्विकल्पभाव उसकी प्राप्तिकेलिये शुद्ध गुणपर्यायके व्याख्यानकी मुख्यताकर आठ दोहा कहते हैं। उनमें पहले चार दोहाओंमें अनादिकर्म- संबंधका व्याख्यान और पिछले चार दोहाओंमें कर्मके फलका व्याख्यान इस प्रकार आठ दोहाओंका रहस्य है, उसमें प्रथम ही जीव और कर्मका अनादिकालका संबंध है ऐसा कहते हैं-[हे जीव ] हे आत्मा [ जीवानां ] जीवोंके [ कर्माणि] कर्म [अना- दीनि ] अनादि कालसे है अर्थात् जीव कर्मका अनादिकालका संबंध है [तेन] उस जीवने [ कर्म] कर्म [न जनितं ] नही उत्पन्न किये [कर्मणा अपि ] ज्ञानावरणादि कर्मोंने भी [जीवः ] यह जीव [ नैव जनितः] नही उपजाया [येन] क्योंकि [ द्वयोः अपि ] जीव कर्म इन दोनोंकी ही [आदिः न] आदि नहीं है दोनों ही अनादिके है ॥ भावार्थ-यद्यपि व्यवहार नयकर पर्यायोंके समूहकी अपेक्षा नये नये कर्म समय २ बांधता है नवे नवे उपार्जन करता है जैसे बीजसे वृक्ष और वृक्षसे वीज होता है उसीतरह पहले बीजरूप काँसे देह धारता है देहमें नवे नवे कोको विस्तारता है यह तो वीजसे वृक्ष हुआ । इसीप्रकार जन्मसंतान चली जाती है । परंतु शुद्धनिश्चयनयकर विचारा जावे तो जीव निर्मलज्ञानदर्शन खभाव ही है । जीवने ये कर्म न तो उत्पन्न किये और यह जीवभी इन कर्मोंने नहीं पैदा किया । जीव भी अनादिका है ये पुद्गलस्कंध भी अनादिके हैं जीव कर्म नवे नही हैं जीव अनादिका कर्मोंसे बंधा है। और कर्मों के क्षयसे मुक्त होता है । इस व्याख्यानसे जो कोई ऐसा कहते हैं कि आत्मा सदा मुक्त है कर्मोंसे रहित है उनका निराकरण (खंडन) किया। वे वृथा कहते हैं ऐसा ९ - , रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथ व्यवहारनयेन जीवः पुण्यपापरूपो भवतीति प्रतिपादयति,- एहु ववहारिं जीवडउ, हेउ लहेविणु कम्मु । बहुविहभावि परिणवइ, तेण जि धम्मु अहम्मु ॥ ६०॥ एष व्यवहारेण जीवः हेतुं लब्ध्वा कर्म । बहुविधभावेन परिणमति तेन एव धर्मः अधर्मः ॥ ६० ॥ एहु ववहारे जीवडउ हेउ लहेविणु कम्मु एप प्रत्यक्षीभूतो जीवो व्यवहारनयेन हेतु लब्ध्वा । किं । कर्मेति बहुविहभावि परिणवइ तेण जि धम्मु अहम्मु बहुविधभावेन विकल्पज्ञानेन परिणमति तेनैव कारणेन धर्माधर्मश्च भवतीति । तद्यथा । एप जीवः शुद्धनिश्चयेन वीतरागचिदानंदैकखभावोपि पश्चाद्वयवहारेण वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदना- भावेनोपार्जितं शुभाशुभं कर्म हेतुं लब्ध्वा पुण्यरूपः पापरूपश्च भवति । अत्र यद्यपि व्यवहारेण पुण्यपापरूपो भवति तथापि परमात्मानुभूत्यविनाभूतवीतरागसम्यग्दर्शनज्ञान- चारित्रबहिर्द्रव्येच्छानिरोधलक्षणतपश्चरणरूपा या तु निश्चयचतुर्विधाराधना तस्या भावनाकाले साक्षादुपादेयभूतवीतरागपरमानंदैकरूपो मोक्षसुखादभिन्नत्वात् शुद्धजीव उपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ ६० ॥ तात्पर्य है । ऐसा दूसरी जगहभी कहा है-"मुक्तश्चेत्" इत्यादि । इसका अर्थ यह है कि जो यह जीव पहले बंधा हुआ होवे तभी 'मुक्त' ऐसा कथन संभवता है और जो पहले बंधा ही नही तो 'मुक्त' ऐसा कहना किसतरह ठीक हो सकता है । मुक्त तो छूटे हुएका नाम है सो जब बंधा ही नही तो 'छूटा' किसतरह कहा जासकता है। जो अबंध है उसको छूटा कहना ठीक नही । जो विभावबंध मुक्ति मानते हैं उनका कथन निरर्थक है । जो यह अनादिका मुक्त ही होवे तो पीछे बंध कैसे संभव हो सकता है। बंध होवे तभी मोचन होसके । जो बंध न हो तो मुक्त कहना निरर्थक है ॥ ५९ ॥ आगे व्यवहार नयकर यह जीव पुण्यपापरूप होता है ऐसा कहते हैं।-[एप जीवः] यह जीव [ व्यवहारेण ] व्यवहारनयकर [कर्म हेतुं] कर्मरूप कारणको लब्ध्वा] पाकरके [ बहुविधभावेन ] अनेक विकल्परूप [परिणमति ] परिणमता है [तेन एव ] इसीसे [धर्मः अधर्मः] पुन्य और पापरूप होता है । भावार्थ-यह जीव शुद्धनिश्चयनयकर वीतरागचिदानंद खभाव है तौभी व्यवहारनयकर वीतराग निर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानके अभा- वसे रागादिरूप परिणमनेसे उपार्जनकिये शुभ अशुभ कर्मों के कारणको पाकर पुन्यी तथा पापी होता है । यद्यपि यह व्यवहारनयकर पुन्य पापरूप है तौभी परमात्माकी अनुभूतिसे तन्मयी जो वीतरागसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र और बाह्यपदार्थोंमें इच्छाके रोकने रूप तप ये चार निश्चय आराधना हैं उनकी भावनाके समय साक्षात् उपादेयरूप वीतरागपरमानंद परमात्मप्रकाशः। ६७ अथ तानि पुनः कर्माण्यष्टौ भवंतीति कथयति,- ते पुणु जीवहं जोइया, अवि कम्म हवंति। जेहिं जि झंपिय जीव णवि, अप्पसहाउ लहंति ॥ ६१॥ तानि पुनः जीवानां योगिन् अष्टौ एव कर्माणि भवति । यैः एव झंपिताः जीवाः नैव आत्मखभावं लभते ॥ ६१ ॥ ते पुणु जीवह जोइया अहवि कम्म हवंति तानि पुनर्जीवानां हे योगिन्नष्टावेव कर्माणि भवंति । जेहिं जि झंपिय जीव णवि अप्पसहाउ लहंति यैरेव कर्मभिपिताः संतो जीवाः सम्यक्त्वाद्यष्टविधस्वकीयस्वभावं न लभंते । तद्यथा हि । “सम्मत्तणाणदंसण- वीरियसुहुमं तहेव अवगहणं । अगुरुगलहुगं अव्वावाहं अट्ठगुणा हुंति सिद्धाणं"। शुद्धात्मादिपदार्थविपये विपरीताभिनिवेशरहितः परिणामः क्षायिकसम्यक्त्वमिति भण्यते । जगत्रयकालत्रयवर्तिपदार्थयुगपद्विशेपपरिच्छित्तिरूपं केवलज्ञान भण्यते तत्रैव सामान्यपरि- च्छित्तिरूपं केवलदर्शनं भण्यते । तत्रैव केवलज्ञानविषये अनंतपरिच्छित्तिशक्तिरूपमनंतवीर्य भण्यते । अतींद्रियजानविपयं सूक्ष्मत्वं भण्यते । एकजीवावगाहप्रदेशे अनंतजीवावगाहदान- सामर्थ्यमवगाहनत्वं भण्यते । एकांतेन गुरुलघुत्वस्याभावरूपेण अगुरुलघुत्वं भण्यते । जो मोक्षका सुख उससे अभिन्न आनंदमई ऐसा निजशुद्धात्मा ही उपादेय है अन्य सब हेय हैं ।। ६० ॥ आगे वे कर्म आठ हैं जिनसे ससारी जीव बंध हैं ऐसा कहते हैं;-श्री- गुरु अपने शिष्य मुनिको कहते है कि [हे योगिन् ] हे योगी [तानि पुनः कर्माणि ] वे फिर कर्म [जीवानां अष्टौ एव ] जीवोंके आठ ही [भवंति ] होते हैं [यैः एव झंपिताः ] जिन कर्मोंसे ही आच्छादित (ढकेहुए) [जीवाः] ये जीव [ आत्मस्वभावं ] अपने सम्यक्त्वादि आठगुणरूप खभावको [नैव लभते] नही पाते ॥ अव उन्ही आठ गुणोंका व्याख्यान करते हैं "सम्मत्त" इत्यादि-इसका अर्थ ऐसा है कि शुद्ध आत्मादि पदार्थों में विपरीत श्रद्धानरहित जो परिणाम उसको क्षायिक सम्यक्त्व कहते हैं, तीन लोक तीन कालके पदार्थोको एक ही समयमें विशेषरूप सबको जानें वह केवलज्ञान है, सब पदार्थीको केवलदृष्टिसे एक ही समयमें देखै वह केवल दर्शन है। उसी केवलज्ञानमें अनंतज्ञायक (जाननेकी ) शक्ति वह अनंतवीर्य है, अतींद्रियज्ञानकर अमूर्तीक सूक्ष्मपदार्थोंको जानना आप चार ज्ञानके धारियोंसे न जाना जावे वह सूक्ष्मत्व है, एक जीवके अवगाह क्षेत्रमें (जगहमें ) अनंते जीव समाजाये ऐसी अवकाश देनेकी सामर्थ्य वह अवगाहन गुण है, सर्वथा गुरुता और लघुताका अभाव ६८ रायचंदजैनशालमालायाम् । वेदनीयकमोदयजनितसमत्तवाधारहितत्वाइन्यावाधगुणश्चेति । इदं सन्यक्त्वादिगुणाष्टकं संसारावस्थायां निमपि केनापि कर्मणा प्रच्छादितं तिष्टति यथा तथा कथ्यते । सन्यक्त निथ्यात्वकर्मणा प्रच्छादितं, केवलज्ञानं केवलज्ञानावरणेन झंपितं, केवलदर्शनं केवलदर्श- नावरणेन मंपित, अन्तर्वार्य वीर्यातरायेण प्रच्छादितं. सूक्ष्नत्वमायुष्ककर्मणा प्रच्छादितं । कस्मादितिचेन् । विवक्षितायुःकर्मोदयेन भवांतरे प्रामे सत्यतींद्रियज्ञानविपर्य सूक्ष्मत्वं सच्चा पश्चार्जिठियज्ञानविषयो भवतीत्यर्थः । अवगाहनत्वं शरीरनामकमांडयेन प्रच्छादितं, सिद्धावस्थायोग्यं विशिष्टागुरुलघुत्वं नानकमादन प्रच्छादितं । अथवा गुरुत्वशब्दनोच्चगो- जनितं महत्त्वं भण्यते. लघुत्वशब्देन नीचगोत्रजनितं तुच्छत्वमिति, तदुभवकारणभूतेन गोत्रकोंडचेन विशिष्टागुरुलघुत्वं प्रच्छाद्यत इति । अव्यावाधगुणत्वं वेदनीयकोदयनेति संक्षेपेणाष्टगुणानां कर्ममिराच्छादनं ज्ञातव्यनिति । तदेव गुणाष्टकं मुक्तावस्थायां स्वकीयस्व- कीयकर्मप्रच्छाइनाभाव व्यक्तं भवति संक्षेपेणाष्ट्रगुणाः कथिताः । विशेषेण पुनरमूर्तत्व- निर्नामगोत्रादयः साधारणासाधारणल्पानंतगुणाः यथासंभवमागनाविरोधेन ज्ञातन्या इति । अत्र सम्यक्त्वादिशुद्धगुणस्वरूपः शुद्धात्मैवोणदेय इति भावार्थः ॥ ६१ ॥ अर्थात् न गुरु न लघु-उसे अगुरुलघु कहते हैं और वेदनीयकर्मके उदयके अभावकर उत्पन्न हुआ समस्त बागरहित जो निरावाध गुण उसे अव्यावाध कहते है। ये सम्यक्त्वादि आठगुण जो सिद्धोंके हैं वे संसारअवस्थामें किस २ कर्मले ढंके हुए है वोही कहते हैं- सन्यक्त्व गुण मिथ्यात्वनाम दर्शनमोहनीयकमते आच्छादित है, केवलज्ञानावरणसे केवल- ज्ञान ढका हुआ है, केवलदर्शनावरणसे केवलदर्शन ढका है. वीयोतरायकर्नले अनंतवीर्य का है. आयुःकर्मले सूक्ष्मत्वगुण ढका है, क्योंकि आयुक्रमके उदयसे जब परभवो जाता है वहां इंद्रियज्ञानका धारक होता है अतींद्रियज्ञानका अभाव होता है इस कारण कुछ एक स्थूलवस्तुओंको तो जानता है सूक्ष्मको नहीं जानता, शरीर नामकर्मके उदयसे अवगाहन गुण आच्छादित है, सिद्धावस्थाके योग्य विशेषरूप अगुल्लघुगुण नामचमके उदयत्ते अथवा गोत्रकमके उदयते ढका गया है क्योंकि गोत्रक्रमके उदयसे जब नीच गोत्र पाया तब उसमें तुच्छ या लघु कहलाया और उच्चगोत्रनें वड़ा अर्थात् गुरु कह लाया और वेदनीय कर्मके उदयसे अव्यावाध गुण ढका गया क्योंकि उसके उदय साताअसा- तारूप संसारीक सुखदुःखका भोता हुआ । इस प्रकार आठ गुण नाठ कोंसे उके गये इसलिये यह जीव संतारनें भ्रमा । जब कर्मचा आवरग मिट जाता है तब सिद्धपढ़नें ये आठ गुण प्रगट होते हैं। यह संक्षेपसे आठ गुणोंका कथन किया। और विशेषतासे अनू. तत्व निर्नामगोत्रादिक अनंतगुण यथासंभव शास्त्रप्रमाणकर जानने । तात्पर्य यह है कि सम्यक्त्वादि निज शुद्धगुणवरूप जो शुद्धात्मा वही उपादेय है।। ६१ ।।

परमात्मप्रकाशः। अथ विपयकपायासक्तानां जीवानां ये कर्मपरमाणवः संबद्धा भवंति तत्कर्मेति कथयति;- विसयकसायहिं रंगियह, जे अणुया लग्गति । जीवपएसह मोहियह, ते जिण कम्म भणंति ॥ २॥ विपयकपायैः रंगिताना ये अणवः लगंति । जीवप्रदेशेषु मोहितानां तान् जिनाः कर्म भणंति ॥ १२ ॥ विसयकसायहिं रंगियहं जे अणुया लग्गति विषयकषायै रंगिताना रक्तानां ये परमाणवो लग्ना भवंति जीवपएसिहि मोहियहं ते जिण कम्म भणंति । केषु लग्ना भवंति । जीवप्रदेशेपु । केपां। मोहितानां जीवानां तान् कर्मस्कंधान जिनाः कर्मेति कथयति । तथाहि । शुद्धात्मानुभूतिविलक्षणैर्विपयकपायै रक्तानां स्वसंवित्त्यभावोपार्जित- मोहकर्मोदयपरिणतानां च जीवानाम् कर्मवर्गणायोग्यस्कंधास्तैलम्रक्षितानां मलपर्यायव- दष्टविधज्ञानावरणादिकर्मरूपेण परिणमंतीत्यर्थः । अत्र य एव विषयकषायकाले कर्मों- पार्जनं करोति स एव परमात्मा वीतरागनिर्विकल्पसमाधिकाले साक्षादुपादेयो भवतीति तात्पर्यार्थः ॥ ६२ ॥ इति कर्मस्वरूपकथनमुख्यत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं । अथापींद्रियचित्तसमस्तविभावचतुर्गतिसंतापाः शुद्धनिश्चयनयेन कर्मजनिता इत्यभिप्राय मनसि धृत्वा सूत्रं कथयंति, आगे विषयकषायोंमें लीन जीवोंके जो कर्मपरमाणुओंके समूह बंधते हैं वे कर्म कहे जाते हैं ऐसा कहते हैं;-[ विषयकपायैः] विषयकषायोंसे [रंगितानां ] रागी [मोहितानां] मोही जीवोंके [जीवप्रदेशेपु] जीवके प्रदेशोंमें [ये अणवः] जो परमाणु [ लगंति ] लगते है बंधते है [ तान् ] उन परमाणुओंके स्कधों ( समूहों) को [जिनाः ] जिनेन्द्रदेव [कर्म ] कर्म [ भणंति ] कहते है ॥ भावार्थ-शुद्ध आत्माकी अनुभूतिसे भिन्न जो विषयकषाय उनसे रंगे हुए आत्मज्ञानके अभावसे उपार्जन किये हुए मोहकर्मके उदयकर परिणत हुए ऐसे रागी द्वेषी मोही ससारी जीवोंके कर्मवर्गणायोग्य जो पुद्गलस्कंद है वे ज्ञानावरणादि आठ प्रकार कर्मरूप होकर परिणमते है । जैसे तेलकर चिकने शरीर में धूलि लगकर मैलरूप होके परिणमती है वैसे ही रागी द्वेषी मोही जीवोंके विषयकपायदशामें पुद्गलवर्गणा कर्मरूप होके परिणमती हैं । जो कर्मोंका उपार्जन करते हैं वही जब वीतराग निर्विकल्पसमाधिके समय कर्मोंका क्षय करते हैं तब आराधने योग्य हैं यह तात्पर्य हुआ ॥ ६२ ॥ इसप्रकार कर्मखरूपके कथनकी मुख्यताकर चार दोहा कहे । आगे पांचइंद्रिय, मन, समस्तविभाव और चार गतिके दुःख ये सब शुद्धनिश्चयनयकर कर्मसे उपजे हैं जीवके

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रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
पंचवि इंदिय अण्णु मणु, अण्णुवि सयलविभाव ।
जीवहं कम्मई जणिय जिय, अण्णुवि चउगइताव ।। ६३ ।।
पंचैव इंद्रियाणि अन्यत् मनः अन्यदपि सकलविभावः ।
जीवानां कर्मणा जनिता जीव अन्यदपि चतुर्गतितापाः ॥ ६३ ॥
पंचवि इंदिय अण्णु मणु अण्णुवि सयलविभाव पंचेंद्रियाणि अन्यन्मनः अन्यदपि
पुनरपि समस्तविभावः जीवहं कम्मइ जणिय जिय अण्णुवि चउगइताव एने जीवानां
कर्मणा जनिता हे जीव, न केवलमेते अन्यदपि पुनरपि चतुर्गतिसंतापाले कर्मजनिता
इति । तद्यथा । अतींद्रियात् शुद्धात्मनो यानि विपरीतानि पंचेंद्रियाणि शुभाशुभसंकल्प-
विकल्परहितात्मनो विपरीतमनेकसंकल्पविकल्पजालरूपं मनः, ये च शुद्धात्मतत्त्वानुभूते-
विलक्षणाः समस्तविभावपर्यायाः वीतरागपरमानंदसुखामृतप्रतिकूलाः समस्तचतुर्गतिसंतापाः
दुःखदाहाश्चेति सर्वेप्येते अशुद्धनिश्चयनयेन स्वसंवेद्याभावोपार्जितेन कर्मणा निर्मिता जीवा-
नामिति । अत्र परमात्मद्रव्यात्प्रतिकूलं यत्पंचेद्रियादिसमस्तविकल्पजालं तद्धेयं तद्विपरीनं
स्वशुद्धात्मतत्त्वं पंचेद्रियविपयामिलापादिसमस्त विकल्परहितं परमसमाधिकाले साक्षादुपा-
देयमिति भावार्थः ।। ६३ ।।
नही हैं यह अभिप्राय मनमें रखकर दोहासूत्र कहते हैं;-[पंचैव ] पाचोंही [इंद्रियाणि]
इंद्रियां [अन्यत् ] भिन्न हैं [ मनः ] मन [अपि] और [ सकलविभावः] रागादि
सब विभाव परिणाम [ अन्यत् ] अन्य है [ चतुर्गतितापाः अपि ] तथा चारों गतियोंके
दुःखभी [अन्यत् ] अन्य है [जीव ] हे जीव ये सब [जीवानां ] जीवोंके [कर्मणा]
कर्मकर [जनिताः] उपजे हैं जीवसे भिन्न है ऐसा जान । भावार्थ-इंद्रियरहित शु-
द्धात्मासे विपरीत जो स्पर्शन आदि पांच इंद्रियां, शुभ अशुभ संकल्पविकल्पसे रहित
आत्मासे विपरीत अनेकसंकल्पविकल्पसमूहरूप जो मन और शुद्धात्मतत्त्वकी अनुभूतिसे
भिन्न जो रागद्वेषमोहादिरूप सब विभाव ये सब आत्मासे जुदे हैं तथा वीतरागपरमानंद
सुखरूप अमृतसे परान्मुख जो समस्त चतुर्गतिके दुःख महान् दुखदायी वे सब जीव-
पदार्थसे भिन्न है । ये सभी अशुद्धनिश्चयनयकर आत्मज्ञानके अभावसे उपार्जन किये हुए
कर्मोंसे जीवके उत्पन्न हुए हैं । इसलिये ये सब अपने नही है कर्म जनित हैं । यहांपर
परमात्मद्रव्यसे विपरीत जो पांच इंद्रियोंको आदि लेकर सब विकल्पजाल है वे तो त्या-
गने योग्य है, उससे विपरीत पांच इंद्रियोंके विषयोंकी अभिलाषाको आदि लेकर सब
विकल्पजालोंसे रहित अपना शुद्धात्मतत्त्व वही परमसमाधि के समय साक्षात् उपादेय है।
यह तात्पर्य जानना ॥ ६३ ॥

परमात्मप्रकाशः। ७१ अथ सांसारिकसमस्तसुखदुःखानि शुद्धनिश्चयनयेन जीवानां कर्म जनयतीति निरूपयति,- दुक्खुवि सुक्खुवि बहुविहउ, जीवह कम्मु जणेइ । अप्पा देखह मुणइ पर, णिच्छउ एउ भणेइ ॥ ६४ ॥ दुःखमपि सुखमपि बहुविधं जीवानां कर्म जनयति । आत्मा पश्यति मनुते परं निश्चयः एवं भणति ॥ ६४ ॥ दुक्खुवि सुक्खुवि बहुविहउ जीवह कम्मु जणेइ दुःखमपि सुखमपि । कथंभूतं । बहुविधं जीवानां कर्म जनयति । अप्पा देखइ मुणइ पर णिच्छउ एउ भणेइ आत्मा पुनः पश्यति जानाति परं नियमेन निश्चयनयः एवं ब्रुवते इति । तथाहि-अनाकुलत्व- लक्षणपारमार्थिकवीतरागसौख्यात् प्रतिकूलं सांसारिकसुखदुःखं यद्यप्यशुद्धनिश्चयनयेन जीवजनितं तथापि शुद्धनिश्चयेन कर्मजनितं भवति । आत्मा पुनर्वीतरागनिर्विकल्पसमा- धिस्थः सन् वस्तु वस्तुस्वरूपेण पश्यति जानाति च न च रागादिकं करोति । अत्र पारमा- र्थिकसुखाद्विपरीतं सांसारिकसुखदुःखविकल्पजालं हेयमिति तात्पर्यार्थः ॥ ६४ ॥ अथ निश्चयेन बंधमोक्षौ कर्म करोतीति प्रतिपादयति, बंधुवि मोक्खुवि सयलु जिय, जीवहं कम्नु जणेइ । अप्पा किंपिवि कुणइ णवि, णिच्छउ एउ भणेइ ॥ ६५ ॥ आगे संसारके सब सुखदुःख शुद्धनिश्चयनयसे शुभ अशुभ कर्मोंकर उत्पन्न होते हैं और कौको ही उपजाते है जीवके नहीं है ऐसा कहते है,-[जीवानां ] जीवोंके [बहुविध ] अनेक तरहके [ दुःखमपि सुर्ख अपि ] दुःख और सुख दोनों ही [कर्म] कर्म ही [जनयति ] उपजाता है । [आत्मा] और आत्मा [पश्यति ] उपयोगमई होनसे देखता है [ परं मनुते ] और केवल जानता है [एवं] इस प्रकार [निश्चयः] निश्चयनय [भणति कहता है अर्थात् निश्चयनयसे भगवानने ऐसा कहा है । भावार्थ- आकुलतारहित परमार्थिक वीतरागसुखसे परान्मुख (उलटो) जो ससारके सुखदुःख यद्यपि अशुद्ध निश्चयनयकर जीवसबंधी है तौभी शुद्धनिश्चयनयकर जीवने उपजाये नही हैं इसलिये जीवके नही हैं कर्मसयोगकर उत्पन्न हुए है । और आत्मा तो वीतरागनिर्वि- ल्पसमाधिमें स्थिर हुआ वस्तुको वस्तुके स्वरूप देखता है जानता है रागादिकरूप नहीं होता उपयोगरूप है ज्ञाता द्रष्टा है परम आनंदरूप है। यहा पारमार्थिक सुखसे उलटा जो इंद्रीजनित ससारका सुखदुःख आदि विकल्पसमूह है वह त्यागने योग्य है ऐसा भग- वानने कहा है यह तात्पर्य है ॥ ६४ ॥ आगे निश्चयनयकर बंध और मोक्ष कर्मजनित ही है कर्मके योगसे बंध और कर्मके ७२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । बंधमपि मोक्षमपि सकलं जीव जीवानां कर्म जनयति । आत्मा किमपि करोति नैव निश्चय एवं भणति ॥ ६५ ॥ बंधुवि मोक्खुवि सयलु जिय जीवहं कम्मु जणेइ बंधमपि मोक्षमपि समस्तं हे जीव जीवानां कर्म कर्तृ जनयति अप्पा किंपिवि कुणइ णवि णिच्छर एउ भणेइ आत्मा किमपि न करोति बंधमोक्षस्वरूपं निश्चय एवं भणति । तद्यथा । अनुपचरितास- द्भूतव्यवहारेण द्रव्यबंधं तथैवाशुद्धनिश्चयेन भाववंधं तथा नयद्वयेन द्रव्यभावमोक्षमपि यद्यपि जीवः करोति तथापि शुद्धपारिणामिकपरमभावग्राहकेन शुद्धनिश्चयनयेन न करोत्येव भणति । कोसौ। निश्चय इति । अत्र य एव शुद्धनिश्चयेन बंधमोक्षौ न करोति स एव शुद्धात्मोपादेय इति भावार्थः ।। ६५ ।। अथ स्थलसंख्यावाचं प्रक्षेपकं कथयति, सो णस्थित्ति पएसो चउरासीजोणिलक्खमज्झम्मि। जिणवयणं ण लहंतो जत्थ ण डुलडल्लिओ जीवो ॥ ६६ ॥क्षे० स नास्त्यत्र प्रदेशः चतुरशीतियोनिलक्षमध्ये । जिनवचनं न लभमानः यत्र न भ्रमितः जीवः ॥ ६६ ॥ सो णस्थित्ति पएसो स प्रदेशो नास्त्यत्र जगति । स कि । चउरासी जोणिलक्सम- ज्झम्मि जिणवयणं ण लहंतो जत्थ ण डुलुडुल्लिओ जीवो चतुरशीतियोनिलक्षेपु मध्ये वियोगसे मोक्ष है ऐसा कहते है,-हे जीव ] हे जीव [बंधमपि ] बंधको [मोक्ष- मपि ] और मोक्षको [ सकलं ] सबको [ जीवानां ] जीवोंके [कर्म] कर्म ही [जन- यति ] करता है [आत्मा] आत्मा [किमपि] कुछ भी [ नैव करोति] नहीं करता [निश्चयः] निश्चयनय [ एवं ] ऐसा [ भणति ] कहता है अर्थात् निश्चयनयसे भगवा- नने ऐसा कहा है । भावार्थ-अनादिकालकी सबधवाली अयथार्थखरूप अनुपचरितास- द्भूतव्यवहारनयसे ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मबंध और अशुद्धनिश्चयनयसे रागादि भावकर्मके बंधको तथा दोनों नयोंसे द्रव्यकर्म भावकर्मकी मुक्तिको यद्यपि जीव करता है तौभी शुद्ध- पारिणामिकपरमभावके ग्रहण करनेवाले शुद्धनिश्चयनयसे नही करताहै बंध और मोक्षसे रहित है ऐसा भगवानने कहा है। यहां जो शुद्धनिश्चयनयकर बंध और मोक्षका कर्ता नहीं वही शुद्धात्मा आराधने योग्य है ।। ६५ ॥ आगे दोहासूत्रोंकी स्थलसंख्यासे बाहर उक्तंच स्वरूप प्रक्षेपकको कहते हैं;-[अत्र] इस जगतमें [स कः अपि ] ऐसा कोई भी [प्रदेशः नास्ति ] प्रदेश (स्थान) नहीं है कि [ यत्र ] जिस जगह [चतुरशीतियोनिलक्षमध्ये ] चौरासीलाख योनिमें होकर [जि- परमात्मप्रकाशः । भूत्वा जिनवचनमलभमानो यत्र न भ्रमितो जीव इति । तथाहि । भेदाभेदरत्नत्रयप्रति- पादकं जिनवचनमलभमानः सन्नयं जीवोऽनादिकाले यत्र चतुरशीतियोनिलक्षेषु मध्ये भूत्वा न भ्रमितः सोत्र जगति कोपि प्रदेशो नास्ति इति । अत्र यदेव भेदाभेदरत्नत्रयप्रति- पादकं जिनवचनमलभमानो भ्रमितो जीवस्तदेवोपादेयात्मसुखप्रतिपादकत्वादुपादेयमिति तात्पर्यार्थः ॥ ६६ ॥ अथात्मा पंगुवत् स्वयं न याति न चैति कमैव नयत्यानयति चेति कथयति,- अप्पा पंगुह अणुहरइ, अप्पु ण जाइ ण एइ । भुवणत्तयहं वि मज्झि जिय, विहि आणई विहि णेइ ॥ ६७ ॥ आत्मा पंगोः अनुहरति आत्मा न याति न आयाति । भुवनत्रयस्य अपि मध्ये जीव विधिः आनयति विधिः नयति ॥ ६७ ॥ अप्पा पंगुह अणुहरइ अप्पुण जाइ ण एइ आत्मा पंगोरनुहरति सदृशो भवति अयमात्मा न याति न चागच्छति । क । भुवणत्तयहवि मज्झि जिय विहि आणइ विहि णेइ भुवनत्रयस्यापि मध्ये हे जीव विधिरानयति विधिर्नयतीति । तद्यथा । अयमामा शुद्धनिश्चयेनानंतवीयत्वान् शुभाशुभकर्मरूपनिगलद्वयरहितोपि व्यवहारेण अनादिसंसारे स्वशुद्धात्मभावनाप्रतिबंधकेन मनोवचनकायत्रयेणोपार्जितेन कर्मणा निर्मितेन पुण्यपापनिग- लद्वयेन दृढतरं वद्धः सन् पंगुवद्भूत्वा स्वयं न याति न चागच्छति स एवात्मा परमात्मो- पलंभप्रतिपभभूतेन विधिशब्दवाच्येन कर्मणा भुवनत्रये नीयते तथैवानीयते चेति । अत्र नवचनं अलभमानः] जिनवचनको नही प्राप्त करताहुआ [जीवः ] यह जीव [न भ्रमितः ] नही भटका । भावार्थ-इस जगतमें कोई ऐसा स्थान नही रहा कि जहापर यह जीव निश्चय व्यवहार रत्नत्रयको कहनेवाले जिनवचनको नहीं पाता हुआ अनादिका- लसे चौरासीलाखयोनिमे होकर न घूमा हो अर्थात् जिनवचनकी प्रतीति न करनेसे सब- जगह और सब योनियोंमें भ्रमण किया जन्म मरण किये। यहां यह तात्पर्य है कि जिन वचनके न पानेसे यह जीव जगतमें भ्रमा इसलिये जिनवचन ही आराधने योग्य है ॥ ६६ ॥ आगे आत्मा पांगलेकी तरह आप न तो कहीं जाता है और न आता है कर्मही इसको ले जाते है और ले आते है ऐसा कहते है,-[हे जीव] हे जीव [आत्मा यह आत्मा [पंगोः अनुहरति ] पागलेके समान है [ आत्मा] आप [न याति ] न कहीं जाता है [न आयाति] न आता है [ भुवनत्रयस्य अपि मध्ये] तीनों लोकमें इस जीवको [विधिः] कर्म ही [नयति ] ले जाता है [विधिः] कर्म ही [आनयति] ले आता है। भावार्थ-यह आत्मा शुद्ध निश्चयनयसे अनंतवीर्य (बल)का धारण कर- १० ७४ , .. रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । वीतरागसदानंदैकरूपात्सर्वप्रकारोपादेयभूतात्परमात्मनो यद्भिन्नं शुभाशुभकर्मद्वयं तद्धेयमिनि भावार्थः ॥ ६७ ॥ इति कर्मशक्तिस्वरूपकथनस्थले सूत्राष्टकं गतं । अत ऊर्ध्व भेदाभेदभावनामुख्यतया पृथक् पृथक् स्वतंत्रसूत्रनवकं कथयति;- अप्पा अप्पुजि पर जि परु, अप्पा पर जि ण होइ । परु जि कयाइवि अप्पु णवि, णियमि पभणहिं जोइ ।। ६८ ॥ आत्मा आत्मा एव परः एव परः आत्मा परः एव न भवति । पर एव कदाचिदपि आत्मा नैव नियमेन प्रभणंति योगिनः ॥ ६८ ॥ अप्पा अप्पु जि परु जि परु, अप्पा पर जि ण होइ आमालैव पर एव परः आत्मा पर एव न भवति परु जि कयाइवि अप्पु णवि णियमें पभणहिं जोइ पर ण्व कदाचि- दप्यात्मा नैव भवति नियमेन निश्चयेन भणंति कथयति । के कथयति । परमयोगिन इति । तथाहि । शुद्धात्मा केवलज्ञानादिस्वभावः शुद्धात्मामेव परः कामक्रोधादिस्वभावः पर एव पूर्वोक्तः । परमात्माभिधानं तदैकस्वस्वभावं त्यक्त्वा कामक्रोधादिरूपो न भवति । कामक्रोधादि- रूपः परः क्वापि काले शुद्धाला न भवतीति परमयोगिनः कथयति । अन मोक्षसुखादुपादे- यभूतादभिन्नः कामक्रोधादिभ्यो भिन्नो यः शुद्धामा स एवोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ ६८॥ नेवाला होनेसे शुभ अशुभकर्मरूपबंधनसे रहित है तौभी व्यवहारनयसे इस अनादि संसा- रमे निजशुद्धात्माकी भावनासे विमुख जो मन वचन काय इन तीनोंसे उपार्जे कर्मोंकर उत्पन्न हुए पुण्यपापरूप बंधनोंकर अच्छीतरह बंधा हुआ पांगलेके समान आप न कही जाता है न कही आता है । जैसे बंदीवान आपसे न कही जाता है और न कही आता है चौकीदारोकर ले गया जाता है और आता है आप तो पांगलेके समान है । वही आत्मा परमात्माकी प्राप्तिके रोकनेवाले चतुर्गतिरूपसंसारके कारणस्वरूप कर्मोकर तीन जगतमे गमन आगमन करता है एक गतिसे दूसरी गतिमें जाता है । यहां सारांश यह है कि वीतराग परम आनंदरूप तथा सबतरह उपादेयरूप परमात्मासे (अपने खरूपसे) भिन्न जो शुभ अशुभ कर्म है वे त्यागने योग्य हैं ॥ ६७ ॥ इस प्रकार कर्मकी शक्तिके स्वरूपके कहनेकी मुख्यतासे आठवें स्थलमें आठ दोहा कहे । इससे आगे भेदाभेदरत्नत्रयकी भावनाकी मुख्यतासे जुदे २ स्वतंत्र नौ सूत्र कहते हैं;-[आत्मा ] निजवस्तु [आत्मा एव] आत्मा ही है [परः] देहादि पदार्थ [पर एव ] पर ही हैं [आत्मा] आत्मा तो [ परः न एव ] परद्रव्य नहीं [भवति] होता [पर एव ] और परद्रव्य भी [कदाचिदपि ] कभी [आत्मा न एव ] आत्मा नही होता ऐसा [नियमेन] निश्चयकर [ योगिनः] योगीश्वर [प्रभणंति ] कहते है । भावार्थ-शुद्धात्मा तो केवलज्ञानादि खभाव है जडरूप नही है उपाधिरूप नहीं है परमात्मप्रकाशः। ७५ अथ शुद्धनिश्चयेनोत्पत्तिमरणं बंधमोक्षौ न करोत्यालेति प्रतिपादयति,- णवि उप्पजइ णवि मरइ, बंधु ण मोक्खु करेइ । जिउ परमत्थें जोइया, जिणवरु एउ भणेइ ।। ६९ ॥ नापि उत्पद्यते नापि म्रियते बंधं न मोक्षं करोति । जीवः परमार्थेन योगिन् जिनवरः एवं भणति ॥ ६९ ।। नाप्युत्पद्यते नापि म्रियते बंधमोक्षं च न करोति । कोसौ कर्ता । जीवः । केन । परमार्थेन हे योगिन् जिनवर एवं ब्रूते कथयति । तथाहि । यद्यप्याला शुद्धालानुभूत्यभावे सति शुभाशुभोपयोगाभ्यां परिणम्य जीवितमरणशुभाशुभवंधान करोति । शुद्धामानुभूति- सद्भावे तु शुद्धोपयोगेन परिणम्य मोक्षं च करोति तथापि शुद्धपारिणामिकपरमभाव- ग्राहकेण शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन न करोति । अत्राह शिष्यः । यदि शुद्धद्रव्यार्थिकलक्षणेन शुद्धनिश्चयेन मोद्धं च न करोति तर्हि शुद्धनयेन मोक्षो नास्तीति तदर्थमनुष्ठानं वृथा। परिहारमाह । मोक्षो हि बंधपूर्वकः स च बंधः शुद्धनिश्चयेन नास्ति तेन कारणेन बंधप्र- तिपक्षभूतो मोक्षः सोपि शुद्धनिश्चयेन नास्ति यदि पुनः शुद्धनिश्चयेन बंधो भवति तदा शुद्धात्मखरूपही है । पर जो कामक्रोधादि पर वस्तु भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्म हैं वे पर ही हैं अपने नहीं हैं, जो यह आत्मा ससार अवस्थामें यद्यपि अशुद्धनिश्चयनयकर काम- क्रोधादिरूप हो गया है तौभी परमभावके ग्राहक शुद्धनिश्चयनयकर अपने ज्ञानादि निज- भावको छोड़कर कामक्रोधादिरूप नही होता अर्थात् निजभावरूप ही है । ये रागादिविभा- वपरिणाम उपाधिक हैं परके सबंधसे हैं निजभाव नही है इसलिये आत्मा कभी इन रागादिरूप नही होता ऐसा योगीश्वर कहते हैं । यहां उपादेयरूप मोक्षसुख (अतींद्रिय सुख) से तन्गय और काम क्रोधादिकसे भिन्न जो शुद्धात्मा है वही उपादेय है ऐसा अभिप्राय है ॥ ६८॥ आगे शुद्धनिश्चयनयकर आत्मा जन्म मरण बंध और मोक्षको नही करता है जैसा है वैसा ही है ऐसा निरूपण करते है।-[हे योगिन् ] हे योगीश्वर [ परमार्थेन] निश्चयनयकर विचारा जावे तो [जीवः ] यह जीव [नापि उत्पद्यते] न तो उत्पन्न होता है [नापि म्रियते] न मरता है [च] और [न बंधं मोक्षं] न बंध मोक्षको [करोति] करता है अर्थात् शुद्ध निश्चयसे बंधमोक्षसे रहित है [एवं ] ऐसा [जिन- वरः] जिनेन्द्रदेव [भणति ] कहते हैं । भावार्थ-यद्यपि यह आत्मा शुद्धात्मानुभूतिके अभावके होनेपर शुभअशुभ उपयोगोंसे परिणमनकरके जीवन मरण शुभअशुभकर्मबंधको करता है और शुद्धात्मानुभूतिके प्रगट होनेपर शुद्धोपयोगसे परिणत होकर मोक्षको करता है, तौभी शुद्ध पारिणामिक परमभावग्राहक शुद्धद्रव्यार्थिकनयकर न बंधका कर्ता है और ७६ , रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । सर्वदैव बंध एव । अस्मिन्नर्थे दृष्टांतमाह । एकः कोपि पुरुपः शृंखलाबद्धस्तिष्ठति द्विती- यस्तु बंधनरहितस्तिष्ठति । यस्य बंधभावो मुक्त इति व्यवहारो घटते, द्वितीयं प्रति मोक्षो जातो भवत इति यदि भण्यते तदा कोपं करोति । कस्माद्वंधाभावे मोक्षवचनं कथं घटत इति । तथा जीवस्यापि शुद्धनिश्चयेन बंधाभावे मुक्तवचनं न घटते इति । अत्र वीतराग- निर्विकल्पसमाधिरतो मुक्तजीवसदृशः स्वशुद्धामोपादेय इति भावार्थः ॥ ६९ अथ निश्चयनयेन जीवस्योद्भवजरामरणरोगलिगवर्णसंज्ञा नास्तीति कथयंति;- अत्थि ण उन्भउ जरमरणु, रोयवि लिंगवि चण्ण । णियमि अप्पु वियाणि तुह, जीवहं एकवि सण ॥ ७० ॥ अस्ति न उद्भवः जरामरणः रोगाः अपि लिंगान्यपि वर्णाः । नियमेन आत्मन् विजानीहि त्वं जीवस्य एकापि संज्ञा ॥ ७० ॥ अत्थि ण उन्भउ जरमरणु रोयवि लिंगवि वण्ण अस्ति न न विद्यते । किं किं नास्ति । उम्भउ उत्पत्तिः जरामरणरोगा अपि लिगान्यपि वर्णाः णियमि अप्पु वियाणि न मोक्षका कर्ता है। ऐसा कथनसुनकर शिष्यने प्रश्न किया कि हे प्रभो शुद्धद्रव्यार्थिक- खरूप शुद्धनिश्चयनयकर मोक्षकाभी कर्ता नहीं है तो ऐसा समझना चाहिये कि शुद्धनयकर मोक्षही नही है जव मोक्ष नही तब मोक्षके लिये यत्न करना वृथा है । उसका उत्तर कहते है-मोक्ष है वह बंधपूर्वक है और बंध है वह शुद्धनिश्चयनयकर होता ही नहीं इसकारण बंधके अभावरूप मोक्ष है वह भी शुद्धनिश्चयनयकर नही है। जो शुद्धनिश्चय- नयसे बंध होता तो हमेशा बंधा ही रहता कभी बंधका अभाव न होता । इसके बारेमें दृष्टांत कहते हैं--कोई एक पुरुष सांकलसे बंध रहा है और कोई एक पुरुष बंध रहित है उनमेंसे जो पहले बंधा था उसको तो 'मुक्त' (छूटा) ऐसा कहना ठीक मालूम पडता है और दूसरा जो बंधा ही नहीं उसको जो 'आप छूट गये' ऐसा कहा जाय तो वह क्रोध करै जो मै कब बंधाथा सो यह मुझे 'छूटा' कहता है, बंधा होवै वह छूटै इसलिये बंधेको तो मोक्ष कहना ठीक है और बंधा ही न हो उसे छूटा कैसे कहसकते हैं। उसी प्रकार यह जीव शुद्धनिश्चयनयकर बंधा हुआ नही है इसकारण मुक्त कहना ठीक नही है । बंध भी व्यवहारनयकर और मुक्ति भी व्यवहारनयकर है, शुद्धनिश्चयनयकर न बंध है न मोक्ष है और अशुद्धनयकर बंध है इसलिये बंधके नाशका यत्न भी अवश्य करना चाहिये । यहां यह अभिप्राय है कि सिद्धसमान यह अपना शुद्धात्मा वीतरागनिर्विकल्प- समाधिमें लीन पुरुषोंको उपादेय है अन्य सब हेय हैं ॥ ६९ ॥ आगे निश्चयनयकर जीवके जन्म जरा मरण रोग लिंग वर्ण और संज्ञा नहीं है आत्मा परमात्मप्रकाशः। ७७ तुहुं जीवहं एकवि सण्ण नियमेन निश्चयेन हे आत्मन् हे जीव विजानीहि त्वं । कस्य नास्ति । जीवस्य न केवलमतन्नास्ति संज्ञापि नास्तीति । अत्र संज्ञाशब्देनाहारादिसंज्ञा नामसंज्ञा वा ग्राह्या । तथाहि । वीतरागनिर्विकल्पसमाधेर्विपरीतैः क्रोधमानमायालोभप्रभृ- तिविभावपरिणामैर्यान्युपार्जितानि कर्माणि तदुदयजनितान्युद्भवादीनि शुद्धनिश्चयेन न संति जीवस्य । ते कस्मान्न संति । केवलज्ञानाद्यनंतगुणैः कृत्वा निश्चयेनानादिसंतानागतो- द्भवादिभ्यो भिन्नत्वादिति । अत्र उपादेयरूपानंतसुखाविनाभूतशुद्धजीवात्तच्छकाशाद्यानि भिन्नान्युद्भवादीनि तानि हेयानीति तात्पर्यार्थः ॥ ७० ॥ यद्युद्भवादीनि स्वरूपाणि शुद्धनिश्चयेन जीवस्य न संति तर्हि कस्य संतीति प्रश्ने देहस्य भवंतीति प्रतिपादयति, देहहं उन्भउ जरमरणु, देहहं वण्णु विचित्तु । देहहं रोय वियाणि तुहूं, देहहं लिंगु विचित्तु ॥ ७१ ॥ देहस्य उद्भवः जरा मरणं देहस्य वर्णः विचित्रः । देहस्य रोगान् विजानीहि त्वं देहस्य लिंगं विचित्रं ॥ ७१ ॥ देहस्य भवति । कि किं । उन्भउ उत्पत्तिः जरामरणं च वर्णो विचित्रः । वर्णशब्देनात्र इन सब विकारोंसे रहित है ऐसा कहते है-[हे आत्मन् ] हे जीव आत्माराम [जीवस्य ] जीवके [ उद्भवः न ] जन्म नही [ अस्ति ] है [जरामरणः ] जरा मरण [रोगा अपि ] रोगभी [लिंगान्यपि ] चिन्ह भी [वर्णाः ] वर्ण [ एका संज्ञा अपि] आहारादिक एकभी संज्ञा वा नाम नहीं है ऐसा [त्वं] तू [नियमेन] निश्चयकर [विजानीहि ] जान । भावार्थ-वीतरागनिर्विकल्पसमाधिसे विपरीत जो क्रोध मान माया लोभ आदि विभाव परिणाम उनकर उपार्जन किये कर्मोंके उदयसे उत्पन्न हुए जन्ममरण आदि अनेक विकार है वे शुद्धनिश्चयनयकर जीवके नहीं है, क्योंकि निश्चय- नयकर आत्मा केवलज्ञानादि अनंत गुणोंकर पूर्ण है और अनादिसतानसे प्राप्त जन्म जरा मरण रोग शोक भय, स्त्री पुरुष नपुंसकलिंग, सफेद काला वगैरः वर्ण, आहार भय मैथुन परिग्रहरूप संज्ञा-इन सबोंसे भिन्न है । यहां उपादेयरूप अनंतसुखका धाम जो शुद्धजीव उससे भिन्न जन्मादिक है वे सब त्याज्य हैं एक आत्मा ही उपादेय है यह तात्पर्य जानना ॥ ७० ॥ आगे जो शुद्धनिश्चयनयकर जन्ममरणादि जीवके नही है तो किसके है ऐसा शिष्यके प्रश्न करनेपर समाधान यह है कि ये सब देहके है ऐसा कथन करते है, श्रीगुरु कहते है कि हे शिष्य [त्वं] तू [ देहस्य ] देहके [उद्भवः] जन्म [जरा मरणं ] जरा मरण होते है अर्थात् नया शरीर धरना विद्यमान शरीर छोडना वृद्ध , ७८ - रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । पूर्वसूत्रे च श्वेतादि ब्राह्मणादि वा गृह्यते तस्यैव दहस्य रोगान् विजानीहीति लिंगमपि लिंगशब्देनात्र पूर्वसूत्रे च स्त्रीपुंनपुंसकलिगं यतिलिगं वा ग्राह्यं चित्तं मनश्चेति । तद्यथा- शुद्धाससम्यश्रद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरत्नत्रयभावनाप्रतिकूलै रागद्वेपमोहर्यान्युपार्जितानि कर्माणि तदुदयसंपन्ना जन्ममरणादिधर्मा यद्यपि व्यवहारनयेन जीवस्य संति तथापि निश्चयनयेन देहस्येति ज्ञातव्यं । अत्र देहादिममत्वरूपविकल्पजालं त्यक्त्वा यदा वीतराग- सदानंदैकरूपेण सर्वप्रकारोपादेयभूतेन परिणमति तदा स्वशुद्धालवोपादेय इति भावार्थः।।७१ अथ देहस्य जरामरणं दृष्ट्वा मा भयं जीव कार्षीरिति निरूपयति, देहहं पेक्खिवि जरमरणु, मा भउ जीव करेहि । जो अजरामरु वंभु परु, सो अप्पाणु मुणेहि ॥७२॥ देहस्य दृष्ट्वा जरामरणं मा भयं जीव कार्षीः । यः अजरामरः ब्रह्म परः तं आत्मानं मन्यस्ख ॥ ७२ ॥ देहह पेक्खिवि जरमरणु मा भउ जीव करेहि देहसंबंधि दृष्ट्वा । किं । जरामरणं मा भयं कार्षीः हे जीव । अयमों यद्यपि व्यवहारेण जीवस्य जरामरणं तथापि शुद्धनि- श्चयेन देहस्य न च जीवस्येति मत्त्वा भयं मा कार्षीः । तर्हि किं कुरु । जो अजरामरु वंभु परु सो अप्पाणु मुणेहि यः कश्चिदजरामरो जरामरणरहितब्रह्मशब्दवाच्यः शुद्धामा । , अवस्था होना ये सब देहके जानो [देहस] देहके [विचित्रः वर्णः] अनेकतरहके सफेद श्याम हरे पीले लालरूप पांचवर्ण अथवा ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ये चार वर्ण [देहस्य ] देहके [रोगान् ] वात पित्त कफ आदि अनेक रोग [देहस्य] देहके [विचित्रं लिंगं] अनेक प्रकारके स्त्रीलिंग पुरुषलिंग नपुंसकलिंग रूप चिन्हको अथवा यतिके लिंगको और द्रव्यमनको [विजानीहि ] जान । भावार्थ-शुद्धात्माका सच्चा श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप अभेद रत्नत्रयकी भावनासे विमुख जो रागद्वेषमोह उनकर उ- पार्जे जो कर्म उनसे उपजे जन्ममरणादिविकार है वे सब यद्यपि व्यवहारनयसे जीवके है तौभी निश्चयनयकर जीवके नही है देहसंबंधी है ऐसा जानना चाहिये । यहाँपर देहादि- कमें ममतारूप विकल्पजालको छोड़कर जिससमय यह जीव वीतराग सदा आनंदरूप सवतरह उपादेयरूप निजभावोंकर परिणमता है तब अपना यह शुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसा अभिप्राय जानो ॥ ७१ ।। आगे ऐसा कहते हैं कि हे जीव तू जरा मरण देहके जानकर डर मत करैः- [हे:जीव ] हे आत्माराम तू [ देहस्य ] देहके [जरामरणं] वुढापा मरनेको [दृष्ट्वा ] देखकर [ भयं] डर [मा कार्षीः ] मत करै [यः] जो [अजरामरः] अजर अमर परमात्मप्रकाशः। ७१ कथंभूतः । परः सर्वोत्कृष्टस्तमित्थंभूतं परं ब्रह्मस्वभावमात्मानं जानीहि पंचेद्रियविषयप्रभृ- तिसमस्तविकल्पजालं मुक्त्वा परमसमाधौ स्थित्वा तमेव भावयेति भावार्थः ॥ ७२ ॥ अथ देहे छिद्यमानेपि भिद्यमानेपि शुद्धात्मानं भावयेत्यभिप्रायं मनसि धृत्वा सूत्रं प्रतिपादयति,- छिजउ भिजउ जाउ खउ, जोइय एहु सरीरु । अप्पा भावहि णिम्मलउ, जिं पावहि भवतीरु ॥७३ ।। छिद्यतां भिद्यतां यातु क्षयं योगिन् इदं शरीरम् । आत्मानं भावय निर्मलं येन प्राप्नोसि भवतीरं ॥ ७३ ॥ छिजउ भिजउ जाउ खउ जोइय एहु सरीरु छिद्यतां वा द्विधा भवतु भिद्यतां वा छिद्री भवतु क्षयं वा यातु हे योगिन् इदं शरीरं तथापि त्वं किं कुरु । अप्पा भावहि णिम्मलउ आसानं वीतरागचिदानंदैकस्वभावं भावय । किं विशिष्टं । निर्मलं भावकर्मद्र- व्यकर्मनोकर्मरहितं । येन किं भवति । जि पावहि भवतीरु येन परमात्मध्यानेन प्राप्नोसि लभसे त्वं हे जीव । किं । भवतीरं संसारसागरावसानमिति । अत्र योसौ देहस्य छेदनादि- व्यापारेपि रागद्वेपादिक्षोभमकुर्वन् सन् शुद्धालानं भावयतीति संपादनादर्वाङ्मोक्षं स गच्छतीति भावार्थः ॥ ७३ ॥ [ परः ब्रह्म ] परम ब्रह्म शुद्धखभाव है [तं ] उसको तू [ आत्मानं ] आत्मा [मन्यख] जान । भावार्थ-यद्यपि व्यवहार नयसे जीवके जरा मरण हैं तौभी शुद्धनिश्चयनयकर जीवके नहीं हैं देहके हैं ऐसा जानकर भय मत करै तू अपने चित्तमें ऐसा समझ कि जो कोई जरा मरणरहित अखंड पर ब्रह्म है वैसा ही मेरा वरूप है शुद्धात्मा सबसे उत्कृष्ट है ऐसा तू अपना खभाव जान । पाच इंद्रियोंके विषयोंको आदिदे समस्त विक- ल्पजालोंको छोड़कर परमसमाधिमें स्थिर होकर निज आत्माको ही ध्याय यह तात्पर्य हुआ ॥ ७२ ॥ आगे जो देह छिद जावे मिद जावे क्षय हो जावे तौभी तू भय मत करै केवल शुद्ध आत्माका ध्यानकर ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर सूत्र कहते है-[हे योगिन् ] हे योगी [इदं शरीरं] यह शरीर [ छिद्यतां] छिदजावै दो टुकडे हो जावें [भिद्यतां ] अथवा भिद जावै छेदसहित हो जावै [क्षयं यातु] नाशको प्राप्त होवै तौभी तू भय मतकरै मनमें खेद मत लावै [ निर्मलं आत्मानं ] अपने निर्मल आत्माका ही [ भावय ] ध्यान- कर अर्थात् वीतराग चिदानंद शुद्धखभाव तथा भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्मसे रहित अपने आत्माका चिंतवन कर [येन] जिस परमात्माके ध्यानसे तू [भवतीरं] भवसागरका पार [प्राप्नोसि] पावै । भावार्थ-जो देहके छेदनादि कार्य होते भी रागद्वेषादि वि- रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथ कर्मकृतभावानचेतनं द्रव्यं च निश्चयनयेन जीवाद्भिन्नं जानीहीति कथयति,- कम्महं केरा भावड़ा, अण्णु अचेयणु दन्छ । जीवसहावहं भिण्णु जिय, णियमिं बुज्झहि सन्चु ॥ ७४ ।। कर्मणः कृता भावाः अन्यत् अचेतनं द्रव्यं । जीवस्वभावात् भिन्नं जीव नियमेन वुध्यख सवै ॥ ७ ॥ कम्मह केरा भावडा अण्णु अचेयणु दन्चु कर्मसंबंधिनो रागादि भावानन्यं चा- चेतनं देहादिद्रव्यं एतत्पूर्वोक्तं अप्पसहावहं भिण्णु जिय विशुद्धन्नानदानस्वरूपादात्मत्र- भावान्निश्चयेन भिन्नं पृथग्भूतं हे जीव णियमि बुझहि सन्चु नियमेन निश्चयेन बुध्यस्व जानीहि सर्व समस्तमिति । अत्र मिथ्यात्वाविरतिप्रमादकपाययोगनिवृत्तिपरिणामकाले शुद्धासोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ ७४ ॥ अथ ज्ञानमयपरमात्मनः सकाशादन्यत्परदव्यं मुक्त्वा शुद्धात्मानं भावयेति निरूपयति;- अप्पा मेल्लिवि णाणसउ, अण्णु परायउ भाउ। सो छंडेविणु जीव तुहुं, भावहि अप्पसहाउ ॥ ७९ ॥ आत्मानं मुक्त्वा ज्ञानमयं अन्यः परः भावः । तं छंडयित्वा जीव वं भावय आत्मस्वभावं ॥ ७५ ॥ अप्पा मिल्लिविणाणमर अण्णु परायउ भाउ आत्मानं मुक्ता । किं विशिष्टं । ज्ञानमयं केवलनानांतर्भूतानंतगुणराशि निश्चयान् अन्यो मिन्नोऽभ्यंतरे मिथ्यात्वरागादि कल्प नहीं करता निर्विकल्प भावको प्राप्त हुआ शुद्ध आत्माको ध्यावता है वह थोड़े ही समयमें मोक्षको पाता है ।। ७३ ॥ आगे ऐसा कहते हैं जो कर्मननितरागादिभाव और गरीरादि पर वस्तु हैं वे चेतन द्रव्य न होनेसे निश्चयनयकर जीवसे भिन्न हैं ऐसा जानो;-[हे जीव ] हे जीव [कर्मणः कृता भावाः] कर्मोकर जन्य रागादिक भाव और [अन्यत् ] दूसरा [अचे- तनं द्रव्यं ] गरीरादिक अचेतन पदार्थ [सर्व] इन सबको [नियमेन] निश्वयसे [जीवस्वभावात् ] जीवके खभावसे [भिन्नं] जुदे [बुध्यस्व ] जानो अर्थात् ये सब कर्मके उदयसे उत्पन्न हुए हैं आत्माका खभाव निर्मलज्ञानदर्शनमई है । भावार्थ-यह है कि जो मिथ्यात्व अविरत प्रमाद कपाय योगोकी निवृत्तिरूप परिणाम हैं उस समय शुद्ध आत्मा ही उपादेय है ॥ ७४ ।। आगे ज्ञानमई परमात्मासे भिन्न परद्रव्यको छोड़कर तू गुदात्माका ध्यानकर ऐसा कहते है। [हे जीव ] हे जीव [त्वं] तू [ज्ञानमयं] ज्ञानमई [आत्मानं] आ- , परमात्मप्रकाशः। बहिर्विपये देहादिपरभावः सो छडेविणु जीव तुहं भावहि अप्पसहाउ तं पूर्वोक्त शुद्धात्मनो विलक्षणं परभाव छंडयित्वा त्यक्त्वा हे जीव त्वं भावय । कं । स्वशुद्धालख- भावं । किं विशिष्टं । केवलज्ञानाद्यनंतचतुष्टयव्यक्तिरूपकार्यसमयसारसाधकमभेदरत्नत्रया- मककारणसमयसारपरिणतमिति । अत्र तमेवोपादेयं जानीहीत्यभिप्रायः ॥ ७५ ॥ अथ निश्चयेनाष्टकर्मसर्वदोपरहिनं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रसहितमात्मानं जानीहीति कथयति,- अहं कम्महं बाहिरड, सयलहं दोसई चत्तु । दसणणाणचरित्तमउ, अप्पा भावि णिरुत्तु ॥ ७६ ॥ अष्टाभ्यः कर्मभ्यः बाह्यं सकलैः दोषैः त्यक्तं । दर्शनज्ञानचारित्रमयं आत्मानं भावय निश्चितं ॥ ७६ ॥ अहहं कम्महं बाहिरउ सयलहं दोसहं चत्तु अष्टकर्मभ्यो बार्य शुद्धनिश्चयेन ज्ञानाव- रणाद्यष्टकर्मभ्यो भिन्नं मिथ्यात्वरागादिभावकर्मरूपसर्वदोषैत्यक्तं । पुनश्च किं विशिष्टं । दसणणाणचरित्तमउ दर्शनज्ञानचारित्रमयं शुद्धोपयोगाविनाभूतैः स्वशुद्धात्मसम्यग्दर्शन- ज्ञानचारित्रैनिवृत्तं अप्पा भावि णिस्तु तमित्थंभूतमात्मानं भावय । दृष्टश्रुतानुभूतभोगा- कांक्षारूपनिदानबंधादिसमस्तविभावपरिणामान् त्यक्त्वा भावयेत्यर्थः । णिरुत्तु निश्चितं । अन्न निर्वाणसुखादुपादेयभूतादभिन्नः समस्तभावकर्मद्रव्यकर्मभ्यो भिन्नो योसौ शुद्धात्मा स एवाभेदरत्नत्रयपरिणतानां भव्यानामुपादेय इति भावार्थः ॥ ७६ ॥ एवं त्रिविधात्मप्रति- पादकप्रथममहाधिकारमध्ये पृथक् पृथक् स्वतंत्रं भेदभावनास्थलसूत्रनवकं गतं । स्माको [ मुक्त्वा ] छोड़कर [अन्यः परः भावः ] अन्य जो दूसरे भाव हैं [तं] उनको [छंडयित्वा] छोडकर [आत्मस्वभावं ] अपने शुद्धात्मखभावको [भावय] चितवनकर भावार्थ-केवलज्ञानादि अनंतगुणोंकी राशि आत्मासे जुदे जो मिथ्यात्वरागादि अंदरके भाव तथा देहादि वाहिरके पर भाव ऐसे जो शुद्धात्मासे विलक्षण परभाव हैं उनको छो- ड़कर केवल ज्ञानादि अनंतचतुष्टयरूप कार्यसमयसारका साधक जो अभेदरनयरूप कारण समयसार है उस रूप परिणत हुए अपने शुद्धात्मखभावको चितवन कर और उसीको उपादेय समझ, ऐसा हुआ ॥ ७५ ॥ आगे निश्चयनयकर आठ कर्म और सब दोषोरहित सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्रमई आ- त्माको तू जान ऐसा कहते हैं;-[अष्टाभ्यः कर्मभ्यः ] शुद्धनिश्चयनयकर ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंसे [ बाह्यं ] रहित [ सकलैः दोषैः ] मिथ्यात्वरागादि सब विकारोसे [ त्यक्तं] रहित [दर्शनज्ञानचारित्रमयं] शुद्धोपयोगके साथ रहनेवाले अपने सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्ररूप भावखरूप [आत्मानं ] आत्माको [ निश्चितं ] निश्चयकर [ भावय ] चिंत- ८२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । तदनंतरं निश्चयसम्यग्दृष्टिमुख्यत्वेन स्वतंत्रसूत्रमेकं कथयति,- अप्पिं अप्पु मुणंतु जिउ, सम्मादिहि हवेइ । सम्माइडिउ जीवडउ, लहु कम्मइ मुच्चेइ ॥ ७७॥ आत्मना आत्मानं जानन् जीवः सम्यग्दृष्टिः भवति सम्यग्दृष्टिः जीवः लघु कर्मणा मुच्यते ॥ ७७ ॥ अप्पि अप्पु मुणंतु जिउ सम्मादिहि हवेइ आत्मनात्मानं जानन् सन् जीवो वीतरागस्वसंवेदनज्ञानपरिणतेनांतरात्मना स्वशुद्धात्मानं जानन्ननुभवन् सन् जीवः कर्ता वीतरागसम्यग्दृष्टिर्भवति । निश्चयसम्यक्त्वभावनायां फलं कथ्यते सम्माइडिउ जीवडउ लहु कम्मइ मुच्चेइ सम्यग्दृष्टिः जीवो लघु शीघ्र ज्ञानावरणादिकर्मणा मुच्यते इति । अत्र येनैव कारणेन वीतरागसम्यग्दृष्टिः किल कर्मणा शीघ्रं मुच्यते तेनैव कारणेन वीतरागचा- रित्रानुकूलं शुद्धात्मानुभूत्यविनाभूतं वीतरागसम्यक्त्वमेव भावनीयमित्यभिप्रायः । तथाचोक्तं श्रीकुंदकुंदाचार्मोक्षप्राभृते निश्चयसम्यक्त्वलक्षणं-"सद्दव्वरवो सवणो सम्मादिट्ठी हवेइ णियमेण । सम्मत्तपरिणदो उण खवेइ दुट्ठ कम्माई" ॥ ७७ ।। वन कर । भावार्थ-देखे सुने अनुभवे भोगोंकी अभिलाषारूप सब विभाव परिणामोंको छोड़कर निजस्वरूपका ध्यानकर । यहां उपादेयरूप अतींद्रियसुखसे तन्मई और सब भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्मसे जुदा जो शुद्धात्मा है वही अभेद रत्नत्रयको धारण करनेवाले निकटमव्योंको उपादेय है ऐसा तात्पर्य हुआ ॥ ७६ ॥ ऐसें तीन प्रकार आत्माके कहनेवाले प्रथम महाधिकारमें जुदे जुदे स्वतंत्र भेदभावनाके स्थलमें नौ दोहासूत्र कहे । आगे निश्चयकर सम्यग्दृष्टीकी मुख्यतासे खतंत्र एक दोहा- सूत्र कहते हैं;-[आत्मानं] अपनेको [आत्मना] अपनेसे [जानन् ] जानता हुआ यह [जीवः ] जीव [ सम्यग्दृष्टिः] सम्यग्दृष्टि [भवति ] होता है [सम्यग्दृष्टिः जीवः ] और सम्यग्दृष्टि हुआसंता [लघु] जल्दी [ कर्मणा] कर्मोंसे [मुच्यते ] छूट जाता है ॥ भावार्थ-यह आत्मा वीतराग वसंवेदनज्ञानमें परिणत हुआ अंतरात्मा होकर अपनेको अनुभवता हुआ वीतराग सम्यदृष्टि होता है तव सम्यग्दृष्टि होनेके कार- णसे ज्ञानवरणादि कर्मोंकर शीघ्र ही छूट जाता है रहित हो जाता है। यहां जिस हेतु वीतराग सम्यदृष्टि होनेसे यह जीव कर्मोसे छूटकर सिद्ध हो जाता है इसीकारण वीतराग चारित्रके अनुकूल जो शुद्धात्मानुभूतिरूप वीतराग सम्यक्त्व है वही ध्यावने योग्य है ऐसा अभिप्राय हुआ। ऐसा ही कथन श्रीकुंदकुंदाचार्यने मोक्षपाहुडिग्रंथमें निश्चयसम्यक्त्वके लक्षणमें किया है "सद्दबरओ" इत्यादि-उसका अर्थ यह है कि आत्मखरूपमें मगन परमात्मप्रकाशः। ८३ - अत ऊर्ध्व मिथ्यादृष्टिलक्षणकथनमुख्यत्वेन सूत्राष्टकं कथ्यते तद्यथा;- पज्जयरत्तउ जीवडउ, मिच्छादिहि हवेइ । बंधइ बहुविहकम्मडा, जे संसारु भमेइ ॥७८ ॥ पर्यायरक्तो जीवः मिथ्यादृष्टिः भवति । बध्नाति बहुविधकर्माणि यैः संसारं भ्रमति ॥ ७८ ॥ पञ्जयरत्तउ जीवडउ मिच्छादिहि हवेइ पर्यायरक्तो जीवो मिथ्यावृष्टिर्भवति परमा- त्मानुभूतिरुचिप्रतिपक्षभूताभिनिवेशरूपा व्यावहारिकमूढत्यादिपंचविंशतिमलांतर्भाविनी मिथ्या वितथा व्यलीका च सा दृष्टिरभिप्रायो रुचिः प्रत्ययः श्रद्धानं यस्य स भवति मिथ्या- दृष्टिः । स च किं विशिष्टः । नरनारकादिविभावपर्यायरतः । तस्य मिथ्यापरिणामस्य फलं कथ्यते । बंधइ बहुविहकम्मडा में संसारु भमेइ बध्नाति बहुविधकर्माणि यैः संसार भ्रमति येन मिथ्यात्वपरिणामेन शुद्धात्मोपलव्धेः प्रतिपक्षभूतानि बहुविधकर्माणि बध्नाति तैश्च कर्मभिव्यक्षेत्रकालभवभावरूपं पचप्रकारं संसार परिभ्रमतीति।तथा चोक्तं मोक्षप्राभृते निश्चयमिथ्यादृष्टिलक्षणं । "जो पुणु परदव्वुरओ मिच्छाइट्ठी हवेइ सो साहू। मिच्छत्त- परिणदो उण वजादि दुट्ठकम्महि" ॥ पुनश्चोक्तं तैरेव । “जे पज्जएसु णिरदा जीवा परसमइगत्ति णिहिट्ठा । आदसहावम्मि ठिदा ते सगसमया मुणेयव्वा" ॥ अत्र वसंवित्ति- रूपाद्वीतरागसम्यक्त्वात् प्रतिपक्षभूतं मिथ्यात्वं हेयमिति भावार्थः ॥ ७८ ॥ हुआ जो यति वह निश्चयकर सम्यग्दृष्टि होता है फिर वह सम्यग्दृष्टि सम्यक्त्वरूप परिणमता हुआ दुष्ट आठ कर्मोंको क्षय करता है । ७७ ॥ इसके वाद मिथ्यादृष्टिके लक्षणके कथनकी मुख्यतासे आठ दोहा कहते हैं;-[पर्या- यरक्तः जीवः ] शरीर आदि पर्यायमें लीन हुआ जो अज्ञानी जीव है वह [ मिथ्या- दृष्टिः ] मिथ्यादृष्टि [भवति ] होता है और फिर वह [बहुविधकर्माणि ] अनेक प्रकारके कर्मोंको [वनाति ] बांधता है [ यः ] जिनसे कि [ संसारं] ससारमें [भ्रमति] भ्रमण करता है । भावार्थ-~-परमात्माकी अनुभूतिरूप श्रद्धासे विमुख जो आठ मद आठ मल छह अनायतन तीन मूढता इन पच्चीस दोषोंकर सहित अतत्त्वश्रद्धानरूप मिथ्यात्व परिणाम जिसके है वह मिथ्यादृष्टि कहलाता है। वह मिथ्यादृष्टि नर नारकादि विभाव पर्यायोंमें लीन रहता है । उस मिथ्यात्व परिणामसे शुद्धात्माके अनुभवसे परा- न्मुख अनेक तरहके कको बांधता है जिनसे कि द्रव्य क्षेत्र काल भव भावरूपी पाच प्रकारके ससारमें भटकता है। ऐसा कोई शरीर नही जो इसने न धारण किया हो, ऐसा कोई क्षेत्र नही है कि जहा न उपजा हो और मरण किया हो, ऐसा कोई काल नही है कि जिसमें इसने जन्म मरण न किये हों, ऐसा कोई भव नही जो इसने पाया रायचंद्रनशास्त्रमालायान् । अय मिथ्यालोपार्जितकर्मशक्ति कयगति-- कम्मई दियणचिक्कणई, गम्बई वनसमाई। णाणवियक्खणु जीवडउ, उप्पहि पाडहि ताई ॥ ७९ ॥ कर्माणि दृढघनचिक्षणानि गुरुकाणि वनसमानि । ज्ञानविचक्षणं जीवं उत्पथे पातयंति तानि ॥ ७९ ॥ कम्मई दिढघणचिकणई गरुबई बजसमाई कर्माणि भवंति । किं विशिष्टानि । ढानि बलिष्टानि धनानि निविडानि चिऋणान्यपनेतुमसन्यानि विनानाचिनुमशक्यानि गुरुकानि महांति वनसनान्यभेद्यानि च। इत्यंभृतानि कर्माणि किं कुर्वति । णाणवि- यक्खणु जीवडउ उप्पहि पाडई ताई नानविचक्षणं जीवनुत्पथे पातयंति । तानि कर्नाणि युगपहोकालोकप्रकाशककेवलज्ञानाद्यनंतगुणविचक्षणं दरं जीवन दरबत्रयलणा- निश्चय्नोक्षमार्गात्प्रतिपक्ष्भूत उन्नार्गे पातयंतीनि । अत्रायमेवाभेदरनत्रयम्पो निश्च- यमोक्षमार्ग उपादेय इसभिप्रायः ॥ ७९ ॥ न हो और ऐते अशुद्धभाव नहीं हैं जो इसके न हुए हों । इस तरह अनंत परावर्तन इसने किये हैं। ऐसाही कथन मोक्षपाहुडमें निश्चय मिथ्याष्टिके लक्षणमें श्रीकुदकुंवाचार्यने कहा है-"जो पुण" इत्यादि । इसका अर्थ यह है कि जो अज्ञानी जीव द्रव्यक्रम भावक्रम नोकर्नरूप परद्रव्यनें लीन हो रहे है वो साधुके व्रत धारण करनेपर भी मिथ्य- दृष्टि ही हैं सन्यग्दृष्टि नहीं और मिथ्यात्वकर परिणमते दुःखदेनेवाले आठ कर्नोको बांधते हैं। फिर भी उन आगोंने ही मोक्षापाहुडमें कहा है-"जे पज्येमु" इत्यादि। उसका अर्थ यह है कि जो नर नारकादि पर्यायोंने मगन होरहे हैं वे जीव परपर्ययमें रत मिथ्यादृष्टि है ऐसा भगगनने कहा है और जो उपयोग लक्षणरूप निजभावनें तिष्ठ रहे हैं वे लसमयरूप सन्यादृष्टि हैं ऐसा जानो । सारांश यह है कि जो परपर्यायमें रत हैं वे तो परसमय (निथ्यावृष्टि ) है और जो मानतमावनें लगे हुए हैं वे खसमय (सम्यग्दृष्टि) है मिथ्यादृष्टि नहीं हैं। यहांपर आत्मज्ञानरूपी वीतराग सम्यक्त्वसे परान्नुस जो मिथ्यात्व है वह त्यागने योग्य है ॥ ७८ ॥ आगे मिथ्यावकर अनेक प्रकार उपार्जन निये कमाँसे यह जीव संसार वनमें ममता है उस कर्नगक्तिो कहते हैं। [तानि कर्माणि] वे ज्ञानावरणादि कर्म [ज्ञानवि- चक्षणं ] ज्ञानादि गुणसे चतुर [जीवं] इस जीवको [ उत्प] खोटे मार्गमें [पात- यति ] पटकते (डालते) हैं। कैसे हैं वे कन! [दृढघनचिकणानि ] बल्बान हैं, बहुत हैं विनाशकरनेको अशक्य हैं इसलिये चिकने हैं [गुरुकाणि] भारी हैं [वनस- मानि] और वज्रके समान अमेय हैं । भावार्थ-यह जीव एकसमयमें लोकालोकके

परमात्मप्रकाशः।
८५
,
ते
अथ मिथ्यापरिणत्या जीवो विपरीतं तत्त्वं जानातीति निरूपयति,
जिउ मिच्छत्से परिणमिउं, विवरिउ तचु मुणेइ ।
कम्मविणिम्भियभावडा, अप्पाणु भणेइ ॥ ८०॥
जीवः मिथ्यात्वेन परिणतः विपरीतं तत्त्वं मनुते ।
कर्मविनिर्मितभावान् तान् आत्मानं भणति ॥ ८० ॥
जिउ मिच्छत्ते परिणमिउ विवरिउ तयु मुणइ जीवो मिथ्यात्वेन परिणतः सन्
विपरीतं तत्त्वं जानाति शुद्धात्मानुभूतिरुचिविलक्षणेन मिथ्यात्वेन परिणतः सन् जीवः
परमात्मादितत्त्वं च यथावत् वस्तुस्वरूपमपि विपरीतं मिथ्यात्वरागादिपरिणतं जानाति ।
ततश्च किं करोति । कम्मविणिम्मियभावडा ते अप्पाणु भणेइ कर्मविनिर्मितान्
भावान् तमात्मानं भणति विशिष्टभेदज्ञानाभावाद्गौरस्थूलकृषादिकर्मजनितदेहधर्मात्मानं
जानातीत्यर्थः : । अत्र तेभ्यः कर्मजनितभावेभ्यो भिन्नो रागादिनिवृत्तिकाले स्वशुद्धात्मैवो-
पादेय इति तात्पर्य ॥ ८० ॥
प्रकाशनेवाले केवलज्ञान आदिक अनंत गुणोंसे वुद्धिमान चतुर है तौभी इस जीवको वे
संसारके कारण कर्म ज्ञानादि गुणोंका आच्छादनकरके अभेदरत्नत्रयरूप निश्चयमोक्षमार्गसे
विपरीत खोटे मार्गमें डालते है अर्थात् मोक्षमार्गसे भुलाकर भववनमें भटकाते हैं । यहा
यह अभिप्राय है कि संसारके कारण जो कर्म और उनके कारण मिथ्यात्वरागादि परिणाम
है वे सब हेय है तथा अभेदरत्नत्रयरूप निश्चय मोक्षमार्ग है वह उपादेय है ॥ ७९ ॥
आगे मिथ्यात्वपरिणतिसे यह जीव तत्त्वको यथार्थ नही जानता विपरीत जानता है
ऐसा कहते है।-[जीवः ] यह जीव [ मिथ्यात्वेन परिणतः] अतत्त्वश्रद्धानरूप परि-
गया [तत्वं ] आत्माको आदि लेकर तत्त्वोंके खरूपको [विपरीतं] अन्यका अन्य
[ मनुते ] श्रद्धान करता है यथार्थ नहीं जानता । वस्तुका खरूप तो जैसा है वैसा ही है
तौभी वह मिथ्याती जीव वस्तुके खरूपको विपरीत जानता है अपना जो शुद्धज्ञानादि-
सहित खरूप है उसको मिथ्यात्वरागादिरूप जानता है । उससे क्या करता है। [कर्म-
विनिर्मितभावान् ] कौकर रचे गये जो शरीरादि परभाव है [ तान् ] उनको आ-
त्मानं] अपने [भणति] कहता है अर्थात् भेदविज्ञानके अभावसे गोरा श्याम स्थूल कृश
इत्यादि कर्मजनित देहके खरूपको अपने जानता है इसीसे ससारमें भ्रमण करता है।
भावार्थ-यहां पर कर्मोंसे उपार्जन किये भावोंसे भिन्न जो शुद्ध आत्मा है वही जिस
समय रागादि दूर होते है उससमय उपादेय है क्योंकि तभी शुद्ध आत्माका ज्ञान होता
है ऐसा हुआ ॥ ८० ॥

, रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथानंतरं तत्पूर्वोक्तकर्मजनितभावान् येन मिथ्यापरिणामेन कृत्वा बहिरात्मात्मनि यो- जयति तं परिणाम सूत्रपंचकेन विवृणोति;- हउँ गोरो हउं सामलउ, हर्ष जि विभिण्ण वण्णु । हउं तणु अंगउं थूलु हर्ष, एहउं मूढउ मण्णु ॥ ८१॥ अहं गौरः अहं श्यामः अहमेव विभिन्नः वर्णः । अहं तन्वगः स्थूलः अहं एवं मूदं मन्यख ॥ ८१ ॥ अहं गौरो गौरवर्णः अहं श्यामः श्यामवर्णः । अहमेव भिन्नो नानावर्णः मिश्रवर्णः क । वर्णविषये रूपविषये । पुनश्च कथंभूतोहं । तन्वंगः कृशांग । पुनश्च कथंभूतोहं । स्थूलः स्थूलशरीरः । इत्थंभूतं मूढात्मानं मन्यस्व । एवं पूर्वोक्तमिथ्यापरिणामपरिणतं जीवं मूढात्मानं जानीहीति । अयमत्र भावार्थः । निश्चयनयेनात्मनो भिन्नान् । कर्म- जनितान् गौरस्थूलादिभावान् सर्वथा हेयभूतानपि सर्वप्रकारोपादेयभूते वीतरागनित्यानं- दैकस्वभावे शुद्धजीवे यो योजयति स विपयकपायाधीनतया स्वशुद्धात्मानुभूतेश्च्युतः सन् मूढात्मा भवतीति ।। ८१ ॥ अथ । हउं वरु वंभणु वइसु हउं, हर्ष खत्तिउ हर्ड सेसु । पुरिसु णउंसउ इस्थि हलं, मण्णइ मूड विसेसु ॥ ८२ ॥ अहं वरः ब्राह्मणः वैश्यः अहं अहं क्षत्रियः अहं शेषः । पुरुषः नपुंसकः स्त्री अहं मन्यते मूढः विशेपं ॥ ८२ ॥ हउं वरु वंभणु वइसु हउंहउँ खत्तिउ हउंसेसु अहं वरो विशिष्टो ब्राह्मणः अहं वैश्यो इसके बाद उन पूर्व कथित कर्मजनित भावोंको जिस मिथ्यात्व परिणामसे वहिरात्मा अपने मानता है और वो अपने है नहीं ऐसे परिणामोंको पांच दोहासूत्रोंमें कहते है:- [अहं] मै [गौरः] गोरा हूं [अहं ] मै [ श्यामः] काला हूं [अहमेव ] मै ही [वि- भिन्नः वर्णः] अनेकवर्णवाला हूं [ अहं] मै [तन्वंगः] कृश (पतले) शरीरवाला हूं [अहं] मै [स्थूल:] मोटा हूं [एवं ] इसप्रकार मिथ्यात्वपरिणामकर परिणत मिथ्यादृष्टि जीवको तू [मृदं] मूढ [मन्यख ] मान । भावार्थ-यह है कि निश्चय नयसे-आत्मासे भिन्न जो कर्मजनित गौर स्थूलादि भाव हैं वे सर्वथा त्याज्य है और सर्व प्रकार आरा- धने योग्य वीतराग नित्यानंदखभाव जो शुद्धजीव है वह इनसे भिन्न है तो भी जो पुरुष विषय कषायोंके आधीन होकर शरीरके भावोंको अपने जानता है वह अपनी शुद्धात्मानु- भूतिसे रहित हुआ मूढात्मा है ॥ ८१ ॥ आगे फिर भी मिथ्यादृष्टिके लक्षण कहते हैं।-[मूढः] मिथ्यादृष्टि अपनेको [वि- शेष मनुते] ऐसा विशेष मानता है कि [अहं] मै [वरः ब्राह्मणः ] सबमें श्रेष्ठ ब्राह्मण परमात्मप्रकाशः। ८७ वणिक् अहं क्षत्रियोहं शेपः शूद्रादिः । पुनश्च कथंभूतः । पुरिसुणउंसउ इत्थि हउं मण्णइ मूहु विसेसु पुरुषो नपुंसकः स्त्रीलिंगोहं मन्यते मूढो विशेषं ब्राह्मणादिविशेषमिति । इदमत्र तात्पर्य । यन्निश्चयनयेन परमात्मनो भिन्नानपि कर्मजनितान् ब्राह्मणादिभेदान सर्वप्रकारेण हेयभूतानपि निश्चयनयेनोपादेयभूते वीतरागसदानंदैकस्वभावे स्वशुद्धात्मनि योजयति संबंधान् करोति । कोसौ कथंभूतो । ज्ञानपरिणतः स्वशुद्धात्मतत्त्वभावनारहितो मूढात्मेति ॥ ८२ ॥ अथ । तरुणउ बूढउ ख्यडउ, सूरउ पंडिउ दिव्यु । खवण वंदङ सेवडउ, मूढउ मण्णइ सव्वु ॥ ८३ ॥ तरुणः वृद्धः रूपखी शूरः पंडितः दिव्यः । क्षपणकः वंदकः श्वेतपटः मूढः मन्यते सर्वम् ॥ ८३ ॥ तरुणउ बूढउ रूयडउ सूरउ पंडिउ दिव्वु तरुणो यौवनस्थोहं वृद्धोहं रूपस्व्यहं शूरः सुभटोहं पंडितोहं दिव्योहं । पुनश्च किंविशिष्टः । खवणउं वंदउं सेवडउ क्षपणको दिगंवरोहं वंदको वौद्धोहं श्वेतपटादिलिंगधारकोहमिति मूढात्मा सर्व मन्यत इति । अयमत्र तात्पर्यार्थः । यद्यपि व्यवहारेणाभिन्नान् तथापि निश्चयेन वीतरागसहजानंदैक- स्वभावात्परमात्मनः भिन्नान् कर्मोदयोत्पन्नान् तरुणवृद्धादिविभावपर्यायान् हेयानपि साक्षादुपादेयभूते स्वशुद्धात्मतत्त्वे योजयति । कोसौ । ख्यातिपूजालाभादिविभावपरि- णामाधीनतया परमात्मभावनाच्युतः सन् मूढात्मेति ॥ ८३ ॥ अथ । - हूं [अहं ] मैं [वैश्यः] वणिक् हूं [अहं ] मै [क्षत्रियः] क्षत्री हूं [अहं] मै [शेषः] इनके सिवाय शूद्र हूं [अहं] मै [पुरुपः नपुंसकः स्त्री] पुरुष हूं नपुंसक हूं और स्त्री हूं। इसप्रकार शरीरके भावोंको मूर्ख अपने मानता है । सो ये सब शरीरके हैं आ- त्माके नही हैं । भावार्थ-यहां पर ऐसा है कि निश्चयनयसे ये ब्राह्मणादि भेद कर्म- जनित हैं परमात्माके नही है इसलिये सब तरह आत्मज्ञानीके त्याज्यरूप हैं तो भी जो निश्चयनयकर आराधने योग्य वीतराग सदा आनंदखभाव निज शुद्धात्मामें इन भेदोंको लगाता है अर्थात् अपने को ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र मानता है स्त्री पुरुष नपुंसक मानता है वह कर्मोंका बंध करता है वही अज्ञानसे परिणत हुआ निजशुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे रहित हुआ मूढात्मा है ज्ञानवान् नही है ॥ ८२ ॥ आगे फिर मूढके लक्षण कहते हैं,-[तरुणः] मै जवान हूं [वृद्धः] वुड्डा हूं [रूपस्वी ] रूपवान् हूं [शूरः] शूरवीर हूं [पंडितः] पंडित हूं [दिव्यः ] सबमें श्रेष्ठ हूं [क्षपणकः ] दिगंवर हूं [वंदकः] बौद्धमतका आचार्य हूं [श्वेतपटः ] और मै श्वेतांबर हूं इत्यादि [सर्व ] सब शरीरके भेदोंको [ मूढः] मूर्ख [ मन्यते ] अपने मानता ८८ रायचंद्रजैनशासमालायाम् । जणणी जणणुवि कंत घरू, पुक्षुवि मित्तुवि व्वु । मायाजालुवि अप्पणउं, मूढउ मण्णइ सन्चु ।। ८४ ॥ जननी जननः अपि कांता गृहं पुत्रोपि मित्रमपि द्रव्यं । मायाजालमपि आत्मनः मूढः मन्यते सर्व ।। ८४ ॥ जणणी जणणुवि कंत घरु पुत्तुवि मित्तुवि दन्बु जननी माता जननः पित्तापि कांता भार्या गृहं पुत्रोपि मित्रमपि द्रव्यं सुवर्णादि यत्तत्सर्व मायाजालवि अप्पणउ मूढउ मण्णइ सन्बु मायाजालमप्यसत्यमपि कृत्रिममपि आत्मीयं स्वकीयं मन्यते । कोसो। मूढो मूढात्मा । कतिसंख्योपेतमपि । सर्वमपीति । अयमत्र भावार्थः । जनन्यादिकं परस्वरू- पमपि शुद्धात्मनो भिन्नमपि हेयस्याशेषनारकादिदुःखस्य कारणत्वाद्धेयमपि साक्षादुपादेय- भूतानाकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसौख्यादभिन्ने . वीतरागपरमानंदैकखभावे शुद्धात्मतत्त्वे योजयति । स कः । मनोवचनकायव्यापारपरिणतः स्वशुद्धात्मद्रव्यभावनाशून्यो मूढा- त्मेति ॥८४॥ अथ । है । ये भेद जीवके नहीं हैं। भावार्थ-यहांपर यह है कि यद्यपि व्यवहार नयकर ये सब तरुण वृद्धादि शरीरके भेद आत्माके कहे जाते हैं तो भी निश्चयनयकर वीतराग सहजानंद एक स्वभाव जो परमात्मा उससे भिन्न हैं । ये तरुणादि विभावपर्याय कमके उदयकर उत्पन्न हुए हैं इसलिये त्यागने योग्य हैं तो भी उनको साक्षात् उपादेवरूप निज शुद्धात्मतत्त्वमें जो लगाता है अर्थात् आत्माके मानता है वह अज्ञानी जीव वडाई प्रतिष्ठा धनका लाभ इत्यादि विभावपरिणामोंके आधीन होकर परमात्माकी भावनासे रहित हुआ मूढात्मा है वह जीवके ही भाव मानता है ॥ ८३ ॥ आगे फिर भी मूढके लक्षण कहते हैं;-जननी] माता [जननः] पिता [अपि] और [कांता] स्त्री [गृहं] घर [पुत्रः अपि] और वेटा बेटी [ मित्रमपि] मित्र वगैरः सब कुटुम्बजन वहिन भानजी नाना मामा भाई वंध और [ द्रव्यं ] रल माणिक मोती सुवर्ण चांदी धन धान्य द्विपद वांदी धाय नौकर चौपाये गाय बैल घोडा घोडी ऊंट हाथी रथ पालकी वहली ये [ सर्वं] सब [मायाजालमपि] असत्य हैं कर्मजनित हैं तो भी [ मूढः ] अज्ञानी जीव [आत्मीय ] अपने [ मन्यते ] मानता है। भावार्थ-ये माता पिता आदि सब कुटुंबजन परखरूप भी हैं सब स्वारथके हैं, शुद्धात्मासे भिन्न भी हैं शरीर संबंधी हैं हेयरूप संसारीक नारकादिदुःखोके कारण होनेसे त्याज्य भी है उनको जो जीव साक्षात् उपादेयरूप अनाकुलताखरूप परमार्थिक सुखसे अभिन्न वीतराग परमा- नंदरूप एकखमाववाले शुद्धामद्रव्यमें लगाता है अर्थात् अपने मानता है वह मन वचन कायरूप परिणत हुआ शुद्ध अपने आत्मद्रव्यकी भावनासे शून्य (रहित ) मूढात्मा है PM परमात्मप्रकाशः। ८९ दुक्खहं कारणि जे विसय, ते सुहहेउ रमेह । मिच्छाइडिउ जीवडउ, इत्थु ण काइ करेइ ॥ ८५ ॥ दुःखस्य कारणं ये विषयाः तान् सुखहेतून् रमते । मिथ्यावृष्टिः जीवः अत्र न किं करोति ॥ ८५ ॥ दुःखहं कारणि जे विसय ते सुहहेउ रमेइ दुःखस्य कारणं ये विषयास्तान् विषयान् सुखहेतून् मत्त्वा रमते । स कः । मिच्छाइहिउ जीवडउ मिथ्यादृष्टिर्जीवः इत्थु ण काई करेइ अत्र जगति योसौ दुःखरूपविषयान् निश्चयनयेन सुखरूपान् मन्यते स मिथ्यादृष्टिः किमकृत्यं पापं न करोति अपि तु सर्व करोत्येवेति । अत्र तात्पर्य । मिथ्यादृष्टिीवो वीतरा- गनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नपरमानंदपरमसमरसीभावरूपसुखरसापेक्षया निश्चयेन दुःखरूपा- नपि विषयान् सुखहेतून् मत्वा अनुभवतीत्यर्थः ॥ ८५ ॥ एवं त्रिविधात्मप्रतिपादक- प्रथममहाधिकारमध्ये "जिउ मिच्छत्ते” इत्यादिसूत्राष्टकेन मिथ्याष्टिपरिणतिव्याख्यान- स्थलं समाप्तं । तदनंतरं सम्यग्दृष्टिभावनाव्याख्यानमुख्यत्वेन "कालु लहेविणु"इत्यादि सूत्राष्टकं कथ्यते अथ, कालु लहेविणु जोइया, जिमु जिमु मोहु गलेइ । तिमु तिमु दंसणु लहइ जिउ, णियमें अप्पु मुणेइ ॥ ८६ ॥ कालं लब्ध्वा योगिन् यथा यथा मोहः गलति । तथा तथा दर्शनं लभते जीवः नियमेन आत्मानं मनुते ॥ ८६ ॥ ऐसा जानो, अर्थात् अतींद्रियसुखरूप आत्मामें पर वस्तुका क्या प्रयोजन है । जो पर वस्तुको अपना मानता है वही मूर्ख है ॥ ८४ ॥ अव और भी मूढका लक्षण कहते है;-[ दुःखस्य ] दुःखके [कारणं ] कारण [ये ] जो [विषयाः ] पाच इंद्रियोंके विषय है [ तान् ] उनको [सुखहेतून् ] सुखके कारण जानकर [ रमते ] रमण करता है वह [ मिथ्याष्टिः जीवः ] मिथ्यादृष्टि जीव [अत्र] इस ससारमें [किं न करोति ] क्या पाप नही करता सभी पाप करता है अर्थात् जीवोंकी हिसा करता है झूठ बोलता है दूसरेका धन हरता है दूसरेकी स्त्री सेवन करता है अति तृष्णा करता है बहुत आरंभ करता है खेती करता है खोटे २ व्यसन सेवता है जो न करनेके काम है उनको करता. है । भावार्थ-मिथ्यादृष्टि जीव वीतराग निर्विकल्प परमसमाधिसे उत्पन्न परमानंद परमसमरसीभावरूप सुखसे परान्मुख हुआ निश्चयकर महा दुःखरूप विषयोंको सुखके कारण समझकर सेवन करता है सो इनमें सुख नहीं है ॥ ८५॥ १२

रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
कालु लहेविणु जोइया जिमु जिमु मोहु गलेइ कालं लब्ध्वा हे योगिन् यथा यथा
मोहो विगलति तिमु तिमु दंसणु लहइ जिउ तथा तथा दर्शनं सम्यक्त्वं लभते जीवः ।
तदनंतरं किं करोति । णियमें अप्पु मुणेइ नियमेनात्मानं मनुते जानातीत्यर्थः । तथाहि-
एकेंद्रियविकलेंद्रियपंचेंद्रियसंज्ञिपर्याप्तमनुष्यदेशकुलशुद्धात्मोपदेशादीनामुत्तरोत्तरदुर्लभक्रमेण
दुःप्राप्तान काललब्धिः कथंचित्काकतालीयन्यायेन तां लब्ध्वा परमागमकथितमार्गेण
मिथ्यात्वादिभेदभिन्नपरमात्मोपलंभप्रतिपत्तेर्यथा यथा मोहो विगलति तथा तथा शुद्धात्मै-
वोपादेय इति रुचिरूपं सम्यक्त्वं लभते । शुद्धात्मकर्मणोर्मेंदबानेन शुद्धात्मतत्त्वं मनुते
जानातीति । अत्र यस्यैवोपादेयभूतस्य शुद्धात्मनो रुचिपरिणामेन निश्चयसम्यग्दृष्टिर्जातो
जीव स एवोपादेय इति भावार्थः ॥ ८६ ॥
अत ऊर्ध्व पूर्वोक्तन्यायेन सम्यग्दृष्टिभूत्वा मिथ्यादृष्टिभावनायाः प्रतिपक्षभूतां यादृशीं
भेदभावनां करोति तादृशीं क्रमेण सूत्रसप्तकेन विवृणोति;-
अप्पा गोरड किण्हु णवि, अप्पा रत्तु ण होइ ।
अप्पा सुहुमुवि थूलु णवि, णाणिउ णाणे जोइ ॥ ८७॥
आत्मा गौरः कृष्णः नापि आत्मा रक्तः न भवति ।
आत्मा सूक्ष्मोपि स्थूलः नैव ज्ञानी ज्ञानेन पश्यति ।। ८७ ॥
इस प्रकार तीनतरहके आत्माके कहनेवाले पहले महा अधिकारमें "जिउ मिच्छत्ते"
इत्यादि आठ दोहाओंसे मिथ्यादृष्टिकी परिणतिका व्याख्यान समाप्त किया । इसके आगे
सम्यग्दृष्टिकी भावनाके व्याख्यानकी मुख्यतासे "काल लहेविणु" इत्यादि आठ दोहासूत्र
कहते है;-[हे योगिन् ] हे योगी [ कालं लब्ध्वा ] काल पाकर [ यथा यथा] जैसा
जैसा [मोहः ] मोह [गलति ] गलता है कम होता जाता है [ तथा तथा ] तैसा तैसा
[जीवः ] यह जीव [ दर्शनं] सम्यग्दर्शनको [लभते ] पाता है फिर [नियमेन]
निश्चयसे [आत्मानं] अपने खरूपको [ मनुते] जानता है । भावार्थ-एकेंद्रीसे
चिकलत्रय (दो इंद्री ते इंद्री चौ इंद्री) होना दुर्लभ है, विकलत्रयसे पंचेंद्री, पंचेद्रीसे
सैनी पर्याप्त, उससे मनुष्य होना कठिन है। मनुष्यमें भी आर्यक्षेत्र उत्तमकुल शुद्धात्माका
उपदेश आदि मिलना बहुत कठिन है। और किसीतरह "काकतालीय न्यायसे" कालल-
ब्धिको पाकर सव दुर्लभ सामग्री मिलनेपर भी जैन शास्त्रोक्त मार्गकर मिथ्यात्वादिके दूर
हो जानेसे आत्मखरूपकी प्राप्ति होते हुए जैसा जैसा मोह क्षीण होता जाता है वैसे २
शुद्ध आत्मा ही उपादेय है ऐसी रुचिरूप सम्यक्त्व होता है। शुद्ध आत्मा और कर्मको
जुदे २ जानता है । जिस शुद्धात्माकी रुचिरूप परिणामसे यह जीव निश्चयसम्यग्दृष्टि
होता है वही उपादेय है यह तात्पर्य हुआ ॥ ८६ ॥

परमात्मप्रकाशः। आत्मा गौरो न भवति कृष्णो न भवति रक्तो न भवति आत्मा सूक्ष्मोपि न भवति स्थूलोपि नैव । तर्हि किंविशिष्टः । ज्ञानी ज्ञानस्वरूपः ज्ञानेन करणभूतेन पश्यति । अथवा "णाणिउ जाणइ जोई” इति पाठांतरं, ज्ञानी योसौ योगी स जानात्यात्मानं । अथवा ज्ञानी ज्ञानस्वरूपेण आत्मा । कोसौ जानाति । योगीति । तथाहि-कृष्णगौरादिकधर्मान् व्यवहारेण जीवसंबंधानपि तथापि शुद्धात्मनो भिन्नान् कर्मजनितान् हेयान् वीतरागखसं- वेदनज्ञानी स्वशुद्धात्मतत्त्वे तान् न योजयति संबंधान्न करोतीति भावार्थः ॥ ८७ ॥ अथ । अप्पा वंभणु वइसु णवि, णवि खत्तिउ णवि सेसु । पुरिसु णउंसउ इत्थि णवि, णाणिउ मुणइं असेसु ॥ ८८ ॥ आत्मा ब्राह्मणः वैश्यः नापि नापि क्षत्रियः नापि शेषः । पुरुषः नपुंसकः स्त्री नापि ज्ञानी मनुते अशेषं ॥ ८८ ॥ अप्पा वंभणु वइसु णवि णवि खत्तिउ गवि सेसु पुरिसु णउंसउ इत्थि णवि आत्मा ब्राह्मणो न भवति वैश्योपि नैव नापि क्षत्रियो नापि शेपः शूद्रादिः पुरुषनपुंसक- स्त्रीलिंगरूपोपि नैव । तर्हि कि विशिष्टः । णाणिउ मुणइ असेसु ज्ञानी ज्ञानस्वरूप आत्मा ज्ञानी सन् । किं करोति । मनुते जानाति । कं । अशेषं वस्तुजातं वस्तुसमूहमिति । तद्यथा । यानेव ब्राह्मणादिवर्णभेदान् पुल्लिंगादिलिगभेदान् व्यवहारेण परमात्मपदार्था- दभिन्नान् शुद्धनिश्चयेन मिन्नान् साक्षाद्धेयभूतान् वीतरागनिर्विकल्पसमाधिच्युतो बहिरात्मा इसके बाद पूर्वकथित रीतिसे सम्यग्दृष्टि होकर मिथ्यात्वकी भावनासे विपरीत जैसी भेदवि- ज्ञानकी भावनाको करता है वैसी भेदविज्ञानभावनाका स्वरूप क्रमसे सातदोहासूत्रोंमें कहते हैं;-[ आत्मा] आत्मा [गौरः कृष्णः नापि] सफेद नहीं है काला नहीं है [ आत्मा] आत्मा [रक्तः ] लाल [ न भवति ] नही है [ आत्मा] आत्मा [ सूक्ष्मः अपि स्थूलः नैव ] सूक्ष्म भी नही है और स्थूल भी नही है [ ज्ञानी] ज्ञानखरूप है [ज्ञानेन] ज्ञानदृष्टि से [ पश्यति ] देखा जाता है अथवा ज्ञानी पुरुष योगी ही ज्ञानकर आत्माको जानता है। भावार्थ-ये खेत काले आदि धर्म व्यवहारनयकर शरीरके संबंधसे जीवके कहे जाते हैं तौभी शुद्धनिश्चयनयकर शुद्धात्मासे जुदे हैं कर्मजनित हैं त्यागने योग्य हैं। जो वीतरागखसंवेदन ज्ञानी है वह निजशुद्धात्मतत्त्वमें इन धर्मोको नही लगाता अर्थात् इनको अपने नही समझता है ॥ ८७ ॥ आगे ब्राह्मणादिवर्ण आत्माके नही हैं ऐसा वर्णन करते हैं,-[आत्मा आत्मा [ब्राह्मणः वैश्यः नापि ] ब्रामण नही है वैश्य भी नहीं है क्षत्रियः नापि] क्षत्री भी नहीं है [ शेषः वाकी शूद्र भी [ नापि ] नही है [ पुरुषः नपुंसका स्त्री नापि ] पुरुष नपुंसक स्त्रीलिंगरूप भी नहीं है [ ज्ञानी] ज्ञानखरूप हुआ [अशेषं] समस्त वस्तुओंको ज्ञानसे [ मनुते] ९२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । स्वात्मनि योजयति तानेव तद्विपरीतभावनारतोंतरात्मा स्वशुद्धात्मस्वरूपेण योजयतीति तात्पर्यार्थः ।। ८८ ॥ अथ । अप्पा बंदड खवणु णवि, अप्पा गुरउ ण होह । अप्पा लिंगिउ एकु णवि, णाणिउ जाणइ जोइ ॥ ८९ ॥ आत्मा वंदकः क्षपणः नापि आत्मा गुरवः न भवति । आत्मा लिंगी एकः नापि ज्ञानी जानाति योगी ।। ८९ ।। आत्मा वंदको वौद्धो न भवति आत्मा क्षपणको दिगंवरो न भवति आत्मा गुरवश- ब्दवाच्यः श्वेतांबरो न भवति । आत्मा एकदंडित्रिदंडिहंसपरमहंससंज्ञाः संन्यासी शिखी मुंडी योगदंडाक्षमालातिलककुलकघोपप्रभृतिवेषधारी नैकोपि कश्चिदपि लिगी न भवति । तर्हि कथंभूतो भवति । ज्ञानी । तमात्मानं कोसौ जानाति योगी ध्यानीति । तथाहि-यद्यप्यात्मा व्यवहारेण वंदकादिलिगी भण्यते तथापि शुद्धनिश्चयनयेनैकोपि लिंगी न भवतीति । अयमत्र भावार्थः । देहाश्रितं द्रव्यलिंगमुपचरितासद्भूतव्यवहारेण जीवखरूपं भण्यते वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूपं भावलिगं तु यद्यपि शुद्धात्मस्वरूपसाधकत्वादुपचारेण शुद्धजीवस्वरूपं भण्यते तथापि सूक्ष्मशुद्धनिश्चयेन न भण्यत इति ॥ ८९ ॥ अथ । जानता है । भावार्थ-जो ब्राह्मणादिवर्णभेद है और पुरुषलिंगादि तीन लिग है वे यद्यपि व्यवहारनयकर देहके संबंधसे जीवके कहे जाते है तौभी शुद्धनिश्चयनयकर आत्मासे भिन्न है और साक्षात् त्यागने योग्य है उनको वीतरागनिर्विकल्पसमाधिसे रहित मिथ्या- दृष्टि जीव अपने जानता है और उन्हींको मिथ्यात्वसे रहित सम्यग्दृष्टि जीव अपने नहीं समझता । आपको तो ज्ञानस्वभावरूप जानता है ॥ ८८ ॥ आगे बंदक क्षपणकादि भेद भी जीवके नहीं हैं ऐसा कहते है;-[आत्मा] आत्मा [वंदकः क्षपणः नापि ] बौद्धका आचार्य नहीं है दिगंबर भी नहीं है [आत्मा] आत्मा [ गुरवः न भवति ] खेताम्बर भी नहीं है [ आत्मा] आत्मा [ एकः अपि] कोई भी [लिंगी] वेशका धारी [न] नही है अर्थात् एक दंडी त्रिदंडी हंस परमहंस संन्यासी जटाधारी मुंडित रुद्राक्षकी माला तिलक कुलक घोप वगैरः भेषोंमें कोई भी भेषधारी नही है एक [ज्ञानी] ज्ञानस्वरूप है उस आत्माको [ योगी ] ध्यानी मुनि ध्यानारूढ होकर [जानाति ] जानता है ध्यान करता है ॥ भावार्थ-यद्यपि व्यवहार- नयकर यह आत्मा बंदकादि अनेक भेषोंको धरता है तौभी शुद्धनिश्चय नयकर कोई भी भेष जीवके नहीं है देहके है । यहां देहके आश्रयसे जो द्रव्यलिग है वह उपचरितास- द्भूतव्यवहारनयकर जीवका खरूप कहा जाता है तभी निश्चयनयकर जीवका स्वरूप नही ॥ ( .

परमात्मप्रकाशः।
अप्पा गुरु णवि सिस्सु णवि, णवि सामिउ णवि भिचु ।
सूरउ कायरु होइ णवि, णवि उत्तमु णवि णिच्चु ॥९॥
आत्मा गुरुः नैव शिष्यः नापि नैव स्वामी नैव भृत्यः ।
शूरः कातरः भवति नैव नैव उत्तमः नैव नीचः ॥ ९० ॥
आमा गुरुनैव भवति शिष्योपि न भवति नैव स्वामी नैव भृत्यः शूरो न भवति
कातरो हीनसत्त्वो नैव भवति नैवोत्तमोत्तमकुलप्रसूतः नैव नीचो नीचकुलप्रसूत इति ।
तद्यथा । गुरुशिष्यादिसंबंधान् यद्यपि व्यवहारेण जीवस्वरूपस्तथापि शुद्धनिश्चयेन परमास-
द्रव्याद्भिन्नान् हेयभूतान वीतरागपरमानंदैकस्वशुद्धालोपलब्धेश्युतो बहिरात्मा स्वाससंबंधान
करोति तानेव वीतरागनिर्विकल्पसमाधिस्थो अंतरामा परस्वरूपान् जानातीति
भावार्थः ॥ ९० ॥ अथ ।
अप्पा माणुसु देउ णवि, अप्पा तिरिउ ण होइ ।
अप्पा णारज कहिंवि णवि, णाणिउ जाणई जोइ ।। ९१ ॥
आत्मा मनुष्यः देवः नापि आत्मा तिर्यक् न भवति ।
आत्मा नारकः कापि नैव ज्ञानी जानाति योगी ॥ ९१ ॥
अप्पा माणुसु देउ णवि अप्पा तिरिउ ण होइ अप्पा णारउ कहिंवि णवि
है क्योंकि जब देह ही जीवकी नही तो भेष कैसे होसकता है इसलिये द्रव्यलिंगतो सर्वथा
ही नही है और वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूप भावलिंग यद्यपि शुद्धात्मखरूपका साधक है
इसलिये उपचारनयकर जीवका स्वरूप कहा जाता है तौभी परमसूक्ष्म शुद्धनिश्चयनयकर
भावलिंग भी जीवका नही है । भावलिंग साधनरूप है वह भी परम अवस्थाका साधक
नही है ॥ ८९ ॥
आगे यह गुरु शिष्यादिक भी नही है,-[आत्मा] आत्मा [गुरुः नैव] गुरु
नहीं है [शिष्यः नापि] शिष्य भी नहीं है [खामी नैव] खामी नहीं है [भृत्यः
नैव ] नोंकर नही हैं [शूरः कातरः नैव ] सूरवीर नही है बलहीन नहीं है [उत्तमः
नैव ] ऊंचकुली नही है [नीचः नैव भवति ] और नीचकुली भी नहीं है । भावार्थ-
ये सब गुरु शिष्य खामी सेवकादि सबंध यद्यपि व्यवहारनयसे जीवके खरूप हैं तो भी
शुद्ध निश्चयनयसे शुद्ध आत्मासे जुदे हैं आत्माके नही है त्यागने योग्य है इन भेदोंको
वीतरागपरमानंद निज शुद्धात्माकी प्राप्तिसे रहित बहिरात्मा मिथ्यादृष्टि जीव अपने सम-
झता है और इन्ही भेदोंको वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें रहता हुआ अंतरात्मा सम्यग्दृष्टि-
जीव पररूप (दूसरे) जानता है ॥ ९० ॥

, रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । आमा मनुष्यो न भवति देवो नैव भवति आत्मा तिर्यग्योनिर्न भवति आमा नारकः कापि काले न भवति । तर्हि किंविशिष्टो भवति । णाणिउं जाणई जोइ ज्ञानी ज्ञानरूपो भवति । तमामानं कोसौ जानाति । योगी, योगी कोर्थः । त्रिगुप्तिनिर्विकल्पसमाधिस्थ इति। तथाहि । विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावपरमामतत्त्वभावनाप्रतिपक्षभूतैः रागद्वेपादिविभावपरिणा- मजालैर्यान्युपार्जितानि कर्माणि तदुदयजनितान् मनुष्यादिविभावपर्यायान् भेदाभेदरत्नत्रय- भावनाच्युतो बहिरात्मा स्वात्मतत्त्वे योजयति । तद्विपरीतोंतरात्मशब्दवाच्यो ज्ञानी पृथक् जानातीत्यभिप्रायः ॥ ९१ ॥ अथ । अप्पा पंडिउ मुक्खु णवि, णवि ईसरु णवि णीसु । तरुणउ बूढउ वालु णवि, अण्णुवि कम्मविसेसु ।। ९२॥ आत्मा पंडितः मूर्खः नैव नैव ईश्वरः नैव निःखः । तरुणः वृद्धः बालः नापि अन्य एव कर्मविशेपः ॥ ९२ ॥ अप्पा पंडिउ मुक्खु णवि णवि ईसरु णवि णीसु तरुणउ बूढउ चालु णवि आला पंडितो न भवति मूर्यो नैव ईश्वरः समर्थों नैव निःस्वो दरिद्रः तरुणो वृद्धो वालोपि नैव । पंडितादिस्वरूपं यद्यात्मस्वभावो न भवति । तर्हि किं भवति । अण्णुवि कम्मविसेसु अन्य एव कर्मजनितोयं विभावपर्यायविशेष इति । तद्यथा । पंडितादिसंबंधान् यद्यपि व्यवहारनयेन जीवस्वभावान् तथापि शुद्धनिश्चयेन शुद्धात्मद्रव्याद्भिन्नान् सर्वप्रकारेण आगे आत्माका स्वरूप कहते है।-[आत्मा] जीव पदार्थ [ मनुष्यः देवः नापि] न तो मनुष्य है न देव है [आत्मा] आत्मा [तिर्यक् न भवति ] तिर्यच पशु भी नहीं [आत्मा] आत्मा [ नारकः ] नारकी भी [ कापि नैव ] कभी नही अर्थात् किसी- प्रकार भी पररूप नही है परंतु [ज्ञानी] ज्ञानस्वरूप है उसको [योगी ] मुनिराज तीन गुप्तिका धारक और निर्विकल्पसमाधिमें लीन हुआ [जानाति ] जानता है ॥ भावार्थ- निर्मल ज्ञान दर्शन खभाव जो परमात्मतत्त्व उसकी भावनासे उलटे रागद्वेपादि विभाव परिणामोंसे उपार्जन किये जो शुभाशुभ कर्म है उनके उदयसे उत्पन्न हुई मनुष्यादि विभा- वपर्यायोंको भेदाभेदस्वरूप रत्नत्रयकी भावनासे रहित हुआ मिथ्यादृष्टि जीव अपने जानता है और इस अज्ञानसे रहित सम्यग्दृष्टि ज्ञानी जीव उन मनुष्यादि पर्यायोंको अपनेसे जुदा जानता है ॥ ९१ ॥ आगे फिर आत्माका स्वरूप कहते हैं;-[आत्मा] चिद्रूप आत्मा [पंडितः] विद्या- वान व [ मूर्खः] मूर्ख [नैव ] नही है [ ईश्वरः] धनवान् सब वातोंमे समर्थ भी [नैव नहीं है [ निखः ] दरिद्री भी [नैव ] नही हैं [तरुणः वृद्धः बाला नापि] जवान बूढा और बालक मी नहीं है [अन्य एव कर्मविशेषः ] ये सब पर्यायें आत्मासे परमात्मप्रकाशः। ९५ हेयभूतान, वीतरागस्वसंवेदनज्ञानभावनारहितोपि बहिरात्मा स्वस्मिन्नियोजयति तानेव पंडितादिविभावपर्यायांतद्विपरीतो योसौ चांतरामा परस्मिन् कर्मणि नियोजयतीति तात्पर्यार्थः ॥ ९२ ॥ अथ । पुण्णुवि पाउवि कालु णहु, धम्मा धम्मुवि काउ। एक्कुवि अप्पा होइ णवि, मेल्लिवि चेयणभाउ ॥१३॥ पुण्यमपि पापमपि कालः नमः धर्माधर्मोपि कायः । एकमपि आत्मा भवति नैव मुक्त्वा चेतनभावं ॥ ९३ ॥ पुण्णुचि पाउवि कालु णहु धम्माधम्मुवि काउ पुण्यमपि पापमपि कालं नमः आकाशं धर्माधर्ममपि कायः शरीरं एकुवि अप्पा होइ णवि मेल्लिवि चेयण भाउ इदं पूर्वोक्तमेकमण्यात्मा न भवति । किं कृत्वा । मुक्त्वा । किं चेतनभावमिति । तथाहि । व्यवहारनयेनात्मनः सकाशादभिन्नान् शुद्धनिश्चयेन मिन्नान हेयभूतान् पुण्यपापादिधर्मा- धर्मान्मिथ्यात्वरागादिपरिणतो वहिराला स्वासनि योजयति तानेव पुण्यपापादिसमस्त- संकल्पविकल्पपरिहारभावनारूपे स्वशुद्धात्मद्रव्ये सम्यक्झद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरत्नत्र- यात्मके परमसमाधौ स्थितीतरामा शुद्धासनः सकाशात् पृथक् जानातीति तात्पर्यार्थः ॥ ९३ ॥ एवं त्रिविधामप्रतिपादकमहाधिकारमध्ये मिथ्यादृष्टिभावनाविपरीतेन सम्यग्दृष्टि- भावनास्थितेन सूत्राष्टकं समाप्तं । अथानंतरं सामान्यभेदभावनामुख्यत्वेन "अप्पा संजमु” इत्यादि प्रक्षेपकान् विहायैक- त्रिंशत्सूत्रपर्यंतमुपसंहाररूपा चूलिका कथ्यते । तद्यथा । जुदे कर्मके विशेष हैं अर्थात् कर्मसे उत्पन्न हुए विभावपर्याय हैं । भावार्थ-यद्यपि शरीरके संबंधसे पंडित वगैरः भेद व्यवहारनयसे जीवके कहे जाते हैं तौभी शुद्धनिश्चय- नयकर शुद्धात्मद्रव्यसे भिन्न हैं और सर्वथा त्यागने योग्य हैं । इन भेदोंको वीतरागखसं- वेदनज्ञानकी भावनासे रहित मिथ्यादृष्टि जीव अपने जानता है और इन्हीं पंडितादि विभावपर्यायोंको अज्ञानसे रहित सम्यग्दृष्टि जीव अपनेसे जुदे कर्मजनित जानता है ॥९२॥ आगे आत्माका चेतनभाव वर्णन करते हैं,-पुण्यमपि ] पुण्यरूप शुभकर्म [पाप- मपि ] पापरूप अशुभकर्म [ काल: ] अतीत अनागत वर्तमान काल [ नभः ] आकाश [धर्माधर्मोपि] धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य [कायः ] शरीर, इनमेंसे [ एक अपि ] एक भी [आत्मा] आत्मा [ नैव भवति ] नही है [चेतनभावं मुक्त्वा] चेतनभावको छोड़- कर अर्थात् एक चेतनभाव ही अपना है ॥ भावार्थ-व्यवहारनयकर यद्यपि पुन्यपापादि आत्मासे अभिन्न हैं तौभी शुद्धनिश्चयनयकर भिन्न है और त्यागने योग्य हैं उन परभा- वोंको मिथ्यात्वरागादिरूप परिणत हुआ बहिरात्मा अपने जानता है और उन्हींको . , रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । यदि पुण्यपापादिरूपः परमात्मा न भवति तर्हि कीशो भवतीति प्रश्शे प्रत्युत्तरमाह;- अप्पा संजमु सील तउ, अप्पा दंसणु णाणु । अप्पा सासयमोक्खपउ, जाणंतउ अप्पाणु ॥ ९४ ॥ आत्मा संयमः शीलं तपः आत्मा दर्शनं ज्ञानं । आत्मा शाश्वतमोक्षपदं जानन् आत्मानं ॥ ९४ ॥ अप्पा संजमु सील तउ अप्पा दंसणु णाणु अप्पा सासय मोक्खपउ आत्मा संयमो भवति शीलं भवति तपश्चरणं भवति आत्मा दर्शनं भवति नानं भवति शाश्वतमोक्षपदं च भवति । अथवा पाठांतरं "सासयमुक्खपहुं" शास्वतमोक्षस्य पंथा मार्गः अथवा "सासयमुक्व- पउ” शास्वतसौख्यपदं स्वरूपं च भवति । किं कुर्वन् सन् । जाणंतर अप्पाणु जानननु- भवन् । कं । आत्मानमिति । तद्यथा । वहिरंगेंद्रियसंयमप्राणसंयमवलेन माध्यसाधक- भावेन निश्चयेन स्वशुद्धात्मनि संयमनात् स्थितिकरणात् संयमो भवति वहिरंगसहकारिका- रणभूतेन कामक्रोधविवर्जनलक्षणेन व्रतपरिरक्षणशीलेन निश्चयेनाभ्यंतरे स्वशुद्धात्मद्रव्यनि- मलानुभवनेन शीलं भवति । वहिरंगेन सहकारिकारणभूतानशनादिद्वादशविधतपश्चरणेन निश्चयनयेनाभ्यंतरे समस्तपरद्रव्येच्छानिरोधेन परमात्मस्वभावे प्रतपनाद्विजयनात्तपश्चरणं पुण्यपापादि समस्त संकल्पविकल्परहित निजशुद्धात्मद्रव्यमें सम्यक् श्रद्धान ज्ञान चारित्ररूप अभेदरलत्रयखरूप परम समाधिमें तिष्ठता सम्यग्दृष्टि जीव शुद्धात्मासे जुदे जानता है ।। ९३॥ ऐसें बहिरात्मा अंतरात्मा परमात्मारूप तीनप्रकारके आत्माका जिसमें कथन है ऐसे पहले अधिकारमें मिथ्यादृष्टिकी भावनासे रहित जो सम्यग्दृष्टिकी भावना उसकी मुख्य- तासे आठ दोहासूत्र कहे । आगे भेदविज्ञानकी मुख्यतासे "अप्पा संजमु" इत्यादि इक- तीस दोहापर्यंत क्षेपकसूत्रोंको छोड़कर पहला अधिकार पूर्ण करते हुए व्याख्यान करते हैं उसमें भी जो शिष्यने प्रश्न किया कि यदि पुण्यपापादिरूप आत्मा नहीं है तो कैसा है ऐसे प्रश्नका श्रीगुरु समाधान करते हैं;-[आत्मा] निजगुणपर्यायका धारक ज्ञान- खरूप चिदानंद ही [ संयम ] संयम है [शील तपः ] शील है तप है [आत्मा] आत्मा [दर्शनं ज्ञानं ] दर्शन ज्ञान है और [आत्मानं जानन् ] अपनेको जानता अनुभ- वता हुआ [आत्मा] आत्मा [शाखतमोक्षपदं] अविनाशी सुखका स्थान मोक्षका मार्ग है। इसी कथनको विशेषताकर कहते हैं। भावार्थ-पांच इंद्रियां और मनका रोकना व छह कायके जीवोंकी दया स्वरूप ऐसे इंद्रिय संयम तथा प्राणसंयम इन दोनोंके वलसे साध्यसाधक भावकर निश्चयसे अपने शुद्धात्मस्वरूपमें स्थिर होनेसे आत्माको संयम कहा गया है, बहिरंग सहकारी निश्चयशीलका कारणरूप जो कामक्रोधादिके - परमात्मप्रकाशः। भवति । स्वशुद्धात्मैवोपादेय इति रुचिकरणान्निश्चयसम्यक्त्वं भवति । वीतरागस्वसंवेदन- ज्ञानानुभवनान्निश्चयज्ञानं भवति । मिथ्यात्वरागादिसमस्तविकल्पजालत्यागेन परमात्मतत्त्वे परमसमरसीभावपरिणमनाच मोक्षमार्गों भवतीति । अत्र वहिरंगद्रव्येंद्रियसंयमादिप्रतिपा- दनादभ्यंतरे शुद्धात्मानुभूतिरूपभावसंयमादिपरिणमनादुपादेयसुखसाधकत्वादात्मैवोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ ९४ ॥ अथ स्वशुद्धात्मसंवित्ति विहाय निश्चयनयेनान्यदर्शनज्ञानचारित्रं नास्तीत्यभिप्रायं मनसि संप्रधार्य सूत्रं कथयति,- अण्णु जि दसणु अत्थि णवि, अण्णुवि अत्थि ण णाणु । अण्णु जि चरणु ण अस्थि जिय, मिल्लिवि अप्पा जाणु ॥ ९५ ॥ अन्यत् एव दर्शनं अस्ति नापि अन्यदपि अस्ति न ज्ञानं । अन्यत् एव चरणं न अस्ति जीव मुक्त्वा आत्मानं जानीहि ॥ ९५ ॥ अण्णु जिदंसणु अत्थि णवि अण्णुजि अत्थि ण णाणु अण्णु जि चरणु ण अस्थि जिय अन्यदेव दर्शनं नास्ति अन्यदेव ज्ञानं नास्ति अन्यदेव चरणं नास्ति हे जीव । किं. कृत्वा । मिल्लिवि अप्पा जाणु मुक्त्वा त्यक्त्वा । कं । आत्मानं जानीहीति । तथाहि । यद्यपि पड्द्रव्यपंचास्तिकायसप्ततत्त्वनवपदार्थाः साध्यसाधकभावेन निश्चयसम्यक्त्वहेतुत्वा- त्यागरूप व्रतकी रक्षा वह व्यवहारशील है और निश्चयकर अंतरंगमें अपने शुद्धात्मद्रव्यका निर्मल अनुभव वह शील कहा जाता है सो शीलरूप आत्मा ही कहा गया है, बाह्य सहकारी कारणभूत जो अनशनादि बारह प्रकारका तप है उससे तथा निश्चयकर अंतरं- गमे सव परद्रव्यकी इच्छाके रोकनेसे परमात्मस्वभाव (निजखभाव) में प्रतापरूप तिष्ठ रहा है इसकारण और समस्तविभावपरिणामोंके जीतनेसे आत्मा ही 'तपश्चरण' है और आत्मा ही निजखरूपकी रुचिरूप सम्यक्त्व है वह सर्वथा उपादेयरूप है इससे सम्यग्दर्शन भी आत्मा ही है अन्य कोई नही है, वीतरागखसवेदन ज्ञानके अनुभवसे आत्मा ही नि- श्चयज्ञानरूप है और मिथ्यात्वरागादिसमस्तविकल्पजालके त्यागकर परमात्मतत्त्वमें परम- समरसीभावके परिणमनसे आत्मा ही मोक्षमार्ग है। तात्पर्य यह है कि बहिरंग द्रव्येद्रिय- सयमादिके पालनेसे अंतरंगमें शुद्धात्माके अनुभवरूप भावसयमादिकके परिणमनसे उपा- देयसुख जो अतीद्रियसुख उसके साधकपनेसे आत्मा ही उपादेय है ॥ ९४ ॥ आगे निजशुद्धात्मस्वरूपको छोड़कर निश्चयनयसे दूसरा कोई दर्शन ज्ञान चारित्र नहीं है इस अभिप्रायको मनमें रखकर गाथासूत्र कहते हैं;-हे जीव ] हे जीव [ आत्मानं ] आत्माको [ मुक्त्वा ] छोड़कर [अन्यदपि ] दुसरा कोईभी [दर्शनं ] दर्शन [न एव ] नही है [अन्यदपि ] अन्य कोई [ज्ञानं न अस्ति ] ज्ञान नहीं है १३ ९८ रायचंद्रमशास्त्रमालायाम् । व्यवहारेण सम्यक्त्वं भवति तथापि निश्चयेन वीतरागपरमानंदैकस्वभावः शुद्धात्मोपादेय इति रुचिरूपपरिणामपरिणतशुद्धात्मैव निश्चयसम्यक्त्वं च भवति । यद्यपि निश्चयस्वसंवेदन- ज्ञानसाधकत्वात्तु व्यवहारेण शास्त्रज्ञानं भवति तथापि निश्चयनयेन वीतरागस्वसंवेदनतान- नपरिणतः शुद्धात्मैव निश्चयज्ञानं भवति । यद्यपि निश्चयचारित्रमाधकत्वान्मूलोत्तरगुणा व्यवहारेण चारित्रं भवति तथापि शुद्धात्मानुभूतिरूपवीतरागचारित्रपरिणतः स्वशुद्धात्मैव निश्चयनयेन चारित्रं भवतीति । अत्रोक्तलक्षणेऽभेदरत्नत्रयपरिणतः परमात्मैवोपादेय इति भावार्थः ॥ ९५ ॥ अथ निश्चयेन वीतरागभावपरिणतः स्वशुद्धात्मैव निश्चयतीर्थः निश्चयगुरुनिश्चयदेव इति कथयति;- अण्णु जि तित्थु म जाहि जिय, अण्णु जि गुरुउ म सेवि । अण्णु जि देउ म चिंति तुहुं, अप्पा विमलु मुएवि ॥ १६ ॥ अन्यत् एव तीर्थ मा गच्छ जीव अन्यत् एव गुरुं मा सेवख । अन्यत् एव देवं मा चिंतय त्वं आत्मानं विमलं मुक्त्वा ॥ ९६ ॥ अण्णु जि तित्थु म जाहि जिय अण्णु जि गुरुउ म सेवि अण्णु जि देउ म चिति तुहुँ अन्यदेव तीर्थ मा गच्छ हे जीव अन्यदेव गुरुं मा सेवस्व अन्यदेव देवं मा चितय त्वं । किं .. , [अन्यत् एव चरणं नास्ति ] अन्य कोई चारित्र नहीं है ऐसा [जानीहि ] तू जान अर्थात् आत्मा ही दर्शन ज्ञान चारित्र है ऐसा संदेहरहित जानो। भावार्थ-यद्यपि छह द्रव्य पांच अस्तिकाय सात तत्त्व नौ पदार्थका श्रद्धान कार्यकारणभावसे निश्चय सम्यक्त्वका कारण होनेसे व्यवहार सम्यक्त्व कहा जाता है, अर्थात् व्यवहार साधक है निश्चय साध्य है तौभी निश्चयनयकर एक वीतराग परमानंदखभाववाला शुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसा रुचिरूप परिणामसे परिणत हुआ शुद्धात्मा ही निश्चयसम्यक्त्व है। यद्यपि निश्चय- खसंवेदनज्ञानका साधक होनेसे व्यवहारनयकर शास्त्रका ज्ञानभी ज्ञान है तौभी निश्चयन- यकर वीतरागखसवेदनज्ञानरूप परिणत हुआ शुद्धात्मा ही निश्चयज्ञान है। यद्यपि निश्च- यचारित्रके साधक होनेसे अट्ठाईस मूलगुण चौरासी लाख उत्तरगुण व्यवहारनयकर चारित्र कहे जाते है तौभी शुद्धात्मानुभूतिरूप वीतरागचारित्रको परिणत हुआ निज शुद्धात्मा ही निश्चयनयकर चारित्र है। तात्पर्य यह है कि अभेदरूप निश्चयरत्नत्रयस्वरूप परिणत हुआ परमात्मा ही ध्यानकरने योग्य है ॥ ९५ ॥ आगे निश्चयनयकर वीतरागभावरूप परिणया निजशुद्धात्मा ही निश्चयतीर्थ, निश्चय गुरु, निश्चयदेव है ऐसा कहते हैं;-[हे जीव ] हे जीव [वं] तू [अन्यत् एव ] परमात्मप्रकाशः। ९९ कृत्वा । अप्पा विमलु मुएवि मुक्त्वा त्यक्त्वा । के। आत्मानं । कथंभूतं । विमलं रागा- दिरहितमिति । तथाहि । यद्यपि व्यवहारनयेन निर्वाणस्थानचैत्यचैत्यालयादिकं तीर्थभूतपुरुष- गुणस्मरणार्थ तीर्थ भवति तथापि वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूपनिश्छिद्रपोतेन संसारसमुद्रत- रणसमर्थत्वान्निश्चयनयेन स्वात्मतत्त्वमेव तीर्थ भवति तदुपदेशात्पारंपर्येण परमात्मतत्त्वला- भो भवतीति । व्यवहारेण शिक्षादीक्षादायको यद्यपि गुरुर्भवति तथापि निश्चयनयेन पंचें- द्रियविपयप्रभृतिसमस्तविभावपरिणामपरित्यागकाले संसारविच्छित्तिकारणत्वात् स्वशुद्धात्मैव गुरुः । यद्यपि प्राथमिकापेक्षया सविकल्पापेक्षया चित्तस्थितिकरणार्थ तीर्थकरपुण्यहेतुभूतं साध्यसाधकभावेन परंपरया निर्वाणकारणं च जिनप्रतिमादिकं व्यवहारेण देवो भण्यते तथापि निश्चयनयेन परमाराध्यत्वाद्वीतरागनिर्विकल्पत्रिगुप्तपरमसमाधिकाले स्वशुद्धात्मख- भाव एव देव इति । एवं निश्चयव्यवहाराभ्यां साध्यसाधकभावेन तीर्थगुरुदेवतास्वरूपं ज्ञातव्यमिति भावार्थः ॥ ९६ ॥ दूसरे [ तीर्थ ] तीर्थको [मा गच्छ ] मत जावै [ अन्यत् एव ] दूसरे [गुरुं ] गुरुको [मा सेवख ] मत सेवै [ अन्यत् एव ] अन्य [ देवं ] देवको [ मा चिंतय ] मत ध्यावै [आत्मानं विमलं ] रागादिमलरहित आत्माको [मुक्त्वा] छोड़कर अर्थात् अपना आत्मा ही तीर्थ है वहा रमण कर, आत्मा ही गुरु है उसकी सेवा कर, और आत्मा ही देव है उसीकी आराधना कर । अपने सिवाय दूसरेका सेवन मत करै । इसी कथनको विस्तारसे कहते हैं। भावार्थ-यद्यपि व्यवहार नयसे मोक्षके स्थानक सम्मेदशिखर आदि व जिनप्रतिमा जिनमंदिर आदि तीर्थ हैं क्योंकि वहां गये महान पुरुषोंके गुणोंकी याद होती है तौभी वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूप छेदरहित जिहाजकर संसाररूपी समुद्रके तरनेको समर्थ जो निज आत्मतत्त्व है वही निश्चयकर तीर्थ है उसके उपदेश परंपरासे परमात्मतत्त्वका लाभ होता है । यद्यपि व्यवहार नयकर दीक्षाशिक्षाका देनेवाला दिगंवर गुरु होता है तौभी निश्चयनयकर विषय कषाय आदिक समस्त विभावपरिणामोंके त्याग- नेके समय निजशुद्धात्मा ही गुरु है उसीसे संसारकी निवृत्ति होती है। यद्यपि प्रथम अवस्थामें चित्तकी स्थिरताकेलिये व्यवहारनयकर जिनप्रतिमादिक देव कहे जाते हैं और वे परंपरासे निर्वाणके कारण हैं तौभी निश्चयनयकर परम आराधने योग्य वीतरागनिर्वि- कल्प परमसमाधिके समय निज शुद्धात्मभाव ही देव है अन्य नहीं । इसप्रकार निश्चय व्यवहारनयकर साध्यसाधक भावसे तीर्थ गुरु देवका वरूप जानना चाहिये । निश्चयदेव निश्चयगुरु निश्चयतीर्थ निज आत्मा ही है वही साधने योग्य है और व्यवहार देव जिनेंद्र तथा उनकी प्रतिमा, व्यवहार गुरु महामुनिराज, व्यवहार तीर्थ सिद्ध क्षेत्रादिक ये सब निश्चयके साधक हैं इसलिये प्रथम अवस्थामें आराधने योग्य हैं । तथा निश्चयनयकर १०० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथ निश्चयेनात्मसंवित्तिरेव दर्शनमिति प्रतिपादयति,- अप्पा दसणु केवलुवि, अण्णु सव्वु ववहारु । एकु जि जोइय झाइयइ, जो तइलोयहं सारु ॥ १७ ॥ आत्मा दर्शनं केवलोपि अन्यः सर्वः व्यवहारः एक एव योगिन् ध्यायते यः त्रैलोक्यस्य सारः ।। ९७ ॥ अप्पा दसणु केवलुवि आमा दर्शनं सम्यक्त्वं भवति । कथंभूतोपि । केवलोपि । अण्णु सव्वु ववहारु अन्यः शेषः सर्वोपि व्यवहारः तेन कारणेन एक्कु जि जोइय झाइ- यइ हे योगिन्नेक एव ध्यायेत । यः आमा कथंभूतः । जो तइलोयहं सारु यः परमात्मा त्रैलोक्यस्य सारगूत इति । तद्यथा । वीतरागचिदानंदैकस्वभावात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञाना- भूतिरूपाभेदरत्नत्रयलक्षणनिर्विकल्पत्रिगुप्तिसमाधिपरिणतो निश्चयनयेन स्वासैव सम्यत्तवं अन्यः सर्वोपि व्यवहारस्तेन कारणेन स एव ध्यातव्य इति । अत्र यथा द्राक्षाकर्पूरश्रीखंडा- दिबहुद्रव्यैर्निष्पन्नमपि पानकमभेदविवक्षया कृत्वैक्यं भण्यते तथा शुद्धासानुभूतिलक्षणैर्निश्चय- सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैर्बहुभिः परिणतो अनेकोप्यात्मा त्वभेदविवक्षया एकोपि भण्यत इति भावार्थः । तथा चोक्त अभेदरत्नत्रयलक्षणं "दर्शनमात्मविनिश्चितिरात्मपरिज्ञानमिप्यते बोधः । स्थितिरात्मनि चारित्रं कुत एतेभ्यो भवति बंधः" ।। ९७ ॥ ये सब परपदार्थ हैं इनसे साक्षात् सिद्धि नही है परंपरायसे है। यहां श्रीपरमात्मप्रकाश अध्यात्मग्रंथमें निश्चयदेव गुरु तीर्थ अपना आत्मा ही है उसे आराधकर अनंत सिद्ध हुए और होवेंगे ऐसा सारांश हुआ ॥ ९६ ॥ आगे निश्चयनयकर आत्मखरूप ही सम्यग्दर्शन है;-केवलः आत्मा अपि] केवल (एक) आत्मा ही [दर्शनं ] सम्यग्दर्शन है [ अन्यः सर्वः व्यवहारः] दूसरा सब व्यवहार है इसलिये [हे योगिन् ] हे योगी [एक एव ध्यायते ] एक आत्मा ही ध्यान करने योग्य है [ यः त्रैलोक्यस्य सारः] जोकि तीनलोकमें सार है ।। भावार्थ- वीतराग चिदानंद अखंड खभाव आत्मतत्त्वका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान अनुभवरूप जो अभेद- रत्नत्रय वही जिसका लक्षण है तथा मनोगुप्ति आदि तीनगुप्तिरूप समाधिमें लीन निश्चय- नयसे निज आत्मा ही निश्चयसम्यक्त्व है अन्य सब व्यवहार है । इस कारण आत्मा ही ध्यावने योग्य है । जैसे दाख कपूर चंदन वगैरः बहुत द्रव्योंसे बनाया गया जो पीनेका रस वह यद्यपि अनेकरसरूप है तौभी अभेदनयकर एक पानवस्तु कही जाती है उसीतरह शुद्धात्मानुभूतिखरूप निश्चयसम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रादि अनेक भावोंसे परिणत हुआ आत्मा अनेकरूप है तौभी अभेदनयकी विवक्षासे आत्मा एक वस्तु है । यही अभेदरत्न- त्रयका स्वरूप जैनसिद्धातोंमें हर एक जगह कहा है-"दर्शनमित्यादि" इसका अर्थ .

परमात्मप्रकाशः। १०१ । अथ निर्मलमात्मानं ध्याय त्वं येन ध्यातेनांतर्मुहूर्तेनैव मोक्षपदं लभ्यत इति निरूपयति;- अप्पा झायहि णिम्मलउ, किं बहुए अण्णेण । जो झायंतह परमपउ, लम्भइ एक्कखणेण ॥ ९८ ।। आत्मानं ध्यायख निर्मलं किं बहुना अन्येन । यं ध्यायमानानां परमपदं लभ्यते एकक्षणेन ॥ ९८ ॥ अप्पा झायहि णिम्मलउ आत्मानं ध्यायख । कथंभूतं । निर्मलं किं बहुए अण्णेण किं बहुनान्येन शुद्धात्मबहिर्भूतेन रागादिविकल्पजालमालाप्रपंचेन जो झायंतह परमपउ लब्भइ यं परमात्मानं ध्यायमानानां परमपदं लभ्यते । केन करणभूतेन । एक्कखणेण एकक्षणेनांतर्मुहूर्तेनापि । तथाहि । समस्तशुभाशुभसंकल्पविकल्परहितेन स्वशुद्धात्मतत्त्व- ध्यानेनांतर्मुहूर्तेन मोक्षो लभ्यते तेन कारणेन तदेव निरंतरं ध्यातव्यमिति । तथा चोक्तं बृहदाराधनाशास्त्रे । पोडशतीर्थकराणां एकक्षणे तीर्थकरोत्पत्तिवासरे प्रथमे श्रामण्यबोध- सिद्धिः अंतर्मुहूर्तेन निवृत्तः । अत्राह शिष्यः । यद्यंतर्मुहूर्तपरमात्मध्यानेन मोक्षो भवति तर्हि इदानीमस्माकं तद्ध्यानं कुर्वाणानां किं न भवति । परिहारमाह । यादृशं तेषां प्रथमसंहन- ऐसा है कि आत्माका निश्चय वह सम्यग्दर्शन है आत्माका जानना वह सम्यग्ज्ञान है और आत्मामें निश्चल होना वह सम्यक चारित्र है यह निश्चयरत्नत्रय साक्षात् मोक्षके कारण हैं इनसे बंध कैसे हो सकता है कभी नहीं हो सकता ॥ ९७ ॥ आगे ऐसा कहते हैं कि जो निर्मल आत्माको ही ध्यावौ जिसके ध्यान करनेसे अंत- र्मुहूर्तमें ( तत्काल ) मोक्षपदकी प्राप्ति हो;-हे योगी तू [ निर्मलं आत्मानं ] निर्मल आत्माका ही [ध्यायस्व ] ध्यान कर [अन्येन बहुना किं] और बहुत पदार्थोंसे क्या । देश काल पदार्थ आत्मासे भिन्न हैं उनसे कुछ प्रयोजन नहीं है रागादिविकल्पजालके समूहोंके प्रपंचसे क्या फायदा एक निज खरूपको ध्यावो [1] जिस परमात्माके [ध्यायमानानां ] ध्यानकरनेवालोंको [एकक्षणेन] क्षणमात्रमें [परमपदं ] मोक्षपद लभ्यते ] मिलता है । भावार्थ-सब शुभाशुभ सकल्प विकल्परहित निजशुद्ध आत्म- खरूपके ध्यान करनेसे शीघ्र ही मोक्ष मिलती है इस लिये वही हमेशः ध्यान करने योग्य है। ऐसा ही बृहदाराधना शास्त्र में कहा है । सोलह तीर्थंकरोंको एक ही समय तीर्थकरोंके उत्पत्तिके दिन पहले चारित्र ज्ञानकी सिद्धि हुई फिर अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष होगई । यहांपर शिष्य प्रभ करता है कि यदि परमात्माके ध्यानसे अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष होती है तो इस समय ध्यानकरनेवाले हमलोगोंको क्यों नहीं होती। उसका समाधान इस तरह है कि जैसा निर्विकल्पशुक्लध्यान वज्रवृषभनाराच संहनना वालोंके चौथेकालमें होता है १०२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । नसहितानां शुक्लध्यानं भवति तादृशामिदानी नास्तीति । तथा चोक्तं । "अत्रेदानी निषेधंति शुक्लध्यानं जिनोत्तमाः । धर्मध्यानं पुनः प्राहुः श्रेणिभ्यां प्राग्विवर्तन" । अत्र येन कारणेन परमात्मध्यानेनांतर्मुहूर्तेन मोक्षो लभ्यते तेन कारणेन संसारस्थितिछेदनार्थमिदानी- मपि तदेव ध्यातव्यमिति भावार्थः ॥ ९८ ॥ अथ यस्य वीतरागमनसि शुद्धात्मभावना नास्ति तस्य शास्त्रपुराणतपश्चरणानि कि कुर्वतीति कथयति,- अप्पा णियमणि णिम्मलउ, णियमें वसइ ण जासु । सत्थपुराणइं तवचरणु, मुक्खु जि करहिं कि तासु ॥ ९९ ॥ आत्मा निजमनसि निर्मलः नियमेन वसति न यस्य । शास्त्रपुराणानि तपश्चरणं मोक्षं अपि कुवैति किं तस्य ॥ ९९ ।। अप्पा णियमणि णिम्मलउ णियमें वसइ ण जासु आत्मा निजमनसि निर्मलो नियमेन वसति तिष्ठति न यस्य सत्थपुराणइ तवचरणु मुक्खु जि करहि कि तासु शास्त्रपुराणानि तपश्चरणं च मोक्षमपि किं कुर्वति तस्येति । तद्यथा । वीतरागनिर्विकल्प- समाधिरूपा यस्य शुद्धात्मभावना नास्ति तस्य शास्त्रपुराणतपश्चरणानि निरर्थकानि भवंति । तर्हि किं सर्वथा निष्फलानि । नैव । यदि वीतरागसम्यक्त्वरूपस्वशुद्धात्मोपादेयभावना- वैसा अब नही होसकता । ऐसा ही दूसरे ग्रंथों में कहा है-"अत्रेत्यादि" इसका अर्थ यह है कि श्रीसर्वज्ञवीतरागदेव इस भरतक्षेत्रमें इस पंचमकालमें शुक्लध्यानका निषेध करते हैं इस समय धर्मध्यान हो सकता है शुक्लध्यान नहीं हो सकता । उपशमश्रेणी और क्षपकश्रेणी दोनों ही इस समय नही हैं सातवां गुणस्थानतक गुणस्थान है ऊपरके गुणस्थान नही हैं । इस जगह तात्पर्य यह है कि जिस कारण परमात्माके ध्यानसे अंतर्मुहूर्तमें मोक्ष होती है इसलिये संसारकी स्थिति घटानेके वास्ते अब भी धर्मध्यानका आराधन करना चाहिये जिससे परंपराय मोक्ष भी मिलसकती है ।। ९८॥ आगे ऐसा कहते हैं कि जिसके रागरहित मनमें शुद्धात्माकी भावना नही. है उसके शास्त्र पुराण तपश्चरण क्या करसकते हैं अर्थात् कुछभी नहीं कर सकते-[यस्य] जिसके [निजमनसि] निज मनमें [निर्मल आत्मा] निर्मल आत्मा [नियमेन] निश्चयसे [न वसति ] नहीं रहता [तस्य ] उस जीवके [शास्त्रपुराणानि] शाल पुराण [तप- श्चरणमपि] तपस्या भी [किं] क्या [मोक्षं ] मोक्षको [कुवैति ] करसकते हैं कभी नहीं करसकते । भावार्थ-वीतरागनिर्विकल्लसमाधिरूप शुद्धभावना जिसके नहीं है उसके शास्त्र पुराण तपश्चरणादि सब व्यर्थ हैं। यहां शिण्य प्रश्न करता है कि क्या विल- परमात्मप्रकाशः। १०३ सहितानि भवंति तदा मोक्षस्यैव बहिरंगसहकारिकारणानि भवंति तदभावे पुण्यबंधकार- णानि भवंति । मिथ्यात्वरागादिसहितानि पापबंधकारणानि च विद्यानुवादसंज्ञितदशमपूर्वश्रुतं पठित्वा भर्गपुरुपादिवदिति भावार्थः ॥ ९९ ।। अथात्मनि जाते सर्व ज्ञातं भवतीति दर्शयति, जोइय अप्पें जाणिएण, जगु जाणियउ हवेइ । अप्पहं केरह भावडइ, विविउ जेण वसे ॥१०॥ योगिन् आत्मना ज्ञातेन जगत् ज्ञातं भवति । आत्मनः कृते भावे विवितं येन वसति ॥ १००॥ जोइय अप्पं जाणिएण हे योगिन् आत्मना ज्ञातेन । किं भवति । जगु जाणियउ हवेइ जगत्रिभुवनं ज्ञातं भवति । कस्मात् । अप्पहं केरई भावडइ विविउ जेण वसेइ आत्मनः संबंधिनि भावे केवलज्ञानपर्याये विवितं प्रतिबिंबितं येन कारणेन वसति तिष्ठ- तीति । अयमर्थः । वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनजानेन परमात्मतत्त्वे ज्ञाते सति समस्तद्वा- दगांगागमस्वरूपं ज्ञातं भवति । कस्माद्यस्माद्राघवपांडवादयो महापुरुपा जिनदीक्षां गृहीत्वा द्वादशांगं पठित्वा द्वादशांगाध्ययनफलभूते निश्चयरत्नत्रयात्मके परमात्मध्याने तिष्ठति तेन कारणेन वीतरागस्वसंवेदनज्ञानेन निजात्मनि ज्ञाते सति सर्व ज्ञातं भवतीति । अथवा कुल ही निरर्थक हैं । उसका समाधान ऐसा है कि विलकुल तो नहीं है लेकिन वीत- राग सम्यक्त्वरूप निज शुद्धात्माकी भावना सहित हों तव तो मोक्षके ही बाह्य सहकारी कारण हैं यदि वे वीतरागसम्यत्तवके अभावरूप हों तो पुन्यबंधके कारण हैं और जो मिथ्या- त्वरागादि सहित हों तो पापबंधके कारण हैं जैसेकि रुद्र वगैरः विद्यानुवादनामा दशवें पूर्वतक शास्त्र पढकर भ्रष्ट हो जाते हैं ॥ ९९ ॥ आगे जिन भव्यजीवोंने आत्मा जानलिया उन्होंने सब जाना ऐसा दिखलाते हैं- [हे योगिन् ] हे योगी [आत्मना ज्ञातेन ] एक अपने आत्माके जाननेसे [जगत् ज्ञातं भवति ] यह तीन लोक जाना जाता है [ येन] क्योंकि [ आत्मनः कृते भावे] आत्माके भाव रूप केवलज्ञानमें [विवितं] यह लोक प्रतिबिंबित हुआ [वसति ] वस रहा है । भावार्थ-वीतराग निर्विकल्प खसंवेदनज्ञानसे शुद्धात्मतत्त्वके जाननेपर समस्त द्वादशाग शास्त्र जाना जाता है। क्योंकि जैसे रामचंद्र पाडव भरत सगर आदि महान् पुरुष भी जिनराजकी दीक्षा लेकर फिर द्वादशागको पढकर द्वादशांग पढनेका फल निश्च- यरलत्रय स्वरूप जो शुद्धपरमात्मा उसके ध्यानमें लीन हुए तिष्ठे । इसलिये वीतरागखस- वेदन ज्ञानकर अपने आत्माका जानना ही सार है आत्माके जाननेसे सबका जानपना १०४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । निर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नपरमानंदसुखरसास्वादे जाते सति पुरुपो जानाति । किं जानाति । वेत्ति मम स्वरूपमन्यदेहरागादिकं परमिति तेन कारणेनात्मनि जाते सर्व जातं भवति । अथवा आत्मा कर्ता श्रुतज्ञानरूपेण व्याप्तिज्ञानेन करणभूतेन सर्व लोकालोकं जानाति तेन कारणेनात्मनि ज्ञाते सर्व ज्ञातं भवतीति । अथवा वीतरागनिर्विकल्पत्रिगुप्तिममाधिवलेन केवलज्ञानोत्पत्तिबीजभूतेन केवलज्ञाने जाते सति दर्पणे विववत सर्व लोकालोकस्वरूपं विज्ञायत इति हतोरात्मनि जाते सर्व ज्ञातं भवतीति । अत्रेदं व्याख्यानचतुष्टयं नात्वा बाह्याभ्यंतरपरिग्रहत्यागं कृत्वा सर्वतात्पर्येण निजशुद्धात्मभावना कर्तव्येति तात्पर्य । तथा चोक्तं समयसारे "जो पस्सइ अपाणं अवद्धपुढे अणण्णमविसेसं । अपदेससुत्तममं पस्मइ जिणसासणं सव्वं" ॥ १०० ॥ अथैतदेव समर्थयतिः- अप्पसहावि परिहियह, एहउ होइ विसेसु । दीसइ अप्पसहावि लहु, लोयालोउ असेसु ॥१०१॥ , सफल होता है इस कारण जिन्होंने अपना आत्मा जाना उनने सबको जाना । अथवा निर्विकल्पसमाधिसे उत्पन्न हुआ जो परमानंद सुखरस उसके आखाद होनेपर ज्ञानी पुरुष ऐसा जानता है कि मेरा खरूप जुदा है और देहरागादिक मुझसे दूसरे हैं मेरे नही हैं इसलिये आत्माके ( अपने )जाननेसे सब भेद जाने जाते हैं जिसने अपनेको जानलिया उसने अपनेसे भिन्न सब पदार्थ जाने । अथवा आत्मा श्रुतज्ञानरूप व्याप्तिज्ञा- नसे सब लोकालोकको जानता है इसलिये आत्माके जाननेसे सब जाना गया । अथवा वीतरागनिर्विकल्प परमसमाधिके बलसे केवल ज्ञानको उत्पन्न ( प्रगट ) करके जैसे दर्पणमें घटपटादि पदार्थ झलकते हैं उसीप्रकार ज्ञानरूपी दर्पणमें सब लोक अलोक भासते हैं। इससे यह वात निश्चय हुई कि आत्माके जाननेसे सब जाना जाता है । यहांपर सारांश यह हुआ कि इन चारों व्याख्यानोंका रहस्य जानकर वाह्य अभ्यंतर सब परिग्रह छोडकर सब तरहसे अपने शुद्धात्माकी भावना करनी चाहिये । ऐसा ही कथन समयसारमें श्री- कुंदकुंदाचार्यने किया है । “जो पस्सइ" इत्यादि-इसका अर्थ यह है कि जो निकट संसारी जीव खसवेदन ज्ञानकर अपने आत्माको अनुभवता सम्यग्दृष्टिपनेसे अपनेको देखता है वह सब जैनशासनको देखता है ऐसा जिनसूत्रमे कहा है। कैसा वह आत्मा है ! रागादिक ज्ञानाबरणादिकसे रहित है, अन्यभाव जो नरनारकादिपर्याय उनसे रहित है, विशेष अर्थात् गुणस्थान मार्गणा जीवसमास इत्यादि सब भेदोंसे रहित है। ऐसा आत्माके स्वरूपको जो देखता है जानता अनुभवता है वह सब जिनशास- नका मर्म जाननेवाला है ॥ १० ॥ - है परमात्मप्रकाशः । १०५ आत्मखभावे प्रतिष्ठिताना एप भवति विशेषः । दृश्यते आत्मखभावे लघु लोकालोकः अशेषः ॥ १०१॥ अप्पसहावि परिहियह आत्मस्वभावे प्रतिष्ठितानां पुरुपाणां एहउ होइ विसेसु एष प्रत्यक्षीभूतो विशेपो भवति । एपः कः । दीसइ अप्पसहावि लहु दृश्यते परमात्मस्व- भावे स्थितानां लघु शीघ्रं । अथवा पाठांतरं 'दीसइ अप्पसहाउ लहु' दृश्यते । स कः । आत्मस्वभावः कर्मतापन्नो लघु शीघ्रं न केवलमात्मस्वभावो दृश्यते लोयालोउ असेसु लोकालोकस्वरूपमप्योपं दृश्यत इति । अत्र विशेपेण पूर्वसूत्रोक्तमेव व्याख्यानचतुष्टयं ज्ञातव्यं यस्मात्तस्यैव वृद्धमतसंवादरूपत्वादिति भावार्थः ॥ १०१ ॥ अतो अमुमेवार्थ दृष्टांतदाीताभ्यां समर्थति,- अप्पु पयासइ अप्पु परु, जिम अंवरि रविराउ । जोइय एत्थु म भंति करि, एहउ वत्थुसहाउ ॥१०२॥ आत्मा प्रकागयति आत्मानं परं यथा अंबरे रविरागः । योगिन् अत्र मा भ्रांति कापीः एष वस्तुखभावः ॥ १०२ ।। अप्पु पयासइ आत्मा कर्ता प्रकाशयति । कं । अप्पु परु आत्मानं परं च । यथा का किं प्रकाशयति । जिमु अंवरि रचिराउ यथा येन प्रकारेण अंबरे रविरागः जोइय एत्थु म मंति करि एहउ वत्थुसहाउ हे योगिन्नत्र भ्रांति मा कार्षीः एप वस्तुस्वभावः इति । तद्यथा । यथा निर्मेघाका रविरागो रविप्रकाशः खं परं च प्रकाशयति तथा वीतरागनि- विकल्पसमाधिरूपे कारणसमयसारे स्थित्वा मोहमेघपटले विनष्टे सति परमात्मा छद्मस्थाव- अब यही बात समर्थन (दृढ ) करते हैं;-[आत्मस्वभावे ] आत्माके स्वभावमें [प्रतिष्ठितानां] लीन हुए पुरुषोंके [एप विशेषः भवति ] प्रत्यक्षमें तो यह विशेषता होती है कि [आत्मस्वभावे ] आत्मखभावमें उनको [अशेषः लोकालोकः ] समस्त लोकालोक [लघु ] शीघ्र ही [ दृश्यते ] दीख जाता है । अथवा इस जगह ऐसा भी पाठांतर है "अप्पसहाव लहु" इसका अर्थ यह है कि अपना खभाव शीघ्र ही दीख जाता है और खभावके देखनेसे समस्त लोक भी दीखता है । यहांपर भी विशेषकरके पूर्वसूत्रकथित चारोंतरहका व्याख्यान जानना चाहिये, क्योंकि यही व्याख्यान वड़े २ आ- चार्योंने माना है ॥ १०१॥ आगे इसी अर्थको दृष्टांतदाष्टीतकरके दृढ करते हैं,-[यथा] जैसे [अंबरे] आकाशमें [रविरागः] सूर्यका प्रकाश अपनेको और परको प्रकाशित करता है उसी- तरह [ आत्मा] आत्मा [आत्मानं] अपनेको [परं] पर पदार्थोंको [प्रकाशयति ] प्रकाशता है सो [हे योगिन् ] हे योगी [अत्र] इसमें [भ्रांति मा कुरु ] श्रम मत १४ , १०६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । स्थायां वीतरागभेदभावनाज्ञानेन स्वं परं च प्रकाशयतीत्येप पश्चादईवस्थारूपकार्यसमयसार- रूपेण परिणम्य केवलज्ञानेन स्वं परं च प्रकाशयतीत्येप आत्मवस्तुस्वभावः संदेहो नास्तीति । अत्र योसौ केवलञानाद्यनंतचतुष्टयव्यक्तिरूपः कार्यसमयसारः स एवोपादेय इत्यभिप्रायः ॥ १०२॥ अथास्मिन्नेवार्थे पुनरपि व्यक्त्यर्थ दृष्टांतमाह;- तारायणु जलि विवियन, णिम्मलि दीसह जेम । अप्पए णिम्मलि विंबियउ, लोयालोउवि तेम ॥ १०३ ।। तारागणः जले विबितः निर्मले दृश्यते यथा । आत्मनि निर्मले विंबितं लोकालोकमपि तथा ॥ १०३ ॥ तारायणु जलि विवियउ तारागणो जले विवितः प्रतिस्फलितः । कथंभूते जले । हिम्मलि दीसइ जेम निर्मले दृश्यते यथा । दार्टातमाह । अप्पइ णिम्मलि विवियउ लोयालोउवि तेम आत्मनि निर्मले मिथ्यात्वरागादिविकल्पजालरहिते विवितं लोकालोक- सपि तथा दृश्यत इति । अत्र विशेषव्याख्यानं यदेव पूर्वदृष्टांतसूत्रे व्याख्यातमत्रापि तदेव ज्ञातव्यं । कस्मात् । अयमपि तस्य दृष्टांतस्य दृढीकरणार्थमिति सूत्रतात्पर्यार्थः ॥ १०३ ॥ करै [एष वस्तुभावः ऐसा ही वस्तुका खभाव है । भावार्थ-जैसे मेघरहित आका- शमें सूर्यका प्रकाश अपनेको और परको प्रकाशता है उसी प्रकार वीतरागनिर्विकल्पसमा- धिरूप कारणसमयसारमें लीन होकर मोहरूप मेधसमूहका नाश करके यह आत्मा मुनि अवस्थामें वीतराग खसंवेदन ज्ञानकर अपनेको और परको कुछ प्रकाशित करता है पीछे अरहंत अवस्थारूप कार्यसमयसारखरूप परिणमनकरके केवलज्ञानसे निज और परको सब द्रव्य क्षेत्र काल भावसे प्रकाशता है । यह आत्मवस्तुका खभाव है इसमें संदेह नही सम- झना । इस जगह ऐसा सारांश है कि जो केवल ज्ञान केवल दर्शन अनंतसुख अनंतवीर्य- रूप कार्यसमयसार है वही आराधने योग्य है ॥ १०२ ॥ आगे इसी अर्थमें फिर भी खुलासा करनेके लिये दृष्टांत कहते हैं;-यथा] जैसे [तारागणः] ताराओंका समूह [निर्मले जले] निर्मल जलमें [विचितः प्रतिबिंबित हुआ [ दृश्यते ] प्रत्यक्ष दीखता है [तथा] उसीतरह [निर्मले आत्मनि ] मिथ्यात्वरा- गादि विकल्पोंसे रहित स्वच्छ आत्मामें [लोकालोकं अपि ] समस्त लोक अलोक भासते है । भावार्थ-इसका विशेष व्याख्यान जो पहले कहा था वही यहां पर जानना अर्थात् जो सबका ज्ञाता दृष्टा आत्मा है वही उपादेय है। यह सूत्र भी पहले कथनका दृढ़ करनेवाला है ॥ १०३ ।।

परमात्मप्रकाशः।
१०७
अथात्मा परञ्च येनात्मना ज्ञानेन ज्ञायते तमात्मानं स्वसंवेदनज्ञानबलेन जानीहीति
कथयति:-
अप्पुवि परुवि वियाणियइ, जे अप्पें मुणिएण ।
सो णियअप्पा जाणि तुहूं, जोइय णाणवलेण ॥ १०४॥
आत्मापि परः अपि विज्ञायते येन आत्मना विज्ञातेन ।
तं निजात्मानं जानीहि त्वं योगिन् ज्ञानबलेन ॥ १०४ ॥
अप्पुवि परुवि वियाणियई जे अप्पें मुणिएण आत्मापि परोपि विज्ञायते येन
आत्मना विज्ञातेन सो णिय अप्पा जाणि तुहुं तं निजात्मानं जानीहि त्वं जोइय णाण-
पलेण हे योगिन् । केन कृत्वा जानीहि । ज्ञानवलेनेति । अयमत्रार्थः । वीतरागसदानंदैक-
स्वभावेन येनात्मना ज्ञातेन स्वात्मा परोपि ज्ञायते तमात्मानं वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदन-
ज्ञानभावनासमुत्पन्नपरमानंदसुग्वरसास्वादेन जानीहि तन्मयो भूत्वा सम्यगनुभवेति भा-
वार्थः ॥ १०४ ॥
अतः कारणान् ज्ञानं पृच्छति,-
णाणु पयासहि परमु महु, किं अण्णे बहुएण ।
जेण णियप्पा जाणियई, सामिय एकखणेण ॥ १०५ ॥
ज्ञान प्रकाशय परमं मम किं अन्येन बहुना ।
येन निजात्मा ज्ञायते खामिन् एकक्षणेन ॥ १०५ ॥
णाणु पयासहि परमु महु ज्ञानं प्रकाशय परमं मम कि अण्णे बहुएण किमन्येन
ज्ञानरहितेन बहुना जेण णियप्पा जाणियई येन ज्ञानेन निजामा ज्ञायते सामिय एक-
आगे जिस आत्माके जाननेसे निज और पर सब पदार्थ जाने जाते है उसी आ-
त्माको तू स्वसवेदन ज्ञानके वलसे जान ऐसा कहते हैं;-[येन आत्मना विज्ञान]
जिस आत्माको जाननेसे [आत्मा अपि] आप और [ परः अपि] पर सब पदार्थ
[विज्ञायते ] जाने जाते है [तं निजात्मानं ] उस अपने आत्माको [हे योगिन् ]
हे योगी [त्वं ] तू [ज्ञानवलेन ] आत्मज्ञानके बलसे [जानीहि ] जान । भावार्थ-
यहापर यह है कि रागादि विकल्पजालसे रहित सदा आनंद खभाव जो निज आत्मा
उसके जाननेसे निज और पर सब जाने जाते है इसलिये हे योगी हे ध्यानी तू उस
आत्माको वीतराग निर्विकल्पस्वसवेदनज्ञानकी भावनासे उत्पन्न परमानंद सुखरसके आखा-
दसे जान अर्थात् तन्मयी होकर अनुभव कर । स्वसवेदन ज्ञान (आपकर अपनेको अनु-
भव करना) ही सार है । ऐसा उपदेश श्रीयोगींद्रदेवने प्रभाकर भट्टको दिया ॥ १०४॥

, n १०८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । खणेण हे स्वामिनियतकालेनैकक्षणेनेति । तथाहि । प्रभाकरभट्टः पृच्छति । किं पृच्छति । हे भगवन् येन वीतरागस्वसंवेदनज्ञानेन क्षणमात्रेणैव शुद्धबुद्धैकस्वभावो निजामा आयते तदेव ज्ञानं कथय किमन्येन रागादिप्रवर्धकेन क्रिकल्पजालेनेति । अत्र येनैव मानेन मिथ्यात्वरागादिविकल्परहितेन निजशुद्धामसंवित्तिरूपेणांतर्मुहूर्तेनैव परमात्मस्वरूपं झायते तदेवोपादेयमिति तात्पर्यार्थः ॥ १०५ ॥ अत ऊर्ध्वं सूत्रचतुष्टयेन ज्ञानस्वरूपं प्रकाशयति;- अप्पा णाणु मुणेहि तुहुं, जो जाणइं अप्पाणु । जीवपएसहिं तित्तिडउ, णाणे गयणपवाणु ॥ १०६ ।। आत्मानं ज्ञानं मन्यस्व त्वं यः जानाति आत्मानं । जीवप्रदेशैः तावन्मानं ज्ञानेन गगनप्रमाणं ॥ १०६ ।। अप्पा णाणु मुणेहिं तुहुं हे प्रभाकरभट्ट आत्मानं ज्ञानं मन्यस्व त्वं । यः किं करोति । जो जाणइ अप्पाणु यः कर्ता जानाति । कं । आत्मानं । किविशिष्टं । जीवपएसहि तित्तिडउ जीवप्रदेशैस्तावन्मानं लोकमात्रप्रदेशं । अथवा पाठांतरं । 'जीवपएसहिं देहसमु' तस्यार्थो निश्चयेन लोकमात्रप्रदेशेपि व्यवहारेणैव संहारविस्तारधर्मत्वाद्देहमानः । पुनरपि कथंभूतमात्मानं णाणे गयणपवाणु ज्ञानेन कृत्वा व्यवहारेण गगनमात्रं जानीहि इति । अब प्रभाकर भट्ट महान् विनयसे ज्ञानका खरूप पूछता है;-[हे स्वामिन् ] हे भगवान [येन ज्ञानेन] जिस ज्ञानसे [एक क्षणेन] क्षण भरमें [ निजात्मा] अपना आत्मा [ज्ञायते ] जाना जाता है वह [परमं ज्ञानं] परम ज्ञान [मम] मेरे [प्रकाशय] प्रकाशित करो [अन्येन बहुना] और बहुत विकल्पजालोंसे [किम् ] क्या फायदा कुछ भी नही। भावार्थ-प्रभाकर भट्ट श्रीयोगींद्रदेवको पूछता है कि हे खामी जिस वीतराग खसंवेदन ज्ञानकर क्षणमात्रमें शुद्धबुद्ध स्वभाव अपना आत्मा जाना जाता है वह ज्ञान मुझको प्रकाशित करो दूसरे विकल्पजालोंसे कुछ फायदा नहीं है क्योंकि ये रागादिक विभावोंके बढानेवाले हैं। साराश यह है कि मिथ्यात्वरागादि विकल्पोंसे रहित तथा निज शुद्ध आत्मानुभवरूप जिस ज्ञानसे अंतर्मुहूर्तमेंही परमात्माका खरूप जाना जाता है वही ज्ञान उपादेय है। ऐसी प्रार्थना शिष्यने श्रीगुरूसे की ॥ १०५ ॥ आगे श्रीगुरु चार दोहासूत्रोंसे ज्ञानका खरूप प्रकाशते हैं;-श्रीगुरु कहते हैं कि हे प्रभाकरभट्ट [त्वं] तू [आत्मानं] आत्माको ही [ज्ञानं] ज्ञान [ मन्यख] जान [ यः] जो ज्ञानरूप आत्मा [आत्मानं ] अपनेको [जीवप्रदेशैः तावन्मानं] अपने प्रदेशोंसे लोक प्रमाण [ज्ञानेन गगनप्रमाणं] ज्ञानसे व्यवहार नयकर आकाशप्रमाण [जानाति ] जानता है । अथवा यहां "देहसमु" ऐसा भी पाठ है तब ऐसा समझना परमात्मप्रकाशः। १०९ तद्यथा । निश्चयनयेन मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलज्ञानपंचकादभिन्नं व्यवहारेण ज्ञानापेक्षया रूपावलोकनविषये दृष्टिवल्लोकालोकव्यापकं निश्चयेन लोकमात्रासंख्येयप्रदेशमपि व्यवहारेण स्वदेहमानं तमित्थंभूतमात्मानं आहारभयमैथुनपरिग्रहसंज्ञास्वरूपप्रभृतिसमस्तविकल्पकल्लो- लजालं त्यक्त्वा जानाति यः स पुरुष एव ज्ञानादभिन्नत्वाज् ज्ञानं भण्यत इति । अत्राय- मेव निश्चयनयेन पंचज्ञानामिन्नमात्मानं जानात्यसौ ध्याता तमेवोपादेयं जानीहीति भा- वार्थः । तथा चोक्तं । "आभिणिसुदोहिमणकेवलं च तं होदि एगमेव पदं । सो एसो परमट्ठो जं लहिदु णिव्वुदि लह दि" ॥ १०६ ॥ अथ,- अप्पहं जेवि विभिण्ण वढ, ते जि हवंति ण णाणु । ते तुहं तिषिणवि परिहरिवि, णियमि अप्पु वियाणु ॥ १०७ ॥ आत्मनः ये अपि विभिन्नाः वत्स तेपि भवंति न ज्ञानं । तान् त्वं त्रीण्यपि परिहृत्य नियमेन आत्मानं विजानीहि ॥ १०७ ॥ अप्पहं जेवि विभिण्ण वढ आसनः सकाशाद्यपि मिन्नाः वत्स ते जि हवंति ण णाणु तेपि भवंति न ज्ञानं तेन कारणेन तुहुं तिण्णिवि परिहरिवि तान् कर्मतापन्नान् तत्र हे कि निश्चयनयसे लोक प्रमाण है तौभी व्यवहारनयसे सकोच विस्तारखभाव होनेसे शरीर प्रमाण है । भावार्थ-निश्चयनयकर मति श्रुत अवधि मनःपर्यय केवल इन पांच ज्ञानोंसे अभिन्न तथा व्यवहारनयसे ज्ञानकी अपेक्षा रूप देखनेमें नेत्रोंकी तरह लोक अलोकमें व्यापक है । अर्थात् जैसे आखें रूपी पदार्थोंको देखती हैं परंतु उन खरूप नहीं होती वैसे ही आत्मा यद्यपि लोक अलोकको जानता है देखता है तौभी उन स्वरूप नहीं होता अपने खरूप ही रहता है ज्ञानकर ज्ञेय प्रमाण है यद्यपि निश्चयसे प्रदेशोंकर लोक प्रमाण है असख्यात प्रदेशी है तौभी व्यवहारनयकर अपने देहप्रमाण है ऐसे आत्माको जो पुरुष आहार भय मैथुन परिग्रहरूप चार वांछाओंखरूप आदि समस्त विकल्पकी तरं- गोंको छोड़कर जानता है वही पुरुष ज्ञानसे अभिन्न होनेसे ज्ञान कहा जाता है । आत्मा और ज्ञानमें भेद नहीं है आत्मा ही ज्ञान है । यहा साराश यह है कि निश्चयनयकरके पाच प्रकारके ज्ञानोंसे अभिन्न अपने आत्माको जो ध्यानी जानता है उसी आत्माको तू उपादेय जान । ऐसाही सिद्धातोंमें हरएक जगह कहा है-"आभिणि" इत्यादि । इसका अर्थ यह है कि मति श्रुत अवधि मनःपर्यय केवल ज्ञान ये पांच प्रकारके सम्यग्ज्ञान एक आत्माका ही स्वरूप है आत्माके विना ये ज्ञान नही होसकते वह आत्मा ही परम अर्थ है जिसको पाकर यह जीव निर्वाणको पाता है ॥ १०६॥ आगे परभावका निषेध करते हैं;-[हे वत्स] हे शिष्य [आत्मनः] आत्मासे ११० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । प्रभाकरभट्ट त्रीण्यपि परिहृत्य । पश्चात्किं कुरु । णियमि अप्पु वियाणु निश्चयेनात्मानं विजानीहीति । तद्यथा । सकलविशदैकज्ञानस्वरूपात्परमात्मपदार्थात् निश्चयनयेन भिन्नं त्रीण्यपि धर्मार्थकामान् त्यक्त्वा वीतरागस्वसंवेदनलक्षणे शुद्धात्मानुभूतिज्ञाने स्थित्वात्मानं जानीहीति भावार्थः ॥ १०७ ॥ अप्पा णाणहं गम्मु पर, णाणु वियाणइ जेण । तिण्णिवि मिल्लिचि जाणि तुहुं, अप्पा णाणें तेण ॥ १०८॥ आत्मा ज्ञानस्य गम्यः परः ज्ञानं विजानाति येन । त्रीण्यपि मुक्त्वा जानीहि त्वं आत्मानं ज्ञानेन तेन ॥ १०८ ॥ अप्पा णाणहं गम्मु पर आत्मा ज्ञानस्य गम्यो विषयः परः । कोर्थो । नियमेन । कस्मात् । णाणु वियाणइ जेण ज्ञानं कर्तृ विजानात्यामानं येन कारणेन अतः कारणात तिण्णिवि मिल्लिवि जाणि तुहु त्रीण्यपि मुक्त्वा जानीहि त्वं हे प्रभाकरभट्ट अप्पा णाणे तेण । के जानीहि । आसानं । केन । ज्ञानेन तेन कारणेनेति । तथाहि । निजशुद्धात्मा ज्ञानस्यैव गम्यः । कस्मादिति चेत् । मतिज्ञानादिपंचकविकल्परहितं यत्परमपदं परमालश- ब्दवाच्यं साक्षान्मोक्षकारणं तद्रूपो योसौ परमात्मा तमामानं वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेद- नज्ञानगुणेन विना दुर्धरानुष्ठानं कुर्वाणोपि बहवोपि न लभंते यतः कारणात् । तथा चोक्तं समयसारे । " णाणगुणेहिं विहीणा एवं तु पदं वहूवि ण लहंति । तं गिण्ह सुपदमेदं जइ इच्छसि दुक्खपरिमोक्खं” । अत्र धर्मार्थकामादिसर्वपरद्रव्येच्छां योसौ मुंचति स्वशुद्धात्म- सुखामृते तृप्तो भवति स एव निःपरिग्रहो भण्यते स एवात्मानं जानातीति भावार्थः । [ये अपि भिन्नाः] जो जुदे भाव हैं [ तेपि] वेभी [ज्ञानं न भवंति ] ज्ञान नहीं हैं वे सब भाव ज्ञानसे रहित जडरूप हैं [तान् ] उन [त्रीणि अपि धर्म अर्थ कामरूप तीनों भावोंको [परिहत्य] छोडकर [ नियमेन ] निश्चयसे [आत्मानं] आत्माको [त्वं] तू [विजानीहि ] जान । भावार्थ-हे प्रभाकरभट्ट मुनिरूप धर्म, अर्थरूप संसा- रके प्रयोजन, काम (विषयाभिलाष ) ये तीनों ही आत्मासे भिन्न हैं ज्ञानरूप नहीं हैं निश्चयनयकरके सब तरफसे निर्मल केवल ज्ञानखरूप परमात्मपदार्थसे भिन्न तीनों ही धर्म अर्थ काम पुरुषार्थोंको छोडकर वीतराग खसंवेदनखरूप शुद्धात्मानुभवरूपज्ञानमें रहकर आत्माको जान ।। १०७ ॥ आगे आत्माका खरूप दिखलाते हैं;-[आत्मा] आत्मा [परः] नियमसे ज्ञानस्य जानके, जो ज्ञानरपेचर है [ येन ] क्योंकि [ज्ञानं ] ज्ञान ही [ विजानाति ] आत्माको प्रदेशोंसे लोक प्रमाणलिये [त्वं ] हे प्रभाकरभट्ट तू [त्रीणि अपि मुक्त्वा] धर्म अर्थ [जानाति ] जानता हो छोडकर [ ज्ञानेन ] ज्ञानसे [आत्मानं ] निजआत्माको परमात्मप्रकाशः। १११ उक्तं च । “अपरिग्गहो अणिच्छो भणिओ गाणी दु णिच्छदे धम्मं । अपरिग्गहो दु धम्मस्स जाणगो तेण सो होदि" ॥ १०८ ॥ अथ:- णाणिय णाणिउ णाणिएण णाणिलं जा ण मुणेहि । ता अण्णाणिं णाणमलं, किं पर वंभु लहेहि ॥ १०९ ॥ ज्ञानिन् ज्ञानी ज्ञानिना ज्ञानिनं यावत् न जानासि । तावत् अज्ञानेन ज्ञानमयं किं परं ब्रह्म लभसे ॥ १०९ ॥ णाणिय हे ज्ञानिन् णाणिउ ज्ञानी निजामा णाणिएण ज्ञानिना निजामना करण- भूतेन । कथंभूतो निजामा । णाणिउ ज्ञानी ज्ञानलक्षणः तमित्थंभूतमामानं जा ण मुणेहि यावत्कालं न जानासि ता अण्णाणिं णाणमउं तावत्कालमज्ञानेन मिथ्यात्वरा- [जानीहि ] जान । भावार्थ--निजशुद्धात्मा ज्ञानके ही गोचर (जानने योग्य) है क्योंकि मतिज्ञानादि पाच भेदोंरहित जो परमात्मशब्दका अर्थ परमपद है वही साक्षात् मोक्षका कारण है उस खरूप परमात्माको वीतराग निर्विकल्प स्वसवेदन ज्ञानके विना दुर्धर तपके करनेवाले भी बहुतसे प्राणी नहीं पाते । इसलिये ज्ञानसे ही अपना खरूप अनुभव कर । ऐसा ही कथन श्रीकुंदकुंदाचार्यने समयसारजीमें किया है “णाणगुणेहि" इत्यादि । इसका अर्थ यह है कि सम्यग्ज्ञान नामा निज गुणसे रहित पुरुष इस ब्रह्मपदको बहुत कष्ट करके भी नही पाते अर्थात् जो महान दुर्धर तप करौ तौभी नही मिलता । इसलिये जो तू दुःखसे छूटना चाहता है सिद्धपदकी इच्छा रखता है तो आत्मज्ञानकर निजपदको प्राप्त कर । यहां सारांश यह है कि जो धर्म अर्थ कामादि सब परद्रव्यकी इच्छाको छोड़ता है वही निज शुद्धात्मसुखरूप अमृतमें तृप्त हुआ सिद्धांतमें परिग्रहरहित कहा जाता है और निग्रंथ कहा जाता है और वही अपने आत्माको जानता है। ऐसा ही समयसारजीमें कहा है "अपरिग्गहो" इत्यादि । इसका अर्थ ऐसा है कि जिन- सिद्धातमे परिग्रहरहित और इच्छारहित ज्ञानी कहा गया है जो धर्मको भी नही चाहता है अर्थात् जिसके व्यवहारधर्मकी भी कामना नही है उसके अर्थ तथा कामकी इच्छा कहांसे होवै । वह आत्मज्ञानी सब अमिलाषाओंसे रहित है जिसके धर्मका भी परिग्रह नहीं है तो अन्य परिग्रह कहांसे हो इसलिये वह ज्ञानी परिग्रही नही है केवल निजस्वरूपका जाननेवाला ही होता है ॥१०८॥ आगे ज्ञानसे ही परब्रह्मकी प्राप्ति होती है ऐसा कहते हैं;-[हे ज्ञानिन् ] हे ज्ञानी [ज्ञानी] ज्ञानवान् अपना आत्मा [ज्ञानिना] सम्यग्ज्ञानकरके [ज्ञानिनं] ज्ञानलक्षण- ११२ रायचंद्र जैनशास्त्रमालायाम् । गादिविकल्पजालेन ज्ञानमयं । किं पर वंभु लहेहि कि परमुत्कृष्ट ब्रह्मस्वभावं लभसे कि तु नैवेति । तद्यथा। यावत्कालमामा कर्ता आत्मानं कर्मतापन्नं आत्मना करणभूतेन आत्मने निमित्तं आत्मनः सकाशात् आत्मनि स्थितं समस्तरागादि विकल्पजालं मुक्त्वा न जानासि तावत्कालं परमब्रह्मशब्दवाच्यं निर्दोषिपरमात्मानं किं लभसे नैवेति भावार्थः ॥ १०९ ॥ अथानंतरं सूत्रचतुष्टयेनांतरस्थले परलोकशब्दव्युत्पच्या परलोकशब्दवाच्यं परमात्मानं कथयति,- जोइजइ ति वंभु परु, जाणिजइ तिं सोइ । वंभु मुणेविणु जेण लहु, गम्मिजइ परलोइ ॥११० ॥ दृश्यते तेन ब्रह्म परः ज्ञायते तेन स एव । ब्रह्म मत्त्वा येन लघु गम्यते परलोके ॥ ११० ॥ जोइजइ दृश्यते तिं तेन पुरुषेण तेन कारणेन वा । कोसौ दृश्यते । वंशु परु ब्रह्म- शब्दवाच्यः शुद्धामा । कथंभूतः । परः उत्कृष्टः । अथवा पर इति पाठे नियमेन । न केवलं दृश्यते जाणिजइ ज्ञायते तेन पुरुषेण तेन कारणेन वा सोइ स एव शुद्धात्मा । केन कारणेन । वंभु मुणेविणु जेण लहु येन पुरुषेण येन कारणेन वा ब्रह्मशब्दवाच्यनि- दोषिपरमात्मानं मत्त्वा ज्ञात्वा पश्चात् गमिजइ परलोइ तेनैव पूर्वोक्तेन ब्रह्मस्वरूपे परिज्ञा- वाले आत्माको [ यावत् ] जबतक [न] नही [जानासि ] जानना [ तावत् ] तब- तक [अज्ञानेन] अज्ञानी होनेसे [ज्ञानमयं ] ज्ञानमय [परं ब्रह्म] अपने खरूपको [किं लभसे ] क्या पासकता है कभी नहीं पासकता । जो कोई आत्माको पाता है तो ज्ञानसे ही पासकता है । भावार्थ-जबतक यह जीव अपनेको आपकर अपनी प्राप्तिके लिये आपसे अपनेमें तिष्ठता नही जान ले तबतक निर्दोष शुद्ध परमात्मा सिद्ध परमेष्टीको क्या पासकता है कभी नही पासकता । जो आत्माको जानता है वही परमात्माको जानता है ॥ १०९ ॥ इसप्रकार प्रथम महास्थलमें चार दोहाओंकर अंतरस्थलमें ज्ञानका व्याख्यान किया । आगे चार सूत्रोंकर अंतरस्थलमें परलोक शब्दकी व्युत्पत्तिकर परलोक शब्दसे परमात्माको ही कहते हैं;-[तेन] उस कारणसे उसी पुरुषसे [परः ब्रह्म] शुद्धात्मा नियमसे [दृश्यते ] देखा जाता है [ तेन] उसी पुरुषसे निश्चयसे [ स एव वही शुद्धात्मा [ज्ञायते ] जाना जाता है | येन ] जो पुरुष जिसकारण [ब्रह्म मत्त्वा] अपना खरूप जानकर [ परलोके लघु गम्यते । परमात्मतत्त्वमें शीघ्र ही प्राप्त होता है । भावार्थ-जो परमात्मप्रकाशः। ११३ नपुरुपेण तेनैव कारणेन वा गम्यते । क । परलोके परलोकशब्दवाच्ये परमात्मतत्त्वे । किं च । योसी शुद्धनिश्चयनयेन शक्तिरूपेण केवलज्ञानदर्शनखभावः परमात्मा स सर्वेपां सूक्ष्मैकेन्द्रियादिजीवानां शरीरे पृथक् पृथग्रूपेण तिष्ठति स एव परमब्रह्मा स एव परम- विष्णुः स एव परमशिवः इति, व्यक्तिरूपेण पुनर्भगवानहन्नेव मुक्तिगतसिद्धात्मा वा परमत्रामा विष्णुः शिवो वा भण्यते । तेन नान्यः कोपि परिकल्पितः जगद्व्यापी तथैवै- को परमवमा गिवो वालीति । अयमत्रार्थः । यत्रासौ मुक्तात्मा लोकाग्रे तिष्ठति स एव बसलोकः स एव विष्णुलोकः स एव शिवलोको नान्यः कोपीति भावार्थः ।। ११० ॥ अथ,--- मुणिवरविंदहं हरिहरहं, जो मणि णिवसइ देउ । परहं जि परतरु णाणमउ, सो वुचा परलोउ ॥१११ ॥ मुनिवरचंदाना हरिहराणां यः मनसि निवसति देवः । परमात् अपि परतरः ज्ञानमयः स उच्यते परलोकः ॥ १११ ।। मुणिवरविंदहं हरिहरहं मुनिवरदानां हरिहराणां च जो मणि णिवसइ देउ कोई शुद्धात्मा अपना स्वरूप शुद्ध निश्चयनयकर शक्तिरूपसे केवलज्ञान केवलदर्शन खभाव है वही वाम्नवमें (असलमें ) परमेश्वर है । परमेश्वर में और जीवमें जातिभेद नही है नवतक कर्मोंसे बंधा हुआ है तबतक संसारमें भ्रमण करता है । सूक्ष्म बादर एकेन्द्रि यादि जीवोंके शरीरमें जुदा जुदा तिष्ठता है और जब कर्मोंसे रहित होजाता है तब सिद्ध कहलाता है। ससारअवस्थामें शक्तिरूप परमात्मा है और सिद्ध अवस्थामें व्यक्तिरूप है । यही आत्मा परब्रह्म परमविष्णु परमशिव शक्तिरूप है और प्रगटरूपसे भगवान अर्हत अथवा मुक्तिको प्राप्त हुए सिद्धात्मा ही परमब्रह्मा परमविष्णु परमशिव कहे जाते हैं । यह निश्चयसे जानो। ऐसा कहनेसे अन्य कोई भी कल्पना किया हुआ जगतमें व्यापक परमब्रह्म परमविष्णु परमशिव नहीं है। साराश यह है कि जिसलोकके शिखरपर अनंत सिद्ध विराज रहे है वही लोकका शिखर परम धाम ब्रह्मलोक वही विष्णुलोक और वही शिवलोक है अन्य कोईभी ब्रह्मलोक विष्णुलोक शिवलोक नही है । ये सब निर्वाण क्षेत्रके नाम हैं और ब्रह्मा विष्णु शिव ये सव सिद्ध परमेष्ठीके नाम हैं । सो भगवान तो व्यक्तिरूप परमात्मा हैं तथा यह जीव शक्तिरूप परमात्मा है । इसमें सदेह नहीं है । जितने भगवानके उतने सब शक्तिरूप इस जीवके नाम हैं। यह जीव ही शुद्धनयकर भगवान है ॥ ११०॥ आगे ऐसा कहते हैं कि भगवानका ही नाम परलोक है-[य] जो आत्मदेव [मुनिवरदानां हरिहराणां] मुनीश्वरों के समूह के तथा इंद्र वा वासुदेव, रुद्रोंके १५ .. ११४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । योसौ मनसि निवसति देवः आराध्यः । पुनरपि किविशिष्टः । परहं जि परतरु णाणमउ परस्मादुत्कृष्टादपि अथवा परहं जि बहुवचनं परेभ्योपि सकाशादतिशयेन परः परतरः । पुनरपि कथंभूतो । ज्ञानमयः केवलजानेन निर्वृत्तः सो वुचइ परलोउ स एवं गुणवि- शिष्टः : शुद्धात्मा परलोक इत्युच्यते इति । पर उत्कृष्टो वीतरागचिदानंदेकस्वभाव आत्मा तस्य लोकोऽवलोकनं निर्विकल्पसमाधौ वानुभवनमिति परलोकगब्दस्यार्थः अथवा लोक्यंते दृश्यंते जीवादिपदार्था यस्मिन् परमात्मस्वरूपे यस्य केवलज्ञानेन वा स भवति लोकः परश्चासौ लोकश्च परलोकः व्यवहारेण पुनः स्वर्गापवर्गलक्षणः परलोको भण्यते । अत्र योसौ परलोकशब्दवाच्यः परमात्मा स एवोपादेय इति तात्पर्यार्थः ॥ १११ ॥ अथ । सो पर वुच्चइ लोउ परु, जसु मइ तित्थु वसेइ । जहिं मइ तहिं गइ जीवहं जि, णियम जेण हवेइ ॥ ११२ ॥ सः परः उच्यते लोकः परः यस्य मतिः तत्र वसति । यत्र मतिः तत्र गतिः जीवस्य एव नियमेन येन भवति ॥ ११२ ।। सो पर वुच्चइ लोउ परु स परः नियमेनोच्यते लोको जनः । कथंभूतो भण्यते । पर उत्कृष्टः । स कः । जसु मइ तित्थु वसेइ यस्य भव्यजनस्य मतिर्मनश्चित्तं तत्र निजपर- मात्मस्वरूपे वसति विषयकपायविकल्पजालस्यागेन स्वसंवेदनसंवित्तिस्वरूपेण स्थिरीभवतीति । यस्य परमात्मतत्त्वे मतिस्तिष्ठति स कस्मात्परो भवतीति चेत् जहिं मइ तहं गइ जीवह [मनसि ] चित्तमें [निवसति ] वस रहा है [सः] वह [ परसात् अपि परतरः] उत्कृष्ट से भी उत्कृष्ट [ज्ञानमयः] ज्ञानमई [परलोकः] परलोक [उच्यते] कहा जाता है । भावार्थ-परलोक शब्दका अर्थ ऐसा है कि पर अर्थात् उत्कृष्ट वीतराग- चिदानंद शुद्धखभाव आत्मा उसका लोक अर्थात् अवलोकन निर्विकल्पसमाधिमें अनुभवना वह परलोक है । अथवा जिसके परमात्मखरूपमें या केवलज्ञानमें जीवादिपदार्थ देखे जावें इसलिये उस परमात्माका नाम परलोक है । अथवा व्यवहारनयकर स्वर्ग मोक्षको पर- लोक कहते हैं । खर्ग और मोक्षका कारण भगवानका धर्म है इसलिये केवली भगवानको परलोक कहते हैं । परमात्माके समान अपना निज आत्मा है वही परलोक है वोही उपा- देय है ॥ १११ ॥ आगे ऐसा कहते हैं जिसका मन निजआत्मामें वस रहा है वही ज्ञानी जीव परलोक है-[यस्य मति ] जिस भव्यजीवकी बुद्धि [ तत्र ] उस निज आत्मखरूपमें [ वसति] वस रही है अर्थात् विषयकषायविकल्पजालके त्यागसे स्वसंवेदन-ज्ञानखरूपकर स्थिर हो रही है [ सः] वह पुरुष [परः] निश्चयकर [परः लोकः] उत्कृष्ट जन [ उच्यते ] कहा जाता है । अर्थात् जिसकी बुद्धि निजखरूपमें ठहर रही है वही उत्तम जन है परमात्मप्रकाशः। ११५ जि णियमि जेण हवेइ येन कारणेन यत्र स्वशुद्धात्मस्वरूपे मतिस्तत्रैव गतिः । कस्यैव । जीवस्यैव अथवा बहुवचनपक्षे जीवानामेव निश्चयेन भवतीति । अयमत्र भावार्थः । यद्यार्त- रौद्राधीनतया स्वशुद्धात्मभावनाच्युतो भूत्वा परभावेन परिणमति तदा दीर्घसंसारी भवति, यदि पुनर्निश्चयरत्नत्रयात्मके परमात्मतत्त्वे भावनां करोति तर्हि निर्वाणं प्राप्नोति इति ज्ञात्वा सर्वरागादिविकल्पत्यागेन तत्रैव भावना कर्तव्येति ॥ ११२ ॥ अथ । जहिं मइ तहिं गइ जीव तुहुं, मरणुवि जेण लहेहि । तें परवंभु मुएवि भई, मा पर दव्वि करेहि ॥ ११३ ॥ यत्र मतिः तत्र गतिः जीव त्वं मृत्वा येन लभसे । तेन परब्रह्म मुक्त्वा मति मा परद्रव्ये कार्षीः ॥ ११३ ॥ जहिं मइ तहिं गइ जीव तुडं मरणुवि जेण लहेहि यत्र मतिस्तत्र गतिः हे जीव त्वं मरणेन कृत्वा येन कारणेन लभसे तें परवंभु मुएवि मइ मा परदवि करेहि तेन कारणेन परमब्रह्मशब्दवाच्यं शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन टंकोत्कीर्णज्ञायकैकखभावं वीतरागसदानं- दैकसुखामृतरसपरिणतं निजशुद्धात्मतत्त्वं मुक्त्वा मतिं चित्तं मा परद्रव्ये देहसंगादिपु मा कार्पोरिति तात्पर्यार्थः ॥ ११३ ॥ एवं सूत्रचतुष्टयेनांतरस्थले परलोकशब्दव्युत्पत्त्या परलो- कशब्दवाच्यस्य परमात्मनो व्याख्यानं गतं । [येन ] क्योंकि [यत्र मतिः ] जैसी बुद्धि होती है [ तत्र ] वैसी [ एव ] ही [ जीवस्य ] जीवकी [गतिः ] गति [नियमेन ] निश्चयकर [ भवति ] होती है ऐसा जिनवरदेवने कहा है । अर्थात् शुद्धात्मस्वरूपमें जिस जीवकी बुद्धि होवे उसको वैसी ही गति होती है जिन जीवोंका मन निजवस्तुमें है उनको निजपदकी प्राप्ति होती है इसमें सदेह नही है । भावार्थ-जो आर्तध्यान रौद्रध्यानकी आधीनतासे अपने शुद्धात्मकी भावनासे रहित हुआ रागादिक परभावोंखरूप परिणमन करता है तो वह दीर्घससारी होता है और जो निश्चयरत्नत्रयखरूप परमात्मतत्त्वमे भावना करता है तो मोक्ष ही पाता है। ऐसा जानकर सब रागादि विकल्पोंको त्याग उस परमात्मतत्त्वमें ही भावना करनी चाहिये ॥ ११२ ॥ आगे फिर भी इसी बातको दृढ करते हैं, हे जीव हे जीव [ यत्र मतिः ] जहा तेरी बुद्धि है [तत्र गतिः] वहीपर गति है उसको [येन] जिस कारण से [त्वं मृत्वा] तू मरकर [ लभसे ] पावैगा [ तेन ] इसलिये तू [परब्रह्म] परम ब्रसको [ मुक्त्वा ] छोडकर [ परद्रव्ये ] परद्रव्यमे [ मतिं] बुद्धिको [ मा कार्षीः ] मत करै ।। भावार्थ- शुद्धद्रव्यार्थिकनयकर टाकीकासा गढा हुआ अघटितघाट, अमूर्तीक पदार्थ ज्ञायकमात्र खभाव, वीतराग सदा आनंदरूप अद्वितीय अतीद्रिय सुखरूप अमृतके रसकर तृप्त, ऐसे

११६
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
तदनंतरं किं तत् परद्रव्यमिति प्रश्ने प्रत्युत्तरं ददाति,
जं णियद्व्वहं भिण्णु जड, तं परषु वियाणि ।
पुग्गल धम्माधम्मु णहु, कालुवि पंचमु जाणि ॥ ११४ ॥
यत् निजद्रव्यात् भिन्नं जडं तत् परद्रव्यं जानीहि ।
पुद्गलः धर्माधर्मः नमः कालं अपि पंचमं जानीहि ॥ ११४ ॥
जमित्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते जं यत् णियदव्वहं निजद्रव्यात् भिण्णु
भिन्नं पृथग्भूतं जड जडं तं तत् परदन्यु वियाणि परद्रव्यं जानीहि । तच्च किं । पुग्गलु
धम्माहम्मु णहु पुद्गलधर्माधर्मनभोरूपं कालवि कालमपि पंचमु जाणि पंचमं जानीहीति ।
अनंतचतुष्टयस्वरूपानिजद्रव्याद्वाह्यं भावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्मरूपं जीवसंबंधं शेपं पुद्गलादि-
पंचभेदं यत्सर्व तद्धेयमिति ॥ ११४ ॥
अथ वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरंतर्मुहूर्तेनापि कर्मजालं दहतीति ध्यानसामर्थ्य दर्शयति;-
जइ णिविसहुवि कुवि करइ, परमप्पइ अणुराउ ।
अग्गिकणी जिम कट्ठगिरि, डहइ असेसुवि पाउ ॥ ११५ ॥
यदि निमिषार्धमपि कोपि करोति परमात्मनि अनुरागं ।
अग्निकणिका यथा काष्ठगिरि दहति अशेषमपि पापं ॥ ११५ ॥
निजशुद्धात्मतत्त्वको छोड़कर द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्ममें या देहादि परिग्रहमें मनको
मत लगा ॥ ११३ ॥
इसप्रकार पहले महाधिकारमें चार दोहासूत्रोंकर अंतरस्थलमें परलोक शब्दका अर्थ
परमात्मा किया। आगे परलोक ( परमात्मा ) में ही मन लगा परद्रव्यसे ममता छोड
ऐसा कहा गया था उसमें शिष्यने प्रश्न किया कि परद्रव्य क्या है उसका समाधान श्रीगुरु
कहते हैं। [यत् ] जो [निजद्रव्यात् ] आत्मपदार्थसे [भिन्नं] जुदा [जडं] जड
पदार्थ है [ तत् ] उसे [ परद्रव्यं ] परद्रव्य [जानीहि ] जानो । और वह परद्रव्य
[पुद्गलः धर्माधर्मः नमः कालं अपि पंचमं ] पुद्गल धर्म अधर्म आकाश और
पांचवा कालद्रव्य [जानीहि ] ये सब परद्रव्य जानो । भावार्थ-द्रव्य छह हैं उनमेंसे
पांच जड और जीवको चैतन्य जानो । पुद्गल धर्म अधर्म काल आकाश ये सब जड हैं
इनको अपनेसे जुदे जानो और जीव भी अनंत हैं उन सबोंको अपनेसे भिन्न जानो । अनंत
चतुष्टय स्वरूप अपना आत्मा है उसीको निज (अपना) जान । और जीवके भावकर्म-
रूप रागादिक तथा द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि आठकर्म, और शरीरादिक नोकर्म इनका
संबंध अनादिसे है परंतु जीवसे भिन्न हैं इसलिये अपने मत मानें । पुद्गलादि पांच भेद
जडपदार्थ सब हेय जान अपना, स्वरूप ही उपादेय है उसीको आराधन कर ॥ ११४ ॥

परमात्मप्रकाशः। ११७ जइ इत्यादि । जइ णिविसद्धवि यदि निमिपार्धमपि कुवि करइ कोपि कश्चित् करोति । किं करोति । परमप्पइ अणुराउ परमात्मन्यनुरागं । तदा किं करोति । अग्गि- कणी जिमु कहगिरि अग्निकणिका यथा काष्ठगिरि दहति तथा डहइ असेसुवि पाउ दहत्य- शेषं पापमिति । तथाहि-शुद्धिगौरवरसगौरवकवित्ववादित्वगमकत्ववाग्मित्वचतुर्विधशब्दगौ- रवस्वरूपप्रभृतिसमस्तविकल्पजालत्यागरूपेण महावातेन प्रज्वलिता निजशुद्धात्मतत्त्वध्याना- निकणिका स्तोकाग्निकेंधनराशिमिवांतर्मुहूर्तेनापि चिरसंचितकर्मराशि दहतीति । अत्रैवंविधं शुद्धात्मध्यानसामर्थ्य ज्ञात्वा तदेव निरंतरं भावनीयमिति भावार्थः ॥ ११५ ।। अथ हे जीव चिंताजालं मुक्त्वा शुद्धात्मस्वरूपं निरंतरं पश्येति निरूपयति,- मिल्लिवि सयल अवक्खडी, जिय णिचिंतउ होइ । चित्तु णिवेसहि परमपइ, देड णिरंजणु जोइ ॥ ११६ ॥ मुत्त्वा सकलां चिंतां जीव निश्चितः भूत्वा । चित्तं निवेशय परमपदे देवं निरंजनं पश्य ॥ ११६ ॥ मिल्लिवि' इत्यादि । मिल्लिवि मुक्त्वा सयल समस्तं अवक्खडी देशभापया चिंता जिय हे जीव णिचिंतउ होइ निश्चितो भूत्वा । किं कुरु । चित्तु णिवेसहि चित्तं निवेशय आगे एक अंतमुहूर्तमें कर्म जालको वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूप अग्नि भस्म करडालती है ऐसी समाधिकी सामर्थ्य है वोही दिखाते हैं;-[ यदि ] जो [ निमिषार्धमपि ] आधेनिमेषमात्र भी [कोपि] कोई [ परमात्मनि ] परमात्मामें [अनुरागं] प्रीतिको [करोति ] करै तो [ यथा ] जैसे [अग्निकणिका ] अग्मिकी कणी [ काष्ठगिरिं] काठके पहाड़को [ दहति ] भस्म करती है उसीतरह [अशेष अपि पापं] सब ही पापोंको भस्म कर डालै ॥ भावार्थ-ऋद्धिका गर्व रसायनका गर्व अर्थात् पारावगैरः आदि धातु- ओंके भस्म करनेका मद अथवा नौ रसके जाननेका गर्व, कविकलाका मद, वादमे जीतनेका मद, शास्त्रकी टीका वनानेका मद, शास्त्रके व्याख्यान करनेका मद ये चार तरहका शब्द गौरव स्वरूप इत्यादि अनेक विकल्पजालोंका त्यागरूप प्रचंड पवन उसकरके प्रज्वलित हुई (दहकतीहुई ) जो निजशुद्धात्मतत्त्वके ध्यानरूप अग्निकी कणी है वह जैसे अग्निकी कणी काठके पर्वतको भस्म करदेती है उसीतरह समस्त पापोंको भल कर डालती है अर्थात् जन्म जन्मके इकडे किये हुए कर्मोंको आधे निमेपमें नष्ट कर देती है ऐसी शुद्ध आत्मध्यानकी सामर्थ्य जानकर उसी ध्यानकी ही भावना हमेशा करनी चाहिये ॥ ११५॥ आगे हे जीव चिंताओंको छोड़कर शुद्धात्मखरूपको निरंतर देख ऐसा कहते हैं। [हे जीव ] हे जीव [ सकलां] समस्त [चिंता] चिंताओंको [मुक्त्वा] छोडकर . ११८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । धारय । क । परमपए निजपरमात्मपदे । पश्चात् किं कुरु । देउ णिरंजणु जोह देवं निरंजनं पश्येति । तद्यथा । हे जीव दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षाखरूपापध्यानादि-समस्तचि- ताजालं मुक्त्वा निश्चितो भूत्वा चित्तं परमात्मस्वरूपे स्थिरं कुरु, तदनंतरं भावकर्मद्रव्यम- नोकर्माजनरहितं देवं परमाराध्यं निजशुद्धात्मानं ध्यायेति भावार्थः । अपध्यानलक्षणं कथ्यते "बंधबधच्छेदादेद्वेषाद्रागाच्च परकलत्रादेः। आध्यानमपध्यानं शासति जिनगासने विशदाः ॥ ११६ ॥ अथ शिवशब्दवाच्ये निजशुद्धात्मनि ध्याते यत्सुखं भवति तत्सूत्रत्रयेण प्रतिपादयति, जं सिवदंसणि परमसुह, पावहि झाणु करंतु। तं सुहु भुवणिवि अत्थि णवि, मेल्लिवि देउ अणंतु ॥ ११७ ।। यत् शिवदर्शने परमसुखं प्रामोपि ध्यानं कुर्वन् । तत् सुखं भुवनेपि अस्ति नैव मुत्तवा देवं अनंतं ॥ ११७ ॥ जमित्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते-जं यत् सिवदंसणि स्वशुद्धात्मदर्शने परमसुहु परमसुखं पावहि प्राप्नोपि हे प्रभाकरभट्ट । किं कुर्वन् सन् । झाणु करंतु ध्यानं कुर्वन् सन् तं सुहु तत्पूर्वोक्तसुखं भुवणिवि भुवनेपि अत्थि णवि अस्ति नैव । किं कृत्वा । मिल्लिवि मुक्त्वा । कं । देउ देवं । कथंभूतं । अणंतु अनंतशब्दवाच्यपरमात्मपदार्थमिति । [निश्चितः भूत्वा] निश्चित होकर तू [चित्तं] अपने मनको [ परमपदे ] परमपदमें [निवेशय ] धारण कर और [ निरंजनं देवं ] निरंजनदेवको [ पश्य ] देख । भावार्थ- हे हंस (जीव) देखे सुने और भोगे हुए भोगोकी वाछारूप खोटेध्यान आदि सब चिंताओंको छोडकर अत्यंत निश्चित होकर अपने चित्तको परमात्मस्वरूपमे स्थिर कर । उसके बाद भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्मरूप अंजनसे रहित जो निरंजनदेव परम आराधने योग्य अपना शुद्धात्मा है उसको ध्यावो । पहले यह कहा था कि खोटे ध्यानको छोड, सो खोटे ध्यानका नाम शास्त्रमें अपध्यान कहा है । वह अपध्यानका लक्षण कहते हैं। "बध बंधेत्यादि" उसका अर्थ ऐसा है कि निर्मल बुद्धिवाले पुरुष जिन शासनमे उसको अपध्यान कहते हैं कि जो द्वेषसे परके मारनेका बांधनेका अथवा छेदनेका चितवन करे और रागभावसे परस्त्री आदिका चितवन करे। उस अपध्यानके दो भेद है एक आर्त दूसरा रौद्र । सो ये दोनों ही नरक निगोदके कारण हैं इसलिये विवेकियोंको त्यागने योग्य हैं ॥ ११६ ॥ आगे शिव शब्दसे कहे गये निजशुद्धआत्माके ध्यान करनेपर जो सुख होता है उस सुखको तीन दोहासूत्रोंसे वर्णन करते हैं;-[यत् ] जो [ध्यानं कुर्वन् ] ध्यान करता हुआ [शिवदर्शने परमसुखं ] निजशुद्धात्माके अवलोकनमें अत्यंत सुख [प्राप्नोषि] परमात्मप्रकाशः। ११९ तथाहि-शिवशब्देनान विशुद्धो ज्ञानस्वभावो निजशुद्धात्मा ज्ञातव्यः तस्य दर्शनमवलोकन- मनुभवनं तस्मिन् शिवदर्शनेन परमसुखं निजशुद्धात्मभावनोत्पन्नवीतरागपरमाहादरूपं लमसे । किं कुर्वन् सन् । वीतरागनिर्विकल्पत्रिगुप्तिसमाधि कुर्वन् । इत्थंभूतं सुखं अनंत- शब्दवाच्यो योसौ परमात्मपदार्थस्तं मुक्त्वा त्रिभुवनेपि नास्तीति । अयमत्रार्थः । शिवशब्द- वाच्यो योसौ निजपरमात्मा स एव रागद्वेषमोहपरिहारेण ध्यातः सन्ननाकुलत्वलक्षणं परम- सुखं ददाति नान्य कोपि शिवनामेति पुरुषः ॥ ११७ ॥ अथ । जं मुणि लहइ अणंतसुहु, णियअप्पा झायंतु । तं सुहु इंदुवि णवि लहह, देविहिं कोडि रमंतु ॥ ११८ ॥ यत् मुनिः लभते अनंतसुखं निजात्मानं ध्यायन् । तत् सुखं इंद्रोपि नैव लभते देवीना कोटिं रम्यमानः ॥ ११८ ॥ जमित्यादि । जं यत् मुणि मुनिस्तपोधनः लहइ लभते अणंतुसुहु अनंतसुखं । किं कुर्वन् सन् । णियअप्पा झायंतु निजात्मानं ध्यायन् सन् तं सुहु तत्पूर्वोक्तं सुखं इंदुवि णवि लहइ इंद्रोपि नैव लभते । किं कुर्वन् सन् । देविहिं कोडि रमंतु देवीनां कोटि , हे प्रभाकर तू पासकता है [ तत् सुखं ] वह सुख [ भुवने अपि ]तीनलोकमें भी [अनंत देवं मुक्त्वा] परमात्म द्रव्यके सिवाय [ नैव अस्ति ] नही है ॥ भावार्थ-शिव नाम कल्याणका है सो कल्याणरूप ज्ञानखभाव निजशुद्धात्मा जानो उसका जो दर्शन अर्थात् अनुभव उसमें सुख होता है वह सुख परमात्माको छोड तीनलोकमें नहीं है । वह सुख क्या है कि जो निर्विकल्प वीतराग परम आनंदरूप शुद्धात्मभाव है। वही सुखी है । क्या करता हुआ यह सुख पाता है कि तीनगुप्तिरूप परमसमाधिमें आरूढ हुआ सता ध्यानी पुरुष ही उस सुखको पाता है । अनंत गुणरूप आत्मतत्त्वके विना वह सुख तीनों लोकके स्वामी इंद्रादिकों भी नही है । इसकारण साराश यह निकला कि शिव नामवाला जो निज शुद्धात्मा है वही राग द्वेष मोहके त्यागकर ध्यान किया गया आकुलतारहित परम- सुखको देता है । ससारी जीवोंके जो इद्रियजनित सुख है वह आकुलता रूप है और आत्मीक अतींद्रियसुख आकुलता रहित है सो सुख ध्यानसे ही मिलता है दूसरा कोई शिव या ब्रह्मा या विष्णु नामका पुरुष देनेवाला नहीं है। आत्माका ही नाम शिव है विष्णु है ब्रह्मा है ।। ११७ ।। आगे कहते हैं कि जो सुख आत्माको ध्यावनेसे महामुनि पाते हैं वह सुख इंद्रादि देवोंको दुर्लभ है;-[निजात्मानं ध्यायन् ] अपनी आत्माको ध्यावता [मुनिः] परम तपोधन (मुनि) [ यत् अनंतसुखं ] जो अनंतसुख [लभते ] पाता है [ तत् सुखं ] उस सुखको [इंद्रः अपि ] इंद्र भी [ देवीनां कोटिं रम्यमानः ] करोड़ देवियों के साथ

१२०
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
रम्यमानः अनुभवन्निति । अयमत्र तात्पर्यार्थः । बाह्याभ्यंतरपरिग्रहरहितः स्वशुद्धात्मतत्त्व-
भावनोत्पन्नवीतरागपरमानंदसहितो मुनिर्यत्सुखं लभते तहेवेन्द्रादयोपि न लभंत इति
तथा चोक्तं । "दह्यमाने जगत्यस्मिन्महता मोहवह्निना । विमुक्तविपयासंगाः मुखायंते
तपोधनाः ॥ ११८ ॥
अप्पादसणि जिणवरह, जं सुहु होइ अणंतु ।
तं सुहु लहइ विराउ जिउ, जाणतउ सिउ संतु ॥ ११९ ॥
आत्मदर्शने जिनवराणां यत् सुखं भवति अनंतं ।
तत् सुखं लभते विरागः जीवः जानन् शिवं शांतं ॥ ११९ ॥
अप्पा इत्यादि । अप्पादंसणि निजशुद्धात्मदर्शने जिणवरहं छद्मस्थावस्थायां जिनवराणां
जं सुहु होइ अणंतु यत्सुखं भवत्यनंतं तं सुहु तत्पूर्वोक्तसुखं लहइ लभते । कोसी ।
विराउ जिउ वीतरागभावनापरिणतो जीवः । किं कुर्वन् सन् । जाणंतउ जानन्ननुभवन्
सन् । कं । सिर शिवशब्दवाच्यं निजशुद्धात्मस्वभावं । कथंभूतं । संतु शांतं रागादि-
विभावरहितमिति । अयमत्र भावार्थः । दीक्षाकाले शिवशब्दवाच्यस्वशुद्धात्मानुभवने
यत्सुखं भवति जिनवराणां वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरतो जीवस्तत्सुखं लभत इति ॥ ११९।।
रमता हुआ [नैव ] नही [लभते ] पाता ॥ भावार्थ-वाह्य और अंतरंग परिग्रहसे
रहित निज शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ जो वीतराग परमानंद उसकर सहित महा-
मुनि जो सुख पाता है उस सुखको इंद्रादिक भी नहीं पाते । जगतमें सुखी साधु ही हैं
अन्य कोई नही । यही कथन अन्यशास्त्रोंमें भी कहा है-"दह्यमाने इत्यादि" इसका
अर्थ ऐसा है कि महामोहरूपी अग्निसे जलते हुए इस जगतमें देव मनुष्य तिर्यच नारकी
सब दुःखी हैं और जिनके तप ही धन है तथा सव विषयोंका संबंध जिन्होंने छोड दिया
है ऐसे साधु मुनि ही इस जगतमें सुखी हैं ॥ ११८ ।।
आगे ऐसा कहते हैं कि वैरागी मुनि ही निज आत्माको जानते हुए निर्विकल्प
सुखको पाते है;-[ आत्मदर्शने] निजशुद्धात्माके दर्शनमें [यत् अनंतं सुखं] जो अनंत
अद्भुत सुख [ जिनवराणां ] मुनि अवस्थामें जिनेश्वर देवोंके [ भवति ] होता है [तत्
सुखं:] वह सुख [ विरागः जीवः ] वीतराग भावनाको परिणत हुआ मुनिराज [ शिवं
शांतं जानन् ] निज शुद्धात्मस्वभावको तथा रागादिरहित शांत भावको जानता हुआ
[लभते ] पाता है। भावार्थ-दीक्षाके समय तीर्थकरदेव निज शुद्ध आत्माको
अनुभवते हुए जो निर्विकल्प सुख पाते हैं वही सुख रागादिरहित निर्विकल्प समाधिमें
लीन विरक्त मुनि पाते हैं ॥ ११९ ॥

परमात्मप्रकाशः। १२१ अथ कामक्रोधादिपरिहारेण शिवशब्दवाच्यः परमात्मा दृश्यत इत्यभिप्रायं मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं कथयंति,- जोइय णियमणि णिम्मलए, पर दीसह सिउ संतु। अंवरि णिम्मलि घणरहिए, भाणु जि जेम फुरंतु ॥१२० ।। योगिन् निजमनसि निर्मले परं दृश्यते शिवः शांतः । अंबरे निर्मले धनरहिते भानुः इव यथा स्फुरन् ॥ १२० ।। जोइय इत्यादि । जोइय हे योगिन् णियमणि निजमनसि । कथंभूते । णिम्मलए निर्मले परं नियमेन दीसइ दृश्यते । कोसौ । कर्मतापन्नः सिउ शिवशब्दवाच्यो निजपर- मात्मा । कथंभूतः । संतु शांतः रागादिरहितः । दृष्टांतमाह । अंबरे आकाशे । कथंभूते । णिम्मलि निर्मले । पुनरपि कथंभूते । घणरहिए घनरहिते । क इव । भाणु जि भानुरिव यथा । किं कुर्वन् । फुरंतु स्फुरन् प्रकाशमान इति । अयमत्र तात्पर्यार्थः । यथा धन- घटाटोपविघटने सति निर्मलाका दिनकरः प्रकाशते तथा शुद्धात्मानुभूतिप्रतिपक्षभूतानां कामक्रोधादिविकल्परूपघनानां विनाशे सति निर्मलचित्ताकाशे केवलज्ञानाद्यनंतगुणकरक- लितः निजशुद्धालादित्यः प्रकाशं करोतीति ॥ १२० ॥ अथ यथा मलिने दर्पणे रूपं न दृश्यते तथा रागादिमलिनचित्ते शुद्धामस्वरूपं न दृश्यत इति निरूपयति,- राएं रंगिए हियवडए, देउ ण दीसइ संतु। दप्पणि मइलइ विवु जिम, एहउ जाणि णिभंतु ॥ १२१ ॥ रागेन रंजिते हृदये देवः न दृश्यते शातः । दर्पणे मलिने विंबं यथा एतत् जानीहि नितं ॥ १२१ ॥ आगे काम क्रोधादिकके त्यागनेसे शिव शब्दसे कहा गया परमात्मा दीख जाता है ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर यह गाथासूत्र कहते हैं;-[योगिन् ] हे योगी [ निर्मले निजमनसि] निर्मल अपने मनमें [शिवः शांत:] निज परमात्मा रागादि रहित [परं] नियमसे [ दृश्यते ] दीखता है [ यथा ] जैसे [धनरहित निर्मले ] वादल रहित निर्मल [अंबरे ] आकाशमें [ स्फुरन् ] भासमान (प्रकाशमान ) [भानुः इव ] सूर्यके समान । भावार्थ-जैसे मेघमालाके आडंबरसे सूर्य नही भासता और मेधके आडवरके दूर होने- पर निर्मल आकाशमें सूर्य प्रगट दीखता है उसी तरह शुद्धआत्माकी अनुभूतिके शत्रु जो कामक्रोधादि विकल्परूप मेघ हैं उनके नाश होनेपर निर्मल मनरूपी आकाशमें केवल- ज्ञानादि अनंतगुणरूप किरणोंकर सहित निज शुद्धात्मारूपी सूर्य प्रकाश करता है ॥ १२० ॥ आगे जैसे मैले दर्पणमें रूप नही दीखता उसीतरह रागादिकर मलिन चित्तमें शुद्ध १६ -- रायचंद्वजैनशास्त्रमालायाम् । १२२ राएं इत्यादि । राएं रंगिए हियवडए रागेन रंजिते हृदये देड ण दीसइ देवो न दृश्यते । किं विशिष्टः । संतु शांतो रागादिरहितः । दृष्टांतमाह । दप्पणि मइलए दर्पण मलिने विवु जिम विवं यथा एहउ एतत् जानीहि हे प्रभाकरभट्ट णिभंतु निभ्रांतं यथा भवतीति । अयमनामिप्रायः । यथा मेघपटलप्रच्छादितो विद्यमानोपि सहनकरो न दृश्यते तथा केवलज्ञानकिरणैर्लोकालोकप्रकाशकोपि कामक्रोधादिविकल्पमेघप्रच्छादितः मन् देह- मध्ये शक्तिरूपेण विद्यमानोपि निजशुद्धामा दिनकरो न दृश्यते इति ॥ १२१ ॥ अथानंतरं विषयासक्तानां परमात्मा न दृश्यत इति दर्शयति;- जसु हरिणच्छी हियवडए, तसु णवि वंभु वियारि। एकहिं केम समंति वढ, वे खंडा पडियारि॥ १२२ ॥ यस्य हरिणाक्षी हृदये तस्य नैव ब्रह्म विचारय । एकस्मिन् कथं समायातौ वत द्वौ खड्गौ प्रतिद्वारे ॥ १२२ ।। जसु इत्यादि । जसु यस्य पुरुपस्य हरिणच्छी हरिणाझी स्त्री हियवडए हृदये वसतीति क्रियाध्याहारः तसु तस्य णवि नैवास्ति । कोसौ। बंभु ब्रह्मशब्दवाच्यो निज- परमात्मा वियारि एवं विचारय त्वं हे प्रभाकरभट्ट । अत्रार्थे दृष्टांतमाह । एक्कहिं केम एकस्मिन् कथं समंति सम्यग्मिमाते सम्यगवकाशं कथं लभंते वढ वत वेखंडा द्वा खड्गौ असी । काधिकरणभूते । पडियारि प्रतिद्वारे कोशशब्दवाच्ये इति । तथाहि । आत्मस्वरूप नहीं दीखता ऐसा कहते हैं;-[रागेन रंजिते ] रागकरके रंजित [ हृदये] मनमें [शांतः देवः ] रागादिरहित आत्मा देव [न दृश्यते ] नहीं दीखता [यथा] जैसे कि [मलिने दर्पणे ] मैले दर्पणमें [ विवं] मुख नहीं भासता [एतत् ] यह वात हे प्रभाकर भट्ट तू [ निभ्रांतं] संदेह रहित [जानीहि ] जान । भावार्थ-ऐसा श्री योगींद्राचार्यने उपदेश दिया है कि जैसे सहस्र किरणोंसे शोभित सूर्य आकाशमें प्रत्यक्ष दीखता है लेकिन मेघसमूहकर ढका हुआ नही दीखता उसीतरह केवलज्ञानादि अनंत गुणरूप किरणोंकर लोक अलोकका प्रकाशनेवाला भी इस देह (घट) के बीच में शक्ति- रूपसे विद्यमान निज शुद्धात्मारूप ( परमजोति चिद्रूप) सूर्य काम क्रोधादि रागद्वेषभा- वोखरूप विकल्प जालोरूप मेघसे ढंका हुआ नहीं दीखता ॥ १२१ ॥ आगे जो विषयोंमें लीन हैं उनको परमात्माका दर्शन नही होता ऐसा दिखलाते हैं:- [यस्य हृदये ] जिस पुरुषके चित्तमें [हरिणाक्षी ] मृगके समान नेत्रवाली स्त्री [वसति] [वसति] वस रही है [तस्य ] उसके [ब्रह्म ] अपना शुद्धात्मा [नैव ] नहीं है अर्थात् उसके शुद्धात्माका विचार नहीं होता ऐसा हे प्रभाकरभट्ट तू अपने मनमें [विचारय] विचार कर । जसे [वैत] खेदकी वात है कि [ एकमिन् ] एक [प्रतिद्वारे] म्यानमें परमात्मप्रकाशः। १२३ वीतरागनिर्विकल्पपरमसमाधिसंजातानाकुलत्वलक्षणपरमानंदसुखामृतप्रतिबंधकैराकुलत्वोत्पा- दकैः खीरूपावलोकनचितादिसमुत्पन्नहावभावविभ्रमविलासविकल्पजालैमूर्छिते वासिते रंजिते परिणते चित्ते त्वेकस्मिन् प्रतिहारे खगद्वयवत्परमब्रह्मशब्दवाच्यनिजशुद्धामा कथम- धकाशं लभते न कथमपीति भावार्थः । हावभावविभ्रमविलासलक्षणं कथ्यते । "हावो मुखविकारः स्याद्भावश्चित्तोत्थ उच्यते। विलासो नेत्रजो जयो विभ्रमो भ्रूयुगांतयोः"॥१२२॥ अथ रागादिरहिते निजमनसि परमाला निवसतीति दर्शयति,- णियमणि णिम्मलि णाणियह, णिवसइ देउ अणाइ । हंसा सरवरि लीणु जिम, महु एहउ पडिहाइ ॥ १२३ ॥ निजमनसि निर्मले ज्ञानिनां निवसति देवः अनादिः । हंसः सरोवरे लीनः यथा मम एवं प्रतिभाति ॥ १२३ ।। णियमणि इत्यादि । णियमणि निजमनसि । किं विशिष्टे । णिम्मलि निर्मले रागा- दिमलरहिते । केपां मनसि । णाणियहं ज्ञानिनां णिवसइ निवसति । कोसौ । देउ देवः आराध्यः । किंविशिष्ट. । अणाइ अनादिः । क इव कुत्र । हंसा सरवरि लीणु जिम हंसः सरोवरे लीनो यथा हे प्रभाकरभट्ट महु एहउ पडिहाइ ममैवं प्रतिभातीति । [दौ खगौ ] दो तलवारें [कथं समायातौ ] कैसे आसकतीं हैं कभी नही समासकती ॥ भावार्थ-वीतराग निर्विकल्प परम समाधिकर उत्पन्न हुआ अनाकुलतारूप परम आनंद अतीन्द्रिय सुखरूप अमृत है उसके रोकनेवाले तथा आकुलताको उत्पन्न करनेवाले जो खीरूपके देखनेकी अभिलापादिसे उत्पन्न हुए हाव ( मुखविकार ) भाव अर्थात् चित्तका विकार विभ्रम अर्थात् भोहका टेढा करना, विलास अर्थात् नेत्रोंके कटाक्ष इन खरूप विकल्प जालोंकर मूर्छित रंजित परिणत चित्तमें ब्रह्मका (निजशुद्धात्माका) रहना कैसे हो सकता है । जैसे कि एक म्यानमें दो तलवार कैसे आसकती हैं नहीं आसकतीं। उसी तरह एक चित्तमें ब्रह्मविद्या और विषयविनोद ये दोनो नहीं समासकते । जहां ब्रह्म विचार है वहां विषयविकार नही है, जहा विषयविकार है वहा ब्रह्मविचार नही है । इन दोनों में आपसमें विरोध है । हाव भाव विभ्रम विलास इन चारोंका लक्षण दूसरी जगह भी कहा है । "हावो मुखविकारः" इत्यादि, उसका अर्थ ऊपर कह चुके हैं इससे दूसरी बार नही कहा ॥ १२२ ॥ आगे रागादि रहित निज मनमें परमात्मा निवास करता है ऐसा दिखाते हैं;- [ज्ञानिनां] ज्ञानियोंके [निर्मले ] रागादिमलरहित [निजमनसि] निज मनमें [अनादिः देवः ] अनादि देव आराधने योग्य शुद्धात्मा [ निवसति ] निवास कररहा है [यथा] जैसे [सरोवरे ] मानसरोवरमें [ लीनः हंसः ] लीन हुआ हंस वसता है ।

१२४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । तथाहि । पूर्वसूत्रकथितेन चित्ताकुलोत्पादकेन स्त्रीरूपावलोकनसेवनचिंतादिसमुत्पनेन रागादिकल्लोलमालाजालेन रहिते निजशुद्धात्मद्रव्यसम्यश्रद्धानमहजसमुत्पन्नवीतरागपरमसु- खसुधारसस्वरूपेण निर्मलनीरेण पूर्णे वीतरागस्वसंवेदनजनितमानससरोवरे परमात्मा लीन- स्तिष्ठति । कथंभूतः । निर्मलगुणसादृश्येन हंस इव हंसपक्षि इव । कुत्र प्रसिद्धः। सरोवरे । हंस इवेत्यभिप्रायो भगवतां श्रीयोगींद्रदेवानां ॥ १२३ ॥ उक्तंच;- देउ ण देउलि णवि सिलए, णवि लिप्पड़ णवि चित्ति । अखउ णिरंजणु णाणमउ, सिउ संठिउ समचित्ति ॥ १२४ ।। देवः न देवकुले नैव शिलाया नैव लेपे नैव चित्र । अक्षयः निरंजनः ज्ञानमयः शिवः सस्थितः समचित्ते ॥ १२ ॥ देउ इत्यादि । देउ देवः परमाराध्यः ण नास्ति । कस्मिन् कस्मिन् नास्ति । देउले देवकुले देवतागृहे णवि सिलइ नैव सिलाप्रतिमायां णवि लिप्पइ नैव लेपप्रतिमायां णवि चित्ति नैव चित्रप्रतिमायां । तर्हि व तिष्ठति । निश्चयेन अखउ अक्षयः णिरंजणु कर्माजनरहितः । पुनरपि किं विशिष्टः । णाणमउ ज्ञानमयः केवलजानेन निर्वृत्तः सिउ शिवशब्दवाच्यो निजपरमाला । एवं गुणविशिष्टः परमात्मा देव इति । संठित संस्थितः सो हे प्रभाकरभट्ट [ मम ] मुझे [एवं ] ऐसा [प्रतिभाति ] मालूम पडता है । ऐसा वचन श्री योगीदेवने प्रभाकरभट्टसे कहा । भावार्थ-पहले दोहेमे जो कहा था कि चित्तको आकुलताके उपजानेवाले स्त्रीरूपका देखना सेवन चिंतादिकोंसे उत्पन्न हुए रागादि- तरंगोंके समूह है उनकर रहित निज शुद्धात्म द्रव्यका सम्यक् श्रद्धान खाभाविकज्ञान उससे उत्पन्न वीतराग परमसुखरूप अमृतरस उस खरूप निर्मलनीरसे भरे हुए ज्ञानियोंके मानसरोवर में परमात्मादेवरूपी हंस निरंतर रहता है । वह आत्मदेव निर्मलगुणोंकी उज्जल- ताकर हंस समान है । जैसे हंसोंका निवासस्थान मानसरोवर है वैसे ब्रह्मका निवासस्थान ज्ञानियोंका निर्मलचित्त है। ऐसा श्री योगीद्रदेवका अभिप्राय है ॥ १२३ ।। आगे इसी वातको दृढ करते हैं;- [देवः] आत्मदेव [देवकुले ] देवालयमें (मंदिरमें) [न] नही है [ शिलायां नैव ] पाषाणकी प्रतिमामें भी नही है [लेपे नैव ] लेपमें भी नही है [चित्रे नैव] चित्रामकी मूर्तिमें भी नहीं है । लेप और चित्रामकी मूर्ति लौकिक जन बनाते है पंडितजन तो धातुपाषाणकी ही प्रतिमा मानते हैं सो लौकिक दृष्टांतकेलिये दोहामें लेप चित्रामका भी नाम आगया । वह देव किसी जगह नही रहता । वह देव [अक्षयः ] अविनाशी है [ निरंजनः] कर्माजनसे रहित है [ज्ञानमयः ] केवल ज्ञानकर पूर्ण है | शिवः] ऐसा निज परमात्मा [समचित्ते wen H परमात्मप्रकाशः। १२५ %D समचित्ति समभावे समभावपरिणतमनसि इति । तद्यथा । यद्यपि व्यवहारेण धर्मवर्तना- निमित्त स्थापनारूपेण पूर्वोक्तगुणलक्षणो देवो देवगृहादौ तिष्ठति तथापि निश्चयेन शत्रुमित्र- सुखदुःखजीवितमरणादिसमतारूपे वीतरागसहजानंदैकरूपपरमात्मतत्त्वसम्यक्षद्धानज्ञाना- नुभूतिरूपाभेदरत्नत्रयामकसमचित्ते समशब्दवाच्यः परमामा तिष्ठतीति भावार्थः तथा चोक्तं समचित्तपरिणतश्रमणलक्षणं । "समसत्तुबंधुवग्गो समसुहदुक्खो पसंसणि- दसमो । समलोदु कंचणोवि य जीवियमरणे समो समणो ॥ १२४ ॥ इत्येकत्रिंशत्सूत्रै- चूलिकास्थलं गतं । अथ स्थलसंख्यावाचं प्रक्षेपकद्वयं कथ्यते,- मणु मिलियउ परमेसरहं, परमेसरुवि मणस्स । बीहिवि समरसि हुवाह, पुज्ज चडावर्ड कस्स ॥ १२५ ॥ मनः मिलितं, परमेश्वरस्य परमेश्वरः अपि मनसः । द्वयोरपि समरसयोः भूतयोः पूजां समारोपयामि कस्य ॥ १२५ ॥ मणु इत्यादि । मणु मनो विकल्परूपं मिलियउ मिलितं तन्मयं जातं । कस्य संबंधित्वेन । परमेसरहं परमेश्वरस्य परमेसरुवि मणस्स परमेश्वरोपि मनःसंबंधित्वेन लीनो - संस्थितः] समभावमें तिष्ठरहा है अर्थात् समभावको परिणत हुए साधुओंके मनमें विराज रहा है अन्य जगह नही है । भावार्थ-यद्यपि व्यवहारनयकर धर्मकी प्रवृत्तिके- लिये स्थापनारूप अरहंतदेव देवालयमे तिष्ठता है धातुपाषाणकी प्रतिमाको देव कहते है तौभी निश्चयनयकर शत्रुमित्र सुखदुख जीवितमरण जिसमें समान है तथा वीतराग सहजानंदरूप परमात्मतत्त्वका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान चारित्ररूप अभेद रत्नत्रयमें लीन ऐसे ज्ञानियोंके सम चित्तमें परमात्मा तिष्ठता है । ऐसाही अन्यजगह भी समचित्तको परिणत हुए मुनियोंका लक्षण कहा है। "समसत्तु" इत्यादि। इसका अर्थ ऐसा है कि जिसके सुख दुख समान है, शत्रुमित्र वर्ग समान है, प्रशंसा निंदा समान है, पत्थर और सोना समान है, और जीवन मरण जिसके समान है ऐसा समभावका धारण करनेवाला मुनि होता है। अर्थात् ऐसे समभावके धारक शातचित्त योगीश्वरोंके चित्तमें चिदानंद देव तिष्ठता है ॥ १२४ ॥ इस प्रकार इकतीस दोहासूत्रोंकर चूलिका स्थल कहा । चूलिका नाम अंतका है सो पहले स्थलका अंत यहांतक हुआ । आगे स्थलकी सख्यासे सिवाय दो प्रक्षेपक दोहा कहते है।-[ मनः] विकल्परूप मन [परमेश्वरस्य मिलितं] भगवान् आत्मारामसे मिलगया तन्मई होगया [ परमेश्वरः अपि ] और परमेश्वर भी [ मनसः] मनसे १२६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । जातः बीहिवि समरसि हूवाह एवं द्वयोरपि समरसीभूतयोः पुज पूजां चडावउं समारोपयामि । कस्स कस्य निश्चयनयेन न कस्यापीति । अयमत्र भावार्थः । यद्यपि व्यवहारनयेन गृहस्थावस्थायां विषयकषायदुर्ध्यानवंचनार्थ धर्मवर्धनार्थ च पूजाभिषेकदा- नादिव्यवहारोस्ति तथापि वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरतानां तत्काले बहिरंगव्यापारा. भावात् खयमेव नास्तीति ॥ १२५ ॥ जेण णिरंजणि मणु धरिउ, विसयकसायहिं जंतु । मोक्खहं कारणु एत्तडउ, अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥ १२६ ॥ येन निरंजने मनः धृतं विषयकषायेषु गच्छत् । मोक्षस्य कारणं एतावदेव अन्यः न तंत्रः न मंत्रः ॥ १२६ ॥ जेण इत्यादि । येन येन पुरुपेण कर्तृभूतेन णिरंजणि कर्माजनरहिते परमासनि मणु मनः धरिउ धृतं । किं कुर्वत् सत् । विसयकसायहिं जंतु विषयकषायेपु गच्छत् सत् । विसयकसायहिं तृतीयांतं पदं सप्तम्यंतं कथं जातमिति चेत् । परिहारमाह । प्राकृते कचित्कारकव्यभिचारो भवति लिंगव्यभिचारश्च । इदं सर्वत्र ज्ञातव्यं । मोक्खहं कारणु मोक्षस्य कारणं एत्तडउ एतावदेव । विषयकषायरतचित्तस्य व्यावर्तनेन स्वात्मनि स्थापनं अण्णु ण अन्यत् किमपि न मोक्षकारणं । अन्यत् किं । तंतु तंत्रं शास्त्रमौषधं वा मंतु मंत्राक्षरं चेति । तथाहि । शुद्धात्मतत्त्वभावनाप्रतिकूलेपु विपयकषायेपु गच्छत् सत् मिलगया तो [द्वयोः अपि ] दोनोंही को [ समरसी भूतयोः] समरस (आपसमें एकम एक ) होनेपर [कस्स ] किसको अब मैं [पूजा समारोपयामि] पूजा चढाऊं अर्थात् निश्चयनयकर किसीको पूजना सामग्री चढाना नही रहा ॥ भावार्थ-जवतक मन भगवानसे नहीं मिला था तब तक पूजा करता था और जब मन प्रभूसे मिलगया तब पूजाका प्रयोजन नहीं है । यद्यपि व्यवहारनयकर गृहस्थ अवस्थामें विषायकषायरूप खोटे ध्यानके रोकनेकेलिये और धर्मके वढानेकेलिये पूजा अभिषेक दान आदिक व्यवहार तौभी वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें लीन हुए योगीश्वरों को उस समयमें बाह्य व्यापारके अभाव होनेसे स्वयं ही द्रव्यपूजाका प्रसंग नही आता भावपूजा ही तन्मई है ॥ १२५ ॥ आगे यही कथन दृढ करते हैं;-[येन] जिस पुरुषने [ विषयकषायेषु गच्छत् ] विषयकपायोंमें जाता हुआ [मनः] मन [निरंजने धृतं] कर्मरूपी अंजनसे रहित भगवानमें रक्खा [एतावदेव ] येही [ मोक्षस्य कारणं] मोक्षका कारण है [अन्यः ] दूसरा कोई भी [तंत्रान ] तंत्र नही है [ मंत्रान] और न मंत्र है। तंत्र नाम शास्त्र व औषधीका है मंत्र नाम मंत्राक्षरोंका है । विषयकषायादि पर पदार्थोसे मनको रोककर परमात्मामें मनको लगाना यही मोक्षका कारण है । भावार्थ-जो कोई निकट संसारी

परमात्मप्रकाशः।
१२७
मनो वीतरागनिर्विकल्पखसंवेदनजानबलेन व्यावर्त्य निजशुद्धात्मद्रव्ये स्थापयति यः स एव
मोक्षं लभते नान्यो मंत्रतंत्रादिवलिप्ठोपीति भावार्थः ॥ १२६ ॥
एवं परमात्मप्रकाशवृत्तौ प्रक्षेपकत्रयं विहाय व्यधिकविंशत्युत्तरशतदोहकसूत्रैखिविधा-
स्मप्रतिपादकनामा प्रथममहाधिकारः समाप्तः ॥१॥
जीव शुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे उलटे विषयकपायोंमें जाते हुए मनको वीतरागनिर्विकल्प
खसंवेदन ज्ञानके वलसे पीछे हटाकर निजशुद्धात्मद्रव्यमें स्थापन करता है वही मोक्षको
पाता है दूसरा कोई मंत्र तंत्रादिमें चतुर होनेपर भी मोक्ष नहीं पाता ॥ १२६ ॥
इसतरह परमात्मप्रकाशकी टीकामें तीन क्षेपकोंके सिवाय एकसौ तेईस दोहासू-
त्रोंसे वहिरात्मा अंतरात्मा परमात्मारूप तीनप्रकार आत्माको कहनेवाला पहला महा-
धिकार पूर्ण किया ॥ १ ॥

१२८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अत ऊर्ध्व स्थलसंख्याबहिर्भूतान् प्रक्षेपकान् विहाय चतुर्दशाधिकशतद्वयामितैर्दोहक- सूत्रैर्मोक्षमोक्षफलमोक्षमार्गप्रतिपादनमुख्यत्वेन द्वितीयमहाधिकारः प्रारभ्यते । तत्रादी सूत्रदशकपर्यतं मोक्षमुख्यतया व्याख्यानं करोति । तद्यथा- सिरिगुरु अक्खहिं मुक्खु महु, मुक्खहं कारणु तत्थु । मोक्खहं केरउ अण्णु फल, जे जाणउं परमत्थु ॥१२७ ॥ श्रीगुरो आख्याहि मोक्षं मम मोक्षस्य कारणं तथ्यं । मोक्षस्य संबंधि अन्यत् फलं येन जानामि परमार्थ ॥ १२७ ॥ सिरि गुरु इत्यादि । सिरिगुरु हे श्रीगुरो योगींद्रदेव अक्खहिं कथय मोक्खु मोक्षं महु मम, न केवलं मोक्षं मोक्खह कारणु मोक्षस्य कारणं । कथंभूतं । तत्थु तत्थ्य मोक्खहं केरउ मोक्षस्य संबंधि अण्णु अन्यत् । किं । फलु फलं । एतत्रयेन नातेन किं भवति । जे जाणउं येन त्रयस्य व्याख्यानेन जानाम्यहं कर्ता । कं । परमत्थु परमार्थ- मिति । तद्यथा । प्रभाकरभट्टः श्रीयोगींद्रदेवान् विज्ञाप्य मोक्षं मोक्षफलं मोक्षकारणमिति त्रयं पृच्छतीति भावार्थः ॥ १२७ ॥ अथ तदेव त्रयं क्रमेण भगवान् कथयति;- जोइय मुक्खुवि मोक्खफलु, पुच्छिउ मोक्खहं हेउ । सो जिणभासिउ णिसुणि तुहुं जेणवियाणहि भेउ ॥ १२८ ।। योगिन् मोक्षोपि मोक्षफलं पृष्टं मोक्षस्य हेतुः । तत् जिनभाषितं निशृणु त्वं येन विजानासि भेदं ।। १२८ ।। जोइय इत्यादि । जोइय हे योगिन् मुक्खुवि मोक्षोपि मुक्खफल मोक्षफलं पुच्छिउ इसके बाद प्रकरणकी संख्याके बाहर अर्थात् क्षेपकोंके सिवाय दोसौ चौदह दोहासू- त्रोंसे मोक्ष मोक्षफल और मोक्षमार्गके कथनकी मुख्यतासे दूसरा महा अधिकार आरंभ करते हैं। उसमें भी पहले दस दोहा तक मोक्षकी मुख्यतासे व्याख्यान करते है। [हे श्रीगुरो] हे श्रीगुरु [मम ] मुझे [ मोक्षं ] मोक्ष [तथ्यं मोक्षस कारणं ] सत्यार्थ मोक्षका कारण [अन्यत् ] और [ मोक्षस्य संबंधि] मोक्षका [फलं] फल [आख्याहि ] कृपाकर कहो [येन ] जिससे कि मैं [ परमार्थ ] परमार्थको [जानामि] जानूं ॥ भावार्थ-प्रभाकरभट्ट श्रीयोगीद्रदेवसे विनतीकरके मोक्ष, मोक्षका कारण और मोक्षका फल इन तीनोंको पूछता है ॥ १२७ ॥ अब श्रीगुरु उन्ही तीनोंको क्रमसे कहते हैं। [योगिन् ] हे योगी तूने [ मोक्षोपि] मोक्ष और [ मोक्षफलं ] मोक्षका फल तथा [ मोक्षस्य ] मोक्षका [हेतुः] कारण परमात्मप्रकाशः। १२९ पृष्टं त्वया कर्तृभूतेन । पुनरपि कः पृष्टः । मोक्खहं हेउ मोक्षस्य हेतुः कारणं । तत्रयं जिणभासिउ जिनभाषितं णिसुणि निश्चयेन शृणु समाकर्णय जेण येन त्रयेण ज्ञातेन वियाणहि भेउ विजानासि भेदं त्रयाणां संबंधिनमिति । अयमत्र तात्पर्यार्थः । श्रीयोगी- द्रदेवाः कथयंति हे प्रभाकरभट्ट शुद्धात्मोपलंभलक्षणं मोक्षं केवलनानाद्यनंतचतुष्टयव्य- क्तिरूपं मोक्षफलं भेदाभेदरत्नत्रयात्मकं मोक्षमार्ग च क्रमेण प्रतिपादयाम्यहं त्वं शूण्विति ॥ १२८॥ अथ धर्मार्थकाममोक्षाणां मध्ये सुखकारणत्वान्मोक्ष एवोत्तम इति अभिप्रायं मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं प्रतिपादयति, धम्महं अत्थहं कामहवि, एयह सयलहं मोक्खु । उत्तमु पभणहि णाणि जिय, अण्णे जेण ण सुक्खु ॥ १२९ ।। धर्मस्य अर्थस्य कामस्यापि एतेषां सकलानां मोक्षं । उत्तमं प्रभणंति ज्ञानिनः जीव अन्येन येन न सुखं ॥ १२९ ॥ धम्महं इत्यादि । धम्महं धर्मस्य धर्माद्वा अत्थहं अर्थस्य अर्थाद्वा कामहंवि कामस्यापि कामाद्वा एयहं सयलहं एतेषां सकलानां संबंधित्वेन एतेभ्यो वा सकाशात् मोक्खु मोक्षं उत्तमु पभणहि उत्तमं विशिष्टं प्रभणंति । के कथयति । णाणि ज्ञानिनः जिय हे जीव । कस्मादुत्तमं प्रभणंति मोक्षं । अण्णइ अन्येन धर्मार्थकामादिना जेण येन कारणेन ण सोक्खु नास्ति परमसुखं इति । तद्यथा-धर्मशब्देनात्र पुण्यं कथ्यते अर्थश- [ पृष्टं] पूछा [तत् ] उसको [ जिनभाषितं] जिनेश्वरदेवके कहे प्रमाण [त्वं ] तू [निशृणु] निश्चयकर सुन [येन] जिससे कि [ भेदं ] भेद [विजानासि ] अच्छी- तरह जान जावै । भावार्थ-श्री योगीद्रदेवगुरु शिष्यसे कहते हैं कि हे प्रभाकर- भट्ट योगी शुद्धात्माकी प्राप्तिरूप मोक्ष, केवलज्ञानादि अनंतचतुष्टयका प्रगटपना खरूप मोक्षफल और निश्चय व्यवहार रत्नत्रयरूप मोक्षका मार्ग इन तीनोंको क्रमसे जिन आज्ञा- प्रमाण तुझको कहूंगा । उनको तू अच्छीतरह चित्तमें धारण कर जिससे सब भेद मालूम होजावै ॥ १२८ ॥ अब धर्म अर्थ काम और मोक्ष इन चारोंमेंसे सुखका मूल कारण मोक्ष ही सबसे उत्तम है ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर इस गाथासूत्रको कहते हैं,-[हे जीव ] हे जीव धर्मस्य ] धर्म [अर्थस्य ] अर्थ [कामस्य अपि] और काम [एतेषां सकलानां ] इन सब पुरुषार्थोंमेंसे [ मोक्षं उत्तमं] मोक्षको उत्तम [ ज्ञानिनः] ज्ञानी पुरुष [प्रभ- णति ] कहते हैं [येन] क्योकि [अन्येन] अन्य धर्म अर्थ कामादि पदार्थोसे [सुखं ] परमसुख [न] नही है ॥ भावार्थ-धर्मशब्दसे यहा पुण्य समझना, अर्थशब्दसे पुण्यका , १३० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । ब्देन तु पुण्यफलभूतार्थों राज्यादिविभूतिविशेपः, कामशब्देन तु तस्यैव राज्यस्य मुख्यफ- लभूतः स्त्रीवस्त्रगंधमाल्यादिसंभोगः एतेभ्यखिभ्यः सकाशान्मोभमुत्तमं कथयति । के ते। वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनजानिनः । कस्मात् । आकुलत्वोत्पादकेन वीतरागपरमानंदसु- खामृतरसास्वादविपरीतेन धर्मार्थकामादिना मोक्षादन्येन येन कारणेन सुखं नास्तीति भावार्थः ॥ १२९॥ अथ धर्मार्थकामेभ्यो यद्युत्तमो न भवति मोक्षस्तहिं तत्रयं मुक्त्वा परलोकान्दवाच्यं मोक्षं किमिति जिना गच्छंतीति प्रकटयंति, जइ जिय उत्तमु होइ णवि, एयह सयलह सोइ। तो किं तिणिवि परिहरवि, जिण वच्चहिं परलोइ ॥ १३० ।। यदि जीव उत्तमो भवति नैव एतेभ्यः सकलेभ्यः स एव । ततः किं त्रीण्यपि परिहत्य जिनाः ब्रजंति परलोके ।। १३० ।। जइ इत्यादि । जइ यदि चेत् जिय हे जीव उत्तम होइ णवि उत्तमो भवति नैव । केभ्यः । एयहं सयलहं एतेभ्यः पूर्वोक्तेभ्यो धर्मादिभ्यः । कतिसंख्योपेतेभ्यः । सकलेभ्यः सोवि स एव पूर्वोक्तो मोक्षः तो ततःकारणात् किं किमर्थ तिण्णिवि त्रीण्यपि परिहरिवि परिहृत्य त्यक्त्वा जिण जिनाः कर्तारः बच्चहिं ब्रजंति गच्छंति । कुत्र गच्छंति । परलोइ परलोकशब्दवाच्ये परमात्मध्याने न तु कायमोक्षे चेति । तथाहि-परलोकगब्दस्य व्युत्प- त्यर्थः कथ्यते । परः उत्कृष्टो मिथ्यात्वरागादिरहितः केवलज्ञानाद्यनंतगुणसहितः फल राज्य वगैरः सपदा जानना और कामशब्दसे उस राज्यका मुख्यफल स्त्री कपड़े सुगंधितमाला आदि वस्तुरूप भोग जानना । इन तीनोंसे परम सुख नही है क्लेशरूप दुःख ही है इसलिये इन सबसे उत्तम मोक्षको ही वीतरागसर्वज्ञदेव कहते हैं क्योकि मोक्षसे जुदे जो धर्म अर्थ काम हैं वे आकुलताके उत्पन्न करनेवाले हैं तथा वीतरागपरमा- नंद सुखरूप अमृतरसके आखादसे विपरीत है इसलिये सुखके करनेवाले नहीं है ऐसा जानना ॥ १२९॥ आगे धर्म अर्थ काम इन तीनोंसे जो मोक्ष उत्तम नही होता तो इन तीनोंको छोड़- कर जिनेश्वर देव मोक्षको क्यों जाते ऐसा प्रगट दिखाते हैं;-[हे जीव] हे जीव [यदि ] जो [एतेभ्यः सकलेभ्यः ] इन सबोंसे [स:] मोक्ष [ उत्तमः ] उत्तम [एव] ही [ नैव ] नहीं [ भवति ] होता [ततः ] तो [जिनाः ] श्रीजिनवरदेव [त्रीण्यपि] धर्म अर्थ काम इन तीनोंको [परिहत्य] छोड़कर [परलोके ] मोक्षमे [किं] क्यों [ब्रजति ] जाते । इसलिये जानते हैं कि मोक्ष सबसे उत्कृष्ट है । भावार्थ-पर अर्थात् उत्कृष्ट मिथ्यात्वरागादिरहित केवलज्ञानादि अनंतगुण सहित परमात्मा वह पर है उस , परमात्मप्रकाशः। १३१ परमात्मा परशब्देनोच्यते तस्यैवंगुणविशिष्टस्य परमात्मनो लोको लोकनमवलोकनं वीतरा- गपरमानंदसमरसीभावानुभवनं लोक इति परलोकशब्दस्यार्थः । अथवा पूर्वोक्तलक्षणः परमात्मा परशब्देनोच्यते । निश्चयेन परशिवशब्दवाच्यो मुक्तात्मा शिव इत्युच्यते तस्य लोकः शिवलोक इति । अथवा परमब्रह्मशब्दवाच्यो मुक्तामा परमब्रह्म इति तस्य लोको ब्रह्मलोक इति । अथवा परमविष्णुशब्दवाच्यो मुक्तात्मा विष्णुरिति तस्य लोको विष्णुलोक इति परलोकशब्देन मोक्षोभण्यते परश्वासौ लोकश्च परलोक इति । परलोकशब्दस्य व्युत्प- त्यर्थो ज्ञातव्यः नचान्यः कोपि परिकल्पितःशिवलोकादिरस्तीति । अत्र स एव परलोक- शब्दवान्यः परमात्मोपादेय इति तात्पर्य ॥ १३० ॥ अथ तमेव मोक्षं सुखदायकं दृष्टांतद्वारेण दृढयति,- उत्तमु सुक्खु ण देइ जइ, उत्तमु मुक्खु ण होइ । तो किं इच्छहि, बंधणहिं बद्धा पसुयवि सोइ ॥ १३१ ॥ उत्तमं सुखं न ददाति यदि उत्तमो मोक्षो न भवति । ततःकि इच्छंति बंधनैः बद्धा पशवोपि तमेव ॥ १३१ ॥ उत्तमु इत्यादि । उत्तमु उत्तमं सुक्खु सुखं ण देइ जइ न ददाति यदि चेत् उत्तम मुक्खु ण होइ उत्तमो मोक्षो न भवति तो तस्मात्कारणात् किं किमर्थ इच्छहि इच्छंति वंधणहिं बंधनैः बद्धा निवद्धाः । किं निवद्धाः । पसुयवि पशवोपि । किमिच्छंति । सोइ तमेव मोक्षमिति । अयमत्र भावार्थः । सुखकारणत्वाद्धेतोः बंधनबद्धाः पशवोपि परमात्माका लोक अर्थात् अवलोकन वीतराग परमानंद समरसीभावका अनुभव वह पर- लोक कहा जाता है अथवा परमात्माको परमशिव कहते हैं उसका जो अवलोकन वह शिवलोक है, अथवा परमात्माका ही नाम परम ब्रह्म है उसका जो लोक वह ब्रह्मलोक है, अथवा उसीका नाम परमविष्णु है उसका जो लोक अर्थात् स्थान वह विष्णुलोक है ये सब मोक्षके नाम है यानी जितने परमात्माके नाम हैं उनके आगे लोक लगानेसे मोक्षके नाम हो जाते है दूसरा कोई कल्पना किया हुआ शिवलोक ब्रह्मलोक विष्णुलोक नही है । यहापर सारांश यह हुआ कि परलोकके नामसे कहागया परमात्मा ही उपादेय है ध्यान करने योग्य है अन्य कोई नही ॥ १३० ॥ आगे उसी मोक्षको अनंतसुखका देनेवाला दृष्टांतके द्वारा दृढ करते है;- यदि] जो [ मोक्षः] मोक्ष [ उत्तमं सुखं] उत्तमसुखको [न ददाति ] न देवै तो [ उत्तमः ] उत्तम [ न भवति ] नही होवै और जो मोक्ष उत्तम ही न होवै [ ततः] तो [बंधनैः बद्धाः] बंधनोंसे बंधे [ पशवोपि ] पशु भी [तमेव ] उस मोक्षकी ही [किं इच्छंति] क्यों इच्छा करें। भावार्थ-बंधनेके समान कोई दुःख नही है और छूटनेके समान १३२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । मोक्षमिच्छंति तेन कारणेन केवलज्ञानाद्यनंतगुणाविनाभूतस्योपादेयरूपस्यानंतसुखस्य कार- णत्वादिति ज्ञानिनो विशेषेण मोक्षमिच्छंति ॥ १३१ ॥ अथ यदि तस्य मोक्षस्याधिकगुणगणो न भवति तर्हि लोको निजमस्तकस्योपरि तं किमर्थं धरतीति निरूपयति,- अणु जइ जगह जि अहिययरु, गुणगणु तासु ण होइ। तो तहलोउवि किं धरइ, णियसिर उप्परि सोइ ॥ १३२ ॥ अनु यदि जगतोपि अधिकतरः गुणगुणः तस्य न भवति । ततः त्रिलोकोपि किं धरति निजगिरसि उपरि तमेव ॥ १३२ ॥ अणु इत्यादि । अणु पुनः जइ यदि चेत् जगह जि जगतोपि सकाशान् अहिययरु अतिशयेनाधिकः अधिकतरः । कोसौ । गुणगणु गुणगणाः तासु तस्य मोक्षम्य ण होइ न भवति तो ततः कारणात् तइलोउवि त्रिलोकोपि कर्ता । किं धरइ किमर्थ धरति । कस्मिन् । णियसिर उप्परि निजशिरसि उपरि किं धरइ किं धरति सोइ तमेव मोक्ष- मिति । तद्यथा । यदि तस्य मोक्षस्य पूर्वोक्तः सम्यक्त्वादिगुणगणो न भवति तर्हि लोक: कर्ता निजमस्तकस्योपरि तकि धरतीति । अत्रानेन गुणगणस्थापनेन कि कृतं भवति, बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काराभिधानानां गुणानामभावं मोक्षं मन्यते ये कोई सुख नही है बंधनसे बंधे जानवर भी छूटना चाहते है नब छूटते है तभी सुखी होते है । इस सामान्यबंधनेके अभावसेही पशु सुखी होते है तो कर्मबंधनके अभावसे ज्ञानी जन परमसुखी होवें इसमें अचंभा क्या है । इसलिये केवलज्ञानादि अनंतगुणसे तन्मई अनंतसुखका कारण मोक्ष ही आदरने योग्य है इसकारण ज्ञानी पुरुष विशेषतासे मोक्षको ही इच्छते है ॥ १३१ ॥ आगे जो मोक्षमें अधिकगुणोंका समूह नहीं होता तो मोक्षको तीनलोक अपने मस्तक पर क्यों रखता ऐसा वतलाते है,-[अनु] फिर [यदि] जो [जगतः अपि] सव लोकसे भी [अधिकतरः] बहुत ज्यादा [गुणगणः] गुणोंका समूह [तस्य ] उस मोक्षमें [न भवति ] नही होता [ततः] तो [त्रिलोकः अपि] तीनों ही लोक [नि- जशिरसि ] अपने मस्तकके [उपरि ] ऊपर [तमेव ] उसी मोक्षको [किं धरति] क्यों रखता । भावार्थ-मोक्ष लोकके शिखर (अग्रभाग) पर है सो सब लोकसे मोक्षमें बहुत ज्यादा गुण है इसीलिये उसको लोक अपने सिरपर रखता है । कोई किसीको अपने सिरपर रखता है वह अपनेसे अधिक गुणवाला जानकर रखता है । यदि क्षायिक- सम्यक्त्व केवलदर्शनादि अनंतगुण मोक्षमे न होते तो मोक्ष सबके सिरपर न होता मोक्षके ऊपर अन्य कोईस्थान नहीं है सबके ऊपर मोक्ष ही है और मोक्षके आगे अनंत अलोक परमात्मप्रकाशः। १३३ वृद्धवैशेपिकास्ते निपिद्धाः । ये च प्रदीपनिर्वाणवज्जीवाभावं मोक्षं मन्यते सौगतास्ते च निरस्ताः । यथोक्तं सांख्यैः । सुप्तावस्थावत् सुखज्ञानरहितो मोक्षस्तदपि निरस्तं । लोकाग्रे तिष्ठतीति वचनेन तु मंडिकसंज्ञा नैयायिकमतांतर्गता यत्रैव मुक्तस्तत्रैव तिष्ठतीति वदंति तेपि निरस्ता इति । जैनमते पुनरिंद्रियजनितज्ञानसुखस्याभावेन चातींद्रियज्ञानसुखस्येति कर्मजनितेद्रियादिदशप्राणसहितस्याशुद्धजीवस्याभावे न पुनः शुद्धजीवस्येति भावार्थः।।१३२॥ है वह शून्य है वहा कोई स्थान नही है । वह अनत अलोक भी सिद्धोंके ज्ञानमें भास रहा है । यहांपर मोक्षमें अनंतगुणोंके स्थापन करनेसे मिथ्यादृष्टियोंका खंडन किया । कोई मिथ्यादृष्टि वैशेषिकादि ऐसा कहते हैं कि जो बुद्धि सुख दुःख इच्छा द्वेष प्रयत्न धर्म अधर्म संस्कार इन नव गुणोंके अभावरूप मोक्ष है उनका निषेध किया, क्योंकि इंद्रिय जनित बुद्धिका तो अभाव है परंतु केवल बुद्धि अर्थात् केवलज्ञानका अभाव नहीं है। इंद्रियोंसे उत्पन्न सुखका अभाव है लेकिन अतीद्रियसुखकी पूर्णता है, दुःख इच्छा द्वेष यन इन विभावरूप गुणोंका तो अभाव है ही केवलरूप परिणमन है, व्यवहार धर्मका अभाव ही है और वस्तुका खभावरूप धर्म वह है ही, अधर्मका तो अभाव ठीक ही है और पर द्रव्यरूप सस्कार सर्वथा नही है खभावसस्कार ही है। जो मूढ इन गुणोंका अभाव मानते हैं वे वृथा वकते हैं मोक्ष तो अनंतगुणरूप है । इसतरह निर्गुणवादियोंका निषेध किया। तथा बौद्धमती जीवके अभावको मोक्ष कहते हैं। वे मोक्ष ऐसा मानते हैं कि जैसे दीपकका निर्वाण (वुझना) उसीतरह जीवका अभाव वही मोक्ष है । ऐसी बौ- द्धकी श्रद्धाका भी तिरस्कार किया। क्योंकि जो जीवका ही अभाव होगया तो मोक्ष किसके हुई । जीवका शुद्ध होना वह मोक्ष है अभाव कहना वृथा है । साख्यमतवाले ऐसा कहते हैं कि जो एकदम सोनेकी अवस्था है वही मोक्ष है जिसजगह न सुख है न ज्ञान है ऐसी प्रतीतिका निवारण किया। नैयायिक मतवाले ऐसा कहते हैं कि जहासे मुक्त हुआ वहींपर ही तिष्ठता है ऊपरको गमन नही करता। ऐसे नैयायिकके कथनका लोक सिखर- पर तिष्ठता है इस वचनसे निषेध किया। क्योंकि बंधनसे छूटता है वहा वह नही रहता यह प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कैदी कैदसे छूटता है तव वंदीग्रहसे छूटकर अपने घरकी तरफ गमन करता है वह निजघर निर्वाण ही है। जैनमार्गमें तो इंद्रियजनित ज्ञान जोकि मति श्रुत अवधि गनःपर्यय हैं उनका अभाव माना है और अतींद्रियरूप जो केवलज्ञान है वह वस्तुका खभाव है उसका अभाव आत्मामें नहीं होसकता । स्पर्श रस गंध रूप शब्द इन पांच इंद्रियविषयोंकर उत्पन्न हुए सुखका तो अभाव ही है लेकिन अतींद्रियसुख जो निराकुल परमानंद है उसका अभाव नहीं है, कर्मजनित जो इंद्रियादि दस प्राण अर्थात् पाच इंद्रियां मन वचन काय आयु श्वासोच्छास इन दश प्राणोंका भी अभाव है ज्ञानादि १३४ रायचंदजैनशास्त्रमालायाम् । अथोत्तमं सुखं न ददाति यदि मोक्षस्तर्हि सिद्धाः कथं निरंतरं सेवंते तमिति कथयति; उत्तमु सुक्खु ण देइ जइ, उत्तमु मुक्खु ण होइ । तो कि सयलुवि कालु जिय, सिद्धवि सेवहिं सोइ ॥ १३३ ।। उत्तमं सुखं न ददाति यदि उत्तमः मोक्षो न भवति । ततः कि सकलमपि कालं जीव सिद्धा अपि सेवंते तमेव ॥ १३३ ॥ उत्तमु इत्यादि । उत्तमु सुक्खु उत्तमं सुखं ण देइ न ददाति जइ यदि चेत् उत्तमु उत्तमो मुक्खु मोक्षः ण होइ न भवति तो ततः कारणात् किं किमर्थ सयलुवि कालु सकलमपि कालं जिय हे जीव सिद्धवि सिद्धा अपि सेवहिं सेवंते सेवितमेव मोनमिति । तथाहि । यद्यतींद्रियपरमाहादरूपमविनश्वरं सुखं न ददाति मोक्षस्तहि कथमुत्तमो भवति उत्तमत्वाभावे च केवलज्ञानादिगुणसहिताः सिद्धा भगवंतः किमर्थ निरंतरं सेवते च चेन् । तस्मादेव जायते तत्सुखमुत्तमं ददातीति । उक्तं च सिद्धमुखं । "आत्मोपादानसिद्धं स्वयमतिशयवद्वीतवाधं विशालं, वृद्धिहासव्यपेतं विषयविरहितं निःप्रतिद्वन्द्वभावं । अन्यद्र- व्यानपेक्षं निरुपमममितं शाश्वतं सर्वकालं उत्कृष्टानंतसारं परमसुखमतस्तस्य सिद्धस्य जातं" ॥ अत्रेदमेव निरंतरमभिलपनीयमिति भावार्थः ॥ १३३ ॥ निज प्राणोंका अभाव नहीं है । जीवकी अशुद्धताका अभाव है शुद्धपनेका अभाव नहीं यह निश्चयसे जानना ।। १३२ ।। आगे कहते हैं कि जो मोक्ष उत्तमसुख नही दे तो सिद्ध उसे निरंतर क्यों सेवन कर ;-[यदि ] जो [ उत्तमं सुखं ] उत्तम अविनाशी सुखको [न ददाति] नहीं देवै तो [ मोक्षः उत्तमः ] मोक्ष उत्तम भी [न भवति] नही होसकती उत्तम सुख देती है इसी लिये मोक्ष सबसे उत्तम है । जो मोक्षमें परमानंद नहीं होता [ ततः] तो [हे जीव ] हे जीव [सिद्धा अपि] सिद्ध परमेष्ठी भी [सकलमपि कालं] सदा काल [तमेव ] उसी मोक्षको [कि सेवते ] क्यों सेवन करते कभी भी न सेवते । भावार्थ-वह मोक्ष अखंड सुख देती है इसीलिये उसे सिद्ध महाराज सेवते हैं मोक्ष परम आहादरूप है अविनश्वर है मन और इंद्रियोंसे रहित है इसीलिये उसे सदाकाल सिद्ध सेवते हैं केवलज्ञानादिगुणसहित सिद्ध भगवान निरंतर निर्वाणमें ही निवास करते हैं ऐसा निश्चय है । सिद्धोंका सुख दूसरी जगह भी ऐसा कहा है "आत्मोपादान" इत्यादि । इसका अभिप्राय यह है कि इस अध्यात्मज्ञानसे सिद्धोंके जो परमसुख हुआ है वह कैसा है कि अपनी २ जो उपादानशक्ति उसीकर उत्पन्न हुआ है परकी सहाय- तासे नहीं है स्वयं (आप ही ) अतिशयरूप है सब बाधाओंसे रहित है निराबाध है विस्तीर्ण है घटती वढतीसे रहित है विषयविकारसे रहित है भेदभावसे रहित है निर्द्वन्द्व परमात्मप्रकाशः। १३५ - अथ सर्वपां परमपुरुपाणां मोक्ष एव ध्येय इति प्रतिपादयति,- हरिहरवझवि जिणवरवि, मुणिवरविंदवि भव्य । परमणिरंजणि मणु धरिवि, मुक्खु जि झायहि सव्व ॥ १३४ ॥ हरिहरब्रह्माणोपि जिनवरा अपि मुनिवरवृंदान्यपि भव्याः । परमनिरंजने मनः धृत्वा मोक्षं एवं ध्यायति सर्वे ॥ १३४ ॥ हरि हर इत्यादि । हरि हरवंभुवि हरिहरब्रह्माणोपि जिणवरवि जिनवरा अपि मुणिवरविंदवि मुनिवरवृंदान्यपि भव्य शेपभव्या अपि, एते सर्वे किं कुर्वति । परमणिरं- जणि परमनिरंजनाभिधाने निजपरमात्मस्वरूपे मणु मनः धरिवि विषयकषायेपु गच्छन् सन् व्यावृत्य धृत्वा पश्चात मुक्खु जि मोक्षमेव झायहि ध्यायति सच सर्वेपि इति । तद्यथा । हरिहरादयः सर्वेपि प्रसिद्धपुरुपाः ख्यातिपूजालाभादिसमस्तविकल्पजालेन शून्ये शुद्धबुद्धैकस्वभावनिजालद्रव्यसम्यश्रद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमा- धिसमुत्पन्नवीतरागसहजानंदैकसुखरसानुभवेन पूर्णकलावत् भरितावस्थे निरंजनशब्दाभि- धेयपरमात्मध्याने स्थित्वा मोक्षमेव ध्यायंतीति । अयमत्र भावार्थः । यद्यपि व्यवहारेण है जहा पर वस्तुकी अपेक्षा ही नही है अनुपम है अनंत है अपार है जिसका प्रमाण नहीं सदा काल साश्वता है महा उत्कृष्ट है अनंतसारता लिये हुए है । ऐसा परमसुख सिद्धोंके है अन्यके नही है। यहां तात्पर्य यह है कि हमेशा मोक्षका ही सुख अभिलाषा करने योग्य है ओर ससारपर्याय सव हेय है ॥ १३३ ॥ आगे सभी महान पुरुषोंके मोक्ष ही ध्यावने योग्य है ऐसा कहते हैं;-[हरिहर- ब्रह्माणोपि ] नारायण वा इंद्र रुद्र अन्य ज्ञानीपुरुष [जिनवरा अपि] श्री तीर्थकर परमदेव [मुनिवरदान्यपि ] मुनिश्वरोंके समूह तथा [ भव्याः ] अन्य भी भव्यजीव [ परमनि- रंजने] परम निरंजनमे [ मनः धृत्वा ] मन रखकर [ सर्वे ] सब ही [ मोक्षं ] मोक्षको [एव 1 ही [ध्यायंति] ध्यावते है । यह मन विषयकषायोंमें जो जाता है उसको पीछे लौटाकर अपने खरूपमें स्थिर अर्थात् निर्वाणका साधनेवाला करते है । भावार्थ-श्री तीर्थकर देव तथा चक्रवर्ती बलदेव वासुदेव प्रतिवासुदेव महादेव इत्यादि सब प्रसिद्ध पुरुष अपने शुद्ध ज्ञान अखंडखभाव जो निज आत्मद्रव्य उसका सम्यक श्रद्धान ज्ञान आचरण- रूप जो अभेदरलत्रय उस मई समाधिकर उत्पन्न वीतरागसहजानद अतीद्रियसुखरस उसके अनुभवसे पूर्ण कलशकी तरह भरे हुए निरंतर निराकार निजखरूप परमात्माके ध्यानमें स्थिर होकर मुक्त होते है । कैसा वह ध्यान है कि ख्याति (प्रसिद्धि) पूजा (अपनी महिमा) और धनादिकका लाभ इत्यादि समस्त विकल्पजालोंसे रहित है। यहा केवल आत्मध्यान ही मोक्षमार्ग बतलाया है और अपना खरूप ही ध्यावने योग्य है। तात्पर्य यह ।

१३६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । सविकल्पावस्थायां वीतरागसर्वज्ञस्वरूपं तत्प्रतिविवानि तन्मंत्राक्षराणि तदाराधकपुरूपाश्च ध्येया भवंति तथापि वीतरागनिर्विकल्पत्रिगुप्तिगुप्तपरमसमाधिकाले निजशुद्धात्मैव ध्येय इति ॥ १३४॥ अथ भुवनत्रयेपि मोक्षं मुक्त्वा अन्यत्परमसुखकारणं नास्तीति निश्चिनोति,- तिहुयणि जीवहं अत्थि णवि, सुक्खहं कारणु कोइ । मुक्खु मुएविणु एमु पर, तेणवि चिंतहि सोइ ॥ १३५ ॥ त्रिभुवने जीवानां अस्ति नैव सुखस्य कारणं किमपि । मोक्षं मुत्तवा एक परं तेनैव चिंतय तमेव ॥ १३५ ॥ तिहुयणि इत्यादि । तिहुयणि त्रिभुवने जीवहं जीवानां अत्थि णवि अस्ति नैव । किं नास्ति । सोक्खहं कारणु सुखस्य कारणं कोइ किमपि वस्तु । किं कृत्वा । मुक्सु मुएविणु एकु मोक्षं मुक्त्वैक परं नियमेन तेणवि तेनैव कारणेन चिंतहिं चितय सोइ तमेव मोक्षमिति । तथाहि । त्रिभुवनेपि मोक्षं मुक्त्वा निरंतरातिशयसुखकारणमन्यत्पंचद्रि- यविषयानुभवरूपं किमपि नास्ति तेन कारणेन हे प्रभाकरभट्ट वीतरागनिर्विकल्पपरम- सामायिके स्थित्वा निजशुद्धात्मस्वभावं ध्याय त्वमिति । अत्राह प्रभाकरभट्टः हे भगवन्न- तींद्रियमोक्षसुखं निरंतरं वर्ण्यते भवद्भिस्तञ्च न ज्ञायते जनैः । भगवानाह हे प्रभाकरभट्ट कोपि पुरुषो निर्व्याकुलचित्तः प्रस्तावे पंचेद्रियभोगसेवारहितस्तिष्ठति स केनापि देवदत्तेन है कि यद्यपि व्यवहारनयकर प्रथम अवस्थामें वीतरागसर्वज्ञका स्वरूप अथवा वीतरागके प्रतिबिंब अथवा वीतरागके नाम मंत्रके अक्षर अथवा वीतरागके सेवक महामुनि ध्यावने योग्य हैं तौभी वीतराग निर्विकल्पतीनगुप्तिरूप परम समाधिके समय अपना शुद्ध आत्मा ही ध्यान करने योग्य है अन्य कोई भी दूसरा पदार्थ पूर्ण अवस्थामें ध्यावने योग्य नही है ।। १३४ ॥ अव तीन लोकमें मोक्षके सिवाय अन्य कोई भी परमसुखका कारण नहीं ऐसा निश्चय करते हैं;-[त्रिभुवने] तीनलोकमें [ जीवानां] जीवोंको [मोक्षं मुक्त्वा] मोक्षके सिवाय [ किमपि ] कोई भी वस्तु सुखस्य कारणं] सुखका कारण [नैव] नही [अस्ति ] है एक सुखका कारण मोक्ष ही है [तेनैव ] इस कारण तू [परं एकं तं एव] नियमसे एक मोक्षका ही [चिंतय] चितवन कर जिसे कि महामुनि भी चितवन करते हैं । भावार्थ-श्रीयोगींद्राचार्य प्रभाकर भट्टसे कहते हैं कि वत्स मोक्षके सिवाय अन्य सुखका कारण नहीं है और आत्मध्यानके सिवाय अन्य मोक्षका कारण नहीं है इसलिये तू वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें ठहरकर निजशुद्धात्मस्वभावको ही ध्याय । यह श्रीगुरुने आज्ञा की । तव प्रभाकर भट्टने वीनती की हे भगवन् तुमने निरंतर अतींद्री परमात्मप्रकाशः। १३७ पृष्टः सुखेन स्थितो भवान् । तेनोक्तं सुखमस्तीति तत्सुखमात्मोत्थं । कस्मादिति चेत् । तत्काले लीसेवादिस्पर्शविपयो नास्ति भोजनादिजितेंद्रियविपयो नास्ति विशिष्टरूपगंधमा- ल्यादिघ्राणेद्रियविपयो नास्ति दिव्यस्त्रीरूपावलोकनादिलोचनविपयो नास्ति श्रवणरमणीय- गीतवाद्यादिशब्दविपयोपि नास्तीति तस्मात् ज्ञायते तत्सुखमात्मोत्थमिति । किं च । एक- देशव्यापाररहितानां तदेकदेशेनामोत्थसुखमुपलभ्यते वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानरतानां पुनर्निरवशेपपंचेंद्रियविपयमानसविकल्पजालनिरोधे सति विशेपेणोपलभ्यते । इदं तावत् स्वसंवेदनप्रत्यक्षगम्यं सिद्धासनां च सुखं पुनरनुमानगम्यं । तथाहि । मुक्तात्मनां शरीरेन्द्रि- यव्यापाराभावेपि सुखमस्तीति साध्यं । कस्माद्धेतोः । इदानीं पुनर्वीतरागनिर्विकल्पसमा- धिस्थानां परमयोगिनां पंचेद्रियविपयव्यापाराभावेपि स्वासोत्थवीतरागपरमानंदसुखोपल- मोक्षसुख वर्णन किया है सो ये जगतके प्राणी अतीद्रियसुखको जानते ही नहीं हैं इंद्रियन सुखको ही सुख मानते है । तब गुरुने कहा कि हे प्रभाकर भट्ट कोई एक पुरुष जिसका चित्त व्याकुलतारहित है और पंचेंद्रियके भोगोंसे रहित अकेला स्थित है उससमय किसी पुरुषने पूछा कि तुम सुखी हो । तब उसने कहा कि सुखसे तिष्ठ रहे हैं उस समयपर विपयसेवनादि सुख तो है ही नही उसने यह क्यों कहा कि हम सुखी हैं । इसलिये यह मालूम होता है सुख नाम व्याकुलता रहितका है सुखका मूल निक्कुलपना है वह नि- ाकुल अवस्था आत्मामे ही है विषय सेवनमें नही । भोजनादि जिहा इंद्रियका विषय भी उस समय नही है, स्त्रीसेवनादि स्पर्शका विषय नही है और गधमाल्यादिक नाकका विषय भी नही है, दिव्य स्त्रियोंका रूप अवलोकनादि नेत्रका विषय भी नही और का- नोंका मनोज्ञ गीत वादिनादि शब्द विषयभी नही हैं इसलिये जानते हैं कि सुख आत्मामे ही है । ऐसा तू निश्चयकर जो एकोदेश विषयव्यापारसे रहित हैं उनके एकोदेश थिर- ताका सुख है तो वीतरागनिर्विकल्पस्वसवेदनज्ञानियोके समस्त पच इद्रियोंके विषय और मनके विकल्प जालोंकी रुकावट होनेपर विशेषतासे निर्व्याकुल सुख उपजता है । इस. लिये ये दो वाते तो प्रत्यक्ष ही दृष्टि पडती हैं। जो पुरुष नीरोग और चिंतारहित हैं उनके विषयसामग्रीके विना ही सुख भासता है और जो महामुनि शुद्धोपयोग अवस्थामें ध्यानारूढ हैं उनके निक्कुलता प्रगट ही दीख रही है वे इंदादिक देवोंसे भी अधिक सुखी हैं । इसकारण जब ससार अवस्थामें ही सुखका मूल निर्व्याकुलता दीखती है तो सिद्धोंके सुखकी वात ही क्या है। यद्यपि वे सिद्ध दृष्टिगोचर नही हैं तो भी अनुमानकर ऐसा जानाजाता है कि सिद्धोंके भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्म नही तथा विषयोंकी प्रवृत्ति नहीं है कोई भी विकल्पजाल नही है केवल अतींद्रिय आत्मीक सुख ही है वही सुख उपादेय है अन्य सुख सब दुःखरूप ही हैं। जो चारों गतियोंके पर्याय हैं उनमें १८ , १३८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । ब्धिरिति । अत्रेत्थंभूतसुखमेवोपादेयमिति भावार्थः । तथागमे चोक्तमासोत्यमतींद्रियमुखं । "अइसयमादसमुत्थं विसयातीदं अणोवममणंतं । अबुच्छिण्णं च मुहं सुद्भुवओगप्प- सिद्धाणं" ॥ १३५॥ अथ यस्मिन् मोक्षे पूर्वोक्तमतींद्रियसुखमस्ति तस्य मोक्षस्य स्वरूपं कथयति जीवह सो पर मुक्खु मुणि, जो परमप्पयलाहु । कम्मकलंकविमुक्काहं, णाणिय वोल्लहिं साहु ।। १३६ ।। जीवानां तं परं मोक्षं मन्यख यः परमात्मलाभः । कर्मकलंकविमुक्तानां ज्ञानिनः ब्रुवंति साधवः ॥ १३६ ॥ जीवहं इत्यादि । जीवहं जीवानां सो तं परं नियमेन मोक्ग्यु मोक्षं मुणि मन्यस्व जानीहि हे प्रभाकरभट्ट । तं कं । जो परमप्पयलाहु यः परमात्मलाभः । इत्थंभूतो मोक्षः केपां भवति । कम्मकलंकविमुक्काहं ज्ञानावरणाद्यष्टविधकर्मकलंकविमुक्तानां । इत्थंभूतं मोक्षं के ब्रुवंति । णाणिय बोल्लहिं वीतरागस्वसंवेदनज्ञानिनो ब्रुवंति । ते के । साहु साधवः इति । तथाहि । केवलज्ञानाद्यनंतगुणव्यक्तिरूपम्य कार्यसमयसारभूतस्य हि परमामालाभो मोक्षो भवतीति । स च केपां। पुत्रकलत्रममत्वस्वरूपप्रभृतिसमस्तविकल्प- रहितध्यानेन भावकर्मद्रव्यकर्मकलंकरहितानां भव्यानां भवतीति ज्ञानिनः कथयति । अत्रायमेव मोक्षः पूर्वोक्तस्यानंतसुखस्योपादेयभूतस्य कारणत्वादुपादेय इति भावार्थः कदापि सुख नही है । सुख तो सिद्धोंके है या महामुनीश्वरोंके सुखका लेशमात्र देखाजाता है दूसरेके जगतकी विषयवासनाओंसे सुख नही है। ऐसा ही कथन श्रीप्रवचनसारमें किया है । "अइसय" इत्यादि । सारांश यह है कि जो शुद्धोपयोगकर प्रसिद्ध ऐसे श्रीसिद्ध परमेष्टी हैं उनके अतीद्रियसुख है वह सर्वोत्कृष्ट है और आत्मजनित है तथा विषयवास- नासे रहित है अनुपम है जिसके समान सुख तीनलोकमें भी नही है जिसका पार नही बाधारहित ऐसा सुख सिद्धोंके है ।। १३५ ॥ आगे जिस मोक्षमें ऐसा अतीद्रिय सुख है उस मोक्षका स्वरूप कहते हैं। हे प्रभा- करभट्ट जो [कर्मकलंकविमुक्तानां जीवानां ] कर्मरूपी कलंकसे रहित जीवोंको [य: परमात्मलाभः ] जो परमात्मकी प्राप्ति है [तं परं] उसीको नियमसे तू [ मोक्षं मन्यख ] मोक्ष जान ऐसा [ज्ञानिनः साधवः] ज्ञानवान् मुनिराज [ब्रुवंति ] कहते हैं, रत्नत्रयके योग्से मोक्षका साधन करते हैं इससे उनका नाम साधु है । भावार्थ- केवलज्ञानादि अनंतगुण प्रगट रूप जो कार्यसमयसार अर्थात् शुद्धपरमात्माका लाभ वह मोक्ष है यह मोक्ष भव्यजीवोंके ही होती है। भव्य कैसे हैं कि पुत्रकलत्रादि पर वस्तु- ओंके ममत्वको आदि लेकर सब विकल्पोंसे रहित जो आत्मध्यान उससे जिन्होंने भावकर्म

परमात्मप्रकाशः।
१३९
॥ १३६ ॥ एवं मोक्षमोक्षफलमोक्षमार्गादिप्रतिपादकद्वितीयमहाधिकारमध्ये सूत्रदशकेन
मोक्षस्वरूपनिरूपणस्थलं समाप्तं ।
अथ तस्यैव मोक्षस्यानंतचतुष्टयस्वरूपं फलं दर्शयति,-
दसणु णाणु अणंतसुहु, समउ ण तुइ जासु।
सो पर सास मोक्खफलु, बिजउ अस्थि ण तासु ॥ १३७ ।।
दर्शनं ज्ञानं अनंतसुखं समयं न त्रुट्यति यस्य ।
तत् परं शाश्वतं मोक्षफलं द्वितीयं अस्ति न तस्य ॥ १३७ ॥
दसणु इत्यादि । दसणु केवलदर्शनं णाणु केवलज्ञानं अणंतसुहु अनंतसुखं एतदुपल-
क्षणमन्तवीर्याद्यनंतगुणाः समउ ण तुट्टइ एतद्गुणकदंबकमेकसमयमपि यावन्न त्रुट्यति न
नश्यति जासु यस्य मोक्षपर्यायस्याभेदेन तदाधारजीवस्य वा सो पर तदेव केवलज्ञानादिस्वरूपं
सासउ मोक्खफलु शाश्वतं मोक्षफलं भवति विजउ अत्थि ण तासु तस्यानंतजा-
नादिमोक्षफलस्यान्य द्वितीयमधिकं किमपि नास्तीति । अयमत्र भावार्थः । अनंतज्ञानादिमो-
क्षफलं ज्ञात्वा समस्तरागादित्यागेन तदर्थमेव निरतर शुद्धात्मभावना कर्तव्येति ॥ १३७ ॥
एवं द्वितीयमहाधिकारे मोक्षफलकथनरूपेण स्वतंत्रसूत्रमेकं गतं ।
अथानंतरमेकोनविशतिसूत्रपर्यतं निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गव्याख्यानस्थलं कथ्यते तद्यथा,-
जीवहं मुक्खहं हेड वर, दसणु णाणु चरित्तु ।
ते पुणु तिण्णिवि अप्पु मुणि, णिच्छइं एहउ वुत्तु ॥ १३८ ॥
द्रव्यकर्मरूपी कलंक क्षय किये हैं ऐसे जीवों के निर्वाण होता है ऐसा ज्ञानी जन कहते
हैं। यहां पर अनंतसुखका कारण होनेसे मोक्ष ही उपादेय है ॥ १३६ ॥
इस प्रकार मोक्षका फल और मोक्ष मार्गका जिसमें कथन है ऐसा दूसरे महाधिकारमें
दस दोहाओंसे मोक्षका स्वरूप दिखलाया ।
आगे मोक्षका फल अनंतचतुष्टय है यह दिखलाते हैं;-[यस्य ] जिस मोक्षपर्यायके
धारक शुद्धात्माके [दर्शनं ज्ञानं अनंतसुखं] केवलदर्शन केवलज्ञान अनंतसुख और
अनंतवीर्य इन अनंतचतुष्टयोंको आदि देकर अनंत गुणोंका समूह [ समयं न त्रुव्यति]
एक समयमात्र भी नाश नही होता अर्थात् हमेशा अनंतगुण पाये जाते हैं। [ तस्य]
उस शुद्धात्माके [तत् ] वही [परं] निश्चयसे शाश्वतं फलं] हमेशा रहनेवाला मोक्षका
फल [अस्ति ] है [द्वितीयं न] इसके सिवाय दूसरा मोक्षफल नहीं है और इससे
अधिक दूसरी वस्तु कोई नही है । भावार्थ-मोक्षका फल अनंत ज्ञानादि जानकर सम-
स्तरागादिकका त्यागकरके उसीके लिये निरंतर शुद्धात्माकी भावना करनी चाहिये ॥१३७॥

१४० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । जीवानां मोक्षस्य हेतुः वरं दर्शनं ज्ञानं चारित्रं । तानि पुनः त्रीण्यपि आत्मानं मन्यव निश्चयेन एवं उक्तं ॥ १३८ ॥ जीवह इत्यादि । जीवहं जीवानां अथवा एकवचनपक्षे 'जीवहों' जीवस्य मोक्खह हेउ मोक्षस्य हेतुः कारणं व्यवहारनयेन भवतीति क्रियाध्याहारः । कथंभूनं । वरु वरमु- स्कृष्टं । किं तत् । दसणु णाणु चरित्तु सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं । ते पुणु तानि पुनः तिण्णिवि त्रीण्यपि सम्यग्दर्शनजानचारित्राणि अप्पु आसानमभेदनयेन मुणि मन्यत्र जानीहि त्वं हे प्रभाकरभट्ट णिच्छए निश्चयनयेन एहर वुत्तु एवमुक्तं भणितं तिष्टतीति । इदमत्र तात्पर्य । भेदरत्नत्रयात्मको व्यवहारमोक्षमार्गो साधको भवति अभेदरबत्रयात्मकः पुनर्निश्चयमोक्षमार्गः साध्यो भवत्येवं निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गयोः साध्यसाधकभावो ज्ञातव्यः सुवर्णसुवर्णपापाणवत् इति । तथा चोक्तं । "सम्महसणणाणं चरणं मोक्खस्स कारणं जाणे । ववहारा णिच्छयदो तत्तियमइओ णिओ अप्पा" ॥ १३८ ॥ अथ निश्चयरत्नत्रयपरिणतो निजशुद्धात्मैव मोक्षमार्गो भवतीति प्रतिपादयति,- पेच्छइ जाणइ अणुचरइ, अप्पिं अप्पउ जो जि । दसणु णाणु चरित्तु जिउ, मुक्खहं कारणु सो जि ॥ १३९ ।। पश्यति नानाति अनुचरति आत्मना आत्मानं य एव । दर्शनं ज्ञानं चारित्रं जीवः मोक्षस्य कारणं स एव ॥ १३९ ।। पिच्छइ इत्यादि । पिच्छइ पश्यति जाणइ जानाति अणुचरइ अनुचरति । केन इस प्रकार दूसरे महाधिकारमें मोक्षफलके कथनकी मुख्यताकर एक दोहासूत्र कहा । आगे उन्नीसदोहापर्यंत निश्चय व्यवहारमोक्षमार्गका व्याख्यान करते है;-[जीवानां] जीवोंके [ मोक्षस्य हेतुः ] मोक्षके कारण [वरं] उत्कृष्ट [दर्शनं ज्ञानं चारित्रं] दर्शन ज्ञान और चारित्र हैं [ तानि पुनः ] फिर वे [त्रीण्यपि ] तीनों ही [ निश्चयेन ] निश्च- यकर [ आत्मानं ] आत्माको ही [ मन्यस्व ] जानो [एवं ] ऐसा [उक्तं ] श्रीवीत- रागदेवने कहा है ऐसा हे प्रभाकरभट्ट तू जान । भावार्थ-भेदरलत्रयरूप व्यवहार- मोक्षमार्ग साधक है और अभेदरत्नत्रयरूप निश्चयमोक्षमार्ग साधने योग्य है । इस प्रकार निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गका साध्यसाधकभाव, सुवर्ण सुवर्णपाषाणकी तरह जानना । ऐसा ही कथन श्रीद्रव्यसंग्रहमें कहा है। "सम्मइंसण" इत्यादि । इसका अभिप्राय यह है कि सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्र ये तीनों ही व्यवहारनयकर मोक्षके कारण जानना और निश्चयसे उन तीनोंमयी एक आत्मा ही मोक्षका कारण है ॥ १३८॥ आगे निश्चयरतत्रयरूप परिणया निजशुद्धात्मा ही मोक्षका मार्ग है ऐसा क- परमात्मप्रकाशः। १४१ कृत्वा । अप्पई आसना करणभूतेन । के कर्मतापन्नं । अप्पउ निजात्मानं जो जि य एव कर्ता दसणुणाणुचरित्तु दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं भवतीति क्रियाध्याहारः । कोसौ भवति । जीउ जीवः य एवाभेदनयेन सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं भवतीति मोक्खहं कारण निश्चयेन मोक्षस्य कारणं एक एव सो जि स एव निश्चयरत्नत्रयपरिणतो जीव इति । तथाहि । यः कर्ता निजात्मानं मोक्षस्य कारणभूतेन पश्यति निर्विकल्परूपेणावलोकयति । अथवा । तत्त्वार्थश्रद्धानापेक्षया चलमलिनावगाढपरिहारेण शुद्धात्मैवोपादेय इति रुचिरू- पेण निश्चिनोति न केवलं निश्चिनोति वीतरागस्वसंवेदनलक्षणाभेदज्ञानेन जानाति परिछि- नत्ति । न केवलं परिच्छिनत्ति । अनुचरति रागादिसमस्तविकल्पत्यागेन तत्रैव निजस्वरूपे स्थिरीभवतीति स निश्चयरनत्रयपरिणतः पुरुप एव निश्चयमोक्षमार्गो भवतीति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । तत्त्वार्थश्रद्धानरुचिरूपं सम्यग्दर्शनं मोक्षमार्गो भवति नास्ति दोषः पश्यति निर्विकल्परूपेणावलोकयति इत्येवं यदुक्तं तत्सत्तावलोकदर्शनं कथं मोक्षमार्गो भवति यदि भवति चेत्तर्हि तत्सत्तावलोकदर्शनमभव्यानामपि विद्यते तेपामपि मोक्षो भवति स चाग- मविरोधः इति । परिहारमाह । तेपां निर्विकल्पसत्तावलोकदर्शनं वहिर्विषये विद्यते न चा- ज्वंतरशुद्धात्मतत्त्वविपये । फस्मादिति चेत् । तेपामभव्यानां मिथ्यात्वादिसप्तप्रकृत्युपश- मक्षयोपशमक्षयाभावात् शुद्धात्मोपादेय इति रुचिरूपं सम्यग्दर्शनमेव नास्ति चारित्रमोहो- हते हैं। [य एव ] जो [आत्मना] अपनेसे [आत्मानं ] आपको [ पश्यति ] दे- खता है [जानाति ] जानता है [अनुचरति ] आचरण करता है [ स एव ] वही विवेकी [दर्शनं ज्ञानं चारित्रं] दर्शन ज्ञान चारित्ररूपपरिणया [जीवः ] जीव [ मो- क्षस्य कारणं ] मोक्षका कारण है । भावार्थ-जो सम्यग्दृष्टी जीव अपने आत्माको आपकर निर्विकल्परूप देखता है अथवा तत्त्वार्थ श्रद्धानकी अपेक्षा चंचलता और मलि- नता तथा शिथिलता इनका त्यागकर शुद्धात्मा ही उपादेय है इस प्रकार रुचिरूप निश्चय करता है, वीतराग स्वसवेदनलक्षण ज्ञानसे जानता है और सब रागादिक विकल्पोंके त्यागसे निजस्वरूपमें स्थिर होता है सो निश्चय रत्नत्रयको परिणत हुआ पुरुष ही मोक्षका मार्ग है । ऐसा कथन सुनकर प्रभाकरभट्टने प्रश्न किया। कि हे प्रमो तत्त्वार्थ श्रद्धान रुचिरूप सम्यग्दर्शन वह मोक्षका मार्ग है इसमें तो दोष नही और तुमने कहा कि जो देख वह दर्शन, जाने वह ज्ञान और आचरण वह चारित्र । सो यह देखनेरूप दर्शन कैसे मोक्षका मार्ग होसकता है । और जो कभी देखनेका नाम दर्शन कहो तो देखना अभव्यके भी होता है उसके मोक्षमार्ग तो नहीं माना है यदि अभव्यके मोक्ष- मार्ग होवै तो आगमसे विरोध आवै । आगममें तो यह निश्चय है कि अभव्यको मोक्ष नहीं होती। उसका समाधान यह है कि अभव्योंके देखनेरूप जो दर्शन है वह बाह्य- पदार्थीका है अंतरंगशुद्धात्मतत्त्वका दर्शन तो अभव्योंके नहीं होता उनके मिथ्यात्व - है १४२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । दयात् पुनर्वीतरागचारित्ररूपं निर्विकल्पशुद्धात्मसत्तावलोकनमपि न संभवतीति भावार्थः । निश्चयेनाभेदरत्नत्रयपरिणतो निजशुद्धात्मैव मोक्षमार्गो भवतीत्यस्मिन्नर्थे संवादगाथामाह । "रयणत्तयं ण वट्टइ अप्पाणं मुइतु अण्णद वियम्मि । तह्मा तत्तियमइओ होदि हु मोक्खस्स कारणं आदा" ॥ १३९ ॥ अथ भेदरत्नत्रयात्मक व्यवहारमोक्षमार्ग दर्शयति,- जं वोल्लइ ववहारणउ, दंसणु णाणु चरित्तु । परियाणहि जीव तुहुं, जे परु होहि पवित्तु ॥ १४० ।। यत् ब्रूते व्यवहारनयः दर्शनं ज्ञानं चारित्रं । तत् परिजानीहि जीव त्वं येन परः भवसि पवित्रः ॥ १४० ॥ जं इत्यादि । जं यत् वुल्लइ ब्रूते । कोसौ कर्ता । ववहारणउ व्यवहारनयः । यत् किं ब्रूते । दसणु णाणु चरित्तु सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रयं तं पूर्वोक्तं भेदरत्नत्रयस्वरूपं परिया- णहि परि समंतात् जानीहि जीव तुहुं हे जीव त्वं कर्ता जिं येन भेदरत्नत्रयपरिजानेन पर होहि परः उत्कृष्टो भवसि त्वं । पुनरपि किं विशिष्टस्त्वं । पवित्तु पवित्रः सर्वजनपूज्य इति । तद्यथा । हे जीव सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूपनिश्चयरत्नत्रयलक्षणनिश्चयमोक्षमार्ग- साधकं व्यवहारमोक्षमार्ग जानीहि त्वं येन ज्ञातेन कथंभूतो भविष्यसि ? परंपरया पवित्रः आदि सात प्रकृतियोंका उपशम क्षयोपशम क्षय नही है तथा शुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसी रुचिरूप सम्यग्दर्शन भी उनके नहीं है और चारित्रमोहके उदयसे वीतराग चारित्र- रूप निर्विकल्प शुद्धात्मका सत्तावलोकन भी कभी नही है। तात्पर्य यह है निश्चयकर अभेदरत्नत्रयको परिणत हुआ निज शुद्धात्मा ही मोक्षका मार्ग है। ऐसा ही द्रव्यसंग्रहमें साक्षीभूत गाथा कहा है । "रयणत्तयं" इत्यादि । उसका अर्थ ऐसा है कि रत्नत्रय आत्माको छोड़कर अन्य (दूसरी) द्रव्योंमें नहीं रहते इसलिये मोक्षका कारण उन तीनमई निजआत्मा ही है ॥ १३९ ।। आगे भेदरत्नत्रयस्वरूप व्यवहार वह परंपराय मोक्षका मारग है ऐसा दिखलाते हैं- [जीव ] हे जीव [व्यवहारनयः ] व्यवहारनय [यत् ] जो [दर्शनं ज्ञानं चारित्रं] दर्शन ज्ञान चारित्र इन तीनों को [ब्रूते ] कहता है [ तत् ] उस व्यवहाररतत्रयको [त्वं ] तू [ परिजानीहि ] जान [येन ] जिससे कि [परः पवित्रः] उत्कृष्ट पवित्र [भवसि ] होवै । भावार्थ-हे जीव तू तत्त्वार्थका श्रद्धान शास्त्रका ज्ञान और अशुभ- क्रियाओंका त्यागरूप सम्यग् दर्शन ज्ञान चारित्र व्यवहारमोक्षमार्गको जान क्योंकि ये निश्चयरत्नत्रयरूप निश्चयमोक्षमार्गके साधक हैं इनके जाननेसे किसी समय परमपवित्र परमात्मा हो जायगा । पहले व्यवहार रत्नत्रयकी प्राप्ति होजावे तव ही निश्चयरत्नत्रयकी परमात्मप्रकाशः। १४३ परमात्मा भविष्यसि इति । व्यवहारनिश्वयमोक्षमार्गस्वरूपं कथ्यते । तद्यथा । वीतराग- सर्वनप्रणीतपड्यादिसम्यक्श्रद्धानन्ञानव्रताद्यनुष्ठानरूपो व्यवहारमोक्षमार्गः निजशुद्धा- लसम्यक्सद्धानज्ञानानुष्ठानरूपो निश्चयमार्गः । अथवा साधको व्यवहारमोक्षमार्गः साध्यो निश्चयमोक्षमार्गः । अत्राह शिष्यः । निश्चयमोक्षमार्गो निर्विकल्पः तत्काले सविक- ल्पमोक्षमार्गो नास्ति कथं साधको भवतीति । अत्र परिहारमाह । भूतनैगमनयेन परंपरया भवतीति । अथवा सविकल्पनिर्विकल्पभेदेन निश्चयमोक्षमार्गो द्विधा, तत्रानंतज्ञानरूपोऽहमि- त्यादि सविकल्पमाधको भवति, निर्विकल्पसमाधिरूपो साध्यो भवतीति भावार्थः ।। सविकल्पनिर्विकल्पनिश्चयमोक्षमार्गविपये संवादगाथामाह । “जं पुण सगयं तच्चं सवियप्पं , प्राप्ति होसकती है इसमें संदेह नहीं है । जो अनंतसिद्ध हुए और होवेंगे वे पहले व्यवहार रलत्रयको पाकर निश्चय रत्नत्रयरूप हुए । व्यवहार साधन है और निश्चयसाध्य है । व्यवहार निश्चयमोक्षमार्गका स्वरूप कहते हैं-वीतरागसर्वज्ञदेवके कहे हुए छह द्रव्य साततत्त्व नौ पदार्थ पंचास्तिकाय इनका श्रद्धान इनके खरूपका ज्ञान और शुभ- क्रियाका आचरण यह व्यवहार मोक्षमार्ग है और निज सुद्ध आत्माका सम्यक् श्रद्धान खरूपका ज्ञान और खरूपका आचरण यह निश्चयमोक्षमार्ग है। साधनके विना सिद्धि नहीं होती इसलिये व्यवहारके विना निश्चयकी प्राप्ति नहीं होती । यह कथन सुनकर शिप्यने प्रश्न किया कि हे प्रभो निश्चयमोक्षमार्ग जो निश्चय रत्नत्रय वह तो निर्विकल्प है और व्यवहार रनत्रय विकल्प सहित है सो यह विकल्पदशा निर्विकल्पपनेकी साधन कैसे होसकती है इसकारण उसको साधक मत कहो । उसका समाधान करते हैं । जो अनादिकालका यह जीव विपय कपायोंकर मलीन होरहा है सो व्यवहारसाधनके विना उज्ज्वल नही होसकता जब मिथ्यात्व अवृत कपायादिककी क्षीणतासे देवगुरु धर्मकी श्रद्धा करै तत्त्वोंका जानपना होवै अशुभक्रिया मिट जावै तब गुरू वह अध्यात्मका अधिकारी होसकता है। जैसे मलिन कपडेको धोवें तव रंगने योग्य होता है विना धोये रंग नही लगता इसलिये परंपराय मोक्षका कारण व्यवहाररत्नत्रय कहा है । मोक्षका मार्ग दो प्रकार है एक व्यवहार दूसरा निश्चय, निश्चय तो साक्षात् मोक्षमार्ग है और व्यवहार परंपराय है । अथवा सविकल्प निर्विकल्पके भेदसे निश्चय मोक्षमार्ग भी दो प्रकारका है । जो मै अनंतज्ञानरूप हूं शुद्ध हूं एक हूं ऐसा 'सोह' का चितवन है वह तो स- विकल्प निश्चयमोक्षमार्ग है उसको साधक कहते हैं और जहांपर कुछ चितवन नही है कुछ बोलना नहीं है और कुछ चेष्टा नही है वह निर्विकल्पसमाधिरूप साध्य है यह तात्पर्य हुआ। इसी कथनके वारेमें द्रव्यसग्रहकी साख देते है। "मा चिट्ठह" इत्यादि । सारांश यह है कि हे जीव तू कुछ भी कायकी चेष्टा मत करै कुछ बोले भी मत - १४४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । होइ तह य अवियप्पं । सवियप्पं सासवयं निरासवं विगयसंकप्पं" ॥ १४० ॥ एवं पूर्वोक्त- एकोनविंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गप्रतिपादनरूपेण सूत्रत्रयं गतं । इदानीं चतुर्दशसूत्रपर्यतं व्यवहारमोक्षमार्गप्रथमावयवभूतव्यवहारसम्यक्त्वं मुख्यवृत्त्या प्रतिपादयति । तद्यथा,- व्वई जाणइं जह ठियइं, तह जगि मण्णइ जो जि । अप्पर केरउ भावडउ, अविचलु दसणु सो जि ॥१४१ ॥ द्रव्याणि जानाति यथास्थितानि तथा जगति मन्यते य एव । आत्मनः संबंधि भावः अविचलः दर्शनं स एव ॥ १४१ ॥ दन्वई इत्यादि । दम्बई द्रव्याणि जाणइं जानाति । कथंभूतानि । जहठियई यथास्थि- तानि वीतरागस्वसंवेदनलक्षणस्य निश्चयसम्यग्ज्ञानस्य परंपरया कारणभूतेन परमागमज्ञानेन परिछिनत्तीति । न केवलं परिछिनत्ति तह तथैव जगि इह जगति मण्णइ मन्यते निजा- मद्रव्यमेवोपादेयमिति रुचिरूपं यन्निश्चयसम्यक्त्वं तस्य परंपरया कारणभूतेन । “मूढत्रयं मदश्चाष्टौ तथानायतानि षट् । अष्टौ शंकादयश्चेति हग्दोषाः पंचविशतिः" || लोककथित- पंचविंशतिसम्यक्त्वमलत्यागेन श्रद्दधातीति । एवं द्रव्याणि जानाति श्रद्दधाति । कोसौ । अप्पहं केरउ भावडउ आत्मनः संबंधिभावः परिणामः । किविशिष्टो भावः । अविचल मौन रह और कुछ चितवन भी मतकरै । सब वातो को छोड आत्मामें आपको लीन कर, यह ही परमध्यान है । श्रीतत्त्वसारमें भी सविकल्प निर्विकल्प निश्चयमोक्ष. मार्ग के कथनमें यह गाथा कही है कि "जं पुण सगई" इत्यादि । इसका सारांश यह है कि जो आत्मतत्त्व है वह भी सविकल्प निर्विकल्पके भेदकर दो प्रकारका है जो विकल्पसहित है वह तो आस्रवसहित है और जो निर्विकल्प है वह आस्रव रहित है ।। १४०॥ इस तरह पहले महास्थलमें अनेक अंतर स्थलोंमेंसे उन्नीसदोहाओंके स्थलमें तीन, दोहाओंसे निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गका कथन किया । आगे चौदह दोहापर्यंत व्यवहारमोक्षमार्गका पहला अंग व्यवहारसम्यक्त्वको मुख्यतासे कहते हैं। [य एव] जो [द्रव्याणि ] द्रव्योंको [यथास्थितानि] जैसा उनका खरूप है वैसा [जानाति ] जानें [ तथा ] और उसी तरह [जगति ] इस जगतमें [ मन्यते ] निर्दोष श्रद्धान करै [ स एव ] वही [आत्मनः] आत्माका [निश्चलः संबंधिभावः] चलमलिनावगाढ दोषरहित निश्चल भाव है [स एव ] वही आत्मभाव [दर्शनं ] सम्यक् दर्शन है। भावार्थ-यह जगत् छहद्रव्यमयी है सो इन द्रव्योंको अच्छीतरह जानकर श्रद्धान करै जिसमें सदेह नही वह सम्यक् दर्शन है यह सम्य- परमात्मप्रकाशः। १४५ अविचलोपि चलमलिनावगाढदोपरहितः दंसणु दर्शनं सम्यक्तवं भवतीति । क एव । सो जि स एव पूर्वोक्तो जीवभाव इति । अयमत्र भावार्थः । इदमेव सम्यत्तवं चितामणि- रिदमेव कल्पवृक्ष इदमेव कामधेनुरिति मत्त्वा भोगाकांक्षास्वरूपादिसमस्तविकल्पजालं वर्जनीयमिति । तथा चोक्तं । "हस्ते चितामणिर्यस्य गृहे यस्य सुरद्रुमः । कामधेनुर्धनं यस्य तस्य का प्रार्थना परा" ॥ १४१ ।। अथ यैः पव्यैः सम्यक्त्वविपयभूतैत्रिभुवनं भृतं तिष्ठति तानीदृक् जानीहीत्यभिप्राय मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं कथयति, दवइ जाणहि ताहं छह, तिहुयणु भरियउ जेहिं । आइविणासविवन्जियहिं, णाणिहि पभणियएहिं ॥ १४२॥ ग्दर्शन आत्माका निज खभाव है । वीतरागनिर्विकल्प स्वसंवेदन निश्चयसम्यग्ज्ञान उसका परंपराय कारण जो परमागमका ज्ञान उससे अच्छीतरह जाने और मनमें मानें यह निश्चय करे कि इन सव द्रव्योंमें निज आत्मद्रव्य ही ध्यावने योग्य है ऐसी रुचिरूप जो निश्चयसम्यक्त्व है उसका परंपराय कारण व्यवहारसम्यक्त्व देव गुरु धर्मकी श्रद्धा उसे स्वीकार करै । व्यवहारसम्यक्त्वके पच्चीसदोप है उनको छोडै । उन पच्चीसोंको "मूढ- त्रयं" इत्यादि श्लोकमें कहा है। इसका अर्थ ऐसा है कि जहा देव कुदेवका विचार नही है वह तो देवमूढ, जहा सुगुरु कुगुरुका विचार नही है वह गुरुमूढ, जहां धर्म कुधर्मका विचार नहीं है वह धर्ममृढ ये तीन मूढता; और जातिमद कुलमद धनमद रूपमद तपमद वलमद विद्यामद राजमद ये आठमद; कुगुरु कुदेव कुधर्म इनकी और इनके आराधकोंकी जो प्रशंसा वह छह अनायतन और निःशंकितादि आठ अंगोंसे विपरीत शंका काक्षा विचिकित्सा मूढता परदोपकथन अथिरकरण साधर्मियोंसे स्नेह नहीं रखना और जिनधर्मकी प्रभावना नही करना ये शंकादि आठ मल इस प्रकार सम्यग्दर्शनके पच्चीस दोप है । इन दोषोंको छोडकर तत्त्वों की श्रद्धा करै वह व्यवहार सम्यग्दर्शन कहाजाता है । जहां अस्थिर बुद्धि नही है और परिणामोंकी मलिनता नहीं और शिथिलता नही वह सम्यक्त्व है। यह सम्यग्दर्शन ही कल्पवृक्ष कामधेनु चिंतामणि है ऐसा जानकर भोगोंकी वाछारूप जो सब विकल्प उनको छोड़कर सम्यक्त्वका ग्रहण करना चाहिये । ऐसा कहा है "हस्ते" इत्यादि । जिसके हाथमें चिंतामणि है धनमें कामधेनु जिसके घरमें कल्पवृक्ष है उसके अन्य क्या प्रार्थनाकी आवश्यकता है कल्पवृक्ष कामधेनु चिंतामणि तो कहने मात्र है सम्यक्त्व ही कल्पवृक्ष कामधेनु चिंतामणि है यह जानना ॥ १४१ ॥ , 4 sn १९ ४ , , १४६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । द्रव्याणि जानीहि तानि पट् त्रिभुवनं भृतं यैः । आदिविनाशविवर्जितैः ज्ञानिभिः प्रभणितैः ॥ १४२ ॥ दव्वई इत्यादि । दव्वई द्रव्याणि जाणहि जानीहि त्वं हे प्रभाकरभट्ट ताइ तानि परमागमप्रसिद्धानि। कतिसंख्योपेतानि । छहं पडेव । यैः द्रव्यैः किं कृतं । तिहुयणु भरियउ त्रिभुवनं भृतं जेहिं यैः कर्तृभूतैः । पुनरपि किंविशिष्टैः । आइविणासविवन्जियहि द्रव्यार्थिकनयेनादिविनाशविवर्जितैः । पुनरपि कथंभूतैः । णाणिहि पभणियएहिं ज्ञानिभिः प्रभणितैः कथितैश्चेति । अयमत्राभिप्रायः। एतैः पद्रिव्यैर्निप्पन्नोऽयं लोको नचान्यः कोपि लोकस्य हर्ता कर्ता रक्षको वास्तीति । किं च । यद्यपि पड्व्याणि व्यवहा- रसम्यक्त्वविषयभूतानि भवंति तथापि शुद्धनिश्चयेन शुद्धात्मानुभूतिरूपस्य वीतरागसम्य- क्त्वस्य नित्यानंदैकस्वभावो निजशुद्धात्मैव विपयो भवतीति ॥ १४२ ॥ अथ तेषामेव षड्व्याणां संज्ञां चेतनाचेतनविभागं च कथयति,- जीउ सचेयणु चु मुणि, पंच अचेयण अण्ण । पुग्गल धम्माहम्मु णहु, काले सहिया भिण्ण ॥ १४३ ॥ जीवः सचेतनं द्रव्यं मन्यख पंच अचेतनानि अन्यानि । पुद्गलः धर्माधर्मों नभः कालेन सहितानि भिन्नानि ।। १४३ ॥ जीउ इत्यादि । जीउ सचेयणु दव्यु चिदानंदैकस्वभावो जीवश्चेतनाद्रव्यं भवति मुणि मन्यत्र जानीहि त्वं पंच अचेयण पंचाचेतनानि अण्ण जीवादन्यानि । तानि कानि । पोग्गल धम्माहम्मु णहु पुद्गलधर्माधर्मनभांसि । कथंभूतानि तानि । काले सहिया आगे सम्यक्त्वके कारण जो छह द्रव्य है उनसे यह तीनलोक भरा हुआ है उनको यथार्थ जानो ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर यह गाथासूत्र कहते हैं;-हे प्रभाकर भट्ट तू [तानि षद्रव्याणि ] उन छहों द्रव्यों को [जानीहि ] जान कि [यै] जिन द्रव्योंसे [त्रिभुवनं भृतं ] यह तीनलोक भररहा है वे छह द्रव्य [ज्ञानिभिः ] ज्ञानियोंने [आ- दिविनाशविवर्जितैः ] आदि अंतकर रहित द्रव्यार्थिकनयसे [प्रभणितैः] कहे है । भावार्थ-यह लोक छह द्रव्योंसे भरा है अनादि निधन है इस लोकका आदि अंत नही है तथा इसका कर्ता हर्ता व रक्षक कोई नही है । यद्यपि ये छह द्रव्य व्यवहार सम्यक्त्वके कारण है तो भी शुद्ध निश्चयनयकर शुद्धात्मानुभूतिरूप वीतरागसम्यक्त्वका कारण नित्य आनंद खभाव निजशुद्धात्मा ही है ॥ १४२ ॥ आगे उन छह द्रव्योंके नाम कहते है; हे शिष्य तू [जीवः सचेतनद्रव्यं] जीव चेतनद्रव्य है ऐसा [ मन्यख ] जान [अन्यानि ] और वाकी [पुद्गल धर्माधमौ] पुद्गल धर्म अधर्म [नभः] आकाश [ कालेन सहिता] और काल सहित जो [पंच] परमात्मप्रकाशः। १४७ कालद्रव्येण सहितानि । पुनरपि कथंभूतानि । भिण्ण खकीयस्वकीयलक्षणेन परस्परमि- मानि इति । तथाहि । द्विधा सम्यक्त्वं भण्यते सरागवीतरागभेदेन । सरागसम्यक्त्वलक्षणं कथ्यते । प्रशमसंवेगानुकंपास्तिक्यामिव्यक्तिलक्षणं सरागसम्यक्त्वं भण्यते तदेव व्यवहारस- म्यक्त्वमिति तस्य विषयभूतानि पड्द्रव्याणीति । वीतरागसम्यक्त्वं निजशुद्धात्मानुभूतिलक्षणं वीतरागचारित्राविनाभूतं तदेव निश्चयसम्यक्त्वमिति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । निजशुद्धात्मै- वोपादेय इति रुचिरूपं निश्चयसम्यक्त्वं भवतीति बहुधा व्याख्यातं पूर्व भवद्भिः इदानीं पुनः वीतरागचारित्राविनाभूतं निश्चयसम्यक्त्वं व्याख्यातमिति पूर्वापरविरोधः । कस्मादि- तिचेत् । निजशुद्धात्मैवोपादेय इति रुचिरूपं निश्चयसम्यक्त्वं गृहस्थावस्थायां तीर्थकरपरमदेव- भरतसगररामपांडवादीनां विद्यते न च तेषां वीतरागचारित्रमस्तीति परस्परविरोधः अस्ति चेत्तर्हि तेपामसंयतत्वं कथमिति पूर्वपक्षः । तत्र परिहारमाह । तेषां शुद्धात्मोपादेयभावना- रूपं निश्चयसम्यक्त्वं विद्यते पर किंतु चारित्रमोहोदयेन स्थिरता नास्ति व्रतप्रतिज्ञाभंगो भवतीति तेन कारणेनासंयता वा भण्यते । शुद्धात्मभावनाच्युताः संतः भरतादयो निर्दोषि- she . पाच है वे [अचेतनानि ] अचेतन है और [अन्यानि ] जीवसे भिन्न है तथा ये सब [भिन्नानि ] अपने २ लक्षणोंसे आपसमें भिन्न (जुदे२ ) है, काल सहित छह द्रव्य कालके विना पांच अस्तिकाय है । भावार्थ-सम्यक्त्व दो प्रकारका है एक सराग- सम्यक्त्व दूसरा वीतरागसम्यक्त्व, सरागसम्यक्त्वका लक्षण कहते है । प्रशम अर्थात् सातिपना, संवेग अर्थात् जिनधर्मकी रुचि तथा जगतसे अरुचि, अनुकंपा परजीवोंको दुखी देखकर दया भाव और आस्तिक्य अर्थात् देव गुरु धर्मकी तथा छह द्रव्योंकी श्रद्धा ये चारोंका होना वह व्यवहारसम्यक्त्वरूप सरागसम्यक्त्व है। और वीतराग- सम्यक्त्व जो निश्चयसम्यक्त्व वह निजशुद्धात्मानुभूतिरूप वीतरागचारित्रसे तन्मयी है। यह कथन सुनकर प्रभाकर भट्टने प्रश्न किया । हे प्रभो निजशुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसी रुचिरूप निश्चय सम्यक्त्व का कथन पहले तुमने अनेकवार किया फिर अब वीतरा- गचारित्रसे तन्मयी निश्चयसम्यक्त्व है यह व्याख्यान करते है यह तो पूर्वापर विरोध है । क्योंकि जो निजशुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसी रुचिरूप निश्चयसम्यक्त्व तो गृहस्थ अवस्थामें तीर्थकर परमदेव भरतचक्रवर्ती सगरचक्रवर्ती और रामपाडवादिक बड़े २ पुरु- पोंके रहता है लेकिन उनके वीतरागचारित्र नही है । यही परस्पर विरोध है । यदि उनके वीतरागचारित्र माना जावे तो गृहस्थपना क्यों कहा । यह प्रश्न किया। उसका उत्तर श्रीगुरु कहते हैं। उन महान (बड़े ) पुरुषोंके शुद्धामा उपादेय है ऐसी भावना रूप निश्चय सम्यक्त्व तो है परंतु चारित्रमोहके उदयसे थिरता नहीं है । जबतक महाव्रतका उदय नहीं है तबतक असयमी कहलाते हैं शुद्धात्माकी अखंड भावनासे रहित हुए भरत रायचंद्रजैनशास्तमालायाम् । परमात्मनामर्हत्सिद्धानां गुणस्तववस्तुस्तवरूपस्तवनादिकं कुर्वति । तच्चरितपुराणादिकं च समाकर्णति तदाराधकपुरुषाणामाचार्योपाध्यायसाधूनां विषयकपायदुर्ध्यानवंचनार्थ संसार- स्थितिछेदनाथै च दानपूजादिकं कुर्वति तेन कारणेन शुभरागयोगान् सरागसन्चन्दृष्टयो भवंति । या पुनस्तेषां सम्यक्त्वस्य निश्चयसम्यक्त्वसंज्ञा वीतरागचारित्राविनाभूतस्य निश्चयसम्यक्त्वस्य परंपरया साधकत्वादिति । वस्तुवृत्त्या तु तत्सम्यम्त्वं सरागसत्यत्वाख्यं व्यवहारसम्यक्त्वमेवेति भावार्थः ।। १४३ ।। अधानंतरं सूत्रचतुष्टयेन जीवादिषड्व्याणां क्रमेण प्रत्येकं लक्षणं कथ्यते;- मुत्तिविहूणउ णाणमउ, परमाणंदसहाउ । णियमि जोड्य अप्पु मुणि, णिचु णिरंजणु भाउ ॥ १४४॥ मूर्तिविहीनः ज्ञानमयः परमानंदखभावः । नियमेन योगिन् आत्मानं मन्यत्र नित्यं निरंजनं भावम् ॥ १४४ ॥ मुत्तिविहूणउ इत्यादि । मुत्तिविहूणउ अमूर्तशुद्धात्मनो विलक्षणया परसगंधवर्णवत्या मूर्त्या विहीनत्वात् मूर्तिविहीनः णाणमउ क्रमकरणव्यवधानरहितेन लोकालोकप्रकाशन केवलजानेन निवृत्तत्वात् ज्ञानमयः परमाणंदसहाउ वीतरागपरमानंदैकरूपसुखामृतरसा- स्वादेन समरसीभावपरिणतत्वरूपत्वात् परमानंदस्वभावः णियमि शुद्धनिश्चयेन जोइय हे योगिन् अप्पु तमित्थंभूतमात्मानं मुणि मन्यत्र जानीहि त्वं । पुनरपि किंविशिष्टं जानीहि । णिचु शुद्धद्व्यार्थिकनयेन टंकोत्कीर्णजायकैकखभावत्वान्नित्यं । पुनरपि कि सगर राघव पांडवादिका निर्दोष परमात्मा अरहंत सिद्धोंके गुणस्तवन वस्तुस्तवन रूप स्तोत्रादि करते हैं और उनके चारित्रपुराणादिक सुनते है तथा उनकी आज्ञाके आराधक जो महान पुरुष आचार्य उपाध्याय साधु उनको भक्तिसे आहारदानादि करते हैं पूजा करते हैं। विषय कषाय रूप खोटे ध्यानके रोकनेके लिये तथा संसारकी स्थितिके नाश करनेके लिये ऐसी शुभक्रिया करते हैं । इसलिये शुभरागके संबंधसे सम्यग्दृष्टि हैं और इनके निश्चय सम्यक्त्व भी कहा जासकता है क्योंकि वीतरागचारित्रसे तन्मई निश्चय सम्यक्त्वके परंपराय साधकपना है । अब वास्तवमें (असलमें) विचारा जावे तो गृहस्थ अवस्थामें इनके सरागसम्यक्त्र ही है और जो सरागसम्यक्त्व है वह व्यवहार ही है ऐसा जानो ॥ १४३ ॥ आगे चार दोहाओंसे छह द्रव्योंके क्रमसे हर एकके लक्षण कहते हैं;-योगिन् ] हे योगी [ नियमेन ] निश्चय करके [आत्मानं ] तू आत्माको ऐसा [मन्यख ] जान । कैसा है आत्मा [ मूर्तिविहीनः] मूर्तिसे रहित है [ज्ञानमयः] ज्ञानमई है [ परमा- नंदस्वभावः] परमानंदस्वभाववाला है [ निलं] नित्य है [निरंजनं ] निरंजन है परमात्मप्रकाशः। १४९ -- विशिष्टं । णिरंजणु मिथ्यात्वरागादिरूपांजनरहितत्वान्निरंजनं । पुनश्च कथंभूतमात्मानं जानीहि । भाउ भावं विशिष्टपदार्थ इति । अत्रैवं गुणविशिष्टः शुद्धात्मैवोपादेय अन्यद्धे- यमिति तात्पर्यार्थः ॥ १४४ ॥ अथ,- पुग्गल छविहु मुत्तु वढ, इयर अमुत्तु वियाणि । धम्माधम्मुवि गइठियहिं, कारणु पभणहिं णाणि ॥१४५ ॥ पुद्गलः पशिधः मूर्तः वत्स इतराणि अमूर्तानि विजानीहि । धर्माधर्ममपि गतिस्थित्योः कारणं प्रभणंति ज्ञानिनः ॥ १४५ ॥ पुग्गलु इत्यादि । पुग्गल पुद्गलद्रव्यं छब्बिहु पड्डिधं । तथा चोक्तं । "पुढवी जलं च छाया चउरिदियविसय कम्मपाउग्गा । कम्मातीदा एवं छन्भेया पुग्गला होति" । एवं तत्कथं भवति । मुत्तु स्पर्शरसगंधवर्णवती मूर्तिरिति वचनान्मूर्त वढ वत्स पुत्र इयर इतराणि पुद्गलात् शेपव्याणि अमुत्त स्पर्शाद्यभावादमूर्तानि वियाणि विजा- नीहि त्वं धम्माधम्मुवि धर्माधर्मद्वयमपि गइठियहिं गतिस्थित्योः कारणु कारणं निमित्तं पभणहिं प्रभणंति कथयति । के कथयति । णाणि वीतरागस्वसंवेदनज्ञानिनः इति । अत्र द्रष्टव्यं । यद्यपि वज्रवृपभनाराचसंहननरूपेण पुद्गलद्रव्यं मुक्तिगमनकाले सहका- , [भावं ] ऐसा जीवपदार्थ है । भावार्थ-यह आत्मा, अमूर्तीक शुद्धात्मासे भिन्न जो स्पर्श रसगंधवर्णवाली मूर्ति उससे रहित है, लोक अलोकका प्रकाश करनेवाले केवल- ज्ञानकर पूर्ण है जो कि केवलज्ञान सव पदार्थोंको एक समयमें प्रत्यक्ष जानता है आगे पीछे नहीं जानता, वीतरागभाव परमानंदरूप अतीद्रियसुखखरूप अमृतके रसके खादसे समरसी भावको परिणत हुआ है ऐसा हे योगी शुद्धनिश्चयसे अपने आत्माको ऐसा समझ शुद्धद्रव्यार्थिकनयसे विना टाकीका धड्या हुआ सुघटघाट ज्ञायक खभाव नित्य है । तथा मिथ्यात्वरागादिरूप अंजनसे रहित निरंजन है । ऐसे आत्माको तू भली भाति जान सब पदार्थोंमे उत्कृष्ट है । इन गुणोंसे मंडित शुद्ध आत्मा ही उपादेय है और सब तजने योग्य हैं ॥ १४४ ॥ आगे फिर भी कहते हैं;-[हे वत्स ] हे वत्स तू [पुद्गलः ] पुद्गलद्रव्य [षड्विधः] छै प्रकार तथा [ मूर्तः] मूर्तीक है [ इतराणि ] अन्य सब द्रव्य [अमूर्तानि ] अमूर्त है ऐसा [विजानीहि ] जान [धर्माधर्ममपि ] धर्म और अधर्म इन दोनों द्रव्योंको [गतिस्थित्योः कारणं] गति स्थितिका सहायककारण [ ज्ञानिनः ] केवली श्रुतकेवली [प्रभणंति ] कहते हैं । भावार्थ- पुद्गल द्रव्यके छह भेद दूसरी जगह भी "पुढवी जलं" इत्यादि गाथासे कहे हैं। उसका अर्थ यह है कि बादर बादर १ बादर २ बाद- १५० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । रिकारणं भवति तथापि धर्मद्रव्यं च गतिसहकारिकारणं भवति, अधर्मद्रव्यं च लोकाने स्थितस्य स्थितिसहकारिकारणं भवति । यद्यपि मुक्तात्मप्रदेशमध्ये परस्परैकक्षेत्रावगाहेन तिष्टंति तथापि निश्चयेन विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावपरमात्मनः सकाशाद्भिन्नस्वरूपेण मुक्ती तिष्ठति । तथात्र संसारे चेतनाकारणानि हेयानीति भावार्थः ॥ १४५ ।। अथ,- व्वई सयलई वरि ठियई, णियाम जालु वसंति । तं णहु व्वु वियाणि तुहुं, जिणवर एउ भणंति ॥ १४६ ॥ द्रव्याणि सकलानि उदरे स्थितानि नियमेन यस्य वसंति । तत् नभः द्रव्यं विजानीहि त्वं जिनवरा एतद् भणंति ॥ १४६ ॥ दबइ द्रव्याणि । कतिसंख्योपेतानि । सयलई समस्तानि उवरि उदरे ठियई स्थितानि णियमें निश्चयेन जासु यस्य वसंति आधाराधेयभावेन तिष्ठति तं तत् णहु दन्बु नभ रसूक्ष्म ३ सूक्ष्मबादर ४ सूक्ष्म ५ सूक्ष्मसूक्ष्म ६ ये छह भेद पुद्गलके हैं। उनमेंसे पत्थर काठ तृण आदि पृथ्वी वादर वादर है टुकड़े होकर नहीं जुड़ते, जल घी तैल आदि वादर हैं जो टूटकर मिल जाते हैं, छाया आतप चांदनी ए वादर सूक्ष्म है जो कि देखने में तो वादर और ग्रहण करनेमें सूक्ष्म है, नेत्रको छोडकर चार इंद्रियोंके विषय रसगंधादि सूक्ष्म वादर हैं जो कि देखनेमें नहीं आते और ग्रहण करनेमें आते हैं, कर्मवर्गणा सूक्ष्म हैं जो अनंत मिली हुई हैं परंतु दृष्टिमें नहीं आती और सूक्ष्मसूक्ष्म परमाणु है जिसका दूसरा भाग नहीं होता । इस तरह छह भेद हैं। इन छहोंतरहके पुद्गलोंको तू अपने स्वरूपसे जुदे समझ । यह पुद्गलद्रव्य स्पर्शरस गंध वर्णको धारण करता है इसलिये मूर्तीक है अन्य धर्म अधर्म दोनों गति तथा स्थितिके कारण है ऐसा वीतरागदेवने कहा है । यहांपर एक बात देखनेकी है कि यद्यपि वज्रवृषभनाराचसहननरूप पुद्गलद्रव्य मोक्षके गमनका सहायक है इसके विना मुक्ति नहीं होसकती तौमी धर्मद्रव्य गति सहाई है इसके विना सिद्धलोकको जाना नहीं होसकता तथा अधर्मद्रव्य सिद्धलोकमें स्थितिका सहाई है। लोकशिखरपर आकागके प्रदेश अवकाशमें सहाई हैं। अनंते सिद्ध अपने खभावमें ही ठहरे हुए हैं परद्रव्यका कुछप्रयोजन नहीं है। यद्यपि मुक्तात्माओंके प्रदेश आपसमें एक- जगह हैं तौभी विशुद्धज्ञान दर्शन भाव भगवान सिद्धक्षेत्रमें भिन्न भिन्न स्थित हैं कोई सिद्ध किसी सिद्धसे प्रदेशोंकर मिला हुआ नहीं है । पुद्गलादि पांचो द्रव्य जीवको यद्यपि निमित्त कारण कहे गये हैं तौभी उपादान कारण नहीं है ऐसा सारांश हुआ ॥ १४५ ॥ आगे आकाशका वरूप कहते हैं;-[यस्य ] जिसके [ उदरे] अंदर [ सकलानि द्रव्याणि] सब द्रव्ये [स्थितानि ] स्थित हुई [ नियमेन वसंति] निश्चयसे आधार .. - परमात्मप्रकाशः। १५१ आकाशद्रव्यं वियाणि विजानीहि तुहुं त्वं हे प्रभाकरभट्ट जिणवर जिनवराः वीतराग- सर्वज्ञाः एउ भणंति एतद्भणंति कथयंतीति । अयमत्र तात्पर्यार्थः । यद्यपि परस्परैकक्षेत्रा- वगाहेन तिष्ठत्याकाशं तथापि साक्षादुपादेयभूतादनंतसुखस्वरूपात्परमात्मनः सकाशादत्यंत- भिन्नत्वाद्धेयमिति ॥ १४६ ॥ अथ,- काल मुणिजहि दव्यु तुहुं, वणलक्खणु एउ । रयणहं रासि विभिण्ण जिम, तसु अणुअहं तह भेउ ॥१४७॥ कालं मन्यख द्रव्यं त्वं वर्तनालक्षणं एतत् । रत्नानां राशिः विभिन्नः यथा तस्य अणूनां तथा भेदः ॥ १४७ ॥ कालु इत्यादि । कालु कालं मुणिजहि मन्यस्व जानीहि । किं जानीहि । दव्यु कालसंज्ञं द्रव्यं । कथंभूतं । वट्टणलक्खणु वर्तनालक्षणं स्वयमेव परिणममानानां द्रव्याणां वहिरंगसहकारिकारणं । किंवदिति चेत् । कुंभकारचक्रस्याधस्तनशिलावदिति एउ एतत् प्रत्यक्षीभूतं तस्य कालद्रव्यस्यासंख्येयप्रमितस्य परस्परभेदविपये दृष्टांतमाह । रयणहं रासि रत्नानां राशिः । कथंभूतः । विभिन्नः विशेपेण स्वरूपव्यवधानेन भिन्नः तसु तस्य कालद्र- व्यस्य अणुअहं अणूनां कालाणूनां तह तथा भेउ भेदः इति । अत्राह शिष्यः । समय एव निश्चयकालः अन्यन्निश्चयकालसंजं कालद्रव्यं नास्ति । अत्र परिहारमाह । समयस्तावत्प- आधेयरूप होकर रहती हैं [ तत् ] उसको [त्वं] तू [नभो द्रव्यं ] आकाशद्रव्य [विजानीहि ] जान [एतत् ] ऐसा [जिनवराः] जिनेंद्रदेव [भणंति ] कहते हैं। लोकाकाश आधार है अन्य सब द्रव्य आधेय हैं । भावार्थ-यद्यपि ये सब द्रव्य आका- शमें परस्पर एक क्षेत्रावगाहसे ठहरी हुई हैं तौभी आत्मासे अत्यंत भिन्न हैं इसलिये त्यागने योग्य हैं और आत्मा साक्षात् आराधने योग्य है अनंतसुखखरूप है ॥ १४६ ॥ आगे कालद्रव्यका व्याख्यान करते हैं;-[त्वं ] हे भव्य तू [एतत् ] इस प्रत्यक्षरूप [वर्तनालक्षणं] वर्तनालक्षणवालेको [ कालं ] कालद्रव्य [मन्यख ] जान अर्थात् अपने आप परिणमते हुए द्रव्योंको कुम्हारके चक्रकी नीचेकी सिलाकी तरह बहिरंग सहकारी कारण है यह कालद्रव्य असख्यात प्रदेश प्रमाण है [ यथा ] जैसे [ रत्नानां राशिः] रनोंकी राशि [ विभिन्नः ] जुदे रूप है सब रत्न जुदे २ रहते हैं मिलते नही हैं [तथा] उसीतरह [तस्य ] उसकालके [अणूनां ] कालकी अणुओंका [भेदः] भेद है एक कालाणूसे दूसरी कालाणू नही मिलता । यहापर शिष्यने प्रश्न किया कि समय ही निश्चय- काल है अन्य निश्चयकाल नामवाला काल द्रव्य नही है उसका श्रीगुरु समाधान करते हैं। समय है वह कालद्रव्यकी पर्याय है क्योंकि विनाशको पाता है। ऐसा ही श्रीपंचास्ति-

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१५२
रायचंद्जैनशासमालायाम् ।
र्यायः । कस्मात् । विनश्वरत्वात् । तथा चोक्तं समयस्य विनश्वरत्वं । "समओ उापण्णप-
द्धंसी" इति । स च पर्यायो द्रव्यं विना न भवति । कस्य द्रव्यस्य भवतीति विचार्यते ।
यदि पुद्गलद्रव्यस्य पर्यायो भवति तर्हि पुद्गलपरमाणुपिंडनिष्पन्नघटादयो यथा मूर्ता भवंति
तथा अणोरण्वंतरव्यक्तिक्रमणाजातः समयः, चक्षुःसंपुटविघटनाज्जातो निमिपः, जलभा-
जनहस्तादिव्यापाराजाता घटिका आदित्यविवदर्शनाज्जातो दिवसः, इत्यादि कालपर्याया
मूर्ता दृष्टिविषया प्राग्भवंति । कस्मात् । पुद्गलद्रव्योपादानकारणजातत्वात् घटादिवत् इति ।
तथा चोक्तं । उपादानकारणसदृशं कार्य भवति मृत्पिडाद्युपादानकारणजनितघटादिवदेव
न च तथा समयनि मिषघटिकादिवसादिकालपर्याया मूर्ता दृश्यते । यैः पुनः पुद्गलपरमाणु-
मंदगतिगमननयनपुटविघटनजलभाजनहस्तादिव्यापारदिनकरविवगमनादिमिः पुद्गलपर्या-
यभूतैः क्रियाविशेषैः समयादिकालपर्यायाः परिच्छिद्यते । ते चाणुव्यतिक्रमणादयः तेपामेव
समयादिकालपर्यायाणां व्यक्तिनिमित्तत्वेन बहिरंगसहकारिकारणभूता एव ज्ञातव्याः । न
चोपादानकारणभूता घटोत्पत्तौ कुंभकारचक्रचीवरादिवत् । तस्माद् ज्ञायते तत्कालद्रव्यम-
मूर्तमविनश्वरमस्तीति तस्य तत्पर्यायाः समयनिमेपादय इति । अत्रेदं तु कालद्रव्यं सर्वप्र-
कारोपादेयभूतात् शुद्धबुद्धैकस्वभावाज्जीवद्रव्याद्भिन्नत्वाद्धेयमिति तात्पर्यार्थः ।। १४७ ।।
कायमें कहा है "समओ उप्पण्णपद्धंसी" अर्थात् समय उत्पन्न होता है नाश होता है
इससे जानते हैं कि समय पर्याय है पर्याय द्रव्यके विना हो नहीं सकता । किस द्रव्यका
पर्याय है इसपर अब विचार करना चाहिये । यदि पुद्गलद्रव्यकी पर्याय मानी जावे तो
जैसे पुद्गलपरमाणुओंसे उत्पन्न हुए घटादि मूर्तीक हैं वैसे समयभी मूर्तीक होना चाहिये
परंतु समय अमूर्तीक है इसलिये पुद्गलकी पर्याय तो नही है । पुद्गलपरमाणु आकाशके
एक प्रदेशसे दूसरे प्रदेशको जव गमनकरता है तव समय होता है सो समय पर्याय
कालकी है पुद्गलपरमाणुके निमित्तसे होती है, नेत्रोंका मिलना तथा विघटना उससे
निमेष होता है, जलपात्र तथा हस्तादिकके व्यापारसे घटिका होती है और सूर्य विंबके
उदयसे दिन होता है इत्यादि कालकी पर्याय हैं पुद्गलद्रव्यके निमित्तसे होती हैं पुद्गल
इन पर्यायोंका मूलकारण नही है मूलकारण काल है। जो पुद्गल मूलकारण होता तो सम-
यादिक मूर्तीक होते । जैसे मूर्तीक मट्टीके डेलेसे उत्पन्न घड़े वगैरः मूर्तीक होते हैं वैसे
समयादिक मूर्तीक नही हैं । इसलिये अमूर्तद्रव्य जो काल उसकी पर्याय हैं द्रव्य नही हैं
कालद्रव्य अणुरूप अमूर्तीक अविनश्वर है और समयादिक पर्याय अमूर्तीक हैं परंतु
विनश्वर हैं अविनश्वरपना द्रव्यमें ही है पर्यायमें नही है यह निश्चयसे जानना । इसलिये
समयादिकको कालद्रव्यकी पर्याय ही कहना चाहिये पुद्गलकी पर्याय नही हैं पुद्गलपर्याय
मूर्तीक है। सर्वथा उपादेय शुद्धबुद्धकेवलखभाव जो जीव उससे भिन्न कालद्रव्य है इस-
लिये हेय है ऐसा सारांश हुआ ॥ १४७ ॥

.. परमात्मप्रकाशः। १५३ अथ जीवपुगलकालद्रव्याणि मुक्त्वा शेषधर्माधर्माकाशान्येकद्रव्याणीति निरूपयति,- जीउवि पुग्गलु काल जिय, ए मेल्लेविणु व्व । इयर अखंड वियाणि तुहु, अप्पपएसहिं सव्व ॥ १४८ ॥ जीवोपि पुद्गलः कालः जीव एतानि मुक्त्वा द्रव्याणि । इतराणि अखंडानि विजानीहि त्वं आत्मप्रदेशैः सर्वाणि ॥ १८ ॥ जीउवि इत्यादि । जीउवि जीवोपि पुग्गल पुद्गलः कालु कालः जिय हे जीव ए मेल्लेविणु एतानि मुक्त्वा दब द्रव्याणि इयर इतराणि धर्माधर्माकाशानि अखंड असंडदव्याणि वियाणि विजानीहि तुहुं त्वं हे प्रभाकरभट्ट । कैः कृत्वाखंडानि विजानीहि । अप्पपएसहिं आसप्रदेशैः । कतिसंख्योपेतानि । सन्न सर्वाणि इति । तथाहि । जीवद्र- व्याणि पृथक् पृथक् जीवद्रव्यगणनेनानंतसंख्यानि पुद्गलद्रव्याणि तेभ्योप्यनंतगुणानि भवंति । धर्माधर्मामाशानि पुनरेकद्रव्याण्येवेति । अत्र जीवद्रव्यमेवोपादेयं तत्रापि यद्यपि शुद्धनिश्चयेन शक्त्यपेक्षया सर्वे जीवा उपादेयास्तथापि व्यत्यपेक्षया पंचपरमेष्ठिन एव तेप्वपि मध्ये विशेषेणाईत्सिद्धा एव तयोरपि मध्ये सिद्धा एव परमार्थेन तु मिथ्या- त्वरागादिविभावपरिणामनिवृत्तिकाले स्वशुद्धात्मैवोपादेय इत्युपादेयपरंपरया ज्ञातव्येति भावार्थः ॥ १४८॥ आगे जीव पुद्गल काल ये तीन द्रव्य अनेक है और धर्म अधर्म आकाश ये तीन द्रव्य एक हैं ऐसा कहते हैं-[हे जीव ] हे जीव [त्वं] तू [जीवः अपि ] जीव और [पुद्गलः ] पुद्गल [काल:] काल [एतानि द्रव्याणि ] इन तीन द्रव्योको [ मुक्वा] छोड़कर [इतराणि ] दूसरी धर्म अधर्म आकाश [ सर्वाणि ] ये सब तीन द्रव्य [आत्म- प्रदेशैः] अपने प्रदेशोंसे [अखंडानि ] अखंडित हैं । भावार्थ-जीवद्रव्य जुदे २ जीवोंकी गणनासे अनंत हैं पुद्गलद्रव्य उससे भी अनतगुणे हैं कालद्रव्याणू असंख्यात हैं धर्मद्रव्य एक है वह लोकव्यापी है अधर्मद्रव्य भी एक है लोकव्यापी है ये दोनों द्रव्य असख्यात प्रदेशी हैं और आकाशद्रव्य अलोक अपेक्षा अनंत प्रदेशी है तथा लोक अपेक्षा असंख्यात प्रदेशी हैं। ये सब द्रव्य अपने २ प्रदेशोकर सहित हैं किसीके प्रदेश किसीसे नही मिलते । इन छहों द्रव्योंमे जीव ही उपादेय है । यद्यपि शुद्धनिश्चयसे शक्तिकी अपेक्षा सभी जीव उपादेय है तौभी व्यक्तिकी अपेक्षा पंच परमेष्टी ही उपादेय हैं उनमें भी अरहंतसिद्ध ही है उन दोनोंमें भी सिद्ध ही है और निश्चयनयकर मिथ्या- त्वरागादिविभावपरिणामके अभाव में विशुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसा जानना ॥ १४८ ॥ २० १५४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथ जीवपुद्गलौ सक्रियौ धर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि निःक्रियाणीति प्रतिपादयति;- व्व चयारिवि इयर जिय, गमणागमणविहीण । जीउवि पुग्गलु परिहरिवि, पभणहिं णाणिपवीण ॥१४९ ।। द्रव्याणि चत्वारि एव इतराणि जीव गमनागमनविहीनानि । जीवोपि पुद्गलः परिहृत्य प्रभणंति ज्ञानिप्रवीणाः ॥ १४९ ॥ दैव्व इत्यादि । दव्य द्रव्याणि । कतिसंख्योपेतानि एव । चयारिवि चत्वार्येव इयर जीवपुद्गलाभ्यामितराणि जिय हे जीव । कथंभूतान्येतानि । गमणागमणविहीण गमना- गमनविहीनानि निःक्रियाणि चलनक्रियाविहीनानि । किंकृत्वा । जीउवि पुग्गलु परिह- रिवि जीवपुद्गलौ परिहृत्य पभणहिं एवं प्रभणंति कथयति । के ते । णाणिपवीण भेदा- भेदरत्नत्रयाराधकाविवेकिन इत्यर्थः । तथाहि । जीवानां संसारावस्थायां गतेः सहकारि- कारणभूताः कर्मनोकर्मपुद्गलाः कर्मनोकर्माभावात्सिद्धानां निःक्रियत्वं भवति पुद्गलस्कंदानां तुं कालाणुरूपं कालद्रव्यं गतेर्वहिरंगनिमित्तं भवति । अनेन किमुक्तं भवति । अविभागि- व्यवहारकालसमयोत्पत्तौ मंदगतिपरिणतपुद्गलपरमाणुः घटोत्पत्तौ कुंभकारवद्वहिरंगनिमित्तेन व्यंजको व्यक्तिकारको भवति । कालद्रव्यं तु मृत्पिडवदुपादानकारणं भवति । तस्य तु पुद्रल- आगे जीव पुद्गल ये दोनों चलनहलनादि क्रिया युक्त हैं और धर्म अधर्म आकाश काल ये चारों निःक्रिय हैं ऐसा निरूपण करते है;-[हे जीव] हे हंस [ जीवः अपि पुद्गलः] जीव और पुद्गल इन दोनोंको [परिहत्य] छोड़कर [इतराणि] दूसरी [चत्वारि एव द्रव्याणि ] धर्मादि चारों ही द्रव्य [गमनागमनविहीनानि] चरुन हलनादि क्रिया रहित हैं जीव पुद्गल क्रियावंत है गमनागमन करते है ऐसा [ज्ञानिप्रवीणाः ] ज्ञानियोंमें चतुर रत्नत्रयके धारक केवली श्रुतकेवली [प्रभणंति] कहते हैं । भावार्थ-जीवोंके संसार अवस्थामें इस गतिसे अन्य गतिके जानेको कर्म नोकर्म जातिके पुद्गल सहाई है । और कर्म नोकर्मके अभावसे सिद्धोंके निःक्रियपना है गमनागमन नहीं है। पुद्गलके स्कंदोंको गमनका बहिरंगनिमित्तकारण कालाणुरूप कालद्रव्य है । इससे क्या अर्थ निकला । यह निकला कि निश्चय कालकी पर्याय जो समयरूप व्यवहारकाल उसकी उत्पत्तिमें मंदगतिरूप परिणत हुआ अविभागी पुद्गलपरमाणू कारण होता है । समयरूप व्यवहार कालका उपादानकारण निश्चय काल द्रव्य है उसीकी एक समयादि व्यवहारकालका मूलकारण निश्चयकालाणुरूप काल द्रव्य है उसीकी एक समया- दिक पर्याय है पुद्गल परमाणुकी मंदगति बहिरंग निमित्त कारण है उपादान कारण नहीं है पुद्गल परमाणु आकाशके प्रदेशमें मंदगतिसे गमन करता है यदि शीघ्र गतिसे चले तो एक समयमें चौदह राजू जाता है जैसे घटपर्यायकी उत्पत्तिमें मूलकारण तो मट्टीक परमात्मप्रकाशः। १५५ परमाणोर्मदगतिगमनकाले यद्यपि धर्मद्रव्यं सहकारिकारणमस्ति तथापि कालाणुरूपं निश्व- यकालद्रव्यं च सहकारिकारणं भवति । सहकारिकारणानि तु बहून्यपि भवंति मत्स्यानां धर्मद्रव्ये विद्यमानेपि जलवत् घटोत्पत्तौ कुंभकारबहिरंगनिमित्तेपि चक्रचीवरादिवत् जीवानां धर्मद्रव्ये विद्यमानेपि कर्मनोकर्मपुद्गला गतेः सहकारिकारणं पुद्गलानां तु कालद्रव्यं गते: सहकारिकारणं । कुत्र भणितमास्ते इति चेत् । पंचास्तिकायप्राभृते श्रीकुंदकुंदाचार्यदेवैः सक्रियनिःक्रियव्याख्यानकाले भणितमस्ति । "जीवा पुग्गलकाया सह सकिरिया हवंति ण य सेसा । पुग्गलकरणा जीवा खंदा खलु कालकरणेहिं" ॥ पुद्गलस्कंधानां धर्मद्रव्ये विद्यमानेपि जलवत् द्रव्यकालो गते: सहकारिकारणं भवतीत्यर्थः । अत्र निश्चयनयेन डला है और बहिरंग कारण कुम्हार है वैसे समयपर्यायकी उत्पत्तिमें मूलकारण तो कालाणूरूप निश्चय काल है और बहिरंगनिमित्त कारण पुद्गलपरमाणू है । पुद्गलपरमाणुकी मंदगतिरूप गमन समयमें यद्यपि धर्मद्रव्य सहकारी है तौभी कालाणूरूप निश्चयकाल परमाणूकी मंदगतिका सहाई जानना । परमाणूके निमित्तसे तो कालका समय पर्याय प्रगट होता है और कालके सहायसे परमाणू मंदगति करता है । कोई प्रश्न करै कि गतिका सहकारी धर्म है कालको क्यों कहा । उसका समाधान यह है कि सहकारी कारण बहुत होते है और उपादानकारण एक ही होता है दूसरा द्रव्य नही होता निज द्रव्य ही निज ( अपनी) गुणपर्यायोंका मूलकारण है और निमित्तकारण बहिरंगकारण तो बहुत होते है इसमें कुछ दोष नहीं है । धर्म द्रव्य तो सबहीका गतिसहाई है परंतु मछलीयोंको गतिसहाई जल है तथा घटकी उत्पत्तिमें बहिरंग निमित्त कुम्हार है तौभी दंड चक्र चीवरादिक ये भी अवश्य कारण है इनके विना घट नहीं होता । और जीवोंके धर्मद्रव्य गतिकी सहाई विद्यमान है तौभी कर्म नोकर्म पुद्गल सहकारी कारण है इसीतरह पुद्गलको कालद्रव्य गतिसहकारी कारण जानना । यहा कोई प्रश्न करै कि धर्म द्रव्य तो गतिका सहाई सब जगह कहा है और कालद्रव्य वर्तनाका सहाई है गति सहाई किसजगह कहा है । उसका समाधान श्रीपंचास्तिकायमें कुंदकुंदाचार्यने क्रियावंत और अक्रियावंतके व्याख्यानमें कहा है । “जीवा पुग्गल" इत्यादि । इसका अर्थ ऐसा है कि जीव और पुद्गल ये दोनों क्रियावंत हैं और वाकीके चार द्रव्य अक्रियावाले हैं चलन हलन क्रियासे रहित हैं । जीवको दूसरी गतिमें गमनका कारण कर्म है वह पुद्गल है और पुद्गलको गमनका कारण काल है । जैसे धर्म द्रव्यके मौजूद होनेपर भी मच्छोंको गमनसहाई जल है उसीतरह पुद्गलको धर्म द्रव्यके होनेपर भी द्रव्यकाल गमनका सहकारी कारण है । यहा निश्चयनयकर गमनादि क्रियासे रहित निःक्रिय सिद्धखरूपके समान निःक्रिय निर्द्वद्व निज शुद्धात्मा ही उपादेय है यह शास्त्रका तात्पर्य हुआ । इसी प्रकार १५६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । नि:क्रियसिद्धस्वरूपसमानं निजशुद्धात्मद्रव्यमुपादेयमिति तात्पर्य । तथाचोक्तं निश्चयनयेन निःक्रियजीवलक्षणं "यावक्रियाः प्रवर्तते तावहतस्य गोचरः । अद्वये निष्कले प्राप्त निःक्रियस्य कुतःक्रिया" ॥ १४९ ॥ अथ पंचास्तिकायसूचनार्थ कालद्रव्यमप्रदेशं विहाय कस्य द्रव्यस्य कियंतः प्रदेशाः भवं- तीति कथयति;- धम्माधम्मुवि एक्नु जिउ, ए जि असंखपदेस । गयणु अणंतपएसु मुणि, बहुविह पुग्गलदेस ॥ १५० ।। धर्माधर्मों अपि एकः जीवः एतानि एव असंख्यप्रदेशानि । गगनं अनंतप्रदेश मन्यख बहुविधाः पुद्गलदेशाः ॥ १५० ।। धम्माधम्मुवि इत्यादि । धम्माधम्मुवि धर्माधर्मद्वितयमेव एक जिउ एको विवक्षितो जीवः ए जि एतान्येव त्रीणि द्रव्याणि असंखपएस असंख्येयप्रदेशानि भवंति गयणु गगनं अणंतपएसि अनंतप्रदेशं मुणि मन्यस्व जानीहि बहुविह बहुविधा भवंति । के ते । पुग्गलदेस पुद्गलप्रदेशाः । अत्र पुद्गलद्रव्यप्रदेशविवक्षया प्रदेशशब्देन परमाणवो ग्राह्याः दूसरे ग्रंथोंमें भी निश्चयकर हलन चलनादि क्रिया रहित जीवका लक्षण कहा है । "याव- क्रिया" इत्यादि । इसका अर्थ ऐसा है कि जब तक इस जीवके हलन चलनादि क्रिया है गतिसे गत्यंतरको जाना है तब तक दूसरे द्रव्यका सबंध है जब दूसरेका संबंध मिटा अद्वैत हुआ तव निकल अर्थात् शरीरसे रहित निःक्रिय है उसके हलन चलनादि किया कहांसे होसक्ती है अर्थात् ससारी जीवके कर्मके संबंधसे गमन है सिद्ध भगवान कर्म- रहित निःक्रिय हैं उनके गमनागमन क्रिया कभी नहीं होसक्ती ॥ १४९ ॥ आगे पंचास्तिकायके प्रगट करनेके लिये काल द्रव्य अप्रदेशीको छोड़कर अन्य पांच- द्रव्यों से किसके कितने प्रदेश है यह कहते हैं;-[धर्माधर्मों ] धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य [अपि एकः जीवः ] और एक जीव [एतानि एव ] इन तीनों ही को [असंख्य- प्रदेशानि ] असख्यात प्रदेशी [मन्यख ] तू जान [ गगनं] आकाश [अनंतप्रदेशं] अनंतप्रदेशी है [ पुद्गलप्रदेशाः ] और पुद्गलके प्रदेश [बहुविधाः] बहुत प्रकारके हैं परमाणू तो एक प्रदेशी है और स्कंध संख्यात प्रदेश असंख्यात प्रदेश तथा अनंत प्रदेशी भी होते हैं । भावार्थ-जगतमें धर्म द्रव्य तो एक ही है, वह असंख्यात प्रदेशी है, अधर्म द्रव्य भी एक है असंख्यात प्रदेशी है, जीव अनंत हैं सो एक २ जीव असंख्यात प्रदेशी है. आकाशद्रव्य एक ही है वह अनंतप्रदेशी है ऐसा जानो । पुद्गल एक प्रदेशसे लेकर अनंत प्रदेशतक है। एक परमाणू तो एक प्रदेशी है और जैसे २ परमाणू मिलते नाते हैं वैसे २ प्रदेश भी वढते जाते हैं वे संख्यात असंख्यात अनंत प्रदेशतक जानने, , ।

परमात्मप्रकाशः । १५७ न च क्षेत्रप्रदेशा इति । कस्मात् । पुद्गलस्यानंतक्षेत्रप्रदेशाभावादिति । अथवा पाठांतरं । 'पुग्गलु तिविहु पएसु' पुद्गलद्रव्ये संख्यातासंख्यातानंतरूपेण त्रिविधाः प्रदेशाः परमाणवो भवंतीति । अत्र निश्चयेन द्रव्यकर्माभावादमूर्ता मिथ्यात्वरागादिरूपभावकर्मसंकल्पविक- ल्पाभावात् शुद्धा लोकाकाशप्रमाणेनासंख्येयाः प्रदेशाः यस्य शुद्धात्मनः स शुद्धात्मा वीत- रागनिर्विकल्पसमाधिपरिणतिकाले साक्षादुपादेय इति भावार्थः ॥ १५० ॥ अथ लोके यद्यपि व्यवहारेणैकक्षेत्रावगाहेन तिष्ठति द्रव्याणि तथापि निश्चयेन संकर- व्यतिकरपरिहारेण कृत्वा स्वकीयस्वकीयस्वरूपं न त्यजंतीति दर्शयति,- लोयागासु धरेवि जिय, कहियई व्वई जाई। एक्कहिं मिलियई इत्थु जगि, सगुणहिं णिवसहिं ताई ॥ १५१ ॥ लोकाकाशं धृत्वा जीव कथितानि द्रव्याणि यानि । एकत्वे मिलितानि अत्र जगति स्वगुणेषु निवसति तानि ॥ १५१ ॥ लोगागासु इत्यादि । लोगागासु लोकाकाशं कर्मतापन्नं धरेवि धृत्वा मर्यादीकृत्वा जिय हे जीव अथवा लोकाकाशमाधारीकृत्वा ठियाइं आधेयरूपेण स्थितानि । कानि स्थितानि । कहियई दन्बई जाई कथितानि जीवादिद्रव्याणि यानि । पुनः कथंभूतानि । अनंत परमाणू इकट्ठे होवें तव अनंत प्रदेश कहे जाते हैं । अन्य द्रव्योंके तो विस्ताररूप प्रदेश हैं और पुद्गलके स्कंधरूप प्रदेश हैं । पुद्गलके कथनमें प्रदेश शब्दसे परमाणू लेना क्षेत्र नही लेना पुद्गलका प्रचार लोकमें ही है अलोकाकाशमें नहीं है इसलिये अनंत क्षेत्र प्रदेशके अभाव होनेसे क्षेत्र प्रदेश न जानने । जैसे २ परमाणू मिलजाते हैं वैसे २ प्रदेशोंकी वढवारी जाननी । इसी दोहाके कथनमें पाठातरमें "पुग्गल तिविहु पएसु" ऐसा है उसका अर्थ यह है कि पुद्गलके संख्यात असंख्यात अनंत प्रदेश परमाणु- ओंके मेलसे जानने चाहिये अर्थात् एक परमाणू एक प्रदेश बहुत परमाणू बहु प्रदेश यह जानना । सूत्रमें शुद्ध निश्चयनयकर द्रव्यकर्मके अभावसे यह जीव अमूर्तीक है और मिथ्यात्वरागादिरूप भावकर्म संकल्प विकल्पके अभावसे शुद्ध है लोकाकाशप्रमाण असख्यात प्रदेशवाला है ऐसा जो निजशुद्धात्मा वही वीतरागनिर्विकल्पसमाधिदशामें साक्षात् उपादेय है यह जानना ॥ १५० ॥ आगे लोकमें यद्यपि व्यवहारनयकर ये सव द्रव्य एक क्षेत्रावगाहसे तिष्ठरहे हैं तो भी निश्चयनयकर कोई द्रव्य किसीसे नहीं मिलता और कोई भी अपने २ स्वरूपको नहीं छोड़ता है ऐसा दिखलाते हैं। हे जीव ] हे जीव [ अत्र जगति ] इस ससारमें [यानि द्रव्याणि कथितानि] जो द्रव्य कहे गये हैं [ तानि] वे सव [ लोकाकाशं १५८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । एकहि मिलियई एकत्वे मिलितानि । इत्थु जगि अत्र जगति सगुणहिं णिवसहि निश्चयनयेन स्वकीयगुणेपु निवसंति 'सगुणहिं तृतीयांतं करणपदं स्वगुणेष्वधिकरणं कथं जातमिति । ननु कथितं पूर्व प्राकृते कारकव्यभिचारो लिंगव्यभिचारश्च कचिद्भवतीति । कानि निवसति । ताई तानि पूर्वोक्तानि जीवादिपड्व्याणीति । तद्यथा । यद्यप्युपचरिता- सद्भूतव्यवहारेणाधाराधेयभावेनैकक्षेत्रावगाहेन तिष्ठति तथापि शुद्धपारिणामिकभावग्राहकेण शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन संकरव्यतिकरपरिहारेण स्वकीयखकीयसामान्यविशेपशुद्धगुणान्न सज- तीति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । हे भगवन् लोकस्तावदसंख्यातप्रदेशः परमागमे भणितं तिष्ठति तत्रासंख्यातप्रदेशलोके प्रत्येकं प्रत्येकमसंख्येयप्रदेशान्यनतजीवद्रव्याणि, तत्र चैकैके जीवद्रव्ये कर्मनोकर्मरूपेणानंतानि पुद्गलपरमाणुद्रव्याणि च तिष्ठति तेभ्योग्यनंतगुणानि शेषपुद्गलद्रव्याणि तिष्ठति तानि सर्वाण्यसंख्येयप्रदेशलोके कथमवकाशं लभंते इति पूर्वपक्षः । भगवान् परिहारमाह । अवगाहनशक्तियोगादिति । तथाहि । यथैकस्मिन् गूढनागरसगद्या- णके शतसहस्रलक्षसुवर्णसंख्याप्रभितान्यवकाशं लभते । अथवा यथैकस्मिन् प्रदीपप्रकारे बहवोपि प्रदीपप्रकाशा अवकाशं लभंते । अथवा यथैकस्मिन् भस्मघटे जलघटः सम्यग- वकाशं लभते । अथवा यथैकस्मिन् भूमिगृहे वह्वीपि पटहजयघंटादिशब्दाः सम्यगवकाश लभंते तथैकस्मिन् लोके विशिष्टावगाहनशक्तियोगात् पूर्वोक्तानंतसंख्या जीवपुद्गला अवकाशं लभंते नास्ति विरोधः इति । तथा चोक्तं जीवानामवगाहनशक्तिस्वरूपं परमागमे । “एग- धृत्वा ] लोकाकाशमें स्थित हैं लोकाकाश तो आधार है और ये सब आधेय हैं [एकत्वे मिलितानि] ये द्रव्य एक क्षेत्रमें मिले हुए रहते हैं एक क्षेत्रावगाही हैं तौभी [स्वगुणेषु] निश्चय नयकर अपने २ गुणों में ही [ निवसंति] निवास करते हैं परद्रव्यसे मिलते नहीं है । भावार्थ-यद्यपि उपचरित असद्भूत व्यवहारनयकर आधाराधेय भावसे एक क्षेत्रावगाहकर तिष्ठरहे हैं तौभी शुद्धपारिणामिक परमभाव ग्राहक शुद्धद्रव्यार्थिक नयसे परद्रव्यसे मिलनेरूप संकर दोषसे रहित हैं और अपने अपने सामान्यगुण तथा विशेष- गुणोंको नहीं छोड़ते हैं । यह कथन सुनकर प्रभाकर भट्टने प्रश्न किया कि हे भगवन् परमागममें लोकाकाश तो असंख्यात प्रदेशी कहा है उस असंख्यात प्रदेशी लोकमें अनंत जीव किसतरह समासकते हैं क्योंकि एक एक जीवके असख्यात २ प्रदेश हैं और एक एक जीवमें अनंतानंत पुद्गलपरमाणू कर्मनोकर्मरूपसे लगरही है और उनके सिवाय अनंतगुणे अन्य पुद्गल रहते हैं सो ये द्रव्य असंख्यात प्रदेशी लोकमें कैसे समा- गये । उसका समाधान श्रीगुरु कहते है । आकाशमें अवकाशदान (जगहदेनेकी) शक्ति है उसके संबंधसे समाजाते है । जैसे एक गूढ नागरस गुटिकामें शत सहस्र लक्ष सुवर्ण संख्या आजाती है, अथवा एक दीपकके प्रकाशमें बहुत दीपकोंका प्रकाश परमात्मप्रकाशः। १५९ णिगोदसरीरे जीवा दव्वापमाणदो ट्ठिा । सिद्धेहि अणंतगुणा सव्वेण वितीदकालेण" ॥ पुनस्तथोक्तं पुद्गलानामवगाहनशक्तिस्वरूपं । "ओगाढगाढणिचिदो पुग्गलकाएहि सव्वदो लोगो । सुहुमेहि वादरेहि य ताणंतेहि विविहेहिं"। अयमन भावार्थः । यद्यप्येकाव- गाहेन तिष्ठति तथापि शुद्धनिश्चयेन जीवाः केवलज्ञानाद्यनंतगुणस्वरूपं न त्यति पुद्गलाश्च वर्णादिस्वरूपं न त्यति शेषद्रव्याणि च स्वकीयस्वकीयखरूपं न त्यति ॥१५१॥ अथ जीवस्य व्यवहारेण शेपपंचद्रव्यकृतमुपकारं कथयति, तस्यैव जीवस्य निश्चयेन तान्येव दुःखकारणानि च कथयति,- एयई व्वई देहियई, णियणियकजु जणंति । चउगइदुक्ख सहंत जिय, ते संसारु भमंति ॥१५२॥ एतानि द्रव्याणि देहिनां निजनिजकार्य जनयंति । चतुर्गतिदुःखं सहमानाः जीवाः तेन संसारं भ्रमंति ॥ १५२ ॥ एयई इत्यादि । एयई एतानि दव्वई जीवादन्यद्रव्याणि देहियहं देहिनां संसारि- जगह पाता है, अथवा जैसे एक राखके घड़ेमें जलका घड़ा अच्छी तरह अवकाश पाता है भस्ममें जल शोषित हो जाता है, अथवा जैसे एक उटनीके दूधके घडेमें शहतका घड़ा समा जाता है, अथवा एक भूमिघरमें ढोल घंटा आदि बहुत वाजोंका शब्द अच्छी तरह समाजाता है उसीतरह एक लोक आकाशमें विशिष्ट अवगाहन शक्तिके योगसे अनंतजीव और अनंतानंत पुद्गल अवकाश पाते हैं इसमें विरोध नही है । और जीवोंमें परस्पर अवगाहन शक्ति है । ऐसा ही कथन परमागममें कहा है-“एगणिगोद" इत्यादि । इसका अर्थ ऐसा है कि एक निगोदिया जीवके शरीरमें जीव द्रव्यके प्रमाणसे दिखलाए गये जितने सिद्ध हैं उन सिद्धोंसे अनंतगुणे जीव एक निगोदियाके शरीरमें हैं और निगोदियाका शरीर अंगुलके असल्यातवें भाग है सो ऐसे सूक्ष्म शरीरमें अनंत जीव समा जाते हैं तो लोकाकाशमें समाजानेका क्या अचंभा है। अनंतानंत पुद्गल लोका- काशमें समारहे हैं उसकी "ओगाढ" इत्यादि गाथा है। उसका अर्थ यह है कि सवप्रकार सब जगह यह लोक पुद्गल कायोंकर अवगाढगाढ भरा है ये पुद्गल काय अनंत हैं अनेक प्रकारके भेदको घरते है कोई सूक्ष्म है कोई बादर है । तात्पर्य यह है कि यद्यपि सब द्रव्य एक क्षेत्रावगाहकर रहते है तोभी शुद्धनिश्चयनयकर जीव केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप अपने स्वरूपको नहीं छोडते है पुद्गलद्रव्य अपने वर्णादि खरूपको नही छोड़ता और धर्मादि अन्य द्रव्य भी अपने २ खरूपको नही छोडते है ॥ १५१ ॥ आगे जीवका व्यवहारनयकर अन्य पाचों द्रव्य उपकार करते है ऐसा कहते हैं तथा उसी जीवके निश्चयसे वे ही दुःखके कारण है ऐसा कहते है,-[ एतानि ] ये १६० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । जीवानां । किं कुर्वति । णियणियकजु जणंति निजनिजकार्य जनयंति येन कारणेन निजनिजकार्य जनयंति चउगइदुक्ख सहत जिय चतुर्गतिदुःखं सहमानाः संतो जीवा तें संसारु भमंति तेन कारणेन संसारं भ्रमंतीति । तथा च । पुद्गलस्तावज्जीवस्य स्वसंवि- त्तिविलक्षणविभावपरिणामरतस्य व्यवहारेण शरीरवाड्मनःप्राणापाननिप्पत्तिं करोति, धर्मद्रव्यं चोपचरितासद्भूतव्यवहारेण गतिसहकारित्वं करोति, तथैवाधर्मद्रव्यं स्थितिसहका- रित्वं करोति, तेनैव व्यवहारनयेन आकाशद्रव्यमवकाशदानं ददाति, तथैव कालद्रव्यं च शुभाशुभपरिणामसहकारित्वं करोति । एवं पंचद्रव्याणामुपकारं लब्ध्वा जीवो निश्चयव्यव- हाररत्नत्रयभावनाच्युतःसन् चतुर्गतिदुःखं सहत इति भावार्थः ॥ १५२ ॥ अथैवं पंचद्रव्याणां स्वरूपं निश्चयेन दुःखकारणं ज्ञात्वा हे जीव निजशुद्धात्मोपलं- भलक्षणे मोक्षमार्गे स्थीयत इति निरूपयति,- दुक्खहं कारण मुणिवि जिय, वह एहु सहाउ । होयवि मुक्खहं मग्गि लहु, गम्मिजइ परलोउ ॥ १५३ ॥ दुःखस्य कारणं मत्त्वा जीव द्रव्याणां इमं स्वभावम् । भूत्वा मोक्षस्य मार्गे लघु गम्यते परलोकः ॥ १५३ ।। दुक्खहं कारणु दुःखस्य कारणं मुणिवि मत्वा ज्ञात्वा जिय हे जीव । किं दुःखस्य कारणं ज्ञात्वा । दन्वहं एहु सहाउ द्रव्याणामिमं शरीरवाड्मनःप्राणापाननिप्पत्त्यादिलक्षणं [द्रव्याणि ] द्रव्य [ देहिनां ] जीवोंके [निजनिजकार्य] अपने २ कार्यको [जनयंति] उपजाते है [तेन ] इस कारण [ चतुर्गतिदुःखं सहमानाः जीवाः ] नरकादि चारों गतियोंके दुःखोंको सहते हुए जीव [ संसारं] संसारमें [ भ्रमंति ] भटकते है। भावार्थ- ये द्रव्य जो जीवका उपकार करते है उसको दिखलाते है । पुद्गल तो आत्मज्ञानसे विपरीत विभाव परिणामोंमें लीन हुए अज्ञानी जीवोंके व्यवहारनयकर शरीर वचन मन श्वासोश्वास इन चारोंकी उत्पत्ति करता है अर्थात् मिथ्यात्व अवृत कषाय रागद्वेषादि विभाव परिणाम है इन विभावपरिणामोंके योगसे जीवके पुद्गलका संबंध है और पुद्गलके संबंधसे ये हैं, धर्मद्रव्य उपचरितासद्भूत व्यवहारनयकर गतिसहाई है. अधर्म द्रव्य स्थिति सहकारी है, व्यवहार नयकर आकाश द्रव्य अवकाश (जगह ) देता है और कालद्रव्य शुभ अशुभ परिणामोंका सहाई है । इस तरह ये पांच द्रव्य सहकारी है । इनका सहाय पाकर ये जीव निश्चय व्यवहार रत्नत्रयकी भावनासे रहित भ्रष्ट होते हुए चारों गतियोंके दुःखोंको सहते हुए संसारमें भटकते है यह तात्पर्य हुआ ॥१५२ ।। आगे पर द्रव्योंका संबंध निश्चय नयसे दुःखका कारण है ऐसा जानकर हे जीव शुद्धा- स्माकी प्राप्तिरूप मोक्षमार्गमें स्थित हो ऐसा कहते है;-[हे जीव ] हे जीव [द्रव्याणां - परमात्मप्रकाशः। १६१ पूर्वोक्तस्वभावं पुद्गलादिपंचद्रव्यस्वभावं दुःखस्य कारणं ज्ञात्वा । किं क्रियते । होयवि भूत्वा । क । मोक्खहं मग्गि मोक्षस्य मार्गे लहु लघु शीघ्रं पश्चात् गमिजइ गम्यते । का कर्मतापन्नः । परलोउ परलोको मोक्ष इति । तथाहि । वीतरागसदानंदैकस्खाभाविक- सुखविपरीतस्याकुलत्वोत्पादकस्य दुःखस्य कारणानि पुद्गलादिपंचद्रव्याणि ज्ञात्वा हे जीव भेदाभेदरत्नत्रयलक्षणे मोक्षस्य मार्गे स्थित्वा परः परमामा तस्यावलोकनमनुभवनं परमसम. रसीभावेन परिणमन परलोको मोक्षस्तत्र गम्यत इति भावार्थः ॥ १५३ ॥ अथेदं व्यवहारेण मया भणितं जीवद्रव्यादिश्रद्धानरूपं सम्यग्दर्शनमिदानी सम्यग्ज्ञानं चारित्रं च हे प्रभाकरभट्ट शृणु त्वमिति मनसि धृत्वा सूत्रमिदं प्रतिपादयति, णियमि कहियउ एहु मई, ववहारेणवि दिहि । एवहिं णाणु चरित्तु सुणि, जिं पावहि परमेहि ॥ १५४ ॥ नियमेन कथिता एषा मया व्यवहारेणैव दृष्टिः । इदानीं ज्ञानं चारित्रं शृणु येन प्रामोषि परमेष्टिम् ॥ १५४ ॥ णियमें नियमेन निश्चयेन कहियउ कथिता एहु मइ एषा कर्मतापन्ना मया । केनैव । ववहारणवि व्यवहारनयेनैव । एपा का । दिहि दृष्टिः । दृष्टिः कोर्थः सम्यक्त्वं एवहि इदानीं णाणु चरित्तु सुणि हे प्रभाकरभट्ट क्रमेण ज्ञानचारित्रद्वयं शृणु । येन श्रुतेन किं भवति । जे पावहि येन सम्यग्ज्ञानचरित्रद्वयेन प्राप्नोपि । किं प्राप्नोपि। परमेहि परमे- ष्टिपदं मुक्तिपदमिति । अतो व्यवहारसम्यक्त्वविषयभूतानां द्रव्याणां चूलिकारूपेण व्याख्यानं इमं स्वभावं ] परद्रव्योंके ये खभाव [ दुःखस्य ] दुःखके [कारणं मत्वा ] कारण जान- कर [ मोक्षस्य मार्गे ] मोक्षके मार्ग में [ भूत्वा ] लगकर [लघु ] शीघ्र ही [ परलोक गम्यते । उत्कृष्ट लोक रूप मोक्षमें जाना चाहिये । भावार्थ-पहले कहेगये पुद्गलादि द्रव्योंके सहाय शरीर वचन मन श्वासोश्वास आदिक ये सब दुःखके कारण है क्योंकि वीतराग सदा आनंदरूप खभावकर उत्पन्न जो अतीद्री सुख उससे विपरीत आकुलताके उपजानेवाले है ऐसा जानकर हे जीव तू भेदाभेद रत्नत्रयखरूप मोक्षके मार्ग में लगकर परमात्माका अनुभव परमसमरसीभावसे परिणमन रूप मोक्ष उसमें गमन कर ॥ १५३ ॥ आगे व्यवहारनयसे मैंने ये जीवादि द्रव्योंके श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन कहा है अब सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रको हे प्रभाकर भट्ट तू सुन ऐसा मनमें रखकर यह दोहा- सूत्र कहते है; हे प्रभाकर भट्ट [मया ] मैने [व्यवहारेणैव ] व्यवहारनयसे तुझको [एपा दृष्टिः ] ये सम्यग्दर्शनका खरूप [ नियमेन कथिता] अच्छीतरह कहा [इदानीं] अब तू [ज्ञानं चारित्रं] ज्ञान और चारित्रको [शृणु] सुन [ येन ] जिसके धारण करनेसे [ परमेष्टिं प्राप्नोपि] सिद्धपरमेष्टीके पदको पावै । भावार्थ-व्यवहार सम्यक्त्वके २१ १६२ रायचंद्रजैनशामालायाम् । क्रियते । तद्यथा । "परिणाम जीव मुत्तं सपदेसं एय खित्त किरिया य। णिचं कारण कत्ता सव्वगदं इदरह्मि यपवेसो"। परिणाम इत्यादि । 'परिणाम परिणामिनी जीवपुगलौ स्वभावविभावपरिणामाभ्यां शेषचत्वारि द्रव्याणि जीवपुद्गलवद्विभावव्यंजनपर्यायाभावान् मुख्यवृत्त्या पुनरपरिणामीनि इति, 'जीव' शुद्धनिश्चयनयेन विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावं शुद्धचे- तन्यं प्राणशब्देनोच्यते तेन जीवतीति जीवः व्यवहारनयेन पुनः कर्मोदयजनितद्रव्य- भावरूपैश्चतुर्भिः प्राणैर्जीवति जीविष्यति जीवितपूर्वो वा जीवः पुद्गलादिपंचद्रव्याणि पुनरजीवरूपाणि, 'मुत्तं' अमूर्तशुद्धात्मनो विलक्षणा स्पर्शरसगंधवर्णवती मूर्तिरुच्यते तत्स- द्धावान्मूर्तः पुद्गलः जीवद्रव्यं पुनरनुपचरितासद्भूतव्यवहारेण मूर्तमपि शुद्धनिश्चयनयेनामूर्त धर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि चामूर्तानि, 'सपदेस' लोकमात्रप्रमितासंख्येयप्रदेशलक्षणं जीवद्रव्यमादिं कृत्वा पंचद्रव्याणि पंचास्तिकायसंज्ञानि सप्रदेशानि कालद्रव्यं पुनर्वहुप्रदेश- लक्षणकायत्वाभावादप्रदेश, 'एय, द्रव्यार्थिकनयेन धर्माधर्माकागद्रव्याण्येकानि भवति जीवपुद्गलकालद्रव्याणि पुनरनेकानि भवंति, 'खेत सर्वद्रव्याणामवकाशदानसामर्थ्यान क्षेत्रमाकाशमेकं शेषपंचद्रव्याण्यक्षेत्राणि, 'किरिया य क्षेत्राक्षेत्रांतरगमनरूपा परिस्पंदवती चलनवती क्रिया सा विद्यते ययोस्तौ क्रियावंती जीवपुगलौ धर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि पुनर्निष्क्रियाणि, 'णिचं' धर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि यद्यप्यर्थपर्यायत्वेनानित्यानि तथापि चैतन्य- कारण भूत छह द्रव्योंका सांगोपांग व्याख्यान करते है "परिणाम" इत्यादि गाथासे । इसका अर्थ यह है कि इन छह द्रव्योंमें विभावपरिणामके परिणमनेवाले जीव और पुद्गल दोही है अन्य चार द्रव्य अपने खभावरूप तो परिणमते है लेकिन जीव पुगलकी तरह विभाव व्यंजन पर्यायके अभावसे विभावपरिणमन नहीं है इसलिये मुख्यतासे परि- गामी दो द्रव्य ही कहे हैं, शुद्ध निश्चय नयकर शुद्ध ज्ञान दर्शन खभाव जो शुद्ध प्राण उनसे जीवता है जीवेगा पहले जी आया और व्यवहार नयकर इंद्री वल आयुखा- सोखास रूप द्रव्यप्राणोंकर जीता है जीवेगा पहले जी चुका इसलिये जीवको ही जीव कहा गया है अन्य पुद्गलादि पांच द्रव्य अजीव है, स्पर्शरसगंधवर्णवाली मूर्ति सहित मूर्तीक एक पुद्गलद्रव्य ही है अन्य पांच अमूर्तीक है । उनमेंसे धर्म अधर्म आकाश काल ये चारों तो प्रत्यक्षमें अमूर्तीक है तथा जीवद्रव्य अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नयकर मूर्तीक भी कहा जाता है क्योंकि शरीरको धारण कर रहा है तौभी शुद्धनि- श्चयनयकर अमूर्तीक ही है, लोक प्रमाण असंख्यात प्रदेशी जीवद्रव्यको आदि लेकर पाच द्रव्य पंचास्तिकाय हैं वे सप्रदेशी हैं और कालद्रव्य बहुप्रदेशखभावकायपना न होनेसे अप्रदेशी है, धर्म अधर्म आकाश ये तीन द्रव्य एक एक हैं और जीव पुद्गल काल ये तीनों अनेक हैं । जीव तो अनंत हैं पुद्गल अनंतानंत हैं काल असंख्यात है परमात्मप्रकाशः। १६३ मुख्यवृत्त्या विभावव्यंजनपर्यायाभावात् नित्यानि । द्रव्यार्थिकनयेन च जीवपुद्गलद्रव्ये पुनर्यद्यपि द्रव्यार्थिकनयापेक्षया निये तथाप्यगुरुलघुपरिणतिरूपस्वभावपर्यायापेक्षया विभावव्यंजनपर्यायापेक्षया चानित्ये, 'कारण' पुद्गलधर्माधर्माकाशकालद्रव्याणि व्यवहारनयेन जीवस्य शरीरवाङ्मनःप्राणापानादिगतिस्थित्यवगाहवर्तनाकार्याणि कुर्वति इति कारणानि भवंति जीवद्रव्यं पुनर्यद्यपि गुरुशिष्यादिरूपेण परस्परोपग्रहं करोति तथापि पुद्गलादिपंच- द्रव्याणां किमपि न करोतीत्यकारणं, 'कत्ता' शुद्धपारिणामिकपरमभावग्राहकेण शुद्धद्रव्यार्थिन कनयेन यद्यपि बंधमोक्षद्रव्यभावरूपः पुण्यपापघटपटादीनामकर्ता जीवस्तथाप्यशुद्धनिश्चयेन शुभाशुभोपयोगाभ्यां परिणतःसन् पुण्यपापवंधयोःकर्ता तत्फलभोक्ता च भवति विशुद्धज्ञान- दर्शनस्वभावनिजशुद्धासद्रव्यसम्यश्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपेण शुद्धोपयोगेन तत्परिणतः सन् मोक्षस्यापि कर्ता तत्फलभोक्ता च । शुभाशुभशुद्धपरिणामानां परिणमनमेव कर्तृत्वं सर्वत्र ज्ञातव्यमिति । पुद्गलादिपंचद्रव्याणां च स्वकीयस्खकीयपरिणामेन परिणमनमेव कर्तृत्वं । वस्तुवृत्त्या पुनः पुण्यपापादिरूपेणाकर्तृत्वमेव, 'सव्वगर्द' लोकालोकव्यात्यपेक्षया सर्वगत- माकाशं भण्यते धर्माधौं च लोकव्याप्त्यपेक्षया जीवद्रव्यं तु पुनरेकैकजीवापेक्षया लोकपू- सब द्रव्योंको अवकाश देने समर्थ एक आकाश ही है इसलिये आकाश क्षेत्र कहागया है वाकी पांच द्रव्य अक्षेत्री हैं, एक क्षेत्रसे दूसरे क्षेत्रमें गमन करना वह चलन हलन- वती क्रिया कही गई है यह क्रिया जीव पुद्गल दोनोंके ही है और धर्म, अधर्म आकाश काल चार द्रव्य निष्क्रिय हैं जीवोंमें भी संसारी जीव हलनचलनवाले हैं इसलिये क्रियावंत हैं और सिद्ध परमेष्ठी निःक्रिय हैं उनके हलन चलन क्रिया नहीं है, द्रव्यार्थि- कनयसे विचारा जावे तो सभी द्रव्य नित्य हैं और अर्थपर्याय जो षट् गुणी हानि वृद्धिरूप स्वभावपर्याय है उसकी अपेक्षा सब ही अनित्य हैं तौभी विभावव्यंजनपर्याय जीव और पुद्गल इन दोनोंकी है इसलिये इन दोनोंको ही अनित्य कहा है अन्य चार द्रव्य विभावके अभावसे नित्य ही हैं इसकारण यह निश्चयसे जानना कि चार नित्य हैं दो अनित्य हैं तथा द्रव्यकर सव ही नित्य हैं कोई भी द्रव्य विनश्वर नही है, जीवको पांचों ही द्रव्य कारणरूप हैं पुद्गल तो शरीरादिकका कारण है धर्म अधर्मद्रव्य गति स्थिति के कारण हैं आकाशद्रव्य अवकाश देनेका कारण है और काल वर्तनाका सहाई है। ये पाचों द्रव्य जीवको कारण हैं और जीव उनको कारण नही है । यद्यपि जीवद्रव्य अन्य जीवोंको गुरु शिष्यादिरूप परस्पर उपकार करता है तौभी पुद्गलादि पांचद्रव्योंको अकारण है और ये पाचो कारण हैं, शुद्ध पारिणामिक परमभावग्राहक शुद्धद्रव्यार्थिक नयकर यह जीव यद्यपि बंध मोक्ष पुन्य पापका कर्ता नही है तौभी अशुद्ध निश्चयनयकर शुभ अशुभ उपयोगोंसे परिणत हुआ पुन्य पापके बंधका कर्ता होता है और उनके - १६४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । रणावस्थां विहायासर्वगतं नानाजीवापेक्षया सर्वगतमेव भवतीति । पुद्गलद्रव्यं पुनर्लोकरूप- महास्कंधापेक्षया सर्वगतं शेपपुद्गलापेक्षया सर्वगतं न भवतीति । कालद्रव्यं पुनरेककाला- णुद्रव्यापेक्षया सर्वगतं न भवति लोकप्रदेशप्रमाणनानाकालाणुविवक्ष्या लोके सर्वगतं भवति, 'इदरह्मि यपवेसों' यद्यपि सर्वद्रव्याणि व्यवहारेणैकक्षेत्रावगाहेनान्योन्यानुप्रवेशेन तिष्ठति तथापि निश्चयनयेन चेतनादिस्वकीयस्वकीयस्वरूपं न यजंतीति । तथा चोक्तं । 'अण्णोणं पविसंता दिता उग्गासमण्णमण्णस्त । मेलंतावि य णिचं सगसम्भावं ण विजहंति" ।। इदमत्र तात्पर्य । व्यवहारसम्यक्त्वविषयभूतेषु पड्द्रव्येपु मध्ये वीतरागचिदानंदैकादिगुण- स्वभावं शुभाशुभमनोवचनकायव्यापाररहितं निजशुद्धामद्रव्यमेवोपादेयं ॥ १५४ ॥ एवमे- कोनविशतिसूत्रप्रमितस्थले निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गप्रतिपादकत्वेन पूर्वसूत्रत्रयं गतं । इदं पुनरंतरं स्थलं चतुर्दशसूत्रप्रमितं पड्व्यध्येयभूतव्यवहारसम्यक्त्वव्याख्यानमुख्यत्वेन समाप्तमिति । फलका भोक्ता होता है तथा विशुद्ध ज्ञान दर्शनरूप निज शुद्धात्मद्रव्यका श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप शुद्धोपयोगकर परिणत हुआ मोक्षका भी कर्ता होता है और अनंतसुखका भोक्ता होता है । इसलिये जीवको कर्ता भी कहाजाता है और भोक्ता भी कहा जाता है । शुभ अशुभ शुद्ध परिणमन ही सवजगह कर्तापना है और पुद्गलादि पांचद्रव्योंके अपने २ परिणामरूप जो परिणमन वही कर्तापना है पुन्य पापादिकका कर्तापना नही है, सर्वगत- पना लोकालोकव्यापकताकी अपेक्षा आकाशहीमें है धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य ये दोनों लोका- काशव्यापी है अलोकमें नहीं है और जीव द्रव्यमें एक जीवकी अपेक्षा केवलसमुद्धातमें लोक पूरण अवस्थामें लोकमें सर्वगतपना है तथा नाना जीवकी अपेक्षा सर्वगतपना नहीं है, पुद्गलद्रव्य लोकप्रमाण महास्कंधकी अपेक्षा सर्वगत है अन्य पुद्गलकी अपेक्षा सर्वगत नही है कालद्रव्य एक कालाणूकी अपेक्षा तो एकप्रदेशगत है सर्वगत नही है और नाना कालाणूकी अपेक्षा लोकाकाशके सव प्रदेशोंमें कालाणू है इसलिये सब कालाणुओंकी अपेक्षा सर्वगत कह सकते है । यह नयविवक्षासे सर्वगतपनेका व्याख्यान किया । और मुख्यवृत्तिसे विचाराजावे तो सर्वगतपना आकाशमें ही है अथवा ज्ञानकी अपेक्षा जीवमें भी है जीवका केवलज्ञान लोकालोक व्यापक है इसलिये सर्वगत कहा । ये सब द्रव्य यद्यपि व्यवहारनयकर एक क्षेत्रावगाही रहते है तौभी निश्चयनयकर अपने २ खभावको नही छोड़ते दूसरे द्रव्यमें जिनका प्रवेश नही है सभी द्रव्य निज २ खरूपमे हैं पररूप नहीं है कोई किसीका स्वभाव नही लेता । ऐसा ही कथन श्रीपंचास्तिकायमें कहा है। "अण्णोणं" इत्यादि । इसका अर्थ ऐसा है कि यद्यपि ये छहों द्रव्य परस्परमें प्रवेश करते हुए देखे जाते है तौभी कोई किसीमें प्रवेश नहीं करता, यद्यपि अन्यको अन्य , परमात्मप्रकाशः। १६५ , अथ संशयविपर्ययानध्यवसायरहितं सम्यग्ज्ञानं प्रकटयति, जं जह थक्कउ दव्वु जिय, तं तह जाणइ जो जि। अप्पहं केरउ भावडउ, णाणु मुणिजहि सो जि ॥ १५५ ॥ यत् यथा स्थितं द्रव्यं जीव तत् तथा जानाति य एव । आत्मनः संबंधि भावः ज्ञानं मन्यख स एव ॥ १५५ ॥ जं इत्यादि । जं यत् जह यथा थकउ स्थितं दव्वु द्रव्यं जिय हे जीव तं तत् तह तथा जाणइ जानाति जो जि य एव । य एव कः । अप्पहं केरउ भावडउ आमनः संबंधि भावः परिणामः णाणु मुणिजहि ज्ञानं मन्यख जानीहि सो जि स एव पूर्वोक्त आत्मपरिणाम इति । तथा च । यद्रव्यं यथा स्थितं सत्तालक्षणं उत्पादव्ययध्रौव्यलक्षणं वा गुणपर्यायलक्षणं वा सप्तभङ्गयात्मकं वा तत् तथा जानाति य आत्मसंबंधी स्वपरपरि- च्छेदको भावः परिणामस्तत् संज्ञानं भवति । अयमत्र भावार्थः । व्यवहारेण सविक- ल्पावस्थायां तत्त्वविचारकाले स्वपरपरिच्छेदकं ज्ञानं भण्यते । निश्चयनयेन पुनर्वीतराग- / अवकाश देता है तो भी अपना २ अवकाश आपमें ही है परमें नहीं है यद्यपि ये द्रव्य हमेशासे मिलरहे है तौभी अपने खभावको नहीं छोड़ते । यहां तात्पर्य यह है कि व्यव- हारसम्यक्त्वके कारण छह द्रव्योंमें वीतराग चिदानंद अनंत गुणरूप जो शुद्धात्मा है वह शुभ अशुभ मन वचन कायके व्यापारसे रहित हुआ ध्यावने योग्य है ॥ १५४ ॥ इस प्रकार उन्नीस दोहाओंके स्थलमें निश्चय व्यवहार मोक्षमार्गके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहा कहे । ऐसे चौदह दोहा तक व्यवहार सम्यक्त्वका व्याख्यान किया जिसमें छहद्रव्यका श्रद्धान मुख्य है। आगे संशय विमोह विभ्रम रहित जो सम्यग्ज्ञान है उसका स्वरूप प्रगट करते है। [ हे जीव ] हे जीव [ यत् ] ये सबद्रव्य [ यथास्थितं ] जिस तरह अनादिकालके तिष्ठे हुए है जैसा इनका खरूप हैं [ तत् तथा ] उनको वैसा ही संशयादि रहित [ य एव जानाति ] जो जानता है [ स एव ] वही [आत्मनः संबंधी भावः] आत्माका निजखरूप [ज्ञानं ] सम्यग्ज्ञान है ऐसा [मन्यस्व ] तू मान । भावार्थ-जो द्रव्य है वह सत्ता लक्षण है उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप है और सभी द्रव्य गुणपर्यायको धारण करतो हैं गुणपर्यायके विना कोई नहीं है । अथवा सब ही द्रव्य सप्तभंगीखरूप है ऐसा द्रव्योंका खरूप जो निःसदेह जाने आप परको पहचाने ऐसा जो आत्माका भाव (परिणाम) वह सम्यग्ज्ञान है। सारांश यह है कि व्यवहारनयकर विकल्प सहित अवस्थामें तत्वके विचारके समय आप परका जानपना ज्ञान कहा है और निश्चयनयकर वीतराग निर्विकल्प समाधिसमय पदार्थोका जानपना मुख्य नही लिया केवल खसवेदनज्ञान ही

१६६
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
निर्विकल्पसमाधिकाले बहिरुपयोगो यद्यप्यनीहितस्तथापीहापूर्वकविकल्पाभावागौणत्वमिति
कृत्वा स्वसंवेदनज्ञानमेव ज्ञानमुच्यते ॥ १५५ ॥
अथ खपरद्रव्यं ज्ञात्वा रागादिरूपपरद्रव्यविपयसंकल्पविकल्पत्यागेन स्वस्वरूपे अवस्थान
ज्ञानिनां चारित्रमिति प्रतिपादयति,
जाणवि मण्णवि अप्पु परु, जो परभाउ चएइ ।
सो णिड सुद्धउ भावडउ, णाणिहिं चरणु हवेह ॥ १५६ ।।
ज्ञात्वा मत्त्वा आत्मानं परं यः परभावं त्यजति ।
स निजः शुद्धः भावः ज्ञानिनां चरणं भवति ॥ १५६ ॥
जाणवि इत्यादि । जाणवि सम्यग्ज्ञानेन ज्ञात्वा न केवलं ज्ञात्वा मण्णवि तत्त्वार्थ-
श्रद्धानलक्षणपरिणामेन मत्त्वा श्रद्धाय । कं । अप्पु परु आत्मानं च परं च जो यः कर्ता
परभाउ परभावं चएइ त्यजति सो स पूर्वोक्तः जिउ निजः सुद्धउ भावडउ शुद्धो
भावः णाणिहि चरणु हवेइ ज्ञानिनां पुरुषाणां चरणं भवतीति । तद्यथा । वीतरागसह-
जानंदैकस्वभावं स्वद्रव्यं तद्विपरीतं परद्रव्यं च संशयविपर्ययानध्यवसायरहितेन ज्ञानेन
पूर्व ज्ञात्वा शंकादिदोषरहितेन सम्यक्त्वपरिणामेन श्रद्धाय च यः कर्ता मायामिथ्यानिदा-
नशल्यप्रभृतिसमस्तचिंताजालत्यागेन निजशुद्धात्मस्वरूपे परमानंदसुखरसास्वादतृप्तो भूत्वा
तिष्ठति स पुरुप एवाभेदेन निश्चयचारित्रं भवतीति भावार्थः ।। १५६ ॥ एवं मोक्षमोक्ष-
निश्चय सम्यग्ज्ञान है । व्यवहारसम्यग्ज्ञान तो परंपराय मोक्षका कारण है और निश्चय
सम्यग्ज्ञान साक्षात् मोक्षका कारण है ।। १५५ ॥
आगे निजपर द्रव्यको जानकर रागादिरूप जो परद्रव्यमें संकल्पविकल्प हैं उनके
त्यागसे जो निजखरूपमें निश्चलता वही ज्ञानी जीवोंके सम्यक् चारित्र है ऐसा कहते
हैं;-सम्यग्ज्ञानसे [आत्मानं च परं] आपको और परको [ज्ञात्वा] जानकर और
सम्यग्दर्शनसे [मत्त्वा] आपपरकी प्रतीति करके [ यः ] जो [ परभावं ] परभावको
[त्यजति ] छोड़ता है [सः] वह [ निजः शुद्धः भावः] आत्माका निज शुद्ध भाव
[ ज्ञानिनां] ज्ञानीपुरुषोंके [चरणं ] चारित्र [ भवति ] होता है। भावार्थ-वीतराग
सहजानंद अद्वितीय खभाव जो आत्मद्रव्य उससे विपरीत पुद्गलादि परद्रव्योंको सम्य-
ग्ज्ञानसे पहले तो जानें वह सम्यग्ज्ञान सशय विमोह और विभ्रम इन तीनोंसे रहित है।
तथा शंकादि दोषोंसे रहित जो सम्यग्दर्शन है उससे आप परकी श्रद्धा करै अच्छीतरह
जानके प्रतीति कर और माया मिथ्या निदान इन तीन शल्योंको आदि देकर समस्त
चिंतासमूहके त्यागसे निज शुद्धात्म खरूपमें तिष्ठै है, वह परम आनंद अतींद्रिय सुख-
रसके आखादसे तृप्त हुआ पुरुष ही अभेदनयसे निश्चय चारित्र है ॥ १५६ ॥

परमात्मप्रकाशः। १६७ , फलमोक्षमार्गादिप्रतिपादकद्वितीयमहाधिकारमध्ये निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गमुख्यत्वेन सूत्र- प्रयं पड्द्र्व्यश्रद्धानलक्षणं व्यवहारसम्यक्त्वव्याख्यानमुख्यत्वेन सूत्राणि चतुर्दश, सम्य- रज्ञानचारित्रमुख्यत्वेन सूत्रद्वयमिति समुदायेनैकोनविंशतिसूत्रस्थलं समाप्त । अथानंतरमभेदरत्नत्रयव्याख्यानमुख्यत्वेन सूत्राष्टकं कथ्यते तत्रादौ तावत् रत्नत्रयभक्त- भव्यजीवस्य लक्षणं प्रतिपादयति,- जो भत्तउ रयणत्तयह, तसु मुणि लक्खणु एउ । अप्पा मिल्लिवि गुणणिलउ, तासुवि अण्णु ण झेउ ॥१७॥ यः भक्तः रतत्रयस्य तस्य मन्यस्व लक्षणं इदम् । आत्मानं मुक्त्वा गुणनिलयं तस्यैव अन्यत् न ध्येयम् ॥ १५७ ॥ जो इत्यादि । जो यः भत्तउ भक्तः । कस्य । रयणत्तयहं रत्नत्रयसंयुक्तस्य जीवस्य मुणि मन्यस्व जानीहि हे प्रभाकरभट्ट । किं जानीहि । लक्खणु लक्षणं एउ इदमने वक्ष्यमाणं । इदं किं । अप्पा मिल्लिवि आत्मानं मुक्त्वा । किं विशिष्टं । गुणणिलउ गुणनिलयं गुणगृहं तासुवि तस्यैव जीवस्य अण्णु ण झेउ निश्चयेनान्यद्वहिर्द्रव्यं ध्येयं न भवतीति । तथाहि । व्यवहारेण वीतरागसर्वज्ञप्रणीतशुद्धात्मतत्त्वप्रभृतिषड्द्रव्यपंचास्तिका- , इस प्रकार मोक्ष, मोक्षका फल, मोक्षका मार्ग इनको कहनेवाले दूसरे महाधिकारमें निश्चयव्यवहार रूप निर्वाणके पंथकी मुख्यतासे तीन दोहाओंमें व्याख्यान किया और चौदह दोहाओंमें छह द्रव्यकी श्रद्धारूप व्यवहार सम्यक्त्वका व्याख्यान किया तथा दो दोहाओंमें सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्रकी मुख्यतासे वर्णन किया । इसप्रकार उन्नीस दोहाओंका स्थल पूरा हुआ। आगे अभेद रतत्रयके व्याख्यानकी मुख्यतासे आठ दोहासूत्र कहते हैं उनमेंसे पहले रत्नत्रयका भक्त भव्यजीव है उसका लक्षण कहते हैं;-[यः] जो जीव [ रत्नत्रयस्य भक्तः ] रत्नत्रयका भक्त है [तस्य] उसका [इदं लक्षणं] यह लक्षण [ मन्यख] जानना हे प्रभाकर भट्ट रत्नत्रय धारकके ये लक्षण हैं कि [गुणनिलयं ] गुणोंके समूह [आत्मानं मुक्त्वा ] आत्माको छोडकर [ तस्यैव अन्यत् ] आत्मासे अन्य बाय द्रव्यको [न ध्येयं ] न ध्यावै निश्चयनयसे एक आत्मा ही ध्यावने योग्य है अन्य नहीं । भावार्थ-व्यवहार नयकर वीतराग सर्वज्ञके कहे हुए शुद्धात्म तत्त्व आदि छहद्रव्य सात तत्व नौ पदार्थ पंच अस्तिकायका श्रद्धान योग्य है जानना योग्य है और हिंसादि पाप त्यागना योग्य है व्रतशीलादि पालने योग्य हैं ये लक्षण व्यवहार रत्नत्रयके हैं सो व्यवहा- रका नाम भेद है वह भेदरत्नत्रय आराधने योग्य है उसके प्रभावसे निश्चयरत्नत्रयकी प्राप्ति है। वीतराग सदा आनंदरूप जो निज शुद्धात्मा आत्मीक सुखरूप सुधारसके आखाद यस्य १६८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । यसप्ततत्त्वनवपदार्थविषये सम्यक् श्रद्धानज्ञानाहिंसादिवतशीलपरिपालनरूपस्य भेदरबत्र- निश्चयेन वीतरागसदानंदैकरूपसुखसुधारसास्वादपरिणतनिजशुद्धात्मतत्त्वसन्यक्- श्रद्धानज्ञानानुचरणरूपस्याभेदरत्नत्रयस्य च चोसौ भक्तत्तस्येदं लक्षणं जानीहि । इई कि। यद्यपि व्यवहारेण सविकल्पावस्थायां चित्तस्थितिकरणार्थ देवेन्द्रचक्रवादिविभूतिविशेष- कारणं परंपरया शुद्धात्मप्राप्तिहेतुभूतं पंचपरमेष्टिरूपस्तववस्तुस्तवगुणस्तवादिकं वचनेन स्तुत्यं भवति मनसा च तदक्षररूपादिकं प्राथमिकानां ध्येयं भवति तथापि पूर्वोक्तनिश्चय- रत्नत्रयपरिणतिकाले केवलज्ञानाद्यनंतगुणपरिणतस्वशुद्धात्मैव ध्येय इति । अत्रेदं तात्पर्य । योसावनंतज्ञानादिगुणः शुद्धात्मा ध्ययो भणितः स एव निश्चयेनोपादेय इति ॥ १५७ ॥ अथ ये ज्ञानिनो निर्मलरत्नत्रयमेवात्मानं मन्यते शिवगन्दवाच्यं ते मोक्षपदाराधकाः संतो निजात्मानं ध्यायंतीति निरूपयति, जे रयणत्तर णिम्मलओ, णाणिय अप्पु भणंति । ते आराय सिवपयह, णियअप्पा झार्यति ॥ १५८ ॥ ये रतत्रयं निर्मलं ज्ञानिनः आत्मानं भणति । ते आराधकाः शिवपदत्य निजात्मानं ध्यायति ॥ १५८ ॥ जे इत्यादि । ये केचन रयणत्तउ रत्नत्रयं । कथंभूतं । णिम्मलउ निर्मलं रागादि- कर परिणत हुआ। उसका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप अभेदरलत्रय है उसका जो भक्त (आराधक ) उसके ये लक्षण हैं यह जानो। वे कोनसे लक्षण हैं—यद्यपि व्यवहार नयकर सविकल्प अवस्थामें चित्तके स्थिर करनेके लिये पंचपरमेष्टीका स्तवन करता है जो पंचपरमेष्टीका स्तवन देवेंद्र चक्रवर्ती आदि विभूतिका कारण है और परंपराय शुद्ध आत्म- तत्त्वकी प्राप्तिका कारण है सो प्रथम अवस्थामें भव्यजीवोंको पंच परमेष्टी ध्यावने योग्य हैं उनके आत्माका स्तवन गुणोंकी स्तुति वचनसे उनकी अनेक तरहकी स्तुति करनी और मनसे उनके नामके अक्षर तथा उनका रूपादिक ध्यावने योग्य है तो भी पूर्वोक्त निश्चय- रत्नत्रयकी प्राप्तिके समय केवलज्ञानादि अनंत गुणरूप परिणत जो निजशुद्धात्मा वही आराधने योग्य है अन्य नही । तात्पर्य यह है कि ध्यान करने योग्य या तो निज आत्मा या पंचपरमेष्ठी हैं अन्य नहीं सो प्रथम अवस्थामें तो पंच परमेष्ठीका ध्यान करना योग्य है और निर्विकल्पदशामें निजखरूप ही ध्यावने योग्य है निजरूप ही उपादेय है॥ १५७॥ आगे जो ज्ञानी निर्मलरत्नत्रयको ही आत्मस्वरूप मानते हैं और अपनेको ही शिव जानते हैं वे ही मोक्षपदके धारक हुए निज आत्माको ध्यावते हैं ऐसा निरूपण करते हैं;-[ये ज्ञानिनः] जो ज्ञानी [निर्मलं रत्नत्रयं] निर्मल रागादि दोषरहित रत्नत्र- - परमात्मप्रकाशः। १६९ दोषरहितं । कथंभूता ये । णाणिय ज्ञानिनः । किं कुर्वति । अप्पु भणति पूर्वोक्तरनत्रय- स्वरूपमेवात्मानं आत्मस्वरूपं कर्मतापन्नं भणंति मन्यते ते आराहय ते पूर्वोक्ताः पुरुषाः आराधका भवंति । कस्य । सिवपयहं शिवपदस्य शिवशब्दवाच्यमोक्षस्य । मोक्षपदाराधका संतः किं कुर्वति । णियअप्पा झायंति निजात्मानं कर्मतापन्नं ध्यायति इति । तथा च ये केचन वीतरागखसंवेदनज्ञानिनः परमात्मानं सम्यक्त्रद्धानज्ञानानुष्ठानलक्षणं निश्चयरत्नत्र- यमेवाभेदनयन निजशुद्धात्मानं मन्यते ते शिवशब्दवाच्यमोक्षपदाराधका भवंति । आरा- धकाः संतः किं ध्यायति । विशुद्धज्ञानदर्शनं स्वशुद्धात्मस्वरूपं निश्चयनयेन ध्यायंति भावयतीत्यभिप्रायः ।। १५८ ।। अथात्मानं गुणवरूपं रागादिदोषरहितं ये ध्यायति ते शीघ्र नियमेन मोक्षं लभंत इति प्रकटति,- अप्पा गुणमउ णिम्मलज, अणुदिणु जे झायंति । ते पर णियमें परममुणि, लहु णिव्वाणु लहंति ॥ १५९ ॥ आत्मानं गुणमयं निर्मलं अनुदिनं ये ध्यायति । ते परं नियमेन परममुनयः लघु निर्वाणं लभंते ॥ १५९ ॥ अप्पा इत्यादि । अप्पा आत्मानं कर्मतापन्नं । कथंभूतं । गुणमउ गुणमयं केवलज्ञा- नाद्यनंतगुणनिर्वृतं । पुनरपि कथंभूतं । णिम्मलउ निर्मलं भावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्ममल- रहितं अणुदिणु दिनं दिनं प्रति अनुदिनमनवरतमित्यर्थः । इत्थंभूतमात्मानं जे झायंति ये केचन ध्यायति ते पर ते एव नान्ये णियमें निश्चयेन । 'किं विशिष्टास्ते । परमसुणि परममुनयः लहु लघु शीघ्रं लहंति लभंते । किं लभंते । णिवाणु निर्वाणमिति । अनाह यको [आत्मानं ] आत्मा [भणति] कहते हैं [ते] वे [शिवपदस्य आराधकाः] शिवपदके आराधक हैं और वे ही [निजात्मानं] मोक्षपदके आराधक हुए अपने आत्माको [ध्यायंति] ध्यावते हैं। भावार्थ-जो कोई वीतराग खसवेदन ज्ञानी सम्य- ग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्ररूप आत्माको मानते हैं वे ही मोक्षपदके आराधक हुए निश्चयनयकर केवल निजरूपको ही ध्यावते हैं ॥ १५८ ॥ आगे अनंत गुणरूप रागादिदोष रहित निज आत्माको ध्यावते हैं वे निश्चयसे शीघ्र ही मोक्षको पाते हैं यह व्याख्यान करते हैं। ये] जो पुरुष [गुणमयं] केवल- ज्ञानादि अनत गुणरूप [ निर्मलं] भाव कर्म द्रव्यकर्म नोकर्म मलरहित निर्मल [आत्मानं ] आत्माको [अनुदिनं निरंतर [ध्यायंति ] ध्यावते हैं [ते परं] वे ही [ परममुनयः] परममुनि [नियमेन] निश्चयकर [निर्वाणं] निर्वाणको [लघु] २२ १७० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । प्रभाकरभट्टः । अत्रोक्तं भवद्भिः य एव शुद्धात्मध्यानं कुर्वति त एव मोक्षं लभते नचान्ये चारित्रसारादौ पुनर्भणितं द्रव्यपरमाणु भावपरमाणु वा ध्यात्वा केवलबानमुत्पादयंती- त्यत्र विषये अस्माकं संदेहोस्ति । अत्र श्रीयोगींद्रदेवाः परिहारमाहुः । तत्र द्रव्यप- रमाणुशब्देन द्रव्यसूक्ष्मत्वं भावपरमाणुशब्देन भावसूक्ष्मत्वं ग्राह्यं न च पुद्गलद्रव्यपर- माणुः । तथाचोक्तं सर्वार्थसिद्धिटिप्पणिके । द्रव्यपरमाणुशब्देन द्रव्यसूक्ष्मत्वं भावपर- माणुशब्देन भावसूक्ष्मत्वमिति । तद्यथा । द्रव्यमात्मद्रव्यं तस्य परमाणुशब्देन सूक्ष्मावस्था ग्राह्या । सा च रागादिविकल्पोपाधिरहिता तस्य सूक्ष्मत्वं कथमिति चेत्, निर्विकल्पस- माधिविषयत्वेनेद्रियमनोविकल्पातीतत्वात् । भावशब्देन स्वसंवेदनपरिणामः तस्य भावस्य परमाणुशब्देन सूक्ष्मावस्था ग्राह्या। सूक्ष्मा कथमिति चेत् । वीतरागनिर्विकल्पसमरसी- भावविषयेन पंचेद्रियमनोविषयातीतत्वादिति । पुनरप्याह । इदं परद्रव्यावलंबनं ध्यानं निषिद्धं किल भवद्भिः निजशुद्धात्मध्यानेनैव मोक्षः कुत्रापि भणितमास्ते । परिहारमाह- "अप्पा झायहि णिम्मलउ" इत्यत्रैव ग्रंथे निरंतरं भणितमास्ते, ग्रंथांतरे च समाधिशत- कादौ पुनश्चोक्तं तैरेव पूज्यपादस्वामिमिः । "आत्मानमाला आत्मन्येवात्मनासौ क्षणमु- शीघ्र [लभंते ] पाते हैं । भावार्थ -यह कथन श्रीगुरुने कहा तव प्रभाकरभट्टने पूछा कि हे प्रभो तुमने कहा कि जो शुद्धात्माका ध्यान करते हैं वे ही मोक्षको पाते हैं दूसरा नहीं । तथा चारित्रासारादिक ग्रंथोंमें ऐसा कहा है जो द्रव्यपरमाणू और भावपरमाणूका ध्यानकर केवल ज्ञानको पाते हैं । इस विषयमें मुझको संदेह है । तब श्रीयोगीन्द्रदेव समाधान कहते है । द्रव्यपरमाणुसे द्रव्यकी सूक्ष्मता और भावपरमाणूसे भावकी सूक्ष्मता कही गई है। उसमें पुद्गल परमाणूका कथन नहीं है । तत्त्वार्थसूत्रकी सर्वार्थसिद्धि टीकामें भी ऐसा ही कथन है जो द्रव्यं परमाणू द्रव्यकी सूक्ष्मता और भावपरमाणू भावकी सूक्ष्मता समझना अन्यद्रव्यका कथन न लेना। यहां निजद्रव्य तथा निजगुणपर्यायका ही कथन है अन्य द्रव्यका प्रयोजन नही है । द्रव्य अर्थात् आत्मद्रव्य उसकी सूक्ष्मता वह द्रव्यपरमाणू कहा जाता है । वह रागादि विकल्पकी उपाधि से रहित है उसको सूक्ष्मपना कैसे हो सकता है ऐसा शिष्यने प्रश्न किया । उसका समाधान इस तरह है कि मन और इंद्री- ओंके अगोचर होनेसे सूक्ष्म कहा जाता है तथा भाव । (खसंवेदनपरिणाम) भी परम- सूक्ष्म है वीतराग निर्विकल्प परमसमरसीभावरूप है वहां मन और इंद्रियोंकी गम्य नहीं है इसलिये सूक्ष्म है । ऐसा कथन सुनकर फिर शिष्यने पूछा कि तुमने परद्रव्यके आलं- बनरूप ध्यानका निषेध किया और निजशुद्धात्माके ध्यानसे ही मोक्ष कही। ऐसा कथन किसजगह कहा है । उसका समाधान । "अप्पा झायहि णिम्मल" निर्मल आत्माको ध्यावो ऐसा कथन इस ग्रंथमें पहले कहा है और समाधिशतकमें भी श्रीपूज्यपादस्वामीने 1 . परमात्मप्रकाशः। १७१ पजनयन् स स्वयंभूः प्रवृत्तः" अस्यार्थः । आमानं कर्मतापन्नं आमा कर्ता आमन्येवा- धिकरणभूते असौ पूर्वोक्ताला आमना करणभूतेन क्षणमंतर्मुहूर्तमानं उपजनयन् निर्विक- ल्पसमाधिनाराधयन् स स्वयंभूः प्रवृत्तः सर्वज्ञो जात इत्यर्थः । ये च तत्र द्रव्यभावप- रमाणुध्येयलक्षणे शुक्लध्याने ह्यधिकचत्वारिंशद्विकल्पा भणितास्तिष्ठति ते पुनरनीहितवृत्त्या प्रायाः । केन दृष्टांतेनेति चेत् । यथा प्रथमौपशमिकसम्यक्त्वग्रहणकाले परमागमप्रसि- द्धानधाप्रवृत्तिकरणादिविकल्पान् जीवः करोति न चाहादि पूर्वकत्वेन स्मरणमस्ति तथात्र शुक्लध्याने चेति । इदमत्र तात्पर्य । प्राथमिकानां चित्तस्थितिकरणार्थ विषयक- पायदुर्ध्यानवंचनार्थ च परंपरया मुक्तिकारणमर्हदादिपरद्रव्यं ध्येयं पश्चात् चित्ते स्थिरे भूते साक्षान्मुक्तिकारणं स्वशुद्धामतत्त्वमेव ध्येयं नास्त्येकांतः । एवं साध्यसाधकभावं ज्ञात्वा ध्येयविपये विवादो न कर्तव्यः इति ॥॥ १५९ ॥ अथ सामान्यग्राहक निर्विकल्पं सत्तावलोकदर्शनं कथयति, सयलपयत्थहं जं गहणु, जीवहं अग्गिमु होइ । वत्थुविसेसविवज्जियउ, तं णियदसणु जोइ ॥१६० ॥ सकलपदार्थानां यत् ग्रहणं जीवानां अग्रिमं भवति । वस्तुविशेषविवर्जितं तत् निजदर्शनं पश्य ॥ १६० ।। सयल इत्यादि । सयलपयत्थहं सकलपदार्थानां जं गहणु यगृहणमवलोकनं । कस्य । कहा है "आत्मानम्" इत्यादि । अर्थात् जीवपदार्थ अपने खरूपको अपनेमें ही अपने करके एक क्षणमात्र भी निर्विकल्प समाधिकर आराधता हुआ वह सर्वज्ञवीतराग हो जाता है । जिस शुक्ल ध्यानमें द्रव्य परमाणुकी सूक्ष्मता और भावपरमाणुकी सूक्ष्मता ध्यान करने योग्य है ऐसे शुक्ल ध्यानमें निजवस्तु और निजभावका ही सहारा है पर वस्तुका नही । सिद्धातमें शुक्ल ध्यानके व्यालीस भेद कहे हैं वे अवांछीक वृत्तिसे गौणरूप जानना मुख्य- वृत्तिसे न जानना । उसका दृष्टात । जैसे उपशमसम्यक्त्वके ग्रहणके समय परमागममें प्रसिद्ध जो अधाकरणादि भेद हैं उनको जीव करता है वे वाछापूर्वक नही होते सहजही होते हैं वैसे ही शुक्ल ध्यानमें भी ऐसेही जानना । तात्पर्य यह है कि प्रथम अवस्थामें चित्तके थिर करनेके लिये और विषयकषायरूप खोटे ध्यानके रोकनेके लिये परंपराय मुक्तिके कारणरूप अरहंत आदि पंच परमेष्टी ध्यान करने योग्य हैं वादमें चित्तके स्थिर होनेपर साक्षात् मुक्तिका कारण जो निज शुद्धात्मतत्त्व है वही ध्यावने योग्य है। इस प्रकार साध्य साधकभावको जानकर ध्यावने योग्य वस्तुमें विवाद नहीं करना पंचपरमे- ष्टीका ध्यान साधक है और आत्मध्यान साध्य है यह निःसदेह जानना ॥ १५९ ॥ मागे सामान्य ग्राहक निर्विकल्प सत्तावलोकन रूप दर्शनको कहते हैं। [यत् ] जो ।

१७२
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
जीवहं जीवस्य अथवा बहुवचनपक्षे “जीवह" जीवानां । कथंभूतमवलोकनं । अग्गिमु
अग्रिमं सविकल्पज्ञानात्पूर्व होइ भवति । पुनरपि कथंभूतं । वत्थुविसेसविवजियउ
वस्तुविशेषविवर्जितं शुक्लमिदमित्यादिविकल्परहितं तं तत्पूर्वोक्तलक्षणं णियदंसणु निज
आमा तस्य दर्शनमवलोकनं जोइ पश्य जानीहीति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । निजामा
तस्य दर्शनमवलोकनं दर्शनमिति व्याख्यातं भवद्भिरिदं तु सत्तावलोकदर्शनं मिथ्यादृष्टी-
नामप्यस्ति तेषामपि मोक्षो भवतु । परिहारमाह । चक्षुरचक्षुरवधिकेवलभेदेन चतुर्धा
दर्शनं । अत्र चतुष्टयमध्ये मानसमचक्षुर्दर्शनमालाग्राहकं भवति तच्च मिथ्यात्वादिसप्त-
प्रकृत्युपशमक्षयोपशमक्षयजनिततत्त्वार्थश्रद्धानलक्षणसम्यक्त्वाभावात् शुद्धासतत्त्वमेवोपादेय-
मिति श्रद्धानाभावे सति तेषां मिथ्यादृष्टीनां न भवत्येवेति भावार्थः ॥ १६० ॥
अथ छमस्थानां सत्तावलोकदर्शनपूर्वकं ज्ञानं भवतीति प्रतिपादयति,-
दसणु पुव्वु हवेइ फुड, जं जीवहं विण्णाणु ।
वत्थुविसेसु मुणंतु जिय, तं मुणि अविचलु णाणु ॥१३१॥
दर्शनपूर्व भवति स्फुटं यत् जीवानां विज्ञानं ।
वस्तुविशेष जानन् जीव तत् मन्यख अविचलं ज्ञानं ॥ १६१ ।।
[जीवानां ] जीवोंके [अग्रिमं] ज्ञानके पहले [ सकलपदार्थानां] सब पदार्थोंका
[वस्तुविवर्जितं ] यह सफेद है इत्यादि भेदरहित [ग्रहणं] सामान्यरूप देखना [ तत् ]
वह [निजदर्शनं ] दर्शन है [पश्य ] उसको तू जान । भावार्थ-यहां प्रभाकर भट्ट
पूछता है कि आपने जो कहा कि निजात्माका देखना वह दर्शन है ऐसा बहुतवार तुमने
कहा है अब सामान्य अवलोकनरूप दर्शन कहते है । ऐसा दर्शन तो मिथ्या दृष्टियोंके
भी होता है उनकोभी मोक्ष कहनी चाहिये । उसका समाधान । चक्षुदर्शन - अचक्षुदर्शन
अवधिदर्शन केवलदर्शन ये दर्शनके चार भेद हैं। इन चारों में मनकर जो देखना वह
अचक्षुदर्शन है जो आंखोंसे देखना वह चक्षुदर्शन है। इन चारोंमेंसे आत्माका अवलोकन
छद्मस्य अवस्थामें मनसे होता है और वह आत्मदर्शन मिथ्यात्व आदि सातप्रकृतियोंके
उपशम क्षयोपशम तथा क्षयसे होता है । सो सम्यग्दृष्टिके तो यह दर्शन तत्त्वार्थ श्रद्धान-
रूप होनेसे मोक्षका कारण है जिसमें शुद्ध आत्मतत्त्व ही उपादेय है और मिथ्यादृष्टि-
योंके तत्त्वश्रद्धान नहीं होनेसे आत्माका दर्शन नही होता। मिथ्यादृष्टियोंके स्थूलरूप
परद्रव्यका देखना जानना मन इंद्रियों के द्वारा होता है वह सम्यग्दर्शन नही है इसलिये
मोक्षका कारण भी नहीं है । सारांश यह है कि तत्त्वार्थ श्रद्धानके अभावसे सम्यक्त्वका
अभाव है और सम्यक्त्वके अभावसे मोक्षका अभाव है ॥ १६० ॥

परमात्मप्रकाशः। १७३ ३ । दसणु पुव्वु इत्यादि । दसणपुबु सामान्यग्राहकनिर्विकल्पसत्तावलोकदर्शनपूर्वकं हवेइ भवति फुड स्फुटं जं यत् जीवहं जीवाना । किं भवति । विण्णाणु विज्ञानं । किं कुर्वन् । सन् । वत्थुविसेसु मुणंतु वस्तुविशेष वर्णसंस्थानादिविकल्पपूर्वक जानन जिय हे जीव तं तत् मुणि मन्यस्व जानीहि । किं जानीहि । अविचलु णाणु अविचलं संशयविपर्य- यानध्यवसायरहितं ज्ञानमिति । तत्रेदं दर्शनपूर्वकं ज्ञानं व्याख्यातं । यद्यपि शुद्धात्मभा- वनाव्याख्यानकाले प्रस्तुतं न भवति तथापि भणितं भगवता । कस्मादिति चेत् । चक्षु- रचक्षुरवधिकेवलभेदेन दर्शनोपयोगश्चतुर्विधो भवति । तत्र चतुष्टयमध्ये द्वितीयं यदचक्षु- दर्शनं मानसरूपं निर्विकल्पं यथा भव्यजीवस्य दर्शनमोहोपशमक्षयोपशमक्षयलाभे सति शुद्धालानुभूतिरुचिरूपं वीतरागसम्यक्त्वं भवति तथैव च शुद्धालानुभूतिस्थिरतालक्षणं वीतरागचरित्रं भवति तदा काले तत्पूर्वोक्तं सत्तावलोकलक्षणं मानसं निर्विकल्पदर्शनं कर्तृ पूर्वोक्तनिश्चयसम्यत्तवचारित्रवलेन निर्विकल्पनिजशुद्धालानुभूविध्यानेन सहकारिकारणं भवति पूर्वोक्तभव्यजीवस्य नचाभव्यस्य । कस्मात् । निश्चयसम्यक्त्वचारित्राभावादिति भावार्थः ॥ १६१॥ आगे केवल ज्ञानके पहले छद्मस्थोंके पहले दर्शन होता है उसके वाद ज्ञान होता है और केवली भगवानके दर्शन और ज्ञान एक साथ ही होते हैं आगे पीछे नहीं होते यह कहते हैं। [यत् ] जो [जीवानां] जीवोंके [विज्ञानं ] ज्ञान है वह [स्फुटं] निश्चयकरके [दर्शनपूर्व ] दर्शनके वादमें [ भवति] होता है [तत् ज्ञानं] वह ज्ञान [वस्तुविशेषं जानन् ] वस्तुकी विस्तीर्णता को जाननेवाला है उस ज्ञानको [जीव] हे जीव [अविचलं] सशय विमोह विभ्रमसे रहित [मन्यस्त्र] तू जान । भावार्थ- जो सामान्यको ग्रहण करै विशेष न जाने वह दर्शन है तथा जो वस्तुका विशेषवर्णन आकार जानै वह ज्ञान है। यह दर्शन ज्ञानका व्याख्यान किया । यद्यपि यह व्यवहार सम्यग्ज्ञान शुद्धात्माकी भावनाके व्याख्यान समय प्रशंसा योग्य नहीं है तौमी प्रथम अव- स्थामें प्रशंसा योग्य है ऐसा भगवानने कहा है । क्योंकि चक्षु अचक्षु अवधि केवलके भेदसे दर्शनोपयोग चारतरहका होता है । उन चार भेदोंमें दूसरा भेद अचक्षुदर्शन मन संबंधी निर्विकल्प भव्यजीवोंके दर्शनमोह चारित्रमोहके उपशम क्षयोपशम तथा क्षयके होनेपर शुद्धात्मानुभूति रुचिरूप वीतराग सम्यक्त्व होता है और शुद्धात्मानुभूतिमें स्थिर- तारूप वीतराग चारित्र होता है उस समय पूर्वोक्त सत्ताके अवलोकनरूप मनसबंधी निर्विकल्पदर्शन निश्चयचारित्रके वलसे विकल्परहित निज शुद्धात्मानुभूतिके ध्यानकर सहकारी कारण होता है । इसलिये व्यवहारसम्यग्दर्शन और व्यवहारसम्यग्ज्ञान भव्य- जीवके ही होता है अभव्यके सर्वथा नही क्योंकि अभव्यजीव मुक्तिका पात्र नहीं है।

१७४ रायचंद्र जैनशास्त्रमालायाम् । अथ परमध्यानारूढो ज्ञानी समभावेन दुःखं सहमानः स एवाभेदेन निर्जराहेतुर्भण्यते इति दर्शयति;- दुक्खुवि सुक्खु सहंतु जिय, णाणिउं झाणणिलीणु । कम्महं णिजरहेउ तउ बुच्चइ संगविहीणु ॥ १६२॥ दुःखमपि सुखं सहमानः जीव ज्ञानी ध्याननिलीनः । कर्मणः निर्जराहेतुः तपः उच्यते संगविहीनः ॥ १६२ ॥ दुक्खुवि इत्यादि । दुक्खुवि सुक्खु सहंतु दुःखमपि सुखमपि समभावेन सहमानः सन् जिय हे जीव । कोसौ कर्ता । णाणिउ वीतरागस्वसंवेदनज्ञानी । किविशिष्टः । झाणणिलीणु वीतरागचिदानंदैकाग्र्यध्याननिलीनो रतः स एवाभेदेन कम्महं णिजरहेउ शुभाशुभकर्मणो निर्जराहेतुरुच्यते न केवलं ध्यानपरिणतपुरुषो निर्जराहेतुरुच्यते तउ परद्र- व्येच्छानिरोधरूपबाह्याभ्यंतरलक्षणं द्वादशविधं तपश्च । किविशिष्टः स तपोधनस्तत्त- पश्च । संगविहीणु संगविहीनो बाह्याभ्यंतरपरिग्रहरहित इति । अत्राह प्रभाकर भट्टः । ध्यानेन निर्जरा भणिता भवद्भिः उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिंतानिरोघो ध्यानमिति ध्यानलक्षणं जो मुक्तिका पात्र होता है उसीके व्यवहार रत्नत्रयकी प्राप्ति होती है । व्यवहार रनत्रय वह परंपराय मोक्षका कारण है और निश्चयरतत्रय साक्षात् मुक्तिका कारण है ऐसा तात्पर्य हुआ ॥ १६१ ॥ आगे परमध्यानमें आरूढ ज्ञानी जीव समभावसे दुःख सुखको सहता हुआ अभेदन- यसे निर्जराका कारण होता है ऐसा दिखाते है।-[जीव] हे जीव [ज्ञानी] वीतराग- खसंवेदनज्ञानी [ध्याननिलीनः ] आत्मध्यानमें लीन [दुःखं अपि सुखं] दुःख और सुखको [सहमानः] समभावोंसे सहता हुआ अभेद नयसे [कर्मणो निर्जराहेतुः] शुभ अशुभ कर्मोकी निजेराका कारण है ऐसा भगवानने [ उच्यते] कहा है और [संगवि- हीनः तपः] बाह्य आभ्यंतर परिग्रह रहित परद्रव्यकी इच्छाके निरोधरूप बाम अभ्यंतर अनशनादि बारह प्रकारके तपरूप भी वह ज्ञानी है । भावार्थ-यहां प्रभाकर भट्टने प्रश्न किया कि हे प्रभो आपने ध्यानसे निर्जरा कही वह ध्यान एकाग्र चित्तका निरोधरूप उत्तमसंहननवाले मुनिके होता है जहां उत्तमसंहननही नहीं है वहां ध्यान किस तरहसे हो सकता है । उसका समाधान श्रीगुरु कहते हैं । उत्तमसंहननवाले मुनिके जो ध्यान कहा है वह आठवें गुणस्थानसे लेकर उपशम क्षपक श्रेणीवालोंके जो शुक्लध्यान होता है उसकी अपेक्षा कहा गया है । उपशमश्रेणी वव्रषभनाराच वजनाराच नाराच इन तीन संहननवालोंके होती है उनके शुक्लध्यानका पहला पाया है वे ग्यारवें गुणस्थानसे नीचे आते हैं और क्षपक श्रेणी एक वनवृषभनाराच संहननवालेके ही होती है वे आठवें परमात्मप्रकाशः। १७५ उत्तमसंहननाभावे कथं ध्यानमिति । भगवानाह । उत्तमसंहनेन यद्धयानं भणितं तदपूर्व- गुणस्थानादिपूपशमक्षपकण्योर्यत् शुक्लध्यानं तदपेक्षया भणितम् अपूर्वगुणस्थानादधस्तन- गुणस्थानेषु धर्मध्यानस्य निषेधकं न भवति । तथाचोक्तं तत्त्वानुशासने ध्यानग्रंथे । “यत्पु- नर्वभकायस्य ध्यानमित्यागमे वचः । श्रेण्योानं प्रतीत्योक्तं तन्नाधस्तानिषेधकं" । किं च । रागद्वेपाभावलक्षणं परमं यथाख्यातरूपं स्वरूपे चरणं निश्चयचारित्रं भणंति इदानीं तदभावेन्यच्चारित्रमाचरंतु तपोधनाः । तथाचोक्तं तत्रेदं । "चरितारो न संत्यद्य यथाख्यातस्य संप्रति । तकिमन्ये यथाशक्तिमाचरंतु तपस्विनः" । पुनश्चोक्तं श्रीकुंदकुंदाचार्यदेवैः मोक्ष- प्राभृते । "अजवि तिरयणसुद्धा अप्पा झाऊण लहहि इंदत्तं । लोयंतियदेवत्तं तत्थ चुदा गुणस्थानमें क्षपक श्रेणी मांडते (प्रारंभ करते) हैं उनके आठवें गुणस्थानमें शुक्लध्यानका पहला पाया (भेद ) होता है वह आठवें नवमें दशवें तथा दशवेंसे बारवें गुणस्थानमें स्पर्श करते हैं ग्यारवेंमें नहीं तथा वारवेंमें शुक्लध्यानका दूसरा पाया होता है उसके प्रसा- दसे केवलज्ञान पाता है और उसी भवमें मोक्ष को जाता है । इसलिये उत्तमसहननका कथन शुक्लध्यानकी अपेक्षा है । आठवें गुणस्थानसे नीचेके चौथेसे लेकर सातवें तक शुक्लध्यान नहीं होता धर्मध्यान ही है वह धर्मध्यान छहो सहननवालोंके है श्रेणीके नीचे धर्मध्यान ही है उसका निषेध किसी सहननमें नही है । ऐसा ही कथन तत्त्वानुशासन नामा ग्रंथमें कहा है "यत्पुनः" इत्यादि । उसका अर्थ ऐसा है कि जो वज्रकायके ही ध्यान होता है ऐसा आगममें वचन कहा है वह दोनों श्रेणियोंमें शुक्लध्यान होनेकी अपेक्षा है और श्रेणीके नीचे जो धर्मध्यान है उसका निषेध (न होना) किसी संहननमें नहीं कहा है यह निश्चयसे जानना | रागद्वेषके अभावरूप उत्कृष्ट यथाख्यातखरूप खरूपाचरण निश्चय चारित्र है वह इस समय पंचमकालमें भरतक्षेत्रमें नही है इसालेये साधुजन अन्य चारित्रको आचरण करौ । चारित्रके पांच भेद हैं सामायिक छेदोपस्था- पना परिहारविशुद्धि सूक्ष्मसापराय यथाख्यात । उनमें इस समय इस क्षेत्रमें सामायिक छेदोपस्थापना ये दोही चारित्र होते हैं अन्य नहीं इसलिये इनको ही आचरौ । तत्त्वानु- शासनमें भी कहा है "चारितारो इत्यादि । इसका अर्थ ऐसा है कि इस समय यथा- ल्यात चारित्रके आचरण करनेवाले मौजूद नहीं है तो क्या हुआ अपनी शक्तिके अनुसार तपस्सीजन सामायिक छेदोपस्थापनाका आचरण करौ । फिर श्रीकुंदकुंदाचार्यने भी मोक्षपाहुड़में ऐसा ही कहा है "अजवि" इत्यादि । उसका तात्पर्य यह है कि अब भी इस पंचमकालमें मन वचन कायकी शुद्धतासे आत्माका ध्यान करके यह जीव इंद्र पदको पाता है अथवा लोकांतिकदेव होता है और वहासे च्युत होकर मनुष्य भव धारण करके मोक्षको पाता है। अर्थात् जो इस समय पहलेके तीन संहनन तो नहीं हैं रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । णिज्बुदि जंति” । अयमत्र भावार्थः । यथादित्रिकसंहननलमणवीतरागययाख्यातचारि- त्राभावेपीदानी शेषसंहनेनापि संसारस्थितिछेदकारणं परंपरया मुक्तिकारणं च धर्मध्यानमा- चरंतीति ।। १६२ ॥ अथ सुखदु:खं सहमानः सन् येन कारणेन समभावं करोति मुनिस्तेन कारणेन पुण्य- पापद्वयं संवरहतुर्भवतीति दर्शयति;- विपिणवि जेण सहंतु मुणि, मणि समभाउ करेइ । पुण्णहं पावहं तेण जिय, संवरहेज हवेइ ।। १६३ ।। द्वे अपि येन सहमानः मुनिः मनसि समभावं करोति । पुण्यस्य पापस्य तेन जीव संवरहेतुः भवति ॥ १६३ ।। विण्णिवि इत्यादि । विण्णिवि द्वे अपि सुखदुःखे जेण येन कारणेन सहंतु समानः सन् । कोसौ कर्ता । मुणि मुनिः स्वसंवेदनप्रत्यक्षबानी मणि अविक्षिप्रमनसि समभाउ समभावं सहजशुद्धज्ञानानंदैकरूपं रागद्वेपमोहरहितं परिणामं कर्मतापन्नं करेइ करोति परिणमति पुण्णहं पावहं पुण्यस्य पापस्य संबंधी तेण तेन कारणेन जिय हे जीव संवर- हेड संवरहेतुः कारणं हवेइ भवतीति । अयमत्र तात्पर्यार्थः । कर्मोदयवशात् सुखदुःखे परंतु अर्घनाराच कीलक स्पाटिका ये आगेके तीन हैं इन तीनोंसे सामायिक छेदोपस्था- पनाका आचरण करो तथा धर्मध्यानको आचरो । धर्मध्यानका अभाव छहों संहनोंमें नहीं है शुक्लध्यान पहलेके तीन संहननोंमें ही होता है उनमें भी पहला पाया (भेद) उपशम श्रेणीसंबंधी तीनों संहननों में है और दूसरा तीसरा चौथा पाया प्रथमसंहननवाले हीके होता है ऐसा नियम है । इसलिये अब शुक्लध्यानके अभावमें भी हीन संहनन- वाले इस धर्मध्यानको आचरो । यह धर्मध्यान परंपराय मुक्तिका मार्ग है संसारकी स्थितिका छेदनेवाला है । जो कोई नास्तिक इस समय धर्मध्यानका अभाव मानते हैं बोलनेवाले हैं इस समय धर्मध्यान है शुक्लध्यान नहीं है ॥ १६२ ।। आगे जो मुनिराज सुखदुःखको सहते हुए समभाव रखते हैं अर्थात् सुखमें तो हर्ष नहीं करते और दुःखमें खेद नहीं करते जिनके सुख दुःख दोनों ही समान हैं वे ही साधु पुन्यकर्म पापकर्मके संवर (रोकने ) के कारण है आनेवाले कर्मों को रोकते हैं ऐसा दिखलाते हैं। [येन] जिस कारण [द्वे अपि सहमानः] सुख दुःख दोनों को ही सहता हुआ [मुनिः] स्वसंवेदनप्रत्यक्षज्ञानी [मनसि] निश्चित मनमें [समभावं] सम- भावोंको [करोति] धारण करता है अर्थात् रागद्वेषमोहरहित स्वाभाविक शुद्धज्ञानानंद खरूप परिणमन करता है विभाव रूप, नहीं परिणमता [वेन] इसी कारण [हे जीव] हे जीव वह मुनि [पुण्यस्य पापस्य संवरहेतुः] सहजमें ही पुण्य और पाप इन दोनोंके ro परमात्मप्रकाशः। १७७ जातेपि योसौ रागादिरहितमनसि विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजशुद्धालसंवित्तिं न त्यजति स पुरुप एवाभेदनयेन द्रव्यभावरूपपुण्यपापसंवरस्य हेतुः कारणं भवतीति ॥ १६३ ।। अथ यावंतं कालं रागादिरहितपरिणामेन स्वशुद्धात्मस्वरूपे तन्मयो भूत्वा तिष्ठति तावंतं कालं संवरनिर्जरां करोतीति प्रतिपादयति, अत्थइ जित्तिउ कालु मुणि, अप्पसरूवि णिलीणु । संवरणिज्जर जाणि तुहं, सयलविअप्पविहीणु ॥ १६४ ॥ तिष्ठति यावंतं कालं मुनिः आत्मखरूपे निलीनः । संवरनिर्जरां जानीहि त्वं सकलविकल्पविहीनं ॥ १६४ ॥ अत्थइ इत्यादि । अत्थइ तिष्ठति । किंकृत्वा तिष्ठति । जित्तिउ कालु यावंतं कालं प्राप्य । क तिष्ठति । अप्पसरूवि निजशुद्धात्मस्वरूपे । कथंभूतः सन् । णिलीणु निश्च- येन लीनो द्रवीभूतो वीतरागनित्यानंदैकपरमसमरसीभावेन परिणतः हे प्रभाकर इत्थंभूत- परिणामपरिणतं तपोधनमेवाभेदेन संवरणिजर जाणि तुहं संवरनिर्जरास्वरूपं जानीहि त्वं । पुनरपि कथंभूतं । सयलवियप्पविहीणु सकलविकल्पहीनं ख्यातिपूजालाभप्रभृति- विकल्पजालावलीरहितमिति । अत्र विशेपव्याख्यानं यदेव पूर्वसूत्रद्वयभणितं तदेव ज्ञातव्यं । कस्मात् । तस्यैव निर्जरासंवरव्याख्यानस्योपसंहारोयमित्यभिप्रायः ॥ १६४ ॥ एवं मोक्षमोक्षमार्गमोक्षफलादिप्रतिपादकद्वितीयमहाधिकारोक्तसूत्राष्टकेनाभेदरत्नत्रयव्याख्या- संवरका कारण [भवति ] होता है । भावार्थ-कर्मके उदयसे सुख दुःख उत्पन्न होने- पर भी जो मुनीश्वर रागादिरहितमनमें शुद्ध ज्ञान दर्शनखरूप अपने निज शुद्धखरूपको नही छोड़ता है वही पुरुष अभेदनयकर द्रव्य भावरूप पुण्य पापके संवरका कारण है ॥१६३॥ आगे जिस समय जितने काल तक रागादि रहित परिणामोंकर निज शुद्धात्मखरूपमें तन्मय हुआ ठहरता है तब तक सवर और निर्जराको करता है ऐसा कहते हैं;-मुनिः] मुनिराज [यावंतं कालं] जब तक [आत्मस्वरूपे निलीनः] आत्मखरूपमें लीन हुआ [तिष्ठति] रहता है अर्थात् वीतराग नित्यानंद परम समरसीमावकर परिणमता हुआ अपने स्वभावमें तल्लीन होता है, उस समय हे प्रभाकर भट्ट [त्वं] तू सकलविकल्प- विहीनं] समस्त विकल्पसमूहोंसे रहित अर्थात् ख्याति ( अपनी बड़ाई) पूजा ( अपनी प्रतिष्ठा) लाभको आदि देकर विकल्पोंसे रहित उस मुनिको [संवरनिर्जरां] संवर निर्जरा खरूप [जानीहि ] जान । यहापर भावार्थरूप विशेष व्याख्यान जोकि पहले दो सूत्रोंमें कहा था वही जानो । इस प्रकार सवर निर्जराका व्याख्यान सक्षेपरूप कहा है ॥ १६४ ॥ इस तरह मोक्ष मोक्षमार्ग और मोक्षफलका निरूपण करनेवाले दूसरे गया २३

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रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
नमुख्यत्वेन स्थलं समाप्तं ।। अत ऊर्ध्व चतुर्दशसूत्रपर्यतं परमोपशमभावमुख्यत्वेन
व्याख्यानं करोति ।
तथाहि,-
कम्मु पुरकिउ सो खवइ, अहिणव पेसु ण देई ।
संगु मुएविणु जो सयल, उवसमभाउ करेइ ॥१६५ ॥
कर्म पुराकृतं स क्षपयति अभिनवं प्रवेशं न ददाति ।
संगं मुक्त्वा यः सकलं उपशमभावं करोति ॥ १६५ ॥
कम्मु इत्यादि । कम्मु पुरकिउ कर्म पुराकृतं सो खवइ स एव वीतरागस्वसंवेदनत-
त्वज्ञानी क्षपयति । पुनरपि किं करोति । अहिणव पेसु ण देइ अभिनव कर्म प्रवेश
न ददाति । स कः । संगु मुएविणु जो सयलु संगं बाह्याभ्यंतरपरिग्रहं मुक्त्वा यः कर्ता
समस्तं । पश्चात्किं करोति । उवसमभाउ करेइ जीवितमरणलाभालाभसुखदुःखादिसम-
ताभावलक्षणसमभावं करोति । तद्यथा । स एव पुराकृतकर्म क्षपयति नवतरं संवृणोति य
एव वाह्याभ्यंतरपरिग्रहं मुक्त्वा सर्वशास्त्रं पठित्वा च शास्त्रफलभूतं वीतरागपरमानंदैकसुख-
रसाखादरूपं समभावं करोतीति भावार्थः । तथा चोक्तं । “साम्यमेवादराद्भाव्यं किमन्यै-
ग्रंथविस्तरैः । प्रक्रियामात्रमेवेदं वाङ्मयं विश्वमत्य हि ॥ १६५ ॥
महाधिकारमें आठ दोहा सूत्रोंसे अभेदरत्नत्रयके व्याख्यानकी मुख्यतासे अंतरस्थल
पूरा हुआ।
आगे चौदह दोहा तक परम उपशम भावकी मुख्यतासे व्याख्यान करते हैं।
[स एव] वही वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानी [पुराकृतं कर्म] पूर्व उपार्जित कर्मोंको [क्षप-
यति क्षय करता है और [अभिनवं] नवे कर्मोंको [प्रवेशं] प्रवेश [न ददाति]
नहीं होने देता [यः] जो कि [सकलं] सव [संगं] बाह्य अभ्यंतर परिग्रहको मुक्त्वा]
छोडकर [उपशमभावं] परम शांत भावको [करोति] करता है अर्थात् जीवन मरण
लाम अलाभ सुख दुःख शत्रु मित्र तृण कंचन इत्यादि वस्तुओंमें एकसा परिणाम रखता
है । भावार्थ-जो मुनिराज सकल परिग्रहको छोड़कर सब शास्त्रोंका रहस्य जानके
वीतराग परमानंद सुखरसका आखादी हुआ समभाव करता है वही साधु पूर्वके कर्मोका
क्षय करता है और नवीन कौंको रोकता है । ऐसा ही कथन पद्मनंदि पचीसीमें भी
कहा है। "साम्यमेव" इत्यादि । इसका तात्पर्य यह है कि आदरसे समभावको ही धारण
करना चाहिये अन्य ग्रंथके विस्तारोंसे क्या, समस्त पंथ तथा सकल द्वादशांग इस समभा-
वरूप सूत्रकी ही टीका है ॥ १६५ ॥

परमात्मप्रकाशः।
१७९
अथ यः समभावं करोति तस्यैव निश्चयेन सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि नान्यस्येति
दर्शयति,
दसणु णाणु चरित्तु तसु जो समभाउ करेइ ।
इयरहं एकुवि अस्थि णवि, जिणवरु एउ भणेइ ॥१६६ ॥
दर्शनं ज्ञानं चारित्रं तस्य यः समभावं करोति ।
इतरस्य एकमपि अस्ति नैव जिनवरः एवं भणति ॥ १६६ ॥
दसणु इत्यादि । दसणु णाणु चरित्तु सम्यग्दर्शनज्ञानचरित्रत्रयं तसु निश्चयनयेन
तस्यैव भवति । कस्य । जो समभाउ करेइ यः कर्ता समभावं करोति इयरहं इतरस्य
समभावरहितस्य एकुवि अत्थि णवि रत्नत्रयमध्ये नास्येकमपि जिणवरु एउ भणेइ
जिनवरो वीतरागः सर्वज्ञ एवं भणतीति । तथाहि । निश्चयनयेन निजशुद्धात्मैवोपादेय
इति रुचिरूपं सम्यग्दर्शनं तस्यैव निजशुद्धात्मसंवित्तिसमुत्पन्नवीतरागपरमानंदमधुररसास्वा-
दोयमात्मा निरंतराकुलत्वोत्पादकत्वात् कटुकरसास्वादाः कामक्रोधादय इति भेदज्ञानं तस्यैव
भवति स्वरूपे चरणं चारित्रमिति वीतरागचारित्रं तस्यैव भवति । तस्य कस्य । वीतराग-
निर्विकल्पपरमसामायिकभावनानुकूलं निर्दोषिपरमात्मसम्यश्रद्धानज्ञानानुचरणरूपं यः
समभावं करोतीति भावार्थः ॥ १६६ ॥
अथ यदा ज्ञानी जीव उपशाम्यति तदा संयतो भवति कामक्रोधादिकषायसंगतः पुनर-
संयतो भवतीति निश्चिनोति,-
आगे जो जीव समभावको करता है उसीके निश्चयसे सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक
चारित्र होते हैं अन्यके नही ऐसा दिखलाते हैं;-[दर्शनं ज्ञानं चारित्रं] सम्यग्दर्शन
ज्ञान चारित्र [तस्य ] उसीके निश्चयसे होते हैं [यः] जो यति [समभावं] समभाव
[करोति] करता है [इतरस्य ] दूसरे समभाव रहित जीवके [एक अपि] तीन रत्नोंमेंसे
एक भी [नैव अस्ति ] नही है [एवं ] इस प्रकार [जिनवरः] जिनेन्द्रदेव [भणति]
कहते हैं । भावार्थ-निश्चय नयसे निजशुद्धात्मा ही उपादेय है ऐसी रुचिरूप सम्य-
ग्दर्शन उस समभावके धारकके होता है । और निजशुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ
जो वीतराग परमानंद मधुररसका आखाद उस खरूप आत्मा है तथा हमेशा आकुलताके
उपजाने वाले काम क्रोधादिक हैं वे महा कटुकरसरूप अत्यंत विरस हैं ऐसा जानना वह
सम्यग्ज्ञान और खरूपके आचरणरूप वीतराग चारित्र भी उसी समभावके धारण करने-
यालेके ही होता है जो मुनीश्वर वीतराग निर्विकल्प परम सामायिक भावकी भावनाके
अनुकूल (सन्मुख) निर्दोष परमात्माके यथार्थ श्रद्धान यथार्थ ज्ञान और खरूपका यथार्थ
आचरणरूप अखंड भाव धारण करता है उसीके परमसमाधिकी सिद्धि होती है ॥१६६॥

१८० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । जावइ णाणि उवसमई, तामई संजदु होइ । होइ कसायहं वसिगयउ, जीउ असंजदु सोइ ॥ १६७ ।। यदा ज्ञानी उपशाम्यति तदा सयतो भवति । भवति कपायानां वशंगतः जीवः असयतः स एव ।। १६७ ।। जांवइ इत्यादि । जांवइ यदा काले णाणिउ ज्ञानी जीवः उवसमइ उपशाम्यति तामइ तदा काले संजदु होइ संयतो भवति । होइ भवति कसायहं वसिगयउ कपायवा- गतः जीउ जीवः । कथंभूतो भवति । असंजदु असंयतः । कोसौ । सोइ स एव पूर्वोक्त- जीव इति । अयमत्र भावार्थः । अनाकुलत्वलक्षणस्य स्वशुद्धात्मभावनोत्थपारमार्थिकसुख- स्थानुकूलपरमोपशमो यदा ज्ञानी तिष्ठति तदा संयतो भवति तद्विपरीतं परमात्माकुललो- त्पादककामक्रोधादौ परिणतः पुनरसंयतो भवतीति । तथा चोक्तं । "अकसायं तु चरितं कसायवसगद असंजदो होदि । उपसमइ जम्हि काले तत्काले संजदो होदि" || १६७ ।। अथ येन कषाया भवंति मनसि तं मोहं त्यजेति प्रतिपादयति;- जेण कसाय हवंति मणि, सो जिय मिल्लहि मोहु । मोहकसायविवजियउ, पर पावहिं समवोहु ॥ १६८ ॥ येन कषाया भवंति मनसि तं जीव मुंच मोहम् । मोहकषायविवर्जितः परं प्राप्नोषि समबोधम् ॥ १६८ ।। आगे ऐसा कहते हैं कि जिस समय ज्ञानी जीव शात भावको धारण करता है उसी समय सयमी होता है तथा जब क्रोधादि कपायके वश होता है तव असंयमी होता है।-[यदा] जिससमय [ ज्ञानी जीवः ] ज्ञानी जीव [ उपशाम्यति ] शांत भावको प्राप्त होता है [तदा] उस समय [ संयतः भवति ] संयमी होता है और [कपा- याणां] क्रोधादि कषायोंके [वशं गतः] आधीन हुआ [स एव] वही जीव [असंयतः] असयमी [ भवति] होता है । भावार्थ-आकुलता रहित निज शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न हुए निर्विकल्प ( असली ) सुखका कारण जो परमशांतभाव उसमें जिससमय ज्ञानी ठहरता है उसी समय संयमी कहलाता है और आत्मभावनासे उलटे परमआकुलताके उपजानेवाले काम क्रोधादिक अशुद्ध भावोंमें परिणमता हुआ जीव असंयमी होता है इसमें कुछ सदेह नहीं है। ऐसा दूसरी जगह भी कहा है। "अकसायं" इत्यादि । अर्थात् कषायका जो अभाव है वही चारित्र है इसलिये कषायके आधीन हुआ जीव असंयमी होता है और जब कषायोंको शांत करता है तब संयमी कहलाता है ।। १६७ ॥ आगे जिस मोहसे मनमें कषायें होती हैं उस मोहको तू छोड ऐसा वर्णन करते

परमात्मप्रकाशः।
१८१
जेण इत्यादि । जेण येन वस्तुना वस्तुनिमित्तेन मोहेन वा । किं भवति । कसाय
हवंति क्रोधादिकपाया भवंति । क भवंति । मणे मनसि सोतं जिय हे जीव मिल्लहि
मुंच । कं । तं पूर्वोक्तं मोहु मोहं मोहनिमित्तपदार्थ चेति । पश्चात् किं लभसे त्वं । मोह-
कसायविवज्जियउ मोहकषायविवर्जितः सन् पर नियमेन पावहि प्राप्नोसि । के कर्मता-
पन्नं । समबोहु समवोधं रागद्वेपरहितं ज्ञानमिति । तथाहि । निर्मोहनिजशुद्धात्मध्यानेन
निर्मोहवशुद्धात्मतत्त्वविपरीतं हे जीव मोहं मुंच, येन मोहेन मोहनिमित्तवस्तुना वा निष्क-
पायपरमात्मतत्त्वविनाशकाः क्रोधादिकपाया भवंति पश्चान्मोहकषायाभावे सति रागरहितं
विशुद्धज्ञानं लभसे त्वमित्यभिप्रायः । तथा चोक्तं । "तं वत्थु मुत्तव्यं जं पडि उपजए
कसायग्गी । तं वत्थु सल्लियजो जत्थुवसम्मो कसायाणं" ॥ १६८ ।।
अथ हेयोपादेयतत्त्वं ज्ञात्वा परमोपशमे स्थित्वा येषां ज्ञानिनां स्वशुद्धात्मनिरतिस्त एव
सुखिन इति कथयति,-
तत्तातत्तु मुणेवि मणि, जे थक्का समभावि ।
ते पर सुहिया इत्थु जगि, जहं रइ अप्पसहावि ॥ १६९ ॥
तत्त्वातत्त्वं मत्वा मनसि ये स्थिता समभावे ।
ते परं सुखिनः अत्र जगति येषा रतिः आत्मखभावे ॥ १६९ ॥
।
हैं;-[हे जीव ] हे जीव [ येन ] जिस मोहसे अथवा मोहके उत्पन्न करनेवाली
वस्तुसे [ मनसि ] मनमें [कषायाः] कषाय [ भवंति ] होवै [तं मोहं ] उस
मोहको अथवा मोहनिमित्तक पदार्थको [ मुंच ] छोड़ [ मोहकपायविवर्जितः] फिर
मोहको छोडनेसे मोह कषाय रहित हुआ तू [ परं] नियमसे [ समबोधं] रागद्वेष
रहित ज्ञानको [प्राप्नोपि] पावेगा । भावार्थ-निर्मोह निज शुद्धात्माके ध्यानसे निर्मोह
निजशुद्धात्मतत्त्वसे विपरीत मोहको हे जीव छोड । जिस मोहसे अथवा मोहकरनेवाले
पदार्थसे कषायरहित परमात्मतत्त्व रूप ज्ञानानंद स्वभावके विनाशक क्रोधादि कषाय होते
हैं इन्हींसे ससार है, इसलिये मोहकषायके अभाव होनेपर ही रागादि रहित निर्मल
ज्ञानको तू पासकेगा । ऐसा दूसरी जगह भी कहा है। "तं वत्थु" इत्यादि । अर्थात् वह
वस्तु मन वचन कायसे छोड़नी चाहिये कि जिससे कषायरूपी अमि उत्पन्न हो तथा
उस वस्तुको अंगीकार करना चाहिये जिससे कषायें शांत हों । तात्पर्य यह है कि
विषयांदिक सब सामग्री और मिथ्यादृष्टि पापियोंका सग सब तरहसे मोह कषायको
उपजाते हैं इससे ही मनमें कषायरूपी अमि दहकती रहती है । वह सवप्रकार छोड़ना
चाहिये और सत्सगति तथा शुभ सामग्री ( कारण ) कषायोंकों उपशमाती है कषायरूपी
अमिको बुझाती है, इसलिये उस सगति वगैरः को अंगीकार करना चाहिये ॥ १६८ ॥

, १८२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । तत्तातत्तु इत्यादि । तत्तातत्तु मुणेवि अंतस्तत्त्वं बहिस्तत्त्वं मत्वा । क। मणि मनसि जे ये केचन वीतरागस्वसंवेदनप्रत्यक्षज्ञानिनः थक्का स्थिता । क । समभावि परमोपशमप- रिणामे ते पर त एव सुहिया सुखिनः एत्थु जगि अत्र जगति । के ते । जहं रइ येषां रतिः । क । अप्पसहावि स्वकीयशुद्धात्मस्वभावे इति । तथाहि । यद्यपि व्यवहारेणानादि- वंधनबद्धस्तिष्ठति तथापि शुद्धनिश्चयेन प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशवंधरहितं, यद्यप्यशुद्धनिश्चयेन प्रकृतशुभाशुभकर्मफलभोक्ता तथापि शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन निजशुद्धात्मतत्त्वभावनोत्थवीतरा- गपरमानंदैकसुखामृतभोक्ता, यद्यपि व्यवहारेण कर्मक्षयानंतरं मोक्षभाजनं भवति तथापि शुद्धपरिणामिकपरमभावग्राहकेण शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन सदा मुक्तं एव, यद्यपि व्यवहारेणेंद्रिय- जनितज्ञानदर्शनसहितं तथापि निश्चयनयेन सकलविमलकेवलज्ञानदर्शनस्वभावं, यद्यपि व्यवहारेण स्वोपात्तदेहमानं तथापि निश्चयेन लोकाकाशप्रमितासंख्येयप्रदेश, यद्यपि व्यव- हारेणोपसंहारविस्तारसहितं तथापि मुक्तावस्थायामुपसंहारविस्ताररहितं चरमशरीरप्रमाणप्र- देशं, यद्यपि पयार्यार्थिकनयेनोत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं तथापि द्रव्यार्थिकनयेन नित्यटकोत्कीर्णज्ञा- आगे हेयोपादेय तत्त्वको जानकर परमशात भावमें स्थित होकर जिनके निःकषायभाव हुआ और निजशुद्धात्मामें जिनकी लीनता हुई वेही ज्ञानी परमसुखी है ऐसा कथन करते हैं;-[ये] जो कोई वीतरागखसवेदन प्रत्यक्ष ज्ञानी जीव [ तत्त्वातत्त्वं ] आराधने योग्य निजपदार्थ और त्यागने योग्य रागादि सकल विभावोंको [ मनसि ] मनमें [मत्त्वा] जानकर [ समभावे स्थिताः] शांत भावमें तिष्ठते हैं और [येषां रतिः] जिनकी लगन [आत्मखभावे ] निज शुद्धात्मखभावमें हुई है [ ते परं] वे ही जीव [ अत्र जगति ] इस संसारमें [ सुखिनः] सुखी हैं। भावार्थ-यद्यपि यह आत्मा व्यवहार नयकर अनादिकालसे कर्मबंधनकर बंधा है तौभी शुद्धनिश्चयनयकर प्रकृति स्थिति अनुभाग प्रदेश–इन चार तरहके बंधनोंसे रहित है, यद्यपि अशुद्धनिश्चयनयसे अपने उपार्जनकिये शुभ अशुभकर्मोके फलका भोक्ता है तौभी शुद्धद्रव्यार्थिक नयसे निजशुद्धात्म- तत्त्वकी भावनासे उत्पन्न हुए वीतराग परमानंद सुखरूप अमृतका ही भोगनेवाला है, यद्यपि व्यवहारनयसे कर्मों के क्षय होंने वाद मोक्षका पात्र है तौभी शुद्ध पारिणामिक परमभावग्राहक शुद्ध द्रव्यार्थिकनयसे सदा मुक्त ही है, यद्यपि व्यवहार नयकर इंद्रिय- जनित मति आदि क्षयोपशमिक ज्ञान तथा चक्षु आदि दर्शन सहित है तौभी निश्चयनयसे सकलविमल केवलज्ञान और केवलदर्शन स्वभाववाला है, यद्यपि व्यवहार नयकर यह जीव नामकर्मसे प्राप्त देह प्रमाण है तौभी निश्चयनयसे लोकाकाश प्रमाण असख्यात प्रदेशी है, यद्यपि व्यवहारनयसे प्रदेशोंके संकोच विस्तार सहित है तौभी सिद्ध अवस्थामें सकोचविस्तारसे चरम शरीर प्रमाण प्रदेशवाला है, और यद्यपि पर्यायार्थिकनयसे उत्पाद व्यय प्रौव्यकर सहित है तौभी द्रव्यार्थिकनयकर टंकोत्कीर्ण ज्ञानके अखंड स्वभावसे ध्रुव . । परमात्मप्रकाशः। १८३ यकैकस्वभावं निजशुद्धासद्रव्यं पूर्व ज्ञात्वा तद्विलक्षणं परद्रव्यं च निश्चित्य पश्चात् समस्तमि- थ्यात्वरागादिविकल्पत्यागेन वीतरागचिदानंदैकस्वभावे स्वशुद्धामतत्त्वे ये रतास्तयेव धन्या इति भावार्थः । तथा चोक्तं परमामतत्त्वलक्षणे श्रीपूज्यपादस्वामिभिः । "अस्त्यामाना- दिवद्धः स्वकृतजफलभुक् तत्क्षयान्मोक्षभागी ज्ञाता द्रष्टा स्वदेहप्रमितिरुपशमाहारविस्तार- धर्मा । ध्रौव्योत्पत्तिव्ययात्मा स्वगुणयुत इतो नान्यथा साध्यसिद्धिः" ॥ १६९ ।। अथ योसावेवोपशमभावं करोति तस्य निंदाद्वारेण स्तुति त्रिकलेन कथयति, विपिणवि दोस हवंति तसु, जो समभाउ करेइ । बंधु जि णिहणइ अप्पणउ, अणु जगु गहिल करेइ ॥१७॥ द्वौ अपि दोपौ भवतः तस्य यः समभावं करोति । बंधं एव निहंति आत्मीयं पुनः जगत् गहिलं करोति ॥ १७० ॥ विण्णिवि इत्यादि । विण्णिवि द्वावपि । द्वौ कौ । दोस दोपौ हवंति भवतः तसु तम्य तपोधनस्य जो समभाउ करेइ यः समभावं करोति रागद्वेपत्यागं करोति । तौ दोषी बंधु जि णिहणइ बंधमेव निहंति । कथंभूतं बंधं । अप्पणउ आत्मीयं अणु पुनः जग जगत प्राणिगणं गहिल करेइ गहिलं पिशाचसमानं विकलं करोति । अयमत्र भावार्थः । ही है । इस तरह पहले निजशुद्धात्मद्रव्यको अच्छीतरह जानकर और आत्मखरूपसे विपरीत पुद्गलादि परद्रव्योंको भी अच्छी तरह निश्चय करके अर्थात् आप परका निश्चय करके वादमें समस्त मिथ्यात्वरागादि विकल्पोंको छोड़कर वीतराग चिदानंद स्वभाव शुद्धात्मतत्त्वमें जो लीन हुए हैं वे ही धन्य हैं । ऐसा ही कथन परमात्मतत्त्वके लक्षणमें श्रीपूज्यपादखामीने कहा है "नाभाव" इत्यादि । अर्थात् यह आत्मा व्यवहार नयकर अनादिका बंधा हुआ है और अपने किये हुए कौके फलका भोक्ता है, उन कर्मों के क्षयसे मोक्षपदका भोक्ता है, ज्ञाता है, देखनेवाला है, अपनी देहके प्रमाण है, ससार अवस्थामें प्रदेशोंके सकोच विस्तारको धारण करता है, उत्पाद व्यय ध्रौव्य सहित है और अपने गुण पर्याय सहित है । इस प्रकार आत्माके जाननेसे ही साध्यकी सिद्धि है दूसरी तरह नहीं है ॥ १६९ ॥ आगे जो सयमी परमशांत भावको ही कर्ता है उसकी निंदा द्वारा स्तुति तीनगाथासे करते है;-[ यः ] जो साधु [ समभावं ] रागद्वेषके त्यागरूप समभावको [ करोति ] करता है [तस्य ] उस तपोधनके [ द्वौ अपि दोपौ ] दो दोष [भवतः ] होते हैं। [आत्मीयं बंधं एव निहंति] एक तो अपने बंधको नष्ट करता है [ पुनः ] दूसरे [जगत् गहिलं करोति ] जगत्के प्राणियोंको बावला वना देता है । भावार्थ-यह १ यह 'लोक अपूर्ण है भाषामे 'नाभाव' आदि लिखा है।

१८४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । समशब्देनात्राभेदनयेन रागादिरहित आत्मा भण्यते तेन कारणेन योसौ समं करोति वीत- रागचिदानंदैकस्वभावं निजात्मानं परिणमति तस्य दोपद्वयं भवति । कथमिति चेत् । प्राकृ- तभाषया बंधुशब्देन ज्ञानावरणादिवंधा भण्यंते गोत्रं च येन कारणनोपशमस्वभावेन परमा- मस्वरूपेण परिणतः सन् ज्ञानावरणादिकर्मबंध निहंति तेन कारणेन स्तवनं भवति अथवा येन कारणेन बंधुशब्देन गोत्रमपि भण्यते तेन कारणेन बंधुघाती लोकव्यवहारभापया निंदापि भवतीति । तथा चोक्तं । लोकव्यवहारे ज्ञानिनां लोकः पिशाचो भवति लोकस्या- ज्ञानिजनस्य ज्ञानी पिशाच इति ॥ १७० ॥ अथ; अण्णु जि दोसु हवेइ तसु, जो समभाउ करेइ । सवि मिल्लिवि अप्पणउ, परहं णिलीणु हवेइ ॥ १७१ ॥ अन्यः अपि दोषो भवति तस्य यः समभावं करोति । शत्रुमपि मुंचति आत्मीयं परस्य निलीनः भवति ॥ १७१ ॥ अण्णु जि इत्यादि । अण्णु जि न केवलं पूर्वोक्त अन्योपि दोसु दोपः हवेइ भवति तसु तस्य तपोधनस्य । यः कि करोति । जो समभाउ करेइ यः कर्ता समभावं करोति । पुन- रपि किं करोति । सत्तुवि मिल्लिवि शत्रुमपि मुंचति । कथंभूतं शत्रु । अप्पणउ आत्मीयं । पुनश्च किं करोति । परह णिलीणु हवेइ परस्यापि लीन आधीनो भवति इति । अयमत्र निंदाद्वारा स्तुति है। प्राकृत भाषामें बंधु शब्दसे ज्ञानावरणादि कर्म बंध भी लिया जाता है तथा भाईको भी कहते हैं। यहाँपर बंधु हत्या निंद्य है इससे एक तो बंधु हत्याका दोष आया तथा दूसरा दोष यह है कि जो कोई इनका उपदेश सुनता है वह वस्त्र आभूषणका त्यागकर नम दिगंबर होजाता है। कपडे उतार कर नंगा होजाना उसे लोग गहला कहते हैं । ये दोनों लोकव्यवहारमें दोष हैं सो शब्दके अर्थसे ऐसे ऊपरसे निकाले हैं । परंतु दूसरे अर्थ में कोई दोष नहीं है स्तुति ही है। क्योंकि कर्मबंध नाश करने ही योग्य है तथा जो समभावका धारक है वह आप नग्न दिगंवर होजाता है और अन्यको दिगंबर कर देता है सो मूढ लोक निंदा करते हैं। यह दोष नही है गुण ही है । मूढ लोकोंके जानने में ज्ञानी जन वाचले हैं और ज्ञानियों के जाननेमें जगतके जन पावले हैं । क्योंकि ज्ञानी जगतसे विमुख हैं तथा जगत् ज्ञानियोंसे विमुख है ॥ १७० ॥ आगे समभावके धारक मुनिकी फिर भी निंदा स्तुति करते हैं;-[य] जो [समभावं] समभावको [ करोति करता है [तस्य ] उस तपोधनके [अन्य अपि दोषः ] दूसरा भी दोष [ भवति ] है । क्योंकि [ परस्य निलीनः] परके आधीन [ भवति ] होता है और [ आत्मीयं अपि] अपने आधीन भी [श] शत्रुको - , परमात्मप्रकाशः। १८५ भावार्थः । यो रागादिरहितस्य समभावलक्षणस्य निजपरमात्मनो भावनां करोति स पुरुषः शत्रुशब्दवाच्यं ज्ञानावरणादिकर्मरूपं निश्चयशवं मुंचति परशब्दवाच्यं परमामानमाश्रयति च तेन कारणेन तस्य स्तुतिर्भवति । अथवा यथा लोकव्यवहारेण बंधनबद्धं निजशत्रु मुक्त्वा कोपि केनापि कारणेन तस्यैव परशब्दवाच्यस्य शत्रोराधीनो भवति तेन कारणेन स निंदां लभते तथा शब्दच्छलेन तपोधनोपीति ॥ १७१ ॥ अथ,- अण्णु जि दोसु हवेइ तसु, जो समभाउ करेइ । वियल हवेविणु इकलउ, उप्परि जगह चडेइ ॥ १७२ ॥ अन्यः अपि दोषः भवति तस्य यः समभावं करोति । विकलः भूत्वा एकाकी उपरि जगतः चटिति ॥ १७२ ॥ अण्णु जि इत्यादि । अण्णु जि न केवलं पूर्वोत्तोन्योपि दोसु दोषः हवेइ भवति तसु तस्य तपस्विनः । यः किं करोति । जो समभाउ करेइ यः कर्ता समभावं करोति । पुन- रपि किं करोति । वियल हवेविणु विकलः कलरहितः शरीररहितो भूत्वा इक्कलउ एकाकी पश्चात् उप्परि जगहं चडेइ उपरितनभागे जगतो लोकस्यारोहणं करोतीति । अयमत्रा- भिप्रायः । यः तपस्वी रागादिविकल्परहितस्य परमोपशमरूपस्य निजशुद्धात्मनो भावनां करोति सकलशब्दवाच्यं शरीर मुक्त्वा लोकस्योपरि तिष्ठति तेन कारणेन स्तुतिं लभते [मुंचति ] छोड़ देता है। भावार्थ-जो तपोधन धनधान्यादिका राग त्यागकर परम शात- भावको आदरता है राजा रंकको समान जानता है उसके दोष कभी नही होसकता। सदा स्तुतिके योग्य है तौभी शब्दकी योजनासे निंदा द्वारा स्तुति कीगई है। वह इस तरहसे है कि शत्रु शब्दसे कहे गये जो ज्ञानावरणादि कर्मशत्रु उनको छोडकर पर शब्दसे कहे गये परमात्माका आश्रय करता है । इसमें निंदा क्या हुई वल्कि स्तुति ही हुई । परंतु लोक व्यवहारमें अपने आधीन शत्रुको छोड़कर किसी कारणसे पर शब्दसे कहेगये शत्रुके आधीन आप होता है इसलिये लौकिकनिंदा हुई वह शब्दके छलसे निंदा स्तुति कीगई। यहां शब्दका श्लेष होना रूप अलंकार कहा गया है ॥ १७१ ॥ आगे समदृष्टिकी फिर भी निंदास्तुति करते हैं। [यः] जो तपखी महामुनि [ समभावं ] समभावको [करोति ] करता है [ तस्य ] उसके [ अन्यः अपि] दूसरा भी [ दोपः ] दोष [ भवति ] होता है जोकि [विकल: भूत्वा ] शरीर रहित होके अथवा बुधि धन वगैरःसे भ्रष्ट होकर एकाकी] अकेला [जगतः उपरि ] लोकके शिखर पर अथवा सवके ऊपर [ चटिति ] चढता है । भावार्थ-जो तपखी रागादि रहित परम उपशम भावरूप निजशुद्धात्माकी भावना करता है उसकी शब्दके छलसे तो २४ १८६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथवा यथा कोपि लोकमध्ये वित्तविकलो भूतः सन् निंदां लभते तथा शव्दछलेन तपो- धनोंपीति ॥ १७२॥ अथ स्थलसंख्याबाह्यं प्रक्षेपकं कथयति, जा णिसि सयलहं देहियह, जोग्गिउ तहिं जग्गेइ । जहिं पुणु जग्गइ सयल जंगु, सा णिसि मणिवि सुवेइ ॥ १७३ ॥ या निशा सकलानां देहिनां योगी तस्यां जागर्ति । यत्र पुनः जागति सकलं जगत् तां निशां मत्वा खपिति ॥ १७३ ॥ ना णिसि इत्यादि । जां णिसि या वीतरागपरमानंदैकसहजशुद्धामावस्था मिथ्यात्वरा- गायधकारावगुंठिता सती रात्रिः प्रतिभाति । केषां । सयलहं देहियहं सकलानां स्वशु- द्धात्मसंवित्तिरहितानां देहिनां जोग्गिउ तहिं जग्गेइ परमयोगी वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवे- दनज्ञानरत्नप्रदीपप्रकाशेन मिथ्यात्वरागादिविकल्पजालांधकारमपसार्य स तस्यां तु शुद्धा- त्मना जागर्ति जहिं पुणु जग्गइ सयलु जगु यत्र पुनः शुभाशुभमनोवाकायपरिणामव्या- पारे परमात्मतत्त्वभावनापराङ्मुखः सन् जगजागर्ति स्वशुद्धात्मपरिज्ञानरहितः सकलो निंदा है कि विकल अर्थात् बुद्धि वगैरःसे भ्रष्ट होकर लोक अर्थात् लोगोंके ऊपर चढता है । यह लोकनिंदा हुई। लेकिन असलमें ऐसा अर्थ है कि विकल अर्थात् शरीरसे रहित होकर तीन लोकके शिखर (मोक्ष) पर विराजमान हो जाता है। यह स्तुति ही है । क्योंकि जो अनंत सिद्ध हुए तथा होंगे वे शरीर रहित निराकार होके जगतके शिखरपर, विराजे ॥ १७२ ॥ आगे स्थलसंख्याके सिवाय क्षेपक दोहा कहते है-[था] जो [ संकलानां देहिनां ] सब संसारी जीवोंकी [ निशा] रात है [ तस्यां] उस रातिमें [योगी] परम तपखी [ जागर्ति ] जागता है [ पुनः] और [ यत्र ] जिसमें [ सकलं जगत् ] सब संसारी जीव [जागति ] जाग रहे हैं | ता] उस दशाको [ निशां मत्वा] योगी रात मानकर [ स्वपिति ] योगनिद्रामें सोता है। भावार्थ-जो जीव वीतराग परमानंद- रूप सहज शुद्धात्माकी अवस्थासे रहित हैं मिथ्यात्व रागादि अंधकार कर मंडित हैं इसलिये इन सबोंको वह परमानंद अवस्था रात्रिके समान मालूम होती है। कैसे ये जगतके जीव हैं कि आत्मज्ञानसे रहित हैं अज्ञानी हैं अपने स्वरूपसे विमुख हैं जिनके जाग्रत दशा नहीं हैं अचेत सोरहे हैं ऐसी रात्रिमें वह परमयोगी वीतराग निर्विकल्प खसंवेदन ज्ञानरूपी रतदीपके प्रकाशसे मिथ्यात्वरागादि विकल्प जालरूप अंधकारको दूर कर अपने खरूपमें सावधान होनेसे सदा जागता है । तथा शुद्धात्माके ज्ञानसे रहित. शुभ अशुभ मन वचन कायके परिणमनरूप व्यापारवाले थावर जंगम सकल अज्ञानी - परमात्मप्रकाशः। १८७ ज्ञानीजनः सा णिसि मणिवि सुवेइ तां रात्रि मत्वा त्रिगुप्तिगुप्तः सन् वीतरागनिर्विकल्प- परमसमाधियोगनिद्रायां स्वपिति इति निद्रां करोतीति । अत्र बहिर्विषये शयनमेवोपशमो भण्यत इति तात्पर्यार्थः ॥ १७३ ॥ अथ ज्ञानी पुरुपः परमवीतरागरूपं समभावं मुक्त्वा बहिर्विषये रागं न गच्छतीति दर्शयति;- णाणि मुएप्पिणु भाउ समु, कित्थुवि जाइ ण राउ । जेण लहेसइ णाणमउ, तेण जि अप्पसहाउ ॥ १७४ ॥ ज्ञानी मुत्तवा भावं शमं वापि याति न रागम् । येन लमिष्यति ज्ञानमयं तेन एव आत्मखभावम् ॥ १७४ ॥ णाणि इत्यादि । णाणि परमात्मरागाद्यास्रवयोर्भेदज्ञानी मुएप्पिणु मुक्त्वा । कं । भाउ भावं । कथंभूतं भावं । समु उपशमं पंचेद्रियविपयाभिलापरहितं वीतरागपरमाहादसहितं कित्थुवि जाइ ण राउ तं पूर्वोक्तं समभावं मुक्त्वा कापि बहिर्विषये रागं न याति न गच्छति । कस्मादिति चेत् । जेण लहेसइ येन कारणेन लभिष्यति भाविकाले प्राप्स्यति । कं । णाणमउ ज्ञानमयं केवलज्ञाननिर्वृत्तं केवलज्ञानांतर्भूतानंतगुणं तेण जि तेनैव समभा- वेन अप्पसहाउ निर्दोपिपरमात्मस्वभावमिति । इदमत्र तात्पर्यं। ज्ञानी पुरुषः शुद्धात्मानुभू- जीव परमात्मतत्त्वकी भावनासे परान्मुख हुए विषयकषायरूप अविद्या में सदा सावधान हैं जाग रहे हैं, उस अवस्थामें विभावपर्यायके स्मरण करनेवाले महामुनि सावधान (जागते) नही रहते। इसलिये ससारकी दशासे सोते हुएसे मालूम पड़ते हैं। जिनको आत्मस्वभावके सिवाय विषयकषायरूप प्रपंचकी मालूम भी नही है। उस प्रपंचको रात्रिके समान जानकर उसमें याद नहीं रखते मनवचनकायकी तीन गुप्तिमें अचल हुए वीतराग निर्विकल्प परम समाधिरूप योगनिद्रामें मगन होरहे हैं । साराश यह है कि ध्यानी मुनियोंको आत्मख- रूपकी गम्य है प्रपंचकी गम्य नही है और जगतके प्रपंची मिथ्याहष्टि जीव हैं उनको आत्मखरूपकी गम्य नही है अनेक प्रपंचोंमें ( झगड़ोंमें ) लगे हुए हैं। प्रपंचकी सावधानी रखनेको भूलजाना वही परमार्थ है तथा बाह्यविषयोंमें जाग्रत होना ही भूल है ॥ १७३ ॥ आगे जो ज्ञानी पुरुष हैं वे परमवीतरागरूप समभावको छोडकर शरीरादि परद्रव्यमें राग नही करते ऐसा दिखलाते हैं। ज्ञानी] निजपरके भेदका जाननेवाला ज्ञानी मुनि [शमं भावं] समभावको [ मुक्त्त्वा] छोडकर [कापि ] किसी पदार्थमें [ रागं न याति ] राग नहीं करता [येन] इसी कारण [ज्ञानमयं] ज्ञानमई निर्वाणपद [प्राप्स्यति ] पावेगा [तेनैव ] और उसी समभावसे [आत्मस्वभावं ] केवल ज्ञान पूर्ण १८८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । तिलक्षणं समभावं विहाय बहिर्भावे रागं न गच्छति येन कारणेन समभावेन विना शुद्धा- मलाभो न भवतीति ॥ १७४ ॥ अथ ज्ञानी कमप्यन्यं न भणति न प्रेरयति न स्तौति न निंदतीति प्रतिपादयति भणइ भणावइ णवि थुणइ, गिदइ णाणि ण कोइ । सिडिहिं कारणु भाउ समु, जाणंतउ पर सोइ ॥ १७५ ॥ भणति भाणयति नैव स्तौति निंदति ज्ञानी न कमपि । सिद्धेः कारणं भावं समं जानन् परं तमेव ।। १७५ ।। भणइ इत्यादि । भणइ भणति नैव भणावइ नैवान्यं भयंतं प्रेरयति णवि शुणइ नैव स्तौति णिदइ णाणि ण कोइ निदति ज्ञानी न कमपि । किंकुर्वन् सन् । सिद्धिहि कारणु भाउ समु जाणंतउ पर सोइ जानन् । कं । परं भावं परिणामं । कथंभूतं । समं रागद्वेप- रहितं । पुनरपि कथंभूतं । कारणं । कस्याः । सिद्धेःपरं नियमेन तमेव सिद्धिकारणं परिणाममिति । इदमत्र तात्पर्य । परमोपेक्षासंयमभावनारूपं विशुद्धज्ञानदर्शननिजशुद्धास- तत्त्वसम्यश्रद्धानज्ञानानुभूतिलक्षणं साक्षात्सिद्धिकारणं कारणसमयसारं जानन् त्रिगुप्ता- आत्मस्वभावको आगे पावेगा । भावार्थ-जो अनंतसिद्ध हुए वे समभावके प्रसादसे हुए हैं और जो होवेंगे इसीभावसे होंगे। इसलिये ज्ञानी समभावके सिवाय अन्य भावोंमें राग नहीं करते । इस समभावके विना अन्य उपायसे शुद्धात्माका लाभ नही है । एक समभाव ही भवसागरसे पार होनेका उपाय है । समभाव उसे कहते जो पंचेन्द्रीके विषयोंकी अभिलाषासे रहित वीतराग परमानंदसहित निर्विकल्प निजभाव हो ॥१७४ ॥ आगे कहते हैं कि ज्ञानीजन समभावका खरूप जानता हुआ न किसीसे पढता है न किसीको पढाता है न किसीको प्ररणा करता है न किसीकी स्तुति करता है न किसीकी निंदा करता है।-[ज्ञानी] निर्विकल्प ध्यानी पुरुष [कमपि न] न किसीपर [भणति ] शिष्य होकर पढता है, न गुरु होकर किसीको [भाणयति ] पढाता है [नैव स्तौति निंदति ] न किसीकी स्तुति करता है न किसीकी निंदा करता है [ सिद्धेः कारणं] मोक्षका कारण [समं भावं ] एक समभावको [परं] निश्चयसे [जानन्-] जानता हुआ [तमेव ] केवल आत्मखरूपमें अचल होरहा है, अन्य कुछभी शुभ अशुभ कार्य नहीं करता । भावार्थ-परमोपेक्षा संयम अर्थात् तीनगुप्तिमें स्थिर परम समाधि उसमें आरूढ जो परमसंयम उसकी भावनारूप निर्मल यथार्थ सम्मग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्र वही जिसका लक्षण है ऐसा मोक्षका कारण जो समयसार उसे जानता हुआ अनुभवता शा अनुभवी पुरुष न किसी प्राणीको सिखाता है, न परमात्मप्रकाशः। १८९ वस्थायां अनुभवन् सन् भेदज्ञानी पुरुषः परं प्राणिनं न भणति न प्रेरयति न स्तौति न च निदतीति ॥ १७५ ॥ अथ बाह्याभ्यंतरपरिग्रहेच्छायाः पंचेन्द्रियविषयभोगाकांक्षादेहमूर्छाव्रतादिसंकल्पविक- ल्परहितेन निजशुद्धामध्यानेन योसौ निजशुद्धासानं जानाति स परिप्रविषयदेहव्रता- व्रतेपु रागद्वेपौ न करोतीति चतुःकलं प्रफटयति,- गंथहं उप्परि परममुणि, देसुवि करइ ण राउ । गंधहं जेण वियाणियउ, भिण्णउ अप्पसहाउ ॥ १७६ ॥ ग्रंथस्य उपरि परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागं । ग्रंथात् येन विज्ञातः भिन्नः आत्मखभावः ॥ १७६ ॥ गंथहं इत्यादि । गंथहं उप्परि ग्रंथस्य बाह्याभ्यंतरपरिग्रहस्योपरि अथवा ग्रंथरचनारू- पशास्त्रस्योपरि परममुणि परमतपस्वी देसुवि करइ ण द्वेषमपि न करोति न राउ रागमपि । येन तपोधनेन किंकृतं । गंथहं जेण वियाणियउ भिण्णउ अप्पसहाउ ग्रंथात्सकागायेन विज्ञातो भिन्न आसवभाव इति । तद्यथा । मिथ्यात्वं, ख्यादिवे- दकांक्षारूपवेदत्रयं, हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सारूपं नोकपायषट्, क्रोधमानमायालो- भरूपं कपायचतुष्टयं चेति चतुर्दशाभ्यंतरपरिग्रहाः क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासी- दासकुप्यभांडरूपा वाह्यपरिग्रहा इत्थंभूतान् बाह्याभ्यंतरपरिग्रहान् जगत्रये कालत्रयेपि मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च त्यक्त्वा शुद्धालोपलंभलक्षणे वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ , किसीसे सीखता है न स्तुति करता है न निंदा करता है । जिसके शत्रुमित्र सुख- दुःख सब समान हैं ॥ १७५ ॥ आगे वाह्य अंतरंग परिग्रहकी इच्छासे पांच इंद्रियोंके विषयभोगोंका वांछक हुआ देहमें ममता नही करता तथा मिथ्यात्व अव्रत आदि समस्त सकल्पविकल्पोंसे रहित जो निज शुद्धात्मा उसे जानता है वह परिग्रहमें तथा विषयदेहसंबधी व्रत अव्रतमें राग द्वेष नहीं करता ऐसा चारसूत्रोंसे प्रगट करते हैं।-[ग्रंथस्य उपरि ] अंतरंग बाह्य परिग्रहके ऊपर अथवा शास्त्रके ऊपर जो [ परममुनिः ] परम तपखी [रागं न द्वेषमपि करोति] राग और द्वेष नही करतो है [येन] जिस मुनिने [आत्मस्वभावः] आत्माका खभाव [ग्रंथात् ] ग्रंथसे [भिन्नः विज्ञातः] जुदा जानलिया है। भावार्थ-मिथ्यात्व, वेद, राग, द्वेष, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, क्रोध, मान, माया लोभ-ये चौदह अंतरंग परिग्रह और क्षेत्र, वास्तु (घर), हिरण्य, सुवर्ण, धन, धान्य, दासी, दास, कुप्य, भांडरूप दस बाह्य परिग्रह-इसप्रकार चौवीस तरहके बाह्य अभ्यंतर परिग्रहोंको तीन जगतमें तीनोंकालोंमें मन वचन काय कृतकारित अनुमोदनासे छोड़ और शुद्धा- , रायचंद्वजैनशास्त्रमालायाम् । स्थित्वा च यो वाह्याभ्यंतरपरिग्रहाद्भिन्नमालानं जानाति स परिग्रहस्योपरि रागद्वेपी न करोति । अत्रेदं व्याख्यानं एवं गुणविशिष्टनिर्ग्रथत्यैव शोभते न च सपरिग्रहस्येति तात्पर्यार्थः ॥ १७६॥ अथ;- विसयहं उपरि परममुणि, देसुवि करइ ण राउ। विसयहं जेण वियाणियउ, भिण्णउ अप्पसहाउ ॥ १७७॥ विषयाणां उपरि परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागम् । विषयेभ्यः येन विज्ञातः भिन्नः आत्मस्वभावः ॥ १७७ ॥ विसयह इत्यादि । विसयहं उप्परि विषयाणामुपरि परममुणि परममुनिः देसुवि करइ ण राउ द्वेषमपि करोति न च रागमपि येन । येन किं कृतं । विसयह जेण वियाणियउ विषयेभ्यो येन विज्ञातः । कोसौ विज्ञातः । भिण्णउ अप्पसहाउ आलस्व- भावः । कथंभूतो, भिन्न इति । तथा च । द्रव्येद्रियाणि भावद्रियाणि द्रव्येदियभावद्रिय- ग्राह्यान् विषयांश्च दृष्टश्रुतानुभूतान् जगत्रये कालत्रयेपि सनोवचनकायैः कृतकारितानु- मतैश्च त्यक्त्वा निजशुद्धासभावनासमुत्पन्नवीतरागपरमानंदैकरूपमुखामृतरसास्वादेन तृप्तो भूत्वा यो विषयेभ्यो भिन्नं शुद्धालानमनुभवति स मुनिः पंचेंद्रियविपयेपु रागद्वेपौ न स्माकी प्राप्तिरूप वीतराग निर्विकल्प समाधिमें ठहरकर परवस्तुसे अपनेको भिन्न जानता है वोही परिग्रहके ऊपर रागद्वेष नहीं करता है । यहापर ऐसा व्याख्यान निग्रंथ मुनिको ही शोभा देता है परिग्रह धारीको नही शोभा देता है ऐसा तात्पर्य जानना ॥ १७६॥ आगे विषयोंके ऊपर वीतरागता दिखलाते हैं।-[परममुनिः] महामुनि [विष- याणां उपरि] पांच इन्द्रियोंके स्पर्शादि विषयोंपर [रागमपि दोषं ] राग और द्वेष [न करोति ] नही करता अर्थात् मनोज्ञ विषयोंपर राग नहीं करता और अनिष्ट विषयपर द्वेष नहीं करता क्योंकि [येन] जिसने [आत्मस्वभावः] अपना खभाव [विषयेभ्यः] विषयोंसे [भिन्नः विज्ञातः] जुदा समझलिया है । इसलिये वीतराग दशा धारण करली है ॥ भावार्थ-द्रव्येंद्री भावेन्द्री और इन दोनोंसे ग्रहण करने योग्य देखे सुने अनुभव किये जो रूपादि विषय हैं उनको मन वचन काय कृत कारित अनुमोदनासे छोड़कर और निजशुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न वीतराग परमा- नंदरूप अतींद्रियसुखके रसके आखादनेसे तृप्त होकर विषयोंसे भिन्न अपने आत्माको जो मुनि अनुभवता है वोही विषयोंमें रागद्वेष नहीं करता । यहाँपर तात्पर्य यह है कि जो पंचेन्द्रियोंके विषयसुखसे निवृत्त होकर निज शुद्ध आत्मसुखमें ..

परमात्मप्रकाशः। करोति । अत्र यः पंचेद्रियविषयसुखान्निवर्त्य स्वशुद्धात्मसुखे तृप्तो भवति तस्यैवेदं व्याख्यानं शोभते न च विपयासक्तस्येति भावार्थः ॥ १७७ ।। अथ;- देहहं उप्परि परममुणि, देसुवि करइ ण राउ । देहहं जेण वियाणियउ, भिण्णउ अप्पसहाउ ॥ १७८ ॥ देहस्य उपरि परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागं । देहात् येन विज्ञातः भिन्नः आत्मस्वभावः ॥ १७८ ॥ देहहं इत्यादि । देहहं उप्परि देहस्योपरि परममुणि परममुनिः देसुवि करइ ण राउ द्वेपमपि न करोति न रागमपि । येन किं कृतं । देहहं जेण वियाणियउ देहात्सकाशाद्येन विज्ञातः । कोसौ । भिण्णउ अप्पसहाउ आत्मस्वभावः । कथंभूतो विज्ञातः । तस्मादेहा- द्भिन्न इति । तथाहि । "सपरं वाधासहियं विच्छिण्णं बंधकारणं विसमं । जं इंदियेहि लद्धं तं सुक्खं दुक्खमेव तहा" ॥ इति गाथाकथितलक्षणं दृष्टश्रुतानुभूतं यदेहजनितसुखं तज्जगत्रये कालत्रयेपि मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च त्यत्तवा वीतरागनिर्विकल्प- समाधिवलेन पारमार्थिकानाकुलत्वलक्षणसुखपरिणते निजपरमात्मनि स्थित्वा च य एव देहाद्भिन्नं वशुद्धालानं जानाति स एव देहस्योपरि रागद्वेषौ न करोति । अत्र य एव तृप्त होता है उसीको यह व्याख्यान शोभा देता है और विषयाभिलाषीको नहीं शोभता ॥ १७७ ॥ आगे साधु देहके ऊपर भी रागद्वेष नही करता;-[ परममुनिः] महामुनि [देहस्य उपरि ] मनुप्यादिशरीरके ऊपर भी [ रागमपि दोष ] राग और द्वेषको [न करोति ] नहीं करता अर्थात् शुभ शरीरसे राग नही करता अशुभ शरीरसे द्वेष नही करता [येन ] जिसने [आत्मस्वभावः] निजखभाव [देहात् ] देहसे [भिन्न: विज्ञातः ] भिन्न जानलिया है । देह तो जड है आत्मा चैतन्य है जड चैतन्यका क्या सबंध ॥ भावार्थ-इन इंद्रियोंसे जो सुख उत्पन्न हुआ है वह दुःखरूप ही है। ऐसा कथन श्रीप्रवचनसारमे कहा है । 'सपरं' इत्यादि । इसका तात्पर्य ऐसा है कि जो इंद्रियोंसे सुख प्राप्त होता है वह सुख दुःखरूप ही है क्योंकि वह सुख परवस्तु है निजवस्तु नही है, बाधा सहित है निरावाध नही हैं, नाशको लिये हुए है जिसका नाश होजाता है, बन्धका कारण है और विषम है। इसलिये इन्द्रियसुख दुःखरूप ही है। ऐसा इस गाथामे जिसका लक्षण कहा गया है ऐसे देहजनित सुखको मन वचन काय कृत कारित अनुमोदनासे छोडै । वीतरागनिर्विकल्पसमाधिके बलसे आकुलतारहित परमसुखरूप निजपरमात्मामें स्थित होकर जो महामुनि देहसे भिन्न अपने शुद्धात्माको जानता है वही । १९२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । सर्वप्रकारेण देहममत्वं त्यक्त्वा देहसुखं नानुभवति तस्यैवेदं व्याख्यानं शोभते नापरस्येति- तात्पर्यार्थः ॥ १७८॥ अथ:- वित्तिणिवित्तिहिं परमणि, देसुवि करइ ण राउ । बंधहं हेउ वियाणियउ, एयहं जेण सहाउ॥ १७९ ॥ वृत्तिनिवृत्त्योः परममुनिः द्वेपमपि करोति न राग । बंधस्य हेतुः विज्ञातः एतयोः येन खभावः ॥ १७९ ।। वित्तिणिवित्तिहि इत्यादि । वित्तिणिवित्तिहिं वृत्तिनिवृत्तिविपये तात्रतविपये परम- मुणि परममुनिः देसुवि करइ ण राउ द्वेपमपि न करोति न च रागं । येन किं कृतं । बंधहं हेउ वियाणियउ बंधस्य हेतुर्विज्ञातः । कोसौ । एयह जेण सहाउ एतयोञताब- तयोः स्वभावो येन विज्ञात इति । अथवा पाठांतरं । "भिण्ण जेण वियाणियउ एयहं अप्पसहाउ" भिन्नो येन विज्ञातः । कोसौ । आलस्वभावः । काभ्यां । एताभ्यां व्रताव्रत- विकल्पाभ्यां सकाशादिति । तथाहि । येन व्रताव्रतविकल्पो पुण्यपापबंधकारणभूतौ विज्ञातो स शुद्धामनि स्थितः सन् व्रतविषये रागं न करोति तथा चाव्रतविपये द्वेपं न करोतीति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । हे भगवन् यदि व्रतस्योपरि रागतात्पर्य नास्ति तर्हि व्रतं निषिद्ध- देहके ऊपर राग द्वेष नही करता । जो सब तरह देहसे निर्ममत्व होकर देहके सुखको नही अनुभवता उसीके लिये यह व्याख्यान शोभा देता है और देहवुद्धिवालोंको नहीं शोभता ऐसा अभिप्राय जानना ॥ १७८ ॥ आगे प्रवृत्ति और निवृत्तिमें भी महामुनि राग द्वेष नही करता ऐसा कहते हैं;- [परममुनिः] महामुनि [वृत्तिनिवृत्त्योः] प्रवृत्ति और निवृत्तिमें [रागं अपि द्वेषं] राग और द्वेषको [न करोति ] नहीं करता [येन] जिसने [ एतयोः ] इनदोनोंका [स्वभावः ] स्वभाव [बंधस्य हेतुः ] कर्मबंधका कारण [विज्ञातः] जानलिया है । भावार्थ-व्रत अव्रतमें परममुनि राग द्वेष नहीं करता । जिसने इन दोनोंका खभाव वंधका कारण जानलिया है । अथवा पाठांतर होनेसे ऐसा अर्थ होता है कि जिसने आत्माका स्वभाव भिन्न जानलिया है । अपना खभाव प्रवृत्ति निवृत्तिसे रहित है। जहां व्रत अव्रतका विकल्प नही है । ये व्रत अव्रत पुण्य पापरूप बंधके कारण हैं। ऐसा जिसने जान- लिया वह आत्मामें तल्लीन हुआ व्रत अव्रतमें रागद्वेष नही करता । ऐसा कथन सुनकर प्रभाकर भट्टने पूछा हे भगवन् जो व्रतपर राग नही करे तो व्रत क्यों धारण करै । ऐसे कथनमें व्रतका निषेध होता है । तब योगीन्द्राचार्यकहते हैं कि व्रतका अर्थ यह है कि सब शुभ अशुभ भावोंसे निवृत्ति परिणाम होना । ऐसा ही अन्य ग्रंथोमें भी "रागद्वेषौ।'

. " परमात्मप्रकाशः। मिति । भगवानाह । व्रतं कोर्थः । सर्वनिवृत्तिपरिणामः । तथाचोक्तं । हिंसानृतस्तेयाब्रह्म- परिग्रहेभ्यो विरतिव्रतं । अथवा । "रागद्वेषौ प्रवृत्तिः स्यानिवृत्तिस्तनिषेधनं । तौ च बाह्यार्थ- संबंधौ तस्मात्तांस्तु परित्यजेत् ॥” प्रसिद्धं पुनरहिंसादिव्रतं एकदेशेन व्यवहारेणेति । कथ- मेकदेशव्रतमितिचेत् । तथाहि । जीवधाते निवृत्तिर्जीवदयाविषये प्रवृत्तिः, असत्यवचनविषये निवृत्तिः सत्यवचनविपये प्रवृत्तिः, अदत्तादानविपये निवृत्तिः दत्तादानविषये प्रवृत्तिरि- यादिरूपेणैकदेशं व्रतं । रागद्वेषरूपसंकल्पविकल्पकल्लोलमालारहिते त्रिगुप्तिगुप्तपरमसमाधौ पुनः शुभाशुभत्यागात्परिपूर्ण व्रतं भवतीति । कश्चिदाह । व्रतेन किं प्रयोजनमालभावनया मोक्षो भविष्यति । भरतेश्वरेण किं व्रतं कृतं ? घटिकाद्वयेन मोक्षं गतः इति । परिहारंमाह । भरतेश्वरोपि पूर्व जिनदीक्षाप्रस्तावे लोचानंतरं हिसादिनिवृत्तिरूपं महाव्रतविकल्पं कृत्वांतर्मुहूर्ते गते सति दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षारूपनिदानवंधादिविकल्परहिते मनोवचनकायनिरोधलक्षणे इत्यादिसे कहा है। अर्थ यह है कि राग और द्वेष ये दोनों प्रवृति हैं तथा इनका निषेध वह निवृत्ति है । ये दोनों अपने नही हैं अन्य पदार्थके संबंधसे हैं । इसलिये इन दोनोंको छोडै । अथवा "हिसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरति-तं" ऐसा कहा गया है । इसका अर्थ यह है कि प्राणियोंको पीडादेना, झूठवचन, परधनहरना, कुशी- लका सेवन और परिग्रह इनसे जो विरक्त होना वही व्रत है। ये अहिसादि व्रत प्रसिद्ध वे व्यवहारनयकर एकोदेशरूप व्रत हैं । यही दिखलाते हैं-जीवघातमें निर्वृत्ति जीव दयामें प्रवृत्ति, असत्यवचनमें निवृत्ति सत्यवचनमें प्रवृत्ति, अदचादान (चोरी)से निवृत्ति अचौर्य में प्रवृत्ति इत्यादिखरूपसे एकोदेश व्रत कहा जाता है । और राग द्वेषरूप संकल्पविकल्पोंकी कल्लोलोसे रहित तीन गुप्तिसे गुप्त समाधिमें शुभाशुभके त्यागसे परिपूर्ण बेत होता है । अर्थात् अशुभकी निवृत्ति और शुभकी प्रवृत्तिरूप एकोदेशव्रत और शुभ अशुभ दोनोंका ही त्याग होना वह पूर्ण व्रत है । इसलिये प्रथम अवस्थामें व्रतका निषेध नहीं है एकोदेश व्रत है और पूर्ण अवस्थामें सर्वदेश व्रत है । यहा पर कोई यदि प्रश्न करै कि व्रतसे क्या प्रयोजन आत्मभावनासे ही मोक्ष होती है । भरतजी महाराजने क्या व्रत कियाथा ? वो दोघड़ीमें ही केवल ज्ञान पाकर मोक्ष गये । उसका समाधान ऐसे है कि भरतेश्वरने पहले जिनदीक्षा धारण की, शिरके केश छंचन किये, हिसादि पापोंकी निर्वृत्तिरूप पंच महाव्रत आदरे । फिर एक अंतर्मुहूर्तमें समस्त विकल्प रहित मनवचन काय रोकनेरूप निज शुद्धात्मध्यान उसमें ठहरकर निर्विकल्प हुए । वो शुद्धात्माका ध्यान, देखे सुने और भोगे हुए भोगों की वाठारूप निदानबन्धादि विक- ल्पोंसे रहित है । ऐसे ध्यानमें तल्लीन होकर केवली हुए । जव राज छोड़ा और मुनि हुए तभी केवली हुए । तव भरतेश्वरने अंतर्मुहूर्तमें केवल ज्ञान प्राप्त किया । इसलिये महावतकी प्रसिद्धि नहीं हुई । इसपर कोई मूर्ख ऐसा विचारलेवे कि जैसा उनको हुआ २५ , १९४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । निजशुद्धांमध्याने स्थित्वा पंश्वानिर्विकल्पो जातः । परं किंतु तस्य स्तोककालत्वान्महावतप्र- सिद्धिर्नास्ति । अथेदं मतं वयमपि तथा कुर्मोऽवसानकाले । नैवं वक्तव्यं । यद्येकस्यधिस्य कथंचिन्निधानलाभो जातस्तहि किं सर्वेषां भवतीति भावार्थः । तथा चोक्तं । "पुन्चममा- विदजोगो मरणे आगहओ जदि वि कोई । खन्नंगनिधि दिद्रुतं तं खु पमाणं ण सम्वत्थ" ।। १७९ ॥ ', एवं मोक्षमोक्षफलमोक्षमार्गप्रतिपादकमहाधिकारमध्ये परमोपशमभावव्याख्यानोपलक्ष- णत्वेन चतुर्दशसूत्रैः स्थलं समाप्तम् । अथानंतरं निश्चयनयेन पुण्यपापे द्वे समाने इयाद्युप- लक्षणत्वेन चतुर्दशसूत्रपर्यतं व्याख्यान क्रियते । तद्यथा-योसौ विभावखभावपरिणामी निश्चयनयेन बंधमोक्षहेतुभूतौ न जानाति स एव पुण्यपापद्वयं करोति न चान्य इति मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं प्रतिपादयति;- बंधहं मोक्खहं हेउ णिरु, जो णवि जाणइ कोइ। सो पर मोहिं करइ जिय, पुण्णुवि पाउवि दोवि ।। १८०॥ बंधस्य मोक्षस्य हेतुः निजः यः नैव जानाति कश्चित् । स एव मोहेन करोति जीव पुण्यमपि पापमपि द्वे अपि ॥ १८० ॥ : बंधहं इत्यादि । बंधहं बंधस्य मोक्खहं मोक्षस्य हेउ हेतुः कारणं । कथंभूतं । णिरु निजविभावस्वभावहेतुस्वरूपं जो णवि जाणइ कोइ यो नैव जानाति कश्चित् सो पर स वैसे हमको भी होवेगा । ऐसा विचार ठीक नही है । यदि किसीएक अंधेको किसी तरहसे निधिका लाभ हुआ तो क्या सभीको ऐसा होसकता है सवको नही होता । भरत सरीखे भरत ही हुए । इसलिये अन्य भव्य जीवोंको यही योग्य है कि तप संयमका साधन करना ही श्रेष्ठ है । ऐसा ही "पुन्बं" इत्यादि गाथासे दूसरी जगह भी कहा है । अर्थ ऐसा है कि जिसने पहले तो योगका अभ्यास नही किया और मरणके समय जो कभी आराधक हो जावे तो यह वात ऐसे जानना जैसे किसी अंधे पुरुषको- निधिका लाभ हुआ हो । ऐसी वात सब जगह प्रमाण नही होसकती। कभी कहीपर-होवे तो होवे ॥ १७९ ॥ । इस तरह मोक्ष, मोक्षका फल और मोक्षके मार्गके कहनेवाले दूसरे महाधिकार में परम उपशांत भावके व्याख्यानकी मुख्यतासे अंतरस्थलमें चौदह : दोहा पूर्ण हुए । -- आगे निश्चय नयकर पुन्य पाप दोनों ही समान ऐसा चौदह दोहाओंमें कहते हैं । जो कोई खभाव परिणामको मोक्षका कारण और विभाव परिणामको बंधका कारण ऐसा निश्चयसे भेद नहीं जानता है वही पुन्यपापका कर्ता' होता है - अन्ये नहीं ऐसा मन में धारणकर यहाँगाथासूत्र कहते हैं;--[ः कश्चित् ] जो कोई जीव [बंधस्य . परमात्मप्रकाश १९५ एव मोहिं मोहेन करइ करोति पुण्णुवि. पाउवि पुण्यमपि पापमपि । क्रतिसंख्योपेते अपि । दोइ द्वे अपीति । तथाहि । निजशुद्धात्मानुभूतिरुचिविपरीतं मिथ्यादर्शनं स्वशुद्धात्म- प्रतीतिविपरीतं मिथ्याज्ञानं निजशुद्धात्मद्रव्यनिश्चलस्थितिविपरीतं मिथ्याचारित्रमित्येतत्रयं कारणं, तस्मात्रयाद्विपरीतं भेदाभेदुरत्नत्रयस्वरूपं मोक्षस्य कारणमिति योसौ न जानाति स एव पुण्यपापद्वयं निश्चयनयेन हेयमपि मोहवशात्पुण्यमुपादेयं करोति पापं हेयं करोतीति भावार्थः : ॥ १८० ॥ अथ सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रपरिणतमात्मानं योसौ मुक्तिकारणं न जानाति स पुण्यपाप- द्वयं करोतीति दर्शयति,- दसणणाणचरित्तमउ, जो णवि अप्पु मुणेइ । सिद्धिहिं कारणु भणिवि जिय, सो पर ताई करेइ ॥ १८१ ॥ दर्शनज्ञानचारित्रमयं यः नैवात्मानं मनुते । मोक्षस्य कारणं भणित्वा जीव स एव ते करोति ॥ १८१ ।। दसणु णाणु चरित्तु इत्यादि । दंसणणाणचरित्तमउ सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रमयं जो णवि अप्पु मुणेइ यः कर्ता नैवात्मानं मनुते जानाति । किंकृत्वा न जानाति । मोक्खहं कारणु भणिवि मोक्षस्य कारणं भणित्वा मत्त्वा जिय हे जीव सो पर ताई करेइ स एव पुरुपस्ते पुण्यपापे द्वे करोतीति । तथाहि-निजशुद्धात्मभावनोत्थवीतरागसहजानंदैकरूप- मोक्षस्य हेतुः] बंध और मोक्षका कारण [निजः] अपना विभाव और खभाव परिणाम है ऐसा भेद [ नैव जानाति ] नही जानता है [स एव] वोही [ पुण्य मपि पापमपि ] पुण्य और पाप [वै अपि ] दोनोंको ही [ मोहेन ] मोहसे [करोति] कर्ता है । भावार्थ-निज शुद्धात्माकी अनुभूतिकी रुचिसे विपरीत जो मिथ्या- दर्शन, निज शुद्धात्माके ज्ञानसे विपरीत मिथ्याज्ञान और निजशुद्धात्मद्रव्यमें निश्चल स्थिरतासे उलटा जो मिथ्याचारित्र इन तीनोंको बंधका कारण और इन तीनोंसे रहित भेदाभेद रतत्रय स्वरूप मोक्षका कारण ऐसा जो नहीं जानता है । वही मोहके वशसे पुन्य पापका कर्ता होता है । पुन्यको उपादेय जानके कर्ता है पापको हेय समझता है ॥ १८० ॥ आगे. सम्यग्दर्शन . सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्ररूप • परिणमता जो आत्मा वोही मुक्तिका कारण है ऐसा जो.भेद नही जानता है वही पुन्यपाप दोनोंको कर्ता है ऐसा ' दिखलातेहै;-[यः] जो [दर्शनज्ञानचारित्रमयं] सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रमयी [आत्मानं] आत्माको [नैव मनुते नही जानता [स एवं] वही [हे-जीव] हे जीव [ते] उन पुण्य पाप दोनोंको [ मोक्षस्य! कारणं] मोक्षके कारण [मत्त्वा] जानकर रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । सुखरसास्वादरुचिरूपं सम्यग्दर्शनं, तत्रैव स्वशुद्धात्मनि वीतरागसहजानंदैकस्वसंवेदनपरि- च्छित्तिरूपं सम्यग्ज्ञानं, वीतरागसहजानंदैकपरमसमरसीभावेन तत्रैव निश्चलस्थिरत्वं सम्यक् चारित्रं इत्येतैत्रिभिः परिणतमात्मानं योसौ मोक्षकारणं न जानाति स एव पुण्यमुपादेयं करोति पापं हेयं च करोतीति । यस्तु पूर्वोक्तरनत्रयपरिणतमात्मानमेव मोक्षमार्ग जानाति तस्य तु सम्यग्दृष्टेयद्यपि संसारस्थितिछेदकारणेन सम्यत्वादिगुणेन परंपरया मुक्तिकारणं तीर्थकरनाम प्रकृत्यादिकमनीहितवृत्त्या विशिष्टपुण्यमानवति तथाप्यसौ तदुपादेयं न करोतीति भावार्थः ॥ १८१॥ अथ योसौ निश्चयेन पुण्यपापद्वयं समानं न मन्यते स मोहेन मोहितः सन् संसारं परिभ्रमतीति कथयति;- जो णवि मण्णइ जीउ समु, पुण्णुवि पाउवि दोई। सो चिरु दुक्खु सहंतु जिय, मोहिं हिंडइ लोइ ॥ १८२ ॥ यः नैव मन्यते जीवः समाने पुण्यमपि पापमपि द्वे । स चिरं दुःखं सहमानः जीव मोहेन हिडते लोके ॥ १८२ ॥ जो इत्यादि । जो णवि मण्णइ यः कर्ता नैव मन्यते जीउ जीवः । किं न मन्यते । समु समाने । के। पुण्णुवि पाउवि दोइ पुण्यमपि पापमपि द्वे सो स जीवः चिरु दुक्खु सहंतु चिरं बहुतरं कालं दुक्खं सहमानःसन् जिय हे जीव मोहिं हिंडइ लोइ मोहेन मोहितःसन् हिंडते भ्रमति । क । लोके संसारे इति । तथा च । यद्यप्यसद्भूत- [करोति] करता है । भावार्थ-निजशुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न जो वीतराग सह- जानंद एकरूप सुखरसका आखाद उसकी रुचिरूप सम्यग्दर्शन, उसी शुद्धात्मामें वीत- राग नित्यानंद खसंवेदन रूप सम्यग्ज्ञान और वीतरागपरमानंद परम समरसी भावकर उसीमें निश्चय स्थिरता रूप सम्यक् चारित्र-इन तीनों स्वरूप परिणत हुआ जो आत्मा उसको जो जीव मोक्षका कारण नही जानता वोही पुन्यको आदरने योग्य जानता है और पापको त्यागने योग्य जानता है । तथा जो सम्यग्दृष्टी जीव रत्नत्रयखरूप परिणत हुए आत्माको ही मोक्षका मार्ग जानता है उसके यद्यपि ससारकी स्थितिके छेदनका कारण सम्यक्त्वादिगुणसे परंपराय मुक्तिका कारण ऐसी तीर्थकर नाम प्रकृति आदि शुभ (पुण्य ) प्रकृतियोंको ( कर्मोंको ) अवाछितवृत्तिसे ग्रहण करता है तौभी उपादेय नहीं मानता । कर्मप्रकृतियोंको त्यागने योग्य ही समझता है ।। १८१ ॥ आगे जो निश्चयनयसे पुन्य पाप दोनोंको समान नही मानता वह मोहसे मोहित कारण एसागनश्चकता है ऐसा कहते हैं।[यः] जो [जीवः] जीव [पुण्यमपि ऐसा मनमें धारणकर गैर पाप दोनोंको [समाने] समान [नैव मन्यते ] नहीं मानता .

परमात्मप्रकाशः। १९७ व्यवहारेण द्रव्यपुण्यपापे परस्परभिन्ने भवतस्तथैवाशुद्धनिश्चयेन भावपुण्यपापे मिन्ने भवत- स्तथापि शुद्धनिश्चयनयेन पुण्यपापरहितशुद्धात्मनः सकाशाद्विलक्षणे सुवर्णलोहनिगलवद्वंध प्रति समान एव भवतः । एवं नयविभागेन योसौ पुण्यपापद्वयं समानं न मन्यते स निर्मोहशुद्धात्मनो विपरीतेन मोहेन मोहितः सन् संसारे परिभ्रमति इति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । तर्हि ये केचन पुण्यपापद्वयं समानं कृत्वा तिष्ठति तेषां किमिति दूषणं दीयते भवद्भिरिति । भगवानाह । यदि शुद्धात्मानुभूतिलक्षणं त्रिगुप्तिगुप्तवीतरागनिर्वि- कल्पपरमसमाधि लभ्वा तिष्ठति तदा सम्मतमेव । यदि पुनस्तथाविधामवस्थामलभमाना अपि संतो गृहस्थावस्थायां दानपूजादिकं त्यजति तपोधनावस्थायां षडावश्यादिकं च त्यत्त्वोभयभृष्टाः संतः तिष्ठति तदा दूषणमेवेति तात्पर्य ॥ १८२ ॥ अथ येन पापफलेन जीवो दुःखं प्राप्य दुःखविनाशार्थ धर्माभिमुखो भवति तत्पापमपि समीचीनमिति दर्शयति,- वर जिय पावई सुंदरई, णाणिय ताई भणंति । जीवहं दुक्खई जणिवि लहु, सिवमइ जाई कुणंति ॥ १८३ ॥ [सः] वह जीव [मोहेन] मोहसे मोहित हुआ [चिरं] बहुतकाल तक [दुःखं सह- मानः] दुःख सहता हुआ [लोके] संसारमें [हिंडते भटकता है । भावार्थ-यद्यपि असद्भूत ( असत्य ) व्यवहारनयसे द्रव्यपुन्य और द्रव्य पाप येदोनों एक दूसरेसे भिन्न हैं और अशुद्ध निश्शयनयसे भावपुन्य और भावपाप ये दोनोंभी आपसमे भिन्न हैं तौभी शुद्ध निश्चय नयकर पुन्य पाप रहित शुद्धात्मासे दोनोंही भिन्न हुए बधरूप होनेसे दोनों समा- न ही हैं । जैसे सोनेकी वेडी और लोहेकी बेडी ये दोनों ही बंधका कारण हैं इससे समान हैं । इस तरह नयविभागसे जो पुन्य पापको समान नहीं मानता वह निर्मोह शुद्धात्मासे विपरीत जो मोहकर्म उससे मोहित हुआ ससारमें भ्रमण करता है ॥ ऐसा कथन सुनकर प्रभाकर भट्ट बोला । यदि ऐसे ही है तो कितने ही परमतवादी पुन्य पापको समान मानकर खच्छंद हुए रहते हैं उनको तुम दोष क्यों देते हौ । तब योगी- द्रदेवने कहा । जब शुद्धात्मानुभूतिखरूप तीनगुप्तिसे गुप्त वीतरागनिर्विकल्पसमाधिको पाकर ध्यान में मम हुए पुन्य पापको समान जानते हैं तब तो जानना योग्य है । परंतु जो मूढ परमसमाधिको नहीं पाकरभी गृहस्थ अवस्थामें दानपूजा आदि शुभक्रियाओको छोड़देते हैं और मुनिपदमें छह आवश्यककर्मोंको छोडते हैं वे दोनों वातोंसे भ्रष्ट हैं । न तो यती हैं न श्रावक हैं । वे निंदा योग्य ही हैं । तब उनको दोष ही है ऐसा जानना ॥ १८२॥ आगे जिस पापके फलसे यह जीव नरकादिमें दुःख पाकर उस दुःखके दूर करनेके- १९८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । वरं जीव पापानि सुंदराणि ज्ञानिनः तानि भणंति । जीवानां दुःखानि जनित्वा लघु शिवमति यानि कुर्वति ॥ १८३-|| वर जिय इत्यादि । वर जिय वरं किंतु हे जीव पावई सुंदरई पापानि सुंदराणि समीचीनानि भणंति कथयति । के । णाणिय ज्ञानिनः तत्त्ववेदिनः । कानि । ताई तानि पूर्वोक्तानि पापानि । कथंभूतानि ! जीवहं दुक्खई जणिवि लहु सिवमई जाई कुणंति जीवानां दुःखानि जनित्वा लघु शीघ्र शिवमति मुक्तियोग्यमति यानि कुर्वति । लिये धर्मके संमुख होता है वह पापका फल भी श्रेष्ठ ( प्रशंसा योग्य ) है ऐसा दिख- लाते हैं;-[हे जीव] हे जीव [यानि] जो पापके उदय [जीवानां] जीवोंको [दु:- खानि जनित्वा] दुःख देकर [लघु] शीघ्र ही [शिवमति] मोक्षके जाने योग्य उपायोंमें बुद्धि [कुर्वति] कर देंवें [तानि पापानि] वे पाप भी [वरं सुंदराणि] बहुत अच्छे है ऐसा [ज्ञानिनः] ज्ञानी [भणंति] कहते है । भावार्थ-कोई जीव पाप- करके नरकमें गया वहांपर महान दुःख भोगे उससे कोई समय किसी जीवके' सम्य- तवकी प्राप्ति हो जाती है। क्योंकि उस जगह सम्यत्तत्वकी प्राप्तिके तीन कारण है। पहला तो यह है कि तीसरे नरक तक देवता उसे संबोधनेको (चेतावने को ) जाते है सो कभी कोई जीवके धर्म सुननेसे सम्यक्त्व उत्पन्न हो जावे, दूसरा कारण-पूर्व - भवका स्मरण और तीसरा नरककी पीडाकरि दुःखी हुआ नरकको महान दुःखका स्थान जान नरकके कारण जो हिसा झूठ चोरी कुशील परिग्रह और आरंभादिक है उनको खराव जान पापसे उदास होवे। तीसरे नरकतक ये तीन कारण है। आगेके चौथे पांचवें छठे सातवें नरकमे देवोंका गमन न होनेसे धर्मश्रवण तो है नहीं लेकिन जातिसरण है, तथा वेदनाकर दुःखी होके पापसे भयभीत होना-ये दो ही कारण है। इन कारणोंको पाकर किसी जीवके सम्यत्त्व उत्पन्न हो सकता है । इस नयसे कोई भव्य जीव पापके उदयसे खोटी गतिमें गया और वहां जाकर यदि सुलट जावे तथा सम्यक्त्व पावै तो वह कुगति भी बहुत श्रेष्ठ है। यही श्रीयोगीन्द्राचार्यने मूलमें कहा है-जो पाप जीवोंको दुःख प्राप्त कराके फिर शीघ्र ही मोक्षमार्गमें बुद्धिको लगावें वे अशुभ 'भी अच्छे । तथा जो अज्ञानी जीव किसी समय अज्ञानतपसे देव भी हुआ और देवसे मरके एकेंद्री हुआ तो वह देवपर्याय पाना किस कामका । अज्ञानीके देवपद पाना भी वृथा है । जो कभी ज्ञानके प्रसादसे उत्कृष्ट देव होके बहुत कालतक सुख भोगके देवसे मनुष्य होकर मुनिव्रत धारण करके मोक्षको-पाचे तो उसके समान दूसरा क्या होगा "। जो नरकसे भी निकलकर कोई भव्यजीव मनुष्य होके महाव्रत धारण करके मुक्ति पावे तो वोमी अच्छा है। ज्ञानी पुरुष उन पापियोंको भी श्रेष्ठ कहते है, जो पापके प्रभावसे दुःख - परमात्मप्रकाशः। १९९ अयमंत्राभिप्रायः । यत्र भेदाभेदरबत्रयात्मकं श्रीधर्म लभते जीवस्तत्पापजनितदुक्खमपि श्रेष्ठमिति । कस्मादिति चेत् । "आर्ता नरा धर्मपरा भवंती"ति वचनात् ॥ १८३ ॥ अथ निदानबंधोपार्जितानि पुण्यानि जीवस्य राज्यादिविभूतिं दत्त्वा नारकादिदुःखं जनयंतीति हेतोः समीचीनानि न भवंतीति कथयति, मं पुणु पुण्णइ भल्लाई, णाणिय ताई भणति । जीवहं रजई देवि लहु, दुक्खई जाई जणंति ॥ १८४ ॥ मा पुनः पुण्यानि भद्राणि ज्ञानिनः तानि भणंति । जीवस्य राज्यानि दत्त्वा लघु दुःखानि यानि जनयंति ॥ १८४ ॥ मं पुणु इत्यादि । मं पुणु मा पुनः न पुनः पुण्णइं भल्लाई पुण्यानि भद्राणि भवंतीति णाणिय ताई भणंति ज्ञानिनः पुरुषास्तानि पुण्यानि कर्मतापन्नानि भणंति । यानि कि कुर्वति । जीवहं रजई देवि लहु दुक्खई जाई जणंति यानि पुण्यकर्माणि जीवस्य राज्यानि दत्त्वा लघु शीघ्रं दुःखानि जनयंति । तद्यथा। निजशुद्धात्मभावनोत्थवीतरागपर- मानंदैकरूपसुखानुभवविपरीतेन दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षारूपनिदानबंधपूर्वकज्ञानतपोदाना- दिना यान्युपार्जितानि पुण्यकर्माणि तानि हेयानि । कस्मादितिचेत् । निदानबंधोपार्जित- पुण्येन भवांतरे राज्यादिविभूतौ लब्धायां तु भोगान् त्यक्तुं न शक्नोति तेन पुण्येन नरकादि- भोगकर उस दुःखसे डरके दुःखके मूल कारण पापको जानके उस पापसे उदास हों वे प्रशंसा करने योग्य है, और पापी जीव प्रशंसाके योग्य नहीं है क्योंकि पापक्रिया हमेशा निंदनीक है । भेदाभेदरलत्रयखरूप श्रीवीतरागदेवके धर्मको जो धारण करते है वे श्रेष्ठ है । यदि सुखी धारण करै तोभी ठीक और दुःखी धारण करे तब भी ठीक । क्योंकि शासका वचन है कि कोई महाभाग दुःखी हुए ही धर्ममें लवलीन होते है ।। १८३ ।। आगे निदानबंधसे उपार्जन किये हुए पुण्यकर्म जीवको राज्यादि विभूति देकर नर- कादि दुःख उत्पन्न कराते है इसलिये अच्छे नही है।-[पुनः ] फिर [तानि पुण्यानि] वे पुण्य भी [मा भद्राणि] अच्छे नही है [यानि] जो [जीवस्य] जीवको [राज्या- नि दत्वा] राज देकर [लघु] शीघ्र ही [दुःखानि] नरकादि दुःखोंको [जनयंति] उपजाते हैं [ज्ञानिनः] ऐसा ज्ञानी पुरुष [भणंति] कहते हैं । भावार्थ-निज शुद्धा- स्माकी भावनासे उत्पन्न नो वीतराग परमानंद अतीद्रिय सुखका अनुभव उससे विपरीत जो देखे सुने भोगे इंन्द्रियोंके भोग उनकी वांछारूप निदानबंधपूर्वक दान तप आदि- कसे उपार्जन किये जो पुन्यकर्म हैं वे हेय हैं। क्योंकि वे निदानबंधसे उपार्जनकिये पुन्यकर्म जीवको दूसरे भवमें राजसपदा देते हैं । उस राज्य विभूतिको अज्ञानी जीव माकर विषय भोगोंको छोड नही सकता उससे नरकादिकके -दुःख पाता है रावणकी - २०० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । दुःखं लभते । रावणादिवत् । तेन कारणेन पुण्यानि हेयानीति । ये पुनर्निदानरहित- पुण्यसहिताः पुरुषास्ते भवांतरे राज्यादिभोगे लब्धेपि भोगांत्यत्तवा जिनदीक्षां गृहीत्वा चोर्ध्वगतिगामिनो भवंति वलदेवादिवदिति भावार्थः । तथा चोक्तं । "ऊर्ध्वगा वलदेवाः स्युनिनिदाना भवांतरे" । इत्यादि वचनात् ॥ १८४ ॥ अथ निर्मलसम्यक्त्वाभिमुखानां मरणमपि भद्रं तेन विना पुण्यमपि समीचीनं न भवतीति प्रतिपादयति वर णियदसणअहिमुहउ, मरणुवि जीव लहेसि । मा णियदसणविम्मुहड, पुण्णुवि जीव करेसि ॥ १८५ ।। वरं निजदर्शनाभिमुखः मरणमपि जीव लभख । मा निजदर्शनविमुखः पुण्यमपि जीव करिष्यसि ॥ १८५ ।। वर इत्यादि । वर णियदंसण अहिमुहउ वरं किंतु निजदर्शनाभिमुखः सन् मरणुवि जीव लहेसि मरणमपि हे जीव लभस्व भज मा णियदसणविम्मुहउ मा पुनर्निजदर्शन- विमुखःसन् पुण्णुवि जीव करेसि पुण्यमपि हे जीव करिष्यसि । तथा च स्वकीयनिर्दो- षिपरमालानुभूतिरुचिरूपं त्रिगुप्तिगुप्तलक्षणनिश्चयचारित्राविनाभूतं वीतरागसंज्ञं निश्चयस- भ्यत्त्वं भण्यते तदभिमुखःसन् हे जीव मरणमपि लभस्व दोपो नास्ति तेन विना पुण्यं मा , , तरह । इसलिये अज्ञानियोंके पुन्य कर्म भी होता है । और जो निदानबंध रहित ज्ञानी पुरुष हैं वे दूसरे भवमें राज्यादि भोगोंको पाते हैं तौभी भोगोंको छोडकर जिनराजकी दीक्षा धारण करते हैं । धर्मको सेवनकर ऊर्ध्वगतिगामी बलदेव आदिककी तरह होते हैं । ऐसा दूसरी जगह भी कहा है कि भवांतरमें निदानबंध नही करते हुए जो महामुनि वे महान तपकर वर्गलोक जाते हैं । वहांसे चयकर बलभद्र होते हैं। वे देवोंसे अधिक सुख भोगकर राजका त्याग करके मुनिव्रतको धारणकर या तो केवलज्ञान पाके मोक्षको ही पधारते हैं या बड़ी रिद्धिके धारी देव होते हैं, फिर मनुष्य होकर मोक्षको पाते हैं ॥ १८४॥ आगे ऐसा कहते हैं कि निर्मल सम्यक्त्वधारी जीवोंको मरण भी सुखकारी है उनका मरना अच्छा है और सम्यक्त्वके विना पुन्यका उदय भी अच्छा नही है।-[हे जीव] हे जीव [निजदर्शनाभिमुखः] जो अपने सम्यग्दर्शनके सन्मुख होकर [मरणमपि] मरणको भी [लभख वरं] पावे तो अच्छा है परंतु [जीव] हे जीव [निजदर्शनवि- मुखः] अपने सम्यग्दर्शनसे विमुख हुआ [पुण्यमपि] पुण्य भी [करिष्यसि] करै [मा वरं] तो अच्छा नही । भावार्थ-निर्दोष निज परमात्माकी अनुभूतिकी रुचिरूप तीन गुप्तिमई जो निश्चय .. चारित्र उससे अविनाभावी (तन्मई ) जो वीतरागनिश्चय- परमात्मप्रकाशः। २०१ कार्षीरिति । अत्र सम्यक्त्वरहिता जीवाः पुण्यसहिता अपि पापजीवा भण्यते । सम्यक्त्व- सहिताः पुनः पूर्वभवांतरोपार्जितपापफलं मुंजाना अपि पुण्यजीवा भण्यंते येन कारणेन तेन कारणेन सम्यक्त्वसहितानां मरणमपि भद्रं । सम्यक्त्वरहितानां च पुण्यमपि भद्रं न भवति । कस्मात् । तेन निदानबंधपुण्येन भवांतरे भोगान् लब्ध्वा पश्चान्नरकादिकं गच्छं- तीति भावार्थः । तथा चोक्तं । "वरं नरकवासोपि सम्यक्त्वेन हि संयुतः। न तु सम्यक्त्व- हीनस्य निवासो दिवि राजते" ॥ १८५ ॥ अथ तमेवार्थ पुनरपि दृढयति,- जेणियदसणअहिमुहा, सुक्खु अणंतु लहंति । तिं विणु पुण्णु करंतावि दुक्खु अणंतु सहति ॥ १८६ ॥ ये निजदर्शनाभिमुखाः सौख्यमनंतं लभते । तेन विना पुण्यं कुर्वाणा अपि दुःखमनंतं सहते ॥ १८६ ॥ जे णिय इत्यादि । जे ये केचन णियदंसणअहिमुहा निजदर्शनाभिमुखाः ते पुरुषाः सोक्खु अणंतु लहंति सौख्यमनंतं लभते । अपरे केचन तिं विणु पुण्णु करंतावि सम्यक्त्व उसके सन्मुख हुआ हे जीव जो तू मरण भी पावै तो दोष नहीं और उस सभ्यत्तवके विना मिथ्यात्व अवस्थामें पुण्य भी करे तो अच्छा नहीं है । जो सम्यक्त्वरहित मिथ्यादृष्टि जीव पुण्य सहित हैं तो भी पापी ही कहे हैं । तथा जो सम्यक्त्वसहित हैं वे पहले भवमें उपार्जन किये हुए पापके फलसे दुःख दारिद्र भोगते हैं तौभी पुण्याधि- कारी ही कहे है । इसलिये जो सम्यक्त्व सहित है उनका मरना भी अच्छा । मरकर ऊपरको जावेंगे । और जो सम्यक्त्व रहित है उनका पुण्य कर्म भी प्रशंसा योग्य नहीं है । वे पुण्यके उदयसे क्षुद्र ( नीच) देव तथा क्षुद्र मनुष्य होके संसार वनमें भटकेंगे। यदि पूर्वले पुन्यको यहां भोगते है तो तुच्छ फल भोगके नरकनिगोदमें पड़ेंगे । इसलिये मिथ्यादृष्टियोंका पुण्य भी भला नहीं है। निदानबंधपुण्यसे भवातरमें भोगोंको पाकर पीछे नरकमें जावेंगे। सम्यग्दृष्टि प्रथम मिथ्यात्व अवस्थामें किये हुए पापोंके फलसे दुःख भोगते है लेकिन अव सम्यक्त्व मिला है इसलिये सदा सुखी ही होवेंगे । आयुके अंतमें नरकसे निकलके मनुष्य होकर ऊर्ध्वगति ही पावेंगे, और मिथ्यादृष्टि जो पुण्यके उदयसे देवभी हुए है तोभी देवलोकसे आकर एकेंद्री होवेंगे। ऐसा दूसरी जगह भी "वरं" इत्यादिश्लोकसे कहा है कि सम्यक्त्व सहित नरकमें रहना भी अच्छा और सम्य- नव रहितका खर्गमें निवास भी नही शोभा देता ॥ १८५ ।। अब इसी वातको फिर भी दृढ करते है;-[ये] जो [निजदर्शनाभिमुखाः] सम्य- ग्दर्शनके सन्मुख है वे [अनंतं सुखं] अनंत. सुखको [लभंते] पाते है [तेन विना] २६ २०२ , रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । तेन सम्यक्त्वेन विना पुण्यं कुर्वाणा अपि दुक्खु अणंतु सहति दुःखमनंतं सहत इति । तथाहि । निजशुद्धात्मतत्त्वोपलब्धिरुचिरूपनिश्चयसम्यक्त्वाभिमुखा ये ते केचनास्मिन्नेव भने धर्मपुत्रभीमार्जुनाद्विवदक्षयसुखं लभंते, ये केचन पुनर्नकुलसहदेवादिवत् स्वर्गसुखं लभते । ये तु सम्यक्त्वरहितास्ते पुण्यं कुर्वाणा अपि दुःखमनंतमनुभवंतीति तात्पर्य ।। १८६ ।। अथ निश्चयेन पुण्यं निराकरोति; पुण्णेण होइ विहवो, विहवेण मओ मएण मइमोहो। मइमोहेण य पावं, ता पुण्णं अम्ह मा होउ ॥ १८७ ।। पुण्येन भवति विभवो विभवेन मदो मदेन मतिमोहः । मतिमोहेन च पापं तस्मात् पुण्यं अस्माकं मा भूत् ॥ १८७ ॥ पुण्णेण इत्यादि । पुण्णेण होइ विहवो पुण्येन विभवो विभूतिर्भवति विहवेण मओ विभवेन मदोऽहंकारो गर्वो भवति भएण मइमोहो विज्ञानाद्यष्टविधमदेन मतिमोहो मतिभ्रंशो विवेकमूढत्वं भवति । मइमोहेण य पावं मतिमूढत्वेन पापं भवति ता पुण्णं अम्ह मा होउ तस्मादित्थंभूतं पुण्यं अस्माकं माभूदिति । तथाच । इदं पूर्वोक्तं पुण्यं भेदाभेदरत्नत्रयाराधनारहितेन दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षारूपनिदानवंधपरिणामसहितेन जीवेन और जो जीव सम्यक्त्वरहित हैं वे [पुण्यं कुर्वाणा अपि] पुण्य भी करते है तो भी पुन्यके फलसे अल्प सुख पाके संसारमें [अनंतं दुःखं] अनंत दुःख [सहते] भोगते है। भावार्थ-निज शुद्धात्माकी प्राप्तिरूप निश्चय सम्यत्तवके सन्मुख हुए जो सत्पुरुष हैं वे इसी भवमें युधिष्ठिर भीम अर्जुनकी तरह अविनाशी सुखको पाते हैं और कितने ही नकुल सहदेवकी तरह अहमिंद्र पदके सुख पाते है। तथा जो सम्यक्त्वसे रहित मिथ्यादृष्टि जीव पुण्य भी करते हैं तौभी मोक्षके अधिकारी नही हैं संसारी जीव ही हैं, यह तात्पर्य जानना ॥ १८६ ॥ आगे निश्चयसे मिथ्यादृष्टियोंके पुन्यका निषेध करते हैं;-[पुण्येन] पुण्यसे घरमें [विभवः] धन [भवति ] होता है और [विभवेन] धनसे [मदः] अभिमान [मदेन] मानसे [मतिमोहः] बुद्धिभ्रम होता है [मतिमोहेन बुद्धिके भ्रम होनेसे (अविवेकसे) [पा] पाप होता है [तस्मात् ] इसलिये [ पुण्यं ] ऐसा पुन्य [ असाकं ] हमारे [मा भवतु ] न होवै । भावार्थ-भेदाभेद रत्नत्रयकी आराधनासे रहित, देखे सुने अनुभवकिये भोगोंकी बांछारूप निदानबंधके परिणामोंसहित जो मिथ्यादृष्टि संसारी अज्ञानी जीव है उसने पहले उपार्जन किये जो भोगोंकी वांछारूप पुण्य उसके फलसे प्राप्त हुई घरमें संपदा होनेसे अभिमान (घमंड ) होता है अभिमानसे बुद्धिभ्रष्ट होती है बुद्धि भ्रष्टकर पाप कमाता है और पापसे भव २ में अनंत दुःख पाता है । इसलिये मिथ्यादृष्टि- परमात्मप्रकाशः। २०३ यदुपार्जितं. पूर्वभवे तदेव मदमहंकारं जनयति बुद्धिविनाशं च करोति । न च पुनः सम्यक्त्वादिगुणसहितं भरतसगररामपांडवादिपुण्यबंधवत् । यदि पुनः सर्वेषां मदं जनयति तर्हि ते कथं पुण्यभाजनाःसंतो मदाहंकारादिविकल्पं त्यक्त्वा मोक्षं गता इति भावार्थः ।। तथा चोक्तं चिरंतनानां निरहंकारत्वं । "सत्यं वाचि मतौ श्रुतं हृदि दया शौर्य भुजे विक्रमे लक्ष्मीनमनूनमर्थिनिचये मार्गे गतिनिवृतेः । येषां प्रागजनीह तेपि निरहंकाराः श्रुतेर्गोचराश्चित्रं संप्रति लेशतोपि न गुणास्तेषां तथाप्युद्धताः "॥ १८७ ।। अथ देवशास्त्रगुरुभक्त्या मुख्यवृत्त्या पुण्यं भवति न च मोक्ष इति प्रतिपादयति, देवहं सत्थहं मुणिवरह, भत्तिए पुण्णु हवेइ । कम्मक्खउ पुणु होइ णवि, अजउ संति भणेइ ॥ १८८ ॥ देवानां शास्त्राणां मुनिवराणां भक्त्या पुण्यं भवति । कर्मक्षयः पुनः भवति नैव आर्यः सांतिः भणति ॥ १८८ ॥ देवह इत्यादि । देवहं सत्थहं मुणिवरहं भत्तिए पुण्णु हवेइ देवशास्त्रमुनीनां भक्त्या पुण्यं भवति कम्मक्खउ पुणु होइ णवि कर्मक्षयः पुनर्मुख्यवृत्त्या नैव भवति । एवं कोसौ भणति । अजउ आर्यः । किं नामा । संति नामा भणेइ भणति कथयति इति । योंका पुण्य पापका ही कारण है। जो सम्यत्तवादि गुण सहित भरत सगर राम पाडवादिक विवेकी जीव हैं उनको पुन्यबंध अभिमान नही उत्पन्न करता परंपराय मोक्षका कारण है। जैसे अज्ञानीयोंके पुन्यका फल विभूति गर्वका कारण है वैसे सम्यग्दृष्टियोंके नहीं है। वे सम्यग्दृष्टि पुण्यके पात्र हुए चक्रवर्ती आदिकी विभूति पाकर मद अहंकारादि विक- ल्पोंको छोडकर मोक्षको गये अर्थात् सम्यग्दृष्टि जीव चक्रवर्ती बलभद्रपदमें भी निरहंकार रहे । ऐसा ही कथन आत्मानुशासन ग्रंथमें श्रीगुणभद्राचार्यने किया है । कि, पहले समयमें ऐसे सत्पुरुष होगये हैं कि जिनके वचनमें सत्य, शास्त्रमें बुद्धि, मनमें दया, पराक्रमरूप भुजाओंमें शूर वीरता, याचकोंमें पूर्ण लक्ष्मीका दान और मोक्षमार्ग में गमन है वे निरभिमानी हुए, जिनके किसीगुणका अहंकार नहीं हुआ। उनके नाम शास्त्रोंमें प्रसिद्ध हैं परंतु अव बड़ा अचंभा है कि इस पंचमकालमें लेशमात्र भी गुण नहीं है तौभी उनके उद्धतपना है यानी गुण तो रंचमात्र भी नही और अभिमानमें बुद्धि रहती है१८७ आगे देव गुरु शास्त्रकी भक्तिसे मुख्यतासे तो पुण्य बंध होता है परंपराय मोक्ष होती है साक्षात् मोक्ष नही ऐसा कहते हैं;[ देवानां शास्त्राणां मुनिवराणां ] श्री वीतरा- गदेव, द्वादशाग शास्त्र और दिगंबर साधुओंकी [ भक्क्या] भक्ति करनेसे [ पुण्यं भवति ] मुख्यतासे पुण्य होता है [ पुनः ] लेकिन [कर्मक्षयः] तत्काल कर्मोका क्षय [ नैव भवति ] नही होता ऐसा [ आर्यः सांतिः] साति नाम आर्य अथवा कपटरहित सत-

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रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
तथाहि । सम्यक्त्वपूर्वकदेवशास्त्रगुरुभक्त्या मुख्यवृत्त्या पुण्यमेव भवति न च मोक्षः ।
अत्राह प्रभाकरभट्टः । यदि पुण्यं मुख्यवृत्त्या मोक्षकारणं न भवत्युपादेयं च न भवति
तर्हि भरतसगररामपांडवादयोपि निरंतरं पंचपरमेष्टिगुणस्मरणदानपूजादिना निर्मरभक्ताः
संतः किमर्थ पुण्योपार्जनं कुर्युरिति । भगवानाह । यथा कोपि रामदेवादिपुल्पविशपो
देशांतरस्थितः सीतादिखीसमीपागतानां पुरुषाणां नदर्थ संभापणदानसन्मानादिकं करोति
तथा तेपि महापुरुषाः वीतरागपरमानंदेकरूपमोक्षलक्ष्मीसुखसुधारसपिपासिताः संतः
संसारस्थितिछेदकारणं विषयकपायोत्पन्नदुर्छानविनाशहेतुभूतं च परमेष्टिसंबंधिगुणस्मरण-
दानपूजादिकं कुर्युरिति । अयमत्र भावार्थः । तेषां पंचपरमष्ट्रिभक्त्यादिपरिणतानां कुछ-
विनां पलालवदनीहितं पुण्यमास्रवतीति ।। १८८ ॥
अथ देवशास्खमुनीनां योसौ निदां करोति तस्य पापबंधो भवतीति कथयति;-
देवहं सत्यहं मुणिवरहं, जो विहेसु करे ।
णियमें पाउ हवेइ तसु, जे संसार भमेइ ॥ १८९ ॥
पुरुष [भणति ] कहते हैं । भावार्थ-सम्यक्त्वपूर्वक जो देव गुरु शालकी भक्ति करता
है उसके मुख्य तो पुण्य ही होता हे और परंपराय मोक्ष होती है। जो सम्यक्त्व रहित
मिथ्यादृष्टि हैं उनके भावभक्ति तो नहीं है लौकिक बाहिरी भक्ति होती है उससे पुण्यका
ही बंध है कर्मका क्षय नहीं है। ऐसा कथन सुनकर श्रीयोगीन्द्रदेवले प्रभाकरभट्टने प्रश्न
किया । हे प्रभो जो पुण्य मुख्यतासे मोक्षका कारण नहीं है तो त्यागने योग्य ही है ग्रहण
योग्य नहीं है । जो ग्रहण योग्य नहीं है तो भरत सगर राम पाडवादिक महान् पुरुषोंने
निरंतर पंच परमेष्टीके गुणसरण क्यों किये और दान पूजादि शुभ क्रियाओंकर पूर्ण हुए
क्यों पुण्यका उपार्जन किया । तव श्रीगुरुने उत्तर दिया । कि जैसे परदेशमें स्थित कोई
रामादिक पुरुष अपनी प्यारी सीता आदि स्त्रीके पाससे आये हुए किसी मनुष्यसे बहुत
वातें करता है, उसका सन्मान करता है और दान करता है ये सब कारण अपनी
प्रियाके हैं कुछ उसके प्रसादके कारण नहीं है। उसीतरह वे भरत सगर राम पांडवादि
महान पुरुष वीतराग परमानंद रूप मोक्षलक्ष्मीके सुख अमृत रसके प्यासे हुए संसारकी
स्थितिके छेदनेकेलिये विषयकपायकर उत्पन्न हुए आर्त रौद्र खोटे ध्यानोंके नाशका
कारण श्रीपंचपरमेष्ठीके गुणोंका सरण करते हैं और दानपूजादिक करते हैं परंतु उनकी
दृष्टि केवल निज परिणतिपर है पर वस्तुपर नहीं है । पंच परमेष्ठीकी भक्ति आदि
शुभक्रियाको परिणत हुए जो भरत आदिक है उनके विना चाहा पुण्य प्रकृतिका आनव
होता है। जैसे किसानकी दृष्टि अन्नपर है तृण भूसादि पर नहीं है। बिना चाहा पुण्यका
बंध सहजमें ही होजाता है । वह उनको संसारमें नहीं भटकाय सकता है। वे तो शिव-
पुरीके ही पात्र हैं ॥ १८८ ॥

परमात्मप्रकाशः। २०५ देवानां शास्त्राणां मुनिवराणा यो विद्वेषं करोति । नियमेन पापं भवति तस्य येन ससारं भ्रमति ॥ १८९ ॥ देवहं । इत्यादि । देवह सत्थहं मुणिवरहं जो विद्देसु करेइ देवशास्त्रमुनीनां साक्षात्पु- ण्यवंधहेतुभूतानां परंपरया मुक्तिकारणभूतानां च योसौ विद्वेषं करोति । तस्य किं भवति । णियमें पाउ हवेइ तसु नियमेन पापं भवति तस्य । येन पापबंधेन किं भवति । में संसारु भमेइ येन पापेन संसारं भ्रमतीति । तद्यथा । निजपरमालपदार्थोपलंभरुचिरूपं निश्चयसम्यक्त्वकारणस्य तत्त्वार्थश्रद्धानरूपव्यवहारसम्यक्त्वस्य विषयभूतानां देवशास्नयतीनां योसौ निदां करोति स मिथ्यादृष्टिर्भवति । मिथ्यात्वेन पापं बध्नाति पापेन चतुर्गतिसंसार भ्रमतीति भावार्थः ॥ १८९ ॥ अथ पूर्वसूत्रद्वयोक्तं पुण्यपापफलं दर्शयति,- पार्विणारउ तिरिउ जिउ, पुपिणं अमरु वियाणु । मिस्सिं माणुसगइ लहइ, दोहिवि खइ णिव्वाणु ॥ १९०॥ पापेन नारकः तिर्यग् जीवः पुण्येनामरो विजानीहि । मिश्रेण मनुष्यगतिं लभते द्वयोरपि क्षये निर्वाणं ॥ १९० ॥ पावे इत्यादि । पाविं पापेन णारउ तिरिउ नारको भवति तिर्यग्भवति । कोसौ। जिउ जीवः पुण्णे अमरु वियाणु पुण्येनामरो देवो भवतीति जानीहि मिस्सि माणुसगइ लहइ मिश्रेण पुण्यपापद्वयेन मनुष्यगतिं लभते दोहि वि खइ णिव्वाणु द्वयोरपि कर्मक्षयेपि आगे देव शास्त्र गुरुकी जो निंदा करता है उसके महान पापका बंध होता है, वह पापी पापके प्रभावसे नरकनिगोदादि खोटीगतिमें अनंतकाल तक भटकता है- [देवानां शास्त्राणां मुनिवराणां ] वीतरागदेव जिनसूत्र और निग्रंथमुनियोंसे [य] जो जीव [ विद्वेषं] द्वेष [ करोति ] करता है [ तस्य ] उसके [नियमेन ] निश्चयसे [पापं] पाप [ भवति ] होता है [येन ] जिस पापके कारणसे वह जीव [ संसारं] संसारमें [ भ्रमति ] भ्रमण करता है। अर्थात् परंपराय मोक्षके कारण और साक्षात् पुण्यबंधके कारण नो देवशास्त्रगुरूकी निंदा करता है उसके नियमसे पाप होता है पापसे दुर्गतिमें भटकता है। भावार्थ-निजपरमात्मद्रव्यकी प्राप्तिकी रुचि वही निश्चयसम्यक्त्व उसका कारण तत्त्वार्थश्रद्धानरूप व्यवहार सम्यक्त्व उसके मूल अरहंत देव निग्रंथ गुरु और दयामई धर्म इन तीनोंकी जो निंदा करता है वह मिथ्यादृष्टि होता है । उस मिथ्यात्वसे महान पाप बांधता है । उस पापसे चतुर्गतिससारमें अमता है ।। १८९ ॥ आगे पहले दो सूत्रोंमें कहे गये पुण्यपापफल हैं उनको दिखाते हैं,-जीवः ] यह जीव [ पापेन ] पापके उदयसे [ नारका तिर्यग् ] नरक गति और तिर्यंचगति पाता २०६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । निर्वाणमिति । तद्यथा । सहजशुद्धज्ञानानंदैकस्वभावात्परमात्मनः सकागाद्विपरीतेन छेदना- दिनारकतिर्यग्गतिदुःखदानसमर्थन पापकर्मोदयेन नारकतिर्यग्गतिभाजनो भवति जीवः । तस्मादेव शुद्धामनो विलक्षणेन पुण्योदयेन देवो भवति । तस्मादेव शुद्धामनो विपरीतेन पुण्यपापद्वयेन मनुष्यो भवति । तस्यैव विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावस्य निजशुद्धालतत्त्वसम्यक्- श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपण शुद्धोपयोगेन मुक्तो भवतीति तात्पर्यार्थः ॥ तथा चोक्तं ॥ "पावण णरयतिरियं गम्मइ धम्मेण देवलोयम्मि । मिस्सेण माणुसत्तं दोण्हपि खएण णिव्वाणं"१९० अथ निश्चयप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानालोचनखरूपे स्थित्वा व्यवहारप्रतिक्रमणप्रत्याख्या- नालोचनां त्यजतीति त्रिकलेन कथयति;- वंदणु र्णिदणु पडिकमणु, पुण्णहं कारणु जेण । करइ करावइ अणुमणइ, एकुवि णाणि ण तेण ॥ १९१॥ वंदनं निंदनं प्रतिक्रमणं पुण्यस्य कारणं येन । करोति कारयति अनुमन्यते एकमपि ज्ञानी न तेन ॥ १९१ ॥ वंदणु इत्यादि । वंदणु जिंदणु पडिकमणु वंदननिंदनप्रतिक्रमणत्रयं । किंविशिष्टं । पुण्णहं कारणु पुण्यस्य कारणं जेण येन कारणेन करइ करावइ. अणुमणइ करोति कारयति अनुमोदयति एकुवि एकमपि णाणि ण तेण ज्ञानी पुरुषो न तेन कारणे- है [ पुण्येन ] पुण्यसे [अमरः] देव होता है [मिश्रेण] पुण्य और पाप दोनोंके मेलसे [ मनुष्यगति ] मनुष्य गतिको [ लभते ] पाता है और द्वयोरपि क्षये] पुण्य पाप दोनोंके ही नाश होनेसे [निर्वाणं ] मोक्षको पाता है ऐसा [विजानीहि ] जानो। भावार्थ-सहज शुद्ध ज्ञानानंद स्वभाव जो परमात्मा है उससे विपरीत जो पापकर्म उसके उदयसे नरक तिर्यंचगतिका पात्र होता है, आत्मखरूपसे विपरीत शुभकर्मों के उदयसे देव होता है, दोनोंके मेलसे मनुष्य होता है और शुद्धात्मस्वरूपसे विपरीत इन दोनों पुण्य पापोंके क्षयसे निर्वाण (मोक्ष ) मिलता है । मोक्षका कारण एक शुद्धोपयोग है वह शुद्धोपयोग निजशुद्धात्मतत्त्वके सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप है । इसलिये इस शुद्धोपयोगके विना किसी तरह भी मुक्ति नही हो सकती यह सारांश जानो । ऐसा ही सिद्धातग्रंथोंमें भी हर एक जगह कहागया है। जैसे—यह जीव पापसे नरक तिर्यंच गतिको. जाता है और धर्म ( पुण्य ) से देवलोकमें जाता है, पुण्य पाप दोनोंके मेलसे मनुष्य- देहको पाता है और दोनोंके क्षयसे मोक्ष पाता है ॥ १९० ॥ आगे निश्चयप्रतिक्रमण, निश्चयप्रत्याख्यान और निश्चयआलोचनारूप जो शुद्धोम- योग उसमें ठहरकर व्यवहार प्रतिक्रमण, व्यवहार प्रत्याख्यान और व्यवहार आलोचनारूप शुभोपयोगको छोडै ऐसा कहते हैं;-[वंदनं ] पंच परमेष्टीकी वंदना, [निंदनं] अपने -

परमात्मप्रकाशः।
नेति । तथाहि । शुद्धनिर्विकल्पपरमात्मतत्त्वभावनावलेन दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षास्मरण-
रूपाणामतीतरागादिदोषाणां निराकरणं निश्चयप्रतिक्रमणं भवति, वीतरागचिदानंदै-
कानुभूतिभावनावलेन भाविभोगाकांक्षारूपाणां रागादीनां त्यजनं निश्चयप्रत्याख्यानं भण्यते,
निजशुद्धामोपलंभवलेन वर्तमानोदयागतशुभाशुभनिमित्तानां हर्पविषादादिपरिणामानां निज-
शुद्धालद्रव्यात् पृथकरणं निश्चयालोचनमिति । इत्थंभूते निश्चयप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानालोचन-
त्रये स्थित्वा योसौ व्यवहारप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानालोचनत्रयं तत्रयानुकूलं वंदननिंदनादिशु-
भोपयोगं च त्यजन् स ज्ञानी भण्यते न चान्य इति भावार्थः ॥ १९१ ॥
अथ:-
वंदणु जिंदणु पडिकमणु, णाणिहुं एहु ण जुत्तु ।
एक जि मिल्लिवि णाणमउ, सुद्धउ भाउ पवित्तु ॥ १९२ ॥
अशुभकर्मकी निंदा और [प्रतिक्रमणं] अपराधोंकी प्रायश्चित्तादि विधिसे निवृत्ति ये सब
येन पुण्यस्य कारणं ] जो पुण्यके कारण है मोक्षके कारण नहीं है [तेन ] इसलिये
पहली अवस्थामें पापके दूर करनेकेलिये ज्ञानी पुरुष इनको करता है कराता है और
करते हुएको भला जानता है तौभी निर्विकल्प शुद्धोपयोग अवस्थामें [ज्ञानी] ज्ञानी
जीव [ एकमपि ] इन तीनोंमेंसे एक भी [न करोति ] न तो करता [कारयति]
न कराता है और न [अनुमन्यते ] करते हुएको भला जानता है । भावार्थ-केवल
शुद्धस्वरूपमें जिसका चित्त लगा हुआ है ऐसा निर्विकल्प परमात्मतत्त्वकी भावनाके बलसे
देखे सुने और अनुभव किये भोगोंकी वाछारूप जो भूतकालके रागादिदोष उनका
दूर करना वह निश्चय प्रतिक्रमण, वीतराग चिदानंद शुद्धात्माकी अनुभूतिकी भावनाके
बलसे होनेवाले भोगोंकी वांछारूप रागादिकका त्याग वह निश्चय प्रत्याख्यान और निज
शुद्धात्माकी प्राप्तिके वलसे वर्तमान उदयमें आये जो शुभ अशुभके कारण हर्षविषादादि
अशुद्ध परिणाम उनको निज शुद्धात्मद्रव्यसे जुदा करना वह निश्चय आलोचना इस
तरह निश्चय प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान और आलोचनामें ठहरकर जो कोई व्यवहार
प्रतिक्रमण व्यवहार प्रत्याख्यान व्यवहार आलोचना इन तीनके अनुकूल वन्दना निंदा
आदि शुभोपयोग हैं उनको छोडता है वही ज्ञानी कहा जाता है अन्य नहीं । सारांश
यह है कि ज्ञानी जीव पहले तो अशुभको त्यागकर शुभमें प्रवृत्त होता है वाद शुभको
भी छोडके शुद्धमें लग जाता है। पहले किये हुए अशुभ कर्मोंकी निवृत्ति वह व्यवहार
प्रतिक्रमण, अशुभपरिणाम होनेवाले है उनका रोकना वह व्यवहार प्रत्याख्यान और
वर्तमानकालमें शुभकी प्रवृत्ति अशुभकी निवृत्ति वह व्यवहार आलोचना है । व्यवहारमें
तो अशुभका त्याग शुभका अंगीकार होता है और निश्चयमें शुभ अशुभ दोनोंका ही
त्याग होता है ॥ १९१ ॥

२०८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । चंदनं निंदन प्रतिक्रमणं ज्ञानिनां इदं न युक्तं । एकमेव मुक्त्वा ज्ञानमयं शुद्ध भावं पवित्रं ॥ १९२ ॥ वंदणु जिंदणु पडिकमणु वंदननिंदनप्रतिक्रमणत्रयं णाणिहु एहु ण जुत्तु नानेना- दिदं न युक्तं । किं कृत्वा । एकु जि मेल्लिवि एकमेव मुक्त्वा । एकं कं । णाणमउ सुद्धउ भाउ पवित्तु ज्ञानमयं शुद्धभावं पवित्रमिति । तथाहि । पंचेंद्रियभोगाकांक्षाप्रभृति- समस्तविभावरहितः शून्य: केवलज्ञानाद्यनंतगुणपरमामतत्त्वसम्यक्सद्धानज्ञानानुष्ठानरूप- निर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नसहजानंदपरमसमरसीभावलक्षणसुखामृतरसास्वादेन भरितावस्थो योसौ ज्ञानमयो भावः तं भावं मुक्त्वाऽन्यद्वयवहारप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानालोचनत्रयं तदनु- कूलं वंदननिंदनादिशुभोपयोगविकल्पजालं च ज्ञानिनां युक्तं न भवतीति तात्पर्य ।। १९२॥ , अथ,- वंद जिंदड पडिकमउ, भाउ असुद्धउ जासु। पर तमु संजनु अस्थि णवि, जं मणसुद्धि ण तासु ॥ १९३ ॥ वंदतु निंदतु प्रतिक्रामतु भावः अशुद्धो यस्य । परं तस्य संयमोस्ति नैव यसात् मनःशुद्धिर्न तस्य ।। १९३ ।। वंदउ इत्यादि । वंदउ जिंदउ पडिकमउ वंदननिंदनप्रतिक्रमणं करोतु भाउ असुद्धउ जासु भावः परिणामः न शुद्धो यस्य परं नियमेन तसु तस्य पुरुषस्य संजमु अस्थि णवि संयमोस्ति नैव । कस्मान्नास्ति । जं यस्मात् कारणात् मणसुद्धि ण तासु मनःशुद्धिर्न आगे इसी कथनको दृढ करते हैं;-[वंदनं निंदनं प्रतिक्रमणं ] वंदना निंदा और प्रतिक्रमण [इदं ] ये तीनों [ज्ञानिनां] पूर्ण ज्ञानियोंको [युक्तं न] ठीक नही है [एकमेव ] एक [ज्ञानमयं] ज्ञानमय [ शुद्धं पवित्रं भावं] पवित्र शुद्धभावको [मुक्त्वा] छोडकर अर्थात् इसके सिवाय ज्ञानीको कोई कार्य करना योग्य नही है । भावार्थ-पांच इंद्रियोंके भोगोंकी वांछाको आदि लेकर संपूर्ण विभावोंसे रहित जो केवलज्ञानादि अनंतगुणरूप परमात्मतत्त्व उसके सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरण रूप निर्वि- कल्पसमाधिसे उत्पन्न जो परमानंद परमसमरसीभाव वो ही हुआ अमृतरस उसके आखा- दसे पूर्ण जो ज्ञानमयीभाव उसे छोडकर अन्य व्यवहार प्रतिक्रमण प्रत्याख्यान आलोचनाके अनुकूल वंदन निंदनादि शुभोपयोग विकल्प जाल है वे पूर्णज्ञानीको करने योग्य नही है। प्रथम अवस्थामें ही हैं आगे नही हैं ॥ १९२ ।। आगे इसी वातको दृढ करते हैं;-[वंदतु निंदतु प्रतिक्रामतु] निःशंक वंदना करो निंदा करो प्रतिक्रमणादि करो लेकिन [यस्य ] जिसके [अशुद्धो भावः ] जब तक अशुद्ध परिणाम है [ तस्य ] उसके [परं] नियमसे [ संयमः] संयम [नैव अस्ति ] परमात्मप्रकाशः। २०९ तस्येति । तद्यथा । नित्यानंदैकरूपस्वशुद्धात्मानुभूतिप्रतिपक्षैर्विषयकषायाधीनैः ख्याति- पूजालाभादिमनोरथशतसहस्रविकल्पजालमालाप्रपंचोत्पन्नैरपध्यानैर्यस्य चित्तं रंजितं वासितं तिष्ठति तस्य द्रव्यरूपं वंदननिंदनप्रतिक्रमणादिकं कुर्वाणस्यापि भावसंयमो नास्ति इत्यभि- प्रायः ॥ १९३ ॥ एवं मोक्षमोक्षफलमोक्षमार्गादिप्रतिपादकद्वितीयमहाधिकारमध्ये निश्च- ग्रनयेन पुण्यपापद्वयं समानमित्यादि व्याख्यानमुख्यत्वेन चतुर्दशसूत्रस्थलं समाप्तं । अथानंतरं शुद्धोपयोगाविप्रतिपादनमुख्यत्वेनैकाधिकचत्वारिंशत्सूत्रपर्यंतं व्याख्यानं क- रोति । तत्रांतरस्थलचतुष्टयं भवति । तद्यथा । प्रथमसूत्रपंचकेन शुद्धोपयोगव्याख्यानं करोति, तदनंतरं पंचदशसूत्रपर्यतं वीतरागस्वसंवेदनज्ञानमुख्यत्वेन व्याख्यानं, अत ऊर्ध्व सूत्राष्टकपर्यतं परिग्रहत्यागमुख्यत्वेन व्याख्यानं, तदनंतरं त्रयोदशसूत्रपर्यतं केवलज्ञानादि- गुणवरूपेण सर्वे जीवाः समाना इति मुख्यत्वेन व्याख्यानं करोति । तद्यथा । रागादिविकल्पनिवृत्तिस्वरूपशुद्धोपयोगे संयमादयः सर्वे गुणास्तिष्ठंतीति प्रतिपादयति;- सुद्धहं संजमु सील तउ, सुद्धहं दंसणु णाणु । सुद्धहं कम्मक्खउ हवइ, सुद्धउ तेण पहाणु ॥ १९४ ॥ शुद्धानां संयमः शीलं तपः शुद्धानां दर्शनं ज्ञानं । शुद्धानां कर्मक्षयो भवति शुद्धो तेन प्रधानः ॥ १९४ ॥ , नहीं होसकता [यत् ] क्योंकि [ तस्य ] उसके [मनःशुद्धिः न ] मनकी शुद्धता नहीं है। जिसका मन शुद्ध नही उसके सयम कहांसे होसकता है । भावार्थ नित्यानंद एकरूप निजशुद्धात्माकी अनुभूतिके प्रतिपक्षी (उलटे ) जो विषयकषाय उनके आधीन आर्त रौद्र खोटे ध्यानोंकर जिसका चित्त रंगा हुआ है उसके द्रव्यरूप व्यवहार वंदना निदान प्रतिक्रमणादि क्या कर सकते है । जो वह बाह्य क्रिया करता है तौभी उसके भावसंयम नहीं है । सिद्धांतमें उसे असंयमी कहते हैं। कैसे हैं वो आर्त रौद्र स्वरूप खोटे ध्यान । अपनी बड़ाई प्रतिष्ठा और लाभादि सैंकडों मनोरथोंके विकल्पोंकी मालाके (पंक्तिके) प्रपंचकर उत्पन्न हुए है । जवतक ये चित्तमें है तबतक बाह्यक्रिया क्या करसकती है? कुछ नही करसकती ॥ १९३ ।। इसतरह मोक्ष मोक्षफल मोक्षमार्गादिका कथन करनेवाले दूसरे महा अधिकारमें निश्चयनयसे पुण्य पाप दोनों समान हैं इस व्याख्यानकी मुख्यतासे चौदह दोहा कहे । आगे शुद्धोपयोगके कथनकी मुख्यतासे इकतालीस दोहाओंमें व्याख्यान करते हैं । और आठदोहाओंमें परिग्रहत्यागके व्याख्यानकी मुख्यतासे कहते हैं तथा तेरहदोहाओंमें केवल ज्ञानादिगुणखरूपकर सब जीव समान हैं ऐसा व्याख्यान है । अब प्रथम ही रागादि विकल्पकी, निवृत्तिरूप शुद्धोपयोगमें संयमादि सब गुण रहते २१० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । सुद्धहं इत्यादि । सुद्धहं शुद्धोपयोगिनां संजमु इंद्रियमुखाभिलापनिवृत्तिवलेन पड्जीव- निकायहिंसानिवृत्तिबलेनासना आत्मनि संयमनं नियमनं संयमः स पूर्वोक्तः शुद्धोपयो- गिनामेव । अथवोपेक्षासंयमापहृतसंयमौ वीतरागसरागापरनामानौ तावपि तेपामेव संभ- वतः । अथवा सामायिकछेदोपस्थापनपरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययथाख्यातभेदेन पंचधा संयमः सोपि लभ्यते तेषामेव । सील खात्मना कृत्वा स्वात्मनिवृत्तिर्वर्तनं इति निश्चयव्रतं, व्रतस्य रागादिपरिहारेण परिरक्षणं निश्चयशीलं तदपि तेपामेव । तउ द्वादशविधतपश्चरण- बलेन परद्रव्येच्छानिरोधं कृत्वा शुद्धात्मनि प्रतपनं विजयनं तप इति । तदपि तेपामेव । सुद्धहं शुद्धोपयोगिनां दसणु छद्मस्थावस्थायां स्वशुद्धात्मनि रुचिरूपं सम्यग्दर्शनं केवल- ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां तस्यैव फलभूतं अनीहितविपरीताभिनिवेशरहितं परिणामलक्षणं क्षायिक- सम्यक्त्वं केवलदर्शनं वा । तेपामेव । णाणु वीतरागस्वसंवेदनजानं तस्यैव फलभूतं केवल- ज्ञानं वा सुद्धहं शुद्धोपयोगिनामेव । कम्मस्वउ परमात्मस्वरूपोपलब्धिलक्षणो द्रव्यभाव- कर्मक्षयः हवइ तेषामेव भवति सुद्धहु शुद्धोपयोगपरिणामस्तदाधारपुरुषो वा तेण पहाणु येन कारणेन पूर्वोक्ताः संयमादयो गुणाः शुद्धोपयोगे लभ्यते तेन कारणेन स एव प्रधान हैं ऐसा वर्णन करते हैं;-[शुद्धानां] शुद्धोपयोगियोंके ही [संयमः शीलं तपः पांच इन्द्री छठे मनको रोकनेरूप संयम, शील और तप [भवति ] होते हैं [शुद्धानां] शुद्धोंके ही [दर्शनं ज्ञानं ] सम्यग्दर्शन और वीतरागखसंवेदनज्ञान और [शुद्धानां शुद्धोपयोगियोंके ही [कर्मक्षयः] कर्मोंका नाश होता है [ तेन] इसलिये [शुद्धः] शुद्धोपयोग ही [प्रधानः] जगतमें मुख्य है। भावार्थ-शुद्धोपयोगियोंके; पांच इंद्री छठे मनका रोकना, विषयाभिलाषकी निवृत्ति और छहकायके जीवोंकी हिंसासे निवृत्ति उसके बलसे आत्मामें निश्चल रहना उसका नाम संयम है वह होता है, अथवा उपेक्षा संयम अर्थात् तीनगुप्तिमें आरूढ और अपहृत संयम अर्थात् पांच समितिका पालना, अथवा सराग संयम अर्थात् शुभोपयोगरूपसंयम और वीतरागसंयम अर्थात् शुद्धोपयोग- रूप परमसंयम वह उन शुद्ध चेतनोपयोगियोंके ही होता है । शील अर्थात् अपनेसे अपने आत्मामें प्रवृत्ति करना यह निश्चयशील, रागादिके त्यागनेसे शुद्धभावकी रक्षा करना वह भी निश्चय शील है, और देवांगना मनुष्यनी तिर्यंचनी तथा काठ पत्थर चित्रामादि अचेतन स्त्री-ऐसे चार प्रकारकी स्त्री उनका मन वचनकाय कृत कारित अनुमोदनासे त्याग करना वह व्यवहार शील ये दोनों शील शुद्धचित्तवालों के ही होते हैं। तप अर्थात् बारह तरहका तप उसके बलसे भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्मरूप सब वस्तुओंमें इच्छा छोडेकर शुद्धात्मामें मम रहना काम क्रोधादि शत्रुओंके वशमें न होना, प्रतापरूप विजयरूप जितेंद्री रहना है । यह तप शुद्ध चित्तवालोंके ही होता है । दर्शन अर्थात्, साधक अव- , परमात्मप्रकाशः। २११ उपादेयः इति तात्पर्य । तथा चोक्तं शुद्धोपयोगफलं । "सुद्धस्स य सामण्णं भणियं सुद्धस्स दसणं णाणं । सुद्धस्स य णिव्वाणं सो वि य सुद्धो णमो तस्स ॥" ॥ १९४ ॥ अथ निश्चयेन स्वकीयशुद्धभाव एव धर्म इति कथयति,- भाउ विसुद्धउ अप्पणउ, धम्मु भणेविणु लेहु । चउगइदुक्खहं जो धरइ, जीउ पडतउ एहु ॥ १९५ ॥ भावो विशुद्ध आत्मीयः धर्म भणित्वा गृह्णीथाः । चतुर्गतिदुःखेभ्यः यो धरति जीवं पतंतमिमं ।। १९५ ॥ भाउ इत्यादि । भाउ भावः परिणामः । कथंभूतः । विसुद्धउ विशेषेण शुद्धो मिथ्यात्वरागादिरहितः अप्पणउ आत्मीयः धम्मु भणेविणु लेहु धर्म भणित्वा मत्वा प्रगृहीथाः । यो धर्मः किं करोति । चउगइ दुक्खहं जो धरह चतुर्गतिदुःखेभ्यः सकाशात् उद्धृत्य यः कर्ता धरति । कं धरति । जीउ पडतउ एहु जीवमिमं प्रत्यक्षीभूतं संसारे पतंतमिति । तद्यथा । धर्मशब्दस्य व्युत्पत्तिः क्रियते । संसारे पतंतं प्राणिनमुद्धृत्य नरेंद्रना- गेंद्रदेवेद्रवंद्ये मोक्षपदे धरतीति धर्म इति धर्मशब्देनान निश्चयेन जीवस्य शुद्धपरिणाम एव स्थामें तो शुद्धात्मामें रुचिरूप सम्यग्दर्शन और केवली अवस्थामें उस सम्यग्दर्शनका फल- रूप सशय विमोह विभ्रम रहित निजपरिणामरूप क्षायिकसम्यक्त्व केवलदर्शन यह भी शुद्धोंके ही होता है । ज्ञान अर्थात् वीतरागखसंवेदनज्ञान और उसका फल केवलज्ञान वह भी शुद्धोपयोंगियोंके ही होता है और कर्मक्षय अर्थात् द्रव्यकर्म भावकर्म और नोक- मका नाश तथा परमात्मखरूपकी प्राप्ति वह भी शुद्धोपयोगियोंके ही होती है । इसलिये शुद्धोपयोग परिणाम और उन परिणामोंका धारण करनेवाला पुरुष ही जगतमें प्रधान है। क्योंकि सयमादि सर्व गुण शुद्धोपयोगमें ही पाये जाते हैं । इसलिये शुद्धोपयोगके समान अन्य नहीं है ऐसा तात्पर्य जानना । ऐसा ही कथन अन्य ग्रंथोंमें हर एक जगह "सुद्ध" इत्यादिसे कहा गया है । उसका भावार्थ यह है कि शुद्धोपयोगीके ही मुनिपद कहा है और उसीके दर्शन ज्ञान कहे हैं । उसीके निर्वाण है और वही शुद्ध अर्थात् रागादि रहित है। उसीको हमारा नमस्कार है ॥ १९४ ॥ आगे यह कहते हैं कि निश्चयसे अपना शुद्धभाव ही धर्म है।-[विशुद्धः भाव:] मिथ्यात्वरागादिसे रहित जो शुद्ध परिणाम है वही [आत्मीयः ] अपना है और अशुद्ध परिणाम अपने नही है सो शुद्ध भावको ही [धर्म भणित्वा] धर्म समझकर [गृहीथाः] अंगीकार करो। [य] जो आत्मधर्म [चतुर्गतिदुःखेभ्यः ] चारों गति- योंके दुःखोंसे [पतंतं] ससारमें पड़े हुए [इमं जीवं] इस जीवको निकालकर [धरति ] आनंदस्थानमें रखता है ॥ भावार्थ-धर्मशब्दका शब्दार्थ ऐसे है कि ससारमें

२१२
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
ग्राह्यः । तस्य तु मध्ये वीतरागसर्वज्ञप्रणीतनयविभागेन सर्व धर्मातर्भूता लभ्यते ।
तथा अहिंसालक्षणो धर्मः सोपि जीवशुद्धभावं विना न संभवति । सागारानगारलक्षणो धर्मः
सोपि तथैव । उत्तमक्षमादिदशविधो धर्मः सोपि जीवशुद्धभावमपेक्षते । सदृष्टिज्ञानवृत्तानि
धर्म धर्मेश्वरा विदुरित्युक्तं यद्धर्मलक्षणं तदपि तथैव । रागद्वेषमोहरहितः परिणामो धर्मः
सोपि जीवशुद्धभाव एव । वस्तुस्वभावो धर्मः सोपि तथैव । तथा चोक्तं । "धम्मो
वत्थुसहावो"इत्यादि । एवं गुणविशिष्टो धर्मश्चतुर्गतिदुःखेपु पतंतं धरतीति धर्मः । अत्राह
शिष्यः । पूर्वसूत्रे भणितं शुद्धोपयोगमध्ये संयमादयः सर्वे गुणाः लभ्यते । अत्र तु भणि-
तमामनः शुद्धपरिणाम एव धर्मः सूत्रे सर्वे धर्माश्च लभ्यते । को विशेषः । परिहारमाह ।
तत्र शुद्धोपयोगसंज्ञा मुख्या अत्र तु धर्मसंज्ञा मुख्यैतावान् विशेषः । तात्पर्य तदेव । तेन
कारणेन सर्वप्रकारेण शुद्धपरिणाम एव कर्तव्य इति भावार्थः ॥ १९५ ॥
पड़ते हुए प्राणियोंको निकालकर मोक्षपदमें रखै वह धर्म है । वह मोक्षपद देवेंद्र
नागेन्द्र नरेंद्रोंकर वंदने योग्य है । जो आत्माका निज स्वभाव है वही धर्म है उसीमें
जिनभाषित सब धर्म पाये जाते हैं। जो दयाखरूप धर्म है वह भी जीवके शुद्धभावोंके
विना नहीं होता, यति श्रावकका धर्म भी शुद्धभावोंके विना नहीं होता, उत्तम क्षमादि
दक्षलक्षणधर्म भी शुद्धभाव विना नहीं होसकता और रत्नत्रयधर्म भी शुद्धभावोंके विना
नही हो सकता । ऐसा ही कथन जगह२ ग्रंथों में कहा है “सदूदृष्टि" इत्यादि श्लोकसे ।
उसका अर्थ यह है कि धर्मके ईश्वर भगवानने सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र इन तीनोंको
धर्म कहा है । जिस धर्मके ये ऊपर कहे गये लक्षण हैं वह रागद्वेष मोह रहित परि-
णाम धर्म है वह जीवका खभाव ही है क्योंकि वस्तुका स्वभाव ही धर्म है । ऐसा
दूसरी जगह भी "धम्मो" इत्यादि गाथासे कहा है कि जो आत्मवस्तुका खभाव है वह
धर्म है उत्तमक्षमादि भावरूप दस प्रकारका धर्म है रत्नत्रय धर्म है और जीवोंकी रक्षा
वह धर्म है । यह जिन भाषित धर्म चतुर्गतिके दुःखोंमें पडते हुए जीवको उद्धा-
रता है । यहां शिष्यने प्रश्न किया कि जो पहले दोहामें तो तुमने शुद्धोपयोगमें संयमादि
सब गुण कहे और यहां आत्माका शुद्ध परिणाम ही धर्म कहा है उसमें धर्म पाये
जाते हैं सो पहले दोहेमें और इसमें क्या भेद है । उसका समाधान । पहले दोहामें
तो शुद्धोपयोग मुख्य कहा था और इस दोहेमें धर्म मुख्य कहा है । शुद्धोपयोगका
ही नाम धर्म है तथा धर्मका ही नाम शुद्धोपयोग है । शब्दका भेद है अर्थका भेद
नही है दोनोंका तात्पर्य एक है । इसलिये सब तरह शुद्ध परिणाम ही कर्तव्य है वही
धर्म है ॥ १९५॥

- , परमात्मप्रकाशः। २१३ अथ विशुद्धभाव एव मोक्षमार्ग इति दर्शयति,- सिद्धिहिं केरा, पंधडा, भाउ विसुद्धउ एकु । जो तसु भावहं मुणि चलइ, सो किम होइ विमुक्छ ॥१९६ ॥ सिद्धेः संबंधी पंथाः भावो विशुद्ध एकः । यः तमाद्भावात् मुनिश्चलति स कथं भवति विमुक्तः ॥ १९६ ॥ सिद्धिहि इत्यादि । सिद्धिहिँ केरा सिद्धेर्मुक्तेः संबंधी पंथडा पंथा मार्गः । कोसौ भाउ भावः परिणामः । कथंभूतः । विसुद्धउ विशुद्धः एक एक एवाद्वितीयः । जो तमु भावहं मुणि चलइ यस्तस्माद्भावान्मुनिश्चलति सो किम होइ विमुकु स मुनिः कथं मुक्तो भवति न कथमपीति । तद्यथा । योसौ समस्तशुभाशुभसंकल्पविकल्परहितो जीवस्य शुद्धभावः स एव निश्चयरत्नत्रयात्मको मोक्षमार्गः । यस्तस्मात् शुद्धात्मपरिणामान्मुनिश्च्युतो भवति स कथं मोक्षं लभते किं तु नैव । अत्र येन कारणेन निजशुद्धात्मानुभूतिपरिणाम एव मोक्षमार्गस्तेन कारणेन मोक्षार्थिना स एव निरंतरं कर्तव्य इति तात्पर्यार्थः ।। १९६ ॥ अथ कापि देशे गच्छ किमप्यनुष्ठानं कुरु तथापि चित्तशुद्धिं विना मोक्षो नास्तीति प्रकटयति,- जहिं भावइ तहिं जाहि जिय, जं भावइ करि तं जि। केम्वइ मोक्खु ण अत्थि पर, चित्तहं सुद्धि ण जं जि ॥ १९७ ॥ यत्र भाति तत्र याहि जीव यद् भाति कुरु तदेव । कथमपि मोक्षः नास्ति परं चित्तस्य शुद्धिर्न यदेव ॥ १९७ ॥ जहिं भावइ इत्यादि । जहिं भावइ तहिं यत्र देशे प्रतिभाति तन जाहि गच्छ जिय आगे शुद्धभाव ही मोक्षका मार्ग है ऐसा दिखलाते हैं। सिद्धेः संबंधी ] मुक्तिका [पंथा: ] मार्ग [ एकः विशुद्धः भावः ] एक शुद्ध भाव ही है [ यः मुनिः ] जो मुनि [तसात् भावात् ] उस शुद्ध भावसे [ चलति ] चलायमान होजावे [सः ] वह [कथं ] कैसे [ विमुक्तः ] मुक्त [ भवति ] होसकता है किसीप्रकार नहीं होसकता । भावार्थ-जो समस्त शुभाशुभ सकल्प विकल्पोंसे रहित जीवका शुद्ध भाव है वही निश्चय रत्नत्रयखरूप मोक्षका मार्ग है । जो मुनि शुद्धात्मपरिणामसे च्युत होजावे वह किसतरह मोक्षको पासकता है नही पासकता । मोक्षका मार्ग एक शुद्ध भाव ही है, इसलिये मोक्षके इच्छकको वही भाव हमेशा करना चाहिये ॥ १९६ ॥ आगे यह प्रकट करते हैं कि किसी देशमें जावो चाहे जो तप करो तौभी चित्तकी शुद्धिके विना मोक्ष नहीं है।-हे जीव ] हे जीव [ यत्र] जहां [भाति ] तेरी इच्छा २१४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । हे जीव जं भावइ करि तं जि यदनुष्ठानं प्रतिभाति कुरु तदेव केम्बा मोक्खु ण अस्थि कथमपि केनापि प्रकारेण मोक्षो नास्ति परं नियमेन । कस्मान् । चित्तहं सुद्धि ण चित्तस्य शुद्धिर्न जं जि यस्मादेव कारणात् इति । तथाहि । ख्यातिपूजालाभदृष्टश्रुतानुभूतभोगाकां- क्षारूपदुर्ध्यानैः शुद्धात्मानुभूतिप्रतिपक्षभूतैर्यावत्कालं चित्तं रंजितं मूर्छितं तन्मयं तिष्ठति तावत्कालं हे जीव कापि देशांतरे गच्छ किमप्यनुष्ठानं कुरु तथापि मोक्षो नास्तीति । अत्र कामक्रोधादिभिरपध्यानर्जीवो भोगानुभवं विनापि शुद्धात्मभावनाच्युतः सन् भावेन कर्माणि बध्नाति तेन कारणेन निरंतरं चित्तशुद्धिः कर्तव्येति भावार्थः। तथा चोक्तं। "कंखिदकुलुखि- दभूदो हु कामभोगेहिं मुच्छिदो जीवो । णवि भुंजतो भोगे वंधदि भावेण कम्माणि" १९७ अथ शुभाशुभशुद्धोपयोगत्रयं कथयति;- सुहपरिणामें धम्म पर, असुहें होइ अहम्मु । दोहिंवि एहिं विवजियउ, सुद्ध ण बंधइ कम्मु ॥ १९८ ॥ शुभपरिणामेन धर्मः परं अशुभेन भवति अधर्मः । द्वाभ्यामपि एताभ्यां विवर्जितः शुद्धो न बध्नाति कर्म ॥ १९८ ।। सुह इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । सुहपरिणामें धम्मु पर शुभपरि- णामेन धर्मः पुण्यं भवति मुख्यवृत्त्या असुहे होइ अहम्मु अशुभपरिणामेन भवत्यधर्मः हो [ तत्र ] उसीदेशमें [ याहि ] जा और [ यत् ] जो [भाति ] अच्छा लगे [तदेव] वही [कुरु ] कर [परं] लेकिन [यदेव ] जब तक [चित्तस्य शुद्धिः न] मनकी शुद्धि नहीं है तब तक [कथमपि] किसीतरह [ मोक्षो नास्ति ] मोक्ष नहीं होसकती। भावार्थ-~-बडाई प्रतिष्ठा परवस्तुका लाभ और देखे सुने भोगे हुए भोगों की वांछारूप खोटे ध्यान 'जो कि शुद्धात्मज्ञानके शत्रु हैं। इनसे जबतक यह चित्त रंगा हुआ है अर्थात् विषयकषायोंसे तन्मई है तवतक हे जीव किसी देशमें जा तीर्थादिकोंमें भ्रमणकर अथवा चाहे जैसा आचरणकर किसीप्रकार मोक्ष नही है। सारांश यह है कि कामको- धादि खोटेध्यानसे यह जीव भोगोंके सेवने विना भी शुद्धात्मभावनासे च्युत हुआ अशुद्ध भावों करके कर्मोंकों वांधता है । इसलिये हमेशा चित्तकी शुद्धता रखनी चाहिये। ऐसा ही कथन दूसरी जगह भी "कंखिद" इत्यादि गाथासे कहा है । कि इस लोक और परलोकके भोगोंका अभिलाषी और कषायोंसे कालिमारूप हुआ अवर्तमान विषयों का वांछक और वर्तमान विषयों में अत्यंत आसक्त हुआ अति मोहित होनेसे भोगोंको नहीं भागताप भी अशुद्ध भावोंसे कर्मोंको बांधता है ॥ १९७ ।। आगे शुभ अक्षु और शुद्ध इन तीन उपयोगोंको कहते हैं-शुभपरिणामेन] दानपूजादि शुभपरिणागेसे [ धर्मः ] पुण्यरूप व्यवहारधर्म [ परं] मुख्यतासे [भवति] परमात्मप्रकाशः। २१५ पापं दोहिंवि एहिं विवजियउ द्वाभ्यां एताभ्यां शुभाशुभपरिणामाभ्यां विवर्जितः । कोसौ । सुद्ध शुद्धो मिथ्यात्वरागादिरहितपरिणामस्तत्परिणतपुरुषो वा । किंकरोति । ण बंधइ न बध्नाति । किं । कम्मु ज्ञानावरणादिकर्मेति । तद्यथा । कृष्णोपाधिपीतोपाधि- स्फटिकवदयमात्मा क्रमेण शुभाशुभशुद्धोपयोगरूपेण परिणामत्रयं परिणमति । तेन तु मिथ्यात्वविषयकपायाद्यवलंबनेन पापं बध्नाति । अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधुगुणस्मरण- दानपूजादिना संसारस्थितिछेदपूर्वकं तीर्थकरनाम-कर्मादिविशिष्टगुणपुण्यमनीहितवृत्त्या बध्नाति । शुद्धालावलंबनेन शुद्धोपयोगेन तु केवलज्ञानाद्यनंतगुणरूपं मोक्षं च लभते इति । अनोपयोगत्रयमध्ये मुख्यवृत्त्या शुद्धोपयोग एवोपादेय इत्यभिप्रायः ॥ १९८ ॥ एवमेक- चत्वारिंशत्सूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये सूत्रपंचकेन शुद्धोपयोगव्याख्यानमुख्यत्वेन प्रथमांतर- स्थलं गतं । अत ऊर्ध्व तस्मिन्नेव महास्थलमध्ये पंचदशसूत्रपर्यतं वीतरागस्वसंवेदनज्ञानमु- ख्यत्वेन व्याख्यानं क्रियते । तद्यथा,- दाणिं लगभइ भोउ पर, इंदत्तणु वि तवेण । जम्मणमरणविवज्जियत, पउ लन्भह णाणेण ॥ १९९ ॥ होता है [अशुभेन] विषय कषायादि अशुभ परिणामोंसे [अधर्मः] पाप होता है [अपि] और [एताभ्यां ] इन [द्वाभ्यां ] दोनोंसे [ विवर्जितः] रहित [शुद्धः] मिथ्यात्वरागादिरहित शुद्ध परिणाम अथवा परिणामधारी पुरुष [कर्म ] ज्ञानावरणादि कर्मको [न] नहीं [वनाति] बाधता । भावार्थ- जैसे स्फटिकमणि शुद्ध उज्वल है उसके जो काला डंक लगावे तो काली मालूम होती है और पीला डंक लगावें तो पीली भासती है तथा यदि कुछ भी न लगावें तो शुद्ध स्फटिक ही है उसी तरह यह आत्मा क्रमसे अशुभ शुभ शुद्ध इन परिणामोंसे परिणत होता है। उनमेंसे मिथ्यात्व और विषय कषायादि अशुभके अवलंबन (सहायता)से तो पापको ही बाधता है उसके फलसे नरकनिगोदादिके दुःखोंको भोगता है । और अरहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधु इन पांच परमेष्ठियोंके गुणस्मरण और दानपूजादि शुभक्रियाओंसे ससारकी स्थितिका छेदने- वाला जो तीर्थकर नामकर्म उसको आदिले विशिष्टगुणरूप पुन्यप्रकृतियोंको अवाछीक वृत्तिसे बांधता है तथा केवल शुद्धात्माके अवलंबनरूप शुद्धोपयोगसे उसीभवमें केवलज्ञा- नादि अनंतगुणरूप मोक्षको पाता है। इन तीन प्रकारके उपयोगोंमेंसे सर्वथा उपादेय तो शुद्धोपयोग ही है अन्य नहीं है । और शुभ अशुभ इन दोनोंमेंसे अशुभ तो सब प्रकारसे निषिद्ध है नरकनिगोदका कारण है किसीतरह उपादेय नही है हेय है तथा शुभोपयोग प्रथम अवस्था में उपादेय है और परम अवस्थामें उपादेय नही है हेय है ॥ १९८ ।।

२१६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । 1 दानेन लभ्यते भोगाः परं इंद्रत्वमपि तपसा । जन्ममरणविवर्जितं पदं लभ्यते ज्ञानेन ॥ १९९ ॥ दाणिं इत्यादि । दाणि लब्भइ भोउ दानेन लभ्यते पंचेंद्रियभोगाः परं नियमेन इंदत्तणुवि तवेण इंद्रत्वमपि तपसा लभ्यते जम्मणमरणविवजियउ जन्ममरणविवर्जितं पउ पदं स्थानं लब्भइ लभ्यते प्राप्यते । केन । णाणेण वीतरागस्वसंवेदनज्ञानेनेति । तथाहि । आहारभयभैषज्यशास्त्रदानेन सम्यक्त्वरहितेन भोगो लभ्यते । सम्यत्त्वसहितेन तु यद्यपि परंपरया निर्वाणं लभ्यते तथापि विविधाभ्युदयरूपः पंचेंद्रियभोग एव । सम्यक्त्वसहितेन तपसा तु यद्यपि निर्वाणं लभ्यते तथापि देवेंद्रचक्रवर्त्यादिविभूतिपूर्वकेणैव । वीतरागस्वसंवेदनसम्यग्ज्ञानेन सविकल्पेन यद्यपि देवेद्रचक्रवादिविभूतिविशेपो भवति तथापि निर्विकल्पेन मोक्ष एवेति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । हे भगवन् यदि विज्ञानमात्रेण मोक्षो भवति तर्हि सांख्यादयो वदंति ज्ञानमात्रादेव मोक्षः तेषां किमिति दूपर्ण दीयते भवद्भिरिति । भगवानाह । अत्र वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनसम्यग्ज्ञानमिति भणितं तिष्ठति तेन वीतरागविशेषणेन चारित्रं लभ्यते सम्यग्विशेपणेन सम्यक्त्वमपि लभ्यते पानकवदे- कस्यापि मध्ये त्रयमस्ति । तेषां मते तु वीतरागविशेषणं नास्ति सम्यग्विशेषणं च नास्ति ज्ञानमात्रमेव । तेन दूपणं भवतीति भावार्थः ॥ १९९ ॥ इस प्रकार इकतालीस दोहाओंके महास्थलमें पांच दोहाओंमें शुद्धोपयोगका व्याख्यान किया ।आगे पंद्रह दोहाओंमें वीतराग खसवेदन ज्ञानकी मुख्यतासे व्याख्यान करते हैं। [दानेन ] दानसे [परं] नियमकरके [ भोगाः ] पांच इंद्रियोंके भोग [ लभ्यते ] प्राप्त होते हैं [अपि ] और [तपसा] तपसे [इंद्रत्वं ] इंद्रपद मिलता है तथा [ ज्ञानेन] वीतरागखसवेदनज्ञानसे [जन्ममरणविवर्जितं] जन्म जरा मरणसे रहित [पदं ] जो मोक्षपद वह [लभ्यते ] मिलता है ॥ भावार्थ-आहार अभय औषध और शास्त्र इन चार तरह के दानोंको यदि सम्यक्त्वरहित करे तो भोगभूमिके सुख पाता है तथा सम्यत्त्वसहित दान करे तो परंपराय मोक्ष पाता है । यद्यपि प्रथम अवस्थामें देवेंद्रचक्रवर्ती आदिकी विभूति भी पाता है, तो भी निर्विकल्प खसवेदन ज्ञानकर मोक्ष ही है । यहां प्रभाकर भट्टने प्रश्न किया कि हे भगवन् जो ज्ञानमात्रसे ही मोक्ष होती है तो सांख्यादिक भी ऐसे ही कहते हैं कि ज्ञानसे ही मोक्ष है उनको क्यों दूषण देते हो । तब श्रीगुरुने कहा । इस जिनशासनमें वीतरागनिर्विकल्प खसंवेदन सम्यग्ज्ञान कहा गया है सो वीतराग कहनेसे वीतराग चारित्र भी आ जाता है और सम्यक् पदके कह- नेसे सम्यक्त्व भी आ जाता है । जैसे एक चूर्णमें अथवा पाकमें अनेक औषधि आ जाती हैं परंतु वस्तु एक ही कहलाती. है उसीतरह वीतरागनिर्विकल्पखसंवेदन ज्ञानके परमात्मप्रकाशः। २१७ अथ तमेवार्थ विपक्षदूषणद्वारेण दृढयति,- देउ णिरंजणु इर्ड भणइ, णाणिं मुक्खु ण भंति । णाणविहीणा जीवडा, चिरु संसार भमंति ॥ २०० ॥ देवः निरंजन एवं भणति ज्ञानेन मोक्षो न भ्रांतिः । ज्ञानविहीना जीवाः चिरं संसारं भ्रमंति ॥ २०० ॥ देउ इत्यादि । देउ देवः । किविशिष्टः । णिरंजणु निरंजनः अनंतज्ञानादिगुणसहितोष्टा- दशदोपरहितश्च इउं भणइ एवं भणति । एवं किं । णाणि मुक्खु वीतरागनिर्विकल्पखसं- वेदनरूपेण सम्यग्ज्ञानेन मोक्षो भवति । ण भंति न भ्रांतिः संदेहो नास्ति । णाणविहीणा जीवडा पूर्वोक्तस्वसंवेदनज्ञानेन विहीना जीवाः चिरु संसारु भमंति चिरं बहुतरं कालं संसारं परिभ्रमंति इति । अत्र वीतरागस्वसंवेदनज्ञानमध्ये यद्यपि सम्यक्त्वादित्रयमस्ति तथापि सम्यग्ज्ञानस्यैव मुख्यता । विवक्षितो मुख्य इति वचनादिति भावार्थः ॥२०॥ अथ पुनरपि तमेवार्थ दृष्टांतदार्टीतिकाभ्यां निश्चिनोति,- णाणविहीणहं मोक्खपउ, जीव म कासुवि जोइ । वहुएं सलिलिविरोलियई, करु चोप्पडउ ण होइ ॥ २०१॥ ज्ञानविहीनस्य मोक्षपदं जीव मा कस्यापि अद्राक्षीः । बहुना सलिलविलोडितेन करः चिक्कणो न भवति ॥ २०१ ॥ णाण इत्यादि । णाणविहीणहं ख्यातिपूजालाभादिदुष्टभावपरिणतचित्तं मम कोपि न कहनेसे सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र-ये तीनों आजाते है । साख्यादिकके मतमें वीतराग विशेषण नहीं है और सम्यक् विशेषण नही है केवल ज्ञानमात्र ही कहते हैं सो वह मिथ्याज्ञान है इसलिये दूपण देते हैं । यह जानना ॥ १९९ ॥ आगे उसी अर्थको विपक्षीको दूषण देकर दृढ करते हैं;-[निरंजनः ] अनंत ज्ञानादि गुण सहित और अठारह दोष रहित जो [देवः] सर्वज्ञ वीतरागदेव हैं वे एवं] ऐसा [भणति] कहते हैं कि [ज्ञानेन] वीतरागनिर्विकल्प खसवेदनरूप सम्यग्ज्ञानसे ही [ मोक्षः] मोक्ष है इसमे [न भ्रांतिः] इसमें संदेह नही है । और [ज्ञानविहीनाः ] खसवेदनज्ञानकर रहित जो [ जीवाः ] जीव हैं वे [चिरं] बहुत काल तक [ संसारं] संसारमें [भ्रमंति ] भटकते हैं । भावार्थ-यहा वीतरागख- वेदनज्ञानमें यद्यपि सम्यक्त्वादि तीनों हैं तौभी मुख्यता सम्यग्ज्ञानकी ही है। क्योंकि श्रीजिन वचनमें ऐसा कथन किया है कि जिसका कथन किया.जावे वह मुख्य होता है और अन्य गौण होता है। ऐसा जानना ।। २०० ॥ आगे फिरभी इसी कथनको दृष्टांत और दार्टीतसे निश्चय करते हैं;-[ज्ञानविही- २८ , २१८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । जानातीति मत्त्वा वीतरागपरमानंदैकसुखरसानुभवरूपं चित्तशुद्धिमकुर्वाणस्य बहिरंगवक- वेषेण लोकरंजनं मायास्थानं तदेव शल्यं तत्प्रभृतिसमस्तविकल्पकल्लोलमालात्यागेन निजशु- द्धामसंवित्तिनिश्चयेन संज्ञासम्यग्ज्ञानेन विना मोक्खपउ मोक्षपदं स्वरूपं जीव हे जीव म कासुवि जोइ मा कस्याप्यद्राक्षीः। दृष्टांतमाह । बहुयई सलिलिविलोरियई बहुनापि सलिलेन मथितेन करु करो हस्तः चुप्पडउ ण होइ चिक्कणः स्निग्धो न भवतीति । अत्र यथा बहुतरमपि सलेले मथितेपि हस्तः स्निग्धो न भवतीति तथा वीतरागशुद्धात्मानुभूति- लक्षणेन ज्ञानेन विना बहुनापि तपसा मोक्षो न भवतीति तात्पर्य । २०१ ।। अथ निश्चयनयेन निजामवोधज्ञानवाह्यं ज्ञानं तेन प्रयोजनं नास्तीत्यभिप्रायं मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं प्रतिपादयति;- जं णियबोहहं बाहिरउ, णाणु जि कन्जु ण तेण । दुक्खहं करणु जेण तउ, जीवहं होइ खणेण ॥ २०२॥ यत् निजबोधाद्वाद्यं ज्ञानमपि कार्य न तेन । दुःखस्य कारणं येन तपः जीवस्य भवति क्षणेन ॥ २०२ ।। जं इत्यादि । जं यत् णियवोहहं वाहिरउ दानपूजातपश्चरणादिकं कृत्वापि दृष्टश्रुतानु- भूतभोगाकांक्षावासितचित्तेन रूपलावण्यसौभाग्यवलदेववासुदेवकामदेवेंद्रादिपदप्राप्तिरूपभा- नस्य ] जो सम्यग्ज्ञानकर रहित मलिन चित्त है अर्थात् अपनी वड़ाई प्रतिष्ठालाभादि दुष्टभावोंसे जिसका चित्त परिणत हुआहै और मनमें ऐसा जानता है कि हमारी दुष्टताको कोई नही जान सकता ऐसा समझकर वीतराग परमानंदसुखरसके अनुभवरूप चित्तकी शुद्धिको नही करता, तथा बाहरसे वगुलाकासा भेष मायाचाररूप लोकरंजनकेलिये धारण किया है यही सत्य है इसी भेषसे हमारा कल्याण होगा इत्यादि अनेक विकल्पोंकी कल्लोलोंसे अपवित्र है ऐसे [ कस्यापि] किसी अज्ञानीके [मोक्षपदं] मोक्षपदवी [जीव] हे जीव [मा द्राक्षीः] मत देखै अर्थात् विना सम्यग्ज्ञानके मोक्ष नहीं होती । उसका दृष्टांत कहते हैं [ बहुना ] बहुत [ सलिलविलोडितेन] पानीके मथनेसे भी [ करः] हाथ [चिक्कणः] चीकना [ न भवति ] नहीं होता । क्योंकि जलमें चिकनापन है ही नही । जैसे जलमें चिकणाई नही है वैसे बाहिरी भेषमें सम्यग्ज्ञान नही है । सम्यग्ज्ञा- नके विना महान तप करो तौभी, मोक्ष नहीं होती। क्योंकि सम्यग्ज्ञानका लक्षण वीतराग शुद्धात्माकी अनुभूति है वही मोक्षका मूल है । वह सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शनादिसे भिन्न नहीं है, तीनों एक हैं ॥ २०१ ।। आगे निश्चयकर आत्मज्ञानसे बहिर्मुख बाह्यपदार्थोंका ज्ञान है उससे प्रयोजन नहीं सधता ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर कहते हैं। [यत् ] जो [ निजबोधात् ] आत्म- - , परमात्मप्रकाशः। २१९ विभोगाशाकरणं यन्निदानबंधस्तदेव शल्यं तत्प्रभृतिसमस्तमनोरथविकल्पज्वालावलीरहित- त्वेन विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजालावबोधो निजबोधः तस्मान्निजबोधाद्वाह्यं यत् णाणु जि कजु ण तेण शास्त्रादिजनितं ज्ञानमपि यत्तेन कार्यं नास्ति । कस्मादितिचेत् । दुक्खहं कारणु दुःखस्य कारणं जेण येन कारणेन तउ वीतरागस्वसंवेदनरहितं तपः जीवह जीवस्य होइ भवति खणेण क्षणमात्रेण कालेनेति । अन यद्यपि शास्त्रजनितं ज्ञानं स्वशु- द्धालपरिज्ञानरहितं तपश्चरणं च मुख्यवृत्त्या पुण्यकारणं भवति तथापि मुक्तिकारणं न भवतीत्यभिप्रायः ॥ २०२ ॥ अथ येन मिथ्यात्वरागादिवृद्धिर्भवति तदात्मज्ञानं न भवतीति निरूपयति;- तंणियणाणु जि होइ णवि, जेण पवडइ राउ । दिणयरकिरणहं पुरउ जिय, किं विलसइ तमराउ ॥ २०३ ।। तत् निजज्ञानमेव भवति नापि येन प्रवर्धते रागः । दिनकरकिरणानां पुरतः जीव किं विलसति तमोरागः ॥ २०३ ।। ज्ञानसे [बाह्यं] बाहर (रहित ) [ज्ञानमपि ] शास्त्रवगैरः का ज्ञान भी है [तेन ] उस ज्ञानसे [कार्य न ] कुछ काम नहीं [येन ] क्योंकि [तपः] वीतरागखसंवेदनज्ञानरहित तप [क्षणेण ] शीघ्र ही [जीवस्य ] जीवको [दुःखस्य कारणं] दुःखका कारण [भवति ] होता है । भावार्थ-निदानबंध आदि तीन शल्योंको आदि ले समस्त विष- यामिलाषरूप मनोरथोंके विकल्पजालरूपी अग्निकी ज्वालाओंसे रहित जो निज सम्यग्ज्ञान है उससे रहित बाह्यपदार्थोंका शास्त्रद्वारा ज्ञान है उससे कुछ काम नहीं । कार्य तो एक निज आत्माके जाननेसे है। यहां शिष्यने प्रश्न किया कि निदानबंधरहित आत्मज्ञान तुमने बतलाया उसमें निदानबंध किसे कहते हैं। उसका समाधान । जो देखे सुने और भोगे हुए इंद्रियोंके भोगोंसे जिसका चित्त रंग रहा है ऐसा अज्ञानी जीव रूपलावण्य सौभाग्यका अभिलाषी वासुदेव चक्रवर्तीपदके भोगोंकी वांछा करे, दान पूजा तपश्चरणादि- कर भोगोंकी अभिलाषा करे वह निदानबंध है सो वडी सल्य (काटा) है। इस शल्यसे रहित जो आत्मज्ञान उसके विना शब्दशास्त्रादिका ज्ञान मोक्षका कारण नहीं है। क्योंकि वीतरागखसंवेदनज्ञानरहित तप भी दुःखका कारण है। ज्ञानरहित तपसे जो ससारकी सपदायें मिलती हैं वे क्षणभंगुर हैं। इसलिये यह निश्चय हुआ कि आत्मज्ञानसे रहित जो शास्त्रका ज्ञान और तपश्चरणादि हैं उनसे मुख्यताकर पुन्यका बंध होता है । उस पुन्यके प्रभावसे जगतकी विभूति पाता है वह क्षणभंगुर है । इसलिये अज्ञानियोंका तप और श्रुत यद्यपि पुन्यका कारण है तौभी मोक्षका कारण नही है ॥ २०२ ॥ आगे जिससे मिथ्यात्वरागादिककी वृद्धि हो वह आत्मज्ञान नही है ऐसा निरूपण २२० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । तमित्यादि । तं तत् णियणाणु जि होइ णवि निजज्ञानमेव न भवति वीतरागनित्या- नंदैकस्वभावनिजपरमात्मतत्त्वपरिज्ञानमेव न भवति । येन ज्ञानेन किं भवति । जेण पव- डुइ येन प्रवर्धते । कोसौ । राउ शुद्धालभावनासमुत्पन्नवीतरागपरमानंदप्रतिबंधकपंचेंद्रिय- विपयामिलाषरागः । अत्र दृष्टांतमाह । दिणयरकिरणहं पुरउ जिय दिनकरकिरणानां पुरतो हे जीव किं विलसइ किं विलसति किं शोभते अपि तु नैव । कोसौ । तमराउ तमोरागस्तमोव्याप्तिरिति । अत्रेदं तात्पर्य । यस्मिन् शास्त्राभ्यासजाने जातेप्यनाकुलवल- क्षणपारमार्थिकसुखप्रतिपक्षभूता आकुलत्वोत्पादका रागादयो वृद्धि गच्छंति तन्निश्चयेन नानं न भवति । कस्मात् । विशिष्टमोक्षफलाभावादिति ॥ २०३ ॥ अथ ज्ञानिनां निजशुद्धात्मस्वरूपं विहाय नान्यत्किमप्युपादेयमिति दर्शयति;- अप्पा मिल्लिवि णाणियह, अण्णु ण सुंदर वत्थु । तेण ण विसयहं मणु रमइ, जाणतहं परमत्थु ।। २०४ ।। आत्मानं मुक्त्वा ज्ञानिनां अन्यन्न सुंदरं वस्तु । तेन न विषयाणां मनो रमते जानतां परमार्थ ॥ २० ॥ अप्पा इत्यादि । अप्पा मिल्लिवि शुद्धबुद्धकस्खभावं परमात्मपदार्थ मुक्त्वा णाणियह ज्ञानिनां मिथ्यात्वरागादिपरिहारेण निजशुद्धात्मद्रव्यपरिज्ञानपरिणतानां अण्णु ण सुंदर करते हैं;-[जीव ] हे जीव [ तत् ] वह [ निजज्ञानं एव] वीतरागनित्यानंदअखंड- खभाव परमात्मतत्त्वका परिज्ञान ही [ नापि ] नही [ भवति ] है [येन] जिससे रागः] परद्रव्यमें प्रीति [प्रवर्धते ] बढे [ दिनकरकिरणानां पुरतः । सूर्यकी किर- णोंके आगे [तमोरागः] अंधकारका फैलाव [कि विलसति ] कैसे शोभायमान होस- कता है नहीं हो सकता । भावार्थ-शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न जो वीतराग परम आनंद उसके शत्रु पंचेन्द्रियोंके विषयोंका अभिलाष जिसमें हो वह निज (आत्म) ज्ञान नही है अज्ञान ही है। जिस जगह वीतराग भाव है वही सम्यग्ज्ञान है । इसी चातको दृष्टांत देकर दृढ करते हैं सो सुनो । हे जीव जैसे सूर्यके प्रकाशके आगे अंधेरा नहीं शोभा देता वैसे ही आत्मज्ञानमें विषयोंकी अभिलाषा (इच्छा) नहीं शोभती । यह निश्चयसे जानना । शास्त्रका ज्ञान होनेपर भी जो निराकुलता न हो और आकुलताके उपजानेवाले आत्मीकसुखके वैरी रागादिक जो वृद्धिको प्राप्त हों तो वह ज्ञान किसका- मंका । ज्ञान तो वह है जिससे आकुलता मिट जावे । इससे यह निश्चय हुआ कि बाह्य पदार्थों का ज्ञान मोक्षफलके अभावसे कार्यकारी नहीं है ॥२०३ ॥ आगे ज्ञानी जीवोंके निजशुद्धात्मभावके विना अन्य कुछ भी आदरने योग्य नहीं है ऐसा दिखलाते हैं;-[आत्मानं:] आत्माको [मुक्त्वा] छोडकर [ज्ञानिनां] ज्ञानि- .

परमात्मप्रकाशः। २२१ वत्थु अन्यन्न सुंदरं समीचीनं वस्तु प्रतिभाति येन कारणेन तेण ण विसयहं मणु रमह तेन कारणेन शुद्धात्मोपलब्धिप्रतिपक्षभूतेषु पंचेंद्रियविषयकामभोगेपु मनो न रमते । किं कुर्वतां । जाणतहं जानतां परमत्थु वीतरागसहजानंदैकपारमार्थिकसुखाविनाभूतं परमामा- नमेवेति तात्पर्य । २०४ ॥ अथ तमेवार्थ दृष्टांतेन समर्थयति,- अप्पा मिल्लिवि णाणमउ, चित्ति ण लग्गइ अण्णु । मरगड जे परियाणियउ, तहुं कच्चे कउ गण्णु ॥ २०५ ॥ आत्मानं मुक्त्वा ज्ञानमयं चित्ते न लगति अन्यत् । मरकतः येन परिज्ञातः तस्य काचेन किं गहनं ॥ २०५ ॥ अप्पा इत्यादि । अप्पा मिल्लिवि आत्मानं मुत्तवा । कथंभूतं । णाणमउ ज्ञानमयं केवलज्ञानांतर्भूतानंतगुणमयं चित्ते मनसि ण लग्गइ न लगति न रोचते न प्रतिभाति । किं । अण्णु निजपरमात्मस्वरूपादन्यत् । अत्रार्थे दृष्टांतमाह । मरगउ जेण वियाणियउ मरकतरत्नविशेषो येन परिज्ञातः तहुं तस्य रत्नपरीक्षापरिज्ञानसहितस्य पुरुषस्य कचे कउ गण्णु काचेन किं गहनं किमपेक्षा तस्येत्यभिप्रायः ॥ २०५ ॥ योंको [अन्यत् वस्तु ] अन्य वस्तु [सुंदरं न ] अच्छी नही लगती [ तेन ] इसलिये [परमार्थ जानतां] परमात्मपदार्थको जाननेवालोंका [मनः] मन[विषयाणां] विषयों में [न रमते ] नहीं लगता । भावार्थ-मिथ्यात्वरागादिकके छोडनेसे निजशुद्धात्मद्रव्यके यथार्थ ज्ञानकर जिनका चित्त परिणत होगया है ऐसे ज्ञानियोंको शुद्ध बुद्ध परम खभाव परमात्माको छोड़के दूसरी कोई भी वस्तु सुंदर नही भासती । इसीलिये उनका मन कभी विषयवासनामें नहीं रमता । वे विषय कैसे हैं। जोकि शुद्धात्माकी प्राप्तिके शत्रु हैं। ऐसे ये भवभ्रमणके कारण काम भोगरूप पाच इंद्रियोंके विषय उनमें मूढ जीवोंका ही मन रमता है सम्यग्दृष्टीका मन नहीं रमता । कैसे हैं सम्यग्दृष्टि, जिन्होंने वीतराग सह- जानंद अखंड सुखमें तन्मय परमात्मतत्त्वको जान लिया है । इसलिये यह निश्चय हुआ कि जो विषयवासनाके अनुरागी हैं वे अज्ञानी हैं, और जो ज्ञानीजन हैं वे विषयविका- रसे सदा विरक्त ही हैं ॥ २०४ ।। आगे इसी कथनको दृष्टातसे दृढ करते हैं;-[ज्ञानमयं आत्मानं ] केवल ज्ञानादि अनंतगुणमई आत्माको [मुक्त्वा ] छोड़कर [अन्यत् ] दूसरी वस्तु [चित्ते ] ज्ञानियोंके मनमें [न लगति] नहीं रुचती । उसका दृष्टात यह है कि [ येन ] निसने [मरकतः] मरकतमणि (रत्न) [परिज्ञातः] जानलिया [तस्य] उसको [काचेन] काचसे [कि गहनं ] क्या प्रयोजन है । भावार्थ-जिसने रत्न पा लिया उसको कांचके खंडोंकी २२२ रायचंद्रजैनशालमालायाम् । अथ कर्मलं मुंजानत्लन् चोलो रागद्वेषं करोति स कर्म बनातीति कथयतिः- भुंजंतुवि णियकम्मफलु, मोहई जो जि करेह । भाउ असुंदर सुंदरुवि, सो पर कम्मु जणेइ ॥ २०६ ।। मुंजानोपि निजकर्नफलं नोहेन य एवं करोति । भावं असुंदर सुंदरमपि स परं कर्म जनयति ।। २०६ ॥ मुंजंतुवि इत्यादि । भुंजंतुवि भुंजानोपि । किं । णियकम्मफलु वीतरागपरमाहादरूप- शुद्धानानुभूतिविपरीतं निजोपार्जितं शुभाशुभकर्नफलं मोहई निर्मोहाद्वात्मप्रतिकूलमोहो- दोन जो जि करेइ ए एव पुरुषः करोति । कं । भाउ भावं परिणाम । किं विशिष्टं । असुंदर सुंदरुवि अशुभं शुभमपि सो पर स एव भावः कम्मु जणेई सुभाशुमं कर्म जनयति । अयमत्र भावार्थः । उच्चागते मर्मणि योलो ववभावच्युतः सन् रागद्वेयाँ करोति स एव कर्म बध्नाति ॥ २०६॥ अय उद्यागते कर्मानुभवे चोसो रागद्वयो न करोति न कर्न न बनातीति कथयति:- भुजंतुवि णियकम्मफल, जो तहिं राउ ण जाइ । सो गवि बंधह कम्मु पुणु, संचिउ जेण विलाइ ॥ २०७॥ मुंजानोपि निजामफलं यः तत्र राग न याति । स नैव वनाति कन पुनः संचितं येन विलीयते ।। २०७॥ मुंजंतुवि इत्यादि । भुजंतुवि नुज्ञानोपि । किं । णियकम्मफलु निजकर्मफलं निजह- क्या जरूरत है उसी तरह जिसका चित्त आत्माने लग गग उसके दूसरे पहायोंकी वांछा नहीं रहती ॥२०५॥ आगे नालको भोगता हुआ जो राग देव करता है वह कमौको गश्त है:-[य- एव] जो जोव [निजकर्मफलं अपने कर्मोके फलनो [भुंजानोपि] भोगता हुआ मी मोहेन ] मोहते [असुंदरं सुंदरं अपि] भले और बुरे [भावं] परिणानोंको करोति ] करता है [सः] वह [ परं] केवल [कर्म जनयति ] कर्नको उपनाता (बांधना) है । भावार्थ-वीतराग परम आहाइप शुद्धात्माकी अनुभूतिले विपरीत जो अशुद्धरागादिक विभाव उनसे उपार्जन किये गये शुभ अशुमान उनके फालको भोगना हुआ जो अज्ञानी जीव मोहके उदयसे हर्ष विषाद भाव करता है वह नरे जाँच कंत्र नरता है । सारांश यह है कि वो निजतभावले च्युत हुला उद्यमें आये हुए कोनें राग द्वेष करता है वही कनौलो वांवता है ।। २०६ ॥ आगे जो उन्यप्राप्त कौन राग द्वेष नहीं करता वह कोंको भी नहीं बांधता ऐला परमात्मप्रकाशः। २२३ द्धात्मोपलंभावावेनोपार्जितं पूर्व यत् शुभाशुभं कर्म तस्य फलं जो यो जीवः तहिं तत्र कर्मानुभवप्रस्तावे राउ ण जाइ रागं न गच्छति वीतरागचिदानंदैकखभावशुद्धात्मतत्त्वभा- वनोत्पन्नसुखामृततृप्तः सेन् रागद्वेषौ न करोति सो स जीवः णवि बंधइ नैव बध्नाति । किं न बध्नाति । कम्मु ज्ञानावरणादि कर्म पुणु पुनरपि । येन कर्मबंधाभावपरिणामेन कि भवति । संचिउ जेण विलाइ पूर्वसंचितं कर्म येन वीतरागपरिणामेन विलयं विनाशं गच्छतीति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । कर्मोदयफलं भुंजानोपि ज्ञानी कर्मणापि न बध्यते इति सांख्यादयोपि वदंति तेपां किमिति दूषणं दीयते भवद्भिरिति । भगवानाह । ते निजशुद्धात्मानुभूतिलक्षणं वीतरागचरित्रनिरपेक्षा वदंति तेन कारणेन तेषां दूषणमिति तात्पर्य ॥ २०७॥ अथ यावत्कालमणुमात्रमपि रागं न मुंचति तावत्कालं कर्मणा न मुच्यते इति प्रति- पादयति, जो अणुमित्तुवि राउ मणि, जाम ण मिल्लइ एत्थु । सो णवि मुचइ ताम जिय, जाणंतुवि परमत्थु ॥ २०८ ॥ कहते हैं;-[निजकर्मफलं ] अपने बांधे हुए कर्मोंके फलको [भुंजानोपि] भोगता हुआ भी [ तत्र ] उस फलके भोगनेमें [य] जो जीव [ रागं] राग द्वेषको [न याति] नही प्राप्त होता [सः ] वह [पुनः कर्म ] फिर कर्मको [नैव ] नहीं [वनाति] बाधता [येन] जिस कर्मबंधाभावपरिणामसे [ संचितं ] पहले बांधे हुए कर्म भी [विलीयते ] नाश होजाते हैं । भावार्थ--निजशुद्धात्माके ज्ञानके अभावसे उपार्जन किये जो शुभ अशुभ कर्म उनके फल को भोगता हुआ भी वीतराग चिदानंद परमखभाव- रूप शुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न अतींद्रियसुखरूप अमृतसे तृप्तहुआ जो रागी द्वेषी नहीं होता वह जीव फिर ज्ञानावरणादि कर्मोंको नही बाधता है और नवे कर्मों के बंधका अभाव होनेसे प्राचीन कर्मोंकी निर्जरा ही होती है । यह सवरपूर्वक निर्जरा ही मोक्षका मूल है । ऐसा कथन सुनकर प्रभाकर भट्टने प्रश्न किया कि हे प्रभो "कर्मके फलको भोगता हुआ भी ज्ञानसे नहीं बंधता" ऐसा साख्य आदिक भी कहते हैं उनको तुम दोष क्यों देते हो । उसका समाधान श्रीगुरु कहते हैं जो हम तो आत्मज्ञान सयुक्त ज्ञानी जीवोंकी अपेक्षा कहते हैं, वे ज्ञानके प्रभावसे कर्मफल भोगते हुए भी रागद्वेषभाव नहीं करते । इसलिये उनके नवे बंधका अभाव है। और जो मिथ्यादृष्टि ज्ञानभावसे बाह्य पूर्वोपार्जितकर्मफलको भोगते हुए रागी द्वेषी होते हैं उनके अवश्य बंध होता है। इस तरह साख्य नही कहता वह वीतराग चारित्रसे रहित कथन करता है । इसलिये उन साख्यादिकोंको दूषण दिया जाता है । यह तात्पर्य जानना ॥ २०७ ।।

, २२४ रायचंदजैनशास्त्रमालायाम् । यः अणुमात्रमपि राग मनसि यावत् न मुंचति अत्र । स नैव मुच्यते तावत् जीव जानन्नपि परमार्थ ॥ २०८॥ जो इत्यादि । जो यः कर्ता अणुमित्तुवि अणुमानमपि सूक्ष्ममपि राउ रागं वीतराग- सदानंदैकशुद्धात्मनो विलक्षणं पंचेंद्रियविपयसुखामिलापरागं मणि मनसि जाम ण मिल्लइ यावंतं कालं न मुंचति एत्थु अत्र जगति सो णवि मुच्चइ स जीवो नैव मुच्यते ज्ञानावर- णादिकर्मणा ताव तावंतं कालं जिय हे जीव । किं कुर्वन्नपि । जाणंतुवि वीतरागानुष्ठान- रहितः सन् शब्दमात्रेण जानन्नपि । कं जानन् । परमत्थु परमार्थशब्दवाच्यनिजशुद्धात्म- तत्त्वमिति । अयमत्र भावार्थः । निजशुद्धालखभावज्ञातेपि शुद्धामोपलब्धिलक्षणवीतराग- चारित्रभावनां विना मोक्षं न लभत इति ॥ २०८ ॥ अथ निर्विकल्पालभावनाशून्यः शास्त्रं पठन्नपि तपश्चरणं कुर्वन्नपि परमार्थ न वेत्तीति कथयति;- बुज्झइ सत्थई तउ चरइ, पर परमत्यु ण बेइ। ताव ण मुंचइ जाम णवि, इहु परमत्थु मुणेइ ॥ २०९ ।। बुध्यते शास्त्राणि तपः चरति परं परमार्थ न वेत्ति । तावत् न मुच्यते यावंतं नैव एनं परमार्थ मनुते ॥ २०९ ।। बुज्झइ इत्यादि । वुज्झइ बुध्यते । कानि । सत्थई शास्त्राणि न केवलं शास्त्राणि बुध्यते तउ चरइ तपश्चरति पर परं किंतु परमत्थु ण वेइ परमार्थ न वेत्ति न जानाति । कस्मान वेत्ति । यद्यपि व्यवहारेण परमात्मप्रतिपादकशास्त्रेण ज्ञायते तथापि निश्चयेन वीतरागस्वसं- वेदनज्ञानेन परिच्छिद्यते । यद्यप्यनशनादिद्वादशविधतपश्चरणेन वहिरंगसहकारिकारणभूतेन आगे जव तक परमाणूमात्र भी रागको नहीं छोड़ता-धारण करता है तब तक कोसे नहीं छूटता ऐसा कथन करते हैं। [यः] जो जीव [अणुमात्रं अपि] थोड़ा भी [रागं] राग [ मनसि ] मनमेंसे [यावत् ] जवतक [अत्र] इस संसारमें [न मुंचति ] नहीं छोड़ देता है [ तावत् ] तवतक [जीव ] हे जीव [परमार्थ ] निजशु- - द्धात्मतत्त्वको [जानन्नपि ] शब्दस केवल जानता हुआ भी [नैव ] नही [मुच्यते ] मुक्त होता । भावार्थ-जो वीतराग सदा आनंदरूप शुद्धात्मभावसे रहित पंचेंद्रियोंके विषयोंकी इच्छा रखता है मनमें थोड़ासा भी राग रखता है वह आगमज्ञानसे आत्माको शब्दमात्र जानता हुआ भी वीतराग चारित्रकी भावनाके विना मोशको नही पाता ॥२०८॥ आगे जो निर्विकल्प आत्मभावनासे शून्य है वह शास्त्रको पढता हुआ भी तथा तपश्च- रण करता हुआ भी परमार्थको नही जानता है ऐसा कहते हैं;-शास्त्राणि] शास्त्रोंको [बुध्यते] जानता है [तपः चरति ] और तपस्या करता है [ परं] लेकिन [परमार्थ] परमात्मप्रकाशः। २२५ साध्यते तथापि निश्चयेन निर्विकल्पशुद्धात्मविश्रांतिलक्षणवीतरागचारित्रसाध्यो योसौ परमार्थशब्दवाच्यो निजशुद्धामा तत्र निरंतरानुष्ठानाभावात् ताव ण मुंचइ तावतं कालं न मुच्यते । केन । कर्मणा जाम णवि इहु परमत्थु झुणेइ यावंतं कालं नैवैनं पूर्वोक्त- लक्षणं परमार्थ मनुते जानाति श्रद्धत्ते सम्यगनुभवतीति । इदमत्र तात्पर्य । यथा प्रदीपेन विवक्षितं वस्तु निरीक्ष्य गृहीत्वा च प्रदीपस्त्यज्यते तथा शुद्धात्मतत्त्वप्रतिपादकशास्त्रेण शुद्धात्मतत्त्वं ज्ञात्वा गृहीत्वा च प्रदीपस्थानीयः शास्त्रविकल्पस्त्याज्यत इति ॥ २०९ ॥ अथ योसौ शास्त्रं पठन्नपि विकल्पं न मुंचति निश्चयेन देहस्थं शुद्धात्मानं न मन्यते स जडो भवतीति प्रतिपादयति, सत्थु पदंतुवि होइ जड, जो ण हणेइ वियप्पु । देहि वसंतुवि णिम्मलउ, णवि मण्णइ परमप्पु ॥२१०॥ शास्त्रं पठन्नपि भवति जडः यः न हंति विकल्पं । देहे वसंतमपि निर्मलं नैव मन्यते परमात्मानं ॥ २१० ॥ परमात्माको [न वेत्ति] नही जानता है [यावत् ] और जवतक [एवं ] पूर्व कहे हुए [ परमार्थ ] परमात्माको [नैव मनुते] नही जानता व श्रद्धान व अच्छीतरह अनुभव करता है [तावत् ] तवतक [न मुच्यते ] नही छूटता । भावार्थ-यद्यपि व्यवहार नयसे आत्मा अध्यात्मशास्त्रोंसे जाना जाता है तौभी निश्चयनयसे वीतरागखसंवेदन ज्ञानहीसे जानने योग्य है, यद्यपि बाह्य सहकारी कारण अनशनादि बारह प्रकारके तपसे साधा जाता है तौभी निश्चयनयसे निर्विकल्पवीतराग चारित्रहीसे आत्माकी सिद्धि है। जिस वीतरागचारित्रका शुद्धात्मामें विश्राम होना ही लक्षण है । सो विना वीतराग- चारित्रके आगमज्ञानसे तथा बाह्य तपसे आत्मज्ञानकी सिद्धि नहीं है। जवतक निजशु- द्धात्मतत्त्वके खरूपका आचरण नही है तवतक कर्मोंसे नहीं छूट सकता। यह निःसं- देह जानना जवतक परमतत्त्वको न जाने न श्रद्धा करै न अनुभवै तबतक कर्मबंधसे नहीं छूटता । इससे यह निश्चय हुआ कि कर्मबंधसे छूटनेका कारण एक आत्मज्ञान ही है। और शास्त्रका ज्ञान भी आत्मज्ञानकेलिये ही किया जाता है, जैसे दीपकसे वस्तुको देख- कर वस्तुको उठा लेते हैं और दीपकको छोड़ देते हैं उसी तरह शुद्धात्मतत्त्वके उपदेश करनेवाले जो अध्यात्मशास्त्र उनसे शुद्धात्मतत्वको जानकर उस शुद्धात्मतत्त्वका अनुभव करना चाहिये और शास्त्रका विकल्प छोड़ना चाहिये । शास्त्र तो दीपकके समान है तथा आत्मवस्तु रत्न समान ॥ २०९॥ आगे जो शास्त्रको पढकरके भी विकल्पको नहीं छोड़ता और निश्चयसे शुद्धात्माको नही मानता जो कि शुद्धात्मदेव देहरूपी देवालेमें मौजूद है उसे न ध्यावता है वह मूर्ख है २९ २२६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । सत्थु इत्यादि । सत्थु पढंतुवि शास्त्रं पठन्नपि होइ जड स जडो भवति । यःकि करोति । जो ण हणेइ वियप्पु यः कर्ता शास्त्राभ्यासफलभूतस्य रागादिविकल्परहितस्य निजशुद्धात्मस्वभावस्य प्रतिपक्षभूतं मिथ्यात्वरागादिविकल्पं न हति । न केवलं विकल्पं न हति । देहि वसंतुवि देहे वसंतमपि णिम्मलउ निर्मलं कर्ममलरहितं णवि मण्णइ नैव मन्यते न श्रद्धत्ते । कं । परमप्पु निजपरमात्मानमिति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा त्रिगुप्त- समाधिं कृत्वा च स्वयं भावनीयं । यदा तु त्रिगुप्तिगुप्तसमाधि कर्तु नावाति तदा विपय- कषायवंचनार्थ शुद्धात्मभावनास्मरणदृढीकरणार्थ च वहिर्विपये व्यवहारज्ञानवृद्धयर्थ च परेषां कथनीयं किंतु तथापि परप्रतिपादनव्याजेन मुख्यवृत्त्या स्वकीयजीव एव संवोध- नीयः । कथमिति चेत् । इदमनुपपन्नमिदं व्याख्यानं न भवति मदीयमनसि यदि समी- चीनं न प्रतिभाति तर्हि त्वमेव स्वयं किं न भावयसीति तात्पर्य ॥ २१० ॥ अथ बोधार्थ शास्त्रं पठन्नपि यस्य विशुद्धात्मप्रतीतिलक्षणो वोधो नाति स मूढो भवतीति प्रतिपादयति- बोहणिमित्तै सत्यु किल, लोइ पढिजइ इत्थु । तेणवि बोहु ण जासु वरु, सो किं मूढ ण तत्थु ॥ २११ ॥ बोधनिमित्तेन शास्त्रं किल लोके पठ्यते अत्र । तेनैव बोधो न यस्य वरः सः किं मूढो न तथ्यं ॥ २११ ॥ है ऐसा कहते हैं;-[यः ] जो जीव [शास्त्रं ] शास्त्रको [पठन्नपि ] पढता हुआ भी [विकल्प] विकल्पको [न हंति ] नही दूर करता (मेंटता ) वह [जडो भवति ] मूर्ख है जो विकल्प नहीं मेंटता वह [ देहे ] शरीरमें [वसंतमपि ] रहते हुए भी [ निर्मल परमात्मानं] निर्मल परमात्माको [नैव मन्यते ] नही श्रद्धानमें लाता। भावार्थ- शास्त्रके अभ्यासका तो फल यह है कि रागादि विकल्पोंको दूर करना और निज शुद्धा- स्माको ध्यावना । इसलिये इस व्याख्यानको जानकर तीनगुप्तिमें अचल हो परम समा- धिमें आरूढ होके निजखरूपका ध्यान करना । लेकिन जब तक तीन गुप्ति न हों परमसमाधि न आवे (होसके) तव तक विषयकषायोंके हटानेकेलिये परजीवोंको धर्मोप- देश देना उसमें भी परके उपदेशके वहानेसे मुख्यताकर अपना जीव ही सबोधना । वो इस तरह है कि परको उपदेश देते अपनेको समझावे । जो मार्ग दूसरोंको छुड़ावै वह आप कैसे करे । इससे मुख्य सबोधन अपना ही है । परजीवोंको ऐसा ही उपदेश है जो यह वात मेरे मनमें अच्छी नहीं लगती तो तुमको भी भली नहीं लगती होगी तुम भी अपने मनमें विचार करो ॥ २१० ॥ आगे ज्ञानके लिये शास्त्रको पढते हुए भी जिसके आत्मज्ञान नहीं है वह मूर्ख है ऐसा परमात्मप्रकाशः। २२७ वोधनिमित्तेन किल शास्त्रं लोके पठ्यते अन तेनैव कारणेन बोधो न यस्य । कथंभूतो, वरो विशिष्टः स किं मूढो न भवति किंतु भवत्येव तथ्यमिति । तद्यथा । अत्र यद्यपि लोकव्यवहारेण कविगमकवादिवाग्मित्वादिलक्षणशास्त्रजनितो वोधो भण्यते तथापि निश्च- येन परमात्मप्रकाशफाध्यात्मशास्त्रोत्पन्नो वीतरागखसंवेदनरूपः स एव बोधो ग्राह्यो न चान्यः । तेनानुवोधेन विना शास्त्रे पठितेपि मूढो भवतीति । अत्र यः कोपि परमात्म- बोधजनकमल्पशास्त्रं ज्ञात्वापि वीतरागभावनां करोति स सिद्ध्यतीति । तथा चोक्तं । "धीरा वेरग्गपरा थोपि हु सिक्खिऊण सिज्ज्ञति । ण हु सिझंति विरागेण विणा पढि- देसुवि सव्वसत्येसु" । परं किंतु । "अक्खडा जोयंतु ठिउ अप्पि ण दिण्णउ चित्तु । कण- विरहियउ पलालु जिमु पर संगहिउ वहुत्तु" । इत्यादि पाठमानं गृहीत्वा परेपां वहुशास्त्र- मानिनां दूपणा न कर्तव्या । तैर्वहुश्रुतैरप्यन्येपामल्पश्रुततपोधनानां दूपणा न कर्तव्या । कम्मादिति चेन् । दूपणे कृते सति परस्परं रागद्वेपोत्पत्तिर्भवति तेन जानतपश्चरणादिकं नश्यतीति भावार्थः ॥ २११ ॥ कथन करते हैं।-[अत्र लोके] इस लोकमें [किल] नियमसे [वोधनिमित्तेन] जानके निमित्त [शास्त्रं ] शास्त्र [पठ्यते ] पढे जाते हैं [ तेनैव ] परंतु शास्त्रके पढनेसे भी [ यस्य ] जिसको [वरः वोधः न ] उत्तमज्ञान नही हुआ [ सः ] वह [किं] क्या [मृढः न ] मूर्ख नहीं है [तथ्यं ] ठीक मूर्ख ही है इसमें सदेह नही । भावार्थ-इस लोकमें यद्यपि लोकव्यवहारसे नवीन कविताका कर्ता कवि, प्राचीनकाव्योंकी टीका कर्ता गमक, जिससे वादमें कोई न जीतसके ऐसा वादित्व, और श्रोताओंके मनको अनुरागी करनेवाला शासका वक्ता होनारूप वाग्मित्व इत्यादि लक्षणोंवाला शास्त्रजनित ज्ञान होता है तौभी निश्चयनयसे वीतरागखसवेदनरूप ही ज्ञान अध्यात्मशास्त्रोंमें प्रशंसा किया गया है। इसलिये खसवेदन ज्ञानके बिना शासके पढते हुए भी मूर्ख है। और जो कोई परमात्मजानके उत्पन्न करनेवाले छोटे थोड़े शास्त्रको भी जानकर वीतराग खसवेदन जानकी भावना करते हैं वे मुक्त होजाते हैं। ऐसा ही कथन ग्रंथों में हर एक जगह कहा है कि-वैराग्यमें लगे हुए जो मोह शत्रुको जीतनेवाले हैं वे थोड़े शास्त्रको ही पढकर सुधर जाते हैं मुक्त हो जाते है और वैराग्यके विना सब शास्त्रोंको पढते हुए भी मुक्त नहीं होते । यह निश्चय जानना परंतु यह कथन अपेक्षासे है। इस वहानेसे शाल पढनेका अभ्यास नहीं छोडना, और जो विशेष शास्त्रके पाठी हैं उनको दूषण न देना ॥ जो शास्त्रके अक्षर बता रहा है और आत्मामें चित्त नही लगाया वह ऐसे जानना कि १. वीरा वैराग्यपरा तोकमपि हि शिक्षयिखा सिध्यति । न सल सिध्यति विरागेण विना पठितेष्वपि सर्वशालेपु ॥ २. अक्षराणि पश्यन स्थित आत्मनि न दत्तं चित्तं । कणविरहित. पलालो यथा पर सगृहीतो बहुतरं ॥

- , २२८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथ वीतरागस्वसंवेदनज्ञानरहितानां तीर्थभ्रमणेन मोक्षो न भवतीति कथयति;- तित्थई तित्थु भमंताहं, मूढहं मोक्खु ण हो । णाणविवजिउ जेण जिय, मुणिवरु होइ ण सोइ ॥२१२ ।। तीर्थ तीर्थ भ्रमतां मूढानां मोक्षो न भवति । ज्ञानविवर्जितो येन जीव मुनिवरो भवति न स एव ॥ २१२ ॥ तीर्थ तीर्थ प्रति भ्रमतां मूढात्मनां मोक्षो न भवति । कस्मादिति चेत् । ज्ञानविवर्जि- तो येन कारणेन हे जीव मुनिवरो न भवति स एवेति । तथाहि । निर्दोषिपरमात्मभाव- नोत्पन्नवीतरागपरमाहादस्पंदिसुंदरानंदरूपनिर्मलनीरपूरप्रवाहनिर्झरज्ञानदर्शनादिगुणसमूहचं- दनादिद्रुमवनराजितं देवेन्द्रचक्रवर्तिगणधरादिभव्यजीवतीर्थयात्रिकसमूहश्रवणसुखकरदि- व्यध्वनिरूपराजहंसप्रभृतिविविधपक्षिकोलाहलमनोहरं यदहद्वीतरागसर्वज्ञखरूपं तदेव निश्च- येन गंगादितीर्थ न लोकव्यवहारप्रसिद्धं गंगादिकं । परमनिश्चयेन तु जिनेश्वरपरमतीर्थ- सदृशं संसारतरणोपायकारणभूतत्वाद्वीतरागनिर्विकल्पपरमसमाधिरतानां निजशुद्धासतत्त्वस्म- रणमेव तीर्थ, व्यवहारेण तु तीर्थकरपरमदेवादिगुणस्मरणहेतुभूतं मुख्यवृत्त्या पुण्यवंधका- जैसे किसीने कण रहित बहुत भूसेका ढेर कर लिया हो ॥ वह किसी कामका नहीं है। इत्यादि पीठिकामात्र सुनकर जो विशेष शास्त्रज्ञ हैं उनकी निंदा नहीं करनी, और जो बहुश्रुत हैं उनको भी अल्पशास्त्रज्ञोंकी निंदा नहीं करनी चाहिये । क्योंकि परके दोष ग्रहण करनेसे रागद्वेषकी उत्पत्ति होती है उससे ज्ञान और तपका नाश होता है यह निश्चयसे जानना ॥ २११ ॥ आगे वीतरागखसंवेदन ज्ञानसे रहित जीवोंको तीर्थ भ्रमण करनेसे भी मोक्ष नहीं है ऐसा कहते हैं;-[तीर्थ तीर्थ ] तीर्थ तीर्थ प्रति [भ्रमतां ] भ्रमण करनेवाले [मूढानां] मूर्खाको [ मोक्षः ] मुक्ति [न भवति ] नहीं होती [जीव ] हे जीव [ येन] क्योंकि जो [ज्ञानविवर्जितः] ज्ञान रहित है [ स एव ] वह [मुनिवरः न भवति ] मुनीश्वर नहीं है संसारी है । मुनीश्वर तो वे ही हैं जो समस्त विकल्पजालोंसे रहित होके अपने खरूपमें रमें, वे ही मोक्ष पाते हैं। भावार्थ-निर्दोषपरमात्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ जो वीतरागपरम आनंदरूप निर्मलजल उसके धारण करनेवाले और ज्ञान दर्शनादिगुणों के समूहरूपी चंदनादि वृक्षोंके वनोंसे शोभित तथा देवेंद्रचक्रवर्ति गणधरादि भव्यजीवरूपी तीर्थयात्रियोंके कानोंको सुखकारी ऐसी दिव्यध्वनिसे शोभायमान और अनेकमुनिजन- रूपी राजहंसोंको आदि लेके नाना तरहके पक्षियोंके शब्दोंसे महामनोहर जो अरहंत वीतराग सर्वज्ञ वेही निश्चयसे महातीर्थ हैं, उनके समान अन्य तीरथ नहीं है। वे ही संसारके तरनेके कारण परमतीर्थ हैं। जो परमसमाधिमें लीन महामुनि हैं उनके वे ही परमात्मप्रकाशः। २२९ रणं तनिर्वाणखानादिकं च तीर्थमिति । अयमत्र भावार्थः । पूर्वोक्तं निश्चयतीर्थ श्रद्धानप- रिमानानुष्टानरहितानाममानिनां शेपतीर्थ मुक्तिकारणं न भवतीति ॥ २१२ ॥ अथ शानिना तथैवाजानिनां च यतीनामंतर दर्शयति, णाणिहिं मृदहं मुणिवरह, अंतर होह महंतु । देहु जि मिल्लद णाणियां, जीवहं भिण्णु मुणंतु ॥ २१३ ।। ज्ञानिनां मृढाना मुनिवराणा अंतरं भवति महत् । देहमपि मुंचति ज्ञानी जीवादिन्न मन्यमानः ॥ २१३ ।। मानिनां मृटानां च गुनिवराणां अंतरं विगेपो भवति । कथंभूनं । महन् । कस्मादिति फोन । ममि मुंगति । कोनी । जानी । किं कुर्वन् मन । जीवात्मकागाद्भिनं मन्यमानो जानन ति । तथा च । श्रीनरागस्यसंवेदनज्ञानी पुत्रकलबादि बहिव्यं तावहरे तिष्ठतु मुम्बुकन्यभावात न्यशुद्रान्मन्बम्पात्मकायान पृथग्भूतं जानन् स्वकीयदेहमपि त्यजति । मृटात्मा पुनः स्वीकरोति नि तात्पर्यम ॥ २१३ ॥ एवमेकचत्वारिंगत्सूत्रप्रमितमहास्थल. मध्य पंचदशनयानगगम्यमवेदनमानमुन्यतेन द्वितीयमंतरस्यलं समाप्तम् । तदनंतर त- म्य महालालमन्य सूत्राष्टम्पर्यनं परिग्रहत्यागव्याख्यानमुख्यत्वेन तृतीयमंतरस्थलं प्रारभ्यते । तीर्थ है निश्चयनवसे निजशुद्वात्मतत्त्वक व्यानके समान दूसरा कोई तीर्थ नहीं हैं और गवहारनयने तीर्थकरपरमदेवादिके गुणस्मरणके कारण मुख्यतासे शुभवंधके कारण ऐसे जोदेलामा सम्मेदशिखर आदि निर्वाणस्थान है वे भी व्यवहारमात्र तीर्थ कहे हैं। जो तीर्थ तीर्थ प्रति प्रमण करें और निज तीर्थका जिसके श्रद्धान परिज्ञान आचरण नहीं है वह अनानी है । उनके तीर्थ मनेसे मोक्ष नहीं होसकती ॥ २१२ ।। आगे जानी और अनानी यतियोंमें बहुत वडा भेद दिखलाते है,-[ज्ञानिनां] सम्यग्दृष्टी भावनिगी [ मूढानां ] मिथ्यादृष्टि द्रव्यलिंगी [मुनिवराणां] मुनियोम [ महत् अंतरं] या भारी भेद [भवति ] है। [ज्ञानी ] क्योंकि ज्ञानीमुनि तो [देहं अपि] पारीरको भी [जीवानिन्नं] जीवसे जुदा [ मन्यमानः] जानकर [मुंचति ] छोड देते हैं अर्थात् शरीरका भी ममत्व छोड़ देते है तो पुत्र स्त्री आदिका क्या कहना है ये तो प्रत्यक्षसे जुदे है और द्रव्यलिंगी मुनि लिंग (भेप) में आत्मबुद्धिको रखता है। भावार्थ-वीतरागत्वसवेदनजानी महामुनी मनवचनकाय इन तीनोंसे अपनेको भिन्न जानता है द्रव्यकर्म भावार्म नोकर्मादिकसे जिसको ममता नहीं है, पिता माता पुत्र कल- त्रादिकी तो वात अलग रहो जो अपने आत्मस्त्रमावसे निजदेहको ही जुदा जानता है। जिसके पर वस्तुमे आत्मभाव नहीं है और मूहात्मा परभावोंको अपने जानता है। यही नानी और अनानीमें अंतर है । परको अपना मानें वह बंधता है और न मानें वह मुक्त

२३०
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
तद्यथा-
लेणहं इच्छइ मूदु पर, भुवणुवि एहु असेसु ।
बहुविहधम्ममिसेण जिय, दोहिमि एहु विसेसु ॥ २१४ ॥
लातुं इच्छति मूढः परः भुवनमपि एतत् अशेपं ।
वहुविधधर्ममिषेण जीव द्वयोः एप विशेषः ॥ २१४ ॥
लातुं गृहीतुं इच्छति । कोसौ । मूढो वहिरात्मा परः । कोर्थः, नियमेन । किं । भुवन-
मप्येतत्तु अशेषं समस्तं । केन कृत्वा । वहुविधधर्ममिपेण व्याजेन । हे जीव द्वयोरप्येप
विशेषः । कयोर्द्वयोः । पूर्वोक्तसूत्रकथितज्ञानिजीवस्यानसूत्रोक्तपुनरजानिजीवस्य च ।
तथाहि । वीतरागसहजानंदैकसुखास्वादरूपः स्वशुद्धात्मैव उपादेय इति रुचिरूपं सम्यग्द-
र्शनं, तस्यैव परमात्मनः समस्तमिथ्यात्वरागाद्यास्रवेभ्यः पृथग्रूपेण परिच्छित्तिरूपं सन्य-
रज्ञानं, तत्रैव रागादिपरिहाररूपेण निश्चलचित्तवृत्तिः सम्यक्चारित्रं इत्येव निश्चयरत्नत्रयस्व-
रूपं तत्रयात्मकमात्मानमरोचमानस्तथैवाजानन्नभावयंश्च मूढात्मा । किं करोति । समल
जगद्धर्मव्याजेन गृहीतुमिच्छति, पूर्वोक्तज्ञानी तु सतुमिच्छतीति भावार्थः ॥ २१४ ॥
अथ शिष्यकरणाद्यनुष्ठानेन पुस्तकाद्युपकरणेनाज्ञानी तुष्यति, ज्ञानी पुनर्वधहेतुं जानन्
सन् लज्जां करोतीति प्रकटयति;-
..
.
होता है । यह निश्चय जानना ॥ २१३ ॥ इस प्रकार इकतालीस दोहाओंके महास्थलके
मध्यमें पंद्रहदोहाओंमें वीतरागखसवेदनज्ञानकी मुख्यतासे दूसरा अंतरस्थल समाप्त हुआ।
अब परिग्रहत्यागके व्याख्यानको आठदोहाओंसे कहते है;-[द्वयोः] ज्ञानी और
अज्ञानी इन दोनोंमें [एष विशेषः ] इतना ही भेद है कि [मूढः ] अज्ञानीजन [ बहु-
विधधर्ममिषेण] अनेकतरहके धर्मके वहानेसे [एतत् अशेपं] इस समस्त [ भुवनं
अपि] जगतको ही [ परः] नियमसे [लातुं इच्छति ] लेनेकी इच्छा करता है अर्थात्
सव ससारके भोगोंकी इच्छा करता है तपश्चरणादिकायक्लेशसे स्वर्गादिके सुखोंको चाहता
है और ज्ञानीजन कर्मोंके क्षयकेलिये तपश्चरणादि करता है भोगोंका अभिलाषी नहीं
है। भावार्थ-वीतरागसहजानंद अखंडसुखका आखादरूप जो शुद्धात्मा वही आराधने
योग्य है ऐसी जो रुचि वह सम्यग्दर्शन, समस्तमिथ्यात्वरागादि आसबसे भिन्नरूप उसी
परमात्माका जो ज्ञान वह सम्यग्ज्ञान और उसीमे निश्चलचित्तकी वृत्ति वह सम्यक्चारित्र
यह निश्चयरतत्रयरूप जो शुद्धात्माकी रुचि जिसके नहीं ऐसा मूढजन आत्माको नहीं
जानता हुआ और नहीं अनुभवताहुआ जगतके समस्तभोगोंको धर्मके वहानेसे लेना
चाहता है तथा ज्ञानीजन समस्तभोगोंसे उदास है जो विद्यमान भोग थे वे सब छोड़ दिये
और आगामी वाछा नहीं है ऐसा जानना ॥ २१४ ॥

परमात्मप्रकाशः। २३१ चिल्लाचिल्लीपुत्थियहि, तूसइ सूटु णिभंतु । एयहिं लजइ णाणियउ, बंधहं हेउ मुणंतु ॥ २१५ ॥ शिष्यार्जिकापुस्तकैः तुष्यति मूढो निर्मातः । एतैः लज्जते ज्ञानी बंधस्य हेतुं जानन् ।। २१५ ॥ शिष्यार्जिकादीक्षादानेन पुस्तकप्रभृत्युपकरणैश्च तुष्यति संतोषं करोति । कोसौ । मूढः । कथंभूतो । निर्धातः । एतैर्वहिर्द्रव्यैर्लज्जां करोति । कोसौ । ज्ञानी । किं कुर्वन्नपि । पुण्य- बंधहेतुं जानन्नपि । तथा च । पूर्वसूत्रोक्तसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षणं निजशुद्धात्मस्वभाव- मश्रद्दधानो विशिष्टभेदज्ञानेनाजानंश्च तथैव वीतरागचारित्रेणाभावयंश्च मूढात्मा । किंकरोति । पुण्यवंधकारणमपि जिनदीक्षादानादि शुभानुष्ठानं पुस्तकाद्युपकरणं वा मुक्ति- कारणं मन्यते । ज्ञानी तु यद्यपि साक्षात्पुण्यवंधकारणं मन्यते परंपरया मुक्तिकारणं च तथापि निश्चयेन मुक्तिकारणं न मन्यते इति तात्पर्य ॥ २१५ ॥ अथ चट्टपट्टकुंडिकाद्युपकरणैर्मोहमुत्पाद्य मुनिवराणां उत्पधे पात्यते इति प्रतिपादयति;- चहहिं पट्टहिं कुंडियहि, चेल्लाचेल्लियएहिं । मोहु जणेविणु मुणिवरह, उप्पहिं पाडिय तेहिं ॥ २१६ ॥ चट्टेः पट्टैः कुंडिकाभिः शिष्यार्जिकाभिः । मोहं जनयित्वा मुनिवराणा उत्पथे पातितास्तैः ॥ २१६ ॥ आगे शिष्योंका करना पुस्तकादिका सग्रह करना इन बातोंसे अज्ञानी प्रसन्न होता है और ज्ञानीजन इनको बंधके कारण जानता हुआ इनसे रागभाव नहीं करता इनके सग्रहमें लज्जावान होता है;-मूढः] अज्ञानीजन [ शिष्यार्जिकापुस्तकैः] चेला चेली पुस्तकादिकसे [तुष्यति ] हर्पित होता है [ निधीतः ] इसमें कुछ सदेह नहीं है [ज्ञानी] और ज्ञानीजन [ एतैः] इन बाह्यपदार्थोंसे [लज्जते] शरमाता है क्योंकि इन सवोंको [बंधस्य हेतुं] बंधका कारण [जानन् ] जानता है । भावार्थ-सम्यग्द- र्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्ररूप जो निजशुद्धात्मा उसको न श्रद्धान करता न जानता और न अनुभवकरता जो मूढात्मा वह पुन्यबंधके कारण जिनदीक्षा दानादि शुभ आचरण और पुस्तकादि उपकरण उनको मुक्तिके कारण मानता है, और ज्ञानीजन इनको साक्षात् पुन्यबंधके कारण जानता है परंपराय मुक्तिके कारण मानता है। यद्यपि व्यवहारनयकर बाह्य सामग्रीको धर्मका साधन जानता है तौभी ऐसा मानता है कि निश्चयनयसे ये मुक्तिके कारण नही हैं ॥ २१५ ॥ आगे कमंडलु पीछी पुस्तकादि उपकरण और शिष्यादिका संघ ये मुनियोंको मोह , , २३२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । चट्टपट्टकुंडिकाद्युपकरणैः शिष्याजिकादिपरिवारैश्च कर्तृभूतैर्मोहं जनयित्वा । केषां । मुनि- वराणां पश्चादुन्मार्गे पातिता तेस्तु तैः । तथाहि । यथा कश्चिदजीर्णभयेन विशिष्टाहारं त्यत्वा लंघनं कुर्वन्नास्ते पश्चादजीर्णप्रतिपक्षभूतं किमपि मिष्टोपधं गृहीत्वा जिह्वालापट्ये- नौषधेनापि अजीर्ण करोत्यज्ञानी इति, न च ज्ञानीति, तथा कोपि तपोधनो विनीतवनिता- दिकं मोहमयेन त्यक्त्वा जिनदीक्षा गृहीत्वा च शुद्धबुद्धैकस्वभावनिजशुद्धासतत्त्वसम्यक्- श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपनीरोगत्वप्रतिपक्षभूतमजीर्णरोगस्थानीयं मोहमुत्पाद्यात्मनः । किंकृत्वा । किमौषधस्थानीयमुपकरणादिकं गृहीत्वा । कोसावज्ञानी न तु ज्ञानीति । इदमत्र तात्पर्य । परमोपेक्षासंयमधरेण शुद्धात्मानुभूतिप्रतिपक्षभूतस्सर्वोपि तावत्परिग्रहस्त्याज्यः । परमोपेक्षा- संयमाभावे तु वीतरागशुद्धात्मानुभूतिभावसंयमरक्षणार्थ विशिष्टसंहननादिशक्त्यभावे सति यद्यपि तपःपर्यायशरीरसहकारिभूतमन्नपानसंयमशौचज्ञानोपकरणतृणमयप्रावरणादिकं कि- मपि गृह्णाति तथापि ममत्वं न करोतीति । तथा चोक्तं । "रम्येपु वस्तुवनितादिपु वीतमोहो मुह्येद्वृथा किमिति संयमसाधनेषु । धीमान् किमामयभयात्परिहत्य भुक्ति पीत्वौषधं व्रजति जातुचिदप्यजीर्ण" ॥ २१६ ॥ उत्पन्न कराके खोटे मार्गमें पटक देते हैं;-[चट्टैः पट्टैः कुंडिकाभिः ] पीछी कमंडलु पुस्तक और [शिष्यार्जिकाभिः ] मुनि श्रावकरूप चेला, अर्जिका श्राविका इत्यादि चेली-ये संघ [मुनिवराणां ] मुनिवरोंको [ मोहं जनयित्वा] मोह उत्पन्न कराके [तैः] वे [उत्पथे] उन्मार्गमें ( खोटेमारगमें) [पातिताः ] डाल देते हैं। भावार्थ-जैसे कोई अजीर्णके भयसे मनोज्ञ आहारको छोड़कर लंघन करता है पीछे अजीर्णकी दूर करनेवाली कोई मीठी औषधिको लेकर जिहाका लंपटी होके मात्रासे अधिक लेके औषधिका ही अजीर्ण करता है, उसी तरह अज्ञानी कोई व्यलिंगी यती विनयवान पतिव्रतास्त्री आदिको मोहके डरसे छोडकर जिनदीक्षा लेके अजीर्ण समान मोहके दूर करनेकेलिये वैराग्य धारणकरके औषधि समान जो उपकरणादि उनको ही ग्रहणकरके उन्हीका अनुरागी (प्रेमी) होता है, उनकी वृद्धिसे सुख मानता है वह औषधिका ही अजीर्ण करता है। मात्रा प्रमाण औषधि लेवे तो वह रोगको हर सके। यदि औषधिका ही अजीर्ण करै मात्रासे अधिक लेवै तो रोग नही जाता उलटी रोगकी वृद्धि ही होती है। यह निःसंदेह जानना । इससे यह निश्चय हुआ जो परमोपेक्षासंयम अर्थात् निरविकल्प परमसमाधिरूप तीन गुसिमई परम शुद्धोपयोगरूप संयमके धारक हैं उनके शुद्धात्माकी अनुभूतिसे विपरीत सब ही परिग्रह त्यागने योग्य है । शुद्धोपयोगिमुनियोंके कुछ भी परिग्रह नही है। और जिनके परमोपेक्षा संयम नही लेकिन व्यवहारसंयम है उनके भावसंयमकी रक्षाके निमित्त हीनसंहननके होनेपर उत्कृष्ट शक्तिके अभावसे यद्यपि तपका साधन शरीरकी रक्षाके निमित्त अन्न जलका ग्रहण होता है, उस अन्नजलके लेनेसे मल- " परमात्मप्रकाशः। २३३ अथ केनापि जिनदीक्षा गृहीत्वा शिरोलुंचनं कृत्वापि सर्वसंगपरित्यागमकुर्वतात्मानं वंचितमिति निरूपयति केणवि अप्पट वंचियउ, सिरुटुंचिवि छारेण । सयलवि संग ण परिहरिय, जिणवरलिंगधरेण ।। २१७ ॥ केनापि आत्मा वंचितः शिरो लुचित्वा क्षारेण । सकल अपि संगा न परिहताः जिनवरलिंगधरेण ॥ २१७ ॥ केनाप्यात्मा वंचितः । किंकृत्वा । शिरोढुंचनं कृत्वा । केन । भस्मना । कस्मादितिचेत् । यतः सर्वेपि संगा न परिहृताः । कथंभूतेन भूत्वा । जिनवरलिंगधारकेणेति । तद्यथा । वीतरागनिर्विकल्पनिजानंदैकरूपसुखरसावादपरिणतपरमात्मभावनाखभावेन तीक्ष्णशस्त्रोपक- रणेन बाह्याभ्यंतरपरिग्रहकांक्षारूपप्रभृतिसमस्तमनोरथकल्लोलमालात्यागरूपं मनोमुंडनं पूर्व- मकृत्वा जिनदीक्षारूपं शिरोमुंडनं कृत्वापि केनाप्यात्मानं वंचितं । कस्मात् । सर्वसंगपरि- त्यागाभावादिति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा स्वशुद्धात्मभावनोत्थवीतरागपरमानंदपरिग्रह मूत्रादिकी बाधा भी होती है इसलिये शौचका उपकरण कमंडलु और संयमोपकरण पीछी और ज्ञानोपकरण पुस्तक इनको ग्रहण करते हैं तौभी इनमें ममता नहीं है प्रयोजनमात्र प्रथम अवस्थामें धारते हैं। ऐसा दूसरी जगह "रम्येषु" इत्यादिसे कहा है कि, मनोज्ञ स्त्री आदिक वस्तुओंमें जिसने मोह छोड दिया है ऐसा महामुनि सयमके साधन पुस्तक पीछी कमंडल आदि उपकरणों में वृथा मोहको कैसे कर सकता है कभी नही करसकता। जैसे कोई बुद्धिमान पुरुष रोगके भयसे अजीर्णको दूर करना चाहे और अजीर्णके दूर करनेके लिये औषधिका सेवन करे तो क्या मानासे अधिक ले सकता है ऐसा कभी नहीं, मात्राप्रमाण ही लेगा ॥ २१६ ॥ आगे ऐसा कहते हैं कि जिसने जिनदीक्षा धरके केशोंका लौच किया और सकल परिग्रहका त्याग नहीं किया उसने अपना आत्मा ही वंचित किया-[ केनापि] जिसकिसीने [जिनवरलिंगधरण] जिनवरका भेष धारण करके [क्षारेण] भस्मसे [शिरः] शिरके केश [लुचित्वा] लौच किये (उखाड़े) लेकिन [सकला अपि संगाः] सब परिग्रह [न परिहृताः ] नही छोड़े उसने [आत्मा] अपना आत्मा [वंचितः] उगलिया । भावार्थ-वीतरागनिर्विकल्पनिजानंद अखडरूप सुखरसका जो आखाद उसरूप परिणमी जो परमात्माकी भावना वही हुआ तीक्ष्ण शस्त्र उससे वाहिरके और अंतरके परिग्रहोंकी यांच्छा आदि ले समस्त मनोरथ उनकी कल्लोलमालाओंका त्यागरूप मनका मुंडन वह तो नही किया और जिनदीक्षारूप शिरोमुंडनकर भेष रखा सब परिग्रहका त्याग नहीं किया उसने अपना आत्मा ठगा । ऐसा कथन समझकर ३० , . रायचंद्रजैनशालामालायाम् । २३४ कृत्वा तु जगत्रये कालत्रयेपि मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च दृष्टश्रुतानुभूतनि:परिप्रह- शुद्धालानुभूतिविपरीतपरिग्रहकांक्षां त्यजेत्यभिप्रायः ॥ २१७ ॥ अथ ये सर्वसंगपरित्यागरूपं जिनलिगं गृहीत्वापीष्टपरिग्रहान् गृहंति ते छार्द कृत्वा पुन- रपि गिलंति तामिति प्रतिपादयति,- जे जिणलिंगु धरेवि मुणि, इट्टपरिग्गह लिंति । छद्दि करेविणु ते जि जिय, सा पुणु छद्दि गिलंति ॥ २१८ ॥ ये जिनलिंगं धृत्वापि मुनय इएपरिग्रहान् लांति । छर्दि कृत्वा ते एव जीव तां पुनः छर्दैि गिलंति ॥ २१८ ॥ ये केचन जिनलिगं गृहीत्वापि मुनयस्तपोधना इष्टपरिग्रहान् लांति गृहति । ते किं कुर्वति । छर्दि कृत्वा त एव हे जीव तां पुनश्छार्दै गिलंतीति । तथापि गृहस्थापेक्षया चेतन- परिग्रहः पुत्रकलत्रादिः, सुवर्णादिः पुनरचेतनः, साभरणवनितादि पुनर्मिश्रः । तपोधना- पेक्षया छात्रादिः सचित्तः पिच्छकमंडलादिः पुनरचित्तः उपकरणसहितउछात्रादिस्तु मिश्रः । अथवा मिथ्यात्वरागादिरूपः सचित्तः द्रव्यकर्मनोकर्मरूपः पुनरचित्तः द्रव्यकर्मभावक- मरूपस्तु मिश्रः । वीतरागत्रिगुप्तसमाधिस्थपुरुपापेक्षया सिद्धरूपः सचित्तः पुनलादिपंच- द्रव्यरूपः पुनरचित्तः गुणस्थानमार्गणास्थानजीवस्थानादिपरिणतः संसारी जीवस्तु मिश्नश्चेति । निजशुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न वीतराग परम आनंदवरूपको अंगीकार करके तीनों- काल तीनों लोकमें मनवचनकाय कृतकारितअनुमोदनाकर देखे सुने अनुभवे जो परि- ग्रह उनकी वांछा सर्वथा त्यागनी चाहिये । ये परिग्रह शुद्धात्माकी अनुभूतिसे विपरीत हैं ॥ २१७ ॥ आगे जो सर्व संगके त्यागरूप जिनमुद्राको ग्रहणकर फिर परिग्रहको धारण करता वह वमनकरके पीछे निगलता है ऐसा कथन करते हैं;-[ये] जो [मुनयः] मुनि [जिनलिंगं] जिनलिंगको [धृत्वापि ] ग्रहणकर [ इष्टपरिग्रहान् ] फिरभी इच्छित परिग्रहोंको [लांति ] ग्रहण करते हैं [जीव ] हे जीव [ ते एव ] वे ही [छर्दि कृत्वा] वमन करके [पुनः] फिर [तां छर्दैि ] उस वमनको पीछे [गिलंति] निगलते हैं। भावार्थ—परिग्रहके तीन भेदोंमें गृहस्थकी अपेक्षा चेतन परिग्रह पुत्र कलत्रादि, अचेतन परिग्रह आभरणादि और मिश्र परिग्रह आभरण सहित स्त्री पुत्रादिः साधुकी अपेक्षा सचित्त परिग्रह शिष्यादि, अचित्त परिग्रह पीछी कमंडल पुस्तकादि और मिश्र परिग्रह पीछी कमंडल पुस्तकादि सहित शिष्यादि अथवा साधुके भावोंकी अपेक्षा सचित्त परिग्रह मिथ्यात्वरागादि, अचित्त परिग्रह द्रव्यकर्म नोकर्म और मिश्रपरिग्रह द्रव्यकर्म भावकर्म दोनों मिले हुए । अथवा वीतराग त्रिगुप्तिमें लीन ध्यानी पुरुषकी अपेक्षा सचित्तho .

परमात्मप्रकाशः। २३५ एवंविधबाह्याभ्यंतरपरिग्रहरहितं जिनलिंगं गृहीत्वापि ये शुद्धात्मानुभूतिविलक्षणमिष्टपरिग्रह गृहंति ते छर्दिताहारग्राहकपुरुषसहशा भवंतीति भावार्थः। तथा चोक्तं । “त्यक्त्वा स्वकीय- पिमित्रकलत्रपुत्रान् सक्तोन्यगेहवनितादिषु निर्मुमुक्षुः । दोर्ध्या पयोनिधिसमुद्गतनकचक्र प्रोत्तीर्य गोष्पदजलेषु निमग्नवान् सः" ॥ २१८ ॥ अथ ये ख्यातिपूजालाभनिमित्तं शुद्धात्मानं त्यजति ते लोहकीलनिमित्तं देवं देवकुलं च दहंतीति कथयति, लाहहं कित्तिहि कारणिण, जे सिवसंगु चयंति । खीलालग्गिवि तेवि मुणि, देउलु देउ डहंति ॥ २१९ ॥ लाभस्य कीर्तेः कारणेन ये शिवसंगं त्यजति । कीलानिमित्तं तेपि मुनयः देवकुलं देवं दहति ॥ २१९ ।। लाभकीर्तिकारणेन ये केचन शिवसंगं शिवशब्दवाच्यं निजपरमात्मध्यानं त्यजति ते मुनयस्तपोधनाः । किं कुर्वति । लोहकीलकाप्रायं निःसारेन्द्रियसुखनिमित्तं देवशब्दवाच्य निजपरमात्मपदार्थ दहति देवकुलशब्दवाच्यं दिव्यपरमौदारिकशरीरं च दहंतीति । परिग्रह सिद्धपरमेष्ठीका ध्यान, अचित्त परिग्रह पुद्गलादि पांच द्रव्यका विचार और मिश्रपरिग्रह गुणस्थान मार्गणास्थान जीवसमासादिरूप संसारी जीवका 'विचार । इस तरह बाहिरके और अंतरके परिग्रहसे रहित जो जिनलिंग उसे ग्रहण कर जो अज्ञानी शुद्धा- त्माकी अनुभूतिसे विपरीत परिग्रहको ग्रहण करते हैं वे वमन करके पीछे आहार करने- वालोंके समान निंदाके योग्य होते हैं । ऐसा दूसरी जगह भी कहा है कि जो जीव अपने माता पिता पुत्र मित्र कलत्र-इनको छोड़कर परके घर और पुत्रादिकमें मोह करते हैं अर्थात् अपना परिवार छोड़कर शिण्यसाखाओंमें राग करते हैं वे भुजाओंसे समुद्रको तैरके गायके खोदे जलमें डूबते हैं । कैसा है समुद्र , जिसमें जलचरोंके समूह प्रगट हैं ऐसे अथाह समुद्रको तो बाहोंसे तिर जाता है लेकिन गायके खोजके जलमें डूबता है। यह बड़ा अचंभा है । घरका ही संबंध छोडदिया तो पराये पुत्रोंसे क्या राग करना ? नही करना ॥ २१८॥ आगे जो अपनी प्रसिद्धि (बडाई) प्रतिष्ठा और पर वस्तुका लाभ इन तीनोंकेलिये आत्मध्यानको छोडते हैं वे लोहके कीलेकेलिये देव तथा देवालयको जलाते हैं। [ये जो कोई [लाभस्य ] लाभ [कीर्तेः कारणेन ] और कीर्तिके कारण [शिवसंग] परमात्माके ध्यानको [ त्यति] छोड़ देते हैं [ ते अपि मुनयः ] वे ही मुनि [ कीला- निमित्तं] लोहेके कीलेके लिये अर्थात् कीलेके समान असार इंद्रियसुखके निमित्त [देवकुलं] मुनिपद योग्य शरीररूपी देवस्थानको तथा [ देवं] आत्मदेवको [ दहंति] २३६ रायचंगुजैनशास्त्रमालायाम । कथमिति चेत् । यदा ख्यातिपूजालाभार्थ शुद्धात्मभावना त्यत्तवा वर्तते तदा ज्ञानावरणा- दिकर्मबंधो भवति तेन बानावरणकर्मणा केवलनानं प्रच्छाद्यते केवलदर्शनावरणेन केवल- दर्शनं प्रच्छाद्यते वीर्यातरायेण केवलवीर्य प्रच्छाद्यते मोहोदयेनानंतसुखं च प्रच्छाचत इति । एवंविधानंतचतुष्टयस्यालाभे परमौदारिकशरीरं च न लभंत इति । यदि पुनरने- कभवे परिच्छेद्यं कृत्वा शुद्धालभावनां करोति तदा संसारस्थिति छित्वाऽद्यकालेपि स्वर्ग गत्वागत्य शीघ्र शास्वतसुखं प्राप्नोतीति तात्पर्य । तथा चोक्तं । "संग्गो तवेण सन्चो वि पावए किं तु झाणजोएण । जो पावइ सो पावइ परभवे सासयं सोक्खं" ।। २१९॥ अथ यो बाह्याभ्यंतरपरिग्रहणात्मानं महांतं मन्यते स परमार्थ न जानातीति दर्शयति;- अप्पउ मण्णइ जो जि मुणि, गस्य गंथहि तत्थु । सो परमत्थें जिणु भणइ, णवि बुज्झइ परमत्थु ॥ २२० ।। आत्मानं मन्यते य एव मुनिः गुरुकं ग्रंथैः तथ्यं । स परमार्थेन जिनो भणति नैव बुध्यते परमार्थ ।। २२० । आसानं मन्यते य एव मुनिः । कथंभूतं मन्यते । गुरुकं महांतं । कैः। ग्रंथैर्वाह्याभ्यंतर- भवकी आतापसे भस्म कर देते हैं । भावार्थ-जिस समय ख्याति पूजा लामके अर्थ शुद्धात्माकी भावनाको छोडकर अज्ञानभावोंमें प्रवर्त होते हैं उस समय ज्ञानावरणादि कर्मोंका बंध होता है । उस ज्ञानावरणादिके बंधसे ज्ञानादि गुणका आवरण होता है। केवल ज्ञानावरणसे केवल ज्ञान ढका जाता है, मोहके उदयसे अनंतसुख, वीर्यातरायके उदयसे अनंतबल और केवलदर्शनावरणसे केवलदर्शन आच्छादित होता है। इस प्रकार अनंत चतुष्टयका आवरण होरहा है । उस अनंत चतुष्टयके अलाममें परमौदारिक शरी- रको नही पाता क्योंकि जो उसी भवमें मोक्ष जाता है उसीके परमौदारिक शरीर होता है। इसलिये जो कोई सम भावमें शुद्धात्माकी भावना करे तो अभी खर्गमें जाकर पीछे विदेहोंमें मनुष्य होकर मोक्ष पाता है । ऐसा ही कथन दूसरी जगह शास्त्रोंमें लिखा है कि तपसे खर्ग तो सभी पाते हैं परंतु जो कोई ध्यानके योगसे वर्ग पाता है वह परभवमें सासते (अविनाशी) सुखको (मोक्षको) पाता है । अर्थात् वर्गसे आकर मनुष्य होके मोक्ष पाता है उसीका वर्ग पाना सफल है और जो कोरे (अकेले ) तपसे खर्ग पाके फिर संसारमें भ्रमता है उसका स्वर्ग पाना वृथा है ॥ २१९ ॥ आगे जो बाह्य अभ्यंतर परिग्रहसे अपनेको महंत मानता है वह परमार्थको नही जानता ऐसा दिखलाते हैं। [य एव ] जो [मुनिः ] मुनि [ग्रंथैः] बाह्य परिग्रहसे [आत्मानं ] अपनेको [गुरुकं ] महंत (बड़ा)[मन्यते ] मानता है अर्थात् परिप्र- १ खर्गस्तपसा सर्वोपि प्राप्नोति कितु ध्यानयोगेन । य. प्राप्नोति स प्राप्नोति परभवे शाश्वतं सौख्यं ॥ arma परमात्मप्रकाशः। २३७ परिग्रहैस्तथ्यं सत्यं स पुरुषः परमार्थेन वस्तुवृत्त्या नैव बुध्यते परमार्थमिति जिनो वदति । तथाहि । निर्दोषिपरमालविलक्षणैः पूर्वसूत्रोक्तसचित्ताचित्तमिश्रपरिग्रहैथरचना- रूपशब्दशास्त्रैर्वा आत्मानं महातं मन्यते यः स परमार्थशब्दवाच्यं वीतरागपरमानंदैक- खभावं परमात्मानं न जानातीति तात्पर्य ॥ २२० ॥ ग्रंथेनामानं महातं मन्यमानः सन् परमार्थ कस्मान्न जानातीति चेत् ;- वुझंतह परमत्थु जिय, गुरु लहु अत्थि ण कोइ । जीवा सयलवि वंभु परु, जेण वियाणई सोइ ॥ २२१ ॥ बुध्यमानानां परमार्थ जीव गुरुः लघुः अस्ति न कोपि । जीवाः सकला अपि ब्रह्म परं येन विजानाति सोपि ॥ २२१ ॥ बुध्यमानानां । कं । परमार्थ हे जीव गुरुत्वं लघुत्वं वा नास्ति । कस्मान्नास्ति । जीवाः सर्वेपि परमब्रह्मस्वरूपाः । तदपि कस्मात् । येन कारणेन ब्रह्मशब्दवाच्यो मुक्तात्मा केवलज्ञानेन सर्व जानाति यथा तथा निश्चयनयेन सोप्यको विवक्षितो जीवः संसारी सर्व जानाती- त्यभिप्रायः ॥ २२१॥ एवमेकचत्वारिंशत्सूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये परिग्रहपरित्यागव्याख्या- हसे ही गौरव जानता है [ तथ्यं] निश्चयसे [सः] वही पुरुष [परमार्थेन] वास्तवमें [ परमार्थ ] परमार्थको [नैव बुध्यते ] नहीं जानता [जिनः भणति ] ऐसा जिनेश्वरदेव कहते हैं। भावार्थ-निर्दोषि परमात्मासे परान्मुख जो पूर्वसूत्रमें कहे गये सचित्त अचित्त मिश्र परिग्रह हैं उनसे अपनेको महंत मानता है जो मै बहुत पढा हूं। ऐसा जिसके अभिमान है वह परमार्थ यानी वीतरागपरमानंदखभाव निज आत्माको नहीं जानता । आत्मज्ञानसे रहित है यह निःसंदेह जानो ॥ २२० ॥ आगे शिष्य प्रश्न करता है कि जो ग्रंथसे अपनेको महंत मानता है वह परमार्थको क्यों नहीं जानता ? इसका समाधान आचार्य कहते हैं।-[हे जीव ] हे जीव [ पर- मार्थ ] परमार्थको [बुध्यमानानां ] समझनेवालोंके [कोपि] कोई जीव [गुरुः लघुः] बडा छोटा [न अस्ति ] नही है [ सकला अपि ] सभी [ जीवाः ] जीव [ परब्रह्म] परम ब्रह्मखरूप हैं [येन] क्योंकि निश्चयनयसे [ सोपि] वह सम्यग्दृष्टि एक भी जीव [विजानाति ] सबको जानता है। भावार्थ-जो परमार्थको नही जानता वह परिग्र- हसे तो गुरुता समझता है और परिग्रहके न होनेसे लघुपना जानता है यही भूल है। यद्यपि गुरुता लघुता कर्मके आवरणसे जीवों में पायी जाती है तौभी शुद्धनयसे सब समान हैं, तथा ब्रह्म अर्थात् सिद्धपरमेष्टी केवलज्ञानसे सबको जानते हैं सबको देखते हैं उसी- प्रकार निश्चयनयसे सम्यग्दृष्टी सब जीवोंको शुद्धरूप ही देखता है ॥ २२१ ॥ इस तरह इकतालीस दोहाओंके महास्थलमें परिग्रह त्यागके व्याख्यानकी मुख्यतासे आठ दोहा- २३८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् | नमुख्यतया सूत्राष्टकेन तृतीयमंतरस्थलं समाप्त । अथ ऊर्ध्व त्रयोदशसूत्रपर्यंत शुद्धनिश्चयेन सर्वे जीवाः केवलज्ञानादिगुणैः समानास्तेन कारणेन पोडशवर्णिकासुवर्णवद्भेदो नास्तीति प्रतिपादयति । - तद्यथा- जो भत्तउ रयणत्तयह, तसु मुणि लक्खणु एउ । अत्थउ कहिवि कुडिल्लियइं, सो तसु करइ ण भेउ ॥ २२२ ॥ यः भक्तः रतत्रयस्य तस्य मन्यस्व लक्षणं इदं । तिष्ठतु कस्यामपि कुड्यां स तस्य करोति न भेदं ॥ २२२ ॥ जो इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । जो यः भत्तउ भक्तः । कत्य । रय- तयह रत्नत्रयस्य तसु तस्य पुरुषस्य मुणि मन्यख जानीहि । किं । लक्खणु एउ लक्षणं इदं प्रत्यक्षीभूतं । इदं किं । अस्थउ कहि वि कुडिल्लियइ तिष्ठतु कस्यामपि कुड्यां शरीरे सो तसु करइ ण भेउ स ज्ञानी तस्य जीवस्य देहभेदेन भेदं न करोति । तथाहि । योसौ वीतरागस्वसंवेदनज्ञानी निश्चयस्य निश्चयरत्नत्रयलक्षणपरमात्मनो वा भक्तः तस्येदं लक्षणं जानीहि हे प्रभाकरभट्ट । क्वापि देहे तिष्ठतु जीवस्तथापि शुद्धनिश्चयेन पोडशवणिकासुवर्णव- केवलज्ञानादिगुणैर्भेदं न करोतीति । अत्राह प्रभाकरभट्टः । हे भगवन् जीवानां यदि ओंका तीसरा अंतरस्थल पूर्ण हुआ । आगे तेरह दोहाओतक शुद्धनिश्चयनयसे सब जीव केवलज्ञानादिगुणसे समान हैं इसलिये सोलह वान (ताव ) के सुवर्णकी तरह भेद नहीं है सब जीव समान हैं ऐसा निश्चय करते हैं। वह ऐसे है:-[ यः] जो मुनि [रत्नत्रयस्य ] रत्नत्रयकी [भक्तः] आराधना (सेवा) करनेवाला है [ तस्य ] उसके [इदं लक्षणं ] यह लक्षण [ मन्यस्व ] जानना कि [कस्सामपि कुट्यां] किसी शरीर में जीव [तिष्ठतु] रहे [ सः] वह ज्ञानी [तस्य भेदं] उस जीवका भेद [न करोति ] नही करता अर्थात् देहके भेदसे गुरुता लघुताका भेद करता है परंतु ज्ञानदृष्टि से सबको समान देखता है। भावार्थ-वीतराग स्वसंवेदन ज्ञानी निश्चयरत्नत्रयका आराधकका ये लक्षण हे प्रभाकरभट्ट तू निःसंदेह जान, जो किसी शरीरमें कर्मके उदयसे जीव रहे परंतु निश्चयसे शुद्ध वुद्ध (ज्ञानी) ही है । जैसे सोनेमें वानभेद है वैसे जीवों में बानभेद नही है केवलज्ञानादि अनंतगुणोंसे सब जीव समान हैं। ऐसा कथन सुनकर प्रभाकरभट्टने प्रश्न किया । हे भगवन् जो जीवों में देहके भेदसे भेद नही हैं सब समान हैं तब जो वेदाती एक ही आत्मा मानते हैं उनको क्यों दोष देते हो । तब श्रीगुरु उसका समाधान करते हैं कि शुद्धसंग्रहनयसे सेना एक ही कही जाती है लेकिन सेनामें अनेक हैं तौभी ऐसे कहते हैं कि सेना आई सेना गई, उसी , परमात्मप्रकाशः। २३९ देहभेदेन भेदो नास्ति तर्हि यथा केचन वदंत्येक एव जीवस्तन्मतमायातं । भगवानाह । शुद्धसंग्रहनयेन सेनावनादिवज्जात्यपक्षया भेदो नास्ति व्यवहारनयन पुनर्व्यक्त्वपेक्षया वने भिन्नभिन्नवृक्षवत् सेनायां भिन्नभिन्नहस्त्यश्वादिवझेदोऽस्तीति भावार्थः ॥ २२२ ॥ अथ त्रिभुवनस्थजीवानां मूढा भेदं कुर्वति ज्ञानिनस्तु मिन्नभिन्नसुवर्णानां पोडशवर्णि- कैकत्ववत्केवलज्ञानलक्षणेनैकत्वं जानंतीति दर्शयति,- जीवहं तिहुयण संठियहं, मूढा भेउ करंति । केवलणाणि णाणि फुड, सयलुवि एक मुणंति ॥ २२३ ॥ जीवानां त्रिभुवनसंस्थितानां मूढा भेदं कुर्वति । केवलज्ञानेन ज्ञानिनः स्फुटं सकलमपि एकं मन्यते ॥ २२३ ॥ जीवह इत्यादि । जीवहं तिहुयण संठियहं श्वेतकृष्णरक्तादिमिन्नभिन्नवस्यैवेष्टितानां पोडशवर्णिकानां भिन्नभिन्नसुवर्णानां यथा व्यवहारेण वस्त्रवेष्टनभेदेन भेदः तथा त्रिभुवन- संस्थितानां जीवानां व्यवहारेण भेदं दृष्ट्वा निश्चयनयेनापि मूढा भेउ करंति मूढामानो भेदं कुर्वति । केवलणाणि वीतरागसदानंदैकसुखाविनाभूतकेवलज्ञानेन णाणि वीतराग- स्वसंवेदेनज्ञानिनः फुड स्फुटं निश्चितं सयलवि समस्तमपि जीवराशि इकु मुणंति संग्रहनयेन समुदायं प्रत्येकं मन्यंत इति अभिप्रायः ॥ २२३ ॥ प्रकार जातिकी अपेक्षासे जीवोंमें भेद नहीं है सब एक जाति हैं और व्यवहारनयसे व्यक्तिकी अपेक्षा भिन्न भिन्न है अनंत जीव हैं एक नहीं है। जैसे वन एक कहा जाता है और वृक्ष जुदे २ हैं उसी तरह जातिसे जीवोंमें एकता है लेकिन द्रव्य जुदे २ हैं तथा जैसे सेना एक है परंतु हाथी घोड़े रथ सुभट अनेक है उसी तरह जीवोंमें जानना ॥ २२२ ॥ आगे तीन लोकमें रहनेवाले जीवोंका अज्ञानी भेद करते हैं सबको समान नहीं जानते और ज्ञानीजन केवलज्ञानलक्षणसे सवको समान जानते हैं। जीवपनेसे कोई कम बढ नहीं है कर्मके उदयसे शरीर भेद है परंतु द्रव्यकर सब समान हैं। जैसे सीनेमें वानभेद है वैसे ही परके संयोगसे भेद मालूम होता है तौभी सुवर्णपनेसे सब समान है ऐसा दिखलाते है-[त्रिभुवनसंस्थितानां ] तीन भुवनमें रहनेवाले [जीवानां] जीवोंका [ मूढाः ] मूर्ख ही [ भेदं ] भेद [ कुर्वति ] करते है और [ज्ञानिनः] ज्ञानी जीव [ केवलज्ञानेन] केवलज्ञानसे [स्फुटं] प्रगट [सकलमपि ] सब जीवोंको [एक मन्यते ] समान जानते है । भावार्थ-व्यवहारनयकर सोलहवानके सुवर्ण भिन्न २ वस्त्रमें लपेटें तो वस्त्रके भेदसे भेद है परंतु सुवर्णपनेसे भेद नहीं है, उसी प्रकार तीन लोकमें तिष्ठे हुए जीवोंका व्यवहारनयसे शरीरके भेदसे भेद है परंतु जीवपनेसे भेद नहीं २४० रायचंद्रजैनशासमालायाम् । अथ केवलज्ञानादिलक्षणेन शुद्धसंग्रहह्नयेन सर्वे जीवाः समाना इति कथयति- जीवा सयलवि णाणमय, जम्मणमरणविमुक्क। जीवपएसहि सयल सम, सयलवि सगुणहिं एक ॥ २२४ ॥ जीवाः सकला अपि ज्ञानमया जन्ममरणविमुक्ताः। जीवप्रदेशैः सकलाः समाः सकला अपि स्वगुणैरेके ।। २२४ ।। जीवा इत्यादि । जीवा सयलविणाणमय व्यवहारेण लोकालोकप्रकाशकं निश्चयेन खशुद्धासग्राहकं यत्केवलज्ञानं तज्जानं यद्यपि व्यवहारेण केवलज्ञानावरणेन प्रपितं तिष्ठति तथापि शुद्धनिश्चयेन तदावरणाभावात् पूर्वोक्तलक्षणकेवलज्ञानेन निवृत्तत्वात्सर्वेपि जीवा ज्ञानमयाः जम्मणमरणविमुक्क व्यवहारनयेन यद्यपि जन्ममरणसहितास्तथापि निश्चयेन वीतरागनिजानंदैकरूपसुखामृतमयत्वादनाद्यनिधनत्वाश्च शुद्धासस्वरूपाद्विलक्षणस्य जन्मम- मरणनिर्वर्तकस्य कर्मण उदयाभावाजन्ममरणविमुक्ताः । जीवपएसहि सयल सम यद्यपि संसारावस्थायां व्यवहारेणोपसंहारविस्तारयुक्तत्वादेहमात्रा मुक्तावस्थायां तु किंचिदूनचर- मशरीरप्रमाणास्तथापि निश्चयनयेन लोकाकाशप्रमितासंख्येयप्रदेशवहानिवृद्धयभावात् स्वकीयस्वकीयजीवप्रदेशैः सर्वे समानाः । सयलवि सगुणहिं एक यद्यपि व्यवहारे- णाव्यावाधानंतसुखादिगुणाः संसारावस्थायां कर्मपितास्तिष्ठति तथापि निश्चयेन कर्मा- है । देहका भेद देखकर मूढ जीव भेद मानते हैं और वीतराग स्वसंवेदनज्ञानी जीवपनेसे सब जीवोंको समान मानता है। सभी जीव केवल ज्ञान वेलिके कंद सुख पंक्ति हैं कोई कम बढ नहीं है ॥ २२३ ॥ आगे केवलज्ञानादि लक्षणसे शुद्धसंग्रहनयकर सब जीव एक हैं ऐसा कहते हैं- [सकला अपि ] सभी [ जीवाः ] जीव [ज्ञानमयाः ] ज्ञानमई हैं और [जन्ममरण- विमुक्ताः ] जन्ममरणसे रहित हैं [जीवप्रदेशैः ] अपने २ प्रदेशोंसे [सकलाः समाः] सव समान हैं [ अपि ] और [ सकलाः] सत्र जीव [ स्वगुणैः एके] अपने केवलज्ञा- नादि गुणोंसे समान हैं । भावार्थ-व्यवहारसे लोक अलोकका प्रकाशक और निश्चयन- यसे निजशुद्धात्मद्रव्यका ग्रहण करनेवाला जो केवलज्ञान वह यद्यपि व्यवहारनयसे केवल- ज्ञानावरणकर्मसे ढंका हुआ है तौभी शुद्ध निश्चयसे केवलज्ञानावरणका अभाव होनेसे केवलज्ञानस्वभावसे सभी जीव केवलज्ञानमई हैं। यद्यपि व्यवहारनयकर संब संसारी जीव जन्ममरण सहित हैं तौभी निश्चयनयकर वीतराग निजानंदरूप अतींद्रिय सुखमई हैं जिनकी आदि भी नहीं और अंत भी नहीं ऐसे हैं, शुद्धात्मस्वरूपसे विपरीत जन्ममरणके उत्पन्न करनेवाले जे कर्म उनके उदयके अभावसे जन्ममरणरहित हैं। यद्यपि संसार अवस्थामें व्यवहारनयकर प्रदेशोंका संकोचविस्तारको धारण करते हुए देह प्रमाण हैं परमात्मप्रकाशः। २११ भावात्सर्वेपि स्वगुणैरेकप्रमाणा इति । अत्र यदुक्तं शुद्धात्मनः स्वरूपं तदेवोपादेयमिति तात्पर्य ।। २२४ ॥ अथ जीवानां ज्ञानदर्शनलक्षणं प्रतिपादयति, जीवहं लक्खणु जिणवरहिं, भासिउ दंसणु णाणु । तेण ण किजइ भेउ तह, जइ मणि जाउ विहाणु ॥ २२५ ॥ जीवानां लक्षणं जिनवरैः भाषितं दर्शनं ज्ञानं । तेन न क्रियते भेदः तेषां यदि मनसि जातो विभातः ॥ २२५ ॥ जीवहं इत्यादि । जीवहं लक्खणु जिणवरहिं भासिउ दंसणु णाणु यद्यपि व्यव- हारेण संसारावस्थायां मत्यादि ज्ञानं चक्षुरादि दर्शन जीवानां लक्षणं भवति तथापि निश्च- येन केवलदर्शनं केवलज्ञानं च लक्षणं भापितं । कैः । जिनवरैः । तेण ण किजइ भेउ तहं तेन कारणेन व्यवहारेण देहभेटेपि केवलज्ञानदर्शनरूपनिश्चयलक्षणेन तेषां न क्रियते भेदः । यदि किं । जइ मणि जाउ विहाणु यदि चेन्मनसि वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञा- नादित्योदयेन जातः । कोसौ । प्रभातसमय इति । अन यद्यपि पोडशवर्णिकालक्षणं वहूनां सुवर्णानां मध्ये समानं तथाप्येकस्मिन सुवर्णे गृहीते शेषसुवर्णानि सहैव नायांति । कस्मात् । भिन्नभिन्न प्रदेशत्वात् । तथा यद्यपि केवलज्ञानदर्शनलक्षणं समानं सर्वजीवानां तथाप्येकस्मिन् विवक्षितजीवे पृथक्कृते शेपजीवाः सहैव नायांति । कस्मात् । भिन्नप्रदे- और मुक्त अवस्थामें चरम (अंतिम) शरीरसे कुछ कम देह प्रमाण हैं तौभी निश्चयनय- कर लोकाकाशप्रमाण असख्यातप्रदेशी हैं हानि वृद्धि न होनेसे अपने प्रदेशोंकर सब समान हैं। और यद्यपि व्यवहारनयसे ससारअवस्थामें इन जीवोंके अव्याबाध अनंत सुखादिगुण कर्मोंसे ढके हुए हैं तौभी निश्चयनयकर कर्मके अभावसे समी जीव गुणोंकर समान है । ऐसा जो शुद्ध आत्माका खरूप है वही ध्यान करने योग्य है ॥ २२४ ॥ आगे जीवोंका ज्ञान-दर्शन लक्षण कहते है,-[जीवानां लक्षणं] जीवोंका लक्षण [जिनवरः] जिनेंद्रदेवने [ दर्शनं ज्ञानं] दर्शन और ज्ञान [ भापितं ] कहा है | तेन] इसलिये [ तेषां ] उन जीवोंमें [ भेदः] भेद [न क्रियते] मत कर यदि ] अगर [ मनसि ] तेरे मनमें [विभातः जातः] ज्ञानरूपसूर्यका उदय होगया है अर्थात् हे शिष्य तू सबको समान जान । भावार्थ यद्यपि व्यवहारनयसे संसार- अवस्थामें मत्यादि ज्ञान और चक्षुरादि दर्शन जीवके लक्षण कहे हैं तौभी निश्चयनयकर केवल दर्शन केवलज्ञान येही लक्षण हैं ऐसा जिनेंद्रदेवने वर्णन किया है । इसलिये व्यवहारनयकर देहभेदसे भी भेद नही है, केवलज्ञानदर्शनरूप निजलक्षणकर सब समान है कोई भी बड़ा छोटा नहीं है । जो तेरे मनमें वीतराग निर्विकल्प खसवेदन ज्ञानरूप ३१ २४२ रायचंद्रजैनशाखमालायाम् । शत्वात् । तेन कारणेन ज्ञायते यद्यपि केवलनानदर्शनलक्षणं समानं तथापि प्रदेशभेदो. स्तीति भावार्थः ।। २२५ ॥ अथ शुद्धासनां जीवजातिरूपेणैकत्वं दर्शयति,- बंभहं भुवणि वसंताहं, जे णवि भेउ करंति । ते परमप्पपयासयर, जोइय विमल मुणति ॥ २२६ ॥ ब्रह्मणः भुवने वसतः ये नैव भेदं कुवैति । ते परमात्मप्रकाशकराः योगिन् विमलं मन्यते ॥ २२६ ॥ वंभहं इत्यादि । वंभहं ब्रह्मणः शुद्धासनः । किं कुर्वतः । भुवणि वसंताहं भुवने त्रिभुवने वसतः तिष्ठतः जे णवि भेउ करंति ये नैव भेदं कुर्वति । केन । शुद्धसंग्रहनयेन ते परमप्पपयासयर ते बानिनः परमासस्वरूपस्य प्रकाशकाः संतः जोड्य हे योगिन् अथवा बहुवचनेन हे योगिनः । किं कुर्वति । विमल मुणंति विमलं संशयादिरहितं शुद्धा- सस्वरूपं मन्यते जानंतीति । तद्यथा । यद्यपि जीवराश्यपेक्षया तेपामेकत्वं भण्यते तथापि व्यक्त्यपेक्षया प्रदेशभेदेन भिन्नत्वं नगरस्य गृहादिपुरुपादिभेदवन् । कश्चिदाह । यर्थकोपि चंद्रमा वहुजलघटेपु मिन्नमिन्नरूपेण दृश्यते तथैकोपि जीवो बहुगरीरेषु भिन्नमिन्नरूपेण दृश्यत इति । परिहारमाह । वहुषु जलघटेपु चंद्रकिरणोपाधिवशेन जलपुद्गला एव चंद्रा- सूर्यका उदय हुआ है और मोहनिद्राके अभावसे आत्मबोधरूप प्रभात हुआ है तो तू सवोंको समान देख । जैसे यद्यपि सोलहवानीके सोने सत्र समान वृत्त हैं तौभी उन सुवर्णराशियोंमेंसे एक सुवर्णको ग्रहण किया तो उसके ग्रहणकरनेसे सव सुवर्ण साथ नहीं आते क्योंकि सबके प्रदेश भिन्न है, उसी प्रकार यद्यपि केवलज्ञानदर्शनलक्षण सव जीव समान है तौभी एक जीवका ग्रहण करनेसे सबका ग्रहण नही होता। क्योंकि प्रदेश सबके भिन्न २ है । इससे यह निश्चय हुआ कि यद्यपि केवलज्ञानदर्शनलक्षणसे सब जीव समान है तौभी प्रदेश सबके जुदे २ है यह तात्पर्य जानना ॥ २२५ ॥ आगे जातिके कथनसे सब जीवोंकी एक जाति है परंतु द्रव्य अनंत है ऐसा दिख- लाते हैं;-[भुवने] इस लोकमें [वसतः ] रहनेवाले [ब्रह्मणः] जीवोंका [ भेदं] भेद [ये] जो [नैव ] नहीं [ कुर्वति] करते हैं [ते वे [परमात्मप्रकाशकराः] परमात्माके प्रकाशकरनेवाले [योगिन् ] हे योगी [विमलं] अपने निर्मल आत्माको [मन्यते] जानते है । इसमें संदेह नहीं है। भावार्थ-यद्यपि जीवरागिकी अपेक्षा जीवोंकी एकता है तौभी प्रदेशभेदसे प्रगटरूप सब जुदे २ है। जैसे वृक्षजातिकर वृक्षोंका एकपना है तौभी सब वृक्ष जुदे २ है और पहाड़जातिसे सब पहाडका एकत्व है तौभी सब जुदे २ है तथा रत्नजातिसे रनोंका एकत्व है परंतु सब रन पृथक् २ है, , परमात्मप्रकाशः। २४३ कारेण परिणता न चाकाशस्थचंद्रमाः । अत्र दृष्टांतमाह । यथा देवदत्तमुखोपाधिवशेन नानादर्पणानां पुद्गला एव नानामुखाकारेण परिणमंति न च देवदत्तमुखं नानारूपेण परिणमति । यदि परिणमति तदा दर्पणस्थं मुखप्रतिविवं चेतनत्वं प्राप्नोति न च तथा, तथैकचंद्रमा अपि नानारूपेण न परिणमतीति । किं च न चैको ब्रह्मनामा कोपि दृश्यते प्रत्यक्षेण यश्चंद्रवन्नानारूपेण भविष्यति इत्यभिप्रायः ॥ २२६ ॥ अथ सर्वजीवविषये समदर्शित्वं मुक्तिकारणमिति प्रकटयति, रायदोसवे परिहरेवि, जे सम जीव णियंति । ते समभावि परिट्ठिया, लहु णिव्वाणु लहंति ॥ २२७ ॥ रागद्वेषौ परिहत्य ये समा जीवा निर्गच्छति । ते समभावे प्रतिष्ठिताः लघु निर्वाणं लभते ॥ २२७ ॥ राय इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । रायदोसवे परिहरेवि वीतराग- निजानंदैकस्वरूपस्वशुद्धात्मद्रव्यभावनाविलक्षणौ रागद्वेषौ परिहत्य जे ये केचन सम जीव घटजातिकी अपेक्षा सव घटोंका एकपना है परंतु सब जुदे २ है और पुरुषजातिकर सबकी एकता है परंतु सब अलग २ है । उसी प्रकार जीवजातिकी अपेक्षासे सब जीवोंका एकपना है तौभी प्रदेशोंके भेदसे सब ही जीव जुदे जुदे हैं । इहा पर कोई पर- वादी प्रश्न करता है कि जैसे एक ही चंद्रमा जलके भरे बहुत घडोंमें जुदा जुदा भासता है उसीप्रकार एक ही जीव वहुत शरीरों में भिन्न २ भास रहा है। उसका श्रीगुरु समा- धान करते है-जो बहुत जलके घडोंमें चंद्रमाकी किरणोंकी उपाधिसे जलजातिके पुद्गल ही चंद्रमाके आकार परिणत होगये है लेकिन आकाशमें स्थित चंद्रमा तो एक ही है कुछ चंद्रमा तो बहुत स्वरूप नही होगया । उसका दृष्टात कहते है । जैसे कोई देवदत्त- नामा पुरुष उसके मुखकी उपाधि (निमित्त) से अनेक प्रकारके दर्पणोंसे शोभायमान जो काचका महल उसमें वे काचरूप पुद्गल ही अनेकमुखके आकार परिणत हुए है कुछ देवदत्तका मुख अनेकरूप नही परिणत हुआ है, मुख एक ही है। जो कदाचित देवदत्तका मुख अनेकरूप परिणमन करे तो दर्पणमें तिष्ठते हुए मुखोंके प्रतिविंब चेतन हो जावें । परंतु चेतन नहीं होते, जड़ ही रहते है । उसीप्रकार एक चंद्रमा भी अने- करूप नहीं परिणमता । वे जलरूप पुद्गल ही चंद्रमाके आकार परिणत हो जाते है। इसलिये ऐसा निश्चय समझना कि जो कोई ऐसे कहते है कि एक ही ब्रह्म नानारूप दीखता है । यह कहना ठीक नही है । जीव जुदे २ है ॥ २२६ ॥ आगे ऐसा कहते है कि सब ही जीव द्रव्यसे तो जुदे २ है परंतु जातिसे एक हैं और गुणोंकर समान है ऐसी धारणा करना मुक्तिका कारण है;-[ये जो [रागद्वेषौ] - २४४ रायचंद्वजैनशास्त्रमालायाम् । णियति सर्वसाधारणकेवलज्ञानदर्शनलक्षणेन समाना सहनाः जीवा निर्गति जाति ते पुरुपाः । कथंभूताः । सममावि परिष्टिया जीवितमरणलाभालाभमुखदुःखादिसमना- भावनारूपे समभावे प्रतिष्ठिताः संतः लहु णिच्वाणु लहंति लघु शीनं आयंतिकस्वभाव- काचिंत्याद्भुतकेवलज्ञानादिगुणास्पदं निर्वाणं लभंत इति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा रागद्वेषा त्यक्त्वा च शुद्धात्मानुभूतिरूपा समभावना कर्तव्येत्यभिप्रायः ॥ २२७ ॥ अथ सर्वजीवसाधारणं केवलज्ञानदर्शनलक्षणं प्रकाशयति;- जीवहं दसणु णाणु जिय, लक्खणु जाणइ जो जि । देहविभेएं भेउ तह, णाणि किं मण्णइ सो जि ॥ २२८ ।। जीवानां दर्शनं ज्ञानं जीव लक्षणं जानाति य एव । देहविभेदेन भेदं तेषां ज्ञानी किं मन्यते तमेव ॥ २२८॥ जीवह इत्यादि । जीवहं जीवानां दसणु णाणु जगत्रयकालत्रयवर्निसमसद्रव्यगुणपर्या- याणां क्रमकरणव्यवधानरहितत्वेन परिछित्तिसमर्थ विशुद्धदर्शनं ज्ञानं च । जिय हे जीव लक्खणु जाणइ जो जि लक्षणं जानाति य एव देह विभेएं भेउ तह देहविभेदेन भेदं तेपां जीवानां, देहोद्भवविषयसुखरसास्वादविलक्षणशुद्धात्मभावनारहितेन जीवेन यान्युपा- राग और द्वेषको [परिहत्य] दूर करके [जीवाः समाः] सब जीवोंको समान [निर्ग- च्छंति] जानते है [ते] वे साधु [समभावे] समभावमें [प्रतिष्ठिताः] विराजमान [लघु] शीघ्र ही [निर्वाणं] मोक्षको [लभते] पाते है । भावार्थ-वीतराग निजानं- दस्वरूप जो निज आत्मद्रव्य उसकी भावनासे विमुख जो राग द्वेष उनको छोड़कर जो महान पुरुष केवलज्ञान दर्शन लक्षणकर सब ही जीवोंको समान गिनते हैं वे पुरुष समभावमें स्थित शीघ्र ही शिवपुरको पाते है । समभावका लक्षण ऐसा है कि जीवित मरण लाभ-अलाभ सुख दुःखादि सबको समान जानें । जो अनंत सिद्ध हुए और होवेंगे यह सब समभाव का प्रभाव है । समभावसे मोक्ष मिलती है। कैसा है वह मोक्षस्थान, जो अत्यंत अद्भुत अचिंत्य केवलज्ञानादि अनंत गुणोंका स्थान है। यहां यह व्याख्यान जानकर राग द्वेषको छोडके शुद्धात्माके अनुभवरूप जो समभाव वे सदा करने चाहिये। यही इस ग्रंथका अभिप्राय है ॥ २२७ ।। आगे सब जीवोंमें केवलज्ञान और केवल दर्शन साधारण लक्षण हैं इनके विना कोई जीव नहीं है । ये गुण शक्तिरूप सब जीवोंमें पाये जाते हैं ऐसा कहते हैं-[जी. वानां ] जीवोंके [दर्शनं ज्ञानं] दर्शन और ज्ञान [लक्षणं ] निज लक्षणको [य एव] जो कोई [जानाति] जानता है [हे जीव] हे जीव [स एव ज्ञानी] वही ज्ञानी [देहविभेदेन] देहके भेदसे [तेपां भेदं] उन जीवोंके भेदको [किं मन्यते] क्या मान परमात्मप्रकाशः। २४५ जितानि कर्माणि तदुदयेनोत्पन्नेन देहभेदेन जीवानां भेदं णाणि किमण्णइ वीतरागस्वसंवे- दनज्ञानी किं मन्यते । नैव । कं । सो जि तमेव पूर्वोक्तं देहभेदमिति । अत्र ये केचन ब्रह्माद्वैतवादिनो नानाजीवान्न मन्यते तन्मतेन विवक्षितैकजीवस्य जीवितमरणसुखदु:- खादिके जाते सर्वजीवानां तस्मिन्नेव क्षणे जीवितमरणसुखदुःखादिकं प्राप्नोति । कस्मादिति चेत् । एकजीवत्वादिति । न च तथा दृश्यते इति भावार्थः ॥ २२८ ॥ अथ जीवानां निश्चयनयेन योसौ देहभेदेन भेदं करोति स जीवानां दर्शनज्ञानचारित्र- लक्षणं न जानातीत्यभिप्रायं मनसि धृत्वा सूत्रमिदं कथयति,- देहविभेयइं जो कुणइ, जीवहं भेउ विचित्तु । सो णवि लक्खणु मुणइ तहं, दसणु णाणु चरित्तु ॥ २२९ ॥ देहविभेदेन यः करोति जीवानां भेदं विचित्रं । स नैव लक्षणं मनुते तेषां दर्शनं ज्ञानं चारित्रं ॥ २२९ ॥ देह इत्यादि । देह विभेयहं देहममत्वमूलभूतानां ख्यातिपूजालाभस्वरूपादीनां अपध्या- नानां विपरीतस्य स्वशुद्धामध्यानस्याभावे यानि कृतानि कर्माणि तदुदयजनितेन देहभेदेन सकता है नहीं मानसकता । भावार्थ-तीनलोक और तीन काल वरती समस्त द्रव्य गुण पर्यायोंको एक ही समयमें जानने समर्थ जो केवल दर्शन केवल ज्ञान हैं इन निज लक्षणोंको जो कोई जानता है वही सिद्ध पद पाता है। जो ज्ञानी अच्छीतरह इन निज लक्षणोंको जान लेवै वह देहके भेदसे जीवोंका भेद नही मानसकता। अर्थात् देहसे उत्पन्न जो विषयसुख उनके रसके आखादसे विमुख शुद्धात्माकी भावनासे रहित जो जीव उसने उपार्जन किये जो ज्ञानावरणादि कर्म उनके उदयसे उत्पन्न हुए देहादिकके भेदसे जीवोंका भेद वीतरागखसवेदन ज्ञानी कदापि नहीं मानसकता । देहमें भेद हुआ तो क्या, गुणसे सब समान हैं और जीव जातिकर एक हैं। यहां पर जो कोई ब्रह्मा- द्वैतवादी वेदांती नाना जीवोंको नही मानते हैं, एक ही जीव मानते हैं, ऐसी बात अप्रमाण है । उनके मतमें एक ही जीवके माननेसे बड़ा भारी दोष होता है। वह इस तरह है कि एक जीवके जीने मरने सुख दुःखादिके होनेपर सब जीवोंके उसी समय जीवना मरना सुख दुःखादि होने चाहिये, क्योंकि उनके मतमें वस्तु एक है। परंतु ऐसा देखनेमें नही आता । इसलिये उनका वस्तु एक मानना वृथा है ऐसा जानो ॥ २२८ ॥ आगे जीवहीको जानते हैं परंतु उसके लक्षण नहीं जानते यह अभिप्राय मनमें रखकर व्याख्यान करते हैं;-[यः] जो [देहविभेदेन] शरीरों के भेदसे [जीवानां] , २४६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । जो कुणइ यः करोति । के । जीवहं भेउ विचित्तु जीवानां भेदं विचित्रं नरनारकादि- देहरूपं सो णवि लक्खणु मुणइ तहं स नैव लक्षणं मनुते तेपां जीवानां । किं लक्षणं । दसणु णाणु चरित्तु सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रमिति । अत्र निश्चयेन सम्यग्दर्शननानचारित्र- लक्षणानां जीवानां ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यचांडालादिदेहभेदं दृष्ट्वा रागद्वेपो न कर्तव्याविति तात्पर्य ॥ २२९ ॥ अथ शरीराणि बादरसूक्ष्माणि विधिवशेन भवंति न च जीवा इति दर्शयति अंगई सुहुमई बादरई, विहिवर्सि हुति जि वाल । जिय पुणु सयलुवि तित्तडा, सव्वत्थवि सयकाल ॥ २३०॥ अंगानि सूक्ष्माणि बादराणि विधिवशेन भवंति ये बालाः । जीवाः पुनः सकला अपि तावंतः सर्वत्रापि सर्वकाले ॥ २३० ॥ अंगई इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । अंगई सुहुमई बादरई अंगानि सूक्ष्मवादराणि जीवानां विहिपसि होति विधिवशाद्भवंति अंगोद्भवपंचेंद्रियविषयकांक्षा- मूलभूतानि दृष्टश्रुतानुभूतभोगवांछारूपनिदानवंधादीनि यान्यपध्यानानि तद्विलक्षणा यासौ जीवोंका [ विचित्रं ] नानारूप [ भेदं ] भेद [ करोति ] करता है [सः ] वह [तेपां] उन जीवोंका [दर्शनं ज्ञानं चारित्रं] दर्शन ज्ञान चारित्र [ लक्षणं] लक्षण [नैव मनुते] नही जानता अर्थात् उसको गुणोंकी परीक्षा (पहचान) नही है । भावार्थ देहके ममत्वके मूल कारण ख्याति (अपनी बड़ाई) पूजा और लाभरूप जो आर्तरौद्र- खरूप खोटे ध्यान उनसे रहित निज शुद्धात्माका ध्यान उसके अभावसे इस जीवने उपार्जन किये जो शुभ अशुभ कर्म उनके उदयसे उत्पन्न जो शरीर है उसके भेदसे भेद मानता है उसको दर्शनादि गुणोंकी गम्य नहीं है । यद्यपि पापके उदयसे नरक योनि, पुन्यके उदयसे देवोंका शरीर और शुभाशुभ मिश्रसे नर देह तथा मायाचारसे पशुका शरीर मिलता है अर्थात् इन शरीरोंके भेदसे जीवोंकी अनेक चेष्टायें देखी जाती हैं परंतु दर्शन ज्ञान लक्षणसे सब तुल्य है । उपयोग लक्षणके विना कोई जीव नहीं है। इसलिये ज्ञानीजन सवको समान जानते हैं। निश्चयनयसे दर्शन ज्ञान चारित्र जीवोंके लक्षण हैं, ऐसा जानकर ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र चांडालादि देहके भेद देखकर रागद्वेष नहीं करना चाहिये । सब जीवोंसे मैत्री भाव करना यही तात्पर्य है ॥ २२९ ।। आगे सूक्ष्म बादर शरीर जीवोंके कर्मके संबंधसे होते हैं सो सूक्ष्म बादर स्थावर जंगम ये सब शरीरके भेद हैं जीव तो चिद्रूप है सब भेदोंसे रहित है ऐसा दिखलाते हैं।-[सूक्ष्माणि ] सूक्ष्म [बादराणि ] और बादर [अंगानि ] शरीर [ये] तथा जो [बालाः ] बाल वृद्ध तरुणादि अवस्थायें [विधिवशेन ] कर्मोंसे [भवंति] होती परमात्मप्रकाशः। २४७ खशुद्धात्मभावना तद्रहितेन जीवेन यदुपार्जितं विधिसंज्ञं कर्म तद्वशेन भवंत्येव । न केवल- मंगानि भवंति जे घाल ये वालवृद्धादिपर्यायाः तेपि विधिवशेनैव । अथवा संबोधनं हे चाल हे अज्ञान जिय पुणु सयलवि तित्तडा जीवाः पुनः सर्वेपि तत् प्रमाणा द्रव्यप्रमाणं प्रत्यनंताः, क्षेत्रापेक्षयापि पुनरैकैकोपि जीवो यद्यपि व्यवहारेण वदेहमात्रस्तथापि निश्चयेन लोकाकाशप्रमितासंख्येयप्रदेशप्रमाणः । क । सव्वत्थवि सर्वत्र लोके । न केवलं लोके सयकाल सर्वत्र कालत्रये तु । अत्र जीवानां चादरसूक्ष्मादिकं व्यवहारेण कर्मकृतभेदं दृष्ट्वा विशुद्धदर्शनज्ञानलक्षणापेक्षया निश्चयनयेन भेदो न कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ २३०॥ अथ जीवानां शत्रुमित्रादिभेदं यः न करोति स निश्चयनयेन जीवलक्षणं जानातीति प्रतिपादयति, सत्तुवि मितुवि अप्पु परु, जीव असेसुवि एइ । एकु करेविणु जो मुणइ, सो अप्पा जाणेइ ॥ २३१ ॥ शत्रुरपि मित्रमपि आत्मा परः जीवा अशेषा अपि एते । एकत्वं कृत्वा यो मनुते स आत्मानं जानाति ॥ २३१ ॥ सत्तुवि इत्यादि । सत्तुवि शत्रुरपि मित्तुवि मित्रमपि जीव असेसुवि जीवा अशेषा [पुनः] और [जीवाः ] जीव तो [ सकला अपि] सभी [ सर्वत्र ] सब जगह [ सर्वकाले अपि] और सव कालमें [तावंतः] उतने प्रमाण ही अर्थात् असंख्यात प्रदेशी ही हैं । भावार्थ-जीवोंके शरीर व बालवृद्धादि अवस्थाये कर्मों के उदयसे होती हैं । अर्थात् अंगसे उत्पन्न हुए जो पंचेद्रियोंके विषय उनकी वाछा जिनका मूल कारण है ऐसे देखे सुने भोगे हुए भोगोंकी वाछारूप निदान बंधादि खोटे ध्यान उनसे विमुख जो शुद्धात्माकी भावना उससे रहित इस जीवने उपार्जन किये शुभाशुभ कर्मों के योगसे ये चतुर्गतिके शरीर होते हैं और वालवृद्धादि अवस्थायें होती हैं। ये अवस्थायें कर्मजनित हैं जीवकी नहीं है । हे अज्ञानी जीव यह वात तू निःसदेह जान । ये सभी जीव द्रव्यप्रमाणसे अनंत है, क्षेत्रकी अपेक्षा एक एक जीव यद्यपि व्यवहारनयकर अपने मिले हुए देहके प्रमाण है तौभी निश्चयनय कर लोकाकाशप्रमाण असंख्यात प्रदेशी है। सव लोकमें सव कालमें जीवोंका यही खरूप जानना । बादर सूक्ष्मादि भेद कर्म जनित होना समझकर (देखकर) जीवोंमें भेद मत जानो । विशुद्ध ज्ञान दर्शनकी अपेक्षा सब ही जीव समान हैं कोई भी जीव दर्शन ज्ञान रहित नही है ऐसा जानना ॥ २३०॥ आगे जो जीवोंके शत्रु मित्रादि भेद नही करता है वह निश्चयकर जीवका लक्षण जानता है ऐसा कहते हैं;-[एते अशेषा अपि ] ये सभी [जीवाः ] जीव हैं उनमेसे [शत्रुरपि ] कोई एक किसीका शत्रु भी है [ मित्रं अपि] मित्र भी है [आत्मा] २४८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अपि एइ एते प्रत्यक्षीभूताः एकु करेविणु जो मुणइ एकत्वं कृत्वा यो मनुते शयुमित्र- जीवितमरणलाभालाभादिसमताभावनारूपवीतरागपरमसामायिकं कृत्वा योसौ जीवानां शुद्धसंग्रहनयेनैकत्वं मन्यते सो अप्पा जाणेइ स वीतरागसहजानंदैकस्खभावं शत्रुमित्रादि- विकल्पकल्लोलमालारहितमात्मानं जानातीति भावार्थः ।। २३१ ।। अथ योसौ सर्वजीवान् समानान्न मन्यते तस्य समभावो नास्तीत्यावेदयति;- जो ण वि मण्णइ जीव जिय, सयलवि एकसहाव । तासु ण थक्कइ भाउ समु, भवसायरि जो णाव ॥ २३२ ॥ यो नैव मन्यते जीवान् जीव सकलानपि एकखभावान् । तस्य न तिष्ठति भावः समः भवसागरे यः नौः ।। २३२ ॥ जो णवि इत्यादि । जो णवि मण्णइ यो नैव मन्यते । कान् । जीव जीवान् जिय हे जीव कतिसंख्योपेतान् । सयलवि समस्तानपि । कथंभूतान्न मन्यते । एकसहाय वीतराग- निर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा सकलविमलकेवलज्ञानादिगुणैनिश्चयेनैकस्वभावान् तासु ण थक्का भाउ समु तस्य न तिष्ठति समभावः । कथंभूतः। भवसायरि जो णाव संसारसमुद्रे यो है - अपना है और [ परः] दूसरा है । ऐसा व्यवहारसे जानकर [यः] जो ज्ञानी [एकत्वं कृत्वा] निश्चयसे एकपना करके अर्थात् सबमें समदृष्टि रखकर [मनुते ] समान मानता है [सः] वही [आत्मानं] आत्माके खरूपको [जानाति ] जानता भावार्थ-इन संसारी जीवोमें शत्रु आदि अनेक भेद दीखते हैं परंतु जो ज्ञानी सबको एक दृष्टिसे देखता है समान जानता है । शत्रु मित्र जीवित मरण लाभ अलाभ आदि सबोंमें समभावरूप जो वीतराग परमसामायिक चारित्र उसके प्रभावसे जो जीवोंको शुद्ध संग्रह नयकर एक जानता है सबको समान मानता है वही अपने निज स्वरूपको जानता है । जो निजखरूप, वीतराग सहजानंद एक स्वभाव तथा शत्रु मित्र आदि विकल्प जालसे रहित है। ऐसे निजखरूपको समता भावके विना नही जान सकता ॥२३१॥ आगे जो सब जीवों को समान नहीं मानता उसके समभाव नहीं होसकते ऐसा कहते है;-[ जीव ] हे जीव [य] जो [ सकलानपि ] सभी [जीवान् ] जीवोंको [एकस्वभावान् ] एक खभाववाले [ नैव मन्यते ] नही जानता [ तस्य ] उस अज्ञानीके [समः भावः ] समभाव [ न तिष्ठति ] नही रहता [यः] जो समभाव [भवसागरे] ससार समुद्रके तैरनेको [ नौः] नावके समान है। भावार्थ-जो अज्ञानी सब जीवोंको समान नहीं मानता अर्थात् वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें स्थित होकर सबको समान दृष्टिसे नहीं देखता । सकल ज्ञायक परमनिर्मलकेवल ज्ञानादि गुणोंकर निश्चयनयसे. सब जीव परमात्मप्रकाशः। २४९ नावस्तरणोपायभूता नौरिति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा · रागद्वेषमोहान् मुक्वा च परमो- पशमभावरूपे शुद्धात्मनि स्थातव्यमित्यभिप्रायः ॥ २३२ ॥ अथ जीवानां योसौ भेदः स कर्मकृत इति प्रकाशयति, जीवहं भेउ जि कम्मकिउ, कम्मुवि जीउ ण होइ । जेण विभिण्णउ होइ तहं, कालु लहेविणु कोह ॥ २३३ ॥ जीवानां भेद एव कर्मकृतः कर्मैव जीवो न भवति । येन विभिन्नः भवति तेभ्यः कालं लब्ध्वा कमपि ॥ २३३ ॥ जीवई इत्यादि । जीवह जीवानां भेउ जि भेद एव कम्मकिउ निर्मेदशुद्धामविल- क्षणेन कर्मणा कृतः कम्मुवि जीउ ण होइ ज्ञानावरणादि कर्मैव विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावं जीवस्वरूपं न भवति । कस्मान भवतीति चेत् । जेण विभिण्णउ होइ तहं येन कारणेन विमिन्नो भवति तेभ्यः कर्मभ्यः । किंकृत्वा । कालु लहेविणु कोइ वीतरागपरमालानुभू- तिसहकारिकारणभूतं कमपि कालं लब्ध्वेति । अयमत्र भावार्थः । दंकोत्कीर्णज्ञायकैकशु- द्धजीवस्वभावाद्विलक्षणं मनोज्ञामनोज्ञस्त्रीपुरुषादिजीवभेदं दृष्ट्वा रागाद्यपध्यानं न कर्त- व्यमिति ।। २३३ ॥ एकसे है ऐसी जिसके श्रद्धा नही है उसके समभाव नहीं उत्पन्न होसकता। ऐसा निस्सदेह जानो । कैसा है समभाव, जो ससार समुद्रसे तारनेके लिये जहाज समान है। यहां ऐसा व्याख्यान जानकर राग द्वेष मोहको तजकर परमशांत भावरूप शुद्धा. त्मामें लीन होना योग्य है ।। २३२ ॥ आगे जीवों में जो भेद है वह सब कर्मजनित है ऐसा प्रगट करते हैं;-जीवानां] जीवोंमें [भेदः] नर नारकादि भेद [कर्मकृत एव] कर्मोंसे ही किया गया है और [कर्म एव ] कर्म ही [ जीवः ] जीव [न भवति ] नहीं होसकता । [येन] क्योंकि वह जीव [कमपि] किसी [कालं] समयको [लब्ध्वा] पाकर [तेभ्यः ] उन कर्मोसे [विभिन्नः ] जुदा [भवति ] होजाता है । भावार्थ-कर्म शुद्धात्मासे जुदे है, शुद्धात्मा भेदकल्पनासे रहित है। ये शुभाशुभकर्म जीवका स्वरूप नहीं हैं जीवका खरूप तो निर्मल ज्ञान दर्शन खभाव है । अनादिकालसे यह जीव अपने खरूपको भूल रहा है, इसलिये रागादि अशुद्धोपयोगसे कर्मको बांधता है । सो कर्मका बंध अनादि- कालका है। इस कर्मबंधसे कोई एक जीव वीतराग परमात्माकी अनुभूतिके सहकारी कारणरूप जो सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका समय उसको पाकर उन कर्मोंसे जुदा हो जाता है। कर्मोंसे छूटनेका यही उपाय है जो जीवके भवस्थिति समीप ( थोड़ी) रही हो,जभी सम्यत्त्व उत्पन्न होता है और सम्यक्त्व उत्पन्न होजावे तभी कर्मकलंकसे छूट सकता है। ३२ २५० रायचंदजैनशास्त्रमालायाम् । अतः कारणात् शुद्धसंग्रहेण भेदं मा कार्पोरिति निरूपयति- • एक्कु करे मण विण्णि करि, मं करि वण्णविसेसु । इकई देवइं जिं वसइ, तिहुयणु एह असेसु ॥ २३४ ।। एकं कुरु मा द्वौ कार्षीः मा कापीः वर्णविशेष । एकेन देवेन येन वसति त्रिभुवनं एतत् अशेपं ॥ २३ ॥ एकु करे इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । एक्कु करे सेनावनादिवजीव- जायपेक्षया सर्वमेकं कुरु मण विणि करि मा द्वौ कापीः मं करि वण्णविसेसु मनुष्य- जात्यपेक्षया ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रादिवर्णभेदं मा कापीः, यतः कारणात् इकई देवई एकेन देवेन अभेदनयापेक्षया शुद्धैकजीवद्रव्येण में येन कारणेन वसइ वमति । किं कर्तृ । तिहुयणु त्रिभुवनं त्रिभुवनस्थो जीवराशिः एह एषः प्रत्यक्षीभूतः । कति संख्योपेतः । असेसु अशेषं समस्त इति । तथाहि । लोकस्तावदयं सूक्ष्मजीवैर्निरंतरं भृतस्तिष्ठति । बारैश्वाधारवशेन कचिदेव सैः कचिदपि । तथा ते जीवाः शुद्धपारिणामिकपरमभाव- प्राहकेण शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन शक्त्यपेक्षया केवलज्ञानादिगुणरूपास्तेन कारणेन स एव जीवराशिः यद्यपि व्यवहारेण कर्मकृतस्तिष्ठति तथापि निश्वयनयेन शक्तिरूपेण परमब्रह्म- स्वरूपमिति भण्यते, परमविष्णुरिति भण्यते परम शिव इति च । तेनैव कारणेन स एव जीवराशिः केचन परमब्रह्ममयं जगद्वदंति, केचन परमविष्णुमयं वदंति, केचन पुनः तात्पर्य यह है कि जो टंकोत्कीर्ण ज्ञायक एक शुद्धखभाव उससे विलक्षण जो स्त्री पुरुषादि शरीरके भेद उनको देखकर रागादि खोटे ध्यान नहीं करने चाहिये ।। २३३ ॥ आगे ऐसा कहते हैं कि जो तू शुद्धसंग्रहनयकर जीवोंमें भेद मत कर;-[एकं कुरु] हे आत्मन् तू जातिकी अपेक्षा सब जीवोंको एक जान [मा द्वौ कापी] इसलिये राग और द्वेष, मत कर [वर्णविशेष ] मनुष्यजातिकी अपेक्षा ब्राह्मणादि वर्णभेदको भी [मा कार्षीः ] मत कर [येन] क्योंकि [एकेन देवेन] अभेदनयसे शुद्ध आत्माके समान [एतत् अशेष ] ये सब [त्रिभुवनं ] तीनलोकमें रहनेवाली जीवराशि [वसति] ठहरी हुई है अर्थात् जीवपनेसे सब एक हैं । भावार्थ-सबजीवोंकी एक जाति है। जैसे सेना और वन एक वैसे जातिकी अपेक्षा सब जीव एक हैं। नर नारकादि भेद और ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्रादि वर्ण भेद सब कर्मजनित हैं अभेद नयसे सब जीवोंको एक जानो । अनंत जीवोंकर ये लोक भरा हुआ है। उस जीवराशिमें भेद ऐसे है-जो पृथ्वी- कायसूक्ष्म जलकायसूक्ष्म अग्निकायसूक्ष्म वायुकायसूक्ष्म नित्यनिगोदसूक्ष्म इतर निगोदसूक्ष्म- ये छह तरहके सूक्ष्मजीवोंकर तो यह लोक निरंतर भरा हुआ है, सब जगह इस लोकमें सूक्ष्म जीव हैं। और पृथ्वीकायवादर जलकायवादर अग्निकायवादर वायुकायवादर नित्य- परमात्मप्रकाशः। २५१ परमशिवमयमिति च । अत्राह शिष्यः । यद्येवंभूतं जगत्संमतं भवतां तर्हि परेषां किमिति दूपणं दीयते भवद्भिः । परिहारमाह । यदि पूर्वोक्तनयविभागेन केवलज्ञानादिगुणापेक्षया वीतरागसर्वज्ञप्रणीतमार्गेण मन्यते तदा तेपां दूषणं नास्ति, यदि पुनरेकः पुरुषविशेषो व्यापी जगत्कर्ता ब्रह्मादि नामास्तीति मन्यते तदा तेषां दूषणं । कस्माद् दूषणमिति चेत् । प्रत्यक्षादिप्रमाणबाधितत्वात् साधकप्रमाणप्रमेयचिंता तर्के विचारिता तिष्ठत्यत्र तु नोच्यते, अध्यात्मशास्त्रत्वादित्यभिप्रायः ॥ २३४ ॥ इति षोडशवर्णिकासुवर्णदृष्टांतेन केवलज्ञानादि- लक्षणेन सर्वे जीवाः समाना भवंतीति व्याख्यानमुख्यतया त्रयोदशसूत्रैरंतरस्थलं गतं । एवं मोक्षमोक्षफलमोक्षमार्गादिप्रतिपादकद्वितीयमहाधिकारमध्ये चतुर्भिरंतरस्थलैः शुद्धोप- योगवीतरागस्वसंवेदनज्ञानपरिग्रहत्यागसर्वजीवसमानताप्रतिपादनमुख्यत्वेनैकचत्वारिंशत्सूत्र- महास्थलं समाप्त । निगोदवादर इतरनिगोदवादर और प्रत्येक वनस्पति-ये जहां आधार है वहां है। सो कहीं पाये जाते है कही नही पाये जाते परंतु येभी बहुत जगह है । इस प्रकार स्थावर तो तीनोलोकमें पाये जाते है और दो इंद्री तेइंद्री चौ इद्री पंचेंद्री तिर्यंच ये मध्यलोकमें ही पाये जाते है अधोलोक, ऊर्ध्वलोकमें नहीं । उनमेंसे दो इंद्री तेइंद्री चौ इंद्री जीव कर्म भूमिमें ही पाये जाते है भोगभूमिमें नहीं । भोगभूमिमें गर्भज पंचेद्री सेंनी थलचर या नभचर ये दोनों जाति तिर्यच है । तथा मनुष्य मध्यलोकमें ढाई द्वीपमें पाये जाते है अन्य जगह नही, देवलोकमें स्वर्गवासी देव देवी पाये जाते है अन्य पंचेंद्री नही, पाताललोकमें अपरके भागमे भवनवासी देव तथा व्यंतरदेव और नीचे भागमें सात नरकोंके नारकी पंचेंद्री है अन्य कोई नही और मध्यलोकमें भवनवासी व्यंतरदेव तथा ज्योतिषीदेव ये तीन जातिके देव और सब जातिके तिर्यंच पाये जाते हैं । इस प्रकार त्रस जीव किसी जगह है किसी जगह नही है । इसतरह यह लोक जीवोंसे भरा हुआ है । सूक्ष्मस्थावरके विना तो लोकका कोई भाग खाली नही है सब जगह सूक्ष्म स्थावर भरे हुए है । ये सभी जीव शुद्ध परिणामिक परमभाव ग्राहक शुद्ध द्रव्यार्थिक नयकर शक्तिकी अपेक्षा केवलज्ञानादिगुणरूप है । इसलिये यद्यपि यह जीवराशि व्यवहारनयकर कर्माधीन है तौभी निश्चयनयकर शक्तिरूप परब्रह्मस्वरूप है । इन जीवोंको ही परमविष्णु कहना, परम शिव कहना चाहिये । यही अभिप्राय लेकर कोई एक ब्रह्ममई जगत् कहते हैं, कोई एक विष्णुमई कहते हैं, कोई एक शिवमई कहते हैं। यहां पर शिष्यने प्रश्न किया कि तुम भी जीवोंको परब्रह्म मानते हो तथा परम विष्णु परम शिव मानते हो तो अन्यमतवालोंको क्यों दूषण देते हो। उसका समाधान । हम तो पूर्वोक्त नयविभागकर केवलज्ञानादि गुणकी अपेक्षा वीतरागसर्वज्ञप्रणीत मार्गसे जीवोंको ऐसा मानते हैं तो - २५२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अत ऊर्ध्व पर जाणंतु वि” इत्यादि सप्ताधिकशतसूत्रपर्यंत स्थलसंख्यावहिर्भूतान् प्रक्षेप- कान् विहाय चूलिकाव्याख्यानं करोति इति;- परु जाणंतु वि परमणि, परसंसग्गु चयंति । परसंसग्गई परमप्पयहं, लक्खहं जेण चलंति ॥ २३५ ।। परं जानंतोपि परममुनयः परसंसर्ग त्यति । परसंसर्गेण परमात्मनः लक्ष्यस्य येन चलंति ॥ २३५ ॥ पर जाणंतुवि इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । पर जाणंतुवि परदन्यं जानतोपि । के ते । परममुणि वीतरागस्वसंवेदनजानरताः परममुनयः । किं कुर्वति । पर- संसग्गु चयंति परसंसर्ग त्यजति निश्चयेनाभ्यंतरे रागादिभावकर्म-ज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मश- रीरादि-नोकर्म च बहिर्विषये मिथ्यात्वरागादिपरिणतासंवृतजनोपि परद्रव्यं भण्यते । तत्संसर्ग परिहरंति । यतः कारणात् परसंसग्गई पूर्वोक्तवाह्याभ्यंतरपरद्रव्यसंसर्गेण परमप्पयह वीतरा- गनित्यानंदैकखभावपरमसमरसीभावपरिणतपरमालतत्त्वस्य । कथंभूतस्य । लक्खहं लक्ष्यस्य । । दूषण नहीं है । सो इस तरह वे नहीं मानते हैं। वे एक कोई पुरुष जगतका कर्ता हर्ता मानते हैं । इसलिये उनको दूषण दिया जाता है, क्योंकि जो कोई एक शुद्धबुद्ध नित्य मुक्त है उस शुद्ध बुद्धको कर्ता हर्तापना नही संभवता । इच्छा विना कर्ता हर्तापना हो ही नहीं सकता और इच्छा है वह मोहकी प्रकृति है । भगवान मोहसे रहित है इसलिये कर्ता हर्ता नही हो सकता । कर्ता हर्ता मानना प्रत्यक्ष विरोध है । हम तो जीवराशिको परम ब्रह्म मानते हैं उसी जीवराशिसे लोक भरा हुआ है । वे अन्यमती ऐसा मानते हैं कि एक ही ब्रह्म अनंतरूप होरहा है । जो वही एक सवरूप हो रहा होवे तो नरक निगोद स्थानको कोंन भोगे । इसलिये जीव अनंत हैं। इन जीवोंको ही परमब्रह्म परम शिव कहते हैं ऐसा तू निश्चयसे जान ॥ २३४ ॥ इस प्रकार सोलह वानीके सोनेके दृष्टांतद्वारा केवल ज्ञानादिलक्षणसे सब जीव समान हैं इस व्याख्यानकी मुख्यताकर तेरह दोहासूत्र कहे । इसतरह मोक्षमार्ग मोक्षफल और मोक्ष इन तीनोंका कहनेवाले दूसरे महाधिकारमें चार अंतरस्थलोंकर इकतालीस दोहाओंसे महास्थल समाप्त हुआ। इनमें शुद्धोपयोग वीतराग वसवेदन ज्ञान, परिग्रह त्याग और सब जीव समान ये कथन किया। आगे ‘पर जाणंतुवि' इत्यादि एकसौ सात दोहा पर्यंत तीसरा महाधिकार कहते हैं उसीमें प्रथको समाप्त, करते हैं;-[परममुनयः ] परममुनि [परं जानंतोपि] उत्कृष्ट आत्मद्रव्यको जानते हुए भी [परसंसर्ग] परद्रव्य जो द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्म उसके संबंधको, [ त्यति] छोड़ देते है । [येन] क्योंकि [ परसंसर्गेण] परद्रव्यके संबंधसे परमात्मप्रकाशः। २५३ ध्येयभूतस्य धनुर्विद्याभ्यासप्रस्तावे लक्ष्यरूपस्यैव जेण चलंति येन कारणेन चलंति त्रिगुप्ति- समाधेः सकाशात् च्युता भवंतीति । अत्र परमध्यानविघातकत्वान्मिथ्यात्वरागादिपरिणा- मस्तत्परिणतः पुरुपरूपो वा परसंसर्गस्त्यजनीय इति भावार्थः ॥ २३५ ।। अथ तमेव परद्रव्यसंसर्गत्यागं कथयति;- जो समभावहं बाहिरउ, ति सहु मं करि संगु । चिंतासायरि पडहिं पर, अण्णुवि डज्झइ अंगु ॥ २३६ ॥ यः समभावात् वायः तेन सह मा कुरु संगं । चिंतासागरे पतसि परं अन्यदपि दह्यते अंगः ॥ २३६ ॥ जो इत्यादि । जो यः कोपि समभावहं वाहिरउ जीवितमरणलामालाभादिसमभावानु- फूलविशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावपरमात्मद्रव्यसम्यश्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपसमभावबाह्यः तिं सहु मं करि संगु तेन सह संसर्ग मा कुरु हे आत्मन् । यतः किं । चिंतासायरि पडहिं रागद्वेपादिकल्लोलरूपे चिंतासमुद्रे पतसि परं नियमेन अण्णुवि अन्यदपि दूषणं भवति । कि । उज्झइ दह्यते न्याकुलं भवति । किं दह्यते । अंगु शरीरं इति । अयमत्र भावार्थः । वीतरागनिर्विकल्पसमाधिभावनाप्रतिपक्षभूतरागादिस्वकीयपरिणाम एव निश्चयेन पर [लक्ष्यस्य ] ध्यानकरने योग्य जो [ परमात्मनः] परमपद उससे [चलंति] चलायमान हो जाते है । भावार्थ-शुद्धोपयोगी मुनि वीतराग खसवेदन ज्ञानमे लीन हुए परद्रव्योंके साथ सबंध छोड़ देते है । अंदरके विकार रागादि भावकर्म और वाहरके शरीरादि ये सब परद्रव्य कहे जाते है । वे मुनिराज एक आत्मभावके सिवाय सब परद्रव्यका ससर्ग (सवंध) छोड़ देते है। तथा रागी द्वेपी मिथ्यात्वी असजमी जीवोंका संबंध छोड़ देते है। इनके ससर्गसे परमपद जो वीतरागनित्यानंद अमूर्तखभाव परमसमरसीमावरूप जो परमा- मतत्त्व ध्यावने योग्य है उससे चलायमान होजाते हैं अर्थात् तीन गुप्तिरूप परमसमाधिसे रहित हो जाते है । यहांपर परमध्यानके घातक जो मिथ्यात्वरागादि अशुद्धपरिणाम तथा रागी द्वेषी पुरुष इनका संसर्ग सर्वथा त्यागना यह साराश है ।। २३५ ॥ आगे उन्ही परद्रव्योंके सबंधको फिर छुड़ानेका कथन करते हैं-[य] जो कोई [समभावात् ] समभाव अर्थात् निजभावसे [ वाह्यः ] बाह्य पदार्थ हैं [ तेन सह ] उनके साथ [संग] सग [मा कुरु ] मत करै । क्योंकि उनके साथ संग करनेसे [चिंतासागरे। चिंतारूपी समुद्रमें पतसि] पड़ेगा [परं] केवल [अन्यदपि ] और भी [अंगः ] शरीर [दह्यते ] दाहको प्राप्त होगा अर्थात् अंदरसे जलता रहेगा । भावार्थ-जो कोई जीवित मरण लाम अलाभादिमें तुल्यभाव उसके संमुख जो निर्मलज्ञान दर्शन खभाव परमात्म द्रव्य उसका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप निजभाव उसरूप समभावसे जो जुदे पदार्थ हैं । २५४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । इत्युच्यते । व्यवहारेण तु मिथ्यात्वरागादिपरिणतपुरुपः सोपि कथंचित, नियमो' नास्तीति ॥ २३६॥ अथ तदेव परसंसर्गदूषणं दृष्टांतेन समर्थयति; भल्लाहं वि णासंति गुण, जहं संसग्गु खलेहिं । पइसाणरु लोहहं मिलिउ, ते पिटियइ घणेहिं ॥ २३७ ॥ भद्राणामपि नश्यति गुणाः येषां संसर्गः खलैः । वैश्वानरो लोहेन मिलितः तेन पिट्यते धनैः ॥ २३७ ।। भल्लाहि वि' इत्यादि । भल्लाहवि भद्राणामपि स्वस्वभावसहितानामपि णासंति ,गुण नश्यंति परमालोपलब्धिलक्षणगुणाः । येषां किं । जहं संसग्गु येषां संसर्गः । कैः सह । खलेहिं परमात्मपदार्थप्रतिपक्षभूतैर्निश्चयनयेन स्वकीयबुद्धिदोपरूपैः रागद्वेषादिपरिणामैः खलैर्दुष्टैर्व्यवहारेण तु मिथ्यात्वरागादिपरिणतपुरुपैः । अस्मिन्नर्थे दृष्टांतमाह । वहसाणरु लोहहं मिलिउ वैश्वानरो लोहमिलितः तें तेन कारणेन पिट्टियइ घणेहि पिट्टनक्रियां लभते । कैः । घनैरिति । अत्रानाकुलत्वसौख्यविघातको येन दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षारूप- उनका संग छोड़ दे । क्योंकि उनके संगसे चिंतारूपी समुद्र में गिरपड़ेगा । जो समुद्र राग द्वेषकल्लोलोंसे व्याकुल है। उनके संगसे मनमें चिंता उत्पन्न होगी और शरीरमें दाह होगा। यहां तात्पर्य यह है कि वीतरागनिर्विकल्पपरमसमाधिकी भावनासे विपरीत जो रागादि अशुद्ध परिणाम वे ही परद्रव्य कहे जाते हैं । और व्यवहारनयकर मिथ्यात्वी रागी द्वेषी पुरुष पर कहे गये हैं। इन सबकी संगति सर्वदा दुःख देनेवाली है किसी प्रकार सुखदाई नही है ऐसा निश्चय है ॥ २३६ ।। आगे परद्रव्यका प्रसंग महान दुःखरूप है यह कथन दृष्टांतसे दृढ करते हैं;-खलैः सह] दुष्टोंके साथ [येषां] जिनका [ संसर्गः] संबंध है बह [ भद्राणां अपि] उन विवेकी जीवोंके भी [गुणान् ] सत्यशीलादि गुणोंको [नाशयति ] नाश कर देता है (1) जैसे [ वैश्वानरः] आग [ लोहेन] लोहेसे [मिलितः] मिलजाती है [तेन] तभी [घनैः] धनोंसे [पिठ्यते ] कूटी जाती है। भावार्थ-विवेकी जीवोंके शीलादि गुण मिथ्यादृष्टी रागी द्वेषी अविवेकी जीवोंकी संगतिसे नाश हो जाते हैं । अथवा आत्माके निजगुण मिथ्यात्व रागादि अशुद्ध भावोंके संबंधसे मलिन हो जाते हैं। जैसे अग्मि लोहेके संगसे कूटी जाती है । यद्यपि आगको घन कूट नही सकता परंतु लोहेकी संगतिसे अमि- भी कूटनेमें आती है, उसीतरह दोषोंके संगसे गुण भी मलिन हो जाते हैं । यह कथन जानकर आकुलतारहित सुखके घातक जो देखे सुने अनुभव किये भोगोंकी वाछारूप

परमात्मप्रकाशः।
२५५
निदानबंधाद्यपध्यानपरिणाम एव परसंसर्गस्त्याज्यः । व्यवहारेण तु परपरिणतपुरुष
इत्यभिप्रायः ॥ २३७ ॥
अथ मोहपरित्यागं दर्शयति;-
जोइय मोहु परिचयहि, मोहु ण भल्लउ होइ ।
मोहासत्तउ सयलु जगु, दुक्खु सहतउ जोइ ।। २३८ ॥
योगिन् मोहं परित्यज मोहो न भद्रो भवति ।
मोहासक्तः सकलं जगत् दुःखं सहमानं पश्य ॥ २३८ ॥
जोइय इत्यादि । जोइय हे योगिन् मोहु परिच्चयहि निर्मोहपरमात्मस्वरूपभावनाप्रति-
पक्षभूतं मोहं त्यज । कस्मात् । मोहु ण भल्लउ होइ मोहो भद्रः समीचीनो न भवति ।
तदपि फस्मात् । मोहासत्तउ सयलु जगु मोहासक्तं समस्तं जगत् निर्मोहशुद्धात्मभावना-
रहितं दुक्खु सहंतुउ जोइ अव्याकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसुखविलक्षणमाकुलत्वोत्पादक
दुःसं महमानं पश्येति । अन्नास्तां तावदहिरंगपुत्रकलनादौ पूर्व परित्यक्तेन पुनर्वासनावसेन
स्मरणरूपो मोहो न कर्तव्यः । शुद्धात्मभावनास्वरूपं तपश्चरणं तत्साधकभूतशरीरं तस्यापि
स्थित्यर्थमशनपानादिकं यद्गृह्यमाणं तत्रापि मोहो न कर्तव्यः इति भावार्थः ।। २३८ ॥
अथ स्थलसंख्यावहिर्भूतमाहारमोहविषयनिराकरणसमर्थनार्थ प्रक्षेपकत्रयमाह तद्यथा-
काऊण णग्गरूप, वीभस्सं दड्डमडयसारिच्छं।
अहिलससि किं ण लज्जसि, भिक्खाए भोयणं मिट्ट ।। २३९ ॥ (क्षे०)
निदान बंध आदि खोटे परिणामरूपी दुष्टोंकी सगति नहीं करना अथवा अनेक दोषोंकर
सहित रागी द्वेषी जीवोंकी भी संगति कभी नही करना, यह तात्पर्य है ॥ २३७ ॥
आगे मोहका त्याग करना दिखलाते हैं;-[योगिन् ] हे योगी तू [ मोहं] मोहको
[परित्यज ] विलकुल छोड़ दे क्योंकि [ मोहः ] मोह [ भद्रः न भवति ] अच्छा नहीं
होता है [ मोहासक्तः ] मोहसे आसक्त [सकलं जगत् ] सब जगतजीवोंको [ दुखं
सहमानं ] केश भोगते हुए [ पश्य ] देख । भावार्थ-जो आकुलता रहित है वह
दुःखका मूल मोह है । मोही जीवोंको दुःख सहित देखो । वह मोह परमात्मखरूपकी
भावनाका प्रतिपक्षी दर्शनमोह चारित्रमोहरूप है। इसलिये तू उसको छोड़ । पुत्र स्त्री
आदिकमें तो मोहकी वात दूर रहे यह तो प्रत्यक्षमें त्यागने योग्य ही है। और विषय-
वासनाके वश देह आदिक पर वस्तुओंका रागरूप मोहजाल है वह भी सर्वथा त्यागना
चाहिये । अंतर बाह्य मोहका त्यागकर सम्यक् खभाव अंगीकार करना । शुद्धात्माकी
भावनारूप जो तपश्चरण उसका साधक जो शरीर उसकी स्थितिकेलिये अन्न जलादिक
लिये जाते हैं तौभी विशेष राग न करना, रागरहित नीरस आहार लेना चाहिये ॥२३८॥

२५६ रायचंदजैनशास्त्रमालायाम् । कृत्वा नग्नरूपं वीभत्सं दग्धमृतकसदृशं । अमिलषसि किं न लजसे भिक्षायां भोजनं मिष्टं ॥ २३९॥' काऊण इत्यादि । काऊण कृत्वा । किं । णग्गरूवं नग्नरूपं निर्ग्रथं जिनरूपं । कथंभूतं । वीभत्थं भयानकं । पुनरपि कथंभूतं । दड्डमडयसारित्थं दुग्धमृतकसदृशं । एवंविधं रूपं धृत्वा हे तपोधन अहिलससि अमिलापं करोषि किं न लजसे लज्जां किं न करोपि किं कुर्वाणः सन् । भिक्खाए भोयणं मिहं भिक्षायां भोजनं मृष्टं इति मन्यमानः सन्निति । श्रावकेण तावदाहाराभयभैषज्यशास्त्रदानं तात्पर्येण दातव्यं । आहारदानं येन दत्तं तेन शुद्धालानुभूतिसाधकं बाह्याभ्यंतरभेदभिन्नं द्वादशविधं तपश्चरणं दत्तं भवति । शुद्धामभावनालक्षणसंयमसाधकस्य देहस्यापि स्थितिः कृता भवति । शुद्धात्मोपलंभ- प्राप्तिरूपा भवांतरगतिरपि दत्ता भवति । यद्यप्येवमादिगुणविशिष्टं चतुर्विधदानं श्रावकाः प्रयच्छंति तथापि निश्चयव्यवहाररत्नत्रयाराधकतपोधनेन बहिरंगसाधनीभूतमाहारादिकं किमपि गृहतापि स्वस्वभावप्रतिपक्षभूतो मोहो न कर्तव्यः इति तात्पर्यम् ॥ २३९ ।। आगे स्थलसंख्याके सिवाय जो प्रक्षेपक दोहे हैं उनके द्वारा आहारका मोह निवारण करते हैं;-वीभत्सं] भयानक देहके मैलसे युक्त [दग्धमृतकसदृशं] जले हुए मुरदेके समान रूप रहित ऐसे [ नग्नरूपं ] वस्त्ररहित नग्नरूपको [कृत्वा] धारण करके हे साधु तू [भिक्षायां] परके घर भिक्षाको भ्रमता हुआ उस भिक्षामें [मिष्टं] खादयुक्त [ भोजनं ] आहारकी [ अभिलपसि] इच्छा करता है तो तू [किं न लजसे] क्यों नहीं शरमाता यह बड़ा आश्चर्य है । भावार्थ-पराये घर मिक्षाको जाते मिष्ट आहा- रकी इच्छा धारण करता है सो तुझे लाज नहीं आती। इसलिये आहारका राग छोड़ अल्प और नीरस आहार उत्तम कुली श्रावकके घर साधूको लेना योग्य है । मुनिको राग- भाव रहित आहार लेना चाहिये । स्वादिष्ट सुंदर आहारका राग नहीं करना योग्य है। और श्रावकको भी यही उचित है कि भक्ति भावसे मुनिको निर्दोष आहार देवै जिसमें शुभका दोष न लगे । और आहारके समय ही आहारमें मिली हुई निर्दोष औषधि दे, शास्त्रदान करे, मुनियोंका भय दूर करे उपसर्ग निवारण करे। यही गृहस्थको योग्य है। जिस गृहस्थने यतीको आहार दिया उसने तपश्चरण दिया, क्योंकि संयमका साधन शरीर है और शरीरकी स्थिति अन्न जलसे है। आहारके ग्रहण करनेसे तपस्याकी वढवारी होती है । इसलिये आहारका दान तपका दान है। यह तप-संयम शुद्धात्माकी भावनारूप है और ये अंतर वाह्य वारहप्रकारका तप शुद्धात्माकी अनुभूतिका साधक है। तपसंयमका साधन दिगंवरका गरीर है। इसलिये आहारके देनेवालेने यतीके देहकी रक्षा की और आहारके देनेवालेने शुद्धात्माकी प्राप्तिरूप मोक्ष दी । क्योंकि मोक्षका परमात्मप्रकाशः। ૨૭ अथ:- जइ इच्छसि भो साहू, बारहविहतवहलं महाविउलं। तो मणवयणे काए, भोयणगिद्धी विवजेसु ॥ २४० ॥ (क्षे०) यदि इच्छसि भो साधो द्वादशविधतपःफलं महद्विपुलं । ततः मनोवचनयोः काये भोजनगृद्धिं विवर्जयख ॥ २४० ॥ जइ इच्छसि यदि इच्छसि भो साधो द्वादशविधतपाफलं । कथंभूतं । महद्विपुलं स्वर्गापवर्गरूपं ततः कारणात् वीतरागनिजानंदैकसुखरसास्वादानुभवेन तृप्तो भूत्वा मनोव- चनकायेपु भोजनगृद्धिं वर्जय इति तात्पर्य ।। २४० ॥ उक्तं च- जे सरसिं संतुट्ठमण, विरसि कसाउ वहति । ते मुणि भोयण घार गणि, णवि परमत्थु मुणंति ॥ २४१॥ (क्षे०) ये सरसेन सतुष्टमनसः विरसे कषायं वहति । ते मुनयः भोजने गृद्धा गणय नैव परमार्थ मन्यते ॥ २४१ ॥ जे इत्यादि । जे सरसिं संतुहमण ये केचन सरसेन सरसाहारेण संतुष्टमनसः विरसि कसाउ वहति विरसे विरसाहारे सति कपायं वहंति कुर्वति ते ते पूर्वोक्ताः मुणि मुनयस्त- पोधनाः भोयण घार गणि भोजनविपये गृद्धसदृशान् गणय मन्यख जानीहि । इत्थंभूताः साधन मुनिव्रत है और मुनिव्रतका साधन शरीर है तथा शरीरका साधन आहार है। इस प्रकार अनेक गुणोंको उत्पन्न करनेवाला आहारादि चार प्रकारका दान उसको श्रावक भक्तिसे देता है तौभी निश्चय व्यवहार रत्नत्रयके आराधक योगीश्वर महातपोधन आहारको ग्रहण करते हुए भी राग नही करते है । राग द्वेष मोहादि परिणाम निजभा- वके शत्रु है यह सारांश हुआ ॥ २३९ ॥ आगे फिर भी भोजनकी लालसाको त्याग कराते हैं;-[भो साधो] हे योगी [ यदि ] जो तू [द्वादशविधतपःफलं ] बारहप्रकार तपका फल [ महद्विपुलं ] बड़ा भारी खर्ग मोक्ष [इच्छसि ] चाहता है [ ततः ] तो वीतराग निजानंद एक सुखरसका आखाद उसके अनुभवसे तृप्त हुआ [ मनोवचनयोः ] मन वचन और [ काये] कायसे [भोजनगृद्धि] भोजनकी लोलुपताको [विवर्जयख ] त्याग दे । यह सारांश है ॥२४० और भी कहा है। [ये] जो योगी [ सरसेन ] स्वादिष्ट आहारसे [ संतुष्टमनसः] हर्षित होते हैं और [विरसे ] नीरस आहारमें [कषायं] क्रोधादिकषाय [वहंति) करते हैं [ ते मुनयः] वे मुनि [ भोजने गृद्धाः] भोजनके विषयमें गृद्धपक्षीके समान है , २५८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । संतः णवि परमत्थु मुणंति नैव परमार्थ मन्यते जानंतीति । अयमत्र भावार्थः । गृहस्था- नामाहारदानादिकमेव परमो धर्मस्तेनैव सम्यक्त्वपूर्वेण परंपरया मोक्षं लभते । कस्मात् एव परमो धर्म इति चेत् , निरंतरविपयकपायाधीनतया आतैरौद्रध्यानरतानां निश्चयरत्न- त्रयलक्षणस्य शुद्धोपयोगपरमधर्मस्यावकाशो नास्तीति । शुद्धोपयोगपरमधर्मरतस्तपोधनस्त्वन्न- पानादिविषये मानापमानसमतां कृत्वा यथालाभेन संतोपः कर्तव्य इति ।। २४१ ॥ अथ शुद्धात्मोपलंभाभावे सति पंचेंद्रियविपयासक्तजीवानां विनाशं दर्शयति;- रूवि पयंगा सहि मय, गय फासइ णासंति । अलिउल गंधइ मच्छ रसि, किम अणुराउ करंति ।। २४२ ॥ रूपे पतंगाः शव्दे मृगाः गजाः स्पर्शः नश्यति । अलिकुलानि गंधेन मत्स्याः रसे कि अनुराग कुवैति ।। २४२ ।। रूपे समासक्ताः पतंगाः शब्दे मृगाः गजाः स्पशैंः गंधेनालिकुलानि मत्स्या रमासक्ता ऐसा तू [गणय ] समझ । वे [ परमार्थ ] परमतत्त्वको [नैव मन्यते ] नहीं समझते हैं । भावार्थ-जो कोई वीतरागके मारगसे विमुख हुए योगी रस सहित स्वादिष्ट आहारसे खुश होते हैं, कभी किसीके घर छह रस युक्त आहार पावें तो मनमें हर्प करे आहारके देनेवालेसे प्रसन्न होते हैं । यदि किसीके घर रसरहित भोजन मिले तो कषाय करते हैं उस गृहस्थको कुरा समझते हैं वे तपोधन नहीं हैं भोजनके लोलुपी हैं । गृद्धपक्षी समान है। ऐसे लोलुपी यती देहमें अनुरागी होते है परमात्मपदार्थको नही जानते । गृहस्थोंके तो दानादिकही बड़े धर्म हैं । जो सम्यक्त्वसहित दानादि करे तो परंपरया मोक्ष पावे । क्योंकि श्रावकका दानादिक ही परमधर्म है । वह ऐसे है कि ये गृहस्थलोक हमेशा विषयकषायके आधीन हैं इससे इनके आर्त रौद्र ध्यान उत्पन्न होते रहते हैं इस कारण निश्चय रत्नत्रयरूप शुद्धोपयोग परमधर्मका तो इनके ठिकाना ही नहीं है, अर्थात् गृहस्थोके शुभोपयोगकी ही मुख्यता है । और शुद्धोपयोगी मुनि इनके घर आहार लेवें तो इसके समान अन्य क्या । श्रावकका तो यही बड़ा धरम है जोकि यती अर्जिका श्रावक श्राविका इन सवको विनय पूर्वक आहार दे। और यतीका यही धर्म है जो अन्न जलादिमें राग न करे और मान अपमानमे समताभाव रक्खे । गृहस्थ के घर जो निर्दोष आहारादिक जैसा मिले वैसा लेवै चाहे चावल मिले चाहे अन्य कुछ मिले। जो मिले उसमें हर्ष विषाद न करे। दूध दही घी मिष्टान्न इनमें इच्छा न करे । यही जिनमार्गमें यतीकी रीति है ॥ २४१॥ आगे शुद्धात्माकी प्राप्तिके अभावमें जो विषयी जीव पांच इंद्रियों के विषयोंमें आसक्त हैं उनका अकाज ( विनाश ) होता है ऐसा दिखलाते हैं;-[रूपे] रूपमें लीन हुए

परमात्मप्रकाशः।
२५९
नश्यंति यतः कारणात् ततः कारणात्कथं तेषु विषयेष्वनुरागं कुर्वतीति । तथाहि । पंचेंद्रि-
यविपयाकांक्षाप्रभृतिसमस्तापध्यानविकल्पैः रहितः शून्यः स्पर्शनादींद्रियकषायातीतनिर्दोषि-
परमाससम्यश्रद्धानज्ञानानुचरणरूपनिर्विकल्पसमाधिसंजातवीतरागपरमाह्लादैकलक्षणसुखा-
मृतरसास्वादेन पूर्णकलशवद्भरितावस्थः केवलज्ञानादिव्यक्तिरूपस्य कार्यसमयसारस्योत्पादकः
शुद्धोपयोगस्वभावो योसावेवंभूतः कारणसमयसारः तद्भावनारहिता जीवाः पंचेंद्रियविषया-
मिलापवशीकृता नश्यंतीति ज्ञात्वा कथं तत्रासक्तिं गच्छंति ते विवेकिन इति । अत्र पतं-
गाय एकैकं विपयासक्ता नष्टा, ये तु पंचेंद्रियविषयमोहितास्ते विशेषेण नश्यंतीति
भावार्थः :॥ २४२ ॥
[पतंगाः] पतंग जीव दीपकमें जलकर मर जाते हैं [ शब्दे] शब्दविषयमें लीन
[ मृगाः ] हिरण व्याधाके बाणसे मारे जाते हैं [ गजाः ] हाथी [ स्पशैंः ] स्पर्शविषयके
कारण गड्ढेमें पड़कर बांधे जाते हैं [गंधेन] सुगंधकी लोलुपतासे [ अलिकुलानि ]
भोरे काटोंमें या कमलमें दबकर प्राण छोड़देते हैं और [रसे] रसके लोभी [ मत्स्याः
मच्छ [नश्यंति] धीवरके जालमें पड़कर मारे जाते हैं । एक एक विषय कषायकर
आसक्त हुए जीव नाशको प्राप्त होते हैं तो पंचेंद्रीका कहना ही क्या है। ऐसा जानकर
विवेकी जीव विषयोंमें [किं] क्या [ अनुरागं] प्रीति [ कुर्वति ] करते हैं, कभी नही
करते । भावार्थ-पंचेंद्रीके विषयोंकी इच्छा आदि जो सब खोटे ध्यान वेही हुए
विकल्प उनसे रहित विषय कषाय रहित जो निर्दोषपरमात्मा उसका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान
आचरणरूप जो निर्विकल्प समाधि उससे उत्पन्न वीतराग परम आह्लादरूप सुख अमृत
उसके रसके खादकर पूर्ण कलशकी तरह भरे हुए जो केवलज्ञानादि व्यक्तिरूप कार्य
समयसार उसका उत्पन्न करनेवाला जो शुद्धोपयोगरूप कारणसमयसार उसकी भावनासे
रहित ससारी जीव विषयों के अनुरागी पांच इन्द्रियोंके लोलुपी भव भवमें नाश पाते हैं।
ऐसा जानकर इन विषयोंमें विवेकी कैसे रागको प्राप्त होवें कभी विषयाभिलाषी नहीं
होते । पतंगादिक एक एक विषयमें लीन हुए नष्ट हो जाते हैं लेकिन जो पांच इंद्रियों के
विषयोंमें मोहित हैं वे वीतरागचिदानंदखभाव परमात्मतत्त्व उसको न सेवते हुए न जानते
हुए और न भावते हुए अज्ञानी जीव मिथ्यामार्गको वांछते कुमार्गकी रुचि करते हुए
नारकादि गतिमें घानीमें पिलना करीतसे विदारना और शूलीपर चढना इत्यादि अनेक
दुःखोंको देहादिककी प्रीतिसे भोगते है। ये अज्ञानी जीव वीतरागनिर्विकल्प परमसमाधिसे
परान्मुख हैं जिनके चित्त चंचल है कभी निश्चलचित्तकर निजरूपको नहीं ध्यावते है।
और जो पुरुष स्नेहसे रहित है वीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें लीन है वे ही लीलामात्रमें
ससारको तैर जाते है ॥ २४२ ॥

२६० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथ लोभकषायदोष दर्शयति;- जोइय लोहु परिचयहि, लोहु ण भल्लउ होइ। लोहासत्तउ सयलु जगु, दुक्खु सहंतउ जोइ ॥ २४३ ॥ योगिन् लोभ परित्यज लोभो न भद्रः भवति । लोभासक्तं सकलं जगत् दुःखं सहमानं पश्य ॥ २४३ ।। हे योगिन् लोभं परित्यज । कस्मात् । लोभो भद्रो समीचीनो न भवति । लोभासक्तं समस्तं जगत् दुःखं सहमानं पश्येति । तथाहि-लोभकषायविपरीतात् परमात्मस्वभावा- द्विपरीतं लोभं त्यज हे प्रभाकरभट्ट । यतः कारणात् निर्लोभपरमात्मभावनारहिता जीवा दुःखमुपभुजानास्तिष्ठंतीति तात्पर्य ॥ २४३ ॥ अथासुमेव लोभकषायदोषं दृष्टांतेन समर्थयति;- तलि अहिरणि वरि घणवडणु, संडस्सयलुंचोड । लोहहं लग्गिवि हुयवहहं, पिक्खु पडतउ तोडु ॥ २४४॥ तले अधिकरणे उपरि घनपातनं संडसकलंचनं । लोहं लगित्वा हुतवहं पश्य पिट्टतं त्रोटनं ॥ २४४ ॥ तले अधस्तनभागेऽधिकरणसंज्ञोपकरणं उपरितनभागे घनघातपातनं तथैव संडसकसं- ज्ञेनोपकरणेन लुचनमाकर्षणं । केन । लोहपिंडनिमित्तेन । कस्य । हुतभुजोऽग्ने त्रोटनं खंडनं पश्येति । अयमत्र भावार्थः । यथा लोहपिंडसंसर्गादग्निरज्ञानिलोकपूज्यः प्रसिद्धेः , आगे लोभकषायका दोष कहते हैं;-[ योगिन् ] हे योगी तू [लोभं] लोमको [परित्यज] छोड़ [ लोभः ] ये लोभ [ भद्रो न भवति ] अच्छा नही है क्योंकि [लोभासक्तं ] लोभमें लगे हुए [ सकलं जगत् ] इस संपूर्ण जगतको [ दुःखं सहमानं] दुःख सहते हुए [पश्य ] देख । भावार्थ-लोभकषायसे रहित जो परमात्मखभाव उससे विपरीत जो इस भव परभवका लोभ, धनधान्यादिका लोभ उसे तू छोड । क्योंकि लोभी जीव भवभवमें दुःख भोगते हैं ऐसा तू देख रहा है ॥ २४३ ॥ आगे लोभकषायके दोषको दृष्टांतसे पुष्ट करते हैं;-लोहं लगित्वा ] जैसे लोहेका संबंध पाकर [ हुतवहं] अमि [ तले ] नीचे रक्खे हुए [ अधिकरणे उपरि] अहरनके ऊपर [धनपातनं ] धनकी चोट [संडसकलंचनं ] सिंडासीसे खेचना [ पिट्टतं त्रोटनं] चोट लगने से टूटना इत्यादि दुःखोंको सहती है ऐसा [ पश्य ] देख । भावार्थ- लोहकी संगतिसे लोक प्रसिद्ध देवता अग्नि दुःख भोगती है यदि लोहेका संबंध न करे तो इतने दुःख क्यों भोगे अर्थात् जैसे अमि लोहपिंडके सबंधसे दुःख भोगती है उसी

परमात्मप्रकाशः।
२६१
देवता पिट्टनक्रियां लभते तथा लोभादिकषायपरिणतिकारणभूतेन पंचेद्रियशरीरसंबंधेन
निर्लोभपरमात्मतत्त्वभावनारहितो जीवो घनघातस्थानीयानि नारकादिदुःखानि बहुकालं
सहत इति ॥ २४४॥
अथ स्नेहपरित्यागं कथयति,-
जोइय णेहु परिचयहि, णेहु ण भल्लउ होइ ।
णेहासत्तउ सयलु जगु, दुक्खु सहतउ जोइ ॥ २४५ ॥
योगिन् नेहं परित्यज लेहो न भद्रो भवति ।
लेहासक्तं सकलं जगत् दुःख सहमानं पश्य ।। २४५ ॥
रागादिस्नेहप्रतिपक्षभूते वीतरागपरमासपदार्थध्याने स्थित्वा शुद्धामतत्त्वाद्विपरीतं हे
योगिन् स्नेहं परित्यज । कस्मात् । स्नेहो भद्रः समीचीनो न भवति । तेन स्नेहनासक्तं
सकलं जगन्निस्नेहशुद्धालभावनारहितं विविधशरीरमानसरूपं बहुदुःखं सहमानं पश्येति ।
अन भेदाभेदरत्नत्रयामकमोक्षमार्ग मुक्त्वा तत्प्रतिपक्षभूते मिथ्यात्वरागादौ स्नेहो न कर्तव्य
इति तात्पर्य । उक्तं च । "तावदेव सुखी जीवो यावन्न निहते क्वचित् । स्नेहानुविद्धहृदयं
दुःखमेव पदे पदे ॥ २४५ ॥
अथ स्नेहदोपं दृष्टांतेन द्रढयति,-
जलसिंचणु पयणिद्दलणु, पुणु पुणु पीलणदुक्खु ।
णेहहं लग्गिवि तिलणियरु, जति सहंतउ पिक्खु ॥ २४६ ॥
तरह लोह अर्थात् लोभके कारणसे परमात्मतत्त्वकी भावनासे रहित मिथ्यादृष्टि जीव
घनघातके समान नरकादि दुःखोंको वहुतकालतक भोगता है ॥ २४४ ॥
आगे स्नेहका त्याग दिखलाते हैं। [योगिन् ] हे योगी रागादिरहितवीतराग परमा-
त्मपदार्थके ध्यानमें ठहरकर ज्ञानका वैरी [स्नेहं ] नेह (प्रेम) को [ परित्यज] छोड
[स्नेहः ] क्योकि खेह [ भद्रः न भवति ] अच्छा नहीं है [स्नेहासक्तं ] स्नेहमे लगा-
हुआ [ सकलं जगत् ] समस्त ससारी जीव [ दुःखं सहमानं] अनेक प्रकार शरीर और
मनके दुःख सह रहा है उसको तू [पश्य ] देख । ये ससारी जीव नेहरहित शुद्धात्म-
तत्त्वकी भावनासे रहित हैं, इसलिये नानाप्रकारके दुःख भोगते हैं । दु.खका मूल एक
देहादिकका लेह ही है। भावार्थ- यहा भेदाभेदरनत्रयरूप मोक्षके मार्गसे विमुख होकर
मिथ्यात्वरागादिमें लेह नही करना यह सारांश है । क्योकि ऐसा कहा भी है कि जव
तक यह जीव जगतसे नेह न करे तवतक सुखी है और जो लेहसहित है जिनका मन
नेहसे बंध रहा है उनको हर जगह दुःख ही है ॥ २४५ ॥

रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
२६२
जलसिंचनं पादनिर्दलनं पुनः पुनः पीडनदुःखं ।
स्नेह लग्नेन तिलनिकर यंत्रेण सहमानं पश्य ॥ २४६ ॥
जलसिंचनं पादनिर्दलनं पुनः पुनः पीडनदुःखं स्नेहनिमित्तं तिलनिकर यंत्रेण सहमानं
पश्येति । अत्र वीतरागचिदानंदैकखभावं परमासतत्त्वमसेवमाना अजानंतो वीतरागनिर्वि-
कल्पसमाधिवलेन निश्चलचित्तेनाभावयंतश्च जीवा मिथ्यामार्ग रोचमानाः पंचेंद्रियविषया-
सक्ताः संतो नरनारका दिगतिपु यंत्रपीडनक्रकचविदारणं शूलारोहणादि नाना दुःखं
सहंत इति भावार्थः ॥ २४६ ॥
उक्तं चः-
ते चिय धण्णा ते चिय, सप्पुरिसा ते जियंतु जियलोए।
वोदहदहम्मि पडिया, तरंति जे चेव लीलाए ।। २४७ ॥
ते चैव धन्याः ते चैव सत्पुरुषाः ते जीवंतु जीवलोके ।
यौवनद्रहे पतिताः तरंति ये चैव लीलया ॥ २४७ ।।
ते चैव धन्यास्ते चैव सत्पुरुषास्ते जीवं तु जीवलोके । ते के । वोदहशब्देन यौवनं स
एव द्रहो महाहदस्तत्र पतिताः संतस्तरंति ये चैव । कया । लीलयेति । अत्र विषया-
कांक्षारूपस्नेहजलप्रवेशरहितेन सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रामूल्यरत्नभांडपूर्णेन निजशुद्धासभाव-
नापोतेन यौवनमहाहदं ये तरति त एव धन्यास्त एव सत्पुरुषा इति तात्पर्य ॥ २४७ ॥
आगे स्नेहका दोष दृष्टांतकर दृढ करते हैं;-[तिलनिकरं] जैसे तिलोंका समूह
[स्नेहं लग्नेन ] स्नेह (चिकनाई ) के संबंधसे [जलसिंचनं ] जलसे भीगना [ पादनिर्द-
लनं ] पैरोंसे खंदना [यंत्रेण] घानीमें [पुनः पुनः ] वार वार [पीडनदुःखं ] पिल-
नेका दुःख [ सहमानं ] सहता है उसे [ पश्य ] देखो । भावार्थ-जैसे लेह (चिक-
नाई-तेल)के सबंध होने से तिल घानीमें पीडे जाते हैं उसीतरह जो पंचेद्रीके विषयोंमें
आसक्त हैं मोहित हैं वे नाशको प्राप्त होते हैं इसमें कुछ संदेह नही है ॥ २४६ ॥
इस विषयमें कहा भी है।-[ते चैव धन्याः] वे ही धन्य हैं [ते चैव सत्पुरुषाः]
वे ही सज्जन हैं और [ ते ] वेही जीव [जीवलोके इस जीवलोकमें [जीवंतु] जीवते हैं
[ये चैव ] जो [यौवनव्हे ] जवान अवस्थारूपी बड़े भारी तालावमें [पतिताः] पड़े
हुए विषयरसमें नही डूवते [ लीलया] लीला (खेल) मात्रमें ही [ तरंति ] तैर जाते
हैं । वे ही प्रशंसा योग्य हैं । भावार्थ-यहां विषयवांछारूप जो स्नेहजल उसके प्रवेशसे
रहित जो सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्ररूपी रत्नोंसे भरा निज शुद्धात्मभावनारूपी जिहाज
उससे यौवन अवस्थारूपी महान तालावको तैर जाते हैं वे ही सत्पुरुष हैं वे ही धन्य हैं
यह सारांश जानना बहुत विस्तारसे क्या लाभ है ॥ २४७ ॥

परमात्मप्रकाशः।
२६३
किंबहुना विस्तरेण:-
मोक्खु जि साहिउ जिणवरहिं, छंडिवि बहुविहु रन्जु ।
भिक्खभरोडा जीव तुहुं, करहि ण अप्पउ कन्जु ॥ २४८॥
मोक्षः एव साधितः जिनवरैः त्यक्त्वा बहुविधं राज्यं ।
भिक्षाभोजन जीव त्वं करोषि न आत्मीयं कार्य ॥ २४८ ॥
मुक्खु जि इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । मोक्खु जि साहिउ मोक्ष
एव साधितः निरवशेषनिराकृतकर्ममलकलंकस्यासन आत्यंतिकस्वाभाविकज्ञानादिगुणास्प-
दमवस्थांतरं मोक्षः स साधितः । कैः । जिणवरहिं जिनवरैः । किं कृत्वा । छंडिवि
त्यत्त्वा । किं । बहुविहु रज्जु सप्तांगं राज्यं । केन । भेदाभेदरत्नत्रयभावनाबलेन । एवं
ज्ञात्वा भिक्खभरोडा जीव भिक्षाभोजन हे जीव तुहुं त्वं करहि ण अप्पउ कञ्जु
कि न करोपि आत्मीयं कार्यमिति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा बाह्याभ्यंतरपरिग्रहं त्यक्त्वा
वीतरागनिर्विकल्पसमाधी स्थित्वा च विशिष्टतपश्वरणं कर्तव्यमित्यमिप्रायः ॥ २४८ ॥
अथ हे जीव त्वमपि जिनभट्टारकवदष्टकर्मनिर्मूलनं कृत्वा मोक्षं गच्छेति संबोधयति,-
पावहि दुक्खु महंतु तुहु, जिय संसारि भमंतु ।
अट्ठवि कम्मइ णिदलिवि, वचहि मुक्खु महंतु ॥ २४९ ॥
आगे मोक्षका कारण वैराग्यको दृढ करते हैं,-[जिनवरैः] जिनेश्वरदेवने [बहु-
विधं ] अनेक प्रकारका [ राज्यं ] राज्यका विभव [ त्यक्त्वा ] छोड़कर [ मोक्ष एव]
मोक्षको ही [साधितः] साधन किया परंतु [जीव ] हे जीव [मिक्षाभोजन
भिक्षासे भोजनकरनेवाला [त्वं ] तू [आत्मीयं कार्य ] अपने आत्माका कल्याण भी
[न करोपि] नहीं करता । भावार्थ-समस्त कर्ममलकलंकसे रहित जो आत्मा उसके
खाभाविक ज्ञानादि गुणोंका स्थान तथा ससार अवस्थासे अन्य अवस्थाका होना वह मोक्ष
कही जाती है उसी मोक्षको वीतरागदेवने राज्यविभूति छोड़कर सिद्ध किया । राज्यके
सात अंग हैं राजा मंत्री सेना वगैरः । ये जहा पूर्ण हों वह उत्कृष्ट राज्य कहलाता है
वह राज्य तीर्थकरदेवका है उसको छोड़नेमें वे तीर्थकर देरी नहीं करते । लेकिन तू
निरधन होकर आत्मकल्याण नहीं करता । तू माया जालको छोड़कर महान पुरुषोंकी तरह
आत्मकार्य कर । उन महान पुरुषोंने भेदाभेद रत्नत्रयकी भावनाके बलसे निजखरूपको
जानकर विनाशीक राज्य छोड़ा, अविनाशीराज्यकेलिये उद्यमी हुए । यहापर ऐसा
व्याख्यान समझकर बाह्याभ्यंतर परिग्रहका त्याग करना तथा बीतरागनिर्विकल्पसमाधिमें
ठहरकर दुर्धर तप करना यह सारांश हुआ ॥ २४८ ॥

- २६४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । प्राप्नोषि दुःखं महत् त्वं जीव संसारे भ्रमन् । अष्टापि कर्माणि निर्दल्य ब्रज मोक्षं महांतं ॥ २४९ ।। पावहि इत्यादि । पावहि दुक्खु महंतु प्राप्नोपि दुःखं महद्रूपं तुहुं त्वं जिय हे जीव । किंकुर्वन् । संसारि भमंतु निश्चयेन संसारे विपरीतशुद्धात्मविलक्षणं द्रव्यक्षेत्रकालभवभाव- पंचभेदभिन्न संसारं भ्रमन् । तस्मात्कुरु अहवि कम्मई णिद्दलिवि शुद्धात्मोपलंभवलेनाष्टापि कर्माणि निर्मूल्य वचहि ब्रज । कं । मुक्खु स्वात्मोपलब्धिलक्षणं मोक्षं । तथा चोक्तं सिद्धिः स्वात्मोपलब्धिः । कथंभूतं मोक्षं । महंतु केवलज्ञानादिमहागुणयुक्तत्वान्महांत- मित्यमिप्रायः ॥ २४९ ॥ अथ यद्यप्यल्पमपि दुःखं सोढुमसमर्थस्तथापि कर्माणि किमिति करोपीति शिक्षा प्रयच्छति;- जिय अणुमितुवि दुक्खडा, सहण ण सकहि जोइ । चउगइदुक्खहं कारणइ, कम्मइ कुणहि किं तोइ ।। २५० ॥ जीव अणुमात्राण्यपि दुःखानि सोढुं न शक्रोषि पश्य । चतुर्गतिदुःखानां कारणानि करोषि किं तथापि ॥ २५० ॥ जिय इत्यादि । जिय हे मूढ जीव अणुमित्तुचि अणुमात्राण्यपि । कानि । दुक्खडा दुःखानि सहण ण सकहि सोढुं न शक्नोपि जोइ पश्य यद्यपि चउगइदुक्खहं कारणई आगे हे जीव तू भी श्रीजिनराजकी तरह आठ कर्मोंका नाशकर मोक्षको जा ऐसे समझाते हैं;-[जीव ] हे जीव [ त्वं ] तू [ संसारे ] संसार वनमें [भ्रमन् ] भटकता हुआ [ महत् दुःखं ] महान् दुःख [प्राप्नोपि ] पावेगा इसलिये [ अष्टापि कर्माणि ] ज्ञानावरणादि आठों ही कर्मोंको [निर्दल्य] नाशकर [ महांतं मोक्षं] सवमें श्रेष्ठ मोक्षको [व्रज] जा । भावार्थ-निश्चयकर संसारसे रहित जो शुद्धात्मा उससे जुदा जो द्रव्य क्षेत्र काल भव भावरूप पांच तरहके परावर्तनस्वरूप संसार उसमें भटकता हुआ चार गतियोंके दुःख पावेगा, निगोदराशिमें अनंतकाल तक रुलेगा । इसलिये आठ काँका क्षय करके शुद्धात्माकी प्राप्तिके बलसे रागादिकका नाशकर निर्वाणको जा । कैसा है वह निर्वाण, जो निजखरूपकी प्राप्ति वही जिसका खरूप है और जो सबमें श्रेष्ठ है। कापेल शागापमहान एणोंकर सहित है । जिसके समान दूसरा कोई नहीं ॥ २४९ ॥ आगे जो थोड़े दुःखकाही भी सहनेको असमर्थ है तो ऐसे काम क्यों करता है कि जिन्होंसे अनंतकाल तक रख भोगै ऐसी शिक्षा देते हैं;-[जीव ] हे मूढजीव तू [अणुमात्राण्यपि ] परमाणुमारत्र (थोड़े) भी [ दुःखानि ] दुःख [ सोढुं ] सहनेको [न शक्नोषि] नही समर्थ है [ पश्य र 7 देख [ तथापि ] तो फिर [चतुर्गतिदुःखानां ] चार परमात्मप्रकाशः। २६५ परमात्मभावनोत्पन्नतात्त्विकवीतरागनित्यानंदैकविलक्षणानां नारकादिदुःखानां कारणभूतानि कम्मई कुणहि किं कर्माणि करोपि किमर्थ तोइ यद्यपि दुःखानीष्टानि न भवंति तथापि इति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा कर्मास्रवप्रतिपक्षभूतरागादिविकल्परहिता निजशुद्धात्मभा- वना कर्तव्येति तात्पर्य ॥ २५० ॥ अथ पहियासंगासक्तं जगत् क्षणमप्यात्मानं न चिंतयतीति प्रतिपादयति, धंधइ पडियउ सयलु जगु, कम्मई करइ अयाणु । मोक्खहं कारणु एक खणु, णवि चिंतइ अप्पाणु ॥ २५१ ।। धांधे पतित सकलं जगत् कर्माणि करोति अज्ञानि । मोक्षस्य कारणं एक क्षणं नैव चिंतयति आत्मानं ॥ २५१ ॥ धंधइ इत्यादि । धंधइ धांधे मिथ्यात्वविषयकषायनिमित्तोत्पन्ने दुर्ध्यानातरौद्रव्यासंगे पडियउ पतितं व्यासक्तं । किं । सयल जगु समस्तं जगत् शुद्धात्मभावनापराङ्मुखो मूढ- प्राणिगणः कम्मई करइ कर्माणि करोति । कथंभूतं जगत् । अयाणु विशिष्टभेदज्ञानरहितं मोक्खहं कारणु अनंतज्ञानादिस्वरूपमोक्षकारणं एकु खणु एकक्षणमपि णवि चिंतइ नैव ध्यायति कं । अप्पाणु वीतरागपरमाहादरसास्वादपरिणतं स्वशुद्धात्मानमिति भावार्थः ।। २५१ ॥ गतियोंके दुःखके [कारणानि] कारण जो कर्म हैं [किं करोषि ] उनको क्यों करता है। भावार्थ-परमात्मकी भावनासे उत्पन्न तत्त्वरूप वीतराग नित्यानंद परम खभाव उससे भिन्न जो नरकादिकके दुःख उनके कारण कर्म ही हैं। जो दुःख तुझे अच्छे नही लगते दुःखोंको अनिष्ट जानता है तो दुःखके कारण कर्मोंको क्यों उपार्जन करता है, मत करे । यहांपर ऐसा व्याख्यान जानकर कोंके आस्रवसे रहित तथा रागादिक विकल्पजालोंसे रहित जो निज शुद्धात्माकी भावना वही करनी चाहिये ऐसा तात्पर्य जानना ।। २५० ।। आगे वाहरके परिग्रहमें लीन हुए जगतके प्राणी क्षणमात्र भी आत्माका चितवन नहीं करते ऐसा कहते हैं;-[घांधे पतितं] जगतके धंधेमें पड़ा हुआ [ सकलं जगत् ] सब जगत् [अज्ञानि ] अज्ञानी हुआ [कर्माणि ] ज्ञानावरणादि आठो कोको [करो- ति] करता है परंतु [ मोक्षस्य कारणं ] मोक्षके कारण [आत्मानं] शुद्ध आत्माको [एक क्षणं] एक क्षण भी [नैव चिंतयति ] नही चितवन करता । भावार्थ-भेदवि- ज्ञानसे रहित यह मूढ प्राणी शुद्धात्माकी भावनासे पराङ्मुख है इसलिये शुभाशुभ कर्मोंका ही बंध करता है और अनंतज्ञानादिखरूप मोक्षका कारण जो वीतराग परमानंदरूप निजशुद्धात्मा उसका एक क्षण भी विचार नहीं करता । सदा ही आत रौद्र ध्यानमें लग रहा है ऐसा सारांश है ॥ २५१ ।। ३४ २६६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । . अथ तमेवार्थ दृढयति,- जोणिलक्खई परिभमइ, अप्पा दुक्खु सहंतु । पुत्तुकलत्ते मोहियउ, जाम ण णाणु महंतु ॥ २५२ ।। योनिलक्षाणि परिभ्रमति आत्मा दुःख सहमानः । पुत्रकलत्रैः मोहितः यावन्न ज्ञानं महत् ॥ २५२ ॥ जोणि इत्यादि । जोणिलक्खई परिभमइ चतुरशीतियोनिलक्षाणि परिभ्रमति । कोसौ । अप्पा बहिरात्मा । किं कुर्वन् । दुक्खु सहंतु निजपरमात्मतत्त्वध्यानोत्पन्नवीत- रागसदानंदैकरूपाव्याकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसुखाद्विलक्षणं शारीरमानसदुःखं समानः । कथंभूतः सन् । पुत्तकलत्तई मोहियउ निजपरमात्मभावनाप्रतिपक्षभूतैः पुत्रकलत्रैः मोहितः । किंपर्यतं । जाव ण यावत्कालं न। किं । णाणु ज्ञानं । किविशिष्टं । महंतु महतो मोक्षलक्षणस्यार्थस्य साधकत्वाद्वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनजानं महदित्युच्यते । तेन कारणेन तदेव निरंतरं भावनीयमित्यभिप्रायः ॥ २५२ ॥ अथ हे जीव गृहपरिजनशरीरादिममत्वं मा कुर्विति संवोधयति;- जीव म जाणहिं अप्पणउं, घरु परियणु तणु इहु । कम्मायत्तउ कारिमड, आगमि जोइहिं दिङ ॥ २५३ ।। जीव मा जानीहि आत्मीयं गृहं परिजनं तनुः इष्टं । कर्मायत्तं कृत्रिमं आगमे योगिभिः दृष्टं ॥ २५३ ॥ , आगे उसी बातको दृढ करते हैं;-[यावत् ] जबतक [महत् ज्ञानं न ] सबमें श्रेष्ठ ज्ञान नहीं है तबतक [ आत्मा ] यह जीव [पुत्रकलत्रैः मोहितः ] पुत्र स्त्री आदिकोंसे मोहित हुआ [ दुःखं सहमानः] अनेक दुःखोंको सहता हुआ [योनिलक्षाणि] चौरासी लाख योनियोंमें [परिभ्रमति] भटकता फिरता है । भावार्थ-यह जीव चौरासी लाख योनियोंमें अनेक तरहके ताप सहता हुआ भटक रहा है निजपरमात्मतत्वके ध्यानसे उत्पन्न वीतराग परम आनंदरूप निर्व्याकुल अतींद्रिय सुखसे विमुख जो शरीरके तथा मनके नाना तरहके सुखदुःखोंको सहता हुआ भ्रमण करता है । निज परमात्मा- की भावनाके शत्रु जो देहसंबंधी माता पिता भ्राता मित्र पुत्र कलत्रादि उनसे मोहित है तब तक अज्ञानी है वीतराग निर्विकल्प खसंवेदन ज्ञानसे रहित है वह ज्ञान मोक्षका साधन है ज्ञानहीसे मोक्षकी सिद्धि होती है । इसलिये हमेशा ज्ञानकी ही भावना करनी चाहिये ॥ २५२॥ आगे हे जीव तू घर परिवार और शरीरादिका ममत्व मत कर ऐसा समझाते ३ ।

परमात्मप्रकाशः। २६७ जीव इत्यादि । जीव म जाणहिं हे जीव मा जानीहि अप्पणउ आत्मीयं । किं । घर परियणु तणु इहु गृहं परिजनं शरीरमिष्टमित्रादिकं । कथंभूतमेतत् । कम्मायत्तउ शुद्धचेतनास्वभावादमूर्तात्परमासन मनासकाशाद्विलक्षणं यत्कर्म तदुदयेन निर्मितत्वात् कर्मा- यत्तं । पुनरपि कथंभूतं । कारिमउ अकृत्रिमात् टंकोत्कीर्णज्ञायकैकस्वभावात् शुद्धात्मद्रव्या. द्विपरीतत्वात् कृत्रिमं विनश्वरं । इत्थंभूतं दिव दृष्टं । कैः । जोइहिं परमज्ञानसंपन्नदिव्य- योगिभिः । क दृष्टं । आगमि वीतरागसर्वज्ञप्रणीतपरमागमे इति । अप्रेदमध्रुवव्याख्यानं ज्ञात्वा ध्रुवे स्वशुद्धात्मस्वभावे स्थित्वा गृहादिपरद्रव्ये ममत्वं न कर्तव्यमिति भावार्थः ॥ २५३ ॥ अथ गृहपरिवारादिचिंतया मोक्षो न लभ्यत इति निश्चिनोति, मुक्खु ण पावहि जीव तुहुं, घरु परियणु चिंतंतु । तो वरि चिंतहि तउ जि तउ, पावहि मोक्खु महंतु ॥ २५४ ॥ मोक्षं न प्राप्नोपि जीव त्वं गृहं परिजनं चिंतयन् । ततः वरं चिंतय तप एव तपसा प्राप्नोपि मोक्ष महांतं ॥ २५४ ॥ मुक्खु इत्यादि । मुक्खु कर्ममलकलंकरहितकेवलज्ञानाद्यनंतगुणसहितं मोक्षं ण पावहि न प्राप्नोपि न केवलं मोक्षं निश्वयव्यवहाररत्नत्रयात्मकं मोक्षमार्ग च जीव हे मूढ जीव तुहुं त्वं । किं कुर्वन् सन् । घरु परियणु चिंतंतु गृहपरिवारादिकं परद्रव्यं चिंतयन् हैं;-जीन ] हे जीव तू [गृहं ] घर [ परिजनं] परिवार [तनुः ] शरीर [इष्ट ] और मित्रादिकोंको [आत्मीयं मा जानीहि ] अपने मत जान क्योंकि [आगमे] परमागममें [ योगिभिः] योगियोंने [ दृष्टं ] ऐसा दिखलाया है कि ये [कमायत्तं कर्मोंके आधीन हैं और [कृत्रिमं] विनाशीक है । भावार्थ-ये घर वगैरह शुद्ध चेतनखभाव अमूर्तीक निज आत्मासे मिन्न जो शुभाशुभ कर्म उसके उदयसे उत्पन्न हुए है इसलिये कर्माधीन है और विनश्वर होनेसे शुद्धात्मद्रव्यसे विपरीत है । शुद्धात्मद्रव्य किसीका बनाया हुआ नहीं है इसलिये अकृत्रिम है अनादि सिद्ध है टंकोत्कीर्ण ज्ञायक स्वभाव है । जो टांचीसे गढा हुआ न हो विना ही गढी पुरुषाकार अमूर्तीक मूर्ति है । ऐसे आत्मस्वरूपसे ये देहादिक भिन्न हैं ऐसा सर्वज्ञकथित परमागममें परमज्ञानके धारी योगी- श्वरोंने देखा है। यहांपर पुत्र मित्र स्त्री शरीर आदि सबको अनित्य जानकर नित्यानं- दरूप निज शुद्धात्मखभावमें ठहरकर गृहादिक परद्रव्यमें ममता नहीं करना ॥ २५३ ॥ आगे घर परिवारादिककी चिंतासे मोक्ष नहीं मिलती ऐसा निश्चय करते हैं। [जीव ] हे जीव [वं] तू [गृहं परिजनं ] घर परिवार वगैरः की [चिंतयन् ] चिंता . २६८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । सन् तो ततः कारणात् वरि वरं किंतु चिंताह चिंतय ध्याय । किं । तउ जि तउ तपस्तप एव विचिंतय नान्यत् । तपश्चरणचिंतनात् किं फलं भवति । पावहि प्राप्नोषि । कं । मोक्खु पूर्वोक्तलक्षणं मोक्षं । कथंभूतं । महंतु तीर्थकरपरमदेवादिमहापुरुषैराश्रितत्वा- न्महातमिति । अत्र बहिर्द्रव्येच्छानिरोधेन वीतरागतात्त्विकानंदपरमात्मरूपे निर्विकल्प- समाधौ स्थित्वा गृहादिममत्वं त्यक्त्वा च भावना कर्तव्येति तात्पर्य ॥ २५४ ॥ अथ जीवहिंसादोषं दर्शयति;- मारिवि जीवह लक्खडा, जं जिय पाउ करीसि । पुत्तकलत्तहं कारणई, तं तुहं एक सहीसि ॥ २५५ ॥ मारयित्वा जीवानां लक्षाणि यत् जीव पापं करिष्यसि । पुत्रकलत्राणां कारणेन तत् त्वं एकः सहिष्यसे ॥ २५५ ॥ मारिवि इत्यादि । मारिवि जीवह लक्खडा रागादिविकल्परहितस्य स्वस्वभावनालक्ष- णस्य शुद्धचैतन्यप्राणस्य निश्चयेनाभ्यंतरे बधं कृत्वा बहिर्भागे चानेकजीवलक्षाणां तेन हिंसोपकरणेन पुत्तकलत्तहं कारणई पुत्रकलनममत्वनिमित्तोत्पन्नदृष्टभुतानुभूतभोगाकां. क्षास्वरूपतीक्ष्णशस्त्रेण जं जिय पाउ करीसि हे जीव यत्पापं करिष्यसि तं तुई एक सहीसि तत्पापफलं त्वं कर्ता नरकादिगतिप्वेकाकी सन् सहिष्यसे हि । अत्र रागाद्यभावो करता हुआ [ मोक्षं ] मोक्ष [न प्राप्नोषि ] कभी नही पासकता [ ततः ] इसलिये [वरं] उत्तम [ तप एव ] तपका ही [चिंतय] चितवनकर क्योंकि [ तपसा] तपसे ही [ महांतं मोक्षं ] श्रेष्ठ मोक्ष सुखको [प्राप्नोषि] पासकेगा। भावार्थ-तू गृहादि परवस्तुओंको चितवन करता हुआ कर्मकलंक रहित केवलज्ञानादि अनंतगुण सहित मोक्षको नही पायेगा और मोक्षका मार्ग जो निश्चयव्यवहाररत्नत्रय उसको भी नहीं पायेगा । इन गृहादिके चितवनसे भववनमें भ्रमण करेगा। इसलिये इनका चितवन तो मत कर लेकिन बारहप्रकारके तपका चितवनकर । इसीसे मोक्ष पायेगा । वह मोक्ष तीर्थकर परमदेवाधिदेव महापुरुषोंसे आश्रित है इसलिये सबसे उत्कृष्ट है । मोक्षके समान अन्य पदार्थ नही । यहां परद्रव्यकी इच्छाको रोककर वीतराग परम आनंदरूप जो परमात्म- खरूप उसके ध्यानमें ठहरकर घर परिवारादिकका ममत्व छोड एक केवल निजखरू- पकी भावना करना यह तात्पर्य है । आत्मभावनाके सिवाय अन्य कुछ भी करने योग्य नहीं है ॥ २५४ ॥ आगे जीवहिसाका दोष दिखलाते हैं;-जीवानां लक्षाणि ] लाखों जीवोंको [मारयित्वा ] मारकर [जीव ] हे जीव [ यत् ] जो तू [पापं करिष्यसि ] पाप करता है [ पुत्रकलत्राणां ] पुत्र स्त्री वगैरहके [ कारणेन ] कारण [तत् त्वं ] उसके फलको

परमात्मप्रकाशः।
२६९
निश्चयेनाहिंसा भण्यते । कस्मात् । निश्चयशुद्धचैतन्यप्राणस्य रक्षाकारणत्वात् , रागाद्युत्प-
त्तिस्तु निश्चयहिंसा । तदपि कस्मात् । निश्चयशुद्धप्राणस्य हिंसाकारणात् । इति ज्ञात्वा
रागादिपरिणामरूपा निश्चयहिंसा त्याज्येति भावार्थः । तथा चोक्तं निश्चयहिंसालक्षणं ।
"रागादीण मणुप्पा अहिंसगतेत्ति देसिदं समए । तेसिं चेव उपत्ती हिंसेति जिणेहिं
णिहिट्ठ" ॥ २५५ ॥
अथ तमेव हिंसादोषं दृढयति;-
मारिवि चूरिवि जीवडा, जं तुहुं दुक्खु करीसि ।
तं तह पासि अणंतगुणु, अवसइ जीव लहेसि ॥ २५६ ॥
तू [एकः] अकेला [ सहिष्यसे ] सहेगा। भावार्थ हे जीव तू पुत्रादि कुटुंबकेलिये
हिसा झूठ चोरी कुशील परिग्रहादि अनेक प्रकारके पाप करता है तथा अंतरंगमें रागादि
विकल्प रहित ज्ञानादि शुद्ध चैतन्य प्राणोंका घात करता है अपने प्राण रागादिकमैलसे
मैले करता है और वाघमें अनेक जीवोंकी हिंसाकरके अशुभकर्मोंको उपार्जन करता है
उनका फल तू नरकादि गतिमें अकेला सहेगा । कुटुंबके लोक कोई भी तेरे दुःखके
वटानेवाले नहीं हैं तू ही सहेगा । श्री जिनशासनमें हिंसा दोतरहकी है । एक आत्मघात
दूसरी परघात । उनमेंसे जो मिथ्यात्वरागादिकके निमित्तसे देखे सुने भोगे हुए भोगोंकी
वांछारूप जो तीक्ष्ण शस्त्र उससे अपने ज्ञानादि प्राणोंको हतना वह निश्चय हिंसा है
रागादिककी उत्पत्ति वह निश्चय हिंसा है । क्योंकि इन विभावोंसे निज भाव घाते जाते
हैं। ऐसा जानकर रागादि परिणामरूप निश्चयहिसा त्यागना । यही निश्चयहिंसा आत्म-
घात है । और प्रमादके योगसे अविवेकी होकर एकेंद्री दोइंद्री तेइंद्री चौइंद्री पंचेंद्री
जीवोंका घात करना वह परघात है । जब इसने पर जीवका घात विचारा तव इसके
परिणाम मलिन हुए और भावोंकी मलिनता ही निश्चयहिसा है इसलिये परघातरूप
हिंसा आत्मघातका कारण है । जो हिंसक जीव है वह पर जीवोंका घातकर अपना
धात करता है। यह खदया पर दयाका खरूप जानकर हिंसा सर्वथा त्यागना । हिसाके
समान अन्य पाप नही है । निश्चय हिंसाका खरूप सिद्धातमें दूसरी जगह ऐसा कहा
है-जो रागादिकका अभाव वही शास्त्रमें अहिंसा कही है और रागादिककी उत्पत्ति
वही हिसा है ऐसा कथन जिनशासनमें जिनेश्वरदेवने दिखलाया है। अर्थात् जो रागा-
दिकका अभाव वह खदया और जो प्रमादरहित विवेकरूप करुणाभाव वह परदया है।
यह खदया परदया धर्मका मूल कारण है । जो पापी हिसक होगा उसके परिणाम
निर्मल नहीं होसकते ऐसा निश्चय है, पर जीव घात तो उसकी आयुके अनुसार है परंतु
इसने जब परघात विचारा तव आत्मघाती हो चुका ॥ २५५ ॥

२७० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । मारयित्वा चूरयित्वा जीवान् यत् त्वं दुःखं करोपि । तत्तदपेक्षया अनंतगुणं अवश्यमेव जीव लभसे ॥ २५६ ॥ मारिवि इत्यादि । मारिवि वहिर्विपये अन्यजीवान् प्राणिप्राणवियोगलक्षणेन मारयित्वा चूरिवि हस्तपादायेकदेशच्छेदरूपेण चूरयित्वा । कान् । जीवडा जीवान निश्चयेनाभ्यंतरे तु मिथ्यात्वरागादिरूपतीक्ष्णशस्त्रेण शुद्धालानुभूतिरूपनिश्चयप्राणांश्च जं तुहुं दुक्खु करीसि यदुःखं त्वं कर्ता करिष्यसि तेपु पूर्वोक्तवपरजीवेपु तं तह पासि अणंतगुणु तद्दुःखं तदपेक्षया अनंतगुणं अवसइ अवश्यमेव जीव हे मूढजीव लहीसि प्राप्नोषीति । अत्रायं जीवो मिथ्यात्वरागादिपरिणतः पूर्व स्वयमेव निजशुद्धासप्राणं हिनस्ति बहिर्विषये अन्यजीवानां प्राणघातो भवतु मा भवतु नियमो नास्ति । परघातार्थ तप्तायः- पिडग्रहणेन स्वहस्तदाहवत् इति भावार्थः । तथाचोक्तं । "स्वयमेवात्मनात्मानं हिनस्त्यात्मा क्रपायवान् । पूर्व प्राण्यंतराणां तु पश्चात्स्याद्वा न वा वधः" ॥ २५६ ।। आगे उसी हिसाके दोषको फिर निंदते हैं और दयाधर्मको दृढ करते हैं;-[जीव] हे जीव [ यत् त्वं ] जो तू [जीवान् ] परजीवोंको [ मारयित्वा ] मारकर [चूरयित्वा] चूरकर [ दुःखं करोपि ] दुःखी करता है [तत् ] उसका फल [तदपेक्षया ] उसकी अपेक्षा [अनंतगुणं] अनंतगुणा [अवश्यमेव ] निश्चयसे [ लभसे ] पावेगा। भावार्थ- निर्दई होकर अन्य जीवों के प्राण हरना पर जीवको शस्त्रादिकसे घात करना वह मारना है और हाथ पैर आदिकसे तथा लाठी आदिसे पर जीवोंको काटना एकदेश मारना वह चूरना है यह हिसा ही महा पापका मूल है । निश्चयनयसे अभ्यंतरमें मिथ्यात्व रागादिरूप तीक्ष्ण शस्त्रोंसे शुद्धात्मानुभूतिरूप अपने निश्चयप्राणोंको हत रहा है क्लेशरूप करता है उसका फल अनंत दुःख अवश्य सहेगा । इसलिये हे मूढ जीव परजीवोंको मत मारे और मत चूरे तथा अपने भाव हिसारूप मत करे उज्ज्वल भाव रख जो तू जीवोंको दुःख देगा तो निश्चयसे अनंतगुणा दुःख पावेगा । यहां सारांश यह है-जो यह जीव मिथ्यात्वरागादिरूप परिणत हुआ पहले तो अपने भावप्राणोंका नाश करता परजीवका घात हो या न हो परजीवका घात तो उसकी आयु पूर्ण होगई हो तव होता है अन्यथा नही परंतु इसने जब परका घात विचारा तव यह आत्मघाती हो चुका । जैसे गरम लोहेका गोला पकड़नेसे अपने हाथ तो निस्संदेह जलजाते हैं। इससे यह निश्चय हुआ कि जो परजीवोंपर खोटे भाव करता है वह आत्मघाती है। ऐसा दूसरी जगह भी कहा है कि जो आत्मा कषायवाला है निर्दयी है वह पहले तो आप ही अप- नेसे अपना घात करता है इसलिये आत्मघाती है पीछे परजीवका घात होवे या न होवे । जीवकी आयु वाकी रही हो तो यह नही मारसकता परंतु इसने मारनेके भाव किये है परमात्मप्रकाशः। , अथ जीववधेन नरकगतिस्तद्रक्षणे स्वों भवतीति निश्चिनोति; जीव वधंतहं गरयगइ, अभयपदाणे सग्गु । वे पह जवला दरिसिया, जहिं भावइ तहिं लग्गु ॥ २५७ ॥ जीवं बध्नतां नरकगतिः अभयप्रदानेन खर्गः । द्वौ पंथानौ समीपे दर्शितौ यत्र रोचते तत्र लग ॥ २५७ ।। जीव वहंतहं इत्यादि । जीव वहंतहं निश्चयेन मिथ्यात्वविषयकषायपरिणामरूपं बधं स्वकीयजीवस्य व्यवहारेणेंद्रियवलायुःप्राणापानविनाशरूपमन्यजीवानां च बधं कुर्वतां गरयगइ नरकगतिर्भवति अभयपदाणे निश्चयेन वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनपरिणामरूप- मभयप्रदानं स्वकीयजीवस्य व्यवहारेण प्राणरक्षारूपमभयप्रदानं परजीवानां च कुर्वतां सग्गु स्वस्याभयप्रदानेन मोक्षो भवत्यन्यजीवानामभयप्रदानेन स्वर्गश्चेति वे पह जवला दरिसिया एवं द्वौ पंथानी समीपे दर्शितौ जहिं रुच्चइ तहिं लग्गु हे जीव यत्र रोचते तत्र लग्नो भव त्वमिति । कश्चिदजानी प्राह । प्राणा जीवादभिन्ना भिन्ना वा यद्यमिन्नाः तर्हि जीववत्प्राणानां विनाशो नास्ति, अथ भिन्नास्तर्हि प्राणवधेपि जीवस्य वधो नात्यनेन प्रकारेण जीवहिसैव नास्ति कथं जीववध पापबंधो भविष्यतीति । परिहारमाह । कथंचि- द्वेदाभेदः । तथाहि-स्वकायप्राणे हृते सति दुःखोत्पत्तिदर्शनाद्व्यवहारेणाभेदः सैव दुःखो- इसकारण निस्सदेह हिसक हो चुका और जब हिसाके भाव हुए तव ये कषायवान् हुआ । कपायवान होना ही आत्मघात है ॥ २५६ ॥ आगे जीवहिंसाका फल नरकगति है और रक्षाकर स्वर्ग होता है ऐसा निश्चय करते है;-[जीवं बनतां] जीवोंको मारनेवालोंकी [ नरकगतिः ] नरकगति होती [अभयप्रदानेन ] अभयदान देनेसे [ स्वर्गः ] खर्ग होता है [ द्वौ पंथानौ ] ये दोनों मार्ग [ समीपे ] अपने पास [दर्शिता] दिखलाये हैं [ यत्र ] जिसमें [ रोचते ] तेरी रुचि हो [तत्र] उसीमें [ लग] तू लग जा । भावार्थ-निश्चयकर मिथ्यात्वविषयक- पाय परिणामरूप निजघात और व्यवहारनयकर परजीवोंके इंद्री बल आयु श्वासोच्छ्वास- रूप प्राणोंका विनाश उसरूप परप्राणघात सो प्राणघातियोंके नरकगति होती है। हिसक जीव नरकहीके पात्र है । निश्चयनयकर वीतरागनिर्विकल्प खसवेदन परिणाम- रूप जो निजमावोंका अभयदान निज जीवकी रक्षा और व्यवहारनयकर पर प्राणियों के प्राणोंकी रक्षारूप अभयदान यह खदया परदयाखरूप अभयदान है उसके करनेवालोंके वर्ग मोक्ष होती है इसमें सदेह नही है । इनमें से जो अच्छा मालूम पडै उसे करो। ऐसी श्रीगुरुने आज्ञा की । ऐसा कथन सुनकर कोई अज्ञानी जीव तर्क करता है कि, जो ये प्राण जीवसे जुदे हैं कि नही ? यदि जीवसे जुदे नही हैं तो जैसे जीवका नाश २७२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । त्पत्तिस्तु हिंसा भण्यते ततश्च पापबंधः । यदि पुनरेकांतेन देहालनोआंद एत्र तर्हि परकी- यदेहघाते दुःखं न भवति तथा स्वदेहरातेपि दुःखं न स्यान्न च तथा । निश्चयेन पुनर्जीवे गतेपि देहो न गच्छतीति हेतोर्भेद एव । ननु तथापि व्यवहारेण हिंसा जाता पापबंधोपि न च निश्चयेन इति । सत्यमुक्तं त्वया, व्यवहारेण पापं तथैव नारकादिदुःखमपि व्यवहारे- णेति । तदिष्टं भवतां चेत्तर्हि हिंसां कुरुत यूयमिति ॥ २५७ ।। अथ मोक्षमार्गे रतिं कुर्विति शिक्षा ददाति;- मूढा सयलुवि कारिमउ, भुल्लउ मं तुस सिवपहि णिम्मलि करहि रह, घरु परियणु लहु छडि ॥ २५८ ॥ मूढ सकलमपि कृत्रिमं प्रांत्वा मा तुष कंडय । शिवपथे निर्मले कुरु रतिं गृहं परिजनं लघु त्यज ॥ २५८ ॥ कंडि। नहीं है वैसे प्राणोंका भी नाश नही होसकता । अगर जुदे हैं अर्थात् जीवसे सर्वथा भिन्न हैं तो इन प्राणों का नाश नही होसकता। इस प्रकारसे जीवहिंसा है ही नहीं तुम जीवहिसामें पाप क्यों मानते हो । उसका समाधान । जो ये इंद्रिय बल आयु श्वासो- च्छास प्राण जीवसे किसी नयकर अभिन्न हैं भिन्न नही हैं किसी नयसे भिन्न हैं। ये दोनों नय प्रमाणीक हैं । अव अभेद कहते हैं सो सुनो । अपने प्राणों के होनेपर जो व्यवहार नयकर दुःखकी उत्पत्ति वह हिंसा है उसीसे पापका वंध होता है। और जो इन प्राणोंको सर्वथा जुदे ही मानें देह और आत्माका सर्वथा भेद ही जानें तो जैसे परके शरीरका घात होनेपर दुःख नहीं होता है वैसे अपने देहके घातमें भी दुःख न होना चाहिये इसलिये व्यवहारनयकर जीवका और देहका एकल दीखता है परंतु निश्चयसे एकत्व नहीं है । यदि निश्चयसे एकपना होवे तो देहके विनाश होनेसे जीवका विनाश हो जावे सो जीव अविनाशी है । जीव इस देहको छोड़कर परभवको जाता है तव देह नहीं जाती है । इसलिये जीव और देहमें भेद भी है । यद्यपि निश्चय- नयकर भेद है तौभी व्यवहारनयकर प्राणोंके चले जानेसे जीव दुःखी होता है सो जीवको दुःखी करना यही हिंसा है और हिसासे पापका वंध होता है । निश्चय नयकर जीवका घात नहीं होता यह तूने कहा वह सत्य है परंतु व्यवहारनयकर प्राणवि- योगरूप हिसा है ही और व्यवहारनयकर ही पाप है और पापका फल नरकादिकके दुःख हैं वे भी व्यवहारनयकर ही है । यदि तुझे नरकके दुःख अच्छे लगते हैं तो हिंसा कर और नरकका भय है तो हिसा मत कर । ऐसे व्याख्यानसे अज्ञानी जीवोका संशय मेंटा ॥ २५७ ।। -- परमात्मप्रकाशः। २७३ मूढा इत्यादि । मूढा सयलुवि कारिमउ हे मूढजीव शुद्धात्मानं विहायान्यत् पंचेंद्रि- यविषयरूपं समस्तमपि कृत्रिम विनश्वरं भुल्लउ म तुस कंडि भ्रांतो भूत्वा तुषकंडनं मा कुरु एवं विनश्वरं ज्ञात्वा सिवपहि णिम्मलि शिवशब्दवाच्यविशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावो मुक्तामा तस्य प्रात्युपायः पंथा निजशुद्धात्मसम्यश्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपः स च रागादि- रहितत्वेन निर्मल: करहि रह इत्थंभूते मोक्षे मोक्षमार्गे च रतिं प्रीतिं कुरु घरु परियणु लहु छडि पूर्वोक्तमोक्षमार्गप्रतिपक्षभूतं गृहं परिजनादिकं शीघ्रं यजेति तात्पर्य ॥ २५८ ॥ अथ पुनरप्यधुवानुप्रेक्षा प्रतिपादयति,- जोइय सयलुवि कारिमउ, णिकारिमण कोइ। जीविं जंतिं कुडि ण गय, इहु पडिछंदा जोइ ॥ २५९ ॥ योगिन् सकलमपि कृत्रिमं निःकृत्रिमं न किमपि । जीवेन याता देहो न गतः इमं दृष्टांतं पश्य ॥ २५९ ॥ जोइय इत्यादि । जोइय हे योगिन् सयलुवि कारिमउ टंकोत्कीर्णज्ञायकैकखभावाद- कृत्रिमाद्वीतरागनित्यानंदैकस्वरूपात् परमात्मनः सकाशात् यदन्यन्मनोवाकायव्यापाररूपं तत्समस्तमपि कृत्रिम विनश्वरं णिकारिमउ ण कोइ अकृत्रिमं नित्यं पूर्वोक्तपरमात्मसदृश संसारे किमपि नास्ति । अस्मिन्नर्थे दृष्टांतमाह । जीवि जति कुडि ण गय शुद्धात्मतत्व- भावनारहितेन मिथ्यात्वविषयकपायासक्तेन यान्युपार्जितानि कर्माणि तत्कर्मसहितेन जीवेन आगे श्रीगुरु यह शिक्षा देते हैं कि तू मोक्षमार्ग में प्रीति कर,-[मृढ ] हे मूढ जीव [सकलमपि ] शुद्धात्माके सिवाय अन्य सब विषयादिक [कृत्रिमं] विनाशवाले हैं तू [प्रात्वा ] श्रम (भूल) से [तुषं मा कंडय ] भूसेका खंडन मत कर । तू [निर्मले परमपवित्र [शिवपथे] मोक्षमार्ग में [रति ] प्रीति [ कुरु ] कर [गृहं परिजनं] और मोक्षमार्गका उद्यमी होके घर परिवार आदिको [लघु] शीघ्र ही [त्यज] छोड़। भावार्थ-हे मूढ शुद्धात्मस्वरूपके सिवाय अन्य सब पंचेद्रीविषयरूप पदार्थ नाशवान हैं तू प्रमसे भूला हुआ असार भूसेके कूटनेकी तरह कार्य न कर इस सामग्रीको विनाशीक जानकर शीघ्र ही मोक्षमार्गके घातक घर परिवार आदिकको छोड़कर मोक्षमार्गका उद्यमी होके ज्ञानदर्श नखभावको रखनेवाले शुद्धात्माकी प्राप्तिका उपाय जो सम्यग्दर्शन सम्य- ज्ञान सम्यक् चारित्ररूप मोक्षका मार्ग उसमें प्रीतिकर । जो मोक्षमार्ग रागादिकसे रहित होनेकर महा निर्मल है ॥ २५८ ।। आगे फिर भी अनित्यानुप्रेक्षाका व्याख्यान करते हैं, योगिन् ] हे योगी [ सक- लमपि] सभी ] कृत्रिम ] विनश्वर हैं [ निःकृत्रिम ] अकृत्रिम [ किमपि] कोई भी वस्तु [न] नहीं है [ जीवेन याता] जीवके जानेपर उसके साथ [ देहो न गतः] ३५ . २७४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । भवांतरं प्रति गच्छतापि कुडिशब्दवाच्यो देहः सहैव न गत इति हे जीव इहु पडिछंदा जोइ इमं दृष्टांतं पश्येति । अन्नेदमध्रुवं ज्ञात्वा देहममत्वप्रभृतिविभावरहितं निजशुद्धासप- दार्थभावना कर्तव्या इत्यभिप्रायः ।। २५९ ॥ अथ तपोधनं प्रत्यध्रुवानुप्रेक्षा प्रतिपादयति,- देउलु देउवि सत्थु गुरु, तित्थु वि वेउवि कव्वु । वत्थु जु दीसइ कुसुमियउ, इंधणु होसइ सञ्चु ॥ २६० ॥ देवकुलं देवोपि शास्त्रं गुरुः तीर्थमपि वेदोपि काव्यं । वृक्षः यत् दृश्यते कुसुमितं इंधनं भविष्यति सवै ॥ २६० ॥ देउलु इत्यादि पदुखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । देउलु निर्दोपिपरमालस्थापनाप्रति- माया रक्षणार्थ देवकुलं मिथ्यात्वदेवकुलं वा देउवि तस्यैव परमात्मनोऽनंतनानादिगुणस्म- रणार्थ धर्मप्रभावनार्थ वा प्रतिमास्थापनारूपो देवः रागादिपरिणतदेवताप्रतिमारूपो वा सत्थु वीतरागनिर्विकल्पात्मतत्त्वप्रभृतिपदार्थप्रतिपादकं शास्त्रं मिथ्याशास्त्रं वा गुरु लोका- लोकप्रकाशककेवलज्ञानादिगुणसमृद्धस्य परमासनः प्रच्छादको मिथ्यात्वरागादिपरिणति- रूपो महाऽज्ञानांधकारदो तद्यापि यद्वचनदिनकरकिरणविदारितः सन् क्षणमात्रेण च विलयं गतः स च जिनदीक्षादायकः श्रीगुरुः तद्विपरीतो मिथ्यागुरुर्वा तित्थुवि संसार- तरणोपायभूतनिजशुद्धात्मतत्त्वभावनारूपनिश्चयतीर्थ तत्स्वरूपरतः परमतपोधनानां आवा- शरीर भी नहीं जाता [ इमं दृष्टांतं ] इस दृष्टांतको [ पश्य ] प्रत्यक्ष देखो । भावार्थ- हे योगी टंकोत्कीर्ण (अघटित घाट-विना टांचीका गढा) अमूर्तीक पुरुषाकार आत्मा केवल ज्ञायक खभाव अकृत्रिम वीतराग परमानंद स्वरूप उससे जुदे जो मन वचन कायके व्यापार उनको आदि ले सभी कार्य पदार्थ विनश्वर हैं। इस संसारमें देहादि समस्त सामग्री अविनाशी नहीं है जैसा शुद्ध बुद्ध परमात्मा अकृत्रिम है वैसा देहादिमेंसे कोई भी नही है सब क्षण भंगुर हैं। शुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे रहित जो मिथ्यात्व विष- यकषाय हैं उनसे आसक्त होके जीवने जो कर्म उपार्जन किये हैं उन कर्मोंसे जब यह जीव परभवमें गमन करता है तब शरीर भी साथ नहीं जाता। इसलिये इस लोकमें इन देहादिक सबको विनश्वर जानकर देहादिकी ममता छोड़ना चाहिये और सकल विभाव रहित निज शुद्धात्मपदार्थकी भावना करनी चाहिये ।। २५९ ॥ आगे मुनिराजोंको देवल आदि सभी सामग्री अनित्य दिखलाते हुए अवैवानुप्रेक्षाको कहते हैं;-[देवकुलं ] अरहंतदेवकी प्रतिमाका स्थान जिनालय [देवोपि] श्री जिनें- देव [शास्त्रं ] जैन शास्त्र [गुरुः] दीक्षा देनेवाले गुरू [ तीर्थमपि ] संसारसागरसे परमात्मप्रकाशः। २७५ सभूतं तीर्थकदंबकमपि मिथ्यातीर्थसमूहो वा चेउवि निर्दोपपरमात्मोपदिष्टवेदशब्दवाच्यः सिद्धांतोपि परकल्पितवेदो वा कन्वु शुद्धजीवपदार्थादीनां गद्यपद्याकारेण वर्णकं काव्यं लोकप्रसिद्धविचित्रकथाकाव्यं वा वत्थु परमात्मभावनारहितेन जीवेन यदुपार्जितं वनस्पति- नाम कर्म तदुदयजनितं वृक्षकदवकं जो दीसइ कुसुममियउ यत् दृश्यते कुसुमितं पुष्पितं इंधणु होसड़ सव्वु तत्सर्व कालाग्नेरिंधनं भविष्यति विनाशं यास्यतीत्यर्थः । अत्र तथा तावत्पंचेद्रियविपये मोहो न कर्तव्यः प्राथमिकानां यानि धर्मतीर्थवर्तनानिमित्तानि देवकुल. देवप्रतिमादीनि तत्रापि शुद्धात्मभावना कालेन कर्तव्येति संबंधः ॥ २६० ।। - तैरनेके कारण परमतपखियोंके स्थान सम्मेदसिखर आदि [ वेदोपि] द्वादशांगरूप सिद्धांत [ काव्यं ] गद्यपद्यरूप रचना इत्यादि [ यद् वस्तु कुसुमितं ] जो वस्तु अच्छी या वुरी दीखनेमें आती हैं वे [ सर्व ] सब | इंधनं ] कालरूपी अनिका ईधन [ भवि- प्यति ] हो जावेंगी । भावार्थ-निर्दोषि परमात्मा श्री अरहंत देव उनकी प्रतिमाके पधारनेकेलिये जो गृहस्थोंने देवालय (जैनमंदिर) बनाया है वह विनाशीक है; अनंत ज्ञानादिगुणरूप श्री जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमा धर्मकी प्रभावनाके अर्थ भव्यजीवोंने देवाल- यमें स्थापन की है उसे देव कहते है वह भी विनश्वर है । यह तो जिनमंदिर और जिन प्रतिमाका निरूपण किया, इसके सिवाय अन्यदेवोंके मंदिर और अन्यदेवकी प्रतिमा ये सब ही विनश्वर है। वीतराग निर्विकल्प जो आत्मतत्त्व उसको आदि ले जीव अजीवादि सकल पदार्थ उनका निरूपण करनेवाला जो जैनशास्त्र वह भी यद्यपि अनादि प्रवृत्तिकी अपेक्षा नित्य है तौभी वक्ता श्रोता पुस्तकादिककी अपेक्षा विनश्वर ही है, और जैनसिवाय जो सांख्यपातंजलादि परशास्त्र है वे भी सब विनाशीक हैं । जिनदीक्षाके देनेवाले लोकालोकके प्रकाशक केवलज्ञानादिगुणोंकर पूर्ण परमात्माके रोकनेवाला जो मिथ्यात्वरागादि परिणत महा अज्ञानरूप अंधकार उसके दूर करनेकेलिये सूर्यके समान जिनके वचनरूप किरणोंसे मोहांधकार दूर होगया है ऐसे महामुनि गुरु हैं वे भी विनश्वर हैं, और उनके आचरणसे विपरीत विपरीत जो अज्ञान तापस मिथ्यागुरु वे भी क्षणभंगुर हैं । संसार समुद्रके तरनेका कारण जो निज शुद्धात्मतत्व उसकी भावनारूप जो निश्चयतीर्थ उसमें लीन परमतपोधनका निवास स्थान संमेद सिखर गिरनार आदिक वे तीर्थ हैं वे भी विनश्वर हैं, और जिन तीर्थ के सिवाय जो पर यतियों के निवास वे परतीर्थ वे भी विनाशीक हैं। निर्दोष परमात्मा जो सर्वज्ञ वीत- रागदेव उनकर उपदेश किया गया जो द्वादशांग सिद्धांत वह वेद है वह यद्यपि सदा' सनातन है तौभी क्षेत्रकी अपेक्षा विनश्वर है किसी समय किसी क्षेत्रमें पाया जाता है किसी समय नहीं पाया जाता, भरत क्षेत्र ऐरावत क्षेत्रमें कभी प्रगट हो जाता है कभी भुवणुवि एहु एहु असेसु। , २७६ रायचंद्रजैनशास्रमालायाम् । अथ शुद्धासद्रव्यादन्यत्सर्वमध्रुवमिति प्रकटयति;- एकु जि मिल्लिवि वंभु परु, पुहविहिं णिम्मिउ भंगुरउ, एहड वुज्झि विसेसु ॥ २६१ ।। एकमेव मुक्त्वा ब्रह्म परं भुवनमपि इदं अशेपं । पृथिव्यां निर्मापितं भंगुरं इमं वुध्यख विशेपं ॥ २६१ ॥ एकु जि इत्यादि । एक्कु जि एकमेव मिल्लिवि मुक्त्वा । किं । वंभु परु परमब्रह्मशब्द- वाच्यं नानावृक्षभेदभिन्नवनमिव नानाजीवजातिभेदभिन्नं शुद्धसंग्रहनयेन शुद्धजीवद्रव्य भुवणुवि भुवनमपि एहु इदं प्रत्यक्षीभूतं । कतिसंख्योपेतं । असेसु अशेष समस्तमपि । कथंभूतमिदं सर्वं पुहविहिं णिम्मिउ पृथिव्यां लोके निर्मापितं भंगुरउ विनश्वरं एहउं बुज्ज्ञि विसेसु इमं विशेपं वुध्यस्व जानीहि त्वं हे प्रभाकरभट्ट । अयमत्र भावार्थः । विलय हो जाता है और महा विदेह क्षेत्रमें यद्यपि प्रवाहकर सदा शान्यता है तौमी वक्ता श्रोता व्याख्यानकी अपेक्षा विनश्वर है वे ही वक्ता श्रोता हमेशा नहीं पाये जाते इसलिये विनश्वर है, और परमतियोंकर कहा गया जो हिंसारूप वेद वह भी विनश्वर है। शुद्धजीवादिपदार्थों का वर्णन करनेवाली संस्कृत प्राकृत छटा रूप गद्य व छंदबंधरूप पद्य उस स्वरूप और जिसमें विचित्र कथाये हैं ऐसे सुंदर कान्य कहे जाते हैं वे भी विनश्वर हैं, और खोटे कवियोंकर प्रकाशित खोटे काव्य वे भी विनश्वर हैं । इत्यादि जो जो वस्तु सुंदर और असुंदर दीखती हैं वे सब कालरूपी अग्निका ईधन हो जावेंगी। तात्पर्य यह है कि सब भसम हो जावेंगी और परमात्माकी भावनासे रहित जो जीव उसने उपार्जन किया जो वनस्पति नाम कर्म उसके उदयसे वृक्ष हुआ सो वृक्षोंके समूह जो फूले फले दीखते हैं वे सब ईंधन हो जायेंगे। ससारका सब ठाठ क्षणभंगुर है ऐसा जानकर पंचेद्रियों के विषयोंमें मोह नही करना, विषयका राग सर्वथा त्यागना योग्य है । प्रथम अवस्थामें यद्यपि धर्मतीर्थकी प्रवृत्तिका निमित्त जिनमंदिर जिनप्रतिमा जिनधर्म तथा जैनधर्मी इनमें प्रेम करना योग्य है तौभी शुद्धात्माकी भावनाके समय यह धर्मानुराग भी नीचे दरजेका गिना जाता है वहां पर केवल वीतरागभाव ही है ॥ २६०॥ आगे शुद्धात्मस्वरूपसे अन्य जो सामग्री है वह सभी विनश्वर है ऐसा व्याख्यान करते हैं;-[एक परं ब्रह्म एव ] एक शुद्ध जीवद्रव्यरूप पर ब्रह्मको [मुक्त्वा] छोड- कर [पृथिव्यां] इस लोकमें [इदं अशेष भुवनमपि निर्मापितं] इस समस्त लोकके पदार्थोकी रचना है वह सब [भंगुरं] विनाशीक है [इमं विशेष ] इस विशेष वातको तू [बुध्यस्व ] जान । भावार्थ-शुद्ध संग्रहनयकर समस्त जीवराशि एक है । जैसे नाना- प्रकारके वृक्षोंकर भरा हुआ वन एक कहा जाता है उसीतरह नानाप्रकारके जीव जाति - ड परमात्मप्रकाशः। २७७ विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावं परमब्रह्मशब्दवाच्यं शुद्धजीवत्वं मुक्त्वान्यत्पंचेंद्रियविषयभूतं विनश्वरमिति ॥ २६१॥ अथ पूर्वोक्तमध्रुवत्वं ज्ञात्वा धनयौवने तृष्णा न कर्तव्येति कथयति, जे दिवा सूरुग्गमणि, ते अत्थवणि ण दिट्ठ । तें कारणि वढ धम्मु करि, धणि जोव्वणि कउ तिह ।। २६२ ।। ये दृष्टाः सूर्योद्गमने ते अस्तमने न दृष्टाः । तेन कारणेन वत्स धर्म कुरु धने यौवने का तृष्णा ॥ २६२ ॥ जे दिवा इत्यादि । जे दिहा ये केचन दृष्टाः । क । सूरुग्गमणि सूर्योदये ते अत्थ- वणि ण दिड ते पुरुपा गृहधनधान्यादिपदार्था वा अस्तमने न दृष्टाः एवमध्रुवत्वं ज्ञात्वा तें कारणि वढ धम्मु करि तेन कारणेन वत्स पुत्र सागारानागारधर्म कुरु धणि जोवणि कउ तिह धने यौवने वा का तृष्णा न कापीति । तद्यथा । गृहस्थेन धने तृष्णा न कर्तव्या तर्हि किं कर्तव्यं । भेदाभेदरत्नत्रयाराधकानां सर्वतात्पर्येणाहारादिचतुर्विधं दानं दातव्यं । करके एक कहे जाते हैं। वे सब जीव अविनाशी हैं और सब देहादिकी रचना विनाशीक दीखती है । शुभ अशुभकर्मकर जो देहादिक इस जगतमें रची गई है वह सब विना- शीक है हे प्रभाकर भट्ट ऐसा विशेष तू जान देहादिकको अनित्य जान और जीवोंको नित्य जान । निर्मल ज्ञान दर्शनखभाव पर ब्रह्म (शुद्ध जीवतत्व ) उससे भिन्न जो पाच इंद्रियोंका विषय वन वह क्षणभंगुर जानो ॥ २६१ ॥ आगे पूर्वोक्त विषयसामग्रीको अनित्य जानकर धन यौवन और विषयोंमें तृष्णा नही करनी चाहिये ऐसा कहते हैं।-वन्स] हे शिष्य [ये] जो कुछ पदार्थ [ सूर्यो- द्गमने] सूर्यके उदय होनेपर [दृष्टाः ] देखे थे [ते ] वे [अस्तमने ] सूर्यके अस्त होनेके समय [न दृष्टाः ] नहीं देखे जाते नष्ट हो जाते हैं [ तेन कारणेन] इस कारण तू [धर्म ] धर्मको [कुरु ] पालनकर [धने यौवने ] धन और यौवनअवस्थामे [का तृष्णा] क्या तृष्णा कर रहा है । भावार्थ-धन धान्य घर मनुष्य पशु आदिक पदार्थ जो सवेरेके समय देखे थे वे सांझके समयमें नही दीखते नष्ट हो जाते हैं ऐसा जगतका ठाठ विनाशीक जानकर इन पदार्थोंकी तृष्णा छोड़ और श्रावकका तथा यतीका धर्म खीकार कर धन योवनमें क्या तृष्णा कर रहा है। ये तो जलके ववूलेके समान क्षणभंगुर हैं । यहा कोई प्रश्न करे कि गृहस्थी धनकी तृष्णा न करे तो क्या करे । उसका उत्तर । निश्चय व्यवहार रत्नत्रयके आराधक जो यती उनकी सब तरह गृहस्थको सेवा करनी चाहिये चार प्रकारका दान देना धर्मकी इच्छा रखनी धनकी २७८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । नो चेत् सर्वसंगपरित्यागं कृत्वा निर्विकल्पपरमसमाधौ स्थातव्यं । यौवनेपि तृष्णा न कर्तव्या यौवनावस्थायां यौवनोद्रेकजनितविपयरागं त्यक्त्वा विषयप्रतिपक्षभूते वीतरागचि; दानंदैकस्वभावे शुद्धामस्वरूपे स्थित्वा च निरंतरं भावना कर्तव्येति भावार्थः ॥ २६२ ।। अथ धर्मतपश्चरणरहितानां मनुष्यजन्म वृथेति प्रतिपादयति;- धम्मु ण संचिउ तउ ण किउ, रुक्खें चम्ममएण । खजिवि जरउद्देहियए, णरइ पडिव्वउ तेण ॥ २६३ ॥ धर्मों न संचितः तपो न कृतं वृक्षेण चर्ममयेन । खादयित्वा जरोदेहिकया नरके पतितव्यं तेन ॥ २६३ ॥ धम्मु इत्यादि । धम्मु ण संचिउ धर्मसंचयो न कृतः गृहस्थावस्थायां दानशीलपूजो- पवासादिरूपसम्यक्त्वपूर्वको गृहिधर्मो न कृतः । दर्शनिकत्रतिकाद्येकादशश्रावकधर्मरूपो वा तउ ण किउ तपश्चरणं न कृतं तपोधनेन तु समस्तबर्हिद्रव्येच्छानिरोधं कृत्वा अनशनादि- द्वादशविधतपश्चरणबलेन निजशुद्धामध्याने स्थित्वा निरंतरं. भावना न कृता । केन कृत्वा । रुक्खें चम्ममएण वृक्षण मनुष्यशरीरचर्मनिवृत्तेन । येनैवं न कृतं गृहस्थेन तपोधनेन वा गरह पडिव्वउ तेण नरके पतितव्यं तेन । किंकृत्वा । खजिवि भक्षयित्वा। कया कर्तृभू- तया । जरउद्देहियइ जरोनेहिकया । इदमत्र तात्पर्य । गृहस्थेनाभेदरत्नत्रयस्वरूपमुपादेयं इच्छा नहीं करनी । जो किसी दिन प्रत्याख्यानकी चौकड़ीके उदयसे श्रावकके व्रतमें भी रहे तो देव पूजा गुरुकी सेवा खाध्याय दान शील उपवासादि अणुव्रतरूप धर्म करे और जो बड़ी शक्ति होवे तो सब परिग्रहका त्यागकर यतीके व्रत धारण करके निर्वि- कल्पपरमसमाधिमें रहे । यतीको तो सर्वथा धनका त्याग और गृहस्थको धनका प्रमाण करना योग्य है । विवेकी गृहस्थ धनकी तृष्णा न करें। धन योवन असार है, योवन अवस्थामें विषय तृष्णा न करें विषयका राग छोडकर विषयोंसे परान्मुखं जो वीतराग निजानंद एक अखंड खभावरूप शुद्धात्मा उसमें लीन होकर हमेशा भावना करनी चाहिये ॥२६२॥ आगे जो धर्मसे रहित हैं और तपश्चरण भी नहीं करते हैं उनका मनुष्य जन्म वृथा है ऐसा कहते हैं;-[येन ] जिसने [ चर्ममयेन वृक्षण मनुष्यशरीररूपी चर्म- मई वृक्षको पाकर उससे [धर्मः न कृतः] धर्म नही किया [ तपो न कृतं ] और तप भी नही किया उसका शरीर [ जरोनेहिकया खादयित्वा] वुढापारूपी दीमक कीड़ेकर खाया जायगा फिर [तेन] उसको मरणकर [नरके ] नरकमें [पतितव्यं] पड़ना पड़ेगा। भावार्थ-गृहस्थ अवस्थामें जिसने सम्यक्त्वपूर्वक दान शील पूजा उपवासादिरूप गृहस्थका धर्म नहीं किया, दर्शनप्रतिमा व्रतप्रतिमा आदि ग्यारह प्रतिमाके भेदरूप श्रावकका 1 परमात्मप्रकाशः। २७९ कृत्वा भेदरत्नत्रयासकः श्रावकधर्मः कर्तव्यः, यतिना तु निश्चयरत्नत्रये स्थित्वा व्यावहारि- करत्नत्रयवलेन विशिष्टतपश्वरणं कर्तव्यं नोचेत् दुर्लभपरंपरया प्राप्तमनुष्यजन्म निष्फलमिति ॥ २६३ ।। अथ हे जीव जिनेश्वरपदे परमभक्ति कुर्विति शिक्षा ददाति,-- अरि जिय जिणपइ भत्ति करि, सुहि सज्जणु अवहेरि । ति वप्पेणवि कज्जु णवि, जो पाडइ संसारि ॥ २६४ ॥ अहो जीव जिनपदे भक्तिं कुरु सुखे खननं अपहर। तेन पित्रापि कार्य नैव यः पातयति संसारे ।। २६४ ॥ अरि जिय इत्यादि । अरि जिय अहो भव्यजीव जिणपइ भक्ति करि जिनपदे भक्ति कुरु गुणानुरागवचननिमित्तं जिनेश्वरेण प्रणीतश्रीधर्मे रतिं कुरु सुहि सजणु अवहेरि संसारसुखसहकारिकारणभूतं स्वजनं गोत्रमप्यपहर त्यज । कस्मात् । तिं वप्पेणवि तेन स्नेहितपित्रापि कज्जु णवि कार्य नैव । यः किं करोति । जो पाडइ यः पातयति । क । संसारि संसारसमुद्रे । तथाच । हे आत्मन् अनादिकाले दुर्लभे वीतरागसर्वज्ञप्रणीते रागद्वेपमोहरहिते जीवपरिणामलक्षणे शुद्वोपयोगरूपे निश्चयधर्मे व्यवहारधर्मे च पुनः पडावश्यकादिलक्षणे गृहस्थापेक्षया दानपूजादिलक्षणे वा शुभोपयोगस्वरूपे रतिं कुरु । धर्म नही धारण किया तथा मुनि होकर सब पदार्थोंकी इच्छाका निरोध कर अनशन वगैरः चारह प्रकारका तप नहीं किया तपश्चरणके बलसे शुद्धात्माके ध्यानमें ठहरकर निरंतर भावना नही की मनुष्यके शरीररूप चर्ममयी वृक्षको पाकर यतीका व श्रावकका धर्म नही किया उनका शरीर वृद्धावस्थारूप दीमक कीड़े खावेंगे फिर वह नरकमें जावेगा । इसलिये गृहस्थको तो यह योग्य है कि निश्चयरलत्रयकी श्रद्धाकर निजस्वरूप उपादेय जान व्यवहार रत्नत्रयरूप श्रावकका धर्म पालना । और यतीको यह योग्य है कि निश्चय रत्नत्रयमें ठहरकर व्यवहार रतत्रयके बलसे महा तप करना । अगर यतीका व श्रावकका धर्म नही वना अणुव्रत महाव्रत नही पाले तो महा दुर्लभ मनुष्यदेहका पाना निष्फल है उससे कुछ फायदा नहीं ॥ २६३ ॥ आगे श्रीगुरु शिप्यको यह शिक्षा देते हैं कि तू मुनिराजके चरणारविंदोंकी परमभक्ति कर [अहो जीव] हे भव्य जीव तू [ जिनपदे ] जिनपदमें [ भक्तिं कुरु ] भक्ति कर और जिनेश्वरके कहे हुए जिनधर्ममें प्रीति कर [सुखे] संसार सुखके निमित्तकारण [स्वजनं ] जो अपने कुटुंबके जन उनको [ परिहर] त्याग अन्यकी तो वात क्या है तेन पित्रापि नैव कार्य ] उस महालेहरूप पितासे भी कुछ काम नहीं है [यः] जो [संसारे ] ससारसमुद्र में इस जीवको [पातयति ] पटक देवे । भावार्थ-हे आत्माराम २८० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । इत्थंभूते धर्मे प्रतिकूलो यः तं मनुष्यं स्वगोत्रजमपि त्यज तदनुकूलं परगोत्रजमपि स्वीकु- विति । अनार्य भावार्थः । विपयसुखनिमित्तं यथानुरागं करोति जीवस्तथा जिनधर्म करोति तर्हि संसारे न पततीति । तथा चोक्तं । "विसयहं कारणि सव्वु जणु जिम अणुराउ करेइ । तिम जिणभासिए धम्मि जइ ण उ संसारि पडेइ" ॥ २६४ ।। अथ येन चित्तशुद्धिं कृत्वा तपश्चरणं न कृतं तेनामानं वंचितमित्यभिप्रायं मनसि धृत्वा सूत्रमिदं प्रतिपादयति;- जेण ण चिण्णउ तपयरणु, णिम्मलु चित्तु करेवि । अप्पा वंचिउ तेण पर, माणुसजम्मु लहेवि ॥ २६५ ॥ येन न चीण तपश्चरणं निर्मलं चित्तं कृत्वा । आत्मा वंचितः तेन परं मनुष्यजन्म लब्ध्वा ॥ २६५ ॥ जेण इत्यादि । जेण येन जीवेन ण चिण्णउ न चीर्ण न चरितं न कृतं । किं । तवयरणु बाह्याभ्यंतरतपश्चरणं । किं कृत्वा । णिम्मलु चित्तु करेवि कामक्रोधादिरहितं वीतरागचिदानंदैकसुखामृतमं निर्मलं चित्तं कृत्वा अप्पा वंचिउ तेण आसानं वंचितं तेन नियमेन । किं कृत्वा । लहेवि लब्ध्वा । किं । माणुसजम्मु मनुष्यजन्मेति । तथाहि । दुर्लभपरंपरारूपेण मनुष्यभवे लब्धे तपश्चरणेपि च निर्विकल्पसमाधिवलेन रागादिपरिहारेण चित्तशुद्धिः कर्तव्येति । येन चित्तशुद्धिर्न कृता स आमवंचक इति भावार्थः । तथा चोक्तं। अनादिकालसे दुर्लभ जो वीतराग सर्वज्ञका कहा हुआ रागद्वेप मोह रहित शुद्धोपयोग- रूप निश्चयधर्म और शुभोपयोगरूप व्यवहारधर्म उसमें भी छह आवश्यकरूप यतीका धर्म तथा दान पूजादि श्रावकका धर्म, यह शुभाचाररूप दो प्रकार धर्म उसमें प्रीति कर । इस धर्मसे विमुख जो अपने कुलका मनुष्य उसे छोड और इस धर्मके सन्मुख जो पर कुटुंबका भी मनुष्य हो उससे प्रीति कर । तात्पर्य यह है कि यह जीव जैसे विष- यसुखसे प्रीति करता है वैसे जो जिनधर्मसे करे तो संसारमें नही भटके । ऐसा दूसरी जगह भी कहा है कि जैसे विषयोंके कारण यह जीव वारंवार प्रेम करता है वैसे जो जिनधर्ममें करे तो संसारमें भ्रमण न करे ॥ २६४ ॥ आगे जिसने चित्तकी शुद्धता करके तपश्चरण नहीं किया उसने अपना आत्मा ठग लिया यह अभिप्राय मनमें रखकर व्याख्यान करते हैं;-[येन] जिस जीवने [तपश्च- रणं] बाह्याभ्यंतर तप [न चीर्ण ] नहीं किया [ निर्मलं चित्रं] महा निर्मल चित्त [कृत्वा ] करके [तेन] उसने [ मनुष्यजन्म ] मनुष्यजन्मको [लब्ध्वा] पाकर [परं] केवल [-आत्मा वंचितः ] अपना आत्मा ठग लिया । भावार्थ-महान दुर्लभ इस मनुष्यदेहको पाकर जिसने विषयकषाय सेवन किये और क्रोधादि रहित वीतराग चिदानंद परमात्मप्रकाशः। २८१ "चित्ते बद्धे बद्धो मुक्के मुक्कोत्ति णत्थि संदेहो । अप्पा विमलसहावो मइलिजइ मइलिए चित्ते ॥ २६५ ॥ अथ पंचेद्रियविजयं दर्शयति;- ए पंचिंदियकरहडा, जिय मोकला म चारि । चरिवि असेसु वि विसयवणु, पुणु पाडहिं संसारि ॥ २६६ ॥ एते पंचेंद्रियकरहटा जीव खेच्छया मा चारय । चरित्वा अशेपं अपि विषयवनं पुनः पातयंति संसारे ॥ २६६ ॥ ए इत्यादि । ए एते प्रत्यक्षीभूताः पंचिंदियकरहडा अतींद्रियसुखाखादरूपात्परमा- स्मनः सकाशात् प्रतिपक्षभूताः पंचेद्रियकरहटा उष्ट्राः जिय हे मूढजीव मोकला म चारि स्वशुद्धात्मभावनोत्थवीतरागपरमानंदैकरूपसुखपराड्मुखो भूत्वा खेच्छया मा चारय व्याघुट्टय । यतः किं कुर्वति । पाडहिं पातयंति । कं । जीवं । क । संसारे निःसंसारशु- द्वात्मप्रतिपक्षभूते पंचप्रकारसंसारे पुणु पश्चात् । किं कृत्वा पूर्व । चरिवि चरित्वा भक्षणं कृत्वा । कि । विसयवणु पंचेद्रियविषयवनमित्यभिप्रायः ॥ २६६ ॥ सुखरूपी अमृतकर प्राप्त अपना निर्मल चित्त करके अनशनादि तप न किया वह आत्मघाती है अपने आत्माका ठगनेवाला है । एकेंद्री पर्यायसे विकलत्रय होना दुर्लभ है, विकलत्रयसे असेनी पंचेंद्री होना, असेनी पंचेद्रियसे सेनी होना, सेनी तियेचसे मनुष्य होना दुर्लभ है। मनुष्यमें भी आर्यक्षेत्र उत्तमकुल दीर्घ आयु सतसग धर्मश्रवण धर्मका धारण और उसे जन्मपर्यंत निवाहना ये सब वाते दुर्लभ हैं सबमें दुर्लभ ( कठिन) आत्मज्ञान है जिससे कि चित्त शुद्ध होता है । ऐसा महादुर्लभ मनुष्यदेह पाकर तपश्चरण अंगीकार करके निर्विकल्प समाधिके वलसे रागादिका त्यागकर परिणाम निर्मल करने चाहिये । जिन्होंने चित्तको निर्मल नही किया वे आत्माको ठगनेवाले हैं। ऐसा दूसरी जगह भी कहा है कि चित्तके बंधनेसे यह जीव काँसे बंधता है। जिनका चित्त धन धान्यादिकसे आसक्त हुआ वे ही कर्मबंधसे बंधते हैं और जिनका चित्त परिग्रहसे छूटा आशा (तृष्णा ) से अलग हुआ वेही मुक्त हुए । इसमें सदेह नही है । यह आत्मा निर्मलखमाव है सो चित्तके मैले होनेसे मैला होता है ॥ २६५ ॥ आगे पांच इंद्रियोंका जीतना दिखलाते हैं;-[ एते] ये प्रत्यक्ष [पंचेंद्रियकरहटाः] पांचइंद्रीरूपी ऊंट है उनको [खेच्छया] अपनी इच्छासे [मा चारय] मत चरने दे क्योंकि [ अशेपं] संपूर्ण [ विषयवनं] विषयवनको [चरित्वा] चरके [पुनः] फिर ये [ संसारे] ससारमें ही [पातयंति ] पटक देंगे । भावार्थ-ये पाच इंद्री अतींद्रियसुखके आस्वादनरूप परमात्मामें परान्मुख है उनको हे मूढजीव तू शुद्धात्माकी

,
२८२
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अथ ध्यानवैषम्यं कथयति:-
जोइय विसमी जोयगइ, मणु संठवण ण जाइ ।
इंदियविसय जि सुक्खडा, तित्थु जि वलि वलि जाइ ।। २६७ ।।
योगिन् विषमा योगगतिः मनः संस्थापयितुं न याति ।
इंद्रियविषयेषु एव सुखानि तत्र एव पुनः पुनः याति ॥ २६७ ॥
जोइय इत्यादि । जोइय हे योगिन् विसमी जोयगइ विपमा योगगतिः । कस्मात् ।
मणु संठवण ण जाइ निजशुद्धासन्यतिचपलं मर्कटप्रायं मनो धर्तुं न याति । नापि
कस्मात् । इंदियविसय जि सुक्खडा इंद्रियविपयेषु यानि सुखानि वलि बलि तित्थु
जि जाइ वीतरागपरमाहादसमरसीभावपरमसुखरहितानां अनादिवासनावासितपंचेंद्रिय-
विषयसुखास्वादासक्तानां जीवानां पुनः पुनः तत्रैव गच्छतीति भावार्थः ॥ २६७ ॥
अथ स्थलसंख्यावाचं प्रक्षेपकं कथयति,-
सो जोइड जो जोगवइ, दंसणु णाणु चरित्तु ।
होयवि पंचहं बाहिरउ, झायंतउ परमत्थु ॥ २६८ ॥
स योगी यः पालयति दर्शनं ज्ञानं चारित्रं ।
भूत्वा पंचभ्यः वायः ध्यायन् परमार्थ ॥ २६८ ॥
भावनासे परान्मुख होकर इनको स्वच्छंद मतकर अपने वशमें रख, ये तुझे ससारमें
पटकदेंगे इसलिये इनको विषयोंसे पीछे लौटा । संसारसे रहित जो शुद्ध आत्मा उससे
उलटा जो द्रव्य क्षेत्र काल भव भावरूप पांच प्रकारका संसार उसमें ये पंचेन्द्रीरूपी
ऊंट खच्छंद हुए विषयवनको चरके जगतके जीवोंको जगतमें ही पटकदेंगे यह
तात्पर्य जानना ।। २६६ ॥
आगे ध्यानकी कठिनता दिखलाते हैं;- योगिन् ] हे योगी [ योगगतिः ] ध्या-
नकी गति [विषमा] महाविषम है क्योंकि [मनः] चित्तरूपी वंदर चपल होनेसे
[संस्थापयितुं न याति ] निजशुद्धात्मामें स्थिरताको नही प्राप्त होता । क्योंकि [इंद्रि-
यविषयेषु एव ] इंद्रियके विषयोंमें ही [सुखानि ] सुख मान रहा है इसलिये [ तत्र
एव ] उन्ही विषयोमें [पुनः पुनः ] फिर फिर अर्थात् वार वार [याति ] जाता है ।
भावार्थ-वीतराग परम आनंद समरसीभावरूप अतीद्रियसुखसे रहित जो यह संसारी
जीव है उसकाः मन अनादिकालकी अविद्याकी वासनामें वस रहा है इसलिये पंचें-
द्रियोंके विषयसुखोंमें आसक्त है इन जगतके जीवोंका मन वारंवार विषयसुखोंमें जाता
है और निजखरूपमें नहीं लगता है इसलिये ध्यानकी गति विषम ( कठिन)
है ॥ २६७ ॥

परमात्मप्रकाशः. २८३ सो इत्यादि । सो जोइउ स योगी ध्यानी भण्यते । यः किं करोति । जो जोगवड यः कर्ता प्रतिपालयति रक्षति । किं । दसणु णाणु चरितु निजशुद्धामद्रव्यसन्यश्रद्धान- जानानुचरणरूपं निश्चयरत्नत्रयं । किं कृत्वा । होयवि भूत्वा । कथंभूतं । बाहिरउ वाह्यः । केभ्यः । पंचहं परमेष्टिभावनाप्रतिपक्षभूतेभ्यः पंचमगतिसुखविनाशकेभ्यः पंचेंद्रियेभ्यः । किं कुर्वाणः । झायंतउ ध्यायन् सन् । कं । परमत्थु परमार्थशब्दवाच्यं विशुद्धन्नानदर्शनस्वभावं परमासानमिति तात्पर्य । योगशब्दस्यार्थः कथ्यते–'युज' समाधौ धातुरिति निष्पन्नेन योगशब्देन वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरुच्यते । अथवानंतज्ञाना- दिरूपे स्वशुद्धासनि योजनं परिणमनं योगः स इत्थंभूतो योगो यस्यास्तीति स तु योगी ध्यानी तपोधन इत्यर्थः ॥ २६८ ॥ अथ पंचेंद्रियसुखस्यानित्यत्वं दर्शयति;- विसयसुहई बे दिवहडा, पुणु दुक्खहं परिवाडि । भुल्लउ जीव म वाहि तुहुं, अप्पण खंधि कुहाडि ॥ २६९ ।। विषयसुखानि द्वे दिवसके पुनः दुःखानां परिपाटी । भ्रांत जीव मा वाहय त्वं आत्मनः स्कंधे कुठारं ॥ २६९ ॥ विसय इत्यादि । विसयसुहई निर्विषयान्नित्याद्वीतरागपरमानंदैकखभावात् परमास- सुखात्प्रतिकूलानि विपयसुखानि वे दिवहडा दिनद्वयस्थायीनि भवंति पुणु पुनः पश्चादि- नद्वयानंतरं दुक्खहं परिवाडि आत्मसुखबहिर्मुखेन विषयासक्तेन जीवेन यान्युपार्जितानि पापानि तदुदयजनितानां नारकादिदुःखानां परिपाटि प्रस्तावः एवं ज्ञात्वा भुल्लउ जीव आगे स्थलसख्याके वाह्य जो प्रक्षेपक दोहा है उसको कहते हैं;-[ स योगी ] वही ध्यानी है [य] जो [पंचभ्यः वाह्यः ] पंचेद्रियोंसे बाहर (अलग ) [ भूत्वा ] होकर [परमार्थ ] निज परमात्माका [ध्यायन् ] ध्यान करता हुआ [ दर्शनं ज्ञानं चारित्रं ] दर्शन ज्ञान चारित्ररूपी रत्नत्रयको [ पालयति ] पालता है रक्षा करता है । भावार्थ- जिसके परिणाम निज शुद्धात्मद्रव्यका सम्यक्श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप निश्चयरत्नत्रयमें ही लीन हैं, जो पंचमगतिरूपी मोक्षके सुखको विनाश करनेवाली और पांचपरमेष्ठीकी भावनासे रहित ऐसी पंचेंद्रियोंसे जुदा होगया है वहीं योगी है । योग शब्दका अर्थ ऐसा है कि अपना मन चेतनमें लगाना वह योग जिसके हो वही योगी है वही ध्यानी है वही तपोधन है यह निःसदेह जानना ॥ २६८ ।। आगे पंचेंद्रियोंके सुखको विनाशीक बतलाते हैं,-विषयसुखानि ] विषयोंके सुख [द्वे दिवसके ] दो दिनके हैं [पुनः] फिर वादमें [ दुःखानां परिपाटी] ये विषय ૨૮૪ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । हे भ्रांत जीव म वाहि तुहं मा निक्षिप त्वं । कं । कुहाडि कुठारं । क । अप्पणखंधि आत्मीयस्कंधे । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा विषयसुखं त्यक्त्वा वीतरागपरमात्मसुखे च स्थित्वा निरंतरं भावना कर्तव्येति भावार्थः ॥ २६९ ।। अथात्मभावनार्थ योसौ विद्यमानविपयान त्यजति तस्य प्रशंसां करोति;- संता विसय जु परिहरइ, वलि किजउं हर तासु । सो दइवेण जि मुंडियउ, सीसु खडिल्लउ जासु ॥ २७० ॥ सतः विषयान् यः परिहरति बलिं करोमि अहं तस्य । स देवेन एव मुंडितः शीर्ष खल्वाट यस्य ॥ २७० ।। संता इत्यादि। संता विसय कटुकविषप्रख्यान किंपाकफलोपमानलब्धपूर्वनिरुपरा- गशुद्धामतत्त्वोपलंभरूपनिश्चयधर्मचौरान विद्यमानविपयान् जो परिहरइ यः परिहरति वलि किजउं हउँ तासु बलिं पूजां करोमि तस्याहमिति । श्रीयोगीद्रदेवाः खकीयगुणा- नुरागं प्रकटयंति । विद्यमाने विषयत्यागे दृष्टांतमाह । सो दइवेण जि मुंडियउ स दैवेन मुंडितः । स कः । सीसु खडिल्लउ जासु शिरः खल्वाटं यस्येति । अत्र पूर्वकाले देवागमनं दृष्ट्वा सप्तर्द्धिरूपं धर्मातिशयं दृष्ट्वा अवधिमनःपर्ययकेवलज्ञानोत्पत्तिं दृष्ट्वा भरतसगररामपां- दुःखकी परिपाटी हैं ऐसा जानकर [भ्रांत जीव ] हे भोले जीव [त्वं] तू [आत्मनः स्कंधे ] अपने कंधेपर [ कुठारं] आप ही कुल्हाड़ीको [मा वाहय] मत चलावै । भावार्थ-ये विषय क्षणभंगुर हैं वारंवार दुर्गतिके दुःखके देनेवाले हैं इसलिये विषयोंका सेवना अपने कंधेपर कुल्हाड़ीका मारना है अर्थात् नरकमें अपनेको डवोना है ऐसा व्याख्यान जानकर विषयसुखोंको छोड वीतराग परमात्मसुखमें ठहर कर निरंतर शुद्धोपयोगकी भावना करनी चाहिये ।। २६९ ॥ आगे आत्मभावनाकेलिये जो विद्यमान विषयोंको छोड़ता है उसकी प्रशंसा करते हैं;-[यः] जो कोई ज्ञानी [ सतः विषयान् ] विद्यमान विषयोंको [परिहरति] छोड़ देता है [ तस्य ] उसकी [अहं ] मै [बलिं ] पूजा [करोमि] करता हूं क्योंकि [यस्य शीर्ष ] जिसका शिर [खल्वाट] गंजा है [सः] वह तो [ दैवेन एव] दैवकर ही [मुंडितः ] मूड़ा हुआ है वह मुंडित नही कहा जा सकता । भावार्थ-जो देखनेमें मनोज्ञ ऐसा इंद्राइनिका विषफल उसके समान ये मौजूद विषय हैं वे वीतराग शुद्धात्मतत्त्वकी प्राप्तिरूप निश्चयधर्मखरूप रत्नके चोर हैं उनको जो ज्ञानी छोडते हैं उनकी बलिहारी श्रीयोगींद्रदेव करते हैं अर्थात् अपना गुणानुराग प्रगट करते है जो वर्तमान विषयोंके प्राप्त होनेपर भी उनको छोडते है वे महापुरुषोंकर प्रशंसा योग्य है , परमात्मप्रकाशः। २८५ अवादिकमनेकराजाधिराजमणिमुकुटकिरणकलापचुंवितपादारविंदजिनधर्मरतं दृष्ट्वा च परमा- मभावनार्थ केचन विद्यमानविषयत्यागं कुर्वति तद्भावनारतानां दानपूजादिकं च कुर्वति तत्राश्चर्य नास्ति । इदानीं पुनः । "देवागमपरिहीणे कालेतिशयवर्जिते । केवलोत्पत्तिहीने तु हलचक्रधरोज्झिते” इति श्लोककथितलक्षणे दुष्षमकाले यत्कुर्वति तदाश्चर्यमिति भावार्थः ॥ २७०॥ अथ मनोजये कृते सतींद्रियजयः कृतो भवतीति प्रकटयति, पंचहं णायकु वसि करहु, जेण होंति वसि अण्ण । मूल विणट्ट तरुवरह, अवसई सुकहिं पण ॥ २७१ ॥ पंचानां नायकं वशं कुरुत येन भवंति वशीनि अन्यानि । मूले विनष्टे तरुवरस्य अवश्यं शुष्यंति पर्णानि ॥ २७१ ॥ अर्थात् जिनके सपदा मौजूद है वे सव त्यागकर वीतरागके मारगको आराधे वे तो सत्पुरुपोंसे सदा ही प्रशंसाके योग्य है और जिसके कुछ भी तो सामग्री नहीं है परंतु तृष्णासे दुःखी होरहा है अर्थात् जिसके विषय तो विद्यमान नही है तौभी अभिलाषी है वह महा निंद्य है । जो चतुर्थकालमें तो इस क्षेत्रमें देवोंका आगमन था उनको देखकर धर्मकी रुचि होती थी और नानाप्रकारकी ऋद्धियोंके धारी महामुनियोंका अतिशय देखकर ज्ञानकी प्राप्ति होती थी तथा अन्य जीवोंको अवधि मनःपर्यय केवलज्ञानकी उत्पत्ति देखकर सम्यत्त्वकी सिद्धि होती थी । जिनके चरणारविदोंको बड़े २ मुकुटधारी राजा नमस्कार करते है ऐसे बडे २ राजाओंकर सेवनीक भरत सगर राम पाडवादि अनेक चक्रवर्ति बलभद्र नारायण तथा मंडलीकराजाओंको जिनधर्ममें लीन देखकर भव्य जीवोंको जिनधर्मकी रुचि उपजती थी तब परमात्मभावनाकेलिये विद्यमान विषयोंका त्याग करते थे । और जवतक गृहस्थपनेमें रहते थे तवतक दानपूजादि शुभ क्रियायें करते थे चारप्रकारके सघकी सेवा करते थे । इसलिये पहले समयमें तो ज्ञानोत्पत्तिके अनेक कारण थे ज्ञान उत्पन्न होनेका अचंभा नहीं था । लेकिन अब इस पंचमकालमें इतनी सामग्री नही है । ऐसा कहा भी है कि इस पंचमकालमें देवोंका आगमन तो बंद होगयाहै और कोई अतिशय नहीं देखा जाता । यह काल धर्मके अतिशयसे रहित है और केवलज्ञानकी उत्पत्तिसे रहित है तथा हलधर चक्रवर्ती आदि शलाका पुरुषोंसे रहित है ऐसे दुःषमकालमें जो भव्य जीव धर्मको धारण करते है यती श्रावकके व्रत आचरते है यह अचंभा है । वे पुरुष धन्य हैं सदा प्रशंसा योग्य है ॥ २७० ।। आगे मनके जीतनेसे इंद्रियोंका जय होता है जिसने मनको जीता उसने सब २८६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । .. पंचहं इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । पंचहं पंचज्ञानप्रतिपक्षभूतानां पंचेंद्रियाणां णायकु रागादिविकल्परहितपरमात्मभावनाप्रतिकूलं दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षा- रूपप्रभृतिसमस्तापध्यानजनितविकल्पजालरूपं मनो नायकं हे भव्याः वसि करहु विशिष्ट- भेदभावनांकुशबलेन स्वाधीनं कुरुत । येन स्वाधीनेन किं भवति । जेण हुंति वसि अण्ण येन वशीकृतेनान्यानींद्रियाणि वशीभवंति । दृष्टांतमाह । मूल विणइ तरुवरहं मूले विनष्टे तरोवृक्षस्य अवसई सुक्कहि पण्ण अवश्यं नियमेन शुप्यंति पर्णानि इति । अयमत्र भावार्थः । निजशुद्धात्मतत्त्वभावनार्थ येन केनचित्प्रकारेण मनोजयः कर्तव्यः तस्मिन् कृते जितेंद्रियो भवति । तथा चोक्तं ! "येनोपायेन शक्येत सनियंतुं चलं मनः । स एवोपाल- नीयोत्र न चैव विरमे ततः ॥ २७१ ।। अथ हे जीव विपयासक्तः सन् कियनं कालं गमिप्यसीति संबोधयति,- विसयासत्तउ जीव तुहं, कित्तिउ कालु गमीसि । सिवुसंगसु करि णिचलउ, अवसिं मुक्खु लहीसि ।। २७२ ॥ विषयासक्तः जीव त्वं कियंतं कालं गमिप्यसि । शिवसंगमं कुरु निश्चलं अवश्यं मोक्षं लभसे ॥ २७२॥ - 2 इन्द्रियोंको जीतलिया ऐसा व्याख्यान करते है।- [पंचानां नायकं] पांच इंद्रियों के खामी मनको [वशं कुरुत] तुम वशमें करो [येन] जिस मनके वश होनेसे [अन्यानि वशीनि भवंति] अन्य पांच इंद्रिये वशमें हो जाती है । जैसे कि [तरुवरस्य वृक्षकी [ मूले विनष्टे ] जड़के नाश होजानेसे [पर्णानि ] पत्ते [अवश्यं शुष्यंति] निश्चयसे सूख जाते हैं। भावार्थ-पांचवां ज्ञान जो केवलज्ञान उससे परान्मुख स्पर्श रसना घ्राण चक्षु श्रोत्र इन पांच इंद्रियोंका खामी मन है जो कि रागादि विकल्परहित परमात्माकी भावनासे विमुख और देखे सुने भोगे हुए भोगोंकी वांछा रूप आत रौद्र खोटे ध्यानोंको आदि लेकर अनेक विकल्पजालमई मन है । ऐसा यह चंचलमनरूपी हस्ती उसको भेद विज्ञानकी भावनारूप अंकुशके वलसे वशमें करो अपने आधीन करो। जिसके वश करनेसे सब इंद्रियें वशमें होसकती हैं जैसे जडके टूट जानेसे वृक्षके पत्ते आप ही सूख जाते हैं । इसलिये निज शुद्धात्मकी भावनाकेलिये जिस तिस तरह मनको जीतना चाहिये । ऐसा ही अन्य जगह भी कहा है कि, जिस उपायसे चंचल मन वश होसकै वही उपाय सर्वथा खीकार करना चाहिये उस उपायसे उदास नही होना । जगतसे उदास होकर मन जीतनेका उपाय करना ।। २७१ ॥ आगे जीवको उपदेश देते हैं कि हे जीव तू विषयोंमें लीन होकर अनंतकाल तक भटका और अव भी विषयासक्त है सो विषयासक्त हुआ कितने कालतक भटकेगा अव है परमात्मप्रकाशः। २८७ विसय इत्यादि । विसयासत्तउ शुद्धात्मभावनोत्पन्नवीतरागपरमानंदस्वेदिपारमार्थिक- सुखानुभवरहितत्वेन विपयासक्तो भूत्वा जीव हे अज्ञानजीव तुहं त्वं कित्तिउ काल गमीसि कियंतं कालं गमिप्यसि वहिर्मुखभावेन नयसि । तर्हि कि करोमीति प्रत्युत्तरमाह । सिवसंगमु करि शिवशब्दवाच्यो योसौ केवलज्ञानदर्शनखभावस्वकीयशुद्धाला तत्र संगम संसर्ग कुरु । कथंभूतं । णिचलउ घोरोपसर्गपरीषहप्रस्तावेपि मेरुवन्निश्चलं तेन निश्चलात्म- ध्यानेन अवसइ मुक्खु लहीसि नियमेनानंतज्ञानादिगुणास्पदं मोक्षं लभसे त्वमिति तात्पर्यम् ॥ २७२ ॥ अथ शिवशब्दवाच्यखशुद्धात्मसंसर्गत्यागं मा कास्त्विमिति पुनरपि संबोधयति,- इहु सिवसंगमु परिहरिवि, गुरुवड कहिं वि म जाहि । जे सिवसंगमि लीण णवि दुक्खु सहता वाहि ॥ २७३ ॥ इमं शिवसंगम परिहत्य गुरुवर कापि मा गच्छ । ये शिवसंगमे लीना नैव दुःखं सहमानाः पश्य ॥ २७३ ॥ इह इत्यादि । इहु इमं प्रत्यक्षीभूतं शिवसंगम शिवसंसर्ग शिवशब्दवाच्योऽनंतज्ञानादि- स्वभावः स्वशुद्वात्मा तस्य रागादिरहितं संबंधं परिहरिवि परिहत्य त्यत्तवा गुरुवड तपोधन कहिंवि म जाहि शुद्धात्मभावनाप्रतिपक्षभूते मिथ्यात्वरागादौ कापि गमनं तो मोक्षका साधन कर ऐसा संबोधन करते हैं;-जीव ] हे अज्ञानी जीव [त्वं] तू [विपयासक्तः] विषयोंमें आसक्त होके [ कियंतं कालं ] कितना काल [ गमिष्यसि ] वितायेगा [शिवसंगमं] अव तो शुद्धात्माका अनुभव [निश्चलं] निश्चलरूप [ कुरु कर, जिससे कि [अवश्य ] अवश्य [ मोक्षं ] मोक्षको [ लभसे ] पावेगा। भावार्थ- है अज्ञानी तू शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न वीतराग परम आनंदरूप अविनाशी सुखके अनुभवसे रहित हुआ विषयोंमें लीन होकर कितने कालतक भटकेगा। पहले तो अनंतकाल तक भ्रमा अब भी भ्रमणसे नही थका सो बहिर्मुखपरिणामकरके कब तक भटकेगा । अव तो केवलज्ञान दर्शनरूप अपने शुद्धात्माका अनुभवकर निज भावोंका सबंध कर । घोर उपसर्ग और बाईस परीसहकी उत्पत्तिमें भी सुमेरुके समान निश्चल जो आत्मध्यान उसको धारण कर । उसके प्रसादसे निःसदेह मोक्ष पावेगा । जो मोक्ष पदार्थ अनंत ज्ञान अनंत दर्शन अनंत सुख अनंत वीर्यादि अनंत गुणोंका ठिकाना है सो विपयके त्यागसे अवश्य मोक्ष पावेगा ॥ २५२ ॥ आगे निजखरूपका संसर्ग त मत छोडै निजखरूप ही उपादेय है ऐसा ही वार २ उपदेश करते हैं;-[गुरुवर] हे तपोधन [शिवसंगं] आत्मकल्याणको [ परिहत्य] छोडकर [कापि] तू कही भी [मा गच्छ ] मत जा [ये] जो कोई अज्ञानी जीव २८८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । मा कापीः जे सिवसंगमु लीण णवि ये केचन विपयकपायाधीनतया शिवशब्दवाच्ये खशुद्धात्मनि लीनास्तन्मया न भवंति दुक्खु सहता वाहि व्याकुलत्वलक्षणं दुक्खं सहमानास्संतः पश्येति । अत्र स्वकीयदेहे निश्चयनयेन तिष्ठति योसौ केवलजानाधनंतगु- णसहितः परमात्मा स एव शिवशब्दत्वेन सर्वत्र ज्ञातव्यो नान्यः कोपि शिवनामा व्याप्येको जगत्कर्तेति भावार्थः ॥ २७३ ॥ अथ सम्यक्त्वदुर्लभत्वं दर्शयति;- काल अणाइ अणाइ जिउ, भवसायरुवि अणंतु। जीविं विणि ण पत्ताई, जिणु सामिउ सम्मत्तु ॥ २७४ ॥ कालः अनादिः अनादिः जीवः भवसागरोपि अनंतः । जीवेन द्वे न प्राप्ते जिनः खामी सम्यक्त्वं ।। २७४ ॥ कालु इत्यादि । कालु अणाइ गतकालो अनादिः अणाइ जिउ जीवोप्यनादिः भवसायरुवि अणंतु भवः संसारस्स एव समुद्रः सोप्यनादिरनंतश्च जीविं विण्णि ण पत्ताई एवमनादिकाले मिथ्यात्वरागाद्यधीनतया निजशुद्धात्मभावनाच्युतेन जीवेन द्वयं न लब्धं । द्वयं किं । जिणु सामिउं सम्मत्तु अनंतज्ञानादिचतुष्टयसहितः क्षुधाद्यष्टादशदोप- , .. [शिवसंगमे] निजभावमें [नैव लीनाः] नहीं लीन होते हैं वे सव [दुःखं] दुःखको [ सहमानाः ] सहते हैं ऐसा तू [ पश्य ] देख । भावार्थ-यह आत्मकल्याण प्रत्यक्षमें संसार सागरके तैरनेका उपाय है उसको छोड़कर हे तपोधन तू शुद्धात्माकी भावनाके शत्रु जो मिथ्यात्वरागादि हैं उनमें कभी गमन मत कर केवल आत्मखरूपमें मगन रह । जो कोई अज्ञानी विषयकषायके वश होकर शिवसंगम (निजभाव) में लीन नही रहते उनको व्याकुलतारूप दुःख भववनमें सहता देख । संसारी जीव सभी व्याकुल हैं दुःख रूप हैं कोई सुखी नहीं है एक शिवपद ही परम आनंदका धाम है । जो अपने खभावमें निश्चयनयकर ठहरनेवाला केवल ज्ञानादि अनंतगुण सहित परमात्मा उसीका नाम शिव है ऐसा सब जगह जानना । अथवा निर्वाणका नाम शिव है अन्य कोई शिव नामका पदार्थ नही है, जैसा कि नैयायिक वैशेषिकोंने जगतका कर्ता हर्ता कोई शिव माना है ऐसा तू मत मानें । तू अपने खरूपको अथवा केवलज्ञानियोंको अथवा , मोक्षपदको शिव समझ । यही श्री वीतरागदेवकी आज्ञा है ॥ २७३ ॥ आगे सम्यग्दर्शनको दुर्लभ दिखलाते हैं;-[कालः अनादिः] काल भी अनादि है [जीवो अनादिः] जीव भी अनादि है और [ भवसागरोपि] संसारसमुद्र भी [अनंतः] अनादि अनंत है। लेकिन [जीवेन ] इस जीवने [जिनः खामी सम्यक्त्वं ] परमात्मप्रकाशः। २८९ रहितो जिनस्वामी परमाराध्यः । "सिवसंगमु सम्मत्तु" इति पाठांतरे स एव शिव- शब्दवाच्यो न चान्यः पुरुपविशेषः । सम्यक्त्वशब्देन तु निश्चयेन शुद्धात्मानुभूतिलक्षणं वीतरागसम्यक्त्वं व्यवहारेण तु वीतरागसर्वज्ञप्रणीतसङ्गव्यादिश्रद्धानरूपं सरागसम्यक्त्वं चेति भावार्थः ।। २७४ ॥ जिनराज स्वामी और सम्यक्त्व [द्वे ] ये दो [न प्राप्ते ] नही पाये । भावार्थ- काल जीव संसार ये तीनों अनादि हैं उसमें अनादिकालसे भटकते हुए इस जीवने मिथ्यात्वरागादिकके वश होकर शुद्धात्मखरूप अपना न देखा न जाना । यह ससारी जीव अनादिकालसे आत्मज्ञानकी भावनासे रहित है । इस जीवने खर्ग नरक राज्यादि सव पाये परंतु ये दो वस्तु न मिली एक तो सम्यग्दर्शन न पाया दूसरे श्रीजिनराज खामी न पाया । यह जीव अनादिका मिथ्यादृष्टि है और क्षुद्र देवोंका उपासक है। श्रीजिनराज भगवानकी भक्ति इसके कभी नहीं हुई अन्य देवोंका उपासक हुआ सम्यग्दर्शन नहीं हुआ। यहा कोई प्रश्न करे कि अनादिका मिथ्यादृष्टि होनेसे सम्यक्त्व नहीं उत्पन्न हुआ यह तो ठीक है परंतु जिनराजखामी न पाये ऐसा नही होसकता क्योंकि "भवि भवि जिण पुजिउ गुरु वंदिउ" ऐसा शास्त्रका वचन है अर्थात् भव भवमें इस जीवने जिनवर पूजे और गुरू वंदे । परंतु तुम कहते हो कि इस जीवने भववनमें भ्रमते जिनराजस्वामी नही पाये ॥ उसका समाधान ॥ जो भावभक्ति इसके कभी न हुई भावभक्ति तो सम्यग्दृष्टीके ही होती है और बाघलौकिक भक्ति इसके संसारके प्रयोजनके लिये हुई वह गिनतीमें नही । ऊपरकी सबवात निःसार (थोथी) है भाव ही कारण होते है सो भावभक्ति मिथ्यादृष्टिके नहीं होती। ज्ञानी जीव ही जिनराजके दास है सो सम्यक्त्व विना भावभक्तिके अभावसे जिनस्वामी नहीं पाया इसमें सदेह नहीं है । जो जिनवर स्वामीको पाते तो उसीके समान होते ऊपरली लोगदिखावारूप भक्ति हुई तो किस कामकी, यह जानना । अब श्री जिनदेवका और सम्यग्दर्शनका खरूप सुनो । अनंत ज्ञानादि चतुष्टय सहित और क्षुधादि अठारह दोष रहित हैं वे जिनखामी हैं वे ही परम आराधने योग्य है तथा शुद्धात्मज्ञानरूप निश्चयसम्यक्त्व (वीतराग सम्यत्तव) अथवा वीतराग सर्वज्ञदेवके उपदेशे हुए षट् द्रव्य सात तत्त्व नौ पदार्थ और पाच अस्तिकाय उनका श्रद्धानरूप सराग सम्यक्त्व ये निश्चय व्यवहार दो प्रकारका सम्यक्त्व है। निश्चयका नाम वीतराग है व्यवहारका नाम सराग है। एक तो चौथे पदका यह अर्थ है और दूसरे ऐसा पाठ है "सिवसगम सम्मत्त" इसका अर्थ ऐसे है कि शिव जो श्री जिनेंद्रदेव उनका सगम अर्थात् भावसेवन इस जीवके नहीं हुआ और सम्यक्त्व नही उत्पन्न हुआ। सम्यक्त्व होवे तो परमात्माका भी परिचय होवे ॥२७॥ १

२९०
रायचंद्जैनशास्रमालायाम् ।
• अथ शुद्धात्मसंवित्तिसाधकतपश्चरणप्रतिपक्षभूतं गृहवासं दूपयति;-
घरवासउ मा जाणि जिय, दुक्कियचासउ एहु ।
पासु कयंतें मंडियउ, अविचलु णिस्संदेहु ॥ २७५ ॥
गृहवासं मा जानीहि जीव दुष्कृतवास एपः ।
पाशः कृतांतेन मंडितः अविचलः निस्संदेहं ॥ २७५ ।।
घर वासउ इत्यादि । घरवासउ गृहवासं अत्र गृहशब्देन वासमुख्यभूता स्त्री ग्राह्या ।
तथाचोक्तं । "न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते"। मा जाणि जिय हे जीव त्वमात्म-
हितं मा जानीहि । कथंभूतो गृहवासः । दुक्कियवासउ एहु समस्तदुःकृतानां पापानां
वासः स्थानमेप: पासु कयंतें मंडियउ अज्ञानिजीवबंधनार्थ पासो मंडितः । केन ।
कृतांतनाम्ना कर्मणा । कथंभूतं । अविचल शुद्धात्मतत्त्वभावनाप्रतिपक्षभूतेन मोहबंधनेना-
बंधत्वादचलः णिस्संदेहु संदेहो न कर्तव्य इति । अयमत्र भावार्थः । विशुद्धज्ञानदर्शनस्व-
भावपरमात्मपदार्थभावनाप्रतिपक्षभूतैः कपायेन्द्रियैः व्याकुलीक्रियते मनः मनःशुद्धयभावे
गृहस्थानां तपोधनवत् शुद्धात्मभावना कर्तु नायातीति । तथा चोक्तं । "कपायरिंद्रियैर्दुष्टैः
व्याकुलीक्रियते मनः । यतः कर्तुं न शक्येत भावना गृहमेधिभिः" ॥ २७५ ।।
आगे शुद्धात्मज्ञानका साधक जो तपश्चरण उसके शत्रुरूप गृहवासको दोष देते
है;-[जीव ] हे जीव तू इसको [गृहवासं] घर वास [मा जानीहि ] मत
जाने [ एपः ] यह [ दुष्कृतवासः ] पापका निवासस्थान है [कृतांतेन] यमराजने
(कालने) अज्ञानी जीवोंको बाधनेकेलिये यह [पाशः मंडितः] अनेक फांसोंसे
मंडित [अविचलं] बहुत मजबूत बंदीखाना बनाया है इसमें [निस्संदेहं] संदेह
नहीं है । भावार्थ—यहां घर शब्दसे मुख्यरूप सी जानना स्त्री ही घरका मूल है
स्त्री विना गृह वास नही कहलाता । ऐसा ही दूसरे शास्त्रोंमें भी कहा है कि घरको
घर मत जानो स्त्री ही.घर है जिन पुरुषोंने स्त्रीका त्याग किया उन्होंने घरका त्याग
किया। यह धर मोहके बंधनकर अति दृढ बंधा हुआ है इसमे संदेह नहीं है । यहां
तात्पर्य ऐसा है कि शुद्धात्म ज्ञान दर्शन शुद्ध भावरूप जो परमात्म पदार्थ उसकी
भावनासे विमुख जो विषय कषाय है उनसे यह मन व्याकुल होता है । इसलिये
मनकी शुद्धिके विना गृहस्थके यतीकी तरह शुद्धात्माका ध्यान नही होता । इसकारण
घरका त्याग करना योग्य है घरके विना त्यागे मन शुद्ध नहीं होता । ऐसा दूसरी
जगह भी कहा है कि कषायोंसे और इन दुष्ट इंद्रियोंसे मन व्याकुल होता है इसलिये
गृहस्थ, लोग आत्मभावना कर नही सकते ॥ २७५ ॥

परमात्मप्रकाशः। २९१ अथ गृहममत्वत्यागानंतरं देहममत्वत्यागं दर्शयति;- देहुवि जित्थु ण अप्पणउ, तहिं अप्पणउ' किं अण्णु । परकारणि मण गुरुव तुहुं, सिवसंगमु अवगण्णु ॥ २७६ ॥ देहोपि यत्र नात्मीयः तन्त्रात्मीयः किमन्ये । परकारणे मा मुह्य त्वं शिवसंगमं अवगण्य ॥ २७६ ॥ देहुवि इत्यादि । देहुवि जित्थु ण अप्पणउं देहोपि यत्र नात्गीयः तहिं अप्पणउ कि अण्णु तन्त्रात्मीयः किमन्ये पदार्था भवंति किं तु नैव । एवं ज्ञात्वा परकारणि परस देहस्य बहिर्भूतस्य स्त्रीवस्त्राभरणोपकरणादिपरिग्रहनिमित्तेन मण गुरुव तुहुँ सिवसंगम अवगण्णु हे तपोधन शिवशब्दवाच्यशुद्धात्मभावनात्यागं मा कारिति । तथाहि । अमूर्तेन वीतरागस्वभावेन निजशुद्धात्मना सह व्यवहारेण क्षीरनीरवदेकीभूत्वा तिष्टति योसो देहः सोपि जीवस्वरूपं न भवति इति ज्ञात्वा बहिःपदार्थे ममत्वं त्यक्त्वा शुद्धात्मानुभूतिलक्षण- वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा च सर्वतात्पर्येण भावना कर्तव्येत्यभिप्रायः ॥ २७६ ॥ अथ तमेवार्थ पुनरपि प्रकारांतरेण व्यक्ति करोति:- करि सिवसंगमु एकु पर, जहिं पाविजइ सुवखु । जोइय अण्णु म चिंति तुहं, जेण ण लब्भइ मुक्खु ॥ २७७ ।। कुरु शिवसंगम एक परं यत्र प्राप्यते सुखं । योगिन् अन्यं मा चितय त्वं येन न लभ्यते गोक्षः ॥ २७७ ॥ करि इत्यादि । करि कुरु । कं । सिवसंगमु शिवशब्दवाच्यशुद्धबुद्धकस्वभावनिजशु- जागे घरकी ममता छुड़ाकर शरीरका ममत्व छुडाते हैं। [यत्र ] जिस संसारमें [देहोपि ] शरीर भी [आत्मीयः न] अपना नहीं है [ तत्र ] उसमें [ अन्ये ] अन्य [आत्मीयः किं] कोंन अपना होसकता है [त्वं ] इसकारण तू [शिवसंगम मोक्षका सगम [ अवगण्य] छोड़कर [ परकारणे] पुत्र सी वस आभूषण आदि उपकरणोंमें [मा मुह्य ] ममत्व गत कर । भावार्थ- अमूर्त वीतराग गावरण जो निजशुद्धात्मा उससे व्यवहार नयकर दूधपानीकी तरह यह देह एकगेफ हो रहा है ऐसा देह, जीवका खरूप नहीं है तो पुत्र फलनादि धन धान्यादि अपने किस तरह हो सकेंगे । ऐसा जानकर बायपदार्थोंगे गगता छोडकर शुद्धात्माकी अनुभूतिरूप जो वीतराग निर्विकल्प समाधि उसमें ठहर फर सब प्रकाररो शुनोपयोगी भावना करनी चाहिये ॥ २७६ ॥ योगी आगे इसी को पिर दूसरी तरह प्रगट करते है---[गोगिन] हंस [त्वं ] तू [एफ शिवसंगगं / निजागाफी ही गागना ।. परं] मंगल २९२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । द्धासभावनासंसर्ग एक्कु पर तमेवैकं जहिं पाविजइ सोक्खु यत्र स्वशुद्धात्मसंसर्गे प्राप्यते। किं । अक्षयानंतसुखं जोइय अण्णु म चिंति तुहं हे योगिन् स्वभावत्वादन्यचिंता मा कास्त्विं जेण ण लब्भइ येन कारणेन चहिचिंतया न लभ्यते । कोसौ । मुक्खु अव्यावाधसुखादिलक्षणो मोक्ष इति तात्पर्य ॥ २७७ ।। अथ भेदाभेदरत्नत्रयभावनारहितं मनुष्यजन्म निस्सारमिति निश्चिनोति;- बलि किउ माणुसजम्मडा, देवखंतहं पर सारु । जइ उट्ठभइ तो कुहइ, अह डज्झइ तो छारु ॥ २७८ ।। बलिः क्रियते मनुष्यजन्म पश्यतां परं सारं । यदि अवष्टभ्यते ततः कुत्सयते अथ दह्यते तर्हि क्षारः ॥ २७८ ॥ बलि किउ इत्यादि । बलि किउ वलिः क्रियते मस्तकस्योपरितनभागेनावतारणं क्रियते । किं । माणुसजम्मडा मनुष्यजन्म । किं विशिष्टं । देखंतहं पर सारु बहिर्भागे व्यवहा. रेण पश्यतामेव सारभूतं । कस्मात् । जइ उहभइ तो कुहइ यद्यवष्टभ्यते भूमौ निभिप्यते ततः कुत्सितरूपेण परिणमति अह डज्झइ तो छारु अथवा दह्यते तर्हि भस्म भवति । तद्यथा । हस्तिशरीरे दंताश्चमरीशरीरे केशा इत्यादि सारत्वं तिर्यक् शरीरे दृश्यते, मनुष्य- शरीरे किमपि सारत्वं नास्तीति ज्ञात्वा घुणभक्षितेक्षुदंडवत्परलोकवीजं कृत्वा निस्सारमपि सारं क्रियते । कथमिति चेत् । यथा घुणभक्षितेक्षुदंडे वीते कृते सति विशिष्टेक्षणां [कुरु ] कर [ यत्र ] जिसमें कि [ सुखं प्राप्येत ] अतींद्रिय सुख पावै [अन्य मा] अन्य कुछ भी मत [चिंतय ] चितवन कर [ येन ] जिससे कि [ मोक्षः न लभ्यते ] मोक्ष न मिले । भावार्थ हे जीव तू शुद्धबुद्ध अखंड स्वभाव निज शुद्धात्माका चितवन कर यदि तू शिवसंग करेगा तो अतीद्रिय सुख पायेगा । जो अनंतसुखको प्राप्त हुए केवल आत्मध्यानसे ही प्राप्त हुए दूसरा कोई उपाय नही है। इसलिये हे योगी तू अन्य कुछ भी चिंतवन मत कर परके चितवनसे अव्यावाध अनंतसुखरूप मोक्षको नही पावेगा इसलिये निज वरूपका ही चिंतन कर ॥ २७७ ।। आगे भेदाभेद रत्नत्रयकी भावनासे रहित जीवका मनुष्यजन्म निष्फल है ऐसा कहते हैं;-[ मनुष्यजन्म ] इस मनुष्यजन्मको [वलिः क्रियते ] मस्तकके ऊपर वार डालो जो कि [पश्यतां परं सारं] देखनेमें केवल सार दीखता है [ यदि अवष्टभ्यते ] जो इस मनुष्यदेहको भूमिमें गाढ दिया जावे [ततः ] तो [कुत्सयते ] सड़कर दुर्ग- धरूप परिणवे [अथ ] और जो [ दह्यते ] जलाइये [ तर्हि ] तो [क्षारः] राख हो जाता है। भावार्थ-इस मनुष्यकदेहको व्यवहार नयसे बाहरसे देखो तो सार मालूम वे । गताः परमात्मप्रकाशः। २९३ लाभो भवति तथा निःसारशरीराधारेण वीतरागसहजानंदैकस्वशुद्धात्मस्वभावसम्यक्रद्धा- नज्ञानानुचरणरूपनिश्चयरत्नत्रयभावनाबलेन तत्साधकव्यवहाररत्नत्रयभावनाबलेन स्वर्गाप- वर्गफलं गृह्यत इति तात्पर्य ॥ २७८ ॥ अथ देहस्याशुचित्वानित्यत्वादिप्रतिपादनरूपेण व्याख्यानं करोति षट्कलेन तथाहि;- उज्वलि चोप्पडि चिट्ठ करि, देहि सुमिहाहार । देहहं सयल णिरत्थ गय, जिमु दुजणि उवयार ॥ २७९ ॥ उद्धर्तय म्रक्षय चेष्टां कुरु देहि सुमृष्टाहारान् । देहस्य सकलं निरर्था गताः यथा दुर्जने उपकाराः ॥ २७९ ॥ उव्वालि इत्यादि पदखंडनारूपेण व्याख्यानं क्रियते । उबलि उद्वर्तनं कुरु चोप्पडि तैलादिम्रक्षणं कुरु चिह कार मंडनरूपां चेष्टां कुरु देहि सुमिहाहार देहि सुमृष्टा- हारान् । कस्य । देहहं देहस्य सयल णिरत्थ गय सकलमपि विशिष्टाहारादयो निरर्थका । केन दृष्टांतेन । जिमु दुञ्जणि उवयार दुर्जने यथोपकारा इति । तद्यथा । यद्यप्ययं कायः खलस्तथापि किमपि प्रासादिकं दत्वा अस्थिरेणापि स्थिरं मोक्षसौख्यं होता है यदि विचार करो तो कुछ भी सार नहीं है । तिर्यंचोंके शरीर में तो कुछ सार भी दीखता है जैसे हाथीके शरीरमें दांत सार है सुरह गौके शरीरमें बाल सार हैं इत्यादि । परंतु मनुष्यदेहमें सार नही है घुणसे खाये हुए गन्नेकी तरह मनुष्यदेहको असार जानकर परलोकका बीज करके सार करना चाहिये । जैसे धुणों का खाया हुआ ईख किसी कामका नही है एक बीजके कामका है सो उसको वोकर असारसे सार किया जाता है उसी प्रकार मनुष्यदेह किसी कामका नही परंतु परलोकका बीजकर असारको सार करना चाहिये । इस देहसे परलोक सुधारना ही श्रेष्ठ है । जैसे घुणसे खाये गये ईखको वोनेसे अनेक ईखोंका लाभ होता है वैसे ही इस असार शरीरके आधारसे वीतराग परमानंद शुद्धात्मखभावका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप निश्चयरत्नत्रयकी भावनाके वलसे मोक्ष प्राप्त की जाती है और निश्चयरत्नत्रयका साधक जो व्यवहार रत्नत्रय उसकी भावनाके बलसे वर्ग मिलता है तथा परंपरासे मोक्ष होती है। यह मनु- प्यशरीर परलोक सुधारनेकेलिये होवे तभी सार है नहीं तो सर्वथा असार है ॥२७८॥ आगे देहको अशुचि अनित्य आदि दिखानेका छह गाथाओंसे व्याख्यान करते हैं;- [देहस्य ] इस देहका [उद्वर्तय ] उवटना करो [प्रक्षय ] तैलादिकका मर्दन करो [चेष्टां कुरु ] श्रृंगार आदिसे अनेक प्रकार सजाओ [ सुमृष्टाहारान् ] अच्छे २ मिष्ट आहार [ देहि ] दे लेकिन [ सकलं ] ये सब [ निरर्थां गताः ] यत्न व्यर्थ हैं [ यथा ] जैसे [ दुर्जने ] दुर्जनोंका [ उपकारा] उपकार करना वृथा है । भावार्थ-जैसे २९४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । गृह्यते । सप्तधातुमयत्वेनाशुचिभूतेनापि शुचिभूतं शुद्धात्मस्वरूपं गृह्यते , निर्गुणेनापि केवल- ज्ञानादिगुणसमूहः साध्यत इति भावार्थः । तथा चोक्तं । "अथिरेण थिरा मलिणेण णिम्मला णिग्गुणेण गुणसारं । काएण जावि ढप्पइ सा किरिया किण्ण कायव्या" , , - अथ:- जेहउ जजरु णरय घरु, तेहउ जोइय काउ। णरइ णिरंतरु पूरियउ, किम किजइ अणुराउ ॥ २८० ॥ यथा जर्जर नरकगृहं तथा योगिन् कायः । नरके निरंतर पूरितं किं क्रियते अनुरागः ।। २८० ॥ जेहउ इत्यादि । जेहउ जजरु यथा जर्जरं शतजीर्ण णरयघरु नरकगृहं तेहउ जोइय 'काउ तथा हे योगिन् कायः । यतः किं । गरइ णिरंतरु पूरियउ नरके निरंतर पूरितं एवं ज्ञात्वा किम किजइ अणुराउ कथं क्रियते अनुरागो न कथमपीति । तद्यथा-यथा नरकगृहं शतजीर्ण तथा कायगृहमपि नवद्वारछिद्रितत्वात् शतजीर्ण, परमात्मा तु जन्मजरा- मरणादिछिद्रदोषरहितः । कायस्तु गूथमूत्रादिनरकपूरितः, भगवान् शुद्धात्मा तु भावकर्म- दुर्जनपर अनेक उपकार करो वे सब वृथा जाते हैं दुर्जनसे कुछ फायदा नही उसीतरह शरीरके अनेक यत्न करो इसको अनेक तरहसे पोषण करो परंतु यह अपना नही हो सकता । इसलिये यही सार है कि इसको अधिक पुष्ट नहीं करना । कुछ थोडासा ग्रासादि देकर स्थिर करके मोक्ष साधन करना, सात धातुमई यह अशुचि शरीर है इससे पवित्र शुद्धात्मखरूपका आराधन करना । इस महानिर्गुण शरीरसे केवलज्ञानादि गुणोंका समूह साधना चाहिये । यह शरीर भोगकेलिये नहीं है इससे योगका साधनकर अवि- नाशीपदको सिद्धि करनी । ऐसा कहा भी है कि इस क्षणभंगुर शरीरसे स्थिरपद मोक्षकी सिद्धि करनी चाहिये, यह शरीर मलीन है इससे निर्मल वीतरागकी सिद्धि करना और यह शरीर ज्ञानादिगुणोंसे रहित है इसके निमित्तसे सारभूत ज्ञानादिगुण सिद्ध करने योग्य हैं । इस शरीरसे तपसंयमादिका साधन होता है और तप संयमादि क्रियासे सार भूत गुणोंकी सिद्धि होती है । जिस क्रियासे ऐसे गुण सिद्ध हों वह क्रिया क्यों नहीं करना, अवश्य करनी चाहिये ।। २७९ ॥ आगे शरीरको अशुचि दिखलाकर ममत्व छुडाते हैं;-[हे योगिन् ] हे योगी [यथा] जैसा [जर्जरं] सैंकड़ों छेदोंवाला [ नरकगृहं ] नरकघर है [ तथा] वैसा यह [कायः ] शरीर [ नरके ] मलमूत्रादिसे [ निरंतरं] हमेशा [पूरितं ] भरा हुआ है। ऐसे शरीरसे [अनुरागः] प्रीति [किं क्रियते ] कैसे की जावे किसी तरह भी यह प्रीतिके योग्य नहीं है । भावार्थ-जैसे नरकका घर अति जीर्ण जिसके सैकडों छिद्र हैं .. परमात्मप्रकाशः। २९५ द्रव्यकर्मनोकर्ममलरहित इति । अयमत्र भावार्थः । एवं दहालनोः भेदं ज्ञात्वा देहममत्वं त्यत्तवा वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा च निरंतरं भावना कर्तव्येति ॥ २८० ।। अथ,- दुक्खई पावई असुचियइं, तिहुयणि सयलइ लेवि । एयहिं देहु विणिम्मियउ, विहिणा वइरु मुणेवि ॥ २८१ ॥ दुःखानि पापानि अशुचीनि त्रिभुवने सकलानि लात्वा । एतैः देहः विनिर्मितः विधिना वैरं मत्वा ।। २८१ ॥ दुवई इत्यादि । दुक्खई दुःखानि पावई पापानि असुचियई अशुचिद्रव्याणि तिह- यणि सयलइ लेवि भुवनत्रयमध्ये समस्तानि गृहीत्वा एयहिं देहु विणिम्मियउ एतैर्दैहो विनिर्मितः । कन कर्तृभूतेन । विहिणा विधिशब्दवाच्येन कर्मणा । कस्मादेवभूतो देहः कृतः । वहरु मुणेवि वैरं मत्वेति । तथाहि । त्रिभुवनस्थदुःखैर्निर्मितत्वात् दुःखरूपोऽयं देहः, परमात्मा तु व्यवहारेण देहस्थोपि निश्चयेन देहाद्भिन्नत्वादनाकुलत्वलक्षणसुखस्वभावः। त्रिभुवनस्थपापैर्निर्मितत्वात् पापरूपोऽयं देहः शुद्धामा तु व्यवहारेण देहेस्थोपि निश्चयेन पापरूपदेहाद्भिन्नत्वादत्यंतपवित्रः । त्रिभुवनस्थाशुचिद्रव्यैर्निर्मितत्वादशुचिरूपोऽयं देहः वैसे यह कायरूपी घर साक्षात् नरकका मंदिर है नवद्वारोंसे अशुचि वस्तु झरती है। और आत्माराम जन्म मरणादि छिद्रदोप रहित है भगवान शुद्धात्मा भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्ममलसे रहित है, यह शरीर मलमूत्रादि नरकसे भरा हुआ है । ऐसा शरीरका और जीवका भेद जानकर देहसे ममता छोड़के वीतराग निर्विकल्प समाधिमें ठहरके निरंतर भावना करनी चाहिये ॥ २८० ।। आगे फिर भी देहकी मलीनता दिखलाते हैं। त्रिभुवने] तीन लोकमें [ दुःखानि पापानि अशुचीनि ] जितने दुःख हैं पाप हैं और अशुचिवस्तुयें हैं [सकलानि ] उन सवको [ लात्वा] लेकर [एतैः ] इन मिले हुओंसे [ विधिना] विधाताने [वै] वैर [मत्वा] मानकर [देहः ] शरीर [निर्मितः ] वनाया है। भावार्थ-तीन लोकमें जितने दुःख हैं उनसे यह देह रचा गया है इससे दुःखरूप है और आत्मद्रव्य व्यवहारनयकर देहमें स्थित है तौभी निश्चयनयकर देहसे भिन्न निराकु- लखरूप सुखरूप है, तीन लोकमें जितने पाप हैं उन पापोंसे यह शरीर बनाया गया है इसलिये यह देह पापरूप ही है इससे पाप ही उत्पन्न होता है और चिदानंद चिद्रूप जीव पदार्थ व्यवहार नयसे देहमें स्थित है तौभी देहसे भिन्न अत्यंत पवित्र है, तीन जगतमें जितने अशुचि पदार्थ हैं उनको इकटेकर यह शरीर निर्माण किया है इसलिये महा अशुचिरूप है और आत्मा व्यवहारनयकर देहमें विराजमान है तौभी देहसे जुदा .

२९६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । शुद्धात्मा तु व्यवहारेण देहस्थोपि निश्चयेन देहात्पृथग्भूतत्वादत्यंतनिर्मल इति । अत्रैवं देहेन सह शुद्धात्मनो भेदं ज्ञात्वा निरंतरं भावना कर्तव्येति तात्पर्य ।। २८१ ॥ अथ,- जोइय देहु घिणावणउ, लजहि किं ण रमंतु । णाणिय धम्मि रइ करहि, अप्पा विमलु करंतु ॥ २८२ ।। योगिन् देहः घृणास्पदः लजसे किं न रममाणः । ज्ञानिन् धर्मेण रतिं कुरु आत्मानं विमलं कुर्वन् ॥ २८२ ।। जोइय इत्यादि । जोयइ ये योगिन् देह धिणावणउ देहो घृणया दुगुंछया सहितः लञ्जहि किंण रमंतु दुगुंछारहितं परमात्मानं मुक्त्वा देहं रम्यमाणो लजां किं न करोपि । तर्हि किं करोमीति प्रश्ने प्रत्युत्तरं ददाति । णाणिय हे विशिष्टभेदज्ञानिन् धम्मई निश्चयधर्मशब्दवाच्येन वीतरागचारित्रेण कृत्वा रइ करहि रतिं प्रीतिं कुरु । किंकुर्वन् सन् । अप्पा वीतरागसदानंदैकखभावपरमात्मानं विमलु करंतु आतरौद्रादिसमस्तविकल्पत्यागेन विमलं निर्मलं कुर्वन्निति तात्पर्यम् ॥ २८२ ।। n अथ,- जोइय देहु परिचयहि, देहु ण भल्लउ होइ । देहविभिण्णउ णाणमउ, सो तुहुं अप्पा जोइ ॥ २८३ ॥ योगिन् देहं परित्यज देहो न भद्रः भवति । देहविभिन्नं ज्ञानमयं तं त्वं आत्मानं पश्य ॥ २८३ ॥ जोइय इत्यादि । जोइय हे योगिन् देहु परिचयहि शुचिदेहान्नित्यानंदैकखभावात् परम पवित्र है । इस प्रकार देहका और जीवका अत्यंत भेद जानकर निरंतर आत्माकी भावना करनी चाहिये ॥ २८१ ॥ आगे फिर भी देहको अपवित्र दिखलाते हैं;-[योगिन् ] हे योगी [ देहः ] यह शरीर [घृणास्पदं] घिनावना है [ रममाणः] इस देहसे रमता हुआ तू [किं न लजसे ] क्यों नही शरमाता । [ज्ञानिन् ] हे ज्ञानी तू [आत्मानं आत्माको [विमलं कुर्वन् ] निर्मल करता हुआ [धर्मेण ] धर्मसे [रति ] प्रीति [कुरु ] कर । भावार्थ- हे जीव तू सब विकल्प छोड़कर वीतरागचारित्ररूप निश्चयधर्ममें प्रीतिकर । आर्तरौद्र आदि समस्त विकल्पोंको छोड़कर आत्माको निर्मल करता हुआ वीतरागभावोंसे प्रीति कर ।। २८२ ॥ आगे देहसे स्नेह छुड़ाते हैं;-[योगिन् ] हे योगी [देहं ] इस शरीरसे [परि-

परमात्मप्रकाशः।
२९७
शुद्धालद्रव्याद्विलक्षणं देहं परित्यज । कस्मात् । देहु ण भल्लउ होइ देहो भद्रः समीचीनो
न भवति । तर्हि किं करोमीति प्रश्ने कृते प्रत्युत्तरं ददाति । देहविभिण्णउ देहविमिन्नं
णाणमउ ज्ञानेन निर्वृत्तं ज्ञानमयं केवलज्ञानाविनाभूतानंतगुणमयं सो तुहुं अप्पा जोइ
तं पूर्वोक्तलक्षणमामानं त्वं कर्ता पश्येति । अयमत्र भावार्थः । "चंडो ण मुयइ वेरं
भंडणसीलो य धम्मटयरहिओ । दुट्ठो ण य एदि वसं लक्खणमेयं तु किण्हस्स" इति
गाथाकथितलक्षणा कृष्णलेश्या, धनधान्यादितीव्रमूर्छाविषयाकांक्षादिरूपा नीललेश्या, रणे
मरणं प्रार्थयति स्तूयमानः संतोपं करोतीत्यादि लक्षणा कापोतलेश्या चैवं लेश्यात्रयप्रभृति-
समस्तविभावत्यागेन देहाद्भिन्नमात्मानं भावय इति ॥ २८३ ॥
अथ,-
दुक्खहं कारणु मुणिवि मणि, देहु वि एहु चयंति ।
जित्थु ण पावहिं परमसुङ, तित्थु किं संत वसंति ॥ २८४ ॥
दुःखस्य कारणं मत्वा मनसि देहमपि इमं त्यजति ।
यत्र न प्रामुवंति परमसुखं तन किं सतः वसंति ॥ २८४ ॥
त्यज] प्रीति छोड क्योंकि [ देहः ] यह देह [ भद्रः न भवति ] अच्छा नहीं है इस-
लिये [देहविभिन्नं ] देहसे भिन्न [ज्ञानमयं ] ज्ञानादि गुणमई [तं आत्मानं ] ऐसे
आत्माको [वं ] तू [पश्य ] देख । भावार्थ-नित्यानंद अखंडखभाव जो शुद्धात्मा
उससे जुदा और दुःखका मूल तथा महान अशुद्ध जो शरीर उससे भिन्न आमाको
पहचान और कृष्ण नील कापोत इन तीन अशुभलेश्याओंको आदि लेकर सब विभाव-
भावोंको त्यागकर निजस्वरूपका ध्यानकर । ऐसा कथन सुनकर शिष्यने पूछा
कि हे प्रभो इन खोटी लेश्याओंका क्या खरूप है । तब श्रीगुरु कहते हैं । कृष्ण
लेश्याका धारक वह है जो अधिक क्रोधी होवे कमी वैर न छोडै उसका वैर पत्थरकी
लकीरकी तरह हो, महा विषयी हो, पर जीवोंकी हंसी उड़ानेमें जिसके शंका न हो
अपनी हंसी होनेका जिसको भय न हो जिसका खभाव लज्जारहित हो दया धर्मसे
रहित हो और अपनेसे बलवानके वशमें हो गरीवको सतानेवाला हो, ऐसा कृष्णलेश्या-
वालेका लक्षण कहा । नीललेश्यावालेके लक्षण कहते हैं वो सुनों-जिसके धनधान्या-
दिककी अति ममता हो और सदा विषयाभिलाषी हो इंद्रियोंके विषय सेवता हुआ तृप्त
न हो । कापोतलेश्याका धारक रणमें मरना चाहता है स्तुति करनेसे अति प्रसन्न होता
है । ये तीनों कुलेश्याके लक्षण कहे गये हैं इनको छोडकर पवित्र भावोंसे देहसे जुदे
जीवको जानकर अपने स्वरूपका ध्यान कर । यही कल्याणका कारण है ॥ २८३ ॥

२९८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । दुक्खहं इत्यादि । दुक्खहं कारणु वीतरागतात्त्विकानंदरूपान् शुद्धामसुखाद्विलक्षणस्य नारकादिदुःखस्य कारणं मुणिवि मत्वा । क । मणि मनसि । कं । देहुवि देहमपि एहु इमं प्रत्यक्षीभूतं चयंति देहममत्वं त्यजति शुद्धालनि स्थित्वा जित्थु ण पावहिं यत्र देहे न प्राप्नुवंति । किं । परमसुहु पंचेद्रियविषयातीतं शुद्धासानुभूतिसंपन्नं परममुखं तित्थु कि संत वसंति तत्र देहे संतः सत्पुरुषाः किं वसंति शुद्धात्मसुखसंतोष मुक्त्तवा तत्र किं रति कुर्वति इति भावार्थः ॥ २८४ ॥ अथामायत्तसुखे रतिं कुर्विति दर्शयति;- अप्पायत्तउ जं जि सुहु, तेण जि करि संतोसु। पर मुहु वढ चिंतंताह, हियइ ण फिइ सोसु ॥ २८५ ॥ आत्मायत्तं यदेव सुखं तेनैव कुरु संतोषम् । परं सुख वत्स चिंतयतां हृदये न नश्यति शोषः ॥ २८५ ॥ अप्पायत्तउ इत्यादि । अप्पायत्तउ अन्यद्रव्यनिरपेक्षत्वेनात्माधीनं जं जि सुहु यदेव शुद्धामसंवित्तिसमुत्पन्नं सुखं तेण जि करि संतोसु तेनैव तदनुभवेनैव संतोपं कुरु पर आगे फिर भी देहको दुःखका कारण दिखलाते हैं;-[ दुःखस्य कारणं] नरकादि- दुःखका कारण [इमं देहमपि ] इस देहको [ मनसि] मनमें [मत्वा] जानकर ज्ञानी जीव [त्यति ] इसका ममत्व छोड देते हैं क्योंकि [ यत्र ] जिस देहमें [परमसुखं] उत्तमसुख [न प्राप्नुवंति ] नही पाते [तत्र ] उसमें [संतः] सत्पुरुष [किं वसंति] कैसे रह सकते हैं । भावार्थ-वीतराग परमानंदरूप जो आत्मसुख उससे विपरीत नरकादिके दुःख उनका कारण यह शरीर उसको कुरा समझकर ज्ञानी जीव देहकी ममता छोड़ देते हैं और शुद्धात्म स्वरूपका सेवन करते हैं निज खरूपमें ठहर कर देहादि पदार्थोंमें प्रीति छोड़ देते हैं । इस देहमें कभी सुख नहीं पाते सदा आधि व्याधिसे पीडित ही रहते हैं। पंचेद्रियोंके विषयसे रहित जो शुद्धात्मानुभूतिरूप परमसुख वह देहके ममत्व करनेसे कभी नही मिलसकता । महा दुःखके कारण इस शरीरमें सत्पुरुष कभी नही रहसकते । देहसे उदास होके संसारकी आशा छोड़ सुखका निवास जो सिद्धपद उसको प्राप्त होते हैं । और जो आत्म भावनाको छोड़कर संतोषसे रहित होके देहादिकमें राग करते हैं वे अनंत भव धारण करते हैं संसारमें भटकते फिरते हैं ।। २८४ ॥ आगे यह उपदेश करते हैं कि तू आत्मसुखमें प्रीतिकर;-[वत्स] हे शिष्य [यदेव ] जो [आत्मायत्तं सुखं ] पर द्रव्यसे रहित आत्माधीन सुख है [तेनैव]

परमात्मप्रकाशः।
२९९
सुहु चढ चितंताहं इंद्रियाधीनं परमसुखं चिंतयंतं वत्स मित्र हियह ण फिट्टइ सोसु
हृदये न नश्यति शोपोन्ताह इति । अत्राध्यात्मरतिस्वाधीनाविच्छेदविघ्नौघरहिता च,
भोगरतिस्तु पराधीना वढेरिंधनैरिव समुद्रस्य नदीसहरिवाप्तिकरा च । एवं ज्ञात्वा
भोगसुखं त्यक्त्वा "एदमि रदो णिचं संतुट्ठो होदि णिच्चमेदसि । एदेण होहि तित्तो तो
होहदि उत्तमं सुक्खं" इति गाथाकथितलक्षणे अध्यात्मसुखे स्थित्वा च भावना कर्तव्येति
तात्पर्य । तथा चोक्तं । "तिणकटेण व अग्गी लवणसमुद्दो णदीसहस्सेहिं । ण इमो जीवो
सफो तिप्पेढुं कामभोगेहि"। अध्यामशब्दस्य व्युत्पत्तिः क्रियते--मिथ्यात्वविषयकषायादि-
वहिर्द्रव्ये निरालंबनत्वेनात्मन्यनुष्ठानमध्यात्मं ।। २८५ ॥
अथात्मनो ज्ञानस्वभावं दर्शयति,-
अप्पहं णाणु परिचयवि, अण्णु ण अत्थि सहाउ ।
इउ जाणेविणु जोइयहु, परहं म बंधउ राउ ॥ २८६ ॥
आत्मनः ज्ञानं परित्यज्य अन्यो न अस्ति खभावः ।
इदं ज्ञात्वा योगिन् परस्मिन् मा बधान रागम् ॥ २८६ ।।
उसीमें [संतोष ] सतोप [कुरु ] कर [ परं सुखं] इंद्रियाधीन सुखको [चिंतयतां]
चितवन करनेवालोंके [ हृदये ] चित्तका [ शोषः ] दाह [न नश्यति ] नहीं मिटता ।
भावार्थ-आत्माधीन सुख आत्माके जाननेसे उत्पन्न होता है इसलिये तू आत्माके
अनुभवसे सतोप कर भोगोंकी वाछा करनेसे चित्त शात नही होता । जो अध्यात्मकी
प्रीति है वह स्वाधीनता है इसमें कोई विघ्न नही है और भोगोंका अनुराग वह पराधी-
नता है । भोगोको भोगते कभी तृप्ति नही होती । जैसे अग्नि ईधनसे तृप्त नही होती
और सैकडों नदियोंसे समुद्र तृप्त नहीं होता उसीतरह इंद्रियसुखोंसे कभी तृप्ति नही
होती एक आत्मसुखसे ही तृप्ति होती है। ऐसा ही समयसारमें कहा है कि हंस (जीव)
तू इस आत्मखरूपमें ही सदा लीन हो और सदा इसीमें सतुष्ट हो । इसीसे तू तृप्त
होगा और इसीसे ही तुझे उत्तम सुखकी प्राप्ति होगी । इस कथनसे अध्यात्मसुखमें -
ठहरकर निजखरूपकी भावना करनी चाहिये और कामभोगोंसे कभी तृप्ति नहीं हो
सकती । ऐसा कहा भी है कि जैसे तृण काठ आदि ईंधनसे अग्नि तृप्त नहीं होती और
हजारों नदियोंसे लवणसमुद्र तृप्त नही होता उसीतरह यह जीव काम भोगोंसे तृप्त नहीं
होता । इसलिये विषयसुखोंको छोड़कर अध्यात्मसुखका सेवन करना चाहिये । आत्म-
सुखका शब्दार्थ करते हैं-मिथ्यात्वविषय कषाय आदि बाह्य पदार्थोंका अवलंबन
( सहारा) छोड़ना और आत्मामें तल्लीन होना वह अध्यात्म है ॥ २८५ ॥

रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । ३०० अप्पह इत्यादि । अप्पहं शुद्धात्मनः णाणु परिचयवि वीतरागखसंवेदननानं त्यक्त्वा अण्णु ण अत्थि सहाउ अन्यो ज्ञानाद्भिन्नः स्वभावो नाति इउ जाणेविणु इदमात्मनः शुद्धात्मज्ञानं स्वभावं ज्ञात्वा जोइयहु योगिन् परहं म बंधउ राउ परस्मिन् शुद्धात्मनो विलक्षणे देहे रागादिकं मा कुरु तस्मात् । अत्रात्मनः शुद्धात्मनः शुद्धात्मज्ञानस्वरूपं ज्ञात्वा रागादिकं त्यक्त्वा च निरंतरं भावना कर्तव्येत्यभिप्रायः ॥ २८६ ॥ अथ स्वात्मोपलंभनिमित्तं चित्तस्थितीकरणरूपेण परमोपदेशं पंचकलेन दर्शयति;- विसयकसायहि मण सलिलु, णवि डहुलिजइ जासु । अप्पा णिम्मलु होइ लहु, वढ पञ्चक्खु वि तासु ॥ २८७ ।। विषयकषायैः मनःसलिलं नैव क्षुभ्यते यस्य । आत्मा निर्मलो भवति लघु वत्स प्रत्यक्षोपि तस्य ।। २८७ ॥ विसय इत्यादि । विसयकसायहि मण सलिलु ज्ञानावरणाद्यष्टकर्मजलचराकीर्णमंसा- रसागरे निर्विषयकपायरूपात् शुद्धात्मतत्त्वात् प्रतिपक्षभूतैर्विपयकपायमहावातैर्मनःप्रचुर- सलिलं णवि डहुलिजइ नैव क्षुभ्यते जासु यस्य भव्यवरपुंडरीकस्य अप्पा णिम्मलु होइ लहु आत्मा रनविशेषो अनादिकालरूपमहापाताले पतितः सन् रागादिमलपरिहारेण लघु शीघ्रं निर्मलो भवति वढ वत्स । न केवलं निर्मलो भवति पञ्चसुवि शुद्धात्मा परम इत्युच्यते तस्य परमस्य कला अनुभूतिः परमकला एव दृष्टिः परमकलादृष्टिः तया परम- आगे आत्माका ज्ञानखभाव दिखलाते हैं;-[आत्मनः ] आत्माका निजस्वभाव [ज्ञानं परित्यज्य] वीतरागखसंवेदन ज्ञानके सिवाय [अन्यः खभावः] दूसरा स्वभाव [न अस्ति ] नहीं है आत्मा केवलज्ञानखभाव है [इति ज्ञात्वा] ऐसा जानकर [ योगिन् ] हे योगी [ परसिन् ] पर वस्तुसे [रागं] प्रीति [ मा वधान ] मत वाधै मतकर । भावार्थ-पर जो शुद्धात्मासे भिन्न देहादिक उनमें राग मतकर आत्माका ज्ञानस्वरूप जानकर रागादिक छोडके निरंतर आत्माकी भावना करनी चाहिये ॥ २८६ ॥ आगे आत्माकी प्राप्तिकेलिये चित्तको स्थिर करना ऐसा परम उपदेश श्रीगुरु दिख- लाते हैं। [यस्य] जिसका [ मनःसलिलं ] मनरूपी जल [ विषयकपायैः] विषय- कषायरूप प्रचंडपवनसे [ नैव क्षुभ्यते ] नहीं चलायमान होता है [ तस] उसी भव्य जीवका [आत्मा] आत्मा [वत्स ] हे वच्चे [ निर्मलो भवति ] निर्मल होता है और [लघु] शीघ्र ही [प्रत्यक्षोपि] प्रत्यक्ष हो जाता है। भावार्थ-ज्ञानावरणादि अष्ट कर्म रूपी जलचर मगरमच्छादि जलके जीव उनसे भरा जो संसारसागर उसमें विषय- कषायरूप प्रचंड पवन जो कि शुद्धात्मतत्त्वसे सदा पराङ्मुख है उस प्रचंड पवनसे जिसका चित्त चलायमान नही हुआ उसीका आत्मा निर्मल होता है । आत्मा रत्नके परमात्मप्रकाशः। ३०१ कलादृष्टया यावदवलोकनं सूक्ष्मनिरीक्षणं तेन प्रत्यक्षोपि स्वसंवेदनप्रायोपि भवति । कस्य । तासु यस्य पूर्वोक्तप्रकारेण निर्मलं मनस्तस्येति भावार्थः ॥ २८७ ॥ अथा अप्पा परहण मेलयउ, मणु मारिवि सहसत्ति । सो वढ जोएं किं करइ, जासु ण एही सत्ति ॥ २८८ ॥ आत्मा परस्य न मेलितः मनो मारयित्वा सहसेति । स वत्स योगेन किं करोति यस्य न ईदृशी शक्तिः ॥ २८८ ॥ अप्पा इत्यादि । अप्पा अयं प्रत्यक्षीभूतः सविकल्प आत्मा परहं ख्यातिपूजालाभप्रभृ- तिसमस्तमनोरथरूपविकल्पजालरहितस्य विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावस्य परमात्मनः ण मेल- विउ न योजितः । कि कृत्वा । मणु मारिवि मिथ्यात्वविषयकषायादिविकल्पसमूह- परिणतं मनो वीतरागनिर्विकल्पसमाधिशस्त्रेण मारयित्वा सहसत्ति ज्ञटिति सो वढ जोएं किं करइ स पुरुपः वत्स योगेन किं करोति । स कः । जासु ण एही सत्ति यस्येशी मनोमारणशक्तिर्नास्तीति तात्पर्यम् ।। २८८ ॥ समान है अनादिकालका अज्ञानरूपी पातालमें पड़ा है सो रागादिमलके छोडनेसे शीघ्र ही निर्मल हो जाता है हे बच्चे आत्मा उन भव्य जीवोंका निर्मल होता है और प्रत्यक्ष उनको आत्माका दर्शन होता है । परमकला जो आत्माकी अनुभूति वही हुई निश्चयदृष्टि उससे आत्मखरूपका अवलोकन होता है। आत्मा स्वसवेदन ज्ञान करके ही ग्रहण करने योग्य है। जिसका मन विषयसे चंचल न हो उसीको आत्माका दर्शन होता है ॥ २८७ ॥ आगे यह कहते हैं कि जिसने शीघ्र ही मनको वसकर आत्माको परमात्मासे नहीं मिलाया जिसमें ऐसी शक्ति नही है वह योगसे क्या करसकता है कुछ भी नही करस- कता:-[ सहसा मनो मारयित्वा] जिसने शीघ्र ही मनको वशमें करके [आत्मा] यह आत्मा [ परस्य न मेलितः] परमात्मामें नहीं मिलाया [ वत्स ] हे शिष्य [ यस्य] जिसकी [ ईदृशी] ऐसी [ शक्तिः ] शक्ति [न] नही है [सः] वह [ योगेन] योगसे [किं करोति ] क्या करसकता है । भावार्थ-यह प्रत्यक्षरूप संसारी जीव विकल्पसहित है दशा जिसकी उसको समस्त विकल्पजाल रहित निर्मल ज्ञान दर्शन खभाव परमात्मासे नहीं मिलाया। मिथ्यात्व विषय कषायादि विकल्पोंके समूहकर परि- णत हुआ जो मन उसको वीतराग निर्विकल्पसमाधिरूपशस्त्रसे शीघ्र ही मारकर आत्माको परमात्मासे नही मिलाया वह योगी योगसे क्या करसकता है कुछ भी नहीं करसकता । जिसमे मन मारनेकी शक्ति नही हैं वह योगी कैसा । योगी तो उसे कहते हैं कि जो बड़ाई, पूजा (अपनी महिमा ) और लाभ आदि सब मनोरथरूप विकल्पजा- ३०२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । , अथ:- अप्पा मिल्लिवि णाणमउ, अण्णु जि झायहि झाणु । वढ अण्णाणवियंभियहं, कउ तहं केवलणाणु ॥ २८९ ॥ आत्मानं मुत्त्वा ज्ञानमयं अन्यदेव ध्यायति ध्यानं । वत्स अज्ञानविजूंभितानां कथं तेषां केवलज्ञानम् ॥ २८९ ।। अप्पा इत्यादि । अप्पा स्वशुद्धात्मानं मिल्लिवि मुक्त्वा । कथंभूतमात्मानं । णाणमउ सकलविमलकेवलज्ञानाद्यनंतगुणनिर्वृत्तं अण्णु अन्यद्वहिव्यालंबनं जे ये केचन झायहि ध्यायति । किं । झाणु ध्यानं वढ वत्स मित्र अण्णाणवियंभियहं शुद्धात्मानुभूतिविलक्ष- णाज्ञानविजुभितानां परिणतानां कउ तहं केवलणाणु कथं तेषां केवलज्ञानं किं तु नैवेति । अत्र यद्यपि प्राथमिकानां सविकल्पावस्थायां चित्तस्थितिकरणार्थ विपयकपायरूपदुानव- चनार्थ च जिनप्रतिमाक्षरादिकं ध्येयं भवतीति तथापि निश्चयध्यानकाले स्वशुद्धात्मैव इति भावार्थः ॥ २८९ ॥ अथ:- सुण्णउं पउं झायंताहं, वलि वलि जोइयडाहँ । समरसिभाउ परेण सहु, पुण्णुवि पाउ ण जाहँ ।। २१० ।। शून्यं पदं ध्यायतां वलिं बलिं योगिनाम् । समरसीभावं परेण सह पुण्यमपि पापं न येषां ॥ २९० ॥ लोंसे रहित निर्मल ज्ञान दर्शनमई परमात्माको देखे जाने अनुभव करै । सो ऐसा मनके मारे विना नही होसकता यह निश्चय जानना ।। २८८ ॥ आगे ज्ञानमई आत्माको छोड़कर जो अन्य पदार्थका ध्यान करते हैं वे अज्ञानी हैं उनको केवलज्ञान कैसे उत्पन्न होसकता है ऐसा निरूपण करते हैं;-ज्ञानमयं] जो महा निर्मल केवल ज्ञानादि अनंतगुणरूप [आत्मानं] आत्मद्रव्यको [ मुक्त्वा] छोड़कर [अन्यदेव ] जड़ पदार्थ परद्रव्य उनका [ध्यानं ध्यायति ] ध्यान लगाते हैं [वत्स ] हे वत्स वे अज्ञानी हैं [ तेषां अज्ञानविज॑भितानां ] उन शुद्धात्माके ज्ञानसे विमुख कुमति कुश्रुत कुअवधिरूप अज्ञानसे परिणत हुए जीवोंको [ केवलज्ञानं कथं] केवल ज्ञानकी प्राप्ति कैसे होसकती है कभी नही होसकती। भावार्थ-यद्यपि विकल्प सहित अवस्थामें शुभोपयोगियोंको चित्तकी स्थिरताकेलिये और विषयकषायरूप खोटे ध्यानके रोकनेकेलिये जिनप्रतिमा तथा नमोकार मंत्रके अक्षर ध्यावने योग्य हैं तौमी निश्चयध्यानके समय शुद्ध आत्मा ही ध्यावने योग्य है अन्य नही, ॥ २८९ ॥ ।

परमात्मप्रकाशः।
सुण्णउं पउं इत्यादि । सुण्णउं शुभाशुभमनोवचनकायव्यापारैः शून्यं पउं वीतरागपर-
मानंदैकसुखामृतरसास्वादरूपा स्वसंवित्तिमयी या सा परमकला तया भरितावस्थपदं
निजशुद्धामस्वरूपं झायंताहं वीतरागनिगुप्तिसमाधिवलेन घ्यायतां वलि बलि जोइयडाह
श्रीयोगींद्रदेवाः स्वकीयाभ्यंतरगुणानुरागं प्रकटयंति, वलि क्रियेऽहमिति परमयोगिनां
प्रशंसां कुर्वति । येपां किं । समरस भाउ वीतरागपरमाह्लादसुखेन परमसमरसीभावं ।
केन सह । परेण सहु स्वसंवेद्यमानपरमासना सह । पुनरपि किं येषां । पुण्णुवि पाउण
जाहं शुद्धबुद्धैकस्वभावपरमासनो विलक्षणं पुण्यपापद्वयमिति न येषामित्यभिप्रायः ॥२९॥
--
अथ;-
उव्वस वसिया जो करइ, वसिया करइ जु सुण्णु ।
वलि किज्ज तसु जोइयहिं, जासु ण पाउण पुण्णु ॥ २९१ ॥
उद्वसान् वसितान् यः करोति वसितान् करोति यः शून्यान् ।
वलिं कुर्वेऽहं तस्य योगिनः यस्य न पापं न पुण्यम् ॥ २९१ ॥
आगे शुभाशुभविकल्पसे रहित जो निर्विकल्प(शून्य) ध्यान उसको जो ध्याते हैं उन
योगियोंकी मै बलिहारी करता हूं ऐसा कहते हैं। [शून्यं पदं ध्यायतां ] विकल्प
रहित ब्रह्मपदको ध्यावनेवाले [योगिनां] योगियोंकी मै [बलिं बलिं ] वार वार
मस्तक नमाकर पूजा करता हूं [येपां] जिन योगियोंके [ परेण सह ] अन्यपदार्थों के
साथ [ समरसीभावं ] समरसीभाव है और [पुण्यं पापं अपि न] जिनके पुण्य और
पाप दोनों ही उपादेय नहीं हैं । भावार्थ -शुभ अशुभ मनवचनकायके व्यापार रहित
जो वीतराग परमआनंदमई सुखामृत रसका आखाद वही जिसका स्वरूप है ऐसी
आत्मज्ञानमई परमकलाकर भरपूर जो ब्रह्मपद-शून्यपद-निजशुद्धात्मखरूप उसको ध्यानी
रागरहित तीन गुप्तिरूप समाधिके बलसे ध्यावते हैं उन ध्यानी योगियोंकी मै वार वार
बलिहारी करता हूं ऐसे श्रीयोगीद्रदेव अपना अंतरंगका धर्मानुराग प्रगट करते हैं और
परम योगीश्वरोंकी प्रशंसा करते हैं । जिन योगीश्वरोंके परम खसवेदन ज्ञानसहित
महा समरसीभाव है । समरसी भावका लक्षण ऐसा है कि जिनके इंद्र और कीट
दोनों समान, चिंतामणिरत्न और कंकड़ दोनों समान हों । अथवा ज्ञानादि गुण और
गुणी निज शुद्धात्मद्रव्य इन दोनोंका एकीभावरूप परिणमन वह समरसीभाव है उसकर
सहित हैं । जिनके पुण्य पाप दोनों ही नही हैं । ये दोनों शुद्धबुद्ध चैतन्य स्वभाव
परमात्मासे भिन्न हैं सो जिन मुनियों ने दोनोंको हेय समझलिया है परमध्यानमें आरूढ
हैं उनकी मै बार बार बलिहारी जाता हूं ॥ २९० ॥

२०३ रायचंद्रनमात्रमालायाम् । उध्वस इत्यादि । उच्चस उद्वसान शून्यान् । कान । वीतरागतात्त्विमचिदानंदोच्छल- ननिर्भरानंदशुद्धालानुभूतिपरिणामान् परमानंदनिर्विकल्पस्वसंवेदनशानबलेनेदानीं विशिष्ट- ज्ञानकाले वसिया करइ तेनैव वसंवेदनज्ञानेन वसितान् भारतावस्यान् करोति जो यः परमयोगी सुण्णु निश्चयनयेन शुद्धचैतन्यनिश्चयप्राणस्य हिंसकत्वान्मिथ्यात्वविकल्पजालनेव निश्चयहिंसा तत्प्रभृतिसमत्तविभावपरिणामान् स्वसंवेदननानालाभात्यूर्व बसितानिदानी शून्यान् करोतीति वलि किजउं तसु जोइयहि वलिमस्तकलोपरेणावतारणं क्रियेहमिति तस्य योगिनः । एवं श्रीयोनीदेवाः गुणप्रशंसां कुर्वति । पुनरपि कि यस रोगिनः । जासु ण यत्त्व न । किं । पाउ ण पुण्णु वीतरागद्धात्मतन्त्राद्विपरीतं पुण्यपापद्वयनिति तात्पर्य ।। २९१ ॥ अथैकसूत्रेण प्रश्नं कृत्वा सूत्रचतुष्टयेनोत्तरं दत्वा च तमेव पूर्वसूत्रपंचक्रेनोन निर्विकल्प- समाधिरूपं परमोपदेनं पुनरपि विवृणोति पंचकलेनः- तुइ मोहु तडित्ति जहिं, मणु अत्यवणहं जाइ । सो सामिय उवएसु कहि, अण्णं देविं काई ।। २९२ ॥ त्रुब्बति मोहः झटिति यत्र मनः अस्तननं याति । तं तामिन् उपदेशं कथय अन्येन देवेन किं ॥ २९२ ।। आगे फिर भी योगीश्वरोंकी प्रशंसा करते हैं;-:] जो [उद्यमान् ] जड हैं अर्थात् पहले कभी नहीं हुए ऐते शुद्धोपयोगरूप परिणामांनो [वसितान् ] स्वसंवेदन जानके बलते वसाता है अर्थन् अपने हृदयने स्थापन करता है और [य] जो [वसि- तान् ] पहलेके वसे हुए मिथ्यात्वादि परिणाम हैं उनको [शून्यान् ] ऊजड करता है उनको निकाल देता है [ तस्य योगिनः] उस योगीकी [अहं ] मैं [वलिं] पूजा [कुर्वे ] करता हूं [यस ] जिसके [न पापं न पुण्यं ] न तो पाप है और न पुण्य है । भावार्थ-जो प्रगटरूप नहीं वसते हैं अनादिकालके वीतरागचिदानंदस्वरूप शुद्धात्मानुभूतिरूप शुद्धोपयोगपरिणाम उनको अब निर्विकल्सतसंवेदन ज्ञानके बल्ले वसाता है निज वादनरूप स्वाभाविक ज्ञानकर शुद्धपरिणामोंकी बस्ती निजघटरूपी नगरमें भर पूर करता है । और अनादिकालके जो शुद्धचैतन्यरूप निश्चयप्राणों के घातक ऐसे मिथ्यात्वरागादिरूप विकल्पनाल है उनको निजखरूप नगरसे काढ देता है उनको ऊबड़ करदेता है ऐसे परमयोगीकी मैं बलिहारी अर्थात् उसके मस्तकपर मैं अपनेको वारता हूं । इस प्रकार श्री योगींद्रदेव परमयोगियोंकी प्रशंसा करते हैं। जिन योगियोंके वीतरागशुद्धात्मतत्त्वसे विपरीत पुण्य पाप दोनों ही नहीं हैं ।। २९१ ।। 3 परमात्मप्रकाशः॥ ३०५ तुट्टा इत्यादि । तुट्टइ नश्यति । कोसौ । मोहु निर्मोहशुद्धालद्रव्यप्रतिपक्षभूतो मोहः तडित्ति झटिति जहिं मोहोदयोत्पन्नसमस्तविकल्परहिते यत्र परमासपदार्थे । पुनरपि कि यत्र । मणु अत्थवणहं जाइ निर्विकल्पात् शुद्धासखभावाद्विपरीतं नानाविकल्पजालरूपं मनो वास्तं गच्छति सो सामिय उवएसु कहि हे स्वामिन् तदुपदेशं कथयेति प्रभाकरभट्टः श्रीयोगींद्रदेवान् पृच्छति अण्णे देवि काइ निर्दोषिपरमात्मनः परमाराध्यात्सकाशादन्येन देवेन किं प्रयोजनमित्यर्थः ।। २९२ ॥ इति प्रभाकरभट्टप्रश्नसूनमेकं गतं । अथोत्तरं,- णासविणिग्गउ सासडा, अंवरि जेत्थु विलाइ । तुइ मोहु तडत्ति तहिं, मणु अत्थवणहं जाइ ॥ २९३ ।। नासाविनिर्गतः उच्छासः : अंवरे यत्र विलीयते । त्रुट्यति मोहः झटिति तत्र गनः अस्तं याति ॥ २९३ ॥ णासविणिग्गड इत्यादि । णासविणिग्गउ नासिकाविनिर्गतः सासडा उच्छवासः अंबरि मिथ्यात्वरागादिविकल्पजालरहिते शून्ये अंवरशब्दवाच्ये जित्थु यत्र तात्त्विकपर- मानंदभरितावस्थेति निर्विकल्पसमाधौ विलाइ पूर्वोक्तः श्वासो विलयं गच्छति नासि- काद्वारं विहाय तालुरंध्रेण गच्छतीत्यर्थः । तुइ त्रुट्यति नश्यति । कोसौ। मोहु मोहो- आगे एक दोहामें शिप्यका प्रश्न और चार दोहाओंमें प्रश्नका उत्तर देकर निर्विकल्प समाधिरूप परम उपदेश फिर भी विस्तारसे करते हैं।-[खामिन्] हे खामी [तं उपदेशं] उस उपदेशको [कथय ] कहो [यत्र ] जिससे [ मोहः ] मोह [झटिति ] शीघ्र [त्रुव्यति] छूट जावे [मनः ] और चंचल मन [ अस्तमनं ] स्थिर- ताको [याति प्राप्त हो जावे [अन्येन देवेन किं] दूसरे देवतासे क्या प्रयोजन है । भावार्थ-प्रभाकरभट्ट श्रीयोगीद्रदेवसे प्रश्न करता है कि हे खामी वह उपदेश कहो कि जिससे निर्मोह शुद्धात्मद्रव्यसे पराङ्मुख मोह शीघ्र जुदा हो जावे अर्थात् मोहके उदयसे उत्पन्न समस्त विकल्पजालोंसे रहित जो परमात्मपदार्थ उसमें मोहजालका लेश भी न रहे और निर्विकल्प शुद्धात्मभावनासे विपरीत नाना विकल्प जालरूपी चंचल मन वह अस्त हो जावे । हे स्वामी निर्दोष परमाराध्य जो परमात्मा उससे अन्य जो मिथ्याती देव उनसे मेरा क्या मतलव है । ऐसा शिष्यने श्री गुरूसे प्रश्न किया उसका एक दोहासूत्र कहा ॥ २९२ ॥ आगे श्रीगुरू उत्तर देते हैं;-[नासाविनिर्गतः ] नाकसे निकला जो श्वास वह [ यत्र ] जिस [अंबरे ] निर्विकल्प समाधिमें [ विलीयते ] मिल जावे [तत्र ] उसी जगह [ मोहः ] मोह [झटिति ] शीघ्र [त्रुट्यति ] नष्ट होजाता है [ मनः] और मन ३९ ३०६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । दयनोत्पन्नरागादिविकल्पजालः तडत्ति झटिति तहिं तत्र बहिर्वोधशून्ये निर्विकल्पसमाधौ मणु मनः पूर्वोक्तरागादिविकल्पाधारभूतं तन्मयं वा अस्थवणहं जाइ अस्तं विनाशं गच्छति स्वस्वभावेन तिष्ठति इति । अन यदायं जीवो रागादिपरभावशून्यनिर्विकल्पसमाधौ तिष्ठति तदायमुच्छासरूपो वायुर्नासिकाछिद्रद्वयं वर्जयित्वा स्वयमेवानीहितवृत्त्या तालुप्रदेशे यत् केशात् शेपाष्टमभागप्रमाणं छिद्रं तिष्ठति तेन क्षणमात्रं दामद्वारेण तदनंतरं क्षणमात्र नासिकया तदनंतरं कृत्वा रंध्रेण निर्गच्छतीति । न च परकल्पितवायुधारणारूपेण श्वास- नाशो ग्राह्यः । कस्मादिति चेत् । वायुधारणा तावदीहापूर्विका ईहा च मोहकार्यरूपो विकल्पः । स च मोहकारणं न भवतीति इति न च परकल्पितवायुः । किं च । कुंभक- पूरकरेचकादिसंज्ञा वायुधारणा क्षणमात्रं भवत्येवान किं तु अभ्यासवगेनं घटिकाप्रहरदि- वसादिष्वपि भवति तस्य वायुधारणस्य च कार्य देहारोगत्वलधुत्वादिकं न च मुक्तिरिति । यदि मुक्तिरपि भवति तर्हि वायुधारणाकारकाणामिदानीतनपुरुपाणां मोक्षो कि न भवतीति भावार्थः ॥ २९३ ॥ [अस्तं याति ] स्थिर होजाता है । भावार्थ-नासिकासे निकले जो श्वासोच्छवास हैं वे अंबर अर्थात् आकाश समान निर्मल मिथ्यात्वविकल्पजालरहित शुद्धभावों में विलीन हो जाते हैं अर्थात् तत्त्वखरूप परमानंदकर पूर्ण निर्विकल्पसमाधिमें स्थिर चित्त हो जाता है तव श्वासोच्छ्ासरूप पवन रुक जाती है नासिकाके द्वारको छोड़कर तालुवारंध्ररूपी दशवें द्वारमें होके निकले तव मोह टूटता है उसी समय मोहके उदयकर उत्पन्न हुए रागादिविकल्पजाल नाश हो जाते हैं बाह्य ज्ञानसे शून्य निर्विकल्पसमाधिमें विकल्पोंका आधारभूत जो मन वह अस्त हो जाता है अर्थात् निज खभावमें मनकी चंचलता नही रहती । जव यह जीव रागादि परभावोंसे शून्य निर्विकल्प समाधिमें होता है तब यह श्वासोछासरूप पवन नासिकाके दोनों छिद्रोंको छोड़कर खयमेव अवांछीक वृत्तिसे तालु- वाके वालकी अनीके आठवें भाग प्रमाण अति सूक्ष्म छिद्रों (दशवें द्वारमें) होकर वारीक निकलती है नासाके छेदको छोडकर तालुरंध्रमें (छेदमें ) होकर निकलती है। और पातंजलमतवाले वायुधारणारूप श्वासोच्छ्रास मानते हैं वह ठीक नहीं हैं क्योंकि वायुधारणा वाछांपूर्वक होती है और वांछा है वह मोहसे उत्पन्न विकल्परूप है वांछाका कारण मोह है । वह संयमीके वायुका निरोध वाछापूर्वक नही होता है खाभाविक ही होता है। जिनशासनमें ऐसा कहा है कि कुंभक (पवनको खेंचना) पूरक (पवनको थांभना) रेचक (पवनको निकालना) ये तीन भेद प्राणायामके हैं इसीको वायुधारणा कहते हैं। यह क्षणमात्र होती है परंतु अभ्यासके वशसे घड़ी पहर दिवस आदितक भी होती है। उस वायुधारणाका फल ऐसा कहा है कि देहकी आरोग्या होती है देहके सब रोग मिट परमात्मप्रकाशः। ३०७ अथ,- मोहु विलिजइ मणु मरइ, तुष्टइ सासुणिसासु । केवलणाणुवि परिणवइ, अंवरि जाहं णिवासु ॥ २९४ ।। मोहो विलीयते मनो म्रियते त्रुट्यति श्वासोच्छ्रासः । केवलज्ञानमपि परिणमति अंबरे येषां निवासः ॥ २९४ ॥ मोहु बिलिज्जइ इत्यादि । मोहु मोहो ममत्वादिविकल्पजालं विलिआइ विलयं गच्छति मणु मरइ इहलोकपरलोकाशाप्रभृतिविकल्पजालरूपं मनो म्रियते तुट्टइ नश्यति । कोसौ। सासुणिसासु अनीहितवृत्त्या नासिकाद्वारं विहाय क्षणमात्रं तालुरंध्रेण गच्छति पुनरप्यं- तरं कृत्वा नासिकया निर्गन्छति पुनरपि रंधेणेत्युच्छासनिःश्वासलक्षणो वायुः । पुनरपि किं भवति । केवलणाणुवि परिणमइ केवलज्ञानमपि परिणमति समुत्पद्यते । येषां किं । अंबरि जाहं णिवासु रागद्वेपमोहरूपविकल्पजालशून्यं अंबरे अंवरशब्दवाच्ये शुद्धात्मसम्य- श्रद्धानज्ञानानुचरणरूपे निर्विकल्पत्रिगुप्तिगुमपरमसमाधौ येषां निवास इति । अयमत्र जाते हैं शरीर हलका हो जाता है परंतु मुक्ति इस वायुधारणासे नहीं होती, क्योंकि वायुधारणा शरीरका धर्म है आत्माका खभाव नही है । शुद्धोपयोगियोंके सहज ही विना यलके मन भी रुक जाता है और श्वास भी स्थिर हो जाते हैं । शुभोपयोगियोंके मनके रोकनेकेलिये प्राणायामका अभ्यास है मनके अचल होनेपर कुछ प्रयोजन नही है । जो आत्मखरूप है वह केवल चेतनामई ज्ञान दर्शनखरूप है सो शुद्धोपयोगी तो स्वरूपमें अतिलीन हैं और शुभोपयोगी कुछ एक मनकी चपलतासे आनंदघनमें अडोल अव- स्थाको नही पाते तबतक मनके वा करनेकेलिये श्री पंच परमेष्ठीका ध्यान स्मरण करते हैं और ओंकारादि मंत्रोंका ध्यान करते हैं । और प्राणायामका अभ्यास कर मनको रोकके चिद्रूपमें लगाते है जब वह लगगया तव मन और पवन सब स्थिर हो जाते हैं। शुभोपयोगियोंकी दृष्टि एक शुद्धोपयोगपर है पातंजलिमतकी तरह थोथी वायुधारणा नहीं है । जो वायुधारणाकर ही मुक्ति होवे तो वायुधारणाके करनेवालोंको इस दुःषम- कालमें मोक्ष क्यों न होवे कभी नही होती । मोक्ष तो केवल खभावमई है ।। २९३ ॥ आगे फिर भी परमसमाधिका कथन करते है। [येषां] जिन मुनीश्वरोंका [अंबरे] परमसमाधिमें [ निवासः] निवास है उनका [ मोहः ] मोह [विलीयते ] नाशको प्राप्त हो जाता है [ मनः ] मन [म्रियते ] मरजाता है [ श्वासोच्छवासः] श्वासोच्छास [त्रुट्यति रुक जाता है | अपि ] और [केवलज्ञानं ] केवलज्ञान [परिणमति] उत्पन्न होता है । भावार्थ-दर्शनमोह और चारित्रमोह आदि कल्पनाजाल सव विलय हो जाता है, इस लोक परलोक आदिकी वाछा आदि विकल्प जालरूप मन स्थिर हो

..
३०८
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
भावार्थः । अंबरशब्देन शुद्धाकाशं न ग्राह्यं किंतु विपयकपायविकल्पशून्यः परमसमा-
धिह्यः, वायुशब्देन च कुंभकरेचकपूरकादिरूपो वायुनिरोधो न ग्राह्यः किं तु स्वयमनी-
हितवृत्त्या निर्विकल्पसमाधिबलेन दशमद्वारसंज्ञेन ब्रह्मरंध्रसंज्ञेन सूक्ष्माभिधानरूपेण च
तालुरंध्रेण योसौ गच्छति स एव ग्राह्यः तत्र । यदुक्तं केनापि । "मणु मरइ पवणु जहिं
खयह जाइ । सव्वंगइ तिहुवणु तहि जे ठाइ मूढा अंतरालु परियाणहि तुट्टइ मोहजालु
जइ जाणहि" । अत्र पूर्वोक्तलक्षणमेव मनोमरणं ग्राह्यं पवनक्षयोपि पूर्वोक्तलक्षण एव
त्रिभुवनप्रकाशक आत्मा तत्रैव निर्विकल्पसमाधौ तिष्ठतीत्यर्थः । अंतरालशब्देन तु रागादि-
परभावशून्यत्वं ग्राह्यं न चाकाशे ज्ञाते सति मोहजालं नश्यति न चान्यादृशं परिकल्पितं
ग्राह्यमित्यभिप्रायः ॥ २९४ ॥
जाता है और श्वासोच्छ्रासरूप वायु रुक जाती है श्वासोच्छ्रास अवांछीकपनेसे नासिकाके
द्वारको छोड़कर तालुछिद्रमें होके निकलते हैं तथा कुछ देरके वाद नासिकासे निकलते
हैं। इस प्रकार श्वासोच्छ्रासरूप पवन वश हो जाता है । चाहे जिस द्वारसे निकालो।
केवलज्ञान भी शीघ्र ही उन ध्यानी मुनियोंके उत्पन्न होता है कि जिन मुनियोंका राग-
द्वेषमोहरूप विकल्पजालसे रहित शुद्धात्माका सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप निर्विकल्प
त्रिगुप्तिमई परमसमाधिमें निवास है । यहां अंबर नाम आकाशका अर्थ नही समझना
किंतु समस्तविषयकषायरूप विकल्पजालोंसे शून्य परमसमाधि लेना । और यहां
वायु शब्दसे कुंभक पूरक रेचकादिरूप वांछापूर्वक वायुनिरोध न लेना किंतु खयमेव
अवांछीक वृत्तिकर निर्विकल्पसमाधिके बलसे ब्रह्मद्वार नामा सूक्ष्म छिद्र जिसको तालु-
वेका रंध्र कहते हैं उसके द्वारा अवांछीक वृत्तिसे पवन निकलता है वह लेना । ध्यानी
मुनियोंके पवन रोकनेका यत्न नही होता है विना ही यतके सहज ही पवन रुक जाता
है और मन भी अचल हो जाता है ऐसा समाधिका प्रभाव है । ऐसा दूसरी जगह
भी कहा है कि, जो मूढ हैं वे तो अंबरका अर्थ आकाशको जानते हैं और जो ज्ञानी
जन हैं वे अंबरका अर्थ परमसमाधिरूप निर्विकल्प जानते हैं । सो निर्विकल्प ध्यानमें
मन मरजाता है पवनका सहज ही निरोध होता है और सब अंग तीन भुवनके समान हो
जाता है। जो परम समाधिको जानै तो मोह टूट जावे । मनके विकल्पोंका मिटना वही
मनका मरना है और वही श्वासका रुकना है जो कि सव द्वारोंसे रुककर दशवें द्वारमेंसे
होकर निकले । तीन लोकका प्रकाशक आत्माको निर्विकल्प समाधिमें स्थापित करता है।
अंतराल शब्दका, अर्थ रागादि भावोंसे शून्य दशा लेना आकाशका अर्थ न लेना । आका.
शके जाननेसे मोहजाल नहीं मिटता आत्मस्वरूपके जाननेसे मोहजाल मिटता है । जो
पातंजलि आदि परमसमयमें शून्यरूप समाधि कही है वह अभिप्राय नही लेना, क्योंकि
नब विभावोंकी शुन्यता हो जावेगी तब वस्तुका ही अभाव हो जाइगा ॥ २९४ ॥

परमात्मप्रकाशः। ३०९ अथ, - - जो आयासई मणु धरइ, लोयालोयपमाणु । तुइ मोहु तडत्ति तसु, पावइ परह पवाणु ॥ २९५ ॥ यः आकाशे मनो धरति लोकालोकप्रमाणम् । त्रुट्यति मोहो झटिति तस्य प्रामोति परस्य प्रमाणम् ॥ २९५ ॥ जो इत्यादि । जो यो ध्याता पुरुषः आयासई मणु धरइ यथा परद्रव्यसंबंधरहितत्वे- नाकाशमंबरशब्दवाच्यं शून्यमित्युच्यते तथा वीतरागचिदानंदैकस्वभावेन भरितावस्थोपि मिथ्यात्वरागादिपरभावरहितत्वानिर्विकल्पसमाधिराकाशमंबरशब्दवाच्यं शून्यमित्युच्यते । तत्राकाशसंज्ञे निर्विकल्पसमाधौ मनो धरति स्थिरं करोति । कथंभूतं मनः । लोयालोय. पमाणु लोकालोकप्रमाणं लोकालोकव्याप्तिरूपं अथवा प्रसिद्धलोकालोकाकाशे व्यवहारेण ज्ञानापेक्षया न च प्रदेशापेक्षया लोकालोकप्रमाणं मनो मानसं ज्ञानं धरति तुट्टइ मोहु तडत्ति तसु त्रुट्यति नश्यति । कोसौ । मोहु मोहः । कथं । झटिति तस्य ध्यानात् । न केवलं मोहो नश्यति । पावइ प्राप्नोति । किं । परहं पवाणु परस्य परमात्मस्वरूपस्य प्रमाणं । कीदृशं तत्प्रमाणमितिचेत् । व्यवहारेण रूपग्रहणविषये चक्षुरिव सर्वगतः । यदि पुनर्निश्चयेन सर्वगतो भवति तर्हि चक्षुषो अग्मिस्पर्शदाहः प्राप्नोति न च तथा, । तथात्मनोपि परकीयसुखदुःखविपये तन्मयपरिणामत्वेन परकीयसुखदुःखानुभवं प्राप्नोति न च तथा । आगे फिर भी निर्विकल्पसमाधिका कथन करते हैं,-[य] जो ध्यानी पुरुष [आकाशे] निर्विकल्पसमाधिमें [मनः] मन [धरति ] स्थिर करता है [ तस्य] उसीका [ मोहः ] मोह [शटिति] शीघ्र [ त्रुट्यति ] टूट जाता है और ज्ञानकरके [परस्य प्रमाणं लोकालोकप्रमाण आत्माको प्राप्नोति प्राप्त होजाता है । भावार्थ- आकाश अर्थात् वीतरागचिदानंद खभाव अनंत गुणरूप और मिथ्यात्वरागादिपरभावरहि- तस्वरूप निर्विकल्पसमाधि यहा समझना । जैसे आकाशद्रव्य सब द्रव्योंसे भरा हुआ है परंतु सवसे शून्य अपने स्वरूप है उसीप्रकार चिद्रूप आत्मा रागादि सब उपाधियोंसे रहित है शून्यरूप है इसलिये आकाश शब्दका अर्थ यहां शुद्धात्मस्वरूप लेना । व्यवहार- नयकर ज्ञान लोकालोकका प्रकाशक है और निश्चयनयकर अपने खरूपका प्रकाशक है । आत्माका केवलज्ञान लोकालोकको जानता है इसकारण ज्ञानकी अपेक्षा लोकालोकप्रमाण कहा जाता है प्रदेशोंकी अपेक्षा लोकालोकप्रमाण नही है। ज्ञानगुण लोकालोकमें व्याप्त है परंतु परद्रव्योंसे भिन्न है । परवस्तुसे जो तन्मयी हो जावे तो वस्तुका अभाव हो जावे । इसलिये यह निश्चय हुआ कि ज्ञानगुणकर लोकालोकप्रमाण जो आत्मा उसे आकाश भी कहते हैं उसमें जो मन लगावे तव जगतसे मोह दूर हो और परमात्माको पावे ।

३१० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । निश्चयेन पुनर्लोकमात्रासंख्येयप्रदेशोपि सन् व्यवहारेण पुनः शरीरकृतोपसंहारविस्तार- वशाद्विवक्षितभाजनस्थप्रदीपवत् देहमान इति भावार्थः ॥ २९५ ॥ 3 । अथ:- देहि वसंतुवि णवि मुणित, अप्पा देउ अणंतु। अंबरि समरसि मणु धरिवि, सामिय णटु णिभंतु ॥ २९६ ।। देहे वसन्नपि नैव मतः आत्मा देवः अनंतः । अंबरे समरसे मनः धृत्वा खामिन् नष्टो निधीतः ॥ २९६ ॥ देहि वसंतुवि इत्यादि । देहि वसंतुवि व्यवहारेण देहे वसन्नपि णवि मुणिउ नैव ज्ञातः । कोसौ । अप्पा निजशुद्धात्मा । किं विशिष्टः । देउ आराधनायोग्यः केवलजाना- धनंतगुणाधारत्वेन देवः परमाराध्यः । पुनरपि किंविशिष्टः । अणंतु अनंतपदार्थपरिच्छि- त्तिकारणत्वादविनश्वरत्वादनंतः । किं कृत्वा । मणु धरिवि मनो धृत्वा । क । अंबरि अंवरशब्दवाच्ये पूर्वोक्तलक्षणे रागादिशून्ये निर्विकल्पसमाधौ । कथंभूते । समरसि वीतरा- गतात्त्विकमनोहरानंदस्यंदिनि समरसीभावे साध्ये सामिय हे स्वामिन् । प्रभाकरभट्टः पश्चात्तापमनुशयं कुर्वन्नाह । किं ब्रूते । णहु णिभंतु इयंतं कालमित्थंभूतं परमात्मोपदेश- व्यवहारनयकर आत्मा ज्ञानकर सवको जानता है इसलिये सब जगतमें हैं। जैसे व्यवहार- नयकर नेत्र रूपीपदार्थको जानता है परंतु उन पदार्थोंसे भिन्न है । जो निश्चयकर सर्वगत होवे तो परपदार्थोंसे तन्मयी हो जावे जो उनसे तन्मयी होवे तो नेत्रोंको अग्निका दाह होना चाहिये इसकारण तन्मयी नही है । उसीप्रकार आत्मा जो पदार्थोंको तन्मयी होके जाने तो परके सुख दुःखसे तन्मई होनेसे इसको भी दूसरेका सुख दुःख मालूम होना चाहिये ऐसा होता नहीं है। इसलिये निश्चयसे आत्मा असर्वगत है और व्यवहारनयसे सर्वगत है प्रदेशोंकी अपेक्षा निश्चयसे लोकप्रमाण असंख्यात प्रदेशी है और व्यवहारन- यकर पात्रमें रखे हुए दीपककी तरह देह प्रमाण है जैसा शरीर धारणकरे वैसा प्रदेशोंका संकोच विस्तार हो जाता है ।। २९५ ॥ आगे फिर भी शिष्य प्रश्न करता है। स्वामिन् ] हे स्वामी [ देहे वसनपि] व्यवहारनयकर देहमें रहता हुआ भी [आत्मा देवः] आराधने योग्य आत्मा [अनंतः] अनंत गुणोंका आधार [नैव मतः] मैने अज्ञानतासे नहीं जाना । क्या करके । [समरसे ] समानभावरूप [अंबरे ] निर्विकल्प समाधिमें [मनः धृत्वा] मन लगाकर । इसलिये अब तक [नष्टो निभ्रीतः ] निस्संदेह नष्ट हुआ । भावार्थ-प्रभाकरभट्ट पछताता हुआ श्री योगीद्रदेवसे वीनती करता है कि हे स्वामिन् मैने अवतक रागादि विभावरहित निर्विकल्पसमाधिमें मन लगाकर आत्म देव नहीं जाना इसीलिये इतने परमात्मप्रकाशः। मलभमानःसन् निभ्रांतो नष्टोऽहमित्यभिप्रायः ॥ २९६ ॥ एवं परमोपदेशकथनमुख्यत्वेन सूत्रदशकं गतं। अथ परमोपशमभावसहितेन सर्वसंगपरित्यागेन संसारविच्छेदं भवतीति युग्मेन निश्चिनोति;- सयलवि संग ण मिल्लिया, णवि किउ उचसमभाउ । सिवपयमग्गुवि मुणिउ णवि, जहिं जोइहिं अणुराउ ॥ २९७ ॥ घोरु ण चिण्णउ तवचरणु, जंणियबोहरं सारु । पुण्णुवि पाउवि दडु णवि, किमु छिजइ संसारु ॥ २९८ ॥ सफला अपि सगा न मुक्ताः नैव कृत उपशमभावः । शिवपदमार्गोपि मतो नैव यत्र योगिनां अनुरागः ॥ २९७ ।। घोरं न चीर्ण तपश्चरणं यत् निजबोधेन सारम् । पुण्यमपि पापमपि दग्धं नैव किं छिद्यते ससारः ।। २९८ ॥ सयलवि इत्यादि । सयलवि समस्ता अपि संग मिथ्यात्वादिचतुर्दशभेदमिन्ना अभ्यं- तराः क्षेत्रवास्त्वादिबहुभेदभिन्ना वाह्या अपि संगाः परिग्रहा ण मिल्लिया न मुक्ताः । पुनरपि किं न कृतं । णवि किउ उवसमभाउ जीवितमरणलाभालाभसुखदुःखादिसमता- भावलक्षणो नैव कृतः उपशमभावः । पुनश्च किं न कृतं । सिवपयमग्गुवि मुणिउ णवि "शिवं परमकल्याणं निर्वाण शांतमभयं । प्राप्तं मुक्तिपदं येन स शिवः परिकीर्तितः" "इति वचनात् शिवशब्दवाच्यो योसौ मोक्षस्तस्य मार्गोपि न ज्ञातः । कथंभूतो मार्गः । स्वशुद्धा- त्मसम्यश्रद्धानज्ञानानुचरणरूपः । यत्र मार्गे किं । जहिं जोइहिं अणुराउ यत्र निश्चय- मोक्षमार्गे परमयोगिनामनुरागस्तात्पर्य । न केवलं मोक्षमार्गोपि न ज्ञातः । घोरुण चिण्णउ तवचरणु घोरं दुर्धरं परीषहोपसर्गजयरूपं नैव चीर्ण न कृतं । किं तत् । अनशनादिद्वाद- कालतक संसारमें भटका । निजखरूपकी प्राप्तिके विना मै नष्ट हुआ । अव ऐसा उपदेश कहो कि जिससे भ्रम मिट जावे ॥ २९६ ।। इस प्रकार परमोपदेशके कथनकी मुख्यतासे दस दोहा कहे हैं। आगे परमोपदेश भाव सहित सव परिग्रहका त्याग करनेसे ससारका विच्छेद होता है ऐसा दो दोहाओंमें निश्चय करते हैं;-[ सकला अपि संगाः] सब परिग्रह भी [न मुक्ताः ] नहीं छोड़े [ उपशमभावः नैव कृतः] समभाव भी नहीं किया [यत्र योगिनां अनुरागः ] और जहाँ योगीश्वरोंका प्रेम है ऐसा [शिवमार्गोपि] मोक्ष पद भी [नैव मतः] नहीं जाना [घोरं तपश्चरणं] महा दुर्धर तप [न चीर्ण ] नहीं

३१२
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
शविधं तपश्चरणं । यत्कथंभूतं । जं णियबोहहं सारु यत्तपश्चरणं वीतरागनिर्विकल्पस्वसं-
वेदनलक्षणेन निजबोधेन सारभूतं । पुनश्च किं न कृतं । पुण्णुवि पाउवि निश्चयनयेन
शुभाशुभनिगलद्वयरहितस्य संसारिजीवस्य व्यवहारेण सुवर्णलोहनिगलद्वयसदृशं पुण्यपाप-
द्वयमपि णवि शुद्धात्मद्रव्यानुभवरूपेण ध्यानाग्निना दग्धं नैव किमु छिज्जइ संसारु
कथं छिद्यते संसार इति । अनेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा निरंतरं शुद्धात्मद्रव्यभावना कर्तव्येति
तात्पर्य ॥ २९७ ॥ २९८ ॥
अथ दानपूजापंचपरमेष्टिवंदनादिरूपं परंपरया मुक्तिकारणं श्रावकधर्म कथयति;-
दाणु ण दिण्णउ मुणिवरहं, णवि पुजिउ जिणणाहु।
पंच ण वंदिय परमगुरु, किमु होसइ सिवलाहु ॥ २९९ ॥
दानं न दत्तं मुनिवराणां नापि पूजितः जिननाथः ।
पंच न वंदिता परमगुरवः किं भविष्यति शिवलाभः ॥ २९९ ।।
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किया [ यत् ] जो कि [ निजबोधेन सारं] आत्मज्ञानकर शोभायमान है [पुण्यमपि
पापमपि ] और पुण्य तथा पाप ये दोनों [ नैव दग्धं ] नहीं भस्म किये तो [ संसारः]
संसार [कि छिद्यते] कैसे छूट सकता है । भावार्थ-मिथ्यात्व (अतत्वश्रद्धा) राग
(प्रीतिभाव) दोष (वैरभाव) वेद (स्त्री पुरुष नपुंसक) क्रोध मान माया लोभरूप चार
कषाय और हास्य रति अरति शोक भय ग्लानि-ये चौदह अंतरंग परिग्रह, क्षेत्र
(प्रामादिक) वास्तु (गृहादिक) हिरण्य (रुपय्या मौहर आदि) सुवर्ण (गहने आदि)
धन (हाथी घोड़ा आदि) धान्य (अन्नादि ) दासीदास, कुप्य (वस्त्र तथा सुगंधादिक)
भांड ( वर्तन आदि) ये दस तरह के बाहरके परिग्रह, इस प्रकार बाह्य अभ्यंतर परि-
ग्रहके चौवीस भेद हुए इनको नहीं छोड़ा । जीवित मरण सुख दुःख लाभ अलाभा-
दिमें समान भाव कभी नहीं किया कल्याणरूप मोक्षका मार्ग सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्र भी
नही जाने । निजस्वरूपका श्रद्धान निजखरूपका ज्ञान और निजखरूपका आचरणरूप
निश्चयरत्नत्रय तथा नव पदार्थोंका श्रद्धान नव पदार्थोंका ज्ञान और अशुभक्रियाका त्याग.
रूप व्यवहाररत्नत्रय-ये दोनों ही मोक्षके मार्ग हैं इन दोनोंमेंसे निश्चयरत्नत्रय तो साक्षात्
मोक्षका मारग है और व्यवहाररत्नत्रय परंपराय मोक्षका मार्ग है । ये दोनों मैने कभी
नहीं जाने संसारका ही मार्ग जाना । अनशनादि बारहप्रकारका तप नहीं किया बाईस
परीषह नहीं सहन की । तथा पुण्य सुवर्णकी वेड़ी पाप लोहेकी वेड़ी सो ये दोनों
बंधन निर्मल आत्मध्यानरूपी अमिसे भस्म नहीं किये । इन बातोंके विना किये
संसारका विच्छेद नहीं होता संसारसे मुक्त होनेके येही कारण है। ऐसा व्याख्यान
जानकर हमेशां शुद्धात्मखरूपकी भावना करनी चाहिये ॥ २९७ ॥ २९८ ॥

.. परमात्मप्रकाशः। ३१३ दाणु इत्यादि । दाणु ण दिण्णउ आहाराभयभैषज्यशास्त्रभेदेन चतुर्विधदानं भक्तिपूर्वक न दत्तं । केषां । मुणिवरहं निश्चयव्यवहाररत्नत्रयाराधकानां मुनिवरादिचतुर्विधसंघस्थितानां पात्राणां गवि पुजिउ जलधारया सह गंधाक्षतपुष्पाद्यष्टविधपूजया न पूजितः । कोसौ । जिणणाहु देवेद्रधरणेंद्रनरेंद्रपूजितः केवलज्ञानाद्यनंतगुणपरिपूर्णः पूज्यपदस्थितो जिननाथ: पंच ण चंदिय पंच न वंदिताः । के ते । परमगुरु त्रिभुवनाधीशवंद्यपदस्थिता अर्हत्सिद्धाः त्रिभुवनेशवंद्यमोक्षपदाराधकाः आचार्योपाध्यायसाधवश्वेति पंचगुरवः किमु होसइ सिव- लाहु शिवशब्दवाच्यमोक्षपदस्थितानां तदाराधकानामाचार्यादीनां च यथायोग्यं दानपूजावं- दनादिकं न कृतं कथं शिवशब्दवाच्यमोक्षसुखस्य लाभो भविष्यति न कथमपीति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा उपासकाध्ययनशास्त्रकथितमार्गेण विधिद्रव्यदापात्रलक्षणविधानेन दातव्यं पूजावंदनादिकं च कर्तव्यमिति भावार्थः ॥ २९९ ॥ अथ निश्चयेन चितारहितध्यानमेव मुक्तिकारणमिति प्रतिपादयति चतुष्कलेन,- अहुम्मीलियलोयणिहिं, जोउ किं झंपियएहिं । एमुइ लभइ परमगइ, णिचंतिं ठियएहिं ॥ ३०० ॥ आगे दानपूजा और पंच परमेष्ठीकी वंदना आदि परंपरा मुक्तिका कारण जो श्राव- कधर्म उसे कहते हैं;-[दानं ] आहारादि दान [ मुनिवराणां] मुनीश्वर आदि पात्रोंको [न दत्तं] नही दिया [जिननाथः] जिनेन्द्र भगवानको भी [नापि पूजितः] नही पूजा [पंच परमगुरवः ] अरहंत आदिक पाच परमेष्ठी [न वंदिताः) भी नहीं पूजे तब [शिवलाभः ] मोक्षकी प्राप्ति [ कि भविष्यति ] कैसे हो सकती है । भावार्थ- आहार औपध शास्त्र और अभयदान-ये चार प्रकारके दान भक्तिपूर्वक पात्रोंको नहीं दिये अर्थात् निश्चय व्यवहाररत्नत्रयके आराधक जो यती आदि चार प्रकार संघ उनको चार प्रकारका दान भक्तिकर नहीं दिया, और दुःखी भूखे जीवोंको करुणाभावसे दान नहीं दिया । इंद्र नागेंद्र नरेन्द्र आदिकर पूज्य केवलज्ञानादि अनंतगुणोंकर पूर्ण जिनना- थकी पूजा नहीं की-जल चंदन अक्षत पुष्प नैवेद्य दीप धूप फलसे पूजा नही की और तीनलोककर वंदने योग्य ऐसे अरहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधु इन पाच परमेष्ठि- योंकी आराधना नही की । सो हे जीव इन कार्योंके विना तुझे मुक्तिका लाभ कैसे होगा। क्योंकि मोक्षकी प्राप्तिके ये ही उपाय हैं कि जिन पूजा पंचपरमेष्ठीकी वंदना और चारसंघको चारप्रकार दान इन विना मुक्ति नही हो सकती । ऐसा व्याख्यान जानकर सातवें उपासकाध्ययन अंगमें कही गई जो दान पूजा वंदनादिककी विधि वही करनी योग्य है। शुभविधीसे न्यायकर उपार्जन किया अच्छा द्रव्य वह दातारके अच्छे गुणोंको धारणकर विधिसे पात्रको देना, जिनराजकी पूजा करना और पंच परमेष्ठीकी वंदना करना, ये ही व्यवहारनयकर कल्याणका उपाय है ॥ २९९ ।। , .. रायचंदजैनशास्त्रमालायाम् । ३१४ अोन्मीलितलोचनाभ्यां योगः किं झंपिताभ्याम् । एवमेव लभ्यते परमगतिः निश्चितं स्थितैः ॥ ३००॥ अद्भुम्मीलिय लोयणिहिं अर्धोन्मीलितलोचनपुटाभ्यां जोउ कि योगो ध्यानं किं भवति अपि तु नैव । न केवलमर्धोन्मीलिताभ्यां । झंपियएहि झंपिताभ्यामपि लोचनाभ्यां नैवेति । तर्हि कथं लभ्यते । एमुइ लभइ एवमेव लभ्यते लोचनपुटनिमीलनोन्मीलन- निरपेक्षैः । का लभ्यते । परमगइ केवलजानादिपरमगुणयोगात्परमगतिर्मोक्षगतिः । कैः लभ्यते । णिचंतिं ठियएहिं ख्यातिपूजालाभप्रभृतिसमस्तचिंताजालरहितैः पुरुपैश्चितारहितैः स्वशुद्धात्मरूपस्थितैश्वेत्यभिप्रायः ॥ ३०० ॥ अथ:- जोइय मिल्लहि चिंत जइ, तो तुइ संसारु । चिंतासत्तउ जिणवरुवि, लहइ ण हंसाचार ॥ ३०१॥ योगिन् मुंचसि चिंतां यदि ततः त्रुट्यति संसारः । चिंतासक्तो जिनवरोपि लभते न हंसचारं ॥ ३०१ ॥ जोइय इत्यादि । जोइय हे योगिन् मिल्लहि मुंचसि । कां । चिंतारहिताद्विशुद्धज्ञान- दर्शनस्वभावात्परमात्मपदार्थाद्विलक्षणां चितां जइ यदि चेत् तो ततश्चिताभावात् । किं भवति । तुट्टइ नश्यति । स कः । संसारु निःसंसारात् शुद्धात्मद्रव्यात् विलक्षणो द्रव्यक्षे- त्रकालादिभेदभिन्नः पंचप्रकारः संसारः । यतः कारणात् चिंतासत्तउ जिणवरुवि छद्मस्था- वस्थायां शुभाशुभाचंतासक्तो जिनवरोपि लहइ ण लभते न । कं । हंसाचारु संशयवि- आगे निश्चयसे चिंतारहित ध्यान ही मुक्तिका कारण है ऐसा कहते हैं।-अधों- न्मीलितलोचनाभ्यां] आधे उघड़े हुए नेत्रोंसे अथवा [झंपिताभ्यां] बंद हुए नेत्रोंसे [किं ] क्या [योगः ] ध्यानकी सिद्धि होती है कभी नही । [ निश्चितं स्थितैः ] जो चिंता रहित एकाग्रमें स्थित हैं उनको [एवमेव ] इसीतरह [लभ्यते परमगतिः] खयमेव परमगति (मोक्ष) मिलती है । भावार्थ ख्याति (वड़ाई) पूजा ( अपनी प्रतिष्ठा) और लाभ इनको आदि लेकर समस्त चिंताओसे रहित जो निश्चित पुरुष हैं वे ही शुद्धात्मखरूपमें स्थिरता पाते है उनहीके ध्यानकी सिद्धि है और वे ही परमगतिके पात्र है ॥ ३०॥ आगे फिर भी चिंताका ही त्याग वतलाते हैं;-[योगिन् ] हे योगी [यदि] जो तू [चिंता मुंचसि ] चिंताओंको छोडेगा [ततः] तो [संसारः] संसारका भ्रमण त्रुट्यति ] छूट जायगा क्योंकि [चिंतासक्तः] चिंतामें लगे हुए [जिनवरोपि] छद्मस्थ अवस्थावाले तीर्थकर देव भी [हंसचारं न लभते ] परमात्माका आचरणरूप , परमात्मप्रकाशः। ३१५ भ्रमविमोहरहितानंतज्ञानादिनिर्मलगुणयोगेन हंस इव हंसः परमात्मा तस्य चारं रागादि- रहितं शुद्धामपरिणाममिति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षाप्रभृतिसम- स्तचिंताजालं त्यत्तवापि चिंतारहिते शुद्धात्मतत्त्वे सर्वतात्पर्येण भावना कर्तव्येति तात्पर्य । अथ,- जोइय दुम्मइ कवुण तुह, भवकारणि ववहारि। वंभु पवंचहिं जो रहिउ, सो जाणिवि मणु मारि ॥ ३०२ ॥ योगिन् दुर्मतिः का तव भवकारणे व्यवहारे । ब्रह्म प्रपंचैर्यत् रहितं तत् ज्ञात्वा मनो मारय ॥ ३०२ ॥ जोइय इत्यादि । जोइय हे योगिन् दुम्मइ कवुण तुह दुर्मतिः का तवेयं भव- कारणि ववहारि भवरहितात् शुभाशुभमनोवचनकायव्यापाररूपव्यवहारविलक्षणाच्च स्वशुद्धात्मद्रव्यात्प्रतिपक्षभूते पंचप्रकारसंसारकारणे व्यवहारे । तर्हि किं करोमीति चेत् । वंभु ब्रह्मशब्दवाच्यं स्वशुद्धात्मानं ज्ञात्वा । कथंभूतं यत् । पवंचहिं जो रहिउ यत्प्रपंच- रहितं । पश्चात्किं कुरु । सो जाणिवि तं निजशुद्धात्मानं वीतरागस्वसंवेदनज्ञानेन ज्ञात्वा । पश्वात्किं कुरु । मणु मारि अनेकमानसविकल्पजालरहिते परमात्मनि स्थित्वा शुभाशुभवि- कल्पजालरूपं मनो मारय विनाशयेति भावार्थः ।। ३०२ ॥ शुद्ध भावोंको नही पाते । भावार्थ-हे योगी निर्मल ज्ञान दर्शन खभाव परमात्मपदा- र्थसे पराङ्मुख जो चिंताजाल उसे छोडेगा तभी चिंताके अभावसे संसार भ्रमण टूटेगा । शुद्धात्म द्रव्यसे विमुख जो द्रव्य क्षेत्र काल भव भावरूप पांचप्रकारके ससारसे तू मुक्त होगा । जबतक चिंतावान है तबतक निर्विकल्प ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती। दूसरोंकी तो क्या बात है जो तीर्थंकरदेव भी केवल अवस्थाके पहले जवतक कुछ शुभा- शुभ चिंताकर सहित हैं तबतक वे भी रागादिरहित शुद्धोपयोगपरिणामोंको नही पास- कते । सशय विमोह विभ्रमरहित अनंत ज्ञानादि निर्मलगुण सहित हंसके समान उज्ज्वल परमात्माके शुद्ध भाव हैं वे चिंताके विना छोड़े नहीं होते । तीर्थकर देव भी मुनि होके निश्चित व्रत धारण करते हैं तभी परमहंस दशा पाते हैं ऐसा व्याख्यान जानकर देखे सुने भोगे हुए भोगोंकी वांछा आदि समस्तचिंताजालको छोड़कर परम निश्चित हो शुद्धात्माकी भावना करना योग्य है ॥ ३०१ ॥ आगे श्रीगुरु मुनियोंको उपदेश देते हैं कि मनको मारकर परमब्रह्मका ध्यान करो, [योगिन् ] हे योगी [तव का दुर्मतिः ] तेरी क्या खोटी बुद्धि है जो तू [ भवकारणे व्यवहारे ] ससारके कारण उद्यमरूप व्यवहार करता है । अब तू [प्रपंचैः रहितं] मायाजालरूप पाखंडोंसे रहित [ यत् ब्रह्म ] जो शुद्धात्मा है [ तत् ज्ञात्वा ] उसको रायनंदजैनशास्त्रमालायाम् । अथ:- सव्वहिं रायहिं छहिं रसहि, पंचहिं रूवहिं जंतु । चित्तु णिवारिवि झाइ तुहुं, अप्पा देउ अणंतु ॥ ३०३ ॥ सर्वैः रागैः षद्भिः रसैः पंचभिः रूपैः गच्छत् । चित्तं निवार्य ध्याय त्वं आत्मानं देवमनंतम् ॥ ३०३ ॥ सव्वहिं इत्यादि । झाइ ध्याय चिंतय तुहुं त्वं हे प्रभाकरभट्ट । कं । अप्पा स्वशुद्धा- त्मानं । कथंभूतं । देउ वीतरागपरमानंदसुखेन दीव्यति क्रीडति इति देवस्तं देवं । पुनरपि कथंभूतं । अणंतु केवलज्ञानाद्यनंतगुणाधारत्वादनंतसुखास्पदत्वादविनश्वरत्वाच्चानंतस्तमनंतं । किं कृत्वा पूर्व । चित्तु णिवारिवि चित्तं निवार्य व्यावृत्य । किं कुर्वन् सन् । जंतु गच्छ- त्परिणममानं सत् । कैः करणभूतैः । सव्वहिं रायहि वीतरागात्स्वशुद्धात्मद्रव्याद्विलक्षणैः सर्वशुभाशुभरागैः । न केवलं रागैः । छहिं रसहिं रसनारहिताद्वीतरागसदानंदैकरसपरि- णतादात्मनो विपरीतैः गुडलवणदधिदुग्धतैलघृतपड्रसैः । पुनरपि कैः । पंचहिं रूवहिं अरूपात् शुद्धात्मतत्त्वात्प्रतिपक्षभूतैः कृष्णनीलरक्तश्वेतपीतपंचरूपैरिति तात्पर्य ॥ ३०३ ।। अथ येन स्वरूपेण चिंत्यते परमात्मा तेनैव परिणमतीति निश्चिनोति; जेण सरूविं झाइयइ, अप्पा एहु अणंतु । तेण सरूविं परिणवइ, जिमु फलिहउमणि मंतु ॥३०४ ॥ जानकर [मनो मारय ] विकल्पजालरूपी मनको मार । भावार्थ-वीतरागस्वसंवेदन- ज्ञानसे शुद्धात्माको जानकर शुभाशुभविकल्पजालरूप मनको मारो । मनके विना वश किये निर्विकल्पध्यानकी सिद्धि नहीं होती। मनके अनेकविकल्पजालोंसे जो शुद्ध आत्मा उसमें निश्चलता तभी होती है जव कि मनको मारके निर्विकल्प दशाको प्राप्त होवे । इसलिये सकल शुभाशुभ व्यवहारको छोड़के शुद्धात्माको जानो ॥ ३०२ ॥ आगे यही कहते हैं कि सब विषयोंको छोडकर आत्मदेवको ध्यावो-हे प्रभाकर भट्ट [त्वं] तू [ सर्वैः रागैः] सव शुभाशुभरागोंसे [षभिः रसैः] छहों रसोंसे [पंचभिः रूपैः ] पांच रूपोंसे [गच्छत् चित्तं] चलायमान चित्तको [निवार्य ] रोक- कर [अनंतं] अनंतगुणवाले [आत्मानं देवं ] आत्मदेवका [ध्याय ] चिंतवनकर । भावार्थ-वीतराग परम आनंद सुखमें क्रीडा करने वाले केवलज्ञानादि अनंतगुणवाले अविनाशी शुद्ध आत्माका एकाग्रचित्त होकर ध्यान कर । क्या करके ? वीतराग शुद्धात्म- द्रव्यसे विमुख जो समस्त शुभाशुभराग, निजरससे विपरीत जो दधि दुग्ध तेल घी नोन मिस्त्री ये छहरस और जो अरूप शुद्धात्मद्रव्यसे भिन्न काले सफेद हरे पीले लाल ,

परमात्मप्रकाशः।
३१७
येन खरूपेण ध्यायते आत्मा एषः अनंतः ।
तेन खरूपेण परिणमति यथा स्फटिकमणिः मंत्रः ॥ ३०४ ॥
जेण इत्यादि । तेण सरूविं परिणवइ तेन स्वरूपेण परिणमति । कोसौ कर्ता । अप्पा
आत्मा एड एप प्रत्यक्षीभूतः । पुनरपि किंविशिष्टः । अणंतु वीतरागानाकुलत्वलक्षणानं-
तशक्तिपरिणतत्वादनंतः । तेन केन । जेण सरू झाइयइ येन शुभाशुभशुद्धोपयोगरूपेण
ध्यायते चित्यते । दृष्टांतमाह । जह फलिहउमणि मंतु यथा स्फटिकमणिः जपापुष्पायु-
पाधिपरिणतः गारुडादिमंत्रो वेति । अत्र विशेपव्याख्यानं तु “येन येन स्वरूपेण युज्यते
यंत्रवाहकः । तेन तन्मयतां याति विश्वरूपो मणिर्यथा” इति श्लोकार्थकथितदृष्टांतेन
ध्यातव्यः । इदमत्र तात्पर्य । अयमात्मा येन येन स्वरूपेण चित्यते तेन तेन परिणमतीति
ज्ञात्वा शुद्धात्मपदप्राम्यर्थिभिः समस्तरागादिविकल्पसमूहं त्यक्त्वा शुद्धरूपेणैव ध्यातव्य
इति ॥ ३०४ ॥
पाचतरहके रूप-इनमें निरंतर चित्त जाता है उसको रोककर आत्मदेवकी आरा-
धना कर ॥ ३०३ ॥
आगे आत्माको जिसरूपसे ध्यावो उसीरूप परिणमता है जैसे स्फटिकमणिके नीचे
जैसा डंक दिया जाये वैसा ही रंग भासता है ऐसा कहते हैं;-[एषः] यह प्रत्यक्षरूप
[अनंतः] अविनाशी [आत्मा] आत्मा [येन स्वरूपेण ] जिस स्वरूपसे [ ध्यायते ]
ध्याया जाता है [ तेन स्वरूपेण ] उसी खरूप [ परिणमति ] परिणमता है [यथा स्फ-
टिकमणिः मंत्रः] जैसे स्फटिकमणि और गारुडी आदि मंत्र हैं। भावार्थ-यह आत्मा
शुभ अशुभ शुद्ध इन तीन उपयोगरूप परिणमता है । जो अशुभोपयोगका ध्यान करे तो
पापरूप परिणवे, शुभोपयोगका ध्यान करे तो पुण्यरूप परिणवे और जो शुद्धोपयोगको ध्यावे
तो परमशुद्धरूप परिणमन करता है। जैसे स्फटिकमणिके नीचे जैसा डंक लगाओ अर्थात्
श्याम हरा पीला लालमेंसे जैसा लगाओ उसीरूप स्फटिक मणि परिणमता है हरे डंकसे
हरा और लालसे लाल भासता है । उसीतरह जीवद्रव्य जिस उपयोगरूप परिणमता है
उसीरूप भासता है । और गारुडी आदि मंत्रोंमेंसे गारुडीमंत्र गरुडरूप भासता है
जिससे कि सर्प डर जाता है । ऐसा ही कथन अन्य ग्रंथोंमें भी कहा है कि जिस २
रूपसे आत्मा परिणमता है उस २ रूपसे आत्मा तन्मयी हो जाता है जैसे स्फटिकमणि
उज्ज्वल है उसके नीचे जैसा डंक लगाओ वैसा ही भासता है । ऐसा जानकर आत्माका
खरूप जानना चाहिये । जो शुद्धात्मपदकी प्राप्तिके चाहनेवाले हैं उनको यही योग्य है
कि समस्त रागादिक विकल्पोंके समूहको छोडकर आत्माके शुद्धरूपको ध्यावें और विका-
रोंपर दृष्टि न रक्खें ॥ ३०४ ॥

३१८
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अथ चतुष्पादिकां कथयति;-
एहु जु अप्पा सो परमप्पा, कम्मविसेसें जायउ जप्पा ।
जामइ जाणइ अप्पें अप्पा, तामई सोजि देउ परमप्पा ॥ ३०५ ॥
एष य आत्मा स परमात्मा कर्मविशेपेण जातः जाप्यः ।
यदा जानाति आत्मना आत्मानं तदा स एव परमात्मा ॥ ३०५ ॥
एहु जु एष यः प्रत्यक्षीभूतः अप्पा स्वसंवेदनप्रत्यक्ष आत्मा । स कथंभूतः । सो
परमप्पा शुद्धनिश्चयेनानंतचतुष्टयस्वरूपः क्षुधाद्यष्टादशदोपरहितः स निर्दोपिपरमात्मा
कम्मविसेसें जायउ जप्पा व्यवहारनयेनानादिकर्मबंधनविशेपेण स्वकीयबुद्धिदोपेण जात
उत्पन्नः । कथंभूतो जातः । जाप्यः पराधीनः जामइ जाणइ यदा काले जानाति । केन
कं । अप्पें अप्पा वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानपरिणतेनात्मना निजशुद्धात्मानं तावइ
तस्मिन् स्वशुद्धात्मानुभूतिकाले सो जि स एवात्मा देउ निजशुद्धात्मभावनोत्थवीतरागसु-
खानुभवेन दीव्यति क्रीडतीति देवः परमाराध्यः । किं विशिष्टो देवः । परमप्पा शुद्धनि-
श्वयेन मुक्तिगतपरमात्मसमानः । अयमत्र भावार्थः । यद्येवंभूतः परमात्मा शक्तिरूपेण
देहमध्ये नास्ति तर्हि केवलज्ञानोत्पत्तिकाले कथं व्यक्तिर्भविष्यतीति ।। ३०५ ॥
अथ तमेवार्थ व्यक्तिं करोति,
जो परमप्पा णाणमउ, सो हउँ देउ अणंतु ।
जो हर्ष सो परमप्पु पर, एहउ भावि णिभंतु ॥ ३०६ ॥
यः परमात्मा ज्ञानमयः सः अहं देवः अनंतः ।
यः अहं स परमात्मा परः इत्थं भावय निधीतः ॥ ३०६ ॥
-
P
आगे चतुष्पदछंदमें आत्माके शुद्ध खरूपको कहते है।-[एप य आत्मा] यह
प्रत्यक्षीभूत खसंवेदन ज्ञानकर प्रत्यक्ष जो आत्मा [स परमात्मा] वही शुद्ध निश्चयनय-
कर अनंत चतुष्टयखरूप क्षुधादि अठारहदोष रहित निर्दोष परमात्मा है वह व्यवहारनय-
कर [कर्मविशेषेण ] अनादिकर्मबंधके विशेषसे [जाप्यः जातः] पराधीन हुआ दूस-
रेका जाप करता है परंतु [ यदा] जिस समय [आत्मना] वीतराग निर्विकल्प खसं-
वेदन ज्ञानकर [आत्मानं] अपनेको [जानाति ] जानता है [तदा] उस समय
[स एव ] यह आत्मा ही [परमात्मा] परमात्मा देव है। भावार्थ-निज शुद्धा-
स्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ जो परम आनंद उसके अनुभवमें क्रीडा करनेसे देव कहा
जाता है यही आराधने योग्य है । जो आत्मदेव शुद्ध निश्चयनयकर भगवान् केवलीके
समान है। ऐसा परमात्मदेव शक्तिरूपसे देहमें है जो देहमें न होवे तो केवलज्ञानके
कैसे प्रगट होवे ॥ ३०५॥

परमात्मप्रकाशः। ३१९ जो परमप्पा इत्यादि । जो परमप्पा यःकश्चित् प्रसिद्धपरमात्मा सर्वोत्कृष्टानंतज्ञानादि- रूपा मा लक्ष्मीर्यस्य स भवति परमश्वासावात्मा च परमात्मा णाणमउ ज्ञानेन निर्वृतो ज्ञानमयः सो हठं यद्यपि व्यवहारेण कर्मावृतस्तिष्ठामि तथापि निश्चयेन स एवाहं पूर्वोक्तः परमात्मा । कथंभूतः । देउ परमाराध्यः । पुनरपि कथंभूतः । अणंतु अनंतसुखादिगुणा- स्पदत्वादनंतः । जो हउं सो परमप्पु योऽहं स्वदेहस्थो निश्चयेन परमात्मा स एव तत्सदृश एव मुक्तिगतपरमात्मा । कथंभूतः । परु परमगुणयोगात् पर उत्कृष्टः एहउ भावि इत्थंभूतं परमात्मानं भावय हे प्रभाकरभट्ट । कथंभूतः सन् । णिभंतु भ्रांतिरहितः संशय- रहितः सन्निति । अत्र स्वदेहेपि शुद्धात्मास्तीति निश्चयं कृत्वा मिथ्यात्वाद्युपशमवशेन केवलज्ञानाद्युत्पत्तिवीजभूतां कारणसमयसाराख्यामागमभापया वीतरागसम्यक्त्वादिरूपां शुद्धासैकदेशव्यक्तिं लब्ध्वा सर्वतात्पर्येण भावना कर्तव्येत्यभिप्रायः ॥ ३०६ ॥ अथामुमेवार्थ दृष्टांतदार्टान्ताभ्यां समर्थयति,- णिम्मलफलिहहं जेम जिय, भिण्णउ परकियभाउ । अप्पसहावहं तेम मुणि, सयलुवि कम्मसहाउ ॥ ३०७॥ आगे इसी अर्थको प्रगटपनेसे दृढ करते हैं। [यः परमात्मा ] जो परमात्मा [ज्ञानमयः ] ज्ञानस्वरूप है [स अहं ] वह मै ही हूं जो कि [अनंतः देवः] अविनाशी देवखरूप हूं [य अहं] जो मै हूं [ स परः परमात्मा ] वही उत्कृष्ट परमात्मा है [इत्थं ] इस प्रकार [ निीतः ] निस्संदेह [ भावय ] तू भावना कर । भावार्थ-जो कोई एक परमात्मा परम प्रसिद्ध सर्वोत्कृष्ट अनंतज्ञानादिरूप लक्ष्मीका निवास है ज्ञानमई है वैसाही मै हूं । यद्यपि व्यवहारनयकर मै कर्मोंसे बंधा हुआ हूं तभी निश्चयनयकर मेरे बंध मोक्ष नही है, जैसा भगवानका खरूप है वैसा ही मेरा खरूप है । जो आत्मदेव • महामुनियोंकर परम आराधने योग्य है और अनंत सुख आदि गुणोंका निवास है। इससे यह निश्चय हुआ कि जैसा परमात्मा वैसा यह आत्मा और जैसा यह आत्मा है वैसा ही परमात्मा है । जो परमात्मा है वो मै हूं और जो मै हूं वही परमात्मा है । अहं यह शब्द देहमें स्थित आत्माको कहता है और सो यह शब्द मुक्ति प्राप्त परमात्मामें लगाना । जो परमात्मा वह मै हूं और मैं हूं सो परमात्मा-यही ध्यान हमेशा करना। वह परमात्मा परमगुणके संबंधसे उत्कृष्ट है । श्रीयोगींद्राचार्य प्रभाकरभट्टसे कहते हैं कि हे प्रभाकर भट्ट तू सब विकल्पोंको छोड़कर केवल परमात्माका ध्यानकर । निस्सदेह होके इस देहमें शुद्धात्मा है ऐसा निश्चयकर । मिथ्यात्वादि सब विभावोंकी उपशम- ताके वशसे केवलज्ञानादि उत्पत्तिका जो कारण समयसार (निज आत्मा) उसीकी नि- ३२० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । - निर्मलस्फटिकात् यथा जीव भिन्नः परकृतभावः । आत्मखभावात् तथा मन्यख सकलमपि कर्मखभावम् ॥ ३०७ ॥ भिण्णउ भिन्नो भवति जिय हे जीव जेम यथा । कोसौ कर्ता । परकियभाउ जपापु- प्पायुपाधिरूपः परकृतभावः । कस्मात्सकाशात् । णिम्मलफलिहहं निर्मलस्फटिकात तेम तथा भिन्नं मुणि मन्यव जानीहि । कं । सयलुवि कम्मसहाउ समस्तमपि भाव. कर्मद्रव्यकर्मनोकर्मस्वभावं । कस्मात् सकाशात् । अप्पसहावहं अनंतज्ञानादिगुणस्वभावात् परमात्मन इति भावार्थः ॥ ३०७ ॥ अथ तामेव देहात्मनोर्मेदभावनां दृढयति,- जेम सहाविं णिम्मलउ, फलिहउ तेम सहाउ । भंतिए मइल म मर्पिण जिय, मइलउ देवखवि काउ ॥ ३०८ ॥ यथा खभावेन निर्मलः स्फटिकः तथा स्वभावः । भ्रांत्या मलिनं मा मन्यख जीव मलिनं दृष्ट्वा कायम् ॥ ३०८ ॥ जेम इत्यादि । जेमु सहाविं णिम्मलउ यथा स्वभावेन निर्मलो भवति । कोसौ । फलिहउ स्फटिकमणिः तेम तथा निर्मलो भवति । कोसौ कर्ता । सहाउ विशुद्धज्ञानरूपस्य परमात्मनः स्वभावः भंतिए मइलु म मण्णि पूर्वोक्तमासस्वभावं कर्मतापन्नं भ्रांत्या मलिनं मा मन्यस्व जिय हे जीव । किं कृत्वा । मइलउ दिक्खिवि मलिनं दृष्ट्वा । कं । काउ निर्मलशुद्धबुद्धकस्वभावपरमात्मपदार्थाद्विलक्षणं कायमित्यभिप्रायः ॥ ३०८ ॥ , रंतर भावना करनी चाहिये । वीतरागसम्यक्त्वादिरूप शुद्ध आत्माका एकदेश प्रगटपनेको पाकर सब तरहसे ज्ञानकी भावना करना योग्य है ॥ ३०६ ॥ आगे इसी अर्थको दृष्टांत दाटीतसे पुष्ट करते हैं; [जीव] हे जीव [ यथा] जैसे [ परकृतभावः ] नीचेके सब डंक [निर्मलस्फटिकात् ] महा निर्मल स्फटिकम- णिसे [भिन्नः] जुदे हैं [ तथा ] उसीतरह [आत्मस्वभावात् ] आत्मखभावसे [ सकल- मपि ] सब [कर्मखभावं ] शुभाशुभकर्म [मन्यस्व ] भिन्न जानो । भावार्थ-आत्म- खभाव महानिर्मल है भावकर्म द्रव्यकर्म नोकर्म ये सब जड़ हैं आत्मा चिद्रूप है। अनंत ज्ञानादि गुणरूप जो चिदानंद उससे तू सकल प्रपंच भिन्न मान ॥ ३०७ ॥ आगे देह और आत्मा जुदे २ हैं यह भेद भावना दृढ करते हैं;-यथा जैसे [स्फटिकः ] स्फटिकमणि [ स्वभावेन ] खभावसे [ निर्मल: ] निर्मल है [ तथा] उसी- तरह [स्वभावः ] आत्मा ज्ञान दर्शनरूप निर्मल है। ऐसे आत्मखभावको [जीव] हे जीव [ कायं मलिनं ] शरीरकी मलिनता [दृष्ट्वा] देखकर [ भ्रांत्या ] श्रमसे [मलिनं] परमात्मप्रकाशः। ३२१ अथ पूर्वोक्तभेदभावनां रक्तादिवस्त्रदृष्टांतेन व्यक्तीकरोति चतुष्कलेन,- रत्तं वत्थे जेम वुहु, देहु ण मण्णइ रत्तु । देहिं रतिं णाणि तह, अप्पु ण मण्णइ रत्तु ॥ ३०९ ॥ जिपिण वत्थे जेम वुहु, देहु ण मण्णइ जिण्णु । देहिं जिणि णाणिं तह, अप्पु ण मण्णइ जिण्णु ॥ ३१० ॥ वत्थु पणट्ठई जेमु बुहु, देहु ण मण्णइ णडु । पढ़ें देहिं णाणि तह, अप्पु ण मण्णइ णड्ड ॥ ३११ ॥ भिण्णउ वत्थु जि जेम जिय, देहहं मण्णइ णाणि । देहुवि भिण्णउ णाणि तह, अप्पहं मण्णइ जाणि ॥३१२ ॥ रक्ते वसे यथा बुधः देहं न मन्यते रक्तं । देहे रक्ते ज्ञानी तथा आत्मानं न मन्यते रक्तम् ॥ ३०९ ॥ जीर्णे बसे यथा बुधः देहं न मन्यते जीणें । देहे जीणे ज्ञानी तथा आत्मानं न मन्यते जीर्णम् ॥ ३१० ॥ वसे प्रणष्टे यथा बुधः देहं न मन्यते नष्टम् । नप्टे देहे ज्ञानी तथा आत्मानं न मन्यते नष्टम् ॥ ३११ ॥ भिन्नं वस्त्रमेव यथा जीव देहात् मन्यते ज्ञानी । देहमपि भिन्नं ज्ञानी तथा आत्मनः मन्यते जानीहि ॥ ३१२ ॥ यथा कोपि व्यवहारज्ञानी रक्ते वस्त्रे जीणे वस्त्रे नष्टेपि स्वकीयवस्ने स्वकीयं देहं रक्तं जीर्ण नष्टं न मन्यते तथा वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानी देहे रक्ते जीर्णे नष्टेपि सति व्यवहारेण देहस्थमपि वीतरागचिदानंदैकपरमात्मानं शुद्धनिश्चयनयेन देहाद्भिन्नं रक्तं जीर्ण नष्टं न मन्यते इति भावार्थः । अथ मण्णइ मन्यते । कोसौ। णाणि देहवस्त्रविषये भेद- ज्ञानी । किं मन्यते । भिण्णउ मिन्नं । किं । वत्थु जि वनमेव जेम यथा जिय हे जीव । मैला [मा मन्यस्व ] मत मानें । भावार्थ-यह काय शुद्ध बुद्ध परमात्मपदार्थसे भिन्न है काय मैली है आत्मा निर्मल है ॥ ३०८ ॥ आगे पूर्वकथित भेदविज्ञानकी भावना रक्त पीतादि वस्त्रके दृष्टांतसे चार दोहाओंमें प्रगट करते हैं;-[यथा] जैसे [बुधः] कोई बुद्धिमान् पुरुष [ रक्ते वस्त्रे ] लाल वस्त्रसे [ देहं रक्तं] शरीरको लाल [न मन्यते ] नही मानता [ तथा] उसीतरह [ज्ञानी] वीतराग निर्विकल्प खसवेदन ज्ञानी [ देहे रक्ते ] शरीरके लाल होनेसे [आत्मानं] आत्माको [ रक्तं न मन्यते ] लाल नहीं मानता । [यथा बुधः] जैसे कोई बुद्धिमान् [ वस्त्रे जीणे ] कपड़ेके जीर्ण (पुराने) होनेपर [ देहं जीर्ण ] शरीरको ४१ ३२२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । कस्माद्भिन्नं मन्यते । देहहं स्वकीयदेहात् । दृष्टांतमाह । मण्णइ मन्यते । कोसौ । णाणि देहात्मनोहेंदज्ञानी तह तथा भिन्नं मन्यते । कमपि । देहुवि देहमपि । कस्मात् । अप्पहं निश्चयेन देहविलक्षणाद् व्यवहारेण देहस्थात्सहजशुद्धपरमानंदैकस्वभावान्निजपरमात्मनः जाणि जानीहीति भावार्थः ॥ ३०९ । ३१० । ३११ । ३१२ ।। अथ दुःखजनकदेहघातकं शत्रुमपि मित्रं जानीहीति दर्शयति; इहु तणु जीवड तुज्झ रिउ, दुक्खई जेण जणेइ । सो परु जाणहि मित्तु तुहुं, जो तणु एह हणेइ ॥ ३१३ ॥ इयं तनुः जीव तव रिपुः दुःखानि येन जनयति । तं परं जानीहि मित्रं त्वं यः तनुमिमां हंति ॥ ३१३ ॥ रिउ रिपुर्भवति । का । इहु तणु इयं तनुः की जीवड हे जीव तुज्झ तव । कस्मात् । दुक्खई जेण जणेइ येन कारणेन दुक्खानि जनयति सो परु तं परजनं जाणहि , जीर्ण [न मन्यते ] नही मानता [ तथा ज्ञानी ] उसीतरह ज्ञानी [ देहे जीर्णे] शरीरके जीर्ण होनेसे [आत्मानं जीर्ण न मन्यते ] आत्माको जीर्ण नहीं मानता । [यथा वुधः] जैसे कोई बुद्धिमान् [वस्त्रे प्रणप्टे] वस्रके नाश होनेसे [देहं नष्टं] देहका नाश [न मन्यते ] नही मानता [ तथा ज्ञानी ] उसी तरह ज्ञानी | देहे नष्टे ] देहका होनेसे [आत्मानं] आत्माका [नष्टं न मन्यते ] नाश नही मानता । [जीव ] हे जीव [ यथा ज्ञानी ] जैसे ज्ञानी [ देहात् भिन्नं एव] देहसे भिन्न ही [वस्त्रं मन्यते] कपडेको मानता है [ तथा ज्ञानी] उसीतरह ज्ञानी [देहमपि ] शरीरको भी [आत्मनः भिन्नं ] आत्मासे जुदा [ मन्यते ] मानता है ऐसा [जानीहि ] तुम जानो । भावार्थ- जैसे वस्त्र और शरीर मिले हुए भासते हैं परंतु शरीरसे वस्त्र जुदा है उसीतरह आत्मा और शरीर मिले हुए दीखते हैं परंतु जुदे हैं । शरीरकी रक्ततासे, जीर्णतासे और विना- शसे आत्माकी रक्तता, जीर्णता और विनाश नही होता । यह निस्संदेह जानो। यह आत्मा व्यवहारनयकर देहमें स्थित है तौभी सहज शुद्ध परमानंदरूप निज खभावकर जुदा ही है देहके सुख दुःख जीवमें नही हैं ॥ ३०९।३१०।३१११३१२ ।। आगे दुःख उत्पन्न करनेवाला शत्रुरूप यह देह है उसको तू मित्र मत समझ ऐसा कहते हैं;-[जीव ] हे जीव [इयं तनुः] यह शरीर [ तव रिपुः ] तेरा शत्रु है [येन ] क्योंकि [ दुःखानि ] दुःखोंको [ जनयति] उत्पन्न करता है [य] जो १ "दुखका कारण जो देह उसके नाश करनेवाले शत्रुको भी मित्र समझ ऐसा दिखलाते हैं"। यह अर्थ संस्कृतटीकाके अनुसार है। , ३२३ परमात्मप्रकाशः। जानीहि । किं । मित्तु परममित्रं तुहुं त्वं कर्ता । यः परः किं करोति । जो तणु एहु हणेइ यः कर्ता तनुरियं प्रत्यक्षीभूतं हंतीति । अत्र यदा वैरी देहविनाशं करोति तदा वीतरागचिदानंदैकस्वभावपरमात्मतत्त्वभावनोत्पन्नसुखामृतसमरसीभावे स्थित्वा शरीरघा- तकस्योपरि यथा पांडवैः कौरवकुमारस्योपरि द्वेषो न कृतस्तथान्यतपोधनैरपि न कर्तव्य- इत्यभिप्रायः ॥ ३१३ ॥ अथ उदयागते पापकर्मणि स्वस्वभावो न त्याज्य इति मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं कथयति, उद्यहं आणिवि कम्मु मइ जं मुंजेवउ होइ। तं सह आविउ खविउ मह, सो पर लाहु जि कोइ ।। ३१४ ।। उदयमानीय कर्म मया यत् भोक्तव्यं भवति । तत् स्वयमागतं क्षपितं मया स परं लाभ एव कश्चित् ॥ ३१४ ॥ जं यत् भुंजेवउ होइ भोक्तव्यं भवति । किं कृत्वा । उदयहं आणवि विशिष्टात्मभा- वनावलेनोदयमानीय । किं । कम्मु चिरसंचितं कर्म । केन । मइ मया तं तत् पूर्वोक्तं कर्म सइ आविउ दुर्धरपरीपहोपसर्गवशेन स्वयमुदयागतं सत् खविउ मइ निजपरमात्म- तत्त्वभावनोत्पन्नवीतरागसहजानंदैकसुखरसास्वादद्रवीभूतेन परिणतेन मनसा क्षपितं मया सो स परं नियमेन लाहु जि लाभ एव कोइ कश्चिदपूर्व इति । अत्र केचन महापुरुषाः [इमां तनुं] इस शरीरका [हंति ] घात करे [तं] उसको [त्वं ] तुम [परं मित्रं] परम मित्र [जानीहि ] जानो । भावार्थ-यह शरीर तेरा शत्रु होनेसे दुःख उत्पन्न करता है इससे तू अनुराग मत करै और जो तेरे शरीरकी सेवा करता है उससे भी राग मतकर तथा जो तेरे शरीरका घात करदेवे उसको शत्रु मत जानें । जब कोई तेरे शरीरका विनाश करे तब वीतराग चिदानंद ज्ञानखभाव परमात्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न जो परम समरसीभाव उसमें लीन होकर शरीरके घातकपर द्वेष मतकर । जैसे महा धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आदि पाडव पाच भाई उन्होंने दुर्योधनादिपर द्वेष नही किया । उसी तरह सभी साधुओंका यही स्वभाव है कि अपने शरीरका जो घात करे उससे द्वेष नहीं करते सबके मित्र ही रहते हैं ॥ ३१३ ॥ आगे पूर्वोपार्जित पापके उदयसे दुःख अवस्था आजावे उसमें अपना धीरपना आदि खभाव न छोड़े ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर व्याख्यान करते हैं;-[यत् ] जो [मया ] मै [कर्म ] कर्मको [उदयं आनीय ] उदयमें लाकर [ भोक्तव्यं भवति ] भोगने चाह- ताथा [तत् ] वह कर्म [ स्वयं आगतं ] आप ही आगया [ मया क्षपितं] इससे मै शात चित्तसे फल सहनकर क्षय करूं [स कश्चित् ] यह कोई [ परं लाभः] महान ही लाभ हुआ। भावार्थ-जो महामुनि मुक्तिके अधिकारी हैं वे नहीं उदयमें आये हुए रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । ३२४ दुर्धरानुष्ठानं कृत्वा वीतरागनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा च कर्मोदयमानीय तमनुभवंति, अस्माकं पुनः स्वयमेवोदयागतमिति मत्वा संतोपः कर्तव्य इति तात्पर्यम् ॥ ३१४ ।। अथ इदानीं परुषवचनं सोढुं नायाति तदा निर्विकल्पात्मतत्त्वभावना कर्तव्येति प्रतिपादयति,- णिहरवयणु सुणेवि जिय, जइ मणि सहण ण जाइ । तो लहु भावहि बंभु परु, जिं मणु झत्ति विलाइ ॥ ३१५ ॥ निष्ठरवचनं श्रुत्वा जीव यदि मनसि पोढुं न याति । ततो लघु भावय ब्रह्म परं येन मनो झटिति विलीयते ॥ ३१५॥ जई यदि चेत् सहण ण जाइ सोढुं न याति । क । मणि मनसि जिय हे मूढ जीव । कि कृत्वा । सुणिवि श्रुत्वा । कि । णिहरवयणु निष्ठुरं हृदयकर्णशूलवचनं तो तद्वचनश्रवणानंतर लहु शीघ्रं भावहि वीतरागपरमानंदैकलक्षणनिर्विकल्पसमाधौ स्थित्वा भावय । कं । वंभु ब्रह्मशब्दवाच्यनिजदेहस्थपरमात्मानं । कथंभूतं । पर परमानंतजाना- दिगुणाधारत्वात् परमुत्कृष्टं जिं येन परमात्मध्यानेन । कि भवति । मणु झत्ति विलाइ कमौको परम आत्मज्ञानकी भावनाके वलसे उदयमें लाकर उसका फल भोगकर शीघ्र निर्जरा करदेते हैं। और जो वे पूर्वकर्म विना उपायके सहज ही बाईस परिपह तथा उपसर्गके वशसे उदयमें आये हैं तो विषाद न करना बहुत लाभ समझना । मनमें यह मानना कि हम तो उदीरणासे इन काँको उदयमें लाकर क्षय करते परंतु ये सहज ही उदयमें आये यह तो बड़ा ही लाभ है । जैसे कोई वड़ा व्यौपारी अपने ऊपरका कर्ज लोगोंको बुला बुलाके देता है यदि कोई विना बुलाये सहज ही लेने आया हो तो बडा ही लाभ है । उसी तरह कोई महा पुरुष महान दुर्द्धर तपकरके कर्मोंको उदयमें लाके क्षय करते हैं लेकिन वे कर्म अपने स्वयमेव उदयमें आये हैं तो इसके समान दूसरा क्या है ऐसा सतोष धारणकर ज्ञानीजन उदय आये हुए कर्मीको भोगते हैं परंतु रागद्वेष नही करते ॥ ३१४ ॥ आगे यह कहते हैं कि जो कोई कर्कश (कठोर ) वचन कहे और यह न कहसकता हो तो अपने कषायभाव रोकनेकेलिये निर्विकल्प आत्मतत्वकी भावना करनी चाहिये। [जीव ] हे जीव [निष्ठुरवचनं श्रुत्वा] जो कोई अविवेकी किसीको कठोर वचन कहे उसको सुनकर [यदि ] जो [न सोढुं याति] न सह सके [ततः] तो कषाय दूर करनेकेलिये [परं ब्रह्म ] परमानंदखरूप इस देहमें विराजमान परम ब्रह्मका [ मनसि ] मनमें [ लघु] शीघ्र [भावय] ध्यान करो । जो ब्रह्म अनंतज्ञानादि .

परमात्मप्रकाशः। ३२५ वीतरागनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्नपरमानंदैकरूपसुखामृतास्वादेन मनो झटिति शीघ्रं विलयं याति द्रवीभूतं भवतीति भावार्थः ॥ ३१५ ॥ अथ जीवः कर्मवशेन जातिभेदभिन्नो भवतीति निश्चिनोति,- लोउ विलक्खणु कम्मवसु, इत्थु भवंतरि एइ । बुजु कि जइ इहु अप्पि ठिउ, इत्थु जि भवि ण पडे ॥ ३१६ ॥ लोकः विलक्षणः कर्मवशः अत्र भवांतरे आयाति । आश्चर्य किं यदि अयं आत्मनि स्थितः अत्रैव भवे न पतति ॥ ३१६ ॥ लोउ इत्यादि । विलक्खणु षोडशवर्णिकासुवर्णवत्केवलज्ञानादिगुणसदृशो न सर्वजीवरा- शिसहशात् परमात्मतत्त्वाद्विलक्षणो विसदृशो भवति । केन । ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रादि- जातिभेदेन । कोसौ । लोउ लोको जनः । कथंभूतःसन् । कम्मवसु कर्मरहितशुद्धात्मानु- भूतिभावनारहितेन यदुपार्जितं कर्म तस्य कर्मण आधीनः कर्मवशः । इत्थंभूतःसन् किं करोति । इत्थु भवंतरि एइ पंचप्रकारभवरहिताद्वीतरागपरमानंदकखभावात् शुद्धात्मद्रव्या- द्विसो अस्मिन् भवांतरे संसारे समायाति वुजु कि इदं किमाश्चर्य किंतु नैव जइ इहु अप्पि ठिउ यदि चेदयं जीवः स्वशुद्धात्मनि स्थितो भवति तर्हि इत्थु जि भवि ण पडेइ अत्रैव भवे न पततीति इदमप्याश्चर्य न भवतीति । अनेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा संसारभयभी- गुणोंका आधार है सर्वोत्कृष्ट है [ येन ] जिसके ध्यान करनेसे [ मनः] मनका विकार [झटिति ] शीघ्र ही [विलीयते ] विलाय जाता है ॥ ३१५ ॥ आगे जीव, कर्मके वशसे भिन्न २ स्वरूप जातिभेदसे होता है ऐसा निश्चय करते हैं;-[विलक्षणः ] सोलहवानीके सुवर्णकी तरह केवलज्ञानादि गुणकर समान जो परमात्मतत्व उससे भिन्न जो [लोकः ] ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र आदि जाति भेदरूप जीवराशि वह [कर्मवशः ] कर्मसे उत्पन्न है अर्थात् जातिभेद कर्मके निमित्तसे हुआ है और वे कर्म आत्मज्ञानकी भावनासे रहित अज्ञानी जीवने उपार्जन किये हैं उन काँके अधीन जातिभेद है जवतक कर्मोंका उपार्जन है तब तक [अत्र भवांतरे आयाति] इस ससारमें अनेक जाति धारण करता है [अयं यदि] जो यह जीव [आत्मनि स्थितः ] आत्मखरूपमें लगे तो [अत्रैव भवे ] इसी भवमें [न पतति ] नही पड़े भ्रमण नही करै [ किं आश्चर्य ] इसमें क्या आश्चर्य है कुछ भी नहीं । भावार्थ-जव- तक आत्मामें चित्त नही लगता तबतक संसारमें भ्रमण करता है अनेकभव धारण करता है लेकिन जब यह आत्मदर्शी हुआ तव कर्मोंको नही उपार्जन करता और भवमें भी नहीं भटकता । इसमें आश्चर्य नही है। ससार शरीर भोगोंसे उदास और जिसको भव- भ्रमणका भय उत्पन्न होगया है ऐसा भव्य जीव उसको मिथ्यात्व अव्रत कपाय प्रमाद , ३२६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । तेन भव्येन भवकारणमिध्यात्वादिपंचानवान् मुक्त्वा द्रव्यभावानवरहिते परमात्मभावे स्थित्वा च निरंतरं भावना कर्तव्येति तात्पर्यम् ॥ ३१६ ॥ अथ परेण दोषग्रहणे कृते कोपो न कर्तव्य इत्यभिप्रायं मनसि संप्रधार्य सूत्रमिदं प्रतिपादयति;- अवगुणगहणइं महुतणई, जइ जीवहं संतोसु । तो तहं सुक्खहं हेड हउं, इउ मण्णिवि चइ रोसु ॥ ३१७॥ अवगुणग्रहणेन मदीयेन यदि जीवानां संतोषः। ततः तेषां सुखस्य हेतुरहं इति मत्वा त्यज रोषम् ॥ ३१७ ॥ जइ जीवहं संतोसु यदि चेदज्ञानिजीवानां संतोपो भवति । केन । अवगुणगहणई निर्दोषिपरमात्मनो विलक्षणा ये दोपा अवगुणास्तेषां ग्रणेन । कथंभूतेन । महुतणई मदीयेन तो तह सोक्खहं हेउ हउं यतःकारणान्मदीयदोपग्रहणेन तेषां सुखं जातं ततस्ते- पामहं सुखस्य हेतुर्यातः इउं मण्णिवि चइ रोसु केचन परोपकारनिरताः परेषां द्रव्यादिकं दत्वा सुखं कुर्वति मया पुनर्द्रव्यादिकं मुक्तवापि तेपां सुखं कृतमिति मत्वा रोपं त्यज । अथवा मदीया अनंतज्ञानादिगुणा न गृहीतास्तैः किंतु दोषा एव गृहीता इति मत्वा च कोपं यज, अथवा ममैते दोषारसंति सत्यमिदमस्य वचनं तथापि रोपं यज, अथवा ममैते दोषा न संति तस्य वचनेन किमहं दोपी जातस्तथापि क्षमितव्यं, अथवा परोक्षे दोपग्रहणं करोति न च प्रत्यक्षे समीचीनोसौ तथापि क्षमितव्यं, अथवा वचनमात्रेणैव दोषग्रहणं योग इन पांच आस्रवोंको छोड़कर परमात्म तत्त्वमें हमेशा भावना करनी चाहिये । जो इसके आत्मभावना होवे तो भव भ्रमण नहीं होसकता ॥ ३१६ ॥ आगे जो कोई अपने दोष ग्रहण करे तो उसपर क्रोध नही करना क्षमा करना यह अभिप्राय मनमें रखकर व्याख्यान करते हैं;-[ मदीयेन अवगुणग्रहणेन ] अज्ञानी जीवोंको परके दोष ग्रहण करनेसे हर्ष होता है मेरे दोष ग्रहणकरके [जीवानां संतोपः ] जिन जीवोंको हर्ष होता है [ततः] तो मुझे यही लाभ है कि [अहं ] मैं [तेषां सुखस्य हेतु:] उनको सुखका कारण हुआ [इति मत्वा ] ऐसा मनमें विचार- कर [रोषं त्यज] गुस्सा छोडो । भावार्थ-ज्ञानी गुस्सा नहीं करते ऐसा विचारते हैं कि जो कोई परका उपकार करनेवाले परजीवोंको द्रव्यादि देकर सुखी करते हैं मैने कुछ द्रव्य नहीं दिया उपकार नहीं किया मेरे अवगुण ही से सुखी होगये तो इसके समान दूसरी क्या बात है । ऐसा जानकर हे भव्य तू रोष छोड । अथवा ऐसा विचार कि मेरे अनंत ज्ञानादि गुण तो उसने नहीं लिये दोष लिये वो निस्संक लो । जैसे घरमें कोई चोर आया और उसने रत सुवर्णादि नही लिये माटी पत्थर लिये तो लो, तुच्छ - परमात्मप्रकाशः। ३२७ करोति न च शरीरवाधां करोति तथापि क्षमितव्यं, अथवा शरीरबाधामेव करोति न च प्राणविनाशं तथापि क्षमितव्यं, अथवा प्राणविनाशमेव करोति न च भेदाभेदरत्नत्रयभाव- नाविनाशं चेति मत्वा सर्वतात्पर्येण क्षमा कर्तव्येत्यभिप्रायः ॥ ३१७॥ अथ सर्वचिंता निषेधयति युग्मेन;-- जोइय चिंति म किंपि तुहुं, जइ वीहउ दुक्खस्स। तिलतुसमित्तुवि सल्लडा, वेयण करइ अवस्स ॥ ३१८ ॥ योगिन् चिंतय मा किमपि त्वं यदि विभेषि दुःखस्य । तिलतुपमात्रमपि शल्यं वेदना करोत्यवश्यम् ॥ ३१८ ॥ चिंति म चिंतां मा काीः किंपि तुहुँ कामपि त्वं जोइय हे योगिन् । यदि किं । जड़ वीहउ, यदि विभेपि । कस्य । दुक्खस्स वीतरागतात्त्विकानंदैकरूपात् पारमार्थिकसु- खात्प्रतिपक्षभूतस्य नारकादिदुःखस्य । यतः कारणात् तिलतुसमित्तुवि सल्लडा तिलतु- वस्तुके लेनेवालेपर क्या क्रोध करना, ऐसा जान रोष छोड़ना । अथवा ऐसा विचारे कि जो यह दोष कहता है वे सच कहता है तो सत्यवादीसे क्या द्वेष करना । अथवा ये दोष मुझमें नहीं हुआ वह वृथा कहता है ते उसके वृथा कहनेसे क्या मै दोषी होगया विलकुल नहीं हुआ। ऐसा जानकर क्रोध छोड़ क्षमाभाव करने चाहिये । अथवा यह विचारो कि वह मेरे मुंहके आगे नही कहता लेकिन पीठ पीछे कहता है सो पीठ पीछे तो राजाओंको भी बुरा कहते हैं ऐसा जानकर उससे क्षमा करना कि प्रत्यक्ष तो मेरा मानभंग नहीं करता है परोक्षकी वात क्या है । अथवा कदाचित कोई प्रत्यक्ष मुंह आगे दोष कहै तो तू यह विचार कि वचनमानसे मेरे दोष ग्रहण करता है शरीरको तो बाधा नहीं करता यह गुण है ऐसा जान क्षमा ही कर । अथवा जो कोई शरीरको भी बाधा करे तो तू ऐसा विचार कि मेरे प्राण तो नहीं हरता यह गुण है । जो कभी कोई पापी प्राण ही हर ले तो यह विचार कि ये प्राण तो विनाशीक हैं विनाशीक वस्तुके चले जानेकी क्या बात है। मेरा ज्ञान भाव अविनश्वर है उसको तो कोई हर नहीं सकता इसने तो मेरे बाह्य प्राण हर लिये हैं परंतु भेदाभेदरत्नत्रयकी भावनाका विनाश नहीं किया। ऐसा जानकर सर्वथा क्षमा ही करना चाहिये ॥ ३१७ ॥ आगे सब चिंताओंका निषेध करते हैं,-[योगिन् ] हे योगी [त्वं] तू [ यदि] जो [ दुःखस्स ] वीतराग परम आनंदके शत्रु जो नरकादि चार गलियोंके दुःख उनसे [विभेपि] डर गया है तो तू निश्चित होकर परलोकका साधन कर, इस लोककी [किमपि मा चिंतय ] कुछ भी चिंता मत कर । क्योंकि [तिलतुपमात्रमपि शल्यं ] ३२८ रायचंदजैनगालमालयान् । - पमाननपि शल्य वेयण करइ अवस्स वेदनां वायां करोत्सवश्यं नियनेन । अत्र चिंतारहि- तात्परनालनः सकाशाद्विलक्षणा या विषयकषायानिचित्ता सा न कर्तव्य । कांडादिगल्यनित्र दुःखकारणत्वादिति भावार्थः ।। ३१८ ॥ -- मोक्खु म चिंतहि जोड्या, मोक्खु ण चिंतित होइ। जेण णिबद्ध जीवडर, मोक्खु करेसइ सोइ ॥ ३१९॥ मोझ ना चिंतय योगिन् मोक्षो न चिंतितो भवति । येन निबद्धो जीवः नोक्षं करिप्यति तदेव ।। ३१९ ॥ मोन्तु इत्यादि । मोक्तुम चितहि नोक्षत्रितां मा कापोस्त्वं जोइया हे योगिन् । यतः गरणान् मोक्सुण चिंतिउ होइ रागातिचिंताजालरहितः केवलज्ञानाद्यनंतगुणव्यक्ति- हितो मोक्षः चितितो न भवति । तर्हि न्यं भवति । जेण णिवद्ध जीवड येन निध्यात्वरा- गादिचिंताजालोपार्जितेन कर्मणा बद्धो जीवः सोइ तदेव कर्म शुभाशुभविकल्पसमूहरहिते शुद्धालस्वरूपे त्थितानां परनयोगिनां मोक्खु करेसइ अनंतज्ञानादिगुणोपलंभरूपं मोई तिलके भूसे मान भी शल्य [वेदनां] मनको वेदना [ अवश्यं करोति] निश्चयत्ते करती है। भावार्थ-चिंता रहित आत्मज्ञानले उल्टे जो विषय कपाय आदि विकास जाल उनकी चिंता कुछ भी नहीं करना । यह चिंता दुःला ही कारण है, जैसे वाण जादिकी तृणप्रमाण भी सलाई महा दुःखका कारण है जब वह शल्य निकले तभी सुल होता है ।। ३१८॥ जागे मोक्षकी भी चिंता नहीं करना ऐसा कहते हैं:- योगिन् ] हे योगी अन्य चिंताकी तो बात क्या रही [ मोक्षं मा चिंतय] मोक्षकी भी चिंता मतकर [मोक्षः] क्योंकि मोक्ष [चिंतितो न भवति ] चिंता करनेते नहीं होती वांछाके त्यागते ही होती है रागादि चिंताजालसे रहित केवलज्ञानादि अनंतगुणोंकी प्रगटता सहित जो मोक्ष है वह चिंताके त्यागते होती है । यही कहते हैं-[येन ] जिन मिथ्णत्वरागादि चिंता- जालौंले उपार्जन किये कमांसे [जीवः ] यह जीव [निवद्धः] बंधा हुआ है [ तदेव ] वे कर्म ही [ मोक्षं] शुभाशुभविकल्पके समूहले रहित जो शुद्धात्मतत्त्वमा सरूप उसने लीन हुए परनयोगियोंकी मोक्ष [करिष्यति ] करेंगे । भावार्थ-वह चिंताका त्याग ही तुझको निस्संदेह मोक्ष करेगा । अनंत ज्ञानादि गुणोंकी प्रगटता वह मोक्ष है। यद्यपि विकल सहित जो प्रथम अवस्था उसने विषय कषायादि खोटे ध्यानके निवारण करनेकेलिये और मोक्षमार्गमें परिणाम हठ करनेकेलिये ज्ञानीजन एसी भावना करते हैं कि चतुर्गतिके दुःखोंका क्षय हो, अष्ट काँका क्षय हो, ज्ञानका लाभ हो, पंचमगतिमें परमात्मप्रकाशः। ३२९ करिष्यतीति । अत्र अद्यपि सविकल्पावस्थायां विषयकषायाद्यपध्यानवंचनार्थ च मोक्ष- भार्गो भावनाहढीकरणार्थ च । "दुक्खक्खउ कम्मक्खउ वोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झम्मि" इत्यादि भावना कर्तव्या तथापि वीतरागनिर्विकल्पपरम- समाधिकाले न कर्तव्येति भावार्थः ॥ ३१९ ॥ अथ चतुर्विशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये परमसमाधिव्याख्यानमुख्यत्वेन सूत्रषटूमंतर- स्थलं कथ्यते । तद्यथा,- परमसमाहिमहासरहिं, जे चुडहिं पइसेवि। अप्पा थका विमलु तह, भवमल जंति बहेवि ॥ ३२० ॥ परमसमाधिमहासरसि ये जुडंति प्रविश्य । आत्मा तिष्ठति विमलः तेषां भवमलानि यांति वहित्वा ॥ ३२० ॥ जे वुड्डहिं ये केचन पुरुषा मन्ना भवति । क । परमसमाहिमहासरहिं परमस- माधिमहासरोवरे । किंकृत्वा मग्ना भवति । पइसेवि प्रविश्य सर्वासप्रदेशैरवगाह्य अप्पा थक्कइ चिदानंदैकखभावः परमामा तिष्ठति । कथंभूतः । विमलु द्रव्यकर्मनोकर्ममतिज्ञा- नादिविभावगुणनरनारकादिविभावपर्यायमलरहितः तहं तेषां परमसमाधिरतपुरुषाणां भवमल जंति भवरहितात् शुद्धात्मद्रव्याद्विलक्षणानि यानि कर्माणि भवमलकारणभूतानि गच्छति । किं कृत्वा । वहेवि शुद्धपरिणामनीरप्रवाहेण प्रहितत्वेनेति भावार्थः ॥ ३२० ॥ अथ,- सयलवियप्पहं जो विलउ, परमसमाहि भणति । तेण सुहासुहभावडा, मुणि सयलवि मिलंति ॥ ३२१ ॥ गमन हो समाधि मरण हो और जिनराजके गुणोंकी संपत्ति मुझको हो । यह भावना चौथे पांचवें छठे गुणस्थानमें करने योग्य है तो भी ऊपरके गुणस्थानोंमें वीतरागनिर्विकल्प- समाधिके समय नही होती ॥ ३१९ ॥ आगे चौवीस दोहाओंके स्थल में परमसमाधिके व्याख्यानकी मुख्यतासे छह दोहासूत्र कहते हैं-[ये] जो कोई महान पुरुष [ परमसमाधिमहासरसि] परमसमाधिरूप सरोवरमे [प्रविश्य] घुसकर [बुडंति ] मग्न होते हैं उनके सब प्रदेश समाधिरसमें भीग जाते हैं | आत्मा तिष्ठति ] उन्हीके चिदानंद अखंड खभाव आत्माका ध्यान स्थिर होता है । जो कि आत्मा [विमल] द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्मसे रहित महानिर्मल है [तेपां] जो योगी परमसमाधिमें रत हैं उन्ही पुरुषोंके [भवमलानि] शुद्धात्मद्रव्यसे विपरीत अशुद्धभावके कारण जो कर्म हैं वे सब [वहित्वा यांति ] शुद्धात्मपरिणामरूप जो जलका प्रवाह उससे वहजाते हैं । भावार्थ-जहा जलका प्रवाह आवे वहा मल कैसे रह सकता है कभी नही रहता ॥ ३२० ॥ , ४२ ३३० रायचंद्वजैनशास्त्रमालायाम् । सकल विकल्पानां यं विलयं परमसमाधि भणंति । तेन शुभाशुभभावान् मुनयः सकलानपि मुंचंति ॥ ३२१ ॥ भणंति कथयति । के ते । वीतरागसर्वजाः । कं भणंति । परमसमाहि वीतरागपरम- सामायिकरूपं परमसमाधिकं जो विलउ यं विलयं विनाशं । केपां । सयलवियप्पहं निर्विकल्पात्परमात्मस्वरूपात्प्रतिकूलानां समस्तविकल्पानां तेण तेन कारणेन मिल्लंति मुंचंति । के कर्तारः । मुणि परमाराध्यध्यानरतास्तपोधनाः । कान् मुंचति । सुहासुह- भावडा शुभाशुभमनोवचनकायव्यापाररहितात् शुद्धात्मद्रव्याद्विपरीतान् शुभाशुभभावान् परिणामान् । कतिसंख्योपेतान् । सयलवि समस्तानपि ।। अयं भावार्थः । समस्तपरदन्या- शारहितान् स्वशुद्धात्मस्वभावाद्विपरीता याशापीहलोकपरलोकाशा यावत्तिष्ठति मनसि तावडुःखी जीव इति ज्ञात्वा सर्वपरद्रव्याशारहितशुद्धालद्रव्यभावना कर्तव्येति । तथा चोक्तं । "आसापिसायगहिओ जीवो पावेइ दारुणं दुक्खं । आसा जाहं णियत्ता ताई णियत्ताइ सयलदुक्खाई ॥ ३२१ ।। अथ:- घोरु करंतुवि तवचरणु, सयलवि सत्थ मुणंतु । परमसमाहिविवजियउ, णवि देखइ सिउ संतु ।। ३२२ ॥ घोरं कुर्वाणोपि तपश्चरणं सकलान्यपि शास्त्राणि मन्वानः । परमसमाधिविवर्जितः नैव पश्यति शिवं शांतम् ॥ ३२२ ।। clo आगे परमसमाधिका लक्षण कहते हैं। [यत् ] जो [ सकलविकल्पानां] निर्विक- ल्पपरमात्मस्वरूपसे विपरीत रागादि समस्त विकल्पोंका [विलयं] नाश होना उसको [ परमसमाधि भणंति ] परमसमाधि कहते हैं | तेन] इस परमसमाधिसे [ मुनयः ] मुनिराज [ सकलानपि] सभी [शुभाशुभविकल्पान् ] शुभअशुभ भावोंको [मुंचंति] छोड देते हैं । भावार्थ-परमआराध्य जो आत्मस्वरूप उसके ध्यानमें लीन जो तपोधन शुभअशुभ मन वचन कायके व्यापारसे रहित जो शुद्धात्मद्रव्य उससे विपरीत जो अच्छे बुरे भाव उन सबको छोड़देते हैं, समस्त परद्रव्यकी आशासे रहित जो निज शुद्धात्म स्वभाव उससे विपरीत जो इस लोक परलोककी आशा, वह जब तक मनमें स्थित है तब तक यह जीव दुःखी है। ऐसा जानकर सब परद्रव्यकी आशासे रहित जो शुद्धात्मद्रव्य उसकी भावना करनी चाहिये । ऐसा ही कथन अन्य जगह भी है-आशा- रूप पिशाचसे घिरा हुआ यह जीव महान भयंकर दुःख पाता है जिन मुनियोंने आशा छोड़ी उन्होंने सब दुःख दूर किये क्योंकि दुःखका मूल आशा ही है ॥ ३२१ ॥ , परमात्मप्रकाशः। करंतुवि कुर्वाणोपि । किं । तवचरणु समस्तपरद्रव्येच्छावर्जितं तपश्चरणं । कथंभूतं । घोरु पोरं दुर्धरै वृक्षमूलातापनादिरूपं । न केवलं तपश्चरणं कुर्वन् । सयलवि सत्थ मुणंतु शास्त्रजनितविकल्पतात्पर्यरहितात् परमालखरूपात्प्रतिपक्षभूतानि सर्वशास्त्राण्यपि जानन् । इत्थंभूतोपि सन् परमसमाहि विवञ्जियउ यदि चेद्रागादिविकल्परहितपरमसमा- धिविवर्जितो भवति तर्हि णवि देखइ सिउ न पश्यति । कं । शिवं शिवशब्दवाच्यं विशु- द्धज्ञानदर्शनस्वभावं स्वदेहस्थमपि च परमात्मानं । कथंभूतं । संतु रागद्वेषमोहरहितत्वेन शांतं परमोपशमरूपमिति । इदमत्र तात्पर्य । यदि निजशुद्धात्मैवोपादेय इति मत्वा तत्सा- धकत्वेन तदनुकूलं तपश्चरणं करोति तत्परिज्ञानसाधकं च पठति तदा परंपरया मोक्षसा- धकं भवति, नोचेत् पुण्यवंधकारणं तमेवेति । तथाचोक्तं । निर्विकल्पसमाधिरहिताः संतः आमरूपं न पश्यति । "आनंदं ब्रह्मणो रूपं निजदेहे व्यवस्थितं । ध्यानहीना न पश्यंति जात्यंधा इव भास्करम्" ॥ ३२२ ।। आगे ऐसा कहते हैं कि जो परमसमाधिके विना शुद्ध आत्माको नहीं देख सकता;- [घोरं तपश्चरणं कुर्वाणोपि ] जो मुनि महा दुर्धर तपश्चरण करता हुआ भी और [सकलानि शास्त्राणि ] सव शास्त्रोंको [ मन्वानः अपि ] जानता हुआ भी [ परमस- माधिविवर्जितः] जो परमसमाधिसे रहित है वह [ शांतं शिवं ] शांतरूप शुद्धात्माको [नैव पश्यति ] नही देख सकता । भावार्थ-तप उसे कहते हैं कि जिसमें किसी वस्तुकी इच्छा न हो । सो इच्छाका अभाव तो हुआ नहीं परंतु कायक्लेश करता है शीतकालमें नदीके तीर, ग्रीष्मकालमें पर्वतके शिखरपर और वर्षाकालमें वृक्षकी मूलमें महान दुर्धर तप करता है । केवल तप ही नहीं करता शास्त्र भी पढता है । सकल शास्त्रोंके प्रबंधसे रहित जो निर्विकल्प परमात्मखरूप उससे रहित हुआ सीखता है शास्त्रोंका रहस्य जानता है परंतु परमसमाधिसे रहित है अर्थात् रागादि विकल्पसे रहित समाधि जिसके प्रगट न हुई तो वह परमसमाधिके विना तप करता हुआ और श्रुत पढता हुआ भी निर्मल ज्ञान दर्शनरूप तथा इस देहमें विराजमान ऐसे निजपरमात्माको नही देख सकता । जो आत्मस्वरूप रागद्वेषमोह रहित परमशांत है । परमसमाधिके विना तप और श्रुतसे भी शुद्धात्माको नही देख सकता । जो निज शुद्धात्माको उपादेय जान- कर ज्ञानका साधक तप करता है और ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय जो जैनशास्त्र उनको पढता है तो परंपरा मोक्षका साधक है । और जो आत्माके श्रद्धान विना कायक्लेशरूप तप ही करे तथा शब्दरूप ही श्रुत पढे तो मोक्षका कारण नही है पुण्यवंधके कारण होते हैं । ऐसा ही परमानंद स्तोत्रमें कहा है कि जो निर्विकल्प समाधिरहित जीव हैं वे आत्मखरूपको नही देखसकते । ब्रह्मका रूप आनंद है वह ब्रह्म निज देहमें मौजूद है रायचंगजैनशास्त्रमालायाम् । ३३२ अथ;- विसयकसायवि णिहलिवि, जे ण समाहि करंति । ते परमप्पहं जोइया, ण वि आराहय होति ।। ३२३ ॥ विषयकषायानपि निर्मूल्य ये न समाधि कुवैति । ते परमात्मनः योगिन् नैव आराधका भवंति ॥ ३२३ ।। जे ये केचन ण करंति न कुर्वन्ति । के। समाहि त्रिगुप्तिगुप्तपरमसमाधि । कि- कृत्वा पूर्व । णिलिवि निर्मूल्य । कानपि विसयकसायवि निर्विपयकपायात् शुद्धामतत्त्वान् प्रतिपक्षभूतान् विषयकषायानपि ते णवि आराहय होति ते नैवाराधका भवंति जोइय हे योगिन् । कस्याराधका न भवंति । परमप्पहं निर्दोपिपरमासन इति । तथाहि । विषयकषायनिवृत्तिरूपं शुद्धामानुभूतिखभावं वैराग्यं शुद्धात्मोपलब्धिरूपं तत्तत्त्वविज्ञानं वाह्याभ्यंतरपरिग्रहपरित्यागरूपं नैर्पथ्यं निश्चिंतात्मानुभूतिरूपा वगचित्तता वीतरागनिर्विक- ल्पसमाधिबहिरंगसहकारिभूतं जितपरीषहत्वं चेति पंचैतान् ध्यानहेतून ज्ञात्वा भावयित्वा च ध्यानं कर्तव्यमिति भावार्थः । तथा चोक्तं । "वैराग्यं तत्त्वविज्ञानं नैग्रंथ्यं वशचि. त्तता । जितपरीषहत्वं च पंचैते ध्यानहेतवः” ॥ ३२३ ।। - परंतु ध्यानसे रहित जीव ब्रह्मको नहीं देखसकते, जैसे जन्मका अंधा सूर्यको नहीं देख सकता है ॥ ३२२ ॥ आगे विषयकषायोंका निषेध करते हैं। [ये] जो [विषयकपायानपि ] समा- धिको धारणकर विषयकषायोंको [ निर्मूल्य ] मूलसे उखाडकर [ समाधि ] तीन गुप्ति- रूप परमसमाधिको [न कुर्वति ] नहीं धारण करते [ते] वे [योगिन् ] हे योगी [ परमात्माराधकाः] परमात्माके आराधक [नैव भवति ] नही हैं । भावार्थ-ये विषय कषाय शुद्धात्म तत्त्वके शत्रु हैं जो इनका नाश न करे वह खरूपका आराधक कैसा । स्वरूपको वही आराधता है जिसके विषयकषायका प्रसंग न हो सब दोषोंसे रहित जो निज परमात्मा उसकी आराधनाके घातक विषयकषायके सिवाय दूसरा कोई भी नही है। विषयकषायकी निवृत्तिरूप शुद्धात्माकी अनुभूति वह वैराग्यसे ही देखी जाती है । इसलिये ध्यानका मुख्य कारण वैराग्य है । जव वैराग्य हो तव तत्त्वज्ञान निर्मल हो, सो वैराग्य और तत्त्वज्ञान ये दोनों परस्परमें मित्र हैं । ये ही ध्यानके कारण हैं और बाह्याभ्यंतर परिग्रहके त्यागरूप निग्रंथपना वह ध्यानका कारण है। निश्चित आत्मानुभूति ही है स्वरूप जिसका ऐसा जो मनका वश होना वह वीतरागनिर्विकल्पसमाधिका सहकारी है और वाईस परीषहोंका जीतना वह भी ध्यानका कारण है । ये पांच ध्यानके कारण जानकर ध्यान करना चाहिये । ऐसा दूसरी जगह भी कहा है कि ससार शरीरभोगोंसे परमात्मप्रकाशः। अथ:- परमसमाहि धरेवि मुणि, जे परभु ण जति । ते भवदुक्खई बहुविहई, कालु अणंतु सहति ॥ ३२४ ॥ परमसमाधि धृत्वापि मुनयः ये परब्रम न यांति । ते भवदुःखानि बहु विधानि कालं अनंतं सहते ॥ ३२४ ॥ जे ये केचन मुणि मुनयः ण जति न गच्छति । कं कर्मतापन्नं । परबंच परमब्रह्म परमशब्दवाच्यं निजदेहस्थं केवलज्ञानाद्यनंतगुणस्वभावं परमात्मस्वरूपं । किं कृत्वा पूर्व । परमसमाहि धरेवि वीतरागतात्त्विकचिदानंदैकानुभूतिरूपं परमसमाधि धृत्वा ते पूर्वोक्त- शुद्धात्मभावनारहिताः पुरुषाः सहति सहते । कानि कर्मतापन्नानि । भवदुक्खई वीतरा- गपरमाहादरूपात् पारमार्थिकसुखात्प्रतिपक्षभूतानि नरनारकादिभवदुःखानि । कतिसं- ख्योपेतानि । बहुविहई शारीरमानसादिभेदेन बहुविधानि । कियंतं कालं । कालु अणंतु अनंतकालपर्यतमिति । अत्रेदं व्याख्यानं ज्ञात्वा निजशुद्धात्मनि स्थित्वा रागद्वेषादिसम- स्तविभावत्यागेन भावना कर्तव्येति तात्पर्यम् ॥ ३२४ ॥ अथ,- - जामु सुहासुहभावडा, गवि सयलवि तुति । परमसमाहि ण तामु मणि, केमुलि एमु भणति ॥ ३२५ ।। विरक्तता, तत्त्वविज्ञान, सकलपरिग्रहका त्याग, मनका वश करना और बाईस परीषहका जीतना-ये पांच आत्मध्यानके कारण हैं ॥ ३२३ ॥ आगे परमसमाधिकी महिमा कहते हैं-[ये मुनयः ] जो कोई मुनि [परमसमाधि] परमसमाधिको [धृत्वापि ] धारण करके भी [ परब्रह्म ] निज देहमें ठहरे हुए केवल- ज्ञानादि अनंतगुणरूप निज आत्माको [न यांति] नहीं जानते हैं [ते ] वे शुद्धात्म- भावनासे रहित पुरुष [वहुविधानि ] अनेक प्रकारके [भवदुःखानि ] नारकादि भवदुःख आधि व्याधिरूप [अनंतं कालं ] अनंत काल तक [ सहते ] भोगते हैं। भावार्थ-मनके दुःखको आधि कहते हैं और तनसंबंधी दुःखोंको व्याधि कहते हैं, इन नानाप्रकारके दुःखोंको अज्ञानी जीव भोगता है । ये दुःख वीतराग परम आहादरूप जो पारमार्थिक सुख उससे विमुख हैं । यह जीव अनंतकाल तक निज खरूपके ज्ञान विना चारों गतियों के नानाप्रकारके दुःख भोग रहा है। ऐसा व्याख्यान जानकर निज शुद्धात्ममें स्थिर होके रागद्वेषादि समस्त विभावोंका त्यागकर निज खरूपकी ही भावना करनी चाहिये ।। ३२४ ॥

, ३३४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । यावत् शुभाशुभभावाः नैव सकला अपि त्रुव्यंति । परमसमाधिन तावत् मनसि केवलिन एवं भणंति ॥ ३२५ ॥ जामु इत्यादि । जामु यावत्कालं णवि तुटृति नैव नश्यति । के कर्तारः । सुहासु- हभावडा शुभाशुभविकल्पजालरहितात् परमात्मद्रव्याद्विपरीताः शुभाशुभभावाः परि- णामाः । कतिसंख्योपेता अपि । सयलवि समस्ता अपि तामु ण तावत्कालं न । कोसौ । परमसमाहि शुद्धात्मसम्यनद्धानज्ञानानुचरणरूपः शुद्धोपयोगलक्षणः परमसमाधिः । क । मणि रागादिविकल्परहितत्वने शुद्धचेतसि केवुलि एमु भणंति केवलिनो वीतराग- सर्वज्ञा एवं कथयंतीति भावार्थः ॥ ३२५ ॥ इति चतुर्विशतिसूत्रप्रमितमहास्थल- मध्ये परमसमाधिप्रतिपादकसूत्रषट्रेन प्रथममंतरस्थलं गतं । तदनंतरमहत्पदमिति भावमोक्ष इति जीवन्मोक्ष इति केवलज्ञानोत्पत्तिरित्येकोर्थः तस्य चतुर्विधनामाभिधेयस्याहत्पदस्य प्रतिपादनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयपर्यतं व्याख्यानं करोति । तद्यथा सयलवियप्पहं तुहाहं, सिवपयमग्गि वसंतु। कम्मचउक्कड विलउ गइ, अप्पा हुइ अरहंतु ॥ ३२६ ।। सकलविकल्पानां त्रुट्यतां शिवपदमार्गे वसन् । कर्मचतुष्के विलयं गते आत्मा भवति अर्हन् ॥ ३२६ ॥ हुइ भवति । कोसौ । अप्पा आत्मा । कथंभूतो भवति । अरहंतु अरिमोहनीयं कर्म तस्य हननात् रजसी ज्ञानहगावरणे तयोरपि हननात् रहस्यशब्देनांतरायस्तदभावाच देवेंद्रा- दिविनिर्मितामतिशयवती पूजामहतीत्यर्हन् । कस्मिन् सति । कम्मचउकइ विलउ गइ आगे यह कहते हैं कि जबतक इस जीवके शुभाशुभभाव सब दूर न हों तबतक परम समाधि नहीं होसकती-[यावत् ] जब तक [ सकला अपि] समस्त [शुभा- शुभभावाः] सकल विकल्पजालसे रहित जो. परमात्मा उससे विपरीत शुभाशुभ परिणाम [नैव त्रुव्यंति ] दूर न हों नही मिटें [ तावत् ] तबतक [ मनसि] रागादि- विकल्परहित शुद्ध चित्तमें [ परमसमाधिः न] सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्ररूप शुद्धोपयोग जिसका लक्षण है ऐसी परमसमाधि इस जीवके नहीं होसकती [ एवं ] ऐसा [केवलिनः] केवली भगवान [भणंति ] कहते है । भावार्थ-शुभाशुभ विकल्प जब मिटे तभी परमसमाधि होवे ऐसी जिनेश्वरदेवकी आज्ञा है ॥ ३२५ ॥ इस प्रकार चौवीस दोहाओंके महास्थलमें परमसमाधिके कथनरूप छह दोहाओंका अंतरस्थल गया। आगे तीन दोहाओंमें अरहंतपदका व्याख्यान करते हैं, अरहंत पद कहो या भाव- मोक्ष कहो, अथवा जीवन्मोक्ष कहो या केवलज्ञानकी उत्पत्ति कहो-ये चारों अर्थ एकको ही सूचित करते हैं अर्थात् चारों शब्दोंका अर्थ एक है।-[कर्मचतुष्के विलयं गते] परमात्मप्रकाशः। घातिकर्मचतुष्के विलयं गते सति । किं कुर्वन् सन् पूर्व । सिवपयमग्गि वसंतु शिवशब्द- वाच्यं यन्मोक्षपदं तस्य योसौ सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रितयैकलक्षणो मार्गस्तस्मिन् वसन् सन् । केपां सतां । सयलवियप्पहं तुट्टाहं समस्तविकल्पानां नष्टानां समस्तरागादिविक- ल्पविनाशादनंतरं भवतीति भावार्थः ॥ ३२६ ।। अथ:- केवलणाणिं अणवरउ, लोयालोउ मुणंतु । णियमें परमाणंदमउ, अप्पा हुइ अरहंतु ॥ ३२७॥ केवलज्ञानेनानवरतं लोकालोकं जानन् । नियमेन परमानंदमयः आत्मा भवति अर्हन् ।। ३२७ ॥ हुइ भवति । कोसौ । अप्पा आत्मा । कथंभूतो भवति अरहंतु पूर्वोक्तलक्षणो अर्हन् । किं कुर्वन् । लोयालोउ मुणंतु क्रमकरणव्यवधानरहितत्वेन कालत्रयविषयं लोकालोकं वस्तु वस्तुस्वरूपेण युगपत् जानन् सन् । केन । केवलणाणे लोकालोकप्रकाशकसकलविम- लकेवलज्ञानेन । कथं । अणवरउ निरंतरं । किविशिष्टो भवति भगवान् । परमाणंदमठ वीतरागपरमसमरसीभावलक्षणतात्त्विकपरमानंदमयः । केन । णियों निश्चयेनात्र संदेहो न कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ३२७ ॥ ज्ञानावरणी दर्शनावरणी मोहनी और अंतराय इन चार घातिया कर्मोंके नाश होनेसे [आत्मा] यह जीव [ अर्हन् भवति ] अर्हत होता है अर्थात् जब घातियाकर्म बिलय हो जाते हैं तब अरहंतपद पाता है देवेंद्रादिकर पूजाके योग्य हो वह अरहंत है क्योंकि पूजायोग्यको ही अहंत कहते हैं । पहले तो महामुनि हुआ [शिवपदमार्गे वसन्] मोक्षपदके मार्गरूप सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रमें ठहरता हुआ [ सकलविकल्पाना ] समस्त रागादिविकल्पोंका [त्रुप्यतां ] नाश करता है अर्थात् जब समस्तरागादि विकल्पोंका नाश हो जावे तब निर्विकल्प ध्यानके प्रसादसे केवलज्ञान होता है । केवलज्ञानीका नाम अहैत है चाहे उसे जीवन्मुक्त कहो । जब अरहंत हुआ तव भाव मोक्ष हुई पीछे चार अघातियाओंको नाशकर सिद्ध हो जाता है। सिद्धको विदेहमोक्ष कहते हैं । यही मोक्ष होनेका उपाय है ॥ ३२६ ॥ अब केवलज्ञानकी ही महिमा कहते हैं।- केवलज्ञानेन] केवल ज्ञानसे [ लोका- लोकं ] लोक अलोकको [अनवरत ] निरंतर [जानन् ] जानता हुआ [ नियमेन ] निश्चयसे [ परमानंदमयः ] परम आनंदमई [आत्मा ] यह आत्मा ही रखत्रयके प्रसा- दसे [ अर्हन् ] अरहंत [ भवति ] होता है । भावार्थ-समस्त लोकालोकको एक ही ३३६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथ:- जो जिणु केवलणाणमउ, परमाणंदसहाउ। सो परमप्पउ परमपउ, सो जिय अप्पसहाउ ।। ३२८ ।। यः जिनः केवलज्ञानमयः परमानंदखभावः । सः परमात्मा परमपरः स जीव आत्मखभावः ।। ३२८॥ जो इत्यादि । जो यः जिणु अनेकभवगहनव्यसनप्रापणहेतून् कर्मारातीन् जयतीति जिनः । कथंभूतः । केवलणाणमउ केवलज्ञानाविनाभूतानंतगुणमयः । पुनरपि कथंभूतः । परमाणंदसहाउ इंद्रियविपयातीतः स्वात्मोत्थः रागादिविकल्परहितः परमानंदस्वभावः सो परमप्पउ स पूर्वोत्तोऽहनेव परमात्मा परमपरु प्रकृष्टानंतञानादिगुणरूपा मा लक्ष्मीर्यस्य स भवति परमः संसारिभ्यः पर उत्कृष्टः पर इत्युच्यते परमश्वासौ परश्च परमपरः सो स पूर्वोक्तो वीतरागः सर्वज्ञः जिय हे जीव अप्पसहाउ आत्मस्वभाव इति । अत्र योसौ पूर्वोक्तभणितो भगवान् स एव संसारावस्थायां निश्चयेन शक्तिरूपेण जिन इत्युच्यते । केवलज्ञानावस्थायां व्यक्तिरूपेण च । तथैव च परमब्रह्मादिशब्दवाच्यः स एव तदनः समयमें केवल ज्ञानसे जानता हुआ अरहंत कहलाता है । जिसका ज्ञान जाननेके क्रमसे रहित है। एक ही समयमें समस्तलोकालोकको प्रत्यक्ष जानता है आगे पीछे नहीं जानता। सब क्षेत्र सब काल सब भावको निरंतर प्रत्यक्ष जानता है । जो केवली भगवान परम आनंदमई है। वीतराग परम समरसी भावरूप जो परम आनंद अतींद्रिय अविनाशी सुख वही जिसका लक्षण है । निश्चयसे ज्ञानानंद खरूप है इसमें संदेह नही है ॥ ३२७॥ आगे ऐसा कहते हैं कि केवलज्ञान ही आत्माका निजखभाव है और केवलीको ही परमात्मा कहते हैं-[यः जिनः] जो अनंत ससाररूपी वनके भ्रमणके कारण ज्ञाना- वरणादि आठ कर्मरूपी वैरी उनका जीतनेवाला वह [ केवलज्ञानमयः ] केवलज्ञानादि अनंत गुणमई है [परमानंदखभावः] और इंद्रियविषयसे रहित आत्मीकरागादि विकल्पोंसे रहित परमानंद ही जिसका खभाव है ऐसा जिनेश्वर केवलज्ञानमई अरहंत देव [स:] वही [ परमात्मा] उत्कृष्ट अनंत ज्ञानादि गुणरूपलक्ष्मीवाला आत्मा परमात्मा है । उसीको वीतराग सर्वज्ञ कहते हैं [ जीव] हे जीव वही [ परमपरः] संसारियोंसे उत्कृष्ट है ऐसा जो भगवान वह तो व्यक्तिरूप है और [स आत्मखभावः] वह 'आत्माका ही खभाव है । भावार्थ-संसार अवस्थामें निश्चयनयकर शक्तिरूप विराज- मान है इसलिये संसारीको शक्तिरूप जिन कहते हैं और केवलीको व्यक्तिरूप कहते हैं। द्रव्यार्थिक नयकर जैसा भगवान है वैसे ही सब जीव हैं इस तरह निश्चयनयकर जीवको परब्रह्म कहो परमशिव कहो जितने भगवानके नाम हैं उतनेही निश्चयनयकर विचारो तो परमात्मप्रकाशः। २३७ स्वयमेव कथयति । निश्चयनयेन सर्वे जीवा जिनस्वरूपाः जिनोपि सर्वजीवस्वरूप इति भावार्थः । तथा चोक्तं । "जीवा जिणवर जो मुणइ जिणवर जीव मुणेइ । सो समभावि परिट्टियउ लहु णिव्याणु लहेइ ॥ ३२८ ॥ एवं चतुर्विशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये अर्हदवस्थाकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयेण द्वितीयमंतरम्थलं गतं । अत ऊर्ध्व परमात्मप्रकाशशब्दस्यार्थकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयपर्यंत व्याख्यानं करोति तद्यथा- सयलहं कम्महं दोसह वि, जो जिणुदेउ विभिण्णु । सो परमप्पपयासु तुहुं, जोइय णियमें मण्णु ।। ३२९ ।। सकलेभ्यः कर्मभ्यः दोपेभ्यः अपि यो निनदेवः विभिन्नः । तं परमात्मप्रकाशं त्वं योगिन् नियमेन मन्यव ॥ ३२९ ।। सो तं परमप्पपयासु परमात्मप्रकाशसंज्ञं तुहुं त्वं कर्ता मण्णु मन्यस्व जानीहि जोइय हे योगिन् णियमें निश्चयेन । स कः । जो जिणदेउ यो जिनदेवः । किंविशिष्टः । विभिण्णु विशेपेण भिन्नः । केभ्यः । सयलह कम्महं रागादिरहितचिदानंदैकखभावपर- मात्मनो यानि भिन्नानि सर्वकर्माणि तेभ्यः । न केवलं कर्मभ्यो भिन्नः । दोसहवि टंको- त्कीर्णज्ञायकैकस्खभावस्य परमात्मनो येऽनंतज्ञानसुखादिगुणास्तत्प्रच्छादका ये दोषास्तेभ्योपि भिन्न इत्यभिप्रायः ॥ ३२९ ।। सब जीवोंके है सभी जीव जिनसमान है और जिनराज भी जीवोंके समान हैं ऐसा जानना । ऐसा दूसरी जगह भी कहा है । जो सम्यग्दृष्टि जीवोंको जिनवर जाने और जिनवरको जीव जानें जो जीवोंकी जाति है वही जिनवरकी जाति है और जो जिनवरकी जाति है वही जीवोंकी जाति है ऐसे महामुनि द्रव्यार्थिकनयकर जीव और जिनवरमें जातिभेद नहीं मानते वे मोक्ष पाते है ॥ ३२८ ॥ इसप्रकार चौवीस दोहाओंके महा- स्थलमें अरहंतदेवके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहाओंमें दूसरा अंतरस्थल कहा। आगे परमात्माप्रकाश शब्दके अर्थके कथनकी मुख्यतासे तीन दोहा कहते हैं; [सकलेभ्यः कर्मभ्यः ] ज्ञानावरणादि अष्टकर्मोंसे [ दोषेभ्यः अपि ] और सब क्षुधादि अठारह दोषोंसे [ विभिन्नः ] रहित [ यः जिनदेवः ] जो जिनेश्वरदेव है [तं] उसको [योगिन् त्वं ] हे योगी तू [परमात्मप्रकाशं] परमात्माप्रकाश [ नियमेन] निश्चयसे [मन्यस्व ] मान । अर्थात् जो निर्दोष जिनेंद्रदेव है वही परमात्माप्रकाश है । भावार्थ- रागादि रहित चिदानंद खभाव परमात्मासे भिन्न जो सब कर्म वे ही ससारके मूल है। जगतके जीव तो कर्मोकर सहित हैं और भगवान जिनराज इनसे मुक्त है और सब दोपोंसे रहित है । वे दोष सब ससारी जीवोंके लगरहे हैं, ज्ञायकखभाव आत्माके अनंत रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । , अथ:- केवलदसणु णाणु सुहु, वीरिउ जो जि अणंतु । सो जिणदेउवि परममुणि, परमपयासु मुणंतु ॥ ३३० ।। केवलदर्शनं ज्ञानं सुखं वीर्यः य एव अनंतं । स जिनदेवोपि परममुनिः परमप्रकाशं मन्यमानः ॥ ३३० ॥ सो जिणदेउवि स जिनदेवोपि एवं भवति । न केवलं जिनदेवो भवति । परममुणि परम उत्कृष्टो मुनिः प्रत्यक्षज्ञानी । किं कुर्वन् सन् । मुणंतु मन्यमानो जानन् सन् । कं । परमपयासु परममुत्कृष्टं लोकालोकप्रकाशक केवलज्ञानं यस्य स भवति परमप्रकाशस्तं परमप्रकाशं । स कः । केवलदसणु णाणु सुहु वीरिउ जो जि केवलज्ञानदर्शनसुखवीर्य- स्वरूपं य एव । कथंभूतं तत् केवलज्ञानादिचतुष्टयं । अणंतु युगपदनंतद्रव्यक्षेत्रकालभाव- परिच्छेदकत्वादविनश्वरत्वाचानंतमिति भावार्थः ॥ ३३० ॥ , अथ:- जो परमप्पा परमपउ, हरि हर बंभुवि वुद्ध । परमपयासु भणंति मुणि, सो जिणदेउ विसुडु ॥ ३३१ ॥ यः परमात्मा परमपदः हरिः हरः ब्रह्मापि बुद्धः। परमप्रकाशं भणंति मुनयः स जिनदेवो विशुद्धः ॥ ३३१ ॥ भणंति कथयति । के ते । मुणि मुनयः प्रत्यक्षज्ञानिनः । कथंभूतं भणंति । परमपयासु ज्ञान सुखादि गुणोंके आच्छादक है । उन दोषोंसे रहित जो सर्वज्ञ वही परमात्मप्रकाश है योगीश्वरोंके मनमें ऐसा ही निश्चय है । श्रीगुरु शिष्यसे कहते है कि हे योगिन् तू निश्चयसे ऐसा ही मान यही सत्पुरुषोंका अभिप्राय है ॥ ३२९ ।। फिर भी इसी कथनको दृढ करते हैं;-[ केवलदर्शनं ज्ञानं सुखं वीर्यः] केवल दर्शन केवल ज्ञान अनंतसुख अनंतवीर्य [यदेव अनंतं] ये अनंतचतुष्टय जिसके हों [स जिनदेवः ] वही जिनदेव है [ परममुनिः] वही परममुनि अर्थात् प्रत्यक्ष ज्ञानी । क्या करता संता! [ परमप्रकाशं मन्यमानः] उत्कृष्ट लोकालोकका प्रकाशक जो केवल ज्ञान वही जिसके परमप्रकाश है उससे सकल द्रव्य क्षेत्र काल भव भावको जानता हुआ परमप्रकाशक है। ये केवल ज्ञानादि अनंत चतुष्टय एक ही समयमें अनंतद्रव्य अनंतक्षेत्र अनंतकाल और अनंतभावोको जानते हैं इसलिये अनंत हैं अविनश्वर हैं इनका अंत नहीं है ऐसा जानना ॥ ३३० ॥ आगे जिनदेवके ही अनेक नाम हैं ऐसा निश्चय करते हैं। [य] जिस [ पर- मात्मा] परमात्माको [मुनयः] मुनि [ परमपदः ] परमपद [हरिः हरः ब्रह्मा अपि] परमात्मप्रकाशः। ३३९ परमप्रकाशः । यः कथंभूतः । जो परमप्पउ यः परमात्मा । पुनरपि कथंभूतः । परमपउ परमानंतज्ञानादिगुणाधारत्वेन परमपदस्वभावः । पुनरपि किंविशिष्टः । हरि हरिसंज्ञः हरु महेश्वराभिधानः भुवि परमब्रह्माभिधानोपि बुद्ध बुद्धः सुगतसंज्ञः सो जिणदेउ स एव पूर्वोक्तः परमात्मा जिनदेवः । किंविशिष्टः । विसुद्ध समस्तरागादिदोषपरिहारेण शुद्ध इति । अत्र य एव परमात्मप्रकाशसंज्ञो निर्दोषिपरमात्मा व्याख्यातः स एव परमात्मा, स एवं परमपदः, स एव विष्णुसंज्ञः, स एवेश्वरामिधानः, स एव ब्रह्मशब्दवाच्यः स एव सुगतशब्दाभिधेयः, स एव जिनेश्वरः, स एव विशुद्ध इत्याद्यष्टाधिकसहस्रनामाभिधेयो भवति । नानारुचीनां जनानां तु कस्यापि केनापि विवक्षितेन नानाराध्यः स्यादिति भावार्थः । तथा चोक्तं । "नामाष्टकसहस्रेण युक्तं मोक्षपुरेश्वर"मित्यादि ॥ ३३१ ॥ एवं चतुर्विशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये परमात्मप्रकाशशब्दार्थकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयेण तृतीय- " मंतरस्थलं गतम् । तदनंतरं सिद्धस्वरूपकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयपर्यतं व्याख्यानं करोति तद्यथा;- झाणिं कम्मक्खउ करिवि, मुक्का होइ अणंतु । जिणवरदेवई सो जि जिय, पभणिउ सिद्ध महंतु ॥ ३३२ ॥ ध्यानेन कर्मक्षयं कृत्वा मुक्तो भवति अनंतः । जिनवरदेवेन स एव जीव प्रभणितः सिद्धो महान् ॥ ३३२ ।। हरि महादेव ब्रह्मा [बुद्धः परमप्रकाशः भणति ] बुद्ध और परमप्रकाश नामसे कहते हैं [सः] वह [ विशुद्धः जिनदेवः] रागादि रहित शुद्ध जिनदेव ही है उसीके ये सब नाम । भावार्थ-प्रत्यक्षज्ञानी उसे परमानंद ज्ञानादिगुणोंका आधार होनेसे परमपद कहते हैं, । वही विष्णु है वही महादेव है उसीका नाम पर ब्रह्म है, सबका ज्ञायक होनेसे बुद्ध है, सबमें व्यापक ऐसा जिनदेव देवाधिदेव परमात्मा अनेक नामोंसे गाया जाता है । समस्त रागादिक दोषके न होनेसे निर्मल है ऐसा जो अरहंत देव वहीं परमात्म- प्रकाश है। निर्दोष परमात्माका व्याख्यान करनेसे वही परमात्मा परमपद, वही विष्णु, वही ईश्वर, वही ब्रह्म, वही शिव, वही सुगत, वही जिनेश्वर और वो ही विशुद्ध- इत्यादि एक हजार आठ नामोंसे गाया जाता है । नानारुचिके धारक ये संसारी जीव वे नानाप्रकारके नामोंसे जिनराजको आराधते हैं । ये नाम जिनराजके सिवाय दूसरेके नहीं हैं । ऐसा ही दूसरे ग्रंथों में भी कहा है- एक हजार आठ नामों सहित वह मोक्ष- पुरका खामी उसकी आराधना सब करते हैं । उसके अनंत नाम और अनंतरूप है। वास्तवमें नामसे रहित रूपसे रहित ऐसे भगवान देवको हे प्राणियों तुम आराधो ।। ३३१ ॥ इसप्रकार चौवीस दोहाओंके महास्थलमें परमात्मप्रकाश शब्दके अर्थकी मुख्यतासे तीन दोहापर्यंत तीसरा अंतरस्थल कहा। , ३४० रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । पभणिउ प्रभणितः कथितः । केन कर्तृभूतेन । जिणवरदेवई जिनवरदेवेन । कोमा भणितः । सिद्ध सिद्धः । कथंभूतः । महंतु महापुरुपाराधितत्वात् केवलनानादिमहागुणा- धारत्वाच महान् । क एव । सो जि स एव । स कः । योसौ मुकउ होइ जानावरणादिमिः कर्मभिर्मुक्तो रहितः सम्यत्तवाद्यष्टगुणसहितश्च जिय हे जीव । कथंभूतः । अणंतु न विद्यततो विनाशो यस्य स भवत्यनंतः । किं कृत्वा पूर्व मुक्तो भवति । कम्मक्खउ करिवि विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावादात्मद्रव्याद्विलक्षणं यदातरौद्रध्यानद्वयं तेनोपार्जितं यत्कर्म तस्य क्षयः कर्मक्षयस्तं कर्मक्षयं कृत्वा । केन । झाणि रागादिविकल्परहितस्वसंवेदनज्ञानलमणेन ध्यानेनेति तात्पर्यम् ॥ ३३२ ॥ अथ- अण्णुवि बंधुवि तिहुयणहं, सासयसुक्खसहाउं । तित्थु जि सयलुवि कालु जिय, णिवसइ लद्धसहाउ ॥ ३३३ ॥ अन्यदपि बंधुरपि त्रिभुवनस्य शाखतमुखस्वभावः । तत्रैव सकलमपि कालं जीव निवसति लब्धखभावः ॥ ३३३ ।। आगे सिद्धस्वरूपके कथनकी मुख्यतासे तीनदोहापर्यंत व्याख्यान करते है- [ध्यानेन ] शुक्लध्यानसे [कर्मक्षयं ] कर्मोका क्षय [कृत्वा] करके [मुक्तः भवति ] जो मुक्त होता है [ अनंतः ] और अविनाशी है [जीव ] हे जीव [ स एव ] वो ही [जिनवरदेवेन] जिनवरदेवने [महान् सिद्धः प्रभणितः] सबसे महान् सिद्ध भगवान कहा है । भावार्थ-अरहंत परमेष्ठी सकल सिद्धातोके प्रकाशक हैं वे सिद्ध परमात्माको सिद्ध परमेष्ठी कहते है जिसे सव सत पुरुष आराधते है । केवलज्ञानादि महान अनंत- गुणोंके धारण करनेसे वह महान अर्थात् सबमें बड़ा है । जो सिद्ध भगवान ज्ञानावर- णादि आठों ही कौसे रहित है और सम्यक्त्वादि आठ गुण सहित है । क्षायक सम्यक्त्व, केवल ज्ञान, केवलदर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्म, अवगाहन, अगुरुलघु, अव्यावाध- इन आठ गुणोंसे मंडित है और जिसका अंत नही ऐसा निरंजनदेव विशुद्धज्ञान दर्शन खभाव जो आत्मद्रव्य उससे विपरीत जो आर्त रौद्र खोटे ध्यान उनसे उत्पन्न हुए जो शुभ अशुभकर्म उनका खसवेदनज्ञानरूप शुक्लध्यानसे क्षय करके अक्षय पद पा लिया है। कैसा है शुक्लध्यान ? रागादि समस्तविकल्पोंसे रहित परम निराकुलतारूप है । यही ध्यान मोक्षका मूल है इसीसे अनंत सिद्ध हुए और होंगे ।। ३३२ ॥ आगे फिर भी सिद्धोंकी महिमा कहते है;-[अन्यदपि] फिर वे सिद्धभगवान [त्रिभुवनस्य ] तीन लोकके प्राणियोंके [बंधुरपि ] हित करने वाले है [शाखतसुख- खभावः] और जिनका खभाव अविनाशी सुख है और [ तत्रैव ] उसी सिद्ध क्षेत्रमें परमात्मप्रकाशः। ३४१ अण्णुवि इत्यादि । अण्णुवि अन्यदपि पुनरपि स पूर्वोक्तः सिद्धः । कथंभूतः । बंधुवि वंधुरेव । कस्य । तिहुयणहं त्रिभुवनस्थभव्यजनस्य । पुनरपि किं विशिष्टः । सासयसुक्ख- सहाउ. रागादिरहितान्यावाधशास्वतसुखस्वभावः । एवं गुणविशिष्टः सन् किं करोति स भगवान् । तित्थु जि तत्रैव मोक्षपदे णिवसइ निवसति । कथंभूतः सन् । लद्धसहाउ लव्धशुद्धात्मस्वभावः । कियत्कालं निवसति । सयलवि समस्तमप्यनंतानंतकालपर्यंत जिय हे जीवेति । अत्रानेन समस्तकालग्रहणेन किमुक्तं भवति । ये केचन वदंति मुक्तानां पुनरपि संसारे पतनं भवति तन्मतं निरस्तमिति भावार्थः ॥ ३३३ ॥ अथ:- जम्मणमरणविवजियउ, चउगइदुक्खविमुक्छ । केवलदंसणणाणमउ, णंदइ तित्थु जि मुकु ॥ ३३४ ॥ जन्ममरणविवर्जितः चतुर्गतिदुःखविमुक्तः । केवलदर्शनज्ञानमयः नंदति तत्रैव मुक्तः ॥ ३३४ ॥ पुनरपि कथंभूतः स भगवान् । जम्मणमरणविवजियउ जन्ममरणविवर्जितः । पुनरपि किंविशिष्टः । चउगइदुक्ख विमुकु सहजशुद्धपरमानंदैकखभावं यदात्मसुखं तस्माद्विपरीतं यञ्चतुर्गतिदुःखं तेन विमुक्तो रहितः । पुनरपि किंवरूपः । केवलदसणणाणमउ क्रमकरण- [लब्धखभावः] निजखभावको पाकर [जीव ] हे जीव [ सकलमपि कालं] सदा काल [निवसति ] निवास करते है फिर चतुर्गतिमें नहीं आयेंगे । भावार्थ-सिद्ध परमेष्ठी तीनलोकके नाथ है और जिनका भव्य जीव ध्यान करके भवसागरके पार होते है इसलिये भव्योंके बंधु है हितकारी है। जिनका रागादि रहित अव्यावाध अविनाशी सुख खभाव है । ऐसे अनंत गुणरूप वे भगवान उस मोक्षपदमें सदा काल विराजते है । जिन्होंने शुद्ध आत्मखभाव पा लिया है । अनंत काल वीत गये और अनंतकाल आवेंगे परंतु वे प्रभु सदा काल सिद्ध क्षेत्रमें वस रहे है । समस्त काल रहते है इसके कहनेका प्रयोजन यह है कि जो कोई ऐसा कहते है कि मुक्त जीवोंका भी ससारमें पतन होता है सो उनका कहना खंडित किया गया ॥ ३३३ ॥ आगे फिर भी सिद्धोंका ही वर्णन करते हैं;-जन्ममरणविवर्जितः ] वे भगवान सिद्धपरमेष्ठी जन्म और मरणकर रहित है [चतुर्गतिदुःखविमुक्तः ] चारों गतियों के दुःखोंसे रहित है [ केवलदर्शनज्ञानमयः] और केवलदर्शनकेवलज्ञानमई है ऐसे [मुक्तः ] कर्म रहित हुए [ तत्रैव ] अनंतकालतक उसी सिद्ध क्षेत्रमें [नंदति ] अपने स्वभावमें आनंदरूप विराजते है। भावार्थ-सहज शुद्ध परमानंद एक अखंड खभाव- रूप जो आत्मसुख उससे विपरीत जो चतुर्गतिके दुःख उनसे रहित हैं जन्ममरणरूप- ३४२ रायचंद्र जैनशास्त्रमालायाम् । व्यवधानरहितत्वेन जगत्रयकालत्रयवर्तिपदार्थानां प्रकाशककेंवलदर्शनजानाभ्यां निर्वृत्तः केव- लदर्शनज्ञानमयः । एवं गुणविशिष्टः सन् किंकरोति । णंदर स्वकीयस्वाभाविकानंतना- नादिगुणैः सह नंदति वृद्धि गच्छति । क । तित्थु जि तत्रैव मोक्षपदे । पुनरपि किं विशिष्टः सन् । मुक्कु ज्ञानावरणाद्यष्टकर्मनिर्मुक्तो रहितः अव्यावाधाद्यनंतगुणैः सहितश्चेति भावार्थः ।। ३३४ ॥ एवं चतुर्विशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये सिद्धपरिमेष्ठिव्याख्यानमुख्य- त्वेन सूत्रत्रयेण चतुर्थमंतरस्थलं गतं । अथानंतरं परमात्मप्रकाशभावनारतपुरुषाणां फलं दर्शयन् सूत्रपर्यतं व्याख्यानं करोति । तथाहिः- जे परमप्पपयासु मुणि, भावि भावहिं सत्थु । मोहु जिणेविणु सयल जिय, ते वुज्झहिं परमत्थु ॥ ३३५ ॥ ये परमात्मप्रकाशं मुनयः भावेन भावयंति शासं । मोह जित्वा सकलं जीव ते बुध्यति परमार्थम् ।। ३३५ ।। भावहिं भावयंति ध्यायति । के । मुणि मुनयः जे ये केचन । किं भावयंति । सत्थु शास्त्रं । कथंभूतं शास्त्रं । परमप्पपयासु परमात्मस्वभावप्रकाशत्वात्परमालप्रकाशसंज्ञं । केन भावयंति । भाविं समस्तरागाद्यपध्यानरहितशुद्धभावेन । किं कृत्वा पूर्व । जिणेविणु जित्वा । कं । मोहु निर्मोहपरमात्मतत्त्वाद्विलक्षणं मोहं । कतिसंख्योपेतं । सयलु समस्तं रोगोंसे रहित है अविनश्वरपुरमें सदा काल रहते है । जिनका ज्ञान संसारी जीवोंकी तरह विचाररूप नही है कि किसीको पहले जानें किसीको पीछे जानें उनका केवल- ज्ञान और केवलदर्शन एक ही समयमें सव द्रव्य सव क्षेत्र सब काल और सब भावोंको जानता है । लोकालोक प्रकाशी आत्मा निज भाव अनंत ज्ञान अनंत दर्शन अनंतसुख और अनंत वीर्य मई है । ऐसे अनंत गुणोंके सागर भगवान् सिद्ध परमेष्ठी खद्रव्य खक्षेत्र स्खकाल स्वभावरूप चतुष्टयमें निवास करते हुए सदा आनंदरूप लोकके शिखरपर विराजरहे हैं जिसका कभी अंत नही उसी सिद्धपदमें सदा काल विराजते है केवलज्ञान दर्शनकर घट २ में व्यापक है । सकल कर्मोपाधिरहित महा निरुपाधि निराबाधपना आदिदे अनंतगुणों सहित मोक्षमें आनंद विलास करते हैं ॥ ३३४ ॥ इस तरह चौवीस दोहावाले महास्थलमें सिद्ध परमेष्ठीके व्याख्यानकी मुख्यताकर तीनदोहाओंमें चौथा अंतरस्थल कहा। आगे तीन दोहाओंमें परमात्मप्रकाशको भावनामें लीन पुरुषोंके फलको दिखाते हुए व्याख्यान करते है। ये मुनयः] जो मुनि [भावेन ] भावोंसे [ परमात्मप्रकाशं शास्त्रं ] इस परमात्मप्रकाश नामा शास्त्रका [भावयति ] चितवन करते हैं हमेशा इसीका

परमात्मप्रकाशः।
निरवशेष जिय हे जीवेति ते त एवं गुणविशिष्टास्तपोधनाः बुज्झहि बुध्यति । कं ।
परमत्थु परमार्थशब्दवान्यं चिदानंदैकस्वभावं परमात्मानमिति भावार्थः ॥ ३३५ ।।
अथ:-
अण्णु जि भत्तिए जे मुणहिं, इहु परमप्पपयासु ।
लोयालोयपयासयरु पावहिं तेवि पयासु ॥ ३३६ ॥
अन्यदपि भत्तया ये मन्यते इमं परमात्मप्रकाशं ।
लोकालोकप्रकाशकं प्रामुवंति तेपि प्रकाशम् ॥ ३३६ ॥
अण्णु जि इत्यादि । अण्णु जि अन्यदपि विशेषफलं कथ्यते भत्तिए जे मुणहि
भक्त्या ये मन्यते जानते । कं । परमप्पपयासु इमं प्रत्यक्षीभूतं परमात्मप्रकाशप्रथमर्थतस्तु
परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यं परमात्मतत्त्वं पावहिं प्राप्नुवंति तेवि तेपि । कं । पयासु प्रकाश-
शब्दवाच्यं केवलज्ञानं तदाधारपरमात्मानं वा । कथंभूतं परमात्मप्रकाशं । लोयालोयप-
यासयरु अनंतगुणपर्यायसहितत्रिकालविपयलोकालोकप्रकाशकमिति तात्पर्य ॥ ३३६ ॥
अभ्यास करते है [जीव ] हे जीव [ते] वे [ सकलं मोहं] समस्त मोहको [जित्वा]
जीतकर [ परमार्थ बुध्यति ] परमतत्त्वको जानते हैं। भावार्थ-जो कोई सब परिग्र-
हके त्यागी साधु परमात्मस्वभावका प्रकाशक इस परमात्मप्रकाश नामा ग्रंथको समस्त
रागादि खोटे ध्यान रहित जो शुद्धभाव उससे निरंतर विचारते हैं वे निर्मोह परमात्म-
तत्त्वसे विपरीत जो मोह नामा कर्म उसकी समस्त प्रकृतियोंको मूलसे उखाड देते हैं
मिथ्यात्वरागादिकोंको जीतकर निर्मोह निराकुल चिदानंद खभाव जो परमात्मा उसको
अच्छीतरह जानते हैं ॥ ३३५ ॥
आगे फिर भी परमात्मप्रकाशके अभ्यासका फल कहते हैं,-[अन्यदपि ] और भी
फल कहते हैं [ये] जो कोई भव्य जीव [भक्त्या ] भक्तिसे [ इमं परमात्मप्रकाशं]
इस परमात्माप्रकाश शासको [ मन्यते ] पढ़ें सुनें इसका अर्थ जानें [तेपि ] वे भी
[लोकालोकप्रकाशक ] लोकालोकको प्रकाशनेवाले [प्रकाशं ] केवलज्ञान तथा उसके
आधारभूत परमात्मतत्त्वको शीघ्र ही पासकेंगे । अर्थात् परमात्मप्रकाश नाम परमात्मत-
त्वका भी है और इस ग्रंथका भी है सो परमात्मप्रकाशग्रंथके पढनेवाले दोनों हीको
पावेंगे । प्रकाश ऐसा केवलज्ञानका नाम है उसका आधार जो शुद्ध परमात्मा अनंत गुण-
पर्याय सहित तीनकालका जाननेवाला लोकालोकका प्रकाशक ऐसा आत्मद्रव्य उसे तुरंत
ही पावेंगे ॥ ३३६॥

३४४ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । , अथ;- जे परमप्पपयासयह, अणुदिणु णाउ लयंति । तुइ मोहु तडत्ति तहं, तिहुयणणाह वंति ॥ ३३७ ॥ ये परमात्मप्रकाशस्य अनुदिनं नाम गृहंति । त्रुट्यति मोहः झटिति तेषां त्रिभुवननाथा भवंति ॥ ३३७ ।। लयंति गृह॒ति जे ये विवेकिनः णाउ नाम । कस्य । परमप्पपयासयह व्यवहारेण परमात्मप्रकाशाभिधानग्रंथस्य निश्चयेन तु परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यस्य केवलज्ञानाद्यनंत- गुणस्वरूपस्य परमात्मपदार्थस्य । कथं । अणुदिणु अनवरतं । तेषां किं फलं भवति । तुदृइ नश्यति । कोसौ । मोहु निर्मोहात्मदव्याद्विलक्षणो मोहः तडत्ति झटिति तहं तेषां । न केवलं मोहो नश्यति । तिहुयणणाह हवंति तेन पूर्वोक्तेन निर्मोहशुद्धात्मतत्त्वभावना- फलेन पूर्व देवेंद्रचक्रवादिविभूतिविशेष लब्ध्वा पश्चाजिनदीक्षां गृहीत्वा च केवलज्ञानमु- त्पाद्य त्रिभुवननाथा भवंतीति भावार्थः ॥ ३३७ ॥ एवं चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये परमात्मप्रकाशभावनाफलकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयेण पंचमस्थलं गतं । अथ परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यो योसौ परमामा तदाराधकपुरुपलक्षणजापनार्थ सूत्रत्रयेण व्याख्यानं करोति । तद्यथा- जे भवदुक्खहं वीहिया, पउ इच्छहिं णिव्वाणु । इह परमप्पपयासयहं, ते पर जोग्ग वियाणु ॥ ३३८ ॥ ये भवदुःखेभ्यः भीताः पदं इच्छंति निर्वाणम् । अस्य परमात्मप्रकाशकस्य ते परं योग्या विजानीहि ॥ ३३८ ।। ते पर त एव जोग्ग वियाणु योग्या भवंतीति विजानीहि । कस्य । इह परमप्पपयास- आगे फिर भी परमात्मप्रकाशके पढनेका फल कहते हैं, ये] जो कोई भव्यजीव [परमात्मप्रकाशस्य ] व्यवहारनयसे परमात्माके प्रकाश करनेवाले इस ग्रंथका तथा निश्चयनयसे केवलज्ञानादि अनंत गुण सहित परमात्मपदार्थका [अनुदिनं] हमेशा [नाम गृह्णति ] नाम लेते हैं सदा उसीका स्मरण करते हैं | तेषां] उनका [ मोहः निर्मोह आत्मद्रव्यसे विलक्षण जो मोह नामा कर्म [झटिति त्रुट्यति] शीघ्र ही टूट जाता है और वे [त्रिभुवननाथा भवंति ] शुद्धात्मतत्त्वकी भावनाके फलसे पूर्व देवेंद्र चर्कवादिकी महान विभूति पाकर चक्रवर्तिपदको छोड़कर जिनदीक्षा ग्रहण करके केवलज्ञानको उत्पन्न कराके तीन भुवनके नाथ होते हैं, यह सारांश है ॥ ३३७ ॥ इस प्रकार चौवीस दोहाओंके महास्थलमें परमात्मप्रकाशकी भावनाके फलके कथनकी मुख्य- तासे तीन दोहाओंमें पांचवां अंतर स्थल कहा ।

परमात्मप्रकाशः। ३४५ यह व्यवहारेणास्य परमात्मप्रकाशामिधानग्रंथस्य परमार्थेन तु परमामप्रकाशशब्दवाच्यस्य निदोषिपरमात्मनः । ते के । जे बीहिया ये भीताः । केषां । भवदुक्खहं रागादिविकल्प- रहितपरमाहादरूपशुद्धात्मभावनोत्थपारमार्थिकसुखविलक्षणानां नारकादिभवदुःखाना । पुन- रपि किं कुर्वति । जे इच्छहिं ये इच्छंति । कि । पउ पदं स्थानं । कथंभूतं । णिवाणु निर्वृतिगतपरमात्माधारभूतं निर्वाणशब्दवाच्यं मुक्तिस्थानमित्यभिप्रायः ॥ ३३८ ॥ अथ,- जे परमप्पर भत्तियर, विसयण जे विरमंति। ते परमप्पपयासयहं, मुणिवर जोग्ग हवंति ॥ ३३९ ।। ये परमात्मनो भक्तिपराः विषयेभ्यः ये विरमंति । ते परमात्मप्रकाशकस्य मुनिवरा योग्या भवंति ॥ ३३९ ॥ हवंति भवंति जोग्ग योग्याः । के ते । मुणिवर मुनिप्रधानाः । के । ते ते पूर्वोक्ताः । कस्य योग्या भवंति । परमप्पपयासयह व्यवहारेण परमात्मप्रकाशसंज्ञग्रंथस्य परमार्थेन तु परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यस्य शुद्धात्मस्वभावस्य । कथंभूता ये । जे परमप्पहं भत्तियर ये परमात्मनो भक्तिपराः । पुनरपि किं कुर्वति ये । विसयण जे विरमंति निर्विषयपरमात्म- आगे परमात्मप्रकाश शब्दसे कहा गया जो प्रकाशरूप शुद्ध परमात्मा उसकी आरा- धनाके करनेवाले महा पुरुषोंके लक्षण जानने के लिये तीन दोहाओंमें व्याख्यान करते [ते परं] वे ही महापुरुष [ अस्य परमात्मप्रकाशकस ] इस परमात्मप्रकाशग्रंथके अभ्यास करनेके [योग्याः विजानीहि ] योग्य जानो [ये] जो [ भवदुःखेभ्यः ] चतुर्गतिरूप ससारके दुःखोंसे. भीताः ] डर गये है और निर्वाणं पदं ] मोक्षपदको [इच्छंति ] चाहते है । भावार्थ-व्यवहारनयकर परमात्मप्रकाश नामा ग्रंथकी और निश्च- यनयकर निर्दोषपरमात्मतत्त्वकी भावनाके योग्य वे ही है जो रागादि विकल्प रहित परम आनंदरूप शुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न हुए अतींद्रिय अविनश्वर सुखसे विपरीत जो नारकादि संसारके दुःख उनसे डर गये है जिनको चतुर्गतिके भ्रमणका डर है और जो सिद्धपरमेष्ठीका निवास मोक्षपदको चाहते है ।। ३३८ ॥ आगे फिर भी उन्ही पुरुषोंकी महिमा कहते हैं, ये ] जो [ परमात्मनः भक्ति- पराः] परमात्माकी भक्ति करनेवाले [ये] जो मुनि [ विषयेभ्यः विरमंति ] विषय- कषायोंमें नही रमते हैं [ ते मुनिवराः] वे ही मुनीश्वर (परमात्मप्रकाशस्य योग्याः ] परमात्मप्रकाशके अभ्यासके योग्य [भवंति ] हैं । भावार्थ-व्यवहारनयकर परमात्म- प्रकाश नामका ग्रंथ और निश्चयनयकर निजशुद्धात्मखरूप परमात्मा उसकी भक्तिम जो ४४ ३४६ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । तत्त्वानुभूतिसमुत्पन्नातींद्रियपरमानंदसुखरसावादतृप्ताः संतः सुलभान्मनोहरानपि विपयान रमंत इत्यभिप्रायः ॥ ३३९ ॥ अथ:- णाणवियक्खणु, सुद्धमणु, जो जणु एहउ कोइ । सो परमप्पपयासयहं, जोग्गु भणंति जि जोइ ॥ ३४० ॥ ज्ञानविचक्षणः शुद्धमना यो जन ईदृशः कश्चिदपि । तं परमात्मप्रकाशकस्य योग्यं भणति ये योगिनः ॥ ३४० ॥ भणंति कथयंति जि जोइ ये परमयोगिनः । कं भणंति । जोग्गु योग्यं । कस्य । परमप्पपयासयह व्यवहारनयेन परमात्मप्रकाशाभिधानशास्त्रस्य निश्चयेन तु परमात्मप्रका- शशब्दवाच्यस्य शुद्धात्मस्वरूपस्य । कं पुरुषं योग्यं भणंति । सो तं । तं कं । जो जणु एहउ कोइ यो जनः इत्थंभूतः कश्चित् । कथंभूतः । णाणवियक्खणु स्वसंवेदनजानविच- क्षणः । पुनरपि कथंभूतः । सुद्धमणु परमात्मानुभूतिविलक्षणरागद्वेपमोहवरूपसमस्तविक- ल्पजालपरिहारेण शुद्धामा इत्यभिप्रायः ।। ३४० ॥ एवं चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितमहास्थलमध्ये परमाराधकपुरुषलक्षणकथनरूपेण सूत्रत्रयेण षष्ठमंतरस्थलं गतम् । तत्पर हैं वे विषय रहित जो परमात्मतत्त्वकी अनुभूति उससे उपार्जन किया जो अती- द्रिय परमानंदसुख उसके रसके आखादसे तृप्त हुए विषयोंमें नही रमते हैं। जिनको मनोहर विषय आकर प्राप्त हुए हैं तौभी वे उनमें नहीं रमते ॥ ३३९ ॥ आगे फिर भी यही कथन करते हैं;-[यः जनः] जो प्राणी [ज्ञानविचक्षणः] खसंवेदनज्ञानकर विचक्षण (बुद्धिमान ) है और [शुद्धमनाः] जिसका मन परमा- त्माकी अनुभूतिसे विपरीत जो रागद्वेषमोहरूप समस्त विकल्पजाल उनके त्यागसे शुद्ध है [कश्चिदपि ईदृशः] ऐसा कोई भी सत्पुरुष हो [तं] उसे [ये योगिनः] जो योगीश्वर हैं वे [परमात्मप्रकाशस्य योग्यं ] परमात्मप्रकाशके आराधने योग्य [ भणति ] कहते हैं। भावार्थ-व्यवहारनयकर यह परमात्मप्रकाश नामा द्रव्यसूत्र और निश्चयन- यकर शुद्धात्मखभाव सूत्र उसके आराधनेको वे ही पुरुष योग्य हैं जो कि आत्मज्ञानके प्रभावसे महा प्रवीण हैं और जिनके मिथ्यात्व राग द्वेषादिमलकर रहित शुद्ध भाव है । ऐसे पुरुषोंके सिवाय दूसरा कोई भी परमात्मप्रकाशके आराधने योग्य नही है ॥ ३४०॥ इस प्रकार चौवीस दोहाओंके महास्थलमें आराधक पुरुषके लक्षण तीन दोहाओंमें कह छठा अंतरस्थल समाप्त हुआ।

परमात्मप्रकाशः।
३४७
अथ शास्त्रफलकथनमुख्यत्वेन सूत्रमेकं तदनंतरमौद्धत्यपरिहारेण च सूत्रद्वयपर्यतं
व्याख्यानं करोति । तद्यथा,-
लक्खणछंदविवज्जियउ, एहु परमप्पपयासु।
कुणइ सुहाविं भावियउ, चउगइदुक्खविणासु ॥ ३४१ ॥
लक्षणछंदोविवर्जितः अयं परमात्मप्रकाशः।
करोति सुभावेन भावितः चतुर्गतिदुःखविनाशं ॥ ३४१ ॥
लक्खण इत्यादि । लक्खणछंदविवजियउ लक्षणछंदोविवर्जितोऽयं । अयं कः । इहु
परमप्पपयासु एप परमात्मप्रकाशः । एवंगुणविशिष्टोऽयं किं करोति । कुणइ करोति ।
कं । चउगइदुक्खविणासु चतुर्गतिदुःखविनाशं । कथंभूतः सन् । भावियउ भावितः ।
केन । सहावई शुद्धस्वभावेनेति । तथाहि । यद्यप्ययं परमात्मप्रकाशग्रंथः शास्त्रक्रमव्यव-
हारेण दोहकछंदसा प्राकृतलक्षणेन च युक्तः तथापि निश्चयेन परमात्मप्रकाशशब्दवाच्यशु-
द्वालस्वरूपापेक्षया लक्षणछंदोविवर्जितः । एवंभूतः सन्नयं किं करोति । शुद्धभावनया
भावितःसन् शुद्धात्मसंवित्तिसमुत्पन्नरागादिविकल्परहितपरमानंदैकलक्षणसुखविपरीतानां च-
तुर्गतिदुःखानां विनाशं करोतीति भावार्थः ॥ ३४१ ॥
अथ श्रीयोगीद्रदेव औद्धत्यं परिहरति,
इत्थु ण लिव्वउ पंडियहिं, गुणदोसुवि पुणुरुत्तु ।
भट्टपभायरकारणई, मइ पुणु पुणुवि पउत्तु ॥ ३४२ ॥
आगे शास्त्रके फलके कथनकी मुख्यताकर एक दोहा और उद्धतपनेके त्यागकी
मुख्यताकर दो दोहे इसतरह तीनदोहाओंमें व्याख्यान करते हैं।-[अयं परमात्म-
प्रकाशः] यह परमात्माप्रकाश [सुभावेन भावितः ] शुद्ध भावोंकर भाया हुआ
[चतुर्गतिदुःखविनाशं ] चारों गतीके दुःखोंका विनाश [करोति ] करता है । जो
परमात्मप्रकाश [ लक्षणछंदोविवर्जितः] यद्यपि व्यवहारनयकर प्राकृतरूप दोहा छंदोंकर
सहित है और अनेक लक्षणोंकर सहित है तौभी निश्चयनयकर परमात्मप्रकाश जो शुद्धा-
त्मस्वरूप वह लक्षण और छंदोकर रहित है । भावार्थ-शुभलक्षण और प्रबंध ये दोनो
परमात्मामें नही है । परमात्मा शुभाशुभलक्षणोंकर रहित है और जिसके कोई प्रबंध नहीं
अनंतरूप है उपयोगलक्षणमई परमानंदलक्षणखरूप है सो भावोंसे उसको आराधो, वही
चतुर्गतिके दुःखोंका नाश करने वाला है ॥ शुद्ध परमात्मा तो व्यवहार लक्षण और
श्रुतरूप छंदोसे रहित है इनसे भिन्न निजलक्षणमई है और यह परमात्मप्रकाशनामा
अध्यात्म ग्रंथ यद्यपि दोहकछंदरूप है और प्राकृतलक्षणरूप है परंतु इसमें खसंवेदनज्ञा-
नकी मुख्यता है छंद अलंकारादिकी मुख्यता नही है ॥ ३४१ ॥

३४८ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । अत्र न ग्राह्यः पंडितैः गुणो दोषोपि पुनरुक्तः । भट्टप्रभाकरकारणेन मया पुनः पुनरपि प्रोक्तम् ॥ ३४२ ॥ इत्थु इत्यादि । इत्थु अत्र ग्रंथे ण लेवउ न ग्राह्यः । कैः । पंडियहिं पंडितैर्विवेकिभिः। कोसौ । गुण दोसुवि गुणो दोषोपि । कथंभूतः । पुणुरुत्तु पुनरुक्तः । कस्मान्न ग्राह्यः । यतः मइ पुणु पुणुवि पउत्तु मया पुनः पुनः प्रोक्तं । किं तत् । वीतरागपरमात्मतत्त्वं । किमर्थ । भट्टपहायरकारणइं प्रभाकरभट्टनिमित्तेनेति । अत्र भावनाग्रंथे समाधिशतकादिवत् पुनरुक्तदूषणं नास्ति इति । तदपि कस्मादिति चेत् । अर्थ पुनः पुनश्चितनलक्षणमिति वचनादिति मत्वा प्रभाकरभट्टव्याजेन समस्तजनानां सुखबोधार्थ बहिरंतःपरमात्मभेदेन तु त्रिविधात्मतत्त्वं बहुधाप्युक्तमिति भावार्थः ॥ ३४२ ।। अथ:- जं मइ किंपिवि जंपियउ, जुत्ताजुत्तुवि इत्थु । तं वरणाणि खमंतु महु, जे बुज्झहिं परमत्थु ॥ ३४३ ॥ यत् मया किमपि जल्पितं युक्तायुक्तमपि अत्र । तत् वरज्ञानिनः क्षाम्यंतु मम ये बुध्यते परमार्थम् ॥ ३४३ ॥ जं इत्यादि । जं मइ किंपिवि जंपियउ यन्मया किमपि जल्पितं । किं जल्पितं । जुत्ताजुत्तुवि शब्दविपये अर्थविषये वा युक्तायुक्तमपि इत्थु अत्र परमात्मप्रकाशाभिधानग्रंथे खमंतु क्षमा कुर्वतु । किं तत् । पूर्वोक्तदूषणं । के । वरणाणि वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदन- , आगे श्री योगींद्रदेव उद्धतपनेका त्याग दिखलाते है;-अत्र] श्री योगींद्रदेव कहते है अहो भव्यजीव हो इस ग्रंथमें [पुनरुक्तः] पुनरुक्तका [ गुणो दोषोपि] दोष भी [पंडितैः] आप पंडितजन [न ग्राह्यः] ग्रहण नही करें और कविकलाका गुण भी न लें क्योंकि [मया] मैने [भट्टप्रभाकरकारणेन] प्रभाकर भट्टके संबोधनेकेलिये [पुनः पुनरपि प्रोक्तं ] वीतरागपरमानंदरूप परमात्म तत्त्वका कथन चार वार किया है भावार्थ-इस शुद्धात्मभावनाके ग्रंथमें पुनरुक्तका दोष नही लगता । समाधितंत्र ग्रंथकी तरह इस ग्रंथमें भी बार २ शुद्धखरूपका ही कथन किया है वारंवार उसी अर्थका चितवन है ऐसा जानकर इसका रहस्य ( अभिप्राय) वार २ चितवना । प्रभाकर भट्टकी मुख्यताकर समस्त जीवोंको सुखसे प्रतिबोध होनेकेलिये इस ग्रंथमें वार वार बहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्माका कथन किया है ऐसा जानना ।। ३४२ ॥ आगे श्रीयोगींद्राचार्य ज्ञानी जनोंसे प्रार्थना करते है कि मैने जो किसी जगह छंद अलंकारादिमें युक्त अयुक्त कहा हो तो उसे पंडितजन परमार्थके जानने वाले मुझपर क्षमा करें;-[अत्र] इस ग्रंथमें [ यत् ] जो [ मया ] मैने [किमपि ] कुछ भी ] परमात्मप्रकाशः। ३४९ ज्ञानयुक्ता विशिष्टज्ञानिनः। कस्य । महु मम योगींद्रदेवाभिधानस्य । कथंभूता ये ज्ञानिनः । जे बुज्झहिं ये केचन बुध्यते जानंति । कं परमत्थु रागादिदोषरहितमनंतज्ञानदर्शनसुख- वीर्यसहितं च परमार्थशब्दवाच्यं शुद्धात्मानमिति भावार्थः ॥ ३४३ ॥ इति सूत्रत्रयेण सप्तममंतरस्थलं गतं । एवं सप्तभिरंतरस्थलैश्चतुर्विंशतिसूत्रप्रमितं महास्थलं समाप्तम् । अथैकवृत्तेन प्रोत्साहनार्थं पुनरपि फलं दर्शयति,- जं तत्तं णाणरूवं परममुणिगणा णिच झायंति चित्ते जं तत्तं देहचत्तं णिवसइ भुवणे सचदेहीण देहे । जं तत्तं दिव्वदेहं तिहुवणगुरुगं सिज्झए संतजीवे तं तत्तं जस्स सुई फुरइ णियमणे पावए सोहि सिद्धिं ॥ ३४४ ॥ यत् तत्त्वं ज्ञानरूपं परममुनिगणा नित्यं ध्यायंति चित्ते यत् तत्त्वंदेहत्यकं निवसति भुवने सर्वदेहिनां देहे । यत् तत्त्वं दिव्यदेहं त्रिभुवनगुरुकं सिध्यति शातजीवे तत् तत्त्वं यस्य शुद्ध स्फुरति निजमनसि प्राप्नोति स हि सिद्धिम् ॥ ३४४ ॥ पावए सो प्राप्नोति स हि स्फुटं । कं । सिद्धि मुक्ति । यस्य किं । जस्स णियमणे फुरइ यस्य निजमनसि स्फुरति प्रतिभाति । कि कर्मतापन्नं । तं तत्तं तत्तत्त्वं । कथंभूतं । - - [युक्तायुक्तमपि जल्पितं ] युक्त अथवा अयुक्त शब्द कहा होवे तो [तत् ] उसे [ये वरज्ञानिनः] जो महान ज्ञानके धारक [ परमार्थ ] परम अर्थको [बुध्यते ] जानते है वे पंडित जन [ मम क्षाम्यंतु ] मेरे ऊपर क्षमा करें । भावार्थ-मेरी छद्मस्थकी बुद्धि है जो कदाचित् मैने शब्दमें अर्थमें तथा छंद अलंकारमें अयुक्त कहा हो वह मेरा दोष क्षमा करो । सुधार लो । जो विवेकी परमअर्थको अच्छी तरह जानते है वे मुझपर कृपा करो मेरा दोष न लो। यह प्रार्थना योगींद्राचार्यने महामुनियोंसे की । जो महामुनि अपने शुद्ध- खरूपको अच्छी तरह अपनेमें जानते हैं । जो निजखरूप रागादि दोष रहित अनंत दर्शन अनंत सुख अनंत वीर्यकर सहित है ऐसे अपने खरूपको अपनेमें ही देखते है, जानते है और अनुभवते है वे ही इस ग्रंथके सुननेके योग्य है और सुधारनेके योग्य ॥ ३४३ ॥ इस प्रकार तीन दोहाओंमें सातवा अंतरस्थल कहा । इस तरह चौवीस दोहाओंका महास्थल पूर्ण हुआ । आगे एक स्रग्धरा नामके छंदमें फिर भी इस ग्रंथके पढनेका फल कहते है;-[ तत्] वह [तत्वं ] निज आत्मतत्त्व [यस्य निजमनसि] जिसके मनमे [स्फुरति] प्रकाश- मान हो जाता है [ स हि ] वो ही साधु [सिद्धिं प्राप्नोति ] सिद्धिको पाता है । कैसा -

३५०
रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
मुद्धं रागादिरहितं । पुनरपि कथंभूतं यत् । जं तत्तं णाणत्वं यदात्मतत्त्वं ज्ञानरूपं ।
पुनरपि किं विशिष्टं यत् । णिच झायंति नित्यं ध्यायति । क । चित्ते मनसि । के
ध्यायति । परममुणिगणा परममुनिसमूहाः । पुनरपि किं विशिष्टं यत् । जं तत्तं देहच
यत्परमात्मतत्त्वं देहत्यक्तं देहाद्भिन्नं । पुनरपि कथंभूतं यत् । णिवसइ निवसति । क ।
भुवणे सव्वदेहीण देहे त्रिभुवने सर्वदेहिनां संसारिणां देहे । पुनरपि कीदृशं यत् । जं तत्तं
दिव्वदेहं यत् शुद्धात्मतत्त्वं दिव्यदेहं दिव्यं केवलनानादिशरीरं । शरीरमिति कोर्थः ।
स्वरूपं । पुनश्च कीदृशं यत् । तिहुयणगुरुगं अव्यावाधानंतसुखादिगुणेन त्रिभुवनादपि
गुरु पूज्यमिति त्रिभुवनगुरुकं । पुनरपि कि रूपं चन् । सिज्जए सिद्ध्यति निप्पनि याति ।
क । संतजीवे ख्यातिपूजालाभादिसमस्तमनोरथविकल्पजालरहितत्वेन परमोपगांतजीव-
स्वरूपे इत्यभिप्रायः ॥ ३४४ ॥
अथ ग्रंथस्यावसाने मंगलार्थमागीर्वादरूपेण नमस्कारं करोति;
परमपयगयाणं भासओ दिव्वकाओ
मणसि मुणिवराणं मुक्खदो दिव्धजोओ।
विसयसुहरयाणं दुल्लहो जो हु लोए
जयउ सिवसरूवो केवलो कोवि बोहो ॥ ३४५ ॥
परमपदगतानां भासको दिव्यकायः
मनसि मुनिवराणां मोक्षदो दिव्ययोगः ।
विषयसुखरतानां दुर्लभो यो हि लोके
जयतु शिवस्वरूपः केवलः कोपि बोधः ॥ ३४५ ॥
है वह तत्त्व ? जो कि [शुद्ध ] रागादि मलरहित है [ज्ञानरूपं] और ज्ञानरूप है
जिसको [ परममुनिगणाः] परममुनीश्वर [नित्यं] सदा [चित्ते ध्यायंति] अपने
चित्तमें ध्याते है [ यत् तत्त्वं ] जो तत्त्व [ भुवने] इस लोकमें [ सर्वदेहिनां देहे ]
सब प्राणियोंके शरीरमें [ निवसति ] मौजूद है [देहत्यक्तं ] और आप देहसे रहित है
[ यत् तत्वं] जो तत्त्व [दिव्यदेहं ] केवलज्ञान और आनंदरूप अनुपम देहको धारण
करता है [त्रिभुवनगुरुकं ] तीनभुवनमें श्रेष्ठ है [शांतजीवे सिध्यति ] जिसको आरा-
धकर शांतपरिणामी संतपुरुष सिद्धपद पाते है। भावार्थ-ऐसा वह चैतन्यतत्व जिसके
चित्तमें प्रगट हुआ है वही साधु सिद्धिको पाता है । अव्यावाध अनंतसुख आदि गुणों-
कर वह तत्त्व तीनलोकका गुरु है सत पुरुषोके ही हृदयमें वह तत्त्व सिद्ध होता है।
कैसे हैं संत ? जो अपनी बड़ाई, अपनी प्रतिष्ठा और लाभादि समस्त मनोरथ विकल्प
जालोंसे रहित है । जिन्होंने अपना खरूप परमशातभावरूप पा लिया है ॥ ३४४ ॥

परमात्मप्रकाशः। ३५१ जयउ सर्वोत्कर्पण वृद्धिं गच्छतु । कोसौ । दिव्वकाओ परमौदारिकशरीरामिधान- दिव्यकायस्तदाधारो भगवान् । कथंभूतः । भासओ दिवाकरसहस्रादप्यधिकतेजस्त्वाद्भासकः प्रकाशकः । केपां कायः । परमपयगयाणं परमानंतज्ञानादिगुणास्पदं यदहत्पदं तत्र गतानां । न केवलं दिव्यकायो जयतु । दिव्वजोओ द्वितीयशुक्लध्यानामिधानो वीतरागो निर्विकल्पसमाधिरूपो दिव्ययोगः । कथंभूतः । मोक्खदो मोक्षप्रदायकः । क जयतु । मणसि मनसि । केपां । मुणिवराणं मुनिपुंगवानां । न केवलं योगो जयतु । केवलो कोवि वोहो केवलज्ञानाभिधानः कोप्यपूर्वो बोधः । कथंभूतः। सिवसरूवो शिवशब्दवाच्यं यदनंतसुखं तत्स्वरूपः । पुनरपि कथंभूतः । दुल्लहो जो हु लोए दुर्लभो दुष्प्राप्यः यः स्फुटं । क । लोके । केपां दुर्लभः । विसयसुहरयाणं विषयसुखातीतपरमात्मभावनोत्पन्न- परमानंदैकरूपसुखास्वादरहितत्वेन पंचेद्रियविषयासक्तानामिति भावार्थः ॥ ३४५ ॥ इति पर जाणंतुवि परममुणि परसंसग्गु चयंति' इत्यायेकाशीतिसूत्रपर्यंत सामान्यभेद- भावना, तदनंतरं 'परमसमाहि महासरहि' इत्यादि चतुर्विंशतिसूत्रपर्यंत महास्थलं, तदनंतर वृत्तद्वयं चेति सर्वसमुदायेन सप्ताधिकसूत्रशतेन द्वितीयमहाधिकारे चूलिकागतेति ।। एवमत्र परमात्मप्रकाशाभिधानग्रंथे' प्रथमतस्तावत् 'जे जाया झाणग्गियए, इत्यादि त्रयो- विंशत्यधिकसूत्रशतेन प्रक्षेपकत्रयसहितेन प्रथममहाधिकारो गतः । तदनंतरं चतुर्दशाधिक- शतद्वयेन प्रक्षेपकपंचकसहितेन द्वितीयोपि महाधिकारो गतः । एवं पंचाधिकचत्वारिंशत्स- आगे ग्रंथके अंतमंगलकेलिये आशीर्वादरूप नमस्कार करते है,-[दिव्यकायः] जिसका ज्ञान आनंदरूप शरीर है अथवा [परमपदगतानां भासकः] अरहंतपदको प्राप्त हुए जीवोंका प्रकाशमान परमौदारिक शरीर है ऐसा परमात्म तत्त्व [जयतु] सर्वोत्कर्षपनेसे वृद्धिको प्राप्त होवे । जो परमौदारिक शरीर ऐसा है कि जिसका तेज हजारों सूर्योसे अधिक है अर्थात् सकल प्रकाशी है । जो परमपदको प्राप्त हुए केवली हैं उनको तो साक्षात् दिव्यकाय पुरुषाकार भासता है [ मुनिवराणां] और जो महामुनि हैं उनके [ मनसि] मनमें [ दिव्ययोगः] द्वितीयशुक्लध्यानरूप वीतराग निर्विकल्पसमाधिरूप भास रहा है । [मोक्षदः ] और मोक्षका देनेवाला है । [ केवलः कोपि बोधः] जिसका केवल ज्ञान खभाव है ऐसी अपूर्व ज्ञानज्योति [शिवखरूपः] सदा कल्याणरूप है। [लोके] लोकमें [ विषयसुखरतानां ] शिवखरूप अनंत परमात्माकी भावनासे उत्पन्न जो परमानंद अतीद्रियसुख उससे विपरीत जो पांच इंद्रियोंके विषय उनमें जो आसक्त हैं उनको [यः हि] जो परमात्मतत्त्व [ दुर्लभः] महा दुर्लभ है । भावार्थ- इस लोकमें विषयी जीव जिसको नही पासकते ऐसा वह परमात्मतत्त्व जयवंत होवे ॥ ३४५॥ - ३५२ रायचंद्रजैनशास्त्रमालायाम् । हितशतत्रयप्रमित श्रीयोगींद्रदेवविरचित दोहकसूत्राणां विवरणभूता परमात्मप्रकाशवृत्तिः समाप्ता ॥ इसप्रकार इस परमात्मप्रकाशनामा ग्रंथमें पहले 'जे जाया झाणग्गीए' इत्यादि एकसौ तेवीस दोहा तीन प्रक्षेपकों सहित ऐसे १२६ दोहाओंमें पहला अधिकार समाप्त हुआ। एकसौ चौदह दोहा तथा ५ प्रक्षेपक सहित दूसरा महाधिकार कहा । और 'परु जाण- तुवि' इत्यादि एकसौ सात दोहाओंमें तीसरा महाधिकार कहा । प्रक्षेपक और अंतके दो छंद उन सहित तीनसौ पैतालीस ३४५ दोहाओंमें परमात्मप्रकाशका व्याख्यान ब्रह्मदेवकृत टीका सहित समाप्त हुआ। १ सस्कृत टीकामें दूसरे अधिकारकी चूलिका कही गई है। - .

टीकाकारस्यांतिमकथनं। अत्र ग्रंथे प्रचुरेण पदानां संधिर्न कृतः, वाक्यानि च भिन्नभिन्नानि कृतानि सुखबोधार्थ । किं च परिभापासूत्रं पदयोः संधिर्विवक्षितो न समासांतरं तयोस्तेन कारणेन लिंगवचन- क्रियाकारकसंधिसमासविशेषणवाक्यसमात्यादिकं दूषणमत्र न ग्राह्यं विद्वद्भिरिति । इदं परमात्मप्रकाशवृत्तेाख्यानं ज्ञात्वा कि कर्तव्यं भव्यजनैः। सहजशुद्धज्ञानानंदैक- खभावोऽहं, निर्विकल्पोऽहं उदासीनोऽहं, निजनिरंजनशुद्धात्मसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरू- पनिश्चयरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिसंजातवीतरागसहजानंदरूपसुखानुभूतिमात्रलक्षणेन स्वसंवेदनज्ञानेन स्वसंवेद्यो गम्यः प्राप्यो भरितावस्थोऽहं, रागद्वेषमोहक्रोधमानमायालोभ- टीकाकारका अंतिमकथन । इस ग्रंथमें बहुधा पदोंकी संधि नही की और वचन भी जुदे २ सुखसे समझनेके- लिये रक्खे गये हैं, समझनेकेलिये कठिन संस्कृत नही रक्खी इसलिये यहाँ लिंग वचन क्रिया कारक सधि समास विशेष्य विशेषणके दोष न लेना । जो पंडितजन विशेषज्ञ हैं ऐसा समझें कि यह ग्रंथ बालबुद्धियोंके समझानेकेलिये सुगम किया है । इस परमा- त्मप्रकाशकी टीकाका व्याख्यान जानकर भव्यजीवोंको ऐसा विचार करना चाहिये कि मैं सहज शुद्ध ज्ञानानंद स्वभाव निर्विकल्प हूं, उदासीन हूं, निजानंद निरंजन शुद्धात्म सम्य- ग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्ररूप निश्चयरत्नत्रयमई निर्विकल्पसमाधिसे उत्पन्न वीतरागसहजानंदरूप आनंदानुभूतिमात्र जो स्वसवेदनज्ञान उससे गम्य हूं, अन्य उपायोंसे गम्य नही हूं । निर्विकल्प निजानंद ज्ञानकर ही मेरी प्राप्ति है पूर्ण हूं। राग द्वेष मोह क्रोध मान माया लोभ पांच इंद्रियोंके विषय व्यापार मन वचन काय द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्म ख्याति पूजा लाभ देखे सुने और अनुभवे भोगोंकी वाचारूप निदानबंध, माया मिथ्या ये तीन शल्य इत्यादि विभाव परिणामोंसे रहित सब प्रपंचोंसे रहित मै हूं । तीन लोक तीनकालमें मन वचन कायकर कृत कारित अनुमोदनाकर शुद्ध निश्चयनयसे मै आत्माराम ऐसा हूं। तथा सभी जीव ऐसे है । ऐसी हमेशा भावना करनी चाहिये । अव टीकाकारके अंतके श्लोकका अर्थ कहते हैं:-युधिष्ठिरराजाको आदि लेकर पाच भाई पाडव और श्री रामचंद्र तथा अन्य भी विवेकी राजा हैं उनसे अत्यंत भक्तिकर यह जिनशासन पूजनीक है जिसको सुर नाग भी पूजते हैं ऐसा श्री जिन भाषित शासन ४५

२
पंचेंद्रियविषयव्यापारमनोवचनकायव्यापारभावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्मख्यातिपूजालाभदृष्टश्रुता-
नुभूतभोगाकांक्षारूपनिदानमायामिथ्याशल्यत्रयादिसर्वविभावपरिणामरहितशून्योऽहं, जगत्रये
कालत्रयेपि मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च शुद्धनिश्चयनयेन । तथा सर्वेपि जीवाः,
इति निरंतरं भावना कर्तव्येति ॥ ग्रंथसंख्या ४०००।
पंडवरामहिं णरवरहिं, पुजिउ भत्तिभरण ।
सिरिसासणु जिणभासियउ, गंदउ सुक्खसएहिं ॥ १ ॥
इति श्रीब्रह्मदेवविरचिता
परमात्मप्रकाशवृत्तिः समाता।
-
सुखोंके सैकड़ाओंकर वृद्धिको प्राप्त होवे ॥ यह परमात्मप्रकाश ग्रंथका व्याख्यान प्रभाकर
भट्टके संबोधनेकेलिये श्रीयोगींद्रदेवने किया उसपर श्री ब्रह्मदेवने संस्कृतटीका की । श्री
योगींद्रदेवने प्रभाकरभट्टके समझानेकेलिये तीनसौ तेतालीस दोहा किये उसपर श्री ब्रह्म
देवने संस्कृतटीका पांच हजार चार प्रमाण की । उसपर दौलतरामने भापावचनिकाके
श्लोक अडसठिसौ नव्वै संख्याप्रमाण किये।
इसप्रकार श्री योगींद्राचार्य विरचित परमात्मप्रकाशकी
पं० दौलतराम कृत भाषाटीका समाप्त हुई.
.
21
+
समाप्त.
NSAR
१ पाडवरामैः नरवरैः पूजितः भक्तिभरेण । श्रीशासनं जिनभाषितं नंदतु सुखशतैः ॥ १॥

अथ परमात्मप्रकाशस्य विषयानुक्रमणिका । विषय पृ.सं. दो.सं. विषय पृ.सं. दो.सं. मंगलाचरण १११ निश्चय सम्यग्दृष्टिका खरूप ८२/७७ त्रिविधात्माधिकार ॥१॥ मिथ्यादृष्टिके लक्षण ८३१७८ श्रीयोगींद्रगुरुसे प्रभाकरभट्टका सम्यग्दृष्टिकी भावना ८९.८६ प्रश्न १६८ भेदविज्ञानकी मुख्यतासे आत्माका श्रीगुरुका तीन प्रकार आत्माके कथन ९६१९४ कथनका उपदेशरूप उत्तर १९।११ मोक्षाधिकार ॥२॥ बहिरात्माका लक्षण २२।१३ मोक्षके वारेमें प्रश्न १२८।१२७ अंतरात्माका स्वरूप २३११४ मोक्षके विषयमें उत्तर १२८।१२८ परमात्माका लक्षण २४११५ मोक्षका फल १३९।१३७ परमात्माके खरूप जाननेकी मोक्षमार्गका व्याख्यान १३९/१३८ रीति. २६/१७ अभेदरननयका व्याख्यान १६७१५७ शक्तिरूपसे सब जीवोंके शरीरमें परम उपशमभावकी मुख्यता १७८।१६५ परमात्मा विराजमान है ३३।२६ निश्चयसे पुण्यपापको एकपना १९४११८० जीव और अजीवमें लक्षण- शुद्धोपयोगकी मुख्यता २०९/१९४ भेदसे भेद है ३६।३० (चूलिकाव्याख्यान) शुद्धात्माका मुख्य लक्षण ३७/३१ परद्रव्यके संबंधका त्याग २५२।२३५ शुद्धात्माके ध्यानसे ससार- त्यागका दृष्टात २५४।२३७ भ्रमणका रुकना.... ३८.३२ मोहका त्याग २५५/२३८ जीवको अपने २ देहके प्रमाण इंद्रियोंमें लंपटी जीवोंका मानने में अपने मत और विनाश २५८।२४२ ५४१५१ लोभकषायमें दोष २६०२४३ द्रव्य गुण पर्यायकी मुख्यतासे सेहका त्याग २६१।२४४ आत्माका कथन ५९/५६ जीवहिसाका दोष २६८१२५५ द्रव्यगुणपर्यायका खरूप ६११५७ जीवरक्षासे लाभ २७१२२५७ जीवकर्मके सबंधका विचार ६४१५९ अध्रुवभावना २७३।२५९ जीवको शिक्षा २७८।२६३ आत्माका परवस्तुसे भिन्नपनेका पंचेद्रियको जीतना २८१३२६६ ७४।६८ कथन परमतका विचार २ विषय पृ.सं. दो.सं. इंद्रियसुखको अनित्यपना २८३।२६९ मनको जीतनेसे इंद्रियोंका जीतना २८५/२७१ सम्यत्तवकी दुर्लभता २८८२७४ गृहवास व ममत्वमें दोष २९०२७५ देहसे ममत्वत्याग २९१२७६ देहकी मलिनताका कथन २९३।२७९ आत्माधीन सुखमें प्रीति २९८४२८५ चित्त स्थिर करनेसे आत्मस्व- रूपकी प्राप्ति ३००।२८७ निर्विकल्प समाधिका कथन ३०४।२९२ दानपूजादि श्रावकधर्मपरंपरा मोक्षका कारण है ३१२।२९९ विषय पृ.सं. दो.सं. चितारहित ध्यानमुक्तिका कारण३१३१३०० यह आत्माही परमात्मा है ३१८१३०५ देह और आत्माकी भेदभावना ३२०३३०८ सवचिंताओंका निषेध ३२७,३१८ परमसमाधिका व्याख्यान ३२९/३२० अर्हतपदका कथन ३३४।३२६ परमात्मप्रकाश शब्दका अर्थ ३३७/३२९ सिद्धखरूपका कथन ३३९/३३२ परमात्मप्रकाशका फल ३४२।३३५ परमात्मप्रकाशके योग्य पुरुष ३४४।३३८ परमात्मप्रकाशशास्त्रका फल ३४९।३४४ अंतिम मंगल ३५०/३४५ .... 1

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Parmatmatmprakash

Author
Shastri, Manoharlal
Title
Parmatmatmprakash
File name
Parmatmatmprakash
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2009/11
Publisher
Bombay, Nirnayasagar Press
Language
Sanskrit
Pages
364
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
344243
Barcode
99999990234119.00
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Banasthali University
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