Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Shastrarth Firojabaad

2010/10

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-- - ।। श्रोम् ॥ . भूमिका ॥ T उस परब्रह्म परमात्मा को अनेकशः धन्यवाद देना चाहिये जिसकी प्रेरणा और परमकृपा से सब मनुष्य अपने २ कर्त्तव्यधर्मों में प्रवृत्त होते हैं, उस परमात्मा ने अपनी परमदयालुता से सव प्राणियों के हितार्थ उस सर्वोत्तम विद्या का उपदेश किया कि जिससे संसार और पस्मार्थ का सुख सिद्ध हो । और परमेश्वर वही हो सकता है जिसके ऊपर कोई न हो और उसकी आज्ञा भी सब के लिये एकसी होनी चाहिये यदि किसी समुदाय को अन्य उपदेश दे तथा किसी को भिन्न आज्ञा देवे तो समझिये कि उन दो समुदायों में विरोध करानेवाला ईश्वर ही हो जावे फिर ऐसे को ईश्वर मानना सिद्ध न हो सकेगा इसलिये ईश्वर वही है जो सव के लिये एक हो और उसका उपदेश वा आज्ञा भी सव के लिये.एकसी होवे । प्रयोजन यह, है कि संसार में परस्पर विरुद्ध अनेक मत जो प्रवृत्त हैं उन सब का मूल ईश्वर नहीं है, किन्तु मनुष्य लोगों की ओर से है। इन मतो में जो २ वातें सब की एकसी मिलती हैं वे सब ईश्वरीय विद्या वेद से वहां २ गई हैं। जैसे-ईश्वर को प्रायः मानते हैं और बहुधा ईश्वर के गुण कर्म स्वभावो को भी एक प्रकार से मानते हैं वे सब ठीक हैं और जो २ ईश्वर विषय मे भी परस्पर विरुद्ध गुणादि मानते हैं वे सब बीच के चनाचटी हैं। जो लोग नास्तिक समझे जाते हैं वे भी किसी सिद्ध पुरुष को सर्व- ज्ञादिगुणविशिष्ट अपना इष्टदेव मानते हैं पर उसको अनादि सनातनसिद्ध सर्वशक्ति- मान् सृष्टिकर्ता नहीं मानते । इस मन्तव्य में यह विरोध आता है कि जो अनादि न होगा और बीच में सिद्ध हो जायगा तो वह अपने उत्पन्न होने से पहिले का हाल. नहीं जान सकता क्योंकि पिता के जन्म का दर्शन पुत्र को होना कदापि सम्भव नहीं है । जब ऐसा है तो उसको सर्वज्ञ मानना कदापि ठीक नहीं है। इस अनेक प्र- 'फार के मतान्तर का फैलना मनुष्यो की अविद्या से होता है पर इस सृष्टि में जो २ सर्वज्ञहितकारी विद्वान होते हैं वे प्रायः यही यत्न करते हैं कि ईश्वरीय व्यवस्थानुसार सब का मन्तव्य ठीक २ हो जावे परस्पर का वैरविरोध मिटकर शुद्ध वैदिकधर्म की सर्वत्र प्रवृत्ति होवे । इसी के अनुसार श्रीमत् दयानन्दसरस्वतीजी महाराज ने भी प्रयत्न 4 . ܝܐ ܫ ..

। ( २ ) - - किया कि सब मतों का वैर विरोध मिटा के एक वैदिकमत को सब माने, पर मात- वादी लोग ऐसे पक्षपात में प्रस्त- हो रहे है कि आर्य लोग आंख से देखते हैं तो हम नाक से देखने लगे जब से श्रीमदुक्त स्वामीजी ने वैदिक आर्यधर्म को उत्तमता का उपदेश किया है तब से अनेक मतवादियों ने (अपनी बनावटी लीला को कटते देखकर.) जहां तहां शास्त्रार्थ करने का प्रारम्भ किया परन्तु वे लोग शास्त्रार्थ करने में यदि कि- चारपूर्वक पक्षपात छोड़ के केवल सत्यासत्य के निर्णय के लिये प्रवृत्त हों तब तो अवश्य अच्छा फल होवे, परन्तु उन लोगों की दृष्टि यह रहती है कि हमारे पक्ष की मूर्खमण्डली (जिससे हमारा सब धनादि का काम निकलता है, गडबडा कर हमारे फन्दे से न निकल जावे इसलिये शास्त्रार्थ का हल्ला करके अपना विजय सब को प्रकट कर देवेंगे । आजकल अनेक स्थलों में शास्त्रार्थ होते हैं पर उनसे ऐसा कोई पूर्णलाभत्तहीं होता कि जो अनेक सत्पुरुषों को सत्यासत्य मालूम होजावे तथाप्ति बुद्धिमान लोग उस विवाद में यथोचित बलाबल समझ ही लेते हैं इससे वैदिकधर्स की उन्नति शनैः २ होती ही जाती है। जिला आगरा में एक फ़ीरोजाबाद नामक कस्वा है वहां जैनियों का तीर्थ है प्रतिवर्ष चैत्र में मेला होता है, यह प्रसिद्ध है कि जिन नगरों में जैनी आदि की पो- पलीला के मुख्यस्थान हैं वहां आर्यसमाज की उन्नति वा स्थिति होना कठिन होता है इसी के अनुसार नगर फीरोजाबाद में भी आर्यसमाज का प्रारम्भ होना जैनियों को महाअनिष्टकारी हुआ, उन्होंने समाज तोड़ने के कई एक उपाय किये दो एक वार समाज में अपना आदमी भेजा कि हम मतविषय में शास्त्रार्थ करना चाहते हैं, समाज से पत्रद्वारा उत्तर दिया गया कि हम भी शास्त्रार्थ करने को क्रटिवद्ध हैं इस प्रकार की बाते आर्यसमाज फ़ीरोज़ावाद और उस नगर के जैनियो में हो ही रही थी कि इतने में सनातन आर्यधर्मोपदेशक श्रीस्वामि भास्करानन्दसरस्वतीजी सं०१९४४ फाल्गुन मास में इस फ़ीरोजाबाद नगर में पधारे और सनातनधर्म की वृद्धि पर व्याख्यान दिया । इस पर इसी उक्त नगर के रईस जैनधर्मावलम्बी सेठ फूलचन्द- जी ने कहा कि मतविषय पर वार्ता होनी चाहिये जिसका मत ठीक और सनातर निकले द्वितीय पक्षवाला उसी का ग्रहण करे (स्वा० भा. जी के साथ ) फूलचन्द वे और उक्त स्वामीजी ने परस्पर प्रतिज्ञा की कि जिसका पक्ष गिर जावे वह द्वितीय पक्ष को स्वीकार करे । तव स्वा० भा० जी ने कहा कि तुम्हारी ओर से जो कोई शास्त्रार्थ करनेवाला हो उसको बुलाओ इस पर सेठ फूलचन्दजी ने पं० पन्नालाल + +--- -- . +- (1) जैनधर्मी को बुलाया वे किसी विशेष कारण से न आये तब यह बात निश्चित हुई कि प्रथम चैत्रसुदि ३.से ८ तक. मतविषय पर आर्य और जैनियों को शास्त्रार्थ हो। इस बात का लेख भी समाचारपत्रों में छप गया था और यह बात सम्पूर्ण हिन्दुस्तान में प्रकट होगई दोनों पक्षवालों ने अपने २ पक्षं के पण्डितों को बुलाना प्रारम्भ किया। आय्यों की ओर से शास्त्रार्थ करनेवाले पण्डित चैत्रसुदि द्वितीया तक आगए, परन्तु जैनपक्ष के पण्डित द्वितीया को नहीं आये, आयर्यों की ओर से द्वितीया के दिन जब पण्डित लोग आगये तब सर्वसम्मति के अनुसार पं० गंगाधरजी उपदेशक आर्य- समाज जसर्वन्तनगर ने सेठ फूलचन्दर्जी से जाकर कहा कि शास्त्रार्थ कल तृतीया से प्रारम्भ होना चाहिये जैसा कि सर्वत्र प्रसिद्ध हो चुका है इसलिये (पहिले से) आज ही शास्त्रार्थ के नियम और विषय नियत हो जाने चाहिये जिससे. शास्त्रार्थ होते समय कालत्यय न हो, इस पर उक्त सेठजी ने उत्तर दिया कि हमारे पण्डितं लोग तृतीया को आजावेगे उसी समय सब नियमादि हो जावेगें। जब जैन पण्डित द्वितीया की रात को आगये तो उसी समय में समाज के मन्त्री और उक्त पं० गंगाधरजी ने फिर जाकर सेठजी से कहा कि शास्त्रार्थ के नियम बँधजाने चाहिये ती. प्रबन्धकर्ता और सभापति भी नियत होजाने चाहिये जिससे शास्त्रार्थ के समय में किसी प्रकार की गड़बड़ न हो तब उन्होंने यह कहा कि ये सब बातें सभी में इक? हो- कर कर लेनेगे। इस पर बहुत कहने सुनने से दोनों पक्ष की और से दो २ प्रबन्ध- की नियत किये गये आर्यों की ओर से सभापति आर्यसमाज फ़ीरोजाबाद श्रीमान् चतुर्वेदी कमलापतिजी और पं० गङ्गाधरजी और जैनियों की ओर से लाला' मजू- लाल साहब तथा लाला प्यारेलाल नियत हुए फिर एक पंचम पुरुष सभापति के लिये कहा गया वह पुरुष सरकारी ओहदेदार वकील आदि हो वा शहर का कोई प्रतिष्ठित रईस हो वा कोई जमीदार हो चाहें किसी मज़हब का क्यों न हो उसको दोनों पक्षवाले निष्पक्षपाती धर्मात्मा समझ के स्वीकार करें। वह संभा पति शास्त्रार्थ के नियम और विषयों पर दोनों पक्ष के शास्त्रार्थकर्ताओं के हस्ता- क्षर करा अपने पास रक्खे जो कोई नियम का विषय से चलायमान हो उसको य- थोचित रोके । इस पर सेठ फूलचन्दजी ने कहा कि सभापति और नियमादि सब प्रात:काल नियत कर लिये जावेगे और शास्त्रार्थ का समय भी उसी समय नियत कर दिया जायगा ।मन्त्री और पं० गङ्गाधरजी सब को धन्यवाद देकर अपने स्थान को भले भाये और आये हुए आर्य पंडितजनों से निवेदन किया कि उन्होंने प्रातःकाल शो- साहब सरपंच - . - (.४ ) 1 . , - पक्ष के स्त्रार्थ के नियम पंच और विषय स्थिर करने के लिये कहाँ है सव की सम्मति हुई कि प्रात:काल ही सही । तब, प्रात:काल सेठजी साहब ने रात्रि की बातों पर कुछ ध्यान और प्रवन्ध न किया । अर्थात् ऐसा भुलादिया कि जानो स्वप्न हुआ था, प्रातःकाल और का और ही ठाठ रचमारा कि एक पत्र संस्कृत का ( जिसमें किसी के हस्ताक्षर भी नहीं थे ) लिख भेजा, इस पर मंत्री ने एक पत्र उर्दू जवान में लिखा कि श्राप कृपाकर यह लिख भेजिये कि यह पत्र आपका ही है ? । इस पर सेठजी...साहब के अनुयायी पण्डित आदि बहुत लाल ताते हुए और कहा कि हमको म्लेच्छभाषा क्यों लिख भेजी, इस पर मन्त्री और पं० गङ्गाधरजी त्रिपाठी पुन. सेठजी के पास गये और कहा कि आपने पंचम प्रवन्धका पुरुष और नियमों का कुछ प्रय- न्ध अभी तक न किया तब उन्होंने उस पत्र पर पं० छेदालाल के हस्ताक्षर करा दिये और उत्तर दिया कि नियम और पंचम मनुष्य का सब निश्चय पत्रों से हो, जायगा आप पत्र का उत्तर दीजिये, मन्त्री ने फिर भी निवेदन किया कि ऐसी वातों के निश्चयार्थ पत्रो की लिखा पढ़ी करने की आवश्यकता नहीं किन्तु दोनों भद्रपुरुष मिलकर मकान, नियम और जिन विषयों पर शास्त्रार्थ हो निश्चय कर लेवे उन्होंने मेरे कथन को सुना न सुना कर यही जवाब दिया कि आप पत्र का उत्तर दीजिये, मन्त्री ने कहा वहुत अच्छा परन्तु यह काम इस रीति से कदापि अच्छा न होगा, मन्त्री ने अपनी पण्डितमण्डली को वह उक्त संस्कृत का पत्र हस्ताक्षर कराया हुआ उत्तर देने को दिया, इस पत्र के उत्तर की शीघ्रता करने में उनका अभिप्राय यह था कि हमने जो अपनी ओर से दाम देकर पण्डितों को भाड़े का टटू बनाया है आर्य लोग इस संस्कृत के पत्र का उत्तर नहीं दे सकते हैं, इसलिये - मिलकर प्रबन्ध करना चाहते है और जैनियों का मुख्य भीतरी प्राशय यह था कि इस प्रकार पत्र भेजने करने में ही कुछ समय व्यतीत हो जवतक कोई और कारण खड़ा हो जायगा तो शास्त्रार्थ होना वचा रहे और आर्यों का अभिप्राय था कि साधारण बातों के लिये पत्रव्यवहार से कालक्षेप न हो और मुख्य शास्त्रार्थ का प्रारम्भ शीघ्र होवे। वह जैनियों का प्रथम संस्कृत पत्र यह है.- यथा-( श्रीः) श्रीमदाय॑समाजसभ्यैः फिरोजावादनगरस्थजैनर्गिकृतनत्युत्तरमदोऽवग- न्तव्यम् । । - .

4 - । - शराब्ध्यकेद्वब्दीयप्रथमचैत्रशुक्लपक्षगुर्वन्विततृतीयायां शास्त्रार्थो भविष्यती- ति तत्र २ भवद्भिरणित मुद्रितं च अतस्स पाङ्क्तघण्टाध्वननतः पाथोऽधिघण्टाध्व- ननावध्यद्यैव कर्त्तव्यः परन्तु शास्त्रार्थपदशक्यस्य शास्त्रीयवाक्यतात्पर्यावबो- धनिर्णायकतया शास्त्राणां सस्कृतरूपत्वेन च परस्परसंस्कृतालापपूर्वक एव शास्त्रार्थः कर्त्तव्य इत्यस्मदीयेप्सा, शास्त्रार्थानन्तरं शास्त्रार्थविषयः संस्कृत भाषायां च जगदित्यनेयः । शास्त्रार्थापक्षितजयाजयनिर्णेतृमध्यस्थाविवेचनं समक्षतः परस्पराभिलाषातोवानुष्ठेयः, एतावतैवालमल्पाड्कनतोऽप्यभिप्रायावगन्तज्ञेषु । संवत् १९४५ प्रथम चैतशुक्ल भवत्स्नेहिनः फीरोजाबाद- ३ गुरुवारे स्था जैनधर्मावलम्बिनः नियतसमयात्पूर्व पत्रोत्तरा- भिलाषिर्णश्च-हः छेदालालजैन । भाषार्थ-श्रीमान् आर्यसमाज के सभ्यों को फीरोजाबाद नंगरस्थजैनधर्मवालों ने किये नमस्कार के पश्चात् यह जानना चाहिये कि सं० १९४५ के प्रथमचैत्र शुक्लपक्ष तृतीया बृहस्पतिवार को शास्त्रार्थ होगा इस प्रकार उन २ शहर आदि मे आप लोगों ने और छपाया है इससे बह शास्त्रार्थ १० बजे से ४ बजे तक आज ही कर लेना चाहिये,परन्तु शास्त्रार्थपद का जो अभिप्राय है वह शास्त्रसम्बन्धी वाक्यों से निकले तात्पर्य्य के बोध का निश्चय करानेवाला होने और शास्त्रों के संस्कृतरूप होने से आपस में संस्कृतभापण पूर्वक शास्त्रार्थ करना चाहिये यह हमारी इच्छा है, शास्त्रार्थ के पश्चात् उसका विषय संस्कृत में और भाषा मे अनुवाद कराके जगत् को विदित. करना चाहिये, जय पराजय का निश्चय करनेवाला एक मध्यस्थ विद्वान् शास्त्रार्थ में अपेक्षित है उसका विवेचन सामने मिलकर वा परस्पर की इच्छा से होना चाहिये। इस थोड़े ही लेख से भी अभिप्राय जानने वालों में उत्तम ज्ञाताओं में समाप्ति है। समीक्षा-सव महाशयों को ध्यान रखना चाहिये कि पूर्वोक्त जैन धर्मियो का संस्कृतपत्र कैसा है, इसमें शब्द, अर्थ और सम्बन्ध की कहां २ अशुद्धि हैं सो यह पत्र हमारे भ्रातृवर्गस्थ पं० जियाला तथा पं० मिहिरचन्द्रजी की सहायता से लिखा हुआ है क्योंकि इसका पूर्ण अनुमान, इससे हुआ कि जैनों के पं० छेदालालादि ने जो पत्र सभा में सबके समक्ष लिखे ( जिनमे मिहरचन्द्रादि की सहायता नहीं ले सके ) हैं उनमें इससे बहुत अधिक अशुद्धियां है । अर्थरूप अशुद्धियां तो, कहा - , । - -- - 1 1 उनके भाषार्थ से ज्ञात हो जावेगी ( शराब्ध्यके द्वन्दीय ), यहां (केन्द्र) ऐसा चाहिये अस्तु, छोटी २ बातों पर ध्यान न देकर बड़ी अशुद्धि देखिये ( मध्यस्थ विवेचनं ० ० वा नुप्ठेयः ) विवेचनं नपुंसक लिङ्ग का विशेषण अनुष्ठेयः पुंलिङ्ग के साथ किया है संस्कृतज्ञ लोगों के सामने यह अशुद्धि छोर्य नहीं है इससे यह अनुमान होता है यदि धनादि के लोभवश होकर नास्तिक पक्ष की सहायता न करते. तो पं० जियालालादि से ऐसी अशुद्धि होनी सम्भव न थी, ईश्वरविमुखों को सहायता देने से इन पर अन्तर्यामी ईश्वर की अप्रसन्नता हुई जिससे उनकी बुद्धि स्वस्थ न रहीं । आस्तिक जन अपने सब काम ईश्वर की सहायता से करते हैं । इस उक्त संस्कृत पत्र के उत्तर में आर्यसमाज का संस्कृत पत्र ही द्वारा उत्तर:--- ओ३म श्रीमज्जैनधर्मावलम्बिषु भवतां पत्रं समागतं रात्री यन्निीतं तस्मिन् विषये किमपि न लिखितं, शास्त्रार्थप्रवन्धकर्तारः पञ्चसज्जनाः पूर्व नियोजनीयाः पश्चात्स्थानं निणेत- व्यं यत्र शास्त्रार्थः स्यादिति । ततो यैनियमैः शास्त्रार्थः स्यात्तऽपि निश्चेतव्याः। यत्र २ विषये शास्त्रार्थन भवितव्यं सोऽफि लेख्य एव । संवत् १९४५ चैत्रशु० ३. हस्ताक्षराणि गंगारामवर्मणः फीरोजाबादस्थार्यसमाजामात्यस्य भाषार्थ-श्रीमान् जैनधर्मावलम्बि योग्य-पत्र आपका आया रात को जो निश्चय हुआ था- उस विषय में आपने कुछ नहीं लिखा । पहिले. शास्त्रार्थ के प्रबन्धकर्ता पांचं सज्जन पुरुप नियुक्त करने चाहिये, इसके पश्चात् जहां शास्त्रार्थ हो उस स्थान का निश्चय करना चाहिये, इसके अनन्तर जिन नियमों के अनुकूल शास्त्रार्थ हो उनका निश्चय करना योग्य है, जिस २ विषय में शास्त्रार्थ हो वह भी लिखना चाहिये। इस-पत्र के जाने पर जैनियों का द्वितीय पत्र जो संस्कृत मे आया वह यह है:- श्रीमदार्यमतानुयायिनः भवदीरितं पत्रमुपलब्धम् शास्त्रार्थसमयः संस्कृतएव भविष्यतीति नियमः । मध्यस्थभवनप्रकारश्च पू- र्वपत्रएच लिखितः मञ्जूलालप्यारेलालौप्रबन्धक जैनपाठशालास्थान चह- स्ताक्षराणिकारयितुमागतेभ्यो गंगारामवर्मभ्योऽवरिप विषयनिर्णयश्च शास्त्रार्य- - .

(७) an । , काले भविष्यति यतो वयं यूयञ्च न दूरस्थाः परन्तु समयनियममध्यस्थानां- लिखितानामप्युत्तरं भवद्भिर्नालेखि । शास्त्रार्थलिखितसमयमत्तीत्यपत्रोचरमदाने किं कारणम् । संवत् १९४५ १२ बजे दिन के ६. छेदालालजैनधर्मिणः म. चै० शु० ३१० भाषार्थ श्रीमान् आर्यमत के अनुयायियो ! आपका भेजा पत्र मिला शा- स्त्रार्थ का समय वही होगा जो हम पूर्व संस्कृत में लिख चुके हैं और मध्यस्थ होने. का प्रकार भी पूर्व पत्र में लिख चुके हैं। हमारी ओर से मंजूलाल प्यारेलाल प्रब- धकर्ता होंगे। शास्त्रार्थ का स्थान जैनपाठशाला होना चाहिये सो हस्ताक्षर कराने को आये गङ्गाराम वर्मा से कह दिया था । विषय का निर्णय शास्त्रार्थ होने के समय हो जायगा क्योंकि हम और तुम दोनो दूर नहीं हैं, परन्तु समय, नियम और मध्यस्थ विषयक उत्तर आपने नहीं लिखा । शास्त्रार्थ का समय जो १० वजे का लिखा था उसके पश्चात् उत्तर देने में क्या कारण है ? ।। इस पर आर्यसमाज की ओर से उत्तर ( संस्कृत ही में) ओ३म् मावन्मारजिकक्षान्तसदसदुदन्तालब्धगरिष्ठवरिष्ठाः तत्र भवतां पत्रमातुङ्गितम् । श्रुतार्थानेहाः पूर्वभाविनियमेतरेतरोरीकृतानन्त- रं वादिपतिवादिभ्यां समसातजनने चोरी कर्तव्या जयाजयनिणेता कश्चिदपि भवितकुं नाईतीक कस्यचित्सार्वभौमसर्वपरीक्षकाधिगतयाथातथ्यार्थस्य पक्षद्व- यवकिवेचनसामर्थ्याधिष्ठितत्वाभावात् । वादिपतिवादिनोर्लेखनद्वारास्पष्टीकृतो विषयएव जयाजयसूचको भविष्यतीति मन्यध्वम् । यच्चोक्तं शास्त्रार्थकालएव विषयो निर्णय इति तन्न कुतः सति कुड्ये चित्रं भवतीतिवत् पूर्वमेव विषयो नि- ऐतव्यः । यच्चोल्लिखित, शास्त्रार्थसमयमतीत्योत्तरमदाने कि कारणामिति तत्त्व स्माभिरङ्गीकृतमन्तरेणात्ययनं वक्तुमशक्यम् ॥ म चै० शु० ३ सं० ४५ ह० गङ्गारामस्य भाषार्थ-श्रीमान् सहनशील सत्यासत्य को प्राप्त होनेवाले महाजनों में श्रेष्ठ जैनधर्मावलम्बियो ! आप का पत्र आया, शास्त्रार्थ का समय पूर्व होने वाले नियम परस्पर स्वीकृत 5 1 न १४) होजाने के पश्चात् दोनो पक्षवालो को सम्मति से स्वीकार करना चाहिये, जय पैरा- जय का निश्चयकर्त्ता कोई निर्जे मनुष्य नहीं हो सकता । कोई सब पृथिवी पर सवापरि शास्त्री सत्यवक्ता पक्षपातरहित यथार्थभाव का ज्ञाता दोनो पक्ष का विवे- चन करने में समर्थ अधिष्ठाता हो वह मध्यस्थ होसके सो सर्वगुणाकर पुरुष को मिलना प्राय: असम्भव होने से मध्यस्थ होना आधुनिक समय पर दुर्लभ है इस- लिये वादिप्रतिवादि के लेखद्वारा स्पष्ट किया हुआ विषय ही जय पराजय का सू- चक हो जायगा अर्थात उस लेख से अपनी २ वुद्धि के अनुसार दोनों पक्ष में बला- वल समझ लेंगे । और जो आपने कहा कि शास्त्रार्थ होते समय विपय का निश्चय करलेगे सो मेरी अल्प बुद्धि से ठीक नहीं क्योंकि जब तक भित्ति (दीवार) न बन जावे उस पर चित्र विचित्र चिन्ह धरना बन नहीं सकता इसी प्रकार पहिले विषय का निश्चय कर लिया जाय तव उस पर शास्त्रार्थ का आरम्भ हो सक्ता है। और जो लिखा कि शास्त्रार्थ का समय होजाने बाद उत्तर देने में क्या कारण है सो जव केवल अपने पक्ष की सम्मति से तुम लोगो ने नियत किया और हम लोगों की उस पर कुछ सम्मति न हुई तो ( इकतर्फी डिगरी हुई ) हमारा पत्रोत्तर देना काल व्यतीतकर हुआ यह तुम्हारा कहना ठीक नहीं है । इस पर जैनियों का जो तृतीय पत्र आया वह यह है कि:- श्रीमदार्यमतानुसारिणः द्वितीयपत्रघण्टात्रयकालात्ययउपलब्धम् भवद्भिर्जयाजयनिर्णेतृमध्यस्थासम्भवोऽभाणि, लेखद्वारा जयाजयस्पष्टता- ऽगीकृता शास्त्रार्थसमयात्पूर्वम्विषयनिर्णयश्चापेक्ष्यते शास्त्रार्थस्थानसमयसंस्कृत- भाषाशास्त्रार्थविषयेकिञ्चिदपि नाऽभांपि, यदि विषयनिर्णयोत्तरमेव शास्त्रार्थ- चिकीप तईि समाचारपत्रेषु विषयनिर्णयमन्तरा मुद्रापणकिंविचार्याकारि मध्यस्थासम्भवेशास्त्रार्थासम्भवः । लेखतः शास्त्रार्थस्य धादिपतिवादिनोविदेश- स्थत्वेऽपि सम्भवेऽत्र तत्तत्समाजमन्यादीनां सङ्गमकृतेः किं प्रयोजनम् । तथापि यदि शास्त्रार्थचिकीर्पा तर्हि सप्तघण्टाध्वनिमारभ्यदशघण्टाध्वनिपर्यन्तं जैन- पाठशालास्थान आगयं कर्त्तव्यः विपयोऽप्येतत्पत्रोत्तरे भवद्भिरेव लेख्या, नोचदलम्वृथा समयात्ययेन । सं० १९४५ म० चै० शु० ३ व ४ बजे ह० छेदालालजैनधर्मिणः । 7 - - - - r भाषार्थ-श्रीमान् आर्य मतानुयायियो ! आपका दूसरा पत्र तनि घण्टा में मिला, आपने जयपराजय के निश्चयकर्ता मध्यस्थ का होना असम्भव कहा और लेखद्वारा जयपराजय स्पष्टता स्वीकार की और शास्त्रार्थ होने के पहिले विषय का निर्णय चाहते हो । शास्त्रार्थ का स्थान, समय तथा संस्कृत वा भाषा में होने के विषय में कुछ नहीं कहा जो विषय का निश्चय होने पश्चात् ही शास्त्रार्थ करने की इच्छा है तो समाचारपत्रों में विषय का निर्णय किये विना क्या विचार के छपाया था-(इमारा विचार है कि ) मध्यस्थ का होना असम्भव है तो शास्त्रार्थ होना भी असम्भव, लेखद्वारा शास्त्रार्थ तो वादीप्रतिवादी के विदेशस्थ होने मे भी हो जाना सम्भव है। फिर उस २ समाज के मन्त्री आदि के यहां एकत्र करने को क्या प्रयो- जन था, तथापि यदि शास्त्रार्थ करने की इच्छा है तो ७ बजे से १० बजे तक जैनपाठशाला स्थान में आकर करना चाहिये । शास्त्रार्थ का विषय भी इस पत्र के उत्तर में आप ही लिखिये और यह. न हो तो व्यर्थ समय न खोना चा- दिये अर्थात् शास्त्रार्थ का नाम भी न लेना चाहिये ।। । ~ 1 न -*- 얗 . . विशेष-सब महाशयों को ध्यान देना चाहिये कि हमारे लेख में और इनके ' लेख में क्या भेद है। हमने लिखा था कि दोनों पक्ष की सम्मति से पहिले नि- यम स्थिर हो जावें फिर शास्त्रार्थ के समयादि का विचार किया जावे सो नियमों के लिये तो कुछ उत्तर न दिया इसका कारण एक तो यह है कि जैनी लोग उस पत्र के अभिप्राय को यथावत् समझे ही नहीं और कदाचित् कुछ समझे भी हों तो शालार्थ करने से डरते हैं और बखेड़ा करके पीछा छुड़ाया चाहते हैं । शास्त्रार्थ का विषय समाचारपत्रों मे छपाया तो उसका आभप्राय 'यह कोई सिद्ध नहीं कर, सकता कि विना ही नियम और विषय के शास्त्रार्थ हो जायगा । ऐसा हो तब तो * बिना कारण के भी कार्य हो जाया करे जब कोई कहे कि मैं अमुक समय भो- जन बनाऊंगा तो उस पर ऐसा आक्षेप नहीं कर सकते कि भोजन बनाने की प्रतिज्ञा के समय यह क्यों नहीं कहा कि मैं आटा से भोजन बनाऊंगा । इस जै- नियों के पत्र में कई अशुद्धि हैं जैसे अभाणि अभाषि आदि स्थान में प्रयुक्त हैं (पूर्वम्विषय ) ( किम्धिचार्य ) ( दलम्वृथा ) इत्यादि में परसवर्ण अनुस्वार को मकार लिखना सर्वथा अशुद्ध है क्योंकि अोष्ठय बकार के परे परसवर्ण हो सकता है दन्त्योष्ठय के परे नहीं होता। इत्यादि अनेक २ अशुद्धियां हैं। 41 ܕ ܟ २ (१०). - * 1 ܢܐ ܀ . 1 . + इस पर भार्यसमाज की ओर से चतुर्थ उन्तर:- ओ३म् ॥ श्रीमत्सोमन्तमतावलम्बिषु ।। 'भावकपत्रमागतमालोक्येदमुत्तरमाविष्क्रयते शास्त्रार्थस्थानसमय, संस्कृतभा- पाविषयकमुत्तरं प्राकृतभाषानिर्मितनियमेष्वाविष्कृतमस्माभिः । समाचारपत्रेषु वि- पयनिर्णयमन्तरेणैव शास्त्रार्थो भवितुमशक्य इत्यत्र कि वाधकं मन्यते भावद्भिः। 'शास्त्रार्थः सम्मुख एव स्यात्तस्य लेखनं तु सर्वसाधारणोपकारार्थ परिणामनिष्कर्ष- पार्थ च कर्त्तव्यमेव । समयश्चभवद्भिलिखित एव स्वीक्रियतेऽस्माभिरपि । यदि तत्र भवन्तो वास्तवेन शास्त्रार्थ चिकीर्षन्ति तर्हि मुहुर्मुहुः पत्रगमनागमनेन कि- मपिप्रयोजनं नास्ति किन्त्वस्मल्लिखितशास्त्रार्थविषयान्प्राकृतभाषांनिर्मितनियमांश्च स्वीकुर्वन्तु यदि काचिद्विातिपत्तिःस्यात्तदाभिमतविषयनियमाल्लिखित्वा प्रेरयन्तु । अद्यतु भवन्नियमितकाले शास्त्रार्थो भवितुमशक्यः । यतः कालादारभ्यसायं मा- सर्वाश्वो भविता स लेख्यो भवद्भिर्यतः पूर्व वयमपि जानीयामेति शम् ।। ह० गंगारामस्य, ४॥ बजे भाषार्थ-श्रीमान जैनधर्मियों के समीप निवेदन- आपका पत्र श्राया उसका उत्तर दिया जाता है, शास्त्रार्थ का स्थान, समय और संस्कृत वा भाषा में होने के विषयक उत्तर भाषा में घनाये नियमों में हैं सो आप के पास भेजे जाते हैं। समाचारपत्रों से हम लोगो ने ऐसा कहां छपाया कि विषय निश्चय किये विना शास्त्रार्थ होगा, विषय का निश्चय हुए विना शास्त्रार्थ होना ही अशक्य है इसमें क्या आप कुछ वाधक समझते हो ? । शास्त्रार्थ सम्मुख ही होना चाहिये उसका लिखा जाना सर्वसाधारण के उपकारार्थ और परिणाम निकालने के लिये है । आप ने जो ७ वजे से १० बजे तक समय लिखा उसको हम लोग भी स्वीकार करते हैं । यदि आप लोग वस्तुतः शास्त्रार्थ किया चाहते हो तो बार २ पत्रों के आने जाने से क्या प्रयोजन है १, किन्तु हमारे लिखे शास्त्रार्थ के विषय और भाषा में बनाये नियमो को स्वीकार कीजिये, यदि कुछ विरुद्ध समझो तो अपने अभिमत विषय और नियमों को लिख कर भेजो। आज तो आप के नियत किये समय में शास्त्रार्थ होना अशक्य है पर कल प्रातःकाल वा सायंकाल जब से जब तक होना पाहिये मो आप लिखिये, जिससे हम लोग भी पहिले से जानलें और उद्यत रहें। بدسم . - 7 ।

-- - - 1 , .- A 1 ४- (११) maa इस उक्त पत्र के साथ शास्त्रार्थ के निम्नलिखित नियम और विपम जैनियो के पास भेजे गये थे। १-शास्त्रार्थ में पांच पुरुष प्रबन्धकर्ती होने चाहिये, दो २ उभय पक्ष की ओर से रहें जिनको अपने २ पक्षवाले नियत करें एक प्रवन्धका सभापति मध्यस्थ हो जिसको दोनों पक्षवाले सम्मति कर नियत करें। २-शास्त्रार्थ किसी मध्यस्थ के स्थान में व सरकारी स्थान में होवे अथवा अन्यत्र जिसको उभय पक्ष स्वीकार करे । ३---शास्त्रार्थ में दोनों पक्ष के बराबर मनुष्य हो, किन्तु सर्वसाधारण मनुष्य न आने पावें ।। -दोनों पक्ष वाले शास्त्रार्थ का विषय आरम्भ से पहिले अपनी २ ओर से लिख के एक दूसरे के हस्ताक्षर कराकर सभापति के पास रक्खें ।। ५-सभा में एक बार में एक ही वादी वा प्रतिवादी बोले. अन्य कोई किसी के बीच में न बोलने पावे ॥ ६. -प्रश्न के लिये जितना समय रहे उससे चौगुना समय उत्तरदाता को मिले । ७-अपनी २ पक्ष की ओर से अधिक से अधिक. पांच २ मनुष्य शास्त्रार्थ के लिये नियत करें। ८-जो २ विषय शास्त्रार्थ के लिये नियत हो उसके विरुद्ध पक्ष पर कुछ भी विषय वीच में न छेड़ा जावे ॥ ९-यह शास्त्रार्थ अक्षर २ यथावत् तीन प्रति में लिखा जावे, दो प्रति दोनों पक्ष की ओर से और एक सभापति की ओर से लिखी जाये।, उन. सख, प्रतियों पर प्रश्न वा उत्तरदाता के तथा सभापति के हस्ताक्षर चीच २ होते जावें ।। १०-शास्त्रार्थ दोनों पक्ष नालों की सम्मत्यनुसार संस्कृत मे ही हो पर प्रश्न वा उत्तर लिखान पश्चात् उसका आशय नागरी भाषा में अनुवाद कर सभा के सब मनुष्यों को सुना दिया जाया करे । ११-एक साथ में एक प्रश्न ही हो सकेगा उस पर उत्तर प्रत्युत्तर पांच बार वा दश बार से अधिक न होना चाहिये ।। १२-संस्कृत की अशुद्धि शुद्धि पर कुछ विचार आपड़े तो जिस शास्त्र के अनुसार निम्यय किया जाये उसको प्रथम 1 T । नियत कर लेवे ॥ T (१२) न . " -- - १३-शास्त्रार्थ जैनधार्मियों की इच्छानुसार दिन वा-रात्रि में हो पर चारघण्टे बाद उठने पर किसी पक्ष का पराजय न समझा जावेगा अर्थात् प्रतिदिन चार-- घंटा से अधिक न होना चाहिये ।। १४-उभय पक्ष के शास्त्रार्थकर्ता पण्डित लोग अपने २ मत. को मानते अवश्य अर्थात् अन्यमतावलम्बि पुरुप अन्य की ओर से नियत न हो सकेगा। १५-दोनों पक्ष वाले वादी प्रतिवादी प्रश्न वा उत्तर करने के लिये १० मिनट तक परस्पर सम्मति कर सकेगे। १६-यदि कोई अपने पक्ष के वादी प्रतिवादी को बदला चाहे तो सभापति की आज्ञा से बदल सकेगा । सभापति की आज्ञा विना सभा में कोई अन्य मनु- ज्य बीच में न बोल सकेगा। शास्त्रार्थविषयाः ॥ १-अमन्यकर्तृकायाः सृष्टेः कर्ता सनातन ईश्वरः कश्चिदस्ति न वा.? ॥ २-जीवः कोऽस्ति तस्य चेश्वरेण कः संबन्धः ।। ३-चतुर्विंशतिस्तीर्थकराः केऽभूवन् किं च तेषां सामर्थ्यम् ? कियत्परि- माणानि च तच्छरीराणि ? ।। जीवरक्षा च क पर्यन्तं भवितुं शक्या ? ॥ ५-~-रथयात्रा काऽस्ति किमर्थं च कर्तव्या ? ॥ ६-अत्तस्मिंस्तबुद्धिमिथ्यानानं तत्त्वज्ञानं वेति ? ॥ १-भाषार्थ----जिसका एक सर्वोपरि से भिन्न कर्ता नहीं हो सकता ऐसी सृष्टि का की सनातन ईश्वर कोई है वा नहीं २-जीव कौन है और उसका ईश्वर के साथ क्या सम्बन्ध है ? ॥ ३-चौवीश तीर्थंकर कौन हुए, उनका क्या २ सामर्थ्य था? | और कितने २ घले उनके शरीर थे ? ४-जीवरक्षा कहांतक हो सकती है ? ॥ ५.- रथयात्रा क्या है और किसलिये करनी चाहिये ? । ६-और को और समझना मिथ्याज्ञान है वा तत्त्वज्ञान ? | इस पर जैनियों का जो पत्र आयां वह यह है:- श्रीमदार्य्यमतानुयायिनः ! समततो लेखनेन च प्रवन्धक दिनिर्णयेऽपि यूयन्नायाता,शाखानियत- " । - - 7 ४ २ - ? ॥ ॥ . + । - - - 2. 3 +- (१३) www.ar समयद्यात्ययनञ्च कृतम्, इदानी दशघण्टा ध्वनिता भतो यूयं शास्त्रार्थङ्कर्तुम- समर्था इत्यनुमितमित्यलम् । संवत् १९४५ प्र० चै० शु०.३ , १० बजे ह. छेदालालजैनधर्मिणः भाषार्थ- श्रीमान् श्रार्यमतानुयायियो ! सामने और लिखने द्वारा भी प्रबन्धकी आदि का निश्चय होजाने पर भी तुम नहीं आये, शास्त्रार्थ के नियम किये दो समय भी टाल दिये अब दश बज गये इससे तुम लोग शास्त्रार्थ करने में असमर्थ हो यह अनुमान है ॥ . - T + , विशेष—इससे पहिले जो पत्र भेजा उसके साथ शास्त्रार्थ के नियम और विषय लेकर मंत्री और श्रीचतुर्वेदी कमलापतिजी सभापति सेठ फूलचन्दजी के पास इस अभिप्राय से गये कि पत्रों द्वारा नियमादि शीघ्र निश्चय होने कठिन हैं और ऐसा ही झगड़ा रहा तो कल ता०१६ को भी शास्त्रार्थ न हो सकेगा,इसलिये सामने नियमों का निश्चय शीघ्र होकर कल से शास्त्रार्थ होने लगे। मंत्री ने सेठजी से कहा कि आप इन नियमों और विषयों को देख सुनकर सम्मति कर लीजिये इसपर भी उनके सहकारी लोगों ने यही उत्तर दिया कि सब बातों का निश्चय पत्र द्वारा,कीजिये। इसपर मंत्री आदि ने, बहुत कुछ कहा पर उन्होंने सिवाय लबड़धोंधों के प्रबन्ध की वात एक भी नहीं मानी, इसके पश्चात् मंत्री आदि चले आये और नियम जो ले गये थे उनको पत्र द्वारा भेजे उसका उन्होंने कुछ उत्तर न दिया और एक पत्र (पूर्वोक्त ) फ़िर लिख मारा जिसका हमारे पत्र से कुछ सम्बन्ध नहीं हमने लिखा उन्होंने उत्तर कुछ और ही दिया ( आम्रान् पृष्टः कोविदारानाचष्टे ) इस उक्त पत्र में लिखते हैं कि "प्रबन्धक दि का निश्चय हो चुका तो तुम नहीं आये" क्या हम लोग इनके नौकर हैं जो इनके बुलानेमात्र से इनके घर पर शास्त्रार्थ के लिये चले जाते और प्र- बन्धक दि का निश्चय कहां हो चुका था ? क्या मिथ्या लिखते लज्जा नहीं आई ! शास्त्रार्थ के मूलकारण नियमों पर तो अभी झगड़ा ही हो रहा है। विना ही नियमों के शास्त्रार्थ का समय अपने मन माना लिख भेजा, क्या तुम्हारा लिखा समय राजाज्ञा के तुल्य था जिसको हम निर्विवाद मान लेते (जो महाशय इसपर ध्यान देंगे उन- को यथावत् ज्ञात हो जायगा कि जैन लोग विना नियमों के शीघ्र हल्ला गुल्ला कर फे अपना पीछा छुड़ाना चाहते थे ) इसके पश्चात् इस उक्त पत्र का आर्यों की भोर से उत्तर दिया गया- 4 .

( १४ ) 1 ។ - - + -- . - श्रीमज्जैनमतानुयायिनः पूर्वमप्यस्माभिरलेखि नियमनिर्णयमन्तरा नैकान्ततस्तत्र भवन्तो वक्तुमर्हन्ति यन्नियतसमयद्वयमत्तिक्रान्तमिति यदि नियमपत्र स्वीकृत्य तत्र हस्तान्तराणि कृत्वा ब्रूयुम्तदा तु प्रमाणीकृतं स्यात् । यदि भवन्तः शास्त्रार्थ कर्तुमिच्छन्ति तर्हि सद्यो नियमान् स्वीकृत्य हस्ताक्षराणि कृत्वाप्रेरयन्तु वयं चेदानीमेव शास्त्रार्थ कर्तुं सम्म- द्धाः । यदि नियमानन्तरेण कर्तुमिच्छन्ति तर्हि ज्ञायते न शास्त्रार्थ चिकीर्षन्तीति। अस्माभिश्च यत्पत्रं प्रेरितं तस्योत्तरं किमपि न दत्तं तदिदानीं सद्योदातव्यमिति। इस्ताक्षराणि- प्र. चै० शु० ३ सं० १९४५ गङ्गारामवर्मणः फिरोजावादस्थार्य- समाजामात्यस्य भाषार्थ-पहिले भी हमने लिखा था (कि सब से पहिले नियम स्थिर करना चा- हिये तब समय नियत किया जावे ) नियमों का निश्चय किये विना एक अपनी ओर से आप नहीं कह सकते कि तुमने दो समय टाल दिये, ऐसे तो हम भी कह सकते हैं कि तुमने हमारे लिखे नियमों को टाला कुछ उत्तर नहीं दिया इससे तुम्हारा पराज- य हुआ। यदि आप नियमपत्रों को स्वीकार कर हस्ताक्षर करके भेज देते तो हमारे न आने का उल्हाना मान भी लिया जाता । यदि आप शास्त्रार्थ करना वस्तुतः अं- न्तःकरम से चाहते हैं तो शीघ्र नियमों को स्वीकार करके हस्ताक्षर कर भेजिये और हम लोग इसी समय शास्त्रार्थ करने को तैयार हैं। यदि आप नियमों के विना हल्ला गुल्ला किया चाहते हो तो ज्ञात होता है कि शास्त्रार्थ करने की इच्छा भीतर से नहीं है। हम लोगों ने जो पत्र भेजा था उसका उत्तर आपने कुछ नहीं दिया सो उत्तर शीघ्र दीजिये l यह उक्त पत्र जव भेजा गया तब इसपर जैनियों ने कुछ उत्तर नहीं दिया, उनकी ऐसी लीला 'देखकर सामाजिक पुरुषों ने वस्ती के भद्रपुरुषों को बुलाकर सेठजी के पास भेजा कि यदि आप लोगों को शास्त्रार्थ करना है तो नियमों को स्वीकार कर लीजिये प्रयोजन यह था कि हम लोग जो नियमपूर्वक शास्त्रार्थ करना चाहते हैं उनको म- . ध्यस्थ होकर देख लीजिये कि वे नियम दोनों पक्ष की ओर एकसा सम्बन्ध रखते वा हमारा कुछ स्वार्थ है ? इसपर नागरिक मध्यस्थ लोगों ने हमारी उनकी बातें सुन के और नियमादि देखकर सेठ फूलचन्दजी और अन्य जैनियों के पास जाकर कहा कि ?

( १५ ) ANA . - , . -- आर्य लोग निष्पक्षपात होके नियमपूर्वक शास्त्रार्थ करना चाहते हैं आप लोग स्वीकार क्यों नहीं करते, इस पर जैन लोगों ने अनेक जगडाल की बातें कहीं जिससे शास्त्रार्थ के होने की कोई आशा न जान पड़ी और उन नागरिक भद्र- जनों को विश्वास हो गया कि जैन लोग शास्त्रार्थ करने से हटते हैं। ऐसा हाल देख के उन लोगो ने आर्यसमाज की उपस्थित सभा में अकि स्वयमेव उच्चस्वर से कहा कि हमको ठीक निश्चय होगया कि आर्यों के सामने जैन लोग शास्त्रार्थ नहीं कर सकते, किन्तु टालाटूली करते हैं, हम सब के सामने लिख सकते हैं कि श्रार्यों का जय और जैचों का पराजय हुआ । इस पर आर्यसमाज के लोगों ने उन सत्पुरुषों से एक पत्र लिखा के हस्ताक्षर करा लिये, वह पत्र यह है:- हम सत्य परमात्मा को जानकर कहते हैं कि मैं आर्यों की तरफ़ से जैनियों के पास गया मैंने शास्त्रार्थ करने में जैनियों को इनकार पाया, हस्ताक्षर लक्ष्मीचन्द गुप्त ।। ह० गुलजारीलाल ह० रघुवरदयाल और जितने आयंजन एकत्रित हुए थे सबको विश्वास होगया कि अब शा- सार्थ नहीं होगा कल अपने २ घर चलेंगे। यह सब समाचार ता०१५ मार्च को हुआ इसी रात्रि के १२ बजे तक समाप्त हुआ सब लोग सो गये ।।। . . . ता० १६ मार्च ८८ ई० को प्रात:काल आर्य लोग नित्यकृत्य शौच संध्या-, दि करके आये तबतक शहर में हल्ला मच गया कि जैन लोग शास्त्रार्थ करने से हट गये बहुतेरे लोगो ने तो जैन सेठजी से जा २ कर कहा भी कि यह तो सहज में ही तुम पराजय करा बैठे तब तो सेठजी को बड़ा विचार पड़ा, इधर आर्यसमाज की ओर से भी दो एक पुरुष गये और सेठजी से कहा कि अब भी शास्त्रार्थ करावें तो ठीक २ निश्चय कीजिये नहीं तो हमारे पं० आज अपने २,स्थान को जावेंगे। इस पर सेठजी ने कहा कि हमारे अनुमतिकर्ता मंजुलाल प्यारेलालजी. आजावें सब सलाह करके उत्तर देवें पश्चात् सामाजिक जन चले आये, इसके पश्चात् सेठ- जी ने अपना उपहास जान शहर के दो एक मध्यस्थ पुरुष समाज में भेजे और उन्होंने कहा कि जैनी लोग शास्त्रार्थ करना चाहते हैं और विशेष कर मध्यस्थ नागरिक लोगों की सम्मति हुई कि जैनियों की ओर से सेठ फूलचन्दजी और आर्यों की ओर से पं० भीमसेन शर्माजी दोनों महाशय जैनपाठशाला में बैठकर नियमों को निश्चय कर लेवें और उनको. दोनों पक्षवाले स्वीकार करें, जैन लोगों . , 1 ( १६ )" - 11 - -- + ने भी यह स्वीकार कर लिया । सब की सम्मति से पं० भीमसेन शर्मा और च- तुर्वेदी कमलापतिजी सभापति जैनपाठशाला में गये और सेठ फूलचन्दजी वहां इमीलिये जाकर बैठे थे । वहां पहुंच कर दोनों की सम्मति से विशेष कर सेठ फूलचन्दजी की सम्मति से नियम जो पहिले लिखे हुए थे उन्हों को काट बढ़ा के ठीक किया और यह ठहरा कि इन नियमों की शुद्धप्रति कराली जावे सभा के प्रारम्भ में पांचों नबन्धकर्ताओं के हस्ताक्षर भी हो जावें इस प्रकार बातें चीतें होते २. दश बज गये थे और बारह बजे से चार बजे तक शास्त्रार्थ ठहरा था, इस- लिये उसी समय नकल होकर हस्ताक्षर नहीं हो सकते थे और शास्त्रार्थकर्ताओं को भोजन भी करने थे । पश्चात् उन नियमों की शुद्ध नकल कराई गई और सब ने भोजन किये तबतक शास्त्रार्थ का समय आगया ।। मनुष्यों को शा० में जाने के लिये टिकट बँट गये थे टिकट सेठजी की ओर से बांटे गये थे उन नियमों को लेकर ठीक बारह बजे दिन को आर्य लोग जैनपाठशाला में पहुंचे और जैन लोग भी आये कोतवाल साहब कितने ही यमदूतों के साथ प्रबन्धार्थ आये जब सब लोग यथावस्थित बैठ गये तब यह प्रस्ताव आय्यों की ओर से हुआ कि जो नियम पं० भीमसेन शर्मा और सेठ फूलचन्दजी ने नियत किये हैं वे सभा में सुना दिये जावें तव इन नियमों के अनुसार कार्य होवे इस पर सभा की आज्ञा हुई कि नियम सुना दिये जावें, वे नियम ये हैं: (१) सभाप्रबन्ध के लिये पांच पुरुष प्रबन्धकर्ता नियत हुए, आर्यों की ओर से चौवे कमलापतिजी और पं० गंगाधर त्रिपाठीजी, जैनों की ओर से लाला मंजूलालजी और लाला प्यारेलालजी और उभय पक्ष की ओर से एक चौवे ज्वालाप्रसादजी सभापति, इन पांचों महाशयो ' को निम्नलिखित नियमानुसार संभा का प्रबन्ध करना होगा। (२) सभा में वे महाशय जायंगे कि जिनके पास टिकट होगा पर वे सभास्थ पुरुष दोसौ से अधिक न होंगे। (३) प्रश्नोत्तर दोनों ओर से बराबर ही, होने चाहिये प्रश्न के लिये पांच मिनट और उत्तर देने के लिये २० मिनट समय नियत किया है और जवतक एक प्रश्न पर पूरी वार्ता न हो जाय तब तक दूसरा विषय न छेड़ा जाय । (४) उभय पक्ष की ओर से दो २ पण्डित शास्त्रार्थ में उपस्थित होकर वार्ता करें 'अर्थान् आर्यों की ओर से पं० देवदत्तजी और पं. भीमसेनजी और जैनों , H - ( १७ ) aarana - - -- , से पं० छेदालालजी और पं० पन्नालालजी इनसे भिन्न कोई न बोल सकेगा। (५ ) यह शास्त्रार्थ अक्षर २ यथावत् तीन प्रतियों में लिखा जायगा दो प्रति उ- भयपक्ष की ओर से, तीसरी सभापति की ओर से और इन तीनों प्रतियों पर उभयपक्ष के पं० और सभापति के हस्ताक्षर होने चाहिये । (६) शास्त्रार्थ दोनों पक्षो की समत्यनुसार संस्कृत ही में होगा, परन्तु उसी जगह संस्कृत का अनुवाद करके नागरी भाषा में सब को सुना देना चाहिये । ७ ) शब्द की शुद्धाऽशुद्धि पर कुछ विशेष वार्ता वा विचार न किया जायगा सज्जन लोग छप जाने पर अपने आप ही जान लेंगे। ( ८ ) उभयपक्ष के शास्त्रार्थकर्ता अपने २ ही मत के माननेवाले हों अर्थात् अन्यमतावलम्बी पुरुष अन्य की ओर से न बोलेंगे। (९) उभयपक्ष वाले अपने २ वर्ग में १० मिनट से अधिक सम्मति न कर सकेंगे। १०) शास्त्रार्थ जैनों की इच्छानुसार दिन में वा रात्रि में हो पर चारघंटे से अधिक प्रतिदिन न होगा, समय की पूर्ति पर उठने में जयाजय न समझना चाहिये । (११) ता० २० मार्च को शास्त्रार्थ वन्द रहेगा, कदापि साहब कलेक्टर बहादुर आज्ञा दें तो हो सकेगा। ये सब नियम सुनाये गये इस पर जैन लोगों ने अनेक शङ्का पैदा की और कहा कि ये नियम हमारे साथ नहीं नियत हुए, इस प्रकार परस्पर बहुत से झगड़े होते २ छठे नियम पर अधिक विवाद हुआ इसका कारण यह था कि आर्य लोग कहते थे शास्त्रार्थ संस्कृत में हो और जैन लोग भाषा मे होने का हठ करते थे आर्य लोग संस्कृत मे होने पर इसलिये वल देते थे कि जैन लोगो ने प्रथम ही पत्र मे संस्कृत में होने की प्रतिज्ञा की थी उस समय जैनों ने समझा था कि हम अपनी ओर से पं० मिहिरचन्द और जियालाल ( जिनको कुछ धन देकर लाये थे ) से शास्त्रार्थ करावेंगे वस्तुतः जैनियो मे कुछ भी संस्कृत विद्या का वल नहीं था परन्तु उनमें (निरस्तपादपे देशे एरण्डोपि द्रुमायते ) जैसे वृक्षरहित देश में एरण्ड भी वड़ा वृक्ष मालूम होता है वैसे छेदालाल पन्नालाल साधारण विद्या- थियो के तुल्य कुछ २ संस्कृत जानते थे सो सेठ फूलचन्दजी ने भी इनके ऊपर शास्त्रार्थ का' आरम्भ नहीं किया था किन्तु पंडित मिहिरचन्द और जियालाल ( भाड़े के टुओं ) के भरोसे शास्त्रार्थ का बल बांधा था और इसी वल से सं- स्कृत में करने की प्रतिज्ञा लिखाई थी पर जव नियम स्थिर किये गये तब यह A । का वृक्ष ३ (१८) - निश्चय होगया कि अन्य पक्ष का पं० अन्य की ओर से मुखत्यार बन के शा- नार्थ न कर सकेगा अर्थात् जो २ पं० जिस २ की ओर से नियत हो वह उस मत को यथावत् मानता हो इस नियम से भाड़े के पंडित तो निकल गये जव जैनियों का भाड़े का बल टूट गया तब संस्कृत में शास्त्रार्थ करने से इनकार करते थे और ऊपर से प्रसिद्ध करते थे कि सब लोग कुछ नहीं समझेंगे इससे भाषा में होवे । इसका उत्तर आर्य लोग देते थे कि संस्कृत की भाषा करक सभा में समझा दी जाया करेगी और यह भी बल देते थे कि तुम लोगो ने प्रथम प्रतिज्ञा की थी इस- लिये संस्कृत में ही होना चाहिये, इस प्रकार नियमों पर झगड़ा होते २ जैनि- यों ने एक मध्यस्थ का झगड़ा छेड़ दिया इसपर दोनों ओर से बहुत विवाद होता रहा । जैनियों की ओर से पं० छेदालाल ने कहा कि स्वामी विशुद्धानन्दजी, श्रीधरजी तथा जो २ पं० आर्यसमाजी और जैनियों के मत में नहीं उनमें से चाहे जो पं० मध्यस्थ कर लिये जावें जो शास्त्रार्थ लिखापढ़ी द्वारा हो सो उनके पास भेज दिया जावे जिसके पक्ष को वे अच्छा वतलावें उसका पक्ष ठीक सम- झा जावे। आर्यों की ओर से पं० भीमसेनशर्मा ने कहा कि प्रथम ऐसा पुरुष मिलना ही दुर्लभ है कि जो सर्वथा निष्पक्ष और निर्लोभ होकरे सत्य कहे, बहुधा पं० लोग थोड़े २ धन के लोभ से ईसाइयों तक को अपने मत के खण्डनविण्यक पुस्तक बना देते हैं (जैसे पं० मिहिरचन्द्रादि यद्यपि जैनमत को मानवे नहीं तथापि धनलोभ से नास्तिको की ओर से वेद का खण्डन करने आये हैं ) तो किस का विश्वास किया जावे ? और कदाचित् कोई निष्पक्ष पुरुष मिल भी जावे और वह धर्मपूर्वक किसी एक पक्ष का पराजय . कह देवे तो क्या उस समुदाय के लोग सव उस पक्षको छोड़ देवेगे ?, मेरी समझ में जैन लोग तो ऐसे हठीले हैं कि उन के तीर्थंकर पार्श्वनाथ साक्षान् आकर जैन पक्ष को पराजित कहे तो भी न मानें- गे। अर्थात् इस मध्यस्थ के झगड़े से यही प्रयोजन होगा कि हजार पांचतौ रुपये खर्च करके अपने पक्ष के विजय का डंका पं० रूप वाजीगरों से बजवा देगे । इस पर बहुत काल तक विवाद होता रहा और शास्त्रार्थ का आरम्भ न हुआ। आर्य लोग कहते थे कि पहिले नियम भले ही मत मानो किन्तु अव पंचों की सम्मति से और नये नियम बना लिये जावें तथा मध्यस्थ कोई नही करना चा- हिये तथा विना नियमों के हम शास्त्रार्थ न करेगे । जैन लोगो का कथन था कि हम नियम एक भी न मानेंगे और मध्यस्थ काई 1 अवश्य होवे । ऐसे होते २॥ (अढ़ाई) घंटे बीत गये सभा के सब लोग व्याकुल हो- गये और मालूम हुआ कि सभा उठना चाहती है तब कोतवाल साहब ने कहा कि आज जिम पक्ष के लोग ( चाहे किसी कारण से ) शास्त्रार्थ न करेगे उन्हीं का पराजय समझा जायगा । यद्यपि आर्यसामाजिक लोगो का विचार नहीं था कि विना नियमों के ऊटपटांग- शास्त्रार्थ किया जावे ( अनुमान से ज्ञात होता है कि जैनी लोगों ने यह सम्मति करली थी कि आर्य लोग विना नियमों के शास्त्रार्थ नहीं करेंगे इसलिये हम नियमों को तोड़ देवें और कह देवेगे कि आर्य लोगों ने शा- स्वार्थ नहीं किया इससे उनका पराजय होगया ) तो भी अनिष्ट परिणाम देखकर विचार किया कि हम अव विना ही नियमो के शास्त्रार्थ करेंगे, परन्तु कोत- वाल साहब ने उर्दू में शास्त्रार्थकर्ता दोनो पक्ष के पण्डितों के नाम लिख लिये थे। इसके पश्चात् दोनों पक्ष वालों का विचार हुआ कि शास्त्रार्थ होना चाहिये तब (अहमहमिका ) का झगड़ा हुआ कि पहिले कौन प्रश्न करे सभासम्मति से यह निश्चय हो गया कि दोनो पक्ष वाले साथ ही अपना २ प्रश्न लिख के अपने २ प्रतिपक्षियों को देवें इसके अनुसार शास्त्रार्थ का प्रारम्भ हुआ । शास्त्रार्थ का प्रारम्भ प्रथम दिन ता० १६ मार्च सन् १८८८ ई. प्रथमपत्र जैनियों का ॥ प्रथम प्रश्न-भोविद्वज्जनवर्याः जगतिपदार्थानां प्रमेयत्वं सर्वसाधारणं ॥ प्रमेयसिद्धेप्रमाणाधीनत्वेन ।। प्रथम प्रमाणनिर्णयोऽपेक्षितः अतः तत्स्वरूपं कि?॥ कति च भेदाः कश्च तद्विषयः किञ्च तत्फलं तत्मामाण्यं स्वतः परतो वेत्यस्माकम्मनः॥. ह० छेदालालजैनधर्मिणः ह • पन्नालालजैनमतानुयायिनः । भाषानुवाद-भो विद्वानो में श्रेष्ठजनो ! जगत् मे वर्तमान पदार्थों का प्रमेय होना सर्वसाधारण (मिहिरचन्दकृत भापानुवाद "पदार्थों को प्रमेय मानते हैं।" टीक नहीं है क्योंकि ज्ञान विषयक कोई क्रिया संस्कृत में नहीं है पदार्थ शब्द पष्ठ य- न्त है, उसको द्वितीयान्त, करना ठीक नही केवल अस्ति-सामान्य क्रिया का अध्या- हार हो सकता है ) और उस प्रमेय की सिद्धि प्रमाण के आधीन होने से पहिले प्रमाण का निश्चय अपेक्षित है, इसलिये उसका स्वरूप क्या है । उसके भेद. कितने हैं, उसका विषय क्या है और उस प्रमाण का फल क्या है ! उसका स्वतः प्रामाण्य वा परतःप्रामाण्य है यह हमारा प्रा है। M (२०) - इसके साथ ही आर्यों की ओर से प्रथम विचारणीय प्रश्न दिये गये। . । . प्रथमपत्र आर्यों का॥ मुखमार्गान्वेषणार्था सर्वस्य प्राणभृतः प्रवृत्तिस्तत्माप्तिÖनसम्पदायात्कथं सम्भवति । जिनशब्दस्य कः पदार्थों जैनशब्दस्य चानयोश्च का सम्बन्धः । जिनशब्दवाच्यो यः कश्चिदभिमतोऽस्ति स नित्य आहोस्विदनित्यः । जिन- जैनपदार्थयोर्लक्षणं स्वरूपं च च कव्यमिति । तत्पूजनं सफलं विपरीतं वा यदि सफलं तर्हि किं फलकम् ॥ इ० भीमसेनशर्मणः ह. देवदत्तशर्मणः भाषानुवाद-सुख का मार्ग खोजने के लिये सब प्राणी प्रवृत्त हो रहे हैं उस सुख के मार्ग की प्राप्ति जैन संप्रदाय से कैसे हो सकती है । जिन और जैन शब्द से किस वस्तु का ग्रहण होता है अर्थात् जिन जैन का वाच्यार्थ क्या है और जिन तथा जैन का परस्पर ( पितापुत्रादि ) क्या सम्बन्ध है। जिन शब्दवाच्य जो कोई पदार्थ माना है वह नित्य है वा अनित्य ? जिन जैन इन दोनों पदो और इनके वाच्य अर्थों के लक्षण और स्वरूप कहो | उस जिनका पूजन सफल है वा निष्फल ?, यदि सफल है तो उसका क्या फल है ? | विशेप-यह पत्र लिखकर जैनियो को दिया गया और इससे पहिला जै- नियों का पत्र आर्यों के पास आया । सब महागयो को विचारना चाहिये कि आर्यों के पत्र का जो उत्तर जैनियों ने दिया है वह आर्यों के प्रश्न से क्या स- म्बन्ध रखता है ? और साथ ही इस पर भी ध्यान रक्खे कि जैनियों के पत्र का जो आर्यों ने उत्तर दिया है वह प्रश्न से कितना सम्बन्ध रखता है ? ।। आर्यों के प्रथम प्रश्न के उत्तर में जैनियो का दूसरा पत्र ।। मानाधीनामेयसिद्धिरिति न्यायेन युष्मदुक्तपदार्थानां प्रमेयरूपत्वात्प्रथम प्रमाणनिर्णयः आवश्यकः । तनिर्णयाभावे मेयानां निर्णयो दुर्घटः अतएव ममोक्तपूर्वपक्षस्य आदौ परामर्शो युक्तः ।। ह० छेदालाल ६० पन्नालल , - - (२१ ) Chana འས་འའའའབུ་ । भाषानुवाद-प्रमेय की सिद्धि प्रमाण के आधीन है इस न्याय से तुम्हारे कहे (जिनजनादि ) पदार्थो के प्रमेयरूप होने से पहिले प्रमाण का निर्णय होना आ- वश्यक है क्योंकि प्रमाण निश्चय के विना प्रमेय का निश्चय होना दुर्घट है, इससे हमारे कहे पूर्वपक्ष का पहिले विचार करना चाहिये । इस पत्र में ( ममोक्तपूर्वपक्ष- स्य ) यह बड़ीभारी अशुद्धि है, विद्वानों को इनका पाण्डित्य अच्छे प्रकार ज्ञात हो जायगा ।इन पहिले दो पत्रो में बड़ी २ अशुद्धि कम हैं क्योंकि यह संस्कृत पण्डितों (मिहिरचन्द्रादि ) ने पहिले ही लिखा दिया था कि तुम यह प्रश्न करना सो छेदालाल जैन ने सभा के बीच वह पर्चा निकाल के नकल कर दिया था और कुछ भूले तब मिहिरचन्द्र को पूछने लगे तब आर्यों ने कहा कि यह शास्त्रार्थ आर्यों और जैनियों का है यदि अन्य कोई पण्डित जैनियो को सहायता देवे तो उचित होगा कि प्रथम यज्ञोपवीत उतार के जैनी बन जावे । इस पर मिहिरचन्द्र चिड़ कर बोले कि मै जैनियों की ओर नही किन्तु दोनो को पतित समझता हूं। परन्तु यह विचार न किया कि धर्मशास्त्र के अनुमार (संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् ) वैदिकधर्म से पतित जैनियो के साथ वर्षों से आचरण करने वा उनका धान्य खाने से मैं भी पतित होगया हूं । यदि धर्मशास्त्रों को विचारते और अपने को पतित समझ लेते तो क्यो दूसरों को पतित कहते ? । एक चोर दूसरे चोर को चोर नहीं कह सकता, चोर चोर मौसियाते भाई होते हैं । इससे मिहिरचन्द्र का अभिप्राय यह था कि मैं किसी की ओर नहीं दोनो को पतित समझता हूं , परन्तु रुपये की ओर हूं क्योंकि रुपया पतित नही है उससे प्रयोजन है । अब आर्यों ने जैनियों के प्रथम पत्र का जो उत्तर दिया है उसको ध्यान देकर प्रश्न के अक्षरों से मिलाइये । जैनियों के प्रथमपत्र के उत्तर में आर्यों का दूसरा पत्र ।। अपद न प्रयुजीत इति शब्दशास्त्रनियमात्, अपदत्वं च विभक्तिरहितत्वं मुप्तिङन्तं पदमिति शासनात् मथमप्रश्न इति लेखोऽपभाषणम् । यदि जगदृत्ति- पदार्थानां सर्वसाधारणं प्रमेयत्वं तर्हि प्रमाणस्यापि सर्वसाधारणभावेन प्रमेय. स्वात्ममाणविषयक प्रश्नः प्रमेयान्तर्गतत्वात्साध्यसमहेत्वाभासः। अस्य च प्रमा- विषयकप्रश्नस्य जगदृत्तिपदार्थान्तर्गतत्वाज्ञेयत्वसिद्धिरिति ज्ञातत्वादगीकृत- मेव प्रमाणपूर्वकव्यवहारकरणात् । अतश्च तद्विषयका प्रश्न. सर्वसाधारणप्रमे- . ।

( २२ ) यत्वे सिद्धे व्यर्थएव । तद्भेदाश्च यथाशास्त्रं द्वौ त्रयश्चत्वारोऽष्टौ वाप्रमाणफलं च व्यवहारपरमार्थयोः सिद्धिः, तत्मामाण्यं स्वतः परतश्च । ह. भीमसेनशर्मणः है. देवदत्तशर्मणः भाषानुवाद-व्याकरण शास्त्र का यह नियम है कि जिसमें विभक्ति नहीं ऐसे अपद् शब्द का प्रयोग न करे पद उसको कहते हैं जिसके अन्त में सुप् और तिङ् हो, इस कारण "प्रथम प्रश्न" यह शब्द व्याकरण से विरुद्ध होने से "प्रथमग्रासे मक्षि- कापात:" के तुल्य लिखा गया है क्या इसी पण्डित्य के आश्रय से जैनी लोग संस्कृत मे शास्त्रार्थ करना चाहते थे ? । इस पर पं० मिहिरचन्द्र लिखते हैं "एक विसर्गमात्र की अशुद्धि है" क्या व्याकरण में विसर्गमात्र की अशुद्धि कम होती है । कोई प-, ण्डित किसी विद्यार्थी से बोले कि हम तुम्हारी परीच्छा करेंगे विद्यार्थी ने कहा-महाराज मेरी परीक्षा तो आप करेंहीगे पर आप की परीक्षा परीच्छा शब्द से पहिले ही होगई, वही वृत्तान्त पं० मिहिरचन्द्र का हुआ कि जिनको विसर्ग, व्यवहार, विषय आदि शब्दों मे यह भी नहीं मालूम कि इनमें कौन वकार लिखना चाहिये इससे इनकी भी परीक्षा होगई और सब को ज्ञात हो जावेगा । क्या इसी पाण्डित्य के भरोसे अपने को अर्थ- शास्त्रज्ञ होने का दम्भ करते हैं अस्तु, यदि जगत् में वर्तमान सव पदार्थों को प्रमेयत्व है तो क्या जगत् मे वर्तमान सब पदार्थों में प्रमाण नहीं समझा जावेगा?, जब जगत् के सब पदार्थों मे प्रमाण भी एक पदार्थ होने से पदार्थत्व सामान्य से प्रमाण भी प्रमेयरूप में आगया तो उसके भी प्रमेय होजाने से प्रमाण रहा ही नहीं फिर उसका प्रश्न करना कभी ठीक नहीं है । जब प्रमाण को साध्य पक्ष मे लेकर उसको निर्णय किया चाहते हो तो उसके निर्णय करने में जो कुछ प्रमाण कहोगे वह सब साध्य पक्ष में आजाने से प्र- मेय हो जायगा क्योंकि तुम सर्वसाधारण पदार्थों का प्रमेय कह चुके हो तो तुम्हारा प्रमाण विषयक प्रश्न भी सब पदार्थों के अन्तर्गत होने से जानने योग्य है । इससे तुम्हारा प्रश्न जाना हुआ नहीं रहा अर्थात् तुम्हारे प्रश्न को यदि तुम सब पदार्थों में मानते हो तो विचारणीय पक्ष में आगया । यदि कहो कि हमको अपने प्रमाण विपयक प्रश्न में सन्देह नहीं तो अपने प्रश्न को प्रमाणरूप मान लेने से तुमने प्रमाण को निश्चित समझ लिया फिर प्रमाण मे सन्देह न रहने से प्रमाणविषयक प्रश्न नहीं बनता। यदि तुम को प्रश्न में भी सन्देह होता तो प्रश्न ही न करसकते अर्थात् संसार में जो कुछ व्यवहार होता ।

. (२३ ) - L ८ है वह सब प्रमाणपूर्वक है जब भोजन करते हैं तब भी नेत्रादि से निश्चय कर लेते हैं कि यह अन्न है इससे क्षुधा की निवृत्ति होकर सुख होगा इसलिये भोजन करें, यदि सन्देह हो कि यह हमारे भोजन योग्य अन्न है वा नही तो भोजन करना भी न बने। मनुष्य जिसको नेत्रादि प्रमाणों से अपने सुख का साधन समझ लेता है उसको ग्र- हण करता और जिसको दुःख का हेतु जानता है उससे सदा बचा करता है । इ. त्यादि सब व्यवहार प्रमाणपूर्वक होता है तो तुम्हारा प्रश्न भी प्रमाणपूर्वक होने से तुमने प्रमाण को जानलिया फिर प्रमाणविषयक प्रश्न नहीं बन सकता । यद्यपि प्रश्न नहीं बनता तथापि उत्तर देते हैं कि पृथक् २ शास्त्रकारों की शैली के अनुसार प्र- माण के भेद दो, तीन, चार और आठ है । प्रमाण फल व्यवहार परमार्थ की सिद्धि है उस प्रमाण का निश्चय स्वतः उसी से और परतः अन्य से भी होता है ।। इस आर्यों के द्वितीयपत्र के उत्तर गे जैनियों का तीसरा पत्र ।। जगदृत्तिपदार्थांना सर्वसाधारणं प्रमेयत्वं तर्हि प्रमाणस्यापि सर्वसाधारणभा- वेन प्रमेयत्वात् । प्रमाणविषयकः प्रश्नः प्रमेयान्तर्गतत्वात्साध्यसमहेत्वाभासरिति भवद्भिरपरामर्शत्वेनोल्लेखोयं कृतः कुतः प्रमाणस्य तु विषयीरूपत्वात् प्रमेयाणां विषयरूपत्वाच्च प्रमाणरूपत्वेन प्रमाणस्य न प्रमेयत्वं अन्यथा लक्षणस्यापि लक्षा- क्रान्तत्वेन दूषणगणवाणमहारपातात् किञ्चप्रमाणपूर्वकव्यवहारकरणाद् तद्विष- यका प्रश्नः सर्वसाधारणप्रमेयत्वे सिद्धे व्यर्थएव । एतदप्ययुक्तं कुतः यदि अस्म. स्वीकृतं मतं प्रमाणं ताई भवन्तोप्यगीकुर्वन्तु नोचेत्समायातो विचारः सोपि- प्रमाणाधीनः अतः प्रमाणविषयकः प्रश्नः सार्थिकः किञ्च तझेदाश्च यथाशास्त्रं द्वी-त्रयश्चत्वारोऽष्टौ व इदमप्यविशेषेण लेखन कस्मिन्शास्त्रे इमे भेदाः केन प्रकारे- ण उद्दिष्ठाः अपि च प्रमाणविषयोनोक्तः किं तर्हि अस्तिया नवेति स्पष्टतयोल्लेख- नीयं । प्रमाणफलं च व्यवहारपरमार्थयोः सिद्धिः इत्यनेनापि प्राप्तः प्रमाणनिर्ण- यः तत्मामाण्यं स्वतः परतश्च इत्यनेनानैकांतको हेत्वाभासः निर्पेक्षतयोक्तत्वात् ॥ ह० छेदालालजैनधर्मिणः ह० पन्नालाल जैनमतानुयायिनः भाषानुवाद--आपने यह कहा कि जगत् में वर्तमान पदार्थों को साधारण रीति से प्रमेयत्व है तो प्रमाण भी सव में आगया इससे प्रमेय हुआ तो प्रमाणविषयक प्रश्न ( २४ ) । ........... . प्रमेयान्तर्गत होने से साध्यसमहेत्वाभास हुआ यह आप का लिखना विना विचारे है क्योकि प्रमाण विपयिरूप और प्रमेय विषयरूप है प्रमाणरूप से प्रमाण को प्रमय- त्व नहीं अन्यथा लक्षण को भी लक्ष्यत्व होने से अनेक दूषण जायंगे और यह भी श्रापका कहना अयुक्त है कि प्रमाणपूर्वक व्यवहार के करने से प्रमाणविषयक प्रश्न सर्वसाधारण प्रमेय होने से व्यर्थ है क्योंकि जो हमारे स्वीकृतमत को प्रमाण मानते हो तो अङ्गीकार करो जो नही मानते हो तो विचार करने का अवसर आया इससे प्रमाण- विषयक हमारा प्रश्न सार्थक है और उसके भेद शास्त्रके अनुसार दो२, तीन३, चार ४ वा आठ हैं यह लेख भी विशेषरहित संदेहरूप है क्योंकि यह नहीं लिखा कि किन शास्त्रों में यह भेद हैं और किस प्रकार से कहे हैं और प्रमाण विषय नहीं कहा वह है या नहीं, स्पष्ट कहो और प्रमाण का फल व्यवहार परमार्थ की सिद्धि कहा सो इस आपके कथन से भी प्रमाण का निर्णय प्राप्त हुआ और उसका प्रामाण्य स्वतः परतः होता है इस आपकी उक्ति को निरपेक्ष होने से अनैकान्तिक अर्थात् व्यभिचारी हेत्वाभास की नाई स्वतः परतः की साधकता नहीं हो सकती [. विशेप-जैनियों के इस पत्र में कई अशुद्धियां हैं, जैसे-१-हेत्वाभासरिति । २-विषयंरूपत्वात् ।३-लक्षाक्रान्तत्वेन। ४-सार्थिकः। ५-उद्दिष्ठाः। ६-नैकान्तकः। ७-भवंतोऽप्यंगीकुर्वतु । इन तीन शब्दों मे तीन अशुद्धियां हैं । यदि कोई लिखने में अक्षर छूट जाता है तो उससे पण्डिताई में हानि नहीं समझी जाती सो ऐसी अशु- द्धि यहां नहीं गिनाई हैं । इन उक्त अशुद्धियों के अनन्तर इनके पत्र में अन्य भी अशुद्धियां हैं जिनसे जैन पण्डितों की पण्डिताई प्रकाशित हो जावेगी । इसके आगे जैनियों के द्वितीयपत्र के उत्तर में आर्यों का तृतीय पत्र ॥ सर्वव्यवहाराणा प्रमाणपूर्वकत्वमप्रमाणपूर्वकत्वं वा । यदि प्रमाणपूर्वकत्वं तईि भवत्मनस्यापि सर्वव्यवहारान्तर्गतत्वात्संशयाभावेनानर्थकः प्रश्नः । यदि चा- प्रमाणपूर्वकत्वं तर्हि भवत्पश्नस्यायोग्यत्वम् । यद्यस्मदुक्तपदार्थानां मेयत्वं भवद्भिः स्वीक्रियते तहिं जिनपदस्य तदर्थस्य च साध्यत्वाद्भवन्मतमूलमेव साध्यं न तु सिद्भमित्यतो भवदनुमतौ सर्वस्य साध्यत्वात् प्रामाणाभावेन प्रमेयाभावः । ह. भीमसेनशर्मणः इ. देवदत्तशर्मणः . - । . 1 (२५) 'भाषानुवाद - सब व्यवहार प्रमाणपूर्वक होते हैं वा अप्रमाणपूर्वक ? अर्थात् सोच समझ के मनुष्य कार्य करने में प्रवृत्त होते हैं वा अन्धाधुन्ध उन्मत्त के समान । यदि कहो कि प्रमाण से व्यवहार होते हैं तो आपका प्रश्न भी सब व्यवहारों मे होने से प्रमाणपूर्वक हुआ अर्थात् आपने अपने प्रश्न को प्रामाणिक माना तो तुमको प्र- माण का बोध होगया अर्थात् प्रमाण का बोध था तब ही तुम प्रश्न कर सके तो प्रमाण में संदेह न होने से तुम्हारा प्रमाण विषय प्रश्न करना सर्वथा व्यर्थ हुआ। यदि कहो कि विना' प्रमाण के व्यवहार होते हैं तो तुम्हारा प्रश्न भी अप्रमाणिक होने से अयोग्य है । और यदि हमारे प्रथमपत्र में लिखे जिन जैनादि पदार्थों को तुम प्रमेय अर्थात् विचारपक्ष में लानेयोग्य मानते हो तो जिनपद और उसके वाच्यार्थ के साध्य होने से तुम्हारे कथनानुसार ही तुम्हारे मत का मूल साध्य होगया किन्तु, सिद्ध नहीं रहा इससे यह आया कि तुमको अपने जैनमत पर विश्वास नहीं यदि विश्वास होता तो उसको प्रामाणिक मानते जब प्रामाणिक मान लेते तो प्रमाणविषय में सन्देह न होने से प्रश्न क्यों करते जब तुमको अपने मत के प्रामाणिक होने का विश्वास नहीं तो अन्य मत पर कैसे विश्वास हो सकता है । इसलिये तुम्हारे मत सभी साध्य होने से प्रमाण कोई वस्तु न रहा क्योंकि प्रमाण वहीं कहाता है कि जिससे विषय का निश्चय हो और जिस विषय को उस प्रमाण से निश्चय करें वह प्रमेय कहाता है सो जब प्रमाण ही न रहा तो प्रमेय का ठहरना भी दुस्तर है। यह पहिले दिन ता० १६ मार्च का शास्त्रार्थ समाप्त हुआ संब अपने २ घर को चले गये । उसी दिन आयर्यों को चिन्ता रही कि अब कल कब शास्त्रार्थ होगा उस का समय पहिले से नियत होना चाहिये परन्तु जैन लोगों को कुछ भी फिकिरन थी और पहिले दिन के शास्त्रार्थ से जैनियों को तथा अन्य श्रोताजनों को बलाबल भी ज्ञात होगया था इससे जैनियों की भीतरी इच्छा नहीं थी कि दूसरे दिन शा- नार्थ हो पर अपनी ओर से बन्द करने में भी प्रसिद्ध पराजय हुआ जाता था क्योंकि जैनियों के प्रतिपक्षी आठों प्रहर कटिवद्ध हो रहे थे इस कारण आर्यों की ओर से कई बार संदेशा जाने से जैनी लोगों को ता० १७ को शास्त्रार्थ खीकार करना पड़ा और ता० १७ को भी उसी समय से शास्त्रार्थ का आरम्भ हुप्रा । पर ता०-१६ को प्रायों ने जो तीसरा पत्र अन्त में दिया था उसका उत्तर जै.. मियो को देना था और जैनियो के तृतीयपत्र का उत्तर आर्यों को देना था ४ 1 , ( २६ ) T t प आर्यों का पत्र जैन लेगये थे और जैनियों का पत्र. आर्य लेगये थे और अपने २ घर विचारपूर्वक उत्तर लिखकर 'लाये जैनियों को उत्तर लिखने के लिये घर पर- अन्य मतावलम्बी पं० लोगों की सहायता मिल गई जिससे अच्छे प्रकार लिखा ।। द्वितीय दिन ता. १७ मार्च आर्यों के तृतीयपत्र । । के उत्तर में जैनियों का चौथा पत्र ।। श्रीमद्भिः यदुक्तं सर्वव्यवहाराणां प्रमाणपूर्वकत्वमप्रमाणपूर्वकत्वं वेत्ययुक्त । नायें नियमः सर्वव्यवहाराणां प्रमाणपूर्वकत्वमभमाणपूर्वकत्वं बा कस्मात् व्यवहा- राणां वैलक्षण्यात् । प्रश्नस्यानर्थक्यन्तु वक्तुमसक्यं । येन व्यवहारापो प्रमाण- पूर्वकत्वं तत्प्रमाणं किमिति प्रश्नस्य सार्थक्यात् ।। नास्माकं प्रमाणस्वरूपादौ सं- शयः । यूयं जानीथ नवेति पृच्छते । अस्मत्पृश्नविषयस्य सर्वशास्त्रसंमतत्त्वेन ना: योग्यत्वं । अस्मन्मतविषये भवजिज्ञासितपदार्थानां यथा मेयत्वं तथा सर्वेषां प- दार्थमात्राणां मेयत्वमस्माभिरंगी क्रियते परन्तु यन्मेयं तत्साध्यमिति न व्याप्तर- भावात् इत्यनेन यद्यस्मदुक्तपदार्थानाम्मेयत्वं भवद्भिः स्वीक्रियते तहि जिनपदस्य तदर्थस्य च साध्यत्वाद्भवन्मतमूलमेव साध्ये नतु सिद्धमन्युक्तं तदपि निर्मूलं ।। अपि च मेयं च किं प्रमाणाधीनमिति प्रश्नावकाशः ।। अन्ततो गत्वा भवद्भि- रपि प्रमाणाभावेन प्रमेयाभावः इति लेखद्भिः प्रमाणं त्वंगीकृतं परन्तु पृष्ठस- विशेषप्रमाणस्वरूपादिकम् वक्तुमसमर्थाः इत्यस्माभिरवगतस् । ह• छेदालाल जैनधर्मिणः इ० पन्नालाल जैनधर्मिणः भापानुवाद-आपने जो कहा कि सब व्यवहार प्रमाणपूर्वक हैं या अप्रमाणपूर्वक- यह श्रापका कहना अयोग्य है क्योकि यह नियम नहीं है कि सब व्यवहार प्रमाण- पूर्वक ही होते है या अप्रमाणपूर्वक क्यों के व्यवहार विलक्षण हैं अर्थात् कोई प्रमाण पूर्वक कोई अप्रमाणपूर्वक होते हैं तो और हमारे प्रश्न को दो अनर्थक आप नहीं कह स- कते क्योंकि जिस व्यवहार को प्रमाणपूर्वकता है वह प्रमाण क्या, इससे हमारा प्रश्न सार्थक है और हमको तो प्रमाण के स्वरूपादि में संशय नहीं है, पूछते इस- लिये हैं कि आप भी उसको जानते हैं या नहीं हमारे प्रश्न का विषय सम्पूर्ण. शास्त्रों को सम्मत इससे अयोग्य नहीं है हमारे मत के विषय में जिन पदार्थों के जानने की आपकी इच्छा है वे जैसे प्रमेय हैं उसी रीति से हम सम्पूर्ण पदार्थों को. . 7 १ (२७ ) A । प्रमेय मानते हैं परन्तु जो मेय है वह साध्य अवश्य होता है यह नहीं कह सके क्योंकि व्याप्ति का अभाव है इसी लेख से आपने कहा कि जो हमारे फहे हुए पदार्थों को तुम प्रमेय मानते हो तो जिन पद और उसका अर्थ भी साध्य हुश्रा इससे तु- म्हारे मत का मूल साध्य है सिद्ध नहीं यह आपका कहना भी निर्वल है और मेय "किस प्रमाण के आधीन है इससे हमारे प्रश्न का अवकाश है और अन्त में प्राप- ने भी प्रमाण के विना प्रमेय का अभाव होता है यह लिख कर उस प्रमेय की सिद्धि का कारण तो प्रमाण को माना परन्तु हमारे पूछे हुए प्रमाण के पृथक् २ स्वरूप आदि को आप कहने को समर्थ नहीं यह हमने जान लिया । विशेष-यह पत्र लिखकर लाये और जैनियों, ने सभा के प्रारम्भ होते ही सब की सम्मति से सभा में सुनाया और कितनी ही बातें अपनी इच्छानुसार ऊपर से कहीं पीछे आय्यों की ओर से पण्डित देवदत्त शास्त्रीजी ने भी अपना लिखा उत्तर सुनाया और कुछ उस पत्र के सम्बन्ध में कहा इस पर छेदालाल जैन ने फिर खड़े- "होकर कहा इस पर भीमसेन शर्मा ने कहा, जैनियों को सभा के प्रारम्भ में कहने के लिये समय दिया गया इस पर तो जैनी प्रसन्न थे पर जब आर्य पण्डित बोल चुकें तब फिर भी पीछे बोलना चाहें तब आर्य पण्डितों ने कहा कि तुम जितनी बार बोलोगे, उतनी बार हम तुम्हारे पीछे अवश्य बोलेंगे । अन्त में यह हुआ कि दूसरे दिन अन्त में आर्य प्पण्डितों ने उनके उत्तर देकर जैनमत की पोल खोल ने का प्रारम्भ किया ( जिसको प्रमाण प्रमेय का झगड़ा डाल के अपने मत की गो- लमाल पोलपाल को दबाते थे कि हमारे मत पर विचार न चलनेपावे ) तब तो जै- 'नियों के मुख पर सफेदी आनेलगी इस दूसरे दिन के शास्त्रार्थ को जैन पण्डितों ने इस विचार से बोल चाल अर्थात् लिखा पढ़ी न होकर भाषा में बोलने में टाला था कि हमारे संस्कृत की अशुद्धियां सभा में प्रकट हो चुकी फिर लिखेंगे तो और भी अशुद्धियां निकलने से विशेष धूर होगी इसलिये भाषा में वोलकर समय पूरा करें परन्तु आर्यों की. इसमें भी चढ़ बनी अर्थात् प्रमाण विषय में यथावत् वर्णन किये पछि जैनमत की अच्छे प्रकार सभा को पोल दिखाई । पहिले दिन के शास्त्रार्थ से जैनियों ने अपने मत की हानि देखकर शास्त्रार्थ के स्वीकारकर्ता जैनपक्षी सेठ फूलजन्दजी को अनेक जैनों ने जा, २ कर धमकाया और कहा कि तुमने यह रोग हमारे और अपने पीछे क्यों लगा दिया हमारा मत जैसा है वैसा मानते हैं इस , 7 -- - - - ( २८ ) प्रकार अनेक जैनियो ने फूलचन्दजी को लज्जित किया इससे सेठ फूलचन्द जी दूसरे ही दिन से बीमार होकर घर में पड़ रहे और दूसरे दिन से सभा में नहीं आये थे । इस बात का अनेक सज्जनों को पूरा अनुभाव होचुका है कि जैन लोग अपने मत की चर्चा से ऐसे डरते हैं कि जैसे कोई काल से डरे । इससे पूकट है कि जैनि. यों के मत में अत्यन्त पोल है । इस दूसरे दिन के शास्त्रार्थ मे पृथम जैनियों ने अ- पना पत्र सुनाया तत्पश्चात् आर्यों ने चौथा पत्र सुनाया। '. आर्यों का चौथापत्र जैनियों के तृतीयपत्र के उत्तर में ॥ ओ३म् -तृतीयसङ्ख्याके पत्रे नवाशुद्धयः प्रतीयन्ते ताश्च शब्दशास्त्रोधी- भावन जाता इति निश्चितमेव । इदच तृतीयपत्रं पूर्वपेव दत्तात्तरम् । पुनश्चतदु- परि लेखः पिष्टपेषणवत्पतिभाति । तथापीदं ब्रूमः । याद विषयिरूपस्य प्रमाण- स्य स्वस्वरूपादचाञ्चल्यं तईि जिनजैनादिपदार्थानां विषयिरूपत्वं विषयरूपत्वं चा किं भवद्भिरङ्गीक्रियते ! । यदिविषयिरूपत्वमूरी क्रियते तन्न युष्मदुक्तपदार्थानां ममेयरूपत्वात्, इति पूर्वलेखन विरुध्यते यदि च विषयरूपत्वं तर्हि जिनजैनादिप- दार्थानां साध्यत्वात् भवन्मतमूलं युष्माभिरेवाप्रमाणीभूतं स्वीकृतमिति निग्रहस्था- नप्राप्तिः । अस्मन्मते तु प्रमाणस्य प्रामाण्यं स्वतः परतश्चेति मत्वा न क- श्चिद्दोष इति । इदानी च प्रमाणविषयको विचारः समाप्त इति भवत्पश्न- स्यावकाशाभावः। अस्माभिश्चादौ यः प्रश्नः कृतोऽस्ति तस्योत्तर भवद्भिः किमपि नो दत्तं त. स्योपरि विचारः सर्वस्मात् पूर्वं कर्तुं युक्तस्तस्य प्रयोजनरूपण निमित्तीभूतत्वात् । जनमतमूलं सप्रमाणकमप्रमाणकं वेत्यादिविचारे प्रवृत्ते जैनमतसमीक्षणं प्रमा- णेनैव भविष्यतीति प्रमेयरूपाज्जैनसम्पदायात्पूर्व प्रमाणं सेत्स्यत्येवेति । तत्रे विचार्यते-यदि जिनपदार्थः कश्चित्सनातनः सर्वज्ञो नित्यशुदबुद्धमुक्तखभावो नि- स्यैश्वर्यसम्पन्नस्तहितस्यैव सनातनसर्वनियन्त्रीश्वरस्य सिद्धावविरवादो निर- स्तः । यदि च कश्चित्कालविशेषोत्पनी जिनपदार्थोभिधेयस्तर्हि तस्याधुनिकस्या- नित्यत्वात्सर्वज्ञत्वादिगुणासम्भवेन तदुपासनमश्रेयस्करमित्यादयो दोषाः। .. ६० भीमसेन शर्मणः ह० देवदत्तस्यः भाषानुयाद-तीसरे पत्र में नव पशुद्धि निश्चित हुई हैं सो जैनियों के तीसरे पात्र -- A ( २६ ) Cirmanan 7 . के नीचे दिखा चुके है। वे अशुद्धियां व्याकरण का बोध न होने से हैं यह निश्चित ही है। यद्यपि इस तृतीयपत्र में जो विषय है उसका उत्तर हम- पहिले ही दे चुके हैं कि प्रमाण उस वस्तु का नाम है जिससे विषय को जाने यदि वह जानने योग्य विषय हो जायगा तो उसको प्रमेय कहेंगे प्रमाण नहीं कहे सकते फिर प्रमाण का निश्चय करना चाहिये यह कथन नहीं बन सकता। क्योंकि जो स्वयं प्रकाश स्वरूप हो और अन्य पदार्थ उसके प्रकाश से देखे जावें वह प्रमाण कहाता है जैसे एक दी- पक से अन्य पदार्थ देखे जाते हैं परन्तु उसी दीपक के देखने के लिये द्वितीय दीपक की अपेक्षा नहीं होती ऐसे ही प्रमाण वही है जिसको सिद्ध करने की अपेक्षा नही किन्तु वह स्वयंसिद्ध है। कहीं २ किसी प्रमाण का निश्चय करने पड़ता है तब उसको प्रमेय क- हते हैं किन्तु वह प्रमाण कोटि में नहीं कहाता । जब कोई मनुष्य किसी विषय को विचा- रना वा देखना चाहता है तब वह पहिले अपने नेत्र को निश्चय नहीं करने वैठता कि मेरे कै नेत्र हैं, कैसे हैं, मैं देख सकता हूं वा नहीं तथा न्यायाधीश जब न्यायालय में न्याय करने को उद्यत होता है तब वह यह नहीं विचारता कि जिस कानून से मै 'न्याय करूंगा उसी को पहिले निश्चय करलूंकि वह कानून ठीक है वा नहीं किन्तु 'कानून के अनुसार न्याय करने लगता है ऐसे ही मत विषय पर विचार होना चाहिये प्रमाण के निर्णय की कुछ आवश्यकता नहीं है। यह आशय पूर्व ही प्रकाशित किया गया था | इसलिये इस पर बार २ लिखना पिसे को पीसना है तथापि यह कहते हैं कि यदि विषयिरूप प्रमाण अपने स्वरूप से चलायमान नहीं होता तो जिननादि पदार्थों को आपने विषयरूप माना वा विषयिरूप माना है इन दोनों में आप क्या ठीक समझते हो ? । यदि कहो कि जिनजैनादिकों को विषयिरूप प्रमाण मानते हैं तो ठीक नहीं क्योंकि आप पहिले लिख चुके हो कि तुम्हारे कहे जिनजैनादि पदार्थ प्रमेयरूप विषय हैं इससे पूर्वापर वदतोव्याघात हो जायगा । यदि विषय- रूप प्रमेय मानते हो तो जिनजैनादि पदार्थों के साध्य होने से तुम्हारे मत के मूल को तुमने ही अप्रमाण मान लिया इससे तुम्हारा पक्ष पराजय स्थान में पहुंच गया ।ह- मारे मत में तो प्रमाण निश्चय स्वतः और परतः दोनों प्रकार होता है इससे कोई दोष नहीं आता। अब इस पूर्वोक्त सब कथन से प्रमाण विषयक विचार समाप्त हो गया क्योंकि तुमने पूछा था सो सब समझा दिया गया यदि इतने पर भी न समझो तो कुछ दिन विद्वानों की सेवा करो भौर पढ़ो तब प्रमाणविषय को पूछना । परन्तु तुमने - 4 (३०) जैन मत को ग्रहण किया तो उसको कुछ अच्छा समझ लिया होगा इसलिये हम को जो तुम्हारे जैनमत में शङ्का हे उन प्रश्नों का उत्तर दीजिये । हमारे पहिले प्रम का उत्तर तुमने अब तक नहीं दिया और हम आप के प्रमाण विषयक उत्तर बराबर देते श्राते हैं । ऐसे कहां तक टालोग | हमारे किये प्रश्न पर सब से पहिले उत्तर होना चाहिये क्योंकि सब प्राणिमात्र तथा विशेष मनुष्यों का यही प्रयोजन है कि हमको मुख मिले और दुःखो से छूटें । किसी मनुष्य को पूछिये सभी कहेगे कि यदि कोई क- ल्याण का मार्ग ठीक २ समझा देवे तो सर्वोत्तम है क्योंकि सुखकी प्राप्ति ही मुख्य प्रयोजन है । सुख की प्राप्ति अर्थात् मनुष्य का कल्याणकारी कौन मत है यही हमारा प्रश्न है। इसका उत्तर अब तक जैनियों ने नहीं दिया । जैनमत पर जब परीक्षा चलेगी कि जैनमत प्रमाणयुक्त वा अप्रमाण है इत्यादि विचार होने में जैनमत की समीक्षा प्र. माण मे होगी तो प्रमेयरूप जैन सम्प्रदाय से प्रमाण पहिले स्वयमेवसिद्ध होजायगा इस- लिये प्रथम जैनमत पर विचार होना चाहिये। उस जैनमत पर इस प्रकार विचार चलना चाहिये कि यदि जिन पदार्थ कोई सनातन,सर्वज्ञ,नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव और अ- विनाशी ऐश्वर्यवाला है तो वही सनातन सर्व नियन्ता ईश्वरसिद्ध हो जायगा ऐसा होने से अनीश्वरवाद स्वयमेव कट जायगा यदि कोई काल विशेष में सर्वज्ञ होने से उत्पन्न जिन पद का वाच्यार्थ होगा तो उस आधुनिक जिनके अनित्यत्वादि गुणों का प्रारम्भ है क्योंकि जो किसी समय विशेष में उत्पन्न होता है वह अपनी उत्पत्ति से पहिले हो- गये समाचारों को नहीं जान सकता ऐसा हो तो तब पिता के जन्म के समाचार को पुत्र भी प्रत्यक्ष कर लेवे सो असम्भव है इसलिये किसी समय विशेष में उत्पन्न हुआ पुरुष सर्वज्ञ नहीं हो सकता फिर ऐसे अल्पज्ञ जिनकी उपासन कदापि कल्याणका- रिणी नहीं हो सकती इसलिये यह जैन संप्रदाय अनेक दोषों से प्रस्त होने के कारण ग्राह्य नहीं हो सकता। इस प्रकार द्वितीय दिन आर्यों ने अपना पत्र सुनाकर जैनों को दिया और जैनियोंने पूर्वोक्त अपना पत्र सुनाकर पार्यों को दिया तथा कुछ भाषा में अपने २ पक्ष की ओर से दोनों पक्ष के पण्डितों ने कहा पश्चात् द्वितीय दिन का शास्त्रार्थ समाप्त हुआ । इस दिन भी शास्त्रार्थ होने वाद जैनियों की इच्छा नहीं थी कि अब फिर शास्त्रार्थ हो परन्तु आर्य लोग कव मानते थे उन्होंने ता० १७.को सन्ध्या से चार २ संदेशा भेजकर फिर जैनियों को खटखटाया,कि कल ता१८ को .

(३१) किस समय से शास्त्रार्थ होगा। और आर्यों की और पं. ठाकुरप्रसाद शास्त्री जी श्रागरे से आगये थे इस पर कई लोगों का विचार ठहरा कि पं० ठाकुरप्रसादजी आर्यों की ओर से बोलें और विशेष कर श्रीमान् लाला सोहनलाल जी रईस फीरोजाबाद की इच्छा थी कि पं० ठाकुरप्रसादजी भी बोलें तो ठीक हो अगले दिन ता० १८ को १ बजे से शास्त्रार्थ होना नियत हुश्रा सघ लोग नियत समय पर सभा में पहुंचे। प्रथम पं० ठाकु- रप्रसादजी शास्त्री को नियत करने का विचार चला इस पर जैनियों ने बहुत वाद वि- वाद चलाया उनकी इच्छा थी कि वादविवाद में समय कट जावे तो ऐसे ही फंद से छुटे वा आर्य्यलोग यह कह देखेंगे कि पं० ठाकुरप्रसादजी, फो न बोलने देओगे सो हम शास्त्रार्थ नहीं करेंगे तोभी हमारा कार्य सिद्ध होजावे सो आर्यसमाजस्थ उनको कब छोड़ते थे । अन्त में अनेक वादविवाद एक घण्टा तक होने पश्चात् दो बजे शा, सार्थ का प्रारम्भ हुआ। . आर्यों के चौथे पत्र के उत्तर में जैनियों का पांचवां पत्र ।। 1 पच्च पूर्वपत्रे भवद्भिरुटङ्कितं न लिखितप्रश्नानामुत्तरन्तु जातं भूयपिष्टपेषणवद्- मइति तन सम्यक् प्रमाणस्वरूपनिश्चितसङ्ख्ययोरभिमतप्रमाणलक्षणानां कस्मि- श्चिदपि पत्रे लेखनाभावाबहि तुलामन्तरेण चस्तुपरिमाणमुपलभ्यते तत् प्रामाण्यं स्वतः परतश्चत्यशिरस्कवचनं ब्रुवाणैयुष्माभिः क्रोडीकृतः प्रमाणविषयको विचा- रश्वरमवर्णध्वंसगत इति ॥ तदपि चित्रंखपुष्पिितवतप्रतीयमानत्वात् नहि कि- ञ्चित्पदार्थापेक्षया स्वतः परतइत्यङ्कितं युष्माभिरतोविरहादतिसाहसमात्रमेतत्क- थानमिति पश्यामः किं पुनर्वहुविडम्बनेन यच्च (यदि विषयिरूपस्य प्रमाणस्य स्वस्व रूपादचाञ्चल्यं तर्हि जिनजैनादिपदार्थानां विषयिरूपत्वंविषयरूपत्वं वा किं भव- द्भिरंगीक्रियते यदि विषयिरूपत्वमुरीक्रियते तन्न युष्पदुक्तपदार्थानां प्रमेयरूपत्वात् इतिपूर्वलेखेन विरुध्यते यदि च विषयरूपत्वं ताई जिनर्जनादिपदार्थानां साध्यत्वा- द्भवन्मतमूलयुष्माभिरेवाप्रमाणीभूतं स्वीकृतमिति निग्रहस्थानप्राप्तिरिति) तदपिवा- लभाषितं आम्राणां प्रश्नं कोविदारमाचष्ट इतिवत् प्रमाणनिरूपणावसरे भिन्नजिन- जैनादिनां विषयविषयित्ववरणनात् नहि साध्यो विषयो भवितुं नाईतीति यत्र रसा ध्यस्तत्ररविषयोति व्याप्तेरभावात् किञ्च जिनमतसप्रमाणमस्माकं परन्तु जिन- मतंप्रमाणमप्रमाणं चेति विकल्प प्रमाणपदस्य कः पदार्थो येन जिनमतं युष्माभिः - - (३२) - दृढं कारयिष्यामः नित्यत्वानित्यत्वादिकं च प्रमाणाधीनमिति भवद्भिः सविशेषण- माणादिः पूर्व कथनीयः ।। हैंपन्नालाल जैनधर्मिणा ह. छेदालाल जैनर्धामणः भाषांनुवाद-जो पहिले पत्र में आप ने कहा कि आप के लिखे प्रश्नों का उत्तर दे चुके फिर पिष्टपषण के समान कहैं सो आपका कहना ठीक नहीं प्रमाण का स्व. रूप और निश्चित संख्या और शास्त्रकारों के माने हुए लक्षणों को किसी पत्र में भी आपने नहीं लिखा तुला के विना वस्तु का परिमाण नहीं जाना जाता और उस प्रमा- णं की प्रमाणता स्वत: परतः इस विना शिर के वचन को कहनेवाले आपने स्वीकार किया कि प्रमाणविषयक विचार पूरा हुआ यह भी अत्यन्त आश्चर्य है क्योंकि यह कहना आकाश के फूलों के समान है काहेते कि आपने यह नहीं कहा किस पदार्थ की अपेक्षा से स्वतः और किसकी अपेक्षा से परत: इस युक्ति के विना इस आपके कथन को अतिसाहसपूर्वक समझते हैं बहुत विडम्बना से क्या है और आपने यह क- हा कि विषयिरूप प्रमाण अपने स्वरूप से चंचल नहीं तो जिनजैनादि पदार्थों को तुम विपयिरूप मानते हो कि विपयरूप, जो विषयिरूप मानते हो सो ठीक नहीं क्योकि आ- पके कहे पदार्थों को प्रमेयरूप होने से इस पूर्व लेख के संग विरोध है और जो वि- पयरूप मानते हो तो जिनजैनादि पदार्थों के साध्य होने से अपने मत का मूल आप- ने ही अप्रमाण स्वीकार किया यह निग्रह स्थान की प्राप्ति है यह आप का कहना भी बालक अर्थात् अज्ञानी कामा है क्योंकि पूछे आम बताये अमरूद इसके समान प्र- माण निरूपण समय में जिनजैनादि का विषयविषयित्व वर्णन करते हो और यह निय- म नहीं कि साध्य विषय न होसके क्योंकि जहां २ साध्य वहां २ विषय नहीं यह व्याप्ति नहीं और हमको तो जैनमत प्रमाण सिद्ध है परन्तु जिनमत प्रमाण है या श्र- प्रमाण है इस आप के विकल्प में प्रमाण पद का क्या अर्थ है जिससे आप को जिन- मत की दृष्टिता करावें और नित्य अनित्य का ज्ञान भी प्रमाण के आधीन है इससे तुम पहिले प्रमाण के स्वरूपादि कहो । आर्यों का पांचवां पत्र जैनियों के चौथे पत्र के उत्तर में ।। जैनानां पूर्वपत्रे व्याकरणानुसारतो दिगशुद्धयः श्रीमद्भिः । सर्वव्यवहाराणा प्रमाणपूर्वकत्वप्रमाणपूर्वकत्ववेत्ययुक्तमिति प्रतिज्ञातम् । एतद्वाक्यान्तर्गतमयुक्त- ५ -- -- - - . (३३) मिति सिपाधयिपितम् । व्यवहाराणां वैलक्षण्यादिति हेतुना । अत्रायं प्रश्नः व्यव- हारचलतण्यरूप हेतोः प्रमाणपूर्वकत्वमप्रमाणपूर्वकत्वं वेत्ययुक्तमिति वाक्यघटिता- युक्तत्वरूपसाध्यस्य च क व्याप्तिरस्ति, किं पुरुषोऽयुक्तत्वरूपसाध्याभावविशिष्टवि- लक्षणव्यवहारे न प्रवर्चते दृश्यते च सर्वेषाम्पुरुषाणां निष्टका सर्वत्र प्रवृत्तिस्तत्रा- युक्तत्वरूपसाध्याभावेन व्यवहारवैलक्षएयरूप देतोश्च सत्वेनायुक्तोयं हेतुः । निर- वच्छिन्नमूलधुमसत्ववन्हेरवश्यं भावनियमात् किञ्च व्याकरणशास्त्रोक्तदिशाने- कशुद्धिग्रस्तत्वेन पूर्वापरविरोधसद्भावेन चात्यन्तउपेक्ष्यो भवता लेखः। अशुद्धी- नामनेकत्वात् ताश्च समयान्तरे प्रदर्शयिष्यामः । विरोधश्चायं येन व्यवहाराणां भमाणपूर्वकत्वं तत्ममाणं किमिति प्रश्नस्य सार्थक्यादिति वाक्ये तत्पमाणं कि- मिति वाक्येन मश्नः कृतः, लिख्यते चाग्रे नास्माकम्प्रमाणस्वरूपादौ संशय इति रात्रिन्दिवयोरिवात्यन्तविरोधाक्रान्तत्वात् । अपि च सर्व व्यवहाराः प्रमाणनि- र्णयमकृत्वैव प्रवर्तन्ते नायं नियमः।प्रमाणानि च शास्त्रज्ञानवतांप्रमाणत्वेन ज्ञाता- जानि शास्त्राज्ञानवताच प्रमाणत्वेनाज्ञातान्यपि व्यवहाराप्रतिबन्धकानि भवन्तीति सम्मतम् । प्रमाणनिर्णयमनधिगम्यापि प्रवर्त्तन्ते च विद्वांसः प्राकृताश्च जना हहा- दिषु क्रयविक्रयव्यवहारे, भवद्भिरपिकतिप्रमाणानि कानि च तेषां लक्षानीति निर्णयमहत्वव पत्रलेखनं कृतं ततश्च सिद्धमेतत् यद्वादिनोः सभायां मतमाव- न्यदौर्षल्याभ्यां जयपराजयो निश्चीयेते । अथ तत्रैव चेदाग्रहः सभायामागत्य सद्विषयकाः प्रश्नाः क्रियन्तामित्यलं मुत्सु ।। ह० भीमसेन शर्मणः १० देवदत्त शर्मणः भाषानुवाद-आपने यह प्रतिज्ञा की कि यह बात अयुक्त है कि सब व्यवहार प्रमाणपूर्वक या अप्रमाणपूर्वक होते हैं इसमें प्रयुक्त साध्य है और व्यवहारो में वै- लक्षण्य हेतु है इसमें यह प्रश्न है कि व्यवहारवलक्षण्य हेतु की ओर अयुक्तत्वरूप साध्य की कहां व्याप्ति है क्या मनुष्य अयुक्तत्वरूप साध्य से विलक्षण व्यवहार में नहीं प्रवृत्त होता? सव मनुष्यों की सब जगह निःशंक प्रवृत्ति देखते हैं वहां अयुक्तत्वरूप साध्य नहीं और व्यवहारवैलक्षण्यरूप हेतु है इससे हेतु है अयुक्त है जहां पर्वत के मूल आकाश तक धूम हो वहां वन्हि के अवश्य होने का नियम है और व्याकरण की रीति से अनेक अशुद्धि और पूर्वापर विरोध होने से श्रापका लेख अत्यन्त N - 1 । - - , 1 (३४) - . । है। । उपेक्षा करने योग्य है वे अशुद्धि कालान्तर में दिखावेगे और विरोध यह है कि जिस- से व्यवहारों को प्रमाणपूर्वकत्व है वह प्रमाण क्या इससे प्रश्नसार्थक है - इसमें वह प्रमाण क्या इस वाक्य से प्रश्न किया और आगे जाकर लिखा कि हमको प्रमाण स्वरूपादि में संशय नहीं सो यह रात्रि दिन के समान अत्यन्त विरुद्ध है और यह नियम नहीं है कि सव व्यवहार प्रमाण निर्णय के विना किये ही प्रवृत्त हों और शा- स्त्रज्ञान वालों को प्रमाणरूप से नहीं जाने हुए और शास्त्र के अज्ञानियों को प्रमाण- रूप से नहीं जाने हुए भी प्रमाणव्यवहार के प्रतिबन्धक नहीं होते यह सम्मत है और प्रमाण निर्णय के विना किये भी विद्वान् और हट्ट आदि के लेने देने में प्राकृत जन प्रवृत्त होते हैं तुमने भी कितने प्रमाण और उनके क्या लक्षण यह निर्णय किये विना ही पत्र लिखा इससे यह बात सिद्ध हुई कि वादियों के मत की प्रबलता और दुर्बलता से ही जयपराजय का निश्चय होता है जो उसी प्रमाण निर्णय में आग्रह है तो सभा में आनकर उस विषयक प्रश्न करो विद्वानों में इतना बहुत विशेष-~-यह उक्त पत्र सभा मे सुनाया गया और जैन मत पर कुछ विशेष कहा गया तव पं० छेदालाल जैनी ने श्रीस्वामी दयानन्दसरस्वतीजीकृत सत्यार्थप्रकाश को लेकर कोई २ दोष दिखायें और कहा कि हमारे मत विषय में सब मिथ्या लिखा है सर्वदर्शनसंग्रह के पुस्तक में कुछ दिखाया कि यह जैन मत नहीं है इत्यादि कहा उसका यथोचित उत्तर दिया गया । जो २ वार्ता विना लिखी हुई है उन सबको यथावत् कोई नहीं कह सकता इसलिये सवका लिखना उचित नहीं है। यदि एक वचन वा प्रमाण का स्मरण हुआ और उसके सम्बन्ध की सब युक्ति वा प्रमाण लिखे जावें तो बहुत लेख वढ़जावे और ऐसा लेख करना उचित भी नहीं जान पड़ता है, इसलिये विशेष वढ़ाना ठीक नहीं (इस दिन भी शास्त्रार्थ होने वाद जैनियों की इच्छा नहीं थी कि अब फिर शास्त्रार्थ हो परन्तु आर्य लोग कब मानते थे) इस प्रकार - ठारह तारीख को ४ बजने में ५ मिनिट शेष रहे उस समय में शास्त्रार्थ का सारांश और जैन पण्डितों की कुटिलता पर और जैनमत की समीक्षा पर आर्य पण्डित कह रहे थे उसको सुनकर जैन बहुत लज्जित और उच्चस्वर से कहने लगे कि समय हो गया इस पर श्रीमान् चतुर्वेदी राधामोहनजी और श्रीमान् राय सोहनलालजी ने कहा कि अभी समय बाकी है हल्ला न करो, श्रीमान् चतुर्वेदी कमलापतिजी ने सम्पूर्ण शास्त्रार्थ द्रष्टा और विशेष कर राय सोहनलालजी की पूर्ण इच्छानुसार श्रीमान् पण्डित - 1 ।

, (३५) ठाकुरप्रसादजी के व्याख्यान होने के लिये सभा से निवेदन किया इन जैन लोगों ने किसी की एक न सुनी और एक साथ सभा से उठकर चल दिये । ( इससे शहर के प्रतिष्ठित रईसों को भी इनकी योग्यता अच्छे प्रकार प्रकट होगई सभा में को- लाहल मचजाने से वहां व्याख्यान न हुआ तात्पर्य यह था कि इस दिन इनकी पोल अच्छे प्रकार खोली गई कुछ शेष रही थी यदि बैठे रहते तो सभी इनकी पोपलीला प्रकट होजाती) आर्य लोग भी अपने २. घर आये सर्वसम्मत्यनुसार श्रीमान् राय साहब सोहनलालजी के स्थान पर ता० १८ को सन्ध्या. के ७ बजे पं० ठाकुरप्रसादजी शास्त्री का व्याख्यान जैनमत विषय पर ठहरा, तदनुसार सब नगर में विज्ञापन दिये गये, नियत समय व्याख्यान हुआ नगर के सभ्यों को बड़ी प्रसन्नता हुई पं० जी ने न्याय आदि शास्त्रों से जैनमत की अच्छे प्रकार समीक्षा की, सभा की समाप्ति में पं० सीताराम चतुर्वेदी मैनपुरी निवासी ने पार्यों की प्रशंसा कविताई में पढ़ी। - प्रोम - । - (दोहा)-सत्यासत्य विचारहित, भये विज्ञ एकत्र । वाक्यामृत की वृष्टि करि, सन्तोषे जन तत्रः।। कवित ईश अवराधक शुभसत्यता प्रकाशक अवगुणादिनाशक सुशासक विज्ञान के, देशगतिसुधाएँ वेदसम्मसप्रचारै वाक्य उचित उचाएँ नहिं प्राहाक धनदान के। विद्यानुरागी असत्य मत त्यागी ऐसे बड़भागी हितचिन्तक प्रजान.के, सीताराम पुलकित है पुनिरधन्यवाद देत कहां लगि गाऊं गुण आर्य्यमहान् के। आपका शुभचिन्तक सीताराम चतुर्वेदी मैनपुरी और उसी दिन अनेक आर्य लोगों ने नगर मे जहां तहां व्याख्यान देना प्रारम्भ किया इस व्याख्यान के पश्चात् आर्य लोगों को फिर वही चिन्ता लगी कि ता० १९ को कव से शास्त्रार्थ होगा। इसलिये एक पत्र सेठ फूलचन्दजी के नाम भेजा। ओ३म् सेठ फूलचन्दजी योग्य-आप कृपा करके वहुत शीघ्र उत्तर दीजिये कि कल - ..

~ शास्त्रार्थ का आरम्भ किस समय से होगा। प्रभात समय शास्त्रार्थ का निश्चय होने में बड़ी हानि होती है, इससे अभी शास्त्रार्थ का समय निश्चय करके सूचित कीजिये।। १८-३-८८ द० गङ्गाराम रात्रि के ८ बजे प्र० चैत्रसुदी ६ रवौ मन्त्री आर्यसमाजः फीरोजाबादः । इस पत्र का उत्तर सेठजी ने कुछ नहीं दिया और अनेक लोगों से जैनों की अन्तरङ्ग चर्चा सुनी गई कि अब जैन शास्त्रार्थ करना नहीं चाहते । तम ता०१५ को प्रातःकाल एक पत्र जैनियों के पास और भेजा गया कि:- ओम् श्रीयुत लाला मंजूलाल, प्यारेलाल, फूलचन्दजी जैनधर्मावलम्बियों को विदित हो कि हमारा आपका शास्त्रार्थ इसी समय आरम्भ होजावे. इसमें क्षणभर भी विलम्ब नहीं होना चाहिये, क्योंकि हमारे महाशय लोग बड़े २ कार्य को छोड़कर बहुत दूर से केवल इसी कार्य के लिये आये हैं यदि आप कहें कि हमारे मेले में हानि होती है और समय थोड़ा है तो हमको पहिले ही विज्ञापन क्यों नहीं दिया कि हम मेले के दिनों में शास्त्रार्थन करेंगे यदि आपको किसी विषय में प्रश्न करना हो तो सभा में ही आकर कीजिये यदि आप आज दश बजे से शास्त्रार्थ न करेंगे तो आपका पराजय समझा जावेगा, हम लोग अधिक प्रतीक्षान करेंगे इस पत्रका उत्तर तत्काल न देने से भी पूर्वोक्त व्यवस्था सिद्ध होगी। आपका कृपाकांक्षी- १९ । ३ । ८८ई० सोमवार मन्त्री-श्रार्यसमाज, फ़ीरोज़ाबाद इस पत्र का भी कुछ उत्तर नहीं दिया और न पत्र लिया ता० १९ से पत्र लेना भी बन्द कर दिया तव ता० १८ के संस्कृत के ५ वें पत्र का उत्तर संस्कृत में लिखकर भेजा गया सो भी नहीं लिया पीछे समाज के दो चार आदमी सज्जन लोग लेगये तब भी सेठ जी ने पत्र न लिया तव यह कहा गया कि आप पत्र नहीं लेते तो यह लिखा दीजिये कि हम पत्र नहीं लेते सो यह भी नहीं लिखा तव आर्य लोगों ने शहर के दो चार लोगों को (जो आर्यसमाज में वा जैन मत में नहीं थे) कहा कि आप इस पत्र को सेठजी के समीप ले जाइये। वे लोग लेगये तब भी पत्र नहीं लिया परन्तु आर्य गङ्गाराम वर्मा, - 1 1 1 ( ३७ ) -- लोगों ने उनको साक्षी कर लिया वह ऑय्यों ने भेजा छठा पत्र यह था कि:- - जैनियों के पांचवें पत्र के उत्तर में आर्यों का छठा पत्र ।। पूर्वप्रहितभावत्कपत्रे केवलं प्रमाणखरूपभेदविषयाणां प्रश्नो जातः । इतश्च ते प्रदर्शिताः । अधुनाप्रतिभाति चैतद्यद्भावत्कैस्तेषां लक्षणानभिज्ञैर्भूयते । अ- तश्च तानि प्रकारान्तरेण देवानां प्रियावगमाय पुनः प्रतिपाद्यन्ते प्रत्यक्षानुमा- नोपमानशब्दाप्रमाणानीति संख्याचतुष्टयविशिष्टं तार्किकसंमतं प्रमाणस्वरूपम्।। वैशेषिकराद्धान्ते प्रत्यक्षं चानुमानचेति प्रमाणद्वयम् । साङ्ख्ययोगयोश्चसिद्धा- न्ते प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानीति प्रमाणत्रयम् । पूर्वमीमांसकमतानुसारिणस्तु प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दैतिह्यापत्तिसम्भवाभावा अष्टौ प्रमाणानि मन्यन्ते । उत्तरमीमांसकास्तुव्यवहारदशायां ह्यष्टौ प्रमाणान्युररीकुर्वन्ति । लक्षणानि च प्रत्यक्षानुमानिक्यौपमानकीशाब्दीप्रमाणां करणं तत्तात्माणम् । यथाच प्रात्य- चप्रमायाः करणं प्रत्यक्षं प्रमाणमित्यादिधेपेलिमम् । अनिर्दिष्टप्रवक्तृकं पारम्पर्य- क्रमागतज्ञानुकरणमैत्तिह्यम् । अर्थादापत्तिरपत्तिः। यत्राभिधीयमानर्थे योऽन्योऽर्थः प्रसज्यते साऽर्थापत्तिः । सम्भवोनामाविनाभावितोऽर्थस्य सत्ताग्रहणादन्यस्य सत्ताग्रहणम् । अभावविरोध्यभूतं भूतस्यति । प्रदर्शितप्रमाणस्वरूपसंख्या लक्षणेषु, सत्यां विप्रतिपचौ अर्द्धघटिकापरिमितसमयेन सप्रमाणं प्रदर्शनीया । तुलामन्त- रेणेत्यारभ्य कथनीयेत्मन्तं पूर्वापरविरोधादनेकपराभूतिविशिष्टत्वात् सर्वथोपेक्ष्य: शिलकुलेखात्पलमतिपल्लवितेन । ह० भीमसेनशर्मणः १० देवदत्तशर्मणः भाषानुवाद-आप के पहिले पत्र में प्रमाण के स्वरूप, भेद और विषय का प्रश्न था इससे स्वरूपादि विषयों का उत्तर दिया गया। अब जान पड़ता है कि आप उन के लक्षणज्ञान से सर्वथा शून्य हैं इसलिये वे प्रमाण स्वरूपादि प्रकारान्तर से तुम को चोध होने के लिये दिखाये जाते हैं प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, माण नैयायिक सम्मत हैं। वैशेषिक शास्त्र में प्रत्यक्ष, अनुमान, दो प्रमाण माने हैं। साख्य और योगशास्त्र में प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम, तनि प्रमाण माने हैं। पूर्व मीमांसा में चारन्याय वाले,ऐतिय, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव पाठ प्रमाण माने । उसरमीमांसा में भी व्यवहार दशा में उक्त आठ प्रमाण माने हैं। प्रमाणों के लक्षण ये चार प्र- . ( ३८ ) inimmin प्रत्यक्षादि बुद्धियों का तत्तद्विषय में यथावत् होना प्रत्यक्षादि प्रमाण हैं इत्यादि प्रत्येक के लक्षण भी सस्कृत मे लिखे हैं। यदि इन लिखित प्रमाण के स्वरूपादि में कुछ सन्देह रहे तो प्रमाणसहित आध घड़ी में उत्तर दीजिये आगे जो तुम्हारे पञ्चम पत्र में "तुला- मन्तरेण." इत्यादि लेख है वह पूर्वापर विरुद्ध होने से अनेक प्रकार से तुम्हारा पराजय प्रकट करता है इसलिये उपेक्षणीय है इति शम्। यह पत्र न लिया और जैनियों के ओर के प्रबन्धकर्ताओं ने सभापति ज्वालाप्रसादजी से यह निश्चय किया कि अब शा- स्त्रार्थ करना बन्द करदिया जावे और जैनियों की ओर से यह न मालूम हो कि जैन लोग शास्त्रार्थ नहीं करना चाहते किन्तु उपद्रव के भय से प्रवन्धकर्ताओं ने शास्त्रार्थ होना बन्द कर दिया इस प्रकार का एक पत्र जैनप्रबन्धकर्ताओं ने बनाकर सभा- पति के हस्ताक्षर करा लिये पर आर्यप्रवन्धकर्ताओं के पास लाये तो इन्हों ने ह- स्ताक्षर न किये और कहा कि जैनी लोग यदि शास्त्रार्थ करना चाहें तो जैनी और आर्यों की ओर से दश २ आदमी एक स्थान में दश २ हाथ पर बैठे रहें बीच में पुलिस बैठी रहे कोई किसी से बोले नहीं वा कोई प्रतिष्ठित रईस प्रश्न करे उसका उत्तर अपनी २ विद्या वा मतानुसार दोनो पक्ष वाले उस रईस के प्रति देवे इत्यादि अनेक प्रकार निकल सकते हैं कि जिससे उपद्रव कदापि न होवे, परन्तु जैनों ने किसी की न सुनी शास्त्रार्थ करने से सर्वथा हट गये । इसके पश्चात् आर्य्य लोगों ने ता० २० को एक विज्ञापन शहर में दिया कि:- ओ३म् सर्व सज्जनों को विदित किया जाता है कि किसी कारण से न करने शास्त्रार्थ जैन भाइयों के हमारे विद्वान् पुरुष स्वस्थान को आज पधारेंगे इससे हम फिर भी १ घंटे का अवकाश जैनमतावलम्बियों को देते हैं कि शंकानिवारण या शास्त्रार्थ करना चाहें तो आकर करें वाद चले जाने विद्वानों के कहना उनका माननीय न होगा । प्र० चैत्र शु० ८ भौम दिन-२०-३-८८ ई० गङ्गाराम वर्मा मन्त्री, आर्यसमाज । फ़ीरोज़ावाद इसके पश्चात् सब लोग अपने २ नगरों को पधारे जो बाहर से आये थे। इस प्रकार शास्त्रार्थ समाप्त हुआ !! न - . V 4 ओ३म्तत्सत् जैनियों का प्रमाद ॥ st विदित हो कि जो शास्त्रार्थ वेदमतानुयायी और जैनमतावलम्बियों से नगर फ़ी- रोज़ाबाद में हुआ था उसका ठीक २ वृत्तान्त वोही महाशय कि जिनकी शास्त्रार्थ समय उपस्थिति हुई थी जानते होंगे और होने का कारण भी उन्हीं महाशयों पर प्रकट है कि जो यहां के रहनेवाले हैं ये दोनों बातें सत्य २ तभी सम्पूर्ण महाशयों पर विदित हो सकती हैं जब पक्षपात रहित द्रष्टा पुरुष लिखे या कहें, शास्त्रार्थ फ़ीरोज़ाबाद का सारांश जो मुंशी जगनकिशोर साहब ने छपवाया है वह बहुत ही सही यानी सत्य है जैसे मैंने अपनी अल्पबुद्धि से उसको सत्य समझा है ऐसे और भी महाशयों ने जो पक्षपातरहित होंगे समझा होगा, क्योंकि सत्य के कारण से किन्तु जैनी'महाशयों के शिर से अभतिक पक्षपात का भूत नहीं उतरा कहीं तो ऐसे गपोड़े हांकने लगे कि हमसे आN हार गये और हमारे प्रश्न का कुछ उत्तर न देसके इससे भी अधि- क प्रत्येक जैन मिथ्याभाषण करने लगे इनकी प्रपंचमय वार्ताओं को सुन आर्य पु- रुषों ने बहुत सहन किया तो भी पराजयभूषण जैनी अपना पराजय छिद्र दवाने के लिये ठौर २ और भी अधिक मिथ्याभाषण करने लगे इस पर मंत्री आगरासमाज ने प्रसिद्धिपत्र इस आशय का दिया कि यदि भब भी जैनी कुछ पुरुषार्थ रखते हों तो हम सर्वत्र जैनियों को सूचित करते हैं कि एक हफ्ते के अन्दर हमसे फिर शास्त्रार्थ करें। सज्जनो ! ध्यान की जगह है, गौर का मुकाम है, खयाल की बात है, बुद्धि की परीक्षा है यदि ये ऐसे ही सभाजीत थे तो क्यों न शास्त्रार्थ किया इनकी शास्त्रज्ञता तो भले प्रकार ३ दिवस के शास्त्रार्थ फ़ीरोजाबाद ही में प्रकट होगई थी कि पराज- यदल में ऐसा दवाव डाला कि' पत्र और विज्ञापनों से भी शास्त्रार्थ करने को समर्थ न हुए फिर ये किस बल से शास्त्रार्थ करते, जैनमतावलम्बियों ने शास्त्रार्थ फ़ीरोज़ाबाद जो छपवाया है उसको शास्त्रार्थद्रष्टा सज्जन लोग तो अवश्य २ ही सत् असत् को जान गये होंगे किन्तु मैं अपनी अल्पबुद्धयनुसार सर्व के ज्ञातार्थ प्रमाद से जो उन्हों ने विपर्याय छपवाया है उसको प्रगट करता हूं क्योंकि- चौपाई॥ अति संघर्षण करे जो कोई । अनल प्रकट चन्दन ते होई ॥ । . 1 (४०) - - + " जैनियों का प्रमाद प्रमाद प्रमाद प्रथम प्रमाद. श्रीस्वामी भास्करानन्दजी के विषय में जो छपवाया है यह उनका अति ही प्रमाद है स्वामी भास्करानन्द यहां से जब पधारे, तब पं० पन्नालाल का पत्र इस.श्रा- शय का आगया कि मैं इस समय नहीं आसकता मेरे पैर मे फोड़ो है जब पन्नाला- ल ने फोड़े का मिस किया तब सेठ साहबे, ने चतुर्वेदी, कमलापति साहब और उक्त स्वामीजी से यह कहा कि अव हमारा तुम्हारा शास्त्रार्थ मत, विषय, का मेले पर यानी ता. १५ मार्च सन् १८८८ ई० से अवश्य होगा इसको सर्वसज्जन भले प्रकार जानते हैं कि जब पन्नालाल न आये तो भी स्वामी-भास्करानन्दजी ने, १७ फरवरी को अपने व्याख्यान में यह कहा कि यदि अब भी कोई प्रतिष्ठित जैनी यह कहे कि हम कल या ता० १८ फरवरी १८८८ ई० को पं: पन्नालाल को अवश्य २. बुला लेंगे तो मैं कदापि बांकीपुर के शास्त्रार्थ में नहीं जाऊंगा चाहे मेरे पहुंचने के लिये वहां से तार आही गया है इसको किसी जैनी ने कल के लिये यानी ता० १८ फरवरी को स्वीकृत नहीं किया और सेठ फूलचन्द साहव ने यही कहा कि मेले पर हमारे पं० लोग अवश्य आवेगे, सज्जनो ! जब सेठ साहब ने किसी तरह से उस समय शास्त्रार्थ करना स्वीकृत न किया तब स्वामि भास्करानन्द सरस्वतीजी बांकीपुर को पधारे । २-प्रमादः॥ इनके पन्नों के उत्तर ठीक २ समय पर पहुंचते रहे यह लिखना भी प्रमाद से असत्य है बल्कि आर्यपुरुषों के दो पत्रों का तो जैनी. महाशयों ने उत्तर भी नहीं दिया और जैनियों ने किसी पन का उत्तर भी ठीक २ भले प्रकार नहीं दिया कुछ- का कुछ उत्तर देते रहे यह बात भी सर्वसज्जनों को विदित है । ३-प्रमाद ॥ पंडित भीमसेन शर्माजी और सेठ फूलचन्द साहब में जो नियम,नियत होगये थे उनके सिवाय कुछ भी न्यूनाधिक नहीं हुए, यह लिखना जैनियों का सर्वथा व्यर्थ है इनके लेख ही से इनका झूठ यानी मिथ्याभाषण सिद्ध होता है क्योंकि जब ये लिखते हैं कि न्यूनाधिक कर दिये थे सज्जनो ! ध्यान से देखिये कि यह इनकी कैसी प्रपंचयुक्त वार्ता है मानो जो न्यून होगये थे उनको बढ़ा के और जो अधि- ! ८ स 17 .

(४१) 1 h क होगये थे ,उनको दूर करके नियम क्यों न माने और यह लिखा है कि पं० भी- मसेन शर्मा अपने धर्म से कह देवें यही नियम ठहरे थे यह लिखना और भी जो । उक्त पं० जी के विषय में लिखा है बिलकुल असत्य ही है इसको सम्पूर्ण द्रष्टा शा- स्त्रार्थ सज्जन लोग भले प्रकार जानते हैं, भो विद्वज्जनो ! इनका पूर्ण सिद्धान्त नि- यमों का न मानना ही इनके लेख से सिद्ध होता है जब अनियम कार्य करना ही जैनी महाशयों को प्रिय लगता है तो इनके बीच में शास्त्रज्ञता की गंध मेरी भी अ- ल्पबुद्धि के अनुसार कोई विद्वान् नहीं कह सकता देखो नियम ही से सम्पूर्ण कार्य संसार के होते हैं अनियम से कोई भी नहीं होता है फिर अनियम ! कार्य कैसे हो स- कता है जब जैनी पं० शास्त्रार्थ के साधारण नियमों का होना मुख्य नहीं समझते तो शास्त्रार्थ करने की योग्यता इनमें कोई विद्वज्जन कब अनुमान कर सकता है जब जैनियों की इच्छानुसार आर्यपुरुषों ने पंच और सरपंच स्थान स्वीकार किया फिर किस प्रकार से आर्य्यपुरुषो का हठ इच्छानुसार नियम नियत होने का सिद्ध हो सकता है ?" ४-प्रमाद॥ मध्यस्थ के विषय मे हम जैनियों का अत्यन्त ही प्रमाद प्रकट करते हैं कि जिन- में शास्त्रार्थ और सभ्यता का व्यवहार किंचित् भी प्रकट नहीं जान पड़ता है आधु- निक आर्य और जैनियों के विद्वानों से भिन्न मतावलम्बी मध्यस्थ हो इस लेख से और भी अल्पज्ञता जैनी महाशयो की प्रकट होती है कि शास्त्रार्थ के प्रकार से होता है और उसके विशेष २ नियम सर्वोत्तम क्या हैं प० भीमसेनजी शर्मा, ने यह कदापि नहीं कहा कि हमारे सर्व विरोधी हैं और सत् असत् का निर्णय करनेवाला कोई नहीं है ऐसा अनर्थरूप लेख लिखना जैनी महाशयों की ही योग्यता है क्या आज आर्य, जैन, मुसल्मान, ईसाइयों के अनेक सम्प्रदाय हैं इनमें एक महाशय से पूछा जाय या सर्व से पूछ के जो सिद्धान्त निश्चय किया जाय तो कौन श्रेष्ठ होगा देखो श्रीमती महारानी विक्टोरिया आज कमेटी यानी वहुसम्मति पर ही सर्वकार्य करती हैं, ऐसे ही.पं. भीमसेन शर्मा का यह कथन था कि हमारे तुम्हारे लेखो को देख कर सर्व जगत् और सर्व विद्वान् जयाजय जान सकते हैं, ऐसे मध्यस्थ की कुछ इस शास्त्रार्थ में आवश्यकता नहीं, है, ऐसे मध्यस्थ की आवश्यकता जैनी महाशय समझ- ते हैं तो मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार शास्त्रार्थ करना वृथा था उसी मध्यस्थ से ही .

( ४२.) aaran.harmanane पूछ लिया जाता कि किनका सिद्धान्त ठीक और मत प्राचीन है विद्याहीन जैनियों का अपने दुराग्रह और अपना कपोलकल्पित जाल कटने के भय से यही आशय इनके लेख से सिद्ध होता है कि शास्त्रार्थ न हो जैनियों की मंदत्ता देखिये कि ये श्राधुनिक दयानन्दमतावलम्बी लिखना क्या इनको लज्जा नहीं आती है यदि ऐसे ही पं० थे तो इन शब्दों को सभा मे क्यों नहीं सिद्ध किया जब पं. भीमसेनजी शर्मा ने यह कहा था कि अगर तुम वेद को कपोलकल्पित आधुनिक आर्य और दयानन्दमतीय सिद्ध करदो तो हमारा तुम्हारा इस पर शास्त्रार्थ सही इस कहने पर इनके मुख बन्द होगये कुछ उत्तर न दे सके, प्रियवरो इन जैनी पं० को सिवाय मिथ्या प्रलाप के कुछ विशेष नहीं आता, सज्जनो ! शास्त्रार्थ दो प्रकार से होता है एक तो मुखद्वारा दूसरा लेखद्वारा लिखित शास्त्रार्थ के जयाजय के ज्ञाता सर्व विद्वान् और सर्व जगत् होता है और सुखद्वारा के शास्त्रार्थ के द्रष्टा वे ही लोग होते हैं जो तत्काल उपस्थित हों मध्यस्थ प्रबन्धकर्ताओ का होना अवश्य चाहिये क्योकि जिससे शास्त्रार्थ समय कोई पक्ष नियमविरुद्ध प्रतिकूल कार्य न करे । ५-प्रमाद ॥ सज्जन पुरुषो! इनका, धर्म से ज्यों का त्यो इस पुस्तक के लिखने में प्रमाद और मिथ्याभाषण प्रगट करता हूं एक लघु वात यह है कि पं० पन्नालाल ने शास्त्रार्थ के पत्रो में अपना नाम अनुस्वार लगाकर कई पत्रों पर लिखा था इसको सर्व सज्जन । शास्त्रार्थद्रष्टा भले प्रकार जानते हैं यदि किसी महाश्त्य को प्रत्तीत न हो तो मैं स पन्नालाल के लेखो को दृष्टिगोचर करा सकता हूं फिर ज्यों के त्यों धर्मपूर्वक ले। कोई भी जैनी और जैन पं० सिद्ध कर सकता है, क्या मिथ्याभापण को ही जैसे की पंडितो ने धर्म समझ लिया है इनका इस विषय में सम्पूर्ण लेख मिथ्याभापण औ पक्षपात की अनेक व्याधियों से अभिग्रस्त है । ६-प्रमाद॥ जैनी पंडितों को व्याकरण का पूर्णवोध न होने से उन्होंने अपने पत्रों में वि- शेप अशुद्धियां का और आर्य पं० ने अपने प्रत्येक पत्र में इनकी अशुद्धियों की ग- णना प्रगट की और सभा में पं. भीमसेनजी शर्माने यह भी कहा कि जैनी पं० यह कहैं कि ये अशुद्धियां हैं या पछि शुद्धि बना ले तो इसी समय हम अशुद्धियों को जैनी पं० के संमुख व्याकरणशास्त्र से सिद्ध कर सकते हैं, इस पर व्याकरण - 4 .

( ४३ ) . शून्य जैनी पं० ने कुछ उत्तर न दिया और शास्त्रार्थ जो छपवाया है उसमे लिखते हैं किं पाय्यों के पत्रों मे भी अधिक अशुद्धियां हैं यह लिखना कैसा अज्ञानता से निर्मूल है जैनियों के सम्पूर्ण पत्रों को देखकर सर्व को इनका झूठ और भी अधिक प्रतीत होगा कि जैनी महाशयों ने पत्रों में तो कहीं अशुद्धियों की चर्चा भी नहीं लिखी और न इनके लेख से जो पत्रो में है यह सिद्ध हो कि कोई अशुद्धि है फिर अशुद्धि- यों के विषय मे लिखना सर्वथा व्यर्थ ही है, जैनी महाशयों के लेख से यह बात सर्व सज्जनो को विदित होजायगी कि अपनी अशुद्धियो को बना लेना और आर्यों के पत्रों में मिथ्या अशुद्धियां प्रगट करना इस एक ही लघु बात से सिद्ध है जो मैं पं० ' पन्नालाल सा० के हस्ताक्षरों के विषय में पूर्वी लिख चुका हूं और छठा पत्र तो जैनी महाशयों ने अपने अत्यन्त प्रमाद की प्रबलता से मन माना लिखदिया है सभा में तो इस पत्र को नहीं दिया और न आर्यसमाज में भी किसी के हस्तगत होके भेजा यह बात इनकी मिथ्या प्रपंच की नहीं है , जब यह नियम था कि एक २ पत्र दोनों पक्षवाले एक दूसरे को देदें फिर छठा पत्र किस प्रकार से जैनियों का अधिक आना कोई विद्वान् कब अनुमान प्रमाण कर सकता है ? ।। ७-प्रमाद । मैं अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार जैनियों के प्रत्येक विषय के लेख का स्थूल बातों में ही प्रमाद प्रगट करता हूं, जब इनके लेख से यह सिद्ध है कि हमारे और इन के परस्पर यह वास ठहरी थी कि संस्कृत के लेखानुसार भाषानुवाद करके सभा कों सुना दिया करेंगे, सज्जनो! ध्यान कीजिये इन लेखों के भाषानुवाद कों कि यह संस्कृत का ही अनुवाद हैं ? उस पर भी यह अधिकता कि प्रमाद से परामर्श का पीछातो पांच २ या छ: २ पृष्ठ तक न छोडा कहीं की ईंट कही के रोड़े का उदाहरणं पूरा दरसाने लगे और अपने लेखों में विरोधाविरोध का भी ध्यान न रहा, सज्जनो इन के संस्कृत. लेखों पर अच्छे प्रकार ध्यान देना चाहिये कि परामर्श सत्यार्थप्रकाश और सर्वदर्शनसंग्रहादि के पृष्ठ और पंक्तियों को लिखना इनके पत्रों के कौन से शब्द के अर्थ से प्रगट होता है, यदि यही भाषानुवाद संस्कृत का हो तो अपनेसम्पूर्ण प्रन्थ और सप्तभंगी न्याय का जैनियों ने पूरा उल्था क्यों न लिख दिया, प्रियवर जैनियों! तुम्हारे इन झूठ मूठ के लड्डुओं के खाने से क्षुधा न दूर होगी कहीं सत् के संमुख असत् और आधुनिक जो जैनमत है वह ठहर सकता है शंकराचार्यादि प्राचार्यों की - (४४) 4. ! H सहस्रों फटकारों के लजाये हुए जैन यानी बौद्धमतावलम्वी हठ और दुराग्रह को अभी तक नहीं छोड़ते पक्षपात की पगड़ी को सिर पर और खींच २ के बांधते ही जाते हैं यह अाधुनिक मत तुम्हारा पीछा तभी छोड़ेगा जब सत् सनातन वेदधर्म का ग्रहण कर पक्षपात की पगड़ी को खूटी पर रख सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान् की शरण लोगे तभी तुम सच्चे तत्त्वज्ञानी होगे, प्रियवर ! इस आधुनिक जैनमत के असत्य ज्ञान. को कल्याणकारी समझ क्यों अपना जीवन व्यर्थ गमाते हो ।। ५-प्रमाद॥ जैनियों का पं० ठाकुरप्रसादजी के विषय मे लिखना अति ही असत्य यानी मिथ्याभाषण है ऐसे असत्य लेखों के लिखने में जैन यानी बौद्धमतावलम्बियों को लज्जा भी नहीं आती यह न ध्यान दिया कि हमारे मिथ्या लेखों को शास्त्रार्थद्रष्टा लोग देखकर कितना पश्चात्ताप करेगे और हमको झूठे का दादा ठहरावेंगे जो, पुरुष एक चात झूठ बोलता है और उसके छिपाने के लिये १०० बात झूठ यानी असत्य भाषण करता है परन्तु असत्य के कारण से अन्त में असत्य ही रहता है इसको अच्छी तरह शास्त्रार्थदृष्टा लोग जानते हैं कि इन बातों में से एक भी बात शास्त्रार्थ के समय में जैनी पं० ने नहीं की कि यदि जैनी पं० यह कहे कि पं० ठाकुरप्रसाद आर्य नही हैं इस वात को सब सज्जन पुरुप जानते हैं कि पं० ठाकुरप्रसादजी ने अपने व्याख्यानो में यह कहा था कि जो आर्य न होगा वह तो गैर आर्य होगा मैं सोन के पत्र पर रजिस्टरी करा सकता हूं कि मैं आर्य हूं, सज्जनो ! देखो यदि आर्य न होते तो आर्यसिद्धान्त के सभासद् क्यों होते बड़े पश्चात्ताप का विषय है कि जब समान संख्या दोनो पक्ष के पंडितो की है तो भी पं० ठाकुरप्रसादजी से क्यो न शास्त्रार्थ किया जव समान समय तक दोनों पक्षों को लिखने और कहने का अधिकार है फिर जैनी महाशयों को क्या भय था यह पं० ठाकुरप्रसादजी का कथन इस वात पर अपने व्याख्यानो में सर्व के ज्ञातार्थ हुआ जव शास्त्रार्थ करके जैनी पं० पेच में पहुंचे तव बहुत पुरुपों ने यह कहा कि तुम्हारा बड़ाभारी अपवाद इस बात से हुआ जो ने पं० ठाकुरप्रसाद से शास्त्रार्थ करना स्वीकृत नहीं किया तव जैन पण्डितो ने उन पुरुषों को यह उत्तर दिया कि पं० ठाकुरप्रसाद आर्य नहीं हैं इससे हमने उनसे शास्त्रार्थ नहीं किया उन पुरुपों ने आकर समाज में कहा जैनियो का संपूर्ण लेख इस विषय का अनेक मिथ्याभाषण की व्याधियो से अभिग्रस्त है और जैन यानी बौद्धम- - (४५) हठ - - तावलम्बियों ने असत्य भाषण ही अपना धर्म समझ रक्खा है, इनके धर्मग्रन्थो का भी यही.. आशय है कि जैसे कोई वस्तु है और नहीं है और कह भी नहीं सकते कि है या नहीं ऐसे ही असत्य ग्रन्थों के संस्कार प्रबल होने से जैनी महाशयों को मिथ्याभाषण और करने का असाध्य रोग ही होगया है. इनके ग्रन्थों में ऐसा असत्य भाषण लिखा है कि विद्वानों को अत्यन्त ही पश्चात्ताप इनके विद्याहीन प्राचार्यों पर आता है कि कोई प्रमाण. किसी वस्तु का अनुमान करके नही लिखा जो मन मे आया अप्रमाण लिख मारा जैसे ४८ कोस का जूआ और ८ कोस का बिच्छू १६ कोस का कलसा ४० अक्षरों में एक एक पुरुष का आयु जो सहस्रों वर्षों का एक वर्ष ऐसे ही अनेक मिथ्याभाषण इन के ग्रन्थों में है कि जिनको देखकर बुद्धिमानों को अति ही ग्लानि इस आधुनिक मत से होती है ॥. ६-प्रमाद॥ जैनियों ने जो चतुर्वेदी कमलापतिजी के विषय में लिखा है वह सर्वप्रकार अ- सत्य ही है इसको समस्त शास्त्रार्थद्रष्टा पुरुष अच्छे प्रकार जानते हैं कि सभापतिजी का कदापि यह कहना नही था कि हमारा जयपराजय पं.० ठाकुरप्रसादजी ही पर, है पं०,ठाकुरप्रसादजी के व्याख्यानार्थ कहा था कि पांच मिनट शास्त्रार्थ समय में ही से चाहे श्रार्य पंडितों के ही समय में से लेकर दिया जाय क्योंकि सम्पूर्ण शास्त्रार्थद्रष्टा पुरुषों की आकांक्षा उक्त पं० जी के व्याख्यान सुनने की है इसको सुनकर पराजय मूर्ति जैनी बहुत घबराय क्योकि अन्तिम समय ३० मिनट आर्य पंडितों ही का था कि जिसमें इनकी सारी पोलें इनहीं के ग्रन्थों से सुनाई थी कि जिससे बहुत लज्जित हुए और यों कहकर कि हमारी तोहीन होती है संभा से भाग गये फिर पत्र और विज्ञापनों के देने से भी शास्त्रार्थ करने को उपस्थित न हुए, सज्जनो ! इसमे किसका पराजय विदित होता है ।। १०-प्रमाद॥" महाशयो । जैनी पंडितों के प्रमाद की प्रबलता और मिथ्याभाषण का मकर जाल देखियेगा कि पं० छेदालाल के लेख से विदित है कि मैंने पं० भीमसन से यह कहा कि यह श्लोक हस्ताक्षर करके हमको दे दो क्योकि इससे हमारे मत पर मिथ्या आक्षेप किया है बड़े पश्चात्ताप का समय है कि आज दीर्घ यांनी बहुत समय सत्यार्थप्रकाश को बने होगया है किसी पं. जैनी ने मिथ्या आक्षेप का स्वामीजी - t ( ४६ ) 3 L महाराज पर दावा न किया क्या पं० छेदालाल साहब उत्तरायण और दक्षिणायन ध्रुव की यात्रा को चले गये थे; जो' अब गाढ़निद्रा से जगे और एक श्लोक पर नाक उठाकर देखने और कहने लगे, प्यारे जैनियो ! तुम्हारे आधुनिक मत का' तो खण्डन श्री १०८ स्वामी दयानन्दसरस्वतीजी ने अपने संत्यार्थप्रकाश के १२ वें समुल्लास में खूब प्रकटकर दिखाया' यदि ये पोलें जो उक्त समुल्लास में लिखी हैं सत्य नहीं हैं तो दावा तोहीन का क्यों न किया ?, क्या सर्वत्र जैनियों को मोति- याविन्द का रोग हो गया था कि जिससे आजतक न सूझा और बैठिकाने "की वेसरी दो चार बातों को कहकर इन भोले भाले जैनी महाशयों को क्यों ठगते हो और अपने को पंडितों की गणना में कहते हो क्यों इस पंडित शब्द को भी अपने नाम में लगाकर लज्जित करते हो अजी लालाजी आप अपने यथा नाम तथा गुण ही पर संतोष करो दुराग्रह और मिथ्याभाषण के व्यवहार को छोड़ो सदैव सत्यसनातन वातों को ग्रहण करो कि जिससे व्यवहार और परमार्थ सिद्ध होना चारित्र कहाता है अर्थात् जिन मत से भिन्न प्राचार्य सब सर्वथा अवद्य (निन्दनीय) और उनके निन्दित मंतों का त्यागना चारित्र कहाता है.। और जिनोक्त तत्त्वों मे रुचिवाली वाणी प्रियपथ्य और तथ्य कहाती है यह वाणी चारित्र से सम्बन्ध' रखती है यही कात इनके सूत्रों से भी सिद्ध होती है कि जिन भिन्न कुगुरु का संग करने से विषैले सर्प का काटना भला है। क्या ही आश्चर्य है कि पं० छेदालालजी ने ऐसे २ सूत्रों को छिपाकर और पूर्वापर अपने मत का विचार न करके केवल वितण्ड्य किया है। स्वामी- जी महाराज ने अवद्य शब्द का अर्थ सब प्रकार निन्दनीय किया है. सो जैनमत को पूर्वापर देख के किया है इससे बहुत ठीक है यदि स्वामीजी अनवद्य पाठ- सम- मते तो उसका अर्थ भी वैसा ही करते जब पाठ अनक्द्य लिखा और अर्थ. अवद्य, का किया तो निश्चय है कि यह भल लेखक की वा छापे, की है । क्योंकि इसी पुस्तक में ( यान्यनवद्यानि कर्माणि ) यहां अनवद्य का अर्थ अनिन्दनीय किया है. इससे स्पष्ट हुआ कि चारित्र प्रकरण में अवद्य ही पाठ है जैसे जैनियो की प्रि- यतथ्य वाणी के विषय मे जैन देवगुरुतत्त्वज्ञान उपदेशक में लिखा है कि: कर्ताऽस्ति नित्यो जगतः स चैकः स सर्वगः सन् स्ववशः स सत्यः । इमाः कुहेयाः कुविडम्बनाः स्युमन्ता न तासामनुशासकस्त्वम् ॥ इस जगत् का कर्त्ता नित्यव्यापक अपने सामर्थ्य मे श्राच्छादन करनेवाला वह सत्य है यह कुविडम्बना (नीचंचुद्धि) त्यागने योग्य हैं उनका मानने वा कहने वाला तू -- - प L.

(४७) - १ - (जैनी) नहीं है। अर्थात् नित्यच्यापक जगत्कर्ता ईश्वर को मानना जैनों का काम नहीं। जैन पण्डितो की द्वितीय शङ्का यह है कि स्वामी ( दद्यानन्दसरस्वती ) जी ने जो सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि "लक्ष्यते येन तल्लक्षणम्" जिससे लक्ष्य जाना जाय उसको लक्षण कहते हैं जैसे आंख से रूप जाना जाता है, सो ठीक नहीं क्योंकि लक्षण का स्वरूप नेत्र को नहीं कह सकते । इसका उत्तर यह है कि नैयायिकी परि- पाटी यह है कि:--- अव्याप्त्यतिव्याप्त्यसम्भवदोषाग्रस्तत्वे सति लक्ष्यस्वरूपबोधकत्वं लक्षणत्वम् । । जिसमें अव्याप्ति अतिव्याप्ति और असम्भव दोष न हो और लक्ष्य पदार्थ का . खरूप जलानेवाला हो उसको लक्षण कहते हैं । यहां जैसे नेत्र से रूप का बोध होता है। इसमें नेत्ररूप लक्षण में अव्याप्ति दोष इसलिये नही कि नेत्ररूप के साथ च्याप्त है अतिव्याप्ति इसलिये नहीं कि नेत्र से रूप भिन्न लक्ष्यमात्र का बोध नहीं होता । नेत्ररूप का प्रहण असम्भव भी नहीं और लक्ष्यरूप का बोध नेत्र से होता है। इस कारण रूप का लक्षण नेत्र को कहना असगत नहीं है । लक्षण के सा- मान्य स्वरूप मे शब्द वाक्य सूत्र आदि लक्षण कहे जाते हैं । जैसे प्रमाण शब्द का व्याकरणानुसार यही अर्थ है कि जिससे प्रमेय को जाने निश्चय करें वैसे लक्ष धातु के दर्शन ( ज्ञान ) अर्थ से गन्धादि विषय ज्ञान के साधन होने से ज्ञानेन्द्रिय लक्षण हो सकते है इसमें कोई बाधा नहीं । इसको न समझ के लिखा है तीसरे दिन के शा- सार्थ में पं० छेदालाल जैनी ने सत्यार्थप्रकाश पर तीन शङ्का बलपूर्वक की थीं । यद्य- 'पि दूसरे दिनके शास्त्रार्थ में श्रार्यों के पण्डितों ने कह दिया था श्रीस्वामी दयानन्दसर खतीजी हमारे मत के प्रवर्तक नहीं हैं किन्तु हमारा सनातन वैदिक मत है स्वामीजी के लेख पर जो कोई आक्षेप होगा वह वैदिक मत पर नहीं समझा जावेगा किन्तु स्वामीजी भी एक आप्त सनावनधर्मोपदेशक थे इसलिये हम लोग उनको वेदोक्त धर्मोपदेशक मानते हैं तुम लोग आर्यों के मन पर जो शङ्का करना चाहो वेद पर करना इस पर जैनियों ने कुछ न ध्यान दिया और इस विचार से कि वेद पर कहने का कुछ साम- र्थ्य नहीं तथा स्वा० द० जी के सत्यार्थप्रकाश का खण्डन करें जिससे अन्य आर्य- ( हिन्दू.) लोग भी आर्यसमाज से तथा सत्यार्थप्रकाशादि से घृणा करेगे और हमारी प्रशंसा करेंगे तथा बहुत जैन लोग भी सत्यार्थप्रकाशादि से जैन मत के गपोड़े देखर आर्यसमाजस्थ होगये हैं सो सत्यार्थप्रकाश का खण्डन करेंगे तो जैनी लोग सत्यार्थप्र- , .

( ४८ ) काश को देखने से घृणा करेंगे और हमारी प्रशंसा होगी कि हमारे पं० ने सत्यार्थप्र- काश का खण्डन कर दिया, इन तीनों शङ्काओं का उत्तर भी उसी दिन की सभा में यथोचित दे दिया गया था तथापि जैनियों ने अपनी शङ्का और बढ़ाकर छपवाई कि जितना तत्काल नहीं कहा था और हमारी ओर से जो २ कहा गया था सो कुछ नहीं छपाया यह पक्षपात नहीं तो क्या है। उचित तो यही था कि शास्त्रार्थ मे जो लेखबद्ध विषय हुआ था उतनाही शा- स्त्रार्थ के नाम से छपाते और विशेष छपाना होता सो अलग पीछे से छपा देते। पर यह काम धर्मात्माओ का है, सब का नहीं । अब सुनिये-सत्यार्थप्रकाश सम्बन्धी तीन शंकाओं में पहिली यह है कि " पृष्ठ ४२९ पं० ३ सर्वथानवंद्य योगानां " इसमे स्वामीजी ने अवद्य को अनवद्य लिखा है इस पर पं० छेदालाल तथा अन्य जैनियो ने वड़ा कोलाहल मचाया है कि स्वामीजी ने अज्ञान से वा कपट से शंका कोटि से उठा- के तौतातितीको सिद्धान्त कोटि में रख दिया है। इस पर विचार यह है कि वास्तव मे (सर्वथावद्ययोगानां) ऐसा ही पाठ ठीक है क्योंकि (वदितुमयोग्यमवद्यम् ) (अवधपण्य इस सूत्र से पूर्वोक्त अर्थ सिद्ध होता है जो कहने योग्य नहीं हो उसको अवध कह- ते हैं तो उक्त श्लोक का अर्थ यह होगा कि (जो कहने योग्य न हो उसका त्याग- चारित्र कहाथा है वह अहिंसादि भेद से पांच प्रकारका है) अब प्रश्न यह है कि अ- वद्य नाम अयोग्य का क्या अर्थ हुआ तो जैनमत के सव पुस्तकों अर्थात् मुख्य सिद्धा- न्तों से यही निश्चित है कि जिन मत से भिन्न तत्त्वों का अनुसन्धान करना और जिन मत से भिन्न प्राचार्य सब कुगुरु हैं उनका त्याग, यह विद्वान् का दोष नहीं है किन्तु समझने वाले का दोष है पाठ का यह काम है कि जब उनकी समझ में न आवे तो दूसरे स्थलों में देखते हैं जैसे स्वामीजी महाराज ने सत्यार्थप्रकाश के पृष्ठ ६६ में ( लक्षणप्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः ) इसका अर्थ बहुत सरल किया है कि जैसे गन्ध- वती पृथिवी । जो गन्धवाली है वहं पृथिवी है अर्थात् गन्ध पृथिवीं का लक्षण है ।। जैनियों का तृतीय उपालम्भ यह है कि तौतातियों के पूर्वपक्ष को लेकर स्वामी- जी ने जैनमत का खण्डन किया है सो ठीक नहीं क्योंकि वह जैनमत नहीं । सर्वज्ञो वीतरागादिदोषस्त्रैलोक्यपूजितः । यथास्थितार्थवादी च देवोऽहन्परमेश्वरः। सर्वज्ञो दृश्यते तावन्नेदानीमस्मदादिभिः । दृष्टोन चैकदेशोस्ति लिङ्ग यो वानुमापयेत् ।। .

- ( ४९ पढ़ा था इन दोनों वचनों को स्वामीजी ने जैनमत के वर्णन में लिखा है। इनमें से पहिला श्लोक छेदालाल जैन ने शास्त्रार्थ में और कहा कि हम सर्वज्ञ ईश्वर को मानते हैं और द्वितीय श्लोक तौतातिती नास्तिकशिरोमणि का है। इसको छ- दालाल ने अपना प्रतिपक्षी कहा है सो यह ठीक नहीं क्योंकि तौतातिती यद्यपि किसी अंश में अर्हन्तदेव का भी खण्डन करता है इसीलिये माधवाचार्य ने सर्व- दर्शनसंग्रहस्थ जैनमत में तौतातिती को पूर्वपक्ष में लिया है परन्तु मुख्य कर तौ- तार्तिती वैदिकमतानुयायियों का प्रतिपक्षी है अर्थात् नित्य सर्वज्ञ ईश्वर को वेद म- तानुयायी लोग मानते हैं उसी का (न चागमविधिः कश्चिन्नित्यसर्वज्ञबोधकः) इत्या- दि वचनों से खण्डन किया है जैनी लोग जिस अईन्देव को सर्वज्ञ मानते हैं उसको वे नित्य नहीं कह सकते क्योंकि उनका मुख्य सिद्धान्त यही है कि अनादिसिद्ध सनातन ईश्वर कोई नहीं किन्तु अर्हन्देव वा आदिदेव जब उत्पन्न हुए तब सम्यग्ज्ञा- नादि से सिद्ध होगये उन्हीं को सर्वज्ञ ईश्वर मानते हैं सो बीच में उत्पन्न होने वाला सर्वज्ञ भी नहीं हो सकता क्योंकि उसकी उत्पत्ति से पहिले अपने पिता पिता- महादि का हाल नहीं जान सकता और सिंद्ध होने पहिले बाल्यावस्था का अपना ही चरित्र नहीं जान सकता और सर्वज्ञ उसी को कह सकते हैं जो अतीतानागत व. न्तमान सब समय में एकरस कूटस्थ व्याप्त हो के सब को जाने सो ऐसा ईश्वर आ- र्यों का. मन्तव्य है जैतादि का नहीं लोगों को बहकाने के लिये जैसे ईसाई लोग ईश्वर का अनेक प्रकार वर्णन करते २ अन्त मे ईसामसीह पर तान तोड़ते हैं ऐसी.. ही कुछ चाल जैनियो की हैं मानते तो एक-बीच के उत्पन्न हुए शरीरधारी को हैं उसके विशेषण सर्वज्ञादि हों। यह असम्भव है इसीलिये तौतातिती ने बीच में हुए भी किसी को ईश्वर नहीं माना इससे वह नास्तिकशिरोमणि और जैनियों का बड़ा भ्राता है अर्थात् अनादिसिद्ध सनातन सृष्टिकर्ता ईश्वर के न मानने में जैनी और तोता- तिती दोनो एक ही हैं इसी अभिप्राय से स्वामीजी ने दोनों को साथ ही लिखा है इस से जैनो का आक्षेप ठीक नहीं है । ११-प्रमाद सज्जनो ! इन जैनियों के मिथ्याभाषण की अधिकता देखियेगा कि जिसके लिखने से ये प्रमाद की गठरी हो जचते है, जैनी पं० लिखते है कि आर्यों को अस- मर्थता तो पहिले से ही शास्त्रार्थ विपय मे थी आज शास्त्रार्थ के प्रारम्भ समय से तो क्षात ही हो गई कि प० देवदत्तजी की जगह पं० ठाकुरप्रसाद शास्त्रार्थ करेंगे, . । -- (५०) 1 न्यायशील सज्जनो! इसको क्या असमर्थता का कारण कोई विद्वान् अनुमान प्रमाण से समझ सकता है, देखिये जब कोई पुरुप किसी विशेष कारण या रोगादि या स- मानसंख्या की गणना से किसी कार्य को न करे तो क्या असमर्थ समझा जायगा कदापि नहीं, ख्याल कीजिये जब समान संख्या दोनों पक्ष के पण्डितों की है और समान ही समय तक उभयपक्ष को कहने का अधिकार है फिर इससे तो असमर्थता आर्यों की कोई न्यायशील नहीं कह सकता, यदि जैनियों की असमर्थता नहीं थी तो आर्यों के प्रश्न का उत्तर क्यो नहीं दिया और मतविषयक शास्त्रार्थ क्यों न किया, इस से जैनी महाशयो तुम्हारा पराजय तो सर्वजगत् तथा सर्वविद्वानों को तुम्हारे लेख ही से विदित हो गया कि न तो साधारण नियम जो शास्त्रार्थ समय अवश्य मा- ननीय हैं उनको और न मतविषयक शास्त्रार्थ करना, अब तुम्हारे इन असंगत लेखों को कोई विद्वान् प्रमाण न करेगा । १२-प्रमाद ।। शास्त्रार्थ वन्द होने में जैनियों की असमर्थता ही प्रगट होती है यदि ये असमर्थ न होते तो क्या पत्र और विज्ञापनों से शास्त्रार्थ न करत और उपद्रव का मिस करके शास्त्रार्थ बन्द करना यह जैनियों की कातरता नही है ? यह इनके लेख ही से विदितः है कि धन्य है ऐसे न्यायमार्गी सभापति को कि जिन्होंने दोनों पक्ष को समष्टि से देखा और न्याय मार्ग पर आरूढ़ होकर न्याय किया जब सर्वोत्तम न्यायका श्रीमान् चतुर्वेदी ज्वालाप्रसादजी और प्रवन्धकर्ताओं को कहा और प्रबन्ध की उत्तमता यहां तक लिखी कि नियत प्रबन्ध से इधर उधर न चलने दिया बड़े पश्चात्ताप का समय है इन जैनी महाशयो की बुद्धि पर कि ऐसे न्यायशील प्रवन्धकर्ताओं के न्याय में भी उपद्रव होने का दोप आरोपण करने लगे तो जो प्रबन्धकी अपने न्याय से किसी पक्ष को इधर उधर नहीं चलने देते थे फिर ऐसे न्यायशील प्रवन्धकर्ताओं के संमुख अन्याय और उपद्रव का होना किस प्रकार से सम्भवित है इससे जैनियों की पूर्ण असमर्थता सिद्ध होती है और प्रमाद की प्रबलता देखियेगा कि श्रीयुत चतुर्वेदी राधामोहनादि और भी प्रतिटिन रईसों ने उपद्रव होता जान शास्त्रार्थ होना बन्द किया, इन असंगत लेखो के लिखने में जर्नी महाशयो को लज्जा नहीं आती जब यह ठीक यानी सत्य ही था तो सर्व प्रकार रईसों के हस्ताक्षर क्यों न करा लिये, जो पत्र शास्त्रार्थ बन्द होने के पिय से छापा है वह तो जैनी महाशयों के लेख ही से अप्रमाण सिद्ध होता है जब पत्र पांच की राय से और हस्ताक्षर केवल सभापति ही के हैं कब सम्पूर्ण प्रचन्धकर्ताओं ( ५१ ) का माना जा सकता है जबतक दोनों पक्ष के प्रवन्धकर्ता अपनी राय पर हस्ताक्षर न करें कब समस्त प्रबन्धकर्ताओ की ओर से माननीय हो सकता है, यदि यह लेख सभा- पतिजी ने प्रबन्ध करने की अपने में असमर्थता देख दिया तो पांच की राय प्रकट करना उचित न था केवल अपनी राय प्रकट कर सकते थे, मेरी अल्पबुद्धि में तो इस लेख से मी जैनियो की असमर्थता और अल्पज्ञता विदित होती है सर्व सज्जनों की सेवामें जैन आधुनिक मत की आधुनिकता प्रकट करता हूं आजतक आर्यावर्त देश में प्राचीन समय से सर्व ऋपि मुनि और सम्पूर्ण विद्वान् चार वेद उपवेद और ६ शास्त्रों की प्राचीनता ही ( अन्यदेशी तक भी यानी लन्दन और जर्मनादि ) विदित करते हैं और जैनी महागय इन सतशास्त्रो को मानते नहीं जब प्राचीन और अनुकूल बातों ही को नहीं ग्रहण करते फिर आधुनिकता तो इनकी सर्व पर विदित होगई इनके ग्रन्थो का किसी सत्शास्त्र में नाम तक नहीं और इन के प्रामाणिक ग्रन्थो में पुराणादिक तक के नाम और कथा लिखी हैं जव पुराण वाले भी वेद को सनातन अनादि मानते है फिर तो जैनमत बहुत ही नवीन और आधुनिक सिद्ध होगया अब हम जैनियो की अविद्वत्ता सिद्ध करते है यदि ये प्राचीन और विद्वान् होते तो पाणिनि ऋपिकृत व्याकरण और गोतम ऋापेकृत न्याय कदापि नहीं मानते जो कुछ ग्रन्थ इनके आचार्यों ने बनाये हैं इधर उधर की बाते लेकर और मनमानो बुद्धि लड़ाकर ऐसी कपोलकल्पित असन् गाथा लिख मारीं कि जिससे यह सूमा कि यह जाल शीघ्र कट जायगा इससे अ- पने शिष्य और मतावलम्बियों को यही शिक्षा की कि अन्य मतवालो को अपन ग्रन्थ न सुनाना न दिखाना यह आधुनिक और असगत कथाओं का कारण क्या नहीं सिद्ध होता है जब इनके ग्रन्थों में अन्य मतवालों के साथ न बातचीत क- रना और न उनका कुछ सहाय करना और न जीवरक्षा की वस्तुये बनाना इत्यादि निषेध लिखा है जैसा कुआँ बाग तालाव आदि फिर यह पूर्ण जीवरक्षक कैसे सिद्ध हो सकते हैं हां यह हम कह सकते हैं कि और आधुनिक मतो से इन मे जीवरक्षा कुछ विशेष है, कहांतक इनकी असङ्गत बातें और आधुनिकता लिखें इनकी असत् गाथाओं का तो वारापार नहीं इससे सज्जनों के विलोकनार्थ कुछ विदित करके लेखनी को विश्राम देता हूं और सज्जनो की सेवामे प्रतिज्ञा करके कहता हूं कि इनका सम्पूर्ण लेख जो शास्त्रार्थ फीरोजाबाद में छपा है अनेक पज्ञपात और मिथ्याभापण की व्याधियो से ग्रस्त है इसको कोई सज्जन माननीय नहीं कह सकता है। इति ॥ सर्व सज्जनों का कृपाभिलापी- गङ्गारामवर्मा, मन्त्री-श्रार्यममाज, फीरोजाबाद. ६

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+ - ओ३म् वेदविरुहमतखण्डनोऽयङ्ग्रन्थः* Pe.. श्रीमत्स्वामिदयानन्दसरस्वतीनिर्मितः 1 १ तच्छिष्यभीमसेनशर्मकृतभाषानुवादसहितः T अजमेरनगरे वैदिकयन्त्रालये मुद्रितः 4 सम्मतिरत्रवेदमतानुयायिपूर्णानन्दस्वामिनः 1 संवत् १९६२ वि० 7 T २ भाद्रपद शुक्ल T डाकव्ययसहित चतुर्थवार छपा १०००' J मूल्य : --

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ओ३म् -- अथ वल्लभादिमतस्थान्प्रति प्रश्नाः खण्डनं च । १ } 2 , । १-(प्र० ) कोऽयं वल्लभोनाम कश्चास्यार्थः ४ ॥ २-( उ० ) वल्लभोऽस्मदाचार्यः प्रियत्वगुणविशिष्टोऽस्यार्थः ।। ३-(प्र०) किमाचार्यत्वं नाम भवन्तश्च के ? ॥ ४-( उ०) गुरुराचार्यः, वयं वर्णाश्रमस्थाः ।। ५-(प्र० ) किं गुरुत्वमास्ति ।। ६-( उ० ) उपदेष्टुत्वमिति वदामः ॥ ७-(प्र. ) स बल्लभो धर्मात्मनां विदुषां प्रिय उताधर्मात्मानां मूर्खाणां च ? ॥ ८-( उ० ) नाचः कुतो भवतां सर्वेषान्तु धर्माचरणविद्यावत्त्वाभावात् । किन्तु क- श्चित्तादृशोऽस्ति । न चरमोऽधर्मात्मनां मूर्खाणां तत्र प्रीत्या स एवाश्रेष्ठः स्यात्' स्वजाति १-(प्र० ) वल्लभनामक पुरुष कौन है और इस शब्द का अर्थ क्या है ? २-( उ० ) वल्लभ हमारा आचार्य है इस वल्लभ शब्द का अर्थ प्रीति गुण- युक्त प्यारा है ।। ३ (प्र०) आचार्यपन क्या है और आप कौन हैं ? ।। ४-( उ० ) गुरु को आचार्य कहते हैं और हम लोग वर्णाश्रम धर्मस्थ हैं ।। ५-(प्र०) गुरुपन क्या वस्तु है १ ॥ ६-( उ० ) उपदेश करना इस को लोग गुरुपन कहते हैं । ७-(प्र० ) वह वल्लभनामी पुरुष धर्मात्मा विद्वानों को प्रिय है अथवा अधर्मी और मूों को प्रिय है ? ॥ ८-(उ०) आद्य पक्ष अर्थात् धर्मात्मा विद्वानों को वह प्रिय नहीं हो सकता क्योंकि आप सब लोगों का धर्माचरण और विद्यावान होना संभव नहीं किन्तु कोई वैसा है। द्वितीयपक्ष इसलिये ठीक नहीं कि वल्लभ मूरों को प्रिय हो तो उस में मूरों की प्रीति होने से वह ही अश्रेष्ठ समझा जावे क्योंकि अपने २ सजातीय में प्रीति होने का प्रवाह प्रसिद्ध है अर्थात् हम ? - वेदविरुद्धमतखण्डन ।। परत्वप्रवाहस्य विद्यमानत्वात् । भन्यच्च सजीवान्प्रति सर्वेषां प्रीतेः सत्त्वान्मृताश्च प्रति प्रीते- रभावान्नैप्फल्याच्च तत्र वल्लभत्वमेव दुर्घटम् । मृतस्याचार्यत्वकरणासंभवात् । “समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रहानिष्ठङ्गुरुं समुपगच्छेदिति" श्रुतेर्वतमानागिप्रायत्वात् । “उपनीय तु यश्शिष्यम्वे- दमध्यापयेद् द्विजः । सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य्यम्प्रचक्षत" इति मनुमतविरोधात् ॥ मरणानन्तरमध्ययनाऽध्यापनयोरशक्यत्वात् शरीरमात्रसंबन्धाभावाचेति युक्त्या तस्मिन्ना- चार्यत्वमेवासगतम् ।। तथा च मृतम्प्रति प्रीतिरशक्या निष्फला च ॥ तत्र प्रियत्वगु- णविशिष्टवचनत्वमप्यसड्गतन्तस्य भ्रान्तिनिष्ठत्वात् ।। ९-(प्र. ) किड्गुरुत्वं सत्योपदेष्टुत्वमाहोखिदमत्योपदेष्टुत्वञ्च ? ॥ १०-(उ० ) नादिगः कुतो भवत्सु श्रोत्रियब्रह्मनिष्ठत्वासत्त्वादस्तिचेन्न सङ्गच्छते विषयसेवायां प्रीतेर्दर्शनात् ।। "मर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयत" इति मनुसाक्ष्यविरो- विद्वानों की विद्वानों में और मूरों की मूों में प्रीति विशेष होती है। और भी देखो कि जी- वितों में सब की प्रीति होने, मरे हुओं में न होने और मरों में प्रीति करना भी निष्फल होने से उस पुरुष में वल्लभत्व अर्थात् प्रियपन होना ही नहीं घट सकता और मरे हुए को गुरु करना भी असम्भव है,। वेद में लिखा है कि वेदवेत्ता ब्रह्मज्ञानी गुरु के पास हाथ में समिध लेके जावे इस से सिद्ध है कि मरे हुए के पास में समिध ले के जाना असम्भव है और “जो यज्ञोपवीत करा के कल्पसूत्र और वेदान्त सहित शिष्य को वेद पढ़ावे उसको आचार्य कहते है" इस मानवधर्मशास्त्र की सम्मति से भी वल्लभ का आचार्य- त्व होना विरुद्ध है मरने पश्चात् पढना पढाना आदि जो आत्मधर्म है वे नहीं हो सकते क्योंकि इन धर्मों का शरीरमात्र से सम्बन्ध नहीं है इस प्रकार की युक्तियों से वल्लभ को आचार्य मानना ही असङ्गत है । इसी कारण मरे से प्रीति करना अशक्य और निष्फल है और वल्लभ के भ्रान्तिग्रस्त होने से उस को प्रियत्व गुणयुक्त कहना भी भसगत है। ९-(प्र० ) गुरुपन क्या वस्तु है ? क्या सत्योपदेश करना वा असत्य उपदेश करना भी गुरुपन कहाता है ? ।। १०-~(उ०) प्रथम पक्ष अर्थात् सत्योपदेश करना रूप गुरुत्व नहीं घटता क्योंकि सत्योपदेष्टा गुरु तुम में इस से नहीं हो सकते कि आप लोगों में वेदवेत्ता और ब्रह्म- ज्ञानी जन नहीं है यदि कहो कि है तो तुम्हारा कहना असगत है क्योंकि तुम लोगों की प्रीति विषयों की सेवा में प्रसिद्ध दीखती है। धर्मशास्त्र में कहा है कि अर्थ और १ वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ ३ धाद्भवतामर्थकामेष्वेवासक्तेः प्रत्यक्षत्वात्स्त्रीषु धनेषु चात्यन्तप्रीतर्विद्यमानत्वान्मरणसमयेपि स्वशिष्याणां वक्षःस्थलस्योपरि पादं स्थापयित्वा धनादीनां पदार्थानां संग्राहकत्वाद्यथा मृ- तकस्य शरीरस्य वस्त्राऽऽभूषणादीम्पदार्थान् कश्चिद्गृह्णाति भवतान्तेन तुल्यत्वाच्च । नान्त्यः ॥ असत्योपदेशस्यानभिधानाद्वयोर्दुःखफलस्य प्रापकत्वाच्च ।। स्वपुत्रादीप्रति पितुर्गुरुत्वाऽधिकारादन्यान्प्रतिगुरुत्वाभिमानानभिधानाद्भवत्सु गुरुत्वस्य विरहएवेत्यवगन्त- व्यम् ।। "निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ॥ सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरु- रुच्यत" इति मनुसाक्ष्यविरोधादविवाहितस्त्रियां वीर्यानिषकस्य पापफलत्वाच्चेति ॥ भवन्तो वर्णाश्रमस्थाश्चेत्तर्हि वेदोक्तानि वर्णाश्रमस्थकर्तव्यानि कर्माणि कुतो न क्रियन्ते क्रियन्ते चेन्मूर्तिपूजनं कण्ठांधारणन्तिलक समर्पणं वेदानुक्तमंत्रोपदेशञ्च त्यजन्तु नोचेद्वेदोक्तधर्मा- चरणविरोधाद्भवन्तो वर्णाश्रमस्था एव नेति मन्तव्यम् ।। काम में जो आसक्त नहीं उन के लिये धर्मज्ञान का विधान है। इस से विरुद्ध आप लोगों की आसक्ति द्रव्य और काम चेष्टा ही में प्रसिद्ध है। स्त्रियों और धनों में तुम्हारी अत्यन्त प्रीति प्रत्यक्ष विद्यमान है और मरण समय में भी अपने शिष्यों की छाती पर पैर रख कर धनादि पदार्थों का संग्रह करते हो और महाब्राह्मण वा चाण्डालादि के तुल्य मृतक के वस्त्र आभूषणादि पदार्थों को लेते हो इस से महाब्राह्मण के तुल्य हुए । और द्वितीय पक्ष असत्योपदेश करने से भी वल्लभगुरु नहीं हो सकते क्योंकि असत्यो- पदेश से गुरु मानना शास्त्र विरुद्ध और दोनों गुरुशिष्य दु.ख फलभागी होते हैं । अ- पने पुत्रों के प्रति गुरु होने का मुख्य अधिकार पिता को है । अन्य किसी का स्वयमेव गुरु बन बैठने का धर्म शास्त्र में विधान न होने से आप लोगों में गुरुत्व कदापि संघ- टित नहीं हो सकता । धर्मशास्त्र में कहा भी है "जो विधिपूर्वक गर्भाधानादि कर्मों को करता और अन्नादि से पालन करता है वह ब्राह्मण गुरु कहाता है" इस से अन्य को गुरु मानना विरुद्ध है। और अविवाहित स्त्री में गर्भाधान करना पाप इस मुख्य कर पिता ही गुरु हो सकता है ! यदि आप लोग वर्णाश्रमधर्मस्थ अपने को मानते हैं तो वर्णाश्रम के कर्तव्य वेदोक्त कर्म क्यों नहीं करते ? यदि करते हो तो पापाणादि मूर्तिपूजन, कण्ठी बांधना, तिलक लगाना, समर्पण कराना और वेद में न कहे हुए मंत्रों का उपदेश करना छोड देवो यदि ऐसा नहीं करते तो वेदोक्त वर्णाश्रमधर्म के आच. रण से विरुद्ध होने से आप लोग वर्णाश्रमधर्मरथ नहीं हो सकते यह निश्चय जानना ܀ से चाहिये।

४ ? वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ ११-(प्र० ) भवन्तो गुरवः शिष्या मध्यस्था वा ? १२-( उ० ) गुरवश्चेदर्थज्ञानपूर्वकान्वेदान्पाठगालाकृत्वा कुतो नाध्यापयन्ति ? शिष्याश्चत्कथं न पठन्ति ? मध्यस्थाश्चेब्राह्मणाचार्याभिमानो भवत्सु व्यर्थोऽस्तीत्यवग- न्तव्यम् ॥ १३-(प्र० ) भवन्तो वेदमतानुयायिनस्तद्विरोधिनो वा ? ॥ १४-( उ० ) यदि वेदमतानुयायिनस्तर्हि वेदोक्तविरुद्धं स्वकपोलकल्पितं वल्ल भसप्रदायमन्यं वा किमर्थ मन्यन्ते ? वेदविरोधिनश्चेन्नास्तिकत्वं शूद्रत्वञ्च किमर्थं न स्वीक्रियते ? | "नास्तिको वेदनिन्दक." "योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।। स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशुगच्छति सान्वय” इति मनुसाक्ष्यविरोधात् ।। पुनर्हि जन्ममरणव- तो देहधारिण कृष्णादीजीवानीश्वरत्वेन किमर्थ व्यवहरन्ति ? नो चेन्मन्दिरे जड़मूर्ति स्थापनकृत्वा घण्टादिनादरूचाज्ञानिनां मिथ्योपदेशव्याजेन धनादीन्पदान्किमर्थमाह- रन्ति ? ॥ १५-(प्र० ) भवन्तः स्वस्मिन्कृष्णत्वं मन्यन्त उत मनुष्यत्वम् ? ।। ११-(प्र. ) आप लोग गुरु शिष्य वा मध्यस्थ हो ? ।। १२-( उ० ) यदि गुरु हो तो पाठशाला कर अर्थज्ञानपूर्वक वेदों को क्यों नहीं पढ़ाते ? यदि शिष्य हो तो क्यों नहीं पढ़ते ? । यदि मध्यस्थ हो तो आप में ब्राह्मण और आचार्य होने का अभिमान व्यर्थ है यह निश्चय जानना चाहिये ।। १३-(प्र०) आप लोग वेदमतानुयायी हो वा वेदमत के विरोधी हो ? ॥ १४-( उ० ) यदि वेदमतानुयायी हो तो वेदविरुद्ध अपने कपोलकल्पित वल्लभ वा अन्य संप्रदाय को क्यों मानते हो ? । यदि वेदविरोधी हो तो अपने को नास्तिक और রহ্মরা में क्यों नहीं मानते ? यही धर्मशास्त्र में लिखा है कि "वेदनिन्दक ही नास्तिक होता है " और " जो वेद को न पढ़ के अन्य ग्रन्थों में परिश्रम करता है वह अपने कुटुम्बसहित जीवते ही शूद्र हो जाता है " इस से नास्तिक और शूद्रकक्षा के योग्य हो ! फिर जन्मने मरने वाले श्रीकृष्णजी आदि देहधारी जीवों में ईश्वर का भाव का व्यवहार क्यों करते हो ? यदि कहो कि हम श्रीकृष्णादि ईश्वर नहीं मा- नते तो मन्दिरों में उनकी जड़मूर्ति स्थापन और घण्टादि वजा कर उपदेश के छल से मज्ञानियों के धनादि पदार्थ क्यों हरते हो?॥ १५-(प्र०) आप लोग अपने में कृष्णपन की भावना करते हैं वा मनुष्यपन की ! ।।

वेदविरुद्धमत्तखण्डन ।। १६-( उ० ) कृष्णत्वं मन्यन्ते चेद्यादवक्षत्रियाभिमानित्वं कुतो न खीक्रियते तादृशः पराक्रमो भवत्सु कुतो न दृश्यते कृष्णस्तु परमपदं प्राप्तो भवन्त' कथजीवनव- न्तश्च ॥ मनुष्यत्वं चेत्तर्हि स्वोत्तमाभिमानस्त्यज्यताम् ॥ १७-(प्र० ) भवन्तो वैष्णवा उतान्ये वैष्णवाश्चेत्कीगर्थो वैष्णवशब्दस्य खी- क्रियते ? ॥ १८-( उ० ) विष्णोरयं भक्तो वैष्णव इति वदाम इति चेन्नैवशक्यन्तस्येदमि- ति सूत्रस्य सामान्यार्थे वर्तमानत्वाद्विष्णोरयमित्येतावानर्थो ग्रहीतुं शक्यो विशेषार्थग्रहण- स्य नियमाभावात् ॥ यथा भवद्भिर्भक्त शब्दो गृहीतस्तथाविष्णोरयं शत्रुः पुत्रः पिता प्र. भावश्शिष्यो गुरुश्चेत्यादयोऽर्था अन्येनापि ग्रहीतुं शक्या अतो भवत्कृतोऽर्थोऽनुचितः ॥ १९--(प्र. ) भवद्भिर्विष्णुः कीदृशो गृहीतः ।। २०-( उ० ) गोलोकवैकुण्ठवासी चतुर्भुजो द्विभुजो लक्ष्मीपतिर्देहधारीत्यादिति वदाम इति चेद् व्यापकत्वं त्यज्यताम् ॥ चतुर्भुजादिकं मन्यते चेत्सावयवत्वमनित्यत्वन १६-(उ०) यदि अपने को कृष्ण मानते हो तो यादव क्षत्रियों के युद्धादि सब कामों को क्यों नहीं ग्रहण करते ? श्रीकृष्णजी के सदृश पराक्रम आप लोगों में क्यों नहीं दीख पड़ता है। श्री कृष्णजी तो परमपद को प्राप्त होगये आप लोग कैसे जीव- ते बने हो ? और वदि अपने को मनुष्य मानते हो तो अपने को उत्तम मानने का अ- भिमान छोड़ देओ ।। १७-(प्र. ) आप लोग वैष्णव हो वा अन्य ? । यदि वैष्णव हो ता वैष्णव शब्द का अर्थ कैसा स्वीकार करते हो ? ॥ १८--- ( उ० ) यदि कहते हो कि विष्णु का भक्त वैष्णव है तो ठीक नहीं क्योंकि व्याकरण के ( तस्येदम् ) इस सूत्र से विष्णु का सम्बन्धी रूप सामान्य अर्थ ग्रहण होता है भक्तिविशेष रूप अर्थ लेने में कोई नियम नहीं जैसे आप लोगों ने विष्णु का सम्बन्धी भक्त रूप अर्थ का ग्रहण किया वैसे कोई विष्णु शब्द के शत्रु, पुत्र, पिता, प्रभाव, शिप्य, गुरु मादि अर्थों का ग्रहण कर शत्रु आदि को भी वैष्णव कह- सकता है । इसलिये आप लोगों का कल्पित अर्थ ठीक नहीं हो सकता ॥ १९--(प्र०) आप लोगों ने विष्णु को किस प्रकार का समझा है ? ।। २०-( उ० ) यदि गोलोक, वैकुण्ठ, का निवासी, चतुर्भुज द्विभुज, लक्ष्मी का पति देहधारी कहते हो तो व्यापक होना छोड़ो यदि चतुर्भुजादि आकृति वाला मानते ? . J ६ वेदविरुद्धमनखएडन ।। खीक्रियतामीश्वरत्वञ्च त्यज्यताम् ॥ कुतः संयोगमन्तरासावयवत्वमेव न मिद्धयति संयो- गश्चानित्यस्तस्माद्भिन्नएवेश्वर इति स्वीकारे मङ्गलन्नान्यथा। ईश्वरस्य सावयवत्वग्रहणं वेदवि- रुद्धगेव । “सपर्यगाच्छुक्रमकायगव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धमित्यादि" श्रुतिविरोधात् ॥ २१-(प्र. ) कण्ठीतिलकधारणे मूर्तिपूजने च पुण्यं भवत्युतापुण्यम् ? ।। २२-( उ० ) पुण्यं भवति न च पापमिति ब्रूमः ।। स्वल्पकण्ठी तिलकधारणे म्- र्तिपूजने च पुण्यं भवति चेत्तईि कण्ठीभारधारणे सर्वमुखशरीरलेपने पृथिवीपर्वतपूजने च महत्पुण्यं भवतीति मन्यताक्रियताञ्च ॥ तत्र वेदविधिप्रतिष्ठाया अभावान्न क्रियत इति जल्पामः ।। वेदेषु तु खलु कण्ठीतिलकधारणस्य पाषाणमूर्तिपूजनस्य च लेशमात्रोपिविधिः प्रतिष्ठा च न दृश्यते । अतोमवत्कथनं व्यर्थमेव ।। २३-(प्र०) किं प्रतिष्ठात्वन्नाम ? ॥ २४- ( उ० ) पाषाणादिमूर्तिषु प्राणादीनाह्य तत्र स्थापनमिति बूम इति नैवं हो तो सावयव उत्पत्ति धर्मवाला अनित्य मानो और उस में ईश्वरत्व छोड़ो । क्योंकि संयोग के विना सावयव होना नहीं सिद्ध होता और संयोग अनित्य है इस से संयोग वियोग वाले से भिन्न को ईश्वर मानने में ही कल्याण है अन्यथा नहीं और ईश्वर को सावयव मानना वेद विरुद्ध ही है । वेद में कहा है कि ईश्वर शरीर छेदन और नाड़ी आदि के बन्धन से रहित शुद्ध निष्पाप सर्वत्र व्यापक है इससे तुम्हारा कहना विरुद्ध है। २१--(प्र० ) कण्ठी तथा तिलक धारण और मूर्ति के पूजने में पुण्य होता है वा अपुण्य । २२-( उ० ) पुण्य होता है पाप नहीं ऐसा कहते हो सो ठीक नहीं क्योंकि य- दि थोड़े कंठी तथा तिलक के धारण और मूर्तिपूजन में पुण्य होता है तो बहुत कंठियों का भार लादने चन्दन से सब मुख और शरीर के लेपन करने तथा सम्पूर्ण पृथिवी और पर्वतों के पूजने में बड़ा पुण्य होता है ऐसा मानो और करो । यदि कहो कि पृथि- वी और पहाड़ के पूजने के लिये वेद में प्रतिष्ठा का विधान न होने से नहीं करते तो वेदों में कंठी तिलकधारण और पाषाणमूर्तिपूजन का लेशमात्र भी विधान नहीं और न प्रतिष्ठा का कहीं नाम है इस लिये आपका कथन व्यर्थ है ।। २३-(प्र० ) प्रतिष्ठा करना क्या वस्तु है ? ।। २४-- ( उ० ) यदि कहते हो कि पाषाण आदि की मूर्तियों में वेदमन्त्रद्वारा प्राण प्रादि का आह्वान कर स्थापन करना प्रतिष्ठा है तो यह कहना ठीक नहीं क्योंकि ७ वेदविरुद्धपतखण्डन ॥ शक्यं वक्तम् । कथं प्राणादीनान्तत्कर्मणान्तत्रादर्शनात् यदि तन्त्र प्रणादयो वसेयुस्तर्हि ग- मनभाषणभोजनमलविसर्जनादीनि कर्माणि कुतो न दृश्यन्ते ? ताश्च कथं न कुर्वन्ति ? य- दि प्राणादीनां यत्र कुत्र स्थापने शक्तिरस्ति चेत्तर्हि मृतकशरीराणां मध्ये प्राणादीन् स्था- पयित्वा कुतो न जीवयन्ति ? भवतामनेनैव महान् धनलाभः प्रतिष्ठा च भविष्यति ॥ कि- ञ्च पाषाणादिमूर्तिनाम्मध्ये प्राणादीनाङ्गमनागमनयोरवकाश एव नास्ति न नाड्यश्छिद्रा- णि च । मृतकशरीराणां मध्ये तु यथावत्सामग्री वर्तत एव प्राणादिभिर्विना दाहादिकाः क्रिया जनै क्रियन्ते यदा भवन्तः प्राणादीनान्तत्र स्थापनड्कुर्युस्तदा कस्यापि मरणमेव न भवेदनेन महत्पुण्यम्भविष्यति तस्माच्छीघूमेवेदड्कर्म कर्त्तव्यमिति निश्चेतव्यम् ॥ यदि कश्चिन्मृतं शरीरजीवयेत्तादृशो मनुष्यो न भूतो न भविष्यतीति वयं जानीमः ॥ कुत ईश्वरस्य नियमस्यान्यथाकरणे कस्यापि सामर्थ्यन्न जातन्न भविष्यतीत्यवगन्त- व्यम् । तद्यथा जियैव रसज्ञानम्भवति नान्यथेतीश्वरनियमोऽस्ति ॥ एतस्यान्यथाक- रणे कस्यापि यथा सामर्थ्यन्नास्ति तथा सर्वेष्वीश्वरकृतेषु नियमेष्विति बोध्यम् ।। ईश्व- प्राण आदि और उन की क्रिया मूर्तियों में नहीं दीख पड़ती जो उन मूत्तियों में प्राण वा इन्द्रिय रहते तो चलना, बोलना, खाना, मलमूत्र त्याग करना आदि कर्म क्यों नहीं दीख पढ़ते ? और वे मूर्तियां उन कामों को क्यों नहीं करती ? यदि प्राणादिकों को जहां कहीं स्थापन करने की शक्ति तुम लोगों में है तो मृतक शरीरों के बीच प्राणादि को स्थापन कर क्यों नहीं जिला देते ? केवल इसी एक कर्म से तुम को बहुत धन की प्राप्ति और प्रतिष्ठा होगी और यह भी विचारो कि पाषाणादि मूर्तियों में तो प्राणादि के जाने आने का अवकाश ही नहीं न नाड़ी और इन्द्रिय छिद्र हैं और मृतक शरीरों में तो सब अवकाश नाड़ी और इन्द्रियों के छिद्र आदि सामग्री विद्यमान ही रहती है केवल प्राणादि के न रहने से वे शरीर जला दिये जाते है सो जब आप लोग उन शरीरों में आह्वान कर प्राणादि को स्थित कर देओ तब तो किसी का मरण ही न होवे ? इससे बड़ापुण्य होगा इसलिये शीघ्र ही निश्चय कर यह कर्म करना चाहिये । हम जानते है कि यदि कोई मरे हुए को जिला देवे ऐसा मनुष्य न हुआ न होगा क्योंकि ईश्वर के नियम के अन्यथा करने में किसी का सामर्थ्य न हुआ न होगा यह निश्चय जानना चाहिये । जैसे जीभ से ही रस का ज्ञान हो सकता है अन्य इन्द्रिय से नहीं यह ईश्वरकृत नियम है इस के अन्यथा करने में जैसे किसी का सामर्थ्य नहीं है वैसे ही ईश्वर के किये सब नियमों में जानना चाहिये । ईश्वर ने जो पदार्थ जड़ ब- ८ बेदविरुद्धमतखण्डन । रेण ये जडाः पदार्था रचितास्ते कदाचिच्चेतना न भवन्ति तथा चेतना जडा. कदाचिन्नैव भवन्तीति निश्चयः ॥ ईश्वरः सर्वव्याप्यस्त्यतः पाषाणादिमूर्तिमध्येप्यस्ति पुनस्तत्पूजने को दोषः खण्डनञ्च किमर्थ क्रियते ? ॥ एवजानन्ति चेत्तर्हि पुष्पत्रोटनञ्चन्दनघर्षणन्नम- स्कारञ्च किमर्थ कुर्वन्ति । कुतःसर्वत्रेश्वरस्य व्यापकत्वात् ॥ नोचेदन्यघृणितपर्थानाञ्च पूननष्किमर्थ न कुर्वन्ति ? । सर्वव्यापिनीश्वरे सिद्धे खल्वेकस्मिन्वस्तुनि स्वीकृते मह- पापं भवति ॥ तद्यथा चक्रवर्तिनं राजानम्प्रति कश्चिद्व्याद्भवान्दशहस्तप्रमिताया भूगे रा- जास्तीति तम्प्रति राज्ञो महान्कोपो यथा भवति तथेश्वरस्यैवं स्वीकारे चेति वेदितव्यम् ।। २५-(प्र०) किञ्चिन्मात्राणाम्पाषाणपित्तलादिमूर्तीनां पूजने पुण्यंभवत्युत पापम् ॥ २६-( उ० ) नाद्य कुतः किञ्चिन्मात्रस्य पित्तलादेर्मूर्तिपूजने पुण्यम्भवति चेत्तर्हि महत्याः पित्तलादिमूर्तेर्दण्डप्रहारेण महत्पापं भवतीति बुध्यताम् ॥ अन्यच्च वेदानाभिहित- नाये है वे कभी चेतन नहीं होते वैसे चेतन कभी जड़ नहीं हो जाते यह निश्चय है। यदि कहो कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है इस से पाषाणादि मूर्तियों में भी है तो पाषाणादि मूर्तियों के पूजने में क्या दोष है ? और क्यों खण्डन करते हो तो उत्तर यह है कि यदि ऐसी भावना रख पूजा करते हो तो पुष्प तोड़ना, चन्दन घिसना और हाथ जो- ड़ कर नमस्कार आदि कर्म क्यों करते हो ? क्योंकि ईश्वर पुष्प, चन्दन, हाथ और मुख आदि में भी व्यापक है जैसे पाषाणादि में व्यापक होने से ईश्वर पूजित होगा वैसे पुष्पादि के साथ टूटना घिसजाना भी संभव है यदि नहीं मानते तो अन्य घृणित पदा- थों का पूजन क्यों नहीं करते है। जब ईश्वर सर्वव्यापक सिद्ध है तो एक छोटी सी किसी मूर्ति आदि वस्तु में उसको मानना बड़ा पाप है । तद्यथा--जैसे चक्रवर्ति राजा से कोई कहे कि आप दश हाथ भूमि के राजा है उसके प्रति जैसे राजा का बड़ा कोप होता है वैसे ईश्वर के इस प्रकार स्वीकार करने में ईश्वर वडा कोप करेगा यह जानना चाहिये। २५-(प्र. ) छोटी २ बनी हुई पाषाण पित्तलादि की मूर्तियों के पूजन में पुण्य होता है वा पाप ! ॥ २६-( उ० ) पहिला पक्ष पुण्य होना ठीक नहीं क्योंकि यदि छोटी २ पीतल आदि की मूर्तियों के पूजने में पुण्य होता है तो बडी २ पीतल आदि की घंटादिरूप मू- तियों में दण्डा मारने से बड़ा पाप होता है ऐसा जानो और भी देखो कि वेद में नहीं वेदविरुद्धमतरखण्डन ॥ पाषाणादिमूर्तिपूजने महत्यापमेव भवतीति स्वीक्रियतानोन्नास्तिकत्वं स्वीकार्यम् ॥ न चरमः कुत. पापाचरणस्य वेदेऽनभिधानात् ॥ मनुष्यजन्मानेन व्यर्थमेव गच्छतीत्यतः ।। तत्पूजनमुक्तिसाधनञ्चेन्न तस्या मूर्तेरपिशिल्पिना पूजारिणा वैकत्र बद्धत्वात्स्वयजड़त्वा- च्चेति ॥ २७-(प्र०) ईदृकण्ठीतिलकधारणे किं मानका वा युक्ति. १ ॥ २८-( उ० ) हरिपदाकृतित्वम् ॥ कृष्णकलाटे राधया कुड्कुमयुक्तेन चरणेन कृतं ताडनं ललाटस्य शोभार्थञ्चेति ब्रूमः ।। हरि शब्देन कस्य ग्रहणम् १ ॥ विष्णोरेवेति वदामः । नैतदेकान्ततः शक्यं ग्रहीतुम् ।। अश्वसिंहसूर्यवानरमनुष्यादीनामपि ग्रहणाद्वे- दानुक्तत्वादतएव पापजनकतिलकमिति वेद्यम् । किञ्च तिलकत्वमिति ॥ त्रिपुण्ड्रो- वपुण्डूरचनत्वमिति वदामः ॥ नैववक्तुमुचितम् ॥ तिलस्य प्रतिकृतिस्तिलकमल्प- स्तिलस्तिलकवेत्यर्थस्य जागरूकत्वादेतावतो दीर्घस्य ललाटे लिप्तस्य तिलकसंज्ञायां कहे पाषाणादि मूर्ति के पूजन में महापाप ही होता है ऐसा मानो यदि न मानो तो वेद विरोधी होने से नास्तिक बनो। और पाप होना रूप द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं क्योंकि पाप करना भी वेद में नहीं कहा तो मनुष्य जन्म इस से व्यर्थ जाता है यदि कहो कि मूर्तियों का पूजना मुक्ति का साधन है तो ठीक नहीं क्योंकि उस मूर्ति को कारीगर वा पूजारी ने एक स्थान में स्थिरबद्ध किया और स्वयं जड़ है तो अन्य को क्या मुक्ति दे सकेगी। २७-(प्र० ) ऐसे विशेष चिन्ह युक्त कण्ठी और तिलक के धारण में क्या प्र- माण वा युक्ति है ॥ २८-( उ० ) श्रीकृष्ण के पग के आकार तिलक इसलिये धारण करते है कि कृष्ण के मस्तक पर राधा जी ने लालचन्दन युक्त लात मारी थी और वैसी लात मारने से शोभा भी समझते है । (प्र०) हरि शब्द से किस को लेते हो ? हरि शब्द से वि- ष्णु का ग्रहण करते है यह कहना ठीक नहीं क्योंकि घोड़ा, सिंह, सूर्य, बानर और मनुष्यादि का नाम भी हरि है उन का ग्रहण क्यों नहीं होता वेदोक्त न होने से ति- लक लगाना अयुक्त है इसी से पाप कारी है यह जानना चाहिये । तिलक क्या वस्तु है ? यदि त्रिपुण्डू और ऊर्ध्वपुण्डू रचना को तिलक कहते हो तो यह कहना ठीक नहीं क्योंकि व्याकरण रीति से तिल के प्रतिबिम्न को तिलक वा छोटे तिलको तिलक कह- ना चाहिये यह सिद्ध है तो इस प्रकार के लम्बीभूत चन्दनादि ललाट पर के लेपन की - -- . २ १० वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ मतायांमवत्सु प्रमत्तत्वापत्तिर्भवतीति वेद्यम् ।। २९-(प्र०) मूर्तिपूजनादिषु पुण्यंभवत्युत पापम् ।। ३०-( उ०) मूर्तिपूजने कण्ठीतिलकधारणे च दोषो नास्ति कुतः यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशीत्यतः ।। ३१-(प्र० ) भावना सत्यास्त्युत मिथ्या ? ।। ३२-( उ० ) न प्रथमः कुतो दुःखस्य भावनांकोपि न करोति सदैव सुखस्यैव च पुनः सुखं न भवति दु.खञ्च भवत्यतो भावना न सत्या ॥ न द्वितीयः कथं विद्याधर्मार्थकाममोक्षाणां भावनया विना सिद्धिरेव न भवतीत्यतः ।। यदि भावना सत्यास्ति चर्हि भवच्छरीरे रेलाख्ययानभावनाड्कृत्वोपासीमहि यावता कालेन यावद्देशान्तरन्तद्यानङ्गच्छति तावता कालेनैव भवच्छरीरन्तावद्देशान्तरगस्मान् गमये- चेत्तदा तु भावना सत्या नान्यथा ॥ पुनः पाषाणादिषु हीरकादिरत्नभावनाञ्जले दधि- घृतदुग्धभावनाम्धूल्याड्गोधूमपिष्टशर्कराभावनां शर्करायान्तन्दुलभावनान्तथा जडे चेत- तिलक संज्ञा मानने में आप लोगों में प्रमाद प्राप्त होता है यह निश्चय जानना चाहिये ॥ २९-(प्र० ) मूर्तिपूजनादि में पाप होता है वा पुण्य ? ॥ ३१-( उ० ) मूर्तिपूजन और कण्ठी तिलक धारण करने में कुछ दोष नहीं है क्योंकि जिस की भावना जैसी होती है उसकी वैसी ही सिद्धि हो जाती है । ३१-(प्र० ) भावना सत्य है वा मिथ्या ? ॥ ३२-( उ० ) पहिला पक्ष भावना का सत्य मानना ठीक नहीं क्योंकि दुःख की भावना कोई नहीं करता किन्तु सदैव सुख की भावना करते है फिर मी सब को सुख नहीं मिलता किन्तु दुःख होता ही है इस से भावना सत्य नहीं । दूसरा पक्ष भावना का मिथ्या मानना भी ठीक नहीं क्योंकि भावना के विना विद्या, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि ही नहीं हो सकती। इस से यथायोग्य भावना करना ठीक है । यदि अन्य की भावना करना सत्य है तो आप के शरीर में रेल की भावना करके हम बैठे तो जित ने समय में जितनी दूर रेल पहुंचती है उत ने समय में उतनी दूर माप का शरीर हम को पहुंचा देवे तब तो भावना ठीक नहीं तो मिथ्या ? फिर पत्थर आदि में होरे आदि रत्नों की भावना, जल में दूध दही घी की भावना, धूलि में आटा और शक्कर की, शक्कर में तण्डुल की, जड़ में चेतन, चेतन में जड़, निर्धनी दरिद्र अपने में चक्रवर्ती राजा की और चक्रवर्ती राजा अपने में दरिद्र की भावना , अन्य में वेदविरुद्धमतखण्डन ।। नभावनांचंतने नडभावनान्दरिद्रः स्वस्मिश्चक्रवर्तिभावनाञ्चक्रवर्ती स्वस्मिन्दरिद्रभाव- नाञ्च कुर्यात्सा सथैव सिद्धा भवेच्चेतदा तु सत्याऽन्यथा मिथ्येति बोद्धव्यम् । तर्हि भावना का नाम ।। भावना तु पाषाण पाषाणभावना रोटिकायां रोटिकामावनेति यथार्थ ज्ञानमिति बेमस्तस्मिस्तद्बुद्धिरिति ।। तथा रोटिकायां पाषाणभावना पाषाणे रोटिकाभाव- नाऽयथार्थज्ञानमतस्मिस्तबुद्धिर्धगोलभावना चेति ।। ३३-(प्र. ) प्रतिमाशब्देन किगृह्यते । ३४-( उ० ) पूजनार्था चतुर्भुजादिमूर्तिरिति वदामः ।। ३५--(प्र०) प्रतिमाशब्दस्य कोऽर्थः क्रियते ।। ३६--( उ० ) प्रतिमीयते यया सा प्रतिमा किञ्चाऽनया प्रतिमीयते ।। ई- श्वरशिवनारायणादयश्चेति वदामः ॥ किन्च भोरनया पाषाणादिमूर्येश्वरस्य शि- वादिशरीराणाञ्च प्रत्यक्षतया भवद्भिस्तोलनड्कृतङ्किमतोयमर्थः क्रियते ? ॥ "तुला- मानं प्रतामान सर्वञ्च स्यात्मुलक्षितम् ॥ षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेदिति" - । 1 - 2 करे और वह वैसी ही ठीक २ सिद्ध हो जावे तब तो सत्य अन्यथा मिथ्या जाननी चाहिये । तो फिर भावना किस का नाम है ? पत्थर में पत्थर रोटी में रीटी की भा. वना करना यथार्थ ज्ञान कहाता है । अर्थात् जैसे को वैसा जानना भावना है। रोटी में पत्थर और पत्थर में रोटी की भावना करना मिथ्या ज्ञान अन्य में अन्य बुद्धि भ्रमरूप अभावना कहाती है। ३३-(प्र०) प्रतिमा शब्द से क्या लेते हो ? । ३४-( उ० ) पूजने योग्य चतुर्भुज आदि की मूर्ति को लेते हैं । ३५-(प्र०) प्रतिमा शब्द का क्या अर्थ करते हो ? । ३६--( उ० ) जिस से पदार्थ का स्वरूप वा अवधि जानी जावे वह प्रतिमा है ऐमा अर्थ करते हो तो किस का स्वरूप इस से जाना जाता है यदि कहो कि ई. श्वर, शिव और नारायण आदि का बोध प्रतिमा से होता है तो हम पूछते है कि क्या इस पापाणादि मूर्ति से ईश्वर और शिवादि के शरीरों को भाप ने प्रत्यक्ष तोल लिया है कि जिस से ऐसा अर्थ करते हैं ? धर्मशास्त्रस्थ राजधर्म में लिखा है कि तराजू और प्रतीगानबाट सब ठीक २ रखने चाहिये और छः २ महीने में इन की परीक्षा १२ घेदविरुद्धमत्तखण्डन ॥ मनुसाक्ष्य बोध्यम् ॥ प्रतिमाशब्देन गुडवृतादीनान्तोलनसाधनानाम्पलसेटकादीनां मा- सादीनां च ग्रहणमिति निश्चयः ॥ “न तस्य प्रतिमाऽस्ति यस्य नाम महद्यश" इति य- जुस्संहिताया द्वात्रिंशेऽध्याये ॥ ईश्वरस्य प्रतिमातोलनसाधनमेव न भवति तस्याऽतुल- त्वात् ।। अतएव भवत्कृतोऽर्थो व्यर्थएवति बोध्यम् ॥ ३७-(प्र०) पुराणशब्देन किड्गृह्यते ।। ३८-( उ० ) ब्रह्मवैवर्तादीन्यष्टादशपुराणोपपुराणानि चेति ब्रूम ॥ नैवंशक्यपुराण- शब्दस्य विशेषणवाचकत्वेन व्यावतकार्थत्वात् ।। यथा पुरातनप्राचीनादयश्शब्दा नवीना- र्वाचीनादीञ्छब्दार्थान्व्यावर्त्तयन्ति तथा पुराणादयश्शब्दानवीनाद्यर्थीश्चेति ।। तद्यथा केन- चिदुक्तम्पुराण घृतपुराणो गुड. पुराणी शाटाचेत्यर्थान्न नवीनघृतम्चेत्यादि व्यावर्त्तते त. स्मात्पुराणशब्देन वेदानान्तद्व्याख्यानब्राह्मणादीनाञ्च ग्रहण भवति न ब्रह्मवैवर्तादीनाञ्चेति "ब्राह्मणानीतिहासः पुराणानीति" "दशमेऽहनि किञ्चित्पुराणमाचक्षीत"।। "पुराणविद्यावेदो दशमेऽहनि श्रोतव्य" इत्याद्यश्वमेधस्य पूर्व्यनन्तरन्नवदिनपर्यन्तमृग्वेदादिक श्रुत्वाऽऽख्याय च के से राजा करावे इस प्रमाण अनुकूल प्रतिमा शब्द गुड़ घृत आदि के तोलने के साधन सेर आदि वा मासा आदि बटखरों का ग्रहण होना निश्चय है । और यजुर्वेद बत्तीसवें अध्याय के तीसरे मंत्र में ईश्वर कैप्रतिमा अर्थात् तोल साधन का निषेध किया है क्योंकि ईश्वर अतुल है इसी से आप का किया अर्थ व्यर्थ ही जानना चाहिये ।। ३७-(प्र० ) पुराणशब्द से क्या लेते हो ? ॥ ३८-( उ० ) ब्रह्मवैवर्तादि अठारह पुराण और उपपुराण लेते हो सो ठीक नहीं क्योंकि पुगणशब्द विशेषण वाचक होने से व्यावर्तक अर्थ वाची होता । जैसे पुराने प्राचीन आदि शब्द नवीन और अर्वाचीन आदि से निवृत्त करते वैसे पुराणादि शब्द नवीन आदि के वाच्य अर्थों को निवृत्त करते है । जैसे किसी ने कहा कि पुराना वृन पुराना गुड पुरानी साड़ी इस से घृत श्रादि में नवीन पन की निवृत्ति हो गई । इस कारण पुराणशब्द से वेद और वेद के व्या- ख्यान ब्राह्मण ग्रन्थों का ग्रहण होता है किन्तु ब्रह्मवैवर्तादि का नहीं, कल्पसूत्रकारों ने लिखा है कि ब्राह्मण ग्रन्थ ही इतिहास पुराण नामक है । अश्वमेध यज्ञ में दशमे दिन कुछ थोड़ी पुराण की कथा कहे सुने पुराणविद्या वेद का व्याख्यान दशगे दिन मुने अर्थात् नवदिन तक यज्ञ में ऋग्वेदादि सुन कह के दशमे दिन ब्रह्मज्ञान का and वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ दशमेऽहनि ब्रह्मज्ञानप्रतिपादकमुपनिषत्पुराण शास्त्र यजमानादय · आचक्षरिञ्छृणुयुश्चेति ब्राह्मणावेदानामेव ग्रहणन्नान्यस्येति साक्ष्यात्सर्वेभ्यो वेदानामेव पुरातनत्वाञ्चति ॥ परन्तु मतमस्माकं खलु वेदा नान्यदिति सिद्धान्तः ॥ ब्रह्मवैवर्त्तादीनि व्यासनागव्याजेन सम्प्रदा यस्थैर्जीविकार्थिभिर्मनुष्याणां भ्रान्तिकरणार्थानि रचितानीति जानीमः यथा शिवादिनामव्या- जेन तन्त्राणि याज्ञवल्क्यादिनामव्याजेन च याज्ञवल्क्यादिस्मृतयश्च रचितास्तथैव ब्रह्मवै- वर्तादीनीति विज्ञायताम् ॥ ३९-(प्र. ) देवालयशब्देन भवद्भिः किड्गृह्यते ? ॥ ४०-( उ० ) मूर्तिस्थापनपूजनस्थानानि घण्टादिनादकरणार्थानि मन्दिराणीति प्रतिजानीमः ।। नैवं शक्यं कुतोऽत्र वेदविधेरभावाभान्तियुक्तत्वाच्चेति यत्र होमः क्रियते तदेव देवालयशब्देनोच्यते कथं होमस्य देवपूजाशब्देन गृहीतत्वात् ।। "अध्यापनम्ब्रह्म- यज्ञः पितृयज्ञन्तु तर्पणम् । होमोदैवो बलिभॊतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥ १ ॥ स्वाध्या- येनार्चयेतर्षीन् होमर्देवान्यथाविधि । पितृच्छ्राद्धैनन्नैश्च भूतानि बलिकर्मणा" ॥२॥ प्रतिपादक ब्राह्मणान्तर्गत उपनिषद्भाग यजमान आदि कहें और सुनें इस प्रकार पुरा णशब्द से ब्राह्मण और वेद का ही ग्रहण करना अन्य का नहीं ऐसी साक्षी है और वेद ही सब से पुराने हैं । परन्तु हमारा मत वेद है अन्य नहीं यही सिद्धान्त है ब्रह्म- वैवर्तादि पुराण व्याजी के नाप के छलसे मतवादी जीविकार्थी लोगोंने मनुष्यों को भ्रा- न्ति कराने वाले वनाये है । जैसे शिव आदि के नाम के छल से तंत्र और याज्ञव क्यादि के नाम के छल से याज्ञवल्क्यादि स्मृति रची है वैसे ही ब्रह्मवैवर्तादि पुराण जानो। ३९-(प्र०) देवालय शब्द से आप क्या लेते हो १ ॥ ४०--( उ० ) मूर्ति को स्थापन करने पूजने के स्थान जिन में कि घण्टानाद आर्ति आदि करते हैं उन को देवालय कहते हो तो ठीक नहीं क्योंकि यह कर्तव्य वे- से विरुद्ध और भ्राति युक्त होने से । इस से जिस में होम किया जाता वहीं स्थान देवालय शब्दवाच्य हो सकता है क्योंकि देवपूजा शब्द से होम का ग्रहण है । धर्म- शास्त्र में लिखा है कि, पढ़ाना-ब्रह्मयज्ञ । तर्पण-पितृयज्ञ । होम-देवयज्ञ । वैश्वदेव भूतयज्ञ और अतिथिपूजन, से मनुष्ययज्ञ कहाता तथा-स्वाध्याय से ऋषिपूजन, यथा- विधि होग से देवपूजन, श्राद्धों से पितृपूजन, अन्नों से मनुष्य पूजन, और वैश्वदेव से प्राणिमात्र का सत्कार करना चाहिये । इस से सिद्ध हो गया कि होम ही से देवपूजा वेदविरुद्धमतखण्डन ।। होमेनैव देवपूजनं भवतीति मनुनोक्तत्वाद्भवत्कृतोऽर्थोऽसंगतएवेति निश्चयः ॥ अतो होम- स्थानं यज्ञशालैव देवालयशब्देन ग्राह्येति निश्चयः ।। ४१-(प्र०) देवशब्देन किड्गृह्यते ।। ४२-( उ० ) ब्रह्मविष्णुमहादेवादीनत्रपूजनार्थास्तन्मूर्तीश्चेति गृहीमः ॥ नैवं यो- ग्यम् । “यत्र देवतोच्यते तत्र तल्लिङ्गो मन्त्र" इति निरुक्ते । “मन्त्रमयी देवतेति" पूर्वमीमां- सायाम् ।। तथा मन्त्रमयी देवतेति ब्राह्मणे । “आत्मैव देवतास्सर्वास्सर्वमात्मन्यवस्थितमिति" मनुस्मृतौ ॥ “मातृदेवो भव पितृदेवो भव भाचार्यदेवो भव अतिथिदेवो भव" इति तैत्तिरी योपनिषदि । इत्यादिसाक्ष्यविरोधाकर्मकाण्डमन्त्राणांमात्रादीनां विदुषाञ्च देवदेवताश- व्दाभ्यां सड्यहादुपासनाज्ञानकाण्डयोरीश्वरस्यैव देवताशब्देन सर्वत्र स्वीकारावस्कृतोऽथों मिथ्यैवेति निश्चयः ॥ एवं सति पाषाणादिमूर्तीदेवताशब्देन" यो गृह्णाति स न मनुष्योस्ति किन्तु पशुरेव च ।। "योऽन्यां देवतामुपास्ते स पशुरेव देवानाम् ॥ "उत्तिष्ठत जागृत तज्जानथ अन्या वाचे। विमुञ्चथ" चेत्यायुक्तत्वान्मूञ्जयस्तु कदाचिद्देवता न भवन्तीति निश्चीयताम् ॥ होती है यह मनु की साक्षी है इस से आप का किया अर्थ असंगत है यही निश्चय जानो । इस लिये हाम का स्थान यज्ञशाला ही देवालय शब्द से लेनी चाहिये । ४१-(प्र० ) देवशब्द से क्या लेते हो ? ॥ ४२-( उ० ) पूजने के लिये ब्रह्मा विष्णु और महादेवादि देवताओं को और उन की मूर्तियों को देव शब्द से लेते हो सो ठीक नहीं क्योंकि वेद में जहां २ देवता कहा है वहां २ उस देवता नाम वाचक शब्द युक्त मंत्र का ही नाम देवता है यह निरुक्तकार का सिद्धान्त है और पूर्वमीमांसा और ब्राह्मणभाग में मंत्रस्वरूप ही देवता माना है मनुस्मृति में आत्मा के बीच सब जगत् अवस्थित है इसलिये आत्मा ही सब देवता है तैत्तिरीय आरण्यक में गाता, पिता, प्राचार्य और अतिथि को ही देवता माना है। इत्यादि प्रमाणों से तुम्हारा कथन विरुद्ध होनेसे कर्मकाण्ड में मंत्रस्वरूप, माता आदि और विद्वानों का देव और देवता शब्द से ग्रहण तथा उपासना और ज्ञान काण्ड में स. र्वत्र देवता शब्द से ईश्वर का ही स्वीकार है इस से आप का किया अर्थ मिथ्या ही निश्चित होता है । जब ऐसा है तो जो देवता शब्द से पाषाणादि मूर्तियों का ग्रहण वह मनुष्य नहीं किन्तु पशु ही है । और उपनिषद् में यही कहा है कि जो एक ईश्वर को छोड़ के अन्य देवता की उपासना करता है वह देवताओं में पशु ही है इसलिये हे मनुष्यो ! उठो जागो उस आत्मा को जानो अन्य की उपासनारूप वा- णियों को छोडो इत्यादि प्रमाण से मूर्तियां कदापि देवता नहीं हो सकती यह निश्चय - करता है वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ १५ ४३-(प्र० ) देवल देवलकशब्दाभ्यां किगृह्यते ! ॥ ४४-( उ० ) मूर्तिपूजारीस्तदधीनजीविकावतश्चेति ब्रूमः ।। नैवमुचितवक्तुम् । कथं, "यद्वित्तं यज्ञशीलानान्देवस्वन्तद्विदुर्बुधाः ॥ अयज्वनान्तु यद्वि- तमासुरं तत्प्रचक्षत" इति मनुसाक्ष्यविरोधात् ।। यज्ञशीलानां यज्ञार्थ यद्वितंतद्देवशब्देनोच्येत तल्लाति गृह्णाति स्वभोजनाद्यर्थ सोऽयन्देवलो निन्द्यः ॥ यो यज्ञार्थयद्धनंतच्चोरयति स देवलकः ।। कुत्सितो देवलो देवलकः कुत्सित इति सूत्रेण क प्रत्ययविधाना द्भवत्कृतोर्थोऽ न्यथेति वेदितव्यम् ॥ ४५-(प्र०) ईश्वरस्य जन्मरमणे भवत आहोस्विन्न ? । ४६-( उ० ) अप्राकृते दिव्ये जन्ममरणे भवतो नान्यथेति स्वीक्रियते ॥ भक्ता. नामुद्धारार्थदुष्टानां विनाशार्थन्तथा धर्मास्थापनार्थमवनिर्मूलार्थञ्च ॥ नैवन्याय्यकस्मा- त्सर्वशक्तिमत्त्वात्सर्वान्तमित्वादखण्डत्वात्मर्वव्यापकत्वादनन्तत्वान्निष्कम्पत्वाच्चेश्वरस्येति ॥ ४३-(प्र०) देवल और देवलक शब्दों से किसका ग्रहण करते हो ? ४४-( उ० ) यदि कहते हो कि मूर्तिपूजने और मूर्तिपूजा से जीविका करने वाले देवल देवलक कहाते है तो ठीक नहीं क्योंकि धर्मशास्त्र में लिखा है कि “जो यज्ञ करने वालों का धन है वह देवख और यज्ञ न करने वालों का धन आसुर कहता है, देव नाम यज्ञ के धन को अपने भोजनादि के लिये लेने वाला देवल निन्दित कहाता है यहां व्याकरण रीति से मध्यम पद स्वशब्द का लोप हो जाता ह । और जो यज्ञ के धन की चोरी करता है वह देवलक अतिनिन्दित कहाता है क्योंकि व्याकरण के (कुत्सिते) सूत्र से निन्दित अर्थ में क प्रत्यय होता है इस से आप का किया अर्थ मिथ्या है यह जानना चाहिये। ४५-(प्र०) ईश्वर के जन्ममरण होते हैं वा नहीं है । ४६-( उ० ) यदि यह कहते हो कि अपाकृत मनुष्यादि के जन्म मरण से वि- लक्षण दिव्य जन्ममरण होते हैं अन्यथा नहीं, यह स्वीकार है, क्योंकि भक्तों के उद्धार, टुष्टों के विनाश, धर्म की स्थापना और अधर्म की निर्मूल करने के लिये अस्वाभा- विक जन्म ईश्वर धारण करता है तो ठीक नहीं क्योंकि ईश्वर सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी, अखण्ड, सर्वव्यापक, अनन्त और निश्चल निष्कम्प है ।। + वेदविरुद्धमनखण्डन ॥ सर्वशक्तिमान्दीश्वरोऽस्ति स सर्वन्याय्यङ्कार्यकर्ते समर्थोस्त्यसहायेन यश्च शरीरधारणा- दिसहायेन कार्यकर्तुं समभिवेन्न चान्यथेति नेत्थं चेत्तर्हि सर्वशक्तिमत्त्वमेव तस्य न- श्येत् ॥ यथाखल्वसहायेन सर्वमिदजगद्रचयित्वा धारयति तथैव हिरण्याक्षरावणकंसादी- नां क्षणमात्रेण हननकर्तु सगर्थोऽसहायेनोपदेशम्भक्तोद्धारन्धर्मस्थापनमधर्मदुष्टविनाशच ।। यथा सर्वशक्तिमत्त्वमीश्वरे स्वीक्रियते तथान्यायकारित्वादयोपि स्वभावाईश्वरे स्वीकार्याः।। अन्यथा स्वनाशाद्यधर्ममपिकतुं समर्थो भवेदतईश्वरोऽनन्तोऽजोऽविकारी च ॥ प्रकृत्या- काशादिक सर्वजगदीश्वरस्याऽपेक्षयास्वल्पन्तुच्छंसान्तञ्चास्ति पुनस्तस्य का शरीरसा- मग्री यतो निवासार्थमधिकरणम्भवेत्तस्माबृहकिमपि न विद्यत इति सर्ववेदसिद्धान्तः ।। "सपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम्"। "तदन्तरस्य सर्वस्य तदुसर्वस्या- स्य बाह्यतः" | "सत्यं ज्ञानमनन्तम्ब्रह्म' ।। "दिव्योह्यमूर्तः पुरुषस्सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः" ।। जैसे ईश्वर सर्वशक्तिमान् है तो वह सब न्याययुक्त कार्य विना सहाय के कर ने को समर्थ, है फिर जो शरीर धारणादि सहाय से कार्य कर सके अन्यथा न कर सके तो ऐमा गानने में वह सर्वशक्तिमान् ही नहीं ठहर सकता । जैसे विना सहायता के इस सब जगत् को रच के धारण करता है वैसे ही हिरण्याक्ष, रावण और कसादि को मा- रने को विना शरीरादि सहाय के समर्थ है तथा स्वतन्त्र असहाय ही उपदेश, भक्तो का उद्धार, धर्म का स्थापन, अधर्म तथा दुष्टों का विनाश कर सकता है। जैसे ईश्वर में सब शक्तियों का होना मानते हो वैसे न्यायकारीपन आदि स्वभाव भी ईश्वर में स्वीकार करने योग्य है । यदि ऐसा न मानोगे तो सर्वशक्तिमान् होने से ही अपना नाश, अन्याय अधर्म करने को भी समर्थ होजावे तो ईश्वरता ही न रहे, इससे ईश्वर अनन्त अजन्मा और अ- विकारी है । प्रकृति और आकाशादि सब जगत् ईश्वर की अपेक्षा छोटा तुच्छ और अन्त वाला है । फिर उसके शरीर बनने को कौन सामग्री है जिसमें वह समाय जावे उससे बड़ा कोई भी नहीं यह सब वेद शास्त्र से सिद्ध है तो कैसे एक शरीर में समाय सकता है वेद और उपनिषदों के प्रमाण.-वह सब में व्याप्त प्रकाशमय, सब प्रकार के शरीर से रहित, अच्छेद्य अभेद्य नाडी आदि के बन्धन से रहित, शुद्ध निर्मल, निष्पाप है। वह सब के भीतर और बाहर परिपूर्ण है । वह सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप और सब से ब- ड़ा अनन्त है । वह पुरुष पूर्ण परमात्मा दिव्यरूय सब प्रकार की मूर्ति से रहित सब के बाहर भीतर वर्तमान और अजन्मा है । वह शब्द, स्पर्श रूप, रस, गन्ध और - वेदविरुद्धमतखण्डन ।। - ॥ . - .. "भशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययन्तथाऽरसन्नित्यमगन्धवच्च यत् ॥ अनाद्यनन्तम्महतः पर- न्ध्रुवन्निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते” “अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्" ॥ "वेदाहमेतम्पुरुषम्महान्तमादित्यवर्णन्तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाऽतिमृत्यु- तेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनायेति" यजुर्वेदादिश्रुतिभ्यः ।। ईश्वरस्याऽवतारोऽर्थाज्जन्ममरणे नैव भवत इति सर्वेषां वेदानां सिद्धान्तो चेदितव्यः ।। ४७-(प्र०) ईश्वरस्साकार उत निराकार: ? ।। ४८-( उ० ) निराकारश्चेति वदामः ॥ निराकारश्चेतर्हि तस्मात्साकारतत्कथजा- येत तथा हस्तादिभिर्विना कथजगद्रचयेदिति ॥ भैवं वाच्यड्कुतः || सर्वासा शक्तीनां सामर्थ्यानामीश्वरे नित्यं विद्यमानत्वान्निराकारादेव साकारस्योत्सन्नत्वाच्चेति । तद्यथा ।। "तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशस्सम्भूत., आकाशाद्वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्- भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः, ओषधिभ्योऽन्नम्, अन्नाद्रेतः रेतसः पुरुषः, स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः" ॥ आत्माऽऽकाशौ निराकारौ तस्गाद्वायुर्द्विगुणः स्थूलोऽजायत ततस्त्रिगु- नाश रहित, नित्य, अनादि, अनन्त, महत्त्व से परे निश्चल है उसी को ठीक २ जान के मृत्युरूप ग्राहक मुख छूटता सूक्ष्म और बड़े से बड़ा इस जीव के अन्तःकरण में व्याप्त उपलब्ध होने वाला है । मनुष्य को ऐसा विचार रख- ना उचित है कि मै उस परमात्मा को जानू कि जो सब से बड़ा पूर्ण सूर्य के तुल्य प्र- काश वाला अन्धकार से परे है । क्योंकि उसी को जान कर मनुष्य मृत्यु से बच सकता अन्य कोई मार्ग मुक्ति के लिये नहीं है । इत्यादि मन्त्रों के प्रमाण से ईश्वर का अवतार अर्थात् जन्ममरण नहीं होते यही सब वेदों का सिद्धान्त जानना चाहिये ॥ ४७-(प्र. ) ईश्वर साकार है वा निराकार ? ४८-( उ० ) यदि कहो कि निराकार है तो ठीक है और जो निराकार होने में तुम को शङ्का है कि जो निराकार हो तो उससे साकार जगत् उत्पन्न कैसे होसके और हाथ आदि साधन के बिना कैसे जगत् को रच सके सो यह ठीक नहीं क्योंकि सब प्रकार के सामर्थ्य निराकार ईश्वर में नित्य ही विद्यमान है इस से निराकार से ही सा- कार उत्पत्ति हो सकती है। जैसे प्रमाण-उप ही इस आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधि, ओषधियों से अन्न, अन्न से वीर्य, वीर्य से शरीर उत्पन्न होता है सो ही यह शरीर अन्नरसमय कहाता है इस उत्पत्ति की प्रक्रिया में आत्मा और आकाश निराकार है । आकाश से द्विगुणा स्यूल से है। वह सूक्ष्म से है . -- - ३ - -- वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ णः स्थूलोऽग्निर्जलं पृथिवी चेत्यादि निराकारात्सूक्ष्मात्स्थूलामदञ्जगज्जायते तथा च स्थू- लमयस्कान्तपाषाणादिकम्पिष्ट्वा चूर्णीभूतकृत्वा प्रत्यक्षतया दर्शयितुं द्रष्टुं सर्वे मनुष्याः समर्था इत्यतो निराकारादेव साकारजगज्जायत इति निश्चयः ॥ "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः" । “स वेत्ति विश्वन्न च तस्य वेत्ता तमाहुरप्रयम्पु- रुषम्पुराण"मित्यादि श्रुतिभ्यः ॥ हस्तपादाद्यड्गैर्विनाप्यनन्तानां सर्वेषां सामर्थ्यानामीश्वरे व. तमानत्वात्साफार ईश्वरस्साकारात्साकारोत्पत्तिहस्तपादादिभिर्चिना जगदुत्पादयितुमसमर्थ ईश्वर इत्यादि वाग्जालं मनुष्याणाम्प्रमादेनैवेत्यवगन्तव्यम् ।। ४९-(प्र०) ईश्वरो मायावी न वेति ? ॥ मायाशब्दस्य कोऽर्थः क्रियते ? ।। ५०-(उ०) मायेश्वरशक्तिरित्युच्यते ॥ नैव योग्यम्भवितुम् ।। कथं छलकपट- योरर्थयोर्मायाशब्दस्यापातात् ।। कश्चिद्वदेदयम्मायावीत्यनेन किड्गम्यतेऽयं छली कपटी चेति ।। ईश्वरस्य मायाऽविद्यादि दोषरहितत्वान्निर्मलो निरञ्जनो नित्यशुद्धवृद्धमुक्तस्व- भाव एवेतीश्वरो नैव कदाचिन्मायावीति निश्चेतव्यम् ॥ "क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः , वायु और तिगुणा स्थूल अग्नि, जल और पृथिवी है । इत्यादि प्रकार निराकार सू- क्ष्म से यह स्थूल जगत् उत्पन्न होता है और स्थूल चुम्बक पत्थर आदि का चूर्णरूप पीस के प्रत्यक्षता से सब मनुष्य देख दिखा सकते इस कारण निराकार से ही जगत् उत्पन्न होता है । और विना हाथ पग के शीघ्र ग्रहण करता विना चक्षु के देखता वि- ना कान के सुनता वह सब को जानता उस का जानने वाला कोई नहीं उस को सना- तन पूर्णब्रह्म कहते है इत्यादि श्रुति प्रमाणों से हस्तपादादि अङ्गों के विना भी सब अ- नन्त सामर्थ्य ईश्वर में हैं ऐसा होने पर जो मनुष्य कहते हैं कि ईश्वर साकार है सा- कार से साकार की उत्पत्ति होती है हस्तपादादि के विना ईश्वर जगत् को उत्पन्न नहीं कर सकता इत्यादि वाग्जाल मनुष्यों का प्रमाद से ही निश्चय होता है । ४९-(प्र०) ईश्वर मायावी है वा नहीं ? और मायाशब्द का क्या अर्थ कर- ते हो ? | ५०-( उ० ) यदि कहते हो कि माया ईश्वर की शक्ति है तो यह ठीक नहीं हो सकता क्यों कि छल कपट अर्थ में माया शब्द प्रसिद्ध प्राप्त है। कोई कहे कि यह मायावी है इस से क्या ज्ञात होता है कि यह छली कपटी है । ईश्वर माया और अ- विद्यादि दोषों से रहित है इसी से निर्मल निरञ्जन नित्य शुद्ध बुद्ध और मुक्तस्वभाव ही है । ऐसा कभी न निश्चय करना चाहिये कि ईश्वर मायावी है क्योंकि इस में .. वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ १९ पुरुषविशेष ईश्वर" इति पतञ्जलिसाक्ष्यस्य विद्यमानत्वात् ॥ ५१--(प्र० ) ईश्वरस्सगुणोऽस्ति निर्गुणो वा १ ॥ ५२-( उ० ) उभयमिति प्रतिजानीमः ।। तद्यथा घटः स्पर्शादिभिस्स्वकीयैर्गुणै- स्सगुणस्तथा चेतनम्य ज्ञानादिभिर्गुणैः पृथक्त्वान्निर्गुणोपि स एव ॥ एवमीश्वरोपि सर्व- ज्ञानादिभिः स्वकीयैर्गुणस्सगुण एवजडत्वजन्ममरणाऽज्ञानादिमिर्गुणैः पृथक्त्वात्स एव निर्गुणश्चेति निश्चय । “एको देवस्सर्वभूतेषु गुढस्सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ॥ सर्वाध्यक्ष- स्सर्वभूताधिवासस्साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्चेति" साक्ष्याद्ब्रह्मादयो देवा रामकृष्णनृसिंहा- दयस्सर्वे जीवा एवेति निश्चयः ।। किल्च सर्वेषां ब्रह्मादीनां यः स्रष्टा धारयिताऽन्तर्यामी सर्वशक्तिमान्न्यायकारी स्वामी चास्ति तैः सेव्यस्तेभ्यो भिन्न एक एवेश्वर इति वेदित- व्यम् ॥ ५३-(प्र० ) भवद्भिर्मुक्तिर्मन्यते न वा ? ॥ ५४-( उ० ) सालोक्यसामीप्यसानुज्यसायुज्यलक्षणा चतुर्धा मुक्तिर्मन्यतेऽस्माभिः श्री पतञ्जलि मुनि की साक्षी भी विद्यमान है-अविद्या आदि क्लेशों और शुभाशुभ क- मों के फलों से पृथक् मनुष्यादि की तुल्यता ५१---(प्र० ) ईश्वर सगुण है वा निर्गुण ? ।। ५२-( उ० ) ईश्वर सगुण निर्गुण दोनों प्रकार से है यह निश्चित है जैसे घट स्पर्श आदि अपने गुणों से सगुण तथा चेतन के ज्ञानादि गुणों से पृथक् होने से नि- र्गुण भी वही है ऐसे ही ईश्वर भी सर्वज्ञ आदि अपने गुणों से सगुण और जन्ममरण जड़पन अज्ञान आदि गुणों से पृथक् होने से निर्गुण भी वही है । उपनिषद् में कहा है कि एक ही देव ईश्वर सब भूतों में अदृष्टता से व्याप्त है सब का अन्तर्यामी सब का अध्यक्ष सब प्राणि अप्राणि जगत् का निवास स्थान सब का साक्षी चेतन केवल एक और निर्गुण है इस प्रमाण से ब्रह्मादि देवता और श्रीरामचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र तथा नृ- सिंह आदि सब जीव ही निश्चित होते है क्योंकि एक वही ईश्वर देव है ऐसा कहा है। किन्तु सब ब्रह्मादि का जो स्रष्टा और धारणकर्ता अन्तर्यामी सर्वशक्तिमान् न्या- यकारी और स्वामी ब्रह्मादि को सेवने योग्य उन से भिन्न एक ही ईश्वर है ऐसा जा- नना चाहिये । ५३-(प्र०) आप लोग मुक्ति मानने हो वा नहीं ? || ५४-( उ० ) सालोक्य, सामीप्य, सानुज्य और सायुज्य, यह चार प्रकार की से रहित पुरुष परमेश्वर कहाता है वेदविरुद्धमनखण्डन ।। चतुर्विधाया मुक्तेः कीदृशोऽर्थो विज्ञायते ।। ईश्वरजीवयोस्सगाने लोके निवासस्सा सालो- क्यमुक्तिरित्यादयोर्थी गृह्यन्ते ॥ नैवं शक्यं विज्ञातुड्कुतः सर्वेषाजीवानामीश्वररचिताऽ- धिष्ठिते लोके निवासात्स्वतो गर्दभादीनामपि सा मुक्ति. सिद्धति ॥ सामीप्यमुक्तिरपि सि- द्धा सर्वेषु पदार्थेप्वन्तर्यामिसेन ईश्वरस्य सामीप्ये वर्तगानत्वात् ।। सानुज्यमुक्तिरपि स- र्वेषाजीवानां स्वतस्सिद्धा ।। कस्पादनन्तचेतनेश्वरस्याऽपेक्षया जीवानां सान्तत्वचेतनाप- तेरल्पज्ञत्वादिगुणानां सत्त्वात् ॥ सायुज्यमुक्तिरपि सर्वेषाजीवानां साधारणाऽस्ति ॥ कुत ईश्वरस्य सर्वत्र व्यापकत्वात्सर्वेषां जीवाना तत्र व्याप्यसम्बन्धाच्चेति ।। सा चतुर्धा मुक्ति यथेति मन्तव्यम् ॥ का तर्हि मुक्तिरिति वैकुण्ठगोलोककैलासादिषु निवास इत्युच्य- ते ॥ मैवं वाच्यन्तत्र पराधीनत्वादतएव दुःखापत्तश्चेति ॥ वेदयुक्तिसिद्धान्तः खलुमुक्ति- रेकैवास्ति नान्येति ।। तद्यथा यथावद्विद्याविज्ञानधर्मानुष्ठानानन्तरं यनिर्धमम्ब्रह्मतत्त्वविज्ञा- नन्तेन सर्वज्ञस्यश्वरस्य सर्वानन्दस्य प्राप्त्या जन्ममरणादिसर्वदुःख निवृत्तिरीश्वरानन्देन मुक्ति हम मानते है । प्र०-चार प्रकार की मुक्ति का क्या अर्थ करते हो ? । उ०-एक लोक में जीव ईश्वर का निवास होना सालोक्य मुक्ति इत्यादि अर्थ लेते है यह मानना तुह्मारा ठीक नहीं क्योंकि ईश्वर के रचे और नियत किये लोक में सब जीवों का नि- वास होने से स्वयमेव गदहे आदि की भी वह मुक्ति सिद्ध है । और सब पदार्थों में अन्तर्यामी व्यापक होने से ईश्वर सब के समीप में वर्तमान है इस से सामीप्य मुक्ति भी स्वतः सिद्ध है । और सानुज्य मुक्ति भी सब जीवों को स्वतः सिद्ध ही है क्योंकि अनन्त चेतन ईश्वर की अपेक्षा जीवों में अन्तवाली चेतनता होने से जीव अल्पज्ञादि गुण वाले है । और सायुज्य मुक्ति भी सब जीवों की साधारण सिद्ध ही है। क्योंकि ईश्वर के सर्वत्र व्यापक होने और सब जीवों को उस में व्याप्य होने से व्याप्य व्या- पक सम्बन्ध स्वतः सिद्ध ही है। इसलिये वह चार प्रकार की मुक्ति मानना व्यर्थ ही है । जब यह मुक्ति गानना व्यर्थ हुआ तो अब कैसी मुक्ति मानोगे ? । यदि कहो कि वैकुण्ठ, गोलोक और कैलासादि के निवास को मुक्ति मानते है यह भी तुलारा क- हना ठीक नहीं क्योंकि वहा पराधीन होने से ही दु ख प्राप्त होगा तो दुःख को मुक्ति नहीं कहा जाता । वेद और युक्ति से सिद्धान्त है कि मुक्ति एक ही है अन्य नही जैसे यथावत् जो विद्या, विज्ञान और धर्म का यथावत् अनुष्ठान करने के पश्चात् निर्धान्त ब्रह्म को जानना उस से सर्वज्ञ ईश्वर के सब आनन्द की प्राप्ति से जन्म मरणादि सब दु.खां की निवृत्ति और ईश्वर के गानन्द के साथ सदैव अवस्थिति मुक्ति कहाती वेदविरुद्धपतखएडन ॥ २१ सह सदैवावस्थितिर्मुक्तिरित्यतो भवन्मता मुक्तिर्मिथ्यति निश्चयः । सर्वम्परवशे दुःख स- र्वमात्मवशं सुखमिति गनुसाक्ष्यात् ।। ५५-(प्र०) विष्णुस्वामिवल्लभसम्प्रदायादयो वेदसम्गता आहोस्वित्तद्विरोधिन ? । ५६--( उ० ) न पूर्वः ॥ चतुषु वेदेषु तेषामनभिधानात् ।। वेदविरोधात्पा- खण्डिन एव ते त्विति वेद्यम् ।। " पाखण्डिनो विकर्मस्थान्वैडालनतिका छठान् ॥ है- तुकान्वकवृत्तींश्च वाड्मात्रेणापि नार्चयेदिति" मनूक्तत्वात् ।। एते सम्प्रदायशब्दार्थाही नैव सन्ति किन्तु सम्प्रदाहशब्दार्थाी एवेति । सम्यक् प्रकृष्टतया हि दग्धधर्मज्ञाना जना भवन्ति येषु ते सम्प्रदाहा इति विवेकः ॥ कदाचित्केनचित्तेषां विश्वास एव न कर्तव्यः ।। ५७-(प्र० ) श्रीकृष्णः शरणं मम । अयगक्षरसमुदायः सत्योऽस्ति मिथ्या वेति ? ।। ५८-( उ० ) वेदानुक्तत्वात्कपोलकल्पितत्त्वान्मिथ्यैवेति ॥ वेदोक्तगायत्रीमन्त्रो- पदेशत्यागेन मिथ्याकल्पिताऽक्षरसमुदायोपदेशेन नास्तिकत्वं नरकप्राप्तिश्च भविष्यति भ. वताम् ॥ है - डाल के से से के इस से आप की मानी मुक्ति मिथ्या ही है यह निश्चय जानो । क्योंकि परवश होना सब दुःख और स्वाधीन होना सुख है । तुह्मारी मुक्ति में सदा पराधीन रहना ५५-(प्र०) विष्णुस्वामी और वल्लभसम्प्रदायी आदि वेदानुकूल है वा विरोधी ५६--( उ०) इस में वेदानुकुल होना प्रथम पक्ष ठीक नहीं क्योंकि चारों वेदों में उन का कहीं नाम ही नहीं है । वेदविरोधी होने से वे पाखण्डी ही है यह जा- नना चाहिये धर्मशास्त्र में कहा है किः-पाखण्डी, वेदविरुद्ध कर्म करने हारे वि- स्वभाव युक्त शठ स्वार्थी बगुला तुल्य पर पदार्थ पर ध्यान रखने वालों का वाणी से भी सत्कार न करे । ये विष्णुस्वामी आदि सम्प्रदाय शब्द से कहे जाने योग्य नहीं है किन्तु सम्प्रदाह अर्थात् सम्यक् नाशक ही है अच्छे प्रकार सम्यक् रीति से धर्म और ज्ञान जिन का नष्ट हो गया ऐसे जन जिन में हों वे सम्प्रदाह क- हात है कभी किसी को उन का विश्वास ही न करना चाहिये ।। ५७-(प्र० ) ( श्रीकृष्णः शरणं मग ) यह अक्षरों का समुदायरूप मन्त्र स- त्य है वा मिथ्या ? | ५८-( उ० ) वेदोक्त न होने और कपोलकल्पित होने से मिथ्या ही है। वे- दोक्त गायत्री मन्त्र के उपदेश को छोड़ कर मिथ्या कल्पना किये अक्षरों के समुदाय- रूप गन्त्र के उपदेश से भाप को नास्तिकता और नरक प्राप्ति होगी।

२२ वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ ५९-(प्र० ) कीगर्थोऽस्य क्रियते ? || ६०-( उ० ) यः श्रिया सहितः कृष्णः स मम शरणमास्त्विति ॥ नैवं शक्यं कुतः श्रीकृष्णो मम शरणम्प्रामोतु हिनस्त्वित्याद्यर्थस्य सम्भवादशुद्धानर्थकोयमक्षरसमुदा- योऽस्मात् कारणादस्योपदेशकरणं ग्रहणं विश्वासश्च केनचिन्नव कर्त्तव्य इत्यर्थः ॥ एवमेव 'नमोनारायणाय' 'नमश्शिवाय' 'नमो भगवते वासुदेवाय' 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' इत्यादयोप्यक्षरसमुदायोपदेशा मिथ्यैव सज्जनैर्मन्तव्याः ।। अथ वल्लभसम्प्रदायस्थोपदेशाय ब्रह्मसम्बन्धोऽर्थाश्रूष्ट सम्बन्धोऽक्षरसमुदायः सज्ज- नर्वेदितव्यः । श्रीकृष्णः शरणम्मम सहस्रपरिवत्सरमितकालजातकृष्णवियोगजनितताप- क्लेशाऽनन्ततिरोभावोऽहं भगवते कृष्णाय देहेन्द्रियप्राणान्तः करणतधर्माश्च दारागारपु- त्राप्तवित्तेहपराण्यात्मना सह समर्पयामि दासोऽहं कृष्ण तवास्मि ॥ सहस्रपरिवत्सरेत्यादि ५९-(प्र० ) उक्त मन्त्र का अर्थ कैसा करते हो ? || ६०--( उ० ) श्री लक्ष्मी के सहित जो कृष्ण है सो मेरे शरण हों यह अ- र्थ कहना ठीक नहीं हो सकता क्योंकि श्रीकृष्ण मेरे शरण को प्राप्त हो वा मेरे श- रण को नष्ट करें इत्यादि अर्थ भी सम्भव है अर्थात् तुम्हारे मन्त्र में "प्राप्नोतु" पद नहीं है किन्तु उपर से कल्पना मात्र करते हो वैसे कोई "हिनस्तु" श्रादि क्रिया की भी कल्पना कर सकता है उस को तुम कैसे रोक सकोगे ? इसकारण तुम्हारा यह अक्षरसमुदाय रूप मन्त्र निरर्थक अशुद्ध है । इसी से इस मन्त्र का उपदेश करना वा दूसरे से उपदेश लेना और इसपर किसी को कदापि विश्वास न करना चाहिये । इ- सी प्रकार "नमो नारायणाय । नमः शिवाय । नमो भगवते वासु देवाय । ऐं ही की चामुण्डायै विच्चे " इत्यादि अक्षरसमुदाय रूप बनावटी मन्त्रों के उपदेश भी सज्जनों को मिथ्या ही जानने चाहिये । और वल्लभसंप्रदायियों के ब्रह्मसम्बन्धनामक मन्त्र का उपदेश वस्तुतः भ्रष्टसम्ब- न्ध रूप ही सज्जनों को समझना चाहिये जैसे ब्रह्मसम्बन्ध का मन्त्र “श्रीकृष्णः शर- पं०" इत्यादि है । इसका अर्थ यह है कि श्रीकृष्ण मेरे शरण हो । सहस्रों वर्षकाल से हुआ जो कृष्ण का वियोग उससे हुआ जो दु ख और क्लेश उनसे घेरा हुआ मैं श्री- कृष्ण भगवान के लिये अपने देह, इन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण, और स्त्री पुत्र, घर, प्राप्त धन क्रियासहित देहादि के धर्मों को अपने आत्मा के सहित समर्पण करता हूं और हे- कृष्ण ! मै तुम्हारा दास हूं । सहस्र वर्ष की गणना करना व्यर्थ है क्योंकि तुम्हारा वल्लभ २३ घेदविरुद्धमतखण्डन ॥ सहस्रपरिगणनं व्यर्थम् ।। कुतः वल्लभस्य युष्माकञ्च सर्वज्ञताया अभावात्प्रत्यक्षता च न विद्यते सहस्रं वत्सरा व्यतीता इत्यपि कृष्णवियोगे परिगणनमयुक्तं सन्दिग्धत्वात् ।। ६१-(प्र०) कृष्णशब्देन किड्गृह्यते ! ।। ६२-( उ० ) परब्रह्म गोलोकवासी वेति वदामः । नैतत्सत्यमस्ति कम्गाज्जन्म- मरणवतो जीवस्य कृष्णस्य परब्रह्मत्वाभावात् ।। गवां पशूनां यो लोकस्स तु दु.खरूपो दुर्गन्धरूपत्वात्तत्र ये वसन्ति तेप्यसभ्या विद्याहीना आभीरवन्मूर्खा विज्ञेयाः । किञ्च अस्मात्प्रत्यक्षभूतादाभीरपल्लेगोलोकात्पृथक्कश्चिद्गोलोकएव नास्तीत्यवगन्तव्यम् ॥ तदु- पासकास्तत्र ये गमिष्यन्ति तेपि तादृशा भवन्तीति विज्ञेयम् ।। कृष्णवियोगजनिततापक्ले- शाऽनन्ततिरोभावोऽहमित्यादि || इदमशुद्धम् ॥ कुतस्तापक्लेशयोः पुनरुक्तत्वादेकार्थत्वा- च्च ॥ पुनरनन्तस्य क्लेशस्य तिरोभावविरहाद्देशकालवस्तुपरिच्छेदएवासम्भावनीयः ।। कृष्णस्तु कृष्णगुणविशिष्टदहवत्त्वाज्जन्ममरणादियुक्तत्वाद्भगवानेव भवितुमयोग्यः ।। तस्मै और तुम सर्वज्ञ नहीं कि सहस्र वर्ष से ही वियोग हुआ ऐसा निश्चय कर सको और न प्रत्यक्ष ही सहस्र वर्षों को जान सकते हो कि इतने ही वर्ष व्यतीत हुए। इसलिये कृष्ण वियोग में निश्चय न हो सकने से वर्ष गणना अयुक्त ६ - प्र०) कृष्ण शब्द से क्या लेते हो ? ॥ ६२-( उ० ) यदि कहते हो कि गोलोक निवासी परब्रह्म कृष्ण शब्द से ले- ते है तो यह ठीक सत्य नहीं क्योंकि जन्ममरण वाले कृष्ण जीवात्मा परब्रह्म नहीं सकते । गौ आदि पशुओं का लोक दुर्गन्ध के बढ़ने से दुःख रूप होगा उस में जो वसते हैं वे अहीरों के तुल्य मूर्ख विद्याहीन असभ्य जानने चाहिये और विचार के देखें तो इस प्रत्यक्ष अहीरों के गामरूप गोलोक से पृथक् अन्य कोई गोलोक ही नहीं ऐसा जानना चाहिये । उस गोलोकनिवासी के उपासक जो वहां जावेंगे वे भी वैसे ही होते है यह जानना चाहिये । और जो कहा था कि अनन्त काल से कृष्ण के वियोग हुए दुःख क्लेश से ढपा हुआ मै हूं इत्यादि यह अशुद्ध है क्योंकि ताप और क्लेश दोनों के एकार्थ होने से दोनों का कहना पुनरुक्त दोष है। फिर अनन्त क्ले- श की निवृत्ति न हो सकने से प्रत्येक देश काल और वस्तु से क्लेश का पृथक् होना सम्भव नहीं । काले गुण से युक्त शरीरधारी जन्ममरण वाले श्रीकृष्ण को भगवान् क- हना भी योग्य नहीं हो सकता। और उन कृष्ण के अर्थ शरीर, इन्द्रिय, प्राण, अन्तः- है से २४ वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ देहेन्द्रियमाणान्तःकरणतद्धर्माणा समर्पणमेवाशक्यं सदैव तन्निष्ठत्वात्स्वाभाविकत्त्वाच्च । समर्पणम्भवति चेन्मलमूत्रादिपीडार रागद्वेषाऽधर्माणामपि तस्मा एव समर्पणं स्यात्तत्फलभोगो नरकादिप्राप्ति. कृष्णायैव भवेदिति न्यायस्य विद्यमानत्वात् । दारागारपुत्राप्तवित्तेहानामपि समर्पणम्पापफलकमेव कुतः परदाराणां परपुरुषार्पणस्य पापात्मकत्वात् ।। तद्धमश्चेिति- पुल्लिङ्गेन निर्देशाद्वित्तेह पराणीति नपुंसकलिड्गेन निर्देशाच्चाशुद्धमेव वाक्यड्कुतो लि- ड्गवैषम्यनिर्देशात्परशब्दस्य त्रिषु लिड्गेषु वर्तमानत्वाच्च || आत्मना सह समर्पयामि दासेाऽह कृष्ण तवास्मीत्यन्तोऽनर्थोऽक्षरसमुदायः ॥ एकैवात्मा जीवो न द्वौ, पुनरात्मना सहागाह देहेन्द्रियादीनि समर्पयामीत्यशुद्धमेव दासोर्थाच्छूद्र एवेति ।। शूद्रस्य तु जुगु- प्सितमिति मनुसाक्ष्यदर्शनात् । अत्याभिप्रायो वल्लभेन सिद्धान्तरहस्यादिप्रथेष्वनेकबाल- बुद्धिगनुष्यभ्रमणार्थः पापवृद्ध्यर्थश्च निरूपितः । तद्यथा ॥ "श्रावणस्याऽमले पक्ष एकाद- श्यां महानिशि ॥ साक्षाद्भगवता प्रोक्तन्तदक्षरश उच्यते ॥ १ ॥ ब्रह्मसम्बन्धकरणात्सर्वे करण और इन के धर्मों का समर्पण करना अशक्य है क्योंकि शरीर इन्दियादि अपने २ साथ स्वाभाविक स्थित है अर्थात् एक शरीर के नेत्रादि छुटा कर दूसरे को नहीं दिये जा सकते । यदि कहो कि नहीं, समर्पण होता ही है तो मल मूत्रादि और पीड़ा, राग, द्वेष तथा अधर्मों का भी समर्पण श्रीकृष्ण के लिये ही होवे और मलादि का फल दुःख नरकादि की प्राप्ति भी श्रीकृष्ण के लिये ही होवे यही प्रकट न्याय है । और स्त्री, घर, पुत्र, प्राप्त धन और क्रियाओं का समर्पण भी पापफल वाला ही क्योंकि परस्त्री का परपुरुष को समर्पण करना पापरूप ही है । तथा ( तद्धर्मान् ) इस का पुल्लिङ्गनिर्देश और ( वित्तेहपराणि ) इस विशेषण के नपुंसक होने से वाक्यसम्बन्ध भी अशुद्ध ही है। क्योंकि परशब्द तीनों लिङ्ग का वाचक हो सकता है । हे कृष्ण ! मैं तुम्हारा दास हूं । आत्मा के साथ समर्पण करता हूं यहां पर्यन्त अक्षर समुदायरूप वल्लभ का मंत्र अनर्थक है जव जीवात्मा एक ही वस्तु है दो नहीं है तो फिर आत्मा के साथ देह और इन्द्रियादि कों का समर्पण करता हूं यह कथन अशुद्ध असम्बद्ध ही है । और दास अर्थात् शूद्र हूं शूद्र का नाम दासान्त निन्दित रखना चाहिये यह मनुस्मृति की साक्षी है सो धर्मशास्त्र के अनुसार तुम शूद्रवत् हो। इस उक्त ब्रह्मसम्बन्ध नामक मन्त्र का अभिप्राय वल्लभ ने सिद्धान्त रहस्यादि ग्रन्थों में अनेक वालबुद्धि मनुष्यों को भ्रम और पाप बढाने के लिये निरूपण किया है (श्रावणस्या०) श्रावण महीने के शुल्कपक्ष की एका- दशी की आधी रात्रि के समय में साक्षात् भगवान् ने जो कहा है उस को ज्यों का त्यों वेदविरुद्धमतरखण्डन ॥ २५ षान्देहजीवयो. ॥ सर्वदोषनिवृत्तिर्हि दोषाः पञ्चविधाः स्मृताः । २॥ सहजा देशकालोत्था लोकवेदनिरूपिताः ।। संयोगजाः स्पर्श जाश्च न मन्तव्याः कदाचन ॥३॥ अन्यथा सर्वदोषाणां न निवृत्तिः कथञ्चन । असमर्पितवस्तूनान्तस्मादर्जनमाचरेत् ॥ ४ ॥ निवेदिभिः समप्यैव सर्व कुर्यादिति स्थितिः ॥ न मतं देवदेवस्य स्वामिभुक्तिसमपर्णम् ।। ५ ॥ तस्मादादौ सर्वकार्ये सर्ववस्तुममर्पणम् ॥ दत्तापहारवचनन्तथा च सकलं हरेः ।। ६ ॥ न ग्राह्यमिति वाक्यं हि भिन्नमार्गपर मतम् ।। सेवकानां यथा लोके व्यवहार. प्रसिध्यति ॥ ७ ॥ तथा कार्य समप्यैव सर्वेषां ब्रह्मता ततः ॥ गङ्गात्वे सर्वदोषाणा गुणदोषादिवर्णनम् ॥ ८ ॥ गड्गात्वेन निरूप्यं स्यात्तद्वदत्रापि चैव हि" || प्रथमतस्त्वसकृदुक्तं कृष्णः भगवानेव नेति कृष्णस्य मरणे जातईषन्न्यूनानि पञ्चसहस्राणि वर्षाणि व्यतीतानि स इदानी वल्ल- कहते है । ब्रह्म सम्बन्ध रूप गन्त्र के लेने से सब के जीव और शरीर के सब दोषों की निवृत्ति होजाती है और दोष पांच प्रकार के है ॥ एक सहज स्वाभाविक, २-देश से हुए ३-कालभेद से हुए, ४-लोक वा धर्मशास्त्र में कहे, और ५-वेद में कहे 'ये पाच प्रकार के दोष लग सकते है इनकी निवृत्ति ब्रह्मसम्बन्ध करण रूप मंत्र से होस- कती है । परन्तु स्त्री आदि के सयोग से और स्पर्श से होने वाले देषों को न मानना चाहिये अन्यथा दोषों की निवृत्ति कभी नहीं हो सकती किन्तु समर्पण करने से ही दो- षों की निवृत्ति हो सकती है इसलिये समर्पण अवश्य करना चाहिये । इस से गुसाइयों के चेले निवेदन करने के वस्तुओं सहित समर्पण करके ही सब कार्य करें यही नियम है । देवों के देव विष्णु का यह मत नहीं कि विना समर्पण किये गुसाई के चेले किसी वस्तु को भोगें और समर्पण यही है कि स्वामी गुसांईजी चेलों के सब पदार्थों का भोग प्रथम कर लेवें । इस से सब कामों के आरम्भ में सब वस्तुओं का समर्पण करना ही ठीक है वैसे ही सब पदार्थ हरि को समर्पण करके ही पीछे ग्रहण करें ।। गुसाई जी के मत से भिन्न मार्ग के वाक्य मात्र को भी गुसाई जी के चेला चेली कभी न सुने । जै- सा सेवकों का व्यवहार प्रसिद्ध है वैसा होना चाहिये । वैसे ही सब वस्तुओं का सम- पर्ण करके सब के बीच में ब्रह्म बुद्धि करे । वैसे ही अपने मत में गुणों का और दूसरे के मत में दोषों का वर्णन किया करें ॥ जैसे गगा में अन्य घृणित वस्तु पड़कर पवित्र गङ्गारूप हो जाते है वैसे अपने मत के दोष भी गुणरूर समझने चाहिये ।। हमने पहिले से कई वार कहा है कि कृष्ण भगवान् ही नहीं हो सकते। जिन कृष्ण जी को शरीर त्यागे कुछ न्यून पाचहजार वर्ष व्यतीत हुए सो उन्होंने अब वल्लभ ४ २६ वेदविरुद्धमतखण्डन ।। भस्य समीपे कथगिदमुक्तवान् किन्तु कदाचिन्नैवोक्तवानिति ॥ किञ्च वल्लभेनायं पाखण्ड- जालोऽधर्मकरणार्थो रचित इति जानीमः ।। साक्षाद्भगवता प्रोक्तमिति केवलं छलमेव तस्य वल्लभस्य विज्ञेयमिति तस्मात्तदक्षरसमुदायोपदेशस्य पापजनक त्वादसम्बन्धमलापत्त्वाच सर्व दोष निवृत्तिरिति ॥ दोषा निवृत्ता भूत्वा क्व गमिष्यन्तीति वाच्यम् ॥ नष्टा भवि- प्यन्तीति ब्रूयुश्चेत्कदाचिन्नव नश्येयुरन्यकृताः पापदोषा अन्यमनुष्यन्नैव गच्छन्ति किन्तु कतैव कृतं शुभाशुभफलम्भुक्ते नान्यः कश्चिदिति ॥ हरिं कृष्णं समर्पणेनान्यकृताः पाप- दोषा गच्छेयुश्चेत्तर्हि तत्फलभोगार्थ नरकं दुःखं हरिरेव प्रामुयादिति निश्चयः ॥ कुतः स्वयं कृतानाम्पापपुण्यकर्मफलानां स्वभोगेनैव क्षयादिति न्यायाद्वल्लभकृता कल्पना व्यर्थे- वेति निश्चयः ॥ सहजाइत्यादि ॥ सहजानां दोषाणां निवृत्या स्वयमेव निवर्तेत कुतस्तेषां सहजत्यादग्निदाहवत् ।। सर्वसमर्पणे कृतेऽपि देहस्थानां कुष्ठादिदोषाणां क्षुत्पिपासाशीतो- प्णसुखदुःखाऽज्ञानानाम्भवताम्भवच्छिष्याणाञ्च निवृत्तेरदर्शनात् । तथा देशकालोत्था अपि के समीप आकर कैसे कहा ? किन्तु कदापि नहीं कहा केवल बनावट ही है। किन्तु वल्लभ ने यह पाखण्ड जाल स्वार्थ और अधर्म करने के लिये रचा यह जान पड़ता है। सक्षात् भगवान् ने कहा यह वल्लभ का केवल छल ही जानना चाहिये । इस लिये उस ब्रह्म सम्बन्ध नामक अक्षर समुदायरूप मन्त्र का उप- देश पाप का उत्पादक होने से असम्बन्ध और अनर्थक है । और जो सब दोषों की निवृत्ति मानते हो तो निवृत्त होकर दोष कहां जोवेगे । यदि कहो कि नष्ट हो जावेंगे तो कदापि नष्ट नहीं हो सकते क्योंकि अन्य मनुष्य के किये पाप दोष अन्य को नहीं प्राप्त होसकले किन्तु कर्ता ही अपने शुभाशुभ कर्म फल को भोगता है अन्य कोई नहीं। यदि कहो कि समर्पण करने से अन्य के किये पाप दोष हरि कृष्ण को प्राप्त हों तो दुःखरूप नरकफल भोगने वाले हरि ही होवें यह निश्चय है क्योंकि स्वयं किये हुए पाप पुण्यरूप कर्म के फलों की अपने भोग से ही निवृत्ति हो सकती है इस न्याय से वल्लभकृत कल्पना व्यर्थ ही समझनी चाहिये । सहज स्वाभाविक दोषों की यदि निवृत्ति होवे तो स्वयं आत्मा की ही निवृत्ति हो जावे क्योंकि जैसे अग्नि के स्वाभाविक दाहगुण की निवृत्ति में अग्नि भी नहीं रहता वैसे आत्मा भी न रहेगा सब के समर्पण करने में भी आप तथा आपके शिष्यों के शरीरस्थ कुष्ठादि रोग और क्षुधा, प्यास, शीत, उष्ण सुख दु ख तथा अज्ञान आदि की निवृत्ति नहीं दीख पड़ती इस से तुम्हारा समर्पण ठीक नहीं गौर ब्रह्मसम्बन्ध से देश काल के परिवर्तन से हुए वात पित कफ और उस के वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ २७ वातपित्तकफज्वरादयो दोषा भवदादीनां कथन्न निवर्तन्ते ? ॥ लोकवेदयार्मिथ्याभाषणचौ- र्यकरणमातृदुहितृभगिनीस्नुपापरलीगगनविश्वासघातादयो दोवास्तथा मातृदुहितृभगिनीस्नु पागुरुपत्न्यादिसंयोग जास्तासां स्पर्शजाश्च दोष। वल्लभायैरिदानीन्तनैर्भवद्भिवल्लभसंप्रदाय स्थैर्भगवदुपदेशेन वल्लभोपदेशेन वा कदाचन नैव मन्तव्याः किम् ? ।। इति भगवदल्ल- भोपदेशेनानेन किङ्गम्यते भगवदल्लभौ वेदविरुद्धोपदेशान्नास्तिकावधर्मकारिणी विद्याहीना विषयिणावधर्मप्रवर्तकौ धर्मनाशकौ न विज्ञायते ।। "योऽवमन्येत ते मूले हेतुशासाथ- याद्विजः ॥ स साधुभिर्वहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः" ॥ १ ॥ इति मनुसाक्ष्यस्य विद्यमानत्वात् ॥ अन्यथा सर्व दोषाणां न निवृत्तिः कथञ्चनेत्यादि रचनम्भङ्गापा- नकृत्वैव कृतमिति विज्ञयम् ॥ कुत ईदृगुपदशेन सत्यधर्मगुणानां नाश एव भवत्यत ईदृशस्य भ्रष्टीकरणार्थस्य पापात्मकस्योपदेशस्योपरि केनचिदीप कदाचिद्विश्वासो नैव कर्तव्य इति निश्चयः ।। अधर्मोपदेशोयमन्योऽपि वल्लभसंप्रदायस्थानां श्रोतव्यः तस्मा- ज्वर आदि दोष आप लोगों के क्यों नहीं निवृत्त होते ? और लौकिक धर्मशास्त्र तथा वेद में निरूपण किये मिथ्या बोलना, चोरी करना, माता, कन्या, बहिन, पुत्रवधू आदि अन्य स्त्रियों से समागग और विश्वासघात आदि दोप तथा माता कन्या बहिन पुत्रवधू और गुरुपत्नी आदि के संयोग और स्पर्श से उत्पन्न हुए दोष वल्लभ सम्प्रदाय के मानने वाले वल्लभ से लेके अब तक हुए भाप लोगों को तथा भगवान् के वा वल्लभ के उपदेश से अन्य लोगों को क्या नहीं मानने चाहिये । इस प्रकार भगवान् और वल्लभ के उपदेश से प्रतीत होता है कि भगवान् और वल्लभ दोनों वेद विरुद्ध उपदेश से नास्तिक भ- धर्म करने हारे, विद्याहीन, विषयी, अधर्म के प्रवर्तक और धर्म के नाशक जाने जाते है ।। नास्तिक का लक्षण धर्मशास्त्र में यही किया है कि जो तर्क शास्त्र के आश्रयं से वेद और धर्मशास्त्र का अपमान करता अर्थात् वेद से विरुद्ध स्वार्थ का आचरण करता है श्रेष्ठपुरुषों को योग्य है कि उस को अपनी मण्डली से निकाल के बाहर कर देवें क्योंकि वह वेद निन्दक होने से नास्तिक है इस से आप लोगों में नास्तिकता प्रतीत होती है। और यह जो कहना है कि हमारे मत को ग्रहण किये विना दोषों की निवृत्ति अन्य किसी प्रकार से नहीं हो सकती यह रचना भाग पीकर के ही की है यह जानना चाहिये क्योंकि ऐसे गत के उपदेश से सत्यधर्म और गुणों का नाश ही होता है । इस से ऐसे भ्रष्ट करने के अर्थ प्रवृत्त हुए पापरूप उपदेश के ऊपर किसी को कदापि विश्वास नहीं करना चाहिये यह निश्चय है । और भी थो- २८ वेदविरुद्धमतखण्डन ।। दादौ स्त्रोपभागात्पूर्वमेव सर्ववस्तुपदेन भार्यापुत्रादीनामपि समर्पण कर्त्तव्यं विवाहानन्तरं स्वोपभोगे सर्वकार्ये सर्वकार्यनिमित्तं तत्कार्योपयोगिवस्तुममर्पण कार्य, समर्पणं कृत्वा पश्चा- तानि तानि कार्याणि कर्तव्यानीत्यर्थः ।। १ ।। अथाऽस्य खण्डनम् । विवाहानन्तरं स्वो- पगोगात्पूर्वगेव भार्यापुत्रादीनामपि पवित्रीकरणार्थमाचार्याय गोस्वामिने समर्पणं कृत्वैव पश्चात् तानि कार्याणि कर्त्तव्यानीति भवद्भिरुपदिश्यते चेत्तर्हि स्वस्रीदुहितृभगिनीपुत्रादी- नामपि पवित्रीकरणाथै समर्पणं किमर्थ न क्रियते ? || अस्माकमिच्छाऽन्येभ्यः स्वभार्या- दीनां समर्पणार्थानास्त्यतो न क्रियत इति ब्रूयुश्चेत्तर्धन्येषां भार्यादीनां समर्पणं स्वार्थम्पा- परूप किमर्थ कारयन्ति तत्पुण्यात्मकञ्चेत्तर्हि स्वभार्यादीनामप्यन्येभ्यः पुण्यात्मकं सम- र्पण किगर्थ न क्रियते ? ॥ सिद्धान्तस्तु येन यया सह यस्य यस्याश्च विवाहो जातस्तयोः परस्परं समर्पणजातमेव नान्यथेति वेदितव्यम् ॥ तस्मादस्य व्यभिचारमयोपदेशस्य वल्लभसंप्रदायस्य केनचित्पुरुषेण कयाचित्स्त्रिया च विश्वासः कदाचिन्नैव कर्त्तव्य इति ड़ा यह वल्लभसम्प्रदायियों का अधर्मोपदेश सुनना चाहिये-जिस कारण सर्वस्व समर्पण के विना सब दोषों की निवृत्ति नहीं हो सकती इसलिये गुसाई जी के चेलों को उचित है कि अपने भोग करने से पहिले ही सब वस्तुओं का समर्पण अर्थात् स्त्री पुत्र भा- दि का भी समर्पण करें । विवाह होने पश्चात् अपने भागने के सब काम में सब का- यों का निमित्त उस कार्य के उपयोगी वस्तु का समर्पण करना चाहिये समर्पण कर के उन २ वस्तुओं से कार्य भोग करने चाहिये । इस का खण्डन-यदि आप लोग यह उपदेश करते हो कि विवाह होने पश्चात् अपने भोगने से पहिले ही पवित्र करने के अर्थ स्त्री पुत्रादि का भी आचार्य गोस्वामी के लिये समर्पण कर के ही पश्चात् अपने भोग सम्बन्धी काम करने चाहिये तो अपनी स्त्री कन्या भगिनी और पुत्रादि का भी पवित्र करने के अर्थ समर्पण क्यों नहीं करते ? यदि कहो कि अपनी स्त्री श्रादि को ओरों के लिये समर्पण करने की हमारी इच्छा नहीं इस से नहीं करते तो अन्यों की स्त्री आदि का पापरूप समर्पण अपने लिये क्यों करते हो ? यदि कहो कि उन का हमारे लिये समर्पण करना पुण्यरूप होता है तो अपनी स्त्री आदि का पुण्यरूप समर्प- ण अन्यों के लिये क्यों नहीं करते ? | सिद्धान्त वस्तुतः यही है कि जिस का जिस के साथ विवाह हुआ उन का परस्पर समर्पण हो ही गया अन्यथा नहीं हो सकता यह से व्यभिचारमय उपदेशों वाले इस वल्लभ सम्प्रदाय का किसी पुरुष वा स्त्री को कदापि विश्वास न करना चाहिये यही निश्चय है । जो लोग विश्वास करते . जाना । इम वेदविरुद्धपतखण्डन ॥ निश्चयः ॥ ये विश्वासं कुर्वन्ति करिष्यन्ति वा तेषां नरकप्राप्तिरेव फलं कुतः पापाचर- णोपदेशस्य दुःख फलत्वात् ॥ किञ्च पुष्टिप्रवाहमार्गोपि तादृश एव मिथ्या॥ पुष्टिप्रवाहमर्यादा धर्माचरणार्था उता- ऽधर्माचरणार्थाः ? | नाद्यः कुतो वल्लभादीनामिदानीन्तनान्तानाम्परस्त्रीगमनाद्यधर्माचरणस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यां दर्शनात् ।। अश्ववृषभवानरगर्द मादयो यथा अश्विन्यादिस्त्रियो दृष्ट- वा पुष्टि प्रवाहान्मैथुनमाचरन्ति तथा भवतामपि पुष्टिप्रवाहत्व दृश्यते नान्यथा । भवता- मियमेव मर्यादा वेदविद्याधर्माचरणत्याग परस्त्रीगमनं परधनहरणमधर्माचरणं वेदो- क्तधर्मविनाशकरणञ्चेत्यत्रैव पुष्टिप्रवाही चेति निश्चीयते ॥ अस्मिन्नर्थे वल्लभ आह ।। वैदिकत्वं लौकिकत्वं कापट्यात्तेषु नान्यथा ॥ वैष्णवत्वं हि सहजन्ततोऽन्यत्र विपर्यय इति । अतएव वल्लभे हि नास्तिकत्वं सिद्धम्भवति कुत. लौकिकवैदिकत्वस्य कपटमध्ये गणितत्वात् । तस्य संप्रदायस्था अपि नास्तिका गणनीया वेदविरुद्धाचरणात् ॥ यज्ञो वै विष्णुापको वा ॥ तदनुष्ठानत्यागान्मूर्तिपूजनासक्तत्वाद्व्यापकभक्तिवियोगाद्ववन्तो है वा करेंगे उन को नरक प्राप्ति ही फल होना सम्भव है क्योंकि पापाचरण के उपदेश का फल दुःख ही है ॥ और हमारे मत में शरीरादि की पुष्टि परम्परा से चली आती है यह भी वैसी ही मिथ्या है । पुष्टि प्रवाह की मर्यादा धर्माचरण के लिये है वा अधर्माचरण के अर्थ । इसमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं क्योंकि वल्लभ से ले के अब पर्य्यन्त हुए गुसाइयों का परसी गमनादि अधर्माचरण प्रत्यक्ष और अनुमान से प्रसिद्ध दीख पड़ता है। घोड़े बैल बानर और गर्दभ आदि जैसे घोड़ी आदि अपनी सजातीय स्त्रियों को देख के पुष्टि की उन्मत्तता प्रवाह से मैथुन को प्रवृत्त होते है वैसे ही आप लोगों का भी पुष्टिप्रवाह दीख पड़- ता है अन्यथा नहीं । आप लोगों की यही मर्यादा है कि वेदविद्या और धर्माचरण का त्याग परस्त्रीगमन पराया धन हरना अधर्म का आचरण और वेदोक्त धर्म का नाश करना इसी में पुष्टि और प्रवाह निश्चित होते है। इस विषय में वल्लभ कहता है कि- "लौकिक और वैदिक धर्म विषय कपटरूप होने से यथार्थ नहीं इस में सन्देह नहीं किन्तु एक वैष्णव मत ही सहज है इस से अन्य सब विपरीत है,, इसी से वल्लभ में नास्तिकता सिद्ध हो गई क्योंकि वल्लभ ने लौकिक वौदिक विषय कपट में गिना है। वल्लभ के सम्प्रदाय वाले सभी विरोधी होने से नास्तिक समझने चाहिये । विष्णु शब्द का अर्थ यज्ञ व व्यापक होता है उस यज्ञ वा व्यापक विष्णु परमेश्वर की भक्ति का अनुष्ठान के । वेदविरुद्धमतरवण्डन ॥ वैष्णवा एव नेति निश्चेतव्यम् ॥ पूजानाम सत्कारस्सज्जनानां तस्या भरिनामशत्रुस्य- म्पूजारिशब्दार्थो वेधः ॥ अतिर्नाम दुःखन्ताङ्करोतीत्यार्तिकारः ॥ गोशब्देन पशुगुणवान् साईशब्देन यवनाऽऽचार्यः ॥ अयगोसांय्याख्यशब्दार्थोऽर्थाद्यस्य गम्यागम्ययोविवेको न भवेत्यागञ्च न कुर्याद्धर्मन्यायविरुद्धपक्षपातत्यागञ्च वेदोक्तन्धर्मम्पपरित्यजेत्तादृशा भवन्तो दृश्यन्त इति ।। वाजिशब्देनाऽधो वा गर्दभो मध्यस्थो वेति वावाजिशब्दार्थः ॥ रागोऽस्यास्तीति रागी वै इति निश्चयेन रागीति वैरागिशब्दार्थ. । दण्डेन तुल्यो दण्डवत् दण्डवन्नाम काष्ठवत् ।। हिन्दुशब्दस्यार्थः कृष्णवर्णो दस्युः पाषाणादिमूर्तिपूजको दासईश्वरो- पासनाविरहश्चेत्यादयोर्थाः ॥ इत्यादिशब्दार्थानामन्धपरम्पराऽविद्याप्रचारेण विद्यात्यागेना- यशब्दाभिधानार्थज्ञानेन च विनाऽद्यपर्यन्तमागता वल्लभादिसम्प्रदायरूपेणात्यन्तं परिणता सा सद्यस्सज्जनैस्त्यज्यतामिति निश्चयः ।। भथ शुद्धाद्वैतमार्तण्डखण्डनं लिख्यते । शुद्धाद्वैतशब्दस्य कोऽर्थः क्रियते ॥ द्विषा छोड़ के मूर्तिपूजन में आसक्त होने से आप लोग वैष्णव ही नहीं हो सकते यह नि- श्चय जानना चाहिये । पूजा नाम सत्पुरुषों का सत्कार उस का जो अरि नाम शत्रु यह पूजारिशब्द का अर्थ है । आर्तिनाम दुःख को जो करे वह 'मार्तिकर्ता कहाता है। गोनामक पशुगुणयुक्त सांई शब्द से मुसलमानों का आचार्य अर्थात् जिस को अगम्या- गमन का विवेक न हो और त्याग भी न करे धर्मन्याय से विरुद्ध पक्षपात को भी न छोड़े और वेदोक्त धर्म का त्याग कर देवे वह गोसाई कहाता है वैसे ही आप लोग दीख पड़ते है इसी से गोसाई कहाते हो । वाजी नाम धोड़ा दूसरे वा शब्द से घोड़े का विकल्प करने से गदहा वा मध्यस्थ खिच्चर यह "वावाजी" शब्द का अर्थ है । राग जिस में हो वह रागी वै नाम निश्चय कर जो रागी हो उस को “ वैरागी" कहते है यही वैरागी शब्द का अर्थ है दण्ड नाम काष्ठ के तुल्य अर्थात् जो जड़ हो उस को दण्डवत् कहते हैं यह " दण्डवत्" शब्द का अर्थ है || काले वर्ण वाला, डाकू. पाषाणा- दि मूर्तियों का पूजक, सेवक, गुलाम और ईश्वर की उपासना से रहित इत्यादि हिन्दु शब्द का अर्थ है ।। इत्यादि शब्दों के अर्थों की अन्धपरम्परा अविद्या के प्रचार, विद्या के त्याग और आर्य शब्द के वाच्य अर्थ के न जाने विना अब तक चली आई और बल्लभादि सम्प्रदायोंके साथ अत्यन्त परिणाम को प्राप्त है यह अन्धपरम्परा सज्जनों को शीघ्र ही त्यागने योग्य है यह निश्चित है ।। भत्र शुद्धाद्वैत मार्तण्ड का खण्डन लिखते है-शुद्ध अद्वैत शब्द का क्या अर्थ घेदविरुद्धमतखण्डन ॥ ३१ इत्तं द्वीतं द्वीतमेव द्वैतं न द्वैतमद्वैतं कार्यकारणरूपमेकीभूतमेव ॥ यद्वा तदेव ब्रह्म स्त्रीपुरुषरूपेण द्विधा नातं क्रीडाफरणार्थमिति च ॥ नैवज्छक्यं वक्तुम् || कुतः ।। अविद्यादिदोषरहितत्वात् सदैव विज्ञानस्वरूपत्वाद्ब्रह्मणो जगद्रूपापन्नत्वमयोग्यमेव ।। यदि जीवादिकार्यरूपं यज्जगद्ब्रह्मवास्ति तर्खनन्तविज्ञानरचनधारणसर्वज्ञतासत्यसङ्कल्पादयो गुणा अस्मिजगति कथन्न दृश्यन्ते ॥ तथाच ॥ जन्ममरणहर्षशोकक्षुधातृषावृद्धिक्षयमूढ- स्वादयो दोषा जगत्स्था एवं सति ब्रह्मण्येव भवेयुर्बन्धनरकदुःखविषयभोगादयश्च ॥ तस्मा- द्वल्लभकृतोऽर्थो मिथ्यैवेति वेदितव्यम्। द्वीतमिति ॥ द्वीतं तदेव द्वैत स्यादद्वैतन्तु ततोऽन्यथा ॥ सर्वं खल्विदम्ब्रम तज्जलानिति पठ्यते ।। इति वल्लभप्रबुक्कनन्द्रष्टव्यम् ॥ द्विधाकारणकार्यरूपेण परिणतञ्चेत्तयज्ञानदु.खबन्धन नरकप्राप्त्यादयो दोषा ब्रह्मण्येवस्युः ।। पूर्वावस्थितस्य द्रव्य- स्यावस्थान्तरप्राप्तिः परिणामः।। तथैव भवन्मते ब्रझैव जगदाकारजातमनेन किमागतमिति श्रूयताम् ॥ ये जगत्स्था अविद्याज्वरपीड़ादयो दोषा अपि वल्लभेन ब्रह्मण्येव स्वीकृता अत- एव भवन्मतं वेदयुक्तिविरुद्धमेवेति विज्ञेयम् । वल्लभेन सर्वं खल्विदं ब्रह्म वेद नेह नाना- करते हो ? दो प्रकार से प्राप्त हो वह द्वीत कहाता जो द्वीत है वही द्वैत और जो द्वैत न हो वह अद्वैत-~-कार्य कारण का एक रूप होना है अथवा वही एक ब्रह्म स्त्री पुरुष रूप से दो प्रकार का क्रीड़ा करने के लिये प्रकट हुआ यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि अविद्यादिदोषों से रहित होने और सदैव विज्ञान स्वरूप होने से ब्रह्म का जग- रूप होना अयोग्य ही है । यदि जीव आदि कार्यरूप जो जगत् है वह ब्रह्म ही है तो मनंत, विज्ञान, रचन धारण, सर्वज्ञता, सत्यसङ्कल्प आदि गुण इस जगत् में क्यों नहीं दीख पड़ते और ब्रह्म को कार्यरूप मानें तो जन्म, मरण, हर्ष, शोक भूख, प्यास, बढ़ना, घटना और मूढपन आदि जगत् के प्राणियों के दोष ब्रह्म में प्राप्त होवें इस से बन्ध्य, नरक दुःख और विषयभोग भी ईश्वर को ही होवें इस से वल्लभ का किया अर्थ मिथ्या ही जानना चाहिये । और द्वीत, द्वैत एकही बात है द्वैत का निषेध अद्वैत कहा- ता इस का प्रत्यक्ष उदाहरण " सर्व खल्विदं० यह श्रुति है यह वल्लभ का मूंकना है। कार्य कारण रूप ब्रह्म दो प्रकार से परिणत है तो दुःख, बन्धन, और नरक प्रा- प्ति होना आदिदोष ब्रह्म में ही होवे। पूर्व अवस्थित ग्रव्य की अवस्थान्तरप्राप्ति परिणाम कहता है। वैसे ही आपके मत में ब्रह्म ही जगत्रूप बनगया इससे क्या आया यह सुनो। जो जगत् में अविद्या ज्वर पीड़ा आदि दोष भी वल्लभ ने ब्रह्म में ही मानलिये इसी से आप का मत वेद और युक्ति से विरुद्ध है यह जानना चाहिये । वल्लग ने ( सर्व ख- ३२ वेदविरुद्धमतखण्डन ।। स्ति किञ्चना ॥ तज्जलानिति शान्त उपासीतेत्यादि श्रुतीनामर्थो नैव विज्ञातः ।' कुतः ।। विदुषा समाधिसंयमे विज्ञानेन यादृश ब्रह्म विज्ञायते तत्रत्योऽयमनुभवः ।। यथा केनचिदुक्तं सर्वं खल्विद सुवर्णमिह नानापित्तलादिधात्वन्तरं मिलित नास्ति । तथैव सच्चिदानन्दैक- रसब्रमाण नाना वस्तु मिलितं नास्ति || किन्तु सर्व खल्विद ब्रौकरसमिति विज्ञेयमखण्डे करस्वादभेकेद्यत्वाद्ब्रह्मणश्चेति यथाऽयमात्मा ब्रह्मेत्यत्रेदं शब्देनात्मनो ब्रह्मणएव ग्रहण मिति निश्चेतव्य न कस्यचिज्जगद्वस्तुन संबन्धग्रहणञ्च ।। तथा तज्जलानिति ब्रह्म शान्तः सन्नुपासीत तस्माद्ब्रह्मानन्तसामर्थ्यादेवास्य जगतो जननधारणप्राणदीनि भवन्तीत्येवम्ब- झोपासनीयमेव नान्यदित्यर्थे। वल्लमेनापि नैव विज्ञातस्तसंप्रदायस्थानाम्भवतान्तु का कथा।। "सर्वं ब्रह्मात्मकं विश्वामिदमाबाध्यते पुरः ।। सर्वशब्देन यावद्धि दृष्टश्रुतमदो जगत् ।। १ ।। बोध्यते तेन स हि ब्रह्मरूप सनातनम् ॥ कार्यस्य ब्रह्मरूपस्य ब्रह्मैवस्याद्धिकारणम् ॥ २ ॥ साकारं सर्वशक्तयेकं सर्वज्ञं सर्वकर्तृ च ।। सच्चिदानन्दस्वरूप हिं ब्रह्म तस्मा- ल्विदं ब्रह्म० ) इत्यादि श्रुतियों का अर्थ नहीं जाना क्योंकि समाधि के संयम करने में विज्ञान के प्रकाश से जैसा ब्रह्म स्वरूप जाना जाता है उस समय का किया विद्वानों का अनुभव ही श्रुति का तात्पर्य है । जैसे किसी ने कहा कि:-सब यह सुवर्ण है इस में अनेक पीतल आदि धातु मिले नहीं है वैसे सच्चिदानन्द स्वरूप एकरस ब्रह्म के बीच में नाना वस्तु मिली नहीं है किन्तु यह सप ब्रह्म ही एक रस है ऐसा जानना चाहिये क्योंकि ब्रह्म एकरस अखण्ड और अभेद्य है । जैसे (अयमात्मा ब्रह्म ) यह आत्मा ब्रह्म है इस वाक्य में इदम् शब्द से ब्रह्मात्मा का ही ग्रहण होता है किन्तु किसी जगत् के वस्तुका सम्ब- न्ध ग्रहण नहीं होता । ( तज्जलान इति ब्रह्म ) "तज्ज" नाम उसी से यह सब जगत् उत्पन्न हुमा "तल्ल" नाम उसी में सब लय होता "तदनु" नाम उसी में सब जगत् चेष्टा कर रहा है इस प्रकार शान्त हुआ पुरुष ब्रह्म की उपासना करे । अर्थात् उस ब्रह्म के अनन्त सामर्थ्य से ही इस जगत् के जन्म मरण और चेष्टादि कर्म होते हैं इस प्रकार से ब्रह्म ही की उपासना करनी चाहिये अन्य की नहीं यह अर्थ वल्लभ ने नहीं जाना तो वल्लभ ने सम्प्रदायी आप लोगों की तो कथा ही क्या है । यह सब जगत् ब्रह्म खरूप है यह पहिले ही जताया है। सर्व शब्द से जितना देखा सुना यह गत् है वह सब जानना इससे वह सब जगत् ब्रह्मरूप सनातन है क्योंकि ब्रह्मरूप कार्य जगत् का कारण ब्रह्म ही हो सकता है । वह ब्रह्म साकार, सर्वशक्तियुक्त, एक, सर्वज्ञ और सब का रचने हारा सच्चिदानन्द स्वरूप है उसी से यह जगत् हुआ है । इत्यादि वेदविरुद्धमतखण्डन । ३३ दिदञ्जगत् ॥ ३ ॥ शुद्धाद्वैतपदे ज्ञेयः समासः कर्मधारयः। अद्वैतशुद्धयोः प्राहुः षष्ठी- तत्पुरुषं वुधा." ||४|| इत्यादयः श्लोकाः शुद्धाद्वैतमार्तण्डे अर्थतोऽशुद्धा एवेति निश्चयः ॥ कर्मधारयसमासोऽसंगतः कुत कार्यकारणयोस्तादात्म्यगुणादर्शनात् ।। षष्ठीतत्पुरुषोऽ- प्यसङ्गतः द्वौ चेद्वस्तुतो न कदाचिदेकता अवास्तवौ द्वौ चेत्कार्यकारणकथनं व्यर्थम् ।। शुद्धश्च शुद्धा च शुद्धे तयोस्स्त्रीपुंसयोरद्वैतमर्थान्मैथुनसमये द्वैतं स्त्रीषु राधाभावना स्वस्मि- न् कृष्णभावना च क्रियते ।। अहं कृष्णस्त्व राधा ह्यावयोरस्तु संगम इत्यादि पतितकारक वल्लभादीनां मतमिति निश्चयः ।। कुतः लक्ष्मणभट्टेन संन्यासं पूर्वगृहीत्वा पुनर्ग्रहाश्रमः कृतः स एव प्रथमतः श्ववद्वान्ताशी जातः तत्पुत्रो वल्लभोपि पूर्व विष्णुस्वामिसम्प्रदाये विरक्ताश्रमगृहीत्वा पुनरभून्गृही तथानेकविधो व्यभिचारो गोकुलनाथेन विट्ठलेन च कृ- तस्तत्सम्प्रदाय ग्रन्थेषु प्रसिद्धः ॥ लक्ष्मणभट्ट मूलपुरुषमारभ्याद्यपर्यन्तं व्यभिचारादिदुष्ट- ङ्कर्म यथावद्वल्लभसम्प्रदाये दृश्यते येऽस्य सम्प्रदायस्योपरि विश्वास ड्कुर्वन्तीमान् गुरूँश्व वल्लभ के श्लोक शुद्धाद्वैतमार्तण्ड नामक ग्रन्थ में वस्तुतः अशुद्ध ही हैं यह निश्चय जानो शुद्ध नाम कार्य और अद्वैत नाम कारण जो शुद्ध है वही अद्वैत, यह कर्मधारय समास कार्य कारण के एक स्वरूप एकात्मक गुण वाले न होने से असङ्गत हैं । षष्ठीतत्पुरुष- समास भी ठीक नहीं क्योंकि वस्तुतः जो दो पदार्थ है उनकी एकता क्योंकर होसक- ती है ? और यदि वस्तुतः दो नहीं है तो कार्य कारणरूप कहना व्यर्थ है इससे शुद्ध शुद्ध स्त्री दोनों का एक शेष समास भी असङ्गत है। अर्थात् मैथुन समय में द्वैत स्त्रियों में राधा भावना और अपने में कृष्ण की भावना करते हैं । मै कृष्ण तू राधा मेरा तेरा सनम होवे इत्यादि कुकर्म से वल्लभादि का मत पतित करने वाला जा- नना चाहिये क्योंकि इनका पूर्व आचार्य लक्ष्मण भट्ट हुआ उसने पहिले संन्यास ग्रहण करके पीछे गृहाश्रम धारण किया इसलिये लक्ष्मण भट्ट ही पहिले कुत्ते के तुल्य वा- न्ताशी अर्थात् उगले हुए को खाने वाला हुआ । पहिले गृहाश्रम को छोड़ के संन्यास लिया पीछे उसी वान्त के तुल्य त्यागे हुए गृहाश्रम का ग्रहण और संन्यास का त्याग किया । इसी लक्ष्मण भट्ट का पुत्र वल्लभ हुआ इसने भी पहिले विष्णु खामी के सम्प्र- दाय में विरक्त ( संन्यास ) आश्रम ग्रहण कर फिर गृहाश्रम धारण किया । और गो- कुलनाथ विट्ठल ने अनेक प्रकार का व्यभिचार किया इत्यादि बातें इनके मत के अन्यों में प्रसिद्ध है। इनके आदि पुरुष लक्ष्मण भट्ट से लेकर अब तक वल्लभसम्प्रदाय में व्यभिचारादि दुष्ट कर्म यथावत् दीख पड़ता है तथा जो लोग इनके मत पर विश्वास पुरुष और ५ वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ मन्यन्ते तेपि तादृशा एवेति विज्ञातव्यम् । एतादृशस्य पापकर्मकर्तुरधर्मात्मनो गुरोस्त्यागे हनने च पुण्यमेव भवति नैव पापञ्चेत्यत्राह मनुः ॥ "गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् ।। आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ॥ १ ॥ नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भ- वति कश्चन ॥ प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छतीति" ।।२।। धर्म त्यक्त्वा ह्यधर्मे प्रवर्तेत स आततायी विज्ञेयः ।। ( प्र०) शुद्धाद्वैतम्प्रकाशरूपं स्वभावत उताऽन्धकाररूपम् ? ।। ( उ० ) नाद्यः कुतः स्वभावतः प्रकाशस्वरूपस्य मार्तण्डार्थर्यापेक्षाभावात् । न चरमः स्वभावतोऽन्धकारस्वरूपञ्चेत्सूर्येणापि तस्य प्रकाशासंभवात् ।। एवमेव तसिद्धा- न्तमार्तण्डस्यापि खण्डनं विज्ञेयम् ।। अतएन शुद्धाद्वैतमार्तण्डससिद्धान्तमार्तण्डयोर्नाम- मात्रमपि शुद्धं नास्ति पुनर्ग्रन्थाशुद्धेस्तु का कथा ।। एवमेव विद्वन्गण्डनस्यापि खण्डन विज्ञेयम् ॥ विट्ठल एव यदा विद्वान्नासीत्पुनर्विदुषां मण्डनकर्तु कथं समर्थ. स्यात् ।। किन्तु करते और इन वल्लभादि मतस्थ लोगों को गुरु मानते है वे भी वैसे ही जानने चाहिये । ऐसे पाप कर्म कर्ता अधर्मी गुरु के त्यागने और मार डालने में पुण्य ही होता है पाप नहीं इस विषय में धर्मशास्त्र का प्रमाण है:-गुरु, बालक, वृद्ध वा बहुश्रुत ब्राह्मण ये सब आततायी धर्मनाशक अधर्म के प्रवर्तक हों तो राजा विना विचारे मार डाले। क्योंकि आततायी के मारने में मारने वाले को दोष नहीं लगता चाहे प्रसिद्धि में मारे वा अप्र सिद्धि में सर्वथा क्रोध को क्रोध मारता है किन्तु हिंसा नहीं कहाती । धर्म को छोड़ के सर्वथा जो अधर्म में कहाता प्र०-शुद्धाद्वैत प्रकाशरूप है वा स्वभाव से अन्धकार रूप है ? ॥ उ०-प्रकाशरूप होना पहिला पक्ष इसलिये ठीक नहीं कि यदि स्वभाव से प्र- काशस्वरूप हो तो सूर्य के तुल्य वयं प्रकाशरूप होने से मार्तण्ड नामक पुस्तक देखने के अर्थ सूर्य की अपेक्षा न होवे सूर्यप्रकाश की अपेक्षा विना ही कार्य सिद्ध कर सके सो सम्भव नहीं । स्वभाव से अन्धकार स्वरूप होना द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं क्योंकि स्वभाव से ही अन्धकार स्वरूप हो तो सूर्य से भी उस का प्रकाशित होना असम्भव हो जाये इसी प्रकार ससिद्धान्त मार्तण्ड का भी खण्डन जानो । -इस-पूर्वोक्त प्रकार शुद्धाद्वैतमार्तण्ड और, सत्सिद्धान्तमार्तण्ड ये दोनों पुस्तक का नाम मात्र भी शुद्ध नहीं है ग्रन्थ के अशुद्ध होने का तो कहना ही क्या है इसी प्रकार विद्वन्मण्डन नामक ग्र- न्थ का भी खण्डन जानो । जब तुम्हारा आचार्य विद्दल ही विद्वान् नहीं था तो फिर प्रवृत्त हो वह आततायी है - -- 1 वेदविरुद्धमतखण्डन ॥ परस्त्रीगमन परधन हरण व्यभिचारमण्डने च सामर्थ्यन्तस्याभून्नान्यत्रेति विज्ञेयम् ॥ तत्र दिड्मात्रनिदर्शनं वर्ण्यते ।। निजमुरलिकेति ।। मुरलिका नादेन तेनागता गोकुलस्य सम्ब- न्धिन्यः सुन्दर्यः परस्त्रियः कृष्णेन स्नेहाद्भोगार्थ स्वीकृता इत्युक्तम् ॥ प्रतिर्लक्षणे ।। युवति युवर्ति लक्षीकृत्य यः सम्भेदः सङ्गमः कृत्वा तावन्तमात्मान यावतीर्गोपयोषितइत्यादि भ्र- ष्टवचनस्योक्तत्वाद्विद्वन्मण्डनमित्यस्य नामायोग्यमेव ।। कुतः ॥ मूर्खव्यभिचाराधर्माणामत्र गण्डनत्वात् ॥ एवमेवाणुभाष्यमप्यसङ्गतमेवेति वेद्यम् ॥ तथा च शतशो भाषाग्रन्था रसभावनादयोपि भ्रष्टतरा एव ॥ तत्रत्यैकदेशनिदर्शनं लिख्यते । राधायाः कुचाद्यङ्गेषु मोदकादिगावना कर्तव्या तथा गोलोक एक एव पुरुषः कृष्णः ॥ अन्यास्सर्वाः स्त्रियः स- न्ति ।। महर्निशन्ताभि सह कृष्ण क्रीडति ॥ पुन. सूर्योदयसमये यावत्यः स्त्रियस्तावन्तः पुरुषाः कृष्णशारीन्नि मृत्यैकैकागेकैको गृहीत्वा पुष्कलं मैथुनमाचरन्ति सर्वे ।। तथा व- ल्लभस्य महाप्रभुरिति सज्ञाकृता प्रभुरितीश्वरस्यनामास्ति । प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वत इत्यादि श्रुतिषु वर्णितम् ॥ तेनेश्वेरणाद्यपर्यन्तं तुल्यः कोपि न भूतो न भविष्यतीत्यधिक- विद्वानों का मण्डन कैसे कर सकता है। किन्तु परस्त्रीगमन पराया धन हरना, और व्यभिचार के मण्डन करने में तो अवश्य उसका सामर्थ्य था अन्य किसी कार्य में न- ही सो उदाहरणमात्र दिखाते है विट्ठलकृत विद्वन्मण्डननामकग्रन्थ में (निजमुरलिका० ) इत्यादि लिखा है अभिप्राय यह है कि मुरली का शब्द सुनके गोकुल की सुन्दर सुन्दर स्त्रियां आई, कृष्ण ने उन के साथ क्रीड़ा करने के लिये प्रीति से उन का ग्रहण किया। अर्थात् युवति २ स्त्रियों को देख कर जितनी गोपों की स्त्रियां थीं उतने ही अपने एक ही प्रकार के शरीर धारण कर उन से समागम किया इत्यादिभ्रष्ट वचनों के कहने से विद्वन्मण्डन नाम भयोग्य ही है क्योंकि इस पुस्तक में मूर्ख व्यभिचार और अधर्मों का मण्डन है। इसी प्रकार अणुभाष्य भी असगत ही है और ऐसे ही रस भावना आदि सैकड़ों भाषा के ग्रन्थ भी अत्यन्त भ्रष्ट है । इसमें एक बात उदाहरण के लिये लिखते ॥ राधा के कुच आदि अङ्गों में मोदक आदि की भावना करनी चाहिये ॥ तथा गो- लोक में एक कृष्ण ही पुरुष अन्य सब स्त्रियां है कृष्ण उन स्त्रियों के साथ दिन रात क्रीड़ा करते है ।। सूर्य उदय होते समय जितनी स्त्रियां हैं उतने ही पुरुष कृष्ण के शरीर से निकल के एक २ स्त्री को एक २ पुरुष ग्रहण कर सब अच्छे प्रकार मैथुन करते है ।। और वल्लभ का महाप्रभु नाम रक्खा है प्रभु नाम ईश्वर का है ॥ प्रभु सब शरीरों में व्याप्त है यह वेद में कहा ।। जब उस ईश्वर के तुल्य अब तक न कोई हुआ न होगा ।

" - वेदविरुद्धमतखण्डन । स्य तु का कथा ॥ पुनर्महाप्रभुशब्देन वल्लभविषये किङ्गम्यते यथा महाब्राह्मणस्तथैव गहाप्रभुशब्दार्थोऽवगन्तव्यः । यथा वेदयुक्तिविरुद्धो वल्लभमंप्रदायोऽस्ति तथैव शैवशा- क्तगाणपत्यस रवैष्णवादयस्सम्प्रदाया अपि वेदयुक्तिविरुद्धा एव सन्तीति दिक् ।। गशिरामाङ्कचन्द्रेब्दे कार्तिकस्यासिते ढले ।। अमायां भौमवारे च ग्रन्थोऽयम्पूर्तिमागतः ॥ १ ॥ तो उससे अधिक कौन हो सकता है, फिर महाप्रभु कहने से यही प्रतीत होता है कि जैसे ब्राह्मण के साथ महत् शब्द लगाने से नीच का नाम महाब्राह्मण होता वैसे ही महाप्रभु भी जानना चाहिये जैसे वेद और युक्ति से विरुद्ध वल्लभ का सम्प्रदाय है वैसे ही शैव, शाक्त, गाणपत्य, सौर, और वैष्णवादि सम्प्रदाय भी वेद और युक्ति से विरुद्ध ही है ।। इति शुभम् ।। इति श्रीपरमहसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्दयानन्दसरस्वती स्वामिनिर्मितस्तच्छिप्य भीमसेनशर्मकृतभाषानुवाद सहितश्च वेदविरुद्धूमतखण्डनो अन्थः समाप्तः ।।

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Shastrarth Firojabaad

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Shastrarth Firojabaad
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Shastrarth Firojabaad
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1911
Published
2010/10
Publisher
Ajmer.,vaidik Yantralay
Language
Sanskrit
Pages
94
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Keywords
xxxx
DLI number
327027
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99999990002512.00
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