Banasthali University
Rastarangini
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G Mmm V ॥ श्रीः ॥ MINE श्रीभानुमिश्रविरचित- रसतरंगिणी। m जयपुर राजकीय सस्कृतपाठशालाके प्रधान न्यायशास्त्राध्यापक साहित्य धुरधर दर्शनपारदृश्वा गुरुपदविभूषित श्रीपण्डित जीवनाथजी ओझा विरचित भाषाका साहिब मराज अधिकतम सूची मूल्य रु..3...पैसे 7. म्प ई. जिलको खेमराज श्रीकृष्णापर्ने बम्बई खेतवाडी ७ वी गली खम्बाटा लेन निज "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-मुद्रणयन्त्रालयमें मुद्रितकर प्रकाशित किया। सवत् १९७१, शक १८३६. इसका सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है। हर အသည်းသည် အသင်း Amy पण्डितवर श्रीजीवनाथजी ।
॥ श्रीः॥ अथ रसतरंगिणी। भाषाटीकासहिता। प्रथमस्तरङ्गः १ लक्ष्मीमालोक्य लुभ्यनिगमंमुपहसज्शोचयन्यज्ञजन्तू- न्क्षत्रं शोणाक्षि पश्यन्समिति दशमुखं वीक्ष्य रोमाञ्चमञ्चन् । हृत्वा हेयंगवीनं चकितमपसरन्म्लेच्छरक्तैर्दिगन्ता- सिञ्चन्दन्तेन भूमि तिलमिव तुलयन्पातु नः पीतवासाः॥३॥ अभिमतग्रन्थसमाप्तिप्रतिवन्धकविनविघातके अर्थ ग्रन्थप्रतिपाद्यरसरूपता करके इष्टदेवताकी वारम्बार स्तुति करते है "लक्ष्मी' इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि पीतवस्त्रयुक्त श्रीकृष्ण हमारी रक्षा करो। यहां रक्षा शब्दका अर्थ ग्रन्थ- समाप्तिप्रतिवन्धकदुरितदूरीकरणकारकै समात्यनुकूल धन स्त्री आदि सम्पत्ति दान अभिव्यक्षित करना है । इस श्लोकमें आठवाक्योकरिकै माठही रसकी सरूपता परमेश्वरकी वर्णन करतहैं । तहां रसो, पहिले शृंगार रस है। उसीको आरम्भ करिकै श्रीकृष्णकी रसस्वरूपता वर्णन करतेहै ।क्या करते हुवे रक्षा करोसो कहतेहै कि लक्ष्मीको देखकरिकै आकांक्षा करते हुवे । इस स्थल में जिस रीतिसे 'अधीत्य तिष्ठति' यहां स्थितिके पूर्वकालम अध्ययन बोध नही होताहै किन्तु जिस जिस समय स्थिति होतीहै उस उस समय अध्ययन होताहै। यह जो कालविशेषावच्छिन्न व्याप्ति सो क्त्वा प्रत्ययका अर्थ होताहै । इसी रीतिसे यहां भी भगवानके हृद- यमें लक्ष्मीको में देखू ऐसी आकांक्षा होती है, उसी समय लक्ष्मीका दर्शन होताहै यह जो कालविशेषावच्छिन्न व्याप्ति सो ही "क्त्वा" प्रत्ययका अर्थ है। और आकांक्षाके पूर्वकाल लक्ष्मीका दर्शन होताहै यह अर्थ नहीं है। क्योंकि आकांक्षाकालमें भी दर्शन होताही है इससे पूर्वकालका बाध होनेसे क्त्वा प्रत्यय बाधित होजायगा और यह अर्थ क्त्याप्रत्ययका करनेसे विप्रलम्भकाभी अभि- व्यञ्जन होताहै, इसलिये पूर्वकाल क्त्वाप्रत्ययका अर्थ नहीं जानना किन्तु पूर्वोक्त कालविशेषावच्छिन्न व्याप्तिही क्वाप्रत्ययका अर्थ जानना । अथवा लक्ष्मीको देखकरिके आलिंगनादिकी आकांक्षा करते यह अर्थ जानना । यहां रमाविभ्रम- १ निगममुपहरनिति पाठान्तरम् ।
(२) रसतरंगिणी- [तरंग:- विलासावलोकन करिके तदंगालिंगनचुम्बनप्रवणचित्त जो पीताम्बर भगवान् सो निज वेषविलासादिको नवीन करते शृंगाररसस्वरूप हैं, यह अर्थ व्यंजित भया। फिर क्या करते हुए वेदका उपहास करते हुए । मुनि, भण्ड और निशाचर यह तीन वेदके करनेवाले हैं ऐसे अर्थके "त्रयो वेदस्य कर्तारो मुनिभण्डनिशाचराः" इस सूत्रका प्रणयनकरिकै वेदोपहास करते यह कहनेसे भगवान् हास्यरस स्वरूप हैं यह सूचित किया । कहीं 'उपहरन्' ऐसा भी पाठ है तदनुसार ऐसा अर्थ जानना चाहिये कि मत्स्यका स्वरूप हो कारके शंखासुरको मारि करके वेदका उपहार करते यह कहनेसे तिर्यग् जातिका अनुकरण करनेसे भगवान् हास्यरसस्वरूप हैं, यह अर्थ सूचित हुआ। फिर क्या करते हुए, यज्ञपशुओंका शोच करते भये अर्थात् यज्ञमें पशुका आलम्भन देखकरके आप शोक करते हैं और अन्यको भी शोक युक्त करते है । यह कहनेसे करुणारसस्वरूप भगवान् हैं यह सूचित किया। फिर क्या करते हुए, लाल नेत्र करिकै क्षत्रियसमूहको देखते अर्थात् क्षत्रि- योंका अविनय देखकर क्रोधवश रक्तनेत्र में परशुराम क्षत्रियसमूहका मर्दन करूं ऐसा कहते इससे रौद्ररसस्वरूपता सूचित करते हुए । फिर क्या करते हुए सङ्ग्राममें रावणको देखकरिके रोमाञ्चको प्राप्त होते हुए यह कहनेसे सुरासुरका जीतनेवाला रावण संग्राममें प्राप्त हुवाहै इस पर बडा भया- नक युद्ध में करूँगा इस उत्साहसे शोभायमान रोमहर्षयुक्त रामचन्द्र वीररस- स्वरूप है यह सूचित हुवा । फिर क्या करते हुवे, नवनीत घृत तत्कालमें पक्क है इस हेतुसे हरण करिके अर्थात् चोर करिके चकित जैसे होय तैसे यशोदा हमको ताडना करैगी इस भयसे भागते हुए, यह कहनेसे भयानक रसस्वरूप भगवान हैं यह सूचित हुवा । फिर क्या करते हुवे म्लेच्छोंके रक्तसे दिशाओंके अन्तको सींचते हुवे, यहां जुगुप्सा अभिव्यक्षित होतीहै । इस जुगुप्सासे बीभत्सरसस्वरूप भयवान है यह सूचित हुवा । फिर क्या करते हुवे, सूकरावतारमें दॉतसे पृथ्वीको तिलके परिमाणके तुल्य धारण करते हुवे। यहॉ एकोनपश्चाशत्कोटि योजन परिमित जो पृथ्वी सो दंतसे धारण की गई तब तिलपरिमिता शोभित होती भई। इस विस्मयोक्तिसे अद्भुतरसस्वरूप भगवान हैं यह सूचित हुवा ॥ द्वितीयपक्षव्याख्या। पीत अर्थात् अपहृत किया है गोपियोंके पहिरनेके वस्त्र जिसने सो पीतवास "पंतानि अपहृतानि वासांसि परिधानीयानि अर्थाद्गोपीनां येनस पीतवासाः" इस अर्थको कहता हुवा पीतवास पद नानाविधक्रीडाविटत्वको कृष्णमें सूचित करता है । यहां शब्दशक्तिमूल व्यंजना जानना । यहां श्रृंगार और प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। हास्प दोनों रसाकी प्रतीति होतीहै । अथवा पीत अर्थात् मृत जो गुरुपुत्र उसके लिये जो गमनकरै सो हुवा पीतवा "पीताय मृतगुरुपुत्राय वाति गच्छति इति पीतवाः" तो यह फलित हुवा कि मृत गुरुपुत्रको लानेके लिये गमन करनेवाला, यह पीतवा शब्दका अर्थ हुवा। और फैंका जाय जिसको वह हुवा अ. अर्थात्सुदर्शनचक्र उसकरिके सहित जो होय वह हुवा साः "अस्यते क्षिप्यते इति असुदर्शनचक्रम तेन सहितः साः" पीतवा ऐसा जो साः वह हुवा पीतवासा "पीतवाः चासौ साश्चेति कर्मधारयः" तो यह अर्थ फलित हुवा कि मृतगुरुपुत्रके लानेके लिये गमन करनेवाला जो सुदर्शनचक्रयुक्त पुरुष उसको पीतवासाः कहना। यह कहनेसे अद्भुत और रौद्ररसकी प्रवीति हुई। अथवाचलनेवाला हुवावा"वातीति वाः" अर्थात् पवन । पीया है पवन जिसने वह हुवा पीतवा अर्थात् सर्प या राक्षस "पीतः वाः येन सः पीतवाः" पीतवाका जो मारनेवाला वह हुवा पीतवासाः "सं स्यतीति पीतवासाः" । सम्पूर्ण प्रकारकरिके जो असत्पुरुष हैं उनमें समान- तासे वर्तनेवाला जो है वह हुवा आस् "समन्तात् असति समतया वर्तत इत्यास्" पीतवासा ऐसा जो आस् सो हुवा पीतवासाः पीतवासाश्चासावास् चेति पीतवासाः" तो यह अर्थ फलित हुवा कि पीतवा अर्थात् वायुको पान करनेवाले ऐसे जो व्याल राक्षसादि उनका मारनेवाला ऐसा जो असत्में समानरूपतासे वरतनेवाला पुरुष सो हुवा पीतवासाः यह कहनेसे वीरशान्तकी प्रतीति हुई ॥ अथवा स्थिति होय जिससे उसको कहना आस"आस्यते स्थीयतेऽनेनेत्यासः"अर्थात् स्थितिकरण आसशब्दार्थ हुवा । अथवा स्थितिही आसशब्दार्थ है "आसनमासो भावे घञ्"और गया है धैर्य वा धैर्यकरण पुत्रादि जिन दोनोंका वे हुवे वास अर्थात् देवकी वसुदेव "वाति गच्छति आसः धैर्य धैर्यकरणं पुत्रादि वा ययोस्तौवासौ देवकी वसुदेवौ' उन दोनोके प्रति जो स्थित होय वह हुवावासासू"तौ प्रत्यास्ते इति वासा" और पीत जों शब्द है सो पानकर्ताको कहताहै सो पान दुग्ध दधिका जानना पीत ऐसा जो वासा: वह हुवा पीतवासाः तो यह फलित हुआ कि दधि दुग्धका पान करनेवाला ऐसा। और वास् अर्थात् धैर्य वा धैर्यकरण गया है जिनका ऐसे जो देवकी वसुदेव उनके प्रति स्थित होनेवाला पुरुष यह कहनेसे भयानक और करुणा दो रसकी प्रतीत हुई। अथवा वसा जो है सो ही वासा अर्थात् मांस तहां जो स्थित होय वह हुवा वासास् अर्थात् रुधिर पान कियाहै वासास् अर्थात् पूतनाका रुधिर जिनने वे हुवे पीतवासा: “वसैव वासा मांसं तत्रास्त इति वासा रुधिरम्, पीतं वासाः येन सः पीतवासाः" यह कहनेसे यह अर्थ फलित हुवा कि पान किया है पूतनाका रुधिर जिसने उसको पीतवासाः कहना। यह कहनेसेवीभत्सरसकी प्रतीति हुई। इस रीतिसे (४) रसतरंगिणी- [ तरंग:- - पीतवासाः इस शब्दमेंही नौ रसकी प्रतीति हुई ऐसे जो श्रीकृष्ण सो हमारी रक्षा करो ॥ क्या करते हुचे लक्ष्मी जो हरिप्रिया उसको देखकरिकै अनुराग करते हुवे। यह कहनेसे नृसिंहावतारमें अत्यन्त क्रोध शान्त्युपायका अन्वेषण करनेवाले देवताओंने लक्ष्मीको आगे स्थापित की, तब नृसिंह लक्ष्मीमें आसक्त होगये यह जो पुराण प्रसिद्धार्थ सो सूचित हुवा । फिर क्या करते हुवे वेदका उपहास करते हुवे, इस ही लिये यज्ञोपयुक्त पश्वादिकोंका शोच करते हुवे अर्थात् वृथा ये पशु मारे गयेहै यह प्रतिपादन करते हुवे । इन दोनों बातोंसे बौद्धावतारमें वेदकी निन्दा और पशु. घातकी निन्दा की यह सूचित हुवा । फिर क्या करते हुवे क्षत्रियजातिको लालनेत्र कर देखते हुवे यह कहनेसे परशुरामावतारमें क्रोधावेशसे सम्पूर्ण क्षत्रियोंको देखा यह अर्थ सूचित हुवा । इसही रीतिसे संग्राममें रावणको देखकरिकै रोमाञ्चको प्राप्त होतेहुए यह कहनेसे रामावतारमें सग्राममें रावणको देखकरिके उत्साहयुक्तता प्रतीत हुई। फिर क्या करते हुवे, अतीतदिनका गोदोहोद्भव तात्कालिक घृतका हरण करिकै चकित जैसे होय तैसे अर्थात् व्याकुलान्तःकरण होकरिके दौडते हुवे, यह कहनेसे कृष्णावतारमें यशोदासे भीतिको प्राप्त हुवे यह सूचित हुवा। इसही रीतिसे म्लेच्छोंके रुधिरसे दिशाओंके अन्तको प्रोक्षण करते यह कहनसे कल्कि अवतारमे किया हुवा जो रुधिरसेक उससे बीभत्स सूचित हुवा । इसही रीतिसे दांतसे भूमिको तिलकी तरह उद्धार करते, यह कहनेसे जिस रीतिसे प्राकृत पुरुष अनायाससे तिल- को उठाताहै इसही तरह वराहावतारमें पृथ्वीको उठालिया यह सूचित हुवा। यहां यह शंका होतीहै कि यद्यपि " भग्नं कामरिपोर्धनुः" इत्यादि वक्ष्यमाण जो रसश- वलोदाहरण उसकी रीतिसे एकही व्यक्तिमें नानारसका प्रतिपादन करने में समर्थ होसक्तेहै, फिर भिन्न भिन्न स्वरूप भगवान का वर्णन करिकै भिन्न भिन्न रसप्रतिपादन करनेमें क्या फल है ? यह शंका ठीक है, तथापि एकरसप्रधानताको प्रकाशकरनके लिये तत्तत् अवतारमें तत्तत रसका प्रदर्शन किया ऐसा हुवा तो वाक्यभेदसे एकैक रसकी एकैक अवतारमें प्रतीति होनेसे विरोधकाभी प्रसरण नहीं हुआ, यह भी अनुगुण हुआ। यदि एकहीम सव रसोंका प्रतिपादन करते तो रसशवल नामक रसान्तर ही प्रतीत होजाता । आगे कहेंगे कि “एक सिन्धु- भुवः करे विलुलितः' इत्यादि श्लोकोंमें रसशवलनामक रसान्तरका प्रतिपादन है। प्रकृतमें भी इसही रीतिसे होजायगा । और विवक्षित जो नवरसप्राधान्यप्रतिपादन सो नहीं होगा इसलिये भिन्न भिन्न अवतारमें भिन्न भिन्न रसका प्रतिपादन यहां किया सो दुवा तो एक ही पुरुपका अप्रतिहत इच्छा विना अनुपपद्यमान तत्तदव- तारताके प्रतिपादनके द्वारा शान्तरसका भी प्रतिपादन कियागया क्योकि अप्रतिहत इच्छा शन्तरस विना नहीं होनी है ।। १॥
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प्रथमः १.]
भाषाटीकासहिता।
(५)
भारत्याः शास्त्रकान्तारश्रान्तायाःशैत्यकारिणी ॥
क्रियते भानुना भूरिरसा रसतरंगिणी ॥२॥
वाणी कमलिनी भानोरेषा रसतरंगिणी।
हंसाः कृतधियस्तत्र युक्तमत्र प्रतीयताम् ॥३॥
गिरां देवि तरंगिण्यां वारय क्रूरवारणान् ॥
यद्भविष्यति लोकानामाविलो विमलो रसः॥४॥
अव यह शंका होतीहै कि प्रकृत ग्रन्थको तत्तच्छास्त्रमसिद्ध अर्थ जो आत्मा
उस आत्माकी प्रतिपादकता
रसो वै सः इस श्रुतिसे समान ही है।
क्योंकि आत्मा और रसका स्वरूप भिन्न नहीं है । तो रसप्रतिपादनमें
भी आत्माका ही प्रतिपादन हुवा तो सकल शास्त्रसे विशिष्टता इसमें
नहीं हुई, फिर नवीन ग्रन्थके आरम्भसे क्या फल है ? यह सत्य है तो भी
लौकिक आह्लादका आधिक्यसे जो प्रतिपादन करना सो अतिसुकुमार
जो राजकुमार और शास्त्रव्याकुलितान्तःकरण जो जन उनके भी
अन्तःकरणके विनोदपुररसर निरूपणीयार्थके ज्ञानके निमित्त होगा । इसलिये
यह नवीन ग्रन्थका आरम्भ है यह "भारत्याः" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्य
यहहै कि भानुमिश्र रसतरंगिणी"ग्रन्थ बनाताहै परन्तु इस ग्रन्थमे रसका आधिक्य
होनेसेही तरङ्गाकुलतासे रसतरंगिणीपदप्रतिपाद्यता सम्भवेगी इस हेतु इस ग्र-
न्यको विशिष्ट करतेहैं"भूरिरसा"इत्यादि वाक्योसे । कैसीहै रसतरंगिणी, बहुत है रस
जिसमें ऐसी । फिर कैसीहै कि शास्त्ररूप जो वन उसमें थकी हुई जो सरस्वती ताकी
शैत्यकारिणी अर्थात् सुखावगमहेतु है ॥२॥ इस ग्रन्यमें रसोद्धोधसे सहृदयजनकाही
अधिकार है यह वात "वाणी" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि यह
बुद्धिस्थित रसतरंगिणी अर्थात् इस प्रतिपादक वाक्यावलीगुम्फतास परिणता
तरंगिणी है, तहाँ उदाहरणपरताकरिकै. परिणता जो भानुदत्तवाणी सो कम-
लिनी है। कृतधी अर्थात् पण्डित यही हंस हैं। यहीं जलांशको त्यागकरिकै
दुग्धसारग्रहणकी तरह युक्तार्थ ही प्रतीतिविषय हो ॥ ३ ॥ कर्कश जनको
इस ग्रन्थमें अधिकार नहीं है। यह बात "गिरां देवी" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं ।
श्लोकार्थ यहहै कि, हे वचनकी देवी ! अर्थात् सरस्वती ! क्रूर अर्थात् दुष्टान्त:-
करण जो हैं सो ही वारण अर्थात् गज, उनको इस ग्रन्थमें मत प्रवेश करने
उनके नहीं प्रवेश करने देनेसे नानाग्रन्यावलोकन करनेवाले जो रसिक जन,
तिनको आविल अर्थात् कठोरपुरुषका कुतर्ककर्दमोत्थापनकरिकै अनाहादक रस
विमर अर्थात् हृदयाह्लादक होजायगा ॥ ४॥
(६) रसतरंगिणी-- तरंगः- हेतोः पूर्ववृत्तित्वनियमादतः पूर्वमेव तस्योपन्यासः समुचितः। रसस्य हेतवो भावादयः । तेन रसेभ्यः पूर्व भावादय एव निरूप्यन्ते। रसानुकूलो विकारो भावः । विकारोऽन्यथाभावः॥ इस ग्रन्थमें रसका निरूपणही उद्दिष्ट है इसलिये भावनिरूपण यहॉ अमाप्तकाल है। फिर रस निरूपणका त्यागकरिके प्रथम भावनिरूपण क्यों करना ? इस शंकाका समाधान “हेतोः" इत्यादिग्रन्थसे करतेहैं । कारणको कार्यका पूर्ववृत्तित्वनियम है। इसलिये प्रथमही कारणका उपन्यास योग्य है । प्रकृतमें रसके कारण भावादिक अर्थात् भावप्रधान भाव, विभाव, अनुभाव हैं । इस हेतु रससे पूर्व यथाक्रम भावा- दिकका निरूपण करतेहैं। तहां प्रथम भावका निरूपण “रसानुकूल'' इत्यादिग्रन्थसे करते हैं। अब यहॉ यह शंका होतीहै कि रससे पूर्व भावादिकोंका निरूपण करना तो ठीक है परन्तु भावांदिकोंमें पहले स्थायिभावनिरूपण, पीछे विभावनिरूपण, पीछे अनुभावनिरूपण पीछे सात्विकभावनिरूपणपश्चात् व्यभिचारिभावनिरूपण यह क्रमविरुद्ध है क्योंकि रसके कारण तो सम्पूर्ण हैं । तो प्रथम स्थायिभावहीका निरूपण करनेमें क्या हेतु ?व्यभिचारिभावहीका निरूपण क्यों नहीं किया ? अथवा विभाव अनुभावका निरूपण क्यों नहीं किया ? यदि तुम यह कहो कि इन सबकी अपेक्षा स्थायी सुन्दर है । सम्पूर्ण भाव इसहीको प्राप्त होकरिके रसरूप होतेहैं, इससे स्थायी श्रेष्ठ है।अत एव प्रथम निरूपण किया यह ठीकहै । परन्तु विभावादिकी अपेक्षासे सुन्दरता होनेसे व्यभिचारिभावनिरूपणही स्थायिनिरूपणानन्तर प्रसंगसे उचित है क्योंकि अन्तरभाव दो प्रकारके कहेहैं । एक स्थायी और दूसरा व्यभिचारी। तहॉ स्थायिनिरूपणानन्तर व्यभिचारिनिरूपण उचितहीहै । स्थायिनिरूपणानन्तर विभावादिनिरूपणकरिकै व्यभिचारिनिरूपण करना उचित नहीं । यह शंका समीचीन है, तथापि तुल्ययुक्तिकारकै स्थायिभाव और व्यभिचारिभावकोभी विभाव कारण होतेहै. इस हेतु स्थायिभावनिरूपणसे पूर्व विभावनिरूपण प्राप्त हुआ फिर विभावनिरूपणके बिना स्थायिभावनिरूपण कैसे किया ? परन्तु वक्ष्यमाण रीतिसे स्थायिक ज्ञानकरिक जाननेलायक जो विभाव हे उनका स्थायिके निरूपणके पूर्व निरूपण नहीं करसक्तेहैं । इस हेतु विभावके पूर्व स्थायिका निरूपण किया, पीछे विभावका निरूपण किया।और अनुभाव जो है सो दोनोंही प्रकारका अर्थात् रसका अनुभाव और व्यभिचारीका अनुभाव व्यभिचारिभावके व्यञ्जनमें योग्य है। इस- लिये विभावोत्तर अनुभावका निरूपण किया और सात्विकभावको तो द्विरूपताहै भयात् सात्त्विकभाव व्यभिचारिरूपभी है व अनुभावरूपभी है। यह सूचन करनेके अर्थ प्रथमः१.] भाषाटीकासहिता। (७) अनुभाव व्यभिचारिभावके मध्यमें निरूपण किया इसलिये सम्पूर्ण निरूपण सम्यक है कोई विरुद्ध नहीं । इसके अनुकूल जो विकार सो भाव कहाजाताहै । इसकी व्याख्या कोई इस तरहसे करतेहैं कि रसके अनुकूल जो ज्ञान उसका जो विषय इसही हेतु विकाररूप जो वस्तु सो भाव है । यहाँ अज्ञायमान जो वस्तु सो ज्ञायमान होय यही विकार है। जिस वस्तुका ज्ञान रसके अनुकूल होय वहीं भाव है। यहां यह शंका होतीहै कि ऐसा भावका लक्षण कहा तो हावकाभी ज्ञान रसके अनुकूल होताहै तो हावभी भाव कहावेगा। इसका समाधान यह है कि हावभी भावही है इसलिये भावलक्षण यही रहा तो कोई दोष नहीं । भाव होनेसे लक्ष्यभी जो हाव है उसका हावसे पृथक निरूपण होगा तो भी कुछ अनुचित नहींहै । ऐसा जो भावलक्षण हुआ तो भावलक्षणमें किसी पण्डितने यह दोप दिया? कि नायिकादि जो आलम्बन विभाव और चन्दनादि जो उद्दीपन विभाव सो भी भाव कहातेहैं । तहां इस भावलक्षणकी अव्याप्ति होगी क्योकि नायिकादि और चन्दनादिम यद्यपि रसानुकूलता है परन्तु विकार नहीं है क्योंकि विकार अन्यथाभावका नाम कहतेहैं । सो नायिका वा चन्दनादि अन्यथाभाव नहीहै । यह कहनेवाले अब परास्त होगये क्योंकि हम विकार अन्यथाभावको नही कहते हैं किन्तु ज्ञायमान होय सोही विकार है तो नायिकादि ज्ञायमान होकारकै रसका अनुकूल होताहै इससे भावलक्षणकी अव्याप्ति नहीं होगी। यहां यह शंका होती है कि ऐसा भावका लक्षण कहा तोभी आन्तर भावमें अव्याप्ति होगी। क्योंकि आन्तर भावोंको आपके स्वरूपहीसे रसानुकूलता है, ज्ञायमान हो करिके रसानुकूलता नहीं है । सो भावलक्षण वही नहीं रहा । इस शंकाका समा- धान यह है कि ज्ञायमान शब्दमें ज्ञान जो वस्तु है सो अन्तःकरणवृत्ति और साक्षी दोनोंहीका ग्रहण करताहै । इस हेतु आन्तर भाव अन्तःकरणवृत्तिका विषय नहीं है, तोभी साक्षीका विषय होके रसानुकूल होताहै इससे ऐसे भाव लक्षणमें कोई दोष नही हुआ । यह मत समीचीन नहीं क्योंकि सब जगह भावपदका व्यवहार नहीं होताहै । यदि होता तो आलम्बन विभाव उद्दीपन विभावको भाव बनाने के लिये विकारशब्दका अज्ञायमान ज्ञायमान होजाय यह अर्थ करनाभी बनसकता। सो आलम्बन विभावादिमें भावपद प्रयोग नहीं देख. तेहै । फिर ऐसा अर्थकरनाठीक नहीं। फिर शंका होता है कि आलम्बन विभावादिमें भावपद प्रयोग नहीं होताहै । यह कहना समीचीन नहीं क्योंकि ये विभाव है ये अनुभाव है इस प्रकारसे भावपदप्रयोग सबमें होरहा है, इस शंकाका समाधान यहहै कि विभाव अनुभावमें जो भावपदकी प्रवृत्ति होतीहै सो विशेषकरिके जो अन्यकार सो लक्ष्यताज्ञानोपयुक्त विभाग दिखातेहै "विकारश्च" इत्यादि ग्रन्यसे । रसनरंगिणी- [तरंगः- विकारश्च द्विविधः । आन्तरः शारीरश्च । आन्तरोऽपि गावित करै उसको विभाव कहना और अनुभवको जो करावै उसे अनुभाव कहना, यह जो दूसरी व्युत्पत्ति है इसका अंगीकार करिकै स्वीकार किया गयाहै । और प्रकृतमें जो भाव कहा है उसको मानकरिकै भावपद प्रयोग वहाँ नहीं है । यदि इसीको मानकरिकै भावपद प्रयोग करो तो जिस तरह व्यभिचारी भाव कहा जाताहै इसीतरह विभाव भाव है। अनुभाव भाव है, ऐसाभी प्रयोग होजायगा परन्तु ऐसा प्रयोग नहीं होताहै। इससे उक्त व्युत्पत्ति मान करिकै ही भावपदप्रवृत्ति कहना ठीक है । प्रकृतमें विवक्षित जो भावपद सो वहां नहीं है ऐसा हुआ तोविकार शब्दका ज्ञायमान अर्थ कहकरिकै आलम्बन विभावादिमें जो भावपद प्रयोग स्थापित किया वह असमीचीन ही है । फिर शंका होतीहै कि भाववस्तुका अनुगम तो रहा नहीं कहीं भावपदका अर्थ औरही हुआ कहीं औरही हुआ ऐसा हुआ तो सात्विक भावमेंभी उक्त भावलक्षण रहैगा नहीं। यहांभी दूसरी उत्पत्ति करिकै भावपदप्रयोग करना चाहिये। ऐसा होगा तो सात्त्विक भी भाव नहीं कहावेंगे। इसका समाधान यह है कि भावलक्षणमें विकारपदसे प्राणिप्रयत्न विना जो होय और माणिके आश्रित सत्ता जिसकी होय उसको विकार कहते हैं, यहां प्राणिशब्दसे शरीरयुक्त आत्मा समझना और चेष्टाश्रय शरीर समझना और चेष्टामें जो चेष्टाव धर्म है वह जातिविशेष समझना ऐसा विकारका अर्थ करनेसे भाव लक्षणमें अननु- गम नहीं होगा यह बात ग्रन्थकारभी आगे स्फुट करेंगे। यह जो भावलक्षण है सो सात्त्विक भावमेंभी स्थायिभावादिके समान ही रहैगा इस हेतु व्युत्पत्त्यन्तरसे भावपद प्रयोग करना उचित नहीं। और ग्रन्थकारने "रसस्य हेतवो भावादयः' यहां भावादिशब्दका प्रयोग कियाहै और "भावादय एव निरूप्यन्ते" यहॉभी भावादि शब्दका प्रयोग किया है तो भावादिशब्दका जो अभ्यस्त पाठ किया इससे भाव और भावभिन्न जो रसका हेतु उसका मै निरूपण करताहूं ऐसा कहनेवाले जो अन्यकार हैं उनको सर्वसाधारण भावपदप्रयोग इष्ट नहीं है विकारमात्र भाव कहैं तो ओलाका विकार जो जल वह भी भाव कहावैगा इससे रसानुकूल यह पद दिया, रसानुकूलमात्र कहै तो विभावादिभी रसानुकूल होनेसे भाव होजायंगे इसलिये विकारपद दिया। स्थायिभावों को रसान्तरमें व्यभिचारिता होनेसे रसानुकूलताहै ही इससे भव्याप्ति दोष नहीं होगा सो जानना। अब आन्तरभावाद्यन्यतमको लक्ष्यतावगतिसे प्राप्त हुई जो अन्यजातीय अतिव्यामिशंका उसका अपाकरण करनेकी है इच्छा जिनको ऐसे जो भावम प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। द्विविधः । स्थायिभावोव्यभिचारिभावश्चेति।शारीरस्तु सा- त्त्विकभावादिः॥ यत्तु मनोविकारोभावः॥ तथा च देह- विकारे स्वेदादौ भावपदप्रयोगोगौण इतितनातुल्यवदुभ- यत्र भावपदप्रयोगेण विनिगन्तुमशक्यत्वात् । लक्षणाऽनु- रोधेन लक्ष्याऽव्यवस्थितेः॥ किसी पुस्तकमें 'सात्त्विकभावादयः' ऐसा पाठ है तहाँ आदिपदका प्रयोजन यह है कि स्तम्भस्वेदादि जो आठ सात्विक भाव कहेहै उनमें जृम्भाकी गणना नहीं की है । ता जृम्भाका साविकभावमें संग्रह होवो ऐसा हुआ तो स्थायिभाव, व्यभिचारिभाव, सात्त्विकभाव ये तीनों ही भाव लक्षणके लक्ष्य हैं और जातिके भाव अलक्ष्य ही है। तहाँ इस लक्षणकी सत्ता नही है इस हेतु अतिव्याप्त्या- दि कोई दोषभी नहीं है। अब आन्तर भाव शारीर भाव दोनोमें एक धर्मकी असं- भावना करनेवाले मनोविकारमात्रको भावलेक्षणका लक्ष्य कहनेवालोके मतसे लक्षण"यत्तु" इत्यादिग्रन्थसे कहतेहै।इनके मतमें मनका जो विकार सोहीभाव है ऐसा लक्षण हुआ तो देहविकार जो सात्त्विक भाव उसमें इस लक्षणके नहीं रहनेसे वह अलक्ष्य है परन्तु सात्त्विक भावमें भी भावपद प्रयोग है ताके निर्वाहके लिये वहाँ भावशब्दका विकारमात्ररूप लाक्षणिक अर्थ करना। ऐसा अर्थ करनेसे सात्त्विक- भावभी भाव कहा जायगा। प्रकृत जो भाव है सो वे नहीं हैं सो जानना । इसका खण्डन "तन्न"इत्यादि ग्रन्थसे करतेहै। इसका यह अभिप्राय है कि तुल्यरूप करिकै आन्तर विकार और शारीर विकार दोनो ही में भावपदप्रयोग है इस हेतु विनिगमना करनेमें शंका नही है । एकतर पक्षपातिनी युक्तिको विनिगमना कहते है सो दिनिगमना यही नहीं प्राप्त होती है । कदाचित् यह कहो कि, हमारा जो लक्षण सो साविकभावमें अप्राप्त है इसलिये सात्त्विकभाव लक्ष्य नही है । यह कहना अनुचित है क्योंकि लक्षणके अनुरोधसे लक्ष्यकी व्यवस्था नहीं होतीहै किन्तु उभयत्र भावपदप्रयोग होनेसे दोनाही भाव हैं । लक्ष्यतावच्छेदक भावपदवाच्यत्वही मानना होगा वह दोनोंमे ही है इस हेतु दोनोही लक्ष्य है । इसलिये भावलक्षणमें जो विकारपद है इससे चित्तविकार कायविकार दोनोंका प्रागुक्त रीतिसे अनुगम कियाहै सो युक्तही है ॥ "सजातीयविजातीयैरतिरस्कृतमूर्तिमान् । भात्मभावं नयत्यन्यान्स्थायी तु लवणाकरः॥"इस प्राचीन वाक्यमें एकैकभागमात्रकेलक्षणत्व होनेसे तदितरभागको • [ तरंगः- यिभावका प्रवेश होनेसे आत्माश्रय दोष होगा इसलिये स्वेतरानभिभाव्यत्व ऐसा अर्थ यदलको छोड करिकै सत्यन्त दलका अर्थात् इतरभावस्यात्मभावत्वोपनायकत्वे (१०) रसतरंगिणी- इतरभावस्यात्मभावत्वोपनायकत्वे सति सजातीयविजाती- यभावानभिभाव्यःप्रथमः। पराऽनभिभाव्यो मनोविकारो वैयर्थ्यापत्तिदोष होताहै । इसलिये यह प्राचीन वाक्य लक्षणद्वयतात्पर्यक है यह कह- नेके लिये उस वाक्यका अनुवाद करतेहैं "इतरभावस्य"त्यादिवाक्यसे । यहॉइतरपद स्वरूपकीर्तनहै भावको इतनाही अर्थ विवक्षितहै । आत्मभावत्वोपनायकत्वका यह अर्थहै कि अपनी खरूपताका प्रकाशकत्व ऐसा हुआ तो सत्यन्तका यह अर्थ हुआ कि भावको आत्मस्वरूपताका प्रकाशक होय उसको स्थायिभाव कहना, उत्तरपदका यह अर्थ है कि रतिका सजातीय जो रत्यादि और विजातीय जो निर्वेदादि ताकरिके अनभिभाव्य होय अर्थात् सजातीय विजातीय भावका जो असाधारण धर्म उस धर्मसे जो उसका ज्ञान उसकी प्रतिबन्धक जो सामग्री उस सामग्रीसे सम्पन्न है आस्वाद जिसका ऐसा स्थायिभाव है । विचार करो कि जहां काव्यप्रविष्ट तत्तत्पदार्थ सहृदयहृदयप्रविष्ट होकरिकै सहृदयकी सहृदयतासहका- रकरिकै तत्तत्पदार्थका जो विभावन अनुभावनरूप व्यापार ताकरिकै वह पदार्थ अपने अपने असाधारण धर्म अर्थात् कारणत्व कार्यत्वादि धर्मका त्यागकरिकै प्रकाशित होते हैं इस रीतिसे प्रकाश होनेहीसे शास्त्रीय विभाव अनुभाव व्यभिचा- रिभाव शब्दकरिकै वह पदार्थ कहेजातेहै । पश्चात् वह आलम्बन कारण उद्दीपन कारण और कार्य और सहकारी ये तीनोंही मिलकारकै रतिकी चर्वणा होतीहै तहाँ जिस प्रकार पानक रसमें भिन्नजातीय रस पृथक पृथक् प्रतिभासित नहीं होतेहैं इसही प्रकार यहांभी विभावादि रत्यादि विना प्रतिभासित नहीं होतेहै किन्तु रत्यादिरूपकारिक ही प्रतिभासित होते हैं । इस हेतु उक्त सामग्रीसम्पन्नचर्वणाक- स्थायिभाव होतेहै। इस स्थायिभावलक्षणवाक्यको लक्षणद्वयतात्पर्यकता होनेसे भी विशेष्यदलमें अर्थात् सजातीयविजातीयभावानभिभाव्यत्वदलमे साजात्यादिकी संघटना व्यर्थ है इसलिये उस भागको त्याग करिकै विशेष्यदलका परिष्कार- करतेहै "परानभिभाव्यो मनोविकारो वाइस ग्रन्थसे" इसका अर्थ पूर्व कहहीचुहैं. 'सजातीयविजातीयभावाऽनभिभाव्यः' इसका अर्थ करनेसे सो जानना चाहिये । इस लक्षणका यदि स्थायिभावेतरभावानभिभाव्यत्व अर्थ करें तो स्थायिभावकेलक्षणमें स्था- करें तो यहाँ स्वशब्दका प्रवेश होनेसे लक्षण अननुगत होजायगा इसलिये विशे- प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। (११) वा सकलप्रधानो विकारो वा स्थायिभावः ।। न चान्यभावेऽतिव्याप्तिः । तस्येतरभावस्यात्मभावत्वोप- नायकत्वाभावात् । सति इस दलका परिष्कार करते है "सकलप्रधानः" इत्यादि वाक्यसे । इसका अर्थ यह है कि सकल मनोविकारमें जो प्रधानभूत है सो स्थायिभाव है स्थायिभावको प्रधानतावस्तु यह है कि स्वस्वरूपताकरिकै इतरभावका ज्ञापकत्व इसका अभिप्राय यह है कि इतरभावमें स्थायिभावका आरोप होता है इस आरोपमें इतरभाव तो विशेष्य होताहै स्थायिभाव विशेषण होता है। ऐसा हुआ तो इतरभावविशेष्यक आरोपप्रकारत्वही प्राधान्य समझना ऐसा हुआ तो सत्यन्त दलका यह अर्थ है कि इतरभावविशेष्यक आरोपप्रकार होत सन्ते विभाव अनुभाव व्यभिचारिभाव एत- दन्यतमाभावसहित होकारकै अन्यतमसम्पन्नचर्वणाक होय वह स्थायिभाव है। यह स्थायिभाव सामान्यलक्षण जानना। अब यहाँ सत्यन्तका प्रयोजन नचेत्यादिवाक्यसे दिखाते हैं। इस वाक्यका यह अर्थ है कि जो सत्यन्त नहीं ग्रहण करेंगे तो अन्य भाव अर्थात् सात्विकभावमें अतिव्याप्ति होजायगी क्योंकि सात्त्विकभावभी उक्तान्यतमाभावसहित होताहै और उक्तान्यतमसम्पन्नचर्वणाक होताहै क्योंकि स्थायिभावकी जैसे चर्वणा होती है तैसे ही सात्त्विकभावकी भीचर्वणा होतीहै इस हेतु तहॉ अतिव्याप्ति होगी इस हेतु सत्यन्त देना। सत्यन्त दियेसे अतिव्याप्ति नहीं होती है यह बात "तस्य" इत्यादि वाक्यसे कहतेहैं इस वाक्यका यह अर्थ है कि उस सात्त्विक भावको इतरभावको आत्मभावोपनायकता नहीं है इसका अभिप्राय यह है कि सात्त्विकभाव वस्तुको आन्तरभावविशेष्यक आरोपप्रकारत्व नहीं है क्योकि सात्विक भावका आरोप इतरभावमें नहीं होता है और स्थायिभावका सम्पूर्ण इतरभावमें आरोप होताहै इसलिये उक्त प्राधान्य स्थायिभावकोही है सात्त्विकभावको नहीं है। इसलिये अतिव्याप्ति नहीं हुई सो जानना। यहॉ विशेष करिकै प्रकारता विशे- व्यताका उपादान नही करे किन्तु विषयतामात्रका उपादान करै तो व्यभिचारि- भावमें अतिव्याप्ति होगी क्योकि व्यभिचारिभावको भी आन्तर भाव अर्थात स्थायिभावनिष्ठविषयतानिरूपितविषयताश्रयत्व है इसलिये ऐसा कहना चाहिये आन्तरभावनिष्ठविशेष्यतानिरूपितप्रकारताश्रयत्व ऐसा कहनेसे व्यभिचारिभावमें अतिव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि, आन्तस्भावनिष्ठविशेष्यतानिरूपितप्रकारताश्रयत्व व्यभिचाग्भिाव नही है क्योंकि व्यभिचारिभावका कहीं आरोप होता तो यह दल वहाँ रहता सो आरोप नहीं होता है किन्तु स्थायिभावकाही आरोप होता है इससे उक्त प्राधान्य व्यभिचारिभावम भी नहीं है सो जानना । यहां विशेष्यदलका [ तरंग:- मायहे । स्थायिभावकी तो रससमयमें अभिव्यक्ति होतीही रहतीहै इसलिये इनको (१२) रसतरंगिणी- चरमसमयपर्यन्तस्थायित्वादस्य स्थायित्वव्यपदेशः । उपादान नहीं करें तो आन्तरभावमें जब घटका आरोप होगा तहां उक्त प्राधान्य घटमेंभी रहेगा इससे उक्तान्यतमसम्पन्नचर्वणाक यह विशेषण दिया । तब घटमें अतिव्याप्ति नहीं हुई क्योंकि घटको उक्तान्यतमसम्पन्नचर्वणाकत्व नहीं है यही सहितान्तका अनुपादान करै तो रसमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि रसको भी अन्य- तमसम्पन्नचर्वणाकत्व है इस हेतु सहितान्तविशेषण दिया तब रसमें अतिव्याप्ति नहीं हुई क्योंकि रस अन्यतमाभावसहित नहीं होता है चर्वणामें अन्यतमसम्पन्न- त्वका अनुपादान करें तो घटमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि उक्त प्राधान्य घटमें है ही और घट अन्यतमाभावसहित भी है और घटकी चर्वणाभी होसक्ती है इस हेतु अन्यतमसम्पन्नत्व विशेषण दिया ऐसा हुआ तो घटके अन्यतमसम्पन्नचर्वणा- कत्व नहीं है इससे अतिव्याप्ति नहीं होगी ऐसी व्यवस्था हुई । तो शेष भागको वैयर्थ्य होकरिके दो लक्षण स्थायिभावके हुए यह जानना । अब यहॉ यह शंका हुई कि मनोवृत्तिविशेषरूपस्थायिभावको शीघ्रतरविनाशित्व होनेसे स्थायित्व कैसे होगा। इसका समाधान चरम" इत्यादिवाक्यसे कहतेहैं।वाक्यार्थ यह है कि स्थायिभावका जो सूक्ष्म अवस्थाकाल उसंहीका नाम चरमसमय है । और स्थायिभावका नाशक्षण जो है सो चरमसमय नहीं समझना क्योंकि सत्कार्य- वादीके मतम सम्पूर्ण पदार्थ सत्रूपही हैं उनके मतमें नाश कोई पदार्थका नहीं है ऐसा हुआ तो रत्यादिकभी सूक्ष्मरूप जो वासना तद्रूपतासे स्थित रहतेहैं इससे उनको स्थायित्वव्यवहार होताहै । इसमें प्राचीन वाक्यभी प्रमाण है कि "सजातीय- विजातीयैरतिरस्कृतमूर्तिमान् ॥ यावद्रसं वर्तमानः स्थायिभाव उदाहृतः" इसका अर्थ यह है कि सजातीय-विजातीय-भावकरिके अनभिभाव्यमूर्तिके व रससमयपर्य- न्तवर्तमान ऐसे स्थायिभाव कहेजाते है । इन वाक्योंसे भी यही पर्यवसन्न होताहै कि रससमयपर्यन्त सूक्ष्मरूपकरिके स्थित होनेसे रत्यादि स्थायिभाव कहाते है यह व्याख्या प्राचीन मतकी है। नवीनमतसे तो चित्तवृत्तिविशेषरूप रत्यादि स्थायिका नाश होनेपरभी वासनापरपर्यायक जो तज्जन्य संस्कार अथवा नहीं नाश होनेपरभी रत्यादिकी वासनारूपसे स्थिरता होनेसे जो स्थायित्वव्यपदेश किया सो स्थायित्व व्यभिचारिभावमें भी प्राप्त है । वहभी स्थायी कहावेगे इस हेतु वासनारूप रत्यादिकी जो वारम्बार अभिव्यक्ति होना सो ही स्थिर पदार्थहै।व्यभिचारिभावकी रससमयम बारम्बार अभिव्यक्ति नहीं होती है । व्यभिचारिभावकी अभिव्यक्तितो विद्युद्विद्योत- प्रथमः १.] भोपाटीकासहिता। (१२३ स चाधा। तत्र भरत:- रतिहासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा ॥ जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीर्तिताः॥६॥ तत्रेष्टवस्तुसमीहाजनिता मनोविकृतिरपरिपूर्णा रतिः। सा च क्वचिदर्शनेन, क्वचिच्छ्रवणेन, कचित्स्मरणेन । यथा- स्थिरता हुई इस हेतु ये स्थायी कहातेहैं कोई 'रत्यायन्यतमत्व' स्थायीका लक्षण कर तेहैं सो युक्त नहीं जानना क्योंकि करुणरसका काव्यमें रति व्यभिचारीभाव कहाजाताहै । वहाँ भी रतिमें यह अन्यतमत्वरूप लक्षण प्राप्त होगा तो वहाँभी रति स्थायिभाव कहाजायगा । इसका उदाहरण-"विच्छिन्नबाई पतितं पुरस्तादागत्य भूरिश्रवसं समीक्ष्य । प्रेम्णा समालिङ्गिववाहुखण्डं विमुक्तकण्ठं विलालाप वाला ॥" यही प्रेमशब्दमात्रकरिके प्राप्त जो रति सो करुणा रसका व्यभिचारीहै सो जानना। और जहाँ प्रधानभूत करुणाकी पुष्टताके अर्थ रतिभी पुष्ट कीजाय तहॉ रसवद- लहारही है जिसप्रकार-"अयं स रसनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः ॥ नाभ्यूरुजघ- नस्पी नीवीविषेसनः करः॥" यहॉ भुजखण्डावलोकनोद्दीपित प्रतीयमानरोदनाद्यनु- भावित रतिरूप जो शृङ्गार सो करुणाके पोषणके अर्थ पुष्ट कियागयाहै इसलिये यह रति अलंकाररूप है और स्थायीरूप नहीं है। अब स्थायिभावका विभाग "सच" इत्यादिवाक्यसे करतेहै । वाक्यार्थ यह है कि वह स्थायिभाव आठ प्रकारका है इस विभागमें भरतजीने भी अपना वाक्य प्रमाण दिखाया है । यद्यपि शान्त रसका स्थायिभाव जो निर्वेद है सो भी यहां ही परिगणनके योग्य है तथापि स्वतन्त्रेच्छ जो भरत मुनि उन्होंने व्यभिचारिभावमेंही निवेदकी गणना की और भक्त्यादि जो है सो भावही है रस नही है यह बात आगे कहेगे । आठ प्रकारके रथायिभावमें प्रथम कथित जो रति उसका लक्षण करतेहैं “तत्र" इत्यादि वाक्यसे। इस वाक्यका यह अर्थ है कि उन स्थायिभावोंमें ऐसी मनोविकृतिको रति कहना कैसा, सो कहतेहै कि मनके अनुकूल जो वस्तु तद्वि- षयक जो इच्छा( वह इष्ट हमको होय इत्याकारक इच्छा) तजनितप्रेमरूप करके सो नही पूर्ण हुई अर्थात् रसभावको अप्राप्त अभिप्राय यह है किस्त्रीपुरुषमें परस्परा- लम्बन जो प्रेमाख्यचित्तवृत्तिविशेष सो रति है वहां सम्पूर्ण स्थायिभावके लक्षणमें अपुष्टार्थत्वविशेषण देदेना इससे रसमें अतिव्याप्ति दोष नहीं होताहै सोजानना।वह रति कहीं दर्शनसे, कहीं श्रवणसे, कहीं स्मरणसे होताहै ॥ रतिका उदाहरण (१४) रसतरंगिणी। [ तरंगः- चक्षुर्यस्य कृषीवलो निगदितं पीयूषपाथोधरो भ्रूसंज्ञा परिचारिका समजनि स्फीतं स्मितं दोहदम् । सन्तापं तरुणार्ककर्कशरुचिं निःश्वासवाताहति कस्मादेष सहिष्यते स च सखि प्रेमद्रुमः कोमलः ॥६॥ अत्र कोमलपदादपूर्णता। "चक्षुर्यस्य"इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं।नायकसखीके प्रति नायिकासखीका यह वचन है। श्लोकार्थ यह है कि हे सखी ! वह जो ये अर्थात् अत्यन्त उपादेयताकरिकै अनु भवका विषय इसही हेतु कोमल अर्थात् संभाव्यमानबहुविघ्नयुक्त प्रेमरूप वृक्ष सो मध्याहजृम्भमाणचण्डांशुवत् प्रचण्ड जो सन्ताप अर्थात् कामजर उसको और निश्वासरूप पवनकी ताडनाको किसके बलसे सहने में समर्थ होगा । वह प्रेमद्रुम कौन, सो कहतेहैं, जिस प्रेमद्रुमका नेत्र मनोरूप भूमिका आकर्षक होनेसे खेती करनेवालाहै । और वचन जो है सो अमृतका मेघ है । और भूसंज्ञा कहिये भूवि- लास जो है सो परिचारिका अर्थात् खेती करनेवालेकी सेविका है । और स्फीत कहिये समृद्ध अर्थात् वृद्धिको प्राप्त जो स्री पुरुषका परस्पर स्मित अर्थात् मन्दहास वह दोहद अर्थात् गर्भ है । यह कहनेका यह अभिप्राय है कि विना सम- यभी स्वेच्छाविहाररूप फलसम्पादक होनेसे यह स्मित गर्भरूप है। यहाँ कोई कहते हैं कि पुनरागमनमन्थर जो प्रिय उसके प्रति सखीके प्रेषण करनेकी कामना- वाली जो नायिका उसका यह वचन है । स्थायिभावका उदाहरण यह नहीं बन- सकताहै । क्योंकि यही कस्मात् इस पद्से चिन्तारूप व्यभिचारिभाव प्रतीत होताहै और निश्वासरूप अनुभाव प्रतीत होताहै । यह व्यभिचारिभाव अनुभावकरिकै युक्त नायिकागत विप्रलम्भ शृंगारही प्रतीत होताहै । रतिरूप स्थायिभावमात्र यहां प्रतीत नहीं होताहै।फिर यह उदाहरण स्थायिभावका कैसे होगा ? इस शङ्काका समाधान कोई इस तरह करतेहै कि "विभावानुभावव्याभिचारिभावोंके योगसे रसनिष्पत्ति होती है" एतदर्थप्रतिपादक भरतसूत्रमें मिलितको रसव्यञ्जकताका कथन है इसलिये यहां रसकी प्रतीति किस प्रकार होगी ? क्योंकि आलम्बनविभाव- रूपनायकका उपादान यही नहीं है । यह समाधान युक्त नहीं क्योंकि आलम्बन- विभावका उपादान नहीं है तो भी चिन्तारूप व्यभिचारिभाव निश्वासरूप अनु- भाव इन दोनोंके बलसे नायकरूप आलम्बनविभावका आक्षेप होसकताहै फिर रसका उदाहरण बनही जायगा फिर स्थायिभावका उदाहरण किस तरह कहा ? इसका समाधान कोई इस तरहभी करतेहै कि चिन्तारूप व्यभिचारिभाव निश्वा- सरूप अनुभाव ये दोनों विप्रलम्भश्रृंगार और करुणा और भयानक तीनों रसोंमें प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। कुतूहलकृतवचनवेषवैसादृश्यकृतो मनोविकारः- धारण हैं। इसलिये एकतर आलम्बनके आक्षेपमें नियामक नहीं होसकेंगे सहीसे यह, स्थायिभावका उदाहरण होसकेगा यह भी युक्त नहीं। क्योंकि रही जिस प्रेमरूप वृक्षके नेत्र खेती करनेवाले हैं, इत्यादि वाक्यकरिके नायिका- कृतसादरावलोकनाकृष्ट मनामरूढ प्रेमवृक्षादिज्ञानरूप सहकारीकरिकै उक्त व्यभि- वारिभाव अनुभाव बलकरिके नायकहीकाआक्षेपहोगाक्योंकि इस श्लोकमें हास्याभि- व्यञ्जकजो स्मितहै उसकी करुणभयानकादिमें अत्यन्त प्रतिकूलताहै इसलिये यहीं रस का उदाहरण बन सकताहै स्थायिभावमात्रका नहीं बन सकता। यहां कदाचित् यह कहो कि आक्षेपसे रसकी प्रतीति नहीं होतीहै । तो यह कहना युक्त नहीं क्योंकि आक्षेपसे भी रसमतीतिका उपपादन आलंकारिकधुरंधरभट्टाचार्यने किया है। काव्यप्रकाशके चतुर्थोल्लासमें यह कहाहै कि"वियदलिमलिनाम्बुगर्भमेघम्''इत्यादि श्लोकमें आलम्बनोद्दीपनविभावमात्रका कथन है और "परिमृदितमृणाली" इत्यादि श्लोकमें अंगमालिन्याद्यनुभावमात्रका कथन है। और “दूरादुत्सुकमागते विगलितं संभाषिणि स्फारितम्" इत्यादि श्लोकमें उत्सुकादिविशेषणव्यंग्य औत्सुक्य, लज्जा, हर्ष, क्रोध, असूया, प्रसाद इन व्यभिचारिमात्रोंका कथन है फिरभी यही आक्षेपसे रसप्रतीति होतीहै। इन तीनोंही श्लोकोंकी व्याख्या गूढार्थदीपिका" नाम काव्यप्रकाशकी व्याख्यामें करदी है यहां विस्तारभयसे नहीं लिखते हैं। इसलिये उक्त प्रश्नका यह समाधान है कि प्रकृत श्लोकमें जो कोमल पद दियाहै सो कोमलपद रतिमात्रतात्पर्यका निर्णायक है.। इसलिये यहां आक्षेप नहीं होताहै इसही अभिप्रायसे अन्यकारने कहा है कि 'कोमलपदादपूर्णाता' अपूर्णता यहींहै कि विभावानुभाव व्यभिचारिभावान्यतमका यहां विरहहै सो जानना । अब यहाँ यह शंका होतीहै कि यह कोमल पद नहीं भी होय तोभी प्रेमको स्वशब्दोपात्तता होनेसे वमनाख्य दोष होनेसे रसत्वका अभाव होनेसे स्थायिभावका उदाहरण संगतही होगा । इस शंकाका यह समाधान है कि भरतसूत्रमें रसाभिव्यञ्जनमें तीनका ही उपादान है इसलिये वमनदोषकी रसताके विरोधमें प्रमाण नहीं है इससे यहां रस हो ही जायगा । इसलिये यह व्यवस्था करनी चाहिये कि जहॉ अन्यतरके अनुपा- दानमें भी अन्यतराक्षेपका प्रतिबन्धक कथित होय वही स्थायिभावका उदाहरण होताहै । ऐसा हुआ तो प्रकृत श्लोकमें अन्यतराक्षेपका वाधक कोमल पदहै इससे यह स्थायिभावकाही उदाहरण है. रसका नही सो जानना । अव हासरूपरथायिभावका लक्षणभरतजीकहतेहैं "कुतूहलकृत" इत्यादि सत्रसे।सूत्रका देनेका स्या तात्पर्य है इसका समाधान कोई यह कहते हैं कि अपने पिताका उसहीमें कुतूहलकृत इस विशेषणका अभिप्राय है इसलिये वचन विकार दर्शनजन्मा जो विकास सो हासहै यह अर्थ फलित हुआ यहाँ आत्माश्रय दोष नहीं है और अतिव्याति दोषभीनही है सो जानना अव हासस्थायिभावका उदाहरण "आगच्छन् । इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं। यहां यह शंका होतीहै कि यहां 'तातचरणानाम्' यह पद (१६) रसतरंगिणी- [तरग:- परिमितो हासः॥वचनभेदवेष भेदकृतेभयकोधे नातिव्याप्तिः॥ तत्र कुतूहलकृतत्वाभावात् । यथा-तातचरणानाम् ॥ आगच्छन्नगरोपकण्ठमिलितैरावेष्टितो बालकैः शुद्धान्ते परिचारिकाभिरचिरं सोल्लासमावेदितः ॥ अर्थ यहह कि कुतूहलोद्देश्यक जो वचन वा वेषकी विसदृशताअर्थात् वैचित्र्य तज्जन्य जो अपरिपूर्ण मनोविकार सो हास है इस लक्षणमें कुतूहलकृत पद नही देव तों अतिव्याप्तिरूप दोष होताहै सो दिखातेहैं "वचनभेद"इत्यादि वाक्यसे। वाक्यार्थ यह है कि वचनके वैचित्र्यसे और वेषके वैचित्र्यसे जनित जो भय और क्रोध वहभी वचन वेप वैसादृश्यकृत मनोविकारहै तो वहभी हास कहावैगा। इस हेतु कुतूहलकृत' यह विशेषण दिया। यह विशेषणवचन वेषवैसादृश्यका है ऐसा हुआ तो जहां भय वा क्रोधके अर्थ वचनभेद वा वेषभेद होताहै सो कुतहलोद्देश्यक नहीं होताहै इस हेतु वहां अतिव्याप्ति दोष नहीं हुआ यहही बात “तत्र' इत्यादि वाक्यसे कहीहै सो जानना। अब यहां यह शंका होती है कि कुतूहलोद्देश्यक भी जो वचन वैसादृश्य उससे कदाचित् भय क्रोधका सम्भव होता है तो फिर भी भयक्रोधमें अतिव्याप्ति दोष रहे हीगा इस अतिव्याप्तिके वारणार्थ जो तुम ऐसा लक्षण कहोगे कि कुतूहलोद्देश्यक जो कुतूहलफलोपहित वचन वेषवैसादृश्य, तजन्य जो मनोविकार सो हास है ऐसी विवक्षा करनेसे भयक्रोधर्म अतिव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि भयक्रोधजनक जो वचन वेषवैसादृश्य है सो कुतूहलफलोपहित नहीं है क्योंकि जिस वचनवेष- वैसादृश्यका उत्तरकालमे कुतूहल सम्पन्न होय वह वचन वेषवैसादृश्य कुतूह- लफलोपहितक होताहै, ऐसा हुआ तो भयक्रोधका सम्पादक जो वचन वेषं वैसाव्य सो कुतूहलफलोपहित नहीं हुआ इस हेतु भयक्रोधमें अतिव्याप्ति नहीं होगी परन्तु वह विशेषण देनेसे वा नहीं देनेसे दोनोंही पक्षमें होसके लक्षणमें कुतूहलपदार्थका जो प्रवेश है सो कुतूहलपदका अर्थहासहीहै । तो हासके लक्षणमे हासका प्रवेश होनेसे आत्माश्रय दोष होताहै इस हेतु निर्दोष लक्षण करना चाहिये । इसका समाधान यह है कि विकासरूप जो चित्तवृत्ति विशेष . प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। । १७) साकूतं सकुतूहलं बलिवधूवृन्दे पुरो दापय त्यन्नं किञ्चिदुदश्चितस्मितलवः पायात्स वो वामनः ॥७॥ लवपदादपूर्णता। इष्टविश्लेषजनितो रत्यनालिंगितः परिमितो मनोविकार:- पाण्डित्यख्यापनार्थ 'तातचरणानाम्' यह पद दिया, यह कथन समीचीन नहीं। श्लोक रचना करनेहीसे पाण्डित्य नहीं होताहै, बहुत ईषद्विद्याभी श्लोक बनातेहैं किन्तु इसका समाधान यह है कि अन्यकृत श्लोकका उदाहरणोपन्यास करनेसे 'अस्मत्पद्येन' इत्यादि जो ग्रन्थशेषमे श्लोक है उससे विरोध होजायगा, उस विरोधाभावका उपपादन 'तातचरणानाम्' इससे किया। अभिप्राय यहहै कि हमारे पिताका है तो हमाराही है। श्लोकार्थ यह है कि राजाके प्रति कवि आशीर्वाद देता है कि, वह जो वामन सो आपकी रक्षा करो, कैसा है वह वामन, नगरके समीपमें मिलेहुए अर्थात् प्राप्त हुए जो समुदित बालक तिनसे कौतुक देखनेकी इच्छासे वेष्टित ऐसा भागमन करता हुआ उसही समय अर्थात देखनेके कालमें ही दासियोंने अन्तःपुरमें बलि- वधूवृन्दमें हर्षके साथ जैसे होय तैसे आवेदित अर्थात निवेदन कियागया । फिर कैसा है वामन, बलिवध्वृन्द जो है सो साकूत अर्थात् वामनका जो वृत्तान्त परीक्षा उस परीक्षागर्भ जैसे होय तैसे और सकुतूहल अर्थात् वामनाकार समवलोकन- जनित कौतुकपूर्वक जैसे होय तैसे दासियोंसे अन्न दिवावतीहै ऐसे होत सन्ते "किश्चिदुदश्चितस्मितलबः' अर्थात् वामनने यह विचार किया कि तीनोंलोकोंकी भिक्षा ग्रहणार्थ यह रूप धारण करनेवाला जो मै हूं उसकू चेटीके द्वारा परिमित अन्न देवी है यह विचार करिकै थोडा उल्लसित जो हासका अनुभावभूत किञ्चित् आस्यस्पन्द सो है जिमकू ऐसा। यहां यद्यपि वामनदर्शनजन्य अन्नदानाद्यनुभावयुक्त जो बलिव- धूवृन्दनिट हास सो परिपूर्ण देखतेहै और सुनो कि वामनमुखविकासकरिके आक्षिप्त जो विभावादि उससे वामननिष्ठ जो हास है सोभी परिपूर्ण है यह कहसकतेहैं तथापि लवपदप्रकाशित जो अपरिपूर्णता सोही पूर्वोक्त युक्तिसे वामनगत हासमें विश्रामको प्राप्त होतीहै इस हेतु उदाहरण यहां वन जायगा यही बात 'लवपदात्' इत्यादि वाक्यसे कहते हैं। अवशोकरूप स्थायिभावकालक्षण “इष्टविश्लेषजनितः" इत्यादिवाक्यसे कहते है। वाक्यार्थ यह है कि इष्टजनके वियोगसे उत्पन्न रतिसे अयुक्त ऐसा जो अपरि- पूर्ण मनोविकार वह शोक है । यहां इष्ट शब्दार्थ इच्छाविशिष्ट नहीं समझना. इच्छोपलक्षित समझना, यह कहनेसे मृतव्यक्ति इच्छाभावका प्रतिपादक 'तत्र तत्र २ [ तरंग फिर तजन्पमनोविकृति कहांसे होगी? फिर शोकरूप विकारको उक्त रत्यालिङ्गितत्व (१८) रसतरंगिणी- शोकः ॥ न चेष्टविश्लेषजनितविप्रलम्भशृङ्गारस्य करुण- रसत्वापत्तिः। तस्य रत्यालिङ्गितत्वात् ॥ न चरतिःप्रीतिःतया विनाशोकोपि नोत्पद्यते इति तथा- चासम्भव इति वाच्यम्, इष्टसमीहाजनितमनोविकृतेरेव रतेरुक्तत्वात। कुमारसम्भवेरत्याः,कादम्बयां महाश्वेताया, रघुकाव्येऽजस्य, प्रलापे करुण एव रसः॥ बाधनिश्चयात्' इत्यादि ग्रन्थभी संगत होता है यह वार्ता आगे वहांके व्याख्यानमें स्फुट होजायगी। अब रत्यनालिंगित यह जो विशेषण दिया इसका प्रयोजन शंका- समाधानपूर्वक कहते हैं "नच" इत्यादि ग्रन्थसे। इसका अभिप्राय यह है कि इष्ट वियो- गसे उत्पन्न जो विप्रलम्भ श्रृंगार उसमें शोकलक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि इस स्थलमें जो मनोविकार है सो रतिसे युक्त है और शोकलक्षणमें रत्यनालिंगित पद है तो विप्रलम्भ शृंगारको रत्यनालिंगितत्व नहीं है। अब यहां यह शंका होतीहै कि रति नाम प्रीतिका है उसका प्रयोज्य जो नहीं होय सो रत्यनालिंगित कहाताहै ऐसा हुआ तो शोक भी प्रीति विना नहीं होताहै तो शोकको भी रत्यालिंगितत्व होनेसे रत्यनालिंगितत्व विशेषण नहीं रहेगा तो असम्भव दोष इस लक्षणमें होगा यही पात 'नच' इत्यादि ग्रन्थसे कही है। इसका समाधान "इष्टसमीहा" इत्यादि ग्रन्थसे करते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि शोकलक्षणमें जो रतिपद है सो इष्ट वस्तु समी- हाजनितमनोविकृतिरूप है ऐसी जो रसि है उससे युक्तत्व शोकरूप मनोविकृतिको नहीं है क्योकि शोकस्थलमें इष्ट वस्तुकी इच्छा नहीं होतीहै इस हेतु शोकको रत्यनालिंगितत्व है तो असम्भव दोष नहीं होगा इसी हेतुसे जहाँ मृत पुरुषमें जीवि- ताशाहै तहाँ रति तो प्रधान है शोक अप्रधान है इस हेतु शोकमें रत्यनालिंगितत्व नहीं है इस हेतुवहॉ विमलभ शृङ्गारहै । और जहाँ जीवमें भी मृतत्वनिश्चय है तहाँ शोकरूप विकार पूर्वोत्तरतिसे अनालिगित है इसहेतु वहॉ करुणकाभी निर्वाह होजा- यगा। प्रथमस्थल में जो विप्रलम्भ शृंगार कहा उसमें यह अभिप्राय है कि जिस वस्तुमें भावी इष्टसाधनताबुद्धि होतीहै उस वस्तुकी इच्छा होतीहै ऐसा हुआ तो विमलम्भशृङ्गारस्थलमें इष्टवस्तुसमीहा है और जहाँ करुणरस कहाहै वहाँ मृतत्वनिश्चय दे तो मृतमें भावी इष्टसाधनतावृद्धि नहीं होती है फिर वहाँइच्छा किस हेतुसे होगी?
प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। (१९) तत्रतत्र बाधनिश्चयादिष्टवस्तुसमीहाया अभावात् । यत्र च मृते जीविताशातत्रशृङ्गार एव रसः, बाधसंदेहस्य ग्राह्यसं- देहपर्यवसिततया समीहाया अप्रतिबंधकत्वात् ॥ नहीं होगा, इससे वहाँ करुण रस होगा इसी हेतु कुमारसम्भव ग्रन्थमें रतिका और कादम्बरी ग्रन्थमें महाश्वेताका और रघुवंशमें अजका जो प्रलाप है उसमें करुणही रस है। महाश्वेताका वृत्तान्त कादम्बरीग्रन्थमें देखलेना इसही अभिप्रायको “तत्रतत्र' इत्यादिग्रन्थसे कहते हैं । इस ग्रन्थका यह अर्थ है कि कुमारसंभवादि ग्रन्थम रत्यादिके वृत्तान्तमें जीवन भाव निश्चय होनेसे इष्ट वस्तु समाहा वहाँ नहीं रहतीहै और जहाँ मृतपुरुषमें जीविताशा अर्थात् जीवनसन्देह है तहाँ तो शृंगारही रस है। यहाँ यह शंका होतीहै कि एक व्यक्तिमें जीवन और जीवनाभाव दोनोंका जो जानना वही जीवनसन्देह है तहाँ एक भागमें मरणभी प्राप्त हुआ, ऐसा हुआ तो वह पुरुष मृतत्वसे भी अवगत हुआ तो भावि इष्टसाधनताभावज्ञान वहाँ हुआ उस ज्ञान होनेसे भावि इष्टसाधनताज्ञानाधीन जो इच्छा तज्जन्यमनोविकृतिरूप रति वहां कैसे होगी। ऐसा हुआ तो जीवनसन्देहमें शृङ्गार कैसे कहा ? इसका समाधान “बाध- सन्देहस्य" इत्यादि वाक्यसे कहते हैं । इस वाक्यका यह अर्थ है कि जहॉ जीवनसन्दे- हदशाहै तहाँ भाविइष्टसाधनताभावनिश्चय नही ही होसकताहै । इष्टसाधनत्वाभावका सन्देह होसक्ताहै सो ही सन्देह वाधसन्देह कहाताहै सो एक भागमे इष्टसाधनता सन्देहरूप है तो वह बाधसन्देह सग्राह्य जो इष्टसाधनता वस्तु उसका संन्देहरूप होनेसे समीहा कहिये इच्छाका प्रतिबन्धक नहीं होसक्ताहै । जो इष्टसाधनतासन्देह भी इच्छाका प्रतिबन्धक होय तो युद्धमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये वहाँ पुरुषको इष्टसाधनताका सन्देहहै तो वहां इच्छा नहीं होसकैगी तो प्रवृत्ति कैमे होगी ? इस हेतु इष्ट साधनतासन्देह इच्छाका प्रतिबन्धक नहीं है यहही मानना चाहिये । और दावानलमें इष्टसाधनत्वाभावनिश्चय होनेसे बाधनिश्चय रहगया इस हेतु वहां इच्छा नहीं होती है, इस हेतु प्रवृत्तिभी नहीं होतीहै ऐसा हुआ तो प्रकृतस्थलमें बाधनिश्चय नहीं है किन्तु सन्देह है वह सन्देह समाहाका प्रतिबन्धक नहीं है इस हेतु समीहा होयहीगी तो श्रृंगार रस होने में कोई प्रतिबन्धक नहीं है सो जानना। कोई यह कहतेहै कि जिस प्रकार मृतत्व करिकै निश्चय रहनेमे ही करुण होताहै तैसे ही जीवितत्व करिकै निश्चय रहनेसे ही विप्रलम्भ होताहै । ऐसा नही मानो तो जहां मृतत्व करिकै सन्देह है और जीवित्तत्व कारकै सन्देह है तहां करुणरसका. अवान्तर भेद क्यों नहीं स्वीकार करते हो? जो १ उन उन पुरुषोंमे भाव इष्टसाधनताभावबुद्धि होनेसे तत्तत्पुरुषविषयक इच्छा नही होगी।
जो जमणाव्यवहार होताहै सो अंगभूत चिचवैक्लव्यकृतही जानना। [तरंगा सन्देहाभावज्ञान करानेके अर्थ उत्तरार्द्धप्रणयन क्यों किया, वह व्यर्थ होजायगा है किन्तु सन्देहकाभी अभाव होनेसे स्वीकार है । ऐसा हुआ तो विप्रलम्भश्रृंगारमें (२०) रसतरंगिणी- तथा च यूनोरेकतरस्मिन् मृते प्रलापः करुणरसः, जीव- तोर्विश्लिष्टयोः प्रलापः शृंगारः। अत एव रसरत्नदीपि- कायां करुणरसोदाहरणम्- अयि जीवितनाथ जीवसीत्यभिधायोत्थितया तया पुरः ददृशे पुरुषाकृतिः क्षितौ हरकोपानलभस्म केवलम् ॥ ८॥ स्वीकार करोगे तो ऐसे सन्देहस्थलमें जिस रीतिसे मरणज्ञान होनेसे करुणका भेद मानेंगे तैसेही जीवनकाभी तो सन्देह यहां है तो जीवनज्ञान रह जायगा तो शृंगार भी क्यों नहीं मानोगे? एक माननेमें कोई विनिगमक नहीं इस हेतु ऐसे सन्देहस्थलमें करुणविप्रलम्भाख्य रसान्तरही मानना चाहिये, यह जो मत है सो समीचीन नहीं क्योंकि शृंगारका स्थायी जो राति उसको वियोगकालीन होनेसे विप्रलम्भभंगार तो मानना ही होगा और करुणका स्थायी तो रत्यनालिंगित शोक है सो यहां रत्यालिंगितत्व होनेसे नहीं बन सकताहै। इस हेतु ऐसे स्थलमें रसान्तर मामना युक्त नही यह बात विद्जन सूक्ष्मदृष्टिसे विचार लेवै । यह ही बात,"तथा च" इत्यादि ग्रन्थसे स्पष्ट करतेहैं । इस ग्रन्थका यह अभिप्राय है कि युवति युवा इन दोनोंमें एक जव मृत होय तब जो प्रलाप करना है सो तो करुणरस है और विश्लेषयुक्त दोनों में जहां जीवितत्व सन्देह है तहां जो प्रलाप वह विप्रलम्भ शृंगार है यावत् जीवनसन्देह है तावत् करुणका प्राचीनकी भी सम्मति दिखातेहैं "अंत पव" इत्यादि वाक्यसे । इस वाक्यका यह अर्थ है कि जीवनसन्देहका भी अभाव रहनेसे ही “रसरत्नदीपिका" ग्रन्थमें करुणरसका उदाहरण "अयि जीवित" इत्यादि श्लोक कहाहै । श्लोकार्थ यह है कि हे जीवितनाथ ! जीतेभी हो (यहां अयि यह जो पद है सो दीनताको अभिव्य- जित करताहुआ शोकको पुष्ट करताहै ) यह कह करिकै उठी हुई जो रति उसने फिरभी पृथिवीमें पुरुषाकृति अर्थात् इस्तपादादिविवेकपूर्वक हरकोपानलजन्य भस्ममात्र देखा अर्थात जीवनाशाभी नहीं रही। इस श्लोकमें उत्तरार्द्धसे जीवना- शाका अभावज्ञान कराया इस हेतु यह विचार करना चाहिये कि जो जीवन- सन्देहेमें भी करुणरस होता तो पूर्वाईसे भी जीवनसन्देह सिद्धही था फिर जीवन- इस हेतु रसरत्नदीपिकाकारको भी जीवनसन्देहमें करुणरसका स्वीकार नहीं प्रसरण नहीं है इसमें - - भावाटीकासहिता। प्रथमः१.] (२१) ननु विप्रलम्भस्य पूर्वानुरागमानप्रवासकरुणात्मकत्वाज्जीव- तोरपि विप्रलम्भस्य करुणरसत्वमायातमिति चेत्। सत्यम्, तत्र करुणारसस्याङ्गत्वेन भासमानत्वात्तत्र करुणात्म- कव्यपदेशः ॥ यथा- अब यहाँ यह शंका होतीहै कि जीवनसन्देहस्थलमें तुल्ययुक्तिसे रातिपुष्ट चैलव्यको भी कहसकतेहैं। इस हेतु जहां जीवनसन्देह है तहां श्रृंगारही है ऐसा अवधारण नहीं करसक्तेहै क्योंकि जहॉ रति प्रधान है और अंगवैकुव्य है तहॉ तो श्रृंगार होगा। परंतु जहाँ रति अंग है और चित्तवैक्छव्य प्रधान है तहां तो करुणही कहना होगा। इसका यह समाधान है कि रति और शोक दोनों जहाँ प्राप्त होय तहॉ रतिही प्रधान होय शोक प्रधान नहीं होय । इसमें वस्तुस्वभाव जो है सो ही प्रमाण है एसा हुआ तो दोनोके सद्भावमें रतिकी प्रधानता होनेसे विप्रलम्भ श्रृंगारही होगा करुण नहीं ही होगा। और जो विप्रलम्भश्रृंगारमें करुणव्यवहार होताहै सों पूर्वोक्त युक्तिसेही होताहै सो जानना चाहिये। ( याद पूर्वोक्त रीतिसे गुण- प्रधान नियम नहीं मानो तो चित्तवैक्लव्यसे पुष्ट जो रति उसको तो विप्रलम्भ समझो और रति करिके पुष्ट जो चित्तवैक्लव्य उसको करुण समझो यही व्यवस्था सुस्थ होजायगी) यह कहनेके अर्थ "ननु" इत्यादि ग्रन्थका आरम्भ करतेहैं । इसका यह अभिमाय है कि पूर्वानुराग और मान और प्रवास और करुण चार प्रकारसे विप्रलम्भका वर्णन है इस हेतु जीते हुए जो स्त्री पुरुष उनको विप्रलम्भ शृंगारको करुणरसत्व आया। यहां पूर्वानुराग उसे कहतेहैं कि संगम तो भया होय नहीं और स्नेह उत्पन्न होगया इसीको अभिलाषहेतुकभी कहते हैं। और मान उसको कहतेहैं कि ईष्यासे अथवा स्नेहसे जोकोप होय उसको ईर्ष्या हेतुकभी कहते हैं यह संगमोत्तर जानना । प्रवास उसको कहतेहैं कि प्रवासज्ञान होकरिके जो श्रृंगार होय यह प्रवासज्ञानहेतुक है इसीको प्रवासहेतुकभी कहते हैं। और करुणारूपशृंगार उसको कहतेहैं कि जिस तरह ईर्ष्या और प्रवास एतद्धेतुक और संगमपूर्वक जो विप्रल- म्भ है इसके जो कारण होतेहैं अर्थात् ईर्ष्या प्रवास इससे अतिरिक्त जो हेतु गुर्वादिलज्जा उससे उत्पन्न जो संगमपूर्वक विप्रलम्भ सो विरहहेतुक कहा- ताहै । तिसही तरहसे उन दो प्रकारका जो विप्रलम्भशृंगार उसका कारण जो ईर्ष्या प्रवास उससे अतिरिक्त जो बलवत्तर कारण उससे उत्पन्न जो संगमपूर्वक विप्रलम्भ उसको करुणशृंगार कहतेहैं, ऐसा हुआ तो विप्रलम्भको भी करुण- रसत्व आगया, यह जो शंका 'ननु' इत्यादि ग्रन्थसे की उसका "तत्र" इत्यादि भात युद्धवीरोत्साहोदाहरणावसरमें व्यक्त होगी । अव क्रोधरूप स्थायिभावका यहाँ प्रमोदप्रतिकूल इस विशेषणका फल “प्रमोदप्रतिकूल' इत्यादि वाक्यसे कहतेहैं। वाक्यार्थ यह है कि रावणकृतदुर्वचनसे अपमानयुक्त रामके वीररस स्थायिभाव उत्साहमे भी अवज्ञादिकृतत्व है। तो अतिव्याप्ति होगी इस हेतु प्रमो- दप्रतिकूल यह विशेषण दिया तो वीर रसका व्यभिचारिभाव जो क्रोध उसको विवकरूप प्रमोद प्रतिकूल है तो भी क्रोधव्यभिचारिभावक वीररसस्थायिभाव जो. उत्साह वाम प्रमोदप्रातिकूल्य नहीं है, इस हेतु वहां अतिव्याप्ति नही होगी यह (२२) रसतरंगिणी- [ तरंगा विरहज्वरमूर्च्छया पतन्तींनयनेनाश्रुजलेन सिच्यमानाम्।। समवेक्ष्य रतिं विनिःश्वसन्ती करुणा कुभलिता बभूव शम्भोः९ कुड्नलितेत्यपूर्णता। अवज्ञादिकृतः प्रमोदप्रतिकूलः परिमितो मनोविकारः क्रोधः ॥ प्रमोदप्रतिकूलेतिविशेषणादशमुखदुर्वचनावमा- नितस्य रामस्य वीररसे नातिव्याप्तिः।। वाक्यसे पूर्वोक्तही समाधान करतेहैं । इसका यह अर्थ है कि विप्रलम्भ श्रृंगारमें करुणरसको अंगताकरिकै माना है, इस हेतु वहां करुणपर व्यवहार है,वास्तविकमें वह शृंगारही है । अब शोकका उदाहरण "विरह" इत्यादि श्लोकसे कहतेहे । श्लोकार्थ यह है कि वियोगसम्भूत सन्तापातिशयप्रयुक्त चित्तवैक्लव्यसे लोटती हुई और नयन अश्रुजलसे सींचीहुई ऐसी और निश्वास लेती हुई जो रति उसको देखकरिकै महादेवजीकी करुणा सभातकुडला होती हुई। यहां यद्यपि विश्व- स्तकामसे उत्पन्न अश्रुपात और गात्रविक्षेपादिसे अनुभाव्य जो रतिमनोवैक्लव्य सो परिपुष्ट है तथापि विध्वस्तकामप्रियाविभावित जो शिवचित्तवैक्लव्य सो अप रिपूर्णही तात्पर्यताविषय है इस बात समझना कुलित पदसे ही है । यहही वात कुड्मलितत्यपूर्णता' इस वाक्यसे कहीहै। उक्त युक्तिसे अपूर्णताही सव जगह है। और कोई जगहभी आक्षेपसे पूर्णाता है यह नहीं जानना । यही अधू- र्णता इस पदका अभिप्राय है ।। अव क्रोधरूप स्थायिभावका लक्षण कहतेहै । "अवज्ञादि०" इत्यादिनन्यसे । इसका यह अर्थ है कि अवज्ञा आदिसे उत्पन्न और प्रमोदका प्रतिकूल पेसा जो मनोविकार अर्थात प्रज्वलन अपरिपूर्ण उसको क्रोध कहते हैं ।
प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। (२३) यथा परशुरामवाक्यम्- नाधारभ्य करोमि कार्मुकलताविन्यस्तहस्ताम्बुजः किञ्चित्पाटलभासि लोचनयुगे तावनिमेषोदयान् । यावत्सायककोटिपाटितरिपुक्ष्मापालमौलिस्खलन्- मल्लीमाल्यपतत्परागपटलैनामोदिनी मेदिनी॥१०॥ किञ्चित्पाटलत्वादपूर्णता॥शौर्यदानदयान्यतमकृतः परि- मितो मनोविकार उत्साहः॥ वीरस्तु युद्धवीर-दानवीर-द- यावीरभेदात् विधा । युद्धवीरस्योत्साहो यथा- सेनां संघटयन्द्युतिं द्विगुणयं श्वापं चमत्कारयन नेत्रस्याभिमुखो भविष्यति जगद्विद्रावणो रावणः । उदाहरण "नाधारभ्य" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि परशुरामजी कहतेहैं कि आजके दिन अर्थात् सहस्रार्जुनापराधदिनको आरम्भ करिकै अर्थात अवधि करिकै कार्मुकलता अर्थात् चापमें दिया है अम्बुजसदृश हस्तको जिसने ऐसा जो मैं सो किञ्चित्पाटलभासि अर्थात श्वेतरक्तकान्तियुक्त लोचनयुगमे तबतक निमेषोदय अर्थात् पक्ष्माकुंचनारम्भको नही करूंगा। कबतक, इस अपेक्षासे कह- तेहै कि जबतक मेदिनी अर्थात् पृथिवी बाणाग्रविदारित शत्रुभूत पृथ्वीपतियोके शिरसे विखरी हुई जो मालतीमाला उससे च्युत जो पुष्परेणु समूह उससे आमोदिनी अर्थात् गन्धवती नहीं होवे । यहाँभी गुरुजनापराधादिविभाषित विशिष्टप्रतिज्ञानुभावित क्रोध यद्यपि परिपूर्णही है तथाऽपि किञ्चित्पद क्रोधहीम वात्पर्यका सूचक है। और प्रतिनायकादिको आक्षेप कारकै पूर्ण क्रोधमें भी तात्पर्यको सूचित नहीं करता है। यही बात किंचित् इस पदसे कहते है ।। अव उत्साह लक्षण “शौर्य' इत्यादि वाक्यसे कहतेहैं । वाक्यार्थ यह है कि शूरता और दान और दया एतदन्यतमकृत जो परिमित मनोविकार सो उत्साह है ॥ यहां एकमात्रका उपादान करे तो दूसरे उत्साहमे अव्याप्ति होगी । एतदन्यतमसे कृत अर्थात् अनुभावित जो औद्धत्याख्य मनोविकार वह उत्साह है सो जानना। कार्यवैचित्र्यहीसे कारणवै- चित्र्य जानाजाताहै यह वात "वीरस्तु" इत्यादि वाक्यसे कहतेहैं अर्थात् वीर युद्धवीर, दानवीर, दयावीर इनभेदोंसे तीन प्रकार है । अव युद्धवीरके उत्साहका उदाहरण सेनाम्"इत्यादिश्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्य यह है कि सेनाको इकट्ठा करता च्याप्त अर्थात् देखनेमें अशक्त है कमलसदृश नेत्र जिसका ऐसा। यहां २ देनकी जो इच्छा उससे सञ्जातपल्लव अर्थात् वर्धमान जो आनन्दसम्वन्धी अश्रु तत्सकीर्ण जी जानीमो भृगुनन्दनस्तदखिलं न प्रायशो दृष्टवान् ॥१२॥ हृदय अर्थात् व्यग्रहृदय अर्थात् वार्तानुसन्धानरहित जो रामचन्द्र उनने प्रत्यञ्चाकी चन्द्रमण्डलको भिक्षुकको नहीं देताभया और घरके वास्ते 'हिमाचलको नहीं देता. तरह ये सब क्यों नहीं दिये ? इससे जानते हैं कि उन सबको प्रायः वह नहीं देखताभया। नहीं देखनमें हेतुगर्भ विशेषण कहतेहैं कि कैसाहै भगुनन्दन कि, दनका जो इच्छा उससे पल्लवित अर्थात् पल्लवावस्थासे परिणमित जो प्रमोद अर्थात् आनन्दाकार चित्तवृत्तिविशेष उससे जो जल उससे व्याकीर्ण अर्थात (२४) रसतरंगिणी- [तरंगः- इत्युत्साहविचारमूढहृदयो देवो रघूणां पति- या॑विन्यासविधि विनैव विशिखं बाणासनेन्यस्तवान्।॥११॥ अत्र विचारादपूर्णता। दानवीरस्योत्साहो यथा- आदर्शाय शशांकमण्डलमिदं हाय हेमाचलं दीपाय धुमणि महीमिव कथं नो भिक्षवे दत्तवान् । दित्सापल्लवितप्रमोदसलिलव्याकीर्णनेत्राम्बुजो हुआ कान्तिको द्विगुण वर्धन करता हुआ धनुषको चमत्कार करता हुआ अर्थात ज्याको संयोजित करिके कानपर्यन्त खेचता हुआ जगत्का विद्रावण अर्थात दुःखदेनेवाला ऐसा रावण जो है सो हमारे नेत्रके सम्मुख होयहीगा । इस प्रका- रका जो युद्धोत्साह उस करिके जो विचार अर्थात् मनोघटना उस करिके मूह- रचना विधि विनाही अर्थात् धनुषका ज्याके साथ संयोग विनाही बाणको धनु पमें संयोजित करदिया। यहां उत्साहका जो अनुभाव उसकी अनुपादानतासे उत्साहकी अपूर्णता जाननी । आक्षेपभी विचारपदसे नहीं बनसकताहै इस हेतु 'विचारपदादपूर्णता' यह ग्रन्थ संगत होगया। अब दानवीरके उत्साहका उदाहरण "आदर्शाय" इत्यादिश्लोकसे कहते हैं। लोकार्थ यह है कि कोई कहताहै कि भृगु- नन्दन जो हैं सो काच अर्थ अर्थात् मुखावलोकनार्थ जो दर्पण ताके अर्थ इस भया और दीपके वास्ते सूर्यको नहीं देताभया तो जिस तरह पृथिवी दी इस १ शशाकमण्डलादिको। *चिन सोही पयःपूरनिमग्नतास अभ्युज अर्थात् कमल है जिसका(पश्चान्तर व्याख्या ।)
"प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। पल्लवितं न तु फलितमित्यस्याऽपूर्णता ॥ दयावीरस्यो- साहो यथा- दुस्तारसंसारपयोधिपारप्रकारमालोचयतो जनानाम् । समुत्थितो वक्षसि कैटभारेः कृपांकुरः कौस्तुभकैतवेन ॥१३॥ अंकुरोपन्यासादपूर्णता। 'पल्लवितं न फलितम्' यह जो कहा इसका फलजनक प्रमोदका विषय सम्पत्ति- रूप फलकरिकै फलसम्पत्ति नहीं हुई यह अर्थ जानना । ऐसा हुआ तो सकलवस्तु- विषयक दानेच्छाकी जो विषयसम्पत्ति उस विषयसम्पत्तिका जो अभावप्रतिपादक पल्लवित पद है उसका जो यहां ग्रहण है सो अनुभावमें अनुभावकता वैगुण्यप्रतिपत्ति- कारक होकरिकै अपरिपूर्णताहीमें पर्यवसन्न है सो जानना। अब दयावीरके उत्साहका उदाहरण"दुस्तार"इत्यादिश्लोकसे कहतेहै । लोकार्थ यह है कि लोकको दुःखसे भी तरनेमें अशक्य जो संसाररूप समुद्र अर्थात् अहंताममतात्मकप्रपंचरूप समुद्र उसका नो पारप्रकार अर्थात् पारप्राप्तिका साधन सो क्या है इस प्रकार अन्वेषण करने वाला जो कैटभारि अर्थात् भगवान् उसके वक्षस्थलमें कास्तुभ अर्थात् महामणिके छलसे दयाका लेश उत्थित अर्थात् प्रादुर्भूत हुआहै जो यह मणि दयांकररूप नहीं होता तो परदुःखापहारकत्व कामप्रपूरकत्व इत्यादि जो धर्मका स्मरण सोलोक किस प्रकार करते इससे यह दयांकुररूपहीहै । यहांभी संसारिजनालम्बक कौस्तुभात्मक कृपांकुराऽनुभावयुक्त परिपूर्ण उत्साह तात्पर्यका विषय नहीं है इस हेतु अंकुरपद- प्रतिपाद्यहीहै। यही बात "अंकुरोपन्यासादपूर्णता" इस वाक्यसे कहतेहै । यहां यह बात जाननी चाहिये कि "राज्यं मा लभ्यतां कृष्ण विपदः सन्तु भूयसः। किन्तु सत्यं परित्यक्त कम्पते मानसं मम॥"यहां कम्पते पद दिया और निवर्तते पद नहीं दिया इस हेतु अपरिपूर्ण सत्यवीरोत्साह पूर्वोक्त तीन उत्साहोंसे अतिरिक्तही प्रतीत होता है। यहां कदाचित् पह कहो कि दानवीरान्तर्गत धर्मवीरोत्साहही यह सत्यवीरो- माह है यह कहना युक्त नहीं क्योंकि दयावीरोत्साहकाभी उक्तोत्साहहीमें अन्त- र्भाव होजायगा। और सुनो कि "बृहस्पतिरसौ शुको वाचां वा देवता स्वयम् । सभायामुपविष्टा चेत् किं चिद्वक्तुमुपक्रमे।" यहां पाण्डित्यवीरोत्साहभी अपरिपूर्णरूप किचित्पदसे जाना जाताहै । इसको भी कदाचित् युद्धवारोत्साहमें अन्तर्भूत कर- लोगे तोमी "निन्दन्तु केचिदपरे प्रजल्पन्तु दुरुत्तरम् । अहं क्षमांकुरासक्तः प्रतिवक्तुं न शक्नुयाम् ॥" यहां प्रतीयमान जो क्षमावीरोत्साह उसका कहां अन्तविकरोगे? कदाचित दयावीरोत्साहमें करोतो बलवीरोत्साहमें क्या समाधान करोगे?देखो"सुखं अव भयरूप स्थायिभावका उदाहरण "ताय"इत्यादिश्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ शेषो गुहां यातु कमठः सेवतां जलम् । सर्व जगत्पक्षकोणे गरुत्मान् धर्तुमिच्छति ॥" शृंगारकी तरह नानारूप जो वीर है इनका उत्साहभी नानाहीहै परन्तु प्रकृत ग्रन्थ अव भयरूप स्थायिभावका लक्षण"अपराध"इत्यादिवाक्यसे कहतेहैं । वाक्यार्थ यह है कि अपराधसे और विकृत रवसे और विकृत प्राणसेि उत्पन्न जो अपरिपूर्ण मनोविकार सो भय है। यहां यह शंका होती है कि विकृतरवसे उत्पन्न जो हास वहभी भय कहावैगा । इसका यह समाधान है कि मनोविकारमें परम अनविषयकत्व- विशेषण देना ऐसा हुआ तो हासरूप मनोविकार परम अनर्थविषयक नहींहै, इस हेतु वहां अतिव्याप्ति नहीं होगी। ऐसा हुआ तो भयका लक्षण ऐसा जानना कि अपराधादिकृत जो वैकल्याख्य मनोविकार सो भय है । कोई इस ग्रन्थकी यह व्याख्या करतहैं कि अपराधसे उत्पन्न जो विकृतरव अथवा विकृतसत्त्व तजन्य जो मनोविकार सो भय है यही अपराधसे उत्पन्न यह पद नहीं दे तो विकृतरव विकृतसत्त्वसे हासरूप मनोविकृति होती है वहभी भय कहावैगा । इस हेतु अप- राधसे उत्पन्न यह विशेषण दिया। ऐसा कहा तो जिस विकृत ख और विकृत- सवसे हासरूप मनोविकृति होती है सो विकृत रख विकृत सत्त्व अपराधकृत नहीं है और भयजनक जो विकृतव, विकृतसत्त्व वह अपराधसे उत्पन्न होताहै । इससे वहां अव्याप्ति नहीं होगी यह मत समीचीन नहीं, क्योंकि जहां व्याघ्रदर्शनसे भयो- त्पत्ति हुई वहां अव्याप्ति होगी क्योंकि व्याघ्र यद्यपि विकृतसत्त्व है परंतु अपराधसे एत्पन्न नहीं है ऐसा हुआ तो अपराधसे उत्पन्न जो विकृतरख विकृत्तसत्त्व तजन्यमनोविकृतिरूप जो भय तादृशभयरूप व्याघ्रदर्शन जन्य भय नहीं इमा। इस हेतु यहां अव्याप्ति होगी इस हेतु पूर्व मतही समीचीन जानना। [तरंगा रसतरंगिणा- (२६) अपराधविकृत-रवविकृत-सत्त्वादिजनितोऽपरिपूर्णो मनो- विकारो भयम् । यथा- तार्क्ष्यपक्षपवनोपसेवितं वीक्ष्यवीक्ष्य यदुनन्दनं पुरः भीतभीत इव तत्र कालियो मन्दमन्दमुपसर्तुमुद्यतः ॥१४॥ मार्गप्रदर्शक है इस हेतु यहां न्यूनतादोष नहीं जानना । यहां धरति नहीं कहा इससे अपरिपूर्ण बलवीरोत्साहकी प्रतीति होती है इस हेतु प्रथमः १.] भाषाटीकासहिता। (२७) इवोपन्यासादपूर्णता ॥ अप्रियदर्शनस्पर्शनस्मरणजनिता मनोविकृतिरपरिपूर्णा जुगुप्सा । यथा-- शार्दूलशावकचटचटपाटयमान-- सारङ्गशृङ्गवति भूभृति रामचन्द्रः। वासं चकार न बभार तथा जुगुप्सा दुःखेषु दुःखमतिरेव न दुःखितानाम् ॥ १५॥ यह है कि भीतसेभी भीतकी तरह कालियनामक सर्प कृष्णके समीपमें अतिमन्थर जैसे होय तैसे अनुसरण करनेके अर्थ उद्योगयुक्त है। क्या करके सोकहतेहैं । गरुडके पक्षसे उत्पन्न जो पवन उससे उपसेवित ऐसे श्रीयदुनन्दनको देख देख करके अर्थात् परीक्षा करके । यहां गरुडपक्षात्पन्नपंवनसेवित कृष्ण है यह कहनसे कालि- यनागको यह विचार हुआ कि श्रीकृष्णके अधीन है यह गरुड इसलिये हमको दूरकरनेमें इनकी प्रवृत्ति नहींभी होगी तोभी हमारे अपराधजन्यरोषयुक्त श्रीकृ- ष्णको हमारा अपाय करनेवाला जो उपाय है उसके अन्वेषण करनेमें विलम्बभी नहीं होगा, इस हेतु उस बुद्धिका आवेदन करता भय पुष्ट होताहै । यहां श्रीकृष्णा- पराधविभावित मन्दोपसरणाद्यनुभावित जो कालियगत भय वह भयमात्र तात्पर्य- विषय है इस अर्थमें इव पदही प्रमाण है । यही बात "इवोपन्यासादपूर्णता" इस ग्रन्थसे कहतेहैं । इसका यह अभिप्राय है कि पूर्णचर्वणासे विरुद्ध जो संशययु- क्तत्व सो इवशब्दसे जाना जाता है । इसलिये अपूर्णही भयमें तात्पर्य जानाजावाहै। अंव जुगुप्सारूप स्थायिभावका लक्षण कहतेहैं "अप्रिय'इत्यादिवाक्यसे। वाक्यार्थ यह है कि अप्रियवस्तुका दर्शन और स्पर्श करना और स्मरण इनसे उत्पन्न जो अप- रिपूर्ण मनोविकार वह जुगुप्साहै।इसकाउदाहरण "शार्दूल" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि सिंहके पुत्रसे चटत् चटत् इस प्रकारसे शब्दायमान जैसे होय तैसे विदार्यमाण जो मृग सो है जिसमें ऐसा जो शृंग अर्थात् शिखर उससे -युक्तजो पर्वत उसमें रामचन्द्र वास करता भया। तथा कहिये अधिक जैसे होय तैसे 'जुगुप्साको धारण नहीं करता भया यह इसही अर्थको अर्थान्तरोपन्याससे दृढक- रतेहै कि दु:खित पुरुषको दुःख अर्थात् दुःखसाधनवस्तुओमें दुःखमति अर्थात् दुःखसाधनत्वबुद्धि नहीं ही होती है। यहां पाट्यमान सारंगसे विभावित जोजुगुप्सा वह अपरिपूर्णही तात्पर्यका विषय है। यह बात 'न तथा' इस पदसे जानीजाती है।
[ तरंगा इसहीको"न तथेतिपदादपूर्णता"इस पदसे कहते हैं। जब नतथा इस पदसे जुगुप्साकों विस्मयरूप स्थायिभावकालक्षण"चमत्कार"इत्यादिवाक्यसे कहते हैं। वाक्यावहाँ इस हेतु चमत्कार यह पद दिया । इसका उदाहरण "युध्यन्तम्"इत्यादिश्लोकसे नहीं हुआ किन्तु ईषद्विस्मयको प्राप्तभया। इसमें हेतु यह है कि कैसा है गोविन्द भावित केवल विस्मयही तात्पर्यका विषय है। यह बात 'न मेने इसका विषयहै यह "न मेने इति पदादपूर्णता"इससे कहते हैं यहां यदि पूर्ण विस्मय कविका तात्पर्क तो निवद नहीं होता उसका निवन्धन करनेसे यह जानागया कि पूर्ण विस्मयता- वेषय होवै तो पूर्णविस्मयचर्वणाका बाधकीभूत जो 'न बहु मेने' इस पदव्यङ्गय निषेध त्पर्य विषय नहीं है ऐसा हुआ तो यहां व्यञ्जकान्तरका आक्षेप नहीं होगा सोजानना। अव यहां विस्मयरूप मनोविकारका कहीं अंगतासे कहीं प्रधानतासे उदाहरण दोसकताहै उसका प्रतिपादन "शृंगारादो" इस वाक्यसे कहतेहै। वाक्यार्थ यही कि जहां श्रृंगार वा हास्य इत्यादिमें नायकादिका चमत्कार दर्शन करके (२८) रसतरंगिणी- न तथेतिपदादपूर्णता॥ चमत्कारदर्शनस्पर्शनश्रवणजनितो- ऽपरिपूर्णो मनोविकारो विस्मयः । यथा- युध्यन्तमर्जुनं वीक्ष्य के वा देवा न विस्मिताः ॥ न मेने बहु गोविन्दो दृष्टकर्णपराक्रमः ॥ १६॥ न मेने इतिपदादपूर्णता। शृङ्गारादौ चमत्कारदर्शनाचत्र चमत्कारदर्शनावत्र मनोविकृतिरणतया भासते तत्र शृङ्गारादय एव रसाः॥ प्राधान्येन यत्र भासते तत्राद्भुत एव रसः ॥ अङ्गतया यथा- अपूर्णताही जमाईगई तो अविशिष्टव्यनकका आक्षेप नहीं होताहै सोजानना ! मा कि चमत्कारका दर्शन स्पर्शन स्मरण इससे उत्पन्न जो अपरिपूर्ण मनोविकार आर याख्य वह विस्मय है । यहां चमत्कार पद नहीं देतो गुप्ता, अतिव्याप्ति होगी, कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि दुर्योधन कहताहै कि कृतवर्माके प्रति युद्ध करतेहुए अर्जुनको देखकरिके कौन देवता नहीं विस्मयको प्राप्त हुएहैं १ अपित सम्पूर्ण देवता विस्मयको प्राप्त होगये परन्तु गोविन्द जो है सो बहुत नहीं मानता भया अर्थात् जैसे सम्पूर्ण देवता विस्मयको प्राप्त हुये वैसे गोविन्द कि देखा है कर्णका पराक्रम जिसने ऐसा अर्थात कर्णका पराक्रम इससे भी अधिको सो जानताहुआ बहुत नहीं मानतकार अद्भुत शौर्य दर्शनवि- (२९) प्रथमा १.] भाषाटीकासहिता। वैषम्यं श्रुतिपङ्कजात्प्रकटयत्यानन्दनीरं दृशोः स्वर्णालंकरणाब्यनक्ति पुलको वैधर्म्यभङ्गश्रियः। तस्या नूपुरपमरागमहसः पादारविन्दश्रियो भेदं सिन्चितमेव वक्ति किमतःशिल्पं विधेर्वर्ण्यताम्॥१७॥ प्राधान्येन यथा- विना सायं कोऽयं समुदयति सौरभ्यसुभगः किरज्योत्स्नाधारामधिधरणि तारापरिवृतः। माश्चर्याख्य मनोविकाररूप विस्मय अंग होकरिकै भासमान होय वहाँ श्रृंगा- हास्यादिही रस होतेहै और जहाँ वह विस्मय प्रधान हो करिकै भासमान होय तहाँ अद्भुतही रस है तहां अंगभूत विस्मय जहाँ भासमान होताहै सो उदाहरण "वैषम्यम्'इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि वह जो वर्णनीय नायिका उसका चक्षुओके श्रोत्रभूषणीकृत कमलसे वैचित्र्यको आनन्दानुभाव जो अश्रु सो प्रकट अर्थात अनुमिति गोचरताको प्राप्त करताहै । और उसकी अंगश्री अर्थात वसकाञ्चनसदृश शरीरद्युतिको काश्चनमय भूषणसे जो वैचित्र्य उसको पुलक मर्थात् रोमाश्च व्यक्षित करताहै । अर्थात् अनुमान कराताहै। और उस स्त्रीकी जो पादारविन्दश्री अर्थात् चरणकमलरक्तताकी शोभा उसको चरणभूषण खचित पपरागकान्तिसे जो भेद अर्थात् उत्कर्ष उसको सिन्धित अर्थात् रणितही सूचित करता है । यही 'वत्र' धातु अपने अर्थमें अत्पन्त अनुपयुक्त होकरिकै प्रकाशकरण की अर्थमें अर्थान्तरसंक्रमित है सो जानना । अत:कहिये भेदकधर्म प्राकट्यसे पर कहिये और जो विधाताका शिल्प अर्थाचातुर्य है उसको वर्णन क्यों कियाजाय यहां भूषणपरिधानादिरूप शृंगारमें विस्मय अंगतासे भासित है सो जानना। एक यहभी जानना कि शृंगारादि दृश्यमान होके विस्मयके प्रयोजक होतेहैं स्वरूपसत् विस्मयके प्रयोजक नहीं हैं । इस हेतु दृश्यमान शृंगारमे ही अंगभूत शेकरिकै विस्मयका भान होताहै सो जानना। अब विस्मय जहाँ प्रधान होकरिकै भासमान होताहै वह उदाहरण "बिना सायम्" इत्यादि श्लोकसे कहतेहै नायकका सखीके प्रति यह वाक्य है। श्लोकार्थ यह है कि सायंकाल विना सौरभ्यसुभग ऐसा तारापरिवृह कहिये अर्थात् अभिनवतासे लोचनगोचरताको प्राप्त होताहै । कालमें उदितभी है धारा समझना,स्मारधनुषसे भृकुटी समझना, तमसे कुन्तल समझना, पंकेरुहयुगलसे नेत्र समझना इस रीतिसे प्रसिद्ध चन्द्रवलक्षण्यसे चन्द्राभिन्नतासे रमणीमुखवर्णनमें -अत्याश्चर्य है। इस हेतु विस्मयही प्रधानतासे सहृदयजनको अनुभवारूढतासे प्रतीति विषय है सो जानना । यहां चन्द्रमासे आधिक्यवर्णनसे व्यतिरेकालंकारके साथ (३०) रसतरंगिणी- [तरंगा- धनुर्धत्ते स्मारं तिरयति विहारं न तमसां निरातंकः पंकेरुहयुगलमंके नटयति ॥ १८॥ इति श्रीभानुदत्तविरचिवायां रसतरंगिण्यां स्थायिभावनिरूपणं नाम प्रथमस्तरंगः ॥१॥ ताराधिप अर्थात् चन्द्रमा अदृष्टपूर्व कौन उदित होताहै । प्रसिद्धचन्द्र तो सायं तो भी सौरभ्यसुभग कहिये सौगन्ध्यसुन्दर नहीं है । क्या करता हुआ उदित होताहै कि पृथिवीमें ज्योत्स्नाधारा अर्थात् कान्तिधाराको बिखेरता हुआ प्रसिद्ध चन्द्रतो नीची और ऊँची कान्तिधाराको प्रकाशित करताहै । यह चन्द्र तो पृथिवीमें और चारों तरफ कान्तिधाराको प्रसारित करताहै । और यह जो चन्द्र है सो कामदेवसम्बन्धी धनुषको धारण करताहै । और प्रसिद्ध चन्द्र तो धनुष धारणही नहीं करताहै । और यह चन्द्र अन्धकारका जो विलास उसको दूर नहीं करताहै और प्रसिद्धचन्द्र तो करताहीहै । और यह चन्द्र निरातक अर्थात निर्भय होके अंक अर्थात् गोदमें पंकेरुहयुगल अर्थात् कमलद्वन्द्वको नृत्य प्रसिद्धचन्द्र तो नहीं ही कराताहै किन्तु कलंकको धारण कराताहै। यहाँ साध्यवसान लक्षणसे ताराशब्दका जालीकृतमौक्तिकमाला अर्थ समझना,ज्योत्स्नाधारासे कान्ति रूपकातिशयोक्तिकी संसृष्टि कही गई । इति श्रीरसतरंगिणीभाषाटीकायां स्थायिमावनिरूपणनाम प्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ कराताहै।
(३१) द्वितीयः २.] भाषाटीकासहिता। द्वितीयस्तरङ्गः २. . अथ विभावा निरूप्यन्ते । विशेषेण भावयन्त्युत्पादयन्ति ये रसांस्ते विभावाः। ते च द्विविधाः। आलम्बनविभावा उद्दीपनविभावाश्चेति । यमालम्ब्य रस उत्पद्यते स आल- म्बनविभावः। उत्तर अभिधानमें नियामक जो निर्वाहकतारूप संगति उसको सूचन करते हुए शिष्यसावधानतार्थ विभावनिरूपणप्रतिज्ञा "अथ" इत्यादि वाक्यसे कहते हैं। वाक्यार्थ यह है कि स्थायिभावनिरूपणानन्तर विभावनिरूपण करते हैं । अव विभावपदका वाच्यार्थबोधन करनेके अर्थ विभावका लक्षण करते हैं "विशेषेण, इत्यादि वाक्पसे। वाक्यार्थ यह है कि विशेष करिके जो भावित अर्थात् उत्पादित करै रसको सो विभाव कहेजातेहैं। विशेषकरिके रसोत्पत्तिजनकजो होय उसको विभाव कहना यह फलित हुआ ऐसा हुआ तो विशेषता प्रकृष्टरसजनकज्ञानविषयता अन्यतर- सम्बन्धावच्छिन्ना जो रसनिष्ठा कार्यता तादृशकार्यतानिरूपिता जो तादात्म्यसम्ब- धावच्छिन्ना कारणता तादृशकारणतावत्वही विभावसामान्य लक्षण जानना । इस लक्षणके माननेवाले विभावका विभाग करते हैं तेच"इत्यादिवाक्यसे । वाक्यार्थ यहहै कि उक्त विभाव दो प्रकारकेहैं। अब आलम्बनविभाव शब्दका वाच्यार्थ कहते हुए उसका लक्षण करते है। "यमालम्ब्य"इत्यादिवाक्यसेवाक्यार्य यह है कि जिसका आलम्बन करिकेही रस उत्पन्न होय वह आलम्बनविभाव कहा जाता है। यहां ही पद नहीं तो जिसको आलम्बन करिके रस उत्पन्न होय ऐसा कहते तो जिस समयमें नायिकाको आलम्बन करिके श्रृंगार उत्पन्न होताहै, उस समयमें नियम करिकै उद्दीपनविभावविषयक रति नियमसे नहींभी होती है। तो भी कदाचित् नायिकालम्बनकरातिसमयमें चन्द्रचन्दनाद्यालम्बनकभी रति होती है तो रसका आलम्बन चन्द्रचन्दनादिभी कहावेगा, तो उद्दीपनविभावमें अतिव्याप्ति होगी इस हेतु हीपद दिया। अब उद्दीपनविभावमें अतिव्याप्ति नहीं हुई क्योंकि उद्दीपन विभावका आलम्बन करिके ही रसकी उत्पत्ति नहीं होती है । रसोत्पत्तिकाल में चन्द्रमा चन्दनको रति नियमसे विषय नहीं करती है । नायकनायिकाको तो रति नियमसे विषय करती है । इस हेतु नायकनायिका आलम्बन करिके ही रसकी उत्पत्ति हुई। और चन्द्रचन्दनादिका आलम्बन करिके ही नहीं हुई। इससे चन्द्रचन्दनादिमें अतिव्याप्ति नहीं दुई । नायकनायिकादिमें लक्षणसमन्वय [तरग:- काही आलम्बनविभाव है भूषण आलंबन विभाव नहींहैं इससे भूषणादिमें अतिव्याप्ति नहीं हुई सो जानना । अव उद्दीपन विभावका लक्षण "यो रसमुदीपयति" निवेश करना कि जिसका ज्ञान प्रकृष्टरसजनक होय सो उद्दीपनविभाव है। ऐसा हुआ नो नायिका ज्ञान प्रकृष्ट रसजनक नहीं है चन्द्रचन्दनादि ज्ञान प्रकृष्टरसजनक है इस हेतु प्रकृष्टरसजनकज्ञान विषय जो चन्द्रचन्दनादि सोही उद्दीपनविभाव है नायिकादि नहीं है । ऐसा हुआ तो प्रकृष्टरसजनक ज्ञानविषयत्वही उद्दीपनविभावका लक्षण जानना । आलवनविभावका और रसका कार्यकारणभाव इस रीतिसे विभाव रहे । इसही प्रकार रस और उद्दीपनविभावकाभी कार्यकारणभावप्रकार यह जानना कि जहां विशेष्यतासंबंधसे रस होय तहां तादात्म्यसंबन्धसे आलंबन है कि जहां प्रकृष्ट रसजनकज्ञानविषयत्वसंबन्धसे प्रकृष्ट रस रहै । तहाँ तादात्म्प- संबंधसे उद्दीपन विभाव रहै । ऐसा हुआ। तो दोनों विभावको कारणता होने में तादात्म्यसंबन्धही हुआ रसको कार्यता होनेमें दो संबंध हुए, एक तो विशेष्यता. संबंध दूसरा प्रकृष्टरसजनकज्ञान विषयत्वसंबंध। ऐसा हुआ तो रसनिष्ठा कार्यता कही तो विशेष्यत्व संबंधावच्छिन्ना होगी । कहीं प्रकृष्टरसजनकज्ञानविषयत्व (३२) रसतरंगिणी- यो रसमुद्दीपयति स उद्दीपनविभावः। आलम्बनविभावो यथा- होगया सो जानना ॥ अब यहां यह शंका होती है कि नायिकाके अलंकरणादिवस्तुमें कोई वस्तुको नियम कारकै रतिका विषयत्व है । तो वहभी आलम्बन विभाव होगा। इसका समाधान यह है कि इसही हेतु आलंबन विभावके लक्षणमें रस उत्पद्यते यह पद दिया है इसका यह अभिप्राय है कि जिसको विषय करनेहीसे चित्तवृत्ति विशेषरूप रत्यादि स्थायिभाव रसपदप्रवृत्तिनिमित्त- रसत्त्ववान् होय वह आलंबन विभाव कहा जाताहै । ऐसा हुआ तो विचार करिक देखो नायिकाविषयिणी रति जो है सो अलंकरणादि विषयकभी होगी तोभी वह तिरूप स्थायिभाव रसपद प्रवृत्ति निमित्त रसविशिष्ट जो कहावैगा सो भूषण, विषयकत्वसे नहीं कहावैगा, किंतु नायिकाविषयकवसे ही कहावैगा। इस हेतु नायि- इत्यादि वाक्यसे कहतेहै । वाक्यार्थ यह है कि जो रसको उद्दीपित करे अर्थात प्रकाशित करै वह उद्दीपनविभाव कहावै। अभिप्राय यह है कि रसजनक ज्ञानविषय जो है सो उद्दीपनविभाव है। चन्द्रचन्दनादिका ज्ञान रसका जनक है। इसहेतु रसजनक ज्ञानविषय चन्द्रचन्दनादि है इस हेतु वहां लक्षणसमन्वय होगया। यद्यपि चन्द्रचन्दनादिवत् नायिकाभी रसजनकज्ञान विषयहै, क्योंकि नायिकाके ज्ञानसे रसोत्पत्ति होती तो नायिकादि भी उहीपनविभाव कहावेंगे, तथापि इस प्रकार द्वतीयः २.] भाषाटीकासहिता। (३३) प्राणस्य प्रतिमूर्तिः प्रत्यात्मा पुण्यलतिकायाः। अधिदैवतं नयनयोः सा मम या काऽपिसा सैव ॥ १॥ शृङ्गारस्योद्दीपनविभावाः । तत्र भरतः- ऋतुमाल्यालंकारैः प्रियजनगान्धर्वकाव्यसेवाभिः । उपवनगमनविहारैः शृङ्गाररसः समुद्भवति ॥२॥ चन्द्रचन्दनादय ऊहनीयाः ॥ उद्दीपनविभावस्योदा- हरणम् । यथा- सन्ध्याशोणाम्बरजवनिका कामिनोः प्रेम नाट्यं नान्दी भ्राम्यद्भमरविरुतं मारिषः कोऽपि कालः । न्यावच्छिन्ना होगी परन्तु इस कार्यतानिरूपित जो कारणता सो तादात्म्य धावच्छिन्ना ही है इस हेतु पूर्वोक्त विभावलक्षण समीचीन होगया सो जानना। ही मार्ग संपूर्ण रसमें जान लेना । अब श्रृंगार रसके आलंबन विभावका दाहरण "प्राणस्य" इत्यादि इलोकसे कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि ई नायिकाको प्रेमकी दृढताका निवेदन करनेवाली सखीके प्रति नायककी क्ति है कि प्राणके सदृश पुण्यलतारूपही नयनका अधिदैवत अर्थात् जिस |ना नयनको अन्धताही है ऐसी जो कोई प्राणकी सदृशतासे पुण्यलताको स्वरूप: से अथवा नयनके अधिदैवतत्वसे व्यवहारयोग्य हमारे वह है वो ही । अर्थात् मारी तत्तद्रूपही सो अर्थात् उद्दिष्टनायिका है अर्थात् जिसका तू वर्णन करतीहै ह है । यहां नायिकाविषयक रति नायकनिष्ठहै । इस हेतु नायकनिष्ठ रतिमें नायिका भालम्बनविभाव भई । अब श्रृंगारके उद्दीपनविभाव प्रमाणपुरःसर कहतेहैं “तत्र" त्यादिवाक्यसे। वाक्यार्थ यहहै कि श्रृंगारके उद्दीपनविभावविषयमें भरतसम्मतिभीहै जो उद्दीपनविभाव एक तो ऋतु और माला और आभूषण इनकरिके और प्रियजन अर्थात् आलम्बनसम्बन्धी सख्यादि और गान्धर्व अर्थात् गान और काव्य इनकों सेवन करिके और उपवनमें गमन और विहार करिके श्रृंगार रस उत्पन्न होता है अर्थात् प्रकर्षको प्राप्त होताहै इस हेतु ऋतुमाल्यादिहीहै । चन्द्रमा और चन्दन इत्यादिका ऊह कर लेना अर्थात् यह भी उद्दीपन विभाव है सो जान लेना। अव उद्दीपनविभावका उदाहरण "सन्ध्या" इत्यादिश्लोकसे कहतेहै। श्लोकार्थ यहहै कि सुधादीधिति अर्थात् चन्द्रमाजो है सो ही जो सूत्रधार सो पुष्पकेतु अर्थात् जिनके नृत्यारम्भको जनाता हुआप्रवेश करताहै अर्थात् रंगभूमिका विषय होताहै।
[तरंग:- म क्या करता हुआ, तारा अर्थात् नक्षत्रही जो पुष्प उनकी जो भञ्जलि उसको मानो सोही जवनिका अर्थात् पडदा है अथवा सन्ध्या जो कालहै सो ही रक्तवसकी न्तादि जो काल सो ही मारिख अर्थात् विदूषक है और कामी और कामिनीका जो परस्परालम्बन प्रेम वह नाटय है भ्रमण करतेहुए जो भ्रमर उनका जो शब्द अर्थाद सन्ध्याकालमें संकुचित जो कमल उससे निर्गत जो मधुकर उनका जो रणिव सोही नान्दी है और कोई जो चन्द्रोदयोपलक्षित काल है अर्थात् समय है वह मारिष अर्थात् सूत्रधारका सधर्मा पुरुष है। यहां चन्द्रादि सम्पूर्ण पदार्थ शृंगारका उद्दी. है कि हास्यके विभाव भरतजीने भी कहेहैं "विपरीता" इत्यादि वाक्यसे वाक्या अब हास्यरसका विभाव कहते हैं "तत्र भरतः" इत्यादिसे । इसका अर्थ या यह है कि विपरीत आभूषणोंसे और विकृताचारसे और विकृताभिधानसे और विकृतवेषसे और विकृत अर्थ विशेषोंसे लोक हंसताहै इसलिये यह रस हास्य कहाताहै चाहुआदिकेभूषणको पादआदिमें पहिरनेसे विपरीतालंकार कहाते हैं और ग्रीष्मसम यम वद्धि सेवनकरना इसको विकृताचार कहते हैं। किन्नर कहनेके स्थान में किनल कहना विकृताभिधान है, वस्त्रादिपरिधानकृत जोसंनिवेश वह विकृतवेष है,कुब्जवामना -दिहीअर्थविशेष है । और खमत्व काणत्वादि जो अंगवैकृत उसकाभी उह करदेना। अव हास्यरसके विभावका उदाहरण केयूरम्"इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्य ह है कि नट जो है सो मायाकरिकै शिशुसदृश जो बालमुकुन्दमूर्ति उसको नृत्य (३४) रसतरंगिणी- तारापुष्पाञ्जलिमिव किरन्सूचयन्पुष्पकेतो- नृत्यारम्भं प्रविशति सुधादीधितिः सूत्रधारः ॥ ३ ॥ अथ हास्यरसस्य विभावाः। तत्र भरतः-- विपरीतालंकार्विकृताचाराऽभिधानवेशैश्च । विकृतैरर्थविशेपैर्हसतीति रसः स्मृतो हास्यः ॥ ४॥ अंगवैकृतादय ऊहनीयाः। यथा- केयूरं घर्घरयन्भ्रमयन्मौलिं विवर्तयन्बाहम् । नेत्राञ्चलं चपलयन्नटयति मायाशिशुच्छायाम् ॥ ५॥ विखेरता हुआ। रंगभूमिकी सामग्री दिखाते हैं कि सन्ध्याकालका जो ताम्रमेष जवनिका है ऐसी व्याख्यामे "मारिष कोपि काल" इसका यह अर्थकरना कि यस पनविभाव जानना ॥ .
- द्वितीयः २.] भाषाटीकासहिता। (३५) अथ करुणरसस्य विभावाः। तत्र भरत:- टजनस्य विनाशाच्छापात्क्लेशाच्च बन्धनाब्यसनात् । एतैरर्थविशेषैः करुणाख्यरसः समुद्भवति ॥६॥ बन्धुदारियादय ऊहनीयाः। यथा- त्वां पश्यतो भुजगपाशनिबद्धदेह-- मद्याऽपि मे यदसवो न बहिः प्रयान्ति । नेत्रे निमीलयसि पश्यसि नैव ताव-- दास्यं मदीयमिति लक्ष्मण युक्तमेव ॥ ७॥ अथ रौद्ररसस्य विभावाः । तत्र भरतः-- विशिष्ट कराताहै । क्या करता हुआ, केयूर जो बाहुभूषण सो यद्यपि शब्दयुक्त नहीं है तो भी उसको क्वणनव्यापार कराता हुआ यह कहनेसे विपरीत आचार दखाया । अथवा घर्घर कहिये पादभूषण केयूरको पादभूषण करता हुआ इससे वेपरीतालंकार कहा और मस्तकको भ्रमाता हुआ और बाहुको इतस्ततः फैकता हुआ और नेत्रप्रान्तको चञ्चलतायुक्त करता हुआ अर्थात् दूर करता हुआ। यहां हास्यरसका आलम्बनविभाव तो कृष्ण हैं और विपरीतालंकारादि उद्दीपनविभाव है जो जानना॥ अब करुणरसका विभाव कहतेहैं, तहॉ भरतमम्मति दिखातेहै “इष्टजनस्य' इत्यादि वाक्यसेवाक्यार्थ यह है कि इन अर्थविशेपोंसे करुणाख्य रस उत्पन्न होताहै। इस प्रकार सामान्य रूपसे वाक्यार्थ बोधकरिकै विशेष जिज्ञासा हुई कि कौन अर्थ विशेष, पश्चात् यह कहना कि इष्टजनके विनाशसे और इष्टजनके शापसे इष्टजनके ज्वरादि क्लेशसे इष्टजनके बन्धनसे इष्टजनके विपत्तिरूप व्यसनसे करुण रस होता है। बन्धुजनके दारिद्यकाभी ऊह करदेना इसका उदाहरण"त्वां पश्यतः"इत्यादिश्लो- कसे कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि राम कहतेहै कि हे लक्ष्मण ! नागपाशसे बांधाहै देह जिसका ऐसा जो तू उसको देखता हुआ जो मै हूँ उसके अवभी प्राण वाहर नहीं जातेहैं इस हेतु तू नेत्रोंको मीचताहै, मेरे मुखको नहीं देखताहै सो युक्तही है। यहां करुणाका आलम्बन तो लक्ष्मण है और उसका वन्धन उद्दीपन है । अवरौद्ररसके
[ तरंग-
.
विभाव कहतेहै तहां भरतसम्मति दिखातेहैं "आयुध"इत्यादि वाक्यसेवाक्यार्थ यह हैं
कि आयुधरूप जो खड्ग उसके पराभवसे और वैकृतभेद कहिये अनादरचेष्टासे और
विदारण कहिये निकृन्तनसे और संग्रामसे और सम्भव अर्थ कहिये आक्रमणादिसे
रौद्ररस उत्पन्न होताहै । यहां वाक्यार्थमें सामान्यविशेषभाव पूर्ववत् जानलेना।
कि आयुधके उत्कर्षापकर्षकृत अभिभवसे रौद्ररस नहीं होताहै इसलिये खड्गपद
अब यहां यह शंका होतीहै कि खड्गपद क्यों दिया? इसका समाधान यह है
दिया फिर शंका हुई कि आयुधपद क्यो दिया?इसका समाधान यह है कि प्रमाद-
पतित खड्गाभिभवसे रौद्ररस नहीं होताहै इस हेतु आयुधपर दिया। यहां अभिभव-
शब्द पराभवमात्रार्थक है, इस हेतु विदारणसे पौनरुत्त्य नहीं हुआ सो जानना ।
और वन्धुका बध और डरपाना इत्यादिका भी ऊह करदेना अब रौद्ररसके विभा-
वका उदाहरण "तन्वन्ती" इत्यादि इलोकसे कहतेहै । इलोकार्थ यह है कि हे भार्गव!
अर्थात् परशुराम यह जो आपकी खड्गधारारूप रात्रि सो सर्वोत्कर्षसे वर्तती है,
खड्गधाराको रात्रिसाम्यके बोधकसाधारण धर्माका प्रतिपादन करनेके अर्थ
खड्गधारारूप रात्रिको विशेषणयुक्त करतेहै । कैसी है खड्गधारारूप रात्रि सो
कहते है कि अन्धकारकी कान्तिको विस्तारित करतीहुई फिर कैसीई कि शत्रुजनाका
संग्राममें क्रुद्ध जो शत्रुपक्ष अर्थात् शत्रुसेना उसमें विदीर्ण जो श्रेष्ठ गजका कुम्भ
जो चक्र सोही हुआ चक्रवाक उनकी व्यथाको करतीहुई ऐसी, फिर कैसी है कि
स्थल उससे पड़ते हुए जो मौक्तिक उनके छलसे चौतरफतारावलीको वर्षण करतीहै।
यहां रौद्ररसके आलम्बनविभाव तो शत्रु हैं और संग्रामादि उद्दीपन विभाव हैं।
यच वीररसके विभाव कहते है। तहां भरतसम्मति दिखातेहैं "उत्साह" इत्यादि
(३६)
रसतरंगिणी-
आयुधखइँगाभिभवाद्वैकृतभेदाद्विदारणाच्चैव
"संग्रामसंभवार्थादेभ्यः सञ्जायते रौद्रः॥८॥
वैरिदर्शननिर्भर्त्सनादय ऊहनीयाः । यथा--
तन्वन्ती तिमिरद्युतिं कृतवती प्रत्यर्थिचक्रव्यथा-
मेषा भार्गव तावकी विजयते निस्त्रिंशधारा निशा ।
युद्धक्रुद्धविपक्षपक्षविदलत्कुम्भीन्द्रकुम्भस्थल-
भ्रश्यन्मौक्तिककैतवेन परितस्तारावलीं वर्षति ॥ ९॥
अथ वीररसस्य विभावाः। तत्र भरत:-
उत्साहाध्यवसायादविषारित्वादविस्मयान्मोहात् ।
विविधादर्थविशेषाद्वीररसो नाम संभवति ॥ १० ॥
द्वितीयः २.] भाषाटीकासहिता। (३७) NIGk वेजयबलादय ऊहनीयाः। यथा- लंकाधिपः संयति शंकनीयो जम्भारिदम्भापहबाहुवीर्य इत्यालपन्तं हनुमन्तमेष रामः स्मितैरुत्तरयाञ्चकार॥११॥ दानवीरस्य विभावो यथा- वपुषा विनयं वहन्ति केचिद्वचसा केऽपि चरन्ति चारुचर्याम् । अतिथौ समुपागते सपऱ्यां पुलकैः पल्लवयन्ति केऽपि सन्तः१२ यावीरस्य विभावो यथा- कथमविरलजाग्रद्भक्तिभाजो निशायां तमसि दुरवगाहे प्राणिनो वीक्षणीयाः। . क्यसे । वाक्यार्थ यह है कि उत्साहयुक्त अध्यवसाय अर्थात् बुद्धिसे विषादके अभावसे विस्मयाभावसे और मोहकारण क्रोधसे और उत्साहकारणत्वसे लोकशास्त्रावगत विविधपदार्थोसे वीररस उत्पन्न होताहै। और विजय बल इत्यादिका भी ऊह करदेना। इसका उदाहरण "लंकाधिपः" इत्यादिश्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि यह जो राम है सो इस प्रकारसे कहनेवाले हनुमानको उत्साह- सम्भव ईषतहाससे उत्तर करता भया, किस प्रकारसे कहते हैं कि जम्भार जो इन्द्र उसका जो अभिमान उसका अपहरण करनेवाला है बाहुवीर्य जिसका ऐसा जो लंकाधिप अर्थात् रावण सो संग्राममें शंकनीय है अर्थात् बलवान् अनर्थकी हेतुतासे सम्भावना योग्य है । इस प्रकार यहां वीररसका आलम्बन रावण है, और हनुमानका कथन उद्दीपन है। अब दानवीरको विभावका उदाहरण वपुषा इत्यादि श्लोकसे कहते है, श्लोकार्थ यह है कि अतिथि अर्थात् याचक समागत होतसन्ते कोई अर्थात् व्यवहारमात्र कुशल जो जन सो शरीरसे विनय जो है परोपसर्पण उसको प्राप्त होते हैं। और कोई अर्थात् शास्त्रनिष्णातबुद्धि जो पुरुष सो वचन अर्थात् स्तुतिसे चारुचर्या अर्थात् शिष्टाचारको सम्पादन करते है। और कोई जो सन्त अर्थात् महामहिमपुण्यशील सो तो पुलक अर्थात् रोमाश्चसे सपर्या अर्थात् पूजाको आरम्भयुक्त करते हैं। यहां आलम्बन तो अतिथि है और उद्दीपन अतिथिका आगमन है।अब दयावीरविभावका उदाहरण कहते है "कथम्" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि मुरारि अर्थात् श्रीकृष्ण जो है सो प्रकाश M [तरंग:- उत्साहको उद्दीपन विभाव माननेमें अभिप्राय है अथवा उत्साहयुक्तताबुद्धिरूप जो उत्साहाध्यवसाय ताको उद्दीपनविभाव मानने में अभिप्राय है । यहां प्रथमपक्ष नहीं बनसकताहै क्योंकि उत्साहरूप स्थायिभावका उद्दीपक उत्साहही कैसे होगा ? आपका उद्दीपक. आप नहीं होसकताहै । और द्वितीयपक्षभी नहीं बन वृत्तित्वनियम होगा इस हेतु और उत्साहयुक्तनाबुद्धि उत्साहसे उत्पन्न होती है इस हेतुभी उत्साहकी अनुमापकता उसमें ध्रुव होजायगी सो होनेसे अनुभावकता कहना उसको उचित है विभावकता कहना उचित नहीं। इसही बातको " नतु इत्यादि वाक्यसे कहते हैं । वाक्यार्थ यह है कि स्वनिष्ठ अर्थात् उत्साहयुक्त पुरुषमें स्थित जो उत्साह सो उद्दीपनविभाव कैसे होगा ? उत्साहशब्दसे उत्साहयुक्त बुद्धिभी लेलेना ऐसा हुआ तो यह अभिप्राय हुआ कि उत्साह तो उत्साहकी उद्दीपक नहीं होसकैगा और उत्साहका कार्य जो उत्साहयुक्तताबुद्धिहै सो उत्सा- इका अनुभावभूतहै इस हेतु उत्साह वा उत्साहयुक्तताबुद्धि दोनोंको उत्साहकी कारणता नही होसकैगी । इसका समाधान यहहै कि जगतमें जितनी उत्साहयुक्त ताबुदि है सो सबही उत्साहजन्य है, यह नियम नही किन्तु उत्साहअंशमें लौकिक सनिकर्षजन्य जो उत्साहयुक्तताबुद्धि सो ही उत्साहजन्यहै और भावि जो उत्साह तादृशउत्साहयुक्तताबुद्दि तो उत्साहअंशमें अलौकिकहै अर्थात् ज्ञानलक्षणासनिक- पंजन्यहै वह बुद्धि उत्साहविनाही उत्पन्न होती है और उत्साहको उद्दीपन करनमें सपर्य होतीहै । उस बुद्धिविषय जो उत्साह उसको उद्दीपनविभावना होने में बाधक इसही हेतु आपको आपकी जनकता होनेमें वैमत्य होताहै उसके परिहारके (३८) रसतरंगिणी- इति किमु समुदञ्चद्दीपलेखाभिराम- द्युतिमुरसि मुरारिः कौस्तुभं सम्बभार ॥१३॥ ननु स्वनिष्ठ उत्साहः कथमुद्दीपनविभावो भवतीति चेत्- मान और दीपकलिकासहश कान्तियुक्त ऐसी जो कौस्तुभमणि उसको धारण करता भया सो निरन्तर उद्योगयुक्त जो भजन उससे युक्त जो लोक है सो अत्यन्त अन्धकारयुक्त रात्रिमें किस तरह देखने योग्य होंगे यह विचार करिके क्या यहां आसि- विषया हेतूत्मेक्षा है,यह हेतूमेशा निरुपाधि परदुःखाहरणेच्छारूप दयाको पुष्ट करतीहे यहां आलम्बन भक्तजन है । और अन्धकारयुक्त रात्रिमें वीक्षणयोग्यता उद्दीपन है । अव यहां यह शंका हुई कि उत्साहाध्यवसायात' यह पद जो दिया इससे सकेगा क्योंकि उत्साहयुक्तताबुद्धिको उत्साहक अधिकरणमें स्थिति होनेसे पक्ष " ।
द्वितीयः २.] माषाटीकासहिता। (३९) सत्यम् । उद्दीपनविभावो ज्ञायमान एव गमकः । स च स्व- निष्ठः परनिष्ठो वेति न विशेषः॥अनुभावस्तुस्वनिष्ट एव- पथ ही 'उत्साहाध्यवसायात्' यह भरताचार्यने कहा। इसही अभिप्रायसे "सत्यम्' त्यादिवाक्यसे उत्तर देतेहैं। वाक्यार्थ यह है कि उद्दीपनविभाव वस्तुज्ञानका विषयहीं Tमक होताहै । यहां एवकार जो दिया उससे ज्ञानके विषे उत्साहजन्यत्वका और उत्साहव्याप्ति और उत्साहका आश्रयभूत जो पक्ष तदृत्तित्व दोनों विषयताका नराकरण किया । यही दोनों विषयता अनुमापकतामें उपयुक्त हैं । यह कहनेसे उत्साहयुक्तताबुद्धिको अनुभावकताका खण्डन किया।ज्ञायमान जो उत्साहहै सोस्वनिष्ठ होय तो परनिष्ठ होय तो एतत्कृत कुछ विशेष नहीं जानना। यह कहनेका यह अभिप्रायहै कि पक्षम नहीं रहनेवाला जो पदार्थ वह जिस प्रकार उद्दीपनविभाव होताहै इसही रीतिसे पक्षमें रहनेवाली वस्तुको भी उद्दीपनविभावत्व होनेमें कुछ विशेष नहीं है इस हेतु उत्साहयुक्तताबुद्धि अनुभाव नहीं होगी किन्तु उद्दीपनविभावही होगा सो जानना। यहां कोई यह शंका करै कि अध्यवसायविषय जो उत्साह है सो उद्दीपन- विभाव तो मानाही गयाहै परन्तु अनुभाव उसको क्यों नहीं मानते हो ? इसका समाधान यह है कि उत्साहसे उत्पन्न जो है सो ही उत्साहका अनुभाव कहावैगा। अध्यवसायविषय जो उत्साह है सो उत्साहजन्य नहीं है। क्योंकि स्वजन्यत्व स्वमें नहीं होताहै इस हेतु अध्यवसायविषय जो उत्साह सो उत्साहका अनुभाव नहीं होसकेगा। इसही हेतु उत्साहका उपनीतभानात्मक जो उत्साहयुक्त- ताबुद्धि उसको भी अनुभावकता नहीं होगी, क्योंकि आपका जो उपनीत भान है उसकी आपसे उत्पत्ति नहीं होसकती है, इस हेतु वह उपनीत भान अनुभाव नहीं होसकैगा । कदाचित् यह कहो कि उत्साहसे उत्पन्न हुआ जो उत्साहका लौकिक ज्ञान तादृशज्ञानात्मक जो उत्साहयुक्तताबुद्धि उसको उत्साहकी अनुभावकता होगी सोभी नहीं वनसकैगी क्योंकि अनुभावक वस्तुका व्याप्ति और पक्षधर्मता इस करिके युक्त होकरिके जब ज्ञान होताहै तब वह अनुभव कराता है। यहां लौकिक उत्साहयुक्तताबुद्धिको व्याप्तिमत्त्व है परन्तु पक्षवृत्तित्वकारकै उनका ज्ञान नहीं है इससे वह अनुभाव नहीं कहा सकेंगे। इसही अभिप्रायसे "अनुभा- वस्तु" इत्यादि कहतेहै ।वाक्यार्थ यह है कि अनुभाव जो है सो तोखनिष्ठही अर्थात् पक्षमें स्थित होकरिकै ही गमक अर्थात् अनुभावक होसकतेहै यही उत्साहयुक्तता- बुद्धि पक्षमें स्थित नहीं है इसहेतु अनुभाव नहीं होगा। यहां यह शंका हुई कि उत्साह ज्ञानविषयत्व होनेसे पक्षवृत्तित्वका अर्थात् पक्षवृत्तित्वकरिक ज्ञानविषयत्वका अवश्य स्थितिहै । इसका अभिप्राय यह है कि उत्साहव्याप्य 'उत्साहयुक्ततामति- मानहम्' इत्याकारक उत्साहांशमें लौकिक ज्ञानपक्षमें उत्साहवत्त्वावगाही होसकैगा परन्तु इस ज्ञानके होनेसे सिद्धि रहजायगी। सिद्धि रहनेपर उत्साहयुक्त पुरुष पक्ष नहीं बन सकैगा, क्योंकि वही उत्साह संदिग्ध नहीं हैं ऐसा हुआ तो पक्षता विशिष्ट वह नहीं हुवा ऐसा हुआ। तो फिर पक्षत्वविशिष्टमें धर्मता करिकै ज्ञानभी उनका नहीं होसकैगा फिर वह अनुभवभी नहीं करासकेंगे इससे वह अनुभावक दुःखमें द्विष्टसाधनताज्ञान होनेहीसे होती है ऐसा हुआ तो दयाकृत उत्साहकालमें अवश्य करिकै विष्टसाधनताज्ञानजन्य द्वेषविषयीभूत किश्चिद्वस्तु इष्टजनसंव- न्धिताकरिकै विज्ञात है इस हेतु तज्जन्य चित्तवैक्लव्य भी अवश्यही होगा फिर दयाको पृथक् करिकै क्यों कहा ? करुणासेही निर्वाह होजायगा यह गत "नतु" इत्यादिपन्थसे कहते है । इस ग्रन्थका अर्थ यह है कि दयावीर करुणामें तेहो ? क्पोकि निरुपाधि परदुःखाहरणेच्छा जो दया सो करुणा विना नहीं अन्तभूत क्यो नहीं होताहै अर्थात् दयावीरस्थानमें करुणारसही क्यों नहीं कह- होसकतीहै तो करुणारस तो अवश्य मानना होगा, उस करुणके विना नहीं होनेवाली जो दया ताको करुणहीमें अन्तर्भावयुक्त है । अब इस शंकाका उत्तर "करुणस्य" इत्यादि ग्रन्थसे कहतेह, इस ग्रन्थका यह अभिप्राय है कि करुणरसका स्थायिभाव शोक है, दयावीरका स्थायिभाव उत्साह है इस प्रकारसे स्थायिभाव भेद होनेसे दयावीर भिन्न कहावेगा, करुणरस भिन्न कहावेगा ऐसा मा तो दयावीर किस प्रकार करुणमें अन्तर्भूत होगा, अपि तु नहीं होग नहीं कहावेंगे। अब यह शंका होतीहै कि निरुपाधि परदुःखप्रहरणेच्छारूप जो दया सो (४०) रसतरंगिणी- [ तरंगः- गमकातस्यानुमापकत्वेन पक्षवृत्तित्वादिनियमादिति ॥ ननु दयावीरः कथं करुण एव नान्तर्भवति, निरुपाधि- परदुःखप्रहरणेच्छा दया । सा चकरुणया विना न संभव- तीतिचेन्न । करुणस्य स्थायिभावः शोकः, दयावीरस्य व्याप्य 'उत्साहयुक्ततामतिमानहम्' इस प्रकारसे व्याप्तिविशिष्ट वैशिष्ट्यावगाही परामर्श हो जायगा तो पक्षधर्मताज्ञान बन जायगा फिर उत्साहयुक्तताबुद्धि अनुभाव क्यों नहीं होगा। इसका समाधान तस्य"इत्यादिवाक्यसे कहतेहै । वाक्यार्थ यह है कि अनुभाव जो वस्तु है ताको अनुमापकत्व अर्थात् अनुमितिजनक । द्वितीयः १.] भाषाटीकासहिता। (४१) स्थायिभाव उत्साह इति स्थायिभावभेदेन भेदात् ॥ ननु दयावीरे करुणरसप्रतीते का गतिरिति चेत् । सत्यम् । करुणया विना दयावीरस्याऽननुभवादिति करुणाया- स्तत्रानुभावकत्वादिति ॥ अथ भयानकस्य विभावाः। तत्र भरतः- विकृतरवसत्त्वदर्शनसङ्ग्रामारण्यशून्यगृहगमनात् । गुरुनृपयोरपराधात्कृतकः स भयानको ज्ञेयः ॥१४॥ धाटीबन्धुबन्धनश्रवणश्मशानदर्शनादय उहनीयाः । पथा- उद्यत्कान्तिकठोरकेसरदलत्पाथोघरप्रस्खल- द्विद्युद्दीधितिकाञ्चनीकृतजगनिःशेषभूमीधरः। भिन्न ही रहेगा सोजानना । अब यह शंका हुई कि स्थायिभावमें इसे रसभेदको मानो तो करुणसे भिन्नताकारकै दयावीररस प्रतीति क्यों नहीं होतीहै ? यह शंका "ननु" इत्यादि ग्रन्थसे कहतेहै । इस ग्रन्यका यह अर्थ है कि दयावीरमें करुणरसकी जो प्रतीति होती है उसकी क्या गति है अर्थात् भिन्नता करिकै दयावीर रसकी प्रतीति क्यो नही होती है। इसका समाधान यह है कि करुणा विना दयावीरका अनुभव नहीं होताहै इस हेतु दयावीरमें करुण रसकी अनुभावकता है तो जहां दयावीरकी प्रत्तीति होगी वहां करुण रसका अनुभाव होगाही इसही हेतु भिन्नता करिके दयावीरकी प्रतीति नहीं होती है, करुणके साथही प्रतीति होती है। यही वात 'करुणया विना' इत्यादि ग्रन्थसे कही है सो जानना ॥ अव भयानक रसके विभाव कहतेहैं,तहां भरतमुनिकी सम्मति दिखातेहै "विकृतरव" इत्यादि वाक्यसे । इस वाक्यका यह अर्थ है कि विकृत(बदले)हुए शब्दसे युक्त प्राणीका दर्शन और संग्राम अथवा वन अथवाशून्य घर इनमें जाना इससे और गुरु और नृप इनके अपराधसे किया हुआ ऐसा भयानक रस होता है सो जानना । और धाडा और वन्धुओके वन्धनका श्रवण और श्मशानदर्शन इत्यादिका भी ऊह (आक्षेप) करलेना । इसका उदाहरण "उद्यत्कान्ति" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । इलोकार्थ यह है कि लोकोंने मायाहार अर्थात् नृसिहस्वरूपको देखा, कैसा है मायाहरि सो अशोकपुष्प और नेत्र जो हैं सोही नीरक्ततासे हुए श्वेत कमल और दन्त जो हैं (४२) रसतरंगिणी- [ तरंग:- स्फूर्जत्कण्ठनिनादभिन्नवसुधामार्गप्रविष्टद्विज- प्रौढाशीर्वचनप्रहर्षितबलिालोकि मायाहरिः॥१५॥ अथ बीभत्सस्य विभावाः। तत्र भरतः- अनभिमतदर्शनेन चगन्धरसस्पर्शदोषैश्च । उद्वेजनैश्च बहुभिर्वीभत्सरसः समुद्भवति ॥ १६ ॥ अहृद्यवस्तूनां श्रवणादय ऊहनीयाः॥ यथा- योधानामधरैरशोककुसुमैनॆत्रैः सितैरम्बुजै- दन्तैः कुन्ददलैः करैः सरसिजैः संपाय पुष्पाञ्जलिम् । कहते है कि प्रकाशमान और तीक्ष्ण जो केसर अर्थात् सटा उनसे स्फुरित जो पाथोधर अर्थात् मेघ उनसे प्रकट होती हुई जो बिजलियां उनकी किरणोंसे काञ्चनरूप करिके सम्पन्न ऐसे किये हैं जगत्के सम्पूर्ण पर्वत जिसने ऐसा । फिर कैसा है कि प्रकर्ष करिके बढा हुआ जो कण्ठगर्जन उससे विदीर्ण जो पृथिवी उस पृथिवीके उसी विवरमें प्रविष्ट जो ब्राह्मण उनके ओजयुक्त जो आशीर्वादयचन अर्थात् अभयतात्पर्यसे उच्चारण किये हुए वचन उन वचनाँसे प्रहर्षित अर्थात् हर्षयुक्त किया है बलिका गृह जिसने ऐसा । यहां नामग्रहणमें नामैकदेशका ग्रहण कियाहै सो जानना । यहां भयानकका आलम्बन नृसिंह है और उसका जो विकृत ख (शब्द) सो उद्दीपन है । और बलिसभास्थित महाज- नोंमें व्यनित हुआ बलि तो दानवीर है उसको हर्षोत्पत्ति होनेसे भी क्षति नहीं है। अब बीभत्स रसके विभाव कहते हैं, तहां भरतसम्मति दिखातेहै । "अनभि- मत" इत्यादिवाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि अनीप्सित वस्तुके दर्शनसे और गन्ध रस तथा स्पर्श इनके दोषसे और उद्वेगजनक जो बहुत वस्तु उनसे बीभत्स रस उत्पन्न होताहै । और अप्रिय 'वस्तुके जो श्रवणदर्शनादि उनकाभी ऊह कर लेना। इसका उदाहरण “योधानाम्" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि हाथियोंके रक्तसे अवसिक्त अर्थात् लिप्त ऐसे कुत्सित अंग है जिनके ऐसे जो प्रेतोंके बटुक अर्थात् बालक वे महादेवके आगे नृत्यका आरम्भ करतेहैं । क्या करिके सो कहतेहैं कि योद्धाओंका जो ओष्ठ सोही रक्तता करिकै हुआ सो स्वच्छ समानाकृतिसे हुए कुन्ददल और संकुचितांगुलिदलयुक्त होनेसे हस्त द्वितीयः२] भाषाटीकासहिता। (४३) झिल्ली कर्णयुगे विधाय करिणां रक्तावसिक्तांगकैः प्रेतानां बटुकैः पुरः पुरभिदो नृत्यं समारभ्यते ॥ १७॥ अथाद्भुतरसस्य विभावाः । अत्र भरत:- यत्त्वतिशयार्थयुक्तं वाक्यं शिल्पं च कर्म रूपं च । तत्संबद्धैरथै रसोऽद्भुतो नाम सम्भवति ॥ १८॥ मायेन्द्रजालार्थलाभादय ऊहनीयाः॥ यथा- उद्दामोद्दाममायत्प्रतिभटदलनोदग्रजासत्प्रभावः सोऽयं देवो मुदे वो भवतु नरहरिस्तारिताशेषविश्वः । जो है सोही हुए सरसिज इनसे पुष्पाञ्जलि संपादन करिकै,फिर क्या करिकै,झिल्ली जो झींगुर उसको दोनों कानोंमें धर करिकै अर्थात् दोनों पार्श्वमें स्थित वाद्य- विशेषद्वयकरिकै । यहां वीभत्सके आलम्बन तो प्रेत है और अधरादिका दर्शनादि उद्दीपन है सो जानना ॥ अब अद्भुतरसको विभाव कहतेहै तहां भरतसम्मति दिखातेहैं । "यत्वतिश- यार्थयुक्तम्" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि आश्चर्य करिकै युक्त जो वाक्य अर्थात् बन्ध्यापुत्र मैंने देखाहै इत्यादि वाक्य और शिल्प और कर्म यह दोनों भी अतिशयार्थ युक्तही जानना । इससे मिलित जो अर्थ है उनसे अद्भुतनाम रस होताहै । और माया, इन्द्रजाल, अर्थलाभादिकाभी ऊह करलेना ॥ यहां मायाशब्दका अर्थ तपःसाध्य प्रभावातिशय है, इसका उदाहरण ग्रन्थान्त- रमें अर्थात् अभिज्ञानशाकुन्तलनाम नाटकमें है यहां नहीं दिखाया ।अब अतिशया- र्थयुक्तवाक्यसे संबद्ध अर्थसे अद्भुतरसका उदाहरण दिखाते है "उद्दामोद्दाम" इत्यादि श्लोकसे। श्लोकार्थ यह है कि.सकलपरमानर्थविनाशक होनेसे तारित कियाहै सम्पूर्ण विश्व जिसने ऐसा जो वह प्रसिद्ध नृसिहदेव सो तुम्हारे कल्याणकेलिये होवो । वह कौन सो कहतेहैं कि जिसके प्रौढप्रतापसे उद्भट अर्थात् दुनिरीक्ष्य और विकट कहिये कराल ऐसी जो सटाकोटि अर्थात् केसरोंके आग्रभाग उनसे विदारित जो मेघ तिनके ऑतही मानों बिजलीके छलसे बाहर निकले हैं । वह नृसिंह कैसाहै कि अधिकसे अधिक मदयुक्त जो शत्रु तिनके दलनसे उदग्र अर्थात् सातिशय जाग्रत् अर्थात् अनुभूयमान प्रभाव अर्थात् प्रताप है जिसका ऐसा । यहां अद्भुत रसको आलम्बन तो नृसिह है और अतिशयार्थ युक्त जो
(४४)
रसतरंगिणी-
[ तरंग:-
यस्य प्रौढप्रतापोद्भटविकटसटाकोटिभिः पाटिताना-
मन्त्राण्यम्भोधराणां बहिस्वि निरगुर्विद्युतां कैतेवेन ॥ १९॥
इन्द्रजालार्थलाभो यथा-
व्योनि प्राणसीम्नि सान्ध्यकिरणं विस्तीर्य चेलाञ्चलं
ध्वान्तैः कार्मणपांसुभिस्त्रिजगतां नेत्राणि संमोहयन् ।
ताराः शौक्तिकमौक्तिकानि विहगश्रेणीरवच्छमना
झिंझीकृत्य बहिः करोति वदनात्पञ्चाशुगो मायिकः ॥२०॥
इति श्रीभानुदत्तविरचिवायां रसतरंगिण्यां विभावनिरूपणं
नाम द्वितीयस्तरंगः ॥ २॥
वाक्य तत्संबद्ध अर्थ उद्दीपक है । इन्द्रजालमन्त्रशक्तिको कहतेहैं, उसका उदाह-
रण "व्योनि" इत्यादिश्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि पञ्चाशुग अर्थात्
कामदेव जो है सो ही हुआ मायक अर्थात् मन्त्रशक्तिवाला सो आकाश जो है
सो ही हुआ प्रांगणसीमा अर्थात् चतुष्पथ उसमें सन्ध्याकालिक जो किश्चिद्रक्त
किरण सोही हुआ वस्त्रसम्बन्धी अञ्चल उसको विस्तीर्ण करिके और अन्धकार
जो है सोही हुआ कार्मणपांसु अर्थात् दृष्टिबन्धार्थ विखेरीहुई धूलि तिन करिके
त्रिलोकीके नेत्रोंको संमोहित करता हुआ, तारा जो है सोही हुवे सीपके मोती
उनको मुखसे बाहर करताहै । क्या करिके, विहगसमूहका जो शब्द उसके छलसे
झिंझिं ऐसा शब्द करिके । यहां कामदेवके मुख्से मौक्तिकका बाहर होना यह
बाधित अर्थ है इस हेतु यहां लक्षणसे मन्त्रशक्तिमभावसे लोकको दिखाता हुआ
यह अर्थ जानना । यहां अद्भुत रसका आलम्बन तो काम है और उसको इन्द्र-
जाल उद्दीपन है सो जानना ॥
इति श्रीरसतरङ्गिणीभाषाटीकायां विभावनिरूपणं नाम द्वितीयस्तरङ्गः ॥ २ ॥
तृतीयः ३.] 4- भाषाटीकासहिता। (४५) तृतीयस्तरंगः ३. अथाऽनुभावा निरूप्यन्ताये रसाननुभावयन्ति अनुभ- वगोचरतां नयन्ति ते अनुभावाः कटाक्षादयः, करणत्वे- नाऽनुभावकता। करणत्वं च फलायोगव्यवच्छेदसम्ब- अब रससंगतिसे विभावनिरूपणानन्तर अनुभावनिरूपणकी प्रतिज्ञा करते हैं "अथ" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि अथ कहिये विभावनिरूपणान- न्तर अनुभाव जे हैं ते निरूपण किये जाते है । जो रसोंको अनुभावित करें अर्थात् अनुभवगोचरताको प्राप्त कर वे अनुभाव कहे जातेहै । जैसे कटाक्षादिक अनुभाव है। क्योंकि कटाक्षादि देख करिकै रसका अनुभव अर्थात् अनुमिति लोगोंको होतीहै इस हेतु कटाक्षादिक अनुभाव हैं, अनुभाव शब्दका फलित अर्थ यहहै कि जो रसानुमितिका कारण होय सो अनुभाव है। अब यह शंका होती है कि जिस प्रकार कटाक्षादि ज्ञानसे रसकी अनुमिति होती है तिसही प्रकार विभावका ज्ञान होकारकै रसज्ञानसम्पादनद्वारा स्थायिभावकी अनुमिति होतीहै तो स्था- विभावानुमितिमें कारण विभावभी होताहै तो अनुभावके लक्षणाकी विभावमें अतिव्याप्ति हुई इसका समाधान यह है कि यहां जो अनुभवकारणता लेना सो करणत्व धर्मसे ले तो अभिप्राय यह है कि रसानुभवका जो करण है सो अनुभाव है, ऐसा कहनेसे भी विभावमें अविव्याप्तिका वारण नहीं होसकैगा, क्योकि व्यापारवाला जो कारण सोही करण कहाताहै, तो विभावभी रसज्ञानसम्पादनरूप व्यापारवाला है और स्थायिभावाऽनुमितिमें कारणभी है तो विभावकी रसाऽनुभवकरणता होगई इस हेतु करणत्वका दूसरा अर्थ करतेहै “करणत्वं च इत्यादि वाक्यसे। वाक्यार्थ यह है कि फलका जो अयोग कहिये अभाव उसको निवृत्त करनेवाला जो कारण होय सो करण है ऐसा हुआ तो कटाक्षादिदर्शनसे उत्तरकालमें स्थायिभावकी अनुमिति नियम करिकै होतीहै, विभावज्ञानसे नियम करिकै स्थायिभावकी अनुमिति नहीं होतीहै किन्तु मध्यमें रसज्ञानसम्पन्न होकारकै स्थायिभावको अनुमिति होतीहै और कटाक्षादिका ज्ञान होकरिकै अव्यवहित ही रथायिभावकी अनुः मिति होती है इस हेतु फलके अभावको निवृत्त करनेवाला कारण विभाव नहीं है कटाक्षादि हैं, इससे कटाक्षादिमें लक्षणसमन्वय होगया, विभावमें आति- (४६) रसतरंगिणी- [ तरंग:- व्याप्तिवारण हुआ सो जानना । अब यह शंका हुई कि अनुभाव जो वस्तु है उसके होनेपरभी स्थायिभावानुमितिका कदाचित् अयोगभी होताहै क्योंकि अनुभावका ज्ञानमात्रही स्थायिभावाऽनुमितिमें चरम कारण नहीं है और कार- णकी भी स्थिति होती है तब स्थायिभावानुमिति होतीहै इससे यह सम्पन्न हुआ कि अनुभावके रहनेपरभी कदाचित् फलका अयोग होता कदाचित् फल होताहै इसही रीतिसे विभावके रहनेपरभी कोई कालमें फल होगा कोई कालमें नहीं होगा तो विभावमें अतिव्याप्ति पूर्ववत् स्थित रही। इसका समाधान यह है कि रसाऽनुगुण जो स्थायिभावाऽनुमिति अव्यवहितपूर्वत्वसम्बन्ध करिकै तादृशा- सुमितिसे उपहित अर्थात् युक्त स्थायिभावनिरूपित व्याप्ति और पक्षधर्मता इन दोनोंको विषय करनेवाला यद्वस्तुविषयक यथार्थ ज्ञान सामान्य होय वही वस्तु अनुभाव है । ऐसा हुआ तो विचार करिके देखो कि रतिरूप जो स्थायिभाव है उसका साहचर्यनियमरूप जो व्याप्ति तादृशव्याप्तियुक्त जो कटाक्षादि उसका नायः कनायिकादि आलम्बन विभावरूप जो पक्ष तापक्षवृत्तित्त्वविषयक जो यथार्थ ज्ञानसामान्य है अर्थात् यावत् यथार्थ ज्ञान है सो सम्पूर्ण श्रृंगाररसाऽनुगुण जो रत्यनुमिति अव्यवहितपूर्वत्वसम्बन्ध करिके तादृश अनुमितिकरिके युक्त है इस हेतु यच्छब्दवाच्य जो कटाक्षादि सो अनुभाव कहाताहै । ऐसा हुआ तो पूर्व जो आलम्बनाविभावमें अतिव्याप्तिशङ्का हुईथी वह निरस्त हुई क्योंकि रतिरूप स्थायि- भावका साहचर्यनियमरूप जो व्याप्ति (जहां जहां तादात्म्यसम्बन्ध करिके आलम्ब- न विभाव है तहां तहां विषयतासम्बन्धकरिके रतिरूप स्थायिभाव है यही साहचर्य नियमरूप व्याप्ति है) सो व्याप्ति तादात्म्यसम्बन्ध करिके आलम्बनविभावमें बन- सकेगी तादृशव्याप्तिविशिष्ट नायकनायिकादिरूप आलम्बनविभाव होगा । उस आलम्बन विभावको नायकनायिकादिरूप जो पक्ष उसमें वृत्तित्वका यथार्थ ज्ञान होगा। वह ज्ञान रसानुगुण जो स्थायिभावानुमिति अव्यवहितपूर्वत्वसम्बन्ध करिके तादृशाऽनुमितिसे युक्तभी होगा ऐसा होगा तो यच्छब्दवाच्य जो नायकनायिका- दिरूप आलम्बनविभाव सो अनुभाव कहानायगा परन्तु तादात्म्यसम्बन्ध करिके व्यातिका स्वीकार हमारे मतमें नहीं है। ऐसा हुआ तो आलम्बनविभाव स्थायिभाव व्याप्तिविशिष्ट नहीं होंगे। फिर कैसे अनुभावका लक्षण उनमें प्राप्त होगा, अपितु नहीं होगा, उद्दीपनविभाव जो वस्तुहैं उनके पक्षभूत आलम्बनविभावमें रतिरूपस्था- यिभावनिरूपित व्याप्तिविशिष्ट उद्दीपनविभाववस्तुका यथार्थ ज्ञान नहीं होसकेगा इस हेतु उद्दीपनविभावमें अनुभावका लक्षण नहीं प्राप्त होगा। यहां यह शंका हुई कि जहां यह नायक तिमान नहीं है ऐसा ज्ञान है तहां रतिव्याप्यकटाक्षा- - तृतीयः ३.] भाषाटीकासहिता। (४७) न्धित्वम् । ननु रसे कथमनुभावकापेक्षेति चेत् । सत्यम्, स्थायीभावः परिपूर्णो रसः, तस्य चान्तरत्वाज्ज्ञापकेन विना कथं ज्ञानमित्यनुभावस्यापेक्षणीयत्वात् ॥ दिमानयम्' ऐसा ज्ञान होगा तोभी रतिकी अनुमिति नहीं होसकेगी तो यह परा- मर्श अव्यवहितपूर्वत्वसम्बन्धकरिके अनुमितियुक्त नहीं होगा, इस हेतु कटाक्षरूप अनुभावमें अव्याप्ति होजायगी। इस हेतुका समाधान यह है कि अनुभावलक्षणमें तो यथार्थज्ञानपर है नही यथार्थज्ञानमे प्रतिवन्धकका असमानकालिकत्वविशेषण देना तो प्रकृतमें जो यथार्थज्ञान है सो प्रतिबन्धकसमानकालिक है इस हेतु अनुभावमें अव्याप्ति नही होगी। यहां सामान्यपद नहीं देखें तो स्थायिभा- वका व्याप्तिपक्षधर्मताऽवगाही जो विभाव अनुभावविषयक समूहाल- म्वन ज्ञान है वहभी ज्ञान विभावविषयक यथार्थ ज्ञान है तो विभावमें अतिव्याप्ति होगी इस हेतु सामान्यपद दिया तव विभावमें अतिव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि व्याप्ति पक्षधर्मतावगाही अनुभावविषयक जो समूहालम्वनभिन्न ज्ञान है वह ज्ञान तो अनुमितियुक्त होगा और विभावविषयक जो समूहालम्बन ज्ञान लिया वहभी अनुमितियुक्त है परन्तु विभावविषयक यथार्थ ज्ञान जितनेमें हैं सो सम्पूर्ण अनुमितियुक्त नहीं है कितनेक विभावविषयक ज्ञान तो यथार्थही नही होंगे इस हेतु अतिव्याप्ति नहीं होगी सो जानना । यह जो अनुभावका लक्षण कहाहै सो दोषमहिमाकरिकै अपने आत्मामें शकुन्तलाविषयकरतियुक्त दुष्यन्ताऽभेदविष- यक काव्यार्थभावनाजन्य विलक्षणविषयताशाली बोध रस है। यह जो वक्ष्यमाण मत उसके अभिप्राय करिकै जानना। विशेषवार्ता इस विषयकी जो यहां नहीं कहीहै वह रसनिरूपणप्रकरणमें कहेंगे सो जानना । वास्तविक ठीक विचार करें तो अनुशब्दका 'अनु पश्चाद्भवन्ति' इस व्युत्पत्तिसे रतिसे पीछे जो होय उनको कहना अनुभाव यही अनुभावशब्दका अर्थ होताहै। ऐसा हुआ तो अवच्छेदकता- समवाऽअन्यतरसम्बन्धावच्छिन्ना या स्थायिभावनिष्ठा कारणता तनिरूपिता जो समवायसम्बन्धावच्छिन्ना कार्यता ताशकार्यत्व जो है सोही अनुभावसामान्य- लक्षण जानना। नवीन कहतेहैं कि अनुभावव्यवहारविषयत्व अथवा संकेतसम्बन्धकरिकै अनुभावपदवत्त्व यही अनुभाव सामान्यलक्षण है । यहां यह शंका होताहै कि रसमें अनुभावककी अपेक्षा किस प्रकार है इसका अभिप्राय यह है कि भाव्यमान जो विभाव है उसको ही रसरूपता है इस हेतु वह विभाव प्रत्यक्षसिद्ध है वही अनु- भावककी अपेक्षा कोई रीतिसे नहीं होतीहै यही बात "नतु" इत्यादि ग्रन्थसे भर्यात् वारंवार देखनेसे क्या आकाक्षा करती है अर्थात क्या चाहती है। - लकेवियोगमात्र करिकै ही आत संताप देनेवाली? इस संसारमें बाहुमूलके विभावन (४८) रसतरंगिणी- रंग:- ननु कटाक्षादयः कथमुद्दीपनविभावा न भवति, दृष्टे कटाक्षादौ कामिनोमनोविकारः परिपूर्णो भवति । अनुभव- सिद्धत्वेनापह्नोतुमशक्यत्वात् । किंच, प्राचीनसंमतिरपि- ईषद्धक्रितपक्ष्मपंक्तिभिरनाकूतस्मितैर्वीक्षितै- रेतैरेव तवाद्य सुन्दरि करकोडे जगवर्तते । अन्तःपांसुलहेमकेतकदलद्रोणी दुरापश्रियो दोर्मूलस्य विभावनादिषु पुनःळूरे किमाकाङ्क्षसि ॥१॥ कहतेहै । इसका समाधान यह है कि विभाव अनुभाव व्यभिचारिभावसंयोगसे रसनिष्पत्ति होती है इस अर्थको जनानेवाला जो "विभावानुभावव्यभिचारिस- योगा रसनिष्पत्तिः” यह भरतसत्रहै इसमें मिलित जो तीन उनका उपादान है इस हेतु इन तीनों में एकएकको रसत्व नहीं है किन्तु इन तीनोंके संयोगसे रसपदार्थ निष्पन्न होताहै सो रस आन्तर पदार्थ है इस हेतु उसका प्रत्यक्ष नहीं होसक- लाहै । तब ज्ञापकके विना उसका ज्ञान किस प्रकार होगा इससे अनुभावी अपेक्षा अवश्य होगी यही बात "स्थायी भावः परिपूर्णो रसः" इत्यादिग्रन्थसे कहतेहैं ॥ अब यहां यह शंका होती है कि चन्द्रादिकी तरह कटाक्षादिको भी मनोविकारकी उत्कर्षकता 'आदौ रक्ता भवेन्नारी पुमान् पश्चात्तदिङ्गितैः' इत्यादि- वाक्योंसे शृंगारतिलकादि ग्रन्थोंमें कहीहै । और अनुभवसिद्ध भी यह बात है इस हेतु कटाक्षादिको विभाव कहना युक्त है, अनुभाव कहना युक्त नहींहै, यह आशंका "नतु" इत्यादिग्रन्थसे कहतेहै । इसका अर्थ यह है कि कटाक्षादि जे हैं त उद्दीपनविभाव क्यों नहीं होतेहैं क्योंकि कटाक्षादिका दर्शन होनेपर नायक- नायिकाका मनोविकार परिपूर्ण होताहै यह बात अनुभवसिद्ध है इस हेतु इसका अपद्रव करनेको शक्य नहीं है । अपने अनुभवको प्राचीन विद्वानोंके अनुभव संवाद के साथ प्रमाणयुक्त करते हैं। "किञ्च" इत्यादि वाक्यसे। श्लोकार्थ यह है कि नायिकाके प्रति सखीका वाक्य है कि हे सुन्दार ! किञ्चित् चलित जो नेत्र- पत्र उनकी श्रीकरिकै युक्त और विना अभिभाय करिकै जो स्मित उससे युक्त जो बीक्षण (देखना ) इन वीक्षणोंही करिकै तेरे हस्तपञ्जरमें जगत्के रसिक जन स्थित होरहेहै अर्थात् सम्पूर्ण पुरुष तेरे अधीन होरहे हैं। हे क्रूरे ! अर्थात् किञ्चित्का- ।
तृतीयः ३.] 'भाषाटीकासहिता। (४९) इत्यादय इति चेत् । सत्यम्, कटाक्षादीनां करणत्वेनानु- भावकत्वम्, विषयत्वेनोद्दीपनविभावत्वम्, तथा चात्मनि रसाऽनुभवकरणत्वेन नायकं प्रति कटाक्षादयोऽनुभावाः । ते च दृष्टिगोचरीभूताः कामिनोमनोविकारं कारयन्तो विष- यत्वेनोद्दीपनविभावा इति ॥ स चानुभावः कायिकमानसाहार्यसात्त्विकभेदाच्चतुर्धा ।। कायिका भुजक्षेपादयः, मानसाः प्रमोदादयः, नाटये चतुर्भुजत्वज्ञानादय आहार्याः, सात्त्विका रोमाञ्चादयः॥ अथ शृङ्गारस्याऽनुभावाः। तत्र भरत:- कैसा है वाहुमल कि भीतर पांसुल अर्थात् धूलिधूसर ऐसा जो हेमकेतक उसकी जो दलद्रोणी अर्थात् पत्रोंका गुच्छ ताकरिक नहीं प्राप्त होनेके योग्य है शोभा जिसकी ऐसा । इस प्राचीन लेखसे कटाक्षादिको भी उद्दीपन विभावता दिखाई सो क्यों नहीं कही इसका समाधान "कटाक्षादीनाम्" इत्यादि ग्रन्थसे कहते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि कामी और कामिनीका जो मनोविकार उसका व्यधि- करण होकरिकै परिपोषकता रहनेसे उद्दीपन विभावरूप भी जो कटाक्षादि है, तिनको रतिरूप स्थायिभावका व्याप्ति और पक्षवृत्तित्व दोनों विषयक जो ज्ञान तादृश ज्ञानविषयत्वरूप करणत्व होनेसे अनुभावकता भी होसकती है और प्रकर्पयुक्त रसजनकज्ञानविषयत्व होनेसे उद्दीपन विभावत्व भी होसकताहै। अव अनुभावका विभाग "सच" इत्यादि ग्रन्थसे कहतेहैं । इसका यह अर्थ है कि वह अनुभाव चार प्रकारका है-एक कायिक, दूसरा मानस, तीसरा आहार्य, चौथा मात्तिक । तहां भुजक्षेपादि तो कायिक अनुभाव हैं और प्रमोदादि मानस अनुभाष हैं और नाट्यमें जो चतुर्भुजत्वका आरोप होताहै वह आहार्य अनुभाव है और रोमाञ्चादि सात्तिक अनुभाव हैं ।। अव शृंगारके अनुभाव कहतेहै "अथ इत्यादि वाक्यते। तहाँ भरतसम्मति दिखातहैं " तत्र" इत्यादि वाक्पसे । वाक्यार्य यह है कि नेत्रके और मुखके जो प्रसाद तिनकारकै और स्मित और मधुर वचन और भमोद इनसे और विविध जो अंगविकार अर्थात् चुम्बनयाचनावोधक जो ओप्पुटाकुश्चनादि और सात्त्विकभाव इनसे शृंगार रसका अभिनय अर्थात् तद्रा- पिका चेष्टा प्रयोग करनेके योग्य है। कटाक्ष ओर भुजक्षेपादिका अह कर लेना । ५ (५०) रसतरंगिणी- [ तरंगः- नयनवदनप्रसादैः स्मितमधुरवचनप्रमोदैश्च । विविधैरङ्गविकारैस्तस्याऽभिनयः प्रयोक्तव्यः ॥२॥ कटाक्षभुजपादय ऊहनीयाः। यथा- मुक्ताहारः स्तनकलशयोः कर्णयोः कर्णिकार मौलौ माला परिभवभयादेव दूरे न्यवारि। दृष्टेऽभीष्टे समजनि पुनः सुभ्रुवो भूषणाय प्रातर्वातोत्तरलकमलद्रोहदक्षः कटाक्षः ॥३॥ अथ हास्यस्याऽनुभावाः। तत्र भरतः- विकृताकारैर्वाक्यैरङ्गविकारैविकृतविषेशैश्च । हास्यं जनयेद्यस्मात्तस्माज्ज्ञयो रसो हास्यः॥४॥ आस्याधरविवरणदशनदर्शननासाकपोलस्पन्ददृष्टिव्या- कुञ्चनादय ऊहनीयाः। यथा- अव शृंगाररसके अनुभावका उदाहरण " मुक्ताहारः" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि सखीके प्रति सखीका वचन है कि सूर्योदयकालिक और वात- करकै चञ्चल ऐसा जो कमल उसके द्रोहमें चतुर अर्थात् उस कमलके सदृश जो कटाक्ष है सोही प्रियतमका दर्शन होनेपर सुन्दर है भृकुटी जिसकी ऐसी जो मायिका उसका भूषण अर्थात सर्वातिशयको धारण करने के अर्थ पैदाहुआ कटाक्ष- ही भूषणके अर्थ हुमा ।और अलंकरण क्यों नहीं हुआ इस अपेक्षासे कहते है कि रतनरूप जो कलश उनमें जो मुक्ताहार सो और कानोंमे जो कर्णिका अर्थात पुप्प है सो और केशपाशमे जो माला है सो परिभवभय अर्थात् मालिन्य संभावना- के उद्वेगसे दूर त्याग की गई, यहां नायकविषयक जो नायिकाको रति है उसका कटाक्ष अनुभाव है। अब हास्य रसके अनुभाव कहते हैं । तहां भरतसम्मति दिखातेहै " तत्र इत्यादि व क्यसे । वाक्यार्थ यह है कि हास्य अर्थात् मुखविकासको जिस हेतुसे उत्पन्न कराताहै तिस हेतुसे रस जो है सो हास्पपदवाच्य कहाताहै सो रस विकृ- ताकार वाक्योसे अर्थात् लुप्तगद्गदाक्षर वाक्योंसे और अंगविकार अर्थात् शैथि- त्पादिने और विकृत वेषं अर्थात् वदनरक्ततादिसे ज्ञेय अर्थात् अनुमान करने के योग्य है मुख और ओष्ठ अधर दोनोंका जो विवरण अर्थात् चालन और दन्तका " . तृतीयः ३.] भाषाटीकासहिता। (५१) पात्रीकृत्य कपालमण्डलमिदं पीयूषभानोः कलां वर्तीकृत्य फणामणिं फणिपतेः सम्पाद्य तस्यां शिखाम् । सायं दीपविधि वितन्वति शिशौ मन्दं हसन्त्या तया किञ्चित्कुञ्चिदपांगभंगकुटिला दृष्टिः समारोपिता ॥६॥ अथ करुणाऽनुभावाः। तत्र भरत:- निःश्वसितेन च रुदितैमोहागमनपरिदेवनैश्चैव । अभिनेयः करुणरसो देहाघातादिभिश्चैव ॥ ६॥ मुखशोषप्रलापवैवादय ऊहनीयाः। यथा- ताते निगच्छति गणपतौ नाकमद्याऽपि तस्या वाचां देव्यास्त्यजति शिथिलं कणं नैव दोष्णोः । अद्याप्याभवति कुचयोनैव पाटीरपंको नेत्रे निर्यत्पयसि न पुनः कजलं स्थैर्यसेति ॥ ७॥ दर्शन और नासा और कपोलका किञ्चिचलन और दृष्टिका व्याकुश्चन अर्थात् संकोच इत्यादिका भी ऊह करलेना । अब हारयरसके अनुभावका उदाहरण "पात्रीकृत्य" इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि, किसी रुद्रगणकी यह उक्ति है कि मन्द कहिये ईषत् हँसती हुई जो पार्वती उसने शिशु जो गणेश वा स्वामिकार्तिक उसमें किञ्चित् कुश्चित अर्थात् ईषनिमीलित जो नयनप्रान्त उसका जो भंग कहिये रचना उस करिके कुटिला अर्थात् वका जो दृष्टि सो आरोपित अर्थात् स्थापित की। कैसा है शिशु सो कहतेहैं कि, मण्डलाकार जो कपाल उस- को पात्र बना करिकै उस पात्रमें चन्द्रकलाको बत्ती बना करिकै फणिपति अर्थात् शेषनागकी फणामणिको उस बत्तीमें शिखा सम्पादन करिकै दीपविधिको विस्तारित करे ऐसा । यहां पार्वतीनिष्ठ जो हास्य उसका अनुभाव कुटिला दृष्टि है सो जानना ॥ अब करुण रसके अनुभाव कहते हैं। तहां भरतसम्मति दिखातेहैं-"निश्वसितेन" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्य यह है कि निश्वाससे और रोदनोंसे और मोहागमन और दुःख कथा इनसे और देहताडनादिसे करुण रस जो है सो अभिनेय अर्थात् जनाने योग्य है । और मुखशोषण और प्रलाप और विवर्णता इत्यादिका भी उह करलेना इसका उदाहरण " ताते निर्गच्छति " इत्यादि श्लोकसे कहतेहै ।
(५२) रसतरंगिणी- [तरंग:- अथ रौद्ररसस्याऽनुभावाः । तत्र भरतः- नानाप्रहरणसंकुलशिरसः 'कम्पैः कराग्रनिष्पेपैः। घोरैरर्थविशेषस्तस्याभिनयःप्रयोक्तव्यः॥ ८॥ भृकुटीदन्तौष्ठपीडनादय ऊहनीयाः। यथा- येये भीमेन बद्धभ्रुकुटिषनरवं दन्तनिष्पीडितोष्टं विक्षिप्ता व्योम्नि विन्ध्याचलचटुलचमत्कारभाजः करीन्द्राः। तेषामेषा कपोलादिव भयविधुता काचिदुड्डीय लगा बिम्बे पीयूषभानोर्मधुकरपटली लाञ्छनस्यच्छलेन ॥९॥ अथ वीरस्याऽनुभावाः । तत्र भरतः- श्लोकार्थ यह है कि भानु कविका पिता जा गणपति सो स्वर्गको प्राप्त होतसन्तै उनकी जो सरस्वती देवी उसकी पीडा कहतेहैं कि कविताको करनेवाला मैं हूं तो भी हमारे पिता जो गणपति मिश्र सो स्वर्गको जातसन्तै अवतक भी उनकी जो वाग्देवी है उसका दोनों बाहुका जो कंकण है सो शिथिलताको नहीं त्याग करताहै और आज भी गणपतिमिश्रके वियोगसे जो सन्ताप ताकरिके दोनों स्तनों में जो चन्दनका पंक सो आला नहीं होताहै किन्तु शुष्कही रहताहै । और निकलता है अश्रु जिससे ऐसे जो नेत्र उनमें कजल स्थिरताको प्राप्त नहीं होताहै, किन्तु वहताही जाताहै । यहां गणपतिमिश्रालंबनक जो सरस्वतीनिष्ठ करुणा रस उसका अभिव्यक्त जो निःश्वासरोदनादि सो अनुभावक है। अब रौद्ररसके अनुभाव कहतेहै । तहां भरतसम्मति दिखातेहै । "नानामह रण" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि नानामहारसे व्याकुल जो शिर उसके कम्पोंसे और हस्तानका जो मसलना उनसे और घोर जो अर्थविशेष अर्थात् नहीं देखनेके लायक कर्म विशेष इनसे रौद्रका अभिनय प्रयोक्तव्य है । और भृकुटी और दन्त, ओष्ठका पीडन इत्यादिका भी ऊह करदेना । इसका उदाहरण-"येये" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि भीमसेनने बांधी भुकुटि जिस क्रियामें जैसे होय तैले और घोर है शब्द जिस क्रियामें जैसे होय तैसे और दन्तकारक :निष्पीडित है ओष्ठ जिस कियामें जैसे होय तैसे आकशमें जो जो हाथी के उनके कपोलसे भययुक्त हो करिकेही मानो उडकरिके यह मधुकरपटली अर्थात् भ्रमरोंका समूह जो है सो लाञ्छनके छलस चन्द्रमण्डलमें लगगयाहै । कैसे है इस्ती कि विन्ध्याचलका जो वटुल चमत्कार तृतीयः ३.] भावाटीकासहिता (५३) शौधयवीयैरुत्साहपराक्रमप्रभावैश्च । वाक्यैराक्षेपकृतैर्वीररसः सम्यगभिनेयः ॥ १० ॥ विजयबलादय ऊहनीयाः॥ नन्वतीन्द्रियस्य रसस्य ज्ञाप- काः शरीरधर्मा भवितुमर्हन्ति त एव सर्वत्रोक्ताः। तथा च धैर्योत्साहौ न शरीरधर्माविति चेत् । सत्यम् , धैर्यपदेन चाञ्चाल्याभाव उत्साहपदेन चाश्रुपातादयो विवक्षिताः। यद्वा-अनुभावश्चतुर्विधः,तत्र मानसोऽप्यनुभाव उक्तः। तस्य च ज्ञानमेवाऽनुभावकम् । तच्च मानसमैन्द्रियकवेति न विशेषः॥ युद्धवीरस्याऽनुभावो। यथा- अग्रे वासवजित्समग्रसमरव्यापारदीक्षागुरुः पार्श्वे तस्य विपक्षपक्षदमनक्रीडाधनो रावणः । इत्थंजल्पति सर्वतः परिजने सन्ध्यास्मृतिं कुर्वतः श्रीरामस्य न कुम्भकस्य पवने क्षुण्णः स कोऽपिक्रमः११ है जिनके ऐसे । यहां भीमनिष्ठ जो दुर्योधनालम्बनक रौद्र तिसका दुनिरीक्ष्य में जो इस्तीका फैकना तथा ओष्ठपीडनादि अनुभव है। अव वीर रसके अनुभाव कहते हैं तहां भरतसम्मति दिखातेहैं "शौर्य त्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि शूरताओंसे और धैयाँसे और वीयाँसे मौर उत्साह और पराक्रम और प्रभाव इनसे और आक्षेपकृत वाक्योंसे वीर रस सम्पप्रकारसे अभिनय करने योग्य है। यहां वीर्य बलविशेषको कहतेहैं, परा- हम परवन्धनादिको कहतेहैं, और प्रभाव मारणादिको कहतेहैं, आक्षेप तिरस्कारको कहतेहै, और विजयका बल इत्यादिका भी ऊह करलेना । अब यहां यह शंका होतीहै कि अप्रत्यक्ष रसके जनानेवाले शरीरके धर्म होनेके योग्य है। और सोही सब जगह कहेहै ऐसा हुआ तो धैर्य और उत्साह यह दोनों शरीरधर्म नहीं है फिर पह अनुभाव अर्थात् अनुभावक किस प्रकार होगा। इसका समाधान यह है कि पहां धैर्य शब्दकारकै चञ्चलताका अभाव कहते हैं और उत्साह शब्दकरिके अश्रु- पातादि कहतेहैं । ये दोनों शरीरधर्म ही है इस हेतु अनुभाव होसकेंगे । अथवा अनुभाव चार प्रकारका पूर्व कहाहै तहां मानस भी अनुभाव कहाहै । उसका ज्ञानही अनुभावक है सो ज्ञान मानस होय अथवा ऐन्द्रियक अर्थात् प्रत्यक्ष होय इसमें कुछ विशेष नहीं है । इस हेतु आन्तरभी अनुभाव होतेहै । अब युद्धवीराऽनु- भावका उदाहरण-"अग्ने वासवजित्" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं। इलोकार्थ यह [ तरंगः .. वीरका वसुमती इत्यादिका जो दान है सो अनुभाव है ॥ भब भयानकके अनुभाव (५४) रसतरंगिणी- दयावीरस्याऽनुभावो यथा- ध्वान्तस्तोमधरे जगद्भयकरे पाथोधरे वर्षति क्रोडव्याकुलवत्सगोकुलदयादीनेक्षणः केशवः । हस्तन्यस्तमहीधरच्युतिभिया नैवांगुलीपल्लवै- वेणं सस्तमुरीकरोति न तनोः सस्तं हरत्यंशुकम् ॥ १२॥ दानवीरस्यानुभावो यथा- औदास्यं न विधेहि गच्छ न गृहात्संवीक्ष्य मृदाजनं यांचे किन्तु भवन्तमेतदखिलं कौत्स क्षणं क्षम्यताम् । है कि राम रावणके युद्धसमयमें कपिदल कहताहै कि सम्पूर्ण जो संग्रामका व्यापार उसकी दीक्षा में गुरु ऐसा जो इन्द्रजित सो आगे है अर्थात् सेनापति होरहाहै । और उस इन्द्रजितके समीपमें रावण है । कैसा है रावण कि शत्रुका जो पक्ष उसका जो पराभव अर्थात् खण्डन सोही है क्रीडा सोही है धन जिसको ऐसा । इस प्रकार चारों दिशाओंमें परिजन जो वानरसमुदाय सो बोलतसतै सन्ध्यास्मरणको करतेहुए ऐसे जो रामचन्द्र उनका जो यह कुम्भकके वायुक्रम अर्थात् पहले पूरक प्राणायाम और पीछे कुंभक और पीछे रेचक यह जो क्रम सो विगडा नहीं । यहां रावणालंबनक जो रामका वीर रस उसका चाञ्चल्याभावरूप धैर्य अनुभावक है । दयावीरके अनुभावका उदाहरण कहतेहै "ध्वान्त" इत्यादि श्लोकसे श्लोकार्थ यह है कि अन्धकारके समुदायको धारनेवाला और जगतको भय करनेवाला ऐसा जो मेघ सो बरसत सन्ते दोनों भुजाओंके अन्तरमें व्याकुल ऐसे जो वत्स और गोसमूह उनमें जो दया उससे दीन है दृष्टि जिसकी ऐसा जो केशव सो हस्तमें धारित जो गोवर्धन पर्वत उसके पडनेके भयसे पडता हुआ जो वेणु उसको अंगुलिपल्लवोंसे नहीं धारण करताहै और शरीरसे पडता हुआ जो वस्त्र उसकोभी नहीं धारण करता है। यहां गोकुलालंबन जो केशवका दयावीर रस उसका अनुभाव धैर्य है ।। अब दानवीराऽनुभावका उदाहरण "औदास्यम्" इत्यादि श्लोकसे कहते है । लोकार्थ यह है कि हे कौत्सामृत्तिकाके पात्रको देखकरिके उदासताको मत करो। और घरसे मत जावोयह सब बात आप क्षमा करो अर्थात् इसका विचार मत करो। मैं आपको यही याचना करताहूं कि क्षणमात्र क्षमा करो जो दास गुरुदक्षिणा तब तोमै हू और जो पृथ्वी गुरुदक्षिणा है तो सम्पूर्ण लेलीजिये और जो स्वर्ण गुरुद- क्षिणा है तो कुबेरसे लाकर सम्पादन कियाजाताहै।यहां कौत्सालंबनक रघुनिष्ठ दान तृतीयः ३.] भाषाटीकासहिता। (५५) दासश्चेदहमस्मि चेद्वसुमती सर्वैव संगृह्यता स्वण चद्गुरुदक्षिणा धनपतेरानीय सम्पावते ॥ १३ ॥ अथ भयानकस्याऽनुभावाः । तत्र भरतः- करचरणनेत्रमस्तकसर्वांगानां प्रकम्पनैश्चैव । शुष्कोष्ठतालुकण्ठैर्भयानको नित्यमभिनेयः ॥ १४ ॥ रोमाञ्चवदनवैवर्ण्यस्वरभेदादय ऊहनीयाः । यथा- न्यस्तव्यस्ततृणावलीढवदनव्याकीर्णफेनोच्चय काकुव्याकुलघोरघर्घरवं स्फारीभवल्लोचनम् कम्पप्रस्खलदंघ्रिवामनतनुश्वासोमिनुन्नाधरं विस्तीर्णे भुजगस्य वक्रकुहरे कृष्णस्य गावः स्थिताः१५॥ अथ बीभत्साऽनुभावाः । तत्र भरतः- आनननेत्रविघूर्णननासास्यच्छादनैश्चैव । कहते हैं । तहां भरतसम्मति दिखाते है “करचरण" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि हस्त, पद, नेत्र, मस्तक यह हैं प्रधान जिनमें ऐसे जो संपूर्ण अंग उनके प्रकम्पनोंसे और ओष्ठ, तालु, कण्ठ इनके शोषणकरिके भयानकरस नित्य अभिनव करने योग्य है । और रोमाञ्च, मुखकी विवर्णता, स्वरका भेद इत्यादिका भी ऊह करलेना । इसका उदाहरण "न्यस्तव्यस्त" इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि कृष्णके गौ जे है ते विस्तारयुक्त जो व्यालराक्षसका पत्रकुहर अर्थात् मुखबिल उसमें स्थित होगये । किस प्रकार, सो कहते हैं कि न्यस्त कहिये गलित और व्यस्त कहिये खण्डित ऐसे जो तृण तिनकारके युक्त जो मुख उसमे व्या- कीर्ण कहिये व्याप्त है फेनसमूह जिसक्रियामे जैसे होय तैसे । और काकु जो स्वर- विशेष उससे व्याकुल अर्थात व्याप्त और घोर और घर्घरानुकरणयुक्त है शब्द जिसक्रियामें जैसे होय तैसे. और विस्तारयुक्त है लोचन जिस क्रियामें जैसे: होय तैसे और कंपकरिके गिरताहुआ है चरण जिस क्रियामें जैसे होय तैसे और चाम- न है तनु जिस क्रियामें जैसे होय तैसे और श्वासकी जो परंपरा ताकरिके कंपायमान है अधर जिस क्रियामें जैसे होय तैसे। यहां व्यालराक्षसालम्बनक गोनिष्ठ जो भव उसका कम्पादिक अनुभाव है। अब बीभत्स रसके अनुभाव कहते हैं। तहां भरतसम्मति दिखाते हैं "आनन- नेत्रविघूर्णन" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि मुखका और नेत्रका जो घुमाना और नासिका और मुखका आच्छादन इनसे और अव्यक्त
रततरंगिणी-
[ तरंगा-
अव्यक्तपादपतनैर्बीभत्सः सम्यगभिनेयः॥१६॥
सर्वांगसंहारष्ठीवनादय उहनीयाः । यथा-
कपटहरेर्मुखकुहरे विकृते संवीक्ष्य दिनकर लक्ष्मीः।
हतदैत्यपललकवलभ्रान्त्या मुखमंशुकैः पिदधे ॥ १७ ॥
अथाद्भुतरसाऽनुभावाः। तत्र भरतः-
करस्पर्शग्रहणोल्लासँहाहाकारैश्च साधुवादैश्च ।
वेपथुगद्दवचनैः स्वरभेदैरभिनयस्तस्य ॥ १८॥
निनिमेषप्रेक्षणरोमाञ्चादय ऊहनीयाः । यथा-
पाण्डवं वीक्ष्य दोर्दण्डखण्डितारातिमण्डलम् ।
अद्याऽपि नाकिनां नेत्रे निमेषा नैव जाग्रति ॥ १९॥
इति श्रीभानु रसतरंगिण्यामनुभावनिरूपणं नाम तृतीयस्तरंगः ॥ ३ ॥
पादपतन अर्थात् स्तंभनसे बीभत्स रस सम्यक् अभिनेय है अर्थात् जाननेयोग्य है ।
संपूर्ण अंगका समेटना और थूकना इत्यादिका भी ऊह करदेना । इसका उदाहरण
"कपटहरेः"इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि लक्ष्मीजो है सो मायावी
श्रीकृष्णके मुखच्छिद्रमें सूर्यको देखकरिके मराहुआ जो दैत्य उसके मांसके
शासकी भ्रान्तिसे वस्त्रोंसे मुखको आच्छादित करतीभई । यहां लक्ष्मीनिष्ठ हत-
दैत्यमांसालंबनक जो बीभत्स उसका अनुभाव मुखका ढकना है । अब
अद्भुत रसके अनुभाव कहते है, तहां भरतसम्मति दिखाते हैं-"करस्पर्श-
अहण" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि स्पर्श करिके और ग्रहण करिके
और उसका अर्थ हर्षजनित चित्तविकास करिके और आश्चर्य सूचक हाहाकार
शब्दोंसे आर साधवादोंसे और वेपथु अर्थात् कंपकारके और गद्गवचन करिके
और उदात्तादिस्वरभेदकारक अभुतरसको जानना। और निमेषरहित होकर झांकना,
रोमाञ्च इत्यादका भी अह करलेना । इसका उदाहरण "पाण्डवं वीक्ष्य"
इत्यादि श्लोकस कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि कृष्णके प्रति सात्यकि कहताहै
कि बाहुदण्डसे खण्डित कियाहै शत्रुमण्डल जिसने ऐसा जो पाण्डव अर्जुन उसको
देखकरिके देवताओंके नेत्रोमें अब भी निमेष नहीं जागते है, इसका अभिप्राय यह है
कि दृढ जो निनिमेषप्रेक्षण उसके अभ्यास करिके अब भी निमेष नहीं उत्पन्न होते हैं।
यहां पाण्डवालवनक देवतानिष्ठ अद्धत रसको निनिमेषप्रेक्षण अनुभाव है सो जानना।।
इति श्रीरसतरङ्गिणीमाषाटीकायामनुमावितनिरूपण नाम तृतीयस्तरङ्गः ॥ ३ ॥
चतुर्थः ४.] भाषाटीकासहिता। चतुर्थस्तरंगः४. g= अथ सात्त्विकभावा निरूप्यन्ते । तत्र भरतः- स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभेदोऽथ वेपथुः॥ वैवर्ण्यमथुप्रलय इत्यष्टौ सात्त्विका मताः॥१॥ नन्वस्य सात्त्विकत्वं कथम्, व्यभिचारित्वं न कुतः, सकलरससाधारण्यादिति चेत् । अत्रकेचित्, सत्त्वं नाम परगतदुःखभावनायामत्यन्ताऽनुकूलत्वम्,तेन सत्त्वेन धृताः सात्त्विका इति व्यभिचारित्वमनाहत्य सात्त्विकव्यपदेश इति।तन्न, निर्वेदस्मृतिप्रभृतीनामपि सात्त्विकव्यपदेशापत्तेः। न च परदुःखभावनायामष्टावेते समुत्पद्यन्त इत्यनुकूल- शब्दार्थः । अत एव सात्त्विकत्वमप्येतेषामिति वाच्यम् । निर्वेदादेरपि परदुःखभावनायामप्युत्पत्तेरिति । अवसरसंगति करिके शारीरभावनिरूपणकी प्रतिज्ञा करतेहै । "अथ" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्य यह है कि अनुभावनिरूपणानन्तर सात्विक भाव निरूपण करतेहैं। यहां सात्विकभावशब्दका यौगिक अर्थ ऐसा नहीं है जो आपत्ति न लगे और रूढयर्थका निर्धारण है नहीं इस हेतु सात्त्विक भावोंका नाम कहतेहैं "तत्र भरतः" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि स्तम्भादिक आठ सात्विक भाव हैं। यहां यह शंका हुई कि इन आठ भावोंको सात्त्विकत्व किस प्रकार कहतेहो । यह कहनेका यह अभिप्राय है कि सत्त्व जीवका नाम है उसके आश्रित जो होय सो ही सात्त्विक कहाताहै, इसहीसे इसमें सात्त्विकव्यवहार कर तेहो । सो यह कहना युक्त नहीं । क्योंकि व्यभिचारिभावको भी जीवाश्रितत्व है। वह भी सात्विक कहावैगा सो अभिमत नहीं है। फिर यही आठ क्यों सात्विक कहाते हैं इसका हेतु कहो। और विचार करो तो इन आगेहीके । व्यमि- चारिभावका जो लक्षण है सकलरसगामित्व सो है, तो इनको व्यभिचारिभाव कहना चाहिये सात्त्विक नहीं कहना चाहिये । इसका समाधान कोई इस प्रकार करते है कि सत्वशब्दार्थ यह है परको जो दुःख उसके विचारमें अत्यन्त अनुकू- अब (५८) रसतरंगिणी- [ तरंगः- अत्रेदं प्रतिभाति-सत्त्वशब्दस्य प्राणिवाचकत्वादन सत्त्वं जीवशरीरम् । तस्य धर्माः सात्त्विकाः। इत्थं च शारी- रभावाः स्तम्भादयः सात्त्विका भावा इत्यभिधीयन्ते । स्थायिनो व्यभिचारिणश्च भावा आन्तरतया न शरीर- धर्मा इति॥ शरीरधर्मत्वे सति गतिनिरोधः स्तम्भः । न च निद्राड- लता उस सत्त्व कारके जो धृत हैं वे सात्त्विक कहाते हैं । यह जो अनुकूलता रूप सत्त्व है सो आठहीमें है इस हेतु इन आठहीमें सात्त्विकपद प्रयोग होगा। व्यभिचारिभावमें यह अनुकूलता नहीं है इस हेतु वहां सात्त्विकपद प्रयोग नहीं होगा । यह मत समीचीन नहीं क्योंकि निर्वेदादिमें नहीं रहै और स्तंभादिमें ही रह ऐसी अनुकूलता माननेमें कुछ प्रमाण नहीं इस हेतु निर्वेदादिमें भी ऐसी अनु- कूलता रहेगी। यह कहनेका यह अभिप्राय है कि परगतदुःखभावनामें अनुकूल- तावस्तु उत्पत्तिरूपही होगी । सो उत्पत्ति निर्वेदादिमें भी है ही तो निर्वेदादिको भी सात्त्विक कहना चाहिये।यहां किसीको ऐसा वैमत्य है कि परगतदुःखभावनाम इन आठहीकी उत्पत्ति होती है इस हेतु ये आठही सात्त्विक कहावेंगे । यह वैमत्य युक्त नहीं क्योंकि निर्वेदादिकी भी परदुःखके विचारमें उत्पत्ति होती है तो उनमें भी सात्विकत्वव्यवहार होना चाहिये सो जानना ॥ अब समाधान अत्रेदम्" इत्यादि ग्रन्थसे करते हैं । इस ग्रन्थका यह अभिप्राय है कि हमको यहां यह दीखताहै कि सत्त्वशब्द माणिवाचक है इस हेतु यहां सत्त्वशब्द जीवयुक्त शरीरका नाम है उसके धर्मको सात्त्विक कहतेहैं । ऐसा हुआ तो शारीरभाव जो स्तंभादि सो सात्त्विकभाव कहातेहैं । तो सात्त्विकभावका यह लक्षण फलित हुआ कि शारीरत्व होतसन्तै स्थायिभावप्रका- रक आरोपविषयीभूत भावत्व । यहां विशेषण जो है शारीरत्व सो न दें तो व्यभिचारिभाव और स्थायिभाव ये दोनों भाव है तो ये भी सात्त्विकभाव कहे- जायंगे। और व्यभिचारिभावमें विचार करनेसे स्थायिभावप्रकारकआरोपविशेष्य जो भाव तादृशभावत्व है तो अतिव्याप्ति होगी इस हेतु शारीरत्वे सति' यह विशेषण दिया । तो व्यभिचारिभाव वा स्थायिभावको शारीरत्व नहीं है इस हेतु सात्त्विक- भावलक्षणकी अतिव्याप्ति नहीं होगी सो जानना ।। अव सात्त्विकभावोंका सामान्यलक्षण कहकर स्तंभका लक्षण कहते हैं "शरी- सति' इत्यादिनन्यसे । इसका यह अर्थ है कि शरीरधर्मत्व होतसन्तै गति- " चतुर्थः ४.] भाषाटीकासहिता। (५९) ऽपस्मारादावतिव्याप्तिः,शरीरधर्मपदेन व्यावर्तनात् । प्रल- यभाने तु चेष्टानिरोधो न तु गतिनिरोधः । तस्य विभा- वा हर्परागभयदुःखविषादविस्मयक्रोधाः । यथा- श्रोणी पीनतरा तनुः कृशतरा भूमीधरात्पीवरा वक्षोजस्य तटी कुतो निजकुटी मातर्मया गम्यताम् । इत्युद्भाव्य कदम्बकुलनिकटे निर्विश्य मन्दस्मितं गोविन्दं समुदीक्ष्य पक्ष्मलहशा स्तम्भस्तिरोधीयते ॥२॥ सामान्यका जो निरोध अर्थादकनाजो है सो स्तंभ होयहां शारीरत्व विशेषण न द तो निद्रा और अपस्मार यहां अतिव्याप्ति होगी क्योकि इस अवस्थामभीगतिसामान्यका निरोध रहताहै इस हेतु शारीरत्वविशेषण दिया।सामान्यपद नंद तो प्रलयभावमें अति- व्याप्ति होगी क्योंकि प्रलयभावको शारीरत्व है उस अवस्थामें चेष्टारूप गतिका निरोध भी रहताहै इस हेतु सामान्य पद दिया । अव प्रलयभावमें अतिव्याप्ति नहीं होती है, क्योंकि इस अवस्थामें चेष्टाका निरोध है तो भी गतिका निरोध नहीं है इससे गतिसामान्यनिरोध वहां नहीं रहा सो जानना । इस स्तंभके विभाव अर्थात् उत्पादक हर्षादि है । इसका उदाहरण "श्रोणी" इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि सखकि प्रति सखीका वाक्य है कि हे माता ! मेरा जो कटिपश्चाद्भाग अर्थात् नितंब सो पुष्टतर है । और शरीर जो है सो अत्यन्त कृश है । और स्तनतट जो है सो पर्वतसे भी पुष्ट है । इस हेतु मैने अपना गृह किस प्रकार जायाजायगा अर्थात् मैं किस प्रकार जाऊं, भारसे चलने में समर्थ नहीं हूं । यह कहकरिके कदवसंवन्धी कुञ्जके समीपमें विश्राम लेकारकै मन्द है स्मित जिस क्रियामें जैसे होय तैसे कृष्णको देखकारकै अर्थात् कटाक्षसहित निरी- क्षण करिकै रमणीय जो पक्ष्म ( वॉफणी) तत्संबन्धिनी है दृष्टि जिसकी ऐसी नायिकासे उत्पन्न हुआ जो स्तंभ सो तिरोहित किया गया। यहां 'मातः' यह जो सखीके प्रति सम्बोधन है सो साऽनुकम्पा उक्ति है, यह उक्ति अप्रतारणाकी व्यञ्जक है सो जानना और वक्षोजस्यमें जो एक वचन दिया उससे स्तनके भेद ज्ञानमें प्रतिबन्धक जो अत्यन्त संश्लेष सो व्यजित हुआ। यहां कृष्णदर्शनसे जो स्तम्भ उसका कारण हर्ष रागादि हैं, सो जानना ।
नायिकाके प्रति सखीका वचन है कि हेसखि ! बकुलवृक्षका जो पुष्प उसके किय अर्थात् मध्यसे रोष करिके बाहर निकलते हुए जो भ्रमर उनका जो शब्द (६०) रसतरंगिणी- [ तरंग:- वपुषि सलिलोद्मः स्वेदः ।अस्य विभावा मनस्तापहर्षल- जाक्रोधमयश्रमपीडाघातमूर्छाः। यथा- कान्ते तव कुचप्रान्ते राजन्ते स्वेदबिन्दवः । हृष्यता मदनेनेव कृताः कुसुमवृष्टयः॥३॥ विकारसमुत्थरोमोत्थानं रोमाञ्चः । अस्य विभावाः शी- तालिंगनहर्षभयक्रोधाः। यथा- बकुलमुकुलकोषरोषनिर्यन्मधुकरकूजितभाजि कुनभूमौ । पुलकयति कपोलपालिमालि ! स्मितसुभगः कथमद्य नन्दसूनुः॥४॥ अब स्वेदका लक्षण कहतेहै " वपुषि" इत्यादि वाक्यसे वाक्यार्थ यह है कि शरीरमें जो जलका प्रादुर्भाव उसको स्वेद कहतेहै । नारिकेलमें भी जल होताहै वह जल स्वेद नहीं है। यह अतिव्याप्तिवारणार्थ वपुषि यह विशेषण दिया। यहां शरीर करिके नेत्रभिन्न शरीरका अवयव समझना इस हेतु अनुपातमें अतिव्याप्त नहीं होगी। ऐसा कहनेपरभी श्रमजनित स्वेदमें सात्विक व्यवहार नहीं होताहै सो होजायगा । इस हेतु वह स्वेद विकारसम्भूत समझना चाहिये । इस हेतु उद्गमः यहां उत् यह उपसर्गपद दिया। अभिप्राय यह है कि परस्पराऽनुरागातिशय होतसन्त जो शरीरमें सलिलोद्गम सो स्खेद है, सो जानना । इसके विभाव मनका सन्तापादि जानना, आघातसे ताडना समझना । इसका उदाहरण-"कान्ते तव" इत्यादि इलोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि नायिकाके प्रति नायकका वचन है हे प्रिये ! स्वेदबिन्दु तेरे कुचसमीपमें शोभित होतेहै और यहां उत्पेक्षा करतेहैं कि अघटितघटनासे उत्पन्न सन्तोषयुक्त कामदेवने मानो पुष्पवृष्टि की है यहां स्खेदरूप -सात्विकभावका विभाव हर्ष है ॥ अब रोमाञ्चका लक्षण कहते है विकारसमुत्थ" इत्यादिवाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि विकारसे उत्पन्न जो रोमोत्थान सो रोमाञ्च है। शीतसे उत्पन्न रोमोत्थानमें सात्त्विकपदव्यवहार नहीं होताहै सो होजायगा इससे विकारसमुत्थ पद दिया। इसके विभाव शीतादि हैं कि, इसका उदाहरण-"चकुलमुकुल" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है, युक्त ऐसी जो कुनभूमि उसमें मन्द हास करिकै सुन्दर जो यह कृष्ण सो " उससे (६१) चतुर्थः ४॥ भाषाटीकासहिता। गद्गदत्वप्रयोजकीभूतस्वरस्वभाववैजात्यं स्वरभंगः । अ- स्य विभावाः क्रोधभयहर्षमदाः। यथा- व्यक्तिः स्यात्स्वरभेदस्य कोपादुक्तिः क्रियेत चेत् । इति पत्युः पुरो राधा मौनमाधाय तिष्ठति ॥५॥ भावत्वे सति शरीरनिस्पन्दो वेपथुः । भावत्वे सतीति विशेषणदानात सूचकस्पन्दादी नाऽतिव्याप्तिः।शरीरपदं चेष्टाश्रयमात्रपरम्, तेन शरीरावयवकम्पे नाऽव्याप्तिः॥ कपोलसमीपभागको आज कैसे रोमाञ्चयुक्त करताहै यह कहनेका अभिप्राय यह है कि तेरा सौन्दर्यसारावलोकन करिके कृष्णके सात्त्विकभावीय रोमोद्गम हुआ । यहां साविकभावरूप जो रोमाञ्च उसका विभाव हर्ष है ॥ अब स्वरभंगका लक्षण करतेहैं । " गद्गदत्वे " इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि गद्गदताका प्रयोजक जो स्वरस्वभावका विलक्षणत्व सोही स्वरभंग है। अनुकरणमें भी स्वरस्वभाववैलक्षण्य है तहां अतिव्याप्तिवारणार्थ गद्गदत्वप्रयोजकी भूत यह विशेषण दिया। इसके विभाव क्रोधादिक हैं इसका उदाहरण-"व्यक्तिः स्यात" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि सखीके प्रति सखी कहती है कि याद कोप करिके मुझसे किश्चित् उक्ति कीजावे अर्थात् कोपसे मै कुछ कहूँ तो स्वरभंगकी अभिव्यक्ति अर्थात् प्रकाश होजायगा और उसका प्रकाश होनेसे कोपका प्रकाश होजायगा सो मत हो इस हेतुसे पतिके आगे राधा जो है सो मौनका आलम्बन करिके स्थित है। यहां साविकभाव जो स्वरभंग उसका विभाव क्रोध है । अब वेपथुका लक्षण कहतेह । "भावत्वे सति" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि भावत्व होतसन्तै जो शरीरकी क्रिया सो वेपथु है । यहां सत्यन्त विशे- षण न दे तो शकुनसूचक जो नेत्रादिकी क्रिया उसमें अतिव्याप्ति होगी इस हेतु सत्यन्त दिया। तो शकुनसूचक क्रियामें भावत्व नहीं है इस हेतु अतिव्याप्ति नहीं हुई क्योकि वह सूचक चेष्टा रसाउनुकूल नहीं है सो जानना । यहां शरीरपद चेष्टाश्रयमात्र पर है। मात्रपद देनेसे शरीर और शरीरावयव दोनोंका ग्रहण होताहै । जो शरीर पद अन्त्यावयविमात्रपर कहो अर्थात् सकलशरीरार्थक कहीं तो शरीरावयवकंप भी वेपथु कहाताहै तहां अव्याप्ति होगी, क्योंकि शरीरावयवका जो कंप है सो शरीरका कंप नहीं है, इस हेतु शरीरपद चेष्टाश्रयमात्रपर कहना। ऐसा हुआ तो शरीगवयवकंप भी शरीरकंप कहावैगा इस हेतु अव्याप्ति नहीं होगी।
- जानती हूं कि मेरी जो स्मृति है अर्थात् मेरे सदृश चंपकपुष्पोंको देखकारकै मेरी है सही मेरी सपत्नी है और नहीं है । सपत्नी है इसका अर्थ यह है कि मेरे (६२) रसतरंगिणी- ' [ तरग:- अस्य विभावा आलिंगनहर्षभीत्यादयः । यथा- कथय कथमुरोजदामहेतोर्यदुपतिरेष चिनोतु चम्पकानि । भवति करतले यदस्य कम्पः प्रियसखि ! मत्स्मृतिरेव मत्सपत्नी॥६॥ कोई पुस्तकमें 'शरीरावयवकंपे नाऽतिव्याप्तिः' ऐसा पाठ है उसके अनुसार वेपथुके लक्षणमें शरीर पद अन्त्यावयविपर है। इस पक्षमें सत्यन्त विशेषण नहीं दें तो अन्यथाआभासका हेतु और परप्रयोज्य जो आपका उत्क्षेपण वा अपक्षेपणरूप अवयविकर्म सोही हुआ सूचकस्पन्द वह भी शरीरकर्म है तो वहां आतिव्याप्ति होगी । इस हेतु भावत्वे सति यह विशेषण दिया । ऐसा हुआ तो मनोविकार- जन्यत्वप्रयुक्त जो भावत्व सो वहां नहीं है । इस हेतु अतिव्याप्ति नहीं होगी। इस पक्षमें शरीरशब्दका जो चेष्टाश्रय अर्थ किया तहां भी चेष्टाश्रय इसका चेष्टाश्रय अन्त्यावयवी यह अर्थ जानना। ऐसा कहनेसे शरीरावयवकंपमें अर्थात् हास्यभूत अधरस्पन्दमें अतिव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि यह अधरस्पन्द विकारसंभूत है तो भी शरीररूप जो अवयवी उसकी क्रिया नहीं है। प्रथम पक्षमें जो अतिव्याप्तिः ऐसाही पाठ होय तो उसकी इस प्रकार व्याख्या करनी चाहिये कि 'नातिव्याप्तिः' यह पाठ है तहां प्रकृत लक्षणका ऐसा आदिमें समझ लेना और अतिशब्दका अर्थ अतिक्रान्त है । व्याप्ति शब्दका अर्थ संबन्ध है तो यह अर्थ हुआ कि प्रकृत लक्ष- णकी व्याप्ति पर्यात संबन्ध अतिक्रान्त है अर्थात् शरीरावयवकंपमें नहीं रहै है । यह आतिव्याप्तिशब्दका अर्थ हुआ तो अतिव्याप्तिशब्दसे अव्याप्ति व पर्यवसन्न हुई । इस रीतिसे 'नातिव्याप्तिः' इस शब्दका यह अर्थ हुआ कि अव्याप्ति नहीं हुई तो प्रथमपक्षाऽनुसार होगया सो जानना। इसके विभाव आलिंगनादिक हैं। इसका उदाहरण-"कथय कथम्" इत्यादि इलोकसे कहते हैं । इलोकार्थ यह है कि हे प्रियसखि ! अर्थात् सुखदुःख कहनेका स्थानभूत ! यह अर्थात् अधिकता करिक सदा निकटवर्ती जो यदुपति अर्थात् कृष्ण हैं सो चंपक पुष्पोंको कुचोंके हारके अर्थ अर्थात् कुचोंकी सुन्दरतासाधन मालाके अर्थ किस प्रकार संग्रह करो यह कहा, यह कहनेसे श्रीकृष्णमें अपने अनुरागको आगे करिके अपनी स्मृति में सौतिकार्यका- रित्व दृढकरती हुई कविनिवडवक्री कृष्णाविषयकानुरागातिशयका कथन करती है कि जिस कारणसे कृष्णक करतलमें कप होता तिस कारणसे मैं यह जो .
चतुर्थः ४.] भाषाटीकासहिता। (६३) विकारप्रभवप्रकृतवर्णान्यथाभावो वैवर्ण्यम् । अस्य विभा- वा मोहभयकोधशीततापश्रमाः । यथा- कुकुटे कुर्वति काणमाननं श्लिष्टयोस्तयोः। दिवाकरकराकान्तशशिकान्तिमिवादधौ ॥७॥ विकारजनितमक्षिसलिलमश्रु । अस्य विभावा हर्षामर्ष- धूमभयशोकज़ुभाशीतनिनिमेषप्रेक्षणानि ॥ यथा- विसृजविसृज चित्त दुःखधारामयमुपकण्ठमुपागतो मुरारिः । इति कथयितुमचबिन्दुरक्ष्णोनिपतति वक्षसि पक्ष्मलायताक्ष्याः॥ इच्छितमे विघ्न करनेवाली है। यहां करतलमें जो कंप कहा सो करतलहीको पुष्पसंग्रहसाधनता है इस हेतु उसही को कंप दिखाया। यह दिखानेसे सपूर्ण शरीरका कंप सिद्ध नहीं हुआ। इस हेतु दोनों पक्षोमें उदाहरणता इस श्लोकको होगई। यहां कृष्णनिष्ठ जो वेपथु उसका विभाव हर्ष है सो जानना ।। अब वैवर्यका लक्षण कहते हैं । “विकारप्रभवे" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि विकारसे उत्पन्न जो प्रकृत वर्णका अन्यथाभाव अर्थात् वर्ण बदल जाना सो वैवर्ण्य है। जरावस्था वा आतप एतत्कृत जो वैवर्ण्य है तहां अतिव्याप्तिके वार- णके अर्थ विकारप्रभव यह विशेषण दिया इसका विभाव मोहभयादिक है इसका उदाहरण "कुक्कुट" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि रसभर. करिकै प्रभात समयका ज्ञान नहीं हुआ है जिनको ऐसे जो सम्यकप्रकार आलि- गनासक्त स्त्री पुरुष उनका जो मुख है उसके कुक्कुट जो है सो प्रभातकालिक अव्यक्त शब्द करतसन्तै सूर्य किरणोसे तिरस्कृत जो चन्द्रमा उसकी कान्तिको धारण करताभया । मानो यह उत्प्रेक्षा है। अभिप्राय यह है कि नायकनायिका- ओंकी उत्कण्ठापूर्ति नहीं होनेसे दोनोंका बल हीन होगया। यहां स्त्री पुरुषको जो वैवर्ण्य है उसका विभाव सन्ताप है । अब अश्रुका लक्षण कहते है "विकारजनित" इत्यादि वाक्पसे । वाक्यार्थ यह है कि विकारसे उत्पन्न जो नेत्रजल सो अश्रु है । धूम करिकै उत्पन्न जो अश्रु है उसमें अतिव्याप्ति मत हो इस हेतु विकारजनित यह पद दिया। इसके विभाव हष, क्रोध, धूम, भय, शोक, उकासी, शीत, विना निमेष झांकना ये हैं। इसका उदाहरण "विसृज" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि हे चित्त ! दुःखका जो प्रवाहं उसको त्यागकर यह जो मुरारि है सो समीपमें प्राप्त होग- निरोध है तोभी चेष्टासामान्यनिरोध नहीं है सो जानना और प्रकृत उदाहरणमें जो (६४) रसतरंगिणी- [ तरगः- शारीरत्वे सति चेष्टानिरोधः प्रलयः । शारीरत्वं सतीति विशेषणानिद्रादौ नातिव्याप्तिः । स्तम्भादयः शरीरधर्मा- स्तेषां साहचर्यकथनेन प्रलयोऽपि शरीरधर्म एव ॥ तेनाऽत्र चेष्टापदेन शरीरचेष्टेवाऽभिमता । मनसस्तु कर्म भवति, न तु चेष्टा । अत एव चेष्टाश्रयः शरीरमिति शास्त्रीयं लक्षणम् । अस्य विभावा रागौत्कण्ठ्या- दयः । यथा- याहै यह कहनेके अर्थ ही मानो सुन्दरपक्ष्मयुक्त और दीर्घ ऐसे हैं नेत्र जिसके ऐसी जो स्त्री उसके नेत्रद्वयका जो अश्रुजल है सो वक्षःस्थलमें पड़ताहै । यहां कामिनीनिष्ठ जो अश्रु उसका विभाव हर्ष है ॥ अंब प्रलयका लक्षण कहते हैं "शारीरत्वे सति" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि शरीरधर्म होत सन्तै जो चेष्टानिरोध अर्थात् चेष्टाकी अनुत्पत्तिका प्रयो- जक वस्तु सो प्रलय है । इस ही प्रलयको करना पाव और शैथिल्य इन दोनों शब्दोंसे भी कहतेहैं। यहां सत्यन्त न कहें तो निद्वामें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि निद्रा भी चेष्टानिरोधरूप है इस हेतु सत्यन्त पद दिया । तब निद्रामें अतिव्याप्ति नहीं होती है क्योंकि निद्रा आन्तर धर्म है, शरीरधर्म नहीं है सो जानना । अब यहां यह शंका होती है कि चेष्टा और क्रिया दोनोंके निरोधको जनानेवाला जो प्रलय पद है उस प्रलयपदका यत्किञ्चित् चेष्टानिरोध अर्थ कहोगे तो स्तंभमें भी यत्किञ्चित् चेष्टाका निरोध होताही है तो वहभी प्रलय कहावैगा । इस हेतु चेष्टा- सामान्यनिरोधको प्रलय कहो । ऐसा कहोगे तो प्रलयलक्षणमें असंभव होजायगा क्योंकि वक्ष्यमाण उदाहरणमें मनःक्रियाकी उत्पत्ति कही है इसलिये चेष्टासा- मान्यनिरोध नहीं रहा । इस शंकाका समाधान यह है कि स्तंभादिक शरीरधर्म हैं उनका साहचर्य प्रलयम भी कहाहै इससे प्रलयभी शरीरधर्म ही है । यह कह नेसे मनःक्रियानिरोधक जो मनोधर्म है सो प्रलय नहीं समझना क्योंकि वह धर्म शारीर नहीं है । जो प्रलय शरीरधर्म है, यह विवक्षित हुआ तो यहां चेष्टा पदसे शरीरचेष्टा ही अर्थात् हिताहितप्राप्तिपरिहारार्थ क्रिया हा अभिमत है उस ही क्रियाको निरोध प्रलय है सो जानना चाहिये । ऐसा हुआ तो पूर्व जो स्तंभमें अवि. न्याप्ति दोष कहा था वह नहीं रहा । क्योकि स्तंभमें यद्यपि यत्किञ्चित् क्रियाका - चतुर्थः ४.] भाषाटीकासहिता। (६५) नो वत्रं नमितं धुतं न च शिरों व्यावर्तितं नो वपु- सो न श्लथमाहृतं निगदितं नो वा निषेधाक्षरम् । शोणं नाऽपि विलोचनं विरचितं क्रीडाकलाकातरं चेतः केवलमानने मधुरिपोर्व्यापारितं राधया ॥ ९॥ असंभव दोष कहा वह भी अब नहीं होताहै । क्योंकि वहां मनःक्रियाकी उत्पत्ति कहा है तो भी वह क्रिया शारीरचेष्टा नहीं है इस हेतु शारीरचेष्टानिरोध वहां रहेगा, इस हेतु असंभव नहीं होगा सो जानना । कदाचित् कहो कि चेष्टाशब्द तो क्रियामात्रार्थक है तब हिताहितप्रातिपरिहारार्था क्रिया उसका अर्थ करोगे तो निहतार्थता दोष होगा। यह शंका नहीं कहनी चाहिये, क्योंकि शास्त्रमें जहां शरीरलक्षण हैतहां चेष्टाश्रय शरीर है यह कहाहै। यह लक्षण शरीरका तबही युक्त होगा कि हिता- हितेत्यादि अर्थ चेष्टाका कहोगे । सामान्यतः क्रियाश्रय कहोगे तो घटपदादिमें भी क्रिया होती है तो घट पट भी शरीर कहावेंगे इस हेतु उक्तही अर्थ चेष्टाशब्दका है तो निहतार्थ दोष नहीं होसकताहै सो जानना । 'स्तंभादयः शरीरधर्माः'.यहांसे आरंभ करिके 'शास्त्रीयं लक्षणं' यहां पर्यन्तकी व्याख्या यह जाननी । इसके विभाव अनुराग और उत्कण्ठा इत्यादि है सो जानना । इसका उदाहरण "नो वक्रं. नमितम्" इत्यादि श्लोकसे कहते है। श्लोकार्थ यह है कि मानके माधिक्यसे अधिक कियागया जो विप्रलंभ उससे मिलित जो दुःसह ज्वर उससे खिन्न ऐसी और शठताज्ञानकरिके एकत्रीकृत जो रोषप्रकर्ष उसके आग्रहसे युक्त ऐसी भी होकरिके अवितर्कित जो तत्कालप्राप्त दुर्घट समागम उससे संजात उत्कण्ठाभरसे चञ्चल अन्तःकरण है जिसका ऐसी नायिकाने (कान्तमुखाऽनवलोकनस्पृहाक संवन्धसे युक्त है तो भी) मुखको नम्र नहीं किया और (नायकने जब विबु- कग्रहण किया तब निषेध करनेके अर्थ ) मस्तक नहीं कॅपाया। और (नाय- कने अत्यन्त आश्लेष किया तब ) शरीर उलटा नहीं किया । और पतित वस्त्र अपर धारण नहीं किया । और (नायकने वस्त्रका स्पर्श किया तब) निषेधाक्षर नहीं कहा। और नेत्र भी रक्त नहीं किया (क्योंकि जो दुःख-भोक्तव्य है सो तो मुक्त होगया अब इसके आगे रोषसे क्या प्रयोजन यह मान करिके) किन्तु क्रीडाविशेषमें दुःखी जो अन्तःकरण सोही मधुरिपु जो कृष्ण अर्थात् दुःखाहरण- शील उनके मुखमे दीनतारूप व्यापारसे युक्त किया। अभिप्राय यह है कि संपूर्ण शरीरचेष्टाका निरोध होगया । एक मनमें ही दीनतारूप व्यापार हुआ तो प्रलय- लक्षणसमन्वय सुकरही है विभाव उसका उत्कण्ठा है सो जानना ॥ -- ६६) रसतरंगिणी- [तरंग:- जृम्भा च नवमः सात्त्विको भाव इति प्रतिभाति । अब यहां यह विचार करते हैं कि जूभाकोभी रसाऽनुकूलता है और विकाररूपता है इस हेतु नवम सात्विक भाव कहना युक्त है। यहां यह शंका होती है कि लज्जासे उत्पन्न जो अङ्गसंकोच उसको भी सात्विकभाव कहना चाहिये । इसका समाधान यह है कि लज्जा आदिका नहीं व्यञ्जित करनेवाला जो अंगसंकोच सो रसाऽननुगुण है और मायुक्तावकारत्व भी उसमें बाधित है इससे वह सात्त्विक भाव नहीं है । फिर यह शंका हुई कि ज़ुभाभी स्वतः सुन्दर नहीं है तो उसको भी सात्विक भाव नहीं कहना चाहिये । इसका समाधान यह है कि प्रामाणिक पुरु- घने जृम्भाको सात्तिकभाव कहाहै । यद्यपि पवनसे उत्पन्न जृम्भाको सात्तिक भावत्व नही भी है तो भी विकारसम्भूत जृम्भाको सात्त्विकभावत्व है ही। जिस प्रकार धूमसंभूत अश्रुको सात्तिकभावत्व नहीं भी है तो भी विकारसंभूत अश्रुको सात्त्विक भावत्व हैही इसही अभिप्रायसे "जृम्भा च" इत्यादि वाक्य कहते हैं। वाक्यार्थ यह है कि ज़ुभाभी नवम सात्त्विकभाव है यह दीखता है। यहां ज़ुभाशब्दका अर्थ वायुपरिपोष जानना । यहां यह शंका होती है कि जिस युक्तिसे ज़ुभाको सात्त्विक भाव कहतेहो उस युक्तिसे ही निःश्वास भी दशम सात्त्विक भाव कहना उचित है। इसका समाधान यह है कि मुखसे आर्पिभूत जो वायुपरिपोष सो तो जृम्भा और नासिकासे आविर्भूत जो वायुपरिपोष सो निःश्वास है । ऐसा हुआ तो जृम्भाका उपादान करिके जो साविकभावका विभाग करे तव तो निश्वास- को दशम सात्विक भाव कहना युक्त ही है । और यदि वायुपरिपोषका उपादान करिके विभाग करे तब नव ही भेद होंगे, क्योंकि वायुपरिपोषसे जृम्भा और निःश्वास दोनों का संग्रह होजायगा इससे नवही सात्त्विक भाव कहना योग्य है। इसही हेतु जृम्भा निश्वास के साधारण्यसे नवम सात्त्विकभावता प्राप्त होनेके अर्थ दोनोंमें प्राप्त जो अनौज्ज्वल्प उसका बोध'जो आलस्यपद उसको “भेदो वाचि शोर्जलं कुचतटे स्वेदः प्रकम्पोऽधरे पाण्डुगण्डतटी वपुः पुलकितं लीनं मनस्ति- श्रुति । आलस्यं नयनश्रियश्चरणयोः स्तंभः समुज्जृम्भते तत्कि राजपथे निजाम- धरणीपालोऽप्रमालोकितः ॥ इस रसमञ्जरीके श्लोकमें जृम्भाके स्थानमें कहा है जो जृम्भाहीमात्र कहना होता तो 'जृम्भावक्रसरोरुहे' ऐसा ही कहते स कहा नहीं इनसे वायुपरिपोष कहकरिके दोनोंको ही सात्त्विकता इष्ट है; यह दीखता है। ऐसा हुआ तो इसही युक्तिमे स्वेद अश्रु इन दोनोंको भी सलिलोद्गमशब्दसे कहमकते है इस हेतु इन दोनोंका एक ही विभाग होजायगा। यह बात यद्यपि सत्य शपि गणना जो है सो पुरुषको इच्छानुसार होसकती है इस हेतु यह दोष है चतुर्थः ४.] भाषाटीकासहिता। (६७) ऊर्जनाननसुल्सत्कुचयुगं स्विद्यत्कपोलस्थल कुञ्चत्पक्ष्म गलहूकूलमुदयन्नाभि भ्रमद्भूलतम् । बालापांगुलिबद्धबाहुपरिधिन्यञ्चद्विवृत्तत्रिकं युट्यत्कञ्चुकसन्धिदर्शितलसद्दोर्मूलमुज्जृम्भते ॥१०॥ ही कहना चाहिये । अब जृम्भा नवम सात्विक भाव है इसमें प्राचीनसंमति भी खाते हैं "ऊर्जन्नाननम्" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि वाला जो है उज्जृम्भित होती है अर्थात् उबासी लेरही है । उबासीलेनेका प्रकार क्रियाविशे- णकी रीतिसे कहते हैं। 'ऊर्जनाननम्' अर्थात् अधिक श्वासयुक्त है मुख जिस कयाम जैसे होय तैसे और अतिशय उच्चताको प्राप्त और प्रकाशमान ऐसा है तनद्वय जिस क्रियामें जैसे होय तैसे । और स्वेदजालयुक्त है कपोल जिस क्रियामें से होय तैसे ( यह कहनेसे जृम्भाको स्वेदनरूप सात्तिकभावके साथ साहचर्य महागया) और मिलित है नेत्रपत्र जिस क्रियामें जैसे होय तैसे । और पतित होता है नीवीवन्ध जिस क्रिया जैसे होय तैसे और ऊपरको गमन करती है गामि जिस क्रियामें जैसे होय तैसे और भ्रमित होती है भू जिस क्रियामें जैसे होय से और अगुलीके अग्रभागसे वांधा है बाहुपरिवेष जिस क्रियामें जैसे होय से (परिवेष कहनेसे मुखको चन्द्रत्व ध्वनित किया ) और नीचा होताहै पृष्ठवं- सका अधोभाग जिस क्रियामें जैसे होय तैसे और टूटी है कंचुकीकी सन्धि जेस क्रिया में जैसे होय तैसे दर्शित अर्थात् कामुकलोचनातिथीकृत और बत प्रकाशयुक्त दोर्मूल अर्थात् कक्षाप्रदेश है जिस क्रियामें जैसे होय तैसे । इस श्लोकमें जृम्भाको साविकभावके साथ देखते हैं । और शृंगारतिलक ग्रन्थमें भी जृम्भाको सात्त्विकभाव सामानाधिकरण्य देखते है । तहां यह श्लोक है कि सत्य सन्ति गृहे गृहे प्रणयिनो येषां भुजालिंगनव्यापारोच्छलदच्छमोहनजला १ सत्यं सन्तीत्यादि श्लोकका अर्थ यह है कि वह जो प्रणयी अर्थात् प्रेमपात्रभूत पुरुष सो परघरमे है यह बात सत्य है। वह कौन जिन प्रणयाओं के बाहुद्वयकरिकै जो आलिगनव्यापार उस न्यापारसे उच्छलत् अर्थात् बहुत होकरिकै गमन करता हुआ। और अच्छ अर्थात् स्वभावसुन्दर जो मोहनजल अर्थात् निधुवनसम्बन्धी निस्पन्द वह है जिनको ऐसी स्त्रियां होती है । और यह अर्थात् उद्दिष्ट जो कोई प्रिय अर्थात अनिर्वचनीयलावण्यरूप सो तो अलौकिकही सम्भावनाविषय है। वह प्रिय कैसा है कि यह प्रिय दृष्टिगोचर होत सन्ते ही हमारा शरीर स्वेद और जृम्भा और कंप अरा मावस अर्थात् दुष्प्रापतासभावनासम्भूत भय इत्यादि समुदाय करिकै कोई अर्थात् अनिर्वचनीय अवस्थाको नियत अर्थात् अवश्य ही प्राप्त होजाता है ।
या विकार नहीं है किन्तु शरीरचेष्टा है। यह बात प्रत्यक्षसिद्ध है क्योंकि रोमाञ्चादिकमें सात्त्विकमावत्व और अनुभावत्व दोनों देखते हैं इससे इन दोनोंको दिको भी भाव कहना चाहिये। इस शंकाका यह समाधान है कि अंगाकृष्टि मोर नेत्रमर्दनादि जो हैं तिनमें भावलक्षण नहीं रहता है। इससे वे भाव नहीं कहाते हैं ज्योकि रसके अनुकूल जो विकार सो भावलक्षण कहा है। ऐसा हुआ तो अंगा. (६८) रसतरंगिणी- [तरंगः- इत्यादौ शृङ्गारतिलकादौ च सात्त्विकभावसामानाधिकर- ण्यदर्शनात् । ननु सा भावाऽनुभाव इति विपरीतमेव किं न स्यादिति वाच्यम्, सत्यनुभावत्वे भावत्वविरोधाद पुलकादीनां तथा दृष्टत्वात्। जायन्त एणीदृशः । प्रेयान् कोऽप्यपरोऽयमत्र नियतं दृष्टेऽपि यस्मिन्वपुः खेदो जृम्भणकम्पसाध्वसमुखैः प्रामोति काञ्चिदशाम् ॥" इस श्लोकमें स्वेद और उज्न- म्भण और कम्प ये तीन कहे हैं तहां कम्प तो वेपथुका पर्याय है और स्वेद और कंप इनके मध्यमें उजृम्भण कहा इससे साविकभावसम्पुटित जृम्भाका निर्देश यहां इस हेतु सात्त्विकभावमध्यपतित जो है उसका सात्विकभाव ग्रहणसे ग्रहण होता? (तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते' इस न्यायसे ) ऐसा हुआ तो जृम्भाको सात्विक भावता श्रृंगारतिलककर्ताको भी अभिमत है सो जानना ।अब जम्भाको अनुभावमें अन्तर्भूत करना चाहिये यह शंका "नतु" इत्यादिवाक्यसे कहते हैं ।वाक्पार्थ यह है कि यह जृम्भा सात्त्विकभाव है अथवा अनुभाव है इसमें कोई विनिगमक नहीता अनुभावही इसको मानना। और जहां न च सा भावानुभाव' इत्यादि पाठान्तर, तहां यह व्याख्या जाननी कि वह भा सामान्यरातिसे भावका अनुभाव अथवा सात्त्विकभावका अनुभाव है । इस प्रकार विपरीत ही क्यों नहीं करते हो! इसका समाधान यह है कि अनुभाव माननेसे भी सात्त्विकभाव मानने कोई प्रति- बन्धक नहीं है यही बात 'सत्यम्' इत्यादि वाक्यसे कही है। यहां फिर शंका होती है कि विरुद्ध जो दो वस्तु उनका एक स्थानमें समावेश नहीं होता है इस हेतु सात्त्विकभावत्व और अनुभावत्व इन दोनों से एकका बाध अवश्य कहना होगा । जव भरतवाक्यको प्रमाण मान कारके आठही सात्विक भाव मानना जृम्भाको अनुभाव ही मानना सोही युक्त है। इसका समाधान यह है कि विरोध नहीं है, सो जानना ॥ अब कोई भ्रान्त यह शंका करते है कि अंगका संकोच और नेत्रमर्दन इत्या चतुर्यः १.] भाषाटीकासहिता। न चांगाकृष्टिनेत्रमर्दनादीनामपि भावत्वापत्तिः । तेषां भावलक्षणाभावात् । रसाऽनुकूलो विकारो भाव इति हि तल्लक्षणम् । अंगाकृष्ट्यादयो हि न विकाराः। किन्तु शरीरचेष्टाः। प्रत्यक्षसिद्धमेतत् । अंगाकृष्टिरक्षिमर्दनं च पुरुषरिच्छया विधीयते परित्यज्यते च । जुम्भाच विका- रादेवभवति तनिवृत्तौ निवर्तते चेति । यथा- आधाय मौन रहसि स्थितायाः सम्भाव्य जृम्भामचलात्मजाया। बुटत्कृति स्मेरमुखो महेशः करांगुलीभिः कलयाञ्चकार ॥ ११॥ इति श्रीभानुदत्तमिश्रविरचितायां रसत्तरंगिण्यां सात्त्विकभावनिरूपणं नाम चतुर्थस्तरंगः ॥४॥ अंगाकृष्टि और नेत्रमर्दन पुरुष इच्छासे करते है और त्याग करदेते हैं इससे में विकार नहीं है। और जृम्भा तो विकारसे ही होताहै और विकारकी निवृत्तिमें निवृत्त होजाताहै, इससे जृम्भाको साविकभाव कहना. युक्त है, अंगाकृष्टयादिको कहना युक्त नहीं सो जानना । इस जृम्भाका उदाहरण-"आधाय इत्यादि लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि महादेव जो हैं सो मानको धारण करके एकान्तमे स्थित जो पार्वती उसकी जृम्भाको निश्चय करिके (उसही जृम्भारूप हेतुकरिके मानका दूर करना सुसाध्य है इस ज्ञानसे) हॅसतेहुए ऐसे हाथकी अंगु- लियोंसे चुटत्कृति अर्थात् चुटत् यह अनुकरण है जिसका उस शब्दको करतेभये अर्थात् मान उडकरके गया इस हेतुसे हँसते हैं। इति श्रीरसतरङ्गिणीभाषाठीकाया सात्त्विकभावनिरूपण नाम चतुर्थस्तरङ्गः ॥४॥ १ जाटुवनिमिति पाठान्तरम् ।
समाख्यातास्तु नामतः-इति पाठान्तरम्। कथित है लक्षणसे कथित नहीं है । और पाठान्तरमें ये तेतीस भाव रसताको चारिपदप्रवृत्तिनिमित्त जो व्यभिचारित्व सो शारीरमानसविकारसाधारण अर्थात् दोनोमें है इस हेतु दोनोंको लक्ष्यता युक्त है इस ही अभिप्रायसे (७०) रसतरंगिणी- [तरंगा पञ्चमस्तरंगः ५. अथ व्यभिचारिभावा निरूप्यन्ते । तत्र भरत:- निर्वेदग्लानिशंकाख्यास्तथासूया मदः श्रमः। आलस्यं चैव दैन्यं च चिन्ता मोहः स्मृतितिः॥१॥ व्रीडा चपलता हर्ष आवेगो जडता तथा। गर्यो विषाद औत्सुक्यं निद्राऽपस्मार एव च ॥२॥ सुप्तिर्विबोधोऽमर्षश्चाऽप्यवहित्थमथोग्रता । मतियाधिस्तथोन्मादस्तथा मरणमेव च ॥३॥ त्रासश्चैव वितर्कश्च विज्ञेया व्यभिचारिणः । त्रयस्त्रिंशदमी भावाः प्रयान्ति रसताममी ॥४॥ अब प्रसंगसंगतिसे अथवा अवसरसंगतिसे व्यभिचारिभावनिरूपणकी प्रतिज्ञा करते हैं "अथ" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि सात्त्विक भाव: निरूपणानन्तर व्यभिचारिभाव निरूपित कियेजातेहै । इन व्यभिचारिभावों को मानसत्व होतसन्तें स्थायिभावप्रकारक आरोपविशेष्यीभूत भावत्वरूप लक्षणसे लक्षितत्व जो है सोही पृथक् निरूषणमें बीज है इस हेतु व्यभिचारिभावोंका विभाग करतेहैं "तत्र भरत" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि निर्वेदादि ए तेतीस भाव व्यभिचारिपदवाच्य है सो जानना । ये तेतीस व्यभिचारीनामसे माम होते है यह व्याख्या जाननी चाहिये । यहां यह विचार होताहै कि व्यभि- है - पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (७१) इतस्ततो रसेषु संचारित्वमनेकरसनिष्ठत्वमनेकरसव्याप्यत्वं व्यभिचारित्वम् । न च रोमाञ्चादावतिव्याप्तिस्तेषामपि संग्राह्यत्वात् । ते च भावाः शारीरा व्यभिचारिण एते त्वान्तरा व्यरिचारिण इयान्विशेषः । ननु निर्वेदादेः स्थायित्वं व्यभिचारित्वं च कथमिति चेन, रसपर्यन्तस्था- यित्वमितस्ततोगामित्वञ्चोपाधिभेदमादायोभयसम्भवात् । सामान्य लक्षण करतेहै "इतस्ततः” इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि इतस्ततः अर्थात् काव्यनाट्यादिरूप अनियत कारणसे सहृदयके प्रविष्ट हृदयमें और रसचळमाण होत सन्तें सञ्चारी अर्थात् चय॑माण भावत्व जो है सो ही व्यभिचारि लक्षण है। ऐसा हुआ तो मानसत्वभावको त्यागकरिकै स्थायिभावप्रकारक आरोपविशेषी भूतभावत्व उभयसाधारण लक्षण कहा सो जानना । यहां फिर यह विचार हुआ कि व्यभिचारिपद प्रवृत्तिनिमित्त जो है सो शारीर और मानस दोनों में रहता होय तवही दोनोंको लक्ष्यता कहना युक्त है इसही हेतुसे व्यभिचा- रिपदप्रवृत्तिको उभयसाधारणता दिखाते है "अनेकरसनिष्ठत्वम्' इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि अनेकरसोंमें निष्ठा अर्थात् पोष्यपोषकभावरूप है सम्बन्ध जिनका सो कहिये अनेकरसनिष्ठस जो है सोई व्यभिचारिपदप्रवृत्ति- निमित्त है सो उभयसाधारण है । फिर यह विचार भया कि पोष्यपोषकभावरूप सम्बंध रसका केवल इनहीकोनही है यही कहने के निमित्त व्यभिचारिपप्रवृत्तिनिमित्त दिखाते है "अनेकरसव्याप्यत्वम्' इस ग्रन्थसे। इसका यह अर्थ है कि अनेक जो रस उनकी जो चर्वणा अर्थात् वारंवार अनुसन्धान उसकी व्याप्य जो सामग्री ताम निष्ठत्व यही व्यभिचारिपदप्रवृत्तिनिमित्त है। यह शारीर और मानस दोनाम रहता है इस हेतु यह प्रवृत्तिनिमित्त हो सकेगा। इस लक्षणमें भी कहीं विभावादिम अति- व्याप्ति वारणार्थ भावत्वविशेषण देना सो जानना । अभिप्रायको नही जाननेवाले पुरुष शंका करते हैं कि ऐसा व्यभिचारिभावका लक्षण कहोगे तो रोमाश्चादिमे अतिव्याप्ति होगी क्योंकि यह लक्षण वहां भी प्राप्त है। इसका समाधान आश- यको प्रकट करिकै कहते हैं "तेषाम्" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि रोमांचादिकभी संग्राह्य ह अर्थात् व्यभिचारिलक्षणके लक्ष्यही हैं। इतना विशेष जानना चाहिये कि इन संपूर्ण व्यभिचारिभावोंका जो लक्षण है और लक्ष्य है तहां शारीरत्व और मानसत्व इन विशेषणोंसे भेद करदेना । अभिप्राय यह है कि शारीर जो व्यभिचारिभाव हैं उनके लक्षण और लक्ष्य में शारीरत्व विशेषण देदेना। और आन्तर जो व्यभिचारी है उनके लक्षणमें और लक्ष्यमे आन्तरत्व विशेषण 8 - ग्रहण कियाजाता है और मुनिकेप्रति तो यह शंका करना सर्वथाही अनुचित' ह। व्यभिचारभावके व्यञ्जनमें विभाव अनुभाव दोहीकी सहायता जानना। एक व्यभिचारिभावके व्यञ्जनमें दूसरे व्यभिचारिभावकी अपेक्षा नहीं इस न निर्वेदका विभाव अनुभाव दिखाते हैं । "तत्र' इत्यादि वाक्यसे । (७२) रसतरंगिणी- [तरग:- स्वावनानं,निर्वेदः संसारे हेयत्वबुद्धिा निर्वेदः। तत्र निभा- वास्तत्त्वज्ञानापदीर्षादयः । अनुभावाः स्वेदप्रकाशचिन्ता- श्रुपातादयः । यथा- देदेना। और शारीर सात्त्विकभावका जो अवान्तर भेद अर्थात् स्तंभावेदादि भेद हैं उनके लक्षणमें और लक्ष्य में शारीरत्व विशेषण देदेना । और आन्तर व्यभिचारीका जो अवान्तर भेद है निवेदादि उसके लक्षण- लक्ष्यमें मानसत्व विशेषण देदेना, सो जानना। यहां यह शंका होती है कि निर्वेद अथवा अमर्ष अथवा त्रास इनको स्थायित्व और व्यभिचारित्व दोनों कहना किस प्रकार बनेगा? क्योंकि स्थायित्व और व्यभिः चारित्व ये दोनों विरुद्ध हैं। क्योकि भावविशेष्यक आरोपप्रकारत्व तो स्थायित्व है और स्थायिभावारोपविशेषभावत्व व्यभिचारित्व है। ऐसा हुआ तो विचार करकै देखो कि एक वस्तुमें विशेष्यत्व और प्रकारत्व दोनों नहीं रह सकते हैं । इसका समाधान यह है कि श्रृंगार रसका रथायिभाव जो रति सो करुण रसका व्यभि. चारिभाव भी होताहै। तो अब देखो रसपर्यन्त स्थायित्व होनेसे श्रृंगार रसका स्थायित्व रतिम है। और इतस्ततोगामित्वरूप जो व्यभिचारित्व सो भी करुण- रसका रतिमें है। यह बात दृष्ट है इस हेतु निर्वेदादिमें स्थायित्व और व्यभिचारित दोनों होनेसे विरोध नहीं जानना चाहिये । फिर यह शंका होती है कि जो रति व्यभिचारिभाव है, तो निर्वेदादि व्यभिचारिभावोंकी गणनामें रतिकी गणना नहीं की तो न्यूनता होगई। गणना किये तिनाभी जो रतिमें व्यभिचारित्व मानो तो जिस प्रकार शान्त रस मानते हैं, तिसही प्रकार पुत्रादिविषयकरतिरूप स्थायि- भावसंबंधी वात्सल्याख्य रसान्तभी मानना होगा इसका प्रत्याख्यान नहीं बनेगा। इसका समाधान यह है कि रतिकी स्थायिभावमें गणना की ताकरिकैही रतिकी व्यभिचारिभावभी गणना होगई जिस प्रकार पभिचारिभावमे निवेदकी गणना कारिकै स्थायिभावमें भो निर्वेदकी गणना होजाती है। इससे न्यूनता दोष नहीं रहेगा सो ज नना। यहां यह शंका कोई करें कि रतिकी तो व्यभिचारिभावमें गणना करदेते और निर्वेदकी स्थायिभावमे गणना करदेते। ऐसा भी करने में मुनिका सामर्थ्य थाही फिर ऐसाही क्यों नहीं किया । यह शंका करना समीचीन नहीं। गणना करनेवालेकी इच्छा इसमें नियामक है। यहां अशोकवनितान्याय पञ्चम-९.] भाषाटीकासहिता। (७३) क्षोणीपर्यटनं श्रमाय विहितं वादाय विद्यार्जिता मानध्वंसनहेतवे परिचितास्तेते धराधीश्वराः॥ विश्लेषाय सरोजसुन्दरदृशामास्ये कृता दृष्टयः कुज्ञानेन मया प्रयागनगरे नाऽऽराधि नारायणः ॥५॥ तत्र यह जो पद है सो षष्ठ्यर्थ में सप्तम्यन्त जानना तो यह अर्थ हुआ कि निवेदरूप व्यभिचारिभावके विभाव तो तत्त्वज्ञान और आपत्ति कि अर्थात् गृहकलहादि और ईर्षा आदि हैं। और अनुभाव स्वेद और प्रकाश और अश्रुपातादि हैं । तहां आपका जो अवमानन अर्थात् अवज्ञा (किं जीवनेन इत्याकारा) अथवा संसारमै जो हेयताबुद्धि अर्थात् यहे संसार असारही है इसमें प्रवृत्ति होनेसे क्या ? इत्याकारक सो निर्वेद है। यहां यह रहस्य जानना कि कोई व्यभिचारिभाव आपकी सामग्रीसे व्यंग्यताको प्राप्त होकरिके प्रधानताको प्राप्त होजाय तहां मध्यमे और व्यभिचारिभावका अल्पसामग्रीसे व्यञ्जन होकरिके प्रधानभूत व्यभिचारिभावका अंग होने में कुछ निषेध नहीं है, जिस प्रकार गर्व जहां प्रधान होगा तहां अमर्षके गुणीभाव होने में कोई दोष नहीं है। यहां ऐसी शंका कदाचित् कोई करै कि ऐसा जहां काव्य होगा तहां उस काव्यमें गुणीभूत- व्यंग्यत्वकी आपत्ति होगी क्योकि उसकाव्यमें व्यभिचारिभाव गुणीभूत होकरिके व्यंग्य हुआ है । तो इस शंकाका यह समाधान है कि गुणीभूत व्यंग्यका यह अर्थ है कि गुणीभूत अर्थात् भावान्तरका अंगभूत व्यंग्य अर्थात् उपात्त विभावाऽनुभा- बोंसे अभिव्यश्चित चर्वण विषयीभूत होय जहां सो कहिये गुणीभूतव्यंग्य ऐसा हुआ तो जहां मध्यमे गुणीभूत होकरिके व्यभिचारिभाव व्यंग्य हुआ है तहां गुणीभूत- व्यभिवारिभावका विभाव अनुभाव पृथक् उपात्त नहीं है इससे वह काव्य गुणीभूत- व्यंग्य नहीं होगा सो जानना । निर्वेदादिका विभावमी निमित्त कारणमात्र जानना रसवत् आलम्बन उद्दीपनकी अपेक्षा नहीं। यदि कोई स्थानमें आलम्बन उद्दी- पनरूपभो कारण होजाय तो कोई विद्वेष नहीं है सो जानना । अब इसका उदा. हरण "क्षोणीपर्यटनम्" इत्यादि श्लोकसे कहते । इलोकार्थ यह है कि कुज्ञान अर्थात् मोहमूलकभ्रमयुक्त ऐसा मैंने जो नानादेशमें भ्रमण किया मो भ्रमण होगया तोभी अभिलषितार्थकी वासना पूर्ण नहीं हुई इससे श्रमके निमित्तही किया। अभिप्राय यह है कि जितना भ्रमण किया तितनी तृष्णा बढतीही गई और विद्या अर्थात् तर्कतन्त्रादि जो है सो कथाके अर्थ अर्जित किये अर्थात - १ विदुषामिति पाठान्तरम् ।
वयादिकृत दुःखविशेष ग्लानि है । यहां प्रथमपक्षमें ग्लानि वस्तु शरीरधर्म होजा. जो द्वितीय पक्षही समीचीन है तो प्रथमपक्षकी उक्ति असंबद्धप्रलाप होजायगा। इसका समाधान यह है कि निर्बलता कहनेसे बलहानिके सामानाधिकरण्यके मत्यायनकरिके बलसमानाधिकरणश्रमकापार्थक्य 'समर्थनके अर्थ प्रथम पक्ष भार्यक है सो जानना । ग्लानिका विभाव रतिसे श्रम और तृषा और क्षुधा (७४) रसतरंगिणी- [ तरगः ग्लानिनिर्बलता निःसहता वा । तत्र विभावा रत्याया- सतृक्षुधादयः। अनुभावा निर्व्यापारदृग्भ्रमादयः। यथा- दृढ अभ्यास किया। अभिप्राय यह है कि हमारी विद्यासे किसीका उपकार नहीं हुआ। और वह वह अर्थात् अहंकार करिके अनादर कियाहै सम्पूर्ण संसारका जिनने ऐसे जो धराधीश्वर अर्थात् राजा सो मानके नाशनिमित्त अर्थात् अपमा नके निमित्त परिचित अर्थात् अनुसृत किये । अभिप्राय यह है कि उन राजा- ओंको गुणग्राहक पण्डितकी संगति नहीं थी। और पद्मवत् मनोहर है नेत्र जिनके ऐसी जो स्त्री उनके मुखपर जो दृष्टि की अर्थात् साभिलाष उनको देख सो विश्लेष अर्थात वियोगसे उत्पन्न दुःखके अनुभव के निमित्त की । अभिप्राय है कि सदा संभोगोत्कण्ठाही रही परन्तु प्रयागनगरमें नारायणका आराधन नहीं किया। नाना कर्म करिके क्लेशयुक्त जो कुटुम्बनायक उसकी उक्ति यह श्लोक है सो जानना। यहां आपदादिसे विभावित और चिन्तादिसे अनुभावित जो निर्वेद सो चर्वणा विश्रामस्थान है इस हेतु यह भावकाव्य कहाताहै सो जानना। और जहां रसकाव्य है तहां भावकी प्रतीति होनेपरभी स्थायिभावही चर्वणाका विश्राम होताहै क्योंकि वहां भावका आपके असाधारणरूपसे प्रकाश नही होताहै। यह बात स्मरण रखना चाहिये । और जहां आपके असाधारणरूपसेभी अलंका- रादिका अंग होकरिके भाव प्रतीत होताहै तहां भी यह भाव भावपदकारके व्यवहार- योग्य नहीं है किन्तु अलंकारकाव्यही है जिस प्रकार "यातु प्राधुणिको निजां तृणकुटी गन्ताध्वगं दण्डबच्चेतस्त्वत्परिपालितां दिशमिमां चीनांशुवद्धावति । श्रीम- च्छासनसेविभिः कतिपयैः सूत्रविणैरपि स्वीयैर्यन्त्रितमध्वगैरिदमिव स्वास्थ्य तदालम्बताम्'' यहां पूर्णोपमा अलंकार मुख्य है । प्रभुविषयक रतिभाव अप्र- धान है सो जानना ॥ अब ग्लानिका लक्षण करते हैं "ग्लानिः" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि निर्बलता अर्थात् धातुपाटवाभाव अनिसहता अर्थात् व्याध्यादिप्रभूत ताहै आन्तर नही कहावैगा इस हेतु दूसरा पक्ष कहा। यहां यह शङ्का हुई कि पचमा १.] भाषांटीकासहिता। (७५) व्याहतु पुनरीक्षणाय न गिरः कण्ठादहिनिःसृताः शेषाश्लेषविधि विधातुमपि वा नैवोन्नता दोर्लेता। प्रातस्तल्पमपास्य गच्छति हरौ चण्डांशुचण्डातप- क्लिष्टश्लिष्टकुरंगभंगुररुचस्तस्याः स्थिता दृष्टयः॥६॥ उत्कटकोटिकानिष्टप्रतिसंधानमिष्टहानिविचारो वा शंका। तत्र दुर्नयपरक्रौर्यादयो विभावाः । अनुभावाः कम्पकिया- प्रच्छादनादयः। यथा- एते चित्तविलोचना गुरुजना जिह्वाग्रदोषाः खलाः पौराः क्रूरवचःप्रपञ्चयशसः श्वश्रूश्च चक्षुःश्रवाः । इत्यादि जानना । अनुभाव विवर्णता और शिथिलता और नेत्रका भ्रमण इत्यादि जानना । इसका उदाहरण "व्याहर्तुम्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि श्रीकृष्ण जो है सो प्रातः कालमें शयनको छोडकरिके जातसन्तै उस राधाका वचन' जो है सो फिर दर्शन देनेके अर्थ प्रार्थना करनेको कण्ठसे बाहर नहीं निकला और उस राधाकी बाहुलताभी शेषाश्लेषविधि अर्थात संम्भोगका अंग पारितोषिक आलिंगन करनेको उची नहीं हुई किन्तु दृष्टि जे हैं ते सूर्य के उग्र तापसे जो उष्ण उससे क्लिष्ट अर्थात् पराहत ऐसाजो लिष्टकुरंग अर्थात् चन्द्रमा उसकीनाई भंगुर अर्थात् भंगशील है कान्ति जिसकी ऐसी होती भई। यहां रत्या- याससे विभावित और वैवादिसे अनुभावित जो ग्लानि सो चर्वणाका विश्रा- मस्थान है । अब शंकाका लक्षण करते हैं "उत्कट" इत्यादि वाक्यसे। वाक्यार्य यह है कि उत्कटकोटिक जो अनिष्टप्रतिसन्धान अथवा इष्टहानिका विचार सो शंका है। यहां इष्ट हानिभी अनिष्टान्तर्गतही है तो द्वितीय पक्षभी प्रथम पक्षमें ही अन्तर्गत होगया फिर यहां वाशब्द जो दिया है सो संगृहीतके विवेकार्थ है सो जानना। इसही हेतु विभाव और अनुभावभी यथायोग्य दिखाते है "त" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि शंकाके दुनीति और परक्रूरता इत्यादि विभाव हैं और कंप और क्रियाका ढकना इत्यादि अनुभाव हैं। तो विचार करना चाहिये कि अनिष्टका जो प्रतिसंधान उसका विभाव तो दुर्नय है और इष्टहानिविचारमें परकी क्रूरता विभाव है। और पूर्वपक्षमें अनुभाव कंप है तथा द्वितीयपक्षमें क्रियाप्रच्छादन है। अब इसका उदाहरण "एते चित्तविलोचना" स्यात् अर्थात् कौन अनर्थ आपतित होगा । इस प्रकार बारंबार अनर्थबीज अर्थात् उत्कटकोटिक जो अनिष्ट उसका जो असाधारण उपाय उसका ध्यान करिकै स्तनांम शोभित जो पलाशकुसुमाभरण उसको निःश्वास लेकरिकै (नखक्षतके परकीय कीर्य दोनोंसे विभावित गम्य । और कम्पक्रियापच्छादन दोनोंसे अनुभा- वित्त जो शंका सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अब असूयाका लक्षण "परोत्कर्ष" इत्यादि वाक्यसे कहते है। वाक्यार्थ यह है कि परका जो उत्कर्ष उसकी अस- हिष्णुता अर्थात् सहनशीलताऽभाव अथवा परका अनिष्ट करनेकी इच्छा सो या है। इसके विभाव क्रोध और दुर्जनता इत्यादि है। और अनुभाष की चेष्टा और दोषकथन इत्यादि है। उसका उदाहरण "हरशिरसि । (७६) रसतरंगिणी- तरंग:- किं स्यादित्थमनर्थबीजमसकृत्सश्चिन्त्य वक्षोरुहि स्फूर्जत्किशुकदाम वामनयना निःश्वस्य विन्यस्यति॥७॥ परोत्कर्षासहिष्णुता परानिष्टचिकीर्षा वा असूया । तत्र विभावा मन्युदौर्जन्यादयः । अनुभावाः कोपचेष्टादो- पोद्भावनादयः। यथा- हरशिरसि मयाप्यलब्धवासे निवसति काऽपि कलातुषा- रभानोः॥ इति लिखति विधुन्तुदस्य मूर्ति प्रतिभवनं प्रतिभूधरं भवानी॥८॥ इत्यादि श्लोकसे कहते है। श्लोकार्थ यह है कि वामनयना जो है सो यह विचार करती है कि जिनका बारंबार अनुभव कियाहै ऐसे जो गुरुजन अर्थात् श्वशुरा- दिक सो परकीय अन्तःकरणको जाननेवाले है अर्थात् दूसरेके अभिप्रायको शीघ्र जानते हैं। और दुष्टजन जे हैं ते जिह्वाका अग्ररूप जो परकीय दोष ताकरिके युक्त है अर्थात् परकीयदोषको प्रकट करनेमें रसिक है । और नगरस्थ जो लोको सो मर्मभेदी वचनका जो प्रपञ्च अर्थात् वाग्विभव उससे यश अर्थात् ख्याति है जिनकी ऐसे है । अर्थात् परकीयनिन्दामें व्यसनवाले है। और सासू जो है सो चक्षुःश्रवा है अर्थात् सुने हुए अर्थमात्रका ग्रहण करनेवाली है । अथवा चक्षुश्रवा नाम बधिर है। अभिप्राय यह है कि हमको देखकारकै अन्यथा शंका करती हुई । यह प्रतारणके योग्य नहीं है सो जानना । इत्थं कहिये ऐसे होतसते कि गोपनार्थ, वामनयना जो है सो स्थापित करता है । यहां आपका जो दुर्नय और .
पामः १.] भाषाटीकासहिता। (७७ हर्षोत्कर्षो मदः। दुःखासंभिन्नसुखानुभव उत्कर्षः । तत्र विभावः पानम् । अनुभाव उत्तमानां निद्रा । मध्यमानां इंसितम् । अधमानां रोदनम् । इन्द्रियमोहरूपाऽत्र निद्रा, तस्मादिन्द्रियसंमोहे नयनघूर्णनसाम्येन निद्रेव निद्रा । न च हर्षव्यभिचारिभावेऽतिव्याप्तिः। तत्र हर्षमानसत्त्वात्। न तु तत्रोत्कर्षों जातिविशेषः । किंच, तत्र मनसो मोहः । अत्र च मनसःप्रसाद् इति स्वरूपभेदात, तत्र निद्रारो- दनादयोऽत्र पुलकादयोऽनुभावा इत्यनुभावभेदाच्च । ननु 'तिष्ठतिष्ट क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्' इत्यादौ वीरर- सेऽपि मदो दृष्टोऽस्ति । तत्र निद्रा रोदनं वा कथमनु- भावौ। न हि योधः संयति रोदिति निद्राति वेति चेत् । सत्यम्, रसभेदेनाऽनुभावभेदः । शृङ्गारे तेऽनुभावकाः। वीर नयनारुण्यचमत्कारादयः। सामान्ये च मदे नयन- घूर्णतवचनस्खलनादयश्चेति ॥ यथा-- इत्यादि उलोकसे कहते है। श्लोकार्थ यह है कि पार्वती जो है सो चन्द्रमाकी जो अनिर्वचनीयप्रभा वा कला सो मैने भी अर्थात् अर्घागीकृत जो मै हूं तिसने नहीं पाया है वास जिसमे अर्थात् दुष्प्राप्य है स्थिति जिसमें ऐसा जो शिवका मस्तक उसमे निवास करती है । इस हेतु राहुकी मूर्तिके चित्रको घरघरमें और पर्वत पवर्तमे लिखतीहै। यहां चन्द्रकलाकी जो शिवमस्तकमें स्थिति उससे उत्पन्न जो चन्द्रकलाविषयक क्रोध उससे विभावित और चन्द्रकलाग्राससमर्थ जो राहु उसकी प्रतिमाका सर्वत्र लेखनरूप जो कोपचेष्टा उससे अनुभावित जो. चन्द्रकला- विषयक असूया सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अब मदका लक्षण कहतेहैं "हर्षोत्कर्ष" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्य यह है कि हर्षका जो उत्कर्ष सो मद है। यहां उत्कर्ष जो है सो दुःखसे नहीं मिला- हुआ ऐसा जो सुख उसका अनुभवरूप जो कहेंगे तो आगे उत्कर्षको जातिरूप वर्णन किया सो असंगत होजायगा, इस हेतु दुःखासंभिन्नसुखानुभवानियत जो अनुभावभेदभी होताहै इस हेतु यह जो निद्रादि अनुभाव कहेहें सो शृंगाररसमें जानना । आर जहां वीररसमें मद है तहां नयनकी अरुणता और चमत्कार इत्यादि अनुभाव हैं। जहां सामान्य मद है तहां नयनघूर्णन वचनस्खलन इत्यादिही अनुभावहे सो जानना । अब मदका उदाहरण"रसना"इत्यादि श्लोकसे कहते है। श्लोकार्थ यह है कि यह जोअर्थात् हमारा सजातीय रसना इन्द्रिय जो है सो आपही मधुको आस्वादित करताहै । हमारा सबका जन्म(इष्टानवाप्तिसे) अनर्थक है । इस इतमे उम मधुमें सम्पूर्ण इन्द्रियसमूह प्रतिविम्बके छलसे डूबताहै । यहां उत्प्रेक्षा होती है। यहां उत्प्रेक्षाका वाचक शब्द नहीं है । इस हेतु उत्प्रेक्षा (७८) रसतरंगिणी- [तरगः- रसना रसयत्यसौ मधु स्वयमस्माकमनर्थकं जनुः । इति तत्र समस्तमिन्द्रियं प्रतिबिम्बस्य मिषेण मज्जति ॥ ९ ॥ जातिविशेष सो उत्कर्ष है, यह कहनसे तत्त्वसाक्षात्कारमें भी अतिव्याप्ति नहीं होगी, क्योंकि वहां उत्कर्ष नहीं है सो जानना। इसका विभाव पान है और अनुभाव पुरुषभेदसे विलक्षण है क्योंकि उत्तमको तो पान करनेसे निद्रा होती है । और मध्यमको हसना होताहै । और अधमको रोदन होताहै । इस हेतु मदका अनुभाव विलक्षण जानना । यहां निद्रा जो है सो इन्द्रियोंका संमोह है यह वास्त- विक निद्रा नहीं है। किन्तु इन्द्रियके संमोहमें नयनघूर्णनका साम्य होनेसे निद्रासदृश यह निद्रा है। यहां हर्षमात्रको मद कहते तो हर्षरूप व्यभिचारि- भावमें अतिव्याप्ति होजाती क्योंकि यह भी व्यभिचारिभाव हर्षरूप होनेसे मद कहावैगा, इस हेतु उत्कर्म पद दिया तो हर्षरूप व्यभिचारिभावस्थलमें हर्षमात्र हर्षमें उत्कर्षरूप जातिविशेष नहीं है । और सुनो कि मदरूप व्यभिचारिभा- में मनका मोह है और हर्षरूप व्यभिचारिभावमें मनको प्रसन्नता है। यह कहनेका अभिप्राय यह है कि मदरूप व्यभिचारिभावस्थलमें मनको मंहपद करिके व्यवहार है और हर्षरूपव्यभिचारिभावमें मनको प्रसादपद करिके व्यवहार है । इस प्रकार दोनोंको स्वरूपभेद है। और सुनो कि मदमें तो उत्तमको निद्रा, मध्य मको हसन, अधमको रोदन ये अनुभाव हैं और हर्षरूपव्यभिचारिभावस्थलम पुलकादिक अनुभाव हैं । इस प्रकार अनुभावभेदसे भी हर्षरूप व्यभिचारिभाव वा मदरूप व्यभिचारिभाव इनको भेद जानना । अब यहां यह शंका है कि 'तिष्ठ- "तिष्ठ' इत्यादि सप्तशतीस्तोत्रमें देवीको वीररसमें भी मद देखते हैं तहां निद्रा वा सेदन ये अनुभाव किस प्रकार होंगे ? क्योंकि योद्धा संग्राममें न निद्रा लेते हैं न रोदन करतेहैं । इस शंकाका समाधान यहहै कि यह बात सत्य है परन्तु रसभेदसे भाषाटीकासहिता। (७१) पञ्चमः ५.] आयासप्रभवः पराभवः श्रमः। तस्य विभावा रत्य- ध्वगत्यादयः । अनुभावाः स्वेदनिस्सहतादयः । यथा- स रामचन्द्रः सह निर्गतायाः स्वेदाम्बुसंसिक्तपयोधराया। अपांगपातैमिथिलात्मजायाः श्रमानशषाञ्छिथिलीचकार यहां इस प्रकार समझनी कि मधुमें इन्द्रियरर्गका जो प्रतिविम्ब है सो मानो इन्द्रियवर्ग इष्टानवाप्तिसे दुःखित होकर डूबगयाहै । यहां मजति इस पदका भिपाय यह है कि पानके समकालही उत्पन्न जो मद उससे उत्पन्न जो नयनघूर्णन ससे उत्पन्न पानके चिरसम्बन्धसे बहुत काल पर्यन्त मधुमें इन्द्रियोंकी संमुखता त्पन्न हुई । यहां पानसे विभावित गम्य जो नेत्रघूर्णन उससे अनुभावित जो मद सो चर्वणा विश्रामस्थान है सो जानना । अव बलविरोधिग्लानिसे बलकी अविरो- चिता प्रनिपादन करिके श्रमके भेद दिखाते हुए श्रमका लक्षण करते हैं "आयास", इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि परिश्रमसे ही उत्पत्ति है जिसकी ऐसा जो पराभव अर्थात् खेदनामक दुःखविशेष सो श्रम है। यहां परिश्रमसेही यह जों कहा तिसका यह अभिप्राय है कि बलहानिसे खेद नही है तो बलहानिका कथन नही हुआ इससे बलहानिका जो निपेध है सो ही पदसे कहागया। इससे यहां वलसमानाधिकरणही श्रम जानना इस हेतु बलहानिसमानाधिकरण जो ग्लानि तहां अतिव्याप्ति नहीं हुई। क्योंकि वहां वलसामानाधिकरण्य नही है सो जानना। इसके विभाव रतिमार्गमें चलना इत्यादिक हैं। अनुभाव प्रस्वेद निस्सहता इत्या- दिक हैं । इसका उदाहरण "स राम" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह कोई कहते हैं कि राम कहिये योगियोंका जो मन उसका विश्रामधाम और चन्द्र अर्थात् सकल मनुष्पोंको आह्लाद देनेवाला तो यह अर्थ हुआ कि वह जो योगि- मनोविश्रामधाम और सकलजनालादक ऐसा पुरुष सो सायगई ऐसी और इसही हेतु प्रस्वेदजलसे युक्त है पयोधर जिसके ऐसी (यह कहनेसे सूर्य के सम्बन्धसें उत्पन्न स्वेदको आन्तरविकारा नुमापकता किस प्रकारहोगी यह शंका करनेवाले परास्त हुए क्योंकि यहां आन्तरविकारहीसे स्वेद कथन हुआ) जो मिधि- लात्मना अर्थात् जानकी उसके सम्पूर्ण जो श्रम अर्थात् विकृत और अविकृत नो श्रम हैं उनको नेत्रप्रान्तके पातकरिके शिथिल करताभया । यह व्याख्या समीचीन नहीं क्योंकि यच्छन्दतच्छन्दको नित्य साकांक्षता होती है सो यच्छन्दका अध्याहार आवश्यक है सो नहीं किया इससे तच्छन्द साकांक्षही रहगया । यदि यहां तच्छन्दको प्रसिद्धार्थकता कहकरिके यच्छन्दसाकांक्षताका कारण कोगे तिसन्धानसमानाधिकरणत्व होनेसे क्रियामें उन्मुखताऽभाव जो है. है वास्ते उस देशमें अगाडी होकरिके जानेवाला ऐसी) इसही हेतु प्रस्वेदजालासे यहां मार्गगमनसे विभावित प्रस्वेदसे अनुभावित जो श्रम सो चर्पणा विश्रामस्थान है । अब आलस्यका लक्षण करते हैं । "उत्थान" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ पूर्वोक्त ग्लानिमें और वक्ष्यमाण जडतामें भी उत्थानादिकी अक्षमता है तो अति- व्याप्ति होगी। इसका समाधान यह है कि बलका समानाधिकरणत्व होनेसे और (८०) रसतरंगिणी- [तरगः- उत्थानाधक्षमत्वमालस्यम् । तत्र विभावा गर्भादयः। अनुभावाः क्रियाकातर्यादयः। यथा- तो भी तच्छब्दको प्रसिद्धार्थकता माननेसे भी दोषपरिहार नहीं होगा। क्योंकि सहशब्दके योगमें तृतीया होती है सो यहां नहीं है । यदि कदाचित् येन ऐसे पदका अध्याहार करिके दोनों ही दोषके उद्धारकी इच्छा करोगे तो भी इस व्याख्यामें अपांग किसका यह जो शाब्दबोधमें आकांक्षा उसका पूरण नहीं है। और सुनो कि भाववस्तुको यत्लकी असाध्यता जिस प्रकार होती है इसही प्रकार यत्न करिके अनाश्यतामी सम्पूर्ण आलंकारिकोंके अभिमत है। ऐसा हुआ तो सम्पूर्णश्रम शिथिल करदिये यह अर्थ भी योग्य नहीं । और सुनो कि इस व्याख्यामें श्रमको श्रमपदसे कहा इससे वमनाख्य दोषभी दुर्निवार्य है इस हेतु यह व्याख्या युक्त नहीं। इससे इस श्लोककी ऐसी व्याख्या करनी कि जिस रामचन्द्रके अपांगपातोंके साथ गई ऐसी ( यह कहनका अभिप्राय यह है कि दृष्टिकरिके पवित्र जो स्थान तहां पादन्यास करना इस नीति शास्त्रके अनुसार जिस देशमें जानेके हेतु रामचन्द्रकी इच्छा हुई उस देशमे हमको श्रम नहीं है। साथ जानेमें हमारा प्रतिषेध कोई मत करो यह मान करिके श्रमभावसूचनक युक्त है पयोधर जिसके ऐसी (यहां पयोधरमें जो स्वेद कहा उसका यह अभि- प्राय है कि प्रस्वेद जहां होताहै तहां मस्तकको आरम्भकारक होताहै यह गीत है। यहां स्तनमें प्रस्वेद कहा इससे मध्यम श्रम सीताको भया सो जानना) फिर कैसी है सीता कि मिथिला नाम जो जनकपुरी उसका पति जो जनक सो भी मिथिल है उसकी पुत्री ऐसी सीताके सम्पूर्ण जो श्रम है अर्थात मार्गकाठिन्या- दिक उनको वह रामचन्द्र शिथिल करता भया। शिथिलकरनेका प्रकार 'पृथ्वि त्वं भव कोमला' इत्यादि श्लोकसे रसमञ्जरीमें कहा सो जान लेना । इस श्लोकमें श्रमका कारण जो मार्गकाठिन्यादि उसमें उपचारसे श्रमपद कहा सो जानना यह है कि उत्थानादिमें जो अक्षमता सो हा आलस्य है यहां यह शंका हुई कि पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (८१) हरं हरन्तं स्तनहारयष्टिं करेण रोढुं न शशाक तावत् । गिरेः सुता गर्भवती विहस्य हगञ्चलं कातरयाञ्चकार ॥११॥ दुरवस्था दुःखातिरेको वा दैन्यम् । अनौज्ज्वल्यमिति के चित् । तन्न, तस्य बहिर्विषयत्वेन तदनुभावकत्वात् । विभावा दारिद्यादयः अनुभावाः कायक्लेशक्षुत्पीडनादयः। यथा तातचरणानाम्- असे कुन्तलमालिका स्तनतटे नेत्राम्भसां निम्नगा माद्यन्मन्मथकुञ्जरेन्द्रवचनप्रान्ते विलग्ने मनः। किन्त्वन्यद्विरानलेन सरसं संदह्यमानं वपु- गण्डे पाण्डिमकैतवेन सुतनोः फेनोचयं मुञ्चति ॥ १२ ॥ सो आलस्य है । ऐसा हुआ तो ग्लानिमें बलसमानाधिकरणत्व नहीं है और जड- ताम अवश्यकर्तव्यार्थ प्रतिसन्धान नहीं है, इससे इन दोनोंमें अतिव्याप्तिका वारण होजायगा । इसके विभाव गर्भादिक है । अनुभाव क्रियामें कातरता इत्या- दिक हैं। इसका उदाहरण हरम्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि गर्भयुक्त ऐसी जो पर्वतकी पुत्री पार्वती सो प्रेमातिशयसे सकरिके हगश्चल अर्थात् नेत्रकी रचनाको विवलित करती भई । परन्तु स्तनहारलताको हरण करतेहुए जो शिव उनको हाथसे रोकनेको नही समर्थ भई । यहां गर्भविभावित और दृष्टिरचनाके विक्लनसे और हरनिरोधमें अप्रवृत्तिसे अनुभावित जो आलस्य सो चर्वणाविश्रामस्थान है सो जानना ॥ अब दैन्यका लक्षण कहते हैं “ दुरवस्था इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि दुरवस्था अर्थात् दुरवस्थासाध्य अन्तःकरणवृत्ति दैन्य । यदि दुर- वस्थासाध्य अवस्थान्तर नहीं मानो तो दुःखको जो उत्कर्ष सो दैन्य है । शोकमें अतिव्याप्ति वारणके अर्थ अतिरेकपद दिया। कोई अनुज्वलताको दैन्य कहते हैं सो समीचीन नहीं क्योंकि अनुज्वलता वस्तु दुःखप्रकर्षरूप तो हो नहीं सकता है, मालिन्यरूप अनौज्वल्य हो सकता है परन्तु यह अनौज्वल्य अन्त:- करणका धर्म तो है नहीं किन्तु शरीरधर्म है इस हेतु यह अनौज्वल्प दैन्यका अनुभावरूप है सो जानना । इसको अनुभाव कहनेसे दैन्यके अनुभाव नहीं कहे यह शंका करनेवाले परास्त होगये सो जानना । इसके विभाव शरीरको क्लेश, क्षुधा, पीडा इत्यादि हैं । इसका उदाहरण " असे कुन्तल" इत्यादि श्लोकसे '[ तरंग दन्तत्वकरिकै अध्यवसित जो मनोरथ उसके प्रान्तमें अर्थात् मुख्य दुःखकारणता स्मृतिमे अतिव्याप्ति होगी क्योंकि वह भी ध्यानरूप है सो योग्य नहीं क्योंकि स्मृतिरूप व्यभिचारिभाव आगे न्याराकरिकै कहा है इससे यहां ध्यान स्मरण किन्तु चित्तकी एकाग्रता जो है सोही ध्यान है । इसके विभाव इष्टकी अप्राप्ति और अनुभाव ताप वैवर्ण्य वाष्प श्वास इत्यादि हैं ॥ अव चिन्ताका उदाहरण “शम्भुम्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है हे हिमाचलपुत्रि अर्थात् पार्वति ! शंभुका ध्यान करती अर्थात् अन्तःकरण (८२) रसतरंगिणी- चिन्ता ध्यानम् । ध्यै चिन्तायामित्यनुशासनात् । ध्यान च न स्मरणात्मकम्, स्मृतिभावस्याग्रे पृथक्त्वेन कथनात्, किन्तु चित्तैकाग्रता । इष्टानाप्तिप्रभृतयो विभावाः । अनु- भावास्तापवैवर्ण्यबाष्पश्वासादयः। यथा- शम्भु ध्यायसि शैलराजतनये किन्नाम जानीमहे तस्यैवाक्षितनूनपादिव तनौ तापः समुन्मीलति । अक्ष्णोरचमिषेण गच्छति बहिर्गङ्गातरङ्गावलिः पाण्डिनः कपटेन चन्द्रकलिकाकान्तिःसमुज्जृम्भते॥१३॥ कहते है । इलोकार्थ यह है कि केशपाशवन्धनकी उपेक्षासे केशकी जो माला सो स्कन्धमें प्राप्त होगई है। और स्तनतटमें अश्वजलकी नदी वहती है। यहां तटपदका जो ग्रहण किया सो नदीका भी पूरोत्कर्ष कहनेके निमित्त अतिश- योक्ति है। और तरुण जो कामदेव सोही हुआ गजेन्द्र ( यहां बिना देखकरिकै करना यह धर्म लेकरिकै कामदेवको गजेन्द्र कहा) उससे उत्पन्न होनेसे उसका दशनरूप अर्थात् विषयकी असिद्धिप्रयुक्त दुःखात्मक बलवदनिष्टकारणत्व होनेसे होनेरो प्रान्तत्व करिके अध्यवसित जो उस मनोरथका विषय वस्तु तहां मन जो है सो आसक्त है (यह कहनेसे इच्छाका अनुरूप विषय किसकालमें होगा इस न्यायसे मनोरथभंग भी अनुभाव दिखाया) और क्या कहते हैं सरस अर्थात् प्रेमाई और विरहाग्निसे जलताहुआ ऐसा जो सुन्दरीका शरीर सो गण्डस्थलमें पाण्डुताके छलसे फेनसमूहको बाहर करता है। यहां विश्लेषपीडाविभावित और अनुज्वल तादिसे अनुभाविव जो दैन्य सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अब चिन्ताका लक्षण कहते हैं "चिन्ता" इत्यादि वाक्यसे । वास्या यह है कि ध्यान जो है सो चिन्ता है इसमें 'ध्यै चिन्तायाम्' यह शास्त्रमाण भी है। यहां कोई शंका करे कि पञ्चमः ५..] भाषाटीकासहिता। (८३) मोहो वैचित्त्यम् । मुह वैचित्त्य इति धातोर्मोहनं मोह इति भावव्युत्पनो मोहशब्दः । वैचित्त्यं कार्याकार्या- परिच्छेदः । तस्य विभावा भीत्यावेगानुचिन्तनादयः । अनुभावाः स्तम्भपातपूर्णनादर्शनविस्मरणादयः यथा- अन्तःस्मेरसुवर्णकेतकदलद्रोणिद्युतिद्रोहिणीं लक्ष्मी वीक्ष्य समुद्यदिन्दुवदनां क्षीराम्बुधेरुत्थिताम् । शम्भुः स्तम्भशताकुलः शतमखः कर्तव्यमूढेन्द्रियः सोप्यज्ञानभुजङ्गपातपतितो जातत्रिलोकीपतिः॥ १४ ॥ भी स्थापित करतीहो (ऐसा अर्थ न करें ध्यानमात्रही कहैं तो वमनाख्य दोष होजाय ) यह हम वितर्क करते है । और वैसाही जानते है क्योंकि उसही शंभुके नेत्ररूप अग्निके प्रकार उग्रतासे अग्नित्वरूपकरिकै सम्भाव्यमान जो ताप सो शरीरमे उदयको प्राप्त होताहै । और नेत्रोंसे अश्रुपातके छलसे शिवकी ही गंगा- तरंगावलि जो है सो बाहिर जातीहै। और पाण्डुताके छलसे चन्द्रकलाकान्ति जो है सो स्वच्छतासे प्रकाशित होती है। यहां इष्टानवाप्तिविभावित और तापवै- वर्णादिसे अनुभावित जो चिन्ता सो चर्वणाविश्रामस्थान है । अब मोहका लक्षण कहते है। "मोह" इत्यादिवाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि वैचित्त्य जो है सो मोह है । 'मुह' धातु वैचित्त्य अर्थमें है यह व्याकरणशास्त्र में है। इस धातुसे भावमें प्रत्यय करनेसे मोह शब्द होताहै, मोह वैचित्त्यरूप ही है। इसही मोहको मोहन भी कहते हैं। कार्य और अकार्यका जो अज्ञान सो ही वैचित्त्य है। इसके विभाव भीति अर्थात् भयका प्रसार अथवा भीति और आवेग और अनु- चिन्तन अर्थात उत्कट भयकी चिन्ता इत्यादिही और अनुभाव स्तम्भ और घूमना और आदर्शन, विस्मरण इत्यादि है । इसका उदाहरण अन्तःस्मेर " इत्यादिश्लोकसे कहते इत्यादिश्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ, यह । श्लोकार्थ, यह है कि अन्तः स्मेर अर्थात् विकसित ऐसी जो स्वर्णवर्ण केतकदलकी द्रोणी अर्थात् कलिका उसकी कान्तिका द्रोह करनेवाली अर्थात् तत्सदृशकान्तिमती ऐसी (यह कह- नेसे आतपसे स्पर्श नहीं है यह कहा) और उदयको प्राप्त जो पूर्ण चन्द्र तत्सदृश है मुख जिसका ऐसी । और क्षीरसमुद्रसे उठी ऐसी ( यह कहनेसे कदाचित् भी किसीने देखी नहीं है यह कहा) लक्ष्मीको देखकरिके ही महादेव जो है सो सुखकामनासे उत्पन्न जो असंख्य स्तंभ उनसे युक्त होते भये । और इन्द्र जो है संस्कारजन्य यह कहनेसे दोनोंका संग्रह होगया,सोजानना। जो प्रत्यभिज्ञाका संग्रह करेंअर्थात संस्कारमात्रजन्य ज्ञान सोस्मृति कहें तो प्रत्यभिज्ञाको दूसरा व्याभिचारि- प्रकाशक जो सदृश अदृष्टचिन्ता सो इसके विभाव जानना । और अनुभाव भूको उन्नत करना इत्यादि है, सो जानना। अब प्रत्यभिज्ञारूप स्मृतिका उदाहरण "कालिन्दीसरसः" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि यमुना- सगेवरसे आकरिकै आकाशके समीपमें यह जो चक्रवाकका जोडा है सो क्रीडा है। सो जो यह चक्रवाकका जोडाहै सो चन्द्रकलाको आक्रमण करिक उसकी कान्तिको जीतकरिक शोभित होताहै। चन्द्रमा भी कामदेवका (८४) रसतरंगिणी- [ तरंगः- संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः । संस्कारजन्यं ज्ञानं प्रत्य- भिज्ञारूपं स्मरणरूपं च, संस्कारजन्यत्वेनोभयसंग्रहः। अन्यथा प्रत्यभिज्ञायाः पृथग्भावापत्तेः । प्रत्यभिज्ञास्मृ- त्योर्विभावाः संस्कारोबोधकाः सदृशतादृष्टचिन्तायाः । अनुभावा भ्रूसमुन्नयनादयः । प्रत्यभिज्ञा यथा- कालिन्दीसरसः समेत्य नभसः क्रोडे परिक्रीडते चक्रद्वन्द्वमिदं सुधाकरकलामाक्रम्य विस्फूर्जति। चन्द्रोऽपि स्मरचापचापलचमत्कारं समालम्बते तस्मात्सव कदम्बकुञ्जकुहरे राधा परिभ्राम्यति ॥ १५॥ स्मृतियथा- सो कर्तव्यतामें मूढ हैं इन्द्रिय जिसकी ऐसा होता भया अर्थात् घूमने लगा। और सर्वज्ञ भी जो त्रिलोकीपति ब्रह्मा सो अज्ञानरूप जो भुजंगपाश तामें पतित होगये। ये सम्पूर्ण विस्मृतियुक्त होगये सो जानना । लक्ष्मीविषयकआवेग- विभावित स्तंभघूर्णनविस्मरणाऽनुभावित शंभु-शतमख-त्रिलोकीपतिनिष्ठ मोह चर्व- णाविश्रामस्थान है सो जानना ॥ अब स्मृतिका लक्षण कहते हैं "संस्कार" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि उबुद्धसंस्कारसे उत्पन्न जो ज्ञान सो स्मृति है। ऐसा ज्ञान प्रत्यभिज्ञारूप और स्मरणरूप होताहै। तहां तत्' भागके संस्कारसहित और 'इदम' भागके लौकिकसन्निकर्षजन्य जो 'तत् ' और 'इदम् ' दोनोंका तादास्यज्ञान सो प्रत्य भिता है । और स्वविषय यावद्विषयक संस्कारजन्य ज्ञानसे स्मरण है । ऐसा हुआ तो भाव कहना पड़ेगा, इस हेतु दोनोंकाही संग्रह किया। संस्कारके उद्बोधक अर्थात् (८५) पञ्चमः ६.] भाषाटीकासहिता। वदनाम्बुजलग्नदृङ्तिपाते मयि बध्नत्यवतंसमंसमूले । दरकुञ्चितदृष्टि राधिकायाः स्मितकिर्मीरितमाननं स्मरामि१६ जो धनुष उसकी चपलताके चमत्कार अर्थात् रीतिको अवलम्वित करताहै। (यह कहनसे अर्धचन्द्रका अस्त जानेका समय व्यञ्जित करते हैं। इस व्यङ्ग्यसे प्रातःकाल व्यक्षित होताहै । इससे जिस प्रकार रात्रिवियुक्तचक्रवाकयुगलका पर- स्परसे आकरिकै मिलाप हुआहै तिसहीप्रकार कदम्बकुञ्जमें संकेत करनेवाले कृष्णके साथ प्रातःकाल हमारा भी मिलाप होगा। इस हृदयके अभिप्रायसे राधाका कदम्बकुञ्जपरिभ्रमण कहते हैं) इसही हेतुसे वो ही जो यह राधा अर्थात् जो राधा रात्रिमें वियुक्त रही सो ही राधा कदम्बकुञ्जके वनमें प्रियके आगमनके अभिप्रायसे सम्यक्पकार भ्रमण करती है, यह सखीके प्रति सखीने कहा है। यहां पूर्वपूर्व अनुभूत जो चक्रवाकादि उसका जो उत्तरोत्तर अनुभवीकरण सो ही प्रत्य- भिज्ञा है वहही प्रत्यभिज्ञा चमत्कार विश्रामस्थानतासे प्रतीत होती है। पक्षान्तर- व्याख्या-श्यामतारूप यमुनात्वधर्मसे आरोपित जो रोमावलि सोही हुई कालिन्दी सो सरोबर जो हुवा नाभि सरोवरधर्म वर्तुलाकारता और गम्भीरता सो नाभिमें भी है इस हेतु सरोवरसे अधिरोपित नामि समझना चाहिये । उस सरोवरसे उत्पन्न होकारकै आकाशके तटमें अर्थात् अत्यन्त कोमलतासे आकाशत्व कारकै अध्यवसित जो मध्यमभाग उसके भीतर खेलती है। और यह जो चक्रद्वन्द्र अर्थात् गोलाकारतासे चक्रद्धन्दत्वकरिके अध्यवसित जो कुचयुग सो चन्द्रमाकी जो कला अर्थात् कुटिलत्वधर्मकरिकै चन्द्रकलात्वकारकै अध्यवसित जो नखक्षत ताको प्राप्त होकरिकै शोभित होताहै। और चन्द्र जो है अर्थात् आह्लादकत्व- धर्मकरिकै चन्द्रत्वसे मध्यवसित जो मुख सो भी स्मरचाप अर्थात् कुटिलत्वधर्म- कारकै चापत्वसे अध्यवसित जो भृकुटी उसका जो चपलतारूप क्रियाविशेष उससे जो चमत्कार अर्थात् शोभातिशय उसको प्राप्त होते हैं । इस हेतुसे अर्थात् उस राधा विना इन सम्पूर्ण वस्तुओंका संमिलन असंभावित है इससे वोही जो राधा अर्थात् बहुत कालपर्यन्त जिसका अवलोकन किया रहा, सो ही राधा कदंवनिर्मित जो कुञ्ज अर्थात् मण्डप उसके भीतर स्थित है। यहां चिन्तासहकृत- ताशसंस्कारसंनिकर्षविभावित और गम्यमुखविकासाद्यनुभावित जो प्रत्यभिज्ञा सो चर्वणावित्रामस्थान है । अब स्मरणरूपा स्मृतिका उदाहरण " वदनांजे इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि कृष्ण अपने मित्रसे कहते हैं कि राधिकाका मुखरूप जो कमल उसमें लगा है दृष्टिका पतन जिसका ऐसा जो में सो वाहुमूलमें कर्णभूषणका वन्धन करतसन्तें किश्चित् संकुचित हैं नेत्र जिसमें .
(८६) रसतरंगिणी- [ तरंगा धृतिः सन्तोषो दुःखेप्यदुःखबुद्धिर्वा । विभावा ज्ञानश- क्त्यादयः। अनुभावा अव्यग्रभोगादयः। यथा-- भूषा भस्मरजांसि वेश्म विपिनं वृद्धो वृषो वाहनं चैलं चर्म तथाऽपि मन्मथरिपोर्मोंगः किमु भ्रश्यति । ईशत्वं किमु हीयते किमु महादेवेति नो गीयते किं वा तस्य च देवदेव इति वा संज्ञा जनस्त्यज्यते॥१७॥ ऐसा और ईषतहास्यसे विकसित जो राधिकाका मुख उसका मै स्मरण करताहूं। यहां मुखरूप कमलका संबन्धी जो नेत्र उसमें भ्रमरत्वका सूचन किया । यहाँ स्मरणसे विलक्षण ज्ञान समझना । यहां चिन्तासे उबुद्ध जो संस्कार उससे विभा- वित और गम्य जो भ्रको नमाना उससे अनुभावित जो स्मृति सो चर्वणा- विश्रामरथान है। अब धृतिका लक्षण कहते हैं। "धृतिः' इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि सन्तोष अर्थात् इच्छाकी जो पूर्ति सो धृति है। यह जो इच्छाकी पूर्ति सौ लाभसे ही होती है और भय, शोकसे नहीं होती है इस हेतु भय, शोकसे उत्पन्न जो धृति है, तत्साधारण लक्षणान्तर कहते हैं कि दुःखदेनेवाली वस्तुमें जो अदुःखबुद्धि अर्थात् अनिष्टाजनकत्वज्ञान सो ही धृति है। यहां इष्टकी विरोधी जो द्वेषविषयक वस्तु सो और इष्टहानि ये दोनों ही अनिष्टशब्दसे जानलेने। इसके विभाव ज्ञानमें सामर्थ्य इत्यादि हैं । और अनुभाव दुख बिना भोग लेना इत्यादि जानना। अब इसका उदाहरण "भूषा भस्मरजासि" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि यद्यपि भूषण कहिये अंगराग जो भस्मके रज हैं सो सर्व- सुलभ है । और बहुवित्तके व्यय और परिश्रमसे साध्य जो कस्तूरीचन्दनादि साँ अंगराग नहीं है, तथापि महादेवका भोग अर्थात सुखानुभव भ्रष्ट होताहै क्या ? अपि तु नहीं होताहै । और यद्यपि घर वन है सो स्वतःसिद्ध है कष्टसाध्य जो महल इत्यादि सो घर नहीं है तथापि महादेवकी ईशता अर्थात् जगतका नियमन करना सो क्या हीन होताहै ? आपि तु नहीं होताहै । और महादेका वाहन वृद्ध वृषभ है अर्थात् अज्ञात है जन्मभूमि जिसकी ऐसा नंदिकेश्वर है, उच्चैःश्रवा नहीं है तथापि जनोंसे महादेव अर्थात् सकलश्रेष्ठ ऐसा नहीं कहा जाताहै क्या ? अपितु कहा ही जाताहै । और यद्यपि वस्त्र गजचर्म है और अमूल्य जो शाटी आदि सो नहीं है, तथापि महादेवकी जो देवदेव यह संज्ञा अर्थात् साम्राज्यलक्ष्मी- सम्पन्न ऐसा जो नाम सो मनुष्योंसे त्याग किया जाताहै क्या ? अपि तु नहीं त्याग -- पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (८७) स्वच्छन्दक्रियासंकोचो ब्रीडा । न च शंकायां त्रासे चाति- व्याप्तिस्तत्रतत्र क्रियाविरह एव न तु क्रियासकोचः । अत्र विभावा दुराचारादयः। अनुभावाः शिरोनमनवदन- नयनप्रच्छादनादयः। यथा अयोध्यावर्णने- भित्तौभित्तौ प्रतिफलगतं भालसिन्दूरबिन्दु दृष्ट्वादृष्ट्वा कमलनयना केलिदीपभ्रमेण । कान्ते चैलं हरति हरितं लोलमालोकयन्ती गाचं प्रच्छादयति सहसा पाणिपंकेरुहेण ॥ १८॥ इतरेतरक्रियाकरणं क्रियायाःशीघ्रता वा चपलता।मात्स- यद्वेषरागादयो विभावाः । अनुभावा वैरिदर्शनवाक्पारु- ष्यप्रहारादयः । यथा- किया जाताहै । यहां गम्य जो विवेक उससे विभावित और चपलताकी शान्तिसे अनुभावित जो धृति सो चर्वणाविभ्रामस्थान है । अब ब्रीडाका लक्षण कहतेहैं "स्वच्छन्द" इत्यादि वाक्यसे। वाक्यार्थ यह है कि स्वतन्त्र जो किया उस क्रियाके संकोचमे कारणीभूत जो चित्तवृत्ति सो व्रीडा है । ऐसा कहनेसे ब्रीडाको आन्तरत्व समझा जाताहै। कोई कहताहै कि क्रियाविरहप्रयोजक जो चित्तवृत्तिविशेष सोही ब्रीडा क्यों नहीं मानतेहो ? यह कथन युक्त नहीं, क्योंकि ऐसा कहै तोशंकामें और त्रासमें अतिव्याप्ति होगी। क्योकि वहां भा क्रियाविरह है । हमारे लक्षणसे वहां अतिव्याप्ति नहीं होती है, क्योकि शंका वा त्रासमें क्रियाका अभावही है संकोच नहीं है। इसके विभाव दुराचारादिक है । अनुभाव शिरको नीचा करना और वदन, नयन इनका ढकना इत्यादिक हैं । अव ब्रीडाका उदाहरण “ भित्तों भित्तो" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि अयोध्यावर्णनमें सखीके प्रति सखीकी उक्ति है कि जिस अयोध्या नगरीमें भित्ति भित्तिमें प्रतिविम्बको प्राप्त जो आपकी मूर्ति उसके मस्तकमें जो सिन्दूरविन्दु उसको देख देख करिके जो सुरतक्रीडामें दीपकोंका भ्रम उससे प्रकाशित जो कमलनयना सो सहसाही शीघ्रही नायक जो है सो हरितवस्त्रको हरण करत सन्तै चञ्चल जैसे होय तैसे देखती हुई, सर्वप्रकारसे हस्तकमलसे शरीरको आच्छादित करतीहै । यहां नायकके दर्शन और उसके दुराचारसे विभावित, अङ्गके ढकनेसे अनुभावित जो ब्रीडा सो चर्वणाविश्रामस्थान है । अव चपलताका लक्षण कहते है “ इतरेतर इतरेतर" इत्यादि १ परितः इति पाठान्तरम् ।
सो संग्रामके आरम्भमें जो दम्भ अर्थात् वीरश्रेष्ठताका अभिमान उससे शोभायमान अव हर्षका लक्षण कहते हैं " चेताप्रसादः" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ (८८) रसतरंगिणी- [नरंग:- लंकाचारिणि सेतुकारिणि रणक्रीडाचमत्कारिणि प्रौढानन्दवचःप्रसारिणि पुरो रामे धनुर्धन्वति । जातास्तस्य दशाननस्य समरप्रारम्भदम्भस्फुरत्- केयूरक्वणिताऽनुमेयविशिखत्यागाः करश्रेणयः ॥ १९ ॥ चेतःप्रसादो हर्षः । प्रियदर्शनपुत्रजननादयो विभावाः । अनुभावाः पुलकस्वेदाश्रुस्वरभेदादयः। यथा-- पुलकितकुचकुंभपालि राधा ब्रजति मुकुन्दमुखेन्दुवीक्ष- णाय। विरचयति न मध्यभंगभीतिं गणयति नाऽपि नितम्बगौरवाणि ॥२०॥ वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि अव्यवधानसे जो दो तीन क्रियाओंको करना अथवा क्रियामें जो शीघ्रता अर्थात् क्रियाकी शीघ्रतामें नियामक जो विजातीय अन्तःकरणवृत्ति सो चपलता है । इसके विभाव मत्सरता और द्वेष और अनुराग इत्यादि हैं । और अनुभाव वैरीका दर्शन अर्थात् शत्रुको हेरना और वचनम कठो- रता और प्रहार इत्यादिक हैं । अब इसका उदाहरण कहतेहैं " लंकाचारिण" इत्यादि श्लोकसे। श्लोकार्थ यह है कि लंकाके सम्मुख जानेमें शीलयुक्त और सेतु- का बन्धन करनेवाले और संग्राममें जो क्रीडा उसमें चमत्कारयुक्त और स्वकीय उत्साहसे उत्साहित जो वचन अर्थात् सिंहनादादि उसका उद्घोष करनेवाले ऐसे जो राम सो अगाडी धनुषको धुन्वति अर्थात् प्रत्यञ्चाकर्षणसे टणत्कारशब्दयुक्त करत सन्ते वह अर्थात् त्रिलोकीका जीतनेवाला भी रावण उसके जो वीस हाथ जो केयूरोंका शब्द उससे अनुमान करनेके योग्य है बाणोंका त्याग जिनसे ऐसे होते भये । यहां धनुर्ध्वनिसे समुद्दीपित जो मात्सर्य विभाषित और संपूर्ण भुजाओंसे जो प्रहार उससे अनुभावित जो चपलता सो चर्वणाविश्रामस्थान यह है कि चित्तकी जो प्रसन्नता अर्थात् प्रसन्नताका हेतु सुख सो हर्ष है। यह कहनेसे हर्षको आन्तरत्व हुआ सो जानना । इसके विभाव मियका दर्शन अर्थात् ज्ञान और पुत्रोत्पत्ति इत्यादि हैं। और अनुभाव रोमाञ्च, प्रस्वेद, अनु स्वरभेद इत्यादि हैं । इसका उदाहरण "पुलकित" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं.
पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (८९) आकस्मिक इष्टानिष्टोपपातविवर्तः संभ्रमो वा आवेगः । वैरिदर्शनप्रियश्रवणोत्सातादयो विभावाः । अनुभावास्त्व- राशरीरस्खलनविपर्यासादयः। यथा- एको वाससि विश्लथे सहचरीस्कन्धे द्वितीयः करः। पश्चाद्गच्छति चक्षुरेकमितरतुर्मुखे भ्राम्यति । एकं कण्टकविद्धमस्ति चरणं निर्गन्तुमुत्कण्ठते चान्यद्वैरिमृगीदृशां रघुपतेरालोक्य सेनाचरान् ॥२१॥ श्लोकार्थ यह है कि राधा जो है सो आह्लादकतासे कृष्णका मुखरूप जो चंद्रमा (यहां मुखको चन्द्रमा कहनेसे नेत्रको चकोरत्व ध्वनित होनेसे उत्कण्ठा व्यञ्जित होती है) उसके देखनेके अर्थ जाती है। किस प्रकार कि पुलकित अर्थात् रोमाञ्चयुक्त है कुचरूप कुंभका मण्डल जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, इस समयमें मध्यशरीरके भंगका जो डर उसकी गणना नहीं करती है । और नितंबकी जो गुरुता है उसको भी नहीं गिनती है, अर्थात् ध्यानही नहीं करती है। यहां गम्य जो प्रियसमागमत्रवण उससे विभावित और पुलकादिसे अनुभावित जो हर्ष सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अब आवेगका लक्षण कहते हैं "आक- स्मिक" इत्यादिवाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि आकस्मिक अर्थात् बिना कारण जो इष्टका वा अनिष्टका आजाना सो है मुख्य कारण जिसका ऐसा जो मनो- विकार सो आवेग है परन्तु ऐसा आवेग कहनेसे जडतामें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि जडतारूप मनोविकार भी आकस्मिक इष्टानिष्टोपपातसे ही होताहै । इस हेतु दूसरा लक्षण कहते हैं, कि संभ्रम अर्थात् साध्वससे जो प्रवृत्ति सो आवेग है। इसके विभाव वैरीका देखना और प्रियवातका श्रवण और उत्पात इत्यादि है। (यहां दर्शनश्रवणसे ज्ञानमात्र समझना) और अनुभाव शीघ्रता ! और शरीरका गिरना और विपर्यास अर्थात् जो वस्तु नहीं रहै उस वस्तुमें जो अन्यथाबुद्धि सो इत्यादि हैं । अब इसका उदाहरण "एको वाससि" इत्यादि | इलोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि रामचन्द्रकी सेनामें विचरनेवाले वानरोको देखकरिके वैरी जो राक्षस उनकी मृगीनेत्रसदृशनेत्रयुक्त स्त्रियोंका एक हाथ सो पडतेहुए वस्त्रपर है और दूसरा सखीके कांधेपर है। और एक नेत्र पिछाडी देखता है दूसरा भाके मुखमें भ्रमण करताहै अर्थात पतिके मुखको बारम्बार देखताहै । और एक पग कांटेसे विधाहुआ है। दूसर --- --- .- (९२) रसतरंगिणी- [ तरंगः- तावत्तत्र मया विपक्षनगरीनारीगम्भोरुह- द्वन्दप्रस्खलंदश्रुवारिपटलैः सृष्टाः पयोराशयः॥२३ ॥ इष्टसंशयोऽनिष्टजिज्ञासा वा विषादः। इष्टपदेन जीवनधन- यशम्शरीरपुत्रकलत्रादयः। विभावा अपराधधनगमनादयः। अनुभावा उत्तमानां सहायान्वेषणोपायचिन्तादयः,मध्य- मानां विमनस्कता, अधमानामिष्टध्यानधावनमुखशोष- निद्राश्वासादयः । यथा- प्रत्यावृत्त्य यदि व्रजामि भवनं वाचां भवेत्प्रच्यवो निर्गच्छामि निकुञ्जमेव यदि वा को वेद किं स्यादितः। तिष्ठाम्येव यदि क्वचिद्धनतटे किं जातमेतावता मध्यवर्ती कलानिधेः समुदयोजाताः किमातन्यताम् २१॥ उनके नेत्ररूप कमलयुगलसे पडता हुआ जो अश्रुरूप जल उसके समूहोंसे समुद्र सृजदिये । यहां बलैश्वर्यादिसे विभावित पौरुषप्रकाशाऽनुभावित जो गर्व सो चर्वणाविश्रामस्थान है । अब विषादका लक्षण कहते हैं " इष्टसंशयः' इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि इष्टका संशय अथवा अनिष्टक विचार सो विषाद है । यहां वाशब्दका यह अर्थ है कि दोनोंमें अन्यत एक लक्षण समझना । यहां इष्ट पदसे इच्छाविषयमात्रका ग्रहण है। ऐसा हुआ तो इष्टपदसे जीवन, धन, यश, शरीर, पुत्र, कलत्रादि संपूर्ण इच्छा विषय जानना। इसके विभाव राजा वा गुरु इनका अपराध और धनका जाना इत्यादि हैं। और अनुभाव उत्तम पुरुषोंका सहायान्वेषण अर्थात् हमारा कौन सहाय करेगा ऐसे सहायका हेरना और उपाय अर्थात हेतुकी चिन्ता करना है। और मध्यम पुरुषोंका विमनस्कता अर्थात अप्रसन्नता है। और अधम पुरुषोंका इष्टका ध्यान और धावन अर्थात् गमन मुखका शोष और निद्रा और श्वास इत्यादि है। अब इसका उदाहरण "प्रत्यावृत्त्य" इत्यादि इलोकसे कहते है । इलोकार्थ यह है कि कृष्णाभिसारिकाका वचन है कि मार्गके मध्यमें चन्द्र माका उदय होगया. अब क्या करिये। यदि उलट करिकै घरको जातीहै तो वचनका प्रच्यव अर्थात प्रतिज्ञाहानि होजावे (अवश्य मै आऊँगी यह जो कान्तके प्रति वचन सो मिथ्या होजायगा) और यदि इस स्थानसे निकुलहीको पञ्चमः५] भाषाटीकासहिता। (९३.) औत्सुक्यं कालासहिष्णुता सकलेन्द्रियाणामेकदैव क्रिया- रम्भो वा। प्रियसंस्मरणादयो विभावाः। अनुभावास्त, न्द्रागात्रगौरवादयः । यथा- आद्यः कैरपि केलिकौतुकमनोराज्यौर्द्वितीयः पुन- मल्लीकेसरचारुचम्पकनवाम्भोजस्रजां गुम्फनैः। काञ्चीकुण्डलहारहेमवलयन्यासैस्तृतीयस्ततो नीतःसुन्दरि वासरस्य चरमोयामः कथं यास्यति ॥२५॥ जाऊँ तो क्या अनर्थ होय यह बातको न जानता है अर्थात् कोई नहीं 'जानता है । मैं तो अत्यन्तही नहीं जानती हूं। यदि इन दोनों स्थलोंसें भिन्न जो कोई वनतट है तहां उक्त दोनों स्थलोंके संकटसे उदासीनताको प्राप्त होकरिकै ठहर जातीहूं तो इससे क्या होगा ? अपितु कुछ नहीं होगा । इस पदका अभिप्राय यह है कि इष्टकी अप्राप्ति और अनिष्टकी प्राप्ति दोनों स्थित ही रहीं। यहां अभिसरणरूप अपराधसे विभावित और अनिष्टनिवारणचिन्तासे अनुभावित जो विषाद सो चर्वणाविश्रामस्थान है । अब औत्सुक्यका लक्षण कहते हैं "औत्सुक्यम्" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि मियप्राप्तिमें विलम्ब मत हो ऐसी जो इच्छा सो औत्सुक्य । अथवा सम्पूर्ण इन्द्रि- योंका एककालमें ही जो व्यापार उसकी जो उत्पत्ति सो होय जिससे ऐसी जो वह, सो हमको इसही समय प्राप्त होय इस इच्छाके अनुरूप अन्त:- करणवृत्ति सो औत्सुक्य है। इसके विभाव प्रियका स्मरणादिक है। और अनुभाव तन्द्रा और शरीरकी गुरुता इत्यादि जानना । इसका उदाहरण "आद्यः कैः" इत्यादि श्लोकसे अहते है। श्लोकार्थ यह है कि हे सुन्दरि! अर्थात हे सखि ! दिनका प्रथम प्रहर जो है सो तो कोई अर्थात् हममात्रका प्रत्यक्षविषय जो केलिकौतुकमनोराज्य अर्थात् क्रीडाका जो चमत्कार उसके जो मनोरथ उनसे व्यतीत किया। और द्वितीय प्रहर मल्ली जो मालती उसका जो केसर अर्थात् पुष्प और सुन्दर चम्पा और नवीन जो कमल इनके जो हार उनके गूंथनेसे व्यतीत किया। और तृतीय प्रहर कमरमें कणगती और कानमें कुण्डल और वक्षःस्थलमें हार और हाथोंमें सुवर्णके कंकण इनके स्थाप- नसे व्यतीत किया । अव चतुर्थ प्रहर किस प्रकार व्यतीत होगा ? अर्थात अव (९४) रसतरंगिणी- [ तरंग:- इतरदिन्द्रियमपहाय मनस्त्वचि यदा वर्तते तदा निद्रा । सुप्तस्य कारणत्वात्सुप्तात्मा निद्रा भरतेनोक्ता । स्वप्नवह- नाडिकायां मनो यदा वर्तते तदा स्वमादिसम्भवः । तत्र विभावाः स्वभावचिन्ताऽऽलस्यक्लमादयः । अनुभावाः पार्श्वकरणनयनभ्रूचलनविभ्रमवचनस्वप्नदर्शनादयः । यथा- गच्छन्कच्छं तपनदुहितुः पिच्छगुच्छावतंसः पश्यन्नस्मद्वदनमसकृच्चक्षुषा कुञ्चितेन स्निग्धापाङ्गः शिथिलचरणः स्तोकविस्पष्टहासः स्वप्ने दृष्टः कमलकलिकामण्डनो मेघखण्डः ॥ २६ ॥ कोई प्रसङ्ग नहीं है । यह कहनेसे चिन्ता व्यक्षित की। यहां व्यंग्य जो प्रियसमागम और उससे विभावित गात्रगौरव तथा चिन्तासे अनुभावित जो औत्सुक्य सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अब निद्राका लक्षण कहते हैं"इतरदिन्द्रियसू'इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि और इन्द्रियोंका त्याग करिकै मन जो है सो त्वचा में जिस समय जाताहै उस समयका जो अन्त:करणवृत्तिविशेष सो निद्रा है । यह निद्रा सुप्तका कारण है इस हेतु मुप्तरूप व्यभिचारिभावसे पहले भरत मुनिने इसका कथन कियाहै । इसही निद्रामें स्वमवहनाडिकामें जब मन चला जाताहै तब स्वमका संभव होताहै । इसके विभाव स्वभाव अर्थात् तामस और चिन्ता और आलस्य और ग्लानि इत्यादि जानना । और अनुभाव पार्श्वकरण अर्थात् शरीरको पलटना और नेत्र, भ इनका चलाना और भ्रमयुक्त वचन और स्वमदर्शन इत्यादि जानना । इसका उदाहरण "गच्छन्कच्छम्" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि सखीके प्रति राधाका वचन है कि हे सखि ! मैंने कमलकी कलीसे शोभित जो मेघखण्ड अर्थात् धनसमूह उसको स्वप्नमें देखा । कैसा है वह मेघखण्ड सों कहते हैं कि यमुनाके तटको जाताहुआ ऐसा, और मयूरके जो पंख उनका जो समूह सो है आभूषण जिसका ऐसा, और वारम्बार कुटिल नेत्रसे मेरे बदनकों देखता हुआ ऐसा, और प्रेमयुक्त है कटाक्ष जिसका ऐसा, और आलस्य युक्त चरणकमल जिसका ऐसा, और अल्प जैसे होय तैसे प्रकट है हास जिसका ऐसा । यहां चिन्तासे विभावित और स्वमदर्शनसे अनुभावित जो निद्रा सो चर्वणा- है (९५) पञ्चमः ५.] भापाटीकासहिता। प्रहाद्यावेशोऽपस्मारस्तत्र विभावाः । अपावित्र्यशून्यगृह- स्थितिधातुवैषम्योत्कटदुःखभयादयः अनुभावाः। कम्पफे- ननिःश्वासभूपतनविपर्यासजिह्वालोलनादयः। यथा- उद्वेलन्नवपल्लवाधररुचः पर्यस्तशाखाभुजाः स्फूर्जत्कोरकफेलबिन्दुपटलव्याकीर्णदेहश्रियः। भ्राम्यङ्गकलापकुन्तलजुपः श्वासानिलोत्कम्पिताः शलं प्रेक्ष्य कपर्निपातितमपस्मारं दधुर्भूरुहाः ॥२७॥ मूर्छा चात्रैवान्तर्भवति । त्वचमपि विहाय मनः धुरीतती वर्तते तदा सुप्तम् । निद्रा विभावः। अनुभावा नेत्रनि- मीलनालयश्वासोच्छ्वासादयः। यथा- - वित्रामस्थान है अव अपस्मारका लक्षण "ग्रहाचावेश" इत्यादि वाक्यसे कह- तेहै । वाक्यार्थ यह है कि भूतके सञ्चारादिसे उत्पन्न जो व्याधिविशेष सो अप- स्मार है इसके विभाव अपवित्रता और शून्यघरमें स्थिति और धातुकी विषम अवस्था और अधिक दुःख इत्यादि हैं। अनुभाव कम्प, झाग, निःश्वास, पृथि- चीमें पडना, भ्रान्ति, जिह्वाकी चञ्चलता इत्यादि है । इसका उदाहरण "उद्वेलन्। इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि इधर उधर चलते हुए जो नवीन पत्ते वे हीहै । अधरोष्ठसदृश जिनके ऐसे, और प्रसारित जो शाखा सोही हैं वाहु जिनके ऐसे, और प्रकाशमान जो कलियां वेही हुआ झागजल उसके समूहसे च्याप्त है देहकी कान्ति जिनकी ऐसे, और विखरे हुए जो भ्रमर उनका जो समूह सोही हुआ केशपाश उससे युक्त, और श्वासरूप वायुसे उत्कृष्टकम्पयुक्त ऐसे जो द्रोणाचलके वृक्ष वे कपिके पाससे भरतने पटक्या ऐसे पर्वतको देखकरिके अपस्मार जो उच्चैःपतन उसको धारण करते भये । यहां पर्वतमें आरोप्यमाण जो दुःख उससे विभावित और वास्तविकभूनिपातसे अनुभावित ऐसा जो आहार्यारोप विषयीभूत अपस्मार सो चर्वणावित्रामस्थान है ॥ मूर्छा पृथक व्यभिचारिभाव नहीं है किन्तु अपस्मारका ही नाम है सो जानना। अब सुप्तका लक्षण कहतेहै "त्वचमपि" इत्यादि वाक्यसे वाक्यार्थ यह है कि लवाका भी त्याग करिकै जब मन पुरीततीनामकी नाडीमें स्थित होताहै वह ही जो पुरीवतीनाडीका और मनका संयोग सो सुप्त है । इसका विभाव निद्रा है और (९६) रसतरंगिणी- [तरंग:- श्वासोच्छ्वासंप्रचलदधरोपान्तमामीलिताक्षं क्रीडाकुओ तपनदुहितुः सुप्यतः श्रीमुरारेः । अन्तःस्मेरं निभृतनिभृतं काऽपि कर्णावतंसं काचिदाह्रोः कनकवलयं दाममुष्णाति काचित् ॥२८॥ इन्द्रियाणां प्रथमप्रकाशो विबोधः । निद्राच्छेदो विभावः। अनुभावा अङ्गाकृष्टिजम्भाऽक्षिमर्दनांगुलीमोडनादयः । यथा- राधायाः सहसा दृशा कुवलयद्रोणीदरिद्रं नमः कुर्वन्त्याः कलकण्ठकण्ठनिनदैः सांकेतिकैर्जाग्रतः। अङ्गाकृष्टिविवर्तमानवपुषो देवस्य कंसद्विषो लोलापांगतरंगभंगचतुर नेत्राम्बुजं पातु नः ॥२९॥ अनुभाव नेत्रका मींचना और प्रलयनाम सात्विकभाव और श्वास ऊर्ध्वश्वास इत्यादि हैं । इसका उदाहरण-"श्वासोच्छास" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह ह कि श्वासके आधिक्यसे अथवा श्वास और ऊर्ध्वश्वास दोनोंसे कम्पमान है अधरका समीपभाग जिस क्रियामें जैसे होय तैसे और सर्वप्रकारसे, मींच्ये दोनों नेत्र जिस क्रियामें जैसे होय तैसे यमुनाके क्रीडाकुलमें सुप्यत अर्थात स्वापछलको करते हुए ऐसे, अथवा शयन करते हुए श्रीकृष्णका अत्यन्त मन्द हास है जिस क्रियामें जसे होय तैसे, कोई गोपी तो कर्णके भूषणको, कोई गोपी बाहुके स्वर्णकंकणको, कोई गोपी हारको चोरतीहै । यहां शयन विभावित श्वासायनुभावित चेतोमिलनरूप सुप्तचर्वणाविश्रामस्थान है। अब विबोधका लक्षण कहतेहैं "इन्द्रियाणाम्" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि ज्ञानोपयोगी इन्द्रियोंका जो प्रथम प्रकाश सो विबोध है। इसका विभाव निद्राका नाश है । अनुभाव अंगाकृष्टि, जृम्भा, नेत्रमर्दन, अंगुलियोंका मोडना इत्यादि जानना । इसका उदाहरण-"राधाया" इत्यादि श्लोकसे. कहते है । इलोकार्थ यह कि दृष्टिसे अर्थात् कमलत्वसे अध्यवसित. नेत्रका जो द्रोणी कहिये मुद्रण ताकरिकै रहित ऐसे नभ अर्थात क्रीडामण्डपके आकाशको करती हुई जो राधा उसका जो कलकण्ठनिनदः अर्थात कोकिलशब्दत्वसे अध्यवसित राघाहुंकारादिक तद्रूप जो संकेतकृत.
पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (९७) पराहकारप्रशमोत्कटसमीहाऽमर्षः। विभावा अवमानाऽधि- क्षेपादयः। अनुभावाःस्वेदशिरःकम्पननयनाऽऽरुण्यादयः। यथा- अद्याज्ञा नैव भर्तुः सरसिजनयनासूनुसेनासमेतं.. बद्धा लांगूलमूले दशमुखमभितो भूतले भ्रामयामः । शश्वन्मार्गावलोकप्रचलनयनया सीतया साकसेनां लङ्कामुत्पाव्य किं वा रघुपतिचरणाम्भोजयोर्योजयामः३० आकारव्यवहारसंगोपनमवहित्थम् । विभावा ब्रीडाधार्च- कौटिल्यगौरवादयः । अनुभावा अन्यथाकरणाऽन्यथाप्रे- क्षणान्यथाकथनादयः । यथा- - चेष्टाएं उनसे जागते हुए अर्थात निद्राकात्याग करतेहुए ऐसे और कंसके शत्रु औ क्रीडाविट ऐसे, और अंगके आकर्षणसे उलट पुलट होरहा है शरीर जिनका ऐसे श्रीकृष्णका चञ्चल जो अपांग तरंग कहिये नेत्रच्छटा उसका जो भंग कहिये रचना उसमें चतुर अर्थात कुशल जो नेत्ररूप कमल सो हमारी रक्षा करो । यहां निद्राच्छेदसे विभावित अंगाकर्षणसे अनुभावित विवोध चर्वणाविश्रामस्थान है। अव अमर्षका लक्षण कहतेहैं "पराहकार" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि परके अहंकारको प्रणाशके निमित्त जो अत्यन्त इच्छा सो अमर्ष है। इसके विभाव निन्दा और अधिक्षेप अर्थात् सभामे तिरस्कार इत्यादि हैं। और अनुभाव प्रस्वेद शिरका कम्पन नेत्रकी रक्तता इत्यादि हैं। अब इसका उदा- हरण "अद्याज्ञा नैव" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि हनुमान वानरोके प्रति कहते है कि इस समय रामचन्द्रकी आज्ञा नहीं है, यदि होती तो कमलनयना जो मन्दोदरी और सूनु जो मेघनादादि और सेना इन सबसे युक्त ऐसे रावणको पुच्छमे बांधकरिके सम्पूर्ण प्रकारसे पृथिवीमे फिरावै कि- वा निरंतर रामचन्द्रके मार्गके देखनेके लिये चलायमान है नेत्र जिसके ऐसी जो सीता उनके साथ इस लंकाको उपाडकरके रामके चरणारविन्दो में मिला। यहां गग्य जो राक्षसकृत तिरस्कार उससे विभावित और कठोर उक्तिसे अनुभावित अमर्ष चर्वणाविश्रामस्थान है ॥ अब अवहित्थका लक्षण कहते है “आकार" १ विहारेति पाठान्तरम् । ७ (९८) रसतरंगिणी- [तरग:- त्यक्त्वा सम विभीषणः स गतवान्बद्धः स पाथोनिधिः किञ्चित्क्रुध्यति सोऽपि सारणिरतः सीता परित्यज्यताम् । इण्याकर्ण्य सुहृद्णस्य वचनं स्मेराननो रावणो मुक्तादाम करेण कण्ठसविधे कीरस्य विन्यस्यति ॥३१॥ उग्रता निर्दयता । विभावा अपराधदोषकीर्तनचौर्यादयः । अनुभावास्तर्जनताडनादयः । यथा- इत्यादि वावयसे । वाक्यार्थ यह है कि निर्वेदादि जो व्यभिचारिभाव उसका कार्य जो मुखप्रसन्नतादिक सो कहिये आकार और वैसाही जो प्रियभाषणादि सो कहिये व्यवहार उन दोनोंका जो संगोपन अर्थात् छिपानेके अनुकूल अन्ताकर- णवृत्ति सो अवहित्य है । इसके विभाव-लज्जा, धृष्टता, कुटिलता, गुरुता इत्यादि हैं । और अनुभाव-और प्रकार करना, और प्रकार झांकना, और प्रकार बोलना इत्यादि है । इसका उदाहरण "त्यक्त्वा सम" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। इलोकार्थ यह है कि सः कहिये वह अर्थात् बन्धु भी जो विभीषण सो घरको त्याग करिके चला गया। और सः कहिये वह अर्थात् जिसका बन्धन कभी कोई नहीं करसका ऐसा भी जो समुद्र सो बांधा गया । अर्थात वहां भी सेतुबन्धन कर दिया। और वह अर्थात् पत्नीबन्धुभी जो सारणि सो भी कुछ क्रुद्ध होताहै अर्थात् परस्त्रीके हरणको नही सहता है इसकारणसे सीता जो है सो त्याग करनेके योग्य है । इस प्रकार बन्धुगणके वचनको सुन करिके स्मेरानन अर्थात् सुहृदणके वचनकी अवज्ञा की है जिसने अत एव स्मितयुक्त है मुख जिसका ऐसा जो रावण सो सुहृगणोंमें जो कोप उसके परिहारकी इच्छासे आपके हास्यको अन्यसम्भूत जनानेके लिये मोतियोंकी मालाको हाथसे शुकके कण्ठके समीपमें पटकता है अर्थात् शुकके सम्मुख उस मालाको कर देताहै । (यह कहनेका यह अभिप्राय है कि दाडिमबीज जान कारकै कोई स्थानमें पकडता है वा नही पकडताहै यह परीक्षा करनेके निमित्त उसके समीप मालाको धरताहै ) यह राक्षसोंकी परस्पर उक्ति है । यहां गम्य धृष्टतासे विभावित और प्रकार करनसे अनुभावित जो गर्वादिकार्यभूत मुखविकासादिका संगोपनफलक अवहित्य सो चर्वणाविश्रामस्थान है । अव उग्रताका लक्षण कहते हैं इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि प्रचण्ड क्रियाकी कारणीभूत जो इसका मै क्या करूं - ऐसी इच्छा उग्रता" 1 गश्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (९९) कोदण्डं रणभिन्नभूपतिभुजादंडैः प्रचण्डैः कृतं तत्र ज्या प्रतिपक्षराजरमणीवेणीगुणैर्गुम्फिता। क्रूराकारकुठारतारपतनप्रभ्रष्टदुष्टद्धिप- त्रुट्यदन्तदलैः कृतोस्ति विशिखस्तल्लक्ष्यमुद्रीक्ष्यते॥३२॥ यथार्थज्ञानं मतिः । अत्र विभावाः शास्त्रचिन्तनादयः। अनुभावाः शिष्योपदेशभूक्षेपकरचालनचातुर्यादयः । यथा- लाटीनेत्रपुटीपयोधरघटीक्रीडाकुटीदोस्तटी- पाटीदुभवर्णनेन कविभि टैर्दिनं नीयते । सो उग्रता है। इसके विभाव-आपका अपराध और दोपकीर्तन और धनका हरण इत्यादि है । अनुभाव डरपाना, ताडनाकरना इत्यादि हैं । इसका उदाहरण-" कोदण्डस्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि रामके प्रति परशुरामकी उक्ति है कि रणमे मृत जो राजा उनके जो प्रचण्ड वाहुदण्ड उनसे धनुष किया है। और तहां शत्रु राजाओंकी जो स्त्री उनकी जो वेणी तदूप जो तन्तु उनसे प्रत्यञ्चा बनाई है। और कठोर है स्वरूप जिसका ऐसा जो परशु उसका जो ऊंचेसे पडना उससे प्रभ्रष्ट अर्थात् कोपयुक्त जो दुष्ट हस्ती उनके जो टूटते हुए दन्ततल उनसे वाण कियाहै । ऐसे बाणका जो लक्ष्य अर्थात् निशाना है सो हेरा जाताहै । यहां व्यंग्य जो धनुर्भगरूप अपराध उससे विभावित तर्जनसे अनुभावित जो उग्रता सो चर्वणाविश्रामस्थान है ॥ अव मतिका लक्षण कहते हैं “यथार्थ" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि यथार्थ जो ज्ञान सो मति है । इसके विभाव शास्त्रका चिन्तन इत्यादिक हैं । और अनु- भाव शिष्यके प्रति उपदेश, भृकुटीका चलाना और हाथोंका चलाना और चतुरता इत्यादि है । इसका उदाहरण-"लाटी" इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । इलोकार्थ यह है कि मूढ अर्थात् शास्त्रचिन्ताराहत कवि लाटदेशकी नायिकाका नेत्रयुग, कुचकलश, क्रीडाका घर, बाहुका विस्तार, चन्दनका कर्दम इनके वर्णनसे दिन जो हैं सो विताते हैं। और तदेकमन अर्थात् अव्यभिचारिभक्तियुक्त जो पुरुष अर्थात हम सब हैं उनका समय तो गोविन्द ! जनार्दन ! जगतोंके नाथ ! कृष्ण ! ऐसे कथनोंसे व्यतीत होताहै। यहां शास्त्रीचन्तासे विभावित, चातुर्यसे अनुभावित जो मति सो चर्वणाविश्रामस्थान है। - (१००) रसतरंगिणी- [तरग:- गोविन्देति जनार्दनेति जगतां नाथेति कृष्णेति च व्याहारैः समयस्तदेकमनसां पुंसां परिक्रामति ॥ ३३ ॥ नयविनयाऽनुनयोपदेशोपालम्भा अत्रैवान्तर्भवन्ति । उप- देशो यथा- वसु प्रदेयं खलतोऽवधेयं मनो निधेयं चरणे हरस्य । निजं विधेयं कृतिभिर्विधेयं विधेर्विधेयं विधिरेव वेत्ति ॥३४॥ उपालम्भोऽपि द्विविधः-प्रणयात्मा कोपात्मा च । प्रणयात्मा यथा- पाषाणे यदि मार्दवं यदि पयोधारा हुताशोदरे व्यालीनां वदने सुधा यदि वेगमें हिमानी यदि । नीतिशास्त्रसिद्ध अर्थज्ञानरूप जो नय और लोकव्यवहारका अनुवर्तनरूप जों विनय और आपके अभिलाषका ज्ञापनरूप जो अनुभव और उपदेश और उपा; लम्भ इन सबका मतिमें ही अन्तर्भाव है इस हेतु नय आदिक अधिक व्यभि- चारिभाव हैं, यह शंका नहीं करनी । नय आदि तीनोंका उदाहरण उपदेशके उदाहरणमेही गतार्थ है इस हेतु उपदेशका उदाहरण कहते हैं “वसु प्रदेयम्" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि धन दानकरनेके योग्य है । और दुष्ट जनसे सावधानतासे स्थिति करनेके योग्य है । और भगवान् शिवके चरणारविन्दमें मन जो है सो स्थापन करनेके योग्य है । और कृती अर्थात् कुशल पुरुषोंने निज अर्थात् आपके अधिकारितासे विधिवाधितकिया विधेय है अर्थात् करनेके योग्य है । और विधिका अर्थात् दैवका जो विधेय अर्थात् प्राप्त करनेके योग्य फल उसको तो विधि अर्थात् ब्रह्मा ही जानता है । यह कहनेसे कर्मफलेच्छा- परित्यागपूर्वक जो विहित कर्मका करना सो उपदेशयुक्त है सो जानना ॥ उपालम्भ अर्थात् निन्दा दो प्रकारकी है एक तो प्रणयपूर्वक निन्दा, दूसरी कोप- पूर्वक निन्दा । तहां प्रणयपूर्वक निन्दाका उदाहरण "पाषाणे" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि कोई स्त्री अपने प्रियका स्वममें अवलोकन करिकै विरहसे व्याकुल होकरिकै तुम्हारे समागमवशसे मेरी यह दुःखित अवस्था होगई है यह बात अपने पतिको कहनेके अर्थ कामदेवको उपालम्भ देती है कि हे स्मर! भूमिपाल ! हे भगवन ! क्रोधसे व्यर्थ क्यो दौडते है अर्थात बहुत स्थानका आक्र- पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (१०१) स्थेया किञ्च समीरणे यदि तदा स्वप्ले भवेत्सत्यता किं नामस्मरभूमिपाल भगवन् क्रोधान्मुधाधावसि॥३५॥ कोपात्माऽमर्ष एवान्तर्भवति । यथा- जनयसि जगदेव देव देवाभरण सुधारसशीतलं सुधांशो। उरसि वहसि मे तथाऽपि तापं यदुपतिक्त्रसखाऽसि किं ब्रवीमि ॥३६॥ ज्वरादिविकाराख्यो व्याधिः । कुपितधातुभयकामक्केशा- दयो विभावाः । अनुभावा दशोपद्रवाः । यथा- दातुं स्वीयमनर्घ्यदीधितपदं तस्याः कुरङ्गीदृशः केयूरं कनकांगुलीयकमिवानेतुं बहिर्गच्छति । मण क्यों करतेहो ? हमारे कहनेको सुनो, कि यदि पत्थरमें कोमलता होय, अग्निमें जलकी धारा होय, सर्पिणीके मुखमें अमृत होय, सूर्यमें खूब ठण्डापनां होय, वायुमें स्थिरता होय, तो स्वममें सत्यता भी होय । इसका यह अभिप्राय है कि स्वमदर्शनमात्रसे क्यों दुःख देतेहो। यहां नायकका हृदय अतिकठिन है यह व्यंग्य जानना । कोपपूर्वक जो निन्दा है सो अमर्ष विना नहीं होतीहै इस हेतु इसका अमर्षमे अन्तर्भाव है । इसका उदाहरण “जनयसि" इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । इलोकार्थ यह है कि चन्द्रमाके प्रति नायिकाकी उक्ति है कि हे देव देव जो महादेव उनके आभूषण! अर्थात् मस्तकके अलंकरण ! ऐसा सम्बोधन देनेसे आप महाजन स्वीकृत हो यह सूचित हुवा। और अमृतकिरणयुक्त ! तु जगतको सुधारससे शीतलही करता है । इस रीतिसे दोनोंही प्रकारसे उत्तम है तौभी मेरे हृदयमें ताप करताहै परन्तु श्रीकृष्णका मुख तेरा मित्र है इस हेतु मैं क्या कहूं । अनौचित्यसे कुछ नहीं कह सकतीहूं। यह जो चन्द्रमाका उपालम्भ सो कृष्णके उपालम्भमें पर्यवसन्न है । अब व्याधिका लक्षण कहते हैं "ज्वरादि" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि बरादिसे उत्पन्न जो मानस विकार सो व्याधि- है। यहां ज्वरके जो कारण है धातुका कोप, भय, भ्रम, क्लेश इत्यादि केही इसके विभाव है । और अनुभाव दश उपद्रव हैं । १ अभिलाष, २ स्मृति, ३ चिन्ता, ४ मरण, ५ गुणकीर्तन, ६ व्याधि, ७ प्रलाप, ८ उन्माद, ९ जड़ता, और १० उद्देग । यहां व्याधिशब्दसे शरीरका सन्ताप, कृशता आदि जानना ॥ इसका उदाहरण "दातुम्" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि उस (१०२) रसतरंगिणी- [ तरंग:- - अन्यत्कृष्ण ! निवेदयामि किमितो वेणीमिषात्कालियो दृष्ट्वालोचनवारि कालियसरोभ्रान्त्या परिभ्राम्यति ॥ ३७॥ विना विचारमाचार उन्मादः । न चागम्यागमनेऽतिव्या- प्तिः। विना विचारमितिपदेन तव्यावर्तनात् । तत्र सुख- मुद्देश्यम्, तदंशे विचार एव क्रिया न समीचीनेत्यन्यदे तत् । अप्रेक्ष्यकारिता उन्माद इति यस्य मतं तत्रेदं दूष. णम् । तत्र विभावाः प्रियवियोगविभवभ्रंशादयः। अनु- भावा वृथालपितवृथाहसितवृथारोदनादयः । यथा- मृगीसदृश नेत्रवालीका जो केयूर अर्थात बाहुका भूषण सो आपका जो उज्ज्वल कान्तियुक्त स्थान अर्थात् बाहु उसको देनेके अर्थ सोनेकी जो अंगूठी उसकों बुलानेको ही मानो बाहर जाता है, इससे देहमें अत्यन्त कृशता व्यञ्जित हुई। हे कृष्ण ! और क्या उसके दुःखका निवेदन करूं कि वेणीके छलसे कालिय सर्प जो है सो लोचनके जेलको देखकरकै चमुना सरोवरकी भ्रान्तिसे चारों तरफ भ्रमण करताहै। यहां कामसे विभावित कृशतादिसे अनुभावित व्याधि चर्वणाविश्रामस्थान है। अव उन्मादका लक्षण कहते है "विना विचारम्" इत्यादि वाक्यसे वाक्यार्थ यह है कि विना विचार अर्थात् सुखको उद्देश्य किये विना जो आचरण सो ही है फल जिसका ऐसा मनोविकार सो उन्माद है। यहां आचरणका विशेषण जो (सुखको उद्देश्य किये बिना) है सो न कहै तो अगग्य जो स्त्री अर्थात् नहीं गमन करने योग्य जो गोत्रादिकी स्त्री तहां जो गमन वह भी आचरणरूप है अत: यह मनोविकारभी उन्माद कहावेगा, तो वहां अतिव्याप्ति होगी, इस हेतु सुखको उद्देश्य किये विना यह विशेषण दिया, तो अगम्यागमनरूप जो आचरण सो सुखको उद्देश किये विना नहीं होताहै, इस कारण इसके आचरण हेतु मनोविका- रमें अतिव्याप्ति नहीं हुई। यह जो आचरण है सो समीचीन है वा असमीचीन है यह कथा दूसरी है। कोई कहते हैं कि बलवान् जो अनिष्ट उसकी साधनता बुद्धिको उत्पन्न न होने दे ऐसी जो अन्तःकरणकी वृत्ति सो उन्माद है इसही को अप्रेक्ष्यकारिता कहते हैं । यह जिनका मत है, उनके मतमें अगम्यागमन- फलक जो मनोवृत्ति है तहां अतिव्याप्ति होगी, इस हेतु यह उन्मादका लक्षण नहीं पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (१०३) नैषा काऽपि चकास्ति काश्चनलता सैवास्ति मे राधिका पृष्टा चेन्न कुतोऽपि जल्पति तदा संमूर्छिता वर्तते । इत्थं हन्त विचिन्त्य सिञ्चति मुहुर्नीरैरधीरेईशो वातं व्याननुते करेण सुजयोराधाय सम्भाषते ॥ ३८ ॥ प्राणनिष्क्रमणं निधनम् । विभावाऽनुभावों स्पष्टौ । यथा- पर्यस्तांत्रि विकीर्णबाहु पततः संग्रामभूमौ मिया लंकेशस्यन केशपाशमनिलः स्प्रष्टुं समाकाङ्क्षति । कहना सो जानना। इसके विभाव-प्रियका वियोग, विभवका नाश होना इत्यादि हैं। और अनुभाव-वृथा आलाप, वृथा हँसना, वृथा रुदन इत्यादि हैं। इसका उदाहरण "नैषा कापि" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि दूती किसी सखीसे कहती है कि यह अर्थात् दृष्टिगोचर और अनिर्वचनीय ऐसी स्वर्णलता प्रकाशित होती है, इस प्रकारका ज्ञान तो नहीं किया किन्तु वह परम प्रेमका पात्र हमारी राधिका है, ऐसा जान करिकै उस स्वर्णलताको कहने लगे कि, कोई प्रकारसे पूछताहूं तो नहीं बोलती है, अर्थात् उत्तर नहीं देती है, तो मैं जानता हूं कि यह मूछिता अर्थात् मोहित होरही है। इस प्रकार निश्चयकरिकै श्रीकृष्ण जो है सो अधैर्यसूचक जो नेत्रोंका जल उससे उस लताको सीचते है । और वात अर्थात् अधिक श्वासको विस्तारित करते हैं। और आपके हाथसे दोनों जो भुजा अर्थात् भुजात्वसे अध्यवसित जो काञ्चनलताका समीप भाग उसमे ग्रहणकरिकै बोलते हैं, अर्थात् प्रलाप करते हैं । यहां प्रियावियोगसे विभावित और वृथा रोदनाद्यनुभावित जो उन्माद सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अब निधनका लक्षण कहते हैं "प्राण" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह कि प्राणनिष्क्रमण समयकी जो चित्तवृत्ति सो निधन है। इसके विभाव व्याधि अभिघात इत्यादि लोकप्रसिद्ध हैं, और अनुभाव निश्चेष्टतादि है, सो जानना । इसका उदाहरण "पर्यस्ताघ्रि" इत्यादि श्लोकसे कहते है, श्लोकार्थ यह है कि पर्यस्त कहिये विस्तारित हैं चरण जिस क्रिशमें जैसे होय तैसे और विस्तृत हैं बाहु जिस क्रियामे जैसे होय तैसे संग्रामभूमिमे पडते हुए रावणके भयसे केश- समूहका स्पर्श करनेके निमित्त वायु जो है सो इच्छा नहीं करताहै । और राव- णके मुखकमलमें सूर्य आपके दीप्त किरणोंको नहीं पटकताहै। और देवता आपके घरमे कथा अर्थात् रावणके मरनेकी वार्ता भी प्रकाशित नहीं करते है।
(१०४) रसतरंगिणी- [तरग:- उष्णं नोष्णकरः करं किरति वै वक्रारविन्दे नवा स्वेस्ले धाग्नि मिथः कथामपि सुराः प्रव्यक्तमातन्वते ॥३९॥ मनोविक्षोभस्त्रासः। तथा च विचारोत्थमनःक्षोभोभीतिः । आकस्मिकमनःक्षोभस्त्रास इति विक्षोभेणैव द्वयोरप्येकत्वे- नोपसंग्रहः। विभावा घोरस्वनश्रवणघोरसत्त्वदर्शनादयः। अनुभावाः स्तम्भस्वरभेदरोमाञ्चस्रस्तगात्रतादयः। यथा- शृण्वानो हरिनाम रामवदनादिन्द्रस्य शङ्कां वहन् कुर्वन्कातरमातरं स भगवान्मनाकभूमीधरः। कुञ्चत्पक्षति भुग्नितश्रुति कृतप्रत्यङ्गचोलावृति त्यक्तव्याहति सिन्धुपङ्ककुहरे निर्मक्तुमाकाङ्क्षति ॥ १० ॥ यहां संग्रामविभावित भूएतनाद्यनुभावित जो निधन सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अव त्रासका लक्षण कहते हैं “मनोविक्षोभः" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि मनका जो क्षोभ सो त्रास है । इसका अभिप्राय यह है कि मनका विक्षोभ दो प्रकारका है, एक तो यह है कि, उत्कट, दूसरा अनुत्कट । तहां विचारसे उत्पन्न जो मनोविक्षोभ सो उत्कट है उसको भय कहते है । अनुत्कट जो मनोविक्षोभ है सो भी दो प्रकारका है एक तो प्राक्सम्भावित, दूसरा आकस्मिक । तहां जिस भयका पूर्वकालमें निश्चय रहै वह प्राक्सम्भावित है। और जिस भयकी पूर्वसम्भावना नहीं वह आकस्मिक है । . अब इस रीतिसे उत्कट अनुत्कट दो प्रकारका जो विक्षोभ है तिसमें एकका ग्रहण करेंगे तो दूसग अधिक व्यभिचारिभाव होगा इस हेतु विक्षोभपदसे दोनोंका ग्रहण करलिया, इस हेतु एकही व्यभिचारिभाव इसको जानना चाहिये। परन्तु भीतिको त्रास नहीं कहा जाताहै, इसलिये उत्कटसे भिन्न ऐसा जो विक्षोभशब्दवाच्य वस्तु उसको त्रास कहते हैं सो जानना । इसके विभाव घोर शब्दका श्रवण, घोर प्राणियोंका दर्शन इत्यादि जानना । अनुभाव स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, अश्रुपात इत्यादि जानना । इसका उदाहरण "शृण्वानः" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि समुद्रसे उतरनेके समय कोई विषयमें शंभुके मुखसे हरि इस नामको सुनता हुआ, और उस ही श्रवणसे नाममें इन्द्रकी शंका करता हुआ, इस ही हेतु मनको चकित करता हुआ, वह जो भगवान् (१०५) भाषाटीकासहिता। पञ्चमः ५.] विचारो वितर्कः। विभावा विप्रतिपत्तिसंशयसाधकबाध- कमानसमुद्भावादयः । अनुभावाः शिर कम्पधूचाल- नादयः । वितर्कश्चतुर्विधः-विचारात्मा संशयात्माऽन- ध्यवसायात्मा विप्रतिपत्त्यात्मा चेति । अनध्यवसाय उत्कटकोटिकसंशयः । प्रत्येकमुदाहरणानि- अर्थात् गुप्त होनेकी शक्तियुक्त जो मैनाकनामा पर्वत सो संकुचित है पक्ष जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और वक्रीकृत हैं कर्ण जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और अंग अंगके प्रति वस्त्रका आवरण है जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और धारण किया है मौनत्रत जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, समुद्र के कर्दममें सुलभ जो विवर उसमें गुप्त होनेको इच्छा करताहै । यहां शत्रुनामश्रवणसे विभावित, अंगसंकोचादिसे अनु- भावित जो त्रास सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अब वितर्कका लक्षण कहते हैं "विचारः" इत्यादि वाक्यसे । यद्यपि उहको वितर्क कहना यह प्राचीनांका लक्षण है, उसकी चिन्तामें अतिव्याप्ति होती है, क्योंकि चिन्ताकोभी कौन प्रकारसे यह संघटित होगा, ऐसा जो ऊह तदूपता है इस ही आभिप्रायले विचार जो है सो वितर्क है यह कहनेवाले ग्रन्थकारने विवक्षिता- र्थनिश्चयाऽनुकूल जो यह ऐसा होनेके योग्य है, इस आकारका ऊह तो विचारपदसे कहा. वह ही विचार वितर्क है। सो इसके विभाव विप्रतिपत्ति, संशय, साधक, बाधक, मानका उद्भावन इत्यादि है । वादी प्रतिवादीका परस्पर विरुद्ध जो वाक्य सो विप्रतिपत्ति है । जैसे एकने कहा कि शब्द नित्य है, दूसरेने कहा अनित्य है। यहां नित्यत्व और अनित्यत्व ये दोनों विरुद्ध वस्तु है, इनका प्रति- पादक जो 'शब्दो नित्यो न वा' वाक्य सो विप्रतिपत्तिरूप जानना । विरुद्ध जो वस्तु उनका जो एक धर्मी में ज्ञान सो संशय है, जैसे वहि और वहिका अभाव ये दोनों विरुद्ध वस्तु हैं इन दोनों वस्तुओका जो पर्वतमें (पर्वतो वहिमान्न वा) इत्याकारक ज्ञान होय सो संशय है। यह विप्रतिपत्ति अथवा संशय जहां होय तहां साधकप्रमाण अथवा बाधकप्रमाण इनका.जो प्रकटन करना सो साधक- वाधकमानसमुद्भावन है । इसके अनुभाव-मस्तकको कॅपाना, भुवोंको चलाना इत्यादि है । वह वितर्क चार प्रकारका है-विचारात्मा, संशयात्मा, अनध्यवसा- यात्मा और विप्रतिपत्त्यात्मा। तहां उत्कटकोटिसाधकउपन्यासरूप जो विचार उससे आत्मा अर्थात् स्वरूप होय जिसका ऐसी व्युत्पत्तिसे विचारपूर्वक जो वितर्क सो हुआ विचारात्मा, 'यह वस्तु इस वस्तुके होनेसे ऐसा होने योग्य है' (१०६) रसतरंगिणी- [तरंग:- कालिन्दीविलुठत्कोरकमठङ्करं धनुः शाम्भव रामो बालमृणाल कोमलवपुर्वंशोऽवतंसो सुवः। व्याहारप्रखराः खलाः क्षितिभृतां गोष्ठी गरिष्ठा पुन- स्तस्मात्केवलमेष तिष्ठति मम श्रेयस्करो भास्करः॥४१॥ इस आकारके वितर्कका नाम विचारात्मा है यह फलित अर्थ हुआ। संशयसे है स्वरूप जिसका इस व्युत्पत्तिसे संशयपूर्वक वितर्कको संशयात्मा कहना तो यह वस्तु ऐसा भी हो सकताहै अन्यथा भी हो सकताहै' ऐसे आकारके उहको संशयात्मा कहना यह फलित हुआ। अध्यवसाय विपरीत निश्चयको कहते हैं, उसका जो विरोधी अर्थात् विशेषदर्शन सो अनध्यवसाय कहिये, उससे है स्वरूप जिसका इस व्युत्पत्तिसे विशेषदर्शनपूर्वक जो ऊह सो अनध्यवसायात्मा कहिये तो यह बरतु इस गुणसे युक्त उक्त प्रकारसे किस प्रकार होगा ? ऐसा जो ऊह सो अन- ध्यवसायात्मा है यह फलित हुआ । इसहीको उत्कटकोटिकसंशय ग्रन्थकारने कहाहै । दोनों ही कोटिसे व्यावृत्त अर्थात् भिन्न स्थानमें रहनेवाला जो धर्म उसकी जो प्रतिपत्ति अर्थात् ज्ञान सो कहिये विप्रतिपत्ति उससे है स्वरूप जिसका इस व्युत्पत्तिसे कोटिकद्वयव्यावृत्त जो धर्म अर्थात् दोनों कोटिके रहनेके स्थानमें न रहै ऐसा जो धर्म उसका जो दर्शन उससे उत्पन्न जो संशय तत्पूर्वक जो ऊह सो कहिये विपतिपत्त्यात्मा, तो 'यह वस्तु इस वस्तुके होनेसे ऐसा नहीं होसकताहै उसके होनेसे ऐसा भी नही हो सकताहै' इस आकारके उहका नाम विप्रतिप- त्यात्मा है यह फलित हुआ। अब विचारात्माका उदाहरण "कालिन्दी" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । इलोकार्थ यह है कि स्वयंवरप्रसंगमे रामको देखतेहुए. जनककी आपके मित्रके प्रति उक्ति है कि पण किया ऐसा महादेवका जो धनुष सो यमुनामें रहनेवाला और कठिन ऐसा जो कमठ अर्थात् कच्छप उसकी कठोर- ताके सदृश है, कठोरता जिसकी ऐसी है, अर्थात् महावीरके भी शक्य जिसका आकर्षण नही है ऐसी है। और दशरथके पुत्र जो राम सो नया पैदा हुआ जो कमलनाल उसके सदृश है कोमल शरीर जिसका ऐसा है, अर्थात् महावीरको शक्य नहीं आकर्षण जिसका ऐसा जो धनुष उसके आकर्षण, अत्यन्त अशक्त है। और हमारा जो कुल है सो पृथिवीका अलंकरणरूप है (यह कहनेका अभि- प्राय यह है कि अबतक यह कुल अकलंकित है परन्तु इस कन्यासे तो रामका ही विवाह होगा और मेरी प्रतिज्ञा है कि धनुष तोडनेवालेको कन्या दूंगा (१०७) पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। सौन्दर्यस्य मनोमवेन गणनालेखा किमेषा कृता लावण्यस्य विलोकितुं त्रिजगतीमेषा किमुद्रीविशा। आनन्दद्रुममञ्जरी नयनयोः किंवा समुज्जृम्भते राधायाः किमुवा स्वभावसुभगारीमालिरुन्मीलति४२॥ और रामसे धनुष टूटैगा यह दीखता नहीं है तो प्रतिज्ञाभंग हो जायगा तो लोकमें अकीति होगी सो अकीर्ति हमारे अनुरूप नहीं है ) कदाचित् कहैं कि विवाहमें प्रतिज्ञाभंग होना दोषप्रद नहीं है सो ठीक है परन्तु दुष्टमति जो जन हैं सो दोषो- भावन विषयमें अत्यन्त निपुण हैं । ऐसा है तो हमारी प्रतिज्ञाका भंग होनेसे हम दोष नहीं भी मानैगे तो भी हमको अनाचारिताकी प्राप्ति होवैगीही सो जानना। और यहां राजाओंकी सभा बहुत भारी है इस हेतु लोकोके सामने ऐसा भी अनाचार योग्य नहीं है इस कारणसे हमको कर्तव्य अर्थकी परिस्फूर्ति नहीं होती है। अब तो प्रतिदिन जिनकी उपासना करतेहै ऐसे जगत्प्रकाशक सूर्य ही हमारा कल्याण करनेवाले स्थित हैं। यहां रामचन्द्र धनुषका नमन करेंगे वा नहीं करेंगे ऐसी जो मित्रकी विप्रतिपत्ति उससे विभावित और गम्य जो शिरःकम्पादि उसमे अनुभावित जो देवताऽनुगुण्यरूप साधकोपन्यासात्मक विचारपूर्वक सूर्यकी सहायतासे राम धनुषका नमन करे इत्याकारक ऊह सो चर्वणाविश्रामस्थान है ॥ अव संशयात्माका उदाहरण-"सौन्दर्यस्य" इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि कोई रोमावलीकी प्रशंसा करता है कि यह जो दीखती हुई दीर्घ और सूक्ष्म और श्यामल है सो कामदेवने सौन्दर्यकी गणनारेखा अर्थात् संसारमे एक ही यह सौन्दर्य है इसकी सूचक लिपि की है क्या ? ऐसा दीखताहै । अथवा लावण्यमे तीनों जगतोंको देखनेके लिये ऊंची ग्रीवा की है क्या ? ऐसा दीखताहै। अथवा दोनों नेत्रोंका जो आनन्दरूप वृक्ष उसकी जो मञ्जरी अर्थात् पुष्पगुच्छ सो वृद्धिको प्राप्त होताहै क्या ? ऐसा दीखताहै । अथवा राधाकी स्वभावसे सुन्दर जो रोमावली सो दोनों नेत्रके विपयमें प्रकाशित होती है क्या ? ऐसा दीखताहै । यहां संशयसे विभावित गम्यभूचालनसे अनुभावित और कविकल्पित जो वक्ता उसका जो उक्त प्रकारका संशय तत्पूर्वक जो यह राधाकी रोमावली सो भी होसकती है, गणनारेखा भी होसकती है (१०८) रसतरंगिणी- [तरंगः- कथय कथय केयं खञ्जनं खेलयन्ती विहरति यमुनायाः पाथसि स्वर्णवल्ली। अयमुदयति को वा शारदः शीतभानु- स्तदुपरि तिमिराणामेष को वा विवर्तः ॥ १३ ॥ इयं न विलसत्सुधाकरकलाऽधिका राधिका करं किरणमालिनः किमु सहेत तस्या वपुः। . इत्याकारक ऊह सो चर्वणाविश्रामस्थान है ॥ अब अनध्यवसायात्माका उदाहरण " कथयकथय " इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि यमुनातीरमें स्थित जो राधा उसका यह वर्णन है कि यमुनाके जल में स्वर्णवलित्वसे अवगत ऐसी खञ्जनत्वसे अवगत जो नेत्र उसको खिलाती अर्थात् उद्वेग कराती ऐसी कौन है ? अर्थात् पूर्व इसको नहीं देखी है इसको कहो कहो। और अतिप्रसन्न शीवकिरण, त्वसे अवगत वह भी कौन उगताहै ? अर्थात मेरे सम्मुख आरहाहै । और इसके ऊपर प्रत्यक्ष ऐसा जो तिमिरतासे भासमानका विवर्त अर्थात् परिणामभेद कौन है यह भी कहो? यह भी पूर्व देखा हुआ नहीं है । यहां गम्य जो परवैमत्यादि उस- से विभाक्ति और परकीय प्रश्नस अनुभावित जो खश्चनात्मक विशेषदर्शनपूर्वक खानाध्यवसितलोचनयुगयुक्त यह नायिका कैसे हो सकेगी, और तिमिरत्वसे अध्यवसित धम्मिल्लसे युक्त यह मुख किस प्रकार हो सकेगा। ऐसा जो ऊह सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अब विप्रतिपत्त्यात्माका उदाहरण इयम्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्य यह है कि विशेषतासे शोभायुक्त अर्थात् प्रकाशमान जो सुधाकरकला अर्थात् अमृतभरपूरित अधविम्बात्मक एकदेश ही अमृतपूरितषोडशकलामूर्तिरूप चन्द्रसे आधक है जिसम एसी यह राधिका नहीं, क्योंकि राधिकाका जो शरीर है सो किरणमाला अर्थत सूर्यकी जो किरण उसको सहेगा क्या? इसमे राधिका नहीं है और कनकमञ्जरी भी यह नहीं है, क्योंकि जिसकारणसे खारट अर्थात् पक्षि- विशेषको धारण करती है तिस कारणसे दोनोंसे विलक्षणता हानेसे स्मरमदा- लसा अर्थात् शरीरगौरवसे युक्त ऐसी यह देखने में आती है सो कौन है सोकहो । यहां आधिश्यरूप साधकको सूर्यकिरणरूप बाधकको उपन्याससे विभावित परकीयमश्नमे अनुभावित असाधारण धर्मदर्शनजन्यसंशयपूर्वक यह सूर्यकिर- " पञ्चमः ५.] (१०९) भाषाटीकासहिता। न वा कनकमञ्जरी वहति खारीटं यत- स्ततः स्मरमदालसा कथय केयमुन्मीलति ॥ १४ ॥ ननु दशावस्थास्वभिलाषगुणकथाप्रलापा व्यभिचारिभा- वाऽभ्यन्तरे न गणितास्तत् किं स्वतन्त्रा एवेति चेन्न । औत्सुक्येऽभिलाषस्य वर्णनात्मकस्मृतौ गुणकथाया उन्मादे प्रलापस्यान्तर्भावात् । अत्र प्रतिभाति छलमधिको व्यभि- चारिभाव इति । "ताम्बूलाहरणच्छलेन रभसा श्लेपोऽपि संविनितः' इति शृङ्गारे दर्शनात् । रौढ़े चेन्द्रजालादि- दर्शनात् । हास्ये च व्यपदेशाऽन्यापदेशयोर्दर्शनात् । वीथीभेदे दर्शनाच्च। णके सहनसे राधिका नहीं है खञ्जरीटके धारणसे कनकमञ्जरी भी नहीं है इस आकारका ऊह चर्वणाविश्रामस्थान है। यहां यह शंका होती है कि दोनों कोटिसे जो भिन्न धर्म उसका दर्शन होतसन्ते अन्यतर कोटिका निश्चय नहीं होसकेगा ऐसा हुआ तो विवक्षितार्थ निश्चयके अनुकूल यह उह नहीं हुआ इस हेतु वित. कलक्षणकी यहां अव्याप्ति हुई । इसका समाधान यह है कि 'स्मरमदालसा' इस पदसे गात्रगुरुतादिसे कयचित् सहता भी है इस अर्थका प्रकाश होनेसे राधाकोटिनिश्चयकी अनुगुणता स्फुट ही है तो अव्याप्ति नहीं हुई सो जानना ॥ यहां यह शंका होती है कि दश अवस्था जो कही है तहां कोई तो शारीर है कोई मानस है जैसे व्याधि और उन्माद यह दोनों शारीर है तहां व्याधि जो है सो विकाररूप है, इस हेतु वैवर्ण्यरूप सात्तिकमावमें अन्तर्गत है। और नानाविधव्यापारात्मक जो पुलकादिरूप उन्माद है सो तो यथायोग्यरोमाञ्चादिम अन्तर्गत है । और सव अवस्था मानस हैं । उनमे चिन्ता, स्मृति, जडता इनका तो व्यभिचारिभावों में परिगणन किया है और अभिलाष, गुणकीर्तन, प्रलाप इनका परि- गणन व्यभिचारिभावोमें क्यो नहीं किया तो ये तीनों क्या इनसे न्यारे हैं ? इसका समाधान यह है कि अभिलाष तो इच्छारूप है इस हेतु औत्सुक्यमें अन्तर्गत होगा। और गुणकथाका वर्णनात्मक स्मृतिमें अन्तर्भाव है । और प्रलापका उन्मादमें अन्तर्भाव है इस हेतु ये तीनों व्यभिचारिभावोंमें अन्तर्गत हैं. स्वतन्त्र नहीं (११०) रसतरंगिणी- [ तरंग:- संगुप्तक्रियासंपादनं छलम् । विभावा अवमानप्रति- है सो जानना । यह दिवप्रदर्शन कर दियाहै । और भी जानना चाहिये कि उद्वेग जो है सो व्याधिमें अन्तर्गत है । और निधन जो है सो मरणरूप व्यभिचारि- भावमें अन्तर्गत है । ऐसा हुआ तो जो अवस्था जिस व्यभिचारिभावमें अन्तर्गत होजाय उस अवस्थाका उदाहरण उस व्यभिचारिभाषके उदाहरणमें अन्तर्गत जानना । अब यहां यह प्रतीत होताहै कि व्यभीचारी छलरूपते तिससे पृथक है । क्योंकि 'ताम्बूलाहरण' इत्यादि शृंगारश्लोकमें छलका कथन देखते है यह श्लोक इस प्रकार है कि । “एकत्रासनसंस्थितिः परिहृता प्रत्युद्गमारतस्ताम्बूला. हरणच्छ लेन रभसाश्लेषोऽपि संविनितः । आलापोऽपि न मिश्रितः परिजनं व्यापा- रयन्त्या तया कान्तं प्रत्युपचारतश्चतुरया कोपः कृतार्थीकृतः।" इस श्लोकका अर्थ यह है कि चतुरा जो वह नायिका है उसने कान्तके प्रति ईर्ष्या मान - जो है सो उपचार अर्थात् तत्तत्कालोचित क्रियाओंसे 'कृतार्थीकृत:' अर्थात् अकृतार्थ कृतार्थ करदिया। इसका अभिप्राय यह है कि स्फुटभी जो ईामान् सो अस्फुट- ताको प्राप्त करदिया, क्योकि कोप प्रकाश होत सन्ते कोपकी निवृत्तिमें चतुर नायकने सुन्दरवचनादिकोंसे एक स्थानमें स्थित होकरिकै कोपको अनर्थकता होजाती इस हेतु उस कोपको गुप्त किया, यही बात प्रगट करते हैं कि, दूरसे उठकरिकै सम्मुख जानेसे एक स्थानमें स्थितिका त्याग करदिया । और बीटि- काका.आनयनरूप जो कार्य उससे रभसाश्लेष अर्थात् प्रेमालिंगन जो है सो भी विघ्नयुक्त कर दिया। अभिप्राय यह है कि आलिगनाऽवसरमें आपही उठकारकै ताम्बूलकी बीटिका लाने चली गई इस हेतु आलिंगनकाभी त्याग करदिया। यहां छलशब्द कार्यार्थक जानना इस हेतु वमनाख्य दोष नहीं है । और परिजन अर्थात् बन्धुवर्गको तत्तव्यापारयुक्त करती हुई ऐसी उसने आलाप अर्थात् परस्पर प्रश्नरूप भाषण भी नही मिश्रित किया अर्थात् उत्तर प्रत्युत्तर नहीं हुआ। और रौद्ररसमें इन्द्रजालादि छलरूप देखते हैं । और हास्यरसमें व्यपदेश अर्थात् छलयुक्त व्यवहार और अन्यापदेश अर्थात् औरसे छल करना यह देखते हैं। और मार्गविशेषमें अर्थात् कणादशास्त्रसे पृथग्भूत न्यायशास्त्र में गौतमरचित प्रथम सूत्रमें छलकी पृथक गणना है अभिप्राय यह है कि प्राचीन निवन्धमें भी छलकी गणनाहै सो जानना। हेतु छलका लक्षण कहते हैं “संगुप्त" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि , पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिता। (१११) पक्षकुचेष्टादयः । अनुभावा वक्रोक्तिनिभृतस्मितनिभृतवी- क्षणप्रकृतिप्रच्छादनादयः । शृङ्गारे यथा- संकेतीकृतकाननं प्रविशतोरन्योऽन्यकौतूहला- दन्यत्वप्रतिभानमारचयतोरन्योन्यमुत्रस्यतोः । कुञ्चत्कायमितस्ततः किसलयैरात्मानमावृण्वतो राधामाधवयोनिकुञ्जकुहरादुद्दीविका पातु नः ॥ ४५ ॥ संग्रामे यथा- सप्ताऽपि क्लृप्तान्कपटाम्बुराशीन्युरोपकण्ठे पुनरीक्षमाणः । दृशौ कपीन्द्रस्य सुखेसखेदमायोजयासास स रामचन्द्रः४६॥ कोई क्रियाका जो गोपन इसका कारणीभूत जो क्रियान्तर उसकी कारणीभूत जो अन्तःकरणवृत्ति सो छल है। अवहित्य जो है सो तो निर्वेदादि जो अनुभाव हैं उनका गोपन उसको उत्पन्न करनेवाला है, और छल जो है सो उससे भिन्नक्रि- याका गोपन करनेवाला है, इससे इनमे भेद जानना। इसके विभाव अवमान और विपरीतपक्ष और कुत्सितचेष्टा इत्यादि है। अनुभाव वक्रोक्ति, निरन्तर स्मित और निरन्तर झांकाना और प्रकृतिका छिपाना इत्यादि जानना । शृंगार रसमे छलका उदाहरण"संकेतीकृत"इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्य यह है कि निकुनकुहर कहिये लतामण्डपके समीपमें स्थित होकरिकै कीहुई जो राधा- माधवकी उग्रीविका अर्थात् ग्रीवाका ऊँचा करना सो हमारी रक्षा करो। कैसे है राधा माधव सो, कहते हैं कि संकेतीकृत कानन अर्थात् किया है संकेत जिसका ऐसे वनके प्रति जातेहुए ऐसे, और परस्परमे कौतुकसे जो न्यारापना जानना अर्थात भिन्न २भी जो राधा-माधव तिनका यथार्थतासे परस्पर ज्ञान नहीं होय इस रीतिसे व्यवहार करते हुए, इसही हेतु परस्पर उत्रसित होते अर्थात् वह तो उनके जाननेके भयसे युक्त और वह उनके जाननेके भयसे युक्त ऐसे और संकोचयुक्त है शरीर जिस क्रियामें जैसे होय तैसे । कही कही आपके स्वरूपको आम्रपत्रोसे ढकते हुए ऐसे। यहां निशंकव्यवहारपरीक्षासे विभावित और निरन्तरवीक्षणायनुभावित कुलप्रवेशगोपनफलक जो छल सो चर्वणाविश्रामस्थान है। अव संग्राममें छलका उदाहरण कहते हैं “ सप्ताऽपि" इत्यादि श्लोकसे।
(११२) रसतरंगिणी- [ तरंग:- सर्वाणि व्यभिचारिस्थलानि विस्तरभयानोदाहृतानि । आलस्यौग्यजुगुप्साः सम्भोगे वाः । विप्रलम्भे चाल. स्यग्लानिनिर्वेदश्रमशंकानिद्रौत्सुक्यापस्मारसुप्तविबोधो- न्मादजाड्यासूया व्यभिचारिणः । हास्येऽवहित्थाल- स्यनिद्रासुप्तप्रबोधाऽसूयाव्यभिचारिणः । करूणे मोह- निर्वेददैन्यजाड्यविषादभ्रमापस्मारोन्मादव्याध्यालस्य- स्मृतिवेपथुस्तम्भस्वरभेदाश्रूणि व्यभिचारिणः।रौद्र उत्सा- हस्मृतिस्वेदावेगामर्षरोमाञ्चचपलतोगत्वस्वरभेदकम्पा व्य- भिचारिणः। वीर उत्साहधृतिमतिगर्वावेगामय्यिरोमाञ्चाः श्लोकार्थ यह है कि भ्रान्तिकरिकै सत्तायुक्त जो सातोंही कपटाम्बुराशि अर्थाद इन्द्रजालरचित समुद्र उनको लंकाके समीपमें देखता हुवा जो वह अर्थात् देखाहै हनुमानका पराक्रम जिसने ऐसा रामचन्द्र सो उदधिका आक्रमण करनेवाले हनुमानके मुखमें दोनों नेत्रोंको खेदयुक्त जैसे होय तैसे प्रेरित करता भया । यही अम्बुराशिका अवभासक जो प्रतिपक्ष राक्षस उसकी कुचेष्टासे विभावित, खेदयुक्त दृष्टिपातसे अनुभावित आपका तत्त्वावगोपनफलक जो रामनिष्ठ छल सो चर्वणाविश्रामस्थान है । "ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः। छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ।" इत्यादि रौद्रकाव्यमें भी छल देखते है सो जानलेना। यहां कोई शका करताहै कि यह जो तेतीस प्रकारकी संख्याका नियम किया सो नहीं बनसकता है, क्योंकि मात्सर्य, उद्वेग, दम्भ, ईया, विवेक, निर्णय, क्लीवता, क्षमा, कौतुक, उत्कण्ठा, विनय, संशय, धृष्टता इत्यादिको भी तहां उदाहरणसे देखते हैं। यह शंका समीचीन नहा क्योंकि असूयासे मात्सर्यका, त्राससे उद्धेगका, अवहित्थसे दम्भका, अमर्षसे ईर्ष्याका, मतिसे विवेक और निर्णय इन दोनोका, दीनतासे . क्लीवताका, धृतिसे क्षमाका, औत्सुक्यसे कुतुक और उत्कण्ठा इन दोनोका, लज्जासे विनयका, वितर्कसे संशयका, चपलतासे धृष्टताका वास्तविक सूक्ष्म भेद है भी तोभी इस मध्यमें इनकी प्राप्ति होनेसे इनसे इनको एकताका अध्यवसाय करते है । इन पञ्चमः ५.] भाषाटीकासहिना। (११३) व्यभिचारिभावाः । भये स्तम्भस्वेदगद्दतारोमाञ्चवैवर्ण्य- शङ्कामोहावेगदैन्यचापलत्रासापस्मारप्रलयमूी व्यभि- चारिणः। बीभत्सेऽपस्मारमोहावेगवैवयोनि व्यभिचा रिभावाः। अद्भुते स्तम्भस्वेदगद्गदताश्रुरोमाञ्चविभ्रमस्मया व्यभिचारिभावाः। अन्ये व्यभिचारिणो रसाऽनुकूला ऊहनीयाः॥ व्यभिचारिभावोंमें कोई व्यभिचारिभाव किसीका विभाव भी होताहै। और किसीका अनुभाव भी होताहै । जिस प्रकार ईया निर्वेदका विभाव है और असू- याका अनुभाव है, तिसही प्रकार चिन्ता निद्राका विभाव है और औत्सुक्यका अनुभाव है इत्यादि । अब तत्तद्रसमे व्यभिचारिभावोंको दिखाते हैं-आलस्य, उग्रता, जुगुप्सा यह तीनों सम्भोग शृंगारमं वर्जित हैं। यह कहनेसे इन तीनोंको छोडकरिके सम्भोगशृंगारमें व्यभिचारिभाव जानना । और विप्रलम्भमे आल- स्यादि असूयान्त व्यभिचारिभाव हैं। और हास्यमें अवहित्यादि असूपान्त व्यभि- चारी हैं। करुणमें मोहादि अश्रुपर्यन्त व्यभिचारी हैं । रौद्र में उत्साहादि कम्पान्त व्यभिचारी हैं । वीरमें उत्सादि रोमाञ्चान्त व्यभिचारी हैं। भयानको स्तंभादि मून्ति व्यभिचारिभाव है । बीभत्समें अपस्मारादि वैवान्त व्यभिचारिभाव हैं। अद्भुतमें स्तम्भादि स्मयान्त व्यभिचारिभाव है । ये जो व्यभिचारिभाव दिखाये, सो वहुत स्थल में ये ही व्यभिचारिभाव प्राप्त है इस अभिप्रायसे दिखाये हैं। और भी व्यभिचारिभाव तत्तद्रसमे हैं सो जानना चाहिये । जैसा कि शृंगारमें भय, व्याधि, चिन्ता, स्मृति, मति, विस्मय, हर्ष, व्रीडा, मद, विपाद, अवहित्था, चपलता, धृति ये है । और हास्यमे श्रम, चपलता, स्वप्न, ग्लानि, शंका ये अन्यत्र कहे हैं । करुणमें चिन्ता, ग्लानि, धृति ये हैं । रौद्रमे ईष्या, असूया, गर्व, मद ये है। वीरम वितर्क, असूया, मोह, शोक, हर्ष, मद ये है। भयानको सन्ताप,, मरण ये हैं । बीभत्समें विषाद, भय, रोग, मति, मद, उन्माद ये है । और अद्भु- तमें आवेग, जडता, मोह, हर्ष, विस्मय, धृति ये हैं । इसही हेतु ग्रन्थकार लिखते हैं कि और भी व्यभिचारिभाव रसके अनुकूल है उनका ऊह कर लेना। स्थायिभाव विशेष भी रस विशेषमें व्यभिचारी होतेहैं । जिस प्रकार हास शृंगा-
(११४)
रसतरंगिणी-
[ तरंगः
स्थायितोऽपि व्यभिचरन्ति । हासः शृङ्गारे। रतिःशान्त-
करूणहास्येषु । भयशोको करुणशृङ्गारयोः । क्रोधो
वीरे । जुगुप्सा भयानके । उत्साहविस्मयों सर्वरसेषु
व्यभिचारिणी॥
इति श्रीभानुदत्तविरचितायां रसतरंगिण्यां व्यभिचारिभावनिरूपणं
नाम पञ्चमस्तरंगः ॥ ५॥
रमें व्यभिचारी है, रति शान्त, करुण, हास्य इनमें व्यभिचारी है। और ।
तथा शोक करुण और शृंगार इनमें व्यभिचारी है । क्रोध वीरमें व्यभिचारी है
जुगुप्सा भयानकमे व्यभिचारी है। और उत्साह तथा विस्मय सबरिसोंमें व्यार
चारिभाव है सो जानना ॥
इति श्रीरसतरङ्गिणीपापाटीकायां व्यभिचारिभावनिरूमण नाम पञ्चमस्तरङ्गः ॥ ५ ॥
पष्ठः ६.] भाषाटीकासहिता। (११५) षष्ठस्तरंगः ६. अथ रसा निरूप्यन्ते । विभावाऽनुभावसात्त्विकभावव्य- लिचारिभावैरुपनीयमानः परिपूर्णः स्थायिभावो रस्यमानो - रसके सम्पूर्ण हेतुआंका निरूपण कर दिया। अब अवसरप्राप्त रसनिरूपण है इसकी प्रतिज्ञा करतेहैं "अथ" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि स्थायिभाव- वेभावाऽनुभावताविकभावव्यभिचारिभावनिरूपणाऽनन्तर रसका निरूपण किया नाताहै । निरूपण लक्षणके बिना नहीं होसकताहै इस हेतु रसका लक्षण विभाव " इत्यादि वाक्यसे कहते है । वाक्यार्थ यह है कि विभाव, अनुभाव, स्विकभाव और व्यभिवारिभाव इनसे परिपूर्ण अर्थात् आलम्बन उत्पादित उद्दीपनसे उद्दीपित, अनुभावसे प्रतीतियोग्य किया गया । और व्यभिचारिभावसे पुष्ट जो स्थायिभाव सो रामादिक अनुकार्यों में ही उपनीयमान अर्थात् स्थित और रटमें कृत्रिमवेशादिमे अनुकार्य रामादितुल्यताऽनुसन्धानबलकरिके आगेप्यमाण और रस्यमान अर्थात् चमत्कारहेतु रस अर्थात् रसपदार्थ है सो जानना चाहिये। वहां रस्यमान यह जो कहा सो रस पदकी प्रवृत्तिमं निमित्त दिखाया है, क्योंकि वमत्कार हेतु हुए विना वस्तुमं प्रवृत्ति नहीं होती है, इस हेतु यह प्रवृत्तिनिमित्त है सो जानना । यहां यह शंका हुई कि यद्यपि भरतसूत्र में विभावाऽनुभावव्यभिचारिभावके संयोगसे रसकी निष्पत्ति कही है तथापि यहां सात्त्विकभाव द्विरूप है अव्यक्ति व्यभिचारिभावरूपभी है अनुभावरूप भी है इस हेतु विभाव साविकभाव दोनोंके सम्बन्धसे ही तीनकी प्राप्ति होजायगी। फिर लक्षणवाक्यमें अनुभाव व्यभिचारिभाव इन दोनोंका उपादान क्यो किया ? इसका समाधान यह है कि सात्त्विकभाव कह- करिकै अनुभाव, व्यभिचारिभावका जो ग्रहण किया सो गोवलीवर्दन्यायसे जानना। इसका अभिप्राय यह है कि किसीने किसीसे कहा कि गौको लेआओ और वलीवर्दको लेआओ यहांगोइस शब्दके उच्चारणसे बलीवर्दकाभी आनयन सिद्ध होजायगा, फिर वलीवर्दका उपादान निरर्थक होताहै, इस हेतु यहां गोशब्द वलीबर्दसे भिन्न गोका बोधक होताहै, इस ही प्रकार यही भी अनुभाव व्यभिचारिभाव शब्द जो हैं सो सात्त्विकभिन्न अनुभाव और सात्तिकभिन्न व्यभिचारिभावका वोधक है इस ही हेतु भरतसूत्रमें व्यभिचारिभावशब्इसे निवेदादिका ही ग्रहण कियाहै इस वार्ताका स्मरण कर लेना चाहिये । यह जो रसका लक्षण किया है सो 'विभावाऽनुभाव- व्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' इस भरतसूत्रके व्याख्यानकर्ता जो भट्टलोल्लट (११६) रसतरंगिणी- [तरगः- प्रभृति तिनकेभी संमत है। व्याख्यान इस प्रकार है कि आलम्बनसे उत्पाद्योत्पाद- कभावसम्बन्थ, उद्दीपनसे उद्दीप्योद्दीपकभावसंवन्ध, अनुभावसे गम्यगमकभाव- सम्बन्ध, व्यभिचारिसे पोष्यपोषकभावरूपसम्बन्ध जो रतिको होताहै सो ही तीनोंसे संयोगसम्बन्ध कहाताहै। उस संयोगसम्बन्धके बलसे जो रसकी निष्पत्ति अर्थात आलम्बनसे उत्पत्ति, उद्दीपनसे उद्दीप्ति, अनुभावसे अनुभव, व्यभिचा- रिभावसे रसकी पुष्टि रामादिमें होती है इस हेतु इस मतमें रख रामादिनिष्ठ ही है, नटमें तो रामरूपताऽध्याससे आरोपविषय होताहै । अथवा उक्त लक्षणवाक्यका ऐसा अर्थ है कि कृत्रिम भी जो विभावादि उनमें कृत्रिमताज्ञान नहीं हुआ है इस हेतु कृत्रिमतासे विभावादि सम्पूर्ण अगृहीत है, उसी विभावादि हेतुसे उपनीयमान अर्थात् चित्रतुरगन्यायसे 'राम यह है' यह जो बुद्धि उसका विषय जो नटरूप पक्ष उसमें अनुमीयमान ऐसा, इस ही हेतु परिपूर्णरूप अर्थात स्थायिभावावस्थासें अवस्थान्तरको प्राप्त जो स्थायिभाव इत्यादिक सो रस्यमानता अर्थात् चळमाण- तासे रसपदार्थ है, सो जानना चाहिये। यह बात श्रीशंकुनै कही है कि 'रामही यह है' यह जो रामसे असम्बन्धकी निराकरण करनेवाली बुद्धि, और 'यही राम है' यह जो इदंपदार्थसे भिन्नमें रामसम्बन्धकी निराकरण करनेवाली बुद्धि ये दोनों बुद्धि शास्त्र में सम्यग्बुद्धि कहाती हैं । इन दोनों बुद्धियोंसे और उत्तरकालमें उत्पन्न हुआ जो 'यह राम नहीं है' ऐसा बाधज्ञान सो होनेवाला रहै तब पूर्व- कालमें उत्पन्न हुआ जो 'राम यह है' ऐसी मिथ्याबुद्धि, और विरुद्ध दो वस्तु- ओंकी जो ‘यह राम है' वा 'नहीं है' ऐसी संशयरूप बुद्धि, और रामसादृश्यको विषयकरनेवाली जो 'रामसदृश यह है' यह बुद्धि ये जो पांच प्रकारकी लोकम- सिद्ध बुद्धि हैं, सो तो प्रवृत्ति और निवृत्तिके योग्य है । और जिसमें प्रवृत्तिनिवृ- त्तिकी योग्यता नहीं है इसही हेतु उस पांच प्रकारकी बुद्धिसे विलक्षण जो चित्रमें 'घोड़ा यह है' इस बुद्धिकी तरह 'राम यह है' यह बुद्धि इस बुद्धिका विषय जो नटरूप पक्ष उसमें बाधित भी जो विभावादित्रयात्मक हेतु उसका ज्ञान होताहै। नटमें उसका ज्ञान किस प्रकार होताहै यह शंका नहीं करनी चाहिये, क्योंकि नाट्य करनेवाले नटने नाना प्रकारके काव्यको जानकरिकै आलम्बनविभाव, उद्दीपन- विभाव इन दोनोका और पूर्वकालहीमें गुरुशिक्षाको प्राप्त होकरिकै रोमाञ्चादिके प्रकाशनमें किया हुआ जो अतिशयित अभ्यास उस अभ्यातसे रोमाञ्चके आवि- र्भावकरिकै अभिव्यक्त जो उत्कण्ठादिक व्यभिचारिभाव उनका, और अभ्यास- पटताक रिकै ही तत्तत्कालोचित कटाक्ष-भुजक्षेपादिक अनुभावके अवगमका सम्भव है, विभावादित्रयके ज्ञानसे नटम रत्याद्यात्मक स्थायिभावकी अनुः जो अनुमिति है सो ही चमत्कारसहित प्रतीतिरूपा चर्वणा षष्ठः ६.] भाषाटीकासहिता। (११७) रसः । भावविभावाऽनुभावव्यभिचारिभावैर्मनोविश्रामो यत्र क्रियते स वा रसः॥ कही जाती है। चर्वणाका विषय जो स्थायी सो रस पदार्थ है, पर्वणा सामा- जिकमें है, इस हेतु सामाजिकमें ही रसव्यवहार होताहै । ऐसा हुआ तो भरत. सूत्रका यह अर्थ हुआ कि विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव इनकरिकै जो संयोग अर्थात् अनुमान उससे रस जो स्थायी उसकी निष्पत्ति अर्थात् अनुमिति होती है। ये दोनों पक्ष समीचीन नहीं, क्योंकि वास्तविक विचार करते है तो सामाजिकोंमें रसकास्पर्श तो है नहीं, ऐसा हुआ तो सौ वार रसका आरोप करनेसे अथवा अनुमिति करनेसे चमत्कार नहीं होगा, कदाचित् यह कहो कि स्थायि- भावरूप वस्तुमें जो सुखरूपता है उसके बलसे ही आरोप वा अनुमिति चमत्कारका कारण होसकते हैं, यह कहना भी युक्त नहीं, क्योंकि लोकप्रसिद्ध अर्थको त्याग करिकै ऐसी कल्पना करनेमें सहृदय जनको विश्वास नहीं है । और सुनो, सामा- जिक जनमें तो रामनिष्ठ रति वस्तु है नहीं, तो असत् जो रति सो सामाजिकोंको व्यश्चित होगी, यह भी कहना दुर्लभ है । आपने बाहुबलसे स्वीकार कराओ तो वासनाविरहित जो बालक मूर्ख जन हैं, उनमें रसाऽभिव्यक्ति हो जायगी, इस हेतु भरतसूत्रका ऐसा अर्थ करना चाहिये कि विभावादिसे जो संयोग अर्थात् भोज्यभोजकमावरूप सम्बन्ध उससे उसकी निष्पत्ति अर्थात् भोग होताहै, इस ही अर्थको मानकरिकै दूमरा लक्षण कहते हैं भाव इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि भार अर्थात् स्थायिभाव और विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव इनसे मनका विश्राम जहां करतेहैं सो रस है। इस लक्षणमे विभाव आदिके साथ जो स्थायिभावका उपादान कियाहै सो साधार- णीकरणरूप एक प्रयोजन जनानेके अर्थ है । इस लक्षणका अभिप्राय यह है कि शब्दरूप काव्यका अभिधारूप जो प्रथम व्यापार उससे आप आपके असा- धारणरूपसे अर्थात् सीवात्वादिरूपसे विभावादि उपस्थित होतेहै, फिर काव्यका भावकत्वरूप जो द्वितीय व्यापार उससे नायिकात्वादि जो सानुकूल धर्म उससे भावादि उपस्थित होते हैं। यह जो नायिकात्वादि धर्मसे भावादिकी उप- स्थिति सो रसका विरोधी जो अगम्यात्वरूपरे स्त्रीका ज्ञान उसका प्रतिबन्ध करती है और सम्बन्धिविशेषसे मिलन विना इन सम्पूर्णकी उपस्थिति होती है। यहां यह शंका हुई कि काव्यमें ऐसा भावकत्वव्यापार मानना निरर्थक है, क्यों कि आपके आत्मामें उस उस नायिकादिको जो अभेदबुद्धि होगी उसहीसे - (११८) रसतरंगिणी- [ तरंगः प्रबुद्धस्थायिभाववासना वा रसः । अगम्यात्वरूपकरिके जो स्त्रीका ज्ञान उसका प्रतिबन्ध होजायगा। इसका समा. धान यह है कि दुष्यन्तादि नायकोंमें पृथिवीपतित्व और धीरत्वादिका ज्ञान होनेमे आपके आत्मामें आधुनिकत्व, कुत्सितपुरुषत्वादिका ज्ञान होनेसे वैध- यंका ज्ञान स्फुट हो जायगा, इस हेतु दुष्यन्तादि नायकोंसे अभेद आपमें नहीं जान सकेंगे, ऐसा हुआ तो साधारणीकृत जो दुष्यन्त और शकुन्तला और देशकालवयःस्थिति इनके होतसन्ते भावकत्व व्यापार तो विरामको प्राप्त हो जायगा, पीछे भोगकत्वरूप जो तृतीय व्यापार उससे रज और तम ये दोनों गुप्त होजा- यंगे, पीछे सत्त्वका आधिक्य होगा, उससे उत्पन्न हुआ जो साक्षात्कार अर्थात् प्रत्यक्ष उससे विषयकृत और भावनामात्रमे गम्य ऐसा जो साधारणीकृत इत्यादि स्थायिभाव तो भोगका विषय होकरिकै रसपदार्थ है । साक्षत्कारका स्वरूप ऐसा है कि आपका जो चिदात्मा सो ही हुआ आनन्द उसकी जो विश्रान्ति अर्थात विगलितवेधान्तरतासे स्थिति सो, अथवा आपका चिदात्मास्वरूप जो आनन्द उसकी जो विगलितवेद्यान्तरतासे स्थिति तत्स्वरूप जो स्थायिभावका भोग सो ही रस है इस रसके समयमें इसही रसमें मनकी विश्रान्ति करते हैं। इसही अभि- प्रायसे ग्रन्थकारने कहा है कि मनका विश्राम जहां करते है सो रस है, यह वात भट्टनायकने भी कही है कि नटमें रसका आरोप नहीं है, राममें रसकी उपपत्ति भी नहीं है, आत्मामें रस व्यञ्जित भी नहीं होताहै, किन्तु अभिधारूप व्यापार जैसा काव्यमात्रमें होताहै तिसही प्रकार काव्यनाट्योमें ही विद्यमान भावकत्व व्यापारसे साधारणीकृत जो विभावादिक सो होतसन्ते तीसरा जो भोगकत्व व्यापार उससे भाव्यमान जो स्थायी सो सत्ताधिक्यसे उत्पन्न जो स्वप्रकाश और आनन्दमें ऐसा संक्ति उसकी विश्रान्तिरूप जो पारमार्थिक भोग उससे विषय किये जाते हैं। इस पक्षमें स्थायीआदिका साधारणीकरणफलक जो भावकत्वरूप द्वितीय व्यापार उस व्यापारके बिना ही रसका स्वरूप वनजायगा, फिर यह व्यापारक. ल्पना क्यों करनी ? इस अभिप्रायसे रसका तीसरा लक्षण कहते है "प्रबुद्ध" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि प्रबुद्ध कहिये उद्बुद्ध अर्थात् अभिव्यक्त जो स्थायिभाववासना अर्थात् सूक्ष्म अवस्थापदसे व्यवहारके योग्य जो अनुदुद्ध संस्कार सो रस है । अभिप्राय इसका यह है कि सूक्ष्म अवस्थाको प्राप्त जो स्थायि- भाव सो अभिव्यक्तियुक्त हो जाय वह रस है । इसके प्रबोधक अर्थात अभिव्यञ्जक विभाव, अनुभाव, व्याभिचारिभाव हैं। इस पक्षमें भरतसूत्रका अर्थ षष्ठः ६.] भाषाटीकासहिता। (११९) यह जानना चाहिये कि विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव इनके साथ इत्यादिको व्यंग्यव्याकभावरूप सम्बन्धसे रसकी अर्थात् भग्नावरणचिद्विशिष्टरथायीकी निष्पत्ति अर्थात् स्वरूपसे प्रकाश होताहै। यह बात श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादने भी कही है। उनका यह कथन है कि लोकमें कारण कार्य इत्यादि कहकरिकै व्यवहारयोग्य जो नायिकादि उनसे स्थायिभाव रत्यादिका जो अनुमान उसमें जो अभ्यास उससे जो पटुता अर्थात् शीघ्र प्रवृत्ति होना उससे युक्त जो सामा- जिक उनके वासनारूपसे अन्तःकरणमें स्थित जो रत्यादि स्थायिभाव सो काव्यमें गुणालंकारादिद्वारा, नाट्यमे अभिनयद्वारा यथोक्तविभावनात्मकव्यापार- युक्तता होनेसे अलौकिकविभावादिशब्दव्यवहारयोग्य अवस्थायुक्त नायिकादिसे अभिव्यक्षित होते है, इसही हेतु अपटु बालादिको रसाऽभिव्यक्ति नहीं होती है। बहुत क्या कहैं दूसरी जो स्वाभाविकी वासना है सो भी स्थायीकी अभिव्यक्तिमें हेतु है । स्वाभाविकी वासना कैसी है कि जिस वासना विना शृंगारी भी जो मीमां- सक वैयाकरणादि है उनको रसाऽभिव्यक्ति नहीं होती है। यहां यह शंका होती है कि अन्यमें स्थित जो रत्यादिक उनमे स्थित जो विभावादिक उनसे अन्यमें स्थित स्थायीकी अभिव्यक्ति किस प्रकार होगी। इसका समाधान यह है कि हमारे ही ये हैं, शत्रुके ही ये हैं, तटस्थके ही ये हैं इस प्रकारसे जो सम्ब- न्धिविशेषस्वीकारनियम उसका और मेरा ही नहीं है, शत्रुका ही नहीं है, तटस्थ- काही नही है इस प्रकार जो सम्बन्धिविशेषपरिहानियम उसका अनध्यवसाय होनेसे विभावादिकी साधारणतासे प्रतीति होती है। ऐसा हुवा तो इनका ही यह है इस निश्चयको विना जाने हुए जो विभावादिक उनको आपके असम्बन्धका अज्ञान होनेसे आपके सम्बन्धका ज्ञान होनेसे आपको स्थायिभाववासनाकी अभिव्यक्ति होवैगी, सो युक्तही है। फिर यह शंका होती है कि विभावादिकी साधारणता आवश्यक भी होगी तो भी स्थायीको साधारणता किस प्रकार होगी ? क्योंकि स्थायीको लसत्पुरुषका असाधारणत्व है । कदाचित् यह कहो कि स्थायीको साधारणता मत रहो, असाधारणता भी रहेगी तो भी रसकी अभिव्यक्ति होवैगी, यह कहना युक्त नहीं क्योंकि ऐसा कहो तो सहृदयजनको रसाऽभिव्यक्तिमें एकरूपता नहीं होसकैगी । कदाचित् कहो कि एकरूपता मत हो, तो यह कहना भी युक्त नहीं क्योंकि ऐसे कहोगे तो अलौकिकविभावादिकल्पनामें भी विश्वास नहीं रहेगा। इसका समाधान यह है कि आपका प्रश्न ठीक है परन्तु उपायभूत विभावादिका पूर्वोक्तसाधारण्यबलसे रसाउनुभवकालमें स्थायियोंको प्रमाविशेषमे स्थितिरूप जो परिमितप्रमाता उसका ज्ञान नहीं है, इस हेतु प्रका- (१२०) रसतरंगिणी- [तरंगः- प्रबोधका विभावाऽनुभावव्यभिचारिणः । न च यूनोः प्रथमानुरागेऽव्याप्तिः पूर्वानुभवाभावादिति वाच्यम् । तत्राऽपि जन्मान्तरीयाऽनुभवसत्त्वादिति । 1 शित हुआ जो वेद्यान्तरसम्पर्कशून्य अपरिमित भाव है जिसका ऐसा जो प्रमात पुरुष उसने सकलसहृदयसंवादकारी जो प्रमातृविशेषसम्बन्धग्रहरूप साधारण्य उससे स्थायी चर्वणाके विषय होतेहैं । यहां यह शंका होती है कि चर्वणावि- शिष्टस्यायिभावमात्र रस नहीं है क्योंकि श्रुतिसे सहृदयजनके प्रमाणसे रसको आन- न्दस्वरूपताका आदर है । इसका समाधान यह है कि विज्ञानवादीके मतमें प्रवृत्तिविज्ञान जो है सो घटपटरूप आकारको धारण करनाहै और घटपटविज्ञानके विषयभी कहाते हैं ऐसा हुआ तो प्रवृत्तिविज्ञानरूप जो घटपटादि सो प्रवृत्तिविज्ञान के विषय कहातेहैं जिस तरह, तिसही तरह चर्वणास्वरूपसे अभिन्न भी आत्मानन्दचर्वणाका विषय हो जायगा सो जानना । वह जो रस है सो चय॑माणताका प्राण है अर्थात् जहांतक चर्वणा है तहांतक रस है, चर्वणाके नाशमें रसभी नष्ट होताहै, इस ही हेतु रस विभावादि जीवितावधि कहाताहै अर्थात् विभावादिका ज्ञान रहै तब चर्वणा होतीहै विभावादिका ज्ञान न रहै तब चर्वणा भी नही होती, इसही हेतुरस अनित्य चर्वणहै, रसकी चर्वणाके समयमें विभावादिका आपके असाधारणरूपसे ज्ञान नहीं होता है किन्तु पानकर सन्यायसे रसकी चर्वणा होती है इस रीतिसे जब रसकी चर्वणा होती है तब सहृदयको ऐसा मालूम होताहै कि आगे ही जैसे परिस्फुरित है, हृदयमें जैसे प्रवेश करताहै, सम्पूर्ण अंगका जैसे आलिंगन करताहै और सबका आच्छादन करता ब्रह्मास्वादकी तरह अनुभव कराता अत एव अलौकिकचमत्कारकारी शृंगारादि रस है सो यह रस विभावादिका कार्य नहीं होसकताहै, क्योंकि जो कार्य मानोगे तो विभावादि इसके निमित्त कारण ही होंगे, ऐसा होगा तो निमित्तकारणके नाशसे कार्यका नाश नहीं होताहै इस हेतु विभावादिका नाश होनेपर भी रसकी स्थिति होनी चाहिये सो होती नहीं है, इस हेतु विभावादिका कार्य इसको नहीं कहना । विभावादिको ज्ञाप्य भी नहीं कहना चाहिये क्योंकि, ज्ञाप्य वस्तुका यह नियम है कि वह पहले भी स्वरूपतः स्थित रहती है, तो रस तो पहले स्थित नहीं है । फिर किस प्रकार ज्ञाप्य होगा? यहां यह शंका हुई कि जब रस ज्ञाप्य भी नहीं हुआ, कार्य भी नहीं हुआ, तब विभावादि न तो इसके कारक होंगे, न ज्ञापक होंगे । और हेतु कहातेहै ऐसा हुआ तो कारक और ज्ञापक इनसे भिन्न हेतु शास्त्रमें कहीं सिद्ध नहीं है, तो विभावादि रसके हेतु कैसे होंगे? इसका समाधान यह है कि (१२१) भाषाटीकासइिता। . . स च रसो द्विविधः-लौकिकोऽलौकिकश्चेति । लौकिकस- निकर्षजन्मा रसो लौकिकः । अलौकिकसन्निकर्षजन्मा रसोऽलौकिकः । लौकिकसनिकपः षो । विषयगतः। इसही हेत्तु रसको अलौकिकत्व सिद्ध होताहै, यह आलंकारिकोंको भूषण है, दूषण नहीं है। रसका विचार विशेष गूढार्थदीपिका नाम काव्यप्रकाशकी व्याख्याम किया है, यहां विस्तारभयसे इतनाही लिखा है। जिनको विशेष जिज्ञासा होवे वे वहां देखलें ॥ अव प्रकृतका विचार करतेहै । यहां यह शंका हुई कि प्रबुद्धस्थायि- भाववासनाको रस कहते हो तो नायक नायिकाका जो प्रथमाऽनुराग अर्थात् पूर्वकी रवि विभावाऽनुभावसे पूर्ण होगई है तहां रसलक्षणकी अव्याप्ति होगी, क्योंकि वहां प्रबुद्धस्थायिभाववासना नहीं है क्योंकि पूर्वकालमें विभावाऽनुभावादिका अनुभव नहीं है तो वासना नहीं होसकैगी । इसका समाधान यह है कि विभावा- दिका इस जन्ममें अनुभव नहीं भी हुआ है तो भी पूर्वजन्मका अनुभव तो है ही इस हेतु स्थायिभाववासना प्रबुद्धा होसकैगी, इससे अव्याप्ति दोष नहीं होगा। रसका निरूपण तो कर दिया, अब रसका विभाव करना चाहिये परन्तु भरताचार्यने तो रसकी स्थिति नाट्यमें कही है, और श्रीरुद्रने काव्यमें भी रस- स्थिति कही है और नाट्यकाव्यमें जिसका सम्भव नहीं है ऐसा जो रसका लौकिक भेद उसकी दोनोंने ही उपेक्षा की है, परन्तु भानुमिश्रने तो रसस्वरूप निरूपणकी प्रतिज्ञा की है इस हेतु मिश्रको यह भेद अनुपेक्षणीय हैं इस हेतु उसका विभाग करतेहै " स च" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि वह जो प्रबुद्धस्थायिभाववासनात्मक रस सो दो प्रकारका है, एक लौकिक दूसरा अलौकिक । तहां लौकिक सन्निकर्षसे उत्पन्न जो रस सो लौकिक है। और अललौकिक संनिकर्षसे उत्पन्न जो रस सो अलौकिक है । तहां लौकिक संनि- कर्ष विषयके साय छः प्रकारका होताहै, इसका अभिप्राय यह है कि नायक नायिकाओका जो परस्पर अवलोकन तहां सयोगसन्निकर्ष है, और परस्परनिष्ठ जो कटाक्षादि उनके अवलोकनमें संयुक्तसमयावनिकर्ष है, और कटाक्षादिनिष्ठ तारत्व मन्दत्वादि जातिके अवलोकनमें संयुक्तसमवेतसमवाय संनिकर्ष है, और परस्परके शब्दश्रवणमें समवाय संनिकर्ष है शब्दनिष्ट कोमलत्वकठोरत्वादि जातिके श्रवणमें समवेतसमवाय संनिकर्ष है, कुलादिदेशमें परस्पराभावाऽवलोकनमें विशे- पणविशेष्यभाव सन्निकर्ष है, ये सन्निकर्ष कुछ काम नहीं हैं। और सुनिये वासना. रूपसे स्थित जो कालान्तरके सम्पूर्ण स्थायिभाव उनका आपके अव्यवहित विभावादिपदार्थ उनमें स्थित है, उसके वलसे स्वप्नमें रससम्पत्ति होगी इस (१२२) रसतरंगिणी- तिरंग:- प्राकालमें लौकिक सन्निकर्षसे ही उत्पत्ति हुई है, यह जो रसपदार्थनिविष्ट स्थायिभावमें लौकिकसन्निकर्षजन्यता है सो अलौकिकरससे भेदक नहीं है। किन्तु रसोत्पत्तिके निदानभूत जो व्यञ्जक विभावाऽनुभावव्यभिचारी उनमें से किसीकी चर्वणोत्पत्तिमें लौकिकसन्निकर्षजन्यत्व होय वही जन्यत्व अलौकिक रससे भेदक जानना । ऐसा हुआ तो विभावादिमेंसे एकमें भी जहां लौकिक सन्निकर्ष होय और दो अलौकिक सन्निकर्ष होय तहां भी रस लौकिक ही जानना। यद्यपि व्यभिचारिभाव जो है सो आन्तर है उसमें लौकिक सन्निकर्ष नहीं होसकता है । ऐसा हुआ तो व्यभिचारिभावका उपादान निर्थक होगया तो भी जिस प्रकार रसव्याक विभावाऽनुभावमें लौकिकसन्निकर्ष अपेक्षित होताहै तिस ही प्रकार रसव्याक जो व्यभिचारिभावादि उनके अभिव्यञ्जक जो विभावाऽनुभाव उनमें जो लौकिक सन्निकर्ष है उसको भी लौकिक भेदका नियामक मानना युक्त ही है। यहां लौकिक भेद नहीं जानना चाहिये, इसही हेतु व्यभिचारिभावका उपादान चर्वणोत्पत्तिमें लौकिकसन्निकर्षजन्यता जो लौकिक रसकी भेदक कही है तहां कियाहै । ऐसा हुआ तो विभावमात्रको संयोगसन्निकर्षमात्रसे ग्रहणयो- ग्यत्व है, तथापि गुण वा क्रिया तथा तद्गतवैजात्यादिघटितमूर्तिक अनुभावका छ। इन्द्रियोसे यथायोग्य ग्रहण होसकैगा, इस हेतु नैयायिकको जिस प्रकार सन्निकर्षषट्कभेदसे प्रत्यक्ष छह कहाते है, इसही प्रकार लौकिक रसभी छः प्रकारका होगा सो जानना । सामान्यलक्षणसन्निकर्ष, योगजलक्षणसन्निकर्ष ये दोनों न्याय- शास्त्र में सन्निकर्षों में प्रसिद्ध भी हैं तो भी प्रकृतमें उनका उपयोग नहीं है इस हेतु ज्ञानरूप जो अलौकिक सन्निकर्ष सो अलौकिक रसमे उपयुक्त जानना । अब यहां यह शंका हुई कि अलौकिक रसके जो तीन भेद है तहां प्रथम जो स्वामिक भेद करेंगे सो नहीं बन सकताहै क्योंकि विभावादि के अनुभव विना चर्वणा नहीं होसकती है स्वमकालमें विभावादिका अनुभव है नहीं तो स्वामिक रस कैसे होगा । इसका समाधान यह है कि स्वमस्थलमें भी जाग्रत अवस्थामें जो विभावादिका अनु- भव किया है सोही अनुभव साक्षात् अर्थात् स्वविषयविभावाऽनुभावव्यभिचारि- भावचर्वणाऽव्यवहितप्राक्कालवृत्तित्वसम्बन्धसे विभावादिमें स्थित होकरिके रसको सम्पन्न करेगा। जहां एतजन्माऽननुभूत ही विभावादि हैं, तहां भी पूर्वजन्मका विभावादिका अनुभव स्वविषयविभावाऽनुभावव्यभिचारिचर्वणाऽव्यवहितमाकालिक मोजन्मान्तरीयाऽनुभवजन्यसंस्कार तादृशसंस्कारविषयत्व सम्बन्धसे स्वामिक जो प्रकारसे दोनों ही स्थलमे ज्ञानलक्षण प्रत्यासत्तिसे रससम्पन्न हुआ इस हेतु यह षष्टः ६.] (१२३) भाषाटीकासहिता। अलौकिकसन्निकर्षों ज्ञानम् । तेषु चानुभूतेषु साक्षादेतज्ज- न्माऽननुभूतेष्वपि तेषु प्राक्तनसंस्कारद्वारा ज्ञानमेव प्रत्यासत्तिः । अलौकिको रसस्त्रिधा। स्वाप्निको मानोर- थिक औपनायिकश्चेति । औपनायिकच काव्यपदपदार्थ- चमत्कारे नाव्ये च । परन्तु द्वयोरप्यानन्दरूपता । ननु मानोरथिको रसो न प्रसिद्ध इति चेत् । सत्यम्- धन्यानां गिरिकन्दरे निवसतां ज्योतिः परं ध्यायता- मानन्दाशुपयः पिबन्ति शकुना निश्शंकमकेशयाः । अस्माकन्तु मनोरथोपरचितप्रासादवापीतट- क्रीडाकाननकेलिकौतुकजुषामायुः परिक्षीयते ॥ ३ ॥ अलौकिक रस कहाया । सो ही बात "तेषु" इत्यादि वाक्यसे कहते हैं । वाक्यार्थ यह है कि विभावादिक जहां अनुभूत हैं तहां तो अनुभूतविभावादि होत सन्तै साक्षात् अर्थात् उक्तसम्बन्धसे ज्ञान ही अर्थात् जाग्रत् अवस्थाके विभावादिका अनुभव ही इन्द्रियका अलौकिक सम्बन्ध है, और जहां स्वमका पदार्थ एतज्जन्ममें अनुभूत नहीं है ऐसे विभावादि होत सन्ते प्राक्तनसंस्कारद्वारा अर्थात् संस्कार- घटित पूर्वोक्तसम्बन्धस पूर्वजन्मका अनुभवरूप ज्ञान ही इन्द्रियका अलौकिक सम्बन्ध है । अलौकिक रस तीन प्रकारका है-स्वामिक, मानोरथिक और औपना- यिक । तीनो ही प्रकारके रसमे विभावादिकी उपस्थिति समान ही है तो भी भिन्न भिन्न सामग्रीका सम्पादक स्वप्न और मनोरथ ये दोनों वस्तु स्फुटतासे कह दी हैं। औपनायिक रसमें इन दोनों रसोसे भेद दिखानेके अर्थ इस रसका विषय कहते है "औपनायिकश्च" इत्यादिसे । इसका अर्थ यह है कि काव्यका जो पद और पदार्थ उसका चमत्कार होत सन्तें औपनायिक रस होताहै, और नाट्यमे भी इस ही रीतिसे होताहै, इस हेतु काव्य नाट्य इन दोनोंका रसमें पर- स्पर सामग्रंवैिचित्र्य नहीं जानना । इन दोनोंको एक ही प्रमाण जानना चाहिये । आहायर्यादि जो अभिनयचतुष्टय उसको नाट्य कइतेहै । स्वामिक और मानोरथिक इन दोनोमें दुःखमिश्रित भी रस होतेहैं तो भी काव्य नाट्यमे एकरूप ही रस होताहै सो जानना । अव यहां यह शंका होती है कि मातारथिक रस लोकमे प्रसिद्ध नहीं है फिर यह रस किसतरह कहा । इसका समाधान यह है कि "धन्यानाम्" इत्यादि श्लोकमें मानोराथिक श्रृंगार रसका श्रवण है इस हेतु मानोरथिक भी रस है सो जानना। श्लोकार्थ यह है कि कोई पुरुष कहता है कि पर्वतकी कन्दरामें निवास करनेवाले (१२४) रसतरंगिणी- [ तरंग:- इत्यादौ मानोरथिकशृंगारश्रवणात, शास्त्रे सुखस्य त्रैविध्य- गणनाच रसेन विना च सुखाऽनुत्पत्तेरिति । तत्र विशेषाः। यदाह भरत:- शृङ्गारहास्यकरुणारौद्रवीरभयानकाः । बीभत्साद्भुतसंज्ञौ च नाटये चाष्टौ रसाः स्मृताः ॥ २ ॥ सकलाधिदेवतं विष्णुः, स च शृङ्गारस्याऽपि दैवतम्, तेन सकलाकांक्षाविषयत्वेनाराध्यतया च प्रथमं शृङ्गा- रोपन्यासः। और परज्योतिका ध्यान करनेवाले जो धन्य पुरुष हैं उनके आनन्दाश्रुजलको निःशंक अंकमें सोतेहुए जो पक्षी सो पान करते है। और हमारा तो मनोरथसे कल्पित जो महल और वापीतट और क्रीडावन और केलिविषयक कौतुक इनका सेवन करनेमें आयु क्षीण होताहै । यहां मानोरथिक शृंगार रसके उद्दीपन विभावोंका वर्णन है सो जानना । और शास्त्र में सुख तीन प्रकारका कहा है सो सुख रस बिना उत्पन्न नहीं होसकता है इस लिये मानोरथिक भी रस मानना चाहिये। अब रसके विशेष कहते है तहां भरतसम्मात दिखाते हैं "श्रृंगार" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि नारायण भट्ट अद्भुत रसही एक मानतेहैं, और कोई आलंकारिक श्रृंगारही रस मानते हैं, और आधुनिक कवि बारह प्रकारका रस मानते है सो सम्पूर्ण अयुक्त है, इस हेतु भरतजी कहते है कि शृंगार हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत ये आठ रस नाट्यमें कहे है। यह कहनेका अभिप्राय यह है कि काव्यमें भी इतने रस है इसमें विवाद नहीं है । अब यहां यह शंका हुई कि भरतमुनिने कारिकामें प्रथम शृंगारकी गणना क्यों की ? इसका समाधान यह है कि सकलका अधिदैवत अर्थात् अन्तरात्मा विष्णु है और शृंगारके भी देवता वही हैं इस हेतु और सकलका आकांक्षाविषय होनेसे यह श्रृंगार रस पूज्य है इस हेतु प्रथम शृंगार रसकी गणना की सो जानना । अब यहां यह शंका होती है कि आठही रस किस प्रकार कहते हो ? १ वात्सल्य, २ भक्ति, ३ लौल्य, ४ कापण्य यह चार रस और कहने चाहिये, क्योंकि इन चारों ही रसोंको क्रमसे आर्द्रता, अभिलाप, श्रद्धा,, स्पृहा ये चारों ही स्थायिभाव हैं। फिर आठही रस क्यों कहते हो । इसका समाधान यह है कि वात्सल्पादि चारों व्यभिचारिभावरूप रतिस्वरूप है . - स्परप्रीतिरूप जो शृंगार और हास और क्रोध और आनन्द अर्थात् उत्साह इन हास्य, रौद्र, वीर, इनका नहीं मान सकते हो, क्योकि युवनि युवाओंका पर- षष्ठः ६] (१२५) भाषाटीकासहिता। ननु वात्सल्यं लौल्यं भक्तिः कार्पण्यं वा कथं न रसः। आर्द्रताऽभिलापश्रद्धास्पृहाणां स्थायिभावानां सत्त्वा- दिति चेन्न। तेषां व्यभिचारिरत्यात्मकत्वात् । ननु कस्य रसस्य ते व्यभिचारिभावा भवेयुरिति चेत् । सत्यम्; वात्सल्ये करुणो रसः।लौल्ये हास्यः । भक्तौ शान्तः । कार्पण्ये हास्य एव । नन्वेवं परत्र कृप्तत्वादत्र व्यभिचारि- त्वेनावश्यकत्वार्मिकल्पनातो धर्मकल्पनायां लघुत्वाच्च व्यभिचारिरतिरेवास्तु किं करुणेनेति चेन । रतेः शोक इति शोककारणतायां रतरुपक्षयत्वात् । इससे इनको रसस्वरूप नहीं जानना । फिर शंका हुई कि रस में स्थिति हुये बिना व्यभिचारिभाव तो हो नहीं सकते है तो ये किस रसके व्यभि- चारिभाव होंगे सो कहो । इसका समाधान यह है कि वात्सल्य होनेपर करुणही रस होता है, लौल्य होनेपर हास्य ही रस होता है, भक्ति होनेपर शान्तही रस होता है, कार्पण्य होनेपर भी हास्य ही होता है, इस हेतु कात्सल्य तो करुण रसका व्यभिचारी है, और लौल्प तथा कार्पण्य ये दोनों हास्यके व्यभिचारिभाव है । और भक्ति शान्त रसका व्यभिचारिभाव है,क्योंकि वात्सल्यादि करुणादिको पुष्ट करते हैं सो जानना । अब यहां यह शंका होती है कि वात्सल्यादिको करुणादि रसोंमें व्यभिचारिरतिरूप माने तो भी श्रृंगार रसमें स्थायिभावतासे रति मानीही गई, और करुणरसमें व्यभिचारिभावतासे रति आव- श्यक है, इस हेतु और प्रधानभूत करुणरसकल्पनाकी अपेक्षा पोषकतासे आव. श्यक जो रतिमात्र उसकी कल्पनामें लाघव है क्योकि रसकल्पना नहीं करनी पडेगी। व्यभिचारिभाष रतिकल्पनासे ही कार्यसिद्धि होजायगी, इस हेतु करुण रस नहीं मानना, व्यभिचारिरूपरति ही मानना। इसका समाधान यह है कि रति जो है सो शोकका कारण है इस हेतु शोकको सम्पन्नकरिकै रति क्षीण होजायगी, ऐसा हुवा तो करुणचर्वणापर्यन्त रति नहीं रहेगी इस हेतु करुण रस मानना आवश्यक होगा । और सुनो कि करुणरस माने विना रतिको व्यभिचारिभावता भी उपपन्न नही होगी क्योंकि किस रसका व्यभिचारी रतिको मानोगे ? शृंगार, है १ अद्भुतका व्यभिचारी कहोगे तो सो भी नहीं होसकैगा, क्योंकि विस्मयकी वहां (१२६) रसतरंगिणी- [ तरंग:- किञ्च रतेः कल्य रसस्य व्यभिचारित्वम् । न शृङ्गारहा- स्यरौद्रवीराणाम्, युवमिथुनपरस्परप्रीतिहासक्रोधान- दानां तत्राभावात् । न वा बीभत्सस्य, जुगुप्सायास्त- बाऽभावात् । नाप्यद्भुतस्य, विस्मयस्य तत्राऽस्थिरत्वात् । तस्माच्छोकस्य स्थायितया शोकस्थायिभावकः करुणा- ख्योऽतिरिक्तको रस इति । ननु रतिरेवास्तु, किं हास्येनेति . चेत् । कस्याऽसौ व्यभिचारिणी,करुणरौद्रवीरभयानकबी- भत्सानां न, तत्राऽनवकाशात् । नाप्यद्भुतस्य, विस्मयस्य तत्राऽस्थिरत्वात् । न शृङ्गारस्य, रतेः स्थायित्वाभावात् परन्तु रत्या सह हास्यस्य सांकर्यम् । ननुरतिहास्थयोरसंकी- र्णस्थलाभावात्पृथक्त्वं कथं स्यादिति चेन्न । हेतोरसाधा- रण्यात् । असाधारण्यमत्र स्थायित्वम् । यथा रतिसा- कर्येऽपि स्थायिशोकादसाधारणात्कारणात्करुणो भियते, तथा तत्सांकर्येऽपि स्थायिहासभावादसाधारणात्कार- णादास्यो भिद्यते । शान्तेप्येवमूह्यम् । चारोंकी करुणस्थलकी रतिमें स्थिति नहीं है, तो इन चारोंका व्यभिचारी रति कैसे होगा, बीभत्सका भी व्यभिचारी नहीं है, क्योंकि बीभत्सका स्थायी जो जुगुप्सा सो रतिस्थलमें नहीं है । और अद्भुतका भी व्यभिचारी नहीं होसकताहै, क्योंकि विस्मयकी रतिमें स्थिरता नही है किन्तु विस्मय वहां विद्युद्विद्योतप्राय है इस हेतु करुण रसका शोक स्थायी होनेसे शोक है स्थायिभाव जिसका ऐसा करु- णनाम रस मानना ही चाहिये। यहां फिर यह शंका होती है कि हास्य रस नही मानना किन्तु हास्यस्थलमें व्यभिचारी रति ही मानना । इसका समाधान यह है कि यह रति किसकी व्यभिचारिणी होगी ? कदाचित् कहो कि करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स इनकी व्यभिचारिणी होगी, सो नहीं बनेगा । क्योंकि इन सबका उक्त रतिस्थलमें अभाव है, इस हेतु इनका व्यभिचारी नहीं होगा। स्थिरता नहीं है । शृंगारका व्यभिचारी कहो सो भी नहीं होसकताहै क्योंकि षष्ट: ६.] (१२७) भाषाटीकासहिता। न च वात्सल्यादावप्यसाधारणा हेतव आर्द्रतादयः सन्ती- ति तेषामपि रसत्वापत्तिरिति वाच्यम् । आईतादीनामपि रतित्वात् । तस्याश्च तत्रतत्र साधारण्ये शृङ्गाररसत्वा- पत्तिः । ननूत्साहक्रोधावुभयत्र तस्माद्वीररौद्रयोरन्यतर एवरसो वर्ततामिति चेन्न, स्थायिभेदेन भेदात् । उत्साहवा- शृंगारका स्थायी जो रति है सो हास्यका स्थायी नहीं है, तो वह रति शृंगारका व्यभिचरी कैसे होगा? परन्तु रतिके साथ हारयरसका सांकर्य है इसका निवारण नहीं कर सकते है सो जानना । फिर यह शंका होती है कि रति और हास्य इन दोनोके एक स्थल रहनेसे इन दोनोंका भेद किस प्रकार होगा ? इसका समाधान यह है कि हेतुको असाधारण्य होनेसे भेद है, असाधारण्य यहां स्थायित्वरूप लेना ।। जिस प्रकार करुण रसमे रतिका सांकर्य भी है तो भी स्थायिशोकरूप असाधा रण कारणसे करुण रत रतिसे भिन्न होताहै, तिस प्रकार हास्य रसमे रतिका सांकर्य भी है तो भी स्थायिहासरूप असाधारण कारणसे हास्य रस रतिसे भिन्न होताहै । यही न्याय शान्तरसमे भी कह देना, अर्थात् शान्त रसको रतिसांकर्य भी है तो भी निर्वेदस्थायीरूप असाधारण कारणसे शान्त रस रतिसे भिन्न जानना । अब यहां यह शंका होती है कि असाधारण स्थायिभाव होनेसे ही रस मानो तो वात्सल्या- दिमें भी असाधारण हेतु आर्द्रतादि है ही तो उन असाधारण हेतुओंसे वात्सल्या- दिको भी रस मानना चाहिये । इसका समाधान यह है कि आर्द्रतादि भी रति. रूप हैं उनको वात्सल्यादिका स्थायित्व नहीं है । यदि आपकी प्रौढतासे आर्द्रतादि रूप रतिको वात्सल्यादिमें असाधारण हेतु मानो तो वात्सल्यादि भी रतिरूपस्था- यिभावक होनेसे श्रृंगाररसरूप होजायंगे, इस हेतु वह आर्द्रतादिरूप रति वात्सल्या दिका स्थायी नहीं है सो जानना । यहां यह शंका होती है कि आर्द्रतादिरूप रतिको स्त्रीपुरुषविषयकत्व नहीं है इस हेतु वात्सल्यादि श्रृंगाररसरूप कैसे होंगे ? इसका समाधान यह है कि रतिसे उत्पन्न जो स्त्रीपुरुषविषयक शोक उस शोकम- कृतिक होनेसे अवश्य कल्पनीय जो करुण रस उसका पोषक रतिरूप आर्द्रता- दिको माननेसे ही उपपत्ति होगी। यहां वात्सल्यादि रसान्तर माननमें कुछ प्रमाण नहीं सो जानना । फिर शंका होती है कि उस करुण रसमें राति प्रकृतिकत्व मानना अथवा रविसम्भूतशोक प्रकृतिकत्व मानना, इसमे कोई विनिगमक नहीं, इस हेतु जो (१२८) रसतरंगिणी- [ तरंगः- सना वीरे न तु रौद्रे । क्रोधवासना रौद्रे न तु वीरे। यूनोः परस्परं परिपूर्णः प्रमोदः सम्यक्सम्पूर्णरतिभावो वा शृङ्गारः । यूनोरेकत्र प्रमोदस्य रतेर्वाधिक्ये न्यूनतायां व्यतिरेके वा परिपूर्तेरभावात् रसाभासत्वमिति । स च द्विविधः-संयोगो विप्रलम्भश्चेति । तत्र दर्शनस्पर्शनसंला- पादिभिरितरेतरमनुभूयमानं सुखं परस्परसंयोगेनोत्प- द्यमान आनन्दो वा संयोगः। संयोगो बहिरिन्द्रियसम्ब- न्यः । अस्य दैवतं विष्णुवर्णः श्यामः । यथा- रतिप्रकृतिकत्व भी करुणका मानो तो करुणको भी श्रृंगाररसत्वापत्ति होगी। इस का समाधान यह है कि दूसरे रसमें विजातीयप्रकृतिकत्वका सम्भव होत सन्ते रसा- न्तरप्रकृतिकत्व मानना उचित नहीं इस लिये और रबिके अनुभावसे विरुद्ध अनु- भाव होनेसे रतिविजातीय जो शोक तत्प्रकृतिकत्वका करुणमें अध्यवसाय होताहै, इस हेतु रतिप्रकृतिकत्व इसको नहीं है, ऐसा हुआ तो करुणको शृंगारररात्वापत्ति नहीं हुई, इस ही हेतु पहले कह आयेहैं कि कुरुणचर्वणाके समयमें रतिका नाश होजाताहै सो जानना । तो रतिप्रकृतिक करुण रस नहीं कहाया । अब यह शंका होती है कि उत्साह और क्रोध ये दोनों क्रमसे रौद्र, वीरमें होतेहै इस हेतु रौद्र, वीर दोनों से एकको रस मानना चाहिये और एकको व्यभिचारीरतिरूप मानना चाहिये । इसका समाधान यह है कि स्थायिभावभेदसे रसभेद होगा सो भेद इस प्रकार है कि उत्साहकी वासना वीरमे रहती है रौद्रमें नही रहती है, और क्रोधकी वासना रौद्रमें रहती है वीरमें नही रहती है, यह कइनका अभिप्राय यह है कि वीर रसमें क्रोध व्यभिवारी रतिरूप होगा तो भी रौद्रमें स्थायी है, इस ही प्रकार उत्साहको रौद्र में व्यभिचारित्व है तो भी वीरमें स्थायित्व है, इस हेतुसे और एकको रसरूप मानना एकको न मानना इसमें प्रमाण न होनेसे दोनों ही रसरूप है। इसमें विवाद नहीं करना । स्थायीसे युक्त जो आनन्द अथवा आनन्दसे युक्त जो स्थायी सो रस है, यह पूर्व कहाँहै उस ही के अनुसार प्रथम शृंगारका लक्षण कहतेहै “यूनोः परस्परम्" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि युवति और युवा इनका परस्परपरिपूर्ण अर्थात यथोचित विभावाऽनुभावव्यभिचारिनिष्पन्नरतियुक्त जो प्रमोद अर्थात् (१२९) षष्टः ६.] भाषाटीकासहिता। स्तोमेन चाटुवचनानि पराहतानि पाणिः पयोधरगतो जडतां जगाम । लक्ष्म्याः परन्तु पृथुवेपथुरेव नीवी विख्सयन्सुहृदभून्मधुसूदनस्य ॥३॥ यथावा- निद्राणो क्षणमुन्नमय्य वदनं कान्ते कुचान्तःस्पृशि सस्तव्यस्तदुकूलदर्शितबलिप्रव्यक्तनामिश्रियः । आनन्द सो शृंगार रस है। अयवा सम्यक् कहिये उचिततासे परिपूर्ण अर्थात् विभावाऽनुभावव्यभिचारियोंसे भग्न हुआ है आवरण जिसका ऐसा जो चित् तादृशचित्से युक्त जो रतिरूप स्थायिभाव सो श्रृंगार है । ऐसा हुआ तो यहां युवति युवा इन दोनोंमे एकका प्रमोद वा रति अधिक होय वा न्यून होय वा एकमें होय ही नहीं, तहां परिपूर्णताका अभाव होनेसे रसाभास जानना, रस नहीं जानना । यह कहनेसे लक्षणमें परस्पर औचित्यका प्रयोजन दिखा दिया। जो औचित्यपद न देते तो यह भी शृंगार कहा जाता सो जानना। वह शृंगार दो प्रकारका है, एक सम्भोग दूसरा विप्रलम्भ । तहां दर्शन, स्पर्शन, संलाप, अर्थात् परस्परभाषण इत्यादिसे परस्पर जो अनुभूयमान सुख सो सम्भोग है, अथवा परस्परसंयोगसे अर्थात वहिरिन्द्रियसम्बन्धसे उत्पद्यमान जो आनन्द सो संभोग है । शृंगार रसका देवता विष्णु है । और वर्ण श्याम है। यद्यपि शृंगार रसको अमूर्तत्व होनेसे श्याम वर्णका संभव नहीं है तथापि इसका देवता जो विष्णु सो श्यामवर्ण है उस देवताकी अभेदबुद्धि रसमें करिके भंगार रसम भी श्यामवर्णका व्यवहार है सो जानना । इसका उदाहरण "स्तोभेन" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि मधुसूदनके चाटु वचन अर्थात् प्रिय वाक्य ने हैं ते स्तोम कहिये प्रलयस्वरभंगादिसात्त्विकभाव- संवन्धसे निवृत्त होगये । और मधुसूदनका जो हस्त है सो स्तनमें प्राप्त होत सन्ते जडताको प्राप्त होगया, तथापि लक्ष्मीका गुरुभूत कंपही नीवीका मोचन करता हुआ मधुसूदनका मित्र होगया दार्थात् उनके कार्यका करनेवाला हुआ। इसका द्वितीय उदाहरण कहते है "निद्राणः"इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है किनिद्रासे मुकुलित नेत्र है जिसमें ऐसे मुखको ऊँचा करिकेस्तनके मध्यमें स्थापित कियाहै हस्ताय जिसने ऐसा कृश होत सन्ते प्रथम तो शिथिल और पीछे पतित ९ तिरंग:- , वाक्यसे। वाक्यार्थ यह है कि सम्भोगशृंगारनिरूपणानन्तर हावोंका निरूपण शृंगारचेष्टा अर्थात् सम्भोगशृंगारानुगुण व्यापारविशेष सो हाव है । वह स्त्रियांको कहते है । इसको अर्थ यह है कि विवोक, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम ये चार श्रृंगारवेष्टा पुरुषोंको भी होसकती है, तो इनको भी हाव कहनाचाहिये, इसही दोषके वारण निमित्त सत्यन्त विशेषण देना तब यह दोप नहीं झोगा, क्योंकि पुरुषोंकी जो ये चेष्टा है सो औपाधिक हैं अर्थात् उद्दीपक (१३०) रसतरंगिणी- राधाया दरघूर्णदुत्पलदलद्रोणीमदद्रोहिमि- ईकोणस्य तरंगितैर्विरचितो दीर्घायुरेव स्मरः ॥४॥ देशानां समयानां नायिकानां च भेदेन नायकयोरवस्था- भेदेन च बहवो भेदाः । ते च रसमचर्यां विशेषतो दर्शिताः । इह पुनर्विस्तरभिया न प्रदर्श्यन्त इति ॥ अथ हावा निरूप्यन्ते । तत्र भरतः- लीला विलासोविच्छित्तिविभ्रमः किलकिञ्चितम् । मोहायितं कुट्टमितं विव्वोको ललितं तथा । विहृतं चेति विज्ञेया दश हावास्तु योषितः ॥५॥ नारीणां शृंगारचेष्टा हावः । स च स्वभावजो नारीणाम् ननुविवोकविलासविच्छित्तिविभ्रमाः पुरुषाणामपि सम्भ- सा जो दुकूल उसमें दिखाई गई जो त्रिवली और प्रकटनाभि उससे शोभा युक्त ऐसी राधाके ईषत्कम्पयुक्तकमलपत्रका जो पुट उसके मदको नहीं सहनेवाली अर्थात् मदसे सुन्दर ऐसे जो दृष्टिके कोणके तरंगित अर्थात् नेत्रप्रान्तके पतन उनसे स्मर जो कामदेव सो दीर्घायु ही किया गया। देश, समय, नायिका इनके भेदसे और नायक नायिकाओंकी अवस्था अर्थात् स्वभावभेदसे श्रृंगार रसके बहुत भेद हैं सो रसमञ्जरीमें विशेषतः दिखाये है, यहां विस्तारभयसे नहीं दिखाते हैं। अब यहां प्रसंगसंगतिसे हावनिरूपणकी प्रतिज्ञा करते हैं "अथ" इत्यादि करते हैं । हावोंका नाम “तत्र" इत्यादि वाक्यसे कहते है । वाक्यार्थ यह है कि स्त्रियोंके लीला आदिदश हाव है। सामान्यसे हावका लक्षण यह है कि स्त्रियोंकी जो संभावसिद्ध है ऐसा हुआ तो नारीस्वभावसे उत्पन्न होत सन्ते जो श्रृंगाराऽनुगुण चेष्टा उसका हाव कहना। यहां सत्यन्तका फल इत्यादि ग्रन्थसे टः ६.] भाषाटीकासहिता। (१३१) वन्तीति चेत् । सत्यम्, तेषान्त्वौपाधिकाः स्वभावजाः स्त्रीणामेव। नन्वेवं यदि तासां सदैव ते कथं न भवन्तीति चेत् । सत्यम्, उद्दीपकान्वयव्यतिरेकाभ्यां नायिकानां हावाविर्भावतिरोभावाविति । लीलाविलासविच्छित्ति- विभ्रमललितानि शारीराणि । मौट्टायितकुट्टमितविम्वोक- विहृतान्यान्तराणि । किलकिञ्चितमुभयसङ्कीर्णमिति । प्रियभूषणवचनाद्यनुकृतिर्लीला। तत्र विभावः सखीको- तुककलापः । अनुभावः प्रियपरिहासः । यथा- निष्ठ जो उत्कर्षरूप उपाधि उसकी सत्तासे नियत है सत्ता जिनकी ऐसे है। और ये विव्वोकादिक स्त्रीकोही स्वभावसे हैं अर्थात् उद्दीपकस्वरूपमात्रसत्तासे नियत है सत्ता जिनकी ऐसे हैं, इससे पुरुषचेष्टा जो विव्वोकादि उनमे अतिव्याप्ति नहीं हुई। यहां कोई अभिप्रायानभिज्ञ शंका करते हैं कि ऐसा ही मानते हो तो त्रियोंको ये चेष्टा सदैव क्यों नहीं होती है क्योंकि स्वभाव चिरन्तन होताहै, इस हेतु इन चेष्टाओंको भी सदा होना चाहिये। इसका समाधान आपके आभिप्रायका प्रकाशकारकै करते है कि नायिकाओंका जो हावका आविर्भाव वा तिरोभाव सो उद्दीपकके अन्य व्यतिरेकका अनभिधान करताहै अर्थात् उद्दीपन करताहै तब इन चेष्टाओंका आविर्भाव रहताहै । और उद्दीपक न रहें तब इनका तिरो- भाव होजाताहै, पुरुषको तो उद्दीपकातिशयके साथ अन्वय व्यतिरेक होता है इस हेतु स्त्रियोको सदा हाव नहीं होते हैं सो जानना । अव हावोंका विभाग करते हैं कि लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम और ललित यह पांच शरीरमात्रा- श्रित है। और मोहायित, कुट्टमित, विधोक और बिहत ये चार आन्तर अर्थात् मनोमात्राश्रित है । और किलकिञ्चित शरीर और अन्तर उभयाश्रित हैं, इसका अभिप्राय यह है कि श्रम जो है सो तो शारीर है, और अभिलाष जो है सो पान्तर है, इस हेतु गर्व, स्मित, हर्ष, भय और क्रोध इनको स्वरूपसे किलकिश्चित मानो तब तो ये आन्तर हैं, और फलकरि किलकिश्चित मानो तो शारीर हैं. इस हेतु एतदन्यतमद्यटितसमुदायात्मक किलकिश्चितको उभय संकीर्णत्व है सो जानना । अब प्रथमोद्दिष्ट लीलाका लक्षण कहते हैं "प्रियभूषण" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि पतिके मूपण वा वचन इत्यादिका जो अनुकरण ghe [ तरंग:- जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और चलती हुई है भ्रूवल्ली 'अर्थात् वल्लीस, जैसे होय तैसे, और चलायमान कुण्डलकी शोभा है जिस क्रियाम जैसे होय तैसे,और वक्र है ग्रीवा जिस क्रियामें जैसे होय तैसे वचनका आलाप करतीहुई ऐसी (१३२) रसतरंगिणी- चण्डांशी चरमाद्रिचुम्बिनि मनो जिज्ञासितुं सुभ्रुवा न्यञ्चत्कौतुकया तया विरचिते वंशीरवे राधया। एष स्फूर्जति कस्य निस्वन इति क्रोधाद्रजन्काननं राधां वीक्ष्य लताप्रतानपिहितां स्मेरो हरिः पातु नः ॥६॥ गमननयनवदनप्रभृतीनां यः कश्चिदुत्पद्यते विशेषःस विलासः। अत्र विभावाः प्रियदर्शनस्मरणादयः। अनुभावा अभिलाषवैदग्ध्यप्रकाशनादयः । यथा- कूजत्काञ्चि दरस्फुरद्वलि चलद्भवल्लि वेल्ला- वल्गत्कुण्डलकान्ति साचिचलितग्रीवं लपन्त्या वचः । प्रातर्नर्तितपुण्डरीकपरिषत्पांडित्यपाटच्चरी- दृष्टियं प्रति जायते वरतनोर्वका स शक्राधिकः ॥७॥ सो लीला है । इसका विभाव सखीके साथ कौतुककलाप है । अनुभाव प्रियपरिहास है। इसका उदाहरण "चण्डाशी" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि सूर्य अस्ताचलको प्राप्त होत सन्ते सुन्दर भृकुटियुक्त नायिकाओंकी अन्तःकरणवृत्तिकी परीक्षा करनेके अर्थ उत्पन्न हुआ है कौ तुक जिसको ऐसी मौढ राधाने मुरलीका नाद करत सन्ते “यह शब्द किसका है इस प्रकार क्रोधसे राधाश्रित वनको जाताहुआ विस्तृत लता- से टकी हुई राधाको देखकरिकै स्मितयुक्त कृष्ण हमारी रक्षा करो। अब विलासका लक्षण कहतेहै 'गमन" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है किगमन, नयन, वदन, भू इत्यादिका जो कोई विशेष उत्पन्न होता है सो विलास है। इसके विभाव प्रियका दर्शन, प्रियका स्मरण इत्यादि है। और अनुभाव-अभिलाष, चतुरताका प्रकाश करना इत्यादि हैं। इसका उदाहरण "कूजत्काञ्चि" इत्यादि श्कोकसे कहते है। इलोकार्थ यह है कि शब्दयुक्त है मेखला जिस क्रियामें जैसे होय तसे, और ईषत् प्रकाशित होती है त्रिबली श भू जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और चलायमान है शरीर जिस किया पष्ठः ६.] भागाटीकासहिता। (१३३) कतिपयभूषाविन्यासो विच्छित्तिः। तत्र विभावाः सौकु- मार्यप्रियसौभाग्यसौन्दर्यगर्वक्रोधक्केशादयः । अनुभावा गर्वमानक्केशप्रकाशनादयः। यथा- केयूरं न करे पदे न कटकं मौलौ न माला पुनः कस्तूरीतिलकं तथाऽपि तनुते संसारसारं श्रियम् । सर्वाधिक्यमलेखि भालफलके यद्वेधसा सुभ्रुवो जानीमः किसु तत्र मन्मथमहीपालेन मुद्रा कृता ॥८॥ वागङ्गभूषणानां स्थान विपर्यासो विभ्रमः। तत्र विभावा धनमदरागौत्कट्यादयः । अनुभावाः प्रियसख्याधुपहासा- दयः। यथा- त्यक्ते केलिविधौ निजांशुकधिया पीताम्बरस्यांशुकं पद्मायाः परिधाय पद्मशयनात्प्रातःप्रयान्त्या बहिः । जो सुन्दरशरीरयुक्त नायिका उसकी प्रातःकालमें नृत्य करते हुए जो कमल उनकी जो सभा उसकी जो शोभा उसका अपहरण करनेवाली ऐसी दृष्टि जिस पुरुषको उद्देश- करिकै वक होती है वह पुरुष अनायाससे स्वर्गफलाभिमुख्प होनेसे इन्द्रसे अधिक है। अव विच्छित्तिका लक्षण कहते हैं " कतिपय " इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि कुछ भूषणोंका जो धारण करना सो विच्छित्ति है। इसके विभाव-सुकुमारता, मियकी उदारता, सौन्दर्य, गर्व, क्रोध, क्वेश इत्यादि हैं और अनुभाव-गर्व, मान और क्लेश, इनका प्रकाश करना है। इसका उदाहरण "केयूरम्" त्यादि श्लोकसे कहते है, श्लोकार्थ यह है कि यद्यपि हाथमें वाहुभूषण नही है; और पगमे कटक नहीं है, और मस्तकमें माला नहीं है, तथापि ललाटमें जो कस्तूरी- तिलक है सो सर्वातिशययुक्त शोभाको करताहै । (इसमें उत्प्रेक्षा करतेहै कि) मानो ब्रह्माने इस नायिकाके ललाटदेशसे जो सब विधिका अर्थात् ललनाचूडाम- णित्व लिखा है उसमें कामदेवरूप राजाने यह कस्तुरीतिलकरूप जो मुद्रा है सो यथार्थताको सूचन करनेके निमित्त कीहै, यह बात जानते है । अब विभ्रमका लक्षण कहतेहै " वागङ्ग" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि उचन, अंगभूषण इनका जो स्थानविपर्यय अर्थात् स्थानका उलटापलटा होना सो विभ्रन है । इसके विभाव-धन, मद, राग इनकी उत्कटता है और अनुभाव-प्रिय और सखी इनका परिहास है । इसका उदाहरण "त्युक्ते केलि" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्य (१३४) रसतरंगिणी- [ तरंग:- आदातुं वसनाचलं चपलयन्कोपं दृशा दर्शयन् वाचा कौतुकमाचरन्स्मितसुधास्निग्धो हरिः पातुनः॥ ९॥ श्रमाभिलाषगर्वस्मितहर्षभयझुधा सङ्करः किलकिञ्चितम् । तदाह- श्रमाभिलाषगर्वाणां स्मितहर्षभयक्रुधाम् । असकृत्सङ्करः प्राज्ञैर्विज्ञेयं किलकिञ्चितम् ॥ १० ॥ अत्र विभावा नवयौवनोद्भेदचाञ्चल्यादयः। अनुभावाः कर्तव्यानिर्धारणादयः । यथा- कोदण्डमारोहति चण्डिमानं मधुव्रतः कांक्षति शोणिमानम् । पद्म सुधां वर्षति वेपमानं स्वर्णाचलः स्विधति किं निदानम्॥११॥ यथावा- यह है कि क्रीडाविधिका त्याग होत सन्ते आपके वस्त्रकी बुद्धिसे विष्णुके वस्त्रकों पहर करिकै प्रातःकालमें पनशयनसे बाहर जाती हुई जो लक्ष्मी उससे वस्त्रको ग्रहण करनेके अर्थ उनके वस्त्रको तुमारा यह है इस प्रकार चपलता करते हुए और नेत्रसे कोपको दिखाते हुए और वचनसे कौतुक करते हुए जो स्मितसुधास्निग्ध अर्थात् हास्ययुक्तान्तःकरण कृष्ण सो हमारी रक्षा करो ॥ अब किलकिञ्चितका लक्षण कहते है " श्रमाऽभिलाष " इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि श्रम अर्थात् गात्रगौरवत्वादि और अभिलाष, गर्व, स्मित, हर्ष, भय, क्रोध इनका जो सांकर्य अर्थात् परस्पर सामानाधिकरण्य सो किलकिश्चित है। इसमें प्रमाण कहतेहैं तदाह " इत्यादिसे । कारिकार्य यह है कि श्रम, अभिलाष, गर्ग, स्मित, हर्ष, भय, क्रोध इनका जो वारंवार संकर सो पण्डितोंने किलकिश्चित जानना । इसके विभाव-नवयौवनोद अर्थात् नव यौवनकी प्राप्ति और चञ्चलता इत्यादि हैं और अनुभाव-कर्तव्यका अनिश्चयादि है। अब इसका उदाहरण "कोदण्डम्" इत्यादि श्लोकते कहते हैं, श्लोकार्थ यह है कि कोदण्ड अर्थात् कोदण्डत्वसे अध्यवसित भृकुटियुगल जो है सो चण्डिमा अर्थात् कुटिलताको धारण करताहै ( यह कहनेसे गर्वाऽनुभावका कथन किया) और मधुव्रत अर्थात् तवसे अध्यवसित नेत्र जो है सो शोणिमा अर्थात् रक्त- ताको धारण करताहै (इससे क्रोधका अनुभाव दिखाया) और पद्म अर्थात् षष्ठः १.] भाषाटीकासहिता। (१३५) क्रोधागारसमुत्थिताः समुदयत्संत्रासशैलार्दिताः ब्रीडाभिः परिमर्दिताः स्मितसुधाधाराभिरुद्धर्तिताः। स्नाताः स्नेहरसैर्मनोभवकलामालाभिराभूषिताः पायासुर्मयि शैलराजदुहितुःस्फीताः कटाक्षच्छटाः॥१२॥ वार्तावैमुख्ये सति निभृतभूयोदर्शनस्पृहा मोहायितम् । अत्र विभावाः सपत्नीत्रासलज्जादयः। अनुभावा मनःप्रेम- कथनसङ्केतनिवेदनादयः । यथा- तत्त्वसे अध्यवसित मुख जो है सो अमृतका अर्थात तत्त्वसे अध्यवसित प्रसादका वर्षण करताहै (इससे हासका अनुभाव दिखाया) पद्म कैसा है सो कहते है कि वेपमान अर्थात् कांपता हुआ ( यह कहनेसे भयका अनुभाव दिखाया) और स्वर्णाचल अर्थात् तत्त्वसे अध्यवसित कुचमण्डल जो है सो स्वेदयुक्त होताहै (इससे हर्षाऽनुभाव कहा ) इसमें क्या निदान अर्थात क्या हेतु है यह नायि: काके प्रति नायककी उक्ति है सो जानना। यहां किलकिश्चितके अनुभाव कहे हैं । अब कोई स्थल में सम्पूर्णका सांकर्य भी किलकिश्चित होताहै, यह कहने के अर्थ मुख्य किलकिश्चितकी विवक्षा करिके उदाहरणान्तर कहतेहै "क्रोध'इत्यादिश्लोकसे। श्लोकार्य यह है कि क्रोधके आगार अर्थात् तत्त्वसे अध्यवसित लोचनसे आये- हुये और सम्यक् प्रकार उदयको प्राप्त अर्थात् तत्कालमें आविर्भूत जो संत्रास अर्थात् भय वही हुआ पर्वत, उससे अदित अर्थात् बीचमे रोकेगये ऐसे, और ब्रीडा अर्थात चीडाव्याक हर्षरो परिमदित अर्थात स्पर्श कियगये ऐसे, और स्मित कहिये ईपत् हासरूप जो सुधा उसकी धारासे उर्तित किये गये ऐसे, और स्नेह रस अर्थात् अभिलाष करिके स्नानको प्राप्त ऐसे, और मनोभवकलामाला अर्थात् कामोद्दीपनचतुररचनापरम्परासे जो गतिशय उससे भूषित ऐसे, और स्फीत अर्थात् वृद्धिको प्राप्त ऐसे जो हिमालयसुता पार्वतीके श्रमभरसे कटाक्षच्छटा अर्थात् अपांगपात सो हमारी रक्षा करो। इसका अभिप्राय यह है कि विवाहो- चर,महादेवके समीप पार्वतीकों लानेवाली जो सखी उस सखीने पार्वतीके साथ परिहास किया, तब पार्वतीको क्रोधं हुआ, पीछे भय हुआ, फिर लज्जा हुई अर्थात हर्ष हुआ, फिर हास हुआ, फिर रमण हुआ, तत्कालिक ये कटाक्षच्छटा है सो जानना ॥ अब मोडायितका लक्षण कहते है "वार्तावमुख्य" इत्यादि वाक्यसे । वाक्पार्थ यह है कि वागादिव्यापारविषयकदेषवत्त होत सन्ते (१३६) रसतरंगिणी- [तरंग:- न स्नेहस्य कथारसं कथमपि श्रोतुं समुत्कण्ठते राधा किन्तु विकीर्णरत्नकपटादागत्य सौधादहिः । नृत्यनेत्रपुटि स्फुरत्कुचघटि स्वेदोल्लसदोस्तटि व्यावल्गढुकुटि स्खलत्कटिपुनःकृष्णान्तिके भ्राम्यति॥१३॥ सुखे दुःखचेष्टा कुट्टमितम् । अत्र विभावारागौत्कट्यदशन- करजक्षतकुन्तलाधरग्रहादयः। अनुभावाः कपटकायसङ्को- चकपटसीत्कारादयः । यथा- रोढुं पाणिः प्रचलति चिरादमुलिनिश्चलाऽसौ भूविक्षेपो भवति कुटिलो नेत्रमन्तःप्रसन्नम् । निभृत अर्थात् औरसे अपरिचित जो वारंवार दर्शन अर्थात् दृग्व्यापार उसकी जो इच्छा सो मोडायित है । इसके विभाव-सफ्लीत्रास लज्जा आदि है । और अनुभाव-अन्तःकरणके प्रेमका कथन और संकेतनिवेदन इत्यादि हैं । इसका उदाहरण “न स्नेहस्य" इत्यादि श्लोकसे कहबेहैं । श्लोकार्थ यह है कि राधा जो है सो प्रेमके आस्वादयुक्त जो कथा उसको कोई प्रकारसे भी सुननेकी इच्छा नहीं करती है (यह कहने से द्वेष सूचित किया) किन्तु विखरे हुए जो रल उनके छलसे कोठासे बाहर आकरिके नृत्ययुक्त है नेत्रपुटी जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और शोभायमान है कुचकलश जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और खेदयुक्त है बाहुसमीपभाग जिस क्रियामें जैसे होय तैसे और विशेष करिके चारों तरफ भ्रमण करती हैं भृकुटी जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और मडती हुई है कटि जिस क्रियामें जैसे होय तैसे कृष्णके समीपमें भ्रमण करती है। अब कुट्टमितका लक्षण कहतेहै "मुखे दुःख" इत्यादिवाक्यसे। वाक्यार्थ यह है कि सुखमें जो दुःखचेष्टा अर्थात् इस चेष्टासे नायकको दुःखावगम होवो ऐसी इच्छा सो कुट्टमित है। इसके विभाव-रागका उत्कर्ष और दन्तक्षत और नखक्षत और कुन्तल और अधर इनका ग्रहण इत्यादि है और अनुभाव कपटसे शरीरका संकोच और कपटसे सीत्कार इत्यादि है । इसका उदाहरण "रोद्धम्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। इलोकार्थ यह है कि सुन्दरशरीरयुक्त नायिकाका हस्त जो है सो नीवीका निरोध करनेको विलम्बसे चलताहै और अंगुली जो हैं सो निश्चल है अर्थात् स्वामिकतक नीविमोचनप्रतिवन्धक जो चेष्टा उससे रहित हैं और भृकुटीका जो पष्ठः ६.] भाषाटीकासहिता। (१३७) गाढाश्लेषे भवति सुतनोरर्धमात्रो नकारः कम्पो मूर्ध्नः प्रसरति मुखं सम्मुखं न प्रयाति ॥ १४॥ गर्वाभिमानसम्भूतो विकारोऽनादरात्मा विव्वोकः । अत्र विभावा यौवनमधनमदकुलमदप्रियाऽपराधादयः । अनु- भावा अवहित्थदुर्वचनदुष्प्रेक्षणादयः। यथा- कृताञ्जलिः कातरदृनिपातः प्राणेश्वरः पार्श्वमुपाजगाम । सखीमुखे कुण्डलरत्नरेखामेषापुनःप्रेक्षितुमाचकाङ्क्ष ॥ १५॥ सकलाङ्गसमीचीनविन्यासो ललितम् । अत्रैव स्मिता- दयोऽन्तर्भवन्ति । तत्र विभावा मनःप्रसादप्रियतमदृढा- ऽनुरागधीरत्वादयः । अनुभावाः प्रियवशीकरणलोकाऽनु- रागचमत्कारादयः। यथा- विक्षेप सो कुटिल है अर्थात् क्रोधसूचकता वक्र है और भीतर नेत्र प्रसन्न है। और गाढ आलिंगन होत सन्तें अर्धमात्र नकार होताहै, और मस्तकका कंप होताहै, और मुख जो है सो प्रियके सन्मुख नहीं जाताहै । अव विभोकका लक्षण कहतेहै "गर्व" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि गर्व और अभिमान इनसे उत्पन्न जो अनादर अर्थात् तिरस्काररूप विकार सो वियोक है । इसके विभाव यौवनमद, धनमद, कुलमद, प्रियका अपराध इत्यादि है और अनभाव अव- हित्य, दुर्वचन, दुष्प्रेक्षण इत्यादि है। इसका उदाहरण "कृ तालि" इत्यादि श्लोकसे कहते है। श्लोकार्य यह है कि कातर अर्थात् भयचकित है दृष्टिपात जिसका ऐसा और जो प्राणेश्वर सो जोडे है हात जिसने ऐसा होतसन्त उसके पृष्ठतः समीप आता भया और यह नायिका ताटंकरचित वैदूर्यादिकान्तियुक्त जो कुण्डल उनकी रत्नरेखा सखीमुखमें स्थित उसको देखनेको पुनः आकांक्षा करतीभई। अब ललितका लक्षण"सकलाङ्ग इत्यादि वाक्यसे कहते है । वाक्यार्थ यह है कि सम्पूर्ण अंगोका समीचीनतासे जो विन्यान अर्थात् प्रसाधन सो ललित है। श्लोक-"धन्यासि या कथयसि प्रियसङ्गमेऽपि विश्रब्धचाटुकशतानि रतान्तरेषु। नीवी- म्प्रति प्रणिहिते तु करे प्रियेण सख्यःशपामि यदि किञ्चिदपि स्मरामि ॥" रसकथा- परा जो सखियां उनके मध्यमें रतिकालिक स्वप्रियालापकी कहनेवाली जो कोई सखी उस सखीका प्रहास करनेवाली-जो कोई सखी उसकी यह उक्ति है । इसमें (१३८) रसतरंगिणी- [तरंग:- कलक्वणितमेखलं चपलचारुनेत्राञ्चलं प्रसन्नमुखमण्डलं श्रवणसञ्चरत्कुण्डलम् । स्फुरत्पुलकबन्धुरं लपितशोभमानाधरं विहस्य रतिमन्दिरे ब्रजति कस्य शातोदरी ॥१६॥ प्रियसन्निधावभिलाषापरिपूर्तिविहृतम् । तत्र व्याजलज्जा- दयो विभावाः । अनुभावा अन्यथाचेष्टिताऽन्यथाव्यवहा- रादयः। व्याजाद्यथा- अभिलषति कपोले चन्द्रचूडे विधातुं तिलकमुदयदन्तः कोपभाजा भवान्या । फणिपतिभयकूटादंगमुत्कम्प- यन्त्या प्रचलवसनया तैर्विनिताः केलिदीपाः ॥ १७॥ धन्याऽसि यह जो कहा यह कहनसे व्यजित जो परोपहासरूप स्मित उसको हावोंमें अधिक कहना चाहिये यह शंका कोई करता है, सो युक्त नहीं क्योंकि यह जो उपहासरूप स्मित है सो ललितमें अन्तर्भूत है। इस ललितके विभाव- मनकी प्रसन्नता, प्रियतमका दृढ अनुराग और धीरता इत्यादि है । अनुभाव- प्रियवशीकरण, लोकानुराग, चमत्कार इत्यादि हैं। इसका उदाहरण “कलक- णित" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि कृशोदरी जो नायिका सो हँस करिकै कोई महामहिमाशाली पुण्ययुक्त पुरुषके क्रीडागृहमें मधुर ध्वनियुक्त है मेखला जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और चञ्चल अतएव रमणीय है नेत्रपक्ष्म जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और आन्तरसुखानुभावभूतप्रसादसहित है मण्डलाकार मुख जिस क्रियामें जैसे होय तैसे, और दोनों कानोमें चलते हुए है कुण्डल जिस क्रियामें जैसे होय तैसे,और प्रकाशमान जो पुलकादि परम सूक्ष्म विकार सो है जिसमें ऐसे बन्धुर अर्थात् नीचा ऊँचा नाभिस्तनप्रधान अवयवचक्र है जिस क्रियामें जैसे होय तस, आर मषणसे शोभित है अधर जिस क्रियामें जैसे होय तैसे जाती है। अब विहृतका लक्षण कहते है "प्रियसन्निधौ" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि प्रियके समीपमें भी इच्छाकी अपूर्ति अर्थात् विषयासंस्पर्श सो विहृत है। अभिलाष फलसम्पादकसामधीकालमें आपके प्रयलसे मिलाहुआ जो उस सामग्रीका विघटन सो विहृत है, यह फलितार्थ जानना । इसके विभाव-व्याज, लजा इत्यादि । अनुभाव-अन्यथाचेष्टा, अन्यथा व्यवहारादिक हैं। व्याजसे विहृतका उदाहरण "अभिलपति" इत्यादि श्लोकसे कहते है। इलोकार्थ यह है षष्ठः ६.] (१३९) भाषाटीकासहिता। लज्जातो यथा- आनन्दभाजो यदुनन्दनस्य कराऽवरोधं न करेण कुर्य्याः । सखी लपन्तीमिति सञ्जघान चकोरनेत्राचुलकोदकेन॥ १८॥ यूनोरन्योन्यं मुदितानां पञ्चन्द्रियाणां सम्बन्धाभावोऽभी- ष्टाप्राप्तिर्वा विप्रलम्भः। न च मानात्मके विप्रलम्भेऽव्या- प्तिरिति वाच्यम्, मुदितपञ्चेन्द्रियसम्बन्धाभावरूपस्य विशिष्टाभावस्य तत्राऽपि सत्त्वात् । तदानीं यूनोरिन्द्रि- याणां मुदितत्वाभावात् । ननु या प्रियमभिसरति सा विप्रयुक्ता भवेदिति चेत् । सत्यम्, सा विप्रयुक्तैव । अचि- रदर्शनप्रत्याशाऽनुवृत्तप्रमोदेन विरहधर्मस्याश्रुपातादेर- सम्भव इति। कि चन्द्रचूड जो शिव सो भवानीके कपोलस्थलमें तिलक अर्थात् पत्ररचनाको करनेकी इच्छा करत सन्ते उदयको प्राप्त जो अन्त:करणका कोप उससे युक्त पार्वतीने शेषके भयके छलसे अंगको कपातीहुईने चञ्चल जो वस्त्र उनकी पवनसे क्रीडादीप जो हैं ते विघ्नयुक्त करदिये अर्थात् क्रीडादीपोंको.बुझादिया। अव लज्जासे विहृतका उदाहरण आनन्दभाजः"इत्यादिश्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि चकोरनेत्रा अर्थात् कोपसे रक्त है नेत्र जिसके ऐसी नायिका जो है सो सखीको चुलकोदक अर्थात मुखसम्मानार्थ प्राप्त जलसे मारती भई, कैसी है वह सखी सो कहते है कि आनन्दयुक्त अर्थात् उत्कण्ठित जो कृष्ण उसके हाथका अवरोध अर्थात कंचुकीको मोचनमे प्रवृत्त जो पाणि उसका प्रतिवन्ध आपके हाथसे मत करो इस प्रकारसे शिक्षा करती हुई ऐसी। इस प्रकार सपरिकर सम्भोग शृंगारका निरूपण करिकै अब विप्रलम्भक लक्षण कहते हैं "यूनोर- न्योन्यम्" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि युवति और युवा इनकी जो परस्पर मुदित पांच इन्द्रियां उनका जो परस्पर सम्बन्धाभाव सो विप्रलम्भहै। यहां मुदितपद न दें तो करुणरसमें अतिव्याप्ति होजायगी, क्योंकि वहां भी युवति युवादोनोंका परस्पर पञ्चेन्द्रियसम्बन्धाभावहै। इस हेतु मुदितपद दिया तो अतिव्याप्ति नहीं हुई क्योंकि करुणस्थलमें इन्द्रियोंको मोद नहीं है । इन्द्रियोंकी जो मुदितता सो ही विप्रलम्भ है ऐसा कहैं तो संयोगशृंगारमे अतिव्याप्ति हो- (१४०) रसतरंगिणी- [ तरंग:- स च विप्रलम्भः पञ्चधा, देशान्तरगमनाद्गुरुनिदेशादभि- लाषादीया॑याःशापाचेति । समयादेवाद्विड्वरादित्यादयो ऽप्युन्नेयाः। देशान्तरगमनायथा- जायगी, वहां भी इन्द्रियोंको मुदितता है इस हेतु संबन्धाभाव कहा तो अतिव्याप्ति नहीं हुई क्योंकि वहां संबन्धका अभाव नहीं है। यहां पञ्च पद दिया सो रतिका परिपोषाभिप्रायक है सो जानना । फलित यह है कि वियोगकालावच्छिन्ना जो परिपूर्णा रति सो विप्रलंभ है सो जानना । जहां रतिका परिपोष नहीं होताहै वहां शृंगारका सामान्य लक्षण ही नहीं रहेगा तो विप्रलंभ भी नहीं रहेगा सो जानना। यहां यह शंका होती है कि दोषदुष्टइन्द्रियसंबन्धकालमें भी परस्पर साक्षात्कारका अभाव होनेसे विप्रलंभका योग सर्वमतसिद्ध है परन्तु पञ्चेद्रियसंबं. धाभाव वहां नहीं है, वहां विप्रलंभकी सिद्धिके अर्थ कलोपहितत्व विशेषणसंबंध अवश्य देना होगा, जब फलोपहित पञ्चेन्द्रियतबंध यहां नहीं है तो उसका अभाव है तो विप्रलंभशृंगार बनजायगा तो ऐसा लक्षण विप्रलंभका करना इसमें गौरव होताहै, इसकी अपेक्षा स्वविषयसिद्धयनुपहित जो परिपूर्ण राति सो ही विप्रलंभ कहना चाहिये । इसका समाधान यह है कि इस ही अभिपायसे दूसरा लक्षण कहतेहैं कि अभीष्ट जो अर्थ अर्थात् इच्छाविषय जो अर्थ उसकी प्राप्ति नहीं होय और रति पूर्ण रहै उसको विप्रलंभ कहना। अब प्रथम लक्षणमें जो मुदित पद न दें तो मानरूप विमलभमें अव्याप्ति होगी क्योंकि वहां पञ्चेन्द्रियसंबंधाभाव नहीं है । इससे मुदित पद दिया तो प्रकृतमें पञ्चेन्द्रियसंबंध है तो भी मुदितत्व- विशिष्टपञ्चेन्द्रियसंबंध नहीं है क्योंकि मानकालमें युवति युवाओंकी इन्द्रिय मुदित नहीं रहती हैं इस हेतु मुदितत्वविशिष्टपञ्चेन्द्रियसंबंधाभाव नहीं रहा तो अव्याप्ति नहीं हुई । अब यहां यह शंका हुई कि जो नायिका प्रियके प्रति अभिसरण करतीहै अर्थात जातीहै वह विप्रलंभयुक्ता नहीं कहावैगी, क्योंकि विप्रलंभका कार्य अश्रुपातादि वहां नहीं है । इसका समाधान यह है कि वह तो विप्रलंभयुक्त ही है परन्तु शीघ्र जो प्रियदर्शनप्रत्याशा उसके संबंधसे जो प्रमोद उससे विरहका कार्य अनुपातादि वहां नहीं हो सकता है सो जानना । विमलम्भश्रृंगारमें यद्यपि विशेष उपलम्भ नहीं है तो भी इसका विभाग करते हैं "" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि वह विप्रलम्भश्रृंगार पांच प्रका- का है। एक तो देशान्तरगमनसे, दूसरा गुरुजनाज्ञासे,तीसरा अभिलाषसे, चौथा- ईष्यासे, पांचवां शॉपसे । विशेषाऽनुपलम्भ है तो भी कारण वैचित्र्यमात्रसे भिन्न भेद - पष्ठः ६.] भाषाटीकासहिता। (१४१) प्रस्थानाय कृतोबमे प्रियतमे दोःकंकणेन च्युतं धैर्येण स्खलितं मदेन गलितं नेत्राम्भसा निःसृतम् । जीवेनाऽपि यियासुना शिवशिव प्रारम्भि वामभुवः कम्पान्दोलितकिङ्किणीकलरवव्याजेन वैण्यस्मृतिः॥१९॥ यथा वा तातचरणानाम्- वीणामके कथमपि सखीप्रार्थनाभिनिधाय स्वैरस्वैरं सरसिजहशा गातुमारब्धमेव । तन्त्रीबुद्धया किमपि विरहक्षीणदीनाङ्गवल्ली- मेनामेषा स्पृशति बहुशो मूर्छना चित्रमेतत् ॥ २० ॥ गुरुनिदेशाद्यथा- होतसन्तें और भी बहुत भेद हो सकतेहैं। समयहेतुक विप्रलम्भ, दैवहेतुक विप्रलम्भ, विड्डरादिहेतुक विप्रलम्भ, ये भी विप्रलम्भके भेद जानने चाहिये । देशान्तरगमन आपही विप्रलम्भका हेतु नही होताह किन्तु उसका ज्ञान विप्रलम्भका हेतु होताहै, ऐसा हुआ तो देशान्तरगमन नहीं भी होय और ज्ञान होजाय तो तहेतुक विमलम्भ भी हो सकताहै । इसका उदाहरण प्रस्थानाय इत्यादि श्लोकसे कहते हैं, श्लोकार्थ यह है कि नायक जो है सो प्रस्थान करनेके अर्थ आरब्धोद्योग होत- सन्तें नायिकाका हस्तकंकण गिरपडा (यद्यपि कंकण करभूषणका नाम है तो 'दो।' पद् निरर्थक है तथापि जहां पृथक् विशेषणवाचक पद रहै तहाँ विशिष्टवाचक पद विशेष्यमात्रको कहतहै । यह काव्यवेत्ताओंका संकेत है इस हेतु यहां कंकणपद भूष- णमात्रपर है 'दो' कंकणका प्रयोग करनेसे हस्तकंकणका ज्ञान होगा सो जानना और धैर्यकी शीघ्र निवृत्ति होनेसे वह पड़गया और मद भी नष्ट होगया । और नेत्रसे जल बाहर होगया। रहनेके स्थानमें उपद्रवशंका कारकै जानेकी इच्छा करते हुए जीवने भी कम्पसे आन्दोलित अर्थात् चलित जो किंकिणी अर्थात् काञ्ची उसकी जो मधुरध्वनि उसके छलसे वैण्य अर्थात् वेणुपुत्र पृथुराजाका स्मरण कष्टप्राप्त होकरिकै आरम्भ किया अर्थात् समूहके दाक्षिण्यसे जानेके निमित्त आवश्यकता भी हुई तो भी पुनः आगमनेच्छासे ऐसे मंगलका आचरण किया। वैण्यका स्मरण प्रस्थानसमयमें मंगलरूप है यह शास्त्रमें कहा है । स्वरूपसे देशान्तरगमनहेतुक विप्रलम्भका भी उदाहरण दिखाते हैं “वीणामंके" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि कमलतुल्य हैं नेत्र जिसके ऐसी नायिकाने अर्थात् जलसे भरे है नेत्र जिसके ऐसी नायिकाने प्रिय सखीकी प्रार्थनासे कोई प्रकार अर्थात बलात्कारसे वीणाको गोदमें रख कर यथेष्ट गानके निमित्त प्रारम्भ किया (१४२) रसतरंगिणी- [तरंग:- भास्वाँचूततरुर्गुरुर्मनसिजः कोप्येष गस्तमो मन्दो गन्धवहः सितो मलयजो दोषाकरो माधवः। अंगारो नवपल्लवः परभृतो विज्ञो गुरोराज्ञया निर्यान्तोऽसि विचारिताः कथममी क्रूरास्त्वया न ग्रहाः२१॥ अभिलाषाद्यथा- आगाराभिमुखं मुखं रचयातोर्वक्रीकृतग्रीवयो- र्व्यस्तं चोलमजानतोक्वचिदपि व्याजात्पुनस्तिष्ठतोः। मार्ग विस्मरतोः क्वचिवचिदपि त्यक्ताक्षरं जल्पतोः साचि प्रेक्षितमावयोर्यदभवद्भूयस्तदाशास्महे ॥२२॥ ही यह तो ठीक ही है परन्तु मूर्छना अर्थात मूर्छा जो है सो अत्यन्त विरहसे क्षयको प्राप्त इस ही हेतु दीन, ऐसी है अंगलता जिसकी ऐसी इसहीको वीणाके भ्रमसे बहुत वार विप्रलम्भके उद्दीपनसे स्पर्श करती है, यह आश्चर्य है। अभिप्राय यह है कि शब्दका धर्म जो मूर्छना उसकी अभिव्यक्ति वीणामेंही उचित है, शरीरमें उचितनहीं सो जानना। अब गुरुनिदेशहेतुक विप्रलम्भका उदाहरण कहतेहै "भास्वान्"इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि नायिकाकी उक्ति है कि हे नाथ ! गुरुओंकी आज्ञासे तुम गये हो परन्तु ये जो दुष्ट ग्रह अर्थात् दुष्ट ग्रहका कार्य करनेवाले उनका विचार तुमने क्यों नहीं किया ? अर्यात ये कौन अनर्थका उत्पादन करेंगे इसका प्रश्न ज्योतिषीसे क्यों नहीं किया? ये ग्रह कौन ? सो कहतेहैं कि चूततंरु अर्थाद आम्र जो है सो भास्वान है अर्थात नवपल्लवों से प्रकाशित है और सूर्यरूप है। और कामदेव जो है सो गुरु है अर्थात् महान है, और बृहस्पतिरूप है। और अनिर्वच- नीय है प्रभाव जिसका ऐसा जो यह भुंग सो अन्धताका सम्पादक होनेसे अन्ध- कार है और राहुरूप है। और गन्धका वहन करनेवाला जो पवन सो मन्द अर्थात् कामोद्दीपक है, और अनिरूप है । और चन्दन जो है सो सित अर्थात् जातिसे शुद्ध है, और शुक्ररूप है। और वसन्त जो है सो दोष अर्थात् परपीडनादि दोषोंका स्थान है, और चन्द्ररूप है । और नवीन जो पल्लव सौ अंगाररूप है अर्थात् दाह करनेवाला है और मंगलरूप है। और परभृत अर्थात कोकिल जो है सो विज्ञ अर्थात् विशेषाभिज्ञ है (यह कहनेका अभिप्राय यह है कि स्वरूपसे कुहू यह जो इसका शब्द है सो विरहिजनसन्तापकारक जो चन्द्रमा उसका अवसान- पर्यवसायी है इस हेतु अभिलषित अमावास्यादि रूप अर्थके प्रतिपादनमुखसे इष्ट. चितवनका आपमें प्रख्यापन करनेसे विज्ञ है) और बुधरूप है । अव अभिलाप हेतुक विप्रलंभका उदाहरण “आगारम्" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि कहीं ही अर्थात देवग्रहादिमेंही प्रवृत्त हुआ है नेत्रराग जिनको और समर्दसे .
षष्ठः ६.] भाषाटीकासहिता। (१४३) ईर्ष्यातो यथा- प्राणेशस्य प्रभवति मनः प्रेम हेमप्रसून- ञ्चेतश्चूतं दृगपि कमलं जीवनं बन्धुजीवम् । आशासूत्रे ग्रथितमखिलं वेधसा तस्य भंगे स्यादेतेषामपि निपतनं चण्डिमानं विमुञ्च ॥ २३ ॥ शापाद्यथा- अन्यत्र यदि निर्गन्तुमिच्छा निर्गच्छ दूरतः। प्रियाविरहतापेन शापदग्धो भविष्यसि ॥२४॥ शीघ्रही विश्लिष्ट, और द्वारभेदसे बाहर निकले और परस्परमार्गावलोकनमें आसक्त ऐसे नायक नायिकाओंका मनोरथ वर्णन यह है कि अग्रिम देशमें गमनाशंकासे आगे जाने भी हैं तो भी बीचमें देवतायतनमें ही उत्पन्न जो सम्भावना उससे देवगृहके अभिमुख मुखको करतेहुए, और इस ही हेतु वक्र की है ग्रीवा जिनने ऐसे, और इसही हेतु गिरताहुआ जो अंगावरण वस्त्र उसको नहीं जानते हुए ऐसे, और अस्थानमें भी छलसे स्थित ऐसे और जानेके मार्गका विस्मरण करते हुए ऐसे, और जिस किसी विषयमें लुप्त है वर्ण जिसमें जैसे होय तैसे वोलते हुए ऐसे जो हम और तुम उनका जो तिर्योक्षण अर्थात् मार्गमें दैवसंघटित ऐसा जो प्रेमभरपूरित चक्षुसे निरन्तर परस्पर झांकना होता भया, उसको फिर भी हम इच्छा करते है । अब ईष्पाहतुक विप्रलम्भका उदाहरण "प्राणेशस्य" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि दुतीकी उक्ति है कि हे चण्डि ! अर्थात् अत्यन्तकोपयुक्त! मान अर्थात आग्रहको छोड क्योंकि ब्रह्माने इन सबको आशा- रूप सूत्रमे गूथे है अर्थात् आशासे इनकी सत्ता है, सो ही कहते हैं कि आशा- सूत्रका भंग होनेसे इन सबका निपात होजायगा । ये सब कौन सो कहते है कि प्राणेश अर्थात् अत्यन्त प्रेमालम्बन प्रियका जो मनाप्रेम अर्थात् अन्तःकरणका स्नेह सो अत्यन्त रक्षा करनेके योग्य होनेसे स्वर्णपुष्परूप है, और अन्तःकरण जो है सो प्रियागन्धि जो अनेकविध मनोरथ तयुक्त होनेसे आम्रपुष्परूप है। और नेत्र जो है सो भी जलपूरनिमग्न होनेसे कमलरूप है, और जीवन जो है सो अस्थिरप्रसादता होनेसे वन्धुजीव अर्थात् मध्याह्नपुष्परूप है ॥ अब शापहेतुक विप्रलम्भका उदाहरण "अन्यत्र" इत्यादिश्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि दूतीकी नायकके प्रति उक्ति है कि निर्गमन अर्थात् जीवनके निमित्त जो बाहर जानेकी इच्छा है तो नायिकाको विना देखे ही उलट जावो, और यदि प्रियाके प्रति अभिसरण करोगे तो प्रियाका जो विरह अर्थात् तुमारा विश्लेष उससे उत्पन्न जो ज्वाला सो हमारे प्रतापनमात्रमें क्षम भी है तो भी तुम्हारे मुखावलोकनरूप इन्धनसे प्रवृद्ध होकरिके तुम्हारा दाह करनेमें समर्थ होजायगी।
(१४४)
रसतरंगिणी-
[तरंग:-
समयाद्यथा-विश्लेषनीवनबीडापीडाविधुरमानसा ।
तस्थौ प्रातः प्रियं प्रेक्ष्य वक्री वक्रीकृतानना ॥ २५ ॥
दैवायथा-जीवने सति विश्लेषो विश्लेषे सति जीवनम् ।
द्वयोरप्यनयो!नामहमेव निदर्शनम् ॥ २६ ॥
विड्रायथा-केलीगृहे वा मणिमन्दिरेवाशशामलंकानगरेहुताशः।
इतस्ततः प्रस्थितयोन यूनोवियोगजन्मा विरराम वह्निः॥ २७ ॥
इति श्रीभानु० रसतरंगिण्यां शृंगाररसनिरूपणं नाम षष्ठस्तरंगः ॥ ६ ॥
तुम शापकी तरह भस्मसात् हो जाओगे अर्थात् प्रियाके सम्भोगमें तुम आपके
आत्मामें दग्धत्वकी सम्भावना करोगे, जिस प्रकार महापुरुषके शापसे भस्मी-
भूत आत्माकी सम्भावना करते हैं उसही प्रकार हम भी प्रियाकी निकटतामात्रसे
शाप है मूल जिसमें ऐसा जो तुम्हारा विरहानल उससे भस्मीभूत तुम्हारे आत्माकी
संभावना मैं करती हूँ। यह कहनेसे शापहेतुक विप्रलंभका उदाहरण यह नहीं बनु
सकताहै, यह कहनेवाले परास्त होगये । वे इस श्लोककी ऐसी व्याख्या करते हैं
कि यह जो श्लोक है सो गमनमें प्रतिवन्धकताको सूचन करताहै, यह वियोग
शापमूलक नहीं है किन्तु मेघदूत काव्यमें 'त्वामालिख्य प्रणयकुपिता धातुरागैः
शिलायामात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम् । अनस्तावन्मुहुरुपचितै?-
ष्टिरालुप्यते मे क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते संगम नौ कृतान्तः।' इस इलोकमें शाप-
हेतुक विप्रलंभ है सो जानना ॥ अब समयहेतुक विप्रलंभका उदाहरण "विश्लेष"
इत्यादि श्लोकसे कहते हैं, श्लोकार्थ यह है कि विश्लेष होनेपर जीवनसंभूत जो
ब्रीडा उससे उत्पन्न जो दुःख उससे अधीर है मन जिसका ऐसी जो नायिका
सो प्रातःकालमें प्रियको देखकरिके चक्रवाकीकी तरह अवक्र वक्र किया है मुख
जिसने ऐसी स्थित होती भई, प्रातःकालमें प्रियवियोग सर्वत्र प्रसिद्ध है।
अब दैवहेतुक विप्रलंभका उदाहरण "जीवने सति" इत्यादि इलोकसे कहते हैं,
इलोकार्थ यह है कि सीताके वियोगमें रामचन्द्रकी उक्ति है कि जीवन होत सन्त
जो विश्लेष और विश्लेष होत सन् जो जीवन भी इन दोनोंका युवा पुरुषों में मैं
ही उदाहरण हूं अर्थात् और नहीं है ॥ अब उपद्रवहेतुक विमलभका उदाहरण
"कलीगृहे" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि लंकानगरम क्रीडा-
गृहमें अथवा गृहैकदेशमें मणिमन्दिरमें वा गृहके संपूर्ण भागमें प्रवृद्ध किया जो अति
सो कितनेही कालमें शान्त होगया परन्तु यथानिर्गम भागे हुए जो युवति युवा उनका
जो विरहोद्दीपित अग्नि सो शान्त नहीं हुआ, अभिप्राय यह है कि भयके अतिपातसे
बहुत कालपर्यन्त दोनोंका संयोग नहीं हुआ। यहां उपद्रवहेतुक विप्रलंभ है ।
इति श्रीरसतरङ्गिणीभाषाटीकायां शृङ्गाररसनिरूपणं नाम पष्ठस्तरङ्गः ॥ ६ ॥
भाषाटीकासहिता। (१४५) सप्तमः ७.] सप्तमस्तरंगः ७. हासस्य परिपोषो हास्यः। वर्णोऽस्य शुद्धो दैवतं प्रमथः। सच द्विविधः-स्वनिष्ठः परनिष्ठश्चेति । तावप्युत्तममध्य- माधमभेदाविधेति षड्विधः । स्वनिष्ठोऽपि षड्विधः । परनि- ष्ठोऽपि षड्विध इति द्वादशविधो हास्यः। तथाहि उत्त- मानां स्वनिष्ठे परनिष्ठे च स्मितहसिते । मध्यमानां स्व- निष्टे परनिष्ठे च विहसितोपहसिते । अधमानां स्वनिष्ठे परनिष्ठे चापहसितातिहसिते। अब हास्य रसका लक्षण और वर्ण और देवता "हासस्य" इत्यादि वाक्यसे कहते हैं । वाक्यार्थ यह है कि हास्यरूप स्थायिभावका जो परिपोष अर्थात् पुष्टता सो हास्य है । इसका वर्ण शुद्ध अर्थात् शुक्ल है और देवता प्रमथ है। वह हास्य रस दो प्रकारका है। एक स्वनिष्ठ, दूसरा परनिष्ठ । तहां हास्यरसका जो आश्रय उससे जो अन्य सो जहां आलम्बन विभाव होय तहां हास्य स्वनिष्ठ कहाताहै। जहां हास्य रसका आश्रय आलम्बन विभाव होय तहां हास्य परनिष्ठ कहाताहै। यह जो दोनो प्रकारके हारय हैं सो उत्तम, मध्यम, अधम इन भेदोंसे तीन तीन प्रकारके हैं इस हेतु छः प्रकारके हुये। अभिप्राय यह है कि एक उत्तमका हास्य, मध्यमका हास्य, अधमका हास्य इस तरह हास्य तीन प्रकारका है । उत्तमका जो हास्य सो स्वनिष्ठ परनिष्ठ दो प्रकारका है। और मध्यमका जो हास्य है सो भी स्वनिष्ठ परनिष्ठ दो प्रकारका है। और अधमका जो हास्य है सो भी स्वनिष्ठ पर- निष्ठ दो प्रकारका है। इस तरह छै प्रकार हुए । तहां उत्तमका जो स्वनिष्ठ हास- सो दो प्रकारका है स्मित और हसित । इन भेदोंसे इसही तरह परनिष्ठ भी स्मित रूप और हसितरूप है इससे उत्तमका हास चार प्रकारका हुआ । इसही तरह मध्यमका जो स्वनिष्ठ और पानिष्ठ हास्य सो विहसित उपहसिन इन भेदोसे दो दो प्रकारका है । तो मध्यमका हास्य भी चार प्रकारका होगया। इसही प्रकार अधमका भी स्वनिष्ठ, परनिष्ठ हास्य अपहसित, अतिहसित इन भेदोंसे दो दो प्रकारका है। तो अधमका हास्य भी चार प्रकारक होगया, तो स्वनिष्ठ हास्य छै छै प्रकारका इस तरह हास्यके बारह भेद होगये । प्रकारका परनिष्ठ हास्य १० (१४६) रसतरंगिणी- [तरंग:- उत्तमानामीषद्विकसितकपोलमव्यक्तदशनमपाङ्गसुष्टुवीक्षणं स्मितम् । उत्फुल्लकपोलं किञ्चिल्लक्षितदशनं हसितम् । मध्यमानां समयोचितमुत्तमरचनमाकुञ्चितमुखमाविर्भूतव- दनरागं विहसितम् । उत्फुल्लनासापुटं कुटिलवीक्षितं कुञ्चि- तग्रीव स्फुटस्वनमुपहसितम्।अधमानामुद्धतमुद्यदश्रुकम्पित- मौलि स्फुटतरस्वनमपहसितम्।अत्युद्धतं वहलाच स्फुटत- मस्वनमाश्लिष्टपार्श्वजनमारब्धकरतालमतिहसितम् । स्वनिष्ठं स्मितं यथा- अब उत्तमका जो स्वनिष्ठ और परनिष्ठ हास्य है सो स्मित हसितरूप कहाताहै उनके क्रमसे लक्षण "उत्तमानाम्" इत्यादि वाक्यसे कहते हैं । वाक्यार्थ यह है कि किश्चित् विकसित कपोल होय जिस हास्यमें और नहीं प्रकट है दशन जिसमें और नेत्रप्रान्तसे सुन्दर वीक्षण होय जिसमें ऐसा जो उत्तमका स्वनिष्ठ परनिष्ठ हास्य उसको स्मित कहते है । और जिस हास्यमें फूले हुए कपोल हो और दन्त किश्चित् लक्षित होजायं ऐसा जो उत्तमका स्वनिष्ठ परनिष्ठ हास्य उसको हसित कहते हैं। इसही प्रकार मध्यमका जो स्वनिष्ठ परनिष्ठ हास्य सो भी विहसितोपहसि- तरूप कहा है, उनका भी लक्षण क्रमसे "मध्यमानाम्" इत्यादि वाक्यसे कहते हैं। वाक्यार्थ यह है कि समयसे उचित और उत्तम शब्द होय जिसमें और संकुचित मुख होय और प्रकट वदनराग होय जिसमें ऐसा जो मध्यमका स्वनिष्ठ पर- निष्ठ हास्य सो विहसित है । और इसही प्रकार उत्फुल्ल है नासापुट जिसमें और कुटिल वीक्षित है जिसमें और संकुचित है ग्रीवा जिसमें, स्फुटहै शब्द जिसमें ऐसा जो मध्यमका स्वनिष्ठ परनिष्ठ हास्य वह उपहसित है । अव अधमका जो स्वनिष्ठ परनिष्ठ हास्य अपहसित अतिहसितरूप कहाहै उनका लक्षण “अधमानाम्" इत्यादि वाक्यसे कहते हैं । वाक्यार्थ यह है कि जिस हासमें उद्धत और बाहर निकलते हुए अश्रु होवै और कम्पितमस्तक होय, और अतिस्फुट शब्द होय ऐसा जो अधमका स्वनिष्ठ परनिष्ठ हास्य सो अपहसित है । इस ही प्रकार जिस हासमें और अत्यन्त उद्धत बहुत अश्रु होंय और अत्यन्त स्फुट शब्द होय और आश्लिष्ट समीप जन जिसमें, और आरब्ध है करताल जिसमें ऐसा जो अवमका स्वनिष्ठ परनिष्ठ हास्य वह अतिहसित है ।।
सप्तमः ७.] भाषाटीकासहिता। (१४७) लेखनीमितइतो विलोकयन्कुत्रकुत्र न जगाम पद्मभूः । तांपुनःश्रवणसीम्नि योजितां प्राप्य सन्नतसुखःस्मितंदधौ॥ स्वनिष्ठं हसितं यथा- व्योमांकुरं व्योमगतं रदायमुग्रद्युति स्वीयमुदीक्ष्य विष्णोः । यदा स हास्यं किमु तत्पयोधावद्याऽपि फेनस्तबकायमानम्र परनिष्ठं स्मितं हसितं यथा- हरवृषभमुखे सखेलमायोजयति सुवर्णसवर्णकान्तिपर्णम् । दृशि भुजगपतेः शिशुः षडास्यः कलयति कज्जलमन्तिके भवान्याः॥३॥ विहसितं परनिष्ठं यथा- अब स्वनिष्ठ स्मितका उदाहरण "लेखनीम्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि ब्रह्मा जो है सो लेखनीको इधर उधर देखता हुआ कहां कहां नहीं गया अर्थात् क्या क्या नहीं देखता भया ? और पीछे कानके निकटमें लगाई उस लेखनीको प्राप्त होकरिके नम्र है मुख जिसका ऐसा होतसन्ते स्मितको धारण करताहुआ। यहां वह लेखनी ब्रह्मनिष्ठ हास्यका आलम्बन है । यह लेखनी हास्था- श्रय नहीं है इससे यहां स्वनिष्ठ स्मित बनगया। अब स्वनिष्ठ हसितका उदाहरण "व्योमांकुरम्” इत्यादि श्लोकसे कहते है। श्लोकार्थ यह है कि आपका आकाशमें प्राप्त अर्थात् पृथीवीके उद्धारसमयमें पृथिवीका भेदनकरिके आकाशमें देखा ऐसा जो रदाय अर्थात् दन्तका अग्रभाग उसको व्योमांकुरकी सम्भावना करिके जो विष्णुको उग्रद्युति हास्य हुआ सो समुद्रमें आज भी फेनस्तबकायमान अर्थात् पुत्री- भूत फेनतासे दृश्यमान है क्या ? ॥ अब एक उक्तिसे ही परनिष्ठ जो स्मित और हसित उनका उदाहरण कहते हैं “हरवृषभ" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि छह हैं मुख जिनके ऐसे जो वालरूप स्वामिकार्तिक सो नन्दीके मुखमे सुव- र्णकी समान कान्तियुक्त जो पत्र उसको भवानीके समीप कौतुकसहित जैसे होय तैसे प्राप्त करते है, और शेषकी दृष्टिमे कौतुकसहित कजल लगाते हैं। यहां पत्रिकाव्यापारसे हसते हुए स्वामिकार्तिकको देखकरिके पार्वतीको स्मित हुआ और अञ्जनव्यापारसे हंसते हुए स्वामिकार्तिकको देखकरिके पार्वतीको हास्यका आविर्भाव हुआ, इससे उदाहरण संगत होगया। अव परनिष्ठ उदाहरण कहनेसे स्वनिष्ठ भी कथित होजाताहै, जहां आश्रय और आलम्बन एक रहै तहां परनिष्ठ होताहै इस अभिप्रायसे परनिष्ठ विहसि (१४८) रसतरंगिणी- [तरंग- निशासु तैलस्य धिया गृहीतैमसीजलैर्लिप्तमुखारविन्दम् । गोपं प्रभाते स्खलदश्रुनीरमधीरनादं जहसुस्तरुण्यः ॥ ४॥ उपहसितं परनिष्ठं यथा- यो-निरोधो मयारब्ध इति पद्यं पठन्बुधः। शश्वदुत्फुल्लनामेन तटस्थेनोपहस्यते ॥५॥ परनिष्ठमपहसितं यथा- रतोत्सवे वल्लभयज्ञसूत्रं कण्ठावलग्नं पारमोचयन्तीम् । द्विजाङ्गनां दीर्घतरं श्वसन्ती तारस्वनं वारवधूर्जहास ॥६॥ परनिष्ठमतिहसितं यथा- चोरः कामरिपोर्गृह निशि गतः शूलं कपालं हर-- न्बीजं धूर्तफलस्य तण्डुलधिया नीत्वा पुनर्भुक्तवान् । व्यावल्गन्प्रचलन्स्खलन्परिपतन्मुह्यन्विघूर्णन्हस- ब्राध्वनिमुक्तमौलिकुसुमं स्वर्वेश्यया हस्यते ॥ ७॥ तका उदाहरण "निशासु" इत्यादि श्लोकसे कहते है । इलोकार्थ यह है कि तरुणी जे है ते रात्रिमें तैलकी बुद्धिसे लिया जो मसीजल उससे लिप्त है मुखारविन्द जिसका ऐसे गोपको देखकरिके प्रातःकाल पडताहै बाष्पजल जिस क्रियामें जैसे होय तैसे और अव्यक्त है कण्ठध्वनि जिस क्रियामें जैसे होय तैसे हॅसतीभई ॥ अब परनिष्ठ उपहसितका उदाहरण "योनिरोधः" इत्यादि इलोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि मैंने जो निरोध अर्थात् आग्रह आरब्ध किया इस तात्पर्य- से 'योनिरोधो मयारब्ध' इस वाक्यको बोलता हुआ जो पण्डित सो 'योनिका रोध' ऐसे जुगुप्सित अर्थका प्रतिपादक उस वाक्यको मानकरिके निरन्तर श्वास, भरसे फूलीहुई है नासिका जिसकी ऐसे तटस्थ पुरुषसे हास्ययुक्त किया जाता है। अव परनिष्ठ अपहसितका उदाहरण "रतोत्सवे" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। लोकार्थ यह है कि क्रीडाके समय में कण्ठमें लगा हुआ जो प्रियका यज्ञोपवीत उसको छुडाती हुई और दीर्घतर श्वास लेती अर्थात् इंसतीहुई ऐसी ब्राह्मणकी स्त्रीको देखकरके वेश्या जो है सो बडा भारी है शब्द जिस क्रियामं जैसे होय वैसे हँसती भई ॥ अव परनिष्ठ अतिहसितका उदाहरण "चोरः कामरिपो" सप्तमः ७.] भाषाटीकासहिता। (१४९) शोकस्य परिपोषः करुणः । आशाविच्छेदे सति सर्वेन्द्रि- यकृमो वा । न च विप्रलम्भेऽतिव्याप्तिः । तत्रेष्टाशायाः सत्त्वात्, तद्विच्छेदे तु स विप्रलम्भः करुण एव । शोको दुःखम् । वर्णोऽस्य कपोतचित्रितः । दैवतं वरुणः। स च स्वनिष्ठः परनिष्ठश्च । स्वशापबन्धनक्केशानिष्टैर्विभावैः स्वनिष्ठः । परेष्टनाशशापबन्धनक्लेशादीनां दर्शनस्मरण- विभावैः परनिष्ठः । स्वनिष्ठो यथा- . - . इत्यादि इलोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि रात्रिमें चोर जो है सो महादेवके घरमें गया वहां त्रिशूल और कपाल इनको हरण करता हुआ, चावलकी बुद्धिसे धतूरेके दानोंको लेकरिके भोजन करता भया फिर वल्गन करता हुआ और बहुत चलता हुआ और ठोकर खाताहुआ और पडता हुआ और मोहको प्राप्त होता हुआ और घूमता हुआ और हँसता हुआ ऐसा वह चोर बडी भारी है ध्वनि जसमें जैसे होय तैसे और गिरा है मस्तककापुष्प जिस क्रिया जैसे होय तैसे अप्सराओंसे हॅसा जाताहै अर्थात् अप्सराएं उसकी हँसी करती हैं । अव करुणरसका लक्षण कहते है “शोकस्य" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि शोकरूप स्थायिभावकी जो परिपुष्टता अर्थात् भग्नावरणचित्संबन्ध सो करुण रस है । तहां विनिगमनाविरहसे शोकावच्छिन्न जो भग्नावरण चित् उसको भी करुणरसत्व होनेपर शोकका असाधारण कार्य जो सर्वेन्द्रियलम अर्थात् ग्लानि तदवच्छिन्न जो चित् सो भी करुण रस होगा तो सर्वेन्द्रियक्लममें भी करुणरसावच्छेदकता विनिगमकाभावसे प्राप्त होगी सो अनिवार्य है। वह क्लम अन्तःकरणवृत्तिसे भिन्न भी है तो भी करुणरसरूप है, इस अभिप्रायसे दूसरा लक्षण कहते हैं कि आशाका विच्छेद होनेपर जो सर्वेन्द्रियक्लम अर्थात् ग्लानिसे करुण रस है । परन्तु इस पक्षमें क्लेश बहुत है इस हेतु द्वितीय पक्षमें जो वापद- प्रयोग है सो अरुचिसूचक है । द्वितीय लक्षणमे 'आशापिच्छेदे' सति यह न करें तो विप्रलंभश्रृंगारमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि वहां भी इन्द्रियक्लम है इस हेतु आशा- विच्छेद होत सन्ते यह पद दिया तब विप्रलंभमे अतिव्याप्ति नहीं होगी क्योंकि विप्रलंभमें आशाका विच्छेद नहीं होताहै किन्तु इष्टकी आशा रहती ही है । जो विप्रलंभमें इष्टकी आशा निवृत्त होजाय तो वह विप्रलंभ करुण ही है सो जानना।
(१५० रसतरंगिणी- [तरगः- तव नाथ शरःशरासनं तव देहेन सहैव भस्मसात्। अहमस्मिततःप्रतीयते तव नास्मीति किमुच्यतामितः॥८॥ परनिष्ठो यथा- अनुवनमनुयान्तं बाष्पवारि त्यजन्तं मृदितकमलदामक्षाममालोच्य रामम् । अब प्रथम लक्षणमें जो शोक पद कहा उसका अर्थ कहते हैं कि शोक दुःखको कहना, इस रसका वर्ण कपोतवत् चित्रित है, और देवता वरुण है। यह करुण छाप्रकारका है । एक स्वनिष्ठ दूसरा परनिष्ठ। तहां आपका शाप आपका बन्धन और आपका क्लेश आपका अनिष्ट एतत्स्वरूप विभावोंसे जो करुण रस होय वह स्वनिष्ठ है, इस पक्षमें बन्धनादि जो उपाधि उनको शोकका विभावत्व प्राप्त होताहै इस हेतु आपके अधिकरणमें रहनेवाला आलम्बन विभाव होय जिसका ऐसा जो करुण रस सो स्वनिष्ठ है और आपके अधिकरणमें न रहनेवाला ऐसा आलंबन विभाव होय जिसका वह करुण रस परनिष्ठ है सो जानना । इसही अभिप्रायसे कहते है कि परका इष्टनाश और शाप बन्धन क्लेशादिके दर्शनस्मरणरूप विभावसे जो करुण रस वह परनिष्ठ है। और शापबन्धनादिका आश्रयभूत जो प्राणी सो करुण रसके विभाव हैं, यह जो सिद्धान्त पक्ष उसमें तो स्वाश्रय है आलंबन विभाव जिसका ऐसा जो करुण रस वह स्वनिष्ठ है और स्वाश्रयसे अन्य है आलं- बन जिसका ऐसा जो करुण रस सो परनिष्ठ है सो जानना । यहां यह शंका है कि " बन्धानाद् व्यसनात्" यह जो भरताचार्यकी उक्ति सो इस पक्षमें विरुद्ध होती है क्योंकि इस ग्रन्थसे वन्धनादिको ही विभावताकाकथन है । इसका समाधान यह है कि बध्यमानको भी पन्धन विना करुणका विभावत्व नहीं होताहै इस अर्थको भरतवाक्प ध्वनित करताहै। इस ही प्रकार सब जगह विभावामें रीतिका अनुसरण करलेना, इस ही अभिप्रायसे यहां स्वशापबन्धनादिको विभाव कहेहै । अब खनिष्ठ करुणरसका उदाहरण " तव" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि रतिकी उक्ति है कि हे नाथ ! आपका शर और धनुष आपके देहके साथ एक ही कालमें भस्म होगया और मैं हूं अर्थात भस्म नहीं हुई हूँ इस हेतु मै आपकी नही है ऐसा जाना जाताहै ऐसे निश्चयके उत्तर क्या कहूं ? अर्थात् हमको त्यागकरिकै किस प्रकार परलोकके पथिक हुए इत्यादि क्या कहूं । अब परनिष्ठ करुण रसका उदाहरण-" अनुवनम् " इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि वनको लक्ष्यकारकै जाते हुए और वाष्पजलको त्यागते हुए और म्लान कम- स्तमः ७.] भाषाटीकासहिता। (१५१) दिनमपि रविरोचिस्तापमन्तः प्रसूते रजनिरपि च धत्ते तारकाबाष्पबिन्दून् ॥ ९॥ परिपूर्णः क्रोधोरौद्रः, सर्वेन्द्रियाणामौद्धत्यं वा । वर्णोऽस्य रक्तो दैवतं रुद्रः। यथा- चण्डांशुः किं न चक्रं भुजगपतिरसौवर्तते वा न पाशः कुन्तः किं दन्तिदन्तान च गिरिरशनिः किं न शस्त्रैः किमन्यैः। भीमोऽहं दुष्टदुर्योधननिधनसमुदण्डबाहुप्रकाण्डः प्रत्यावृत्तप्रकोपप्रलयहुतवहो नास्मि कस्याऽपि वश्यः ॥१०॥ यथा वा- लमालाकी तरह कृश ऐसे रामको देखकरिकै दिन भी सूर्यके प्रचण्ड आतपस्वरूप तापको अर्थात् दिनके मध्यमें आतिज्वरको प्रकट करताहै और रात्रि भी तारका स्वरूप बाष्पबिन्दुओंको धारण करती है। अव रौद्रका लक्षण कहतेहै “परिपूर्णः" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि परिपूर्ण जो क्रोधरूप स्थायिभाव सो रौद्र है । अथवा पूर्वोक्त प्रकारसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी जो उद्धतता सो रौद्र है । इसका वर्ण रक्त है, देवता रुद्र है । यद्यपि रौद्र रस अमूर्त होनेसे रक्तरूपवान् नहीं हो सकताहै, देवताके रूपसे रूप कहोगे सो बन नहीं सकगा क्योंकि रुद्रका रूप श्वेत है फिर रक्तवर्ण कसे कहा यह शंका है तथापि अन्तःकरणवृत्तिकालमे देवताका जैसा वर्णका अनुभव किया जाताहै उस ही वर्णसे रसको वर्णवत्ताका अध्यवसान करते हैं। ऐसा हुआ तो क्रोधाविष्ट रुद्रका भी वर्ण रक्त है इस हेतु रसको भी रक्तवर्ण कहा। कोपकालमें वर्ण रक्त होताहै इसम कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा" यह वाक्य प्रमाण है। यहां मषी गुञ्जाका नाम है सो जानना ॥ अब रौद्र रसका उदाहरण-" चण्डांशुः" इत्यादि इलोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि भीमसेन कहताहै कि सूर्य जो है सो चक्र नहीं है क्या ? शेष नागपाश नहीं है क्या ? हाथीके दांत भाले नहीं है क्या? पर्वत वन नहीं है क्या ? अपि तु है ही फिर और शस्त्रोंसे क्या प्रयोजन है ? दुष्ट जो दुर्योधन उसके मारनके निमित्त सम्यक प्रकार ऊंचा किया है दण्ड जिसने ऐसा है बाहुरूप अवयव जिसका ऐसा और प्रत्यावृत्त अर्थात् फिर उद्दीप्त जो क्रोध सो ही है प्रल- यकालीन अग्नि जिसका ऐसा जो मैं भीम सो किसी आधीन नही हूं।
(१५२) रसंतरंगिणी- [ तरं क्रीडातुङ्गतुरङ्गटापपटलीखर्वीकृतो/धर- श्रेणीस्फूर्जितधूलिधारिणि तमस्तोमावलीढं जगत् । बद्धस्पर्द्धकरीन्द्रवृन्दचरणव्याभुनभोगीश्वर- व्यग्रोदयफणाग्ररत्नरुचिभिर्विद्योतयामो वयम् ॥ ११ ॥ परिपूर्ण उत्साहः सर्वेन्द्रियाणां प्रहर्षों वा वीरः। वर्णोऽस्य गौरः। दैवतं शक्रः। स च विधा-युद्धवीरदानवीरदयावीर- भेदात् । इयांस्तु विशेषः। स चोत्साहो युद्धवीरे प्रतापाऽध्य- वसायादिप्रभवः, दानवीरे दानसामर्थ्यादिप्रभवः, दयावीर आर्द्रतादिप्रभवः । युद्धवीरो यथा- संग्रामाङ्गणमागते दशसुखे सौमित्रिणा विस्मितं सुग्रीवेण विचिन्तितं हनुमता व्यालोलमालोकितम् । अब उदाहरणान्तर कहते हैं "क्रीडातुङ्ग" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि किसीकी उक्ति है कि शरोंसे क्रीडा करनेको उच्चतर अश्व उनके खुरोंका जो समूह उनसे खोदे गये जो पर्वतके समूह उनसे उत्पन्न जो पुलिसमूह तद्रूप जो अन्धकारसमूह उसके व्याप्त ऐसा जो जगत् अर्थात् सामन्त सैन्यादि उसको हम रुपेश्वरकी दीर्घताको नहीं सहकरिकै वांधी है स्पर्धा जिनने ऐसे जो बडेबडे हाथियोंके चरण उनसे भारभरसे नम्रीकृत जो भोगीश्वर अर्थात् पृथ्वीका आधार भूत शेष नाग उसकी व्यग्र अर्थात् चलित और उत्कृष्ट जो फणामणि उनकी कान्तिसे प्रकाशित करते हैं। अभिप्राय यह है कि पर्वतके चूर्णसे जो विवर उससे निकली जो मणियोंकी कान्ति उनसे जगतको प्रकाशित करतेहैं । अब वीरताका लक्षण कहते हैं “परिपूर्णः " इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि परिपूर्ण जो उत्साह अथवा पूर्वोक्तमकारसे जो संपूर्ण इन्द्रियोंका प्रहर्ष सो वीर है। इसका वर्ण गौर है, देवता इन्द्र है । वह वीर तीन प्रकारका है एक युद्ध वीर, दूसरा दानवीर, तीसरा दयावीर । इतना विशेष है कि वह उत्साह युद्ध- वीरमें तो प्रतापके ज्ञानसे उत्पन्न होताहै, और दानवीरमें दानसामर्थ्यसे उत्पन्न होताहै, और दयावीरमें आर्द्रतादिसे उत्पन्न होताहै । अब युद्धवीरका उदाहरण “संग्राम' इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । इलोकार्थ यह है कि रावण जो है उसको संग्रामभूमिमें आवत सन्ते लक्ष्मण विस्मयको प्राप्त .
सप्तमः ७.] भाषाटीकासहिता। श्रीरामेण परन्तु पीनपुलकस्फूर्जत्कपोलश्रिया सान्द्रानन्दरसालसा निदधिरे बाणासने दृष्टयः॥ १२ ॥ दानवीरो यथा- अभ्यागच्छति मंदिरं द्विजकुले खण्डाय खण्डाम्बुधिं क्षाराब्धि लवणाय दुग्धजलधिं दुग्धाय चेदास्यति । दुर्वारो विरहो भवेदिति भिया दीनेव दिव्यापगा यस्यांप्रिं न जहाति विप्रवपुषे रामाय तस्मै नमः॥ १३ ॥ दयावीरो यथा- दयाबीजं हरेनेंत्रमंकुरस्तत्र भास्करः। ततः समुत्थितावेतौ पल्लवी रामलक्ष्मणौ ॥ १४ ॥ होते है। अभिप्राय यह है कि आजही कृतकृत्य होंगे इस हर्षसे विस्मयको प्राप्त हुए, और सुग्रीव चिन्तवन करता हुआ। अभिप्राय यह है कि किस प्रकार हमही इसको मारकर श्रीरामके अनृणी होंगे, यह चिन्तवन करता भया । और हनुमान व्यालोल अर्थात् राम, रावण दोनोंका एक कालमें चक्षुका संचार जैसे होय तैसे झांकते भये, अभिप्राय यह है कि राम आज्ञा द तो इसको बांधकर गिरा दूइस विचारसे झांकते भये, परन्तु रामने तो धनुषमें दृष्टिको स्थापित करदी । कैसे राम कि उत्साहका कार्य जो अंगपुष्टि उससे युक्त और रोमाञ्चसे स्फूर्जत अर्थात् शोभित है कपोलश्री जिसकी ऐसे, दृष्टि कैसी है कि निविडआनन्दात्मक रससे आलसयुक्त ऐसी॥ अब दानवीरका उदाहरण- "अभ्यागच्छति" इत्यादि श्लोकसे कहतहैं । श्लोकार्थ यह है कि विप्रवपु अर्थात् ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणके कार्यसंपादनार्थ है शरीर जिनका ऐस अर्थात् परमपुरुपरूप जो वह राम उनके अर्थ नमस्कार है । वह कौन सो कहतेहै कि गंगा इस भय से ही मानो दुःखित होकरिकै जिसके चरणका त्याग नहीं करती है, यह भय कौन सो कहत हैं कि ब्राह्मणकुल याचक होत सन्ते आपके मन्दिरको प्राप्त होत सन्ते अर्थात् अतिथिताको प्राप्त होत सन्वे परशुराम जो है सो खांडके निमित्त खण्डसमुद्रको, लवणके निमित्त क्षारसमुद्रको, दुग्धके निमित्त दुग्धसमुद्रको, जो देदेगे अर्थात् ब्राह्मणोंके आधीन करदेंगे तो हमारा जो विरह अर्थात प्रियविश्लेष सो अप्रतीकार होजायगा इस भयसे । अव दयावीरका उदाहरण कहतेहै " दयाबीजम्" इत्यादि श्लोकसे ।
(१५४) रसतरंगिणी- [ तरंगः- भयस्य परिपोषः सर्वेन्द्रियविक्षोभो वा भयानकः । वर्णोऽस्य श्यामोदैवतं यमः। स च स्वनिष्ठः परनिष्ठश्च । अपराधात्स्वनिष्ठो यथा- गोपीक्षीरघटीविलुण्ठनविधिव्यापारवार्ताविदोः पित्रोस्ताडनशंकया शिशुवपुर्देवः प्रकाश्य ज्वरम् । रोमाञ्चं रचयन्दशौ सुकुलयन्प्रत्यंगमुत्कर्पयन् सीत्कुर्वस्तमसि प्रसर्पति गृहं सायं समागच्छति ॥ १५ ॥ श्लोकार्थ यह है कि विष्णुका जो नेत्र सो दयाका बीज अर्थात् असाधारण कारण है (यहां दयापदका वाक्यार्थ इच्छा विशेषसे अतिरिक्त है) वह दया व्यञ्जनावृत्तिसे इच्छाविशेषरूप दयावीरोत्साहकी बोधक है, ऐसा हुआ तो रक्षणादिरूप व्यापार ही यहां दयापदार्थ है, इससे वमनाख्य दोषका निवारण होगया सो जानना । उस दयाबीजरूप नेत्रमें अंकुर सूर्य होतेभये, उस अंकुरसे ये राम लक्ष्मण पल्लव होतेभये, यहां ईदृशपल्लवारोपाऽनुगुणरूप जो अनुभाव उससे अनुभावित गम्यजगद्विभावित गम्योत्साहचिन्तादि संचारित दयावीरोत्साह व्यंग्य है इस हेतु उदाहरण बनगया। अब भयानकका लक्षण कहतेहैं " भयस्य " इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि भयकी पुष्टता अथवा सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी क्षुब्धता जो है सो भयानक है । इसका वर्ण श्याम है, दैवता यम है वह दो प्रकारका है एक स्वनिष्ठ दूसरा परनिष्ठ । यहां भी पूर्ववत् स्व अर्थात् भयानकके अधिकरणमें रहनेवाला जो विभाव सो है आलंबन जिसका अथवा स्वका जो अधिकरण सो ही है आलंबन जिसका वह स्वनिष्ठ भयानक रस है इसही अभिप्रायसे कहतेहैं कि अपराधसे जो भय सो स्वनिष्ठ है यहां अपराध भी स्वनिष्ठ जानना । अब भयानकका उदाहरण "गोपीक्षीर" इत्यादि इलोकसे कहते हैं। इलोकार्थ यह है कि वालशरीर श्रीकृष्ण जो है सो गोपियोंका दुग्धसे भराहुआ जो घट उसका जो लूटना सो ही है फल जिसका ऐसा जो व्यापार उसकी कथाको जानते हुए। जो पितामातारूप नन्द यशोदा तत्कर्तृक ताडनकी शंकासे ज्वरको प्रकाशित करिके रोमाञ्चको रचतेहुए और दृष्टिको मुकुलित करते हुए और तत्तत् अंगको उत्कम्पित करते हुए और सीत्कारको करते हुए, सायंकाल अन्धकार होत सने घर आते हैं।
सप्तमः ७.] भाषाटीकासहिता। (१५५) परनिष्ठों यथा- गंगायाः सलिले निमजति जटाजूटे परिभ्राम्यति भ्रश्यत्यक्षिहुताशने फणिफणाभोगे कचिल्लीयते । कुब्जीभूय हरस्य कर्णसुषिरं निर्गन्तुमुत्कण्ठते राहोरास्यमुदीक्ष्य किं न कुरुते बालस्तुषारद्युतिः ॥१६॥ विकृतनिनदात्परनिष्ठो यथा- कुर्वाणे दशभिर्मुखैर्दशमुखे नादं सुरैः कंपितं दिङ्नागैश्चकितं हरेरपि हयैरुत्पुच्छमाधावितम् । सुग्रीवस्तु समुच्छलज्जलनिधिव्यालोलवीचिभ्रमि- भ्रश्यत्सेतुविशङ्कया हनुमतो वक्के दृशौ सन्दधे ॥ १७ ॥ अब परनिष्ठ भयानकका उदाहरण "गंगायाः" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। यहां स्वाधिकरणमें नहीं रहनेवाला जो विभाव सो है आलम्बन जिसका अथवा स्वाधिकरणसे अन्य है आलम्बन जिसका ऐसा जो भयानक रस वह परनिष्ठ कहा- ताहै। यहां परनिष्ठ क्रूरतासे पनिष्ठ जानना । श्लोकार्य यह है कि वाल अर्थात कलावशिष्ट जो चन्द्रमा है सो राहुके मुखको देखकरिके क्या क्या साहस नहीं करता है अपि तु सव साहस करताहै क्योंकि शास्त्र में ऐसा कहाहै कि साहसपर प्राप्त हुए विना मनुष्य कल्याणको नहीं देखताहै और साहसमें प्राप्त होकरिके जो जीता है तो देखताहै । वही साहस दिखाते हैं कि महादेवशिरःस्थ गंगाके नलमें डूबता है, और हरके जटाजूटमें भ्रमण करताहै और नेत्ररूप आग्निमें पड- ताहै और फणी अर्थात् सर्पके फणाभोगमें कहीं गुप्त होजाताहै, और कुब्ज अर्थात् शरीरको प्रवेशाऽनुगुणकरिके महादेवके कर्णविपरमे जानेकी उत्कण्ठा करताहै । अव परकृत जो विकृत शब्द उससे परनिष्ठ भयानकका उदाहरण कहते हैं "कुर्वाणे" इत्यादि श्लोकसे। श्लोकार्य यह है किरावण जो है उसको दशमुखोंसे दशदिशाओंमें नाद करत सन्ते देवता कम्पको प्राप्त होगये और दिङ्नाग अर्थात् ऐरावतादि विस्मयको प्राप्त होगये और सूर्य के सातों अश्व भी उच्च पुच्छको करिके दौडते भये, सुग्रीव तो उछलता हुआ और अतिक्षोभको प्राप्त जो समुद्र उसकी वेगयुक्त जो लहर उनका जो आवर्त उससे नाशयुक्त सेतुकी शङ्काकरिके हनुमा- के मुखमे दृष्टिको योजित करता भया। अव वीभत्सका लक्षण कहते हैं।
(१५६) रसलरंगिणी- [ तरंग:- - जुगुप्सायाः परिपोषो बीभत्सः। सन्द्रियाणां संकोचों वा। वर्णोऽस्य नीलो देवतं महाकालः। स च स्वनिष्ठः परनि- युश्चेति । स्वनिष्ठो यथा- कालीकुण्डलिनीकुतूहलमिथःप्रारब्धथूथूत्कृति- न्यञ्चद्वीचिचलद्विहायसि वलज्झल्लीनिपातस्पृशि । बद्धस्पर्द्धविपक्षपक्षरुधिरस्रोतःस्विनीस्रोतसि भ्रश्यत्युद्धर्मति स्खलत्यथ रणकोधाकुलो भार्गवः ॥१८॥ परनिष्ठो यथा- छत्रं कुम्भीन्द्रकर्णेविरचयत नुतं चामरं व्यालपुच्छे-- र्मालां मुण्डैः प्रचण्डैः सृज गजजघनैर्मडपं योजयस्व । "जुगुप्सायाः" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि परिपुष्ट जो जुगुप्सा अथवा • सम्पूर्ण इन्द्रियोंका जो संकोच सो बीभत्सरस है। इसका वर्ण नील है, और देवता महाकाल है। यह दो प्रकारका है-एक स्वनिष्ठ दूसरा परनिष्ठ । यहां भी स्वाधिक- रण वृत्तिविभाव है आलम्बन जिसका अथवा स्वाधिकरण है आलम्बन जिसका ऐसा बीभत्स स्वनिष्ठ है । और स्वाधिकरणमें नहीं रहनेवाला विभाव है आलम्बन जिसका अथवा स्वाधिकरणभिन्न है आलम्बन जिसका वह बीभत्स परनिष्ठ है सो जानना ।। अब स्वनिष्ठ बीभत्सका उदाहरण "कालीकुण्डलिनी" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि परशुराम जो हैं सो बांधी है स्पर्धा जिसने ऐसा जो शत्रुवर्ग उसके रुधिरसे उत्पन्न जो नदी उसके प्रवाहमें पड़ते है, और मोहको प्राप्त होतेहै और ठोकर खाते हैं। कैसे हैं परशुराम कि रणसम्बन्धी जो क्रोध उससे आकुल अर्थात् संग्रामाऽनुगुण क्रोधसे व्यग्र ऐसे । प्रवाह कैसा है कि काली- नामिका और कुण्डलिनीनामिका जो योगिनीविशेष उनने कौतुकसे परस्पर आरम्भ की जो थूथूत्कृति अर्थात् थूकना उससे चलती हुई जो तरंग उनमे चलता हुआ जो गगन अर्थात् गगनसम्बन्धी तारा सो है जिसमें ऐसा । और वलित जो झिल्ली उसका जो परिपतन उससे युक्त ऐसा ॥ अव परनिष्ठ वीभत्सका उदाहरण "छत्रम्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि कुण्डलिनीनामिका जो योगिनी प्रेतमुख्य उसके पुत्रका जो विवाह उसके प्रारम्भसे है जन्म जिसका ऐसा - सप्तमः ७.] भाषाटीकासहिता। (१५७) अन्त्रैर्नीराजनायाः कलय विधिमितिप्रेतवृद्धाङ्गनाना- मालापः कुण्डलिन्यास्तनयपरिणयारम्भजन्मा बभूव १९ विस्मयस्य सम्यक्समृद्धिरद्भुतः, सर्वेन्द्रियाणां ताटस्थ्यं वा । वर्णोऽस्य पीतो दैवतं ब्रह्मा । स च स्वनिष्ठः पर- निष्ठश्च । स्वनिष्ठो यथा- लीलानिबद्धपाथोधिहेलाहतदशाननः । स रामः सीतयाश्लिष्टमात्मानं बह्वमन्यत ॥ २० ॥ परनिष्ठो यथा- त्यक्ता जीर्णदुकूलवद्वसुमती बद्धोम्बुधिर्बिन्दुव-- दाणाग्रेण जरत्कपोतक इव व्यापादितो रावणः। प्रेतवृद्धस्त्रियोंका इस प्रकार आलाप होता भया । किस प्रकार सो कहते है कि बडे जो हस्तियोंके कर्ण उनसे छत्र बनावो, आर दो जने घोडोंकी पुच्छोसे चामर बनावो, और प्रचण्ड अर्थात् उग्र है दर्शन जिनका ऐसे जो मुण्ड उनसे मालाब- नावो, और हाथियोंकी जंघाओंसे मण्डप बनावो, और अन्त्रोंसे नीराजनाविधि अर्थात् आरतियोंको करो। यहां रसका आश्रय जो देखनेवाले पुरुष सो आक्षेप योग्य है यह बात आगे व्यक्त होगी। अव अद्भुतका लक्षण कहते हैं "विस्मयस्य" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि विस्मयकी जो सम्यक्समृद्धि अर्थात् पुष्टता अथवा सर्वेन्द्रियोंकी जो तटस्थता सो अद्भुत है । इसका वर्ण पीत है देवता ब्रह्मा है। यह भी दो प्रकारका है एक स्वनिष्ठ दूसरा परनिष्ठ । इनका लक्षण पूर्ववत् जानना । अब स्वनिष्ठ अद्भुत रसका उदाहरण "लीलानिबद्ध" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि वह राम सीतासे श्लिष्ट आत्माको बहुत मानता भया। वह कौन कि लीलासे बॉधा है समुद्र जिसने । फिर वह कौन कि लीलासे मारा है रावणको जिसने। यहां पूर्वा- र्धमे द्वितीयान्त पाठ होवे तो 'लीलानिवद्धपाथोधि हेलाहतदशाननम्' ऐसा अर्थ करना कि प्रसिद्ध जो राम सो लीलानिवद्ध पाथोधि और हेलाहतदशानन ऐसे आत्माको सीतासे संश्लिष्ट होनेपर बहुत मानता भया। जिस प्रकार सीताश्लेषसे विस्मित होता भया तिस प्रकार किसीसे विस्मित नहीं हुआ यह अभिप्राय दोनाही पाठीसे फलित है सो जानना । अव परनिष्ठ अद्भुतका उदाहरण "त्यक्ता" इत्यादिश्लोकसे कहते हैं। ग्लोकार्थ (१५८) रसतरंगिणी- [ तरंगः- लंका काऽपि विभीषणाय सहसा मुद्रेव हस्तेऽपिता श्रुत्वैवं रघुनन्दनस्य चरितं को वा न रोमाञ्चति ॥२१॥ अत्युक्तिभ्रमोक्तिचित्रोक्तिविरोधाभासप्रभृतयो अद्भुता एव । अत्युक्तिर्यथा- भूयादेष सतां हिताय भगवान्कोलावतारो हरिः सिन्धोः केशमपास्य यस्य दशनप्रान्ते स्थिताया भुवः । तारा हारति वारिदस्तिलकति स्वहिनी माल्यति क्रीडादर्पणति क्षपापतिरहर्देवश्च ताटंकति ॥२२॥ यथा वा- दिव्यहरे खकुहरे विस्तीर्णे पर्णति व्योम । चूर्णति चन्द्रः क्रमुकति कनकगिरिः खदिरसारति खरांशुः २३ यह है कि इस प्रकार रामका चरित सुनकरिकै कौन पुरुष रोमाञ्चयुक्त नहीं होताहै अपितु सब ही रोमाञ्चयुक्त होते है । किस प्रकार सो कहतेहै कि पुराने वस्त्रकी तरह ममताको त्यागकरिकै पृथिवी अर्थात् राज्यका वनवास लेकर त्याग कर दिया। और समुद्रको अनायाससे बिन्दुकी तरह बांध दिया । और बाणके अग्रभागसे वृद्ध कपोतकी तरह दुर्बलतासे रावणको मार दिया। और कोई अर्थात् अपरिमित धनशालिनी जो लंका सो मुद्राकी तरह अल्पत्वाभिमा- नसे विभीषणको आश्वासनार्थ प्रथमदर्शनमें ही हातमें दैदी । प्रतिज्ञामात्र भी नहीं की । इसप्रकार अत्युक्ति आदिक चारों अद्भुतरसके अभिव्यञ्जक ही है इससे इन सबका अद्भुतमें अन्तर्भाव कर देना। तहां अत्युक्तिका उदाहरण "भूयादेष" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । इलोकार्थ यह है कि यह जो सूकरशरीरयुक्त भगवान् सो साधुपुरुषोके हितके अर्थ होवो । यह कौन सो कहते हैं पृथिवीके उद्धारप्रसं- 'गमे समुद्रमज्जनसे प्राप्त जो क्लेश उसको दूरकरिके जिनके दशनके अग्रमें स्थित जो पृथिवी उसके नक्षत्रगण जो हैं सो उज्ज्वलमणिहारवत् आचरण करताहै । मेघ जो है सो तिलकरूप होताहै । गंगा स्वच्छतासे पुष्पमालारूप होती है । चन्द्रमा क्रीडादर्पणवत् आचरण करताहै। सूर्य स्वर्णवर्ण होनेसे ताटकवत् आचरण करताहै । इसका दूसरा उदाहरण "दिव्य" इत्यादि उलोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि शूकरावतार विष्णुके विस्तीर्ण मुखछिमें आकाश ताम्बूलवत् आच- (१५९) सप्तमः ..] भाषाटीकासहिता। भ्रमोक्तिर्यथा- तीस्तिग्मरुचः करैः परिचितां सेक्तुं कपोलस्थली नीराणां निकरं करेण हरता तुच्छीकृते वारिधौ। मैनाकं समुदीक्ष्य पंकपतितं शालूकशंकाजुषो हेरम्बस्य पुनातु दन्तशिखरव्यापारलीलारसः ॥२४॥ यथा वा- अन्तःक्रोधाग्निजाग्रत्कपटनरहरिस्फारनिःश्वासवात- व्याधूता वारिवाहाः कुलधरणिभृतः सानुषु प्रस्खलन्तः । दिङ्नागैर्नागबुद्धया वनहरिणकुलैः शंकया शादलानां छायाान्त्या किरातैःशितिवसनधिया वीक्षिताःस्वर्वधूभिः२६ चित्रोक्तिर्यथा- रण करताहै, और चन्द्रमा चूर्णस्थानाभिषिक्त होताहै, स्वर्णपर्वत सुपारीवत् आच- रण करताहै, सूर्य काथाकी तरह आचरण करताहै, इसका अभिप्राय यह है कि भगवन्मुखान्तर्गत जगत्का रक्षक होनेसे खदिरवत् सूर्य है । अव भ्रमोक्तिका उदाहरण "तीत्रैः" इत्यादि श्लोकसे कहतेहैं । श्लोकार्थ यह है कि गणेशका जो दन्तका शिखरकी तरह शिखर अर्थात् दन्ताग्रभाग उसका जो खोदनेके अनुकूल व्यापार तहां जो लीलारसं अर्थात् प्रीत्यतिशय सो मनोगोचर होकरिकै पवित्र करो। कैसे है गणेश कि पंक अर्थात् सूकते हुए समुद्रके कर्दममें पतित जो हिमालयपुत्र मैनाकनाम पर्वत उसको देखकारकै शालुक जो कन्द- विशेष उसकी शंकासे युक्त, क्या होत सन्ते सो कहते है कि अतिशप उष्ण जो सूर्यकिरण उनसे व्याप्त जो गण्डस्थली उसको सीचनेके अर्थ जिसके समूहको हरण करनेवाला जो शुण्डादण्ड उससे समुद्र तुच्छीकृत होत सन्ते अर्थात् शुष्कहोत सन्ते इसका दूसरा उदाहरण “अन्तः" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्य यह है कि अन्तःकरणस्थित क्रोधाग्निसे उत्पन्न हुआ जो कपटनृसिंह अर्थात् धृतावतार नृसिंहका बहुत निःश्वासपवन उससे क्षिप्त और कुलाचलपर्वतके शिखरमें पडते हुए जो मेघ सो दिग्गजोंने इस्तीकी बुद्धिसे, और वनहरिणसमूहोने शादल (१६०) रसतरंगिणी- [तरंग:- गिरिर्वमति मौक्तिकावलिमलिद्वयं स्थावरं शरचहिनदीधितिय॑जनमारुतं वाञ्छति । धनुः स्वपिति मान्मथं शिथिलबन्धमन्धन्तमो नमो मनसि जायते किमपि कौतुकं तन्वते ॥ २६ लाक्षणिकमखिलं चित्रोक्तिरेव । विरोधाभासो यथा- कोऽप्यसौ तव मुकुन्द नन्दकोऽनन्दको भवति कंससंपदः । कुण्डली त्वमसि कालियं कुतो दूरतो नयसि तन्निवेदय॥२७॥ तृणविशेषकी बुद्धिसे और किरातोंने छायाभ्रान्तिसे और अप्सराओंने नील वस्त्रबुद्धिसे देखे गये। अब चित्रोक्तिका उदाहरण "गिरिः" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि पर्वत अर्थात् तत्वसे अध्यवसित कुचमण्डल जो है सो मौक्तिकावलि अर्थात् तत्से अध्यवसित स्वेदबिन्दुरचनाको बाहर करताहै । और भ्रमरद्वय अर्थात् तत्त्वसे अध्यवसित लोचनयुगल निश्चेष्ट है । और शरत्कालिक चन्द्रमा अर्थात् तत्त्वसेअध्यव- सित मुख,व्यजनका पवन अर्थात् तत्वसे अध्यवसित श्वासको धारण करता है। और कामदेव सम्बन्धी धनुष अर्थात् तत्वसे अध्यवासित जो भृकुटियुग सो उदासीनताको धारण करता है। और अन्य जो तम अर्थात् अतिनीलतासे अध्यवासित केशपाश गलितबन्ध होताहै, इस हेतु कुछ अर्थात् आप आपका अनुभबैकवेद्य जो कौतुक अर्थात् चमत्कार उसको विस्तार करनेवाले जो कामदेवरूप आप उनको अनन्य साधा- रणकलापात्रतासे नमस्कार करता हूं। सारोपलक्षणा और साध्यवसानलक्षणासे युक्त पदोंसे घटित जितने वाक्य हैं सो सम्पूर्ण चित्रोक्ति ही* ॥ विरोधाभासका उदा- हरण "कोप्यसौ' इत्यादिश्लोकसे कहते है । इलोकार्थ यह है कि हे मुकुन्द ! आपका जो कोई यह अर्थात् सर्वलोकप्रसिद्ध है प्रभाव जिसका ऐसा जो नन्दक नाम खड्ग सो कंससंपत्तिका अनन्दक अर्थात नाशक होताहै । हे मुकुन्द ! तुम कुण्डली अर्थात कर्णभूषणयुक्त हो फिर कालियनाम जो कुण्डली उसको कौन उद्देश्यसे दूर करिकै फेंकते हो, इसका प्रयोजन हमको कहो। यहां कुण्डली- सामान्यके अपाकरणको उद्देश्य करिकै जो यह आपका व्यापार उससे कुण्डलीसामा- न्यका अपाकरण आपके समीपमें नहीं सम्भव हुवा इससे विरोध हुवा। सर्प सामान्यका अपाकरण सम्भव होनेसे आभासरूप हुआ। इसही प्रकार पूर्वाधमें सप्तमः ७. ] भाषाटीकासहिता। (१६१) नाट्ये च सर्वेरसा आनन्दरूपा अद्भुताख्यः परनिष्ट एवेति । चित्तवृत्तिाधा-प्रवृत्तिनिवृत्तिश्चेति । निवृत्तौ यथा शान्त- रसस्तथा प्रवृत्तौ मायारस इति प्रतिभाति । एकत्र रसोत्प- त्तिरपरत्र नेति वक्तुमशक्यत्वात् । न च स रतिरेव सकस्यास्त व्यभिचारी। नशृङ्गारस्थ, तद्वैरिणो बीभत्सस्यापि तत्र सत्त्वादत एव न बीभत्सस्यापि।न हास्यस्य,तरिणःकरु- णस्य तत्र सत्त्वादत एव न करुणस्याऽपि।न रौद्रस्य,तद्वै- रिणोऽद्भुतस्याऽपि तत्र सत्त्वादत एव नाद्भुतस्याऽपि।न च- वीरस्य तद्वैरिणो भयानकस्याऽपि तत्र सत्त्वादत एव न भयानकस्याऽपि । नाऽपि शान्तस्य,तद्विरोधित्वात् । न च सामान्य एव रसस्तद्विशेषा इतरे भवन्ति, शान्तरसस्य तर्हि रसाभासत्वापत्तेः । किन्तु विद्युत इव रतिहासशोक- क्रोधोत्साहभयजुगुप्साविस्मयास्तत्रोत्पद्यन्ते विलीयन्ते च। भी जानलेना । नाट्यमे और चकारसे काव्यमें सम्पूर्ण अर्थात् आठ प्रकारके रस आनन्दरूप हैं, और अद्भुताख्य अर्थात् विस्मयनाम जो व्यभिचारभाव है सो परनिष्ठ अर्थात् नटसे भिन्न जो सामाजिक तद्गत ही है। एवकारसे यह सूचित हुआ कि काव्यमे तो कविमें और सहृदयमें भी अद्भुत रस रहताहै ॥ अब नाट्यभिन्न स्थलमें शान्तरस विरोधितासे मायारसकी व्यवस्था करनेको भूमिका रचते है "चित्तवृत्ति' इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्य यह है कि चित्तवृत्ति दो प्रकारकी है। एक प्रवृत्ति, एक निवृत्ति । तहां उपादेयताबुद्धि प्रवृत्ति है और हेयता- बुद्धि निवृत्ति है । निवृत्तिमे जैसे शान्त रस है तैसे प्रवृत्तिमें मायारस है, यह दीखता है क्योकि निवृत्तिमे रसोत्पत्ति है, प्रवृत्ति में नहीं है, यह कहने में समर्थ नहीं हो सकते हैं इससे मायारस मानना चाहिये । यहां यह शंका होती है कि मायारस रतिरूप ही मानना । इसका समाधान यह है कि यह रति कौन रसका व्यभिचारिभाव होगा ? शृंगारका कहोगे सो नहीं कह सकते हो, क्योकि शृंगारका विरोधी जो वीभत्स उसकी भी मायारसमे स्थिति है। इससे शृंगारका व्यभिचारिभाव नहीं होसकता है। इस ही हेतु बीभत्सका भी व्यभिचारी नही होसकताहै क्योंकि बीभत्सका विरोधी शृंगार भी वहां है । कदाचित् हास्यका कहो तो सो भी नहीं हो सकता है ११ (१६२). रसतरंगिणी- [ तरण:- तेन तत्र तेव्यभिचारिभावा इति । लक्षणं च प्रबुद्धमिथ्या- ज्ञानवासना मायारसः। मिथ्याज्ञानमस्य स्थायिभावः । विथावाः सांसारिकभोगार्जकधर्माधर्माः। अनुभावाः पुत्र- कलत्रविजयसाम्राज्यादयः यथा- वाटी लाटीहगम्भोरुहरभसकरीवापिका काऽपि कान्ता तल्पं चन्द्राऽनुकल्पं प्रकटयति मिथः कामिनी कामनीतिम् । रूपं कामाऽनुरूपं मणिमयभवनं बन्धुरं बन्धुरागो लोके लोकेश कस्य त्वमसि न भवने सर्वदा सर्वदाता॥२८॥ क्योंकि हास्यका विरोधी करुण भी वहां है । इसही हेतु करुणका भी नहीं हो सकता है कदाचित् रौद्रका व्यभिवारी कहो तो सो भी नहीं हो सकता है । क्योंकि रौद्रका विरोधी अद्भुत भी वहां स्थित है इसही हेतु अद्भुतका भी नहीं होसकता है । कदाचित वीरका कहो तो सो भी नहीं कह सकतेहो क्योंकि उसका विरोध भयानक भी वहां स्थित है, इसही हेतु भयानकका भी नहीं होसकताहै । शान्तका कहो तो सो भी नहीं हो सकताहै क्योंकि शान्तरस और मायारस दोनों विरुद्ध हैं इस हेतु मायारस रतिरूप नहीं है किन्तु भिन्न ही है । यहां यह कहो कि रस तो सामान्यरूपही है उसहीको मायारस कहते हैं। उसहीके विशेष आठ भेद हैं तो मायारस भिन्न नहीं रहा ये ही आठों मायारस कहावैगे तो सो नहीं कह सकते हो, क्योंकि ऐसा कहो तो शान्तरस रसाभास कहा जायगा इस हेतु मायारस अतिरिक्तही कहना । इस मायारसमें रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा और विस्मय ये विद्युत्की तरह उत्पन्न होते हैं और लीन होजाते हैं, इस हेतु मायारसमें ये आठों व्यभिचारिभाव हैं सो जानना। मायारसका लक्षण यह है कि प्रबुद्ध जो मिथ्याज्ञानवासना सो मायारस है मिथ्याज्ञान इसका स्थायिभाव है । और सांसारिक भोगके उत्पादक जो धर्मा- धर्म सो विभाव हैं। पुत्रकलत्रविजयसाम्राज्यादि अनुभाव है। इसका उदाहरण "वाटी" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि लाट दशकी जो स्त्री उसकी जो दृष्टि सोही हुआ कमल उसका जो वायुप्रेरणासे रभस अर्थात् वेग उसको करनेवाली फलपुष्पसमृद्धिहेतुसे ऐसी जो वाटिका सो स्थित है। और कोई जो कान्ता सो मनोविश्राम हेतु होनेसे कमल और सारंगादि पक्षियोंकी प्राप्ति होनेसे ऐसी जो वापिका सो स्थित है। और चन्द्रमाके सदृश पर्यकको यह कामिनी १ सप्तमः ७.] भाषाटीकासहिता। (१६३) नाट्यभिन्ने परं निवेदस्थायिभावकः शान्तोऽपि नवमो रसो भवति । नैर्मल्यमार्दवादि संबंधसे प्रकट करती है। (यह कहनेसे उपभोगसाधनसम्पत्ति कारक अदृष्टरूप उद्दीपन विभाव कहा) और कामिनी जो है सो कामनीति अर्थात् कामक्रीडाको परस्पर प्रकट करती है (यह कहनेसे बहिरिद्रियजन्य आनन्द लक्षण श्रृंगाररूप व्यभिचारी सूचित किया) और मनोऽभिलपित जो रूप अर्थात् आकृत्यादि उसको कामिनी प्रकट करती है (यह कहनेसे कामिन्यादिकी बुद्धि- रूप जो मिथ्याज्ञानवासना उसका आलम्बन विभाव दिखाया) और मणिमय जो गृह सो वन्धुर अर्थात् ऊँचानीचा सब ऋतुओम सेवनीय किया गया है (यह कहनेसे धनसम्पत्ति कही) और बंधुराग अर्थात् बन्धुजनप्रीति स्वयं संपादित है सो हे लोकेश ! तुम कौन पुरुषको लोकमें सर्वकाल में सब देनेवाले नहीं हो ? अर्थात् तीनों लोकोम विद्यमान जो संपूर्ण लोक उनको यथाकाल अनायाससे ही सब कुछ देते हो। यहां ययोक्त विभावादि संयोगसे अभिव्यज्यमान जो कविकल्पित नायकगत मिथ्याज्ञानवासना सोमायारस है सो जानना। नाट्यभिन्न स्थलमं अर्थात् आदिकाव्य इतिहासादिमें तो निवेद है स्थायी जिसका ऐसा शान्त भी नवम रस है । यहां यह शंका होती है कि शान्त रमभिन्न माननेमे क्या प्रमाण है इसका समाधान यह है कि मुनिवचन ही प्रमाण है सो वचन ऐसा है कि "शृंगारः करुणः शान्तो रौद्रो वीरोद्भुत- स्तथा । हास्यो भयानकश्चैव वीभत्सश्चेति ते नव" । फिर यह शंका होती है कि शान्त रस नाट्यमें क्यों नहीं होता है, इसका समाधान यह है कि नटमें शमका अभाव है इस हेतु और विषयवैमुख्यात्मक जो शान्त रस उसके विरोधी जो गीत वाद्यादि उनकी नटमें स्थिति होनेसे वहां शान्तरसका संभव नहीं है सो नानना । इसमें प्रमाण "शान्तस्य शमसाध्यत्वान्नटे च तदसम्भवात् । अष्टावेव रसा नाटये न शान्तस्तत्र युज्यते" यह वचन है और नवीनोका तो यह मत है कि नटमें शम नहीं है इस हेतु नाट्यमें शान्त रस नहीं है यह कहना असंगत है, क्योकि नटम रसाभिव्यक्तिका स्वीकार नहीं है इस हेतु नटमें शान्त रस मत हो सामा- जिकोमे शम है इस हेतु सामाजिकोको रसोद्रोध होनेमे कुछ बाधक नहीं। यहां यह शंका हुई कि नटमे जो शमका अभाव मानोगे तो शमके आभिनयकी प्रका- शकता नटको नहीं होगी। इसका समाधान यह है कि शमका अभाव भी [तरगः- रसतरंगिणी- (१६४) निर्वेदस्य परिपोषःशान्तो रसः, दोषप्रशमो वा । दोषाः कामक्रोधादयः । अस्य विषयदोषविचारविरक्त्यादयो विभावाः । अनुभावा आनन्दाश्रुपुलकहर्षगद्गदवचना- दयः । यथा हेयं हर्म्यमिदं निकुञ्जभवनं श्रेयः प्रदेयं धनं पेयं तीर्थपयो हरेभगवतो गेयं पदाम्भोरुहम् । नेयं जन्म चिराय दर्भशयने धर्मे निधेयं मनः स्थेयं तत्र सितासितस्य सविधे ध्येयं पुराणं महः ॥ २९ ॥ होगा तो भी अभिनयप्रकाशकता होनेमें कुछ बाधक नहीं ऐसा न मानें तो नटको भयक्रोधादिका भी अभाव होनेसे उसकी भी अभिनयप्रकाशकता शास्त्रोक्त असं- गत होजायगी। यदि ऐसा कहो कि नटको क्रोधादिका अभाव होनेसे क्रोधादिका कार्य जो वधबन्धनादि उसकी उत्पत्ति नहीं भी होगी तो भी कृत्रिम जो क्रोधादिका कार्य वधबन्धनादि उसकी शिक्षाभ्याससे उत्पत्ति होने में कोई वाधक नहीं है तो शमका अभाव होनेसे भी शमको कार्यकी शिक्षाभ्याससे उत्पत्ति होनेमें कोई बाधक नहीं तो नाट्यमें भी शान्तरस होनेमें कोई बाधक नहीं सो जानना । अब शान्तरसका लक्षण कहते है "निवेदस्य" इत्यादि वाक्यसे । वाक्या यह है कि निर्वेदरूप स्थायिभाव अर्थात् नित्यानित्य वस्तुविचारजन्य विषयवि- रागाख्य चित्तवृत्तिविशेषकी जो पुष्टता अथवा दोषका जो प्रशमन सो शान्त . रस है। यहां दोषपदसे कामक्रोधादि जानना। इसके विभाव विषयमें दोषविचार विरक्ति इत्यादि जानना और अनुभाव आनन्दसम्बन्धी अश्रु और रोमाञ्च और हर्ष और गद्गद वचन इत्यादि है। इसका उदाहरण "हेयम्" इत्यादि इलोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि कोई शान्त पुरुष कहताहै कि प्रसिद्ध सम्पत्तियुक्त जो गृह सो अस्थिर होनेसे त्यागयोग्य है । (यह कहनेसे विषय दोषबुद्धिरूप आलम्बन विभाव कहा ) और निकुञ्जभवन आश्रय करनेके योग्य है (इससे औदासीन्यरूप अनुभाव कहा) और धन देनेके योग्य है इसमें हेतु यह है कि धन राग द्वेषका हेतु है इससे अनुपादेय है और तीर्थका जल अनायास सम्पत्तिसे पान करने योग्य है ( यह कहनसे हिताहितप्राप्तिपरिहारार्थ क्रियाहानि- रूप अनुभावान्तर कहा ) और समग्र ऐश्वर्य और वीर्य, यश, श्री. ज्ञान, वैराग्य
सप्तमः ७.]
भाषाटीकासहिता।
(१६५)
यथा वा-
वेदस्याध्ययनं कृतं परिचितं शास्त्रं पुराणं श्रुतं
सर्व व्यर्थमिदं पदं न कमलाकान्तस्य चेत्कीर्तितम् ।
उत्खातं सदृशीकृतं विरचितः सेकोऽम्भसा भूयसा
सर्व निष्फलमालवालवलये क्षिप्तं न बीजं यदि ॥३०॥
इति श्रीभानुदत्तविरचिवायां रसतरंगिण्यां रसनिरूपणनाम
सप्तमस्तरंगः ॥ ७॥
F
यह जो छह प्रकारका भग यही हुआ गुण उससे युक्त जो विष्णु उसके चरणाराव-
न्दकी स्तुति करना ( यह कहनेसे मतिरूप व्यभिचारिभाव सूचित किया) और
कुशकी शय्यामें बहुत कालपर्यन्त जन्मको नीत करना (यह कहनेसे तपस्वि-
दर्शनरूप उद्दीपन कहा ) और मनको धर्ममें स्थापित करना ( यह कहनेसे
चेदान्तश्रवणादि उद्दीपनान्तर कहा ) और गंगायमुनाके सान्निध्यमें अर्थात् प्रयाग
नगरमे स्थिति करना ( यह कहनेसे तपोवन दर्शनादि उद्दीपनान्तर कहा ) और
पुराणमह अर्थात् आत्मचैतन्यध्यान करनेके योग्य है (यह कहनेसे नासाग्रदृष्टि-
रूप अनुभाव ध्वनित किया।)
शान्तरसका द्वितीय उदाहरण "वेदस्प" इत्यादि श्लोकसे कहतहैं । श्लोकार्थ
यह है कि यदि कमलाकान्त भगवानके चरणारविन्दका कीर्तन नहीं किया तो
वेदका अध्ययन किया सो और शास्त्रका परिचय किया सो और पुराणका
श्रवण किया सो यह सब व्यर्थ है। क्योंकि अध्ययनादिजन्य फल विनाशवान्
है (यह कहनेसे विरक्ति आलम्बन विभाव कहा। वेदाध्ययनसे वेदान्तश्रवण
उद्दीपन कहा । शास्त्रका परिचय कहनेसे उद्दीपनान्तर कहा । पुराणश्रवण किया
यह कहनेसे वैराग्यदृढताप्रतिपादनके निमित्त नियतकालिकताफलविषयक अरु-
चिमे बीज कहा) इसमे दृष्टान्त कहते है कि मृत्तिकाको वरोवर की और खनन भी
की और बहुत जलसे सीच भी दी यह सम्पूर्ण निष्फल है यदि क्यारी में वीजको
नहीं पटकै तो (यह कहनेसे मतिरूप व्यभिचारिभाव कहा )।
इति श्रीरसतरङ्गिगीभाषाटीकाया रसनिरूपण नाम सप्तमस्तरङ्गः ॥ ७ ॥
(१६६) रसतरंगिणी- [तरंगः- अष्टमस्तरंगः ८. स्थायिभावजा दृष्टिरष्टधा । स्निग्धा, हृष्टा, दीना, क्रुद्धा, हप्ता, भीता, जुगुप्सिता, विस्मिता चेति । व्यभिचारिभा- वजा दृष्टिविंशतिधा-शून्या, मलिना, श्रान्ता, लज्जिता, शंकिता, मुकुलाऽईमुकुला, ग्लाना,जिला, कुञ्चिता,वित- र्किता, अभितप्ता, विषण्णा, ललिता, केकरा, विकोशा, विभ्रान्ता, विष्णुता, त्रस्ता, मदिरा चेति । रसभेदादष्टधा रस दृष्टिः-कान्ता, हास्या, करुणा, रौद्रा, वीरा, भया- नका, बीभत्सा, अद्भुता चेतिषत्रिंशद्भदा दृष्टयः । कुणिता, विकसिताऽद्धविकसिता, चकिता, सुप्ता, पूर्णिता- ऽलसा, विवर्तिता-ऽईविवर्तिता,पर्यस्ता शून्या स्तिमिता चेत्यादयो दृष्टिभेदा ऊहनीयाः। दृष्टि तीन प्रकारकी है-एक स्थायिभावना, दूसरी व्यभिचारिभावजा और तीसरी रसजा, ये दृष्टि संगीतशास्त्राऽनुसार है । इस हेतु स्थायिभावभेदसे नियत है भेद जिसका ऐसी दृष्टि कहते हैं "विभावजा" इत्यादि वाक्यसे । स्निग्धादिस्था- यिभावजा दृष्टि आठ प्रकारकी है, और शून्यादि व्यभिचारिभावजा दृष्टि वीस प्रकारकी है। यद्यपि व्यभिचारिभावके तेतीस भेद कहे है, तज्जन्य दृष्टि वीस प्रका- रकी कही, इस दृष्टिका यथायोग्य विनियोग नहीं हो सकेगा तथाऽपि उस विंश- तिप्रकारकी दृष्टिका त्रयसिंशत् व्यभिचारिभावोंमें जिस प्रकार विनियोग होताहै सो संगीतशास्त्र में प्रतिपादित है सो यहां अत्यन्त उपयुक्त नहीं है इस हेतु दिड- मात्र प्रदर्शन करते है, जिस तरह ग्लानदृष्टि ग्लानि और अपस्मार दोनोंमें है। विकोशा दृष्टि मति, गर्व, स्मृति और उग्रता चारोंमें है। और विप्लुता उन्माद, दैन्य, दोनोंमें है। यह बात और जगह विस्तारपूर्वक है । और रसभेदसे नियत है भेद जिसका ऐसी रसदृष्टि शान्तादिभेदोंसे आठ प्रकारकी है और मतान्तरमें कुणिता आदिक भी दृष्टिभेद कहे है उनका भी ऊह कर लेना। इस रीतिसे स्त्रीपुरुषोंकी प्रकृति तथा अवस्थाके भेदसे भी दृष्टिभेद हैं परन्तु इस प्रकारके भेदको आप आपको अनुभवमात्रसे वेद्यता है इसमें सवका संवाद नहीं है और ये भेद अनन्त है इससे इन भेदोंको नहीं कहा । संगीतशास्त्रप्रसिद्ध जो दृष्टि विशेष लक्षण है उसके अनुसार दृष्टिविशेषका उदाहरण परन्तु तहां (१६७) अष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। - . तत्र ललिता यथा- मनसिजनृपतिर्वा मण्डनं वा मदो वा शशिमुखि भवनं वा यौवनं वा वयं वा । अखिलमपि कृतार्थं वीचिविक्षेपखेल- कमलविजयलीलाशालिना लोचनेन ॥१॥ ग्लाना यथा- पर्यस्तालकरोचिपः श्रमजुषः प्रस्पन्दगण्डत्विषः शम्भौशीकरशीतलेन शशिना वातं समातन्वति । जीयास्तामचलाऽधिराजदुहितुनिःस्पन्दनीलोत्पल- च्छायानिद्वितचञ्चरीकमिथुनस्पर्दासमृद्ध दृशौ ॥२॥ विस्तारभयसे दिङ्मात्रको आवेदन करनेके हेतु अशोक वनिकान्यायसे ललिताका उदाहरण कहते है "मनसिज" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्य यह है कि हे चन्द्रमुखि! कामदेव वा अलंकरण वा मद वा भवन वा यौवन वा हम ये सम्पूर्णभी तेरे नेत्रसे अभिलषितार्थप्राप्तिसे कृतार्थ होते हैं । कैसा है लोचन सो कहते हैं कि लहरका जो इकट्ठा होना उससे चञ्चल जो कमल उसका विषय है फल जिसका ऐसी जो लीला अर्थात शोभाविशेष उससे युक्त ऐसा । ललिताका लक्षण शास्त्र में यह कहा है कि "सभूक्षेपस्मितापांगा कुञ्चिता मधुरोन्मुखी।ललिताललने प्रोक्ता दृष्टिर्म- इसही रीतिसे ग्लानाका उदाहरण कहते है "पर्यस्त" इत्यादि श्लोकसे । ग्लानाका लक्षण विनियोगपुररसर संगीतशास्त्रमें कहाहै कि "अन्तर्निविष्टतारा या मलिना मन्दचारिणी । विश्लथभूपक्ष्मपुटा ग्लानां ग्लानौ नियोजयेत्' सो जानना। उदाहरणश्लोकार्य यह है कि पर्वतोमें श्रेष्ठ जो हिमालय उसकी पुत्री पार्वतीकी भूपुटसे ढकी हुई है कनीनिका जिसमें ऐसी दृष्टि सर्वोत्कर्षसे स्थित होवो। कैसी है दृष्टि कि निश्चल जो नील कमल उसकी छायाम निद्रित जो भ्रमरयुगल उसकी स्प से समृद्ध अर्थात् बढी ऐसी । क्या होत सन्ते सो कहते हैं कि महादेव जो हैं सो जलकणसे ठण्डा किया हुआ जो चन्द्रमा अर्थात् चन्द्राकार व्यजन उससे पवन करत सन्ते । कैसी है पार्वती कि विखरता हुआ जो केशपाश उससे है कान्ति जिसकी ऐसी।और श्रम अर्थात् विपरीतरतिगर्भादिप्रयुक्त जो श्रम उससे युक्त और अतिशयिते कम्पशालिनी जो कपोलशोभा उससे युक्त ऐसी । यह दिङ्मात्र दिखा दिया है और भी उदाहरणोंका ऊह करलेना। न्मथतारका ॥ " सो जानना।
[तरंग:- (१६८) रसतरंगिणी- एवमन्या अप्युदाहरणीयाः।अथ रसानां जन्यजनकभावः तत्र भरत:- शृङ्गारात्तु भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो मतः । वीरात्स्यादद्भुतोत्पत्तिबीभत्साच भयानकः ॥ ३॥ अयमुत्सर्गः, परेषामपि रसानां कार्यकारणभावदर्शनात् । पूर्वग्रन्थकारसम्मतिरपि- कथासंग्रहयोगाच्च विवक्षावशतः कवेः। अन्योऽन्यं जन्यजनका रसभावा भवन्त्यमी ॥४॥ यथा- मातुर्दृष्ट्वा गम्भोरुहयुगलगलद्वाष्पधारामुदागं तातस्य प्रेक्ष्य वक्षःस्थलरुधिरचयंक्रुध्यता भार्गवेण । हस्ते न्यस्तः सहस्रार्जुनदमनसमारम्भगम्भीरवीर्य-- स्फूर्जद्दोर्वल्लिहल्लीसकसकलकलासूत्रधारः कुठारः॥५॥ अत्र वीरम्प्रति करुणबीभत्सयोः कारणता । यथा वा तातचरणानाम्- अब प्रसंगसे रसोंका कार्यकारणभाव कहते हैं । तहां भरतसम्मति दिखातेहैं शृङ्गारात्" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि शृंगारसे हास्यकी और रौद्रसे करुणकी, वीरसे अद्धतकी,बीभत्ससे भयानककी उत्पत्ति होती है, यह भी दिकपद- र्शन है । और और रसोंके भी कार्यकारणभाव दिखते हैं। यहां प्राचीन ग्रन्थका- रोंकी सम्मति दिखातेहै "कथा" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि वर्णनीय कथामें जो संग्रह अर्थात् सन्दर्भविशेष उसका जो योग अर्थात् संघटन उससे और कविकी विवक्षासे रस और भाव अथवारसके जो स्थायिभाव सो परस्पर जन्यजनक होते है । इस प्रकरणमें रसशब्दसे इस श्लोकको त्यागकरिकै सर्वत्र स्थायिभाव समझना। मुख्य रसको अखण्डानन्दरूपता होनेसे जन्यजनकभाव नहीं बन सकताहै इस श्लोकमें भी प्रथम पक्षमें रसशब्दसे स्थायिभाव ही लेना ॥ मातुदृष्ट्वा " इत्यादि श्लोकसे कहतेहै । श्लोकार्थ यह है कि माता जो रेणुका उसकी जो दृष्टि सो ही हुआ कमलयुगल " इसका उदाहरण भष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। (१६९) कुरंगाक्ष्या वेणी सुभग विपरीते रतविधा- वधिस्कन्धं दृष्ट्वा किमपि निपतन्तीमारिभटः। अधिग्रीवं युष्मत्प्रचलकरवालव्यतिकर स्मरनैव स्तब्धो विरमति परीरम्भणरसात् ॥ ६॥ अत्र भयानकम्प्रति शृंगारस्य कारणता । यथा वा- युधि कुपितकृतान्तस्यन्दनस्पर्दिनादं दिशिदिशि दशकण्ठस्त्यक्तवान्वारिदास्त्रम् । तडिति जनकपुत्र्याः साम्यमालोकमान-- स्त्यजति न पवनास्त्रं राघवः स्विन्नपाणिः ॥७॥ अत्र शृङ्गारम्प्रति वीरस्य कारणता । एतेषामङ्गाङ्गिभावा- पन्नानां रससङ्कर इति नाम लोका लपन्ति । रसानां मिथो विरोधोऽपि । तत्र भरतः- उससे पडती हुई जो उदार अर्थात् बहुत बाष्पधारा उसको देखकरिकै, और पिता जो जमदग्नि उनका वक्षःस्थलसम्बन्धी जो रुधिरचय उसको देखकरिकै क्रोधयुक्त जो परशुराम उसने सहस्रार्जुनके खण्डनोद्योगसे गम्भीर जो वीर्य उससे शोभायमान जो बाहुलता तत्सम्बन्धी जो हल्लीसक अर्थात् नृत्य उसकी सकल- कलाओंका जो कौशल उसका सूत्रधार अर्थात् प्रवर्तक आचार्य जो कुठार सो हाथमें लिया। यहां वीररसके प्रति रेणुकाविषय करुणा और तातसम्बन्धी बीभत्स दोनोंको कारणता है । इस प्रकरणमे पितृकृत श्लोक उदाहरणान्तर कहते है “कुरंगाक्ष्या" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि हे सुभग!आपका जो अरिभट अर्थात् शत्रुभूत योद्धा सो विपरीत सुरतविधिमे स्कन्धमें कोई भागसे कुछ पडती हुई जो हरिणनयनाकी वेणी उसको देखकारकै ग्रीवामें आपका जो प्रकम्पनशाली खड्ग उसके संवन्धको स्मरण करता हुआ अर्थात् स्मरण समकालमें ही स्तब्ध होत सन्ते आलिगन- सम्बन्धसे विरामको प्राप्त होताहै । यहां भयानक रसके प्रति श्रृंगार रसको कार- णता है। अब कविविवक्षावैचित्र्य दिखानेके निमित्त प्रकारान्तरसे उदाहरणा- नवर कहते हैं "युधि कुपित" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि दशकण्ठ अर्थात रावण जो है सो युद्ध में कोपयुक्त जो यमराज उसका जो स्यन्दन उसकी (१७०) रसतरंगिणी- [ तरंग. - शृङ्गारबीभत्सरसौ तथा वीरभयानको। रौद्राद्भुतौ तथा हास्यकरुणौ वैरिणौ मिथः ॥ ८॥ वैरिरस इव वैरिरसस्य विभावाऽनुभावव्यभिचारिभावाः । अपि रसहानिकरा इति तानपि वारयेत् । तत्र प्राचीन- सम्मतिः- न च वैरिरसं ब्रूयाद्वैरिणो न विभावकम् । नाऽनुभावं न सञ्चारिमावं चाऽपिकदाचन ॥९॥ स्पर्धा करनेवाला ऐसा है नाद जिसमें ऐसाजो मेघास्त्र उसको दिशा दिशामें छोडता भया, उस समयमें मेघास्त्रमें जो विजलीकी चमक उसमें सीताकी समानताको देखता हुआ और इस ही हेतु खिन्न है हाथ जिसका ऐसा जो राम सो पवना- स्त्रको नहीं छोडता भया । यहां शृंगारके प्रति वीरको कारणताहै। यह जों अंगांगिभावको प्राप्त उक्त प्रकारके अविरुद्ध ग्स उनका जो एकस्थानमें समा- वश उसको लोक रससंकर कहते है । जिस प्रकार अनेक अलंकारोंकी प्राप्ति होनेसे प्रभाविशेष होनेसे भिन्न व्यवहार होजाताहै तिस ही प्रकार अनेक रस- मेलनसे चमत्कारातिशय होनेसे भिन्नव्यवहारविषयता रसमें होती है, ऐसा हुआ तो अंगत्वप्रकारसे भासमान जो स्वस्थायीतरस्थायी सो है जिसमें उसको रस- संकर कहते हैं। रसोंका परस्पर विरोध भी होताहै । जहां परस्पर विरोध होताहै तहां रसशवलव्यवहार होताहै सो जानना ॥ विरोध दो प्रकारका है-एक तो यह कि एक रसके अधिकरणमं दूसरे रसकी स्थिति न होय, दूसरा यह कि एक रसके ज्ञानसे दूसरे रसका ज्ञान रुक जाप । इसमें प्रमाण भरतवाक्य कहतेहैं " श्रृंगार" इत्यादिसे । वाक्यार्थ यह है कि श्रृंगार और बीभत्स ये दोनों रस और वीर, भयानक ये दोनों रस और रौद्र, अद्भुत ये दोनों रस और हास्य, करुण ये दोनों रस, परस्पर विरोधी हैं। इस रसके विरोध प्रसंगमें यह कहतेहै कि वैरिरसकी तरह वैरिरसके विभाव, अनुभाव, व्यभिचारिभाव जे ते भी रसहानि करनेवाले है इस हेतु काव्यमें वैरि रसके विभावाऽनुभावांका भी वारण करना चाहिये इसमें प्राचीनसंमति भी कहते हैं "न च" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि एक काव्यमें वैरिरसका प्रयोग नहीं करना और वैरिरसके विभाव, अनुभाव, सञ्चारिभावोंका भी प्रयोग नहीं करना । जहां रसको अंगांगिभाव होताहै तहां तो विरोध होता ही नहीं है किन्तु अगांगिभावको अप्राप्त जो दो रस .
भष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। (१७१) किन्त्वनांगिभावाऽनापन्नयोरेकदेशे सति वैरम् । देशभेदे सति न वैरम् । वृक्षे कपिसंयोगतदभावयोरिव । समय- मेहे सत्यपि न वैरम्, भूतले घटतदभावयोरिव । वैरं यथा- प्रियेणालिङ्गयमानायाः प्रियायाः कुचकुम्मयोः। करजक्षतनिर्मुक्तं रुधिर कुङ्कुमायते ॥ १० ॥ देशभेदे सति विरोधाभावो यथा- एकः सिन्धुभुवः करे विलुलितश्चक्रे द्वितीयः स्थितः कामध्वंसिनि कालकूटकवलक्लिष्टे तृतीयो धृतः। भूयः क्षीरनिधेर्घनप्रमथने सक्तश्चतुर्थस्तथा पायासुः कमलापतेभगवतो नानारसाः पाणयः ॥ ११ ॥ अत्र शृङ्गाररौद्रकरुणाऽद्भुताना रसानां विरोधाभावः । उनको एक अधिकरण होनेसे वैर होताहै, अधिकरणभेद होनेसे प्रथम विरोध नहीं होताहै अर्थात् एक रसके अधिकरणमें दूसरे रसकी स्थिति न होना यह जो विरोध सो नही होसकताहै, जैसे वृक्षमें कपिसयोग और कपिसंयोगाभाव इन दोनोंको मूल शाखारूप अधिकरणभेदसे विरोध नही होताहै इसही तरह यहां भी जानना । सम- यभेद होत सन्ते भी विरोध नहीं होताह जिस तरह पृथिवीमे कोई समयमें घटकी प्रतीति कोई समयमे घटाभावकी प्रतीति होतीहै तहां विरोध नहीं होता तिस तरह यहां भी जानना। देश कालकी एकता होनेसे जो दोनो प्रकारका विरोध होताहै उसका उदाहरण "प्रियेण" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि प्रियसे आलिंगित ऐसी जो प्रिया उसके कुम्भसदृश कुचोमे नखक्षतसे उत्पन्न जोरुधिर सोकुंकुमक्त आचरण करता है । अब देशभेद होत सन्ते विरोधाभावका उदाहरण "एक" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि लक्ष्मीकान्त भगवान्के जो नाना रस अर्थात् तत्तद्रसयुक्त हस्त सो हमारी रक्षा करो । कैसे है हस्त कि एक हस्त तो लक्ष्मीके हस्तपर चञ्चल होत सन्ते स्थापित है और दूसरा हस्त चक्रमें स्थित है और तीसरा जो हस्त सो विषपानसे क्लेशयुक्त जो कामध्वंसी अर्थात् शिव उनपर धृत है और चतुथ हस्त इतरप्रयत्नानिष्पन्न समुद्रके घन प्रमथनमे सक्त है। 'भूयः' पद यहां (१७२) रसतरंगिणी- [तरंग:- समयभेदेन यथा-- भग्नं कामरिपोर्धनुः परिहतं राज्यं स्थितं कानने निभिन्नस्त्रिशिराः खरस्य पिशितं स्पृष्टं कपिर्लालितः। लंकेशो दलितश्चिराय रुदितं लंकावधूनां श्रुतं नीता सम विदेहभूस्तदखिलं रामस्य लोकोत्तरम् ॥ १२ ॥ अत्राद्भुतशान्तभयानकरौदबीभत्सहास्यवीरकरुणशृङ्गारा- णां विरोधाभावः । अंगांगिभावानापन्नानां रसानां निवेशो यत्र स रसशवल इति वेदितव्यम् । तस्याऽप्येतदेवोदाहर- णम् । अंगयो रेऽपि न रसहानिर्भटयो:रे प्रभोरिव । यथा-- सीतां संस्मयं वीचिप्रचलकुवलयस्पर्दिचक्षुः क्षिपन्ती सेनां संवीक्ष्य रक्षःशरदलितवपुःशोणितासारसिक्ताम् । चाक्यालङ्काग्में है । यहां शृंगार, रौद्र, करुण और अद्भुत इन रसोंको एकाधिकरण भगवान्में स्थित होनेसे प्राप्त जो विरोध उसका भी नानाहस्तरूप अवच्छेदकभे- दसे निवारण है सो जानना ॥ अब समयभेदसे विरोधाभावका उदाहरण " भग्नम्" इत्या भग्नम्" इत्यादि श्लोकरो कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि कामरिपु जो महादेव उनके धनुषको तोडा, और राज्यको त्याग किया, और वनमें निवास किया, और त्रिशिराको मारा, और खरके पिशितको स्पर्श किया, और कपिको लालित किया, और रावणका दलन किया, और बहुत कालतक लंकास्थित स्त्रियोंकारोदन सुना, और जानकीकोघरमें प्राप्त किया यह संपूर्ण कृत्य रामके लोकोत्तर हैं। यहां अद्भुत, शान्त, भयानक, रौद्र, बीभत्स, हास्य, वीर, करुण और शृंगार इन रसोको कालभेदसे विरोधका अभाव है। इसका अभिमाय यह है कि विरुद्ध भी दो रस होंय तो भी एक रसकी चर्वणामें व्यवहित द्वितीय रसकी चर्वणा होय तहां द्वितीय विरोध भी नहीं है सो जानना । जहां अंगांगिभावको अमाप्त अर्थात् विरुद्ध रसोंका निवेश होय तहां रसशवल होताहै सो जानना। उतका भी यही उदाहरण है अर्थात् "भग्नम्' इत्यादि श्लोक ही उसका उदाहरण है। कालभेदसे पूर्व पूर्वका उपमर्द यहां होताहै सो जानना । दो अंगोंको वैर भी रहै तो वहां भी रसहानि नहीं होती है, जिस तरह दो भटोंका विरोध भी रहे तो राजाकी हानि नहीं होती है तिसही तरह यहां भी जानना। इसका उदाहरण "सीताम्'इत्यादिश्लोकसे कहते है। श्लोकार्थ अष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। (१७३) रामेण क्रोधडप्यदशमुखनिपतन्मुण्डलाभप्रमोद- क्रीडत्कालीकरालभ्रुकुटिसहचरी सन्दधे चापयष्टिः॥१३॥ अत्र शृंगारबीभत्सयोर्विरोधेऽपि न रसहानिः । एवमङ्गाङ्गिभावापन्नयोविरोधिनोरेकत्र भावेऽपि न रस- हानिः । यथा- भौजंगमं गिरिमयं जलदात्मकं वा शस्त्रं यदेव मुमुचे दशकन्धरेण । सर्व विदेहतनयाविरहाकुलेन रामेण वह्निमयशस्त्रमिव व्यलोकि ॥ १४ ॥ ननु बीभत्सशृङ्गारयोः सहजवैरं कुतो मधु निपीय निष्ठी- वतोःसम्भोगदर्शनादिति चेत् । सत्यम्,बीभत्सस्य जुगुप्सा स्थायिभावः सा च तदर्शनेन तटस्थस्य भवति न तु तयोः रागौत्कट्यादिति । ननु तथाऽपि बीभत्से रागो दृश्यते । तथाहि- यह है कि रामने बीचि अर्थात् लहरीसे चलायमान जो कुवलय उसकी स्पर्धा करनेवाला अर्थात् चञ्चल जो नेत्र उसको चलानेवाली सीताको स्मरणकारकै और राक्षसके बाणोंसे विदारित जो शरीर उससे जो शोणित उसकी धाराके पतनसे सिक्त ऐसी सेनाको देखकरिकै क्रोधसे अर्थात् तत्तत्कार्यादिके अविवेकसे दर्पयुक्त जो रावण उसका पतित जो मुण्ड उसके लाभसे जो हर्ष उससे क्रीडा करती हुई कालीकी कराल भुकुटी कौटिल्य और मरणकारणतासे उसकी सहचरी जो चापयाष्टि सो धारण की। यहां अंगभूत श्रृंगार और वीभत्सरसोको विरोध भी है तो भी रसहानि नहीं हुई। इसही प्रकारसे अंगांगिभावको प्राप्त ज दो विरोधी रस उनकी एकत्र स्थिति होनेसे भी रसहानि नहीं होती है। इसका उदाहरण "भौजङ्गम्" इत्यादि श्लोकसे कहते है । श्लोकार्थ यह है कि रावणने नागपाश अथवा पर्वतास्त्र अथवा मेघास्त्र इत्यादि जो २ शस्त्र चलाया सो सब शस्त्र जानकीके विरहसे व्याकुल ऐसे रामचन्द्रने अग्निमयशस्त्रवत् देखा। यहां भयानकर्म वीरको अंगता होनेसे रसहानि नहीं हुई। यहां यह शंका होती है कि वीभत्स और शृंगार इन दोनोको स्वाभाविक वैर किसप्रकार होगा क्योंकि (१७४) रसतरंगिणी- [ तरंग:- यदपि हदि विशाला मुण्डमाला न पाणि- स्त्यजति नरकपालं रौरवं चर्म चैलम् । तदपि गिरिसुतायाः पक्षपातः पुरारौ समुदयति विचित्रः कामिनोः प्रेमबन्धः ॥ १५ ॥ इत्यादाविति चेत्। सत्यम्,निजभर्तुरधमेऽपि भूषणे भत्त्य- तिशयेन पत्न्यास्तत्र जुगुप्सैव नावतरति । जुगुप्सितत्वेन प्रतीयमानमेव हि जुगुप्सोत्पादकं भवति । किञ्च, प्रियसम्ब- न्धोपाधिकमधिकं तत्र प्रमेवोत्पद्यते तस्मात्स्थायिभावा- भावादीभत्सस्तत्र न जायत इति ॥ ननु वीरस्य युधि गच्छतः सर्पस्पर्श चकितना दृश्यते, मधुपान कारकै थूकने हुए कान्त कान्ताओंका सम्भोग देखते है तो वहां बीभत्स शृंगार दोनोंकी स्थिति हुई। इसका समाधान यह है कि बीभत्सका स्थायी जुगुप्सा है सो जुगुप्सा थूकना देखकरिकै तटस्थको होती है उन दोनोंको उत्कट राग होनेसे जुगुप्सा नहीं होती है, तो वहां बीभत्सकी स्थिति नही है। फिर यह शंका होती है कि आश्रयभेदसे वीभत्स व शृंगारके विरोधका उस स्थलमें वारण किया तो भीबीभत्स होतसन्ते शृंगार देखते है सो यदपि"इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि यद्यपि शिवके हृदयमें विशाल मुण्डमाला है । और हस्त मनु- प्यके कपालका त्याग नहीं करता है। और मृगका जो चर्म सो वस्त्र है तथापि पार्वतीका महादेवमें जो पक्षपात अर्थात् प्रेमातिशय सो उदयको प्राप्त होता है। इसही हेतु कामी व कामिनी इन दोनोंका जो प्रेमसम्बन्ध सो विचित्र अर्थात् प्रतिबंधकसे भी नहीं निवृत्त होता है यह जानते है इत्यादिमें वीभत्समें भी शृंगार देखते है । इसका समाधान यह है कि आपके स्वामीको अधम भूषणम भी भक्त्यतिशयसे स्त्रीको जुगुप्सा ही नहीं उत्पन्न होती है क्यो कि जुगुप्सिततासे जो प्रतीयमान होताहै सो ही जुगुप्साका उत्पादक होताहै । यहां तो स्वामीमें जैसे उत्कट राग होताहै तैसे उनके भूषणमें भी उत्कट राग होनेसे जुगुप्सा उत्पन्न नहीं होती है। और सुनो कि प्रियकी संबंधरूप उपाधिसे उस भूषणमें अधिक प्रेमही उत्पन्न होताहै इस हेतु भर्ताके भूषण जुगुप्साव्यञ्जकका अभाव होनेसे बीभत्स वहां नहीं होताहै ।।
1 अष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। (१७५) रौद्रे चाकस्मिकोत्पातातिपाते विस्मय इति चेत् । चकितता विस्मयश्च तत्र रसावेशान भवत्येव, सति वा विषयभेदः । वीरस्य न प्रतिभटाद्यं किन्तु भुजंगमात् । रौद्रे च न प्रति- भटबलाधिक्ये विस्मयः किन्तृत्पाते । रसवरस्योत्पादक- मखिलमवधेयम् । तत्र पूर्वाचार्याः- अन्यच्च रसवैरस्योत्पादकं वचनन्तथा न वाच्यं रसभावनाव्यशास्त्रविशारदैः॥ १६॥ वचनमित्युपलक्षणम् । एवं विभावाऽनुभावेष्वपि द्रष्ट- व्यम् । यथा- फिर यह शंका होती है कि युद्धमे जानेवाले वीरको सर्पस्पर्श होतसन्ते चकि- तता देखते हैं । और रौद्रमे आकस्मिक उत्पातका अतिपात होनेसे विस्मय देखते हैं। यह कहनेका अभिप्राय यह है कि वीर और भयानक इन दोनोंको विरोध नहीं होसकता है और रौद्र व अद्रुत इन दोनोंको विरोध नहीं होसकता है । इसका समाधान यह है कि वीरको सर्पस्पर्शमं चकितता और रौद्रमें उत्पातमें विस्मय ये रसावेशसे नहीं ही होते है यदि कदाचित् होते है तो विषयभेदसे होते है क्योंकि वीरको प्रतिभटसे भय नहीं होताहै किन्तु सर्पसे होताहै और रौद्रमें प्रतिभट बलाधिक्यसे विस्मय नहीं होता है किन्तु उत्पातसे होताहै तो इनको विरोध है ही तो जानना । उक्त प्रकारसे अविरोध संपादनकरिकै निषिद्धयमान भी रस रसशब्दसे अथवा शृंगारादि शब्दसे कहनेके योग्य नहीं है क्योकि ऐसे कहने में रसको आस्वाद्यता नहीं रहती है उसके आस्वादमव्यञ्जनामात्रनिष्पाद्यता सर्वसंमत है कदाचित् यह कहो कि रसको पदवाच्यता होनेपर भी व्यञ्जना होने में दोष नहीं है तो यह कहना युक्त नही क्योकि व्यंगको वाच्य रखनेसे वमनाख्यदोष होजाता है, इसही रीतिसे स्थायिभाव और व्यभिचारिभावोंका भी पदवाच्यता होनेमे दोष जानना । इसही रीतिसे विभाव अनुभावकी जो असम्यक् प्रतीति और विलंबसे प्रतीति और प्रतिकूल विभाव अनुभावोकी जो प्रतीति सो दोष है अर्थात् प्रकृतर सकी हानिकारक हैं। इन दोषोंको कविजन त्याग करदें यही वात कहते हैं कि रसवैरस्यके उत्पादक जो है उनको जान लेना चाहिये । इसमे पूर्वाचार्योंकी सम्मति कहतेहै “अन्यच्च" इत्यादि कारिकासे । कारिकार्थ यह है कि रसभावोंको जाननेवाले और नाट्यशास्त्रविशारद ऐसे पुरुषांने रसवै- (१७६) रसतरंगिणी- [ तरंगः- काऽहं व त्वं क मधुसमयः कुत्र वा दूतिकाऽसौ मेघच्छायाप्रविचलमिदं कुत्र वा प्रेम यूनोः । आयुर्वायुप्रचलनलिनीवारिबिन्दूपमानं मानं मुग्धे विसृज सकलं तुच्छमेव प्रतीमः ॥ १७॥ रस्यका उत्पादक सामान्यकारकै वचन वा विशेषकरिकै वचन "नच वैरिरसंब्रूयात्" इत्यादि वाक्यसे अन्य नहीं कहना चाहिये । यहां वचनपद विरुद्ध रस. विभावादिका भी परिचय करताहै । इस ही प्रकार विभावाऽनुभावोंमें भी जानलना। विभावत्वरूपसे अथवा अनुभावत्वरूपसे प्रतीतिका अजनक अथवा विल- म्बित प्रतीतिजनक वचन नहीं कहना सो अभिप्राय है । इसका उदाहरण"वाहम्' इत्यादि श्लोकसे कहते है । इलोकार्थ यह है कि मानवतीके प्रसाधनकी दूत्यादि द्वारा करनेमें अशक्यताको माननेवाले नायककी यह उक्ति है कि मैं कहां, तू कहां (यहां दो जो कपद दिये सो अधिक अन्तरको बोधित करते हैं इसका अभि- प्राय यह है कि हमारा तुमारा समागम काकतालसमागम सदृश है ) और वसन्तसमय कहां (यह कहनेसे वसन्तकी भी शीघ्र निवृत्ति है यह सूचित किया) और यह अर्थात् संघटनकालोचित वचन में चतुर ऐसी दूतिका कहां (यह कह- नेसे तुम्हारा आरोपित जो अपराध सो भी अत्यन्त जसम्भावित ही है यह सूचित किया) और मेघच्छायासदृश चलायमान जो यह अर्थात् स्वाभाविक दोनोंका प्रेम सो कहां है (यहां मेघच्छायाका सादृश्य कहनेसे कुछ अवश्य होनेवाला है इस हेतु सदा चलनेवालेके सदृश जो हमारा तुम्हारा विघटनका कारण सो भी अनिवारणीय ही है यह सूचित किया) इदं इसपदसे यह सूचित किया कि कालान्तरमें इस प्रेमका आधिक्य होत सन्ते पश्चात्तापयुक्त होगी सो जानना । और युवति युवा इनका प्रेम कहां (यह कहने से प्रेमको आकस्मिकता सूचित की) आपकी प्रार्थनाको भी विफलताकी आशंकायुक्त होकरिकै बलसे प्रवर्तन के निमित्त बलवत्तर अनिष्टका प्रतिपादन " आयुः" इत्यादि वाक्पसे करते हैं कि आयु जो है सो वायुसे चलायमान जो कमलिनी उसका जो जलबिन्दु तत्सदृश है (यह कहनेसे स्वभावसे नष्ट होनेवाली वस्तुकी नाशसाधनसम्पत्ति भी अनायाससे ही है यह सूचित किया)। हे मुग्धे ! अर्थात् करनेके योग्य है वा न करनेके योग्य है इस विचारसे रहित ऐसी, हित उपदेशसे मानका त्याग कर (स्वार्थपरायण जो तू उसको कौन हेतुसे हितत्व होगा ऐसी शंका मत कर । इस अभिप्रायसे कहताहै कि) सम्पूर्ण जगत्का स्वार्थसाधनविकल ही निर्वेदसे हम जानते हैं । इसका अष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। (१७७) अत्र निवेदप्रतिपादकमखिलं तच्च शृङ्गारविरोधि । अनौ- चित्यं सर्वथावधेयम् । तत्र प्राचीनग्रन्थः-- अनौचित्याहते नान्यद्रसभंगस्य कारणम् ॥ प्रसिद्धौचित्यवद्वस्तु रसहर्षाय जायते ॥ १८॥ उद्वेगकरमनौचित्यम् । लोकयात्राप्रसिद्धमौचित्यम्।तस्मा- हयोऍनोर्यत्र मिथो रतिस्तत्रैव रसः। एकस्यैव रतिश्चेद्रसा- भास एव । एकस्या एव रतिश्चेद्रसाभास एव । क्रमेणोदा- हरणम्-- सीतासमागमश्लाघाबन्धुरं दशकन्धरम् । प्रहर्तुं क्षमते कामो रामो वा निशितैः शरैः ॥ १९ ॥ अत्र रावणस्यैव रतिर्नतु सीतायाः। अभिप्राय यह है कि बलसे प्रवृत्ति होत सन्ते भी काषायवस्तुके पानमें प्रवृत्तिकी तरह कटुता है ही, और शितोपलके स्वादमें प्रवृत्तिकी तरह एकरसता'नहीं है इस हेतु हीनबल जो श्रृंगार है सो निवेदांग जो तुच्छताप्रतीति उससे रोका जाताहै । यह जो संपूर्ण प्रघट्टकार्थ सो भी अबाधित ही है सो जानना। रसका निरूपण करिकै रसाभासके निरूपणार्थ आरंभ करते है “अनौ- चित्यम् इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि रसके प्रतिकूल जो अनौचित्य सो सर्वथा विचारणीय है। तहां प्राचीनसंमति दिखाते हैं-"अनौ- चित्याव" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि अनौचिंत्य विनारस- भंगका कारण और नहीं है और प्रसिद्ध है औचित्य जिसमें ऐसा जो काव्य बन्ध सो रसरूप आनन्दके निमित्त होताहै । “रसस्योपनिषत्परा" ऐसा भी पांठ है तहां यह अर्थ जानना कि उक्त जो बन्ध है सो रसका उत्कृष्ट प्रमाण है। अनौचित्य उद्देगको करनेवाला है। तहां भौचित्य क्या है सो कहते हैं कि लोक- व्यवहारजन्यज्ञानविषयत्व ही औचित्य है इस हेतु दोनों युवति युवाओंकी जो ' परस्पर प्रीति सो जहां होय तहां ही रस है। एक नायकहीकी रति होय तो रसाभास ही है नायिकाहीकी रति होय तो भी रसाभास ही है। तहाँ पूर्वका उदा- हरण कहते है "सीता" इत्यादि श्लोकसे श्लोकार्थ यह है किकाम अथवा राम , (१७८) रसतरंगिणी- [तरंग:- निधुवनवनप्रान्ते यान्तं चलैनयनाञ्चलैः किमिति वलितग्रीव मुग्धे मुहुर्मुहुरीक्षसे । विफलमखिलं यूनोनों चेदुदेति परस्परं रतिरथ मनोजन्मा देवः स एव निषेव्यताम् ॥२०॥ अत्र नायिकाया एव रतिर्न तु नायकस्य । एवमेकस्या अनेकविषया रतिराभास एव । एवमेकस्याऽप्यनेकविषया- रतिराभास एव । परन्वेष विशेषः, यस्य व्यवस्थिता बह्वयो नायिका भवन्ति तत्र नरसाभासस्तथा सति कृष्णस्य जो हैं सो ही सीतासमागमयोग्यतासिद्धिके निमित्त नम्रीभूत रावणको तीक्ष्ण- बाणोंसे अथवा पुष्पसे प्रहारयुक्त करनेको समर्थ होते हैं । यहां रावणही की रति है सीताकी नहीं है। अब नायिकामात्ररतिप्रयुक्त रसाभासका उदाहरण "निधुवन" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि हे मुग्धे ! सुरतप्रधानवनसमीपमें जाते हुए युवाको लज्जासे चञ्चल जो नेत्रपक्ष्म उनसे वलित है ग्रीवा जिस क्रिया जैसे होय तैसे क्या उद्देश करिके बारम्बार देखती है ?यदि युवति युवाकी परस्परप्रीति नहीं उदित होय तो सम्पूर्ण वीक्षणादि निष्फल है । अथ कहिये पक्षान्तर कहते हैं कि दोनोंको अनुराग होय तो वह जो ईक्षणादिका उद्देश्य मनोजन्मा देव अर्थात् काम ही सेवित करिये फिर वीक्षणादिकी क्या गणना करती है ? अभिप्राय यह है कि जो पुरुषको अनुराग होवे तो स्वतः पुरुषकी प्रवृत्ति होजायगी, यदि अनुराग नहीं हो तो वीक्षणकी व्यर्थता युक्त ही है सो जानना । यहां नायिकाकी ही रति है नायककी नहीं है। इसही प्रकार नायिकाकी अनेक नायकोंमें रति जहाँ होय तहां भी भाभास ही जानना इसही प्रकार नायककी अनेकनायिकाओंमें रति होय तो वह भी माभास ही है परन्तु नायकमें यह विशेष है कि जिस नायकको बहुत भी नायिका व्यवस्थित हैं तहां अनौचित्यके अभावसे आभासत्व नहीं है यदि वहां भी रसाभास मानो तो सकलनायकोत्तम कृष्णकी अनेककामिनीविषयिणी रतिको आभासतापत्ति होगी इस हेतु अव्यवस्थितबहुकामिनीविषयिणी रति जहां होय और वैषियिक नायककी प्रीति और बहुनायकविषयक प्रीति इन स्थलोंमें रसा- भास जानना, इत ही हेतु वैषयिककी और वेश्याकी जो प्रीति सो रसाभास है यह प्राचीनोंका मत है तो जानना ॥
अष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। (१७९) सकलोत्तमनायकस्य बहुकामिनीविषयाया रतेराभासता- पत्तेः । तस्मादव्यवस्थितबहुकामिनीवैषयिकबहुनायक- परमेतत्, अत एव वैषयिकानां वेश्यानां च रसाभास इति प्राचीनमतम् । एकस्या अनेकविषया रतिर्यथा- संपत्कस्याऽद्य तारा भवति तरलिता यत्पुरो नेत्रतारा दृष्टा केनाऽद्य काञ्चीयदभिमुखगता वेपते रत्नकाञ्ची। उग्रः कस्याऽद्य तुष्टः सखि यदनुगमे कश्चिदुग्रोऽभिलाषः स्नातं केनाऽद्य वेणीपयसि विलुलिता यत्कृते काऽपि वेणी१२ अत्र किमो बाहुल्येन वेश्यात्वम् । एकस्यानेकनायिकाविषया रतिर्यथा- पञ्चेषुक्षितिपप्रतापलहरी प्रीतिस्त्वदीया पुनः कासां वा स्तनकाञ्चनाञ्चलतटे काश्मीरपंकायते । कासां मूर्धनि नैव नीरजदृशां सिन्दूररेखायते कासां वान च कर्णयोः प्रियसखे माणिक्यभूषायते ॥२२॥ जहां नायिकाको अनेक नायकविषयक रति है तहां रसाभासका उदाहरण "सम्यक्" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि हेसखिोजिसके आगे नेत्रतारा जो है सो अभिलाषसहित शोभित होती है वह कौन है ? जिसकी सम्पत्ति तारारूपतासे परिणमित अर्थात् फलित होती है। और जिसके सम्मुखमें प्राप्त हुई रत्नकाञ्ची हर्षोद्गमसे कम्पित होती है वह कौन है जिसने आज काश्चीपुरीको देखी है। और जिसके पिछाडी चलनेमें विशेषतासे कहा न जाय और उग्र कहिये अधिक अभिलाष है वह कौन है जिसपर आज सदाशिव तुष्ट हैं । और जिसके अर्थ विलक्षण जो वेणी सो कम्पसे विखर रही है वह कौन है? जिसने आज त्रिवेणी: के जल में नान कियाहै । यहां षष्ठ्यन्त जो दो किशब्द और तृतीयान्त जो दो किंशब्द हैं सो अनेक नायकों विना अनुपपन्न होकर नायकोंको अनेकत्व सूचित करतेहैं, इससे उदाहरण संगत होगया। अब एककी अनेकनायिकाविपयक रतिका उदाहरण पश्चेषु" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि नायिकाको लोभ करानेवाला जो नायकका (१८०) रसतरंगिणी- [ तरंग:-- अत्राऽपि वैषयिकता प्राग्वदेव । यत्र रसाबहवः स रसश- बलः । यत्र भावा बहवः सभावशबलः । तत्र रसशबलो दर्शितः । भावशबलो यथा- प्रवज्यैव शुभाय मे श्रुतिपथं जायेत तस्या वच- श्वकाग्रे मम का स्मरस्त्रिजगती शून्या विना राधया। नर्मसचिव उसके प्रति यह उक्ति है कि हे प्रिय ! अर्थात हे अभिलषितार्थपरायण । और हे सखे अर्थात् प्रतारणाके अयोग्य ! पाँच हैं बाण जिसके ऐसा जो राजा कामदेव उसकी जो प्रतापलहरी अर्थात् प्रतापोज्जृम्भण तद्रूप ऐसी जो प्रकृत पुरु- षकी प्रीति सो कौन स्त्रियोंके स्तनरूप काञ्चनपर्वतोंके तटमें काश्मीरपंकवत् आच- रण नहीं करती है ? और कौन कमलनयनाओंके मस्तकमें सिन्दूररेखावत् आचरण नहीं करती है ! और कौनके दोनों कानोंमें मणिरचिंत भूषणवत् आचरण नहीं करती है ? अपि तु सम्पूर्ण स्त्रियोंमै तत्तत्कार्यसे उसकी प्रीति व्यक्त ही है। यहां सुलभतार्थक एवकारके, प्रयोगसे और दो तीन वार किंशब्दके प्रयोगसे अनेक नायिका विषयक रति सूचित होती है सो जानना । यहां यह जानना चाहिये कि कलहशील जो कुपुत्रादि तदालम्बनंतासे और वीतरागाद्यालम्बनवासे वर्ण्यमान शोक, और ब्रह्मविद्यानधिकारिचाण्डालादिगत निवेद, और कदर्य कातरादिगत क्रोध, और पित्राद्यालम्बनक उत्साह और ऐन्द्रजालिकाद्यालम्बनक विस्मय, गुर्वा- द्यालम्बनक हास, महावीरादिगत भय, यज्ञीयपशुमांसालम्बनक जुगुप्सा ऐसे वर्ण- नमें रसाभास जानना और भावाभासमें भी यही रीति जाननी ॥ सशवलदृष्टान्तसे भावशवल कहनेके अर्थ रसशवलका अनुवाद करते है “यत्र" इत्यादि वाक्यसे । वाक्यार्थ यह है कि जहां बहुत रस होय वह रस शवल है। इसही रीतिसे जहां भाव बहुत होय तहां भावशवल कहना । यहां निर्वेद जो तेतीस और गुर्वादिविषयक रति ये भावपदार्थ हैं, इसका अभिप्राय यह है कि नारि- केलका जल और दुग्ध और बरा और केला इनको एकत्रित कारकै भोजन कर- नेसे जैसे विलक्षण 'स्वाद होता है तैसे ही भावोंका जहां समूह है तहां भी स्वाद होताहै सो जानना। इन दोनों में रसशवलका उदाहरण वो कह ही आये हैं "तस्याप्येतदेवोदाहरणम्" इस ग्रन्थसे। और भावशवलका उदाहरण कहते हैं "प्रव्रज्य"इत्यादिश्लोकसे। श्लोकार्थ यह है कि कृष्णकी उक्ति है कि उस राधाका जो पचन सो यदि हमारे श्रुतिपथको . 1 .
अष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। (१८ निर्मुक्तैव मनस्त्रपा मृगहशो लावण्यमन्यादृशं धिग्जन्म व गतासि किं विलपितैः क्वाऽसि प्रसन्ना भव ॥२३॥ निवेदौत्सुक्यामर्षभ्रममतिविषाददैन्यानां भावानां सांकर्या- देष भावशबल इति। अथ रसभावालंकाराणामभिव्यक्तिरसस्त्रिविधः-अभिमु- खोविमुखः परमुखश्चेति। व्यक्तैर्भावविभावाऽनुभावैर्यस्या- भिव्यक्तिः सोऽभिमुखः । भावविभावाऽनुभावानामनु- तत्वात्कष्टावगमो विमुखः । परमुखोऽपि द्विविधः-अलं- कारमुखो भावमुखश्च । अलंकारमुखेऽलङ्कारो मुख्यो मनोविश्रामहेतुत्वादसों गौणः । भावमुखे भावो मुख्यो मनोविश्रामहेतुत्वाद्रसो गौणः। प्राप्त होय तो हमको संन्यास शुभ है (यहां प्रव्रज्याही शुभ है यह कहनेसे निर्दे सूचित किया और राधाका वचन जो श्रुतिपथको प्राप्त होय यह कहनेसे औत्सुक्य- सूचित किया) फिर कहते है कि हमारे चक्रके आगे कामदेव कौन है ( यह कहनेसे अनर्थ सूचित किया) फिर कहते हैं कि तीनों जगत् राधा विना शून्य है (इससे भ्रमसूचित किया) फिर कहते है कि मनकी जो लज्जा सो जाती ही रही (इससे मति सूचित की )फिर कहते हैं कि मृगनयनाका जो लावण्य है सो विलक्षण है अर्थात् अनुपम है (इससे स्मृति सूचित की) फिर कहते है कि तू अनिश्चित देशमें गई इसहीसे हमारे जन्मको धिक्कार है (यहां अलाभ होनेसे विषाद सूचित किया) फिर कहते है कि विलाप करनेसे क्या, नहीं सम्मुखमें प्राप्त ऐसी तू कहां है, प्रसन्न होजाओ अर्थात् जहां हो तहांसे आकर हमको प्रसन्न करो (इससे दीनता सूचित की) यहां निर्वेद, औत्सुक्प, अमर्ष, भ्रम, मात, विषाद और दैन्य इन भावोंका सार्य होनेसे यह भावशवल है सो जानना । अब इसके उत्तर रसभाव अलंकार इनकी अभिव्यक्ति कहते हैं । भाव और अलंकार इन दोनोकी अभिव्यक्ति दिखाने के निमित्त रसका विभाव "रसस्त्रिविधः" इत्यादि वाक्यसे कहते है । वाक्यार्थ यह है कि रस तीन प्रकारका है, एक अभिमुख दूसरा विमुख, तीसरा परमुख । तहां अभिव्यक्त जो भाव, विभाव, अनुभाव उनसे (१८२) PET रसतरंगिणी- [तरंग:- अत्र प्राचीनसम्मतिः- अलंकारेच रुचिरे मनोविश्रान्तिकारिणि । अलंकारस्य मुख्यत्वं गौणत्वं रसभावयोः॥२४॥ इति । अभिमुखाः स्वस्वप्रकरण उदाहृता एव । विमुखो यथा- मैथिली लक्ष्मणो रामः सुग्रीवः पवनात्मजः । लंकापुरंपरित्यज्य पारं वारिनिधेर्ययुः ॥२५॥ अत्र संकटमखिलं समुत्तीयते समागता इत्यद्भुतो रसः कष्टादवम्यते । अलंकारमुखो यथा- एषा न लेखा भ्रमतामलीनां भाति प्रभाते नवकैरविण्याः। आलिंगतः किन्तु तुषारभानोकांतिःकलंकस्य वपुर्विलमा२६ अत्रापढ़तेरलंकारस्य मुख्यता। भावमुखो यथा- - जिसकी अभिव्यक्ति होय वह अभिमुख है और भाव, विभाव, अनुभाव इनके कथन विना कष्टसे जहां रसका अवगम होय वह विमुख है। परमुख रस दो प्रकारका है-एक अलंकारमुख एक भावमुख । तहां अलंकारमुख रसमें अलंकार तो मनोविश्राम हेतु होनेसे प्रधान है और रस गौण है। और भावमुख रसमें मनोविश्राम हेतु होनेसे भाव तो प्रधान है और रम गौण है तहां प्राचीन संमति कहते है "अलंकार" इत्यादि कारिकासे। कारिकार्थ यह है कि जहां चमत्कारहेतु और मनोविश्रान्तिकारक अलंकार होय तहां अलंकार तो मुख्य है और रसभाव गौण है। अभिमुख रस आप आपके प्रकरणमें कह ही आये हैं। विमुखका उदाहरण "मैथिली" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं । श्लोकार्थ यह है कि जानकी और लक्ष्मण और रामचन्द्र और सुग्रीव और हनुमान् ये लंकापुरको त्याग करिके समुद्रके पारको प्राप्त होते भये । यहां सम्पूर्ण संकटको तिरकरिकैये आये यह जो अद्भुत रस सो कष्टसे जानाजाताहै ॥ अब अलंकारमुखका उदाहरण "एषा" इत्यादि श्लोकसे कहते हैं। श्लोकार्थ यह है कि प्रभात समयमें नवीन कैरविणीके समीपमें यह भ्रमण करते हुए भ्रमरोंकी पंक्ति नहीं है किन्तु आलिगन किया जिसने ऐसा जो चन्द्रमा उसकी .
अष्टमः ८.] भाषाटीकासहिता। (१८३) सप्ताम्भोनिधिनीरहीरपटलालंकारिणी मेदिनी दातुं विप्रकुलाय योजितवतः संकल्पवाक्योधमम् । नाभीनीररुहात्सरोरुहभुवा तत्कालमाविष्कृते हस्ताम्भोरुहि भार्गवस्य किमपि क्रीडास्मितंपातुवः॥२७॥ अत्राद्भुतभावस्य मुख्यता, दानवीररसो गौणः॥ विद्वद्वारिधराः स्नेह तथा वर्षत सन्ततम् । लभते विपुलां वृद्धिं यथा रसतरंगिणी ॥२८॥ अवगाहस्व वाग्देवि दिव्यां रसतरंगिणीम् । अस्मत्पद्येन पद्मेन रचय श्रुतिभूषणम् ॥२९ ॥ कलंकको कान्ति शरीरमें लगी हुई शोभित होतीहै यहां अपहुति अलंकार मुख्य है और श्रृंगार रस गौण है । अब भावमुख रसका उदाहरण "सप्ताम्भोनिधि" इत्यादि श्लोकसे कहते है । इलोकार्य यह है कि सातसमुद्रोंका जलरूप जो हीरकसमूह तद्रूप अलंकारसे युक्त जो पृथिवी उसको ब्राह्मणकुलके अर्थ देनेके निमित्त संकल्पसूचक वाक्यका उद्योग करनेवाले जो भार्गव उनका अतिशयित जो बीडास्मित अर्थात् उक्त प्रतिज्ञाका निर्वाह और प्रकृत याचककी कामनापूर्ति दोनोंके विरोधसे उत्पन्न जो लज्जा तत्पूर्वक जो हास्य सो तुम्हारी रक्षा करो। क्या होत सन्ते हास्प है सो कहतेहै कि कमलसे उत्पन्न ब्रह्माने नारायणावतारमें आपके नाभिकमलसे हस्तरूप कमल प्रसारित करत सन्ते । यहां अद्भुतभाव , तो मुख्य है और दानवीर रस गौण है सो जानना । अब आपकी कीर्तिके अनुवर्तनकी विद्वत्परिशीलन विना दुर्घटता मानते हुए भानुमिश्र पण्डितोसे प्रार्थना करते है "विद्वद्वारिधरा" इत्यादि श्लोकसे। इलोकार्थ यह है कि हे पण्डितो! वागमृतप्रयोक्ता विद्वान् रूप जो मेघ सो निरन्तर उस प्रकार स्नेहकी वर्षा करो कि जिस प्रकार रसतरंगिणी बहुत वृद्धिको प्राप्त होय । आपके ग्रन्थके उदाहरणोंम परकीयत्वाशंकाका निवारण करते हुए देवता- प्रसादके अर्थ कविभारतीकी अधिष्ठात्री देवताकी प्रार्थना करतेहै "अवगाहस्व" इत्यादि श्लोकसे । श्लोकार्थ यह है कि हे वाग्देवि दिव्या अर्थात् निमज्जनोन्मज्जन- क्रीडाहेतु जो बह गूढार्दन्यंग्ययुक्त रसतरंगिणी उसका अपगाइन करो, और (१८४.) रसतरंगिणी। [तरंगोटन.८] यावद्भानोः सुता काऽपि कालिन्दी भुवि वर्तते । तावत्तिष्ठतु मे भानोरेषा रसतरंगिणी॥३०॥ इति श्रीभानुदत्तमिश्रविरचिवायां रसतरंगिण्यां प्रकीर्णकं नामाष्टमस्तरंगः॥८॥ हमारे श्लोकरूप जो कमल उनसे कर्णभूषण बनावो। आपकी - कीर्तिकी अनु- वृत्तिके अर्थ आपका और ग्रन्थका नाम कहते हुए आपके यशकी फैलानेवाली वाग्देवीसे इच्छा करते है "यावत्" इत्यादि इलोकसे । लोकार्थ यह है कि जबतक सूर्यकी कन्या काचघटीवत् अनिर्वचनीया अद्भुत जलयुक्त कालिन्दी पृथिवीपर है तबतक मैं जो भानुमिश्र उसकी यह रसतरंगिणी स्थित रहो ॥ इति श्रीरसतरगिणीभाषाटीकाया प्रकीर्णकं नामाष्टमस्तरङ्गः ॥ ८ ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस-बम्बई. -
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