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Sankhya Darshnam

Krishan Das · 2012/08

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धन्यवाद.
हम कोटिशः धन्यवाद उस परब्रह्म परमात्माको
हैं कि जिसकी पूर्णानुकम्पासे अब भी ऐसे परोपकारो
पुरुप विद्यमान हैं, जिनके द्वारा सर्व सामान्यकोभी
ठिन २ विप्रेयावलोकन होते हैं, और अनेक धन्य
श्रीमत् प्रभुदयालुजीको हैं कि जिन्होंने योगसूत्र
ऐसा सरल भापानुवाद किया है, जो भलीभांति सम
आता है बल्कि साथही उसका अमरभी पड़ता जाता
प्रथम उक्त महाशयजी रचित भापानुवाद सहित “
- जलयोगदर्शन" दृटिगोचर कर चुके हैं और यह
ख्यदर्शन " अब होताहै । और “ वैशेषिकसूत्र भा
वाद सहित " भी छप रहाहै, आशा है कि सांख्ययोग
यानुरागी सजनजन आदरकर प्रभुदयालुजीके उत्सा
बढ़ाकर इनके श्रमको सफल करेंगे।
आपका कृपापात्र.
खेमराज श्रीकृष्णदास.
श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना.
खेतवाड़ी न्यॉकरोड-मुर
4

ॐ परमात्मनेनमः। सांख्यदर्शन। भाषानुवादसहित।. अथत्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः॥ अथ त्रिविध दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्ति होना अत्यन्त पुरुषार्थ है ॥ १॥ अथ शन्द मंगलरूप है इससे आदिमे अथ शब्द कहकर शास्त्रका आरंभ किया है. पुरुषार्थ निरूपण शास्त्रका विशेष विषय अंगीकार कारकै आदिमें पुरुषार्थको वर्णन किया है कि त्रिविध दुःखकी निवृत्ति पुरुषार्थ आध्यात्मिक आधिभौतिक आधिदैविक ये त्रिविध दुःख हैं जो आत्माको अपने शरीर व इन्द्रियोंके संयोगसे शारीरिक रोग आदिसे अ- गवा मानसिक दुःख होता है उसको आध्यात्मिक कहते हैं, जो भूत मर्याद प्राणियोंके द्वारासे यथा चोर व्याघ्र सर्प आदिसे दुःख होता है उसको माधिभौतिक कहते हैं, और जो अग्नि वायु आदिसे दुःख होता है उसको आधिदैविक कहते है इस त्रिविध दुःखका अत्यन्त निवृत्त होना अत्यंत पुरुषार्थ है अब यह संदेह होता है कि जो दुःख होगया उसका तो नाश ही होचुका जो वर्तमान है उसका वर्तमान क्षणमे भोगही होता है भोगके पीछे आपही नष्ट होजायगा उसके नाशके अर्थ साधन व ज्ञानकी अपेक्षा नहीं होसकती शेष रहा जो होनेवाला है उसीके निमित्त साधन व ज्ञानकी अपेक्षा है इसमेंभी कोई यह शंका करते हैं कि जो नहीं हुवा उसका प्रमाणही नहीं है जो नहीं हुवा न वर्तमान है आगे होगा यह क्यों मानलेव और उसके नाशका उपाय करना ऐसा है जैसे आकाशके फूलके नाशका उपाय करना क्योंकि जब भाका- ૨ सांख्यदर्शन। शमें फूलही नहीं होता तो उसके नाशका उपाय वृया है अब इस संदेह निवारणके लिये उत्तर यह है कि यह दृष्टांत अयोग्य है अपने अपने कार्य उत्पन्न करनेकी शक्ति द्रव्यमें जबतक द्रव्य है बनी रहती है यथा दाहसे रहित अनिका होना कहीं देखनेमें नहीं माता इसी प्रकारसे अपने अपने कार्य उत्पन्न करनेकी शक्ति प्रत्येक पदार्थ में होती है यह शक्ति अनागत (भविप्यत) कालमे प्रकट होनेवाली द्रव्यमें स्थित रहती है इससे जवतक चित्तकी सत्ता है तबतक अनागत ( होनेवाले) दुःखके सत्ताका अनुमान होता है इसका निवृत्त होना पुरुषार्थ है (शंका ) ऐसा माननेमें दुःख निवृत्त होना कहनाही असंगत है क्यों- कि दुःख चित्तका है पुरुपमें उसकी निवृत्तिका होना संभव नहीं है ( उत्तर ) यह कहना यथार्थ नहीं है जो पुरुप दुःख रहित है तो श्रवण मननसे अनन्तर दुःसके नाशके लिये प्रवृत्ति न होना चाहिए क्योंकि साध्य उपायमें जब फलका निश्चय होता है ती प्रवृत्ति होती है विना फलके निश्चय प्रवृत्ति नहीं होती दुःखके अभाव फलकी वर्णन करनेवाली श्रुति यह निश्चय कराती है कि आत्मा नित्य दुःख रहित नहीं होता ज्ञान होनेपर दुःख रहित होता है श्रुति यह है "तरति शोकमात्मविद् विद्वान् हर्पशोको जहाति । " अर्थ आत्माका जाननेवाला शोकसे तरजाता है ज्ञानवान् हर्ष शोक दोनोंको त्याग देता है पुरुष यद्यपि निज शुद्धरूपसे दुःख रहित शुद्ध मुक्त है तथापि अ. विद्यासे पुरुषमें दुःख सुख होते है अविद्यासे रहित ज्ञान प्राप्त होनेकी अवस्थामें संसारी दुःख सुखसे रहित आनन्दमय मुक्तरूप होता है यया यह कहा है "न नित्यशुद्धवुद्धभुक्तस्य भावस्य तद्योगस्तद्योगाहते । " अर्थ-नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त पुरुषको प्रकृतिक संयोग विना बंध व टुपया संयोग नहीं है तिससे अविद्या भ्रमसे यथा स्फटिक शुद्ध शुक्ल रूप होताहै परंतु अरुण रूप आदि संयुक्त द्रव्यके प्रतिबिंबसे उसीके उपसे भारित होता है इसी प्रकारसे उपाधि द्वारा पुरुपो दुःख भोगकां सम्बंध होता है इसके निवृत्त होनेको पुरुपार्य कहना यथार्थ है, संक्षेपसे भापानुवादसहित। ३ हाँ वर्णन किया गया है विस्तारसे आगे वर्णन किया जायगा ॥ १ ॥ व प्रश्न यह है कि दुःखकी निवृत्तिके अर्थ ज्ञानकी क्या आवश्यकता ौकिक उपायसे दुःख निवृत्त होजायगा. उत्तर- नदृष्टात्तत्सिद्धिनिवृत्तेप्यनुवृत्तिदर्शनात्॥२॥ निवृत्त होजानेपरभी फिर अनुवृत्ति देखनेसेडरपदा- र्थसे उसकी (दुःख निवृत्तिकी) सिद्धि नहीं होती॥२॥ धनका दुःख धन की प्राप्ति व प्रियके वियोगका दुःख प्रियके संयो- से नष्ट होजाता है परन्तु कालान्तरमे फिर धनके क्षयसे व पियके पयोगसे दुःख प्राप्त होताहै इसी प्रकारसे जिस जिस संसारदुःखका श होना देखा जाता है उस दुःखको फिर प्राप्ति होती है अत्यन्त दुःखकी निवृत्ति नहीं होती तिससे से अर्थात जे उपाय लोकमें देख- में आते हैं उनसे दुःखकी निवृत्ति होना सिद्ध नहीं होता ज्ञानहीसे अत्य- त दुःख निवृत्त होना सिद्ध होता है ॥ २॥ प्रात्याहिकक्षुत्प्रतीकारवत्तत्प्रतीकारचेष्ट- नात्पुरुषार्थत्वम् ॥३॥ प्रतिदिन क्षुधा निवारणके तुल्य उसके (दुःखके) निवारणका उपाय वा खोज करनेसे पुरुषार्थ होना सिद्ध नहीं होता ॥३॥ सिद्ध नहीं होता यह अर्थ इस सूत्रमें पूर्व सूत्रसे सिद्ध न होनेकी अ. वृत्ति आनेसे ग्रहण किया जाता है । दृष्ट उपायसे पुरुषार्थ सिद्ध नहीं तिा और जो होता है वह सुधा निवृत्त होने के समान होता हथया भात दन भोजनसे क्षुधा निवृत्त होजाती है निवृत्त होनेके समयमे क्षुधाका ख दूर हो जाता है परंतु फिर प्राप्त हो जाता है यथा क्षुधा दुःख निवा- ण कियगयेकी फिर अनुवृत्ति होती है इसी प्रकारसे धन अर्जन आदिमें .

सांख्यदर्शन। जानना चाहिए ऐसा दृष्ट साधन जो मन्द पुरुपार्यके लिये है ज्ञानवा नको त्याग करनेके योग्य है यह आगे सूत्रमें कहा है ॥ ३ ॥ सर्वासंभवात्संभवेपिसत्तासंभवा- द्वेयःप्रमाणकुशलैः ॥ ४॥ सब असंभव होनेसे संभव होनेपरभी सत्ता- संभव होनेसे प्रमाणमें जे कुशल (प्रवीण) हैं उनको त्याग करना चाहिये ॥४॥ दृष्ट साधनसे जो दुःखका दूरहोना है उसमें सर्वथा दूरहोना असंभव है और जो संभव है उसमेंभी दुःखसत्ताका रहना संभव है अर्थात् प्रतिग्रह पाप आदिसे उत्पन्न दुःख अवश्य होता है इससे प्रमाणके जाननेमें जे प्रवीण हैं उनसे वह त्यागहीके योग्यहै अर्थात् संसार सुख जिसके लिये मूर्ख तन मनसे उपाय करते हैं व उसके पश होते हैं यह अंतमे नाशको प्रात होनेवाला व दुःख परिणामरूप है इससे ज्ञान- वान्को त्याग करना चाहिये ॥४॥ उत्कर्षादपिमोक्षस्य सर्वोत्कर्षश्रुतेः॥५॥ मोक्षके उत्कर्षसेभी सवसे उसके उत्कर्प (श्रेष्ठत्व) होनेमें श्रुति प्रमाण होनेसे ॥५॥ उत्कर्ष उच्चता वा उत्तमताको कहते हैं दृष्ट साधनसे सिद्ध करनेके योग्य जो राज्य आदि है उनसे मोक्षका उत्कर्ष होनेसे अर्थात् मोक्षकी श्रेष्ठता होनेसेभी यह निश्चित होता है कि सब राज्य मादिक सांसारिक सुखमें दुःख है मोक्षही सुखरूप, इष्ट व साध्य पदार्थ है सबसे मोक्षके उत्कृष्ट होनेमे श्रुति प्रमाण है श्रुतिमें कहा है ॥ "नहवैसशरीरस्यसत-प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति।" मर्म-निश्चय करिक नो शरीरवान है उसके दुःख सुखका नाश नहीं है -- भापानुवादसहित । "अशरीरंवावसन्तप्रियाप्रियेनस्पृशतः ।" अर्थ-शरीर रहित वा शरीर अभिमान रहित जो मुक्तरूप सन्त है उसको दुःख सुख स्पर्श न नहीं करते अर्थात् नहीं होते ॥ ५ ॥ अब यह प्रश्न है कि जो दृष्ट साधनसे सर्वथा दुखिका नाश नहीं होता तो घेद विहित यज्ञ आदि कर्म से होजायगा, उत्तर- अविशेपश्चोभयोः॥६॥ दोनोंका विशेप (भेद ) नहीं है ॥६॥ दोनोंका अर्थात् दृष्ट जो लोकमें देखनेमें आता है व अदृष्ट जो यज्ञ साधन धर्म फल वेद विहित देखने में नहीं आता इन दोनोंका जैसा कहागया है अत्यन्त दुःखकी निवृत्तिके साधक न होनेमें विशेष नहीं है अर्थात् दोनों एकही समान हैं अत्यन्त दुःखकी निवृत्ति यज्ञ आदि फलसे भी नहीं होती मोक्षके साधक होनेमें विवेक होनाही मुख्य उपाय है विवेकसे अविवेक जो दुःखका हेतु है उसीके नाशसे दुःख मात्रका नाश होता है अन्यथा नहीं होता। ६ ॥ नस्वभावतोवद्धस्यमोक्षसाधनोपदेशविधिः॥७॥ स्वभावसे बँधेहुयेको मोक्ष साधनके उपदेशकी विधि नहीं है ॥ ७ ॥ अत्यंत दुःख निवृत्तिको जो मोक्ष वर्णन किया है इसमें बंधन केवल दुःखका योग है पुरुपमें दुःख बंध स्वाभाविक नहीं है जो स्वभाव से विधा है तो उसको मोक्ष साधनके उपदेशकी विधि नहीं होसकती क्योंकि स्वाभाविक धर्मका जबतक द्रव्य है तबतक नाश नहीं होसकता द्रव्यके नाशः से उसका नाश होसकता है अन्यया नही होसकता यथा स्वाभाविक उष्णता ( गरमी) का अग्निसे भिन्न होना संभव नहीं होता इसी प्रकारसे स्वाभाविक. बंध होनेसे पुरुषका मोक्ष होना संभव नहीं होसकता इससे पुरुषमें बंध स्वाभाविक नहीं है ॥ ७ ॥ . .

. J सांख्यदर्शन !. इसी हेतुसे जो काल योगमें कहा गया है अर्थात् देशकाभी मुक्त व अमुक्त सबमें सदा सम्बंधसे देश योगसे पुरुषका बंधन होना सिद्ध नहीं होता, नहीं मुक्त पुरुषको भी बंधन होना चाहिए ॥ १३ ॥ नावस्थातोदेहधर्मत्वात्तस्याः॥१४॥ अवस्थाकै देह धर्म होनेसे अवस्थासे नहीं है ।। १४ ॥ यदि अवस्थासे पुरुपका बंधन होना माना जावे तौ अवस्यांसे बंधन नहीं होसकता क्यों नहीं हो सकता उसके देह धर्म होनेसे अर्थात् अव- स्थाके देह धर्म होनेसे अवस्था जड़ देहका धर्म है पुरुषका धर्म नहीं है अन्यका धर्म अन्यक बंधनका कारण नहीं हो सकता अन्यके धर्मसे अन्यका बंधन होना माना जाय तो मुक्तका भी बंधन होना सिद्ध होगा१५ असंगोयंपुरुपइति ॥१५॥ यह पुरुप संगरहित है ॥१५॥ पुरुपमें भी अवस्था अंगीकार करनेसे क्या दोष है उत्तर यह है कि पुरुप (आत्मा) संग रहित है जो यह कहा जाय कि देह व पुरुपका संयोग है पुरुप संग राहत कैसे हो सकता है तो संयोग मात्रसे संग नहीं होता यथा कमलपत्रमें जलका संयोग होता है परन्तु कमलपत्रमें उसका संग अर्थात् मेल नहीं होता इसी प्रकारसे पुरुष असंग है ।। १५ ॥ नकर्मणान्यधर्मत्वादतिप्रसक्तेश्च ॥ १६ ॥ अन्यका धर्म होनेसे व अति प्रसक्तिसे कमसे नहीं है अर्थात् बंध नहीं है ।। १६॥ : धर्म अधर्म कर्मसे पुरुपका वध मानाजाव तो कर्मसे भी पुरुषक बंध होना सिद्ध नहीं होता, क्योंकि कर्म पुरुपका धर्म नहीं है अन्यक धर्म है अर्थात् अंतःकरण चित्तका धर्म है अन्यके धर्मसे अन्यके पंध होनेमें मुक्त पुरुपका भी बंध होना संभव होगा जो यह कहा जाय कि अपने अपने उपाधिके कर्मसे बंध अंगीकार करनेमें यह दोष न होगा भाषानुवादसहित। इससे दूसरा हेतु यह कहा है कि अति प्रसक्तिसे, अर्थात् कर्म बंधनके अति- संयोग होनेसे भी कर्मसे पुरुषका बंध होना नहीं सिद्ध होता क्यो कि कर्म संस्कार मलयमें भी बना रहता है परन्तु कारणमात्रमें लयको माप्त रहनेसे दुःख सुखक बोधका हेतु नहीं होता कर्मसे बैध मानने में प्रलय आदिमें भी दुःख योगरूप बंधकी प्राप्ति होगी परन्तु ऐसा होना प्रमाणसे सिद्ध न होनेसे कर्मसे बंध नहीं है जो सहकारी कालके विलं- बसे मलयमें विलम्ब होना कल्पना किया जाय तो कालके हेतु न होनेका पूर्वही प्रतिषेध करदिया गया है ॥ १६॥ जो काल आदि कोई पुरु- पके बंधके हेतुं नहीं है तो चित्तहीको दुःख योगरूप पंध मानना चाहिए पुरुषका बंध क्यों कल्पना किया जाता है-और विना बंध मोक्षका भी प्रयोजन नहीं है उत्तर- विचित्रभोगानुपपत्तिरन्यधर्मत्वे ॥ १७॥ अन्यके धर्म होने में विचित्र भोगकीसिद्धिवाप्राप्ति नहींहोगी दुःखयोग रूप बंध चित्त मात्र जो पुरुषसे अन्य है उसके धर्म होनेमें विचित्र भोगकी प्राप्ति न होगी अर्थात् अन्यके धर्म होने में विना पुरुपके योग पुरुषमें दुःख भोग होना माननेमें नियामकका अभाव होगा नियामकके अभाव होने में सब पुरुषोंके दुःख सब पुरु- पोंके भोगके योग्य होंगे यह दुःखका भोक्ता है यह सुखका भोक्ता है यह भीग होनेका विचित्र भेद जो अनेक पुरुषोमें होता है न होना चाहिये विचित्र भोग सिद्ध होनेसे भोग नियामक होनेसे दुःख आदि योगरूप जो बंध है वह पुरुषमें भी अंगीकार करनेके योग्य है पुरुषमें बंध चित्तवृत्तिके उपाधिसे है स्वाभाविक नहीं है व चित्तहीका बंध व मोक्ष है पुरुषका नहीं है चित्तके योगसे पुरुपका भी बंध व मोक्ष कहा जाता है।॥ १७ ॥ प्रकृतिनिबंधनाच्चेन्नतस्या अपि पारतन्त्र्यम् ॥ प्रकृति के निमित्तसे होवे नहीं उसके भी परतंत्र दोससे १८॥ २ " 1 -- १२ 1 ,सांख्यदर्शन ।। होता है वहीं सत वही असत होना संभव नहीं है इससे दोनों रूपसे अविद्याका मानना युक्त नहीं है ॥ २३ ॥ नताहपदार्थाप्रतीतेः॥२४ ॥ प्रतीत न होनेसे उसप्रकारका पदार्थ नहीं है ॥२४॥ उस प्रकारका जैसा कहागया है कि यही सत व असत दोनों हो ऐसा कोई पदार्य होना प्रतीत न होनेसे ऐसा पदार्य नहीं माना जासकता २४॥ नवयंषट्पदार्थवादिनो वैशेपिकादिवत् ॥ २५॥ वैशेपिक आदिके समान हम छः पदार्थक वादी नहि है२५॥ यथा वैशेषिक आदि छः पदार्थ नियत संख्या पदार्थको कहते हैं तथा हम नहीं कहते संख्या नियम रहित होनेसे सत असतरूप अथवा सत असतसे विरुद्ध अविद्या पदार्थ मानने में दोप नहीं है जो ऐसा कहा जावे तो इसका उत्तर यह है ॥ २५ ॥ अनियतत्वेऽपिनायौक्तिकस्यसंग्रहो- ऽन्यथावालोन्मत्तादिसमत्वम् ॥२६॥ नियत न होनेमें भी युक्ति विरुद्धका संग्रह नहिं होता अन्यथा पालक व मतवाले आदिको समानता होगी ॥२६॥ नियत पदार्य नहों तौभी वहीसत वही असत जो युक्तिसे विरुद्धहै उसका संगहना दो मारना और जोएंगद किया गयौ पयायालकर उन्मरायुरू 'अयुक्तका ग्रहण करताहे उसके संग्रहका कुछ प्रमाण नहीं है तथा यह भी माना जायगा ॥ २६ ॥ कोई नास्तिक कहते हैं वाद्य विषय प्राणिक है इनके वासनासे जीपको यंध है इसके उत्तरमें यह सूत्र वर्णन करते हैं। नानादिविषयोपरागनिमित्ततोप्यस्य ॥ २७ : .

भापानुवादसहित। १३ इसको अनादि विपय वासनानिमित्तसे भी नाह है ॥२७॥ इसको अर्थात् इस पुरुप आत्माको जो अनादि विषयकी वासना हैं उनके निमित्तसे भी बंध होना संभव नहीं होता इसका हेतु आगे सूत्रमें वर्णन करते हैं ।। २७ ॥ नवाद्याभ्यन्तरयोरुपरज्योपरञ्जक- भावोऽपिदेशव्यवधानात् स्त्रुघ्नस्थ- पाटलिपुत्रस्थयोरिव ॥२८॥ देशके अन्तर होनेसे स्तुनके रहनेवाले व पाटलि- पुत्रके रहनेवालेके समान बाह्य व अन्तर दोनों में उपरज्य व उपरक भाव नहिं होता॥२८॥ जो देहके अंतरदेश मात्र आत्माका होना व पाह्य विषयोंको आत्माके बंधका हेतु होना मानते हैं उनके मतके प्रतिषेध करनेके लिये सूत्रमें यह हेतु वर्णन किया है कि देहके अन्तर स्थित जो आत्मा है उसका अंतरके विषयमें उपरंज्य व उपरंजक भाव होसकता है अन्तर व बाह्य दोनोंमें देशके अंतर होनेसे नहीं होसकता क्योंकि आत्मा देहके अंतरदेशमें है इससे दोनोंका आत्माके साथ संयोग नहीं होसकता संयोगहीसे वासना अर्थात् उपराग होना देखा जाता है जैसे मजीठ व वस्त्र के संयोग होनेसे । पुष्पके व स्फटिकके संयोग होनेसे उपराग होता है आत्मा व बाह्य विषयके साथ देशके अंतर होनेसे किसी प्रकारसे संयोग नहीं होसकता राधा स्वप ( बागरा ) व पालिएन (पटना) के रहनेवालोंका संयोग , ही होसकता जिस पदार्यमें प्रीति वा वासना हो उसको उपरंज्य व जिसको उसकी वासनावामीतिहो उसको उपांजक कहते हैं जो यह कहाजाय क यथा तुझारे मतमें विपय देशमें इंद्रियोंके जाने व विषय संयोग धोनेसे उपराग होता है तथा इमारे मतमें विषय देशमे (जहाँ विषय है सांख्यदर्शन। वहाँ) आत्माके जाने व विषय संयोग होनेसे उपराग होना कहना योग्य है इसका उत्तर यह है ॥ २८ ॥ द्वयोरेकदेशलब्धोपरागानव्यवस्था ॥२९॥ दोनोंकेएकदेशमेंलब्धउपरागहोनेसे व्यवस्थानहिहोगी२९ जो आत्माको विषय देशमें जाना मानाजायगा तो दोनोंके अर्यात् बद्ध व मुक्त दोनोंके आस्माओंका एकही विपय देशमें लब्ध विषयमें उपराग होनेसे अर्थात् विषय उपरागके प्राप्त होनेसे बंध व मोक्षकी व्यवस्था (पृयक्ता ) न रहैगी मुक्तकोभी बंधकी प्राप्ति होगी ॥ २९ ॥ अव पदा- याँको क्षणिक माननेवालोंकी शंकाको वर्णन करते हैं। अदृष्टवशाच्चेत् ॥३०॥ अदृष्ट वशसे होवै ॥३०॥ एकदेश सम्बंध होने व सम विषम संयोग होनेपरभी केवल अदृष्ट ( संस्कार नियम ) वशसे उपराग होता है यह मानाजाय तो इस शंकाका उत्तर यह है ॥ ३० ॥ नद्वयोरेककालायोगादुपकार्यों- पकारकभावः॥३१॥ दोनोंमें एक कालके योग न होनेसे उपकार्य उपकारकभाव न होगा॥३१॥ क्षणिक होनेसे कर्ता व भोक्ताके एककालमें न होनेसे दोनों में उपकार्य उपकारक भाव नहीं होसकता जिसका उपकार हो वा जो उपकारके योग्य हो वह उपकार्य है व उपकार करनेवाला उपकारक है क्यों उपकार्य उपकारक भाव नहीं होसकता वा नहीं होगा हेतु यह है कि कर्तानिष्ठ | जो अदृष्ट है उससे भोक्तानिष्ठ विषय उपरागका होना संभव नही, होता ॥ ३१॥ शंका- भापानुवादसहित । पुत्रकर्मवदितिचेत् ॥३२॥ पुत्र कर्मके समान होवे ॥३२॥. यथा पितामें निष्ठ अर्थात् पितामें स्थित पुत्र के लिये जो कर्म है उससे पुत्रका उपकार होता है तथा व्यधिकरणके अदृष्टसे अति अन्य अधि- करणके अंदृष्टसे विषय उपराग होवै यह माना जावै ।। ३२ ।। उत्तर- नास्तिहितत्रस्थिरएकात्मायोगर्भाधाना- दिनासंस्क्रियते॥३३॥ तिसमें जो गर्भाधान आदिसे संस्कारको प्राप्त होता है ऐसा स्थिर एक आत्मा नहि है ॥ ३३ ॥ तिसमें अर्थात् क्षणिकवादी नास्तिकके मतमें गर्भाधानसे आरंभ करिकै जन्मपर्यंत स्थिर एक मात्मा नहीं है कि जो इस जन्मके पश्चात् कालके कोंके अधिकारके लिये पुत्रइटि करिकै संस्कार कियाजाय इससे पुत्र इष्टि करिकभी नास्तिक क्षणिकवादीके मतमें पुत्रका उपकार होना घटित नहीं होता व दृष्टांतभी प्रसिद्ध है ॥ ३३ ॥ स्थिरकाऱ्यांसिद्धेःक्षणिकत्वम् ॥३४॥ स्थिरकार्यकी सिद्धि न होनेसे क्षणिक होना ॥३॥ स्थिर कार्यकी सिद्धि न होनेसे बंधकाभी क्षणिक होना सिद्ध होता है दीपशिखाके समान नियत कारण वा अभाव कारणसे क्षणिक बंध है यह मानना चाहिये ।। ३४ ॥ उत्तर- नप्रत्यभिज्ञाबाधात् ॥ ३५॥ नहि प्रत्यभिज्ञासे बाधा होनेसे ॥ ३५॥ पूर्व जाने हुए पदार्थको वर्तमान कालमें जाननेसे यह वही है ऐसे ज्ञान होनेको प्रत्यभिज्ञा कहते हैं जो मैने देखाथा उसीको मैं अब स्पर्श करताहूं - सांख्यदर्शन। इस प्रत्यभिज्ञासे स्थिर होनेकी सिद्धि व क्षणिक होनेकी वाधा होनेस . पदार्थ क्षणिक नहीं है बंध घटपट आदिकी तुल्य स्थिर है व दीपशिखामें अनेक सूक्ष्म क्षणोंके योग होनेसे क्षणिक माननां केवल भ्रम है।॥ ३५ ॥ श्रुतिन्यायविरोधाच्च ॥ ३६॥ श्रुतिवन्यायके विरोधसे भी ॥ ३६॥ श्रुतिवन्यायके विरोधसे भी किसीका क्षणिक होना नहीं पाया जाता श्रुतिमें कहा है। सदेवसौम्येदमग्रआसीततमएवेदमग्रआसीत्। अर्थ-हे सोम्य (प्रियदर्शन ) यह ससार आगे (सृष्टिसे पहिले) भी सतहीथा पहिले यह तमही (तमरूपही)तया अर्थात् सूक्ष्म कारण रूप वह आदिके प्रकाशसे रहित होनेसे अलक्ष्यथा इत्यादि श्रुतिसे क्षणिक होना सिद्ध नहीं होता औरकार्य कारणात्मक अखिल प्रपच क्षणिक होना अनुमानके विरुद्ध होनेसे व असतसे सतका होना सभव न हानसे क्षणिक होना प्रमाणसे सिद्ध नही है ।। ३६ ।। दृष्टांतासिद्धेश्च॥ ३७॥ दृष्टांतसे क्षणिक होनेकी सिद्धि न होनेसे भी ॥३७॥ प्रदीप शिखा आदिके दृष्टातमें अनेक सूक्ष्म क्षणोंके सयोग होनेसे क्षणिक होनेकी सिद्धि न होनेसे क्षणिक होनेका अनुमान नही होता ३७॥ युगपज्जायमानयोर्न कार्यकारणभावः ३८ एकवारभी दोके उत्पन्न होनेमें कार्यकारणभाव । नहीं हो सकता ॥३८॥ पूर्व सत कारणसे कार्यकी उत्पत्ति होती है साथही दोनोंके उत्पन्न होनेमें कार्य कारण भाव नहीं हो सकता विनाकारणक कार्यकी उत्पत्ति नही हो सकती क्रमसे अर्थात् कारणसे पीछे अन्य क्षणमें कार्यकी M भाषानुवादसहित । १७ उत्पत्ति मानने में क्षणिक होना सिद्ध नहीं होता क्रमसे कार्यकारणभाव माननेपरभी क्षणिक वादीके मत्तसे कार्यका होना सिद्ध नहीं हो सकता क्यों सिद्ध नहीं होसकता यह आगे सूत्र में वर्णन करते हैं ॥ ३८ ॥ पूर्वापाये उत्तरायोगात् ॥ ३९ ॥ पूर्वके नाशहोनेपर उत्तरका योग.न होनेसे ॥३९॥ क्षणिक होनेमें पूर्व जो कारण है उसके नाश हो जानेपर उत्तर जो कार्य है उसका कारणके साथ योग न होनेसे उसकी उत्पत्ति होना व कार्यकारण भाव होना संभव नहीं होता क्योंकि उपादान कारणके अनु- गत होनेहीसे कार्यका अनुभव होता है ।। ३९ ॥ तद्भावेतदयोगादुभयव्यभिचारादपिन ॥ ४०॥ उसके भावमें उसका योगन होनेसे दोनोंके व्यभि- चारसेभी नहीं हो सका ॥४०॥ पूर्वभाव कालमें उत्तरका सम्बध नहीं है तो दोनोंके व्यभिचारसे अर्थात् अन्वय व्यतिरेकके व्यभिचारसेभी कार्यकारण भाव नहीं हो सकता जब उपादान होता है तब उपादेयकी उत्पत्ति होती है और जव उपादान नहीं होता तब उपादेयकी उत्पत्तिका अभाव होता है इस प्रकार- से अन्वय व्यतिरेकहीसे उपादान उपादेयके कार्यकारण भावका ग्रहण होता है क्षणिक होने में दोनोंके ऋमिक होनेसे वह अन्वय व्यतिरेकके व्यभिचार होनेसे कार्यकारण भावकी सिद्धि नहीं होती ॥ ४० ॥ पूर्वभावमात्रे न नियमः ॥४१॥ पूर्वभावमात्रमें नियम नहीं है ॥ ११ ॥ जो यह कहा जावै कि, निमित्त कारणकी तुल्य उपादान कारणका भी पूर्वभाव मात्र होनेसे कारण होना अंगीकार किया जावे इसके उत्तर

1.सांख्यदर्शन।
में यह सूत्र है कि पूर्वभाव मात्र होनेसे उपादान होनेका नियम नहीं
है व निमित्त कारणोंकाभी पूर्वभाव मात्र होना । विशेष नहीं है उसमें
भी विशेष कार्यकारण भाव होनेकी मावश्यकता है ॥ ४१॥ कोई ना.
स्तिक यह कहते हैं कि विज्ञानसे भिन्न वस्तु होनेके अभावले बंधभी
स्वप्नपदार्थकी तुल्य विज्ञान मात्र है इससे अत्यंत मिथ्या होनेसे बंध
में कोई कारण नहीं है अब इस मतका खण्डन करते हैं ।
न विज्ञानमात्रं वाह्यप्रतीतेः॥४२॥
बाह्य की प्रतीति होनेसे विज्ञानमात्र नहीं है ॥ ४२ ॥
विज्ञान मात्रही तत्व नहीं है क्योंकि विज्ञानके समान बाह्य अर्थोकीभी
प्रतीति होती है ॥ ४२ ॥ बाह्य प्रतीत होनेका हेतु वर्णन करते हैं।
तदभावे तदभावाच्छून्यं तर्हि ॥४३॥
तो उसके अभावमें उसके अभावसे शून्य है ॥४३॥
जो वाह्यका अभाव मानेंगे तो उसके अभाव माननेमें शून्य रहि-
जायगा विज्ञानभी न रहेगा क्योंकि बाह्यके अभाव होनेसे विज्ञानके अ-
भाव होनेका प्रसङ्ग है हेतु यह है कि, जब कुछ ज्ञेय होता है तब उसका
विज्ञान वा ज्ञान होता है विनाज्ञेय विज्ञान नहीं कहा जा सकता इससे
वायके अभावमें विज्ञानके अभाव होनेसे शून्यही अर्थात् कुछ न रहना
सिद्ध होगा जो यह कहा जावै कि विज्ञान मात्रकी सत्यता श्रुति स्मृ-
तिमें कहा है तो श्रुति स्मृतिका अभिप्राय केवल पारमार्थिकसत्तामें
विज्ञानमय अवस्था बाह्य के प्रतिपेध करनेका हे व्यवहारिक सत्ता
सांसारिक दशाम नहीं है ।। ४३ ॥
शून्यं तत्त्वं भावोविनश्यति वस्तु
धर्मत्वाद्विनाशस्य॥४४॥

भापानुवादसहित। शून्यही तत्वहै विनाशके वस्तु धर्म होनेसे भाव नाशको प्राप्त होता है ॥४४॥ शून्य मात्र तत्व है क्योंकि सब भावका नाश होता है और जो विनाशी है वह स्वमवत् मिथ्या है इससे सब वस्तुका आदि अन्तमें अभाव मात्रहोंने व मध्य (वर्तमान ) में क्षणिक होनेसे बंध आदि पारमार्थिक नहीं हैं तो किसको क्या बंधन है क्योंकि नाश होना वस्तु- का धर्म अर्थात स्वभाव होनेसे स्वभाव विरुद्ध पदार्थ नहीं रह स- कता इस नाश धर्म संयुक्त होनेसे स्वप्नवत् सत होनेका भ्रम मात्र है ॥ १४ ॥ अपवादमात्रमबुद्धानाम् ॥४५॥ मृढोंका अपवादमात्र है॥ ४५ ॥ शून्यका भाव होना व विनाशी होना यह मानना मूठोंका अपवाद मात्र है अर्थात् मिथ्यावाद है क्योंकि शुन्यमें प्रमाण अंगीकार करनेमें प्रमाण अंगीकार करनेहीसे अभावकी हानि होगी व प्रमाण अंगीकार न करने में प्रमाणके अभावसे शून्यकीभी सिद्धि न होगी और नाशके कारणके अभावसे अवयव रहित द्रव्योंका नाश होना संभव न होनेसे कार्योंकाभी विनाश सिद्ध नहीं होता इससे निरवयव शून्यके भाव अंगी- कार करने में नाश होना व अभाव सिद्ध नहीं होता और क्षणिक विनाश हीका प्रपंच होना माना जादै तो भी बंधका विनाशही पुरुषार्य होना संभव होता है क्योंकि बंध क्लेशकी इच्छा क्षणमात्रभी कभी नहीं होती सदा बंध व केश रहित होनाही अभीष्ट है ॥४५॥ उभयपक्षसमानक्षेमत्वादयमपि॥४६॥ दोनों पक्षोंमें समानक्षेम होनेसे यहभी ॥४६॥ दोनों पक्षोंमें अर्थात् क्षणिक व वाह्यविज्ञानमें समान सेम होनेसे, . 3 , सांख्यदर्शन। अभिप्राय यह है कि, दोनोंमें,खण्डनके हेतु एकही सम होनेसे यह भी अर्यात् विज्ञानमात्रका पक्षभी, खंडित होता है हाणिकपक्षके निरास (खण्डन ) हेतु प्रत्यभिज्ञान सिद्ध होने आदि शून्यवादमें भी स- मान हैं तथा विज्ञानमात्र 'पक्षके निरासके ' हेतु बाह्यकी प्रतीति आदि शून्यवादमें समान हैं इससे दोनोंपक्षाका समान विमाश है ॥ ४ ॥ अपुरुपार्थत्वमुभयथा ॥४७॥ दोनों प्रकारसे पुरुपार्थ न होना ॥४७॥ दोनों प्रकारसे अपनेसे व परसे शून्यताका पुरुषार्थ होना संभव नहीं होता स्थिर सुख आदिकोंका पुरुषार्थ होना संभव है बंध कारण विष- यमें इस प्रकारसे क्षणिकवादी व नास्तिकमतोंको दुपित किया है अब अन्य बंधकारणोंका जिनका पूर्वही खण्डन नहीं किया उनका प्रतिषेध किया जाता है ॥ ४७ ॥ न गतिविशेषात् ॥४८॥ गतिविशेपसे नहीं है ॥४८॥ जो यह कहा जावै कि जीवके गमन आगमनकी गतिविशेषसे पुरु- पका बंध है तो गतिविशेष शरीरप्रवेश आदि रूपसे पुरुषका बंध नहीं है ॥४८॥ गति न होनेका हेतु वर्णन करते हैं। निष्क्रियस्यतदसंभवात् ॥४९॥ क्रियारहितको वह असंभव होनेसे ॥ १९॥ क्रियारहित विभु अर्थात् व्यापक व निरक्यवपुरुषकी गति संभव नहीं है गति असंभव होनेसे गति विशेष कहना पुरुषमें नहीं होसक्ता ४९ अव यह शंका है कि श्रुतिस्मृतिमें इस लोक व परलोकमें गमन आगमन सुना जाता है इससे पुरुप परिच्छिन्न व सावयव है निरवयव व विभु नहीं है। उत्तर- भाषानुवादसहित । मूर्तत्वाइटादिवत्समानधर्मापत्तावपसिद्धांतः५० मूर्त होनेसे घट आदिकी तुल्य, समानधर्म प्राप्त होनेमें विरुद्ध सिद्धांत होगा ॥१०॥ जो पुरुष परिच्छिन्न मूर्तिमान् अंगीकार किया जावै तौ यथा घट आदि मूर्तिमान अवयव संयुक्त होनेसे नाशको प्राप्त होते हैं तथा समान- धर्म होनेसे पुरुषकाभी नाश होगा और यह विरुद्ध सिद्धांत होगा इससे यह मानने योग्य नहीं है ॥ ५० ॥ गतिश्रुतिरप्युपाधियोग दाकाशवत्॥५१॥ उपाधिके योगसे आकाशकी सहश गति- अर्थमें श्रुति है ॥५१॥ जो श्रुति पुरुषके गतिअर्थमें हैं वह उपाधियोगसे गति अर्थका वर्णन है यथा आकाश सर्वव्यापक है उसमें गतिका अभाव है परन्तु उपाधिसे घटके भीतर जो आकाश देख पड़ता है घट चलानेसे यह जान पड़ता है कि उसके भीतर जो आकाश है यह भी घटके साथ जाता है अर्थात् चलता है अथवा घटके लानेसे घटके साथ आता है यद्यपि घटमात्र चलता है आकाश नहीं चलता आकाश व्यापक निरवयव है सर्वत्र देख पडता है इसी प्रकारसे उपाधिवश शरीर आदि द्वारा पुरुषमें गति श्रुतिमें कहाहै प्रकृति क्रियारूपाहै उसमें घटकी तुल्य गतिका गारोपण होताहै ५१ नकर्मणाप्यतद्धर्मत्वात् ॥ ५२ ॥ कर्मकरकेभी नहीं उसका धर्म न होनेसे ॥५२॥ अदृष्टकर्मसेभी पुरुषका बंध नहीं है क्योंकि उसका अर्थात् पुरुषका धर्म नहीं है जो पुरुषका धर्म नहीं है उससे पुरुषका बंध नहीं हो सकता पूर्वमें विहित निषिद्ध व्यापाररूप कर्म करके बंध होनेका खण्डन किया सांख्यदर्शन। गया है यहां अष्टसे होनेके भेदसे फिर वर्णन किया गया है इससे पुनरुक्त नहीं है ॥ ५२ ॥ अतिप्रसक्तिरन्यधर्मत्वे ॥५३ ॥ अन्यके धर्महोनेमें अतिप्रसक्ति होगी॥५३॥. बंध व बंधकारण भिनके धर्महोनेमे आतिप्रसक्ति दोष होगा जिसमें प्रसंग न हो उसमेंभी प्रसंग मानना अतिप्रसक्ति वा अतिप्रसंग दोप कहा जाता है अतिप्रसक्ति दोपसे अर्यात् अन्यके कर्मसे अन्यको विना नियम बंध होना माननेसे मुक्तकाभी बंध हो जायगा यह मानने योग्य नही है || ५३ ॥ निर्गुणादिश्रुतिविरोधश्चेति ॥५४॥ और निर्गुण आदि श्रुतिका विरोध होगा ॥ १४ ॥ बंध हेतु परीक्षाकी समाप्तिमे यह कहा है कि पूर्वोक्त हेतुसे किसी प्रकार पुरुपका बंध होना सिद्ध नहीं होता और विशेप हेतु यह है कि, निर्गुण आदि श्रुतिका विरोध है पुरुपबंध औपाधिक न माननेमें श्रुति- का विरोध होता है॥५४॥ श्रुति यह है। साक्षीचेताकेवलोनिर्गुणश्च॥ अर्थ-साक्षी चेतन केवल निर्गुण है इत्यादि श्रुतिके विरोधसे पुरुपमें स्वाभाविक बंध नही है सूत्रमें इतिशब्द बंध हेतुकी परीक्षाकी समाप्तिका सूचक है ।। ५४ ॥ तद्योगोप्यविवेकान्नसमानत्वम् ॥५५॥ उसका योग भी अविवेकसे होनेसे समानत्व नहीं है॥५५॥ जो शंका करनेवाला यह शंका करै कि, प्रकृतिपुरुपके संयोगसे जो भापानुवादसहित । ૨૨ पुरुषका बंध होता है वही स्वाभाविक माना जादै तौ स्वाभाविक मान- नेमें जो दोष पुरुषमें स्वाभाविक बंधमानने अथवा काल आदिके निमित्तसे मानने में मुक्तकाभी बंध होना सिद्ध होता है जैसा पूर्वही कहा गया है इसमेंभी समान दोपोंकी प्राप्ति होगी इसके उत्तरमें यह सूत्र है कि उसका अर्थात् प्रकृतिका योग जो पुरुषमें है वह स्वाभाविक नहीं है अविवेक निमित्तसे है अविवेकसे होनेसे समानत्व नहीं होता अर्थात् समान दोष होना नहीं हो सक्ता विवेक होनेसे अविवेक व बंधका नाश होता है यह अविवेक मुक्तपुरुषोंमें नहीं होता अब यह शंका है कि प्रकृतिपुरुपके संयोगसे पहिले न होनेसे अविवेक प्रकृतिपुरुषका भेद- रहित साक्षात्कार होना नहीं है विवेकका प्राग्भाव है (किसी पदार्थके उत्पन्न होने या प्रकट होनेसे पहिले जो उसका अभाव होता है उसको माग्भाव कहते हैं ) और अधिक होना यह बुद्धिका धर्म है पुरुषका धर्म नहीं है अन्य धर्मसे अन्यमें संयोग होनेसे समान अतिप्रसंग दोपकी प्राप्ति है उत्तर-दोपकी प्राप्ति नहीं है क्यों कि विषयता सम्बंध- से अविवेकपुरुषका धर्म होना माना जाता है और जब विपय सम्बध नहीं है सम्बंधक अभावसे मलयमें बंधका कारण नहीं होता तथा प्रकृति बुद्धिरूप हो जिस पुरुषके लिये विवेकसे पृथक् होकर प्रकट नहीं होती उसमें अपनी वृत्ति देखनेके अर्थ लिये उसीकी बुद्धिरूप करिके संयो- गको प्राप्त होती है ऐसी व्यवस्थासे अतिप्रसंग दोपका अभाव होता है जो यह संशय हो कि धर्माधर्म कर्मबंधके कारण मानना चाहिये तो उसर- यह है कि अविवेकहीसे राग आदि व कर्मका सम्बन्ध होता है इससे अविवेकको मुख्य बंधका कारण माना है ।। ५५ ॥ नियतकारणात्तदुच्छितिवन्तिवत् ॥५६॥ नियतकारणसे उसका नाश अंधकारके समान होताहै ॥५६॥ यथा अंधकार केवल प्रकाश जो उसके नाशका नियतकारण है

सांख्यदर्शन।
नष्ट होताहै तथा नियतकारण विवेकसे उसका अर्थात् अविवेकका नाश
होता है ॥ ५७ ॥
प्रधानाविवेकादन्याविवेकस्यतरानेहानम् ५७
प्रधानके अविवेकसे अन्यके अविवेककी प्राप्ति है.
व उसके नाश होनेमें नाश है ॥ ५७ ॥
पुरूपमें आदिकारण प्रधानका अविवेक है प्रधानके अविवेकसे अन्यके
मविवेक अर्थात् बुद्धि आदिकोंके अविवेककी प्राप्ति होती है और प्रधा.
नके अविवेक नाश होनेसे अन्यक अविवेकका नाश होताहै यया शरी-
रसे आत्मा भिन्न है यह ज्ञान होनेमें, शरीरके कार्य जो रूप आदिक है
उनमें अविवेक होना संभव नहीं होता तथा प्रधानसे पुरुपके पृथक् होनेके
ज्ञान होनेसे प्रधानके कार्य परिणाम आदि धर्मवाले बुद्धयादिकोंमें अभि-
मानकी उत्पत्ति नहीं होती अर्थात कारणके नाश होनेसे जैसे जिस पटमें
चित्रहै उस पटके त्यागसे चित्रका त्याग हो जाताहै इसी प्रकारसे प्रकृति-
के कार्य बुद्धि आदिकोंमें अभिमानका त्याग हो जाता है ॥ ५७ ॥
वाङ्मानं न तु तत्वं चित्तस्थितैः॥ ५८॥
चित्तमें स्थिति होनेसे कथनमात्र हे तत्व नहीं है ॥२८॥
बंध आदिका स्थान चित्तहै बंध आदि सबकी चित्तमें स्थिति होनेसे
पुरुषमें बंध आदि होना तत्त्व ( यथार्य ) नहीं है केवल कपनमात्र
है यथा स्फटिकका लाल होना प्रतिविमात्रसे है तत्त्व नहीं है इसका
विशेष वर्णन आगे ग्रंथमें किया है इससे यहां विशेष वर्णन नहीं किया ॥५८॥
युक्तितोऽपि न वाध्यते दिङ्मूढवदपरोक्षाहते९९
दिशाभ्रमको प्राप्तके समान मननसेभी विना साक्षात्कार
हुये वाधाको नहीं प्राप्त होता ॥१९॥

भापानुवादसहित। यद्यपि कयनमात्र पुरुषको बंध आदिक हैं तथापि विना साक्षात्कार हुए श्रवण मननमात्रसे बाधाको नहीं प्राप्त होता अर्थात् नहीं छूटता जै- से जिसको दिशा भ्रम होता है उसको यद्यपि कयन मात्र दिशाका वि- परीत होना होवे तत्वमें न होवै तथापि विना साक्षात्कार हुए श्रवण व युक्तिसे भ्रम नहीं छूटता ॥ ५९ ॥ अचाक्षुपाणामनुमानेन बोधो धूमादि- भिरिव वह्नेः॥६०॥ अप्रत्यक्षपदार्थों का अनुमानसे बोध होता है यथा धूम आदिसे अग्निका होताहै ॥६० ॥ जो यह शंका हो कि स्थूल पदार्थ तो नेत्रसे देखनेसे प्रत्यक्षसे ज्ञात होता है सूक्ष्मपुरुष प्रधान आदिका बोध किसप्रकारसे होता है इसके उत्तरमें यह कहा है कि जो अचाक्षुप हैं अर्थात् चक्षुसे दृश्य नहीं हैं अप्रत्यक्ष हैं उनका बोध अनुमान करिकै वा अनुमानसे होता है यथा धूमसे अग्निका बोध होता है अब प्रत्यक्षपदार्थ जो कारणरूप हैं व अनुमानसे जानने- कि योग्य हैं उनके कार्यरूप पदार्थोंको वर्णन करते हैं ॥ ६ ॥ सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान्महतोऽहंकारोऽहंकारात्पंच- तन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं तन्मात्रेभ्यःस्थू लभूतानि पुरुप इति पंचविंशतिर्गणः॥६१ ॥ सत्वरजतम गुणोंकी सम होनेकी जो अवस्था है वह प्रकृति है प्रकृतिसे महत्तत्व होता है महत्तत्वसे अहंकार अहंकारसे उसके पांचमात्र व दो प्रकारको सांख्यदर्शन। इन्द्रियां उसके मात्रोंसे पांच स्थूलभूत व पुरुष यह पचीस गण हैं ।। ६३॥ सत्व-रज-तम-गुणों की सम होनेकी जो अवस्था है वह प्रकृति है प्रकृ ति कारणसे महत्तस्वकार्य होता है तथा महत्तत्वसे अहंकार अहंकार से पांच उसके मात्रा शब्द, स्पर्श,रूप, रस, गंध, व दो प्रकारकी इन्द्रिय दश बाह्य इन्द्रिय व ग्यारहवां अन्तरइन्द्रिय मन दश बाह्य इन्द्रिय पांच ज्ञानइन्द्रिय कर्ण: त्वचा, चक्षु, रसना, नासिका, व पांचकर्म इन्दिर इस्त, पाद, पायु, गुदा उपस्थ, लिंग वा योनि वाक् पांच उसके मात्र कारणोंसे पांच स्थूलभूत आकाश, वायु, तेज, जल, व पृथिवी कार्य हो ते हैं चौवीस यह व पुरुप यह पचीस गण हैं अर्थात् यह पचीस पदार हैं गुण कर्म सामान्य सब इनहींके अन्तर्गत है ॥ ६१ ॥ स्थूलात्पंचतन्मात्रस्य ॥ ६२ ॥ स्थूलसे पांच उसके मात्रका ॥ ६ ॥ आकाश, वायु, जल, तेज, पृथिवीकी स्थूलभूत संज्ञाहै स्थूल भूतकार्यसे उसके अर्थात् अहंकारके पांच मात्रा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, कारणरूपोंका अनुमान होता है यह सूत्रका भावार्य है विभाग इनका यह है कि, आकाशसे शब्दका, वायुसे स्पर्शका, तेजसे रूपका जलसे रसका, पृथिवीसे गंधका, अनुमान होताहै आकाशसे शब्दका अ. नुमान इससे होता है कि जिस स्थूलद्रव्यमें आकाश अधिक होता है उसमें शब्द अधिक होता है जिसमें न्यून है उसमें न्यून होता है यया ढोल में आकाश होनेके कारणसे शब्द होताहै और वहीं ढोलके भीतरके आ; काशमें मृत्तिका आदि भर देनेसे वैसा शब्द नहीं होता जो कुछ शब्द होता है उसका कारण यह है कि सर्वया आकाश रहित कोई स्थूल पदा- र्य नहीं होसकता जो आंकाश न होवे तौ धातु काष्ठ आदिमें कील आः दिगड न सकें न कील प्रवेश करनेमें कील प्रवेश करताहै उसके परमान इन पांच भापानुवादसहित । २७ ण दव सके कि जिससे कीलके प्रवेश करनेको आकाश मिले वायुसे स्पर्श- के अनुमान होनेका हेतु यह है कि आकाशमें स्पर्श शून्य होनेसे स्पर्श- का बोध नहीं होता सबसे सूक्ष्म जिसमें प्रथम स्पर्शका बोध होता है वह वायु है स्पर्शका आदिकार्य वायु है इससे वायुस्पर्शके अनुमानका हेतु है और जो जिससे स्थूल है उसमें उससे जो सूक्ष्मभूत हैं उसका गुण मिलारहता है यथा वायु आकाशसे स्थूल है इसमें आकाश जो इससे सूक्ष्म है उसका गुण शब्द मिला रहता है अर्थात् वायुमें स्पर्श विशेष गुण हैं परन्तु आकाशसे भिन्न वायुक न होनेसे शब्दभी वायुमें होता है तेजस रूपका अनुमान इससे होता है कि बिनातेज रूपका बोधनहीं होता अ. थीव शब्द स्पर्श रस गंध आकाश आदिके गुणोंसे रूपका बोध नहीं होता तेजहीसे रूपका प्रत्यक्ष होता हैं जलसे रस अर्थात् स्वादुके अनमान होनेका हेतु यह है कि अकाश वायु तेजमें स्वादु नहीं है यह प्रत्यक्षसे सिद्ध है जलमें मीठा खारा स्वादु होनेका बोध होता है और मीठे खट्टे आदि जे फल है वह जबतक आर्ट अर्थात् ओदे रहते हैं तब तक स्वादु अच्छा रहता है जब सूख जाते हैं तब वैसा स्वादु नहीं रह- ता जो यह कहा जावै कि, पृथिवीमें स्वादु गुण है और बहुत फलों में सूखने भी स्वादु रहता है तो सूखे व बेसूखेमें सब फल व अन्य स्वादिष्ट पदार्थोंमें तुल्य स्वादु होना चाहिये क्यों कि सूखे व न सूखे- में जलकी न्यूनता व अधिकता होती है पृथिवीकी नहीं होती इससे जल की विशेषता है परन्तु पृथिवीमेंभी स्वादु गुण है क्योंकि यह प्रथमही कहा गया है कि, जो अधिकस्थूल है वह अपनेसे जो सूक्ष्म भूत हैं उसके "गुण संयुक्त होता है इसीसे वायुमें शब्द स्पर्श कहा गया है तेजमें शब्द स्पर्श रूप तीन हैं जलमें शब्द स्पर्श रूप रस चार हैं व पृथिवीमें शब्द स्पर्शरूप रस गंध पांच हैं गंध पृथिवीका विशेष गुण है वायु, तेज जलमें गंध स्वाभाविक होना सिद्ध नहीं होता वायु तेज जलमें जो रोधका बोध होता है वह पुष्प वा अन्य गंधवान पदार्थक संयोगसे होता है इससे पृथिवी स्थूल कार्यसे सूक्ष्म कारण रूप गंधका अनुमान होता am- - २८ सांख्यदर्शन। है जो यह शंका हो कि जो पृथिवीमें गंध है तौ पृथिवीके कार्यरूप पत्थरमें क्यों गंधका, बोध नहीं होता तो उत्तर यह है कि स्थूल कठिन व दृढ होनेसे वायुके द्वारा उसके चूणु नासिकाके अंतर्गत नहीं होत न वायुमें उडसकते हैं उसके अति चुर्ण करने वा भस्म करनेसे वायु द्वारा उड़के उसके अणु नासिकामें अंतर्गत होनेसे गंधका बोध होता है इससे दूषण नहीं हो सकता ॥ ६२ ॥ बाह्याभ्यन्तराभ्यांतैश्चाहंकारस्य॥६३॥ बाह्य व अंतरोंसे व उनसे अहंकारका ।। ६३ ॥ कार्यरूप बाह्य व अंतरके इन्द्रियोंसे अर्थात् इन्द्रियोंकि द्वारा व उनसे अर्थात् उक्त पांच मात्रोंके द्वारा इनके कारण अहंकारका अनुमान होता है अर्थात् अहंकार अभिमानवृत्तिक अंतःकरण द्रव्य है जिससे में स्पर्श करता हू देखता हूं मेरे नेत्र मेरा शरीर इत्यादि यह पोध होता है इन्द्रियों व मानोंसे कर्ताको में ऐसा कर्ता हूं यह व यह मेरा है यह बोध होता है इससे इन्द्रिय व मानके द्वारा अहंकारका अनुमान होता है ॥ ६३ ॥ तेनान्तःकरणस्य ॥६४॥ उससे अंतःकरणका ॥ ६४ ॥ उससे अर्थात् उक्त अहंकार कार्यसे अथवा अहंकार कार्यके द्वारा मु- ख्य अंतःकरणका अर्थात् महत्तत्व नामक धुद्धिका अनुमान होता है वि. ना बुद्धि अहंकारका होना संभव नहीं होता क्योंकि निश्चय बुद्धिकी वृत्ति है व अभिमान अहंकारकी वृत्ति है और अहंकार निश्चय वृत्ति पूर्वक होता है लोकमें प्रथम स्वरूप निश्चय करके पश्चात् अभिमान होता है कि, यह महूं हम करिक यह करनेके योग्य है यह सिद्ध है अहंकार द्रव्यके कारणकी आकांक्षामें अभिमान व निश्चय वृत्तियोंके कार्य कारण. भाव होनेसे उनके आश्रयोंकाभी अर्थात् अहंकार व बुद्धिकामी कार्य भापानुवादसहित। कारण भाव कल्पना किया जाता है क्योंकि कारण वृत्तिके लाभके साथ ही कार्य वृत्ति लाभ होनेका सम्बध है अर्थात् कारण वृत्तिकी उपलब्धि नहीं होती यद्यपि अंत:करण एकहीं है परन्तु वृत्तिभेदसे भिन्न नामभेद- से कहा जाता है चिन्ता वृत्तिक चित्त व अहंकार दोनों बुद्धिके अंतर्भाव है ॥ ६६ ॥ ततःप्रकृतेः॥६५॥ उससे प्रकृतिका ॥६६॥ उससे अर्थात् महत्तत्त्व कार्यसे अनुमान द्वारा कारण प्रकृतिका वोध होता है क्योंकि सामान्य अंत:करणकाभी एकसमयमें पंच इन्द्रि- योंका ज्ञान उत्पन्न न होनेसे देह आदिकी तुल्य मध्यम परिमाण व नाश धर्म संयुक्त कार्य होना सिद्ध होता है. सुख दुःस्र मोह धर्मिणी बुद्धि है कार्यरूप बुद्धिका विनाकारण उत्पन्न होना संभव नहीं होता क्योंकि का- रण रहित कार्य नहीं होता व कारण गुणके अनुसार कार्य गुण होना उचित है इससे सुख दुःख मोह धर्मके कारण जो प्रकृति शब्दसे वाच्य है उससे महत्तत्त्व नामक बुद्धिकार्यके उत्पन्न होनेका अनुमान होता है और बुद्धि कार्यरूप बोधगत होनेसे उससे उसके कारण प्रकृतिका अनुमान होता है यह भाव है प्रकृतिका विशेष वर्णन आगे किया जायगा ।। ६६ ॥ संहतपरार्थत्वात्पुरुपस्य ॥६६॥ आरंभक संयोग परके अर्थ होनेसे पुरुपका ॥६६॥ आरंभक संयोग अवयव अवयवी भेद न होनेसे साधारण प्रकृतिका कार्य है प्रकृति व प्रकृतिकार्योंका परके अर्थ होनेके अनुमानसे पुरुष- का बोध होता है प्रकृति महत्तव आदिका अपनेसे भिन्न शय्या आसन आदिकी तुल्य परके भोग अपवर्ग फल देनेवाले संहत अर्थात् आरंभक " ३० I , सांख्यदर्शन। संयोग करनेसे , अनुमान करके प्रकृतिसे पर आरंभक संयोग रहित पुरुप सिद्ध होता है पुरुपका भी संहत होना माननेमें बनवस्या दोष की प्राप्ति होगी पुरुपके माननेहीकी क्या आवश्यकता है जो यही माना जावे कि प्रकृति आदि अपने सुख आदि भोगके अर्थ संहत किया। तो उसके साक्षात् अपने जानने योग्य पदार्थमें कर्म कर्ताका विरोध होग क्योंकि प्रकृति स्वयं ज्ञामरूप नहीं है पुरुपके योगसे प्रकृतिमें बुद्धि उत्पन्न होती है विनास्वयं प्रकाशमान व ज्ञान धर्मवान् होनेके मैं सुखी यह सुखज्ञान होना संभव नहीं होता स्वयं यह बोध करनेवाला जो है वह पुरुष है इसका विशेष भेद आगे वर्णन किया जायगा अब प्रथम प्रकृति के नित्य होने व सबके कारण होनेके विषयमें वर्णन किय जाता है ॥ ६६ ॥ मूलेमूलाभावादमूलंमूलम् ॥६७ ॥ मूलमे मूलके अभावसे मूलरहित्त मूल है ॥ ६ ॥ पुरुषको छोडकै प्रकृति सहित चौवीस तत्त्व है प्रकृतिसे इतर जे २३ तेईस तत्व हैं उन सबका मूल प्रधान है अर्थात् प्रकृति है प्रधानका मूल कुछ नहीं है इससे मूल, प्रधानमें मूलका अभाव है अभाव होनेसे मूल रहित मूल है अर्थात् प्रधान मूल रहित है जो प्रधानका भी मूल माना जाय तो इसी मकारसे एक एकका मूल माननेसे अनवस्था दोष की प्राप्ति होगी जो यह कहा जाय कि प्रकृति मूल कारण नहीं है अघि द्या संसारका मूल कारण है तो इसका उत्तर यह है ॥ ६७ ॥ पारम्पय्येप्येकत्रपरिनिष्ठेतिसंज्ञामात्रम् ॥६८॥ परम्परा होने में एकमें परिनिष्ठा होगी प्रकृति यह संज्ञामात्र है ॥६८॥ अविद्या द्वारा परम्परा करके पुरुपके जगत्के मूल कारण होनमेंभी - . भापानुवादसहित । पुरुषके परिणामी न होनेसे अविद्यामें अथवा किसी एक नित्य जगत् कारणमें परम्पराकी परिनिष्ठा अर्थात् पर्यवसान होगा जिसमें पर्याव- सान (सबका अंत ) होगा वहीं नित्य प्रकृति है अर्थात् मूल कारणकी प्रकृति संज्ञा है इससे प्रकृति शब्द यह संज्ञा मात्र है ॥.६८॥ समानःप्रकृतेर्द्वयोः ॥६९ ॥ प्रकृतिके विचारमें दोनोंका समान पक्ष है ॥६९ ॥ विचारमें व पक्ष ये शब्द सूत्रके अर्थमें सूत्रके शब्दसे भापामें अधिक कहे गए है व धिक कहनेका हेतु यह है कि, सूत्रके शब्दोंमात्रका मा- पामें अनुवाद करनेसे सूत्रका भाव व्यक्त न होता प्रकृतिक विचारमें अर्थात् प्रकृतिके मूल कारण होनेके विचार करनेमें दोनोंका अर्थात् वादी व प्रतिवादी दोनोंका समान पक्ष है जब जिसमें परम्पराका पर्याव- सान होवै वही प्रकृति है यह कहा गया तौ अविद्याक मूलकारण मान- 'नेमेभी पक्ष भेद नहीं रहता पक्ष भेद न रहनेसे दोनोंका समान पक्ष है जो यह कहा जाय कि अविद्या पचीस गणोंमें नही कहा इससे पचीससे अधिक तत्व मानना चाहिये तो अविद्या मिथ्याज्ञानरूप बुद्धि धर्म है व बुद्धि प्रकृतिका कार्य है इससे अविद्या प्रकृति व बुद्धिके अंतर्गत है अथवा ज्ञानका अभाव मात्र है इससे अधिक तत्व नहीं है (प्रश्न ) कहीं प्रकृतिका भी पुरुषसे उत्पन्न होना सुना जाता है इससे प्रकृति मूल कारण नहीं है ( उत्तर ) प्रकृतिका पुरुष संयोगसे जगत् उत्पत्तिमें समर्थ होना रूप प्रकट होना गौण उत्पत्ति वर्णन करनेसे प्रयोजन है संयोग लक्षणकप उत्पत्तिको कहा है ॥ ६९ ॥ जो प्रकृति पुरुष अनुमानसे जाने जाते है तो सबहीको क्यों विवेक मननसे उत्पन्न नहीं होता. उत्तर- अधिकारित्रविध्यान्न नियमः॥७० ॥ अधिकारीके त्रिविध होनेसे नियम नहीं है ।। ७०॥ - ३. .

सांख्यदर्शन।
मन्द, मध्यम, उत्तम तीन प्रकारके अधिकारी होते है अधिकारियों के
त्रिविध होनेसे सबको मनन करनेका नियम नहीं है क्यों कि मन्द जो
कुतर्क युक्तिसे अनुमान करता है वह ,ग्रहण योग्य नहीं होता मध्यम
भी सत पक्षका यथार्य ग्रहण नहीं कर सका इससे केवल उत्तम अधि
कारियोंको इस प्रकारका मनन होता है यह भाव है प्रकृतिका स्वरूप
गुणोका सम भाव होना पूर्वही वर्णन किया गया है व सूक्ष्म भूत आदिव
प्रसिद्ध है अब रहे महत्तत्व अहंकार इन दोका स्वरूप वर्णन करते है.
महदाख्यमाचंकार्यतन्मनः॥७१॥
महत्तत्व नामसे जोआदिकार्य है वह मन है ॥७॥
प्रकृतिका आदि कार्य अर्थात् प्रथम कार्य महत्तत्व है वह महत्तत्व
मनन वृत्ति युक्त मन है मननका यहां निश्चय अर्थ है निश्चय करनेवाली
बुद्धि वृत्ति मन है यह अर्थ है ॥ १ ॥
चरमोऽहङ्कारः॥७२॥
उसके पश्चात् अहङ्कार है ॥ ७२ ॥
उसके अर्थात् मनके पश्चात् अभिमान वृत्ति संयुक्त जो कार्य है
वह अहंकार है ॥ ७॥
तत्कार्यत्वमुत्तरेपाम् ॥७३॥
उसका कार्य होना उत्तर वालोंका ॥७॥
उत्तरवाले जो अहंकारके पश्चात् पांच मात्रा आदि कहे गए है उन
सबोंका उसका अर्थात् अहंकारका कार्य होना सिद्ध होता है अर्थात् सब
अहंकारके कार्य है ॥ ७३ ॥
आदिहेतुतदातारापारम्पयेप्यणुवत्॥७॥

उत्तर- भाषानुवादसहित। आद्यकी हेतुता उसके द्वारा परम्पराभावमेंभी अ- गुके तुल्यहै ॥ ७४॥ जो आदिमें सबके प्रथम होवे वह आद्य है वह आद्य प्रकृति है पर. म्परा भावमेंभी अर्थात् साक्षात् हेतु न होनेमेंभी आय प्रकृतिकी हेतु ता अहंकारआदिमें महत्तखके द्वारा है यथा वैशेषिक मतमें अणु समू- हकी घटनादि हेतुता व्यणुकआदिकी द्वारांही होती है ॥ ७ ॥ प्रश्न ) जब प्रकृति पुरुष दोनों नित्य हैं तब केवल प्रकृतिके कारण होने में क्या हेतु है। पूर्वभावित्वे द्वयोरेकतरस्य हाने ऽन्यतरयोगः ॥७५॥ दोनोंके पूर्वमें होनेमें एकके हान होने में अन्यका योग है ।। ७५॥ पुरुप व प्रकृति दोनोंके सम्पूर्ण कार्यके पूर्व होनमेंभी एकके कारण दोनेके हान ( अभाव) होनेसे अर्थात् पुरुषके परिणामी न होनेसे (रूपा- तरको नमाप्त होने सदा एक रूप रहनेसे) कारण होनेके अभाव होने से अन्य जो प्रकृति है उसके कारण होनेमें योग है अर्थात् प्रकृतिहीका कारण होना मानना उचित है प्रकृतिका स्वामी होनेसे पुरुष सृष्टिका कारण होना कहा जाता है यथा योद्धा रणमें लड़कर जय पराजयको मास होते हैं राजा युद्ध करै वा न कर उनके स्वामी राजाका जय व पराजय कहा जाता है प्रकृतिके फल सुख दुःखका भोग करनेवाला पुरुष है इससे प्रकृ- तिका स्वामी कहा जाता है पुरुपके परिणामी न होनेका हेतु यह है कि जो पुरुषका परिणामित्व होता तो यथा चक्षु मन आदि विकार व बंधमें प्राप्त हो कभी विद्यमान रूपआदि विषयको ग्रहण नहीं करते अथवा यथार्थ भावसे ग्रहण नहीं करते इसी प्रकारसे कभी विद्यमान सुख दुःख ४

सांख्यदर्शन ।
आदिको पुरुष न जानता व में सुखी हूँ अथवा नहीं हूं ऐसा संशय
होता परन्तु ऐसा नहीं होता इससे सदा ज्ञान प्रकाशरूप पुरुषको परि
णामी न होना सिद्ध होता है जो परिणाम रहित है वह उपादान कारण
नहीं हो सक्ता इससे प्रकृतिहीका सृष्टिका उपादान कारण होना
सिद्ध होता है ।। ७५ ॥
परिच्छिन्नं न सर्वोपादानम् ॥ ७६ ॥
सबका उपादान परिच्छिन्न नहीं है ॥७६ ॥
जो व्यापक न हो किसी देशविशेपमें हो मूर्तिमान हो उसको परि-
च्छिन्न कहते हैं सब तत्त्वोंका उपादान कारण जो प्रकृति है वह परि.
च्छिन्न नहीं है अर्यात् व्यापक है यह भाव है (शंका) प्रकृतिका व्या-
पक होना सिद्ध नहीं होता क्योंकि प्रकृति त्रिगुणसे भिन्न नहीं
है सत्वगुण आदिमें लघु होना गुरु होना चलना यह धर्म हैं इनका
वर्णन आगे किया जायगा यह धर्म विभु होने अर्थात् व्यापक होनेमें
न हो सकेंगे और सृष्टि आदिके हेतु संयोग विभाग न होंगे (उत्तर)
यथा प्राणव्यक्तियोंके सब देहोंमें सम्बन्ध होनेसे सामान्यसे प्राण-
का स्थावर जंगम अखिल शरीरमें व्यापक होना कहा जाताहै तथा मकृ-
तिका व्यापक होना कहा जाताहै जो किसी देशमें हो सब देशमें नहीं
उसको परिच्छिन्न व जो सर्वत्र हो उसको व्यापक कहते हैं प्रकृति सर्वत्र
है किसी एक देश मात्रमें नहीं है इससे प्रकृति व्यापक कही गई है जै-
से शरीर देशमें सर्वत्र प्राण सम्बंध होनेसे प्राण सब शरीरमें व्यापक
कहा जाता है प्रकृतिके क्रिया व संयोग वियोग आदिक साधर्म्य वैधर्म्य
विषयमें आगे वर्णन किया जायगा ।। ७६ ॥
तदुत्पत्तिश्रुतेश्च ॥ ७७॥
उनकी उत्पत्तिप्रतिपादक श्रुति होनेसेभी ॥७७ ॥

भाषानुवादसहित।
३९
उनकी अर्थात् परिच्छिन्नोंकी उत्पत्ति प्रतिपादक श्रुति होनेसेभी प्रक-
तिका परिच्छिन्न होना सिद्ध नहीं होता श्रुतिमें कहा है "यदल्पं तन्मय।
इत्यादि अर्थ जो अल्प है वह मरनेयोग्य या मरने वाला है मरण धर्मक
होनेसे परिच्छिन्न वा अल्पकी उत्पत्ति सिद्धि होतीहै ॥७७॥जो यह शंका-
होकि प्रकृतिके माननेकी क्या आवश्यकता है विना प्रकृतिकारणके -
ष्टिका होना मानना चाहिये इसके उत्तरमें यह कहाँहै-
नावस्तुनोवस्तुसिद्धिः ॥७॥
अवस्तुसे वस्तुको सिद्धि नहीं होती ॥ ७८॥
अवस्तुसे वस्तुकी सिद्धि नहीं होती अर्थात् अभावसे भावकी सि-
दि नहीं होती अभिप्राय यह है कि जो यह कहै कि कुछ नहीं था अभा-
वसे संसार उत्पन्न हुवा तो यह कहना यथार्थ नहीं है जैसे आकाशके
फूलोंसे हार बनना संभव नहीं है इसी प्रकारसे अभावसे सृष्टिका होना
संभव नहीं है जो यह कहा जाये कि, स्वपके तुल्य जगत् अवस्तु है अ-
र्थात् कुछ वस्तु नहीं है मिथ्याहै इसके उत्तरमे यह सूत्रहै || ७८ ॥
अबाधाददुष्टकारणजन्यत्वाच्च नावस्तुत्वम् ७९
बाधा न होनेसे व दुष्टकारणसे उत्पन्न न होनेसे
अवस्तुका होना सिद्ध नहीं होता ॥७९॥
वस्तुके होने में किसी प्रमाणसे बाधा न होनेसे व दुष्टकारणसे वस्तु हो-
नका बोध उत्पन्न न होनसे अर्थात् जैसे दुष्ट इन्द्रिय जो विकारसंयुक्त
है उससे शुक्ल शंखमें पीत होनेका बोध उत्पन्न होता है इस प्रकारसे
दुष्ट कारणसे जगत्के होनेका बोध न होनेसे किन्तु यथार्थ प्रमाण व अनु-
मानसे सिद्ध होनेसे अस्तु होने का ममाण नहीं होता ॥ ९ ॥

सांख्यदर्शन।
भावेतद्योगेनतत्सिद्विरभावेतदभावात्कु
तस्तरांतत्सिद्धिः॥८॥
भाव में उसके योगसे उसकी सिद्धि है अभावमे
उसके अभावसे कहांसे उसकी सिद्धि है॥८॥
भावमें अर्थान् कारणके सत होनेमें उसके सत्ताके योगसे उसकी ।
द्धि है अर्थात् कार्यकी सिद्धि होती है कारण अभावमे कारणके म
होनेसे कार्यकाभी अभाव होताहै विनाकारण कहाँसे उसकी अर्थात् ।
र्य रूप जगत्की सिद्धि होती है अर्थात् कहींसे वा किसी प्रकारसे न
हो सकती ॥ ८० ॥
नकर्मणउपादानत्वायोगात् ॥ ८१ ॥
कर्मसे नहीं उपादान होनेके योग न होनेसे ॥८॥
जो यह कहा जाये कि प्रधानके कल्पना करनेकी कुछ आवर
कता नहीं है कर्म जगत्की उत्पत्तिका कारणहै इसके उत्तरमें यह सूत्र
कि कर्मसेभी वस्तु होनेकी सिद्धि नहीं होती क्योकि कर्म निमित्तकारण
मूल कारण अर्थात् उपादान कारण होना कर्मका सिद्ध नहीं होता गुण
का द्रव्यके उपादान होने में योग नहीं है द्रव्मके उपादान होने में कर्मः
योगन होनेसे कर्मसे वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती पुरुषका परिणामी
होना व प्रकृतिका परिणामी होना वर्णन करके अब पुरुषार्थ विषय
वर्णन करतेहैं ॥ ८१ ॥
नानुश्रविकादपि तत्सिद्धिः साध्यत्वेना-
त्तियोगादपुरुषार्थत्वम् ॥ ८२॥

भाषानुवादसहित । वैदिककर्मसेभी उसकी सिद्धि नहीं है साथ्यकर्म होनेपरभी फिर आवृत्तिके योगसे पुरुषार्थ होना नहीं है ।। ८२॥ लौकिक कर्मसे पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता व वैदिक वेदविहित जो यज्ञ मादि कर्म है उन भी उसकी अर्थात् पूर्वोक्त पुरुषार्थकी सिद्धि न- ही है क्योंकि वैदिक कर्म जो साध्यहै उनके करनेपरभी फिर आवृ- ति अर्थात् फिर प्रवृत्ति व दुःख सम्बंध होता है इससे उक्त अत्यन्त पुरुषार्थका अभावहै कर्मफलके भनित्य होनेमें यह श्रुतिहै "तयथे- इकर्मचितो लोकाक्षीयतएवमेवामुत्रपुण्यचितो लोकाक्षीयतइति ।" अर्थ-यथा इस संसारमें कर्मसे संचित धनं धान्य आदि पदार्थ क्षयको प्राप्त होते है तथा परलोकमें पुण्य यज्ञ आदि कर्मकारकै संचित व प्राप्त हुए सुख भोग लोकभी क्षयको प्राप्त होते है इससे यज्ञ आदिकाँसभा अत्यन्तपुरुषार्य (मोक्ष) की प्राप्ति नहीं है ।। ८२ ॥ तत्र प्राप्तविवेकस्यानावृत्तिश्रुतिः ॥ ८३॥ तिसमें विवेकप्राप्तहुयेकेलिये अनावृत्तिप्रतिपादक श्रुति है ॥ ८३ ॥ तिसमें अर्थात् वैदिक कर्ममें जो अनावृत्तिमतिपादक श्रुति है अ. र्थात् फिर न पतित होनेके अर्थ में है वह केवल प्राप्तविवेककेलिये है अ. यात् जिसको विवेक प्राप्त हुआ है उसीकेलिये यह श्रुति है इसका विशेष वर्णन छठवे अध्यायमें किया जायगा ॥ ८३ ॥ दुःखाहुःखं जलाभिषेकवन्नजाड्यविमोका४॥

३८ सांख्यदर्शन। दुःखसे दुःख होता है जल अभिषेकके तुल्य जाडय विमोक नहीं होता।। ८४॥ जाडच विमोक शब्दका अर्थ जाडेसे जो दुःख होताहै उसका छूटना अथवा उससे छूटना है दुःखसे दुःख कहनेका अभिप्राय यह है कि सां सारिक वैषयिक कर्मसे वा वैदिक यज्ञ आदिकर्मसे जिसका दुःखात्म क व अनित्य विषय भोगफलहै व अंतमें दुःख परिणामहै इन दुःखक प कर्मोसे दुःखही होता है विना विवेक दुःख दूर नहीं होता जैसे जल सींचनेसे जाडेसे जो दुःखित है उसको दुःखही होताहै जाडेका दुःख उसका निवृत्त नहीं होता ।। ८४ || काम्येऽकाम्येऽपिसाध्यत्वाविशेषात्॥८५॥ - काम्य अकाम्यमेंभी साधन योग्य कर्म होनेके वि- शेप न होनेसे अर्थात एकही समान होनेसे ॥८६॥ जो कर्म काम्यनाम कर्तव्य है व जो कर्तव्य नहीं है सबके दुःखरूप होनेसे दुःखही होता है क्यों दुःख होताहै जो साधन योग्य है उसके विशेष न होनेसे जैसा इस श्रुतिमें कहा है " नकर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनकेऽमृतत्वमानशुः" अर्थ-न कर्मसे न प्रजासे न धनसे मोक्षको प्राप्त हुये त्याग करिक वा त्यागसे एके कोई मोक्षको प्राप्त हुये हैं अभिप्राय यह है कि कर्म मजा धनसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं है त्याग करिक अर्थात् अभिमान. न्या. काकै कोई मोक्षको प्राप्त हुये हैं, अभिमान. साग करनेसेभी सव मोक्षको नहीं प्राप्त हुए विशेष जो तत्वज्ञान है उस दुलभतत्वज्ञानको प्राप्त करिकै तत्वज्ञानसे जे अभिमानको त्याग किया है । पदी मोक्षको प्राप्त हुये है अन्य नहीं प्राप्त हुये ॥ ८५ ॥ .

भाषानुवादसहित। निजमुक्तस्य बंधध्वंसमात्रं परं नसमानत्वम् ॥८६॥ निजमुक्तका बंधकी निवृत्तिमात्र है पर अर्थात् अत्यंत विवेक फलका समान होना नहीं है ।। ८६॥ निजमुक्त अर्थात् स्वभावसे मुक्त जो पुरुष है उसके अविद्याकारणके नाश होनेसे जैसा पूर्वमें वर्णन किया गयाहै बंधकी निवृत्ति मात्र व पर- म आत्यन्तिक विवेकज्ञानके फलका, जो मोक्ष नित्य अत्यंत सुखरूप सब दुःखकी निवृत्ति है व कर्मफलका जो अनित्य व दुःखपरिणाम रूपहै दोनोंका समान होना संभव नहीं है केवल विवेकही साक्षात् ज्ञानका उ. पाय है व ज्ञानके उपयोगी प्रमाण है ॥८६॥ अब प्रमाणपरीक्षाका वर्णन किया जाताहै- द्रयोरेकतरस्यवाप्यसन्निकृष्टार्थप रिच्छित्तिःप्रमातत्साधकतमं यत्त विविधं प्रमाणम् ॥ ८७॥ जो अर्थ बोधगत नहीं हुवा उसका निश्चय करना चाहै यह निश्चय करनेकी वृत्ति दोनों अर्थात बुद्धि व पुरुपका धर्म हो अथवा एकहीका हो वह प्रमाहै उस, प्रमाका, जो, अतिमाधक. कारण, है वह प्रमा. ण है तीन प्रकारका है ।। ८७ ।। १ असन्निकधार्थशब्दका अर्थ बोधगत नहीं हुआ व परिच्छित्तिशब्द- (अर्थ निश्चय इस सूत्रअनुवादमें समझना चाहिये ।

सांख्यदर्शन।
इस प्रमाणके लक्षणमें स्मृति व्यावर्तन ( पृथक करने या दूर करने
केलिये बोधगत नहीं हुवा यह शब्दरक्खा है भ्रम व्यावर्तनके लिये अर्थक-
ब्द रक्खा है अर्थशन्दसे यथार्यवस्तु होनेसे अभिप्राय है संशय व्याप
तनकेलिये निश्चय करना यह शब्द रक्खाहै और दोनों अथवा एक्क
धर्म इस अभिप्रायसे कहा है कि पुरुष व बुद्धि दोनोंका धर्म माने चांद
एकहीका धर्म माने किसी प्रकारसे लक्षण असत न हो अर्यात् लक्षण
में दोपकी प्राप्ति न होवे ॥८७॥ तीन प्रकारका ममाण होना जो कहा।
प्रत्येक तीनोंके पृथक् पृथक् लक्षण मागेसूत्रोंमें वर्णन कियाई तीनदी
प्रमाण क्यों कहाहै तीनसे अधिक प्रमाण सुने जाते है इसका समाधान
आगे सूत्रमे वर्णन करतेहै-
तत्सिद्धौसर्वसिद्धर्नाधिक्यसिद्धिः ॥ ८८॥
उनकी सिद्धि होनेमें सबकी सिद्धि होनेसे अधिककी
सिद्धि नहीं है ॥ ८८॥
उनके अर्थात तीन प्रमाणक सिद्ध होनेसे सब अर्पकी सिद्धि होने
अधिक प्रमाण होनेकी सिद्धि नहीं है अभिप्राय यह है कि, तीनसे अधिव
प्रमाण नहीं है क्योंकि अनुपलब्धि आदि प्रत्यक्षके अंतर्गत व उपमान
अनुमानके अंतर्गत ऐतिह्य शब्दके अंतर्गत समझे जाते है ॥ ८८ ॥
यत्सम्बद्धं सत्तदाकारोल्लेखिवि
ज्ञानं तत्प्रत्यक्षम् ॥ ८९॥
जो इन्द्रियके साथ सत्सम्बंधको प्राप्त वस्तु है उसके
तदाकार अर्थात् भ्रमविकार रहित तत्वरूप धारण
करनेवाला जो ज्ञान वा बुद्धिवृत्ति है वह प्रत्यक्ष
प्रमाण है ॥८९॥

भाषानुवादसहित ।
स प्रत्यक्षके लक्षणके अनुसार जिस वस्तुका इन्द्रियके साथ सम्बंध
होता है उसका ज्ञान होसकता है जिसका इन्द्रियके साथ सम्बंध नहीं
होता उसका प्रत्यक्ष ' ज्ञान नहीं होसकता लोकमें इन्द्रियसम्बंध
हित पदार्थका ज्ञान न होना यथार्थ रूपसे सिद्ध है इससे साधारण
हौकिक जनोंके निमित्त यह लक्षण सत्य है परन्तु योगीजनोंको जो
रस्तु व्यवधानको प्राप्त है अर्थात् किसी पदार्थके आडमें है अदृष्ट है जि-
का इन्द्रियके साथ सम्बध नहीं होता वह पदार्थ व भूत भविष्यत् काल
होगए व होनहार जो पदार्थ हैं उन सबका प्रत्यक्ष होता है योगियोंके
रत्यक्षमें यह लक्षण घाटेत न होनेसे अव्याप्तिदोष संयुक्त होना विदित-
होता है इस आशंका निवारणके अर्थ यह वर्णन किया है ॥ ८९ ॥
योगिनामबाह्यप्रत्यक्षत्वान्न दोषः॥९०॥
योगियोंके अवाह्य प्रत्यक्ष करने वाले होनेसे दोप
नहीं है।। ९०॥
गभिप्राय इसका यह है कि-यह लक्षण ऐन्द्रियक ज्ञानके अर्थ है अर्थात्
इन्द्रियसम्बधी वो इंन्द्रियंजन्य ज्ञान है उसके लिये है योगी जनों-
को जो बाह्यइन्द्रियगोचर पदार्य नहीं है उसकाभी प्रत्यक्ष होता है
ससे योगियों के प्रत्यक्षमें इस लक्षणकी प्राप्ति न होनेसे दोष नहीं है
मथवा जो यह शंका होवे कि विना इन्द्रिय व अर्थक सम्बध कहीं मत्यक्ष
होना विदित नहीं होता तो इसका उत्तर इस सूत्रके अर्थसे यहहै
के तर्कसे लौकिक जनोंके सामर्थ्य अनुसार जो विना इन्द्रियद्वारा व
न्द्रिय व अर्थके सम्बंध हुए प्रत्यक्ष नहीं करसकते यद्यपि सिद्ध न
होरे तथापि विशेष सामर्थ्यसे विना बाह्यइन्द्रियनके द्वारा प्रत्यक्ष करने
ले योगियोंके होनेसे दोष नहीं है अर्थात् यह दोष नहीं हो सकता
सरा सूत्र इसके समाधानमें यह है ॥ ९ ॥
लीनवस्तुलब्धातिशयसम्बंधाद्वादोपः ॥११॥

सांख्यदर्शन। अथवा व्यतीत हुये दूरदेशमें वर्तमान वस्तुओंमें अतिशय सम्बधको लाभ किये वाप्राप्त हुये योगीयोंके होनेसे दोप नहीं है ॥९॥ इसका अभिप्राय यह है कि जो विना इन्द्रिय सम्बध प्रत्यक्ष होना । माना जावै तौ योगसे उत्पन्न अतिशय सामर्थ्य से व्यवहित दूर देशमें वर्त- मान पदार्थ में योगी के चित्तका सम्बंध घटित होता है तिससे योगियोंने लौकिक सामान्य जनोंसे विलक्षण विना वाह्य इन्द्रियके द्वारा प्रत्यक्ष मार करने में दोष नहीं है इस शब्दकी अनुवृत्ति पूर्वसूत्रसे होती यह योगियोंके प्रत्यक्षके समाधान वर्णन करनेसे यह सूचित किया है कि लौकिक बुद्धि अनुसार तर्कसे सब पदार्थका प्रमाण व यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता न बाह्य दृष्ट पदार्थ मात्रके ज्ञानको प्राप्त लौकिक जनोंके तर्क प्रतिष्ठा है क्योंकि योगीजनोंके प्रत्यक्षकी तुल्य ईश्वरकी तर्कसे सिद्धि नहीं होती ईश्वरकी सिद्धि न होने भी दोष नहीं है यह आगे सूत्र में वर्णन करते हैं ॥ ११॥ ईश्वरासिद्धेः॥९२॥ ईश्वरकी सिद्धि नहोनेसे ।। ९२ ॥ इसमें पूर्व सूत्रसे दोष नहीं है यह अनुवृत्ति आनेसे ईश्वरकी सिद्धि होनेसे दोष नहीं है यह पूरा अर्थ सूत्रका होता है भाव इसका यही है कि जैसे योगियोंको भूत भविष्यत्के, व व्यवहित विप्रकृष्ट पदावि ज्ञान होनेमें यद्यपि प्रत्यक्षका लक्षण पटित नहीं होता, व प्रत्यक्ष आदि प्रमाणसे ऐसा ज्ञान होना सिद्ध नहीं होता तथापि दोष नहीं है योग अवा स्था विशेषमें अतिशय सामर्थ्य होने में सत्यही है लोकमें बालकके बुद्धि विचारसे असंभव होनेसे जो पण्डित विद्वानके ज्ञानमें सिद्ध है उस अर्य के खण्डित न होनेके समान खण्डित व असत्य नहीं हो सकता अर्थात लौकिक ज्ञान व तर्कसे यद्यपि ईश्वर सिद्ध नहीं होता तथापि .

भापानुवादसहित। सिद्धि न होनेसे दोष नहीं है लौकिक जनोंकी बुद्धि व तर्कसे सिद्ध न होनेपर भी योगियोंके प्रत्यक्ष समान सत्य होना मानना चाहिये ईश्वर का ययार्य बोध योगही अवस्था व ज्ञान विशेष उदय होने में होता है, व आप्त उपदेशसे सिद्ध व प्रमागके योग्य है तर्कआदिसे सिद्ध नहीं होता बहुत मनुष्प बिना यथार्थ भाव समझे व पूर्वीपरके सम्बंधका विचार किए इस सूत्रको व और जो सूत्र मागे वर्णन किया है उनको 'सर्वथा ईश्वरके प्रतिपेध ( खण्डन ) में समुझते हैं परन्तु यह उनका भ्रम मात्र है क्योंकि जो यह कहै कि दोष नहीं है विना इस अनुवृत्ति- के ग्रहण किये हुये, ईश्वरकी सिद्धि न होनेसे इतनेही सूत्रके अर्थसे ईश्वरके सर्वथा निषेध करनेका अर्थ ग्रहण करना चाहिये तो ईश्वरकी सिद्धि न होनेसे इतने कहनेसे वाक्यको पूर्ति नही होती अन्य शन्दकी अपेक्षा होना विदित होता है जो यह कहें कि ईश्वरकी सिद्धि न होने से ईश्वर नहीं है वा ग्रहणके योग्य नहीं है, ऐसा कोई क्रिया शब्दका आक्षेप करिकै वाक्यार्य करलैवेंगे तो ऐसा अर्य ग्रहण करना सर्वथा अ. युक्त है क्यों कि मनसे कल्पना कारकै असंगत अर्थको ग्रहण करना और जो सम्बंघसे ग्रहणके योग्य है उसको त्यागना केवल आमदप मूर्खता है और सब शास्त्रों में पूर्व सूत्रसे पर सूत्रों में अनुवृत्ति ग्रहण किया जाना व अनुवृत्तिसे वाक्यकी पूर्ति होना सिद्ध है इससे शास्त्र की पद्धति व पूर्वापर सम्बधसे उक्त अर्थ व भावही यथार्थ ग्रहणक योग्य है। अन्य हेतु यह भी विचार करनेके योग्य है कि जो सूत्रकारका ईश्वरके निषेधही करनेका प्रयोजन होता तो सूत्रमें अभाव शब्दको रचते. भिर्यात् ईश्वराभाव अर्थ ईश्वरके अभावसे ऐसा कहते ईश्वरकी सिद्धि न होनेसे दोप नहीं है यह कहनेसे यही सिद्ध होता है कि तर्क प्रमाणसे ईश्वर सृष्टिकत्ती सिद्ध न होनेसे दोष नहीं है मुक्त रूपराग आदि दोष रहित पुरुष वा ईश्वर का आत्मा योगज विशेष ज्ञानसे सिद्ध मानने के योग्य है जो यह शंका हो शिक कार्यका का कोई सिद्ध होनेसे तर्क व प्रमाणसे ईश्वर सृष्टिकर्ता सिद्ध होना संभव है सृष्टि *

| सांख्यदर्शन।
विशेष कार्योंमें भी जीवोंके सन्निधानसे
अधिष्ठातृत्व है ॥ ९७॥
सन्निधानसे अधिष्ठातृत्व है यह पूर्व सूत्रसे ग्रहण किया जाता है अंतः
करणसे उपलक्षित जो है उसीकी जीव संज्ञा है यह छठवें अध्याय
वर्णन करेंगे इस सूत्रका अभिप्राय यह है कि केवल सृष्टिके आदिही
पुरुपके संयोग मात्रसे सृष्टि करना व अधिष्ठाता होना सिद्ध नहीं।
विशेष कार्योंमें अर्थात् व्यष्टि सृष्टिमेंभी अंतःकरणसे प्रतिबिंधित
(प्रतिबिम्बको प्राप्त ) चेतन जो जीव हैं उनके सन्निधानसे भी अधि
धातृत्व है कूटस्थ चेतन मात्र स्वरूप होनेसे किसी व्यापारसे अधिष्ठाता
नहीं होता ॥ ९७ ॥ (शंका ) जो सदा सर्वज्ञ ईश्वर नहीं है तो वेदा
न्तोंके वाक्योंके विवेकके उपदेशका उसमें अंधपरम्परा होनेकी शंक
होनेसे प्रामाण्य नहीं हैं। उत्तर-
सिद्धरूपवोद्धृत्वाद्वाक्यार्थोपदेशः॥९८॥
सिद्धरूपोंके यथार्थ ज्ञाता होनेसे उनके
वाक्यार्थका उपदेश प्रमाण है ॥ ९८॥
प्रमाण है यह मूल सूत्रमें शेप है भावसे ग्रहण किया जाता है अभि-
माय सूत्रका यह है कि-वेदान्तवाक्योंका अर्थ जो विवेकके उपदेशका है
वह इस संशय हेतुसे कि ईश्वर वा पुरुषको चेतनमात्र अकर्ता माना है
विना सर्वज्ञ ईश्वर प्रतिपादक अंगीकार किए जानेके वेदान्त वाक्योंक
उपदेश प्रमाण व ग्राह्य नहीं है, त्यागकी योग्य नहीं है, क्यों कि ब्रह्मा
आदि ज सिद्ध रूप हैं उनमें यथार्थ ज्ञान होनेसे उनका वाक्यार्थ उपदेश
वेद मानने में प्रमाण मानने व ग्रहणके योग्य है ॥ १८ ॥
अंतःकरणस्यतदुज्ज्वलितत्वाल्लो-
हवदधिष्ठातत्वम ॥९९॥

भाषानुवादसहित।
४७
अंतःकरणका उससे उज्ज्वलित होनेसे लोहके समान
अधिष्ठातृत्व है ॥१९॥
उससे अर्थात् चेतनसे उज्ज्वलित अर्थात् प्रकाशित अंतःकरणका
हके समान अधिष्ठातृत्व है अर्थात् यया लोहमें ज्वलन. वा प्रकाश नहीं
परन्तु अनिसंयोगसे रूप व जरानेकी शक्तिमें अनिके सदृश अधिष्ठाता
ता है इसी प्रकारसे चेतनसे उज्ज्वलित अंत:करण चेतनके सदृश म-
ष्ठिाता है इसका विशेष वर्णन आगे होगा ॥ ९९ ॥
प्रतिबंधशःप्रतिवद्धज्ञानमनुमानम् ॥१०॥
प्रतिबंध जो व्याप्ति है उसव्याप्ति दर्शनसे अर्थात् व्याप्ति
ज्ञानसे प्रतिवद्धका ज्ञान होना अर्थात् व्यापकका
ज्ञान होना अनुमान प्रमाण है ॥१०॥
यया धूम व अनि सम्बंधके व्याप्ति ज्ञानसे धूममात्रके प्रत्यक्षसे व्या-
पक अमिका अर्थात् जिसमें व्याप्ति सम्बंध है उस अमिका विना उसके
प्रत्यक्ष हुए ज्ञान होना अनुमान प्रमाण है पुरुषका ज्ञान अनुमानही
प्रमाणसे होता है ।। १०० ॥
आप्तोपदेशःशब्दः ॥ १०१॥
आप्तका उपदेश शब्द है ॥ १०१॥
यथार्थ ज्ञानवान् सत्यवक्ताको आप्त कहते है उसका उपदेश सत्य
होनेसे प्रमाण है इससे आप्तका उपदेश शब्द प्रमाण है ॥ १०१॥
उभयसिद्धिःप्रमाणात्तत्तदुपदेशः ॥ १०२॥ .
दोनोंकी सिद्धि होनेसे उसका उपदेश है ॥१०२॥
। दोनों आत्मा व अनात्माकी सिद्धि विवेकद्वारा प्रमाणहीसे होती है
इससे उसका अर्थात् प्रमाणका उपदेश किया है ॥ १०२ ॥

- । सांख्यदर्शन। सामान्यतोदृष्टादुभयसिद्धिः ॥ १०३॥ सामान्यतो दृष्टसे दोनोंकी सिद्धि है ॥ १०३॥ अनुमान तीन प्रकारका होता है पूर्ववत् शेपवत् सामान्यतो दृष्ट; सा. मान्यतो दृष्ट अनुमानसे दोनोंकी अर्यात् प्रकृति व पुरुपकी सिद्धि छोटी है; यह अर्थ है जो पूर्वही प्रत्यक्ष हुयेके अनुसार पूर्व प्रत्यक्षीकत जातीय विषयक अनुमान होता है उसको पूर्ववत् कहते हैं यया पूर्वही रसोई आदिमें अग्निसे धुवी होनेका पूर्वही प्रत्यक्ष होनेसे धुवां देखने पूर्व प्रत्यक्षीकृत अमिजातीयका अनुमान होता है व जो एकके विशेष धर्भका बोध होनेसे अन्य जे उससे भिन्न शेष रहे पदार्थ हैं उनके भेदका अनुमान होता है उसको शेर्पवत् कहते है यथा गंधवान् द्रव्य पृथिवी होनेके ज्ञान होनेसे पृथिवींसे जे भिन्न' पदार्थ है उनमें यह ज्ञान होता है कि गंधरहित होनसे यह पृथिवी नहीं हैं अथवा गंधवान् होनेसे यह पृथिवी है अन्य पदार्थ नहीं है इसको व्यतिरेक अनुमानभी करते है कोई, कारणसे कार्यो अनुमान करनेको शेषवत् कहते है यथा उठे- हुए अति सधन मेघोंकी विशेष अवस्था देखकर जल होगा यह अनु- मान करना शेपवत् है प्रत्यक्ष आदि जातीय धर्मको लेकर व्याप्ति ग्रहणसे पक्ष धर्मता केवलसे, उसके विजातीय अप्रत्यक्षका जिस अंशमें दोनोंका सामान्य धर्म अर्थात् सहश धर्म हैं उस सामान्य धर्मद्वारा अनुमान किया जाता है वह सामान्यता दृष्ट, कहा जाता है यया स्थूलमें प्रत्यक्षसे कारण कार्यका सम्बंध होना सिद्ध होता है कार्य कारण सम्बंधक ज्ञान होनेस कुण्डल आदि कार्यरूपके देखने कारण सुवर्ण आ- दिका ज्ञान होता है इसीप्रकारसे अप्रत्यक्ष महत्तत्त्व आदिकार्य रूप पदा. थक हान होने से सामान्य कार्य कारण सम्बंधके ज्ञान होनेके हेतुसे कारण- रूप प्रकृतिको अनुमान होता है अर्थात् सुखदुःखमोहधर्मसंयुक्त कार्य- रूप , महत्तत्त्वके, सिद्ध होनेसे सुखदुःखमोहधर्मक उसके कारण प्रकृतिसे होनेका अनुमान होता है। पुरुपमें यद्यपि अनुमानकी अपेक्षा - -- - भाषानुवादसहित । नहीं है तथापि प्रकृति आदिके विवेक होनेमें सामान्य तो दृष्टसे पुरुषका अनुमान होता है अर्थात् प्रधानका ग्रह आदिके तुल्य परके अर्थ संहत्य- कारी होने से उसक विजातीय पुरुपका प्रकृति आदिसे पर होनेका अनु मान होता है क्योंकि प्रकृति जडका, ग्रह आदिके समान होनेसे भोक्ता होना संभव नहीं है देह आदिका भोक्ता होना अविवेकसे मानना है इस- प्रकारसे सामान्य तो दृष्टसे जड प्रकृति व चेतनपुरुष दोनोंकी सिद्धि होती है ॥ १.३॥ चिदवसानो भोगः ॥ १०४॥ चैतन्यमें जिसका अवसान है ऐसा भोग है॥१०॥ अभिप्राय यह है कि, जड होने के कारणसे धुद्धि भोग कर्ता नहीं हो सकती अंतःकरण केवल करणरूप है अंत:करणके वृत्तियोंके द्वारा भोग- पुरुष चेतनमें, प्राप्त होता है इससे कहा कि, भोग ऐसा है कि जिस- का अवसान चैतन्यमें होता है अर्थात् चैतन्य जो पुरुषस्वरूप है उसमें होता है अन्यमें नहीं होता ॥ १०४ ॥ अकर्तुरपि फलोपभोगोऽनादिवत्१०५॥ अकर्ताकोभी फल उपभोग अन्न आदिके समान होता है ॥ १०५॥ इस शंका निवारणकेलिये कि जो पुरुष अकर्ता है तो पुरुषको भोक्ता न होना चाहिये क्योंकि जो कर्म करता है उसीको फलभोग होना उचित है बुद्धि कारकै जो धर्म आदि किये गये उनके जो फल सुख आदि मोग हैं वह पुरुपमें किस प्रकारसे घटित हो सकते हैं सूत्रमें यह वर्णन किया है कि अन्न आदिके तुल्य अकर्ताको भोग होता है यथा पाक बनानेवाला अन्नको पकाता है उसको राजा आदि भोग करते है अर्थात् सेवकके किये हुए पाकका भोग स्वामीको होता है इसी प्रकारसे बुद्धिगत कर्म- फलको पुरुष भोग करता है ॥ १०५॥ ६ सांख्यदर्शन। अविवेकाद्वातत्सिद्धेःकर्तुः फलावगमः॥१०६॥ अथवा उसकी (अकर्ता पुरुपमें भोग होनेकी) सिद्धि होनेसे अविवेकसे कर्ताको फल होना मानना है ।। १०६॥ पूर्वसूत्रमें जो दृष्टांत वर्णन किया गया उससे कर्तासे अन्यको फल होन सिद्ध होता है उसके सिद्ध होनेसे अर्थात् भोक्ता पुरुषमें कर्म फल सिद्धि होनेसे कर्ता बुद्धिको फलप्राप्त होता है यह मानना अविवेक है यह सूत्रका भाव है ॥ १०६ ॥ नोभयं च तत्त्वाख्याने ॥ १०७॥ तत्त्वके साक्षात्कार होनेमें दोनो नहीं॥ १०७॥ प्रमाणसे प्रकृतिपुरुषके तत्वाख्यानमें अर्थात् तत्त्वसाक्षात्कार होनों सुख दुःख दोनों नहीं होते श्रुतिमें लिखा है "विद्वान् हर्पशोको जहाति' मर्थ-विद्वान् हर्ष व शोकको त्याग देता है ।। १०७ ॥ शंका-प्रत्यक्ष इन्द्रियद्वारा प्रकृति व पुरुषके होने में प्रमाण नहीं होता इससे प्रकृतिपुरु पका मानना सत नहीं है. उत्तर- विपयोऽविपयोऽप्यतिदूरादेहीनोपादाना- भ्यामिन्द्रियस्य ॥१०८॥ अतिदूर आदि होनेसे प्रत्यक्ष होने व न होनेसे कहीं इन्द्रियका विषय होता है व कहीं इन्द्रियका विषय नहीं होता।।१०८॥ इन्द्रियसे प्रत्यक्ष न होनेसे प्रकृति आदिका अभाव नहीं हो सकता क्योंकि प्रत्यक्षके योग्य विद्यमान अर्थभी अवस्था भेदसे व अति दूर भापानुवादसहित । आदि होनेके दोपसे इन्द्रियोंसे ग्रहण योग्य न होनेसे अविषय होता है अर्थात् कोई पदार्थ निकट होनेमें इन्द्रियका विषय होता है वही अति- दूर होनेसे इन्द्रियका विषय नहीं होता अर्थात् इन्द्रियद्वारा ज्ञात नहीं होता प्रकाशमें चक्षुइन्द्रियसे देखा जाता है अंधकारमें अथवा इन्द्रियमें विकार होने से उसका प्रत्यक्ष नहीं होता इससे कहा है कि अतिदूर आदि दोपसे जो इन्द्रियका विषय है वही अविषय हो जाता है ऐसा होना सिद्ध होनेसे पदार्योंकि होनेके प्रमाणमें इन्द्रियग्राह्य होनेकी आव- श्यकता नहीं है जब यह प्रश्न है कि प्रकृति व पुरुपके बोधगत न होने में क्या हेतु है. उत्तर यह है- सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः १०९ ॥ सूक्ष्म होनेसे उनकी उपलब्धि नहीं है ।। १०९॥ उनकी अर्थात् प्रकृतिपुरुषकी उपलब्धि न होना अर्थात् उनका प्रत्यक्ष न होना सूक्ष्म होनेक कारणसे है सूक्ष्म होनेसे यहां अणुहोनेसे :- योजन नहीं है क्योंकि व्यापक है प्रत्यक्षमा की जिसमें प्राप्ति न हो- वह सूक्ष्म कहाजाता है मत्यक्ष प्रमा रहित पदार्थ कहनेसे प्रयोजन योगसे उत्पन्न तेजसे पुरुष व प्रकृति आदिका प्रत्यक्ष होताहै निरव- यष द्रव्य होनेसेभी सूक्ष्म होने से अभिप्रायहै ॥ १०९ ॥ । शंका-अभावसे हम अनुपलब्धि मानते हैं सूक्ष्म होने के कारणसे क्यों माने नहीं आकाशके फूल व सरहाके सींगकोभी सत्य मानेगे और कहेंगे कि सूक्ष्म होनेके कारणसे अनुपलब्धि है. उत्तर- कार्यदर्शनात्तदुपलब्धेः॥ ११० ॥ कार्यके देखने अथवा जाननेसे उनकी उपलब्धिसे ११० पूर्व वर्णन किये गपेके अनुसार प्रकृति आदिके कार्यके देसने अ. ar २ सांख्यदर्शन। थवा जाननेसे उनका होना सिद्ध है केवल प्रत्यक्ष न होनेके कारणसे सूक्ष्महोनेका अनुमान होता है यह अभिप्रायहै ॥ ११० ॥ वांदिविप्रतिपत्तस्तदसिद्धिरितिचेत् ॥१११॥ वादीकेतर्कसे जो उसकी असिद्धि मानी जावै ॥११॥ जो कार्य है सृष्टि उत्पत्तिसे पहिलेभी उसकी सिद्धि है क्योंकि का रणका कार्य शक्ति युक्त होना अनुमान किया जाता है नहीं उससे का र्यका उत्पन्न होना असंभव हो परंतु शंका यह है कि जो वादीके तर्क से उसकी अर्थात् कार्यकी असिद्धि मानी जावै तो क्या उत्तर है इस का उत्तर आगे सूत्रमें कहते हैं ॥ १११ ॥ तथाप्येकतरदृष्टयाएकतरसिद्धर्ना पलापः॥११२॥ एक दृष्टिसे उसप्रकारसे माननेपरभी एककी सिद्धि- से अपलाप नहीं है ।। ११२ ॥ एक दृष्टि करके अर्थात् कार्य दृष्टिसे उस प्रकारसे अर्थात् सत् कार न मानने परभी एक दृष्टि करकै अर्थात् कार्यकी दृष्टिसे एक कारण सिद्धि होनेसे अपलाप ( असत् वाद ) नहीं है कारण भावसे नित्य सिद्धही है ॥ ११२ ॥ त्रिविधविरोधापत्तेश्च ॥ ११३॥ त्रिविध विरोधकी प्राप्तिसेभी ॥ ११३॥ विविधविरोधकी प्राप्तिसभी कार्यका अनित्य धा असत् होना सि नहीं होता अर्थात् कार्य तीनप्रकारका है अतीत (जो होगया है ) म नागत ( जो होने वाला है ) और जो वर्तमानहै जो कार्य सदा सदन माना जाय तो उसका त्रिविध होना सिद्ध नहीं हो सकता क्यों कि मा भापानुवादसहित। नेत कालमें जो घट आदिका अभाव है तो घट आदिकोंका अतीत होने आदिधर्म संयुक्त होनेकी सिद्धि नहीं होती इस हेतुसे कि सत् असत्का सम्बंध नहीं हो सकता जो यह कहा जाय कि अभावमात्र होनेके मान- 'नेसे अभिप्राय है घट आदि विशेषके माननेसे नहीं है तो अभावमें विशे- पता न माननेसे पट आदिका अभाव घट आदिका अभाव हो जावेगा जो यह कहा जावे कि जो प्रतियोगी है ( जिसका अभावहै ) वहीं अभा का विशेष कहै अर्थात् विशेषताका बोध करानेवाला है तो असत् प्रतियोगीका प्रागभाव आदिमें विशेषक होना संभव नहीं होता इससे कार्य नित्य है अतीत अनागत वर्तमान केवल अवस्था भेद कहना चा- 'हिये एकका भाव अन्यका अभाव कहना यथार्थ नहीं है अतीत अनागत दो अवस्था ध्वंस व प्रागभाव काल भेदसे व्यवहार वाचक है क्योंकि विमानसे भिन्न दो अभावमें प्रमाणका अभावकै कार्यक असत माननमें त्रिविध विरोधी प्राप्ति होतीहै इससे असत् नहीं है ॥ ११३ ॥ नासदुत्पादोनृशृङ्गवत् ।। ११४ ॥ मनुप्यकेसींगके तुल्य असत्का उत्पन्न होना संभव नहीं होता ॥ ११४ ॥ जैसे मनुष्यके सींगका जो त्रिकालमें असत् है उत्पन्न होना असंभव इसी प्रकारसे असत्का उत्पन्न होना असंभव है ॥ ११ ॥ उपादाननियमात् ॥ ११५॥ उपादानके नियमसे ॥ ११५ ॥ उपादान कारणके नियम होनेसे कार्यका असत् होना नहीं पाया जा- पता क्योंकि मृत्तिकासे घट सूतसे पट कार्य होते हैं कार्योंके होने का उपा- दान कारणोंमें नियम है यह नियम होना संभव न होगा जो कार्यकी उत्पत्तिसे पहिले कारणमें कार्यका सत्तानही है तो कोई विशेष होनेका सांख्यदर्शन। हेतु नहीं है जिससे विशेषकार्य उत्पन्न हो इससे उपादान...... सत्तिसे पहिलेभी कारणमें कार्यका सत्ता है यह मानना चाहिए ॥११५ सर्वत्रसर्वदासंभवात् ।। ११६॥ सर्वत्र सर्वदा सव असंभव होनेसे ॥ ११६ ॥ उपादान नियम न होनेमें सर्वत्र सर्वदा सब पदार्यका, होना संभव होता परन्तु सर्वत्र सबसे सब पदार्थ न होनसे उपादान नियम होना हि द है इससे असत्का उत्पन्न होना नहीं होसकता ॥ ११६ ।। शक्तस्यशक्यकरणात् ॥ ११७॥ शक्तका शक्यके करनेसे ।। ११७॥ शक्ति जिसमें हो वह शक्त है और जो होनेके योग्य हो उसको श. क्य कहते हैं शक्त जो कार्य उत्पन्न करनेमें शक्तिमान् कारणहै उसक शक्य जो कार्य है उसीके उत्पन्न करनेसे मसक्का उत्पन्न होना नहीं। क्योंकि शक्तमें कार्यकी शक्ति कार्यके होनेसे पहिले विद्यमान है यह अनुमानसे सिद्ध होता है ॥ ११७ ॥ कारणभावाच्च ॥ ११८॥ कारणमें भाव (कार्यसत्ता) होनेसे ।। ११८॥ उत्पत्तिसे पहिलीभीकारण रूप कार्यके भाव होनेसे अर्थात् कार्य कार णके अभेद होनेसे कारणमें कार्यकी सिद्धि होनेसे असत्का उत्पन्न होन सिद्ध नहीं होता. ११८॥ नभावभावयोगश्चेत् ॥ ११९॥ भावमें भाव योग न होवे ॥११९॥ .

:- भाषानुवादसहित । शंका-यह है कि जो भावरूप कार्य सत् माना जाय तो भावमें अर्थात् गवरूप कार्यमें भाव योग नहीं होता अर्थात् जो पहिलेसे है उसमें उत्प- होनेरूप भाषका, योग न होना चाहिये अर्थात पुत्र होने पर भी पुत्र- का न होना व होनेसे पहिले भी होना मानना चाहिए इसका उत्तर यह है नाभिव्यक्तिनिबन्धनौव्यवहारा- व्यवहारौ ॥१२॥ नहीं अभिव्यक्ति के निमित्तक व्यवहार अव्यवहार है १२० नहीं अभिमाय यह है कि मसत्का होना संभव नहीं है अभिव्यक्ति प्रकट होने ) के निमित्तक व्यवहार व अव्यवहारहै अर्थात् अभिव्यक्ति होनेसे उत्पत्तिका व्यवहार व अभिव्यक्ति (प्रकटता) न होनेसे उत्पत्ति के व्यवहारका अभाव होताहै अभिव्यक्ति वर्तमान अवस्था है कारणसे उत्कार्यकी अभिव्यक्ति मात्र होना लोकमें देखा जाताहै यथा तिलके अंतर्गत जो तेल है वह पेरनेसे प्रकट होता है व शिला मध्यस्थ प्रतिमा पटनेसे प्रकट होती है इत्यादि ॥ १२० ॥ अब यह शंका है कि जो सत् मनादि कार्य है तो उसका नाश होना क्यों कहा जाता है. उत्तर- नाशाकारणलयः॥१२॥ कारणमें लय होना नाश है ॥ १२१ ॥ नाश किसी पदार्थका नहीं है नाश केवल जिस कारणमें प्रथम कार्य सत्तारूपया और उससे प्रकट हुआथा उहीमें लय हो जाना व फिर सत्ता रूप रह जाना है मतीत जो नए होगया व भनागत् जो नष्ट नहीं हुआ होनेवाला है ऐसा कार्य नष्ट हुआ नाश होनेपर कारणमें सत्ता रूप रहता है अर्थात् अतीत कालमें था व अनागत ( भविष्यत् ) कालमें सत्तारूप हेगा; यह निश्चय कैसे हो. उत्तर-जो अतीत अनागत कार्यका सत्ता न हो तौ योगियोंको अतीत अनागतका अर्थात् जो होगया है व जो होने . .A सांख्यदर्शन । . वाला है उसकाप्रत्यक्ष होता है ऐसायोगियोंको प्रत्यक्ष न होवे इससे रूपकार्य पदार्थका कारणमें अतीत अनागत काल में होना..६ योगियोंको अतीत अनागतके प्रत्यक्ष होने में श्रुति स्मृतिका शंका-जिस प्रकारसे कारणमें कार्यका सत्ता अतीत अनागतमें किया जाता है और यह कहा जाता है कि जो जाम कार्यका कारणमें सत्ता में हो तो असत् कार्यकी संभव नहीं है इसी प्रकारसे अभिव्यक्तिका भी पूर्वसत्ता अंगीकार । चाहिये नहीं असत् अभिव्यक्तिकी अभिव्यक्ति न होना चाहिए सत्कार्य होनेके सिद्धांतको रक्षाकेलिये अभिव्यक्तिकीभी . मानना उचित है परन्तु ऐसा माननमें अनवस्था दोषकी प्राप्ति का उत्तर यह है ॥१२१ ॥ पारम्पर्यतोऽन्वेपणावीजाङ्कुरवत् ॥१२२ परम्परारूपसे जीव अङ्करके तुल्य खोजना है ॥१२: यथा बीज व अंकुर दोनों प्रत्यक्षसे सिद्ध है इससे सत् होने में संदेह परन्तु अंकुर वा वृक्षसे बीज प्रथम उत्पन्न हुवा अथवा वीजसे. हुवा यह जाना नहीं जाता इसी प्रकारसे कारण कार्यके सत् होने देह नहीं है परन्तु अभिव्यक्तिके सत्ता मानने में बीज व अंकुरकी र खोजना है इससे मनवस्था दोप मानना चाहिये केवल यह सम अंगीकारके योग्य नहीं समझा जाय सकता इससे दूसरा सम् आगे सूत्रमें वर्णन किया है ॥ १२३ ॥ उत्पत्तिवद्वादोपः ॥ १२३ ॥ उत्पत्तिके समान दोप रहित है॥ १२३ ॥ यथा घटको उत्पत्तिकी उत्पत्ति, उत्पत्तिका स्वरूपही है इसी प्रव हमको घटके अभिव्यक्तिकी अभिव्यक्तिको मानना चाहिये इससे - इधर्म सभा भापानुवादसहित। मनपत्ति में अनवस्था दोष नहीं है तथा अभिव्यक्तिमें न मानमा चाहिये मेघोंकि जो असतकी उत्पत्ति मानते हैं तो जर सबकी उत्पत्ति होती है 'मुग उत्पत्तिकीभी उत्पत्ति होना चाहिये और ऐसा माननेमें मनवस्या अनापकी प्राप्ति होगी परन्तु अनवस्थाका अंगीकार नहीं होता उत्पत्तिकी संपत्ति, उत्पत्तिका स्वरूपही है इसी प्रकारसे अभिव्यक्तिमें माननेसे । भिव्यक्तिका मानना दोपरहित है ॥ १२३ ॥ पूर्वही कार्यसे मूल तरणके अनुमान होनेका वर्णन किया गया है अब कार्योंके लक्षण तीन करते हैं ॥१२३॥ हेतुमदनित्यमव्यापिसक्रियमनेकमाथि शेव तंलिङ्गम् ॥ १२४॥ 1१२ हेतुमान अनित्य व्यापक नहीं क्रियासंयुक्त १२ अनेक आश्रित लिङ्ग है ॥ १२४ ॥ दिन लिंगशब्द महत्तत्व आदिकार्य वाचक है परन्तु यहाँ महत्तत्व मात्र शेष कार्य कहनेका प्रयोजन नहीं है सामान्य कार्य अर्थमें लिंगशब्द महा है अर्थात् कार्यका यह लक्षण वर्णन किया है कि जो हेतुमान अ- की सात कारणयान् अनित्यदो व्यापक नहो क्रिया संयुक्तहो अनेकहो आश्रि- महो वह लिंग (कार्य ) है अर्थात् कार्यकारणवान् व अनित्य होता है और यथा कारण प्रधानका व्यापक होना पूर्वही कहा गया है इस प्रका- से कार्य व्यापक नहीं होता व कियायुक्त होता है अर्थात् नियत- धारणसे उत्पन्न होनेकी क्रिया संयुक्त होता है अनेक होता है अर्थात् उ- पीर या सीट मदरे गरेका प्रकार. भेद मंगल. ति. शेता.दै. छ, वयवयोंमें आश्रित होता है ।। १२४ ।। आञ्जस्यादभेदतोवागुणसामान्यादेस्त- सिद्धिःप्रधानव्यपदेशादा ॥ १२५ ॥ "

सांख्यदर्शन।
प्रत्यक्षसे अथवा गुण सामान्य ( जाति) आदिके
भेद न होनेसे उसकी सिद्धि है अथवा प्रधानके
वर्णनसे ॥ १२५॥
उसकी अर्थात् कार्यकी सिद्धि कहीं प्रत्यक्षसे होती है पथातन्तु मा-
दिकोंसे पट आदिकार्योकी होती है, कहीं गुण सामान्य आदिके भेद
न होनेसे अर्थात् गुण सामान्य (जाति) के भेद न होनेसे उसकी सिद्धि
अनुमानसे होती है यथा निश्चय आदिगुण होने व कारणके विरुद्ध धर्म
होनेसे महत्तत्व आदिकोंकी सिद्धि होती है जैसे महापृथिवी आदिके सा-
मान्यात्मकरूप (जातिरूप) होनेसे व उसके मात्रा विरुद्ध होनेसे पृयि-
वी कार्य आदिकोंकी होती है तथा प्रधानके व्यपदेशसे अर्थात् श्रुतिमें
प्रधानके वर्णनसे कारणसे भिन्न कार्यके होनेकी सिद्धि होती है ॥ १२५ ॥
त्रिगुणाचेतनत्वादिद्वयोः ॥ १२६ ॥
त्रिगुण व अचेतन होनेसे आदिसे दोनोंका ॥१२६॥
दोनों कार्य कारणोंका त्रिगुण व अचेतन आदि होनेसे साधर्म्य है अ.
र्थात् दोनोंका समान धर्म होना पाया जाता है कारण रूप प्रकृति त्रिगुणा-
स्मक अर्थात् सत्व रजतम गुणरूप है वह महत्तत्व आदि कार्यरूपमें स-
ख आदि त्रिगुण कारण रूपसे प्राप्त है अथवा सत्व आदि शब्दोंसे सुख
दुःख मोह त्रिगुण महत्तत्त्व कार्यमें कहे जानेसे कार्य व कारणमें त्रिगुण
होनेसे दोनोंका साधर्म्य है ।। १२६ ।।
प्रीत्यप्रीतिविपादाद्यैर्गुणानामन्योऽन्यंवै
धर्म्यम् ॥ १२७ ॥
प्रीति अप्रीति विपाद आदिसे अर्थात् विपाद आदि
भेदोंसे गुणोंका परस्पर वैधर्म्य है ॥१२७॥

भाषानुवादसहित । गुणोंका सत्व आदि गुणोंका भीति अनीति विषाद आदि भेदसे पर- स्पर वैधयं है अर्थात् परस्पर विरुद्ध धर्म होना पाया जाता है आदि शब्द अन्य सत्त्व गुण आदिके धर्म ग्रहण करनेसे प्रयोजन है यथा सत्व गुण प्रसन्नता, हलकापन, संग, प्रीति, क्षमा, संतोप, आदिभेद संयुक्त सुखात्मक है. रजोगुण शोक, अनीति, आदि नाना भेदसे दुःखात्मक है तमोगुण निद्रा, आलस्य, आदि भेदसे मोहात्मक है प्रीति आदिकोंके गुणधर्म होना कहनेसे सत्त्व आदिकोंका जिनमें यह गुण आश्रित हैं द्रव्य होना सिद्ध है ॥ १२७ लध्वादिधर्मैःसाधम्यवैधयंचगुणानां ॥ १२८॥ लघु ( हलका होना) आदि धर्मोंके साथ गुणोंका साधर्म्य व वैधयं दोनों हैं ॥१२८॥ लघु आदि धर्मके साथ सब सत्वगुण व्यक्तियोंका साधर्म्य है रज, तम गुणोंके साथ वैधर्म्य है इसी मकारसे चंचलत्व आदि धर्मके साप सब रजोगुण व्यक्तियोंके साथ साधर्म्य है सत्व गुण व तमोगुणके साथ वैध- ये है गुरुत्व (गरुवाई ) धर्मके साथ सब तमो गुणव्यक्तियोंका सा- धर्म्य है सत्व गुण व रजोगुणके साथ वैधर्म्य है कारण द्रव्य सत्व आदि शब्द स्पर्श आदि गुणोंसे रहित है ।। १२८ ॥ उभयान्यत्वात्कार्यत्वंमहदादेघ- टादिवत् ॥ १२९ ॥ दोनोंसे अन्य होनेसे महत्तत्व आदिका घट आदिके तुल्य कार्य होना सिद्ध होता है ।। १२९ ।। दोनों प्रकृति व पुरुपसे अन्य होने अर्थात् भिन्न होनेसे महत्तत्व आदि घट आदिके तुल्य कार्य हे महत्तत्त्व आदि पंचभूत पर्यत भोग्य सांख्यदर्शन। होनेसे भोक्ता पुरुष नहीं है प्रकृतिभी नहीं है क्योंकि महत्तत्व आदि कार्य रूपका नाश होता है जो नाश न होवै तो मोक्षकी सिद्धि न होवे कारणरूप प्रकृतिका नाश नहीं है इससे प्रकृति पुरुपसे भिन्न होना मह- चत्त्व आदिका सिद्ध होता है भिन्न होने से कार्य होना सिद्ध होता है१२९ परिमाणात्॥१३०॥ परिमाणसे ।। १३०॥ परिमाण होनेसे अर्थात् परिच्छिन्न होनेसे महत्तत्व आदिका कार्य होना सिद्ध होता है क्योंकि परिच्छिन्न पदार्थका नाग होता है कारणका नाश नहीं होता ॥ १३०॥ समन्वयात्॥१३१॥ समन्वयसे ।। १३१॥ समन्वयका अर्थ सदृश गति होना अथवा पीछे चलना है अभिप्राय एकका दूसरे वा औरों के अनुसार होना है अवयव युक्त अन्न आदिकार्यों के अनुसार होनेसे बुद्धि आदि तत्वोंका कार्य होना विदित होता है उपवास आदिमें अन्न न खानेसे वृद्धि आदिकी क्षीणता और भोजन करनेसे समन्वय करके फिर बुद्धिकी वृद्धि होती है निरवयव नियत कारणमें अन्न आदिके अवयको प्रवेश होना घटित नहीं होता ॥१३१॥ शक्तितश्चेति ॥ १३२॥ शक्तिसेभी ।। १३२॥ शक्तिसेभी अर्थात् शक्ति होनेसेभी महत्तव आदि कार्य हैं शक्तिले अभिमाय करणसे है पुरुषका जो करण है वह चक्षु आदिकी तुल्प कार्य दै पुरुषमें विषय अर्पण करनेवाला होनेसे महत्तत्व करण है प्रकृति कारण भापानुवादसहित । ६१ ही है महत्तत्वके करण होनेसे कार्य होना सिद्ध होनेसे औरोंकाभी जे हत्तत्त्व के कार्य है उनका कार्य होना सिद्ध है ।। १३२ ॥ तद्धानेप्रकृतिःपुरुषोवा ॥ १३३॥ उसके हान होने में प्रकृति अथवा पुरुप है ।।१३३।। उसके (कार्यके ) न होने में अर्थात् कार्य न मानने में जो परिणामी है प्रकृति है जो परिणामी नहीं है व भोक्ता है तो पुरुष है यह भाव ॥१३३॥ शंका-कार्य न माना जाय और प्रकृति पुरुषभी न होवे तो क्या हनि है ।उत्तर- तयोरन्यत्वेतुच्छत्वम् ॥ १३४ ॥ उनसे अन्य होनेमें तुच्छत्त्व है ॥ १३४॥ उनसे अर्थात् प्रकृति पुरुषसे भिन्न होने में कार्य पदार्थका खरहाके ग आकाशके फूल के समान असत् व तुच्छ होनहाहै ॥ १३४ ॥ कायीत्कारणानुमानंतत्साहित्यात् ॥१३५ कार्यसे कारणका अनुमान कार्य साहित्यसे करने के योग्य है ॥ १३५॥ कार्यसे जो कारणका अनुमान करना कहाहै वह कार्य साहित्यहीसे निके योग्य है अर्थात् कार्यद्वारा जो कारणके होनेका अनुमान होता उस कारणका कार्य सहित होना अनुमान करनेके योग्यहै अर्थात् का- उत्पन्न होनेके पूर्वही कारण कार्य सहितही था यथा तिल में तेल होताहै पादि ऐसा अनुमान करना चाहिये ॥ १३५ ॥ अव्यक्तंत्रिगुणाल्लिंगात् ॥ १३६॥ त्रिगुण कार्यसे अव्यक्त (सूक्ष्म) है ।। १३६॥

. ६२ सांख्यदर्शन । त्रिगुणसे महत्तत्व कार्य रूपसेभी मूल कारण अव्यक्त सूक्ष्मद महर खके सुख आदि गुण साक्षात् किये जाते प्रकृतिके गुणभी साक्षात् नहीं होते प्रधान परम अव्यक्त है महत्तत्व उसकी अपेक्षा व्यक्त है यह अर्थ है ॥ १३६ ॥ शंका-परम सूक्ष्म है यह कहकर प्रकृतिको मानलेना मात्र मिध्या वाद है ॥ उत्तर- तत्कार्यतस्तत्सिद्ध पलापः ॥ १३७॥ उसके कार्यसे उसकी सिद्धि होनेसे अपलाप नहीं है १३७ उसके अर्थात् प्रकृतिके कार्यसे उसकी प्रकृतिकी सिद्धि होनेसे अप- लाप ( असत् कथन ) नहीं है ।। १३७ ।। प्रकृतिके अनुमानका विचार करिकै अव पुरुषका विचार किया जाता है। सामान्येनविवादाभावाद्धर्मवन्नसाधनम् ॥१३५ सामान्यसे विवादके अभाव(नहोने) से धर्मके समान।।१३८ जिसवस्तुमें सामान्यसे विवाद नहीं है उसके स्वरूपसे साधनकी अपे क्षा नहीं होती अर्थात् उसका साधन अपेक्षित नहीं होता यथा धर्मके सा. धनकी अपेक्षा नहीं होती यह भावहै धर्मामेभी विवाद होनेसे सामान्यसे- भी जिस प्रकारसे प्रकृतिका साधन अपेक्षितहै अर्थात् प्रकृतिके साधनकी अपेक्षा होती है इस प्रकारसे पुरुपका साधन अपेक्षित नहीं है क्योंकि चे- तनके सिद्ध न होने व नमाननमें जगत्के अंध होनेका प्रसंग है मेंहूं ऐसा माननेवाला भोक्ता पदार्यमें सामान्यसे बौद्धोंकाभी विवाद नहीं है अर्थात् बौद्ध व सम्पूर्ण मनुष्य सामान्यसे में पदार्थको मानते हैं यथा धर्मको सामान्यसे बौद्ध सब अंगीकार करते कोई धर्म व गुणपदार्यको निषेध नहीं कर सकता तप्तयस्तुके आरोपण करनेसे धर्म होनेका अंगी कार होही जाताहै इसी प्रकारसे में पदार्थका अंगीकार होताह इस

भापानुवादसहित ।
रुषका साधन अपेक्षित नहीं है पुरुपमें विवेक नित्य होना आदिसाध-
मात्र अनुमान करनेके योग्यहै अब शरीर आदिसे पुरुष मिन है
है सिद्ध करनेके प्रयोजनसे प्रथम विवेकके प्रतिज्ञा विषयमें सूत्र वर्ण-
करते हैं ।। १८ ॥
शरीरादिव्यतिरिक्तःपुमान् ॥ १३९ ॥
शरीर आदिसे पुरुष भिन्न है ॥ १३९॥
शरीर आदि प्रकृति पर्यंत चोवीस तत्व व चौवीस तत्वमय जे पदार्थ
हैं उनसबसे भोक्ता पुरुष भिन्नद ॥ १३९ ॥
संहतपरार्थत्वात् ॥ १४०॥
सेहत परके अर्थ होनेसे ॥१४॥
संदत्त जो कार्यनिमित्तक संयोगहै वह प्रकृति आदिका शय्या
आदिके समान परके अर्थहै परके अर्थ होनेसे यह अनुमान होताहै
कि संहत जो देहादि हैं उनसे संहत रहित पुरुष मिन्न व पर है ॥१४०॥
त्रिगुणादिविपर्ययात् ॥ १४१॥
त्रिगुण आदिके विपर्ययसे ॥१४१॥
सत्व, रज, तम इन तीन गुणो जे सुख दुःख मोह आदि धर्म हैं
उनसे विपर्यय अर्थात् विपरीत होनेसे, पुरुप भिन्न है क्योंकि शरीर
आदिकोंका सुखदुःखात्मक होना आदि धर्म है वह सुख आदिके भी-
तामें संभव नहीं होते क्योंकि वह सुख आदिका ग्रहण करनेवालाई प्रह-
करनेवाला व जो ग्रहणके योग्य है, कर्म व कर्तीके विरोधस दोनों एक
नहीं हो सकते मादि शन्दसे अविवेकी होना आदि जानना चाहिये।। १५१
अधिष्ठानाचेति ॥ १४२॥
अधिष्ठानसेभी ॥ १४२॥

सांख्यदर्शन। अधिष्ठान भोक्ताके संयोगको कहते हैं वह प्रकृति आदिकोंके परिणा म रूप भोगके हेतु जे कार्य हैं उनमें कारणहें भोक्ताके अधिष्ठानसे भी गायतन ( भोगस्थान ) कानिर्माण हुआ है जैसा आगे वर्णन किया है इससे पुरुष प्रकृतिसे भिन्न व प्रकृतिसे भिन्न होनेसे प्रकृतिक कार्यों से भिन्न है क्योंकि विना भेदके संयोग संयोगी भाव नहीं होता इति शब्द समाप्ति अर्थ वाचक है सूत्रमें इति शब्द जो है वह पुरुषके भिन्न होनेके वर्णनकी समाप्ति सूचन अर्थमें है ॥ १४२ ॥ भोक्तृभावात्॥१४३॥ भोक्तासे भावसे ॥ १४३ ॥ शरीरमें भोक्ताकें भाव होनेसे शरीर आदिका स्वरूपही भोक्ता नहीं है शरीर आदिसे भिन्न पुरुप भोक्ता है जो शरीर आदि स्वरूपही भोक्ता माना जाय तो भोक्ता होनाही असंभव होगा क्योंकि वहीं कर्म य पही कर्ता नहीं हो सकता अर्थात् शरीरही भोग्य शरीरही भोक्ता नहीं हो सकता ॥ १४३ ॥ कैवल्यार्थप्रवृत्तेश्च ॥१४॥ मोक्षके अर्थ प्रवृत्ति होनेसेभी॥१४॥ जो शरीर आदिका भोक्ता होना अंगीकार किया जाय तो भोक्ताकी मोक्षकेलिये अर्थात् अत्यंत दुःख नाशके अर्थ प्रवृत्ति न होना चाहिये क्योंकि शरीर आदि नष्टही होजाते हैं जो प्रकृतिका मोक्ष होना कहा जावै तो प्रकृति धर्मी ग्रहण किये जानेसे दुःख स्वभाव सिद्ध होनेसे उसका मोक्ष होना असंभव है इससे मोक्षके अर्थ प्रवृत्ति होनेसेभी पुरुपका भिन्न होना सिद्ध होता है ॥ ९४४ ॥ जडप्रकाशायोगात्प्रकाशः॥ १४५॥ जडमें प्रकाशका योग न होनेसे प्रकाश है।।१४५॥ प्रकाश शन्दका अर्थ यहां ज्ञानका है अर्थात् जड लोह आदि पदार्थ- ཨས 4- भाषानुवादसहित। में ज्ञानका योग न होनेसे ज्ञान स्वरूप चेतन पुरुष सम्पूर्ण जड प्रकृति कार्यसे भिन्न है यह सूत्रका भाव है जो प्रकाश शब्दका अर्थ लौकिक तेजका ग्रहण किया जाये तो जडके योग होनेका निषेध नहीं हो सकता क्योंकि भौतिक अमि सूर्य आदि जड प्रकाश युक्त हैं इनका जड होना १ ज्ञान होनेके प्रमाणके अभावसे सिद्ध है।॥१४५॥शंका-प्रकाशस्वरूप होने में धर्म धर्मीका भाव होगा वा नहीं उत्तर- निर्गुणत्वान्नचिधर्मा॥१४६॥ निर्गुण होनेसे ज्ञान धर्मसंयुक्त वा ज्ञान धर्मवाला नहीं है ।। १४६॥ तेजका भकाशही रूपविशेष है उस प्रकाशरूपके आग्रह होनेमेंमी स्पर्श सहित तेजके ग्रहण होनेसे तेज प प्रकाशमें भेद सिद्ध होता है मात्माके ज्ञान संज्ञक प्रकाशके आग्रह कालमें आत्माके भिन्न होनेका ग्रहण नहीं होता इससे धर्म धर्मी भाव शून्य प्रकाश रूपही आत्मा द्रव्य के होनेकी कल्पना कीजाती है उसका गुण होना सिद्ध नहीं होता क्योंकि संयोगआदिमान है ६ आश्रित नहीं है गुण किसीमें माश्रित होता है व उसमें संयोग नहीं होता अब यह शंका है कि यह उत्तर यथार्थ नहीं है मैं जानता हूं ऐसा बोध होनेहीसे धर्म धर्मी भावका अनुभव होनेसे पुरुषका ज्ञान धर्मवान् होना सिद्ध होता है इसका उत्तर वर्णन करते हैं ॥ १४६ ॥ श्रुत्यासिद्धस्यनापलापस्तत्प्रत्यक्षबाधात् १४७ अतिसे सिद्धका उसके प्रत्यक्ष पापा हानेसे अपलाप नहीं है ॥ १४७ ॥ भारमाका निर्गुण होना केवल अनुमानसे नहीं कहा जाता किन्तु श्रुतिसेभी सिद है ऋतिमें कहा है " साक्षी चेता केवलो निर्यणश्च ॥

सांख्यदर्शन। अर्थ-साक्षी ज्ञानवान केवल निर्गुण है जो श्रुतिसे अर्थात् अति प्रमाणसे निर्गुण सिद्ध है उसके प्रत्यक्षसे वाधा होनेसे अर्थात् प्रत्यक्षसे निर्गुण होना सिद्ध न होनेसे उसका अपलाप (मिथ्या वा असत् कथन) नहीं हो सकता जो श्रुतिप्रमाणसे सिद्ध है वही माननेके योग्य है इससे धर्म धर्मी भेद रहित ज्ञानरूपही आत्माका होना सिद्ध होता है मैं जानता हूं ऐसा वोध होने में जो धर्म धर्मों भेद होनेफा अनुभव होता है तो मे गोरा हूं ऐसा बोध होनेसे शरीर व पुरुपके भेद न होनेका अनुभव होना यथार्थ मानना चाहिये व शरीरसे भिन्न होनेके युक्ति हेतुओंका निषेध होना चाहिये परन्तु ऐसा मानना यथार्थ नहीं हो सकता प्रमाण विरुद्ध है इसी प्रकार से मैं जानता हूँ में धर्मभेद मानना उचित नहीं है अथवा यह मानना चाहिये कि ज्ञान धर्म नित्य परिणाम रहित विशेष धर्म चेतन पुरुषमें होनेसे धर्म धर्मीको अभेद मानकर ज्ञानस्वरूपही पुरुषको माना है इससे निर्गुण कहा है व अन्य वद्धि वृत्तियोंके भेदको अंतःकरणका गुण माना है इससे बुद्धि वृशिभेद गुण पुरुपमें न होनेसे गुणगुणी भावका ग्रहण नं करिकै व श्रुति प्रमाणको मुख्य अंगीकार करिके पुरुप निर्गुण है यह क- हा है अब यह शंका है कि जो आत्मा नित्य ज्ञानस्वरूप है तो ज्ञान नाश न होनेसे सुपुति आदि अवस्थाओंका भेद न होना चाहिए इसका उत्तर वर्णन करते है ॥ १४७ ॥ सुपुप्त्याद्यसाक्षित्वम् ॥ १४८॥ सुपुप्ति है आदिमें जिसके ऐसा जो अवस्थात्रय है उसका साक्षी होनामात्र पुरुपमें है ॥ १४८॥ सुपुप्ति है आदिमें जिसके ऐसा अवस्थात्रय जो अवस्थाका तीन होना है उसका साक्षी मात्र होना पुरुषमें सिद्ध होता है अर्थात् सुपुत्ति स्वप्न जाग्रत अवस्थाओंका साक्षी पुरुष है तीनों अवस्थाके साक्षी होनेसे पुरुपका विलक्षण व शरीर आदिसे पृथक् साक्षी होना सिद्ध होता है इन्द्रिय द्वारा बुद्रिका विषयोंके आकार रूप परिणाम होना जाग्रत अब भाषानुवादसहित। स्या है व संस्कार मात्रसे जन्य उसी प्रकारका परिणाम होना स्वप्न अवस्था है, सुपुत्ति अवस्था मर्द्धलय व समग्र लयके भेदसे दो प्रकारकी होती है अर्दलय सुपुति अवस्थामें विषयाकार वृत्ति नहीं होती केवल अपने में प्राप्त सुख दुःख मोह आकारही बुद्धिवृत्ति होती है जो सुखरूप बुद्धि वृत्ति न होवे तो सोकर उठे हुएको मैं सुखने सोवा ऐसा सुपुति कालके सुख आदिका स्मरण न होवे समग्र लयरूप सुपुतिमें सब बुद्धिवृत्तियों का अभाव होता है मृतके तुल्य हो जाता है समग्र सुपुति नो वृत्तियोंका अभाव रूप है उसका पुरुष साक्षी नहीं होता पुरुप वृत्तिही मात्रका साक्ष होता है अन्यथा संस्कार आदि बुद्धिधर्मकाभी साक्षी होना संभव होगा सुपुप्ति मादिका साक्षी होना जिस प्रकारसे बुद्धि वृत्तियां अपने में प्रति- विम्बित होती हैं उनका उसी प्रकारसे प्रकाश कर देना है इसका आगे वर्णन किया जायगा अब यह आशंका है कि यदि सुपुत्ति सुद्धिवृत्तिही सुख दुःख गोचर मानी जाती है तो जाग्रत आदिमेंभी सम्पूर्ण वृत्तियों का वृत्ति ग्राह्य होना अंगीकार करना युक्त है अपने गोचर वृत्ति होने- हीसे अपने व्यवहार हेतुका सामान्यसे कहना यथार्य होनेसे वृत्तियोंका कोई साक्षी पुरुष कल्पना करना व्यर्थ है इसका उत्तर यह है कि ऐसा मानना युक्त नहीं है क्योंकि नियमके साथ अपने गोचर वृत्तियोंके कल्पना करनेमें अनवस्था दोषकी प्राप्ति होगी अनवस्था दोपकी प्राप्ति यह है कि मैं सुखी हूँ इत्यादि वृत्तियोंमें सुख आदिके वि- शेपणता सहित होनेसे आदिमें उनका ज्ञान निर्विकल्पक होना अपेक्षित है अनन्त निर्विकल्पक वृत्तियोंकी अपेक्षा होनेसे अनवस्थाकी प्राप्ति है इससे नित्य एकही आत्मा ज्ञान स्वरूपके ज्ञानकी कल्पना कीजाती है व एकही मात्माका मानना यथार्थ विदित होता है मैं सुसी हूँ इत्यादि विशिष्ट ज्ञानके अर्थ बुद्धिवृत्तिहीका तादृशाकार (उसीके आकार रूप) होना संभव है पुरुपमें वृत्तिसारूप्य मात्र माननेसे वृत्ति आकारसे भिन्न आकार होना अंगीकारके योग्य न होने व पुरुषही स्वतंत्र आकार माननेसे परिणाम होनेकी प्राप्ति व परिणामसे भनित्य होनेकी सिद्धि .

६८
सांख्यदर्शन।
होगी इससे पुरुषको साक्षी मात्र मानना युक्त है अब यह प्रश्न है कि
सुपुप्ति आदिमें साक्षीमात्र होनेसे कोई पुरुष होना सिद्ध होनेमेंभी यह
संशय होता है कि पुरुष एकहीं है अथवा अनेक हैं इसपर पूर्वपक्ष
यह है कि जाग्रत् आदि अवस्थारूप जे विरुद्ध धर्म हैं वह बुद्धिधर्म
होना संभव होनेसे घ श्रुतिमेंभी एक होना कहनेसे आत्मा एकही है
परन्तु यद्यपि एक आत्मा सब बुद्धिओंका साक्षी है तथापि जिस वु-
द्धिकी वृत्ति होती है वही बुद्धि अपनी वृत्ति विशिष्टके साथ साक्षीको
ग्रहण करती है अथवा प्राप्त होती है यथा मैं घटको जानता हूँ इत्यादि
रूपांसे उत्तर-यह कहना यथार्य नहीं है क्योंकि ऐसा कहनेसे यह घर
है यह एक बुद्धिकी वृत्ति होनेमें मैं घटको जानता हूँ यह अनुभव अन्य
बुद्धिकी वृत्तिद्वारा नहीं हो सकता अव सिद्धांत इसका अगले सूत्रों
वर्णन करते हैं ॥ १४८ ॥
जन्मादिव्यवस्थातः पुरुपवहुत्वम् ॥ १४९॥
जन्म आदिके व्यवस्थासे पुरुषोंका बहुत होना है
अर्थात् बहुत होना सिद्ध होता है ।। १४९ ।।
पुण्यवान् स्वर्गको जाता है पापी नरकको जाताहै अज्ञानी बंधको घ
ज्ञानी मोक्षको प्राप्त होताहै कोई मनुष्यजाति कोई पशुजाति आदि
अनेक योनियों में भिन्न भिन्न शरीरमें उत्पन्न हो भिन्न भिन्न अवस्था
व दुःस सुखको प्राप्त होते हैं इस प्रकारसे पुरुषका बहुत होना सिद्ध
होताहै परन्तु जन्म मरणमें न पुरुपकी उत्पत्ति है न पुरुषका विनाश है
केवल अपूर्व देह इन्द्रिय आदिके संघात विशेषसे संयोग व वियोग होता
है ॥ १४९ ॥ अव पुरुपके एक होनेके प्रतिपादनका पूर्वपक्ष यह है.
उपाधिभेदेप्येकस्यनानायोगआकाशस्ये
वघटादिभिः॥१५॥

भापानुवादसहित। उपाधि भेदमें एककाभी नाना योग होता है यथा आकाशका घट आदिकोंके साथ होता है ॥ १५॥ उपाधिसे एकही पुरुषका नाना शरीरके साथ योग होताहै यथा कही आकाशका नाना घट ग्रह आदिसे संयोग होता है जैसे एक घट । रहने व द्वितीय घटके योग होनेसे आकाश प्रदेशकी व्यवस्था होती है इसी प्रकारसे विविध देहके जन्ममरण मादिसे पुरुपकी यवस्था है ॥ १५० ॥ उपाधिर्भिद्यते नतुतद्वान् ॥ १५१ ॥ उपाधि भेदको प्राप्त होती है उस उपाधिवालेमें भेद नहीं होता ॥ १५॥ उपाधि भेदको प्राप्त होतीहै अर्थात् नाना रूप होती है उपाधिमें भे- होनेसे उस उपाधि विशिष्ट में अर्थात् पुरुपमें भेद नहीं होता इसका पेशेष वर्णन छठवे अध्याय में किया जायगा ॥ १५१ ॥ एवमेकत्वेनपरिवर्तमानस्यनविरुद्धधर्मा- ध्यासः ॥१५२ ॥ इसप्रकारसे एक भावसे सर्वत्र वर्तमानका विरुद्ध धर्मका प्रसंग नहीं है |॥ १५२ ॥ इस प्रकारसे अर्याद उपाधि मानसे मैदको प्राप्त तत्त्व भावसे माका- शके समान एक भावसे सर्वत्र सब दिशामें वर्तमान आत्माका विरुद्ध धर्म जन्म मरणमें प्रसंग नहीं है अर्थात् सर्व व्यापकका जन्म मरण होना संभव नहीं होता जन्ममरण परिच्छिन्न पदार्थका होता है पुरुषमें बु- द्धि धर्म सुख दुःख आदि व शरीर धाँकी व्यवस्था स्फोटकमें अरुण नीलरूप भादि धमाकी व्यवस्था होनेके तुल्य होती है ॥ १५२ ।। .

अन्यधमत्वेऽपिनारोपात्तवात्सद्धि रेकत्वात्॥ १५३॥ निश्चय करके अन्यके धर्म होनेमेंभी आरोप कर- नेसे उसकी सिद्धि नहीं है एक होनेसे ॥ १५३॥ अन्यके धर्महोनेमे अर्थात् पुरुप भिन्न प्रकृतिके धर्म होनेमें सुख आ. दि धर्म आरोप करनेसे पुरुपमें उसकी अर्थात् व्यवस्थाकी सिद्धि नहीं है अभिप्राय यह है कि पुरुपमें सुख आदि आरोप न करनेसेभी आरोप- का अधिष्ठान पुरुपके एक होनेसे भेद होनेकी सिद्धि नहीं होता क्यों कि आकाश यद्यपि एक है परन्तु घट अवच्छिन्न आकाशोंकी घटॉके भेदसे भिन्नता होनेसे औपाधिक धर्मव्यवस्था घटित होती है आत्म- व व जीवत्व आदि उपाधि अवच्छिनकी व्यवस्था होना घटित नहीं होता क्योंकि उपाधिके वियोगमें घटोंके आकाशोंके नाश होनेके समा- न उपाधिके नाशसे जीव नहीं मरता व एकही जीव वा पुरुषमें सुख दुःख जन्म मरण विरुद्धधर्म सिद्ध नहीं होते चैतन्यही मात्रसे एकता जैसा पूर्वही कहागयाहै मानना उचित है ॥ १५३ ।। नाद्वैतश्रुतिविरोधोजातिपरत्वात् ॥ १५४॥ जातिपर होनेसे अद्वैत श्रुतिका विरोध नहीं है ॥ १५॥ पूर्व पक्ष यह है कि कहीं श्रुति स्मृतिमें पुरुष व ब्रह्मका भेद कहाहै व कहीं अभेद अद्वैत वर्णन किया है द्वैत प्रतिपादक वाक्योंका अद्वैत प्रति- पादक श्रुति वाक्योंसे विरोध होगा इसका उत्तर यह है कि अद्वैत श्रुतिका अभिप्राय जातिपर होनेसे अद्वैत श्रुतियोंका विरोध नहीं है सामान्य धर्म होना जातिहै समधर्म होना मात्र जो जाति है उसीके प्रतिपादनमें अद्वैत श्रुतियोंका तात्पर्य है और जो द्वैत नाना पुरुष होनेके वर्णनमें श्रुति वाक्य हैं वह साधारण यया सुख दुःख अवस्था भापानुवादसहित । ७१ । भेदसे व्यवस्थालोकमें सिद्ध है उसके प्रतिपादन विषयमें है व्यक्ति व व्यवस्था भेदसे व्यवस्थाप्रतिपादक वाक्य होने व अद्वैत श्रुतिके तत्व- रूप जाति प्रतिपादक होनेसे अर्थात् विजातीय द्वैतके निषेध परहोने- से द्वैत व अद्वैत प्रतिपादक श्रुतियोंमें विरोध नहीं है यया अनेक दी. प उपाधि व व्यक्ति भेदसे अनेक कहे जाते हैं और जो भेद अंगीकार न कारक तत्व रूपसे सबको तेज रूप मात्र एकही पदार्थ माने तो कुछ विरोध नहीं है इसी प्रकारसे पुरुपमें भेद व अभेदका होना जा- नना चाहिये ॥ १५४ ॥ शंका-आत्माके एक न होनेके समान एक जाति व रूप होने में भी नानारूप व भेद प्रत्यक्ष होनेसे विरोध होना सिद्ध होता है इससे एक जाति कहनाभी यथार्थ नहीं है इसके उत्तरमें यह सूत्र है- विदितबंधकारणस्यदृष्टयातद्रूपम् ॥१५५॥ विदितबंध कारणकी दृष्टिसे रूपभेद नहीं है ॥१५॥ विदित बंध कारण जो अविवेकहै उस अविवेकहीकी दृष्टिसे पुरुपमें रूप भेद है भ्रांति दृष्टि से रूपभेद होनेसे रूपभेदकी सिद्धि नहीं है।।१५५॥तथा- नान्धादृष्टयाचक्षुष्मतामनुपलंभः॥ १५६ ॥ अन्धकी दृष्टि में न प्राप्त होनेसे नेत्रवालोंको अप्राप्त नहीं है ।। १५६॥ अभिप्राय यह है कि अंध जो मूट अज्ञान हैं उनकी दृष्टिमें न मात होनेसे अर्थात् न देखने अथवा न जाननेसे नेत्रवान जो ज्ञानी है उनको अमाप्त अर्थात् अदृश्य नहीं है अज्ञानीको नहीं बोध होता परंतु ज्ञानी को एकरूप होना बोध होता है इससे प्रत्यक्षसे बोधगत न होनेसे गति- से एक रूप होनेकी असिद्धि नहीं है ॥ १५६ ॥ वामदेवादिर्मुक्तोनाद्वैतम् ॥ १५७ ॥ .

७४
सांख्यदर्शन।
औदासीन्यंचेति ॥ १६३॥
उदासीन होना भी ॥ १६३॥
उदासीन होना अर्यात् कुछ कर्म न करना भी पुरुपसे सिद्ध होत
है पुरुप कर्तृत्वरहित है श्रुतिमें कहा है " कामः संकल्पो विचिकित्सा
श्रद्धाश्रद्धा धृतिरधृतिभीरित्येतत्सर्वं मन एवेति" अर्थ काम विचि.
कित्सा (संशय) श्रद्धा अश्रद्धा धैर्य अधैर्य विवेक लज्जाभयये सब मन
ही है अर्थात् ये सब मनहींके कार्य है इससे पुरुष दुःख व कर्मबंधसे
रहित है इतिशब्द सूत्रमें पुरुषधर्मप्रतिपादनकी समाप्ति सूचनके
अर्थ है॥१६३॥शंका जैसा वर्णन किया है इस प्रकारसे पुरुप व प्रकृतिका
विवेकसे परस्पर विरुद्ध धर्म होना सिद्ध होने में पुरुषका कर्ता होना व
यद्धिका ज्ञाता होना कैसे सिद्ध होता है उत्तर ॥ १६३ ॥
उपरागात्कर्तृत्वंचित्सान्निध्याच्चित्सा
न्निध्यात्॥ १६४॥
उपरागसे कर्ता होना ज्ञानसंयोग होनेसे
ज्ञानसंयोग होनसे ।। १६४॥
पुरुष व बुद्धिका यथायोग्य परस्पर सम्बन्ध है पुरुपमें जो कर्ता
होनेका धर्म है वह बुद्धिके उपराग वा बुद्धिप्रतिबिवसे है व बुद्धिमें
जो ज्ञान है वह पुरुपके समीप होने के सम्बन्धसे ज्ञानका प्रकाश है न
पुरुषमें अपना स्वाभाविक कर्ता होनेका धर्म है नबुद्धिमें स्वाभाविक ज्ञान
है एक दूसहेके सम्बन्धद्वारा है जैसे अग्नि व लोहके परस्पर संयोग विशेषसे
परस्पर धर्म अर्थात् उपाधिसे एक दूसरे उष्णताव कठिनता होती है दीवार
ज्ञानसंयोग होनेसे कहना अध्यायकी समाप्तिसूचनके अर्थ है ॥ १६४ ॥
इति श्रीप्यारेलालात्मजवांदामण्डलान्तर्गततेरहीत्याख्यग्रामवासि-
श्रीप्रभुदयालुनिमिते सांख्यदर्शने देशभापाकृतभाष्ये विषयोऽध्याय
स्समाप्तः ॥ समाप्तश्चायं प्रथमोऽध्यायः ॥१॥

भाषानुवादसहित । द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ सृष्टिविषयवर्णनमें द्वितीय अध्यायका आरंभ किया जाता है इस अध्यायमें सृष्टिका वर्णन है इस संशय निवारणके अर्थ कि प्रकृतिका सृष्टिकरने में प्रयोजन क्याहै क्योंकि विना प्रयोजन सृष्टि होनेमें मुक्तकाभी बंध होनेका प्रसंग है और विना प्रयोजन प्रवृत्ति नहीं होती न होना संभव है प्रथम सृष्टि उत्पन्न करनेका प्रयोजन वर्णन करते हैं। विमुक्तमोक्षार्थस्वार्थवाप्रधानस्य॥१॥ विमुक्तके मोक्षके अर्थ अथवा प्रधानका अपने अर्थ है ? स्वभावसे दुःख बंधसे रहित विमुक्त पुरुषके प्रतिविम्वरूप दुःखसे मोक्षके अर्थ वा विमुक्त नाम बद्धके मोक्षके अर्थ अथवा अपने पारमार्थि- क दुःखसे मोक्षके अर्थ प्रधानका जगत उत्पत्तिरूप कर्म है उत्पत्ति करने- का अर्थ पूर्व अध्यायके सम्बन्धसे ग्रहण किया जाता है जगत्के कती होनेके वर्णनमें अध्याय समाप्त हुवा है उस सम्बन्धसे सृष्टि करनेका अर्थ- का ग्रहण होता है यद्यपि मोक्षके समान भोगभी सृष्टिउत्पत्तिका प्रयो- जन है क्योंकि विना सृष्टि व शरीरमादिके पुरुषको सांसारिक अनेक विषय सुख प्राप्त नहीं हो सकता विना सृष्टि जिन पदार्थोंमें सुख उत्पन्न करने अथवा दुःख उत्पन्न करनेका धर्म है उनका सफल होना पुरुषको अनेक प्रकारके सांसारिक विषय भोग होना संभव नहीं होता तथापि मुख्य होनेसे मोक्षहीको कहा है विना वैध मोक्ष सुख बोध होना संभव नहीं है क्योंकि विनानिकृष्टके उत्कृष्टका ज्ञान नहीं हो सकता इससे बंधके पश्चात् मोक्षके अर्थ अर्थात् मोक्षसुखके लिये सृष्टिका प्रयोजन है रह भाव सूत्रका विदित होता है जो यह संशय हो कि प्रकृति जडमें रह ज्ञान होना कि किसके अर्थ क्या कार्य करना चाहिये संभव नहीं है १मुक्तका मोक्ष कहना अयुक्त है क्योंकि बद्धका मोक्ष होना संभव है इससे वेमुक्तका अर्थ बद्धहीका ग्रहण करना युक्त है और विमुक्तका अर्थ बद्धका इस प्रकारसे होता है विगतं मुक्तं मोचनं यस्य सः विमुक्तः पद्धः तस्य मोक्षार्थ वेमुक्तमोक्षार्थ ।

७६ सांख्यदर्शन। तौ यद्यपि प्रकृति जड है परन्तु पुरुपके संयोगसे चेतनताको प्राप्त हो सृष्टिके करने व बुद्धि संयुक्त होनेका अनुमान होता है. शंका-जो मोसके अर्थ सृष्टि है तो एक वारकी सृष्टिसे संभव होनेमें वारंवार सृष्टि होना जै. सा श्रुति स्मृति प्रमाणसे सिद्ध है न होना चाहिए, उत्तर- विरक्तस्यतत्सिद्धेः ॥२॥ विरक्तको उसकी सिद्धि होनेसे ॥२॥ एक वारकी सृष्टिसे मोक्ष संभव नहीं है जन्म मरण व्याधि आदि दि. विध दुःखसे जब जीव क्लेशित होता है तव प्रकृति पुरुषके विवेकसे उत्पन्न वैराग्यको प्राप्त होता है उस विरक्तको उसकी ( मोक्षकी) सिद्धि होती है ॥२॥ एक वारकी सृष्टि से वैराग्य न होनेका हेतु कहते हैं- नश्रवणमात्रातत्सिद्धिरनादिवासनाया बलवत्त्वात् ॥३॥ अनादि वासनाके बलवान होनेसे श्रवणमात्रसे उसकी सिद्धि नहीं है ॥३॥ बहुत जन्मके पुण्यसे धर्म उपदेशका श्रवण होता है उस श्रवणमात्र भी विना साक्षात्कार भये वैराग्य सिद्ध नहीं होता साक्षात्कार अनेक ज- न्मकी अनादि वासनाके बलवान होनेसे शीघ्र ( जल्दी) नहीं होता यो- गनिष्ठासे होता है योगमें अनेक विघ्न होते हैं इससे अनेक जन्मके वै- राग्य अभ्यासकी सिद्धिसे कभी किसीकी मोक्ष होती है ॥ ३ ॥ बहुभृत्यवद्वाप्रत्येकम् ॥४॥ अथवा बहुत भृत्यके प्रत्येकको॥४॥ जैसे गृहस्योंको प्रत्येकको स्त्री पुत्र भृत्य आदि भेदसे बहुत भरण भापानुवादसहित। ७७ पोषणके योग्य होते हैं इसी प्रकारसे सत्व आदि गुणोंको प्रत्येकको असदेख्य पुरुष मोक्षके योग्य होते हैं इससे कितनेही पुरुषके मोक्ष माप्त होनेपरभी अन्य पुरुषोंके मोचनके अर्थ सृष्टिका प्रवाह होना घटित होता है क्योंकि पुरुष अनन्त है ॥ ४ ॥ शंका श्रुतिमें कहा है "एत- स्मादात्मन माकाशः संभूत इत्यादि " अर्थ इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुवा इत्यादि इससे प्रकृतिमात्रका सृष्टि उत्पन्न करना क्यों कहना चाहिए पुरुपका भी सृष्टि करना श्रुतिसे सिद्ध होता है उत्तर ॥ प्रकृतिवास्तवेचपुरुषस्याध्याससिद्धिः॥५॥ प्रकृतिमें वास्तवरूप होनेमें पुरुपके अध्यासकोभी सिद्धि होती है ॥५॥ प्रकृतिमें मृष्टि उत्पन्न करना वास्तवमें सिद्ध होता है व पुरुपका मक तिके सम्बंधसे सृष्टिके उत्पन्न करनेमें अध्यासमात्र श्रुतिसे सिद्ध होता है यथा सेवकस्वामी सम्बंध होनेसे राजाके सेवक योधाओंको जो जय अथवा पराजय होता है उसका अध्यास ( उपचार या आरोप) राजामें किया जाता है इसी प्रकारसे पुरुषकी शक्तिरूप प्रकृतिमें वर्तमान सृष्टि उत्पन्न करनेके धर्मका शक्ति व शक्तिमानको अभेदभाव ग्रहण करिक शक्तिमान पुरुपमें उपचार किया जाता है।५॥शंका प्रकृतिमें क्यों वास्तव- रूप सृष्टि करना निश्चय किया जाता है क्योंकि मृष्टि स्वम आदिके तुल्पभी सुनी जाती है उत्तर. ॥ कार्यतस्तत्सिद्धेः॥६॥ कार्यसे उसकी सिद्धि होनेसे ॥६॥ मदत्तत्व आदिकार्योंसे जैसा पूर्वही वर्णन किया गया है कारणरूप मकृतिका सृष्टि करना सिद्ध होता है क्यों कि कार्य कारणके परिणामसे होता है पुरुषमें परिणाम होनेका प्रमाण नहीं होता इससे कारणरूप ७८ सांख्यदर्शन। प्रकृतिके परिणामसे वास्तवमें प्रकृतिसे सृष्टिका उत्पन्न होना सिद्ध होता है. स्वप्नवत् श्रुतिके कहनेका अभिप्राय स्वप्रवत् अनित्य माननेसे है अन्यया सृष्टि प्रतिपादक श्रुतिओंमें विरोध आवैगा ॥ ६ ॥ शंका-मुक्त पुरुषोंमेंभी प्रकृति क्यों प्रवृत्त नहीं होती. उत्तर- चेतनोदेशान्नियमः कंटकमोक्षवत् ॥७॥ चेतनके उद्देशसे कांटाके मोक्षके समान नियम है ॥७॥ चेतन ज्ञानवानके उद्देश (कहने )से कांटाके मोक्षके समान प्रकृतिका नियम है अर्थात् जैसे कांटा जो ज्ञानवानके लगता है तो उससे वह छूट जाता है ज्ञानवान् उसको यत्नसे निकाल डालता है चेतन (ज्ञान- वान ) के दुःखदेनेको कांटा समय नहीं होता और वही अज्ञानको पशु आदिको जो नहीं निकाल सकता दुःखदेता है इसीप्रकारसे प्रकृति ज्ञान वान कृतार्थसे छूट जाती है उसको दुःखात्मिका नहीं होती अन्य अज्ञा• नियोंको दुःखात्मिका होती है यह नियमकी व्यवस्था है इसीसे मुक्त पुरुषोंसे छुटनेसे प्रकृतिकाभी मोक्ष होना घटित होता है इसीसे मुक्तपुरुपमें प्रकृतिकी प्रवृत्ति नहीं होती शंका-पुरुषमें सृष्टिकी उत्पत्तिकी शक्ति होना अध्यस्त मात्र होना जो कहा जाता है यह यथार्थ नहीं है प्रकृतिके संयो- गसे पुरुषकाभी महत्तत्वमादिमें परिणाम होना उचित है. उत्तर- अन्ययोगेऽपितत्सिद्धिर्नाञ्जस्येनायोदाहवत् ८ अन्य योगमेंभी प्रत्यक्षसे लोहके दाहके समान उसकी सिद्धि नहीं है ॥८॥ 'अन्यके योगमेंभी अर्थात् प्रकृतिके योगभी प्रत्यक्षसे लोहके दाइके तुल्य उसकी अर्थात् पुरुपके सृष्टि उत्पन्न करनेकी सिद्धि नहीं है अभि. प्राय यह है कि, जैसे लोहमें साक्षात् दग्ध करनेकी शक्ति नहीं है केवल अपने संयुक्त अग्निद्वारा दाह करनेवाला अध्यस्त मात्र है इसी प्रकारसे भाषानुवादसहित । ७९ प्रकृतिके संयोगद्वारा पुरुषका कर्ता होना है स्वाभाविक कर्तृत्व नहीं है अब सृष्टिका मुख्य निमित्त कारण कहते हैं ॥ ९॥ रागविरागयोर्योगःसृष्टिः ॥ ९॥ रागमें सृष्टि होती है विरागमें योग होता है ॥ ९ ॥ राग मृष्टिका कारण है विरागसे योग होता है योगमें सब वृत्तियोंके निरोध होने व आत्मज्ञान होनेसे मुक्ति होती है इससे विराग मुक्तिका कारण है ॥ ९ ॥ अब सृष्टिप्रक्रिया वर्णन किया जाता है | महदादिक्रमेणपंचभूतानाम् ॥१०॥ महत्तत्व आदिके क्रमसे पांच भूतौकी सृष्टि ॥१०॥ सृष्टि शब्दकी अनुवृत्ति पूर्व सूत्रसे होती है महत्तत्त्व आदिके क्रमसे जैसा पूर्वही वर्णन किया गया है पंच भूतोंकी सृष्टि होती है शंका-इस श्रुतिमें समाणमसृजत माणाच्छुद्धां खंवायुं " अर्थ-उसने प्राणको उत्पन्न किया प्राणसे श्रद्धाको आकाशको वायुको पंच भूतसे पहिले प्राणकी सृष्टिको कहा है उत्तर-प्राण अंतःकरणके वृत्तिका भेद है यह आगे वर्णन किया जायगा इससे इस श्रुतिमें माणही महत्तत्वक अभि- मायसे कहा गया है अर्थात् प्राण शब्दसे महत्तत्वको कहा है ॥ १० ॥ आत्मार्थत्वात्सृष्टे पामात्मार्थआरंभः ॥११॥ सृष्टिका आत्माके अर्थ होनेसे इनके आत्माके अर्थमें आरंभ नहीं है ।। ११ ॥ सृष्टिका आत्माक अर्थ अर्थात् पुरुषके मोक्षके लिये होने से उनके आत्मा अर्थात् महत्तत्व आदिकोंके आत्माक अर्य आरंभ नहीं है अर्थात् महत्तत्व आदिकोंका अपने लिये सृष्टि करनेका आरंभ नहीं है क्यों कि महत्तत्व " सांख्यदर्शन। आदिकोंका कार्यरूप होनेसे विनाशी अनित्य होनेसे मोक्षके साथ योग नहीं है ॥ ११ ॥ दिकालावाकाशादिः॥१२॥ दिशा व काल आकाश आदिकोसे ॥१२॥ आकाश प्रकृति (कारण )से दिशावकाल कार्य उत्पन्न हुये हैं व आकाशके तुल्य विभुहें आदिशन्दसे उपाधियोंको ग्रहण किया है अर्थात् दिशा वकाल दोनों आकाशके कार्य पविभु है जो खण्डरूप दिशा व काल होते हैं वह अपने अपने उपाधिभेदसे आकाशसे उत्पन्न होते है आकाशके गुणविशेप जो सर्वगतविभु होना व नित्य होना है वह दिशा कालमें होने व आकाशके साथ सम्बंध होनेखे व आकाश अखण्ड नित्य होनेसे व काल दिशामें उपाधि भेदसे खण्डरूप माने जानेसे दिशाम कालको कार्य व आकाशको प्रकृतिरूप कहा है ॥ १२॥ अध्यवसायोबुद्धिः॥१३॥ निश्चयरूपा बुद्धि है ॥ १३॥ महत्तत्वका पर्याय बुद्धि है अर्थात् महत्तत्व व बुद्धि दोनों शन्दका एकही अर्थ है निश्चय करना बुद्धिकी वृत्ति है इससे निश्चय रूप कहा बुद्धिको महत्तत्व इससे कहते है कि अपने व परके सकल कार्योम व्या- पक है सबमें व्यापक होनेसे महा उत्कृष्ट तत्व मानाहै ॥ १३ ॥ तत्कार्यधर्मादि॥ १४॥ उसके धर्म कार्य आदि है ।। १४॥ उसके महत्तखके कार्य धर्म आदिहें धर्म ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य कार्यों का उपादान बुद्धि है अहंकार नहीं है वद्धिहीका अतिशय सत्वका कार्य होना प्रमाणसे सिद्ध होता है ।। १४ + भाषानुवादसहित । ८१ शंका-जो महत्तत्वके कार्य धर्म आदि उत्तम गुण हैं तो सम्पूर्ण प्राणि में अधर्मकी प्रबलता क्यों होती है इसका उत्तर वर्णन करत है ।। महदुपरागाद्विपीतम् ॥ ११ ॥ महत्तत्व उपरागसे विपरीत होता है ।। १५ ॥ महत्तत्व रजोगुण व तमोगुणके उपरागसे वा सम्बंधसे विपरीत हो- ताहै शुद्रधर्म अज्ञान अवैराग्य नैश्वर्यका कारण होताहै कारणरूप बु. द्धि प्रकृतिमें लयहो नित्य रहती है कार्यरूप परिणामको प्राप्त होती है अनित्यह ॥ १५॥ अभिमानोऽहंकारः॥ १६ ॥ अभिमान अहंकार है॥ १६॥ मैहूं में कर्ता हूँ इस भावको अभिमान वा अहंकार कहते हैं यह अई- कार अंत:करण द्रव्य है अभिमान उसकी वृत्ति वा उसका धर्म है परन्तु धर्म धर्माको अभेद मानकर अभिमान महंकार है यह कहा है निश्चय बुद्धिकी वृत्ति निश्चित अर्थहीमें में मेरा यह ज्ञान अहंकारका वृत्तिरूप उत्पन्न होता है निश्चय व अभिमान वृत्तियोंके कार्य कारणभावके अनु- सार वृत्ति मानोंका कार्यकारणभाव माना जाता है अर्थात् बुद्धि वाम- हत्तत्यका कार्य महंकार माना जाता है जैसा पूर्वही कहा गया है ॥१६॥ एकादशपंचतन्मात्रंतत्कार्यम् ॥१७॥ ग्यारह व पांच उसके मात्र उसके कार्य हैं ॥१७॥ ग्यारह इन्द्रिय व शन्द आदि पांच उसके मात्रा उसके अर्थात् अहंकारके कार्य है मुझे इस इन्द्रियसे यह रूप आदि भोगके योग्य है यही सुखका साधन है इत्यादिके अभिमानहीसे नादि सृष्टि वा उत्पत्तिमें इन्द्रिय व उ- नके विषयोंकी उत्पत्ति होनेसे अहंकार इन्द्रिय आदिका हेतु है लोकमें सांख्यदर्शन। भोग अभिमानीहीका राग द्वारा भोगमें प्रवृत्त होना देखा जाता है भूत व इन्द्रियके मध्य में राग धर्मयुक्त जो मन है वही आदिमें अहंकारसे उत्पन्न होता है क्योंकि मनसे राग होनेसे शब्द आदि कार्य होते हैं व शब्दरूप आदि मात्रोंके भोगमें राग होनसे भोगके करण श्रवण चक्षु आदि इन्द्रिय कार्य उत्पन्न होते हैं स्मृतिमें मोक्षधर्ममें हिरण्यगर्भ (5- मा) के रागहीसे चक्षु आदिकी उत्पत्ति कहाहै यथा "रूप रागादभूच- क्षुः इत्यादि अर्थ रूपके रागसे चक्षु (नेत्र ) उत्पन्न हुए इत्यादि इससे अनुमान व स्मृति प्रमाणसे अहंकारसे मन मनसे राग रागसे शब्द आ- दि पांच मात्रा व मांत्रोंसे दशबाह्यइन्द्रिय कार्योंका उत्पन्न होना सिद्ध होता है ॥ १७ ॥ सात्विकमेकादशकंप्रवर्ततेवैकृताद हङ्कारत् ॥ १८॥ विकारको प्राप्त अहंकारसे ग्यारहवाँ अहंकारका सात्विक कार्य प्रवृत्त होता है ॥ १८॥ ग्यारहवाँ जो दश इन्द्रियके पश्चात् मन है वह पोडश गण मध्यमें सात्विक व विकारको प्राप्त जो अहंकार है उससे प्रवृत्त होता है अभिप्राय यह है कि, अहंकार तीन प्रकारका होता है सात्विक राजस तामस साखि क अहंकारसे सात्विक मन प्रवृत्त होता है अर्थात् उत्पन्न होता है तथा राजस अहंकारसे दशइन्द्रिय व तामससे पंचमात्रा उत्पन्न होते हैं १८ कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियैरान्तरमेकादशकम् ॥१९॥ कर्मइन्द्रिय ज्ञानइन्द्रिय सहित अन्तरका ग्यारहवाँ है ॥ १९॥ वाक् हस्त, पाद, पायु, ( गुदा) व उपस्य (लिंगवा योनि) यह, पांच कर्मइन्द्रिय हैं. कर्ण, नासिका, रसना, त्वचा, नेत्र यह पांच ज्ञान + .

भाषानुवादसहित। इन्द्रिय हैं इन दश इन्द्रियोंसहित अंतर इन्द्रिय ग्यारहवाँ मन है यह अर्थ है ॥ ११ ॥ आहंकारिकत्वश्रुतेन भौतिकानि ।। २० ॥ श्रुतिसे आहंकारिक होना सिद्ध होनेसे भौतिक नहीं हैं२०॥ श्रुति प्रमाणसे अहंकारके कार्य होना सिद्ध होनेसे इन्द्रिय भौतिक नहीं हैं"इन्द्रिय भौतिक नहीं है"यह कहनेमें इन्द्रिय शब्दकी पूर्व सूत्रसे मनुवृत्ति होती है इन्द्रियोंके आईकारिक होनेकी जो श्रुतिहै वह इसका- लमें वेदके शाखाओंके लोप होजानेसे नहीं मिलती तथापि आचार्यके वाक्यते माननेके योग्य है यद्यपि “एकोहं बहु स्याम्"अर्थ-एक बहुतहोऊ यहभी अहंकारसूचक श्रुति है व भौतिक होनेके ममाणमेंभी श्रुती हैं परन्तु माहंकारिक श्रुतिके मुख्य होनेसे भौतिक श्रुति गौणी मानना चाहिये ॥ २० ॥ शंका-भौतिकश्रुतिके गौणी अंगीकार करनेसेभी आईकारिक होना घटित नहीं होता क्योंकि यह श्रुति है " यस्य पुरुषस्यानि वामप्यति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यम्" अर्थ-इस पुरुपको वाक् अनिमें लयहोती है प्राण वायुमें लय होते हैं नेत्र सूर्यमें लय होते हैं देवताओंमें इन्द्रियोंके लय होनेसे देवताओंका उपादान होनाभी ग्रहण होता है क्योंकि कारणहीमें कार्यलय होता है. उत्तर- देवतालयश्रुति रंभकस्य ॥२१॥ देवतामें लयहोनेकी जो श्रुति है वह आरंभककी नहीं है, अर्थात् आरंभकतिपय सम्बंधी नहीं है ॥२१॥ अग्नि आदि देवतामें लय होनेकी जो श्रुति है वह कार्य आरंभक कारणके विषयमें नहीं है क्योंकि जो आरंभक(आदिमें उत्पन्न करनेवाला)नहीं है उसमेंभी लय होना देखा जाता है यथा भूतल में जलबिन्दुका लय हो- ना आदि इसीप्रकारसे देवताओंमें इन्द्रियोंके लयहोनेमें श्रति है ॥२१॥ .

सांख्यदर्शन। कोई मनको नित्य मानते है इस संदेह निवारणके अर्थ इन्द्रियोंको अनि- त्य वर्णन करते है. तदुत्पत्तिश्रुतेर्विनाशदर्शनाच ॥ २२ ॥ उनकी उत्पत्ति श्रुतिसे सिद्ध होनेसे व नाश देखनसेभी ॥२२॥ उनकी सब इन्द्रियोंकी उत्पत्ति है यया श्रुतिमें कहा है " एतस्माजाय ते प्राणो मनस्वन्द्रियाणिचा अर्थ-इससे आरमासे प्राण उत्पन्न होता है- मन व सव इन्द्रियांभी जो उत्पन्न होता है वह नाश होता है यह अनुमा नसे सिद्ध है । वृद्धा अवस्था आदिमें नेत्रादिके सदृशमनके क्षीणहोनेसे विनाश होनेका निर्णय होता है मनके नित्य होनेको वचन प्रकृति बीज पर है यह मानना चाहिये ॥ २२ ॥ अतीन्द्रियमिन्द्रियंभ्रांतानामधिष्ठाने ॥ २३ ॥ इन्द्रिय अतीन्द्रिय हैं भ्रान्तोंको अधिष्ठानमें (अधिष्टानमें वोध होता है )॥२३॥ इन्द्रिय अतीन्द्रिय है अर्थात् अति सूक्ष्म है प्रत्यक्ष नहीं है भ्रान्तोंको अधिष्ठानमें अर्थात् भ्रान्त जो भ्रमको प्राप्त है उनको अधिष्ठानमे (गोर- कमें) इन्द्रियोंका होना बोध होता है अर्थात् गोलक व इन्द्रियमें भेद नहीं मानते ॥ २३ ॥ शक्तिभेदेऽपिभेदसिद्धौनकत्वम् ॥ २४ ॥ शक्ति भेद होनेमेंभी भेदकी सिद्धि होने में एक होना सिद्ध नहीं है ॥२४॥ कोई यह कहते है कि, इन्द्रिय एकही है शक्ति भेदसे उससे विलक्षण कार्य होते है इस मतके प्रतिपेधकेलिये यह कहा है कि, एक इन्द्रियके

भाषानुवादसहित।
शक्ति भेद अंगीकार करने भी शक्तियोंकेभी इन्द्रिय होनेसे इन्द्रिय भेद
सिद्ध होता है इससे इन्द्रियका एक होना सिद्ध नहीं होता भेद जय सिद्ध
है तौ भिन्न शब्द कल्पना मात्रसे अर्थात् इन्द्रिय शब्दके स्थानमें शक्ति
भेद शब्द कहनेसे एकताकी सिद्धि नहीं होती ॥ २४ ॥ शंका-एक
अहंकारसे नानाविधकी इन्द्रियोंकी कल्पना करनेमें विरोध होगा. उत्तर-
नकल्पनाविरोधःप्रमाणदृष्टस्य ॥२५॥
प्रमाणदृष्टका कल्पनाविरोध नहीं है ॥२५॥
जो प्रत्यक्ष प्रमाणसे नानाविध इन्द्रियोंका होना दृष्ट है अर्थात् देखा
हुवा है प्रत्यक्षसे सिद्ध है उसमें कल्पनाविरोध नहीं होसकता ॥ २५ ॥
उभयात्मकंमनः॥२६॥
दोनों इन्द्रियात्मक मन है ॥२६॥
ज्ञानइन्द्रिय व कर्मइन्द्रिय दोनों इन्द्रियात्मक मन है ॥ २५ ॥
गुणपरिणामभेदान्नानात्वमवस्थावत् ॥२७॥
गुणोंके परिणामभेदसे अवस्थाके तुल्य
नाना भेद होना सिद्ध होता है ॥२७॥
यथा एकही मनुष्य स्त्रीकेसाथ कामी विरक्तके साथ विरक्त अन्यके साथ
अन्य होता है इसी प्रकारसे मन चक्षु आदिके संग चक्षु आदिमें एकभाव
होकर दर्शन आदि विशेष वृत्तिोसे नाना होता है क्यों नाना अर्थात्
अनेक प्रकारका होता है सत्व आदिगुणोंके परिणाम भेदमें समर्थ होनेसे
यह सूत्रका अर्थ है ॥ २७ ॥
रूपादिरसमलान्तउभयोः॥२८॥
रूप आदि रसमलान्त दोनोंके ॥२८॥

८६
सांख्यदर्शन।
रूप आदिसे रूप रस गंध स्पर्श शब्द अभिप्राय है अन्न रसोंका मल
विष्टा है मलतक इन्द्रियका विषय है क्यों कि गुदाइन्द्रियसे मलत्याग
होता है तात्पर्य यह है कि रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द, ज्ञान इन्द्रियके
विषय व बोलना, देना चलना, मैथुन करना, मलत्याग करना, कर्म
इन्द्रियके विषय यह मलत्याग पर्यंत दोनों इन्द्रियोंके दशविषय हैं ॥२८॥
द्रष्टत्वादिरात्मनःकरणत्वमिन्द्रियाणाम्॥२९॥
द्रष्टा होना आदि आत्माका करण होना इन्द्रियोंका॥२९॥
द्रष्टा होना आदि अर्थात् देखनेवाला होना आदि पांच रूप आदि
विषयोंका ग्राहक होना व वक्ता होना आदि पांच कर्म इन्द्रियोंके विषयोम
प्रवृत्त होना व संकल्प का होना यह द्रष्टा होना आदि मात्माका अदि
पुरुषका दर्शन आदि वृत्तियोंमें होता है करण होना इन्द्रियोंश
धर्म है जो यह शंका हो कि, अविकारी पुरुषमें द्रष्टा कर्ता होना आदि कैसे
घटित होता है तो पूर्वोक्त के अनुसार यया चुम्बकके समीप होनेहींसे
लोहमें सञ्चलन होता है उसका कारण चुम्बकही कहा जाता है अथवा
सैन्य करण करिक आज्ञामात्रसे राजा युद्ध करता है शरीरसे राजा
आप कुछ नहीं करता युद्ध योधा करते हैं परन्तु जय व पराजय होना
राजाहीका कहा जाता है इसीप्रकारसे द्रष्टा होना आदि पुरुपमें कहा
जाता है यह जानना चाहिये सन्निधिमात्रसे इन्द्रिय करणोंसे कर्ता है
स्वरूपसे पुरुप कर्ता नहीं है ॥ २९ ॥
त्रयाणांस्वालक्षण्यम् ॥३०॥
तीनोंका अपने अपने लक्षणका भाव है ॥३०॥
तीनोंका महत्तव अहंकार मनका अपने अपने लक्षणका भाव ।
निश्चय मादि उत्कृष्ट गुण होना महत्तत्वका लक्षण है अपने आत्माम
'विद्यमान गुणका आरोप करना अहंकारका लक्षण है संकल्प विकल
करना मनका लक्षण है इन लक्षणोंसे अपने अपने लक्षणोंसे तीनोंका
प्रत्यय होता है।॥३०॥

भाषानुवादसहित। सामान्यकरणवृत्तिःप्राणाद्यावायवःपंच ॥३१॥ प्राण आदि रूप पंच वायु करणकी (अंतःकरणकी) सामान्य (साधारण) वृत्ति है ॥३१॥ वायुके समान सञ्चार होनेसे माण आदि रूपसे जो पांच वायु अर्थात् राय,अपान, समान, उदान, व व्यान नामसे प्रसिद्ध हैं वे अन्त:करणकी सामान्य ( साधारण) वृत्ति हैं अर्थात् अंत:करण त्रयके परिणाम सद है अन्य प्राण आदिको वायु रूप वायु भेद मानते हैं कोई आचा- ६ वायुसे पृथक् प्राण आदिको अन्तःकरणके परिणाम वा कार्यभेद स्वीकार करके अन्त:करणकी वृत्ति कहाहै वायुनामसे कहनेका आशय वह है कि वायुके समान संचार होनेसे वायु नामसे कहेजाते हैं माण गयु हृदय अपान गुदा समान नाभिमें उदान कण्ठमें व्यान सब श- रिमें रहताहै ये प्राण आदिके स्थान हैं ॥ ३१ ॥ क्रमशोऽक्रमशश्चेन्द्रियवृत्तिः ॥३२॥ क्रम व विनाक्रम इन्द्रियकी वृत्ति है ॥ ३२॥ प्रथम निर्विकल्पक ज्ञान होता है पश्चात् क्रमसे सविकल्पक ज्ञान हो- ता है अर्थात् शब्द स्पर्श रूप रस गंध विषयोंमें प्रथम इन्द्रियद्वारा आ. लोचन ज्ञान विना विशेषणके होता है उसको निर्विकल्पक कहते हैं फिर उत्तर कालमें वस्तुके धर्मोंसे द्रव्यरूप धर्मोसे जाति आदिसे जो विशिष्ट ज्ञान होता है उसको सविकल्पक कहते हैं आलोचन ज्ञानहीके दो भेद । अर्थात् निर्विकल्पक सविकल्पक दो प्रकारका ऐन्द्रियक ज्ञान आलो- वन. नामसे कहा जाता है कोई निर्विकल्पक ज्ञान मात्रको आलोचन ६ इन्द्रिय जन्य कहते हैं सविकल्पकको मन मात्रसे जन्य (उत्पत्रके पोग्य ) कहते हैं परंतु सविकल्पकको अर्थात् विशिष्ट ज्ञानकोभी इन्द्रि- से विशिष्ट ज्ञान होने में बाधक होनेके अभावसे सूत्र में ऐन्द्रियक कहा है अर्थात इन्द्रियकी वृत्ति माना है कोई यह कहते है कि, पाह्यइन्द्रियों से ३ ८८ सांख्यदर्शन। लेकर बुद्धि पर्यंतकी वृत्ति उत्पत्ति क्रमसे होती है कभी व्याघ्र आदि देखनेके कालमें भय विशेषसे विद्युल्लताके समान सब इन्द्रियोंमें एकही वार वृत्ति होजाती है यह कहना असद है सूत्रमें इन्द्रियोंके वृत्तिा मात्रको क्रमिक अक्रमिक कहा है बुद्धि व अहंकार वृत्तियोंका प्रसङ्ग नहीं है एकहीवार अनेक इन्द्रियोंकी वृत्ति होने में संशयरूप विरुद्धमा माप्त होनेसे उसके निर्णयके अर्थ व मनके अणु होनेके प्रतिषेधके पर सूत्रमें क्रमसे व विनाक्रमसे इन्द्रिय वृत्ति होनेको वर्णन किया है ॥३२॥ वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥ ३३ ॥ क्लिष्ट अक्लिष्ट भेदसे पांच प्रकारकी वृत्ती हैं ॥३३॥ दुःखकी देनेवाली सांसारिक वृत्ती जो पांच वृत्ती है वह क्लिष्ट कई जाती हैं और जो योगकालकी पांच वृत्ती हैं वह अक्लिष्ट उनके विपरीत कही जाती हैं अविद्या ( अज्ञान) अस्मिता (अहंकार होना) राग द्वेष व अभिनिवेश ( मरणकी त्रास ) यह पांच क्लिष्ट हैं और प्रमा विपर्यय, (विपरीत ज्ञान ) विकल्प, निद्रा, स्मृति यह पांच अक्लिष्ट वृत्त हैं प्रमाणका वर्णन पूर्वही होचुका है विवेक विरुद्ध अयथार्थ ज्ञान विपर्य है किसीसे मनुष्यके सींग सुनकर यह जानकर भी कि मनुप्यके सी नहीं होते यह कल्पना करना कि होते होंगे विकल्प है निद्रा स्मृति साधार ण है विशेष व्याख्यान विपर्यय आदिका योगदर्शन में देखना चाहिये।।३३ तन्निवृत्तावुपशांतोपरागःस्वस्थः॥३४॥ उनके निवृत्त होनेमें शांतोपरागहो स्वस्थ होता है ॥३४ उनके अर्थात् वृत्तिओंके निवृत्त होनेकी दशामें शांतोपराग हो अर्थ त् सम्पूर्ण विषयोंके रागसे रहित होकर स्वस्थ होता है केवल्प आनन्दव प्राप्त होता है ॥ ३४ ॥ कुसुमवञ्चमणिः ॥३५॥ कुसुमके समान जैसे मणि ॥३६॥ .

भापानुवादसहित। जैसे जपाकुसुम (गोडहरके फूल ) के प्रतिबिम्पसे स्फटिकमणि जपाकुसुमके समान अरुण होजाती है और उसके न रहनेपर फिर अपने शुक्क रूपको प्राप्त होजाती है उपाधि जनित अरुणता दूर होजाती है इसी प्रकारसे प्रकृतिसे जो वृत्तियाँ हैं उनकी निवृत्तिसे पुरुष निज स्व- रूपमें स्वस्थ होता है व आनन्दको माप्त होता है ।। ३५ ॥ पुरुषार्थकरणोद्भवोऽप्यदृष्टोल्लासात् ॥३६ ।। पुरुपकेलिये करणका उत्पन्न होनाभी अदृष्टके प्रकट होनेसे ॥ ३६॥ पुरुपके अदृष्टके प्रकट होनेसे जैसे प्रधानकी प्रवृत्ति होती है इसी प्रकारसे पुरुपके अर्थ करणों ( इन्द्रियों ) की प्रवृत्ति वा उत्पत्ति होती है अयशसे करणोंकी प्रवृत्ति इससे कहा है कि, करणों का प्रवृत्त करनेवाला पुरुष नहीं होसकता क्योंकि पूर्वही पुरुषको क्रिया रहित कूटस्थ अंगीकार किया है व ईश्वरको जगत्का कर्ता नहीं माना इससे अदृष्टको प्रवर्तक माना है ।। ३६ ॥ शंका-परके अर्थ आपसे करण किस प्रकारसे प्रवृत्त होते हैं उसका दृष्टांत यह है ॥ धेनुवद्वत्साय ॥ ३७॥ वत्सके अर्थ धेनुके समान ॥ ३७॥ यथा गौ वत्सलिये अपनेहीसे दुग्ध लवती है कोई यत्नकी अपेक्षा नहीं होती एसा स्वभावही है इसी प्रकारसे अपने स्वामी पुरुपके अर्थ करण आपही प्रवृत्त होते हैं सुपुतसे अपनेहीसे बुद्धिका उठना वा प्रकट होना प्रत्यक्षसेभी सिद्ध होता है ।। ३७ ॥ करणंत्रयोदशविधमवान्तरभेदात् ॥३८ ।। अवान्तर भेदसे तेरह विधके करण हैं ॥ ३८ ॥ .

• . ९. सांख्यदर्शन। तीन अन्तःकरण दश बाह्य इन्द्रिय यह तेरह विधक करण हैं मुख्य करण केवल एक बुद्धि है उसके यह सब भेद हैं इससे यह कहा है कि, अवान्तर भेदसे अर्थात् भिन्न कार्यभेदसे तेरह हैं ॥ ३८ ॥ शंका- मो बुद्धि मुख्य करण है और अन्य गौण हैं तो उनके गौण माने जानेका हेतु कौन गुण वा धर्म है उत्तर- इन्द्रियेपुसाधकतमत्वगुणयोगात्कुठारवत्३९ इंद्रियोंमें अति साधक होनेके गुणयोगसे कुठारके सदृश गुण है ॥३९॥ इन्द्रियोंमें परम्परा करिकै पुरुषार्थका अतिसाधक होना कारण स्वरूप बुद्धिका गुण है इससे तेरह प्रकारके करण होना सिद्ध होता है यह पूर्वसूत्रके साथ अन्वय (सम्बंध वा मेल ) है कुठारके सदृश कह- नेका अभिप्राय यह है कि यथा काटने में योग भिन्न करना अर्याद योगसे पृथक् वा विभाग कर देनाही फल होनेसे प्रहारहीका मुख्य कर णत्व है तथापि अतिसाधन गुणके योगसे कुठारकाभी करणत्व है मर्थात् कुठारका कारण होना सिद्ध होता है इसी प्रकारसे यद्यपि मुख्य करण युद्धि है तथापि अतिसाधक होनेसे इन्द्रियोंका करणत्व है ।। ३९ ॥ द्वयोःप्रधानंबुद्धिर्लोकवद्धृत्यवर्गेपु ॥४०॥ दोनोंमें प्रधान बुद्धि भृत्यव!में लोकके समानहै ॥४०॥ दोनोंमें बाह्य व अंतरके करणों ( इन्द्रियों) के मध्यमें घुद्धिही प्रधान है अर्थात् मुख्य है क्योंकि सम्पूर्ण अर्थके पुरुषमें समर्पण करने में बाह्य व अन्तरके जो मन चक्षु आदि करण हैं उन सबमें उत्कृष्ट है जैसे रा- 'जाका कोई प्रधान भृत्य सव भृत्य वर्गों में अर्थात् सेवक घगोंमें मुख्य होता है इसी प्रकारसे बुद्धि सब करणोंमें प्रधान है ॥ ४. || बुद्धिके प्रधान होने में हेतु वर्णन करते हैं।

R भापानुवादसहित । अव्यभिचारात्॥४१॥ व्यभिचार न होनेसे॥४१॥ अन्य इन्द्रिय अपने अपने विषय विशेष मात्रके ग्रहण करने में समर्थ हैं अन्य इन्द्रिय अन्य इन्द्रियके विषयके ग्रहणमें समर्थ नहीं है बुद्धि सब करणोंमें व्यापक होनेसे सब करणों( इन्द्रियों के विषयोंको ग्रहण करती है किसी इन्द्रियके विषय ग्रहण करनेमें निश्चित वृत्ति वा धर्मवान बुद्धिका व्यभिचार नहीं होता सबमें व्यापक होने व फलमें व्यभिचार न होनेसे बुद्धिकी प्रधानताहै || ४१ ॥ तथाशेपसंस्काराधारत्वात् ॥ ४२ ॥ तथा सम्पूर्ण संस्कारके आधार होनेसे ॥ ४२ ॥ यया व्यभिचार न होनेसे बुद्धिकी प्रधानता है तथा सम्पूर्ण संस्का- रके माधार होने से प्रधानता है. क्योंकि चक्षु आदि अथवा अहंकार मन संस्कारके आधार नहीं हो सकते जो पूर्वही देखा वा सुनाहै रस्के स्म- रणको नेत्र आदि कोई वाह्य इन्द्रिय समर्थ नहीं है क्योंकि स्मरण करना याह्यइन्द्रियोंका गुण नहीं है जो वाह्यइन्द्रियोंका धर्म होता तो अंध बधिरको रूप व शन्दका स्मरण न होता यद्यपि अंध बधिरको रूप व शब्दका प्रत्यक्ष नहीं होता परन्तु स्मरण होनेसे वाहाइन्द्रियों- का धर्म नहीं है यह सिद्ध होता है जो मन व अहंकारका धर्म कहा जाय तो तत्वज्ञानसे जब मन व अहंकारका लय होजाता है तबभी स्मरण होता है इससे सम्पूर्ण संस्कारकी आधार बुद्धि है व स्मरण बुद्धिका धर्म है सब संस्कारकी आधार होनेसे बुद्धिकी प्रधानता है।॥४२॥ स्मृत्यानुमानाच॥४३॥ स्मृतिद्वारा अनुमानसेभी ।। ४३ ॥ स्मृतिद्वारा अनुमान होनेसेभी बुद्धिकी प्रधानता है क्योंकि स्मृति- ९२ सांख्यदर्शन। से अनुमान करना युद्धिका कार्य है अन्य इन्द्रियका नहीं है ॥ ४३ ॥ संभवेन्नस्वतः॥४४॥ आपसे संभव न होगा ॥४४ ॥ जो यह कहा जाय कि, स्मृति पुरूपकी वृत्तिहै इसका उत्तर यह है कि, आपसे पुरुपमें स्मृति होना संभव न होगा अर्थात् विना बुद्धि पुरु- पमें स्मरण न होगा अथवा जो यह कहा जाय कि, बुद्धि मुख्य करण है इससे बुद्धिमें सब ज्ञान होना चाहिये इसके उत्तरमें यह कहा कि विना चक्षु आदि करणोंके द्वारा बुद्धिका आपसे करण होना संभव न होगा विमाचक्षु आदि बुद्धिका करण होना सिद्ध नहीं होता अन्यया अंधे आदिकोभी रूप आदिका ज्ञान होना चाहिये यह अर्थ व भावहै।।४४ आपेक्षिकोगुणप्रधानभावः क्रियाविशेषात् ॥ ४५॥ क्रियाविशेपसे गुणप्रधानभाव आपेक्षिकहै ॥ ४५ ॥ आपेक्षिकहै अर्थात् एक दूसरेकी अपेक्षा अपने अपने क्रियाविशेषसे प्रधान है यया बाह्यइन्द्रियोंके व्यापारमें मन मनके व्यापारमें अहंकार अहंकारके व्यापारमें बुद्धि प्रधान है ॥ ४५ ॥ तत्कार्जितत्वात् तदर्थमभि- चेष्टालोकवत् ॥ ४६॥ उसके कमसे आर्जित (प्राप्त वा लब्ध) होनेसे लोकके तुल्य उसके अर्थ व्यापार होता है ।।४।। उसके (पुरुपके ) कर्मसे अर्जित (उन्ध वा प्राप्त ) कियाहुवा जो, करणहै उस्का उसके अर्थ अर्थात् उसी पुरुषके अर्थ लोकके तुल्य व्या

भापानुवादसहित।
पार होताहै अर्थात् यथा लोकमें जिस पुरुषसे मोललेने आदि कर्मसे
कुठार आदि करण अर्जित होता है उसी पुरुषके अर्थ उस्का काटने आ-
दिका व्यापार होता है अर्थात् उसी पुरुपके काम आताहै इसी प्रकारसे
पुरूपके सन्निधि वा संयोगहीसे बुद्धिकी उत्पत्ति व बुद्धिमें शक्ति होने
बुद्धि पुरूषहीका कारण है पुरुषहीके अर्थ उस्का व्यापार है यद्यपि
कूटस्थतासे पुरूपमें कर्म नहीं है तथापि यथा योधाओंका जय पराज-
य राजाका जय पराजय कहा जाताहै इसीप्रकारसे पुरुषके भोक्ता व
स्वामी होनेसे पुरुषका कर्म उपचारसे कहाहै ॥ ४६ ॥
समानकर्मयोगे बुद्धःप्राधान्यं
लोकवल्लोकवत्॥४७॥
समान कर्मयोगमें बुद्धिकी प्राधान्य है लोकके
समान लोकके समान ॥४७॥
यद्यपि पुरुषके अर्थ साधन भावसे सब करण कर्म योगमें समान है तथा-
पि पद्धिकी प्रधानता है जैसे लोकमें सब राजाके भृत्य राजाके सेवक हो
नेके भावसे समान हैं तथापि जो राजाका मंत्री वा कार्यका अधिकारी
होता है वही प्रधान होता है और सब उसको आज्ञाकारी व आधीन हो-
ते हैं इससे बुद्धि सबमें उत्कृष्ट महत्त्व है।॥ ४७ ॥
इति श्रीप्रभुदयालुशास्त्रविनिर्मिते सांख्यदर्शने देशभापाकृतभाप्पेद्वि-
तीयोऽध्यायस्समाप्तः ॥२॥
इसके उपरांत प्रधानके स्थूल कार्य महाभूतशरीरका वर्णन व विवि.
पेरित गदि बाल साप्त, गायनाक देत पर वैरागते. अर्थ
उसके उपरांतपर वैराग्यके गर्थ सम्पूर्ण ज्ञानसाधनके वर्णनमें तृतीय
अध्यायका प्रारंभ किया जाता है ।।
अविशेषाद्रिशेपारंभः॥१॥

९४ सांख्यदर्शन। अविशेपसे विशेपका आरंभ होताहै ॥१॥ जिन्में शांत घोर मूढ यह विशेषण नहीं है ऐसे जो अविशेष पंच- तन्मात्रा शब्द स्पर्श रूप रस गंध हैं उनसे विशेष स्थूल महाभूतोंका आरंभ होता है अर्थात् मात्रोंकी अविशेष संज्ञा है स्थूल भूतोंकी विशेष संज्ञा है पंच मात्रोंसे स्थूल भृतोंकी उत्पति होती है यह अर्थ है ॥१॥ पूर्व अध्यायसे लेकर यहाँतक तेईसतत्वोंको कहिकर अब शरीरकी उत्पत्ति कहते हैं। तस्माच्छरीरस्य ॥२॥ तिससे शरीरका ॥२॥ तिससे अर्थात् उक्त (कहेहुए) सूक्ष्म स्थूल तेईस २३ तत्वसे शरीरका आरंभ होता है अर्थात् शरीरकी उत्पत्ति होती है आरंभ होने शब्दकी पूर्व सूत्रसे अनुवृत्ति होती है ॥ २ ॥ तद्वीजात्संमृतिः॥३॥ उसके वीजसे संसृति होती है ॥३॥ उसके (शरीरके ) वीजसे अर्थात् शरीरका बीज जो २३ तेईस तत्त्वरूप सक्ष्म शरीर है उससे पुरुपकी संसृति ( गमनागमन ) होती है यद्यपि पूर्वोक्त हेतुओंसे पुरुषका आपसे गत आगत होना संभव नहीं होता परन्तु उपाधि अवस्थाभेदसे जैसा पूर्वहीं कहा गया है पुरुषका गमन आगमन होता है अर्थात् उपाधिसे पुरुष पूर्वकृत कर्म फलके भोगके अर्थ देह त्यागकर अन्य देहको जाता है ॥ ३ ॥ अस्विकाचर्तनमविशेषाणाम् ॥४॥ अविवेकसे विशेपोंका प्रवर्तन होता है ॥४॥ अविवेकसे अविशेष अर्थात् ईश्वरत्व अनीश्वरत्व आदि विशेषता रदित सब पुरुषोंको जबतक विवेक नहीं होता प्रवर्तन अर्थात् संसृत्ति भापानुवादसहित। है विवेकके उत्तर संमृतिका नाश होता है ॥ ४ ॥ विनाविवेक के नाश न होनेका हेतु क्या है यह वर्णन करते है ॥ उपभोगादितरस्य॥५॥ इतरके उपभोगसे ॥६॥ तर विवेकीसे भिन्न जो अविवेकी है उसके उपभोगसे अर्थात् नीको कियेहुए कर्मका फलभोग अवश्य होनेसे अज्ञानीकी संमृ. नाश नहीं होता ॥५॥ सम्प्रतिपरिमुक्तोद्वाभ्याम् ॥६॥ वर्तमान संसृति कालमें दोनोसे मुक्त होता है ॥६॥ संमृति कालमे दोनोंसे अर्थात् शीत उष्णके सुख दुःस भादि द्वंदसे प मुक्त अर्यात् रहित होजाता है ॥६॥ मातापितॄजस्थूलप्रायशइतरन्नतथा ॥७॥ वाहुल्यसे स्थूल शरीर मातापितासे उत्पन्न है इतर वैसा अर्थात् ऐसा नहीं है ॥७॥ वाहुल्यसे बाहुल्यकरके वा अर्थात् अधिकतासे वा बहुधा स्थूल शरीर मातापितासे उत्पन्न है वाहुल्यसे इससे कहा है कि कही तपोवल आदि कर्म विशेषसे विना योनिमी स्थूल गरीर होना सुना जाता है सामान्यसे मातापितासे स्थूल शरीर उत्पन्न होता है इसप्रकार इतर सूक्ष्म नहीं है अर्थात् सूक्ष्म शरीर मातापितासे उत्पन्न नहीं होता ॥ ७ ॥ पूर्वोत्पत्तेस्तत्कार्यत्वंभोगादेकस्यनेतरस्य॥८॥ सृष्टिकी आदिमे जिस्को उप्तत्ति है ऐसे लिंगशरीर- हीको एकका भोग होनेसे अन्यको न होनेसे ९६ सांख्यदर्शन। उस्का कार्यत्व ( सुखदुःख ) है॥८॥ सृष्टिमी आदिमें सूक्ष्म लिंगशरीर जो उत्पन्न होता है उसीका सुख दुःख कार्य संयुक्त होना सिद्ध होता है क्योंकि लिंग शरीर- हीको सुख दुःखका भोग होता है स्थूल मृतशरीरमें सुख दुःखका अभाव होता है इससे स्थूलमें भोग होना सिद्ध नहीं होता ॥ ८ ॥ सप्तदशैकंलिङ्गम् ॥९॥ सतरह तत्वका लिङ्गशरीर होताहै ॥९॥ ग्यारह इन्द्रिय पांच तन्मात्रा व बुद्धि यह सतरह तत्वसंयुक्त लिंग- शरीर होता है अहंकारको लिंगशरीरमें बुद्धिके अंतर्गत मानकर भिन्न नहीं कहा ॥ ९॥ व्यक्तिभेदः कर्मविशेपात् ॥१०॥ व्यक्तिभेद कर्मविशेपसे होताहै ॥१०॥ कर्मविशेषसे व्यक्तिभेद अर्थात् पुरुष स्त्री पशुयोनि आदि शरीरोंका भेद होता है कर्म अनुसार कर्म भोगके अर्थ नाना प्रकारके शरीर होते हैं यह भाव है |॥ १० ॥ तदधिष्ठानाश्रयेदेहेतद्वात्तद्वादः ॥ ११॥ उसके अधिष्टानके आश्रय देहमें उस्के पादसे उस्का वाद है ॥ ११॥ उसके अर्थात् लिंगके अधिष्ठान ( आश्रय ) देहमें अर्थात् लिंगका आश्रय जो सूक्ष्म पंचभूत रचित देहहे जिसका आगे वर्णन होगा उस्का आश्रय जो पट्कौशिक देहहै उस्में उस्के वादसे अर्थात् लिंगके अधि- 'हान देहके वादसे उस्का वाद है अर्थात् पाटकौशिक जो स्थूल देहहै, उस्का वाद है यह अर्थ है लिंगके सम्बंधसे अधिष्टानका देह होना सिद्ध होताहै य अधिष्ठानका आश्रय होनेसे स्थूलका देह होना सिद्ध होताहै यह -- . भाषानुवादसहित । ९७ भावार्थ है इस प्रकारसे तीन शरीर सिद्ध होते हैं अन्यत्र जो लिंगशरीर व स्थूल शरीर दोही वर्णन किया है तीसरा अधिष्ठान शरीर जो लिंग शरीरका आश्रय (स्थान ) है नहीं कहा उस्का हेतु यह है कि लिंग- शरीर व मधिष्ठानशरीर दोनोंके सूक्ष्म होने व आधार माधेयभावसे वर्तमान होनेसे अधिष्ठानको लिंगशरीरके अंतर्गत मानकर एकही मा- ना है ॥ ११ ॥ शंका-स्थूलशरीरसे भिन्न लिंगशरीरका अधिष्ठानरूप तीसरे शरीर कल्पना करनेकी क्या मावश्यकता है उत्तर- नस्वातंत्र्यात् तहते छायावच्चित्रवञ्च ।।१२।। छायाके समान व चित्रके समान विना उसके स्वतंत्र (स्वाधीन) न होनेसे ॥ १२॥ लिंगशरीर उस्के विना अर्थात् अधिष्ठान शरीरके पिना, स्वतंत्रतासे (विना अन्य आश्रयके आप अपने सामर्थ्यसे ) नहीं रह सकता यथा छाया निराधार नहीं रहती चित्र निराधार स्थिर नहीं होता अथवा नहीं रहता इसीप्रकारसे विना अधिधान लिंगशरीरका न रहना अनुमान किया जाता है स्थूल देह त्यागकर लोकान्तरके गमनके अर्थ लिंग देहका माधारभूत अन्यशरीर अनुमानसे सिद्ध होता है ॥ १२ ॥ शंका-लिंगशरीर मूर्तिमान होनेपरभी वायु आदिके तुल्य माका शही माधारमें रहै अन्य शरीर कल्पना करना मिथ्या है. उत्तर- मूतत्वेपि नसंगात योगात तरणिवत् ॥१३॥ मूर्तहोनेपरभी नहीं होता संगसे योगसे सूर्यके समान होताहै ॥ १३॥ मूर्तिमान होनेपरभी स्वतंत्रतासे विना संग स्थिर नहीं हो सकता सूर्यके तुल्य यथा प्रकाशरूप तेजवान सूर्य आकाश संचारी है परन्तु

९८
सांख्यदर्शन।
विना पार्थिव द्रव्यके स्थिर नहीं है यह अनुमानसे सिद्ध होताहै क्योंकि
पिण्डरूप मूर्तिमान् द्रव्य होना पार्थिव द्रव्यमें होना विदित होता है इस-
से सूर्य मादि, तेजवान सब पार्थिव द्रव्यके संगही अवस्थित हैं इसी प्रका-
रसे लिंगशरीर सत्वप्रकाशमय है वह भूतोंके संगमें स्थिर होता है
गमन आगमन करता है ॥ १३ ॥
अणुपरिमाणं तत्कृति श्रुतेः ॥१४॥
कृति श्रुतिसे वह अणुपरिमाण है ॥ १४ ॥
कृति श्रुति जो क्रिया वर्णनमें श्रुति है उससे वह अर्थात् लिंग शरी-
रसूक्ष्म अणु 'परिमाण परिच्छिन्न है श्रुति यह है " विज्ञान यज्ञ तनुते क-
मणि" इस श्रुतिमें बुद्धिकी प्रधानतासे विज्ञान संज्ञालिंगकी वर्णन कियाहै
अर्थात् विज्ञान ( लिंग ) अनेक कर्म कर्ता है तथा लिंगशरीरके क्रियामें
यह श्रुतिहै "तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनुकामति प्राणमनुक्रामन्तं सविज्ञानी भ.
पति, अर्थ-उसके पुरुपके निकरते हुये अर्थात् शरीरसे गमन करते हुये,
प्राण गमन करता है प्राण निकरते वा जात हुये लिंगशरीर संयुक्त हो
ता है अर्याद लिंग सहितही जाता है इससे लिंग शरीरका अणु व परि
च्छिन्न होना सिद्ध होता है क्योंकि विभु (व्यापक ) में क्रिया नहीं है
सकती ॥ १४ ॥ अब परिच्छिन्न होनेमें दूसरा हेतु वर्णन करते हैं
तदन्नमयत्वश्रुतेश्च ॥ १५॥
उसके अन्नमय होनेकी श्रुतिसे भी ॥ १५॥
उसके अर्थात् लिंगके अन्नमय होनेकी श्रुति होनेसे एकदेशीय सू
क्षम होना सिद्ध होताहै अन्न आदिके कार्य रूपका विभु होना संभव न
ही देर श्रुति यह है "न्नमयहि सौम्य मन परे मयः समस्तेजी
वाकू" इत्यादि अर्य हे सौम्य अत्रमय मन है जल मय प्राण तेजमयी वा
क है इत्यादि यद्यपि मन आदि भौतिक नहीं हैं तथापि अन्न आदिसे
उत्पन्न सजातीय मंश पूरण होनेसे अन्नमय होने मादिका व्यवहार
होताहै यह समझना चाहिये ॥ १५ ॥

भाषानुवादसहित । पुरुषार्थसंमृतिर्लिंगानां सूपकारवद्राज्ञः॥ १६॥ लिंगोंकी संमृति पुरुपके अर्थ राजाके सूपकार (रसोईवनानेवाले) केसहश है ॥ १६॥ जो यह शंका होवे कि अचेतन लिंगोंको संमृति देइसे देहान्तरमें जा- ने की किस निमित्तहै इसके उत्तरके लिये यह कहा कि यया राजाके लिये राजाके सुपकारोंका पाकशाला (रसोई घर ) में जानाहोता है इसी प्रकारसे लिंग शरीरोंकी संमृति पुरुपकै अर्थ होती है यह सूत्रका भाव है ॥ १६ ॥ सूक्ष्म शरीरको कहा अब स्थूल शरीरका विचार करते हैं पांचभौतिको देहः ॥१७॥ पंचभूतरचित देह है ॥ १७ ॥ पांच भूत जो पृथिवी जल तेन वायु माकाश हैं इनसे बनाना देह है अर्थात् इन पांच भूतसंयुक्त परिणामरूप कार्य देह है ॥ १७ ॥ चातुभौतिकमित्येके ॥ १८॥ कोई चातुभौतिक मानते हैं ॥ १८ ॥ कोई आकाशके आरंभक न होनेसे पृथिवी जल तेज वायु चारही भू- तोंसे देहकी उत्पत्ति मानते हैं अर्थात् चारही भूत सम्बंधी देहकी उत्पत्ति यह मानते हैं ॥ १८ ॥ एकभौतिकमित्यपरे ।। १९ ।। कोई एकही भूतसे उत्पन्न मानते हैं ॥ १९ ॥ कोई एक भूत मुख्य पृथिवी भूतसे शरीरकी उत्पत्ति मानते हैं अय- पा मनुष्य मादि में पृथिवी सत्यके अधिक होनेसे पृथिवीमय सूर्य मा दिमें तेज अधिक होनेसे एकतल तेजको मानकर तेनमय कहते हैं अ.

सांख्यदर्शन। र्थात् एक भूत जो अधिकहै उसीको मुख्य व अन्य भूतोंको उपष्टम्भक (स्थितिके सहायक ) मात्र मानते हैं ॥ १९ ॥ नसांसिद्धिकं चैतन्यं प्रत्येकादृष्टेः ॥ २० ॥ पृथक् भूतमें न देखे जाने अथवा ज्ञात न होनेसे स्वाभाविक चैतन्य नहीं है ॥२०॥ पृथक पृथक् पृथिवी आदि भूतोंमें चेतन होना न देखनेसे यह बोध होता है कि भौतिक अर्थात् पंचभूतसे रचित देहका चेतन होना स्वाभा- विक नहीं है किन्तु औपाधिक मात्र है ॥२० ॥ प्रपंचमरणाद्यभावश्च ॥ २१ ॥ और प्रपंचके मरण आदिका अभाव होता ॥ २१॥ जो देहका चैतन्य स्वाभाविक होता तो प्रपंचके मरण आदिका अर्या- त् मरणे व सुपुप्ति अवस्था प्राप्त होनेका अभाव होता देहका चैतन्यर- हित होनाही मरण व सुपुत्ति होना है स्वाभाविक चेतनता होने में मरण सुपुप्तिका होना संभव नहीं होता क्योंकि स्वाभाविक गुण जव द्रव्यक नाश होता है तभी नष्ट होता है द्रव्यके रहने में उसका नाश नहीं होता श- रीर बने रहनेमें मरण आदि होनेसे देहका स्वाभाविक चेतन होना सिद्ध नहीं होता ॥ २१ ॥ मदशक्तिवच्चेत् प्रत्येक परिदृष्टे सांहत्येतदुद्भवः॥ २२॥ मद शक्तिके सदृश होवै प्रत्येक परिदृष्ट होनेपर मिलेहुयेमें उसकी उत्पत्ति संभव है ॥२२॥ जो यह शंका होवै कि यथा मादक शक्ति भिन्न द्रव्योंमें विदित नहीं होती मिलित द्रव्योंमें प्रकट होती है इसी प्रकारसे शरीरमें चैतन्य माना भाषानुवादसहित। जावै इसपर यह कहा है कि प्रत्येक परिदृष्ट होने पर मिले हुएमें उस्की उत्पत्ति होती है अथवा उस्की उत्पत्ति संभव है अर्थात् जो प्रत्येको कारण भावसे प्राप्त है यद्यपि सूक्ष्मता उस्का प्रत्यक्ष न होवै वही मिले हुये पदार्योंके कार्यरूप द्रव्यमें प्रकट होता है जो प्रत्येकमें परिदृष्ट नहीं है वह मिले हुएमेंभी प्रकट नहीं हो सकता मादक द्रव्यमें मादकता शक्ति उत्पन्न होनेके दृष्टांतमें प्रत्येक पदार्थमें जिससे मिलकर मादक वा मद्य द्र- व्य बनता है शास्त्र प्रमाण व अनुभवसे सूक्ष्म मादकता शक्ति होना सि- द्ध होता है व सिद्ध है शरीरके प्रत्येक भूतोंमें सूक्ष्मतासेभी चैतन्य होना किसी प्रमाणसे सिद्ध नहीं है इससे मिले हुये भूतोके कार्यशरीरमें चैतन्य होना संभव नहीं है जो समुचित्त भूतोंके कार्य होनेसे प्रत्येकभूतों- में होनेका अनुमान किया जाय तो उत्पन्न हुवा चेतन अनित्य होगा 'श्रुति व अनुमान प्रमाणसे चेतन एकरस नित्य होना सिद्ध होता है बि- ना नित्य होनेके कर्म फल भोग व विनाकर्मके दुःख सुख भाग फल होना असंभव है इससे अनेक भूतोंमें अनेक चैतन्य शक्ति कल्पना करनेसे एकही प्रमाण सिद्ध नित्य चित्त स्वरूप मानना उचित है॥२२॥ शरीरका वर्णन करिकै पुरुषार्थ प्राप्त होनेके विषयमें वर्णन करते हैं ज्ञानान्मुक्तिः॥ २३ ॥ ज्ञानसे मुक्ति है ॥ २३॥ ज्ञानसे मुक्ति होती है अर्थात् जन्ममरण क्लेशके त्याग हेतु विवेकसे आत्मतत्व विचारनेमें अज्ञानकी हानि व तत्त्वज्ञानके लाभसे मुक्ति होती है बंधो विपर्ययात् ॥ २४॥ विपर्ययसे बंध ॥२४॥ विपर्ययसे अर्थात् ज्ञानके विपरीत अज्ञान वा अविषेकसे मुखदुःखात्मक पबंध होता है ज्ञान व विपर्यपसे मुक्ति व बंध कहकर ज्ञानसे मुक्ति हो- नेका विचार करते है ॥ २४ ॥ , :

१०२ सांख्यदर्शन। नियतकारणत्वान्न समुच्चयविकल्पौ ॥ २५ ॥ नियतकारणहोनेसे समुच्चय विकल्प नहीं है ॥२५ ॥ यद्यपि विद्या व अविद्या सहित दोनों कर्म वेदमें सुने जाते हैं तथापि अविवेककी निवृत्ति व तत्वज्ञानका होना नियत कारण मोक्षका सिद्ध हो. नेसे अविद्याकर्म सहित जो ज्ञान है उस्का मोक्षके प्राप्तकरनेमे समुच्चय विकल्प दोनों नहीं हैं अर्थात् अविद्याके कर्म सहित जो ज्ञान है न वह अवश्य करिके मोक्ष माप्त करसकताहै न यही कहा जायसकता है कि कभी मात करताहै कभी नहीं प्राप्त करता अर्थात् अविद्या कर्मके सहित जो ज्ञान है उससे किसी प्रकारसे मोक्ष होना संभव नहीं है केवल अवि- वैक रहित ज्ञान मोक्षका नियत कारण है ॥ २५ ॥ समुच्चय विक ल्पका दृष्टांत कहते हैं। स्वप्नजागराभ्यामिव मायिकामायिका भ्यां नोभयोमुक्तिः पुरुपस्य॥ २६ ॥ जैसे स्वप्न व जायतसे ऐसेहीमायिक व अमायिकोंसे दोनोंमें पुरुपकी मुक्ति नहीं है ॥२६॥ जो मायाका कार्य वा माया सम्बंधी हो वह मायिक कहा जाता है यहां अभिप्राय असत्य होनेसे है अमायिक वह है जो स्थिर होव सत्य हो मायिक कर्मकी संज्ञा समायिक ज्ञानकी संज्ञा है यथा स्वप्नके म. सत्य कार्य व जाग्रतके सत्यकार्य वा पदायोंसे पुरुषार्पकी सिद्धि नहीं हो ती क्योंकि यद्यपि स्वप्नकी अपेक्षा जाग्रत सत्यही है परन्तु कूटस्प नित्य पुरुपकी अपेक्षा असत्य है असत् पदार्थसे सत् पुरुषार्थ फलन ही होता इसी प्रकारसे मायिक जो असत् मायाका कार्य है व ममापि कजो कर्म सम्बंधी ज्ञान है इन दोनोंमे पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं है क्योकि अविद्या कर्मसहित जो ज्ञान है वह यथार्थ ज्ञान नहीं है जाग्रत . .

भापानुवादसहित। १०३
स्याकी ऐसी सत्यता है कि स्वमकी अपेक्षा सत्यहै परन्तु यथार्थमें नाश-
मान होनेसे नित्य पुरुपकी अपेक्षा असत्य है माया कर्महित निष्कर्म
तत्त्वज्ञान मोक्ष साधक है माया कार्य अनित्य है अनित्य कर्मसंयुक्त हो.
नेसे मोक्ष साधक नहीं हो सकता यह अभिप्रायहै ॥ २६ ॥ शंका उ-
पास्यके ममायिक होनेसे आत्मोपासना ज्ञान सहित तत्व ज्ञानक
मोक्षमें समुच्चय वा विकल्प होरै उत्तर-
इतरस्यापिनात्यन्तिकम् ॥२७॥
इतरकोभी आत्यन्तिक नहीं है ।। २७॥
जो यह कहा जावै कि विकल्प कारकै अन्य देव अथवा उत्कृष्ट पुरु-
पकी उपासनासे पुरुषार्थ सिद्ध होगा इसके उत्तरमें यह कहा है कि इत-
रकोभी आत्यन्तिक नहीं है अर्थात् इतर जो आत्मासे भिन्न उपास्य
(उपासना योग्य) है उस्काभी आत्यन्तिक माया रहित होना सिद्ध
नहीं होता जो उपास्यही माया रहित नहीं है उस्का उपासक माया रहित
{ होना असंभव है ॥२७॥
संकल्पितेप्येवम् ॥२८॥
संकल्पितमेभी इसीप्रकारसे ॥२८॥
संकल्पित उपास्य जो देवता आदि हैं वहभी मायिक हैं मायारहित
मही हैं क्योंकि जो शरीरवान देवता अथवा महात्माओंके शरीर है वह
'सव माया कार्य हैं क्योंकि जो इन्द्रियगोचर रूप शरीर आदि है सप
अनित्य र मायाके व्यापार हैं ।। २८ ॥ शंका यह उपासना वेदमें कहा है
"सर्व खल्विदं ब्रह्म" अर्थ यह सब निश्चय करिके ब्रह्म है इत्यादि उपासना
अथवा सिद्ध शिव विष्णु आदिकी उपासना करनेसे क्या फल,
.
उत्तर-
। भावनोपचयाच्छुद्धस्यसर्वप्रकृतिवत्॥२९॥

१०४
सांख्यदर्शन।
भावना सिद्धि होनेसे श्रद्धावानको
सव प्रकृतिके तुल्य है ॥ २९ ॥
भावना रूप जो उपासना है वह अदावान उपासना करनेवालेको
सिद्ध होनेसे उपासना करनेवाले शुद्ध पाप रहित पुरुपको प्रकृतिके तुल्य
एश्चर्य व सामर्थ्य, अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति, संहार करनेकी शक्ति प्राति
होती है परन्तु मुक्ति केवल ज्ञानहींसे होती है उपासना मादि कर्मसे
महीं होती यह भाव है ।। २९ ।। अवज्ञान जो मोक्षका हेतु है उसका
साधन वर्णन किया जाता है ।
रागोपहतियानम् ॥३०॥
रागके नाशका हेतु ध्यान है ॥३०॥
ज्ञानका प्रतिबंधक (रोकने वाला) जो विपयोंका राग अर्थात
विषयोंकी चाह अथवा प्रीति है उसके नाश होनेका हेतु ध्यान है अर्थात
ध्यान साधनसे सम्पूर्ण विषयोंके रागका नाश होजाता है यहां ध्यान,
शब्दसे धारणा ध्यान समाधि तीनों ग्रहण करना चाहिये ॥ ३० ॥
वृत्तिनिरोधात्तत्सिद्धिः॥३१॥
वृत्तिके निरोधसे उसकी सिद्धि होती है ॥३१॥
ध्येयसे भिन्न सम्पूर्ण पदार्थोंसे वृत्तियोंके रोकनेसे उसकी अर्याद
ध्यानकी सिद्धि होती है व ध्यानके सिद्ध होनेपर ज्ञानकी उत्पत्ति होती
है ध्यान भारंभ करने मात्रसे ज्ञान नहीं होता ॥ ३१॥
धारणासनस्वकर्मणातत्सिद्धिः॥३२॥
धारणा आसन व अपने कर्मसे उस्की
सिद्धि होती है ॥ ३२॥
धारणा आसन व अपने आश्रम कर्मसे उसकी अर्थात् ध्यानकी
सिद्धि होती है ॥ ३२ ॥

भाषानुवादसहित ।
निरोधच्छर्दिविधारणाभ्याम् ॥३३॥
छदि व विधारणसे निरोध होता है ॥ ३३॥
छदि वमनको कहते हैं यहां अमिप्राय श्वासके बाहर निकालनेसे है
व विधारण शब्दका अर्य विशेष धारण करना है यहां विधारणसे दो
अर्थ ग्राह्य हैं एक बाहरके वायुको भीतर धारण करना दूसरे वायुको
रोकना स्तंभन करना अर्थात् छौंदसे रेचक व विधारणसे पूरक व कुंभक
अर्थ ग्रहण करना चाहिये रेचक पूरक कुंभक द्वारा वायुका निरोध
होता है अर्थात् वायुवश होता है वायुवश होनेसे चित्त स्थिर हो ध्यानमें
एकाम होता है इससे प्राणायामसे वायुको वश करना चाहिये यह अभि-
माय है ॥ ३३ ॥
स्थिरसुखमासनम् ॥ ३४॥
जो स्थिर व सुख साधन हो वह आसन है॥३४॥
जो स्थिर व सुखका साधन है वह आसन है अर्थात् किसी आसनसे
बैठना जिसमें स्थिर रहना व सुखसे रहना साधनसे होसकै वह आसन
है व विशेष भासनके भेद व नामभी अन्य ग्रंथकारोंने लिखा है यथा
सिद्धासन पद्मासन व स्वस्तिक इत्यादि ॥ ३४ ॥
स्वकर्मस्वाश्रमविहितकर्मानुष्ठानम् ॥ ३५॥
अपने आश्रम विहितकमका अनुष्ठान करना
स्वकर्म है ॥ ३५॥
ब्रहचर्य गृहस्य वानप्रस्य सन्यास इन चार आश्रमों में जिस आश्रममें
हो उस अपने आश्रमका जो विहित कर्म है वह सकर्म है उसको करना
चाहिये ॥ ३५ ॥
वैराग्यादभ्यासाच्च ॥३६॥

१०६ सांख्यदर्शन। वैराग्यसे व अभ्याससे ॥३६॥ विना यमनियम,माणायाम, उत्तम अधिकारीयोंको वैराग्यसे व ध्यान के अभ्याससे योग सिद्ध होता है क्यों कि वृत्तियोंका रोकना चित्तका एकाम होना विषय रागका छूटना योगमें मुख्य है यह वैराग्य व अभ्याससे होजाता है अन्य जे उत्तम अधिकारी नहीं है उनको यम नियम मादि करनेसे कठिनसे योगकी सिद्धि होती है ॥ ३६॥ विपर्ययभेदाःपंच ॥३७॥ विपर्ययके भेद पांच हे ॥३७॥ अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेप, अभिनिवेश, यह पांच विपर्ययके भेद है व यही बंधके हेतु हैं अनित्य अशुचि दुःख अनात्मामें नित्य शुचि सुख आत्माका बोध करना अविद्या है आरमा अनारमाका एक होना जानना अस्मिता है यथा मैं शरीरहूं यह बोध होना, राग द्वेप प्रसिद्ध है अभिनिवेश मरण आदि त्रासको कहते हैं यह पांच विपर्यय है ' ॥ ३७ ॥ अशक्तिरष्टाविंशतिधातु ॥३८॥ अशक्ति अट्ठाईसप्रकारको है ।। ३८ ॥ विपर्यय कारणसे अट्ठाईस प्रकारकी अशक्ति है ग्यारह इन्द्रियोंका नाश होना वनव तुष्टि व आठ सिद्धिकावध होना यह अट्ठाईस अशक्ति हैं इन्द्रियोंका बंध होना बधिर होना कुष्ठ होना अंध होना नपुंसक होना मूक होना आदि ग्यारह इन्द्रियोंकी अपनी अपनी वाधा है व नवतुष्टि व आठ सिद्धियोंकि भेद आगे वर्णन किया है इस प्रकारसे अट्ठाईस मलि., २४, तुष्टिर्नवधा॥३९॥ तुष्टि नवप्रकारको है ॥३९॥' नव प्रकारके भेदको आगे सुत्रकार भापही वर्णन करेंगे ॥ ३९ . भापानुवादसहित। सिद्धिरष्टधा॥४०॥ सिद्धि आठ प्रकारको है ॥ ४० ॥ सिद्धियोंके भेद आगे वर्णन किया है ॥ १० अवान्तरभेदाःपूर्ववत्॥४१॥ अवान्तरभेद पूर्वकेसमान है ॥४१॥ ययान्तर भेद विपर्ययके पूर्वके तुल्य हैं अर्यात् जो पांच भेद अविद्या, अस्मिता, राग, देप, अभिनिवेश पूर्वही कहाहै वह विपर्ययके भेद हैं य- हां संक्षेपसे इतनाही कहा है विस्तारसे कहनमें विपर्ययके पासठ भेद है वह यह हैं अव्यक्त, महत्तत्व, अहंकार, व पांच तन्मात्रा इन आठ अनात्माओंमें आत्मबुद्धि होना जो अविद्या है यह आठ तमके भेद है अर्थात् तम आठ प्रकारका होता है इनहीं आठका अस्मिता वृत्तिसे ग्रह- ग होनेसे अष्टप्रकारका मोह होता है शब्द, स्पर्श, रूप, रस. गंध, इन पांचका दिव्य अदिव्य भेदसे ग्रहणकरनेमें राग दशप्रकारका है इसीको महामोह शब्दसे वाच्य करके दशप्रकारका महामोह होना कहते हैं अविद्या व अस्मिताके आठ विषय व रागके दश विषय अठरा विषयमें अठाराविधका तामित्र होताहै अर्थात् द्वेप होताहै और उन अटाराके 'विनाश मादिसे अठाराविधका अंघतामित्र होता है अर्थात् अभिनि वेश होता है यह वासठ भेद है ॥ ४१ ।। एवमितरस्याः॥४२॥ इसी प्रकारसे इतरके ॥४२॥ इसी प्रकारसे इतरके अर्थात् अशक्तिके अवान्तर भेद अट्ठाईस गिन- . चाहिये ॥ ४२ ॥ आध्यात्मिकादिभेदानवधातुष्टिः॥४३॥ -- १०८ सांख्यदर्शन। आध्यात्मिका आदि भेदसे नवप्रकारकी तुष्टि है ॥ १३ ॥ आध्यात्मिका आदि नव तुष्टियोंके भेद इस प्रकारसे हैं कि प्रकृति, उ. पादान, काल, भाग्य, इन चार तुष्टियोंकी आध्यात्मिका संज्ञा है यह चा- र सुष्टी व बाह्य विषय शब्द आदिमें अर्जन ( लाभकरना) रक्षण, क्ष. य, भोग, हिंसा, आदि दोष निमित्तकोंके उपरम (निवृत्ति होने ) से तुष्टि होती है इन पांच सहितनव तुष्टी है प्रकृति नामक जो तुष्टि है वह यह है कि आत्माके साक्षात्कार होने पर्यंत जो परिणाम है उसमें य ह मानना कि सब प्रकृतिही करती है में कूटस्थ पूर्णहूं ऐसी आत्माकी भावनाकरनेसे जो परितोष होताहै उसको प्रकृति तुष्टि कहते हैं व अम्भ भी कहते हैं और उससे संन्यास ग्रहण करनेसे जो तुष्टि होतीहै उसको उपादान तुष्टि व सलिलभी कहते हैं बहुत कालके समाधि व अनुष्ठानसे जो तुष्टि होती है उसको काल तुष्टि व तुष्टिरोध कहतेहैं प्रज्ञान परम काष्ठारूप धर्म मेधा समाधिमें जो तुष्टि होती है उसको भाग्य व वृष्टि क- हते हैं यह चार आध्यात्मिक तुष्टी कही जाती हैं और पांच जो पांच बाह्य विषयके अर्जन आदि दोपनिमित्तककी निवृत्तिसे जैसा पूर्वहीं कहा गया है तुष्टि होती हैं यह नव तुष्टी वा तुष्टियों है इनमें वाध होना नवतुष्टियोंकी अशक्ति कही जाती है ॥ ४३ ॥ ऊहादिभिःसिद्धिः॥४४॥ उहा आदिकोंसे सिद्धि होती है ॥४४॥ ऊहाशन्दर अध्ययन ३ आध्यात्मिक दुःखनाशष्ट आधिभौतिक दुःख- नाश५ आधिदैविक दुःसनाश६ सुहृत्प्राप्तिदान८ इन उहा आदिसे आठ सिद्धियां होती हैं विना उपदेश पूर्वसंस्कारके अभ्याससे आपसे तत विषयमें संभावना होना उहा सिद्धि है, अन्यका पाठ सुनकर अपने में शास्त्र ज्ञान हो जाना, शब्दसिद्धि है, शिप्य आचार्य भाषकारक शास्त्र अध्ययनसे तत्त्वज्ञान होना अध्ययनसिद्धि है अनायास अपने घरमें

भाषानुवादसहित। १०९
परम दयालु अपने उपदेशको प्राप्त हो जानेसे उपदेश लाभ होना सु-
हत्माप्ति सिद्धि है, धन आदि दानसे प्रसन्न कारकै उपदेश लाभ करना
दान सिद्धि है आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिकका पूर्वही वर्णन
किया गया है आध्यात्मिक आदि दुःखोंका नाश होना आध्यात्मिक
आदि सिद्धियां हैं इनमें बाधा विघ्न होना अष्टसिद्धि अशक्ति कही
जाती है शंका-ऊहा आदिहीसे अष्ट सिद्धि क्यों कही गई हैं योगतप-
पलसे अणिमा आदि अष्टसिद्धि होनेका प्रमाण है. उत्तर-
नेतरादितरहानेनविना ॥४५॥
विना इतरके हान इतरसे भिन्न नहीं है ॥ ४५ ॥
इतरसे अर्थात् ऊहन आदि पांचसे भिन्न तप आदिसे साविकी
सिद्धियां नहीं है क्यों नहीं हैं विना इतरके हान होनेसे अर्थात् इतर
जो विपर्यय ( असत् ज्ञान ) है विना उस्के हान ( नाश) के वह
सिद्धियां होती हैं इससे वे केवल संसारी मूढ जनोंको सिद्धियां भा-
सित होती है परन्तु यथार्य तात्विकी सिद्धियां नहीं हैं।॥ ४५ ॥ समाष्टि
सृष्टिको वर्णन करिकै अब व्यष्टि सृष्टिको वर्णन करते हैं.
देवादिप्रभेदाः॥४६॥
देव आदि हैं भेद जिसके ऐसी सृष्टि है ॥४६॥
देव आदि भेद संयुक्त यह सृष्टि है अर्थात् ब्राह्म प्रजापति इन्द्र पि
तर गंधर्व यक्ष राक्षस पिशाचकी सृष्टि दैव सृष्टि है पशु मृग पक्षी
सर्प स्थावर यह तैर्यग्यौनि सृष्टि है व मानुष्य एकही प्रकारकी सृष्टि
है यह दैव आदि मृष्टिके भेद हैं ॥ ४६॥
आब्रह्मास्तम्बपर्यन्तंतत्कृतास-
ष्टिराविवेकात् ॥४७॥

११० सांख्यदर्शन। ब्रह्मासे स्थावर पर्यंत उससे की गई सृष्टि विवेकपर्यंत पुरुषार्थरूप होतीहै ॥४७॥ ब्रह्मासे आरंभ करिक स्यावर पर्यंत उससे अर्थात् प्रकृतिसे कीगई व्यष्टि सृष्टिभी समष्टिरूप विराट सृष्टिके तुल्य पुरुपोंको विवेकपर्यंत पुरुषार्थक अर्थ होतीहै अर्थात् पुरुपार्यकेलिये उपयोगी होती है ॥ ४७॥ ऊर्दू सत्वविशाला॥४८॥ उर्द्धमें सत्वगुण अधिक युक्त सृष्टि है ॥४८॥ ऊर्ध्वमें भूलोकके ऊपर सत्वगुणयुक्त अधिक सृष्टि है अर्यात भूली- कके ऊपर जो सृष्टि है उसमें सत्वगुण अधिकक है ॥ ४० ॥ तमोविशालामूलतः ।। ४९॥ नीचे तमोगुण अधिक युक्त सृष्टि है ॥४९॥ भूलोकसे नीचे जो सृष्टि है उसमें तमोगुण अधि है ॥ ४९ ।। मध्यरजोविशाला ॥५०॥ मध्यमे रजोगुण अधिकयुक्त सृष्टि है ॥५०॥ मध्यमें भूलॊकमें जो सृष्टि है उसमें रजोगुण अधिक है ॥ ५० शंका-प्रकृति एक है एकके चित्र विचित्र सृष्टि करनेका हेतु क्या हैउत्तर कर्मवैचित्र्यात्प्रधानचेष्टागर्भदासवत् ॥५१। कर्मकी विचित्रतासे प्रधानकी चेष्टा गर्भ दासके समान है ॥५१॥ विचित्र कर्म निमित्तहीसे प्रधान अर्थात् प्रकृति विचित्रकार्य करनेव चेष्टा करती है जैसे जो आदि गर्भअवस्थासे दास है वह अपन भापानुवादसहित। सेवा करनेकी प्रवीणतासे स्वामीके अर्थ नाना प्रकारकी चेष्टा सेवामें करता है ॥ ५१ ॥ आवृत्तिस्तत्राप्युत्तरोत्तरयोनियोगाद्धयः ॥५२॥ तिस्मेंभी आवृत्ति है एक एकसे उत्तर यौनिके योग होनेसे त्यागके योग्य है ॥५२॥ तिस्में अर्थात् पूर्वक्ति ऊर्ध्वलोकमें अर्थात् स्वर्ग महः जनः तपलोकमें प्राप्त होनमेंभी आवृत्ति है वहाँसे फिर पतित होता है एक एको उत्तर अर्थात् फिर एक एकके पश्चात् योनिके योग होनेसे नीचेसे नीचमें जन्म होनेसे ऊर्ध्वलोकभी त्यागके योग्य हैं ॥ ५२ ॥ समानंजरामरणादिजंदुःखम् ॥५३॥ जरा मरणादिसे उत्पन्न दुःख समान है ॥५३॥ ऊर्ध्व व अधोगतवालोंको ब्रह्मासे स्थावरतकको जरामरणसे उत्पन्न दुःख सबको है इससे सब त्यागके योग्य है ॥ ५३॥ नकारणलयात्कृतकृत्य तामग्नवदुत्थानात् ॥५४॥ कारणमें लय होनेसे कृतार्थता (कृतार्थ होना) नहीं है मग्न (डूबेहुये) के समान फिर उठनसे ॥ ५४॥ विना विवेक जब प्रकृतिके उपासनासे महत्तत्वादिमें वैराग्य होता है तब उपासक प्रकृतिमें लय होता है वैराग्यसे प्रकृतिमें लय होनेपरभी कृतार्यता नहीं होती जैसे जळमें डूबाहुवा फिर उठता है इसीप्रकारसे' प्रकृतिमें लीनपुरुष ईश्वरभावसे अर्थात् ब्रह्मा विष्णु आदिरूपसे फिर उत्पन्न होते है विना विवेक कोई कर्म व उपासना दोष नाश करने में समर्थ सांख्यदर्शन। नहीं है ॥ ५४ ॥ अब यह शंका है कि कारणरूप प्रकृति किसीका कार्य नहीं है कि अन्य कारणके आधीनही स्वतंत्र होकर अपने उपास- कोंका फिर दुःख निदानरूप उत्यानको क्यों करती है.उत्तर- अकार्यत्वेपितद्योगःपारवश्यात् ॥५५॥ कार्य न होनेमेंभी उस्का योग है परवश होनेसे ॥५५॥ यद्यपि प्रकृति कार्य नहीं है तथापि कार्य न होनेमेंभी उस्का अर्याद प्रकृतिमें लीनके फिर उत्थान होने अर्थात् उत्पन्न होनेका योग हैं क्यों योग है परवश होनेसे अर्थात् पुरुपोंके कर्मसंस्कारपर पुरुषके आधीन होनेसे भाव इस्का यह है कि विना पुरुषोंके कर्मसंस्कार व चेतन पर पुरुष (परमात्मा )के संयोग जड प्रकृति सृष्टि करने में समर्थ नहीं है पुरुकि कर्मसंस्कार रूप अदृष्ट संयुक्त होनेपरभी जड प्रकृति विना चेतन पुरुपके संयोगसृष्टि नहीं करसकती इससे स्वतंत्र नहीं है यद्यपि पुरुषके इच्छाके आधीन न होने व पुरुपके अकर्ता प्रतिपादन किये जानेसे स्वतंत्र कही गई है तथापि चेतनकी सनिधि बिना समर्थ न होनेसे स्वतंत्र ( सर्वथा स्वतंत्र) नहीं है परपुरुषकी सन्निधि मात्रसे बिना इच्छा सम्बंध स्वाभाविक धर्मसे जैसे अयस्कान्त (चुम्बक) से लोहा प्रेरित होकर क्रिया प्रवृत्त होता है इसीप्रकारसे पुरुषसे प्रेरित प्रकृति सृष्टि उत्पत्तिमें प्रवृत्त होती है इससे कार्य न होनेपरभी पुरुषके आधीन है जो यह संशय हो कि यहाँ अयस्कांत (चुम्बक) के तुल्य प्रवृत्तिका निमित्त मात्र माननेका क्या हेतु है सूत्र में परवश होना मात्र कहा है इससे परमात्माईश्वरको इच्छाके आधीन प्रकृति है यही अर्थ ग्रहण करना योग्य है इस्का उत्तर यह है कि पूर्वही अपनी इच्छासे सृष्टि उत्पन्न करनेवाला ईश्वर सिद्ध होनेका निषेध किया है ऐसा अर्थ ग्रहण करनेमे। 'पूर्वापर विरोध होगा इससे अयस्कान्तहीक तुल्य पुरुषके प्रेरक होने व लोहेके तुल्य प्रकृतिका प्रवृत्त होने में आधीन मानना कहनेका अभिप्राय समझना उचित है परपुरुषकी सन्निधि व पुरुषों के कर्म प्रकृतिक प्रवृत्त भाषानुवादसहित । होने में प्रेरक होनेसे प्रकृतिमें लीन पुरुपोंके संस्कार क्षय न होनेसे मक- ति उनको फिर उत्पन्न करती है अब वह परपुरुष जिस्की सनिधि मात्र- से प्रेरित होनेसे प्रकृति सृष्टि उत्पन्न करनेमें समर्थ होती है कैसा है य- ह वर्णन करते हैं ॥ ५५ ॥ सहिसर्ववित्सर्वकर्ता ॥५६॥ वह निश्चयसे सर्वज्ञ व सबका कर्ता है ॥५६॥ वह परपुरुप निश्चयसे सर्वज्ञान शक्तिमान सर्वकर्तृत्व शक्तिमान अर्थात् सब करने में समर्थ है अर्थात् सर्वज्ञ तो अपने स्वरूपहीसे है प अ- यस्कान्तकी तुल्य सन्निधिमानसे प्रेरक होनेसे व उस्की प्रेरणा व ज्ञान शक्तिको प्राप्त हो प्रकृति सम्पूर्ण सृष्टिका कारण होनेसे मुख्य आदि सृष्टिकानिमित्त कारण पुरुषही सिद्ध होनेसे पुरुप सबका कती है यह भा- ५ है इसपर यह संशय होता है कि पूर्वही यह कहाँहै कि ईश्वरका सृष्टि करना सिद्ध नहीं होता और यहां सर्वज्ञ सर्व कर्ता कह से ईश्वरके प्रति- पेधमें विरोध होगा इस्के उत्तरमें यह कहा है कि- ।। ५६ ।। ईदृशेश्वरसिद्धिःसिद्धा॥५७॥ ऐसे ईश्वरकी सिद्धि सिद्ध है ॥२७॥ इस प्रकारकी अर्थात् सन्निधि मात्रसे प्रकृतिका प्रेरक व सृष्टिका निमित्त कारण होनेवाले ईश्वरकी सिद्धि सिद्ध है ऐसे ईश्वर माननेका प्रतिपेध नहीं किया गया अपने इच्छासे सृष्टि उत्पन्न करनेवाला अथवा उपादा- नकरण होकर सृष्टि उत्पन्न करनेवाला ईश्वरके प्रमाणसे सिद्ध होनेका प्रतिषेध किया गया है यह अभिप्राय सूत्रका ग्रहण करना ययार्थ है बहु- नरे पूर्वसूत्र व इस सूत्रका अर्थ इस प्रकारसे कहते हैं कि जो पूर्व पट उपासना व कर्म विशेपसे कारण ( प्रकृति ) में हीन हुये है वह सर्गान्तरमें अर्थात् अन्य सृष्टिमें सर्वज्ञ सर्वकर्ता ईश्वर ब्रह्मा विष्णु आदि .

सांख्यदर्शन। पुरुष होते हैं इस प्रकारके ईश्वरकी सिद्धि सिद्ध है परन्तु ऐसा अर्थ ग्रहण करना यथार्थ नहीं है क्योंकि जिनका जन्म व नाश है वह अपनी उत्पत्तिके माप अपने जन्मसे प्रथम कारण नहीं होसकते और जब आपही जन्म व नाशसे रहित नहीं है तो स्वतंत्रभी नहीं है यहभी सिद्ध होता है स्वतंत्र न होने व सदान होनेसे सर्वज्ञ व सर्वकर्ता व सर्व शक्तिमान होना- भी संभव नहीं है यद्यपि सिद्ध रूप ईश्वरोंमें सृष्टिकी सामर्थ्य हो परन्तु अपनी उत्पत्तिसे पूर्व आदि सृष्टिमें सृष्टिके हेतु नहीं होसकते इससे सिद्ध रूप ईश्वरोंके माननेसे परमेश्वरका प्रतिपेध नहीं होसकता न सूत्रकारका ऐसा भाव होना सिद्ध होता है ईश्वरके सर्वथा प्रतिपेधमें जो अर्थ इस शास्त्र के विशेष सूत्रों का कहते वा समझते हैं वह केवल भ्रम मात्र समुझना चाहिये ।। ५७ ॥ प्रधानसृष्टिःपरार्थस्वतोऽप्यभोक्त- त्वादुष्ट्रकुडमवहनवत् ॥ ५८ ॥ आपसे करनेपरभी अर्थात् प्रधानका आपले सृष्टि करनेप रभी, भोक्ता होनेका सामर्थ्य न होनेसे ऊँटका कुंकुम (केसर)लैचलनेके समान प्रधानको सृष्टि परके ( पुरुपके) लिये है ॥५८॥ जैसे ऊंट केसर लैचलता है परन्तु उसका लैचलना अज्ञान होने अपने भोगके अर्थ नहीं होता केवल स्वामीके अर्थ होता है इस प्रकारसे प्रधानका सृष्टि करना परके अर्थ अर्थात् पुरुपकेलिये है ॥ ५८॥ शंका-अचेतन प्रधानका आपसे सृष्टि करना संभव नहीं है. उत्तर- अचेतनत्वेपिक्षीरवञ्चेष्टितंप्रधानस्य॥५९ ।। अचेतन होनेभी क्षीरके समान प्रधान- का चोटित कार्य होताहै ।। ५९ ॥ .

आपानुवादसहित। ११५ जैसे क्षीर विना चेतन पुरुषके प्रयत्न आपसे दघि रूप होजाता है इसी प्रकारसे अचेतन प्रधानकाभी आपसे विना दूसरेके प्रयत्न महत्तत्व आदिके रूपमें परिणाम होता है ।। ५९ ॥ कर्मवदृष्टेकालादेः॥६०॥ अथवा काल आदिके कर्मके समान देखने (जानने) से ॥ ६ ॥ अथवा काल मादिके कर्मके तुल्य प्रधानका आपसे चेष्टाकरना सिद्ध होता है अर्थात् यह देखनेसे कि एक काल जाता है दूसरा आपसे विना चेतनके प्रयत्न आता है इसी प्रकारसे आपसे स्वभावसे विना चेत- नके प्रयत्न प्रकृतिके कर्म करनेका अनुमान होता है ।। ६० ॥ स्वभावाच्चेष्टितमनभिसंधानामृत्यवत्॥ ६१ ॥ विना अभिसंधान सेवकके समान स्वभावसे चेष्टित है ॥६॥ जैसे अच्छा सेवक स्वभाव (संस्कारही ) से आवश्यक जो प्रति- दिनकी नियत अपने स्वामीकी सेवा है उसमें प्रवृत्त होता है अपने भोगके मनोरथ वा प्रयोजनसे प्रवृत्त नहीं होता इसी प्रकारसे संस्कार स्वभावहीसे पुरुषकोलिये प्रकृतिका चेष्टित कर्म है ॥ ६१ ॥ कर्माकृष्टवानादितः ॥६२॥ अथवा कर्मके आकर्षणसे अनादिसे ॥ ६२ ॥ कर्मके अनादि होनेसे अनादि कर्म संस्कारके आकर्षणसे भी प्रधा- नकी आवश्यकी व्यवस्थित प्रवृत्ति है ॥ ६२ ॥ विविक्तबोधात्सृष्टिनिवृत्तिःप्रधान स्यमूवत्पाके ।। १३॥

११६
सांख्यदर्शन।
विविक्त पुरुपके ज्ञान होनेसे पाकमें रसोई बनाने
वालेके सदृश प्रधानके सृष्टिको निवृत्ति होती है ॥ ६३॥
पुरुषके पृथक् होनेके ज्ञान होनेसेपर वैराग्यसे पुरुषके अर्थ समाप्त
होनेपर प्रधान सृष्टि व्यापारकी निवृत्ति होती है जैसे पाक सिद्ध हो-
जानेपर पाक बनाने वालेका व्यापार निवृत्त होजाता है इसीको अत्यन्त
प्रलय कहते हैं ॥ ६३ ॥ शंका एकही पुरुपकी उपाधिमें विवेक ज्ञान
उत्पन्न होनेसे प्रकृतिकी सृष्टि निवृत्ति होनेपर सबकी मुक्ति होना
चाहिये. उत्तर-
इतरइतरवत्तदोषात् ॥६४॥
इतर इतरके तुल्य उस्के दोपसे ॥६४ ॥
इतर जो विविक्त ज्ञान रहित है वह अज्ञान अज्ञानके तुल्य बद्ध
रहता है. क्यों बद्द रहता है उसके प्रकृत्तिके दोपसे अर्थात् अज्ञानके
प्रकृत्तिके दोष निवृत्त न होनेसे अज्ञान वद्ध रहता है ॥ ६ ॥
द्रयोरेकतरस्यवौदासीन्यमपवर्गः ॥६५॥
दोनों वा एकका उदासीन होना मोक्ष है ॥६५॥
दोनों प्रकृति व पुरुषका उदासीन होना अर्थात् परस्पर वियोग होना
अथवा एक पुरुपहीका उदासीन होना कि में मुक्तहोऊ यही पुरुषा-
थता है यह विचारकर प्रकृति संयोगसे निवृत्त होना मोक्ष है ॥ ६५ ॥
अन्यसृष्टयुपरागेऽपिनविरज्यते
प्रबुद्धरज्जुतत्वस्यैवोरगः॥६६॥
अन्यके सृष्टि उपरागमें विरक्त नहीं होती यथा
केवल रस्सीके ज्ञान प्राप्त हुएको सर्प ॥६६॥

भापानुवादसहित। ११७ तत्त्वज्ञान जिसको प्राप्त हुवा उससे विरक्त होने अथवा पृथक् हो- जानेपरभी प्रकृति अन्य मूट (अज्ञानी) पुरुषमे मृष्टि उपरागकेलिये विरक्त नहीं होती अर्थात मूढके अर्थ सृष्टि उत्पन्नकरती है जैसे केवल 'उसी पुरुषको जिसको सर्प नहीं रस्सी है यह बोध होगयाहै सर्पबोध वा भ्रम रस्सीमें भ्रमसे सर्पआकार भयको उत्पन्न नहीं करता मूट जिस को चोध नहीं हुवा उस्को उत्पन्न करता है ॥ ६६ ॥ कर्मनिमित्तयोगाच्च ॥६७॥ कर्मनिमित्त योगसे भी ॥६७॥ सृष्टि होने में निमित्त जो कर्म है उस्के सम्बंधसे भी बद्ध मूढ पुरु: पके अर्थ सृष्टि करती है ॥ ६७ ॥ अव यह शंका है कि विना सब पुरु- पोंकी प्रार्थना विना अपेक्षा विशेष किसीमें प्रधानकी प्रवृत्ति किसीमें निवृत्ति होती है इसमें नियामक क्या है किस पुरुपका कौन कर्म है इसमें कोई नियामक न होनेसे कर्मका कोई नियामक नहीं है वा ज्ञात नहीं होता इसको उत्तरमें यह कहाहै- नैरपेक्ष्येऽपिप्रकृत्युपकारेऽविवेकोनिमित्तम् ६८ अपेक्षा न होनेमें भी प्रकृतिके उपकारमें अविवेक निमित्त है ॥६८॥ पुरुषाको अपेक्षा न होनेपरभी पुरुष व प्रकृति में भेद होनेका विवे- क न होनेसे यह मेरा स्वामी है यही में हैं. इस अविवेकहीसे प्रकृति सृष्टि आदिसे पुरुषोंका उपकार करती है जिस पुरुपौ व भएलेमें भेद ज्ञान होनेका विवेक प्रकृति नहीं देसती प उसमें निवेक होनेसे वासना ती है उसी में प्रकृतिको प्रवृत्ति होती है इससे प्रकृतिको प्रवृत्तिमें अविव कनिमित्त है यही नियाक है ॥ ६८ ॥ प्रश्न प्रतिके प्रवृत्ति सभा- .

११८
सांख्यदर्शन।
व होनेसे विवेक होनेपरभी निवृत्ति होना संभव नहीं होता प्रकृतिकी नि.
वृत्ति कैसे होती है. उत्तर-
नर्तकीव त्प्रवृत्तस्यापि निवृत्तिश्चरितार्थ्या६९
नर्तकी (नाचनेवाली) के तुल्य चरितार्थ किएगएकी
सिद्धि) होनेसे प्रवृत्तकीभी निवृत्ति होती है ॥ ६९ ॥
प्रधानका सामान्यसे प्रवृत्ति स्वभाव नहीं है जिस्का निवृत्त होना
संभव न हो प्रधानका प्रवृत्त होना केवल पुरुषके निमित्त है इससे पुरु.
पार्थ समाप्तिरूप चरितार्थ होनेमें प्रवृत्त प्रधानकी निवृत्ति युक्त इय-
या नर्तकी जो नृत्य दर्शनके अर्थ प्रवृत्त होती है नृत्यका मनोरथ सिद्ध
होनेपर निवृत्त होती है ॥ ६९ ॥
दोपवोधेपिनोपसर्पणं प्रधानस्य
कुलवधूवत् ॥७०॥
दोप बोध होनेहीमें कुलवधूके समान प्रधानका
उपसर्पण (पासजाना) नहीं होता ॥ ७० ॥
परिणामी होना दुःखात्मक होना आदि प्रकृतिके धर्म पुरुषसे दे
जानेसे अर्थात् समझे जानेसे लज्जाको प्राप्त प्रकृतिका फिर पुरुपके पार
जाना नहीं होता जैसे कुलवधू यह जानकर कि मेरा स्वामी मेरा दो
जान लिया लज्जित कुलवधू स्वामीके पास नहीं जाती अर्यात् प्रकृi
का दुःखात्मक होनेका बोध होनेसे फिर पुरुप बंधको नहीं प्राप्त होता
नैकान्ततोवंधमोक्षौ पुरुपस्याविवेकाहते॥७१।
विना आविवेक पुरुपको एकान्त (एकरस)
से बंध व मोक्ष नहीं है ॥७॥

भापानुवादसहित । ११९ दुःखके योग व वियोग रूप जो बंध व मोक्ष है वह पुरुषको तत्वसे सदा नहीं हैं केवल अविवेकसे हैं विना अविवेक पुरुपको बंध नहीं है। प्रकृतेराअस्यात् ससंगत्वात्पशुवत् ॥ ७२ ॥ प्रकृतिहीके साथ संग होनेसे तत्वसे दुःखसे पशुके सहश बंध होताहै ॥७२॥ प्रकृतिहीके साथ संग होनेसे अर्थात् दुःख साधन धर्म के साथ लिप्त होनेसे तवसे दुःखसे पंध होताहै अन्यथा नहीं तया संगरहित होनेसे मोक्ष होता है यया रस्सीके संग वा सम्बंध होनेसे पशुका बंध व संग र- हित होनेसे मोक्ष होता है ॥ ७२ ॥ रूपैस्सप्तमिरात्मानंबध्नाति प्रधानकोशकार वद्धिमोच यत्येक रूपेण ॥७३॥ आत्माको कुसियारीके कोडेके समान सातरूपसे प्रकृति वांधती है व एकरूपसे ठोंडाती है ।। ७३ ॥ धर्म, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य, इन सात रूप दुःख हेतुओंसे प्रकृति आत्माको बांधती है जैसे कुसियारीका कीडा अपने बनायेहुये वासस्थानसे अपने आत्माको बांधता है वही प्रक- ति एकरूपसे अर्थात् केवल एक ज्ञानसे दुःखसे आत्माको छोडाती है ७३ निमित्तत्वमविवेकस्यनदृष्टहानिः॥७॥ अविवेकके निमित्त होनेसे दृष्ट हानि है ॥७॥ बंध व मुक्ति होना जो विवेकसे कहा है उसमें यह शंका निवारणके कि बंध व मुक्ति अविवेकसे कहना ययार्य नहीं है क्योंकि अविवेक न त्यागके योग्य है न ग्रहणके योग्य है लोकमें यह दृष्ट (देखा गया वा १२० साख्यदर्शन। विदित ) है कि दुःख व उसका अभाव जो सुख है उसीसे आपही त्याग व ग्रहणके योग्य होना विदित होता है अन्यथा दृष्टकी हानि है अर्थात प्रत्यक्षसे सिद्ध हुयेकी हानि है, सूत्रमें यह कहा है कि पुरुषमें अविवे- कबंध मोक्षका निमित्त होना मात्र कहा गया है अविवेकहीं बंध व मोक्ष नहीं है इससे अविवेकके निमित्त मात्रहनिमें दृष्की हानि नहीं है||७|| अब विवेक सिद्ध होने के उपायमें अभ्यासका वर्णन किया जाता है तत्वाभ्यासान्नेतिनेतीतित्यागा द्विवेकसिद्धिः ॥७५॥ यह नहींहै यह नहींहै इस त्यागरूप तत्त्व- अभ्याससे विवेककी सिद्धि है ।। ७५ ॥ प्रकृतिपर्यन्त जड पदार्थोंमें यह नहीं है यह नहीं है (यह आत्मा नहीं है ) इस अभिमान त्यागरूप तत्वके अभ्याससे आत्माके विवेव की सिद्धि होती है भात यह विचार करनेसे कि यह मे नहीं हूँ यार शरीर जो अस्थि नाडी मांस लोहूसे बना नसे बंधा मूत्रपुरीपसे , दुगध युक्त जरा शोकसे व्याप्त रोगको स्थान है यह मिथ्या नाशम व निपिद्ध है यह मैं नहीं हूँ इस शरीरमें मोहित होना अज्ञान मात्र यथा नदीके कॅगारके वृक्ष अथवा वृक्षके पक्षीका कंगार व वृक्षसे वियों, होता है इसी प्रकारसे इस देहसे वियोग अवश्य होना है और देहा भिन्न यावत् पदार्थ हैं इन सब नाश होनेवालोंसे में भिन्न हूँ ऐसी भावना करनेके अभ्याससे आत्माके विवेककी सिद्धि होती है । ७५ अधिकारिप्रभेदाननियमः॥७६ ॥ आधेकारीयोंके भेदसे नियम नहीं है ॥७६ ॥ मन्द आदि अधिकारियोंके भेद होनेसे अभ्यास करने में इसी जन्ममें क्रियमाण अभ्यासमें विवेककी सिद्धि होती है यह नियम नहीं है इससे A. भाषानुवादसहित। १२१ अभ्यासमें परिश्रम व साधन विचार विशेष कारकै मात्मज्ञानमें अधिकार प्राप्त करना उचित है ।। ७६ ॥ बाधितानुवृत्त्यामध्यविवेकतोऽप्यपभोगः॥७७॥ बाधितोंकी अनुवृत्तिसे मध्य विवेकसे भी अपभोग है॥७७॥ मन्द मध्यम, उत्तम विवेकके भेद है उत्तम विवेकसे असम्प्रज्ञात योग होता है जिसमें सब वृत्तियोंका निरोध होजाता है उससे मोक्ष होती है फिर दुःख नहीं होता व सम्प्रज्ञात योगर्म वृत्तियोंका संस्कार सम्बंध रहता है इससे प्रारब्धवशसे फिर दुःख प्राप्त होता है इससे यह कहा है कि बाधित जो दुःख आदि हैं उनकी अनुवृत्तिसे अर्यात नाश होनेके पश्चात् फिर प्राप्त होनेसे मध्य विवेकसेभी अपभोग है अर्थात् मन्दविवेक जिसमें आत्मा साक्षात्कार नहीं होता वह तो अप भोगही है उसमें दुःख निवृत्त नहीं होता मध्यम विवेक जिसमें कहीं सम्प्रज्ञात योगसे आत्मा साक्षात्कार होता है और दुःख निवृत्त होजाता उसमेंभी संस्कारका नाश नहीं होता प्रारब्ध वशसे फिर दुःख प्राप्त- होता है इससे उत्तम विवेकहीसे मोक्ष होना सिद्ध होता है अन्यथा नहीं रह भाव है ॥ ७७ ॥ जीवन्मुक्तश्च ।। ७८॥ जीवन्मुक्तभी॥ ७८॥ जीवन्मुक्तभी मध्य विवेकमें स्थित होता है जीवन्मुत्ता में प्रमाण कहते हैं ।। ७८ ॥ उपदेश्योपदेष्ठत्वात्तत्सिद्धिः ॥ ७९ ॥ उपदेशके योग्य व उपदेश करने वालेके भावसे उसकी सिद्धि है।॥७९॥ .

१२२
सांख्यदर्शन।
शास्त्रमें विवेक विषयमें उपदेश करनेवाला गुरू व उपदेशके योग्य
जो शिप्य है दोनोंके भावसे अर्थात् गुरू व शिप्यके भावसे जीवन्मुक्तका
मध्यम विवेकवान होना सिद्ध होता है उपदेश करनेवालेके उपदेशसे
जीवन्मुक्त होनेकी सिद्धि कहनेसे यह अभिप्राय सुचित होता है कि
जीवन्मुक्तहीका उपदेश करने में अधिकार है ॥ ७९ ॥
श्रुतिश्च ॥८॥
श्रुतिभी॥ ८॥
श्रुतिभी जीवन्मुक्त होनेमें प्रमाण है यथा " ब्रह्मैवसन्ब्रह्माप्यति ।
इत्यादि अर्थ ब्रह्महीहो ब्रह्ममें लय होता है अर्थात् ब्रह्म भाव व प्रेममें
मग्रहो ब्रह्ममें लय होता है इत्यादि ॥ ८० ॥ शंका-मध्यमविवेकवान
जीवन्मुक्तहीका उपदेष्टा होना कहा है मन्द विवेकवानके उपदेश करनेमें
क्या हानि है. उत्तर-
इतरथान्धपरम्परा ॥८॥
अन्यथा अन्धपरंपरा होनेकी प्राप्ति है ।। ८१ ॥
अन्यया अर्थात् मध्यम विवेकवानके उपदेशक न होने व मन्द विवेक
वानके उपदेशक होने में अन्धपरम्पराकी माप्ति होगी क्योंकि मन्द
विवेकवान् उपदेश करनेवालेहीको जब यथार्थ बोध नहीं है तो जिस
अंशमें उसको निश्चय है उसमें यथार्थ उपदेश करेगा और जिसमें उसीको
भ्रम है उसमें मिथ्या उपदेश करेगा शिष्यकोभी भ्रांति युक्त करने
बैगा फिर वह अन्यको भ्रांत करेगा इसीप्रकारसे एक दूसरे में संघ
परम्पराकी प्राप्ति होगी इससे जीवन्मुक्त मध्यम विवेकवानही उपदे,
कर्ता होना योग्य है।। ८१॥शंका-ज्ञानसे कर्मक्षय होजानेपर फिर जीवन्मन
कैसे जविन धारण करता है क्यों कि विना कर्म शरीर में रहन
चाहिये. उत्तर-
चक्रभ्रमणवद्धृतशरीरः॥८॥

भाषानुवादसहित। १२३ चक्रभ्रमणके तुल्य शरीर धारण करता है ।।२।। जैसे कुम्हारके कर्म निवृत्त हो जानेपरभी पूर्व कर्मके वेगसे आपही कुछ कालतक चक्र (कुम्हारका चाक ) घूमता रहता है इसी प्रकारसे ज्ञान होनेसे कर्म निवृत्त हो जानेपरभी प्रारब्ध कोंके संस्कार वेग करिके (वेगसे) जीवन्मुक्त शरीर धारण किये रहता है ।। ८२ ॥ संस्कारलेशात्तत्सिद्धिः॥ ८३॥ संस्कारलेशसे उस्की सिद्धि है ॥ ८३॥ संस्कारलेशसे अर्थात् किंचित् कर्म संस्कार होने अथवा रहनेसे उस- की अर्थात् शरीर होनेकी सिद्धि है अर्थात् जब सर्वया कर्मसंस्कारका नाश होता है तब शरीर धारण नहीं होता और जो कुछभी संस्कार रहता है तो फिर जन्म होता है ॥ ८३॥ विवेकान्निश्शेपदुःखनिवृत्तौकृतकृत्य तानेतरान्नेतरात् ॥ ८४॥ विवेकसे सर्वथा दुःखनिवृत्त होने मेंकृत कृत्यता (कृतार्थ होना) है दूसरेसे नहीं दूसरेसे नहीं ॥ ८४ ॥ विवेकसे परम वैराग्यद्वारा सववृत्तियों का निरोध होनेसे जब सब दुःखों- के छूटता है तभी पुरुष कृतार्थ होता है औरसे जीवन्मुक्ति आदिसेमी कृतार्थ होना संभव नहीं है इससे कहा है कि, केवल विवेकसे कृतार्य हो- ता सिद्ध होता है दूसरे उपायसे पुरुष कृतार्थ नहीं होता यह निश्चय है दूसरेसे नहीं यह दो बार कहना अध्यायकी समाप्ति सूचनके अर्थ है।।८।। इति श्रीप्यारेलालात्मजवादामण्डलान्तर्गततरहीत्यायग्रामवासि भुदयालुशास्त्रविनिर्मितेसांख्यदर्शने देशभाषाकृतभाष्ये पैराग्या या रस्वतीया समाप्तः ॥ ३॥ .

+ १२१ सांख्यदर्शन। विवेक ज्ञान, साधनके वर्णनमें, चतुर्याध्यायका प्रारंभ किया जाता है व साधारण समझनेकेलिये विवेक ज्ञान साधनमें दृष्टांत इतिहास सहित वर्णन करते है राजपुत्रवत्तत्वोपदेशात् ॥१॥ राजाके पुत्रकेसमान तत्वउपदेशसे ॥१॥ राजाके पुत्रके समान तत्त्वउपदेशसे विवेक उत्पन्न होता है यह सूत्रका अर्थ है विवेक होनेका अर्य पूर्व अध्यायके सम्बंधसे ग्रहण किया जाता है राजाक पुत्रके तुल्य कहनेसे इस इतिहाससे अभिप्राय है कि कोई राजाका पुत्र किसी दोप विशेषसे जब वह छोटाया किसीके साय निकाल दिया गयाया उस्को किसी चांडालने लेकर पालन पोषण किया चाण्डालके गृहमें रहनेसे अज्ञानसे उसने अपनेकोभी चाण्डाल मान लिया कुछ कालगत हुए कोई इसके हालका जाननेवाला आकर कहा कि तू राजपुत्र है और ऐसा हाल है तू चाण्डाल नहीं है यह सुनकर वह उसीक्षण चाण्डालका अभिमान छोडकर सच्चा जो राजा होनेका भावया उस्को प्राप्त हुवा कि मै रानाहूँ इसी प्रकारसे परिपूर्ण चेतन अ- विनाशी शुद्ध निर्विकाररूप तू है प्रकृतिरूप नहीं है यह तत्व उपदेश करुणावान् गुरुसे सुनकर प्रकृति अभिमानको छोडकर मैं ब्रह्मरूप हूं अर्थात् तत्व पदार्य वा जातिसे एकही होनसे उस्से विजातीय संसारी नहीं हूं ऐसा जानकर अपने स्वरूपको आलम्बन करता है ॥ १ ॥ पिशाचवदन्यार्थोपदेशेऽपि॥२॥ पिशाचके समान अन्यके अर्थ उपदेशमेंभी ॥२॥ श्रीकृष्णचन्द्रजी अन्पक अर्थ अर्याद अर्जुनकालये उपदेश करते ये वहाँ समीप एक पिशाच था अर्जुनके अर्थ जो उपदेश किया गया नस्के मुननेमे पिशाचको विवेक उत्पन्न होगया अन्यकेलिये उपेदश . भाषानुवादसहित। १२५ होने में भी पिशाचके तुल्य समीपस्यको विवेक उत्पन्न होता है इससे सज्जन महात्माओंके समीप जाना सत्संगकरना उचितह यह भाव है॥२॥ आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥ ३॥ अनेकवारके उपदेशसे आवृत्ति करना चाहिये ॥३॥ • एक वारके उपदेशसे ज्ञान न होनेसे उपदेशकी मावृत्ति अर्थात् फिर फिर चिन्तन करना चाहिये क्योंकि छान्दोग्य आदिमें जो इतिहास श्वेतकेतु आदिके हैं उन्मे अनेकवार पारम्बार चिन्तन व मनन कर- नेका उपदेश है इससे आवृत्ति करना आवश्यक है भावृत्तिकरना चाहिये ॥ ३ ॥ पितापुत्रवदुभयोईष्टत्वात्॥४॥ पिता पुत्र के सदृश जाननेवाला होनेसे ॥४॥ अपने पिता व पुत्रके तुल्य अपना मरण व उत्पन्न होना जानलेनेसे ( अनुमान करनेसे ) वैराग्य सहित विवेक होता है अर्थात् विना अन्यके उपदेश अपने पिता व पुत्रहीके देसने व स्मरण करनेसे व यह विचार नेसे कि जैसे मेरे पुत्र उत्पन्न हुवा है इसी प्रकारसे एक दिन मैं उत्पन्न दुवाहूंगा व जैसे मेरे पिताका मरण हुवा है इसी प्रकारसे मेरा मरण हो- गावैराग्य व विवेक उत्पन्न होता है ॥ ४ ॥ श्वानवत् सुखिदुःखीत्यागवियोगाभ्याम् ॥५॥ कुत्ताके समान त्याग व वियोगसे सुखी व दुःखी होता है ।।५।। परिग्रह न करना चाहिये क्योंकि द्रव्योंके त्यागसे लोक सुखी होता वियोगसे दुःखी होताहे जैसे कुत्ता मांसको लिये जाता है जो किसी- --

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१२६
सांख्यदर्शन।
ने मारकर अथवा वली कुत्ता वलसे छीनलेताहै तो अति दुःखी होता-
है और जो आपसे छोड देताहै तो दुःखसे छूटताहै ॥ ५॥
अहिनिल्वपिनीवत्॥६॥
सांपकी केचुलके समान ॥६॥
जैसे सांप पुरानी खाल केचुलको छोड देताहै इसी प्रकारसे मुमुक्षु
(मोक्षकी इच्छा करनेवाला) प्रकृतिको बहुतकाल भोग की हुई जीर्ण
त्यागके योग्य जानकर त्याग करता है ।। ६ ॥
छिन्नहस्तवद्रा॥७॥
अथवा छिन्न हस्तके समान ॥७॥
अथवा जैसे कटेहुए हाथको फिर कोई आंगिकार नहीं करता न उस्का कोई
अभिमान करता है इसी प्रकारसे त्याग कीहुई प्रकृतिका फिर ज्ञानी अभि-
मान नहीं करता ॥७॥
असाधनानुचिन्तनंबन्धायभरतवत्॥८॥
असाधनमें अनुचिन्तन करना भरतके
तुल्य बंधके अर्थ होताहै ॥ ८ ॥
विवेक जो अंतरंग साधन अंतःकरणसे नहीं होता तो यद्यपिधर्म हो तो
भी अनुष्ठान करनेवालेके वंधका कारण होताहै जैसे जडभरत दया करिक
हरिणके बच्चाका पोषण किया वह दया उन्होंके बंधकी कारण हुई इससे
विना विवेक धर्म कर्मका अनुष्ठानभी भरतके तुल्य बंधका हेतु होता है।
बड्डभियोगेविरोधोरागादिभिःकुमारीशकवत् ९
बहुतके साथ योग होनेसे राग आदिसे कुमारीके
चूडियोंके समान विरोध होताहै ॥९॥

- भापानुवादसहित । १२७ बहुतसे संग न करना चाहिये क्यों कि बहुतके संगमें राग आदिकोंसे कलह होता है वह कलह योगको भ्रष्ट करता है जैसे कुमारीके हाथकी चूडी इस कुमारीक हाथकी चूडियोंके दृष्टांतका व्याख्यान यह है कि एक कुमारीके घरमें महिमान आये महिमानोंकेलिये कुमारी धान कूटने लगी कूटनेमें उसकी चूडियां झनकार करतीर्थी उसको यह लज्जा होतीथी कि, महिमान मेरी चूडियोंका शब्द सुनकर यह समझेंगे कि इसके घरमें कुछ और भन्न नहीं है और रंक है इससे अपने हायसेधान कूटती है इस लज्जासे वह एक एक फोर चली जब दो रहगई तबतक शब्द होना बंद न हुआ जब एक रहगई तब शब्द होना बंद होगया उसको मुख हुवा इच्छाअनुसार अपना काम किया इसीप्रकारसे एकाकी होने में योगीको सुख होता है संगमें कलह व दुःख होता है ॥९॥ द्वाभ्यामपितथैव ॥१०॥ दोके साथभी उसी प्रकारसे ॥१०॥ जो यह समझा जाय कि बहुतसे संग न करना चाहिये दो होने में हानि नहीं है तो दो होनेमेंभी हानि होना जानकर संगका निषेध किया है कि दोके सायमेंभी उसी प्रकारसे कलह व विरोध होता है इस एकान्त एकाकी रहना चाहिये ॥ १० ॥ निराशःसुखीपिङ्गलावत् ॥११॥ आशा रहित वेश्याके समान सुखी होवे ॥११॥ माशाको त्याग कारकै पुरुप सन्तोपको प्राप्त हो मुखको लाभ करै जवतक आशा त्याग नहीं करता सुखको नहीं प्राप्त होता जैसे एक पिंगला नाम वेश्या एक दिन कान्ताकी इच्छा करती रही परन्तु कोई उसदिन उसके मनोरथ पूर्णकरनेको न आया तब उसको बडा खेद हुवा कुछ कालमें खेदके पश्चात् उसको ज्ञान हुवा किं तुच्छ मनुष्योंकी १२८८ सांख्यदर्शन। आशा कारकै मैं सवजन्म गतकर दिया मनुष्योंकी आशासे कुछ नहीं है ऐसा विचारकर माशाको छोड दिया जबतक वह माशा करती रही नी- द न आई दुःखी रही जव आशा त्यागकर दिया मुखपूर्वक सोगई आशा त्यागनेसे यथा पिङ्गला सुखी हुई है तथा आशा त्यागकर पुरुष सुखी होवै यह उपदेश है ॥ ११॥ । अनारंभेऽपिपरग्रहेसुखीसर्पवत्॥ १२॥ विनाघर वनायेभी सर्पकेतुल्य परके घरमें सुखी होवै ॥ १२॥ । ज्ञानी घर वनानेका आरंभ न करै विना घर बनाये सर्पके तुल्य सुखी रहै सर्प जहां छिद्र पाताहै वहां घर बना लेताहै इसी प्रकारसे ज्ञानी जहां पहुंच जाय वही घर है परके घरमें सुखी रहै ॥ १२ ॥ बहुशास्त्रगुरूपासनेऽपिसारादानं षट्पदवत् ॥१३॥ वहुशास्त्र व गुरु उपासनमेंभी भ्रमरके समान सारका ग्रहण करै॥ १३॥ जैसे भ्रमर फूलोंसे सारको ग्रहण करता है इसी प्रकारसे विवेकी सब शास्त्रों व गुरुके उपदेशमें सारको ग्रहणकरै ।। १३ ॥ इपुकारवन्नैकचित्तस्यसमाधिहानिः॥१४॥ वाण बनानेवालेके समान एकाग्रचित्त हुएकी समाधिकी हानी नहीं होती॥१४॥ पया एक याणका बनानेवाला बाणको बना रहाथा उसी समयमें एक राजा वडी भीर समेत पाससे चलागया उसने न जाना इसी प्रकारसे ८- भाषानुवादसहित । १२९ जिस्का अच्छे प्रकारसे एकाग्र चित्त हो जाता है उस्का चित्त अन्य विष- यामें नही जाता व एकाग्रताहीसे समाधिके द्वारा विवेकक साक्षात्कार होनकी सिद्धि होती है ॥ १४ ॥ कृतनियमोल्लंघनादानर्थक्यंलोकवत् ॥ १५॥ कृत नियमके उल्लंघनसे लोकके समान अनर्थक होना है ॥ १५॥ शास्त्रमे जो नियम योगियोंके लिये किया है उस कृत नियमके उल्लंघनमें ज्ञानकी सिदि नही होती उल्लंघन करनेसे केवल अनर्थक होना हे जैसे लोको भेषज आदिमें जो विहित पथ्य है उस्के उल्लघनसे रोगना- शकी सिद्धि नहीं होती ॥ १५ ॥ तद्विस्मरणेपिभेकीवत् ॥१६॥ उस्के भूलनेमें भी भेकीके समान ॥ १६ ॥ उस्के अर्थात् नियमके भूलनमेंभी अनर्थ होताहै जैसा कि भेकीका दृष्टांत है इसकी कथा यह है कि कोई राजा शिकार खेलने गयाथा वहाँ एक माया रूपिणी सुन्दरी कन्याको देखा राजा उस्की सुन्दरताको देखकर उससे अपनी भार्या होनेकी प्रार्थना किया उसकन्याने अगीकार किया परंतु यह नियम किया कि जब तुम मुझें जल देखाओगे तब मै जलमें प्रवे- श करजाऊंगी एक समय क्रीडा करके दोनो श्रमित भये उस कन्याने कहा जल कहाँ है राजाको जो उसने नियम कियाथा भूलगया जल देखा- या कि यह जल है जल दिखातेही यह कन्या मायारूपा इच्छाचारी भेकी रूप हो जलमें प्रवेश करगई राजा बहुत भकारसे जलमें खोजा पता न • लगा राजाको नियम भूलनेसे अत्यंत दुःख हुवा इसी प्रकाररे नियम भू; लनेसे योगमें अनर्थ होताहे यह अभिमाय है ॥ १६ ॥ नोपदेशश्रवणेऽपिकृतकृत्यतापरा

१३०
सांख्यदर्शन।
मर्शादृतेविरोचनवत् ॥ १७॥
विना परामर्श (विचार)विरोचनके सहश उपदेश
श्रवणमेंभी कृतार्थता नहीं है ॥ १७ ॥
विना परामर्श अर्थात् गुरुवाक्यके तात्पर्यनिर्णय करनेवाले विचार के
उपदेश वाक्य सुनने में भीतत्वज्ञान होनेका नियम नहीं है ब्रह्माके उपदेश
सुननेमें इन्द्र प विरोचन दोमेंसे विरोचनको परामर्शके अभावसे भ्रान्ति
बनी रही इससे गुरुके उपदेशमें मनन करनाभी आवश्यकहै केवल सुन
नेसे कृतार्थता नहीं होती अर्थात् सुनलेनेसे कोई कृतार्थ नहीं हो जाता१७
दृष्टस्तयोरिन्द्रस्य ।। १८॥
उन दोनोंके मध्यमें इन्द्रका परामर्श जनागया ॥ १८॥
उन दोनों इन्द्र व विरोचनमेंसे केवल इन्द्रका परामर्श जानागया भ.
यात् इन्द्रमें परामर्श होनेसे उपदेशका बोध हुआ विरोचनको परामर्शक
अभावसे उपदेशका बोध न हुआ इससे परामर्श आवश्यकहै ॥ १८ ॥
प्रणतिब्रह्मचर्योपसर्पणानिकृत्वासिद्धि
बहुकालात्तद्वत्॥१९॥
वहुकालसे प्रणति ब्रह्मचर्य (वेदाध्ययन ) व सेवा करिके
उस्के समान सिद्धि होती है ।। १९॥
घहु कालसे प्रणति ( नम्रता) वेदाध्ययन व सेवा करिकै अर्थात् बहु-
तकाल मुरुको सेवासे उसके समान अर्थात् इन्द्रके समान अन्यकोभी
सिद्धि (तत्वज्ञानकी सिद्धि ) होती है ॥ १९ ॥
नकालनियमोवामदेववत् ॥२०॥
वामदेवके सदृश कालका नियम नहीं है ॥२०॥

भापानुवादसहित । १३१ पूर्वजन्मक साधनके संस्कारसे शीघ्र (जल्दी) भी सिद्धि होती है सबको बहुतकालका नियम नहीं है यथा वामदेवको जन्मान्तरके साध- नसे गर्भहीमें ज्ञान उदय हुवा और यह कहा " अहमनुरभवंसूर्यश्चति " अर्थ-मै मनु हुआया और सूर्य हुआथा इस प्रकारसे जन्मान्तरका ज्ञान घ ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ यह श्रुति बृहदारण्यकमें है इसी प्रकारसे जन्मा- न्तरके साधनसे अन्यकाभी शीघ्रही तत्त्वज्ञान हो सकता है ॥ २० ॥ अध्यस्तरूपोपासनात्पारम्पर्येण यज्ञोपासकानामिव ॥२१॥ अध्यस्तरूपोंके उपासनासे परम्पराक्रम होनेके द्वारा यज्ञउपासकोंके समान ॥२१॥ मध्यस्तरूप जो ब्रह्मा विष्णु हर आदिहै उनके उपासकोंको परम्प- रा क्रमसे यज्ञ उपासको के तुल्य उञ्चलोंगोकी अर्थात् ब्रह्म आदिलो- गोंकी क्रमसे प्राप्ति होती है अथवा सत्त शुद्धिद्वारा ऋमसे ज्ञानकी प्रा- ति होती है परन्तु साक्षात् ज्ञानको सिद्धि नहीं है इससे साक्षात् ज्ञान- की सिद्धि शुद्ध परमात्मज्ञानहीं है ॥ २१ ॥ इतरलाभेऽप्यावृत्तिःपंचाग्नियोग तोजन्मश्रुतेः ॥२२॥ इतरके लाभ होनेपर भी आवृत्ति होती है पंचामि योगसे जन्म सुनेनेसे ॥ २२ ॥ निर्गुण मात्मासे इतर जो मध्यस्तरूप ब्रह्मलोक पर्यंत हैं उसके लाभ होनेपरभी फिर मावृत्ति होती है अर्थात् फिर जन्म आदि व 'दुःखकी पाप्ति होती है किस प्रमाणसे आवृत्ति होनेकी सिद्धि है पंचा नयोगले जन्म सुननेसे अर्थात् छान्दोग्य उपनिषदके पंचम प्र.

-
ઉરૂર
सांख्यदर्शन।
पाठकमें यह वर्णन किया है कि देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमे प्राप्त हुदा
जो पुरुषहै उस्काभी.स्वर्ग, मेघ, पृथ्वी, देवता, स्त्री रूप, पंच अग्रिमें
आहुति होनेसे फिर जन्म होताहै और जो ब्रह्म लोकसे आवृत्ति न होनेमें
वाक्य है वह जिस्को ज्ञान उत्पन्न है उसके विषयमें है जो प्रकृति कार्य
विषयमें बँधा व तत्वज्ञान रहित है उसके लिये नहीं है
विरक्तस्यहेयहानमुपादेयमुपादा
नंहंसक्षीरवत्॥२३॥
विरक्तका त्यागके योग्यका त्याग व करना ग्रहणकेयोग्यका
ग्रहण करना हंसके क्षीर ग्रहण करनेके समान होता है २३
यथा इस दूध व जलके एक भाव होनेपर अर्थात् दोनोंके मिल-
जानेपर असार जलको त्यागकर सार जलको ग्रहण करता है इसी
प्रकारसे विरक्तको हेय (त्यागकी योग्य) जो प्रकृति है उसका त्याग
व विवेकसे आत्मज्ञानका धारण वा ग्रहण होता है जैस इंसही जलसे
भिन्न करके दूधको ग्रहण करता है काक आदि नहीं करते इसी
प्रकारसे विरक्तही आत्मज्ञानको धारण कर्ता है वा प्राप्त होता है
अज्ञानी विषयी नहीं प्राप्त होता ॥ २३ ॥
लब्धातिशययोगाद्वातद्वत्॥२४॥
जिस्को अतिशय ज्ञान प्राप्त है उसके योगसे
भी उसके समान होता है ॥ २४॥
जो अतियोगसाधनसे अतिशय ज्ञान व अधिकारको लाभ किया
है उसके संयपेभी उसके सदृश विवेक उदय होता है यया अलक,
को दत्तात्रेय महात्माके संग मानसे आपसे विवेक उदय हुवा ॥ २४ ॥'
नकामाचारित्वंरागोपहतशुकवत् ॥२५॥

भाषानुवादसहित । १३३ रागोपहत्त पुरुपके समीप शुक (सुवा) के सदृश कामचारी न होना चाहिए।॥२५॥ रागोपहत पुरुषके समीप अर्थात् जिसका चित्त राग करिकै ग्रस्त हैं पच्छे रूप आदि विषयके ग्रहणकी इच्छा युक्त है उसके समीप इच्छा अनुसार गमन न करना चाहिये यह अभिप्राय है क्यों कि उसके संगसे अपने चित्तकोभी रागग्रस्त वा बद्ध होजानेका भय है धंध जानके पिसे इस प्रकारसे रागोपहतका संग न करना चाहिये जैसे वहेलिया रथवा अन्य मनुष्यसे बांधे जानेके भयसे शुकपक्षी इच्छासे गमन नहीं रता अथवा जैसे दानाके लालच में शुक काम चारीहो ( इच्छा रनुसार जाकर ) फँस जाता है ऐसा कामचारी इन्द्रिय विषयमें न ना चाहिये ।। २५॥ गुणयोगाबद्धःशुकवत् ॥२६॥ गुणयोगसे शुकके समान बद्ध होता है ॥ २६ ॥ कामी विषयी पुरुषोंका संग न करना चाहिये क्यों कि उनहीके णिोंक योगसे बद्ध होता है अर्थात् बंध जाता है यथा शुक पक्षी व्याधक पण योग अर्थात् जाल रस्सीके योगसे बंध जाता है अथवा रूप के योगसे रूपलोलुप पुरुपोंकि बांधने से बंध जाता है ॥ २६ ॥ नभोगाद्रागशांतिसुनिवत्॥२७॥ मुनिके सदृश भोगसे रागकी शांति नहीं होती॥२७॥ विषयभोगसे यथा सामरिमुनिके रागकी शांति नहीं हुई इसी मका- से विषय भोगसे रागकी शांति नहीं होती. अर्थात् जो यह संकल्प करै के अच्छेप्रकारसे भोग कारकै जव चित्त शांत हो जायगा त छोंड ना होगा तो विषय भोगसे चित्त कभी शांत नहीं होता इच्छा वनही इती है केवल विवेक वैराग्यहीसे रागकी शांति होती है ॥ २७ ॥ .

सांख्यदर्शन। दोपदर्शनादुभयोः॥२८॥ दोनोंमें दोप देखने ( विचारने ) से ॥२८॥ दोनों में अर्थात् प्रकृति व प्रकृतिक कार्यमें परिणामी होना दुःखात्मक होना आदि दोष देखनेसे अर्थात् विचारनेसे विषयके रागकी शांति होती है यथा सौभरिमुनि जबतक भोगमें प्रवृत्त रहे तवनक रागकी शांति न हुई जब संग दोपका विचार किया तब वैराग्यसे रागका नाश हुवा॥२८॥ नमलिनचेतस्युपदेशवीजप्ररोहोऽजवत् ॥ २९॥ अजके समान मलिन चित्तमें उपदेशका बीज नहीं जमता॥२९॥ उपदेश रूप जो ज्ञान वृक्षका बीज है उस्का अंकुर विषय प्रीतिसे जिस्का चित्त मलिन है उस्के चित्तमें नहीं जमता जसे राजा अजको अपनी स्त्रीका शोकथा स्त्रीकी प्रीतिसे वित्त मलिन होनेके कारणसे वसिष्ठ ऐसे उपदेश करता राजाको उपदेश किया परन्तु राजाके मलिन चित्तमे उपदेशके वीजका अंकुर उत्पन्न न हुवा ॥ २९ ॥ नाभासमात्रमपिमलिनदर्पणवत्॥३०॥ मलिन दर्पणके समान आभास मात्रभी नहीं होता ॥३०॥ जैसे मलिन दर्पणमें किंचित् आभास अर्थात् प्रतिबिंवकी छाया मात्र भी नहीं देख पडती ऐसेही मलिन चित्त में ज्ञानका आभास नहीं होता३० नतज्जस्यापितद्रूपतापंकजवत् ॥३१॥ उससे उत्पन्नकाभी कमलके सहा वहीरूप होना सिद्ध नहीं होता ॥३॥ उससे अर्थात् उपदेशसे उत्पन्नकाभी वही रूप होना सिद्ध नहीं होता अर्थात् जैसा उत्तम उपदेश है वैसाही उत्तम ज्ञान मलिन चित्तौनी

भापानुवादसहित । १३५
होवे यह नहीं होता जो कुछ हुबाभी तो वह उपदेशके अनुसार नहीं
होता जैमा उत्तम कमलका बीज जो निकृष्ट पंको पडजाता है तो उससे
यद्यपि कमल उत्पन्न होता है परंतु पंक (कीचड ) के दोपसे वीजके स-
मान उत्तम नहीं होता ॥ ३१ ॥
नभूतियोगेऽपिकृतकृत्यतोपास्य
सिद्धिवदुपास्यसिद्धिवत्॥३२॥
ऐश्वर्य योगमेंभी कृतार्थता नहीं हे उपास्योंकी सिद्धिकी
तुल्य उपास्योंकी सिद्धिकी तुल्य ॥३२॥
ऐश्वर्य योगमें (ऐश्वर्य होने में ) भी कृतार्यता नहीं है अर्थात् क्षय
होनेके भयका दुःख होनसे कृतार्यता नहीं है जैसे उपास्य जो ब्रह्मा
आदि है उनको सिद्धि प्राप्त होने में भी कृतार्थता नहीं है क्योंकि उनका
भी योगनिद्रा आदिमें योगाभ्यास करना सुना जाता है अर्थात् ऐश्वर्य व
सिद्धिको प्राप्त उपास्य ब्रह्मा आदि भी सर्वथा मुक्त नहीं है वह भी योग
साधक हैं इस्से ऐश्वर्य योगमें कृतार्थता है ॥ ३२ ॥
इति श्रीप्यारेलालात्मजवांदामण्डलान्तर्गततेरहीत्याख्यग्रामवासि
प्रभुदयालु शास्त्रविनिमित्त सांख्यदर्शनेदेशभापाकृतभाप्ये
चतुर्थोऽध्यायःसमातः॥ ४ ॥
पंचम अध्यायमें इस शास्त्रमें अन्यके पूर्वपक्षोंका समाधान करनेके
र्य व अपने मत सिद्ध करने में हेतु व प्रमाणोंको सूत्रकार वर्णन करते हैं-
मंगलाचरणंशिष्टाचारात्फलदर्शनात्
श्रुतितश्चेति ॥१॥
। मंगलाचरण किया गया है शिष्टाचारसे फल दर्शनसे
और श्रुतिप्रमाणसे ॥७॥

१३६ सांख्यदर्शन। इस शंका निवारणके अर्थके प्रथम सूत्रके आदिमें अथ शब्द व्यय कहाहै इस सूत्र में यह कहा है कि अथ शब्दसे मंगलाचरण किया गया है यह मंगलाचरण शिष्टाचारसे ( अच्छे पुरुषोंके करनेसे ) फल दर्श नसे ) व श्रुति प्रमाणते अर्थात् श्रुति में कथित होनेसे आदिम कियाजाना यथार्थ व उचित है ॥ १९ ॥ नेश्वराधिष्ठितेफलनिष्पत्तिःकर्मणा तत्सिद्धेः ॥२॥ ईश्वरके अधिष्टित होने में फलकी सिद्धि नहीं है कर्मसे उस्की (फलकी) सिद्धि होनेसे ॥२॥ पूर्वही ईश्वरकी सिद्धि न होनेसे इत्यादि सूत्रोंसे इश्वरके इच्छापूर्व सृष्टि कर्ता होनेके प्रमाणका प्रतिषेध किया है परन्तु जे ईश्वरके प्रतिपा- दनमें यह कहते हैं कि, कोई कर्म फलका देनेवाला ईश्वर सिद्ध होता है इत्यादि पूर्वपक्ष स्थापनकरनेवालोंके हेतुओंके प्रतिषेधकरनेके अभिप्रा. यसे प्रथम ईश्वरके फल दाता होने के प्रतिषेधमें इस सूत्रमें यह कहा है कि ईश्वर अधिष्ठित कारणमें कर्म फल रूप परिणामकी सिद्धिमानना युक्त नहीं है क्योंकि आवश्यक कर्महीसे फलकी सिद्धि होना संभव है। अर्थात् आवश्यक कर्म विशेष व प्रकृतिके संयोग विशेषसे स्वाभाविक फल विशेष होताहै यह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणसे सिद्ध है इससे आवश्यक कर्म हीसे फलकी सिद्धि होनेसे ईश्वरसे फल होनेकी सिद्धि नहीं है ॥२॥ स्वोपकारादधिष्ठानलोकवत् ॥३॥. अपने उपकारसे लोकके समान अधिष्टान होवे ॥३॥ ईश्वरको फलदाता न मानकर और ईश्वरका सृष्टि करने में कुछ प्रयो जन न माननेसे जो ईश्वरके सृष्टि कर्ता होनेका प्रतिषेध किया गया है उस प्रतिपेधका यथार्य होना अंगीकार न करकै ऐसा माना जायै कि ईश्व रके अधिष्ठाता होने में ईश्वरकाभी कुछ अपना उपकार होना मान .

- भाषानुवादसहित। जाये और अपने उपकारसे अधिष्ठान होवै जैसे लोकमें राजा आदि अप- ने भृत्य आदि व राज्य आदि कार्यमें अपने उपकार समेत अधिष्ठाता होते हैं ऐसा मानने में क्या दोषहै इसका उत्तर आगे सूत्र में कहते हैं॥३ लौकिकेश्वरवदितरथा॥४॥ अन्यथा लोकवाले ईश्वरोंके सदृश होगा॥४॥ अन्य प्रकारसे अर्थात् जैसा ईश्वरका लक्षण पूर्ण काम आदिह उस- के विरुद्ध जो ईश्वरका भी उपकार होना अंगीकार किया जाये तो लो- कवाले ईश्वरोंके सदृश वह भी संसारी अपूर्ण काम होगा ॥ ४ ॥ पारिभापिकोवा ॥५॥ अथवा पारिभापिक होगा॥६॥ पारिभाषिक होगा अर्थात् उस्में परिभाषा मात्र होगी भाव इसका यह है कि संसारी सृष्टि आदिमें उत्पन्न पुरुपको जो ईश्वर मानोगे तो संसारी सृष्टिके आदिमें उत्पन्न पुरुषमें ईश्वर शब्दका कथनमात्र होगा जैसा हम मानते हैं वैसाही तुह्मारा मानना हो जायगा अर्थात् योग व तप विशेषसे प्रकृतिमें लीन हुये जो सृष्टिकी आदिमें समर्थ ऐश्वर्यको प्राप्त पुरुष उत्पन्न होते हैं उनको हम सिद्ध कहते हैं तुम ईश्वर कहवे हो यह समझा जायगा अयवाशन्द कइनेका अभिप्राय यह है कि सृष्टि कर- नेमें ईश्वरका उपकार वा प्रयोजन माननेमें लौकिक ईश्वरके तुल्य ईश्वरके मात काम होने में प्रतिपेध होता है इससे दोमें एक मानना चाहिये नर्यात् चाहै यह मानें कि रागसे अपने उपकारके अर्थ लौकिक ईश्वरके तुल्य सृष्टि कर्ता नहीं है अथवा है तो परिभाषिक नाममात्र है ॥ ५॥ शंका- विना रागही सृष्टि कर्ता माना जावै उत्तर ॥ नरागाहतेतत्सिद्धिःप्रतिनियत- कारणत्वात्॥६॥ १७ १३८ सांख्यदर्शन। विना राग उस्की सिद्धि नहीं है प्रतिनियत कारण होनेसे॥६॥ विना राग उस्की अर्यात् सृष्टिकी सिद्धि नहीं हो सकती किस हेतुसे नहीं हो सकती प्रतिनियत कारण होनेसे प्रतिनियत कारण वह है कि जो कार्यकी उत्पत्तिका विशेष कारण हो विना उस्के वह कार्य न होसके पिना रागके प्रवृत्ति नहीं होती इस्से राग प्रवृत्तिका प्रतिनियत कारण है प्रवृत्ति विना सृष्टिकार्य होना संभव नहीं है इससे रागके प्रतिनियत कारण होनेसे विना रागके सृष्टिकी सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ६ ॥ तद्योगेऽपिननित्यमुक्तः॥७॥ उस्के योगमें भी ईश्वर माननेमें नित्य मुक्त न होगा॥७॥ उस्के अर्थात् रागके योग होनेमें भी ईश्वर होना अंगीकार करनेमें ईश्वर नित्य मुक्त न होगा नित्य मुक्त न होनेसे तुझारे सिद्धांतकी हानि. होगी ॥ ७ ॥ शंका-तीनों गुणोंकी सम अवस्थारूप जड प्रकृतिमें नित्य इच्छा आदिका होना संभव नहीं है इससे दोपकारसे इच्छा आदिका होना मानने योग्य है एक यह कि प्रधानको शक्तिके योगसे साक्षात चेतन सम्बंधसे इच्छा आदि धर्म होते हैं अथवा अयस्कान्त मणिके तुल्य सन्निधि सत्ता मात्रसे प्रेरक होने से होते हैं इन दो से प्रथम प्रधान शक्तिके योग होनेका उत्तर वर्णन करते है॥७॥ प्रधानशक्तियोगाचेत्सङ्गापत्तिः॥८॥ प्रधानके शक्तिके योगसे माना जाय तौ संगकी प्राप्ति होती है ॥८॥ प्रधानशक्ति, इच्छा आदिका पुरुषमें योग होनेसे सृष्टि करना पुरुपमें माना जाय तो पुरुपमें भी संग होनेका धर्म प्राप्त होगा प श्रुतिमें पुरुषके मसंग वर्णन किया है श्रुतिविरुद्ध होगा इस्पे प्रधान शक्तिका योग .

" . भाषानुवादसहित । १३९ अंगीकार करना युक्त नहीं है पुरुषके असंग वर्णन करने में श्रुति यह है "सयत्तत्र पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गोह्ययं पुरुपः" अर्थ जिससे कि वह उक्त ज्ञानवान् विवेकको माप्त तिस्मे विवेक प्राप्त होने में आत्मज्ञान होनेकी दशामें पुरुषको ( अपने आत्माको) प्रकृतिसे भिन्न जनता है इससे पुरुप असंग है ॥ ८ ॥ सत्तामात्राच्चेत्सर्वैश्वर्यम्॥९॥ सत्तामात्रसे चेतनका ऐश्वर्य माना जावै तो सबका ऐश्वर्य सिद्ध है ॥ ९ ॥ जो अयस्कांतके तुल्य सन्निधि सत्ता मात्रसे चेतनका ऐश्वर्य दोना माना जायगा तो सब भोक्ता पुरुषोंका विशेषण रहित ऐश्वर्य जैसा हम कहते हैं उसी प्रकारसे होना सिद्ध होता है क्योंकि अखिल (सम्पूर्ण ) भोक्ताओंके संयोगहीसे प्रधान करके महत्तत्व आदिकी उत्पत्ति होनेका अनुमान होता है अन्यथा नहीं होता सनिधि सत्तामात्रसे ईश्वरका होना यद्यपि सिद्ध होता है परन्तु सन्निधि सत्तामात्रसे ऐश्वर्य होना व प्रकृतिका स्वामी व भोक्ता होना सब पुरुषोंका सिद्ध होता है सब पुरुषोंका व ईश्वरका एकही सदृश सन्निधि सत्ता मात्रसे चेतनश्वर्य सिद्ध होनेसे ईश्वरकी विशेषता नहीं रहती व ईश्वर होनेमें भी जो हमारा सि- दांत है वही सिद्ध होता है अपनी इच्छाले सृष्टिका उत्पन्न करनेवाला सर्व समर्थ होना आदि जैसा तुम मानते हो उस प्रकारसे सिद्ध नहीं होता इससे तुम्हारे सिद्धांतकी हानी है ॥ ९ ॥ प्रमाणाभावान्नतत्सिद्धिः॥१०॥ प्रमाणके अभावसे उसकी सिद्धि नहीं है ||१०॥ मोजो यह कहाजावे कि ईश्वरके सृष्टि कर्ता होनेके प्रमाण विरुद्ध तर्क दोना असत तर्क है कुतर्क करिके ईश्वरका प्रतिपेध करना युक्त नहीं प इस शंका निवारणके लिये यह कहा है कि प्रमाणके अभावसे उस्की .

१४० सांख्यदर्शन। वर्याद ईश्वरके सृष्टि कर्ता होनेकी सिद्धि नहीं है अभिप्राय यह है कि जो किसी प्रमाणसे ईश्वरका सृष्टिकर्चा होना सिद्ध होता तो उस्का प्रतिषेध करना असत होता परन्तु प्रमाणसे सिद्ध नहीं होता इससे म. सत् नहीं है क्योंकि प्रत्यक्षसे ईश्वरका सिद्ध न होना साधारण विदित है अनुमान शब्दसे सिद्ध न होनेके हेतु आगे सूत्रोंमें वर्णन करते हैं ॥१०॥ सम्बंधाभावान्नानुमानम् ॥ ११॥ संम्बधके अभावसे अनुमान नहीं होसकता ॥ ११॥ सम्बंध शब्दका अर्थ यहाँ व्याप्तिका है सम्बंधक अभावसे अर्थात् व्या- तिकी सिद्धि न होनेसे ईश्वरका अनुमान नहीं हो सकता क्योंकि सम्बंध (व्याप्ति का ज्ञान पूर्व प्रत्यक्षसे होता है ईश्वरमें पूर्व प्रत्यक्षका कुछ सम्बंध नहीं है इससे अनुमानसे ईश्वरका प्रमाण नहीं होसकता अथवा प्रयोजन व प्रवृत्तिमें सम्बंध होनेसे विना प्रयोजन कर्ममें प्रवृत्ति नहीं होती ईश्वरमें प्रयोजन होना सिद्ध न होनेसे प्रयोजनके अभावसे ईश्व रके सृष्टि कर्ता दोनेका अनुमान नहीं होसकता ॥ ११ ॥ श्रुतिरपिप्रधानकार्यत्वस्य॥१२॥ श्रुतिभी प्रधानकार्य होने की है ॥ १२॥ श्रुतिभी प्रधानके कार्य होनेमें है इससे शब्दसे भी इधरका सृष्टिका कारण होना व जगत् ईश्वरका कार्य होना अर्थात् प्रकृतिकी सदृश ईश्व- रका उपादान कारण होना सिद्ध नहीं होता जगत्के प्रधानके कार्य होने के प्रमाण, श्रुति यह है " अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बहीः प्रजाः मृजमानां सरूपाः अजोोको जुपमाणोऽनुशेते जहात्पेनां भुक्तभोगाम जोऽन्यः अर्ग एका अजा (प्रकृति ) लोहित शुक्ल कृष्ण रूपको अर्थात् 'रजः सत्वतमगुण रूपको अपने स्वरूपसे बहुत प्रजा जिसने उत्पन्न कि या उस्को एक अज पुरुष उसके साथ प्रीति करता हुवा शयन करता है मर्यात् भौग करता है व दूसरा अज ( पुरुष )जो विरक्त है वह इस भो भापानुवादसहित । ग की दुई भजाको परित्याग करता है और "तदक्षत बहुस्यामि" इत्यादि अर्थ उसने ईक्षा किया कि मैं बहुत होऊ इत्यादि जो चेतनकी प्रतिपादक श्रुति हैं वह सृष्टिकी आदिमें महत्तत्व औपाधिक जो महापुरुष है उस्को जो ज्ञान उत्पन्न हुवाहे उसके ज्ञानवर्णनमे है अथवा कूल गिरनेकी इच्छा करता है यह कहनेके समान प्रकृति विषयमें यह श्रुति गौणी है ऐसा मानना चाहिये जो ऐसा नहीं माना जावेगा तो "साक्षी चेता केवलो निर्गु- णश्च अर्थ साक्षी चेतनके बल निर्गुण है इत्यादि श्रुतिसे परिणामी होना पुरुपमें संभव नहीं होता इससे प्रधानहीका कार्य जगदहै यह जो ईश्वर- का प्रतिषेध है ऐश्वर्यमें वैराग्य होनेके अर्थ व विना ईश्वर ज्ञानकेभी मो- क्ष प्राप्त होनेके योग्य है यह प्रतिपादनके अर्थ प्रौढिवादमात्रदै यह जानना चाहिये अन्यथा औपाधिकोंके नित्य ज्ञान इच्छा आदि महत्तत्व- के परिणाम रूके अंगीकार करने में औपाधिकोंका कूटस्प होना संभ- व होगा औपाधिकोंका नित्यकूटस्थ होना सिद्ध न होनेसे प्रमाणके योग्य नही है इत्यादि प्रकृतिके जगत्कर्ता होनेका प्रतिषेध ब्रह्ममीमांसा अर्थात् वेदान्त सूत्रोंमें देखना चाहिये||१२|| अब अघिद्यासे बंध नहीं हो- ता यह जो प्रथम अध्यायमें सिद्धांत वर्णन किया है फिर यहाँ विस्तारसे वर्णन करते हैं। नाविद्याशक्तियोगोनिःसंगस्य ॥१३॥ निसंगका अविद्या शक्ति के साथ योग नहीं है ॥ १३॥ जो यह शंका करैकि प्रधान नहीं है भविद्या शक्ति चेतनमें रहती है उसीसे बंधन होता है उस्के नाशसे मोक्ष होता है इस्के उत्तरमें यह सूत्र है कि निःसंग ( संगरहित ) पुरुपका अविद्याशक्तिके साथ साक्षात योग होना संभव नहीं होता क्योंकि प्रकृति वा प्रकृतिकार्य रूप अपने- को अज्ञानले पुरुषका मानना अविद्या है यह विद्या विकार विशेष अधिकार हेतु संयोगरूप संगके बिना संभव नहीं होता ॥१३॥शंका-अ. विद्या यशहीसे विद्याका योग कहना चाहिये और अविद्याके पारमा-

१४२
सांख्यदर्शन।
र्थिक न होनेसे अविद्याके साथ संग नहीं है ऐसा मानना चाहिए उत्तर-
तद्योगेतत्सिद्धावन्योन्याश्रयत्वम् ॥१४॥
उस्के योगमें उस्की सिद्धि होनेमें परस्पर
• आश्रय होना है ॥१४॥
उस्के योगमें उस्की सिद्धि होने में अर्थात् अविद्याके योगसे अविद्या
सिद्ध होने में परस्पर एक दुसरेके आश्रय होनाहै और इसप्रकारसे पर-
स्पर आश्रय होना मानते जानेमें अनवस्था दोपकी प्राप्ति है ॥ १४ ॥ शं-
का-बीजांकुरके तुल्य होने में अनवस्था दोष नही है अर्थात जैसे यह
नहीं जाना जाता है कि बीज पहिले हुआ अथवा अंकुर इसी प्रकारसे
अविद्या विद्याके आश्रय होने में कहना चाहिए. उत्तर-
नबीजांकुरवत्सादिसंसारश्रुतेः॥१५॥
संसारके सादि होनेके प्रमाणमें श्रुति होनेसे वीज
व अंकुरके तुल्य नहीं है ॥ १५॥
संसारके आदि संयुक्त होनेमें श्रुति प्रमाण होनेसे वीज व अंकुरके
सुल्य नहीं है श्रुति यह है “ विज्ञानधन एवेभ्यो भूतेभ्यः समुत्यायतान्ये
धानु विनश्यति " अर्थ विज्ञान धनही इनभूतोंसे उठाकर अर्थात् उत्पन्न
करिक उनहीको फिर नाश करता है इत्यादि ॥ १५ ॥
विद्यातोऽन्यत्वेब्रह्मवाधप्रसङ्गः॥१६॥
विद्यासे अन्य होने में ब्रह्मके नाश होनेका प्रसंग है ॥ १६॥
जो विद्यासे अन्य होनाही विद्या शन्दका अर्य माना जावे तो ब-
झके ज्ञान नाश होनेसे ब्रह्म ( आत्मा )के भी नाश होनेका प्रसंग है।
क्योंकि ब्रह्मज्ञानरूप विद्या (ज्ञान ) भिन्न अर्थात् विना विद्या नहीं
रह सकता ॥ १६ ॥

भापानुवादसहित । १४३ अवाधेनैष्फल्यम् ॥१७॥ बाधा न होने में निष्फल होना है ॥ १७॥ जो अविद्या भी रही और विद्यामय जो ब्रह्म है उसमें विद्यासे अवि- पाको थाधा न हुई अर्थात् अविद्याका नाश न हुवा तो 'विद्याका होनाही नेष्फल है अन्यपुरुषमें भी विद्या होनेसे कुछ फल न मानना चाहिए और विद्याका होना व माननाही वृया है ॥ १७ ॥ विद्याबाध्यत्वे जगतोप्येवम्॥१८॥ विद्यासे बाधाके योग्य होनमें जगत्का भी इसी प्रकारसे ॥१८॥ जो विद्यासे बाधा (नाश )के योग्य है उस्को अविद्यासे नाश माना नाप तौ जगत्का प्रकृति महत्तत्व आदि अखिलमपंच जो है सबका मविद्या होना सिद्ध होगा क्यों कि विद्यासे यह सब बाधा ( नाश) योग्य है और जो अविद्याही प्रकृति महत्तत्त्व आदि सब है तौ ज्ञान- । अविद्याकै नाश होनमें चक्षु आदिसे स्थूल जगत्का प्रत्यक्ष न हो- I चाहिए परन्तु ऐसा नहीं होता इससे विद्यासे बाधा (नाश ) के ग्य अविद्याका लक्षण नहीं हो सकता ॥ १८ ॥ तद्रूपत्वे सादित्वम्॥१९॥ उसीके रूप होने में सादि होना सिद्ध होगा ॥१९॥ उसीके रूप होनेमें अर्थात् विद्यासे बाधाके योग्य पदार्थही अविद्या नेमें अविद्याका अनादि होना सिद्ध नहीं होगा अर्थात् जो किसी प्रकार- विद्यासे नाशके योग्य पदार्थही अविद्या मान ली जावै तथापि पुरुपमें पविद्याका सादि (आदि सहित ) होना सिद्ध होगा अनादि होना सिद्ध होगा क्योंकि विज्ञानधन एव इत्यादि अर्थविज्ञानरूपही है इत्यादि श्रुतियोंसे मलय आदिमें पुरुपका ज्ञान स्वरूप होना सिद्ध होता इस्से .

" १४६ सांख्यदर्शन। धर्मआदिका मंतःकरण धर्मत्व है अर्थात् धर्मादि अंतःकरणक धर्म हैं अंतःकरण कार्य व कारणरूपसे होता है प्रकृति अंश विशेष जो मंतःकरण है उसमें धर्म अधर्म संस्कार आदिक प्रलयमें रहते हैं ॥ २५ ॥ शंका धर्मआदि अंतःकरणके धर्म होवे परन्तु प्रकृतिके कायोंके विचित्र होनेसे व श्रुतिप्रमाणसे धर्मआदिकी सिद्धि जो कहा है यह अयुक्त है क्योंकि त्रिगुणात्मक प्रकृति व उस्के कार्योंकी श्रीतहीसे बाधा होती है श्रुति यह है “ साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च " अर्थ साक्षी ज्ञानरूप केवल निर्गुण है तथा अशन्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगंधवच्च ॥ अर्थ शब्दरहित स्पर्शरदित रूपरहित नाशरहित रसरहित नित्यगंधरहित है इत्यादि वाक्योंसे मकृति गुणके नाश होने वन रहनेका प्रमाण होता है उत्तर- गुणादीनां च नात्यन्तवाधः॥२६॥ गुणआदिका अत्यन्त नाश नहीं है ॥२६॥ गुणमादिका अर्थात् सत्वादिका व उनके धर्म सुख आदिका प सनके कार्य महत्तत्व मादिका स्वरूपसे नाश नहीं है संसर्ग न रहनेसे चेतनमें गुण मादिका नाश है यया लोहेके उष्ण होनेकी बाधा होती है अर्थात् लोहेके उष्ण होनेका नाश होता है ॥२६ ॥ शंका सम प्रनोरयके तुल्य मिथ्या मानने में कैसे स्वरूपसे नाश होना ययार्य नहीं है उत्तर- पंचावयवयोगात् सुखादिसंवित्तिः॥२७॥ पंच अवयवोंके योगसे सुख आदिकी उपल धि अथवा सिद्धि होती है ॥२७॥ न्यायके पांच अवयव हैं प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, व निगम न इन पांच अवयवोंके योग अर्थात् मेलसे मुखादि अप्रत्यक्ष पदा- थोकी अनुमानद्वारा सिदि होती है यया सुख सत् है यह प्रतिज्ञा है किस हेतु से सत् है अर्थक्रियाकारी होनेसे यह हेतु है जो जो अर्यकिर .

भापानुवादसहित । १४७
याकारी (प्रयोजन सिद्धिरूप क्रिया करनेवाला ) होता है यह सत्
होता है जैसे चेतन पुरुष यह उदाहरण है सुख पुलकादि रूप अर्थ क्रि-
याकारी है यह उपनय है तिससे सुख सत् है यह निगमन है इस
प्रकारसे पांच अवयवोंके योगसे अनुमानद्वारा गुणआदि अप्रत्यक्ष प-
दार्थों का सर्वथा नाश होना सिद्ध नहीं होता कारणरूपसे रहना सिद्ध
होता है ॥ २७ ॥ अव नास्तिक जो प्रत्यक्षमात्र प्रमाण मानते हैं मन्य-
प्रमाणको व्यासिकी सिद्धि न मानकर नही मानते उनकी यह शंका है-
न सकृद्हणात्सम्बन्धसिद्धिः॥२८॥
एकवार सहचारके ग्रहणसे सम्बंधकी
सिद्धि नहीं होती॥२८॥
एकवारकै सहचारके ग्रहणसे सम्बंध (व्याप्ति) की सिद्धि नहीं
होती वारम्वारकी प्राप्ति नहीं होती क्योंकि धूम व अनिको कहीं वार्य
होते देखकर सदा साथही होना नहीं मान सक्ते विना धूमभी अमि होता
है नहीं कहीं हाथी व अनि एक जगह देखकर फिर कभी हाथी देखकर
अमिका होना अनुमान करना भी मानने योग्य होगा इससे व्याप्तिमहण-
के असंभव होनेसे अनुमानसे अर्थकी सिद्धि नहीं है ॥ २८ ॥ अब इस
अप्रत्यक्षपदार्थमें व्याप्तिग्रहण न दोनेकी शंका निवारण व व्याक्षिसे
मनुमानद्वारा अब प्रत्यक्ष पदार्थोके सिद्ध करनेके अर्थ सूत्रकार प्रथम
व्याप्तिका लक्षण वर्णन करते हैं-
नियतधर्मसाहित्यमुभयोरेकत-
रस्य वा व्याप्तिः ॥ २९॥
नियतधर्मसहित होना दोनोंका अथवा एकको
व्याति है ॥२९॥

१४८ सांख्यदर्शन। नियतधर्म सहित होना अर्यात् धर्मीके धर्मका उस्के सायही रहना ' सहचार है दोनोंका अर्थात् साध्यसाधनका अथवा एक साधनेमात्रका जो नियत धर्म अर्थात् व्यभिचाररहित सहचार है वह व्याप्ति है दोनोंका यह सम व्याप्तिपक्षमें कहाहै और नियम तर्कके साथ जो अनुकूल हो वह ग्रहणके योग्य है नियत धर्म सहित होना व्याप्ति होनेसे व्याप्तिग्रह (व्याप्तिग्रहण ) असंभव नहीं है यह भाव है ॥ २९ ॥ नतत्वान्तरं वस्तुकल्पनाप्रसक्तेः॥३०॥ वस्तुकी कल्पनाका प्रसंग होनेसे तत्वान्तर (भिन्नतत्व) नहीं है ॥३०॥ व्याप्तिका आश्रय जो वस्तु है उस्कीभी कल्पना होनेके प्रसंगसे निय- त धर्म सहित होनेसे भिन्न कोई पदार्थ व्याप्ति सिद्ध नहीं होती अर्थात् जो वस्तु सिद्ध है उसीकी व्याप्ति होनेमात्रकी कल्पना की जाती है यह हमारा ( ग्रंथकारका ) मत है अब अन्यआचार्योंका मत वर्णन करते है ॥ ३० ॥ निजशक्त्युद्भवमित्याचार्याः॥३१॥ १ एक साधनमात्रका दृष्टान्त कार्यद्रव्यमें समझना चाहिये क्योंकि साध्य- कारणके साथ साधनकार्यका सम्बध अवश्य होताहै क्योंकि कार्य विना कारण के नहीं होता वा नहीं रहता है व कारण विना कार्यके रहताहै व होता है यथा धूम कार्य विना अग्निके नही होता व अग्नि कारण विना धूमके रहताहे व चक- मक पत्थर आदिसे विना धूमके प्रकट होताहै तथा विना कार्यके कारणका होना व विना कारणके कार्यका न होना पृथिवी घट कनककुण्डल आदि दृष्टान्तोसे समझलेना चाहिये कार्य विना कारण न होनेसे कारण साध्यमें कार्यसाधन मात्रका सहचार है दोनोंका सहचार ( साथ रहना ) पृथिवी गंध आदिमें जानना चाहिये क्योंकि विना पृथिवी गंध नही होता व विना गध पृथि वी नहीं होती इत्यादि।

।
बंद धर्म सभा
भाषानुवादसहित। १४९
अपनी शक्तिसे उत्पन्न व्याप्ति है कोई आचार्य
यह मानते हैं ॥३१॥
कोई भाचार्य यह कहते हैं कि व्याप्पकी निजशक्तिसे उत्पन्न शक्ति
विशेष रूप तत्वान्तर व्याप्ति है परन्तु निजशक्तिमात्र जबतक द्रव्यमें
स्थित है व्याप्ति नहीं है और उत्पन्न हुएका द्रव्यसे पियोग होजाने य
दूरदेशमें माप्त होजानेपरभी व्याप्तिभाष नहीं रहता यथा देशान्तरमें
प्राप्त धूमकी अग्निसे व्याप्प न होनेसे व देशान्तरमें गमनसे वह शक्ति
नष्ट हो जाती है इससे यह लक्षण यथार्थ नहीं है हम अपने लक्षणमें नि-
यत धर्मका साथ होना कहा है इससे हमारे लक्षणके अनुसार उत्पत्ति
कालावच्छिन्नता सहित धूम विशेषणके योग्य है अर्थात् जिसकालमें धूम
'अग्रिसे उत्पन्न हो रहाहै अनि सम्बंध रहित नहीं हुआ उस काल परिमा-
ण युक्तही धूम लक्षणमें घटित होता है इससे दोपकी प्राप्ति नहीं है ।।३१
आध्येयशक्तियोगइतिपंचशिखः॥३२॥
आध्येयशक्तिका योग व्याप्ति है यह पंच-
शिख आचार्य मानतेहैं ॥३२॥
। प्रकृतिआदिका बुद्धिआदिमें व्यापक होने व बुद्धि आदिके व्याप्य
होनेके व्यवहारसे प्रकृतिमादिकी आधारताशक्ति व्यापकता व बुद्धि-
मादिकी आधेयता शक्ति व्याप्यता है आधेयशक्ति ( व्याप्य होनेके धर्म)
का योग अर्थात् आधेय शक्तिमान होना व्याप्ति है तथा आधार अग्नि-
आधेय धूम होने की शक्तिका योग व्याप्ति है यह पंचशिख आचा-
का मत है ।। ३२ ॥ शंका व्याप्य वस्तुकी स्वरूपशक्तिही व्याप्ति है
मानना चाहिए प्राधेयशक्तिके कल्पना करनेका क्या प्रयोजन
उत्तर-
स्विरूपशक्तिनियमः पुनर्वादप्रसक्तेः॥ ३३॥

१४८ सांख्यदर्शन। नियतधर्म सहित होना अर्थात् धर्मोके धर्मका उस्के सायही रहना सहचार है दोनोंका अर्थात् साध्यसाधनका अथवा एक साधनमात्रका जो नियत धर्म अर्थात् व्यभिचाररहित सहचार है यह व्याप्ति है दोनोंका यह सम व्याप्तिपक्षमें कहाहै और नियम तर्कके साथ जो अनुकूल हो वह ग्रहणके योग्य है नियत धर्म सहित होना व्याप्ति होनेसे व्याप्तिग्रह (व्याप्तिग्रहण ) असंभव नहीं है यह भाव है ॥ २९ ॥ नतत्वान्तरं वस्तुकल्पनाप्रसक्तेः॥३०॥ वस्तुकी कल्पनाका प्रसंग होनेसे तत्वान्तर (भिन्नतत्व) नहीं है ॥३०॥ व्याप्तिका आश्रय जो वस्तु है उस्कीभी कल्पना होनेके प्रसंगसे निय- त धर्म सहित होनेसे भिन्न कोई पदार्थ व्याप्ति सिद्ध नही होती अर्थात् जो वस्तु सिद्ध है उसीकी व्याप्ति होनेमात्रकी कल्पना की जाती है यह हमारा ( ग्रंयकारका ) मत है अब अन्यमाचार्योंका मत वर्णन करते हैं ॥ ३० ॥ निजशक्त्युद्भवमित्याचार्याः॥३१॥ १ एक साधनमात्रका दृष्टान्त कार्यद्रव्यमें समझना चाहिये क्योंकि साध्य- कारणके साथ साधनकार्यका सम्बंध अवश्य होताहै क्योंकि कार्य विना कारण' के नहीं होता वा नहीं रहता है व कारण विना कार्यके रहताहै व होता है यथा धूम कार्य विना अग्निके नही होता व अग्नि कारण विना धूमके रहताहै व चक- मक पत्थर आदिसे विना धूमके प्रकट होताहै तथा विना कार्यके कारणका होना व विना कारणके कार्यका न होना पृथिवी घट कनककुण्डल आदि दृष्टान्तोंसे समझलेना चाहिये कार्य विना कारण न होनेसे कारण साध्यमें कार्यसाधन मात्रका सहचार है दोनोंका सहचार ( साथ रहना ) पृथिवी गंध आदिमें जानना चाहिये क्योंकि विना पृथिवी गंध नही होता व विना गंध पृथि वी नही होती इत्यादि।

बद धर्म सभा
भापानुवादसहित। १४९
अपनी शक्तिसे उत्पन्न व्याप्ति है कोई आचार्य
यह मानते हैं ॥३३॥
कोई भाचार्य यह कहते हैं कि व्याप्यकी निजशक्तिसे उत्पन्न शक्ति
विशेष रूप तत्वान्तर व्याप्ति है परन्तु निजशक्तिमात्र जबतक द्रव्यमें
स्थित है व्याप्ति नहीं है और उत्पन्न हुएका द्रव्यसे वियोग होजाने घ
दूरदेशमें माप्त होजानेपरभी व्याप्तिभाव नहीं रहता यथा देशान्तरमें
प्राप्त धूमकी अग्रिसे व्याप्य न होनेसे व देशान्तरमें गमनसे वह शक्ति
नष्ट हो जाती है इससे यह लक्षण यथार्थ नहीं है हम अपने लक्षणमें नि-
पत धर्मका साथ होना कहा है इससे हमारे लक्षणके अनुसार उत्पत्ति
कालावच्छिन्नता सहित धूम विशेषणके योग्य है अर्थात् जिसकालमें धूम
अमिसे उत्पन्न हो रहाहै भनि सम्बंध रहित नहीं हुआ उस काल परिमा-
ण युक्तही धूम लक्षणमें घटित होता है इससे दोपकी प्राप्ति नहीं है ॥३१
आध्येयशक्तियोगइतिपंचशिखः॥३२॥
आध्येयशक्तिका योग व्याप्ति है यह पंच-
शिख आचार्य मानतेहैं ॥३२॥
प्रकृतिआदिका बुद्धिआदिमें व्यापक होने व बुद्धि आदिके व्याप्य
होनेके व्यवहारसे प्रकृतिमादिकी आधारताशक्ति व्यापकता व बुद्धि-
आदिकी आधेयता शक्ति व्याप्यता है आधेयशक्ति (व्याप्य होनेके धर्म)
का योग अर्थात् अधेय शक्तिमान होना व्याति है तथा माधार अनि-
में आधेय धूम होनेकी शक्तिका योग व्याप्ति है यह पंचशिख आचा-
का मत है ॥ ३२ ॥ शंका व्याप्य वस्तुकी स्वरूपशक्तिही व्याप्ति है
हि मानना चाहिए आधेयशक्तिके कल्पना करनेका क्या प्रोजन
३
उत्तर-
नस्वरूपशक्तिनियमः पुनर्वादप्रसक्तेः॥ ३३॥

सांख्यदर्शन। पुनर्वाद (पुनरुक्ति) के प्रसंगसे स्वरूप- शक्ति नियम (व्याप्ति) नहीं है ॥३३॥ यथा घट कलश है यह कहनेके तुल्य स्वरूपशक्ति कहनेमें व्या- प्य व व्याप्पके स्वरूपमें अर्थभेद ज्ञात न होनेसे पुनर्वाद होनेका म- संग होता इससे स्वरूपशन्द ग्रहण न करके व्याप्तमें व्याप्य धर्मता उपपादन (प्रतिपादन) के अर्थ शक्तिपदको ग्रहण किया है ॥ ३३ ॥ विशेषणानर्थक्यप्रसक्तेः॥३४॥ विशेपणके अनर्थक होनेके प्रसंगसे ॥ ३४ ॥ व्यायका व्याप्यस्वरूप विशेषण कहना पुनर्वाद होनेसे अनर्य- क है अनर्थक होनेके प्रसंगसे स्वरूप शन्दको ग्रहण नहीं किया।॥ ३४ ॥ अब अन्य दूपण कहते हैं पल्लवादिष्वनुपपत्तेश्च ॥३५॥ पल्लवआदिमें सिद्ध न होनेसे ॥३५॥ पल्लव आदि वृक्ष मादिसे व्याप्य हैं अर्थात् वृक्ष आदि व्यापक प पल्लव आदि व्याप्य हैं पल्लव आदि व्याप्पमें स्वरूपशक्तिमात्र कहना व्याप्तिका लक्षण संभव नहीं होता क्योंकि पल्लव छिन्न होजाने अर्थात कटजानेपरभी पल्लवोंके स्वरूपकी शक्ति वृक्षमें रहने से व्याप्यताकी सिद्धि होगी और आधेयशक्ति पल्लाके कटने के समयमें नष्ट होगी इससे कट. जानपर व्याप्तिका अभाव है ॥ ३५|| शंका पंचशिखने व्याप्यकी शक्तिसे उत्पन्न शक्तिविशेषरूप व्याप्ति है यह क्यों नहीं कहा ऐसा नहीं कहा तो धूगके अनिके आधेय होनेके अभावसे अनिका व्यापक व धूमका अनिसे व्याप्प होना सिद्ध नहीं होता अर्थात् धूमकी व्याप्यता सिद्ध नहीं होती उत्तर- .

भापानुवादसहित । १५१ आधेयशक्तिसिद्धौ निजशक्तियोगः समानन्यायात् ॥३६॥ आधेयशक्तिका व्याप्ति होना सिद्ध होनेमें समान न्याय ( समान युक्ति होने ) से निजशक्तिसे उत्पन्नभी व्याप्तिरूपसे सिद्ध है ॥३६॥ जैसे भावविशेष व युक्तिसे आधेयशक्तिका व्याप्ति होना सिद्ध होता है ऐसेही निजशक्तिसे उत्पन्नभी व्याप्ति होना सिद्ध होता है नानाविधके सहचाररूप व्याप्तियोंके होनेसे एक दूसरेके सदृश न होने में जैसे नामा अर्थ व शब्द होनेमें दोप नहीं है दोप न समझना चाहिए अपने मतमें भी नानाविधक सहचारही अनेकव्याप्ति होना जाननेके योग्य हैं मनु- मानके हेतु होनेमात्रमें व्याप्तियोंकी सामान्यता समझना चाहिये यथा तृण, अरणि, मणि, कार्यरूप हैं परन्तु एक दूसरे परस्पर विजातीय होना सिद्ध होता है अर्थात् कार्यत्वरूप परजातिसे समान है व अपर- जातिभेदसे भिन्न हैं इसी प्रकारसे अनुमान हेतु होनेमात्र सहचारोंकी समानता व प्रकार भेदसे वह अनेक व विजातीय हैं मनुमानप्रमाणके पाधक भ्रम दोष निवारणके अर्थ व व्याप्तिके निश्चित होनेके अर्थ यह व्याप्तिका वर्णन किया गया अब उक्त पंच अषयवरूप शन्दका ज्ञान जनक (उत्पन्न करनेवाला) होना सिद्ध करनेके प्रयोजनसे शन्द श- तिका प्रतिपादन व शन्द प्रमाणमें विरुद्ध पक्षवालोंके दूपणोंका प्रति- पेध किया जाता है ।। ३६ ॥ । वाच्यवाचकमावः सम्बंधःशब्दार्थयोगा। वाच्यवाचकभाव शन्द व अर्थका सम्बंध है॥३७॥ अर्यमें षाच्यता शक्ति व शब्दमें वाचकता शक्तिका भाव दोनों शन्द .

१५२
सांख्यदर्शन।
व अर्थका सम्बंध है इस सम्बंधके ज्ञानसे शन्दसे अर्थका बोध होता
है ॥ ३७॥ शक्तिग्राहकोंको वर्णन करते हैं ।
त्रिभिस्सम्बंधसिद्धिः ॥ ३८॥
: तीनसे संबंधकी सिद्धिहै ॥३८॥
आप्तोपदेश, वृद्धव्यवहार, प्रसिद्धपदसमानाधिकरण, इन तीनसे
सम्बंध ग्रहण किया जाता है यह तीन सम्बंधक सिद्ध होनेके हेतु है॥३८
नकार्यनियमउभयथादर्शनात् ॥३९॥
दोनों प्रकारसे देखनेसे कार्यमें नियम नहीं है ॥३९॥
शक्तिग्रह कार्यहीमें होता है यह नियम नहीं है क्योंकि लोकमें
कार्यके तुल्य अकार्यमेंभी वृद्धव्यवहारआदि देखनेमें आते हैं यया
गौ लावो इस कार्यपर वृद्धवाक्यसे गौ ले आनेका व्यवहार देखा जाताहै
इसी प्रकारसे तेरे पुत्र उत्पन्न हुवा इत्यादि सिद्धिपदार्य परवाक्यसे
पुलकादि होनेका व्यवहार देखा जाता है इस प्रकारसे कार्य व अकार्य
दोनोंमें शक्तिग्रह देखनेसे कार्यमात्रमें नियम नहीं है ॥ ३९ ॥ शंका
लोकमें अर्थ व प्रत्यय आदिके देखनेसे सिद्ध पदार्यमेंभी शक्तिग्रह होवै
परंतु घेदमें अकार्य बोधनके वृथा होनेसे कैसे अकार्यमें शक्तिग्रह
होगा उत्तर-
लोके व्युत्पन्नस्य वेदार्थप्रतीतिः॥४०॥
लोकमें व्युत्पन्नको वेदार्थकी प्रतीति
होती है ॥४०॥
लोकमें जो पुरुष शब्दशक्तिमें व्युत्पन्न होता है उसीको लोकानुसार
घेदके सर्पकी प्रतीति होती है लोकमें शब्दशक्ति भिन्न हो य वेदमें
भिन्न हो ऐसा नहीं होता इससे लोकमें सिद्ध अर्थ पर शक्तिग्रह होनों
देखनेसे वेदमेंभी उस्की सिद्धि होती है ॥ ४० ॥

भापानुवादसहित ।
न त्रिभिरपौरुषेयत्वाद्वेदस्यतद
र्थस्यातीन्द्रियत्वात् ॥४१॥
आप्तोपदेश आदि तीनसे वेदमें शक्तिग्रहका होना
वेदके अपौरुषेय होनेसे व वेदार्थके अंतीन्द्रिय
होनसे संभव नहीं होता ॥४१॥
जो किसी पुरुषसे न कहा गया हो वह अपौरुषेय है वेद किसी
पुरुषसे कथित सिद्ध न होनेसे अपौरुषेय है अपौरुषेय होनेसे आप्तोप-
देशसे वेदार्यमें शक्तिग्रह होना संभव नहीं होता तया वेदार्थके अती-
न्द्रिय ( अप्रत्यक्ष ) होनेसे वेदार्थमें वृद्धव्यवहार व प्रसिद्धपद समाना-
धिकरण होनेका ग्रहण नहीं होसकता ॥ ४१ ॥ वेदार्थक अतान्द्रिय
होनेक प्रतिपेधमें प्रथम उत्तर वर्णन करते हैं ।
नयज्ञादेःस्वरूपतो धर्मत्वं वैशिष्टयात् ॥४२॥
नहीं प्रकृष्टफल करनेवाले होनेसे यज्ञ
आदिके स्वरूपहीसे धर्म होना विदित होता है ॥४२॥
जो वेदार्थका अतीन्द्रिय होना कहा है यह युक्त नहीं है क्योंकि दे-
वता उद्देश्यक द्रव्यत्याग आदिरूप यज्ञदान आदिका स्वरूपहीसे
धर्म होना वैशिष्टयसे अर्थात् प्रकृष्टफल करनेवाले होनेसे विदित होते
हैं फलविशेष होने व इच्छा आदिरूप होनेसे यज्ञादिक अतीन्द्रिय
नहीं हैं जो यह कहा जाय कि देवता आदि अतीन्द्रिय हैं तो अतीन्द्रि-
योंमें भी पदार्थ होनेके धर्मसे सामान्यरूपसे प्रतीति होनेका आगे वर्णन
कियेजानेसे अतीन्द्रिय नहीं हैं ॥ ४२ ॥ अपौरुषेय होनेसे जो आप्त
उपदेशका अभाव कहा है उस्का उत्तर कहते हैं।
निजशक्तियुत्पत्त्याव्यवच्छिद्यते॥४३॥

१५४
सांख्यदर्शन।
निजशक्ति व्युत्पत्तिद्वारा विभाग वा भेद सहित
उपदेश की जाती है।। ४३॥
अपौरुषेय होनेमेभी वेदोंकी जो निज अर्थात् स्वाभाविकी अर्थों में
शक्ति है वही परम्परासे आतपुरुषोंकरिक इस शब्दका यह अर्थ :
ऐसी व्युत्पत्तिद्वारा अर्थान्तरसे पृथक् करिके जो अर्थ जिस शब्दमें नि-
यत है उसीसे उपदेश की जाती है आधुनिकशब्दके समान कोई आपसे
संकेत नहीं करता जिस्से पौरुषेय होनेकी अपेक्षा होवे ॥ ४३ ॥
योग्यायोग्येपु प्रतीतिजनकत्वात्
तत्सिद्धिः॥४४॥
योग्य व अयोग्योंमें प्रतीतिजनक (उत्पत्तिकर्ता)
होनेसे उसकी सिद्धि है ॥४४॥
योग्य व अयोग्योंमे अर्थात् प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्षपदायोंमें सामान्य
धर्मसे साधारणसे पदोका अर्थमें प्रतीतिजनक होना अनुभवसे सिद्ध हो-
नेसे उस्की अर्थात् शक्तिग्रह ( अर्य ग्रहणशक्ति )की सिद्धि है परन्तु
जो सामान्य नहीं है ऐसा विशेष अतीन्द्रिय अपूर्ववाक्य है उस्का ग्रहण
इस पूर्ववर्णनमें न समझना चाहिए शब्दगतविशेषका वर्णन किया
जाता है ॥१४॥
न नित्यत्वं वेदानांकार्यत्वश्रुतेः॥ ४५ ॥
कार्य होना श्रुतिप्रमाणसे सिद्ध होनेसे
वेदोंकी नित्यता नहीं है ॥४५॥
"सतपोऽतप्यत तस्मात्तपस्तपनादत्रयो वेदा अजायन्त" इत्यादि अर्य
उसने तप किया उस तप करनेसे तीनवेद उत्पन्न हुऐ इत्यादि श्रुतिसे है-
दका कार्य होना नित्य न होना विदित होता है |॥ १५ ॥

भाषानुवादसहित । न पोरुपेयत्वंतत्कर्तुःपुरुपस्याभावात् ॥ ४६॥ उस्के कर्ता पुरुपके अभावसे पौरुषेय नहीं है ॥४६॥ बहुत मनुष्य यह मानते हैं कि वेदका कर्ता पुरुप ईश्वर है इस शास्त्र में शास्त्रकार पुरुपको अकती माना है इसीसे मुक्तरूप ईश्वरमें सृष्टि कर्तृत्वके सिद्ध होनेका प्रतिषेध किया है कर्तृत्वके अभावसे ईश्वर वेदका कर्ता नहीं होसकता व कर्ताभावसे ईश्वरका अभाव है इससे इस सूत्रमें कहा है कि उनके (वेदोंके ) कर्ता पुरुष ईश्वरके अभावसे अर्थात् कर्व- त्वके अभावसे वेद पौरुषेय नहीं हैं अर्थात् ईश्वरकृत नहीं है किस हेतुसे कर्ता पुरुषका अभाव है वह हेतु आगे सूत्रमें वर्णन करते हैं ॥ १६ ॥ मुक्तामुक्तयोरयोग्यत्वात्॥४७॥ मुक्त व अमुक्त दोनोंके योग्य न होनेसे ॥ १७॥ मुक्त वा अमुक्त दोनों होनेमें वेदके निर्माणमें योग्य नहीं हो सकता मुक्त होने में सर्वज्ञ होनेपरभी रागरहित होनेसे सहस्र शाखा वेदके निर्माण में अयोग्य हे मुक्त न होने में अज्ञान सर्वज्ञ न होनेसे अयोग्य है इस्से ईश्वरके वेद का न होनेसे वेद अपौरुषेय है ॥ ४७ ॥ जो ऐसा समझा जावै कि अपौरुषेय होनेसे वंदनित्य स्वतःसिद्ध है तो अपौरु- पेयं होनेसे नित्य होना सिद्ध नही होता इस्का दृष्टांत आगे सूत्रमें वर्णन करते हैं । नापौरुषेयत्वान्नित्यत्वमङ्गुरादिवत् ॥४८॥ अपौरुषेय होनेसे अङ्कुरआदिके तुल्य नित्य होना सिद्ध नहीं होता ॥१८॥ यथा अंकुर आदि अपौरुषेय नित्य नहीं है तथा वेदी नित्य नहीं हो सकता ॥ ४८॥ शंका अंकुरके कार्यरूप होनेसे घटके सदृश पौ- पेय होनेका अनुमान किया जावै उत्तर- क सांख्यदर्शन। तेषामपि तद्योगेदृष्टबाधादिप्रसक्तिः॥४९॥ उनकाभी उसके साथ योग होनेमें दृष्टकी बाधा होनेका प्रसंग है॥४९॥ उनका उक्त अंकुर आदिका उस्के साथ योग होने में अर्थात् पौरुषेय होनेके योगमें दृष्टकी बाधा होनेका प्रसंग है भाव इसका यह है कि जो पौरुषेय है वह शरीरजन्य ( शरीरसे उत्पन्न होनेके योग्य ) है यह व्याप्ति लोकमें दृष्ट है अर्थात् प्रत्यक्षसे सिद्ध है अंकुर आदिमें ऐसा होना दृष्ट नहीं है इस्से दृष्ट व्याप्तिकी बाधा होनेका प्रसंग होगा ॥ ४९ ।। यस्मिन्नदृष्टेऽपि कृतबुद्धिरुपजाय- ते तत्पौरुषेयम् ॥५०॥ जिस अदृष्ट में भी कृत होनेकी बुद्धि उत्पन्न होती है वह पौरुपेय है ॥ १०॥ दृष्टके समान अदृष्टमें भी जिस वस्तुमें कर्ता करिक बुद्धिपूर्वक कृत होनेकी बुद्धि उत्पन्न होती है वह पौरुषेय है अर्थात् यही पौरुपेय कहा जाता है अभिप्राय इस्का यह है कि यद्यपि नित्य ईश्वर जो वेदका कर्ता पुरुषमाना जाता है वह घेदका कर्ता युक्तिसे सिद्ध न हो व प्रत्य- क्षसे सिद्ध न हो तथापि घेदमें कृतहोनेकी बुद्धि होनेसे घेदको आदि पुरुष वा ब्रह्मासे उक्त होनेसे पौरुषेय मानना चाहिये इस हेतुसे कि यथा दृष्टपदार्थ कोई मन्दिरको उत्तम रचना चित्रकारी संयुक्त देखने व उसमें भोग्यपदार्थ शय्या भोजन वस्त्र आदि पदार्थ देखनेसे कर्ताको करते व धरते हुये न देखने परभी चेतन कर्तासे बुद्धिपूर्वक कृत होने- की बुद्धि होती है इसी प्रकारसे वेदमें धर्म अधर्म आदि उत्तम उपदेश विधि निषेध होनेसे किसी बुद्धिमान पुरुषसे पुद्धिपूर्वक कृत होनेके. अनुमानसे पौरुषेय होनेका बोध होता है कोई इस सूत्रका अर्थ इस्के भाषानुवादसहित । विरुद्ध वर्णन करते हैं वेदको सर्वथा अपौरुषेय स्वतः सुषुप्तके श्वास- के निकसनेके सदृश आदि पुरुषके श्वाससे उत्पन्न मानते हैं परन्तु यह सर्वथा अयुक्त व असंभव कथन है क्योंकि किसी प्रमाणसे विना चेतन ज्ञानवान् जड शब्दका आपसे वाक्यरचना करना व यथोचित तत्वार्य प्रतिपादन करना संभव नहीं हो सकता ॥ ५० ॥ निजशत्यभिव्यक्तःस्वतःप्रामाण्यम् ॥५१ ॥ निजशक्तिकी प्रकटतासे स्वतःप्रामाण्य है ॥५१॥ जो यह शंका होकि आसवाक्यमें आप्तके विश्वासमापसे जो पदा- यं अपनेको निश्चित नही होता व उस्का प्रत्यक्ष नहीं होता उस्का भी प्रामाण्य मान लिया जाता है ऐसाही वेदका प्रामाण्य है अपनेको यथार्य होनेका निश्चय नहीं हो सकता इस शंका निवारणके अर्थ व यह सूचित करनेके गर्थकी आतंक विश्वासहीसे वेदका प्रामाण्य नहीं है वेदकी शब्दशक्तिहीसे जो अर्थ प्रतीत है उससे स्वतः वेदोंका मामा- ण्य सिद्ध होता है सूत्र में यह कहाहै कि निजशक्ति अर्थात् वेदोंके अ- पने शब्दशक्तिसे जो अर्थ सत्यताकी प्रतीति है उस्की प्रकटतासे अर्या व मंत्र व आयुर्वेद आदिमें उस्के प्रकट होनसे सम्पूर्ण वेदोंका मामाण्य आपहीसे सिद्ध होताहै अभिप्राय यह है कि मंत्र व मायुर्वेदमें जैसा कषित है उस प्रकारसे करनेसे मंत्र व औषधका फल सिद्ध होनेसे वेद- के शब्दार्थहीसे वेदोंका आपही सत्य होने व प्रमाण योग्य होनेका नि- श्चय होता है गुण आदिकोंका अत्यन्त नाश नहीं है यह जो प्रतिज्ञा है इस प्रतिज्ञामें सुख आदि सिद्ध करने के लिये अनुमितिके उपयोगी पं- च अवयवों व पंच अपयवोंके शब्दरूप होनेसे शब्दप्रमाणका वर्णन किया अब गुणे आदिकोंको अन्ययुक्तिसे सिद्ध करनेमें अन्य हेतुको वर्णन करते हैं ॥ ५१ ॥ नासताख्याननृशृंगवत्॥५२॥ " .

१५८ सांख्यदर्शन।
मनुष्यके सींगके समान असतका ज्ञान होना
संभव नही होता ॥ १२ ॥
ज्ञानमात्रसे व पंच अवयषद्वारा अनुमानसे जो सुख आदि सिद्ध
होते हैं जिनका वर्णन किया गया है वह सत होनेहीसे ज्ञानसे सिद्ध हो-
ते हैं जो अत्यन्त यसत् है उस्का ज्ञान होना संभव नहीं होता यथा ब-
सत् मनुष्यके सींगका ज्ञान नहीं होता प्रमाणसे सिद्ध होनेसे सुख आदि
गुण सत है ॥ ५२ ॥ अव पूर्वपक्ष यह है कि यद्यपि गुण आदिका सत्
होना अंगीकार किया जाय तथापि गुण आदिकोंका अत्यन्त याध नही
है यह कहना मिथ्या है मिथ्या होनेका हेतु वर्णन करते हैं ।
न सतोवाधदर्शनात् ॥५३॥
नाश देखनेसे सत नहीं है ॥५३॥
विनाशकाल में गुण आदिका नाश होना देखनेसे गुण आदि अत्य-
न्त सतभी नहीं हैं ॥ ५३ ॥ जो यह समझा जाँव कि सत्व असतो
भिन्न जगत् माना जावे तो जो कहीं सत् प कहीं असत् होनेका भ्रम
होता है यह न होघे विलक्षण होनेसे सत्व असत् दोनों मानना चाहि-
ए तो इस्का उत्तर यह है ॥
नानिर्वचनीयस्यतदभावात् ॥ ५४॥
अनिर्वचनीयका भान नहीं होता उस्के अभावसे ॥५४॥
उस्के अभावसे अर्थात् सत् असतसे भिन्न वस्तु होनेके अभाषसे म.
यात् ऐसा पदार्य जो प्रमाणसे सिद्ध नहीं हैं अप्रसिद्ध है ऐसे अनिर्वच-
नीयको भाष नहीं होता सत् असत्से भिन्न होना व वही सत् व वही
असद समकाल व अवस्थामें होना दोनों असंभव है इससे ऐसा मान-
ना अयुक्त है ॥ ५४ ॥
नान्यथा ख्यातिःस्ववचोव्याघातात्॥ ५५॥

. भाषानुवादसहित । अपने वचनके व्याघातसे अन्यथा ख्याति नहीं है ॥५५॥ जो यह कहा जाये कि अन्यपदार्थ अन्य रूपसे भासित होता है तो यह अपनेही वचनका व्यापात है कि शन्दसे अन्यथा कहता है व भाष उस्का अन्यथा कहता है और अन्यमें अन्यस्वरूप होना भी मनुष्यके सोंगकी तुल्य मिथ्या है इससे अन्य वस्तुका अन्यरूपसे भासित होना कहनाभी असंगतहै ॥ ५५ ॥ अव अत्यन्त बाध (नाश ) न हो, नेमें अपना सिद्धांत वर्णन करते हैं- सदसत्ख्यातिबाधावाधात् ॥५६॥ सत् असत् ख्याति (कथन)वाध व अबाध होनेसे॥५६॥ प्रतिपन्न धर्मों में निषेधबुद्धि विषय होनेको वाध कहते हैं सत् व अ- सत् कहना बाध व अवाधसे होता है सब वस्तुओं (पदार्यों )के नित्य होनेसे स्वरूपसे गुणोंका बाघ नहीं है इससे सत हैं व संसर्गसे सब वस्तु- भोंका चैतन्यमें वाध है अर्थात् जब ज्ञानसे बाह्य होते हैं बुद्धिगत नहीं होते ज्ञाम संसर्गरहित होते हैं तब नष्ट सदृश ज्ञात होते हैं इससे असत् है यया पट आदिमें अरुणरूप आदि जबतक पटमें दृष्ट होते हैं सत् विदित होते हैं पटसे दूर हो जानेमें नष्ट समुझे जाते हैं परंतु स्वरूपसे उनका नाश सर्वथा नहीं होता इसी प्रकारसे अवस्या भेदसे कालान्तरमें गुणोंका परिणाममात्र होता है अत्यन्त वाध नहीं होता सत् असत् दोनों विरुद्ध हैं इससे दोनों होना कहना ययार्थ नहीं है जो यह संशय हो- तौ प्रकार भेद होने से विरोध नहीं होता यथा तल रूपसे जो चांदी है वह अपने रूपसे सतहै परन्तु सीपमें जो चांदीका बोध होता है उस्में भ्रमसे सत्यके सटश बोध होनेसे असत् है इसी प्रकारसे जगत् प्रकृति कार्यरूप अपने स्वरूपसे सत् है चैतन्य आदिमें अध्यस्तरूप असत् है' इस प्रकारसे प्रकृति सत् असतस्वरूप है ॥ ५६ ॥ यह सत् असत् "पदार्यका निरूपण कारकै फिर शब्द विषयमें विशेष विचार करते हैं।

१६० सांख्यदर्शन। प्रतीत्यप्रतीतिभ्यांनस्फोटात्मकःशब्दः ॥५७ प्रतीति व अप्रतीति दोनो होनेसे शब्द स्फोटात्मक नहीं है ॥ ५॥ प्रत्येक वाँसे भिन्न कलश इत्यादि रूप अखण्ड एक पद वाँके संयोगसे माना जाता है कलश आदि विशेष शन्द जिस अर्थके वाचक होते हैं उस अर्थक बोधको स्फुट (प्रकट ) करते हैं शब्दसे अर्थ ज्ञान- के प्रकट होने वा प्रतीत होनेको स्फोट कहते हैं शब्दसे यह स्फोट हो- ता है इस्से शन्दको स्फोटात्मक कहते हैं इस स्कोटके प्रतिपेधमें यह कहा है कि शन्दको जे स्कोटात्मक मानते है उनका मत सत नहीं है शब्द स्फोटात्मक नहीं है क्यों नहीं है प्रतीति अप्रतीतिसे अर्थात् श- ब्दसे अर्थकी प्रतीति होती है और नहीं भी होती प्रथम जिस्को इस स्फोटका ज्ञान हो गया है कि यह विशेष शब्द इन विशिष्ट अर्थोके वाच- कहें उसीको अर्थका बोध होता है जिस्को स्फोटका ज्ञान नहीं है उस्को शब्द विशेषसे अर्थ विशेषका ज्ञान नहीं होता अर्थात् उस्को अर्थ बोध करानेकी शब्दोंमें स्वतः (आपसे ) शक्ति नहीं है इस्से शब्दमें स्फोट- कल्पना व्यर्थ है ॥ ५७ ॥ नशब्दनित्यत्वंकार्यताप्रतीतेः॥५८॥ कार्य होनेकी प्रतीतिसे शब्दकी नित्यता नहीं है ॥२८॥ शन्द उत्पन्न होताहै व नष्ट होता है इस्से कार्य है कार्य होनेकी प्रती. तिसे शब्द नित्य नहीं है इस हेतुसे कि गकारका उच्चारण सुनकर यह प्रत्यभिज्ञान होता है कि यह वही अक्षर गकारहै जो पूर्वही मुनाया अथवा जिस्को पूर्वही गकार मानतेथे शन्दको नित्य .माननायुक्त नहीं दै उत्पनगकारयोध होनेसे अनित्य है पूर्वगकारके सजातीय होनेसे प्रत्यभिज्ञानका होना सिद्ध होता है वही एकही होना सिद्ध नहीं होता अन्यथा घट आदिकोंको भी प्रत्यभिज्ञा होनेसे नित्य मानना होगा।

" , भाषानुवादसहित। पूर्वसत्वस्याभिव्यक्तिीपेनेवघटस्य ॥ ५९॥ दीपसे घटके समान पूर्व सिद्ध सत्वकी प्रकटताहै ॥१९॥ जो शब्द सत्तारूपसे पूर्वहीसे सिद्ध है वह धुनिसे केवल प्रकट होता है यही उत्पन्न होता है यथा घटसत्ता अर्थात् घटका होना पूर्वही सि- द्ध होनेपर भी जब अंधकारसे दृष्ट नहीं होता तब पट नहीं हैं ऐसा विदित होता है दीपके प्रकाशसे उस्की अभिव्यक्ति (प्रकटता) हो- ती है इसी प्रकारसे पूर्व सिद्ध शब्दकी उच्चारणसे अभिव्यक्ति होती है ५९ सत्कार्यसिद्धान्तश्चेत्सिद्धसाधनम् ।।६० ॥ सत्कार्य सिद्धांत होवै तौ सिद्ध साधन है ॥६॥ अनागत अवस्थाको छोडकर जो वर्तमान अवस्थाका लाभ करना अभिव्यक्ति अंगीकार की जाये तो सत्कार्य सिद्धांतह अर्थात् कार्यके सदा सत् होनेका सिद्धांतहै ऐसी नित्यता सब कार्योंकी है सब कार्यों- की नित्यता होने में सिद्ध साधन दोप होगा और जो यह माना जाय कि वर्तमानही रूपसे सत है ज्ञान मात्र होना अभिव्यक्ति है तो पट आदिकोंकीभी नित्यता सिद्ध होगी इससे पटआदिके तुल्प कार्यरूप शब्द अनित्यहै ।। ६० ।। अब आत्माके अद्वैत माननेवालोंके मतका प्रतिषेध करतेहै ॥ नाद्वैतमात्मनोलिंगात्तद्भेदप्रतीतेः ॥६१ ॥ आत्माके लिंग (लक्षण)से उस्के (आत्माके) भेदकी प्रतीति होनेसे अद्वैत नहीं है ॥ ६॥ यद्यपि यथा आरमांक भेद लिंग (लक्षण ) में श्रुति वाक्य है तथा भभेद वाक्यभी हैं तथापि अजा वाक्यमें जिस्मे यह वर्णन किया है कि एक पुरुष प्रकृतिको भोग करता है व दूसरा विवेकसे प्राप्त वैराग्य से प्रकृतिको त्याग करताहै त्याग मादि लिंग ( लक्षण) से आरमाके

१६२
सांख्यदर्शन।
भेदही होनेकी सिद्धि होती है अद्वैत वाक्य साधर्म्य होने व वैधर्म्य
न होनेसे एकता प्रतिपादन पर है अत्यन्त अभेद प्रतिपादक नहीं
हैं अत्यन्त अभेदमें एकका त्यागकरना अन्यका त्याग न करना यह
भेद होना संभव नहीं होसक्ता इससे अद्वैत नहीं है ॥ ६१ ॥ श्रु-
त प्रमाणसे भेदं होना वर्णन करिकै प्रत्यक्ष भी अद्वैत होनेका बाधक-
है यह वर्णन करते हैं ॥
नानात्मनापिप्रत्यक्षवाधात् ॥१२॥
अनात्मासे कभी प्रत्यक्ष वाध होनेसे अद्वैत नहीं है ॥६॥
अनात्मासे अर्थात् भोग्य प्रपंचसे प्रत्यक्षसे वाध होनेसे आत्माका
अद्वैत होना सिद्ध नहीं होता क्योंकि एक आत्मामें अनेक प्रकारके
भोग होना सिद्ध नहीं हो सकते और आत्माके भोग्योंमे भेद न होनेमें
घट पट आदिका भी अभेद होना सिद्ध होगा ॥ ६२ ॥
नोभाभ्यांतेनैव ॥६३॥
उक्त हेतुहीसे दोनोंसे अद्वैत नहीं है॥६३॥
उक्त हेतुहीसे अर्थात् प्रत्यक्ष घाधहासे आत्मा व अनात्मा दोनोंसे
अद्वैत होना सिद्ध नहीं होता अर्थात् अनेक प्रकारके भोग्योंका भाग
एकही आत्मामें होना अथवा एक आत्माका अनेक प्रकारके भोग एक
दूसरेके विरुद्ध इष्ट अनिष्ट रूपका ग्रहण करना दोनों असंभव प्रत्यक्ष
विरुद्ध होनेसे अद्वत सिद्ध नहीं होता अथवा दोनों पूर्वोक्त हेतुओंसे
आत्मा व अनात्मासे अद्वैत सिद्ध नहीं होता ॥ ६३ ॥ शंका " आत्मैवेदं
सर्वगतथा सर्व खल्विदं ब्रह्मा अर्थ-आत्माही यह मब है तथा निश्चय क-
रिकै यह सवा ब्रह्महै इत्यादि श्रुतियोंके द्वैतके विरुद्ध होनेका क्या हेतु
है ? उत्तर-
अन्यपरत्वमविवेकानांतत्र॥६४॥

भाषानुवादसहित। १६३ तिस्में (अद्वैतमें) अविवेकियोंप्रति अन्यपरत्व अर्थात् उपासनार्थक अनुवादहै॥ ६४ ॥ लोकमें शरीर शरीरी व भोक्ता भोग्यमें अविवेकसे अभेद व्यवहार करते हैं यथा मैं गोराहूँ यद्यपि गोरा होना देहका धर्म है आत्माका नहीं है तथापि अविवेकसे अभेद व्यवहार करतें हैं इससे उसी प्रकारके व्यव- हारको कहिकर उन अविवेकियोंमति सत्वशुद्धिआदिके अर्थ श्रुति उपासनाका विधान करती है और इसीसे परमार्थदशामें उपास्योंके आत्मा होनेका श्रुति प्रतिषेध करती है यथा श्रुतिमें कहा है "यन्मनसान मनुतेयेनार्मनीमतं । तदेवब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते अर्थ-जो मनसे नहीं जानता अर्थात् विनामनद्वारा सब जानता है जिससे मन जाना गया ऐसा कहते हैं उसीकी तू ब्रह्म जान न इसको जिसकी उपासना कर- ता है इत्यादि ॥ ६४ ॥ नात्माविद्यानोभयजगदुपादान कारणंनिःसंगत्वात् ॥६५॥ न आत्मा व अविद्या न दोनों निःसंग होनेसे जगत्के उपादान कारण नहीं हैं ॥६५॥ मात्मा व आत्मामें आश्रित अविद्या अथवा दोनों निःसंग होनेसे अ- र्यात् आत्माके संग रहित होनेसे जगत्के उपादान कारण नहीं है क्योंकि संगहीसे द्रव्योंका विकार होता है इससे केवल अद्वितीय आत्माका असंग हरेसे ज्यादान होता संपत नहीं होता न अविद्याद्वारा उपादान होना संभव होता है क्योंकि अविद्याके योग होनेका पूर्वही निषेध किया गया है ॥६५॥ नैकस्यानन्दचिद्रूपत्वेद्वयोर्भेदात् ॥६६ ॥ .

१६४
सांख्यदर्शन।
दोनोमें भेद होनेसे आनन्द व चैतन्य (ज्ञान) दोनों
रूप होना एकका धर्म नहीं है ॥६६॥
ब्रह्मको श्रुतिमें आनन्द रूपभी वर्णन किया है यथा "सत्यविज्ञानमान-
न्दं ब्रह्म' अर्थ-सत्य विज्ञानरूप आनन्दरूप ब्रह्म है इससे आनन्दरूप
ब्रह्मके होनेके प्रतिपेधसे व.श्रुतिसे आनन्द रूप होनेका जो भ्रम होता है
उसके निवारणके अर्थ सूत्र में यह कहा है कि आनन्द व चैतन्य दोनों
एकही धर्मीके धर्म होना संभव नहीं होते क्योंकि जिस कालमें दुःखका
ज्ञान होता है उस कालमें सुखके अनुभव न होनेसे ज्ञान सुखका भेद
सिद्ध होता है जो यह समुझा जावै कि ज्ञान विशेष सुख है तो ऐसा
कहनाभी युक्त नहीं है क्योंकि आत्मस्वरूप जो ज्ञान है वह अखण्ड है
इसीसे चैतन्यके अनुभवकालमें सुखका आवरणभी नहीं कहाजाय
सकता अखण्ड होनेसे आनन्दका आवरण होना संभव न होनेसे मैं
दुःखको जानता हूँ यह अनुभव होना असंभव है आत्मामें अंश भेद
नहीं है कि जिस अंशमें आनन्दका आवरण होता है उस्मेंभी चैतन्य
अंश माना जाय घ श्रुतिभी आत्माको दुःखसुखरहित वर्णन करती है
यथा "नानन्दननिरानन्दमि " त्यादि अर्थ-न आनन्दरूप है न आनन्द
रहित है इत्यादि इससे आनन्द आत्माका गुण नहीं है दुःख सुख प्रकृति
कार्यका धर्म है ॥ ६६ ॥ शंका आनन्दरूप प्रतिपादन करनेवाली
श्रुतिका यथार्थ होना किस प्रकारसे माना जायगा ? उत्तर-
दुःखनिवृत्तेगौणः॥६७॥
दुःखनिवृत्तिसे गौण है ॥ ६७॥
औपाधिक दुःखकी निवृत्तिसे जो आत्मा सुखरूप कहा जाता
है
इस भावसे आनन्द शन्द गोण श्रुतिमें कहा है श्रुति सौपाधिक आन-
न्दपर हैना ६७॥
विमुक्तिप्रशंसामन्दानाम् ॥६८॥

भाषानुवादसहित । मन्दोंके अर्थ विमुक्तिकी प्रशंसा है ॥ ६८॥ मन्द जो अज्ञान है उनकी रुचि बढानेके लिये दुःखनिवृत्तिरूप सुखमय आत्मस्वरूप मुक्तिकी श्रुति अज्ञानियोंप्रति प्रशंसा करती है ॥ ६८ ॥ मनके व्यापक न होनेका हेतु वर्णन करते हैं । नव्यापकत्वमनसःकरणत्वादिन्द्रिय त्वादा।।६९॥ करण होने अथवा इन्द्रिय होनेसे मनका व्यापक होना सिद्ध नहीं है ॥ ६९॥ मन अंतःकरण होनेसे जैसे अन्य करण व्यापक नहीं होते व्यापक नहीं है अथवा ज्ञान प कर्म इन्द्रियोंसे भिन्न अंतःकरण रूप इन्द्रिय वि. शेष देह मात्रमें दुःख सुख व इन्द्रिय विषयोंका ग्राहकहोनेसे मनक मध्यम परिमाण होना संभव होता है विभु होना सिद्ध नहीं होता ॥६९॥ सक्रियत्वादतिश्रुतेः॥७॥ गति सुननेसे क्रिया संयुक्त होनेसे ॥७०॥ मात्माका लोकान्तरमें गमन सुननेसे अगवा आत्माके गमन आगमन वर्णनमें श्रुति प्रमाण होनेसे आरमउपाधिभूत अंतःकरणका क्रिया संयुक्त होना सिद्ध होनेसे मनका विभु (व्यापक) होना संभव नहीं होता क्योंकि विभु आत्मामें स्वाभाविक गमन होना सिद्ध नहीं होता ॥ ७० ॥ मनके निरवयव होनेका प्रतिषेध करते है- ननिभीगत्वंतयोगाद्धटवत्॥७१ ॥ उनके संयोग होनेसे घटके समान भागरहित' (निरवयव) नहीं है।।७१॥

. १६८ सांख्यदर्शन। नसोच्छित्तिरपुरुपार्थत्वादि दोपात् ॥७८॥ पुरुषार्थ न होना आदि दोप होनेसे सर्व नाश होना मोक्ष नहीं हैं ॥ ७८॥ जे नास्तिक आत्माका सर्वथा नाश होना मानते हैं और आत्माक नाश होनाही मोक्ष मानते हैं उनके मतके दूपणमें यह कहा है कि आत्म के समग्ररूपसे नाश होने अथवा सबके नाश होने में आत्माकेभी नाम होनेमें पुरुषार्थ रूप मोक्ष होना संभव नहीं है लोकमें नष्ट हुए मात्म का पुरुषार्थ होना देखने में नहीं आता इससे पुरुषार्थ न होनेके दोपर मोक्ष असंभव है ॥ ७८ ॥ एवं शून्यमपि ॥ ७९॥ इसी प्रकारसे शुन्यभी॥ ७९ ॥ इसी प्रकारसे ज्ञानमें ज्ञेयात्मक अखिल प्रपंचके नाश होने मेंभी आ रमाके नाश होनेसे शून्यभी पुरुपार्य सिद्ध न होनेसे मोक्ष नहीं है।।७९॥ संयोगाश्च वियोगान्ता इति न देशादि लाभोऽपि ॥८॥ सब संयोग वियोगके अंततक होते हैं इस्से देशआदिलाभभी मोक्ष नहीं है ॥ ८०॥ अति उच्च उत्तम लोक देश धन सुन्दर स्त्री आदिकोंके स्वामी होनेसे भी मोक्ष नहीं है इस हेतुसे कि सब संयोग वियोगके अंततक अर्यात 'मरणतक अथवा अपने नाश होनेतक रहते हैं विनाशी होनेसे उनका स्वामी होना मोक्ष नहीं है ।। ८० ॥

भाषानुवादसहित। १६९ नभागियोगोभागस्य ॥ ८१ ॥ अंशीमें अंशका योग मोक्ष नहीं है ।। ८१ ॥ जे जीवको ईश्वरका अंश मानते हैं और ईश्वरमें योग (मेल) हो- ॥ मोक्ष मानते हैं उनके इस मतके प्रतिषेधमें यह कहा है कि भाग (S 1) रूप जीवका भागी ( अंशी) परमात्मामें योग होना अथवालयहो. । मोक्ष नहीं है इस हेतुसे कि योगका वियोग होता है वियोग होनेसे प्रनित्य है अनित्य होनेसे पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता तथा अपने में लय होना पुरुषार्थ नहीं है इस्से मोक्ष नहीं है ॥ ८१ ॥ नाणिमादियोगोऽप्यवश्य भावित्वात् तदुच्छित्तेरितरयोगवत् ॥ ८२॥ अणिमा आदिका योगभी अन्ययोगके तुल्य उस्का नाश अवश्य होनहार होनेसे मोक्ष नहीं है । ८२॥ अणिमा आदि जो अष्ट सिद्धि हैं उनका योग होना अर्थात् उनका पाप्त होनाभी मोक्ष नहीं है क्योंकि अन्य योगके समान मणिमा आदि- क योगकाभी वियोग अवश्य होगा वियोग होनेसे अर्थात् नाश होनेसे पुरुषार्थ नहीं है ॥ २ ॥ नेन्द्रादिपदयोगोऽपि तद्वत् ॥८३ ॥ तथा इन्द्र आदिक पदका योगभी मोक्ष नहीं है ॥ ८३ ॥ तथा अर्थात् अणिमादियोगके समान इन्द्र आदिके पदका 'योग "र्थात् प्राप्त होनाभी मोक्ष नहीं है नाशमान मनित्य होनेसे पुरुषार्य ही है ॥ ८३ ॥ पूर्वही इन्द्रियोंको आईकारिक कहा है उसके वि- २१ .

. १७० सांख्यदर्शन। रुद्ध जै इन्द्रियोंको भौतिक मानते हैं उनके मतका अर्थात् इन्द्रियों के भौतिक होनेका प्रतिषेध करते हैं । न भूतप्रकृतित्वमिन्द्रियाणामाहंका रिकत्वश्रुतेः ॥ ८४ ॥ इन्द्रियोंके आहंकारिक होनेमें श्रुतिप्रमाण होनेसे इन्द्रियोंका भूतप्रकृति होना अर्थात् भौतिक होना सिद्ध नहीं होता ।। ८४॥ सुगम है व पूर्वही इस्का व्याख्यान किया है ॥ ८ ॥ नपट् पदार्थनियमस्तद्वोधान्मुक्तिः ॥ ८५ ॥ षट्पदार्थका नियम व उनके बोधसे मुक्ति नहीं है ॥ ८५॥ वैशेषिक जो यह मानते हैं कि द्रव्य गुण कर्म सामान्य विशेष सम- वाय यह छःपदार्थ हैं व इनके ज्ञानसे मुक्ति होती है वह अमामाणिक हैं प्रकृति आदि अधिक पदार्थ हैं जिनका पदार्थज्ञान होना रचित है यद्यपि पट्पदार्य में प्रकृतिकार्योंका वर्णन किया है परन्तु कारण प्रक- तिका जिस्में साम्यावस्थामें पृथ्वी आदिके समान गंध आदि गुण नहीं होते वर्णन नहीं किया तथा शक्तिका वर्णन नहीं किया इस्से पट्पदार्थ- का मानना ययार्थ नहीं है ।। ८५ ॥ पोडशादिष्वप्येवम् ॥ ८६॥ इसी प्रकारसे फोडश आदिम ।। ८६ ।। नेवाषिर्क जो पोडशपदार्थ व उनके तत्त्वज्ञानसे मोक्ष मानते हैं यह भी पदपदार्थक तुल्य अप्रामाणिक है अर्थात् पोडश पदार्थमात्र होनेको नियम नहीं है पोडशपदार्थसे अधिक पदार्थ हैं इसीसे इस शास्त्रमें ए.

भापानुवादसहित
१७१
चीस तत्त्व कहेगये हैं व पचीसही द्रव्यके अन्तर्गत गुण कर्म आदिभी
जानना चाहिये ॥ ८६ ॥
नाणुनित्यता तत्कार्यत्वश्रुतेः॥ ८७ ॥
अणुकी नित्यता उसके कार्यत्व प्रतिपादक
श्रुति होनेसे नहीं है अर्थात् सिद्ध नहीं होती ॥ ८७॥
श्रुतिप्रमाणसे अणुका कार्य होना सिद्ध होता है कार्य नित्य नही
होता विनाशी होता है इससे अणु अर्थात् परमाणु नित्य नहीं है जे
परमाणुको नित्य मानते हैं उनका नित्य मानना यथार्य नहीं है यद्यपि
अणुके कार्य होनेमें जो श्रुति है वह बहुत वेदकी शाखाओंको लुप्त
होजानेसे इस कालमें देखनेमें नहीं भाई तथापि भाचार्यवाक्यसे व
मनुस्मृतिके प्रमाण माननेके योग्य है मनुस्मृतिमें यह कहा है "अण्
व्योमात्राविनाशिन्यो दशार्धानांच याःस्मृताः।ताभिस्साई मिदंसर्वसंभवत्य-
नुपूर्वशः" अर्थ दशके आधे पांचके अर्थात् पाथ्वी आदि पांच भूतोंके जो
अणु मात्रा विनाश होनेवाली हैं उन सहित यह सब जगत् पूर्वसृष्टिके
सदृश उत्पन्न होता है अणु शब्द यहां परमाणुवाचक है परन्तु जहांतक
अणु होनेका व्यवहार है वहाँतक कुछ आकार परिमाण होना संभव
होनेसे कार्य होने व नाशमान होनेका अनुमान होता है इससे अति-
सूक्ष्म कारणसत्तामात्र प्रकृतिहीका नित्यमानना उचित है ॥ ८७ ।।
ननिर्भीगत्वं कार्यत्वात् ॥८८॥
कार्य होनेसे भागरहित होना सिद्ध नहीं होता।।८८॥
श्रुतिप्रमाणसे वणुके कार्य होनेसे अशुका भाग रहित (निरवयप)
होना सिद्ध नहीं होता इस्से निरषयव मानना युक्त नहीं है ॥ ८८॥
न रूपनिबंधनात् प्रत्यक्षनियमः॥ ८९ ॥

१७२ सांख्यदर्शन। रूप निमित्तसे प्रत्यक्ष होनेका नियम नहीं है ।।८९॥ रूपहीके निमित्तसे प्रत्यक्ष होनेका नियम नहीं है धर्म आदिसे भी साक्षात्कार होना संभव होता है अर्थात् स्थूलद्रव्योंका वाह्य इन्द्रियोंसे प्रत्यक्ष होता है सूक्ष्मका अन्तर इन्द्रियद्वारा धर्म आदिसे प्रत्यक्ष होता है अर्थात् साक्षात्कार होता है ॥ ८९ ॥ न परिमाण चातुर्विध्यं द्वाभ्यां तद्योगात्॥९०॥ परिमाण चार प्रकारका नहीं है दोसे उनके योग होनेसे ।। ९०॥ अशु महत् हस्वदीर्घते चार परिमाण कहे जाते हैं परन्तु दोही क- रिक अर्थात् अणु महत दोके साथ उनके अर्थात् चारोंके योग होनेसे परिमाण चार नहीं हैं दीर्घमहत्के अन्तर्गत व दस्वमणुके अन्तर्गत माननेसे दोही परिमाण हैं |॥ ९० || सामान्यद्वारा पुरुपकी ऐक्यता व प्रकृतिकी ऐक्यताका ज्ञान होता है इससे सामान्पको वर्णन करते हैं- अनित्यत्वेऽपि स्थिरता योगात् प्रत्यभिज्ञानं सामान्यस्य ॥९॥ अनित्य होनेमें भी स्थिरताके योगसे सामान्यका प्रत्यभिज्ञान होता है ।। ९१ ॥ न्यक्तियोंके अनित्म होने मेंभी यह वही घट है स्थिरतायोगसे ऐसा जो प्रत्यभिज्ञान (स्मरण) होता है वह सामान्यका प्रत्यभिज्ञान होता है। अर्थात् पद्द प्रत्यभिज्ञान सामान्य विषयक है ॥ ९१ ॥ न तदपलापस्तस्मात् ॥ ९२ ॥ तिस्से उस्का अपलाप ( असत् कथन) नहीं है ॥ ९२।

भापानुवादसहित। १७३ तिस्से उस्का (सामान्यका) अपलाप (मिथ्या कथन) नहीं है अथवा नहीं होसकता सामान्यपदार्थ सत्य है ॥ १२ ॥ नान्यनिवृत्तिरूपत्वं भावप्रतीतेः ॥९३॥ भावकी प्रतीति होनेसे अन्यनिवृत्तिरूप होना नहीं है।९३॥ यही यह है इस भाव प्रत्ययसे सामान्य अन्यका निवृत्तिरूप होना सिद्ध नहीं होता अन्यथा यह घट नहीं है यही प्रतीत होता अन्यकी व्या- वृत्ति माननमें यथा घट न होने में घट होनेकी व्यावृत्ति (निवृत्ति) अर्थात् घटका न होना घट सामान्यसे भिन्न होनेको सामान्य मानना है इस्से सामान्यभावरूपही है अभावरूप नही है ॥ २३ ॥ न तत्त्वान्तरं सादृश्यं प्रत्यक्षोपलव्धेः ॥९४॥ प्रत्यक्षसे उपलब्धि होनेसे सादृश्य तत्त्वान्तर नहीं है।।९।। अवयव आदिके सामान्यसे भिन्न सादृश्य नहीं है सामान्यरूपही प्रत्यक्षसे विदित होनेसे सामान्यरूपही सादृश्यको मानना चाहिये ॥१४॥ शंका जो स्वाभाविक शक्तिही सादृश्य मानाजाय तो यह सामान्य नही है उत्तर- निजशक्त्यभिव्यक्ति वैशिष्टया त् तदुपलब्धेः ॥९५॥ स्वाभाविकशक्तिकी अभिव्यक्ति (प्रकटता) भी सादृश्य नहीं है विलक्षणतासे उस्की उपलब्धि होनेसे ॥ ९५॥ स्वाभाषिकशक्तिका उत्पन्न होना व प्रकट होना सादृश्य नहीं है इस १७४ सांख्यदर्शन। हेतुसे कि शक्तिकी उपलब्धि (ज्ञान ) से सादृश्यकी उपलब्धिकी वि- लक्षणता है शक्तिकी उपलब्धिमें अर्थात् शक्तिके ज्ञानमें अन्यधीके ज्ञानकी अपेक्षा नहीं होती सादृश्यज्ञान अभावके ज्ञानके समान प्रति- योगीके अर्थात् जिसका अभाव होता है उस्के ज्ञानकी अपेक्षा करता है इस्से दोनोंमें विलक्षणता है धौंकी निजशक्ति (स्वाभाविकी शक्ति) सामान्यही है सामान्यरूप धर्मीकी शक्ति सादृश्य नहीं है धर्मीकी शक्ति सामान्य व सादृश्यमें भेद न मानने में बाल्य अवस्थामेंभी युवा- के सादृश्यकी प्राप्ति हो जावेगी जो यह कहा जावै कि युवा यादि काल- सम्बधी शक्तिविशेष, युवा आदिका सादृश्य है तो ऐसा माननेमें भी प्रतिव्यक्तिमें अनन्तशक्ति कल्पना करनेकी अपेक्षा कल्पनामात्रसे साधारण एक सामान्यकल्पना करना युक्त है इस्से सामान्य व सादृश्य एक नहीं है ॥ ९५ ॥ अब जो शब्द व अर्थमें नित्य सम्बंध मानते हैं व यह कहते हैं कि घट आदि संज्ञकत्व ( नामहोना) ही घट आदि व्यक्तियोंका सादृश्य है इस्के प्रतिषेधमें यह सूत्र है ॥ न संज्ञासज्ञिसम्बंधोऽपि ॥९६ ॥ संज्ञासज्ञीका सम्बंध भी नहीं है ॥१६॥ संज्ञासंजीका सम्बंधभी विलक्षणता होनेसे सादृश्य नहीं है अर्थात जो संज्ञा (नाम) व संज्ञी ( नामी) भावको नहीं जानता उस्को भी सादृश्यका ज्ञान होता है इस विलक्षणतासे संज्ञासजीका सम्बंध सादृश्य नहीं है ॥ ९६ ॥ न सम्बंधनित्यतोभयानित्यत्वात् ॥९७॥ दोनोंके अनित्य होनेसे सम्बंधकी नित्यता नहीं है।। ९७॥ संज्ञासजीके अनित्यहोनेसे उनके सम्बंधी नित्यता नहीं है द्रव्यके नष्ट होजानेपर उस जातिसम्बंधी शब्द व व्यक्तियोंके बने रहने भापानुवादसहित। १७५ उस शब्दका व्यवहार होता है व शब्द नष्ट होजानेपर व संज्ञा न जा- नेहुये अर्यकी भी प्रतीति होनेसे दोनोंकी अनित्यतासे है क्योंकि अ- तीतका वर्तमानके साथ सम्बंध होना संभव न होनेसे सम्बंधकी नित्यता सिद्ध नहीं होसकती ॥ ९७ ॥ नातःसम्बंधो धर्मिग्राहकमानवाधात् ॥९८॥ इस्से थर्मीके ग्राहक प्रमाणसे वाध (निषेध) होनेसे सम्बंध नहीं है अर्थात् सम्बंध नित्य नहीं है ।।९८॥ कभी विभाग होनेहीसे सम्बन्ध सिद्ध होता है अन्यथा जैसा कि आगे वर्णन कियाजायगा स्वरूपहीसे प्राप्त होने का सिद्ध होनेमें सम्बंध क- ल्पना करनेका अवकाश नहीं होसक्ता और जो कभी विभाग होना माना जावै तौ नित्यसम्बध होनेकी हानि होती है क्योंकि नित्य- सम्बंधमें कभी विभाग होना संभव नहीं होता इस्से धीग्राहक प्रमाणसे अर्यात् धर्मधर्मा सम्बंधग्राहक प्रमाणहीसे वाधहोनेसे अर्थात् सम्बंधका निषेध होजानते नित्यसम्बंध होना सिद्ध नहीं होता ॥ ९८ ॥ अब यह आशंका है कि ऐसा मानने में नित्य गुण व गुणीका समवाय (नित्यसम्बंध ) होना सिद्ध न होगा नित्य गुणगु- गीका नित्य सम्बंधमाननेके योग्य समझा जाता है इसका उत्तर वर्ण न करते हैं॥ न समवायोऽस्ति प्रमाणाभावात् ॥ ९९ ।। प्रमाणके अभावसे समवाय (नित्यसम्बंध) नहीं है ।। ९९॥ समवायके होनेमें प्रमाणका अभाव है इस्से समवाय पदार्थ नहीं है।॥१९॥ उभयत्राप्यन्यथा सिद्धर्न प्रत्यं- क्षमनुमानं वा॥१०॥ " ৭ছু सांख्यदर्शन। दोनोंमें अन्यथासिद्धि होनेसे न प्रत्यक्ष है न अनुमान है ॥१०॥ जिसमें विशेषपदार्थका सम्बंध हो उस्को विशिष्ट ( विशेषसंयुक्त) कहते हैं व विशिष्ट होना वैशिष्टय कहाजाता है दोनोंमें वैशिष्टयके प्रत्यक्ष अथवा अनुमानमें स्वरूपहीसे अन्यथा सिद्ध होनेसे समवायमें प्रत्यक्ष व अनुमान दोनों प्रमाण नहीं हैं यह भाव है यथा समवायके विशिष्ट होनेकी बुद्धि प्रत्यक्ष व अनुमानके अन्यथा सिद्ध होनेपर भी अनवस्याभयसे समवायके स्वरूपहीसे ग्रहण की जाती है इसी प्रकारसे गुणगुणी आदिके विशिष्ट होनेकी वृद्धिभी उस्में प्रत्यक्ष व अनुमान अन्यथा सिद्ध होनेपरभी गुण आदिके स्वरूपहीसे सिद्ध जानना चाहि- ये जो यह शंका हो कि ऐसे तर्कसे संयोग भी सिद्ध न होगा भूतल आदिमें घट आदिके प्रत्ययकोभी स्वरूपहीसे सिद्ध मानना चाहिये तो इस्का उत्तर यह है कि वियोगकालमें भी घट व भूतलका स्वरूप अ- पनी अपनी अवस्यासे बने रहनेसे विशिष्टबुद्धि होनेका प्रसंग है इससे संयोगसिद्ध होता है समवायस्पलमें समवेत (समवायसंयुक्त) का- कहीं अपने आश्रयसे वियोग नहीं होता इस्से समवाय सिद्ध नही होता जो यह कहा जावे कि कहीं तादात्म्यसम्बंधमें ऐसा होनेसे समवाय- का अन्यथा होना सिद्ध नहीं होता इस्से दोप नहीं है तो शन्दमात्रके भेदसे अत्यन्त तादात्म्य (उसीके रूपमयहोना) न कहना चाहिए गुणके वियोगमें भी गुणी रहता है इस्से और विशिष्ट होनेके प्रत्यय न होनेसे समवाय सिद्ध नहीं होता सम्बंधविशेष भेदअभेद नियामक कहना योग्य है तादात्म्यशब्द कथनमात्रका भेद है तादात्म्यके सदृश तदेव (वही) कहनेमात्रसे समवायकी सिद्धि नहीं होती ॥ १० ॥ नानुमेयत्वमेव क्रियायानेदिष्ठस्य तत्तद्व- तोरेवापरोक्षप्रतीतेः॥१०१॥ .

भापानुवादसहित । १७७
निकटस्थ देखनेवालेको उसकी ६ उस संयुक्त
दोनोंकी प्रत्यक्षसे प्रतीति होनेसे क्रियाका केवल
अनुमानहीके योग्य होना सिद्ध नहीं होता॥३०॥
प्रकृतिके क्षोभसे प्रकृति व पुरुषके संयोगहोनेरूप क्रिया होनेसे सू.
टे होती है यह सिद्धांत है इस्में यह निश्चय होनेके अर्थ कि, क्रिया कोई
पदार्य है और कहीं उसका प्रत्यक्षभी होता है जिसके द्वारा उस्का अ.
नुमान किया जाता है अथवा अनुमानके योग्य मान लेनामात्र है यह
कहा है कि, देशान्तरके संयोग आदिसे क्रिया केवल अनुमानहीके
योग्य नहीं है जो निकटस्थ (निकटमें स्थित ) देखनेवाला है उस्को
स्के व उस्के संयुक्तके अर्यात् क्रिया व क्रियासंयुक्त दोनोंके होनेकी
प्रत्यक्षसे प्रतीति होती है यया वृक्ष हिलताह मनुष्य चलता है इत्यादि.
में ॥ १.१॥ द्वितीयाध्यायमें शरीरके विषय में मतभेदमात्रका व-
पन किया है विशेप निर्णय नहीं किया अय यहाँ विशेषके निश्चय
रिपक्षके प्रतिषेध वर्णन करते हैं ।
न पांचभौतिकं शरीरं वहूनामुपादाना-
योगात् ॥ १०२॥
बहुतोंके उपादान होनेके योग न होनेसे शरीर पांच
भौतिक नहीं है ॥ १०२॥
बहुत भिनजातियोंका उपादान होना घट पट बादि स्थळमें प्रत्यक्षसे
सेद्ध न होनेसे सब शरीर पांच भौतिक (पंचभूतसे उत्पन्न ) नहीं है
। १.२ ॥ बहुत यह कहते हैं कि, स्थूलही शरीर होता है इस्का
नषेध करते हैं ।।
न स्थूलमिति नियम आतिवाहिकंस्या
पि विद्यमानत्वात् ॥१०३ ॥

१७८ सांख्यदर्शन। स्थूलही होना नियम नहीं है आतिवाहिककेभी विद्यमान होनेसे ॥१०३॥ स्थूलही शरीर होनेका नियम नहीं है मातिवाहिकशरीरकेभी होने. से अर्थात् आतिवाहिक शरीरभी होता है आतिवाहिक सूक्ष्मलिंग- शरीरका नाम है जिससे प्राणी लोकान्तरको जाता है और वहभी भौतिक है क्योंकि विनाभूतके आश्रयहुये विना आधारचित्रके तुल्य स्थिर नहीं हो सक्का न लोकान्तरको जाय सक्ताहै. शंका-सूक्ष्म लिंग शरीर सवशरीरमें कैसे व्यापक होता है? उत्तर-यह है कि, अपने प्रकाशसे दीप- कके सब घरमें व्यापक होनकी सदृश व्यापक होता है ॥ १०३ ॥ नाप्राप्तप्रकाशकत्वमिन्द्रियाणामप्रा- तेःसर्वप्राप्तेर्वा ॥ १०४॥ इन्द्रियोंका प्राप्त न हुयेका प्रकाशक होना संभव नहीं है विना प्राप्तिके सब प्राप्ति होनेका प्रसंग होनेसे ॥१०४॥ प्राप्त न हुये अोंका अर्थात् जिन अर्थोके साथ सम्बंध प्राप्त नहीं हुवा उन अाका इन्द्रियोंका प्रकाशक होना संभव नहीं है यथा जिस्में अथवा जहाँ दीपादिक प्रकाशका सम्बंध नहीं होता उस पदार्यके दीप आदि प्रकाशक नहीं होते विना प्राप्तहु एके प्रकाशक होनमें व्य- वहित (जो किसी पदार्थके आडमें है) आदि सव पदार्थोके प्रकाशक होनेका प्रसंग होता है परन्तु व्यवहित आदि पदार्योंका प्रत्यक्ष नहीं होता इस्से दूरस्य सूर्य आदिके सम्बंधके अर्थगोलकसे इन्द्रिय भिन्न है उस गोलकभिन्न इन्द्रियके सम्बंधसे सूर्य आदिका प्रत्यक्ष होता है पुरुषमें अर्थ समर्पण करनेके द्वारा करणोंका अर्थ प्रकाशक होना है क्योंकि इन्द्रिय जड हैं जड इन्द्रियोंका दर्पणके तुल्य प्रकाशक होना है अर्थात् यथा दर्पण मुखप्रकाशक होता है परन्तु माप कुछ नहीं जानता केवर .

भाषानुवादसहित। १७९ पुरुषको रूपज्ञान प्राप्त होनेका हेतु होता है इसी प्रकारसे इन्द्रियोंको जानना चाहिये ॥ १०४ ॥ न तेजोपसर्पणात् तैजसं चक्षुर्वृत्तित स्तत्सिद्धः॥ १०५॥ तेजके गमनसे चक्षु (नेत्र ) तेजस नहीं हैं वृत्तिसे उस्की सिद्धि होनेसे ॥ १०५॥ तेजफलता है व दूर जाकर प्राप्त होताहै यह देखकर चक्षुको तैजस न मानना चाहिये विना तैजस होनेमेभी माणके सदृश वृत्तिभेद- से दूर जाना सिद्ध हो सकता है अर्थात् यथा प्राण नासाके अग्रसे शरीर से बाहर कुछ दूर जाकर शरीरमें प्राप्त होता है इसीप्रकारसे चक्षु अ- तेजस द्रव्य होनेपरभी वृत्तिद्वारा सूर्य आदिमें प्राप्त हो फिर शरीरमें मास होता है ॥ १०५ ॥ वृत्तिहोने में क्या प्रमाण है, उत्तर?- प्राप्तार्थप्रकाशलिंगावृत्तिसिद्धिः ॥ १०६ ॥ प्राप्त अर्थहीमें प्रकाशहोनेके लिंगसे वृत्तिका होंना सिद्ध होता है ॥ १०६॥ जो अर्थ है उसमें गोलक प्राप्त नही होसक्ता शरीरही मात्रमें रहता है अमाप्तवस्तुका प्रकाशक होना संभव नही होता इस्से वृत्तिही द्वारा दूरस्थपदार्थ में प्रकाश वा ज्ञान होनेसे अनुमानसे वृत्ति होनेकी सिद्धि होती है ॥ १०६ ॥ भागगुणाभ्यां तत्त्वान्तरं वृत्तिः सम्बंधार्थ सर्पतीति॥१०७॥. भाग वगुणसे भिन्न तत्व वृत्तिसम्बंधके अर्थ गमन करती है ॥ १०७॥ :

१८० सांख्यदर्शन। वृत्ति चक्षु आदिका भाग (अंश) नहीं है व रूप आदिके तुल्य गुण नहीं है क्योंकि चक्षुके भाग होनेमें चक्षु इन्द्रियका सूर्य आदिके साथ सम्बंध होना घटित न होता और गुण होनेमें गमनकी प्राप्ति न होती इस्से बुद्धि वृत्तिभी दीप शिखांक समान द्रव्य रूपही परिणाम है।।१०७॥ शंका इसप्रकारसे वृत्तियोंके द्रव्य होनमें इच्छा आदिरूप बुद्धि गुणों में वृत्तिव्यवहार क्यों होताहै? उत्तर ॥ नद्रव्यनियमस्तद्योगात् ॥१०८॥ तिस्में योग होनेसे द्रव्य होनेका नियम नहीं है ।। १०८॥ तिस्में अर्थात वृत्तिमें योग होनेसे वृत्ति द्रव्यही होती है यह नियम नहीं है वृत्ति वर्तन व जीवनको कहते हैं यह यौगिक शब्द है जीवन स्वस्थिति ( अपनी स्थिति ) हेतुके व्यापारको कहते हैं क्योंकि जीव धातु घल व प्राण धारण अर्थमें है इससे जीवनका अर्थ बल व प्राणधारण रूप स्थिति काहोनेसे व वैश्यवृत्ति शूद्रवृत्ति आदि व्यवहारसे यह अर्थ सिद्ध होता है इससे यथा द्रव्य रूप वृत्तिसहित युद्धि जीती है इसी प्रकारसे इच्छा आदि वृत्तियाँ है उन सहितभी जीती है सब वृत्ति ओंके निरोधहीसे चित्तका मरण होता है ॥ १०८ ॥ शंका-इन्द्रिय भौतिक सुनी जाती हैं जो इस लोकमें भौतिक नहीं हैं तो अन्य लोकों में होगी. उत्तर॥ न देशभेदेऽप्यन्योपादानतास्म दादिवनियमः ॥१०९॥ देशभेद होनेमें भी अन्य उपादानता नहीं है अस्मदादिके समान नियम है ।।१०९॥ ब्रह्मलोक आदि देशभेद होने में भी इन्द्रियोंका अहंकारसे भिन्न उपादान होना सिद्ध नहीं होता अस्मद् आदिके समान अर्थात् हम

.
भापानुवादसहित ।
भूलोकवालोंके सश सब लोक वालोंके इन्द्रियोंका आईकारिक होने-
का नियम है देशभेदसे एक लिंग शरीरहीका सञ्चारमात्र सुना जा-
ता है ॥ १०९ ॥ शंका-श्रुतिमें भौतिक क्यों कहा है ? उत्तर-
निमित्तव्यपदेशात्तव्यपदेशः॥११०॥
निमित्त व्यपदेशसे उसका व्यपदेश है ॥ ११ ॥
निमित्तमें भी प्राधान्यके कहने की इच्छासे उपादानका होना कहा
जाता है यथा ईधनसे अग्रि यह कहनेमें ईधन अग्रिका उपादान कारण
कहा जाता है तेज आदिभूत आलम्बन करिके उस्के अनुगत अहंका-
रसे चक्षु आदि इन्द्रियोंका होना संभव होता है यथा पार्थिव द्रव्य ई-
धनको आलम्बन करिकै उस्के अनुगत होनेसे तेजसे अग्नि होती है
इत्यादि ॥ ११० ॥ अवस्थूल शरीरोंके भेदको वर्णन करते हैं,-
ऊष्मजाण्डजजरायुजोद्भिज्ज सांकल्पि
कं सांसिद्धिकं चेतिन नियमः ॥१११॥
ऊष्मज, अण्डज, जरायुज, उद्भिज, सांकल्पिक, सांसिद्धिक,
शरीर होते हैं इससे नियम नहीं हे ॥ ११ ॥
श्रुतिमें जो अण्डज जरायुज उद्भिज त्रिविध शरीर कहा है वह इन
त्रिविध अधिक होनेके अभिप्रायसे कहा है इन तीनही प्रकार के होनेका
नियम नहीं है क्योंकि उप्मज आदि छ-मकारके शरीर होतेहैं ऊम्म-
ज यथा मासा आदि अण्डज पक्षी सर्प आदि जरायुज मनुप्य आदि उ-
दिज्ज वृक्ष आदि संकल्पज सनकादि सांसिद्धिक जो शरीर तप आदि-
की सिद्धिसे उत्पन्न होते हैं ॥ १११ ॥
सर्वेपुष्टथिव्युपादानमसाधारण्यांत
तव्यपदेशः पूर्ववत् ॥ ११२ ॥

१८२
सांख्यदर्शन।
सबमें असाधारण्यसे पृथिवी उपादान है
इस्का वर्णन पूर्वहीके सदृश है ॥ ११२॥
असाधारण्यसे अर्थात् आधिक्य आदिसे उत्कर्ष होनेसे सब शरी-
रोंमें पृथिवीही उपादान कारण है शरीरोंके पांच भौतिक चातुर्नीति-
क आदि भेद कहना पूर्वहीके सदृश जानना चाहिये अर्थात् इन्द्रियोंका
भौतिकत्व उपष्टम्मक (स्थापन करने वाला) होना मात्रहै ।। ११२ ॥
शंकाश-शरमें प्राणके प्रधान होनेसे प्राणही शरीरका आरंभकहै अथवा
नहीं हैं. उत्तर-
न देहारंभकस्य प्राणत्वमिन्द्रियशक्ति
तस्तत्सिद्धेः॥११३॥
देह आरंभकका प्राण होना सिद्ध नहीं होता
इन्द्रियोंकी शक्तिसे उस्की सिद्धि होनेसे ॥ ११३॥
देह आरंभक पदार्थका प्राण होना सिद्ध नहीं होता अर्थात् माण देह-
का आरंभक नहीं है क्योंकि विना इन्द्रिय प्राणकी स्थिति नहीं है अ-
न्वय व व्यतिरेकसे इन्द्रियोंके शक्ति विशेपहीसे प्राण होनेकी सिद्धि वा
उत्पत्ति है करणवृत्तिरूप प्राण करणों के वियोगमें नहीं रहता है इ.
स्से मृत देहमें करणके अभावसे प्राणकाभी अभाव होनेसे प्राण देहका
मारंभक नहीं है ॥ ११३ ॥ शंका-जो प्राण देहका कारण नहीं है तो
विना प्राणभी देह उत्पन्न होवे. उत्तर-
भोक्तुरधिष्ठानाभोगायतननिमाणम
न्यथा पूतिभावप्रसंगात् ॥ ११४ ॥
भोक्ताके अधिष्टान होनेसे भोगायतन निर्माण होता
है अन्यथा पूतिभावके प्रसंग होनेसे ॥११४॥

भाषानुवादसहित । १८३ भोक्ता प्राणीके अधिष्ठानसे अर्थात् पारहीसे भोगायतन ( भोगस्थान) शरीरका निर्माण होताहै प्राणके व्यापार विना शुक्रशोणितका पूति- भाव होनेका प्रसंग होताहै जैसाकि प्राण व्यापार रहित होनेसे मृतदेह- में दुर्गंध होता है इससे रस संचार आदि व्यापारविशेषसे प्राण देहका निमित्त कारण है उपादान कारण नहीं है ॥ ११४ ||. भृत्यद्धारास्वाम्यधिष्टितिनैकान्तात् ॥११५ ॥ भृत्यद्वारा स्वामीकी अधिष्ठिति है एकान्त होनेसे नहीं है ।। ११५॥ देह निर्माणमें व्यापाररूप अधिष्ठान एकान्तसे अर्थात् साक्षात् चेतन स्वामीहीका नहीं है किन्तु प्राणरूप भृत्यद्वारा चेतनका अधिष्ठान है यथा पुर निर्माणकरनेमें राजाकी भृत्यद्वारा अधिष्ठिति होती है प्राण साक्षात् देहमें व्यापारका अधिष्ठासाहै पुरुपका अधिष्ठाता होना केवल पाणके संयोग मात्रसे है यद्यपि माणहीके अधिष्ठानसे देहका निर्माण होता है तथापि प्राणद्वारा प्राणीके संयोगकीभी अपेक्षा होती है क्यों कि पुरुपहीके अर्थ माण करके देह निर्माण किया गया है इस आश- यसे भोक्ता अधिष्ठान होना कहागयाहै ॥११५ ॥ समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता ॥ ११६ ॥ समाधि व सुषुप्ति व मोक्षमें ब्रह्मरूपता होती है ॥३१६॥ समाधिसे यहां असम्प्रज्ञात अवस्था सुपुप्तिसे समय सुषुप्ति मोक्षसे विदेह कैवल्य अभिप्राय है इन अवस्थाओंमें पुरुपको ब्रह्मरूपता प्राप्त होती है अर्थात् पुरुष ब्रह्मभावको प्राप्त होताहै बुद्धिवृत्तियोंके लय होनेसे बुद्धि उपाधिकृत पदार्यके नाश होनेसे पूर्णताकेसाथ अपने स्व- रूपमें स्थित होताहै यथा घटके नाश होनेमें घटाकाशकी पूर्णता हो- ती है नैमित्तिक उपाधिके अभाव होजानेपर पुरुषोंका ब्रह्म होनाही १८४ सांख्यदर्शन। स्वभाव है जैसे औपाधिक अरुणताकै अभाव होनेमें अर्थात् दूर हो जाने पर स्फटिकका शुक्ल होनाही स्वभाव है बुद्धिवृत्ति प्रतिबिम्ब वशसे जो दुःख आदिकी मलिनता पुरुपमें होती है उपाधि मात्रसे होती है पुरुप नित्यमुक्त है औपाधिक दुःखकी निवृत्तिके अर्थ प्रकृतिकी सृ- टिहै जैसा पूर्वही कहागया है कि, विमुक्तके मोक्षक अर्य प्रकृतिकी सृष्टि है ॥ ११६ ॥ शंका-जो तीनों तुल्य हैं तो सुपुप्ति समाधिसे मोक्षमें कुछ विशेपता नहीं है उस्को श्रेष्ठ नहीं मानना चाहिये. उत्तर- द्रयोःसवीजमन्यत्रतद्धतिः ॥ ११७ ॥ दोनोंमें वीज सहित है अन्यमें उस्का अभाव है। ११७ ।। दोनों सुपुप्ति समाधिमें पुरुपबंध वीजसहित रहताहै अन्यमें अर्था- त् मोक्षमे उस्का अर्यात बंध वीजका अभाव होताहै इस्से यह कहा है कि दोनों सुपुप्ति व समाधिमें पुरुषबंध बीजसहित है व मोक्षमे बंध वीजरहित होता है यह मोक्षमें विशेषता व उत्कृष्टता है ॥ ११७ ॥ द्योरिवत्रयस्यापि दृष्टत्वान्न तुद्वौ ॥ ११८ ! दोके सहा तीसरेकेभी दृष्ट होनेसे दो नहीं है। ११८॥ दोके सदृश अर्थात् सुपुप्ति समाधिके सदृश मोक्षकेभी दृष्ट होनेसे अ. र्थात् ज्ञात वा अनुमित होनेसे दोही नहीं हैं अर्थात् सुपुति व समाधि यही दो नहीं है तीसरा इनसे भिन्न मोक्षभी पदार्थ है यह सिद्ध होताहै सुषुप्ति आदिमें जो ब्रह्ममाव है वह चित्तमें राग आदि दोप संस्कार संयुक्त होताहै यह दोष जप ज्ञानसे नष्ट होताहै तब मुपुति आदिक सदृशही मोक्ष अवस्था स्थिर होती है ॥ ११८॥ शंका-समाधिमें वासना बीजसंस्कार होनेपरभी वैराग्य आदिसे वासना कुंठ होजानेसे अर्य के आकाररूपं वृत्ति समाधिमें न होना माननेके योग्य है परन्तु सुपुर तिमें वासना प्रबल होनेसे अर्थज्ञान होना चाहिये इस्से सुपुत्तिमें ब्रह्म रूपता कहनायुक्त नहीं है. उत्तर:- भापानुवादसहित । १८५ वासनयानर्थख्यापनं दोषयोगेऽपि निमित्तस्य प्रधानवाधकत्वम् ॥ ११९॥ निद्रादोप योगमें भी वासना अर्थ स्मरण कराना नहीं होता न निमित्तका प्रधानका बाधक होना सिद्ध होता है ।। ११९ ।। यथा पैराग्यमें तथा निद्रादीपके योग होने मेंभी वासना करिक अ. र्थात् वासनासे, अपने अर्थका स्मरण कराना नहीं होता है क्योंकि नि- मित्तका अर्थात् संस्कारका, बलवान् निद्रा दोपका बाधक होना सिद्ध नहीं होता अर्थात् निमित्तरूप संस्कार प्रधानरूप बलवान् निद्राका बाधक नहीं होता बलवान् निद्रा दोपही वासनाको दुर्बल व उस्को अप- ने कार्यमे कुण्ठकर देताहै ॥११९॥शंका-संस्कार लेशसे जीवन्मुक्त- । का शरीर धारण होता है यह तृतीयाध्यायमें कहा है उस्में यह आक्षेप है कि जीवन्मुक्त के पूर्वसंस्कारक नाश होजानेसे व ज्ञानके प्रतिबंध होनेके कारणसे कर्मके तुल्य फिर संस्कार उदय न होनेसे जीवन्मुक्त- को भोग होना किस प्रकारसे संभव होता है ? उत्तर ॥ एकः संस्कारः क्रियानिर्वर्तको नतु प्रतिक्रिय संस्कारभेदा बहुना कल्पनाप्रसक्तः॥ १२०॥ एक संस्कार क्रियानिवर्तक है बहुत कल्पना प्रसंग होनेसे प्रतिक्रिया संस्कारभेद नहीं है ।। १२० ॥ जिस संस्कारसे देव आदि शरीरका भोग आरब्ध होताहै अर्थात् मारंभको प्राप्त होताहै वही एक संस्कार उस शरीरसे साध्य जो प्रारब्ध , भोग है उसका समाप्त करनेवाला होताहै और वह कर्मके सदृश भोगकी समाप्तिमें नाश्य होता है प्रतिक्रिया प्रतिभोगव्यक्ति में ना- २२ १८६ सांख्यदर्शन। ना संस्कार नहीं होते नहीं बहुव्यक्तिकल्पना करनेमें गौरव दोष हो. नेका प्रसंग होगा यया कुलालचक भ्रमण स्थलमें वेग संज्ञक भ्रमण समाप्ति पर्यत रहनेवाला एकही संस्कार होताहै इसीप्रकारसे एक श- रीरसाध्य प्रारब्ध भोगके समाप्त होनेपर्यंत एकही संस्कार जिस्से श. रीरभोग मारब्ध होताहै बना रहताहै ॥ १२० ॥ शंका उद्भिज श- रीर जो कहा गया है उस्मे बाह्य बुद्धि नहीं है इससे शरीर होना संभव नहीं होता है उत्तर ॥ न वाह्यबुद्धिनियमो वृक्षगुल्मलतौपधिव- नस्पतितृणवीरुधादीनामपि भोक्त- भोगायतनत्वं पूर्ववत्॥ १२१ ॥ वाह्यबुद्धिका- नियम नहीं है वृक्ष गुल्म लता औपधि वनस्पति तृण वीरुध आदिकोका भी भोक्ता व भोगायतन होना पूर्वके तुल्य है ।। १२१ ।। जिस्म वाह्यज्ञान होवै वही शरीर हो यह नियम नहीं है वृक्ष मादि अंतःसंज्ञोंकाभी भोक्ता व भोगायतन अर्थात् भोगस्थान शरीर होना पूर्वके तुल्य मानना चाहिये अर्थात् यया पूर्वही कहा गया है कि भोक्त अधिष्ठान हुये विना मनुष्य आदि शरीरका पूतीभाव होताहै इसीप्रका- रसे वृक्षआदि शरीरोंमेभी शुष्कता आदि होना माननेके योग्य है व श्रुति प्रमाणसे सिद्ध है श्रुति यह है "अस्ययदेकशाखां जीवो जहा त्ययसा गुप्यति इत्यादि अर्थ-इस्के जिस एक शाखाको जीव त्याग करता है वह सूख जाती है इत्यादि ॥ स्मृतेश्च ॥ १२२॥ स्मृतिसे भी ।। १२२॥ स्मृतिसेभी वृक्ष आदिके शरीर होनेका प्रमाण है स्मृतिमे यह कहा .

भापानुवादसहित। १८७
है"शरीरजैः कर्मदीपैर्यातिस्थावरतानरः । वाचिकैः पक्षिमृगतां मामसे
रन्त्यजात्तिताम्।। अर्थ शरीरसे उत्पन्न कर्मदोपोसे मनुष्य स्थावर (वृक्ष-
आदि) होताहै वाचिकदोषोंसे पक्षी मृग होताहै मानसदोषोंछे अन्त्यज
कीट पतंग मादि होताहै ।।१२२॥ शंका-शरीरधारी चेतन होनेसे वृक्ष आ-
दिमेंभी धर्म अधर्म होना चाहिए उत्तर-
नदेहमात्रतः कर्माधिकारत्ववैशिष्टय-
श्रुतेः ॥ १२३॥
विशिष्ट होनेमें श्रुतिप्रमाण होनेसे देहमात्रसे कर्म
अधिकार होना सिद्ध नहीं होता ॥ १२३ ॥
देहमात्रसे जीवका धर्मअधर्मके योग्य होना सिद्ध नहीं होता क्यों-
कि विशिष्टहोनेमें धर्मअधर्मकर्मका अधिकारी होना श्रुतिमें कहाहै अ-
र्थात् ब्राह्मण आदि मनुष्यशरीर ज्ञान विशिष्टके अर्थ कर्म करने व धर्म अ-
धर्मका उपदेश श्रुतिमें है अन्यमें नहीं है ॥ १२३ ॥
त्रिधा त्रयाणां व्यवस्था कर्मदेहोपभो
गदेहोभयदेहाः ॥ १२४ ॥
तीनकी तीन प्रकारकी कर्मदेह उपभोगदेह उभयदेह
होनेकी व्यवस्था है ।। १२४ ॥
तीनकी अर्थात् उत्तम मध्यम अधमकी तीन प्रकारकी कर्मदेह उपभो
गदेह उभयदेह होने की व्यवस्था है यया ऋषियोंका देह कर्मदेह है व
इन्द्र आदिकोंका उपभोगदेह है और राजऋषिओंका कर्म व भोग उभय
देह है अर्थात् कर्म व भोग दोनोंके अर्थ है प्रधानतासे तीन प्रकारका विभा-
गहै अन्यथा सवहीका भोगदेह होना सिद्ध होताहै ।। १२३ ॥
न किञ्चिदप्यनुशायिनः ॥ १२५ ॥

१८८ सांख्यदर्शन। विरता देह तीनमेसे कोई नहीं है ।। १२५ ॥ जो वैराग्यको प्राप्त पुरुष है उस्का देह उक्त तीन प्रकार से कोई न- ही है अर्थात् तीनोंसे विलक्षण है ॥ १२५ ॥ न बुद्धयादिनित्यत्वमाश्रयवि शेषेऽपि वह्निवत्॥१२६॥ आश्रयविशेपमेंभी अग्निके तुल्य बुद्धि आदिका नित्यत्व नहीं है ॥ १२६॥ बुद्धि निश्चय करनेवाली वृत्तिका नामहै बुद्धि इच्छा आदिकोंका जो किसी आश्रयविशेष ईश्वर अथवा आदि पुरुप ब्रह्मा विष्णु आदिमें नि- त्य होना माना जावे तो आश्रयविशेषमभी नित्य होना संभव नहीं होता हमको अपनी बुद्धि व इच्छा आदिके अनित्य होनेके दृष्टांतसे सवहींकी बु द्वि व इच्छा आदिके अनित्य होनेका अनुमान करना योग्यहै यया लो- फिक अमिके दृष्टांतसे आवरण तेजकेभी अनित्य होनेका अनुमान होताहै ।। १२६ ॥ आश्रयासिद्धेश्च ॥ १२७॥ आश्रय सिद्ध न होनेसे भी ॥ १२७॥ जो यह माना जायकि पुरुप नित्य है नित्य पुरुषमें आश्रित बुद्धि नि- त्य है तो पुरुषका धर्म बुद्धि नहीं है न पुरुष बुद्धिका आश्रय होना सि- द्ध होता है बुद्धि प्रकृतिकार्यरूप अनित्य है पुरुपका आश्रय होना सि- द न होनेसे परिणामधर्मवाली प्रकृति कारणसे जन्य बद्धि अनित्य है पुरुप अपरिणामी नित्यमें उपाधिमात्रसे जैसा पूर्वही वर्णन किया गया है बुद्धिका सम्बंध होताहै ॥ १२७ ॥ शंका पूर्वही जो सिद्धपुरुषोंमें स- .ष्टिकर्ता होने का सामर्थ्य व ऐश्चर्य होना वर्णन किया सिद्धोंमें ऐश्वर्य सा- मर्थ्य होने आदिकी सिदिओंके होनेका प्रमाण किस प्रकारसे होताहै इ- स्के समाधानमें सिद्धियों के प्रमाण होनेका हेतु दृष्टांत वर्णन करते है भाषानुवादसहित । १८९ योगसिद्धयोऽप्यौषधादिसिद्धिवन्ना- पलपनीयाः ॥ १२८॥ योगसिद्धियांभी औपध आदि सिद्धियोंकी समान असत् कहनेके योग्य नहीं है ॥ २८ ॥ औषध आदि सिद्धियोंके सदृश योगसिद्धियाँ असत् कहनेकी योग्य नहीं है अर्थात् औषध आदि सिद्धियोंके सदृश सत्य है योगसे उत्पन्न अ- णिमादिक सिद्धियां सृष्टि उत्पन्न करने आदिकी उपयोगिनी होती है । ।। १२८ ॥अब जे भूतोंका धर्म चैतन्य मानते हैं उनके मतका प्रतिषेध करते है न भूतचैतन्यं प्रत्येकादृष्टेःसाहत्येऽपि च सांहत्येऽपि च ॥ १२९॥ प्रत्येक दृष्ट न होनेसे संहत होनेकी अवस्थामें भी संहत होनेके अवस्थामेंभी भूतोंमे चैतन्य (चेतनता) नहीं हैं। १२९॥ पंचभूतोंमेंसे एकएक भिन्नमें किसीमे चैतन्य दृष्ट न होनेसे अर्थात् प्रत्य क्षसे सिद्ध न होनेसे उनके संहत भावके अवस्था अर्थात मिलनेके अव- स्थामेभी चैतन्य होनेका अनुमान नहीं होता क्योंकि जो कारण नहीं है वह कार्य में नहीं होसकता और इस्का विशेष व्याख्यान पूर्वही कियागया है प्रत्येक भूतमें चैतन्य न होनेसे संहतभाव शरीरमें चैतन्यधर्म न होनेका अनुमान होता है इस्ते भूताने रिप गई यह सिद्ध शेराद ॥ १२५ ॥ इति श्रीसांख्यदर्शने प्रभुदयालुनिमिते देशभाषा- कृतभाष्ये परपक्षनिर्णये पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥ पंचम अध्यायमे पर पक्षका निराकरण (खण्डन ) कारकै अपने म. । .

१९० सांख्यदर्शन। तको सिद्ध करिकै उसी सारभूत शास्त्रार्थको इस छटवें अध्यायमें दृढतर वोध उत्पन्न होनेके लिये वर्णन करते हैं। अस्त्यात्मा नास्तित्वसाधनाभावात् ॥ १॥ नास्तित्वसाधनके अभाव होनेसे आत्मा है ॥१॥ मैं जानता हूँ यह प्रतीति होनेसे सामान्यसे पुरुप सिद्ध नास्तित्व- के साधनके अभावसे अर्थात् आत्माके न होनेका साधनके अभावसे अर्थात् मात्माके होनेका बाधक होने के प्रमाणके अभावसे आत्माहै यह सिद्ध है विवेकमात्र करना उचितहै ॥ १ ॥ देहादिव्यतिरिक्तोसौ वैचित्र्यात् ॥ २ ॥ विचित्र होनेसे यह देह आदिसे भिन्न है ॥२॥ यह आत्मा चेतन देह आदि प्रकृतिपर्यन्तसे भिन्न है किस हेतुसे भिन्न होना सिद्ध होता है परिणामी होने व परिणामी न होने यह विधि- व धर्म होनेसे अर्थात् प्रकृति व प्रकृतिकेकार्य जिनका प्रत्यक्ष अनुमान शब्दसे परिणामी होना सिद्ध होता है उनसे विचित्र अर्यात् उनके विरुद्ध पुरुष अपरिणामी सिद्ध होनेसे पुरुष देहादि प्रकृतिकार्यसे भिन्न है पुरुषका अपरिणामी होना सदा ज्ञात विषय होनेसे अनुमान किया जा ता है जैसे चक्षुका रूपही विषय है समसनिकर्ष होने मेंभी रसमा- दि विषय नहीं है इसीप्रकारसे अपनी चुद्धिवृत्तिही पुरुषका विषय है समसन्निकर्ष होनेपरभी अन्यवस्तु विषय नहीं है बुद्धिवृत्तिकी आरूढताहीसे अन्य पदार्य पुरुपको भोग्य होते हैं यह बुद्धिवृत्तियां अज्ञाता नहीं रहती जो ज्ञान इच्छा सुख आदिभी अज्ञात सत्तासे अंगी- कार किएजावे तो उन्मेमी यया घट आदि अन्य पदामि संशय होताहै . ऐसा मंशय होना चाहिए कि मै हूं वा नहीं हूं मैं जानताहूंचा नहीं जानता हूँ सुखी हूँ वा नहीं हूँ परन्तु ऐसा नहीं होता इस्से उनके सदा ज्ञात हो नेसे उनका द्रष्टा चेतन अपरिणामी है यह सिद्ध होता है क्योंकि पी

भाषानुवादसहित ।
णामी होनमै कभी परिणाम होनेमे बुद्धिवृत्ति होनेमेंभी बुद्धिवृत्तिके
अज्ञानसे संशय प्राप्त होना संभव है ॥ २ ॥
षष्ठी व्यपदेशादपि ॥३॥
पप्ठी व्यपदेशसे भी ।। ३॥
षष्ठी विभक्तिके व्यपदेश ( कयन सेभी आत्मा शरीरसे भिन्न है यह
सिद्ध होता है यथा मह कहने में यह मेरा शरीर है मेरी बुद्धि है इत्या-
दिमें भेद होना प्रतीत होता है अत्यन्त अभेद होने में संबंध संबंधीके
अभावसे षष्ठीकी प्राप्ति नहीं होसक्ती ॥ ३ ॥
न शिलापुत्रवधर्मिग्राहकमानवाधात्॥४॥
धर्मी ग्राहक प्रमाणसे प्रतिपेध होनेसे शिलाके पुत्रके
सहश नहीं है ॥४॥
जो यह तर्क किया जावै कि सम्बंध अर्थमें पठीका व्यपदेश इस
प्रकारसे है जैसा शिलाके पुत्रका शरीर कहना इस तर्कके प्रतिषेध व समा.
धानके अर्थ सूत्र में यह कहा है कि पुरुषमें पष्ठीका व्यपदेश शिलापुत्रके
षष्ठी व्यपदेशके सदृश नहीं है क्योंकि शिला पुत्र आदि स्थल में धर्माया-
हक प्रमाणसे बाधा वा प्रतिषेध होनसे एक विकल्प मात्र है मेरा शरीर
मादि कहनेमे प्रमाणसे बाधा नहीं है अर्थात् प्रमाणके विरुद्ध नहीं है
केवल देहके आत्मा होनेके प्रमाणका प्रतिषेध है पुरुषके होनेका बोधकि
मैं हूँ यह स्वाभाविक अनुभवसे सिद्ध है व अन्य पदार्यके साथ सम्बंध
बोधगत होनेसे मेरा शरीर आदि कहना युक्त है कल्पना मात्र नहीं
है॥४॥ देहसे व्यतिरिक्त (भिन्न ) आत्माको वर्णन करिकै मुक्तिका
वर्णन करते है-
अत्यन्तदुःखनिवृत्त्या कृतकृत्यता,॥५॥
अत्यंत दुःखकी निवृत्ति होनेसे कृतार्थता
होती है ॥५॥

१९२ सांख्यदर्शन। अत्यन्त दुःख निवृत्त होनेसे मुक्ति होती है यह भाव है ॥ ५॥ यथा दुःखात्क्लेशः पुरुषस्य न तथा सुखाद भिलापः॥६॥ यथा दुःखसे पुरुपका द्वेप होता है तथा सुखसे अभिलाप नहीं होता ॥६॥ यदि यह शंका हो कि मोक्षमें भोग्य सुख दुःख दोनोकी निवृत्ति होती है सुखनिवृत्ति मोक्ष है यह क्यों नहीं कहा दुःखहीके निवृत्तिको मोक्ष क्यों कहाहै इस शंकाका निवारणके अर्थ यह कहा है कि यद्यपि दुःखको निवृत्ति मुखकी प्राप्ति यह विशेष मनोरय सब प्राणि ओंका है परन्तु दुःख प्राप्त होनेमे जैसा द्वेष पुरुपका होता है सुख प्राप्तिमें ऐसा अभिलाप नहीं होता द्वेष प्रबल व अभिलाप उस्के अपेक्षा दुर्बल होता है इस्से प्रबल होनेसे दुःसकी निवृत्तिको मुख्य मानकर दुःखकी निवृत्तिको मोक्ष वर्णन किया है व सुखकी अपेक्षा दुःखकी बाहुल्यता है इस्सेभी दुःखहीके निवृत्त होनेको कहा है दुःखकी अधिकता आगेके सूत्रमें सूचित किया है ॥ ६॥ कुत्रापिकोऽपि सुखीति ॥७॥ कहीं कोई सुखी है ॥७॥ इस अनन्त सृष्टि सण वृक्ष पशुपक्षी आदिमें कुछ मनुष्य देवता आदि. ही सुखी होते है इस्से कहीं कोई सुखी होना कहाई ॥ ७ ॥ तदपि दुःखशवलमिति दुःखप- क्षेनिःक्षिपन्ते विवेचकाः॥८॥ वह भी दुःख मिश्रित है यह समुझकर विवेककरनेवाले दुःख ही पक्ष (कोटि)में संयुक्त करते हैं ॥८॥ .

भाषानुवादसहित । १९३ कहीं कोई सुखी है यह जो पूर्वसूत्रमें कहाई उससुखकोभी विवेक क- रनेवाले दुःखही पक्षमें मिलाते है अर्थात् इस संसार में मुख बहुत कम है और जो सुख कहीं है भी वह मिठाई व विप मिले हुये अन्नके सदृश दुःख मिलाहुवाहै दुःखरहित नहीं है इस्से जो सुखभी है उस्सकोभी विवेक करनेवाले दुःस समझकर दुःखही पक्षमे डालते वा संयुक्त करते हैं॥८॥ सुखलाभाभावादपुरुषार्थत्वमितिचेन्नद्वै- विध्यात्॥९॥ सुख लाभके अभावसे पुरुपार्थत्व नहीं है यह मानाजाय नही दोविध होनेसे ॥९॥ जो यह समुझाजापै कि सुखलाभ न होना यही पुरुषार्थतका नहोना है तो इस्का उत्तर यह है कि नहीं अर्थात् सुखलामका न होना पुरुषार्थ- का नहोना नहीं है किसहेतुसे नहींहै दो प्रकार होनेसे सुख होने वदुःखके न होनेकी प्रार्थना होनेसे दो प्रकारका पुरुषार्थ है क्योंकि मै सुखी होंड दुखी नहोंऊ यह दो भिन्न भिन्न प्रार्थना लोकमें होना विदित होतीहै।।९।। निर्गुणत्वमात्मनोऽसंगत्वादिश्रुतेः ॥ १० ॥ असंगत्व आदि प्रतिपादक श्रुति होनेसे आत्माका निर्गुण होना सिद्ध है ।। १०॥ आत्मा निर्गुण है अर्थात् सुख दुःख मोह आदि सम्पूर्ण गुणोंसे नित्यशून्य है किसममाणसे श्रुतिप्रमाण होनेसे अर्थात् विकारका हेतु संयोगका अभाव श्रुतिसे सिद्ध होनेसे पुरुषका निर्गुण होना सिद्ध होता है क्योंकि विनासयोग गुणनामक विकारका होना संभव नहीं होता इस्से दुःखनिवृत्त होनाभी पुरुषार्थ होना घटित नहीं होता असंग होने. के प्रमाणमें श्रुति यह है "सयदा किंचित् पश्यत्यनन्यागतस्तेन भवत्य संगोह्ययं पुरुषः” अर्थ-वह अर्थात् पुरुप जो जो पदार्य इस संसारमे जान २३

१९४
सांख्यदर्शन।
ता वा देखता है उनके साथ उसका मेल नहीं है इससे यह पुरुष
असंगह ॥ १० ॥
परधर्मत्वेऽपितत्सिद्धिरविवेकात् ॥ ११ ॥
परधर्म होनेमेंभी अविवेकसे उस्की सिद्धि है ॥११॥
सुख दुःख आदि आत्माके गुण नहीं है परके अर्याद चित्तके धर्म हैं
तयापि आत्मामें सिद्ध होतेहैं अर्थात् अविवेक निमित्तसे प्रतिविम्वरूप.
के दुःख आदिकोंकी आत्मामें अवस्थिति है इस्का विशेष वर्णन पूर्व-
ही किया गया है ॥ ११ ॥
अनादिरविवेको अन्यथा दोपद्वय-
प्रसक्तेः ।। १२ ॥
अविवेक अनादि है अन्यथा दो दोप होनेके
प्रसङ्ग होनेसे ॥ १२॥
अविवेक प्रवाहरूपसे चित्तका अनादिधर्म है वासनारूपसे प्रलयमें
स्थित रहताहै जो अनादि न माना जावे तो दो दोष होनेका प्रसंग है म-
नायास अपनेसे उत्पन्न होनेमें मुक्तकामी बंध होजायगा और कर्म
आदिसे उत्पन्न होनेमे कर्मादिकमेभी कारण होनेमें अविवेकान्तर
( अन्य अविवेक ) अन्वेषण ( खोज ) करनेसे अनवस्था दोषकी
प्राप्ति होगी यह अविवेकवृत्तिरूप प्रतिबिम्ब स्वरूपसे पुरुपधर्मके
सदृश होताहै इस्से पुरुषके बंधका प्रयोजक (प्रेरक) होताहै अर्थात्
पुरुपके चंधका हेतु होता है यह भावहै ॥ १२ ॥ शंका अनादिहै तो
नित्य होगा उत्तर ॥
न नित्यःस्यादात्मवदन्यथानुच्छित्तिः॥१३॥
आत्माके समान नित्य न होगा अन्यथा उसका
नाश न होगा ॥१३॥

भाषानुवादसहित । १९५
अविवेक आत्माके तुल्य अखण्ड एक नित्य अनादि नही है किन्तु
प्रवाहरूपसे (सम्बंध न टूटने से अनादि अन्यया अनादिका नाश
होना संभव न होगा ॥ १३ ॥ बंधकारणको कहकर अब मोक्षकारण-
को वर्णन करते हैं।
प्रतिनियतकारणनाश्यत्वमस्य
ध्वान्तवत् ॥ १४॥
अंधकारके सदृश प्रतिनियतकारणसे इस्का
नाश्यत्व है ।। १४॥
इसका अर्थात् बंधके कारण अविवेकका प्रतिनियतकारणसे नाश्य-
त्व ( नाश होनेके योग्य होना) है अर्थात् प्रतिनियतकारण जो अ-
विवेकके नाशका विशेष नियत कारण विवेक है उम्से अविवेकका नाश
होता है यया अंधकार प्रतिनियतकारण प्रकाशहीसे नाशको मात्र हो-
ता है अन्य साधनसे नष्ट नहीं होता. इसीप्रकारसे अविवेक प्रतिनिय-
तकारण विवेकहीसे नाश कियाजाताहै अन्य उपायसे भविवेकका
नाश नहीं होता ॥ १४ ॥
अत्रापिप्रतिनियमोऽन्वयव्यति-
रेकात्॥१५॥
इस्मेभी अन्वय व्यतिरेकसे प्रतिनियम है ।। १५ ।।
इस्मेभी अर्थात् विवेकमैभी अन्वय व्यक्तिरेकसे कारणका प्रतिनि-
यम होना सिद्ध है । अर्थात् श्रवण मनन निदिध्यासन (वारम्बार ध्यान
व चिन्तन करना)का अन्वय (विशेष योग ) है और कर्मका व्यति-
रेक (भेद ) है अभिप्राय यह है कि विवेकमे श्रवण मनन निदिन्यासन-
रूपही कारण है कर्मादिकारण नहीं हैं कर्मादिक बहिरंग है श्रवण
मनन आदिके सदृश अतरंगरूप कारण नहीं है ॥ १५ ॥

१९६
सांख्यदर्शन।
प्रकारान्तरासंभवादविवेक
एववंधः॥१६॥
अन्यप्रकार संभव न होनेसे अविवेकही बंध है ॥१६॥
अविवेकसे भिन्न अन्य प्रकारसे पुरुपमे बंध होना संभव न होनेसे
अर्थात् स्वाभाविक पुरुपमें बंध होना जैसा कि प्रथम अध्यायमें प्रति-
पेध किया गया है सिद्ध न होनेसे तथा अन्यकोई बंधका हेतु सिद्ध न हो-
नेसे केवल अधिवेकही बंधका हेतु है इस्से अविवेकही बंधरूप है
यह भाव है ॥ १६ ॥
नमुक्तस्य पुनर्वन्धयोगोऽप्यनावृत्तिश्रुतेः॥१७॥
मुक्तका फिर बंधयोगभी नहीं होता अनावृत्ति
प्रतिपादक श्रुति होनेसे ॥१७॥
अनावृत्ति होनेके प्रमाणमें यह श्रुति है "भाषकार्यस्यैव विनाशितया
मोक्षस्य नाशो नास्ति'नसपुनरावर्तते" अर्थ भावकार्य ही विनाशित(ना.
शको प्राप्त ) होनेसे मोक्षका नाश नहीं है अर्थात् बंधभाव (होने )का
हेतु अविवेककार्यका विवेकसे नाश होनेसे मोक्षका नाश नहीं है न वह
(मुक्त) फिर बंधमे प्राप्त होता है व संसारमें आता है इस प्रकारसे अ-
नावृत्ति (फिर न होना अर्थात् फिर बंध न होना ) होना श्रुति प्रमाण-
से सिद्ध होनेसे मुक्तका फिर बंधयोगभी नहींहै. भीशन्द यह सूचित कर-
नेके लिये है कि मुक्तोंका फिर बंध नहीं होता ऐसान समझना चाहिये जे
पर मोक्षको नहीं प्राप्तहुये ऐसे मुक्तोंका फिर बंध होताहै अनेक मुक्तोंमें
कोई परम मोक्षको प्राप्त मुक्तका फिर बंध भोगभी श्रुतिप्रमाण अनुसार
नहीं होता और जिनका फिर बंध नहीं होता वही यथार्थ मुक्त व पुरुषार्थ-
को प्राप्त है ॥ १७ ॥
अपुरुषार्थत्वमन्यथा ॥१८॥

. ; ধণ না भाषानुवादसहित । १९७ अन्यथा पुरुपार्थ होना सिद्ध न होगा ॥ १८॥ अन्यया अर्थात् जो कोई ऐसा मुक्त होना कि जिसको फिर बंधन हो ना मानाजावै तौ परमपुरुषार्थ ( सर्वया दुःख निवृत्तिरूप मोक्ष )का होना सिद्ध न होगा ॥ १८॥ अविशेपापत्तिरुभयोः॥ १९॥ दोनोके विशेष न होनेकी प्राप्ति होगी ॥ १९ ॥ जो मुक्तकोभी फिर बंध होजानाहै तो बद्ध प मुक्तमें दोनोंके सम हो- जानेसे कुछ तो विशेषता न रहैगी ॥ १९ ॥ मुक्तिरन्तरायध्वस्तेर्न परः ।। २० ।। अन्तरायके नाश होनेसे पर पदार्थ मुक्ति नहीं है ।। २० ॥ अन्तराय (विघ्र ) जो अविवेक हेतुसे बुद्धि उपाधिद्वारा उत्पन्न दुःखहै उस्के नाशसे पर श्रेष्ठ अथवा भिन्न कोई पदार्य मुक्ति नहींहै अर्थात् अन्त- रायका नाश होनाही मुक्ति है ।। २० ॥ तत्राप्यविरोधः ॥२१॥ उसीमे अविरोध है ।।२१ ॥ उसीमें अर्थात् विघ्न नाशहोनेहीके मोक्ष होनेमें पुरुपार्थ होनेका विरोध नहींहै अर्यात् पुरुषार्थ होना सिद्ध होताहै दुःखका योग व वियोगही पुरु- पमें कल्पितहै दुःख भोग कल्पित नहींहै दुःखसम्बन्धहोना अर्थात् स्फटि- को जपाकुसुमके प्रतिबिम्बके सदृश प्रतिविम्वरूपसे दुःखसंबंधहोना भोगहै इसीका निवृत्तहीना मोक्ष व विघ्नका नाश होनाहै ॥ २१ ॥ अधिकारित्रैविध्याननियमः ॥२२॥ अधिकारी तीन प्रकारके होनेसे नियम नहीं है ॥२२॥ उत्तम, मध्यम, अधम, तीनप्रकारके ज्ञानके अधिकारी विविध मधि-

१९८
सांख्यदर्शन।
कारी होनेसे श्रवणमात्रके पश्चात् सबहीके मानस साक्षात्कार होनेक
नियम नहींहै मन्द अधिकार होनेहीके दोपसे श्रवणमासे विरोचन आ
दिको मानसज्ञान उत्पन्न नहींहुवा इस्से श्रवणमात्रका ज्ञान उत्पन्न करने
सामर्थ्य नहींहै ।। २२ ॥
दाढार्थमुत्तरेपाम् ॥ २३ ॥
दृढ होनेके अर्थ उत्तर वालोंका ॥२३॥
विनका नाश दृढ होनेके अर्थ अर्थात् आत्यन्तिक नाश होनेके अई
श्रवणसे उत्तर ( पश्चात् )जो मनन निदिध्यासन है उनका नियमहै नि
यमशन्दका पूर्वसूत्र सम्बन्धसे व भावसे ग्रहण होताहै ॥ २३ ॥ अब उ.
त्तरवाले मनन निदिध्यासन आदिके साधनको वर्णन करतेहैं
स्थिरं सुखमासनमितिननियमः ॥ २४ ॥
सुखपूर्वक स्थिर होना आसन है नियम नहीं है ॥२४॥
आसनमें पद्मासन आदिका नियम नहीं है जिस्मे सुखसे स्थिरहो यही
भासन है ॥२४॥
ध्याननिर्विषयमनः ॥ २५॥
विपय रहित मन (अंतःकरण) ध्यान है ॥२५॥
वृत्तियोंसे अंतःकरणका शून्य होनाही ध्यानहै जैसा की योगदर्शनमें
कहाहै कि चित्तकी वृत्तियोंका निरोप योगहै यहां ध्यान शन्द योग
कहनेका अभिप्राय है अर्थात् ध्येय पदार्थमात्रमें चित्तका लगना और स-
म्पूर्ण विषयरूप वृत्तियोंसे अंतःकरणका रहितहोना ध्यानहै ॥ २५ ॥
शंका-जम पुरुप योग अयोगमें एकही रूप रहताहै नित्यमुक्तहै फिर योग-
साधनसे क्या प्रयोजनहै उत्तर-
उभयथाप्यविशेपश्चेन्नैवमुपरागनिरोधा-
द्विशेषः ॥ २६ ॥

भापानुवादसहित। दोनोप्रकारमें विशेप नहीं है यह माना जावै तौं उपराग निरोध होनेसे विशेष है ॥२६॥ दोनोमकारमें अर्थात् योगअवस्था व अयोगअवस्थामें विशेष नहीं है जो यह संशय होवै तो उत्तर यहहै कि नहीं योगअवस्थामें अयोगअवस्थासे उपराग निरोध होनेसे अात् प्रतिविम्वरूप बंधकी निवृत्तिहोनेसे विशेष है ॥ २६ ॥ निःसङ्गपुरुषमें उपराग किसप्रकारसे होताहै उत्तर- निःसङ्गेऽप्युपरागो विवेकात् ॥ २७ ॥ संगरहितमभी अविवेकसे उपराग होता है ॥ २७ ॥ संगरहित पुरुषमें यद्यपि पारमार्थिक उपराग विषयप्रीति नहीं है तथा- पि अविवेकसे औपाधिक प्रतिविम्बही उपराम होताहै ॥ २७ ॥ अब इ- सीका विवरण करतेहैं। जपास्फटिकयोरिवनोपरागः किंत्वभिमानः॥२८॥ गोडहरके फूल व स्फटिकके समान उपराग नहीं है किन्तु अभिमान है ॥२८॥ यया स्फटिकमें जपाकुसुम (गोडहरकैफूल )के योगमें उपराग नहीं होता अर्थात् लालरूप नहीं होता किन्तु प्रतिबिम्बवश अभिमानमात्र भ्रमसे होताहै कि स्फटिक रक्त (लाल ) है इसीप्रकारसे बुद्धि व पुरुषमें उपराग नहीं है बुद्धि प्रतिविम्बवशसे अविवेकसे पुरुषमें उपरागका अ. भिमान होताहै इस्ले उपरागके तुल्य वृत्तिप्रतिविम्बही पुरुषका उपराग है यह दुःखात्मक वृत्तिरूप उपरागही विघ्नहै इसविनका नाश होना मो- क्षका मात्र होना है इस्का नाश चित्तवृत्तियोंका निरोधरूप जो असम्भ- ज्ञात योग है उस्में होता है योगही विन ( बंध दुःख)का नाश होतही

सांख्यदर्शन ।
यही योगशास्त्रका सिद्धांत है ॥ २८ ॥ राग निरोध होने व योग:
साधनका उपाय वर्णन करतेहैं ।
ध्यानधारणाभ्यासवैराग्यादिभि-
स्तनिरोधः॥२९॥
ध्यान धारणा अभ्यास वैराग्य आदिकोंसे
उस्का निरोध होता है ।। २९ ॥
उस्का अर्थात् उपरागका ध्यान धारणा अभ्यास वैराग्य आदिसे
निरोध होता है समाधिद्वारा ध्यान करना योगका कारण है ध्यानरा
कारण धारणा है धारणाका कारण अभ्यासह अभ्यास चित्तकी स्थिरता
सिद्ध करनेका अनुष्ठानहै विषयसे वैराग्य होना अभ्यासका कारण है वै.
राग्यका कारण दोष विचारना यम नियम आदि करना है इन योगके
अंगीक साधनसे उपरागका निरोध (रोंक ) होताहै ॥ २९ ॥
लयविक्षेपयोावृत्त्येत्याचार्याः ॥३०॥
लय (निद्रा) व विक्षेप (प्रमाण आदि वृत्ति)
वृत्तियोंकी निवृत्तिसे कोई आचार्य कहते हैं।॥ ३०॥
ध्यान आदिसे चित्तकी निद्रावृत्ति व प्रमाण आदि वृत्तिकी निर्वा
होनेसे पुरुपकेभी वृत्ति उपरागका निरोध होताहै यह कोई माचा
कहते हैं ॥ ३०॥
नस्थाननियमश्चित्तप्रसादात्॥३१॥
चित्तके प्रसाद (प्रसन्नहोने )से ध्यान आदि
होनेसे स्थानका नियम नहीं है।।३।।
चित्तकें प्रसादहीसे ध्यान आदिक होते हैं पर्वतके गुहाआदि स्था
होनेका नियमनहीं है कोई स्थान हो जहां चित्त शुद्ध व प्रसन्न हो ध्य
आदि करना चाहिए ॥ ३१ ॥

"भापानुवादसहित। २०१
प्रकृतेराद्योपादानतान्येपांकार्यत्वश्रुतेः॥ ३२॥
औरोंका कार्य होना सुन्नेसे प्रकृतिकी आय
उपादानता सिद्धिहोतीहै ॥३२॥
महत्तत्व मादिकोंका कार्य होना सुन्नेसे इन सबका मूल प्रकृतिका
माय उपादान कारण होना सिद्ध होता है ।। ३२ ॥ जो पुरुपही उपा-
दान माना जाय तो क्या दोष है उत्तर।
नित्यत्वेऽपिनात्मनोयोगत्वाभावात् ॥३३॥
नित्य होनेमेंभी योग होनेके अभावसे आ-
त्माकी उपादानता नहीं है ॥ ३३ ॥
गुणवान् होना व संगी होना उपादानके योग्य होना है अयीत् जि-
स्में गुण होता है व संग होना धर्म होताहै वही उपादान कारण होस-
कता है आत्मामें गुण व संगका अभाव है दोनोंके अभाव होनेसे आ-
रमाका उपादानकारण होनेका योग होना संभव नहीं है इस्से नित्य
होनेपरभी आत्माका उपादान होना सिद्ध नहीं होता ॥ ३३ ॥
श्रुतिविरोधान्नकुतर्कापसदस्यात्मलाभः॥३४॥
श्रुतिविरोधसे कुतर्क करनेवालेको
आत्मलाभ नहीं है ॥ ३४॥
जे पुरुषके उपादान कारण होनेमें पक्ष हैं यह सव कुतर्क व श्रुति
विरुद्ध है कुतर्क करनेवाले अधमको आत्मलाभ अर्थात् आत्मज्ञानका
लाभ नहीं होता जो आत्माके कारण होनेकी प्रतिपादक श्रुतिहें वह शक्ति
व शक्तियां मानके अभेद भावसे उपासना करनेके उपदेशमें हैं ॥ ३४॥
शंका-स्थावरमादिमें पृथिवीमादिहीका कारण होना विदित होताहै,
प्रकृतिका सघका उपादान क्यों मानते ही उत्तर ॥
पारम्पर्येऽपिप्रधानानुवृत्तिरणुवत् ॥ ३५ ॥

२०२ सांख्यदर्शन। परम्पराक्रम होनेके द्वारा कारण होनेमेभी प्रधान- की अनुवृत्ति अणुके समान है ॥३५॥ स्थावरआदिकोंमें परम्परा करिकै कारण होने मेंभी उनसे प्रधान- का अनुमान होनेसे प्रधानका उपादान होना अंगीकार किया जाताहै यथा अंकुर आदिही द्वारा स्यावर आदिमें पृथिवी आदिके अणुओं- के अनुगम ( अंकुरके सदृश हो प्राप्त ) होनेसे अणुओंका उपादान होना मानाजाता है इसीप्रकारसे पृथिवीआदि स्वरूपसे प्रकृतिका उपादान होना अंगीकार करना चाहिये इस्से पृथिवीआदिमें प्रधानके उपादान होनेकी अनुवृत्ति है ॥ ३५ ॥ सर्वत्रकार्यदर्शनाद्रिभुत्वम् ।। ३६॥ सर्वत्र कार्य देखनेसे प्रधानका विभुत्व है ।। ३६ ॥ व्यवस्थारहित सर्वत्र विकार रूप कार्य देखनेसे प्रधानका विभु होना अर्यात् व्यापक होना विदित होता है यया अणुओंका घट आदिमें व्यापित्व है इसीप्रकारसे प्रधानका सब कार्यपदार्थों में व्यापित्त है इस्का व्याख्यान पूर्वही होगया है ॥ ३६ || जो परिच्छिन्न होनेमेंभी जहाँ कार्य उत्पन्न होता है वहाँ प्रकृति जाकर प्राप्त होती है ऐसा माना जाय तो इसका उत्तर यह है- गतियोगेप्याद्यकारणताहानिरणुवत् ॥ ३७॥ गतियोग होनेमेंभी अणुके तुल्य आधका- रण होनेकी हानि है ॥३७॥ प्रधान (प्रकृति में गति (क्रिया )योग होने में भी अर्याद क्रिया- योगभी मानने में यथा क्रियावान् अणुओंके मूलकारण होनेका अभाव है इसीप्रकारचे प्रधानके मूलकारण होनेका अभाव होगा इस्से प्रधानका व्यापकही मानना युक्त है अथवा सूत्रका यह अर्थ है कि गति योग होने- भाषानुवादसहित । २०३ मेंभी अणुके तुल्य आय (जो आदिमें हो )कारण होनेकी हानि नहीं है व भाव इस्का यह है कि परस्पर संयोग होनेके अर्थ त्रिगुणात्मक प्रधा- नकी क्षोभ (सञ्चलन )रूप क्रिया श्रुति स्मृतिमें सुनी जाती है इसपर जो यह शंका होकि यथा क्रियावान् तन्तु आदि मूलकारण नहीं होते तथा प्रधान मूलकारण नहीं है तो उत्तर यह है कि यथा वैशेषिक मतमें क्रियावान पार्थिव आदि अणुओं (परमाणुओं )को मूलकारण मानते है क्रियावान होनेसे मूलकारणताकी हानि नहीं मानी जाती इसीप्रकारसे क्रियायोग होनेमेंभी प्रधानके मूलकारण होनेकी हानि नहीं है ॥ ३७॥ प्रसिद्धाधिक्यं प्रधानस्यन नियमः॥३८॥ प्रसिद्धसे प्रधानकीअधिकता है इस्से नियम नही है ॥३८॥ नव द्रव्य प्रसिद्ध है प्रधान द्रव्य नव द्रव्यसे अधिक है इस्से नवही द्रव्य है यह नियम नहीं है ॥ ३८ ॥ अब यह संशय है कि सत्व आदि त्रिगुणरूपही प्रकृति हैं अथवा द्रव्यरूप तीनों गुणोकी आधारभूत है इस संशयके निवारणके लिये यह उत्तर है सत्वादीनामतद्धर्मत्वंतद्रूपत्वात् ॥ ३९ ॥ सत्व आदिकोंकाउस्के रूप होनेसे उस्काधर्मत्व नहीं है ॥३९ ॥ सत्वगुणोंका उस्कै अर्थात् प्रकृति के रूप होनेसे उस्का धर्मख अर्थात् प्रकृतिका धर्म होना नहीं है भावार्थ यह है सत्व आदि गुण प्रकृतिके रूपही हैं प्रकृतिक धर्म नहीं है प्रकृतिके रूपही होनेसे सम्बंध सम्बंधी- भाव न होनेसे धर्म धर्मी होनेका निश्चय नहीं होता अब यह संशय है कि सत्वमाद गुणोंका प्रकृतिक कार्य होना संभव नहीं होता क्योंकि एक प्रकृतिका विना अन्यद्रव्यके संयोग विचित्र तीन गुणोंका उत्पन्न करना संभव नहीं है विना अन्यद्रव्यके संयोग विचित्र कार्यकी उत्पत्ति प्रत्यक्षके विरुद्ध कल्पना करना उचित नहीं है इस्का उत्तर यह है कि - सांख्यदर्शन। सत्त्वादि कोई प्रकृतिसे भिन्न पदार्य नहीं हैं जिनकी विचित्र उत्पत्ति मानीजाय अंशभावसे कार्य होना कहा जाता है यथा पृथिवी पृषि वीके संशरूप द्वीपोंकी उत्पत्ति है इसीयकारसे प्रकृतिसे गुणोंकी उत्पत्ति जानना चाहिए ।। ३९ ॥ विना प्रयोजन प्रवृत्ति नहीं होती प्रधान किस प्रयोजनसे सृष्टिको उत्पन्न किया यह वर्णन करते हैं- अनुपभोगेऽपिपुमर्थ सृष्टिःप्रधानस्योष्ट्र- कुंकुमवहनवत्॥४०॥ उपभोगनहोनेमेंभी ऊंटके केसर लैचलनेके समान पुरुपके अर्थ प्रधानकी सृष्टिहै ॥ ४० ॥ परके अर्थ प्रधानकी सृष्टि होनेका तृतीयाध्याय ५८ सूत्रमें इसी ऊंटके केसर ले चलनेके द्रष्टांतसे व्याख्यान किया गया है ॥ ४० ॥ सृष्टिके विचित्र होने का कारण कहते हैं- कर्मवैचित्र्यात् सृष्टिवैचित्र्यम् ।। ४१ ॥ कर्मकी विचित्रतासे सृष्टिको विचित्रताहै ॥४१॥ अनेक प्रकारके विचित्र शरीर आदि होनेसे विचित्रसृष्टि काँकी विचित्रतासे होती है अर्थात् मनेक प्रकारके कर्मोंके अनुसार अनेक प्रका- रकी सृष्टि होती है ॥ ४१ ॥ साम्यवैषम्याभ्यांकार्यद्वयम् ॥४२॥ समभाव व विपमभावसे दो कार्य होते हैं। ४२।। इसशंका निवारणके लिये कि एक कारणसे दो विरुद्ध कार्य सृष्टि व प्रलय कैसे होते हैं यह कहा है कि समभाव व विषमभाव दो भिन्न हेतु • होनेसे दो कार्य होते हैं सत्वमादि तीन गुणरूप प्रधान है इन तीन गुणोंका न्यून अधिक होना विषमभाव है व तीनोंका सम होना सम भाव है इन दो हेतुओंसे सृष्टि मलय दो कार्य होते हैं स्पिति सृष्टिरूप

भाषानुवादसहित। २०५
सृष्टि अंतर्गत है इससे प्रकृतिको उस्का कारण होना पृथक् नहीं कहा
॥ ४२ ॥ शंका प्रकृतिक सृष्टि स्वभाव होनेसे ज्ञानके पश्चात्भी संसार
होना चाहिए उत्तर-
विमुक्तबोधान्नसृष्टिःप्रधानस्य लोकवत् ॥४३॥
विमुक्तबोध होनेसे लोकके तुल्य प्रधानको सृष्टि
नहीं होती ॥४३॥
विमुक्तबोध होनेसे अर्थात् पुरुष साक्षात्कार होनेसे उसपुरुपके अर्य
कृतार्थ होनेसे फिर प्रधानकी सृष्टि नहीं होती जैसे लोकमे मंत्री आदि
राजाका काम कारकै कृतार्थ हो फिर राजाके लिये मवृत्त नहीं होते इसी-
प्रकारसे प्रकृति फिर प्रवृत्त नहीं होती ॥ ४३ ॥ शंका प्रधानकी सृष्टिसे
शांतता नहीं है क्योंकि अज्ञानिओंका बंध रहनेसे, संसार बना रहता है
ऐसा होने में प्रकृतिकी सृष्टिसे मुक्तकाभी फिर बंध होजाना चाहिए अथवा
होजाना संभव है--
नान्योपसर्पणेऽपिमुक्तोपभोगो
निमित्ताभावात् ॥४४॥
अन्य प्रति उपसर्पण होनेमेंभी निमित्तके
अभावसे मुक्तका उपभोग नहीं होता ॥४४॥
र्यकारणसंयोगरूप सृष्टिकारकै अन्यप्रति अर्थात् अज्ञानी मति
प्रधानका उपसर्पण (गमन ) होनेमेंभी अर्थात् प्रधानके प्राप्त होनेमेंभी
मुक्तका उपभोग नहीं होता क्यों नहीं होता निमित्तके अभावसे अर्थात्
उपभोगमे प्रधानकी उपाधिसे उत्पन्न संयोगविशेष व उसके कारण
अविवेक आदि जो निमित्त होते हैं उनके अभावसे, यही मुक्तपतिप्रधान
सृष्टिकी निवृत्ति अर्यात् पुरुपके भोगका हेतु मधानका अपनी उपाधिसे
परिणाम विशेषरूप जो जन्म है उस्का उत्पन्न न करना है ॥ ४४ ॥

२०६
सांख्यदर्शन।
यह मुक्त व बद्धकी व्यवस्था तब घटित होसक्ती है जब पुरुष बहुत हों
और पुरुषोंका बहुत होना अद्वैत श्रुतिओंसे प्रतिपेधित (खण्डित ) है
इस्से संशय होता है इस संशयके निवारणके अर्थ यह सूत्र है-
पुरुपबहुत्वंव्यवस्थातः ॥४५॥
व्यवस्था (अवस्था भेद )से पुरुपका बहुत होना
विदित होता है ।। ४५॥
बंध मोक्ष व्यवस्था होनेसे पुरुषोंका बहुत होना अनुमानसे सिद्ध
होता है व श्रुतिसेभी सिद्ध है श्रुतिमें कहा है"येतद्विदुरमृतास्ते भवन्यये-
तरेदुःखमेवोपयन्ति" इत्यादि अर्थ-जे आत्माको जानते हैं वह मोक्षको
प्राप्त होते हैं इतर दुःखहीको प्राप्त होते हैं इत्यादि ॥ ४५ ॥
उपाधिश्चेत्तत्सिद्धौपुनद्वैतम् ॥ ४६॥
उपाधि हो उसकी सिद्धि होने में फिर द्वैत है।॥४६॥
जो उपाधि मानीजाय कि उपाधिसे अनेक प्रकारकी व्यवस्था होती है
तो उस्की ( उपाधिकी ) सिद्धि होने मेंभी द्वैत सिद्ध होगा अद्वैतका निषेध
होगा ॥ ४६ ॥ पूर्वपक्ष-उपाधिभी अविद्यारूप है इस्से अद्वैतका
भङ्ग नहीं होता उत्तर-
द्वाभ्यामपिप्रमाणविरोधः॥४७॥
दोसेभी प्रमाणका विरोध है ॥४७॥
दोसे अर्थात् पुरुष व अविद्या दो अंगीकार करनेसेभी अद्वैत प्रमाण-
का विरोध होगा ॥ ४७ ॥ अन्य दूषणभी कहते है-
द्वाभ्यामप्यविरोधान्न पूर्वमुत्तरंच
साधकाभावात् ॥४८॥.
दोसे विरोध न होनेसेभी पूर्व और उत्तर साधकके
अभावसे घटित नहीं होते ॥४८॥

भापानुवादसहित। २०७ दोसे विरोध न होनेसेमी अर्थात् जो ऐसा मानाजाय कि पुरुप व अविद्या दी हैं और अविद्याके माननेमें कुछ विरोध नहीं है तो ऐसा माननेसेभी पूर्व व उत्तर अर्यात् अद्वैतवादी जो प्रकृतिके प्रतिषेध कर- नेमें पूर्वपस करते हैं वह तथा साधकके अभावसे अपने सिद्धांतमे द्वैत- पक्षके निषेधमे जो उत्तर वर्णन करते है वह दोनो घटित नहीं होते पूर्व पक्ष इस देतुसे घटित नहीं होता कि अविद्या व मात्मा दोको वह मानते हैं प्रकृति व आत्मा दोको हम मानते है जो उनके दो माननेसे अद्वैतका विरोध नहीं है तो हमारे मतसे विरोध नहीं है वह अविद्याको अनित्य वाचारम्भणमात्र मानते है हमभी विकारको अनित्य पाचारंभणमात्र मानते है परंतु जो हमारे अनेक पुरुषोंके अंगीकार करनेसे और प्रकृति कोभी नित्य अंगीकार करनेसे दोनोंमें विरोध है दो से कौन सत्य मानना चाहिए ऐसा संशय हो तो अद्वैतवादीयोंका उत्तरपक्ष (सिद्धांत) घटित नहीं होता इस्से अद्वैत पक्ष युक्त नहीं है क्यों अद्वैतपक्षका सि- द्धांत घटित नहीं होता साधकके अभावसे अर्थात् अद्वैतपक्षका कोई साधक हेतु सिद्ध नहीं होता किन्तु अविद्याके अंगीकार करनेहीसे अद्वैत- वादिओंके सिद्धांतकी हानि होती है ॥४८॥ प्रकाशतस्तत्सिद्धौकर्मकर्तृविरोधः ॥ १९॥ प्रकाशसे उस्की सिद्धि होनेमें कर्म व कर्ताका विरोध है ॥१९॥ अद्वैतवादी जो प्रकाश का ज्ञानसे आत्माका सिद्ध होना माने व प्र- काशहीरूप अद्वैत भावसे आत्मा मानाजाय तो इसके प्रतिषेधमें यह कहा है कि प्रकाशसे उस्की सिद्धि होनेमें कर्म व कर्ताका विरोध है अर्यात् चैतन्परूप प्रकाशसे चैतन्यकी सिद्धि मानेमे कर्म कर्ताका विरोध होता है भकाश्य व प्रकाशक दोके सम्बंध में प्रकाशकका मकाश करना.लोकमें दृष्ट है साक्षात् अपनाही आपमे सम्बंध होना विरुद्ध है मर्यात् आपही कर्म व आपही कर्ता होना विरुद्ध है इस्से मात्माको प्रकाशक मान भी २०८ सांख्यदर्शन। कर्म सम्बंध होनेसे द्वैत सिद्ध होगा ॥ ४२ ॥ शंका-जो चेतनमें प्रकाश धर्म न माना जाये और अपने प्रकाशसे आप सिद्ध होना मानेमे कर्म व कर्ताका विरोध होता है तो किस प्रकारसे आत्मा सिद्ध होताह उत्तर- जडव्यावृत्तो जडंप्रकाशयतिचिद्रूपः॥ ५० ॥ जडसेव्यावृत्त (भिन्नताको प्राप्त ) चैतन्यरूप जडको प्रकाश करता है ॥२०॥ जडकी व्यावृत्तिमात्रसे व्यावृत्त चैतन्यरूप जडको प्रकाश कर- ता है. सूर्य आदि तेज धर्मवानके समान चेतन प्रकाश नहीं करता भाष इस सूत्रका यह है कि अद्वैत मानेनेहीमें कर्म व कर्ताका विरोध होताह हम जड व चेतन पदार्थको मानते हैं हमारे पक्षमें विरोध नहीं है हमारे धर्म धर्मी भेद न माननेमें व चिद्रूपही चेतनके माननेमें दोष नहीं है क्योंकि यद्यपि हम सूर्य आदिको में प्रकाश होनेके तुल्प चेतनमें प्रकाश धर्म नहींमानते परन्तु चिद्रूप (चैतन्य या प्रकाश रूपही ) पदार्थ जड- को प्रकाश करताहै यह मानते है और वह प्रकाश करना इस हेतुसे माना जाताहै कि जडकी व्यावृत्तिमात्रसे चैतन्य होना कहा जाताहै जडसे व्यावृत्त (पृयक्ताको प्राप्त ) चिद्रूपपदार्थ जडके ज्ञान का हेतु होनेसे जडको प्रकाश करता है ॥ ५० ॥ शंका-दैतके मानने में मंदै- त श्रुति का विरोध होगा उत्तर ।। न श्रुतिविरोधोरागिणां वैराग्याय तत्सिद्धेः ॥ ५१ ॥ रागियोंके वैराग्यके अर्थ उस्की सिद्धि होनेसे श्रुति विरोध नहीं है ॥५१॥ श्रुति विरोध नहीं है विरोध न होनेमें हेतु यह है कि रागियोंके है- राग्य होनेके मर्य श्रुतिमें अद्वैतमीतपादनके प्रयोजनकी सिद्धि है अ.

भाषानुवादसहित । २०९ र्थात् गगी जे विषयोंमे लिप्त उनके वैराग्य होनेके अर्थ प्रयोजनमें कि अद्वैतसाधनसे सत् वैराग्य होता है श्रुति अद्वैतप्रतिपादन किया है क्योंकि पुरुष ज्ञानहीमात्र सत् और सय असत् द्वैतके अभाव जाननेसे स्वतंत्र कोई अन्य फल न सुन्नेसे केवल आत्मज्ञानही कल्याणरूप जानने- से सब अन्यपदार्थसे परम वैराग्य उत्पन्न होताहै ॥ ५१ ॥ अद्वैतवादी जगतको असत् कहते हैं जगत् सत्य है अथवा असत्यहै इस्का सिद्धांत हेतुसंयुक्त वर्णन करते हैं- जगत्सत्यत्वमदुष्टकारणजन्यत्वा- द्वाधकाभावात् ॥५२॥ अदुष्टकारणसे उत्पन्न होनेसे बाधकके अभाव होनेसे जगतका सत्य होना सिद्ध है ।। ५२॥ निद्रा आदि दोपसे दुष्टअंतःकरणसे उत्पन्न होनेके हेतुसे स्वप्नमें शंखमें पियराई देखना लोकमें असत्य होना विदित होता है इसप्रकार से किसीदोपसे दुष्टकारणसे महत्तत्वादि कार्यप्रपंच उत्पन्न नहीं है प्रकृतिकारण सत्यहोनेके विषयमें पूर्वहीं वर्णन कियागया है इस्से दुष्ट- कारणसे उत्पन्न न होनेसे अर्थात् सत्कारणसे उत्पन्न होनेसे जगत् सत्य है तथा सत्य होनेके वाधक (विरुद्ध प्रमाणके अभावसे ( न होनेसे) जगत् सत्य है जो यह कहा जायकि जो श्रुति अद्वैतवर्णन करती हैं - ह जगत्के सतहोनेके प्रमाणकी बाधक हैं तो अद्वैत सिद्ध न होनेका प्रमाण पूर्वही वर्णन कियागया है संक्षेपसे यहां फिर वर्णन किया जा- ताहै कि अद्वैत श्रुती पूर्वोक्तअनुसार वैराग्यके अर्थ हैं अथवा प्रकरण अनुसार ब्रह्म सबमे व्यापक प ब्रह्मसे पृथक् कोई पदार्थ न जानकर ब्रह्म- मय भाषसे विभागकी प्रतिषेध करनेवाली है प्रपंचके अत्यन्त तुच्छता' वर्णनपर नहीं हैं अन्यथा अद्वैत होने में उनही ( श्रुतिओं)के होनेकी बाधा होगी क्योंकि जगत् मपंच स्वप्नवत् मिथ्या होनेके हेतुसे स्वप्न २५ सांख्यदर्शन। कालके शब्दके मिथ्या होनेमें उस शब्दके द्वारा जानागया जो अर्थ है वहभी संदेहयुक्त असत्यही होना संभव है श्रुतियोंका अपनेही मात्मा की घातक होनेसे अर्थात् अपनेही प्रमाणको आप घातक होनेसे श्रुति- यां प्रपंचके अत्यंत (निषेध) करने पर नहीं हैं इस्ले जगत्कै बाधक- प्रमाणके अभावसं जगत् सत्य है ॥५२॥ जगत् केवल वर्तमानदशामें सत नहीं है सदा सत्य है इसमभिप्रायसे सदा सत् होनेका हेतु वर्णन करते है- प्रकारान्तरासंभवात्सदुत्पत्तिः ॥५३॥ अन्यप्रकारसे उत्पन्न होना संभव न होनेसे सत्की उत्पत्ति होती है ॥५३॥ पूर्वही जैसा वर्णन कियागया है उन पूर्वोक्त युक्तिओंसे असत्का उत्पन्न होना असंभव है सूक्ष्मरूप कारणमें सत् वर्तमानही कार्य उत्पन्न वा प्रकट होता है इससे सतहीकी प्रकटता होती है ।। ५३ ।। अहंकारः कर्ता न पुरुपः॥ ५४॥ अहंकार करता है पुरुष नहीं है ॥ ५४॥ अभिमानवृत्तिक अंतःकरणको महङ्कार कहते हैं अहंकारके उत्तर प्रवृत्ति होती है व अहंकारवृति भेदसे बुद्धिका कार्य है अहंकारके उत्तर प्रवृत्ति होनेसे अहंकारको कर्त्ता कहा है अपरिणामी होनेसे पुरुषका प्रच होना सिद्ध नहीं होता ॥ ५ ॥ चिदवसानाभुक्तिस्तत्कार्जितत्वात् ॥ ५५ ॥ भोग चेतनमें प्राप्त होता है उस्के कर्मसे संचित वा जनित (उत्पन्न किया गया) होनेसे ॥५५॥ अहंकारके कर्ता होनेमेंभी भोग चेतनहीमें प्राप्त होता है इसमें यह शंका निवारणके अर्थ कि इसमकारसे अन्यनिष्ठ कर्म अन्यके भोग ५ भाषानुवादसहित । २११ होनेमें पुरुषविशेषमें होनेका नियम न होना चाहिये यह कहा है कि उस्के (चेतनके ) कर्मसे संचित होनेसे अर्यात् भोग चेतनके कर्मोंसे संचितफलरूप होनेसे चेतनमें प्राप्त होता है अपने अपने अहंकार अंत:- करण द्वारा कियेहुये काँका फलभोग होनेसे अन्यके कर्मका फल अन्यको होना सिद्ध नहीं होता इससे अतिप्रसंग दोष नहीं है ॥ ५५ ॥ चन्द्रादिलोकेप्यावृत्तिर्निमित्तसद्भावात् ॥५६॥ चन्द्र आदि लोकमेंभी आवृत्ति है निमित्तकेसत्- भाव होनसे ॥५६॥ निमित्तके सत्भाव होनेसे अर्थात् भोगके निमित्त अविवेक कर्म आदि सत् होनेसे चंद्र आदिलोकमभी आवृत्ति है अर्थात् चन्द्रादिलोक- में प्राप्त होनेमेभी फिर बंध होता है अर्थात् चन्द्र आदि लोकमें प्रा- स फिर दुःखबंधमे प्राप्त होताहै ॥ ५६ ॥ (शंका) चंद्र आदि लोक वासियोंक उपदेशसे अनावृत्ति होना माना जावै ( उत्तर ) लोकस्य नोपदेशात् सिद्धिः पूर्ववत्॥५७ ॥ पूर्वके समान लोकके उपदेशसे सिद्धिनहीं होती॥१७॥ पूर्वके समान अर्थात् यया पूर्वोक्त मनुष्य लोकमें उपदेश मानसे ज्ञानकी सिद्धि नहीं होती इसीप्रकारसे अन्यलोकके वासियोंके उ- पदेशमात्रसे उन लोकके गयेहुयोंको ज्ञानकी सिद्धि नहीं होती ॥५॥ पारंपर्येण तत्सिद्धौ विमुक्तिश्रुतिः॥५८॥ परम्परासे उस्की सिद्धि होने में मुक्ति श्रवण है।॥१८॥ परम्परासे उस्की अर्थात् ज्ञानकी सिद्धि होनेहीमें मुक्ति होना सुना जाता है लोक आदिमें गमनमात्रसे मुक्ति नहीं होती अर्थात् ब्रह्मलोक. मादिगत पुरुषोंका मोक्ष होना अवण मनन नादि परम्पराके द्वारा ज्ञान- ही सिद्ध होनेमे सुना जाता है अन्यया होना संभव नहीं है ।। ५८॥

२१४ सांख्यदर्शन! चित्तकी वृत्तिओंका राग जो प्रवृत्तिका हेतु है उस्के उत्पन्न करनेवाले महंकारके अभावहोनेसे निरोधही होना विदित होता है इस्से . विशिष्ट पु- रुपका जीवव है अइंकाररहित पुरुपका जीवन नहीं है स्वच्छ मुक्त- रूपत्व है अर्थात् अहंकार रहित मुक्तरूप होताहै ॥ ६३ ।। अहङ्कार कधीना कार्यसिद्धिनेश्वराधी- नाप्रमाणाभावात्॥६४॥ अहंकाररूप कर्ताके आधीन कार्यसिद्धि है प्रमाणक अभावसे ईश्वरके आधीन नहीं है ॥६॥ अहंकाररूप जो कर्ता है उसीके आधीन कार्यसिद्धि अर्थात् सृष्टि संहारकी सिद्धि है क्योंकि सामर्थ्य वा बल अहंकारहीका कार्य है अई- कार रहितमें सृष्टि उत्पत्तिकार्यका सामर्थ्य होना विदित नहीं होता अहंकाररहित ईश्वरमें क्योंकि ईश्वरमें अहंकार होनेका कोई हेतु पाया नहींनाता सृष्टि करनेकी प्रवृत्ति होना संभवनहीं है इस्से प्रमाणके अभा- वसे कार्यकी सिद्धि ईश्वरके आधीन नहीं है अहंकाररूप अर्यात् अहं- कारोपाधिक सिद्धपुरुष ब्रह्म रुद्रसे कार्यविद्धि होसकती है परन्तु उन- काभी मूलकारण प्रकृति है नित्य ईश्वर नहीं है नित्य ईश्वरका सटिकता होना प्रमाणसे सिद्ध नहीं होता है ।। ६४ ॥ शंका औरोंका कर्ता तो अहंकार है अहंकारका कर्ता कौन है उत्तर- अदृष्टोद्भूतिवत्समानत्वम् ॥ ६५ ॥ अष्टकी प्रकटताके तुल्य समानत्व है ॥ ६५ ॥ यया सृष्टिकी आदिमें प्रकृति क्षोभक ( करनेवाला ) कर्मकी कालविशेष मात्रसे प्रकटता होती है और उस्के उरोधक कर्मान्तर ( अन्यतम )के कल्पना करने में अनवस्थाकी प्राप्ति होती है इसीप्रका. रसे अहंकार कालमात्र निमित्तहीसे उत्पन्न होता है उस्का कोई अन्य कर्ता नहीं है अन्यकी कल्पना करनेमें अनवस्था दोष प्राप्त होनेका

.
भाषानुवादसहित।
२१५
प्रसंग है इसप्रकारसे प्रकृति क्षोभक कर्मरूप अदृष्ट व अहंकारका समा-
नत्व है अर्थात् अष्टके सदृश अहंकारभी माननेके योग्य है ।। ६५ ॥
महतोऽन्यत् ॥६६॥
अन्य महत्तत्वसे ॥६६॥.
अन्य अहंकार कार्यरुपसृष्टि संहारसेभिन्न जो पालन कार्य है वह
महत्तत्व से होता है पालनमें पर अनुग्रहमात्र प्रयोजन होनेसे अभिमान
रागका अभाव व शुद्ध सत्वगुणका होना सिद्ध होता है इस्से महत्तत्वका
कार्य है इससूत्रसे महत्तत्वीपाधिक अर्थात् महत्तत्वरूप विष्णुको जो
सृष्टिका पालक होना कहते है सिद्ध होसकता है । ६६ ॥
कर्मनिमित्तःप्रकृतेःस्वस्वामिभावोऽप्य
नादिर्वीजांकुरवत् ॥ ६॥
प्रकृतिका अपना व अपने स्वामीका भावहोनाकर्मनिमि-
तक होने में भी बीज व अंकुरके समान अनादि है ॥६॥
प्रकृति व पुरुपका अपना व स्वामिभाव अर्थात् भोग्य भोक्ता भाव जो
कर्म निमित्तक मानाजावै तौभी वह प्रवाहरूपसे अनादिही है यया चीन
व अंकुरका सम्बंध मनादि है आकस्मिक होने में मुक्तकाभी फिर भोग
माप्त होना सिद्ध होगा इससे निमित्त अवश्य अंगीकारके योग्य है॥६॥
अविवेकनिमित्तो वा पंचशिखः॥६८॥
अथवा आववेकनिमित्तसे पंचशिख मानते हैं।६८॥
अथवा प्रकृति व पुरुषका भोग्य व भोक्ता भाव अविवेक निमित्तसे है
जैसा कि पंचशिख पाचार्य मानते है पंचशिख आचार्य जो अविवेक निमि-
समीप भोक्ता आप होता मानते हैं उनके मन में भी अपि-
नादि है अविवेकके अनादि होनेसे भोग्य भोक्ता भाव अनादि है प्रलयमें
भी वासनारूपसे कर्मके समान अविवेक रहता है ॥ ६॥
लिङ्गशरीरनिमित्तकइति सनन्दाचार्यः॥६९॥

२१६ सांख्यदर्शन। लिङ्गशरीरनिमित्तक है यह सनन्दन आचार्य मानते हैं ६९ प्रकृति व पुरुपका भोग्य भोक्ताभाव लिंगशरीरनिमित्तक है यह सनन्दनाचार्य मानते हैं क्योंकि लिङ्गशरीरहीके द्वारा भोग होता है। उनके मतभी लिंगशरीर अनादि है व लिंगशरीरके अनादि होनेसे भोग अनादि है यद्यपि प्रलयमें लिंगशरीर नहीं रहता तयापि उस्वं कारण अविवेक व कर्म आदिक पूर्वसृष्टिके लिंगशरीरजन्य रहते हैं उनके द्वारा बीज व अंकुरके सदृश भोग्य भोक्ता भाव व लिंगशरीरका अनादे होना सिद्ध होता है इस्ले लिङ्गशरीरनिमित्तक है ॥ ६९ ॥ यद्वातदातदुच्छित्तिःपुरुपाथस्तदु- च्छित्तिःपुरुपार्थः ।। ७० ॥ जिसकिसीनिमित्तसे हो उस्का नाश पुरुषार्थ है उस्का नाश पुरुपार्थ है ॥ ७० ॥ चाह कर्म निमित्तसे होचाहै यविवेक निमित्तमे चाहै जिछनिमित्तसे हो प्रकृति व पुरुपका मनादि भोग्य भोक्ता भाव जिस्का नाश करना वा दूर करना अति कठिन है उस्का नाश पुरुषार्थ है उस्का नाश पुरुषार्थ है यह निश्चय है शास्त्रके आदिमे यही प्रतिज्ञा है कि त्रिविध दुःखकी अत्य- न्त निवृत्ति अत्यन्त पुरुषार्थ है व इसीको सिद्धांत निश्चित करके शाख- की समाप्तिमें कहकर शास्त्रको समाप्त किया है उस्का नाश पुरुषार्थ है इसको दोवार की समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ ७० ॥ इतिश्रीप्यारेलालात्मजवांदामण्डलान्तर्गततेरहीतिख्यातग्रामवासि श्रीप्रभुदयालुविनिर्मिते सांख्यदर्शनदेशभापाकृतभाप्ये तंबाध्यायः पठस्समाप्तः। समाप्तश्चेदंशास्त्रमिति ॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-मुंबई.

शुद्धिपत्रम्. पृष्ठ पंक्ति. अशुद्ध मुक्तस्वभावस्य मुक्त स्वभाव पुरुषको २२ मुक्तस्य भावस्य २३ मुक्त पुरुषको ३ स्वभावके नाशवान न होनेसे (अवि- धिस्वरूप)मर्था- त् विधि रहित अप्रामाण्य ( प्रमाणरूप न होना) होगा अ. ननुष्ठान लक्षण . स्वभावके नाशवान न होनेसे अननुष्ठान लक्षण ( अविधिस्वरूप ) अर्थात् विधि रहितरूप अप्रा. माग्य ( प्रमाणरूप न होना) होगा अर्यात श्रु- तिका अननुष्ठान लक्षण अप्रामाण्य होगा. उससे अनुष्ठानके लक्षण उसके मनुष्टानके लक्षण श्रुतिका मामाग्य न होगा श्रुतिमें उपदेश रहित होने से सदा सम्बंध होने सूत्रगाने " ७ " प्रामाण्य न होगा ८ श्रुतिसे उपदेश १. रहित, होनेसे २ सदा सम्बंधसे ६ सूत्रकार ८ हानी ११ विजातीय १ सत वही असत ८ नहिं है १२, विषम ९ नहिं २ आदिकी २० (तमरूपही) तथा विजातीये १२ सन् बड़ी बसन् ११ १५ २१६ सांख्यदर्शन। लिङ्गशरीरनिमित्तक है यह सनन्दन आचार्य मानते हैं ६९ प्रकृति व पुरुपका भोग्य भोक्ताभाव लिंगशरीरनिमित्तक है यह सनन्दनाचार्य मानते हैं क्योंकि लिङ्गशरीरहीके द्वारा भोग होता है । उनके मतमेंभी लिंगशरीर अनादि है व लिंगशरीरके अनादि होनेसे भोग अनादि है यद्यपि प्रलयमें लिंगशरीर नहीं रहता तथापि उस्वं कारण अविवेक व कर्म आदिक पूर्वसृष्टिके लिंगशरीरजन्य रहते हैं उनके द्वारा वीज व अंकुरके सदृश भोग्य भोक्ता भाव व लिंगशरीरका अनादि होना सिद्ध होता है इस्से लिङ्गशरीरनिमित्तक है ॥ ६९ ।। यद्वातद्वातदुच्छित्तिःपुरुपाथस्तदु- च्छित्तिःपुरुपार्थः ।। ७० ॥ जिसकिसीनिमित्तसे हो उस्का नाश पुरुषार्थ है उस्का नाश पुरुपार्थ है।॥ ७० ॥ चाहे कर्म निमित्तसे हो चाहै अविवेक निमित्तसे चाहै जिसनिमित्तसे हो प्रकृति व पुरुपका अनादि भोग्य भोक्ता भाव जिस्का नाश करना वा दूर करना अति कठिन है उस्का नाश पुरुषार्य है उस्का नाश पुरुषार्य है यह निश्चय है शास्त्रके आदिमे यही प्रतिज्ञा है कि त्रिविध दुःखकी अत्य- न्त निवृत्ति अत्यन्त पुरुषार्थ है व इसीको सिद्धांत निश्चित करके शास्त्र- की समाप्तिमें कहकर शाखको समाप्त किया है उस्का नाश पुरुषार्य है इसको दोवार शास्त्रकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ ७० ॥ इतिश्रीप्यारेलालात्मजवांदामण्डलान्तर्गततेरहीतिख्यातग्रामवासि श्रीप्रभुदयालुविनिर्मिते सांख्यदर्शनेदेशभापाकृतभाष्ये तंत्राध्यायः षष्ठस्समाप्तः । समाप्तश्चेदशास्त्रमिति ॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-मुंबई.

शुद्धिपत्रम्. पृष्ठ. पंक्ति. अशुद्ध. ur " २२ मुक्तस्य भावस्य मुक्तस्वभावस्य २३ मुक्त पुरुषको मुक्त स्वभाव पुरुषको ३ स्वभावक नाशवान स्वभावके नाशवान न न होनेसे ( अवि- होनेसे अननुष्ठान लक्षण धिस्वरूप)अर्था- (अविधिस्वरूप ) अर्थात् त् विधि रहित विधि रहितरूप अप्रा- अमामाण्य माण्य ( प्रमाणरूप न ( प्रमाणरूप न होना) होगा अर्थात श्रु- होना) होगा अ. तिका अननुष्ठान लक्षण ननुष्ठान लक्षण अप्रामाण्य होगा. उससे अनुष्ठानके लक्षण उसके भनुष्ठानके लक्षण प्रामाण्य न होगा श्रुविका प्रामाण्य न होगा ८ श्रुतिसे उपदेश श्रुतिमें उपदेश १. रहित, होनेसे रहित होनेसे, २ सदा सम्बंधसे सदा सम्बंध होनेसे ६ सूत्रकार सूत्रकारने ८ हानी हानि ११ विजातीय विजातीये १ सत वही असत सत् वहीं असत् ८ नहिं है नहीं हैं १२. विषम विपय ९ नहिं नहीं २ आदिकी आदिके. १० (तमरूपही) तया " . १० १२ २४ १५ (तम रूपही या) शुद्धिपत्रम्. शुद्ध. 3. एक बारगी ८ . शून्य होगा " २५ पांच मात्रा पंक्ति. अशुद्ध. एकही साथ १८ वह व ५ पदार्थकी तुल्प पदार्यके तुल्य २२ शून्य है २ आदिकी आदिके ९ आकाशकी आकाशके ११ वह उपाधियोगसे उसमें उपाधि योगसे १८ अर्थ लिये अर्थ (लिये) १४ प्रत्यक्ष पदार्थ अप्रत्यक्ष पदार्थ २२ पांच मात्र उपस्थ लिंगवायोमि उपस्थ (लिंगवायोनि) २५ कील प्रवेश जिसमें कील प्रवेश ३ चण अणु ४ चुर्ण चूर्ण कारण वृत्तिकी कारण वृत्ति रहित कार्य उपलब्धि वृत्तिकी उपलब्धि २४ धर्मके धर्मक १४ तत्व है तत्व है २२ विवेक मननसे विवेक व मननसे २२ आदि हेतु तद द्वातारा आदि हेतुता तद्द्वारा ६ घणुक आदिकी द्वाराही द्यणुकही मादिकी द्वारा १६ उसके कारण उसका कारण पुरुपका २८ ३२ ३२ " . २ पुरुषको न कर्मण न कर्मणा ३९ १९ प्रमाण है तीन प्रकारका ८ नहीं है इस शब्दकी प्रमाण तीन प्रकारका नहीं है,नहीं है इस शब्दक ४२ ४६ शुद्धिपत्रम्. पंत्तिः, अशुद्ध.. शुद्ध २२ ईश्वराभाव ईश्चराभावाद १ होनेसे होने में २ होनेसे होनेके २२ घेद मानने में वेद माननेसे २१ सिदि होनेसे सिद्धि प्रमाणसे होने ३ सर्वदा संभवाद सर्वदा सर्वासंभवात् ८ नहीं अभिप्राय नहींसे अभिप्राय २१ नष्ट हुआ नाश होनेपर नष्ट हुआ वा नाश होनेपर २३ अतीत जनागत अतीत अनागतम १३ जीव मारके तुल्य बीज अकुरके तुल्य १८ सोजना है इसमें मोजना है यद्यपि यह जनयस्या दोरमा मोजनमें कि बीजसे - नना चाहिये स्तुर वा नरसे बीन हुआ है निश्चय प्राप्त नहीं और अवस्पाची माति हाव तयारि बीड ६ टुकुरका इंता प्रथम मिद्ध होनमे यह नद- स्था दर कम नहीं " दीर द ग्ब मसार नियन दरमही नियरियामदान दा पनि हुन अनद- न्यादानन्दन कायवादालत ५८ पृष्ठ. ६० ५ सोवा ७४ शुद्धिपत्रम्. पंक्ति. अशुद्ध. शुद्ध. १ नहीं है नहीं हैं १३ धर्मके समान धर्मके समान साधन नहीं है अर्थात् साधन अपेक्षि- त नहीं है ९ भोक्तासे भावसे भोक्ताकेभावसे २४ प्रकाश है प्रकाश भिन्न है सोया १४ नहीं होते चेतनही नहीं होते इससे चेतन मात्र जातिही मात्रसे एकता और व्यवस्था व व्यक्ति- से पुरुपोंमें अनेकता ३ पुरुप पुरुषों २१ एक दूसरे उष्णता एक दूसरेमें उष्णता २१ भृत्यके प्रत्येक भृत्यके समान प्रत्येक १४ इसीसे इससे २० उनके इनके ३ दिकाला वाकाशादि दिकालावाकाशादिभ्यः २० उसके धर्म कार्य उसके कार्य धर्म आदि १४ अहंकारका महंकारकी १२ अहंकारत अहंकारात् १० होनेको होनेका ६ पुरुषार्य पुरुषार्थ ६ निश्चित निश्चय १९ आर्जित भजित १५. बाहुल्यसे वाहुल्यकरके बाहुल्य करके वा वा बाहुल्यसे ७६ ८० .९२ . - ur पृष्ठ. 1 + शुद्धिपत्रम्. पंक्ति. अशुद्ध. ४ पुरुपको(अपने आत्माको पुरुष अपनेको जानता है १९ मविद्यासे नाश माना अविद्या होना माना जावे २४ होता होताहै २० परदारांनगच्छेत अर्थात्, परदारान । १७ पनोरय मनोरथ जनता है १४५ १४७ १२ सार्य साथ १५१ . " १८ व प्रत्यक्ष १२ एक दूसरे परस्पर १५२ न कार्य नियम २ मिलाते है १५३ १७व१८ होते हैं १५५ २ उसके " नहीं है १४ अयोग्य हैं १५६ १४ यही ११ नही है १८ भान नही २५ घट आदिकोंको उत्पन्न होता २३ दिवेकमे प्राप्त ५ श्रुते प्रमाण २०. अणिमादि योग अप्रत्यक्ष एक दूसरेका परस्पर न कार्य नियमः मिलातेहें होता है उनके नहीं है अयोग्य है वही नहीं है भाव नहीं घट आदिकोंकी उत्पन्न होना विवेकको प्राप्त श्रुतिप्रमाण मणिमादिके योग " . ७ फलता है

Sankhya Darshnam

Author
Krishan Das
Title
Sankhya Darshnam
File name
Sankhya Darshnam
Text
OCR done
Citation
1819
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,venkateshwar Yantralay
Language
Sanskrit
Pages
212
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311267
Barcode
99999990320171.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Calcutta.,The Asiatic Society
VMLT id
94h2jdg53fe
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