Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Anubhoot Siddhvisha Yantra Adi Chhe Kalpka Sangrah

2011/02

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स " प्रस्तावना. प्रिय विज्ञ पाठक वृन्द :-- लिखते हुये मुझे अत्यानन्द होता है की, श्री महावीर प्रथमालाके यह भक सजधनके साथ लुप्त प्राय विद्याओंका और ओषधियोंका बडीही खोजके और परिश्रमके साथ पुन प्रचार किया जा रहा है. यद्यपि इस बीसमीशदीमें अधिकाश महानुभावोंका इतना विश्वास इन विद्याओपर नहीं रहा है और वे इस विषयमें अनेक प्रकारको शकार किया करते है लेकिन इस सान्प्रतिक कालमेंभी यह विधाएँ पहिले जितनीही सिद्ध और कार्यकारिणी हो सकती है वशकि यथाविधी दृढ़ विश्वासपूर्वक इनकी साधना की जावे । क्योंकि " विश्वासों फलदायक न्यायानुसार विश्वासहीसे फलकी सिद्धि होती हैं उपेक्षा करना ठीक नहीं हो सकता । अत इस विषयमें अन जादा न लिखकर आपके समक्ष जो लिखनेका है वही लिखा जा रहा है । सिद्धपिसाकल्प:- यह काल्प वही, हे का, जो श्रीपद्मावती देवीने महामहोपा या श्रीमविजयजी गणिको स्वप्नमें बताया था देव्यापद्मावत्या स्वमकथित यंत्रस्याप्राहुवाहुबल्याद्याः मुनयों नयँकोविदाः उसीको हमने ४५० यत्र प्रति कृती ओर करीबन ३५०० लोक मूल भापातरके साथ पाठकों के सामने उपस्थित किया है उसके अदर 'अहं शब्दसे बिसा किस तरह बनता है वह बहीही सरल युक्ति योंसे समजाया गया है इस प्रथको देखकर पाठकोंकी यह शका विनष्ट होती है की बिसा यत्र नच कोठेमें भी बनता है इस प्रथमे तिखुणा चौखुणा पनाकार पचासाही प्रकार के विसा सिद्ध करके दिव्य दिया है, लौकीक कहावत है की," जिसके घर विशा । उसका क्या करेगा,जगदीशा ॥यह प्रथ बहोत उपादेय वा सपाहणीय है यह यत्र राजदरबारमें विजय दिलाता है, वसीकरणमें इसका सानि दुसरा नहीं रखता व्यापारमें लाभ दिलानेमें इसके ढगका यह एकही हे, आरोग्यादी प्राप्तिमें अपने जोडका दुसरा नहीं रम्वना बटोखानेसे छुटकारा दिलानेभे यह अद्वितीय है, ओर दुखीयोंका दुखको यह बीमा क्षणभरमें कापुर कर देता है इत्यादि- नोट-आजक दुनियामे यत्रोकी हरिफाई बहुतसी चलती हे परतु हमारे भाईयोंको उसीका कुछ भी लाभ नहीं मिल सकता है इस लिये उनसे हमारा निवेदन है की इस प्रयको सग्रह करे ताकी इस प्रथके आधारसे कोईभी यत्रकी हरिफाई करनेमें मैक पडेगा यह प्रथ पत्रोकी हरिफाईमे रामबाण है ( मेघविजयजी के हस्तलिखित प्रयोकी यादी और उनके समयका वर्णन अर्हद् गीतामथके गाहाजुअल स्तुतिः रिय श्रीपादरिहरीधरजी टीकाकार पृण्यसा वाचकने किया है दुसरी है आम्नाय बहुत सरल है ईसमें य (२) आगेकीका हेमसिीद आदि गुप्तविद्यार है जो घोडासा श्रम करनेपर सिद्ध हो सकती है स १३८० में जिनप्रभसूरिने अपने हातोसे टीका रची है और लिखी है वहमी समयपर उपाया जायगा पुस्तकों की प्रेस कॉपी तयार हो रही है पावन तोला पावरती ~यह कल्प उही महात्माका बनाया हुवा है की जिनोने सवालाख अजैनकों जैन बनाया था उही महामारा यहकल्प पाटलाके सामने रखा जाना है वही शीदादाजी जिनदत्तसूरीश्वरजा महाराज जो दुतीयामे धर्मार्थ पाम और मोक्षके आले- दरजेके डॉक्टर या वेद कहे जाते है धर्मके रिये बड़े बड़े प्रथ निर्माण करगये है उदाहरणार्थ [ उपदेशरसायन, कलिकोश, चरचरी इत्यादि ] दुनीयामें ३५ महान विमारी या { देहरोग ] ३६ मी दरिद्रावस्या और ३७ मी मौत ( कर्मरोग ] है इमायकेद्वारा ३५ महानबिमारी [ देहरोग ] और ३६ मी दरीदा- वस्था नस्ट होती है और मौत ( कमरोग) के लिये उपदेश रसायन आदि प्रथ मोजुद है. पाठकस्वय-इसकल्पको परीक्षा कारदेख सकते है उस महात्मामा निर्माण । सरत १०११ मे अजमेर में हुवा है इससे समयमा निर्णय की कल्पना हो सकती है उग्रवीर कल्प-यहएक महामाका अनुभूत किया हुवा कल्प है इसके विषयों अधिक तारीफ करना व्यर्थ होगी जमकि इसरी महत्ता इसके नामसेरी प्रपर होती है। इसकी साधनासे अनेकों प्रकारकी बाधाएँ और दरिद्रता देखतेही देखते नष्ट हो जाती है साधना बहुतही सरल है। पर प्रयोगोमे चलता है चद्रकरप-श्रीमान् जगनशेठजीवा सिद्ध किया हुवा । यह चद्रकल्प घडीही खोज और परिश्रमसे जगतशेठकी उनपुस्तकोंमे प्राप्त हुवा है जिनका कि वे हमेशा अध्ययन किया करते। इसनी दृढ विश्वासपूर्वक यथाविधी साधना करनेसे ६ महिनेमें चदका साक्षातकार होता है यह लिग्वना कोई गडतफहमी नही होगी कि जगतशेठने इसी साधनासेही अतुल यश प्राप्त किया था। हम अपने उत्तर दायित्र पूर्ण कार्यों कहातक सफर हो है इसका निर्णय विज्ञ पाटकोपर ही निर्भर है। प्रसके भूतोंकी पामे यदि कहीं शुद्धाशुद्धीका नियम भग हुवा हो तो विज्ञ उमे सुधारकर पद। यह सिद्ध विसाकप आदि ६ कप समाजमें ई रहर पैदा करही देगी पदि पाठकोने इसे अपगया तो फारसे मैं दुसरा प्रथ लेकर उपस्थित होउगा एसी आशा है। निवेदन, एम् के कोटेचा.

अर्थ:-आकाशमा चढेला मेघना गर्भ सरग्बा दाना मगरनी हिर जळनी लक्ष्मी वाला) श्रावण मास सरखा जमानणालगतना, नाश करनारा छे, तथा जे मनु वैरावणमेपलानीसग कान्तिवाला छे, ॥ श्रीरावण पार्श्वनाथस्तवम् पाठः ॥ श्रीपार्श्वः प्रकट' प्रभाकर इव प्राज्यप्रभावैभवा. तेजोनन्ततया जगत्त्रयमपिप्रोद्भासयनंजसा ।। श्रीमद्रावणनामतीर्थविपये ख्यातस्तमानाशक । स्तुत्यादर्शन निर्मलनियमयं पुष्णातु मे नित्यशः ।। अर्थ:-विशाळ प्रभावना वैभवथी अनन्त तेजवडे नणे - उद्भासन करता (प्रगट करता) अवा, तथा श्रीमद्गव विषयमा (संयधमां अथवा ते क्षेत्रथी) प्रसिद्ध थपेला, तसा मन्दि - रुपी अंधकारनो नाश करनारा अवा प्रगट सूर्यमरम्बा (अटले श्रीरावण पार्श्वनाथ), ते हमेशा मारी सम्यक्त पुष्ट करो [ वृद्धि पमाडो]||| श्रीमद्रावणमासवत् त्रिजगतीसन्तापविलिदा 'प्रोन्नीताम्बुद्गर्भ (वस्व') देहविमलज्योनिनन् । यो वै रावण मेघवंत्सितरुचिश्चिन्तामणी वामन लोकालोक नमो ददान विधिना जागर्तिमृलानियः॥२॥ पामेली निर्मल कांति वडे अर्थात् मेघ सरकीकृष्ण शनि श्रीम अथवा जे प्रभु मुख्य चिंतामणी नया टोकना आलोकनधी [ज्ञानयी'] 4 जागृत छे-अगट छे संबंध m P PRE ने मुर्तिमान .

२ ॥ श्रीरावण पार्श्वनाथस्तवम् ॥ यस्यश्रावणगोचरेपि विचरन्नामापिनिर्मापित। त्रैलोक्यागुतवैभवान्भवभृतां प्रोद्भावयेद्भावत ।। स श्रीरावणनामधेय भगवान् पार्श्व सदा सम्पदे । भूयाद्मगलमालिकाकमलिनी प्रोल्लासभानूदयः ॥ ३॥ अर्थ:-तथा जे प्रभुनु नाम पण श्रावणना विषयमा वर्ततुं निर्माण छे [ श् रहित करता रावण पार्श्वनाथ नाम थयेल छे], तथा त्रणे लोकना अद्भुत वैभवी प्राणीओने भावथी जे प्रभु ज्ञानादि बडे प्रगट करनार [अर्थात् जीवोनी ज्ञानादिलक्ष्मीनो वैभव प्रगट करनारा] छे, ते मंगलीकनी माळा [ मगळना समुह ] स्पी कमलिनीने विकश्वर [प्रगट] करवामा सूर्योदय सरग्वा श्रीरावण पार्श्वनाथ नामना प्रभु हमेशां सपदानेमाटे थाओ॥३॥ स्पष्टश्चाष्टम एव यः प्रतिहार नाम्नातिघानाहरि । पूर्वरावण एप ते चलनयो भक्ति प्रसक्तोभवत् ॥ तेन त्वत् प्रतिमासमान महिमा कैलाशशैलाशयात् । निन्येऽ रचनैः स्तनादि वचनैः स्वीयं पुर पावितुम् ॥ ४॥ अर्थ -स्पष्ट (प्रगट धयेला ) अबो जे आठमोज प्रतिवासुदेव के जे पोतान नाम यहे अने अत्यत तेज बड़े हरि-इन्द्र सरग्वोथयो ते रावण प्रति वासुदेवज प्रथम तारा ये चरण कमळनी भक्तीमा अत्यत लीन थयो, अने ते रावणेज तारी समान महिमावाळी [उत्तम महिमावाळी] प्रतिमा कैलाशपर्वतन स्थान उपरथी ( अष्टापद पर्वत उपरथी) पुजा रचया पुर्वक अने स्तुति विगेरेन वचनो सहीत (अर्थात् पुजा स्तुती करीने) पोतानु नगर पवित्र करवाने . रह गयो [अर्थात रावण पोताना नगरमां श्रीपार्थ प्रभुनी प्रतिमा लाव्यो]॥४ जानेतजनकात्मजाव्यतिकर प्रोद्यमानानया- न्मत्वा व ननुभइमेवभगवन्नेतत्स्थले तस्थिवान् ॥ भविरावणास्यनगरं तत्तेन सवासितम् । वे चेन्द्रपथ सुतेन विहित तेनेन्द्रजिच्छर्मणा ॥५॥ .

॥ श्रीरावण पार्श्वनाथस्तवम् ।। ३ नर्थ:-जाणे ते सीताना वृत्तान्तथी प्रगट थयेला अन्यायधी हे भगवन नेश्चय आ नगरनो भंगज थशे अम जाणीने तमो ते स्थळे न रह्या, तेथी तेणे वाने माटे पृथ्वीमां रावण नामर्नु नगर वसाव्यु, अने तेनी पासे इन्द्रजीत मना पुने पोताना कर्म वडे ( पोतानी इच्छा बडे) इन्द्रप्रस्थ नामनुं नगर साव्यु ॥५॥ तत्तीर्थं प्रथितं पुराणकथितं त्वत्संज्ञयैव प्रभो । लोकाभ्यर्थनयार्थसार्थयुगपद्दानेन देवार्चितम् ॥ श्रीवामेयममेयमेवभवताइद्धिर्भवेत्सेवने । यस्याश्चक्रिरमा रसेन परमा वश्याभवेदाभवम् ॥ ६॥ अर्थ:-तेथी लोकनी प्रार्थना बडे लोकना वांछितार्थना समूहने सम- काळे-शीघ्र पूर्ण करवाथी हे प्रभु ! देवोने पण पूजनीक अg ते नगर तारा नामवडेज तीर्थ रूपे प्रसिद्ध धयु, अने पुराणमां-शास्त्रमा पण तेनुं वर्णन उखायुं ओवा तीर्थमां रहेला ते श्री वामेय पार्श्व प्रभु के जे अमेय अपार महिमा पाळा छे तेमने सेववाथी बुद्धि-ज्ञान लक्ष्मी प्रगट थाय छे, तेमज जे सेवा थी चक्रवर्तिनी पण उत्कृष्ट लक्ष्मी दर्प सहित संपूर्ण भवपर्यन्त पोताने वशवर्ती थाय छे.॥६॥ वजन्मन्यमृतं जगत्समभवदुःखोपशान्तेर्जने । साकल्याणमयी तदामृतरसैः वृष्टिःसुनिमिता ॥ विस्तीर्ण जिनशाशनं तवगिरा यत्रामृतस्थापना । लोकेनामृतमस्ति तेनसुलभं देवप्रमादोदयात् ॥७॥ अर्थ:-जे वखते हे प्रभु! तमारो जन्म भयो त्यारे लोकमां दुःखनी शान्ति थवाधी आ जगत अमृत (मरणादि दुःख रहित) धयं ते वखते देवो पण कल्याणकारी ओवी ते अमृत रसनी वृष्टि करी, तेमज तारुं विस्तीर्ण अवं जिनशासन के जेमां त्हारी वाणी वडे अमृतनी स्थापना थयेली छे ( अर्थात् जिनशासनमां तारी वाणी रुपा सदा विद्यमान छे), तेथी लोकमा हे देव ! प्रमादना सुलभ नथी (कारण के सघळ श्री जीनेन्द्रनी तिो लोकमां पीजे क्या मळे. ५ ४ ॥ श्रीरावण पार्थनाथस्तवम् ॥ इन्द्रास्त्वजनने जिनेन्दुसहसा ससमीयुर्भुवि । वरस्यापि विहाय सर्वमसुरा वैरस्यमभ्येयरुः ।। इन्द्ररग्निकुमारकासुरगणै' सत्राभवत्सोहृदम् । नक्षत्रस्यततोजनेऽजनिकथा देवर्द्धिदैवाख्यया ॥८॥ अर्थ हे श्री जिन ! त्हारा जन्म चखते सर्वे इन्द्रो आ सहसा-शीघ आन्या,तेमज पोतानी धैरी देयोनी सायना पैरनो त्याग करी सर्वे असुरा-असुरेन्द्रो पण आन्या (सर अने असुरनो चैर लोक प्रसिध्ध तेथी अम कए ) तेमज [ लोक प्रसिद्ध वैरवाळा अवा ] इन्द्रोने अने आ कुमारादि असुर देवोने पॅण अंक पीजा साथे 'परस्पर मित्राई थई, तो देवाधिदेवना नामथी लोकमा नक्षत्रनी कथा प्रसिद्ध थई [ आ कथा , पहृतथी जाणवी]॥८॥ द्रागविद्रावणमेतिमोहचरट स्तेवीक्षणाचक्षणात् । नामश्रावणभावसौरयकरणं विश्वेशितस्तावकम् ।। श्रीमद्रायणपार्श्वमेघविजयाजोतिर्भवमूर्तिजा । नित्यानन्दपद ददातु विशद शैव च देव शुभम् ॥ ९॥ अर्थ:-हे प्रभु! हारी दर्शनयी 'तत्क्षण-शीध मोह 'रुपी चरंट-चोर तु विनाश पामे छे, हे विन्चना ईश दारु नाम सामळन्नु'(तारा नामनु अव ते) पण भावसुसने (मोक्षसुपने ) करनाल न्छे हे श्रीमद् रावणमा प्रभु मेघना विजयथी उत्पन्न थयेली त्हारी मूर्तिनी ज्योति [ मेघने जितना तारा शरीरनी कान्ति अथवा श्री मेघविजयजी उपाध्याय जे आ स्तोत्र फर्ता तेमनाधी स्तुति करायली तारा शरीरनी कान्ति] ते निर्मळ, उपद्रवरहित अने शुमदेवरप अव नित्यानदपद अटले मोक्षपद आपो॥९॥ -इति श्रीरावणपार्श्वनाथ स्तोत्रम् ॥

॥ श्रीअर्जुनपताका।। श्रीअर्जुनपताकारव्ये, विजयापर नामनि । स्यादर्ध ५ भू १ मितेयंत्रम्, मध्ये पंचप्रतिष्टया ॥१॥ अर्थ:-जेनुं पीजु नाम विजययन्त्र छे, ओवा अर्जुनपताका नामना यन्त्र- मां [अर्घ-५ अने भू-१, अकोनां वामतो गतिः ओ प्रमाणे] १५ प्रमाणनो अटले पंदरीयो यन्त्र मध्यखानामा ५ नो अंक स्थापवाथी थाय के ॥१॥ एवं यत्र विभागाति - र्यन्त्राणि पूर्वसूरिभिः । सर्वाणि तानि फलदा-न्युक्तानि नव वेश्मसु ॥२॥ अर्थ:- प्रमाणे ज्यां पूर्वाचार्यो) ब्रीजा भागनी प्राप्तिवाळां यन्त्रो दर्शाव्या छे, ते सर्वे यंत्रो नव गृहमां-वानामां स्थपाय छे, अने ते सर्वे फळदाता कया छे॥२॥ पूर्वनैऋतिकोदीची - वायु मध्याऽग्निदक्षिणः ! ऐशानी पश्चिमा तासु, क्रमादकनिवेशनम् ॥ ३॥ अर्थ-प्रथम पूर्वदिशामां, त्यारयाद नैनात्यकोणमां उत्तरदिशामां वाय- व्यकोणमा मध्यमां अग्निकोणमां दक्षिणदिशामां ईशानकोणमा अने पश्चिमदिशामा अप्रमाणे क्रमपूर्वक कहेली दिशाओमां अनुक्रमे अंक- स्थापन करवू॥३॥ आ ९ खानावाला कोठामां पंदरीयो यन्त्र करवानो छे, तेथी उपर कहा प्रमाणे पंदरनो बीजो भाग ५, तेने प्रथम मध्य सानामा स्थापवो. त्यारवाद ५ जता बधेला दशमांथी ओक अंक न्यून करीने त्यारयाद ओकेक न्यून न्यून अक वीजा श्लोकमां कहेला अनुक्रम प्रमाणे स्थापता पूर्वग्वानामा ९, नैऋत्य खानामां ८, उत्तर १दो अडेहिं न दीजइ दीजई छक्केण वह चउकोण । सत्चमितइएवचा नव पंचरणआगमण।। -५ जे मध्यमा स्थापेल छ तेनी साये २-८ स्थापता ६-४ स्थापता ७-३ स्थापना, अने ९-१ स्थापता पंदनाय छे. उपरनो पंदरीयो यत्र से प्रमाणेज' बन्यो छे ते अनुक्रमे इशान नैमात्य अमि ६-४, उत्तर दक्षिण ७-३t पश्चिम ९-१ औ क्रमथी मध्यगत ६ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ হাল छामि वं १ २ उ मध्य५ ३ ३ द बु वृ शु दे रा ६ ६ १ घायु परिम १५ यात्रमिदम् देय मध्यमगति विरपर पानामा ७, वायव्य सानामा ६ मध्य सानामा ८ (नो अक तो प्रथमधी स्थापेलोज छे), अग्नि पानामा ४, दक्षिणग्वानामा ३, इशान खानामा २, अने पश्चिम ग्वानामा १, पुनः दिशिना फेरद्वारथी [जे खानामा जे अक आ यत्रमा आवेल छे ते प्रमाणे नहिं आवता बीजी पीजी रीते] पण पदरीया यत्र अनेक बने छे जेम के-उपरना यन्त्रमा पूर्वदिशिने उर्ध्व स्थापी छे, तेने पदले जमणी पाजूमा स्थापीओ तो धीजी रीते पण पदरीयो यन्त्र थाय ते आप्रमाणे- वा उ इ ६ २ प . ५ पू ओ रीते दिशिस्थापनना फेरफारथी जेम आ यीजो पदरीयो यत्र यने तेवी रीते मध्यसानु वर्जीने शेप ८ ग्वानामा९ना अपने फेवता आठ प्रका- रना पदरीया यत्र यनी शके छे, परन्तु मध्य- पानामां नयनो अक रापीने पदरीयो यन्त्र बनी शके नहिं न द अ । कमाइकोल्लघनेऽपाच्या - मेकेऽधिके धृते भवेत् । रस ६ भू१ यत्रनिष्पत्ति , एवमेकोनविंशतिः॥४॥ अर्थ:-पदरीयामा जे अनुममे अंक स्थाप्या के तेनु उल्लघन [ ते कामनु उल्लघन ] करीने जो दक्षिपादिशाथी प्रारभीने तेज झमयी अफेक अक 4. स्थापता जई तो (रस = ६५ = १) रस अटले * १६ ना ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ ७ . यवनी उत्पत्ति धाय छ, अने अज प्रमाणे १९ नो यत्र पण घने छे ॥४॥ वायावेकेधिकेतद्वत्, मुनिभू १७ यंत्र निर्मितिः । एवद्वयधिके विश ·- त्यादि यत्रं प्रसाध्यते ॥५॥ अर्थः तेनी पेठे [१६ ना यत्रनी पेठे] वायुकोणमां [ वायु-मध्य- अग्निमां] १ अधिक कर्याथी [ मुनि ७ भू १ अटले ] १७ ना अकनो यंत्र थाय छे, अने से प्रमाणे ये अधिक [तथा अक ] कर्याथी २० विगरेनो यत्रो बने छे॥५॥ दश१० घार ट८ चतुष्ट सप्त७ - नवर पड्वेद पव ५ शिवा:११ । त्रयचेत्यंक राजीस्यात् , साकस्मादिशयंत्रके ॥ ६ ॥ अर्थ:-१०-२-८-४-७-९-६-५-११ अंकश्रेणि जे २०' मा यत्रमा आवे छे ते शा माटे -इति प्रश्न:- ॥६॥ तत्रोचरं नवस्थान्यां, शकुनाथग्रहस्थितौ । भानुर्दशशतार्चिप्मान् , आदावुचोदिगं १० शत ॥ ७ ॥ ओ प्रमाणे दक्षिण पश्चिम इशानमा अफेक अंक अधिक करवाथी १६ ३ नो यंत्र थयो आमा वायुथी आने कोणनी श्रेणिमा १६ थता नधी, तेमजनो अफये वार आव्यो तेनो विरोध विचारवो नहिं. पुनः अज१६ ना यंत्रमा वायुकोणथी वायु-मध्य १७ यन्त्रम् अग्नि से व्रणस्थाने ओकेक अवधा- रता १७ नो यन ओ प्रमाणे थयो, १९-२० नो यन आगळ कहवाशे, *३ नो अक पण आवे छे. २० नो यंत्र- अहिं यंत्रमा ५-६ अक छे S आगळ कहेवाशे, १ Ca ५ ६ ७ १६ यत्रम् म १ २० हा ११ 7 ॥ थीअर्जुनपताका ॥ ८ - अर्थ:-उत्तर- मननो उत्तर आ प्रमाणे छे फे-ग्रस्थानोमा रहेला अर्थात् नव स्थानोमा रहेला नव ग्रहो उपरथी शकुन (शुभाशुभफळ) देग्यवाने अर्थ-जाणयाने अर्थे नव स्थानोमा नव अफ स्थपाप थे त्या प्रथम १० नो अफ स्थापयानु कारणो-सूर्यग्रह हजार किरणवाटो छ, पहेली राशिमा [मेप राशिमा ] दिग-१० अश जेटरो होय त्यासुधी अति उघ गणाय छे, माटे ९ पानाचाळा यत्रमा प्रथम १० नो अक स्थपाय छे ॥७॥ उत्तरायणत पूर्गों- सरयोरतरेस्थितः । श्रेष्टोदिगर्क योगोस्मात् , एकोने नवमोपिच ॥ ८॥ अर्थ:-पळी ते सूर्य उत्तरायणधी (उत्तरायणमा वर्ततो होय त्यारे) पूर्व अने उत्तर दिशाना आतरामां (इशानकोणमा) रहेलो [उगतो] होप के तेथी (दिगु-१० अर्क-सूर्य अटले) सूर्यनो १० अशयालो योग श्रेष्ठ फयो छे, अने तेथी १० नो अंक ईशान कोणमा स्थपाय छे अने तेमाथी १ न्यून करता नवमो सूर्ययोग पण श्रेष्ठ गण्यो ॥८॥ चद्र प्राच्या वृपेप्युच्चो, द्विकेवारो द्वितीयेकः । अशेऽत्युचः कृष्णपक्ष - हान्या चेकोन भावतः ॥९॥ अर्थ-चद्र पूर्व दिशामा उदय पामे छे, अने पीजी घृपभराशिमा ते अति उच्च गणाप छे, ते प्रण अश सुधी अति उघ गणाय छे, जेधी ये अशमा चर्ततो पण उच गणाय, तेमज चद्रनो वार (सोमवार) पण सूर्यवारथी [ रवीवारथी ] पीजो छे, पुनः प्रण अशनी उपतामाथी अहिं ये अशनी उचतागणी ते कृष्णपक्षमा हानि पामयाधी अहिं अशमा पण ओकनी न्यूनता गणीने ये अशनो उच्च गण्यो, जेधी दशना अक पछी पीजो २ नो अक स्थापयो ।॥९॥ अगारकस्तथाग्नेय्या, नवार्चिष्मान् स चक्ररुक् । तदेकोनेस्थितोऽष्टाके, दशातोऽस्याष्टवार्पिका ॥१०॥ ग्रह अग्निकोणमा रहे छे, अने नव अवि ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ जीव्हा ] वाळो तथा मुग्वरोग वाळो गणाय छे, अथवा वक्री होय त्यारे रोग, फळने आपनारो , ते नवमांधी ओक न्यून करता ८ अकमां रहेलो -गणाय, अने ते कारणथी से मंगळनी दशा पण ८ वर्पनी छे. ॥१०॥ पतिरप्टमराशेच, सिद्धैकोनांक ९ पाद्वान् । आगामिराशिफेलदो, भवेदष्ट दिनांतरे ॥ ११ ॥ अर्थः-चळी जे मंगळ ग्रह आठमी राशिनो (वृश्चिक राशिनो) पति छ, तेथी (क न्यून अंक अटले) ८ पादवाळो सिधिने अर्थे , तेमज ८ दिवसने आतरे (८-दिवस. याद) आगामी राशि वृश्चिक राशि पली आवती धनराशिनुं) फळ आपवा वाळो छे [माटे वीसना यन्त्रमा ये पछी-८ नोअंक स्थपाय छे.॥११॥ पंचार्चिष्मान् बुधोवक्र - भावादेकोनतः कृते । दशासप्तदशाद्वास्याऽ - भागे शेषमाशुगाः ॥ १२ ॥ अर्थ:-पाच अर्चिवाळो [ पांच जीभवाळो छे, अने ते वक्रभाव वाळो [वक्री] होवाथी ४ माप्त धया वळी अनी १७ वर्पनी दशा छे, तेने [अर्क- घडे= चार बडे भागतां शेप [आशुग-याण अटले ] पांच रया ॥१२॥ तत्राप्येकोनतायां स्यात् ; द्विगुणश्चन्द्रतो बुधः। अष्टस्थानाक्षरास्याद्वीः - पतिस्तस्या वृहस्पतिः ॥ १३ ॥ अर्थ:-ते पाचमांधी पण ओक न्यून करतां४ रद्या, जेथी चंद्रीं घुध द्विगुण धयो. [ कारणके पूर्व चंद्रमाटे २ नो अंक छे अने अहिं बुध माटे ४ नो अक थयो तेथी द्विगुणथयो], माटे विशतियत्रमा नो अंक । स्थपाय थे तथा गी वाणी-सरस्वती आठ स्थानना अक्षरवाळी (कंव्य- म्यानादि आठ स्थानी अक्षरोचार गण्या छे माटे आठ स्थान वाळी) कही , अने ते गी [-वाणी पति गिप्पतिवृहस्पति छे ] ॥ १३ ॥ अष्टवुद्धगुणस्तद्वान्, वकलादेकहीनने, सि सप्तपात्॥१४॥ . गुरुः।

॥ श्रीअर्जुनपवाफा ।।
अर्थ:-शुद्धिना ८ गुण वाळो गुरु डे, परतु चक्रपणाधी [गुरुयमी गाधी]
ओक न्यून करता ७ रया, ते माथ अंशमा वर्ततो गुर मध्यम गणाय
छे, [अर्थात् गुरु कर्कराशिनो ५ अश सुधी वर्ततो होय त्यारे अनि
उच्च गणाय हे, अने ते उपरान्त छ सात आदि अशमा वर्ततो मध्यम
गणाय 2], तेमज सिद्ध छापावटे प्राप्त थपेला ७ ना अकथी गुरुस्वामी
विशतिपत्रमा फयो छे ।। १४ ॥
.
.
दशास्यैकोनविंशाद्वाऽ - १२ भागेशेपसप्तकात् ।
वागिन्द्रियसप्तमत-स्वामी सप्ताकमान् गुरुः ॥ १५ ।।
अर्थ:-वळी ओ गुरुनी दशा १९ वर्पनी छे, तेने अर्क-सूर्य अटले पार
वडे भागता शेप ७ रहेवाधी, तेमज वचनेन्द्रिय [१० फर्मेन्द्रिय ज्ञाने-
न्द्रियमा] पचनेन्द्रिय सातमो छ, तेनो स्वामी गुरु थे, माटे गुरु विश-
सियत्रमा ७ना अकराळो छ ॥१५॥
अश्विन्यादशमपैत्र, तजातत्वात्कवेर्दश ।
नववकैकहीनने, ननाह पश्चिमास्तत ॥ १६ ॥
अर्थ:-अश्विनी नक्षत्रथी दशमु पैन [ मघा नक्षत्र छे, ते दशमा पैत्र
नक्षत्रमा जन्म थयाथी अने चाहोवाधी ओक अंक न्यून करता गुमानो
विंशतियंत्रमा ९ नो अफ छे तेमज पश्चिम दिशामा नय दिवस वर्ततो
होवाधी नव अफ शुक्रना स्थापना करेला छे ॥ १६ ॥
दशेकविंशत्यब्दा- स्यादोंने नवशेषत ।
सिद्धसार्धाष्टपादेषु, राशिमध्यफलासमू ॥ १७ ॥
अर्थ तथा शुफानी दशा अकवीस वर्पनी छे, तेने सूर्यना धार अंकवडे
याद करता (अथवा मागता)९ शेष रहेवाथी, तथा पोतानी राशिमा
पादोमा वर्ततो शुफ मध्यफळपाटो होवाथी (माढा आठ ते नवमानो
अक छे माटे) शुमानो ९ नो अक विशतियत्रमा स्थपाय छे ॥१७॥

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ कविसार्धाष्टमासान्प्राग , प्रतीच्यां नवमासभुक् । सप्तार्चिष्मान्शनिर्वक्र - भावात्पट्चैकहानितः ॥ १८॥ अर्थः-शुक्र पूर्व दिशामा सादा आठ मास अने पश्चिम दिशामां ९ मात भुक्त होय छे, (भोगी होय छे), ते कारणधी शुक्रनो ९ नो अक विंश- तियंत्रमा होय छे तथा शनि सात अर्चि [७ जिव्हा] वाळो छे, अने ते वक्री रोवाथी अक बाद करतां ६ ना अकवाळो गणाय छे ।। १८ ॥ पन्मासानतिचरेत, फलदद्यात्ताथग्रिम । वक्रत्वेपचमास्यस्य, युगाग्निभूदिनो१३४क्तितः॥ १९ ॥ अर्थ '-तथा शनि ६ मास अतिचार गतिवाळो छ, तथा ६ मासे अग्रिम [ पछीनी राशिनुं] फळ आपनारो होय छे, अने चक्र होवाथी ते पन्ने छमांधी १-१ याद करतां पांचनो अक आवे छे, तेमज वक्री- पणाना १३४ दिवस कहेला होवाथी चार मास उपरान्त पाचमो मास पण १४ दिवस सुधी धफ्री छे ते कारणथी शनिनो ५ नो अंक विंशति- यंत्रमा स्थपाय छे॥१९॥ राहुकेतुर्वक्रगती, त्रिभीरुदे११स्तयोर्गतिः। स्थानद्वये वेपरीत्यात् , प्रतिष्टाऽत्र द्वयोरिह ॥२०॥ अर्थ:-तथा राहुनी अने केतुनी गति अनुक्रमे ३ मास तथा ११ मासनी ऐ माटे विंशतियंत्रमा स्थानमा विपरीतपणे ते बने अंकनी स्थापना करची, अर्थात् प्रथम केतु सर्वांधि ११ नो अंक स्थापीने त्यारयाद राहु संबधि नो अब स्थापयो ।। २० ॥ एवं शकुनखेटानां, स्थानाद्विशतियत्रकम् । निश्चित मेघविजय-श्रिया विभववृद्धिदम् ॥ २१ ॥ अर्थ-अ प्रमाणे शकुन निमित्तवाळा अरोना स्थानोथी [ नय स्थानांधी-]-. श्री मेघविजयजी उपाध्याय वैभवनी वृद्धि-जापनारो- २० ना अंकनो यत्र[पि। 'ने निश्चय कयो ।। २१ ।। %3D श्रीअर्जुनपवारा॥ , दशावतारादाशाह, चन्द्रार्को दृशि जन्मना । अष्टमीदोश्चतुपच, नगभृत्वच नद९ ॥ २२ ॥ अर्थ-दाशाहना-कृष्णना १०.अवतार घया, चद्र अने सूर्य थे छे [अथवा जम्बूद्वीपमा २ सूर्य २ चंद्र छे ], तेनो ,जन्म-उदया८ दिशिमा-यापा [आठे विशिमा भिन्न भिन्न क्षेत्रनी अपेक्षा, उदय प्रकाश करनाराहो याथी ८ दिशिमा उदय गणाय,], अथग दिशाओ.८ होवाथी केवळ दिशाओ तथा अष्टमी तिधि, तथा [ दोधतुफ ] चार भुजाओ कृष्ण- नी छे ते, तथा नगभृत्पणु अटले [कृष्णे पर्वतने धारण कयों छे माटे कृष्णनु गिरिधर पणु, अने नद नव थपा माटे नंदपणु ॥२२॥ विदुपटू पचहृषी - केशव च त्रिविक्रमे । एकादशीवतेप्टल, ध्येयं-विंशतियत्रत. ॥ २३ ॥ अर्थ-चिंदु छ छे, तेथी पिंदु पणु, तया इन्द्रियो पाच छे, तेथी इन्द्रिय पण, [ अथवा कृष्ण हपीक-पाच इन्द्रियोनो इश-पति शेगाधी कृष्ण पोतेज हृषीकेश कडेवाय छे माटे हपीकेशपण अटले पाच इन्द्रियोनु स्वामीपणु ], अने त्रिविक्रम । ३ पराक्रमाळा ] पण कृष्णनूज नाम के, तेथी त्रिविक्रमपणु, अने अकादशी व्रतनु ईष्टपणु से सर्व विंशतियत्री ध्येय-भावना योग्य छे ॥ २३ ॥ पाश्वेशभवाअष्ट - गणागणभृतस्तथा । युग्मजयस्यविजय - स्तुर्यांवोधेटनगा७फल. ॥ २४ ॥ विशति यनमा कृष्णनी भावना आ प्रमाणे- १० ना अक्थी दश अवतार ९ना अकयी नवनंदपणं २ ना अस्थी चद्र सूर्य ६ ना अकथी हिंदुपणु ८ ना अस्थी आठ दिशि ५ना अकयी पाच इन्द्रिय अथवा अष्टमी तिथि. स्वामीपणुं ४ ना अक्थी चार भुजा ३ ना अस्थी निविक्रमपणु ७ ना अमी गिरिधारणवा ११ ना अस्थी कादशी प्रतेष्टपणु १ - वे चार गनि-रीतिवडे २० नो यंग पने छे, तेनी बना हवाद ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ अर्थ:-(हवे श्री पार्श्वनाथ प्रभुनी भावना विगति यंत्रधी थाय छे ने आ माणे-) श्री पार्श्वनाथना दशभव थया छे माटे १० नो अंक भाषचो. अर्थात विशतियंत्रमा स्थापेला १० मा अंकी श्रीपार्श्वमभुना १८ विचारवा ८ मा अकथी श्रीपार्श्वनाथना आठ गणअने आज घया छे ते विचारवा, जय अने विजय कोपर जय विजय थी २ नो अंक विचारवो ४ ना अंकथी चार प्रकारना महल उपदेश विचारचो, ७ ना अंकथी सात फणा विचारची ॥ २१ नवहस्ततनूरत्न - त्रयमेकादशीवते। शतानिपंच५सांगादनि, वैक्रियर्धिभृतः प्रभोः । अर्धः-९ ना अथी नव हाथर्नु शरीर, ३ ना अंकी - [दर्शन जान चारित्र], ११ ना अंकधी अकादशी बताई ग अकधी पाच भूत अने ते सहित ओक शरीर मळीने * रखो मे प्रमाणे वैक्रियऋद्धि वाळा प्रभुना ९ प्रकारना का रना अंक विंशतियंत्रथी विचारया ॥ २५ ॥ आयुविशाब्धयः पूर्व, भांव्यन्ते भव्यजन्तुभिः । देधारिविजयात् सर्व-सिध्यै विशति यंत्र अर्थ:-विंशति यत्रमा-यंत्रधी भव्य जियो श्रीपाद पूर्व भवन २० सागरोपमनु आयुष्य विचार, तथा पर [राग द्वेष रूप शत्रुना] विजयथी मिद्धि पण विंशनिय विकास ॥ इति श्रीविजययंत्र प्रभातः॥ ते आ प्रमाणे- १४ ।। भीअर्जुनपताका ॥ सिद्ध वुधा यत्रमाहु ॥१॥ ४ २ उ २० ४ मध्य२ ६ ३ वायु पश्चिम आयालिंगा पक्षे २ हया ७ व्धयो ४ का । द्वितीयपतो रस ६ दृक् २ समुद्रा॥ अधोग ६ रामा ३ वसव ८ प्रसिद्ध । विंशति अर्थ:-विंशति यत्रमा पहेली पक्तिने विपे पक्ष-२ इय-७ अने अधि-४ ईचान अमि [-अकगति प्रतिलोम होवाधी अनुलोम-ग्रामश स्थापता ४-७-२] त्रण अफ छ, त्यारषाद । धीजी पंक्तिमा रस ६ एक-२ अने समुद्र-१, जेथी फ्रमशःस्थापता ४-२-६त्रण अकरे, तथा श्रीजी पक्तिमा अग-राम =३ अने वमु-८प्रसिद्ध छे, जेथी क्रमश स्थापता ८-३-६ मे व्रण अक छे जे प्रमाणे बुध- पडित जनोओ सिध्ध धयेलो आ २० नो यन्त्र कह्यो छे ॥१॥ निधानमानैरिहशिष्टकोप्टै। स्वेष्टमये यत्र सुसूत्रणेयं ॥ मध्यस्थिताकैः ७६ ३-४ द्विगुणे १४-१२ ६-८ स्वपाधों- भयाक ४ २-२-६-६८८४ युक्तंर्गतय चतस्रः ॥२॥ सानद १४ तत्र ४-२ मेलने २० इत्येकागति. ६ छदू १२ तत्र २-६- मेलने २० द्वितीया सीन दू ६ तत्र ६-८ मेलने २० तृतीया चार दू८ तत्र ४८ मेलने २० चतुर्थी अर्थ -अमां निधान-नव संरयावाला करेला उत्तम कोठाओ-याना पड़े पोनानी ईटा-ईच्छाप्रमाणे आ यननी उत्तम सूत्रणा-गुधणी-रचना कहेली-करेली छे ते आ प्रमाणे-मध्यवती अकोने ७-६-३-४ ने द्विगुण करता १४ १२ ६-८ थाय, ते दरेकने पोतानी पड रहेला ये ये अकोनी माधे [५-२॥ २-६-16-८।८-४ नी माथे ] युक्त करता चार गतिये (चारे रीतिये). नो अक आवे छे ॥२॥ ते आ प्रमाणे-सात इ.१४, ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ + मां ४-२ मेळचत्तां २० थया । इत्येका गतिः ॥ छ दू १२ मा २-६ मेळ- बता २० थया ॥ इति द्वितीया गतिः॥त्रण दू ६ मा ६-८ मेळवता २० थया ॥ इति तृतीया गतिः॥ चार दू आठमा ४-८ मेळयता २० धया ॥ इति चतुर्थी गतिः प्रमाणे चार रीते २० नो अंक प्राप्त थाय छे हये ७ गुणे ३ चद्विगुणे १४-६ पिविशा । कृते ४ रसे ६ पि द्विगुण ८ १२ तथा सा २० ।। कोणेप्यथांगे ६ जलधौ ४ द्विनिने १२-८ । गजे ८ भुजे २ चद्विगुणे १६ ४ तथान्या ॥३॥ अर्थ:-हय-७ ने गुण-३ ओ घेने द्विगुण करतां १४-६ थाय ते घेने मेळ- चता पण २० थाय छे, ॥ इति पंचमी गतिः॥ पुनः कृत-४ तथा रस-६ ने द्विगुण करतां ८-१२ थाय, ते येने मेळवतां २० थाय ॥इति षष्ठीगति ( ये गति मध्योपंक्ति तथा मध्यतिर्यकपक्तिनी अटले दिशिअंकनी थई, जे प्रमाणे विदिशिपक्तिनी पण ये गति आ प्रमाणे-] विदिशिमां पण अग-६ तथा जलधि-४ मे येने द्विगुण करता १२-८ थाय, ते येने मेळवता २० थाय ॥ इति सप्तमि गतिः ॥ पुनः गज-८ तथा भुज-२ ने द्विगण करतां १६-४ थाय, ते वेने मेळवतां वीजा २० थाय, ॥ अष्टमी गति ॥३॥ १ उपर स्थापेला यत्रमा मध्यवर्ती अटले पूर्व दिशानो ७ नो अक छे तेने नमणा कर- वाथी १४ थया तेमा पडखे रहेला चे अक अटले ईशाननो ४ अने अग्मिनो २ मेळ- वता २० थया. अ अक रीति थई. पुनः दक्षिणनो ६ अक मध्यवर्ती छे, तेने द्विगुण करवायी १२ थया वेमा अज छनी बे पडखना ये अक अटले अग्मिनो २ अने नै मृत्यनो ६ ओपे अक मेळवता २० थया-अरिजी रीति, पुन: पश्चिमनो ३ अक मध्यवर्ती छे तेने द्विगुण करता ६ थया, तेमा से रणनी पडखेना ८ तथा ६ ने मेळवता २० थया- त्रीजी रीति पुनः उत्तरनो अंक ४ मध्यवर्ती छे, तेने द्विगुण करवा ८ थया, सैमा अ चारनी पडसेना ये अक ८-४ मेळवता २० थया-- चोयी रीति. २ ४-२-३ अत्रण अक्साळी मध्योध्यपंक्ति अटले पूर्व पश्चिम पंक्ति जने ४६ ओरण अकवाळीन । उत्तरदाक्षिण पक्ति. ५ ur ॥ श्रीअर्जुनपताका || . दिगक ७६.३ ४ योगे ननमीगति स्या द्विदिग्गताके ४ २-६-८ दशमी स्फुटेव ॥ आद्यालिकोप्टद्वितये १७ पिचाये। युक्तेतृतीयालिमकोप्टयुग्मे ३६ ॥ ४ ॥ अप-तथा यत्रमा दिशिने विपे स्थापला ७-६-३-४ अकोने मेळयना पण २० बाय ते नवमी गति-रीति छे ॥ इति नवमी गति ॥ तेमज विदिशिमा रहेला अको ४-२-६-८ ने मेळवता पण २० थाय, दशमी गति तो स्पष्टज ॥ इति दशमी गति ॥ तेमज पोली पंक्तिना परेला ये कोठामा-मानामा रहेला ४-७ मे ये अकमा श्रीजी पक्तिना छेटेला ये कोठामा रहेला ३-६ मे ये अफ मेळवीओ तो पण २० थाय ॥ इति एकादशी गति ॥४॥ एकादशीय गतिरित्थमुक्ता। तथाद्य पक्तावचले ७ भुजे २ च । युक्त तृतीयालिमुसाष्ट ८ रामे ३। स्याद्वादशीयगतिरकै १२ तुल्या ॥५॥ अर्गले प्रमाणे ओ आरमी गति कही, तथा पहेली पक्तिमा छेच्छा ने अफ अचर - तथा भुज-२ छे, ते ने श्रीजी पक्तिना पडेला अष्ट- अने राम=३ ये अकमा युक्त फरीपे तो ते २० ना अगनी [अर्क तुल्य सर्थ जेटली ओटले ] बारमी गति थई इति द्वादशी गतिः ॥५॥ द्विकेन २ तकण ६ कृतेन ४ सिध्या ८। प्रयोदशी साग ६ रसै ६ समुद्रः ४ ॥ प्रमाण ४ युक्तेश्च चतुर्दशीसा। जानाति विशतिसरययैव ॥६॥ -तथा हि+-२ तर्फ-६ हत-४ सिद्वि-८ जे [अर्थात् अग्नि दक्षिणना २मा उतर चायन्यना ४-८ ] मेळवता जे २० थाय ते तेरमी गति ।

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ १७ गति जाणवी ॥ इति त्रयोदशी गतिः ॥ तथा अग६ रस-६ समुद्र-४ अने प्रमाण-४ [अर्थात् दक्षिण नैसत्यना ६-६ मा उत्तर ईशानना ४-४] मेळवतां पण २० धाय ते विंशति सस्या संबंधि ज चौदमी गति थई इति चतुर्दशी गति ॥६॥ अधःस्थिताप्ट ८ द्विगुणस्त मध्य- स्थितद्वयेनेत्यपि पोडशामी । मुख्येश्चतुर्भिः सहिताहिविश- संख्याततः पंचदशीयमत्र ॥७॥ अर्थ:-पुनः यंत्रमा नीचे रहेला ८ ने द्विगुण करी १६ धाय तेमां मध्य कोठामा रहेला २ ने पण द्विगुण करतां थयेला मुख्य अंक ४ ने मेळवीओ तो ओ रीते पण [८x२-१६ २४२-४ १६+४=२०] वसिनो अंक प्राप्त थाय, तेथी विंशतियत्रमा ओ पदरमी गति थई ।इति पचमदशागतिः॥७॥ कोणस्थषड्मध्यगतद्वयेन, द्विघ्नाततोद्वादशतेऽष्टयुक्ता । स्यात्पोडशीयंगणनातथैव, साविंशते स्तोरणसज्ञयह ॥८॥ अर्थः-तथा खूणामा रहेला ६ ने मध्यमा रहेला २ वडे द्विगुण करीओ, तो १२ थाय, तेमा म्वृणामा रहेला ८ ने युक्त करी तो २० थाय, ओ - सोलमी गणत्री (गति) छे, ओ प्रमाणे करेली वीसनी गणत्री ते आ - यत्रमा तोरण गति नामनी छे ॥ इति पोडशी तोरणगतिः ॥ ८॥ सिध्या ८ऽथमध्याऽब्धि ४ भुजां २ ग ६ भाजा त्पष्टि १२ प्रमाण गणानापताका ॥ धृति १८ प्रमाष्ट ८ त्रि ३ भुजा २ चलां ७ कै। पिपीलिका शकुगति प्रवृत्त्या ॥ ९॥ अर्थ:-सिध्धि-८ तथा म ध-४ भुजा- २ अंग-६ (८-४-२-६) वढे मत्तर प्रमा भेदले सत्तरमी) । ३ ..

१८ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ - . २. थाय छे, ते सत्तरमी पताकागति जाणवी ॥ इति सप्तदशी पंताका गति ॥ तथा अष्ट-८ त्रि-३ भुजा-२ अने अचल [ पर्वत (८-३-२-७) अफवडे शकुगतिनी प्रवृत्ति गणत्रीधी २० ना पिपीलिका गति जाणवी अ धृतिप्रमा -कृति-१८ प्रमाणनी अटले १८ मी गति के ॥ इति अष्टादशी पिपीलिका शकुगतिः॥९॥ मध्यस्थ पड् ६ द्वि १२ कृत ४ सागरां ४ के। एकोनविश प्रमितापि सख्या- द्विप्ने १४ नगा ७ के पिचकोणपड् ६ भिः । युक्तेच सा विशतिरेवगण्या ॥ १० ॥ अर्थ. तथा मध्यवर्ती ६ ने द्वि-गुण करता १२ थया तेमा कृत-४ सागर =४ मेळयता [ ६४२-१२+४+४= ] २० थाय छे ओ ओगणीसमी प्रमा णवाली सख्यागति (अटले ओगनीसमी गति थई)॥इति एकोनविंशी गति ॥ तथा नग-७ ना अफमा पण तेवी रीते अटले द्विगुण करीने तेमा विदिशिमा रहेलो ६ नो अक मेळवता (७४२-१४+६= )२० धाय जे वीसवी गति गणची ॥१०॥ अस्मिन् दशत्रिशदथाभ्रवेदा ४०। पचाशता ५० पष्टिरपिप्रवोध्या॥ सप्त ७ त्रि ३ योगेंग ६ चतुफ ४ सगे- ऽष्ट ८ वि २ प्रयोगे प्रकटादशापि ॥११॥ अर्थ: बळी विंशतियनमा दश-१० त्रिसम्३० अभवेद [ अभ्र- वेद-४] ४०,तेमज . अने ६० नी अकगणत्री पण थाय छे अम- जाणवु ते आ प्रमाणे- -मात अने वणना योगे १०, अग-६अने ४ ना १ जहिं ८-४-२-६ अ अक वायव्य-उत्तर-मध्य-अने दक्षिण स्थानीय होवाथी ओ रीते पताका आकार थयो अने शकुगतिनो अ आकार ययो. इत्यादि रीते वीस गति- ओमा बम आकार दीवारों , -- !"

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ योगे पण १०, तेनज आठ अने येना योगे पण प्रकट रीते १० धाय छे [ ओ प्रमाणे +3=१०, ६+४=१०, ८+२=१० मे प्रण रीते १० थाय छे ॥११॥ तथान्धयः ४ सप्रगुणा २८ द्वयाढ्या २। त्रिश ३० तथाऽष्टौ त्रिगुण २४ स पद्का ६ ॥ ३० चतुर्गुणा अष्ट ३२ मुखेऽब्धयो ४ द्विः ८। खवार्द्धि संख्यति ४० बुधै विवोध्या ॥ १२ ॥ अर्थ:-तथा अब्धि-४ ने ७ गुणा करता २८ थाय तेमा २ उमेरता ३० थाय छे तथा आठने व्रण गुणाकरी छ उमेरतां पण ३० थाय छे प्रमाणे बेरीते (४-७-२८+२=३० 1 ८४३-२४+६-३०) श्रीसनी अफ प्राप्त थाय छे तथा आठने चार गुणाकरी प्रथमना [इशान गत ] चार ने द्विगुण मध्यगत चे वडे तेमां उमेरतां [प-०, चार्थि४-3] ४० नो अक [ ८x४-३२, ४४२-८ ३२+८-४०] प्राप्त थाय छे, ओ प्रमाणे बुध्धि- मानोओ जाणवू ।। १२॥ चतुर्गुणा अष्ट ३२ चतुर्गुणत्वे । कृते ४ कृते १६ मध्यगतद्वि २ योगे ॥ पंचाशदेव फलितास्तिपष्टिः। पड्वर्ग ३६ मध्ये त्रिगुणाष्ट २४ युक्ते ॥१३॥ अर्थ:-आठने चार गुणाकरी तेमां चाग्ने चारगुणाकरी मेळवी तेमां मध्यगत धेने मेळवतां ५० जवाब (८-४-२ व्रण अंकथी)माप्त थयो तथा से प्रमाणे पहेला [ दक्षिणगत ] छनो नीचेना छ साथै वर्ग-गुणा- फार करी तेमा त्रण अने आठनो गुणाकार उमेरवो अथी ६० नो जवाब (६-६-३-८ जे चार अंकी) प्राप्त थाय छे (६x४-३२, ४४४-१६ ३२+१३+२-५० तथा ६४६-३४८-२४ ३६१२४-६०)॥१३ २० ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ कोणस्थपण्णां ६ त्रिगुणेतरस्थाद्वयेनयुक्विंशतिकाप्युपेति ।। कोणद्वयेसप्तगुणेचमध्य । पट्सगतो सा नविपक्षणीया ॥ १४ ॥ अर्थ:-पूणामा रहेला छ ने व्रण गुणा फरी मध्यगत थे ने उमेरता [६-२ ना अकथीज ६४३-१८+२% ]२० पण पाय छे तथा गुणामां रहेला ये बडे सातने गुणता चौद थाय तेमां मध्यगत ६ [ दक्षिणना ६] उमेरता पण २० थाय परन्तु ये गतिनी अहिं विवक्षा करी नथी।१४॥ प्राच्यामुरेन्द्र सहसोमराजो-पाच्यायमस्तीवरुवातिचारुः ।। पाशीप्रतीच्यासहशेषनागो। ब्रह्मान्वित श्रीदइहास्त्युदीच्याम् ॥१५॥ अर्थ:-पूर्व दिशामा सुरेन्द्र सोमराज [ मोम लोकपाल ] सहित जाणवो दक्षिण दिशिमा कान्तिपडे अति मनोहर यम लोकपाल छ, पश्चिम दिशामा शेषनाग सहित वम्ण नामनो लोकपाल देव छे, अने उत्तर दिशामा ब्रह्मा सहित कुवेर नामे लोकपाल छे ।। १५॥ श्रीयत्रमेतद्विहरजिनाना । नानाधियास्तापरित परीतम् ॥ सर्वार्थसिध्यादिगुणे प्रतीत । चितामणीव त्रिदशाग्रणीनाम् ॥१६॥ अर्थ -चीस विहरमान जिननो आ विंगतियत्र नाम चटे तथा बुध्धिवडे सर्वत्र व्याप्त छे सर्व अर्थनी सिध्धि आदि गुणोरटे प्रसिह, अने देवता ईन्द्रोने पण चिंतामणि रत्न सरपो छे ॥१६॥ ॥ इति विशति यत्राम्नाय.॥

॥ श्रीअर्जुनपताका ।। २१ w H e X१. THI 1. १३ १८ न २ ८ ३ ७ ३ ८ ५ ४ ब ८ २ २ १. २ ५ . १८ १८ २ ८ ८ ४ ६ ४ ७ ५ ११ ६ १. ३ २१

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॥ श्रीअर्जुनपताका २३ पक्षाहिरसिधु ४ नग ७ वाणगुणतुश्चंद्र १ । नागै ८ क्रमांक धरणे विजयार्जुनस्य ॥ अस्यांगतो क्रमिक पंचक लघनेन । पस्थापने भवति विंशति यंत्र मंत्र ॥ १ ॥ अर्थः-पक्ष-२, अहि-१, सिधु-४, नग-७, बाण-५, गण-२, ऋतु-६, चंद्र-१ [परन्तु अहिं विंदु सरित १०], नाग ८ ओ (२-१-४-७-५-३- ६-१०-८) अकोने अनुक्रम प्रमाणे स्थापता [अटले २-३-४-५-६-७ ८-९-१० ने अनुक्रमे त्रीजा श्लोकमां दर्शाच्या प्रमाणे स्थापतां] अर्जुननो' विजय यंत्र नामनो यने छ। वाळ ओ विशति यत्रनी गतिमा (अक- स्थापन पद्धतिमा)५ नो अंक उलंघीने ६ थी स्थापन करता अहिं विंशतियत्र बने छे[जेयी १० ने स्थाने ११ नो अंक प्राप्त पाय ठे] ॥१॥ तत्रैक कोण गणने खल्ल विशति स्यात् । सैकाथ तत्रतु पडक पदेपि पंच ॥ भाव्याततो भवति कोपिन दोपलेशः। क्लेशोन्यथा न किलयत्र गते निवेशः ॥ २॥ अर्थ:-त्या विंशति विजय यन्त्रमा [ दिशिश्रेणि तो वास वीसनी थाय छे, परन्तु ] विदिशिश्रेणि गणता ओक विदिशिश्रेणिमा निश्चय २० गणाय छ, परन्तु पिजी पिदिशिशेणि गणतां २१ थाय छे, माटे ते अक श्रेणिमा ते कोठाने विपे[६ ना कोठामां] ६ ना अंकने स्थाने ५ नो अंक पण स्थापवो; अने ते रीते ते पिजी विदिशिणि विचारवी, गणवी, तेथी कोई लेशमात्र पण दोप नथी, अने जो तेमन गणीये तो (६ स्थाने ५ न गणीये तो )केशरूप गणाय, तेमज यंत्र गतिनो [यंत्रनी रीतिनो] निवेश पण थाय नहिं (यत्र रचना पण सम्यक् गणाय नहिं) ॥२॥ . ५ ना अक्नु उल्लप करीने (पांचने बदले) ६ नो अंक स्थापता अन्ते ११ नो अक आवे छे, यी यत्रमा स्थपाता अक अनुक्रमे २-३-४- (५)६-७-८-९- १०-११ अ प्रमाणे पू०-३०-उ० वा०-म० अ०-३०-३०-प० दिशामा स्थपाय छे.

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ स्याद्भावनातिशयतः शकुनेऽशुभेपि । सम्यक् फलं तदितर त्तुशुभे विहगे ॥ स्वप्नेप्युपश्रुतिपु धर्म निघौ तथात्र । मपि चित्य फलदा किलभाव नैव ॥३॥ अर्थ:-भावनाना अतिशयथी अशुभ शकुनमा पण सम्यक् शुभ फलनी प्राशि धाय छे, अने शुभ [विहगमा %D] शकुनमा अशुभ फलनी प्राप्ति धाय , ओ प्रमाणे स्वममा उपश्रुतिओमा अने धर्मविधिओमा पण जेम शुभाशुभ फळनी प्राप्ति भावना विशेपथी छे, तेवी रीते अहिं मत्रमा (पत्रमा) पण निश्चय भावनाज अचिंत्य फल आपनारी छे. ॥३॥ ते तेवसा यवन शिति यत्र मध्ये- ऽकांक १२ द्वयस्यश्वत पड़ गणने कलाके १६ ।। प्राज्ञेःफलाय कथिता हदि भावनेर । नेवान्यथी भवति विंशति यन्त्रसिद्धि ॥४॥ अर्थ ते फारणीज यचनना विशति यंत्रमा अर्क-१२ ना अंकमा २नी गणत्री अने फला-१६ ना अंकमा ६ नी गणत्री थाय छे बुद्धिमानो हृदयनी भावनाज फळ आपनारी की छे, नहितर विंशति यत्रनी सिद्धी पती नधी ॥४॥ [यवननो विंशनियंत्र आगळ दर्शावशे ] तम्राय केपा चिदभिनिवेश मेशः कृमपाता लोपे पुनस्तत्कार्य नधार्य प्रसक्ता दर्शन लोपः तस्मिन् जाते यदि तेन कार्यस्या त्त िफानि सतीत्यादी यकार• स्यात् धातोरकार लोपेपि तत्कार्य प्रसगात् मृतो ज्जीयन प्रायत्यादशुद्धमिद यन लापस्य ध्वस रूपस्य नित्यत्वात् नचभावनैव सवत्र फलदा 'गुडोय' मिति मुग्ध भावनया खाधमानेन पिपेन मरणात् अशुद्धे नाणकादौ शुद्ध धिया गृधमाणेपि न तत्फल तस्मानकोंक' कार्यद्वये गम्य इति अनोच्यते नायमेकान्त कान्तः अचकथ रियादी लताकारस्य पृष्पभाव प्रयोजकत्वात् अकविद्यायामपि वलय चिंदोरनकत्येपि अक संनिधानेकत्वाच नचेदकगणना नपात ।। श्रीअर्जुनपवाका॥ वदशमांकः कतमः अकं शहन नव संख्यानात् अतण्व अंक संकलने विदुः प्रसक्तोपि तल्लघने सकलना अंक गणने एकः दश इत्यादौ तद पेक्षा च प्यते अंकप्रधान ज्योतिशास्नेपि उभयीगतिः उदया पेक्षया तिधिलोपेपि प्राच्यतिथी घटिकापेक्षया तिथिच्छेदादि दोष प्रयोजकत्वात् अतण्य प्रत्यय लोपे प्रत्यय लक्षणं न याति १ स्थानिवदादेशोऽनलविधा विति परिभापाद्वयं युक्तं अलकारगास्नेपि एकस्मात् शहात् यथायोगं नानार्थलाभः यथा अनुदराकन्या अलोमाएडका इत्यादी विशिष्टार्थे शक्तश्च वैद्याअपिलंघनस्यायोग लघु भोजने तदेव व्यवहरति उत्सर्गोप वादयोरेकार्थविपयात् नचैवं पडंकस्थाने पंचकभावेनेइति प्रसंगःसाव- र्णस्य नियोजकत्वात् तथाहि प्रथमेकद्विकयो सावर्ण्य संख्यादिरा धात् द्विकस्यसख्यादित्वं लहसंविदुचियइति सिद्धान्तात् तत्रापि एफस्य चरक्त रूपत्वाभिमायात् आद्यद्वितीययोरघोपत्वमपि एच मेव नवक- दशकयोः सावण्यं सख्यांत साधादेव विषम समभावेपि एकद्विकयोः संवघः यथा पूर्व दिन तदनुगारात्रिरित्यनयोः संवधः अतएव द्वाभ्यां केवलाणुभ्यां द्वेणुक न तथा तार्किक मते अणुक तम्य पडणूमानातू यद्यपि सिद्धांतमध्ये त्रिभिरणकैरल्यणुक तथापिनदिकत्रिकयोः सार्धका नर्द्धक विरोधात् यद्यपि एकोऽनर्धकोऽणुम्तथापि न त्रिकेण सावर्ण्यभार द्विकेनव्यवधानात् एकस्मिन्ननर्धकत्वेपि अव्यवधानात्सावर्ण्य एफरि वस्त सदपिनसत् द्वयोभावेतु आस्तिक्यं संयोगादेव सिद्धेः संयोगादिद्वयं । ततव सम्यग्ज्ञान क्रियाभ्यामोक्षः इतिसूत्रं शाद्विक मते सर्वादिपाठोप एकद्वि गहयोन त्रिशब्दस्य अतण्व एक समुखोद्विका शाब्दिका अपि प्रथमा द्वितीयपो' सावर्ण्य माहु' मुने रित्यादी पष्ठी पंचम्योश्च एकत्व रूपस्य एकस्य वाचकत्व एकफेयथा द्विकेपि तथा द्विरूप एकार्थ वाचकत्वं म पुनः त्रिके बहुत्वस्य नित्वसंरया पर्यवसानात् । वंत्रिक चतुष्फयोरपि सावयं स्थान विशेपेऽभिधानात् यद्यपि कचित् द्विमार्गादौ द्विकाभिधान मपि तथापि तियचउकचचर चउम्मुहे त्यादि सूत्रेत्रिक चतुप्कयोः सब- सारचर्य न दिकस्य शब्दशास्त्रेपि त्रिचतुरोरेव सूत्रणात् ज्योतिर्मतेपि चता भद्रा कृष्णपक्षेतृतीमाया पर्यवसन्ना वेदेष्वपि नित्वं चतुष्टमपि त्रयीवनीनांगगुणेन विस्तरं वपु त्रित्वं चतुष्टमपि गस्त्रियः इतित्रिपुरास्तये पः 'चउण्डं वेयाण सारण, -- ने २६ ॥ श्रीअर्जुनपताका || प्रसिद्ध 'त्रियों धर्मकामाचतुवर्गः समीक्षक: इति फोपरचनात् एव पचा पडकयो सायर्यमुदाहरणीय रसाना फचित् पंचत्वे लयण रमस्यभेद विरक्षया पोढा भणनात् एवमिंद्रियाणा तद्विपपाणाच पचापोढाइति उभयीसरया पंचोद्रियाणि विविधालय, इति पहिंद्रियाणि पड्विपया, इति केशमा ततण्य हिंदुफमते पचका यवन मन पडका उभयोस्तुल्याकृतिः या. पचम पष्टेके इत्यपि सप्ताष्टकयो. सावपर्ये सत्त- पयाइ अणुगच्छद तथा सत्तहभवजहणाड तथा सत्तपढवीओ पण्णत्ता- ओशापि अपढवीओ इत्यादि सूत्राणि गमकानि ज्योतिर्मनेऽष्टमी भद्रा कृष्णपक्षे सप्तम्यां तथा अतिवका नगा ७ प्टमे ८॥ नवरुदशकयो मावण्ये 'नवमे दशमे भाना जायते सरलागतिः, ॥ण्य पचक पढकयो। सावपर्यंमस्तु परमुमयार्थत्य कथमितियेत् एकोपिलकार. अनिलहतिवायु नामिमाजरीत्या उचार्यते अनलइति अग्निनाग्नि प्रयत्नातरेण यथवा य- फार' योगी योग. इत्यादी स्पष्टोचारणेन नियोगी नियम इत्यादी अस्पष्ट तया ध्येय. ण्य चकारेपि मतव्य सतोप्पकारः प्रक्रियानियोगा द्विवृत्त. प्रतिज्ञापते उचारणार्थोपि प्रत्याहारार्ध सानुनाशिकश्च ततोशाद्विभक्ति परिणामवत् अकस्यापि गणना नियोगात् सैक निरेकत्ये यथाई परिणाम- कार्यः धारादिवत् यथाना नियक्षातः कारकाणि तयात्रापि पडके पचक विषक्षा कार्या स्वरसज्ञाप्पनुस्वारे सिद्धात कौमुदीमता व्धजनत्व हैममते कस्यादे व्यजना श्रयात् यथाहि 'भुरणानि निवधियात् । त्रीणि सश चतुर्दश।। चतन कीर्तयेद्वाष्टौ । दशयाककुभः कचित् ॥ १॥ तथा चतुरा समवावुधीम् इति सरास्त्रयः ३ पच ५ सप्त ७ चतुर्दश १४ नय ९ फाचित ण्य यथा समचारया सर्व पटितममता मार्गनिमी तथाचापि मैक निरेक करणात् मारपर्येन सर्वत्र निर्वाह. यधारा छदाशाले लघुरपि पादाते गुगर्भायनीय अहदिगणे सयोग परत्वेन गुरुरपि लघुर्भाय नोऽनिष्टार्थी शास्त्रमवृत्तिरिति न्यायात् तथात्रापि अकाना तत्तत्सवर्ण पावनयैव निर्वृहप्प सतो गति चिंतनीया इतिन्यायात् नयभावना नकार्य सिद्धि रित्येकात 'पानीय मध्यमृत मित्यन्युचित्यमान फिनामनो विपविकार मपाकरोति, इति प्राचीन रचनात् विपादनात् विपादना शुद्धना णकादौ तुमोदन दोपसहकारि ल्यान्त मायनामात्रत तत्तत्काय फिंच यत्राणा रिन्यनेन मनोष्टस्य यथाकमलाकृति विशतियत्रे चतरनोगत- .

॥ श्रीअर्जुनपताका ।। २७ यस्त्रिस्थामिका दिग् १ विदिग् २ परिधसव्य तदितर ४ गतया श्चतुस्थाने काद्वादशकयंत्रे काचिद्दति स्त्रिभिहै। काचिद्वाभ्या मेवगृहाभ्या मित्यादि विस्तरो गंगाप्रवाह ग्रंथाद्वेद्यः एव दा समानानामिय दशांकानामपि सावण्यं ज्ञेयं तत एव चूडामाणि शास्त्रे अक्षरेपु अंन्यासः लिपिभेदे जक रेच वर्णभावणात् वक्त तरक्त यत्राणां गत वैचिव मेवमत्त्वा सतोष्टव्य ने शास्त्र विरोध योवैर्भाव्यं अनन्यगतिकत्वात् ।। इति नवग्रह यंत्र विशतेवर्तमाना- ऽभयद जयद सेवा सक्तदेवानुषतम् ॥ विजयविधिनिधानं तर्जनं दुर्जनानाम् । भवतु विभवहेतुः केतु रेवार्जुनस्य ॥१॥ प्राचीनानूचाने-स्त्रिभागदाना दिहेक शेपेपि॥ कृत ४ गुण ३ यंत्र रचितं । ख वाणह यंत्रं द्वयेशेपे ॥२॥ तन्मार्गानुगतधियो-पाध्यायपदस्थ मेघविजयेन ॥ विहरज्जिनयंत्रमिह । स्फुटीकृत विजयकरं ॥३॥ अर्थ-अहिं [५ नो लोप करी ६ स्थापवामां] केदलाफनो अवो आग्रहप कलेश छे के अनुक्रमे प्राप्त थयेला अंकनो लोप कर्याधी पुनः कार्यसद्धि धाय ओम न जाणवू, केमके-प्रसत्तादर्शनं लोपः प्राप्त थयेलानु अदर्शन-अदृश्यपणु ते लोप, अने ते लोप थये छते पण जो ते लोप थपेला बडे अर्थ थतु होय [ ओटले लोप थयेलो अक्षर पण जो पोतानु कार्य करी शकतो होय ] तो कानि सन्ति इत्यादि वाक्योमा * य * सन्ति मा अस् धातु छे परन्तु अस् धातुने जन्ति प्रत्यय लागता असना अकार नो लोप पवाथी कानि सन्ति वास्य थयु, जो असना अनो लोप न थाव तो कानि अमन्ति से येनी साधे यात, अने सधि यती वसते नि मा रहेला इकारनो अग्रे आवेला नकार थी ) यकार थात, जेथी समासान्त अवु वाक्य यात. परन्। अन्ना अनो लोप थवाथी इनो निहि, इति तात्पर्य:- - न २८ ।। श्रीअर्जुनपताका॥ कारथयो जोईये, कारणके घातुना [ अस् धातुना ] अकारनो लोप थवा छता पण तेना कार्यनो प्रसंग प्राप्त धवाथी, माटे मरण पामेलाने पुनः जीवतो करया सरनो [५ नो लोप कर्या छता पण पुनः५नी गणत्री करवायी] आ विंशति यत्र अशुद्ध गणाय, कारणके विनष्ट स्वरूप वाळो लोप नित्यभाषी छे, (जेथी कदाचित् दृश्य याय अने कदाचित् दृश्य न थाय अवो नथी, मादे लोप कृत ५ नो अंक कोई वग्वत गणत्रीमा लेवो ने कोई वसत गणत्रीमा न लेयो ओम न थाय, जो ५ नो लोप कर्यो छे तो ते लोप नित्यभावी होवाथी कदी पण गणवीमा लई शकाय नर्हि ) बळी कहो छो के भावनाज मर्वत्र फळ आपनारी छे, तेम पण नथी कारणके आ गोळ छे अची मुग्ध मायनाधी गवातु विप मरण माटेज थाय छे, तथा सोटा नाणाने (वोटा पियाने ) सरानी बुद्धि से ग्रहण करता पण तेनु कई फळ धतु नथी, माटे अक अक ये कार्यमा (गणत्रीमा अने अगणत्रीमा अम ये रोते) उपयोगी थई शके नहिं [ अधया लोपमा अने अलोपमा ओ बनेमा उपयोगी५ नो अक थाय नहिं] ॥ इति प्रश्नः।। अर्थः-हवे अहिं अनो उत्तर दर्शायाय छे के- पात अकान्त इष्ट नथी, (अर्थात् लुप्त अक्षर कई पण कार्य न ज करे अम अकान्त नधी), कारणके-कान्न अचाथत् इत्यादि पदोमा लुप्त अकार पण वृद्धिना अभावमा प्रयोजनवाळो थयो छे तेमज अकविद्यामा [ अकगणितमा ] पण केवळ विदुने अकरहितपणु छे [अर्थात् पिंदुने अकमां गण्यो नथी] तो पण अकनी पासे रहेल होय त्यारे अंक तरीकेज गणाय छे, अने जो तेम न होय तो अकनी गणत्री९ सुधीज थाय, परतु १० मो अंक क्याथी प्राप्त थाय? कारण अफ ओ शब्द वडे नवनीज सरया गणाय छे ते कारणीज अक सफलनामा विन्दु प्राप्त होचा छता पण ते विन्दुनु उल्लघन करीनेज अफ सकलना थाय छे, अने तेधीज अकगणत्रीनो क्रम (० वी नहिं पण)१ यी प्रारभीने १० इत्यादि सुधी गणाय छे, अने अज अपेक्षा अहिं (लुप्त थयेला ५ मा अकमा) पण जाणवी अर्थ तथा अकगणितनी मुरयतायाळा ज्योतिषशास्त्रमा पण उभयगति कोई वपते उपयोग अने अनुपयोग ] पावेला छे ते आ उदयनी अपेक्षा तिथिनो लोप थवा छता पण ते लुप्त तिथि }} श्रीअर्जुनपत्ताका। २९ पूर्व तिथिमां घटिकाओनी (घडीओनी) अपेक्षाय तिथिच्छेदादि दोपना प्रयोजनवाळी छे [अर्थात् क्षय तिथि जे तिथिमा आची छे ते तिथिमा पण क्षयतिथिनो दोप उपजावनारी छे, अने तेथी यात्रादिने अगे ते उदयतिथि पण क्षयतिधि तरीके मानीने ते ते कार्य थतु नथी ] ते कारणधीज प्रत्ययनो लोप थवा छतां पण प्रत्यय लक्षण सर्वथा जतु नयी तेथी अकस्थानमाज बदा देशोऽनलविधौ प्रमाणे के परिभापा युक्त जे. तथा अलकारशास्त्रमा पण अकज शब्दयीज अनेक प्रकारना अर्थनो लाभ कह्यो , जेमके अनुदरा कन्या [ कन्या उदर रहित छे], अलोमा एडका ( घेटां लोम रहित ), इत्यादि वचनोमां विशिष्ट अर्थवाळी शक्ति होवाथी ते वचनो नो जूदो जूदो अर्थ थाय छे तथा वैदकशास्त्रीओ पण लंघन प्रसगे लघु भोजनमा (अल्प अने हलका आहारमा) लंघन शन्दनोज व्यवहार करे , कारणके उत्सर्ग अने अपवाद से पन्ने अकज प्रयोजनवाळा छे. अने अ प्रमाणे होवाथी ६ मा अंकस्थानमा ५ नो अंक स्थापयो ते अतिप्रसंग दोपवाळो नथी, कारण सदृशपर्णानो नियोगक-प्रयोजक होवाधी. ते आ प्रमाणे:-प्रथम एक अने ये संख्यानु मरखाणुं छे, ते सदृश पणं संख्याना आदिपणाथी जाणQ [त्या १ नो अक तो संख्यानी आदि सूप स्पष्ट छेज, अने] २ नो अंक संख्यानी आदिसूप केवी रीते पन्या उदरवाळी स्पर देखावा छना पण "उदर रहित" वचन केहवाय छे ते विशिष्ट शक्तिधालु उदर अटले गर्भधारण शक्तिवाल उदर नथी विशिष्ट शक्तिरूप अर्थथीज. २ घटा सर्वे वाळ युक्त । लोम युक्त होवा छता विशिष्ट लोम अटले वस्त्र बनवा योग्य उनवाना वाटना अमावे घेटा लोम रहित केहवाय छे, रीते से ये वाक्योना दरकेना चे घे अर्थ थया. ३ जे साध्यसिध्धिने अर्थे उत्सर्ग छे, वेम अपवाद पण तेज साध्यासिध्धिने अर्थे होय छे, अने जो तेम न होय तो तेत्रो अपवाद वास्तविक रीवे अपवाद न गणाय. ६ नो अक कार्यसाधक वनो) छे, तेम ५ नो अंक कार्य साधक होवाथी ६ सश गण्या छे. १ ३० ।। श्रीगर्नुनपवारा॥ १ . छे' ते दर्शायाय ठे-लहुमग्पिनं दुचिय [ अर्थात् २ ज लघुसंरपात छे], प्रमाण सिद्धान्तमा कालु छे. अमा पण अफ [१नी संग्या] तो वस्तुसूप पणाना आभिप्रायधी संग्या रुप रे, अनेमा तो आपरेल अने आ पीजु रीते पहेला धीज पणानी गणनीयी धोपपर्नु [ संख्या स्पष्ट बोलचा पणु ] पण छे आ माटे सएन पणु छे से प्रमाण नय अने दशमा पण सस्यातपणाना साधर्माधी सरामापणु , [ अर्थात् ९ जेम सत्यात कवाय छे, तेम १० पण मरयातज छे माटे सरमा के बड़ी विषम सम भावमा पण १ ने अने २ ने समय छे, जेम प्रथम दिवस अने त्यारनाद (पीजी) रानी, से प्रमाणे से येनो (१-२ नो अधया परेला श्रीजानो) सबध (विषमभार सपध), अने अधीज केवळ थे परमाणुनो स्कय ते द्वयणुक, घळी ओ रीते ताकि मतमां अणु [अफ भावी अणु ] मान्यो नधी, कारण के तेना मत [ अफ अणु पण छ अणुना मानवाठो होवाधी घळी जो के सिद्धान्तोमा प्रणे अणु पडे ध्यणुक कपो छे, तोपण द्विक निकमा साधेक अनकनों (यणुकादि म्कयो अर्ध युक्त होयाथी सार्धक अने केवळ अणु यी प्रदेश ते निर्विमान्य होवाधी अनर्धक ओ रीते भाज्याभाज्यो) पिराध नही गणी गणीनेज को छे पळी जोके अक अने अन| निर्विभाज्य ] रोय तेज अणु कारे वाय, तो पण ते त्रिकनी सांधे मदृशता चालो नथी, फारणके द्विकना व्यवधानथालो आंतरायालो छे अने अगमा अनर्धकता या एता पण अव्यवधान होवाथी सदृश पणु छे के घंस्तु सत् छे तोपण असत सरखी छे, परन्तु ये वस्तुना सहारे आस्तिस्य-सत् पणु सार्थक छे कारण मयोगादेन सिद्धि [संपोगंधीज सिद्धि ] कही छे, अने संयोग ये वस्तुना सदभावेज होय छे अने ते कारणधीज सम्यग्ज्ञान फियाभ्यां मोक्ष सम्परज्ञान अने मियों में धीज मोक्ष कंधो छ | अबु बचन छ वळी शब्दिकमतमा [ वैयाकरणमा ] पण सर्वादि पाठ पण ओक द्वि शब्द ने विपे छे, परतु त्रण शब्दने नथी, अने अधीज अफ सन्मुग्व द्विक [१ नी तुल्य ३] कवाय छै वेळी शाब्दिको (चैयारणीओ) प्रथमा हुने द्वितीया विभक्ति मे येने' पण सदृशं कहे छे, मुनें इत्यादि फलानि [ प्रथमा | फलं ले फलानि, द्वितीया, बहुवचने करिण ॥ श्रीअर्जुनपत्ताका ।। , शब्दोमा छही अने पांचमी विभक्तिनुं ओक स्वरूप छे माटे जे पन्ने विभरिओ पण कन्ध वाचक छे, [अर्थात् ये विभक्तिओ ओक स्वरूप- पाळी होवाथी अक छे ], ओ प्रमाणे अम्मा जेम अंक पणानो व्यपदेश छे, तेम द्विकमां-थे मां पण द्विये रूप अक पणानो व्यपदेश छ (अर्थात् द्विक कहेयाथी अंक जोड समजाय छे), परन्तु तेवी रीते त्रिकमां (त्रणने योगमा) तेवो ओकपणानो उपपदेश नथी कारणके यहुपणाने घणनी संख्या छे, अने ते यहुपणु पर्यवसानवाल [अन्तै रतु चा पालातुं होवार्थी पर्यन्तस्थानीय ] छे, बळी प्रमाणे (जम अक बेने महशता छ तेम) व्रण अने चारने पण सहशाता छे अने ते सहशता स्थान विशेषमां कहेली छे नगर विगेरेमां मार्गने अंगे सिद्धान्तोमा करेली छे], जो के कोई स्थाने नगरमा वे मार्गादिक होय छे, अने तेथी द्विमार्गादिकनों पाठ कहेवो जोईये छतां पण तियचउपचचरचउम्मुह इत्यादि सूत्रपाठमांत्रिक अने चतुष्टमुंज'सत्चारी पणुं देखाय छे, परन्तु घेतुं सहचारपिणं देग्वातं नथी शब्दशास्त्रमा पण त्रिचतुरोः ओज सूत्र कहेलं होपाथी, मज ज्योतिप शास्त्रमा पण चतुर्थनी [चोथ तिथियो] भद्री कृष्णपक्षनी श्रीजमा अन्त पामती कही छे, वेदोमा पण त्रणपणु तथा चारपणु (सहचारी) कडुं छे, त्यां 'बयीय नतिांग गुणेन विस्तर इति श्रीरः, चउण्डवेयाणं सारग-इतिसूत्र तथा वर्णोमां पण प्रणपणु १ विमस्ति विगरेमा त्रण वस्तु माटे बहु वचनना प्रत्ययो लागे छे. २ वर्ण मार्ग ते निक, चार मार्गवाठे स्थान चतुष्क, चत्वर आगणु विगेरे अने चतुर्मुस पण चार मार्गनुं स्थान विशेष छे. ३ अगना गुणवडे पामेला गुणविस्तारने जाणे निरुपतानेज पामी होय अची, अर्थात् गुणवण छे सत्वगुण-रजोगुण-तमोगुण, जेथी भारीर पण अरणे गुणने पामेलु अबी कोई सी अंग में वाक्य समवे छे. अथवा चाल विपयन अनुसारे " वेदत्रयीने पामेली शरीरवाळी अर्थ पण समवे. ४ चार वेदोनो स्मारक सभारीने रक्षण करनार. ५ अमावचम्म जैन सिध्धान्तोमा दिन आने ३२ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ अने चारपण सहचारी छ, निब्रामवर्णस्त्रयः-इति त्रिपुरास्तवमा (त्रिपुरा देवीना स्तोत्रमा) कापुं छे अने चार वर्ण [क्षत्रियादि] तो प्रसिद्ध छे तथा [ पुस्पार्धमा पण व्रण तथा चारनु सहचारीपण छ तेमा] धर्म अर्ध काम त्रिवर्ग रूप त्रण पुस्पार्थ, अने मोक्षसहित चार पुरुषार्थ इति कोश बचनात् ओ प्रमाणे ५ तथा ६ ना अकनु कपणुं पण द्रष्टान्त सहित जाणयु ते आ प्रमाणे-कईकस्थाने रस पाच कहेवाय छे, तेमा लयणरस भेदनी विवक्षाये छ रस पण करेला छे, ओ प्रमाणे इन्द्रियो पाच छे, पण ते साये तेना विपयोनो १ भेद गणता छ इन्द्रियो पण गणाय छ, जे प्रमाणे घे सख्या छ फा छ के-पचेन्द्रियाणि विविध बल [पाच इन्द्रियो अने मन वचन काय बल ओत्रण थल], पडिन्द्रियाणि पड्विपया-[छ इन्द्रियो ते छ प्रकारना विषय, अर्थात् पाच इन्द्रिय अने छटो विषय ', इति केशव. अने से कारणधीज हिन्दुमतमा [हिन्दी लिपीमा ] पाचना अकनी अने छ ना जकनी यनेनी आकृति लगभा अक सरखी छे वळी पका पचम पप्टेंके [-पाचमा अने छा अकमा वा आकृति छे ] अम का पण छे माटे ५ अने ६ घे अकने सहशपण छे- इति तात्पर्यः] ये ७ अने ८ ओघे अफनु अपत्य-सादृश्य दर्शावाय छे-सत्त पयाइ अणुगच्छई तथा सत्तह भवग्गहोइ तथा सत्तपुढवाओ पत्नात्ताओ १ ने पारमा विविध यलच अटलो पाउ गाथाना सवध मानी क्यो छे, जेथी अहिं अप्रण चलनी गणनी फरवी नहीं. २ हिंदी लीपिमा ६ छगडानी आकृति ६ अवी छे, अने यवनलीपिमा ५ अथवा ६ अबी छे ३ [ गुस्तता होय ते वसते शिष्य ] ७-८ पगला गुरुनी पाछळ जाय ४ (पचेन्द्रिय सज्ञि विडंच वथा सज्ञि मनुष्य वारवार पोताना भवमा उत्पन्न थाय तो उथी ) साव अथवा आठ भव सुधी उत्पन थाय, त्यारवाद अवश्य अन्य भवमाज त्पन थाय. विगेरे सात पृथ्वीओ (अनुक्रमे नीचे नीचे ) कहेली छे.

॥ श्रीअर्जुनपताका ।। ३ अने कोईस्थाने अट्ट पुढवीओ इत्यादि गमक सूत्रो [ सूत्रना आलापक] कपा छे तथा ज्योतिपमते अष्टमीनी भद्रा कृष्णपक्षनी सप्तमीमां अन्त पामे तथा अतिवत्रा नगाष्टमे मे प्रमाणे ७-८ अंकन अकत्व छ, अम जाणवू हये ९ तथा १० अंकनुं अकत्व दर्शाचाय छे ते आ प्रमाणे-नवमे दशमे भानी, जायते सरला गतिः [सूर्य नवमे अने दशमे (लग्न- कुंडलीमा) रोय तो तेनी (जन्मेला मनुष्यनी) सरलगति थाय छे ]. प्रश्न:-प्रमाणे ५ अने ६ ना अंकनी सहशता अंकनी सदृशता भले होय, परन्तु उमयार्थ पण [५ मां पांचनो अने छनो अर्थ तथा ६ मां पांचनो अने छनो अर्थ ओम बन्ने अर्थ ] केची रीते होय? उत्तर-जो तमो अम पूछना हो के उभयार्थ केवी रीते रोय? तो दर्शावाय छे के ओक लकार पण जेम "अनिल" शब्दमां वायना नामथी सहज रीते उच्चराय छे तेम तेज ओक लकार "अनल" शब्दमा अग्निना नामथी अन्य प्रयत्न बडे पण उच्चाराय छे. अथवा योगी योद इत्यादि शन्दोमा जेम स्पष्ट उच्चार वडे य कार उच्चराय छे तेम नियोगी नियम इत्यादि शब्दोमा अस्पष्टपणे उच्चाराय छे अम जाणवू, तथा मे प्रमाणे व कारणां पण जाणवु तथा सवृत्त अयो पण अंकार प्रक्रिया- नियोगधी [प्रक्रिया वशधी] विवृत गणाय छे, अने प्रत्याहारने अर्थे उच्चारण अर्थवाळो होगा छनां पण सानुनासिक गणाय छ, तेथी अर्थना वशधी विभक्ति परिणामनी पेठे अंकनी पण गणत्री नियोगथी [अर्थ- घराधी ] अपत्य वाळी अथवा ओकत्व रहित (-ये अंकनी सहशता अथवा ! असहाता) विचारवी, जेम वार आदिकनी पेठे अथवा कारको [छ कारक ] जेम विवक्षाधी [ सहश असदृश अर्थ दर्शवनारा] होय १ प्रत्याहारमा प्रहण करवा अक्षेराना वाचक होवा ता पण २ महशतरूपवागी होवा छत्ता पण तेज पहली विमक्ति अने पीजी विभक्ति ना अर्थमा अथवा पंचमी तथा पष्टीना पण अधमा जूदी दो जणाय छे. ३ अहि विष मक्षणा दि चाय न करता वैरुप्यनी अवर्मावनाथी तो, कार याय वेज बो ३४ ॥ श्रीअर्जुनपताका छे, तेम अहिं पण ६ ना अंकमा ५ नी विवक्षा करवी बळी अनुस्वारमा सिद्धान्तकौमुदिये स्वरसजा मानी छे, अने हेमव्याकरणना मते आदि व्यंजनना अत्रययी व्यंजनपणु मानेल छे जेमके- भुवणानि निबध्नीयात् , त्रीणि सप्त चतुर्दश । चतस्त्र कीर्तयेद्वाष्टो, दशवा ककुभः क्वचित् ॥१॥ अर्थ:-मुवनो कोई स्थाने प्रण (व्रण भुवन) फया छे, कोई स्थाने मात भुवन कह्या छे अने कोई स्थाने (कोई शास्त्रमा ) चौद भुवन पण कया छ तेमज दिशाओना संबंधसा पण कोई ग्रंथमां चार, दिशाओ गणी छे, कोई ग्रंथमा ६ दिद्याओ गणी छे, अने कोई प्रथमां दशदिशाओ पण गणी छे ॥१॥ तथा समुद्र सज्ञाथी समुद्रोने कोई ग्रथमा चार गण्या छे, अने कोई ग्रंथमा सात समुद्र पण गण्या छे तेमज स्वरोना सयधमा पण कोई स्थाने त्रण अथवा पांच अथवा सात अथया चौद अथवा नव पण स्वरो पण गण्या छे, प्रमाणे सर्वस्थाने सर्व प्रथोमा जे स्थाने जेवी व्याख्या घटे ते स्थाने तेवी व्याख्या सर्व पडितोने सम्मत होयाछे, तेम-अहिं-पण सहश असदशना करणथी (५'तथा ६ ना अंकमा ओकत्व अनेकत्वनी भावनांथी ) सदृश पणा वडे [पाचनो अक पण ६ सदृश छ, अथवा ६ नो अंक पण ५ सदृश छे अथवा लप्त थेयेलो ५ नो अक पण कोई वसते स्वकार्य कर्ता छे ओम विचारीने ] आ विंशति आदि सर्वे यंत्रो विसवाद ररित जाणवा अथवा जेम छदः शास्त्रमा लघु अक्षर पण पादने-चरणने (श्लोकना परेला चरणने ) पर्यन्ते होय तो गुरु गणाय छे, अने अहीदि गणमां सयोगपर वडे [ अग्रे आवेला सयुक्ताक्षर-जोडाक्षर बडे गुरु अक्षर पण लघु गणाय छ कारण फेशास्त्र प्रवृत्ति अनिष्ट अर्थवाळी रोती नयी ओ न्याय छे, माटे तेवी रीते अहिं यत्रमा पण ते ते अकोनी सदृशता विचारीनेज निर्यार करो अविसवाद पणु, जाणवु, कारण.. के [जे सत् छे तेनीज गति विचारची न्याय छे. म ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ वळी भावना वडे कार्यसिद्धि नथी ओम अकान्त नथी कारणके-- पानीयमप्यमृतमित्यनुचिन्त्यमानं, किं नाम नो विपविकारमपाकरोति। अ प्रमाणे प्राचीन मुनीओनं वचन छे तथा विप भक्षण तथा अशुद्ध नाणा विगेरेमा तो मूढपणानो दोप छ (अने अहि तो) सरकारी वैरुप्यती अन्तर्भावना मात्रधी ते ते कार्य थाय छे, ओम जाणवू वळी बिजी वात ओछ,के-यत्रोनी विचित्रगति छे माटे अटलं जाणीने पण संतोष मानवो, जेम कमलाआकृतियाळा विशति यंत्रमा चार गति छे [ अटले चार, रीति, २० नो अंक प्राप्त थाय छे, अ आ प्रमाणे-] त्रिस्थानिका दिग्गति-विदिग्गति परिधिसव्य-परिधिसव्येतर. तथा चार स्थानवाला बारना यंत्रमां कोई गति त्रण गृहवडे अने कोई गति थे ज,गृहवडे थाय छे, इत्यादि विस्तार गंगाप्रवाह ग्रंथथी जाणवो प्रमाणे द्रशनी सावर्ण्यतावाळा दशे अंकनुं पण सावर्य [ सहशपणं] जाणवु, अने ते कारणथीज चुडामणि शास्त्रमा अक्षरो मा पण अंकन्यास कहेलो छे, कारण के लिपिमेदवाळा अंकोवडेज वर्ण अक्षरोनी भावना करेली होवाथी अने वस्तुतः तो यंत्रोनी गतिज विचित्र १ दिशिपक्तिगत ३ खाना गणवाथी. त्रिस्थानिकागति उायः रीते वे प्रकारनी छ, ते पहेली दिग्गति, वे, विदिशिपक्ति गणवाथी चे प्रकारनी विदिग्गति पेरावामा पूर्वधी चार अकोनी सर्वाळो करखो ते सव्यपरिधिगति, अने ईशानाकथी चार अक सुधीनो मर्वाळो करखो ते सव्येतर परिधिगति ( अर्थात् जमणों घेरॉवो अने डावो घेरावो गणवाथी ये परिधिगति थई । आ कमलाकृतिमा ३-१०-७ तथा ६-१०-४ से दिग्गतिक्ष २० थाय छे. ९-१०-१ तथा २-१०-८ अ वे विदिग्गतिथी २० थाय छे. ४-१-७-८ से जमणा परिधिमा २० थाय छे अने २-३-९-६ मे डावा परिधिमा २० थाय छे. २॥जे १-२ तथा ३-४ से वे वे अंकोनी सदृशता, कही ते रीते १.थी १० सुधीना दशे अक्नो, पण परस्पर सदृशता दशपणानी समानता वडे जाणवी. ३ जेम अर्हन्मा अकारथी ८ र कारथी १०.1 १ * १० ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ छे ओम मानीनेज सतोप करचो, परंतु शास विरोपना विवादो वडे अकोनी भावना न करवी कारणके यत्रोमा अकन्यासनी धीजी कोई गतीज नधी ओ प्रमाणे विंशतिनो [ २० अकनो ] नय गृह । नय ग्याना बाळो यन्त्र वर्तमानकाळमा पण जेनी से अभयने आपनारी अने जयने आपनारी छे, तेनी सेवामा आसक्त रस्त थयेला या देर घडे अनुपक्त (देवाधिष्टित ) छे, तथा विजय विधिनु निधान थे, दुर्जनोने तर्जना ग्प छे, अवो आ अर्जुन पताका नामनो पिंशति यन वैभवनो हेतु याओ॥१॥ प्राचीन पटितो आ यत्रोमा (नय सानायाळा यत्रोमां) नीजो भाग करवायी शेप अक रये छते पण [कृत-गुण-३ अटले ] चोत्रीसनो यन करलो छ, अने ने शेप रहेता पण (प० थाण-५ जेटले) पचासनो यन्न करेलो छ, माटे ते पहितोना मार्गने अनुमरनारी बुद्धिवाळा अने उपाध्याय पद प्रतिष्ठित अवा श्री मेच विजयजी उपाध्याये आ विहरमान जिननो विजयकारी अथवा विजय नाम नो विंशति यंत्र स्पष्ट कर्यो छे-प्रगट कर्यो छे ।। ॥ इति श्री विजययन्ने निशति यन्त्रन्यासः ।। . ११ 4 ११ ३ ११ १२ ४ १० 1 ८ ६ ४ ७ १२ ७ ५ ॥२२॥ ॥२३॥ ॥२४॥ २४ ॥२५॥ १२ ५ ३ ५ . १३ ५ ५ ७ १२ ७ १२ १३ ६ ८ १४ ९ १४ ॥१७॥ २७ ॥२८॥ ३.

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ ३७ ६ १४ १४ ६ १२ १४ ७ १२ ८ १२ १३ ८ ९ ११ १४ ७ ។ १० १५ ८ ३० ॥३२॥ २ ७ १२ १५ २० 10 १ ११ १४ १२ १४ १९ २ 4 ६ १६ ८ १६ २१ १३ ३ ८ १ ॥३५॥ ॥५॥ ॥१२॥ कमराकृति ४ १० १ ८ १ ३॥ Saneeliabless ३ १० ANSADAsce २॥ ५ णा २ ६ ३ ५ नाम ६) नाम ५ ८॥ नाम ॥२०॥ दशगतिका ॥१५॥ ॥१२॥ ४॥ १२॥ १॥ ४ १२ २ १४ २॥ १४ ३ ६ ४ ८ ५ १०॥ नाम ३॥ ७ १०॥ नाम ८ ११॥नाम ९॥ १२ा नाम ॥१८॥ 41 ॥१८ ॥२१॥ ॥२१॥ -२ अहिं से ३४ तथा ५० नो या प्रधान छे चोवीसना यत्रमा निभागे ११ थया तेमाथी चार न्यून करता हुमा स्थाप्या छे तथा पर्चाशनो तीजे भागे १६ प्राप्त थया 'न्यून करता १२ वीजी गृहमा, ३८ ॥ श्रीअर्जुनपताका॥ १ पुपाति C १ १२ ७ ४ १२ ८ ८ २ १. ५ १. म १३ | नाम ३ १० ॥२४॥ ॥२४॥ पाहिगल्या पभागिया प्रपन करत जन . १७ २॥ RI ६G श a 421 १२ १२ ৱািখ কপ शुद्ध उत्तम मारणे उत्तम ३॥ १. १ १३ २ ३ ५ ८ ६ 40 नाम ॥ १५ ४ ८ १३ १५ यत्रामिद २० " पुष्पाकृतिमा ५ ना द्विगुण १० मा १० मेव्ये [५-२-१० थी] २० थया. पुन' ६४२-धार मा ८ मेळये २० थया. ओ पे गति, अने उर्व ३ गति सथा आयत दीर्य नण गति (१०-९-१।२-६-१२।८-५-७ । ९-६-५।१०-२-८) ओ ६ गति प्रसिद्ध छ पुन ६४२ वारमा ७-१ भेळवता २०॥ अथवा १२-८ मेळवता २० । अथवा ८-५-६-१ मेव्यता २० । अथवा १०-२-४-१ मेळवता २० । मैं प्रमाणे १२ गति थाय छे.

॥श्रीअर्जुनपताका ॥ ३९ में अथ इष्ट यन्त्रे अकन्यास रीति ॥ ८ गृहात्मिका ॥ इप्टस्यराशेः क्रियते त्रिभाग-- स्त तन्यशकस्यापि तुरीयभागः । गुणा ३ ब्धि ४ भू १ मध्य ५ नवां ९ ग ६ सप्त ७ । भुजे २ पुधार्यः कृत ४ भागवघ्या ॥१॥ अर्थ:-इष्ट राशिनो (जेटला अंकनो यंत्र बनाववो होय ते अंकनो) बीजो भाग करवो. [ अने मध्यमा स्थापयो]. ते ब्रीजा अंशनो पुनः चौथो भाग गुण-३, आन्ध-४, भू-१, मध्य ५, नव-९, अंग-६, सम-७, अने भुज-२ जे नंबरवाळा आठ गृहोमां क्रमशः (धारना) चोथा भागनी वृध्दि सहित [मध्याकना चोथा भागनी पृन्दि सहित] अंकस्थापना करवी (जेआठ गृहवाळा यत्रमा अंकस्थापना दांची छे) ॥१॥इति प्रथमारीतिः इप्टस्यराशेः क्रियते त्रिभाग। समध्यगस्त द्विगुणे द्वितीये। व्यंशादाविहान्या जलधौ ४ द्विवध्या । पष्ठे तदधं पुनराद्य कोप्टे ॥२॥ २ ३ ९ १२ १ घारो के इष्ट राशि ३६ नो यंन आठ कोठामा बनाववानो होय त्यारे स्थापना आ प्रमाणे अहिं ३६ नो जीजो भाग १२ मध्यमा अटले पाचमा गृहमां, ते धारनो चोथो भाग ३ वीजा गृहमा, तेमा पुन: । पारनो चोर्यो भाग त्रण अधिक करवाथी ६ चोथा गृहमां, तेमा पुनः पारनो चोथो भाग त्रण उमेरतां ९ पहेला गृहमा, तेमा पुनः पारना चोथा भाग प्रण उमेरतां १२ मध्यमा स्थापेलाज छ. पुना तेमा वारनो चोथो माग त्रण उमेरता १५ नवमा गृहमां, पुनः तेमा चारनो चोथो भाग पण उमरेवा १८ छट्टा गृहमा, पुनः तैमा पारनो चोथो भाग प्रण उमेरता । गृहमा, पुन: तेमा मारनो चोयो भाग प्रण उमेरता २४ वीजा गृहमा १६ नो यंत्र स्थापो. २१ नाम १५ ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ तुरीय कोप्टार्ध मधो तृतीये । शेपेच शेपं प्रविचार्य धार्यम् ।। समेंक साम्य विपमेधपाद पादोनरीत्याष्ट सुकोष्टकेषु ॥३॥ अर्थ:-इष्ट राशिनो चीजो भाग करवो, ते मध्यगृहमा स्थापयो, अने तेथी [ मध्यगृहना अंथी ] द्विगुण अक पीजा गृहमा स्थापयो ते त्रीजा भागधी द्विरानि (द्विगुणहीन अटले अर्ध) अक। जलधि-४ ओटले ] चोथा गृहमा स्थापयो अने द्विवृद्धि (चोथा गृहना अंकी द्विगुण अधिक अर्थात् चतुर्थ गृहराकने द्विगुण करी तेज गृहाफमा अधिक उमेरो तेटलो अक छट्ठा गृहमा स्थापयो, अने ओज छहा गृहना अंकथी अर्ध अक पहेला गृहमा स्थापनो, तथा चोथा गृहना अकथी अर्ध अंक ब्रीजा गृहमा स्थापचो, अने शेप गृहोमा [शेष ये गृहमा] पाकीना अफ गणती विचारीने [इष्ट गशि माथाय तेजीत लेटला अ] स्थापया तेमा जो सम अक आवे तो गृहोमा सम अक स्थापयो, अने जो विषम अंक शेय तो तेमा अर्ध चोथो भाग अथवा पोणो भाग स्थापवो, ओ रीते आठे गृोमा अफ स्थापवा ॥२॥३॥ इति द्वितीया रीतिः ।। इप्टस्वराशे क्रियते त्रिभागः। समध्यगस्त द्विगुणो द्वितीये ।। व्यशार्थ मध्वौस रसे ६ च सा! । रसा ६ ध माये च १ गुणे ३ कृता ४ र्ध ॥४॥ यथा पशे इष्टस्य पद त्रिंशद्राशे ३६ द्वादश १२ तदर्ध पट् चतुर्थ कोटे स.पत्यश १२ साध गुण १८ पष्ट कोटेदेयः, पाटकोप्टा प्रथमेदेय, तुर्यकोष्टाधं त्तीयकोटे धार्यमित्यादि गगामवाहे ।। अर्ध-इट राशिनो श्रीजो भाग करवो, अने ते मध्यगृहां स्थापवो, बीजा गृहमा तेथी [ मध्य गृरथी ] हिगुण अफ स्थापयो, [अन्धि-४ १ ओ पिजी रीति पण आ स्थापला ३६ ना या उपरथी विचारखी सुगम छे. २ प्रथम स्थपाई गयेला ये प्रकारना पदरीया अने के अद्वारना यनमा जे रीते पा पोणा भाग यथायोग्य स्थाप्या छे तवत्

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥
२१
-
,
अटले ] चोथा गृहमा ते वीजा भागनो अर्ध अंक स्थापचो,- वळी तेज
त्रीजा भागनो दोढ गुणो अंक [रसे-६-] छहा गृहमा स्थापवो (रसार्ध)
उट्ठा गृहथी अर्ध अंक आय-पहेला गृहमा स्थापवो, अने [गुणे-३ अटले]
त्रीजा खानामां, कृत चोथा गृहथी अर्थ - अक स्थापवो ॥ ४ ॥
इति तृतीया रीतिः॥
अर्थ:-जेम इष्ट राशि छत्रीस होय तो तेनोत्रीजो भाग १२ अने तेनु
अर्ध ६ ते चोथा गृहमा, अने तेज ब्रीज़ो भाग जे चार तेनो दोढ गुणो
अफ अटले १८, तेने छटा गृहमा स्थापयो, अने छटा ग्रनो ( १८ नो)
अर्ध भाग १, तेने पहेला गृहमा स्थापनो, अने चोथा गृहनुं छिर्नु ] अर्ध
३, तेने त्रीजा गृहमा स्थापनो, इत्यादिरीति गंगाप्रवाह अंथमा कही छ ।
श्रीमत्प्रश्रेश्वर ग्रंथा-दकारेष्ट धूवास्मृतः।
रेफेद्वौ समरसारात् । हे दिशो नष्टचक्रतः ॥ ५॥
अर्थ:-श्री मनेवर धधी अकारने ८ ने 5वांक गण्यो छे, समरसार
ग्रंथथी अहिं रेफने रे मो धूवाक गणयो, अने नष्ट चक्र ग्रंथथी ह कारने
दिशा-१० नो भ्रूषांक गणवो [ जेथी अहं पदर्थी ८-२-१०-२०
विहरमान थाय छे. ॥५॥
, तच्चक्र ज्ञानमंजयां । ते ना भूविंशयंत्रकम् ।
स्याद् ज्ञापकं चास्यसानु-स्वाराकारानुयोजनम् ॥६॥
अर्थ: ते चक ज्ञानमंजरी ग्रंथमा का छे, तेथी ते चक्रवडे पण २० नो
यन्त्र थयो अने ते [ २० नो,अंक ] अनुस्वार सहित अकारनो संबंध
जणावनारो छे ॥६॥ ते आ रीते-
दोतिन्नीत्यादि गाथायां । अकारे पिद्विकांकतः।
विदोः स्पष्ट तयैवाक्के । विंशसंख्या प्रबोधनम् ॥७॥
अर्थ:-दो तिन्नि [पेत्रण] ३५
पदवाळी गाथामां अकारमा पण
२ नो घृवाक कह्यो छे, अने.
पष्टज कहेलं,छे, जेथी अम
पण २० नी संख्याने
१२-०३२० ॥ ७॥

४२ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ १ . पुनरप्यष्टतेऽकारे । मात्राकैकस्य मेलने । जातः सनवकोसाग्रे । रेफेऽप्टोनप्ट चकत ॥८॥ व्यजनेत्वात्तदैकोन-भावेमध्यग सप्तक । हकारेऽये कृतः मिता-प्रश्नेश्वर धृतभवात ॥९॥ शेषनागवदिहापिस्यात् । त्तीयालिस्थितोपुन । समानाका वकारे द्वौ । जनतेन त्रिकोग्रिम ॥ १०॥ अर्थ-वळी पीजी रीते पण विचारी तो अकारमा ८ नो भवॉक है, तेमा "अ" कार मात्रायाळो छ माटे मात्रानो अंक अफ मेळवतां ९थया ते नीचे स्थापना, ते "अ" नी आगळ पुन' रेफ छे. ते रेफनो धूवाक नष्ट चक्रमा ८ नो कयो छे, परन्तु रेफ पोते व्यजन होपाधी अंक थार करतांनो अक प्राप्त थयो तेने विंशति यन्नना] मध्यगृहमा स्थापको से रेफनी पछी ह कार आव्यो तेनो ध्वा प्रश्नेश्वर ग्रथमा को छ माटे ते चारने ७ मी पछी (पश्चात् स्थापन शेप गृहो पाकी रया तेने वीसनो मेळ मले अवा अकोथी पूरा अम पूर्वे कधुं छे तेम अहि पण जाणवू, वळी श्रीजी पक्तिमा रहेला मात्रा सहित अकराला ये अकार छे माटे तेने पछीनो-नीचेनो अ [ १ अधि+करवाधी ] ३ नो प्राप्त थाय छे ॥८-१-१०॥ १ अहिं अहम् पदधी विंशति यत्र करवानो छे, त्या अहम् पदमा अह अ से आदि अकस्थापन गतिनो क्रम प्रथम आकारे थई ने पुनः- अ आकार थयो ओ पन्ने क्रम जमणी पायी प्रारभाईने डारी वाजू पूर्ण थाय छे. अमा जीजी पक्तिनों रण गृह जूदा जूदा अपारखाळां छे, अने शेप गृहमा रकार विगैरे दर्शाच्या छ, ते प्रमाणे श्लोकार्थने अनुसार २० नो मेळ विचारवो. २ अर्थात् पहेलो उपरनो अ मात्रा सहित होवा छता मानानो अक गण्यो नी अने जना अ पण माना सहित छ तेनो मात्रानो थक गणालो छ, जेथी १ मात्रा अने पति १ २ ३ १. २ अट ८ अ९ ७ ८६५१३ मटीने ३ नो अक सर्वथी नीचे आव्यो.

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ ४३ अंइत्यस्यर होऽत्यागा देकादशततो निमा । रेफेद्वौहे कृत ४ मिता-स्तद्वोगे पट निवेशिताः ॥ ११ ॥ रेफेस्य व्यजनले नै कोनत्वे पंचवा स्थिताः। अहं पदाद्विशयंत्रं । मेघादि विजयोदितं ॥ १२ ॥ तथा अं[अर्ह मानो अ] र-७ तथा ४ ने नहि छोडीनो रद्या के माटे ते [७१४,१११ नो अक अग्रे [ अटले ३ नी ] पश्चात् स्थापवो तथा रेफनो २ अने ह नो ४ धृयांक छे, ते थे मळीने ६ याय मारे ६ ने अंक अगिआरनी पश्चात् स्थापवो वळी रेफ जे व्यजन छे, माटे अक न्यून करवाथी ५ नो अक आवे छे, माटे ते पण ६ नी साथे स्थापयो ओ प्रमाणे श्रीमेघविजयजी उपाध्याये कहेलो २० नो यत्र अंई पदधी सिद्ध कयों. ॥ इति अंई पदेन विशति यत्रम् ।। ११ ॥ १२ ॥ ॥ इत्यहँ पदेन विशयंत्र व्यवस्था ॥ २४ ३ १२ एकादयास्यु नव यावदंकाः । यंने यतः पच दश प्रसिद्ध । द्वाद्या दशांता धृति यंत्रकेऽका। व्यक्तोऽधिके स्मादाणतेर्थ भेदः ॥१३॥ धारक नाम ॥ अथ विंशतियत्रे ३ त: ११ अकहेतुः ॥ अर्थः जे कारणी १५ ना अफथी प्रसिद्ध अवा यंत्रना ( पदरीया यंत्रमा)१धी प्रारंभीने ९ सुधीना अंक होय , अने धृति-१८ ना पत्रमा श्री दश सुधीना होय छे ते पंदरियाथी अधिक अज सोयाधी जे गणितनोज ४४ ail श्रीअर्जुनपताका क्रमागताके न विलोपनंचे। स्कथ तदेका दश चांकतास्यु ॥ द्वयाधिक त्वा ससुस्थलेषु । अकेतदेकत्र कृतीर्थ भेद ॥ १४ ॥ ओ १५-- तथा १८ यंत्रमा (आयेला ९-१ अंको) अनुक्रमे आवेरा रोयार्थी मम प्राप्त थयेला कोई पण अंकनो लोप भयो, नयी, परन्तु २० मा यंत्रमा क्रमे आयता अफीमाथी ओक अंकमा लोप फेरचो पटे छे, अने जो ते ममे आवता अकोमाथी ओक अकोनो लोप न करी तो आदि अफ २ नो होवाधी अथवा में अक होवाथी । जेटले पंदरीयानो पर्यत अफ ९ न्यार विंशतिनो पर्यन्तक ११(ओटले २ थी ११ सुधीना १० अको होयाधी ते १० अको नव गृहोमा केवी रीते स्थपाय ? ते कारणधी अंक अंगमा अर्थ भेद करयो पडे है, [अर्थात् नव खानामा दश अंको न गोटवाई शकवाना कारणथी अक अकनो ओक लोप करवी पटे छे ] ॥१८॥ यंत्रेतदेकाधिक विशविद्ध। एकादशाता स्त्रिमुखाहितेंकाः । एकोनतायामपि विंशयत्रे। विनार्थभेदं गतिरस्तिनान्या ॥ १५॥ अर्थ -अने ते कारणीज क अधिक पीस [२१] ना पत्रमा प्रणयी शारभीने अगिआर सुधीना नव अक छे, जेथी तेभा अफ लोप करको पख्यो नथी, अने वीसनो यत्र अकयीसनी अपेक्षा अक न्यून होवा छता पण अकलोप थाप छे, मारे विंशति यत्रमा अर्थ भेद विना { अक लोप विना] पीजी कोई गति नी ॥ १५॥ जघन्यभारेनजिनादशस्युः । जिनद्वयश्वर्णभिदाऽटतेपि । जिलेशाधपुनरत्रसिद्वा२४ गत्वात उच्च गज्जुदेशम् ॥१६॥ - २ ॥ श्रीअर्जुनपवाका ।। अर्थ:- (हवे विशति यंत्रमा दश आदि अंको तथा तेनो क्रम स्थापवामां २४ तीर्थकरनी गणत्री दर्शावाय छे ते आ. प्रमाणे-) जघन्यथी १० तीर्थकरोनो समकाळे जन्म थाय छे, माटे प्रथम दशनी स्थापना, त्यार बाद ये आठ तीर्थं करो[-सोलं तीर्थ करो वर्ण भेदथी छ [ सुवर्ण वर्णना छ ] माटे २ तथा ८ नो अंक स्थापवो. त्यार याद जलेशाः = ४ तीर्थकर गणतां सिद्धन्ते चोवीसे तीर्थ करो उबलोकमां नग ७- रज्जु उंचे जईने सिद्ध थया माटे ७ नो अंक स्थापवो. ॥ १६ ॥ ध्येया इतोऽमी भवभेद मुक्त्या । मूर्भित्रिलोक्याः शिव ११ शर्मभाजः ।।. पट् ६ पंचवा ५ केवल बोध दृष्टया । द्रव्याणि नित्यं परिभापयंतः ॥१७॥ अर्थ:-त्यारयाद मे चोवीसे सिद्धनुं स्वरुप मोक्षना नव भेद वडे (सत्प- दादि नच अनुयोगद्वारचडे) ध्येय-भाववा योग्य छे, माटे ९ नो अक स्थापचो. तथा ऋण लोकने मस्तके शिवशर्म-शिवसुखने भजनारा थया, माटे (शिव) ११ नो अंक स्थापवो, ( परन्तु मोक्षे जवा पहेला) ते तीर्थंकरो केवल ज्ञान अने केवल दर्शन घडे नित्य छ अथवा पाच द्रव्यनी परिभावनावाळा (ध्यान वा उपदेशवाळा) हता तेथी [ अगि- आरना अंक पहेलो ] ६ अने ५ नो अंक स्थापवो (जेथी प्रथम ६ नो मुरय अक स्थापीने गौणपणे लुस करेलो ५ नो अक पण स्थापवो. त्यार बाद ११ नो अंक स्थापवो ॥ १७ ॥ अप्रदेशतयाऽस्कंध-भावावव्याविवक्षया । कालः स्याद्रव्यपर्यायो । द्रव्यपंचकमेवतत् ॥ १८ ॥ अर्थ:-[छ तथा पांच द्रव्यतुं कारण आ प्रमाणे-~] काळ द्रव्य प्रदेश रहित होवाथी स्कंध रहित हे ( अर्थात् काळ द्रव्यनो स्कध. नथी तेम प्रदेश पण नथी.)म व्यनी विवक्षा न करवाधी, द्रव्य पर्याय रहित [द्रव्य रहित ] छे. जेथी द्रव्यः - मे अर्धधीज अभ्युदित लदमीवाळा [८ जिनेवरोने 'पूर्व तरफना ॥ श्रीगर्जुनपवाकी । गणाय छे [त्यारनाद ३ मा अंकनी स्थापनानु कारण स्पष्ट कछु नी ते यथा संभव स्वत विचारयु].॥१८॥ चत्वारो ४ दश १० च द्वोर ता-चष्टे ८ ति स्फुटिकांचले ॥ तीथे जिना स्थिता निव-स्तदंक विशयन्त्रकम् ॥ १९ ॥ । अर्थ:-अथवा योजी रोते विचारता (स्फुटिकाचले तीर्थ =) अष्टापद तीर्थ उपर ४-१०-२-८ तीर्थंकरांनी प्रतिमाओ रहेली , माटे ते चोवीस प्रतिमाओना अफ सहित जा विंशतियत्र थाय छे ॥ १९॥ प्राच्या जैन द्वय तत्र । दक्षिणस्यों चतुष्टयम् ॥ उदगासन्न इंशान देशे देश जिना स्थिता ॥ २० ॥ अर्थः त्या अष्टापद पर्वत उपर पूर्वदिशामा २ तीर्थकर, दक्षिणमां ? अने उत्तर दिशा पासे ईशान दिशामा १० जिनेश्वरो रया छ ।॥ २० ॥ प्रतिच्यामष्ट चामेय्या-मिहतेपि प्रसगतः ॥ पूर्व देश जनुर्मुक्त्यो-पैदिवाऽभ्युदयश्रियाः ॥ २१ ॥ अर्थ.-तथा पश्चिममा ८ जिनेश्वरो कथा छे, ते अहिं प्रसंगने अनुस अग्निकोणमा गणवा कारण पूर्वदेशमा जन्म अने मोक्ष थवा पडे" अग्निकोणमा गण्या छे ]॥ २१ ॥ पट् ६ संता ७ दिगतो वॉष्ट । त्रि ३ वार्ष्या ४ दिगतीतत ॥ अष्टाप्राचीप्रतीच्योस्ते- प्यंतराले प्रतिष्टिता ॥ २२ ॥ ४ नो अक उत्तरमा आवेडे, ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ अर्थ:-तथा उही सातमी आदि गतिमांधी ८ नो अंक छ, तथा त्रीजी चोथी विगेरे गतिमां पण आठनो अंक छ तेथी आठनो अक वा ,जिनेश्वरी दक्षिण अने पश्चिम दिशिने वच्चे पण रहेला गणवा ॥२२॥ उत्तमा क्षत्रिय गतिः । पट् सप्ताद्या ततःस्मृता ॥ पद्माकृतौ विंशयत्रे । तथैवाट निवेशिताः ॥ २३ ॥ अर्थ:-क्षत्रिय गति उत्तम छे, तेथी छ अथवा सातथी प्रारंभीने (पूर्वमा ६ अथवा ७ नो अंक स्थापीने ) विशति यंत्र होय छे, अने ते कारणधीज पद्माकृतिवाळा विशति थंचमां पण ८ नो अक तेवी रीतेज [अटले ६-७ नी बच्चेज ] रहेलो छेस्थापेलो,छे. ॥ २३ ॥ यद्यप्यंक परावृत्ति। गतिभेदेन-दृश्यते ॥ नास्तिदिग् निश्चयःप्रोक्त ।स्तथाप्येपा व्यवस्थितिः॥२४॥ अर्थ:-जो के गतिभेदोधी अपरावृत्ति देखाय छे तेथी [ अटले भिन्नभिन गति वेडे स्थपाना विंशति यंत्रोनां अनुक अंक अमुक गृहमांज रही शके अंवों ] दिशिनो निश्चय कयो नथी, तो पण विशेपतः आ आगळ करवायी व्यवस्था निश्चित कहे छे ॥२४॥ पक्षा २ हि ९ सिधु ४ शैला ७ दि-रुत्तमा ब्राह्मणेगतिः॥ अनुरोधादियंतस्या । प्रतिष्टाकेपुनिश्चिता ॥ २५ ॥ । अर्थ:-पक्ष-२ अहि=९ सिंधु-४ शैल-७ इत्यादि क्रमवाळी ब्रामणगतिज उत्तम छे, माटे ते अनुरोधधी [ ते ब्राह्मणगतिने अनुसरीने अंकोने विपे अज प्रतिष्ठा-स्थापनक्रम (पूर्वमा २ दक्षिणमा ९ उत्तरमा ४ मध्यमा ७ इत्यादि घणीवार वर्णवायेलो-मम ]-निश्चित ययो छे , ॥ २५ ॥ इति विजययत्रे विशति यत्रांकप्रतिष्ठा ।। इति अंक हेतुः ।। छ तेमानी गति अथवा' (इशानमा ६ वा ७, १ प्रथम वास प्रकारनी गतिओ यो प्रारमाती धानियगति. हौश्य गति. इत्यादि.

४८ - ४ १ म ७ ११ ४ यु गु ११ रा १० २ के अर्थ-ईशान दिशामा १० नो अंक ते ईश्वरनी-महादेवनी शरीरसंबंधि दशस्थितीने सूचय नारो छे, कारण के महादेवनु पंचानन नाम होवाची पच मुख छे, अने अधांगमा पार्वती होवाथी में शरीर महादेवना थयां तेथी पाचने घमणाकरतां १० स्थिति धई तपा अर्धागे पार्वती होवाची मरादर द्विरुप थवाथी दश पछी २ नो अक आवे छे तथा आठ सिद्धि नी उत्पत्ति होवाथी ( त्रिमूर्ति होपाधी ) नव नेन अने छ भुजान. ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ इति विजययंत्रे विंशति यंत्रांक प्रतिष्टा ईशानेशदिगी १० श्वर स्थितिरपि स्वागेपिपंचानन- द्वैगुण्याद्वय यमर्ध तोद्रितनया रोधे न हंसद्वयात् ।। अप्टोसिद्धय एव मूर्तयइवांभोराशिनिर्मथन । समावा नवनेत्र पट् भुजधरस्यास्मात् ज्वरस्योद्भव. ॥ १ ॥ अज जेनी आठ मूर्ति जेवायो न आवे छे,तथा अभोराशि समुद्रन मथन क्यु तेथी समुद्र साधना सरया गणाता होवाधी ७ ने अफ आये छे, तथा अनाथी नवनेत्र अने छ भुजा पाळा ज्वर ( अपेक्षा ९तथा ६ नो अक आवे छे, ॥१॥ सरयेकादशहवयी विजयकृहानंजयस्यार्जुनेऽ- प्येश्वर्यार्थिपु विशयत्र करणे ध्येयानि वस्तून्यत ॥ यारधर गता रमापिपरमाांगीभवती स्थिरा। गेहेतबहुधा भवेशवसुधाधीशोपिवश्यः स्वयं ॥ २ ॥ ।

।। श्रीअर्जुनपताका ॥ ४९ , अर्थ:-महादेव अगिआर होचाधी ११ नो अंक, विजयकारी अवां त्रा क्षेत्रवाळा होवाथी ३ नो अंक आवे छे ओ प्रमाणे अर्जुनने पण अश्वर्या दिकमा जय आपनार आ यत्र छे, माटे विशतियत्र करणमां ओ वस्तुओ ध्येय-ध्यान करवा योग्य छ, तथा गमे तेटली दूर गयेली उकृष्ट लक्ष्मी स्त्री तुल्य अर्धांगना थाय छे, अने घरमां स्थिर थई रहे छे वळी ओ यंत्रयी बहुधा (विशेषे करीने ) वसुधाधीश-राजा पण पोताने वथ थाय छ ॥ २॥ इति विंशति यंत्रे महादेवावतरणम् ।। वीरेवतारो दशमथलोकात् । व्रतं दशम्यां वरकेवलाप्तिः । द्वैमातुरे धर्मयुग तथाष्ट-वर्षे महावीर पद प्रातिष्टा ॥३॥ अर्थ:-श्री वीरमभुर्नु अवतरण [ च्यवन । दशमा देवलोकथी थयु छे, बळी दशमीने दिवसे नतमाप्ति तथा केवळ ज्ञाननी प्राप्ति थई छे, ते पेयथी १० नो अंक विचारवो श्री वीरप्रभुनी [देवानंदा अने त्रिशला जे] ये माता छे, अने [ साधु धर्म तथा आवकधर्म मे] ये धर्म उप- देश्य छे ते ध्येयपी २ नो अंक विचारवो आठ यर्पनी थय धये [पाल- क्रीडा मसंगे पळणी परीक्षा करनारा देवे ] " महावीर " अर्बु नाम स्थाप्यु ते ध्येययी ८ नो अंक विचारयो । ३ ।। - चतुर्मुखांगत्वमृषिप्रमाण-करांगता साधुगणाः नवापि ॥ पाण्मासिकी पंचदिनोनतप्ति-व्रते शरापट् त्रितय चरित्रे ॥४॥ अर्थ:-देशना समये समवसरणमां चार मुख थाय छे, [पिप्रमाण%] ७ रायन शरीर प्रमाण छ, साउना नवगण छे, पाच दिवस न्यून छ मासनो तप कयों छे, पांच अथवा छ महाव्रतवाळा छे अने दर्शनज्ञान चरित्ररूप त्रण रत्नवाळा छे, ओ कारणथी यन्त्रमा ४-७-९-६वा ५-३ जे अंको ते ते स्वरूपे ध्येय छे. ॥४॥ पष्ठे भवे पोहिलता पि स्तथैकादशतद्गणेश्वराः विश यंत्रो दिसावन ।। श्रीअर्जुनपताका ॥ अर्थ.-पाचमे अथवा छटे भरे पोहिलना अटले पोहिलमुनि एमा, अरोते पण ५-६ नो अंक विचारयो तण श्रीवीरमभुना अगियार गणधर हता, अने पूर्वभयमा चीस सागरोपमनु आयुष्यरतु तेधी से रीने २१ ना अक सहित आ २० नो यत्र विचारयो, मेरीत उपर कहेला भावोनो निश्चय आ विंशनि यंत्री विचारयो ॥५॥ इति विंशतिपत्र श्रीमहावीरावतरणम् ॥ दशासुराया घुसदोद्विधासेऽ- टोव्यतराः ज्योतिपिकाश्चतुर्धा ।। ते नारका सप्त नरात्र तिर्यग- जात्याश्च पचेंद्रिय देहभाज ॥६॥ अर्थः-१० ना अफथी असुरकुमारादि दश भवनपतिदेयो, २ ना अंकथी ते भवनपति [ उत्तर निकाय अने दक्षिण निकायना अमाये प्रकारना ८ मा अरुथी आठ प्रकारना व्यन्तरदेयो ४ ना अकधी चार प्रकारना ज्योतिषी, ७ ना अकी सात प्रकारका नारक, ना अस्थी नव प्रकारना तिपंच [त्रण वेद वाळा जलचरादित्रण गणता नव तिर्यंच ], ५ ना अकथी ते तिर्यचो विगेरे पचेन्द्रियजाति, नाजीयो छे ओम विचारयु ॥६॥ स्यु स्थापरा पंचवका पृथक्त्वात् । प्रत्येक वृक्षेपिकलत्रयंच ॥ नरास्तथैका दशधेतिविंश-यत्रे प्रसिद्धि समयेपिसिद्धा॥७॥ अर्थ'-अथवा प्रत्येक वनस्पतीने जूदी गणवाधी स्थावरो पांच [ साधारण वनस्पति सहित ] छे, तथा ३ ना अमची श्रण प्रकारना विकलेन्द्रिय ११ ना अकथी अगिआर मकारना मनुष्य अहिं आगळ कडेवाशी ते प्रमाणे विचारया प्रमाणे आविंशति यत्रमा जे प्रसिद्ध छे, ते अंकनो भाव समयमा-सिद्धान्तमा सिद्ध-प्रसिद्ध छ ॥७॥ जलचर १ स्थलचर २ खेचरा ३ त्रिवेदा ९ नरा सो क्षेत्रजाः --- ४ एव ११ ज्योतिष्काधनक्षत्रेताराणामभेदात् ॥८॥ .

६ 1 - -- - अर्थ:- प्रमाणे आ विंशति यंत्रने सद्गुणना समुहाई अन्टी पुक्तिओवडे भावथी अतिढपणे सूत्रित को दियो छ- सहदय-विचारशील अवा बुद्धिमानोना हृदयमा तो नत्व भार छ, तु नंधी [ अर्थात् शठना चित्तनां कई तत्त्व प्राप्त धनुन पन्त ॥ पद्मावती स्तोत्रान्तर्गत विंशतिपत्र पत्रिः ५ ॥ श्रीअर्जुनपताका अर्थः-उपरना लोकमां (हामां ) तिर्यचना नवभेद कह्या ते जलचर स्थलचर अने खेचर अत्रणे घ्रग त्रण वेढवाळा होवाधी, जाणवा, असे मनुष्यना अंगिओर भेद ते भरतादि ७ क्षेत्रना अने ४ अरहोग जाणा, तथा ज्योतिपीओ चार का ते नक्षत्र अने ताराना में दर्द [ येने अक गणीने कहा छ ]॥८॥ इतिकतिपययुक्ति व्यक्तिभिः विंशयंत्र । दृढतरमपिभावात् सूत्रितं साँधैः ।। हठमतिशठांचित्ते नैतितत्वा-कथंचित् सह्दयसुहृदांतु-स्तादतः शाश्वतश्रीः ॥ १ ॥ कदाग्रहनी बुद्धिवाला ओवा पठ पुस्पना चित्तमा तत्त्वों जेथी शाश्वतलदमी सिद्धी थाय छे॥९॥ J .

२ आ शापमा लसेला अकोनी विशेष सष्टता आ शोफनी अहिं चार ठीकाना, भांगार ५२ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ भूविश्वक्षणश्चद्र१चद्रपृथिवीश्युग्मैक१२सरयाक्रमात् । चद्राभोनिधिष्ट्वाणपृषण्दनव९वसून ८ दिक्१०खेऽचराश्यादिषु॥ ऐश्वर्यात्शरिपुमारी विश्वभयहत् क्षोभातरायात् विपात् । लक्ष्मी १ रक्षण २ भारती ३ गुरुमुखात् मत्रान् इमान् देवते ॥१॥ इति पद्मावती सारे अधी-भू-१, विश्व=३, क्षण-६, चन्द्र-१, चंद्र-१, पृथ्वी १, युग्मैक-१२, ओ संख्याना अनुक्रमपी चद्र-१, अम्भोनिधि-४, पाण-५, पद-६, नव- वसु-८, अने दिग्-१० अने तथा वे उy आकाशमा | अटले १० नी उपर राशि-१२ विगेरे अंको स्थापयामा जे यंत्र पने छे] ते अन्धर्यवाना यत्र लक्ष्मी प्राप्त धाय छे, तथा शत्रु अने मरकी विगैरे तथा सर्व भयोपी रक्षण धाय छे, तथा हदयक्षोभधी अन्तरायची अने विषधी पण रक्षण थाय छे तथा गुम्मुपधी [ वृहस्पतिना मुग्यथी ] वाणी थाप छे, से प्रमाण लक्ष्मी रक्षण भारती प्राप्त पाय छे, तेथी रे पद्मावती देवि ! माता ! ओ मंत्रोने-रहस्योने गुरुमुराधी निश्चय करीने ध्यान करे ॥१॥ तत्रेद्री १ राक्षसो २ दीची ३ वायु४मध्या५मिददक्षिणा७॥ ऐशानी ८ पश्चिमे तासु ९ । मादक निवेशनम् ॥ २॥ अर्थः-या अनुक्रमे पूर्व दिशिमा-राक्षसी (नैऋत्य) दिशिमा, उत्तर दिशिमा पाय य-मध्य-अग्निकोण-दक्षिण-ईशान-अने पश्चिम से नव स्थानोमा [ कोठाओमा ] अनुक्रमे अकस्थापना करवी ॥२॥ राशेरिष्टस्यांशकोयस्तृतीयो- 4 - दिम्भिहीन 'सद्वितीये निवेश्य ।। रूपा १ धिक्यानंद'९ वेदा ४ द्रि १ वाण ५ रामा ३ग६मा सिद्धि ८ कोप्टेषुदध्यात्॥३॥ समनी शाशे के अ अकोथी २० केवी रीते बने थे। ।

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ अदष्ट राशिनो जे बीजो भाग, तेमांधी चार याद करतां जे अंक प्राप्त थाय तेने घीजा कोठामा स्थापवो, अने तेनाथी अकेक अधिक अंक ने अनुक्रमे ९ मा चोथा सातमा पांचमा श्रीजा छहा पहेला अने आठमा २-४-७-५-३-६-१-८ ओ नंबरवाळा आठ] कोठाओमा स्थापवो. ॥३॥ विशतेन त्रयाभागा-स्तेनाष्टादशयंत्रवत् ।। द्वितीयगेहे द्वितीयं । दत्वामार्ग समाश्रयेत् ॥ ४॥ अर्थः-परन्तु अहिं वीशना यंत्रमांत्रण भाग पूर्ण धता नथी, ते कारणयी अवारना यवनी पेठे वीजा गृहमा २ ना अक स्थापीने त्यारवाद आगळनो मार्ग लेवो [अटले ३-४-५-६-७-८-इत्यादि अंकोनी स्थापना २-४७-५-३ इत्यादि गृहोमा करवी. ] ॥४॥ सर्वस्थानेषु चैकांकः । परमश्वरवाचकः ॥ मत्रपाठे प्रणववत् । धार्य कार्यस्य सिद्धिदः॥५॥ अर्थ:-पुनः मंत्र पाठमा जेम प्रणव (ॐ) नी स्थापना अवश्य थाय छे, नेम आ विंशतियत्रना अंकामां पण परमेश्वरनो चाचक अने सर्व कार्यनी सिद्धि करनारो अवो १ नो अंक सर्व गृहोमां स्थापयो॥५॥ १ अप्रमाणे स्थापवाथी आ अंक स्थापना थई १ १२ २ सर्व गृहोमा १ नो अंक स्थापवायी आ स्थापना थाय, परतु १४ १ १६ ४-३-८ इत्यादि विझे यवनपद्धति प्रमाणे स्थापना ८ प्रमाणे अंक स्थापना थई. जेमा २६ १नो अक आवे तेवा यो हनी ज्ञ आयो छे, परन्तु सर्व गृहोमा दर्शावाशे.

अर्थ:-त्या मध्य कोठामा १० वें अकस्थान जे आ विंशति यंत्रमा छ, ५४ ॥ श्रीअर्जुनपताका, यथायवनयत्रस्याऽ-धित्रिशसिध्याददिकागतिः ॥ श्रीमद्विजययत्रोका-टमीशुद्रेषु सोत्तमा ॥ ६ ॥ अर्थ:-जेम ययनोना विंशतियत्रमा ४-३-८ इत्यादि गतिथे गृहोनो अनुक्रम कयो छे, तेम विजय यंघमां फहली आठमी गति शुद्रोमा [शुद्रो मारे ] उत्तम छे ॥६॥ स्थाने येऽत्र यवने-रेक दान विनिर्मितम् । तेनद्विके द्वादशातिः । पढे पोडश सभः ॥७॥ अर्थ-यवन विंशति यंत्रमा ययनो पे स्थानोमा [पे कोठामा १ नो अक [ अधित ] स्थापन कयों छ, ते कारण ना, फोठामा १२ अने ६ ना कोठामा १६ नो अफ स्थपाय छे ॥७॥ मध्ये तत्र दश स्थान । यथा प्रातस्तथा दश । कमलाकृति यत्रेपि । तत्क्रमादग्निगाः शिवा ११ ॥ ८॥ तेम कमलाकृति यत्रमा पण मान्य काम १० नो अछे, त्यारवाद अनुफमे आगळ चालता [शिय-] ११ नो अक स्थपाय छे ॥८॥ क्रमात पचकारपंचा-धिक लेदश १० मध्यगा। तदेका दशतः पचा-धिकत्वेऽवस्त पोडश. ॥९॥ १ ३ आठमी गति मनेलो या आ प्रमाणे आ ययोमा २०.नी ८ ४ केवी शेते करवी ते चार टीकाना भावार्थमाज कडेवाशे .

॥ श्रीअर्जुनपताका ।। F - अर्थ:-त्यारयाद जेम पांचमां कोठामां प्राप्त थयेला कोठा संबंधि ५ ना अकमां ५ मेळवतां १० नो अंक मध्यगत पांचमां कोठामां आव्यो छे, म.१ मा मेळयता १६ नो अंक ११ ना अंकनी नीचे छठा कोगमां आवे छे. ॥९॥ अथ काव्या-भूः१ विश्वानि ३ क्षणाः ६ क्षणैः पाभिरक्तगामिका इति वचनात् चंद्र १ पृथिवी २ पुनः पुनश्चंद्र कथनादेकः सर्वत्र देयः इत्याने प्रायः एवं १३-१६-१२ इति स्थान नय सिद्धिः अनुलोम विलोमे नाक ' सूत्रणमुभयांकेभ्योपि योजना ज्ञापकात् चंद्रांभोनिधि इति पद्मावत्या व्याख्येयं समुद्र शद्वेन चत्वारः सप्तवा इति गणनात् ततः १७-१४ इति स्थान द्वय सिद्धिः वाणेति चतुर्दशाऽधः घाणाः५ यद्वा पट् परशा इति सावण्यात् एतद्विस्तर प्रागुक्त एव पांडव शद्वेन पच प्रसिदाः वक्तनः पट् कर्णस्य पाडयत्वात् तथा पचमिः काम्यते कुंता तद्वधूः पंच- काम्यतीत्यत्र धर्म १ वायु २ इंद्राः ३ अश्विनीकुमार २ द्वयं एव ५ पष्ठ. पांडरिति पंच कथने पडपि ग्राद्याः एवं चाणाः ५ कामस्य प्रसिद्धाः पष्टोयसरः 'रहोनास्तिक्षणोनास्ति' इति वचनात् एव मिंद्रिय रसादि संख्यायामपि पंच पत्वं भाव्य तेन ॥ अर्थः-उपर कहेला भु विश्व क्षण इत्यादि पदवाला काव्यनो [पद्मावती काव्यनोभावार्थ आप्रमाणे भूएटले १ विश्वअटले३,क्षण अशब्द छना अकने दर्शावनारो रोवाधी क्षण अटले ३, ओ बणे अंक साधे चंद्र शब्द वारवार कहेवाथी चंद्र पटले १ नो अंक सर्वत्र जोडता तथा पृथ्वी अटले १ नो अंक पण जोडता, (अर्थात् १, ३, ६ नी पश्चात् १, १, १ जोडता ११-२३-१६ थाय ) प्रमाणे १ नो अक सर्वत्र (सर्वस्थाने) स्थापनो, जेथी १३-१६-११ जे व्रण स्थान [ अकस्थान ] सिध्ध थाय छे, अहिं फ्रमपूर्वक अथवा क्रमरहित पण अंक स्थापना थाय छे, तेथी पन्ने मकारता अंकोवडे पण योजना जणावेली छे तथा चंद्राभोनिधि इत्यादि पदोनी व्याख्या आ प्रमाणे-अंभोनिधि अटले समुद्र शब्दयी ४ अथवा ७ नो अंक गणाय छे. तेथी ७ अने ४, अने उपर कदाप्रमाणे १ नोअक अहिंपण जोडतां १७ अने १४ अप्रमाणे ये अंकस्थान सिध्ध थाय छे. तथा याण अटले ५ नो खंड ते चौदनी ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ " नीचे स्थापवो, अथया छ अने पाच अये अकने सदृशपणु छे, ते सविस्तर प्रथमज कहेवाई गयु छे, जेमके " पास्य " अशब्द वडे पाचनो अक प्रसिद्ध के, अने वस्तुत. कर्णने पण पाडय पणु रोवाथी पाडव शब्द थी छनो अक पण गणाय तथा पाच वडे जे काम्यते इच्छायते पचकामी अटले फुता माता तेमनी वधू [ पुत्रवधू द्रौपदी], ओमा धर्म-वायु-इन्द्र-आश्विनीकुमार थे, अप्रमाणे पांच अने छठा पाडू ओप्रमाणे पाच कोयाथी छनु पण ग्रहण थाय छे मेरीते पाण शब्दथी पण कामदेवना ५ याण प्रसिद्ध छे, अने छटो अकसर ( पण कामनु छु? पाण तुल्य छै ], कायू छे के रहो नास्ति-अकान्त नथी, क्षणो नास्ति-अवसर नपी इतिवचनात् अप्रमाणे इद्रिय अने रस पाच पाच मख्यावाळा छे तो पण ६ नी गणत्री कराय छे, अम जाणयु जेथी याण ओ शब्दयी ५ अथषा 6 नो पण अक जाणयो, ते कारणथी प्राच्यादृगिदू १२ नैऋत्या-गुणेन्दु १३ उत्तराश्रितौ ॥ कृतेंदू १४ तदधोवाणेंदू १५ कला १६ वैकवृद्धित ॥१०॥ अर्थ.-पूर्वदिशमा इन्दूि-१२, नैऋत्यकोणमा गुणेन्दू-१३, उत्तरादि शामा कृतेन्दू-१४, तेनी नीचे पाणेन्दू-१५ अथवा अमा अक अधिक करवाची चद्रनी फळा=१६पण गणाय ते घायव्य कोणमास्थापाय छे]॥१०॥ पचाधिकत्वादत्रैव । स्थापनीया नवेदवः १९ ॥ ततो दशातो नौरुदा ११-अघ पचाधिकानृपा १६ ।। ११ ।। , भ १२ अर्थ-अथवा उत्तरदिशिमा जे १४ स्थाप्या छ, तेमा पाच अधिक करवायी १९ थाय ते पण त्याज १५ ना स्थाने स्थपाय छे त्यारयाद अत'-मध्यमा १४ तेनी अग्रे[अटले अमिकोणमा] ११ नो छे अने तेनी [ ११ नी] नीचे पाच १६ नो अक स्थापवो ॥११॥ १६ १ १ या पश्चिम ।। श्रीअर्जुनपताका ॥ ५७ . A ४ १ ऐशान्यात्यष्टि १९ रष्टेदू १८ । वारुण्या मघवादिीश ।। क्रमप्राप्तोष्टादशांक-स्तत्रभाव्या नवापिते ॥ १२ ॥ १-१०-९ इतियोजनायां नवक गणनात् यद्वा वाणति सूने चतुर्दशेभ्यो याणाधिकत्वे १९ गौ ९धूवेत्वन्यथा रुचिरित्युपदेशात् यद्वा वाणोनत्वे ९ यद्वा कम प्राप्त १५ मध्ये पड्नत्वे ९ अग्रे विवृत्यनवकथनात् दशशर कला इति सौंदर्यलहरी तेन १० वाणा एकोना ९ इत्यपि यद्वा वाणाः ३ रामस्य १ अर्जुनस्य २ कामस्य ३ तन्त्र : मेलने ९ वाण तद्वतो रभेदोप वारात् अत्र १-७-१ चाण पट् इति ११ एष २० आयतत्वपि १-८-११ इति २० तथा १७-१-१-१ एवं २० कोणगणने दशस्थाने 'शून्यवात् एकोनत्वे ९-११ ." एव स्थानद्वयादपि २० योजना भावात् वाण ५ प ६ वचनेन एकादशाक इति केचित् तन्नपूर्व एकादशांक भावेन पुनस्क्तदोपात् तेन वाण कयनात् पंच ५ त्रयोवा (चतुर्दश स्थाने अफ पार्थस्ये १-४-१५ एव २० तथा १-७-१-४-१-६ एवं.२० सिधा १७ पुनर्वाण ३ एव २० तथा १४-१-५ एवं २० ततो यथा योगं वाणेत्यादि सूत्र विवरणीयं एव मन्यत्रापि १-७-१२ अथवा १७-१-२ तथा १-३-१६ अथवा १३-१-३ तथा १७ एकोन ४ तदा ३ एवं २० कोणे एकोन ९-१-११ द्वितीय कोणे एकोन ७ तदा ६-१-१३ एवं २० तथा ११ एकोन ६ तथा ५ अधः १-३ एवं २० अनयारीत्या कोष्टाक भेदे अभेदेचा ऊन करणे अधिक करणेवा ज्ञापक पाणपडिति सूत्र मंतव्यं ततः एकोन ८ तदा ७ अग्ने १३ एवं २० तथा एकोन २ तदा'१-१० एकोन एकाधिक ८ तदा ९ इत्यादिना सर्वत्र समाधिः एवं यथधा यत्र भावना सर्व कार्य सिद्धि करत्वात् पोडश कोष्ठाचनुस्त्रिशत् यंत्रवत् एवं १५-१८ इतिस्थानद्वय सिद्धिः तत एव वाण रूप वसु दिक् दिक् खेच राश्यादिषु इतिकचित्पाठः तेन नववस्त नित्यमपि व्याख्यातं सतोमध्येदिक दश देयाः ततोप्युचैः खे आकाशे दशकस्थानादुपरि राश्यादिषु द्वादश प्रतिषु अकेषु धृतेषु यंत्रात् अस्मात् ऐश्वर्यात् लक्ष्मी भवति रिपु प्रमुखा' निष्टेभ्यो रक्षण मनति रिपवो चैरिणः मारि युगपल्लोकमृत्यः विश्वानि गत mms ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ इत्योभ. चित्तनम उपलक्षणात् सर्व रोगा ततो द्वन्द्वातस्मात् विपात् सादेः अप्राप्युप लक्षणात् सिंह गजादेरिति तथा गुममुग्वात् वृहस्पनि मुखात भारति पाणी भवति द्वद्वालक्ष्मी रक्षण भारती ( वाण १७ एश्वर्य रक्षाया .६ विधार्थे १९ सप्तम स्थाने लेरया) मामोति है देवते मात. पभावति इमान मचान रहस्यानि गुरुमुवादित्यात्या व्यारपानानिश्चित्य ध्यापामिनि अध्यातार इति काव्यार्थ. यापेचरा गूहा' यथानवसुस्थानेषु स्थापिता व्यापादिपु पूर्यादि दिशासु एतानकान तथासस्थाप्य ध्यायामि अर्थ.-इशान कोणमा त्वष्टि-1७, धारणी दिशामां [ पश्चिममां ] अप्टेंदू-१८, अ प्रमाणे मघवा दिशीधी (पूर्व दिशाथी) दिशाओना क्रम प्रमाणे अहारनो अक आव्यो, ते विंशति यत्रमा नवे गृहोमा अथ नवे अकस्थानो विचारया ते आ प्रमाणे-~- अर्थ:-१-१०-९* योजनामा ९ नी गणत्री फरयाथी, (२० थाय छे) अथवा काव्यमा घाण शब्द कयो छे ते याण अटले ५ ना अकोनो चौदमां अधिक करवाधी १९ थाय छे तेमा[जे १९ मा ] गौ जेटले ९ नो अक ध्रुव रोपाथी यथा रुचि प्रमाणे गणितमा जोडवो, ओम करेलु होवाथी (१-१०-९ मा ९ नो अक गणाय छे,) अथवा पीजी रीते विचारता थाण अटले ५ नो अंक न्यून करयाची [ ओटले चौदा माथी ५ पाद करवापी ] पण ९ आवे, अथवा पांच अने छ सदृश होवाधी १५ माथी ६ न्यून करीओ तो पण ९ आये, अने ते नयनी अफ पूर्वे विवरीने कहेवाई गयो छ, अथवा दश सर कला (अटले १०-१-३-१६ ओमा सर-याण अटले १ने १० मा थी पाद करता पण ९ आवे, अथवा पाण अटले ३ नो अंक * विंशतिपत्रमा पर्ने दर्शाच्या प्रमाणे वीजा पाचण अने सावमा कोठामाना ११-१०-१९ माथी यथारचि अको लईने २० गणवानी पद्धति अहिं दीवाय छ त्या ११ मानो १, १० माना १० अने १९ माथी ९ नो अफ लई १-१०-१ अत्रणे मेळवीने २० गण्या, बकी भर्हि साक्मा कोठामा १५ ना स्थाने अटले रीते ५ ना स्थानमा १९ ओटले ९ नो अक कवी रीवे गणवो ? वेनी दी रीत दावी. जे कोणपक्तिथी २० गण्या छे. A ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ . पण गणाय, कारण के रामर्नु अर्जुननु अने कामदेवतुं से व्रण याण प्रसिद्ध छे, माटे मे ३ मां (१६ माना)६ ने मेळवतां पण ९ थाय अथवा घाण अने बाणधारी मे मां अभेदोपचारथी ६ गणता ५ मा मेळवी ११ करी १-७-१-११='२० थाय अर्थ:-हवे १७-१२-११ अत्रण अंकनी पंक्तिमां १, [७+१ = ] ८, ११ ओ व्रण मळीने २० थाय छे, अथवा १७-१-१-१ मळीने २०याय छे, अथवा खूणाधी खूणे गणतां १० मा शून्य होवाथी १ न्यून करवाथी ९ थाय, जेथी ११-९ अटले २० धाय ओ रीते घे स्थानधी [त्रीजा पांचमा कोठाना ११-१० थी पण २० नी गणत्री थई. वळी योजना भावधी सयुक्त भावधी सातमा कोठामा ५-६ नी साहशतायाळा घे अकोने मेळवी ११ करी मध्य कोठामा रहेला १० ने अक न्यून पणाधी ९ गणीने ११-९ ओटले २० केटलाक आचार्यों गणे छे, ते योग्य नथी, कारणके प्रथम ११ ना अफ साथे ९ मेळवी अफवार २० गाई गया छ, तेथी अहिं पुनरुक्त दोप [ पुनर्गणना दोप) प्राप्त थाय छे, ते माटे अहिं बाण कहेवाथी ५ अथवा ३ गणीने १४ ना अकने छूटो पाडता १-४-१८ अटले २० थाय छे, तथा [१७-१४-१५ ने यदले १६ नी पंक्तिमांधी अक छूटा पाडी ] १-७-१-४-१-६ अटले २० गणाय छे तथा सत्तर अने सातमा कोष्टकमा पाणने ५ गण्या छे, तेने पदले ३ गणता १७-३ ओटले २०याय छे. तथा [१४-१५ मा] १४-१-५ ओटले २० थाय छे, माटे आ काव्यमा पाण शब्दनो अर्थ ५-६-३ इत्यादिरीते यथा योग्य विचारयो, 'अने ते प्रमाणे अन्यस्थाने पण पाण शब्दना अर्थोथीज यथायोग्य २० नो अंक प्राप्त करवो तथा १-७-१२ अटले पण २० थाय छे अथवा १७-१-२ थी पण २० थाय छे तथा [११-१६-१३ नी पंक्तिमां अंकोने यथा रुचि छुटा पाडतां] १-३-१६ थी २० थाय छे, अथवा १३-१-६ थी २० थाय छे तथा [ १७-१४-१५ नी पंक्तिमा ] १७ मा १४ ना अकने (१ न्यून ४ ओटले) ३गणीने उमेरता २० थाय छे, मेरीते खूणामा रहेला १९ अटले १ न्यून ९ अर्थात् ८ गणीने ८-१-११ 20 थाय छे [ ओ १२-१०-११ नी १ जे गणित १७-१४-१५ PART ।। श्रीअर्जुनपताका ॥ पंक्तिमाथी २० गण्या ] तथा बीजे पुणे १७-१०-१३ नी पंक्तिमाथी १७ जेटले १ न्यून ७ अर्थात् ६ गणीने ६-१-१३ मेळघता २० धाय छ ओ प्रमाणे [ ११-१६-१३ नी पंक्तिमा ] ११-[१ न्यून ६ अर्थात् ] ५-१-३ थी पण २० थाय छे. अर्थ-- रीते कोठामा रहेला अकोन छूटा पाख्या विना अथया छूटा पाडीने तथा अकादि अंक न्यून करीने अथवा अधिक करीने पण ओ यत्र २० सरया नो जणावनार , तथा याण अटले ६ नो अक अबु पण सून जाण अथवा सारयाद [१९-१३ नी पक्तिमा अक न्यून आठ करवायी अद अदले सात गणीने ते ७ नी आगळनो १३ अक उमेरतां ७-१३ थी २० थाय छे तथा [१२-१०-१८ नी पंक्तिमा ] १ न्यून २ अदले १ गणी तेमज अढारमा १ अधिक ८ अटले ९गणीने १-१०-९ स्थापवाथी पण २० थाय इत्यादिरीने सर्व स्थाने २० नी गणन्त्री सम्यकीते विचारची अने से रीते धणी घणी रीते करेली यत्रना गणितनी भावना सर्व कार्यनी सिद्धि करनारी होवाथी सोल कोठामा करेला घोत्रीसना यत्रनी पटे पिंशनियंत्रनी भावना पण जाणवी. ओ प्रमाणे आ विंशतियनमा ५ ना स्थाने १५ अने १९ नी भावना अक स्थाननी सिद्धि सातमा कोटामा गणेलीले अर्थ ते कारणथीज याण रूप वसु दिक दिक् ग्ये च राश्यादिषु से धो पण पाठ कोई कोई प्रथमा छे तेथी नव वस्तुओ ओम पण [ नव गृहोमा नय अकस्थानरूप ९ ओम पण ] काधु छे, मादे ते नव कोठाओमा मध्य मोठाना विषे दिर अटले १० नो अक स्थापयो, ते अफथी पण उचे ग्वे-आकाशमा अर्थात् १० नो अफनी उपर राश्यादिषु अदले १२ विगेरे अको स्थाप्ये छते ये यत्ररूप रोवर्यथी रक्ष्मी मात थाय'छे, अने, शष्ट विगेरे अनिष्ट पदार्थाची रक्षण थाय छे, अहिं रिपु अटले शत्रुओ, मारि अटले समकाळे घणा लोग्नु मृत्यू, तथा विश्व-म' जालना भय अटले भय अने हत्क्षोभ अटले चित्तनो भ्रम, तया- मकारना रोग, ओ मनो द्वन्द्वममास करता। मारवाद 4 प्रकारना विषयी अटले सर्प मिर सस्ति विगेरेपी (१५ . ' ५ ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ ६ - , तथा गुरुमुखात् अटले बृहस्पतिना मुखथी भारती अटले वाणी थाय के अॅनणेनो द्वन्द्वसमास करता लक्ष्मीरक्षणभारती अg चाक्य थाय छे अने [अहि सातमा गृहमां याण अटले जैश्वर्यार्थ १५, रक्षार्थे १९, विद्यार्थे १९ नो अंक स्थापयों, ] ते लक्ष्मीरक्षण अने, पाणी प्राप्त थाप छे तथा हे देवते अटले हे पद्मावती माता ! आ मंत्रोने रहस्योने गुरुमुखथी जाणीने यावत् व्याख्याथी निश्चय करीने ध्यायामि अटले हुं ध्यान करूं हूं अध्यायामि ५६ श्लोकमा कर्वा नथी तो पण अध्याहारथी ग्रहण कर ॥ इति काव्यार्थः ।। ॥विशतियंत्रे नवग्रहादि स्थापना ॥ अथवा खेचराः अटले नव गृहोने जेम यंत्रना नव कोठामा पूर्वादि दिशाओमा स्थापला होय छे, तेची रीते ओ अंकस्थानोने पण स्थापीने हे पमावती देवी ! हुं ध्यान करू छु ते ग्रहोनी स्थापना आ प्रमाणे:- मध्ये रवि शशी प्राच्यां । प्रतीच्यां मंगल स्थितः ॥ गुरुरीशे कविर्याम्ये । कोवेयाँ निश्रितो बुधः ॥ १ ॥ अर्थ-मध्यमा सूर्य, पूर्वमा चंद्र, पश्चिममा मंगल, ईशानमा गुरु, दक्षिणमा शुक्र, अने उत्तर दिशामां विंशति यंत्रने विपे] बुध रहेलो'हे. ॥१॥ मंदोवायोतमोवन्ही । नेरुत्याकेतुराश्रितः ॥ ग्रहाणामितिदिग् भागा । न्यस्यतेमुद्रिकादिषु ॥२॥ अर्थ:-वायुकोणमा शनि, अग्निकोणमा राहु, अने नैऋत्यमां केतु रह्यो के. ओ प्रमाणे मुद्रिका विगेरमा ग्रहोने ते ते दिशीभागमा स्थपाय छे ॥२॥ अध स्थलात् उपर्युपरि अंकधरणं कुंडलिन्यागत्यानागाधिष्टितत्वात् नीचेना स्थानी उपर लिनी गति प्रमाणे [ प्रदक्षिणा वर्तममथी ] अंकस्थापन धारणके से यंत्र ना - ॥ श्रीअर्जुनपवाका ।। (पद्मावती ते धागोन्द्रनी इद्राणी छे, अने धरणेन्द्र ते नागफुमार देवोनो इन्द्र छे, माटे नागाधिष्ठित) [ते नागराजनी साधकता आ प्रमाणे- इत पचफणोनाग-राजपद्माफणत्रयात् ॥ मध्येदशावतारोहन् । भानुतेजाः कविशंयुम् ॥ ३॥ अर्थ-हवे अहिं नागराज पांच फणावाठोरे, तेया दक्षिण दिशामा सूणे ५ नो अंक स्थपाय छे, अने पना [ पद्मावती ] ण फणावाळी रोयाधी ३ नो अक पण दक्षिणमा र्याजे सूणे [जमणे सूणे ] स्थपाय छे. अने ते यने फणाओनी उपर मध्ये दश अवतारवाळा श्री पार्श्वनाथ प्रमु रथा छ, तेधी ते घे अकोनी उपर मध्यमा १० नो अक स्थपाय छे सूर्यना तेज वाळो [ उपर १२ चाळो ] अने तेनी जमणी पाजु तथा डायी याजुले कवि-शुमा १६ जिन्दावालो होवाधी १६ नो अने ज्ञ-युध १+४= जिव्हावाळो होवाथी १४ नो अफ स्थपाय छे, अर्थात् जमणो बुध अने डापो शुक्रनो अक स्थपाय छे ॥३॥ नागकुलानां नयसख्या सिद्धव यदा हे देवते तय गोप्यानि यत्रस्थापना अयोजना यथा १७-२-१ प्रथमा ७१२-१ द्वितीया ७२-११ तृतीया एच ३ उपरि पक्तौ १४-० ६ चतुर्थी ४१०६ पचमी ४-०-१६ पष्टी एव ३ मध्यपक्तौ १५-१-१-३ सप्तमी १-८-१ अष्टमी १-५-१-१३ नवमी एव३ अधापक्तौ अत्र ६-८-३-१-१-१ एका ५९३-१-१-१ द्वितीया १९-१ इति स्थान द्वयादपि जायमाना विंशतिका ज्ञेया यथा पड़ना. (पइनवपचभ्या ऊना इति पडून वचनादेक कदान सिद्ध तेन १५ मध्ये पड्नता) १५ तदा ९ तत्र एकाक धरणे १९ १ पट्मएकोनत्वे पचयाम्या २ चतुर्पएकोनत्वेनय उदीच्या ३ कविपोडशादिः १-४-इति युध पचार्वि १ छमाथी १ न्यून करवा ५ नो अक दक्षिणमा २ चारमाथी १ न्यूनकरता ३ नो अक उसरमा ३ फवि १६ अर्चि जिव्हावालो छ, ४ व अटले घुघ ५ ओटले १-६ १७ १४ १. १८ छ माटे १४. ค์ :

॥ श्रीअर्जुनपवाका॥ सन प्रयोदशस्थान गतः १ मेलने २० एनान गण्यते विंशति चार विंशते रुपरि प्रयोजनाभायात् गर्व आयनत्ये ८ योजना अप उड्टरीत्या प्रथम पंगा योजना ७-४ पडून १५ शेप ९एवं २० प्रथमा १-१४५ द्वितीया १-४-१५ तृतीया ण्य तितः १२-०-८- चतुर्थी २-१०-८ पचमी १-१-१८ पष्टी यं३ मध्यपंक्ती ११-६-३ सप्तमी १-२६-३ अष्टमी १-६-१३ नवमी गला ८ नवउद्धरीत्या सर्वा १८ फोणे ३-१०-७ द्वितीय कोणे १-१० पड्न पपशशेषवं विशनिवार विंशतिकाः॥ अव १२-८ तथा ४-१६ तथा १४.३ तथा ९-२१ यद्वा १९.१ तथा ७-१३ दशस्थानेपि शून्यत्वात् एको- मत्वे ९-१९ तया पनसु कोनत्ये ४ परसुराकोनत्वेरएर ९-१०-१ यद्वार-६ दशरथाने ९ गवं स्थानद्वयजा अन्यापि विंशतिका शेया गंभीरायविषयात् पंचेश्य एवमेय गगामयार ग्रंथ कथिते नागकुन्दनी संग्पा नव प्रसिद्ध छे. अपया पभावती देवि! नव गृहमा [विंशति यत्रमा] नप अंक स्थाना गोप्यानि-रक्षण अदि २० नी करया योन्य अर्यात् स्थापया योग्य से. से गंगनी रथापना आ प्रमाणे- गणीनी पोजना आ प्रमाणे- अर्ध- २० नी गणग्री पति रीति) धाय ते आ प्रमाणे- [१७-१२-११नी पतिमाथी ] १७-२-१ अटी २०,७-१२-१ जेटले २०, भन ७-२-११ अटले २० प्रमाणे पाली पीजी ने श्रीजी से प्रणा राति प.तपा [१४-१०-१६ नी पंतिमा ]१४-०-६ जे घोधी रीति २०,४-१०- अटले २०७ पांचमी गति, ४-०-१६ अरल २० ओटी रीति, प्रमाणे प्रण रीनि मम्प पंकिनी पई तपा [१५-१८-१३ नी पंभिमां) १५.१-१-३ अटटे २० अ मालमी रीनि, १-१८-१ अटले २० मादीसनि. १-०-१-१३ अदरे २० नयमी रीति, जेममाणे प्रण पनि नापनी पंतिमा जागी अपना मालमा गृहमांना स्थाने १९ पण विषारी सारया के ५- नीमराना होवापी ६ शिधारी अं मो६-८-1-1-1-1 अटले २० पहेली रीति अन ११-१९ विचारी थे ती ५-९-२-१-१-१ पाजी रीति, नेमश १९-१ अंन्दे

२० ओ जीजी रीति ओप्रमाणे बीजी रीते ५
त्रण रीति जाणवी अहिं छेल्ली रीतिमा थे।
जाणवी तथा अहिं छ न्यून अटले छ नो .
पटू उन कहेवाथी । नो अंक स्थापयो मिद
१५ माथी छ न्यून करता ९ नो अंक आये ते
अक स्थापता १९ थाय छे त्यारयाद १३
थाय छे ते पीस अहिं न गणवा, कारणके
२० नी गणत्री करवानी होवाथी ते उपरान्त
ओप्रमाणे दीर्घ पक्तिथी नव रीति २० नी ।
[खे १७-१४-१५ नी पक्तिमा] उर्ध्व पक्ति
पक्तिमा छ न्युन १५ ओटले ९ गणीने ७-४-९
रीति, १-१४-५ ओटले २० ओ बीजी रीति, १-४-५
रीति जे त्रण रीति जाणवी
त्यारयाद पीजी मध्य उर्ध्व पक्तिमा [अटले
१२-०-८ अटले २० ओ चोथी' रीति, २-१०-८ अटले
रीति, १-१-१८ ओटले २० मे छद्दी रीति, '
पक्तिमा पण भ्रण रीति थई
[त्यारयाद ११-१६-१३ जे त्रीजी उर्ध्व पक्तिमा ।
२० ओ सातमी रीति, १-१६-३ अटले २० भे
५-६-१३ ओटले २० ओ नवमी रीति, जे नव रीति उर्ध्व पथि
जाणवी अने प्रमाणे नव आयत रीति अने-नय .
मळीने १८ रीति थई ।
तथा अक खूणाथी पीजा सूणानी पंक्तिमा [विदिशिक
१३-१०-१७ नी पक्तिमा ] ३-१०-७ अटले २०
नया [१६-१०-११ नी पक्तिमा ] छ न्यून पदर अटले ९
१-१०-९ ओटले २० थे वीममी रीति ओ प्रमाणे २०
श्री जाणाची

अपूर्व चमत्कार ? पूर्वगत गुप्त महाविद्याओं का भडार "
रिचारन महानिधि [ दशपूर्ववर भगवान श्री भद्रगुप्ताचार्यकृत भागतर र १०
हिन हम अपकी तारीफ विषयमें क्या लिखा नाय, जाकि इमकामा ५ .
मानसेही प्रकट हो रहा है। न्योछावर २५ रुपये
_म अनेक प्रकारको पूर्वगत गुण विद्याहि नो थोटासा श्रम करनपरही आ नमक
यताता है किननीक ग्यिा एमा है जो पढ मे सिद्ध होजाताई में पाठक महानुभागका र
नोग्न करताह कि इस प्रथकी एक एक प्रति अपग्य करें और इसके चमकारका
यर पहना कोई अतिशयोकि नहीं होगा कि यह इसजगती तपर अपनी दशानी 7.3}
बंटी सांभाग्याकी बात है की शासन देवकी टपाम त सात्ती भी सलाम होने आई।
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ज्योतिष शास्त्रका अदभुत नमुना !
जिस प्रकोरिय जनता विचार करनीया यी योगीपशास्त्रया सगा अदु चुडामणी
मारमटीक आन निमरा आता पके नयार है मूल कीमतर ३३ भेटकी कीमत स.१॥
सिपम आपको क्या मिटेगा तिपा मार । पुरे हुये प्रोक इत्ता।
गुप मानिन्थ वर्तमान की बात जाननेवी चाया। ममा करनस आपको मर
रानमा मिलेगा आप य म प्रमशाग तमाम चरा मार जागे
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उपमर्गहरस्तांत्र यंत्र
गो गो गो पारमे प्रयाया दी
ट, सो ? मामि it में राम, दामन पाप या माग
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IT रिमोद शटमित

1 कितना सुंदर कायम द्विानी मिठी मापा!!! चरप्पर चरिंग- II गुरका इस यि ग्यि मे का प्रामा कर आपही दवाय प्रगान ३:" रम प्रथा र समह को उस प्रयो॥ नि गरे १२ मा जादा जमरा नहीं मुर किमा ३ पिन नमा । 1 अगर आपकामा । 10 वटन देखनको इच्छा होतो सि एयदा युक्तिमा (7 TMA {" पर ख ग प्रथम धर्मका नहातहास F । दूनाम किया है कना कवि पाय मा मुल मिमन २रु भेट किमत १२. ( अदभुत चीज विचित्र स्तु) सुप खबर वासनाम+1 सिपागानगी [ नारारमे लाग यह यहा करते है की "मिरवाया फरंगा स्टा राजा" जिमरा हमने गहा परिमार माह सो शिविर मरमे मनित करके पास गर्ने बालोंकी गलाबा रिटी होना बरणमा यह अपने दगी एक है, तथा इमरे प्रभावसे गासभाम मा, मोमें रिजय प्रापि, मा पिशाचादिपोरा टपात नष्ट, ३६० अमोगापर माप देशर गफ मरिनार जाधरी नीरपर बीचमे रखरो या मा गमें हर ण आकाश र मी यह सिपाडमीगी अपने टगक योगाधा राग हापातादी नामरा व वृक्षका का जादखने में साक्षात हातके अगुलियोंसे घेरित है दश हभिकी स्मित प्रन्हिात चार आना है दो हायसे दश हावतकका मिला। कमसेकम दो हाया जाता है याहामें दश हावार जो उडेही परिश्रमसें प्राप्त दुवार प्रवृतिशी जो वृक्षोम रेमे २ फल लगते है यह वृक्ष कामरूप देशमें होता है एफ डीमें मत्रमे मनित करक जिमके नामम कह रखये यस वह पश हो जायगा दश हातका बहुत जन्दी काम करता ह तरसीव मायमें भेनी जाती है नोट -दाग जोटी जोर मियाल सिंगी इन प्रभारशाली वस्तुओने जनतामे बहुतहा बुम मचाइ है इन वस्तुओंको टपरा उपरी मागणी आसे नयास्टॉफ मगवाना पड़ा शकई' प्रमाण पत्र जाये है आर उनकी मुल कीमत मे बहनदी , यम मिमन रता है आपभी. । जरूर उपयोग करे ॥ श्रीअर्जुनपताका || ६५ वळी अहिं पीजी रीते पण १२-८ ओटले २०, ४-१६ अटले २०, १७-३ अटले २०, ९-११ अटले २०, अथवा १९-१ अटले २०, तथा ७-१३ अटले २०, तथा दशमां शून्य होवाथी ओक न्यून करतां९याय ते ९-११ अटले २०, तथा पांचमाथी ओक याद कर्ये ४, अने उ माथी ओक याद कये ५ आवे, जेथी [५१४९] गणी ९-१०-१ अटले २०, तथा दशना स्थाने [शून्य रोवाथी अफ बाद करतां नव गणीने ५-६-९ जेटले २०, ओ प्रमाणे येथे अंकम्यान मेळवीने गणाती पीजा प्रकारनी २० नी गणत्रीओ पण थाय छे ते यथा योग्य जाणवी. गंभीर अर्थना विपयवाळी होवाथी गंगाप्रवाह प्रथमां कहेला आ चीसना यन्त्रमा प्रमाणेज गणत्री गणवी. राजन्महेभे ८ निधिभि ९ त्रिलोक्यां ३। राज्यंभुजाभ्यां २ लभतेश्व ७ चक्रः ।। शिवं ११ दिशा १० मन्धि १ जयारसढयां। ६-५ नरोत्रयंत्राविहरजिनानां । अर्थ:-विराजता या महान हस्ति ओ घडे [ अहिं हस्ति ओटले यंत्रपक्षे ८घटे] नया निधि बडे (९ बडे ) अण, लोकने विपे मुजाओ बडे [२ पडे ] अने अन्च [ अटले ७ ना] समूहबढे शिव-११ दिशा-१० भने अन्धि-४ मा विजयवाळू रस-६ सहित अथवा रस-५ सहित अया गज्यने पीसविरमान जिनेश्वरोना आ विंशति यंत्रधी अहि-आलोकमां मनुप्य प्राप्त करे से [अर्थात् ८९-३।२-७-११ । अने १०-४-६ अथवा * से प्रण पंक्तिगत अंकस्थानो रूप पसि चिहरमानना पिंशनि यत्र पदे मनुष्य आलोकमा राज्य प्राप्त करे ऐ.] इति यत्रे सर्वत्र एकक लेखने योजना ज्ञेया ।। से प्रमाणे यंत्रमा सर्यघ १ नो अंक म्पापयाथी मे विशनि यंत्रनी योजना जाणपी.

।। श्रीअर्जुनपताका ॥
भाप्रमे जुम्मा मस्जीदके प्रवेश परत जमना हायके दर्गापर
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- ॥ श्रीअर्जुनपताका॥' श्रीशीतलनाथजीका मदिर सुरत सिध्यचक २ ९ २ ७ १० ६ ६ ६ ९ १ ८ ३ ४ 4 ३ ४ ८ ७ बगदाद शरीफ महयुवमियाके ९ ४ । ॐ ७३ १२ द ६ १. १ ३ ८ ५ ॥ भीअर्जुनपताका॥ ४ ४ ८ ५ , क्वचितस्थानद्वेतात् क्वचिदपिच कोप्टत्रितयतः । समस्ताव्यस्ताद्वा कचिदपिकतो वोन करणात् ।। अभूत सरया विशत्यत्पनुगममयी विशतिमिता। ततस्तस्या पद्मोदितमपिचयन विजयतात् ॥१॥ अर्थ- प्रमाणे कोई वखत घे स्थानथी (ये गृहोमा रहेला पे अक- स्थानोथी, ) कोई वपत व्रण गृहमा रहेला भ्रण अस्थानोथी, कोई वखत सपूर्ण अकस्थानोथी, कोई बरसत व्यस्त (अपूर्ण) अकस्थानोधी कोई बग्वत आदि अधिक करीने, अने कोई वक्त छ आदि न्यून फरी पण मेळवता विंशति यत्रने अनुसरनारी २० नी संख्या प्राप्त थाय छे, ते कारणथी ते विंशति सख्यानो पद्मावती देवी) कहेलो यत्र पण विजयवत चर्ते छे ॥ १ ॥ वाचकेघविजय- विंशत्यत्रसुसूत्रितम् ।। श्री वीरपार्श्वयत्पद्मा-नुभावादस्त सिद्धिदम् ॥ २॥ अर्थ -अ प्रमाणे श्री वीरमभु अने पार्श्वप्रभुना तथा पद्मावती देवीना प्रभावधी श्रीमेघविजयजी उपाध्याये जे आ विंशति यंत्रनी सूत्रणा [रचना] रची ते विंशति यत्र सर्व सिध्धिने आपनारो थाओ ॥२॥ इतिश्री पद्मावती स्तवन कथित विंशति यत्र प्रतिष्ठा ॥ श्रीरस्क्त श्रीमर्नुनपताका ।। Leappm ॥विंशतियंत्र प्रतिष्टा ॥ ओप्रमाणे पद्मावती देवी ना स्तोत्रमा कहेला विंशति यंननी प्रतिष्ठा [अरु स्थापना अथवा अंक गणत्री ] समाप्त पई. ॥ अथ शुद्रोत्तमा अष्टमी गतिः ॥ विंशतियंत्रस्य । अधित्रि ३, सिद्धि ८ नव ९ वाणपकुरा रनगां ७६ । प्यकं क्रमेण विलिखेत्खलु-शुद्र लक्ष्म्यै । एपेव यावनिक यंत्रकृताप्रतिष्ठा । स्यादप्टमी विजययंत्रवरेविशिष्टा ॥१॥ •अर्थ:--अन्धि-१, त्रि-३, सिद्धि-८, नव-९, पाण-५, कु-१, दृग-२, नग-५, अंग-, [४-३-८-९-५-१-२-७-६ नंपरवाळा ] कोठामोना प्रामधी २ आदि मक निश्चय शुद्रनी लक्ष्मीने अर्थे देखवा, अने ओज सामयाळी यवनना विंशति यत्रनी स्थापना ‘पण करी तो ते आ आठमी गति आ श्रेष्ठ विजय यंत्रमा अति उत्तम कहेली,हे. (शुद्रोने माटे अति उत्तम है)॥१॥ अत्रापि विंशतिमिता ननु योजनाःस्यु- स्तामुग्धोधविधये परिशीलनीया ॥ रुदा ११ रसा ६ सय ३ इति प्रयमा १ भूपा १६ । रामा ३ पराकु १ रस ६ विम्व २३ पदेस्तृतीया ॥२॥ . १ " १ आ दोघम विंशति पंको पन मापाने ११ IF स्थापना ५ वियत्र रने है, ७० ।। श्रीअनुनपताका ॥ अर्थ:- आठमी गतिवाळा यत्रमा पण यीमनी योजना [गणत्री] जे रीते थाय छे, ते रीति मुग्ध जनना योपने अर्थे कोया योग्य छे, त्या प्रथम ११-६-३ मे प्रथम रीति, त्यारयाद कु-१, भूप-१६, अने राम ओ रीते १-१६-३ नी पीजी रीति, त्यारगद कु-१, रस-६ अने विश्व-13 ओ रीते १-६-१३ ओ नीजीरीति जाणवी ( चणे रीते २०थाप छे) ॥ अर्का १२ भू • वसुभि ८ पक्ष २- दशे १० भै ८ _ १ कु १ धृत्यतैः १८॥ भू १ शैल ७ भू १ कृते ४ व १ गै६-- रिदु १ शक १४ रसे ६ पुनः ॥ ३ ॥ अर्थ' तथा १२० ८ ओटले २० से चोधी रीति, २-१०-८ ओटले २० से पाचमी रीति, १-१-१८ * अटले २० मे छटी रीति, [से भ्रण रीति, १२-१०-१८ नी पीजी पक्तिमा धाय छे ] तथा [ १७-१४-१८ नी घीजी पक्तिमा] १-७-१-४-१-६ अटले २० ओ सातमी रीति, १४-६ ओटले २० ओ आठमी रीति, ॥३॥ भू १ सिंधु ४ दिवस १५ पंक्ता-वायतत्वेनवाप्यमूः॥ उद्भवेशिव११हक् २ शैले-कार१२मुनिभिस्तथा ॥४॥ अर्थः तथा १-४-१५ अटले २० से नवमी रीति, अ प्रमाणे आयत [आडी-दीर्घ पक्तिओमा नव रीति थाय छे, वे उर्ध्व पक्तिनी रीते (११-१२-१७ नी पहिली पक्तिमा) ११-२७ ओटले २० ओ पहेली रीति, अने १-१२-७ अटले २० ओ पीजी रीति.॥४॥ or १४ अ चाल गणाती रितीओ आ यनमाथी गणवी. * कुकृत्युतै. अ पदमा कु-१ ते धृति-१८ उतै' सहित वो अर्थ छे जेथी भू कु धृत्यु अटले १-१-१८. २ अहिं ६ अने ५ नी सदृशवा गर्णाने २० नो अक गणवो.

www भू १ राम ३ १ दिने १५ स्ने ३ क १-कला रोगका ।। श्रीअजुनपताका ॥ भृमी १ दु १ धृति १९ भिश्चात्र-सावपत्ति यद्वैककत्रयेभेद स्पष्टासी १७ परिपूर्यते ॥ ५॥ व अर्थ:-तथा १-१-१८ अटले २० ओ श्रीजी रीनि अहिं। गण्या ते ७ अने ८ नी साशता विचारीने गया . पंक्तिमा १ अकना त्रण भेद [ ओटले त्रण अकामनामी करवा, अटले १-१-१-१७ ओटले २० ओम पण गावा कला १६ भू • वार्धि ४ भिवांग :- दश १० सिधु ४ निमीलनेः ।। पट ६ व्योम ० मनुभि १८ विश्व भू १ भ्यंगे ६ ५ १ धृती १० अर्थ तथा ( १६-१०-१४ ओ बीजी उर्घ पक्तिमां) अबोधी रीति, ६-१०-४ ओटले २० ओ पाचमी दि. res छटी रीति २० गणवा. [ पुनः १३-१४-१५ निर्ग] १३-१-६ अटले २० ओ सातमी रीति, तया ! आठमीरीति ॥६॥ त्रि ३ दशां १० गै ७ रेक १ दश १० नवमि अहन नव ॥७॥ ३ पड्न पंचदशत शेपे नवयतोमता ॥ यद्वैकोनापद् ६ च पंचे-कोनाः पंच ५ चतुर्मिनाः १ ॥

७२ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ करता ९ आये ते गणवा अथवा अफ न्यून छ ओटले ५ अनेक न्यून पाच अटले ४ प्रमाणनो अंक आयो, ॥७॥८॥ योगे चतुर्णा पंचाना-नववागो ९ब्ज १ धारणात् ॥ एव विशतयोविंश-प्रमाणाइह जज्ञिरे ॥ ९ ॥ अर्थ:- ओ रीते पण ४ अने ५ ना योगे ९नो शंक जाणयो ते साये अकनो अक स्थापयाथी १९ याय, रीते घीस प्रकारनी वीसनी गणत्री अहि थई ॥९॥ देव्या पद्मावत्या भगवत्या स्वप्नकथित यंत्रस्य । संवादार्थ विवृत वाचक मेघादिविजयेन ॥१०॥ अर्थ. भगवती पद्मावती देवी स्वानमा कोला आ विंशति यत्रना संवादने अर्थे [गणिती रीति प्रगट करवाने अर्थे ] श्रीमेघविजयजी उपाध्याये जा यत्रनु विवरण कर्यु ॥ १० ॥ भवति नानायत्राणा गतय स्तेन रिशते ॥ यत्रे शठकृताक्षेप विक्षेपायोद्यमोप्यसौ ॥ ११ ॥ अर्थ -यळी विंशति यत्रधी वीजा पण अनेक प्रकारना यंत्रोनी गतिओं [तिओ] प्राप्त थाय छे ते कारणथी, तेमज आविंशति यत्रमा मूर्खज नोयडे फरता आक्षेपोने दूर करवा माटे पण मारो आ उद्यम छे ओम जाणवु ॥११॥ इति विजययत्राष्टम गत्यायवनमत विशति यत्रप्रतिष्टा ॥ ओ प्रमाणे विजययननी आदमी गतिवडे यवनना मते विंशति पननी स्थापना दर्शायी ॥ इति ।

॥ श्रीअर्जुनपताका । m ॥ अथ ग्रहोपरिशकुनम् ॥ आइच्छेनस्थिलाहो । सोमे रिद्धीय मंगलेमरणम् ॥ बुध गुरु सुक्के लाहो । सनिराहूरोरवं भरणम् ॥ १॥ अर्थ:-विंशति यंत्रमा सूर्य होय तो लाभ न थाय, चंद्र होय तो ऋद्धि माप्त थाय, मंगल होय तो मरण माप्त थाय, बुध गुरु शुक अ व्रण होय तो लाभ थाय, अने शनि तथा राहू होय तो रौरव [भयंकर मरण थाय ॥१॥ बुधे चंद्रोतरे मार्गे-समीपे गुरुशुक्रयोः ॥ भौमे खो तथा दूरे । आपदाहु शनैश्चरे ॥२॥ अर्थ:-बुध अने चंद्र होय तो अतरे- समुद्रमा प्रयाण धाय, गुरु अने शुक्र ममीप होय तो मार्गमा प्रयाण थाय, मगळ अने सूर्य होय तो दूर देशमां गमन धाय, अने राहु तथा शनि होय तो आपदा प्राप्त थाय. ॥२॥ आदित्ये दृष्टि दोप स्यात् । सौमे शरीरसंभवः । भौमेच डाफिनीदोपः । गोत्रदेव्यायुधेपुनः ॥ ३ ॥ अर्थ:-पुनः सूर्य होयतो द्रष्टि दोष थाय, चंद्रहोर तो शरीरसंबधि दोप माप्त थाय, मंगल होयतो डाकिनी दोपथाय, अने बुध' होयतो गोत्र देवीनो दोप प्राप्त थाय ॥३॥ गुरोचक्षेत्रपालस्य । शुक्रेचजलमातरः ॥ शनैश्चरे भूतदोपः । पितृदोपश्चराहुजः ॥४॥ अर्थः गुरु होयतो क्षेत्रपालनो दोष प्राप्त धाय, शुम होय तो जलदेवी नो दोष गणाप, शनिहोयतो भूतदोप, अने राहुथी पितृदोप प्राप्त थाय ३॥४॥ इ गानम् ॥

७४
॥ श्रीअर्जुनपताका |-.
२०
१३
.
१२
११
१७
१९
१६
१६
१४
१३
१६
१२
१५
१८
१९
प्रााणे उत्तम
क्षत्रिये उत्तम
वैश्ये उत्तम
२.
२.
१६
१५
१३
११
१३
१
१८
१.
१४
१२
१८
१.
१५
१८
។
१९
क्षत्रिय मध्यम
शुद्ध उत्तम
माह्मणे मध्यम
२०
२.
१५
१८
१८
१२
१.
श्य मध्यम
शुद्धे मध्यम
अथकेचिदिदं यंत्र । विंशतेर्गतिभेदतः ।।
पाहुः श्रीवाहुवल्याया-मुनयोनयकोविदा ॥१॥
अर्थ'-रये नय ना ज्ञानीओ ओवा याहुयली आदि केटलाफ मुनीओ आ
विशति यत्रने गतिमेदधी (पीजी कोई जूदीज गणत्रीथी) करे छे ॥१॥
युक्त तदुकमास्थाप्य । तदत्रैवप्रपच्यते।
यत स्यात्सुदृशालक्ष्मी-नानामनिनश्वरा ॥२॥

, - ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ - , अर्थ:-ते पण तेमनु कहेषु युक्त छे, माटे तेमना करेवा प्रमाणे ते गतिभेदी पण विशति यत्रने हं विस्तारपूर्वक कहुं छु के जेथी साम्यम्- हटी ओवा जैनोने अविनश्वर अवी मोक्ष लक्ष्मी प्राप्त थाय छे. ॥ २ ॥ वांछात्रिभक्त फलपचम् ५ वन्हि ३ पटक ६- आया १ष्ट ८ कोशगतिरत्रसुधांशुवृध्या ॥ रूपोनितंगुण ३ फल मुनि ७ वेद ४ नद ९- नेत्रे २ पुतल्लिखिततो नवकोप्टयंत्रम् ॥ ३ ॥ अर्थः-इष्ट राशिने घणो भागतां जे जवाय आवे ते अंकने पंचम अटले पंचमा गृहमा [ मध्यगृहमां] स्थापवो, अने त्यारवाद त्रीजा छटा पहेला अने आठमा गृहमा अनुक्रमे अंकेक वृद्धिथी अंक स्थापता जवू, अने अने सातमा चोथा नवमा अने वीजा मे चार गृहोमां अनुक्रमे [ मध्य- स्थापित अंकथी । ओकेक न्यून करवाथी जे व्रण जवाब अंथी आवे ते अनुक्रमे स्थापना अने चायो जवाय अकधी न आवे तो ० शून्य स्थापवी मे प्रमाणे नव कोठानो यत्र लखवो ॥३॥ पोडशादिके विशेष परन्तु १६ आदिना यंत्रमा जे विशेषता छे ते दर्शावाय छे इष्टराशेस्तृतीयोशः । पंचोनः ५ स्याद्वितीयके । रूपा १ धिकोऽश्वे ७ पप्टे ६ च । क्रमाप्तादेकवर्धनम् ॥ ४॥ अर्थ:-इष्ट राशिना श्रीजा भागमांधी पाच याद करता जे आवे ते वीजा कोठामा स्थापयो त्यारयाद सातमा कोठामा [बीजा कोठाना अकयी ] १ अधिक स्थापयो, तेमज छट्ठा कोठामा पण अनुक्रमे प्राप्त थयेला अस्थी [सातमा कोठाना अंकथी] १ अधिक अंक स्थापवो ॥ ४॥ त्रिभागेचैकवृद्धोस्या-द्वयेऽधिके वयाधिकः ।। क्रमान्मध्येतथेशाने। कौवेयांसदवाधिकः ॥५॥ , ७६ ॥ श्रीअर्जुनपताका॥ अर्थ -ओक वृद्धिबाळो त्रिभाग होय अथवा तो ये वृद्धियाळो विभाग होय तो ते अनुक्रमथी मध्यमा तथा इशान कोणमां बे अधिक सहित अक स्थापवो ॥५॥ क्रमेणग्रोचवारुण्या-मकवृद्धिविधीयते ॥ एवयथेष्ठयत्राणि । जायंतेनवकोशके ॥६॥ अर्थ: स्यारपाद अनुक्रमे अग्निकोणमा अने पश्चिम दिशामा अंकवृद्धि करवी, ओ प्रमाणे नव कोठाओमा इष्टराशिवालो कोहेपण यत्र बने छे ॥६॥ अत्राप्येकाधिकोमत्वे । स्वत्वात्पंचपडकयोः ।। समाधानं नशंकात्र । सारूप्यायावनेमते ॥७॥ अर्थ -अरि पण अक अधिक अथवा अक न्यून अकधी यंत्र पेसतो होय तो पाच अने छ ना अकमा सरखापणु गगीने समाधान करवु [ अटले गणित परार मेळवयु ] अने से पायतमा शका न करवी, कारणके यवनीना मतमा [पण पाच अने छ नु सरखापणु स्पष्ट रीते कोलज छे ॥७॥ ७ . ६ २ ४ २ Y ३ ५ ७ ३ ८ , ९ १ १४ १ 1 . २ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ ७७ ८ १० ८ १ ८ ३ ६ ९ ३ २ १० २ ११ १७ १८ V १ १ ८ : ३ ३ . १० १० ३ २ १२ १२ . २ २० २. ३ १५ १२ ६ १५ १२ ९ १४ ११ १४ ४ १ ८ १४ ८ ११ ७ २६ १३ ६ १३ ६ ८ १४ . १५ ११ ८ १५ १२ ८ ११ १७ १० १७ ३४ ३५ १४ १९ १८ २३ १३ ११ १५ १३ १८ २० २२ १२ २२० १६ २४ १७ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ अथाष्टं ८ दु १ पड़ ६ षन्हि ३ वाणा ५ द्रि ७ वार्षि ४- गृह ९ द्वी २ तिरीतिर्विशामुत्तमासौ ॥ तयास्थाप्पते विंशतेयंत्रमत्र । यथादेविपद्मावती संस्तवादो ॥१॥ अर्थ:-हवे आठमु परेल छटु श्रीजु पाचमु सातमु चोथु नवमु अने पीनु से अनुममधी नय गृहमा [कोठाओमा ] अस्थापना करवायी ओ विंशति यत्र वैश्योने माटे अति उत्तम काप्यो छे, अने ते जेवी रीते पद्मावती देवीना स्तोत्रादिकमा विंशतिनो यंत्र [पैदयोमाटे 1 दर्शाव्यो छे तेवी रीते अहिं पण ते यत्र स्थापनो ॥१॥ते आ प्रमाणे- २ ९ ४ V ७ ४ ८ ८ वारुणी ८श १ यमा ६ ग्न्या ३ शा- मध्य ५ वायु ७त्तरा ४ दिशि ।। पलाद ९ शक दिकोशः। स्यात्पचदशयत्रकं ॥२॥ १ अ कोठाओमी अनुक्रमे १-२-३-४ ५-६-७८९ अको स्थापन करवायो १५ नो यत्र पने छे, अने २३४-३-७८९-१०-११ स्थापवाथी २० नो यंत्र पने छे. २ से पदरना यत्रमा विचारी तो श्लोकमा जे गृहोनो क्रम ८१-६-३-५-७-४९-२ कोठामोना नबर प्रमाणेनाब अक पश्चानु पूर्वी उलटा क्रमे आवेला छे ॥ श्रीअर्जुनताका ॥ ७९ । अर्थ:-अहिं आठमा पहेला छहा त्रीजा पांचमा सातमा चोथा नवमा अने धीजा ओ गृहोमां अनुक्रमे [१-२-३-४ ५-६-७८९] अंको स्थापवाथी १५ ना अंकवाळो यंत्र बने छे ॥२॥ यंत्रे पंचदशानांत न्मध्ये पंचकलेखनं ।। अष्टादशानांयंत्रांतः । ततः पट्टः प्रतिष्ठित ॥ ३॥ अर्थ:-ते कारणधी १५ ना यत्रमा मन्यकोठामा ५ नो अंक लखवो, अने तेथी [ अथवा त्यारवाद] १८ ना यत्रमा मध्यकोठामा ६ नो अंक लम्बाय छे ॥३॥ एक विशतियंत्रस्य । मध्यसप्तक एवतत् ॥ अंकास्तत्रैकादशातः । द्वादशान्तः मृपाततः ॥ ४ ॥ अर्थः-अने ते कारणधी २१ ना यंत्रमा मध्यकोठामां७ नोज अक स्थपाय छे, अने त्यारयाद अंकस्थापना [त्रणथी ] ११ ना अक सुधीनीज स्थपाय हे, परन्तु जेओ १२ना अंक सुधीनी स्थापना कहेछे ते मृपा-मिथ्या छे॥४॥ विशतेनत्रिभिांग-स्तेनाष्टदशयत्रवत् ॥ सिद्धिकोशेद्विकंदत्वा-यंत्रमार्गसमाश्रयेत् ॥ ५॥ अर्थ:-चळी २० ना अकनो चीजो भाग यतो नधी [कारणके शेप वधे छे, ] माटे १८ ना यंत्रवत् आठमा कोठामा २ नो अक स्थापीने त्यारयाद यवना मार्गनो (यंत्र गतिनो) आश्रय करी अक स्थापता जवु ॥५॥ चंद्रकोशेत्रिक पष्टे । कोशेपि चतुरोधरेत् ॥ पद पंचवाग्निकोशस्था । ऐक्यान्मध्येतुसप्तकः ॥ ६ ॥ अर्थ-हते यन्त्र मार्गनो आ प्रमाणे-] पहेला स्थापया, छक्ष पेवा, अग्निकोणमा रहेला - .

॥ श्रीअर्जुनपताका॥ अथवा ६ से पन्ने अक सहश गणीने स्थापना, अने मभ्य कोठामा ७ स्थापचा ॥६॥ वायावष्टनवोदीच्य । निधोदशद्वितीयके ।। कोशेएकादशस्थाप्या । एतद्यनहि विंशते ॥ ७॥ अर्थ -चायुकोणमा ८, उत्तरमा ९, नरमा कोठामा १०, अने घीजा कोठामा ११ स्थापना, ओ प्रमाणे पिंशति यत्र [वैश्योमाटे Jथयो॥७॥ यद्येक विंशयत्रेपि । आदिरेकादशातक ॥ अकन्यासो विंशतेस्तत् । यत्रेके द्वादशातता ॥ ८॥ अर्थ-जो २१ यत्रमा पण प्रणयी अगिआर सुधीनाज नर अंक स्थापना आयेछे, ते तो विंशति यत्रमा तो पारसुधीना अके आवेज केवी रीते ? [ कारणके २१ थी तो २० नो पर १ न्यून अफवाळो छे ] ॥4॥ तत. पचदशादियत्राणि ४ १ ४ २ ५ १ १६ ३ ४ ४ U ७ २ २ १८ ३ ३ ८ २ ७ ९ Y ६ १. ६ ८ २ १. ११ २ U ८ १३ १ ६ ११ ६ २ १० ८ ७ १६ ४ १२ २१ १ पूर्वे कहेवायला विंशति यरमा जे ७ आदि अंको स्थाप्या , ते अशेने म्पने ॥ श्रीअर्जुनपताका ।। ८१ २० पश्योत्तमा प्रामणोत्तम २. * ३-११-५ इत्यादि विंशति यन पैश्यमा उत्तम छे १३ शुदोत्तम आ पभापती या छे सप्तको विंशतेयत्रे । मध्यभागे प्रतिष्टित ॥ तत्योडशनवस्थाने । दशस्थानेश्वयुग ७ दश ॥ ९ ॥ एकादशककोशस्था । अष्टादशततोधृताः॥ सप्तवृध्यैतिकोशानां । त्रययत्रेऽत्र सूत्रितम् ॥ १० ॥ अर्थ:-विशति यंत्रमा ७ नो अंक मध्यभागमा रहेलो छ, नेत्री नवना स्थाने १६ अने दशना स्थाने १७, अने कोठामा अगिआर आला होय तो तेने स्थाने १८ स्थापना, ओ प्रमाणे आ यनमा व्रण कोठा सात 'सातनी घृध्धि स्थापवा कया छे ॥९॥१०॥ अटले ते अकोने बदले स्थापना, परतु " ते अकबे कोठामा बे, कोठामा " स नहीं.

८२ ॥ श्रीअर्जुनपवाका ॥ सप्ताधैनत्रिकेणापि । योजने स्थानकत्रयी ।। सप्तस्थानेदशन्यासान्देकादशतदष्टके ॥ ११ ॥ अर्थ: -तथा सातवें अर्थ त्रण [साडात्रण तो पण पूर्ण अंकनी आपेक्षा श्रण ] छे, ते घणनी योजना पण व्रण स्थानोमा T-त्रण कोठामां करवी. जेथी सातना स्थाने १० स्थापवा, अने आठना स्थाने ११ स्थापया ॥११॥ वाणपङ्कपदेन्यस्ते । नवकेशेपमप्यत.॥ द्वित्रिचारुचतुपाना । स्थानेप्यकास्तएवहि ॥ १२ ॥ अर्थ तथा पाच अथवा छ ना स्थाने ९ स्थापवा, अने ये प्रण तथा मनोहर अक जे चार मे व्रण अक ना स्थाने तो अना ओज अक रऐवा देवा ॥१२॥ सर्वत्रप्येककोधार्यः । परमेश्वरवाचकः ।। इतिपद्मावती यत्रे । नवकोशाइमेऽभवन् ॥ १३ ॥ अर्थ:-चळी जे सर्व कोठाओमां परमेश्वरना अर्थवाळो १ नो अक स्थापन फरवो, अ प्रमाणे पद्मावती यत्रमा [ पद्मावती देवीना बीसवा चालीसना यंत्रमानव कोठा र्थया॥१३॥ मध्यात्सप्ताष्टचद्रागे-काधिक्यंचतुष्टये ॥ कोणाटकरभुजश्रामे ३ पु । पुनरेकाधिकाक्रम ॥ १४ ॥ २ पद्मावती यत्रनी स्थापना आप्रमाण १६ १.

॥ श्रीअर्जुनपताका || , अर्थ:-[जे उपर कहेली अंकस्थापना आ प्रमाणे-] सातमो आठमो पहेलो अने छट्टो ओ प्रामवाळा चार कोठाआमा मध्य अंकथी अनुक्रमे अकेकनी धूध्धिो अक स्थापना करयी (१०-११-१२-१३ अको स्थापया,) अने त्यारवाद घोधा नवमा धांजा अने त्रीजा ओ चार कोठाओमां पण स्यांची आगळ [ १३ थी आगळ ] अकेक अधिक वृधिले अको स्थापना . [अर्थात् १४-१५-१६-१७ अंको स्थापना. ॥१४॥ आद्यानयेऽधिकेतुर्यः । षष्टात्रयेधिकनिधिः ।। मध्यात्रयेधिकेप्याय. । इत्थंकोशात्रयाधिकाः ।। १५ ।। अर्थ:-से प्रमाणे अंक स्थापना करवाथी पहिला कोठामा जे अंक आव्यो छे, तेथी त्रण अधिक वृध्धिवाळो अफ चोथा कोठामा आवे छे, अने छट्ठा कोठाना अंकथी व्रण अधिक नवमा कोठानो अक आवे छे, मध्य कोठाना अंकथी व्रण अधिक पहेला कोठानो अंक आवे छे, ओ प्रमाणे व्रण कोठा प्रण प्रण अधिक अकवाळा छे ॥१५॥ आद्यात्पंचाधिका:द्विष्टा-मुने ७ पंचाधिकाःकृते ४॥ सिद्धे ८ पंचाधिकानदे ९ इतिपंचाधिकात्रयी ॥ १६ ॥ अर्थ:-तथा पहेला कोठाना अंकथी पांच अधिक अंक पीजा कोठामा रयो छे, अनेसातमा कोठाना अंकथी पांच अधिक अंक चोथा कोठामा आवे छे, अने आठमांथी पाच अधिक अक नवमा कोठामा आवे छे, ओ प्रमाणे त्रण कोठाओ पांच पांच अधिक अंकवाळा छे ॥१६॥ भूविधाकाआद्यकोशे । तदधाक्षणचंद्रभाकू ।। तदधश्चंद्रष्टथिवी-त्यके कोशत्रयीभृता ॥ १७ ॥ अर्थ:-त्यां पहेला कोठामां भू-१ अने विश्व-३ अटले १३ नो अक स्थपाय . १ पचदशपत्रात् २० यत्रे पचाधिकत्वाद. * आपत् अटले पदरना यरथी-इतिटिप्पनिकाया.

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ छे, अने तेनी नीचे क्षण-६ अने चद्र-१ अटले १६ नो स्थपाय छे, तेनी नीचे चद्र-१ पृथ्वी १ ओटले ११ नो अंक स्थपाय छे, अ प्रमाणे व्रण जातना अंक स्थानो वडे [ १३-१६-१७ बडे ] ऋण कोठा (पहेली अघ पक्तिले व्रण कोठा) भरायला-स्थपायला छे ॥ १७ ॥ युग्मैकधरणसिद्धौ । व्यस्ताःसख्याकमात्परे । एकादशेभ्यःपरतो । यथायुग्मेकमाहतम् ॥ १८ ॥ अर्थः-तथा [ सिध्धमा] आठमा कोठामा युग्मैक ओटले १२ नो अक स्थापयो, त्यारयाद आगळ आगळना [वामावर्तना] क्रमधी अकेक वृद्धिवाळा अको स्थापचा जम ११ पछी अक अधिक १२ नो अक स्थाप्यो [सवध अग्रगाथामा] ॥१८॥ तथा पोडशतोद्धौ । निधोसप्तदशस्थिताः ॥ पूर्वेपोडशतोभूमी-विश्वाकस्यात्तदुत्तराः ॥ १९ ॥ अर्थ. तेम १६ थी ओक अधिक १७ नो अक निधिमा अटले नवमा फोटामा स्थापयो तथा १६ थी पूर्वे १३ नो अक छे, तेथी ते तेरना अक धी अक अधिक अक[सनध अन गाथामा ] ॥ १९॥ चद्राभोनिधय १४पष्ट स्थानस्था र वे निधे ९ पदात् ।। पूर्व पूर्वाकद्धत्वा-दधोपिचद्रवार्धयः ॥ २० ॥ अर्थ -चद्राभोनिधि १४ थाय ते नवमा कोठाथी उपरना छटा कोठामा स्थापचो पळी पूर्व पूर्वना [१६ आदि] अकोधी अकेक अधिक वृद्धिवाळा [१७ आदि ] अको होवाथी जेम छटा कोठामा चद्रवाघि अटले १४ नो अ आन्योछे, तेम छहाथी नीना नवमा कोठामा पण १७ नो अक छे ते पण चद्रयधिसज्ञा याळोज आवेलो छ ॥२०॥[तेनु कारण कहेवाय छे । तत्राभोनिधिशद्वैन । सप्तसरयाकमान्मताः ॥ निवन्नतियत प्राच्या श्वतुर' सप्तवावुधीन् ।। २१ ।।

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ अर्थ-अभोनिधि अथवा बाधि आदि जे समुद्रवाचक शहो छ, ते समुद्र वाचक शब्दोनी संज्ञा वडे सातनो अक पण फ्रमथी कहेला छे, जे कारणी प्राचीन विद्वानो समुद्र शब्दथी ४ अथवानो अक कहे छे. ॥२१॥ सूत्रमेक यथाकार्य-द्वये प्राहुः प्रसाधनम् ॥ तथांभोनिधिशद्वोय । कोशद्वितयसाधकः ॥ २२ ॥ अर्थ:-जेम अफज सूत्र ये कार्यमां साधन रूप कयुं छे, तेम आ समुद्र- वाचक शब्द पण अहिं ये कोठाओना ये अंकनो १४-१७ नो साधक छे. ॥२२॥ पष्टात्खेवाणवृध्या । स्यादंक एकोनविंशते ॥ चतुर्दशाकेवाणोने । यद्वानवकलेखनम् ॥ २३ ॥ अर्थ-छा कोठाथी उपर[छटा कोठाना १४ थी] पांच अधिक अंरुवाळो १९ नो अक आवे छे, अथवा ओज १४ मांथी पाच * न्यून करतां जे ९नो अक आवे छे छटा कोठा उपर जीजा कोठामा लखयो. ॥ २३ ॥ चतुर्दशांकदरोपि । यद्वापंचदशांककः ॥ प्राप्तस्तमात् पडूनवे । लेख्याअग्नि पदेश्नव ॥ २४ ॥ अर्थ:-अथरा चौदनी आगळ पंदरनो अंक आवे छे, ते पंदरमांची छ बाद करतां [ कोठानो छ नो अंक याद करता ] ९ प्राप्त थाय छे, माटे पण पण श्रीजा कोठामा ९ अक लखवो ॥ २४ ॥ पडूनत्वेमनो१४रंके । वसव ८ स्तिथिसंमिते १५॥ पंचोनत्वेदिशोमध्ये१० । पड्वसूदिक्चसूत्रितं ॥ २५ ॥ २ वाणोनत्वे पटूसु एक शेतात् जग्रे नवाकाद * पाणोनत्वे पट्सु एक शपाद अग्रे नवाकान-कोठानो ६ नो अक तेमाथी ५ बाद करता १ आवे तेनी अंग्रे, छहा कोठामा रहेला १४ अकमायी ५ बाद करता ९ आवे ते स्थापना १९ नो अक बीजी कोठामा स्थपाय, इति टिप्पनिका भावार्थ, - 4 ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ अर्थ:-मनु-१४ ना अफमाधी [ छहा कोटाना १८ माघी ] छ न्यून करता घसु-८ आये, अने [१४ ने पदले अग्राक ] १५ माथी पाच वाद करतां दिशी १० आये, ते मध्यमा स्थापयो से प्रमाणे ६-८-१० प्रण अकनी सूत्रणा रचना दर्शायी छे ॥२५॥ यद्वाद्यतुर्यकोशस्थ-विकपण्मेलनान्नव ॥ सिध्यटकरकोशयोधरश्व७-योगादपियथानव ॥ २६ ॥' अर्थ-अथवा पहेला अने चोधा कोठामा रहेला ३ अने ६ ने मेळवता ९ थाय, अथवा आठमा अने नवमा कोठामाना २ तथा ७ अ [१२ माना २ तथा १७ माना ७ मे ये ने मेळवता पण जेम ९याय छे ॥ २६ ॥ तथापष्टपदस्थायि । चतु:केणक्रमागत ॥ पचकोयोज्यतेजात । निश्चयान्नवधारणम् ॥ २७ ॥ अर्थ:-अथवा छटा कोठामा रहेला [ १४ माना] ४ अकनी पछी अनुक्रमे आवतो [अकगणितना अनुक्रममा आवतो] ५नो अक, ते ये ने मेळवता पण निश्चययी ९ नु अफस्थापन त्रीजा कोठामा थाय छे ॥ २७ ॥ नवकेपिचपचारया । तस्यस्थानेतदासनात् ॥ यद्वामध्यस्थपचाके । पूर्वाकमेलनान्नव ॥ २८ ॥ अर्थ[जे चार अने पाचनो अक मेळयवानु कारण के ] नव कमा पण पाचनु नाम छे, (अर्थात् 'नव' कहेयाथी पांच नो अर्थ थाय छ,) कारण के पाचना स्थाने नवनो अरु पण [विंशति यत्रमा जेम १५ या १६ वा १९ अकज कोठामा आवे छे तेम] आये छे माटे अथवा नवनी . . a , १ पावती स्तोपना आ प्रथमाज दर्शवेला पहेला मूळ काव्यमा बीजा चरणामा ॥ श्रीअर्जुनपताका॥ ८७ संरयामा पांचनो अंक सर्वधी मध्यमां आव्यो माटते पांचना अंकमां पूर्वनो चारनो अक मेळयता पण ९याय छे ॥ २८ ॥ पटपंचकयोरत- वात्सर्वांकसंग्रहः ॥ व्याख्यायांनवतत्साक्षात् । वाणषणनबसूत्रतः ॥ २९ ॥ अर्थ:-अथया सर्व अंकनो अटले नव अंफनो अंतर्भाव पाच अने छ ओ वे अंकमां छे, ते कारणथी व्याख्यामां [ आ विंशति यत्रनी वृत्तिमां] जे नवनो अंक छे ते ने साक्षात् ५-६-९ त्रणे अकनी सूत्रणाधी [त्रणे अंक रचनामां सदृशपणाधी ] कयो छे ॥ २९ ॥ वसवोऽष्टौ भुजरस्थाने । तेऽष्टदशसचद्रतः ॥ चद्रामोनिधिसूत्रस्य । चंद्र शदस्यसंगहात् ॥ ३० ॥ अर्थः त्यां वसु भेटले ८ नो अंक ते [भुजस्थाने=] पीजा कोठामा लग्यवो 'अने तेने चंद्र-१ सहित करता १८ नो अंक थाय, कारणके चद्रामोनिधि से सूत्रधी अहिं चंद्र-१ नुं ग्रहण [अनुवृत्तिथी ] ग्रहण करवानु रे ॥३०॥ चाणवृद्धा जवेत्यर्थात् । पड्वृद्धा सवोथवा ॥ चतुर्दशपदे पष्टे । तेसप्तदशतोहिखे ॥ ३१ ॥ 'अर्थ'-पाचनी वृद्विधी [आठमा कोठानो १२ मांनो २ नो अंक जेम] 'जव थाय छे, अने छ नी वृद्धियी ८ थाय छे, तेथी छटा कोठामा १४ ते सत्तरनी उपर ररेला के (६+६=१४ तथा ९+८=१७ प्रमाणे बने अंक १४ अने १७ ते पोताना कोठाथी आठ आठ अधिक छ ) ॥ ३१ ॥ १ संस्पायर्या पंचको मध्यस्थ तलिन सौका मिति सर्व मुखस्थानमवर्णीमत्यादिवत्- बम मर्व अक्षरोमा अवर्ण मुख्य छे, कारणके तमा सर्व अक्षरोनो समावेश थाय छे, वैम सर्व ( नब) अकोमा ५ नो अ मध्यस छे, तेमा सर्व अक मळे छे २ पचात् प्राकः ४ सेन मेटने नव-सटा:- - १८८ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ वाण५पड् योगतेश्चैका-दशतत्समुसेनव ॥ मध्य१०नवधिकं चाग्नौ । प्राच्यावस्वधिकततः ॥ ३२ ॥ अर्थ:-तथा पाच अन छ मळीने ११ नो अंक जेम (१६ माना ६ वा५नी नीचे) सन्मुस रघो छे, तेम [ १४ ना] ४ अने ५ मळीने यनेलो ९नो अक पण १४ नी उपर १९ना रूपमा सन्मुख रायो छे, अने विदिशिमाथी ११ नी पण सन्मुग्य रयो छे ॥ तथा मध्यगत १० थी ९ अधिक वो १९ नो अक अग्निकोणमा आन्यो छे, त्यारे अज १० थी ८ अधिक १८ नो अक पूर्व दिशामा आव्यो छे ते योग्यज छ ॥ ३२ ॥ पाठातरे वाणरूप । वसुदिग्दिगीतीरणात् ॥ स्यु पचदशतद्वाण-रूपाभ्यामिह रामगा ॥ ३३ ॥ अर्थ -पाठान्तरथी ( अन्य ग्रंथना पाठमा) घाण रूपा वसु दिग् दिर से प्रमाणे कहेवाथी ते पाण-५ रूप-१ मळीने १५ थाय छे ते त्रीजा कोठामा स्थपाय छे ॥३३॥ (अहिं १९ वाळा त्रीजा कोठामाज १५-१९ जे ये लपाय छे) वसुयुक्तादिशस्तेष्टा-दशद्वितीय कोशगाः ।। दिशोमध्यगताएर । सिद्ध विशतियत्रक ॥ ३४॥ अर्थ'-अने वसु ८ सहित दिशा-१० ओटले १८ नो अक घीजा कोठामा स्थपाय छे अने दिशा-१० नो अक तो मध्यमा होय छेज, ओ रीते पण विंशतियत्र सिद्ध थाय छे ॥ ३४ ॥ खेचराभास्करायाये । ईशदिपुदिशास्वमी । भूविश्वाद्यास्तथैवाका-यसनीयायथागम् ॥३५॥ अर्थ-तथा इशान कोण विगेरे दिशाओमा अनुप्रामे सूर्य विगेरे ग्रहो स्थापना, अने अनुक्रमे [भू विश्व-] १३ विगेरे अको पण आगमने स्थापवा ॥ ३५॥ 4 ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ अत्रेवमका एकाद्या । यावदेकोनविंशतिः॥ एक वेठमनि सावर्णात् । चितायां पंचपट्योः ॥ ३६ ॥ अर्थ:-जे प्रमाणे ओ विशति यंत्रमा १ थी मांडीने १९ सुधीना अंक यथा योग्य | १०-११-१२ इत्यादि रीते आवे, परन्तु १-२-३ इत्यादि रीते नहिं जे रीते ] आवे कारणके अंक कोठामा ५ अने ६ नो अंक सदृश रोवाथी अक अफठी आवे छे ( अर्थात् १५-१० ये अंक अकज कोठामा आवे छे) ॥ ३६॥ पुनःपुनश्चंद्रपदा-दमृतांशो प्रधानता ॥ पद्मावत्या.साधनेषु । चक्रेश्वर्यारवेरिव ॥ ३७॥ अर्थ:-पुनः पुनः चंद्र-१ नो शब्द [ पद्मावती काव्यमां] आववाधी पद्मावतीना विशति यत्रमा चद्रनी प्रधानता छे, जेम चकेवरी देवीना यनमा सूर्यनी प्रधानता छ तेनी पेठे. ॥ ३७॥ तत पंचदशांकस्यां-तर्भावः क्रियतेबुधैः ।। कलावाचि पोडशाके । सर्वत्र पंचकाश्रयात् ॥ ३८ ॥ अर्थ:-ते कारणथी विद्वाना फळावाचक ('कला' शब्दधी) १६ ना अंकमां सर्वत्र ५ ना अकनो आश्रय होवाथी १५ ना अंकनो अंतर्भाव करे छ । अर्थात् १६ अने १५७ ये चद्रनी कळा अने तिथिवाचक होवाधी सहश गणीने गणितमा तुल्य गणे छे ] ॥३८॥ यथैकादशत पंच-धिकत्वे पोडशोपरि ॥ चतुर्दगोपरितथा । युक्तवैकोन विशतिः ॥ ३९ ॥ अर्थ-जेम सातमा कोठाना ११ ना अंकी चोथा कोठानो १६ नो अक छ एकादशादिपु १-२-३-४-२ पच पट्टकयोरेकत्वात् ७-८-९-१० इति तत ११-१२- १३-१४-१५-१६-१७-१८-१९ २ व ११ थी १९ सुधीनानव अंक ते १ महित सवे अफगण.प.

'९० ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ पांच अधिक छे, अने उपर आयेलो छे, तेम ब्रीजा कोठानो १० नो अफपण छटा कोठाना १४ ना अफथी पाच अधिक होई ने उपर आगे छे ते युक्तज छे ॥ ३९॥ ३ यस्याद्विशतेः सके । चत्वारिंशत्सु सग्रहात् ॥ एकोनविंशतोतत्र । केवल नवक ग्रहः ॥ ४०॥ अर्थ:-चळी सर्व कोठामा सहित होवाधी जे विंशति यन्त्रमा ८० ने सग्रह [ सर्व पाजुथी ४० नी गणत्री ] थवाथी ओज विंशति यः ४० नो यंत्रपण गणाय परतु तफावत अज के अमा १९ मा स्थाने केवळ ९नो अंक गणत्रीमा लेवो परतु १ नो अक न गणवो ॥ ४० ॥ एकोनविंशति.पूर्णा । सख्येयाकोण योजने ॥ नान्यथासगातयत्रे । वैपम्यात्रिविभाजने ॥४१॥ अर्थ'-परन्तु राणाधी सूणानी [ विदिशिनी ] पक्ति गणता ओ १९ नो अक सपूर्ण गणवो नरितर भ्रण विभागमा विषमता आववादी यत्रने विपे यत्र पद्धति-गणितरीति मळती आये नहिं ॥४१॥ सेक विश्वसुटखेटारकेश्चत्वारिशच विशतेः॥ यत्रे तदस्य द्विगुण । फलदानस्य सूचनम् ॥ ४२ ॥ ~ + अर्थ -१ ना अक सहित ३, अटले १३ अंक सहित वसु-८ अटले १८ अने अंक सहित खेट ९ ओटले १९ माथी ९ घण मळीने मे विंशति * यत्रमा ४० थाय छे. तेथी ओयत्र द्विगुण फळ आपे अवी सूचना वाळो छ कारणके ४० ते वीसथी द्विगुण छे, माटे फळ द्विगुण छे ॥४२॥ १ अणे मळीने ४० नी गणत्री न थवाथी अहिं त्रण विमागनी विषमता जाणवी.

॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ . अत्रकेचिदूचुर्न भुवि वेत्यादिकाव्ये यंत्रन्यासः किन्तु भु इत्येकाक्षरोमंत्रः विश्वेति त्रयोदशाक्षरक्षण इति वक्षर इत्यादि अक्षरगणनया मंत्र भेदान् व्यारयाति तदल्पं यत्राधिकारात् तथा १-१३-२-१११-१२-२- इति पुनरेकाक्षर मंत्र गणनापत्तेश्च यदि विश्व शब्देन यतदापि १-३-२११-१२-१ तथैय यदि सख्या शब्देन एक संरया पदेन १९ तदा तावत्सरयाक्षर मंत्रस्य दोपः प्रतीतः एव पण नव वसूनित्यत्र नवाक्षरे प्रोक्त पुनः खेचर पदेन तदुक्तिर्जेया आशा पदेन दिक् पदे नच पौनरुत्त्य । 'तथा भू विश्व १३ ईक्षण चद्र १२ चंद्र पृथिवी ११ युग्मैक' इत्यत्रापि तद् भावनीयमीति अत्रापि विंशति २० योजना तत्र प्रथम निरेकत्वे योजना ३८९ ।। ६-१०-४ ॥११-२-७ ॥ ३-६-१९ ।। ८-१०-२१९४-७१ ३.२०-७ । १९-१०-१ । इत्यष्टया योजना अत्र एकादशस्थाने कोणगत्यां एक गणनं 'एक एक एक' इति लोके एकेन गुणने तदेव इति शाने सख्याया अविवक्षातः अविवक्षापि एकस्य वरक्तम्वरूपात् खात्मलाभे परानपेक्षणात् 'सहु ,मखिज दुचिय' इति सिद्धान्त वचनात् चैके भू विश्वेत्यादि यंत्रे । विशतिर्गति मेलने ॥ गतीनां विशति ज्ञेया । गुरुणामुपदेशतः ॥४३॥ ३-८९। १-१८-१ । ३ कोना अष्ट ७-१-२१, यद्वा कोराद्वयेन पिंशतिः १३-७ एवं २० ततः १-१९ एफोन करण ज्ञापक पाण् पण् नय सूत्र चाणोनाः पट् तदा एक एव । एव मेकाधिकदेपि सैक, निरेक विधे ज्योतिःशास्त्रादौ प्रसिद्धः नयस्थाने पचक भावने १३-१-१-५ ॥ १-१८-१ । १-३-१-१५ अत्रांक व्यस्त करणे ज्ञापक 'वाणरूप वसुदिर दिगितिपाट: अथ पाण पण नव इति पाठात् पच स्थाने पर भायने १३-१-६।१-३-१ ८-१-5। ३-१-१६ एव मुंपरितनं पंक्ती किंगति योजना एकादशधा रोचर्य तृतीये कोशे १५ रक्षायां १६ विद्यार्थे १९ अग्निकोणे सेवन १६-०-४। ६-१०-४।६-०-१४ । इति मध्यपतो तिसो योजना ११.२-७ ११-१२-७ । १-२-१७ । इस्यघ पक्की माधिक तनांक १५ मा मापतरीत्या ९ योजना संप । ३-१६-११-६-११ । इति - - ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ विंशतित्रय १८०-२१ ८-१०-२।८-०-१२॥ इति मध्य पक्तौ विंशतिग्रयं २-४-७ एकाधिक ४ तदा ५ तदध. एफोन ७ तदा ६ एव ९.५-६ । ततः एफोन ४ तदा ३ एकाधिका' सप्त ७ तदा ८ सय ९-३-८ अथ नव ९ स्थाने पचमावने १८-४-१।५-१४१।१-१-१-१७ । अत्रैक कोप्यधिक १५१९ इति द्वेधा एकस्मिन् कोशे स्थापनात् पचकस्थाने पकभावने १६-३-१ एकोन ६तदा ५-१४-१ एकाधिकाः ६ तदा ७ पुन' एकाधिकथ ४ तदा ५ पुनः एकाधिकाः सप्त ७ तदा ८ एच ७०८॥ इति तृतीय पंक्ती उद्भत्वे विशतित्रय ३१०-91 कोणे ९-१०-१ द्वितीय कोणे अत्रापि ११ स्थाने एकगणने समाधि प्रागवत् मूलमेक एव तत्र मध्यस्थ दशानुरोधा- देकादश भावात् ण्य ९ योजना आयतत्वे ९ योजना उङ्गत्वे गतिद्वय कोणयो. एव सर्वा विंशतिवार विशतय अत्र १३-७ एव २० इय योजना अदोलन सिहासन यत्रादिपु मध्य पक्तो कोशद्वय मीलनात्तावदक साधनात् तदनुसारेण तथा १३-१-१५ इत्यादि योजना कोश चतुरक मीलनात् जायते सा कमलाकार विंशति यो कोषचतुष्टय मेलनानुसारा द्वेघा शेपा योजना अपि सूनस्य गभीरार्थत्वात् यो गतीना वैचिच्या- चावगम्या 'भू विश्व १३ क्षण चद्र १६ चद्र पृथिवी ११ युग्मै क १२ सख्याक्रमात् चन्द्राभोनिधि १७-१४ चाण पण नव १५-१६-१९ वसू न ८ १८ दिक् १० मेचरादिषु॥ अर्थ --अहिं केटलाक ओम कहे छे के-भू विश्व इत्यादि पदोवाळा प्रथम कहेवायला विंशति यन्न सषधी पद्मावती काव्यमा यन्त्रन्यास अटले अफ सूचना वा अकस्थापना कही नथी, परतु भू ओ ओकाक्षरी मन्त्र छे, अने विश्व मे पदथी १३ अक्षरवाळो मन्त्र, अने इक्षण* ओ पदथी ये अक्षरवाळो मन्त्र [ ईक्षण अटले नेत्र अर्थ रोयाधी ये अक्षरवाळो मन] छे, इत्यादि रीते अक्षरोनी गणत्री बडे भत्रना भेदोनी व्याख्या करी छे, पण ते अहिं अल्प अटले गौण छे, कारण अहिं तो यत्रनो अधिकार चाले छे काव्यमा क्षण भेटले ६ ना अर्थ वाळो शद कयो छे. अने अहिं ईक्षण शद पेना अर्थवालो क्यो ते पयानो : विध छे तेनो बटले विश्वे होय तो तेम थाय, ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ . . तथा १-१३-२ । ११-१२-१ ले प्रमाणे पुनः अकाक्षर मत्र गणनानी प्राप्ति होवाथी जो विश्व शब्दथी ३ विचारीओ तो पण १-३-२ । ११-१२-१ थाय अनेते प्रमाण 'संख्या' शब्द वडे ओक शब्द सहित १९ थाय, त्यारे तो तेटली संख्यावाळा अक्षरोनो अटले १९ अक्षरोनो मन्त्र [विंशति मंत्र] दोप वाळोज समजाय छे, अने जे प्रमाणे तो पण नव घसुनी-६-९-८ पदोमां नव अक्षर कन्या छे, अने पुनः खेचराशादिषु अ पदोमा खेचर पदवडे पण ९ अक्षर कया छे, तेथी द्विरुक्ति कथन दोप जाणवो, अने आशा अटले १० तेमज दिक् जेटले पण १० पण द्विरुकि- पुनरुक्ति दोष प्राप्त थाय छे. तथा भू विश्व=१३ ईक्षण चंद्र-१२ चंद्र पृथिवी-११ अने युग्मैक-१२ जे - पदोधी अमा पण विंशतिनी अज भावना विचारवी (अटले सदोष छे -विचारवी) इति तर्क विचार समाप्त: हवे द्विगुण गणत्रीवाळा विंशति यंत्रना गतिभेद कहेवाय छे. अत्रापि विंशति २० योजना -तत्र प्रथम निरेकत्त्वे योजना अर्थ:-अहिं [४० नी गणत्रीवाळा] विशति यंत्रमा २० नी योजना आप्रमाणे त्यां प्रथम १ ना अंक रहित ३ आदि अंकोथी २० नी गणनी थाय छे ते आ प्रमाणे- पहेली तीछी पंक्तिमा [१३-१८-१९ मां ] ३-८-९ अटले २०॥ पीजी तीी पक्तिमां [ १६-१०-१४ मां ] ६-१०-४ ओटले २० ॥ त्रीजी तीची पंक्तिमा [११-१२-१७ मां] ११-२-७ अटले २० ॥ १ भू-१ विश्व-१३ इक्षण-२ चन्द्रचन्द्र -११ पृथ्वीयुग्म १२ एक-१ [अथवा एक-१ ४० ४. १५ अने संख्या-९-१९) ४. • इति द्विगुणांक विशतियो १० एक-१ सख्या-९ अटले १९ १७४० ४.४.

९४ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ पुनः जे प्रमाणे अध:पंक्तिमा [अटले १३-१६-११ इत्पादिरीते ] ३-६-११ अटले २०॥ ८-१०-२ अटले २०॥९-४-७ अटले २०॥ पुनः विविशि पक्तिओमा ३-१०७ अटले २०॥९१०-१-२० ॥ओ प्रमाणे आठ प्रकारे अकना अंक रहित * गणत्री करी अहिं विदिशानी पंक्तिमां ११ ना स्थाने जे ये कडा छ तेनो गुणाकार करता 'ओक ओके एक 'ओ प्रमाणे लोकमा अक बडे [कोईपण रकमने] गुणवाथी जवाप तेनो तेज आवे छे, माटे शास्त्रमा १ना अकने सख्यानी विवक्षा नथी अटले १ ने सख्यामा गण्यो नथी, कारणके ओक छे ते पोते घस्तु स्वरूप अटले स्वाभाविक छे, कारण के स्वात्मलाभमा (अटले अकना ज्ञानमा) परनी [पीजी ] वस्तुनी अपेक्षा नथी होती ते कारणधी सिद्धान्तनु पण वचन छे के 'लहु साविज दुधिय' लघु संख्यात [अटले ओछामा ओछी सख्या ] निश्चय पेज छ ॥ भू विश्वादि विंशति यत्रनी २० गति. ॥ अर्थ:-हवे भू विश्व इत्यादि पदोवाळा पद्मावती यानी वीशनी गणत्री २. रीते थाय छे, ते वीस गतिओ श्रीगुरुना उपदेशथी आ प्रमाणे जाणवी ॥४३॥ अर्थ:- अहिं १३१८-१९ परेली पंक्तिमा ११ रीति आ प्रमाणे- ३-८-९ अटले २०- प्रण अंकी " " " २०- चार अंकथी ( अहिं १ न्यून ८ अटले ७ छे) २०-ओमा १ न्यून करवानी रीति पाण पण नव ओ २०--सूनधी पाण-५ न्यून ६ ओटले अकाधिकपणामा पण अज सूत्र जाणवु अनेक करवानी विधी ज्योतिपशासाविकमां * अहि १० अने ११ ना अझनो में, गणतीमा ठीघो छ अने १२-१३ इत्या जीपा नथी, कारणके २ थी ११ मुधीना ॥ श्रीअर्जुनपताका ।। हवे नवण स्थाने [ १९ ने बदले ] ५ नो [१५ नो] अक विचारतां १३ १.१५ अटले २०॥ १-१८-१ अटले २० ॥ १-३-१-१५ अटले २० थाय छे. अहिं अकोने हटा पाडवानी रीतिने जणावनार वाणरूप वसु दिग् दिगु ओज पाठ [ पद्मावती काव्यमां कयो छे ते] जाणवो. हवे याण पण नव अ पाठयी पांचना स्थाने ६ विचारीले तो १३-१-६ अटले २० र तथा १-३-१-८-१-६ अटले २० तया ३-१-१६ अटले २० ओ प्रमाणे उपरनी पहेली २० नी योजना अगिआर प्रकारे थई अने काव्यमा कहेला जैश्वर्य, रक्षण लक्ष्मी अने भारती जे चार माथी अग्निखूणामां श्रीजा कोठामा १५ नो अक जैश्वर्य माटे १६ नो अंक रक्षा माटे अने १९ नो अंक विद्यानो माटे स्थापवो. अर्थ:-मध्य पंक्ति १६-१०-१४ मा २० नी गतिओ आ प्रमाणे-१६-०-४ अटले २० ।। ६-१०-४ अटले २०॥६-०-२४ जेटले २० ओ त्रण रीति मध्य पंक्तिमां थई. तया ११-१२-१७ मे निचेनी पंक्तिमा ११-२-७ अटले २०॥१-१२-७ अटले २० ।। १-२-१७ अटले २० ॥ से प्रमाणे नीचनी ओ पंक्तिमा पण श्रण योजना दर्शावी. से प्रमाणे आयत गति । ती. दीर्घ पंक्तिनी पद्धति ] नव गति २० नी योजना दर्शावी, अने शेप [आठ] रीतिओ अंकना विषमपणाची अधिक जाणवी. (हवे उर्ध्व गनिजे २० नी योजना विचारतां) पहेली १३-१६-११ नी पक्तिमा १३-६-१ सेटले २० ॥३-१६-१ अटले २०॥३-६-११ ओटले २०॥ से प्रमाणे परेली उर्ध्व पक्तिमा व्रण गतिले २० थाय छे बीजी १८-१०-१२ नी उर्व पक्तिमा १८-०-२ अटले २०॥ ८-१००२ अटले २० ॥ ८-०-१२ अटले २०॥ जे रीते मध्य पक्तिमा प्रण रीति थई श्रीजी १९-१४-१७ नी उर्ध्व पंक्तिमा ९-४-७ अटले २० ॥ तथा १४ मांना ४ ने मेक अधिक गणतां ५ गणी अने तेनी नीचे १७ ना ७ ने १ न्यून करी ६ गा तो ९५६ अटले २० धाय. त्यारयाद मे मारने अक न्यून करी ३गणी अने ओ सातने अक अधिक करी दगणी स्यारे ९-३-८ अटले २६ ९६ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ ५ विचारी से तो १५-४-१ अटले २० थाय ॥ ७.१४१ ओटले २० ॥धाय अने १-१-१-१७ अटले पण २० थाय, ओमा व्रण अकडाने पदले धार अफठा गणवाथी ओक कहो अधिक गण्यो तेनु पारणके ओगणीसना कोठामा १९ अने १५ यन्ने अरु स्थापना थाय छे ते कारणथी जे अफज कोठाना घे ओफडा गण्या चळदी ओगणीसना कोठामा १९ अने १५नी अकस्थापना कराय छे ते पदरमा ५ ने अकने ६ सदृश्य गणी त्यारे १६ नो पण अक आये तेथी १६-३-१ अटले २० [अहि चोदमाना चार ने अक न्यून करी व्रण गणेला छे] पुन. ६ ने ओफ न्यून करी५ गणीने तो ५-०४-१ अटले २० थाय तथा जे छ ने अंक अधिक करी ७ गणी [सत्तरमाना ] सातने अक अधिक करी ८ गणी त्यारे ७५-८ अटले २० धाय मे प्रमाणे श्रीजी उर्ध्व पक्तिमा भ्रण रीते [अने न्यूनाधिक पद्वति सहित ९ रीते ] पीसनी योजना दर्शाती विविक्षिपक्तिमा ३-१०-७ अटले २०, अने पीजी विदिशिमां ९-१०-१ अटले २० पाय छे अहिं पण ११ ना. स्थाने १ गणगाना कारणनु सम्पधान पूर्व कहेली रीते विचारयु अमा मृत अंक १ ज छे ते १ मा मध्य कोठामा रहेला १० ना अनुरोधथी [अनुसरणधी] ११ धयेला छे. प्रमाणे ओ विंशति यन्त्रमा नय योजना (नवगति) आयतगति- पाळी, नव याजना उर्ध्वगतिवाळी अने योजना विदिशिगतिवाळी थवाथी चीस रीते २०-२० थाय छे ॥ इति विंशति गति भेदाः॥ ओमा १३-७ अटले २० ओ योजना गति अदोलान Eि मध्य पंक्तिमा पे कोठाना अक मेळचवाथी तेटलो अक। सिद्ध धाय छे, अने ते अनुमारे तेवी रीते १-३-१-१५ इस कोठाना [त्रण कोठाना ] चार अंक कमळाकृतिवाळा विंशति पत्रमा चार अनुस्वारे शेष योजनाओ पण जाणवी इत्यादि पदयाळु कान्य ] गभीर अर्थवालु १ अदोलन अने सिंहामन से यवना भेद विशेष स ॥ श्रीअर्जुनपताका || ९७ विचित्र होवाथी अ प्रमाणे शेष योजनाओ (२० योजनाओथी उपरान्तनी योजनाओ) जाणवी [परन्तु गणत्रीमा २० योजनाओनुंज ग्रहण कराय छे.] एतत्काव्यनिवद्ध शुद्धचरणा-यंत्र स्फुटं विंशतः। संसूत्र्यार्जितपुण्यतो विजयतां श्री तीर्थकृच्छाशनं ॥४४॥ अर्थ:-भूविश्व-१३, क्षणचंद्र-१६: चंद्रपृथ्वी-११ युग्मैक १२ अ संख्याना कमधी तथा चंद्रांमोनिधि-१७ अथवा १४ पाण-१५ प १६ नव-१९ वसु-१८से चार अंकमा चंद्र पदनी अनुवृत्ति होवाथी १ नो अंकयुक्त कराय छे.] दिक्-१० तथा 'खेचराशादिषु' ओ पद अनेक अर्थवाळ पूर्व कहेवाई गपुं छे तेथी अहिं अनो अर्थ कह्यो नथी ] ओ पदोवाळा पूर्वे कहेवाई गयेला काव्यमां रचायेला शुद्ध चार चरणोधी २० नो यंत्र जे रीते प्रगट थाय छे ते रीते २० नो यंत्र प्रगट दर्शावीने उपार्जन करेला पुण्यथी श्री तीर्थकर भगवंतनुं शासन विजयवत वर्तो ॥४४॥ तद्वाणरूप वसुदिक् । दिक् पाठोपिसमार्थितः ॥ वाण पणू मुनि वस्वाशे-त्येव पाठो विसाध्यतां ॥४५॥ बळी ते पाठमांधी याण-५ रूप-१ वसु-८ अने दिक्-१० अ पाठ पण समर्थित कर्यों [प्रगट कर्यो ] तथा बाण पण-६ मुनि-७ वसु-८ अने आशा'४ अ पाठ पण सिद्ध कयों ते जाणवो. ।। ४५॥ वाण-दक् श्रुतयो दिग् दिग् । एवं पाठोपि चिंत्यताम्॥ दृग-दर्शनानि पड् धातुः । श्रुतयोप्टेतिभावनात् ॥ ४६॥ तथा पाण=५ हक-६ विचारयो. अमांक अतिओ ८ छे ओम दिग् दिग्-१०-१० मे पाठ पण छ, अथवा छ घातु छे, अने अति शब्द जाणवा. JA ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ गति वैचित्र्यमन्यत्र । यत्रे पचदशात्मके ॥ दृश्यते लोक बोधाय । तदिहापि निदर्श्यत ॥४७॥ अर्थ:-चळी पीजा प्रकारना पदरीया यंत्रमा गतिने जे विचित्रता देखाय छे ते विचित्रगति अहिं पण लोकमां ज्ञान थवाने अथें दर्शापाय छे ॥४७॥ 'अपड् द्विसप्तयने कोणगतिः ७-३-५ द्वितीय कोणगती ६.३ मेलने नव च्यावृत्त्य पुन, पड़ गणने १५ भवंति द्वितीये ४-१०-१ अस्मिन् यंत्र सिंहासनादि यत्रवत् मध्य पक्तिकोश द्वयादपि पंचदश पूरणात् यंत्राणां गति वैचित्र्यदर्शनादेव विंशतियत्रं श्रद्धेय मिति भावः एकत्र कोण गती न्युनाधिकत्वे प्यदोपात् अर्थ:-अहिं ६-२-७ मे अक स्थापनायाळा पंदरीया यंत्रमा विदिशागति ७-३५ जेटले १५ अने पीजी विदिशागतिमां ६-३ अटले ९, अने पुन: पाछावाळीने ६ गणता [६-३-६ अटले ] १५ थाय छे थळी पीजा प्रकारना पंदरीया यत्रमा ४.१०. अटले १५ जे पदरीया यन्त्रमा सिंहासनादि यननी पेठे मध्य- पक्तिमा [ अटले पीजी उर्ध्व पंक्तिमां] ये कोठाना अंफथी [१०५ थी] पण १० नो अक पूर्ण थाय छे, तेथी अप्रमाणे यत्रोनी गति विचित्र देसीने २० नो यत्र पण विचित्र गतिवाळो होय अवी श्रद्धा करवी मे तात्पर्य २ ४ १ ८ २ ५ ८ ५ ९ ४ ८ ४ ९ २ १ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ छे [ अर्थात् जेम १५ ना यंत्रो विचित्रगति वाळा दर्शाव्या तेम २० ना यंत्रो पण विचित्र गतिवाला होय अम जाणवु ] जेथी ओक विदिशिग- तिमा अक न्यून होय (१९ वा १६ ना यदले जेम १५ होय) अथवा अधिक होय [१५ ना बदला १६ होय अथवा १९ होय तो पण तेमां कोई प्रकारे दोष नथी ओम जाणवू. चंद्रांभोनिधिवाणाः पण्-मुनयो वसवो दिशः ॥ एवं पाठेपिसूत्रार्थः । साधनीयोनया दिशा ॥४८॥ अर्थ:-तथा चंद्र-१ अंमोनिवि वा ७] पाण ५ पण ६ मुनि-७ वसु-८ दिक्-९ वा पाठ्धी पण सूत्रनो अर्थ [पमा काव्यनो अर्थ ] आ रीति सिद्ध करवो [ते कहेवाय छे] ॥४८॥ मू विश्व १३ क्षण चद्र १६ चंद्र पृथिवी११ युग्मैफ १२ इति इश १ उदर २ वायु ३ वरुण ४ स्थान चतुष्टये अकैः पुरिते सख्या क्रमादिति ११-१२- १३१६ इत्यकक्रमात् शेषाः १४-१७-१८-१९ एतेका यथायोगं स्थानेयु धाः तत्रापि वाणपण् इति सजया ११ तत्संमुखे १९ पुनः १२ संमुख कोशे १८ पुनः १३ संमुखकोशे १७ पुन: १६ समुवा १४ इत्युत्क्रमादक न्यासः अत्रपचदशांका पंचकपङ्कयोः सावात्पोडशांतर्भाव्यः एवं अष्टपुस्थानेषु पूरितेषु मध्य दिशोदशइत्यतोयसूत्रार्थः संपन्नः चद्रेनयुक्ता' अमा जलकूप १ नदी २ तटाक ३ आकाश ४ स्थानभेदाचतुर्षो यद्वा अंमः शद्धेन जलं तस्पस्थानं समुद्राश्चत्वारः निधयो नव घाण ५पद्भुनय सप्त पसबोष्ट तान्नचे दशम्बेचरा गृहास्तेषां इशानादिदिक्षु इमान्मवान रहस्यानि ध्यायामीति 'मत्ररहस्य वार्तायामित्यमरः' नतु मंत्रान् पाठ- रूपाक्षर मनान् इतिअप्रध्यानाधिकारेण यत्र लक्षणरूपध्यानाव लवनात् पदस्थध्यानात् रूपध्यानस्याधिक्यात् एतेन 'चद्राभानिधि याणवणमुनि वन्' इतिपाठसिद्धिः एवंअन्यन्नापि भावनीयं १६, चद्रपृथ्वी ११, युग्मैफ-१२ अचार हंग-उत्तरदिशा-वायव्यकोण- रापनापासना ma अथे:-मृ वि-च-१३, अस्थानोने जा मना ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ ' गति वेचियमन्यत्र । यत्रे पचदशात्मके । दृश्यते लोक बोधाय । तदिहापि निदर्यत ॥४७॥ अर्थः-वळी घीजा प्रकारना पदरीया यत्रमा गतिने जे विचित्रता देखाय छे ते विचित्रगति अहिं पण लोकमा ज्ञान धवाने अर्थे दर्शापाय छे ॥४७॥ अनपद द्विसप्तयत्रे कोणगतिः ७-३-५ द्वितीय कोणगतौ ६-३ मेलने नव च्यावृत्त्य पुनः पड गणने १५ भवति द्वितीये ४-१०-१ अस्मिन् यत्र सिंहासनादि यत्रवत् मध्य पक्तिकोश द्वयादपि पचदश पूरणात् यंत्राणां गति वैचिन्यदर्शनादेव विंशतियत्र श्रद्धेय मिति भावः एकत्र कोण गती न्युनाधिकत्वे प्यदोपात् अर्थ:-अर्हि ६-२-७ जे अक स्थापनायाळा पदरीया यनमां विदिशागति ७-३५ ओटले १५ अने पीजी विदिशागतिमा ६-३ ओटले ९, पाछावाळीने ६ गणतां [६-३६ ओटले ) १५ थाय छे. घळी पीजा प्रकारना पदरीया यत्रमा ४-१०-१ अटले १५ मे पदरीया यंत्रमा सिंहासनादि यननी पेठे मध्य- पक्तिमा [ अटले पीजी उर्व अने पुनः ६ २ . ४ १ ४ ३ ८ ५ ८ ។ पक्तिमा ] ये कोठाना अकथी [१०५ थी] पण १५ नो अफ पूर्ण पाय छे, तेथी प्रमाणे यत्रोनी गति विचित्र देखीने २० नो यत्र पण विचित्र गतिवाळो होय अवी श्रद्धा फरवी जे तात्पर्य ३ U ४ १ ४ ८ . ३ ४ ५ १५ ॥ श्रीअर्जुनपवाका ॥ ९९ अर्थात् जेम १५ ना यंत्रो विचित्रगति वाळा दर्शाव्या तेम २० ना पंयो पग विचित्र गतिवाला होय अम जाणवू ] जेथी ओक विदिशिग- निमां अक न्यून छोय (१९ वा १६ ना पदले जेम १५ होय) अथवा अधिक होय [१५ ना बदला १६ होय अथवा १९ होय] तो पण तेमां कोई प्रकारे दोष नयी अम जाणवू. चंद्रांभोनिधिवाणाः पण-मुनयो वसवो दिशः ॥ एवं पाठेपिसूत्रार्थः । साधनीयोनया दिशा ॥ ४८ ॥ अ-तथा चंद्र-१ अंभोनिवि-४ [या ७] याण ५ षण-६ मुनि-७ परशु८ दि ९ वा पाठधी पण सूत्रनो अर्थ [पद्मा काव्यनो अर्थ ] आरीनिशे सिद्ध करवो [ते कहेवाय छे] ॥४८॥ भरिम्ध १३ क्षण चंद्र १६ चद्र पृथिवी११ युग्मैक १२ इति इश १ उदग् २ पायु ३ याग ४ स्यान चतुष्टये अंकैः पुरित संख्या क्रमादिति ११-१२० १३१६६वंककमात् शेपाः १४-१७-१८-१९ एतेका यथायोगं स्थानेषु पाय: मन्त्रापि पाणपण् इति संज्ञया ११ तत्संमुग्वे १९ पुनः १२ संमुख कोगे १८ पुनः १३ समुन्वकोशे १७ पुनः १६ संमुग्वा १४ इत्युत्क्रमादक म्यामा अपयशांकः पंचकपर्योः सावोत्पोदशांतर्भाव्यः एवं मधुम्यानेषु परितेषु मध्य दिशोदशाइत्यनार्यस्त्रायः संपन्नः चंद्रनयुक्ताः आमा जनप १ नदी २ नाक ३ आकाश ४ स्थानभेदाचतुर्धा यद्वा मा शहेन जल तस्परथानं ममुद्राश्चत्वारः निधयो नवयाण ५पदमुनय सन यमपोट तान्नप्पे दशम्बेचरा गृहातेषां इशानादिदिक्षु इमान्मंत्रान गयानि पायामीति मनरहस्य थानोपामित्यमरः' नतु मंत्रान् पाठ- पार मंग्रान् निमप्रध्यानाधिकारेण यंत्र लक्षणरूपध्यानाय लवनात् पप्पानात् रुपम्यानस्याधिश्यात् पतेन चद्राभानिधि याणपणमुनि सन' इनिपाटसिद्धिा एपअन्पनापि भावनीयं ॥ श्रीअर्जुनपताका ।। १६ १८ १६ १४ ११ स्थानो ११-१२-१३-१६ धाय छे. जेथी मे क्रमथी रोष रहेला अकस्थानो १४-१७-१८-१९ जे अकस्थानोने यथायोग्य कोठाओमां स्थापवा पाणपण" ओ सज्ञावडे [५+६= ] ११ स्थापया, अने तेनी सन्मुख १९ नो अंक स्थापवो, [ अर्थात् विदिशिपंक्तिमा सन्मुख स्थापवो] पुनः ज्यां १२ स्थाप्या के तेनी सन्मुख १८ स्थापवा, ज्या १३ स्थाप्या छ,तेजी सन्मुख कोठामा १७ स्थापया पुन ज्या १६ स्थाप्या, छे, तेनी सन्मुख कोठामा १४ स्थापवा, प्रमाणे अनुक्रमे अक स्थापना जाणवी अमा १५ नो अंक ते पांच अने छनी, सहशता गणवाधी १६ ना अकमा अंतर्गत जाणवों प्रमाणे आठ कोठा पूर्ण थयापाद मध्यकोठामा दिशा-१० स्थापवा, ते कारणर्थी सूत्रार्थ जे प्राप्त थयो के चद्रा मोनिधि चन्द्र अटले १ सहित अभ-जळ ते कृवा-नदीतलाव-अने आकाशना भेदधी ४५ कारनु छ अथवा अभ अटले जळ, तेनु स्थान जे समुद्र ते ४ छे ( अर्थात् समुद्र सज्ञाथी ४ नो अक गणाय छे), त्यारवाद निधि अटले ९, पाण अटले ५, अथवा ६, मुनि अटले ७, वसु अटले ८ ते सर्व अकोनी मध्ये दश [१०] तथा प्रेचर अटले गृहोते ओने ईशानादि दिशाओमां स्थापवा अप्रमाणे जे मन्नान-रहस्योने ध्यायामि-हु ध्यान करु छु " शब्दनो अध रहस्यवार्तामा [ गोप्यवातोमा] प्रचते छे ओम अमरकोशमा फरयु छे. परतु अहिं मत्र अटले पाठरूप अक्षरवाळा मंत्र, नहि, मे प्रमाणे, अहिं भ्याननो अधिकार होगाथी मन्त्रणा लक्षणयाळा रुपध्याननु आर धन छे। कारणके पदस्थव्यानधी पण रूपध्यान [पस्थध्यान । अधिक छे, से -पाग्याथी " चद्राभोनिधि पाणपण मुनियसून " मे पाठनी सिद्धि थई जे प्रमाणे अन्यत्र [रोप सर्व प्रकारना पिंशतियत्रोमा] पण जे पाठना मन्त्र ओटरे रहस्यो यथायोग्य विचारवा तपागच्छेशसूरीश । विजयप्रभसेवकः ।। कृपारिजयधीराणां । शिप्योईच्छासनश्रिये ॥१९॥ मत्र - आत्मज्ञानका खजाना. प्रियविज पाठकवृन्द- आपको यह जानकर हर्ष होगा की, आपने जैन समाजमें आज तक गीता जैसे प्रथका अब यही अभार या सौभाग्यकी बात है की निसको पुति आप महानुभागोंके समय यह " अदूगीना" प्रथकी चतुर्थ आवृत्ति के साथ प्रकाशित हो रही है वैष्णव धर्ममें भगवद्गीताको कितना मान हे अर्ह दाता भी मानव समुदायके लिय गणन भगीतास कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है यदि विज्ञ पाठकोनें इसे जापनायानो । क्योंकि यह अहगीता जिस अध्यात्मज्ञानरुपी सुगा रसमे ओतप्रोत है वह अद्वितीय है श्रीगोतमस्वामी प्रथमही प्रश्न कहते हैं कि भगवान योगियोंका और गृहस्थोंका मन वशमे हो जाता है तो क्या काई इसकी विधि है उत्तरमे विश्व बदनीय प्रभु महापौर भगवान निधि बताने हुये क्या कहते है यह प्रथकी आदिमे आपके टष्टीगोचर होगा. विशेशमें आपको ईस प्रथकी प्रशसा लेखणीद्वारा क्या का पाठक आप इसको खरदार' एक वक्त ईसका जार मनन करें मुल कीमत रु. ७ मेट कीमत रु २ प्यार भाईयों क्या आपका आकाशकी मैर करनी है? सो फार आप क्यों विचार करते हो. भीमहातीर प्रथमासे आकाशगमानी औषधी कल्प मगायो ताकी आपकी मनकी मुराद पुरी हागी अगर आपको यशावरण चहाये तो इसी कल्पके साथ गोपीचक्र नाममा कल्प दिया है ईस कल्पके द्वारा पत्थर हृदयभीमाम हो जाताह ओरईमीमे लिखी हुई औपपीओसे जलस्यभन अग्नि स्थभन आदि कार्य सिद्ध होते है. यह प्रय सुश्रावक नागार्जुन का बनाया हुना है तन इसके बारेमे विशेष क्या लिवे मुल कीमत रुपीया १५ व भेट कीमत रुपीया ७॥ मिटनेका -एस के कोटेचा, धुलीया.

-- जैन सायन्स जगतसुदरी पयोगमाला. जस महत्तर पानथे । जैनाम उनका कितनी प्रतिष्ठा थी १ वह कितने उछ काटाके पुस्पथें । उम भाग्यशाला पुरुषका को नहा पहिचानताथा ? आज उस महा मा की कातको जन समाजके वालगोपा' सब परिचित है अर उनके विषयमे में क्या दिग्यु अगर जो उनका आधयकारक माने दखनी होतो उनका बनाया हा जगतसुदरी पयोगमाला नामके अथका गीगोचर करे इसी प्रथमें प्रवेर रतुआना पणन दाया है ऊ सम्नुक सयागसे अनेक चमनारी देख मान हो आप इस प्रथको एरवक्त रूर पटे और पटारे पसा आपसे नम प्रार्थना है तीमरीआत्ति मुल किमत पिया १० व भेट किमत ५ रु० एक शेठकी तर्फमे मणिओंका उत्पत्तिस्थान मानतुग शारत्र [ कर्ना:--मानतुग सृरि ] आजतक नन मामा मणिसी उपति आर उमका उपयोगिताको बिरयुल खवर नर्थ। परतु हमार इस प्रयन साराही भेद बता दिया आर जनताको होशियार करा दिया आपको रस प्रथम मणिका उत्पत्ति और उसकी उपयोगिताका ज्ञान होगा मणाद्वारा अदृश्य नाह! मन म म्यारे पदचा, शिकरण, महाविषधरका विय क्षण भरमें हटा देना वैगरे बहोतसे का सिद्ध हो सस्तन तारे मणी महाक तीय के एक गुप्त स्थानपर मिलते ह निसमा वन गायकारा स्वय प्रयमे दिया है दुर्भाग्यमी बात है का उसकी उपयोगिता न माम का उममा जो उपयोग लिया जाय र न रेते हुये, उसो एसेहा फेंक देनेमे आते है परंतु अशाप इस गथको अपने पास रखेगे तो आपको इस प्रथ द्वारा बहुतही फायदा होगा बनाने मणि प्राप्त करके फायदा उठाया है आपभी लाभ उठायें मम द्वारा मुल कीमत स्पीया ३ भेट कीमत रुपीया ॥ नोट'-मणिओके नाम · हनुमान मणी, तिरकर गणा, हममणी इत्यादि बहुत मणी ओके जात और नाम आपको इसी प्रपसे मालम अगा ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ अर्थ:-श्रीतपागच्छना अधिपति आचार्य श्री विजयप्रभसूरिना सेवक श्री कृपाविजय धैर्यगुणवाळा तेमनो हु शिष्य ते श्री अहेतु शासननी शोभा अथा लक्ष्मी माटे याओ ॥ ४९ ॥ श्रीमेघविजयप्राप्तो-पाध्यायपदविश्रुतः ॥ भू विश्वेत्यादि काव्यस्य । व्याख्यानं चकृवानिदम् ॥५०॥ अर्थ:-प्राप्त धयेला उपाध्याय पदवडे विश्वत-प्रसिद्ध अवो हुँ श्रीमेघ- विजय उपाध्याय तेणे, आ भू विश्व" इत्यादि पदवाळा पद्मावती विंशतियंत्रना काव्यनी विशेषव्याख्या करी ॥५०॥ इति श्री पद्मावतीस्तवन मध्यस्थ भू विश्वेत्यादिकाव्यस्य विवरणं समाप्तम् .

।। श्रीअर्जुनपताका ॥ परिशिष्ट न.१ ४ . ६ २ २ १० ५ . ८ १ ८ १ १ ८ , . ८ २ . ६ ५ ६ . १० २ २ ३ १५ १५ ६ २ 3 4 ६ २ १. २ ५ ८ ५ . ५ ४ ६ ४ ३ १५ १५ १५ २ ९ ४ ८ ५ ५ १ ४ १ १५ १५ १ २ ९ ४ है ८ ४ १] ८ १५ १५ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ १०३ २ ८ २ १२ १४ १२ 3 १ ४ १० ६ १० १४ ११ १३ ९ १० १ ८ १० १२. . ८ ३० ३३ १ ८ ८ ८ । ४ ४ ६ २ ७ . ८ ३ , . . १ ३ ९ ३ A ५' ८ ५ ४ १८ , ८ ८ द १ २ २ २ । न . १- ६ . १. २० २३ " A , २ . ४ ११ ६ A , ४ प ४ १४ 808 ॥ श्रीअर्जुनपताका॥ ८ ११ ८ ८ ८ १० २ ११ १३ ३ ५ ६ १४ ३ ४ Y . १२ ५ २९ १२ १३ १० १ ८ १ २ १. २ V ८ १४ ७ , ७ ४ , ५ ४ ८ ५ १४ ८ ५ - १२ १४ १३ ३ ९ ११ २१ U ५ ४ १५ ३६ ३ १ ४ ४ ५ 7 २ २ AL १२ २४ AL ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ १०५ ૧૬ २ २. २२ " १. १८ ३ ५ २८ २९ ८ १४ ६ १७ २ ४८ १ 1. ६ , , ८ ८ २ ७ १२ ૨ १३ " १४ - ३६ ८ ९ १६ . ३ २४ ३४ . १ AL १. ८ ८ १५ २ १६ " ११ ५ ४ ६ ३ १४ ५ ८ २ १२ १३ १ है ३४ , १६ . A २ २ . १ १२ ३ ६ ५ ४ ९ ५ १४ । ॥ धीअजुनपताका ॥ ८ ។ १ ८ ८ १४ ४ . ११ २ ११ १४ ५ १९ १३ . ३ . ४ १३ ६ ११ ५ १४ १६ १ २४ ३४ १ १५ ८ १ . १६ १ १२ १५ ८ 16 ९ ८ ३ ६ १५ ३ ४ ११ १४ ४ ५ १० ५ १३ १२ २ १५ ११ १ ७ ३४ ३४ १ ८ १ ८ १४ १२ १३ १३ १२ ७ २ ३ १५ ३ ६ ३ ५ ी १४ ४ , १३ २ १२ १६ ९ ५ ४ ३४ . ११ १४ ८ . ८ १४ ६ ३ १३ २ ४ U २ S مام १० * १२ ११ Al ॥ थीअर्जुनपताका ।।। ८ १२ १४ १४ ७ २ ३ ३ ६ . ४ v १२ २ ४ ५ १४ १२ ५ ६ १० ३ ४ १० ९ ७ २ ३० १४ ८ १ १२ १३ ८ ५ १२ ७ . १४ . १ ८ १० १० ६ ११ ४ ९ ७ १० १५ ३ २ १४ है. १५ ८ १ ८ १२ १ ८ १२ १३ १ १३ १२ ६ ३ २ " १६ २ ११ १० २ ६ ३ १५ ६ ९ ४ १ ८ १ १३ १६ a ४ १४ 7 ८ ५ १. २ १२ ७ १९ १० २ १० ६ १० ३ १४ २ ५ 主 y 高 4 1 己 5 } 1 書 4 了 1 A At At 于 11 是 1 y 15 1分 1 11 3 人 事 与 Y 式 扩 f { 高1 श्रीअर्जुनपताका ॥ १०९ १ ११ १६ १ १६ ६ ८ १ ३ १० ८ १४ ९ ८ १२ २ ५ १३ २ १५ २ १० ३ ४ १४ १ द ६ ११ ४ ११ ६ ८ १३ २ २ २ १४ ३ १६ ३ १३ . १० ८ १ १२ ३ ९ ४ ८ ३ १४ ३४ १ १३ १६ ४ १ १६ १ ८ १२ ६ ४ ८ १५ २ ६ १० १५ ३ १४ ५ १४ २ ३ ३ ५ १२ ६ ११ ४ ३४ १० १४ اسم १ ६ ११ ११ ४ ११ ८ १० १५ १० ३ ३ १३ १३ ७ १ १२ ३ १४ १४ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ १६ ४ १ १६ १ ८ ७ १० ११ १२ ६ ५ ८ ३ १४ १४ ३ २ ९ ५ ३ १२ १२ २ AU १० ६ ५ ३ १५ १५ १४ २ ३४ . ७ १० १ १ ४ १३ ६ १२ १६ ८ १. ३ १४ ५ ११ ६ २ ५ ३ १५ २ १४ २ . ८ ९ ८ १२ ३४ ३४ ३४ १ ६ १ १ १३ ४ १४ ८ १२ A ८ १. १५ २ २ १२ " ७ Y ६ 4- . १५ १४ ॥ श्रीअर्जुनपक्षाका ॥ १० १ १६ १ १६ १० ७ १ १३ ८ ४ ६ ११ ८ १२ ५ १३ ४ ११ ८ ९ १५ २ १४ २ १२ १२ ५ ३ ११ १० ६ १ ६ १ १४ १२ ७ १ 10 १५ ८. १० ११ ८ २ ९ २ १२ ५ १५ २ ६ ९ १५ ४ १२ १३ ३ १४ ३ ५ १० १४ ५ ។ २४ ३८ १ ८ १ १५ १ १४ ८ १४ १४ ५ १२ ७ २ ७ २ . ६ ९ T २ ९ १२ १० १ १२ १ १ ११ २ ७ ₹ ४ ५ १४ ५ ४ १३ २ ३ ६ १३ Pr ३ २ म ३.

॥ श्रीअर्जुनपाका ८ १ ८ ८ १३ १६ ७ " ५ १४ ११ १५ २ ९ ४ ३ १५ ३ ६ ६ २ १३ ४ ५ ३४ ३४ ८ १ १२ १३ ८ १४ १ १ १२ १४ ७ २ १६ ३ ८ ६ ३ ४ ५ १० ७ ९ १४ ४ ५ ९ १६ ५ ११ २ ३४ ३४ ३४ १ ८ १० १ १२ ३ १२ ६ ३ ७ ९ २ AL ११ ५ १६ ५ १ २ १४ ११ १४ ५ ४ ३४ २॥ ८ १ १४ ७ १६ २ ९ १३ ३ ७ २ १३ १५ १ . . २ . १६ ३ ३. ३४ ॥ श्रीअर्जुनर्पताका ॥ *११३ १ १२ ८ १३ १ १२ ८ १५ ६ १० ३ १५ ३ १५ ६ ३ AL २ ५ ४ ५ २ १४ १४ ३४ १५ १ १० ५ १ ८ १२ १३ ११ ८ ७ १६ २ १० ६ ३ ६ ९ १२ ७ १४ ११ १४ ११ ७ ८ ३ २ १३ १० ३ ४ ३४ प ८ १ ११ १ १. 10 ८ ५ १२ १३ २ ४ १३ २ १४ ७ ६ ३ ९ ९ C ६ ३ ३४ ३ ३४ - ४ १० १५ ८ १ १ ८ १५ १५ १० १६ १२ १३ १२ ६ ३ १२ ३ १३ २ १४ ११ ३ ४ १३ २ ॥ श्रीगर्नुपताका ।। १ १. १ ८ १२ १ ४ १४ १ १४ ११ ७ १५ ४ - १३ ४ , १६ ३ ७ . २ १५ ३ १२ १३ ३४ -' ३ १४ १ १२ १४ ८ ३ ५ ८ ११ :: १३ ६ १२ १५ ६ १५ ४ ३ ४ १ १ ३ ३४ ३४ १२ ६ . १४ १२ २ ६ १५ १४ २ १४ %3D 1 ३ ३ ११ १ " २ ८ १३ ३ २४ 1 ११ १ ७ १४ १२ १ १५ " ८ ५ १. ८ १३ ३ १५ ३ ९ ४ ६ . 19 २ १६ ॥ श्रीअर्जुनपताका॥ १ १ १२ १५ 14 10 १२ . ९ ८ १२ ७ ९ ६ १३ २ : १० ५ ११ २ ३ १३ ३ ४ ४ ३४ १ ६ १५ १५ ८ २ ११ २ ८ ११ १२ १४ १४ ९ ७ ८ ६ ६. १३ ११ ८ ३ १० ३ १ १२ . १ १२ १४ १५ ६ २ ११ ४ ८ २ ३ ५ ३ ५ ६ ११ २ १ A १ १२ ८ २ " १४ ૬૮ १४ १ . ४ A ३ १४ ॥ श्रीअर्जुनपताका ।।' १५ १४ ४ ४ १ १० १२ ६ ९ ११ १३ ३ १ ३ ५ २४ ३४ ३४ ११ ६ ७ ४ १ १५ १४ १४ ८ ९ ३ १६ ३ ८ ५ १५ १२ ९ ६ r ४ ११ १ . , ८ २ १३ ३४ १ ६ १ १२ १४ १२ १४ ४ ८ १३ ३ १० १५ ६ C १० १३ ३ २ १६ ५ १६ ३ ११ २- १६ १४ ७ ८ १ १. १६ १२ ७ १५ १ ८ २ १४ १५ ६ * , ११ ६ ५० ३ १६ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ ११७ ७ १ १४ १५ १ १५ ६ | १२ ७ ४ 5 4 ६ 2 ५ २ १३ ३ ११ . १. ५ ३ १६ १२ 5 . , ८ . ३ ३४ ३४ ५८ ५८ ४८ ६० ४० ४३ ६. ४८ ५६ 3 ४८ ६. ४२ ४२ ४८ ५८ ५२ १५० १५ १५. १५० ४२ ५८ ४८ ४८ ४४ ४० ६० ४० ४० ५० ५० ४० ४४ ५८ ४२ ४२ ५२ १५० १५० ६६ ३२ ४८ ४८ ३४ १५० ३२ ६८ ४८ ४८ ४८ ३. ३४ ३. ६८ ६८ २२ १५. १५० ॥ श्रीअर्जुनपताका || ४८ ८. २० २२ ४८ ५२ ७८ २४ At ५. २४ २४ ८० २२ ८० २. ४८ १५० १५० १५. ४८ २४ ८. २० २. ५० ८. २. २. ८ ५० ४८ २४ ७८ ७८ २४ ४८ २२ १५. १५. ८८ १० १२ ८८ ८. १४ ८० ८६ ८६ ७. १४ ४८ १४ ८८ १२ ८८ १५० १५. १५. १२ ४८ ४८ १४ ८८ ४८ ९ १२ ८८ १४ १४ १० ८६ ५२ १२ ८८ १२ १५. ९८ . २ -- १६ . ४८ १८ २ ४८ १५ १५ ॥ श्रीअर्जुनपताका ।। २ ४८ ४८ १८ ५० 9 . ४ . २ २ १५० १५० ५३ ५३ ४३ ५४ ६. ५० ४६ ४० ४७ ४३ ४० ४६ ४३ ६० ४७ १५० १५. " ४६ ५. ४६ ४. ४३ ५७ ४३ ५४ १५. १५० ४४ ४. ४८ ४. . ४६ ४१ ६. ४८ ४६ ४८ १५. १५. १५० ४४ ४८ । ४८ ४८ ४४ ५६ ४० ५४ १५.

१२० ॥श्रीअर्जुनपताका ॥ ५५ ५५ ३. ६. ३५ ४५ ६५ १५. .. ६५ ६. ४. ३. ४. ७ ३५ ३५ १५० ४ १० ५० . ८. २. ८० २. ६. १० ४० ४. १५० ६. ८. ४.१.11. ४. ६ . १ ० ८. ५. २. ५. ९. ४० १५० १५. देडसो यत्रोका भेद दोसो होता है उसका नमुना दाखल ७२ यर दिया है, पाकी सब गुरुमुरासे समज लेना.

निकरवदनकमलालंकारायमान श्रुत्या विद्यामदध्मातचित्ता श्रीपुण्यनिलक सूरयो यादलिप्सया श्रीगुरुसमीपमागता तैरुक्त च भो मया सर वादा विधेयः तदा श्रीगुरुभिरुक्त' कि वृथायासेन वादेन' प्रयोजनमनुद्दिश्य मदाधियोऽपि न प्रवर्तते तदा श्रीपुण्यतिलकसूरिभिरुक्तं कि वृथायासः? यो य जयति स तं शिप्यीकरोतीत्याययो सधा, तदा गुरभिरंगीकृत, भारम्घश्य धाद , श्रीगुरुभिमुहर्तादेव ते जिता. ततः श्रीपण्यतिलक-- श्रीगुरुभिरपि तेपां महत्त्वरक्षणार्थ दीक्षा दत्वा शानाचार्य वे स्यापिता', तत्पूर्वजाना च श्रीपादलिप्तसूरिणां विरचितमिद वीरजिनानोत्रं समभाष पहुयोगमिद्विसपन्न दृष्टा श्रीसप्तस्मरणमहास्नान तुनीयमहास्तोत्र. जेयं, श्रीउपसर्गहरस्तोलवत्, तदन्वये चाद्यापि शिप्या ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ परिशिष्ट नं. २ ॥ अथ श्रीमहावीर जिनस्तोत्रं प्रारभ्यते ॥ (मूलकर्ता-श्रीपादलिप्तसूरिः टीकाकार-श्रीपुण्यसागरवाचक') प्रणतसुरनरालिवातपादाराटि । विदितसकललोकालोकसदज्ञेयवृंदम् ॥ सविनयमथ नत्वा वर्धमान जिनेश । किमपि विरचयेऽहं तत्स्तवस्यार्थलेशम् ॥ १ ॥ तावत् श्रीपाटलिप्तसूरयोऽनेकयोगसिद्धा महांत.. प्रभायकपुरुषा आसन् , तदन्वये सकलज्ञानविज्ञानविज्ञाः श्रीपुण्यतिलकसूरयो चिर- रतोऽवंतीपुयों समेताः तत्र च श्रीविधिपक्षगछाधिराजसरस्वतीलब्ध प्रसादश्रीमन्महेंद्रसिंहसूरयः सति, तेपां महिमान सकलनागरिरुजन स्थापित, महत्त्व चास्य स्तोत्रस्यानेऊयोगसिद्धिमान्य दत्वा प्रथममिद स्तोत्र पाठयतीनि अस्य प्रथम मूलम्-जयई नवनलिणकुवलय-पिथ' वीरोगइदमयगल-तुल ममहिमत्वेन १२२ ।। श्रीअर्जुनपताका ॥ , ध्यारुपा-वीरो जयतीत्यन्वयः विशेपेण ईरयति गच्छति कर्मशगुजयाय सन्मुग्यतया, कंपपति वा कर्मशनिति परि', ईरगतिकपनयो पचाद्य कर्मशनुसमूहजेतृत्वार्शितपराकमत्वेन वीरयते इति वा धीर' पीर- विमाती, पचाय पदेकदेगे पदसमुदायोपचारात् श्रीमरावीरथतुर्विन्श तितमा जिनो जयति उत्कर्ष मामोति, जि जयेऽकर्मकोऽय धातु, पंच- मारकपर्यंत यावद्विद्यमानशासनत्वेन वर्तमाने लट् मगलार्थं च प्रथम जयतीति पदप्रयोग , नमस्कारश्चाक्षितः, यथा जयतींद्रियरूपायकर्मपरीप होपसर्गादिशगणपराजयात्सर्वानप्यतिोते उत्कर्ष प्रामोति, इत्थ सर्या- तिशायी च भगवान् प्रेक्षावतामेवश्य प्रणामाह', ततो जयतीति किमुक्तं मवति ? तंप्रति प्रणतोऽस्मीत्यर्थ', किंविशिष्टो परिः नवनलिनकुवलय विकसितशतपत्रपत्तलदराक्ष', नवं नवीनं, पन्नलिनं सूर्यविकासिकमल, पुनः फुरलय चद्रविकासीकमल, पुन विकसित च तत्शतपत्र, शत- शब्दोऽत्र पहुन्वोपलसकस्तेन सहस्त्रपत्रादेरपि परिग्रह' अथ समास- नलिन च कुचल्य च नलिनरुवलये, नवे च ते नलिन कुवलये च नवनलिनकवलये, विकसित तत्शतपन च विकसितशतपत्रं, नवनलिन. कुवलये च विकसितशतपत्र च नवनलिनकुनलयविकसितशतपत्राणि, तपा पत्तल तीक्ष्ण यद्दल पत्रं तहदक्षिणी नेने यस्य स नधनलिनकुवलय- विकसितशतपत्रपत्तलदक्षः पहुवीही सस्थ्यक्ष्णोः स्थागात्पजिती पच् , पत्तलशब्दोऽत्र तीक्ष्णपाचक' यदुक्त देशीनाममालाया श्रीहेमसूरिभिः- पत्तलपडुवइआ तह । पत्तसमिन्द्र च तिख्खमि ॥' तथा च तद्वृत्ति'- पत्तल पवाय पत्तसमिद्ध एते प्रयोऽपि तीक्ष्णार्धाः, पत्तल पायहुलमिति तु पनलशब्दभवमिति भगवचक्षुपोरहोरात्रविकासित्वादुभयोः सूर्य- विकासिगद्गरिकासिकमलयोरुपमानत्यमुक्त पुन' किंविशिष्ट पीर. ? मातत्याद्विशेषणस्य परनिपातत्वान्मदकलगजेंद्रसुललितविक्रम', मदेन फरी मनोहरो मदकलो मदोत्कट इत्यर्थः, मदोत्कटो मदकल इति श्रीहेमसूरिः एवविधो यो गजेन्द्र. सकलगजलक्षणोपेतत्वेन गजेपु इदति परमैश्वर्य भजतीति गजेंद्र. सफलगजश्रेष्टर, तद्वत् सुअतिशयन ललिता मनोहरा या गतिस्तया विशिष्ट कामति गडनीति मदकरगजेंद्रसुललित- निविषमा पुनः किंविशिष्टो ची १ भगवान् , भगो ज्ञानाद्यर्थ भगनान् भगोऽज्ञान मारात्म्य -यशोवैराग्यमुक्तिपु॥ . N , घाकायानां सघातः समुदायस्त्रिसघातस्तेन त्रिकरणशुद्धया स्तोप्यामि स्तुतिगोचर करिष्यामित्यर्थः केन ? गाथायुगलेन, विपुलाचपलाधार्या- लक्षणलक्षिता प्राकृते घडुल गाथेत्यभिधीयते, तयोयुगल पुग्मं तेन. किंविशिष्ट जिन ? मदमोहविवर्जित, आनद संमोयो। संगमोत्था मत्तता कामो येन 'जियकसाय' मित्याधुनिका पादः, तत्र जिताः कपाया क्रोधाद्या येन त, पुनः किंविशिष्ट जिन १ तीसंग, तीर्णः सगः ससारानुयध्यभिष्वगो, बाधातरभेदमिन्नो पेन ते, पुत्रकलत्रादिरूपः, आतरश्च कर्मएद्गलरूपा, तीर्थससारसमणि ॥ श्रीअर्जुनपताका॥ १२३ रूपवुद्धिप्रयत्नेछा-श्रीधमैश्वर्ययोनिषु ॥१॥ इति श्रीहेमसूरिः तत्रा- योनिवर्ज द्वादशभगशब्दार्ययुक्त इत्यर्थः ॥१॥ अथ श्रीवार कविराशिपति- मूलम्-अज्जवि वहई सुतीत्थं।अखंडियं जस्स भरहवासंमि॥ सो वद्धमाणसामी । तेलुक्कदिवायरो जयउ ॥२॥ व्याख्या-स वर्धमानस्वामी श्रीवीरजिनो जयतु सर्वोतकर्पण प्रवर्तता. किविशिष्टो वर्धमानस्वामी ? त्रैलोक्यदिवाकरः, त्रय एव लोकास्त्रैलोक्यं, चतुर्वर्णानां स्वार्थे प्य वाच्य इति ध्यन् वर्गमर्त्यपातालरूपं, तत्र दिवाकर इव दिवाकरः सूर्यः केवलज्ञानेन तस्य प्रकाशकत्यात्, त्रैलोक्य- दिवाकरः स क ? यस्य वर्धमानस्वामिनः सुतीर्थ तीर्यते ससारार्णवोऽने- निति तीर्थ चतुर्विधः सघः सफल शुभगुणोपेतत्वेन शोभन तीर्थ सुतीय अद्यापि दुःपमकालेऽपि अवडितमविछिन्न परतीयोदिखडनारहितं भरत- वर्षे भरतक्षेत्रे वहति,धातुनामनेकार्थत्यात्मवर्तत इत्यर्थः अथाभिधेय वक्ति- मूलम् -गाहाजुअलेण जिणं । मयमोहविवाज्नियं जियाणंग ॥ थोसामि तिसघाएण । तिण्णसंगं महावीरं ॥३॥ व्याख्या--अहं पादलिप्तसूरिमहावीरं जिनं त्रिसंघातेन, श्रयाणां मनो मदा, मदोमुन्मोत्सभेद इति श्रीहेमसूरिः स च जात्यावष्टकारी मोहो मौत्यमज्ञानमिति यावत, मदश्च मोहश्च मदमोही, ताभ्यां विजिता रहितस्त, पुनः किंविशिष्ट जिन? जितानंग, जिता पार * खवशीकृतोऽनगा मा तिसश्झाग त निसगमित्याधुनिक' तत्र तमिती १२४ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ जिनमिती योज्य प्रसिद्धानुभूतार्थ तान्दो यादोपादान नापेक्षाने तिसझागमिति निम्र सध्या समाहना पति त्रिसध्य, गोत्रिपोरिति हस्वत्व धिमध्य तूपर्वणवमिति श्रीहेमसूरयः, निसध्यमेव निसध्यक, स्वार्थे कन्, क्रियाविशेषणमिद दीर्यत्व मोहतलक्षणात्, निस्मंगमिति, निर्गतः सगानिस्सगस्तमित्यक्षरार्थः, अथास्या गायाया म्पसिद्रिसुवर्ण- सिद्धयादयो भूयस्य सिद्धय उक्ता सति, पर किंचिदिग्दर्शनमात्रमुच्यने- 'गाहाजुअलेणत्ति' गा इति गगन अम्रक अभ्रक मेधारय स्वच्छपत्र गिरिजामलमिति रेमसूरयः, दीर्घत्व च बहुत्यव्यापक, पात्र ध शुभ्रादिगुगोपेतत्वेन प्राधान्यख्यापक, तेन सिनामक न तु कृष्णमित्यर्थः. हा इति हरिताल, दीर्घत्व वित्, जुअलमिति तार, तैत्रिभिर्युक्त जिन पारदं, कथभूत ? 'मयमोहविवनिय जियाणग' मलशिपिविष- दोपत्रयापेत, 'योसामित्ति' नभयिप्यामि, केन कृत्या ' निसघातेन सितानकतालतारत्रयाणा योगेन, सधौपधसमवायेन जारणस्यदनविधि करोमि पुनः कीदृश जिन ? तीर्णसग, मृतसप्तगुणसंगोत्तीर्ण महावीर- मिति रूप्य, इत्यक्षरयोजनामानमुक्त, विशेपानायस्तु सद्गुरोरयसेयः॥३॥ अथ प्रतिज्ञातमेव गाथाद्वयमार- मूलम्-सुकुमालधीरसोमा । रत्तफिसणपडुरा सिरिनिकेया ॥ सीय कुसगहभीरू । जलथलनमडणा तिन्नि ॥४॥ न चयति वीरलील । हाउ जइसुरहिमत्तपडिपुण्णा ॥ पकयगइदचदा । लोयणचकमियमुहाण ॥ ५॥ युग्मं ।। व्याख्या-तयेत्यध्याहार्य हे पीर ! पफजगजेंद्रचद्रा 'तिन्नत्ति' एते अयस्तव रोचनचक्रमितमुपाना लीला हातु न चयतीत्यन्यय'. पकज कमल, गजेंद्रो द्विपश्रेष्ट , चद्रश्चद्रमा', एपा द्वद्वः, पकजगजेंद्रच द्रास्ते तव सवधि लोचने नेत्रे, चफमित गगन, मुग्ग च बदन, एपा दूद्व लोचनचक्रमितमुग्यानि तेपा ननु द्वद्वश्च प्राणितूर्यसेनागानामित्येकवदेव स्यात्तत्कथ बहुत्य ? सत्य, अधिकरणेतायत्त्वे चेति, एते त्रय एतेपा प्रयाणामित्येवरूपे द्रव्यपरिमाणवगमे नैकवद्भार , यथा दशदतोटा इति लीलाविलास, रातु जतर्भावितण्यर्थत्यात्याजितु न चयति न शक्नुवति, । , ।। श्रीअजुनपताका ॥ १२५ . • पाकृतसूत्रेण शक्तृ शक्तौ इत्यस्य धातोः चय इत्यादेशा, न समर्था भनतीत्यर्थः ते कीदृशाः ? यदि सुरभिमत्तप्रतिपूर्णाः, यदीति संभाव- नाया, सुरभि घ्राणतर्पण पंकजं मत्तो गर्जितो हस्ती प्रतिपूर्णः पोडश- कलावाश्चद्रः, एपा द्वंद्व, अह सभावयामि, यद्यते पंकजादित्रयः सुरभि- मत्तप्रतिपूर्णा भवति, तथापि भवतो लोचनचक्रमितमुग्वाना लीला हातुं न शक्नुवतीत्यर्थः, तव लोचन पकजादप्यधिकसुदर, तव गमन गजेंद्र- ' गमनादप्यधिकतर सुदरं, तव मुख सपूर्णचंद्रादप्याधिकसुंदरमित्यर्थः, एव सर्वत्र विशेष्यविशेषणशब्दा यथासख्य योज्याः, पुन कीदृशास्त्रयः ? सुकुमारधीरसौम्याः, सुकुमार कोमल पकज, धीरो धैर्यवान् गजः, धीरो जे धैर्यसयुते इति श्रीहेमसूरिः, सौम्यः कमनीयश्चद्रः, ततो द्वद्वः पुन' कहिंशास्त्रयः ? रक्तकृष्णपांडराः, रक्तं कमल, कृष्णो गजा, पांडरः वेतश्चद्रः, पां द्वः, पुनः कीदृशाः ! श्रीनिकेता, श्रियः लक्ष्म्याः शोभाया या निकेता, निकेतति वसत्येष्विति निकेता गृहाणि, कितनि- वामे, निपूर्णः, अधिकरणे घन, श्रीनिवासस्थानानीत्यर्थः पुन कीदृशाः? शीतांकुशग्रभीरवः शीत हिम, अकुशः सूणि , ग्रहो राहुरुपरागो वा ततो व तेभ्यो भीरयो भीताः, पुनः कीदृशा ! जलस्थलनभोमडनाः जल पानीय, स्थल स्वभावोन्नतभूमि', रूढ्या भुमिमात्र वा, नभो व्योम, ततो द्वंद्वः, तेषां मडनाः, अलकरिष्णव स्यादित्यनेकार्थनग्रह. एवविधा अपि पफजगजेंद्रचद्रास्नयस्तव लोचनचकमणमुग्नानां शोभां न प्राप्नु चतीति तात्पर्यार्थ. अस्मिन् गाथाद्वये पादलेपजलज्वलनशन्त्रादिस्तम- नगगनगमनाऽदृष्टीकरणदयोऽनेके आनारा संति, ते तु सद्गगम्या इति ॥४॥५॥ अथोपसहारमार- मूलम्एव वीरजिणिदो । अच्छरगणसंघसंथुर भयव ॥ पालित्तयमयमहिउ । दिसउ खय सबदुरियाण ॥ ६ ॥ व्याख्या-वीरजिनेंद्र. श्रीवर्धमानस्वामी, ममेत्यध्याहार्य, मम सर्व दुरिताना सकलपातकाना क्षय नाश दिशतु, घातूनामनेकार्थत्वात्करो- स्वित्यर्थः किविशिष्टो वीरजिनेद्रः" मस्तु उरवधूना गणः समुदाय., तस्य सस्तुत. . ३ , 4 १२६ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ यद्वा अप्सरोगणः सुरवधूसमूहः, सयश्चतुर्विधस्ताभ्या सस्तुन' अप्सरस उपलक्षणत्वात्समयदेवदेव्य , गणः, साधुसमुदाय', सोडत अर्शआदिभ्पअच् गणा' गणधरा इद्रभूत्यादय , सघ. श्रमणदिक विध , तैः सस्तुतः पुन कीदृशो चीरजिनेंद्रः ? भगवान् , ज्ञाना... गुणयुक्तः, प्रथमगाथायामुक्तविशेपणत्वात्पुनरुक्तिदोपो , नाशकनीर, उक्त च सज्ञायज्ञाण तवो-सहेसु उपएसथुइपयाणेसु ॥ सतगुणफित्त णासु य । न हुति पुणरुत्तदोसाउ ॥ १॥ पुन: किंविशिपो रिजिनेंद्र. एव पूर्वोक्तप्रकारेण पादलिप्तकमतिमहितः, लिप्तो पादौ यस्य स पादलिप्त घाहिताग्न्यादिष्विति निष्टातस्य परनिपाता, स्वार्थे कनि, पादलिप्तक प्राकृते तु फगचजतदपयवाभायोलगिति सूत्रेण दकारलोपेऽफारस्य सव दीचे पालित्तय इति भवति, तस्य या मतिर्बुद्धिस्तया महित. स्तुति- रूपपूजया पूजितः, अर्थात् कासद्रहगच्छीपपादलिप्तसूरिकृतमेतत्स्तोत्र मित्यर्थः ॥ ६॥ विधिपक्षगणाधीशाः । सूरयो भूरिसद्गुणाः ।। श्रीअमर- सागरारया । विचरति महीतले ॥१॥ तत्पक्षयोतका. श्रीम-क्ष्यासागर- वाचका. ॥ सचारित्रगुणोपता। ज्ञानविज्ञानपेशाला ॥२॥ तेया प्रसाद- मासाथ । पुण्यसागरयाचकै. ॥ महावीरस्तयस्पेय । टीका विरचिता शुभा ॥३॥ नामिमुनि सख्ये । वर्षे मास्याश्विने सिन ॥ दशम्या रविवारे घ । पुरहानपुरे पुरे ॥ ४ ॥ इति श्रीमहावीरस्तवस्यावरि. सपूर्णा ॥ श्रीरस्तु॥ गाहा जुअल रतुतिः आनायः पादलितसूरी विरचित स्वोपज्ञस्तोत्राम्नायः गाहा जुअलेणजिण । मयमोह विवज्जिअ जिअ कसायं ।। थोसामि तिसघाएण । तिपणतग महानीर ॥ १॥ आम्नाय गा० गाऽभ्रक । हाहारितालो ॥ जूशलेणतार मुच्यते ॥ जिन पारद पथ भूत मयमोह विधर्जित जिआणगमल शिखिविप दोपत्रय- ॥ श्रीअर्जुनपताका । । १२७ . . वर्जिनं थोसामिति स्तंभयामिकेन कृत्वा त्रिसंघातेन सिताऽभ्रक हरि- • योगेन तथौषध समवायेन जारणा स्वेदन विधि विधास्यामि । कथंभूतं जिनं तीर्णसगं मृतसप्तगुणवंगोत्तीर्ण । एतावता- भेने दर्शिता अधुनापीतविधिमाह महावीरमहे ममक्षाकं हा हारकंची कृप्नाऽनकरसमित्यर्थः शेषा औपच्या समाना ॥१॥ , 'सुकुमाल धीरसोम । रत्तकसिपंडुरानियां ॥ सीअंकुस गहभीरु । जलथलमंडणातिषिण ॥ २॥ आनाय ॥ सुकु. नाइणिधार नाइ सोमासोमवल्ली वयं रत्तरत्त दुग्धिका बहुफलि कचनिका 'पांडुरी देवदाल' सिशृगयेरकं पंचकरि लघुरिंगणी लांगलिका कुसग्रह अहिखरयीजानि भीरुसंकोइणि 'लजल जलमहिका' जलच तादशी नभमहपिका धल अंगवती ॥२॥ नचयंतिवीरलीले । हाउंजे सुरहिमत्त पडिपुर्पणा ॥ पंकयगईंगचदा । लोअणंचकम्मिअंमुहाणं ।। ३॥ आग्नाप इदानी रोचनक्रमेण उद्घात विधिमाहा पंकयगगनं । गयंद मत्तनागं चदतार हेमं वा त्रयमपि रोचनमित्यर्थः तथाक्रामण । तथाद- पाटनमित्यर्थः ॥३॥ एवंचीरजिणिदो। अच्छर गणसंघसंथुओभयवं ॥ पालित्त्यमइमहिओ । दिसउ खयं सम्बदुरिआणं ॥४॥ आलापः यदुक तारहितारु सुवर्णदस्स सुचणिसूओ रेव नह यज्झई अनि कामणु पेदुग्पाद एडनाई दवि करणहाई सराइ एव कृत्वा जिणिंदो अजगण इति अम्ल वात वरगणइति क्षारवर्गः गणासंवइति समुदा- येन पमिः सघुओ सस्तुत्य स्तमत्यर्थः भगवान सेंद्र पुज्योभवति कमकृद् भवति । पालियमयमहिओ महितः परिकर्मितः दिशतु क्षय सर्व दुरितानामित्यर्थः असणे अनितलोननिम्मलोहो इ सद्दणा रहिओ सारण रहिमओ पसरं अकामियों ने कमइ लोहेस्तु ॥ ४॥ स्तोत्रार्थः । इति श्रीपालित्तयकृत स्तोत्र हेमकल्प स्वोपज्ञापचूरी समाप्तो। संवत १६२३ परसे नकल किया १२६ ॥ श्रीअर्जुनपता || . यद्वा अप्सरोगण. सुरवधूसमता, सपश्चतुर्विधस्ताभ्या सस्तुनः यदा अप्सरम उपलक्षणत्यात्समग्रदेवदेव्य , गणा, सायुसमुदाय:, मोऽस्त्येषां, अर्शआदिभ्यअप गणा' गणपरा इंद्रमत्यादयः, मय. श्रमणचितु. विधा, तैः सस्तुतः पुनः कीदृशो पीरजिनंद्रा ? भगवान् , সাণাৰি गुणयुक्ता, प्रथमगायायामुक्तविशेषणत्वात्पुनरुतिदोपो नाशमनीय' उक्त प-सज्ञायज्ञाण तयो-सहेरु उयासहपयाणेसु ॥ सतगुणफित्त- णामु य । न हुति पुणरुत्तदोसाउ ।। १ ।। गुना किंपिशिपो चीरजिनेंद्र ? एव पूर्वोक्तप्रकारेण पादलिप्तकमतिमाहितः, लिप्ती पादौ पम्य स पादलिप्त घाहिताग्न्यादिप्यिति निष्टांतस्य परनिपाता, स्पा कानि, पादलिसका प्राकृते तु फगचजतदपयवाभायोलगिति सूप्रेणा दफार रोपेकारस्य सब- र्णदीचे पारित्तय इमि माति, तस्य या मतिषुद्धिस्तया मरितः स्तुति रूपपूजया पूजित , अर्थात् कासदरगच्छीयपादलिागरिकृतमेतत्स्तोत्र- मित्यर्थः ॥ ६॥ विधिपक्षगणाधीशाः । सूरया भूरिसद्गुणाः ॥ श्रीअमर- मागरारया । विचरति महीतले ।। १।। तत्पक्षपोतका श्रीम-यासागर- पाचका. । सघारित्रगुणोपता । ज्ञानविज्ञानपेशाला ॥२॥ तेया मसाद- मासाद्य । पुण्यसागरवाचक ॥ मरावीरस्तषम्येय । टीका विरचिता शुभा ॥ ३ ॥ नदामिमुनि सख्ये । वर्षे मास्याश्चिने सिन ॥ दशम्या रविगरे च । पुरहानपुरे पुरे ॥ ४॥ इति श्रीमहावीरस्तयत्यापयरिः सपूर्णा ॥ श्रीरस्तु॥ गाहा जुअल स्तुतिः आनाय: पादलितसूरी विरचित सोपज्ञस्तोत्रामायः गाहा जूअलेणजिण । मयमोह विवज्जिअ जिअ कसायं ।। थोसामि तिसघाएण । तिपणतग महावीर ॥ १ ॥ आम्नाय गा० गाऽभ्रकं । हारितालो ।। जूअलणतार मुच्यते। जिन ५ पथ भूत मयमोर विवर्जित जिआणगमल शिपिविष दोपत्रय- ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ १२७ . . चर्जितं थोसामिति स्तभयामिकेन कृत्वा त्रिसंचातेन सिताऽभ्रक हरि- तालंकतारत्रयाणां योगेन तथौषध समवायेन जारणा स्वेदन विधि विधास्यामि । कथभूत जिन तीर्णसगं भृतसप्तगुणवंगोत्तीर्ण । एतावता- चेते दर्शिता अधुनापीतविधिमार महावीरमहे ममक्षाक हा हारकवी कृप्नाऽनकरसमित्यर्थः शेषा औपच्या समाना ॥१॥ सुकुमाल धीरसोम । रत्तकसिपडुरानिकेया । सीअकुस गहभीरु । जलथलमंडणातिणि ॥२॥ आम्नाय ॥ सुकु नाइणिधार नाइ सोमासोमवल्ली वयं रत्तरत्त दुग्धिका बहुफलि कचनिका 'पाथरी देवदाल' सिशृगयेरकं पचकरि लघुरिगणी लांगलिका कुसार अहिखरयीजानि भीरुसकोइणि 'लजल जलमडिका' जलच तादशी नभमडपिका धल अगवती ॥२॥ नचयतिवीरलील । हाउंजे सुरहिमत्त पडिपुण्णा ।। पंकयगईंगचदा । लोअणंचकम्मिमुहाणं ॥ ३ ॥ आम्नाय इदानी रोचनक्रमेण उद्घात विधिमाहा पकयगगनं । गयंद मत्तनाग चदूतार हेमं वा त्रयमपि रोचनमित्यर्थः तथाक्रामण । ताद- घाटनमित्यर्थ ॥३॥ एवंवीरजिणिदो । अच्छर गणसंघसंथुओभयवं ।। पालित्तयमइमहिओ। दिसउ खय सव्वदुरिआणं ॥४॥ आम्नायः यदुक तारहितारु सुवर्णदस्स सुचणिसूओ रेव नह पाई अति कामणु येदुग्घाड एडनाई दवि करणहोई सराइ एव कृत्वा जिणिदो अच्छरगण इति अम्ल वर्ग: घरगणइति क्षारवर्गः गणासवइति समुदा- येन एभिः सथुओ सस्तुत्य स्तभितेत्यर्थः भगवान् सेंद्र पुज्योभवति कमकृद् भवति । पालियमयमहिओ महितः परिकर्मितः दिशतु क्षयं सर्व दुरितानामित्यर्थः असणे इअ नतलोननिम्मलोहो इ सद्दणा रहिओ सारण रहिओ पसर अकामिओ नेअ कम लोहेस्तु ॥ ४॥ स्तोत्रार्थः ॥ इति श्रीपालित्तयकृत स्तोत्र हेमकल्प स्वोपज्ञावचूरी समातो॥ सवत १६१३ परसे नकल किया १२८ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ परिशिष्ट नयर ३ -: उग्रवीर कल्प :- द १७१८१.१.२१२२१३२४ २५२६२७१८१५.११३ उग्रवीर महाविप्नु । ज्वलतं सर्वतोमुखम् । नृसिंह भीषणभद्र । मृत्यु मृत्यु नमाम्यहम् ॥ १॥ २९ गर्दन १ शिर ९द भुजा १७६ संघ २५ गुदा १० या भुजा १८ या जघ २६ इद्रिय ३ द नेत्र ११ द पार्श्व १९द जानु २७ पृष्ट ४ चा नेत्र १२ वा पाच २० वा जानु २८ गला ५द कर्ण १३ उदर २१६ टाग ६ वा कर्ण १४ नाभि २२ घा दाग ३०दत ७ दरूध १५ द फरि २३ ६ पग ३१ जिव्हा ८ वा स्कघ १३ वा कटि २४ वा पग ३२ दाद इस मत्रका जप १२५००० सवालाख कम अधिक नहिं जपना प्रथम सूर्य ग्रहणके दिन जपना जितना जपा जाये उतना जाप करे फिर सवा- लक्ष पुरा करे यीचमे नागा [अतर] न करे नहि तोमत्र चला जायगा पुराफरे सिद्ध हुया जयतक सवालक्ष न होये तयतक लोहकी खीलीमत्र अक्षरके उपर ३२ अक्षरका एक नयर निकालकर खीली ठोकदे दरद नाश कार्य काले दरदयालेको २१ चार पढकर पानी देवे दरद नास हो जायगा प्रयोगमे सदा जाप करना सवालक्ष पुरा न होय तबतक १०००हजार जाप पशीकरणमें मत्रनाम मन्न सपूट करना सम्मोहन [सामने ] करना नाम- मननाम, लक्ष्मीप्राप्ति श्रीमत्र श्री, उचाटन नामनाममन्त्र राजवश्ये क्ली मंत्र की विद्वेषण मत्र मत्रनाम शत्रुदमन द्री मन्त्री मार्पण मन्त्रनाममत्रनाममत्र भूतोत्साधन स्तमण नाममन्ननाममन याघानिवारण क्षौ मन्त्र क्षों ॐ मंत्र ॐ ॥ श्रीअर्जुनपताका ॥ १२९ जय मंत्रका जाप प्रारंभ करने बैठे पहिलें इस मंत्रको पढकर फिर मंत्र सुरु करें इसमें विधि लिखी, येसे करलेवे आसन पिछाकर हाथमुह घोकर स्नानकर धोती सफेद धारणकरे अस्थमंत्रस्य ब्रह्मापी गायत्री छंदः महानृसिहो देवता क्षौ चीज श्रीशक्तिः ही कीलकं नृसिंह- प्रीत्यर्य जपे विनियोगः क्षा अगुष्ठाभ्यांनमः क्षी तर्जनीभ्यांनमः मध्यमाभ्यानमः खें अनामिकाभ्यांनमः क्षा कनिष्टभ्यांनमः क्षा करतलपृष्टाभ्यांनमः क्षा हृदयाय नमः क्षी शिरसे स्वाहा। क्षु शिखाचौपट * कवचाय ह क्षा नेत्राय चौपट क्षः अस्त्रायफट् ध्यान रक्त वर्ण महाकायं सहस्त्रादित्यवर्चसम् । अष्ट याहु शस्त्रधर सिंहानन हरिभजे ॥ ले पृथवीनत्वंगंधसमर्पयामिनमा र आकाशतत्यपुष्पं यं वायुतत्वंधूप र अमितत्वंदीपं वं जलतत्वं नैवेद्य फिर मन ३२ अक्षरका उग्रवीरका जपना प्रारम करदेना चाहिए। मंघ (चंदनलाल ) पुष्प (लालकनेर) धूप (गूगल ) दीप (तिलका- तेल) नैवेद्य (गुडगेहु) किसी जगापर मंत्र प्रारम करना होवेतवतीनमत्रपढकर फिर मत्र पढना दिग् पधन ॐ सहस्त्रार फुट तीनवार पढकर अपने चारोतर्फ अक्षत या सफेद सरसों छादके, स्थानशुद्धि ॐ पवित्र बज्रमूर्ति ॐ फट तीन यार पढके चारोतर्फ जल छांटना, आसन शुद्धि ॐ आसू रखे वनरेखे हैं फटू यामे हातसे पकड़कर आसनपर १० चारपडे अनुसतं. . - दादाजी श्री जिनदत्त सूरीश्वर आम्नाय -~यावन तोला पावरती. हेम कल्प- हरताल मारण वि. प्रथम हरताल सोधन वि । हरताल बगदादी पत्र पईसा दो भार आणिजे, कली चुनो असिल सेर ८ आणीजे, कोरा फुडा लाहि चूनो राशिजे, हरताल सरा कपडा रा तेरा पुड मारिया धी , १३० ॥ श्रीअर्जुनपताका।। गठडी कीजे चुनाका कुडामाहि गठदी हरसालकी मेलीजे उपर दररोज पाणी सिंचीजे चुनो पाणीसु नीलो राखीजे, इम मास २ सिंचीजे आपरी किसीकी छाया उपर पडन न दीजे एकात राखीजे, फिनही रो पग फेरो राग्वीजे नहीं मास दो पीछे काढीजे, पिछे दीनघीकुमार रा रसमें ग्वरल कीजे दिन ३ काला भागरा रा रसमे खरल कोजे, दिन ३ अर्फ दुध परल कीजे, दिन ३ थोहर काटाली रा रसमें ग्वरल कीजे सर्व दीन १२ खरल किजे पछे टिकडी याधिजे, पछे सेर पाच पिपली राय हासीमे घाल बिचमे टिकडी मेल पचाईजे अग्नी प्रहर ३२ दिजे, आपरी छाया उपर पडन न दीजे अग्नी शीतल होय, तय काढीजे सफेद बर्फ होय असल हरताल निपजे निसदेह वात छे इस्ट देवतारी पुजा किजे, पछे हरताल परीक्षा-पावन तोलाने पाच रती यावन तोला तायो गालने पाव रती मार मेलीजे, कचन होवे सही सत्य छई पिछे खानेकी परीक्षा नामर्दनु दिजे, तीन दिन तीन चावल दिजे सेर ३५ दुध तोलने खीर कर उपर पाईजे अस्त्री २१ घरोर सुवाणीजे पण अनी हार छुटे, पण आप धापे नहीं, खलास मोडो हुवई मीसरी पईसा ११ भार उपर खवाडीजे तरा सितल हुये अनाज सेर७पको खाय, नामर्द होय सों पको मद हुवई अस्त्री विना वालाने दीजे नहीं, दीजे तो इद्री माही संचीत उठे लोही पदे । निपट मर्दमी हुये तिनने चावल एक दीजे मराकामी होवे । कोढवालेको चावल तान दीजे, उपर रोग चिणारी खिलाये कोद जावे पाटो खारो न खावे । घोला चाठा बालाने चावल तीन दीजे, उपर चावल मुगारी खीचडी चाठा सफेद जाय। पाढरोग पालेको चायल तीन दीजे चायल साठी जीमाईजे पाडुरोग जाप । पेट मार वालाको चाघल तीन दीजे उपर थुली गष्टुरी दीजे, दुध नदीजे पतासा दीजे पेटमार जाय झोलो लागो होय तिनने चार दिन चार दीजे उपर उडदारी ने चापलारी खीचडी दीजे, सीताग झोलो सर्व समाध हुये । अस्त्री सुहागनको नहीं दीजे, जो रोगरे वास्ते देये तो रोग जाये पिण तिनरे सतान हुये नहीं तिनसु अस्त्री ने नहीं दीजे । उनने काम घणो व्यापे । जीणने मिरगी वालाने दिजे दीन तीन नागरवेलके पत्र में जि मिरगी जाय पारा पाटो टालीजे गहुरो लपटोने दुध दीजे मिरगी पन यालाने दोररती पार दिन दिजे उपर चिणारी रोटी लुखी खीलाईजे

Anubhoot Siddhvisha Yantra Adi Chhe Kalpka Sangrah

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Title
Anubhoot Siddhvisha Yantra Adi Chhe Kalpka Sangrah
File name
Anubhoot Siddhvisha Yantra Adi Chhe Kalpka Sangrah
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2011/02
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
141
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
549776
Barcode
99999990030240.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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