Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Bakim Nibandhawali

Pandit, Rupnarayen · 2010/11

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प्रथमात्ति १५०० प्रति । जून १९१६ । द्वितीयात्ति १५०० प्रति । फरवरी १९१९ । ६०-serifiers-wiseurns. Lons ६-sim बंकिम-निवन्धावलीका दूसरा भाग भी तैयार हो रहा है। morrmarmensgrunes } . - Printed by M N Kulkarni at the Karnatak Press, 434, Thakurdwar, Bombay, Published by Nathuram Pronı, Proprietor, Jaiu Granth Ratushar Kalyala, Hirabag, Bombay.

विषयानुक्रमणिका । छ। १ ... ६ ... ... ... ... २३ ३१ ५ ... ... ४३ ४९ ८ ५४ ... विषय धर्म लौर साहित्य २ गौरदास बाजाकी झोली- (.) रामदास बाबूकी भीख (२) अष्टमीकी भीख (३) राधाकृष्ण ३ ज्ञान मनुप्यत्व क्या है? ५ चित्तकी शुद्धि ६ सुशिक्षित बंगाली और बंगाली भाषा गीति-काव्य प्रहत और अतिप्रकृत ९ सार्यजातिका सूक्ष्मशिल्प संगीत नवीन लेखकोंके लिए कुछ उपदेश १२ भारत-कलंक १३ भारतकी स्वाधीनता और पराधीनता बाहुबल प्यारका अत्याचार मनुकरण प्राचीना और नवीना तीन टंग १९ रोकशिक्षा रामधन पोद... मेव २२ दृष्टि २३ जुगनू पुष्प-नाटक ... 58 ६८ :: ७१ ... ८६ ६४ और वाचवल ९६ ... १५ १०८ ... ... ६ ११७ १७ १२६ १३६ १८ ... : : ... १४५ १५१ ... १५३ ... १५५ १५८ - बंकिम-बाबूका सुप्रसिद्ध ग्रन्थ । चौवेका चिट्ठा। इस ग्रन्थके पाठसे पाठकोको बंकिम बावूकी हास्यरसमयी अमृतस्यन्दिनी लेखनीका परिचय मिलेगा । यह उनके 'कमलाकान्तर दफ्तर' का हिन्दी अनुवाद है । इसमे ‘चिदानन्द चौबे' नामक विद्वान् भंग-भक्तके सब मिलाकर २० लेख और पत्र है । इनमे हॅसी दिल्लगी और मनोरजनके साथ ऊँचेसे ऊँच विपयोकी शिक्षा दी गई है । चौवेजी देशकी वर्तमान सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक वातोकी वडी ही चुभती हुई और मर्मस्पर्गा आलोचना करते है, पुराने और नये दोनो प्रकारके शिक्षितोको उनके वर्तावोके विषयमे गहरी चुट- कियाँ लेकर सचेत करते है, लेखको, सम्पादको, ढंगभक्तो, अँगरेजी सभ्यो और धर्मात्माओकी ऐसी बाते सुनाते है कि मुनकर दंग हो जाना पड़ता है। कभी आप इसका पाठ करते करते रोने लगेंगे, कभी गोकसूचक सॉसे लेने लगेंगे, कभी आनन्दसे उन्मत्त हो उठेगे और कभी हँसते हँसते पेट पकड़ने लगेगे । विनोद और विवेक दोनोका इसमे विलक्षण संयोग है । इसकी रचना काव्यके सम्पूर्ण गुणोसे परिपूर्ण है। तीसरा संस्करण शीघ्र प्रक शित होगा । मू० ॥४) -बंकिम वावूने वही खुवीसे इसमे सामाजिक बुराइयाँ दिखाई है । कही कही हास्यरसका विलक्षण मिश्रण भी उन्होने किया है । अनुवादक महागयने मूलकी खूबियोकी रक्षा योग्यतापूर्वक की है । भापा सरल और शुद्ध है । पुस्तक वडी मनोरजक है और साथ ही शिक्षादायक भी है। अच्छी छपी है। सरस्वती। -चौवेका चिट्ठा जैसा चित्ताकर्षक है वैसा ही उपयोगी भी है। इसमे सरलता और उपदेश दोनो है । पढनेसे देश और समाजविपयक अनुभव वढता है । इसकी शिक्षाये अप्रत्यक्ष होकर भी वडी ही मर्मस्पर्शिनी है और यही इसकी महत्ता है । पुस्तक सर्वथा आदरणीय है। -मैथिलीशरण गुप्त । ---यह आनन्द देनेमे उपन्यासोसे कम नहीं है। कही कही ऐसी गंभीर बाते लिखी हुई हैं जिन्हें पढकर बड़े वडे विद्वान् चकित हो जाते है। यह अपनी वर्णन- शैलीसे सवका चित्त हरण कर सकती है। कई बार पढने पर भी पुस्तक नयी जैसी मनोहर मालूम पड़ती है। -शिक्षा। यह हिन्दी-ग्रन्य-रत्नाकर सीरीजका छठा ग्रन्थ है। सीरीजमे अब तक ३७ अन्य निकल चुके है । सूचीपत्र मॅगाकर देखिए । मैनेजर-हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, हीराबाग, पो. गिरगांव-अम्बई। । । - बंकिम-निवन्धावली त धर्म और साहित्य । मैं प्रचार ( मानिकपन्न ) का एक लेखक हूं। यह जानकर ‘प्रचार के एक पाठकने मुझसे कहा--प्रचारसे इतने अधिक धर्मसम्बन्धी प्रबन्ध अच्छे नहीं लगते। जबतक दो-एक बाते हम लोगोके काम की न हो तबतक जी नहीं लग सस्ता। मैने कहा-चो, उपन्यासमे भी क्या तुम्हारा जी नही लगता ? उसकी तो प्रत्येक संत्यामे एक उपन्यास प्रकाशित होता है। उन्होने कहा-केवल वही एक न ? प्रचार २४ पृष्ट होते हैं। आठ पेजके लगभग उपन्यास होता है। वह भी पाठकोके मनोविनोदके लिए काफी नही ! आठ-नौ पेजोके बाद दो- एक पृष्ट कविता भी निकल जाती है। एक कोनेमे एक दो धर्मसम्बन्धी लेख भी पड़े रहते है । तथापि इस पाटकके लिए उतनी धर्मचर्चा भी रचि- र नहीं है। नायद कुछ और पाक भी ऐसे निकलेगे, जिन्हें धर्मचर्चा कड़वी लगती है । इन प्रवन्धका उद्देश्य केवल इसी प्रश्नपर विचार करना है कि धर्मचर्चा त्यो कड़वी लगती है, और उपन्यास आमोद-प्रमोद त्यो इतने रचते हैं? हमारी इच्छा यह है कि पाठकगण आप ही जरा सोचकर इन प्रश्नोंका उत्तर श्रीक रें। स्वयं अपनी बुद्धिमे काम लेकर निश्चय करनेमे उनका जितना उपकार होगा उतना उपकार किसीकी शिक्षाले नहीं होसकता। इस विचार काममे हम उन्हें महायता अवश्य देंगे। 1 १ । बंकिम-निवन्धावली- यह अवश्य है कि साधारण धर्मशिक्षकांके द्वारा पृथ्वी पर जिस रूपमें धर्मकी स्थापना हुई है वह प्रीतिकर नहीं है। इस देशके आधुनिक धर्मा- चार्य जिस हिन्दू धर्मकी व्यारया और रक्षा करते है उसकी मूर्ति भयानक है। आजकलके अध्यापक और पुरोहित महाशयोकी समझमे व्रत, प्रायश्चित्त, पृथ्वीके सब सुखोके प्रति वैराग्य, और अपनेको पीडित करना ही धर्म है । गर्मियोमे बहुत ही गर्मी और प्यासके मारे अगर थोडासा बर्फका पानी मैने पी लिया तो मेरा धर्म नष्ट हो गया । ज्वर चढा हुआ है, मै पलंग पर पड़ा हुआ हूँ, कप्टके मारे दम निकला जा रहा है, डाक्टरने मेरे प्राणोकी रक्षाके लिए अगर ओपधिके साथ चार पाँच बृढ व्राण्डी दे दी तो बस मेरा धर्म नष्ट हो गया ! आठ नव वर्षकी लड़की विधवा हो गई है, जिस ब्रह्मचर्य के बारेमे वह कुछ नहीं जानती और जिस ब्रह्मचर्यका पालन साठ वर्षकी बुढियाके लिए भी कठिन है, उसी ब्रह्मचर्यके द्वारा पीड़ा पहुंचाकर उस बालिकाको रुलाये बिना धर्मकी रक्षा नहीं हो सकती। धर्मोपार्जन करना हो तो पुरो- हितका घर भरो, गुरुको दो, बेकार स्वार्थपर लोभी कुकर्मी भिक्षुक ब्राह्म- णोको दो। महाकप्टसे कमाया हुआ अपना धन कुपात्रो और अपात्रोको दे डालो। यह मूर्ति धर्मकी मूर्ति नहीं है-यह एक उत्कट पैशाचिक कल्पना है। तथापि लड़कपनसे हम इसीका नाम धर्म सुनते आते है । पाठकोका इससे पिशाच या राक्षसकी तरह डरना कुछ असंगत नहीं है। जो लोग शिक्षित है, अर्थात् जिन्होंने अंगरेजी पढ़ी है, वे इसे तो धर्म नहीं मानते, किन्तु वे और एक आफतमे फंस गये है। उन्होने अंगरेजीके साथ ईसाई धर्मको भी सीख लिया है। उस शिक्षाके लिए बाइबल नहीं पढ़नी पड़ती। विलायती साहित्य ही उस धर्मसे सराबोर है। हम लोग ईसाई धर्मको ग्रहण करे या न करे, धर्मका नाम सुनते ही उसी धर्मको समझते है। किन्तु उसकी और भी भयंकर मूर्ति है। परमेश्वरका नाम लेते ही उसी ईसाइयोके परमेश्वरका स्मरण हो आता है। परंतु वह ईसाइ- योका परमेश्वर इस पवित्र नामके सर्वथा अयोग्य है। इसमे सन्देह नहीं कि वह विश्व-संसारका राजा है, लेकिन इसमे भी सन्देह नहीं कि कोई नर-पिशाच भी वैसा प्रजापीडक अत्याचारी और विचारशून्य नहीं हो २ धर्म और साहित्य। । ako घर । सक्ता । वह क्षणिक और अत्यन्त क्षुद्र अपराधके लिए मनुप्यको चिर- स्थानी दण्ड देता है। छोटे बड़े सभी पापोके लिए अनन्त नरक्की व्यवस्था करता । निप्पाप पुरुष भी, अगर वह ईसाई न हो तो उसके लिए अनन्त नरक- भोगका विधान है। जिसने कभी ईसाका नाम नहीं सुना, इसी कारण ईसाई होना जिसके लिए असम्भव है उसे भी उसी अपराधके लिए अनन्त नरक भोगना पड़ेगा । जो हिन्दूके घर पैदा हुआ उसका हिन्दूके पैदा होनेने कुछ भी दोष नहीं है। ईश्वरने उसे जहाँ भेजा वहीं वह आया । इसमे अगर कुछ दोष है तो वह ईश्वरका है । तथापि उस दोपके लिए उस गरीवको अनन्त नरक भोगना पड़ेगा । जो ईसाके पहले पैदा हुआ था और इसी कारण ईसाईधर्मको नही ग्रहण कर सका, उसे भी ईश्वरकृत जन्म-दोपके लिए अनन्त नरक भोगना पड़ेगा । इस ईसाइयोके अत्याचारी परमेश्वरका एक काम यही है कि वह दिन-रात सब लोगोके हृदयमे झोंक झाक कर देखा करता है कि किसने कब क्या पाप-सङ्कल्प क्विा । जिसमे जरा भी पाप-संकल्प देख पाया उसके लिए उसी दम अनन्त नरपती व्यवस्या कर दी । जो लोग इस धर्मके चक्करमें पड़े हैं वे लना उसी भारी विपादके भयले सटपटाये रहते हैं और जीवन्मृत अव- स्थाने अपना जीवन बिताते हैं । पृथिवीका कोई भी सुख उनके लिए सुख नहीं है । ऐली दशामे जिन लोगोने इस धर्मको धर्म कहना सीखा है उन्हें धर्मके नामसे बुखार चढ़ आना सर्वथा संगत है। साधारण धर्म-प्रचारकोंके इन दोपोसे ही धर्मकी लालोचनासे सर्व साधा- रज लोग इतने विमुख देख पड़ते हैं वे उस ओर अपनी ऐसी अरचि दिखाते हैं। नहीं तो धर्नकी मूर्ति ऐसी मनोहर है कि सब छोड़कर धर्मकी अलोचनने ही लोगोको अधिक अनुराग होना चाहिए । मुझे विश्वास है कि जगतमे लोग धर्मको मनोहर और प्रिय ही समझते हैं। केवल यहाँके ही चिदिकार-वस्त पाठकोने यह बात नहीं पाई जाती। वे अगर विचार करके देखें तो उन्हें देख पड़ेगा कि हिन्दू और ईसाइयोंके दोपसे जो धर्नी विकृत मूर्ति उन्होंने देखी है वह धर्म नहीं, अधर्म है । धर्मकी मूर्ति बहुत ही मनोहर है । ईश्वर प्रजाको पीड़ा नहीं पहुंचाता । वह बंकिम-निवन्धावली- प्रजापालक है । अपने आत्माको पीड़ा पहुंचाना धर्म नहीं है। अपनी उन्नति करना, अपने आनन्दको बढाना ही धर्म है । ईश्वरकी भक्ति, मनु- प्यके प्रति प्रीति और हृदयम शान्ति ही धर्म है। भक्ति, प्रीति और शान्ति~-इन तीन शब्दोसे जो मोहिनी मूर्ति बनती है जगतमे उसने बढ़कर मनोहर और क्या हो सकता है ? उसे छोड़कर और किस विषयकी आलोचना करनेको जी चाहेगा ? जो लोग नाटक-उपन्यास पढ़ना बहुत पसन्द करते है उन्हें एक गर अपने मनमें विचार करके देखना चाहिए कि वे किस आकांक्षासे नाटक- उपन्यास पढ़ते है । यदि वे नाटक-उपन्यासोकी विचित्र विस्मयजनक वट- नाओसे मनोविनोद करनेके लिए उन्हें पढ़ते है तो मैं उनसे पूछता हूँ कि विश्वेश्वरकी इस विश्वसृष्टिको अपेक्षा अधिक विस्मयजनक घटना किन भापाके साहित्यमे वर्णन की गई है ? एक तृण या एक मक्खीके परम जितना विचित्र कौशल है उतना कौशल किस उपन्यास-लेखककी रचनाम पाया जाता है ? और इस श्रेणीके पाठकोकी अपेक्षा और ऊंचे दर्जेके जो पाठक हैं जो कविकी कल्पना-सृष्टिके लोभसे साहित्यके प्रति अनुरक्त है, 'उनसे मैं पूछता हूँ कि ईश्वरकी सृष्टिकी अपेक्षा किस कविको सृष्टि सुन्दर है ? वास्तवमे यदि देखा जाय तो उस ईश्वरकी सृष्टिका अनुकरण होनेके कारण ही कविकी सृष्टि सुन्दर जान पड़ती है । नकल कभी असलकी वरावरी नहीं कर सकती । धर्मकी मोहिनी मूर्तिके आगे साहित्यका प्रभाव हीन पड़ जाता है। पाठक कहेगे कि यह बात सत्य नही हो सकती। क्योकि हमे उप- न्यास-नाटक पढ़नेकी इच्छा होती है और पढ़कर हम आनन्द भी पाते है। धार्मिक प्रवन्ध पढ़नेकी इच्छा नहीं होती और आनन्द भी नहीं मिलता।" इसका उत्तर बहुत ही सहज है । तुमको साहित्य पढ़नेका अनुराग है और तुमको उसमें आनन्द भी मिलता है, सो इसका कारण यह है कि जिन वृत्तियोका अनुशीलन करनेसे साहित्यका मर्म ग्रहण किया जाता है, तुम सदासे उन वृत्तियोका अनुशीलन करते आते हो, इसी कारण उससे तुमको आनन्द मिलता है । जिन वृत्तियोके अनुशीलनसे धर्मका मर्म ग्रहण ४ धर्म और साहित्य । । किया जाता है, तुमने उनका अनुशीलन नहीं किया । यही कारण है कि उनकी अलोचनामे तुमको आनन्द नहीं मिलता । लेकिन इस समय उनकी अलोचनाकी बड़ी जरूरत है। इसमे सन्देह नहीं कि साहित्यकी अलोचनामे सुख है. किन्तु जो सुख तुम्हारा उद्देश्य और प्राप्य होना उचित है उसका वह (साहित्यका सुख ) एक क्षुद्र अंगमात्र है। साहित्य भी धर्मको छोड़कर नही है । क्योकि साहित्यको जड़ सत्य है और जो सत्य है वही धर्म है। यदि कोई ऐसा कुत्सित साहित्य हो जिसकी जड असत्य और अधर्म हो, तो उसे पढ़नेमे दुरात्मा और विकृतरुचि पाको लिवा और किसीको सुख नहीं मिल सकता। किन्तु साहित्यका सत्य और धर्म भी पूर्ण नहीं है, वह पूर्ण धर्मका एक अंशमात्र है । अतएव केवर साहित्य नही, किन्तु वह महान् तत्त्व धर्म, जिसका अंश साहित्यमें है, आलोचनाके योग्य है । साहित्यको मत छोड़ो, साहित्यकी सीढ़ीपर पैर रखकर धर्मके मजपर चढ़ो। लेकिन यह भी स्मरण रहना चाहिए कि आरंभमे कुछ दुःख या कष्ट उठाये बिना कोई भी सुख नहीं प्राप्त होता । विलासी और पापी लोग जिल इन्द्रियतृप्तिको ही सुख समझते है उसकी भी सामग्री यत्न और कएने प्राप्त होती है। धर्मालोचनाका जो असीम और अनिर्वचनीय आनन्द है उसके उपभोगके लिए प्रयोजनीय जो धर्ममन्दिरकी निचली सीढ़ीमें कठिन कर्कश पत्थर सदृश तत्व है उन्हें पहले अपने वशमे करो । अतएव आरंभमे धर्मविषयक लेख रूखे और कठिन जान पड़नेपर भी उनके प्रति अनादर करना उचित नहीं। to ५ - । बंकिम-निवन्धावली- गौरदास बाबाकी झोली। (१.) रामदास वावूकी भीख । मैं बावाजीका चेला और भीखकी झोलीका वर्तमान अधिकारी हूँ । बाबाजीका वैकुण्ठवास हो चुका है। उन्होने भीखम अनेक रत्न प्राप्त किये थे । मेरे सिवा और कोई उनका उत्तराधिकारी न होनेके कारण मुझे ही वे उन रत्नोंको दे गये है। मै भी उन्हें खैरात करना चाहता हूं । नमूना देखिए। एकदिन मैं बावाजीके साथ रामदास बाबूके घर भीख मांगने गया । हम दोनो गुरू-चेले 'राधेगोविन्द' कह कर दरवाजे पर खड़े हो गये रामदास बाबूने व्यंग्य करके कहा-बाबाजी, हरिहरि भजो । मैं अपने मनमे सोच रहा था कि इन बाबूको हरिनाम क्यों इतना प्यारा है ! किन्तु इधर हरिप्रेममे गदगद बाबाजी एकतारा बजाकर गाने लगे- हरि भजत न क्यो नर मूढ़। जन-तारन-कारन करुनामय माया काया गूढ़। बाबूने दिल्लगी करके बाबाजीसे पूछा-तुम्हारे हरि कहाँ है बाबाजी ? मैंने.चाहा प्रह्लादकी तरह उत्तर दे दूं कि ' इसी खंभेमे' और मन-ही-मन कहा कि प्रभु खंभेसे निकलकर इस दूसरे हिरण्यकशिपुका पेट फाड़ डाले और मैं नरसिहके हाथसे नर-वानरका विनाश देखकर अपनी आँखे ठंडी करूं। लेकिन मै तो प्रह्लाद न था, इस लिए चुप रह गया । बाबाजीने नम्रभावसे उत्तर दिया-बाबा, मै क्या जानूं कि हरि कहाँ है ? अगर जानता तो तुम्हारे पास क्यो आता ? उन्हींके पास न जाता ? वाबू-तो भी क्या कही कोई जगह उनके रहनेकी नहीं है ? हरिके क्या कोई लोक नहीं है? बाबा-है क्यों नहीं ? वे वैकुण्ठमे रहते है। चाव-वैकुण्ठ यहाँसे कितनी दूर है बाबाजी ? वावा-तुमसे हमसे बहुत दूर है। ६ गौरदास वावाकी झोली। बाबू-तो फिर पास किसके है ? बाबा-जिसके कुण्ठा नहीं है। बाबू-कुण्ठा क्या है? बाबा-समझा, कालेजके साहबोने तुमसे मुफ्त ही रुपये ठग लिये । अगर वे ही रुपये मुझे दे देते तो अधिक उपकार होता, मैं हरिनाम सिवा देता। अब कोश खोलकर देखो। बाबू-घरमे कोग नहीं है, एक आदमी मांग ले गया है। बाबा-यह स्वीकार करनेमे तुम इतने कुंठित क्या होते हो कि कोश तुम्हारे यहाँ था ही नहीं । बाबू-ओह-वह कुण्ठा ! कुण्ठा-कुण्ठित । जहाँ कोई कुण्ठित नहीं होता वही वैकुण्ठ ? क्या ऐसी जगह भी कहीं है ? बाबा-बाहर नहीं है, भीतर है। बाबू-भीतर-किसके भीतर ? बाबा-मनके भीतर । जब तुम्हारा मन जगतम किसीतरह कुण्ठित न होगा--जब चित्त शुद्ध होगा, इन्द्रियो वशमें होगी, ईश्वरमे भक्ति, मनुष्योके प्रति प्रीति और हृदयमे शान्ति उपस्थित होगी, जब सर्वत्र वैराग्य और सर्वत्र सुखका अनुभव होगा, तब तुम पृथ्वीमे रहो या न रहो, संसारमै रहो या न रहो, समझना कि वैकुण्ठमे पहुंच गये। बाबू तो वैकुण्ठ कोई शहर नहीं, केवल मनकी अवस्थामात्र है और विष्णु वहीं रहते है ? बाबा-हो. कुण्ठारहित निर्विकार चित्तम ही वे रहते हैं। रिनका हृदय उनके रहनेका स्थान है, इनीले वे वैकुण्ठ हैं। बाबू-किन्तु यह क्या ! वे तो शरीरधारी हैं । शरीरधारीके लिए रहनेको कोई घरबार होना चाहिए। -- मालन नहीं, व्याकरणने वाबाकी कितनी गति थी। वैकुण्ठ भी विष्णुका एक नाम है । पण्डितलोग वैकुण्ठ गन्दकी व्युत्पत्ति करते है-विविधा कुण्टा... माया यस्य स वैकुण्ठः । लेकिन बावाजीका अर्थ भी गात्रसम्मत है ।

बंकिम-निवन्धावली- । । हैं बाबा-अच्छा, बताओ उनका शरीर केन्या है। बाबृ-तुम लोग ही उनको चतुर्भुज कहते हो। बाबा--ठीक है, उनको चतुर्भुज कहते है। उनकी चारों भुजाओम क्या क्या चीज है? वावृ-शंख, चक्र, गदा और पद्म । बाबा-एक एक करके समझो । पहले पद्मको लो । किन्तु उसके पहले यह देखो कि ईश्वर करते क्या है ? बाबू- क्या करते हैं? बाबा--सृष्टि, स्थिति, प्रलय । मृष्टिके सम्बन्धमे दो मत है । एक मत यह है कि आदिम जगतका कुछ उपादान भी न था । ईश्वरने पहले उपादान (पञ्चतत्त्व ) उत्पन्न करके फिर उससे सृष्टिरचना की है । और एक मत यह है कि जगतके उपादान नित्य है । ईश्वर हरएक कल्पमे उनमे मृटिरचना करते है । इस दूसरे प्रकारकी सृष्टिकी शक्ति जगतके केन्द्रमे है । सुना कि साहबलोगोका भी शायद इसी तरहका एक मत है छ । सृष्टिका मृलस्व- रूप यह जगत्-केन्द्र ही हिन्दुओके शास्त्रोमे नारायणकी नाभिका कमल कहा । अतएव विष्णुके हाथका पद्म सृष्टिक्रियाकी प्रतिमा है । बावृ-अच्छा, और तीनो चीजे ? बावा-गढा प्रलयक्रियाकी प्रतिमा है। शंख और चक्र दोनो स्थिति- क्रियाकी प्रतिमा है । जगतकी स्थिति स्थान और कालम है। स्थान है आकाश । आकाश शब्दवाही और शब्दमय है । इसीसे शब्दमय शंख आकाशकी प्रतिमाके रूपसे विष्णुके हाथमे स्थापित किया गया है। बावृऔर चक्र ? बाबा-वह काल-चक्र है । करप युग मन्वन्तर आदिके फेरसे काल घूमा करता है । इसी कारण कालको चक्ररूपसे ईश्वरके हाथमे स्थान मिला है । जगदीश्वर अपनी चार भुजाओमे आकाश, काल, शक्ति और सृष्टिको धारण किये हुए है । अब समझे कि विष्णुके शरीर नहीं है। विष्णु वैकु- है La Placiau hypothesis गौरदास बावाकी झोली। एके ईश्वर है. इसका तात्पर्य यह है कि कुण्ठायन्य निर्भय विरक्त पुरुष हरवडी हृदयमे तष्टा-पाता-हर्ता स्पले ईश्वरका ध्यान करते है। वाचू-तो फिर बस इतना कह देना ही काफी था। इस वातको तो सभी स्वीकार करते है । यह रूपक रचनेकी क्या जरूरत थी ? बाबा-यह भी तो सब स्वीकार करते है कि कलकत्ता अंगरेजोकी राज- धानी है, तो फिर किले पर अंगरेजी अंडा खड़ा करनेकी क्या जरूरत है? पृथ्वीपर सभी कामोमे इस तरहकी कल्पना देखी जाती है। फिर मुझ ऐसे मूर्खके भक्तिके मार्गमे चो कोटे धनेकी चेष्टा क्यो करते हो भैया ? बा-अच्छा यदि सममुत्र विगुके दारीर नहीं है तो फिर श्याम वर्ण किल्का है ? जिसके शरीर ही नही उसके रंग कैसा ? बाबा-आकागका भी तो श्यामवर्ग देखा जाता है. किन्तु क्या आका- शके शरीर है ? अच्छा तुम्हारा अंगरेजी शास्त्र क्या कहता है ? जगत् अन्ध- कारनय है या प्रकागमय ? बात्र-जगत् अन्धकारमय है। बाबा-इलीले विश्वन विष्णुका रंग श्याम है । बाब-किन्नु जगतमे सूर्योदय भी तो होता है-प्रकाश भी तो है। बाबा-विष्णुके हयने कौस्तुभमणि है। कौस्तुभ-सूर्य है, और वन- माला-ग्रह नक्षत्र आदि। बाद-अच्छा तो क्या यह जगत् ही विष्णु है ? बाबा-नहीं. जो जगतने सर्वत्र व्याप्त है वे ही विष्णु है । जगत् शरीर है और वे आत्मा है। बाबू-अच्छा, अशरीरी परमेश्वरके दो स्त्रिा क्यो हैं ?- लक्ष्मी, और सरस्वती । बाबा-कोग खरीदकर देखो। लक्ष्मीका अर्थ है शोभा या सौन्दर्य रमा आदि लक्ष्मीके और और नानीका भी यही अर्थ है। सरस्वतीका अर्थ है ज्ञान । विष्णु सत् हैं, सरस्वती चित् है और लक्ष्मी आनन्द है । इसीसे अरे मूर्ख ! सच्चिदानन्द परब्रह्मको प्रणाम कर । ९ + . बंकिम-निवन्धावली- बाप रे बाप ! बाबूको उनके ही घरमे 'अरे मूर्ख !' कहना । बावने उसी समय दरबानको हुक्म दिया-'मार बदजातको।' बाबाजीकी झोली पकड़कर मैं उन्हें बाहर घसीट लाया । बाहर आकर मैंने बावाजीसे कहा-बाबाजी, आज भिक्षामे क्या पाया ? बावाजीने कहा--बटपूर्वक जन धातुके आगे क्ति प्रत्यय लानेसे जो स्प बनता है वही पाया । इसे भीखकी झोली में डाल रक्खो । -श्रीहरिदास वैरागी। -- (२) अष्टमीकी भीख । आश्विन शुक्ल अष्टमीकी दुर्गापूजाके दिन बाबाजी नहीं देख पड़े। यह संभव है कि वे किसी दुर्गामन्दिरमे हरिभजन कर रहे हो। यह भी असम्भव नहीं है कि उस अमूल्य अमृतमय नामके बदले पेड़ा- बरफी आदि मिट्टीके ढेले ले लेकर वैष्णवोकी उदारता और महिमाका प्रमाण दे रहे हो। मुहीभर आटेके बदलेमे जो हरिनाम सुनाता है उससे बढ़कर दाता और कौन होगा ? मन-ही-मन इन्ही सब बातोकी विशेप- रूपसे आलोचना करता हुआ मैं पूज्यपाद गौरदासबाबाका पता लगाने निकला । जिन सब घरोमे दुर्गापूजाकी धूम थी, और दरवाजोपर युडके युड भिक्षुक खड़े थे उन सभी घरोमे ईढा, पर वह सफेद दाढीका झंडा फहराते कही न देख पड़ा । हूंढ़ते हेढ़ते एक घरमे जाकर देखा, वाबाजी भोजन करने बैठे हैं। देखकर मुझे विशेष प्रसन्नता नहीं हुई । वैष्णव होकर शक्तिका प्रसाद भोजन करना मुझे अच्छा न लगा। पास जाकर मैने बाबाजीसे कहा- स्वामी, जान पड़ता है कि भूखसे धर्मकी उदारता भी बढ़ जाती है ? बाबाजीने कहा-तव तो फिर चोरका धर्म बढ़ा ही उदार मानना पड़ेगा। भैया ऐसी बातें क्या कर रहे हो ? मे-वैष्णवको क्या शक्तिका प्रसाद खाना चाहिए ?

अष्टमीकी भीख ।
वावाजी-टोप क्या है ?
मै-हम लोग कृष्णके उपासक है । शक्तिका प्रसाद क्या खाय ?
बाबाजी--तुम यह जानते हो कि शक्ति क्या है?
मै-देवताकी शक्ति देवताकी सीको कहते है। जैसे नारायणकी शक्ति
लक्ष्मी. शिवकी शक्ति दुर्गा, ब्रह्माकी शक्ति ब्रह्माणी, इसी तरह ।
बाबाजी-दूर हो पापी ! उठ जा । तेरा मुंह देखकर भोजन करनेसे
पाप लगता है। देवता क्या तेरी तरह वैष्णवी रखकर घर गिरिस्ती करते हैं ?
दूर हो।
मैं तो फिर शक्ति क्या है ?
बाबाजी-अच्छा. यह जलका कलसा उठा।
मैंने पानीका कलसा उठा लिया।
बाबाजीने एक जलकी बूद गिराकर कहा-
मैं -यह भी कहीं हो सकता है ?
बाबाजी-नुनमें पानीका घड़ा उठानेकी शक्ति है, पर बूंद उठानेकी शक्ति
नही है। रोटी खा सकते हो ?
में-त्यो नहीं खा सकता ? रोज ही खाता हूँ।
बाबाजी-अच्छा. इस जलती हुई लकड़ीको खा सकते हो ?
मैं -जलती लड़ी भी कही खाई जा सकती है ?
बाबाजी--तुममे रोटी खानेकी शक्ति है, पर जलती लकड़ी खानेकी शक्ति
नहीं है। अब समझे कि देवताकी गति क्या है?
मै-नहीं।
बाबाजी-देवता अपनी क्षमताके द्वारा अपने करनेके कामको पूरा करते
है। उसी क्षमताका नाम शक्ति है। अग्निमे जलानेकी क्षमता ही उसकी शक्ति
है, उसका नाम न्वाहा है । इन्द्र वर्षा करते है, वर्षा करनेकी शक्तिका नाम
इन्द्राणी है । रद महार करते हैं, उनकी संहारशक्तिका नाम रुद्राणी है।
मै-यह सब आप क्या कह रहे हैं ? जिस शक्तिसे में घड़ा उठाता हूँ
या रोटी खाता हूं वह तो मुझे लाक्षात नहीं देख पड़ती । वह मेरी शक्ति
११

बंकिम-निवन्धावली- । तो दुर्गादेवीकी तरह कपड़े लत्ते पहन कर सजधजकर मेरे पास नहीं बैटनी । मेरी वैष्णवी ऐसा करती है, इसीले में उसे अपनी शक्ति कह सकता है। बाबाजी-मूर्ख लोग ऐसा ही समझते है । तुम गरीरधारी हो, तुम्हारी गक्ति तुम्हारे शरीरमे है उसके सिवा और कोई तुम्हारी शक्ति नहीं हो सकती। मै तो देवता लोग क्या है ? गरीरधारी है ? तो फिर क्या उनकी गनि भी निराकार होगी? बाबाजी-शरीरधारी और शरीररहित, दोनाकी शक्ति निगकार ही होती है। किन्तु एक एक करके समझो। पहले यह समझो कि इन्द्रादि सभी देवता शरीरधारी नहीं है। मै-यह क्या ? इन्द्रके अगर शरीर गरीर नहीं है तो म्वर्गके मिहासन पर बैठकर अप्सराओका नाच-गाना कौन देखता सुनता है ? बाबाजी—यह सब रूपक है। इसका गूढ अर्थ और किनीदिन समझाऊंगा। इस समय यह समझो कि जिससे वर्षा होती है वही इन्द्र है। जो जलाता है वही अग्नि है। जिससे जीव या वस्तुका ध्वंस होता है वही रुद्र है।। मै-मैं नहीं समझा। कोई रोगसे मरता है, कोई इबकर मरता है. कोई जल कर मरता है, कोई गिरकर मरता है, कोई कटकर मरता है। कोई जीव किसीको खाजाता है, कोई जीव किसीको मार डालता है। कोई वस्तु गल गलकर ध्वंसको प्राप्त होती है, कोई वस्तु सूखकर नष्ट होती है । इनमे कौन रुद्र है ? बाबाजी-सबका जो समष्टि भाव है, अर्थात् सबको एकत्र सोचनेसे जो समझम आता है वही रुद्र मैं-तो फिर रुद्ध एक है या अनेक ? बाबाजी-एक है । जैसे इस कलसेमे जो जल है, इस बृदमे जो जल है, और गंगामे जो जल है, सो सब एक ही जल है वैसे ही जहा जो ध्वंसका कारण है वही रुद्ध है। मैं-रुद्धके शरीर नहीं है ? वावाजी-वही तो कह रहा हूँ। - है । १२ अष्टमीकी भीख। ? - - मै तो फिर महादेवकी मूर्ति बनाकर उनकी उपासना क्यों करते है ? वह क्या उनका रूप नहीं है ? बाबाजी-उपासनाके लिए जिसकी उपसना करो उसका एक रूप होना चाहिए। नहीं तो उपालनास मन नहीं लगता । तुम उस निराकार विश्व- व्यापी रुद्रके स्वरूपका ध्यान कर सकते हो ? मैने चेष्टा की. पर वैसा. हो न सका । तब बाबाजीकी बात स्वीकार करनी ही पड़ी। बाबाजीने कहा-जिन्होंने उस तरह ध्यान करना सीख लिया है वे कर सकते है। किन्तु उसके लिए ज्ञानका प्रयोजन है । पर जिसके ज्ञान नहीं है वह क्या उपासना करे ही नहीं ? ऐसा तो उचित नहीं है। जिसके ज्ञान नहीं है वह जिस रूपसे रुकी चिन्ता कर सकता है उसी रूपसे रुडकी उपासना करेगा। ऐसी अवस्थामे रूपकी कल्पना करके ध्यान करना सहज उपाय है। तुम यदि ऐसी एक रूपकी कल्पना करो कि वह संहारक्रियाका आदर्श समझा जाय तो वह रुद्रहीकी मूर्ति है । इसीसे रुद्धके काल भैरव रूपकी कल्पना की गई है। नहीं तो रुद्रके कोई रूप नहीं है -यह तो समझा । किन्तु जैसे मेरी शक्ति मुझमे ही है वैसे ही रुद्धकी शक्ति द्राणी भी रुद्रमे ही है । तब शिव और दुर्गाकी अलग अलग मूर्ति बनाकर त्यो पूजते हैं? बाबाजी-तुम्हारा ध्यान करनेसे ही तुम्हारी शक्तिका ज्ञान नहीं हो सकता। जिसने आगमे कभी हाथ नहीं डाला वह आगको देखते ही यह नहीं समझ सक्ता कि आगमे हाथ जल जायगा । अतएव शक्ति और शक्तिशालीकी अलग अलग बालोचना किये बिना शक्तिको समझना संभव नहीं । रत भी निराकार हैं और स्वकी शक्ति भी निराकार है । जो ज्ञानी नहीं है और इसीक्षारण निराकारके स्वल्पका ध्यान करनेमे असमर्थ है, उसे उपा- सनाके लिए शनि और देवताके अलग अलग रूपोकी कल्पना करनी पड़ती है। मैं-दिन्नु वैष्णव लेग विष्णुकी ही उपासना करते हैं, लकी उपासना नहीं करते । इस कारण रुद्राणीका प्रसाद खाना आपके लिए सर्वधा अनुचित है। १३ . बंकिम-निवन्धावली- बाबाजी-विष्णुने पेट देकर मुझे ऐसी आज्ञा नहीं दी है कि रुद्राणी- के प्रसादसे उसे न भरूँ। किन्तु वह बात जाने दो, वास्तवमे रुद्राणी विष्णु की ही शक्ति है। मै- यह क्या ? रुद्राणी तो रुद्रकी शक्ति है । बावाजी-विष्णु ही रुद्र है। मे-आपकी ये बाते मानने योग्य नहीं जान पड़ती । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ये तीनो देवता अलग अलग है । एक सृष्टि, दूसरे पालन और तीसरे प्रलय करते हैं । फिर विष्णु रुद्र कैसे हो सकते हैं? बाबाजी-जिन रईसके घर बैठा हुआ में भोजन कर रहा हूं वह क्या करते है, जानते हो? मे-जानता हूँ, जमीदारी करते है। बाबाजी और कुछ नहीं करते ? में कपड़ेकी दूकान भी करते हैं। बाबाजी और भी कुछ करते हैं ? मै-रुपया देकर व्याज खाते है। बाबाजी-अच्छा । अब अगर मै बाहर जाकर किसीसे कहूँ कि में जमींदारके यहाँ भोजन कर आया हूँ, किसीसे कहूं कि मैं एक कपड़ेके सौदागरके यहाँ खा आया हूँ, और किसीसे कहूं कि मै एक महाजनके घरमै अपना पेट भर आया हूँ तो वह तीन आदमियोके सम्बन्धकी बात होगी या एक आदमीकी ? मैं-एक ही आदमीकी । क्योकि एक ही आदमी तीनो पेशे करने- वाला है। बाबाजी-वैसे ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर तीनो एक है । एक ही ईश्वर सृष्टि, पालन और संहार करता है । हिन्दूधर्ममे एक ईश्वरके सिवा तीन ईश्वर कभी नही हो सकते । मै तो फिर तीनो रूपोकी अलग अलग उपासना क्यो की जाती है? बावाजी-तुम अगर इन रईसको विशेष रूपसे जानना चाहो तो तुम्हे इनके सब कामोको अलग अलग समझना पड़ेगा । ये जमीदारके रूपमें किस तरह जमींदारी करते है, सौदागरके रूपमे किस तरह सौदागरी करते है, १४ अष्टमीकी भीख । । सूर्य है । जो ब्रह्मा, विष्णु, और महाजनके रूपमे किस तरह महाजनी करते है। वैसे ही ईश्वरकी ,उपासनामे ईश्वरके सृष्टि-स्थिति-प्रलय कायांको अलग समझना पड़ता है। इसीसे हमारे यहाँ त्रिदेवकी उपासना प्रचलित है। अलग अलग कार्यके अनुसार एकहीके अलग अलग तीन नाम रख लिये गये है। तीनो नाम अलग अलग तीन आदमियोके नहीं है। -यह तो मै समझ गया, लेकिन गड़बड़ी फिर भी नहीं मिटी। वर्षा हुई और उससे अन्न पैदा हुआ, उसे खाकर सब जिये । तो बचाया किलने ? पालनकर्ता विष्णुने या बरसानेवाले इन्द्रने ? बाबाजी-जो मै कह चुका हूं उसे अगर तुम समझ गये हो तो तुमको यह बतलानेकी कोई जरूरत नहीं है कि इन्द्र, वायु, वरुण आदि कोई जुदा देवता नहीं है। जो सृष्टि करता है वही जैसे पालन करता है वैसे ही संहार भी करता है। वे ही जलानेवाले अग्नि, बरसानेवाले इन्द्र, आंधी चलानेवाले पवन और प्रकाश करनेवाले महे- श्वर है. वे ही इन्द्र. वे ही अग्नि और वे ही सब देवता है। किन्तु जैसे हम लोग समझनेकी सुगमताके लिए एक ही जलको कहीं नदी, कही समुद्र, कही झील, कही तालाव, कहीं गढ़ा और कहीं कुआं कहते हैं वैसे ही उपासनाकी सुगमताके लिए एक ही परमेश्वरको कही इन्द्र, कही अग्नि, कही ब्रह्मा और कही विष्णु कहते है । मै-तो उनका यथार्थ नाम क्या है ? बाबाजी-दो प्रकारसे उनकी उपासना होती है। जब उनको अव्यक्त, अचिन्त्य, निर्गुण और सब जगतका आधार मानकर उनकी उपासना करते है तब उन्हे ब्रह्म, परब्रह्म या परमात्मा कहते है। और, जब उनको व्यक्त, उपास्य और इसी कारण चिन्तनीय, सगुण और सव जगतकी सृष्टि-स्थिति- संहारका कारण मानकर उनकी उपासना करते है तब उन्हें वातचीतमे ईश्वर, वेदमे प्रजापति और पुराण-इतिहासोमे विष्णु और शिव कहते है। जब एक साथ उनके दोनो रूपोका ध्यान या उपासना कर सकते हैं. अर्थात् हमारे हृदयमे जब दोनोरूप भासित होने लगते हैं- श्रीकृष्ण कहते हैं। १५ बंकिम-निवन्धावली- ? छाप मै—क्यों, तभी श्रीकृष्ण क्यो कहते है ? बाबाजी-गोतामे श्रीकृष्णजीने अपनेको इन दोनों रूपोंने ध्येय बन- लाया है । मैं उनका दायानुदास है, इस कारण उनको मे इसी नामले पुकारता हूँ। एकबार बोलो जय श्रीकृष्णचन्द्रकी । बोलो-कृष्ण-कृष्ण हरे हरे ! मै-बाबाजी, इतना कृष्णभजन क्या कर रहे हो ? यह तो बतलाओ कि 'अहिंसा' वैष्णवाका धर्म है या नहीं ? बाबाजी-अहिसा वैष्णव-कन्या अवश्य है, किन्तु वह कुला त्यागकर बौद्धोके घर चली गई है, इसीसे वह जातिभ्रष्ट हो गई है। मै-मैं आपकी यह पहेली नहीं समझ सका। बाबाजी-देख भैया, वैष्णव बननेके पहले यह समझ लेना चाहिए कि वैष्णव-धर्म क्या है ? कंठी बांधनेसे, तुलसीकी माला पहननेमे, लगानेसे, निरामिप भोजन करनेसे, पञ्च संस्कारसे या वैष्णवी रखनेमे कोई वैष्णव नहीं कहा जासकता। अच्छा बतला तो सही, जगतम सबसे श्रेष्ट वैष्णव कौन मै-नारद, ध्रुव, प्रह्लाद। बाबाजी-प्रह्लाद ही सबमे श्रेष्ठ है। सुन, प्रह्लादने वैष्णवधर्मकी क्या व्याख्या की है- सर्वत्र दैत्याः समतामुपेत्य समत्वमाराधनमच्युतस्य । अर्थात् हे दैत्यगण ! तुम सर्वत्र समदर्शी बनो । समत्व अर्थात् सबको अपने समान जानना ही विष्णुकी आराधना है। कंठी,-तिलक, माला, छाप क्या दिखाता है रे मूर्ख । यह समदर्शी भाव ही अहिंसाधर्मका यथार्थ तात्पर्य है। समदर्शी होनेपर हिंसा रह नहीं सकती। यो समदर्शी होनेपर विष्णुका नाम न जानने पर भी मनुप्य वैष्णव होसकता है। जो ईसाई या मुसलमान मनुष्यमात्रको अपने समान समझता है वह चाहे ईनाकी पूजा करे और चाहे पीर-पैगम्बरको माने, वही सच्चा वैष्णव है। और, तुम्हारे कंटी-तिलकवाले दलमे जो समदर्शी नहीं हुआ, वह वैष्णव भी वैष्णव नहीं है। हुआ है? १६

राधा-कृष्ण ।
मैं तो क्या मुसलमानके घर खाना भी खा लेना चाहिए ?
वाबाजी-इस कानसे सुनता है और उस कानले निकाल देता है ?
जब सबको समदृष्टिसे देखते हैं, सबको अपने समान समझना ही
वैष्णव धर्म है, तब हिन्दू-मुसलमान और छोटी-बड़ी जातिका भेद-भाव
रखना भी उचित नहीं । जिसमें यह भेद-भाव है वह वैष्णव नहीं । आज
तुझको कुछ वैष्णव धर्म समझाया है। अब किली दिन ब्रह्मकी उपासना
और कृष्णकी उपासना समझाऊँगा । धर्मकी पहली सीढ़ी बहुत देवतोकी
उपासना है। दूसरी लीढ़ी सकाम ईश्वरोपासना है। तीसरी सीढ़ी निष्काम
ईश्वरोपासना या वैष्णवधर्म अथवा ज्ञानयुक्त ब्रह्मोपासना है । चरमधर्म
श्रीक्षणकी उपासना है।
-श्रीहरिदास वैरागी।
।
जाहु नाथ।
(३)
राधा-कृष्ण।
में एक पुराने गीतको धीरे गुनगुना रहा था ।-" व्रज तनिके
जान
यह सुनते ही आहा!' कहकर बावाजी रोने लगे।
मुझले रहा न गया, मै हंस पड़ा । वाबाजीने खड़े होकर कहा-हँसता
क्या है रे मूर्ख !
मैं-तुम जराजरासी बातपर रोने लगते हो, इसीसे मैं हंस रहा हूँ।
बाबाजी- जिसे जराली बात कहता है, उसे कुछ समझा भी ? या
तोतेकी तरह खाली रट ही रहा है।
ने-समझा क्यों नहीं ? राधा कृष्णसे कह रही हैं-" तुम ब्रजको
छोड़कर न जाना स्वामी।"
बाबाजी-ब्रज क्या है ?
--कृप्य जहाँ गायें चराते और गोपियोंके वीचम बंसी बजाते थे।
दावाजी-चल मूर्ख ! ब्रज धातु किस अर्थमें है ?

बंकिम-निबन्धावली- मै-व्रज धातु ? आठ धातुर्य तो मुझे मालूम हैं । व्रज धातु कौनसा धातु है? -धातु है ' व्रज गमने-व्रज, अर्थात् जानेवाला । मै—जो जाता है वही व्रज है ? गऊ जाती है, तुम जाते हो, में जाता हूं, सब ब्रज है? बाबाजी-सब जज है । जानता है, जगत् किसे कहते है ? मै-यही विश्व जगत् है। बाबाजी-जगत् शब्द किस धातुसे बना है ? मै-धातुको छोड़कर जो पूछिए वह मैं बताऊं । यह शब्द सुनते ही मुझे एक प्रकारका भय लगता है। बाबाजी 'गम' धातुसे जगत् बना है । जो जाता है वही जगत् है । विश्व नाशशील है, इससे वह भी जगत् है । व्रज शब्द और जगत् शब्दका एक ही अर्थ है। मै तो क्या ब्रज कोई एक जगह नहीं है ? मैं कहता हूं वृन्दावन ही बेज है। बाबाजी-वृन्दावन नामका शहर बंगालके वैष्णवोने बना लिया है। मै तो पुराणमे वृन्दावन किसे कहा है ? बाबाजी- वृन्दा यत्र तपस्तेपे तत्तु वृन्दावनं स्मृतम्'-वृन्दाने जहाँ तप किया ( करती है, कहना ठीक होगा) वही वृन्दावन है। मै- -वृन्दा कौन? बाबाजी- राधापोडशनाम्नां च वृन्दा नाम श्रुतौ श्रुतम् । तस्याः फ्रीडावनं रम्यं तेन वृन्दावनं स्मृतम् ॥' राधा ही वृन्दा है। मै-र -राधा कौन? वावाजी-राध धातु- मै-धातु छोड़ो बाबाजी ! बावाजी -"राध साधने प्राप्ती तोपे पूजायां वा । " जो ईश्वरकी साधना करता है, उनको पाता है, उनकी पूजा या आराधना करता है वहीं राधा है । तुम जब सच्चे ईश्वरके भक्त हो जाओगे तब राधा हो सकोगे।

राधा-कृष्ण - मै-तो फिर वह कोई गोपिनी नहीं है ? बाबाजी-गोपिनी नहीं-गोपी शब्द है। जानते हो, गोपी किसे कहते हैं। मैं-गोपकी ती हुई गोपी । बाबाजी-गो शब्दका अर्थ है पृथ्वी । जो धर्मात्मा है, वे ही पृथ्वीके रक्षक है । वे ही गोप हैं। स्वीलिगमे वे ही गोपी है। मैं तो फिर गोलोक क्या है ? बाबाजी-यह पृथ्वी ही गोलोक -भूलोक है। मै-आपने सब उलट दिया। अच्छा, यदि सभी रूपक है, तो फिर नन्द क्या है ? बाबाजी-नन्द धातु हर्प और आनन्दके अर्थमे है। हम लोग उपसर्गके बिना बात नहीं करते यही एक बड़ी आफत है । आनन्द ही, नन्द है। मैं-भगवान् त्या आनन्दमे पैदा होते हैं, जो उन्हें नन्द-नन्दन कहते हैं ? दादाजीकृष्णको नन्दका पुत्र कोई नहीं कहता। वे वसुदेवके पुत्र नन्दके घर कुछ दिनके लिए जाकर रहे थे। मैं-इसका क्या अर्थ है ? बाबाजी-परनानन्द-धाम ही ईश्वरका निवास है। अर्थात् वे आनन्दमें ही विधनान हैं। मैं तो फिर यगोदा कहाँ जार्यगी ? उन्होंने कृष्णको पाला-पोसा था, इसका तात्पर्य त्या है? दाबाजी-ईवरके यश अर्थात् महिमाके कीर्तन द्वारा वे हृदयमें स्थापित और परिवर्द्धित दिये जाते हैं। मैं तो सभी रूपक है ? कृष्ण भी क्या रूपक है ? दावाजी-मेरा दृढ विश्वास है कि जगदीश्वरने सगरीर पृथ्वीपर अवतार लेकर जगतने धर्म स्थापित किया था। जैसा कि उन्होंने आप गीतामें कहा है-'धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।' वे रूपक नहीं है । पुराग-रेखस्ने उनको बीचमे स्थापित करके यह धर्मसम्बन्धी रूपक रचा है। कृष्ण नामका और एक अर्थ है, इसीसे इस रूपकके रचनेमे एक RA १ ९ बंकिम-निवन्धावली- - सुविधा हुई है । 'कृप' धातु कर्पण या आकर्पण अर्थम है । जो मनुष्यके चित्तको अपनी ओर खींचे वही कृष्ण है। मैं-बावाजी, यह तो कप्ट-कल्पना है। बावाजी-सो तो है ही। कृष्ण स्वयं रूपक नहीं है, इसीसे कप्टकल्पना करके यह अर्थ निकालना पड़ता है। वे शरीरधारी थे, अन्यान्य मनुष्योके साथ कार्यक्षेत्रमें विद्यमान थे। तथापि वे अशरीरी जगदीश्वर है । उनको प्रणाम करो। मैं-किन्तु रूपकका क्या होगा ? क्या राधा-कृष्णकी उपासना करनी चाहिए? बाबाजी-जगदीश्वरके साथ उनके भक्तोकी उपासना करनी उचित ही है। क्यो कि भक्त तन्मय होते है। भक्त भी ईश्वरका अंश हो जाते हैं। जगत् ईश्वरका भक्त है । जगत् ईश्वरमय है। जगतके ईश्वरके साथ जगतकी भी उपासना करनी चाहिए । बोलो-श्रीराधावल्लभाय नमो नमः । मै-श्रीराधावल्लभाय नमो नमः । -श्रीहरिदास वैरागी। . काम । हिन्दू-धर्मके ग्रन्थोमे 'काम' शब्दका सदा व्यवहार हुआ करता है। जो कामात्मा या कामार्थी है उसकी वारम्वार निन्दा की गई है। किन्तु साधारण पाठक इस 'काम' शब्दका अर्थ समझनेमे बड़ी गड़बड़ किया करते है । इसी कारण वे सर्वत्र शास्त्रका ठीक ठीक तात्पर्य नहीं समझ सकते । वे साधारणतः किसी विशेप इन्द्रियकी तृप्तिकी इच्छाके अर्थमे इस शब्दका व्यवहार किया करते है । वे समझते है कि शास्त्रमे भी इसी अर्थमे इस शब्दका व्यवहार किया गया है। किन्तु यह उनका भ्रम है। महा- भारतसे दो-एक श्लोक उद्धृत करके यहाँ पर काम शब्दका अर्थ समझानेकी चेष्टा की जाती है। । २० काम। । " पांच इन्द्रिय, मन और हृदय अपने विषयमे वर्तमान रहकर जो प्राति प्राप्त करते है उसीका नाम काम है। " (वनपर्व, ३३वा अध्याय ।) यह काम एकदम निन्दाके योग्य नहीं ठहरता । 'मन और हृदय' यह न कहकर अगर केवल पाँच इन्द्रियोकी बात कही जाती तो समझा जाता कि इन्द्रियवश्यता ( Sensuality )प कुप्रवृत्तिका नाम काम है। किन्तु और हृदय' का उल्लेख रहनेसे ऐसा नहीं कहा जा सकता। महा- भारतमे ही दूसरे स्थानपर कहा गया है कि " माला चन्दन आदि पदार्थोके स्पर्ग या सुवर्णादि पदाथाके लाभले मनुष्यको जो प्रसनता होती है उसीका नाम काम है। इसले यह देखा जाता है कि एक तो वह किसी प्रकारकी प्रवृत्ति या वृत्ति नहीं है। प्रवृत्ति या वृत्तिकी तृप्तिकी अवस्थामात्र है । दूसरे वह सर्वदा निन्दनीय या निन्दित तुख नहीं । वह भले-बुरे कमौका फलमात्र है। इसी कारण पीछेसे कहा गया है कि वह कर्मका एक उत्कृष्ट फल है। मनुष्य इसीतरह धर्म, अर्थ और कामके ऊपर अलग अलग दृष्टिपात करके क्वल धर्मपर या कामपर न हो । निरन्तर समानभावसे उसे इस त्रिव- र्गत अनुशीलन करना चाहिए । शास्त्रमें कहा गया है कि पहले प्रहरमें धर्मानुष्ठान, दूसरे प्रहरमें धनोपार्जन और तीसरे पहरमें कामभोग करना उचित है। 'क्वल धर्मपर न होना चाहिए,' ऐसी बात सुननेसे एकाएक यह जान पड़ता है कि उपदेश देनेवाला आदमी या तो घोर अधर्मी है और या धर्मशब्दका क्सिी विशेष अर्थमे व्यवहार कर रहा है। यहां पर ये दोनों बातें कुछ कुछ सच हैं। यहाँ पर वक्ता स्वयं भीमसेन हैं। वे अधर्मी नहीं हैं, किन्तु युधिष्टिर या अर्जुनकी तरह धर्मके सबसे ऊंचे सोपान पर नहीं पहुँच सके थे और धर्म शब्दका व्यवहार भी यहाँ उन्होने विशेष अर्थमे दिया है। उनकी एक बातसे ही यह समझमे आजाता है । वे इसके बाद ही कहते है.-" दान, यज्ञ, साधु-पूजा, वेदपाठ और सरलता-ये ही कई एक प्रधान धर्म है।" । २१ । बंकिम-निवन्धावली- वास्तवमें हम इस समय जिसे धर्म कहते हैं वह दो प्रकारका है। एक अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाला और दूसरा औरोसे सम्बन्ध रखनेवाला । औरोसे सम्बन्ध रखनेवाला धर्म ही धर्मका प्रधान अंग है। किन्तु अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाला धर्म भी धर्स है, और वह एकटम तजने योग्य नहीं है । मै दूसरेको सुखी रखकर अगर आप भी सुखसे रह सकता हूँ तो उसे छोड़कर इच्छा- पूर्वक क्या कष्ट उठाऊँगा ? इच्छापूर्वक व्यर्थ कष्ट उठाना भी अधर्म है। यहाँ पर भीमसेन दूसरोंसे सम्बन्ध रग्बनेवाले धर्मको ही धर्म और अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले धर्मके फलभोगको काम कह रहे है । यह समझ लेनेसे केवल धर्मपर न होना चाहिए' यह उक्ति युक्तिसंगत जान पड़ती है। किन्तु वास्तवमै धर्मके दो विभाग-आत्मसम्बन्धी और परसम्बन्धी- करना ठीक नहीं है। धर्म एक है। धर्ममात्रका अपनेसे और औरोसे सम्बन्ध है। । बहुत लोगोका मत है कि धर्म केवल औरोले सम्बन्ध रखनेवाला ही होना चाहिए । किन्तु ईसाई आदि कुछ लोगोका कहना है कि जिससे हम लोग परकालमे सद्गृति प्राप्त कर सके वही केवल आत्मसम्बन्धी ही- धर्म है। '. लेकिन असल वात तो यह है कि धर्मका सम्बन्ध न केवल अपनेसे है और न केवल औरोसे है। हृदयकी सब वृत्तियोका उचित अनुगीलन और परिणति ही धर्म है। यह काम अपने या औरोके लिए नही, धर्म समझ कर ही करना चाहिए । उन वृत्तियोका सम्बन्ध अपनेसे भी है और औरोंसे भी है। उनके अनुशीलनसे स्वार्थ और परार्थ एकसाथ सिद्ध होते है। मतलब यह है कि धर्मको इस प्रकारसे समझकर स्वार्थ और परार्थका भेद मिटा देना ही इस अनुशीलनवादका एक उद्देश्य है। मैंने अपने लिखे 'धर्म- तत्त्व ' नामके निवन्धमे यह अनुशीलनवाद समझाया है। । ૨૨ शान। ज्ञान । . । भारतवर्षमे 'दर्शन' किसे कहते है ? इसका उत्तर देनेसे पहले यह समझना होगा कि यूरोपमे, जिस अर्धमे, 'फिलासफी' शब्दका व्यवहार होता है उस अर्धमे 'दर्शन' शब्दका व्यवहार नहीं होता । वास्तवमे फिला- सफी शब्दका कोई एक ठीक अर्थ नहीं है। कभी इसका अर्थ अध्यात्मतत्त्व, कभी इसका अर्थ प्राकृतिक विज्ञान, कभी इसका अर्थ धर्मनीति और कभी इसका अर्थ विचार-विद्या होता है । इनमेले एक भी अर्थ दर्शन शाके मर्थके अनुरूप नहीं है। फिलासफीका उद्देश्य ज्ञानविशेप है; इसके सिवा उसका और कोई उद्देश्य नहीं है। दर्शनका भी उद्देश्य ज्ञान है सही, किन्तु उस ज्ञानका भी उद्देश्य है। वह उद्देश्य, निःश्रेयस् , मुक्ति, निर्वाण या अथवा ऐसे ही किसी दूसरे नामसे युक्त अवस्था है । यूरोपकी फिलासफीका साध- नीय ज्ञान ही है, पर दर्शनमे ज्ञान साधन मात्र है। इसके सिवा दोनोम एक और भारी भेद है । फिलासफीका उद्देश्य ज्ञानविशेप-कभी आध्या- त्मिक, कभी भौतिक, कभी नैतिक और कभी सामाजिक ज्ञान है। किन्तु सर्वत्र पनार्थमात्रका ही ज्ञान दर्शनका उद्देश्य है। इस कारण सभी प्रकारके ज्ञान दर्शनके अन्तर्गत हैं। संसार दुःखमय है। प्राकृतिक वल सदा मनुप्यके सुखदुःखका प्रति- द्वन्द्वी है। तुम जो कुछ सुख भोगते हो, उसे बाह्य प्रकृतिके साथ युद्ध करके प्राप्त करते हो। मनुष्यजीवन प्रकृतिके साथ लम्बी लड़ाई मात्र है। जब तुम समरमे जय पाते हो तभी तुमको कुछ सुख प्राप्त होता है। किन्तु मनुप्यवलकी अपेक्षा प्राकृतिक बल अनेकगुणा भारी है । अतएव मनुष्यकी जय कभी कभी होती है, और प्रकृतिकी जय नित्य निरन्तर हुआ करती है। तब तो मनुष्य-जीवन या जन्म यन्त्रणामय ही है। उसपर आर्य लोगोंके मतके अनुसार वह जन्म बारबार मिलता है। इस जन्ममें किली तरह अनन्त दुःखको भोगकर, प्राकृतिक युद्धमे अन्तको परास्त होकर, यदि जीवने देह-याग किया तो भी क्षमा नहीं है। फिर जन्मग्रहण करना होगा, फिर अनन्त दुःख भोगना होगा, फिर मरना होगा, फिर जन्म लेना होगा, २३ बंकिम-निवन्धावली- । मनुष्य-जीवनको बनाओ। इस फिर उसी दुःखका सामना है। इस अनन्त दुःखकी क्या निवृत्ति नहीं है ? मनुष्यका निस्तार नहीं है? इसके दो उत्तर है। एक उत्तर यूरोपका है और एक उत्तर भारतवर्पका है। यूरोपके लोग करते है कि प्रकृति जीती जा सकती है। जिससे प्रकृति पर जय पा सको, वही चेष्टा करो। इस जीवन-संग्राममें प्रकृतिको परास्त करनेके लिए 'शस्त्र-संग्रह करो। प्रकृतिले पूछने पर वह खुद उन शस्त्रोको बतला देगी । प्राकृतिक तत्वोका अध्ययन करो । प्रकृतिके गुप्त तत्वोको जान- कर उन्हीके वलसे प्रकृतिको जीतकर सुगमय उत्तरका फल यूरोपका विज्ञान शास्त्र है। भारतवर्षका उत्तर यह है कि प्रकृति अजेय है । जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहेगा तब तक दुःख भी रहेगा । अतएव प्रकृतिसे सम्बन्ध न रखना ही दुःखनिवारणका एक मात्र उपाय है। वह सम्बन्धविच्छेद केवल ज्ञानके ही द्वारा हो सकता है । इस उत्तरका फल भारतके दर्शनशास्त्र है। वह ज्ञान, क्या है ? आकाशकुसुम कहनेसे भी तो एक ज्ञान होता है। क्योकि आकाश क्या है सो हम जानते है और कुसुम क्या है सो भी हम जानते है। मनकी शक्तिके द्वारा दोनोका संयोग कर सकते है। किन्तु ऐसा ज्ञान दर्शनका उद्देश्य नहीं है । यह भ्रम-ज्ञान है; यथार्थ ज्ञान ही दर्शनका उद्देश्य है। इस यथार्थ ज्ञानको प्रमा-ज्ञान वा प्रमा-प्रतीति करते है । यह यथार्थ ज्ञान क्या है? जो जानते हैं वही ज्ञान है । जो जानते है उसे किस तरह जाना है ? कुछ विपयोको इन्द्रियोंके साक्षात् संयोगसे जान सकते है । यह घर, यह वृक्ष, यह नदी, यह पर्वत हमारे सामने है। इनको हम आंखोसे देख रहे है। इस लिए हम जानते है कि यह घर, यह वृक्ष, यह नदी, यह पर्वत है । अतएव ज्ञातव्य पदार्थके साथ चक्षु-इन्द्रियके संयोगसे हमे उक्त ज्ञान प्राप्त हुआ 18 इसे चाक्षुप-प्रत्यक्ष कहते है । इसी तरह घरम .' गृह-पर्वत आदि दूर है, हमारी आँखोंसे लगे हुए नहीं हैं, तो फिर इन्द्रियसे उनका सयोग किस तरह हुआ ? इसके उत्तरमे यह कहा जा सकता है कि दृष्ट पदार्थमे किरणे पडती है और वे किरणे वहाँसे पलटकर जव हमारे नेत्रोंमे प्रवेश करती हैं तव वह पदार्य हमे दीख पडता है। २४ ज्ञान - रहकर हमने सुना कि मेघ गरज रहे है, पक्षी बोल रहे है । यहाँ पर मेधके शब्द और पक्षीके बोलनेका कानोके द्वारा प्रत्यक्ष-ज्ञान हुआ। यह श्रवणे- न्द्रियका प्रत्यक्ष हुआ । इसी प्रकार चक्षु, श्रवण, घ्राण, त्वचा और रसना इन पात्र इन्द्रियोके द्वारा पाच प्रकारका प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। आर्यढानि- कोने मनकी भी गिनती इन्द्रियोमे की है। अतएव वे मानसप्रत्यक्ष भी मानते है । मन बार इन्द्रिय नहीं है । भीतरी इन्द्रियके साथ बाहरी विपयका संयोग असंभव है। अतएव मानसप्रत्यक्षले बाय विपय नहीं जाना जासक्ता । किन्तु अन्तर्ज्ञान मानस-प्रत्यक्षके ही द्वारा हुआ करता है। जो पदार्थ प्रत्यक्ष होता है उसके विषयमे हमे ज्ञान होता है। किन्तु प्रत्यक्षके बिना भी हमारा विषयका ज्ञान सूचित होता है। मैं जिसके किवाड़े बंद हैं उस कोठरीमे सोया हुआ हूं। इसी समय मेवका शब्द सुन पड़ा। इसले प्रावण-प्रत्यक्ष या श्रवणसम्बन्धी प्रत्यक्ष हुआ । किन्तु चह' प्रत्यक्ष ध्वनिका है, मेघका नहीं । मेघ यहाँ पर हमारे प्रत्यक्षका विषय नहीं है । तथापि हमको मालूम होगया कि आकागमे मेघ है । ध्वनिके प्रत्यक्षले मेघके अस्तित्वका ज्ञान कहाँसे हुआ ? हम पहले चुके हैं कि आकाशने नेपके सिवा कभी ध्वनि नहीं होती। ऐसा कभी नहीं हुआ कि मेव न हो और ऐसी ध्वनि सुन पड़े। अतएव बंद दरवाजेवाली कोरी में रहकर भी हन बिना प्रत्यक्षके जान गये कि आकाशमे मेघ है। इसको अनुनिति या अनुमान कहते है। मेवकी ध्वनिको हमने प्रत्यक्ष सुनकर जाना, और नेवते अनुमानके द्वारा । मान रो, बंद दरवाजेवाली कोठरीमे अन्धकार है और उसके भीतर तुन केले हो । इसी समय तुमने शरीरके साथ अन्य क्सिी मनुप्यके शरीरके स्पर्शका अनुभव क्यिा । उस समय कुछ देखे बिना ही तुमने जान लिया कि कोडरीके भीतर मनुष्य आया है। वह स्पर्शका ज्ञान त्वचाका प्रत्यक्ष है, क्न्नुि कोरीके भीतर मनुष्यका ज्ञान अनुमान है। उस अंधेरी कोठरीमें तुम यदि ही फूल्की महक पाओगे तो समझोगे कि वहाँ पुष्प आदि हैं। यहाँ गन्ध ही प्रत्यक्षका विषय है। पुप्प अनुमानका विषय है। बहुत बार देख . २५ यकि.म-निवन्धावली- मनुष्य बहुत ही थोड़ी बातोमे स्वयं प्रत्यक्ष कर सकता है । अधिकांश ज्ञान अनुमान पर ही निर्भर हैं । अनुमान शक्ति न होती तो हम प्रायः कोई कार्य न कर सकते । विज्ञान दर्शन आदि अनुमानके ऊपर ही बने है। किन्तु जैसे कोई भी मनुष्य सब विपयोका स्वयंप्रत्यक्ष नही कर सकता, वैसे ही कोई व्यक्ति सब तत्त्वोंको स्वयं अनुमान करके सिद्ध नहीं कर सकती। ऐसे अनेक विषय है कि अनुमान करके उन्हें जाननेमे जितने परिश्रमकी आवश्यकता है उतना परिश्रम एक मनुष्य अपने जीवनकाल भरमे कर ही नहीं सकता। ऐसे अनेक विषय है कि उन्हे अनुमानके द्वारा सिद्ध करनेके लिए जिस विद्या, जिस ज्ञान, जिस बुद्धि और जिस तत्पर- ताका प्रयोजन है वह विद्या, बुद्धि, ज्ञान और तत्परता अधिकाग लोगोमे नहीं देखी जाती। अतएव यह मानना पड़ेगा कि ऐसे अनेक अत्यन्त प्रयोजनीय विषय हैं कि बहुत लोग स्वयं प्रत्यक्ष या अनुमानके द्वारा उन्हें जान नहीं सकते। ऐसे स्थानपर हम लोग क्या करते है ? जिसने उस "विषयको स्वयं प्रत्यक्ष किया है या उसका अनुमान किया है, उसकी बात सुनकर उसपर विश्वास करते हैं । इटलीदेशके उत्तरमे जो 'आल्पस' नामकी पर्वतश्रेणी है उसे तुमने प्रत्यक्ष नहीं देखा । किन्तु जिन्होंने देखा है उनकी लिखी पुस्तक पढ़कर तुमको उसका ज्ञान प्राप्त हुआ। परमाणुमात्र अन्य परमाणुओके द्वारा आकृष्ट होते है। यह प्रत्यक्षका विपय नहीं हो सकता और तुम भी इसे गणनाके द्वारा सिद्ध नहीं कर सके। इस कारण तुमने न्यूटन' की बातपर विश्वास करके यह ज्ञान प्राप्त किया। न्याय-सांख्य आदि आयोंके दर्शनशास्त्रोमे इसे एक तीसरा प्रमाण माना है। यह शब्द-प्रमाण है । उक्त दर्शनकारीकी समझमे वेद आदिकी प्रामा- णिकता इसी प्रमाण पर निर्भर है । आप्तवाक्य या गुरुका उपदेश साधारणत. विश्वासके योग्य है। आर्यलोगोके मतसे यह भी एक स्वतन्त्र प्रमाण है। इसीका नाम शब्द-प्रमाण है। किन्तु चार्वाक आदि कुछ आर्य दार्शनिक इसे प्रमाण नहीं मानते । यूरो- पके दार्शनिक भी इसे एक स्वतन्त्र प्रमाण माननेके लिए तयार नहीं है। साधारणतः देखा जाता है कि सबकी बातोपर विश्वास करना अकर्तव्य है। यदि कोई प्रसिद्ध मिथ्यावादी आकर कहे कि वह जलमे आग जलते 4 - २६ ज्ञान। , देख आया है, तो इस बातपर कोई विश्वास न करेगा । उसके उक्त उपदेशसे मिध्याज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । अतएच व्यक्ति-विशेपका उपदेश ही प्रमाण करकर ग्राह्य है। तथापि वह ज्ञान प्राप्त करनेके पहले यह मीमांसा आवश्यक है कि कौन निश्वासके योग्य है और कौन नही । अब प्रक्ष यह है कि किस प्रमाणके ऊपर निर्भर करके यह मीमांसा की जाय ? क्लि प्रमाणके जपर निर्भर करके 'मनु' आदिका कहना ' आप्त-बास्य समझ कर ग्रहण किया जाय और रासू श्यासूसी बात अग्राह्य समझी जाये ? देखा जाता है कि अनुमानके द्वारा इस समस्याको हल करना होगा । मनुके साथ हमारे पादरी साहबका मतभेद है। तुम सदासे सुनते आ रहे हो कि मनुजी लभ्रान्त अपि थे और पादरी साहब स्वार्थपर साधारण सादमी है । इस लिए तुमने अनुमान स्यिा कि मनुकी बात ब्राह्म है और पादरीली बात अग्राह्य है । मनुके समान अभ्रान्त ऋपिने गोमांस लेवनका निध म्यिा है; इसीले तुमने अनुमान किया कि गोमांस- अमन्य है । तब 'शब्द'को एक स्वतन्त्र प्रमाण न कहकर अनुमानके अन्तर्गत ही क्यों नहीं कहते ? केवल यही नहीं । जिसके कुछ उपदेशोको ग्राह्य समझते हो उसीके अन्य कुछ उपदेशको अग्राह्य समझते हो। माध्याकर्पणके सम्बन्धले न्यूट- नका जो मत है उसे तुन सानते हो, किन्तु प्रकाशके सम्बन्धमे जो उनका मत है उसे छोड़कर तुम क्षुद्रतर बुद्धिजीवी यंग और फेनेल साहबका मत मानते हो । इलका कारण क्या है ? इसके कारणका अनुसंधान करनेसे वह कारण अनुमान ही जान पड़ेगा । अनुमानके द्वारा तुमने जाना है कि माध्या- कर्पणके सम्बन्धमे न्यूटनका मत सत्य है और प्रकाराके सम्बन्धमे जो उनका मत है वह गलत है। यदि शब्द एक जुदा ही प्रमाण होता तो उसके सभी मताको तुम स्वीकार करते । विन्नु भारतवर्ष यही होता है । भारतवर्पने जिसका एक मत अभ्रान्त और प्रारा है उसके सभी मत ग्रादा समझे जाते हैं। इसका कारण यही है कि यहाँ शब्द एक स्वतन्त्र प्रमाण माना गया है । आचोंके दर्शनशास्त्रकी आज्ञा रेवि आप्तवात्यमान प्राय हैं । यह कहनेकी तो कोई आवश्यकता ही । -- २७ बंकिम-निवन्धावली- । नहीं कि इसप्रकार विोपविचारके बिना ऋपियों और पण्डितोके हरएक मतको ग्रहण करना भी भारतवर्पकी अवनतिका एक कारण है । यहाके दार्श- निकोकी इस एक क्षुद्र भ्रान्तिसे साधारण कुफल या अनिष्ट नहीं हुआ है। प्रत्यक्ष, अनुमान और गढके अतिरिक्त नैयायिक लोग उपमितिको भी एक स्वतन्त्र प्रमाण समझते है । विचार करके देखनेसे यही सिद्ध होगा कि उपमिति अनुमितिका प्रकारभेद मात्र है, और इसी कारण सांस्य आदि दर्शनामे उपमितिको एक स्वतन्त्र प्रमाण नहीं माना है । अतएव उपमितिके विस्तृत उल्लेखका प्रयोजन नहीं जान पड़ता । वास्तवमं प्रत्यक्ष और अनुमान ही ज्ञानकी जड़ है। अनुमानकी भी जड़ प्रत्यक्ष ही है । जिन विषयका कभी प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हुआ उसका अनुमान भी नहीं हो सकता । नुम अगर कभी पहले मेधको न देखते या अगर और कोई कभी न देखता, तो तुम बंद दरवाजे- वाले घरमें मेघका गर्जन सुनकर कभी मेधका अनुमान न कर सकते। तुम अगर कभी जूहीकी खुशबूका प्रत्यक्ष ज्ञान न प्राप्त करते, तो अंधेरे घरमे जूहीकी खुशबू सूंघकर कभी अनुमान न कर सकते कि इस घरम जूहीका फूल है। इसी तरह अन्यान्य पदार्थों के सम्बन्धमे भी कहा जा सकता हैं। कभी कभी एक अनुमानकी जड़में बहुतसे बहुजातीय पूर्व-प्रत्यक्ष भी देखे जाते है । एक एक वैज्ञानिक नियम हजार हजार तरहके प्रत्यक्ष ज्ञान- का फल है। अतएव प्रत्यक्ष ही ज्ञानका एकमात्र मूल है। यही सब प्रमाणोकी जड़ । अनेक लोग यह जानकर विस्मित होंगे कि दर्शनशास्त्र दो-तीन हजार वर्पतक घूम-फिर कर फिर उसी चार्वाकके मतके पास पहुंच गया है । धन्य है आर्य लोगोंकी बुद्धि । इतने दिनोके बाद जिसे ह्यूम, मिल, बेन आदिने सिद्ध किया है उसे दो हजार वर्षसे भी पहले वृहस्पति प्रतिपादित कर गये है। कोई यह न समझे कि हम यह कह रहे है कि प्रत्यक्षके सिवा प्रमाण नहीं है । हम यह कहते हैं कि सब प्रमाणाकी जड़ प्रत्यक्षप्रमाण । gho । - * इन सब मतोंको इस समय मैंने त्याग कर दिया है।-ग्रन्थकार । २८ ज्ञान। बृहस्पतिके सब ग्रन्थ लुप्त हो जानेके कारण यह निश्चय करना कठिन है कि वृहस्पतिने ठीक यही कहा था या नहीं। प्रत्यक्ष ही ज्ञानकी एकमात्र जड़ है। किन्तु इस तत्त्वमे यूरोपके दार्श- निकोके बीच एक भारी झगड़ा है। कोई कोई कहते है, हम लोगोके ऐसे अनेक ज्ञान है जिनके सूलमे प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं पाया जाता । जैसे काल, आकाश आदि। यह बात समझना जरा कठिन है। आकाशके सम्बन्धमें एक सहज बात ले लीजिए। जैसे-दो समान्तराल रेखाये चाहे जितनी दूरतक घसीटिए, वे कभी मिल नहीं सकती। इस तत्त्वको हम निश्चित रूपसे जानते है। किन्तु यह ज्ञान हमने कहासे पाया ? प्रत्यक्षवादी कहेंगे कि “प्रत्यक्षके द्वारा । हमने जितनी समान्तराल रेखाये देखी है वे कभी एकमे मिली नहीं।" इसपर दूसरे पक्षके लोग कहेगे कि “जगतमे जितनी समान्तराल रेखाये हुई हैं, उन सबको तुमने नही देखा । तुमने जिन रेखाओको देखा- है वे अवश्य नहीं मिली, किन्तु तुमने यह किस तरह जाना कि कभी. कहीं ऐसी दो समान्तराल रेखाये नहीं खीची गई, या खीची न जायंगी, जो खीचते खीचते एक जगहपर न मिली हो, या न मिलेगी ? जिसे मनुप्यने प्रत्यक्ष देखा है उससे तुमने अप्रत्यक्ष विपयके वारेमे कैसे' निश्चय कर लिया ? तथापि हम यह जानते हैं कि जो तुम कह रहे. हो वह सत्य है-कभी कही ऐसी दो समान्तराल रेखाये नहीं हो सकती कि वे मिल जाय । तब यह मानना पड़ेगा कि प्रत्यक्षके सिवा और किसी ज्ञानका मूल तुममे है, नहीं तो तुमने यह प्रत्यक्षसे अतिरिक्त ज्ञान कहाँले पाया ?" यही कहकर प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक कोम्टने लक और घमके प्रत्यक्षवादका प्रतिवाद किया है। इसके अतिरिक्त ज्ञानके सम्बन्धमे वे यह कहते है कि जहां वायविषयका ज्ञान हमारी इन्द्रियके द्वारा होता है वहाँ वाह्यविपयकी प्रकृतिके सम्बन्धमे विसी तत्वकी नित्यता हमारे ज्ञानसे अतीत होने पर भी हमारी इन्द्रियोकी प्रकृतिको नित्यता हमारे ज्ञानके अधीन है। अपनी इन्द्रि- योकी प्रकृतिके अनुसार हम वाद्यविपयोको कुछ निर्दिष्ट अवस्थाऑको प्राप्त २९ बंकिम-निवन्धावली- । समझते हैं । इन्द्रियोंकी प्रकृति सर्वत्र एक तरहकी है, इसी लिए बाह्य विपत्रोकी सब अवस्थाये भी हमारे निकट सर्वत्र एकरूप है । इसीसे हम काल, आकाश आदिके समवायकी नित्यता जान सकते हैं । यह ज्ञान हमारा ही है, इससे कोम्टने इसको स्वतःप्राप्त या आन्तरिक ज्ञान नाम दिया है। पाटकोको फिर देख पड़ेगा कि आधुनिक यूरोपका दर्शन घृम फिरकर उसी प्राचीन भारतीय दर्शनमे मिल रहा है। जैसे चार्वाकके प्रत्यक्षवादके साथ मिल और बेनके प्रत्यक्षवादका सादृश्य देखा गया है वैसे ही वेदान्तके मायावादके साथ कोम्टके इस प्रत्यक्ष प्रतिवादका सादृश्य देखा जाता है। यूरोपमे आध्यात्मिक विषयके ऐसे बहुत कम तत्त्वोका आविष्कार हुआ है जिनकी सूचना प्राचीन आयोंने अपने प्राचीन आयान अपने ग्रंथाम न कर दी हो। कोम्टके ' आभ्यन्तरिक ज्ञान' के मतके प्रधान प्रतिद्वन्द्वी जान स्टुअर्ट मिल हैं। उन्होंने कार्य-कारण-सम्बन्धके नित्यत्त्वका आश्रय लिया है। वे कहते है कि हमलोगोने प्रत्यक्षके द्वारा एक यह अकाच संस्कार प्राप्त किया है कि जहाँ कारण वर्तमान है वहीं उसका कार्य वर्तमान रहेगा। जहाँ पहले देखा है कि ' क ' वर्तमान है वहीं 'ख' को भी देखा है। फिर अगर हम कही ' को देखें तो हम जान सकते है कि यहां पर ख ' भी है । क्योंकि हमने प्रत्यक्षके द्वारा जाना है कि जहां कारण रहता है वही उसका कार्य रहता है। समान्तराल-भाव कारण है और संमिलन-विरह उसका कार्य है। क्योंकि हमने जहाँ जहाँ समान्त- रार-भाव देखा है, वहीं देखा है कि मिलन नहीं हुआ। अतएव समान्त- राल-भाव सदा संमिलन-विरहके पहले रहता है। इसी कारण हम जानते है कि जब जहाँ दो समान्तराल रेखाय होगी वही उनका मिलन नहीं हो सकता । अतएव यह ज्ञान प्रत्यक्षमूलक अन्तमे हर्बर्ट स्पेन्सरका मत है। वे भी प्रत्यक्षवादी है। किन्तु वे कहते हैं कि ये सब प्रत्यक्षमूलक ज्ञान हमारे अपने प्रत्यक्षसे उत्पन्न नही है। प्रत्यक्षजात संस्कार पुश्तैनी होते है । मेरे पूर्व पुरुषोके जो प्रत्यक्ष- जात संस्कार थे उनका कुछ अंश मैने पाया है । मै उन संस्कारोंको लेकर . क । ३० मनुष्यत्व क्या है? ही नहीं पैदा हुआ था। ऐसा होता तो तुरतका पैदा हुआ बच्चा भी संस्कार- विशिष्ट होता। किन्तु उस समय भी उन संस्कारोका बीज मेरे गरीरमें (मन शरीरके अन्तर्गत है) था, प्रयोजनके समय वही ज्ञानके रूपने परि- त हो गया । इस प्रकार कोन्टले मतमे जो आभ्यन्तरिक या सहज ज्ञान है वहीं पेन्सरके मतने पूर्वपुरुषपरम्परागत प्रत्यक्षजात ज्ञान है। यह बात इस सनय अप्रामाणिक जान पड़ सकती है, किन्नु स्पेन्सरने ऐसी दक्षता थ इसक्ष समर्थन दिया है कि इस समय यूरोपने यही मत प्रचलित है। . मनुष्यत्व क्या है? मनुष्य इस बातको अभीतक नहीं समझ सका कि मनुष्यजन्म लेकर न्या करन्न होगा ? अनेक रोग ऐसे हैं जो जगतमे धर्नामा कहकर अपना परिचय देते हैं। वे मुखले कहा करते हैं कि परकाल्के लिए पुण्यसञ्चय ही ननुप्यके इस जन्मका उद्देश्य है । विन्नु अधिकांश लोग, चाहे मुहले भले ही यह बात करते हो, पर उनके कार्य इसके अनुसार नहीं होते ।। बहुत लेग तो परकाल्के अस्तित्वको ही स्वीकार नहीं करते । यद्यपि पर-:- बालन विषय सर्ववादितन्नत है और इस बातको सब लोग स्वीकार करते हैं कि परकारके लिए उपयलञ्चय ही इस जन्नत उभ्य है, तथापि इन् विपथने विनेष मतभेद है कि पुष्य त्या है ? केवल वंगवेगमें ही एक संजनाय न्तले नपानले परलोक बिगड़ता है, और दूसरे संप्रदायके मल्ले नपान परलेने वाले परन कार्य है। तथापि दोनों संप्रदायके गगाली और हिन्दू हैं। यदि सचमुच परकार के लिए पुप्यनञ्चय ही नकुल जलका प्रधान कार्य भान लिया जाय तो अभीतक इस वातका बहुत लोग मेन्ट Positive Philosophy नानक दर्जन मात्रा नन्ननुवाद 'प्रयावाद' लिखते हैं। हमारी सन्मने यह भ्रम है । जिनको Emp.rical Philosophy कहते है, अर्थात् लर, निल, हन और बेनका मीदार कहलाता है । इन प्रबन्धन हमने ही अपने प्रत्यक्षवाद जका प्रयोग किया है। - वंकिम-निवन्धावली- है . । कुछ निश्चय ही नही हुआ कि वह पुण्य क्या है और किस प्रकार उसका उपार्जन किया जाता है। अच्छा मान लो, यह भी निश्चित हो गया । मान लो, ब्राह्मणभक्ति, गंगाम्नान, तुलसीकी माला और हरिनामकीर्तन इत्यादि पुण्यकार्य है। ये ही मनुष्य-जीवनके उद्देश्य है। अथवा मान लो कि रविवारको काम न करना, गिरजेमे बैठकर आंखे मूंढना और स्त्रीप्टधर्मके सिवा दूसरे धर्मसे विद्वेप ही पुण्यकर्म है ! इसको भी जाने दो । दान, दया, सत्यनिष्ठा आदिको सभी लोग पुण्यकार्य मानते है । किन्तु तथापि यह नहीं देख पड़ता कि दान, दया, सत्यनिष्टा आदिको अधिक लोग अपने जीवनका उद्देश्य समझनेका अभ्यास रखते हो और उन्हें सिद्ध करते हो । अतएव इस बातको सभी लोग स्वीकार नहीं करते कि पुण्य ही जीवनका उद्देश्य है। 'जहाँ यह वात सर्वस्वीकृत है वहाँ वह विश्वास केवल जबानी जमा-खर्च भर है। वास्तवमे अगर देखा जाय तो जीवनके उद्देश्यके तत्त्वकी मीमांसाको लेकर मनुष्यलोकमे इस समय भी बड़ी गड़बड़ मची हुई है। लाखो वर्ष पहले, अनन्तसमुद्रके गहरे जलके भीतर जो अणुवीक्षणसे देख पड़नेवाले जीव रहते थे उनके देहतत्त्वको लेकर तो मनुष्य विशेप व्यस्त देख पड़ते है, परन्तु इस बातके निर्णयकी विशेष चेष्टा नही देख पड़ती कि इस संसारमें उन्हे खुद क्या करना चाहिए । बहुत लोग किसी तरह अपना पेट पालकर वाद्य इन्द्रियोको चरितार्थ करके आत्मीय-स्वजनोके भी पेट पाल सकनेको ही मनुष्यजन्मकी सफलता सम- झते हैं। इसके सिवा किसीतरह औरोपर प्रधानता प्राप्त करना भी एक उद्देश्य देख पड़ता है। पेटपालनके उपरान्त, धनसे हो या किसी अन्य- प्रकारसे हो, लोगोमे यथासाध्य प्रधानता प्राप्त करनेको अपने जीवनका उद्देश्य समझकर लोग काम करते हैं। लोगोकी समझमे यह प्रधानता प्राप्त करनेका उपाय धन, राजपद और यशकी प्राप्ति ही है । अतएव, मुखमे चाहे कोई न कहे किन्तु कार्यके द्वारा धन, पद और यशकी प्राप्ति ही मनुष्यजीवनका सर्ववादिसम्मत उद्देश्य जान पड़ता है। इन्ही तीनोके अन्यान्य ३२ मनुष्यत्व क्या है? । समवायको समाजमे सम्पत्ति कहते हैं। तीनो बातोका एकत्र होना दुर्लभ है, इसलिए दो-एक-खासकर धन-होनेसे भी उसे सम्पत्ति मान लेते है । इस सम्पत्तिको आकांक्षा ही समाजमे जीवनका सुत्य उद्देश्य समझी जाती है और यही समाजके घोरतर अनिष्टका कारण भी है। समाजकी उन्नतिकी गति धीमी होनेका प्रधान कारण यही है कि धीरे धीरे बाह सम्पत्ति ही मनुष्य-जीवनका प्रधान उद्देश्य बनती जाती है। केवल साधारण मनुष्योके खयाल्ने नहीं, यूरोपके प्रधान पण्डितो और राजपुरुषोके खयालमे भी यह बाघसम्पति ही मनुप्य-जीवनका प्रधान उद्देश्य है। शायद ही कभी भी बीचमे ऐसा कोई संसारमे उत्पन्न हो जाता है कि वर वाहसम्पत्तिको ननुष्य-जीवनका उद्देश्य समझना कैसा, उसे जीवनके उदेश्यकी सिद्धिका प्रधान विन्न समझकर दलसे अलग हो जाता है। जिस राज्यसम्पत्तिको अन्य लोग जीवनकी सफलताकी सामग्री समझते हैं उसीको विन समझर. शायसिहने लात मार दी । भारतमे और यूरोपमे भी ऐसे मुन्वृित्तिधारी अनेक महापुरुष उत्पन्न हुए हैं जिन्होने बाह्यसम्पत्तिसे इतनी घृणा दिखाई है। चिन्तु मैं यह नहीं कह सकता कि इन्होंने ही असली और यथार्थनार्गक्ष सवलंबन दिया। शायसिहने यह शिक्षा दी कि इस लोरले व्यापाराने नन लगाना ही अनिष्टका कारण है -मनुप्य सर्वत्यागी होन्र निर्वाणी कामना करे। भारतमे इस शिक्षाका फल विपमय हुआ है। ननुप्य-जीवनके उन्यके सन्दन्धने इस प्रकार और भी अनेक मुनि- वृत्ति महापुरषोती भ्रान्त धारणा होनेके कारण वे ऐहिक सम्पत्तिके प्रति विरक्त होर भी समाजका इष्ट करनेमें विशेप कृतकार्य नहीं हो सके। साधारणत: संन्यासी भादि सर्वदेशीय वैरानी-संप्रदायको उदाहरणके तोरसर निर्दिष्ट करनेसे ही यह बात अच्छी तरह प्रमाणित हो जायगी। : यह स्वीकार करता हूँ कि, किती परिनापने धनकी आकांक्षा समाजके लिए नगरवर है। धनवी आशंक्षामानको ही मै अमंगलजन्क नहीं समझता; चिन्तु धन मनुष्य-जीवनका उद्देश्य होना ही अमगलकर है । ३३ किस-निबन्धावली- कहनेका तात्पर्य यह है कि धन-संचय आदिकी तरह सुखगन्य, शुभफल. ग्रन्य, महत्त्वशन्य कार्य प्रयोजनीय होनेपर भी कभी मनुष्य-जीवनका उद्देश्य कहकर स्वीकृत नहीं हो सकते । यह जन्म भविन्य पारलौकिक जीवन के लिए परीक्षामात्र है। पृथ्वीतल स्वर्गलाभके लिए कर्मभूमि मात्र है। यह बात यदि यथार्थ हो, तो परलोकने सुख देनेवाले कार्यका अनुष्ठान ही जीवनका उद्देश्य होना उचित है । किन्तु पहले तो वैसे कार्य कौन है, इसी विपम मतभेद है-निश्चय करनेका विल्कुल कोई उपाय नहीं है और दूगरे परलोको अस्ति- त्वका ही कोई प्रमाण नहीं है। तीसरे परलोकके रहने पर भी-यह पृथ्वी परीक्षा-भूमि मात्र होने पर भी-ऐहिक और पारलौकिक भलाईमे विभिन्नता होनेका कोई कारण नहीं देख पड़ता। यदि परलोक है तो जिस व्यवहारले परलोकसे भलाई होनेकी संभावना है उसी कार्यसे इन लोकमे भी भलाई होनेकी संभावना है। इस लोकमे उसीसे भलाई होनेकी संभावना न होनेका कारण अवतक कोई वतला नहीं सका । धर्मका आचरण यदि मंगलका कारण हो तो यह बात किस तरह प्रामाणित होती है कि वह केवल परलो- कमे ही मंगलाद है, इस लोकमे नही । ईश्वर स्वर्गम बैठकर काजीकी तरह न्याय-विचार करते हैं-पापीको नरकझुंडम डालते हैं और पुण्यात्माको स्वर्ग भेजते है। इन प्राचीन मनोरंजन दन्तकथाओको प्रमाण नहीं माना जासकता। जो लोग कहते है कि इस लोकमे जधार्मिकली सलाई और धर्मात्माकी उराई होते देखी जाती है, उनकी दृष्टिम चल धनसम्पत्ति आदि ही शुभ या भलाई है। उनका विचार इस नूलमे ही होने- वाली भ्रान्तिसे दूपित है । यदि पुण्यकर्म परलोकमे शुभप्रद है तो वह इस लोकसे भी शुभप्रद होगा। किन्तु वास्तवमै केवल पुण्यकर्न क्या इस लोकमे और क्या परलोकम, शुभप्रद नहीं हो सकता। जिस प्रकारकी सनोवृतिका फल पुण्यकर्म है उसीका दोनो लोकोमे शुभप्रद होना संभव है। यदि कोई केवल मजिस्ट्रेटसाहनकी प्रेरणाके वशीभूत होकर, या यशकी लालसासे, अग्रसन्न चित्तसे दुर्भिक्षनिवारणके लिए लाखों रुपये देता है तो वह उससे परलोकके लिए पुण्य सञ्जय . - मनुष्यत्व क्या है? कैसे कर सकता है ? दान पुण्यकर्स अवश्य है, किन्तु यह कोई नहीं कह सकता कि ऐसे दानले परलोकका कुछ उपकार होगा। किन्तु जो अर्थाभावके कारण दान नही कर स्का, किन्तु तान न कर सकनेके कारण तिन है उसका इस लोक्से और परलोक अगर हो तो वहां भी. सुती होना संभव है। अतएव सनोवृत्तियोके जिल अवस्थासे परिणत होनेले पुण्यकर्म उसके फल के रूपने आप ही निप्पा होता है, परलोक अगर हो तो वही परलोकमें भी उसनद है, चर दात मानी जा सकती है । परलोक हो चाहे न हो, इस लोक्ने वही सतुप्य-जीवनका उद्देश्य है। किन्तु केवल वह अवस्था ही मन्प्य-जीवनका उद्देश्य नहीं हो सकती। जैले पुछ सानसिक वृत्तियोकी चेष्टा कर्न है और जैसे उन वृत्तिचोले अच्छी तरह परिमार्जित और उन्नत सोनेले स्वभावत शुभ कर्म करनेकी प्रवृत्ति होती है वैसे ही और भी कुछ वृत्तिया है। उनका उद्देश्य किसी तरह कार्य नहीं है-ज्ञान ही उनकी निता है। कार्यकारिणी वृत्तियोका अनुशीलन जैले सनुप्यजीवनका उद्देश्य हैले ही ज्ञानोपार्जनकी वृत्तियोवा मनुशीलन सी जीवनका उद्देश्य होना उचित है। वास्तवसे अगर देखा जाय तो देख पड़ेगा कि सब प्रकारकी मानल्कि वृत्तिचोका राज्य अनुशीलन, संपूर्ण स्फूर्ति, यथोचित उन्नति और विशुद्धि ही मनुष्य-जीवनका उद्देश्य है। परमात नही है लिऐले जनुप्योने जगतले जन्म ही न लिया तो जिन्होने दल इसी उद्देश्यका जवलंजन कर, सम्पत्ति आदिको उपयुक्त घृणा दिखा- कर अपना जीवन बिताया हो । ऐसे लोगोकी संस्था बहुत कम होनेपर भी उनके जीवनचरित मनुप्योो अमूल्य शिक्षा दे सकते हैं। जीवनके हेरचेक बन्धन रेली शिक्षा और किसी तरह नहीं मिल सकती। नीति- मात, धर्मशाल, विज्ञान, दर्शन आदि सबकी अपेक्षा यही प्रधान शिक्षा । दुर्भाग्यका ऐले लेगोके जदिनले गूड़तत्व अपरिय है। केवल दो आदती आप अपना जीवनचरित लिखदर रख गये है,-एक गेटे और दूसरे जान सजई मिल। । .. - ३५ बंकिम-निवन्धावली- चिलकी शुद्धि। हिंदूधर्मका सारांग चित्तकी शुद्धि है। जो लोग हिन्दूधर्मपर विशद अनुराग रखते है, अथवा जिन्हें हिन्दूधर्मके यथार्थ मर्मके अनुसन्धानकी इच्छा है उनसे मै अनुरोध करता हूँ कि वे इस तत्त्वकी ओर विशेष ध्यान दे। हिन्दूधर्मके अन्तर्गत और कोई भी तत्त्व इस तत्त्वके समान मर्म-गत नहीं है। साकारकी उपासना या निराकारकी उपासना, एकेश्वरवाद या बहुत देवतोकी भक्ति, द्वैतवाद या अद्वैतवाद, ज्ञानवाढ, कर्मवाद और भक्तिवाद, लब कुछ इसके निकट तुच्छ है । चित्तशुद्धिके होनेसे सभी मत शुद्ध है और चित्तशुद्धिके बिना सभी मत अशुद्ध है । जिसका चित्त शुद्ध नहीं है उसका कोई धर्म नहीं है । जिसका चित्त शुद्ध है उसको और किसी धर्मका प्रयोजन नहीं है । यह बात नहीं है कि चित्तशुद्धि केवल हिन्दूधर्मका ही सार हो, वह सभी धोका सारांग है। यह हिन्दुधर्मका सारांश है, ईसाईधर्मका सारांश है, मुसलमानीधर्मका सारांश है, निरीश्वर- धर्मका भी सारांग है। जिसका चित्त शुद्ध है, वह श्रेष्ट हिन्दू, श्रेष्ट ईसाई श्रेष्ट बौद्ध, श्रेष्ठ मुसलमान और श्रेष्ठ निरीश्वरवादी है। जिसका चित्त शुद्ध नही है वह किसी धर्मके लोगोमे धार्मिक नहीं समझा जाता । चित्त शुद्धि ही धर्म है और खासकर हिन्दूधर्ममे ही इसकी प्रबलता है। जिसका चित्त शुद्ध नहीं है वह हिन्दू ही नहीं । मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोके सम्पूर्ण विधिविधानके अनुसार सब काम करनेपर भी वह हिन्दू नहीं है। यह चित्त-शुद्धि क्या है, यह वात दो-एक लक्षणोके द्वारा समझानेकी चेष्टा करता हूँ। चित्तशुद्धिका पहला लक्षण है इन्द्रिय-संयम । इन्द्रिय-संयमका यह अर्थ नहीं है कि सब इन्द्रियाका एकदम विध्वंस या उच्छेद कर डालो। इसका अर्थ यही है कि इन्द्रियोको संयत करो। उदाहरणस्वरूप पेटूपनको ले लीजिए । पेटू होना एक प्रकारकी इन्द्रियपरता है। इस इन्द्रियके संयम यह अर्थ न समझा जायगा कि कभी खाइए नही, हवा खाकर रहिए, अथवा खराव भोजन कीजिए। शरीररक्षा और स्वास्थ्यरक्षाके लिए जितने और जैसे आहारकी आवश्यकता है वह अवश्य करना होगा। वैसा करनेसे इन्द्रिय-संयममें कोई व्यतिक्रम न होगा। इन्द्रियसंयम वैसा कठि , ३६ बिन्ती शुदि। नहीं है। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि जितनपुर . शून्य होकर अच्छे अच्छे भोजन भी कर सकता है। माता- है कि इन्द्रियोंमे आसक्तिका अभाव इन्द्रिय-पवन है । आमरण या धर्मरक्षा अर्थात् ईश्वरीय नियमकी रक्षाके लिए जितना इन्दिय मौन आवश्यक है उससे अधिक इन्द्रिय-तृप्तिकी जो अभिलाषा कन्ता की इन्द्रियोका संयम नहीं कर सका । और. जो वैसी अभिलाया नही रना वही जितेन्द्रिय है । जिसे इन्द्रिय-परितृप्तिमे कोई सुध नहीं है, गोई साकांक्षा नहीं है. केवल धर्मरक्षाका ध्यान है वही संयतेन्द्रिय है। ऐसे अनेक आदमी देखे जाते हैं जो जाहिरसे इन्दिय-परितृप्तिले बिल विमुख हैं, पर सनके कलुपको नहीं धोलके । वे लोक रज्जाग्ने, गाने प्रतिपत्ति प्राप्त करनेके लिए. या ऐहिक उन्नतिके लिए, अथवा धर्मका दोग रचनेके लिए संयतेन्द्रिय पुरुपका सा आचरण करते है, पर उनके रत्यके भीतर इन्द्रिय-भोगकी लालसा बहुत ही प्रबल होती है । जन्मले पर नृत्युतक कभी कुमार्गगामी न होनेपर भी वे इन्द्रियसंयमसे बहुत दूर रहते है । जो लोग वारम्वार इन्द्रिय-परितृप्तिका उद्योग करके उसमे सफर. ता भी प्राप्त करते हैं उनमे और इन धर्मात्मा लोगोमे बहुत ही कम भेट होता है। दोनों समान रूपले इस लोकके नरककी आगमे जला करते हैं इन्द्रियोंको तृप्त करो या न करो, इन्द्रिय-संयम तभी होगा जब भूल कर भी मनमें इन्द्रियपरितृप्तिका खयाल न हो-आत्मरक्षा या धर्मरक्षाके लिए इन्द्रियोको चरितार्थ करने पर भी वह दुःखके सिवा सुख न जान पड़े। यह न होने पर कठोर योग और तपस्या सब वृथा है। इसी बातको स्पष्ट करनेके लिए हिन्दुओके पुराणो और इतिहासोमे ऋपियोंके सम्बन्ध- की अनेक कयाये हैं । स्वर्गले एक अप्सरा आई और उसने एक ऋपिको तपस्याने नष्ट कर दिया । वह भी उसपर आसक्त होगये। इन सब रागद्वेवेनुकास्तु विपयानिन्द्रियैश्चरन् । आत्मवदविवेगमा प्रनादमविगच्छति ॥ (गीता अ० २, इलो० ६४।) अर्थात्-राग-वेप-हीन और अपने वशीभूत इन्द्रियोंके द्वारा विषयभोग करता मा विधेयात्मा पुत्व प्रसन्नता ( अर्थात् चितशुद्धि ) को प्राप्त होता है।

वकिस-निवन्धावली- । गूढ़ बात । । कथाओसे हमे एक यह शिक्षा प्राप्त होती है कि योग या तपस्वासे इन्द्रि- यसंयमकी प्राप्ति नहीं होती । कार्यक्षेत्रम-संसारधर्मरे --ही इंद्रियसंयम प्राप्त किया जाता है। नित्य वनमे रहकर, इन्द्रियतृप्तिकी सामप्रियाने दूर रहकर, सब विगयोसे निलिल होकर यह अवश्य समजा जा सकता है कि मैने इन्द्रियोको वशमे कर लिया, किन्तु कच्चा घड़ा जैसे पानी लगते ही नहीं टिकता. वैसे ही ऐसा कचा इन्द्रिय-रंयम भी लोभके आते ही नष्टनष्ट होजाता है। जो नित्य इन्द्रिय-भोगोपयोगी सामग्रियोंके संसर्गमें रहता है, उनके साथ युद्ध करके कभी जीतता और कभी हारता है, वही अन्तको इन्द्रियाको जीत सकता है। विश्वामित्र चा परागर इन्द्रियोको नहीं जीत सके, और भीष्म या लक्ष्मणने इन्द्रियोको जीत लिया । यह हिन्दूधर्मकी एक बहुत ही है। किन्तु इन्द्रिय-संयम भी अपेक्षाकृत तुच्छ है । चित्तशुद्धिका उसकी भी अपेक्षा बड़ा और कठिन लक्षण है । बहुत लोग ऐसे है जो जितन्द्रिय है, किन्तु अन्य कारणोसे उनका चित्त शुद्ध नहीं है। उनके मनसे इंडिय-सुसकी इच्छा न रहनेपर भी यह वासना बड़ी प्रपल है कि मैं अच्छा रहू, मेरे सत्र अच्छे रहे । वे ऐसी कामना करते है कि मुझे धन मिले, मेरा मान हो, मुझे सम्पत्ति, यश और सौभाग्य मिले, मैं बड़ा होऊँ, और सब मेरी अपेक्षा छोटे रहे। जिनके ये सव अभीष्ट सिद्ध होते है वे सदा नित्य प्रति इसी चेष्टा और इसी उपयोगमें व्यस्त रहते हैं। ऐसा कोई काम नहीं जिसे वे इसके लिए न करे, ऐसा कोई विषय नहीं जिसमे वे इसे छोड़कर मन लगाये । इंद्रियासक्त पुस्पोकी अपेक्षा भी ये लोग निकृष्ट है । इनके निकट धर्म, कर्म, ज्ञान और भक्ति कोई चीज नहीं है। ईश्वरको मानने पर भी उनके लेखे ईश्वर नहीं है, जगतके रहने पर भी उनके लेखे जगत् नहीं है। केवल वे ही हैं, उनके सिवा और कुछ नहीं है । उनका यह अपना आदर और स्वार्थपरता इन्द्रियासक्तिसे भी बढ़कर चित्तशुद्धिका विघ्न है । परोपकारका भाव आये बिना कभी चित्त-शुद्धि नहीं होती। जब यह समझेगे कि जैसे हम हैं वैसे ही दूसरा है, जब जैसे अपने सुखको खोजेगे वैसे ही दूसरे सुसको भी खोजेगे, जब अपनेसे दूसरोको अलग न समझेगे, जब अपनेकी -- । ३८ चित्तकी शुद्धि अपेक्षा भी दूसरोको अपना समझेगे, जब धीरे धीरे अपनेको भूल जाकर दूसरेको ही सर्वत्व जान सकेगे, जब दूसरोसे अपनेको लीन कर देगे, जब हमारा आत्मा विश्वव्यापी विश्वमय हो जायगा, तभी चितकी शुद्धि होगी। यदि ऐसा न हुआ तो लगोटी लगाकर, संसारको छोड़कर, भगवानका नाम लेकर द्वार-द्वार पर भीख मांगते फिरनेसे चित्तशुद्धि न होगी। पक्षान्तरमे राजसिंहासन पर हीरा पक्षाने जड़ाऊ गहने पहने बैटा हुआ राजा भी यदि एक भिक्षुक प्रजाके दुःखको अपना ही दुःख समझ सकता है तो उसका चित्त शुद्ध समझना चाहिए । जो ऋषि विश्वामित्रको एक गज नहीं दे सके, उनका चित्त शुद्ध नहीं था । लौर, जो राजा शरणागत कबूतरके लिए अपना मांस काटकर बाजको दे सके थे उनका चित्त शुद्ध था। परन्तु इसकी अपेक्षा भी चित्तकी शुद्धिका एक बड़ा भारी लक्षण है। जो सब शुद्धियोंकी समष्टि करनेवाले हैं, जो शुद्धिमय है, जिनकी कृपा, ध्यान और अनुकम्पाके बिना शुद्धि नहीं होती उनमे गाढ़ी भक्ति ही चित्त- शुद्धिका प्रधान लक्षण है । इन्द्रियसंयस या परोपकारका भाव, इनके सम्पूर्ण स्वभावके चिन्ता और उनके प्रति गाड़े अनुरागके सिवा कभी नही प्राप्त हो सकता । वह भगवद्भक्ति ही चित्तशुद्धि और धर्मकी जड़ है। चित्तशुद्धिके प्रथम लक्षणले सम्बन्धमे जो कहा गया है उसका स्थूल तात्पर्य है हृदयने शान्ति । दूसरे लक्षणके सम्बन्धमे जो कहा गया है उलका स्थूल तात्पर्य है मनुप्योके प्रति प्रीति । तीसरे लक्षणके संबंध जो व्हा गया है उसका तात्पर्य है ईश्वरकी भक्ति । अतएव चित्तशुद्धिका सम्पूर्ण लक्षण हुआ हृदयमे शान्ति, मनुप्योके प्रति प्रीति और ईन्दरकी भनि । यही हिन्दूधर्मके नर्मकी बात है। भक्ति-प्रीति-शान्तिमयी इस चित्तशुद्धिको हिन्दूशानकारोंने किस तरह समझाया है तो बतलानेके लिए उदाहरण के तौरपर श्रीमद्भागवतके तृतीय- स्कन्धले भगवान् कपिलदेवकी निन्नलिखित उक्त यहाँपर उद्धृत की जाती है.- लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणत्य हुदाहृतं । अहेतुक्यव्यवहिता या भक्ति पुरमोत्तने ॥ १० ॥ -- ।

बंकिम-निवन्धावली-
सालोक्यसार्टिसामीप्यसारुयैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृहन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥ ११ ॥
स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः ।
येनातिव्रज्य त्रिगुणान् मद्भावायोपपद्यते ॥ १२ ॥
निपेवितानिमित्तन स्वधर्मण महीयसा ।
क्रियायोगेन शस्तेन नातिहिंस्रेण नित्यग. ॥ १३ ॥
मद्धिष्ण्यदर्शनस्पर्शपूजास्तुत्यभिवन्दनः ।
भूतेषु मद्भावनया सत्त्वेनासंगमेन च ॥ १४ ॥
महता वहुमानेन दीनानामनुकम्पया ।
मैत्र्या चैवात्मतुल्येषु यमेन नियमेन च ॥ १५ ॥
आध्यात्मिकानुश्रवणानामसकीर्तनाच मे ।
आर्जवेनार्यसंगेन निरहक्रियया तथा ॥ १६ ॥
मर्मणो गुणैरेते. परिसशुद्ध आशयः ।
पुरुपस्त्वनाऽन्येति श्रुतमात्रगुणं हि माम् ॥ १७ ॥
यथा वातर यो प्राणमावृड्के गन्ध आगयात् ।
एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत् ॥ १८ ॥
अहं सर्वेषु भूतेयु भूतात्मावस्थितः सदा ।
तमवज्ञाय मां मत्य कुरुतेऽचीविडम्बनम् ॥ १९ ॥
यो मा सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् ।
हित्वाऽची भजते मौव्याद्भस्मन्येव जुहोति सः ॥ २० ॥
द्विपत परकाये मा मानिनो भिनदर्शिन. ।
भूतेपु वद्धवरस्य न मन शान्तिमृच्छति ॥ २१ ॥
अहमुच्चावचैद्रव्यै क्रिययोत्पन्नयाऽनघे ।
नैव तुप्येऽपितोऽचीया भूतग्रामावमानिनः ॥ २२ ॥
अचीदावर्च येत्तावदीबर मां स्वकर्मकृत् ।
यावन वेद स्वहृदि सर्वभूतेप्यवस्थितम् ॥ २३ ॥

चिन्तकी शुद्धि। । आत्मानश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् । तस्य मिनहशो मृत्युर्विदधे भयमुल्यणम् ॥ २४ ॥ अप मां सर्वभूतेषु भूतात्मान कृतालयम् । अर्हयेद्दानमानाभ्या मैत्र्याभिनेन चक्षुषा ॥ २५ ॥ ( भागवत, तृतीयस्कन्ध, २९ वा अध्याय । ) कपिलदेवजी अपनी माता देवहूतिसे कहते है कि पुरुषोत्तमम अकारण और अन्तररहित भक्ति ही निर्गुण भक्तियोगका लक्षण है ॥ १०॥ मेरे ऐसे भक्त मेरी सेवाके लिए मेरी दी हुई सालोक्य (मेरे साथ एक लोकमे निवास), साटि (मेरे समान ऐश्वर्य), सामीप्य (मेरे समीप रहना), सारूप्य (मेरा ऐसा रूप ) और एकत्व (अर्थात् सायुज्य) आदि सब प्रकारकी मुक्तियोको भी नहीं ग्रहण करते ॥ ११॥ यही आत्यन्तिक भक्तियोग है । इसके द्वारा त्रिगुणातीत होकर जीव नेरे भावको प्राप्त हो जाता है ॥ १२॥ इस प्रकारके भक्तियोगके साधन आगे कहे जाते हैं। अपने श्रेष्ठ निष्काम धर्मद्वारा इस भक्तिका सेवन करना, पञ्चरात्र आदिमे वर्णित प्रशस्त कर्मकाण्डके द्वारा पूजा करना, मेरी प्रतिमा आदिका दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति, वन्दना, सब णियोमे मेरे भावको चिन्ता, धैर्य, वैराग्य, महात्माओका सम्मान, दीनों- पर दया, आत्मतुल्य व्यक्तियोले मैत्री, यम अर्थात् बाहरी इन्द्रियोका दमन, नियम अर्थात् भीतरी इन्द्रियोका निग्रह, आध्यात्मिक विषयोका श्रवण, मेरे नानोका कीर्तन. सरलता, सत्सङ्ग और अहङ्कारका त्याग ॥ १३॥-१६ ।। मेरे धर्मके इन गुणोले जिसकी चित्तशुद्धि हो गई है वह पुरुप मेरे गुणोका श्रवण करते ही अनायास मुझे प्राप्त होजाता है ॥ १७ ॥ जैसे गन्ध वायुके द्वारा अनायास ही ब्राणेन्द्रिय तक पहुंच जाता है वैसे ही भक्तियो- गयुक्त शुद्धचित्त परमात्माको प्राप्त होता है ॥ १८ ॥ मै आत्मा- रूपसे सदा सब प्राणियोमे अवस्थित हूं। तथापि कोई कोई मूढ पुरप मेरी अवहेला करके प्रतिमा-पूजारूप व्यर्थकी विडम्बना करते है ॥ १९॥ लब प्राणियोसे अवस्थित आत्मारूप मुझ ईश्वरको छोड़ कर जो कोई मूर्खतासे प्रतिमाको पूजा करता है वह राखमे ही होम करता है ॥ २० ॥ पराये शरीरमे मुझसे द्वेप करनेवाले, अभिमानी, भेदभावपूर्ण ४१ ।

पंकिग-निवन्धावली- - और जीवासे वैर बाँधनेवाले पुरुपके मनको शान्ति नहीं प्राप्त होती ॥ २१ ॥ जो व्यक्ति प्राणियोले वैर रखता है वह वाहे प्रतिमासे अनेक लामाग्रियो और क्रियाओले पूजा करे तो भी मैं उसपर सन्तुष्ट नहीं होता ।। २२ ॥ अपेन कर्म करता हुआ पुरुष तभी तक प्रतिमा आदि मेरी पूजा करे, जब तक उसे अपने हृदयमं यह ज्ञान न प्राप्त हो कि मैं नत्र प्राणियोमे अवस्थित हूँ॥ २३ ॥ अपने और दृसरेमे जो कोई जरा भी भेदभावना करता है उरा भेदभाव भरे पुरुषको मृत्युसे बहुत ही घोर भय प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ अतएव पुरुपका कर्तव्य है कि वह मुझे सब प्राणियोका अन्तर्यामी और सब प्राणियोमे अवस्थित जानकर दान, मान, मंत्री और रामहिके द्वारा मेरी पूजा करे ॥ २५॥ चित्त-शुद्धिके सम्बन्धमे हिन्दूशास्त्रासे इस प्रकारकी रहुतनी उनियाँ उद्धृ- त की जासकती है, पर वैसा करनेकी कोई जरूरत नहीं जान पड़ती। हिंदु- ओको यह स्मरण रखना चाहिए कि चित्तशुद्धिके बिना प्रतिमा-पूजासे कोई धर्म नहीं है। ऐसी अवस्थाले प्रतिमा-पूजा करना व्यर्थकी विडम्बना है। मनुप्योको सब प्रवृत्तियोकी सम्यक् स्फूर्ति, परिणति और सामञ्जस्यके द्वारा यह चित्त-शुद्धि प्राप्त होती है। भक्ति और प्रीति ये दोनो बृत्तिया कार्यका- रिणी होती है । किन्तु केवल कार्यकारिणी वृत्तियोके अनुशीलनसे धर्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती। ज्ञानोपार्जनकी वृत्तियोंके अनुशीलनके विना धर्मके स्वरू- पका ज्ञान नही हो सकता। चिर-रान करनेवाली वृतियोंके अनुमीलनके बिना धर्मके माहात्म्य और सौन्दर्यकी सम्यक् उपलब्धि नटरी टोती और चित्तशुद्धिके मार्ग साफ नहीं होते। शारीरिकवृत्तियोंके समुचित अनुमीलनके बिना धर्मानुमोदित कायोके उपयोगी क्षमता नहीं पैदा होती और हृदयको भी शान्ति नहीं मिलती। इस कारण सव वृत्तियोंके सम्यक अनुशीलन और सामञ्जन्यका फल ही चित्तकी शुद्धि है। ASIA क ૨

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बंकिम-निवन्धावली- । होते है। अगर दोनो आदमी अंगरेजी जानते हैं तो बातचीत भी अंगरेजीम की जाती है। कभी सोलहो आने अंगरेजीमें, और कभी बारह आने अंगरेजीमे बातचीत होती है । बातचीत चाहे जिस भापामे हो, लेकिन चिठीपनी कसी बॅगलामे नही होती। हमने अबतक कभी यह नहीं देखा कि कुछ भी अंगरेजी जाननेवाले दो आदमी बगलामें चिट्ठीपत्री लिखते हो । हमे अब भी यह आशा है कि विशेषरूपसे दुर्गापूजाके मन्त्रआदि भी अंगरे- जीमे ( तर्जुमा करके) ही पढ़े जायगे ! इसमे विरमयकी बात कुछ भी नहीं है । एक तो अंगरेजी राजभापा है- धन कमानेकी भाषा है, दूसरे उसमे बहुतसी विद्याओंका समावेश है, वही ज्ञानोपार्जनका द्वार है। बंगालियोने उसे लड़कपनसे पढ़कर दूसरी मातृभापाका स्थान दे रक्खा है। खासकर अंगरेजीके इस बहुल प्रचारका कारण यही है कि अंगरेजीमे अपना वक्तव्य कहे बिना उसे अंगरेज नहीं लमझते । अंगरेजोके समझे विना मान-मर्यादा नहीं होती। अंगरेजीस मान न मिला तो और लोगोले मान मिलना या न मिलना बराबर है। अंगरे- जोने जिसे नहीं सुना वह जंगलमे रोनेके समान है, अंगरेजोने जिसे नहीं देखा वह राखमे होम करनेके समान निष्फल है । हम अंगरेजी या अंगरेजोके द्रोही नहीं है। हमारा भी यह मत है कि अंगरे- जोसे इस देशका जितना उपकार हुआ है उसमे अंगरेजीको शिक्षाका प्रचार ही प्रधान है। अनन्तरत्नप्रसविनी अंगरेजी भापाका जितना अनुशीलन हो उतना ही अच्छा है। हमारी यह भी सम्मति है कि समाजकी भलाईके लिए कुछ एक सामाजिक कार्याका राजभापामे ही सम्पन्न होना आवश्यक है हमारी बहुतसी ऐसी बाते है जिन्हें हमे राजपुरुपोंको समझाना होगा । वे सब वाते अंगरेजीमे ही कहनी पड़ेगी। ऐसी बहुतसी बात है जो केवल बंगा- लियोके लिए ही नहीं हैं, सारे भारतवर्षको वे दाते सुनानी पड़ेगी । उन सब बातोको अंगरेजीमे कहे विना सारा भारत नहीं समझ सकता । भारतकी अनेक जातियोका मत सलाह और उद्योग जब तक एक न होगा तबतक भारतकी उन्नति नहीं हो सकती । यह मत, सलाह और उद्योगकी एकता केवल अंगरेजीके ही द्वारा हो सकती है। क्यो कि इस समय संस्कृत ४४ सुशिक्षित बंगाली और बँगला भाषा भाषा लुप्तप्राय हो गई है। बंगाली, मराठे. तैलंग, पंजाबी आदिकी साधारण मिलन-भूमि अंगरेजी भापा है। इसी सूत्रमे भारतकी गांठ दृढ़ बांधी जा सकेगी। (इस समय कांग्रेसके द्वारा यह कार्य बहुत कुछ हो रहा है।) इस कारण जितना अंगरेजीका व्यवहार है उतना होता रहे। किन्तु एकदम अंगरेज बननेसे काम नहीं चल सकता । बंगाली फभी अंगरेज नहीं हो सकते । वंगा- लियोकी अपेक्षा अंगरेजोमे अनेक गुण है और वे बहुत कुछ सुखी है। अगर ये तीन करोड़ बंगाली एकाएक तीन करोड़ अंगरेज बन जा सकते तो कुछ बुरा न था । किन्तु इसकी कुछ भी संभावना नहीं है । हम चाहे जितना अँगरेजी पड़े, अंगरेजीमे बातचीत करे और अंगरेजीमे लिखें, लेकिन वह सियारके सिहकी खाल मोड़नेके सिवा और कुछ न होगा। जब हम बोलेगे, तब हमारी असलियत छिपी नहीं रह सकती। पांच सात हजार नकली साहबोके सिवा तीन करोड़ अंगरेज कभी नहीं बन सकते । गिलटसे खालिस पीतल अच्छी । पत्थरकी बनी सुन्दर वीमूर्तिकी अपेक्षा कुरूप जंगली स्त्री गुजरके लिए अच्छी । नकली साहब बननेकी अपेक्षा खालिस बंगाली होना कहीं अच्छा है। अगरेजी लिखने और पढ़नेवाले सम्प्रदायले नकली साहबोके सिवा खालिल बंगाली पैना होनेकी संभावना नहीं है। जबतक सुशिक्षित और ज्ञानसन्पन बंगाली बेगला भापाने अपने विचारोको नही प्रकट करेंगे, तब तक बंगाली जातिकी उन्नति नही हो सकती। मालूम नहीं. बंगाली लोग इस वातको क्यो नहीं समझते। जो बात अंगरेजीने लिखी जाती है उसे कितने बंगाली समझ सकते है ? वह बात अगर देगलाने लिखी जाय तो कौन बंगाली उसे न समझ सकेगा ? अगर कोई यह समझे कि सुशिक्षितोंकी बाते समझना केवल सुशिक्षितोके लिए ही आव- दमक है, तो वह भारी भ्रममे पड़ा हुआ है । लब बंगालियांकी उन्नति बिना देशकी छ नी भलाई नही हो सकती । देशके सब लोग अंगरेजी नहीं समजते. और उनके कभी समझनेकी भाशा भी नहीं की जा सकती। अतएव यह निर्विवाद है कि जो बात बंगलामें नहीं कही जायगी उसे तीन क्रोद दंगारी कभी सुन या समझ नहीं सकते । इस समय भी नहीं नुनते और आगे भी कभी नहीं सुन सक्ते । जिन बातको देशके सब लोग नहीं सुनते या समझते, उसले समाजकी कोई विशेष उन्नति नहीं हो सकती किस-निवन्धावली- इस समय एक बात यह उठी है कि केवल उच्च श्रेणीके लोगोके सुशि- क्षित होनेकी जरूरत है, निम्न श्रेणोके लोगोको अलग शिक्षा देनेकी जस्- रत नही है । वे आप ही उच्च श्रेणीके द्वारा विद्वान् हो उठेगे । जैसे किसी सोखनेवाले पदार्थके उपर पानी डालनेले उसके नीचेकी तहतक भीग जाती है वैसे ही वंगालीजातिरूप शोपक पदार्थको ऊपरकी तह पर विद्यारप जल डालनेले उसकी नीचेकी तह–अर्थात् निन्नश्रेणी-भी भीग जायगी । जलकी बात होनेसे यह उक्ति निःसन्देह कुछ सरस जान पड़ती है। अंगरेजी शिक्षाके लाथ ऐसा जलयोग हुए बिना हमारे देशकी इतनी उन्नतिकी आशा कभी नहीं की जा सकती थी। जल भी असंत्य है और सोखनेवाले भी असंख्य है । अबतक सूखे ब्राह्मण पण्डित देशको उजाड़ रहे थे, अब नई पौधके लोग जलयोगके द्वारा देशका उद्धार करने। क्योकि उनने छिद्र होनेके कारण निम्नश्रेणीके लोग तक सरस हो उठेगे ! लिन्तु हसे यह आशा नहीं है कि यह जलमयी विद्या यहां तक कर सकेगी। विद्या पानी या दूध नहीं है कि ऊपर डालनेसे नीचेकी तह तक असर करेगी। केवल इतना कहा जा सकता है कि किली जातिका एक हिस्सा पढ़ा लिखा सुशिक्षित होनेसे उसके संसर्गसे अन्य अंगकी भी श्रीवृद्धि हो सकती है। किन्तु यदि जातिके दोनो हिस्सोकी भाषामे ऐसा भेद हो कि विद्वानी भापाको सूर्ख न लमज सके तो संसर्गज्ञा फल कैसे हो सकता है? सुरय बात यह है कि इस समय उन लोगोके भीतर उघ श्रेणी और निम्न श्रेणीक बीच पररपर कुछ भी सहृदयता नहीं है । उदणीके सुशि- क्षित लोग मूर्स दरिद्र लोगोके किसी दुःखरो दुसी नहीं होते । मूर्ख दरिद- लोग धनी और सुशिक्षित लोगोले किसी सुखले तुखी नहीं है । इस समय यह परम्पर एल्दयताका अभाव ही देशोनातिके लिए प्रधान रकावट है। इस राहयताके न होनेले ही दोनो श्रेणियोमे दिन दिन भारी अलगाव होता जाता है। अगर उच्च श्रेणी और निम्न श्रेणीमे ऐला अलगाव ह तो फिर संसर्गन फर क्या होगा? जो अलग है उसके साथ संलर्ग कैसा ? अगर शक्ति- शाली लोग अशक्त लोगोंके दुःसमे दुख और सुखमे सुसी न हुए तो फिर । ४६ - सुशिक्षित वंगाली और वंगला भाषा। उनको उबारेगा कौन ? और. अगर सर्वसाधारणका उद्धार न हुआ तो फिर शक्तिशाली लोगोकी उत्सति कही हुई ? ऐला तो कभी किसी देश नहीं हुआ कि निम्नश्रेणीके लोग सदा एक अवस्थामे रहे, और उच्चभ्रेगीके लोगोकी निरन्तर श्रीहद्धि होती रहे। बल्कि जिस जिल समाजकी विशेष उन्नति हुई है उस उस समाजले दोनो श्रेणीके लोग समकक्ष, हिलेमिले और लहृदयताल्पता ही देते जाते है । जनतक ऐला नही हुआ-जबतक दोनोमे अन्तर बना रहा, तन्तक उन्नति नहीं हो सकी । जब दोनो श्रेणियोमे लामञ्जत्य हुआ तमीले श्रीवृद्धिका श्रीगणेश हुआ। रोम, एथेन्स, इंग्लैण्ड, अमेरिका जादि देन के उदाहरण है । इन देशोके इतिहासको सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं । इल्के विपरीत समाजके भीतर भिन्न भिन्न श्रेणिनेने अल्गाय रहनेले जैसा अनिष्ट होता है उसके उदाहरण पार्टी, मान्त. निलर और भारतवर्ष आदि देश हैं । एथेन्स और स्पार्टा, ये दोनों प्रतियोगी नगर थे। एथेन्सने सब समान थे, स्पार्टामे एकजाति प्रभु और एक जाति दाल थी । एपेल्लले पृथ्वीकी सन्यताकी सष्टि हुई । जिस विद्याके प्रभावले आधुनिक यूरोपका इतना गौरव है उसका जन्मस्थान एथेन्स है। और. सार्शल-श्यके कारण विध्वंसको प्रात हो गया । फ्रान्समे इसी अल्गावलारण सर ७८९ ने जोनारी गदर शुरू हुआ उसका अन्त अभी- तक नही हुआ । यद्यपि उस्का अन्तिम फल भलाई है, तथापि असाधारण समाज पीडाके वाद उस भलाईके लरण देख पड़ते है । हाय-पैर काटकर तेगीको आरोन्य करनेले लमान इस गदरले समाजकी भलाई हो रही है। इस भयानक घटनाले सही रोग अच्छीतरह जानते है। मिसरमें सर्वसाधारणके साथ धर्मवाल्योल जमाव रहने के कारण असमयमें ही समाजकी उन्नतिका गला दुट गया । नवीन तारतने वही कान वर्णनत अलगावने किया । वर्गगत जनाबके कारण उच्चवर्ग और नीवर्गमे ऐना भारी भेद पड़ गया विदा मे किली देनमें नहीं पड़ा और बैल अन्टि भी किसी देशमें नहीं हुआ। यही पर उन अनिष्टका विस्तृत वर्णन करनेकी कोई आवश्य- क्ता नहीं है। इन रूमय वर्णगत बलगाव बहुत कुछ कम हो आया है । लेकिन दुर्गन्या रिक्षा और सन्नत्तिके कारण दूसरे प्रकारका अलगाव दिनोंदिन पढ़ता जाता है। ४७ वाकम-निवन्धावली- । उस अलगावका विशेष कारण भापाका भेट है। सुशिक्षित बंगालियांके हृदयके भाव साधारणतः जबतक वंगला भापाम प्रकाशित न होंगे तबतक उन्हें साधारण बंगाली कभी समझ न सकेगे । वे न उनको पहचान सकेंगे और न उनके संसर्गम आ सकेंगे, अर्थात उनमे हेलमेल न बढ़ सकेगा। पढ़ने या सुननेवालोके प्रति सहृदयता ही लेखक या व्यारयानदाताका स्वाभाविक स्वयंसिद्ध गुण है। लिखने या बोलनेमे यह गुण आप ही आजाता है। जहाँ लेखक या वक्ताको निश्चितरूपसे यह मालूम है कि उसकी जातिके साधारण लोग उसके पाठक या श्रोता नही है, वहाँ उसके साथ सर्व साधारणकी सहृदयताका अभाव आप ही हो जाता है। जिन कारणोसे सुगिक्षित बंगालियोको बंगलामे ही लिखना पढ़ना चाहिए उन्हें हमने विस्तारपूर्वक कह दिया । किन्तु रचनामे सुशिक्षित बंगालि- योके बंगला भापाका व्यवहार करनेमे एक विशेष विन्न है । सुशिक्षित लोग वॅगलाभापाको नहीं पढ़ते । सुशिक्षित लोग जिसे नहीं पढ़ते उसे सुशिक्षित लोग लिखना नहीं चाहते । आपरितोषाद्विदुपांन साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।" हम सब लोगोकी दृष्टि स्वार्थपर है । लेखकमात्रको यगकी अभिलाषा होती है । यश सुशिक्षितासे ही प्राप्त होता है । अन्य लोग अच्छे बुरेका विचार नहीं कर सकते । वे अगर यश भी देते है तो उससे रचनाका परि- श्रम सार्थक नहीं जान पड़ता । जब तक सुशिक्षित लोग नहीं पड़ेगे तब- तक सुशिक्षित लोग नहीं लिखेंगे। इधर किसी सुशिक्षित बंगालीसे अगर पूछा जाता है कि "महागय, आप बंगाली होकर भी बंगलाके ग्रन्थो और पत्रोंसे इतने विमुख क्यो है ?" तो वह उत्तर देता है कि "पंगलाके किस ग्रन्थ या पत्रका आदर करे ? अगर पटने लायक कुछ मिले तो हम उसे अवश्य पढ़े ।" हम मुक्तकण्ठ होकर इस बातको स्वीकार करते हैं कि इस यातका कुछ भी उत्तर नहीं है । जो कुछ बंगलाके ग्रन्थ पड़ने योग्य है वे दो ही तीन दिनमे पढ़ डाले जा सकते है। उसके बाद दो-तीन वर्ष तक प्रतीक्षा किये बिना पढ़नेके योग्य बॅग- लाका कोई अन्य नहीं मिल सकता।

गीति-काव्य। इस प्रकार सुशिक्षिताका बंगलके प्रति अनादरका भाव ही बंगलाकी श्रीवृद्धि नहीं होने देता। सुशिक्षित बंगाली बंगला पड़ते नहीं, इस कारण सुशिक्षित बंगाली बंगलामे नहीं लिखते है। और, उधर सुशिक्षित बंगाली लिखते नहीं, इस कारण सुशिक्षित दंगाली बंगला पड़ते नही। इस कारण यह भावना है कि सुशिक्षित बंगाली लोग एक साथ ही बंगला लिखना और पटना एरु करे। तभी बंगलाको और साथ ही बंगालकी श्रीवृद्धि होगी। मा गीति-काव्य । कान्य किसे कहते हैं, यह समझानेके लिए बहुत लोगोने चेष्टा की है। किन्तु किसीकी चेष्टा सफल हुई है या नहीं, इसमे सन्देह है। यह स्वीकार करना होगा कि दो व्यक्तियोने कभी एक प्रकारका अर्थ नहीं किया। किन्नु कान्यके यथार्थ क्षणके सम्बन्धमे मतभेद रहने पर भी काव्य एक ही नार्थ है. इसमें सन्देह नहीं । चाहे कोई समझा सके या न लनझा सके, बह पदार्थ क्या है. इसका अनुभव हर एक काव्यप्रेमी एक प्रकारले कर सन्ना है। तान्यज्ञा भण चाहे जो हो. हमारी समझसे बहुतसे ग्रन्थ, जिन्हे साधा- रजतः काव्य नहीं कहते, वे भी चान्य हैं। नहाभारत और रामायण इति- हार नकर प्रसिद्ध होनेपर भी साध्य हैं । श्रीमद्भागवत पुराण कहर प्रनिट होनेपर भी ॐा-विशेपमे काव्य है। स्वाटवे उपन्यास हमारी समझने उत्कृष्ट-काव्य हैं। यह व्हनेती जखरत ही नहीं कि हम नाटकाको काध्यके अन्तर्गत नन्झते हैं। भारतवर्षीन और पाश्चात्य सालंकारिकाने वायके अनेक श्रेणी-विभाग दिने हैं। उनमें अनेर विभाग अनर्थक जान पड़ते है। उन लोगोंकी ने पाते दग्नि वाहने देगलने सम्बन्धन दिखी है वे ही नब बातें हिन्दी परेने भी निती जा नाती है । इसी कारण यह ले भी गानिल कर लिया गया है। प्रशासन । ४९ बंकिम-निवन्धावली-- कही हुई तीन श्रेणियाँ ले लेनेसे ही काम चल सकता है। यथा एक दृश्य- काव्य, अर्थात नाटक आदि । दूसरे आरयानकाव्य, अथवा महाकाव्य । रखु- वगकी तरह बंगावलीके उपाख्यान, रामायणकी तरह व्यक्तिविगेपके चरित, माघकी तरह घटना-विशेषके विवरण-सभी इसके अन्तर्गत है । वासवदत्ता, कादम्बरी आदि गद्यकाव्य और आधुनिक उपन्यान इमी श्रेणीके अन्तर्गत है। तीसरे खण्डकाव्य । जो काव्य प्रथम और द्वितीय श्रेणीके अन्तर्गत नहीं है वे खण्डकाव्य है। देखा जाता कि इन त्रिविध काव्यांके रूपमे बहुत विषमता है । किन्नु रूपकी विषमता यथार्थ विषमता नहीं है। दृश्यकाव्य सर्वत्र साधारणतः कथोपकथनके रूपमे ही रचित होते हैं और रंगभूमिमे उनका आभिनय हो सकता है। किन्तु यह बात नहीं है कि जो कुछ कथोपकथनके रूपमे हो और जिसका अभिनय किया जा सके वही नाटक या उस श्रेणीका काव्य मान लिया जाय । इस देशके लोगोको साधारणतः ऊपर कही गई भ्रान्त धारणा है। इसीसे बंगला, गुजराती, मराठी आदि भाषाओम कथोपकथनके रूपमे रचित असंख्य पुस्तके नाटकके नामसे प्रकाशित होकर पड़ी जाती है और उनका अभिनय भी होता है। वास्तवमे उनमेसे अनेक पुन्तके नाटक नहीं हैं। पाश्चात्य भाषाओम अनेक उत्कृष्ट काव्य है जो नाटककी तरह कथोपकथनके रूपमे लिखित है। किन्तु वान्तवने वे नाटक नहीं है। • Comus ', ' Manfred', 'Faust' इस बातके उदाहरण है। बहुत लोग शकुन्तला और उत्तररामचरितको भी नाटक कहकर स्वीकार नहीं करते। वे कहते है अंगरेजी और ग्रीक भाषाके सिवा किसी भापामें प्रकृत नाटक नहीं है। गेटे कह गये है कि यथार्थ नाटक होनेके लिए बातचीनका ग्रन्थन और अभिनयकी उपयोगिता अत्यन्त आवश्यक नही है। हमारी समझमे Bride of Lammermoor' को नाटक करने कुछ अन्याय न होगा। इससे जान पड़ता है कि आरयान-काव्य भी नाटकाकारमे प्रणीत हो सकता है। अथवा गीत-परंपरामे सन्निवेगित होकर गोनिकाव्यका रूप धारण कर सकता है । बंगलाभापाम गेपोनविषयक उदाहरणका अभाव नहीं है। यह भी देखा गया है कि अनेक खण्डकाव्य महाकाव्यके आकारमे रचे गये हैं। यदि किमी एक सामान्य उपाय- ५० - गीति-काव्य। । । नके सूत्रमे ग्रथित काव्यमालाको आख्यानकाव्य नाम देना उचित समझा जाय तो ' Excursion, 'Childe Harold' को यह नाम दिया जा सकता है। किन्तु हमारी समझसे ये दोनो काव्य खण्डकाव्यके संग्रह मात्र है। खण्डकाव्यके भीतर हमने अनेक प्रकारके काव्योको स्थान दिया है। उनमेले एक प्रकारका कान्य प्रधानता प्राप्त करके यूरोपमे गीतिकाव्य ( Lyric) के नामसे प्रसिद्ध हुआ है। इस प्रवन्धमे हम उसी श्रेणीके काव्यकी बात कहना चाहते हैं यूरोपमे किसी वस्तुको एक अलग नाम प्राप्त होनेसे हमारे देशमे भी उसका एक अलग नाम रखनेकी कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। जहाँ वस्तुमे कोई विभिन्नता नहीं है वही नामकी विभिन्नता अनर्थक और अनिष्टजनक है। किन्तु जहाँ वस्तुये जुदी जुदी है वहाँ नास भी अलग होना आवश्यक है। यदि ऐसी कोई वस्तु हो कि उसके लिए गीति-काव्य नाम धारण करना आवश्यक हो तो अवश्य यूरोपके निकट हमको ऋणी होना पड़ेगा। गीत मनुप्यके लिए एक स्वाभाविक वस्तु है । वातसे केवल मनका भाव- व्यक्त किया जा सकता है, किन्तु त्वरके ढंगसे वह स्पष्ट होता है। 'आह यह शब्द स्वरके ढंगके अनुसार दुःखबोधक हो सेकता है, विरक्ति-वाचक हो सकता है और व्यंग्योक्ति भी हो सकता है। 'तुम्हे देखे बिना मेरे प्राण जाने लगे' यह कहनेसे दु.ख प्रकट किया जासकेगा, परन्तु यही उपयुक्त स्वरभगीके साथ बोलनेसे सौगुणा दुःख प्रकट होगा। इसी त्वर-चैचित्र्यका परिणाम संगीत है । अतएव मनका वेग प्रकाशित करनेके आग्रहकी आधिक- तासे मनुप्य सङ्गीत-प्रिय है और उसकी साधनामे आपहीसे यत्नशील है। किन्तु अर्थयुक्त वाक्यके बिना चित्तका भाव व्यक्त नहीं होता । अतएव संगीतके साथ वाक्यका संयोग आवश्यक है। इसी संयोगसे उत्पन्न पदको नीत करते है। गतिके रिए वाक्य-विन्यास करनेसे देखा जाता है कि किसी नियमके अधीन वाक्य-विन्याल करने से ही गीतकी रचना सुडौल हो जाती है। और उन्ही नियमोके ज्ञानसे छन्दोकी सृष्टि हुई है। १ । ५१ बंकिम-निवन्धावली- - । -- गीतके सुडौल होनेके लिए दो बातोकी आवश्यकता है । स्वर-चातुरी और शब्द-चातुरी । इन दोनोंकी अलग अलग क्षमता होती है। दोनो क्षमतायें एक ही मनुष्यमे अकसर नहीं देखी जाती । सुकवि और सुगायक होना हरएकको नसीब नहीं होता। इसी कारण एक आदमी गीतकी रचना करता है और दूसरा गाता है । इस प्रकार गीतसे गीति-काव्य अलग हो जाता है । गीत होना ही गीति-का. व्यका आदिम उद्देश्य है। किन्तु जव देखा गया कि गीत न होनेसे भी केवल पचरचना ही आनन्ददायक है और सम्पूर्ण रूपसे मनोभावको व्यक्त कर सकती है तब गीतके उद्देश्य पर ध्यान न देकर अनेक गीतिकाव्योंकी रचना होने लगी। अतएव गीतका उद्देश्य ही जिस काव्यका उद्देश्य है वही गीति-काव्य है। वक्ताके भावोच्छासको व्यक्त करना ही जिसका उद्देश्य है वही काव्य गीति- काव्य है। जब हृदय किसी विशेष भावसे आच्छन्न होता है, वह स्नेह, शोक, भय आदिमेसे चाहे जो हो, तब उस भावका संपूर्ण अंश कभी व्यक्त नही होता । कुछ व्यक्त होता है और कुछ नही व्यक्त होता। जो व्यक्त होता वह वातचीत और क्रियाके द्वारा। वही बातचीत और क्रिया नाटककार- की सामग्री है। जो उलमे अव्यक्त रहता है वही गीतिकाव्य रचनेवालेकी सामग्री है। जो साधारणतः नहीं देख पड़ता, अदर्शनीय और अन्यके अनुमानमे भी आनेवाला नहीं है, अर्थात् भावयुक्त मनुप्यके रद्ध हृदयम उच्छसित है उसीको व्यक्त करना गीति-काव्य-लेखकका काम है । महाका- व्यका विशेष गुण यह है कि कविको दोनो तरहके अधिकार रहते है, वक्तव्य और अवक्तव्य दोनो उसके अधान होते हैं। महाकाव्य, नाटक और गीति-काव्य, इन तीनोमे यही एक प्रधान प्रभेद जान पड़ता है । अनेक नाटककार इस भेदको नहीं जानते । और इससे उनकी नायिका और नायकके चरित्र अप्राकृत और बहुतसे वागाडम्बरसे परिपूर्ण हो जाते है । सत्य है कि गीति-काव्य-लेखकको भी वाक्यके द्वारा ही रसकी उद्भावना करनी । है ५२ गीति-काव्य। होती है और नाटककारका भी वही वाच्य सहाय है, किन्तु जो वास्य वनम्न है उलीको नाटककार पानके सुखले कहला सकता है । जो अवकन्य है उसपर गीतिकाव्यकारका ही अधिकार है। उदाहरणके बिना इस बातको बहुत लोग समझ न सकेगे । सीता- विसर्जनके समय और उसके बाद भवभूतिके नाटक और वाल्मीकिकी रामायणमे जो रामके व्यवहारका तारतम्य देखा जाता है, उसकी आलो- चना करनेसे यह बात समझमे आजायगी । रामके चित्तमे जिस समय जिल भावका उन्य हुआ उसे उसी क्षण भवभूतिकी लेखनीने लिख डाला। उन्होने अपने नाटकमे वक्तव्य और अवक्तव्य दोनो तरहकी बातोका समावेश दिया है। उन्होंने ऐसा करके नाटक्कारके योग्य काम नहीं न्यिा, वे गीति-काव्यकारके अधिकारमे हस्तक्षेप करने चले है। किन्तु वाल्मीक्नेि वैसा न करके केवल रामके कायाँका ही वर्णन किया है और उनकायोंके सम्पादनके लिए जितना भाव व्यक्त करनेकी आवश्यकता थी. उतना ही भाव व्यक्त किया है । भवभूतिरचित नाटकमे वर्णित रामवि- - लपके लाथ गेक्सपियरके 'उथेलो' नाटकमे डेडिमोना-वधके उपरान्त उपेलोके दिलापकी विगेपल्पसे तुलना करके देखनसे भी यह वात समझमे आजायगी । शेक्सपियरने उस समय उयेलोके मुखले ऐसी कोई बात नही क्हलाई. तत्कालीन कार्यके लिए या अन्यकी बातके उत्तरमे, जिसके व्यक्त रनका प्रयोजन न था । वक्तव्यसे वे चावल भर भी आगे नहीं बढ़े । मेक्सपियरने भवनृतिकी तरह नायक्के हृदयका अनुसन्धान करके उसके भीतरसे एक एक भावको खींचकर, एक एक गिनकर, क्तारकी कतार सजा- पर पायोके आगे खड़ा नहीं कर दिया; तथापि यह कौन कह सकता है कि भवभूतिने रान नुजसे जो दुःख व्यक किया है उससे हजारगुना तुन शेलपियरने उथलोके मुखले नहीं व्यन कराया। पर महल ही अनुमान चिया जा सकता है कि जो वनव्य है वह दूसरे- से सम्बन्ध रखता है या दिची कार्यके लिए होता है और जो अवतव्य है 4. अपने वित्तले सन्न्ध रखता है-उसरा उद्देश्य केवल कह ढालना भर है। ऐली बात नाक्मे होनी ही न चाहिए यह मे नहीं कहता । ।

बंकिम-निवन्धावली- बल्कि कभी कभी तो इसका होना आवश्यक होता है । किन्तु यही कभी नाटकका उद्देश्य नही हो सकता। नाटकके उद्देश्यके अनुकूल होनेपर प्रयो- जनके अनुसार कहीं कहीं इसका भी सन्निवेग होता है। - प्रकृत और अतिप्रकृत। काव्यरसकी सामग्री मनुष्यका हृदय है । जो मनुप्यके हृदयका अंश अथवा उसका सञ्चालक है उसके सिवा और कुछ भी उसके कामके लायक नही है । किन्तु कभी कभी महाकवि लोग अमानुपिक अलौकिक वस्तुका भी वर्णन करने बैठे है। उनमेसे अधिकांश वर्णन नरचरित्रके चित्रके माथी भर है । महाभारत, इलियड आदि प्राचीन काव्य इसी प्रकार लौक्कि नायक नायिकाओंके चित्रके साथी अलौकिक देवचरित्रोके वर्णनसे परिपूर्ण है। देवचरित्रके वर्णनम रस-हानिका विशेष कारण यह है कि जो कुछ मनुष्य चरित्रके अन्तर्गत नही, उसके साथ मनुष्य-लेखक या मनुष्य-पाठकका मन मेल ही नहीं खा सकता । अगर हम कहीं पड़े कि कोई मनुष्य यमुनाके एक गहरे पानीसे भरे कुण्डमे डूब गया है और अजगर सर्पने उसपर आक्रमण किया है तो हमारे मनमे भयका सञ्चार होगा । हमारा जाना हुआ है कि ऐसी विपत्तिमे पड़े हुए मनुप्यके मरनेकी ही संभावना है । अतएव उसकी मृत्युकी आशंकासे हम टरते और दुःखित होते है-कविके वाञ्छित रमकी अवतारणा होती है, उसका यत्न सफल होता है। किन्तु यदि हम पहलेसे ही जानते हो कि इवा हुआ मनुष्य वास्तवमे मनुष्य नही-देवता है, वह जल या मर्पकी शक्तिके अधीन नहीं है, इच्छामय और सर्वशक्तिमान् है, तब फिर हमे भय या कुतूहल नहीं होता । क्यो कि हम पहलेसे ही जानते है कि यह अजेय आविनश्वर पुरुप अभी कालियदमन करके जलसे निकल आवेगा। ऐसी अवस्थामे नी जो पहलेके कविगण देवचरित्र या अमानुषिक चरि- त्रकी सृष्टि करके लोकरञ्जनमे समर्थ हुए है उसका एक विशेष कारण है। ५४ प्रकृत और अतिप्रकृत। उन्होंने देवचरित्रको मनुप्यचरित्रके अनुकरण पर वर्णन किया है, इसी कारण उनके पड़ने सुननेमे पाठको और श्रोताओकी सहृदयता बनी रहती है। मनुष्य जैसे राग-द्वेष आदिके वशीभूत हैं, जैसे सुखोकी अभिलापा करते है. दुखको अप्रिय समझते है, आशाओ पर जैसे लुब्ध रहते है, सौन्दर्यपर सुग्ध होते है, पश्चात्ताप करते है, वैसे ही पूर्व कवियोंके वर्णित मनुप्च- प्रकृति देवता भी हैं। श्रीकृष्णचन्द्र, जगदीश्वरके अंशावतार या पूर्णावतार नाने जाने पर भी, मनुप्यकी तरह मनुष्यधर्मावलम्बी है। मानव-चरित्र- गत ऐसी कोई उत्कृष्ट मनोवृत्ति नहीं है जिसे भागवतके लेखकने कृष्णचरि- नमे अंकित न किया हो । इस मानुपिक चरित्रके साथ अमानुपिक बल और बुद्धिका संयोग होनेसे चित्रकी मनोहरता और भी बढ़ गई है। क्योकि कविने उसमे मानुपिक बल-बुद्धिकी सुन्दरताके चरम उत्कर्षकी सृष्टि की है । काव्यमे अतिप्रकृतको स्थान देनेका उद्देश्य और उपकार यही है कि वे प्रकृतके नियम ही कविकी अतिप्रकृत सृष्टिके नियामक होते है। ऐसा ही होना उचित भी है। एक संस्कृतमे और एक अंगरेजीमे ऐसा महाकाव्य है कि देवचरित्र और अतिप्रकृतचरित्र उसके आनुपंगिक नहीं, मूल विषय हैं। संस्कृतका काव्य कुमारसम्भव' और अंगरेजीका 'Paradise Lost' है। मिल्टनने Paradise Lost मे देवप्रकृति ईश्वरविद्रोही शैतानको अनुचरवर्गसहित नायक बनाया है। जगदीश्वरके साथ उसके विरोध और जगदीश्वर तथा उनके अनुचरोके साथ उसके युद्दका वर्णन है । मिल्टनने किसी भी पक्षको पूर्णरूपले ननुप्वप्रकृतिविशिष्ट नहीं दिखलाया । अतएव वे काव्यरसन्नी अति उत्कृष्ट अवतारणामे कृतकार्य होकर भी लोगोके मनोरंजनमे वैली सफरता नहीं प्राप्त कर सके । Paradise Lost अति उत्कृष्ट महाकाम होनेपर भी, प्रायः कोई उसे आदिसे अन्ततक नहीं पड़ता । उसको इल तरह पटनेने जी जब उठता है । मिल्टन ऐसे प्रथम श्रेणीके कविनी रचना न होकर अगर यह मध्यम श्रेणीके किसी कविकी रचना होती तो शायद कोई भी इने न पटता । इसका कारण यही है कि मनुष्य- नरिनसे भिन्न देवचरित्रके पढ़नेमे मनुष्यका मन नहीं लगता । इस काव्यने ५५ - - बंकिम-निवन्धावली- जही आदम और ईश्वरकी कथा है वही स्थान अधिकतर सुखदायक है। किन्तु ये काव्य प्रकृत नायक-नायिका नहीं है-इनका उल्लेख आतुपंगिक है । आदम और ईश्वर प्रकृत मनुष्य-प्रकृति थे । वे -आदिम मनुष्य, पार्थिव सुख-दुःखसे मुक्त निष्पाप थे। जिन शिक्षाओके गुणसे मनुष्य मनुष्य होता है उनमेमे कोई शिक्षा उन्हें मिली नहीं थी। अतएव ग्रह कहना टीक है कि इस काव्यमें प्रकृत मनुष्यचरित्रका वर्णन ही नहीं किया गया । कुमारसंभवका कोई पात्र मनुष्य नहीं है । जो प्रधान नायक है वे स्वयं परमेश्वर है। नायिका परमेश्वरी हैं। इनके सिवा पर्वतराज, उनकी स्त्री, अपि, ब्रह्मा, इन्द्र, रति, काम आदि सब देव, देवी है । वास्तवमै इस काव्यका तात्पर्य बहुत गूढ है । संसारमे दो संप्रदायके लोग सना परस्पर झगड़ा करते है । एक इन्द्रियपरायण, ऐहिक सुखमानके अभिलापी, पर- लोककी चिन्ता न करनेवाले और दूसरे विपयोसे विरक्त, सांसारिक सुख- मात्रके विद्वेपी, ईश्वरचिन्ताम मग्न । एक संप्रदाय केवल शारीरिक सुखको सारांग समझता है और दूसरा संप्रदाय शारीरिक सुखके साथ अनुचित द्वेष रखता है। वास्तवमै देखा जाय तो दोनों संप्रदायांके लोगोकी भ्रान्त धारणा है । जो ईश्वरवादी है उन्हे ईश्वरकी दी हुई इन्द्रियोको अमंगलकर या अश्रद्धेय समझना अनुचित है । शारीरिक भोगकी अधिकता ही दूपणीय है । परिमित शारीरिक सुख तो संसारके नियमोकी और संसारकी रक्षाका कारण । वह ईश्वरका आदेश और धर्मको पूर्ण करनेवाला है । शारीरिक और पार- लौकिक सुखके परिणयके गीत गाना ही कुमारसंभव काव्यका उद्देश्य है। पार्थिव पर्वतसे उत्पन्न उमा ही 'शरीर' का रूप है और तपम्बी महादेव पार- लौकिक गान्तिकी प्रतिमा है । शान्ति पानेकी आकांक्षाम उमाने पहले काम- देवकी सहायता की, किन्तु उपाय निष्फल हुआ । इन्द्रिय-मेवाके द्वारा शान्ति नहीं प्राप्त होती । अन्तको अपने चित्तको शुद्ध कर इन्द्रियासक्तिरूप मलको चित्तसे दूर करके जब उमाने शान्तिम मन लगाया तब उन्हें शान्ति प्राप्त होगई । सांसारिक सुखके लिए चित्तशुद्धिकी आवश्यकता है । चित्त- शुद्धि रहनेमे ऐहिक और पारलौकिकम परस्पर विरोध नहीं होता, दोनों परम्पर एक दृमरेकी सहायता करते है। है - ५६ प्रकृत और अतिप्रक्त । इसी प्रकार मनोवृत्तियोको लेकर कविने नायक-नायिका बना कर लोगोकी प्रीतिके लिए लौकिक देवताओके नामसे उनका परिचय दिया है। किन्नु देवचरिनले प्रणयनने कारिदासने मिल्टनकी अपेक्षा अधिक कौशल दिखाया है। विवके हिसाबले Paradise Lost की अपेक्षा कुमारभत्रका बहुन ईचा बर्जा है । हमारी समझमे कुमारसंभवके तृतीय-सर्गकी कवितानी बराबरी करनेवाली कविता क्सिी और भापाके क्लिी महाकाव्यमे नहीं है। किन्त विचकी बात छोड़ देनेपर केवल कौगलके लिए भी मिल्टनकी अपेक्षा कालिदास अधिक प्रशंसाके पात्र है। Paradise Lost पड़नेमे अम जान पड़ता है और स्मारसंभवको आदिले अन्ततक वारंवार पड़नेमे भी तृप्ति नहीं होती । इसका कारण यही है कि कालिदासने देवचरित्रको मनुष्यचरित्रके सोने तारकर उसमे अमित माधुर्य भर दिया है। उमा आदिले अन्ततक मानवी है. दहीपर तिलभर भी उनमे देवभाव नहीं इत्रता। उनकी माता मेन मानवी माताके समान है। 'पदं सहेत भ्रम- रन्य पेलवन् ' इत्यादि सोज्ञार्धके लाथ माण्टेगूकी कही Like the bud bit by an envious worm ' इस उपमाकी तुलना कीजिए । देखि- एगा, उमाजी नाता और रोमियोके पिता एक ही प्रकृतिके-सर्वथा मनुष्य है । नेना पन्थरके पहाड़नी स्त्री हैं, पर उनका हृदय कुलकामिनीयोके समान कुमुनमुक्मार है। इसलिए अतिप्रत जबतक प्रकृतके अनुकरणपर न होगा तबतक वह उपयोगी नहीं हो सस्ता । ।

बंकिम-निवन्धावली- । आर्यजातिका सूक्ष्म शिल्प । कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि इस संग्मारम सुख नहीं है, वनमे चलो, “भोग समाप्त करके मुक्ति या निर्वाण प्राप्त करो । और कुछ लोग ऐसे है जो कहते है कि संसार सुखमय है, वञ्चकोंकी वञ्चना पर ध्यान न देकर खाओ, पियो, सोओ । जो लोग सुखके अभिलापी हैं उनमें भी अनेक मत हैं। कोई कहता है धनमे सुख है, कोई कहता है मनमे सुख है । कोई धर्ममे सुख और कोई अधर्ममे सुख मानता है। किसीको कार्यम सुख है, किसीको ज्ञानमें सुख है। किन्तु ऐसा मनुष्य एक भी नहीं देख पड़ता जो सौन्दर्य में सुख न मानता हो। संसारमे सब सुन्दरी नीकी कामना करते है, सुन्दरी कन्याका मुख देखकर प्रसन्न होते हैं, सुन्दर बालककी ओर देखकर विमुग्ध होते हैं, सुन्दर बहूके लिए बड़ी कोशिश करते है । सुन्दर फूल चुनकर अपने पास रखते है। घोर परिश्रम करके जो धन पैदा करते हैं उसे खर्च करके सुन्दर घर बनवाते हैं और उसमे सुन्दर सामान रखते हैं इसके लिए ऋणी भी हो जाते है। सर्वथा सुन्दर सजधजसे आप सुन्दर बनना चाहते हैं । चिड़ियातक सुन्दर देखकर पालते है, सुन्दर वृक्षोसे सुन्दर बाग लगाते हैं। सुन्दर मुखकी सुन्दर हंसी देखनेके लिए सुन्दर स्वर्ण और रत्नके आभूपण सुन्दरीको पहनाते है । सभी नित्य सौन्दर्य- की तृष्णामे चूर रहते है। किन्तु कभी किसीने इधर अधिक ध्यान न दिया होगा, इसीसे ये बाते यहाँ पर इतने विस्तारसे कही गई है। यह सौन्दर्य-तृष्णा जैसी प्रबल है वैसी ही प्रशंसनीय और परिपोषणीय भी है। मनुष्यके जितने सुख है उनम यही सुख सबसे श्रेष्ठ है । क्योंकि पहले तो यह पवित्र, निर्मल और पापके संसर्गसे शून्य है। सौन्दर्यका उपभोग केवल मानसिक सुख है-इन्द्रियसुखके साथ इसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है । यह सच है कि अकसर सुन्दर वस्तुका इन्द्रिय-तृप्तिके साथ सम्बन्ध होता है; किन्तु सौन्दर्यसे उत्पन्न मुख इन्द्रियतृप्तिमे भिन्न है। रत्नजटित सोनेके गिलास या कटोरीमे जल पीनेमे जिस तरह तुम्हारी प्यास जाती रहेगी उसी तरह भहे बने हुए मिट्टीके कुल्हमे जल पीनेमे भी - वह आर्यजातिका मुभम शिल्प। तुम्हारी प्यास मिट जायगी। स्वर्णपात्रम जल पीनेका जो अतिरिक मुत्र मिलता है वह सौन्दर्य-जनित मानसिक सुख है। स्वर्णपात्र में अपने जर पीनेके अहंकारका सुख उसके साथ मिला हुआ अवश्य होता है, किन्तु पराये स्वर्णपात्रमे जल पीनेपर प्यास मिटनेये अलग जो मुख मिलता है केवल सौन्दर्यजनित है। यह बात माननी ही पड़ेगी । दसरे यह मुत्र सब सुखोसे बड़कर तोत्र होता है। जिन्हें प्राकृतिक शोभा देखना पसन्द है या जो काच्यामोटी है. वे इसके अनेक उदाहरणाको खोज ले सकते है। सौन्दर्यके उपभोगका सुख अकसर इतना तीव्र होता है कि असहा हो उठता है। तीसरे अन्यान्य सुख बारबार भोगनेसे अरुचिकर हो जाते विन्तु सौन्दर्यजनित सुख सदा नया, सदा प्रसन्नता देनेवाला बना रहता है। अतएव जो लोग मनुष्यजातिका यह सुख बढ़ाते है उन्हें मनुष्यजा- तिका उपकार करनेवालोमे सोच पद मिलना चाहिए। यह सच है कि जो निक्षुक संजरी बजाकर, भजन गाकर, मुट्ठीभर भीख पाकर चला जाता है, उसे कोई मनुष्यजातिका बड़ा उपकार करनेवाला न मानेगा । किन्नु जो वाल्मीकि चिरकालके लिए कोटि कोटि मनुप्योके अक्षय सुख और चित्तके उपका उपाय कर गये हैं वे यशके मन्दिरमै न्यूटन, हावी, वाट या जेनरके नीचे स्थान पानेके योग्य नहीं है । बहुत लोग लेकी, मेकाले आदि असारमाही लेखकोके अनुवर्ती होकर कविकी अपेक्षा जूते बनानेवा- लको उपकारीहकर जेचे सासनपर विठाते है । पर इस मूर्खदलमे कुछ आधु- निक अर्धशिक्षित बाबू लोग ही अग्रगण्य हैं। उधर विलायतमे राजपुरप- बुढामणि ग्लाडल्टन, न्काटलेडके मनुष्योंमे ह्यूम, स्मिथ, हण्टर, कार्लाइल लादिके रहते भी वाल्टर स्काटको सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जैन्ने ननुपके अन्यान्य अभादोकी पूर्तिके लिए एक एक शिल्पविद्या है, देने ही लौन्दर्यकी आकांक्षा पूर्ण करनेके लिए भी विद्या है। सौन्दर्य उत्पन्न करनेके विविध उपाय है। उपायोके भेदके अनुसार उस विद्याने भिन्न भिन्न रुप धारण दिये हैं। हन जिन सुन्दर बन्नुओले देखते हैं, उनमेमे कुछ एकके केवल वर्णमात्र है और कुछ नहीं है-जैसे आपन । ५२ बंकिम-निवन्धावली- । और कुछ एकके वर्णके सिवा आकार भी है-जैसे पुष्प । कुछ एकके वर्ण और आकारके सिवा गति भी है-जैसे नाग । कुछ एकके वर्ण, आकार और गतिके सिवा गब्द भी है जैसे कोकिला। मनुष्यके वर्ण, आकार, गति और गढके सिवा अर्थयुक्त वाक्य भी है। अतएव सौन्दर्य उत्पन्न करनेकी ये ही कई एक सामग्रियों है-जैसे वर्ण, आकार, गति, शब्द और अर्थयुक्त वाक्य । जिस सौन्दर्यजननी विद्याका आधार वर्णमात्र है, उसको चित्रविद्या कहते हैं। जिस विद्याका अवलंबन आकार है वह दो प्रकारकी है । जड़के आकारका सौन्दर्य जिस विद्याका उद्देश्य है उसको स्थापत्य कहते है। चेतन या उद्भि- दका सौन्दर्य जिस विद्याका उद्देश्य है उसे भार्य कहते है। जिस सौन्दर्यजननी विद्याकी सिद्धि गतिके द्वारा होती है उनको नृत्य कहते है। गद जिस विद्याका अवलम्बन है उसे संगीत कहते है। वाक्य जिसका अवलम्बन है उसे काव्य कहते है। काव्य, संगीत, नृत्य, भास्कर्य, स्थापत्य और चित्र-ये छः मौन्दर्चजननी वित्राये है। इन विद्या- औका जो जातिवाचक नाम प्रचलित है उसका अनुवाद करके उनको 'सूक्ष्म शिल्प' नाम दिया गया है। सौन्दर्य उत्पन्न करनेवाली ये छ. विद्याये मनुष्यजीवनको अलंकृत और सुखपूर्ण बनाती है । भाग्यहीन हिन्दुस्तानियोके भाग्यमे यह सुख नहीं बदा है। सूक्ष्मशिल्पके साथ उनका बड़ा विरोध है। इन विद्याओके प्रति इम देगके लोग बहुत ही अनादर और घृणाका भाव दिग्गते है। इस देगके लोग वास्तवमे सुखी होना जानते ही नहीं। हम स्वीकार करते हैं कि सारा दोष इम देगके लोगोका अपना ही नहीं है। उसमे कुछ दोप हमारी सामाजिक रीति-नीतिका भी है। हम बापदादेकी देहली छोड़कर कही जायंगे नहीं-उसीमे अग्य सन्तान-सन्तति लेकर बिलम चीटियोकी तरह रहेगे। अतएव स्थानाभावके कारण सफाई और मौन्दर्य-माधन हो नहीं सकता । कुछ दोष हमारी गरीबीका भी है। । - ६० । आर्यजातिका सूक्ष्म शिल्प सौन्दर्यका साधन धनके बिना हो नहीं सकता । बहुतोके पास क्लिी तरह गिरिस्ती चलानेके लिए भी यथेष्ट धन नहीं है । उसपर सामाजिक- ताके कारण पहले स्त्रियोके गहने गड़ाकर तिथि-त्योहारमे मा-बापकी बर्सी, चौवी और श्राद्ध आदि कृत्यामे और पुत्र-कन्याके व्याहमे वित्तबाहर खर्च करना पड़ता है। चाहे चूकरनालाके समान तंग और गन्दी जगहम रहना पड़े, पर इन बातोमे रत्तीभर कसी नहीं हो सकती। यही सामाजिक रीति है । इच्छा होनेपर भी समाज-श्रृंखलामे बंधा हुआ हिन्दू इस रीतिके विपरीत आचरण नहीं कर सकता । कुछ दोप हिन्दूधर्मका भी है। जिल धर्मके अनुसार कीमती संगमर्मरके फर्शवाले मकानको भी गोवर लीप- कर साफ बनानेही रीति है उस धर्मकी कृपाले सूक्ष्मशिल्पक्षी दुर्दगा होना ही सर्वथा संभव है। यह लव स्वीकार कर लेनेपर भी हम दोपसे बच नहीं सकते । जो अंगरेज की करके किलीतरह सौ रपये महीनेमे गुजर करता है उसके साथ, घरकी सजावट और सफाईके बारेमे लालमे २००००) रुपये मुनाफेके पानेवाले दे- हाती जमीदारकी तुलना क्रो । देखोगे कि वह भेद बहुत कुछ स्वाभाविक सा है। दो चार धनाद बाबू अंगरेजोंका अनुकरण करके अंगरेजोकी तरह घर वगैरहकी सजावट किया करते हैं और भास्कर्य तथा चित्र आदिके हारा घरको सजाते है । हिन्दुस्तानी नकलनवीस अच्छे होते हैं । उनके अनुकरणमे शिथिलता जरा भी नहीं देख पड़ती । किन्तु उनका भास्कर्य और चित्रका संना देसनेसे ही जान पड़ता है कि अनुकरणकी न्हाले ती उन्होंने वह संग्रह किया है । नहीं तो लौन्दर्यके प्रति उन आन्तरिक अनुराग नहीं है। यहां भरे-बुरेका विचार नहीं है, मंहगी चीज होनी चाहिए । सजावकी निपुणता नहीं है, सामग्री संत्यामे अधिक होनी चाहिए। भार्य और चित्रको जाने दीजिए । काव्यके मन्वन्धमे भी हिन्दुन्यानियो उत्तम अधम विचारदी शक्ति नहीं देख पडती । इस विषयमें यहाँके लशिक्षित और अशिक्षित समान हैं। दोनोमे बहुत घोड़ा भेद है । नृत्य और गीतकी विद्या तो शायद हिन्दुस्तानले उठ ही गई है । मौन्दर्य विचारनेकी शक्ति, सौन्दर्य-रनके आन्वाइना सुख, शायद निधाताने इन देशके रोगोके भाग्यमे नहीं रिखा।

बंकिम-निवन्धावली- - संगीत । संगीत किसे कहते है ? सभी जानते है कि सुरसमेत शब्द ही संगीत है । पर अब प्रश्न यह है कि सुर क्या है ? किसी वस्तुमें दूसरी वस्तुका आघात लगनेसे शब्द उत्पन्न होता है, और जिस पदार्थमे आघात लगता है उसके परमाणुओमे कम्पन पैदा हो जाता है। उस कम्पनसे उसके आसपासकी हवा भी कम्पित होती है । जैसे तालावमें जलके ऊपर ईंट फेकनेसे छोटी छोटी लहरे उठकर मण्डलाकारम फैलती हैं वैसी ही कम्पित वायुकी लहरे चारो ओर फैलती है। वे ही तरंगें कानमे प्रवेश करती है । कानके पम एक सूक्ष्म झिल्ली है । वायुकी लहरोका सिलसिला उसी झिल्ली पर जाकर धक्का मारता है, उसके बाद वह उस झिल्लीसे मिली हुई हड्डी आक्केि द्वारा कानके स्नायुमे पहुंचकर मस्तिष्कमे प्रवेश करता है । उसीसे हमे शब्दका अनुभव होता है। इस कारण वायुका कम्पन ही शब्दका मुख्य कारण है। वैज्ञानिकोने यह निश्चित किया है कि जिस शब्दमे, हर सेकेण्डमे, ४५००० दफा वायुका कम्पन होता है उसे हम सुन पाते हैं; उससे अधिक कम्पन होने पर हम नही सुन पाते । एक और वैज्ञानिकका कहना है कि हर सेकेण्डमे जिस शब्दमे, १४ दफासे कम कम्पन होता है उस शब्दको हम नहीं सुन पाते । इस वायु-कम्पनकी समान मात्रा ही सुरका कारण है। दो कम्पनोमे जितना समय बीतता है वह यदि हरवार समान रहे तो सुर पैदा हो जाता है। गीतमे ताल जैसे मात्राकी समता मात्र है वैसे ही शब्दकम्पनमे मात्राकी समता होनेसे सुरकी उत्पत्ति होती है । जिस शब्दमे वह मानाकी समता नहीं वही ' वेसुरा ' कहलाता है । ताल-सुर ही संगीतका सारांश है। इस मुरकी एकता या बहुत्व ही संगीत है । बाहरी प्रकृति-तत्त्वमें संगीतकी यह प्रक्रिया है। किन्तु इससे मानसिक सुख क्या होता है, सो भी बतलाते है। संसारमें कुछ भी ऐसा नहीं जो सम्पूर्ण रुपले उत्कृष्ट हो । सभी चीजोमे उत्कर्षक किसी अंशका अभाव या दोप है । किन्तु निर्दोष उत्कर्पकी हम ६२ संगीत। है अपने मनमे कल्पना कर ले सकते है: और एकबार अपने मनमे उसकी प्रतिमा स्थापित कर लेनेपर उसकी प्रतिमूर्तिकी सृष्टि भी कर सकते है । जैले संसारने कभी निर्दोष मनुष्य नहीं मिलता, जितने मनुष्य देख पड़ते है उन सबमे कोई-न कोई दोष अवश्य है। किन्तु हम उन सब दोपोको त्यागकर, सुन्दर कान्तिमात्रके सौन्दर्यको ध्यानमे रखकर, एक निर्दोष मृतिकी कल्पना कर सकते है । और, मनमे कल्पना करके पत्थरकी एक निदोष प्रतिमा गढ़ी जाती । इस प्रकार उत्कर्षकी चरम सृष्टि ही काव्य है-चित्र आदिका उदेश्य है। जैसे सभी वस्तुओके चरम उत्कर्षकी एक सीमा है वैसे ही शब्दके उपकी भी है। बालकोकी वाते मीठी लगती है, युवतीकी आवाज मनको नोह रेती है, वक्राका स्वर ही वक्तृताका सारांश है । वक्तृता सुननेसे जितना अच्छा लगता है उतना उसी विषयको पुस्तकमे पढ़ना अच्छा नहीं मालूम पड़ता । क्योकि उसमे वह स्वर और उच्चारणकी अदा' नहीं है। वही बात सहज भावसे कहनेमे कोई रस नहीं मिलता और वही बात क्सिी रलिक्के उच्चारणले बहुत ही रसीली जान पड़ती है। कभी की एक साधारण वातने इतना शोक, इतना प्रेम या इतना आह्वाद प्रस्ट होते देखा जाता है कि गोक, प्रेम या आहाद जतानेके लिए लिखे गये लंबे चौड़े व्यात्यानमे उसका शतांग भी नहीं पाया जाता । क्यों ऐसा रोता है ? देवर स्वर और उच्चारणके प्रभावसे । उस स्वर या उच्चारणका भी अवश्य ही एक चरम उत्कर्ष है । वह अत्यन्त सुखदायक हो तो आश्चर्य ही क्या है। च्चो कि साधारण स्वर या उच्चारण भी मनको चञ्चल बना देता है। स्वर या उधारणका वह चरम उत्कर्ष ही नंगीत है । स्वर मनाने भावका चिह्न है। अतएव संगीतके हारा सब प्रकारके मानसिक भाव पर दिये जानते है। मनी ननयोने, नभी देशाने, सभी रोगोंमे भक्ति, प्रेम और आहाटके सुबक नंगीत गाये जाते है। केवल दुष्टता प्रकट करनेवाले संगीत नहीं है जिन्ने राग-देप आदि भाव चन होते है वे शब्द गीतोमें नहीं है रगबाध आदि अवर है, किन्तु वे हिमाके लिए उत्तेजित करने- बंकिम-निवन्धावली- वाले नहीं है। उनका काम केवल उत्साह बढ़ाना ही है। कल्पनाके द्वारा हम नोध, अहङ्कार आदि दुष्टभावोंके वर्गनको गीतमें भावमिद करनेकी चेष्टा करते हैं, किन्तु वह वर्णन केवल कल्पनात्मक रहता है। समझाये बिना वह समझ नहीं आता । इस कारण ऐसे गीत स्वभावसंगत नहीं होते। गोक प्रकट करनेवाले गीत है। वे गीत अत्यन्त मनोहर है। किन्तु गोक ऋरभाव नहीं है, वह करुणाके अन्तर्गत होनेसे भक्ति और प्रेमकी श्रेणीमे ही आजाता है। इसके उपरान्त राग-रागिनियोके सम्बन्धमे कुछ कहना है। जैसे तेतीम आदि-देवतासे तेतीस करोड़ देवताकी सृष्टि हुई है वैसे ही छः रागो और छत्तीस रागिनियोसे, अद्भुत कल्पनाके प्रभावसे, असंरय उपराग उपरागिणी और उनके लड़के, नाती-पोते तक कल्पित हुए हैं। यह बड़ा ही रहम्य है। हिन्दुआकी बुद्धि अत्यन्त कल्पना-कुतूहलसे परिपूर्ण है। उसने गब्दार्थ मात्रको मनुष्य-चरित्र-विशिष्ट बना डाला है। प्राकृतिक वस्तुओ या शक्तियों भरको देव-पदवी दे दी है। पृथ्वी देवी है, आकाग, इन्द्र, वरुण, अति, सूर्य, चन्द्र, वायु-सभी देवता है, नद-नदी भी देव-देवी है। सब देव- देवी मनुष्यके समान शरीरधारी है। उन सबके स्त्री, स्वामी, पुत्र, पौत्र आदि है । तर्कके द्वारा पहले यह सिद्ध हुआ कि इस जगतकी सृष्टि करने- वाला एक कोई है । वह ब्रह्मा है। देखा जाता है कि घट-पट आदि वस्तु- ओकी सृष्टि करनेवाला एक हाथ-पैरोवाला माकार पुरुष होता है। इस कारण ब्रह्मा भी साकार और हाथ पैरोवाले है। अधिकता यह है कि उनके चार मुंह है। उनके एक ब्रह्माणीका होना भी जरूरी ठहरा । एक ब्रह्माणी भी है । ऋषिगण उनके पुत्र हुए । हंस उनका वाहन हुआ-नहीं तो चलते-फिरते वे कैसे ?--ब्रह्मलोकमें गाड़ियां या पालकियों नहीं है । कल्पना करनेवालाको केवल इतनेहीले सन्तोष नहीं हुआ। मनुष्य जैसे क्रोध आदिके बगीभूत, महापापी होते है वैसे ही ब्रह्मा भी कन्याहारी है। जहा सृष्टिकर्ता आदि अप्रमेय पदार्थ-आकाश, नक्षत्र, पहाड, नदी आदि प्राकृतिक पदार्थ-अग्नि, वायु आदि प्राकृतिक क्रियाय-काम आदि मानसिर वृत्तिया-इत्यादि सब मूर्ति-विशिष्ट पुत्र-स्त्री-युक्त और सभी काम, । ? । संगीत। विषयोमे मनुष्यस्वभावसम्पन्न है, वहां स्वर-समष्टि रागके लिए इन बातोकी कल्पनाका होना क्या विचित्र है ? वे भी साकार गृहस्थ माने गये। रागके साथ रागिनीकी कल्पना हुई । केवल यही नहीं कि हर एक रागके एक ही एक रागिनी हो । वे भी वंगाली कुलीन ब्राह्मण, पालीगेमिस्ट, है । एक एक रागके छः छः रागिणी है । संगीतके रसिकोको इतनेहीसे सन्तोष नही हुआ। उन्होने रागोको पूरा बाबू बना डाला। रागिणीके ऊपर उपरा- गिणियोकी भी कल्पना हुई । उपरागिणीयोके लिए उपरागोंकी भी कल्पना हुई । राग-रागिणी, उपराग-उपरागिणी वगैरहके लड़के-बाले और पोते- पोती भी देख पड़े। किन्तु यह सब केवल दिल्लगी.भी नहीं है। इस दिल्लगीके भीतर विशेष सारांश है। राग-रागिनीको आकार देना केवल दिल्लगी नहीं है। शब्द शक्तिको कौन नहीं जानता ? इस बातको सब जानते है कि किसी खास शब्दको सुनकर मनमे किसी खास भावकी उत्पत्ति हुआ करती है । किसी दृश्य वस्तुको देखकर भी उसी भावका उदय हो सकता है। मान लो, हमने कभी किसी पुत्रशोकसे व्याकुल माताके रोनेकी ध्वनि सुनी । यह भी मान लो कि वह रोनेवाली हमे देख नहीं पड़ती। हम केवल उसके रोनेकी ध्वनि सुन रहे हैं । उस ध्वनिको सुनकर हमारे मनमे शोकका आविर्भाव हुआ। फिर हम जब वैसा ही रोनेका शब्द सुन पार्यगे हमको वही शोक याद आजायगा-वैसे ही शोकका आविर्भाव होगा। मान रो, अन्यत्र हमने देखा कि पुत्रशोकसे आतुर माता बैठी हुई है। वह रोती नहीं है, किन्तु उसका चेहरा देखनेसे ही हमने उसकी उत्कट मानसिक यंत्रणाका अनुभव कर लिया। उस सन्तापसे केशको प्राप्त मलिन मुख-मण्टर का भाव हमारे हृदयमे अंकित हो गया । तबसे जब वैसा मलिन शोकार्त चेहरा देखेंगे तभी हमको वह शोक याद आजायगा--हृदयमें उस गोक्का आविर्भाव होगा। अतएव वह ध्वनि और वह मुखका भाव, दोनो ही हमारे मनमे शोकके चिदम्वरप है । वैसी ध्वनिसे वही शोक याद हो आवेगा । मानस. ६५ बंकिम-निबन्धावली- । । . प्रतिके नियमके अनुसार इसका एक और विचित्र फल होता है । शब्द और चेहरेका ढंग, दोनो ही शोकके चिह्न होनेके कारण परस्पर एक दूसरेकी याद दिलाते है । वैसी क्रन्दनध्वनि सुन पड़ते ही वैसा चेहरा याद आ जाता है। वैसा चेहरा देखते ही वैसी क्रन्दन-ध्वनि स्मरण हो आती है। इस प्रकार वारम्बार दोनोके एक साथ याद आनेके कारण दोनो ही दोनाकी प्रतिमा बन जाते है । वह गोकसूचक चेहरा उस गांकसूचक ध्वनिकी साकार प्रतिमा जान पड़ता है। ध्वनि और मूर्तिके इस परस्पर सम्बन्धके अवलम्बनये ही प्राचीन लोगांने राग-रागिणीको साकार कल्पना करके, उनके ध्यानाकी रचना की है। उन ध्यानोंसे प्राचीन आयोकी विचित्र कवित्वयक्ति और करपनागक्तिका परिचय प्राप्त होता है। हम लोग पूर्वपुल्पोंकी कीर्तिकी जितनी आलोचना करते हैं उतना ही उनकी महानुभवताको देखकर विस्मित होते है। दो एक उदाहरण दिये जाते है । अनेक लोगोने टोड़ी रागिनी सुनी तोगी । सहृदय पुरुष उसे सुनकर जिस एक अनिर्वचनीय भावमे मग्न हो जाते है वह सहजम व्यक्त नहीं किया जा सकता । साधारणः जिसे 'आवेश' कहते हैं वह इस भावका एक अंशमात्र है-किन्तु एक अंगमात्र ही है। उसके साथ भोगकी अभिलापा भी मानो संमिलित है। वह भोगकी अभिलापा नीच-प्रवृत्ति नहीं है । जो भोग निर्मल और सुख देनेवाला है, जिसको अन्यजनकी अपेक्षा नहीं है, जो केवल आध्यात्मिक है, उसी भोगकी अभिलापा । किन्तु उस भोगकी अभिलापाकी सीमा नहीं है, तृप्ति नहीं है। उसमें न निरोध है और न शासन है । भोग और भोगनुल-अभिलापा लोटपोट हो जाती है । आकांक्षा बढ़ उटती है । प्राचीन लोगोंने इस टोड़ी रागिणीकी मूर्तिकी इस प्रकार करपना की है कि वह परमसुन्दरी युवती, वन-झारसे आभूपित, किन्तु विरहिणी है । आकांक्षाकी निगृत्ति न होनेके कारण ही वह विरहिणी कल्पित हुई है। यह विरहिणी सुन्दरी वनविटारिणी है । वनमे, एकान्तमे, अकेले बैठकर मयपानसे उन्मतली हो रती है। वीणा बनाकर गा रही है। उसके व प्राभूषण अपने अपने स्थानमे गिरने पड़ते है । वनझी हरिणिया उसके आगे आकर चुपचाप खड़ी हुई है। ६६ ।

संगीत। यह चित्र अनिर्वचनीय सुन्दर है। किन्तु सौन्दर्यके अतिरिक्त इसमें एक अद्भुत गुण है। यह टोड़ी रागिणीकी यथार्थ प्रतिमा है। टोड़ी रागिणी सुननेले मनमे जिस भावका उदय होता है, ठीक वही भाव इस प्रतिमाको देख कर भी उत्पन्न होगा। इसी प्रकार अन्यान्य राग-रागिणियोझे ध्यान है। मुल्तानी रागिणी दीपक रागनी स्त्री है। यह गोरी सुन्दरी लाल कपड़े पहने दीपक रागके पास अवस्थित है। भैरवी रागिणी श्वेतवस्त्र पहने और अनेक अलंकारोसे आभूषित है। इत्यादि। इसमे सन्देह नही कि इन ध्यानाके सम्बन्धमे सतभेद है। जन वैज्ञा- निक वियोमे ही पण्डितोमे सतभेद पाया जाता है तब कल्पनाके विषयों- में अनेक सुनियोके अनेक मत होना कुछ विचिन्न नहीं है। केवल आंख मूंदकर, सोचकर, मनसे अलंकारकी सृष्टि करने पर अलंकारके सम्बन्धमें मतभेद होना आश्चर्य ही क्या है। किन्तु यह सबको स्वीकार करना होगा कि कुछ गवदोके द्वारा छ भावोका उदय होता है। तर्क करनेवाले लोग कह सकते हैं कि कोसल दरसे यदि शोक भी सूचित होता है, प्रेम भी सूचित होता है, उन्माद भी सूचित होता है तो स्वरभेदके द्वारा एक ही भावकी उपलब्धि किल प्रकार हो सकती है ? इसके उत्तरमे यही म्हना है कि वह उपलब्धि केवल संस्कारके अधीन है। हमारी संगीत- विधाने स्वर छई हैं और भेद भी असीम हैं। किन्तु केवल शिक्षा और अभ्याललेही उनके तारतम्यकी उपलब्धि होती है। साधारण अभ्यासके कारण ही लढले गहनाई सुनकर खुनीसे नाचने लगते है, हाइलंडर पापाइपने शरीर पुलाते हैं ()। यह अभ्यास बद्धमूल और सुशिक्षा परिणत रोनेले भाव-राजयकी अधिक्ता उत्पन्न होती है--पुंखानुमुखरूपसे अनुभव किया जा सकता है। शिक्षाहीन नूडलोग जिसमे हसते है, भावुक उलीन नावातिरेकर रोने लगते हैं । अतए लोगोका यह साधारण संस्कार निमीत नुसता अनुभव नगुप्यके लिए स्वभाव-सिद्ध है, भ्रमपूर्ण है। एक बीनातक पर है कि अच्छी आवाज सबको अच्छी रणनी -बालादिः तारज्ञा बोध सतको होता है, जिन्तु उच्च नत्य ६७ बंकिम-निबन्धावली- - प्रकृतिके नियमके अनुसार इसका एक और विचित्र फल होता है । शब्द और चेहरेका ढंग, दोनो ही शोकके चिह्न होनेके कारण परस्पर एक दूसरेकी याद दिलाते हैं। वैसी क्रन्दनध्वनि सुन पड़ते ही वैसा चेहरा याद आ जाता है। वैसा चेहरा देखते ही वैसी क्रन्दन-ध्वनि स्मरण हो आती है। इस प्रकार वारम्वार दोनोके एक साथ याद आनेके कारण दोनो ही दोनाकी प्रतिमा बन जाते है । वह गोकसूचक चेहरा उस गोकसूचक ध्वनिकी साकार प्रतिमा जान पड़ता है। ध्वनि और मूर्तिके इस परस्पर सम्बन्धके अवलम्बनने ही प्राचीन लोगोंने राग-रागिणीकी साकार कल्पना करके, उनके ध्यानोकी रचना की है। उन ध्यानोसे प्राचीन आर्याकी विचित्र कवित्वशक्ति और कल्पनाशक्तिका परिचय प्राप्त होता है । हम लोग पूर्वपुरुपोकी कीर्तिकी जितनी आलोचना करते हैं उतना ही उनकी महानुभवताको देखकर विस्मित होते है। दो एक उदाहरण दिये जाते है । अनेक लोगोने टोड़ी रागिनी सुनी होगी। सहृदय पुरुप उसे सुनकर जिस एक अनिर्वचनीय भावमे मग्न हो जाते हैं वह सहजमे व्यक्त नही किया जा सकता । साधारणः जिसे 'आवेश' कहते हैं वह इस भावका एक अंशमात्र है-किन्तु एक अंगमात्र ही है। उसके साथ भोगकी अभिलापा भी मानो संमिलित है। वह भोगकी अभिलापा नीच-प्रवृत्ति नहीं है। जो भोग निर्मल और सुख देनेवाला है, जिसको अन्यजनकी अपेक्षा नही है, जो केवल आध्यात्मिक है, उसी भोगकी अभिलापा । किन्तु उस भोगकी अभिलापाकी सीमा नहीं है, तृप्ति नहीं है। उसमें न निरोध है और न शासन है। भोग और भोगसुख-अभिलापा लोटपोट हो जाती है । आकांक्षा बढ़ उठती है । प्राचीन लोगोने इस टोड़ी रागिणीकी मूर्तिकी इस प्रकार कल्पना की है कि वह परमसुन्दरी युवती, वस्त्र-अलंकारसे आभूपित, किन्तु विरहिणी है । आकांक्षाकी निवृत्ति न होनेके कारण ही वह विरहिणी कत्पित हुई है। यह विरहिणी सुन्दरी वनविहारिणी है । वनम, एकान्तमे, अकेले बैठकर मयपानसे उन्मत्तली हो रही है। वीणा बजाकर गा रही है। उसके बाभूषण अपने अपने स्थानसे गिरेसे पड़ते है । वनझी हरिणिया उसके आगे आकर चुपचाप खड़ी हुई है। ।

संगीत। । यह चित्र अनिर्वचनीय सुन्दर है। किन्तु सौन्दर्यके अतिरिक्त इसमें एक अद्भुत गुण है। यह टोड़ी रागिणीकी यथार्थ प्रतिमा है। टोड़ी रागिणी सुननेले मनमे जिस भावका उदय होता है, ठीक वही भाव इस प्रतिमाको देख कर भी उत्पन होगा। इसी प्रकार अन्यान्य राग-रागिणियोके ध्यान है। मुल्तानी रागिणी दीपक रागली स्त्री है। यह गोरी सुन्दरी लाल कपड़े पहने दीपक रागके पास • अवस्थित है । भैरवी रागिणी श्वेतवस्त्र पहने और अनेक अलंकारोसे आसूपित है। इत्यादि। इसमे सन्देह नहीं कि इन ध्यानाके सम्बन्धमे मतभेद है। जब वैज्ञा- निक दिपयोस ही पण्डितोमे सतभेद पाया जाता है तब कल्पनाके विषयों- से अनेक सुनियोंके अनेक मत होना कुछ विचित्र नहीं है । केवल आंख बूंदकर, सोचकर, मनसे अलंकारकी सृष्टि करने पर अलंकारके सम्बन्धमें मतभेद होना आश्चर्य ही क्या है। किन्तु यह सनको स्वीकार करना होगा कि कुछ गनोके द्वारा दुछ भावोका उदय होता है। तर्क करनेवाले लोग कर सकते है कि कोसल रदरसे यदि शोक भी सूचित होता है, प्रेम भी सूचित होता है, उन्माद भी सूचित होता है तो स्वरभेदके द्वारा एक ही भावकी उपलब्धि किस प्रकार हो सकती है ? इसके उत्तरमे यही कहना है कि वह उपलब्धि केवल संन्कारके अधीन है। हमारी संगीत- विधा, न्वर गई है गैर भेद भी असीम हैं। किन्तु केवल शिक्षा और अभ्यालले ही उनके तारतम्यकी उब्धि होती है। लाधारण अन्यानके कारण ही ल्टले गहनाई सुनकर गुगीले नारने लगते है, हाइलंडर नपाइपने शरीर फुलाते है (1)। यह अभ्यास बद्धमूल और नुशिक्षा परिणत रोनेले भाव-समयकी अधिकता उत्पन्न होती-पुंजातुरुंखरूपये अनुभव दिया जा सकता है। शिक्षाहीन नूटलोग जिसने हलते है, भावुक उनीने भावातिरेकरे रोने लगते है। अतएर लोगोका यह साधारण संन्कार विसंगीत सुसका अनुभव मलप्यके लिए दभाव-सिद्ध है, भ्रमपूर्ण है। ८. सीमातम पर है कि अच्छी आवाज सर सच्ची रगती - दामादि नाला कोच सको होता है, किन्तु उच्च चित्य ६७ बंकिम-निवन्धावली- श्रेणीके संगीतके सुखका अनुभव शिक्षाके बिना नहीं हो सकता । जिनको अभ्यास नहीं वे जैसे प्याज नहीं खाना चाहते, वैसे ही अशिक्षित लोग उत्कृष्ट संगीतको सुनना नहीं चाहते । दोनों ही बाते अभ्यासके अधीन है । संस्कारहीन लोग राग-रागिणी-परिपूर्ण पक्का गाना सुनना नहीं चाहते और बहुत अनुप्रासासे युक्त यूरोपका संगीत हिन्दुस्तानियोंके लिए जंगलमे रोनेके बरावर है । किन्तु इन दोनोके लिए अनादरका भाव अस- भ्यताका चिह्न है । जैसे राजनीति, धर्मनीति, विज्ञान, साहित्य आदि विपयोको जानना सब मनुष्योंके लिए उचित है, वैसे ही शरीरके स्वास्थ्यके लिए व्यायाम और मनोरञ्जनके लिए मनोमोहिनी संगीतविद्या जानना भी हरएक भले आदमीका कर्तव्य है। अभ्याससम्बन्धिनी विद्याओमें संगीत सर्व प्रधान है। हम लोगोके भले घरों में लड़कियो और लड़कोको संगीत शिक्षा देना निषिद्ध समझा जाना, हमारी असभ्यताका चिह्न है। स्त्रियोके संगीतनिपुण होनेपर घरमे एक विमल आनन्दकी गंगा बहती है। शौकी- नोका मद्यपान और एक अन्यटोप उससे बहुत कुछ दूर हो सकता । इस देशमे निर्मल आनन्दके अभावसे ही वहुत लोग मद्यपान करने लगते हैं- संगीतप्रियतासे ही बहुत लोग वेश्याओके घर जाने और बिगढ़ने लगते हैं। है नवीन लेखकोंके लिए कुछ उपदेश । (१) यशके लिए न लिखना । अगर यशके लिए लिखोगे तो यश भी न मिलेगा और तुम्हारी रचना भी अच्छी न होगी। रचना अच्छी होनेसे यश आप ही प्राप्त होगा। (२) रुपयेके लिए न लिखना । यूरोपमे इस समय अनेक लोग रुप- येके लिए लिखते हैं और रुपये पाते भी हैं। उनकी रचना भी अच्छी होती है। किन्तु हमारे यहाँ अभी वह दिन नहीं आया। इस समय यहाँ रुप- येके लिए लिसनेसे लोकरजनकी प्रवृत्ति प्रबल हो उठती है। और, हमारे ६८ । नवीन लेखकोंके लिए कुछ उपदेश । देशके वर्तमान साधारण पाठकोकी रुचि और. शिक्षापर ध्यान देकर लोक- रञ्जनकी ओर घुमनेसे रचनाके विकृत अनिष्टका कारण हो उठनेकी सम्पूर्ण संभावना है। (३) अगर तुम अपने मनमे यह समझो कि लिखकर देश या मनुष्य- जातिकी कुछ भलाई कर सकोगे, अथवा किसी सौन्दर्यकी सृष्टि कर सकोगे तो अवश्य लिखो। जो लोग अन्य उद्देश्यसे लिखते है वे लेखककी उच्च पदवीको नहीं पासकते। (४) जो लसत्य और धर्मविरुद्ध है, जिसका उद्देश्य पराई निन्दा, दूस- रेको पीड़ा पहुंचाना या स्वार्थलाधन है, वह लेख कभी हितकर नहीं हो तक्ता । इस कारण ऐसा लिखना सर्वधा त्याज्य है। सत्य और धर्म ही साहित्यका लक्ष्य है। और किसी उद्देश्यसे कलम उठाना महापाप है। (५) जो लिखो उसे वैले ही प्रकाशित न कर दो। कुछ दिनोतक उसे डाल रखो। कुछ दिनोवाद उसका संशोधन करो। तब तुम्हें देख पड़ेगा कि तुम्हारे लेखमे अनेक दोष हैं । काव्य, नाटक, उपन्यास आदिको लिख कर दो एक वर्ष डाल रखकर फिर संशोधन करनेसे वे विशेप उत्कर्पको प्राप्त करते है। किन्तु जो लोग सामयिक साहित्यकी सेवा करते हैं उनके लिए यह नियम नहीं है। इसी कारण लेखक्के लिए सामयिक साहित्य अवनतिका कारण हुना करता है। (६) जिस विषयमें जिसकी गति नहीं है उस विपयमें उसे हाय न डालना चाहिए। यह एक सीधी बात है। पर सामयिक साहित्यमें इस नियमकी रक्षा नहीं होती। (७) अपनी विद्या या विद्वत्ता दिखानेकी चेष्टा मत करो। अगर विद्या होती है तो वह लेख आप ही प्रकट हो जाती है, चेष्टा नहीं करनी पड़ती। विद्या प्रकट करनेनी चेष्टाले पाटक खीझ उटते हैं और उनसे रचनासौन्दर्यको भी विशेष हानि पहुंचती है। आज करके देखो अंगरेजी, संस्कृत, फ्रेंच और जर्मन भापालोके उद्धरण (कोटेगन ) बहुत अधिक देख पढ़ते हैं। जो भाषा श्पनेको नहीं मालूम उन भाषा क्लिी दाक्य या अंशको औरोक अन्यती महायताने वनी मन रदृत करो।

बंकिम-निवन्धावली- ८ अलंकारके प्रयोग या रसिकताके लिए चेष्टा न करना। किसी किसी रथानमे अलंकार या व्यंग्यका प्रयोजन अवश्य होता है; किन्तु लेखकके भंडारेमे यह सामग्री होगी तो प्रयोजनके समय आप उपस्थित हो जायगी और भंडारेम न होगी तो सिर पटकने पर भी नही आसकती। असमयम या भंडारा सूना होने पर अलंकारके प्रयोग या रसिकताकी चेष्टाके समान उपहासकी बात और नहीं है। (९) यह एक प्राचीन विधि है कि जिस स्थान पर अलंकार या व्यंग्य बहुत सुंदर जान पड़े उस स्थानको काट देना चाहिए। किन्तु मै यह बात नहीं कहता। पर मेरी सलाह यह है कि उस स्थानको अपने मित्रोके आगे वारम्वार पढ़ो । अगर वह अच्छा न होगा तो लेखकको आप ही अच्छा न लगेगा-मित्रोके आगे पढ़नेमे भी लजा मालूम होगी । तब उसे काट देना ही ठाक जान पड़ेगा। (१०) सब अलंकारोसे श्रेष्ठ अलंकार सरलता है । जो सरल शब्दोमे सहज रीतिसे पाठकोको अपने मनका भाव समझा सकते है वे ही श्रेष्ठ लेखक हैं। क्यो कि लिखनेका उद्देश्य ही पाठकोको समझाना ११) किसीका अनुकरण मत करो । अनुकरणमें दोपोका ही अनुकरण होता है, गुणोका नहीं। इस बातको कभी मनमे जगह मत दो कि अमुक अँगरेजी, संस्कृत या हिन्दी लेखकने ऐसा लिखा है तो मै भी वैसा लिखू । (१३) जिस बातका प्रमाण न देसको वह भी मत लिखो। प्रमाणोके प्रयोगकी यद्यपि सब समय आवश्यकता नहीं होती, तथापि प्रमाणका हाथमें रहना बहुत जरूरी है। हर एक जातिकी भापाका साहित्य उस जातिके लिए आशा-भरोसा होता है। उन जातियोके लेखक यदि इन नियमो पर ध्यान रख्खेगे तो उनकी भापाके साहित्यकी श्रीवृद्धि शीव्रताके साथ होगी। है Go भारत-कलंक। । भारत-कलंक। भारतवर्ष पराधीन क्यों है ? भारतवर्ष कई सौ वपोसे पराधीन क्यो है ? इस प्रश्नके उत्तरमे सब लोग कहा करते है कि भारतके लोग हीनबल है। इसी कारण Effeminate Hindoos. " यूरोपियनोकी जिहापर सदा बना रहता है। यही भारतका कलंक है । किन्तु उधर यूरोपियनोके मुखले ही भारतवर्षके लिपाहियोके बल और साहसकी प्रशंसा सुनी जाती है । उन्ही स्त्री-स्वभाव हिदुओके बलले ही काबुल जीता गया। इससे भी कोई सन्देह नहीं कि उन्हीं स्त्रीस्वभाव हिन्दुओकी सहायतासे उन्होंने भारतवर्षको जीता है। चे स्वीकार करे या न करे, उन्ही स्त्री-स्वभाव हिन्दुओके-मराठे और सिक्खोके-निकट अनेक युद्धोमे उन्हे परास्त भी होना पड़ा है। आधुनिक हिन्दुओका दर-वीर्य इस समय चाहे जैसा हो, इसमें कोई सन्देश नहीं कि वह प्राचीन हिन्दुओके बल-वीर्यकी अपेक्षा हीन है । हजारो वर्षाकी अधीनताले उसका हाल अवश्य ही हो गया होगा। प्राचीन भारतके रोग अन्य जातियोके द्वारा विजित होनेके पहले विशेष बलशाली थे । ऐसा समजनेके अनेक कारण है । दुर्बल होनेके कारण वे पराधीन नहीं हुए। हम स्वीकार करते है कि इस पक्षका समर्थन करना सहज नहीं है और इस विएचके यथेष्ट प्रमाणोंको प्राप्त करना भी दुरसाध्य ह । इस तझी नीमांना केवल इतिहासके ही सहारे हो सकती है। किन्तु दुर्भा- ग्यवरा अन्यान्य जातियोकी तरह भारतवर्षीय रोग अपनी कीर्तियाको लिखकर रख नही गये है । प्राचीन भारतवर्षका इतिहास नहीं है । इसी कारण भारतवर्पके लोगोकी जो प्रशंसनीय युद्धकीर्ति थी वह भी टुप्त हो गई है । जो अन्ध 'पुराण' के नामसे प्रसिद्ध है उनमें यथार्थ इतिहास बुछ भी नहीं है । जो कुछ है वह अस्वाभाविक अमानुषिक कथाओले ऐसा टका हुआ है कि यथार्थ घटनाका निश्चय किसी तरह नहीं होता ।

बंकिम-निवन्धावली- - भाग्यवश अन्य देशोंके ऐतिहासिकोके ग्रन्थों में दो जगह प्राचीन भारत- वर्षके लोगोंके युद्ध आदिका उल्लेख पाया जाता है । पहला हाल तो तबका है जब मेसीडोनियाके अलेग्जंडर या सिकन्दर दिग्विजयकी यात्रा करके भारतमे आकर लड़े थे । रचना-कुगल यवन-लेखकोने उस युद्धका वर्णन किया है। दूसरे, मुसलमानोने भारतको जीतनेके लिए जो उद्योग किये थे उनका विवरण मुसलमान लेखक अपने ग्रन्याम लिख गये है। किन्तु पहले ही वक्तव्य यह है कि ऐसी गवाहीम पक्षपातकी भारी संभावना है। चित्रकारके मनुष्य होनेके कारण ही चित्रमे सिंह मनुप्यके द्वारा परास्त देख पड़ता है । ऐसे ऐतिहासिकोकी संरया बहुत कम है जो अपनी जातिके लाधव या पराभवको स्वीकार करके सत्यके अनुरोधसे शत्रुपक्षके यगका कीर्तन करते हैं । अपेक्षाकृत मूढ आत्मगौरवपरायण मुसलमानोंकी बात जाने दीजिए, सुशिक्षित, सत्यनिष्ठाका अभिमान रखनेवाले यूरोपके इति- हास-लेखक भी इस दोपसे ऐसे कलंकित है कि उनके ग्रंथ पड़ते पढ़ते कभी कभी घृणा उत्पन्न हो आती है । इसी कारण इस देशके और शत्रु- पक्षके, दोनो ओरके इतिहास-लेखकोंकी सहायता मिले बिना किसी घटनाके यथार्थरूपका निर्णय नहीं किया जा सकता । केवल आत्मगौरव- परायण परधर्मावलम्बी सत्यभीत मुसलमानलेखकोकी बातपर निर्भर करके प्राचीन भारतवर्षके लोगोकी युद्ध-निपुणताकी मीमांसा नहीं की जा सकती। खैर जो कुछ हो, निम्नलिखित दो बाते मुसलमान इतिहास-लेखकोंके ग्रन्थोसे ही विचारके द्वारा सिद्ध होती हैं। एक तो यह कि अरवदेशके लोग एक प्रकारसे दिग्विजयी हो चुके थे । उन्होंने जब जिस देशपर आक्रमण किया तब उसी देशको जीतकर पृथ्वीपर अतुल साम्राज्य स्थापित किया। वे केवल दो देशोसे हारकर निकाले गये। पश्चिममें फ्रान्ससे और पूर्वमे भारतसे । अरबके लोगोंने मुहम्मदकी मृत्युके वाद छः वर्पमें सीरियादेशको, दस वर्पमे फारिसको, एक सालमे आफ्रिका और स्पेनको, अठारह वर्षमे काबुलको और आठ वर्षम तुर्किस्तानको सम्पूर्णरूपसे अपने अधिकारमें कर लिया था। किन्तु वे भारतवर्षको जीतनेके लिए तीनसौ वर्पतक यत्न करके भी उसे हस्तगत नहीं कर सके । महम्मद- । ७२ भारत-कलंक। बिन कासिमने सिन्धुदेशपर अवश्य अधिकार कर लिया था, किन्तु राजपू- तानेने उनको हराकर बाहर निकाल दिया था। उनके मरनेके कुछ दिनों बाद राजपूतोने सिन्धुदेशपर फिर अधिकार कर लिया था। दिग्विजयी अरब लोग भारतको जीत नहीं सके । एलफिन्स्टन कहते हैं कि हिन्दुओंका अपने धर्नके प्रति हड़ अनुराग ही उनके यो अजेय होनेका कारण था । किन्तु हन कहते हैं. नहीं, युद्ध-निपुणता और लड़नेकी शक्ति ही इसका कारण था। हिन्दुओका अपने धर्मपर अनुराग अभी तक प्रबल है। फिर वे क्यों लगातार सातली वाले अन्य जातियोंके अधीन हैं ? दूसरे यह कि जब क्सिी प्राचीनदेशके निकट किली नवीन अभ्युदयको प्राप्त और विजयकी अभिलाषा रखनेवाली जाति अवस्थिति करती है तब प्राचीन जाति प्रायः नवीन जातिके प्रभुत्वके अधीन हो जाती है। इस प्रकारकी सर्वान्तकारिणी लौर विजयकी अभिलापा रखनेवाली जाति प्राचीन यूरोपमे रोनन लोग और एशियाने अरब और तुर्क लोग थे। जो जाति इन्के संखवने लाई वही परास्त होकर इनके अधीन हो गई। पहले ही कहा जा चुका है कि कितने थोड़े समयनें अरबी लोगोंने मिसर, उत्तर आफ्रिका, सेन, पारिन, टकी लौर काबुल्के राज्योको काबूने कर लिया था। इनकी पेक्षा भी नुमानित कुछ मात्राज्योंका उदाहरण दिया जा सकता है। रोन्न लेगोंने ईची सन्के २०० वर्ष पहले ग्रीसपर नाक्रमण किया था । नक्ले वावन वर्षके बीच में ही उन्होंने संपूर्ण प्रसिके राज्यको बिल्कुल अपने वगर्ने कर लिया । मुमसिद्ध कार्थेज-राज्य ईन्वी सन्के २६४ वर्ष पहले, ज्यांत २० वर्षके वीच ही रोमन लोगोंने उस राज्यको विवस्त करके अपने अधीन बना लिया। पूर्व-रोनन या ग्रीक्लान्नाय चौदहवीं शता- दी प्रयन भागमें तुली द्वारा आक्रान्त होकर सन् १४५३ ई० में, अर्यात् ५० वर्ष श्रीचनें, कि दूसरे नन्नदवे हाय रोपको प्राप्त हो गया। पधिन-रोन जिया नान अभीतर जगतन वीर-दपंकी पतासा समझा जाता है, वह भी सन् ०८६ ई० में उत्तरकी वर जानिके द्वारा पहले शान्त होकर, सन् १७६ ई० में, भयात् प्रथम बर्बर-विश्वके १९० ૯૨ बंकिम-निवन्धावली- वोंके बीच में ही ध्वंसको प्राप्त हो गया। सन् ६६४ ई० में पहले पहल अरबके मुसलमानोंने भारत पर आक्रमण किया था। उस सालले ५२९ वपके बाद शहाबुद्दीन गोरी उत्तरभारत पर अधिकार कर सका था। किन्तु शहाबुद्दीन गोरी या उसके अनुचर अरबी नही थे । जैसे अरबी लोगोंका यत्न निष्फल हुआ वैसे ही गजनी शहरके रहनेवाले तुकोंकी भी चेष्टा व्यर्थ हुई। जिन्होने पृथ्वीराज, जयचन्द और सेनवंशीय राजाओसे उत्तर-भारतका राज्य छीना वे पठान या अफगान थे। अरबियाके प्रथम-भारताक्रमणके ५२९ वर्ष बाद और तुर्कोके प्रथम भारताक्रमणके २१३ वर्ष बाद उक्त फानोने भारतके राज्यपर अधिकार कर पाया । पठानलोग कभी अरबी या तुर्क लोगोके समान समृद्धिशाली या प्रतापी न थे। उन्होंने केवल पहलेके अरबी और तुर्क लागोके सूचित कार्यको सम्पन्न किया । अरबी, तुर्क और पठान, इन तीनो जातियोकी यत्न-परम्परासे साढ़े पांचसौ वर्षमे भारतवर्षकी स्वाधीनता मिटी। मुसलमान साक्षी यही कहते है। यह भी स्मरण रखना उचित है कि इन्होंने जब हिन्दुओका परिचय पाया तब हिन्दुओका सुदिन बीत चुका था-राजलक्ष्मी क्रमशः फीकी पड़ती जा रही थी। ईस्वी सन् चलनेके पह- लेवाले हिन्दू अधिकतर बलवान् थे, इसमें कोई सन्देह नहीं । उसी समय यहाँके लोगोके साथ श्रीकलोगोका परिचय हुआ । वे खुद अद्वितीय बलशाली थे। उन्होने वारम्वार भारतवर्षके लोगोके साहस और युद्ध-निपुणताकी प्रशंसा की है। मेसीडोनियाके विप्लवके वर्णनके समय ग्रीक- लेखकोने बार बार यह लिखा है कि एशियामे ऐसी युद्ध-निपुण दूसरी जाति उन्होने नहीं देखी। यह भी लिखा है कि हिन्दुओने ग्रीक-सेनाको जितनी हानि पहुंचाई उतनी और किसी जातिने नही । प्राचीन भारतवर्ष के लोगोकी युद्ध-निपुणताके सम्बन्धमें अगर किलीको संशय हो तो उसे भारतवर्षका वृत्तान्त लिखनेवाले ग्रीकलोगोके ग्रन्थ पढ़ने चाहिए। - पश्चिम अशमे अरबी और तुर्कलोग केवल कुछ भूमिपर अधिकार कर सके थे। ७४ भारत-कलंका भारतभूमि सर्वरत्नप्रसविनी होनेके कारण अन्य देशके राजा इसे सदा लोभकी दृष्टिसे देखते आये है। इसी कारण अकसर अनेक जातिके लोगोने आकर उत्तर पश्चिन और पहाड़ी रास्तेसे प्रवेश कर भारतपर आधि- कार जमानेकी चेष्टा की है। ईरानी, जोन, बाल्हीक, शक, हूण, अरबी, तुर्क आदि सब यहाँ आये है और सिन्धुके पार अथवा दोनो किनारोपर कुछ दिनोंके लिए कुछ जगह पर अधिकार करके फिर निकाल दिये गये है। पन्द्रहवी शताब्दी तक आर्य लोग सब जातियोको शीघ्र या देरमे दूर करके अपने देगकी रक्षा कर सके । पृथ्वीपर ऐसी कोई जाति नही है, और शायद कभी न थी, जिसने पन्द्रहसौ वर्षातक प्रबल जातियोके आक्रमण रोककर इतने दिनोतक अपनी स्वतन्त्रताकी रक्षा की हो। इतने अधिक दिनोतक हिन्दुओंकी समृद्धि अक्षय रहनेका कारण निस्सन्देह उनका बाहु- बल ही था । अन्य कोई कारण नहीं देख पड़ता। इन लय प्रमाणोके रहते भी सर्वदा सुना जाता है कि हिन्दूलोग सदाले रण-विमुख या युद्ध करनेमे असमर्थ है। अदूरदर्शी लोगोके निकट भारत- वर्षके इस चिर-कलकके तीन कारण है। 1-हिन्दुओका इतिहास नहीं है। अपने गुणोको अगर आप न गावे तो और कौन गावेगा ? संसारका स्वभाव ही यह है कि जो कोई अपनेको महापुरुष कहकर परिचय नहीं देता उसे कोई आदमियोमे ही नहीं गिनता । का क्सि जातिने दूसरी जातिके गुण गाये है ? रोमनलोगोके युद्ध-पाण्डि- त्यका प्रमाण रोमनोका लिखा हुआ इतिहास है। ग्रीक लोगोंके वीर होने- का परिचय प्रीकलोगोके लिखे अन्योसे मिलता है। मुसलमानोंके वहादुर होनेवी यात भी हमे केवल मुसलमानो ही लेखले जान पड़ती है। केवल इसी पातके न होनेले कोई हिन्दुओके गोरवको नहीं मानता । क्योकि हिन्दओदी उस दातका कोई गवाह नहीं है। २--जो जातियां दूसरोके राज्यो पर आक्रमण करती है, छीननेकी चेष्टा करती है, वे ही युद्धपुशल कहकर अन्यजातियोके निकट परिचित होती हैं। जिन्होंने केवर आत्मरक्षा मात्र सन्तुष्ट रहकर दूसरेका राज्य छीननेकी चंकिम-निवन्धावली- । करेगा और कोई चोरको पुरस्कार न देगा । चाहे जो राजा हो, हम उसके लिए कुछ आपत्ति न करेंगे।" हम इस समय स्वतन्त्रता-प्रिय अँगरेजोंके निकट शिक्षा प्राप्तकरके इन सर वातोके भ्रमको जान रहे हैं । किन्तु किसी जातिका दुसरी जातिके द्वारा शासन होना अस्वाभाविक भी नहीं है, -इसकी भ्रान्तिका सहजमे अनुमान भी नहीं किया जा सकता । प्रकृतिके अनुसार कोई जाति असभ्यताके लम- यसे ही स्वातन्त्र्य-प्रिय है और कोई जाति सुसभ्य होकर भी उसके प्रति आल्या-रहित है। इस संसारम अनेक स्पृहणीय बन्तुये हैं । किन्तु सब लोग सभी चीजोको पानेकी चेष्टा नहीं करते । धन और अग दोनो ही स्पृहणीय पदार्थ हैं । किन्तु साधारणतः हम देख पाते हैं कि कोई धनसञ्च- यमे ही लगा हुआ है, यशका उसे कुछ भी खयाल नहीं, और दूलरा आदमी यशको चाहता है, यशके लिए धन लुटानेमे उसे कुछ भी संकोच नही । मोहन धनसञ्चयको ही अपने जीवनका व्रत बनाकर कृपणता, नीचता आदि दोपोले यशकी हानि कर रहा है और सोहन अमित धन लटाकर उदारता आदि गुणांसे यशका सञ्चय कर रहा है। मोहन भ्रान्त या सोहन, इसका निर्णय करना सहज नहीं है। कमसे कम यह निश्चय है कि दोनोमेसे किसीका कार्य स्वभावविरुद्ध नहीं है। इसी तरह ग्रीक लोग है • हम यह नहीं कहते कि भारतमे कभी कोई स्वातन्त्र्यप्रिय जाति नहीं थी। जिन्होंने टाड-राजस्थानमे मेवारके राजपूतोंकी अपूर्व कयाय पडी है व जानते है कि राजपूतोके समान स्वतन्त्रताके लिए उन्मत्त जाति पृथ्वी पर दूसरी नहीं देख पड़ी। उस स्वातन्त्र्य-प्रियताका फल भी बड़ा विचित्र देख पडता है । मेवार एक क्षुद्रराज्य होकर भी छः नौ वयं तक मुसलमानी मात्रा- ज्यके वीचमे लावीन हिन्दूकी राजपताना उडाता रहा । अकबर बादशाह- का बल और नौशल भी मेवारका ध्वस नहीं कर सका। अभीतर उदयपुरका राजवश पृथ्वीपर प्राचीन राजवश कहकर प्रसिद्ध है। किन्तु अव उनका वह दिन नहीं है । वह राम भी नहीं है, और वह अयोन्या भी नहीं है । ऊपर हमने जो कहा रै वह सर्वसाधारण हिन्दुओके दिपयमे ठीक है। ૬૮ भारत-कलंक। स्वाधीनताप्रिय हैं, हिंदू लोग स्वाधीनताप्रिय नहीं हैं वे शान्ति सुखके अभिलाषी है । यह केवल जातीय स्वभावको विचित्रताका फल है। इसमे विस्मय करनेकी कोई बात नहीं है। किन्तु बहुत लोग यह बात नही समजते । हिन्दुओके पराधीन होने और स्वाधीनता लाभ लिए उत्सुक न होनेके कारण वे यह अनुमान करते हैं कि हिन्दूलोग दुर्बल (कमजोर ) हैं. लडाईसे डरते हैं, स्वाधीनता प्राप्त क्रने असन है। दे यह नही समझते कि हिन्दूलोग साधारणतः स्वाधी- नता पानेकी अभिलाषा और यत्न ही नहीं करते। अगर दे इसकी आम- लापाचा यत्न करते तो प्राप्त कर सकते थे। हम यह नहीं करते कि स्वतन्त्रतापर श्रद्धा केवल आधुनिक हिन्दुओका स्वभाव है। पर हिन्दू जातिका सदाका स्वभाव जान पड़ता है। जो लोग यह नलते हैं कि हिन्दू लोग सातली वने वतन्त्रताहीन होकर इस समय स्वतन्त्रताली साझाले अन्य होगये है, उन्का अनुमान टीक नहीं है। संत साहित्यमे भी कही ऐसा कुछ नहीं मिलता कि उसने प्राचीन हिन्दुओ वाधीनताके लिए प्रयास करनेवाला वि दिया जा सके । पुराण- उपपुराण-कान-नाटक आदिमे यही स्वाधीनतारा गुणगान नही है । नेवारले लिदा और कहीं नही देखा जाता कि कोई हिन्दू-समाज न्वतन्त्र- तादी आशकाले मिनी सामने प्रवृत्त नुआ रो। गारा राज्य-सम्पत्तिकी रज्ञा, पन्न, दीरका दीरढरे. क्षन्निपदा युद्ध करने । प्रयान-इन कातोरे हुतरे उलेख देले जाते हैं। किन्तु स्वतन्त्रता पानेकी आशंदा इन्ने नीव नही है । वातन्त्र्य, वाधीनना, देय नई दाने । । ।

बंकिम-निवन्धावली- परिश्रमसे अधिक अवकाश मिलनेपर सहजमे ही मनकी गति आभ्यन्तरिक होती है। ध्यान और चिन्तनकी अधिकता होती है। उसका एक फल कवित्त्व और जगतके तत्त्वामें पाण्डित्य है। इसी कारणसे हिन्दूलोग थोड़े ही समयमें अद्वितीय कवि और दार्शनिक हो गये हैं। किन्तु मनकी आभ्यन्त- रिक गतिका दूसरा फला बाह्य सुखोके प्रति आस्थाका न होना है । बाह्य सुखोके प्रति आस्था न होनेसे निश्चेष्टभाव आजाता है। स्वतन्त्रताके प्रति आस्थाका न होना इस स्वाभाविक निश्चेष्टताका एक अंगमात्र है। आयाँके धर्मतत्त्व और दर्शनशास्त्रम यह चेष्टाहीनताका भाव सर्वत्र विद्यमान है। क्या वैदिक, क्या बौन्द्र, क्या पौराणिक, सभी धर्म इसी निश्चेष्टताकी संवर्द्ध- नासे परिपूर्ण है। वेदसे वेदान्त, सारय आदि दर्शनोकी उत्पत्ति हुई है। उसके अनुसार लय या भोगकी निवृत्ति ही मोक्ष है-निष्काम भाव ही पुण्य है । बौद्धधर्मका निर्वाण ही मुक्ति है। - अब प्रश्न यह हो सकता है कि यदि हिन्दूजाति सदाले स्वतन्त्रताका आदर करना नहीं जानती तो यहाँ मुसलमानोको अमलदारी होनेके पहले साढ़े पाँच हजार वर्पतक उन्होंने क्यो यत्नपूर्वक विजातीयोको विमुख करके स्वाधीनताकी रक्षा की ? विजातीय लोग कभी सहजमे यहाँसे हटे न होगे. बड़ी मुश्किलसे यह काम हुआ होगा। जिस सुखके प्रति आस्था न थी उसके लिए हिन्दू-समाजने इतना कष्ट क्यो स्वीकार किया था ? इसका उत्तर यह है कि इसका प्रमाण कहीं नहीं मिलता कि हिन्दू-समा- जने कभी शक यवन आदिको विमुख करनेके लिए विशेप यत्न किया था। हिन्दू नरपतियोंने अपनी राज्य-सम्पत्तिकी रक्षाके लिए यत्न किया था। उनकी संग्रह की हुई सेना युद्ध करती थी; जब हो सकता था, शत्रुको विमुख करती थी। इससे देशकी स्वतन्त्रताकी रक्षा होती थी। इसके सिवा इस वातका कोई प्रमाण नहीं मिलता कि " हम अपने देशमे विदेशीय राजा न होने देगे" यह विचार कर साधारण लोगोने कभी उद्योग किया हो या उत्साह दिखाया हो । वरिक इसके विरद्ध होना ही यथार्थ जान पड़ता है। जब समर-लक्ष्मीकी कोपदृष्टिके प्रभावसे हिन्दू राजा या हिन्दू सेनापति ८० भारत-कलंका रणमे मारा गया तभी हिन्दूसेना युद्ध छोड़कर भाग गई—फिर युद्धके लिए एकत्र नहीं हुई । फिर किसके लिए युद्ध करती ? जब राजा मर गया या अन्य कारणले उसने राज्य-रक्षाकी चेष्टा छोड़ दी तभी हिन्दुओका युद्ध समाप्त हो गया। फिर किसीने उल राजाके स्थानपर खड़े होकर स्वतन्त्र- ताकी रक्षाका उपाय नहीं किया, साधारण समाजसे अरक्षित राज्यको रक्षाका उद्योग नहीं हुआ। जब भाग्यके फेरसे यवन, ईरानी, शक या बाल्हीक किली प्रदेश-खण्डके राजाको रणमें हरा कर उसके सिंहासन पर बैठे तभी प्रजाने अपने पहले स्वामीकी तरह उन अनार्य राजाओका भी आदर किया। राज्यके छीननेमे उन्होने कोई आपत्ति नहीं की। तीन हजार वर्षसे अधिक समय तक, आयोंके साथ आर्यजातीय, आर्यजातीयोके साथ भिन्नजातीय, भिजातीयोके साथ भिन्नजातीय-मगध (बिहार) के साथ कान्यकुञ्ज, कान्यनुजके साथ दिल्ली, दिल्लीके साथ लाहौर, हिन्दुओके साथ पठान, पठानाके साथ मुगल-लड़-झगड़कर सदा समरकी आग जलाकर देशको नष्टभ्रष्ट करते खाकमे मिलाते रहे हैं। किन्तु इन सब युद्धामे केवल राजाके साथ राजाकी लड़ाई होती थी । साधारण हिन्दूसमाजने कभी किसीकी ओर होकर किसीसे युद्ध नहीं किया । हिन्दूराजाओं अथवा हिन्दुस्तानके राजाओको चारचार भिन्न भिन्न जातियोंने जीता है। किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि साधारण हिन्दू-समाज कभी किसी अन्य जातिके द्वारा जीता गया है । क्यो कि साधारण हिन्दूजातिने कभी किसी अन्यजातिके साथ युद्ध ही नहीं किया। इस विचारमे हिन्दूजातिको बहुत दिनोकी पराधीनताका दूसरा कारण प्रकट होगया । उस कारणको हिन्दूसमाजकी फूट, समाजमे जातीय भावकी स्थापनाका अभाव, जातिहितैपिताकी कनी, आदि चाहे जो उ कहिए। हम यहापर विन्तारके साथ उसे समझानेकी चेष्टा करते है। ने हिन्दू है, तुम हिन्दू हो, यह हिन्दू है, वह हिन्दू है, और भी रालों हिन्द है । इन लाखों हिन्दुओकी जिसमे भलाई है उसीने मेरी भी भलाई है। जिसमे उनवा मंगर नहीं है उसने मेरा भी मंगर नहीं है । अतएव सत्र हिन्दुजोया जिसमे मगर हो वही मेरा कर्तव्य है और किसी भी हिन्दूका । ६. नि.

बंकिम-निवन्धावली- । जिससे अमंगल हो वही अकर्तव्य है। जैसे मेरा इस प्रकार कर्त्तव्य और अक- व्य है वैसे ही तुम्हारा भी है, इसका भी है, उसका भी है, सभी हिन्दुओंका है। जब सभी हिन्दुओंका एक ही कर्त्तव्य और अकर्तव्य है नब सब हिन्दुओको चाहिए कि एक सलाह करके, एकमत होकर मेलके साथ हरएक कार्य करें। यह ज्ञान जाति ( नेशन) की स्थापनाका प्रथम भाग-आधाअंग मात्र है। हिन्दूजातिके अलावा पृथ्वीपर अन्य अनेक जातियां है। उनके हरएक भलाईके कामसे हमारी भलाई होना असंभव है। बहुत स्थानोंमे उनके मंगलसे हमारे अमंगलकी ही संभावना है। जिस जगह उनके मंगलसे हमारा अमंगल है उस जगह हम वही करेंगे जिसमे उनका मंगल न हो । इसमे परजाति-पीड़न करना होगा तो हम वह भी करेंगे । जिस तरह उनके मंगलसे हमारे अमंगलकी संभावना है वैसे ही हमारे मंगलसे उनके अमं- गलकी संभावना है। हो तो हो, हम उसके लिए अपनी जातिकी भलाई कर- ' नेसे निवृत्त न होगे। दूसरी जातिका अमंगल करके अपनी जातिकीभलाई करनी होगी तो हम वह भी करेंगे । जातिकी स्थापनाका यह दूसरा भाग है। किन्तु देखा जाता है कि इस प्रकारकी मनोवृत्ति निष्पाप शुद्धभाव कह- कर स्वीकार नहीं की जा सकती। इसमे भारी दोपपूर्ण विकार है । उस विकारसे जातिके सर्वसाधारणको ऐसी भ्रान्ति उत्पन्न हो सकती है कि पराई जातिके मंगल मानसे अपनी जातिका अमंगल है, और पर-जातिके अमंगल- मात्रसे अपनी जातिका मंगल है। इसी कुसंस्कारके वयवर्ती होकर यूरोपकी जातियाने अनेक दुःख भोगे है। उन्होने वृथा ही अनेक बार युद्धकी आग जलाकर यूरोपको उसमे दग्ध किया है। किन्तु स्वजाति-प्रतिष्ठा चाहे भली हो चाहे बुरी, जिस जातिमे यह बल- वती होती है वही जाति अन्य जातियोकी अपेक्षा प्रबलता प्राप्त करती है। आजकल यूरोपमे इस ज्ञानने विशेप प्रधानता प्राप्त की है और इसीके प्रभावसे वहाँ अनेक विप्लव होते देख पड़ते है। इसीके प्रभावसे इटलीमे एक-राज्यकी स्थापना हुई है। इसीके प्रभावसे विषम प्रतापगाली नवीन जर्मन-साम्राज्यको स्थापना हुई हैं (और अभी अभी एक जगद्व्यापी घोर युद्ध चल कर समाप्त हुआ है)। और भी क्या क्या होगा, सो कहा नहीं जा सकता। ८२ भारत-कलंक। । हम यह नहीं कहते कि भारतवर्षमे, किसी भी समयमे, यह जाति-प्रतिष्टा थी ही नहीं । यूरोपके पण्डितोने यह निश्चय किया है कि आर्यजातिके लोग सदाले भारतवर्पके रहनेवाले नहीं है । अन्यत्रसे भारतमे आकर उन्होंने उसपर अधिकार किया है। पहले आयोने जब जय प्राप्त की तव वेद आढिकी सृष्टि हुई, और उसी समयको पण्डित लोग वैदिक काल कहते है । वैदिक मन्त्र आदिमे इसके अनेक प्रमाण पाये जाते है कि वैदिक कालम और इसके कुछ उपरान्त भी आर्य लोगोमे जातिप्रतिष्टाका भाव विशेष प्रबल था । उस कालके समाजके नियामक ब्राह्मणोने जिस प्रकार समाज-श्रृंखला स्थापित की थी उससे भी जातिप्रतिष्ठाके भावका परिचय प्राप्त होता है। आर्यवणा में और शूद्रोंमे जो विषयभेद देख पड़ता है-आर्यवणा और शूद्रोके शासनमे आकागपातालका अन्तर देख पड़ता है वह भी जाति- प्रतिष्टाके भावका ही फल है। किन्तु क्रमशः आर्य-वंश विस्तृत हो पड़ा और तब वह जाति-प्रतिष्टाका भाव नहीं रहा । आर्यवंशके लोगोने विस्तृत भारतवर्षके अनेक प्रदेशो पर अधिकार करके स्थान रयान पर एक एक खण्ड-लमाजकी स्थापना की । भारतवर्ष इस प्रकारके बहुतले खण्ड-समाजामें बैट गया। समाज-भेद, भापा-भेद, आचार व्यवहारका भेद, अनेक भेद अन्तको जाति-भेदके रूपमे परिणत रो गरे । बालीक ने पौग्ट्र तक, काश्मीरले चोल और पाण्ड्य तक, मारी भारतभूमि मधुमक्षियोंसे परिपूर्ण शहटके उत्तेकी तरह अनेक जाति और समाजासे परिपूर्ण होगई । अन्तको कपिलवस्तुके राजकुमार शाक्यमिहने एक अभि- नव धर्नकी सृष्टि की । अन्यान्य भेद तो मौजूद ही थे. धर्मभेद भी उत्पन्न हो गया । देशभेद, स्पाभेद, राज्यभेद, धर्मभेदके आगे एकजातायता कमी टिक सकती थी ? सागरके भीतरके मत्यदरकी तरह भारतवर्ष रोग एकतारसे शुन्य हो गये । उसके बाद सुसलमान आये। मुसलमानोरा वंग भी यहां पड़ने लगा। उसके दाद सागरकी रहरले ऊपर रटरकी तरह नये नये सुनलमान-सम्प्रदाय पाशात्य पर्वतमाला पार रोबर आने लगे। दूर देशके एजारो आदमी राजामी हपाके लोभसे या राजारे हारा मनाये जानेके सरने मुलरमान होने लगे। अद भारतवर्ष निवान्निधोमे हिन्दू ८३ बंकिम-निवन्धावली- जिससे अमंगल हो वही अकर्तव्य है। जैसे मेरा इस प्रकार कर्त्तव्य और अक- र्तव्य है वैसे ही तुम्हारा भी है, इसका भी है, उसका भी है, सभी हिन्दुओंका है। जब सभी हिन्दुओंका एक ही कर्त्तव्य और अकर्तव्य है तब सब हिन्दुओको चाहिए कि एक सलाह करके, एकमत होकर मेलके साथ हरएक कार्य करे । यह ज्ञान जाति ( नेगन ) की स्थापनाका प्रथम भाग--आधाअंग मात्र है। हिन्दूजातिके अलावा पृथ्वीपर अन्य अनेक जातियाँ है । उनके हरएक भलाईके कामसे हमारी भलाई होना असंभव है। बहुत स्थानोमे उनके मंगलसे हमारे अमंगलकी ही संभावना है। जिस जगह उनके मंगलसे हमारा अमंगल है उस जगह हम वही करेगे जिसमे उनका मंगल न हो । इसमे परजाति-पीड़न करना होगा तो हम वह भी करेगे । जिस तरह उनके मंगलसे हमारे अमंगलकी संभावना है वैसे ही हमारे मंगलसे उनके अमं- गलकी संभावना है। हो तो हो, हम उसके लिए अपनी जातिकी भलाई कर- नेसे निवृत्त न होगे। दूसरी जातिका अमंगल करके अपनी जातिकीभलाई करनी होगी तो हम वह भी करेंगे । जातिकी स्थापनाका यह दूसरा भाग है। किन्तु देखा जाता है कि इस प्रकारकी मनोवृत्ति निष्पाप शुद्धभाव कह- कर स्वीकार नहीं की जा सकती। इसमे भारी दोपपूर्ण विकार है। उस विकारसे जातिके सर्वसाधारणको ऐसी भ्रान्ति उत्पन्न हो सकती है कि पराई जातिके मंगल मानसे अपनी जातिका अमंगल है, और पर-जातिके अमंगल- मानसे अपनी जातिका मंगल है। इसी कुसंस्कारके वशवर्ती होकर यूरोपकी जातियाने अनेक दुःख भोगे है। उन्होने वृथा ही अनेक बार युद्धकी आग जलाकर यूरोपको उसमे दग्ध किया है। किन्तु स्वजाति-प्रतिष्ठा चाहे भली हो चाहे बुरी, जिस जातिमे यह दल- वती होती है वही जाति अन्य जातियोंकी अपेक्षा प्रबलता प्राप्त करती है। आजकल यूरोपमे इस ज्ञानने विशेष प्रधानता प्राप्त की है और इसीके प्रभावसे वहाँ अनेक-विप्लव होते देख पढ़ते हैं। इसीके प्रभावसे इटलीमें एक-राज्यको स्थापना हुई है। इसीके प्रभावले विपम प्रतापशाली नवीन जर्मन-साम्राज्यको स्थापना हुई है (और अभी अभी एक जगद्व्यापी घोर युद्ध चल कर समाप्त हुआ है )। और भी क्या क्या होगा, सो कहा नहीं । जा सकता। ८२ भारत-कलंक। हम यह नहीं कहते कि भारतवर्षमे, किसी भी समयमें, यह जाति-प्रतिष्ठा थी ही नहीं । यूरोपके पण्डितोने यह निश्चय किया है कि आर्यजातिके लोग सदाले भारतवर्पके रहनेवाले नहीं है । अन्यत्रसे भारतमे आकर उन्होने उसपर अधिकार किया है। पहले आयौंने जर जय प्राप्त की तब वेद आदिकी सृष्टि हुई, और उसी समयको पण्डित लोग वैदिक काल कहते है । वैदिक मन्त्र आदिने इसके अनेक प्रमाण पाये जाते है कि वैदिक कालमे और इसके छ उपरान्त भी आर्य लोगोमे जातिप्रतिष्टाका भाव विशेष प्रबल था । उस कालके समाजके नियामक ब्राह्मणाने जिस प्रकार समाज-श्रृंखला स्थापित की थी उसले भी जातिप्रतिष्ठाके भावका परिचय प्राप्त होता है। आर्यवणाम और यूद्रोंमें जो विषयभेद देख पड़ता है-आर्यवणों और भदोके शासनमे आकागपातालका अन्तर देख पड़ता है वह भी जाति- प्रतिष्टाले भावका ही फल है। किन्नु क्रमशः आर्य-चंग विस्तृत हो पड़ा और तब वह जाति-प्रतिष्ठाका भाव नहीं रहा । आर्यवंशके लोगोने विस्तृत भारतवर्ष के अनेक प्रदेशो पर अधिकार करके स्थान स्थान पर एक एक खण्ड-समाजको स्थापना की । भारतवर्ष इस प्रकारके बहुतने खण्ड-समाजाम बैंट गया। समाज-भेद, भापा-भेद, आचार व्यवहारका भेद, अनेक भेद अन्तको जाति-भेदके रूपने परिणत हो गरे । बालीको पोग्लू तक, काश्मीरले चोल और पाण्टय तक, नारी भारतभूमि मधुनकिनमोसे परिपूर्ण सहढके छत्तेकी तरह अनेक जाति और समाजाने परिपूर्ण होगई । अन्तको कपिलवस्तुके राजकुमार शाक्यमिहने एक अभि- नद धर्नकी सृष्टि की । अन्यान्य भेद तो मौजूद ही थे, धर्मभेद भी उत्पन्न रो गया । देशभेद, गाभेद, राज्यभेद, धर्मभेदके आगे रजातीयता टिक सकती थी ? सागरके भीतरके मल्यदरती तर भारतवरे लोग एकताले जन्य हो गये । उसके बाद मुसलमान जाये । मुसलमानाका का भी सामने लगा। उसके दाद लागरकी लहरके उपर लटकी तरह न्ये नये सुलहनान-सन्त्रदाय पाहात्य पतनाला पार होकर आने लगे। इस देशके रजारो आदमी राजाकी पाके लोनसे का नजारे हात मताय जानेवे उरले मुकरमान रोने लगे। नर भारतवर्ष निवान्नियोने हिन्दू ८३ बंकिम-निवन्धावली- . और मुसलमान दो जातियाँ हो गई । हिन्दू, मुसलमान, मुगल, पठान, राजपूत, महाराष्ट्र एकत्र काम करने लगे। तब जातिमें एका कैसे रहता? एकेका ज्ञान किस तरह रहता? इस प्रकार भारतवर्षमे अनेक जातियाँ हो गई। निवासस्थानके भेदसे, भापाके भेदले, वंगके भेदसे, धर्मके भेदसे अनेक जातियाँ हो गई । बंगाली पंजावी, सराठे, राजपूत, जाट, हिंदू, मुसलमान, इनमे कौन किसके साथ एका करता ? धर्मका मेल है तो वंशका मेल नहीं है, वंशका मेल है तो भापाका मेल नहीं है, भापाका मेल है तो निवासस्थानका मेल नहीं है। राजपूती और जाटोंका एक धर्म है तो भिन्न वंशमै उत्पत्ति होनेके कारण वे भिन्नजातीय है। बंगाली और बिहारी अगर एक वंशके हैं तो उनकी भापाये भिन्न है। केवल यही नहीं है । भारतका ऐसा भाग्य है कि जहाँ किसी प्रदेशके लोग सब बातोमे एक है-जिनका धर्म, भापा, जाति, देश सब एक है-वहाँ उनमे भी जातिकी एकताका ज्ञान नहीं है। बंगा- लियोमे बंगाली जातिकी एकताका बोध नहीं है, सिखोमे सिखजातिकी एकताका बोध नहीं है । इसका भी विशेष कारण है । बहुत समयतक भिन्न जातियां जब एक बड़े साम्राज्यके बीच में रहती है तन क्रमशः जाति-ज्ञान या जातीयताका भाव लुप्त हो जाता है । भिन्न भिन्न नदियोकी जल-राशि जब समुद्रमे आकर मिल जाती है तब उसमें यह नहीं जाना जा सकता कि अमुक नदीका अमुक जल है। वैसे ही बृहत् साम्नाज्यके अन्तर्गत भिन्नजातियोका भी वहीं हाल होता है। उनका अलगाव जाता रहता है, किन्तु ऐक्य नहीं उत्पन्न होता । रोमन साम्राज्यके भीतर आई हुई जातियोकी ऐसी ही दशा हुई थी । हिन्दुओंकी भी वही दशा हुई है। भारतवर्षमे अनेक कारणोमे बहुत दिनासे जाति-प्रतिष्टा उठ गई है। जाति-प्रतिष्टाके उट जानके कारण ही कभी हिन्दू समाजके द्वारा किसी जातीय कार्यका सपादन नहीं हुआ। जाति- प्रतिष्ठा उठ जानेके कारण ही हिन्दुओंके राज्यासन पर विना आपत्तिके हिन्दृ-समाजने सब जातिके राजाओको बिठा लिया है। इसी कारण हिन्दू समाजने कभी स्वतन्त्रताकी रक्षा करनेके लिए उगली भी नहीं उठाई। इतिहासमें उल्लिखित समयके बीच केवल दो बार हिन्दूसमाजमे जाति-प्रतिष्टाका उदय होते देखा गया है। एक बार महाराष्ट्रप्रदेश । ८४ भारत-कलंक। शिवाजीने इस महामन्त्रका पाठ किया था। उनके सिंहनादसे महाराष्ट्र प्रदेश जग उता था। उस समय मराठोंमे भ्रातृभाव देख पड़ा था। इसी महा- मन्त्रके बल्ले सराटोने उल सुगलसाम्राज्यको नष्ट कर दिया जिस पर पहले किसीने विजय नहीं पाई थी। सारा भारत महाराष्ट्रोके हाथमे आ गया था। भारतके सभी राजाओने मराठोके चरणोमे सिर झुकाया था। दुबारा रनजीतसिहने 'खालसा' का महामन्त्र पड़कर ऐसा ही चमत्कार दिखाया था। जातीयवन्धन दृढ़ होने पर पठानोका अपना देश भी कुछ कुछ हिन्दुलोके हाथमे आगचा था। सतलजके उसपार सिंहनाद सुनकर निर्भक अंगरेज भी शंकित हो उठे थे । भाग्यवश वह सिह मर गया । लार्ड डलहौलीने होशियारीके साथ 'खालसा' के महामन्त्रका चमत्कार मिटा दिया । किन्तु रामनगर और चिनियानवालाकी लड़ाई इतिहासमे अंकित होगई। जब क्लिी प्रदेश-खण्डने जाति-प्रतिष्टाका उदय होनेसे इतना हुआ य तर संपूर्ण भारत अगर एक्-जाति कनकर जातीयभावसे परिपूर्ण हो उठता तो क्या नहीं हो सक्ता था? अंगरेज रोग भारतवर्षफे परम उपकारी हैं। अंगरेज रोग हमे नई नई दाते निखा रहे हैं । जो हम कभी जानते न थे वही जना रहे है, जो हमने कभी देखा सुना और ममता नहीं था वही हमको दिसा, सुना और समता रहे हैं। जिस मार्गमें हम कभी चले नहीं, उन मार्गमें किस तरह चरना चाहिए, जो हमको निखा रहे हैं। इन शिक्षाऑने अनेक मिक्षाने अमूल्य हैं। जो अमूल्यरत्न हमको अंगरेजोके ज्ञानभायारले मिले उनमें दोका दस प्रयमें उलेख क्विा गया है- न्वातन्यप्रियता और द्वितीय जानि-प्रतिधा । हिन्द इन्हें पहले नहीं जानते थे। * हम जन्मने बहे गन्द आया है हो इसका अर्थ Nation. city पा Notion सम्स्ना चाहिए।

बंकिम-निवन्धावली-- और मुसलमान दो जातियाँ हो गई । हिन्दू, मुसलमान, मुगल, पठान, राजपूत, महाराष्ट्र एकत्र काम करने लगे। तब जातिम एका कैसे रहता ? एकेका ज्ञान किस तरह रहता ? इस प्रकार भारतवर्पमें अनेक जातियाँ हो गई। निवासस्थानके भेदसे, भापाके भेदले, वंगके भेदसे, धर्मके भेदसे अनेक जातियां हो गई। बंगाली पंजाबी, मराठे, राजपूत, जाट, हिंदू, मुसलमान, इनमे कौन किसके साय एका करता ? धर्मका मेल है तो वंशका मेल नहीं है, बंशका मेल है तो भापाका मेल नहीं है, भापाका मेल है तो निवासस्थानका मेल नहीं है। राजपूतो और जाटोंका एक धर्म है तो भिन्न वंशमै उत्पत्ति होनेके कारण वे भिन्नजातीय हैं। बंगाली और बिहारी अगर एक वंशके हैं तो उनकी भापाये भिन्न है। केवल यही नहीं है । भारतका ऐसा भाग्य है कि जहाँ किसी प्रदेशके लोग सब बातोमे एक है-जिनका धर्म, भाषा, जाति, देश सब एक है-वहाँ उनमे भी जातिकी एकताका ज्ञान नहीं है। बंगा- लियो में बंगाली जातिकी एकताका बोध नहीं है, सिखोंमे सिराजातिकी एकताका बोध नहीं है । इसका भी विशेष कारण है । वहुत समयतक भिन्न जातियाँ जब एक बड़े साम्राज्यके बीच में रहती है तब क्रमशः जाति-ज्ञान या जातीयताका भाव लुप्त हो जाता है । भिन्न भिन्न नदियोकी जल-राशि जब समुद्रमे आकर मिल जाती है तब उसमे यह नहीं जाना जा सकता कि अमुक नदीका अमुक जल है। वैसे ही बृहत् साम्राज्यके अन्तर्गत भिन्नजातियोका भी वही हाल होता है। उनका अलगाव जाता रहता है, किन्तु ऐक्य नहीं उत्पन्न होता । रोमन साम्राज्यके भीतर आई हुई जातियोकी ऐसी ही दशा हुई थी । हिन्दुओकी भी वही दशा हुई है। भारतवर्षमें अनेक कारणामे बहुत दिनोसे जाति-प्रतिष्ठा उठ गई है । जाति-प्रतिष्टाके उठ जानके कारण ही कभी हिन्दू समाजके द्वारा किसी जातीय कार्यका संपादन नहीं हुआ। जाति- प्रतिष्टा रट जानेके कारण ही हिन्दुओंके राज्यासन पर बिना आपत्तिके हिन्द-समाजने सब जातिके राजाओको बिठा लिया है। इसी कारण हिन्दू समाजने कभी स्वतन्त्रताकी रक्षा करनेके लिए उगली भी नहीं उठाई। इतिहागमें उल्लिखित समयके बीच केवल दो बार हिन्दूसमाजमें जाति-प्रतिष्टाका उदय होते देखा गया है। एक बार महाराष्ट्रप्रदेशमे । ८४ भारत-कलंक। शिवाजीने इस महामन्त्रका पाठ किया था। उनके सिहनादसे महाराष्ट्र प्रदेश जग उन था। उस समय मराठोंमे भ्रातृभाव देख पड़ा था। इसी महा- मन्त्रके बल्ले मराठोने उस सुगलसाम्राज्यको नष्ट कर दिया जिस पर पहले किलोने विजय नहीं पाई थी। सारा भारत महाराष्ट्रोके हाथमे आ गया था। भारत सभी राजाओने सराठोंके चरणोमे सिर युकाया था। दुबारा रनजीतसिहने 'खालला' का महामन्त्र पढ़कर ऐसा ही चमत्कार दिखाया था। जातीयबन्धन दृढ़ होने पर पठानोका अपना देश भी कुछ कुछ हिन्दुओके हाथमे आगया था। सतलजके उसपार सिंहनाद सुनकर निक रंगरेज भी शंकित हो उठे थे। भाग्यवश वह सिह मर गया । लार्ड डलहौसीने होशियारीके लाय 'खालसा' के महामन्त्रका चमत्कार मिटा दिया । किन्तु रामनगर और चिनियानवालाकी लड़ाई इतिहासमें अंकित होगई। जब क्लिी प्रदेश-खण्डमें जाति-प्रतिष्टाका उदय होनेसे इतना हुआ य तर संपूर्ण भारत अगर एक्-जाति बनकर जातीयभावले परिपूर्ण हो उठता तो क्या नहीं हो सकता था ? अंगरेज रोग भारतवर्षके परम उपकारी हैं। अंगरेज लोग हमें नई नई दातें सिखा रहे हैं । जो हम कभी जानते न थे वही जना रहे हैं, जो हमने कभी देखा सुना और समझा नहीं था वही हमको दिखा, सुना और समझा रहे हैं। जिस मार्गने हन कभी चले नहीं, उस मार्गमें किस तरह चलना चाहिए, तो हनको लिखा रहे हैं । इन शिक्षाऑमे अनेक शिक्षामें अमूल्य हैं। जो अमूल्यरत्न हमको अंगरेजोके ज्ञानभाण्डारले मिले हैं उनमे दोका इस प्रबन्धमें उल्लेख क्यिा गया है-एक स्वातन्त्र्यप्रियता और द्वितीय जाति-प्रतिष्टा । हिन्दू इन्हें पहले नहीं जानते थे । । * इस प्रबन्यनें जहाँ जति गन्द आया है वहाँ उसन अर्थ Nationclity या Nation सन्जना चाहिए ।

बंकिम-निवन्धावला- ches भारतकी स्वाधीनता और पराधीनता। लनुप्यकी ऐसी दुर्दगा कभी हो नहीं सकती कि उसमे शुभ कुछ न देख पड़े । हमारे भारी दुर्भाग्यमे भी ढूढ़नेसे कुछ न कुछ भलाई पाई जा सकती । जो अशुभके भीतर शुभका अनुसन्धान करके उसकी आलोचना करता है वही विज्ञ है । दुःखके दिनोमे इस बातकी आलोचना करने में कुछ सुख है कि दुःख भी केवल दुःख ही नहीं है। भारतवर्ष पहले स्वाधीन था अब कई सौ वपास पराधीन है। भारतव- पके नई पौधके लोग इसे घोरतर दुःख समझते हैं। हमारी इच्छा है कि एक बार उस प्राचीन स्वाधीनता और नवीन पराधीनताकी तुलना करके देखे । देख कि दुःख क्या है और सुख क्या है। पहले इस पर विचार करनेकी आवश्यकता जान पड़ती है कि स्वाधीनता पराधीनता आदि शब्दोका तात्पर्य क्या है। हम इस समय प्राचीन भारतव- पंकी तुलना करने बैठे हैं । तुलनाका उद्देश्य है न्यूनाधिकता या तारतम्यका निटेंश करना । किन्तु किस विपयका तारतम्य हमारे अनुसन्धानका विषय है ? प्राचीन भारतवर्ष स्वाधीन था और आधुनिक भारत पराधीन है-यह वात कहनेसे क्या लाभ है ? हमारी समझमें इस प्रकारकी तुलनाका एक मात्र उद्देश्य.यह होना चाहिए कि प्राचीन भारतवर्षम लोग सुखी थे या आधुनिक भारतवर्पमें अधिक सुखी है। हो सकता है कि इतनेमें हमारे कुछ पाटक हम पर खीझ उठे हो। स्वाधीनतामे सुख है, इस सिद्धान्तम संशय ही क्या है ? जो संशय करता है वह नासमझ नराधम इत्यादि है। हम स्वीकार करते है। किन्तु यह प्रश्न करनेसे कि स्वाधीनता पराधीनताकी अपेक्षा क्यों अच्छी है, टीक उत्तर मिलना कठिन है। इस देशके लोगोंने अंगरेजी पढ़कर इस विषयमें दो बाते सीखी है- Independence ' और 'Liberty ।' इनका अनुवाद ' ग्वाधीनता' और ' म्वतन्त्रता' हो सकता है। बहुत लोगोंकी धारणा है कि ये दोनों शब्द एक ही अर्थ सूचित करते है । इन शब्दोसे स्वजातीय शासन के अधीन . ८६ भारतकी स्वाधीनता और पराधीनता। -- अवस्थाका बोध होता है. यही सर्वसाधारणकी प्रतीति है । राजा यदि दूसरे देशका हो तो उसकी प्रजा पराधीन और वह राज्य परतन्त्र है । इस कारण, इस समय अंगरेजोके शासनाधीन भारतवर्षको पराधीन और परतन्त्र कहा जाता है। इस धारणाकी जड़ क्या है, इसी पर पहले विचार करना उचित है। महारानी विक्टोरियाको अँगरेज-कन्या कहा जा सकता है। किन्तु उनके पूर्वपुरुप प्रथम या द्वितीय जार्ज अंगरेज नहीं थे। वे जर्मन थे। तृतीय विलियम पोर्तुगीज थे। बोनापार्ट कार्सिकाय इटालियन थे । स्पेनके भूत- पूर्व प्राचीन बोवंशके राजा. फ्रेच थे। रोम-साम्राज्यके सिहासनपर अनेक वर्बर जातिके सन्नाद् बैठे थे। इस प्रकारकी सैकड़ो घटनाओका उल्लेख किया जा सकता है। देखा जाता है कि इन सब राज्योमें उस उस समय भिन्न जातिके राजा थे । अच्छा, उस उस समय ये सब राज्य पराधीन या परतन्त्र कहे जा सकते हैं या नहीं? कोई नहीं कह सकता कि ये राज्य उस उस समयमै पराधीन थे। यदि प्रथम जार्जके शासनाधीन इंग्लैंडको या ट्रेजन-शासित रोमको पराधीन नहीं कहा जा सकता तो शाहजहाँके शासनाधीन भारतवर्पको या अलीवर्दीखोके शासनाधीन बंगालको पराधीन क्या कहते हैं? देखा जाता है कि शासनकर्ता भिन्न जातिका होनेसे ही राज्य परतन्त्र नहीं होता । इस बातके भी अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं कि शासन- कर्ताकै स्वजातीय होनेले ही राज्य स्वतन्त्र नहीं होता। वागिनटनके किये युद्धके पहले अमेरिकाके गालनकर्ता स्वजातीय थे। उपनिवेगों (कलोनियों) भरकी प्रथनावन्याने शासनकर्ता स्वजातीय हुआ करता है। किन्तु उस भवन्याने उपनिवेगोंको भी स्वतन्त्र नहीं कहा जा सकता। तो फिर परतन्त्र क्लेि कहते हैं ? यह निश्चित है कि हंगरेजोके अधीन जाधुनिक भारत परतन्त्र राज्य है। रोमन रोगो द्वारा विजित ब्रिटेनले सीरिया तक सर्व राज्य परतन्त्र थे। अरजियर्स, या जमेका परतन्त्र, राज्य है । ये सब राज्य क्यों परतन्त्र हैं ? ८७ चंकिम-निवन्धावली- ये सब एक एक अलग राज्य नहीं है, भिन्न देशवासी राजाके राज्यका एक अंशमात्र हैं। भारत-सम्राट् भारतवर्षमे नही रहते । भारतवर्षका बादशाह भारतवर्षसे नहीं, अन्य देशमें है। जिस देगका राजा अन्य देगके सिंहासन पर अवस्थित और अन्य देशका रहनेवाला हो वही देश परतन्त्र है। दो राज्योंका एक राजा होनेसे उनमेंसे एक देश परतन्त्र और एक देश स्वतन्त्र होगा। जिस देश में राजा, रहता है वह देश स्वतन्त्र है और जिस देगमे राजा नहीं रहता वही देश परतन्त्र है। इस प्रकारकी परिभाषा करनेमें कुछ आपत्तियाँ उठाई जा सकती हैं। इंग्लैंडके राजा प्रथम जेम्स स्काटलैंड और इंग्लैंड दो राज्योंके अधीश्वर होकर, स्काटलैंड छोड़ कर इंग्लैंडमें रहने लगे। स्काटलैड क्या इंग्लैंडको राज्य देकर परतन्त्र हो गया ? बावरशाह, भारतको जीत कर, दिल्लीमे सिंहासन स्थापित कर, वहीसे पैतृक-राज्यका शासन करने लगे। उनका अपना देश क्या भारतवर्षके अधीन हो गया। प्रथम जार्ज इंग्लडके सिंहासनको पाकर वहीं रहकर पैतृक-राज्य हनोवरका शासन करने लगे । तो क्या हनोबर उस समय परतन्त्र हो गया था ? परिभापाके अनुरोधसे हमको कहना पड़ेगा कि प्रथम जेम्स, प्रथम जाज या बाबरगाहका पैतृक-राज्य परतन्त्र हो गया था। किन्तु परतन्त्र भर हो गये थे, पराधीन नहीं हुए थे। हम Indipendence शब्दके बदले म्वतन्त्रता' और Liberty दाब्दकी जगह 'न्याधीनता' का और इनके अभावसूचक स्थानों में इनके अभाव-सूचक शब्दोका प्रयोग करते हैं। नो परतन्त्रता और पराधीनतामें भेद क्या है ? अथवा स्वतन्त्रता या पराधीनताम भेट क्या है? इंग्लैंडमें राजनैतिक म्वाधीनताका एक विशेष प्रयोग प्रचलित है। हम उस अर्थका आश्रय लेनेके लिए बाध्य नहीं है । क्यो कि वह अर्थ इस उप- स्थित विचारके लिए उपयुक्त नहीं है। इसका जो अर्थ भारतवर्ष के लोग ममझने हैं वही अर्थ हम भी समावेंगे। ८८ - भारतकी स्वाधीनता और पराधीनता दूसरे देशका आदमी किसी देशमे सजा होता है तो एक अत्याचार होता है। जो राजाके स्वजातीय होते हैं उन्हे इस देशके लोगोकी अपेक्षा प्रधा- नता प्राप्त होती है । उससे प्रजा दूसरी जातिके द्वारा पीड़ित होती है। जहाँ देशकी प्रजा और राजजातिकी प्रजामे इस तरहका तारतम्य हो उसी देगको पराधीन कहेगे । जो राज्य परजाति-पीड़नसे शून्य है वह स्वाधीन है। अतएव परतन्त्र राज्यको सी कभी कभी स्वाधीन कहा जा सकता है जैसे -प्रथम जार्जके राज्यकालमे हनोवर और मुगलोंके राज्यकालमें काबुल । ऐसे ही कभी कभी स्वतन्त्र राज्यको भी पराधीन कहा जासकता है। जैले नार्मनलोगोके समयमे इंग्लैड और औरंगजेवके समयमें भारतवर्ष हम कुतुबुद्दीनके अधीन उत्तर-भारतको परतन्त्र और पराधीन तथा अकबर शासित भारतको स्वतन्त्र और स्वाधीन कहते है। वह जो कुछ हो, प्राचीन भारत स्वतन्त्र और स्वाधीन था, और आधुनिक भारतवर्ष परतन्त्र और पराधीन माना जाता है। हम पहले स्वतन्त्रता और परतन्त्रतासे जो विषमता होती है उसकी आलोचना करेगे । उसके बाद स्वाधीनता और पराधीनताके सम्बन्धमें अपने विचार प्रकट करेगे । राजाके अन्यदेशवासी होनेसे दो अनिष्ट होनेकी संभावना होती है। एक तो कि राजाके रहने पर सुशासनमें.वित होता है। दूसरे यह कि राजा जिस देशमे रहता है उसके प्रति उसको अधिक श्रद्धा होती है। वह उसकी भलाईके लिए दूरके राज्यको कुछ हानिको भी स्वीकार कर सकता ह । यह नहीं कहा जा सकता कि भारतके संबंध इन दोपोंकी कुछ मात्रा नहीं देख पड़ती । इसमें सन्देह नही कि यदि भारतसम्राटका सिंहासन कलकत्ते या दिल्लीम होता तो भारतवर्पकी शासनप्रणाली पहुँतं कुछ उत्कृष्ट होती । क्योकि जो राजाके निकट होता है उसके प्रति राजपुरुष अधिक मन लगाते हैं। दूसरा दोप भी देखा जाता है । इंग्लैंडके गौरवके लिए अदीसीनियाका युद्ध हुआ, खर्च देना पड़ा भारतवर्पको। 'होम चार्जेज' कहकर बजटमे जो खर्चकी लिखी जाती है उसमें इंग्लैंटके लिए यह दूर । , मद ८९ बंकिम-निवन्धावली- इसी तरह भारतवर्षका क्षति-स्वीकार देखा जाता है। इसी तरह आर भी बात है। राजाके दूर रहनेके कारण आधुनिक भारतवर्पके सुगासनमे विन्न अवश्य होता है, किन्तु राजाके म्वेच्छाचारी होनेसे सुशासनमें जिन विनोके संघटित होनेकी संभावना होती है, वे विन्न नहीं होते। पहलेके जमानेमें ऐसा होता था कि कोई राजा विषयी है-महलोंमें ही रहता है, राज्यकी दुर्दगा हो गई। कोई राजा निष्ठुर है, कोई राजा धनका लोभी है । प्राचीन भारतमे इस तरहकी भारी अमुविधाये होती थी। इन समय दूर-स्थित राजा या रानीमें यदि इस प्रकारका कोई दोष भाभी जाय तो उसका फल भारतवर्ष तक अपना असर नहीं डाल सकता । दूसरे, जैसे आधुनिक भारतवर्ष में इंग्लैंडकी भलाईके लिए कभी कभी भारतको हानि उठानी पड़ती है वैसे ही प्राचीन भारतमे राजाके आत्म- सुखके लिए राज्यको हानि उठानी पड़ती थी । पृथ्वीराजने जयचन्द्रकी क्न्याको हरकर आत्म-मुखका संपादन किया । उससे भयानक युद्ध टन गया । दोनोंमें मनोमालिन्य बढ़नेसे और दोनोकी शक्ति क्षीण होनेसे दोनों ही मुसलमानोंके शिकार बने और उनके इस कृत्यले प्रजाको धनहानि, जनहानि, प्राणहानि तक उठानी पड़ी । आधुनिक भारतवर्षमें दृरवासी राजाके आत्मसुखके अनुरोधसे इस प्रकारका कोई अनिष्ट होनेकी संभावना नहीं है। किन्तु यह जो कुछ कहा गया वह परतन्त्रताके सम्बन्धमे ही कहा गया है । हम पहले ही पातन्त्रता और पराधीनताम अन्तर दिया चुके हैं। भारतमें अंगरेजोंकी प्रधानता है, देमी प्रजामात्र, अंगरेजीका दबाव मानती है और अंगरेजोके सुखके लिए भारतवाग्मियोंको कुछ कुछ अपने मुग्यकी हानि भी म्बीकार करनी पड़ती है। इस बानको दस देशका कोई आदमी अम्बाकार न करंगा । इस प्रकार एक जानिके उपर दृमर्ग जातिसरी प्रथा- मना प्राचीन भारत में नहीं थी । यह बात तो नहीं थी, किन्तु इसीके समान वर्ग-दिमागका पादन था। इस बानको कोई अम्बाकार न करेगा कि भारतकी स्वाधीनता और पराधीनता । चिरकालसे भारतवर्पको साधारण प्रजा शूद्ध है। ब्राह्मण आदि तीनो श्रेष्ठ वर्ण शूद्रोकी अपेक्षा बहुत कम थे। इन तीनों वर्गोंमे ब्राह्मण और क्षत्रिय देशके शासक थे । इन बातोको यहापर जरा विस्तारके साथ लिखनेकी आव- श्यकता जान पड़ती है। लोगोका विश्वास है कि प्राचीन भारतमे केवल क्षत्रिय ही राजा थे। । किन्तु वास्तवमे यह बात नहीं है। राजकाजके दो विभाग थे। युद्ध आदिका काम क्षत्रियोके ऊपर था और राजव्यवस्थानिर्वाचन, न्याय-विचार इत्यादिका काम ब्राह्मणोके हाथमे था। इस समय जैसे सिविल और मिलिटरी ये दो राजकाजके विभाग है, उस समयकी व्यवस्था भी कुछ ऐसी ही थी । ब्राह्मण लोग सिविल कर्मचारी थे और क्षत्रिय लोग मिलिटरी थे । इस समय भी जैसे मिलिटरीकी अपेक्षा सिविल कर्मचारियोकी अधिक प्रधानता है वैसे ही उस समय भी थी। राजपुरुषोमे राजपदवी क्षत्रियोको ही दी जाती थी, किन्तु कार्यतः उन पर भी ब्राह्मणोका दवाव था, या यो कहो कि वे भी ब्राह्मणोके मातहत थे। यह भी बात नहीं है कि प्राचीन भारतमे सदा क्षत्रिय ही राजा रहे हो । जान पड़ता है, पहलेके समयमे क्षत्रिय ही राजा थे। किन्तु बौद्ध युगमे मौर्यआदि संकरजातीय राजवंश देख पड़ते है। चीनी यात्री ह्वेन्त्सांग सिन्धु-पारमे ब्राह्मण राजा देख गये थे । अन्यत्र भी ब्राह्मणोने 'राजा' नाम धारण कर लिया था। मध्यकालके अधिकांश राजा ही राजपूत थे । राजपूत लोग क्षत्रियवंशसे उत्पन्न संकरजाति हैं। प्राचीन भार- तमे क्षत्रियोकी प्रधानता चिरकाल तक अप्रतिहत नहीं रही, ब्राह्मणोका गौरव एक दिनके लिए भी कम नहीं हुआ। वेदविद्वेपी वौद्धोके समयमे भी राजकाज ब्राह्मणोके हाथसे दूसरोके हाथ नहीं गया। क्यो कि वे ही पण्डित, सुशिक्षित और उस कार्य करनेकी शक्ति रखनेवाले थे । अतएव प्राचीन भारतमे ब्राह्मण लोग ही असलमे राजपुरुप कहलाने योग्य थे। सुविज्ञ लेखक बाबू ताराप्रसाद चट्टोपाध्यायने बंगाल-मेगजीनमें, एक प्रवन्धमे, ठीक. ही लिखा है कि ब्राह्मण ही प्राचीन भारतके अंगरेज थे। अब प्रश्न यह है कि आधुनिक भारतवर्षके देसी और विलायती लोगोम जो वैपम्य देख पड़ता है वह क्या प्राचीन भारतके ब्राह्मण और शहोंके वैषम्यकी अपेक्षा बहुत अधिक है ?

बंकिस-निवन्धावली- तरह भिन्न जातीय राजा होनेसे जो जाति-पीड़ा उत्पन्न हुमा करती है वह दो तरहसे होती है। एक तो राजव्यवस्थाके नियममें लिखा रहता है कि राजाके स्वजातीय लोगोंके लिए यह बात इस होगी और देसी लोगोंके लिए और तरह होगी । दूसरे म्बजाति-पक्षपाती राजाकी इच्छासे होनेवाली राजपासे जाति-पीड़ा होती है। राजा अपनी जातिमे रिभायतका बरताव करता है और स्वजातिके पक्षपातके मारे राजकाजमें अपनी ही जातिवालोको नियुक्त करता है । अंगरेजोंके शासनाधीन भारतमे और ब्राह्मण-गापित भारतमें ये दोनों दोप किस प्रकारसे वर्तमान थे और हैं, मो नीचे लिखा जाता है। । । 1-अंगरेजोंकी बनाई राजव्यवस्था अनुसार देसी अपराधीके लिए 'एक विचारालय हैं और विलायती अपराधीके लिए दूसरा विचारालय है। देसी लोगोंको अंगरज विचारक दण्ड दे सकता है, किन्तु अंगरेज अपराधी. को देसी विचारक दण्ड नहीं दे सकता । इसके सिवा व्यवन्याम और अधिक वैपम्य नहीं है। किन्तु ब्राह्मणोके शासनकालमें इसने कही अधिक वैषम्य देखा जाता है। अंगरेजोंके लिए अलग विचारालय है, लेकिन कानून जुदा नहीं है। इसे एक देसी आदमी अंगरेजको हत्या करनेमे क्वके योग्य है, वैसे ही अँगरेज भी अगर देसी आदमीको हत्या करे तो वह भी आईनके अनुसार उसी तरह वधके योग्य है। किन्तु बामणा शासन- कालमें शूद्रहन्ता ब्राह्मण और ब्राह्मणहन्ता शूद्रके दण्डम कितना बपन्य देख पढ़ता है । कौन कहेगा कि इस विश्यमे प्राचीन भारतवर्षस आयुनिक भारतवर्ष निकृष्ट है? अंगरेजॉरे राज्यमें जैसे अंगरेजको देसी आदमी दण्ट नहीं दे सकता बैये ही प्राचीन भारतमें झूद्र भी ब्राह्मण अपराबीको दण्ट नहीं दे सकता था। अगन्जॉक गन्यमें राजप्रसाद प्रायः अँगरेजोको ही मिलता है। लेकिन किसी कदर देसी गंग भी उच्च पदॉपर हैं। ब्राह्मगांके, राज्यमें शायद भारतकी स्वाधीनता और पराधीनता 2 शूद्रोको इतना भी राजानुग्रह नहीं मिलता था । किन्तु जब कभी कभी श्रद्ध राजसिहासनपर बैठनेके लिए समर्थ हुए है तब अन्यान्य उच्चपदोपर भी उन्होने समय समय पर अवश्य अधिकार जमाया होगा । इस समय देखा जाता है कि प्राथमिक न्याय विचारका काम प्रायः देसी लोगोके ही द्वारा होता ह । प्राचीन भारतमे क्या प्राथमिक विचारका कार्य शूद्वोके द्वारा होता था। हम प्राचीन भारतके सम्बन्धमे इतना कम जानते है कि इस प्रश्न पर कुछ निश्चित रुपले नहीं कह सकते । जान पड़ता है, अनेक न्याय विचारकार्य ग्राम्य- पंचायतोके द्वारा ही हुआ करते थे। किन्तु प्राचीन ग्रन्थ आदि पड़ने से यह जान पड़ता है कि उच्च श्रेणीके विचारक और सेनापति आदिके अन्यान्य प्रधानपद ब्राह्मणो और क्षत्रियोंके ही अधिकारमे रहते थे। बहुत लोग कहेंगे कि अंगरेजोंकी प्रधानता और ब्राह्मण-क्षत्रियोकी प्रधा- नतामे सादृश्यकी कल्पना अच्छी कल्पना नहीं है। क्यो कि ब्राह्मण-क्षत्रिय शुद्धपीड़क होने पर भी स्वजातीय थे-बैंगरेज लेग भिन्न जातीय है । इसका ऐला उत्तर देनेकी इच्छा होती है कि जो पीड़ित होता है उसके लिए न्वजा तिका पीड़न और अन्य जातिका पीड़न दोनों ही समान है । यह तो नहीं जान पड़ता कि स्वजातीयके हाथले मिली हुई पीड़ा कुछ मीठी होती हो, और विजातीयके हायसे मिली हुई पीड़ा कुछ तीखी लगती हो । चिन्नु हम यह उत्तर देना नहीं चाहते । यदि स्वजातीयको दी हुई पीडामे क्सिीको प्रीति हो तो हमको उसने कुछ आपत्ति नहीं है । हमारे कहनेका यही उद्देश्य है कि आधुनिक भारतकी जाति-प्रधानताके स्थानमें प्राचीन भारतमें वर्ग:प्रधानता थी । अधिकांग लोगोंके लिए दोनो समान हो, यह अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि पराधीन भारतवन उच्च श्रेणीके लोग अपनी बुद्धि, शिक्षा, वंश और नर्यादाके अनुसार प्रधानता नहीं प्राप्त कर सकते। जिलके विद्या और बुद्धि है उसको यदि अद्धिके सज्ञारन और विद्याको सफल क्रनेशी जगह न दी जाय तो वह उसके प्रति दड़ा भारी अत्याचार होगा । आधुनिक भारतवर्गमे ऐसा होते देखा जाता है। प्राचीन भारतमे वर्णगत वैपन्यके कारण यह भी होता था, किन्तु इतना नहीं होता था । और एक बात यह है कि इस समय राज- है ९३ बंकिम-निवन्धावली- काज आदि मत्र अंगरेजोंके हाथमें हैं हम लोग दूसरोके बाहुबलसे रक्षित होने कारण हम बुद्ध कोई काम नहीं कर पाते । इससे हम राज्यरक्षा और राज्यपालनकी विद्या नहीं सीखते । जातीयगुणकी स्मृत्ति नहीं होती। अतएव स्वीकार करना पड़ता है कि पराधीनता इस और हमारी उन्नतिमें बाधा डालती है। किन्तु वैसे ही दूसरी ओर हम यूरोपके साहित्य और विज्ञानकी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यूरोपियन जातिके अधीन हुए बिना हमको यह सुख नसीब न होता । अतएव पराधीनतामें जैसे एक और हमारी अति होती है वैसे ही दूसरी और उन्नति हो रही है। अतएव यही समझा जाता है कि आधुनिक भारतकी अपेक्षा प्राचीन भारतवर्ष में उच्च श्रेणीके लोगोको न्वाधीनताका कुछ सुन्ख था। किन्तु अधिकांग लोगोंके लिए प्रायः दोनों ही बराबर हैं; बल्कि आधुनिक भारत- वर्ष अच्छा है। दोनोकी तुलना करनेसे हमने जो जाना है उसे संक्षेपमें फिर नीचे लिखते हैं। इससे बहुत लोगोंको समझनेम सुविधा होगी। 1-भिन्न जातिका राजा होनेसे राज्य परतन्त्र या पगधीन नहीं होता। भिन्नजातीय राजाके अधीन राज्यको भी स्वतन्त्र और स्वाधीन कह सकते है। २. वतन्त्रता और न्वाधीनता, परतन्त्रता और पराधीनता, इनके हम भिन्न भिन्न पारिभाषिक अर्थ लिख चुके हैं। विगनिवासी राजाके द्वारा शामित गन्य परतन्त्र है। जहाँ भिन्न जानिकी प्रधानता है वह राज्य पराधीन है । अतएव काई राज्य परतन्त्र, पर परा- धान नहीं है । कोई राज्य बनन्त्र है, पर न्यावीन नहीं है । कोई राज्य पर- तन्त्र है और पराधीन भी है। ३-~-बिन्दु तुरनाका उद्देश्य उत्कर्ष और अपर देखना है। जिस राज्यम लेग नुर्वा वर्ग उत्कृष्ट है । जिम राज्चम लोग दुर्गा है वही अपकृष्ट है। विचारगीय यी है कि आधुनिक भारतकी प्रजा स्वतन्त्र और पराधीन अब- न्याने स्तिनी दुर्गा है। । ।

ty तत्व भारतकी स्वाधीनता और पराधीनता। ४-पहले, स्वतन्त्रता और परतन्त्रताको लीजिए । इसके अन्तर्गत दो । एक यह कि राजाके विदेशमें रहनेके कारण भारतवर्पके सुशासनमे वित होता है या नही ? स्वदेशके मङ्गलके लिए शासनकर्ता लोग इस देशको हानि पहुंचाते है या नहीं ? स्वीकार करना होगा कि उक्त कारणसे सुशासनसे विप्न भी होता है और भारतकी हानि भी होती है। किन्तु पूर्वलमयमे राजाके चरित्रके दोपसे जो अनिष्ट होते थे वे आधु- निक भारतसे संघटित नहीं होते । अतएव इस सम्बन्धमे प्राचीन और आधुनिक भारतनर्वमे विशेप तारतम्य नहीं देख पड़ता । ५-दूसरे, स्वाधीनता और पराधीनताको लीजिए। आधुनिक भारतवर्ष यदि प्रभुजातिकी प्रधानतासे पीड़ित है तो प्राचीन भारतमे भी ब्राह्मणोके प्राधान्यकी पीड़ा कम न थी । अधिकांश प्रजाके लिए इस विपयमे भी कुछ अधिक इतर-विशेष नहीं है । हो, प्राचीन समयमे ब्राह्मणो और क्षत्रि- योको कुछ सुख था। ६-आधुनिक भारतमे कार्यगत जातीय-शिक्षाका लोप हो रहा है। किन्तु विज्ञान और साहित्यकी चर्चाकी अपूर्व स्फूर्ति हो रही है। इसपर वहुतसे पाठक हमपर बिगड़ कर कहगे कि तो फिर क्या स्वाधी- नता और पराधीनता तुल्य है ? तो फिर पृथ्वीकी सब जातिया स्वाधीनताके लिए प्राणपण किये क्यो बैठी हैं ? जो लोग यह कहेगे उनसे हमारा विनीत निवेदन यह है कि हम उस तत्त्वकी मीमांसा करने नहीं बैठे है। हम पराधीन जाति हैं-बहुत समय तक पराधीन ही रहेगे। इसके विचारसे हमे कुछ प्रयोजन नहीं है। हमारा यह प्रवन्ध लिखनेका उद्देश्य केवल यही है कि प्राचीन भारतवर्षकी स्वाधीनताके कारण उस समयके भारतवासी आधुनिक भारतकी प्रजाकी अपेक्षा सुखी थे या नहीं। हमने इस प्रबन्धमे यह निर्णय किया है कि आधुनिक भारतने ब्राह्मण-क्षत्रिय अर्थात् उच्च श्रेणीके लोगोकी अवनति हुई और शूद्रोको अर्थात् साधारण प्रजाकी कुछ उन्नति हुई है। ९५ - बाहुबल और वाक्यवल। इतिहासमे सामाजिक दुःख दूर करनेके केवल दो उपाय कहे गये हैं- बाहुबल और वाक्यबल । इन दोनो बलोंके संबंध हमें जो कुछ कहना है वह कहनेके पहले सामाजिक दुःखकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें कुछ कहना आवश्यक जान पड़ता है। मनुष्यके दुःखके तीन कारण हैं ।-(१) कुछ दुःख जड़ पढाथाके दोपले होते है । बायजगत् कुछ नियमोंके अधीन होकर चलता है कुछ शक्तियोके द्वारा शासित हो रहा है। मनुष्य भी बाह्यजगतका एक अंश है । इस कारण उसपर भी वे ही शक्तियां शासन करती है । नैसर्गिक निय- मोका उल्लंघन करनेसे रोग आदि कष्ट देते हैं, भूख-प्यास पीड़ा पहुंचाती है और अनेक प्रकारके शारीरिक व मानसिक दुःख भोगने पड़ते है । (२ वायजगतकी तरह अन्तर्जगत् भी और एक मनुष्यके दुःखका कारण है। कोई पराई बढ़ती देखकर सुख पाता है और कोई दुःख पाता है। कोई इन्द्रियसंयमसे सुखी होता और किसीके लिए इन्द्रियसंयम घोर दुःख है। पृथ्वीके सब काव्यग्रन्थोंका इसी श्रेणीका दुःख ही आधार है । (३) मनुप्यके दुःखका तीसरा कारण समाज है । मनुष्य सुखी होनेके लिए समाजबन्धनमे पड़ता है । परस्परकी सहायतासे परस्पर आधिक सुखी होनेकी आशासे सब मिलकर रहते है । इससे विशेष उन्नति अवश्य होती है, किन्तु बहुत अमंगल भी होते है । समाजमें दुःख भी है। दारिद्यका दुःख सामाजिक दुःख है । जहाँ समाज नहीं है, वहाँ दारिद्य भी नहीं है। कुछ सामाजिक दुःख समाजकी स्थापनाके ही फल है-से गरीवी । जैसे प्रकागके साथ अन्धकार अवश्य होता है वैसे ही टारिा आदि कुछ दु.प भी समाजके माथ लगे हुए है। इन सा सामाजिक दुःनाका - प्रकाश और छायाकी उपमा संपूर्ण और शुद्ध है । यह सत्य है, कि हम अपने मनमे ऐसे एक जगतकी कल्पना कर सकते है, जहां प्रकाशक सूर्यके बाहुवल और वाक्यवल ! मूलच्छेद कभी नहीं हो सकता। किन्तु और भी कुछ सामाजिक दुःख ऐसे हैं जो समाजके नित्य फल नहीं है, वे निवृत्त किये जा सकते है, और उन्हें दूर करना सामाजिक उन्नतिका प्रधान अंश है। समाजके आदमी उन्हीं सामाजिक दुःखोकी जड़ उखाड़नेके लिए बहुत दिनोसे चेष्टा करते आ रहे हैं। उस चेष्टाका इतिहास सभ्यताके इतिहासका प्रधान अंश तथा समाज- नीति और राजनीति, इन दो शास्त्रोका एकमात्र उद्देश्य है । इन दो प्रकारके सामाजिक दुःखोको मै कुछ उदाहरणोके द्वारा समझानेकी चेष्टा करूंगा। स्वाधीनताकी हानि एक प्रकारका दुःख है, इसमे सन्देह नहीं। समाजमे रहनेपर अवश्य ही स्वाधीनताकी कुछ हानि उठानी ही पड़ेगी। जितने मनुप्य समाजमे हैं, मै, समाजमे रह कर, सबके कुछ कुछ अधीन हूँ । समाज-संचालकोका तो मुझपर पूर्ण अधिकार है। अतएव स्वाधीनताकी हानि यह एक समाजका नित्य दु.ख है। स्वानुवर्तिता एक परमसुख है और उसकी क्षति परमदुःख है । जगदी- श्वरने हमको जो शारीरिक और मानसिक वृत्तियां दी हैं उनकी स्फूर्तिसे ही हमको मानसिक और शारीरिक सुख मिलता है। यदि उन्होने हमको आँखे दी हैं तो देखनेकी सब चीजोके देखनेले ही हमको आँखोका सुख मिल सकता है। आंख पाकर अगर हम उन्हें सदा वंद ही किये रहे तो आँखोंके सम्बन्धमे हम सदा दुखिया रहे । अगर हम कभी कभी या किसी किसी वस्तुके संबंधमे आंखे बंद करनेके लिए बाध्य हुए, तो हम आंखके सम्बन्धमे कुछ अंगमे दुखी व्हरे। हमको बुद्धि मिली है । बुद्धिकी स्फूर्ति ही हमारा मुख है । अगर हमे अपनी बुद्धिको सदा परिमार्जित करने और अपनी इच्छाके अनुसार चलानेका अवसर न मिला, तो हम उतना ही बुद्धिके सम्बन्धमें दुखिया हुए। अगर हमें किसी विशेष बातमें बुद्धिसे काम न लेनेके लिए बाध्य दना दिया गया तो हम उतना ही बुद्धिके संबंधमे दुखी व्हरे । सिवा और कुछ नहीं-अतएव वहो प्रकाश है, छाया नहीं है। वैसे ही हम अपने मनमें ऐसे एक समाजकी भी फ्ल्पना कर सकते है, जिसमें सुख है, दु.ख नहीं है । किन्तु वह जगत् और समाज दोनों ही केवल मनके लड्डू और अस्तित्वशून्य है। . .नि.७ बंकिम-निवन्धावली- - । समाजमे रहकर हम सब दृश्योंको देखने नहीं पाते--सब बातों में बुद्धिने काम लेनेका हमें अवसर नहीं मिलता। मनुष्यको मारकर विज्ञान नहीं सीखने पाते-~अथवा राजाके घरमे घुसकर वहाँका दृश्य देखने नही पाते । ये बात समाजके लिए मंगलकी होने पर भी स्वानुवर्तितामें बाधा डालनेवाली हैं और, इसीसे ये सामाजिक नित्य दुःख हैं । दारिद्यकी बात पहले ही लिखी जा चुकी है । असामाजिक अवस्थामे कोई गरीब नहीं है। वनके फल-मूल और पशु सबको आहारके लिए मिल सकते हैं; नदीके जल और वृक्षकी छाँहमें किसीका इजारा नहीं है । खाना, पीना और आश्रय, जितना शरीर धारण करनेके लिए आवश्यक है, उससे अधिक कोई नहीं चाहता । न वैसा करनेकी कोई आवश्यकता समझता है और न वैसा करता है। इसी कारण एककी अपेक्षा दूसरा गरीब नहीं हो सकता। इसी कारण मानना पड़ता है कि असामाजिक अवस्थामे दरिद्रता नहीं है दारिद्रय तो एकसे दूसरेका मुकाबिला करनेकी बात है । वही तारतम्य या एकका दूसरेसे मुकाविला सामाजिकताका नित्य फल है। दारिद्य इमीमे सामाजिकताका नित्य कुफल है। ये सब सामाजिकताके फल हैं। जबतक मनुष्य समाजबद्ध रहेगा तब तक ये नित्य दोष भी बने रहेंगे। किन्तु और भी कुछ सामाजिक दुःख है, जो अनित्य हैं और मिटाये जा सकते हैं। बहुत लोग कहते हैं कि इस देशम जो विधवायें व्याह नहीं कर सकती, यह सामाजिक कुप्रथा-सामाजिक दुःख है, स्वाभाविक नहीं है। समाजकी गति फिरते ही यह दुःख दूर हो सकता है । हिन्दूसमाजके सिवा अन्य समाजमें यह दुःख नहीं है। ऐसे ही स्त्रियाँ सम्पत्तिकी अधिकारिणी नहीं हो सकतीं, यह विलायती समाजका एक मामा- जिक दुःग्य है । व्यवस्थापक समाजकी लेखनीकी एक सतरमे यह दु.य दूर हो सकता है। अनेक समाजोमें यह दुःख नहीं है । भारतवर्षफे लोग अपने देशमें राजकाजके ऊंचे पदोंको नही पासकते, यह एक दूर हो सकनेवाले सामाजिक दु.ग्वका उदाहरण है। जो सामाजिक दु.ख नित्य और अनिवार्य हैं, उन्हें भी दूर करने के लिए मनुष्य यन्न करते हैं। सामाजिक दरिद्रताको दूर करनेकी चेष्टा करनेवाले - । बहुत वाहुवल और वाक्यवल। लोग यूरोपमे सोशियालिस्ट, कम्युनिस्ट आदि नामोसे प्रसिद्ध हैं। स्वानुव- तिताके साथ समाजका जो विरोध है उसे कम करनेके लिए जान स्टुअर्ट मिल Liberty" (स्वाधीनता) नामका अन्य लिख गये है लोग इस अन्यको देवप्रसादसे प्राप्त वास्यके समान मानते हैं। अनिवार्यका निवारण असंभव है। किन्तु लनिवार्य दुःखकी भी मात्रा कम की जा सकती है। सांपातिक रोगको भी चिक्लिा है-उसकी यन्त्रणा घटाई जा सकती है। इस कारण जो लोग सामाजिक दुःख दूर करनेकी चेष्टामें लगे हैं उनके परिश्रमको वृथा समझनेका कोई कारण नहीं है। नित्य लौर अपरिहार्य सामाजिक दुःखोका उच्छेद असंभव है। किन्तु अन्य नामाजिक दुःखोंका मूलोच्छेद संभव लौर मनुप्यके द्वारा साध्य है । उन्हीं दुःखोंको दूर करनेमे ननुप्य-समाज सदा व्यस्त रहता है । मनुष्यका इति- हास उसी व्यस्तताका इतिहास है। कहा जा चुका है कि समाजके सब नित्य दुःख समाजकी स्थापनाके ही अपरिहार्य फल हैं-समाजकी सृष्टिसे ही वे उत्पन्न हुए हैं। अब प्रश्न यह है कि अन्य सामाजिक दुःखोंका कारण क्या है? वे समाजका अपरिहार्य फल न होनेपर भी क्यों होते हैं ? उनके निवारणके लिए इस प्रश्नकी मीमांसा होना बहुत लावश्यक है। इन्न प्रकारके दु.खॉकी सृष्टि सामाजिक अत्याचारसे होती है । जान पड़ता पहले उदाहरणके तौरपर अत्याचारके वारेमें कह देना ठीक होगा, नहीं तो पाठक कहेंगे कि समाजके उपर अत्याचार किसका और कैसा ? शक्तिके लविहित प्रयोग अत्याचार कहते हैं। देखो, माध्याकर्षण आदि जो नैसर्गिक दानियों हैं वे एक ही नियन पर चलती हैं-उसमें कभी कमी-वेशी नहीं होती। वह नियन विधिवद्ध बौर अनुल्लड्यनीय है। किन्तु जो शक्तियां मनुष्य के हाथमें हैं उनके नियमोंने ऐसी स्थिरता नहीं है । जो शक्ति मनुष्यके हाथमें है उसका प्रयोग विहित भी हो सकता है और अविहित भी हो सकता है। जितनी शक्तिके प्रयोगले उद्देश्य सिद्ध हो और किसीका कुछ निष्ट न हो, वही विहित प्रयोग है। उससे अधिक अविहित प्रयोग है।

चंकिम-निवन्धावली- है है । - बारूढकी शक्तिके विहित प्रयोगसे शत्रु मरते हैं और अविहित प्रयोगसे तोप फट जाती है। शक्तिका यह अतिरिक्त प्रयोग ही अत्याचार मनुष्य शक्तिका आधार । समाज मनुष्योका समूह है और इस लिए वह भी शक्तिका आधार है। उस शक्तिके विहित प्रयोगमें ही मनुष्यका मङ्गल है-दिनोदिन सामाजिक उन्नति होनेकी संभावना है । अविहित प्रयोगका फल सामाजिक दुःख है । सामाजिक शक्तिका वही अविहित प्रयोग सामाजिक अत्याचार है। बात अभीतक स्पष्ट नहीं हुई। सामाजिक अत्याचार तो समझमें आ गया, किन्तु अत्याचार करता कौन है ? किसके ऊपर अत्याचार होता है ? समाज तो मनुष्योका समूह है। तो क्या ये सब मनुष्य मिलकर अपने ही ऊपर अत्याचार करते हैं ? अथवा परस्परकी रक्षाके लिए जिन्होंने समाजबन्धनको स्वीकार किया है वे ही परस्पर अत्याचार करते है ? है यही, लेकिन ठीक यही भी नहीं कहा जा सकता । स्मरण रखना चाहिए कि अत्याचार शक्ति- हीका होता है। जिसके हाथमे सामाजिकशक्ति है, वही अत्याचार करता है। जैसे ग्रह आदि जड़-पिण्डोकी माध्याकर्पणशक्ति केन्द्रनिहित है, वैसे ही समाजकी भी एक प्रधानाक्ति केन्द्रनिहित है। वह शक्ति शासन-शक्ति है और समाजके केन्द्र राजा अथवा सामाजिक शासनकर्ता लोग होते हैं। समाज-रक्षाके लिए समाजके मासनकी आवश्यकता है। अगर सभीके हाथमे शासन हो तो अनियम और मतभेटके कारण शासन होना असंभव हो जाय । इसी कारण हरएक समाजम शासनका काम एक या उससे अधिक व्यक्तियोको सौंप दिया जाता है। उन्हींके हाथमे समाजकी शासन-शक्ति रहती है, वे ही सामाजिक केन्द्र होते है। वे ही अत्याचार करते है । वे मनुष्य हैं और मनुष्यमात्र भ्रम और आत्मादरके भावसे खाली नहीं है वे भ्रान्त होकर समाजके ऊपर उसीकी दी हुई शासनशक्तिका अविहित प्रयोग करते हैं। आत्मादरके कारण भी कभी कभी वे उस शक्तिका अवि- हित प्रयोग करते है। तो अब एक प्रकारके सामाजिक अत्याचारीका पता लग गया। वे राजपुस्प है और समाजका अवशिष्ट अंश अत्याचारका पात्र है। किन्तु अप- रमे हम संप्रदायक अन्याचारी केवल राजा या राजपुरप ही नहीं है। जो । - - १०० । बाहुबल और वास्यवल। लोग समाजपर शासन करते हैं वे ही इस सम्प्रदायके अत्याचारी है । प्राचीन भारतवर्पके ब्राह्मग राजपुरुष नहीं गिने जाते थे, तथापि वे समाजके प्रधान शासक थे। आर्योके समाजको वे लोग जिधर घुमाते फिराते थे उधर ही वह घूमता फिरता था। समाजको वे जो जंजीर पहनाते थे. समाज अलं- कार समझकर उसे पहन लेता था। मध्यकालिक यूरोपके धर्मयाजक भी इसी तरहके थे-राजपुरुष न होकर भी वे यूरोपियन समाजके शासक और शेर अत्याचारी थे । पोपगण यूरोपके राजा नही थे-बोडीसी भूमिके राजा थे, किन्तु लारे यूरोपपर घोर अत्याचार कर गये हैं। ग्रेगरी या इनोसेण्ट, लिओ या नाडियन यूरोपमे जितना अत्याचार कर गये है उतना दूसरे फिल्पि, चौदहवे लुई, आठवे हेनरी और प्रथम चार्ल्स भी नहीं कर सके। केवल राजपुरपों और धर्मयाजकोको ही दोष नही दिया जा सकता। इस लमय इंग्लैडमे राजा या रानी, किसी प्रकारका अत्याचार करनेकी क्षमता नहीं रखते-शासनशक्ति उनके हाथमे नहीं है। इस समय इंग्लैंडमे यथार्थ शासनशक्ति एडीटरोके हाथमे है। अतएव इंग्लैंडके एडीटर लोग अत्याचारी है। जहाँ सामाजिक शक्ति है वहीं सामाजिक अत्याचार है। क्न्तुि यह बात नहीं है कि केवल शासक और समाजके व्यवस्थापक लोग ही अत्याचारी हो । अन्य प्रकारके सामाजिक अत्याचारी भी है। जिन विपयोमे न राजशासन है और न धर्मशासन है--किसी प्रकारके शासन- पर्ताका शालन नहीं है-उन विषयोमे समाज किनके मत पर चलता है ? अधिकांश लोगोके मतपर । जहाँ समाजका मत एक है, वहाँ कुछ भी गड़. दड़ नहीं है कोई अत्याचार नहीं है। किन्तु इस प्रकारका एक मत होना बहुत दुर्लभ है। मतभेद होनेपर अधिकांशके मतके अनुसार ही थोड़े लोगोंको चलना पड़ता है। थोड़ा अंश अगर भिन्नमतावलम्बी होता है तो भी, और अगर वह अधिकांशके मतके अनुसार काम करनेको घोरतर दु.ख समझता है तो नी, उने अधिकांशके मतके अनुसार ही चलना पड़ता है। नहीं तो समाजका अधिक अंश थोड़े अंशको अपनेसे अलग कर देगा, या लन्य कोई सामाजिक दण्ड देकर पीड़ा पहुँचावेगा ।यह घोरतर सामाजिक अत्याचार है। यह जल्पांश उपर अधिकांशका अत्याचार कहलाता है। १०१ बंकिम-निवन्धावली- इस देशमें अधिकांशका मत है कि हिन्दुके घर पैदा होकर कोई विध- वाका व्याह न कर सकेगा या समुद्रयात्रा न कर सकेगा। अल्पांगका मत है विधवाका ब्याह करना अवश्य कर्तव्य है और इंग्लैंडकी यात्रा परम इष्ट है। किन्तु यदि यह अल्पांश अपने मतके अनुसार कार्य करे-विधवा- कन्याका व्याह करे और विलायत जाय, तो अधिकांश उसे समाजसे बाहर कर देगा। यही अधिकांगका अल्पांगके ऊपर किया गया अत्याचार है। इंग्लैंडमें अधिकांश लोग ईसाके भक्त और ईश्वरवादी हैं। जो अनीश्वर- वादी है और ईसाका भक्त नहीं है, वह साहस करके अपने मतको वहाँ प्रकट नहीं कर सकता । प्रकट करनेसे उसे अनेक प्रकारकी सामाजिक पीड़ाओसे पीड़ित होना पड़ता है । जान स्टुअर्ट मिल जिन्दगी भर अपनी अभक्तिको व्यक्त नहीं कर सके, व्यक्त न करके भी, केवल सन्देहपात्र होकर भी, पार्लियामेंटमे प्रवेश करनेके समय उन्हें अनेक विन्न-बाधाओंसे तंग होना पड़ा था। मृत्युके बाद उन्हे अनेक गालियाँ भी खानी पड़ी। यह अत्यन्त घोर सामाजिक अत्याचार है। अतएव सामाजिक अत्याचारियोकी दो श्रेणियाँ है। एक समाजके शासक और व्यवस्थापक और दूसरे समाजके अधिकांश लोग। इन्हीके अत्याचारसे सामाजिक दुःखकी उत्पत्ति होती है। ये सामाजिक दु.स समाजकी अवन- तिके कारण हैं। इनका निराकरण मनुष्यसाध्य और मनुप्यके लिए आवश्यक कर्तव्य है। किन उपायोंसे इनका निराकरण हो सकता है ? ऐसे दो उपाय और दूसरा वाक्यवल। पहले यह समझाया जायगा कि बाहुबल किसे कहते है और वाक्यबल क्मेि कहते है । इसके बाद इन दोनों बलोका प्रयोग समझाया जायगा और दोनाका भेद और तारतम्य भी दिग्याया जायगा। किमीको यह बतानेकी जरूरत नहीं है कि जिस बलके द्वाग वाघ मृगके बच्चेको मारकर ग्वाजाता है और जिम बलमै आम्टलिज या मेटन जीता गया था--दोनों ही बाहुबल है। मैंने अभी लिखते लिपने देगा, एक छिपकली माशे पकड़कर निगल गई। सिन्टिममे मिकन्दर तक जिमने जितना है-एक बाहुवर १०२ है । । बाहुबल और वाक्यवल । साम्राज्य स्थापित किया है-संसारके बड़े बड़े खलीफाओ और बादशाहोंमेसे जिस किसीने जो साम्राज्य स्थापित और रक्षित किया है उसका बल और इस भूखी छिपकलीका बल एक ही बल-अर्थात् बाहुबल । सुल्तान महमूद सोमनाथका मन्दिर लूट कर ले गया और यह काले मुंहकी विल्ही मूसा पकड़कर भाग गई, दोनो ही वीर है, दोनोके बाहुबल है । सोमनाथके मन्दिर और मेरे कपड़े काटनेवाले मूसेमें बहुत अन्तर है, यह बात मैं स्वीकार करता हूँ। किन्तु महमूदके लाखो सिपाहियो और अकेली बिल्लीमे भी बड़ा अन्तर है। संख्या और शरीरमें अन्तर होनेपर भी दोनोके पराक्रममें बहुत अधिक अन्तर नहीं देख पड़ता । सागर भी जल है, और ओसका बूंद भी जल है। महमूदका वह पराक्रम और छिपकली या बिल्लीका पराक्रम एक ही है। दोनो कार्य बाहुबलके पराक्रम है। पृथ्वीके वीरपुरुष धन्य हैं और उनके गुणोका कीर्तन करनेवाले 'हिराडोट्स' से 'के और 'किगलेक' साहब तक धन्य हैं। यहाँ पर कोई महाशय कह सकते है कि केवल बाहुबलसे कभी कोई साम्राज्य नहीं स्थापित हुआ। केवल बाहुके वलसे पानीपत या सेडन नहीं जीता गया—केवल वाहुके बलसे नेपोलियन या मार्लबरो वीर नहीं हुए । हम स्वीकार करते है कि कुछ कौशल-अर्थात् बुद्धिबल-बाहुबलके साथ संयुक्त हुए विना कार्यकारिता नही होती । किन्तु कौशल भी केवल मनुष्यवीरका कार्य नहीं है। क्या आप यह समझते हैं कि छिपकली मक्खीको या बिल्ली मूसेको बिना कौशलके पकड़ती है ? बुद्धिबलके संयोगके बिना वाहु- बलकी स्फूर्ति नहीं होती,-बुद्धिवलके बिना जीवके किसी भी बलकी स्फूर्ति नहीं होती। अतएव यह स्वीकार करना पड़ता है कि जिस बलसे पशु और मनुष्य दोनों प्रधानतः स्वार्थसाधन करते हैं वही वाहुवल है। असलमें उसे पशुवल कहना चाहिए, किन्तु उसमें सब प्रकारके कार्यकी क्षमता है और निप्पत्तिका वहीं अन्तिम उपाय है । जिसकी निष्पत्ति और किसी तरह नहीं होती, उसकी निप्पत्ति वाहुबरसे होती है । ऐसी कोई गाँठ नहीं जो छुरीसे न टे, ऐसा कोई पत्थर नहीं जो चोटसे न टूटे। बाहुबल इस संसारकी ऊंची १०३ चंकिम-निबन्धावली- PARA- - अदालत है-सब अपीलोके बाद यहीं अपील होती है। इसके ऊपर अपील नहीं है। वाहुवल पशुका बल है, किन्तु मनुष्य अभीतक किसी किसी अंशमें पशु है, इस लिए बाहुबल ही मनुष्यका प्रधान अवलम्बन है । किन्तु मनुष्य और पशुके बाहुवलमें एक भारी अन्तर है । पशुगण नित्य ही चाहुवलका व्यवहार करते है, किन्तु मनुष्यको नित्य बाहुबलके प्रयोगका प्रयोजन नहीं पड़ता। इसके दो कारण हैं । बाहुबल अनेक पशुओके पेट भरनेका उपाय है । दूसरा कारण यह है कि पशुगण प्रयुक्त-बाहुबलके वशी- भूत अवश्य हैं, किन्तु प्रयोगके पहले प्रयोगकी संभावनाको वे समझे हुए नहीं रहते। इसके सिवा समाजवद्ध न होनेके कारण वे बाहुबलके प्रयोज- नका निवारण नहीं कर सकते । एक पुस्तकमे यह कथा लिखी हुई है कि एक जंगलके पशुओंने जब देखा कि उनके साथी पशुओको नित्य सिह मार- मारकर खाजाता है तब उन्होने सिहके साथ यह प्रबन्ध कर लिया कि नित्य पशुओंपर अत्याचार करनेकी कोई जरूरत नहीं है, नित्य सिहके खानेके लिए एक पशु दे दिया जायगा। यहॉपर पशुओने समाजबद्ध मनुष्यके ऐसा काम किया । सिंहके द्वारा किये जानेवाले नित्यके बाहुबलके प्रयोगको रोक दिया । मनुष्य बुद्धिके द्वारा समझ सकता है कि किस अवस्थामे बाहुबल के प्रयुक्त होनेकी सम्भवना है और सामाजिक बन्धनके द्वारा उसका निवारण किया जा सकता है। जितने राजा है वे सब बाहुबलसे राजा है। किन्तु नित्य बाहुबलके प्रयोगद्वारा उन्हें प्रजापीड़न नहीं करना पड़ता। प्रजा देखती है कि लाखों सिपाही राजाकी आज्ञाके अधीन है। राजाकी आज्ञा न मानना या उसका उल्लंघन करना उनके लिए केवल ध्वंसका कारण होगा। अतएव प्रजा वाहुबलके प्रयोगकी संभावना देखकर राजाकी आज्ञाका विरोध नहीं करती। इस तरह बाहुबलका प्रयोग भी नहीं होता और बाहुबलके प्रयोगका उद्देश्य सिद्ध हो जाता है। इधर लाग्यो सेना जो राजाकी आज्ञाके अधीन है उमरा भी कारण मजाका धन और अनुग्रह ही है। प्रजाका धन जो राजाके यजानेम है और प्रजाका अनुग्रह जो राजाको प्राप्त है उसका कारण सामाजिक नियम है। अतएव इस जगतपर बाहुबलका प्रयोग न होनेका मुख्य कारण मनुष्यकी दृरदर्शिता और गौण कारण समाजबन्धन है । १०४ वाहुरल और वाक्यवल! । हम इस प्रबन्ध गौण कारणको छोड़ भी दे सस्ते है । हम इस बातकी आलोचना कर रहे हैं कि सामाजिक अत्याचार किस क्लि बलसे निवृन होते हैं। समाजनिवद्ध हुए बिना सामाजिक अत्याचारका अस्तित्व ही नहीं हो सकता। समाजवन्धन सब सामाजिक अवस्थाओका नित्य कारण है। जो नित्य कारण है वह विकृतिके कारणके अनुसन्धानमे छोड़ दिया जा सक्ता है। ऐला समझा जा चुका है कि ऐसा करनेसे हमारे शासनके लिए बाहु- बलका प्रयोग होगा-यह विश्वास ही बाहुबल के प्रयोगके निवारणका मृल कारण है। किन्तु ननुप्यकी दूरदर्शिता सब समय समान नहीं रहती। वह सब समय बाहुबलके प्रयोगकी सारांका नहीं करती। अक्सर देखा जाता है कि समाजमें जिनकी दृष्टि तीण है वे ही उसे समझ पाते हैं कि इस अवस्याने वाहुबल्के प्रयोगकी संभावना है वे औरोंको वह अवस्था समझा देते हैं। लोग समझ जाते हैं। समझते हैं कि यदि हम इस समय कर्तव्य- साधन न करेगे तो हमारे उपर बाहुबलझे प्रयोगकी संभावना है। उसके सगुन फलकी लाशंक्षा करके विपरीत मार्ग पर चलनेवाले लोग ठीक राह पर चरने लगते हैं। अतएव जब मनाजका एक भाग दूसरे भागको पीड़ित करता है तब उसके प्रतिकारले दो उपाय हैं। उनमेसे एक बाहुबलका प्रयोग है । जब राजा मजाको उत्पीड़ित करके लहजमें निरस्त नहीं होता तव प्रजा बाहुबलका प्रयोग करती है। यदि कभी कोई राजाशे यह समझा सकता है कि इस प्रकारका उत्पोटन क्रनेसे प्रजाके द्वारा वाहुबलके प्रयोगकी आशंका है तो राजा बचावारले निरन्त हो जाता इन्डो प्रथन चार्ल्स प्रजाके बाहुबलसे शासित हुए थे, यह सबको लालून है। चा पुन हितीय जेन्स बाहुबलके प्रयोगका उद्यम देखकर देगलागी रोग थे। रिन्नु साधारणतः इस प्रकारके बाहुबलके प्रयोगका स्पोजन नहीं होता। बाहुदलकी लाशंका ही ययेट है। असीमप्रतापशारी ज्गर न कि किसी काम प्रजा असन्तुष्ट होगी तो वे उस कार्यमे कभी रापन सारे । मन् १८५७-५८ में देखा गया है कि यद्यपि भारतकी प्रजा १०५ .

बंकिम-निवन्धावली- - बाहुबलमे उनके समकक्ष नहीं है, तथापि प्रजाके साथ बाहुबलकी परीक्षा सुखदायक नहीं है। अतएव वे बाहुबलके प्रयोगकी आशंका देखकर अपने वाञ्छित मार्गम गमन नहीं करते। अतएव देखा जाता है कि केवल भावी फल समझा सकनेहीसे बिना प्रयोगके बाहुबलका कार्य सिद्ध हो जाता है । इस प्रवृत्ति और निवृत्तिको देनेवाली शक्ति और एक दूसरा बल है। उसमे वाक्यके द्वारा समझाना पड़ता है। इसीसे वह यहाँ पर वाक्यवलके नामसे लिखा जाता है। यह वाक्यवल अत्यन्त आदरणीय पदार्थ है। वाहुबलसे मनुष्य संहार आदि विविध अनिष्ट होते हैं। किन्तु वाक्यबल बिना रक्तपातके-बिना अस्त्राघातके-बाहुबलका काम निकाल देता है। अतएव इसकी विशेष रूपसे समालोचना होनी चाहिए कि यह वाक्यबल क्या है और इसका प्रयोग, लक्षण और विधान किस प्रकारका है। हमारे देशर्म बाहुबलके प्रयोगकी कोई संभावना नहीं है और वर्तमान अवस्थामे वह अकर्त्तव्य भी है। सामाजिक अत्याचारके निवारणका एक मात्र उपाय वाक्यबल है। अतएव वाक्यवलकी उन्नति खास तौरसे की जानी चाहिए। वास्तवमें बाहुबलकी अपेक्षा सब अंशोमे वाक्यबल श्रेष्ट है। अबतक बाहुबलसे संसारकी अवनति ही हुई है। उन्नति जो कुछ हुई है वह वाक्य- बलसे। सभ्यताकी जो कुछ उन्नति हुई है वह वाक्यबलसे ही हुई है। समाजनीति, राजनीति, धर्मनीति, साहित्य, विज्ञान, शिल्प आदि जिस चीजकी उन्नति हुई है, वाक्यवलसे हुई है। वक्ता, लेखक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, नीतिवेत्ता, धर्मवेत्ता, व्यवस्थावेत्ता आदि सबका बल वाक्य. बल है। इससे यह कोई न समझे कि बाहुबलके प्रयोगका निवारण ही वाक्य- बलका परिणाम है, या इसके लिए वास्यबलका प्रयोग होता है। मनुष्य कुछ कुछ पशुचरित्रको छोड़कर उन्नत अवस्थाको प्राप्त हुआ है । अस्पर मनुष्य भयभीत न होकर भी अच्छे काम करता है। यदि किसी समय एकदम समाज भरकी किसी विशेष अच्छे काममे प्रवृति उत्पन हो तो वह मकार्य अवश्य अनुष्टित होता है। कभी कभी ज्ञानीक उपदेशक बिना । - १०६ बाहुवल और वाश्यवर! । ऐले सत्पथमें सर्वसाधारणकी प्रवृत्ति नहीं होती। साधारण मनुष्य अज्ञ होने है, चिन्ताशील व्यक्ति उन्हें शिक्षा देते हैं। वे शिक्षा देनेवाले उपदेन जत्र यथाविहित बलशाली होते हैं तभी समाजके हृदय में स्थान पाते है। जो विल्लुर समाजके हृदय में बस जाता है उसे समाज फिर छोड़ नहीं सस्ता- उसके अनुष्ठानमे प्रवृत्त होता है। उपदेशके वास्यबरले आन्दोलित समा- जमे विल्व उपस्थित हो सकता है। वायबलले जैसा सामाजिक इष्ट सिद्ध होता है वैला होनेकी बाहुबल्ले कभी संभावना नही । भूता, ईला, शायलिह आदि बाहुबलले बली नहीं थे, उनके पास केवल वाक्यबल था । किन्नु ईसा. शाक्यसिह आदिके द्वारा पृथ्वीका जितना भला हुजा है उसका शतांश भी बाहुबलके द्वारा नहीं हुबा । यह बात नहीं है कि बाहुबल्के द्वारा कभी समाजका इष्ट नहीं होता । आत्मरक्षाके लिए बाहुबल ही मे है। अमेरिकाके प्रधान उन्नतिकर्ता बाहुबलवीर वाशिगटन थे। हालैंड और देजियनके प्रधान उतिकर्ता बाहुबलवीर विलियम थे । भारतवर्षकी आधु- निक दुर्गतिका कारण बाहुबलका अभाव ही है। किन्तु साधारणतः देखनेसे यह देख पड़ेगा कि बाहुबलकी अपेक्षा वाक्यबलसे ही जगतका कल्याण होता है। बाहुवल पशुका वर है। वास्यबल मनुष्यका बल है। किन्तु केवल कुछ बक- दक कर लेना ही वायनल नहीं | कोरे वाक्यके वलको में वाक्यवल नहीं कहता। वात्यले जो व्यक्त होता है उसीको मैं वाक्यबल कहता हूँ। चिन्ता- शील मनुष्य चिन्ता द्वारा जगतके तत्त्वोंको अपने मनसे आविष्कृत करते । वका लोग वायके द्वारा उन तत्वोंको लोगोंके हृदयमें जमाते हैं। इन दोनों दातोके क्लवी समष्टिको वाक्यबल कहते हैं। ये दोनों दल प्रायः एक ही पुस्पलें पाये जाते हैं। कभी कभी दोनों बल नि भिन पुरमों में अलग अलग होते हैं। एक्त्र हो, या अलग अलग हो, दोगेंका समवाय ही वायबल है। [ असमाप्त । । १०७ किम-निबन्धावली- । प्यारका अत्याचार । लोगोका विश्वास है कि केवल शत्रु अथवा म्नेह, दया, अनुकूलता आदिसे रहित व्यक्ति ही हमारे ऊपर अत्याचार करते है। किन्तु यह बात हमारे ध्यानमे नहीं आती कि उनकी अपेक्षा भी भारी अत्याचार कर- नेवाले एक श्रेणीके लोग है । जो प्यार करता है वही अत्याचार करता है । प्यार करनेसे ही अत्याचार करनेका अधिकार प्राप्त हो जाता है। मैं अगर तुमको प्यार करता हूँ तो तुमको मेरा मत मानना पड़ेगा, मेरी बात सुननी पड़ेगी, मेरा अनुरोध रखना पड़ेगा । तुमारा इष्ट हो या अनिष्ट, तुमको मेरा मत स्वीकार करना पड़ेगा । यह अवश्य स्वीकार करना पड़ता है कि जो प्यार करता है वह जान-बूझकर तुम्हारी बुराईके लिए तुमसे अनुरोध नहीं करेगा। किन्तु कौन कार्य मंगलजनक है और कौन अमंगल- जनक, इसकी मीमांसा कठिन है। इस बारेमे अक्सर दो आदमियोंकी राय नहीं मिलती। ऐसी अवस्थामे कार्यकर्ता और उस कार्यका फल भोगनेवाला इस बातका पूर्ण अधिकारी है कि वह अपने मतके अनुसार ही कार्य करे । उसके मतके विरुद्ध उससे काम करानेका आधिकार केवल राजाको ही है। केवल राजा ही इस लिए इस बातका अधिकारी है कि हमलोगोने उसे समाजका हित अहित जाननेवाला मानकर राज्यासन पर बिठलाया है । केवल राजाके ही सदसद्विवेकको अभ्रान्त मानकर उसे हमने अपनी प्रवृत्तियोंके दमन करनेका अधिकार दिया है । जो अधिकार हमने दिया है उसके अनुसार अगर वह कार्य करे तो उसमे किसी के ऊपर अत्याचार नहीं हो सकता। परन्तु सब समय और नब विपयोम हमारी प्रवृत्तियोंके दमनका अधिकार उसे भी नहीं। हमारे जिस कार्यसे वह अन्यके अनिष्टका अनुमान करे उस कार्यकी प्रवृत्तिको रोकनेका ही उसे आधिकार है। जिस कार्यमे केवल हमारा ही अनिष्ट वह समझे उस कार्यकी प्रवृत्तिको रोकनेका उसे भी कोई अधिकार नहीं है। जिसमे केवलः यदि राजाका रोमा अविकार स्वीकार किया जाय तो रोगका इलाज न करनेवालों अथवा लडकपन या बुटापेमे व्याह करनेवालोको भी राजदण्ट मिलना चाहिए। और अगर अस्वीकार किया जाय तो मनीदाह-निवारण आदि नियमोरा समर्थन नहीं दिया जा सकता। १०८ हमारा अनिष्ट है उससे निवृत्त होनेकी हमे मार के नुमा अधिकार है। राजा भी सलाह दे सकता है। किन्तु हमारी मर्जीके खिलाफ चलनेके लिए लाचार का विकास कि नहीं है । समाजके सब रोगीको अधिकार है कि वे बरेन मान को हरएक कार्यको सपनी अपनी प्रवृत्तिके अनुसार संपादित करेका अनिष्ट करनेसे यह स्वेच्छाचार कहलायेगा और दूसरेवा अनिनो इसे स्वानुवर्तिता कहेगे। जो इस स्वानुवर्तितामे विन्न ढाल्ना के. किसीका सनिष्ट न होनेके स्थानमे भी हमारे मतके विन्द्र अपने मनमें प्रबल रके उसके अनुसार कार्य करता है वही सन्याचारी है। राजा. समाज, लौर प्रणयी, ये तीन जन इस तरहका अत्याचार किया करते है। राजाके अत्याचारको रोकनेका उपाय बहुत दिन पहले निकाला जा चुका है। समाजके इस अत्याचारको रोकनेके लिए पूर्वकाल्के कर पपिडतोने लनधारण दिया था। इस विषयमें जान स्टुअर्ट मिलका बन्न सोर विचारनिपुणता उनके माहात्म्यका परिचय देगी । किन्नु प्यारका अत्याचार रोक्नेके लिए भी किसीके यत्न करनेकी बात आजतक देनी सुनी नहीं गई । कवि लोग सर्वतत्त्वदशी और अनन्तज्ञानगाली होते हैं। वे छ नहीं छोड़ते। वैकेयीके अत्याचारले दशरथकृत राम-वनवास, घृतने लासक्त युधिष्टिरके क्येि भाइयोके निर्वासन और अन्यान्य सैकड़ों स्थानोमें कविगण इस महती नीतिका प्रतिपादन कर गये हैं। किन्तु कवि- लेग नीतिवेत्ता नहीं होते और नीतिज्ञ लोगोंने प्रकाश्यरूपसे इस विषयम की हस्तक्षेप नहीं किया है। जो कोई मन लगा कर लौकिक व्यापारो पर दृष्टि डालेगा, वह इस तस्वकी समालोचनाके विशेप प्रयोज- नीर होनेने कोई संशय नहीं रख सकता । क्यों कि इस अत्याचारके करनेदारे त्याचारी भनेक हैं । पिता-माता, भाई-बहन, स्त्री-स्वामी पुत्र-पन्या, लान्मीच-कुटुम्ब, सुहृद्-नृत्य, जो कोई प्यार करता है, दही छ न कुछ अत्याचार और अनिष्ट करता है । तुम यह इच्छा किये बैठे हो कि अच्छे रक्षणवारी, अच्छे कुटकी, अच्छे चरित्रकी कन्या देख कर उसके साथ व्याह करेंगे। इसी वीचमें तुम्हारे बापने तुमसे बिना पूछे ही ।

बंकिम-निवन्धावली- किमी लड़कीके साथ तुम्हारे व्याहकी बात पक्की कर ली। तुम यदि बालिग हो तो इस विषयमें पिताकी आज्ञा माननेके लिए बाध्य नहीं हो । किन्तु पितृप्रेमके वशीभूत होकर तुमको वही व्याह करना पड़ा । मान लो, कोई गरीव है । देवके अनुग्रहसे उसे कोई अच्छी जगह मिल गई और वह दूर देश जाकर गरीबीसे पीछा छुड़ानेका उद्योग कर रहा है। इसी बीचमे माताने रोना धोना मचा दिया । उसे अपनेसे दूर जानेके लिए मना किया । वह मातृप्रेमसे लाचार होकर रह गया। मातृप्रेमके अत्याचारसे उसने अप- नेको सदाके लिए गरीबीके गढ़ेमें डाल दिया । लायक भाईके कमाये रुप- येको निकम्मे नालायक भाई नष्ट करते है । यह बिल्कुल ही प्यारका अत्या. चार है। यह हिन्दू-समाजमें प्रत्यक्ष देख पड़ता है। भााँके प्यारके अत्या- चारका उदाहरण उद्धृत करनेकी कोई आवश्यकता ही नहीं जान पड़ती; और स्वामीके अत्याचारके सम्बन्धमे धर्मसे इतना कह देना कर्तव्य है कि उनमेंसे कुछ प्यारके अत्याचार भी होते हैं, किन्तु अधिकांश अत्याचारीका सम्बन्ध बाहुबलसे ही होता है। मनुष्य-जीवन प्यारके अत्याचारोंसे पूर्ण है। मनुष्य सदासे अत्याचार- पीड़ित है। प्रथमावस्थामे बाहुवलका अत्याचार था। असभ्य जातियोंमें जो बली था वही पर-पीड़न करता था। कुछ समय बाद यह अत्याचार राजाके अत्याचार और धनके अत्याचारके रूपमें परिणत हो गया। यह अत्याचार किसी समाजसे बिल्कुल कभी नहीं उठाया जा सका । द्वितीय अव- जातीय अवस्थामें सामाजिकताका अत्याचार और सभी अवस्थाऑम प्यारका अत्याचार पाया जाता है। इन चार प्रकारके अत्याचारोंमें प्यारका अत्याचार किमी अत्याचारकी अपेक्षा हीनबला या कम अनिष्ट करनेवाला नहीं है । वरिक यह कहा जा सकता है कि राजा, समाज, या धर्मवेत्ता, कोई भी प्रणयीकी अपेक्षा बलवान् नहीं है। प्रणयीकी तरह कोई भी सदा सब घड़ी सब कामोंमें आकर हस्तक्षेप नहीं करता। इस कारण यह कहा जा सकता है कि प्यारका अत्याचार सबसे बढ़कर अनिष्ट- कारी है । अन्य अन्याचारोको रोका जा सकता है-अन्य अत्याचारोंकी मीमा है । क्यों कि अन्यान्य अत्याचारियांका विरोध करना सहज है । स्थामें धर्मका अत्याचार, प्यारका अत्याचार प्रयोजन है । जड़ प्रजा, प्रजापीड़क राजाको कभी गद्दीसे उतार देती है और कभी उसके प्राण ही ले लेती है । लोकपीड़क समाज त्याग किया जा सकता है। किन्तु धर्म और स्नेहके अत्याचारसे छुटकारा नहीं है । क्यो कि इनका विरोध करनेकी प्रवृत्ति ही नहीं होती। कभी कभी बकरीके बच्चेका सालन देखकर वैरागी बाबाकी लार टपक पड़ती है, किन्तु कभी वे गोस्वामीके मांस- भोजन के सम्बन्धमे विचार करनेकी इच्छाही नहीं करते कि वह उचित है या अनुचित । त्यो कि वे जानते हैं, इस लोकमे चाहे जिनना कष्ट हो, पर परलोकमें तो गोलोक अवश्य ही मिलेगा। मनुप्य जिन अत्याचारोके अधीन है उनकी जड़ मनुष्यका पदार्थको अपने वशमे किये बिना मनुष्यजीवनका निर्वाह नहीं हो सकता। इस लिए बाहुबलका प्रयोजन है । इसी कारण वाहुवलका अत्याचार भी है । बाहुबर का फल बनानेके लिए समाजका प्रयोजन है। उसके साथ ही समाजका अत्याचार भी है। जैसे परस्पर समाज बन्धनमें बंधे बिना मनुष्यजीवनका उद्देश्य सुसम्पन्न नहीं होता वैसे ही परस्पर आन्तरिक बन्ध- नमें बंधे विना मनुष्यजीवनका अच्छी तरह निर्वाह नहीं होता । अतएव समाजका जैसा प्रयोजन है वैसा ही, बल्कि उससे भी अधिक, प्रणयका प्रयोजन है । बाहुबल या समाजका अत्याचार अत्याचार होनेके कारण जिस तरह बाहुबल या समाजको मनुष्य त्याज्य या अनादरकी चीज नहीं समझते, उसीप्रकार प्रणयका अत्याचार होनेके कारण वह भी त्याज्य चा अनादरणीय नहीं हो सकता । किन्तु जैसे मनुष्य अत्याचारी बाहु- दल और समाजवलको परित्यक्त या अनाहत न करके धर्मके द्वारा उसे शान्त करनेकी चेष्टा करता है, वैसे ही प्रणयके अत्याचारको भी धर्मके द्वारा शान्त क्रनेका यत्न करना कर्तव्य है। धर्मका भी अत्याचार अवश्य है। धर्मका अत्याचार रोक्नेके लिए नगर अन्य शक्तिका प्रयोग किया- जायगा तो उसका भी अत्याचार होगा । अत्याचारकी शक्ति स्वाभाविक है। यदि धर्मका अत्याचार शान्त कर सकनेवाली कोई शक्ति है तो वह ज्ञान है। विन्तु ज्ञानका भी अत्याचार है। इसका उदाहरण हितवाद और प्रत्यक्ष वाद नामके दो दर्शन हैं । इन दोनोंके वेगसे हृदयसागरका वहुतसा हिस्सा सूखे पारके टापुलोंका रूप धारण करता जा रहा है । जान पड़ता है, - घंकिम-निवन्धावली- ज्ञानके अत्याचारपर शासन करनेके लिए मनुष्य क्सिी शक्तिका व्यवहार न कर.सकेगा। कमसे कम इस समय तो यही समझम आता है । उसी तरह यह भी कहा जा सकता है कि प्रणयके ही द्वारा प्रणयका अत्या- चार शान्त किया जा सकता है। हम स्वीकार करते हैं कि यह बात यथार्थ है । स्नेह यदि स्वार्थपरतासे शून्य हो तो यह हो सकता है। किन्तु साधारण मनुप्योकी प्रकृति ऐसी है कि स्वार्थपरताशून्य प्यार इस संसारमे दुर्लभ है। इस बातके असली मतलबको न लेकर अनेक लोग मन-ही-मन इसका प्रतिवाद कर सकते है । वे कह सकते हैं कि जिस माताने स्नेहवश पुत्रको धन कमानेके लिए परदेश नहीं जाने दिया वह क्या स्वार्थपर है ? बल्कि यदि वह स्वार्थपर होती तो पुत्रको धनकी खोजम दूरदेश जानेके लिए मना न करती। क्योंकि कौन माता पुत्रकी कमाईका सुख नहीं भोगना चाहती ? अतएव इस प्रकारके दर्शनमात्रकी आकांक्षा रखनेवाले स्नेहको बहुत लोग अस्वार्थपर स्नेह समझते है । किन्तु वास्तवमे यह खयाल ठीक नहीं है। यह स्नेह अस्वार्थपर नहीं है। जो लोग इसे अस्वा- र्थपर मानते हैं वे केवल धनपरायणताको ही स्वार्थपरता समझते है। जो धनकी कामना नहीं करता उसे वे स्वार्थपरतासे शून्य समझते है। वे यह नहीं समझ सकते कि धनलाभके अलावा पृथ्वी पर अन्यान्य सुख है और उनमसे किसी किसी सुखकी आकांक्षा धनकी आकांक्षासे अधिकतर वेग- वाली है। जिस माताने धनका मोह त्यागकर पुत्र-मुस देखनेके मुग्यकी वासनासे पुत्रको सदाके लिए गरीब बना टाला, अथवा अपनी अवस्था संभालनेका अवसर उसके हाथसे निकल जाने दिया उसने भी अपना मुख खोजा । वह धनका सुख नहीं चाहती, किन्तु पुत्रको सदा देख- नेका सुग्ब चाहती है । वह सुख माताका है, पुत्रका नहीं है । माताको देवनेसे अगर पुत्रको सुख हो तो हो, वह जुदी बात है। उसमें पुत्रकी प्रवृत्ति होनी चाहिए। माताने यहाँपर अपना एक सुप हंढा-नित्य पुत्रका मुख देखना । उसकी अभिलाषा करके उसने पुत्रको दारिद्यके द ग्यसे दुःमित बनाना चाहा । यही माता स्वार्थपर है; क्योकि उसने अपने मुग्य- के लिए अन्यको दुखी क्यिा । ११२ प्यारका अत्याचार। मनुप्यके स्नेहका अधिक अंश इसी तरह प्रणयी और प्रणय-पात्र दोनोके चित्तको सुखदायक, किन्तु स्वार्थपर पशुचरित्र होता है। केवल प्रणयी अन्य सुखकी अपेक्षा प्रणयसुखका अभिलापी होता है, इसी लिए लोग ऐसे स्नेहको अस्वार्थपर कहते है। किन्तु स्नेहका जो सुख है वह स्नेहयुक्तका है। स्नेहयुक्त, अर्थात् स्नेह करनेवाला, अपने सुखकी आकांक्षा करता है, इस लिए साधारण मनुष्य-स्नेहको स्वार्थपर-वृत्ति कहना अनुचित नहीं। किन्तु स्नेह मनुप्यके हृदयमें स्वार्थसाधनके लिए नहीं स्थापित हुआ है। मनुप्यके चरित्रने अबतक वैसा उत्कर्ष प्राप्त नहीं किया, इसीसे मनुष्यस्नेह लबतक पशुवत् है। पशुवत् इस लिए है कि पशुओंमे भी दाम्पत्यके लतिरिक्त परस्पर वत्स-स्नेह, दाम्पत्य-प्रणय और वात्सल्य, आदि अन्य प्रकारके प्रणय हैं । सन्तानका स्नेह पशुओमे मनुष्यकी अपेक्षा कम नहीं है। स्नेहका यथार्थ स्वरूप ही अस्वार्थपरता है। जिस माताने पुत्रके सुख लिए पुनमुखदर्शनसुखकी कामना छोड़ दी, वही यथार्थ स्नेह करनेवाली है। जो प्रणयी प्रणय-पानकी भलाईके लिए प्रणयसुख-भोगको छोड़ सका, वही सच्चा प्रणयी है। जब तक साधारण मनुष्योका प्रेम इस तरह विशुद्धताको प्राप्त न करेगा तब तक मनुप्यके प्यारसे स्वार्थपरताका कलंक दूर न होगा और स्नेहकी यथार्थ स्फूर्ति न होगी । जहाँ प्यारको ऐसा शुद्धरूप प्राप्त होगा, या जिसका प्यार ऐसे शुद्धरूपको प्राप्त हो चुका है, वहीं प्यारके द्वारा प्यारका अत्या- चार रोका जा सकता है और रोका भी जाता है। ऐसे शुद्ध प्रणयके प्रणयी मनुष्य दुर्लभ नहीं हैं। किन्तु इस प्रवन्धमें उनकी वात नहीं की जा रही है और वे अत्याचार भी नहीं करते । अन्यत्र, धर्मके शासनसे प्रणयको शासित करना ही प्यारके अत्याचारको रोकनेका एक मात्र उपाय है। चह धर्म क्या है? धर्मकी चाहे जो कोई जैसी व्यारया करे, धर्म एक है। केवल दो मूल- सूनाम मनुष्य मात्रके नीतिशासका निचोड़ कहा जा सकता है। उनमें एक मात्मसम्बन्धीय और दूसरा पर-सम्बन्धीय है । जो आत्मसम्बन्धीय है वह आत्मसंवारनीतिका मूल कहा जा सकता है। अपने चित्तकी स्फूर्ति और . । ६.नि.८ बंकिम-निबन्धावली- निर्मलताकी रक्षा ही उसका उद्देश्य है। दूसरा सून पर-सम्बन्धीय होनेके कारण यथार्थ धर्मनीतिका मूल कहा जा सकता है। १-दूसरेका अनिष्ट न करना, २-यथाशक्ति दूसरेकी भलाई करना, यह महती उक्ति जगत् भरके धर्मशास्त्रोंका एकमात्र मूल और एकमात्र फल है । अन्य कोई भी नीतिसे सम्बन्ध रखनेवाली उक्ति कहिए, उसका आदि और अन्त इसीमें लीन हो जायगा। आत्मसंस्कार नीतिके सब तत्वोके साथ इस महानीति-तत्वका ऐक्य है । और, परहित-नीति और आत्मसंस्कार-नीति एक ही तत्त्वकी भिन्न भिन्न व्याख्या मात्र है। परोपकारमे प्रवृत्ति और पराये अहितसे निवृत्ति, यही समग्र नीतिशास्त्रके उपदेशोका सारांश है। अतएव इसी धर्मनीतिके मूलसूत्रका अवलंबन करनेसे ही प्यारका अत्या- चार निवृत्त हो सकता है। जब स्नेह करनेवाला आदमी स्नेहपात्रके किसी काममे हस्तक्षेप करनेको उद्यत होता है, तब उसे अपने मनमे यह दृढ़ संकल्प कर लेना चाहिए कि मैं केवल अपने सुखके लिए उसमें हस्तक्षेप नहीं करूंगा। अपना समझकर जिस पर स्नेह रखता है उसका किसी प्रका- रका अनिष्ट नहीं करूंगा। जितना कष्ट सहना पड़े, मै सहूंगा, तथापि स्नेह पात्रको किसी अनिष्टकार्यमें प्रवृत्त न करूंगा। यह बात सुननेमे बहुत छोटी और साधारण है और पुरानी जनश्रुतिकी पुनरक्ति जान पड़ सकती है, किन्तु समय पर इसके अनुसार चलना उतना सहज नहीं है। उदाहरणके तौर पर दशरथकृत रामनिर्वासनकी बातको ही ले लीजिए। इसीके द्वारा इस सामान्य नियमके प्रयोगकी कटिगता बहुतोंकी समझमे आ जायगी। यहाँ कैकेयी और दशरथ दोनो ही ग्यारके अत्याचारमै प्रवृत्त है। कैकयी दशरथके उपर और दारथ रामके ऊपर वह प्यारका अन्याचार कर रहे हैं। इनमये कैन्यीका कार्य स्वार्थपर और नीच कदर चिर-परिचित है । कैकेयीका कार्य म्वार्थपर और नीच अवश्य है, शिन्तु उसके प्रति इतनी कहक्तियोका प्रयोग शायद विहित नहीं कहा जामक्ता। कैवाने अपने किसी इटकी कामना नहीं की--अपने पुनकी भलाई सोची थी। यह सत्य है कि पुत्रके मंगलमे ही माताका मंगल है; किन्नु टमम सन्देह नहीं कि जो गतगीय पिता-माता अपनी जानिके प्यारका अत्याचार। खौफले पुनको पढ़नेके लिए विलायत नहीं जाने देते, उनके कार्यकी अपेक्षा कैकेयीका यह कार्य सौगुना अस्वार्थपर है। इस बातको जाने दो। कैकेयीके दोप-गुणोका विचार करनेके लिए इस समय हम प्रस्तुत नहीं है। दशरधने सत्य-पालनके लिए रामको वन भेजकर भरतको राज्य दिया। इसमें उन्हें प्राणाधिक पुत्रका वियोग स्वीकार करना पड़ा और अपने प्राणोसे हाथ धोना पड़ा । इसीसे भारतवर्षके साहित्यका इतिहाल उनके यशके कीर्तनले परिपूर्ण है। किन्तु उत्कृष्ट धर्मनीतिके विचा- रले यही सिद्ध होता है कि दशरथने पुत्रको अपने अधिकारसे च्युत और निर्वालित करके सत्यका पालन किया, तो इससे उन्हे घोर अधर्म ही हुआ। हन पूछते हैं कि क्या सत्य (अर्थात् प्रतिज्ञा) मात्रका पालन करना चाहिए ? यदि सती कुलकामिनी किसी फेरमे पड़कर किसी कुचरित्र पुरु- पके निकट धर्मत्यागका वादा कर ले, तो क्या उस वादेको पूरा करना चाहिए ? यदि कोई किसी के बहकानेले विना किसी दोपके मित्रको मारनेकी प्रतिज्ञा कर ले, तो त्या उसे उसका पालन करना चाहिए ? जो कोई घोर महापाप करनेकी प्रतिज्ञा कर ले तो क्या वह प्रतिज्ञा पालनीय हो सक्ती है? जहाँ प्रतिज्ञा तोड़नेही अपेक्षा उसकी रक्षा करनेमे अधिक अनिष्ट है, वहाँ क्या उचित है ? प्रतिज्ञाको तोड़ना या प्रतिज्ञाकी रक्षा ? बहुत लोग पहेंगे कि वहां भी सत्यका पालन करना चाहिए। क्यो कि सत्य नित्य-धर्म है. अवस्था-भेदसे दर पुण्यसे पाप नहीं हो सकता। अगर आप पुण्य और पापच निर्णय इस विचारले करते है कि जब जो काम करनेवालेकी समझमें इटकारक हो तर वह वर्तव्य है. और जब अनिष्टकारक हो तव अकर्तव्य है. तो फिर पुण्य-पापने लोई भेद नहीं रहता। तब लोग पुण्य कहकर घोर महापातामें प्रवृत्त हो सस्ते हैं। हम यहाँपर इस तत्त्वकी मीमांसा नहीं करते। क्यो कि हिनदानदर्शनके अनुयायी रोगोने एकप्रकारने इसकी मीमांसा र रक्खी है। जब इन प्रकार मीनालामे गड़बड़ हो. तद धर्मनीतिका जो मलमूत्र पहले बताया जा जा है उसके हारा परीक्षा की जानी चाहिए।

बंकिम-निवन्धावली- । सत्य क्या सर्वत्र पालनीय है ? इसके उत्तरका निर्णय करनेके पहले प्रश्न यह है कि सत्य-पालनीय क्यों है ? सत्य-पालनकी एक जड़ धर्मनीतिम है और एक जड़ आत्मसंस्कार-नीतिमे है। हम आत्मसंस्कार-नीतिको धर्मनी- तिका अंश मानना अस्वीकार कर चुके है, इससे धर्मनीतिका मूल ही देखेंगे। विशेप बात यह है कि दोनोका फल एक ही है । धर्मनीतिका मूलसूत्र यह है कि जिससे दूसरेका अनिष्ट हो वह अकर्त्तव्य है । सत्य पालन न करनेसे दूस- रेका अनिष्ट होता है, इस लिए सत्य पालनीय है । किन्तु जब सत्य-पाल- नसे दूसरेका भारी अनिष्ट होता हो, और सत्यका पालन न करनेसे वैसा न होता हो, तब सत्य पालनीय नहीं। दशरथके सत्यपालनसे रामका भारी अनिष्ट हुआ, और सत्यका पालन न करनेसे कैकेयीका चेसा कुछ अनिष्ट न होता । रहा दृष्टान्त-स्वरूपसे जनसमाजका अनिष्ट, सो रामको उनके अधिका- रसे भ्रष्ट करनेमे ही उसकी आशंका अधिक है। यह तो दत्त्युताका रूपान्तर कहा जा सकता है। अतएव ऐसी जगह पर दशरथने सत्यका पालन करके ही महापाप किया। यही पर दशरथ स्वार्थपरतासे खाली नहीं है। सत्यभंग होनेसे जगतमे उनके कलंककी घोपणा होगी, इसी भयसे उन्होंने रामको उनके अधिकारसे च्युत और बहिष्कृत कर दिया । अतएव यशोरक्षारूप स्वार्थके वशीभूत होकर उन्होंने रामका अनिष्ट किया। सच है कि उन्होने अपने प्राणोकी हानि भी स्वीकार की, किन्तु उनके निकट प्राणोंकी अपेक्षा यश ही प्रिय था । अतएव उन्होंने अपने इष्टकी ही रक्षा की। इस लिए वे स्वार्थपर है। म्वार्थपरता के दोपसे युक्त पराया अनिष्ट निस्सन्देह घोरतर महापाप है। अस्वार्थपर प्रेम और धर्मकी एक ही गति और एक ही परिणति है। दोनोंका माध्य दुसरेका मंगल है । वास्तवम प्रेम और धर्म एक ही पदार्थ है। मय गंगार जब प्रेमका विषय ता है तब वर प्रेम ही धर्मनामको प्राप्त होता है। धर्म जबतक सार्वजनिक प्रेमके रूपको धारण नहीं करता, नव- नक वर संपूर्णताको नहीं प्राप्त होता । किन्तु मनुष्याने कार्यत. स्नेहको धर्मगे अलग का किया है, अतएव ग्यारका अत्याचार रोकने के लिए धर्मके द्वारा स्नेह पर वायन होने की आवश्यक्ता है। जाता अनुकरण। अनुकरण। जगदीश्वरकी रूपाले उन्नीसवी-बीसवी शताब्दीमे नव्य बाबू नाम- धारी एक अद्भुत जीव जगतमें दिखाई पड़े है । पशुतत्वके ज्ञाताओने परी- क्षाद्वारा निश्चय किया है कि बाहरसे तो इनमे मनुप्यके लक्षण मिलते है, इन्के हाथो और पैरोमें पांच पांच अंगुलिया है पूछ नहीं है, और इनकी हडिर्या तथा मत्तक 'बाइमेन' जातिके सदृश जान पड़ते हैं । परन्तु इनके अन्तःस्वभावके सम्बन्धले अभी तक वैसा निश्चय नहीं हो सका है। किसी किसी विद्वानका मत है कि ये भीतरसे भी मनुष्य है। कोई कोई कहते हैं कि ये बाहरसे मनुष्य किन्तु भीतरले पशु है। इसी तत्त्वकी मीमांसाके लिए श्री राजनारायण बसुने कुछ समय पहले एक व्यात्यान दिया था । उक्त व्याख्यान अब मुद्रित भी हो चुका है। उसमे उन्होने पशुपक्षका ही समर्थन निचा है। तो हम लोग क्सि मतके माननेवाले हैं ? हम भी बाबुओको पशुश्रेणी- भूत माननेवाले हैं। हमने अंगरेजी समाचारपत्रोंसे इस पशुतत्वका अभ्यास दिया है। किसी क्लिी तान्नम्मच ऋपित मत यह है कि जिल तरह विधा- ताने तीनो रोनेकी सुन्दरियोंके सौन्दर्यका तिल तिल संग्रह करके तिलोत्त- माका सृज्न क्यिा थ, उसी प्रकार पशुवृत्त्यिाज्ञ तिल तिल संग्रह करके यह अपूर्व नव्य बाब चरित्र सृजन किया गया है। विधाताने शृगालोंसे शठता (धुर्तता), श्वानोले खुशामद और भिक्षानुराग, भेडोले भारता, वानरोंसे अनुकरणपटुना और गर्दनाले गर्जन-इन सब गुणोंका संग्रह करके, दिन- एडरको उम्बर रन्वाले, भारतवर्ष के एक मात्र भरोन्ने, नौर भट्ट मोक्ष- मूल्रके जानर न्यान, नव्य बाबुगेको नमाजाकागर्ने उदित क्यिा है । जैसे मुन्नात्याने तिलोत्तमा, अन्योने रिचर्डसन्न सिलेक्शन्न. पानाकाने फकी- रवी गुदड़ी. और भोजनोने रिडी है, वैसे ही मनुष्योंमे नव्य बाबु रोग हैं। जिन्न तरर क्षीरसागर मन्यन रनेसे जगमगार चन्द्र निकला था, उसी तरह पह-चरित्र-सागर नन्थन्ले ये अनिन्दनीय वायु-चन्द्रमा निकलकर भारतवर्षको उजेत देते हैं। राजनारायण याद जैले स्मृतब्ध रोगोको हम उच्चा नहीं मनाते, जो राहु बनकर इन वरचन्य चन्द्रदिन्बाको असना १२७ बंकिम-निवन्धावली- 4 हुआ, सत्य क्या सर्वत्र पालनीय है ? इसके उत्तरका निर्णय करनेके पहले प्रश्न यह है कि सत्य-पालनीय क्या है ? सत्य-पालनकी एक जड़ धर्मनीतिमें है और एक जड़ आत्मसंस्कार-नीतिम है। हम आत्मसंस्कार-नीतिको धर्मनी- तिका अंश मानना अस्वीकार कर चुके है, इससे धर्मनीतिका मूल ही देखेंगे। विशेप बात यह है कि दोनोका फल एक ही है । धर्मनीतिका मूलसूत्र यह है कि जिससे दूसरेका अनिष्ट हो वह अकर्तव्य है । सत्य पालन न करनेसे दूस- रेका अनिष्ट होता है, इस लिए सत्य पालनीय है । किन्तु जब सत्य-पाल- नसे दूसरेका भारी अनिष्ट होता हो, और सत्यका पालन न करनेसे वैसा न होता हो, तब सत्य पालनीय नहीं । दशरथके सत्यपालनसे रामका भारी अनिष्ट और सत्यका पालन न करनेसे कैकेयीका वैसा कुछ अनिष्ट न होता। रहा दृष्टान्त-स्वरूपसे जनसमाजका अनिष्ट, सो रामको उनके अधिका- रसे भ्रष्ट करनेमे ही उसकी आगंका अधिक है । यह तो दस्युताका रूपान्तर कहा जा सकता है। अतएव ऐसी जगह पर दशरथने सत्यका पालन करके ही महापाप किया। यहाँ पर दशरथ स्वार्थपरतासे खाली नहीं हैं। सत्यसंग होनेसे जगतमे उनके कलंककी घोपणा होगी, इसी भयसे उन्होने रामको उनके अधिकारसे च्युत और बहिष्कृत कर दिया । अतएव यशोरक्षारूप स्वार्थके वशीभूत होकर उन्होंने रामका अनिष्ट किया। सच है कि उन्होंने अपने प्राणोकी हानि भी स्वीकार की, किन्तु उनके निकट प्राणोंकी अपेक्षा यश ही प्रिय था । अतएव उन्होने अपने इष्टकी ही रक्षा की । इस लिए वे स्वार्थपर है। स्वार्थपरताके दोपसे युक्त पराया अनिष्ट निस्सन्देह घोरतर महापाप अस्वार्थपर प्रेम और धर्मकी एक ही गति और एक ही परिणति है। दोनोंका साध्य दूसरेका मंगल है। वास्तवमे प्रेम और धर्म एक ही पदार्थ । सब संसार जब प्रेमका विषय हो जाता तब वह प्रेम ही धर्मनामको प्राप्त होता है । धर्म जबतक सार्वजनिक प्रेमके रूपको धारण नहीं करता, तब- तक वह संपूर्णताको नहीं प्राप्त होता । किन्तु मनुप्याने कार्यतः स्नेहको धर्मसे अलग कर रक्खा है, अतएव प्यारका अत्याचार रोकनेके लिए धर्मके द्वारा स्नेह पर शासन होने की आवश्यकता है। है है है - अनुकरण। । अनुकरण। जगदीश्वरकी कृपाले उनीसवी-बीसवी शताब्दीमे नव्य दाबू नाम- धारी एक अद्भुत जीव जगतमे दिखाई पड़े है । पशुतत्त्वके ज्ञाताओने परी- क्षाहारा निश्चय किया है कि बाहरसे तो इनमें मनुप्यके लक्षण मिलते है,- इन्के हाथो और पैरोमे पांच पाँच अंगुलिया है पूँछ नहीं है, और इनकी हडिर्या तथा मत्त्तक 'वाइमेन 'जातिके सदृश जान पड़ते है । परन्तु इनके अन्तःस्वभावके सन्बन्ध में अभी तक वैसा निश्चय नहीं हो सका है। किसी क्सिी विद्वानका मत है कि ये भीतरसे भी मनुप्य है। कोई कोई कहते हैं कि ये बाहरसे मनुष्य किन्तु भीतरले पशु है। इसी तत्त्वकी मीमांसाके लिए श्री राजनारायण बसुने कुछ समय पहले एक व्यात्यान दिया था । उक्त व्यारयान अब मुद्रित भी हो चुका है। उसमें उन्होंने पशुपक्षका ही समर्थन लिया है। तो हम रोग लि मतके माननेवाले हैं ? हम भी बाबुओको पशुश्रेणी- मुनाननेवाले है। हमने अंगरेजी समाचारपत्रोंसे इस पशुतत्वका अभ्यास किता है। किसी क्सिी तान्नश्मश्रु अपिका मत यह है कि जिस तरह विधा- ताने तीनों लोकोकी सुन्दरियोंके सौन्दर्यका तिल तिल संग्रह करके तिरोत्त- नाश सुन्न क्यिा था, उसी प्रकार पशुवृत्त्यिांना तिल तिल संग्रह करके यह अपूर्व नव्य बाव-चरित्र सृजन किया गया है। विधाताने शृगालोले शटता (धूर्तता ). स्वानोंले खुशामद और भिक्षानुराग, भेडोंले भारता, वानरोंसे अनुरणपद्धता और गर्दभोले गर्जन-इन सब गुणोंका संग्रह करके, दिन- प्टल्को उस्बर रवाले, भारतवर्ष एक मात्र भरोसे, लौर भट्ट नोक्ष- नरके जाबरके स्थान, नव्य बाबुडोको समाजातराने उदित किया है । जैसे सुन्दात्याने तिलोत्तमा, अन्योने रिचर्डसन्त सिलेक्शन्स, पागाकॉन फकी- रकी गुददी, और भेजनाने खिचड़ी है, वैसे ही मनुष्योमे न्व्य वा रोग हैं। जिन रह जागरके मन्यन करनेसे जगमनासक बन्द्र निक्ला था, उसी तरह पशु-पत्रि-सागर मन्यन्तरे ये अनिन्दनीय वायु-चन्द्रमा निकलकर भारतको उता दे रहे है । राजनारायण नाव जैसे अमृतब्ध रोगोंको रनरचाही सका दे. जे राहु बनकर इनर,गन्य चन्द्रविन्द्रको प्रसना १२७ बंकिम-निवन्धावली- चाहते है । विशेप कर हम राजनारायण बलु महागयसे पूछते हैं कि जब आपने अपनी एक पुन्तकम गोहत्याका निपेध किया है, तब आप क्यो अपनी वक्तृताम बाबू, लोगो पर खड्गहन्त हुए है ? बाबू लोग गऊ-बैलोंसे किस वातम कम या निकृष्ट है ? जैसे गऊ-बैल उपकार करते है वैसे ही ये भी करते हैं । ये लोग अखबाररूपी सुत्वादु दूध मटके भर भर कर देते हैं, चाकरीका हल कंधे पर लादकर जीवनके खेतको जोत कर अंगरेज किसानोंको अन्न-धन पैदा करनेमें सहायता पहुंचाते हैं, विद्याके बोरे कालेजोसे पीठ, पर लाद लाद कर छापेखानोमे आकर डाल देते है, समाज- संस्कारकी गाड़ी पर विलायती माल लाद कर रसके बाजारमे पहुंचाते हैं और देशहितके कोल्हमे स्वार्थ-सरसा पेरकर यगरूपी तेल निकालते है। भला ऐसे जीवी पर कोई खगहस्त होता है। हमारे देगके इन बाबुओकी लोग जितनी निन्दा करते है वास्तवमै उतने निन्दनीय वे नहीं है । वहुतमे स्वदेशवत्सल लोग जिस अभिप्रायसे बाजुओकी निदा करते हैं, राजनारायण- जीने भी उसी अभिप्रायसे-बाबुओके हितके लिए उनकी निन्दा की है। अपने तब और अब " शीर्पक -लेखम निरपेक्षभावसे ' भूत' और वर्तमान'की आलोचना करना उनका उद्देश्य नहीं । 'वर्तमान' के दोप दिखलांना ही उनका उद्देश्य है। उन्होंने 'वर्तमान'के गुणो पर दृष्टि नहीं डाली और दृष्टि डालना भी व्यर्थ था, क्यो कि वर्तमान बाबुआको अपने गुणोके विपयमे तो कुछ भी सन्देह नहीं है-वे केल अपने दोपोको ही नहीं देख पाते। यह कहना अनुचित नहीं कि इस नई पौधर्म कई दोष है। उन सबमे अनुकरणका अनुराग' एक ऐसा दोप है जिसपर सबका कटाक्ष है। इसके लिए क्या अंगरेज और क्या हिन्दुस्तानी, सभी नित्य इस पौधका तिरस्कार करते हैं । इस विषयमै राजनारायणजीने जो कुछ कहा है उसे उद्धृत करनेकी यहाँ कोई आवश्यकता नहीं दीख पड़ती। वे बाते आजकल हर एक पुराने ढंगके आदमीके मुखसे सुन पड़ती है। हम उन बातोको स्वीकार करते है, और यह भी मानते है कि राजना- रायणजीने जो कहा है उसमें बहुत कुछ सत्य है; किन्तु अनुकरणके बारेमे अनुकरण । -- हम उनले सहमत नहीं । अनुकरणके सम्बन्धमे लोगोकी कुछ भ्रान्त धारणाये हो गई हैं। त्या अनुकरण करना ही दोप है ? यह कभी हो नहीं सकता । अनुक- रपके सिवा, प्रथम शिक्षा प्राप्त करनेका कोई उपाय ही नहीं है। जैसे छोटा रजा सयाने रोगोकी बातोका अनुकरण करके बोलना सीखता है, जैसे वह सयानोके कानोको देखकर अनुकरण करके उन्हें करना सीखता है, वैसे ही अलभ्य लौर अशिक्षित जातिया सभ्य और शिक्षित जातियोका अनुकरण करके वैसी ही बनती हैं । अतएव नई पौधके हिन्दुस्तानी अगर संगरेजोका अनुकरण करते हैं तो वह ठीक है-युक्तिसंगत है । यह सच है कि लादिकी सभ्य जातिया, बिना किसीका अनुकरण किये शिक्षित और सभ्य बनी-प्राचीन भारतवर्ष और मिसरकी सभ्यता क्लिीके अनुकरणका फल नहीं है । चिन्नु आधुनिक यूरोपकी सन्यता और शिक्षा, जो इस समय सब जातियॉकी सभ्यता और शिक्षासे प्रेसनली जाती है, ने सुसम्पन्न हुई ? इसका उत्तर यही है कि अनुक- रजते । रोन और यूनानझी सभ्यताके अनुकरणले ही यूरोपकी सभ्यता इस दर्जेको पहुंची है। रोनकी सन्यता भी यूनानकी सभ्यताके अनुकरणका फल है। पुरावृत्त जान्नेवालाको नालून है कि आजकल हिन्दुस्तानी बाबू लोग गरेजका जितना लौर जैला अनुकरण करते हैं, यूरोपियन लोगोंने पहले. पहल यूनान्विोका-विपकर रोमन-उसले कम अनुकरण नहीं किया। उन्होंने पहले जनुकरण क्यिा. इसीले लाज वे उन्नतिके इतने ऊँचे मोपान पर विन्य-वैजयन्ती लिये खड़े हुए हैं । ल्डकपनमें दूसरेका हाथ पकड़कर जरने उतरन जिसने नहीं दीखा, वह कभी तैरना नहीं सीख सक्ना । नान्टर अमरोको देखकर जिसने पहले रिखना न्हीं सीखा, वह लिख नहीं मरता। हिन्दन्तानी लोग अंगरेजोक्षा स्नुकरण कर रहे हैं। यही उन्के . हिर जाना है। पिन्ट रोगको यह विज्ञान है कि जनुकरण द्वारा अम्बर दजेकी उन्नति नहीं हो सकती । क्यों भाई की परले नाहित्यको लीजिए । पृथ्वीरे कुछ प्रथम श्रेणी महाकाव्य केवल उनुपरस्नान । पोरने बाइन और बोपारोका अनुकरण किया है और बंकिम-निबन्धावली- । जान्सनने पोपका । हम इस तरहके छोटे छोटे लेखकोके दृष्टान्त दिखाकर ही अपने कथनको प्रमाणित नहीं करना चाहते । बड़ोंको भी देखिए । बर्जिलका महाकाव्य होमरके प्रसिद्ध महाकाव्यका अनुकरण है। रोमका सारा साहित्य यूनानके साहित्यका अनुकरण है। कहनेका मतलब यह है कि जो रोमका साहित्य वर्तमान यूरोपकी सभ्यताका आधार है, वह अनुकरणमात्र इन विदेगके उदाहरणोको जाने दीजिए। आप अपने ही यहाँके लीजिए। हमारे देशमें दो महाकाव्य है-उनको हम महाकाव्य न कह कर गौरवके लिए इतिहास कहते हैं-वे पृथ्वीके सब काव्योमे श्रेष्ठ हैं । गुणमे दोनो प्रायः समान ही हैं, थोड़ा ही अन्तर है । पर साहित्यकी दृष्टिसे देखिए, तो एक प्रायः दूसरेका अनुकरण है। हिलर साहबको छोड़कर शायद और कोई इसमे आपत्ति नहीं करेगा कि महाभारतकी रचना रामायणके बाद हुई है। अन्यान्य अनुकृत और अनुकारी नायकोंमें जितना अन्तर देखा जाता है, राम और युधिष्टिरमे उससे अधिक अन्तर नहीं है। रामायणके अमित वल- शाली वीर जितेन्द्रिय भ्रातृवत्सल लक्ष्मण महाभारतमे अर्जुन बन गये हैं प्रतिविव नकुल-सहदेव । भीमका ढंग निराला है, तथापि बहुतसी बातोमे उनपर कुंभकर्णकी छाया पड़ गई है। रामायणमें विभीषण हैं, महाभारतमे विदुर है । अभिमन्यु और इन्द्रजित् एक ही ढंगके है। इधर राम अपने भाई और स्त्रीके साथ सुदीर्घसमय तक वनमे रहनेको बाध्य हुए, और उधर युधिष्टिर भी भाई और स्त्रीके साथ वनको गये। दोनो ही राज्य पाते पाते उससे वञ्चित हुए। एककी स्त्री हरी गई और दूसरेकी स्वीका भरी सभामे अपमान हुआ। दोनो ही महाकाव्योका सारांग जो युद्ध है टसमे एकमे स्पष्टरूपसे और दूसरेमे अस्पष्टरूपसे-~-वही अग्नि जलती है। दोनो ही काव्योका प्लाट यह है कि युवराज राजभ्रष्ट होकर भाई और स्त्रीके साथ वनवासी बने, फिर लड़कर विजयलक्ष्मी पाकर अपना राज्य करने लगे। छोटी छोटी घटनाओम भी यही बात पाई जाती है। लवकुशका काम मणिपुरमे वभ्रुवाहनने कर दिखाया । मिथिलामे धनुभंग हुआ, पञ्जाबम भी उसी धनुप्यकी क्रियासे मत्स्यवेध हुआ और शाप बहुत कुछ मिलता जुलता है। लंकादाह और लाक्षाभवनकी लीलाम भी घटना सादृश्य है। और भरत-शत्रुघ्नका - । दशरथ पाण्डुका पाप और अनुकरण । । हमारे इस कथनका यह आशय न समझ लिया जाय कि रामायण और महाभारतके पात्र पृथ्वी पर पैना ही नहीं हुए, या उन्होंने इन काव्योमे वर्णित कार्योको नहीं क्यिा । वे सब लोग हुए और उन्होंने उन कायोको भी क्यिा । किन्तु उनके उन कार्योका वर्णन परवर्ती कवियोके द्वारा किया गया-और उनमे परवती कविने पूर्ववर्ती कविका बहुत कुछ अनुकरण किया और पूर्ववर्ती कविन भी लोकपरम्पराके मुखसे सुने गये उपारयानके वर्णन करनेमे अपनी कविवशक्तिका उपयोग क्यिा। इसी कारण हमने इन दोनों ग्रंयोको. इतिहास होनेपर भी, नहाकाव्य कहा है। लापका जी चाहे तो आप महाभारतको रामायणका अनुकरण न कहे. परन्तु याद रखिए. अनुकृत और अनुकारीमे इससे अधिक समानता आपको बहुत कम मिलेगी। मगर देखिए. हमारी समझमे महाभारत रामा- यणका अनुकरण होकर भी पृथ्वीमे अद्वितीय है। अगर उसकी तुरना हो सकती है तो कुछ अंशोंमें रामायणसे । परन्तु, संपूर्ण नहीं । क्योकि महाभारतमे बहुतले नवीन पात्र और घटनायें ऐसी हैं जो रामायणने नहीं हैं। महा- भारतके श्रीकृष्ण, बलराम, भीष्म, वर्ण, सुभद्रा आदि रामायणमे नहीं है। पाठोंके स्वादोंने भी, न्यूलरूपले समता होनेपर भी, सूक्ष्मरूपसे अन्तर है। एक सीता भौर द्रौपदीको ही लीजिए । द्रोपदीकी प्रचण्डता और तेज- विता ताजीनं नहीं है। केवल उसकी झलक रावणको अशोक-बाटिकामे पकारते सत्य सीताजीनं पाई जाती है। साहित्यको देख चुके. अब समाजको देखिए । जब रोमवालोको यूना- की लन्यताका पता ल्गा, तब वे मन्-वाणी-कायाले उसका अनुकरण करने लगे । उनका फल पर हुमा विक्किरो ऐले वता. तासितस ऐले इतिहास- रेल, वरि ऐले नहारवि, शाटन और दैविन्स ऐसे नाटककार, होरेस और आदिवा ले गीतकाव्य बननेवाले, पेपिनियन ऐसे व्यवस्थाकार, सेनेका ऐसे धर्मनीतिमता, आन्तनैन ऐसे राजवर्न पालनेबारे और कुकालस ऐसे भोगासन पुरस रोन्ने दिखाई पड़े। जनगधारणका ऐश्वर्य दिन दिन और मन्नाहोंने अपनी मौन्दरं प्रियता परिचय देनेवाली बड़ी बड़ी इमारते बढ़ा न्वाई। पूरोपका हार पर रिक्षा ही जा चुका है । इटली और फ्रान्सका बंकिम-निबन्धावली- साहित्य भी त्रीस और रोसके साहित्यका अनुकरण है। यूरोपका व्यवस्था- शास्त्र रोनके व्यवग्याशास्त्रका अनुकरण है । यूरोपकी शासनप्रणाली भी रोमके अनुकरणपर संगटित हुई है। कही वह 'इम्पिरेटर' है, कहीं वही 'फोरम' है, कहीं वही 'प्लेब' श्रेणी है, कही वही 'म्यूनिसिपियम' है। आधुनिक यूरोपका स्थापत्य ( इन्जीनियरी) और चित्रविद्याका मूल भी यूनान और रोमसे आया है। ये सब चीजे पहले-पहल अनुकरण मात्र थी । अब अनुकरण छोड़कर और भी उन्नत होकर इन सब बातोमे यूरोपियन लोग अपने गुरुले भी बड़े चढ़े है । मगर ऐसा होनेके लिए प्रतिभाकी बड़ी आवश्यकता है । प्रतिभाशाली लोग पहले अनुकरण करते है और फिर उसका अनुशीलन, अभ्यास और आलोचना करक स्वतन्त्रतापूर्वक पूर्वगामियोसे आगे बढ़ जाते है । जो बच्चा पहले लिखना सीखता है, उसे पहले गुरुके हस्ताक्षरोका अ करण करना पड़ता है। अन्तको उसके अक्षर अलग हो जाते है, और प्रतिभा होने पर तथा अभ्यास करने पर वह गुरुसे भी अच्छा.लिख सकता है। . परन्तु, इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रतिभासे शून्य मनुष्य अगर अनु- करण करता है, तो उसका फल अच्छा नहीं होता। जिसमें जिस बातकी स्वाभाविक शक्ति नहीं, वह उस बातका सदा अनुसरण ही किया करता है, उसमे कुछ अपनी विचित्रता या स्वतन्त्रता दिखानेकी शक्ति कभी नहीं देख पड़ती। यूरोपके नाटक इसका एक उत्तम उदाहरण है। यूरोपकी जातियोंमे जो नाटककार हुए है, सबने यूनानी नाटकोका अनुकरण किया है। किन्तु प्रतिभाशाली होनेके कारण स्पेन और इंग्लैंडके नाटक शीघ्र ही स्वतन्त्र रूपसे लिखे जाने लगे और इंग्लैडने इस विषयमे ग्रीसके बराबर आसन जमा लिया । इधर इस विपयमे प्रतिभा अर्थात् स्वाभाविक शक्तिसे शून्य रोम, इटली, फ्रान्स और जर्मनीके लेखक केवल अनुकरण करनेवाले ही बने रहे। वहुत लोग कहते है कि रोम आदि देशोके लोग जो नाटक-रचनामे स्पेन और इंग्लैडके समकक्ष न होसके, इसका कारण और कुछ नही उनके अनु करणका अनुराग ही है। लेकिन यह भ्रम है। इसका कारण अनुकरणका अनुराग नही, उनमें नाटक-रचनाकी स्वाभाविक शक्तिका न होना ही है। अनुकरणकी इच्छा भी एक कार्य है, कारण नहीं । १२२ अनुकरण। अनुकरण' को आजकल लोग गालीसे बड़कर समझते है । इसका कारण यही है कि प्रतिभाशुन्य लोगोकी अनुकरणमे प्रवृत्ति और उसका बुरा फल देख कर लोगोको उसपर अश्रद्धा या अरुचि होगई है। असमर्थ मनुप्यके लिए अनुकरणले वड़कर हेसीको गत और नहीं है। एक तो वह खुद उरा, उस पर उसका अन्ध अनुकरण करना किसको अच्छा लगेगा ? यदि प्रतिभाशाली व्यक्ति अनुकरण करे तो वह भी घृणाके योग्य नहीं । हम लोगोती इल रूजय जो दशा हो रही है. उसे देखते हमारी अनुकरणकी प्रवृत्ति बुरी या अनुचित नहीं कही जासकती। हमारी समझसे तो ऐला अनुकरण सतुप्यके स्वभावले ही सिद्ध है। ऐसा अनुकरण करनेमे अगर कोई हिन्दुस्तानियोको दोष दे, तो हमे तो उसका कोई यथेष्ट कारण नहीं देख पड़ता। यह तो मनुष्यका स्वभावसिद्ध गुण (या दोप)है। जब उत्कृष्ट और निकृष्ट मिलते हैं तब निकृष्टको उत्कृष्टके समान होनेकी अभिलापा होना एक स्वाभाविक बात है । समान होनेका उपाय क्या है ? उपाय यही है कि उत्कृष्ट लोग जैसा करते हैं, निकृष्ट लोग भी वैसा ही करें। इसीको अनुकरण कहते हैं। जाजकल के हिन्दुस्तानी लोग देखते हैं कि बैंगरेज लोग सभ्यतामे, शिक्षा, बलने, ऐश्वर्यने, सुखने, विद्याने सब बातोमे उनले श्रेष्ठ हैं । तब हिन्दुन्तानी रोग क्यो न अगरेजोके समान होना चाहेगे? हिन्दुस्तानी लोग समझते हैं कि अगरेज रोग जो जो करते हैं उसका अनुकरण करनेसे हम भी उन्हीके ऐले सन्य, निक्षित, सन्पन्न और सुखी हो जायेंगे । चाहे कोई भी जाति हो, हिन्दुस्तानियोंकी ती अवस्थामे आकर वह भी यही करती । यह अनुकरण-प्रवृत्ति केवल हिन्दुस्तानियोंके स्वभावका दोष नहीं है । कमसे कन व जातियोंके हिन्दू भायोंके वंशनें उत्पन्न हैं। उनके शरीरमें इस समय भी आपका र ल्हरें मार रहा है। वे कभी वानरोकी तरह केवल अनु- करण-प्रिय नहीं हो सकते । उन्के अनुक्रणका कुछ उद्देश्य है । उनका अनुकरण वाभाविक और अन्तने मानायक हो सकता है। जो लोग हने गरेकी पोशाक, रहन-सहन और खानेपीनेका अनुकरण करते देख र जल है, वे अंगरेजोको मालले खानपान और पहनावेका अनु- करण करते देखकर क्या क्हो ? अनुकरण करनेमें क्या अंगरेज लोग ।

बंकिम-निवन्धावली- हिन्दुस्तानियोंसे कम हैं ? भला, हम जो अनुकरण करते हैं वह तो अपनी जातिके प्रभुओका करते हैं ; मगर अंगरेज किसका अनुकरण करते हैं ? हम यह अवश्य स्वीकार करते है कि आधुनिक हिन्दुस्तानी जितना अनुकरण कर रहे हैं उतनेकी आवश्यकता नहीं । हिन्दुस्तानियोमे प्रतिभाहीन अनुकरण करनेवाले ही अधिक हैं और वे प्रायः गुणोंका अनुकरण न कर दोपोके ही अनुकरणमें तत्पर देख पड़ते हैं । यही बड़े दुःखकी बात है । हिन्दुस्तानी लोग गुणोका अनुकरण करनेमें उतने निपुण नहीं है, मगर दोपोंका अनु- करण करने में वे पृथ्वीमण्डलमे अपना सानी नहीं रखते । इसी लिए लोग हिन्दुस्तानियोंकी अनुकरणपरप्रवृत्तिको गालियाँ देते हैं, और इसी कारण राजनारायणजीने इस सम्बन्धर्म जो कुछ कहा है, हम उसमसे बहुतसी बातोंको स्वीकार करते है। अनुकरण करनेवाला प्रतिभाशाली होनेपर भी, अनुकरणमें दो भारी टोप दिखाई देते है। एक तो उससे विचित्रताके विकासमे बिन होता है। इस संसारमें विचिन्त्रताका सुख भी एक प्रधान सुख है । पृथ्वी भरके सब पढार्थ अगर एक ही रंगके होते तो जगतका दृश्य क्या इतना सुखदायक कभी हो सकता था ? यदि सब शब्द एक ही तरहके होते—मान लो, सब शब्द कोयलका स्वर ही होते-तो बतलाओ मधुर कुहु-स्वर मानोको कभी अच्छा लगता ? हममे यदि वैचित्र्यसुखका अनुराग न होता तो चाहे वह अच्छा भी लगता, लेकिन इस समय जिस प्रकृतिको लेकर मनुष्य-जाति पैदा हुई है उसमे विचित्रताके विना सुख नही-स्वाद नहीं । अनुकरणकी प्रवृत्ति उस वैचित्र्यके मार्गमे कण्टक है। हम मानते है कि शेक्सपियरका मैक- वेथ नाटक एक उत्तम नाटक है। किन्तु यदि पृथ्वीके सब नाटक मैकबेथके अनुकरण ही पर लिखे गये होते, तो फिर नाटक देसनेमे क्या सुख या रवाद रह जाता ? सभी महाकाव्य अगर रघुवंशके आदर्श पर लिखे जाते तो फिर कीन महाकाव्य पड़ता? दूसरा दोप अनुकरणमे यह है कि उससे शीत्र किसी काममें उन्नति नहीं होती । संसारका नियम है कि चाहे जिस कामको आप ले लीजिए, उसम वारम्बार यत्न करते रहनेसे ही उन्नतिकी संभावना होती है। किन्तु यदि ? १२४ अनुकरण। पर-वर्ती कार्य पूर्व-वर्ती कार्यका अनुकरण मात्र हुआ, तो चेष्टा किली नई राह पर नहीं जाती। यही कारण है कि उस कार्यमे उन्नति नहीं होने पाती। तब फल यह होता है कि बहुत दिनों तक एक ही ढंग चला जाता है । इस बातको क्या शिल्प, साहित्य, विज्ञान और क्या सामाजिक कार्य या मानसिक अभ्याल,-सवमे आप आजमाकर देख सकते हैं। विचार करनेले जान पड़ेगा कि मनुष्यकी दैहिक और मानसिक वृत्तियोकी एक साथ ही यथोचित स्फूर्ति और उन्नति ही मनुष्य-देह धारण करनेका प्रधान उद्देश्य है । मगर जिससे उनमेंसे कुछ वृत्तियो अधिक पुष्ट हो, और कुछके प्रति अवज्ञा उत्पन्न हो. वह कार्य मनुप्यके लिए अवश्य ही अनि- कारी है। मनुष्य अनेक हैं और एक मनुप्यके सुख भी अनेक है । उन सब सुखोकी सिद्धिके लिए बहुत तरहके भिन्न भिन्न कायाके करनेकी आवश्यकता है। वे भिन्न भिन्न प्रकारके कार्य भिन्न भिन्न प्रकृतिके लोगोके बिना सुसम्पन्न नहीं हो सकते । एक श्रेणीके चरित्रवाला आदमी अनेक श्रेणीके अनेक कार्य नहीं कर सकता। अतएव संसारमे चरित्र वैचित्र्य, कार्य-वैचित्र्य, और प्रवृत्ति- वैचित्र्यकी बड़ी जरूरत है । इसके सिवा समाजकी सर्वाङ्ग उन्नति नहीं हो सस्ती । इस वैचिच्चकी उन्नति ही समाजकी भलाई है । अनुकरण प्रवृ- त्तिका फल यही होता है कि अनुकरण करनेवालेके चरित्र, प्रवृत्ति और कार्य अनुकृतके ऐसे हो जाते हैं-अनुकरण करनेवाला दूसरे मार्ग पर नहीं जा सक्ता (लेक्नि यह नियम विरोप कर प्रतिभाहीन लोगोके लिए ही लागू है), और जद समाजले सभी लोग या अधिकांश लोग, अथवा काम करनेवाले लोग, एक ही आदर्शका अनुकरण करने लगते हैं तब यह वैचिन्यकी रानि हो जाती है। मनुष्य-चरित्रका सम्पूर्ण विकास नहीं होता, सन प्रकारली मानसिक वृत्तियोमे सामान्य नहीं रहता; सब तरहके काम सुसम्पन्न नहीं होते, मनुष्यले सद प्रकारके सुख नसीब नहीं होते । मनु- प्यत्व अलम्पूर्ण रह जाता है, समाज असम्पूर्ण रह जाता है, मनुष्य-जीवन अन्नपूर्ण रह जाता है। हमारे इस सर क्धनका सारांश यही है कि- 5) सामाजिक सन्यताकी उत्पति दो तरहसे है-कोई समाज आपसे सन्य होता है, और पोई समाज दूसरे समाजले शिक्षा प्राप्त करता है। - किस-निवन्धावली । ( पहले प्रकारसे बहुत दिन लगते है, और दूसरे प्रकारसे, बहुत शीघ्र कार्य सिद्ध हो जाता है। (२) जब कोई अपेक्षाकृत असभ्य जाति अत्यन्त सस्य जातिसे हिलने मिलनेका अवसर पाती है तब वह सभ्यताकी गह पर बड़ी तेजीले दौड़नेकी . कोशिश करती है, और प्रतिभा होनेले अपनी चेटामे सफलता भी प्राप्त करती है। ऐसी जगह पर सामाजिक गति ऐसी होती है कि अपेक्षाकृत असभ्य अशिक्षित समाज अपनेसे अधिक सभ्य शिक्षित समाजमा अनुकरण सब बातोस करने लगता है। यही स्वाभाविक नियम है। ( ३ ) अतएव हिन्दुस्तानियोंके आबुनिक समाजमे दिन्वाई देनेवाली वह अनुकरण-प्रवृत्ति न अस्वाभाविक है और न हिन्दुस्तानियोके स्वाभाविक दोपसे उत्पन्न हुई है। ४) अनुकरण-मानले अनिष्ट नहीं होता। अगर अनुकरणमे कुछ दोप है तो उसम गुण भी है । प्रतिभाहीन-विचित्रताहीन-का अन्ध अनुकरण दो कौड़ीका होता है। प्रतिभाशाली मनुष्य ( या जाति ) पहले अनुकरण करता है, और पीछे अभ्यास हो जाने पर स्वतन्त्र रूपसे उसीमे उन्नति करता है । हमारे हिन्दुस्तानियोंकी जैसी अवस्था है, उसे देख कर यह बात निश्चित रूपसे नहीं कही जा सकती कि इनकी अनुकरण-प्रवृत्ति अच्छी नहीं । इस अनुकरणप्रवृत्तिम आशाकी झलक भी पाई जाती है। (५) परन्तु अन्ध-अनुकरणमें एक बड़ा भारी टोप भी है । वह यह कि अनुकरणयोग्य प्रथम अवस्था निकल जाने पर भी अगर अनुकरणकी प्रवृत्ति प्रवल बनी रही; अथवा अनुकरणके योग्य समयमे ही बराबर अनु- करणकी प्रवृत्ति जोर पकड़ती गई, अर्थात् अनुकरणका अभ्यास बढ़ता गया तो बहुत ही शीघ्र सर्वनाश उपस्थित होता है। (६) अनुकरण करनेवाले हिन्दुस्तानी अगर इन बातोपर ध्यान देकर- संभल कर काम करें, तो वे शीघ्र ही अपने गुरओके उत्तम शिष्य बनकर सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। । १२६ प्राचीना और नवीना। प्राचीना और नवीना। हमारे समाज-संचारक रोग नई कीर्ति न्यापित करने के लिए जैसे व्यय है. वैले समाजज्ञी गति देखनेने मन नहीं लगात। " यह होनेसे अच्छा होता है. इसलिए यह करो यही उनकी उक्ति है। किन्तु यह कोई नहीं देखता कि क्या करनेसे क्या हो रहा है । हिन्दुस्तानी लोग अंगरेजी पढ़ें, इसने सभी उत्साह देखा जाता है। किन्तु इसका फल क्या हो रहा है, इसकी समालोचना अभी कुछ ही दिनोसे होने लगी है। एक श्रेणीके लोग कहते है कि अंगरेजी शिक्षाके फल नाननीय गोखले, नालवीयजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, नेहना गादि हैं। दूसरी श्रेणीके लोग कहते हैं कि दल पांच फल सुपच सुमधुर स्वश्य है, किन्तु अधिकांग फल तीते और विपमय है। इसके उदाहरणने देनघपाची, और विलासी शिक्षित बाबुओंके दलको पेश करते हैं। उसके बाद छ दिनले धून नची हुई है कि वियोको अवस्थाका संस्कार करो, स्त्री- निक्षाका प्रचार क्रो, विधवाओंका फिर व्याह कर दो, स्त्रियोशे बरके पिज- इले निकालकर उड़ा दो, बहुविवाहकी प्रथा उठा दो, और अन्यान्य प्रका- रले नरून्धिा, बतलिया, गुलवियाको विलायती मेन बना डाले। इसमे कोई सन्देह नहीं स्विदि त्म ऐसा कर सकें तो बहुत अच्छा हो, किन्तु यविनखनिया भी दिलायती मेन हो सकती है तो ऐसी आना की जा सकती है किहमारे यहाँश माखूका पेड़ भी एकदिन 'जाक का पेड़ बन जायगा ।जिन रीति- यो मकान इन कनय अनंभव या वे प्रचलित नहीं हुई। सोनिक्षा संन्द थी, इस कारण उनका चलन हो गया है और तेता जा रत है। दल सनद नेक्षाहत अधिक मिक्षित बंगाली आदि जातियोगी नियां पुत्वाने जो निक्षा पारही है वह तो तिमामान्य है । परिवर्तनशील मनाजमें न्ह कारण ाद लिक्षित और अंगरेजोका अदुवाल र नेवाले पिता, भाई, पति आदि बने रहने उन्को जो मिक्षा प्राप्त हो रही है वही नरवर है। इस दो प्रकारकी शिक्षादा पर क्या देख पड़ रहा है ? अंग- रेली पदे लिये न्यानो चरित्रने मा परिवर्तन देवा जा रहा है, वैसे ही परिवर्तन र रानियोरे चरित्रने भी देज पड़ते हैं या नहीं ? यादे देव १२७ चंकिस-निबन्धावली- ही गुरुतर है पड़ते है तो वे अच्छे है या नहीं ? उनके लिए उत्साह देना जावश्यक है या उनका दमन उचित है ? प्रायः साधारण लेखकाको इन प्रश्नोकी आलोचना करते नहीं देखा जाता । किन्तु इस विषयसे बढ़कर भारी सामाजिक तत्व भी और कोई नहीं है। इसीसे कहते है कि हमारे समाज-संस्कारक लोग नई कीर्ति स्थापित करनेके लिए जैसे व्यग्र है, वैसे समाजकी गति देखनेमे और उसकी आलोचना करनेमें मन नहीं लगाते । विपय बहुत । समाजमे स्त्रीजातिका जो बल है, उसका चर्णन करनेकी कुछ आवश्यकता नहीं जान पड़ती। माता बाल्यकालमे गिक्षा देती है, स्त्री मन्त्रीका काम देती है, इत्यादि पुरानी बातोको फिरसे दुहरा- नेका कुछ प्रयोजन नहीं है । सभी जानते है कि स्त्रियोंकी सम्मति और सहा- यताके बिना संसारका कोई बड़ा काम सम्पन्न नहीं होता । गहना गढ़ाने और बैल खरीदनेसे लेकर फ्रेंच राजविप्लव और लूथरके धर्मविप्लव तक सब काम स्त्रीकी सहायताकी अपेक्षा रखते हैं। फ्रान्सकी स्त्रियोने फ्रेचराज्यवि- प्लवमें महारथीका काम किया था । यह कहा जा सकता है कि हमारे शुभाशुभका मूल हमारे कर्म होते है । कर्मोकी मूलप्रवृत्ति और अनेक स्थानोमे हमारी सब प्रवृत्तियोका मूल हमारी स्त्रियाँ ही हैं । अतएव स्त्रीजाति हमारे शुभाशुभका मूल है। स्त्रीजातिके महत्त्वका कीर्तन करते समय ये सब बाते कहनेकी प्राचीन प्रथा है, इसीसे हमने भी यहॉपर ये बात कही है। किन्तु इन बातोका जो लोग व्यवहार करते है उनका आन्तरिक भाव यही है कि पुरुप ही मनुष्यजाति है। जो पुरुषोके लिए शुभाशुभका विधान कर सकता है वही गुरुतर विषय है। स्त्रिया पुरुपोंके शुभाशुभका विधान कर सकती हैं, इससे उनकी उन्नति और अवनतिका विपय गुरतर विषय है । किन्तु हमारे कहनेका यह तात्पर्य नहीं है । हमारा कथन यह है कि स्त्रियाँ संख्यामे पुरुपाके बराबर या उनसे अधिक हैं । इसलिए वे समाजका आधा अंश है । वे मौके शुभाशुभका विधान करनेवाली हो या न हो, उनकी उन्नतिसे समाजकी उन्नति है। जैसे पुरपोकी उन्नतिसे समाजकी उन्नति है वैसे ही स्त्रियोकी उन्नतिसे भी समाजकी उन्नति है। क्योकि स्त्रियाँ समाजका आधा अंश है । स्त्री-पुरुपोके १२८ प्राचीना और नवीना। समान-भागके लफूहको समाज कहते हैं । दोनोंकी समान उन्नतिसे समाजकी उन्नति है। यह कहना नीतिके विरुद्ध है कि एक भागकी उन्नति समाज- संस्कारका मुख्य उद्देश्य है, और उस भागकी उमतिमें सहायक होनेहीके कारण अन्य भागकी उन्नति गौण उद्देश्य है। किन्तु समाजके निवासक लोग सर्वदा सभी देशोंमें इस भ्रममें पड़े हुए देख पड़ते हैं। वे लोग यह विधान किया करते हैं कि स्त्रियाँ इस इस तरहका आचरण करे । क्यों करे ? इसका उत्तर यह दिया जाता है कि बैला करनेले पुरुए-जातिकी अमुक भलाई होगी या अमुक बुराई निवृत्त होगी । समाज-संचालकोकी सर्वत्र यही उक्ति सुन पड़ती है। समाज- संचालकोंका यही उद्देश्य सर्वत्र विद्यमान है । अन्तर इतना ही है कि कहीं उद्देश्य स्पष्ट है और कहीं अस्पष्ट । इसी कारण स्त्रीके सतीत्वके लिए इतना दबाव डाला गया है। किन्तु पुरुपमे उसी धर्म-एकपत्नीव्रत-का अभाव होनेसे वह उतना बढ़ा दोप नहीं गिना जाता । वास्तवमे अगर नीतिशास्त्रके मूल पर ध्यान दिया जाय तो ऐसा कोई विषय ही नहीं पाया जाता, जिसके द्वारा स्त्री-कृत व्यभिचार पुरुषकृत परस्त्रीगमनकी अपेक्षा गुरु. तर दोष समझा जा सके। पाप दोनों ही समान हैं। एक पुरुपकी पत्नी स्त्री पर उस पुल्पका जैसा स्वाभाविक अधिकार है, ठीक वैसा ही स्वाभाविक अधिकार एक खोके स्वामी मर्दपर उस औरतका है । तथापि पुरुप अगर इस नियमका लंबन करता है, तो वह उसकी शौकीनी समझी जाती है और स्त्री अगर वही दोप करती है तो उसके लिए संसारके सब सुख नष्ट हो जाते है-वह अधमसे भी अधम और कोटीसे भी बढ़कर अस्पृश्य समझी जाती है। क्यो ? पुरुपके सुखके लिए खीका सतीत्व आवश्यक है। वैसे ही श्री- जातिके सुरुके लिए भी पुरपके भी पुरपके इन्द्रिय-चमकी आवश्यकता है। किन्तु पुरप ही समाज हैं, स्त्रिया कुछ नहीं है। अतएव स्त्रीका पतिव्रतमे च्युत होना समाजमें गुरतर पाप समन्ना गया और पुत्पोके लिए नैतिक बन्धन शिथिल सभी समाजोंमें बीजाति पुरोकी अपेक्षा पम उन्नत है। पुरवारा पने प्रति पक्षपात ही इनका कारण है । पुरप दरवाली हैं। इस कारण मनाजका सब दास पुरपोरे सपने दसी कारण नियोंको पुरपाके - वं. नि. ९ बंकिम-निवन्धावली- वाहुबलके अधीन होकर रहना पड़ता है। आत्मपक्षपाती पुरुषगण जहाँतक आत्मसुखका प्रयोजन है, वहॉतक स्त्रियोंकी उन्नति पर ध्यान देते है- उससे अधिक रत्ती भर भी नहीं । यह बात अन्यान्य समाजोंकी अपेक्षा हमारे देशमे अधिक सत्य है । हम प्राचीन समयकी बात नहीं कहना चाहते। उस समय तो स्त्रियोंको सदा पुरुपके अधीन रहनेकी विधि थी। केवल अवस्थाविशेषके विना स्त्रियोको धनका अधिकार न था । स्त्री- के धनाधिकारिणी होनेपर भी वह उस धन-सम्पत्तिको न दान कर सकती थी और न बेच सकती थी। उनके सती होनेकी चाल थी, बहुत दिनासे विधवा-विवाहका निषेध प्रचलित था, विधवाओके लिए कठिन नियम प्रचलित थे । उस समय स्त्री-पुरुषामे जो घोर वैपम्य था उसके इतने ही प्रमाण यथेष्ट है । उसके उपरान्त, मध्यकालमे भी स्त्रियो- की अधिक अवनति देखी जाती है। मर्द प्रभु था, स्त्री दासी थी। वह जला भरती थी, भोजन बनाती थी, वर्तन माँजती थी, घर बहारती थी, कूटना कूटती थी, पीसना पीसती थी। तनख्वाह पानेवाली दासीके लिए तो थोड़ी बहुत स्वाधीनता भी होती है, किन्तु औरत, लड़की और बहनको वह भी नहीं थी। आज कल पुरुपोकी शिक्षाके कारण हो, स्त्रियोकी शिक्षाके कारण हो, या अंगरेजोके दृष्टान्तसे हो, अवस्थामे परिवर्तन हो रहा किन्तु जिस तरहका परिवर्तन हो रहा है उसका सभी अंश क्या उन्नति- सूचक है ? देशके युवकोकी जो हालत बदल रही है, उसका तो विशेष आन्दोलन सुन पड़ता है। । किन्तु देशकी युवतियोकी अवस्थाका जो परि- वर्तन हो रहा है, वह क्या उन्नति है ? इस प्रश्नका उत्तर देनेके पहले यह स्मरण रखनेकी आवश्यकता कि देशकी स्त्रियाँ पहले किस रूपमें थी और अब उनका क्या रूप हो रहा प्राचीना स्त्रियोंके साथ नवीना स्त्रियोकी तुलना आवश्यक जान पड़ती है। पहलेकी स्त्रिया लाखकी चूड़ियोके जोड़े हाथोंमे पहनती थी, शरीरपर लहंगा और दुपट्टा रहता था, कामके समय धोती पहने, हाथमे झाडू लिये घर उहारती या रसोई के कामम लगी देख पड़ती थी। उनकी मांगमे सेदुरकी मोटी रेखा, नाकमे नथ, दाँतोंमें मिस्सी और पीछे पर्वतकी चोटीके समान ऊंची चोटी देख पढ़ती थी। हम स्वीकार करते है कि उस जमानेकी अधि- है १३० प्राचीना और नवीना। जार कांश सिया जब कमर कसे, झाइ हाथमे लिये, ऊंची चोटी खड़ी किये, नध हिलाती सामने खड़ी हो जाती थी तब अनेक पुरुषोका हृदय धड़क उठता था । जो पुरुष इस प्रकार आंगनमे खड़ी हुई रसीली स्त्रीके साथ वादानुवाद करनेका साहस करते थे वे जरा सावधान होकर दूर खड़े होते थे। उस जमानेकी अधिकांश स्त्रियो लड़ने-झगड़नेमे खूब पढ़ी होती थी। बात बात पर बिगड़कर झाडू मार देनेकी धमकी देना भी उनका एक साधारण स्वभाव था। यह भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी भापा साधुभापा थी। क्योकि वे आधुनिक 'प्राणनाथ' 'प्रियतम' शब्दोकी जगह 'दाढ़ी. 'डोकरा' आदि निपात-साध्य शब्दोका और 'सखी' वहन आदि शब्दोकी जगह 'हरामजादी' 'कलमुही' आदि शब्दोका प्रयोग करती थी। इस समय जिन सुन्दरियोने अपने महावरसे रंगे हुए चरणों द्वारा देश- भूमिको उज्ज्वल कर रक्खा है उनकी प्रकृति भिन्न प्रकारकी है। पुराने जमा- नेकी सजधज-नोटी सेंदुरकी रेखा, मिस्सी, काजल, लहंगा, दुपट्टा आदि- कुछ भी नहीं है । पूर्वोक्त सम्बोधन भी अब उनके मुखसे नहीं सुन पड़ते। इल समय लहंगे-दुपट्टेके पुराने पहनावेकी जगह महीन और बड़िया पचापाढ़ की धोती रूप' के जहाजकी 'पाल बनकर सोहाग और आदरको हवामे फरफराया करती है । चमचा, करछुई, झाडू, सुई-डोरेकी जगह अब उनके हाथमे कार्पेट और किताब देख पड़ती है । धोती एडीके नीचे तक रहती है। चोटी खुली हुई पीठपर पड़ी रहती है। शरीरमे दो एक सोफियाने गहनोके सिवा और अलंकार नहीं देख पड़ते । धूल और कीचड़ने कान करनेवाली कुलकामिनियों माबुन, एसेंस आदिकी महिमा मनन गई हैं। उनकी क्लकण्ठध्वनि पपीहकी सी आकाशको गुजा देने- वाली न होकर बहुत ही धीमी हो गई है । कहनेका मतलब यह कि प्राचीना रियोकी अपेक्षा नवीना लियोकी रवि कुछ अच्छी है । त्रियोंकी रचिका संस्कार हुआ है। दिन्नु रम यह नहीं कह सकते कि अन्यान्य विषयोंमें भी वैसी ही रति हुई है। वई दातोमे हन वीना तिचाको निन्दाके योग्य समझते है। उनकी दिनी तरहदी निन्दा करना हमारे रिए दड़ी देअदबीकी वात किस-निवन्धावली- है है; तथापि चन्द्रमाके साथ उनकी उपमा सम्पूर्ण करनेके लिए उनके कुछ कलंक यहॉपर दिखलाये जाते हैं। १-उनका पहला दोप आलस्य है। प्राचीना स्त्रियाँ बहुत ही परिश्रम करनेवाली और गिरिस्तीके कामोंमें निपुण थीं। नई स्त्रियाँ बिल्कुल बाबू बनी हुई हैं । जलके उपर कमलकी तरह स्थिर भावसे बैठकर स्वच्छ दर्प- णमें आप ही अपना रूप देखकर वे दिन बिता देती है। घरके कामकाजकी देखरेख प्रायः दासियोंको करनी पड़ती है। इससे बहुत कुछ अनिष्ट हो रहा । एक तो शारीरिक परिश्रम न करनेके कारण स्त्रियोके शरीर- निर्बल और रोगोके घर, बनते जा रहे है । पहले जमानेकी नियोके शरीर स्वास्थ्य ठीक रहनेके कारण अपूर्व लावण्यसे युक्त थे । इस समय वह स्वास्थ्यका सलोनापन केवल निम्न श्रेणीकी स्त्रियांमें पाया जाता है। नवीना स्त्रियोके नित्यके रोगभोगसे उनके स्वामी, पिता, पुत्र आदि सदा दुःखा और चिन्तित रहते हैं। गृहस्थी भी इसी कारण विश्रृंखलायुक्त और दुःखसे परिपूर्ण हो उठती है । गृहिणी यदि रोग-शय्यापर पड़ी रहती है तो घरकी भी रौनक जाती रहती है। धनका ध्वंस होता है और बाल- बच्चोंका भी अच्छी तरह पालन-पोपण नहीं किया जा सकता। इससे उनके भी स्वास्थ्यकी हानि होती है और उनको अच्छी शिक्षा नहीं मिलती। घरमै सर्वत्र दुर्नीतिका प्रचार होता है। जो लोग प्यार करते है, वे भी नित्य रोगीकी सेवाके दुःखको सह नहीं सकते। इससे स्त्री-पुरुषके प्रेम भी कमी होती है। यदि माता असमयमे ही मर गई तो उससे बच्चोंका ऐसा अनिष्ट होता है कि वे जन्मभर उसका फल भोगते है । यह सच है कि अंगरेज जातिकी स्त्रियाँ भी आलस्यके अधीन देख पड़ती है; किन्तु वे घोड़ेकी सवारी, वायुसेवन इत्यादि स्वास्थ्यरक्षक व्यायामाको नित्य निय- मित रूपसे करती रहती है । हमारे घरके पिजड़ेकी चिड़ियाँ उन व्याया- मोको नहीं कर सकती। स्त्रियोंके आलस्यका और एक भारी कुफल यह है कि उनकी सन्तान दुर्वला और कम जीनेवाली होती है। माताके ध्यान न देनेसे ही अक्सर बच्चे नित्यरोगी देखे जाते हैं, और उनकी अकालमृत्यु तक हो जाती है। वहुत लोग कहते है कि पहले इतने रोग न थे, इस समय नित्य रोगोंका १३२ प्राचीना और नेवीना! सामना रहता है। पहले लोग दीर्घजीवी होते थे, इस समय थोड़ी ही अवस्थामें मर जाते है । बहुत लोगोका विश्वास है कि यह सब कालकी महिमा है-कलियुगके कारण ये सब अस्वाभाविक वाते हो रही हैं। बुद्धिमान् लोग जानते हैं कि स्वाभाविक नियम कभी समयके फेरसे बदल नहीं सकते। यदि इस समयके लोग बहुरोगी और अल्पायु होते हैं तो अवश्य ही उसका कोई स्वाभाविक कारण है। उन सब स्वाभाविक कारणोसे प्रधान कारण माताका परिश्रम न करना ही है। जिस देशके लोगोकी उन्नतिका भरोसा शारीरिक बलके ऊपर निर्भर है उस देशमें माताओमें आलस्यकी ऐसी वृद्धि निस्सन्देह बहुत ही शोचनीय बात है। आलस्यका तीसरा कुफल यह है कि नवीना स्त्रियाँ घरके कामाको नहीं जानती-उनमे उन्हें कुछ भी निपुणता नहीं है । वे कभी उन कामोको नहीं करती, इसीसे सीखती भी नहीं हैं । इससे अनेक अनिष्ट होते हैं। प्राचीना स्त्रिी, बहुत ही अमीर घरकी न होने पर, पानी भरती थी, बर्तन मांजती थी, आगनमें झाडू देती थी। रसोई बनाना उनका एक प्रधान कार्य था । यह कुछ उचितसे अधिक भी है। हम नवीना स्त्रियोंसे इतना सद करनेके लिए नहीं कहते । जिसकी जैसी अवस्था है वह उसीके अनुसार कान करे । इतना ही यथेष्ट है। किन्तु केवल काट बुनकर या किताव पढ़कर समय बिताना हमारी समझमे ठीक नहीं । परस्परका सुख बढ़ने के लिए सदका जन्म हुआ है । जिस सीने पृथ्वी पर भाकर पौंग- पर लेटे लेटे, सामने आईना रख कर, बाल संवारनेमें, काट बुनने में, पुस्तक पटनेनें और सन्तान उत्पन्न करनेमे ही समय बिता दिया, अपने सिवा और विरीके सुखको नहीं बढ़ाया, वह सी पाजातिकी अपेक्षा छ अच्छी चाहे मानी जा सक्ती हो, किन्तु उसका स्वी-जन्म निरर्थर है । ऐली स्त्रियों हम पाली रगाकर मर जानकी सलाह देते है । क्यों कि वैसा परनेले भनेव निरर्थक भारोपी यन्त्रणासे पृथ्वी दर जायगी। गृहिणी अगर गृहम नहीं जानती तो चिरलोगिणी गृहिणीने घरी तर उतरे घरपी सर दाताकी भूखता नष्ट हो जाती है । धनने उपकार नही होता. अन्न पच जाता है. धरमे बरीद कर लाई गई सामग्री हट जाती है-आधेये लगभग चाकर और आनेजाने वाले । १३३ बंकिम-निवन्धावली- । लोग टहला देते हैं। बहुत धन खर्च होने पर भी खानेपीनेकी सामग्री कम पड़ जाती है। अच्छी सामग्रीकी लागत लगाकर भी बुरी सामग्री काममें लानी पड़ती है । घरके स्वामीको अच्छी चीज खाने-पीने बरतनेको नहीं मिलती । घरकी औरतोंमे अनबन पैदा हो जाती है। अतिथि-अभ्यागतका उपयुक्त सत्कार नहीं होता। घर कण्टकमय जान पड़ने लगता है। २-~-नवीना स्त्रियोका दूसरा दोष धर्मसे सम्बन्ध रखता है। हम इस समयकी देशकी स्त्रियोको अधार्मिक नहीं कहते । देशके नवयुवकोंकी अपेक्षा वे धर्मभक्त और विशुद्ध हृदयकी हैं । किन्तु प्राचीना स्त्रियोंकी अपेक्षा धर्मका भाव उनमें अवश्य कम है। विशेष कर जो धर्म गृहस्थके धर्म कह- लाते है, उनकी आज कलकी युवतियोमे कमी देखकर कष्ट होता है । स्त्रियोंका पहला धर्म पातिव्रत्य है । पातिव्रत्य धर्ममे अबतक इस देशकी स्त्रियाँ अद्वितीय है। किन्तु पहले जो था वह क्या अब भी है ? इस प्रश्नका उत्तर जल्दी नहीं दिया जा सकता। पुराने जमानेकी स्त्रियोका पातिव्रत्य प्रेमकी दृढ़ गांठसे हृदयमें बंधा हुआ था-पातिव्रत्य जैसे उनकी अस्थि, मजा और रक्तमे बसा हुआ था, वैसे ही वही बात, क्या नये जमानेकी स्त्रियोंमें भी है ? अनेक स्त्रियोंमे वही बात है, किन्तु क्या अधिकांश खियोमे वही वात पाई जाती है ? नये जमानेकी स्त्रियाँ पतिव्रता अवश्य है, किन्तु उन्हें जितना लोक-निन्दाका भय है, उतना धर्मका भय नहीं है। इसके सिवा दान आदिम पुराने जमानेकी स्त्रियोंकी जैसी रुचि थी वैसी रुचि नये जमानेकी स्त्रियोमे नहीं पाई जाती। तबकी स्त्रियोको दृढ़ विश्वास था कि दान परमार्थका कार्य है। जो दान करता है वह स्वर्गको जाता है। अबकी स्त्रियोको स्वर्गपर उतना दृढ़ विश्वास नहीं है-उनको परलोकम स्वर्ग पानेकी कामना उतनी प्रवल नहीं है। अंगरेजी सभ्यताके फलसे देशर्म अनेक प्रकारकी सामग्रीकी अधिकता होनेसे सबको धनकी अधिक आवश्यकता होगई है। स्त्रियाको भी धनकी अधिक आवश्यकता हो गई है। इसीसे इस समय दानमे त्रियोंका उतना अनुराग नहीं देख पड़ता। उतना दान करने से उनका खर्च पूरा नहीं होता। रपयेरो जो सुस खरीदे जाते है उनकी मेरया और विचित्रता बढ़ गई है। दानमें अधिकता होनेसे इस जिस तरह प्राचीना और नवीना। समय अनेक सुखोसे वञ्जित होना पड़ेगा । इस लिए स्त्रिया (और पुरुष भी) इस समय उत्तना दान नहीं करती। हिन्दुओका एक प्रधान धर्म अतिधि-सत्कार है। जो घरमे आवे उसे आहार आदिक द्वारा प्रसन्न करनेमे इस देशके लोगोकी बराबरी करनेवाली कोई जाति न थी। तबकी स्त्रियोमे यह गुण विशेष रूपले वर्तमान था । अबकी स्त्रियोले यह धर्म एक्दम उठाया है। घरमे अतिथि अभ्यागतके आने पर तबकी तिया अपनेको कृतार्थ समझती थी, किन्तु अबकी स्त्रियाँ खीझ उठती हैं। किसीको खिलाने तबकी स्त्रियोको सबसे बढ़कर सुख मिलता था, किन्तु अबकी सियां इस कासको घोर विपत्ति समझती हैं। धर्म-भावमे अक्की स्त्रियाँ जो तवकी स्त्रियोसे निकृष्ट है, इसका एक विशेष कारण असन्पूर्ण शिक्षा है । लिखने-पढ़ने या अन्य प्रकारसे जो कुछ शिक्षा उन्हें प्राप्त होती है उलीले वे यह समझ बैठती हैं कि प्राचीन धर्मका शासन अनूल्क है। इसीले उसके प्रति विश्वास खोकर धर्मके बन्धनसे खिलक पड़ती है। उस बन्धनकी जगह और किसी नवीन बन्धनकी गोठ नही लगती। हम लिखने पड़नेकी निन्दा नहीं करते । हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि धर्मके सिवा विद्यासे बढ़कर कीमती चीज संसारमें और कोई नहीं है। किन्तु सर्वत्र विद्याका फल यही देखा जाता है कि उससे आँखे खुलती हैं। विद्या पड़कर आदमी मिध्याको मिथ्या और सत्यको सत्य समझता है । विद्याके फलसे मनुष्य प्राचीन धर्मशास्त्रोके कहे हुए धर्मके मूल्ने अरीक्ता देख पाता है, परन्तु प्राकृतिक सत्य धर्मको सत्य समझ सकता है। अतएव विद्याले धर्मक्षी हानि नहीं, बल्कि वृद्धि ही होती है । साधा- रणतः यही देखा जाना है कि पण्डित जैसे धर्मिष्ट होते हैं, मूर्ख वैसे ही पापिष्ट होते हैं । किन्तु थोड़ी विद्यामे यह दोप है कि धर्मकी मिथ्या जड़ तो उनसे पट जाती है, परंतु सत्य-धर्मकी स्वाभाविक जड़ नहीं स्थापित होती । सत्य-धर्मकी जड़ स्थापित होनेके लिए क्छ अधिक ज्ञानकी आव- दयक्ता होती है परोपकार करना चाहिए, यह यथार्थ धर्मनीति है। मूर्ख भी इसे जानता है, और मूर्स-मण्डलीने जिनमे धर्मभाव है वे भी इसके अनुगामी होते है । इसका कारण यह है कि यह नैतिर आज्ञा प्रचलित धर्मशास्त्रों में लिपी १३..

बंकिम-निवन्धावली- । हुई है। मूर्खका उसपर यह विश्वास है कि वह देव या ईश्वरकी आज्ञा है। ईश्वरीय विधिको न माननेसे इस लोक और परलोकम भी हानि होगी, इसी भयसे मूर्ख उक्त नीतिका अनुगामी होता है । पण्डित भी उक्त नीति- के अनुगामी होते हैं । किन्तु वे केवल धर्मशास्त्रमे कही जानेके कारण उक्त नीतिके अनुगामी नहीं होते । वे जानते है कि धर्मके कुछ प्राकृतिक नियम हैं, वे अवश्य पालनीय है, और परोपकारकी विधि उन्ही सब नियमांका फल है। अतएव इस स्थानपर विद्यासे धर्मकी क्षति नहीं हुई। किन्तु यदि कोई केवल इतनी ही विद्याकी आलोचना करे कि उसके द्वारा प्राचीन धर्मशास्त्रासे विश्वास उठ जाय और प्राकृतिक धर्मके विश्वासको सीमातक उसकी विद्याचर्चा न पहुंचे, तो फिर उसके लिए धर्मकी कोई जड़ न रह जायगी । लोकनिन्दाका भय ही उनके लिए एकमान धर्मका बन्धन हो उठता है, पर यह बन्धन बहुत ही कमजोर होता है । आधु- निक अल्पशिक्षित युवकों और युवतियोकी कुछ कुछ ऐसी ही अवस्था । इसकारण धर्मके अंशमे वे तवकी स्त्रियोके बराबर नहीं है। जो लोग स्त्रीशिक्षाके लिए व्यग्र हैं उनसे हम पूछते हैं कि आप लोग बालक- बालिकाओके हृदयसे प्राचीन धर्मवन्धनको हटाते हैं, तो उसकी जगहपर क्या स्थापित करते हैं? है तीन ढंग। नम्बर १ । वंगदर्शनमें 'नवीना और प्राचीना' लेख किसने लिसा है ? चाहे जिसने लिग्वा हो, लेखकने समझ लिया है कि अबला स्त्रीजाति कुछ नहीं कहेगी, अतएव जो जीम आवे सो लिख डालो। वह लेसक नहीं जानता कि झाइ ही स्त्रियांका शस्त्र है। अच्छा, नवीन महागय, आपने नवीना और प्राचीना स्त्रियोंके गुणों और दोपोशी तुलना की है। तो क्या नवीन और प्राचीन पुल्पाकी तुलना नहीं हो सस्ती ? तुलना करनेमे दोपका पल्ला किधर झुकेगा? । १३६ तीन ढंग। । . प्राचीन पुरुषोकी अपेक्षा नवीनोमे आधिक गुण यही देख पड़ता है कि तुम लोगोने अंगरेजी पढ़ ली है। किन्तु अंगरेजी पढ़कर तुमने किसका क्या उपकार किया है ? मै तो देखती हूँ, अंगरेजी पढ़कर तुम केवल क्लर्की करना सीख गये हो । किन्तु मनुष्यत्व ? सुनो, प्राचीन और नवीन पुरुषोमे भेद क्या है। प्राचीन लोग परोपकारी धे; तुम लोग केवल अपना उपकार करना जानते हो । प्राचीन लोग सत्यवादी थे, तुम लोग केवल प्रियवादी हो। प्राचीन रोग पिता-माताकी भक्ति करते थे, तुम लोग भक्ति करते हो पत्नी या उपपत्नीकी । प्राचीन लोग देवता-ब्राह्मणकी पूजा करते थे, तुम्हारे देवता गोरी जाति और तुम्हारे ब्राह्मण सुनार दर्जी वगैरह है। प्राचीन लोग पौत्तलिक (मूर्तिपूजक) थे. तो तुमलोग बोतलिक हो । सिहवाहिनी 'शक्ति'की जगह तुम बोतल-बाहिनी मदिराकी उपासना करते हो। प्राण्डी, रम, बियर तुम्हारे ब्रह्मा, विष्णु, महेश है । तुम लोग भ्रातृस्नेह उसके प्रति दिखाते हो, जिलकी लड़कीसे अपना लड़का व्याहना चाहते हो । घोड़े और कुत्तेके प्रति पुत्र-वात्सल्य दिखाते हो । पितृभक्ति आफिलके मेनेजर साहबके प्रति और मातृभक्ति रसोई बनानेवाली महाराजिनके प्रति दिखाते हो । यह सच है कि हम अतिथि-अभ्यागतके आनेसे उसे महाविपत्ति समझती हैं, किन्तु तुम लोग तो उन्हें गरदनिया देते हो । हममे आलस्य है, किन्तु तुमलोग केवल सारली ही नहीं हो—तुमलोग बाबू हो ! अंगरेज बहादुर नाफमे नाथ डार- कर तुमको कोल्हूके बैलकी तरह घुमाते है, बल न होनेके कारण तुम घूमते हो। इधर हम भी तुमको नाकमे रस्सी डालकर घुमाती है और बुद्धि न होनेके कारण तुम मजेसे घूमते हो। हमने अच्छी तरह लिखना-पढ़ना नहीं सीखा, इससे हमारे धर्म बन्धन नहीं है, और तुम्हारे ? तुम्हारे धर्मका बन्धन बहुत दृढ़ है । क्योकि तुम्हारे उस बन्धनकी रस्सीको एक ओर मदिराका व्यापारी और दूसरी ओर वेश्या पकड़े खीच रही है । तुमलोग तो धर्मकी रस्सीसे शराबकी नल्न गलेमे बांधकर प्रेमके सागरम फोद रहे हो और वेचारी नवीना खियोपर खूनका इलजाम लगाया जाता है । तुन्हे धर्मका भय क्या है ? तुम क्या मानते हो ? चार-देवता ? ईसामसीह ? धर्म मानते हो ? पुण्य मानते हो । हट नही-वेदर हमारे इन महावरले रंगे कड़े-छड़े-रलय आदिले विभूपित श्रीचरणोको मान्ते हो । सो भी लातोके टरले । -श्रीचण्डिकासुन्दरी देवी । १३७ ?

बंकिम-निवन्धावली- नम्बर २ संपादक महागय, इन किंकरियोंने आपके श्रीचरणोमे क्या अपराध किया है ? हम क्या जाने ! आप सिखावं, हम सीखेगी-आप गुरु हैं, हम शिष्या । किन्तु शिक्षा देना और बात है, और निन्दा करना और बात है। बंग- दर्शनमे नवीनाओंके प्रति इतनी कटूक्ति क्यों की गई है ? हम स्वीकार करती हैं कि हममें हजारों टोप हैं। एक तो स्त्री, दूसरे हिन्दुस्तानीकी लड़की; एक तो कड़वा करेला, दूसरे नीम-चढ़ा -दोप क्यो न होगे ? किन्तु यह अवश्य है कि हमारे कुछ टोप आप लोगोहीके गुणसे उत्पन्न हुए है । आप लोगोके गुणसे, दोपसे नहीं । आप लोग हमारा इतना प्यार न करते तो हममे इतने दोप न होते। आप लोगोने हमको सुखी किया है, इसीसे हम आलसी हैं । अंगसे ऑचल खिसक जाता है तो उसे आप अपने हाथसे ठीक कर देते है। आप लोग पानी होकर जिस कमलि. नीको हृदयमे धारण करते है, वह क्यो न स्वच्छ जलमे अपने रूपकी छाया देखकर दिन वितावे? हम लोग अतिथि-अभ्यागतकी ओर ध्यान नहीं देती, तो इसका कारण यही है कि हम लोग स्वामी पुत्र आदिके प्रति अधिक ध्यान देती हैं। हमारे छोटेसे हृदयमे आप लोगोने इतना स्थान ले लिया है कि अन्य धोके लिए रथान ही नहीं है। और आप क्या समझते हैं कि हम धर्मको नहीं डरती ? छिः । धर्मसे डरनेके कारण ही मै आपको और कुछ नहीं कह सकी। आप लोग ही हमारा धर्म है । आप लोगोंसे डरनेके कारण ही हम अन्य धर्मका भय नहीं करती। सब धर्म-कर्माको हमने स्वामी और पुनको अर्पण कर दिया है। हम अन्य धर्म नहीं जानती। लिखना पढ़ना सिखाकर आप हमे किस धर्मम वांधना चाहते है ? चाहे जितना लिखाइए पढ़ाइए-हम हिन्दूकी लड़की है- सव बन्धनोंको तोड़कर पातिव्रत्यके बन्धनमे आप ही बंधी रहेगी। यदि इसमें अधर्म हो, तो वह आप ही लोगोका दोप है। और यदि मुझ ऐसी टीट दालिकाकी चञ्चलताको क्षमा कीजिए तो में यह पूछती है कि आप गुर है हन शिष्य है-आप हम कौनसा धर्म सिखायगे ? । १३८ तीन ढंग। १ लिखना-पढ़ना सीखे ? क्यो ? तुम्हारा सुखचन्द्र देखनेमे जितना सुख है उतना ही तुस त्या लिखने-पड़नेमे भी है ? तुम्हें सुखी बनानेमे जो धर्मशिक्षा होती है वह क्या लिखने पढ़नेमे प्राप्त हो लकती है ? देखो तुम लोगोको देखकर हमने आत्मत्याग सीखा है । भला लिखना पढ़ना त्या उसकी शिक्षा दे सकता है ? और लिखना पड़ना सीखे किल समय ? तुम्हारे ध्यान और दर्गनमे ही दिन बीत जाता है-लिखना पढ़ना सीखनेका अवकात कहाँ है ? छिः । दालियोकी भी निन्दा ! -श्रीलक्ष्मीमाणि देवी। नम्बर ३ भला, किल रलिकचूडामणिने नवीना और प्राचीना " लिखा है ? लेखक महागय ! तुमने जो कुछ कहा सब सच है-एक वात भी झूठ नहीं है। हम आलसी अवश्य है. किन्तु यदि हम आलसी न होकर काम क्रती फिरती तो तुम्हारी दशा त्या होती ? यह बिजली यदि तुम्हारे हन्याशने स्थिर न रहती, तो तुम किसकी ओर देखकर इस दुःख- दारिद्रवनय जीवनको व्यतीत करते ? यह बिजली स्थिर न रहती तो तुम इस अन्धकारपरिपूर्ण संसारमें कहाँ प्रकाश पाते ? हम काम करे ? करेगी। हानि क्या है। किन्तु देखो, हमको दम भर न देखकर तैलशून्य दीपककी तरह एकाएक बुझ न जाना-जलगन्य मछलीकी तरह तड़फने न लगना- रखवारेले टूटे हुए बछड़ेकी तरह बंबाकर घर न भर देना । हम काम करने जायगी, किन्तु तुम फिर इस लहराते हुए रूपको न देख पाओगे ! इन्स क्लकण्ठध्वनिको दम भर न सुननेसे गीतमुग्ध हरिणकी तरह संसार काननमें शब्दकी खोज करते फिरोगे !-वाहरे भाग्य ! फिर भी कहते हो कि हन काम नहीं करती ! हन अतिथि-अभ्यागतको सान्दो नहीं देती; दें क्या, तुम घरमे कुछ रखते ही नहीं हो । मालूम नहीं, अंगरेजोके दफ्तरमे क्या सिफत है, जानके समय तो उन्हेंया बनकर जाते हो-और लौटते हो तब कुंभर्ण वनकर आते हो ! अपना अपना पेट-क एक अधमने बोरेके समान! हम हिन्दूकी ल्दी हैं, इसीसे उले क्लिी तरह तील लेर हल कर भर देती है । इस पर भी अतिथि-अन्यागतकी दात चलाते हो! १३९ घाकमानवन्धावला- धर्मके बन्धनमे वाधोगे ? हानि क्या है। किन्तु हम जिन बन्धनोमें बंधी है उन बन्धनोंसे बढ़कर धर्मका वन्धन नहीं है। बल्कि धर्मका बन्धन उन वन्धनोसे कोमल है । खैर, हमारे उन वन्धनीको तुम ले लो। हम लिखना- पढ़ना सीख कर अपनेको धर्मके बन्धनसे जकड़नेके लिए राजी है। हमारी बड़ी इच्छा है कि एक बार तुम लोगोकी अवस्थाके साथ अपनी अवस्था बदल लें। गाली-गलौज करनेके पहले जरा अपने और हमारे सुख-दुखका हिसाब करके देख लो । हमारे मरने पर तुमको ब्रह्मचर्य से रहना होगा, तुम किसी तरहका आनन्द नही मना सकोगे । तुम्हारे स्वर्गारोहणके उपरान्त हम दुबारा व्याह करेगी । और जीवित अवस्थामै तुम लोग बच्चा जनोगे, रसोईकी देखरेख करोगे, घरमे कामकाज होने पर मूंछो पर घूघट काढ़ कर स्त्रियोके आचार करोगे । तुम्हारे सुखकी सीमा नहीं रहेगी। हम जवानीमे कितावे हाथमे लेकर कालेजमे जायेगी, - कालेजकी पढ़ाई समाप्त होने पर कोट पटलून डॉट कर दफ्तर जायगी। टाउनहालमे नथ हिला-हिलाकर स्पीचें देंगी, चश्मेके भीतरसे इन नेत्रोके चंचल कटाक्षी द्वारा सृष्टि-स्थिति- प्रलय करेगी, और शौकिया धर्मकी रस्सी गले में डाल कर संसार- गोशालामे खली-भूसी खायेंगी । हानि क्या है ? तुम अवस्थाका विनिमय करोगे ? किन्तु एक बातके लिए सावधान किये देती हूँ। तुम जब मान करके बैठोगे-और हम मनाने बैठेगी-जब मुख रुआसा बना- कर, रसभंगीके साथ कानोंके आभूपण जरा हिलाकर, इन भ्रमरयुक्त कमलतुल्य नेत्रोसे एक बार कटाक्ष करके इन आभूपणभूपित हाथोसे तुम्हारे पैर पकड़ेगी-तब ? तब क्या तुम लोग हमारी तरह 'मान' की मानरक्षा कर सकोगे ? बड़ाई छोड़कर वही करो, तुम धरके भीतर बैठो-हम दफ्तर जार्य । जो सातसौ वपास दूसरोंके जूते उठाते आ रहे है वे भी मर्द है ? कहते लजा नहीं आती? -श्रीरसमयी देवी। पहलेका प्रबन्ध 'वंग-दर्शन ' मासिकपत्रमे "प्राचीना और नवीना गीर्षक देवर प्रकाशित हुआ था। उसके बाद ये तीन कत्पित पत्र लिखकर, धियोंकी ओरसे जो उत्तर दिये जा सकते थे, वे प्रकाशित किये गये थे। १४० प्लोक-शिक्षा। . लोक-शिक्षा। लोक-संत्याकी गणना करके जाना गया है कि भारतमें रहनेवाले हिन्दु भोकी संख्या ३३ करोडके लगभग है। शायद पृथ्वीपर ऐसा कोई काम ही सम्पन नहीं होता, जिले इतने आदमी मिलकर न कर सकते हो । किन्तु हमारे द्वारा कोई भी काम सिद्ध नहीं होता । इसका कारण है। लोहेका औजार बननेपर उसके द्वारा पत्थर तक तोड़ा जा सकता है। किन्तु लोहे- मात्रनें तो यह गुण नहीं है । लोहेको अनेक प्रकारकी सामग्रियोंसे प्रस्तुत गठित लौर तेज करना पड़ता है, तब लोहा ईत्पात होकर काटता है । ऐसे ही मनुष्यको प्रस्तुत, उत्तेजित और शिक्षित करना पड़ता है, तब उसके द्वारा कार्य होता है। भारतके इन करोड़ों आदमियोके द्वारा कोई कार्य न होनेका कारण यह है कि भारतने लोक्-शिक्षाका अभाव है। जो लोग भार- तकी तरह तरहती उन्नति करनेमें लगे हैं वे लोक-शिक्षाकी वातपर ध्यान नहीं देते, अपनी अपनी विद्या-बुद्धि प्रकट करनेमे ही लगे रहते हैं। मामला क्म लायंका नहीं है। यह भी संभव नहीं कि विद्यालय पुस्तकें पढ़ाकर, व्याकरण, साहित्य और ज्यानिति लिखाकर इन करोड़ों लोगोंको शिक्षा दी जा सके । यह शिक्षा ही नहीं है और उक्त उपायोंले यथार्थ शिक्षाकी प्राप्ति असंभव है। सर चित्तवृत्तियोंकी प्रत अवत्या, अपने अपने कार्यमें निपुणता और तन-कार्यने उत्साह जिसले हो वही शिक्षा है। मेरा यही विश्वास है कि व्याकरण और ज्यानितिले वह शिक्षा नहीं होती और बड़े बड़े सुशिलित-नानधारियोले लेकर साधारण पड़े लिखे मनुप्यो तक किसी भी अगरेजी-नदीसरे मुखले इस वारेने कोई बात आज तक नहीं सुन पड़ी। दूरोपमे इन प्रकारनी लेक्-शिक्षा अनेक उपायोंने हुमा करती है । प्रगिया सादि अन्य देशनि, सर्वसाधारणले इस प्रकारकी शिक्षा दी जाती है। देशोने सवार लोर-शिक्षाका एक मधान उपाय है। अखवारोंसे लोक.

बांकम-निवन्धावला- - शिक्षा कैसे होती है, यह बात शायद इस देशके लोग सहजम समझ नहीं सकते। इस देगकी हर एक भापामे अधिकसे अधिक वीस बीस पचीस पचीस अखबार निकलते है। (अब इस संरयामे वृद्धि हो गई है।) इनमेसे किमीके ग्राहक दो सौ है, किसीके ग्राहक पाँच सौ हैं । अखबारोके तमाम पाठकोकी संरया दस पाच हजार या इससे कुछ अधिक होगी। किन्तु यूरोपके हर एक देगमे सैकड़ों, यहाँ तक कि कहीं कहीं हजारो अखबार निकलते हैं। एक एक अखबारके ग्राहक हजारों और लाखो है । उनको पड़नेवालोकी संरया लाखो-करोड़ोके लगभग है । इसके ऊपर हर एक नगरमे कई कई सभाये हैं। गांव गाँवमे वक्तृताये हुआ करती है । जिसको जो कहना होता है वह अपने परोसियोको जमा करके व्याख्यानमे उनको वह समझा देता है। वह वात सैकड़ो अखबारोमे छप जाती है। सैकड़ो भिन्न भिन्न ग्रामो और नगरोम यह बात प्रचारित और विचारित होती है। लाखो लोग उस बातको पढ़कर उससे शिक्षा प्राप्त करते है। एक एक भोजनके निमन्त्रणमे ही स्वादिष्ट भोजन करते करते यूरोपके लोग जिस शिक्षाको प्राप्त करते हैं, उस शिक्षाका अनुभव ही हम नहीं हो सहता। हमारे देशमे जो थोड़ेसे अखबार हैं उनकी दुर्दशाकी बात तो पहले ही कह जा चुकी है। रहीं वक्तृताये, सो वे तो लोकशिक्षाकी राह होकर भी नहीं जाती। इसके बहुतसे कारणोंमे एक प्रधान कारण यह है कि वक्तृताय प्रायः देशीभापाओमे नहीं दी जातीं । उन्हें बहुत ही कम लोग सुनते हैं, बहुत ही कम लोग पड़ते है और बहुत ही कम लोग समझते हैं। इसके सिवा अधिकांश वक्तृताओके असार होनेके कारण और भी कम लोग उनसे शिक्षा पाते है। इस समय ऐसी दशा होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि सदामे यहाँ लोक-शिक्षाके उपायका अभाव चला आरहा ह । लोक-शिक्षाका उपाय न था, तो शाक्यसिंहने किस तरह सारे भारतवर्षको बौद्धधर्मकी शिक्षा दी ? विचार कर देखो, बौद्धधर्मके कृट-तकाको समझनेमें हमारे आधुनिक दार्शनिकोकि मिरका पसीना पर आता है। कलकत्ता -रिव्यूम इसका प्रमाण मौजूद है कि मैक्समूलर उन तकॉको समझ नही सके । वही कूट- तत्वमय, निर्वाणवादी, अहिसामधान दुर्योध्य धर्म शाक्यसिह और उनके १४२ लोक-शिक्षा। शिष्योने सारे भारतवर्पको-गृहस्थ, परिव्राजक, पण्डित, मूर्ख, कान-काजी, उदासीन, ब्राह्मण, शूल सबको-सिखलाया था। लोक-शिक्षाका क्या उस समय उपाय नही था ? शङ्कराचार्यजीने उसी दृढ़वद्धमूल दिग्विजयी साम्यप्रधान बौद्धधर्मको लुप्त करके फिर समग्र भारतवर्पको वेदान्तकी शिक्षा दी। उस समय त्या लोकशिक्षाका उपाय नहीं था? अभी कुछ ही दिन हुए, बंगालके चैतन्यदेवने उड़ीसे भरको वैष्णवधर्ममे दीक्षित कर लिया । पर अब देखते है कि राममोहनरायसे लेकर कालेजके लड़के तक-. सभी ब्राह्मधर्मकी घोपणा करते फिरते हैं, किन्तु लोग उसे नहीं सीखते । अर्थात् पहले लोक शिक्षाके उपाय थे, पर अब नही है। या लोकशिक्षाका एक बहुत सुन्दर उपाय था। वह उपाय यहाँ कथा वांचनेती प्रथा थी। आज कथा वाचनेकी प्रथाका प्रचार एकदम नष्ट न हो जाने पर भी वह निस्सार और विकत होगई है। उस जमानेमे कथा वाचने- वाले व्यास मत्तकमे चन्दनका तिलक और गलेमे सुगन्धित पुप्पोकी माला धारण किये व्यासगडीपर बैठकर सीताके सतीत्व, अर्जुनके वीरधर्म, लक्ष्मण- के सत्यव्रत. भीमके इंद्रियजय, राक्षसीके प्रेम-प्रवाह, दधीचिके आत्म- समर्पण, हरिश्चन्द्रकी कठोर परीक्षा आदि विषयोकी सुन्दर व्याख्या मधुर क्ण्ठले सबले सामने सुनाते थे। किसान, रोजगारी, नीचजातिके लोगतक उसके हारा सहजसे सुशिक्षा पाते थे। साधारण श्रोता तकको उससे यह ज्ञान होता था कि धर्म नित्य है. धर्म देव है, अपना ही खयाल रखना अश्रद्धाकी वात है. जीवन यह पराये लिए ही मिला है, ईश्वर है, वे विश्वकी सृष्टि, उसका पालन और संहार करते है । वे यह जान जाते थे कि पाप पुण्य है, पापका दण्ड और पुग्यका पुरस्कार है, अहिसा परम धर्म है-लोकहित परम कार्य हैं। ऐनी शिक्षा देनेवाले कथक अब कहाँ गये ? जो कुछ अब ऐसे वक्ता है भी. वे इस कारण उस कानको छोड़ बैठे है कि आजकलके नवशिक्षित सम्प्रदायरे लोग उनसे अरचि रखते हैं। कथा वाचनेवालोको हरामखोर तर कहने में संकोच नहीं करते । प्राचीन इतिहास पुराणोंकी सभी बातोंको गप्प मान कर उनपर अम्रता प्रकट करते हैं। ब्रांडी पीना, वेश्याके मुंहले आज रंगीरे रलिया देखे मैंने" सुननेमे जिन्हें लाभ सना पड़ता है, १४३ । - बंकिम-निवन्धावली- है और लोक-शिक्षा प्रचारिणी कथाके प्रचारमे हानि, उन अल्पमिलित, स्वधर्म- भ्रष्ट, कदाचार, दुराशय, असार, वात करनेके अयोग्य लोगोंके टोपसे अब कथाकी प्रथा उठ जानेमे अधिक विलम्ब नहीं है । अंगरेजी-शिक्षाके गुणसे भारतमे क्रमशः लोक-शिक्षाका उपाय लुप्त ही होता जा रहा अंगरेजी शिक्षाको मै इस लिए टोप दे रहा हूँ कि उसने ऊपर लिखे दोपके अलावा एक दोप यह होजाता है कि शिक्षित और अशिक्षितम सहानुभूति नहीं रहती । अँगरेजीम ही बातचीत करनेकी सनक रखनेवाले वावू लोग अशिक्षितांके हृदयको नहीं समझते । गिक्षित लोग आशिक्षितोके ऊपर दृष्टि ही नहीं डालते । कल्लू किसान किसानीके कामामे जुटकर जान दे, हमे उम्मका फल भोगनेसे मतलब । कल्लूके दिन किस तरह बीतते है, उसे क्या दुख और क्या सुख है, इसपर हमारे यहाँके शिक्षित बाबूलोग रत्तीभर ध्यान नहीं देते। शिक्षितोके लंबे चौड़े व्याख्यान पढ़कर विलायतके बड़े बड़े अँगरेज मुग्ध और चकित हो भी गये, तो उससे फल कुछ नही । शिक्षितोके मनकी बात, उनका वक्तव्य विदेशी भाषामे होनेके कारण अगर कल्लू किसानकी मण्डली-जिसकी संख्या फी-सदी नब्बेसे भी अधिक है- कुछ भी न समझ सकी तो वह निष्फल है। कोरे यशसे क्या होगा ? अंग- रेजोके मुग्ध और चकित होनेसे क्या होगा ? जब तक देशीभापामें अपना वक्तव्य कल्लुकी मण्डलीको सुनाकर उसे हम 'लोकमत' का रूप न देगे, तब तक उसका पूरा असर नहीं पड़सकता । करोड़ो अशिक्षितोके मूक- ऋन्दनसे आकाश फटा जाता है। पर वे क्या कर ? उनको शिक्षा नही मिली है-उनके पास अपने भाव प्रकट करनेकी भापा नहीं है। सुशिक्षित लोग उनसे मिलकर, देशी भापामे अपना वक्तव्य प्रकटकर उन्हें शिक्षित "नहीं बनाते। सुशिक्षित लोग जो समझते हैं, अशिक्षितोको एकत्र करके अपनी भापामें वह कुछ कुछ समझा देनेसे लोग सहजमे शिक्षित हो सकते हैं। लोक-शिक्षाका यह राहज सुन्दर उपाय है । यह वात भारतमे सर्वत्र प्रचारित होनी चाहिए। इसके लिए सुशिक्षितोको अशिक्षिताये हेलमेल बढ़ाना होगा । सुशिक्षित और अशिक्षितोमें सहानुभूतिका भाव होना १४४ रामधन पोद। चाहिए। यह हेलमेल बढ़ानेका सरसे अच्छा उपाय देशी भापामे पुस्तकें लिखना और लेकचर आदि देना है। . रामधन पोद। बँगलाके साहित्यमे एक ही रोना सुन पड़ता है कि बंगालियोके बाहुमें बल नहीं है । इल अभिनव अभ्युत्थानके समय बंगालियोके मुखसे यही सुन पड़ता है कि हाय, बंगालियोके बाहुमे वल नहीं है। बंगालियोके सब दुःखोकी जड़ केवल बाहुमे बल न होना ही है। जगार पता लगाया जाय कि बंगालियोके वाहुमे वल क्यो नहीं है ? तो उसका यही एक उत्तर मिलेगा कि बंगालियोंको पेटभर खानेको नहीं मिलता-बंगालमें अन्न नहीं है। जैले एक माताके वहुत बच्चे होने पर कोई भरपेट दूध नहीं पाता, वैसे ही हमारी जन्मभूमि वहुतसी संतानोकी माता होनेके कारण उसले प्राप्त अन्नले सवको पूरा आहार नहीं मिलता। शायद बंगालकी ऐसी प्रजावृद्धि पृथ्वीके किसी देशमे न होगी। बंगालकी अतिशय प्रजाति ही उसकी अवनतिका कारण है। प्रजाकी बहुलतासे अन्नाभाव, जन्नाभावले अपुष्टि, अजीर्ण, ज्वर और मानसिक दुर्बलता आदि अनेक दोष उत्पक होते हैं। बहुत लोग व्हेगे, देखो देशमें अनेक बड़े आदनियोंके लड़के हैं जिनको न्छ भी कष्ट नहीं है, क्न्तुि वे तो अनाहारी चांडाल पोद (बंगालकी एक नोत्र जाति) की स्पेक्षा दुर्बल हैं। बड़े आदमियोके लड़के ही वास्तवमें दानराकार हो रहे हैं। यह सच है. किन्तु एक पीटीने अन्नाभावका दोष दूर नहीं होता। जो पीढ़ी-दर-पीढीने वानराकार हो रहे हैं, वे एक पीढ़ी भरपेट भोजन पान्ले ही मनुष्याकार नहीं दन जाते । खासकर बड़े आदमियोंके हटकोकी दात तो छोड़ ही दो। वे हिल-डुलकर कोई काम नहीं कर सकते । दन कारण दुखको क्नीसे तैयार भोजनको भी खा नहीं सकते-खाये हुए आहारको पचा नहीं सकते। सभी देशोंमें ऐले बाबुओका दल वानरा- .नि. १० बंकिम-निवन्धावली- है देगा, । - कार हुआ करता है। श्रमजीवी माधारण दरिद्र लोगोका बाहुबल ही देशका बाहुवल | बहुत लोग बिगड़कर कहेंगे कि अपना यह कठिन मन्तव्य रहने दो। ये बातें तो हमने अक्सर सुनी हैं। क्यों, अगर देगमे ग्याने भरको अन्न नहीं होता तो यूरोपके भिन्न भिन्न देशों में इनने चावल और गेहूं यहांले कैसे भेजे जाते हैं ? इस मंप्रदायके लोग यह नहीं समझते कि देगी यथेष्ट सामग्री न रहने पर भी वह विदेश भेजी जा सकती है। जो अधिक दाम उसके हाय चीज विकेगी। इस देश में अगर कोई चीज यथेष्ट होती है तो वह चांवल है। चावलक बिना आहार न करनेका अवसर जिनको दुर्भाग्यवश प्राप्त होता हो उन लोगोंकी संरया इस देशमे बहुत ही कम है । बंगालके अधिकांश लोगोको, और चाहे कुछ नसीव न हो, लेकिन मुसमय होने पर, चावलकी कमी नहीं रहती । पेटभर भात प्रायः हरएक बंगाली पाजाता है। किन्तु पेटभर भात खा लेनेसे ही आहारकी पूर्ति नहीं हो सकती । केवल भात खाकर प्राणरक्षामात्र की जा सकती है -उसके शरीरकी पुष्टि नहीं हो सकती। चाँवलमें बलकारक सारपदार्य सौ भागमें सात भाग मात्र है। चर्बी, शरीरकी पुष्टिके लिए अत्यन्त प्रयोजनीय है, चावलमे बिलकुल नहीं है। केवल भात खानेवाले लोग अगर कम नहीं है तो अधिक भी नहीं है। बंगालके अधिकांग लोग भातके साथ जरा दालका पानी, एकाध मछ- लीका टुकड़ा और साग आलू या कचे केलेकी तारी मिलाकर मानेको पाते हैं तो उसे अच्छी तरह भोजन करना समझ लेते है। इस भोजनमें प्रायः पौने सोलह आने एक पाई भर भात दाल और दो पाई भर सालन रहता है। ऐसे भोजनको एक प्रकारसे 'सूसी रोटी खाना' ही कह सकते हैं। बंगालके चौदह आने भर लोग इसी तरहका आहार करते हैं। किसी तरहकी बाधा या विन्न न उठ खड़ा हो तो इतनेये भी जीवनरक्षा हो सकती है, और होती ही है। किन्तु ऐसे गरीरमे रोग बहुत सहजमें अपना घर बना लेते है (मलेरिया ज्वर इस बाता माझी है ) और ऐसे गरीग्में बल नहीं रहता। इसी लिए बंगालियाँ बाहुबल नहीं है। १४६ रामधन पोद। इन्हीं सब बातो पर सोच विचार कर बहुत लोग कहते है कि जब तक बंगाली लाधारणतः मांसाहार न करेगे तबतक उनके बाहुबल न होगा। हम यह बात नहीं कहते । मांसका प्रयोजन नहीं है। दूध, घी, आटा, मैदा, दाल, चने, अच्छी साग-सब्जी, यही उत्तम आहार है। इसका दृष्टान्त युक्त प्रान्तके आदमी है। वे लोग पेट भरकर बलकारक आहार रोटी और उसके साथ थोडासा भात खाते है । बंगाली भी अगर भातकी मात्रा घटाकर रोटी आदि सामग्रीकी मात्रा बड़ा दे तो एक पीढ़ीमे नीरोग और तीन पीढ़ियोंमें यलिष्ट शरीरवाले हो सकते है । ये सब बाते रामधन पादको समझा रहा था-रामधन पोदका परिवार भर रोगी रहता था। रामधन पोदने हाथ जोड़कर कहा-"आपने सब ठीक कहा-मगर दूध, घी, आटा ? भैया ये सब चीजे हमको कहाँ नसीव ? ऐसा जमाना लग गया है कि खाली पेटभर भातका खर्च उठाये नहीं उठता।" मैंने सोचकर देखा, वात सच है। मै रामधन पोदके यहाँ धान कूटनेकी जो ढेकी थी उसके काष्ट पर बैठा हुआ था । दहलानमें एक बड़ा कुत्ता लेटा हुआ था, इससे मैं और आगे नहीं बढ़ सका । वहीसे मैं रामधन पोदकी वंशा- वलीका परिचय पा रहा था। रामधनने एक एक करके दिखलाया कि उसके चार लड़के, पाच लड़किया है । एक लड़के और तीन लड़कियोका व्याह करना वाकी है। नीच जातिके यहाँ लड़का व्याहनेमे भी खर्च होता है और लड़की व्याहनेमें भी । लेकिन लड़की व्याहनेमे कम खर्च होता है। उसने कहा-“एक लड़केका व्याह करनेका तो ठिकाना है नहीं, आप दूध, घी, आटेकी वात चला रहे हैं !" मैंने अपने मनमे कहा-वेशक मेरी यह यात असंगत ही हुई है । जान पड़ा, जैसे वह जमीन पर लेटा हुआ कुत्ता भी मुझ पर खफा हो कर तर्जन-गर्जन करनेका उद्योग कर रहा है। जान पड़ा. जैसे वह कह रहा है कि मुझे मुट्ठी भर जूठा भात तो मिलता ही नहीं, और तुम बूट-जूते डोटे इस ढेकीके ऊपर बैठे घी-आटेका जिक्र चला रहे हो । एक रोमशून्य विल्ली मेरी ओरसे फिर कर दुम उठाये उधरहीसे चली गई । रामधनके उस नीरस घरमे घी, दूध, मक्खनकी बात सुनकर वह निस्सन्देह मेरा उपहास करके चली गई। । १४७ बंकिम-निवन्धावली- मैने रामधनसे कहा-"चार लड़के-तीन लड़कियाँ ? और उस पर दो बहुये ले आये हो ?” उसने हाथ जोड़ कर कहा-" जी हाँ, आपके आगी. वाढसे दो बहुये आगई है।" मैने कहा- उनके कोई बालबच्चा भी हुआ है ? रामधनने कहा-जी हो, एकके दो लड़कियाँ है और एकके एक लड़का मैंने कहा-शत्रुकी आँखोम राई-नोन, परिवार तो तुमने खूब बढ़ा रस्सा है। बहुत परिवार होनेके कारण पहले ही तुमको खाने-पीनेका कष्ट था। अब तो वह कष्ट और भी बढ़ गया होगा ? रामधन-जी हाँ, अब खाने-पीनेका बड़ा कष्ट है। तब मैंने रामधनसे पूछा---तो तुमने इतना परिवार क्यो बढ़ा लिया ? रामधनने कुछ विस्मित होकर कहा-यह क्या साहब ! मैने क्यो परि- वार बढ़ाया ? विधाताने बढ़ाया। मैंने कहा-गरीब विधाताको वृथा दोप मत दो। लड़कोका व्याह तुमने ही किया है। इस कारण तुमने ही दो बहुये बढ़ा ली है। और लड़कोका व्याह करनेसे ही दो पोती और एक पोतेकी भी वृद्धि हो गई है। रामधनने बहुत ही कातर भावसे कहा-आप इस तरह मेरे परिवारकी बढ़तीको न खूटिए, अभी उस दिन मेरा एक महीने भरका पोता मर चुका है। मैंने पूछा-वह कैसे मरा रामधन ? रामधन कुछ उत्तर न देता था। बहुतसे जिरहके सवाल करके मैने यह जान लिया कि माताके दूध न होनेसे उसकी मृत्यु हो गई है। माताके पीड़ित हो जानेसे दूध न निकलता था, उधर रामधनकी गज भी मर चुकी थी। दूध मोल लेकर पिलानेका सामर्थ्य नहीं था। लड़का सानेको न पाकर पेटकी पीड़ा भुगतकर मर गया। अनाहारका एक फल पेटकी पीड़ा भी है। इस वातको शायद बहुत लोग न जानते होंगे। फिर मैने रामधनसे पूछा-अब तुम छोटे लड़केका व्याह करोगे ? रामपनने कहा-स्पोका कुछ इन्तिजाम होते ही वह काम भी कर डालेगा। दुःख प्रकट करके १४८ रामधन पोद । मैंने कहा-ये जो बहुये आगई है इन्हीको पेटभर खानेको नहीं जुरता, फिर और आदमी क्यो बढ़ाते हो ? व्याह करनेसे पहले तो बहू आवेगी, उसे खानेको देना होगा । उसके भी दो चार बच्चे होगे-उन्हें भी खानेको चाहिए। अभी तो पूरा ही नहीं पड़ता, और उस पर तुम और एक लड़का व्याहना चाहते हो? रामधनने विगड़कर कहा-लडकेका व्याह कौन नहीं करता ? जिसे खानेको जुरता है वह भी करता है और जिसे नहीं जुरता वह भी करता है मैने कहा-जिसे खानेको नहीं जुरता उसका लड़केका व्याह करना क्या भच्छा है? रामधनने कहा-संसार भरमे यही हो रहा है । मैने कहा--संसार भरमे नहीं रामधन, केवल इसी देशमे । ऐली पूर्स जाति और किसी देगमे नहीं है। रामधनने कहा-जब देश भरके लोग कर रहे हैं तब मेरे ही ऐसा कर- नेमें दोप क्या हुआ ऐसे निवोधको किस तरह समझाता। मैंने कहा-रामधन, देश भरके लादमी अगर गलेमें रस्ली बाँधकर जान दे दे तो क्या तुम भी यही करोगे? रामधनने चिल्लाना शुरू कर दिया-बोला, आप कहते क्या है ? गलेम फाली लगाना और बेटा व्याहना क्या एक ही बात है ? मुझे भी कुछ क्रोध आगया। मैंने कहा-एक ही बात कौन कहता है रामधन ! इस तरह लड़केका व्याह करनेकी अपेक्षा गलेमें फांसी लगाना बहुत अच्छा है । अपने गलेने फोसी न लगा सको तो लड़केके गले लगा --- देना। यह कहकर मैं टेकी परसे रटकर चरा आया। घरमे आकर गुन्ना उतरने पर मैने नोचा कि इसमे गरीब रामधनका अपराध क्या है? दंगाल भरमे ऐसे ही रामधन भरे पड़े हैं। यह तो गरीब पोदका रटका है- विद्या-सादि नहीं रखता। किन्तु जो लोग कृतविद्य करकर अपना परिचय देते 1-सुशिक्षित होनेका नाता रखते है-वे भी रामधनसे दो हाथ बढ़े हुए १४९ बंकिम-निवन्धावली- । । है। घरमे खानेको हो चाहे न हो, लड़केका व्याह पहले कर देंगे । केवल कुछ दाल और मोटा भात खाकर, सात पुरखोंसे, जली लकड़ीका ऐसा आकार धारण किये हैं-ज्वर और पिलहीसे परेशान हैं तो भी वही कुत्सित आहार खानेके लिए, अनाहारका भाग बॅटानेके लिए, ज्वर और पिलही- रोगका विस्तार बढ़ानेके लिए, गॉटके रुपये खर्च करके पराई लड़की अपने घर लानी ही होगी । मनुष्यजन्ममे यही उनके लिए सुख है । जो बंगाली होकर लड़केका व्याह न कर सका-उस बंगालीका जन्म ही वृथा है। यह विचार कर देखनेकी कोई आवश्यकता नहीं समझी जाती कि व्याहके बाद लड़का बेचारा अपनी स्त्रीको खिला-पिला सकेगा या नहीं। इधर स्कूल छोड़ते छोड़ते ही लड़का एक छोटीसी बच्चोकी पल्टनका बाप बन बैठता है। उसकी रसट जुटानेमे ही बाप-दादेका नाकमें दम हो जाता है । गरीब विवाहित. युवक तव पोथी-पन्ना बांधकर उम्मेदवारीमें लग जाता है। हाथ जोड़कर अंगरेजोके द्वार द्वारपर हाय नौकरी, हाय नौकरी, करता फिरता है । शायद वह लड़का एक आदमी ऐसा आदमी हो सकता। शायद उस समय अपनी राह पहचानकर जीवन-क्षेत्रमे प्रवेश कर सकनेसे वह अपने जीवनको सार्थक कर सकता । किन्तु राह पहचाननेके पहले ही वह आशा जाती रही- उम्मेदवारीकी यन्त्रणा और नौकरीके निप्पेपणसे-गृहस्थी चलानेके कप्टोसे- उसका हृदय और शरीर विकल हो गया । व्याह हो गया है, लड़के- वाले हो गये है। अब मार्ग खोजनेका अवसर नहीं है इस समय वही एक उम्मेदवारीका मार्ग तुला हुआ है । और उसके द्वारा लोकोपकार होनेकी कोई संभावना नहीं है। क्योकि अपनी स्त्री और बालबचोका उपकार करनेसे ही फुरसत नहीं मिलती। वे ही रात-दिन 'दो, दो' की धुन लगाये रहते है । देशका हित करनेकी क्षमता नहीं रहती । स्त्री-पुत्रके हितके लिए ही सर्वस्व अर्पण कर देना पड़ता है। लिखने-पढ़ने और धर्म-चिन्ताके साथ कोई संबंध नहीं रहता। लड़केको दुलराने और खिलानेम ही समय धीत जाता है । जो रपया वह पेट्रियटिक एसोसियेशनको चंदमे दे सक्ता, उसमे उसका लटका अपनी सीको गहने बनवा देगा। इस पर भी बंगारके रामधन अगर बचपनमे लड़केका व्याह नहीं कर सकते, तो उससे - १५० मेघ । लड़केका भी सर्वनाश समझते है और अपना भी सर्वनाश समझते हैं। लड़का होनेसे उसका व्याह करना ही होगा, हरएक मनुष्यको व्याह करना ही चाहिए और लड़केका बचपनमे व्याह कर देना भी प्रधान कार्य है, ऐसा भयानक भ्रम जिस देशमे सर्वव्यापी है उस देशकी भलाई कहाँसे हो सकती है ? जिस देशमे मा-बाप लड़केके तैरना सीखनेके पहले ही स्त्री-रूप पत्थर उसके गलेमे बांधकर दुस्तर संसार-सागरमे डाल देते है उस देशकी उन्नति कैसे हो सकती है ? मेघ । मैं न वरतूंगा। क्यो बरसू ? बरसनेसे मुझे क्या सुख है ? बरसनेसे तुम्हे सुख है । लेकिन तुम्हारे सुखले मुझे क्या प्रयोजन ? देखो, मेरे क्या यन्त्रणा नहीं है ? इस दारुण बिजलीकी आगको मैं सदा हृन्यमे धारण करता हूं। मेरे हृदयमे इल सुहासिनी सौदामिनीका उदय देखकर तुम प्रसन्न होते हो, तुम्हारी आँखें ठंडी होती है, मगर इस विज- लीके स्पर्शसे ही तुम जल जाते हो । इसी आगको में हृदयमे रखता हूँ। मेरे सिवा किसकी मजाल है कि इस आगको हृदयमें रक्खे ? देखो, वायु सदा मुझको अस्थिर किये रहता है। वायुको दिशा-विदि- शाका ज्ञान नहीं है । वह सब ओरसे चलता है। जब मैं जलके बोझसे भारी रहता हूँ तब वायु मुझे उड़ा नहीं सकता। नुन डरना नही, मैं अभी बरसता हूँ, पृथ्वी अन्नसे हरी भरी हो उठेगी। मुझे पूजा चटाना। मेरा गरजना अत्यन्त भयानक है। तुम इससे डरना नहीं। जब मैं मन्द गम्भीर शब्दले भरजाता ई-वृक्षोरे पत्तोको हिलाकर, नोरॉो नचाकर, टदुगंभीर गर्डनग करता है तब इन्द्र के हृदयने पढ़ी हुई क्पवृक्षके फूलोकी मारा हिल उठती है, कृष्णचन्द्र के लिरपरका मोर-मुन्ट डोरने लगता है, पर्वतोकी बन्दराओले प्रतिध्वनि होने लगती है। और भैया, वृत्रासुरके १५६ बंकिम-निवन्धावली- । पर, बूंदका वधके समय वज्रकी सहायतासे जो मैने गर्जन किया था तुम उस गर्जनको सुननेकी इच्छा न करना-डर मालूम होगा । वरतूंगा क्यो नहीं ? देखो, कितनी ही जूहीकी कलिया मेरे जलकणोकी आशासे ऊपर मुंह उठाये हुए हैं। उनके मुखमं स्वच्छ जल मै न सींगा तो और कौन सीचेगा? बरतूंगा क्यों नहीं ? देखो, नदियोंका शरीर अभी तक पुष्ट नहीं हुआ। वे मेरी दी हुई जलराशिको पाकर परिपूर्ण हृदयसे हंसती हँसती, नाचती नाचती कलरव करती हुई अनन्त सागरकी ओर चलेगी। यह देखकर किसे वरसनेकी साध न होगी? मैं नहीं वरतूंगा। देखो, यह पाजी औरत मेरे ही दिये पानीको नदीले कलसीमें भर कर लिये जाती है और आग लगे इस बरसने पर, तार नहीं टूटता! कह कर मुझको ही गालियां देती चली जाती है। मैं नहीं बरतूंगा। देखो, घरमें पानी टपकनेके कारण किसान मुझको ही गालियां दे रहा है। नहीं तो वह किसान ही काहेका ? मेरा जल न मिलता तो उसकी खेती न होती–मैं उसका जीवनदाता हूँ । भैया, मै न बरतूंगा। मुझे याद है:- मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकुलो यथा त्वां । वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगर्वः ।। कालिदास वगैरह जहाँ मेरी स्तुति करनेवाले है वहाँ मै क्यो न वरतूंगा? मेरी भाषाको कविवर शेली समझते थे। जब मैं कहता हूं-being fresh showers for the thirsting flowers. तब उस गंभीर वाणीके मर्मको शेली जैसा कवि हुए विना कौन समझ सकता है ? क्यों, जानते हो ? कवि मेरे ही समान हृदयमें बिजलीकी आग धारण करता है। प्रतिभा ही उसके अनन्त हृदयाकाशकी विजली है। मै अत्यन्त भयंकर है। जब अन्धकारमे मै कृष्ण-करालरूप धारण करता ई, तब मेरी टेढ़ी भोहीको कौन सह सकता है ? मेरे ही हृदयकी यह वृष्टि। कालान्नि विद्युत् तब दम दस सर पर चमकने लगता है। गरी निःश्वाससे चराचर जगत् उड़ने लगता है। मेरे शब्दसे ब्रह्माण्ड कांप उठता है। साथ ही मै मनोरम भी कैसा हूँ । जब पश्चिमके आकागमें, सन्ध्याके समय, अरुणवर्ण सूर्यकी गोदमे खेलकर मै सुनहरी लहरोके ऊपर लहरे फैलाता है. तब कौन ऐसा है जो मेरी उस क्रीड़ा और रंगको देखकर मुग्ध न हो जाता हो ? चादनी रातको आकाशमे मन्द पवनकी सवारी पर चढ़कर मनोहरमूर्ति धारण करके मै कैसे विचरता हूँ । सुनो पृथ्वी परके रहनेवालो, मैं बहुत सुन्दर हूँ, तुम सुझको सुन्दर कहना। और एक बात है । वह कह कर मैं अब बरसने जाता हूँ । पृथ्वीतल पर एक बहुत गुणों से सम्पन्न कामिनी है, उसने मेरे मनको हर लिया है। वह पर्वतोकी कन्दरामे रहती है, उसका नाम प्रतिध्वनि है । मेरी आवाज सुनते ही वह आकर मुझसे बातचीत करने लगती है । जान पड़ता है, वह मुझे प्यार करती है। मैं भी उसके आलापसे मुन्ध हो रहा हूँ। तुम कोई सम्बन्ध ठीक करके उसके साथ मेरा व्याह करा दे सकते हो ? . । वृष्टि। चलो नीचे उतरे, असाढ़ आ गया, चलो नीचे उतरे । हम छोटी छोटी वर्षाकी बूंदे है। अकेले एकजनी तो जूहीकी कलीका मुंह भी नहीं धो सकती- मल्लिकाके छोटेसे हृदयको भी नहीं भर सकती । किन्तु हम हजारों, लाखों कराडो है। चाहे तो पृथ्वीको बोर दे । छोटा या क्षुद्र कौन है ? देखो, जो अकेला है वही क्षुद्र है-वही सामान्य है। जिसमे एका नहीं है वही तुच्छ है । देखो वूदो, कोई अकेले नीचे न उतरना-आधी ही राहमें इस प्रचण्ड सूर्यको किरणोसे सूख जाओगी-चलो, हजारों, लाखो, करोड़ो, अर्युदो बूंद नीचे उतरकर सूखी हुई पृथ्वीको भर दें। पृथ्वीको टुया दगी। पर्वतकी चोटी पर चटकर उसकी छाती पर पर रख- कर पृथ्वीपर उतरना होगा-झरनेके मानने मोतीका आकार धारण करवे निवतगी । नदियोंके गुन्य हृदयणे परिपूर्ण करके, उन्हें स्पा बन्न १५३ बंकिम-निवन्धावली- करेगा-वायु है पहनाकर, महा तरंगांसे भीषण बाजा बजाकर, लहरके ऊपर लहर उठाकर हम क्रीड़ा करेगी। आओ, मब नीचे उतरे । कौन युद्ध ? हिश । वायुके कंधेपर' चढ़कर हम देश-देगा- न्तरमे घूमेगी। हमारे इस वर्षा-युद्धमे वायु हमारा घोड़ा है-उसकी सहायता पाव तो हस जल-थल एकाकार कर दे । हवाकी सहायता मिल- नेसे हम बड़े बड़े घरोंको ढहा देनेकी भक्ति रखती हैं। वायुके कन्धेपर चढ़कर हम लोगोंके घरोंके दरवाजाके भीतर घुसती है। युवतीकी बड़ी यत्नसे बिछाई हुई गय्याको हम भिगो देती है--सोती हुई सुन्दरीके ऊपर जाकर गिर पड़ती हैं। वायु तो हमारा गुलाम है। देखो भाई, कोई अकेले न नीचे उतरना। एका ही हमारा बल नहीं तो हम कुछ भी नहीं हैं। चलो हम क्षुद्र वृष्टि-बिन्दु है--किन्तु पृथ्वीके प्राणोंकी रक्षा करेंगी। खेतों में अन्न उपजावेगी-मनुष्योंके प्राणाकी रक्षा होगी। नदियोमे नावे चलेंगी, मनुप्योका रोजगार चलेगा। तृण लता वृक्ष आदिको पुष्ट करेगी-पशु पक्षी कीट पतंग जीवन पविगे । हम क्षुद्र वृष्टि-विन्दु है, पर हमारे समान कौन है ? हम ही संसारकी रक्षा करती है। तो फिर आ नवनील मेघमाला । आ, वृष्टि-बिन्दुओंकी जननी आ ! माता दिङ्मण्डलव्यापिनी । सूर्यतेजसंहारिणी ! आ, आकाशमण्डलको घेर रे, हम नाचे उतरे । आओ बहन सुहासिनी सौदामिनी ! वृष्टि-बिन्दुमुलके मुखको उज्ज्वल करो । हम हंसती नाचती हुई पृथ्वीतल पर उतर पढे । तुम वृत्रासुरकं मर्मस्थलको काटनेवाला वन हो, तुम भी गरजो। इस उल्ल- वमें तुम्हारे सिवा और उपयुक्त बाजा कौन है ? तुम भी पृथ्वीतल पर गिरोगी ? गिरो, किन्तु केवल गर्वसे उन्नत मस्तक पर ही गिरना । इस परो- पकारी क्षुद्र अन्नके ऊपर मत गिरना । हम इसकी रक्षा करने जाती है। गिरना हो तो इरा पर्वतकी गिवरपर गिरो। जलाना हो तो इन चोटी परके पदाको जलाओ । क्षुद्रसे कुछ न बोलना। हम शुट है, शुद्र के लिए हमारे हृदयमे बड़ी व्यथा होती है। देवो देखो, हमें देखकर पृथ्वी परके लोगोका आहाद दग्यो । पेट बगर मिर हिला रहे हैं नदी हिला दुल रही है-बड़े बड़े वृक्ष सिर झुकार १५४ जुगनू । प्रणाम कर रहे है। किसान खेत जोत रहा है, लड़के भीग रहे हैं । केवल खटीककी औरत आमका रस लिए भीतर भागी जा रही है । मर हराम- जादी ? दो एक अमरसके टुकड़े रक्खे न जा-हम खायेगी । दो, इसके कपड़े भिगो दो। हमने जलकी जातिमे जन्म पाया है, लेकिन तो भी हम रंग-रस करना जानती है। लोगोके छप्पर फाड़कर घरके भीतर झांकती है-स्त्री-पुरुप जिस घरमे सोये होते है वहाँ छतके छेदसे भीतर जाकर उनको चौका देती है। जिस राहमे बहू-बेटियो कलसी लेकर पानी भरने जाती है उसी राहमे हम कीचड़ कर रखती हैं । चमेलीका पराग धो डालकर भोरोको भूखो मारती है। नौकर-चाकर कपड़ा धोकर फैलाते है तो उसे कीचड़मे डालकर उनका काम बढ़ा देती हैं। हम क्या कम दिल्लगीबाज है ? तुम सब चाहे जो कुछ कहो हम रसिका है। खैर इसे जाने दो, हमारा दल देखो । देखो, पर्वत, कन्दरा, घर-द्वार आदि सदको धोकर हम एक नई ही हरीभरी पृथ्वीकी रचना कर देगी ? देखो, शिथिल दुर्बल नदीको कूलप्लाविनी, देशको डुबानेवाली, अनन्त-तरंग- संकुला लंबे-चौड़े पाटकी जल-राक्षसी बना देंगी ? किसी देशके मनुष्योकी रक्षा करेगी, किसी देशके मनुप्योका (बहियाके द्वारा) संहार करेगी. कितने ही जहाजोको ठिकाने पर पहुंचा देगी और कितने ही जहाजोको डदार ठिकाने लगा देगी, पृथ्वीको जलमयी दना देगी । फिर भी हम छद्र हैं ? हमारा ऐला क्षुद्र और कौन है ? हमारा ऐला दलवान् और कौन है ? जुगनू। यर मेरी समझ नहीं आता कि जुगन्, त्यो हमारे उपहालका पात्र है। जान पड़ता है, चन्द्र-सूर्य आदि बडे प्रकागोके मंसारमें रहने के कारण ही जानका इतना अपमान है। जहाँ अत्पगुणविशिष्ट व्यत्तिका उपहास क्रन रोता है, दही वना या रेखक उनका आप्रय ग्रहण करते हैं। विन्ट एजे देख पड़ता है कि उनके थोड़ा हो या बहुत, प्रकाश तो है। १५५ । - घंकिम-निवन्धावली- कहां, हमारे तो कुछ भी प्रकाश नहीं है। इस अन्धकारमं पृथ्वीपर जन्म लेकर हम किसके मार्गमे प्रकाश डाल सके हैं ? किसने हमें देखकर अन्ध- कारम, दुस्तर मैदानमे, दुर्दिनम, संकट में कहा है कि आओ भाई, चलो चलो, वह देखो, प्रकाश हो रहा है-चलो, यही प्रकाश देखकर राह चलो। अन्धकार है-इस पृथ्वीम भाई बढ़ा अन्धकार है-राह चलना कठिन है। जब चन्द्र-सूर्य रहते हैं, तब गह चलता हूँ-नही तो चल नहीं सकता । तारागण आकाश में उदय होकर कुछ प्रकाश अवश्य करते है, किन्तु दुर्दिनमें वे भी नहीं देखे पढ़ते । चन्द्र-सूर्य भी सुदिनक है, दुर्दिनम-दुःसमयमें जब मेघकी घटा, विजलीकी छटा, रात और घोर वर्षा होती है तब कोई नहीं होता। मनुष्य-निर्मित वन्यकी तरह वे भी कहते है-Horca 2non mumero mst ser enos! केवल तुम जुगन, क्षुद्र, क्षीण प्रकाग- वाले, घृणित, सहजम मार डालनेके योग्य, सर्वदा मरे रक्खे हुए तुम जुगनू- उस अन्धकार दुर्दिनमे, वर्षामे, देख पड़ते हो । तुम ही अन्धकारमे प्रकारा हो । मैं तुमको प्यार करता हूँ। मैं तुमको प्यार करता हूँ । क्योकि तुममें थोड़ा, बहुत थोड़ा, प्रकाश । तुम भी अन्धकारमें हो, और भाई मै भी घोर अन्धकारमे हूँ। अन्ध- कारमें क्या सुख नहीं है ? तुम भी अन्धकारमें बहुत धूमे हो, भला बत- लाओ, अन्धकारमे सुख नहीं है ? जब आधी रातकी बदल के अन्धकारमें जगन टेक जाता है, वर्षा होती है, बंद हो जाती है, और फिर होने लगती चन्द्रमा नहीं, तारा नही, आकाशकी नीलिमा नहीं, पृथ्वीपर दीपक दिले हुए फूलोंकी शोभा तक नहीं-केवल अन्धकार ही अन्धकार होता है केवल अन्धकार ही होता है और तुम होते हो-तब बतलाओ, अन्धकारमें क्या सुग्ख होता है ? उस ममय अन्धकारपूर्ण संमार और तुम ही होते हो। जगतमें अन्धकार होता है और श्यामल स्निग्ध वृक्षाको पत्तियांके बीच तुम चमकते फिरते हो । बतलाओ भाई, उस अन्धकारमं मुप है या नहीं? मैं तो रहता है कि है। नहीं तो क्यि साहससे तुम इस अन्धमारती अहिया और मैं इस मामाजिक अंधेरैम, इस बार दुर्दिन, संसारको cher नहीं, ।

जुगनू। ? अपने प्रकाशले प्रकाशित करनेकी चेष्टा करते है? है, अन्धकारमे मग्न होनेमे सुख-आमोद है । कोई देखेगा नही, अन्धकारमे तुम ज्वलित होओगे, और इस. अंधेरेके अन्धकारमे मै जलूंगा; अनेक ज्वालाओसे जलूंगा। जीवनका तात्पर्य समझनेमे अत्यन्त कठिन, अत्यन्त गूढ और अत्यन्त भयंकर है। सोचो तो, क्षुद्र होकर तुम क्यो प्रज्वलित होते हो, और क्षुद्र होकर मै ही क्यो जलता हूँ ? तुम क्या इस बातको सोचते हो? तुम अगर नहीं सोचते तो तुम सुखी हो । मे तो सोचता हूँ, मै असुखी हूँ ! तुम भी कष्टी हो, और मैं भी कीट-अत्यन्त क्षुद्र कीट-हूँ। तुम सुखी हो, मैं किल पापले असुखी हूँ ? तुम क्या सोचते हो कि तुम जगतके प्रकाशक सूर्य क्या नहीं हुए ? आकाश और समुद्रकी शोभा चन्द्रमा क्यो नहीं हुए ? क्यो न वही हुए? तुम क्या कभी सोचते हो कि ग्रह, उपग्रह, धूमकेतु, छायापथ अदि कुछ न होकर तुम जुगनू ही क्यो हुए? जिस ईश्वरने इन सब चीजोकी सृष्टिकी है उसीने तुम्हारी भी सृष्टि की है। जिसने इन सबको प्रकाश दिया है उसीने तुमको भी प्रकाश दिया है। उसने एकको बड़ा और दूसरेको छोटा त्यो बनाया ? अन्धकारमे इतना घूमकर सोचनेसे तुमने कुछ जाना है ? तुम लोचो या न सोचो, मै सोचता हूँ । मैने सोचकर निश्चय किया हैं कि विधाताने तुमको और मुझको केवल अंधेरी रातके लिए ही भेजा है । तुम्हारा और सूर्यका प्रकाश एक ही है-दोनो ही जगदीश्वरके दिये है; तथापि तुम केवल वर्षाकी रातके लिए हो और मैं भी केवल इन वकी रातके लिए है। आओ रोवे । आओ रोवें । वर्षाके साथ तुम्हारा और मेरा नित्य सम्बन्ध त्यो है ? प्रकाशपूर्ण नक्षत्रोकी आभाले उज्ज्वल वसन्तऋतुके आकाशमै तुम्हारे और मेरे लिए स्थान क्यो नही है ? वसन्त चन्द्रमाके लिए है, सुखीके लिए है. निश्चिन्तके लिए है, और वर्षा तुम्हारे लिए है, दुखीके लिए है, मेरे लिए है। इसी रिए मैने रोनेकी इच्छा प्रकट की धी-रिन्नु न रोगा। जिसने तुम्हारे और मेरे लिए इन संसारको अन्धकारमय बनाया है, रोकर उसको दोष न दूंगा । यदि उनकी यही इच्छा है कि अन्धकारके साथ तुम्हारा मेरा नित्य सम्बन्ध रहे तो आओ अन्धकारको ही प्यार करें। १५७ बंकिम-निवन्धावली- आओ नवीन नील सेवमाला देखकर इन अनन्त असंख्य विश्व-ब्रह्माण्डकी कराल छायाका अनुभव कर -मेघगर्जनको सुनकर सर्वध्वंसकारी कालके अविश्रान्त गर्जनका स्मरण कर । बिजलीकी चमकको कालका कुटिल कटाक्ष समझे । समझें कि यह संसार बिल्कुल ही क्षणन्थायी है, तुम भी क्षणम्यायी हो और मै भी क्षणस्थायी हूँ । रोनेकी कोई बात नहीं है, वर्षाके लिए ही हम और तुम भेजे गये थे। आओ चुपचाप जलते जलते-अनेक ज्वालाआम जलते जलते--सब महे । नहीं तो, आओ, मरे । तुम दीपकके प्रकागकी प्रदक्षिणा करते हुए जल मरो, और मै आगारूप उज्ज्वल महादीपकळे चारो ओर चकर लगा लगाकर जल मरु । दीपकके प्रकाराम तुम्हारे लिए क्या मोहिनी है सो तो मैं नहीं जानता, किन्तु आशाके प्रकाशमें मेरे लिए जो मोहिनी है उसे मैं जानता हूँ । इस प्रकागमे न जाने कितनी बार मैं फॉढा, कितनी बार जला, किन्तु मरा नहीं । यह मोहिनी क्या है सो मैं जानता हूँ। बड़ी माध थी कि ज्योतिको प्राप्त होकर इस संसारमें प्रकाश फैलावेगे; किन्नु हाय ! हम जुगनू है । हमारे इस प्रकाशमे कुछ भी प्रकाशित न होगा। जाने दो, कुछ काम नहीं है। तुम इस बकुल-कुञ्ज-किसलयके अन्धकारमे अपना क्षुद्र प्रकाश बुझा टो, और में भी जलमे या न्यलमे, रोगमे या दुःयमे इस शुद्ध प्राण-दीपकको बुझा हूँ। -मनुष्य-खद्योत। Sire. पुष्प-नाटक। जूही-आओ आओ प्राणनाथ, आओ, मेरे हृदयके भीतर आओ, मेरा हृदय भर जाय । कबसे तुम्हारी आगाम मुंह उठाये बैटी है यह क्या तुम नहीं जानते ? में जब कलिका-बालिका-धी, तब यह बड़ा भारी अशिचक्र-यह त्रिभुवनको सुनानेवाला महापाप-पूर्वके आकागमे आया था। उस समय इमकी ऐसी जगतको जलानेवाली विकराला मृति भी न थी। उस समय इसके तेजम इतनी ज्वाला भी न थी । हाय ! उस लम- १५८ - पुष्प-नाटक। यको कितनी देर हुई। इस समय देखो, यह महापाप क्रमश: आकाशमें चढ़कर, ब्रह्माण्डको तापसे जलाकर, प्रमशः पश्चिम दिशामे नीचे गिरता हुआ गायद अनन्तसे डूब जानेवाला है। जाने दो ! दूर हो-हाँ, तुम इतनी देर तक कहाँ थे प्राणनाथ ? तुम्हे पाकर शरीर शीतल हुआ, हृदय भर गया-छि मिट्टीमे न गिरना ! मेरे हृदयमे तुम हो इसीसे यह जली हवा मुझे नहीं जलाती, बल्कि तुम्हारी शोभा बढ़ा रही है। इस धूपके प्रकागले तुम रत्नके समान सुन्दर चमकीले जान पड़ते हो । तुम्हारे रूपले में भी रूपवती हो रही है । ठहरो ठहरो हृदयको शीतल करनेवाले ! मेरे हृदयमे ठहरो, मिट्टीमे न गिरना । वेला-(विष्णुकान्तासे, आडमें ) देखो वहन विष्णुकान्ता-लड़कीके हेग देखो! विष्णुकान्ता-किल लड़का ? बेला-इसी जूहीके । अभीतक मुह बंद किये, गर्दन युकाये, दुकानको लैयाकी तरह पड़ी हुई थी उसके बाद आकागले वर्षाका एक बिन्दु- नवाबजादेकी तरह हवाके घोड़े पर चढ़ा हुआ आकाशसे ऊपर आकर टपक पड़ा । दैसे ही लड़की खुलकर खिलकर फूल उठी । अभी कमसिन है न ! यञ्चोका रंग ही जुदा होता है। विष्णुकान्ता-आ., छि छि। जूही-सो इतनी देर कहाँ थे प्राणनाथ ! तुन्हे नहीं मालूम कि मै तुम्हारे विना जीवन-धारण नहीं कर सकती । खित न होना प्राणप्यारी । दहुत समयसे आनेको कर रहा था. किन्नु नहीं आ सका । तुमको नहीं मालूम, आवागने पृथ्वी पर आनेमें अनेक विघ्न है। अकेले आया नहीं जाता, दरबल रेकर आना पड़ता है। मरदा मिजाज और मर्जी नब समय एक्सी नहीं रहती। वोई अपरे रूपशे पसन्द करता है-अपनेको बड़ा आदमी समझ कर साकाशके ईचे न्यानने अश्य होकर रहना पसंद करता है । कोई करता है, जरा टप होने दो, वायकी निचरी तह बहुत गर्म है। अभी ६५९ । बिन्दु-दु । बंकिम-निवन्धावली- जानेसे मूख जानेका डर है । पृथ्वीपर उतरनेको अधःपतन समझकर कुछ साथी अधःपतनके लिए तैयार नहीं होते । कोई कहता है, मिट्टीमे गिरनेकी कोई जरूरत नहीं है, आकागमे कलमुंहा मेव बनकर सदा रहे वह भी अच्छा। कोई कहता है, मिट्टी पर गिरनेकी जरूरत नहीं है, फिर उन्हीं पुराने नदी नालोके भीतर होकर खारी समुद्रमे गिरना होगा । उसकी अपेक्षा यह अच्छा है कि आओ, इस उज्वल धूपमे खेले । सब मिलकर इन्द्रधनुषकी शोभा उत्पन्न करे, पृथ्वी और आकागके लोग उसे देखकर मोहित हो जायगे । खैर, किसी तरह अगर सब आकागमे एकत्र हो जाते है तो भी सबकी राय नहीं मिलती। कोई कहता है, अभी रहने दो-अभी आओ, कालिमामयी काली कराल मेघमाला बनकर विजलीकी माला गलेमे धारणकर यहाँ बैठे बैठे हम वहार देखेगे । कोई कहता है-इतनी जल्दी क्या है ? हम जलवंशम उत्पन्न है, भूलोकका उद्धार करने जायगे-क्या इसी तरह चुपचाप चलेगे ? आओ, जरा गरज तो ले । कोई गरजता है, कोई विज. लीकी क्रीड़ा देखता है। बिजली बड़े रंग दिखलाती है-कभी इस मेघ- की गोदमे, कभी उस मेवकी गोदमे, कभी आकाशके छोरपर, कभी आका- शके बीचमे, कभी धीरे धीरे दमकती है और कभी जोरजोरसे चमकती है। ही-अगर बिजली पर इतने लहू हो रहे थे तो फिर क्यो आये ? वह बढ़ी है और हम क्षुद्र है। विन्दु-अरे ! छि ! छि ! नाराज क्या होती हो ? मै क्या उस ढंगका आदमी हूँ ? देखो, छोटे छोटे छोकरे हलके होनेके कारण कोई नही आये । हम भारी आदमी नहीं रह सके-उतर आये । सासकर इसलिए कि बहुत दिनोंसे तुम लोगोको देखा सुना नहीं था । कमलिनी-(तालावके भीतरसे ) वाह ! बड़ा भारी है ! आ न । तुम ऐसे हजारोको एक पत्ते विठा सकती हूं। बिन्दु-असल बात भूल गई ? तालाबको भरता कौन है ? हे पंकजिनी, वृष्टि न होती तो जगतमे पंक (कीचद) भी न होती, जला भी न होता। तुम भी इस तरह हंस हंसकर अपनी बहार न दिया सकती। हे जलजिनी, तुम हमारे घरकी लड़की हो, इसीसे हम तुमको हृदयपर रसकर पालते ! पर रख १६०

पुष्प-नाटक।
। नहीं तो तुम्हारा यह रूप भी न रहता, यह महक भी न रहती और
यह गर्व भी न रहता। पापिन, तू अपने बापके घरानेके बैरी उसी अग्नि-
पिण्ड (सूर्य) की अनुरागिणी है ?
जूही-छि। प्राणनाथ ! उस औरतके मुंह लगना तुम्हें नहीं सोहता।
वह तो सबेरेसे मुंह खोले उसी भग्निमय नायकके मुंहकी ओर ताका करती
है। जिधर वह जाता है उधर ही इसका मुँह रहता है । न जाने कितने
मौरे और ममाखियां आती जाती है, तब भी इसे संकोच नहीं होता। ऐसी
वेहया, पानीमे बहनेवाली, भौरोंसे मेल रखनेवाली, कटीली औरतसे वात
करना ही ठीक नही।
विष्णुकान्ताच्या बहन जूही, भौंरों और ममाखियोंका आना-जाना घर
घर नहीं है?
जूही-अपने घरकी बात कहो दीदी, मैं तो अभी खिली हूँ । अभीतक
मैं भौरी और ममाखियोका उपद्रव जानती ही नहीं ।
बिन्दु-तुम्ही क्यों ऐसे लोगोंसे बातचीत करती हो ? जो खुद कलं.
किनी ( काली ) है, वह तुम्हारी ऐसी अमल-धवल शोभा और ऐसी सुवा-
सको कैसे देख सकती है ?
कमलिनी-भलारे पानीके किनके ! भला ! ख्य लेक्चर दे रहा है।
वह देख वायु मारहा है !
जूही-सर्वनाश ! क्या कहा, वायु आ रहा है ?
विन्दु-हाँ. अब मैं नहीं ठहर सकता ।
जूही-ठहरो न !
बिन्दु-ठहर न मगा। वायु मुझे गिरा देगा-मैं उससे नहीं पेश
पा सकता।
ही-जरा और ठहरो न ।
[ वायुवा प्रवेश ।।
दाय-(दिन्दुले) उतर ।
दिन्दु-मो महाशय ?
१६१

पंकिम-निवन्धावली-
वायु-मैं इस अमल मृदुल सुशीतल सुवासित खिली हुई कलीसे क्रीड़ा
करूँगा। तू अध:पतित, नीचगामी, नीचवंश है । तु इस सुखके आमनपर
बैठा रहेगा। उतर ।
विन्दु-मैं आकाशसे आया हूँ।
वायु-अवे तू पार्थिवयोनि है। तुझे नीचगामी नाले आदिमें रहना
चाहिए । तू इस आसनंपर कहाँ ? उतर ।
जूही-ठहरो न ।
विन्दु-वह ठहरने ही नहीं देता।
जूही-ठहरो न, ठहरो न, ठहरो न ।
वायु-(जूहीसे) तू इतना गर्दन क्यों हिला रही है ?
जूही-तुम हटो।
वायु-मैं तुमको गले लगाऊंगा सुन्दरी !
( जूहीकी हट हट कर भागनेकी चेष्टा ।)
बिन्दु-इस गढ़बढ़मे अव मै नहीं रह सकता ।
जूही-अच्छा तो फिर मेरे पास जो कुछ है वह तुमको अर्पण करती है।
धो ले जामो।
बिन्दु-क्या है।
जूही-थोडासा मधु सञ्चित है और थोड़ासा परिमल है।
वायु-परिमल में लूँगा, उसी लोभसे आया है। दे-
( वायु पुष्पपर बलप्रयोग करता है।)
जूही-( बिन्दुसे ) तुम जाओ; देखते नहीं हो यह टकैत है।
विन्दु-तुमको छोड़कर किस तरह जाऊँ ? किन्तु ठहर कर यह रश्य देव
भी नहीं सकता । जाता हूँ।
(वृष्टिबिन्दुका पृथ्वी पर पतन । )
१६२

- पुष्प-नाटक। वेला और विष्णुकान्ता--(विन्दुसे) अब कहो भैया स्वर्गवासी । काशले उतर कर आये थे न ? अब मिट्टीमे गिरो, मोहरीमे बहो- जूही-( वायुसे ) छोड़ो । छोड़ो । वायु-क्यों छोई ? दे-परिमल दे। जूही-हाय, कहाँ गये तुम अमल, स्वच्छ, सुन्दर, सूर्यकी प्रतिभासे भालित, रसमय जलकण ! इस हृदयको स्नेहमे भरकर फिर क्यो शून्य कर दिया जलक्ण ? एकबार रूप दिखाकर. स्निग्ध करके, कहां लीन हो गये प्राणनाथ। हाय, में तुम्हारे संग क्यो नहीं गई -तुम्हारे साथ क्या नहीं मर गई? त्यो अनाथ, अ-स्निग्ध पुप्प-देह लेकर इस शून्य प्रदेशमे बनी रही ! वायु-~ले रोना रहने दे-परिमल दे- जूही-छोड़ो, नहीं तो जहाँ मेरा प्यारा गया है वही में भी जाऊंगी। वायु-जा, जायगी, परिमल दे । हू-तुम ! जूही-मै मरूंगी मरती हूँ। अच्छा जाती है । वायु-हु हुम । (जूहीके फूलका पृथ्वीपर गिरना ।) वायु-हु. । हाय ! हाय ! [ यवनिका पतन।] - - Epilogue. ६ श्रोता-नाटककार नहाशय, यह क्या साक-पन्थर हुना? २ श्रोता-ठीक तो है, एक नहीका फूल नायिका और एक वद जल नायक । वटा भारी Drama ट्रामा है ! ३ श्रोता-हो रहता है कि इसमें कोई moral मारल हो । नीतिकी कोई दात जान पड़ती है। ।

बंकिम-निवन्धावली-
४ श्रोता-नहीं जी, यह एक तरहकी Tragedy टेजिडी है।
५ श्रोता-Tragedy ट्रेजिटी है या एक Farce फार्स है ?
६ श्रोता-Farce फार्स है या किसीको लक्ष्य करके उपहास किया गया
है।
.
,
वासना
या
७ श्रोता—यह नहीं है । इसका अर्थ गूढ़ है। मुझे यह परमार्थ-विषयक
काव्य जान पड़ता है।
तृष्णा ' इसका नाम रक्खा ज
सकता था | जान पड़ता है, ग्रन्थकार उतना खुलना नहीं चाहते।
८ श्रोता-यह एक रूपक है। में इसका अर्थ करूंगा।
९ श्रोता-अच्छा ग्रन्थकार ही न कहे, यह क्या है ?
ग्रन्थकार-यह तुम्हारे अनुमानोमसे कुछ नहीं है। मैं इसका अँगरेज
टाईटल Title दूंगा-
A true and faithful account of a lamentabl
Tragedy which occurred in a flower-pot on the
evening of the 19 th July, 1885 Sunday, and of which
the writer was an eyewitness."
समाप्त
है
१६४

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Bakim Nibandhawali

Author
Pandit, Rupnarayen
Title
Bakim Nibandhawali
File name
Bakim Nibandhawali
Text
OCR done
Citation
1911
Published
2010/11
Publisher
Hindi Granth Ratnakar Karyalye Bombay
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
DLI number
325972
Barcode
99999990007841.00
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Banasthali University
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