Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Annual Report Of The Search For Hindi Manuscripts For The Year 1903
Front matter
CONTENTS
Report
Notices of Hindi Manuscripts
Appendix I
Index I. Names of authors
Index II, Names of manuscripts noticed
1 to 2
3 to 85
87 to 90
91 to 94
95 to 96
.
JYA B
RATIYA
$ 1.935
BHA
REPORT.
REPORT. This B my fourth Anqual Report on the Search for Hindi Manuscripts. The greater portion of the year 1903 was devoted to the examining of the library of the Mahariji of Benares and in all 186 manuscripts were noticed there. Notices of 8 other books (Nos 1 to 8) were kindly sent to me by Pandut Chandra dhara Sarm: B A (Jaipur) So that in all 194 manuscripts were noticed Of these complete notices of 135 are given in this Report and a tabular statement of the rest (59) 19 given in Appendu I Oat of the manuscripts noticed in the library of the Maharaj. of Bensres 14 books have 2 or 3 copies. (') Conse quently 177 books have in all becn noticed In the appender I have given information about such of the manuscripts 13 d d not appear to me to be of any great importance and so had been noticed in the previous years. I propose to follow this procodure in all future reports of mine on this subject. Out of 135 manuscripts of which complete notices are given 129(") have been found to be the work of 71 authors whose ages are as follows - 14th century 16th d to 17th dtto 18th dtto 19th dtto The dates of the remaining six authors could not be ascertained (*) The statement in appendix I contains information about 59 manuscripts 46(") out of wine have been ascribed to 35 authors the dates of 19 of whom are as 1 18 26 23 follows - 3 7 5 16th century 1th dito 18th dtto 19th d the The dates of the remaining 16(%) anthors could not be fixed Among the authors lose work have been fully noticed and those whose work are mentioned in Appendix I the following eight names are common Chintamnpi (17th century) Saradara (19th century) Dern (17th century) 6 adina (17th century) Cokplanatba (19ch century) Tulast Diss (17th century) Mapohara Dása (1) Viswanatha Bungbs (19h centuri) Vost of the manuscripts noticed are in verse but there are some which are en proso also and that of course in its Braja d alect The majority of these manus crits rere copied out in the 18th and 19th centuries () Only 6 were copied out in tl o 17th century (1) fou No. 19 91 55 79 101 108 13331 138-39 145 40+ 153-54 152-56 188-53 161 68-69 (9) Selon 13 & 10 09 6 (*) freon 6 19 27 83 84 93 94 (+) Ere los 1 4 to 186. (") fra 10%, 123 199 190 191 19 136 143 144 143 151 153 157 160 161 166 171 (18th century 143 19th century 153 PEPORT. The character in which these manuscripts are witten 19 moulls Detapigart, only in a few cast it u Katha Is my report for 1900 I wrote that from the beginoxg of the 16th cen tary to the present day, India could only produce commentators and brond rate pucts, who were more or less the imutators of the great illustrious masters trho liad Iparis'ed duing the two preceding centuries. In contingation of the Te.narks it may be stated that dunn the 19th and 19th ccnturies, there wero fuer diferent centres of literary activity in Upper Indis, 10 so far, of course ng Hindi un concerned. These antres sere Bendelkliand, Baghelkhand, Oudh and Bcaures. It is diüicult to add adything to what has already been written ly several emincat autbora abont the literary history of the first three minties Bat I am sure that the examination of the libruy of Rus Highness the Vahirit of Boats alonu, when completed, wall throw a flood of light on the hutory of the fourth centre I, therefore, pøstpone my general remarks about the worls poticed thru yeur to 190: by which time I hope to be able to finzsh the examination of tho Halírája's library and then to bola a position to say something definitely about the poets of Benares and their patrons. Luog Tol Besa RES SYAM SUNDAR DAS Tlc teh of dyn 1901 NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS, Notices of Hindi Manuscripts. No1 -अमरेश विलास Vease Sulbstance-KAsmir-made Piper Leaves Size -71x5 inches Lines - 16 on a page Estunt - 860 slokas. Appearance-worm enten but new Complete Generally incorrect Character -Deran.igari Place of deposit-Pandit Suraram's Library,Gulera. Amareta Vildsa-Translation of 108 slohas of Amaru Satala made by the poet Nilakantha in Vikrama Samvat 1698 (1641 A D) This Nilakantha was probably the brother of the great poet Chintamani, Bhusana and Alati Ráma. The manuscript as dated Samvaf 1808 (1751 AD) Beguming -डो श्री गणेशाय नमः ॥ अथ ॥ अमरेश विलास लिख्यते॥ ता सुधन तिहु भवन सारि वाहन जमु जान्यो । तेग त्याग बड भाग बासु गुन गुनिन बघान्यो । योर घोर मति धीर उदधि गभीर धुरधर । लगनीत सोचि नीत परम हिन्द पुनोत वर ॥ महिपाल भोलि नव मुकुट मणि दुख भजन दुर्जन दयन । कवि नीलकंठ इमि उपर्लाह सुवोरल अर्थान अपनी रचन ॥ १॥ विरचि लेंग कर गहे गरि साहिन सुन मडे । दोरि दुअन दलमले मस्त. गन कुभ विहडे ॥ Lrd -सया । काम के प्यास ते कामिनि के जहि ते पिए अधरा सघरा में । जोन मुधारस टू ते अनूपम या विधि और कहो रस कामे । कठ कहे तबतें बहुती विधि द्गुन पास वढी फिरि वामे । ताको अचभी कहा करिए है। नो बलान लनाई है तामे । १०० इति श्रीम महिपालमोलिमुकुचितामणि श्री महाराजाधिरान श्री अमरसिंह देव क्लिासाप्यो नीलकठ कृत समान. शुभमस्तु । घरप से सारह ठानचे सात सावन मास । नोल- कठ कवि उच्चरिय श्री अमरेस विलास । सवत् १८०८ चैत्र मासे कृष्ण पने रघि धासरे प्रति. पदा तिथो हरिपुर नगर पसते जालघर क्षेचे वाण गगा महिमा लिपत हित मनसाराम ही श्री मालपाये नम शुभ भूयात् ॥ Sulject --प्रमशतक के १०८ श्लोको का अनुवाद । Note अन्तिम के अनुसार सयत १६६८ धारण की सममी को कवि ने बनाया है तथा निस प्रति की यह नोटिस हे यह हरिपुर में सात १८०८ चेच कृष्ण १ को पुरोहित मनसाराम ने लिखो थी । गन्यमार ने यद्यपि आदि के छप्पयो में “वीरसिंह" राजा की स्तुति की है किन्तु छठे और सातवे छप्पय में 'राम" "अमरेश" की स्तुति से मिल जाने से यह ऐतिहासिक तागा कच्चा मालूम देता है । कदाचित भूपण प्रभृति चार भाइयो में से यह नीलकण्ठ है। No-वरनातक और रानमक प्रश्न Verse Substance -- country made paper Lcaves-9 Size-4x8 inches Lines-11 on a page blohns Appearance-ordinary Complete Gentrally incorrect. Character- Devangart Place of depositBhatia Divákar Rija Galera district Kangri Prilaga!ála and Ruijannika Prazne-A book on Hında Astrology The name of the author is not given. The manusernpt is dated Samrat 1744 (1687 AD Peginning-ठो स्वस्सियो गणेशायनम् । अथ पहनातक । दोहरा । जयि मुविन्द्र पितु गर्भ मा मृत पठर मयि हो । पुछे प्रश्न विचार के आदि अन्त कटु साई ॥१॥ नारि प्रभूतो कालि को विय भागनि धन धाम । मभ प्रकार विधि निषित दो वृतासक घरि Extent--185 Wrich OF INI JANI'SCHOT the नाम पर मनमा विन्द पने कदादालन तिचि रामरी दिन भानो नाममाया मीडिया परम लग गafrन्द्र निमिया गर्भ मे मा निल दोडकल प्रश्न विन्ददि को नाम निश्चय गाई ॥ ४ ॥ Int-पान ६ कट पुटप फुत्र नाम यिना पुन देष मिया पुष फलो যা যা যা কাম মানি s এর জানা যাবি আ খ বিলে বসে पानी येॉट मष्टा मत यात ८ चन्दम गरि गुम दृष्टि प्रापं नि मापू हटा यि काय न मृवित धारा ८पशु पगा धन प्रे का भूगडेगु यहा कम मानियो येथेट प्रश्न गरि तिमी रामक प्रान II गुम । म. ९८४४ फागुन यदि पुलिया। Street-फलियाति का है। Note -पता का राधा टपके ममम का पना नहीं 1 प्रति मे यह नोटिस की गई है याद गया १०४४ को लिनी। No 3-ostrym l'errr Sallandse wintry tasule raket leave—3 S12-8.5 inchta. Ianiy-19 on ATue Iront-Satirkni AwarRION -w_Incomplete Inorrect Charuter-Drns, art. Place orderritory Bimeta Dhohara Riya, Muka, district hayari Privastart-Alok on rastyaka, writtenty fat antaerdan author an run of Syuhan in 1711 (1031 A.1)) Thi Bab * 1926) n Prynamury-दो म्यान श्री गायनम: स्य प्राय लियो । चोमा । नय पायेगमोम पदाने राण सागर केलाय मा श्रीगर गरकेनाम की पी गया पोला भाडे मूठ न सोया पडा चेद अनेक कधीमर मुनि नन माध मा नागा सा गया प्राग अगरी टुक नाटक नेप पर पवन पहारो इक लिप तीन चार मुण म घय रोकार दिपना मा पाकित का यि दानिमश्द एक नाभिक पानी फदा मपद टसो दुम्मा लामा रमानो र नाना तामे पत्तो चनी एक नाराक पार पधाम मन की पर अति विपन्न भएका तन को एक को रमायन माधे धारा या गाच न पाले प्राधी धारा एक मुपानी अम मे कदा पथ र सेतो धो क्न गाये पेय का भवता टोला । ममा पायो रमझा लिपया दो गुना महगोर यारे माहान दारुम मय मर टोहा: क भार पर पदसठा मन नगा का पार मारा कर ग्यारो मया विशम पद चानी इम पाछेदक योनी कदम न झूठा माचो ताला मिम पिर निपही पाद का दावाम भयन विषम भूपति नरपति गारदा घलया । ४. Int-दोटा । त्रिम रोगो का यन घटे रच ना ध्यान गिम रोगो परि पडिया मिरदिउठाया गेह । १० । दाहा । मुप पाला स्याम उपनामित्र मिलाना देन लिम रोगो ते पदद को तारा करोयोग । १० दाहा Stlyed -येशा का यन्य है । इन शोन एषा में येधन "रितु पोट" "कर्म तथ्य" और 'घर परी" लिया है। Astr-शात्परा के ममय में दिवरी सन् २०७५ मे, यिम्म १० १०११ (6) में पद सय लिया गया। . No.-अायक Imr Substance-country thade rmper Leaves- 18Sz-1-:.-.... 'ostokas Alkar ance-ner Place of degrosat -Datta XOTICES OF HINDI MAA USCRIPTS 7 Addtakro. Dealing with soine of tho principle of Vedentism by one Johans, who ined at Mathurn and composed this book in Samsat 1667 (1610 AD) when Jalingira was on the throne of Delhu The manuscript 18 dated Samrat 1712 (1657 A.D) Regarrang--स्वस्ति थी गणेशाय नमः । अष्टावक मोहन कृत लिप्यते । भोपाई। नमा प्रारमा सहम मनेही ।। परमानद प्रगट घर देही। पापा एक अनेक दिगयो । ठोर ठोर ले मनु विरमायो । सा ग्कु आप भूपाला । प्राय सरुन विरय भए वाला ॥ प्रापे युरप पाप हो नारी ॥ पाप मादि मिल कीन्ह चिन्हारो। End -दोहा । जो यह वाचे सो मुने ठप अमित तरङ्ग । मोहन भेटे भायता सहन सनेही सग । २०० ॥ चौपाई । सोलहसे सतमठा मुनाहा । साधन पडया बुध ठिन राहा महागोर अादित कर राजू । अपर तन पारन मिसाज । पइ रक को नहि समताई । रान मुनमु थिरु सदा रहाई ॥ पाप आप मग जो लिहि मारे । कोड काहू की नहीं चलाये । सभे पय मनही कर तारा ॥ भो सरता निधि मिलहिं अपारा । देस सल राने जो देदो जो मथुरा पुर कीय सनेहो । सदा नगर स्यो गुन हइ नाचा पिन अमिति मछि पके साचा । २०१॥ दोहा ॥ मोहन मथुरा महि बसे कोनो कथा घनाइ आप कप पुरन सकल समझो सहन मुभाइ ॥ २२ ॥ इति श्री सहन सनेही अष्टावक्र मेोहन कृत सपुगणे ॥ ॥रघुनाथ ॥ सबत् १०१४ प्रस्थान दो० सनि वासरे लिखित मिश्रि भगत राह विधीचन्द पाठयाय लेषक पाठकयो शुभ ॥ Sulyeet - रात्व विचार का अवैत वेदान्त, माया घाद प्रभृति के अनुकूल यन्थ हे ॥ Note:-जहागीर के समय में मथुरा में रह कर "माहन" ने (निनका उपनाम सहन सुनेहो प्रतीत होता है) सबत् १६६० में शायन को पडया को यह यन्य बनाया । यह प्रति स २०१४ आश्विन पदो को लिपो गई थी। 4 -66 No5-चण्डी चरिच Verse Substance-country made paper Leuves Siz0-81x5t inches Lines-15 on apage Extent-929 slokas Ag pearance-nes Complete. Correct. Character--Deranigari Place of deposit -Bhatta Divakara Rayas Library, Gulera district Kapuri Chandi Chartr. --Transition of the Dargi Patba by Guru Gobioda Singha (Born 1666) the tenth and the last guri (Padas āha) of the Sinhas. He wns a great soldier and composed good verses in Brajn bhåst The manuscript 18 dated Samrat 1880 (1823 A D) This book 19 divided into two parts called Chandi Charitra ukta vilás and Chandi Charitra Nátaka. Beginning -डॉ श्री गणेशायनमः ।ौं मगल भगवान विण मगल गरुडधप । मगल पुडरोका मगलायतनी हरी । डों श्री गणेशाय नम ॥ अथ चडा चरित्र उक्त विलास लिख्यते ॥ भागकृत कवि श्री गुरु गोविन्दसिंघ जी ॥ सयेया॥ आदि अपार अलेय अनम अकाल प्रभेष अलेप्य अनासा ॥ के शिव शति दर स्तुति चारि रजातम सत्त विह पुर बासा । दिवस निसा सास सूर के दीपक सृष्टि रची पचि तत प्रकाशा । घेर वटाई लराव मुरासुर श्रापहि देखत श्राप तमाशा ॥ १ ॥ Enal ---सवे राग काई ॥ तिसे सर्व पुग्यान कोप न होइ ५ १० देहरा ने वेतुन ध्यान को नित उठि ध्येहे सत । प्रति लहगे मुकत फल पावहिो भगवत IP थी मारकडे पुराणे यो पंडो चरिष नाटक उसतति घरनन नाम अशमा ।
8 XOTICES OF NIDI NANOSCRIPT> मनसरा का मपुरणं मम १ १६0 1 फागुण गुठी । पप्रमो विधार मनासो : २०लियन राजाराम पडिा करमोरी । पठनार्य देशोदन नामठ माता गाम्नान ॥ भाद्वानोगा। शुभमस्तु । श्री राम राम जी । Sulyrict -याम्तत्र में ये दो यन्य है-"घडी चार टक्त पिन्नाम" और "मंडो चरित्र नाटक" । सन्यकार एकही प्रतीत होता है 1 नाटक का अादि यो । नगन चन्द्र । महिण्य देत मूरयं घट्यो मुनार पुरय । मुदेवराज चीर । पिलाकरातकोतय । भजे मुद्र- धता तात्र दोष के मधे । .... या भी अध्यायों का क्रम और नाम मादी है। Note --यन्य बनने के समय का पता नही लगा, किन्तु गुरु गोविन्दमिद श्री इसके रचयिता हे निनका मम मन् १९६६ में हुआ था। यह प्रति एयर ९८८० फाल्गुण मृदो मम्मो रयियार को लिखी गई यो । NoC-मिहासनगतीमो l'erse Substance - country made mper Leaves-124 Size -~8x51 tnches, Lenee-20 on a page. Extent -2822 blokas Appearance - new Incomplete Generally cornet Character Devanigrl. Place of deposit-Bhatta Dirahara Raya's Library, Gulera, tus trict Kangol Sinhdsann Baltisi -Thirty two stories told to Bhoja The name of the author appears to be one Ganga Kima. Tngnrung-टों श्री गयोशायनमः । ॐ अथ मिहासनयतीमी निपते । दादा शिव मुरा को प्रनया मदा करष्ट्र सोम नियाई । मिया श्रादि देवी चपो मन यरदानी माई । सिहि प्रसाद कयनों करो हर्प चित्त टपजाई । नालकठ पिय घरय मुरा विक्रम को नए गाई । चापई । दक्षिण देश उजेनी नगगे। End ---बापरे । मुनहु भान इध विक्रम कीनो ॥ पर कारन को इह बात लोनी में सब रिक्रम अपने ग्रह गयो । द्विज अपने यह मुख मा भया । धन धन राजा पर टपकारी॥ मत वृत्त को देही धागे । विक्रम समजा करणो काने । तरह मिहासन पर पग दोजे । सँइमा परी बोल मुनायो । गगा राम प्रगट बमु गायो । इति रिझम मधनी यासयों कथा मपुरीम् ॥ शुभम् । Sutject--पुतलियों द्वारा कहा गई ३२ कया की मुममिद मिहामन घतोसी का अनुवाद ॥ Note- कुछ पता नहीं चलता । ग्यकार का नाम गगाराम प्रतीत होता है। No.7 कनक मधुरो Perre Substance-country mvie paper Laases Size -71x5 inches Lines-21 on a piger Extent - 484 $10.us Appearance-oll Coinpluth Generally incorrect. Character - Dovanigari Place of deposit.-Bhatta Drákara Hiya's Library, Galers, distret Kingri Kirencada I in ori — The story of Kanals Janjarl, wife of Dhans Dhura, a merchant of Ratnaparth. It is a love story describing the un successful attempts Rajkumárn to seluce her in tho aliserico of lier lusland The name of thit author i Két Rima slowrote it for Rajkunára Lachstri Chand. The exact date of the compwsition of the bok 29 not giren but it must lare ken compared between 102 and mA.D as the poet makes mentors of Tulss Disa, who NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 9 ... - - 1 died in 1623 A.D, and as the date of fnanuseript is Samvat 1834 (1777 AD) Probably be 19 tho kime Kau Ráma whom Dr Grierson mentions to hare been born in 1658 A.D and to have attended the court of Nizamat Khan, Subedar of Aurangazeb Beginning -श्री गणेशायनमः अध कनक मनरो कथा कवि कासो राम कृत लिखित उप मागुडा । दोहा । गनपति गोविन्द गुरु चरन सेई मुपति उपनाई । भजन ॥ भरोसे शती के कविता रचित बनाई १॥ छ । विदित वीर पृधीराज रान दिल्ली थिर थप्यो। रोपान अधकार बंदी वर चन्द समप्यो । आठ अधक सत एक सग सामत सजत नर । सुभट जोसरनौर विमन कोरा मुकरि अंघर । सपहुचक भान चौहान कुलु सेज भान सुन गयो । मृगया विमोद चहू कोद बस चमु वितरन सुप भुगयो । २ ॥ दोहा । विधि यसठि (ली १) तपत तजि समरप पत जगाई । कोयो राज राजो कोए उतम घरन बनाई २॥ उमराई गई निजि हे रहो रनाई राजि ॥ ३ ॥ छुद्र दमन छोनी छमी हिति वि चिन्हें मुहाई ॥ ५ ॥ कवितु । राजा होत जब तक जानिए रजाई वडो राई भए राई ही को कोरत पति हे । राजा शेत नानिय रनाई समरूप को न भूपर अनूप जिह महिमा पति है। देदे मराई दिलिपस दिल जोई करे सहाई पास दर में वति है । (पृष्ट २) नाहि माहि पदयो को चो चक्षुआन अव ताहि ताहि पदवी मु प्रापही धातु है ॥ ३ ॥ Lnd -दोटरा । मुक सारिक सब सुप रहे साह जोर कर कंन । नप घूमे निजु नारि के लागे टर अनुरंज । हिलि मिलि विधा विरह को मेटी । भुन भर कनक मंजरी भेटी । करी केन बहु विधि मन भाई ॥ निरख लत्रात काम रति राई । उतम चरित्र कथा मुनो कुकर मु लक्ष्मीचंद ॥ कविता फासोराम को कोनो अमद ॥ पानिराज सिर पाउ दे आदर सहित समान । घरपासन बहु भूमि दे वसि यकही सनमान ॥ इति श्री महाराज सुमार लघमीचन्द विरचितं कवि कासिराम उतम चरित कनक मजरी कथा समाप्तं शुभं । लोपतं उय सागुडा सर्मणे प्रसाद काय अदर्श प्रति । समत नृपति १८३४ ॥ Subyect.- रतन में धन धीर साह को कनकमजरी स्त्री थी। जब माह समुद्र याण को गया तो एक तोता और सारिका उसको वहलाते थे । एक र स्नान करती धेर काफ उसका हार ले उहा । उसे देख कर राजकुमार श्रासक्त हो गया और कई चतुर दतिया में से एक चतुर अनूप दुती उसे ढूढने चलो। यह भिक्षा मागने भाई और दुःखिनी से भीख न लेने के मिस उसके पति के प्रयास का हाल कनक मजरी मे जान गई । दूसरे दिन पान मिठाई बाटने लगी। कनक मवरी के पक्षने पर उसने चिन्ताहर की पुत्रा करनेवाली एक तपस्विनो का प्रसाद बताया और उसे चिन्ताहर की पूजा में मारे में मिलने का मासा दिया । सारिका ने रोका किन्तु फटकारी गई । दूसरे दिन एक और दूतो को तपस्विनी घनाकर पूजा को ले जाने का विचार किया । सारिका सलाह देते पीटी गई, झूठे प्राप्त फोडने का मिस किया । पूजा को तयार होने पर तोते ने महायर डाल दिया और कनक मंत्ररी को रजस्वला बताकर पाच दिन ठहराया । पाचरें दिन- चिन्ता हर मठ मे नाई बसे । मान भावना के मग लो। पीया गए न द्वारका, पदरी गए न कीर। भान मायना में मिने, सुनसो से रघुधीर । कह कर घर में पत्रा कराई। तोते ने अपनी घ्याध तथा विद्वान के घर रहने को कथा कह कर फुसगति और जल्दबाजी का धुरा परिणाम यताया । फिर न पनप भार तो चिन्ताहर पटमाही बहने वाली 3 10 NOTICES OF INDI MANUSCRIPTS - सनक मरी में यहस में हार कर राजकुमार की सलाह से एक नात्र यनया लाई । सारिका ने अपने दृष्टान्त से उस पर चढ़ने से रोका | फिर सिदनपुर को मात्र ले साने की डोही राजकुमार ने मिट्याई । अनूप ने कना को पति के पास जाने को तयार किया किन्तु जागी यो पारिका ने छींक मार कर रोक दिया । माए कार के पाने को पवर ठहरो घो राजकुमार अक्षर की गवाही मे कनक को कलङ्किरा करने की धमकी दो फिन्तु तोला धार को ले सड पाया । दूसी यो नाक कान काटे गए । प्रेमिक प्रेमिका मिले । Note--यह प्रति म० १८६४ में लिखी गई है। काशीराम ने राजकुमार तम्मीचंद धो लिये यह बनाई थी, और टन्होमे इसका पुरस्कार पाया था । भाषा कुछ पुरानी है।दोहा को टाल भो पुरानो हे । सम्भव है कि इस कथा के 'राजकुमार' और पृथ्योराप के पंश के "मृगया यिनोद" राना और लम्मोचन्द में कार सम्बन्ध हो। कई शब्दों के लिहाज से पद कधि इस देश का भी हो सकता है। No 8 -- more Verse Substanca country made paper Leaves - 24 Sza-stx4 inches. Lines--13 on a sage. Extent-253 alokas Appear. ance-new Complete Incorrect. Character--Devanagari. Place of depornt- Bhatta Divakara Raya's Library, Gulera, dutrict Kángt4 Yoga Pasuta -An abstract translation of Yoga Vásista The data of the author is not given. The date of the manuscript u probably Sanvat 1714 (1657 AD), as it is bound in the same volume which contains other manuscripts written in that year Begunring -स्वस्ति श्री गयो शायनमः । येग मिट लिप्यते । दो दिसा कान निरतर भु बसे पूर्ण ब्रह्म काम घट घट माहि है । पाप हो से आम पाप मुहारमा । नम्सकार करि ताको सोनु निगायणा ॥ १॥ है। यव्य केसे मुक्त से मरो नाहि सयोग । मा अति मर्प ना चतुर यह सास्तु निहियोगु ॥ २ ॥ End.-काष्ट महि तो पतरो मदा निरतर यामु । त्यो सग सदा अध्यक्त ते मने सने परकाम् ॥ ३० ॥ ने सागर से लहर लहरो होइन नामु से सम भगु मून ते सूने माहि समाइ । ३१ । इति श्री योग यसिष्ठ को भाया दसम प्रकरण समान । १०३ Subject --रामचन्द्र और घसिष्ठ के सम्वाद रूप से जगत् को तन्य विवेचना के वन्य योगवासिष्ठ का सधिन अनुवाद १० प्रकरण में है। Note -पन्थकार का नाम नहीं मिलता। न ममयही है । यद्यपि यन्यान्त में प्रति को तारोख नहीं दो है तथापि दमो गाय में, 'अष्टावक, गोला है प्रो. प १०१४ को लिखी हुई है। No-रामायण Versc. Substance-English made paper Leaves-- 253 Sira-131x5} inches Linos-- 9 on & sage. Extcat - 4,705 blokas Amearance-new_Complete Generally incorrect. Character-Deranigart. Place of deposit -The Labrary of the Mabiriji of Benares, Remdyana -- The story of Ramachandra by Gomaţi Disa Varagi at Avadba The book was written in Samrat 1915 (1858 A.D) and the mantu. script copy was mule In Samvat 1921 22 (1864 65 A.D) BeguNAIm-बालकांड प्रारम्भ था मते रामानुनायनम' । चारठा । गन नायक सय गुन सदन । बुद्धि राम मुभ यानि । अम तुम देश अनादि । सास्त्र का परमान ।
NOTICES OF NIRDI MANUSCRIPTS. 11 - १४चोपाई ॥ सकर मुत सब को सुप दाता गयर तनय कौति विप्याता से अब कृपा करो लघुनानि । सीतापति कोरति मन मानि । समर सरोस और हित नाहि ॥ उमा यो सहित बसेा उर माहि ॥ सब प्रकार अपना माहि जाना ॥ रघुपति चरित मार मन मानो । सो अब प्रभु को वात ननाईउ । राम चरन फिर फिर सिर नार्दउ ॥ ब्रह्मादिश सनकादिक गाये । सो मुनि के सुप सतन पाये । जा मुनि चित मार अय लाग्यो । कीजिये कृपा तो होहु समाग्यो । सेस सारदा रोटु दयाला ॥ नारद सहित करो प्रतिपाला ॥ पुनि जो सवे रिपिन सिर नाऊ । सोतापति कोरति अब गाऊ । गुर अन दयाल सहितकारी ॥ रघुपति चरन कोयो अधिकारी । दोहा । सीतापति मन में बसे लपन लान हित नानि । नुमत अव अनुकूल है । मो में करत वानि ॥ ३ ॥ सघत उनईम मे पचदस । श्रायन वितिया नानि ॥ शुरु पछ गुरघार को राम चरित वारो गान ॥ ४ ॥ सर मुरग की सिठि है । अधि नित्य मुष धाम ॥ गोमतीदास विचार के । कोनो वहां विमराम ॥ ५ ॥ End -सोरठा । गोमतोदास यिवार ॥ रघुपति जस गावत भये ॥ उतर को है सार । मानो अति कन्याम मे । अभ्यागत अब जानि । रहते सर्जू निट में 1 सतन कोन प्रमान ॥ दोन नानि अपनो करो । मोतो सावन यदी ॥ १२ ॥ सरत ॥ ५६२२ ॥ Subject -श्री रामचन्द्र का इतिहास । Note -ययतो गोमतीदास वैरागी अपधवासो। निर्माण काल सपत् १६१५ यापण शुरु ३ गुरुवार । लिपिकाल संवत् १९२२ सावन पदो १२ । paper . No 10-रामचरित मानस मुक्तावली Prose Substance -country mado Leaves-488 Size-14x7 inches Lanes-15 on a page Extent -~27,020 slokas. Appearance-somewhat old Incomplete Generally correct Character - Deranagari Place of deposit-The Library of the Afah rays of Benares. Ramacharta manasa sulldrall - Annotations on the Ramacharita minaga of Tulst Disa by some disciple of Sıralala Pathaka The manuscript copy was made by sereral persons. The first book was written in 1890 (1833 A D) and the other books were written in 1915 (1858 A D) Beginnang-चालकांड मगलाचरण ॥ श्री ज्ञानकी बल्लभाय नम ॥ श्री गुरुचरण कमलभ्यो नम ॥ श्री मुमित्रा नदनी नर्यात । चो० ॥ श्री गुरु चरण सरोज प्रणामा । अभि मत फल दायक अभिरामा ॥ जो जग सफल मुकृत कर टोका । जेहि कीन्हे सब हो कर नीका ॥ १॥ (इसी प्रकार दो पत्रे तक हे तीसरे पत्र में कुछ व्याख्या सहित गोसाई जी के श्लोक पानामार्थ इत्यादि, फिर चतुर्थ पचे से गोसाई जी के सोरठे को टीका है) येहि मुमिरत सिधि होइ इत्यादि । १ ॥ श्री रामायनमः टोका । यह मुमिरत सिधि होइ । यहि देयता के मुमिरत मात्र सिद्धि होति है ॥ गन नायक जो आपु येश्वर्य से गन नायक कहे । करि पर बदन फेरि आप स्वरूप सो करियर बदन है । पुद्धि गसि । फेरि जो आपु स्वभाव से बुद्धि के रासि हे। End.-कोश या सुत पव देव सदसो दोव्यर्द्धनादोत' कोतुस्वाचीत रूप सील मुमकन्यधने साधने । सोमोगेतरतोथ सत् समनश्चेतेपिसे पुनोता ॥ सानोकोजन के स्वरेण सहित' साकेतनायोपिस । ३ । नतिरमितमहोम्ने येद दुर्गय सीने सोष कधीत गरीने कोसलेन्द्रारमनाया । अनदिनमधि राष कोटिमेनतसो घा मम पचन XOTICES OF HIYDI HALSCR TT. मनाभ्यामस्तु कायेन चापि ॥ ४॥ संवत 11 १६१५ : पुम मा कृष्ण पने द्वीतीयो युध पारे लोगित समागम । श्रीगम पृट की योगी सर झाइ समान मर्म मान दुभो के रोज धुध के सन १२६६ साल माह । Sayeet.-श्री सुलभीकरा मणि मानस पर टीका । Note-टोकामार अपने नाम के विषय में सर्वत्र यो लिषत कि यो जानकी रमपंचरणमा शिवन्नान पाठक के शिमो शिष्य " कुन कांड एक व्यक्ति के लि महो मान पहते, पहिला फाह मवर १० का निमा और गेप कांड १६१५ में लिखे है। Lapar Leares No11श्मिणी मगल Verse Substanco-country tnate Size - 91XG} ches. Li 19-21 08 a page rstunt-atokes Appearance-oll. Amplcte Correct. Caracter.hathi Place of deposit - Library of tlic Mahirijs of Banáras. Rulmutnapales-The story f the ranrriage of Rukmint asta Knops by Marahari Bhita. Ho aprol ably the same Naral an/1550 AD) who attend ed the Court of Allar and who scoring ta trad 1100 was instrumcatala inducing Akbar to put a stop to con ilung in Le Rig Beginng-श्री गणेशायनम । प्रथमहि लीने नाम पाम निधि पाइये । गनपत्ति गोरि मनाद मे मगन गाइये । ने सारद को नाम मा प्रिधिदि मनाइये । मुर नर मुनि गनदेय तो लगा पादये । भूपति भापम राड से जुदन घर बसे । साझा कया रुक मिनि म तिर EN-चन्द । सारे नो मुलु मब मासि अपने कहे मुने जो गाई । कन्धान काज विवाह मगल सदा मुख पाद कया परम पुनोत ममुकाम ना करि चिरा लाइया । माहरि महा मा पा र विवि परम पद का पारा शुभमस्त इति श्री रुकुमिनो मगल नरहरि भाट विरचिा समाप्त शुभमस्तु रस्तु । 5 yect -श्री किरणो कृष्ण विवाद वरान । Nae -प्रयकता कधि नरहरि भाट हे । इनका पिन कुछ पता नहीं है। Not-यालमुकुन्द लोला Ferse. Substance - antay kazdu paper LERTER-107 Size -10xsi rnches. Lines-20na page Estent-2250 Alokas Appearance-orul gary Incomplete Generally correct Character -D vanigart. Place of depost-Library of the NMahiraja or Bantras Bdlanıkunda Lild The translation of the first half of the tenth canto of Bhigarat dealing with the life of Knsga Cendra ly one Bhisania Kart Beginnng-यो रामायनम श्री गणेशायनम रनोका । हरय प्राणरत्य मार्ग भाता दिग्द प्रस्फुट विश्वमार गजेन्द्रवदन लोदर मुन्दर । परोह यदुनदनस्य चरित विषयदाकर्षमात्मा मुमाप्ति नितरां सदाभपातयते । १ (मो प्रकार दो पक्षों में मालावर के १९ श्लोक हे रहीं में कुछ महारास मोरवडमिह का भी वर्णन है उसके पो माया कथिता है) कवित । दटक । योदि घलका अलकत पाल विधु माल मेंदुर मत मानो मामा बोर वेट को । भद जल भरा लसा पलिवृन्द मुड कुडली करत मन TO महेस को ! मीयम भनत पेशा ध्यान भी धरत नर लेम न रहत उर कुमति कनस को सांकर पवाया सकल विद दाय: समय मुभ सत्य गतिये गनेस को NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 18 End -वाजि विचित्र विचार के कान्ह से धाइ कहो जय गोप कुमारन ॥ प्रातुर ताहि सहा लघि के वटिवे को लगे हरि व्योत विचारन ॥ पीठ पे कामरी ज्या वरि के चढि के चित चाहे कसाइनि मारन । त्यो गहि गास अकास चल्यो पल के छल कान्ह को दूरि अडारन । ६. दोहा । म परि घनस्याम तव ताके मुख भुन मेलि लिये काढि प्रता. घरी गयो केचियो पेलि ताहिमा (भागे पत्र हो नहीं है) Subject - पूर्वार्द्ध दशम मागरत मे श्री कृष्ण लीला। Note -पथकता कान भीपन है। .. .. .. - No 13-a18 wam Verse. Substanco-country made paper Leaves Sizo---7x3 inches Lanes —7 on a page Extent-208 Blokes Aprecranco ordinary Complete Incorrect. Character - - Devanagari Place of deposito-Library of the Maharaja of Bantras Dahusartanga ---Praises of the monkey god Hanamina by the celebrated Tulst Disa (Died 1623 AD) The manuscript is dated Samvat 1882 (1825 A.D) Beguaning --श्री गणेशायनमः अथ पादुसर्याग गात पिर मोचना ॥ दोहा ॥ श्री रघुगोर नाम करि सहित लपन हनुमान । गपि हिदे विस्वास दिठ पुनि पुनि करे। मनाम ॥ १॥ भीमगर पादिक पढे जो नर सहित सनेह ॥ ज संकट या नहि बाढ़े भुप धन मेह ॥ २ ॥ मुचि पनेह पठहिं नर निरुज गात बलगन ॥ होद हे रख सुनसो पद नस पर सब ठाम ॥ ३ ॥ कनित्त । नो गम कृपालु विराजत मध्य महा अनि धाम गद्दे धनुयाना वाम दिसा महिला मुठि मुन्दरि ददिन और लपन वनगना ॥ धामर पान लिये प्रभु के ढोग याये सने हनुमाना । तुनसो हिदे धर ध्यान सदा भ्रम समय त्यागि को परिमाना। ४॥ Ind-राम नाम पितु वधु सनन गुम पुज्य परमहित । माहेर सपा मुनान नेह नाते पुमोरा थित । देस कोस परि कर घरनि धन धाम धरम गति ॥ रान कान मय सान राजरा समान अति । स्वास्थ परमारय समन मुलभ राम ते अमित फन । कह तुलसिदास अब सन दिनाह एक राम ते मार मल ॥ ५॥ अथ मच टो हरि मर्कट मर्कटाय स्वाहा इति मम ॥ इति श्री घाटुसरोग तुलसीदास कृत हनुमान स्तोत्र सपूर्णम् ॥ सयत् १८८२ मिती वेशाय कृपा नाम्याम् । चन्द्र यासरे मुभमस्तु । दसघत सोयरतन पांडे भूइलो याम ॥ Sulyeet -हनुमान मो का सोच । Note -श्री गोस्वामी तुलमीदास जो कृत है । लिपिकाल मत् १८८२ येणार कृप्य चन्द्रवार No14-कायफलाधर Verse Substacco country made paper Leareg-105 Siza-8x4 inches. Lines - 20 on a page Extent-2560 blokas. Apresiace old. Complete. Incorrect. Character-Duranagari Placa of deposit-Labrary of the Vaharaja of Banárss. Künyala'ddhara-A book on Ilındı rhetoric by Raghunitha Bandejans, who was tho court poct of Valuersja Barisanda Singh of Banáras. He composed tha hoon n Samrat 1502 (1745 A.D) Tho manuscript is dated Samrat 1835 (78AD) (See No 15) NOTICES OF ITIVDI NUscrirts .. .. . . .. Deganrang--भोगगोशायनमः । दोहा । मुफल होति मम कामना मिटा विपन से टुंद । गुन मामता बरगत हरप मुमिग्य लालमुकुद । १॥ कवित॥ अये धर्म काम माध कई कवि रघुनाथ चारि र पदारय महनदी में लहिरे रिहि मिद्धि द्धि को शिरिद होति दिन दिन विद्या और धल वियसाय ने ध्यो चहिने मासो प्रति लग कोरति पटा मुष मानिए कार चाम मेोद महा गहिथे । तरन के मुरा को यमाति है न कर नहा गुर के घरन को सरन बाद रहो। भारत में वैविक मया सर मुषसार । काथ्य कलायर को भया कातिक मे अपसार २५ स0 1 4200 कार्तिक Ent-मोटादस लइन । दोहा । पाहि गुर लोग की दरसन वा दिनप्रीत भीत मग घरजिये हाथ सो मोटाइन । २१४ । उदाहरने यथा । रोरो रोगी मदा अम तोहि हितू ना अपर लेपो । तेरो कही में करोगो मदा अरु तो सपकार हिय अवयो। पातु रहो न मुन्यो जब मे रघुनाथ हे। गेह के वासनि भेपी । ते उपाइ मनो करिये कछु मेरी गली हरि आये में देणे ॥ २९५ ॥ यो कयि रघुनाथ बंदोलन कासी निवासी शिरदिने काय्य कलाधर विमाय अनुभाय सवारी अस्याई नयरस हात्र वर्णन नाम चतुर्दस मापः ॥ १४ ॥ मुभमस्त सवत् १८३५ मिती आसनो मासे मुकुल परे गुरु यार के मपुरना । Sulyeet-नायिका भेद अलंकार आदि। Note -Touी बदोजन करि रघुनाय है । ये महाराज यरिवडासह को प्राधिरा थे। गन्य मा निर्माणकाल कार्तिक मया १८०२ और लिपिकात आश्विन शुमा ४ गुरयार सबत् १८३५ है। ॥ No 15-श्री राधा कृप्या बिलास T'erse Substance - country.made paper Leares-120 Size-11x5 inches. Lines-8 on a page. Extent- 2 500 klokas Appearance-old. Incomplete. Correct. Charncter-Derani. gari. Place of deposit-Labrary of the Mahirkja of Bantras. Sri Ridha kriina Ilds --A book on Hindi rhetoric with special refercnce to the description of the beauty of Ridhi and Krişne. The name of the suthor Is Gohalanatha (see No 2 of 1900), who was the son of Rightenstha Bandijana. Gokulanátha was appointed Superintendent of the Charity Department by Maharaja Bariranda Şinghe, and when later on Pinhardji dita Nirayana Singha succeeded, he wrote this book in Samrat 1859 (1801 A.D) with his pertusnon The Baniras Raj family 18sid to have been founded by one Manask Rima, who by his intelligence and eraft, succeeded in wianing over the thes Nawibof Avadha The manuseript as dated SATOTAL 1860 (1803 AD) Rguaning-यो गणेशायनमः । श्री विन्ध्याचलनिवासिन्ये नमः । सिदुर भरो भुमुई एक दर सोहे मानो नस मगदीस नाको दोसे वडो, रती को रिहि लय सिद्धि सणं सुमति समृद्धि लए लवादर लाना हे सदन सरस्वतो को चारो फलदायक सहायक माकरे को भेदो चरन द मा महा मति को गोकुल कदत महादेव को सहायता के गनमुष चंद्रमाल लाल पारवतो को पम् भर पा विधु माधय मा अमद | पंथ को प्रारम लहिं पनी पुरन चंद ८६ Ent-सोरठा-नोची लेहु सभारि कोऊ किनारो को करता यष्टुन निसि अधियारि हरबराद इसनो पनी १८ मोटाहा लान । समुपदि गुरुनाग को दामन चाहा चित्ता मोति .. .. .
NOTICES OF HINDI JANUSCRIPTS 15 भोति मग वानिएं हाय सो माट्टाइत २० यथा-नद को लाल नसोदा को नदन चंदन से सिगरो जगती को। दुनिफदन ददन रापा देयतही बनके मनही को । गोकुलनाथ हे साथ सखाना कालिंदोपे चित चोरन ती को। पाय परे चलि आय देषाय दे सामरे रंग को डायरी नोको १४ सोरठा ।री सखि मोहि देयाय यह नदन नटराय को । लपरा मारि चलि जाय लाल निगोही चपनते २१ इति श्री कपि गोकुलनाथ फासीनिवासी विरचिते राधाकृष्ण बिलासे हाय यनंन नाम द्वादसा पिलास: १२ श्री' सवत् १८६० मिती थापण मासे कृष्या पो पचम्या युध यासरे नोः सुभमस्तु कल्यानरस्तु ग्रंथ श्लोक सण्या २५०० यी विन्ध्याचलनिया. सिन्यै नमः ठो नमो सूर्य नमः ॥ Subject. श्री राधा कृष्ण परिष सयुक्त नायिका दाप भावादि घर्यन का काव्ययाय ॥ Note -पन्यकता कवि गोकुलनाथ काशी निवासी है-ये रघुनाथ कवि के पुत्र थे जो महारान काशीराज मसारामजी के समय में यहां पाए और उनके पाम रहे । फिर महाराज सिद्ध के समय में कवि गोकुलनाथ को दानाध्यक्ष का अधिकार मिला और फिर जब महाराज उदिरानरायणसिद रानपदाधिकारी हुए तब उनकी पाधा से यह यन्य उन्होंने धनाया निर्माण काल १८५६ चेष शुक्र १५ और लिपिकाल स १८६० श्रावण कृष्ण ५ युधधार है। No 16-मानप्रदीप Verse Substance - Toolscap paper Leares -7 Size-9 x 5 inches Lines-9 on a page Extent--125 blokas. Appearanceold. Complete Incorrect Character - Devanagari Place of deposit Library of the Maharaja of Bandras Gydna Pradipa — Praises of God by Gangt Rima Tripathf, who wrote tus book in Samrat 1846 (1789 AD) The manuscript as dated Samvat 1857 (1800 AD) Beginning -श्री गणेशायनमः । कुंडलिया । गत मन मोहन मुदित श्रीधन स्याम स्वरूप ॥ पोत वपन भृकुटो कसन सुदर हसन अनूप ॥ सुदर हसन अनूप रूप अति उतम छाने । मनु तागगन गोपि मध्य मुष चन्द्र विराजे । सेवक मुलभ दयाल नाम करुणा निधि छाजत । कृष्णचद वगदीश माधुरी मूरति राजत ॥ दोहा । यो घृन्दावन रयन प्रभु कृष्णचंद नद नन्द । चरन कमल युग यदि रज करो दूरि दुख दद ॥ End -कुडलिया ॥ गंगाराम चिपाठि ट्विन मालवीय विख्यात । को हो ज्ञानदीप यर विमल पन्थ प्रयदात ॥ विमान यन्ध श्रपदात जहा हार भनन निरसर । कोही मति मति छद नाम लीन्हो बिनु अतर । नाते कोनिहु भाति होय हरि भजन प्रसगा। ध्यायो सो हरि चरन नहाते प्रगटी गगा ॥ दोहा । अष्टादश शत पर अधिक शालिस सवत् माह । भयो यन्य भादो मुदी चतुर्दशी गुरु काह ॥ इति श्री गगागम कृत भाषा ज्ञानप्रदीप समान ए सवत् १८५० कातिक मुदी चंद्र ॥ Subject -भगवद्वान । Note -कता गगाराम त्रिपाठी मालवीय है। निर्माणकाल सवत् १८४६ भादो मुदो १४ गुरुधार और लिपिकाल सरत् १८५० कातिक मुदी १ चद्धार है। No 17-पानदाम्बुनिधि Verse Substance - Sivarampur made paper Leaves-688 Size-17x51 inches Lines -- 10 on a page Extent --28,350 blokas. Appearance-new Complete Generaly correct Character-Dera någari Place of deposit-Labrary of the Blahárája of Banáras 16 NOTICES OF DIVOR KANOSARIPIS deandambunilhi - Translation of the Bhagarat Puritn hy Mahiriya Raghunija Singha of Rewab, who completed it in Sumrat 1911 (1851 AD) Ho trok four years in completing this traaslation Degmang--शी गायनात भय सिद्ध श्री महाराजाविपत थो महाराणा श्री रासायहादुर मोकणचद्र पापाशविकारी रघुरासिंदजूदेव का शानदश्युनिधि लिप्यतो । गोरठा जप धरिषद अरविद मक्त मृग मानद कर । यहा मुनम ममद मुमति फरता ताप पर १ छ । भष मय मनन करन पुर मन काम सनन के । तीर्थास्पद शिघि गंमु यद्य मुनि योग्य मभन के । प्रनसपान मयमिघु पास हि मुर मुनि गायें । माको सेवा दोड भक्तनन मुक्ति न सायं । कलि कुमति दरन अपरन मरन भक्ति भरन मुख पद नरना मान दरन प्रापद घान या यो खबर चरन र दोहा । समि मुर दुरनम मपदा पिसु मापन धरि सीस। दिन को हों। धन को गमन जयति राम अगदोस । ययिता भार ते पोहित म को रिलोकि के ने प्रगटे मयुरा में मुरारी लोला भनत करी पत्र में दुषदाई अनेकन मारि मुरारी द्वारका या मथुरा में बसे प्रमु दामन को सन माति मुधा पटुनदन के पद वदत हे रात्र एदे मुखकारी ११० Erl-दोहा। यद मुप मे किमि कहि सको पिनु धिमुनाव प्रभाउ। मामु फुमा मधु सम रथयो य य भरिधाउ ६ धाराई । मुटु प्रमुटु भयो नो रोई। मुमति मुधारि निहो मन कोई। मे भगत सब लोरयो तेहि भगुन भाषा करि दोहयो २ रिवाछु अ भारत अादी । पोषु यदुत पुराम माजादी ३ गर्ग संहिता पादिक शे। कया रुची हाको मति मागे ४ कह कहु लेहि पनमय विचारों में लिपि दियो मुमति अनुहारो कृष्ण चरिरा अति मुण्द विचारी भनर मुमति यह यिनय हमारी ६ मे प्रति करिन मनाह टिठाई । को कछु धन्यो सो दियो धनाई ० पे श्रम मन में अहे भरोमरि मठ गुनि काउ फरी न रोम ८ एलन प्रीति महिला मुद माई । दानंद अधि गहि नाई पठे मुने सो प्रीति समेत । मापात दास समार समेत १० सिनग वधु रे मोर प्रनामा! मोगर पा करदि मत्ति धामा ११ टेरि हरिहि यह विनय मुनाई। रघुरापदि लोजे अपनाई १० दोहा । जय रघुपति टुपसि पति रघुनदन अनुराल । मेो मन अपने यस करहु विने करस रघुरा१० इति सिद्धि प्रामन्मद्वारा धिरान वाधवेस चिरचनाय सिहारमन सिदिची ममहाराजाधिरान यो मदाराणामी रामा वधादुर श्री कृष्णचन्द्र कृयायापाधिकारि रघुरारसिंह कते आनंदाम्बुनियो समान मुभमस्तु bulyeet -श्रीमद्भागवस के द्वादश कथा का इन्देष्यद्ध अनुमाद । Note:-- यकता महाराज रघुपमिच रोपाधिपति है। निमे इस पुस्तक का प्रादि में लिण समका नाम हनुमान है। ये महायज्ञ के मसी के धन । निमाएकाल-सयत अनइट से मुपधारन । साल जल को श्रम मुहावन hire मास अरहि कोनो मानद अनुचि यथ नगेनो श्चत घीतिगे वापदि चारो।किया क्रमा कार पार गरी १० ओनस से ग्यारह को साला । पुस मात्र गुस्वार घिसाना ११ कृप्यपाल दसमो मुखदाई । धन की जब मकातिहि पाई १२ प्रानवअनिधिष्टि मुभ गया। जो मसन सतत सस पथा १३ तब यह पय समापस मम मम चांचित पान गय१४ दोहा। सत्य सत्य में कहत हो दोज हाय उठाय । मेरो नहि करतूति यह भव कोन्दी जण्य a No 18-21HGUIT ETEICIU Perte. Substance--country wade paper Leave--69 Suza11x6 inches Lips--12 on a page Extent-200 Slokas Appcoriaco De Complete Gencrally correct Character-Derantgart. Plass of depost-Library of the Tahirija of Banaras NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 17 śrmadbhágarat Jahatmya --Translation of an extract from the Padma Purina dealing with the virtues of reciting the Bhagavat by Mahírája Raghurája Singha of Rewah, who wroto it in Samvat 1911 (1854 A.D) Beginning -श्रीगणेशाय नमः । टोहा ॥ जेने रघुकुल कमल रयि जे राक्षस कुल काला जेजे भुघ भारा हरन नाल नाप नदलाल पजे बानी दानी मुमति जयति भयानो नद । जेजे पितु विसुनाथ पद ने हरि गुरू मुकुद २ जे मुक जो जनमत समे ज्ञान विज्ञानहि पाय । चल्यो कृष्ण ध्यावत मनहि लहो व्यास पछिबाय ३ पुष पुध कहि जाहि को गुहरावत मुनि नारा । सय पथन व्यापित भयो उता तरू दिय सात ४ से मुझ के जुग पद कमल मे धार के निज माय । श्री भागवत महात्म को बरनत हो मुद गाथ ५ मुदा पदुम पुरान के हे अध्याय चोवोस । ताको भाषा रचि मुपद पुर करौ नगदीस ६ची नीमपार छेहि यक कला । वेठे सोना बुद्धि विसाला १ कियो मूत प्रप्य मुपारी । कृष्ण कथा को मुनन विचारी ॥२॥ End –दोहा । मुनत भागवत सात दिन होती मुक्ति विसेपि । यामे भय परि. हिते सातो लोजे लेघि १ हरिमुष ते पटत भयो यह रस रूप पुरान । पाठ करत जो बन निते होस म सम भगवान २ सव रिद्धातन सार यह तुम से किया वपान छोडि भागवत जगत मे मुक्ति उपाइ न चान ३ ले प्रथहि असाध ते अरु द्वादस परजस । पान करहु रस भागया हे साना मतिमत ४ नारद रिघि भागवत के ब्रह्म बोज मतियान । भक्ति सक्ति बदहु ग्रहति नदुपति देव न पान ५ कोलक ग्यान विराग हे कृष्ण प्रीति विनियोग । यही मप पठि नारा है यदुपति पुर सब लोग ६ यह भागवत महात्म को मुने पढे चित लाय । सामु पाप जरि जारा हे अर्शस परमपद नाय रुद्र पड ससि सबते प्रमा मुर गुर वार । मास फाल्गुन भागवत भो महात्म अवतार ८ इति सिद्ध श्रीमन्महाराजा धिराम वायस विश्वनाथसिहात्मज सिद्ध श्री महाराजाधिराज श्री महाराजा बहादुर श्री कृष्णचन्द्र कृपापाचाधिकारि रघुराजसिह जू देष कृते पानावुनिधो पद्म पुरानीय नो भागयत मातात्मे पयोगिसस्तरग' ॥ २ ॥ श्रीभागवत महात्म सपूर्ण । Sulyeet -पदापुराणात श्रीमद्भागवत माहात्म्य का कविता में भाषानुवाद । Note -यह गन्ध महाराज रघुरानसिह रोवधिपति कृत्त है । निर्माण काल स १६११ फाल्गुण कृपा ३० शुक्र पार है। No 19-रामाश्यमेध Verse. Substance-country made paper Leaves -194 Size-127 x 6 inches. Lines-12 on a page Extent-6000 Blokas. Appearance-old Complete Incorrect Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Mahardja of Banárss Rumafroamedha.- Translation of the Pațla Khanda of Padma Puríns, dealing with the Horsc sacrifice by Ráma Chandra, Ling of Ajudhys. The name of the author 13 Hari Sahiya Giri of Mirzapur, who composed the book in Samvat 1859 (1802 A.D) The date of the manuscript is Sarurat 1600 (1803 AD) The author gives a detailed account of himself in the beginning of the book which has been quoted in full in the beginning" There are two copies of this book in this Library The second copy has 158 leaves and is 131x7inches in size. Beginning-यो गणेशायनमः । श्री गुरु धान कमलेभ्योनम श्री सीता रामाय नमः । श्री सिंशय नमः । श्री देश्य नमः । श्री हनुमादेवाय नम' । श्लोका लिप्यते । सालमनोरथदापीधारी जगतामुरमुरागध्या यिनसत्प्रत्यवाला घरदा विश्वरी न. 5 13 NOTICES OF UIYDI JIAYUSCRIPTS प्रति ॥ १ प्रोमदाम शिरोळ राममोपे विराजते । मिरिजापुरनामा पुर्य तु गिरिजा पुर । २ गंगा सटति विमलं गोभितं सनसकुलं । समग्रेग्ययंमपनं मनामना।। यष सन्यासिः सिद्धा यान्ति शियपुभकाः । भानिना निर्मणाः शानमा दाना भेदविवर्जितः। साबधा निर्मला पता यप सन्ति विरागिणः । शिय शक्ति रमाराममेदशानाभिश. रका । पाश्चापि शेराश्व शाक्ता गाशिका तथा : महात्मामो मदाधारा प्रवेपारः परस्परं : ग्रमायाः पथिका यत्र गुमवन्तश्व भरिणी मद्राम प्रमादायाः चन्द ब्रह्मनिरूपियः ॥ ६ ॥ धहुना फिमिदोक्तेन या प्राथमिशगया । या मर्च ययान्णय भ्यक- मेरया चन्ति हितोदयगिरः शिष्यो पातायर गिर स्मृतः । मौलागिरिनु सच्छि- यस्तस्य शिष्यो महामतिः ॥ ८॥ श्री मुग्रीवगिरिः स्यातः सूर्यमद्गुणमडिलः । यस्य कोर्ति- महायुद्ध. गाभिी मितिमारले ॥६॥ रामाश्वमेधिक कथा कविता पुरा या वात्स्यायना यदि सहन मुपाहि नाह तच्चिाप्य शिष्य दद यिनमुदे नियद्धा सा भाषया रिमहाय गिदि करोमि ॥ १० ॥ यत्पुर्य मुनिना कृतं मुविना थ्यामन । शेपेन यत्मप्रेत इयमेधक प्रमु. कुरा पारस्याना याद्दु । तद्वतमा यिसनोति रामचरित महापया भाषितं । यो मद्राम प्रसादतो हरिसदायारों गिरिपन्मुदे । ११ । भाषा प्राकृत सस्कृत सदर्भाः सन्तिनिर्मिताः मोदः ममा गिगाः ममतं दृष्टा तुप्यन्तु मम्जनाः सरलाः ॥ १२ ॥ यदि दास्यसोध दोष पदपि सलो मधिकं मुरविला । यस्मात्सदोय यस्तुनिदोमं नामो कदापि सवते ॥ १३ ॥ सोरठा । बुध विधारि भुज चारि । गन नायक गज पर बदन । मिद्धि कारि भय धारि । यदी शिव मुत विघहर ॥ १ ॥ बदो पद नद मद् गोपपति फरुनाई रान । विश्व समुद मुष चंद घेद पायो मीन है। २. यदा दमाय नद सोलापति रायन दुपद धर्म रूप मुष्कंद भूमि धरयो निज पीठ पर ॥ ३ ॥ Fnd -द हरिगीता फल चारि लरि नारि नर सियराम कृत गुन गाय के । तिहू फाल फुसल विमान जस दिः श्रमा पर बाद के । यदि जो यह रघुवर कथा मुनि को कोइ मन लाइ के । भर विभर भेाग यिनाम परि पनि से परिपुर बाद के.१॥ श्लोष । नपथराष्टमहोमितवत्सरे सविनयास्पिनसदृशनी तियो । हरिसहाय गिरिध्यमेधज्ञा व्यधितुरामका नरमापया ॥ १॥ इति श्री पद्मपुराने पातालपड़े मेवात्स्यानमधादे हरिसहायगिरिकृत रामचंद्र पवमेध स्पून मुभमस्तु टिममस्तु मत्रत ॥ १॥६६ । मोती भादे धदी । ५ ५ चार मुभ ॥ श्री सीताराम सीताराम मोताराम सीताराम ॥ ६६० ॥ दोहा मुमार । श्लोक गिय ६००० श्री सताराम मोताराम सीताराम सोताराम सोताराम मोताराम । Suhayster-पी. सानन्द केपोट, या, पर पापार, पात, बंड उद्धृत और अनुगदित Note:-पन्धकसी रिसदायगिरि मिरजापुर धासो है। नेि अपना विशेष क्षाल पादि के श्लोकों में लिया है । इसो लिये घे उद्धृत कर दिए गए है । निर्माण काल मयत १८५६ पाश्विन शुरु विजया १० और लिपिकाल एयत १६ भादो यदी १ मगन्नशार है। No 20-रामभक्तिप्रकाशिका Prose end Perse Substance-country made paper. Leavea 141 Sze-14x6 inches. Lines-B on apage Extent- Goo slokas Appearance---ordinary Complete. Corruct, Character ---Dera negeri. Place of leposit-Library of the Malzárájr of Bundras Admabhalfpralduilds-Annotations on the Rima Chauund of Kenya Disa by Tinakt Prassda, who wroto the book in Samrat 1872 (1815 A.D) Tho manuscript is dated Samrat 1974 (1617 A.D) - NOTICES OF HINDI MANUSCPIPTS 19 Begmaning-श्री गणेशायनम' । कयित्व । फुडलिस सुड गंड गुजरा मलिद फुट बन्दन बिराजे मुड अदभुत गति को । वाल ससि भाल तोनि लाचन विशाल राजे कनि गन माल सुभ सदन मुमति को । ध्यायस पिना ही श्रम लगायत न वार नर पायत अपार मोद भार धनपति को । पाय गन मदन को पिघन निकदन के। पाठो नाम वंदन करत गनपत्ति का १॥... घचला मंद । नेन मूरज पानि सिद्धि निशीस सवस चार : शुभ सयुत शुझपक्ष मुरेस पुति यार । चार दितिथि हस्त सार वरिष्ट योग नवीन । राम भक्ति प्रकासिका अवतार तादिन लोन ॥ १०॥ End.-भूल । रुपाक्रांता छद । अशेप पुन्य पार के कलाप आपने यहाइ ॥ यिदेह गमध्यौ सदेह भक्त राम को कहाइ । लरे से मुक्ति लोक लोक प्रतीत होद ताहि कहे पठे गुने जो रामचन्द्र पद्रिकाहि ॥ ४० ॥ इति, थोमत्सकललोकलोचनचकोरचितामणि श्रीरामचद्र पद्रिकायामिन्द्रजिद्विदिताया कुशलव समागमा नामेकोनदत्वारिंशत् प्रकाश श्रीश्री यो। श्री श्री श्री श्री टोका ॥ कलाप समूह ॥ पुन्य पाप के नाश से मुक्ति होति हे यह घेदात को मरा है। अयथा हन के धारन सौ प्रामा यनादि को अथप सपूर्ण पुन्य हे तास पाप को कलाप यहाइ के ॥ ४० ॥ कयित्य ॥ वेधो मुभ सागर विराजमान हामे पेठि पायदत परम पदारथ को राशिका । काठ में कर सोम धरत सभा के मध्य देवो मोहे माल उर विमल टनासिका ॥ सेनही जाको लहे मुमन प्रयीनगाई पानको प्रमाद केयों भारती लामिका ॥ ज्ञान की प्रकासिका मुकुतिप्रद काशिका हे पेश्य सुनान राम भगति प्रकासिका ॥१॥ दोहा । राम भक्ति तर प्रानि के राम भक्त मन हेतु ॥ रामदिया सिधु मे रच्यो तिलक मय मेतु ॥ २ ॥ लो सुपथ तनि सेतु को भुलाह और मग और ॥ रामवद्रिका सिंधु को लहहि कोन विधि और ॥ ३ ॥ इति श्रीमग्नग जननि दनक नानको बानको जानि प्रसादाय जन नानको प्रसाद निर्मितायां रामभक्ति प्रशासिझायामेरोनचावारिंशत् प्रकाश ॥ ३ ॥ सयत्सरे १८०४ चेच मासि शुश पक्षेतिया नरम्या गुरु वासरे पुस्तकमिद समाप्रिमगमत् ॥ Sulyect -केरारदाश कृप्त रामचदद्रिका पर तिलया। Note ---ग्रन्यकर्ता तो रामचन्द्रिका के केशवदास है । टोका के अन्त में टोकाकार अपना नाम “ जानकीप्रसाद निर्मिताया" ऐसा लिखते है । टीकाकार ने प्रादि में यह भी लिखा है कि विस्तार मय से मैंने केवल कठिन शन्दों के प्रथ किए हैं। टीका सवरा पर की लिखी हे और यन्थ का लिपिकाल सपत १८०४ है। No21-श्रीरामचद्रचद्रिका Verse Substance-country made paper Leaves--185 Size-12X7 inches. Estent-3410 blokas Appearance-new Complete Generally correct. Character - Dovanagari. Place of deposit Labrary of the Mahírája of Banáras Sri Ramachandra Chandrld – The story of Ráma Chandra s life by the poet Kesara Disa, who composed it in Samvat 1658 (1601 AD) There are three manuscripts of the book in the Library of the Blahardja of Banárag, Te Becond manuscript has 231 leaves is 11x6 inches in size and is dated Samsay 1882 (1825 AD) The third manuscript has 100 leares, 1s 131x6 inches nee and 13 dated Samrat 1888 (1831 A.D) No date is, however, given or * manuscript under notice.
20 NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS Begurring-श्री गणेशायनमः । श्री रामचंद्रघंटिका लिप्यते । दंडक । बालक मनालनि ज्यो गरि हारे भय फाल कठिन कराल ये अकान दो द्रुप के विपत हरा हठि पदिानी के पात सम पंक ज्या पगाल पलि पठये फलुप को द्विार के कनक अंक मय सीम मांस सम गया है केसीदास दर के यपुर के । सांगरे को सामानि सनमुए देतही ते दसमुप मुष साने गजमुष मुप को ६१. End --पिमला । अशेष पुन्य पाप के कलाए बापने वहाद घिदेव गया मदेव भक्त राम को कहा । लहे मुमक्ति लोक लोक अंस मुति छोड़ ताहि पढे गुने कहे मुने पु रामचंद्र द्रिशाहि इति श्रीमासकललोचनचकारचितामनि श्रीरामचंद्रचंद्रिकाया केसयराद विरचिताया जाय पुर्न धर्नन नाम ऊनचत्वारिंश प्रकाय समाप्त । मुभमस्तु । रामनाम रामाम. Subject -रामचरित Note --प्रया के शपदाम है। ये धाति के सनाटा ब्राह्मण थे। इनके पूर्वन कृष्णदत मित्र थे। उनके पुत्र गणेश, उनके काशीनाथ, और टनकै फेण्यदास हुए जिन्होंने इस अन्य को बनाया है। इसका निर्माण काल म० १६५८ कार्तिक मुदी युद्धशार है। इस अन्य को दो और प्रतियां इस पुस्तकालय में है जिनमें वे एक सबा १८८२ और दूसरी मया। १८८८ फी लिपो है। . N022-उनुभय पर प्रदर्शनो टोका Prose and Verse Substance-coup try maula raper Leares—319 Size-121x95 inches. Lines24 on a page. Extent-9,165 dlokas. Appearance-ordinary Complete Correct. Character --Devanagarl Place of deposit-Library of the Mahárijs of Barirag Anubhala para pradartani tili - Annotations on the 12 books of Kabisa Disa by Maharaja Viswanstha Singha of Rewah (1834 A.D) The manuscript copy was made in Samyat 1905 (1848 A.D) Beginning --प्रो गणेशायनम दोहा । यो हरि गुरु प्रिय दास ने मन वर पर जे जे हनुमत से सिव सिवा ने सरमुति अभिराम १ श्री कधीर ने साधु मय जे मानस गुरु भेद ॥ थोनक को टीका करत विश्वनाथ हर घेद २ कथनो अकय पत पडनो यदि को बाई विचारी मान किया जा लिपी फरिहि जो मे पाधाम सिंधारी ३ अनुभर परे पनि नामा टोका मुनिदि जो गेहे। विस्यनाथ पराम परेस प्रभु सेहि सब ठोर दियदे ४ लेतने भर कबीर जी के पथ हे ते भर यही घोडक को मत ले के घने हे याते यह योजक सन गन्ध कर चीनक हे याते याको योनक नाउ है और मार सष्ट घरनन किया है पाते या योजन सन यथन को भार हे तामे प्रमान बोर को को चोदह परव शन हम भाषा सार सन्द करि तपर राषा-सरि सब्द बोरामनाम है साको वोन नाम पर सावन में वरनन हे ताहो यीन को चान या बग्नम याते याको घोजक कहे है ओ प्रथम को इत्पत्य यामे हयाते श्रादि मगल जो हे कवीरतो को सो यही योजक को मगलाचान हे यह पानि के प्रादि मगल यह पोन मे लिपि दिया है। End -साधी धो धेषि सब लग धोता हे अगुश को साथ । कहे कबीर पेट जो विडारी पत्र का भावे हाय ३६ अर्थ (यहाँ पर ए साखी को टीका है तन यह लिया) मिद्धि श्री महाराजाधिराज श्री महाराज श्री राशावहादुर सीता रामचंद्र कृपापाषा- ...
NOTICES OF HINDI NANOSCRIPTS 41 The manus धिकारो विस्यनार्थासंघ न देव कृत पाण्ड पंडनो टोका समान सुभमस्तु ॥ श्लोक । पाण्ड पडनी नाम टोकेय परमात्मा प्रेरणात् विस्यनाथेन विस्यनाथ प्रकासिता दोहा। घोजक ग्रय कबोर को फहरा सायो माना गठ मूल लयि तिलक किय श्री विमुनाथ मुनाना लहि विमुनाथ रजाय मुभ रामनाथ परधान । लिप्या आपने हाय ते सापो सन्द महान । इति सापो सपने मिती अमाठ मुदी सुके का सवात १६०५ के साल । Sulyect --कीरदास के निम्न लिखित चारह ग्रन्थो को टोका है। अर्थात् (१) आदिमगल वा बीनक (२) ग्मेनो (३) शब्द (४) ककहरा (५) वसत (६) चौतोमो (6) विश्वतोमी () लि (६) चारि (१०) हिडोल (११) पिाहली (१२) सापो । Vote - टीकाकार महाराप विस्यनामिह जो भूतपूर्व रोगाधिपति है । निमोस काल नहीं दिया है । लिपिकाल सयत १६°आषाढ शुक शुक्रवार No 23 --श्री सीताराम गुणार्णय रामायण समकार्ड Verse Substance - coun try made paper Leares-352 Size-11x7 inches. Lines - 15 on a Page Extent-4950 slokas, Appearance-ordinary Complete. Generally correct Character-Dorsnágarl. Place of deposit-Library of the Malıáriya of Bandras Sri Sitdrdma Guarnata, Nandyana Santa Kdrula.-Translation of the Adhyatma Rimiyana by Gokula Natha Bandljana- (See No 15) cript a dated Samvat 1906 (1849 A D) Beginning-पो गणेशायनम श्री सीता रामायनम ॥ दोहा चरना । एक ग्दन गज बदन बिनायक लंबोदर समि भाल यिपन हरन भरताभरत गोरी नद बिसाल ॥१॥ हरो भूमि को भार यर सागर वाधा सेत । देत चारि फल राम मा चरन चित्त में लेत ॥ ॥ लगत पनि श्री नानको नाप राम हिय धाम । सेबदु तास सरोज पद पूर्ण करिहि मन काम ॥ ३ ॥ रामगीतो। फिरत नारद लोक में सब करि अनुग्रह पर्म । सत्य लोकहि गए क्रम ते प्रत्यारित धर्म ॥ तहा देख्यो मूर्ति धारें घेद सेयत जाहि । घालकि केसो प्रभा परित सभासद नहिं चाहि करत प्रस्तुति मारकडे आदि मुनि मति धाम " पाकदेयी सरस्वती मा पास प्रति अभिराम ॥ जगत का चतुर्मुख को नहा लाख मुखदान । दडवत परनाम करि मुनि कियो मुस्लप गान ॥ १॥ प्रसन के कयो ब्रह्मा घचन नारद पास ॥ कहा चूझो चहत हो सो कहहु मुनि मति राम । End-अध्यात्म रामचरिघ वे यह भादि कान्य ललाम । ब्रह्मादि मुरषर कियो प्रस्तुति परम जे गुन घाम ॥ सहित प्रद्धा पुने जन्म मरे नहि पनि तान । मुद्ध है हरि सदन को सो कर मनुन मुगोन ॥ इति श्री बदोजन काशीवासो रघुनाथ कवीश्वरात्मनेन गोकुलनाथ कयिना कृत उमा महेश्वर सवादे श्रो सोता राम गुणार्णवे उत्तरकाडे नवमस्तरंग ६ उत्तरकाड समान शुभमस्तु मी । आपाठ कृष्ण दतिया तियो गुरवार लिपि सवत् १६४६ सन् १९५६ फसलो॥ ॥ मेराम श्रीराम श्रीराम श्री राम राम राम राम राम राम । Subject --अध्यात्म रामायण का अनुबाद भान पडता है क्योकि करि कई नगद मध्यात्म का नाम लेता है। Note-ग्रन्थकता कवि रघुनाथ बदीनन हैं। लिपिझाल मिती आपाळ कृष्य २ गुरु धार सवत् १६०६ सन १५५६ फसलो है। Nox-यान्मोकि रामायण श्लोकार्थ प्रकाश Verse unade paper Leases-222 Size -13) X74 inches. Sabstance — country Lanes - 9 on a piye 6 22 NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS Complete Istent-3 900 blokas Appearancs-DL 57 Correct Character Derandgari Ince of deposit-Lilrary of the fairiza of Hanára. Valmiko hamuyana Sloldstha Pralást.- Translation of the first bool and five chapters of the fourth Look of Valmiki's Rémiyona by Ganela Kavi, son of Guliba Karl He flourished in 1800 A.D यारा॥ Beginning-योगणेशमनमः । यो गमायनमगामा सुन गिरना सहित यदि कालिका रंग पहनुमान मुनि पंथ कृत यानि रामनगदीश १ कवित। बुद्धि के निधान में प्रधान काध्य भारत में दो घरटान मे परण हमेम के । दुपगमेद्वार भरि मण्णा से परि परि भूषण समेत हेतु नो रस वेश के । मनस गनेश रन्द छन्द मैं लनामरुप भूप मन माहे माहे पंडित मुदेश के । यय परि पुरण के कारण काय भर दीजिय नियादि नेम नदन मद्देश के सुदाकाड Ind-विद मे या प्रयो धार कार टपली परा से नहीं मेोद पाय करि प्रस्ति मग्न है व येमे तरह की जानुको हनुमान साहिन देथियो । लेहि विरह कार प्रति राम के चित होत कट विप्यो । २० । दोहा । गम मनुन पति को प्रिया मिया न यि हनुमत । कपिटत घड वर लाग टुपित मए परत २. पति মী মার্গীয় মামলায় রায় মরাল্যঘিাণ ৱিা নয়য ফানি নয় फाय कृते बाल्मीकीय रामायणे मुदर काडे पंदम सर्गः ॥ ५ ॥ Sulyect--यामोकि रामायण के पूरे घालका ड और अदरकाड हे ५ पंगा का अनुवाद । Note --लाल काय के चार गुनाय कवि के पुत्र गणेय कवि कृता ये महारान दिस नारायण के प्राधित घे और उन्हों की पाना से इन्होने यह अनुवाद किया था । निमायादि काल का पता नहीं है। No 25-कोशलपथ Verse. Substanee-country made paper Leares -236 Size--13 x G) rnches. Lines -- 11 on a page Extent-5,310 stokes. Appearance -old Incomplete Correct Character-Devanagari. Place of deposit-Library of the Maharaja of Banáras. Koala Patha Trapslation of a Sanskrit book called Kola Kupa (). descnbiog in details the scenes from Rama Chandra's life as described in the Becond book of Valamiki's Ramiyana. The name of the author ts Rudrapratips Singhs who composed this book in Samvat 1877 (1820 A.D) at village Mandarya on the baths of the river Ganges Beginning. वहु मुकुमारू । कार्य सकल मत्री सिर रापो श्रापुन त. पुर अभिन्नापो । प्रधहि केकेइ गृह पाये । दीप पानि भृत्या विकाये । करत प्रसस भचिव गण भरी बोलत प्रतिहारिन पुर दूरी। मध्य कछ ते मी येते गये माम्म मदिर कद लेले र के ई प्रतिहारण प्राई । गृहण पनि को पाला माई । दोहा । कोप सदन । मुनि कम्पु किमि निमि करि सिंह निहारि केइलो ताल सभेद तर मानदु वाता पारि ३२॥ End -दोहा । गुहते नहि हिसिक परम पगुते पद्धि न थोर । पश्चन नहिं गणिका सरिज सरिस अनामिल भोर ॥ ६॥ घो० ॥ एक एक गुण चारित मादा हो धारिष्ट गुरु युत नानाहा । साले माणित होटु दयाला । को कलुणे मा परिस विशाला : महा मार हि पोत विराज । क्षेरि पाहन कद अंक महान । पलाहार घटु मृग समुदाई । केवल XOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS. 23 हार मसंग धरि खाई । मो अघ शैल उठावनि हारो । केवल शशि तुम अवविहारो॥ ताते सकल अमर तजि भारे । भनउ तुमहि अघ सवड निहारे दोन जानि लपि प्रापन पासा मेटटु मार घोर बहु पासा । एक सहस वसु सत नग साता । विक्रमार्क सवत् विएशाता । ५६ : दो । भात खण्ड महि द्वीप घर जानु श्रुति विख्यात । दुहिणावत सममि के करी कथा यह नात ॥ दो । कोल कल्प केशव कथा फरी सो कोशन पंथ । हरि भरि कल्पित नहीं श्रुति द्विजोक्त सत ग्रन्थ । सा० । हिद घश्य रहि काल युंड शूर मत्यात महि ॥ किंग रास महिपाल । पालत मेदिनि मनु सरिस ॥ दो । तीरथ अमर नदो मुपद कल्कि रूप किल राम । पूज्य देव किल चयिडका मनु यक रघुपर नाम । छन्द । निज मति निहित हरि नाम गान पुराण मत साहो करी । जिमि भाय पूर्वहि भर्ग बुझेड हेतु सादर शंकरो । रघुनीर किंकर मृत्य किंकर केर अनुग कहावउं । यावत रहो महिमाह तायत नाम तर निरा गांवत ॥ दोहा । दिवो दास कुल ख्यात महि नृप ऐश्चर्य विशाल । रुद्रप्रताप मु तस्य मुस यणेउ चरित कृपाल ॥६॥ इति श्री सिद्धान्तोत्तमे रामख्यडे श्री रुद्रप्रतापसिंह विरचिते कोशलपये देश भमि पुर महात्म वर्णना नाम साचत्यारिग विधामः ॥५६॥६॥२॥१॥ Subyect -रामायण अयोध्याकाड का सविस्तर चरित्र । Note :-सन्यकता गद्रप्रतापसिंह है। इन्होंने इस ग्रन्थ को विध्याचल के निकट गंगा के दरिया तोर पर माडव्ययाम में रचा था और स्यात् यह राजा भी कहलाते थे-सयत १८८० के विक्रम साल में यह यन्य बना है-यह कोई संस्कृत यन्थ कोलकल्प नाम के अन्य का अनुषाद हे। No 26.-नखशिख केशवदास कृत Verse Substance--country-made paper Leaves-16 Si20-61x51 inches Lines-21 on a page Extent-300 glokas. Appearance - old. Complete Correct Character -- Devanagari. Place of deposit-Library of the Maharaja of Banárns. Xalhasılha Ketara Dása Krla. Description of the different parts of the body by the celebrated Kesara Disa (1600 A.D) The manuscript as dated Samvat 1853 (1796 A.D) Beginning-श्रीगणेशायनमः । अय केसीदास कृत नय सिप लिप्यते ॥ दो० ॥ सवि. सा के परताप यो याने कोयता अग। कहे यथा मति पनि त्यो पनिता के प्रत्यंग १ कही नु पूरन पडिनि नाको जितनी सानि । तितनी अब ती अङ्ग को उपमा कहाँ बपनि २ नप ते सिप ला वनिये देवो दीर्गत देघि सियते नय ला मानुषी केसवदास बिपि ३ ॥ End.-अन्यच्च : छप्पे : कः । महि मोहन मोहिनी रूप महिमा रुचि रूरी मदन मंत्र को । सिद्ध पेम को। पद्धति पूरी नोरन मरि बिदिव कियों नगलोय मिप को । किया चितको वृति भित अभिनाय चित को केस परमानद को । पानद सकति किधों बनि आधार रूप भव घरन को गधा बन वाघा हरन को ५ इति श्री केसपदास कृत नसिप लिप्यते सपर्न कासो धो मध्ये रूपदद गोड सपत् १८५३ मितो पासाढ शुद्ध ४ वुधवासरे। [१३ पर में यह समाप्त होगया आगे इसके ३ पप और मो केशवदासहा का कुछ कविता का सयह है । प्रायः कवित हे] । Subject.-नख से शिखा पर्यन्त प्रत्यंग की शोभा का वर्णन । Voc -प्रसिद्ध कवि केशवदास कृत-लिपिकाल सश्त् १८५३ मि पासाठ शुद्ध १४ -- युधयार है।
NOTICES OF 1XDI MANOSCRIPTS . Nor-श्री राधा नखगित Vere Substance - country-made paper Leaves-16 Siza-61x5 inches Lines-17 on a poge. Ixtent-so flokes Appearance -- old. Complete. Correct. Character Devanagari. Placo of deposit-Librnry of the Maharja of Baniras Sri Nadha Nakhre Siblia. Description of the different parts of the body of Radas by the poet Dnya. The manuscrint in datel Semrat 1855 (1798 A.D) This poet is not the Dwija alias Jianna Lal of Benares, Beginnang-श्री गणेशायनमः । दोश । यो राधा मोहन प्रिया बंदायन मुखधाम द्विज कपि तुम परनन कर न सिप छवि अभिराम । १। चरन यः । यधुरु वरन मानहान सपा के केधा पाके विरोचन मंदिर मुधरत है। नाषक समेत अनुगग के निकेत कों रजोगुम के यि देश विहरत है । कहे द्विज कयि मपमलते मृदुन्न नोके याहो मेच विम कठोरता धात हे। बावन दिनेस को मयूयन पाम तेरे सामरस सामरस निदरा ॥ Indl.--अमल कमन रम भ मे उलटि घरे गुरज शुगल देषि केही नमत है। मुधारत पेरकारो लर मत डारी मीफल मृनाल कंधु सभा मरसता है । मुमन गुलाब स्त्रि मदन मकर फोर वजन कमान उपमान परमत हे। द्विप कपि मान काही राधिका मुजान छवि मेरे भान चंद हिंग नागिन लसत हे ६२ दति श्रो दिन करि कृत लिप्यो समाप्त यो कासी मधे रूपचंद गोड संयत् १८५५ मो० घेसाप मु० 0 मोम । Sulyect.-नय से शिक्षा पर्यन्त शोमा वर्णन । Note -दिन कयिकृत । लिपिकाल संवत् १८५५ गाठ शुम • समधार है। - N028-प्रेम तरंग चन्द्रिका Terse. Substanes - country-mnde psper. Leaves-37. Size -61x4 inches Lines --13 on asge. Extent-600 blokas Appearance-old Complete Correct Character -Derarigari- Place of deposit-Library of the Babáraja of Banáras. Prema Taranya Chandrıkd --The description of the differeat kinds of affection by the poot Deva (1G20 AD) The manuscript is dated Samyat 1857 (1800 AD) Beyunning-गो गयेशायनमःमय देवकवि कृत प्रेमांगन्द्रिका लिप्यते । मंगला धरण सवया ॥ पाखिन आधि लगार रहे मुनिये धुनि कानन को मुणकारी । देय रहो हिय में घर न रुके निसरे यिसरे न निसारो । फल मेगा H या मूल मुगस को हे फल फूलि रही फुनगारो । प्यारी उन्यारी हिये भरिपुरि मार न नीयन मरि घमारी End-दोहा । भक्ति भाव आसक्तिहूं मेह काम अनुराग वर सना यात्मल्या हार- हि मिला वह भाग । ६२ । देय दीन दयसिंधुपदि के सहाई अवधु को मट घसा गुफाई कहिश्यय:सिप विधारयो नमिह टयाको प्रनाद मेना सत्रु को पुझाई है । वन को गम है पठायो दिम्य धाम क वामन पमान गति लि को मुझाई हे ग को करें प्रससा घनस्याम जद बदुयंग्रालय कमादिक धेरो घोर यमानि बुझाई हे ॥E३ श्री राधा भरि चरन अग देय देय अधिदेय । दुपहरों यानि के गुरु चरनन की मेर ६४ अति को देयजी करा प्रेमसरंगन्द्रिकाया चतुर्य प्रशासः ॥ ४ । लिखितं ईश्वरीप्रसाद मेड ब्राह्मण काशी मी मध्ये अपने पटना। मका १८३१ मिती यशाप रस 1. प्रतिपदा घार गुरद मुभं भूयात् । Sulgect-- प्रेम का स्वरूप में केमा और कितनी प्रसार का होता हेरस्यादि मा पर्यन ।
NOTICFS OF HIYOT VAVUSCRIPTS 25 Noke.-प्रसिद्ध कपि देवदत्त कृत-लिपिकाल सवत् १८५० वैशाख क प्रतिपदा गुरु 1029-फल्कि चार Trerse Substance-count y mnade paper Lenics Size -Tixalanches Lines -10 on apiye Extent-1310 Blokas Appearanco-old Complete Correct. Character-Devanigan Place of depx sit--Library of the MI zlárlja of Baniras halls Charitra-The story of the Kalki (estli) incarnation of Visnu, which is yet to take Ince by Pránanitha Trivedi who comprised it in Samvat 1765 (1703 AD) The manuscript is dated Suusat 1849 (1792 A.D). Beymring -डॉ सिद्धि श्री गणेशायनम ॥ दोहा । पक रहन करिधर बदन सिद्धि सदन शिवलाल विन विनाशन घिरद सिर मसासन गुन माल ॥ १॥ वारक धाग्न पदन फहि मूझत ज्ञान विकाल । सेमे दोपस देहलो भोतर अमिर स्काल ॥ २ ॥ नराध ॥ भवा नि विध्यवासिनी अखड ने प्रकासिना उदड पाप नासिनो मुद्धि सिद्धि को भरे ॥ करें महाप रकत प्रमाण मेस पक ते हरे किनाझ सकते कटाइ नेकहू ठरे। जपे निमक नाम को बके विनोद धाम को पुजे समस्त काम को अगाध सि उद्धरे । महा गुमान गनिनी विशाल शाक भनिनो नमामि प्राण रजिनी कृपालि पाहि किमरे ॥ ३॥ End -दोहा । केहू विधि फलको कया परेनु श्रवननि माहि। श्रोता यता भगत बन अपि कर नरकन नाहि ॥ इति श्री श्री कालकी चरि भगानी भविष्यते कथन ग्लेछन विध्यसने उत्तर कोड समम मेोपान: 011- मुरसरि न के उतर दिसि नारन सानि मुरि । मेरध्वजो नगरी यह धाननि सो भरि परि । वरननि सो भरिपरि परम अभिराम सुपानि । देष दनुन ना नाग सकल मुनि जन मन भानि ५ बुध पदिक जह घसत लमत मान पर हर हरि । निज निज मन लजि रहत लहस कोऊ नहि मुरसार में रठा । तेही पुर मतिमद यसम भवानी शर्म द्विर ॥ तेन लिपित मुखकद परम सुभग कलको कथा : मेरठा । मोहि न अतर जान ताते पंडित जन मुथा । मायब मति अनुमान अपनी पर विचारिक र सवत्सर नव ६ वेद ४ धृति ९८ चेप कृष्ण विचार ॥ तिथि दशमी शुभ लिपि भई कया सकन सुखसार । सवत् १८४. चे मासि कृष्ण पने दशभ्या गरियासरे निखितमिद पुस्तक भशनीप्रसादकेन । मगल लेखकानाच पाठकानाच मगलम् ॥ मान सर्व साधूनां भूयो भूपति मगलम् । १॥ श्री गुरुभ्यो नम । छ ॥ छ ॥ छ ॥ छ । Salyect --करिक अवतार की भविष्य कथा । Note -प्रयता काय माननाथ विवेदी है। नियकाल का माता दोहा इस प्रकार ॥ सवत् सरह से प्रगट सठि मार सुमास ॥ घुधवासर श्री पदमी कलकी कथा प्रकास । ॥ लिपिकाल संवत् १८४८ चेष कृपा १० रविवार है। No 30 -वृहस्पति काड Verse Substance-country made piper Leaves --26 Size---8x4} inches. Lines-- 8 on a pago. Extent-300 sluhos Apperr Baco-old Complete Correct. Character ---Devanagari Place of deposit Library of the Mabíraja of Baná ras Vrhraspal Aunda — The effects of the planet Jupiter in the twelva Zoliacs on the human body by the celebratedl ſulasi Dása. (Died 1623 AD) 7 20 1OTICES OF HIADITINUSCRIPTS Pegriting-~यो गगोशायनम' । दीघा जे के यो रघुवय मनि दीनदयान कृपन म कहि प्रभु गरिस्पर योने वचन माल ! १ ॥ चौपाई ॥ मुनटु टमा प्रति दिर प्रणय मुर्मा रिलाम मझल मम भा । मा गुरु दगा ३ फन लेना द्वादश गशियाने तेमा। Int-भारठा ॥ टहि मपाद भगवा पारहि बार घेद 4 यहि दृदय धारा मुपमा मिथु कृपायान ॥ दर्शन श्री तुलमीदाम फुटत धृष्टम्पति फाड समाम् । शुभ । अथ मरास पर य गुमराहों * तुला रामि र अब गुम रहहों मुर गुम जन पासि मुथाना "चक रामि पर गुम पायी ५ मियुन गमि पर मुर गुम अयहाँ १० यम धनरामि कहि नग पावन कर्क रामि मन्य धमेरा मर कुल पुग्य मकर कृत बामा आमा गुम नहि मिह प्रस्थाना कुभरामि कर लोप दमेरा पचम मय कथा रामें ८४ मुर गुरु मौन गमि पर रहती Slect -वृदम्पत्ति का यारहो राशियों को दण का फल । Note --- गोप्य'मा तुनम दाम जो कृत । काल इसमे कोई नहीं है। No at-दाय Verse Substance-country mule paner Leareg-27 Stze-100x6 inches Lines--15 on a page. Extent-1,450 dukan. Appearar ce - ordinary Cornpleta. Correct. Character - Devanagari Place of deposit-Library of the Malurija of Baniras Chand irpent -1Iindi prosexly by Bhrkhirapia Kiyaatha, who wrotest in Samat 1-99 (171'AD) Bhikhun Disa is a hered to be one of the great trusters of Ifu di con position. Beyiting - यो गणेशाय नम ॥ कर यदन मदिरोन मडिा पुरन पडित ग्यान पर। गिरिनदिनि न्दन बार निकट न कोलि घर भूपन मृग लक्षण बन पनसान पोर शिवधन पाप धर । नय नय गन नायक पलगन घायक दाम सहायक विथुन हर ॥ ९५ Ind-दोहा । छदनि दोहरो घोहरा करि नित बुधि विषेक । मन रोचक गुरु सनिके दडक रचा अना। ५. रागनि के यस कोनिए ताहि प्रव यानि । छन्द लिय मा पद्य है गदा छन्द विन न नि । 0 ग्यारह ते रथोत लगि धन दुपट तुझ पा ! मो मि दे बहु धन्द टन धरे प्ररथ विधक ५ ३ ॥ भेद छन्द टगहानि को दोउ पागधार । घरनत पय पा र मे दीह मति अनुसार. ४ ६ माह से निनान म पदि पर यदि दास यस्या छटारना मुसि मा परे इन्दु ॥ ५ ॥ इति श्री भिषारोदास कायस्य कृते चन्दानिये दाम भेद पर्नन नाम पचदमम तय १३ गन्य मपर्ने । मुभमस्तु । मिद्धिरम् । Sulyct-पिगल Mate -कती कषि भिशारीदाम कायस्य । निर्माणमान मघा १२ घदी। 1030-छदप्रकाश Prose a llesc Salutance-country male mprer Leares-- Suc10txrt inches. Ianes-15 on alrge Ettent-75 Lokas APILarance-ord nary. Incomplete Correct. Chuncter-Duvarigart Place of deposit-Library of the Maharaja of Banitas. Clanlaprakita Lindu prosols la prose by Bullhin Dist. See No.313 - XOTICES OF HLXDI NYUSCRIPTS Beginning-श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ बदनास पोधो लिप्यते । दोहा । गनपति गोरो शंभु को पग ददो रह नोइ ॥ जामु अनुग्र अगम ते गम बुद्धि के होइ । १ ॥ श्री महारानि मुकुटनि उदिसनरायन भूप । सभ्युरो कासी मुथल ताको रान अनूप ॥ २ ॥ साठा । रहत जासु दरवार सात दोप के अनि पनि ॥ रच्यो ताहि करतार सिन मयि सदिता दिनेस सो ॥ ३ ॥ दोदा । रज सा दाया दान मे रस में रानित बोर ॥ नग पालक पालक खान महागन रनवीर ॥ ४ ॥ सारठा ॥ मुमयि भिखारादास किये। यन्य छन्दारनो ।' तिन छन्टनि परकाम मो महान पसद हिता ॥ ५ ॥ End -सप्या प्रमार वर्णके । वृति । ५६२९४७३५२१३१०॥ इन्द | १९८३ सप्या माया यो धन प्रस्तारके ॥ वृति । ५४२६५३१११३५६ ॥ छन्द ॥ ३१॥ (आगे इति आदि कुछ नहीं है।) Sulyeet कविता के प्रस्तार, धृति और छन्द सस्था का कथन । Note -इस यन्य के की कषि भिपारीदास कायस्य है। ये काशिराज महागन उदितनारायणसिह के पाश्रित थे । V033 -पालम केलि Verse Substance-country made paper Leaves ---57. Size-101x51 inches Lunes-11 on a page Extent-1,350 slokas. Appearance - old Completo Generally correct. Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Maburája of Banáras, Alana Keli -An account of Ridhi and Krisna by the poet Xlama, who as a Brahman by birth, but on falling in love with n Juhammadan woman ho embraced Muhammadanism and remuned for a long time in the service of Juazzam S'aha, son of Aurangzeb, sad afterwards of Bihulur S'iba (1707-1712) Dr Grierson says that he was born in 1700 A.D, but this date does not seem to be correct, as it only milcs a child of 7 or 8 years an admired poct of his time Besides, this manuseript copy of the kieli was made in Samurat 1753 (1696 AD), or 4 years earlier than the year of his birth as given by De Grierson. In my opinion the poet niust le 30 or 10 years old before he could write such elegant poetry He must hare, therefure, been born about 1660 A D Begunnang --पो गणेशायनम ॥ अथ पालमत करित लिप्यो । अय वानलोला । घनाझरो छंद । पलन पेलत नद ललन छलन चल गोट लेने ललना करति माड गान है। पालम मुकाय पल पन मेया पाये भुय पोति पियूष मुकरति पय पान हे ॥ नद सो कहत नदगनो हेमहर मुम चद को सो कनन घन्तु मेरे नान हे ॥ आइ देपि आनद से प्यारे कान्ह आनन में पान दिन प्रान घरा आन झवि आन है ॥१॥ ird -सेज मुपासन हेम होर पटचौर विविध पर । निरपि निवि मन मुदित होत निजु सुर सपत्ति पर ॥ आलम के काय जु आपु वने बनिता बनार विलमत दिलाम अति । जग र जगदास साजु भूल्योन अनप मति ॥ सजह सभारि ग्रानम सुपरि जालो तक नहि ।। पग डगमगात हेत हसत भूविरह मुअगम को डस्यो ॥ ४0 k इति श्री पालम फुत्त करित्व आलम केलि समाप्त ॥ शुभमस्तु । सबत् १०५३ समये आसन पदो अष्टमी घार शुक्र ॥ Subyret -श्री राधा कृष्ण को तोला के कपित्त । Note- यह यन्य का आलम कृत है। निर्माण काल नही मिला । लिपि काल सरत १०५३ पारियन कृष्ण - शुक्रधार हे ।
NOTICES OF JUINDI AYT'SCRITTS No st-भान समुद्र Tere Sultance-Frolsear Paper Learer-12 Sne-x5 inchest Lines-s on smge. Frtentrasofline Ayreuratite--- Wel Complete Internet Character - Ullená jurt. Place of deposit Library of the Maharaja of Banuras Gyana Santra Apul sophical treativo dalina with Value by the THet Sundara Diss of Guslne lenttendtru the court of Sahayahin He wroto thut bwkik iu Samrat 1710 (1033 A1)) Thig Inaniuscript is datul Saunny 1857 (1500 AD) Leginniry --यो पामारमने नमः । अय पानसमुद्र लियो। मंगमारा छापे छद । प्रथम पदि पाय घाम पानट पपा दुतिय बटि गुम्टेय टिया विदि दान पनप : मृतिय यदि मन मरा जारि कर तिनके प्रागे । मन पर काम प्रशाम कनं भय सम मय भागय । दि भार मागनादरस कार मदर यय यपापिय राह विन न काज टपनय यह निश्चय कार मानियें।१ Int-मुर भान रामु को । यो पति भावे शोर । देशही अपने निर्णन सम गभार ॥ ६ ॥ यदा न ममद है । पद गुरु शिष्य म्याद । मुदर यादि म मुने ताके मिटहि पिपाट । ६४ मयत सह मे गये । य दगेलर और । माद्रय मुटि एकदयो । गुर धामशर थिर मार ॥ ६५ । ता दिन सप भयो । भानममुद्र मुपंथ : मंदर अगाटन करे । लो मुक्तिको थय । मदर पान ममुद्र है। याने पच हुलास । गुन दाइ अंजन दिये । लोचन द्विदे काम 10 पति सुदर टामेन विरचितः शाम ममुद्रे द्वमित महा श्री गुरु सथा। 10 मा कृष्ण पने चातुर्दम्या रवि धामरे गम । गम श्रीराम श्रीराम पाय कृष्णाय गोदाय नमानम बोरामा । श्रीराम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम रामगम राम राम राम राम Suryeet--येदान्त। Note-झमा ग्वालियर के मुददाम है और यह दापची जान पहने है ।म पंच का निमाण काल सवत् ११० भादो मुदो 11 गुधार और निषि यान मंत् १var कृष्ण २४ रवशार No 35 - ATACA37 l'erse Sulutance-country made paper Loret Size - 11x6) Incher lines-8on Ange Estent -- 360 Bohre Appearauce-old. Complete. Correct. Character-Derangan. Place of deposit-Library of the Malzárája of Banaras, Karimulla manland ~ Hindi rhetorne written I Gokaka .Inths of Beninas (Sec Do. 15). The manucript cops un inale in Surat 1870 (1813 A.D) Brginning-श्री गणेशायनम । सोता रामाभ्यानमः । श्री गलपति के परन म पारि .... अभि पम देत चार फल पाहा कल कमला के धाम १ (आगे ब्रह्मा से काशित तक की परनी दी है) Ent-हेतु लहन । हेतु मास मह हेतु चई को न मुग्दान । जीव सात मुर पर एने चढे स्थर्ग मापान । २४ । अपर करत गप वारघड नृप कासी को भाम विस्वनाय वा यसै कृपा मी यि धाम । २४० । रामा ति माद मुझ ४ चार पदासरे पन्ध ममा । सन् १८०० ॥ Subyeet-अनंकार।
NOTICES OF NIYDI JANUSCRIPTS Note -कती कधि गोकुलनाय है । यह पुस्तक कषि ने महाराज परिवसिंह को भाना से २१ दिन में बनाई थी। इसके बनने का समय नहीं दिया है। लिपि काल रुघत १००० भाद्रपद शुक्र ४ चन्द्रवार हे। No.s6-पिंगल Terse. Substance-country mude paper. Leaves-34. Size-fx 5 inches. Lines-9 on a page. Extent-680 slokas. Appearanceordinary. Complete. Correct Character-~Deranigart. Place of deposit- Library of the Mahárája of Bapáras. Pangala - Hindi prosody, witten by Chatámani Tripathi (FI 1650 AD), the eldest brother of the celebrated Bhúşana und Mati Ráme. He attended the court of Maharanda S'áks of Nagpur. Thc manascript is dated Sainyat 1956 (1899 A.D) Begirnirg -श्री गणेशायनमः । प्रय चिंतामणि कृत पिंगल लिप्यते दोहण । गन. मुरत जननी जनक के पनि नाइ निम सोस । चिंतामनि कवि साहि को देत बनाइ अमीस ॥ १॥ छप्पय । मुझुरा मात उत मंग इर्ताह घर मंग गंग गति । उत सित चंदन पाड एहि निम्किर ललाट मनि । उहि भाल मणि लाल इतहि दृग अनल घिराजात । उस कपूर तन लेप भस्म इत अति चयि छानत । कहि चिंतामणि सम भेय धरि अति अनूप सोमा सहित । जय साजधु सुरजा साहि कह गिरिता हर अरजंग निर २५ दोहा । सूरज बसो भामिला लसत साहि मकारंद । महाराज दिगपाल निर्मि मंगल मुद जमु चंद ॥ ३ ॥ Ind.-रूप पनाहरी रूंद लरनं दोहा । मारह मारह पर सहा विरति अंत लघु वाद सौ. रूस घन अक्षरी पत्तिस प्रदर नाइ २ यथा सिर शशि पर धर गरि रवंग धर जटा जूट गंग घर गरे मुंड माल घर । विपति यिनास कर दो दिसि पासकर पलनि उर भूल डर मर मल कर । सेवत अमर पर पंगा सुर भर पर देत हरयर चिंतामनि को प्रमय पर । देव लवे वियधर मदन को गरब र निज जन दुःख हर जे ले य हर हर ०३ इति श्रो मन्महाराजाधिरान महि मकरंद कारि यो चिंतामनि कृते छटो यिधारे वृतानि निवृतानि समान गुभं भरत १६५६ मितो कातिक मुदो र थार बुधवार के लिए गया। साकेन पिटरी प्रपोधी दल ठुमन की चाल को। Surject.-पिंगलकविता यनाने के नियमादि । Note-थकता काय चिंतामखि है । यह मकरंद साहि. राजा के प्राधिा घे पोर सन्दों को मात्रा से इन्दनि ग्रह संथ रचा। इस यथ का लिपि काल सवत् १६५६ कातिक मुदी ९ युधधार है। 1037.-पानन्द अनुमत्र Verse Substaneo country-mnde paper Leares-21 Size-81x4 inches Lines-15 on a page Extent-20Glokas. Appearance -old Complete Correct Character-Desanigarl. Place of deposit--Library of the diahírája of Banfras. Ananla lambhrest-A book dealing with spiritual principles and the worship of Gol by the poet, Ananla of Banárns. He wrote this book in Samvat 1812 (1765 A.D) Beginning- कुम्मायनमः। पानदोशच । मेरठा । पादी करें परणाम ! परम पारमा कृष्ण को पान के श्याम । ए व्याणे विष्णु की । दोधा । मुनी मीत चिता लाय के यह अध्यात्म विधारा या गाये मुने निश्चय हो मा पार । टतम याको पियो 8 sortCFS OP NIYDI VA TI'SCRIPTE धान नुमर नामसायो दोन ममि म महिएर धान । ति मागे मत्र या रकम पाय। जनद अनुमा यय यह मो ना मायल PATRI कृप्य भगवान । यह नंदादोबाटामीनी 11-टोटा मा महा पुनीन ठारह मे य्णरेम । अनद पनुमा वंश गिर निगम मम पटयन कार्गपुरी सहो यम के सदा गुद गय गगन के दया को गांवट ती पाना अनुमय पानी का भागां स ममा... दोहा । मानद बन कामापुगे रात्रमदिर निर धाम । लिला भ्याक्तिका विप्र में मान गुला. की मी हरये नमः। Sayrt-टपामना यक कायदान । Nitr-६ सय पानट यि कृत है। यह कार्ग यामी कृप्य मत । निमार काम मया १८४९हे। . V0 %8-17 To Tere Subatanceratrr rede fapt Lacres --232 Size-10xi incines. Lines-tr in ange Fetest-41001... App traner -ll Cupletn. Generally correct. Clenter-Desaigan Place of dryxmt --Blours of the Jallrájx of Banaris Dhurula Tittin-The story of the Dixhibluirnts by the TRAL DIREnye, ctin mrutos st mouent 1766 (1709 AD) urler the justeringe « Divan Irutbra Sin hom, mn of Udvrita Sevgh2 It 19 not clear win the Philırı Sona xan Beginning -- प्रोगणेगायनमः । गुम्यानम । दंडक छन्द । मुटर यान एक दिन ফিঈ বাধি ম ম মুন্না লাঘর । বিগণ দুরূপ দিঘিা লা মূঃ শিঃ माको मनि पढ यलय धनाद । यदन के योघ मुम माहा मापक मानो विधि विष्णु मे न पावही । नानि म च निप्र मोश दिगे योश य से गुनि के गुरु श्री गणेश को गापहीं। Im - दोहा । वो विलाप्त भात यहे पडे मने दिए सदर । ताको पुन कला प्य टेर वर्धन पार । ४३ : मृप मलि दिनदिन पनी टान मत नगि सिद्धि टागा यह भारत पारध प्राति । ४४ । कृष्ण परायर शयन मुनि टिम मेनन यदुदान । एन. फार भूषण यमन ययाक्ति सनमान | RA माग्ठा । भारत र एन गुढ । नहि मजन विमल मति ने घटसा बम मुकाम नहि किम कृष्म गुण लिया ममहागर शामिहात्मप यो दिशान प्रयोमिह मिर्गचते मारत शिलामें इन्द्रामन बुधि- हिर गयन नाम पचागाध्याय 18 : ६५ : सपा । शुभमस्तु । Suyart महाभारत की कथा । Vote -इस यन्य के कर्ना दिग्गत कार।एन्होंने पृथ्वामिद को पड़ा में यह पन्य बनाया और धो के नाम में प्रकाशित किया। निमायकाल इसका मयत १००६ चे शुक्र ५ गुग्धार है। .10 39-मानन पिलाम Peran Substance-country thede raper JCITES Size -8xranches Lines IG on a page Extent - 1,940 blokas AP'ImrnnCO -- Il Complete Currect. Clearncter - Desandgeri I'lsce o dojumit-Library of the Vahirija of Banárne Sgjan Pills A book on thetoric ly the pot Data who lived weder the quatrona, u Kunar Fatel. Suha of Tilir District Gasé He component the Lwok in Sunst 180 (1747 AD) The 10.jus rapt us lated Suivat 1649 (102 AD) NOTICES OF TIIXDI JA YUSCRIPTS 31 Beginning -श्री गणेशायनमः । कपित । घदे मुर मुनि गवर्ष यच्छ नाग ना कमद निपानिधि सकन सिद्धि का हे घर ॥ श्रमर सरित को सरोज सुड अति माहे चारयो भुम धरै पास प्रकुस भययर ॥ सिंदुर भमुड गल सुड पर एक दन्त लवादर मने दस साल कलुप दर । गणपति प्यारो जो दुलारो गिरिजा जू को सो मुमिरत देश सुप सपति को निकर Intt.-श्रो फतेसकुमार जग भगा भान अवतार । मडिल पडित करिम से रहत सहा दरबार ॥ १५ ॥ राज समाज प्रजानि जरा पुत्र कला समृद्धि ॥ श्री फतेस जगमे लहा मुजस मुधर्म मुद्धि ॥ १६ ॥ बालाँग गणपनि गारिपति मनपति सिर भुवभार । चिरनोय तवना रदोश्रो फनस मुझुमार ॥ १३० ॥ इति श्रीमनिमहाराजभार मागचंद्र श्री बाबू सिंह कारित कार दनक सपन विलासे विशेग श्रृंगार भेद वर्नन नाम सनमा विलासः ॥ ॥ समाय समान ॥ प्रोरस्तु शुभंभूयात् ॥ कासो को मये लिप्यत ब्राह्मन गोड रूपचन्द मितो वेशाप पदी १४ रबड़ सबत् १८४८॥ यो। श्री। यो । श्रो॥ Sulject - नायिका भेद ॥ Note -ग्रन्यकता फक्दिन है।ये रामा टिकारी जिला गया को प्राप्ति थे। इनको कुमार फतेसिंह ने प्राजा को, उसो पर इन्होंने यह यथ । धनाया माय बनाने का सवत् इस प्रकार लिया है-सवत ठारह मे वरप चारि चेत मुदि चाम् । नामी बुध दिन को भयो नयो यच अवतारु । इसका लिपिकाल सघत १५ है। Verse 1010-जहागीर चन्द्रिका Substance - country made paper Leaves-30 Size -5x5 inches. Lines-15 on A page Txtent-450slains Arpuarance-mery old Complete Incorrect Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Mohinija of Bandras. Jahringira Chandiska-The praises of the Emperor Ishingara (1605-- 1627) by the grvet Kesava Dusra who wrote this book in Surnyat IGG2 (1612 A.D) The manuscript is dated Sinisat 1848 (1791 A.D) Beyananj - श्री गोपोजनथल्लभाय नम ॥ अथ नागोर चन्द्रिका कवि केसवदास कृत लियते । छप्पे । मुनहु गनेस दिनेस देस परदेस लेम कर ॥ अम्बास फानेज सेस नप तेस बेसार । पन्नगेस प्रतेस मुसिदेस देखि अर । विहस स्यादेस देव देयेस लेस सब प्रभु पर्वतेस मे।केस मिलि कलि कलेश के सब हरहु । जा जहागीर का माहि को पन पल ही रघा करहु ॥ १ ॥ दोहा । सेरह से उनहत्ता माहा मास विवाह । अटागोर सक पक्ष की करोचन्द्रिका चार॥२॥ Frel -दोहा : जहागीर जू नगतपति दे सिगरो मुप साजु । केसवराई जहान में कियो यहोते रातु ॥ १६० ॥ इति श्री मल्ल रव भमडला पडलम्बा सफल साहि सिरोमनि श्री महागोर साहि यशव ट्रेका के सब मित्र विरचिता समाप्ता ॥ सस् १८४८ मोतो आपा शुद्ध १२ मगलनार लिख्यते पचद् ब्राह्मण गोह वाराणसी मध्ये मुभवतु पारस्तु । Select -दागोर शाह का यश वर्णन । Note --का कवि केशव मित्र है। निर्माण काल सवत् १६.६ मधमास और लिपिकान सपत १८४८ आषाढ शुद्ध मगलवार है। No 41--भावषिलास Verge Satst ice-country marle paper Leaves Sze -6xsi inches Lines - 12 on a mere Istent 980 salas --G6 AOTICIS OF HINDI NANI'SCRIPT'). .. .. .. . Appearance-sery old. Incomplete Correct CharacterDcransgart. Place of deposit-Library of the Mahirija of Banítar. Didem Pille-A treatise on rhetoric by the clebrated poct Dera (Born 1CONAD) The manuscript is dited Samrat 1257 (1800 AD) eginning-यो गोगायनमः । माशिला लियो................ ( স্বা मथम १५ पय मादा पड़ा और दोमक का साया भी दे फिर १२ 47 तक धनुयोग परे दीमक ने मनो भाति पाट लिये रे दुसरा पर इस प्रकार गे भारम्भ है) सोर घर । मा तास थिति भाव हे फहत मुर सरकार ।। नर रस के थिति भाव ना तिनथ पिम्गामा शिनगा यिति भारी उपत्रः मिगाम् ६॥ अथ र्गत मे धुपियन दे निपान माति चिरा हर रात कोविद पति न के मुमति कहत रति सह ।। End -टोदा । पन्नंकार र माय हे एनके भेद धनरा । धान गन्य के मतिन । सानि जादु मणिमदः । ८० ॥ अपनी यद्धि म्मान मे कझो कह निराधार । ताले मापर करि कुण लो मुमति मुधार या माहिन समुद्र को पहेनु न पायो पार । हम में बहे कपिन को सहा कहां प्राकार ICE Iोसरिया कवि देय को नगर स्टार्य यामु जापन नयन मुभाव पर कोनो भाव यिनाम । ८० । यसो पुम्नकं दया तादमी लिपत मया यदि शुद्धमगृद्ध था मम दोगे न दीयते । ८५ इति श्री कपि देवदन विरचिो मायविनामे मनकार निश्पने पंचमी विलासः ॥ ५॥ समाप्त । मुभमस्तु । श्री मया १८५० मिती पाये मामे गुझे पो रविवामरे लिपिसं श्री काशोत्री मधे श्यप्रसाद गोड मासान अपने पटनाय श्री दुर्गा देय नमः । श्रोरस्तु मुभ भूमार शोst- Satyect -काध्ययाव-नायिका नकारादि पर्थन । Note-यह पन्य प्रसिद्ध शि देय कृत है। लिपिकाल संवत् १८३० पोप गुस्त । रविचारहे। -63 . 10.42-मदीप काश्य Ferse Substance-country jando paper Leares Siza-11x7 inches Lines 15 on a page Extent - 025 blola Ap pearanmold. Completa Correct. Charseter-De anbratt Place of deposit --Labrary of the Maubraja of Banaras Prasadipa Kirya - book on Hindi rhetoric by Rajs Guru Datta Singhs of Anethi (?) He composeu tlus lok 10 Sument 1793 (1742 AD) Beparing-श्री गणेशायनमः । श्री रामायनमः । मंच परिपरम के तूप विघनशरो मुकता के चरण बाहिर जुगन के । परा अपरा के पेपरों के मध्यगा के प्रतिभा के भेद संधी अनुबंधी कवितान के । मनत कविन्द्र प्रति पद नये नये कठे न्यारे न्यारे प्यारे नटू रस के विधान के । पापो के धरण युग परे ते परिमुष होत है धतुरमुख पानी के समान के ॥ १॥ Erul.-अथ दर्शन नियमलवयम् ॥ दोहा । दशन तोनि प्रकार के भा दे कपि मियत दुविध गार में चित्र स्थम पतिः। भय दर्शन तृतयआय यथा। यनित । मौतम के पट में लिप्यो चिंध निहारि छको मन मोद घटाय । लागाहीं पलता मी अपना पिय पाएं। भूय मने घटयो पानद पाल के सापरतोस यो लाल के आर्य ध्यों एक धार मितासित में अमित बिहार विचार के दारं ।।दोहा। - मे सपने XOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS. दंपति नेह सनेह युत अनुभव दसा समोय ॥ घोति युक्ति से यह रच्यो मुयरन मय रसदोम ॥ इति श्री भूपति गुप्दतसिह विरचिते रस दोपाख्य काव्ये दर्शनाभिधानो नाम द्वादशः प्रकायः॥ १९ ॥ शुभमस्तु । श्री रामायनमः । श्री। श्री। Subyect --नायिका भेदादि रस कान्य । Note -यती राजा गुरुदतमिह अमेठी के राजा थे । येसा पान पडा है कि इन्होने इस संय को सरत् १८६९ कार्तिक शुक ललित तृतिया बुधवार को प्रारभ किया जैसा कि इस दौरे से प्रगट होता है । सपह सना निन्यानये कातिक मुदि बुधवार । ल. लित तृतीया में भयो रसदोपक अवतार - No -कविगुल कण्ठाभरण Versc Substance - country-made paper Leaves-19 Sizo-11x7 inches Lines--15 on a page Ertentr-285tlokas Appearance-old. Complete Correct. Character -Devanigarl. Place of deposit-Library of the Maharijs of Banírns. Karkula Kanthabharana -A treatise on Hindi rhetorio by the celebrated poet Dulalia, a great authority on Hindi composition He floorished about 1750 A.D He was tho grandson of Kal1 DAce Triredl and son of Udaya Natha Trivedi, both celebrated authors of their time Deginning-श्री गणेशायनमः ॥ श्री हनुमतेनमः ॥ अथ अनंकार को यथ कवि लह कृरा कंठाभरन लिप्यते । दोहा ॥ पारयती सिष चरन मे काय दूलह करि प्रीति । थोरे क्रम क्रम से कहा अलकार को ऐति । १५ चरन वरन लक्षन ललित रचि रोमयो करतार । पिन भूग्न नहि भूपहाँ करिता बनिता चारु ॥ २ ॥ दोरघ मत सत कविन के अरथा से लघु तन ॥ कमि दुलह याते कहो करिकुल कंठाभर्न ॥ ३ ॥ End --सकरी मथा। हाही मति भद पे पठाई दोज सफर को चाही चंद कला जान मुप से लदाई री । कहे कवि दुलह अपुरय प्रकाप्यो हेतु नाइन हमारी ठकुराइन है पाई रो ॥ चारो भेद सकर के तुझ मे विचारो चार चातुरी दे माना निठुगई मुनस्याई गे । पेप मनि मदिर में पलक को पोक पोझी साई अरुनाई इनि आयिन में छाई रो० ॥ ॥ इति महा कषि कालिंदासा Subject-अलंकार काध्य Note- यकता प्रसिद्ध कवि ठूलर हे जो सवत् १८०० के लगभग हुए थे । N044-समालिका ग्रन्थ Verse. Substance - country made paper Leaves - 44 Size - 9 x 5 inches. Lines-9 on a page. Extent--675 klokas. Appearance - orlinary Complete Generally incorrect. Character - Deva nigari--Place of deposit-Library of the Maharaja of Banaras. Rasamálıld Granlha - A bool dealing with subjects lke spiritual know ledge, wordly renunciation, love of God, good company, ctc. The author 19 One R{inscharnna, who composed it in Samvat 1844 (1787 A.D) The manuscriptis dated Samyat 1854 (1797 AD) Beyanrang -श्री सीतारामाय नमः । वसत तिनका छन्द ॥ यस्योरमालतुलसी हरिमन्दिोन भाल धनुर्वाण भुशकितस्य । भक्तिश्च भानमभिभूषणभूषिताग ते घेणधाः घरब रामचरयो नमस्ते । १॥ योगदगुरोर्यचन मेहनिसांधताण्डो चित्त ममालि जलजातक सपटारहो । ज्ञानापिभोरवर अमर शन्दस्यका दृश्य स्वरूप प्रतसग नमो नमस्ते ॥२॥ ३ S8 NOTICES OF HINDI MAN USCPIPT3 काध्य छन्द । श्री गणेश श्री शमु अझ श्री सरस्वती थी । श्री मुरमरि श्री गरिचंद श्री सूर्य भो भी शो दृगपति श्री अमिन पपन श्री घेदपाय यो श्री समेरा सब देध घटि पद रामघारा श्री॥३॥ End.-हरिगीत छन्द । तप नेम पूजा पाठ भप नागादि प्रम टतिम पना। मोबादि सब नहि तुहि जो मल एक सतसगति बनो । मेरि मग पाय कुबेर में भिस्या- न मिनु कोटिन गनो तनि सफल कर्माकर्म गति मासग कर परि मम मनो। ४ ॥ दोहा। रामचरण सतसग चिनु अग भाग नहि रोइ । अग भग धिनु कर्म बह धरे रहत सय कोर ३॥ तीन टपर पाठ हुत ईसर अवकाम किवात पोलि कहघ सनि पिय वरम अपर करय विण्यात ॥ ६॥ पर भाषा को कादि के अपने नाहि वढाइ ॥ रामचरण ते स्वान कयि कय छु न येट अघाइश्रुति गिरि कदर में रहत कहत अनटी थात रामचरण ते सिंह कवि ना गयद निरा खात 1 : काश्य धर्म पुर्वपधि अर्थ पास नहि मान ले सिम दूपन देत हे यिनु सागुर के नाम । ६ ॥ मत मत अष्टादमो चौपालिस दिन मूर । सरद बिजे दसमी बिमल रस गरथ भा पूर ॥ १० ॥ इति श्री रसमालिकागाध सास्त्र सवादास्यने म गुरोर्थ दबोधे वर्णनो नाम पचदोपकास ॥ १५ ॥ अयोध्यात्यले । माप यदि मुकल परे दरम्या सपुरण समाप्रम। लियित मप्रसाद वैष्ण्य ॥ श्री महारापत्र के स्यले । सवत ॥ १८॥ ४ ॥ Suljeet -शान, वैराग्य, भक्ति, सत्सगादि । Mote ---इसके ग्रन्यकता कोई रामवरण वान पड़ते है। मवत् १८४४ शरद कातु आश्विन शुक्ल १० रविवार को यह यन्य पुरा हुअा । लिपिकाल पेशाप शुरु १० सवत् १८५४ हे। N045-रसमार Verse Substance-country made raper Leaves 4s Size-~1016 inches L nes 18 on a page Extent--1065 slohus. Ar pearance-old. Complete Generally correct Character-Duvantgarl. Placo of deposit-Library of the Vakurája of Bandras Nasa Sdra -A book on Ilınde composition dealing specially with the «lifferent hin is of heroines and styles etc The name of the author is not clearly ben but in some places the word Disa occurs wluch may only be his nom-do plurme. Thus bob was written in Samrat 1791 (173HA.D) Bearing---श्रीगणेशायनम ॥ दोहा । प्रथम मगलाचरन को तीनि पासमक बानि । नमस्कार अा ध्यान पनि सिरवाद वखानि । नमस्कार पारामा मगलादान । कदन अनेकन विधुन को एक रदन गन पउ । बदन जुत बदन को महकर पुरकर पाउ ॥ २ ॥ ध्यान प्रातमझ मगनाचरन । छापे । पक्रतुड कुलित मुड नग यलिस पाडु रद प्रामि घुमड मडचिरा दान मांडत मुगध मद । बाहु दढ उदइ दुप फुडनि प्रमुड कर। विद्युन पड कर पडवोप सत मारतड घर ॥ श्री पड परस नदन दास चड घडी तनय । भिलायु लाप लाहन समुझि राय प्रापु धाहन दृदय । ३ भासिरयाद पातमा मगलाचरन । सोरठा करो चद तस मी मन को अगमा मुगम । काटो रस सारस मुमति मथानी मर्थनु करि । Ind --दोहा । सत्रह से पकानवे नभ मुदि छठ युधधार । भर पर देख प्रताप गड भयो यथ प्रथतार ५८६ । कुमति फूटपन लाइहे विशवो घरन विगारि । मुमति समुनि मुख पाइहे विगयो वरन मुधारि । ५० ॥ इति यो रससार सपुरन लिप्यते । मुम मजा देपा से लिपा मम दोष न दीयते।
NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 35 Subject --काभ्य नायिकाभेद रस आदि। Note -पथकत्ती का नाम दो तीन कविता में 'दास' कवि मिलता है-निर्माण काल प्रत के दोहे में १८१ हे। ये दास करि कोन थे सो पता नहीं लगता। No ar-शहारनिर्णय Verse Substance-country made paper Leares Size -107 x 67 inches Lines-18 on a page Extent-825 blokas Appearance -old Complete Correcto Character - Dovanágart Placo of deposit-Labrary of tu, Maharája of Baníras Sringúra Nirnaya --A treatise on Hindi composition dealing with the different parts of that subject. The nauut of the author i Blukhari Dasa, who was born in 1723A.D Begurmeey -श्री गणेशयनम । लिपले पोधो सिंगार निर्भय । कथित मूस मृगेस बल धूप बाइन किंकर कोन्हो करोरि तेतीस को । हानि मे फरसा करयाल विमूल धरे पल पाइयो पोस के । गत गुरु जग की नननी जगदीस भरे सुश्देत अमोस को ! दास प्रनाम करे कर जारि गनाधिप को गिरिजा को गिरीम को ॥१॥ End -मरन दसा ॥ मरन दसा सब भाति मनिरास मरिजाइ । जीवन मत फरि घनिए तह रस भग घराई ॥ यथा । नारी न हाथ रही उहि नारी के मारिनी माहि मनान महाको । जीयन टग कहाँते रहो परक में अग रही मिलि जाकी ॥ वास को बोलियो गात को डोलियो हेरे को दास उसास उया को ॥ सीरी? आई सताई सिधाई कहो मारने में कहा रयो याकी ॥ २२४ ॥ इति यो पायो सिगार निर्नय भिपारीदास कृते सपर्ने मुभमस्तु सिद्धिरस्तु । ना देषा सो लिपा मम दोषो न दीयते ॥ Sulyect, नायक, नायिका, उनके अंग, लक्षण, शमा, श्रृंगारादि, हाप, भार, दसो दसादि का वर्णन ॥ Note -पथकता मिपारीदास है, यह अपना नाम करिता में दास रखते हैं। No 47-भावार्थन्द्रिका Verse. Substance country made paper Leaves.-18 Size-5x41 inches. Lines-~-10 on a page Lxtent 210 blokas Appearance - new Complete Generally incorrect Character-Dovanagari Placo of depositLibrary of tho Mahárája of Banírus Bhaidrtha Chandrıld - Translation of the mahınına stotra or the praises of fiva. The translator is llanıyára Singha son of Syáma Singha, of Banáras The translation was made in Samvat 1843 (1786 A.D) and the manuscript ty dated Samrat 1856 (1799 A D) Beginning--श्रीगणेशायनमः ॥ अथ सदाशिवमहिम्नस्य पदभावार्थद्रिका टीका भाषा कवित निवधने लिप्यते ॥ प्रासेमगलार्थ गणपति प्रार्थयामि क । सिधुर बदन सिद्धिसदन रदन एक राजे भुजचारि चारो सिरा वलयेस के उची जर उदद समूचा जोति रासि होत भासमान मानो कोटि उदय दिनेस के । सिंह मनियार लाल सिद्धर घटा मे विटु छटा मनि रत्न स्वर्न भूपन असेस के विविध विनोद रचि मोदक ले पेले गणपति गोद गिरिजा मटेस के ॥९॥ राम राम । End-होने अनुम्वल धराधर से कन्जल ओ जलधि से वासन प्रशासनते यनिजाए। कलविट डारे लेपनो मुधारे पुहमी से। पत्र सरवत्र से। वितानिनाए । यार कहे ऐसे पाचारन ठाट ठठेविधि रटे रते कल्प जेते गन सो नगन बार विरद विशाल लिखा सारदा उकल काल तदपि कृपाल गुन तेरो न पनि जाए ३२ 30 A oriors OP HIYDI MANUSCRIPTS . .. .. सपा के प्रकर अब येद यमचन्द्र पुरी चट्ट परी चंद्र मास मरद घरद धर्म धन को। चाकर अपष्ठित पारामचन्द्र पडिरा मुष्य मिप्य कपि कृष्णलान के चरन को। मनियार नाम स्यामसिह की समय मे दण्डषि यस का पुण्यदस महिमनको ३३ দুনি মা মলিয়াধিস্থ মিনি ম্যায়িত্ব মহিয়সী মামা স্বায়িত্ব নিষষ্টর মূল ।ধত্ব १८३६ मि च गुन १३ मुगु यासरे प्ररय लिप्त । Subject --श्रीमहादेव जी की स्तुति । महिम्न का कयितों में भागनुवाद समूल Note-ययकता स्याममिह के पुत्र मनियारमिह छपी हे मी काशीवामी श्रारामचन्द्र पडित के मेध तया कृप्या काय के मुत्य शिष्य थे। निमाण काल भवत् १८४३ प्राश्विन गुमा १५ और लिपिमाल सबा १८२६ मि चैत्र शुक्र १६ भृगुधार है। - ... ... .... . ... No 48 -राग यियेक Verse Substance - country mude paper Lesrea --15 Siz0-7x5 inches. Lines-18 on a page Extent-1,300 blokas, Air pearance-very old. Complete. Generally incorrect. Chamcter-Dovanigart. Placo of deposit-Library of the Malzárdja of Bapáras, Ruja Vrela - A book on the art of niusic by the poct Purasoftans, who wrote atm Samrat 1715 (1658 A.D) for one Fateha Chanda Kayastha, som of Pancholi Bhaga Chanda The masuserapt is dited Surat 1744 (1667 AD) Beginning-श्रीगणेशायनम । पूजों पादरभार करि प्रथम .. माद मनसायाचा कहत पुरुसोतम सिरनाइ ॥१मसिधर धरन विगुन हरन हेरध । पुरुसोतम की को होहु सदा अग्नव ॥ २ ॥ सारद चद मुपी सदर सम काइ ॥ निगम महोदधि पारदा भोमारदा. • ॥ ३ ॥ अति टनल कायस्य कुल तारे भेद अनेक ॥ सहा मी नाम पर कहित हे कुल एक ॥ ४ ॥ प्राट भए तिहि यस मे जग में लक्ष्मी दास फेलिरहो संसार में चाक मुजस प्रकास ॥ ४ (पहिला पर कुछ फटा हे इसलिये पहा नहीं गया ।) End -सकर राग । फतेचद की चाह पर कोना राग विवेक ॥ या नीक समझिके जानहु राग अनेक ॥ ॥ जो कपि गग विवेम में करह चश्यों होइ य लोना सजन सोधिके दूयो मति पल कोइ ॥ २८ ॥ सवत् सबसे अधिक पदर कौर के रोर कोनो राग यिक तिथि पुना मुदि आसान ॥ LE जालो गगा गिरि सिमिर श्री बाली धरि अग ॥ तोलो राग षियक यह जग में रहो प्रभग ॥ १८० ॥ इति श्री चतुदश विद्या निधानेत्यादि विवक विरुद वि. रानमान कायस्य कुल शेयर पचली भाषचद मुरा भी फतेचद कारते कवि यो पुरुसोतम कृते বা জি মা ঘষা ছম ঘন নাম অম' সন্ধা যায় দ্বি যথ শ্রম मस्तु छ । सबत् १०४४ समय नाम पुस मुबी दुधादसी लोपोत यधुराम कापस्य कामों मधे । रामसहाई ॥ छ । Stbyeet -सगीत Note --यह यथ पुरुपातम कवि कृत है। ये किसी फतेचद नामक कायस्य के प्राश्चित भान पडते है । उहो की प्रधानुकल यह यथ रचा गया है। इसका निर्माण काल सबा १०१५ प्रारियम मुदो १५ शुक्रवार और लिपिकाल सबा १८४४ पुस मुदी १२ हे । 1012-दीपप्रकाश Terre. Substance-country made piper Leaves -32 Siz0-71x4g anches. Lines--17 on a nage Extent-420 slokas. Appenrance-very old. Complete. Correct. Character-Deranígar Place of doposit-Library of the Inhirija of Bagiras. Dip Proldk_A boob dealing with the differcat kinds of heroines by the poet Brahma Datta, who lived is the time of Wahársja Udita Marsyana NOTICES OF UI DI MANUSCRIPTS Singha of Baniras. He wrote this book in Samrnt 1866 (1809 AD) at the request of Babu Dipa Níráganı Singlia the younger brother of Mahiriyn Uditi Nariyars Singha. The manuscript which is dated Samrat 1860 (1803 A.D), is in the authors own landwriting BRgurung -योगणेशायनमा । करितु म सेदुर में भरो माल विशाल उदे गिरि में मनों भानु उदे को । दप्त लो मनो ट्वेन को चद विचार के आयो हे मित्र मिने को। चदन लीक लो चद्ध कला शिर चारि भुना अहे दानि अभय को केसे कलेश को लेश रहे मन आनत रूम मरेश तने को॥१॥ End - कवितु ॥ नाना विश्व करके कमडल में पानी चद महल में मुनि की नि. सानी सोलो गाहियो । जोला अमरावती अखडल अप्पड नभ महल में शूर शशिमडल उमा हियो कहे कपिरम परिवड यममणि तू है धनि तेरो बस नाहू खडनि साहिबी । नाले फरिषद कण महल में मही महीमडल में तो लगि प्रखड तेरी माहिती ॥ २६ ॥ सपुर्णेश्य यथः ॥ दोहा । अष्टादशशत अधिकपट पष्टि यरय राप मास । शुक्र पचमी को मियो दोष प्रकाश प्रकाश १६ से दीप प्रमाय से दृगनि पात सब मूझि तेसे दीप प्रकाश से घस्तु परति सव दुझि ॥ २॥ सवत् १८८६ फाल्गुण पौर्णमासी लिमा ब्रह्मदत्त उपाध्याय दक्षिणी । शुभ भी । Subject --नायिका भेद । Note-कती करि ब्रह्मदत है। ये काशिरान महापत्र उदित नारायणसिंह के समय के कपि हे और स्यात् इहो के प्राधिस भी थे। इन्होंने महारान के मझोले भाई वायू साहय दीपनारायणसिह की पाना से यह यन्य बनाया। इसका निर्माण काल सवत् १ES फागुन सुदो परमो और लिपिकाल संवत् १८६६ फागुन शुदी १५ है । 10 No 50 -Te fue Verse Substance--country made paper Leaves--- Suze-61x5 inches. Lines-18 on a page. Extent-152 slokas. Appear ance - cry old. Complete Generally correct. Character-Deranigari Place of deposit--Library of the Maharaja of Banárad Nakha Sitha-Description of the different parts of the body of a heroine by the poet Murzi Abdur Rahmins, who wrote this book wlule Farrokh a Sayar (1713 19 A.D) was on the throne of Delhi. The manuscript is dated Samvat 1850 (1802 A.D) Beguarang --श्रीगयो शायन प्रयनपशिष वर्णन ॥ मिरता अबदुरहमान प्रेमो कृत लि दोहा । गुर गनेस सादेस कर रुचि सौ रचस्ससाना नसिप भुन्दर सर कियो कवि अवदुर रहमान १ फरकसेर मुनतान घर सुन्दर सुभट सुनान ॥ ताको मनसबदार सुभ कनि अअदुर रहमान ॥ २ ॥ कवि अगदुर रहमान कृत न सिय कठ जो होइ ॥ होइ सभापडित मुमर रोझे सर करि लाइ । जो नर हिय विद्या धरै सो विद्याधर मान । गुथ मजूस में विद्यायान न नान ॥ ४ ॥ मन मजस सुधार के विद्या पुला धार ॥ कोट लगे ना धुन लगे नोक करो विचार ॥ ५॥ अथ पगनय २० ॥ तारे नातवारे दिन दिये निहारे नग लाग है प्यारे रूप मगल को लहे हे ॥ केधो हे मुहाग धीन नावन के धीज केयो अनुराग यीनरान गुन पीत कहे है ॥ रहमान प्रेमी प्यारो मसि भान की प्रधान काठ पग पल्लव पे राये दुति गद्दे है ॥ पगनय लाल से समन छीन धरी केधा मननि के भाय मन पाइ लाग रहे है। End --दीपक की लाइ काप दामिन को देह नापे सरला मी देय ताऐ जाने जग सब है : फूल मुरझाद गिरे प्रश्र सो तारे मरे चद्रमा ह डर सेत भयो पोत दव है ॥ रह मान प्रेमी कहो मे तो अचरल लो ज्याल की लपट लाजे भान जब तय है प्यारो को 10 39 AUTicrs of IRDHYLSOPHITS .." .. .. .. लघु उदार मने लाज लोन शेत गा पानीमा यिनी यो छायदा ध्यास गोस मनाइ के नप मियरयों सवार । भलि देधा वा कडूक लीना मुम यिमुथार || तिश्री प्रेमी कृत नमिय पहि श्री मया १ve fम येष्ट कृत भाम घामरे लि स्वरोप्रमाद गोठ ग्राह्मण यी कामो को मध्य । शुभ भूय Satyeet,-प्रत्यंग की शभा का वर्णन । Note...यह यन्य करि मिर्धा अदमान प्रेमीकृत है, ये फर्मपमियर के ममय के फाय । परोप निर्माण काल का नहीं दिया । लिपिमान मयत् १८५- नेठ यढी १ मगल. पार और लेपक परी प्रसाद गौड सारण कागोवामी है No B1-साहस्य Verse Substanco-country male raper Leaves-110 Sze-1016 inches Imer-15 om page Latent-~1,785 slokas. Appene anco-bew Complete Correct. Character-Devanagari Plxc of depost- Library of the Maharijn of Baniras, Rasi Rainsya-A lonk on rlietoric by Kalanzt Misra of Agri Ile composed this book in Sarurat 1727 (1070 A.D) Dr Grierson ways that the TAK born in 1657 AD but thero appears to be some mistake in this as Kulapata Misra cannot be ein.cted to write a book on Hindi rhetoric when he tras only 13 years old Beginning-गोमते रामानुनाय नमः । अय रसरहस्य लिप्यते । सप्रेमा । रेसिय फुस बने यि पुत्र रहे अलि गुनत यो मुप लोजे । नेन 'विमान दिये धनमान पिलोकत रुप भुधारस पाने । सामिनि वाम को कोतुग तेग पास न जानिये ध्यो नि छोजे । मानद यो टमग्याई रहे पिय माहन को मुप देपियों कीजे । End-वस्तु प्रागरे श्रागरे गुन तप मोल विलास घिन भयुरिया मिश्र धरि 'चरनन के दास । १४१ ॥ प्रभू मित्र सिन बस में परस राम निमि राम । तिनके मुत कुल पत्ति कियो रस रहस्य मुपयाम ॥ १४२ : निो मान हे ऋयित के ममट कदे यानि से सय माण में कदै रम रहस्य में प्रानि । १४३ ॥ समतु माह में घरप योती मनाइम । कालिक यदि एकादशो चार बरन धानीस ॥ १४४ ॥ इति श्री मित्र कुनापति विरचिते रसाहस्य अर्थ नकार निरूपन माम अष्टमा प्रतात ।। सपने । मुभमस्तु । गोरस्तु । श्रीराम ॥ Subject -काथ्य एनकारादिम Note-निमाणकता कुलपति मिय है। निमाय काल मा १२० कातिक पदी १५ गुरुवार है। NE3-*यायार्थ कोमदी ters Substance - country mado paper Leares-73. Size -- 101x01 inches Lancs --- 15 oa a page Extent -1,050 slokas. APPErance-new Complete Correct. Character Dufanigari Place of deposit-Library of the abiriza of Bäniras T'yangartha Karmeli - bookdaling with the different hade of heroes and keronues with special reference to tlo sarcastic style of Iladi omkutron That none of the poet 1 Pratima, who attended the court of Vikrama Siht of Chamblian and wrote this book in Samsat 1859 (1825 AD) The author of the Sara Singhastriya 13 decually wmag when fic says that l'arián attended the court of Chhattrasala lundeli (1649-1:31 AD) for there is adilurencs of more than a century befneen these two person,
XOTICES OF IIDI JLAYUSCRIPTS.
39
Beginning-श्रीगणेशायनमः ॥ रामाय नमः । श्रथ बिग्यार्थ कौमुदी लिप्यते दोहा ।
गनपति गिरा मनाद के मुमिरि गुरन के पाइ । कषित रीत का कहरा हो यिगि अर्थ
चितुलाद ॥ ५ ॥ वाचक लक्ष्म पित्रको सहूँ तोन विधि मानि ॥ याच लच्छ अरु विगि राह
अर्थ विधि पहिचानि ॥ २ ॥ इनसे लच्छन लच्छ यदु रम संथन ठहराइ ॥ साते हरि बरने
नटो व पंथ
समुदाइ
Find -दोहा । सपि दूप्ती दरसन दसा हाय भाव वधु और । याते नहिं पर्नन
करे धरने कपि सर ठोर ॥ १२३ । विगि प्ररथ प्रतिसे कठिन को फहि पारे पार । ममट
मत कछु भमुझि चित कीनी मति अनुसार ॥ १२४ ॥ यह विग्यारथ कोमुदी पठे गुने विनु
लाइ ॥ ताको मति माहित्य को काम अर्य दरमाइ ॥ १२५ । समतु ससि यसु घमु मुवे गनि
अपाक को मास ॥ किय विग्यारथ कोमुदी मुफघि मताए प्रकास । १२६ ॥ गिरो देश मुधारिने
ते गनि मुकमि मुजान । धनी चिंगारत ने मुनि ते कवि अधम समान । १२० ॥ इति श्री
विद्वत कुल मनोसाद कारिनी यिंग्यार्थ कोमुदीया मुवि प्रताप विरचिताय नाइका नाइक
पर्ननो नाम सपुरन प्रकास । छ छ छ छ ।
Sulyect -नायिका नायक आदि वर्णन ।
Note -फत मुरुधि प्रताप है । निर्माणकाल सपत् १८८९ पापाद है।
No63-उत्तम काव्यप्रकाश
Prose and zerse Substance-country-mado
paper Leares -67. Size-11x6 inches
Lines--18 on a page
Extent-
1,195 slokas. Appuarance-ordinary. Complete Correct. Character-Devar
någarl Place of deposit-Library of the Mahúrája of Banáras.
Ullama Kdrya praldia —A book on Hindi composition with special refer-
ence to sarcastic style by Mahāraja Viswanitha Singha (1840) of Rewah. The
manuscript is dated Samvat 289G (1839 AD) a which
year
it
appears
that the
book was also completed.
Beginnung-यो गणेशायनमः । अथ उत्तम काव्यप्रकास लिप्यते । दोहा हरि गुम
श्री प्रिय दास जे जे सिय सिया गनेस । सरस्वती सोसा राम जे जे राधा राधेस । १॥ गोपो
मुकिया हे सने रिझवन हिता वृजनाथ । करहि चरित कुल नाइकनि कहत मु कछु
निमुनाथ ॥ २ ॥ उत्तम काव्य प्रकास यहि नाम विचार अमान । मुझयि ममति गुन गहिरो
या सम ग्रंय न पान ॥ ३ ॥ यक्ति घाघश्य काकु पाच्य अन्य सनिधि प्रस्तार देस कानादिक
अादि पद से चेष्टा येतो वैशिष्ट हे तिन में प्रथम या फक्ति मे वैशिष्ट जन्म अम पति नायक
है । प्रानु अफेली अागारिटी जाइ लई कन्नी फूलन को मन भाई। देयत ही बन देवी तहाँ
गहि के गई आपने अन लियाई । जारस दे किये ध्याह सिगार कही कछुये रहो ताहि
डेराई । के ह के ज्या शुटो काननव्हे दिग तेर लो पाई पराइ में माई ॥ ४ ॥ पक्ति है नाइका
तामे रिहार की वैशिष्ट हे मग कहे हे देशो थ्यार के सिगार किये सेो काहि ब्रह्मा को
मपिर्याय के दियो का विवाह सो गोपन कियो ओ बनते भगी चली अहो मेया कहि विवाह
भये भयो जो विहार मो गोपन किया या यस्तु व्यजिर भई विवाह ते पत्ति नायक श्रायो
याते थो राधा जी को विवाह तो आइहो गयो ओ गोपिन को घस्वाहरन समे मे सब गोपाल
याल भये श्री कृष्ये ताही वर्ष में सब गायिन को विवाह भयो कान्ह रूप गोप बालन
मा अरु गीता मे लिये है की पर। सक्ति जोर है याते सर्व जीव मात्र श्री कृष्ण को मुको
या हे अरु गोमो तीन प्रकार को हे नित्या प्रेमा छाया इनको जानि के सुमति जे हम ते
समाधान करि लेइ तिनको चेवरा पथ के विस्तार के भय नही लिप्या ॥४॥
40 NOTICES OF NIDI NA USCRIPT! Ivl.-मिद्धि श्री बांधय धनी राजाराम वघेला शाम या रामा धमे रीवा पाइ नधेन 40 सा कुल श्री अमिह को विस्यनाथ मपान। पुनि प्रकास कोना भनो गाथा मे साल १२ ॥ सिद्धि यो महाराजाधिराप शोमदाराना थीराजा बहादुर मोसा रामचंद्र कृपापागधिकारी विस्थनार्यासह देष फुरा उनम च्या काश्यप ममान भाति । गुम भूयात् मिती दुतो छठ मुदो ४ का मगर १८४६ के ( इमो वाद या साकार पाएपद्ध मिसमें एक और १६ घाट पर यक पार ८ पोष्ट दे उनमें असर भरे रसके कपर "मध्य. रो" यह शोक लिया है। Sujeet-व्याग काथ्य। Note- की रोषाधिपति मारा विश्वनामिद है। इस पथ का लिपिकाल सय १२६ को इसका मिमांग काल भोपान पहता है। MO64-शातथराक Prose and herse Substanco - country made peper Leares-23 Size -10x6 inches Lines-24 on a pages Extent --2580 blokas, Appearance -- ordinary Complete Generally correct Character- Devanagari Place of deposit-Library of tho Jabárája of Bandras Sinto Salala - brak derling with spirtual subjects by Habardja Visvanatha Singhs of Rewah The book is divided into threo chapters, dealing Tith worldly renunciation, spiritual knowledge and final beatitude The manuscript 13 slated Samvat 1893 (1838 AD) (Sce Xo 53) Beyming -श्री गणेशायनमः । श्रय यस शतक लिप्यते । दोहा श्री रघुनंदन सरसुतो गरि समु गनईम । हनूमान हरि गुरु प्रिया दास पान धरि सीम् ॥ १॥ टीका मुक्ति प्रदीपका कहत अहे विमुनाथ गुरु मुष मुनि यहि विधि कहि याच मुक्ति हिदाय ॥२॥ कश्ति । ननि, नपत कटि केहो कपट टर भुननि भुपा धारा किसने करन में ॥ बदन में विधु वारो नेनन नलिन थारो मत चचरीक धारो कुचित कचन में । नाय विस्वनाय के मसथ्य राय रामचद जगत के नाय यारो पाप गुन गन में । काल रुद्र कृधता में विधि घेद विनता में यारो विगु धार बार करन मरन मा. End ~यहत जे हे वेदात तिनको अभ्यास करिके से घहत ने सत तिनको मग करि तिनके ने बहत मत हे तिनको या त सतक में बनाया हे या में सान केले गुप्त गुप्त भावना हे ये को कवित्त को अभ्यास करिके याको रीति तो कार है मो या मसार समुद्र का हे तास सोयही गोपद सम स्तरि नेहे अह हो या भाति कोज साधन न करि सकेंगो ओ या पाठी मात्र करेंगो मूल तिन को प्रये समुझि के दित धरेगो ताको धाग्य, ज्ञान भक्ति होवदो करेगी जानी भाति से घरो घटुरा अभ्यास करेंगगे ताते याकी परिक्षा करि लेन यह उपदेस व्यजित भयो । इति सिद्धि श्री महाराजाधिराम श्री महाराजा श्री गजा वहादुर मोतारामचन्द्रकृया पाधिकारि विस्वनाथसिंह जूदेव कृत मुक्तिप्रद सात सत्तक समान । मुभमस्तु बेठ पदी ३ का सबत् १८६५० Subject-वेराग्यधान और भक्ति हन सोन पडे में पुस्तक विभक्त है। Note.~यकता महाराम विश्वनाथसिर रोवाधिपति। इसका निर्माय अयश लि. पुस्तक में । सबत् १८५ जेठ बदी ३ दिया है। पिकाल AOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 41 23 No 55-~लालित्यलता Terse Substance-country made paper Leaves Size — 9 x 44 inches. Lines -- 12 on a page Extent - 550 blokas Appearance -- old. Complete Correct. Character - Devanagari Place of deposit-Library of the Mabírája of Baoiras Lalya Lata A book on Hindi rhetoric by the poet Dera Duffs of Jármat He wrote this book in Samvat 1791 (1734 AD) The banuscript is dated Samvat 1805 (1748 AD) Thuis Desa Dutta should not be confounded with the celebrated Deva Dafta of Malnapuri There 19 another manuscript copy of this book dated Santag 1862 (1805 AD) in this library Begrrering -श्री गणेशायनम ॥ कपिन । यदे मुर मुनि गधरय यक्ष नाग नर कामद कृपानिधि सफल सिद्धि को हे घर । अमर सरित को सरोज सुडअम सो हे चाल्यो भुन धरे पास अम अभय पर । सिदुर भमुड गम तुड धक एक दत लबोदर भने दत्त सकल कलुप हर । गणपति प्यारो जो दुलाये गिरिमाज को से मुमिरत देत मुष सपतिन को निकर या । तर वेद पविष महा असनी और कनेल के मध्य विलास है। भागीरथो भवतानि के तट देपत होत सो पाराक नास है। देव सरूप सवे नर नारि दिना दिन देखिये पुन्य प्रकास हे। नव निनानवे कोने जिताति से जाममा कवि दत्त को वास End.-दो० ॥ सप्त सारो गोरे प्रानि पर फेन से न । चलो चांदनी में मुमिति चद्र- मुपो लधियेन ॥ २५ ॥ सकर । चद कला मुघ चद में नदलला मुए पनि । योहा अजन हे लग्यो गुर से अधनि ॥ २५२ ॥ सम्प्रेष्टि । सवत सबह से परे एकानये प्रमान ॥ यह लालित्य लता लालत रची पाय मुर्दिवान ॥ २५३ ॥ इति श्री कषिदत्त कृत लालित्यलता सपूर्ण मुभा मस्तु ॥ दो । घरप अठारह से अधिक पाच पाप मुदि राम ॥ तिथि रविवासर को लिखी भोपम ललित ललाम । Subject --लकार Note -कती कविदत्त जानमनिवासी है। इस यय का निर्माण काल सवत् १२६ और लिपिकाल सरत् १६०५ है । No 56--रसिकमोहनकाय्य Verse. Substance country made paper LRewes-74 Sne-11xsnches. Lices-Tapege Eatern-1550 klokas Appearance-ordinary Complete Generally correct. Character-- Devanagarf Place of deposit-Library of the Mabárája of Bandras Rasila Mohana Kavya - A book on Hindi composition by the poet Raghunitha Bandijapa (FI 1745 AD) who was the court poet of Maharaja Barivanda Singha of Banáras. The manuscript is dated Samrat 1862 (1805 A D) Beginning-श्रोगयेशायनम श्री सरस्वत्यैनम । विधन हरन दुरमति दरन करन एकल कल्पान ॥ सिथ मुत श्री गननाय को सच मुख दायक ध्यान ! १४ श्री गुरदेव मुकुद को लहिक क्रिपा सहाइ । करिधे को पानी सकति य धनि को समुदाइ ॥ २ ॥ ब्रह्मा को भुत मानसिक गौतम परम प्रसिद्धि ॥ ताके कुल कोटू मिसिर प्रगट भयो तपनिद्धि । End --अपर पर असक लापति मेरी पिने सुना पुर पापधार को पहारनि भरो भयो । आधत बसत न्यो त्यो वन उपयन मन्त्र रघुनाथ हरो भयो फूलि के फरो भयो । करिब ना सो भर की मत्र मषिन से मार वयन के पास को डरो भयो । तीन 4 XOTICES OF NIDI J! 1.SUBCRIPT. विपति के दया राम राम त पाग उग्रराय छन पिमीन परो भयो । सो कवि रघुनाथ यश्रीजन कागावामी यिदिी काय गरु मोहने सपनादि कार यनंनं मुभम मयर १२ मार मामे कृष्णा पो । ९५ यो गम राम । Sriject-नकार - Note --पन्ना कवि रघुनाय यदोलन काशीयामों है। ये महाराज परिवमिट के पाथिरा रतन टनमे चोरा याम पाया था तो शारी मे उतर काम पर है और पच. का धाम नि म मा के ममोप रहता है। इस य का लिपिकान मय १८४९ माघ कृपा ५। मुप पायो No Br-मुन्दर म्यामनिलाम Terr Sustance-country maule Troper Leaves-240SA-32xGanches Lines 18 on nnge Extent-5,370 slokass Appearance-ordinary Complete Correct Character-Derana uri. Plact of deposit-Labrazy of the Mabarája of Banátas, Sr Sundara Syem Vilisa-Description of certain sches from Krişna's life and the mention of certatu Bhalfas. The name of the author ** Sunding 14. IIe was the son of Dulha Ruma ho mag alise when Vizir Ali nas do feated in Binára. Sundara Dáss wrote this book in Samyaf 1807 (1810 A.D) Beymriny --श्री राधा कृष्णायनमः । चौपे । और ओ गुर को प्रयम मनायो गमक बनन के लि बॉल भायो । हरि गुर को मन मे को ध्यायो । पुरन काम धाम पद पायो । अनि रचि रुचि मचि हरि गुण गायो । रसिक जनन पर गम बरपायी घमि पूमि भूमि मुकि नायो । भूमि भूमि पर मोक नवाशे रोम रोम में शानद पायो । धूम धूम रम ययि सिराय में अद्भुत रचना रचौ रक्षायो । झूमि भूमि मुष Tinr कार हेभी कामो में वास ध्यान दंपति को बिनास " कृपा करो हरि हरि के मा । तिनको कृपा पुरन भयो ग्य। मया अठारद मे जानोगे । सामठ रा टपर मानागे । चेरा माम शुद्ध पक्ष मगन मन नामी श्री श्रीराम सनम दिन सो हित विस में पठे मुनेगे । और चरित्र मन माह गुनेगा । मो अवश्य हरिगे पद पाई। दोउ नाते मुदर गाये । लाग्यो को अपना नहि भान हरि प्रेरन मा किया बयान : केवल दति को करुणा पुरन भयो अन्य यह ता । इति श्री मुदा स्याम विनाम ममाप्रम शुभ- मन्तु सिद्धरस्तु दोहा । मुदा मुदर ही वो रटो यह मुदर नाम । यह रटना सम ते भलो और न आये. काम ॥ सुदर हरि के सनन से गहे या नित चात् । सुदर मुनम करून को मनमरहे टमाद। Suljeet -कृष्णलीला तथा शुध भक्ती का पर्छन । Note -अन्यकता का नाम मुंदर जान पडता है और यह नासि के कारस्य काशी यामो थे । इन्होंने इस अन्य को मबत् १६० घेत मुदोर को पूर्ण किया । लिपिकाल नहीं है कदाचिा होके सामने की यह मति लिषी हो । सुदरदास के पिता का नाम दूलहराम था जो यमीरनी की लडाई के समय काशी में विद्यमान थे। No 5 --शियराजभूयन Verse Substance-country made paper Leaves --58 Size - 10/xG nehey Lthes -- 15 on a page Lrtent-855slokas Appertades new Completo Correet. Character -- Duraplgart Place of dagost Library of the sharijs of Bapáras NOTICES OP HVDI NIM USCRIPTS. 43 Swardja Bhusana --A book on rhetoric in which the examples are almost all written in the licroic style by the celebrated poet Blousana who composed tlus book in Samrat 1730 (163 AD) Bhusana s history is long and interesting He remained at no less than 5 different court 11z. Aurangzeba Chhattrasila Siviji and his son Sambhiji The date of Bhúsina s birth may be fixed between 1610 and 1650 A.D as be 13 said to have been a young poet when he attended the court of Aurangzeba prior to joining tlut of Siriji, i ha mas born in Blay 1672 AD Beginning-श्री गणेशायनम ॥ अथ शिवरान भूपन लिप्यते ॥ कवित्त । विकट अपार भय पथ के चले को श्रम हरन करन वीज नासे वरम्हाइये । इहि लोक पर लोक सफल करन कोकनद से घरन हिये प्रानि के उडाइये ॥ अलि कुल कलित कपोल ध्याइ ललित अनद रूप सहित मे भूपन अहाइये ॥ पाय ततु भजन विधन गढ गजन भगत मन रजन दुरद मुघ गाइये ॥ १॥ End -मयतु सत्रह से तोस मुवि यदि तेरस भान भूषन थिय भूपन किया पठी मुनी सग्यान ३१६ ॥ चित्र कपित्य ॥ येक प्रभुता को धाम सजे तीने वेद काम रहे पचानन पडा नन रानी सर्वदा ॥ सातो घार पाठो नाम माचिक निराजे अवतार थिराजे पान ज्यो हरि गदा ॥ शिवरान भूषन अटन्न रहे तानो जामी चिदम भूषन सब गग और नरमदा ॥ माहिं सने साहसीक भासला सरना घर दासस्यो ना रसता मरना विसरदा ॥ ३२० ॥ इति श्री कवि भूपन विरचिते शिवरान भूपन गृथ अलकारनि को स्पर्य । समाप्त ॥ * ॥ राम Subject --अन्नकार यथवीर रस की कविता Note--- थकती प्रसिद्ध कवि भूपन हे । निर्माण काल संवत् १०३० है ॥ ॥ -63 No 59 -रसिकपिलास T'erse. Substance_country made paper Leaves Size-9x6 inches Lines--13 on a page Extent-700 slokas. Ap pearance-very old Complete. Correct. Character-~Devanagart Place of deposit--Library of the Mabárája of Banáras. Rasıla Vildsa -A treatise on Hindi composition by the poet Bhojarija, who attended the court of Ryá Vikramíjit of Bundelalhanda Raj Vikrama was born in 1780 and died in 1828 AD consequently the tune of Bhoyaraja may approximately be fixed at 1800 A.D Begunnang-श्रीकृष्णायनम । अथ रसिक विलास लिप्यते । दोहा । कलुष कदन सोभा सदन हस हय वदन मुदेस ५ मिये प्रभु कवि भाज के हृदय सरोन हमेस । १ ॥ ताजी ताती रहु किये भाज्ञ हिये पुत सीव । सानो सानो मुमत रच राजी याज्ञी पीव ॥ २ ॥ रोज रोज कवि भोज उर रन सरोज उछाह ॥ यसिये महरानो सदा बानो वानी माह ॥३॥ End --अथ दिसाबन्द दोहा ! नाइका परकिया प्रोषित पतिका । वाय वहत ईसान हिय अगिन नई रित देत । पुरव मुघ उतर मुपद पत दक्षन के हेत ॥ २५ ॥ समझ रोझ रसिक कर बदन सरोन प्रकार रसिकन को रसमय सरस को हारसिक विलास ॥ २२ ॥ सिध्ध मुरसिक धिन्नास भी वरना विविध विचार । भाषा होइ च भूल कहु लोनो भुकषि सुधार ॥ २३ ॥ सिध्वनी बुदेल वसावतस श्रीमान महाराजधिरान श्री राजा विक्रमाजीतम देवाशित भान गन मुकवि विरचिते रसिक बिलासे काव्ये सपूर्न शुभमस्तु । मगल ददात । श्री राम NOTICES OF JIYDI HATOSCRIPTS Sutyeet-साथ नायिकादि। Note --ययकमा मुधि भागाइनके लेख में मानम टेता कि ये युटेन. पंह के विमान के पाशित पोर टम्दो की प्रामागे धनाया ममय धादि का फुद पता नहीं। conntry made 1000-हिमापदेश दप यायनी Substancepaper Lentes_8 S190-104X5 snclics Lines - 11 on a grage l'utente 160 tholas Appearance-old Compitit Generally out Character- Deranbgarl. I'lact of deprint-Library of the Malárája of Banaran Hitopalehn Upasinan Berani - collection of 34 Kundalışan dealing with moral oratructions by Swami Agra Dika (F1. 1575 AD) The manuncipe copy was proinbly mule in Sadrat 1753 as this brok »» Lund 1 tbo samo solamo withs Klamkels (No 33) and it is the lisadarskin of the entid man Beginning -ौगयेगयनम' । पपदाम को ही कुहनीया निपरा । मतो दुखो मसार मे का काहिरी खोर । कदि घेरो धार नोच माया निम पवे । धरि गर्माय स्यागि का कादि फनि नाचे । मृगतृप्या गमार परापुर नाका धादि । भापति पद विमुष मुथै मुपने नहिं पारहि । अबदाम भूठो कई रोटय नेम निज धार । महो दुखो.. End.--टपणा उपदेश दिये। दुम गापा चद । ध्ये। दुम गाण बद दुतिय दिन दास दिपाये। यह कथन वा धनुमाद हटेर पास घमारे विष्णु प्रदो यानी युद्धि यापन विस्तारा । भव सागर पुरधेनु ताहि गरि लगे न पाराय अटस पावे भगति मत मग पदानंद । उपपाया दपदेश क्षित । ५४ । इति विशापदेशमुपपास यानी सपणे । Subyect--टपदेश। Mote --श्री प्रपदाम कृत नियमाल नही है। लिपि काल मी मने तो नहीं परशु पालमलि और ये दोनो पुस्तक यादी लेखक को लिखी है और दोनों पकहो मिन्द में क्या है प्रा लिपिकाल मयत १०५३ है। No cs-220o Sertt. Substance mmfunntry made fapt LANTES -17! Size-107XGinches Lines-~lf on a page. Extent-2,423 Nokar Appearance - old. Complete Generally correct Character-Devanigauri. Place of deposit-Library of the Inháraja of Banáras. Karya Dirnaya-A treatise on Ilındı composition written by Bhikhart Diss of Bandelkhanda n the nasze of the prineo of Bundelikhanda whon he calls I[undupata Baba Sihtb The poet gives bu nom-de plume is Disa only Ho flourished in 1750 A.D The manuscript is dated Samsat 1871 (1814 AD) Beginnary-श्रीगणेशायनम । छप्पे । एक दन दे मातु स च ची याष्ट्र पर कर । पट पानन पर षय मेश्य भावि भानयर । अ मिटि नय निधि प्रदान दस दिपि जस पिस्तर । म गाध शुषद द्वादमादित्य पावर को पिदय वृद्ध धंदित परन दक्ष पिनि आदि गुरु । तिदि दाध पदय तिथिन भरिय योडशो ध्याग कर।।
NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS. Ent-सानो भक्ति न यान को सक्ति हो टास अनाथ अनाथ स्वामित मागो इतो घर दीन दयानिधि दीनता मेरो चित भरो हामि जू । व्यो विच नाम के नेह को ध्यार हे अतरनामो निांतरजामि जू । मो रसना के रचे रसना तनि गम नमामि नमामि नमामि न ॥ इति श्री सकल कलाधर कलाधर वसावतस यो मन्महारान कुमार वान हीपति विरचिते काथ्य निर्नये रस दोष दोयोद्धार वर्नन नाम पचीसतिमोल्लासः ॥ १५ ॥ अथ समाप्त मुभ भयात्॥ Subject --काश्य के सव अग, उनके लवयादि । Note. -अन्याता का नाम अत में महारान कुमार हिदुपति बाबू साहब लिखा है परन्तु करितो में इस यन्य में दास नाम ही मिलता है । एक जगह भिपारोदास भी लिखा है। इससे यह निश्चय होता है कि यह अन्य भिणरीदास का बनाया है। समय के विषय में अत में केवल सबस् १८०१ हे जो लिपिकाल जान पड़ता है । सवत ॥१६॥ No 02-शृङ्गार_Verse Subątance-country made paper Leaveg-41, Sizc-61x4 inches. Lines--14 on a page Estent—750 blokas Appearance -old. Incomplete Correct Chnracter Devanagarf Place of deposit Labrary of the Blaháråja of Banåras. Sringura - Description of the different kinds of heroes and heroines written in the crotic style by the poet Beat of Asal in Samovat 1817 (1760 AD) under the patronage of one Nihachala Sinha The manuscript 19 dated Samvat 1820 (1763 AD) Dr Grierson mentions only one Beni Kavn of Asant and he gues his date of birth as 1633 A.D If he is the same poet as the author of the booh under notice, hus date of birth must be fixed a century later Degrering-श्री गणेशायनम ॥ प्रथम गणेहि चर्णिये याते सय मुम होत ॥ मौत क भग मुलस के बठे मुक्त में गोत । १ लस्यो कुभ सेंदुर घस्यों बिलसे नीली कार ॥ एक रदन रघि मि मना गहों राह वर जोर ॥ ९ ॥ कींना निहचसिह न घेनो कवि से नेहु ॥ लोला राधा फाद की भाषा में करि देहु । ३ ॥ धरणनु राधे कान्ह को सनन यो मुनि लहि । सय मिखिरी के साथ कामे दामे देहि ॥ ४ ॥ करियतु रस मय ग्रन्यु यह रसिकन की रुचि पाद । वरणनु राधे कृश्न को सब विधि कविन सुनाइ ॥ ५ ॥ End-... • मुहे असनी पर सुभ थान ॥ घसस हरे पटुकुल जहा करें वेद का गान । ४५ ॥ दोहा । प्रयादस सत वर्ष गत साह रो जानि । फागुन दशमी सित सुभग चद्रयार अनुमानि ॥ ४ ॥ दोहा । सत्य मुकुल सब द्विजन के वोट नाथ के हाथ ॥ लिपि पुस्तक पुरन भई कोनो कयिन सनाथ ॥ ४० ॥ दोहा । विनती कोजतु कयिन मो भूल परी को हो । सोधि सुधा वरन धरि गहि नो जोइ ॥ ४ ॥ दोहा । भाषा को समुदाउ बहु पर कहा लगु जानि । मुझम याने मे को अपनी युधि अनुमानि । ४E ॥ दोहा । चरन परमि लगदम्ब के गनपत्ति के मिरु नाइ ॥ यस्य रच्यो शृगार मुभ दोहों कविन बाद ॥ ४५ ॥ शुभमस्तु । यो सवत् ॥ १८९० ॥ समे नाम पागढ कृश्न पत्र ०५ धासरे शुक्रबार । लो: धानसीद घासी मोरनापुर : । यो गधे कृश्न । राम Sayeet.- भूगार रस के कषितों मे नायिका भेद अादि । Note --करियेनी कृपा-यह माम असनी के रहने वाले थे और निहचसिद के पावित तान पहले हे। ठन्दी को पाना से इन्होने यह यग्य बनाया जैसा कि श्रादि के तीसरे दो से रपट दोता है। 12 OTICES OF INDIMANUSCII16 निर्माण काल भैरता १८६० फागुश शुभ पवार और लिपि काल गया १८५० पापाठ धूप शुमार दे। No. 03 -दिाकोनिप्रकाश Substanre country mailo per Leire Sizn-108xinelies LIN -?? on a pharetra Extent-50slokar Appenrance - uld Complete C sreet Character--- Devarnigart. Puneral derpont-Lil rary of the dfahirija of Banaras Ulia horfi Prakale-Prass of Malzírája Udita Várdrana Sir, I of Raniran (1785 1935 AD} by the grant Braya Idla who wrote thur tnatnterrit. copy bhawelim Samrat 1872 (1832 AD) PAJURRENT --शी नुमने नमः I हितकोनिप्रकाप लियो । टारा अमल समान विय कर लगा दियाभरन विमाल । जय श्री मुथान पान कवि विमान ॥ १॥ गग यस अयाम टुब मान ने वृजलान । अदिता कोतिप्रकाम मय भाषण ऋपिटा रमान ॥ २ ॥ प्रानीयादिक इप्पे । कपि करदि राप सांग धरन घर जागि धदि घर नगि अपन पाकाम बलगि फेलास याम र वगि घाँट विधि रहिटलगिभग यहि देव पर। बलगि गम म लमर्माद भानगि मुर घरि मेग पर । कपिगम भनाा निमि पति जर्माग सलग रेन दिन उगम उद्योतनरायन भूम मान लांग भोग भुय मुगपय ॥ ३॥ End -विक्रम अचिता मान कधि दे करिद मर मुद्धव । ता मुराने सहमति लियो माय मुद्ध अमृद्ध ॥ २६ ॥ इति यो मदेव समार उगार कामी मुर दिशा नारायणम्य श्री भान कविनय कृपलान भट्ट कविगण विरचिते झोति प्रामे पूर्ण शुभ भयात् ॥१॥ मिती कार्तिक वदी ११ मनो मयर १८८ मु महा रामनगर लिपिरा स्वहन । Sulyect-कागिराज महारान उदितनारायसिह धो का यश वर्षन । Note- कपि जलाल कृरा । स र मिठो कार्तिक वदी ११ शनिवारा यह पुसार काम ने अपने हाथ में नियो। No6--श्रीलाल मुकुदायलाम Substance-country inade paper Leaves — 99 Su-81* 51 incler Lincs- 14 on 6 page. Ixtent-1360 slokas Appearance ~ordinary Incomplete Correct Character-Katths Place of deposit-Labrary of the Maharaja of Banárns. Sri Laila Jukunda tikust–Duscription of the dirt rent krads of keroes and heroines by the poet fukunda IAI who was a contemporary of Raghunstbr (1745 A.D) of Bandras BRJAur --योगणेशायनम । दोहा । करि लग प्रतियिष्या गुही तो में मग यह भेन । दरसनीय तही भदा नमो नमी श्री देर ॥ १ ॥ दरमु कहावे मानिनो पारि माति मी जान । इस प्रतिछ अनुमान पुनि शन्द निपुन टपमान ३२ ग्यान दिया मिहि विखे शिहि सग भए जुग्यान । सो परतिच्छ कहाषही सफल यन्य परमान ॥ २ ॥ Fnd --मुग्धा उनमा स्यायीन प्रियामा । मया । मदरो समानी रस मदिरे समोप पाडे रोका पिया में चेयो केसी दोसु लीजिये। भावरी माह याद गई हो पादे पाइ यो मुमुद लाल को श्राप प्राप मीनि। मेरेही सदेदनि प्रद दोरा प्यारो के चलते पर नगा चलाइ पार दीजिये चितु चाहना हो तो गरथि माह धनरी को सालो हो हो हो भरोधी NOTICES OF NLDI MANUSCRIPTS. भारो कीजिये ॥ ३॥ मुग्धा मध्यमा स्वाधीन नियतमा जथा ॥ चौथी चार चौक बीच होता क्या उदास पायो परे भाग मेन मानो सेवक सौनाहरी । वाएँ कर योजना च (आगे कुछ नहीं है)। Subject --काय बन्थ नायिकादि । Note -अन्यकता मुकुदलाल-यह कवि रघुनाथ का समसामयिक था । D. --- No or-कमरुढीपा हुलाम Verse Substance country made paper Leares-~-60 Size---108x6 inches Lines-15 on a page Extent-1,100 Slokas Appearanco-old Complete. Correct. Character - Devanigari. Place of deposit-Library of the Mahárája of Banáras. Kanmaruddn Khan Hulasa -An account of Delhi, the emperor, hys ministers, etc., and a short description of the different kinds of heroes and heroines by the poet Ganjnnt, who wroto this book in Samyat 1785 (1728 A.D) under the patronage of Nawab Kapiaruddina Khin whom the poet describes as the Vazır Azams of the Emperor dlohammad Sáha (1719 1748 A.D) The original pıme of Kamaruddina Khan was Vira Duhammad F:-1 Pluhammad Siha after the resignation of Åst tion of Alamud falua Abdále at the battle of two copies of this manuscript in the possession of the Maharaja of Banáras One 19 dated Samvat 1856 (1799 A.D), red the other Saraveţ 1861 (1804 AD) Beginning --भोगणेशायनमः ॥ सरस्थत्येनमः ॥ छप्पे ॥ करहिं प्रथम मगलनि बेहुरि बदु बुद्धि प्रकाहि ॥ भगत मुनय कह देहि नाम मुख लेत हुलासहि ॥ रिद्धिसिद्ध कह क. हि पाहि गरिधि गुन निज जन ॥ माल देहि अति मुजन कान मानहि भूपति मन । पङ्कर सपत्त मुपदाय हिरा हुय असरन कह अति सरन । वड भाग राग गंजन मुवि हियहि धस्यो. गनपति घरन ॥१॥ End --अथ छापे फलस चौसठ फला प्रयोन चोदही विद्या जाने । मुन्दर मुघर उदार दक्ष सब के मन माने । स्वामिकार अनुराग जसी अति तेन वलो है। रस निधान गुन बीर बडो नग माह बली है । मुनि सुजान मरदान मनि आजम उजीर सब जग कह। कमरुद्दोपा नवाब से अष्ट सिद्ध गजन लहइ ॥२८॥ इति श्री मुवि गलन विरचिताया कम भट्टीण हुलास सपूर्ण शुभमस्तु । कल्याणमस्तु । सवत १८५६ मितो ज्येष्ठ कृष्ण चद्र पासरे लिपिस रेस्वरी प्रसाद गोड कामी भी मधे पठनार्थ। (दूसरो प्रति जो इसी की नकल मालूम पडतो हे "श्रो सपत् १८४९ श्रावण शुझ पयोदस्या ॥ १३ रवियासरे।" को लिखी है।) Sulyect --पूर्व में नमुना दिल्ली पादशाह महल यनोर बस ऋतु नप रसादि फिर नायिकादि का वर्णन है। Note -यन्यसती गजन कधि गोड गुर्जर काशी वासी है। नवाव कमट्टीपा ने इनको प्रादर दिया और फिर पन्य रचना की आज्ञा दो। इनके लेख से मालम होता कि नयान फुछ हिन्दी कविता का रसिक था । निर्माण काल | सवत सत्रह में घरप धोते पचासोत । बेसायो मुदि मचमी भृगु यासर विप्रीत ॥ २३ ॥ सबत् १०५ बेमाघ शुरु ५ शुरु धार है। इस अन्य की दो प्रतिया हे। न १ वहो और पीछे की लिपो और न २ छोटो पुर्ष को लिखी है। छी से नकल ली दुई न.९ मालम देती है।
YOTICES OF 21YHI NIANUSCHIITS निर्माण काल मयत १८१० माघ शुम १० भन्दयार और लिपि काल मयत् १८५० আয়ার স্কুল ০ হা » No. 03 -ददिराकानि माग Verde Substance country-male paper. Leaves Siz0-101xG] Inches Lincs-23 on a page. Extent -50 blokat Appearance -ol Complete. Correct. Charter -Devanigiri. Place of deposit-Library of the Inhirsja of Banáras. Udita Sirli P'ralada -- I'raits of Mahirja Vihta Xariyant Singhn of Tantras (1785-1935 AD) us the poet Braja Idla, who wrote this rianuscret. copy himself in Saniyat, 1873 (1252 AD) Beginning -श्री धुनुमते नमः । हिरासीनिंधकाम लियो । दोहा । अमल कमल विय कर लमरा दिव्याभान धिमाल। जय श्री मुशन चान काय... जनान्न ॥ २॥ गंग यम प्रयास धुत्र मान तने शलाल । दिशा कोतिप्रकास मम भाषा काया मान्न ॥ २ ॥ भामोदिक ये कपि कादि सनर्जाग धान वा जलगि धादि घर । अनगि अपन पाकास लाग फेनाम यास हर । स ele विधि रचलिग जग बद्धि देव पर। পুলসি ম শ লম্বা লয় দু বার ঈদ । জঙ্গি সনা নিধির পlি जलगिरेन दिन उपयम दोसनरायन भूय मान रानगि भाग भुग मुगाम ॥ ३ ॥ ..End-विम चिरा मान फघि दे फरिंद मर मुद्दा माने यह प्रति निषो सोधदु मुटु अमृद्ध ॥ २६ ॥ इसियो मद्देद्र सभार दगार कापी मुर ददित नारायणस्य यो मान फक्ति तनय जनाल भट्ट कविराज विरचिो कीर्ति प्रकामे मपर्ण गुभ भयात् ।। मिती कार्तिक यदी १९ मनी मयत् ८८E मुः महा रामनगर लिपित स्वहस्त । Subject --काशिराज महाराज उदिसनारायणसिह लो का या वर्षन । Note- कपि जलाल कृत ! सधL REE मिमी कार्तिक वदी ११ शनिवार का यह पुस्तक कवि ने अपने हाथ में लिखी। No 64-श्रीलाल मुकुविनाम Verse. Substance-country-made paper Leaves -30 Se-8/xStanches, Lines-1 on a Page Extent-1,380 blokas Appearance --- ordinary Incomplete Correct. Character-haithl. Place of deposit-Library of tho Vaháríjs of Banárna. Śrt Lilla Bukura Filura ~Description of the different bunuls of heroes and heroines by the poet Jukunda IAI, sho was a contemporary of Raghunatua (1745 A.D) of Banáras. BAJIRAuny --श्रीगणेशायनमः । दोदा । करि वग प्राविश्या शुदा शो में आग याहु भेव । दरसनीय तह पदा नमो नमो देव । १५ दाम कहा ज्ञानिना चारि भाति मो जान 8 इक प्रतिच्छ अनुमान पूनि गन्द निपुन उपमान ३२ ग्यानदिन प्रविधि यिसे तिहि उग भए बुग्यान । सो परतिच्छ महायही उकल यग्य परमान ॥ २ ॥ End-मुग्धा इतमा स्याथोर प्रियतमा र सथा । मुंदरी स्थानी रम मदिरे समोप आहे रोकता पित्रा में प्रेमी केसी दोमु लीजिये। माघरी कराह ल्याई गई हो पाढे पाई यो मुमुद लाल कहे पापै भाप मोशिये मेरेही सदनि प्रमेव र यारों के नतपर नया चलाइ पाइ दीजिये। चेतु चाहती है तो गरधि माह धनरो को पालते ही पेही से भरोग NOTICES OF HINDI NAXUSCRITTS. भारो कीजिये। शमग्या मध्यमा स्वाधीन प्रियतमा नथा। चौथी चार चौक बीच होता या स्दास पायो पुरे भाग मेन मानो सेवके सौनाहरी । बाएँ कर वोजना च . (मागे कुछ नहीं है)। Subject --काध्य यथ नायिकादि । Note --अन्यकता मुकुदलाल-यर कवि रघुनाथ का समसामयिक था । NoG कमाटीमा हुलाम Verse Substance country made paper Leares --60 Size-10: x 6 inches Lines--15 on a page Extent-1,100 slokas Appearance-old Complete. Correct Character - Devanigarl Place of deposit - Library of the Malulrijs of Banſras. Kamaruddin Khin Iulasa.--An account of Delhi, the emperor, hus ministers, etc., and a short description of the different kinds of heroes and heroines by the poet Ganjana, who wrote this book in Simrat 1785 (1728 AD) under the patronage of Nanab Kamaruddina Khin whom the poct describes as the Vazır Azama of the Emperor Mohanınad Ślho (1719 1718 A.D) The original name of Kamaruddin Khan was Mira Afuhammad F&zı? He was nppointed minister of Muhammad siha after the resignation of Åsafjah He was killed in the opposi tion of Ahamad Sala Abdalt at the battle of Sarnhiad in 1748 AD There are two copies of this manuscript in the possession the Mahiraja of Banfras One 18 datod Samvat 1856 (1799 AD), and the other Samvat 1861 (1804 AD) Regarning --योगणेशायनम ॥ सरस्वत्येनमः॥ छप्पे । करहि प्रथम मगलनि बहुरि बदु बुद्धि प्रकाहि ॥ जगत मुजप्त कह देहि नाम मुख लेत हुलासहि ॥ रिद्धिसिद्ध कह का रहि रहि थोरेहि गुन निजु जन ॥ माल देहि अति सुजन कान मानहि भूपति मम । सङ्कर सपल मुपदाय हित हुय असरन कह प्रति सरन प धड भाग राग गंजन मुकषि हियहि घस्यो. गमति चरन ॥१॥ End -अथ छप्पे फलस ॥ चौसठ कला प्रयोन चोद विद्या जाने । मुन्दर मुघर उदार दक्ष सव के मन माने । स्वामिकाज अनुराग उसी अति तेज बली है : रम निधान गुन बीर बडो जग माह बलो है । मुनि मुजान भरदान मनि आजम उजीर सब जग कहा। कमरुद्दीषा भवाय सो अष्ट सिद्ध गजन लहह ॥२८॥ इति श्री सुकवि गजन विरचिताया कम रुटोण हुलाम सपूर्ण शुभमस्तु । कल्याणमस्तु । सात १८५६ मिती व्येष्ठ कृष्ण चद्र पामरे लिपितं ईस्वरी प्रसाद गोह कासी जी मथै पठनार्थ ।। (दूसरो प्रति जो इमो की नकल मालूम पडतो हे "यो सवत १८६९ श्रावण शुक्र चयोदस्या ॥१३ रविवासरे।" को लिखी है।) Sudyeet --पूर्व में क्षमुना दिल्ली पादशाह महल घजोर बस तु नर रसादि फिर नायिकादि का वर्णन है॥ Note --यन्यकता गजन कवि गोड गुर्जर काशी वासी है। नवाब कमरुद्दीपा ने इनको आदर दिया और फिर यन्य रचना की आज्ञा दो। इनके लेख से मालूम होता है कि नवाब फुछ हिन्दी कविता का रसिक था। निर्माण काल । सवत सत्रह से बरप पोते पचासोत । बेसाणे सुदि पदमी भृगु वासर विप्रीत ॥ २३ ॥ सवत् १५-५ वेसाप शुरु ५ शुरु घार है। इस ग्रन्थ की दो प्रतिया है। न ९ बडो और पीछे की लिवो और न २ छोटो पूर्व को लिखी है। इसी से नकल ली दुई न.१ मालम देती है।
XOTICES OF NIXDI NAYESCRIPTS . No 66--श्री कृपाद नियय Substance country asir gror Leare4-10. Size-~~!!x7 nehes Lines--18 on a page Extent-r1,830 skokax. APIxoranco ---old Completo. Correct. Character - Desantgart Place of deposit-Library of the Jaharija of Raniras, Sri Andilanda Admondha-18 Kauttaa yritten in the crolicetyle with special reference to the praces of Irisps, by the poet Claninanda or Anandaghana, who was killel an 1739 An in the capture of Mathura by Nidra Sthe Dronrning --यो गणेशायनमः । यो कृपानंद नियध लिप्परो। मेक टर प्राय हो यदुरा दुप द्वारि जारा ताप दिनु ताहि श्राप चन्दन कृपा करे लगान दे लागनि दे पाग अनुरानिदे भागा पगार ले मदन कृपा करे । यानी के बिनाम यरमाये धन मानद मक रूप प्रगट गठ मदन कृषा करे । भारति निश्दम मिलाये नद नदन मुभानदन मेरो मति बदन कृपा करे।।। Ful-मग लगे फिरोही अनंग लगे रहो माटुये गेल लगायत प्यों नहीं । निरम सच निहिं सरमो रस भरति प्रोति पगाया पर्यों नहीं । टीन पस्यो तुमने धन प्रानद हो गुन गसि पयारत क्यों नहीं। जागा मोवरा से देश कहा कदा मेगा माहि जगाया या नहीं। ४४८॥ Suryeet-शृगार रस को काया । Note.-पन्यानी धनपानद पषिद्ध कवि है-ये सन् १०३८ मे मयुरा में मारे गय थे। -40 N007-ललिगललाम Perre Substance-country msde paper Leares Size-1016 inches Lines --16 on ange. Extent --720klokas Appearance-oll Complete Correct. Character-Deranigari Place of deposit-Labrary of the Jahardja of Boneras. Lalita Lalama.-Alook on IIindi Prosody by the poet Mata Rama (1050 AD) who wrote this book for Bhira Sinhs of the family of Rája Sarjana Rap Hsd.of Bundi Beymnang -ग्रीगणेशायनमः। दोहा । मुपद साधु बन को सदा मुत्र दानि उदार । मेवनीय सन गा को जग मा बाम कुमार । १। कति मतिराम गमेस को मुमिरा मुष परमात । पान पान लागे निघन तूल तूल हि भाति । २ ॥ मद रम मन मलिन्द गय गान मुदित गननाय । मुमिरत कपि मतिराम के मिट्टि निद्धि निधि हाथ ॥ ३ ॥ End.-मचिर प्ररथ भूपन ने रचि जाने मतिरामासाको वानी घगत में घिन प्रति अभिराम 4 ३६४ नवलगि कच्छप कौल सहम मुप धनि भार घर जयलगि पाठो दिन दिग्ध मादत दिगगन पर मचलगि कधि मतिराम गिरि मागर महि महन । अनिन अनल जल बनय जाति महल प्रापडन । नुए सत्साल नदन मथल भारमिह भूपाल मनि । जग चिरतीय सर लगि मुखद कहासमान सघार नि ! . कठ करे सो समान में विनसे अति अभिराम । मफल मयो ससार हित कविता लनित ललाम । ३६६ ॥ (भागे पति नहीं हे परन्त कविता के अनुमान में यन्ध पुरा जान पडसा हे स्थान कोई टो एक कविता रह गई हो तो हो.) Sutyeet - कविता के नियम का यध। Note--पन्यकता कयि मतिराम प्रसिद्ध है। इन्ोंने इस यन्त्र को वदो के राना हाडा सुरजनराय के पात्र भावसिंह के लिये रखा।
NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 49 No es -कौशलेन्द्ररहस्य या रामरहस्य Terre. Substance -country made paper Leares—204. Size-31x6 inches. Lines~10 on a page Esteat- 4845glokas Appearnnee-new Complete Incorrect. Character-Deva nigari Place of deposit-Library of the Maharaja of Bapáras, Rautalendira Rahasys or Namarahasya A religious book dealing with subjects lihe spiritual knowledge and love of god ete by Rama Charan Disa (F! 1780) The manu cript is dated Samrat 188G (1829 AD) Begauring -श्रीमने रामानुमाय नमः श्लोक । अमलगुण पयोधि विश्वविश्राम देव यिविधिभनदेव्युहमीयतार ॥ चिदरपुरजपूट दियालोकाधिनाथ मखिन सन- निवाध रामचद नमामि ॥ १ ॥ अननिर्गुण ज्ञानमत्यादिणेमदाय कृयामिपमाद्य परेश । मुवेदातरामानुज विश्वैप प्रसाम्यादात मदिभाषाकरोमि । दोहा । श्रीपति रोमेनाधिपति मठरिपुनाथ कृपाल । पटुम नयन श्रीराम पद पदो भूधार भाल । End -दोहा । विभुधन सपत्ति लगि जित दपति सीताराम । ध्यानहु तर प्रापत छनक रामवरन विश्राम ३ इति श्रीमद्रामदरनदास विरचित विभद्रमौलिकमलेंद्र रहस्य चतुर्योनग्ध । सात् १८८६ मितो फागुन धार सोमार सपू . मुभ' । Sulject.-नान भक्ति प्रेम प्रादि का वर्णन । Note.-अथकतो रामचरणदास है। इस पथ का लिपिकाल सपत् १८८६ है। No 69 -याजनामा था दोलानामा Prose. Substance country made paper Leares-82. Siza-81x5 inches. Lines-18 on a page. Extent~-383 Slokas. Appearance -rory old Complete Correct Character Kathi Place of deposit - Library of the Mahiraja of Bapíras Bdrandma or Daulatandmt--An account of the birds of priy such as eagle etc. The name of the author and the date of composition are not given place it is said that Firoza Śíha once asked the physicians of lus court to prepare a treatise dealing with the kinds and trcatment of the birds of prey and thus book was accordingly written by them There have been 3 Firoza Ślhas e lo were connected with the Royal family of Delhi The first who reigned from 1282 to 1296 belonged to the Khiladynasty The second, who reigned from 1351 to 1390 AD belonged to the Tughlal dynasty The third belonged to the local dynasty and was the son of Bahidur Šíla II. If by Firoza Śaha is megnt one of the these princes then it must be the last one as the linguage of the book will bear testiraony and consequently the time of this may be approximately fixed at 1850 A.D Beginning -बिसमिल्लाहिर्रहमानिरहोमि । बहुत तारीफ खुदाइताला को के पीछे जा पैदा करन पाला हे रात और दिन का जिसने इशारत फुन केकुन को सेह जद हजार पालम और पासमान वे सितून पैदा कोया ॥ जमो को बेल पर रखा वेल को म छलो को पोठ पर रहा । मछली हया पर राधी थाने पह कादिर पाक ने इनसान को एफ भूठी पास से और गरटिस आसमान मे अरस व कुरसो घ लोह व कलम प पेदाइस आदम को क साइत मे येता सत्र किया ॥ तमाम पालम तेरो बास मे हेरान है ते नीचे परदे के छिपा हे तिस पुदाइ का शुसुर वेशुमार तारीफ हजरत मुहम्मद मुसतफा । End-इलाज कुलन । तिल का तेल लेके नये वासन मे नई रुई को यती डालके चिराग बनाये सवाही ताई तव जो तेल ववे सो रप छोडे मरोन जानवर को देवे तामा तर In one 18 50 XOTICES OF NIXDI MANUSCRIPT8 काले ऐक फाा मिला । तिस पोछे थारा सा गुलान लेवे जिसमा एक नगी तर हो । येक साता पिलाधे चगा रोड । रिछाला गे कामनुल भनपुर का तमाम लि छ। Sulyeet -बान इत्यादि शिकारी पारयो को पहिदान उनकी पादत मिपान बीमारिया इत्यादि को पहिचान उनके रचाने और सिखाने को तरको टनके इलाज इत्यादि। Note --का के न म का पता नहीं लगता न समय मिलया है। पुस्तक प्राचीन है। एक जगद किताब में लिया है कि फोरोजगाह ने हकोमा मे कहा कि यश नानपरी की पहिचान व इलान मुकार करो और उन्होंने इस किताब को बनाया। No 70-खटमल बाईसो Terre Substance - country made paper Leaves-8 Size-11x7 inches Lines -- 18 on a page. Cxtent-130 b/ohn29 Appearance - old Complete Correct. Cliaracter - Dovanagari. Place or deposit---Library of the Mahariya of Tandras Khatamala Bufst-Praises of bag by Ali Nahiba Rhin of Agri, abo composed this book in Samrat 1637 (1630 A.D) when he was going from Agra to Delht on some patate banuese and huul put up at an lan There he was only troubled by bugs BJunang-योगयो शायनम । नाम दार करि देख ने सर से रामहि राम ! झारो पोरो भूलि के राखि लियो एक नाम ॥ १ ॥ नगर आगरे यसतु हे अन्नोमुदिनन। नाम । एक बार दिल्ली चलो हतो माह का काम ॥ २ ॥ है। देरा ते टुक निकट घरस पलो अति मेह । अट लोग पा रहे का किया न नेह ॥३॥ End -याधन के गन भाक्षि धन में बसे है दवे व्यालन के गन भुय तरे हर वरके । गज मा डा धूरि कछु न बसाय यात प्रेमी देह पाई और अमे बाल धरि के । इनकी पा- हा हे ये तो यह है विचार तिहू लोकहीं मे जो थलो मी डरे हे भे भरि के । भूमि पे सतारे तव पाय मान र मोच पाट पेन आरे यटमलान के डार के २९२ पति श्री प्रीतम कविरान घिरचित घटमल वाईसी ममान:। Subject --सटमलो को प्रशमा । Nut --आगरे के रहने याने अनीमुहिम्यषा उपनाम प्रीतम कमि ने सारा १६८० (रिपि यम दोपस चन्द ) में इस यन्य को बनाया । -105 A071-मुवतहार Verre Salatance country made paper Indrek Sure--1016 tuches Lines-20 on a page Extent-2000 blohara Appevanc--orelaars Colapleto. Correct. Chruter-Deventuart Place of deposit-Library of the Malutaja of Banáras. Sunllahur. A book on Hindt Prosexly by the peut Gayrija of Bandras IIe composed t]\ l ook 14 Satyrat 1903 (1816 AD) Dr Grierson says that lie was born in 1817'A.D Beginning प्रोगणेशायनम ॥ अथ मुतहार लियते । दोहा । मिद्धि करनि जग बनान के याम नाम मनाथ । रानति वृत्त मुकतानि में मनि सरोज घि7 गाथ॥ १ ॥ गोद लिये गिरिमा मन नायकहे अपने मनको प्रनपाली। छुटी लस फलके गुपील में माना विधनुद को धरनाली । पान के हेतु पितुड भयो गगरात पोघा पेमति सानी । पचन NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 61 ॥ कुभ अमी मे भरें मना रक्षक वेठा हे तक ताली ॥ २ ॥ मोरठा ॥ गनाधि ये १८०३ गति वाम । घरस माय मुदि पचमी । गुरु यासर अभिराम । पूर्व भाद्र उड्ड परिघ चुजि । ३ ॥ End --सोरठा ॥ ईस्वर गुरु दयाल । सानो यानी अमृत की ॥ कवियर गर की माल करी मुकवि गनराज मा ॥ १० ॥ दोहा ॥ तेरी कविता पेपि के मा दिसि प्रारति लान । यस वचन बहु वचन को समुझि धरो गजराज ॥ ११ ॥ क्रिया भूत व्रतयान को सहित भविष्य वियक ॥ नारी नर वाचो सपद समुझि रचो ताज टेक में १२ ॥ तुक्ति उक्ति दरसन कहो दरसाये सय छोहि॥ निरपि पथ मुकयोन को भयो ग्यान लव मोहि ॥ १३ ॥ इति श्री गजराज विगुफित मुवृत्त हार सपूर्णम् ॥ (इमके आगे इसी कपि को एक पत्र में कुछ और कपिता )। Sulject -काय के नियम । Note --अन्याती कपि गजराज है । इस रथ का निर्माण काल सयत १६०३ माघ मुदी ५ गुरुवार है। लिपिमाल नहीं दिया है। Nor-हरिभक्ति विलास पूर्वार्द्ध Verse Substance-country male paper Leares-280 Sizo-1xc inches. Lines -14 on a nge. Extent -3500 slokas Appearance-ordinary Complete Correct Cluracter-Devanagari Place of deposit-Library of the Mahárája of Banáras Haribhallrvildsa Purvarılha - Translation of the first half of the 10th canto of the Bhagavat Turána by R {jt Vikrama Silu of Bandelakhanda, one of the descendants of Chhattra Sta (B 1649 and D 1731 A.D) Vikrama Sabi was born in 1785 and died in 1828 A D (See No 73) Beginning -श्रीगणेशायनमः ॥ अथ श्री हरि भक्ति विलास लिप्यते ॥ दोहा । एक रदन गज बदन घर गिरिजा तनय सपुत । चही मुमति हरि भजन हित गही वाह मजबूत ॥ कृष्ण कथा अमना विमल गोवरधन मन मेोद ॥ प्रेम प्रगट यंदा विपन राधा रखन विनोद ॥ २ ॥ मेरठा ॥ नारायन नर पास । मुक सनकादिक सारदा तिन पद परुन पास । जन मिहरि जस पहल । End-छद हरिंगीतका ॥ यह कृष्ण चरित अपार पारावार को कवि कहि सके । मुक ਬੋਥ सभु स्वयंभु नारद कहत सारद मति थके। कछु कहो हृदय विचार मति अनुसार श्रुति समत यही तो मुने गाये मुदिति मन से परम पद पावे सही ॥ १५ ॥ मेरठा । अपनी गति अनुसार । उडत विग अकास निमि। पावत नाही पार ।तिमि विक्रम हरि बस करना। इति श्रीमन महारान छसाल वसावत नृपति विक्रमादित्य कृते हरिभक्तिविनासे हत- नापुरी भवनो नाम येकानपचासतमा अध्याय ॥ ४॥ Subject -श्री कृष्ण को अनलोला । श्रीमद्भागवत दशमस्कध का छदोबद्ध भाषानुनाद पूीई॥ Note -यन्याती छचमाल घशज राना विक्रमादित्य है । ये सन् १९८५ में नन्मे और १८२८ में मरे थे। NOTE रिभक्तिविलास उत्तरार्द्ध Verse Substance — country made paper Leares-357 Size-91xc inches Lines-14 on a page Extent 4370slokas Appcarance — ordinary Complete Correct Character' - Deranagari. Place of deposit-Library of the Maláráji of Baniras XOTICIS OF LYDI MANUSCRIPTS Plaridhathrilasauriratla-Translation of the suennd half of the IOLh aante of the Bhigasat Purta mulen Samrat 1880 (1B2IAMjhy Raja Vikrama Surul of Titulclllands (Sco NW 79) Tlic manuscript is dated Samrat 1883 (1820 AD) Hyunning-श्री गणेशायनमः । पयमित पिलामो टनग लियते दोधा। पंचामा ध्याय कहि सगमय प्रमानिापुनि पठये प्रभु यंधु निनद्वागत मुमानित निषु लोना नरसन धरो अदुल कृपा मिस । भर भार में मम पे गार गारन हेरा । इनवास अन्याय कर पाय फया याना भय हार को दसर पारेरा मुनिये पति मुभान । Ind-टोहा । नहि कविता मनबंध कछु नहि यन बुद्धि विचार। जन विक्रम प्रभु चरित कहि नि मा को अनुमार । १. श्रीमनमहापन छपमान सायम नृपति विक्रमादिग्य कृत हरिभक्तियित्नामे नये अध्याय 180 दोहा । मया पटादम अमो माघ मास गुरु यार। शिय हरि भक्ति पिलाम यह मान शिन को मार। आपाढे मागे शुभे शुम पछे पयोदस्या रवि थापरे । अस्मिन मया १८८३ मुकाम मदान नगरे । सपने मुभमम्न मंगनं ददाति । श्रीश्री। Surject-श्री कृष्ण कया। प्रोमद्भागवत दशम टनगद का माण चंदे में अनुवाद । Wore--गन्यमा सामालयंत्र गजा विक्रमादिाय दे । निमाप काल मत् १८० माघ माम गुम यार और लिपिकान मशर १८३ प्रगढ मुझ १३ रविवार है। Nort-अमरएकाग Teree. Substance-country made paper Learer- 51 Siz0-103xcinehes, Lines-1500a page Trtent-~~850 slokas. Apfearance-orinary Complete Generally correct Character — - Deraniguri Place of deposit - Library of the Inháraja of Bandras. Amaraprakcia --The translation'of the Amiral oss by the poct Khamana, made in Samsat 1893 (1830 A.D) He lived under the patronage of Vikrama Silue of Charablıára (1785 1823 AD). There 19 no doubt that he is the ende poet i ho according to Dr Grierson composed Lachhamana Sataka and Ilanumis Nalhoskor. Beginning-यो गणेशायनमःो राधाकृष्णाय नमः।यो मते रामानुजाय नमः। यो हयगीयाय नमः । शो मारदाय नमः । अय लिप्यते अमर प्रशाम । दोदा । यो धागोमुर पद पदम रम पटे। सानद । महाकिनि मकरन्द एह परिमल परमानद । १ । दिनदिमाट ह्य बदन के घदो जिन मुमिात । विघनन घर के घाट के हाट हाट भटका । यो की ताशो गरल सत्तार । मुम गनी सात्रो फिर भाभी विषन कतार । ३. El-कमल के फेमरा रड फेदा मुगार के दो दो नाम ॥ यारिज केसर किंचलक तामू दई नल नाल । सिफारंद करहाट थर तिहिचर रिम मुमृनाल ३ ६३ . यात कोस पनि घराटक छसिया माता नाहि । अरु नय दलसतिज्ञा मे नशेन दन सादि । ३४ ॥ तरी मुजयि पुमान कृत भाषा अमर प्रकाम नोर वर्ग यह नाम करि पुरन दसम शिलाम ॥ १५ Subject -अमरकार का अनुवाद । Note- पन्या सुमान कवि है। ये छपमान यशव देलखंडीय विक्रमादित्य के शागिरा थे । निर्माए काल मयत रस (रस गुन बमु सपि) पेशव राज सिंह चतुर्दशी बुद्ध धार है। यानी घदन NOTICES OF INDI ANUSCRIPTS 53 No 75-शकुतला नाटक I'crsc Substance -- country madlo mper Leaves---48 Size -10! ( inches. Lines - 15 on a page Lxtent -1500 blokas. Appearance-old_Complete Generally correct Character-Deva nágari Place of deposit-Library of the Malárijs of Banáris Sukuntala Natala - Translation of tho Suntalopikhyana by the poet Nivája (1880 AD) He made th s translation under tlic orders of Azama Súlir son of the Emperor Aurangzeb Tho toanuscript is dated Samsat 1801 (1831 A.D) Begurreg-श्री गणेशायनम ॥ रापत न मूरज ससी को परवाहि निसि घासर प्रफु लित रहत यफ वानो के । ध्यानह किये ते देत जान मशरद वास नाक में लहेया जिनकी कहानी के ॥ के और पानी के सरोन सरि करे सोचे मान मैजे सिर सोस मुरसरि पानी के । सिद्धि की मुगधि पाइ मेरे मन मधुकर पाए पकरन पद पकज भरानी के ॥ १॥ End -दोहा । यो मुनि यौठ विमान में मुनि के करि परनाम ॥ सकुतला मुत महिरा नृप प्रायो अपने धाम ॥ चो० ॥ इहि विधि भाग भाल मे जाग्यो । राना राजु करन फिरि लाग्यो । नृप के मुप सब रेयत रात्री । घर घर पल में भाया बानी । सकुसला अव भी पटरानो । इतनी यह है चको कहानी ॥ इति श्री सकुतला नाटक कथाया चतुर्थीयोक समाप्त मुभमस्तु ॥ सनत् १८८१ मिती वेशाप कृष्ण पक्ष सप्तमो ॥ ॥ मोरामायनमः ॥ श्रीराम ॥ Subject -शकुतलोपाख्यान । Note ---गन्यमती नियात कवि हैं। ये प्रानिमशाह के आश्रित थे और उन्हीं की 'भाना से इन्हें ने शकुन्तला भाषा में बनाई । लिपिकाल मयत २६५ वेशाथ कृप्या ० । No 10-नायिका भेद यरवा छद Verse Substance-country malo paper Leves-20 Sizo-10x6 inches Lines-7 on a page Extent-200 blohas, Appearanco - old Complete Generally correct. Character -Devanagari Place of deposit-Library of the Mahiriya of Bandras. Nagka Bleda Barru Chanda -A detailed description of the heroes And heroines Tho pime of the author or any other information regarding him or fus work could not be uscertained Beguruing-श्री गणेशायनम । अथ नाएका भेद परधा द टोहा लिप्यते । दाहा। कषित कहा दोहा कहा तुने न छप्पे छद विरचा म्हो विचारिक पर बरपा रसकद ॥१॥ बैंधक अनिवारो बडो समुझे चतुर मुमान । मुनत जात चित चार पे यह बरवे के वान ॥ २ ॥ Fnd - परिहास वरवा । मिहसत भैाह चढाए धनुष मनोन । लायत उर उपटनत्रा ठि उरोज । १६५ ॥ दोहा । लवन दोहा जानिऐ उदाहग्न वरवान टूना के सयह भए रस शृगार निमान ॥ १६६ ॥ हि नवीन सयह भुनो जो देय चितदेह ॥ विविध नाइका नाएकनि जानि मलो विधि लेइ । १६ ॥ इति श्री नाएका यिभेद सपूर्ण । शुभ मस्तु । सिद्धि रस्तु॥ श्रीराम Subject -नायिका भेद दोहा तथा वरया छद में ॥ Note -इसके अतिम दोहे से यह सग्रह जान पडता है परन्तु सही नहीं मिला न कोई कालही इसमें है। . - सयहकती का नाम 14 4 XOTICAS OF INDI JAALSCRIPTS N07-अगुन मुगुन निरुधन काया ters Substanco country mudo paper Leaveg--59 Size-~-10x4 inches. Lines-7 on a page. Extent- 735 blokas Appcaranco-ordinary Complete. Incorrect. Character Devanigari Place of deposit-Library of the Diahirijs of Banáras Aguar Saguna Nori pana Aathck-A Look dealing with the doctrines or Sirdaanda, who wroto it in Samyat 1846 (1789 A.D) The manuscript is dated Samrat 1890 (1833 A.D) Degrnnang-श्रीगणेशायनमः ॥ दौरा रघुपर मो गुरपाल शेप हियो नाम टपदेस शिवानद सुमिरन करो मेटो मरव कलेस ॥ १ ॥ प्रस्तुति थो हनुमानजी के । दोटा यक दिवस पितु कहेउ अस शोय तो मुनह विचारि हनुमान अह गर को स्तुति कर सुधारि ॥२॥ प्रापर भवर न जानउ रामवरण में नेष्ट । शोय कहत कर नारि के पिमु अना मय यह ॥ ३ ॥ Erd-सहस छचति निटदा दोहोत मुहांस व शिमानद गति जानन मुपदैव प्या- म॥६॥ पटसे सहस अठारह रो र तिनि मानु यिनद पर अनमा निम दिन लान ॥ १० ॥ शिानद हि गुर मिल ऐतिह गति लानु कपा क प राम निश्चे मनु पनुमानु ॥ १९ ॥ ॥ दोहा । अपद १ यक यमु ८ वेद ४ एम ६ माथय यदि सोमबार । हरि तियि गगा के निकट शिवानद भी पार । १॥ दोहा । भूगु आश्रम के पूर्व दिश पचकोस परमान ॥ हादी याम हरि नाम जपि शिवानद मुरधाम । ९० इति श्री शिवानद विरचिताया ब्रह्मचाना. दिक ऋगुन सगुन निरूपण नाम कथा ममाता । शुभ भूमात् । सब 10 लिग्नि त कारयाम॥ Subyect.-वेदान्त ब्रह्मचरन । Nate ---यघकती शिवानन्द है। इस पन्य का निर्माण काल मयत १८४६ पर लिपि काल संवत् १८६० है। - Mo78-माचपथप्रकाश Verse. Subetance Kfmir mada paper Leaves-127 Size-~10x4 inches. Lines--11 on a rige. Extent-3032 Blolas Appearance --old Complete Correct. Character-Deranigari. Place of deposit-Library of the Vahiraja of Bantras. Bolsapantha Prakiša - A bool dealing with tho doctrines of Velintism by Gulsha Sugha of Amrntsar He wrote this look in Sansat 1635 (1778A.D) and the manoscript is datel Samrat 1837 (1780 A.D) Dr Grierson says that he tas born in 1789 bich 13 decidedly wrong The date of his birth must be fixed at tho earliest between 1750 and 1700 AD Beginning-- मौतगुरू प्रादि । हो भोगणेशायनमः । श्री रामाय नम । सबैया । या नगमे जिनके पद पात सेवस नीत मुरेण्या भारी और मुरागन सेवत है अम पारि भने भवमे मुपदारों में सात मजे लगमात भजे पनि चाहि मनाय जिो पिपुरारा। गणनायक होमसन गहे पद यदन भेट हमारी End --मया ! शत प्रशाटस शुभ सपत में पनि विशात पाच मये अधिकाई । मु भ माघ भुदी सुभ सोम एमे शुभमासा माम महा मुखदाई शिथि पचम नाम यसरी कहे सभ लोफन को मुतने हरणाई । दिन ताहि म पुरन यय भयो धरिक पद पर भेट चढाई १६२ ॥ सत्रेया में गणनायक मारस्पतो रघुवीर मुनाना श्री गुरु यादि उदार ॥ गुरु गोविसंघ ददार बढे पुति को गुरु में भवसागर तारे । सिन क्रोन उपायन पदयरों कछु लाइक नाहि पिो लग सारे । कर और मनो विध दड सम पद पन में घटु धद मारे ।
NOTICES OF JINDI VANUSCRIPTS 65 इति श्रीमन्मानसिह चरण शिजत गुलाबसिधेन गोरो रामात्मजेन विरचिते मातपंय. प्रकाशे विदेहमुक्तिनिर्णयो नाम पंचमोनिवासः ॥ ५ ॥ शुभं भूयात ॥ * ॥ श्रीरामाय नमः । * राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरम ॥ सहस्र नाम तत्तुल्य राम नाम वरानने । सयत । १८३ शुभमस्तु सर्वजगता। Subject --वेदात । Note:--पन्थी गुलावसिह अमृत्सर निवासी है । यह पंथ सवत् १८३५, माघशुक्र बसत पचमी सोमवार को अमृत्सर में पूर्ण हुआ। इसका लिपिकाल सवत् १८३० हे No 79-जानकीमगल Verse Substancor-country made paper Leaves-- 12. Size-~l1x5 inches. Lines--5 on a page. Txtent-260 slokas Appear ance-ner Complete Correct. Character---Devanagarl. Place at deposut-- Library of the Mabárájr of Banaras Jinalı dangala. - Description of the marriage of Rima and Sits by Tulasi Dása. Thero ero two manuscript copies of this book in this library The text of the other copy is mostly incorrect. Beginning --भोगणेशायमः । गुरु गनपति गिरजापति गोरि गिरामति । भारद शेष मुकवि भुप्ति मत सरल मति । हाथ जोरि करि रिनय सहि सिर नावऊ । सिय रघुवीर विवाद जामति गायक End-द विकसहिं कुमुद लिमि देषि विधु भई अवध मुघ मुप सोभा मई । पहि विधि विशहे राम गायहि मुकवि कल कोरति नई ॥ उपचीत व्याह वाह जे सियराम मगल गाइ हेतुलसी सकल कल्यान ते ना भारि अनुदिन पाइ है । २४ ॥ इति श्री गुसाई तुलसीदास विरचितं जानको मगल सपूर्णम् । मुभमस्तु । सिद्धि य रस्तु । Subyect -श्री राम जानकी का विवाह Note:-यह यन्थ प्रसिद्ध श्री गोस्वामी तुलसीदास कृत है। -23 No 80 --परवारामायण Verse Substance-country made paper Leares Stre-13x5 inches Lines-7 on a page Extent-460 Slokas Appear unce-old. Complete Correct. Character-Devanagari Place of deposit- Filonary of Ne&amhriyas Barhara Barard Ramayana. The story of Rama Chandra's life in the Barva ructre by Goswami Tulast Disa. The manuscript 1 dated Samrat, 1873 (1816 A.D) Beyanrsnay-श्री गणेशायनमः । अथ बरवा रामायन लियते । वरया गननायक वर. दायक देव मनाय ॥ विघ्न विनास घरन प्रसक होउ सहाय॥ १ ॥ श्री गुरु पद अतुन रस हृदय सभारि ॥ बरनन करी राम नस कृपा मुधारि ॥२॥ श्री रघुवर अग सामित अतुलित काम । भक्त चशेर पूर्ण विधु को प्रनाम ॥ ३ ॥ End -मनन प्रभाव भाति बडु वरनेउ बेद ॥ तुलसी गाएउ हरि जम मिटि भव घेद ४०३ ६ करन पुनीत हेतु निनबचन विवेक । तुलसी ऐठेहु सेवत रापत टेक ॥ ४०४ ॥ सीता गम लपन सग मुनि के सात । तुलसी चित चित्रकूटहि वस रघुराज ॥ ४० ॥ इति श्री उत्तर काड वरवा रामायन सपूर्ण । शुभमस्तु । सपत् ॥ १८०३ ॥ इति वरवा रामायन । सपुरन । कीमुने पछे माधवायु सीन प्रणद के पोथी ।
NOTICES OF MID WAX USCP INTS (हग अनन्तर और है उमर ९ पत्तियों में यह लिखित)-मनी छारी निन नोठिा मोवारी यरि देश तेष्टि देखिये माना धनुधारो। भात लपन frg. दमन धरे नाम विभय नोके । गये भाव मझट मिटे राय पुरतों के । मफल मनारय विधि किये प्रविधि प्रहरी के । अथ से गाये मुने सब • (आगे कुछ नहीं है) Stayect-वाया छद में मेक्षिय गमाया । Note -प्रमिद की गाम्यामो गुलमोदाम कृत-लिपिमान पवा १८०३ । No 81-शायमदीपिनी Verse Substance - country-made paper Leares-11 S170-9x44 inchies Lines-5on apsge Txtent-55 bloknu Apries -new Complete Generally correct. Character-Deranigari. Place of deposit-Library of the Mabárája of Bansras Vaurogya SandipisJoral lessons on worldly renanciałton by Goswami Talsi Diss. Imjimming-श्रीगणेशायनमः टोटाराम याम दिमितानको लपन दिनों पर। ध्यान साल कन्मान मय भर तुलसी तार ५१॥ तुलसी मिटे न मोह राम कोये कोटि गुन याम ॥ हृदय कमल फूले नहीं विनु रविकुन रविराम ! २. भूमा सपा पुसि नेन मिनु रमना दिनु रम लेत । वाम नासिका विन लो परमा यिना निशेत । । Fnd-फिरी टोहाई गम को गे कामादिक भावि । शुनो ध्यो त्रि के ददे सुरस जारा तम लामि॥ ६ ॥ यह विराग मदोपनो मुमन मुदित मुनि लेंदु अनुदित बदन विधी जह से मुधारित लेहु ६२ ॥ इति श्री घेराग्य मदोपिया मोहाय विध्यामि या श्री गोस्वामी तुलसीदास कृशाया गत वर्णन नाम तृतीयः प्रमाण १३. Sulyect ---उपदेशयुक्त शान । Note --का प्रसिद्ध गोस्यामो सुनम्रीदास तो है। No89-डायनी माया Tere Substance - country mule pinger Leares -12 Size-9x4 inches. Lines-7 on Ange. Extent--12salokne Appearanceu-ner Complete Incorrnet. Character---Deranigart. Place of deposit-Library of the Vatársja of Banáras Criandatafi Ramayana -Tlic story of Rus Chandras life in everal mutres by Goswami Tulsi Dssa. Beginning-श्री मते रामानुजायनम श्री रामायन को इतिहास लिप्यते । ॥ दोहा । शायर घटकने अव भार घरा दुप हो । गई गगन मा देह धरि कदि मुर. पति मारोह ॥१॥छद चोपदा मुरपति गुरझा मुनु मतिमूमागे विधिलाक तुरता शिचिमुर समुझाये सग मिधाये वह सोधत योकता । दशमुष को करनी यविधि वरनी धरनी बेहि विधि रोई । मुनि मारग पानी भई नभ धानी रिवि लाना नदि कोई । विधि वचन मुनाग मुर समुझाये तशटु मोच मन देशा॥ ले बन हिसकारी प्रभु अमुरारी करहि पार सेइ पेश । माना गो पुछा तनु धरि रोशा यस जाइ महिं मासी अवधेम निता प्यूह म. मेगा प्रमु पावत तुम पाहो । दोहा । एहि विधि रियुध विरोपिरो मे मुर नित्र निज धाम। कह काल बीते पाच प्रगट भये श्रीराम ।।
NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 57 End -छद नित प्रात सरित अन्हात वधुन सहित प्रभु भोजन करे ॥ गन वाजि राज समान लीय सत्र देषि वन उपचन फिर ॥ बेठे सभा महं बाइ श्री रघुबीर दुख सन के हरे ॥ करि न्यार पान उलक को लपि लोग सब पिसी करें । माडवो श्रुति कीरति उर्मिला सो सनि मुत द्वे व बने । जानकी सुत जुगल जाये सानि मन आनंद घने ॥ सनकादि नारद मादि मुनिवर सकल अवहिं आयहो। लपि बाइ रघुथर के चरित सव विधिहि साइ सुनायो । इक बार कहु महिदेव को मुक्त समा मह आयो मन्यो । गुप्त धूमि तपते मारि मुदहि तहि सो उठि जिय परयो । इहि भाति गम र परम पवित्र नित नूतन करें । कहि दास तुलसो मुनत सव के घचन मन पातक ठरे ॥ १६ ॥ दोहा ॥ मुनि सीता के भुगल मुत राम कीन्ह अनुमान । लोक सिपावन देन हित वाले श्री भगवान । इति श्री उतर काड समानः ॥ ॥ श्री गुसाई तुलसोदास कृत छदावलि रामायनसः । Sulyeet -विविध दा में मतिम रामायण समकोड । Note -कती प्रसिद्ध गोस्वामी तुलसीदास जी है। No 83-शतप्रध्यातरी Verse Substance-country made paper Leaves Size -103 x 55 inches. Lines - 13 on a page Extent-500 alohas Appearance ordinary Complete Incorrect. Cliaracter Devanagari Place of depost-Library of the Maliarsja of Baparas Satuprcspottari.—A book on the hoowledge of the crcator according to Vedantısın by Manobara D-13a Niranjan.. Beginning-श्री गणेशायनमः ॥ अथ सो प्रश्नोत्तरी लिप्यते ॥ सोरठा ॥ वाच्य लक्ष करि जान निर्गुण मर्गुण ना कहो । करि नमसकारि बग्वानि धाच्य त्याग करि लज्ञ को ॥ २ ॥ यो । अनान शक्ति पात्मा की कहिये । प्रात्म अज्ञान अनादि मिले लहीये । प्रज्ञान अमिल रह्यो शृद्ध पाना । ताका वह्म करिके से जाना ज्ञान मिल्यो मो साक्षो कहोये। दोइ भाग अज्ञान मो लहोये ५ नोवेश्वर काहीये पुनि सामहि । साक्षी नाम कहो हे जा महि ॥३॥ End --लका अर्थ कायो यह माई ॥ नामहि द्वैत भान नहि होई ॥ द्वत मान वाधा कहो तामहि । फन फलनाम दाइ नहि तामहि ॥ ११ ॥ फल चिदाभास परमाता ॥ प्रह ब्रह्म फल कहयो विखाता स्वयमाह दोइ फल नाही विकल्प रहित रहे मो माही । पर। भारठा हो में हो तू नाहि हो तू ही में है कहो । सूत्र हे हो तू माहि हो त होल एक है ॥ १३ ॥ इति शो शतप्रश्नोत्तरी भाषा मनाहादास निरजनो कथ्यते नग्माण्ड समान शुभमस्तु । Subyect-वेदान्त ब्रह्मनान । Note --यथकता मनोहर दास निरक्षनी है । No 8-ज्ञान बचन चूर्णिका Verse Savstance country roade paper Leases-14 Size-10x5 inches Lines-13 on a puge. Extent-550 slokas. Appearance-old. Complute Incorrect. Character - Der anáçarı Place of depsit-Library of the Mahórája of Kanáras. Gyána Vachang Chuntlá --The doctrines of Vediotiem by Manohara DAca Niranjan: The manuscript is dato Suavat 1831 (1774 A.D) 15 NOTICES OF HINDI POSCRITS Payinning-गोगासनमः । अथ न बन पाका लियो । टोहा गुरु मम तुल्य व्यो म शान करें तर गटर में प्रशाण करि घदन को नित्र ! जोयेश तन्य महि करिश है नाम : मर्यशा यम पुन भगारी मृणधाम || मक्षिा पनि दिस महिशा कर्म कहो लोप । ममारीमा भणे हा भयो मात मीया। Fnl नोर पाप भरे दर रोग मय बाय । त्यो माधन मदित विचार को मेमार रोग नमाय ९ ममय गैग ममार पम मामे करे विचा कहे मनोहर निरनो यष्ठ निवे निरधार | sara योगान नाय यवनिका ममाम् शुभभात। (मके पागे कुछ मजा लोक सस्कृत टीग पहिया ६ पहियों और वार १८३१ पण घदी ५ भृगशामरे लिया है) Suulyect-भाग पंद्रान्स । Note:- मी मनावरदास निरनी है--मिपिकाल सत् १११ पापड बनो । भृगुशर है। 11086-गोषमार Prone Sobstance - country made paper LEATCH -17 Size-61x43 inches Llocs17 on a page Extent-300 blokas Apun prarance-ordinary Cumplete Correct. Character-Devaalgart Place of dapatt-Library of the Mshirija of Bandras Gorallacare. The priaciples of Vincent philosophy by Corahlo Nátla For particulars arout Gorakha Nitha sce Report for 1903 The manuscripts dated Samsst 1850 (1802 AD) LEAVerter --नीरामचद्रायनम. मोगणेशायनमः श्री गुरुपरमात्मनेनमःोन मोपतये नम श्रोषालमुकुदाम नमः श्रीरामुदेशायनमः श्री राधावल्लभायनम । श्री सीपतरनम पथ गोरयमार लिप्यते । मंगलाचरन श्री गुरु परमानद तिनिको दायत हे। कम पर. মান Wাল ল । ভী লিমিটো জি বি ই ম ীৰ স্বনি শ খান दोतु है । में दु हो गोरिय है। मदरनाय को दडश्रम करत हो हे केने ग्रे महानाय । আল্লা ভার্সি সিম্বল ই মাংসল শিলিয়া ধ ম মুলা ৯ জুই দম নিলি নাঙ্গী सरह माने । अरु जुगकाल कम इनि को रचना राज्य जिनि गाये । यान मगध के समुद्र शिनिको मेरो दइयत ॥२ Endl -मी यह पुरुष सपुर्न तीर्थ अनान करि भुको । अरु सपुर्न प्रध्यो ब्राहानि को दे धुरी । अम महद्ध नग्य करि दुको । अझ देवता सर्व पनि दुझे । अम मितानि । मतृष्ट कार से वर्ग लोग पान कार नौ । या मनुष्य के मन दन मार डल्ला के बिहार ठा। पर घिर हो तिमो गोरप मर जाग साम्त सपुर्ण समाRE ग. दन मुदि १ सात् ॥ Rave a Srshyect-योग। Note Hai गोरखनाथ है। इस प्रति का लिपिकान मबत् ५५ है।
MOTICES OF HIYDI VAXUSCRIPTS 53 No 86-कथित बेनी कृत Verse Substance - country made paper Leates.-63 Size - 10x6 saches. Lines --15 on a page. Ertont-935 blokas Appearance -- new Complete Correct Character Devanagari Placo of deposit. Library of the Mahirija of Banáras Kaaitta Bent Knta-A collection of 267 kanttas of the poet Bent (1760) wntten in the erotic style Beginnary - प्रोगणेशायनमः । भौजी फुलेन पुली अल मुकुली अखिया बतिया तुतरोहे ॥ येनी चलो उठि के अगिराह उठाइ भुजा जमुहाइ मिछाहें । पोझ को लोके कपोलन मडित यडित में अधरा मुरझाहे ॥ भोर को भारी सो वानि मडो चितये चित में चवेची भौहे ॥१॥ Find -पायरा कान मुनेहो पो से सरूप भरोसो परे अखिया चे॥ वेनी चपाउ रहे पसरो से मुभाउ बरोशन और के वा कान्ह पो मो रहे इतहो चित जातु हरों से गिरि कलाये ॥ अगनहू को भरोमा न है अगरी मे रहे दर्द मारे न में है २० ॥ Subject --शृगार रस की कविता । Note -ग्रन्थकती येनी कवि है। इस प्रति में २६० करितो का सयह जान पडता ॥ No87-रामाचा सगनातो Verse Substance - country made paper Lenyes--30 Size--101 x 41 inches. Lines -B on a pige. Extent-3348104as Appearance---new Complete Incorrect. CharacterDevanagari Place of deposit-Library of the Maharaja of Bantras. namagya Sriganauté ---Consideration of anspicious moments for doing anything, by Goswami Tulasi Dasa. Beginning-श्रीमते रामानुनायनमः । प्रथम सर्ग लिप्यो । पहिली दाहाई ॥ बानी विनायक अब हर रवि गुरु रमा रमेस । मुमिरि करहु सव का शुभ मगन देश विदेश १॥ गुरु सारदा मिधुर घदन समि मुरसरि मुरगाई ॥ मुमिरि करहु मगल मुदित मन होईदि मुकृत महाई ॥ २ ॥ गिरा गरि गुरु गनपति हरि मगल मगल मूल ॥ मुमिरत करतल मिद्धि पर दो ईश अनुकूल ३ Eud --आई लेहि काहि अनुमरे सो दोहा मय होई । मगुन समाय सर सत्य फल काय गम मति माई ॥ 6 ॥ जन विसशस विविध भनि सगुन मनोहर हार ॥ तुलमी रघुपर भक्ति र गिलपति विमल विचार ५०॥ इति श्री तुलसीदास कृत मगनाती रामा'या सपुर्गा । पक्ष मा पाठ कमनगटा भग्न तीन मूठी घरे मात को भाग दे गने पहिलो मूठी को मर्ग दूसरो मुठी को दहाई । सोमरी मूठी को दोहा । अमे दे गने याको विधि। Subject -कुन धिार Note:-पयका श्री गोस्वामी तुलसीदास हे । 58 No89-पिनयमार Jerst, Substance-country mude paper Lenses-- Size-6x6inches Lines-12 on Apage Frtunt-775 slokas ATTARE ance-old Incomplete Correct. CharacterDesanigart. Place of deposit -iul mry of the Slalıárájt of Banini NOTICESOFINDIMINUSCRIPTS Regusnshy - श्रीगणेशायनमः । अय भान यदन नशिश निष्णो दोहा पनि गुट्टे मम तुम eds मान ई दर में प्रकाश कार पंदन का मिज grs: कोपेश्वर सन्य महिं कपिए नाम मता मा पुन मसारी सुपधाम कर्म महित पुनि रहिर है महितमं कहपोलीयाममा भणे हित मया मार मोवाई Fnd - भोर पाया भये ददा रोग मय जाय ! यो माधन मंदिक्षा विभाग में ममार गेगनमाय २ ममय गेग मसार मय मामे करे विचार करे मनोहर मिरसतो यह निहने নিয়া। ৪। যি স্বী প্রান পুব ঘনিষা মাম্ মমত্বসি। (इसके आगे कुछ साफ नाक साका टोरा मदिरा ६ पतियों पर 11 प्रणा पटो । भृगुवामरे लिया ) Sittyeet.- भाग घेदाता Note:- ममापदाम निरनी है-लिपिकाल मगर १०१ पापाद बदो ५ भृगुवार है। 1083-मेरयमार Prore Substance-country made paper Lries -17 Suze--1x4 inches. Line17 on page Extent-300 Llokk, Asm gwarance-ordinary Cumplete CorreCL Character-Derankbark Place of Japaust-Library of the Mahérázn of Banáras Gorakhasara The principles of Yogy philosophy by Gorahler Natba. For particulars about Gorakha Nátha ece Report for 1903 The manuscript is Jated Sımsat 1859 (1802 AD) Beginning-श्रीरामनदायनमा पोगणेशायनमः श्री गुरुमात्मने नमः मोलम्मीपतये ना प्रत्यानमुदाय नम. श्रीयामुदेवायनमः श्री राधावल्लमायनम् , यो मातापलयन प्रय गोरपसार लियो । प्रानाधरन । श्री गुरु परमानद तिनिक) दवा हे घोसे पर मानद पानद म्हप है। मरीर जिशि शिन्ह निझ गये ते मीर चतनिधानमय होत हें । में बु हो गोरिय मा मदरनाथ के दहशत करत है। है केमे धे मदरनाथ । मात्मा नाति निश्चन है । अतहकरन पिनिको श्रम मुनद्वार से छह चा मिनि नौको सरह माने । जुगकान कन्प दनि को रचना राल्प लिनि गायो । ग्यान मुगध के समुद्र तिनिको मेरी दयत ।। Endl ---मो बह पुरुष मर्न तीर्थ धनान कर चुकी । अरु सपनं प्रची ब्राह्मानान को दे चुवो । श्रम सहस्र जग्य करि चुको । अब देवता सर्व पनि चुनो । प्रा पिसन को मतुष्ट कर चुको । स्वर्ग लोग प्राप्त कर चुको ना मनुष्य के मन छन मात्र ब्रह्मा के विवार पेठो पर चि हो 480 इति यो गरिय मत बाग माम्त सपुर्ण ममात्रम् | अग. एन मुदि १ सवा ॥ ९०५६ । Syeet -योग। Notr-ती गोरखनाय है। इस प्रति का लिपिकाल मवत् १८५६ है NOTICES OF TIJDI MANUSCRIPTS 30 No 86-फपित्त वेनो कृत Verse Substance country made paper Lenves-G3 Size --10x6} inches. Lines-15 on a Page Extent-935 slobas Appearance — BOW Complete Correct Character Derrnigari Placo of deposit-Library of the Mahiraja of Banáras, Kanta Bent Krita-A collection of 267 kavittas of the poet Beni (1760) written in the erotic style Regarnung-श्रोगणेशायनमः । भोली फुलेन पुली अल मुकुली अखिया वतिया सुसरोहे ॥ येनी चलो उठि के अगिराह उठाद भुना नमुहाइ पिलोहे । पोक की लोके कपोलन मडित पडित से अधरा मुरझाहे ॥ भार को भारी सी बानि मडी चितये चित में चठी वेचठी भा १॥ End-पाषरा कान मुनेही परो सो सरूप भरोसा पर अखिया । वेनी चाउ रहे पसरों से। मुभाउ बरोसे न और छके है । कान्ह पो मा रहे इतही चित जातु रो से विमूरि कलाघे ॥ अंगनहू को भरोग न हे मगरो से रहे दई मारे न में ॥ २६ ॥ Subject --शृगार रस को कथिता ॥ Note --यन्थकती वेनो कवि है। इस प्रति में २६० कविता का यह लान पड़ता । No87-रामाज्ञा सगनाती Terse Substance country made paper Leaves--30 Size-104 x 4g mches Lines-8 on a page Extent--334 blokas Appearance--nex Complete Incorrect Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Maharaja of Banáras Ramógyá Sgrnautl --Consideration of auspicious moments for doing anything, by Goswami Tulasi Dasa. Beginning-श्रीमते रामानुज्ञापनमः । प्रथम धर्ग लिप्यते ॥ पहिनी दाहाई ॥ बानी विनायक अय हर रवि गुरु रमा रमेस । मुमिरि करहु सर कान शुभ मगल देश विदेश ॥९॥ गुरु भारदा सिधुर बदन ससि मुरसरि मुरगाई । मुमिरि करहु माल मुदित मन होईहि मुकृत सहाई ॥ २ ॥ गिरा गरि गुरु गनपति हरि मगल मगल मूल ॥ मुमिरत करतल सिद्धि सब रोइ ईश अनुकूल ।। End.-जाई क्षेहि काहि अनुपरे सो देोहा जब रोई मान समाय सघ सत्य फल कहब राम मति सोई ॥ ६ ॥ अन विसयाम विधि मनि सगुन मनोहर हार ॥ तुलसी रघुवर भक्ति उर विलसति विमल विचार । ० ॥ इति श्री तुलसीदास कृत सगनाती रामाया सपूर्ण । एक से पाठ कमलगटा अरन तीन मूठी धरै सात को भाग टे गने पहिलो मूठी को वर्ग दुसरी मूठी की दहाई । तसरी मूठी को दोहा । मे दे गने याको विधि ॥ Subject -शकुन चविार ॥ Note -पद्यक श्री गोस्वामी तुलसीदास हे । ॥ . No8s -विनयसार Verse Substance-country made paper Leaves 58 Size-GX6 inches Lines -1% op & pige Extent-775 blokas Appear vice-old Incouplete Correct. CharacterDevanagari Place of deposit Labrary of the Blaháríja of Bandraz YOTICES OF DIDI MATLINITS Pinayırdra --Prairry of Cod by the pret Sarlara Dasa (1509) (Sre 1051) Beyuoty-योगणेशायनम । पय शिनयमा लिप्यते । चोराई। मोदी गुरु को मृमिान करू । मान मानन पर मिर घर धरि की गुर के प्रलि अलि मान। पनपन दिनटिन जसपा सुमाम मे करा भग्नाम। मनी पहनिमि कृष्ण पो गम मे प्रभु के निग गुण गांश। गाय गाय गुण पति मुख पाशा जिनके गेस मटम मय गाय गाय गाय अपरा न पायें । मिनशे धनुमय प्रमा ध्या। गिर जनसादिक पार न पायें । नारद मारद ध्यान में मगन । यामी शुक भाने दोंने मन । पि मन्वादि अनिाम पाई। गोपी तिनके रस में नाकाम कदे ह न सके लियत र प्रतिक्षेत्र । Fri-पाई । मुटर नाम को निम दिन गाये जग के पार मार दी जाये। अपनी देरत्र कुर्मात मार दीनी । धन पाताई में मनी । युद्ध मुह मन छौनी होनी । साले हरि सो विनती कीनो । मेरो विनतो को निलीको पावन शिविरद दिन टालो । अपमा दाम पिचार विचार । अधम टयार नसा र धार हरि कृपा ने कुच में पारे । मुटर टेट मुद्रा को निहारें । राय करना कार रि या दियो । विनती मुनि प्रति टमा हिया । जो कोइ मा विनगो को गात्रे । सो मूग मेरा ट पाये । दोहा । मुदा हरिको मात मागिनती करी पुकार । रित चित मा गाणे मुने । भागे एक पत्र मादा छूटा है और कुछ नहीं है । यही में पुस्तक र दा है। मा गंप मान पडता है। Sujeet -प्रायना और दोनगा। कुछ योक्षा Note-ता मुटरद्वाम है। 1089-रमिकप्रिया Verse Substancs-country made paper Learta -५० Size --98x6 inches. Lines -10 on a page Extent-1,Goslokse Apnersnee ---old. Completa. Incorrect. Character-Devanagari Pince of depr»it-Library of the Maharaja of Bavárns. Bianka Pryd -A book op Landi compriuga by Kesara Dses, who wrote the bank at the request of Indraziti Sinhe, soutger son of Madhukara Siha of Oruth in Simvat 1649 (1591 AD) This 13 oec of the standard banks on lind Sahitya Ergentury-प्राणेशायनमा यो गोपालो प्रति । भव रमिक प्रिया। पट पद। यक पदन गप बदन भदन युधि मदन कदन भुत गोर मंद आनदकद पगडम चन्द्रबुर। मुख दायक दायक मुकति मन नायका नायक । यन घायज्ञ धायक दरिद्र न लायक लाया। गुरु गुन भनत भगत भय भलियत भर भय हरन । वे केगेदास नियासमिचि लवादर अपरम सरन । प्रथम सिंगार मुद्दाम रम करणा रौद मुशोर । भय पोभरम यानिये अद्भुत गास्त मुयोर ....... (निमय काल) मया मारह में पाप बोते अहसालस। कातिम मुदि तिधि मामी पार पनि रमनोस । End-दोहा केशव काना दास्य मह श्रम विभरम मिंगम् । वरना योर मया नाहि मसरा यक निधनामें उपजे वोमाम से भरा मिगार से हार के भर ते करुना को प्रकाम । यहि विधि केशदाय म अनरम हे विचारि । याना नान पर महा कथित लटु मरि । रमिक प्रिया पिना दैघि पदिन दिन दोन त्यो NOTICES OF INDI MANUSCRIPTS 61 भाषा कवि सब रसिक प्रिया विनु होन । वाढ़े रति मति अति चढे जाने सब रस रीति । स्वारय परमारघ लहे रसिक प्रिया की प्रीति ॥ २२८ ॥ इति श्री मन्महाराज कुमार श्री इंद्र- जोत विरचिताया रसिकप्रियायां अनरस धर्नन नाम पोड़स प्रभावः संपूर्ण । मुभमस्तु थो शम्वत् Subject -रस काध्य। Note:-कला प्रसिद्ध कवि केशवदास है। इन्होंने प्रोड़छे के राजा मधुकरसाहि गहरवार चंसी के कनिष्ठ पुष इन्द्रजीतसिंह को पाना से इस मंथ को रचा । निर्माण काल संवत् १६४८ कार्तिक शुक्र सप्तमी चंद्रवार है। No 90.--नखशिष Verse. Substance - country.made paper. Leaves-- 14 Size-61x5 inches Lines--21 on a page. Extent-297 slokas. Appear ance-very old. Complete Incorrect. Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Bahárdja of Baniras Nalhasikha -Detnuled description of the body of & heroine by the poet Kanha, who, according to Dr Grierson, was born in 1857 A.D Beginning - श्रीगणेशायनमः ॥ कपि काहि कृत नप शिप लिप्यते । क. ॥ मूषक भधारी दुष्ट दूपक पथारी पुष्ट पृषक पहारी कोटि विघन को रंदा है । लगोदर नाम पजे कान्ह मन काम कोटि सूर को सो र्धाम भाल वंदन को बंदा है ॥ पड़े बरदानो सेवें सारद भवानी देव मुक्ति मनमानी येथे पापन को फंदा है। सेहे गन मुंड पर चंदन भूसुद्ध पर मुंड पर कंत्र धेरै मुड पर चंदा हे End-चौपई नप पद अंगुरो यही लाल । पारशेव पिंडरी वर माल ॥ जंघा कटि फिकिनो मनकार । नाभि पिवली रोमालि पारु । लक्ष्य ठरन अरुता भरे । ऊपर स्याम कंचुकी करे । नप अंगुरी कर चारु हथेरी। कंकन चुरी भुना मुभ हेरी ॥ मार पोठ योया ससलरो । चिनुक अधर दसनालि भली । रसना धानी हसन सुमेध । नय मुक्ता नासा मुभ वेध । गास कोल लसे मुभ बनी। कोर पलक पुतरी बरनी॥ होरे लाल लसे अति काजर । पनी डीठ नेन छपि हाजर : मृनुटी टेढी बेंदा गोल। भाल बंदनी जटित अमोल। करनफूल कलिकायलि कान । सोसफूल माग मुकतान । पाटी बेनीवार विराजे । अग मुवास घसन रबि धाने ॥ ०१ इति श्री कान्ह कृत नप सिंघ समासपुरन धनारस मध्ये लिप्यते रूपचंद ब्राह्मन ॥ (इसके आगे की पक्ति दीमकं सा गई है और प्रत्येक पत्र की अन्तिम पक्ति का भी यह हाल है) Subject -नख शिख पर्यन्त प्रत्यंग की शैमा वर्णन Note –कवि कान्त कृत। डाकर पियरसन के लेखानुसार ये कवि सक्त् १६०४ में जन्मे थे । No 91 -श्री हनुमत बाल चरिच Ferse. Substance--country-made Paper Leaves--33 Size-2 Inches Lines--15 on apage Extent-420slokas Correct Appearance on Character-Devanagari Place of deposit-Library or we blalarija of Banáras. Sri Hanumała Valacharirt -The story of Hanumánn's younger days by the poet Brijs Illa, who composed the book in Samyat 1876 (1819 A.D) Bagmreng-श्री गणेशायनमः श्रीहनुमते नमः । अध हनुमत बाल चरित्र लिप्यते। दोहा । पमल कमल विय कर लमत दिल्यामरन विसाल : जय जय श्री सुवान पान 16 XOTICES OF INDI YANUSCRIPTS . यदा कवि यमलाल ५१ मर्यात मानकीनाय प्रभू यद पवन कुमार निको किचिन कपाकर । यात्रा सन्य अपार ५९ गामानुज पद पद का गुम चरनन दिलाए । मा बम या रचहिये ध्यार मुशार ............... मघा पट रितु घमु गीमाई छटे शनिशा पार फया जगात रचि प्रादि मुका" विचार. End -प्रय कवि तिन कर नन यो नरधार के दाम मतम यानी in গঙ্গল প্রায় ৪ ও খ গ প্রশ্ন বা মল মঙ্গ সমান ৪ লাশ স্বরে রে भय र प्रसार हनुमान A LE टॉमति नृपसि अली भहां राम श्री महरा मिनि परस्त मुमान मुल मुनिराश पजरात ॥ ६॥ शिधी मन गमचन्द्र प्रामातर अगस्त मुनि मयादे श्रीमहामायय टनर कोड ययान्तर्गत श्री हनुमा धान पात्र गृथेन श्रीमन मान कीद शन्दय पनलाल भट्ट कपिरान शिक्षो मूर्य तट माशाध्यमे या दृश्य मुलीय निषति पुष पंचमणिय: सपा मुझे भूमार प्रो नमते नमः । समापनम' । Sulyeet ---प्रो हनुमान जी के बालपन के परिव रामायण RT कांड में अनुयादिल । Note --না পাল কৰি ৪ বিঘ ক্ষপিতা যন্ত্রন মাত্র ৫ নম্বর ৪ ? No 02-साहित्यमुधाकर Verse Substance couatry-tondu per Leares---135 Sze-101x43 inches Lines-700ange. Extent-1880 blokng Appearance-nem Complete Incorrect Chunracter-Devanigart Place of deposit-Library of the Makdirijamf Paniras Sihulya Sulhdlana.--II ındi prosdg and composition by the poet Simulira of Lalitpur, who composed this book sb Santot 1902 (1845 AD) uniler the patronage of Mahardja 16sari Prasida Náráyana Singh of Buniray Beginning-श्रीगणेशायनमः श्रीगुरवे नमः श्री गुरु पढ रस बद के कर वर मुग्न मनाम 1 करत एक अन्य मुचि कुषि कुन मन विधाम १ पटन चहे माहित हो अथवा पटि जय नेहा लय सरसी साहिन की देयन के मन देइ २ कशिम समुद के घट चन्द्रमा के ले में वुधया विधन हरन गति से हर के । रमन के हनुमत बल को न भाले बा दान का करन देघियता भासकर के। कवि सरदार घेता रामचन्द्रन के लय काल में न दुना टपमा के और नर के । भयो धेरोचन के वन मे सपस जेमी स्वरीप्रसाद उसे दान धा के .. End - मरद एक घट बोस मरा ताके उपर दोह। पूपन कोभ मरदार फर्षि गम जनम सिये चोर । नगर ललित पुरयास हे कासोपति के पास । कीनो हरिजन नद गह हरिनन त बिलास ॥ इति श्री साहित मुधाकर Sulyeet -पिंगल। Note -पया सरदार कवि ललितपुर नियमो ये काशिरान महाराज श्यरो प्रसाद नारायमिह के माथित थे और उन्हीको शचा से इन्होंने यह सन्य बनाया। निमास काल बत् १६०२ चेत मुदी है। No -रममपन या Terre Substance-country made paper Legles -15 Sub-Tixitnebes Lines-15 on a page Extent-180slokna pearance-old Complete Incorrect Character--Deranigari depoat-Labrary of the Mahiriji of Batuirns. Place of JOTICES OF HINDI VANUSCRIPTS. Rasabhusana Grantha --A description of the different kinds of heroes and heroines by Ramanatha Upadhyaya Begrunning---श्री राम नो सरन । श्री गणेशायनमः । प्रथम मनाउ गनपति कह जो सुप चाटु । बढे सकल मुय सपति मिटि है दाहु ॥ १॥ चरन तोरि चित सौरो सिन ठकुनि । कठिन सरल सब है मा पर मुहि वानि ॥ २॥ करहु नीक सिवरानी सब विधि मधि रचेटु यथ तोरे बलसन प्रेम पयोधि । ३॥ End -अथ ललित हाय को उदाहरन यया । लाण्ड तहनि फुलेलबा पिय रसमाति । पहिरया द्याह गहनवा भलि भलि भाति १४४ अय कुटमितहाय को उदाहरन यथा । मि. लेर मोत अन भुपमा गा दुप भागि । नारति घेतु जोन्हया परसत आगि १४५ अथ विहित हाय को उदाहरन यथा । मिलिगा मोत दुअरवे लोगवन साथ। शिरि समुचि हि वोलो तिय लचि माय १४६ इति इति यो घर वाजपेई रामनाथ कृत सपूर्ण शुभमस्तु रसभूपन पन्य स. भी राम राम राम । वाचे रामनाथ कृत । Subject.-मायिश भेद । Note-~यन्धकता वाजपेयी रामनाथ है। इसमें कोई समय नहीं दिया है। माम। . No 9.4.-रतन हमारा Verse Substance-country made paper Leares -91 Size--94x61 inches Lines—13 on a page. Extent-1,007 slokas Appearance-ordinary Complete Correct Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Mahírája of Banáras, Ratana Jajard -A collection of one thousand couplets by Rasa Nidhu Nothing more us Lnown about this poet. The manuscript 19 dated Samrat 1894 (1837A.D) Beginning -श्रीगणेशायनम ॥ श्री सरमुती देव्यैनमः । दोहा ॥ लसत सरस सि. धुर बदन मालथली नपतेस ॥ विधन हरन मगल करन गधरी तनय गनेस ॥ १॥ नमो प्रेम परमारथी यह जाचत हो तोह ॥ नदलाल के चरन से दे मिलाइ किन मोहि ॥ २॥ नमो प्रेम जिन किया दिय लग आइ प्रकास ॥ रगरत वासो नाक गो नाऊ गोपकन पास ॥३॥ निसि दिन गुजत रहतमे विरद गरोनियाज । हे निज मधकुर मृतन की कमल नेन तुहि लाज ॥ ४ ॥ वरन मधुर सुदर अरथ हरि सोदित निरधार । रसनिध सागर मथ लये दोहा रतन हजार ॥५ Frel - अधम उधारन प्रभु कहू करतो जोन सम्हार । हो तो मोसो पसित क्या या मयसागर पार ॥ ६०४ ॥ हेरत कहू नु दीन तन पाहि पाश्ती लान ॥ प्रीतम ते व कहावतो दीनद मजरान ॥ ६ ॥ सदपि अकरनी ह वरी में हर भाति मुगरि । प्रभु करिनी करि पारही हार विधि लेहु सुधारि ॥६७६ ॥ कहे अलप मति कोन विधि तेरे विस्तार ॥ दोनवध प्रभु दान को ले हरि विधि निस्तार ॥ ८ ॥ इतिश्री महाराजाधिरान पोरसनिधि त रतन हतारा सपूर्न ॥ श्रोरस्तु मगल ददात् । कार्तिक शुक्ल । सवत् ॥ १८६४ ॥ धोराम। श्रीराम Subyeet-मरस के दोहे। Note -ग्रन्थकत्ती महाराज रनिधि है । लिपि काल कार्तिक शुक्र ३ सवत् २०६४ NOTICES OF NINDI V NOSCRIPTA. - . N025-मायन मथनाटक Ferse Substanca -- copatrs made poper Leares-100 Size-81xcinehes. Lines--200n snge Extent-3000 blokas, Appenranco-sery old. Completa Incorrect Character-Derana gret. Placo of deposit-Labrary of the Maharaja of Banárak, Ramdyand Vahdndtato -The story of Ramachandra s life by Prána Chanda Chaubáns, who composed this book in Samvat 1007 (1010 A.D) when Siha Salima was the Cn poror of Delhi This Salluia cainnt bo of thic Sara family, being the younger bon of Sora Saha Súra for be was dead in the year 1554 Pro bably it refers to the dogal Imperor Jahangira, who was called Prince Sallma before hus accession in tho year 1605 It 23 jast probable that for some ytara after the accession Jahangira might hava beca popularly known as biha Sallmaa. Tho manuscript ts dated Sunyat 1775 (1718 AD) Beginning-दाशिव परब्रह्म । नम गुरु विर गुनन । नम्गु तेन पतोश लो राम लछमन । महायलो रामा बसी मुवीय।। राधये नाम। पालती । प्रथम करें। तो को पेश घेही गुरु कद सघ मानी देवा । गुम गनेश को पाने वादी मुर नाग याने। शोय मृत केनी शीघुमहो। शुङ उठाये शो नल ली हो। पालो पेट मद काठी अटारा । कहउ म कहठ पयेउय हमारा। कशेश कह शेनक करया। ग्रह्मा कदर ध्याम के घाना । चोय मुत पीके काठी अढाना । तेहो दिन शेजन जो पाप प्रगमग रि बानोक । रहे गाइ नरनाद शो जल क्रीडा गनेश को। परीधीपति शून माद । . कातोक माम पयो ढोयारा तोय पुमा सोम कर धारा। ताही दोन कया कोह अनुमाना शाह सलेम दीलीपती धामा ममत सेरद स मत साठा पृय प्रगास पाय भय नाठा घो साद माता कम दाया धरना प्राद पुरुष को माया हमाया कद मुनो का मुला ग्रला रहे कमल के फुला नीकम न मुझे मामा के पाया टेप कयल नान के पंचा पाद पुरुष वरने कोही माति चाट मुरम सही दोयस न राता नीरगुन रूप रूप कही धीर ध्याना चार वेद गुन रि याना सोना गुन पाने ससारा शीरने पाले मगन हारा प्रवन विनासो प्रसय गुना मन म छोर म पहन मुना देव साधाहीन पापी अधकार घोर केसाण सोदी कर द कोकर पणना मोदी कर मर्मभेद नही खाना माया गोधु भो कोउ नपारा शहर पर धीसा। शारने पलका एक मह मा लागुन वार । घरनी मर्ग पाताल ते मही माया प्रगम अपार । End राम परिव जो कहे घणना घाठे धर्म पाप दोष हाना अरु नोमुने सबन चौत लाई यो "मपुर के नोकट न सा घो मा अानक गेह शशारा राम नाम वोन हाणेन पारा नाद बालमीक दुर्गा गोटु राम नाम की असा चारो प्रत काल कदराम प्रचारा जेदो मोति शङ्क घरही ध्याना दारी घेद पठि ब्रह्म मुनाना मुनीपो त शीच सन्यासी सल थन भी शायदे वामो उन सब मोली ऐह व्रत गण राम नाम बीन पर न भाण चा महोमा गादु कह भागे तेही वरने कह उत्तो मारो पादो कथा ऐह अहे पुराना णे मे माण की बपना धाने समाग NOTICES OF DINDI MANUSCRIPTS 65 बालमीक हनीपत मोलो प्रथम को ह अस्तुती भार भापेउ प्रानचन्द पेह नेहो तेनके उधार इति श्री महानाटक संपूर्ण सुभमस्तु शोधीरस्तु जो कीशु देषा से लीया मम दोपो न दीयते .४ ॥ ४॥ ४ ॥ ४ ॥ सबत् १७०५ मास मागसीर वीदो गुर वासरे ली० मीश्रचद्रे स्वरेण ठा० फकोरचदलो पाठनार्य ॥ मुभ-मुभ । दीवत् गोवीद रामनाथनी नी माथी थे। Subject --रामचन्द्र की कथा । Note ---मानचद चौहान ने शाह सलीम दिलीपति के समय में इस ग्रन्थ को बनाया। निर्माण कात यत् १६६० और लिपि कान सवत् १००५ है। 194 No 96-हितोपदेश Verse. Substance-country made paper Lenves- Size-11x7 inches. Lines-15 on a page, Extent-2900 slokas Ap pearance-ordinary Complete. Correct. Character-Deranigarl. Place of deposit-Library of the Mahariya of Banaras, Infopadefa-Translation of the Sanskrit Hitopadesa by Prayaga Disa who lived at the court of Khumbna Sinha of Charkhiri (1830 AD) (See No 74) Tho manuscript is dated Samrat, 1889 (1832 A.D) Beginning --श्री राधाकृष्णायनम ॥ श्योगणेशायनमः ॥ दोहा सोय सहित रघुनाथ को नमद बारहो बार ॥ निहि ते हित उपदेस यह टोहि सरल सुपदाय ॥ १ गोपनि जुत मुमन नित गो पालत बन के बोचि ॥ अधर मुरलिका धुनि उठत माथे मुकट मरीचि ॥ २ ॥ सत चित पानद रूप घन अरसिय कुमुम सरोर ॥ वेद गीत नद नद प्रभु करह कृपा रनधीर ॥ ३ ॥ जामे पुरन होइ बह करटु कृपा श्रोगम॥ श्रुति हितकारी यह कथा हित उपदेस मनाम ॥ ४ ॥ मेरठा ॥ देत सके मन काम । है प्यारे श्री राम के ॥ यात शिवहि प्रनाम ॥ शिव बिन शिष न कई मिने ॥ ५॥ दोहा हा प्रसाद ते सरा सम मिद्धे तहत मुन । नाके सिर मसि लसत बनु गगा जू को फेन ॥ ६ ॥ Erd-छप्पय । सलगि घर धनि जलगि धुप धाम धराधर । जलगि पेद विलि यास जनगि लोमस प्रकास वर ॥ जनगि देय दिगपान चलगि गोपाल गनेसह ॥ इगि धनेस यनेस मलगि अमरेस प्रदेसह । कषि प्राग कहे कोतुक कलित जलगि मरस सिउ गावहिं । भूपति पुमान पदम प्रवन तलगि राज्य भुय भुगावहिं ॥ १६ ॥ इति श्री हितोपदेसे श्री मम द्वारााधिराज महाराना श्री राजापुमानसिंघजू देयाजया श्री कवि प्रयागदास विरचित सुधि मरदो नाम चतुर्थ ।। सर्ग ॥ शुभमस्तु ।। सयत् ।। १८८८ ॥ मीति कुमार यदि ६ यार मगर । Sulyect --सस्कृत हितोपदेश की भाषा ॥ Note- यकी कांप प्रयागदास हे-ये चहरी के राजा मानसिंह के पाथित ये और उन्हो को पाना मदाने यह अन्य धनाया लिपिकाल समा १८८४ आश्विन कृE भौम धार. No 07 --TTA PER Terse Substance-country made mper Leates -29 Size-४} inches Lncs--16 on a page Extent-about 350 slokes Appearanci-orl nary Complete. Generally correct. Character-haithl. Placo of deposit-Labrary of the Maharaja of Banáras 80 NOTIOES OF HINDI NYUSORIPT3 Namn Vuldrall-Spintual lessons in regard to the worship and virtuce of Ramaplora by the poet Tulasi Desa The manuscript is dated forutet 1853 (1802 A.D) Beynirm -भीगणेशायनमधीगमचंद्रायनन । पाधोपम मुक्तावली टोरा। TA नाम भनि दीप धोद टेक्षा हामी भोसर भार जो पारी मेशिमा १ राम नाम के भाइहे पाय धीज प्रथा । मग सम मा मरे रामह न निहफल : # সান গুলি ব্যাং ই সুজি দ্বি মৃন্ম জারঃ লাম ম ম শষ্ট যুগি ল টা चिला. End -हनामान से योनी करि अमिन माद धो ई। दो ही दृष्ट करि वर्षमा पाय धीम अम यो । सय मा य पाद के राय कीन्ही परगास पठि मुनि से निकमि कोहि रिमोदाम । इति श्री हरि धरित मानसे कलिजालुप विधाने नाम गम मुस्तावली गुलमोदास को पूरा गम को अनुचर सुपरन शुभमस्तु मवर १८५६ सेठ मुद्री १५ मगर लिया कामो मद्धे प्रातरक्षी मह रामघरन मिस ने लिया अपने पास्ने । पडित स्न मो यिमसी मारी। टूटल पर पावर पारो । दोहा । मेध लहरि मामे मठी मन समुद्र अवगाह । तुलसी धीरक्ष के घो मन पायगे याद । हम हम दम मार धमम हमार के धीच । तुलमो अलरदि का लपे राम नाम कटु नोच । Subject,-राम नामोपदेश तया नाम माहाल्य। Note -प्रत्यक्ता गोस्वामी तुलसीदास है । लिपिसान सपा १२ क्षेठ मुदो १५ मगलबार । No.98 -गमलामा Verse Substance-country made Taper Leares-- 26 Size-GX 47 Inclics Lunes-17 on a page Extent-about-430 slokas. Appearance-ordinary Completa. Inco rect. Character-Dmanigant. Place of dupost-Library of the Mahkriya of Raniras Nama Sulla -Amall book dealing with the means of finding out the would be consequences of actions by the poet Tulasi Disa. Sach books are rey numerous in Ilinds and appear to ms to be a Inter development of Hindu astrology The manuscript is dsted Samrat 1202 (1765 A.D). Bernrang-योगणेशायनमः । पोथी रामशलाका की प्रथम वर्ग प्रथम दहाद। प्रय दोहा । गुर महाइ । घानी चीन एक श्रच रवि गुर हर रमा रमेम । मुमिरि रह स्म काम मुम, माल देश विदेश १.११ पुर मुरल सादुर बहन की मुरमुर गा मुमिरि चनहु मगल मुरतो. दोहदो मुकृत सदइ । २ . गोरा गरि गुर गनप धरः मगल मगल मुल । मुमोरस का शीधी भय शेर ही मर चनकुल ।। Lud --सतवा सर्ग के साद दहाइ । दोहा । मुदीन सादी पोधो नेतो. पुत्री प्रमात सम्म । समु विचारव चारमतो सादर सभ्य मुनेम । १ । गुनि गनो दिन गनो धातु गनो दोदा देवी घोचारि । देसक करता यचन पर: असगुन समे अनुहारि सगुन मत समो नेनगुन अवधी अवध नोशान होर मुफन जमु भामु नमु प्रोसो प्रतोली प्रमान ॥ ३ ॥ गुर गनेश हर गोरो सोर राम लप्न हनम नः सुनसो दसरथ मुमोगे मर सगुन बोचार नो धान । ४ नोमान सानुन भाय राम सोश उर पानी । लपन मुमोरी तुलसो क्या गुन घोसा वणनी को बेहो कानहो इनघरे से दोहा षय होइ । सगुन समे सव सत्य फला करब राम गतो सोह६ गुनी धीमप योची मनो. स्मुन मनाहा र । तुलसी 1 XOTICES OF TIRDI MANUSCRIPTS रघुवर भरतो ठरः बोलसत घोमल बोचार 10 ॥ इति श्नो सातो सर्ग सपुर्न शुभमस्तु जो देया से लिपा मम देोप न दोपते सवत् १८२२ मितो श्रापन यदी ॥ २ ॥ वार गुगउ लोः भोमसेन कायस्थ मोकाम पचवनीया परोगनकेण । Sulyeet-शकुनाचली। Note:-~-कनी गोस्वामी तुलसीदास जी है । इस प्रति का लिपिकाल सबत् १८२२ मायण यदो २ गुरुयार - No 99 --माण रामायण Verse Substance--country made paper Leaves -- Size-91x5 inches Lines--11 on a page. Estent-about 480 klokas, Appearance-ordinary Complete Incorrect. Character Devanagari Place of deposit-Library of the Maharaja of Banaras. Bhdsd Ramayana-A short story of Rima Chandra's life by the poet Kapúra Chanda (alias Chanda only) ulio wrote it in Samrat 1700 (1643 AD) when Sahajahana was the Mughal Emperor in Hindustan Beginning-श्री गणेशायनमः । अथ रामायण भाषा पद कृता लिप्यते । दोहरा। गुरु गोश अरु गोरिक्षा मुमिरे होय मानद । कछुक हकीकत राम की परम करत हे चद । १॥ पाद अनादि जुगाद हे जाहि सपे सब कोइ । राम चरित अदभूत कथा मुन्य पुन्य फल होरे ॥२॥ आदि पुरुप परमातमा निरकार हे सोई ॥ भगत हेत सरगुन भयो राम कहत सा कोई ॥३॥ सया भूप विक्रम को गनिये एक । हार पजा हजार सन हजार गनिये । फ०९यदी बैशाख धातुरन जाने माता साहिजहाँ पातिसाद दिल्ली अदल विज्ञासा ! एक सी ग्यारद कविरा इहोर को ये पठात मुनत हर दियो जस परनन रघुनाथ को कपुर. चद लिप्यो किया ॥ १३५ ॥ चारि कवित पहिले ब्याह समे राम जी के मुचे तिस समेति यक सो ग्यारह परन हुवे . १५६ ॥ इति यो रामायन चंद कृत भाषा सपूर्ण । योः । शुभमस्तु । श्री सीतारामाभ्या नमः । श्री। Sulyect---सक्षेप में श्री रामचन्द्र को कथा । Note --अन्य के प्रतिम भाग में जान पडता है कि यन्यकता का पूरा नाम कपुर- धंदा सधा यह दिल्ली के वासी और शाहजहा के है। निर्माण काल सपत् १००० पेशाय पदी है। End-सवह समय में No 100-मीरांठ Verse. Substanca--country made paper Lenses -30 Siz0-13x7 inches Lines - 12 on a page Extent -- 715 klokos Appearance-nem Compluto Correct. Character-Desanagari Place of deposit-Library of the Mahársja of Bandras Ilanira Latha. -IIistory of Hammíra Sioba Chauhina by Chandra Semn of Patials lle compoeed this book in Saturat 1902 (1841 AD) under the patronage of Wahirija Narendra Sinha of Patrill. Beginning-श्री गणेशायनमः । अथ चन्द्रमेपर कृत हमीरदठ लिप्यते । दोहरा। गिरिवरधर अरु गग पर घरन मरन पितु लाइ । या हमोर ४० की कथा को सहि तिम नाद । १ . परसराम धुप भुध प्रदन पष्ठिफन पर चिमि एव । श्री नरेन्द्र मृगान मराव 6 XOTICES OF NIXDI YAvtScript क लांग तय क्षम पर १९६ नीन्द्र मृाति नृपत्ति दिन प्रति दया नियान । दीन जान फोनी कृग मापा पाम मृगन । ३ निकट योलि दोमा इफम यह हमीर हठ आन । वंद पद कारक रचा कया मुहान शेन । ४. महाराज तो दिविधि चिन परिचय पर भाषण करो टुपन कर न मि End-मदागज के शुम रो छिट्टराय याज मया मिनको कृश परि पान मुभ पाज ८ ॥ कर नम रम या पारामा मया फागुन माम । कृष्ण पर तिथि सोच रवि दि दिन चंच काम | ३ राधार के जगत में श्री नरेन्द्र मृगराना सेपर निज प्रभु लोस में तो लपरा न पाश । 800 मोहि भरोसा राघरो महाराव मिरमार करिय कृपा विष दीन निरपि आपनी और। ४०१ आमपि मात्र ते मुरपुर मक समाज । सोलो राज करो अविन श्री नीन्द्र मगरात्र । ४०२ : पय गट्टि एं। प्यनिधी मत्सकल लाक ले वन चार चिंतामपि मनोन मद भगन पंचनायत विमाल नेश्वर यिद मुडपमेय दोर देह पल पंडन पर महनी विहंडन विपद राम गुंड दंडना पंडित, भासं प्रताप गायचे हरन सरनाग मुस देवदेसाधिनाय गन मेयित मुरेम मामाञ्य मृप पुरन पुनौरा बेद. पश्चात सननीत अवलोक्ति घिमीत पर बुद्धि योर संदीवन विमेधिनादि । विधिधि विरदापनी विमान मानणमायांस मामगंध के यिभान बिमद विद्या तुमचतुः स्ट कलानियान मकल नरेन्द्र दामु पदनीय धरनारमिंद चातुर्य मिरोमयि मान मर माधव मुघ दायर नानायक दिलोमदल दमन प्रस कल्पद स्यरूप नरभूप कममिह लोग मोनस मम मोहन मुघा मधुर घरन घटार मागुरू पदाविदानुराग परिपुरित प्रकर्ष गुना याहा गरीब नवाज महाले यो समान महाराजाधिराजेस्या को यो यो श्री श्री यो ী মাল্য পৰিয় আম্বার্ষিালি স্বয়ং জৰি স্কিৰিা চুনী ফল समार शुभमस्तु सर्व जगा Subject -चान मोर का दिल्ली के पादशाह मे युद्ध में Note.-कती कवि चन्द्रशेपर देना महाराज नरेन्द्रसिंह पटियाला चाले के आतिघे । पन्दान एस इतिहास को महागन को पाश मे दोनल बनाया। निमाय कान संगत् १६०२ फागुन यदी ४ रविवार है। No 101.-हरिमतिचिनास 'erye Substance country-mado paper. Leaves-GO Size - 121x7 inches Lines-12 on a paga. Extent--1,775 blokas Arrearance-ner Complete Correct. Character -- Devinigari. Place of depostt- Library of the Jahúrája of Banárok Iarbhaklı Filisa-A religious book dealing specially with devotion to God by Chandra Seshara of Patali (1830 AD) (See No. 100) Pyarseng -श्री गणयनमः । श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नम । दोहा । हि सदन यारन बदन पंदत यलित विसाल । विधन घन मगल करन रिमन बाल विधु माल ॥ १ ॥ अमन अमल कोमल करत मनु मुकुति मकरंद । श्री गुम चरन मरोज वर घटो पानवंद । २ । छापे । इदु कुद करपुर गार विश्वेष धान पन । आदि शक्ति अनित विभूति विदित प्रकाम तन । मुडमाल विपश्याल भाल विधु वाल शिपना नगन बटिस भामरन अग न मिय धषि हाजत दिग थाम दिव्य अंश अमल बाद विरय मगन करन। दुप हरन रन सेपर नरन सतत सि गिरिजा दरन ।३। Ent-पु. वृनयासो कर इंद्र भरत ने पाको मनमे । करि शमना बन पान । ममा महि वृंदानन मे। हरिजन एग को धूलि प्रेम सा मे सन लाये। शिनरी अगर • NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS 61 भाण कवि सवे रसिक प्रिया विनु हीन । वाठे रति मति अति पढे जाने सब स रीति ॥ स्वारथ परमारथ लहे रसिक प्रिया की प्रीति । १२८ ॥ इति श्री मन्महागज कुमार जोत विरचिताया रमिकमियायां अनरस धर्नन नाम घोडम प्रभावः सपूर्ण ॥ मुभमस्तु श्रो सम्पत् Subject -रस काय्य ॥ Note-कती प्रसिद्ध कवि केशवदास है। इन्होंने प्रोडछे के राजा मधुकरसाहि गहरवार घशो के कनिष्ठ पुष इन्द्रनीतसिंह को आना से इस पथ को रचा। निर्माण काल संवत् १६४८ कार्तिक शुक्ल सप्तमी चद्वार है। No 90 parina Perse Sabstance -- country mada paper Lenses 14 Sizo-GX5 inebes Lines--21 on a page. Estent --297 blokas. Appear etce-sery old Complete Incorrect. Character-Devanagori Place of deposit-Library of the Mahírája of Baníras. Nalhatilha-Detailed description of the body of a heroine by the port Kaha, who, according to pr Grierson, was born in 1857 A.D Begimming-श्रोगयेशायनमः। कवि कान्ह कृत नप शिप लिप्यते । क . मूषक सधारी दुष्ट दूपक सयारी पुष्ट पुपक पहारी काटि विधन को रदा हे । लबोदर नाम से काह मन काम कोटि मूर को सो धाम भाल यदन को बदा हे ॥ पडे बरदानो से सारद भवानी देव मुक्ति मनमानी छेवे पापन को फदा हे । माहे मन मुड पर चंदन भुसुड पर मुड पर कन धेरै . मुट पर चदा है। End.-चोपई, नप पद अंगुरी रही लाल । पारजेश पिंडरी र साल ! बघा कटि किकिनी झनकार । नामि पियली रोमालि पार . प रस पहता भरें । उपर स्याम फचुकी करे । नप अगुरी कर चारु होरी । ककन दुरी भुजा मुभ हेरी मार पोठ योवा' मालरी । चियुरु पधर दसनालि भली । रसना धानी हसन सुमेध । नय मुक्ता नासा मुभ वेध गात कोल लमे मुभ यरुनी। कोए पलक पुतरो यानी डोरे लाल लसे अति कार। पैनी डीठ नेन यि हानर । मृकुटी टेढी वेदा गोल । माल घदनो मटित अमाल करनबूल कलिकापलि कान । मोसफूल माग मुकसान । पाटी येनीवार विराजे । श्रग मुखास यमन अघि छाजे ३०१ रति सो कार कृत नए सिप समान सपुरनं धनारस मध्ये लिप्यते रुपचद वामन (एसके आगे की पक्ति दोमर खा गई है और प्रत्येक पर की अन्तिम पोक्त का भी यह हान है) Sulyect --नव शिख पर्यन्त प्रत्यग की ोभा पर्यन । Note-कपि फान्त कृता डाकर प्रियासन के लेखानुसार ये कवि सवत १६०४ में जन्मे थे । . No 1ो हनुमत बाल चरित Verse Substance-country made paper Leaves---33 Sue-lixr mches. Lines-15 0na page. Extent--420 slokna Appearanco-old Complete Correct Charactar~Devandgarl. Place of du positLibrary of tho Mahárja of Banáras Sri Hanumala Válachantra - The story of Henunina s younger days by the poet Briya Tala, who composed the book en Samrat 1876 (1819 AD) Beginning-यो गणेशायनमः श्रीहनुमते नमः । अय हनुमत यान परिष लियो । टोडा पमल कमल गिय कर लसर । दियाभरन विसाला पय मय श्री मुशान घान। 10 XOTICES OF INDI HANDSGRIPTS. बदा कवि धनान । १ अर्याग मानीनाय प्रभु घदा परन कुमार तिनको किदिा कपाकर । बाटा सन्य अपार मानुन पद यद कर । गुम धरनन विगुतार । दन: मा शाम कया रवतु । ये ध्यार मुपयार ।। ................. मा पट रितु यमु मनी । माह छटे निगार । पाल कया जनान रवि बादि मुकास्य विचारि.१६. Ent-अय कवि सिन काई नम्न यो । नहिं हर दर के दाम में मातम पानी लपन कर सकल उपदाम । ५। पेत्र कृष्ण कुत्र दोष मन मयत अंक प्रमान याल परित भयो । सो प्रताप हनुमान : Ven दोलात नृपति अली वहां रात श्री महरान । मिपिन स्वहस्त मुमान मा मुमपिरान जगन। 0 रसि भी मन गमचन्द्र प्रश्नाता अगस्त मुनि. मयादे श्रीमद्रामायण इतर कांड कचान्तर्गत भी हनुमत पाल भरिक गृशन श्रीमन भान कोद्र सन्दय गन्नान मट्ट कविगत विते मूर्य तट सास्वाध्यने ऋगत्पाला दयामि भूगीय निरकृति पुप पंचमोध्याय :॥ मपणे मुझे भूयात् । श्री नमो नमः रामायनमः । Subject -श्री हनुमान जी के वालपन के परिव रामायण टसर काड में अनुवादिरा । Note -पता यमलाल काय निमाय काल इसका म १८८६ माघ ६ शनिशार है। 1038-शाहित्यमुधाकर Verse Substance country mule piper Leaves-135 Suze-101xkuches. Lines-7 on spsge. Extent-1650 tlokas. Appearance-new. Complete Incorrect. Character-Devanigari. Place of deposil-Library of the Mahúrája of Banáras. Sthitya Su thakara --IIandi prosody and composition by the poet Saradira of Lalitpur, wlio composed this book in Samrat 1902 (1845 AD) under the patronage of Maharaja Isvari Prasáda Nárájana Singha of Daniras. Begranng-श्रीगणेशायनमः योगुरवे नमः श्री गुरु पद पन वद के कर कर मुरन प्रभामाकात एक मुचि कुषि कुल मन बिमाम १ पढन परे सारिन को अयया जन लेइ न सरमी मादिन को देशन में। मन देर २ कविन समुद के चंद चन्द्रमा के म बुधयर यिधन हन गनपति ने हर के । परन के हनुमत बल को न भाके का दान को पान टेपियत भापकर के। कवि सरदार घेता रामचन्द्र के लव मति में न तो टपमा के और नर के भयो धरोदन के बल मी सास नेमो ईस्वरीप्रसाद देतेपदान घर के ... भप्रद इक घट घोस मत के उपर दो। न कोय मरदार कधि राम जनम तिजा । नगर ललिग पुरवाम हे कामीपति के पाम । कोना हरिन नद कह हरिजन देश चिनास । इति थी माहित मुधाकर । Satyeet -पिगल Note --यन्धको सरदार कवि ललितपुर निवासी है। ये काशिरान महाराज इंश्यरी प्रसाद नारायणमिह के साचित थे और उन्हीकी प्राशा से उन्होंने यह यग्य बनाया । निमाया काल संवत् १६०२ शेत मुदी है। - End No 03-मभूपन पन्ध Ferse Substance-country nude puper Leaves -15 Size=73x4 inches. Lines---}5 09 A piye, Estebt--180 slodas Ap pearance-old. Complete. Incorrcet Character-Devanigarl. Place of deposit-Library of the Maharaja of Banáras.
NOTICES OF HINDI JANUSCRIPTS. 63 Rasabhesano Grantha -A description of the different kinds of heroes and heroines by Rámanátha Upadhyaya Begrnning-यो राम तो सरन । श्री गणेशायनम ॥ प्रथम मनाउ गनपति का जो सुप चाटु बढे सकल मुप सपति मिटि हे दाहु ० १॥ चान तोरि चिस सेरो सिर ठकुगनि । कठिन सरल सच हैगा पर मुहि जानि । २ । करहु नोक सिवरानी सब विधि सधि रचेहु यथ तारे वलसन प्रेम पयोधि ॥ ३ ॥ End --श्रय ललित हाय को उदाहरन यथा । लापड तहनि फुलेलया पिय रसमाति । पहिल्या द्याद गदनमा भलि भलि भाति १४४ अथ कुटमितहार को उदाहरन यथा । मि लेह मीत श्रय मुपमा गा टुप भागि। नारति चेतु जान्हेया परसत आगि १४५ अथ विहित हाय को उदाहरन यथा । मिलिंगा मोत दुअरवे लोगवन साथ। हरि सचिनहि वोली तिय लाच माघ १४६ इति इति श्री वरचे धानपई रामनाथ कृत सपूर्ण शुभमस्तु रसभूपन यन्य स- मान। श्री राम राम राम । घरवे रामनाथ कृत Sulyect-नायिका भेद । Note -अघता घामपेयी रामनाथ है। इसमें कोई समय नहीं दिया है। -91 No 94-तन हजारा Verse. Substance-country made paper Leaves Size-sixos unchea, Lines-13 on a page Extent-1,007 glokas Appearance ordinary Complete Correct Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Mahirija of Bandras. Rarana Ilajárd -A collection of one thousand couplets by Rasa Nidhi Nothing more is known about this poct. The manuscript is dated Samsat 1894 (1837 A.D) Beginning-भोगणेशायनमः । श्री सामृती देय्यनमः । दोहा । लसत सरस सि धुर धदन भालथली नातेस । विधन हरन मगल करन गरी तनय गनेस ॥ १॥ नमो प्रेम परमारथी मह जाचत हो तोह । नदलाल के चान में दे मिलाइ किन माहि ॥ २॥ नम प्रेम मिने किया दिम लग आइ प्रकास । रगरत वासी नाक गो नाक गोपकन पास ॥३॥ निसि दिन गुजत रहतमे विरद गरोवनिगाज । हे निज मधर मुतन को कमल नेन सुहि लान ॥ ४ ॥ धरन मधुर सुदर प्ररथ धरि मोदित निरधार । रसनिध सागर मय लये देव्हा रतन नार । ५. End-प्रथम उधारन प्रभु कह करतो जो न सम्हार । हो तो मोसो पतित क्या या भागा पार : 881 स क जुटीन न पाहि प्रायती लान राम ते व कहावतो दोनवद प्रताप जदपि अमरनी ह की में हर भाति मुगरि । प्रभु करिनी करि पापहो हार विधि लेहु मुधारि Ece | कहे पनप मति कोन विधि तेरे गुन विस्तार । दोनयध प्रमु दोन को ले हरि वियि निस्तार । ६८ ॥ इतिची महाराजाविरान गरेरनिधि त रतन हमारा सपुर्न य धोरस्तु मगल ददात । कात्तिक शुक: मयत् ॥ १८४ ॥ पोराम श्रीराम Suyeet--प्रेमरस के दो। Note-ययाती महाराज रसनिधि है । लिपि काल कार्तिक शुरु ३ मयत् १८८४ XOTICES OP MINDI VAXOSCRIPTE. । NO.95-रामायन महानाटक Verse Substance-covatry-made rsper Leares-109 Se-8x61 inches Lines-10 om s page Extent-3,000 blokar Appearance-very old. Complete. Iccorrect Character-Derand got. Plass of deposit-Library of the Jlahárája of Bandras. Ramdyan. Mahdndtaka The story of Niceclundra's Itlo by Print Cluanda Chauhana, who compoard this book in Samrat 1667 (1610 AD) when Biha Sallima sas tba Emperor of Delhi. This Silon cannot be of the Sora family, being the younger son of Bara saha Sóm, for he was dood in the year 1958. Pro. bally it refers to the Bogal Emperor Jahangtra, who was callal Princa Sulima before hus accession in the year 1609 It w just possible that for come years aftor the accession Jahéngtra, might have bem popolarly known as $ila Sillou Tho manuzenpt is datod Samrat 1775 (1718 A.D). Degrnning-भदाशिव परंपलप । नम गुरु दिर गुन । ननु र पतीव लो राम लक्ष्मन : महावलो राणा । तो मुची । पपये नाम । पानतो । प्रथम कंग सादी को सेया । हो गुरु कद सत्र मानी देया । गुम गमेरा कार पाने । इंद्र भादो मुर नाग यगने । शोष मुक्त केली शोधु मन्ही गुड ठठा गोनल लोन्दो पाली पेट मह काढी प्ठारा। कदउ मझ कर पवेत्य धमापक शेष कदइथेनश करया झाकहर ध्याम के घरना। शोध सुत पीके फाठी पाना। तेहो दिन से चला मारा। अगमग मिरवानी रहे थोद नरनाह शोस्त क्रीड़ा गनेश को। परी चीपति इन माद। कालोक मास पयो त्रीयारा तोच पुनो सोम कर धारा । तारी दोन कया कोष्ट पनुमाना यह सनेम दोनीपती थाना समत मारह सम भाठा पुग्य प्रगास पाय भय नाठा पो माद माता करु दाया बानो बाद पुरुष को माया बेड माया कर मुनो नग मुला ब्रह्मा रहे कमले के फुला नौकम न सके माया के बाग देव कान माल के पचा पाद पुरुष धरने कोही माति वद मुरम हाँ दोनम न राती नोरगुन रूप रूप बही धीर ध्याना चार वेद गुन जारि वणना सीना गुन पाने पसारा थोरने पाले मंजन हारा वन विनासो अम बटु गुना मन महामु पहले भुना देये मत आही न पायो अधकार चार के मापी तोदी कर दहु कोमर बयाना नोदी का मर्म भेद नही जाना भाया शोधु भी कोउ नपारा शकर धीच दार हारा। घोरवे पनका एक मह मन लागु न यार । धानी सर्ग पाताल त मही माया अगम पवार । Ent.-- राम दरिदो कहे वपना वाढे धर्म पाप रो हाना घर र मुने सघन होत लाई यो समपुर के नौकट न भाई चोमा पानश ऐह शंशारा राम नाम योन होयेन पारा नाद वाग्नीक दुर्यासा सोन्हदु राम नाम को प्रामा पारो युग जाने ससाप अंत काल कद राम अधारा बेहो नोति शङ्ग घरही घाना चारो वेद पठि ब्रह्म मुचाना मुनीपो तथा शीध मन्यासी जल घन शाशके घासो टन सर मोली पेहधा राण राम नाम घोन भार न भाग पा महीमा गरदु कद भारो तेही वरने कह मतो हमारी पादी कथा रोह मेहे पुराना ग मे भाग कोन्द ययाना . 4 NOTICES OF HINDI MANUSCRIPTS. 79 No 108 -मुजन विनोद Verse Substance-country made paper Leaves Sue-91x4 inches Lines--10 on a page. Extent-1,125 Alokas, Appearance-old Complete Incorrect. Character-Depanigari Place of deposit-Labrary of the Maharaja of Banáras Sujana Pinoda —A book on Hindi composition by the poet Deva Datta of Mainapura (1620 A.D) This manuseript is dated Samrat 1857 (1800 A.D) Thero 18 another incomplete copy of this book in this library Beginning-श्री गणेशायनमः । दोहरा श्री राधा हरि प्रेम वस सरस सिंगार ठ. दार स्तुि घारहो मास गुण यन्दा विपिन बिहार । १३ श्री वृन्दा धन प्रस्तुति । प्रेमी उति । होली पन दायन मोदी मे वसति सदा षमुना सरग स्यामरंग प्रबलोनि को । देव धेरै पुदर सघन बन देषिया कुजन में मुनियत गुजन अलोनिको । वंसीवट तट नट नागर न. पतु मम स के विलास में मधुर धुनि धीनको । भरि रह भनक बना तार ताना को तनक पना तामें मानक पुरोनि को । २ ॥ अथ वृन्दावन समय गुण दंपती वर्णन ॥ दोहा देव रितु तोरया समे दंपति तोनि एप र उतपत्ति दिलाए अरु प्रकास मुरम धनूप ३॥ End -तन मन पोट पट कपट घूघट घोलि ठर से लगाये पतने पे अरसात हो। थाकी चपन्याउ अपने न सपने हो थिर होत नदी नम पछि थिरात हो । कोधी किहि गेल खेल बतिया छपार कि विरह धोराने देव बोला न बात हो । प्यारे परजंक हु में सास ले उसक भक हमे प्रलात हो । मातीमो भारती हिय जानिके प्रभात द्रग ठोले करि प्रीतम के गात लफलफान के । हसरत सेन से सपोनि मुप देश नाथ नहीं बनी लायी लपे लाल मेरे लफनिको । दासी देवता सो पग दंपति के दापि चली दावे पग पसन .... लाल को चान मेष पाये दाप देव रगमगी अंगजेम नगमगी मुलफनि को ५० पति श्री सुजनश्निोदे देय कवि- कृते पट रितु विलास वर्णनो नाम सप्तमा विलासः ॥ ॥ इति मुजन विनोद सपूर्ण मुभ सवत् १८५० मिलो प्राषण मुदी ६ बुध वासरे लियितं प्रो दिमान दुर्जनसिंह और उत्तन हदगढ नदो सिंधु नदी तटे परगना तहार सरकार पेरदि मूबा अमरबाद पार दुरपोबाधो लियो मनिर्यिका तटे। Sulyeet -काष्य साहित्या Note -कवि देवदा चिता लिपिकाल सवत् १८५० मिती पापण मुदी बुध पार है। No 109 -केदारपंचप्रकाप Verse. Substanca - country made paper Learea-TI Size-121x7 inches. Lines-12 on n page Extent - 2,725 slokas Appearance -new Complete. Correct. Character - Deranagri. Place of deposit-Library of the Mahárája of Banáras Kedura pentha praldsa.--An account of the journey of Rází Narendra Natha Sinha of Patiala by the poet Disa, He wrote this book in Samvat 1910 (1853 A.D) Beguratig-श्री गणेशायनम् । अथ केदार पथ प्रकास लिख्यते । दोहा । गुर गन पति पितु मात के पद दी धुम्रात प्रनिनझी कृपा कटाछ रवि तुरत हसत भव गत ॥ १ ॥ नर नापयन मुमर पुन द्वीपादन मन लायनिन मग पत परत नर पाराहन हे माय : २५ जिह गुन गाइन मुना नित नारायन मुद होत सिंह नारद मुनि पद अधजन भाय धारय पोत ॥ तिहधानी पद दद को घदा अम दर सन । मिह करनाहित छपाकर जन कुवलन मुपदान सन कुचलन को मुफ्द पो एन कमलन को नाम । साचे रघुबर दद लहु ये पंदे फरिदासा॥ 19 SOTICESOFINDIHIROICATITS. ॥ Ed --मेरठा लियी धुन निनाय व लश मे आया मति garl करिमाय भून पान कपिदाण 1 Sen gो बात माय मया नम अधिक मदि। को कविदा कया गिदार प्रकाप कर पान मा काल का बिना या प्रय ते। कथा पमो रसमा नारायन मकानो १८० ११ सर को रानापिराध यो नरेंद्र सिंध बेदार या द्विार पंच का एच विदारो नाम पदमा विराम ॥ ममम Bulyret-दार माग यन। Note- कपि दाम है। ये मो पटियाला राज्यायित और महान नद मिष्ट में पेदार चद्रीनाग की यागमो समय मा घर्ष के मार्ग का मान लिया या सरनुधारने र य में हमे बन्दोबद्ध किया है। निर्माय बाल सयरा १८० शातिक भुदो १५ ॥ No 10-दपिपानंदकाम Tere Sukulance-onntry made paper Leaves.-37 Buze--12x7 inchea Lates-12 on a page. Extent-950clotas Appearancs - D0W Complete Generally correct Charneter-Devanagari. Place of depoant-Library of the fahariya of Bantras Dal Singhinanda pratils: -A collection of 727 couplets on diferent mubjects wy the poct Disa (Sec No 711). It appears that the pact completed this collection is Sitstaf 1890 (1833 AD) Irom the opcaing lines of this Look it appears that the poct a full name was Dsla Singlia and bis nonmde plume was Dise Begenring-डोश्री गणेशायनमय दलमिपानंद प्रकास मतमया लिप्यते। कुरा फरिदार श्री दलनिघ । मागचरम । दोहा । मिमा गुरु गोयिद जिद सिंगर मुचन को मिहिका पद पइम मुमशुद्धि वृद्धि नर निद्धि । १५ गुम गोविंद मिच पद पदम करत सारदा ध्यान । कर मुत्रन गति मन याने लाने जान अति ध्यन गुरु पद पदम में पदमा कीनी मेह । पदम मुपद अनुमान कर घेठी करयर गेह ॥३॥ End.-पय मय जनम याननदो रायत नम निध यमुररिधुवासर धुध विधार । साठ मुदी दुशिया भले मया पय अयार ! R५ : गुणन से मोम मम छा विराम निय पुटिमाले मोरची यह रचना पामिन C या मे फहों मन यच कम कर नीस सिध्यप गोदसिंघ पद सदा यमे मम चीत 1 ०.०१ पति श्री दलसिहानद प्रकासा सत्य से सताई दोहा सभात। Sulyect --अनेक विषयों के ०२० दो का सरह । Mote-मयकता फषि दा पाराम में एक लिया है कि "कृत कामदासयो दलमिह" इससे यह अनुमान होता है कि इनका पूरा नाम दलमिट और उपनाम कवि दास था । १८० प्रापाठ मुदो र धुध यार इस अय का धम समय लिया है। No Im-उँदरमात सिगार I crt. Sabstands -country mada rmpet Lcares-57 Size--97 x6 inches. Lunes---16 on a page Exteat-900 ilokas. Agrearance--ordinary Complete. Correct. Character-Deranigaut Place of deposit--Library of the debårija of Banánas.
NOTICES OF HINDI LANUSCPIPTS 75 Sundara Sala Singáith-Praises of Krisna Chandra by one Sundara who composed this book in Samrat 1869 (1812 A.D) Begrnning ~~ो कृप्यायनम ॥ अथ सुदरसासगार लिख्यते । चौपाइ हरि वन बन भारही पधारे । भूपन यसन अग अग सुधारे । मन मोहन जन जन मन मोहना काम लजावन नब सिख सोहन । पोतावर कर मुरली धारे । रूम रूम बरपात हे मुधारे । मधुर मधुर प्रति बोलत वत्तियां । माहे मन मोहे मुम दतिया ! पोहे माना मुक्त मोती । रीझ रोझ गई लखि लखि जातोश्री वृषभानु ललो को गली नो । सुदर हिली मिली भावे चली सो अवही तो आपके दे गए वोहनी । डारगे आगे सर पर मोहनी ॥ End -कवित्त ॥ माये उमग से दीप पे पतग समूले मतग सो मानो पतग सो मुक मुक मुकाई है । बाकी पोत श्रग को चागे पोत रंग के भूपन पोत अग अग सोही मो सोहाई है। कपरा अग अग गहे तपत अग अग हे भरो रूप रंग मनाचग सी उडाई है। सरसत अग अग घरयत रग रग दगदग तन मन सो मुदर वलिमाई है ॥ १०२॥ चोपाई । सवत अठारह से यनहतर ॥ वेसाप मास मलि माम पवितर ॥ शुक्ल पक्ष नोमी एतवार । सुन्दर पोथो करो मुरारि ॥ इति भी मुदरसतसिंगार सपूर्णम् । स यानी की प्रार्थना ॥ दोहा ॥ मैं तो अपनी जान में को हो शुद्ध घसान पर लेषक के लिषन को कछू नहीं परमान ॥१॥चौपाई। पिगल बाद भेद नहि जान । काव्य पथ मन मे नहि आनो ॥ केवल हरि रस हरि जस गाया हरि रसि कन के मन को भायो पिगल दृष्टिते यह न लगे । जिय में हरि को प्रान लिखोगे n में ताके बल हरि यस गाऊ ॥ ओरन से अपराध हिमाऊ ॥ दोहा । कियो हरि मन मुख कारने सुदर परा सिगार । सप्त जनन धन सेतो मागो मक्ति प्रकार ॥ १ ॥ Subject -श्री कृष्णचन्द्र के विषय में किसी भक्त को भावना । Note --मयकी कोई सुन्दर नामक भक्त है, जिग्ने इस पथ को सवस १८६८ मेघनाया. No 112-अगसमोहन Terse Substance country made paper Leaves--400 Size-104x7 inches Lincs-17 on a poge Extent-9900 Slokas Appearance-new Incomplete. Correct Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Maharaja of Banaras Jagdla Nohara.A book dealing with several branches of Hindi com position and such other subjects as Vedanta Nyişi astrology medicine etc The pame of the anthor 13 Raghunatha Bandijin to whom some villages were given by R of Burmanda Singha (alias Balaraata Singh) of Banárns. He com posed this book in Sancat 1807 (1750 AD) Thero are several blank pages in this manuscript Probably some portions of it bave not been copied out. Beginning-श्री गणेशायनम । मुफल होति मन कामना मिटत विधन के पुद । गुण सरसत बरसत हाप मुमिरत लाल मुकुद ॥ १॥ दोहा । ब्रह्मा को मुत मानसिक गोतम परम प्रसिद्धि । साझे कुल फोटू मिसिर प्रगट भयो तप निद्धि ॥ १॥ वेद कठ चारो करें अष्टादा पुरान । उपनिषदो अरु सास्त्र सर ओ सन कला निधान ॥ २ ॥ प्रवोध पद्रोदय फरे नाटक परम अनूप । वामे दरसनु हे सदा ब्रह्मचान को रूप ॥ ३॥ धागे काशिराज को षयावतो गोतम मुनि से महारान परिषडसिंह तक । फिर निर्माण काल दोहा । भट्ठारह से मुनि पधिक मयत प्रति अभिराम ! माघ शुक्र की पचमी तिथि मिति सब मुख घाम ॥ ४ ॥ यय भगत माहन मयो सा दिन सय मुखरास । नवरस मय पर गत मे अपनो कियो कास.
* YOTICES OF HINDI VIA USCRIPTS Ext-ठा लियो यु भनित्र हाथ बद सभी ने बया मति ॥ शुम धमा मपिनाच भन एकल कषिदाम की 10 प्रन्यो घातक माए या नभ मिस महि । पुरण की कविदाप या मिदार प्रकाण का मान कार का फर मिना या प्रय से । कथा सभी रसमा नारायन गयधनी , ca | श्री नाराज श्री नरेंद्रसिंघ घेदार याrat फिदार पय प्रकारे पछ यिदा नाम पंचमा विराम || मुभा ॥ Salyeet -बेदार यात्रा पखेन । Note - कपि दास ये भी ध्याला तिथे र मदान न सिंह ने पेदार घटीनारायण को मारा फररी उमय से पके मार्ग का प्रसाना रिग था सदनुसार होने परचम इन्दोबद्ध किया। निमाय फार वा १९५० कासिक मुदो १५ दे। No 110-दलसिंधानश्कास Tere Substance--country made paper Learer-37 Size-12x7 inches Lines-12 on orige Intent~-350 blokal Appearance-now Complete Generally correct Character-Deranagari. Place of deposit-Library of the Maharaja of Banáras Dala S nghdnanda praldi.A collection of 727 couplets on d Terent subjects by tko poet Dása (Sec No. 111) It appears that the poet completed this collection in Samrat 1990 (1833 AD) From the opening lines of this book it appears that the podla fall naduVos Dala Sungla aad bus ronde pluma Vas D 48. Beginning-टोमी गणेशायनम पिय दलमिधानद काम । मतगया लिप्यते। कृत कविदाम श्री दलमिघ । मेगानाचरन । दोटा । सिमर गुरु गाविद पित गिर मुपन को रिद्धिमा पद पदम मुप्रेम बुद्धि वृद्धि नव निद्धि । १५ गुम गाविद मिघ पद पदम करत सारदा ध्यान । कर मुश्न गति भले यारो लो ने जान ९५ प्रति धन गुरु पद परम से पदमा कोमा मेह। पदम मुपद अनुझान कर घेठी झापा गेह । ३. End-पथ पय जनम पाननादो सय नम निध यमुरविधु वासर युध विचार। माठ मुदो दुतिया भले भयो पय अवतार R I गुरुगन से बोस मुभा विना पुर पटियाले मोरची यह रचना परमिन्यता या में कदा मन पच कम का नोस । असियज्ञ गोदिसिंध पद श वसे माम चीत । १० । दक्षिी दलसिहानद पशासा सत्य से सतार दोहरा समा Subyert-अनेक विषयों के ०२० दौछे का साह । Note-धता कवि टास प्रारम्भ में इसने लिखा है कि 'कृत कनिदास प्रो दलपिह" इससे यह अनुमान होता है कि इनका पूरा नाम दलसिंह और सपनाम कवि दास था ! १० पाया भुवो ९ बुध पार इस यय का षम समय लिया है। -दरसप्त सिगार No111-1 Ferre Satatande coastry made proper Leares--57 Szo-xo chea. Ianes-16onapage. Extent--9008Nokar Appearance-ordmary Complete Correct. Character-Duvanagari Place of deposit-Library of tuo Mahirija of Banirak HOTICES OF HINDI MANOSCRIPTS 75 Sundara Sata Sindie-Praises of Krisna Chandra by one Sundara who composed this book in Samrat 1869 (1812 A D) Deguring ---श्री कृष्णायनम । अथ सुदरसतसिंगार लिख्यते । चापाइ । हरि बन बन भारही पधारे । भूयन घसन अग अग मुधारे मन मोहन जन जन मन मोहन 1 काम लज्ञापन नम सिख सोहन ॥ पोतावर कर मुरली धारे । रूम एम बरपा है मुधारे । मधुर मधुर प्रति बोलत बतिया ॥ सोहे मन मोहे मुभ दतियां ॥ पाहे माना मुक्त मोती ॥ रोझ रोम गई लखि लक्षि जाती। श्री वृषभानु लली को गली नो । मुदर दिली मिली भावे चली सो अबही तो आपके दे गए वोहनी ॥ डारंगे पागे सन पर मोहनी॥ End. कविन " भावे उमा से दीप पे पतग समूले मतग सो मामा पाग सो मुक झुक झुकाई है। बाकी पोत प्रग को बागे पोरा रंग के भूपन पोरा अग अग सोही मो सोहाई है। कपत मग प्रा गहें तपत अग अग हे भरी रूप रंग मनाचग सी उडाई है। सरसता अग अंग घरपत रग रग दगदग रान मन से सुदर पलि जाई है ॥ १०२॥ चौपाई । सपत अठारह से धनहत्तर ॥ पेमाख मास मलि मास पवितर ॥ शुक्र पर नोमी पतवार । मुन्दर पायो करो मुरारि ॥ इति श्री सुदरमतसिंगार सपूर्णम् म य थाना को प्रार्थना ॥ दोहा ॥ मे तो अपनी सान मैं कीन्हो शुद्ध घसान ॥ पर लेपक के लिखन को कछू नहीं परमान ॥१३ चोपाई ॥ पिंगल रद भेद नहिं लानो । काथ्य याय मन मे नहि प्रानो । केवल हरि रस हरि जस गायो । हरि रसि कन के मन को भायो । मिगल दृष्टिते यह न लागे जिय में हरि को पान लिखोगे । मे ताके यल हरि लस गाऊ ॥ औरन सा अपराध हिमाऊ ॥ दोहा । कियो हरि जन मुख कारने सुदर उत सिंगार ॥ सत बनन जन सेतो मागो भक्ति प्रकार ॥१॥ Subject -श्री कृष्णचन्द्र के विषय में किसी भक्त को भाषना । Note.~~मयकी कोई मुन्दर नामक भक्त है, जिन्होने इस ग्रन्थ को सपत १८६E में बनाया। Ho com No 112 -जगतमोहन Verse Substance country made paper Leaves-- 400 Size-101x7 inches Lunes-17 on & page Extent-9,900 blokas Appearance-new Incomplete Correct. Character-Devanagari Place of deposit-Library of the Maharaja of Banáras Jagata Mohane -A book dealing with several branches of Hindi com position and such other subjects as Vedanta Nyáyá astrology, medicine, etc The name of the nathor is Raghunitha Bandijanu to whom some vallages were given by Ryi Barranda Singhn (alias Balasanta Singh) of Banárag posed this book in Samvat 1807 (1750 AD) There are several blank pages in this manuscript Probably some portions of at have not been copied out Beguring -श्री गणेशायनमः ॥ मुफल होति मन कामना मिटा विघन के पुद । गुण मरसत बरसत हरय मुमिरत लाल मुकुद ॥ १॥ दोहा । ब्रह्मा को मुत मानसिक गौतम परम प्रसिद्धि ! ताके कुल कोटू मिसिर प्रगट भयो तप निद्धि ॥ १॥ वेद कठ चारों करें अष्टादसा पुरान । उपनिषदो अरु सारच सब ओ सब कला निवान ॥ २ ॥ प्रबोध चद्रोदय करे नाटक परम अनूप । नामे दरसनु हे सदा ब्रह्मज्ञान को रूप ॥ ३॥ [आगे काशिराज को पशावली गोतम मुनि से महाराज परिवसिंह तक । फिर निर्माण काल] दोहा । अट्ठारह से मुनि अधिक भवास अति अभिराम ! माघ शुक्ल श्री पचमो तिथि मिति सब मुख धाम ॥४॥ यन्थ जगत मोहन भयो सा दिन सब सुखरास । नवरस मय सब जगत में अपनी कियो NOTICES OF MNDI JAXO&CRIPTS. End-अय मरछना नहीं क्षेत्र भागही जहा बरोध ! स्वर को मुनिगन मुर्थना त कहा कार हो । १२० . टरब के गुर सार सो मे कहिये आरोद । अध को स्थर भावे नहा राई कहिये अवरोध ॥ १२ ॥ यामाश्रित हे मना तिन को सध्यमm तिन के मुनिये नाम अय मर र मग विमारा । १९६ : प्रथम मुईना , की राशि मदा नाम से निपट की दुसरी गो रजनी अभिगम ॥ १३ ॥ धेरmदि को पाता है कि गुरु राउ। मुद्ध पहरे मुर्टमा चौथो पंचम पास । १३९ । मान्मया पायरे मा स्वर में पास। पस्यामा पर गंधार में आम । १३९ : रिपभादि घर भई प्राट मधमा भान । नाम ददाता कदर है असि मुख दापक तान ॥ १३॥ (यम यदी पृष्ट का अंश है प्राणे बुध नहीं लिया ऐ मादा पन्ना टूटा हे मिति युद्ध नहीं है)। Subject--इसमें अनेक विषय है, येदान्त, न्याय, सामुष्टिक, ज्योतिष, पेदक, कोक, गिल, फाय, पनंकार, नायिका, मगोत पादि। Note -इसके सन्यकी कागी निवासी बंदीलन कवि रघुनाथ है। ये मदाराव काशीनाप यरियमिदमी के प्राप्ति थे । रहनि रनो कई याम दिए थे। इस साथ का निर्माणकाल सवत १००० माघ शुक्र है। No 113-रामन l'erse. Substance-country-made paper. Leares-- 56. Size -101x61 inches Lines-13 on Apage Extent - 444 blokar Appsaranco-~new Incomplete Correct. Character-Deranigart. Place or deposit-Library of the Blaháríja of Bináras. Rasa Iſúla.—The detailed description of heroca and heroines by the poet Lata of Bankran who flourished in the time of Rázd Cheta Singhs (1770-1781) OR Banáras le composed this book in Samyat 1833 (1776 AD) Beginning-श्री गणेशायनमः । दोहा गारो गनपति पद के प्रसार को ध्यान । भाग कविता करत हो दीने यन्य बनाय । १३ जाके भढ़े मुने सने लगा हे सय कोई । झवि कोविद मदिरा रहे भूपति को अमु दोद ॥ २॥ कवित । ध्या गजयदने मदार एक रदने मुपन्य केरे पदने देवेया यदु धन के । सकर मुअन भुिवन में प्रगट येथे भुषन मुअन मे रपया जन जन के । कहे कविलाल कलावर माल झलकरा इपिजाल ग्यारे मुलि गान है। कविता गुप्ति के मुमति के प्रकाम है नामुन कुमति के पिनामन विधन है । esting पसा दिन साल के गण जमुन के फूल पमनगर में माद भार कच्या गन्य रसमल । ३३ ॥ मयत ठारह से घरप गय घोषितेतीस माम मागु तिथि पंदमी भयो अन्य रसमा End-अय पधमा लछन । पिय अनुरागी रहा है आप न पणी । अधमा सारो कह रे मानु करे फरि टेक ! २२१ । नाक हो पनि प्रति हे पाये। हे यह धाधु। ठन गन ठगनति पुरुष से अनगन तनगन रोज ३ ११२ (शति नहीं है। आगे ३ परे मादे )। Sulyect.-नायिका भेद । Note -- -मह मन्य का लाल रचित है जो काशनाश महाराज चतमिदा- FA 2 | पका निमापशाल संवत १८३३ फाल्गुण को पंचमो। ।
NOTICES OF HIYDI VANUSCRIPTS No 11 कवित्त महाराजा महीपनारायण वहादुर तथा और काशी राजा के Verse Substance-country made paper Leaves--33 Size--101 x 0f inches Lines-13 on & page Extent-290 slokas Appearanco-~new Incomplete Correct Character-Devanagui Place of deposit-Library of the Aahirije of Banaras. Kavita dahdruja Mallpa Ndrsynina Bahadura falha aur Killirwort le --Praises of the Rijas of Banfras and of Roja Cheta Sinba specially, by the poet Lila of Bankras (1775 A.D) The book does not appear to be complete Beginning--श्री गणेशायनमः ॥ राम ॥ कधित राजा महीय नाराएन बहादुर के ॥ थप्पन उधप्पन विदित महिपालन को जाहिर जहान प्रतिपालक दुनी को है । जन्बर भुज ध्यान गयर यस मासे सव्यर मिटाये प्याल गोतम धनी को है। कहे कपिलाल दान भान घनो विक्रम सो अयूदीप टपर करन करनो को है । नाती परिषडसिंह भूपति जसो को भी महीपति महो को नीको टीको राजसी को हे ॥१॥ Einl -अ ध धुरोल घरि थुरेटे रहे काल ही चपेटे हे करंटे दल पार के। श्रेहत अडत मद हरत मरत नद पातर पव्वे चर करत सराह के । कहे कविलाल बाधि कहा कतार माना मेव मधधार नभ सारे लो उदाह के । हलत धारे होत नगर हलारे जल चलस दशार चेतमीच नरनाह के । Sulyect - काशी नरेश के पूर्व राजाओं को प्रशमा । Note --मन्थकती लाल कवि हैं। काल इसमे कोई नहीं हैन इति श्री ही है। इसी से इस यन्थ के पूर्ण होने में सदेह है। । No 115-रामायण Verse Substance-country made paper Leaves-- 570 Sire-123x61 inches Lines-11 on a page Extent-13448 lokes Appearance -- new Complete Generally correct. Character - Devanigarl Place of deposit--Lubrary of the Maluirija of Baniras Namuyana -The story of Rama Chandra's life by Mabirija Visvanatha Singha of Rewih (1840) The manuscript us dated Samrat 1889 (1832 AD) Begnmurg -श्री गणेशायनमः । यो मते रामानुजाय नम ॥ श्री सरस्वत्यै नमः । प्रय लिप्यते घालझाड, श्लोक । सत्व येदासशास्त्रभृतिनिगममहत्संदितानाटकाना यतत्व गापिनीनामुगपतिमते यापुरतात : पाराणीय च मन्त्र कथयति निमार्ग काय रामा. यणाना । मादियाना रहस्य रिमनमतिमुदे विश्वनायप्रयधे ॥ १ ॥ मेरठा । परहु ते पर प्रभु दानि । प्रियादास पद पदुम कह ॥ कार प्रनाम डर आनि । का चरित पर राम के ॥ बहिरा रियर । रमिझ सिरोमनि गम रस । करतहि सामु प्रसर ॥ मगन मेरि मन मोट मे १० चौपाई । श्री हरियर कुन्नादधि पायो । सकल तापहर राम मुदायो । Fnd -दोहा । जेति नेति श्री हरि गुप्रियादास रस गाथ । समाया मिनको कृष्ण कद माप विमुना । जेसि शिधानी जयति प्राचारल करतार । परम परा गुर की र यरनन हि मुप सार । मारठा । थे पिय रघुनाय । यम थाप मेरे हिय । गयो सान शिमनाय । देषु नाव निप प्रेम पर ॥ १०४ । पच कमलर छपद । विस्वनाथ कर माथ राम बेहि हर टरर पर प्यार मार सिर मोर धीर वर कर धर घर मरवार वार घर भार पार कर नर घर घर पर धार बार टर घार पोर दर हर पर दर कर । मोरया - PO NOTICES OF NIDI YA USCRIPTS रहे रस रमो रथ रम्या रद रक्तार पर रहेगा रसे रम्ये रत्तो गधेट टिमुर ना। पति श्री मधाराम कुमार श्री घान सादेन विश्वनामिन देव कृत स्तर काड मपूर्न । Sahyect -श्री रामचन्द्र का इतिहास Note -महारान विश्वनामिरमी देय रोषाधिपति कृश। यह यन्य इन्दनि अपनो वान्यावस्था ही मे लिया है, धन राज्याधिकारी नहीं हुए थे। लिपि कान लगा माड में मिलता है और कहीं नही है । यद सयरा है। No 16-रामगुणोदय Verse. Substance country made paper Leaves--76 Size-92xGy inclice. Lines-~30 on a page, Extent -about 3 975 stokas Appearance-old Complete Correet Character-Devanigarh Place of deposit-Library of the Malıdrája of Bandrag namagino layn-An account of the horse sacrifice performed by Rama Chandra The poet, Dhani Rima wrote this book in Samvat 1867 (1810 AD) at the request of Babu Devakinandana of Banáras whose old palatial building, may still be seen in Baniras in dlohalla Rámápuri. Dr Grierson says that this poet was born in 1831 which date appears to be incorrect. If the year 1831 may be talen to be of the Vikrama Sauvat it may be the correct date of the poet a birth Beginning-श्री गणेशायनमः । कवित्त । नाहि मुमिरत सहने हो सिद्धि पाया माइया पागम निगम मति सार है । शकर परम प्रिय परम विमान पर बदस गयद गति अगम अपार हे । कहे धनीराम जन मन प्रतिपान कर सम्ल अमगल विनायक बिहार ईमरी गजानन चरन चितु गाँव है। कहा थर भापि राम धरिरा प्रचार है॥१॥ Erd -चारठा | सीय सहित हि भाति अश्वमेव य राम किय । दियो प्रसारि विति तानि लोक कीरति विमल ॥ १३ ॥ रद सात मेरमन पूछियो मप की कथा । मापियो मरि सेप तोहि भई जया । सेप भापित को सुने सुप पाइयो । ध य धय अनेका वा मुनि गायो ॥ १४ ॥ दोहा । शाग कया माण करया प्रति टिठई मन परि । क्षमा करायन हेतु मन कायन निरत भरि १५ इति श्री राम गुदये यज्ञ समापन नामेष्टितम सर्ग ॥ ६१ ॥ पुस्तकोम समामिमगमा धनीराम कविना सहस्तेन लिपिता । चरी द ब्धि शन सिद्धि मम्मित चद् सपत रानही । शुक्र श्री शियि रुद्र शुक्र सुपच्छ स्यामल साप हो । ग्यतो उडु मे प्रसन्न महा ट्विजाग से। ठाइयो। चार शादिन यथ पुरनता पिसमि मो पाइयो। मयत १८६० जेष्ठ पदी ११ शुक्रवार रेवती न३ । छछछछछछ। Styeet-योगमारयमेध का वर्णन : Vote –कता कपि धनीराम हे । ये वावू देयकीनन्दनसिह के पाथित थे । निमारा कान स. १८६० जेष्ठ कृष्ण १९ शुक्रवार है । यह पुस्तक यसका को हस्तलिपि मानम पड़ती है। 1011-भषमपण Ters Substance-country made paper Legree Szo-7** inchez Lincs-G on a page Estent-300 blobs. Ap prarance new Complete Cortech Character - Deranagart. Place of deport-Library of the Mahardjs of Banaras NOTICES OF FINDI NANUSCRIPTS 79 Blúpa Bhutsa in Moral lessons for kings by the poet Jakeharı of Patrals. He wrote this book in Samyat 1890 (1823 AD) Begenming -ौं श्री गणेशायनम । अय भूपभूपण लिप्यते । भुजग छद ॥ सदा सचिदा नद रूप अपार । मुधासो बुधेसी घमासो अथार । अने आदि अने अधो ध गामी । कषी केदरी जे पहा नमामो। १ Lad -पृथोपाल के देत ये रथ कोनो । भयो मा सम विसमा माल चीनी । नम निद्ध सिद्धी धरा को धरोजे । सुदो हाड को तीन को जान लीजे ॥ १६ ॥ इति श्री जेक्रेटर विचित भूपभूषयो नीति यथे नयम रतन समापत । शुभमस्तु सर्वज्ञगताम । Subject --राजनीति Note-पथकर्ता केरि काम है। ये पटियाले के गला पृथ्वीपालसिद्ध के आश्चित जान पड़ते है । इस पथ के निर्माण का सवत् १८६० पापाढ शुक्ल ३ हे । No 118-विनोदचन्द्रिया Versc Substance country made paper Leaves-9 Size-81x4 inches. Lines-15 on a page Extent--300 slokas Appearance-old. Complete Generally correct. Character -Deranagari Place of deposit -Library of the Maharaja of Banáras. Piroda Chandriká - The detailed description of heroes and heroines by Karaudre udaya Natha (1720) san af Kal Disa Trivedi The tull name of this bool 18 Rat-vinoda rasa chandrika The manuscript is dated Samrat 1860 (1803 AD) Begurung ---श्री गणेशायनम । विनोद चन्द्रिका लिप्यते । तपोब तत्व के सतोगुन के सत्य के ममत्व महादेव पारवतो पर किति को । बुद्धि को विधान के प्रधान गीरवानन की बोन केधे बिंधन पिनासीनो विमति को ॥ पदन यलित पुडा दड मेो मिसिता केधा कामना प्रयाग को प्रयाग उप अति को । बदरा कविंद्र इदु कल्प भी विमल महा सिद्धिन के सदन रदन गनपत्ति को ५५ ॥ योना पुस्तक धारिनो इस चारिनो नाम । पानी पाक सर स्वती देव बुद्धि अभिराम ॥ २ ॥ ताते उपजे यथ यह चले चई दिसि चार ॥ रति विनोद रस चदिका मुनि रोझे समारु ॥ ३ ॥ End ---आगत पतिका पदाहा । पिय प्राये परदेस ते हपित होद जो बाल । श्रा गत पत्तिका करत हे ताको मुमति रसाल ॥ १०१ ० पायो विदेस ते नाह नवेली को पान, कोउ परी सुघरी है। लाज लिये गुर लोगान को गृह कान को श्राजुनरी नसरी हे । ज्याल बुझी शिनल की लिय सोल एकल है अ भरी है । वेलि दयागिनि की फरसो निमि दोगरे के परे होत हरी है। १०२ ॥ अयच्च ५ पाएँ परदेस ते मलाने स्याम सुनो बाम प्रागि मिल गई लपे येसे नऐ हाल की । विचरन रग भयो गरे सुर भग भयो पुलकित अग भयो मूलों गति काल को । भनत कविद पेट् स्वेद जल मेाचे दग कपत अधर मले दसा सात जान की । चीर सौ मरोर वाया घूघट से मुघ देयो उपरि उघरि आत लगान गोपान्न को । १०३ ॥ इति श्री रसिक रायमनो विनादार्थ कपिद्र उदयनाथ यनिताया विनोद चन्द्रिकायाँ कुलवधू परवधू वर्नन नाम तृतीय प्रकास ॥ ३ ॥ समागम भूयात । श्री १८६० मिती कार्तिक शुद्ध २ चन्द्रयासरे लिखित ईश्वरीप्रसाद गौड को । Snkyect-नायिका भेद । Note --यन्यकता कोबर उदयनाथ हे जो १८८० के लगभग हुए । इस पुस्तक का निपिकाल सपत् १८६० हे।
10 NOTICFS OF INDI WANUSCRIPTS No 118 -पञ्चाङ्ग दर्शन Prose Substance-Kashmir made paper Leares —87 Size - 114x6 inches Lines-15 on a page Extent-9758olas Appearance-nex Complete Correct Character-Derandgari. Place of deposit--Library of this Vahérája of Banárns Panchong Daršana. --The mode of preparing Handa almanac by Yadunsthaukta who wrote it in Ssmat 1857 (1800 AD) The manuscript is dated Samest, 1887 (1830 A.D) Beginning-श्री गणयनमः। नम' सरस्यत्य अय पचाग दर्शन पयो लिप्यते। दोहा । सिद्धि समयस कर्मे को होय विदित जग माह ! साले सादि विचारिमा शस्त्र युद्धि के छोह । १० नाम रूप हे कप मनु युग सवत्मर मास । परमार तिथि नपा युति करा लग्न सो राम ॥२॥ क पाटिक नित एक से तिन को नित न विचार । धारादिक नित भ्रमत हे तासे सामु प्रचार ।। End --गुरु शुक्र मूर्य तीसरे चोये शनि मगल रठे रह योग लिया गया है । गजा सन को युद्ध में फलदाय। स्वाती भरपी श्लेपा धनिष्टा हस्त अनुराधा जीना टनर रोहिणी मूल शतभिया স্মা মিণি। तीने पूर्ण परियनी पुष्य मया मागि पए कृतिका चित्रा धनिष्ठा थनि रचि चन्द्र गुरु शुक्र বিশ্ব মা বর্মাযাহ द्वादशी अष्टमी पटी द्वितीया द्वादशी पटमो चोय चतुर्दशी अकुल गगर कुलाकुल फुल गण्य संगवस युद्ध की इच्छा करे गए इस गण में युद्ध तो बिनय होय करे तो सधि होय गण में युद्ध करें तो स्थिर रहे गिरि थर यमु शशि घर भइ मधु यदि ध वार । दर्शन यह पचाग का लियो नयो अप नार यान वचन भाग रचन पान नहीं अपमान। कोने लीजे धरि रिये सपन सरस मुभान । २ । इति श्री शुरु मयुरानाय मृत गुरु यदुनाथ विरचित पधाम दर्शन समातम शुभ भूयात् । सात १० वाण शुक्र पूर्ण पञ्चदशी दिन बुधयार सरे सपूर्णम् । लिखित महाराय परिग्स फारमोरो रामनगर विधे । शुभ । Sulyect -योतिप। Note ---मयकता यदुनाथ गुरु है । इहोने सय १५ मे इस यच को बनाया । पसमा निपिमान १८०है। ६4 Ma 120-स्वरोदय Torre Substance-bountry made paper Leares - Sizg-10x G} inches Lips-17 ou a pa_c Extent--sbout 850 blokas Aprearancsold Incomplete Incorrect Character-Devanigari. Pisce of deport-Library of the Vabárfja of Banáras NOTICES OF DIVDI 11USCRIPTS 91 पाम अकुम Starodaya -The decision about the videt auspicious moment for engaging, in a battle by the brcaths taken at that time It is a common behef among Hindus that u lien they want to do & work they examine their brcaths 1 €, they age whether the breath comes strongly from the right or the left nostri Th moment when the breath comes with a greater force from tho right nostruire considered to be most auspicious. The name of the author is not gren In the opening Stanza tle name Datta occurs wluch may be the nom de plume of the poet Payanang ---श्रीगणेशायनम । करित वटै मुर. मुनि ग अवतु नाग नर कामद कृ पानिधि सकल सिद्धि को हे पर ॥ अमर मरित को सरोज मूड अय माहे चाया भुज धरै अभेवर । सोदुर न मुड गज तुड व एक टत लबोदर भने दत सकल कलपू हर ॥ गनपति प्यारों ना दुलारो गिरिला जू को से सुमिरत देत मुप सपतिनि को निकर ॥ १ ॥ धीधन हरन तुम हो सदा गनपत्ति होहु सहाइ । विनती कर जार करो दोजे यन्य बनाई । योना पुस्तक धारिनो हस चारिनो नाम । वानो याक सरस्वती देह बुधि अभिराम ३ श्रीगणेशायनम ॥ दो० ॥ यानि जू को सुमिर के देखि सुरोदय पथ । धर्मवत राजानि के अर्य कोनित ग्रन्थ ॥ १ ॥ मल्ल यूद्ध भट यू पनि नूप युद्ध के कान । वादी प्रतिधाटो घि धरनत सभ कविराण ॥ २॥ दुटु दिस गनक विचार के कहत विजे के हेतू । पै निदान यह मानिनो धर्मयत कर खेत ॥ ३ ॥ Find - सनि ओ राहु रवि भाम हे कासिन छच परि लाइ । जाने आसन विष अव वित्र छयादिक पाई ॥ २० । जोन आसन विषे में या वृहपति आइ । आनद सटा मोहार के करे मा रान बनाद ॥ २० ॥ इति श्री सिंघासन विधि प्रकाश समाम् ॥ ० ॥ (इसके आगे एक और चा बना हे उसके आगे चार पाच सादे पन्ने छूटे है । इसी से यह अन्य पुरा नहीं नान पहता)॥ Sutject -राजाओं के लडाई पर चलने के लिये स्वरों का विचार । Note --कर्ता के नाम का पता नहीं है। कदाचित दत हो । कोई समय भी नहीं दिया है। No 121 Draft TARTU Verse Substance---Kaslımır made paper Lenves--9.5 Size-14x12 inches. Lines-24 0npige Extent-lont 37 000 glokas. Apearance - new Complete Generally current Character. -Devanagari Place of deposit-Library of the Mahirsa of Bankray Sn Valmtl. Rumayanıt - Translation of Vilroíkıs Rimuyana by Santri Sinha of Pula lle tooh tu juars to haish the translation which will com pleted in Sun nt 1890 (1833 AD) Byinning-ठों श्रीगणेशायनम । अथ रामचद्राय नम श्री मति वान्नमोक रामायन लिप्यते । वालझाड परारभते । द्वाहा ॥ बानो याक मुघरन मै घिसद वरन समचदै । योन दड मडत करा यदा पद कर बद ॥१॥ दोहा ॥ सवल ना प मिरविसरु फल प्राण्ड अनेक ॥ ध्यापम नड जगम ब्रह्मान महा महो सिर टेक ॥ २५ कपितु । श्री गुरु नानक अनूप ब्रह्मकम भये अगद अमर भये रामदास दो सहर । सति गुरू परतन श्री हरि गुविद चट घरोगय देश हे अनद को पिलद वर कसटि निकद हरि कृष्ण मुराद जन तेग भुवादर थिमाद विग्यान र यो मुविदमिय लो अरिदम पटारविद वदे मिटु दुट हा पर हाय यदकर 82 XOTICES OF NID JANUSCRITTI Int-दोहरा । नदन देवामित्र को कवि सलोमिय शानिए परनन कागुन गम के चहि चित मरं कल्यान मुघल मला फुरो मष्टि के थल पुरि अभिराम । राम कथा जानन करी रामायन शिदि नाम । १९ थे। समा विक्रमनीरा अष्टदम महम भाजपम S T रिगुण करिय भयो पुरन लपि लिनय , पुन कानया घट्यो मथि टोनि माना छ कति पसरा पति मुभाग मेष सुभ मास प्रधान मधि भर गय की समाप्ति रामाइन मुदा सरमा कपि हाय जोरि पिनाती फाति धारा चिरा रघुर्ण दाम ॥ १६ दोहा कि दकि दिन महि सरग कि कट्यो मुदनि सहि । याते मन्या मिताब पर विरो वरप दुइ नाहि ॥ १४ ॥ जे सति मान? चान दे पठाद भूनविरित भाइ दिमा के रहि लपि दोष को कवि बुधि अल्प यनाद ॥ १५५ कविन : मुशता रद की धारी बाप नद को कि चादनी मुद को मुकद प्रोत बद की। पासी सराधिद को निपातो पाय बुद्र को मनिद मसि बिटु को पिलदरा गुविंद की ॥ मारदा मुनिद को पदारता अनद को मुहा रदा गिरिद मणिभाल ध्यो फनिंद को। पुश अमरिन्द को दिनिन्द को धरिन्द की पल्टिनि इन्द की मुकथा रामचन्द्र को ॥ १६ ॥ Sulyect ~यालमोकि रामायण का इन्दोर अनुवाद ! Note --यन्यकता कवि मन्तापसिद्ध हे जिन्होंने १६ र १ की सधि में अन्य को पूरा किया। - . । - . . 86 जंग No 120 रसमय यन्य Verse Substance--country mnde raper Leares -75 Size-98x44 Inches Lines-1 on s page. Extent-1,100 Blokes Appearance ordinary Complete Correct. CharacterDes and garl. Place of deposit--Library of the Maharaja of Banaras Rasamaya Granthe --The detailed description of berdes and berdines by the poet Bent of Asant. He wrote thha book in Samrat 1817 (1760 A.D) The manuscript 18 Jated Samrat 1818 (1761 AD). Degurung प्रोगणेशायनम : प्रथम गोहि योगये सम मुमत । सात के बड़े मुक्त मे गात ॥ १॥ लस्यो कुम मदर घस्यो पिलात नीली का। मक रदन रवि शशि भने गयो ग बाजार ॥ २६ पथ नृप यस वर्नन : गोलम रिमि के वम में कीट सप में रुद्र । धम्म थुना मुभ करम के कति में भये समुद्र ॥ ३ ॥ कोटू के कुल में भये मनाजन मनर गलयकस रय प्रकार लिन गझे अरि कुल गन । ४. मन. रमन के चारि मृत जेसे चारो बेट । निनले मही प्रगट भये राज कान के भेद ।। Lul-दोहा । कीन्हो रसमय यच यह समुझि कपिन को गति । ने कपि को विद सिक ममते करिहे इन प्रोति । ४३५ । लसत व उपममयर यानपेड करि मन मुकृती साधु फुलोन पर नवास में सरवज ॥ ४३ 0 दोहा । वेनो कषि की वासु अमनो घर भुभयान । यसत सबै पटकुन पहा का घेद को गान : ४३० : निहचमिध मुजान घर को अनुमामन पाई । कोना रसमय य य यह यानि नाइका माइ ४३ टादश शत वर्षयतर मधद गरी नानि । पागुन दसमी मित मुभा चन्द्रधार अनुमानि ! ४ : विनतो तीज कश्नि में भूत परी जो हो । सोधि मुशागे वरन धरि परि नोके बाइ ॥ ४४०५ चरन पराम मादध के गनर्यात क सिम नाइ । पन्यु यो गार शुभ दोहोकपिन बसाइ । ४४१ इति भो समयपथ सपूर्ण शुभास्तु । रितु वमत घेहाय मुदि छठि तिथि मुमग रमान । श मा धरि लिया लिपि दलाल शुभमस्तु । Slycat-नाधिमा भेद। वरगति XOTICES OR HIDI MANUSCRIPTS 83 Note -पथकती वेनी कवि असनो निवासो है।इहोने राजा निहवनसिह को आचा से सवत १८१० में यह अन्य रचा ! इसका लिपिकाल सवत १८१८ है। No 123-पिगल Prose anul Verse Substance-country made paper Leares-49 Size-11x7 inches Lines-15 on a page Extent-1,200 blokas. Appearance-old. Incomplete Correct. Character-Devanagari Place of deposit-Library of the MInh{rája of Banáras Pengala.--A book on Hindi Prosody by the poet Sukhadeva (1700 AD) Begurring-श्रीगणेशायनमः । गणपति गरि गिरोश के पाह नाद निन सोस । मित्र मु काय महाराज को देत बनाइ असीस ॥१॥ रस्त खभ पर मनहु कना जनीर घिरानति । विसद सरद धन मध्य मनहु छन दुति छबि छालत ॥ मानहु कुमुद कदय मिलित चमक प्रसून तति । मनहु मध्य धनसार लसति कुकुम लकीर अति । हिमगिरि पर मानहु रवि किरण इमि धनधोर अरग मह । मुपदेव सदाशिव मुदित मन हिमतसिंघ नरेस कह ॥ २॥ End. --रूप धनावरी ॥ अथ गदास्योदाहरण । जसर अरि जेर करि मेर समसेर बहा । टुर धेरियरवारण विद्यारणसिंह ॥ समत्य हत्थ ॥ अथत्थरल ॥ हत्थ समान महावीर ॥ समर घोर ॥ धरणि घुरघर । धराधोश । धवल थाम । धवल मुनम पुज विजित मुर धुनी धार धलिम श्री महाराजाधिराप हिमतिसिह चिरजीव ॥ इति गद्य । अधेकातरात्पादादारभ्य -- पदिशति धर्णय (इसके प्रागे १ । पृष्ट सादा छूटा है। इति आदि फुछ नहीं है । ४४ पत्र तक पुस्तक लिखो। पश्चात् पत्रों पर पिगल के विषय के कई यत्र से बने हैं) Subject -काय धनाने की रीति। Note---कर्ता मुखटेषसिंह मिश्य हे जो अमेठी के राजा हिम्मतसिह के आश्रित थे। No 12-मरदान सानिय Verse Substance country male paper Lerves-89 Size-104 x 6 inches. Lines-15 on a page Extent-1000 Slohns. Appearance - Dew Complete Generally correct. Character — Devanagari Place of deposit-Library of the Mahárája of Bruniras Harodána Pastranaia-The detailed description of heroes and heroines by Sukhsdeva (1700 A.D) The manuscript as dated Samvat 1859 (1802 A.D) Bryaneng-श्रीवक्रतुण्डो नर्यात व कानन टूटें विधन के जानन के यह नान में कत्र आनन की पाति मिटि गन पानन के धान । १५ वेस यस अवतस मनि गुण गण को दरिया । कनकसिघ साहिर भयो नग मे रेमा रा3 । २॥ दिल्लोपति के कान जिन कोटिक करी फतूह । नगमगात जग पर जो जाके मस को जूह ॥ ३ ॥ माहिर हिमति हद भयो मन हिटुन को मेंड । समृति जानि जग में करी प्रगट पूय की पेंड ॥ ४ ॥ पृथ्वीपाल को भयो ताक्रे पृथ्वीराज माप देन को भान भी वही गरीबनेशात्रु॥ Ful-ऐसे नगर रसनि के भेद कहे हम मानि । रसयानि की रीति लपि मने सानो हे मानि । २० । यह मादान रमारनो पुरो कोनो ययु । याके जाने मानियत रस पनि को पयु. ४१८॥ इति प्रो मरदान रसारना मुण्टेश्यीय विरचितम् भपूर्णम् ॥ सम्या +BE गाल आगाठ मासे कृष्णय षष्टम्या फुत यापरे । लेपक पदोरणदास गामेतु धगउस । शुभमस्तु । राम।
. auricroLTINDI INSPIPTY Subject-नायिका भेद । Note-पत्यका मुपदेय कवि है। ये वश्य राशा मरदान के प्रति थे और उन्हीं . को मात्रा में इन्होंने यह ग्रन्य रथा, इसी कारण मरटान रसायरमा नाम रमश गया है। एसका लिपकाल समत् है । 1'ero No 126 -वित्त गमायण Substance country-meric paper JANVeg-80. Stre-91x5/-ighes. Lince-8 on page Fixtent-1,440 slokas. Appcarunce-ordinary Complete Correct Character-Duvanigart Place of deposit--Library of the Darázs of Bandras Kavita Rinkycans -The story of Rams Chandra's life in the Kavitta retre by Goywami Tulasi D.lark. The manuscript is dated Samsat 1856 (1799 A.D) Beymrity -श्रीगणेशायनमः । कधित ॥ अवधेम के द्वार कारें गई मृत गोट के भूपति ले निकसे । अयनोकिदो माघ विमोचन को टांग मो दियो न ठग्यो धिक मे ॥ तुनमी मन रजन रनित प्रजन नेन मपंचन पातिक मे । सजनी मसि मे मनपीन र नश्नोल मरो. रुह से निगमे ।। Ind-दो हनुमान मुजान गम राय से कृपा निवान सकर में सावधान मुनि । हरप विषाद राग रोप गुन दोष मई विचि निरधि सब देपियत दुनिये। माया नीय काल के लो काम को मुभाय के करपा राम वेद कई साचो मन गुनिये । समते कहा रोह हाहा मा बुझये मोहि हो रहो मानही वयो सो बानिये ॥ ३६॥ इति श्रीराम किंकर गोस्वामी तुलसीदास कृत करित सपूर्ण शुभम् ५ सयसु २ १८५६ ॥ ज्येष्ठ यदि ।। मोमे मुकाम कायो मनिकायका सटे । कपितु यह पुस्तक राम मिया क्षित से। तुलसी अमो पारि पिचारि वनाई । सी लिपी दुर्जन गोर गगेव ने अच्छर मारनु कि गो भाई । ताको मुधारि यो सवजन मध्य मे सिर पे न धरी न घुराई । में मघ सतन के पग लागरा माथी मनोहर दास लिखाई ॥ ९ ॥ दोहा । इस न रमारा इदुरपी नदी मिधु के तोर । विश्यनाय कासो धि ल्यायो अधम सरीर । यो श्री श्री श्री श्री श्री सोनोश्री श्री। Sulyect -श्री रामचन्द्र का सजिप्त इतिहास । Vote -अन्यकता गोस्वामी तुनौदास नो है। इस प्रति का लिपिकान स० १८५६ है। No 126 -गोराम नहरू I crac. Sahstance country tale paper Lerres-6 Size-11 x 5 inchies Lines-3 on a page Extent-30siokas Appearance-ordinary Complete tienerally correct. Character -Deta mbyart. Place of deposit-Library of the Blahirija of Banaras. Sri Rama Nalachhu.-A mollection of songs by the past Fulst Desain honor of the nail priting ceremonial of Ríma Chandra Regarereng -योगयोगायनमः । यो जानकी वल्लभो विजयते । पादि मारदा गनः पति गरि मनार अहो । रामलला कर भदछु गाइ मुनाइ हो । जेष्टि गाये मिधि होइ परम निधि पाइ हो । कोटि साम कर पाता रि मा जाइ अहो । १ कोटिन पाजन यानाद दसाय के गृह हो । देव लोक मत्र देयहि मानद अति हिय हो । नगर मारायन लागत पनि न जाते हो। कोमल्या के पूर्व न दृदय समाते हो।। - NOTICES OF HINDI JANUSCRIPTS 85 End -दसरथ राउ सियासन चेठि विगहि हो । तुलसिदारा बलि जाहि देषि रघुराजहि हो । ने ये नहळू गावे गाद मुनापइ हो । रिद्ध सिद्धि कल्यान मुक्ति नर पायइ हो ॥ २० ॥ इति श्री गुसाई तुलसीदास कृत नहळू राम जू के मुडन समय का सपूर्णम् । शुभमस्तु सिद्धिरस्तु । Subject ---श्री रामचन्द्र के नहळू समय के मगल गान ।। Note --यह ग्रन्थ श्री गोस्वामी तुलस दास कृत हे ॥ No 127 ---श्रीपातीमगल Verse Substance - country made paper Leaves-24 Sizo-11x5 inches Lines-5 on a page Extent--195 blohas Appearanco -new Complete Correct. Character-Devanigari Place of deposit-Library of the Mahírája of Binarad Sri Párvah Mangala -An account of the marriage of Mahadeva and Parvati by Goswimi Tulasi Disa, who says that he composed this book in the Jaya Samvat There are 60 names of these Vikrama Samvats, Jaya being the 28th Consequently in the 19th century of the Vikrama era, Jaya Sam at fell twice, ie, in 1639 and 1699 It may, therefore, be concluded that Tulasi Disa wrote this book in Samvat 1639 (1582 A.D) Beginnerg --योगणेशायनमः । श्री हेरबम्पाप रामायनमः ॥ विनय गुरुहि गुनि गनहि गिरिहि गननादि । हृदय प्रानि सियराम धरै धनु भारि । गाव गोरि गिरोस विवाद सुहावन ॥ पाप नसारन पावन मुनि मन भावन । करित रोति नरि ज्ञानउ कवि न कहावत ॥ सकर चरित मुसरित मनहि अन्हयारउ ॥ अपवाद विवाद घिपित बानिहिं ५ पानि करो मुगाइ महेस भनानिहि ॥ नय सवत फागुन मुदि पाचे गुरु दिनु । आश्विन विरचेड मगल मुनि मुछिनु दिनु । End -छद ॥ मृगनि विधु पदनो रच्यो मनि मजु मगल हारी । उस घरटु जुपती चन विलोकिति लोक सभा सारसो कल्यान कान उशाह ध्याह सनेह सहित जो गाई है। तुलसो उमा सकर प्रसाद प्रमोद मन जिय पाइ है ॥ १६ ॥ इति श्रीमद्गोरघामि श्री तुलसी. दास कृत सिसिवा विवाह मंगल समानम् । शुभमस्तु । Sulyect -श्री महादेव पार्वती का विवाह Note ---यह ग्रन्थ प्रसिद्ध श्री गोस्वामी तुलसीदास कृत है। निर्माणकाल इसमें भी नहीं मिलता । प्रारम्भ के एक छद से इतना मिलता है कि "नय नाम ग्यत्सर फागुन मुदी ५ गुमधार" इसमे इस ग्रन्थ का बनना सरत् १६३० में माना जा सकता है। ॥ .
APPENDIXI.
APPENDISI LIXT OF TIE BOOKS THE FULL VOTICES OF FIICH ARE VOT GIVEY N.B -The dates w this brackets indicate the lims of the author Incomplete books are market todaster sks No Ages Name of autior Name of book De of mp men sp Temarks 1806 Akad of les con 128 Bal Raps 120 Perahu I ima 130 Bhadra 131 Buskeaf Dafta Jhulane Matra Mala Maha Sukha Dugle ya Muhurta Hibása Campu Samudrika Bhssa Satsast 132 Bhupa 133 Bilat Lala 131 135 Charada Dasa 196 Chema Rama Uyan SA odaya *iate Prakash Astrology 1669 | Reg dent of bal ajad por (1650) 178 See Mos. 115 of 1900 27 of 1901 and 8 1813 of 190 (1760) 1815 Sec Mo 70 of 1901 The book deale *th 1 d rhetoric. Dr Gr ereon ment ons one poct of thus name who wroto on Nayaka Bheda and who fou used 1800 AD) (1650) See Mo 127 of 1900 (1690) 1757 See \o. 53 of 1900 anl 121 of 100 (1859) IIe I ved at CIAD pur 1800 1814 180C See Moof 1900 1 64 See No 135 of 1900 (1660) 1801 See No 47 of 1802 1761 3 6 1800 See Mo 21 of 1901 1806 1890 Im nor poet 1819 1010 1761 Sec Vo 04 of 1000 And 09 24 25 and 53 of 1901 1783 A collect on 1775 See No 58 of 1001 1805 137 Chintamani * Kavikula halpataru 138 Deva AJ ma 13 140 Dllpa Ramayana bila 141 Ganean *R tu Vardana Gokula Natha Nama Rua Mala 143 ITadbaraja &apcha siкага 141J Asawan ngba Bhasa Bl usana 115 Juma Dut Thanatpats 140 * 147 149 brima Din Doa Isla 149 Lalajf Varu hokn bara 100 Malta Muhammads 1 admara i Jayasi 151 Mani Rama Bura Sangrah 152 Manohark Disa Bata Iran Sa ka ranjan. 153 Nand. DASA Anekartha Nania Mala 151 1.Sayada Sukha Vaidya Mano saps 156 Baadrs Kosada 8484 Ratnakars. 19 Padikara Jagaja Tinoda 139 100 I'AT. A Rams Natha & kha 161 I alakara 1G fabajo Bar Sahaja Irakiss 103 bar lapus a hoka Fura 164 Su Ada A 1 sta La Pratisa 16 Guadan Dua Suodara agar 100 m. Bak hema Dhyana Sundari 107 Tulsi Dia Rama Chan . Vapua 109 ing Jl.amina Babuka Uasi Dafia Rarab. 1448 17 iswanalle sogbo als busardana fa te (1567) 1802 Seo mo 68 of 1907 1399 1717 1799 مهم در متر See No 34 of 1900 Tonina 1815 + 1831 1) Ece do 6 of 1907 See Mo 173 of 1907 ora-ta See Mo 129 of 1900 1791 17-43 1 60 1849 1631 1773 See no 3 of 1902 15 4 1767 179 1 1 96-97 Sce No. 1 of 1900 And now on and 29 of 1901 Ece No. Co of 1901 16 3 1830 1833 Ser No. 11 of 1960 Tbe date 1844 8 TA in this note is of the to end not of the coro por ton of the book Bbajas
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95 to 96
. 127 Yupasana bayani Astra chan lrika INDEX II NANES OF VALESCRITS NOTICED IN B-The figures inilicate the item ber of the notice ) Aguns anguna nirůpana katha 77 Kalkı charitra 29 Alama-Leli 33 Kamuruddin bulasa 65 Alankara mali . 104 Kanska madjarf 7 Amara prokida 74 Kavya kaladhara 14 Amare3a-vul3 1 Kirya nirnaya 61 Ananda-anabbata 87 Kedara pantha praksa 103 Anagdambundle 17 Kbstarala-bafsf 70 Anokartba nama mili 153, 151 Koka sira . 149, 163 Anubbaya para pradarsol-tiki 22 Koprla patta 25 Astajima 138, 139 Konsalendr rahsays 68 Astávakra 4 Kripakanda nivandhs 66 Babu-sarrioga 13 LÄla muktada vilasa 64 Bija påmin 69 Lalita lalams 67 Balamukunda INA 12 | Laligya lata 55 Balamiki ramayana 121 Llis rast tartogiai 181 Dalamski tämayana slokartha prakies 24 Mantra bhanda rasa rataalam 167 Barakia 331 171 Maravans rasaraya 124 Barawi ramayana 80 Mohan paſhs prakats 78 Blignat 184 ) Nahha ella 20, 60, 90, 130, 160, 161 Bhagawat malamya 18 Nama ma).. 129 Bhajans 173 Nans ratna måla 142 Bbarata vilasa 38 Nayaka bheda barama chbanda 76 Bhasi bhuan4 141 Padros yati 150 BbXA-}yotiga lagana prahasa 174 Pabell 182 Dbasi tatayap 99 Panchanga darsans. 119 Rbăga pamudriks 175 I'xrasați mangala Bharartha chandnka 47 Fingala 36, 123 Bbara világa 41 Prana sulla 8 Bhipa bhusana 117 Prema ţarsaga chandnka 28 Chanapi samudra bhulst 133 Radha krisna slåss 15 Chandi cbarifra 5 Radha rakba sıkla 27 Cubanda prakása 32 Raga vireks 48 Chhendarnava 31 Rams bhakti prakasika 20 Chbandawali ramayana 82 Rama chandra chandraka 21 Dala singhädanda prakasa-512231 ya 110 Rams charita manasa 187, 188, 169 Dana 1 148 Rama charitamanasa muktavali 10 Din prakása 49 Rama-dhyana sundarf 166 Du gladlya-sukurta bhász 131 Ráma gngodaya 116 L'esta nima 176 Ramagyi saganauti 87 rateha prakasa 136 Rama illa prakaca Gita raghunandana satiks 172 Rama mukjawall. 97 Gorakhe sara 85 Rama nabachbu 126 Gyata bachana churpika 84 Ramarnava i45, 146, 147 yana pradipa 16 Rana jaÁki 98 Gyana aamudra 34 Ramayana 9, 115 Osaga swarodaya 137 | Ramayana Mahapataks 95 Flaminira bathin 100 Ramayana tiks 140 Hanumang bihuka Ramaswamedha 19 Hangmana bala chantra 31 Rasa bhusana grantha 93 Har bhakti yulást 101 Rasa dipa, kárys 42 Ilari bhakti vilass purbărilha 72 Rasa malika grants Ilari bhakti vilasa uttarardha 73 Rasamara grantha 123 Hitopadesa 95 R1-2 mala 113 Falika 177 Rasa rahasya 51 60 Raga ára 45 178 Ranka mobana kirga 66 Jagta molana 112 89 Jegata yinoda 158, 159 Racika plasa 59 40 Raske vinoda graphs 103 79 Ratsoa hajara 94 cbikitsi 179 Riju varnans Jhulate 128 142 Rukmani mangala Kabi kula kalra taru 11 137 Kabı kula kan ha bharana Sahaja prståss 162 43 Sahitya-hirosani 105 Kah mula mendans 55 Sahitya sudbitars 92 Kahittas of Beni 86 Sajjans Filasa 39 Kabutja of Sabfra ninyanz and others 114 Sakuntalopåkhyips 76 Kalustfa tama yang 125 Caneba-sigar 143 Kabuti atgrahn 130Cankarati 283 164 170 Rasika Рауа INDEX I NAXES OT AUTHORS (B-The figures indicate the number of the nolue] 1 Abdura Rahamans Agra Dasa Kiama Al Suh ba hbat Anda Ananda Glada BAI Rana Reni Resab lama Bhadra Blawan! Datta Bh khari Daga Bhiama Bhoja Raja Bhups Bhuana Bharllala B kramada Brahma Dafta Brija Lala Chandra Scoara Charada Deen Chhema Roma Chat Dais Da ta Dera Dbaof Rama D 86 1 lips Dulaba Dw ja Cajaraja Rama Gauga Rama Ti path Ganesa Cadjana Gokula Natha Countf DAGA Gorakha Nå ha Covinda & arba Gulaba &oghn Guru Datta Sugis HIsnt Sabaya Tlapsaraya Jai Kehari JAnaki 'rasada Jasawanta nghe Jbima Dasa 50 Kears Dass 16 89 60 hesays Vista 40 33 / humann 74 Ohrsa D sa 149 3 kulapat yra 51 er 113 114 1% | Lalaj Mura 149 69 86 19 Lala Mukunda 129 Vol ka Yubammads 100 130 Vani lima 151 131 Blan Farangha 47 31 31 46 61 Mfano bara Dasa ranjani 83 84 19 19 Var i ma 67 59 Vobans 4 1 Nanda Di a 153 154 Varbari Bhata 11 133 131 | Nayona Cutla 155 156 7 73 hala 105 106 107 Vsakantha 63 91 N ya Na la 157 100 101 109 103 ja 75 ja) Ps imikara 158 159 136 I arasn lama 160 38 137 Praon (Chanda 95 45 109 110 Prána Natha 29 39 50 19) Pra ap 52 41 108 139 139 Praya . Disa 96 116 Tabakari 161 39 Purasot Araa 140 Raghuvi ba 14 66 112 43 Ragbur jangba 17 18 97 Rama Charada Dasa 44 68 71 Rama Na la Upadhyaya 93 6 Ruadhi 94 16 Rudraprstapa & agha 25 111 Sahajo Bal 169 65 Santosa 6 ogha 15 13 8 149 Saradara 99 164 9 Barada putra 163 85 Yanalda 77 5 Sakhadeva 123 124 78 Sunda a Dasa 34 67 88 111 363 42 Sura a neba 104 19 Sama Sakbi 166 Tbakora 24 117 Tulasi Dasa 13 30 79 80 81 8" 87 57 93 125 20 196 197 167 168 10 10 141 Udaya Maba 119 145 146 147 | Uma Da 171 10 Viswanatha Sogba 27 53 115 1 1 3 99 Yado Matha Gula 118 7 Ganga 143 ܦܬܕܕ Kapura Chands has Rama (00) 18J 140 186 C3 Eunla balaka Bars nograha Flo prašni Satska Sato prasnoltari Sat1951 6 nhuana batis! Biuram gunarpaya ramayana vgraja thena Snegara Sringara Days Kajaan Anda Sandarasugan Sara-ringta, Sundara-yana rilass Sun a tajnakära ni isars Sun pastha plana 64 Burya porica 151 Surnt bara 169 Seomodaya 83 Tasisf-fagara-setu 133 131 ValHa kirpi pratita GUgama kivya graatha 213 Vilda-058ONATA 58 La ragya Mandima 6? Vibgyartba kaumudi 48 Visaya-uára 108 Vinods chandrika 111 Viveka vil.ssa 165 Vitayafska rja-mula-prains 57 rihaspat kānda 107 Yoga-Taasatha 106 16w 106 21 &2 83 118 209 30 8