Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Annutroppatik Dasha Sutram

Shri Atamaram Ji Maharaj · 2010/10

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Front matter

प्रकाशक
लाला खज़ानचीराम जैन,
संयोजक तथा प्रबंधक,
जैनशास्त्रमाला कार्यालय,
सैदमिट्ठा वाज़ार, लाहौर
पुनर्मुद्रणादि सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकायत्ताः
All Rights Reserved.
मुद्रक
लाला खज़ानचीराम जैन,
मैनेजर,मनोहर इलैक्ट्रिक प्रेस,
सैदमिट्ठा वाज़ार,
लाहौर

प्रस्तावना अनादि संसार-चक्र में परिभ्रमण करती हुई आत्मा, अपने पुण्योदय से, सभी इच्छानुकूल पदार्थों की प्राप्ति कर सकती है। सांसारिक सुखों को उपलब्ध कराने वाले पदार्थ भी क्षण-भंगुर होते हैं, अतः शास्त्रकारों ने उन पदार्थों से प्राप्त होने वाले सुखों को भी क्षणभंगुर बताया है । क्योंकि जब पुद्गल द्रव्य ही क्षण-भंगुर हैं, तो उनसे उपलब्ध होने वाले सुख चिरस्थायी कैसे हो सकते हैं ! यही कारण है कि सांसारिक आत्माएँ, सांसारिक सुखों के मिल जाने पर भी, आत्मिक सुखों से वंचित होकर दुखी हो रही हैं। यदि आप संसार के विशाल चित्र-पट पर विवेक-पूर्ण एवं विशाल दृष्टि डालें, तो आपको विदित होजाएगा कि सांसारिक आत्माएँ किस प्रकार दुःखों से उत्पीडित होकर भयंकर आर्तनाद कर रही हैं। मिथ्यात्वोदय से इन आत्माओं में पुनः पुनः मिथ्या-संकल्प उदय होते रहते हैं। वे वास्तविक सुखों के स्थान पर क्षणभंगुर सुखों की खोज में ही समय व्यतीत करती रहती हैं। फिर भी उन्हें शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसी लिए, वर्तमान युग में, जड़वाद की ओर विशेष प्रवृत्ति होने के कारण चारों ओर से अशांति की ध्वनि सुनाई पड़ रही है । धर्म से पराङ्मुख हो जाने से मानसिक तथा शारीरिक दशा भी शोचनीय होती जारही है । बहुत सी आत्माएँ दुःखदायी घटनाओं के घट जाने के कारण अपने अमूल्य जीवन को व्यर्थ ही नष्ट कर रही हैं। संपूर्ण सामग्री के मिल जाने पर भी उनके चित्त को शांति नहीं। जब हम इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं, तो हम आगमों के उपदेशों एवं अनुभवों से इसी परिणाम पर पहुँचते हैं कि आत्मिक शांति के विना वाह्य पदार्थों से कभी भी शांति-लाभ नहीं कर सकते। के कारण इस समय प्रत्येक आत्मा आत्मिक शांति के विना पौगलिक पदार्थों से शांति प्राप्त करने की धुन में लगी हुई है। इसी बड़ी भारी भूल वह दुःख में फंसी हुई है। जब हम 'सिंहावलोकन न्याय' से अपने पूर्वजों के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं, तो हमें पता चलता है कि आज कल के सुख-साधनों के प्रायः न होने पर भी उनका जीवन सुखमय था । क्योंकि उनके हृदयों पर सदाचार की छाप बैठी हुई थी । वे अपने जीवन को सदाचार से विभूषित करते थे, न कि नाना प्रकार के शृंगारों से । वास्तव में वे आत्मिक शांति के ही इच्छुक थे । यही कारण था कि उनका जीवन सुखमय था । वे आज कल की भाँति आत्मिक शांति से रहित बाह्य शांति के अन्वेषक नहीं थे। अव प्रश्न यह उपस्थित होता है कि आत्मिक शांति किस प्रकार उपलब्ध हो सकती है ? इसका उत्तर यही है कि सर्वज्ञोक्त शास्त्रों का स्वाध्याय एवं पवित्र आत्माओं का संसर्ग आत्मिक शांति की प्राप्ति के लिए परम आवश्यक है। स्वाध्याय से आत्म-विकास होने लगता है और जीव, अजीव का भली भाँति निर्णय होजाता है, जिससे कि आत्मा सम्यग्-दर्शन एवं पवित्र चरित्र की आराधना में प्रयत्नशील होने लगती है । इसी आत्मिक शांति की प्राप्ति के लिए राजा, महाराजा, बड़े बड़े धनी, मानी पुरुप भी अपने पौद्गलिक सुखों का परि- त्याग कर आत्मिक शांति की खोज में लग गए । क्योंकि श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने, आत्मिक शांति की उपलब्धि के लिए, मुख्यतया दो ही साधन प्रतिपादन किए हैं-विद्या और चरित्र । पुरुष विद्या-ज्ञान के द्वारा प्रत्येक पदार्थ के स्वरूप को भली प्रकार जान सकता है और चरित्र के द्वारा अपने आत्मा को अलंकृत कर सकता है, जिससे कि वह निर्वाण के अक्षय सुखों का आस्वादन कर सकता है। जनता को उक्त दोनों अमूल्य रत्नों की प्राप्ति हो, इसी आशय से प्रेरित ( ३ ) होकर यह नवाँ अंगशास्त्र हिंदी अनुवाद सहित आपके संमुख उपस्थित किया जा रहा है। द्वादशांग शास्त्रों में अनुत्तरोपपातिक शास्त्र नवाँ अंग है । इस शास्त्र में उन्हीं पवित्र आत्माओं की संक्षिप्त जीवनी का दिग्दर्शन कराया गया है, जिन्होंने सांसारिक सुखों को छोड़कर ज्ञानपूर्वक चारित्र (तप) की आराधना की है। किंतु आयु स्वल्प होने के कारण वे निर्वाण-पद तो न प्राप्त कर सके, किंतु अनुत्तर विमानों में जा उत्पन्न हुए। और विशिष्ट अवधि ज्ञान द्वारा उनका समय आत्मान्वेषण में ही व्यतीत हो रहा है। इसी कारण वे एक जन्म और ग्रहण करके निर्वाण-पद की प्राप्ति अवश्य करेंगे। पाठक गण ! प्रस्तुत शास्त्र के तृतीय वर्ग में वर्णन किए हुए धन्य अनगार के चरित्र को ध्यानपूर्वक पढ़िएगा, जिससे कि आपको यह भली भॉति विदित हो जाएगा कि धन्यकुमार ने, किस प्रकार, श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के वचनामृत का पान कर, सांसारिक सुखों को छोड़कर, केवल निर्वाण-पद को ही अपना ध्येय बना, तप-द्वारा अपने शरीर को अलंकृत किया था। पाठक गण, इस चरित्र के अध्ययन से तीन शिक्षाएँ प्राप्त कर सकते हैं:- १-गुणी आत्माओं का गुणानुवाद करना, जैसे-धन्य अनगार के गुण श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने जनता में प्रकट किए । इस शिक्षा से प्रत्येक आत्मा को गुणी जनों का गुणानुवाद करने की शिक्षा मिलती है। २-महाराजा श्रेणिक ने जब धन्य अनगार के गुण श्री भगवान् के मुखारविंद से सुने, तब वह स्वयं उनके दर्शन कर उनकी स्तुति करने लगा। इस कथन से यह शिक्षा मिलती है कि यथार्थ गुणानुवाद ही होना चाहिए, न कि काल्पनिक । क्योंकि जो यथार्थ गुणानुवाद होता है, वह प्रत्येक आत्मा को गुणों की ओर आकृष्ट करता है । परंतु जो काल्पनिक गुणानुवाद होता है, वह उपहास्य हो जाता है। ३-जिस प्रकार धन्य अनगार ने अपनी प्रतिज्ञा का उत्साहपूर्वक पालन किया, जिससे कि वे अपने ध्येय की प्राप्ति में सफल हो सके, इसी ( ४ ) प्रकार प्रत्येक आत्मा को अपने ध्येय की प्राप्ति में प्रयत्न करना चाहिए । ध्येय की प्राप्ति में चाहे कैसे भी कष्टों का सामना करना पड़ जाए, किंतु अपने प्रण से कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए। इस सूत्र के अध्ययन से भली भाँति उक्त तीन शिक्षाएँ मिल जाती हैं। अतः मुमुक्षु वर्ग को इस शास्त्र का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए । यद्यपि अन्य अंग शास्त्रों की अपेक्षा वर्तमान काल में प्रस्तुत शास्त्र की श्लोक-संख्या स्वल्प है, किंतु इस शास्त्र का प्रत्येक पद शिक्षा से ओत-प्रोत है। अतः जब पाठक वर्ग उपयोगपूर्वक इसका स्वाध्याय करेंगे, तब वे स्वयं ही अनुलोम होने लगेंगे। इस समय बहुत-सी मूर्ख आत्माएँ स्वाध्याय से शून्य एवं सदाचारियों की संगति न होने के कारण आचार से भ्रष्ट हो रही हैं । जब वे इस प्रकार आगमों का स्वाध्याय करेंगी तथा सर्वज्ञ-प्रणीत शास्त्रों में आए हुए चरि- त्रानुवाद से संबंध रखने वाले पवित्र महर्षियों की जीवनियों पर दृष्टिपात करेंगी, तो आशा है कि वे आत्माएँ भी 'ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्षः' के सिद्धांत पर आरूढ़ होकर निर्वाण-पद की अधिकारी बन सकेंगी, जिससे कि सादि अनंत पद एवं अनंत और अक्षय सुख की प्राप्ति हो सकेगी। आत्माराम अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् विषय-सूची प्रथम वर्ग " PM .... ८ .... .... विषय उपक्रमणिका दश अध्ययनों का नामाख्यान प्रथम अध्ययन-जालि कुमार का वर्णन १२ शेष -मयालि कुमार आदि का वर्णन २० द्वितीय वर्ग तेरह अध्ययनों का नामाख्यान २४ , अध्ययन-दीर्घसेन कुमार आदि का संक्षिप्त वर्णन २६ तृतीय वर्ग दश अध्ययनों का नामाख्यान ३२ प्रथम अध्ययन-धन्यकुमार का जन्म ३४ विवाह ३७ ३९ , अनगार की तपस्या ४५ का एकादश अगों का स्वाध्याय ४९ mr m my mm .... दीक्षा ग्रहण

२
विषयसूची।
की जङ्घा"
ग्रीवा "
"
के पैर आदि का वर्णन ५१
५३
कटि
" भुजा
५९
६१
नासिका
६३
के सब अङ्गों का सङ्कलित वर्णन ६७
श्री श्रमण भगवान के द्वारा धन्य अनगार के
गुणों की प्रशंसा
७१
धन्य अनगार का शरीर-त्याग और
सर्वार्थ-सिद्ध विमान में उत्पत्ति
द्वितीय अध्ययन सुनक्षत्र कुमार का वर्णन
शरीर-त्याग, सर्वार्थ-सिद्ध
विमान में उत्पत्ति और शेष आठ अध्ययनों,
ऋषिदास कुमार आदि का संक्षिप्त वर्णन ९०
उपसंहार
८०
८६

सूत्र और सूत्रांशानुक्रमणिका प्रथम वर्ग ३ तेणं कालेणं पएणत्ते तते णं से सुहम्मे कुमारे जइ णं भंते पण्ण ? एवं खलुजंबू पएणत्ते एवं से साणवि पण्णत्ते ::: ... ११ १२-१३ द्वितीय वर्ग जति णं भंते "अज्झयणे जति ण भते "वग्गेसु २४ २६-२७ तृतीय वर्ग तते णं सा भद्दा .. ३२ ३४-३५ ३७-३८ ३६ ४२-४३ ४५-४६ ४६ ५१ ५३ जति णं भते आहिते जति णं भंते . होत्था विहरति तेणं कालेण वंभयारी तते णं से धन्ने विहरति तते णं से धरणे " विहरति समणं भगव चिट्ठति धन्नस्स णं सोणियत्ताते धन्नस्स जंघाणं सोणियत्ताते धन्नस्स कडि-पत्तस्स एवामेव० धन्नस्स वाहाणं एवामेव० धन्नस्स गीवाए एवामेव० धन्नस्स नासाए भन्नति धन्ने णं अणगारे · चिट्ठति तेण कालेणं'पडिगए तए ण तस्स"पन्नत्ते जति णं भते जहा खदतो तेणं कालेण सिज्मणा एव खलु जवू...पएणत्ते ३ . ५६ ६१ ६३-६४ ६७ ७१-७३ ८०-८१ ८६ ६०-६१ ६४-६५ ... .. ... .

धन्यवाद पाठकों के सम्मुख अब मुझे इस जैनशास्त्रमाला का द्वितीय अंक उपस्थित करते हुए बड़ा ही हर्ष होता है । इसके पूर्व 'दशाश्रुतस्कन्धसूत्र' आपकी सेवा में उपस्थित किया जा चुका है । उसमें हमें कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई है, उसका अनुभव हमारे पाठक हम से अधिक कर सकते हैं। श्री वीरप्रभु की परम कृपा से हमारा कार्य आगे भी उसी साहस और उत्साह के साथ चल रहा है । श्री श्री श्री १००८ श्री उपाध्याय आत्माराम जी महाराज ने जिस उदारता और धर्मस्नेह से इस महान् कार्य को अपने हाथों में लिया था, उसी उदारता और धर्मस्नेह से उसे निभा रहे हैं । फलस्वरूप अब 'अनुत्तरोववाई दशासूत्र' आपकी सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है । इसमें भी जैसा कि हमारा पूर्व से ही निश्चय था, हमने दशाश्रुतस्कन्धसूत्र के समान प्राकृतमूल, नीचे संस्कृतच्छाया, प्रत्येक शब्द का अर्थ, मूलार्थ और अन्त में विस्तृतार्थ दिया है । छपाई और शुद्धता की ओर विशेष ध्यान दिया गया है। जहां तक मुझ से बन सका है, मैंने इसे सर्वाङ्गपूर्ण बनाने का यत्न किया है । अपनी ओर से कोई त्रुटि नहीं रक्खी । मैं अपने सहायकों का इतना कृतज्ञ हूँ कि मैं उन्हें धन्यवाद दिये विना नहीं रह सकता। सव से पहले मैं गुरुदेव श्री श्री श्री १००८ श्री जैनधर्मदिवाकर साहित्यरत्न जैनागमरत्नाकर उपाध्याय मुनि श्री आत्माराम जी महाराज का 7 ( २ ) धन्यवाद करता हूँ, जो महान् पवित्र शास्त्रोद्धार में हमें निरन्तर सहायता दे रहे हैं । ३२ शास्त्रों के अनुवाद का बड़ा भारी बोझ उठाना यह उन्हीं की वज्रमयी लेखिनी का काम है। उन्होंने मुझे इस काम में पूरी तरह से सहायता देने की कृपा की है । किसी भाग में भी त्रुटि नहीं रक्खी। जिस शीघ्रता और निपुणता से शास्त्रों के अनुवाद का कार्य चल रहा है, उसे समझने वाले ही समझते हैं। आप हमारी पंजाबी सम्प्रदाय की साधु समाज में विशेष प्रतिष्ठित हैं । बाल- ब्रह्मचारी और प्रसिद्ध शास्त्रमर्मज्ञ हैं, Salil उपाध्याय आदि उपाधियों से विभू- पित और अपनी क्रिया में परम (चित्र परिचय के लिये है पूजन के लिए नहीं) प्रवीण हैं। हमारी प्रभु से यही प्रार्थना है कि आप चिरायु हों, जिससे कि यह पुनीत कार्य सफलतापूर्वक चलता रहे । अब मुझे अपने उन बन्धुओं का धन्यवाद करना है, जिन्होंने इस कार्य में पूर्ण सहयोग दिया है। यदि हमें धन न मिलता तो हमारे लिए इन शास्त्रों की गन्ध तक भी मिलनी सम्भव न होती । हमारा सारा परिश्रम स्वग्नमात्र रह जाता । धन्य जन्म है इन पवित्रात्माओं का, जिन्होंने हमारे मनोरथों को कार्य- रूप में परिणत किया है । इन सब महानुभावों का परिचय मैं दशाश्रुतस्कन्धसूत्र अर्थात् इस शास्त्रमाला के प्रथम अंक में 'धन्यवाद' शीर्षक लेख में दे चुका हूँ । किन्तु इतने पर भी मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ। मेरा हृदय उनका इतना आभारी है कि वह बार बार उनका धन्यवाद करने के लिये उछल रहा है। उन सज्जनों का पुनः परिचय देना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ, ताकि हमारी समाज के अन्य महा- पुरुष भी उनका अनुकरण करके हमारी सहायता करने के लिये प्रोत्साहित हों। श्री श्री श्री १००८ श्री उपाध्याय श्री श्रात्माराम जी महाराज ( ३ ) , , Y सब से पहले मैं वयोवृद्ध श्रीमान् MARISAURAININIATIMINumII- लाला आशाराम जी जैन, अर्जी- नवीस, बैंकर और मालिक फर्म लाला आशाराम जगन्नाथ, सराफ, कसूर का हृदय से धन्यवाद करता हूँ । आप बड़े ही धर्मप्रेमी और भगवद्भक्त हैं । अपने नगर में सुप्रसिद्ध और प्रतिष्ठित हैं। इसके पश्चात् कसूरनिवासी धर्ममूर्ति स्वर्गीय श्रीमान् वाबू परमानन्द जी वकील की धर्मपत्नी श्रीमती दुर्गादेवी जी का धन्यवाद करना आवश्यक समझता हूँ, जिन्होंने अपने पूज्य श्रीमान् लाला आशाराम जी पतिदेव की स्मृति में यह दान देने की कृपा की। स्वर्गीय बाबू जी पंजाब की जैनसमाज के एक मुख्य नेता थे । पंजाब की जैन सभा के प्रसिद्ध कार्यकर्ता और बच्चे बच्च के हितैपी थे। लाहौर के श्री अमर जैन होस्टल की स्थापना का श्रेय आप ही को प्राप्त है। आपकी कसूर में बड़ी प्रतिष्ठा थी। राज्य दरबार में आपको यथेष्ट सम्मान प्राप्त था । वकीलों में आप चोटी के वकील थे। बड़े पवित्रात्मा और सच्चे समाजहितचिन्तक थे । लुधियाना में भी हमारे दो परम m - का!!! | {{|{||{{{{{{{||FF स्वर्गीय श्रीमान् बाबू परमानन्द जी सहायक विद्यमान हैं। एक श्रीमान् लाला सोहनलाल जी मैनेजिङ्ग अध्यक्ष फर्म लाला मिड्डीमल बाबू- रामजी जैन बैंकर तथा क्लाथ मर्चेण्ट लुधियाना। आप बड़े उत्साही, धर्म- प्रेमी और दानवीर हैं। आपके हाथों धर्मोन्नति के सैकड़ों काम चले और चल रहे हैं। आप जाति के अग्र- वाल हैं और नगर में विशेष प्रतिष्ठा रखते हैं। देशहित आपमें कूट कूट कर भरा हुआ है । समाज के बच्चे बच्चे से आपका विशेष प्रेम है। दूसरे लाला सन्तलाल जी जैन, रईस, मालिक फर्म लाला मल्हीमल ज/18| | } | } | }} श्रीमान् लाला मोहनलाल जी सन्तलाल, लुधियाना । आप बड़े turu MINUTRITUTRAINIRuruNurumaunprone धर्मात्मा हैं। प्रकृति बड़ी सरल है । आप भी जाति के अग्रवाल हैं। साधु महात्माओं की संगति में ही आपका अधिक समय व्यतीत होता है । सादगी इतनी बढ़ी चढ़ी है कि कहते नहीं बनता। धनिक होने पर भी मान नाममात्र को नहीं। अब पांचवें स्थान पर मैं अपने पूज्य चचा श्रीयुत लाला गोपीराम जी, मालिक फर्म कन्हैयालाल वृज- लाल, फर्नीचर मर्चेण्ट वा बैंकर, होशियारपुर का अतीव धन्यवाद करता हूँ। आपके पूज्य पिता का श्रीमान् लाला सन्तलाल जी ( ५ ) ||||||||||||||||||||||||||||||||||||| नाम लाला कन्हैयालाल जी था । आप मेरे पूज्य दादा स्वर्गीय लाला मेहरचन्द्र जी के भतीजे हैं । आप वालब्रह्मचारी हैं । बड़े ही उदार और होशियारपुर की जैनजनता के धनिक और प्रतिष्ठित सजनों में से एक हैं । धर्म की बड़ी लगन है । सेवाभाव इतना उच्च है कि निर्धन से निर्धन व्यक्ति के यहाँ भी कोई छोटे से छोटा काम हो तो भाग कर जाते }}|||||||||HHHH||LE इसके अनन्तर हमारे धन्यवाद के पात्र लाला रोचीशाह जी मालिक फर्म लाला कन्हैयाशाह रोचीशाह जी lmanIntruINRNIMAIN श्रीमान् लाला गोपीराम जी जैन, क्लाथ मर्चेण्ट, रावलपिण्डी, हैं। मैं इनकी प्रशंसा में कहाँ तक लिवू । आपकी शास्त्रश्रद्धा, साधुमहात्माओं के प्रति अनन्य भक्ति और ज्ञान प्रचार के लिए उदारहृदयता देखकर मेरा हृदय गद्गद हो जाता है । आप बड़े धनिक और अपनी बिरादरी में मुख्य स्थान रखते हैं। बड़े उच्च विचारों के धनी हैं । सहानुभूति से ओतप्रोत हैं। गुरु महाराज की कृपा से हमें रावलपिण्डी में एक और भी सहायक मिले । आपका शुभ नाम लाला al|||||||||||||||||||||||||||||||||||| श्रीमान् लाला रोचीशाह जी ( ६ ) ||||||| तेजेशाह जी है। आपको रावलपिण्डी जैन जाति में विशेष सम्मान प्राप्त है । आप वहां के प्रसिद्ध बैंकर हैं। इसके अतिरिक्त आपकी सराफी और बजाजी की दुकानें भी चलती हैं । आप मुख्य व्यापारी हैं । आप बड़े ही सुशील और कोमल प्रकृति हैं । गम्भीर और विचारशील हैं । परम उत्साही और शास्त्रप्रेमी हैं । दान में बड़ी रुचि है । आपका पुण्योदय देखिए, सन्तान भी बड़ी योग्य और पितृभक्त है । उपरिलिखित रावल- पिण्डी-निवासी दोनों सज्जनों ने केवल Ti111१||१|||8|||||||||||||१{१}}||TF श्रीमान् लाला तेजेशाह जी इसी धर्मकार्य में ही अपने हृदय की | विशालता का परिचय नहीं दिया अपितु आपके यशस्वी हाथों से अनेक धर्मकार्य सम्पन्न हो चुके हैं । सात सहायकों का परिचय मैं ऊपर दे चुका हूँ । आठवें स्थान पर अब मेरी अपनी ही बारी आती है। अपने सम्बन्ध में मैं क्या लिखू। मैं सकल जैन समाज का एक तुच्छ दास और इस पवित्र कार्य में साहाय्य देने वाले उपरोक्त महापुरुषों का ऋणी हूँ, जिन्होंने मेरे इस उद्देश्य में मेरी हर प्रकार से सहायता की है। मेरे मन में ऐमी शास्त्रमाला के उद्घाटन NIRANIPRITAMILARINA इस शास्त्रमाला का मयोजक और प्रन्धक खजानचीराम जैन, मनेजिङ्ग प्रोप्राइटर फर्म-गहरचन्द्र लक्ष्मणदाम जैन, पुस्तक विक्रेता. लाहोर ।

( ७ ) में के भाव उत्पन्न हुए । उन भावों को लेकर मैं श्री उपाध्याय जी महाराज की सेवा में उपस्थित हुआ। उनके अविश्रान्त परिश्रम से मेरे विचार सफल हुए। किन्तु यह सब कुछ होने पर भी मैं अपने पूज्य दादा स्वर्गीय लाला मेहरचन्द्र जी के प्रति अपना हार्दिक श्रद्धाभाव प्रकट किये विना नहीं रह सकता, जिन्होंने अपने जीवन काल मुझे अपने संरक्षण में रखकर शिक्षा दी, साधु महात्माओं की सङ्गति का सुअवसर दिया, जिस कारण विचार पवित्र रहे । मेरे पिता लाला लक्ष्मणदास जी हम चार भाइयों को अल्पवयस्क ही छोड़कर परलोक सिधार गए थे। इसलिए हमारे पालन पोपण का भार हमारे वृद्ध दादा जी पर ही पड़ा। उनके जीवन में एक बड़ा भारी महत्त्व यह था कि वह अपने भाइयों से अलग होकर कोरा बर्तन लुटिया डोरी लेकर निकले थे और अपने अनथक परिश्रम से पुस्तकों के व्यापार में लाखों की सम्पत्ति का उपार्जन किया । इतना ही नहीं, वे अपने धन के सदुपयोग का विशेष ध्यान रखते थे । गुप्तदान की ओर उनकी विशेष प्रवृत्ति थी । विचार बड़े ही उच्च थे। सबके हितचिन्तक और बड़े सहृदय थे। संसार का उन्हें पूरा अनुभव था। दिन रात हमें शिक्षा देते रहते थे। इतना ही नहीं, लाखों की सम्पत्ति भी हमारे लिए छोड़ गए हैं । भगवान् से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को सदा सुख और शान्ति मिले। अन्त में मैं सब महानुभावों का हृदय से धन्यवाद करता हूँ । इसके लिए आपकी आत्मा का कल्याण हो और आप सब मोक्षमार्ग पर आरूढ हों, यही हम सब की नित्य प्रति की भावना है । सब से अधिक धन्यवाद के पात्र हमारे गुरुदेव मुनि श्री उपाध्याय आत्माराम जी महाराज हैं । उनका उपकार मैं किन शब्दों में प्रगट करूँ । संक्षेप में मैं इतना ही कहे देता हूँ कि सकल जैन समाज आपकी इस अतुलनीय सेवा के लिए आपकी आभारी है और आजन्म आपके इस उपकार को नहीं भूलेगी। मैनेजिंग प्रोप्राइटर फर्म-मेहरचन्द्र लक्ष्मणदास जैन बैंकर, बुकसेलर, पब्लिशर और प्रिंटर सैदमिट्ठा बाजार, लाहौर विनीत ख़ज़ानचीराम जैन संयोजक व प्रवन्धक जैनशास्त्रमाला कार्यालय पूज्यपाद प्राचार्यवर्य श्री अमरसिंह जी महाराज की पटावली। पंचनईय सव्वगुणालंकयस्स पुञ्जसिरि अमरसिंह- स्स सीसोमहाचाई वेरग्गमुद्दा रामबक्खस महामुणी तपट्टे विराइओ! तपट्टे तेसिं लहुगुरु भाया संति मुद्दा गणिगुणालं- कओ सत्थविसारओ पुजसिरि मोतीरामो भूओ। तपट्टे संघहिएसी जोइसविण्णु मिच्छत्त निकंदण- कत्ता पुज्जसिरि सोहणलालो होत्था । तपट्टे जइण जाइए दसाए उद्धारए पंचालकेसरी इय उपाधिधारए पुजसिरि कासीरामो संप्पइ काले विरायए साहिच्चमंडलस ठावणा इमेसिं काले भूआ ! आसं करोमि एएसिं पहावओसव्वकजं सफलं भविस्सइ । विक्रम संवत् १९६३ भाद्रपद शुक्ला बुधवारे ।

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गुर्वावली तस्स नायसुओ वद्धमाणो नायसुओ महामुणी । लोगे तित्थयरो आसी अपच्छिमो सिवंकरो ॥१॥ सतित्थे ठविओ तेण पढमो अणुसासगो। सुहम्मो गणहरो नाम तेअंसी समणच्चिओ ॥२॥ तत्तो पवडिओ गच्छो सोहम्मोनाम विस्सुओ । परंपराए तत्थासी सूरीचामरसिंघओ ॥३॥ तस्स संतस्स दंतस्स मोतीरामाभिहो मुणी । होत्थ सीसोमहापन्नो गणिपयविभूसिओ ॥४॥ पट्टे महाथेरो गणवच्छेअगो गुणी। गणपति संनिओ साहू सामण्ण गुण्णसोहिओ ॥५॥ तस्स सीसो गुरुभत्तो सो जयरामदासओ। गणावच्छेअगो अस्थि समो मुत्तोव्व सासणे ॥६॥ तस्ल सीसो सच्चसंधो पवगपयंकिओ सालिग्गामो महाभिक्खू पावयणी धुरंधरो ॥७॥ तस्संतेवासिणा एसा अप्पारामेण भिक्खुणा । उवज्झाय पयंकणं भासाटीका समत्थिआ ॥८॥ अणुत्तरोववाइएटीकेयं लोकभासासुबद्धिआ । पढ़ताणं गुणंताणं वायंताणं पमोइणी ॥९॥ इगूणवीसा नवासीइ विकमवासेसु निम्मिआ एसा लुधियाणा नामयनयरे दसासुयक्खंध टीका समत्ता ।

-

स्वाध्याय
आत्मा स्वाध्यायद्वारा आत्मविकास कर सकता है, परन्तु स्वाध्याय
विधिपूर्वक होना चाहिए। यदि विधिशून्य स्वाध्याय किया जायगा, तो वह
आत्मविकास करने में समर्थ नहीं हो सकेगा, क्योंकि विधिपूर्वक किया हुआ
स्वाध्याय ही वास्तविक स्वाध्याय है।
स्वाध्याय का फल
अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि स्वाध्याय करने से किस फल की
प्राप्ति होती है। इसका उत्तर यही है कि-
"सज्झाएणं भंते ! जीवे किं जणइ” “सज्झाएणं नाणा-
वरणिज कम्मं खवई”
उत्तराध्ययन अ० २९ सू० १८
अर्थात् हे भगवन् ! स्वाध्याय करने से किस फल की प्राप्ति होती है ?
भगवान् कहते हैं कि हे शिष्य ! स्वाध्याय करने से ज्ञानावरणीय कर्म क्षीण
हो जाते हैं । जब ज्ञानावरणीय कर्म ही क्षीण हो गए, तो आत्मविकास स्वयमेव
हो जायगा, जिससे कि आत्मा अपने स्वरूप में प्रविष्ट हो जाने के कारण सब
दुःखों से छूट जायगा । क्योंकि-
"सज्झाएवा सव्वदुक्खविमोक्खणे" उत्त० अ० २६ गा० १०
अर्थात् स्वाध्याय सब दुःखों से विमुक्त करने वाला है।

了 ,

स्वाध्याय
तो वह
आत्मा स्वाध्यायद्वारा आत्मविकास कर सकता है, परन्तु स्वाध्याय
विधिपूर्वक होना चाहिए । यदि विधिशून्य स्वाध्याय किया जायगा,
आत्मविकास करने में समर्थ नहीं हो सकेगा, क्योंकि विधिपूर्वक किया हुआ
स्वाध्याय ही वास्तविक स्वाध्याय है।
स्वाध्याय का फल
अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि स्वाध्याय करने से किस फल की
प्राप्ति होती है। इसका उत्तर यही है कि-
"सज्झाएणं भंते ! जीवे किं जणइ” “सज्झाएणं नाणा-
वरणिज्ज कम्मं खवई”
उत्तराध्ययन अ० २९ सू० १८
अर्थात् हे भगवन् ! स्वाध्याय करने से किस फल की प्राप्ति होती है ?
भगवान् कहते हैं कि हे शिष्य ! स्वाध्याय करने से ज्ञानावरणीय कर्म क्षीण
हो जाते हैं । जब ज्ञानावरणीय कर्म ही क्षीण हो गए, तो आत्मविकास स्वयमेव
हो जायगा, जिससे कि आत्मा अपने स्वरूप में प्रविष्ट हो जाने के कारण सब
दुःखों से छूट जायगा । क्योंकि-
"सज्झाएवा सव्वदुक्खविमोक्खणे" उत्त० अ० २६ गा० १०
अर्थात् स्वाध्याय सब दुःखों से विमुक्त करने वाला है ।

( २ ) शारीरिक और मानसिक दुःखों का उद्भव अज्ञानता से ही होता है । जब अज्ञानता नष्ट होगई, तब वे दुःख भी स्वयं नष्ट हो जाते हैं। क्योंकि- "दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो” उत्त० अ० ३२ का० ८ अर्थात् जिसको मोह नहीं होता, मानों उसने दुःखों का भी नाश कर दिया । अतः सब प्रकार के दुःखों से छूटने के लिए स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। स्वाध्याय किन किन ग्रन्थों का करना चाहिए ? स्वाध्याय उन्हीं ग्रन्थों का करना चाहिए, जो सर्वज्ञप्रणीत, सत्य पदार्थों के प्रदर्शक, ऐहलौकिक और पारलौकिक शिक्षाओं से युक्त, उभयलोकों के हितोपदेष्टा और जिनके स्वाध्याय से तप, क्षमा और अहिंसा आदि तत्वों की प्राप्ति हो । तात्पर्य यह है कि जिनके स्वाध्याय से आत्मा ज्ञानी और चारित्रयुक्त एवं आदर्शरूप बन सके, वे ही आगम स्वाध्याय करने योग्य हैं । उन्हीं के स्वाध्याय से आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है। किंतु प्रत्येक मतावलम्बी अपने आगमों को सर्वज्ञप्रणीत मानता है। फिर इस बात का निर्णय कैसे हो कि अमुक आगम ही सर्वज्ञप्रणीत हैं, अन्य नहीं ? इसका उत्तर यही है कि आगमों की परीक्षा के लिए मध्यस्थ भाव से प्रमाण और नय के जानने की आवश्यकता है। जो आगम प्रमाण और नय से बाधित न हो सकें, वे ही प्रमाण-कोटि में माने जा सकते हैं। जैसे कि-कुछ व्यक्तियों ने अपने अपने आगमों को अपौरुषेय (ईश्वरोक्त) माना है, उनका यह कथन प्रमाण-बाधित है । क्योंकि जब ईश्वर अकाय और अशरीरी है, तो भला फिर वह वर्णात्मकरूप छन्द किस प्रकार उच्चारण कर सकता है ! क्योंकि शरीर के बिना मुख नहीं होता और मुख के विना वर्णों का उच्चारण नहीं हो सकता । अतः उनका यह कथन प्रमाण बाधित सिद्ध हो जाता है । किन्तु जैनागम इस विषय को इस प्रकार प्रमाणपूर्वक सिद्ध करते हैं, जिसे मानने में किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती और नाही किसी प्रकार की शंका ही उत्पन्न हो सकती है। उदाहरणार्थ-शब्द पौरुषेय है और अर्थ अपौरुषेय है;

( ३ ) अर्थात् शब्दद्वारा सर्वज्ञ आत्माओं ने उन अर्थों का वर्णन किया जो कि अपौरुषेय हैं । कल्पना कीजिए कि सर्वज्ञ आत्मा ने वर्णन किया कि 'आत्मा नित्य है सो यह शब्द तो पौरुषय है, किन्तु शब्दों द्वारा जिस द्रव्य का वर्णन किया गया है, वह नित्य (अपौरुषेय ) है । इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य के विषय में समझ लेना चाहिए । अतः सिद्ध हुआ कि सर्वज्ञप्रणीत आगमों का ही स्वाध्याय करना चाहिए। सर्वज्ञप्रणीत आगम कौन कौन से हैं ? वर्तमान काल में सर्वज्ञप्रणीत और सत्य पदार्थों के उपदेश करने वाले ३२ आगम ही प्रमाण-कोटि में माने जाते हैं । इन आगमों में पदार्थों का वर्णन प्रमाण और नय के आधार पर ही किया गया है । इनके अध्ययन से इन आगमों की सत्यता और इनके प्रणेता सर्वज्ञ या सर्वज्ञ-कल्प स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं। वर्तमान काल में ३२ आगम इस प्रकार हैं- "से किं तं सम्मसुअं? जं इमं अरहंतेहिं भगवंतेहिं उप्पण्ण नाणदंसणधरोहिं तेलुक्क निरिक्खिअ महिअ पूइएहिं तीयपडुप्पण्ण मणागय जाणएहिं सव्वएणूहिं सव्वदरिसीहिं पणीअं दुवालसंगं गणिपिडगं तं जहा-आयारो १ सूयगडो २ ठाणं ३ समवाओ ४ विवाहपण्णत्ती ५ नायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ ७ अंतगडदसाओ ८ अणुत्तरोववाइय- दसाओ ९ पण्हवागरणाई १० विवागसुअं ११ दिविवाओ १२ इच्चेअं दुवालसंगं गणिपिडगं चोद्दस पुस्विस्स सम्मसुअं अभिण्ण दस पुव्विस्स सम्मसुअं तेणपरं भिण्णेसु भयणा सेतं सम्मसुअं । नंदीसूत्र नंदीसूत्र (सू० ४०) १२ अंगशास्त्र, १२ उपांगशास्त्र, ४ मूलशास्त्र, ४ छेदशास्त्र और ( ४ ) " १ आवश्यक सूत्र । किन्तु ये ३३ होते हैं। विचार करना चाहिए कि इस समय ११ अंगशास्त्र विद्यमान हैं; १२ वाँ दृष्टिवादाङ्ग-शास्त्र व्यवच्छेद हुआ माना जाता है । अंगशास्त्रों के नाम निम्नलिखित हैं-१ आचारांगशास्त्र, २ सूयग- डांगशास्त्र, ३ स्थानांगशास्त्र, ४ समवायांगशास्त्र, ५ व्याख्याप्रज्ञप्ति (भगवतीशास्त्र), ६ ज्ञाताधर्मकांगशास्त्र, ७ उपासकदशांगशास्त्र, ८ अंतकृद्दशांगशास्त्र, ९ अनुत्तरी- पपातिकशास्त्र, १० प्रश्नव्याकरणशास्त्र, ११ विपाकशास्त्र, १२ दृष्टिवादांगशास्त्र (जो व्यवच्छेद होगया है)। उपांगशास्त्रों के नाम ये हैं-१ औपपातिकशास्त्र, २ राजप्रश्नीयशास्त्र, ३ जीवाभिगमशास्त्र, ४ प्रज्ञापनाशास्त्र, ५ जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिशास्त्र, ६ सूर्यप्रज्ञप्तिशास्त्र, ७ चन्द्रप्रज्ञप्तिशास्त्र, ८ निरयावलिकाओ, ९ कप्पवडिसियाओ, १० पुफिफयाओ, ११ पुफ्फचूलियाओ, १२ वहिदसाओ । और चार मूल शास्त्र ये हैं-दशव- कालिकशास्त्र १, उत्तराध्ययनशास्त्र २, नंदीशास्त्र ३, और अनुयोगद्वारशास्त्र ४ । चार छेदशास्त्र-व्यवहारशास्त्र १, बृहत्कल्पशास्त्र २, दशाश्रुतस्कन्धशास्त्र ३, निशीथ- शास्त्र ४, एवं ३१ और ३२ वाँ आवश्यकशास्त्र । इस प्रकार ३२ आगमों की संज्ञा वर्तमान काल में मानी जाती है। किन्तु यह संज्ञा अर्वाचीन प्रतीत होती है । कारण यह है कि नंदीसिद्धांत में सब सिद्धान्तों की चार प्रकार से निम्न- लिखित संज्ञाएँ वर्णन की गई हैं। जैसे-अंगशास्त्र, उत्कालिकशास्त्र, कालिक- शास्त्र, और आवश्यकशास्त्र । जो उपांगशास्त्र और मूल चार छेदशास्त्र हैं, वे सब कालिक और उत्कालिक शास्त्रों के ही अन्तर्गत लिए गये हैं । देखो- नदीसिद्धान्त-श्रुतज्ञानविषय । तथा औपपातिक आदि शास्त्रों में कहीं पर भी यह पाठ नहीं कि-यह उपांगशास्त्र है । जैसे पाँचवें अंग के आगे के अंगशास्त्रों के आदि में यह पाठ आता है कि, भगवान् जंबूस्वामी जी कहते हैं- "हे भगवन् मैंने छठे अंगशास्त्र के अर्थ को तो सुन लिया है, किन्तु सातवें अंगशास्त्र का श्रीश्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने क्या अर्थ वर्णन किया है ?" इत्यादि । किन्तु उपांगशास्त्रों में यह शैली नहीं देखी जाती, और नाही शास्त्रकर्ता ने उनकी उपांग संज्ञा कही है। किन्तु केवल निरयावलिकासूत्र के आदि में यह सूत्र अवश्य विद्यमान है। तथा च पाठः- , है ( ५ ) "तएणं से भगवं जंबूजातसड्ढे जावपज्जुवासमाणे एवं धयासि-उवंगाणं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं के अट्ठे पण्णत्ते ? एवं खल्लु जंबू ! समणेणं भगवया जाव संपत्तेणं, एवं उवंगाणं पंचवग्गा पण्णत्ता ? तं जहानिरयावलियाओ कप्पवडिसियाओ २ पुफियाओ ३ पुप्फचूलियाओ ४ वण्हिद- साओ ५'-इत्यादि । इस पाठ के आगे वर्गों के कतिपय अध्ययनों का वर्णन किया गया है । इस पाठ से यह स्फुट नहीं होसकता कि-ये उपांगों के पाँच वर्ग कौन कौन से अंगशास्त्र के उपांग हैं। यद्यपि पूर्वाचार्यों ने अंग और उपांगों की कल्पना करके अंगों के साथ उपांग जोड़ दिये हैं, किन्तु यह विषय विचार- णीय है । कालिक और उत्कालिक संज्ञा स्थानांगादि शास्त्रों में होने से बहुत प्राचीन प्रतीत होती है । किन्तु उपांगादि संज्ञा भी उपादेय ही है । अथवा यह विषय विद्वानों के लिये विचारणीय है । आचार्यवर्य हेमचन्द्र जी ने अपने बनाये 'अभिधानचिंतामणि' नामक कोष में अंगशास्त्रों का नामोल्लेख करते हुए 'केवल उपांगयुक्त अंगशास्त्र हैं' ऐसा कहकर विषय की पूर्ति कर दी है । किन्तु जिस प्रकार अंगशास्त्रों के नामोल्लेख किए हैं, ठीक उसी प्रकार किस किस अंग का कौन कौन सा उपांगशास्त्र है, ऐसा नहीं लिखा है। इससे भी यह कल्पना अर्वाचीन ही सिद्ध होती है । हाँ! यह अवश्य मानना पड़ेगा कि- यह कल्पना अभयदेव सूरि या मलयगिरि आदि वृत्तिकारों से पूर्व की है। क्योंकि उपांगों के वृत्तिकार वृत्ति की भूमिका में उस उपांग का किस अंग से संबंध है, इस प्रकार का लेख स्फुट रूप से करते हैं । अतः वृत्तिकारों के समय से भी यह कल्पना पूर्व की है। इसलिए यह कल्पना श्वेताम्बर आम्नाय में सर्वत्र प्रमाणित मानी गई है। विधिविरुद्ध स्वाध्याय के दोष जिस प्रकार सातों स्वर और रागों के समय नियत है-जिस समय का ( ६ ) जो राग होता है, यदि उसी समय पर गायन किया जाय, तो वह अवश्य आनन्दप्रद होता है, और यदि समयविरुद्ध राग अलापा गया, तब वह सुखदाई नहीं होता; ठीक इसी प्रकार शास्त्रों के स्वाध्याय के विषय में भी जानना चाहिए। और जिस प्रकार विद्यारम्भ संस्कार के पूर्व ही विवाह संस्कार और भोजन के पश्चात् स्नानादि क्रियाएँ सुखप्रद नहीं होतीं, और जिस प्रकार समय का ध्यान न रखते हुए असंबद्ध भाषण करना कलह का उत्पादक माना जाता है, ठीक उसी प्रकार बिना विधि के किया हुआ स्वाध्याय भी लाभदायक नहीं होता। और जिस प्रकार लोग शरीर पर यथास्थान वस्त्र धारण करते हैं- यदि वे बिना विधि के तथा विपरीतांगों में धारण किए जाएँ, तो उपहास के योग्य बन जाते हैं। ठीक इसी प्रकार स्वाध्याय के विषय में भी जानना चाहिए। अतः सिद्ध हुआ कि विधिपूर्वक किया हुआ स्वाध्याय ही समाधिकारक माना जाता है । जिस प्रकार उक्त विषय विधिपूर्वक किए हुए ही 'प्रिय' होते हैं, ठीक उसी प्रकार स्वाध्याय भी विधिपूर्वक किया हुआ ही आत्मविकास का कारण होता है । प्रस्तुत शास्त्र की पहली दशा में उस विषय का स्फुट रूप से वर्णन किया गया है। स्वाध्याय का समय स्वाध्याय के लिए जो समय आगमों में बताया गया है, उसी समय स्वाध्याय करना चाहिए, किन्तु अनध्याय काल में स्वाध्याय वर्जित है। मनुस्मृति आदि स्मृतियों में भी स्वाध्याय के अनध्याय काल का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। क्योंकि वे लोग वेद के भी अनध्यायों का उल्लेख करते हैं। इसी प्रकार अन्य आर्ष ग्रन्थों का भी अनध्याय काल माना जाता है । किन्तु जैनागमों के सर्वज्ञोक्त, देवाधिष्ठित तथा स्वरविद्यासंयुक्त होने के कारण इनका भी अनध्याय काल आगमों में वर्णित है । यथा- "दसविधे अंतलिक्खिते असज्झाइए प. तं.-उक्कावाते दिसिदाग्घे, गजिते, विज्जुते, निग्याते, जूयते, जक्खालित्ते, धूमिता महिता, रत उग्घाते ।दसविहे ओरालिते, असज्झातिते, ( ७ ) प० तं० अट्ठिमंसं, सोणिते, असुतिसामंते, सुसाणसामंते, चंदोवराते, सूरोवराते, पडणे, रायवुग्गहे, उवसयस्स अंतो ओरालिए सरीरगे।" स्थानांगसूत्र स्थान १० सू० ७१४ । (छाया) दशविधं आन्तरीक्षकं अस्वाध्यायिकं प्रज्ञप्तं, तद्यथा-उल्का- पातः, दिग्दाहः, गर्जितं, विद्युत् , निर्घातः, यूपकः, यक्षादीप्ते, धुमिता, महिता, रजउद्धातः । दशविधः औदारिकः अस्वाध्यायिकः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-अस्थिमांस- शोणितानि अशुचिसामन्तं श्मशानसामन्तं चन्द्रोपरागः सूरोपरागः पतनं राज- विग्रहः उपाश्रयस्यान्ते औदारिकं शरीरकं । तथा च पाठः- "नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा चउहिं महा- पाडिवएहिं सज्झायं करित्तए, तं जहा आसाढ पाडिवए, इन्द- महपाडिवाते कत्तिएपाडिवए, सुगिम्ह पाडिवए, णोकप्पइ निग्गं थाण वा निग्गंथीण वा चउहिं सज्झाहिं सज्झायं करेत्तए, तं पडिमाते पछिमाते, मज्झण्हे, अट्ठरत्ते, कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा चाउकालं सज्झायं करेत्तए तं०-पुव्वण्हे अव- रहे पओसे पच्चुसे।" स्थानांगसूत्र स्थान ४ उद्देश २ सू. २८५ (छाया) नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा चतुर्भिः महापाति- पद्भिः स्वाध्यायं कर्तुम् । तद्यथा-आषाढ़ीप्रतिपदः, इन्द्रप्रतिपदः, कार्तिकप्रति- पदः, सुग्रीष्मप्रतिपदः ? नो कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां चतुर्भिः सन्ध्याभिः स्वाध्यायं कर्तुम् । प्रथमायां पश्चिमायां मध्याह्ने अर्धरात्रौ । कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां चतुष्काले स्वाध्यायं कर्तुम् । तद्यथा-पूर्वाळे, अपराहे, प्रदोपे, प्रत्यूषे । भावार्थ-आकाश से संबंध रखने वाले कारणों से आकाश संबंधी दश प्रकार से अस्वाध्याय वर्णन किए गए हैं । जैसे उल्कापात (तारापतन ); यदि महत् तारापतन हुआ हो, तो एक प्रहर पर्यन्त शास्त्रों का स्वाध्याय नहीं करना चाहिए १ । जब तक दिशा रक्त वर्ण की दिखाई पड़ती रहे, तब भी शास्त्रीय , ( ८ ) . स्वाध्याय नहीं करना चाहिए २ । इसी प्रकार आगे भी समझ लेना चाहिए । दो प्रहर पर्यन्त बादल गरजने पर ३ । एक प्रहर पर्यन्त बिजली चमकने पर ४ । दो प्रहर पर्यन्त कड़कने पर ५, अर्थात् बादल के होने या न होने पर आकाश में घोर गर्जना हो, शुक्लपक्ष में तीन दिन पर्यन्त, बालचन्द्र होने पर तीन दिन पर्यन्त । प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया की रात्रि को एक एक प्रहर पर्यन्त स्वाध्याय न करना चाहिए ६ । आकाश में जब तक यक्षाकार दीखता रहे ७ । धूमिका श्वेत ८ । धूमिका कृष्ण ९ । माघ आदि महीनों में धुंध जब तक रहे तब तक स्वाध्याय न करना चाहिए, विशेषतया वृष्टि होने पर १० । उक्त कारणों के उपस्थित होने पर शास्त्रों का स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। किन्तु गर्जना और विद्युत् का अस्वाध्याय चातुर्मास्य में न मानना चाहिए । क्योंकि वह गर्जित और विद्युत्-कार्य ऋतु स्वभाव से ही प्रायः होता है । अतः आर्द्रार्क और स्वाँति अर्क तक अस्वाध्याय नहीं माना जाता । दश प्रकार औदारिक शरीर से संबंध रखने वाले कारणों के उपस्थित हो जाने पर भी अस्वाध्याय हो जाता है । जैसे हड्डी के दिखाई देने पर १ । मांस के समीप होने पर २ । रुधिर के समीप होने पर ३ । वृत्तिकारों ने ६० हाथ के आसपास उक्त चीजें पड़ी होने पर अस्वाध्याय माना है । अशुचि (मलमूत्रादि) के समीप होने पर ४ । श्मशान के पास होने पर ५ । चन्द्रग्रहण के होने पर ८-१२-१६ प्रहर पर्यन्त ६। सूर्यग्रहण होने पर ८-१२-१६ प्रहर पर्यन्त ७ । किसी बड़े राजा आदि अधिकारी की मृत्यु हो जाने पर उनके संस्कार पर्यन्त अथवा अधिकार प्राप्त होने तक शनैः शनैः पढ़ना चाहिए ८ । राजाओं के युद्ध स्थान पर ९ । उपाश्रय के भीतर पंचेन्द्रिय जीव का वध हो जाने पर जैसे किसी ने कबूतर या चूहे को मार दिया हो तथा १०० हाथ के आसपास मनुष्य आदि का शव पड़ा हो, तब भी स्वाध्याय न करना चाहिए १०। एवं २०॥ चार महाप्रतिपदाओं में भी स्वाध्याय न करना चाहिए । जैसे आषाढ़ शुक्ला पौर्णमासी और श्रावण प्रतिपदा २, आश्विन शुक्ला पौर्णमासी तथा कार्तिक प्रतिपदा ४, कार्तिक शुक्ला पौर्णमासी तथा मार्गशीर्ष प्रतिपदा ६, चैत्र शुक्ला पौर्णमासी और वैशाख प्रतिपदा ८ । और सूर्योदय से एक घड़ी पूर्व तथा एक घड़ी पश्चात् एवं सूर्यास्त से एक घड़ी पूर्व तथा एक घड़ी पश्चात् , (६ ) मध्याह्न के समय तथा अर्धरात्रि के समय भी पूर्ववत् स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। किन्तु दिन के प्रथम प्रहर और पश्चिम प्रहर तथा रात्रि के प्रथम प्रहर और पिछले प्रहर में अस्वाध्याय काल को छोड़कर अवश्य स्वाध्याय करना चाहिए । इस प्रकार ३२ प्रकार के अस्वाध्याय काल को छोड़कर स्वाध्याय करना चाहिए । तथा निशीथ सूत्र के १९ वें उद्देश में यह पाठ है- "जे भिक्खू चउसु महापडिवएसु सज्झायं करेइ करतं वा साइज्जइ, तं जहा सुगिम्हिए पाडिवाए, आसाढी पाडिवए, भद्दवए पाडिवए, कत्तिए पाडिवए।" इनका अर्थ भी पूर्ववत् है, किन्तु इस पाठ में भाद्रपद भी ग्रहण किया गया है । सो भाद्रशुक्ला पौर्णमासी और आश्विन कृष्णा प्रतिपदा, इस प्रकार दो दिनों की वृद्धि करने से ३४ अस्वाध्याय काल हो जाते हैं । अतः इनको छोड़कर ही स्वाध्याय करना चाहिए । व्यवहार सूत्र के सातवें उद्देश में स्वाध्याय और अस्वाध्याय काल के विषय में वर्णन करते हुए उत्सर्ग और अपवादमार्ग दोनों का ही अवलम्बन किया गया है । जैसे- "नो कप्पति निग्गंथीण वा निग्गंथाण वा वितिकिट्ठाए काले सज्झायं उद्दिसित्तए वा करित्तए ॥१४॥ कप्पति निग्गं- थीणं वितिकिट्ठाए काले सज्झायं उद्दिसित्तए वा करित्तए वा निग्गंथणिस्साए ॥१५॥ नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा असज्झायं सज्झायं करित्तए ॥१६॥ कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सज्झाइय सन्झायं करित्तए ॥१७॥ नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अप्पणो असज्झाइयं करित्तए कप्पति णं अण्णमन्नस्स वायणं दलित्तए ॥१८॥" इन सूत्रों का भावार्थ केवल इतना ही है कि साधु या साध्वियों को अकाल में स्वाध्याय न करना चाहिए। किन्तु काल में ही स्वाध्याय करना ( १० ) ? चाहिए। यदि परस्पर वाचना चलती हो, तो वाचना की क्रिया कर सकते हैं। अर्थात् वाचना अकाल में भी दे ले सकते हैं। और यदि अपने शरीर से रुधिर आदि बहता हो, तब भी स्वाध्याय नहीं कर सकते, परन्तु उस स्थान को ठीक बाँधकर यदि खून आदि वाहर न बहते हों, तो परस्पर वाचना दे ले सकते हैं। इस प्रकार शुद्धिपूर्वक स्वाध्याय करने में प्रयत्नशील होना चाहिए । अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि अस्वाध्याय मूल सूत्र का होता है या अनुप्रेक्षादि का भी ' इसका उत्तर यही है कि-ठाणांग सूत्र के वृत्तिकार अभयदेव सूरि चार महा प्रतिपदाओं की वृत्ति करते समय प्रथम ही यह लिखते हैं :- "स्वाध्यायो नन्द्यादिसूत्रविषयो वाचनादिः अनुप्रेक्षा तु न निषिध्यते" इस कथन से सिद्ध हुआ कि केवल संहिता-मात्र का अस्वाध्याय है, अनुप्रेक्षा आदि का नहीं। अस्वाध्याय काल में स्वाध्याय करने से हानि अस्वाध्याय काल में स्वाध्याय करने से यही हानि है कि-शास्त्र के देवाधिष्ठित एवं देव-चाणी होने के कारण अशुद्धिपूर्वक पढ़ने से कोई क्षुद्र देव पढ़ने वाले को छल ले या उसे दुःख दे देवे ! (एतेषु स्वाध्यायं कुर्वतां क्षुद्रदेवता छलनं करोति इति वृत्तिकारः ) जिससे कि लोकों में अत्यंत अपवाद हो जावे । तथा आत्मविराधना और संयमविराधना के होने की भी संभावना की जा सकती है । अथवा- "सुय णाणंमि अभत्ती लोगविरुद्धं पमत्त छलणा य । विजा साहणवे गुन्न धम्मया एव मा कुणसु ॥१॥" "श्रुतज्ञानेऽभक्तिः लोकविरुद्धता प्रमत्तछलना च । विद्यासाधनवैगुण्यधर्मता इति मा कुरु ॥" अर्थात्-विद्यासाधन में असफलता, इत्यादि कारण जानकर, हे शिष्य !

( ११ ) अकाल में स्वाध्याय न करना चाहिए । अतएव सिद्ध हुआ कि अकाल में स्वाध्याय करना वर्जित है। जैसे जो वृक्ष अपनी ऋतु आने पर ही फलते और फूलते हैं, वे जनता में समाधि के उत्पन्न करने वाले माने जाते हैं । किन्तु जो वृक्ष अकाल में फलते और फूलते हैं, वे देश में दुर्भिक्ष, मरी, और राज्य- विग्रह ( कलह ) आदि के उत्पन्न करने वाले माने जाते हैं । इसी प्रकार स्वाध्याय के काल, अकाल विषय में भी जानना चाहिए । कारण यह है कि प्रत्येक कार्य विधिपूर्वक किया हुआ ही सफल होता है । जैसे समय पर सेवन की हुई ओषधि रोग की निवृत्ति और बल की वृद्धि करती है, ठीक इसी प्रकार भक्तिपूर्वक और स्वाध्यायकाल में ही किया हुआ स्वाध्याय कर्मक्षय और शान्ति की प्राप्ति कराता है । अतः- "उद्देसोपासगस्सनस्थि" इस वाक्य का स्मरण कर इस विषय को यहीं पर समाप्त किया जाता है । अर्थात् बुद्धिमान् को उपदेश की आवश्यकता नहीं । वह स्वयं ही अपने कृत्यों को समझता है । इसलिए मुमुक्षु जनों को उचित है कि वे शास्त्रीय स्वाध्याय से अपने जीवन को पवित्र बनाकर मोक्ष के अधिकारी बनें। क्योंकि शास्त्र का वाक्य है :- "दोहि ठाणेहिं अणगारे संपन्ने अणादीयं अणवयग्गं दीहमद्धं चाउरंतसंसारकंतारं वीतिवतेज्जा, तं जहा विजाए चेव चरणेण चेव ।" स्थानांगसूत्र, स्थान २ उद्देश १ सूत्र ६३ दो कारणों से संयुक्त भिक्षु अनादि अनन्त दीर्घ मार्ग वाले चतुर्गति रूप संसाररूपी कान्तार से पार हो जाते हैं, जैसे कि विद्या और आचरण से । इसलिए हमें चाहिए कि देश और धर्म का अभ्युदय करते हुए अनेक भव्य प्राणियों को मोक्ष का अधिकारी बनावें, जिससे जनता में सुख और शांति का संचार हो । इत्यलं विद्वद्वर्येषु ।

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श्रीः
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्
संस्कृतच्छाया-पदार्थान्वय-मूलार्थोपेतं
तपोगुणप्रकाशिकाहिन्दीभाषाटीकासहितं च

ܚܝܫ नमो त्थु णं समणस्स भगवओ महावीरस्स प्रथमो वर्ग: . तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे "अज-सुह- म्मस्स समोसरणं। परिसा निग्गया जाव'जंबू पज्जु- वासति एवं वयासी जइ णं भंते ! समणेणं जाव' संपत्तेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं अयमढे पण्णत्ते नवमस्स णं भंते अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं जाव संपत्तेणं के अटे पण्णत्ते ? तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहे "आर्य-सुधर्मस्य समवशरणम् । परिषन्निर्गता यावज्जम्बूः पर्युपासति एव- मवादीत् “यदि भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनाष्टमस्याङ्गस्या- न्तकृद्दशानामयमर्थः प्रज्ञप्तः, नवमस्य नु भदन्त ! अङ्गस्यानु- त्तरोपपातिकदशानां यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः । पदार्थान्वयः-तेणं-उस कालेणं-काल और तेणं-उस समएणं-समय मे रायगिहे-राजगृह नगर में अज-सुहम्मस्स आर्य सुधा समोसरणं-विराजमान , ४] ४ अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः ! हुए परिसा-परिपद् निग्गया-उनकी धर्म-कथा सुनने के लिये नगर से निकली जाव-यावत्-और कथा सुनकर फिर नगर को वापिस चली गई । इस के अनन्तर जंबू-जम्बू स्वामी पज्जुवासति-अच्छी तरह सेवा करता हुआ एवं-इस प्रकार वयासी-कहने लगा णं-वाक्यालङ्कार के लिये है भंते !-हे भगवन् ! जइ-यदि संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए जाव-और अन्य सब गुणों से परिपूर्ण समणेणं-श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अहमस्त-आठवे अंगस्स-अङ्ग अंतगडदसाणं-अन्त- कृद्-दशा का अयमद्वे-यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है तो फिर भंते ! हे भगवन् ! नवमस्स-नौवें अंगस्स-अंग अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक दशा का जाव-'नमो त्थु णं' के गुणों से युक्त और संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए श्री भगवान ने के-कौन-सा अठे-अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है ? मूलार्थ-उस काल और उस समय में एक राजगृह नगर था । (उसके वाहर गुणशिलक नाम के चैत्य में) आर्य सुधर्मा विराजमान हुए । (यह सुनकर) नगर की परिपद् ( उनके पास धर्म-कथा सुनने के लिये ) गई (और धर्म सुन- कर नगर को वापिस चली गई ) । जम्बू स्वामी अच्छी प्रकार उनकी सेवा करते हुए इस प्रकार कहने लगे "हे भगवन् ! यदि मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने पाठवें अङ्ग, अन्तकृद्-दशा का यह अर्थ प्रतिपादन किया है तो हे भगवन् ! नौवें अङ्ग, अनुत्तरोपपातिक दशा का क्या अर्थ प्रति- पादन किया है। टीका-सूत्रों के संख्या-बद्ध क्रम में अङ्गकृत्-सूत्र आठवां और अनुत्त- रोपपातिकसूत्र नौवां अङ्ग है । अतः अङ्गकृत्-सूत्र के अनन्तर ही इसका आना सिद्ध है । आठवे अङ्गा, अङ्गकृत्-सूत्र में उन जीवों का वर्णन किया है, जो मूक केवली हुए हैं अर्थात् जिन्होंने स्वयं तो केवल-ज्ञान की प्राप्ति की किन्तु आयु क्षीण होने के कारण दूसरी भव्य आत्माओं पर अपने उस ज्ञान को प्रकाश नहीं कर सके । जैसे गजसुकुमार आदि । इस नौवें अङ्ग में उन व्यक्तियों के जीवन का दिग्दर्शन कराया गया है, जो अपनी मनुष्य-जीवन की लीला को समाप्त कर पांच अनुत्तरोपपातिक विमानों में उत्पन्न हुए हैं। इस सूत्र की उत्थानिका श्री जम्बू स्वामी से वर्णन की गई है । जब श्री के प्रथमो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [५ अवस्था श्रमण भगवान् महावीर स्वामी मोक्ष को प्राप्त हो चुके तब जम्बू स्वामी के चित्त में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने किस प्रकार उक्त सूत्र का अर्थ वर्णन किया है । उनकी इस जिज्ञासा को देखकर श्री सुधा स्वामी निम्न-लिखित रीति से इस सूत्र का विषय वर्णन करते हैं। इस समय जो एकादश अङ्ग-सूत्र हैं, वे सब श्री सुधा स्वामी की वाचना के ही कहे जाते हैं । ऐसा न मानने से कई एक आपत्तियां उपस्थित हो जाती हैं। जैसे-अङ्ग-सूत्र में इस प्रकार के पाठ मिलते हैं कि धन्ना अनगार ने एकादश अङ्गों का अध्ययन किया था । किन्तु इस समय जो अनुत्तरोपपातिक-सूत्र है, उस में मुख्य रूप से धन्ना अनगार का ही विशद अधिकार पाया जाता है। ऐसी में यह शङ्का विना समाधान के ही रह जाती है कि उन्होंने नौवें कौन से अङ्ग का अध्ययन किया होगा। क्योंकि प्रस्तुत नौवें अङ्ग में तो धन्ना अनगार का पादोपगमन से अनशन पर्य्यन्त और अनुत्तर विमान में उत्पन्न होने तक का सब वर्णन दिया गया है । अतः यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है कि यह सब सुधर्मा- चार्य की ही वाचना है और वह भी श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण- पद-प्राप्ति के अनन्तर ही की गई है। इस सूत्र की हस्त-लिखित प्रतियों में निम्न-लिखित पाठ-भेद भी मिलते हैं :- "तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नगरे होत्था । तस्स णं रायगिहे नाम नयरस्स सेणिए नाम राया होत्था वण्णओ चेलणाए देवी । तत्थ णं रायगिहे नाम नयरे बहिया उत्तर-पुरस्थिमे दिसा-भाए गुणसेलए नाम चेइए होत्था । तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं नयरे अन्ज-सुहम्मे नाम थेरे जाव गुणसेलए नामं चेइए तेणेव समोसढे परिसा निग्गया धम्मो कहिओ परिसा पडिगया ।" "तेणं कालेणं तेणं समएणं जंबु जाव पज्जुवासमाणे एवं वयासी" इनमें से पहला पाठ किसी ग्रन्थ से ज्यों-का-त्यों उद्धृत किया हुआ प्रतीत होता है। क्योंकि इस सूत्र की रचना तो श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के निर्वाण के अनन्तर ही हुई है और श्रेणिक महाराज श्री भगवान् के विद्यमान होते ही पश्चत्व (मृत्यु) को प्राप्त हो चुके थे । इमलिए असद्गत होने के कारण यह पाठ निर्मूल है । इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए 'शास्त्रोद्धार-ममिति ने एक प्रायः अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ प्रथमो वर्गः शुद्ध प्रति मुद्रापित की है । इस प्रति में जो मूल सूत्र हैं, वे ठीक प्रतीत होते हैं । इस में सूत्रों के साथ-साथ श्री अभयदेव-सूरि-कृत संस्कृत-विवरण भी है, किन्तु यह बहुत ही संक्षिप्त है । अनुत्तरोपपातिक-दशा शब्द की व्याख्या विवरणकार इस प्रकार करते हैं:- “अथानुत्तरोपपातिकदशासु किश्चिद्वयाख्यायते--तत्रानुत्तरेषु-सर्वोत्तमेषु विमानविशेषेषु, उपपातः-जन्म,अनुत्तरोपपातः,स विद्यते येषां तेऽनुत्तरोपपातिकास्तत्प्र- तिपादिका दशा:-दशाध्ययनप्रतिबद्धप्रथमवर्गयोगादशाः-ग्रन्थविशेषोऽनुत्तरोपपातिक- दशास्तासां च सम्बन्धसूत्रं तद्वयाख्यानं च ज्ञाताधर्म-कथा-प्रथमाध्ययनादवसेयम् । शेपं सूत्रमपि कण्ठ्यम्"। इसी प्रकार अन्य कुछ-एक स्थलों का ही विवरण किया गया है। उनमें धन्ना अनगार की उपमा के स्थल पर विशेष है। शेष सूत्रों को सरल जान कर विना किसी विवरण किये छोड़ दिया गया है । किन्तु ये सूत्र अर्थ की दृष्टि से सुगम होने पर भी ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्त्व के हैं। पाठकों की सुविधा के लिए इस सूत्र का स्पष्ट और सुगम अर्थ नीचे दिया जाता है :- चतुर्थ आरे के उस समय जब श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी निर्वाण- पद प्राप्त कर चुके थे, राजगृह नाम का एक नगर था । उस नगर के बाहर एक गुणशेलक नाम चैत्य (उद्यान) था । एक समय उस उद्यान में आर्य सुधा स्वामी पधारे । यह सुनकर उस नगर के लोग उनके मनोहर व्याख्यान सुनने के लिए उन की सेवा में उपस्थित हुए । जब उनका व्याख्यान हो चुका, तव जनता प्रसन्न-चित्त से नगर को वापस चली गई। इसके अनन्तर आर्य जम्बू स्वामी ने भगवान सुधा स्वामी से प्रश्न किया "हे भगवन् ! श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी मोक्ष को प्राप्त हो गये हैं । यह हम ने आप के मुखारविन्द से सुन लिया है कि उन्होंने आठवे अङ्ग 'अङ्गकृत्-सूत्र' का अमुक अर्थ प्रतिपादन किया है । अव मेरी जिज्ञासा के अर्थ जानने की है। कृपा करके वह भी वर्णन कीजिए।" यह सुनकर श्री सुधा स्वामी जी ने इस से उक्त नौवे अग का अर्थ कहना प्रारम्भ किया है :- इस सूत्र में "तेणं कालेणं तेणं समएणं" का "तस्मिन् काले तस्मिन् समये" सप्तम्यन्त अनुवाद किया गया है। किन्तु यह दोपाधायक नहीं है । क्योंकि अर्द्ध- . । नौवें अङ्ग प्रथमो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [७ ७ - .. मागधी भाषा में सप्तमी के स्थान पर प्रायः तृतीया का प्रयोग देखा गया है । किसी किसी आचार्य का मत है कि यहां 'ण' वाक्यालङ्कार अर्थ में है और 'ते' प्रथमा का बहुवचन है, जो यहां अधिकरण अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । किन्तु पहले पक्ष का बहुत से आचार्य समर्थन करते हैं। जैसे : -सप्तम्या द्वितीया ॥८।३।१३७॥ इस सूत्र की वृत्ति में आचार्य हेमचन्द्र जी लिखते हैं :-"सप्तम्या स्थाने कचिद् द्वितीया भवति । विज्जु जोयं भरइ रत्तिं । आर्षे तृतीयापि दृश्यते । तेणं कालेणं, तेणं समएणं-तस्मिन् काले, तस्मिन् समये इत्यर्थः । प्रथमाया अपि द्वितीया दृश्यते । चउवीसं पि जिणवरा-चतुर्विंशतिरपि जिनवरा इत्यर्थः ।" जैन सिद्धान्तकौमुदी (अर्द्धमागधी) व्याकरण के कर्ता पण्डित शतावधानि रत्नचन्द्र जी लिखते हैं:-आधारेऽपि ।।२।२।१९।। क्वचिदधिकरणेऽपि वाच्ये तृतीया स्यात् । तेणं कालेणं तेणं समएणं । जेणामेव सेणिए राया तेणामेव-यस्मिन्नेव तस्मिन्नेवेत्यर्थः। “मज्झेणय गंभीरे" "रायवर कण्णाहिं सद्धिं एगदिवसेणं पाणिं गिहाविंसु ।” इत्यादि दृष्टान्त और व्याकरण के नियमों से सिद्ध हो जाता है कि सप्तमी के अर्थ मे तृतीया का प्रयोग शास्त्र-विरुद्ध नहीं है, अपितु शास्त्र-सम्मत ही है । इस सूत्र मे राजगृह नगर का केवल नाम ही दिया गया है। इसका विशेष वर्णन औपपातिक-सूत्र में आता है । जो व्यक्ति इसके जानने की इच्छा रखते हों, उनको इसके लिये औपपातिक-सूत्र ही देखना चाहिए। यहां पर पाठकों को सुधा स्वामी के विषय में भी कुछ बता देना ठीक प्रतीत होता है । आप चतुर्दश पूर्वो के पाठी और चार ज्ञानों को धारण करने वाले थे । यद्यपि आप स्थविर-गुणों से पूर्ण 'जिन' तो नहीं थे तथापि 'जिन' के सदृश यथार्थ-वक्ता अवश्य थे । आप स्व-समय (अपने मत) और पर-समय (दूसरों के मत) के पूर्ण ज्ञाता थे। आप श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पट्ट को सुशोभित करते थे। यहां पर उनके विपय में इतना ही लिखना पर्याप्त होगा। जो उनके विषय में विशेष जानना चाहते हों, उनको 'ज्ञाता-सूत्र' से जानना चाहिए । जम्बू स्वामी के उक्त जिज्ञासा-रूप प्रश्न को सुन कर सुधा स्वामी इस प्रकार कहने लगे:- - - ८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ प्रथमो वर्गः तते णं से सुहम्मे अणगारे जंबुं अणगारं एवं वयासी:-एवं खलु जम्बू ! समणेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तिणि वग्गा पण्णत्ता । जति गंभंते! समणेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तओ वग्गा पण्णत्ता, पढ- मस्स णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं कइ अज्झयणा पण्णत्ता ? एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा-(१) जालि (२) मयालि (३) उवयालि (४) पुरीससेणे य (५) वारिसेणेय (६) दीहदंते य (७) लट्ठदंते य (८) वेहल्ले (९) वेहासे (१०) अभये ति य कुमारे। ततः स सुधर्मोऽनगारो जम्बुमनगारमेवमवादीत् “एवं खल्लु जम्बु ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन नवमस्याङ्गस्य, अनुत्तरोपपा- तिकदशानां, त्रयो वर्गाः प्रज्ञप्ताः” । “यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन नवमस्याङ्गस्य, अनुत्तरोपपातिक-दशाना, त्रयो वर्गाः प्रज्ञप्ताः, प्रथमस्य नु, भदन्त !, वर्गस्य, अनुत्तरोपपातिक- दशानां, कत्यध्ययनानि प्रज्ञप्तानि ?” “एवं खलु जम्बु!श्रमणेन यावत्सम्प्राप्तेनानुत्तरोपपातिक-दशानां प्रथमस्य वर्गस्य दशाध्य- यनानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा- (१)जालिः (२) मयालिः (३) उप- जालिः (४) पुरुषषेणः (५) वारिषेणः (६) दीर्घदान्तश्च (७) लष्ट- , प्रथमो वर्गः ] भापाटीकासहितम्। [९ - दान्तश्च (८) वेहल्लः (९) वेहायसः (१०) अभय इति च कुमाराः । पदार्थान्वयः-तते-तदनु णं-वाक्यालङ्कार के लिए है से-वह सुहम्मे- सुधा अणगारे-अनगार जंबुं अणगारं-जम्बू अनगार को एवं-इस प्रकार वयासी- कहने लगा जम्बू-हे जम्बू ! एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से समणेणं- भगवान महावीर ने जो जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं नवमस्स-नौवे अंगस्स-अङ्ग अणुत्तरोववाइय-दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तिण्णि-तीन वग्गा-वर्ग पण्णत्ता-प्रतिपादन किये हैं । भंते-हे भगवन् । जति णं- यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने नवमस्स- नौवे अंगस्स-अङ्ग अणुत्तरोबवाइय-दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तो-तीन वग्गा-वर्ग पएणत्ता-प्रतिपादन किये हैं तो भंते-हे भगवन् ! पढमस्स-प्रथम वग्गस्स-वर्ग अणुत्तरोववाइय-दसाणं-अनुत्तगेपपातिक-दशा के जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने -कितने अज्झयणा- अध्ययन पएणत्ता-प्रतिपादन किये हैं ? जंबू-हे जम्बू ! एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए जाव-यावत् समणेणं-श्रमण भगवान् ने अणुत्तरो- ववाइय-दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के पढमस्स-प्रथम वग्गस-वर्ग के दस-दश अझयणा-अध्ययन पण्णत्ता-प्रतिपादन किये हैं तं जहा-जैसे जालि-जालि कुमार मयालि-मयालि कुमार उवयालि-उपजालि कुमार य-और पुरिससेणे-पुरुषसेन कुमार य-और वीरसेणे-वीरसेन कुमार य-और दीहदंते-दीर्घदान्त कुमार य- और लट्ठदंते-लष्ठदान्त कुमार य-और वेहल्ले-वेहल्ल कुमार वेहासे-वेहायस कुमार य-और अभये-अभय कुमार इति य-इस प्रकार कुमारे-उक्त दश कुमारों के नाम वर्णन किये हैं। मूलार्थ--इसके अनन्तर वह सुधर्मा अनगार जम्वृ अनगार से कहने लगे "हे जम्बू ! इस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने नौवें अङ्ग, अनुत्तरोपपातिक-दशा, के तीन वर्गप्रतिपादन किये हैं"। "हे भगवन् ! मुक्ति को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् ने यदि नौवें अङ्ग, अनुत्तरोपपातिक- दशा, के तीन बर्ग प्रतिपादन किये हैं तो हे भगवन् ! प्रथम वर्ग, अनुत्तरोपपातिक- दशा, के कितने अध्ययन प्रतिपादन किये हैं ?" श्री सुधा कहने लगे "हे १०] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्। [प्रथमो वर्ग: ? जम्बू ! इस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए श्री भगवान् ने प्रथम वर्ग, अनुत्तरोपपातिक- दशा, के दश अध्ययन प्रतिपादन किये हैं, जैसे-जालि कुमार, मयालि कुमार, उपजालि कुमार, पुरुषसेन कुमार, वारिसेन कुमार, दीर्घदांत कुमार, लष्टदांत कुमार, वेहल्ल कुमार, वेहायस कुमार और अभय कुमार । यही प्रथम वर्ग के अध्ययनों के नाम हैं। टीका-इस सूत्र में इस ग्रन्थ का विषय संक्षेप में बताया गया है और साथ ही इसकी सप्रयोजनता भी सिद्ध की गई है । जम्बू स्वामी ने अत्यन्त उत्कट जिज्ञासा से सुधा स्वामी से पूछा कि हे भगवन् ! श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के कितने वर्ग प्रतिपादन किये हैं ? इस पर सुधा अनगार ने बताया कि उक्त सूत्र के तीन वर्ग प्रतिपादन किये गए हैं। फिर जम्बू स्वामी ने प्रश्न किया कि उन तीन वर्गों में से पहले वर्ग के कितने अध्ययन प्रति- पादन किये गये हैं ? उत्तर में सुधा स्वामी ने कहा कि श्री श्रमण भगवान ने पहले वर्ग के दश अध्ययन प्रतिपादन किये हैं। इनके नाम क्रम से निम्नलिखित हैं : १-जालि कुमार २-मयालि कुमार ३-उपजालि कुमार ४-पुरुषसेन कुमार ५-वारिसेन कुमार ६-दीर्घदान्त कुमार ७-लष्टदान्त कुमार ८-वेहल्ल कुमार ९- वेहायस कुमार और १०-अभय कुमार । यही इन दश अध्ययनों के नाम हैं। 'मयालि कुमार' शब्द के संस्कृत में कई प्रकार के अनुवाद हो सकते हैं। जैसे-मकालि कुमार, मगालि कुमार और मयालि कुमार आदि । क्योंकि "कगचजतदपयवां प्रायो लुक्" ८।१।११७। इस सूत्र से सूत्रोक्त व्यञ्जनों का लोप हो जाता है और फिर अवशिष्ट अकार के स्थान मे "अवर्णो य-श्रुतिः” ८।१०।१८०॥ इस सूत्र से यकार हो जाता है । किन्तु 'अर्द्ध-मागधी-कोष' में इसका मयालि कुमार' ही अनुवाद किया गया है । अतः यह नाम इसी तरह प्रसिद्ध हो गया है। अव प्रश्न यह उपस्थित होता है कि प्रस्तुत ग्रन्थ की सार्थकता या सप्रयो- जनता किस प्रकार सिद्ध होती है ? उत्तर में कहा जाता है कि जो भव्य व्यक्ति अपने वर्तमान जन्म मे सर्वथा कमों के क्षय करने में असमर्थ हों, वे इस जन्म के अनन्तर पांच अनुत्तर विमानों के परम-साता-वेदनीय-जनित सुखों का अनुभव प्रथमो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [ ११ करके निर्वाण-पद की प्राप्ति कर सकते हैं। किन्तु उनका पण्डित-वीर्य पुरुषार्थ किसी भी दशा में निरर्थक नहीं जाता । अतः इस 'सूत्र' की सार्थकता और सप्रयो- जनता भली भांति सिद्ध है। इस सूत्र से यह भी सिद्ध होता है कि गुरु-भक्ति से ही श्रुत-ज्ञान की अच्छी तरह से प्राप्ति हो सकती है। अब जम्बू अनगार सुधा स्वामी से फिर प्रश्न करते हैं:- जइ णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं पढमस्स वग्गस्स दस अज्झयणा पण्णत्ता, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स अणुत्तरोव० समणेणं जाव संपत्तेणं के अट्टे पण्णत्ते ? यदिनु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन प्रथमस्य वर्गस्य दशाध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, प्रथमस्य नु भदन्त ! अध्ययनस्या- नुत्तरोपपातिक-दशानां श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः ? पदार्थान्वयः-भंते-हे भगवन् ! जइ-यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने पढमस्स-प्रथम वग्गस्स-वर्ग के दस-दश अज्झयणा-अध्ययन पएणत्ता-प्रतिपादन किये हैं, तो भंते-हे भगवन् ! पढमस्स- प्रथम अज्झयणस्स-अध्ययन अणुत्तरोव-अनुत्तरोपपातिक-दशा के जाव-यावत संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने के-क्या अडे-अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है। मूलार्थ-हे भगवन् ! यदि मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने प्रथम वर्ग के दश अध्ययन प्रतिपादन किये हैं तो हे भगवन् ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? टीका---पिछले सूत्रों का प्रश्नोत्तर-क्रम इस सूत्र में भी रखा गया है, , १२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः क्योंकि यह शैली अत्यन्त रोचक है और इससे परिमित शब्दों में ही अभीष्ट अर्थ समझाया जा सकता है । तदनुसार ही श्री जम्बू स्वामी श्री सुधर्मा स्वामी से पूछते हैं कि हे भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने-जो 'नमो त्थु णं' में कहे हुए सब गुणों से परिपूर्ण है और मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं--प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है । मुझको इसकी जिज्ञासा है कृपा करके यह मुझको सुनाइए। इस सूत्र से भी यही सिद्ध किया गया है कि विनय-पूर्वक अध्ययन किया हुआ ज्ञान ही सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं । जो शिष्य विनय-पूर्वक गुरु से ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसीको गुरु सम्यग्-ज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं । तथा जिसका आत्मा उक्त ज्ञान से परिपूर्ण होता है, वह सहज ही में अन्य आत्माओं के उद्धार करने में समर्थ हो सकता है। अतः सिद्ध यह हुआ कि गुरु से विनय-पूर्वक ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । यह सफल होता है। अब सुधा स्वामी जम्बू स्वामी के उक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए निम्न-लिखित सूत्र में प्रथम अध्ययन का अर्थ वर्णन करते हैं: एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे रिद्धिस्थिमियसमिद्दे, गुणसिलए चेतिते, सेणिए राया, धारिणी देवी, सीहो सुमिणे। जालीकुमारो जहा मेहो। अट्ठओ दाओ जाव उप्पिं पासा० विहरति।सामी समोसढे सेणिओ णिग्गओ। जहा मेहो तहा जालीवि णिग्गतो। तहेव णिक्वंतो जहा मेहो । एक्कारस अंगाई अहिज्जति । गुणरयणं तवोकम्मं, एवं जा चेव खंदग- वत्तव्वया सा चेव चिंतणा आपुच्छणा थेरेहिं सद्धिं विपुलं तहेव दुरूहति, नवरं सोलस वासाइं सामन्न-परियागं पाउ- प्रथमो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [१३ h Vivornmun णित्ता कालमासे कालं किच्चा उड्ढं चंदिम० सोहम्मी- साण जाव आरणच्चुए कप्पे नव य गेवेजे विमाणपत्थढे उड्ढं दूरं वीतीवत्तित्ता विजय-विमाणे देवत्ताए उववण्णे। तते णं ते थेरा भगवंता जालिं अणगारं कालगयंजाणेत्ता परिनिव्वाणवत्तियं काउस्सगं करेंति २ पत्त-चीवराई गेण्हंति तहेव ओयरंति। जाव इमे से आयार-भंडए। भंते ! त्ति भगवं गोयमे जाव एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पियाणं अंतेवासी जालि-नाम अणगारे पगति- भद्दए।से णं जाली अणगारे कालगते कहिं गते ? कहिं उववन्ने ? एवं खलु गोयमा ! ममं अंतेवासी तहेव जधा खंदयस्स जाव कालं० उड्ढे चंदिम जाव विजए विमाणं देवत्ताए उववन्ने। जालिस्सणं भंते ! देवस्स केवतियं कालं ठिती पण्णत्ता ? गोयमा ! बत्तिसं सागरोवमाई ठिती पण्णत्ता।से णं भंते!ताओ देवलोयाओ आउक्खएणं ३ कहिं गच्छिहिति ? गोयमा! महाविदेहे वासे सिज्झि- हिति, ता एवं जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोव- वाइयदसाणं पढम-बग्गस्स पढम-अज्झयणस्स अयमद्वे पण्णत्ते । पढम-बग्गस्स पढम अज्झयणं समत्तम् । एवं खलु जम्बु ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहं नगरमभूत् । ऋद्धिस्तिमितसमृद्धं गुणशैलकं चैत्यम् । श्रेणिको १४ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्ग: vNAM , राजा, धारिणी देवी, सिंहः स्वप्ने, जालिकुमारो यथा मेघः। अष्टाष्ट दातानि । यावदुपरि प्रासादे विहरति ।खामी समवस्मृतःश्रेणिको निर्गतः । यथा मेघो तथा जालिरपि निर्गतः। तथैव निष्क्रान्तो यथा मेघः । एकादशाङ्गान्यधीते । गुणरत्नं तपः-कर्म, एवं या चैव स्कन्दक-वक्तव्यता सैव चिन्तनाऽऽपृच्छणा। स्थविरैः सार्द्ध विपुलं तथैव दू(आ) रोहति । नवरं षोडश वर्षाणि श्रामण्य-पर्याय पालयित्वा काल-मासे कालंकृत्वोर्ध्वं चन्द्र० सौधर्मेशानयोः आरण्यच्युतयोः कल्पे च अवेयक-विमान प्रस्तटादूर्ध्वं व्यति- वर्त्य विजय-विमाने देवतयोत्पन्नः । ततो नु स्थविरा भगवन्तो जालिमनगारं काल-गतं ज्ञात्वा परिनिर्वाणवर्तिनं कायोत्सर्ग कुर्वन्ति, कृत्वा च पात्र-चीवराणि गृह्णन्ति, तथैवावतरन्ति "याव- दिमान्यस्याचार-भाण्डकानि"। "भगवन् !” इति भगवान् गोतमो यावदेवमवादीत् “एवं खल्लु देवानुप्रियाणामन्तेवासी जालि- नामाऽनगारः प्रकृति-भद्रकः । स नु जालिरनगारः काल-गतः कुत्र गतः? कुत्रोत्पन्नः ?” “एवं खलु गोतम! ममान्तेवासी तथैव यथा स्कन्दकस्य यावत् काल० ऊर्ध्वं चन्द्रमसो यावद्विजय-वि- माने देवतयोत्पन्नः" "जालेर्नु भगवन् ! देवस्य कियान् कालः स्थितिः प्रज्ञप्ता ?” “गोतम ! द्वात्रिंशत्सागरोपमा स्थितिः प्रज्ञप्ता” “स नु भगवन् ! ततो देवलोकादायुःक्षयेण (स्थिति- क्षयेण, भव-क्षयेण) कुत्र गमिष्यति ?” “गोतम ! महाविदेहेवर्षे सेत्स्यति।” तदेवं जम्बु! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनाऽनुत्तरोपपातिक- दशानां प्रथम-वर्गस्य प्रथमाध्ययनस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः । प्रथम- प्रथमो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [ १५ - - A वर्गस्य प्रथमाध्ययनं समाप्तम् । पदार्थान्वयः-जंबू !-हे जम्बू ' एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से (प्रथमा- ध्ययन का अर्थ है ।) तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय राय- गिहे-राजगृह णगरे-नगर था रिद्धि-ऋद्धि-ऊँचे २ भवन आदि तथा स्थिमिय- भय-रहित और समिद्धे-धन-धान्य से युक्त था। गुणसिलए-गुणशैल चेतिते- चैत्य, सेणिए-श्रेणिक राया-राजा धारिणी देवी-धारिणी देवी सीहो सुमिणे- सिंह का स्वप्न जालिकुमारो-जालिकुमार जहा मेहो-जैसे मेव कुमार अट्ठो- आठ २ दामो-दात (अर्थात् विवाह के साथ लड़की की ओर से आने वाला दहेज) जाव-यावत् उप्पिं पास-प्रासाद के ऊपर सुख-पूर्वक विहरति-विचरण करता है सामी-श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी समोसढे-सिंहासन के ऊपर विराजमान हो गये सेणियो-श्रेणिक राजा णिग्गो-श्री भगवान की वन्दना के लिए गया जहा-जैसे मेहो-मेघकुमार गया था जालीवि-जालिकुमार भी णिग्गतो- भगवान् की वन्दना के लिए गया तहेव-उसी प्रकार णिक्खंतो-निकला अर्थात् दीक्षित हुआ जहा मेहो-जिस प्रकार मेघकुमार की दीक्षा हुई थी एक्कारस-एकादश अंगाई-अङ्ग शास्त्रों का अहिजति-अध्ययन किया गुणरयणं-गुणरत्न तवोकम्मं- तप कर्म एवं-इसी प्रकार जा चेव-जो कुछ भी खंदग-वत्तवया स्कन्दक मुनि की वक्तव्यता है सा चेव-चही वक्तव्यता जालिकुमार की भी जाननी चाहिए। उसी तरह की चिंतणा-धर्म-चिन्तना आपुच्छणा-श्री भगवान् से अनशन व्रत के धारण करने की आज्ञा लेना । थेरेहि-स्थविरों के सद्धिं-साथ तहेव-उसी प्रकार विपुलं- विपुलगिरि पर दुरुहति-चढ़ता है । उस पर चढ़ कर नवरं-इतना विशेप है कि सोलस वासाई-सोलह वर्ष तक सामन्न-परियागं-श्रामण्य-पर्याय का पाउणित्ता- पालन कर कालमासे मृत्यु के अवसर पर कालं किच्चा-काल करके उड्डे-ऊंचे चंदिम०-चन्द्र से यावन् सोहम्मीसाण-सौधर्म-देवलोक, ईशान-देवलोक जाव- यावत् श्रारणच्चुए-आरण्य-देवलोक और अच्युत-देवलोक अर्थात् कप्पे-बारह कल्प-देवलोक य-और गेवेज-त्रैदेयक विमाण-विमान पत्थडे-प्रस्तट उड्डे-इनसे भी ऊंचे दूर-और दूर बीतिवत्तित्ता - व्यतिक्रम करके विजय-विमाणे-विजय-विमान में देवत्ताए-देव-रूप से उववएणे-उत्पन्न हुआ। तते-इसके अनन्तर णं-वाक्या- - - १६ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः ~~~~~~~~ लङ्कार के लिए है ते-वे थेरा भगवंता-स्थविर भगवन्त जालि-जालि अणगारं- अनगार को काल-गयं-काल-गत हुआ जाणेत्ता-जानकर परिनिव्वाण-वत्तियं- निर्वाण के निमित्त काउस्सगं-कायोत्सर्ग करेंति २-करते हैं और फिर कायोत्सर्ग करके पत्त-चीवराई-पात्र और वस्त्र गेण्हंति-ग्रहण करते हैं तहेव-उसी प्रकार शनैः शनैः उस पर्वत से ओयरंति-उतरते हैं । जाव-यावत् श्री श्रमण भगवान् महा- वीर स्वामी के सम्मुख आकर कहते हैं कि हे भगवन् ! इमे-ये से-उस जालि अन- गार के आयार-भंडए-वर्पा-काल आदि में ज्ञान आदि आचार पालने के भण्डोप- करण हैं अर्थात् धर्म-साधन के उपयोगी उपकरण हैं । तब उसी समय भंते ! त्ति- हे भगवन् । इस प्रकार कहकर भगवं-भगवान् गोयमे-गौतम स्वामी जाव-यावत् श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पास इस प्रकार वयासी-कहने लगे एवं खलु- इस प्रकार निश्चय से देवाणुप्पियाणं-देवानुप्रिय, आपका अंतेवासी-शिष्य जालि नाम-जालि नाम वाला अणगारे-अनगार पगति-भद्दए-प्रकृति से ही भद्र से णं-वह जाली अणगारे जालि अनगार काल-गते-काल को प्राप्त हो कर कहिं गते-कहां गया है ? कहिं-कहां उववन्ने-उत्पन्न हुआ है ? गोयमा-हे गौतम ! एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से ममं मेरा अंतेवासी-शिष्य तहेव-अर्थात् प्रकृति से भद्र जालि कुमार जधा-जिस प्रकार खंदयस्स-स्कन्दक की वक्तव्यता है उसी प्रकार जाव- यावत् काल-काल करके उड्ढे-ऊंचे चंदिम-चन्द्र से जाव-यावत् विजए-विजय नाम वाले विमाणे-विमान में देवत्ताए-देव-रूप से उववन्ने-उत्पन्न हुआ है । अपने प्रश्न के उचित उत्तर मिलने पर फिर गौतम स्वामी ने श्री भगवान से पूछा भंते - हे भगवन् ! णं-वाक्यालङ्कार के लिए है जालिस्स-जालि देवस्स-देव की केव- तियं-कितने कालं-काल तक ठिती-स्थिति पएणत्ता-प्रतिपादन की है ? फिर उत्तर में श्री भगवान् कहने लगे गोयमा!-हे गौतम ! बत्तीस-बत्तीस सागरोव- माई-सागरोपम की ठिती-स्थिनि पएणत्ता-प्रतिपादन की है। फिर गौतम स्वामी पूछते हैं भंते ! हे भगवन् ! से-वह जालिकुमार देव तारो-उस देवलोगायो- देव-लोक से आउक्वएणं ३-आयु, स्थिति और देव-भव-(लोक) के क्षय होने पर कहिं-कहां गच्छिहिंति-जायगा अर्थात् किस स्थान पर उत्पन्न होगा। भगवान् उत्तर दिया गोयमा !-हे गौतम ! महाविदेहे वासे-महाविदेह क्षेत्र में सिज्झिहिति- सिद्ध होगा अर्थात् वहां सिद्धि प्राप्त कर सिद्ध, बुद्ध, मुक्त होगा और निर्वाण-पद - प्रथमो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [ १७ प्राप्त कर सारे शारीरिक और मानसिक दुःखों का अन्त करेगा। ता-इसलिए एवं- इस प्रकार खलु-निश्चये से जंबू !-हे जम्बू! समणेणं-श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने जाव-यावत् संपत्तेणं-जिनको मोक्ष की प्राप्ति हो चुकी है अणुत्तरोववाइय- दसाणं-अनुतरोपपातिक-दशा के पढमवग्गस्स-प्रथम वर्ग के पढम-अज्झयणस्स- प्रथम अध्ययन का अयमहे-यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है। पढम-बग्गस्स- प्रथम वर्ग का पढम-अज्झयणं-प्रथम अध्ययन समत्तं समाप्त हुआ। मूलार्थ-हे जम्बू ! इस प्रकार श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने प्रतिपादन किया है कि उस काल और उस समय में ऋद्धि, धन, धान्य से युक्त और भय-रहित राजगृह नाम का नगर था। उसके बाहर एक गुणशील नामक चैत्य (उद्यान) था । वहां श्रेणिक राजा राज्य करता था। उसकी धारिणी नाम की देवी थी। धारिणी देवी ने स्वम में सिंह देखा । जिस प्रकार मेधकुमार का जन्म हुआ था, उसी प्रकार जालिकुमार का जन्म हुआ । (जालिकुमार का पाठ कन्याओं के साथ विवाह हुआ I) आठों के घर से उसको बहुत दात (दहेज) आया । इस प्रकार सारे सुखों का अनुभव करता हुआ वह अपने राज- प्रासादों में विचरण करने लगा। इसी समय गुणशीलक चैत्य में श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी विराजमान हुए। वहां श्रेणिक राजा उनकी वन्दना के लिए गया। जिस प्रकार मेघकुमार (श्री श्रमण भगवान के दर्शनों के लिए) गया था, उसी प्रकार जालिकुमार भी गया । इसके अनन्तर ठीक मेघकुमार के समान ही जालिकुमार भी दीक्षित हो गया। उसने एकादशाङ्ग शास्त्रों का अध्ययन किया। इसी तरह गुणरत नामक तप भी किया। शेप जिस प्रकार स्कन्दक संन्यासी की वक्तव्यता है, उसी प्रकार इसके विषय में भी जाननी चाहिए। उसी प्रकार धर्म-चिन्तना, श्री भगवान् से अनशन का विपय पूछना आदि । फिर वह उसी तरह स्थविरों के साथ विपुलगिरि पर्वत पर चढ़ गया । विशपता केवल इतनी है कि वह सोलह वर्ष के श्रामण्य-पर्याय का पालन कर मृत्यु के समय के आने पर काल करके चन्द्र से ऊंचे सौधर्मेशान, श्रारण्याच्युत-कल्प देवलोक और अवेयक-विमान-प्रस्तटों से भी ऊंचे व्यतिक्रम करके विजय विमान में देव- रूप से उत्पन्न हुआ । तर वे स्थविर भगवान् जालि अनगार को काल-गत हुया जानकर परिनिर्वाण-प्रत्ययिक कायोत्मर्ग करके तथा जालि अनगार के १८ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्ग: वस्त्र और पात्र लेकर उसी प्रकार पर्वत से उतर आए और श्री श्रमण भगवान् महा- वीर की सेवा में उपस्थित होकर उन्होंने सविनय निवेदन किया कि हे भगवन् ! ये जालि अनगार के धर्म-आचार आदि साधन के उपकरण हैं । इसके अनन्तर भगवान् गोतम ने श्री भगवान से प्रश्न किया "हे भगवन् ! भद्र-प्रकृति और विनयी वह आप का शिष्य जालि अनगार मृत्यु के अनन्तर कहां गया ? कहां उत्पन्न हुआ ?" श्री श्रमण भगवान् ने इसके उत्तर में प्रतिपादन किया "हे गोतम ! मेरा अन्तेवासी जालि अनगार चन्द्र से और बारह कल्प देवलोकों से नव ग्रैवेयक विमानों का उल्लङ्घन कर विजय-विमान में देव-रूप से उत्पन्न हुआ है।" गोतम ने फिर प्रश्न किया "हे भगवन् ! उस जालि देव की वहां कितनी स्थिति है ?" श्री भगवान् ने उत्तर दिया "हे गोतम ! जालि देव की वहां बत्तीस सागरोपम स्थिति प्रतिपादन की गई है" गोतम ने फिर पूछा "हे भगवन् ! वह जालिदेव उस देवलोक से आयु, भव और स्थिति क्षय होने पर कहां जायगा ?" श्री भगवान् ने फिर उत्तर दिया "हे गोतम ! तदनन्तर वह महा- विदेह क्षेत्र में सिद्ध-गति प्राप्त करेगा अर्थात यावत मानसिक और शारीरिक दुःखों से सर्वथा मुक्त होकर निर्वाण-पद को प्राप्त करेगा" श्री सुधर्मा स्वामी जम्बू स्वामी से कहते हैं कि हे जम्बू ! इस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अनुत्तरोपपातिक दशा के प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह अर्थ प्रतिपादन किया है । प्रथम वर्ग का प्रथम अध्ययन समाप्त हुआ। टीका-इस सूत्र में जालिकुमार के विषय में प्रतिपादन किया गया है। यह ध्यान मे रखने के योग्य है कि इस अध्ययन मे कथित विषय 'ज्ञातासूत्र' के प्रथम अध्ययन के-जिसमें मेघकुमार के विषय मे कहा गया है-विषय के समान ही है । अर्थात् 'ज्ञातासूत्र' के प्रथम अध्ययन में जिस प्रकार मेघकुमार के विपय मे प्रतिपादन किया गया है, उसी प्रकार इस सूत्र के इस अध्ययन मे जालिकुमार के विषय में भी प्रतिपादन किया गया है । इस सूत्र मे सब वर्णन संक्षेप से ही कहा गया है। इसका कारण यही है कि 'ज्ञातासूत्र' मे इस राजगृह नगर, श्रेणिक राजा और धारिणी देवी का विस्तृत वर्णन दिया जा चुका है। उस सूत्र की संख्या छठी है और इसकी नवीं । अतः प्रथमो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । 5 पहले आए हुए विषय का यहां केवल संकेतमात्र दिया गया है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सूत्रकार ने यहां संक्षिप्त वर्णन दिया है यह जान लेना चाहिए । अब शङ्का उपस्थित होती है कि जब मेघकुमार भी जालि अनगार के समान अनुत्तर विमान मे ही उत्पन्न हुआ था तो मेघकुमार का वर्णन 'ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्र' मे क्यों दिया गया ? उत्तर में कहा जाता है कि मेघकुमार का वर्णन छठे अङ्ग में इसलिए किया गया है कि उसमे धर्मयुक्त पुरुषों की शिक्षा-प्रद जीवन-घटनाओं का वर्णन है । उनमे से मेधकुमार के जीवन मे भी कितनी ही ऐसी शिक्षाएं वर्णन की गई हैं, जिनके पढ़ने से प्रत्येक व्यक्ति को अत्यन्त लाभ हो सकता है । किन्तु अनुत्तरोपपातिकसूत्र में केवल सम्यक् चरित्र पालन करने का फल बताया गया है। अतः मेघकुमार के चरित्र मे विशेषता दिखाने के लिए उसका चरित्र नवें अङ्ग मे न देकर छठे ही अङ्ग में दे दिया गया है । जो व्यक्ति इस सूत्र के अध्ययन के इच्छुक हों, उनको इससे पूर्व जाताधर्म- कथागसूत्र' के प्रथम अध्ययन का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। यह सूत्र इतना सार-पूर्ण है कि इससे व्याकरण पढ़ने वालों को समासान्त पदों का भली भांति बोध हो सकता है, साहित्य के अध्ययन करने वालों को अलङ्कारों का, इतिहास के जिज्ञासुओं को पच्चीस सौ वर्ष पहले के भारतवर्ष का, धार्मिक पुरुषों को अनेक धार्मिक शिक्षाओं का, नीति के जिज्ञासुओं को साम दाम दण्ड और भेद चारों नीतियों का भली भांति वोध हो सकता है। न केवल इतना ही बल्कि शिल्पी व्यक्तियों को अनेक प्रकार के शिल्प और कलाओं का, काम-शास्त्र के जिज्ञासुओं को तरुणी-प्रति- क्रम और धार्मिक-दीक्षा आदि महोत्सव मनाने वालों को अनेक प्रकार के महोत्सव मनाने का पता लग जाता है । इसी प्रकार इस सूत्र से पुण्यात्माओं को पुण्य और पापात्माओं को पाप का फल भी ज्ञात हो जाता है । पुनर्जन्म न मानने वालों को उसकी सिद्धि के अत्युत्तम प्रमाण इसमें मिल सकते हैं। अध्यापक लोग भी इससे प्राचीन अध्यापन-शैली का एक अत्युत्तम चित्र प्राप्त कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई व्यक्ति जो इस सूत्र का स्वाध्याय करेगा, बिना कुछ प्राप्त किये निराश नहीं जा सकता । अतः प्रत्येक को इसका स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए । इसी बात को लक्ष्य में रखते हुए सूत्रकार ने यहां इस विषय का अधिक विस्तार नहीं किया। क्योंकि यदि आकांक्षा रहेगी तो पाठक अवश्य ही उसको पूर्ण करने के लिये उक्त २० ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [प्रथमो वर्गः 'ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्र' का अध्ययन करेंगे और उससे उनके ज्ञान-भण्डार मे अधिक से अधिक वृद्धि होगी । अतः जिस ग्रन्थ के पढ़ने से सूत्र-सम्बन्धी सब बातों के ज्ञान के साथ कुछ और भी उपलब्ध हो, उसको क्यों न पढ़ा जाय । बुद्धिमान लोग सदा ऐसे ही कार्य किया करते हैं, जिनमे एक ही क्रिया से दो कार्यों का साधन हो। सारांश यह है कि उपादेय वस्तु का सदा आदर होना चाहिए और उक्त शास्त्र सर्वथा उपादेय है । अतः उसका स्वाध्याय भी अवश्य करना चाहिए । यहां पर हस्त-लिखित प्रतियों में उपलब्ध पाठ-भेद भी नहीं दिखाये गये हैं, क्योंकि वे सब 'ज्ञाताधर्मकथाङ्ग' के ही पद हैं। अब सूत्रकार शेष अध्ययनों के विषय मे कहते हैं :- एवं सेसाणवि अट्ठण्हं भाणियव्वं, नवरं सत्त धारिणि-सुआ वेहल्ल-बेहासा चेल्लणाए।आइल्लाणं पंचण्हं सोलस वासाति सामन्न-परियातो, तिण्हं बारस वासाति दोण्हं पंच वासाति। आइल्लाणं पंचण्हं आणुपुवीए उव- वायो विजये, वेजयंते, जयंते, अपराजिते, सव्वट्ठ-सिद्धे । दीहदंते सव्वट्ठसिद्धे । उक्कमेणं सेसा। अभओ विजए। सेसं जहा पढमे । अभयस्स णाणत्तं, रायगिहे नगरे, सेणिए राया, नंदा देवी माया, सेसं तहेव । एवं खलु जंबू ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइय-दसाणं पढमस्स वग्गस्स अयमढे पण्णत्ते । (सूत्र १) एवं शेषाणामप्यष्टानां भणितव्यम् , नवरं सप्त धारिणि- सुताः, वेहल्ल-बेहायसौ चेल्लणायाः आदिकानां पञ्चानां षोडश वर्षाणि श्रामण्य-पर्यायम्, त्रयाणां द्वादश वर्षाणि, द्वयोः पञ्च प्रथमो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [२१ , वर्षाणि । आदिकानां पञ्चानामानुपूर्योपपातो विजये, वैजयन्ते, जयन्ते, अपराजिते, सर्वार्थसिद्धे । दीर्घदन्तस्य सर्वार्थसिद्धे । उत्क्रमेण शेषाः। अभयो विजये । शेषं यथा प्रथमस्य। अभयस्य नानात्वं राजगृहं नगरम्, श्रेणिको राजा, नन्दादेवी माता, शेषं तथैव । एवं खल्लु जम्बु ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक- दशानां प्रथमस्य वर्गस्यायमर्थः : प्रज्ञप्तः । (सूत्र १) पदार्थान्वयः-एवं-इसी प्रकार सेसाणवि-शेष अट्टएहं-आठ अध्ययनों का भी वर्णन भाणियव्वं-जानना चाहिए नवरं-विशेष इतना ही है कि सत्त-सात धारिणि-सुआ-धारिणी देवी के पुत्र थे और वेहल्ल-वेहासा-वेहल्ल और वेहायस कुमार चेल्लणादेवी के पुत्र थे । पाइल्लाणं-आदि के पंचण्ह-पांचों ने सोलस वासाति-सोलह वर्ष का सामन्न-परियातो-श्रामण्य-पर्याय पालन किया और तिण्हं- तीन ने वारस वासाति-बारह वर्षों का संयम-पर्याय पालन किया और दोण्हं- दो ने पंच वासाति-पांच वर्ष का सयम-पर्याय पालन किया था, आइल्लाणं-आदि के पंचएहं-पांच की आणुपुबीए-अनुक्रम से विजये-विजय विमान वेजयंते- वैजयन्त विमान जयंते-जयन्त विमान अपराजिते-अपराजित विमान और सबट्ठ- सिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमान मे उववायो-उत्पत्ति हुई और उक्कमेणं-उत्क्रम से सेसा- अवशिष्ट कुमारों की उत्पत्ति हुई। किन्तु दीहदंते-दीर्घदन्त भी सव्वहसिद्धे-सर्वार्थ- सिद्ध विमान में और अभो-अभय कुमार विजए-विजय विमान में ही उत्पन्न हुए । सेसं-शेप अधिकार जहा-जैसे पढमे-प्रथम अर्थात जालि कुमार के विपय में कहा गया है उसी प्रकार जानना चाहिए। अभयस्स-अभय कुमार की णाणत्तं- विशेषता इतनी ही है कि वह रायगिहे-राजगृह नगरे-नगर में उत्पन्न हुआ था और सेणिए-श्रेणिक राया-राजा ( उसका पिता था) तथा नंदा देवी-नन्दादेवी माया-माता थी सेसं-शेप वर्णन तहेव-पूर्ववत ही जानना चाहिए । जंबू-सुधर्मा स्वामी जी जम्बू स्वामी को सम्बोधित कर कहते हैं "हे जम्बू ! एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से जाव-यावत संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए सणमणं-श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अणुत्तरोववाड्यदसाणं-अनुत्नरोपपातिक-दशा के पढमस्स-प्रथम - २२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ प्रथमो वर्गः vv वग्गस्स-वर्ग का अयमहे-यह अर्थ पण्णत्ते-प्रतिपादन किया है (सूत्र १-पहला सूत्र समाप्त हुआ ।) मूलार्थ-इसी प्रकार शेष आठ (नौ) अध्ययनों के विषय में भी जानना चाहिए । विशेषता केवल इतनी ही है कि अवशिष्ट कुमारों में से सात धारिणी देवी के पुत्र थे, वेहल्ल और वेहायस कुमार चेल्लणा देवी के पुत्र थे। पहले पांच ने सोलह वर्ष तक, तीन ने बारह वर्ष और दो ने पांच वर्ष तक संयम-पर्याय का पालन किया था । पहले पांच क्रम से विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और सर्वार्थसिद्ध विमानों में, दीर्घदन्त सर्वार्थसिद्ध और अभयकुमार और विजय विमान में उत्पन्न हुए और शेष अधिकार जिस प्रकार प्रथम अध्ययन में वर्णन किया गया है उसी प्रकार जानना चाहिए। अभयकुमार के विषय में इतनी विशेषता है कि वह राजगृह नगर में उत्पन्न हुआ था और श्रेणिक राजा तथा नन्दादेवी उसके पिता-माता थे । शेप सब वर्णन पूर्ववत् ही है । श्री सुधर्मा स्वामी जम्बू स्वामी से कहते हैं कि हे जम्बू ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के प्रथम वर्ग का यह अर्थ प्रतिपादन किया है। पहला वर्ग समाप्त हुआ । टीका-इस सूत्र में प्रथम वर्ग के शेष नौ अध्ययनों का वर्णन किया गया है । इनका विषय भी प्रायः पहले अध्ययन के साथ मिलता-जुलता है। विशे- पता केवल इतनी है कि इनमे से सात तो धारिणी देवी के पुत्र थे और वेहल्ल कुमार और वेहायस कुमार चेल्लणा देवी के तथा अभय कुमार नन्दा देवी के पेट से उत्पन्न हुआ था । पहले पांचों ने सोलह वर्प संयम-पर्याय का पालन किया था, तीन ने वारह वर्ष तक और शेप दो ने पांच वर्ष तक । पहले पांच अनुक्रम से पांच अनुत्तर विमानों में उत्पन्न हुए और पिछले उत्क्रम से पांच अनुत्तर विमानों में । यह इन दश मुनियों के उत्कट संयम-पालन का फल है कि वे एकावतारी होकर उक्त विमानों में उत्पन्न हुए । सिद्ध यह हुआ कि सम्यक् चारित्र पालन करने का सदैव उत्तम फल होता है । उस फल का ही यहां सुचारु-रूप से वर्णन किया गया है । जो भी व्यक्ति सम्यक् चारित्र का आराधन करेगा, वह शुभ फल से कभी भी वञ्चित नहीं रह सकता। अतः यह प्रत्येक व्यक्ति के लिये उपादेय है।

प्रथमो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [२३ , इन नौ अध्ययनों के विषय में हस्त-लिखित प्रतियों में निम्नलिखित पाठमेद मिलता है- "एवं सेसाणवि नवण्हं भाणियव्वं नवरं सत्तण्हं धारिणिसुया, विहल्ले विहायसे चेल्लणाअत्तए, अभय नंदाएअत्तइ । आइल्लाणं पंचण्हं सोलस वासाइं सा- मण्णं परियाओ पाउणित्ता, तिण्हं वारस वासाई दोण्हं पंच वासाइं । आइल्लाणं पंचण्हं आणुपुवीए उववाओ विजए, विजयंते, जयंते, अपराजिए, सम्वट्ठसिद्धे दीहदंते, सव्वट्ठसिद्धे, लट्ठदंते अपराजिए, विहल्ले जयंते, विहायसे विजयंते, अभय विजए । सेसं जहा पढमे तहेव । एवं खलु जंबु ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरो- ववाइय-दसाणं पढमस्स बग्गस्स अयमद्वे पण्णत्ते । इति प्रथम-वर्गः समापः ।" हमने यहां पत्राकार मुद्रित पुस्तक का ही पाठ मूल रूप में रखा है। मुद्रित पुस्तक में जैसे कि पाठकों को हमारे मुद्रित मूल से बात होगा शेप आठ अध्ययनों के विषय में ही पाठ दिया गया है। किन्तु लिखित प्रतियों में जैसा कि ऊपर दिया गया है पूरे नौ अध्ययनों के विपय में कहा गया है । किन्तु इस में कोई भेद नहीं पड़ता, क्योंकि मुद्रित पुस्तक में भी पहले आठ का वर्णन देकर अन्त में अभय कुमार का भी पृथक् वर्णन दे दिया गया है और लिखित प्रतियों में सब का संग्रह-रूप से ही दिया है । अतः इस में कोई विशेष आपत्ति न देखकर ही हमने मुद्रित पुस्तक का पाठ ही मूल में रखा है। इस सूत्र से पाठकों को शिक्षा लेनी चाहिए कि वे भी कर्म-विशुद्धि के उपायों का अन्वेषण करे । इस प्रकार श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अनु- तरोपपातिक सूत्र के प्रथम-वर्ग का अर्थ प्रतिपादन किया है। श्री सुधा स्वामी के इस प्रकार कथन से उनकी गुरु-भक्ति प्रकट होती है। साथ ही आत्मोद्धनता का परिहार और झास्त्र की सप्रयोजनता भी सिद्ध होती है । जम्बू स्वामी ने उनके इस कथन को सहर्ष स्वीकार किया। इससे इस सूत्र की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। आप-वाक्य सर्वत्र ही प्रामाणिक होते हैं । अतः यह सूत्र भी आप्त-वाक्य होने से निःसन्देह ही प्रमाण-कोटि में है। -- प्रथमो वः समारः।

२६] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ द्वितीयो वर्गः को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के द्वितीय वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? श्री सुधा स्वामी ने उत्तर दिया कि हे जम्बू ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के द्वितीय वर्ग के तेरह अध्य- यन प्रतिपादन किये हैं जैसे-दीर्घसेन कुमार, महासेन कुमार, लष्टदन्त कुमार, गूढदन्त कुमार, शुद्धदन्त कुमार, हल्ल कुमार, द्रुम कुमार, द्रुमसेन कुमार, महाद्रुम- सेन कुमार, सिंह कुमार, सिंहसेन कुमार, महासिंहसेन कुमार और पुण्यसेन कुमार । इस प्रकार द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययन होते हैं। टीका-प्रथम वर्ग की समाप्ति के अनन्तर श्री जम्बू स्वामी जी ने श्री सुधर्मा खामी जी से सविनय निवेदन किया कि हे भगवन् ! अनुत्तरोपपातिक सूत्र के प्रथम वर्ग का अर्थ जिस प्रकार श्री श्रमण भगवान् ने प्रतिपादन किया था वह मैंने आपके मुखारविन्द से उपयोग-पूर्वक श्रवण कर लिया है । अब, हे भगवन् ! आप कृपया मुझको बताइए कि मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् ने अनुत्तरो- पपातिक-दशा के द्वितीय वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? इस प्रश्न को सुन कर श्री सुधर्मा स्वामी अपने प्रिय शिष्य को सम्बोधित कर कहने लगे कि हे जम्यू! मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् ने उक्त सूत्र के द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययन प्रतिपादन किये हैं। पाठक उनका नाम मूलार्थ और पदार्थान्वय से जान उक्त कथन से भली भांति सिद्ध होता है कि अपने से बड़ों से जो कुछ भी पूछना हो वह नम्रता से ही पूछना चाहिए । विनय-पूर्वक प्राप्त किया हुआ ज्ञान ही पूर्णरूप से सफल हो सकता है और सर्वथा विकाश को प्राप्त होता है । अतः प्रत्येक छात्र को गुरु से शाखाध्ययन करते हुए विनय से रहना चाहिए । अन्यथा उसका अध्ययन कभी भी सफल नहीं हो सकता। सामान्य रूप से द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययनों का नाम सुनकर श्री जम्बू स्वामी विशेष रूप से प्रत्येक अध्ययन के अर्थ जानने की इच्छा से फिर श्री सुधर्मा स्वामी से विनय-पूर्वक पूछते हैं :- जति णं भंते ! समणणे जाव संपत्तंणे अणुत्तरो- ववाइय-दसाणं दोच्चस्स वग्गस्स तेरस अज्झयणा पं० द्वितीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [२७ , , दोच्च० भंते ! वग्गस्स पढमज्झयणस्स सम० ३ जाव सं० के अढे पं० ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे, गुणसिलते चैतिते, सेणिए राया धारिणी देवी, सीहो सुमिणे, जहा जाली तहा जम्म बालत्तणं कलातो नवरं दीहसेणे कुमारे।सच्चेव वत्तव्वया जहा जालिस्स जाव अंतं काहिति। एवं तेरसवि रायगिहे सेणिओ पिता धारिणी माता । तेरसण्हवि सोलसवासा परियातो, आणुपुव्वीए विजए दोन्नि, वेजयंते दोन्नि, जयंते दोन्नि, अपराजिते दोन्नि, सेसा महादुमसेणमाती पंच सव्वठ्ठसिद्धे । एवं खलु जंबू ! समणेणं० अनुत्तरो- ववाइय-दसाणं दोच्चस्स वग्गस्स अयम? पण्णत्ते।मासि- याए संलेहणाए दोसुवि वग्गेसु । (सूत्र २) यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक दशानां द्वितीयस्य वर्गस्य त्रयोदशाध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, द्विती- यस्य, भदन्त ! वर्गस्य प्रथमाध्ययनस्य श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः? एवं खलु जम्बु ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहं नगरं गुणशैलकं चैत्यम् , श्रेणिको राजा धारिणी देवी, सिंहः स्वप्ने, यथा जालेस्तथैव जन्म, बालत्वं, कला; नवरं दीर्घ- सेनः कुमारः। सा चैव वक्तव्यता यथा जालेर्यावदन्तं करिष्यति। एवं त्रयोदशापि । राजगृहम् , श्रेणिकः पिता, धारिणी माता, त्रयोदशानामपि षोडश वर्षाणि पर्यायः । आनुपूर्व्या विजये , . - २८ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ द्वितीयो वर्गः द्वौ, वैजयन्ते द्वौ, जयन्ते द्वौ, अपराजिते द्वौ, शेषा महाद्रुम- सेनादयः पञ्च सर्वार्थसिद्धे । एवं खल्लु जम्बु ! श्रमणेन० अनु- त्तरोपपातिक-दशानां द्वितीयस्य वर्गस्यायमर्थःप्रज्ञप्तः । मासिक्या संलेखनया द्वयोरपि वर्गयोः (सूत्र २) पदार्थान्वयः-भंते-हे भगवन् ! णं-वाक्यालङ्कार के लिए है जति-यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने दोच्चस्स- द्वितीय वग्गस्स-वर्ग अणुत्तरोववाइयदसाख-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तेरस-तेरह अझयणा-अध्ययन पं०-प्रतिपादन किये हैं, तो भंते-हे भगवन् ! दोच्च-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग के पढमज्झयणस्स-प्रथमाध्ययन का सं०-मोक्ष को प्राप्त हुए सम०३- श्रमण भगवान महावीर ने के-क्या अट्ठ-अर्थ पं०-प्रतिपादन किया है जंबू- हे जम्बू! एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं- उस समय रायगिहे-राजगृह णगरे-नगर गुणसिलते-गुणशैलक चेतिते-चैत्य सेणिए-श्रेणिक राया-राजा धारिणी देवी-और उसकी धारिणी देवी थी । सुमिणे- स्वप्न में सीहो-सिंह का दिखाई देना जहा-जिस प्रकार जाली-जालि कुमार के विषय में कहा गया है तहा-उसी प्रकार जम्म-जन्म हुआ, उसी प्रकार चालत्तणं- वाल-भाव रहा, उसी प्रकार कलातो-कलाओं का सीखना नवरं-विशेषता इतनी है कि दीहसेणे-दीर्घसेन कुमार इसका नाम रखा गया जहा- जैसी जालिस्स-जालि कुमार की वत्तन्वया-वक्तव्यता थी सच्चेव-दीर्घसेन कुमार की वैसी ही हुई। उसी प्रकार जाव-यावत् अंतं काहिति-अन्त करेगा, एवं इसी प्रकार तेरसवि-सब तेरह कुमारों के अध्ययनों के विषय में जानना चाहिए अर्थात् वे भी रायगिहे-राजगृह नगर में उत्पन्न हुए सेणियो-श्रेणिक राजा पिता-उनका पिता -उनका पिता हुआ और धारिणी माता-धारिणी माता । तेरसण्हवि-तेरह के तेरह कुमारों ने सोलस-वासा-सोलह वर्ष तक परियातो-संयम-पर्याय का पालन किया आणुपुबीए-अनुक्रम से दोलि- दो विजए-विजय विमान में उत्पन्न हुए, दोन्नि-दो वेजयंते-वैजयन्त विमान में दोन्नि-दो जयंते-जयन्त विमान में और दोन्नि-दो अपराजिते-अपराजित विमान में गए । सेसा-शेप महामदुसेण माती-महामद्रुसेन आदि पंच-पांच साधु सबट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुए । जंबू-हे जम्बू ! एवं खलु--इस - -- द्वितीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ २९ प्रकार समणेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् महावीर ने अणुत्तरोववाइय- दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के दोच्चस्स-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग का अयमठे-यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है । दोसुवि-दोनों ही वग्गेसु-वर्गों में मासियाए- मासिक २ संलेहणाए-संलेखना से शरीर का त्याग किया । अर्थात् दोनों वर्गों के प्रत्येक साधु ने एक २ मास का पादोपगमन अनशन व्रत धारण किया था। मूलार्थ हे भगवन् ! यदि मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययन प्रतिपादन किये हैं तो फिर हे भगवन् ! द्वितीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का श्रमण भगवान् महावीर ने क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? सुधर्मा स्वामी जी ने जम्बू स्वामी के इस प्रश्न के उत्तर में कहा कि हे जम्बू ! उस काल और उस समय में राजगृह नाम नगर था। उसमें गुणशैलक चैत्य था । वहां श्रेणिक राजा था। उसकी धारिणी देवी थी। उसने सिंह का स्वप्न देखा । जिस प्रकार जालि कुमार का जन्म हुआ था, उसी प्रकार जन्म हुआ, उसी प्रकार बालकपन रहा और उसी प्रकार कलाएं सीखीं । विशेषता केवल इतनी है कि इसका नाम दीर्घसेन कुमार रखा गया । शेप वक्तव्यता जैसे जालि कुमार की है, उसी प्रकार जाननी चाहिए । यावत् महाविदेह क्षेत्र में मोक्ष प्राप्त करेगा इत्यादि । इसी प्रकार तेरह अध्ययनों के तेरह कुमारों के विषय में जानना चाहिए। ये सब राजगृह नगर में उत्पन्न हुए और सब के सब महाराज श्रेणिक और महाराणी धारिणी देवी के पुत्र थे । इन तेरहों ने सोलह वर्ष तक संयम-पर्याय का पालन किया। इसके अनन्तर क्रम से दो विजय विमान, दो वैजयन्त विमान, दो जयन्त विमान और दो अपराजित विमान में उत्पन्न हुए । शेप महाद्रुमसेन आदि पांच मुनि सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुए । हे जम्बू ! इस प्रकार श्रमण भगवान् महावीर ने अनुत्तरोपपातिक- दशा के द्वितीय वर्ग का उक्त अर्थ प्रतिपादन किया है । उक्त दोनों वर्गों के मुनि एक २ मास के अनशन और संलेखना से काल-गत हुए थे । अर्थात् तेईस मुनियों ने एक २ मास का पादोपगमन और अनशन किया था । टीका-उक्त सूत्र में द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययनों का अर्थ वर्णन किया गया है। ये सब तेरह राजकुमार श्रेणिक राजा और धारिणी देवी के आत्मज अर्थात् ~~~~ , २८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [द्वितीयो वर्गः द्वौ, वैजयन्ते द्वौ, जयन्ते द्वौ, अपराजिते द्वौ, शेषा महाद्रुम- सेनादयः पञ्च सर्वार्थसिद्धे । एवं खलु जम्बु ! श्रमणेन० अनु- त्तरोपपातिक-दशानां द्वितीयस्य वर्गस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः। मासिक्या संलेखनया द्वयोरपि वर्गयोः (सूत्र २) पदार्थान्वयः-भंते-हे भगवन् ! णं-वाक्यालङ्कार के लिए है जति-यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् ने दोच्चस्स- द्वितीय वग्गस्स-वर्ग अणुत्तरोववाइयदसायं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तेरस-तेरह अज्झयणा-अध्ययन पं0-प्रतिपादन किये हैं, तो भंते-हे भगवन् ! दोच-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग के पढमज्झयणस्स-प्रथमाध्ययन का सं०-मोक्ष को प्राप्त हुए सम०३- श्रमण भगवान् महावीर ने के-क्या अद्वे-अर्थ पं०-प्रतिपादन किया है जंबू- हे जम्बू! एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं- उस समय रायगिहे-राजगृह णगरे-नगर गुणसिलते-गुणशैलक चेतिते-चैत्य सेणिए-श्रेणिक राया-राजा धारिणी देवी-और उसकी धारिणी देवी थी । सुमिणे- स्वप्न में सीहो-सिंह का दिखाई देना जहा-जिस प्रकार जाली-जालि कुमार के विषय में कहा गया है तहा-उसी प्रकार जम्म-जन्म हुआ, उसी प्रकार बालत्तणं- बाल-भाव रहा, उसी प्रकार कलातो-कलाओं का सीखना नवरं-विशेषता इतनी है कि दीहसेणे-दीर्घसेन कुमार इसका नाम रखा गया जहा- जैसी जालिस्स-ज्ञालि कुमार की वत्तव्वया-वक्तव्यता थी सच्चेव-दीर्घसेन कुमार की वैसी ही हुई। उसी प्रकार जाव-यावत् अंतं काहिति-अन्त करेगा, एवं इसी प्रकार तेरसवि-सब तेरह कुमारों के अध्ययनों के विषय में जानना चाहिए अर्थात् वे भी रायगिहे-राजगृह नगर में उत्पन्न हुए सेणियो-श्रेणिक राजा पिता-उनका पिता हुआ और धारिणी माता-धारिणी माता । तेरसण्हवि-तेरह के तेरह कुमारों ने सोलस-वासा-सोलह वर्प तक परियातो-संयम-पर्याय का पालन किया प्राणुपुबीए-अनुक्रम से दोन्नि- दो विजए-विजय विमान में उत्पन्न हुए, दोन्नि-दो वेजयंते-वैजयन्त विमान में दोन्नि-दो जयंते-जयन्त विमान में और दोन्नि-दो अपराजिते-अपराजित विमान में गए । सेसा-शेष महामदुसेण माती-महामद्रुसेन आदि पंच-पांच साधु सबट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुए । जंबू-हे जम्बू ! एवं खलु-इस द्वितीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ २९ प्रकार समणेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने अणुत्तरोववाइय- दसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के दोच्चस्स-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग का अयम: यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है । दोसुवि-दोनों ही वग्गेसु-वर्गों में मासियाए- मासिक २ संलेहणाए-संलेखना से शरीर का त्याग किया । अर्थात् दोनों वर्गों के प्रत्येक साधु ने एक २ मास का पादोपगमन अनशन व्रत धारण किया था । मूलार्थ हे भगवन् ! यदि मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् ने अनुत्तरोपपातिक दशा के द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययन प्रतिपादन किये हैं तो फिर हे भगवन् ! द्वितीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का श्रमण भगवान महावीर ने क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? सुधर्मा स्वामी जी ने जम्बू स्वामी के इस प्रश्न के उत्तर में कहा कि हे जम्बू ! उस काल और उस समय में राजगृह नाम नगर था। उसमें गुणशैलक चैत्य था । वहां श्रेणिक राजा था। उसकी धारिणी देवी थी। उसने सिंह का स्वम देखा । जिस प्रकार जालि कुमार का जन्म हुआ था, उसी प्रकार जन्म हुआ, उसी प्रकार बालकपन रहा और उसी प्रकार कलाएं सीखीं। विशेषता केवल इतनी है कि इसका नाम दीर्घसेन कुमार रखा गया । शेप वक्तव्यता जैसे जालि कुमार की है, उसी प्रकार जाननी चाहिए । यावत् महाविदेह क्षेत्र में मोक्ष प्राप्त करेगा इत्यादि । इसी प्रकार तेरह अध्ययनों के तेरह कुमारों के विपय में जानना चाहिए। ये सब राजगृह नगर में उत्पन्न हुए और सब के सब महाराज श्रेणिक और महाराणी धारिणी देवी के पुत्र थे । इन तेरहों ने सोलह वर्ष तक संयम-पर्याय का पालन किया । इसके अनन्तर क्रम से दो विजय विमान, दो वैजयन्त विमान, दो जयन्त विमान और दो अपराजित विमान में उत्पन्न हुए । शेष महाद्रुमसेन आदि पांच मुनि सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुए । हे जम्बू ! इस प्रकार श्रमण भगवान महावीर ने अनुत्तरोपपातिक- दशा के द्वितीय वर्ग का उक्त अर्थ प्रतिपादन किया है । उक्त दोनों वर्गों के मुनि एक २ मास के अनशन और संलेखना से काल-गत हुए थे। अर्थात् तेईस मुनियों ने एक २ मास का पादोपगमन और अनशन किया था। -उक्त सूत्र में द्वितीय वर्ग के तेरह अध्ययनों का अर्थ वर्णन किया गया है। ये सब तेरह राजकुमार श्रेणिक राजा और धारिणी देवी के आत्मज अर्थात् ३० अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ द्वितीयो वर्गः पुत्र थे। ये तेरह महर्षि सोलह २ वर्ष तक संयम-पर्याय का पालन कर अनुत्तर विमानों में उत्पन्न हुए । उन विमानों का नाम मूलार्थ में दे दिया गया है। यहां यह सब संक्षेप में इसलिये दिया गया है कि इन सबका वर्णन 'ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्र' के मेघ कुमार के समान ही है । इसके विषय में हम प्रथम अध्ययन में बहुत कुछ लिख चुके हैं । अतः यहां फिर से उसका दोहराना उचित प्रतीत नहीं होता । कहने का सारांश इतना ही है कि विशेष जानने वालों को उक्त सूत्र के ही प्रथम अध्ययन का स्वाध्याय करना चाहिए । यह बात विशेष जानने की है कि इस सूत्र के उक्त दोनों वर्गों के तेईस मुनियों ने एक २ मास का पादोपगमन अनशन किया था और तदनन्तर वे उक्त अनुत्तर विमानों में उत्पन्न हुए । अब यहां प्रश्न यह उपस्थित होता है कि एक मास के अनशनों के साठ भक्त किस प्रकार होते हैं । उत्तर में कहा जाता है कि 'ज्ञाताधर्मकथागसूत्र' के प्रथम अध्ययन की वृत्ति में अभयदेव सूरि जी लिखते हैं 'मासिक्या-मास-परिमा- णया, अप्पणं झूसिते त्ति-क्षपययित्वा पष्टिर्भक्तानि, अणसणाए त्ति-अनशनेन छित्त्वा-व्यवच्छेद्य किल, दिने-दिने द्वे द्वे भोजने लोकः कुरुते, एवञ्च त्रिंशता दिनैः षष्टिर्भक्तानां परित्यक्ता भवतीति' अर्थात् एक दिन के दो भक्त होते हैं इस प्रकार तीस दिनों के साठ भक्त होने में कोई भी सन्देह नहीं रहता। साठ भक्तों को छेदन कर वे महर्षि अनुत्तर विमानों में उत्पन्न होते हैं जो एकावतारी हैं । अतः इस वर्ग में सम्यग् दर्शन और ज्ञान-पूर्वक सम्यक् चारित्रा- राधना का फल दिखाया गया है, क्योंकि यह बात सर्व-सिद्ध है कि सम्यग् दर्शन और सम्यग् ज्ञान-पूर्वक आराधना की हुई सम्यक् क्रिया ही कर्मों के क्षय करने में समर्थ हो सकती है, न कि मिथ्या-दर्शन-पूर्वक क्रिया । यद्यपि लिखित प्रतियों मे कतिपय पाठ-भेद देखने में आते हैं तथापि 'ज्ञाताधर्मकथागसूत्र' का प्रमाण होने से वे यहां नहीं दिखाये गये हैं। अतः जिज्ञा- सुओं को उचित है कि वे उक्त सूत्र के प्रथम अध्ययन का स्वाध्याय अवश्य करें और इन अध्ययनों से शिक्षा ग्रहण करें कि सम्यक् चारित्रासधना का कितना उत्तम फल

द्वितीयो वर्गः]
भाषाटीकासहितम् ।
[३१
होता है और उस पर भी विशेषता यह कि वह चारित्राराधना भी राजकुमारों
ने की । अतः प्रत्येक प्राणी को इस उत्तम मार्ग का अवलम्बन कर मोक्ष की
प्राप्ति करनी चाहिए।
द्वितीयो वर्गः समाप्तः।

तृतीयो वर्गः जति णं भंते ! समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरो० दोचस्स वग्गस्स अयमढे पन्नत्ते तच्चस्स णं भंते ! वग्गस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं सम० जाव सं० के अढे पं० ? एवं खलु जंबू ! समणेणं अणुत्तरोववाइय- दसाणं तच्चरस वग्गस्स दस अज्झयणा पन्नत्ता, तं जहा- धण्णे य सुणक्खत्ते, इसिदासे अ आहिते। पेल्लए रामपुत्ते य, चंदिमा पिट्ठिमाइया ॥१॥ पेढालपुत्ते अणगारे, नवमे पुट्ठिले इ य। वेहल्ले दसमे वुत्ते, इमे ते दस आहिते ॥२॥ यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक- दशानां द्वितीयस्य वर्गस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः, तृतीयस्य नु भदन्त ! वर्गस्यानुत्तरोपपातिक-दशानां श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः ----- तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [३३ , प्रज्ञप्तः ? एवं खलु जम्बु ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपा- तिकदशानां तृतीयस्य वर्गस्य दशाध्ययनानि प्रज्ञतानि, तद्यथा :- धन्यश्च सुनक्षत्रः, ऋषिदासश्चाख्यातः । पेल्लको रामपुत्रश्च, चन्द्रिकः पृष्टिमातृकः ॥१॥ पेढालपुत्रोऽनगारः, नवमः पृष्टिमायी च । वेहल्लो दशम उक्तः, इमे ते दशाख्याताः ॥२॥ पदार्थान्वयः-भंते-हे भगवन् ! णं-पूर्ववत् वाक्यालङ्कार के लिए है जति-यदि जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् महावीर ने अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के दोच्चस्स-द्वितीय वग्गस्स-वर्ग का अयमद्वे-यह अर्थ पएणत्ते-प्रतिपादन किया है तो भंते-हे भग- वन् ' अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिक-दशा के तचस्स-तृतीय वग्गस्स- वर्ग का सम जाव सं0-मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने के-क्या अद्वे अर्थ प-प्रतिपादन किया है ? इस प्रश्न को सुनकर सुधर्मा स्वामी कहते हैं कि जम्बू-हे जम्बू एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से समणेणं-श्रमण भगवान महावीर ने अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोपपातिकदशा के तच्चस्स-तृतीय वग्गस्स-वर्ग के दस-दश अज्झयणा-अध्ययन पन्नत्ता-प्रतिपादन किये हैं, तं जहा-जैसे-धण्णे धन्य कुमार और सुणक्खत्ते-सुनक्षत्र कुमार अ-और इसीदासे-ऋपिदास कुमार आहिते कथन किया गया है पेल्लए-पेल्लक कुमार य-और रामपुत्ते-राम पुत्र कुमार, चंदिमा-चन्द्रिका कुमार, पिढिमाइया-पृष्टिमातृका कुमार पेढालपुत्ते- पेढालपुत्र अणगारे-अनगार य-और नवम-नौवां पुहिले-पृष्टिमायी कुमार दसमे-दशवां वेहल्ले-वेहल्ल कुमार वुत्ते-कहा गया है, इमे-ये ते-वे दस-दश अध्ययन आहिते-कहे गये हैं। मूलार्थ- हे भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर ने अनुत्तरोपपातिक- दशा के द्वितीय वर्ग का उक्त अर्थ प्रतिपादन किया है, तो हे भगवन् ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान महावीर ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के तृतीय वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? इसके उत्तर में सुधर्मा स्वामी कहते हैं कि हे जम्बू ! ? १ ३४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्ग: Arvvv-~~~- - मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् महावीर ने अनुत्तरोपपातिक-दशा के तृतीय वर्ग के दश अध्ययन प्रतिपादन किये हैं, जैसे-१-धन्य कुमार २-सुनक्षत्र कुमार ३-ऋपिदास कुमार ४-पेल्लक कुमार ५-रामपुत्र कुमार ६-चन्द्रिका कुमार ७-पृष्टिमातृका कुमार ८-पेढालपुत्र कुमार ह-पृष्टिमायी कुमार और १० -वेहल्ल कुमार । ये तृतीय वर्ग के दश अध्ययन कहे गये हैं। टीका-द्वितीय वर्ग की समाप्ति होने पर जम्बू स्वामी ने फिर सुधर्मा स्वामी से प्रश्न किया कि हे भगवन् ! द्वितीय वर्ग का अर्थ तो मैंने श्रवण कर लिया है। अब मेरे ऊपर असीम कृपा करते हुए तृतीय वर्ग का अर्थ भी सुनाइए, जिस से मुझे उसका भी बोध हो जाय, इस प्रश्न के उत्तर मे श्री सुधर्मा स्वामी ने प्रतिपादन किया कि हे, जम्बू ! मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् महावीर ने तृतीय वर्ग के दश अध्य- यन प्रतिपादन किये हैं। पाठकों को मूलार्थ में ही उनके नाम देख लेने चाहिएं। यह हम पहले भी कह चुके हैं कि विनय और भक्ति से ग्रहण किया हुआ ही ज्ञान फलीभूत हो सकता है, विना विनय के नहीं । यही शिक्षा इस सूत्र से भी मिलती है । अध्ययन का अर्थ ही शिक्षा ग्रहण है । अतः पाठकों को इन सूत्रों का स्वाध्याय करते हुए अवश्य शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। यह बात भी केवल दोह- रानी मात्र ही रह जाती है कि सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति के लिये सम्यक् चारित्र की आराधना की अत्यन्त आवश्यकता है, इन दोनों बातों की शिक्षा इस सूत्र होती है, अत: यह वर्ग अवश्य पठनीय है। अब जम्बू स्वामी तृतीय वर्ग के प्रथमाध्ययन के अर्थ के विषय में सुधर्मा स्वामी से प्रश्न करते हैं:- जति णं भंते ! सम० जाव सं० अणुत्तर० तच्च- स्स वग्गस्स दस अज्झयणा प०, पढमस्स णं भंते ! अज्झयणस्स समणेणं जाव संपत्तेणं के अढे पन्नत्ते ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं कागंदी णार्म णगरी होत्था रिद्ध-स्थिमिय-समिद्धा सहसंबवणे उजाणे से प्राप्त तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [ ३५ सव्वोदुए, जिअसत्तू राया, तत्थ णं कागंदीए नगरीए भद्दा णामं सत्थवाही परिवसइ, अड्ढा जाव अपरिभूआ। तीसे णं भद्दाए सत्थवाहीए पुत्ते धन्नं नाम दारए होत्था, अहीण जाव सुरूवे पंच धाती-परिग्गहित, तं० खीर- धाती। जहा महब्बले जाव बावत्तरं कलातो अहीए जाव अलं भोग-समत्थे जाते यावि होत्था। यदि नु भदन्त ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिक- दशानां तृतीयस्य वर्गस्य दशाध्ययनानि प्रज्ञप्तानि, प्रथमस्य नु भदन्त ! अध्ययनस्य श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन कोऽर्थः प्रज्ञप्तः? एवं खलु जम्बु ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये काकन्दी नाम ऋद्धि-स्तिमित-समृद्धा, सहस्राम्रवनमुद्यानं सर्वर्तुषु, जितशत्रू राजा । तत्र नु काकन्दयां नगर्यां भद्रा नाम सार्थवाहिनी परिवसति, आढ्या यावदपरिभूता । तस्या नु भद्रायाः सार्थवाहिन्याः पुत्रो धन्यो नाम दारकोऽभूत् , अहीनो यावत्सुरूपः पञ्चधातृ-परिगृहीतः, तद्यथा-क्षीर-धात्री। यथा महा- बलो यावद् द्वि-सप्ततिः कला अधीता । यावदलंभोग-समर्थों जातश्चाप्यभूत् । पदार्थान्वयः-~भंते-हे भगवन् ! णं-वाक्यालङ्कार के लिए है जति-यदि सम० जाव सं०-मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अणुत्तर अनुत्तरोपपातिक-दशा के तचस्स-तृतीय वग्गस्स-वर्ग के दस-दश अझयणा- अध्ययन प०-प्रतिपादन किये हैं तो भंते-हे भगवन् ! पढमस्स-प्रथम अज्झयणस्स- अध्ययन का जाव-यावत् संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हुए समणेणं-श्रमण भगवान् महा- वीर ने के अटे-क्या अर्थ पन्नत्ते-प्रतिपादन किया है । सुधर्मा स्वामी इस प्रश्न नगरी बभूव, अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग. के उत्तर में कहते हैं कि जंवू-हे जम्बू ! तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं- उस समय काकंदी काकन्दी णाम-नाम वाली णगरी-नगरी होत्था-थी और वह रिद्ध-स्थिमिय-समिद्धा-ऊँचे २ भवनों से युक्त, निर्भय तथा धन-धान्य से पूर्ण थी। उसके बाहर सहसंबवने-सहस्राम्रवन नाम वाला उजाणे-उद्यान था सन्चो- दुए-सव ऋतुओं के पुष्प और फलों से युक्त था । उस नगरी में जितसत्तू-जित- शत्रु नाम वाला राया-राजा राज्य करता था तत्थ-उस काकंदीए-काकन्दी नाम नगरीए-नगरी में भद्दा णाम-भद्रा नाम वाली सत्थवाही-सार्थवाहिनी परिवसइ- निवास करती थी। अड्ढा-वह ऋद्धिमती थी और जाव-यावत् अपरिभूत्रा- अपनी जाति और वरावरी के लोगों मे धन आदि से अपरिभूत अर्थात् किसी से कम न थी । तीसे-उस भद्दाए-भद्रा सत्थवाहीए-सार्थवाहिनी का पुत्ते-पुत्र धन्ने- धन्य नाम-नाम वाला दारए-बालक होत्था-था जो अहीणे-किसी इन्द्रिय से भी हीन नहीं था अर्थात् जिसकी सब इन्द्रियां परिपूर्ण थीं और सुरूवे-सुरूप था पंच-धाती-परिगहित्ते-जो पांच धात्रियों (धाइयों) से परिगृहीत था तं०-जैसे-खीर- धाई-एक धाई दूध पिलाने के लिए नियत थी और शेष जैसा महब्बले-'भगवती सूत्र' मे महावल कुमार का वर्णन है उसी के समान जानना चाहिए जाव-यावत् वावत्तरि-बहत्तर कलातो-कलाएं अहीए-अध्ययन की जाव-यावत् जाते-यह वालक धीरे धीरे अलंभोग-समत्थे यावि-सव तरह के भोगों का उपभोग करने मे समर्थ होत्था-हो गया। मूलार्थ-हे भगवन् ! यदि श्रमण भगवान् महावीर ने, जो मुक्ति को प्राप्त हो चुके हैं, अनुत्तरोपपातिक-दशा के तृतीय वर्ग के दश अध्ययन प्रति- पादन किये हैं तो फिर हे भगवन् ! प्रथम अध्ययन का मोक्ष को प्राप्त हुए श्रमण भग- वान् महावीर ने क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ? इस प्रश्न के उत्तर में श्री सुधर्मा स्वामी जी कहते हैं कि हे जम्बू! उस काल और उस समय में काकन्दी नाम की एक नगरी थी । वह सब तरह के ऐश्वर्य और धन-धान्य से परिपूर्ण थी । उसमें किसी प्रकार के भी भय की शङ्का नहीं थी। उसके बाहर एक सहस्राम्रवन नाम का उद्यान था, जो सब ऋतुओं में फल और फूलों से भरा रहता था । उस नगरी में जितशत्रु नाम राजा राज्य करता था। वहां भद्रा नाम की एक सार्थवाहिनी निवास करती थी । वह अत्यन्त समृद्धिशालिनी और धन-धान्य में अपनी तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ३७ जाति और बरावरी के लोगों में किसी से किसी प्रकार भी परिभूत (तिरस्कृत) अर्थात् कम नहीं थी । उस भद्रा सार्थवाहिनी का धन्य नाम का एक सर्वाङ्ग-पूर्ण और रूपवान् पुत्र था । उसके पालन-पोषण करने के लिए पांच धाइयां नियत थीं । जैसे-एक का काम केवल उसको दूध पिलाना ही रहता था । शेष वर्णन जिस प्रकार महावल कुमार का है उसी प्रकार से जानना चाहिए । इस प्रकार धन्य कुमार (धीरे २) सब भोगों को भोगने में समर्थ हो गया । टीका-इस सूत्र में श्री सुधर्मा स्वामी जम्बू स्वामी के प्रश्न के उत्तर में तृतीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का वर्णन करते हैं । यह अध्ययन धन्य कुमार के जीवन-वृत्तान्त के विषय मे है । वही सुधा स्वामी ने जम्वू स्वामी को सुनाया है। इस अध्ययन के पढ़ने से हमें उस समय की स्त्री जाति की उन्नत अवस्था का पता लगता है । उस समय स्त्रियां आज-कल के समान पुरुषों के ऊपर ही निर्भर नहीं रहती थीं, किन्तु स्वयं उनकी बरावरी मे व्यापार आदि बड़े २ कार्य करती थीं। उन्हे व्यापार आदि के विषय में सब तरह का पूरा ज्ञान होता था। देशान्तरों में भी उनका व्यापार-वाणिज्य आदि का कार्य चलता था। यहां भद्रा नाम की स्त्री सार्थवाही का काम स्वयं करती थी और इस पर भी विशेपता यह कि अपनी जाति के लोगों में वह किसी से कम न थी । यह बात उस उन्नति के शिखर पहुंची हुई स्त्री-समाज का चित्र हमारी आँखों के सामने खींचती है । इसके अतिरिक्त हमें अन्य जैन शास्त्रों के अध्ययन से निश्चय होता है कि उस समय त्रियों के अधिकार पुरुपों के अधिकारों से किसी अंश में भी कम न थे । उस समय की स्त्रियां वास्तव में अर्धाङ्गिनियां थीं । उन्होंने पुरुपों के समान ही मोक्ष- गमन भी किया । अतः शूद्र जाति और स्त्रियों को क्षुद्र मानने वालों को भ्रान्ति निवारण के लिए एक बार जैन शास्त्रों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए । अब सूत्रकार पूर्व सूत्र से ही सम्बन्ध रखते हुए कहते हैं:- तते णं सा भद्दा सत्थवाही धन्नं दारयं उम्मुक्क-वा- लभावं जाव भोग-समत्थं वावि जाणेत्ता वत्तीसं पासाय- वडिंसते कारेति अभुगत-मुस्सिते जावतेसिं मझेभवणं ३८ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः अणेग-खंभ-सय-सन्निविटुं। जाव बत्तीसाए इब्भवर-कन्न- गाणं एगदिवसेणं पाणिं गेण्हावेति २ बत्तिसाओ दाओ जाव उप्पिं पासाय० फुटेंतेहि विहरति । ततो नु सा भद्रा सार्थवाहिनी धन्यं दारकमुन्मुक्त-बाल- भावं यावद्भोग-समर्थं वापि ज्ञात्वा द्वात्रिंशत्प्रासादावतंसकानि कारयत्यभ्युद्गतोच्छ्रितानि । तेषां मध्ये भवनमनेकस्तम्भशत- सन्निविष्टम् । यावद् द्वात्रिंशदिभ्यवर-कन्यकानामेकेन दिवसेन पाणिं ग्राहयति । द्वात्रिंशद् दातानि । यावदुपरि प्रासादे स्फुट- द्भिर्विहरति । पदार्थान्वयः-तते-इसके अनन्तर णं-वाक्यालङ्कार के लिये है सा-वह भद्दा-भद्रा सत्थवाही-सार्थवाहिनी धन्न-धन्य दारयं-बालक को उम्मुक्कबालभावं- बालकपन से अतिक्रान्त और जाव-यावत् भोगसमत्थं-भोगों के उपभोग करने में समर्थ जाणेत्ता-जानकर बत्तीसं-बत्तीस अभुगतमुस्सिते-बहुत बड़े और ऊँचे पासायव- डिंसते-श्रेष्ठ प्रासाद (महल) कारेति-बनवाती है । जाव-यावत् तेसिं-उनके मज्म- मध्य मे अणेगखंभसयसन्निविटुं-अनेक सैकड़ों स्तम्भों से युक्त भवणं-एक भवन वनवाया । जाव-यावत् उसने बत्तीसाए-बत्तीस इन्भवरकन्नगाणं-श्रेष्ठ श्रेष्ठियों की कन्याओं के साथ एगदिवसेणं-एक ही दिन पाणिं गिण्हावेति-पाणि-ग्रहण करवाया इनके साथ बत्तीसाओ-बत्तीस दामो-दास, दासी, धन और धान्य आदि दहेज आए । जाव-यावत् वह धन्य कुमार उप्पि-ऊपर पासाय-श्रेष्ठ महलों में फुट्टे- तेहि-जोर २ से बजते हुए मृदङ्ग आदि वाद्यों के से जाव- यावत् पांच प्रकार के मनुष्य-सुखों का अनुभव करते हुए विहरति-विचरता है । मूलार्थ-इसके अनन्तर उस भद्रा सार्थवाहिनी ने धन्य कुमार को बालकपन से मुक्त और सब तरह के भोगों को भोगने में समर्थ जानकर बत्तीस बड़े २ अत्यन्त ऊँचे और श्रेष्ठ भवन बनवाये । उनके मध्य में एक सैकड़ों स्तम्भों से युक्त भवन बनवाया। फिर बत्तीस श्रेष्ठ कुलों की कन्याओं से एक नाद युक्त उन महलों में तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ३९ -~~~~ vN , ही दिन उसका पाणि-ग्रहण कराया । उनके साथ बत्तीस (दास, दासी और धन- धान्य से युक्त) दहेज आये । तदनन्तर धन्य कुमार अनेक प्रकार के मृदङ्ग आदि वाद्यों की ध्वनि से गुञ्जित प्रासादों के ऊपर पञ्च-विध सांसारिक सुखों का अनु- भव करते हुए विचरण करने लगा। टीका -उक्त सूत्र में धन्य कुमार के बालकपन, विद्याध्ययन, विवाह- संस्कार और सांसारिक सुखों के अनुभव के विषय में कथन किया गया है। यह सव वर्णन 'ज्ञातासूत्र' के प्रथम अथवा पांचवें अध्ययन के साथ मिलता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि पाठकों को वहीं से इसका बोध करना चाहिए । अब सूत्रकार धन्य कुमार के बोध के विषय में कहते हैं:- तेणं कालेणं तेणं समएणं भगवं महावीरे समोसढे, परिसा निग्गया, जहा कोणितो तहा जियसत्तू निग्गतो तते णं तस्स धन्नस्स तं महता जहा जमाली तहा निग्गतो, नवरं पायचारेणं जाव जं नवरं अम्मयं भई सत्थवाहिं आपुच्छामि । तते णं अहं देवाणुप्पियाणं अंतिते जाव पव्वयामि । जाव जहा जमाली तहा आपु- च्छइ।मुच्छिया, वुत्त-पडिवुत्तया जहा महब्बले जाव जाहे णो संचाएति जहा थावच्चापुत्तो जियसत्तुं आपुच्छति। छत्त-चामरातो सयमेव जितसत्तू णिक्खमणं करेति। जहा थावच्चापुत्तस्स कण्हो जाव पव्वतिते० अणगारे जाते ईरियासमिते जाव बंभयारी । तस्मिन् काले तस्मिन् । प्ये श्रमणो भगवान् महावीरः समवसृतः, परिपन्निर्गता, यथा तस्तथा जितशत्रुर्निर्गतः ।

४०] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः , ततो नु स धन्यः(स्य) तन्महता यथा जमालिस्तथा निर्गतः, नवरं पादचारेण, यावन्नवरं यदम्बां भद्रांसार्थवाहिनीमापृच्छामि । ततो न्वहं देवानुप्रियाणामन्तिके यावत्प्रव्रजामि । यावद् यथा जमालिस्तथापृच्छति । मूच्छितोक्ति-प्रत्युक्त्या यथा महाबलो यावद् यदा न शक्नोति, यथा स्त्यावत्यापुत्रो जितशत्रुमापृच्छति। छत्र-चामरादिभिः स्वयमेव जितशत्रुनिष्क्रमणं करोति । यथा स्त्यावत्यापुत्रस्य कृष्णो यावत्प्रवजितोऽनगारो जात ईर्यासमितो यावद् ब्रह्मचारी। पदार्थान्वयः-तेणं कालेण-उस काल और तेणं समएणं-उस समय समणे-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरे-महावीर स्वामी समोसढे-सहस्राम्रवन उद्यान में विराजमान हुए । परिसा-नगर की परिपद् निग्गया-उनकी वन्दना करने के लिए गई जहा-जिस प्रकार कोणित-कूणित अथवा कोणिक राजा गया था तहा-उसी प्रकार जित्तसत्तू-जितशत्रु भी निग्गतो-गया तते-इसके अनन्तर णं-वाक्यालङ्कार के लिये है तस्स-वह धनस्स-धन्य कुमार तं-उस महता-बड़े भारी के ऐश्वर्य से जहा-जिस प्रकार जमाली-जमालि कुमार गया था तहा-उसी प्रकार निग्गतो-गया नवरं-विशेषता इतनी है धन्य कुमार पायचारेण-पैदल गया, जाव-यावत् जं नवरं-इतनी और विशेपता है कि उसने कहा कि मैं अम्मयं-माता भई-भद्रा सत्थवाहि-सार्थवाहिनी को आपुच्छामि-पूछता हूं णं-पूर्ववत् तते-इसके अनन्तर अहं-मैं देवाणुप्पियाणं-आपके अंतिते-पास जाव-यावत् पव्वयामि- प्रबजित हो जाऊंगा अर्थात् दीक्षा ग्रहण कर लूंगा। जाव-यावत् जहा-जैसे जमाली- जमालि कुमार ने पूछा था तहा-उसी तरह आपुच्छइ-पूछता है । माता यह सुनकर मुच्छिया-मूर्छित हो गई वुत्तपडिवुत्तया-मूर्छा टूटने पर माता-पुत्र की इस विषय में बात-चीत हुई जहा-जैसे महबले-महाबल कुमार की हुई थी जाव-यावत् जाहे-जब (माता) णो संचाएति-(पुत्र को रखने में) समर्थ न हो सकी तब जहा-जैसे थावच्चापुत्तो-स्त्यावत्या पुत्र की माता को पूछा था ठीक उसी प्रकार भद्रा सार्थवाहिनी ने जियसत्तुं-जित शत्रु राजा को श्रापुच्छड़-पूछा और दीक्षा के लिए - ने कृष्ण तृतीयो वर्गः]] भाषाटीकासहितम्। [४१ छत्तचामरातो०-छत्र और चामर मांगा जितसत्तू-जितशत्रु राजा सयमेव-अपने आप ही निक्खमणं करेति-धन्य कुमार की दीक्षा के लिये उपस्थित होगया । जहा-जैसे थावच्चापुत्तस्स-स्त्यावत्यापुत्र का कण्हो-कृष्ण वासुदेव ने किया था इसी प्रकार जाव-यावत् पबतिते-प्रव्रजित होकर अणगारे-अनगार (साधु) हुआ ईर्यासमिते-वह ईर्या-समिति वाला जाव-यावत् साधुओं के सव गुणों से युक्त चंभयारी-ब्रह्मचारी हुआ। मूलार्थ---उस काल और उस समय में श्रमण भगवान् महावीर स्वामी वहां विराजमान हुए । नगर की परिपद् उनकी वन्दना के लिये गई । कोणिक राजा के समान जितशत्रु राजा भी गया । धन्य कुमार भी जमालि कुमार की तरह गया । विशेषता केवल यही है कि धन्य कुमार पैदल ही गया । दूसरी विशेपता यह है कि (भगवान् के उपदेश को सुनकर) उसने कहा कि हे भगवन् ! मैं अपनी माता भद्रा सार्थवाहिनी को पूछ कर पाता हूं। इसके अनन्तर मैं आपकी सेवा में उपस्थित होकर दीक्षित हो जाऊँगा । ( वह घर आया) उसने अपनी माता से जिस प्रकार जमालि कुमार ने पूछा था, उसी प्रकार पूछा । माता यह सुनकर मूच्छित हो गई । (मूर्छा से उठने के अनन्तर) माता-पुत्र में इस विषय में प्रश्नोत्तर हुए। जब वह भद्रा महावल के समान पुत्र को रोकने के लिये समर्थ न हो सकी तो उसने स्त्यावत्यापुत्र के समान जितशत्रु राजा से पूछा और दीक्षा के लिए छत्र और चामर की याचना की । जितशत्रु राजा ने स्वयं उपस्थित होकर जिस प्रकार कृष्ण वासुदेव ने स्त्यावत्यापुत्र की दीक्षा की थी इसी प्रकार धन्य कुमार का दीक्षा-महोत्सव किया । धन्य कुमार दीक्षित हो गया और ईया-समिति, ब्रह्मचर्य आदि सम्पूर्ण गुणों से युक्त होकर विचरने लगा। टीका-इस सूत्र में वर्णन किया गया है कि जर्व श्रमणे भगवान् महा- वीर स्वामी काकन्दी नगरी में विराजमान हुए तो नगर की परिपद् के साथ धन्य कुमार भी उनके दर्शन करने और उनसे उपदेशामृत पान करने के लिए उनकी सेवा मे उपस्थित हुआ । उनके उपदेश का धन्य कुमार पर इतना प्रभाव पड़ा कि वह तत्काल ही सम्पूर्ण सामारिक भोग-विलासों को ठोकर मार कर गृहस्थ से साधु बन गया।

४२]
अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ।
[ तृतीयो वर्गः
,
इस सूत्र में हमें चार उपमाएं मिलती हैं। उनमें से दो धन्य कुमार के
विषय में हैं और शेष दो मे से एक जितशत्रु राजा की कोणिक राजा से तथा
चौथी दीक्षा-महोत्सव की कृष्ण वासुदेव के किये हुए दीक्षा-महोत्सव से है।
ये सब 'औपपातिकसूत्र', 'भगवतीसूत्र' और 'ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्र' से ली गई हैं।
इन सबका उक्त सूत्रों में विस्तृत वर्णन मिलता है । अतः पाठकों को इनका एक
बार अवश्य स्वाध्याय करना चाहिए । ये सब सूत्र ऐतिहासिक दृष्टि से भी
अत्यन्त उपयोगी हैं । क्योंकि इस सूत्र की क्रमसंख्या उक्त सूत्रों के अनन्तर ही
है । अतः यहां उक्त वर्णन के दोहराने की आवश्यकता न जान कर, इसका संक्षेप
कर दिया गया है।
अब सूत्रकार धन्य अनगार के अभिग्रह के विषय में कहते हैं
तते णं से धन्ने अणगारे जं चेव दिवसं मुंडे
भवित्ता जाव पव्वतिते तं चेव दिवसं समणं भगवं
महावीरं वंदति णमंसतिर एवं व० इच्छामि णं भंते !
तुब्भेणं अब्भणुण्णाते समाणे जावजीवाए छठें छटेणं
अणिक्खितेणं आयंबिल-परिग्गहिएणं तवोकम्मेणं
अप्पाणं भावेमाणे विहरित्तते छट्ठस्स वि य णं पारणयंसि
कप्पति आयंबिलं पडिग्गहित्तते णो चेव णं अणायं-
बिलं, तं पि य संसटुं णो चेव णं असंसटुं, तं पि य णं
उज्झिय-धम्मियं नो चेव णं अणुज्झिय-धम्मियं, तं
पि य ज अन्ने बहवे समण-माहण-अतिहि-किवण-वणी-
मंगा णावकंखति । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंधं
करेह । तते णं से धन्ने अणगारे समणेणं भगवता

तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [४३ महा० अब्भणुनाते समाणे हट्ट तुट्ठ जावजीवाए छटुं छटेणं अणिक्खितेणं तवोकम्मेणं अप्पाणं भावमाणे विहरति । ततो नु स धन्योऽनगारो यस्मिन्नेव दिवसे मुण्डो भूत्वा यावत्प्रवजितस्तस्मिन्नेव दिवसे श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दति, नमस्यति, वन्दित्वा नमस्कृत्य चैवमवादीत् "इच्छामि नु भदन्त ! त्वयाभ्यनुज्ञातः सन् यावज्जीवं षष्ठ-षष्ठेनानिक्षिप्तेना- चाम्ल-परिगृहीतेन तपः-कर्मणात्मानं भावयन् विहर्तुम् । षष्ठ- स्यापि च नु पारणके कल्प ऽआचाम्लं प्रतिग्रहीतुं नो चैव न्वनाचाम्लम् , तदपि च संसृष्टं नो चैव न्वसंसृष्टम् , तदपि च नूज्झित-धर्मिकं नो चैव न्वनुज्झित-धर्मिकम् , तदपि च यदन्नं वहवः श्रमण-ब्राह्मणातिथि-कृपण-वनीपका नावकाङ्क्षन्ति" "यथा-सुखं देवानुप्रिय! मां प्रतिबन्धं कुरु ।” ततो नु स धन्योऽ- नगारः श्रमणेन भगवता महावीरेणाभ्यनुज्ञातः सन् हृष्टस्तुष्टो यावज्जीवं षष्ठ-षष्ठेनानिक्षिप्तेन तपःकर्मणात्मानं भावयन् विहरति । पदार्थान्वयः-तते-दीक्षा के अनन्तर णं-वाक्यालवार के लिए है से- वह धने-धन्य अणगारे-अनगार जं चेव दिवस-जिसी दिन मुंडे-मुण्डित भवित्ता-हो कर जाव-यावत् पयतिते-प्रव्रजित हुआ तंचेव-उसी दिवसं-दिन समणं-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरं-महावीर की वंदति-वन्दना करता है णमंसनि २-नमस्कार करता है और वन्दना तथा नमस्कार करके एवं-इस प्रकार व०-कहने लगा भंते ! हे भगवन् ! णं-पूर्ववत् इच्छामि-मैं चाहना हूं तुन्भेणं-आप की अम्भणुराणाते समाणे-आज्ञा प्राप्त हो जाने पर जारज्जीवाए-जीवन पर्यन्त छठं छडेणं-पष्ट-पष्ट तप से अणिक्खितेणं-अनिक्षिप्त (निरन्तर) आयंबिलपरिग्ग- ४४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्ग: h. wwwvvvvvvv हिएणं-आचाम्ल ग्रहण-रूप तवोकम्मेणं-तपः-कर्म से अप्पाणं-अपनी आत्मा की भावेमाणे-भावना करते हुए विहरित्तते-विचरूं । य-और णं-पूर्ववत् छटुस्स वि- पष्ठ-तप के भी पारणयंसि-पारण करने में कप्पति-योग्य है प्रायविलं-शुद्धौद- नादि पडिग्गहित्तते-ग्रहण करना णो चेव णं-न कि अणायंबिलं-अनाचाम्ल ग्रहण करना य-और तं पि-वह भी संसटुं-संसृष्ट (खरडे) हाथों से दिया हुआ ही लेना चाहिए अर्थात् उसी से लेना चाहिये जिसके हाथ उस भोजन से लिप्त हों यो चेव-न कि असंसटुं-असंसृष्ट हाथों से य-और तं पिणं-वह भी उज्झिय- धम्मियं-परित्याग-रूप धर्म वाला हो णो चेव णं-न कि अणुज्झियधम्मियं- अपरित्याग रूप धर्म वाला य-और तं पि-वह भी ऐसा अन्ने-अन्न हो जं-जिसको बहवे-अनेक समण-श्रमण माहण-ब्राह्मण अतिहि-अतिथि किवण-कृपण-दरिद्र वणीमग-अन्य कई प्रकार के याचक णावकंक्खति-न चाहते हों । यह सुनकर श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने कहा कि देवाणुप्पिया हे देवानुप्रिय ! अहासुहं- जिस प्रकार तुम्हें सुख हो इस शुभ कार्य में पडिबंध-विलम्ब मा-मत करेह-करो। तते णं-इसके बाद से वह धने-धन्य अणगारे-अनगार समणेणं-श्रमण भगवता-भगवान महावीरेणं-महावीर की अन्भणुनाते-आज्ञा प्राप्त कर हट्टतुट्ठ- आनन्दित और सन्तुष्ट हो कर जावज्जीवाए-जीवन भर छटुं छटेणं-षष्ठ-पष्ठ अणिक्खितेणं-निरन्तर तपोकम्मेणं-तप-कर्म से अप्पाणं-अपनी आत्मा की भावेमाणे-भावना करते हुए विहरति-विचरण करता है । मूलार्थ-तत्पश्चात् वह धन्य श्रनगार जिस दिन मुण्डित हुआ, उसी दिन श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी की वन्दना और नमस्कार कर कहने लगा कि हे भगवन् ! आपकी आज्ञा से मैं जीवन-पर्यन्त निरन्तर पष्ठ-पष्ट तप और आचाम्ल- ग्रहण-रूप तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरना चाहता हूं । और पष्ठ (वले) के पारण के दिन भी शुद्धौदनादि ग्रहण करना ही मुझ को योग्य है न कि अनाचाम्ल आदि । वह भी पूर्ण रूप से संसृष्ट अर्थात् भोजन में लिप्त हाथों से दिया हुआ ही न कि असंसृट हाथों से भी, वह भी परित्याग-रूप धर्म वाला हो न कि अपरित्याग रूप वाला भी । उसमें भी वह अन्न हो जिमको अनेक श्रमण, ब्राह्मण, कृपण, अतिथि और वनीपक नहीं चाहते हों । यह सुनकर श्री श्रमण भगवान् ने कहा कि हे देवानुप्रिय ! जिस प्रकार तुम्हें सुख हो, करो। किन्तु इस पवित्र धर्म- तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [४५ ANA-.. -rrrrrrronr NNN ~- कार्य में विलम्ब करना ठीक नहीं। इसके अनन्तर वह धन्य कुमार श्रमण भगवान् महावीर स्वामी की आज्ञा से आनन्दित और सन्तुष्ट होकर निरन्तर पष्ठ-पष्ठ तप- कर्म से जीवन भर अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरण करने लगा। टीका- इस सूत्र में धन्य कुमार की धर्म-विषयक रुचि विशेष रूप से बताई गई है । वह दीक्षा प्राप्त कर इस प्रकार धर्म मे तल्लीन हो गया कि दीक्षा के दिन से ही उसकी प्रवृत्ति बड़े २ तप ग्रहण करने की ओर हो गई। उसने उसी दिन भगवान से निवेदन किया कि हे भगवन् ! मैं आपकी आज्ञा से जीवन भर पष्ठ ( वेले ) तप का आयंविल-पूर्वक पारण करूँ। उसकी इस तरह की धर्म- जिज्ञासा देख कर श्री भगवान् ने प्रतिपादन किया कि हे देवानुप्रिय ! जिस प्रकार तुम्हे सुख हो उसी प्रकार करो। यह सुन कर धन्य अनगार ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार तप ग्रहण कर लिया। 'उज्झित-धर्मिक' उसे कहते हैं, जिस अन्न को विशेषतया कोई नहीं चाहता हो । जैसे-"उज्झिय-धम्मियं ति, उज्झितं--परित्यागः स एव धर्म:-~-पर्यायो यस्या- स्तीति उज्झित-धर्मः” अर्थात् जिस अन्न का सर्वथा त्याग कर दिया गया हो, वह 'उज्झित-धर्म होता है । आयंबिल के पारण करने में ऐसा ही भोजन लेना चाहिए। 'समणेत्यादि-श्रमणो निर्ग्रन्थादिः, ब्राह्मणः-प्रतीतः, अतिथिः भोजनकालोपस्थितः प्राघूर्णकः, कृपणः-दरिद्रः, वनीपकः-याचकविशेषः । अब सूत्रकार पहले सूत्र से ही सम्बन्ध रखते हुए कहते हैं ततेणं से धण्णे अणगारे पढम-छ?-खमण-पारण- गंसि पढमाए पोरसाए सज्झायं करेति । जहा गोतम- सामी तहेव आपुच्छति। जाव जेणेव कायंदी णगरी तेणेव उवागच्छति २ कायंदी णगरीए उच्च० जाव अड- माणे आयंबिलं जाव णावकंखति । तते णं से धन्ने अण- गारे ताए अव्भुजताए पयययाए परगहियाए एसणाए जति भत्तं लभति तो पाणं ण लभति, अह पाणं तो भत्तं .

४६ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः न लभति । तते णं से धन्ने अणगारे अदाणे, अविमणे, अकलुसे, अविसादी, अपरितंतजोगी, जयण-घडण-जोग- चरित्त अहापज्जत्तं समुदाणं पडिगाहेतिर कांकदीओ णगरीतो पडिणिक्खमति, जहा गोतमे जाव पडिदंसेति। तते णं से धन्ने अणगारे समणेणं भग० अब्भणुनाते ससाणे अमुच्छिते जाव अणज्झोववन्ने बिलमिव पणग- मृतेणं अप्पाणेणं आहारं आहारेति२ संजमेण तवसा० विहरति । ततो नु स धन्योऽनगारःप्रथम-षष्ठ-क्षमण-पारणके प्रथ- मायां पौरुष्यां स्वाध्यायं करोति । यथा गोतमस्वामी तथैवा- पृच्छति । यावद् येनैव काकन्दी नगरी तेनैवोपागच्छति, उपा- गत्य काकन्दीनगर्यामुच्च-नीचकुलेष्वटन्नाचाम्लं यावन्नावकाङ्- क्षन्ति ततोनु स धन्योऽनगारस्तयाभ्युद्यतया प्रयतया, प्रदत्तया, प्रगृहीतयैषणया यदि भक्तं लभते पानं न लभतेऽथ पानं भक्तं न लभते । ततो नु स धन्योऽनगारोऽदीनोऽविमनाऽकलुषोऽ- विषाद्यपरितन्तयोगी यतन-घटन-योग-चरित्रो न-योग-चरित्रो यथा-पर्याप्त समुदानं प्रतिगृह्णाति, प्रतिगृह्य च काकन्दया नगरीतः प्रति- निष्कामति । यथा गोतमो यावत्प्रतिदर्शयति।ततो नु स धन्योऽ- नगारः श्रमणेन भगवताभ्यनुज्ञातः सन्नमूच्छितो यावदध्यु- पपन्नो बिलमिव पन्नगभूतेनात्मनाहारमाहारयति, आहार्य संयमेन तपसात्मानं भावयन् विहरति ।

तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [ ४७ पदार्थान्वयः-तते णं-तत्पश्चात् से-वह धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार पढम-पहले छट्ठक्खमणपारणगंसि-पष्ठ-व्रत (वेले ) के पारण में पढमाए-पहली पोरसीए-पौरुषी मे सज्झायं-स्वाध्याय करेति-करता है जहा-जैसे गोतमसामी- गोतम स्वामी ने तहेव-उसी प्रकार धन्य अनगार ने आपुच्छति-पूछा । जाव-यावत् आज्ञा प्राप्त कर जेणेव-जहां कायंदी-काकन्दी णगरी-नगरी है तेणेव-उसी स्थान पर उवा० २-आता है और आकर कायंदीणगरीए-काकन्दी नगरी में उच्च- ऊंच, नीच और मध्यम कुलों मे अडमाणे-मिक्षा के लिये फिरता हुआ आयंविलं- आचाम्ल के लिये जाव-यावत् णावखंति-जिस आहार को कोई नहीं चाहता उसी को ग्रहण करता है । तते णं-इसके बाद से वह धन्ने-धन्य अणगारे-अन- गार ताए-उस आहार की अभुज्जताए-उद्यम वाली पयययाए-प्रकृष्ट यत्न वाली पयत्ताए-गुरुओं से आज्ञप्त पग्गहियाए-उत्साह के साथ स्वीकार की हुई एसणाए- एपणा-समिति से गवेपणा करता हुआ जति-यदि भत्तं-भात लभति-मिलता है पाणं-पानी ण लभति-नहीं मिलता है अह-अथवा पाणं-पानी मिलता है तो भत्तं-भात न लभति-नहीं मिलता। तते-इसके अनन्तर णं-पूर्ववत से-वह धन्ने- धन्य अणगारे-अनगार अदीणो-दीनता से रहित अविमणे अशून्य अर्थात प्रसन्नचित्त से अकलुसे-क्रोध आदि कलुषों से रहित अविसादी-विपाद-रहित अपरितंतजोगी-अविश्रान्त अर्थात् निरन्तर समाधि-युक्त जयण-प्राप्त योगों मे उद्यम करने वाला घडण-अप्राप्त योगों की प्राप्ति के लिये उद्यम करने वाला जोग- मन आदि इन्द्रियों का संयम करने वाला चरित्ते-जिसका चरित्र था अहापजत्तं- वह जो कुछ भी पर्याप्त समुदाणं-भिक्षा-वृत्ति से प्राप्त होता था उसको पडिगा- हेति २-ग्रहण करता है और ग्रहण कर काकंदीअो-काकन्दी णगरीतो-नगरी से पडिणिक्खमति २-निकलता है और फिर निकल कर जहा-जैसे गोतमे-गोतम स्वामी जाव-यावत् पडिदंसेति२-श्री भगवान् महावीर स्वामी को भिक्षा-वृत्ति से एकत्रित आहार दिखाता है और दिखाकर तते-इसके बाद णं-पूर्ववत् से-बह धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार समणेणं-श्रमण भग-भगवान् महावीर स्वामी की अन्भणुनाते समाणे-आज्ञा प्राप्त होने अमुच्छिते-मूर्छा से रहिन जाव-यावन उस भिक्षा-वृत्ति से हुए भोजन को अणभोववएणे-गग और द्वेप से रहित होकर अर्थान अनासक्त भाव पएणगभूतेणं-सर्प के ममान मुग्ध - माम किये ४८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः vvvvvvvvv विलमिव-विल के समान अर्थात् जिस प्रकार सर्प केवल पार्श्व-भागों के संस्पर्श से विल में घुस जाता है इसी प्रकार धन्य अनगार भी आहार-आहार को बिना आसक्ति के आहारेति २-मुंह में डाल देता है और आहार कर फिर संजमेण- संयम और तवसा-तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विहरति-विच- रण करता है। मूलार्थ-इसके अनन्तर वह धन्य अनगार प्रथम-पष्ट-क्षमण के पारण के दिन पहली पौरुपी में स्वाध्याय करता है। फिर जिस प्रकार गोतम स्वामी महार के लिये श्री श्रमण भगवान् की आज्ञा लेता था इसी प्रकार वह भी श्री भगवान् की आज्ञा प्राप्त कर काकन्दी नगरी में जाकर ऊंच, मध्य और नीच सब तरह के कुलों में आचाम्ल के लिए फिरता हुआ जहां दूसरों से उज्झित मिलता था वहीं से ग्रहण करता था। उसको बड़े उद्यम से प्राप्त होने वाली, गुरुत्रों से आज्ञप्त उत्साह के साथ स्वीकार की हुई एपणा-समिति से युक्त भिक्षा में जहां भात मिला, वहां पानी नहीं मिला, तथा जहां पानी मिला, वहां भात नहीं मिला । इस पर भी वह धन्य अनगार कभी दीनता, खेद, क्रोध आदि कलुपता और विपाद प्रकट नहीं करता था, प्रत्युत निरन्तर समाधि-युक्त हो कर, प्राप्त योगों में अभ्यास करता हुआ और अप्राप्त योगों की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते हुए चरित्र से जो कुछ भी भिक्षा-वृत्ति से प्राप्त होता था उसको ग्रहण कर काकन्दी नगरी से बाहर आ जाता था और बाहर आकर जिस तरह गोतम स्वामी आहार श्री भगवान् को दिखाते थे उसी तरह दिखाता था । दिखाकर श्री भगवान् की आज्ञा से विना आसक्ति के जिस प्रकार एक सर्प केवल पाव भागों के स्पर्श से बिल में घुस जाता है इसी प्रकार वह भी बिना किसी विशेप इच्छा के ( केवल शरीर-रक्षा के लिये ) आहार ग्रहण करता था और आहार ग्रहण करने के अनन्तर फिर संयम और तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरण करता था। टीका- इस सूत्र में धन्य अनगार की प्रतिज्ञा-पालन करने की दृढ़ता का वर्णन किया गया है। प्रतिज्ञा ग्रहण करने के अनन्तर वह जव मिक्षा के लिये नगरों में गया तो उसको कहीं भात मिला तो पानी नहीं मिला, जहां भात मिला था वहां पानी नहीं। किन्तु इतना होने पर भी उसने धैर्य का त्याग कर तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [ ४९ R- दीनता नहीं दिखाई । वह अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ रहा और उसीके अनुसार आत्मा को दृढ और निश्चल बनाकर संयम-मार्ग में प्रसन्न-चित्त होकर विचरता रहा । भिक्षा से उसको जो कुछ भी आहार प्राप्त होता था उसको वह इतनी ऋजुता से खाता था जैसे एक सांप विल में घुसता है अर्थात् वह भोजन को स्वाद के लिये न खाता था, प्रत्युत संयम के लिये शरीर-रक्षा ही उसको भोजन से अभीष्ट थी। 'विलं पन्नगभूतेन' का वृत्तिकार यह अर्थ करते हैं :-" यथा विले पन्नगः पार्श्वसंस्पर्शनात्मानं प्रवेशयति तथायमाहारं मुखेन संस्पृशन्निव रागविरहितत्वादाहा- र यति” अर्थात् इस प्रकार विना किसी आसक्ति के आहार कर फिर संयम के योगों में अपनी आत्मा को दृढ़ करता था इतना ही नहीं बल्कि अप्राप्त ज्ञान आदि की प्राप्ति के लिये भी सदा प्रयत्नशील रहता था। अव सूत्रकार धन्य अनगार के पठन के विषय मे कहते हैं :- समणे भगवं महावीरे अण्णया कयाइ काकंदीए णगरीतो सहसंबवणातो उज्जाणातो पडिणिक्खमति २ बहिया जणवय-विहारं विहरति । तते णं से धन्ने अण- गारे समणस्स भ० महावीरस्स तहारूवाणं थेराणं अंतिते सामाइयमाइयाई एक्कारस अंगाई अहिज्जति, संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । तते णं से धन्ने अणगारे तेणं ओरालेणं जहा खंदतो जाव सुहुय० चिट्ठति । श्रमणो भगवान् महावीरोऽन्यदा कदाचित् काकन्या नगरीतः सहस्राम्रवनादुद्यानात्प्रतिनिष्कामति, प्रतिनिष्क्रम्य वहिर्जनपद-विहारं विहरति । ततो नु स धन्योऽनगारः श्रम- णस्य भगवतो महावीरस्य तथारूपाणां स्थविराणामन्तिके ५० ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः rrrrrrrnwwwm vI से सामायिकादिकान्येकादशाङ्गान्यधीते संयमेन तपसात्मानं भावयन् विहरति । ततो नु स धन्योऽनगारस्तेनोदारेण यथा स्कन्दको यावत्सुहुताशन इव तिष्ठति । पदार्थान्वयः-समणे-श्रमण भगवं-भगवान महावीरे-महावीर अण्णया- अन्यदा कयाइ-कदाचित् काकंदीए-काकन्दी णगरीतो-नगरी से सहसंबवणातो- सहस्राम्रवन उज्जाणातो-उद्यान से पडिणिक्खमति२--निकलते हैं और निकल कर बहिया-बाहर जणवयविहारं-जनपद-विहार के लिये विहरति-विचरण करते हैं। तते-इसके अनन्तर णं-वाक्यालङ्कार के लिए है से-वह धन्ने- लिए है से-वह धन्ने-धन्य अणगारे- अनगार समणस्स भ०--श्रमण भगवान महावीरस्स-महावीर के तहारूवाणं-तथारूप थेराणं-स्थविरों के अंतिते-पास सामाइयमाझ्याई-सामायिक आदि एक्कारस-एका- दश अंगाई-अगों को अहिजति-पढ़ता है । संजमेणं-संयम और तवसा-तप अप्पाणं-अपनी आत्मा की भावेमाणे-भावना करते हुए विहरति-विचरण करता है तते णं-तत्पश्चात् से-वह धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार तेणं-उस अोरालेणं- उदार तप से जहा-जैसे खंदतो-स्कन्दक जाव-यावत् सुहुय०-हवन की अग्नि के समान तप से जाज्वल्यमान होकर चिट्ठति-रहता है । मूलार्थ-श्रमण भगवान् महावीर स्वामी अन्यदा किसी समय काकन्दी नगरी के सहस्राम्रवन उद्यान से निकल कर बाहर जनपद-विहार के लिए विचरने लगे । (इसी समय) वह धन्य अनगार भगवान महावीर के तथारूप स्थविरों के पास सामायिकादि एकादश अङ्ग-शास्त्रों का अध्ययन करने लगा। वह संयम और तप से अपने आत्मा की भावना करते हुए विचरता था । तदनु वह धन्य अनगार स्कन्दक संन्यासी के समान उस उदार तप के प्रभाव से हवन की अग्नि के समान प्रकाशमान मुख से विराजमान हुआ । टीका-यह सूत्र स्पष्ट ही है । सब विपय सुगमतया मूलार्थ से ही ज्ञात हो सकता है। उल्लेखनीय केवल इतना है कि यद्यपि तप और संयम की कसौटी पर चढ़ कर धन्य अनगार का शरीर अवश्य कृश हो गया था, किन्तु उससे उसका आत्मा एक अलौकिक वल प्राप्त कर रहा था, जिसके कारण उसके मुख का प्रतिदिन बढ़ता हुआ तेज हवन की अग्नि के समान देदीप्यमान हो रहा था।

तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ५१ vvvv अव सूत्रकार धन्य अनगार के तप के साथ उनके शरीर का भी वर्णन करते हैं: धन्नस्स णं अणगारस्स पादाणं अयमेयारूवे तव- रूव-लावन्ने होत्था, से जहाणामते सुक्क छल्लीति वा कट्ठ- पाउयाति वा जरग्ग-ओवाहणाति वा, एवामेव धनस्स अणगारस्स पाया सुक्का णिम्मंसा अट्ठि-चम्म-छिरत्ताए पण्णायंति णो चेव णं मंस-सोणियत्ताए । धन्नस्स णं अणगाररस पायंगुलियाणं अयमेयारूवे० से जहाणामते कल-संगलियाति वा मुग्ग-सं० वा मास-संगलियाति वा तरुणिया छिन्ना उण्हे दिन्ना सुक्का समाणी मिलाय- माणी२ चिट्ठति । एवामेव धन्नस्स पायंगुलियातो सुक्कातो जाव सोणियत्ताते। धन्यस्य न्वनगारस्य पादयोरिदमेतद्रूपं तपो-लावण्यम- भूदथ यथानामका शुष्क-छल्लीति वा काष्ठ-पादुकेति वा जरत्कोपानदिति वा, एवमेव धन्यस्यानगारस्य पादौ शुष्को निर्मासावस्थि-चर्म-शिरावत्तया प्रज्ञायेते नो चैव नु मांस-शोणि- धन्यस्य न्वनगारस्य पादाङ्गुलीनामिदमेतद्रूपं लावण्यमभूदथ यथानामका कलाय-संगलिकेति वा मुद्ग-संग- लिकेति वा माप-संगलिकति वा तरुणा छिन्नोष्णे दत्ता शुप्का सती म्लायन्ती (म्लानिमुपगता) तिष्टति, एवमेव धन्यस्यान- गारस्य पादाङ्गुलिकाः शुष्का यावत् शोणितवत्तया (प्रज्ञायन्ते)। तवत्तया ।

५२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः - पदार्थान्वयः-धनस्स-धन्य णं-पूर्ववत् अणगारस्स-अनगार के पादाणं- पैरों का अयमेयारूवे-इस प्रकार का तवरूवलावन्ने-तप-जनित सुन्दरता होत्था- हुई से-जैसे जहाणामते-यथानामक सुक्कछल्लीति वा-सूखी हुई वृक्ष की छाल अथवा कट्ठपाउयाति वा-लकड़ी की खडाऊं अथवा जरग्गोवाहणाति वा-जीर्ण उपानत् (जूती) हो एवामेव-इसी तरह धन्नस्स-धन्य अणगारस्स-अनगार के पाया- सुक्का-सूखे हुए णिम्मंसा-मांस-रहित अडिचम्मछिरत्ताए-अस्थि, चर्म और शिराओं के कारण पण्णायंति-पहचाने जाते हैं णो चेव-न कि मंससोणियत्ताए-मांस और रुधिर के कारण । धन्नस्स-धन्य अणगारस्स-अनगार की पायांगुलियाणं-पैरों की अगुलियों का अयमेयारूवे०-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से-जैसे जहाणामते -यथानामक कलसंगलियाति वा-कलाय-धान्य विशेष की फलियां अथवा मुग्ग-सं०-मूंग की फलियां अथवा माससंगलियाति-माप की फलियां वा-समु- चय के लिए है तरुणिया-जो कोमल ही छिन्ना-तोड़कर उण्हे-गर्मी मे दिना-दी हुई अर्थात् रखी हुई सुक्कासमाणी-सूख कर मिलायमाणी-म्लान हो रही चिट्ठति- हो । एवामेव-इसी प्रकार धन्नस्स-धन्य की पायंगुलियातो-पैरों की अंगुलियां सुक्कातो-सूखी हुई जाव-यावत् सोणियत्ताते-मांस और रुधिर से नहीं पहचानी जाती प्रत्युत केवल अस्थि, मांस और शिराओं के कारण ही पहचानी जाती हैं। मूलार्थ-धन्य अनगार के पैरों का तप से ऐसा लावण्य हो गया जैसे सूखी हुई वृक्ष की छाल, लकड़ी की खड़ाऊं या जीर्ण जूता हो । इसी प्रकार धन्य अनगार के पैर केवल हड्डी, चमड़ा और नसों से ही पहचाने जाते थे, न कि मांस और रुधिर से । धन्य अनगार की पैरों की अंगुलियों का ऐसा तप-जनित लावण्य हुआ जैसा कलाय धान्य की फलियां, मूंग की फलियां अथवा माप (उड़द) की फलियां कोमल ही तोड़ कर धूप में डाली हुई मुरझा जाती हैं । धन्य अनगार की अंगुलियां भी इतनी मुरझा गई थीं कि उन में केवल हड्डी, नम और चमड़ा ही नजर आता था, मांस और रुधिर नहीं। टीका-इस सूत्र में बताया गया है कि तप के कारण धन्य अनगार की शारीरिक दशा में कितना परिवर्तन हो गया। तप करने से उनके दोनों चरण इस प्रकार सूख गये थे जैसे सूखी हुई वृक्ष की छाल, लकड़ी की खड़ाऊं अथवा पुरानी , तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [५३ . सूखी हुई जूती हो । उनके पैरों में मांस और रुधिर नाममात्र के लिए भी अव- शिष्ट नहीं रह गया था, किन्तु केवल हड्डी, चमड़ा और नसें ही देखने में आते थे। पैरों की अंगुलियों की भी यही दशा थी। वे भी कलाय, मूंग या माप की उन फलियों के समान जो कोमल २ तोड़ कर धूप मे डाल दी गई हो-~-मुरझा गई थीं। उन मे भी मांस और रुधिर नहीं रह गया था। इस प्रकार इन उपमाओं से धन्य अनगार के शरीर का वर्णन इस मूत्र में दिया गया है। अव सूत्रकार इसी विषय से सम्बन्ध रखते हुए कहते हैं धन्नस्स जंघाणं अयमेयारूवे० से जहा. काक- जंघाति वा कंक-जंघाति वा ढेणियालिया-जंघाति वा जाव णो सोणियत्ताए, धन्नस्स जाणूणं अयमेयारूवे. से जहा कालि-पोरेति वा मयूर-पोरेति वा ढेणियालिया- पोरेति वा, एवं जाव नो सोणियत्ताए। धण्णस्स ऊरुस्स० जहानामते साम-करील्लेति वा बोरी-करील्लेति वा सल्लति० सामली० तरुणिते उण्हे जाव चिट्ठति, एवामेव धन्नस्स ऊरू जाव सोणियत्ताए। धन्यस्य नु जङ्घयोरिदमेतद्रूपं तपो-लावण्यमभूदथ यथानामका काक-जडेति वा कङ्क-जवेति वा ढेणिकालिक-जबेति वा यावन्नो शोणितवत्तया । धन्यस्य जान्वोरिदमेतद्रूपं तपो-ला- वण्यमभूदथ यथानामकं कालि-पति वा मयूर-पर्वति वा ढेलिकालिका-पर्वेति वा, एवं यावच्छोणितवत्तया । धन्य- स्योर्वोरिदमेतद्रूपं तपो-लावण्यमभूदथ यथानामकं श्याम- करीरमिति वा वदरी-करीरमिति वा शल्यकी-करीरमिति वा ५४ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग: , शाल्मली-करीरमिति वा तरुणकमुष्णे यावत्तिष्ठति, एवमेव धन्य- स्योरू यावच्छोणितवत्तया। पदार्थान्वयः-धन्नस्स-धन्य अनगार की जंघाणं-जङ्घाओं का अयमेया- रूवे-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से जहा०-जैसे काकजंघाति वा-काक-जड्डा हो कंकजंघाति वा-अथवा कङ्क पक्षी की जङ्घाएं हों ढेणियालियाजघाति वा-ढेणिक पक्षी की जङ्घाएं हों, इसी प्रकार धन्य अनगार की जङ्घाएं भी जाव-यावत् सोणिय- ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचानी जाती थीं, धन्नस्स-धन्य अनगार के जाणूणं-जानुओं का अयमेयारूवे०--इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से जहा० जैसे कालि-पोरेति वा-कालि-वनस्पति विशेष का पर्व (सन्धि-स्थान) हो मयूर-पोरेति वा-मयूर के पर्व होते हैं ढेणियालिया-पोरेति वा-टेणिक (ढक्क) पक्षी के पर्व होते है वा-सर्वत्र समुच्चयार्थक है एवं-इसी प्रकार जाव-यावत् धन्य अनगार के जानु सोणियत्ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते थे । अर्थात् उनमें मांस और लहू अवशिष्ट नहीं था धरणस्स-धन्य अनगार के ऊरुस्स-ऊरुओं का इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ जहानामते-जिस प्रकार सामकरील्लेति वा-प्रियंगु वृक्ष की कोंपल बोरीकरील्लेति वा-बदरी-बेर की कोंपल सल्लति०-शल्य की वृक्ष की कॉपल सामली-शाल्मली वृक्ष की कोंपल तरुणिते-कोमल ही तोड़ कर उण्हे-गर्मी में मुरझाई हुई जाव-यावत् चिट्ठति रहती है एवामेव-ठीक इसी प्रकार धन्नस्स-धन्य अनगार के ऊरू-ऊरु जाव-यावत् सोणियत्ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते । मूलार्थ-धन्य अनगार की जवाएं तप के कारण इस प्रकार निर्मास हो गई जैसे काक .(कौवे) की, कङ्क पक्षी की और ढेणिक (ढंक) पक्षी की जवाएं होती हैं । वे सूख कर इस तरह की हो गई कि मांस और रुधिर देखने को भी नहीं रह गया । धन्य अनगार के जानु तप से इस प्रकार सुशोभित हुए जैसे कालि नामक वनस्पति, मयूर और ढेणिक पक्षी के पर्व (गांठ) होते हैं। वे भी मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते थे । धन्य अनगार के ऊरुयों की भी तप से इतनी सुंदरता हो गई जैसे प्रियंगु, बदरी, शल्येकी और शाल्मली वृक्षों की कोमल २ कॉपल तोड़ कर धूप में रखी हुई मुरझा जाती हैं । ठीक इम तरह धन्य अनगार के ऊरु भी मांस और रक्त से रहित हो कर मुरझा गये थे। , तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [ ५५ । टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की जङ्घा, जानु और ऊरुओं का वर्णन किया गया है । तप के प्रभाव से धन्य अनगार की जडाएं मांस और रुधिर के अभाव से ऐसी प्रतीत होती थीं मानो काक-जङ्घा नाम के वनस्पति की-जो स्वभावतः शुष्क होती है-नाल हों । अथवा यों कहिए कि वे कौवे की जवाओं के समान ही निमांस हो गई थीं । अथवा उनकी उपमा हम कङ्क और ढंक पक्षियों की जङ्घाओं से भी दे सकते हैं । इसी प्रकार उनके जानु भी उक्त काक-जङ्घा वन- स्पति की गांठ के समान अथवा मयूर और ढंक पक्षियों के सन्धि-स्थानों के समान शुष्क हो गये थे। दोनों ऊरु मांस और रुधिर के अभाव से सूख कर इस तरह मुरझा गये थे जैसे प्रियडगु, बदरी, कर्कन्धू, शल्यकी या शाल्मली वनस्पतियों के कोमल २ कोंपल तोड़कर धूप में रखने से मुरझा जाते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि धन्य अनगार इस प्रकार धर्म की ओर आकर्पित हुए कि उन्होंने उसी पर अपना सर्वस्व निछावर कर दिया। यहां तक कि उनको शरीर का मोह भी लेश मात्र नहीं रहा । उन्होंने कठोर से कठोर तप करने प्रारम्भ किये । जिसका फल यह हुआ कि उनके किसी अङ्ग में भी मांस और रुधिर अवशिष्ट नहीं रहा । सर्वन केवल अस्थि, चर्म और नसा-जाल ही देखने में आता था । अब सूत्रकार धन्य अनगार के कटि आदि अगों का वर्णन करते हैं: धन्नस्स कडि-पत्तस्स इमेया-रूवे० से जहानामए उट्ट-पादेति वा जरग्ग-पादेति वा जाव सोणियत्ताए, धन्न- स्स उदर-भायणस्स इमे० से जहा० सुक्क-दिएति वा भज- णय-कभल्लेति वा कट्ठ-कोलंबएति वा, एवामेव उदरं सुक्कं । धन्न० पांसुलिय-कडयाणं इमे० से जहा० थासया- वलीति वा पाणावलीति वा मुंडावलीति वा । धन्नस्स पिट्ठि-करंडयाणे अयमेयारूवे० से जहाकन्नावलीति वा गोलावलीति वा वट्टयावलीति वा । एवामेव० धन्नस्स -- ५४ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग: VW शाल्मली-करीरमिति वा तरुणकमुष्णे यावत्तिष्ठति, एवमेव धन्य- स्योरू यावच्छोणितवत्तया । पदार्थान्वयः-धन्नस्स-धन्य अनगार की जंघाणं-जवाओं का अयमेया- रूवे-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से जहा०-जैसे काकजंघातिवा-काक-जङ्घा हो कंकजंघाति वा-अथवा कङ्क पक्षी की जवाएं हों ढेणियालियाजंघाति वा-ढेणिक पक्षी की जङ्घाएं हों, इसी प्रकार धन्य अनगार की जङ्घाएं भी जाव-यावत् सोणिय- त्ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचानी जाती थीं, धन्नस्स-धन्य अनगार के जाणूणं-जानुओं का अयमेयारूवे०-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से जहा०- जैसे कालि-पोरेति वा-कालि-वनस्पति विशेष का पर्व (सन्धि-स्थान) हो मयूर-पोरेति वा-मयूर के पर्व होते हैं ढेणियालिया-पोरेति वा-ढेणिक (ढक्क) पक्षी के पर्व होते है वा-सर्वत्र समुच्चयार्थक है एवं-इसी प्रकार जाव-यावत् धन्य अनगार जानु सोणियत्ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते थे । अर्थात् उनमें मांस और लहू अवशिष्ट नहीं था धरणस्स-धन्य अनगार के ऊरुस्स-ऊरुओं का इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ जहानामते-जिस प्रकार सामकरील्लेति वा-प्रियंगु वृक्ष की कोंपल बोरीकरील्लेति वा-बदरी-बेर की कॉपल सल्लति-शल्य -शल्य की वृक्ष की कोंपल सामली०-शाल्मली वृक्ष की कोंपल तरुणिते-कोमल ही तोड़ कर उण्हे-गर्मी में मुरझाई हुई जाव-यावत् चिट्ठति रहती है एवामेव-ठीक इसी प्रकार धनस्स-धन्य अनगार के ऊरू-ऊरु जाव-यावत् सोणियत्ताए-मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते । मूलार्थ-धन्य अनगार की जवाएं तप के कारण इस प्रकार निर्माम हो गई जैसे काक .(कौवे) की, कङ्क पक्षी की और ढेणिक (ढंक) पक्षी की जवाएं होती हैं । वे सूख कर इस तरह की हो गई कि मांस और रुधिर देखने को भी नहीं रह गया । धन्य अनगार के जानु तप से इस प्रकार सुशोभित हुए जैसे कालि नामक वनस्पति, मयूर और ढेणिक पक्षी के पर्व (गांठ) होते हैं । वे भी मांस और रुधिर से नहीं पहचाने जाते थे। धन्य अनगार के ऊरुयों की भी तप से इतनी सुंदरता हो गई जैसे नियंगु, बदरी, शल्येकी और शाल्मली वृक्षों की कोमल २ कोंपल तोड़ कर धूप में रखी हुई मुरझा जाती हैं । ठीक इम तरह धन्य अनगार के ऊरु भी मांस और रक्त से रहित हो कर मुरझा गये थे। .

तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [५५ टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की जङ्घा, जानु और अरुओं का वर्णन किया गया है । तप के प्रभाव से धन्य अनगार की जवाएं मांस और रुधिर के अभाव से ऐसी प्रतीत होती थीं मानो काक-जङ्घा नाम के वनस्पति की-जो स्वभावतः शुष्क होती है-नाल हों । अथवा यों कहिए कि वे कौवे की जवाओं समान ही निर्मास हो गई थीं । अथवा उनकी उपमा हम कङ्क और ढंक पक्षियों की जवाओं से भी दे सकते हैं। इसी प्रकार उनके जानु भी उक्त काक-जङ्घा वन- स्पति की गांठ के समान अथवा मयूर और ढंक पक्षियों के सन्धि-स्थानों के समान शुष्क हो गये थे। दोनों ऊरु मांस और रुधिर के अभाव से सूख कर इस तरह मुरझा गये थे जैसे प्रियड्गु, बदरी, कर्कन्धू, शल्यकी या शाल्मली वनस्पतियों के कोमल २ कोंपल तोड़कर धूप में रखने से मुरझा जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि धन्य अनगार इस प्रकार धर्म की ओर आकर्पित हुए कि उन्होंने उसी पर अपना सर्वस्व निछावर कर दिया। यहां तक कि उनको शरीर का मोह भी लेश मात्र नहीं रहा। उन्होंने कठोर से कठोर तप करने प्रारम्भ किये । जिसका फल यह हुआ कि उनके किसी अग मे भी मांस और रुधिर अवशिष्ट नहीं रहा । सर्वन केवल अस्थि, चर्म और नसा-जाल ही देखने मे आता था । अब सूत्रकार धन्य अनगार के कटि आदि अङ्गों का वर्णन करते है धन्नस्स कडि-पत्तस्स इमेया-रूवे० से जहानामए उट्ट-पादेति वा जरग्ग-पादेति वा जाव सोणियत्ताए, धन्न- स्स उदर-भायणस्स इमे० से जहा० सुक्क-दिएति वा भञ्ज- णय-कभल्लेति वा कट्ट-कोलंबएति वा, एवामेव उदरं सुकं । धन्न पांसुलिय-कडयाणं इसे० से जहा० थासया- वलीति वा पाणावलीति वा मुंडावलीति वा । धन्नस्स पिट्ठि-करंडयाणे अयमेयारूवे से जहा० कन्नावलीति वा गोलावलीति वा वट्टयावलीति वा । एवामेवः धन्नस्म - ५६ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग. उर-कडयस्स अय० से जहा० चित्तकटरोत वा वियण- पत्तेति वा तालियंट-पत्तेति वा, एवामेव० । धन्यस्य कटि-पत्रस्येदमेतद्रूपं तपो-लावण्यमभूदथ यथानामक उष्ट्र-पाद इति वा जरद्व-पाद इति वा यावच्छोणित- वत्तया।धन्यस्योदर-भाजनस्येदम् ० अथ यथानामकःशुष्क-दृति- रित वा भर्जन-कभल्लमिति वा काष्ठ-कोलम्ब इति वा, एवमेवो- दरं शुष्कम् ० । धन्यस्य पांशुलिका-कटकयोरिदम् ० अथ यथा- नामका स्थासिकावलीति वा पाणावलीति वा मुण्डावलीति वा धन्यस्य पृष्टि-करण्डाणामिदमेतद् अथ यथानामका कर्णावलीति वा गोलकावलीति वा वर्तकावलीति वा । एवमेव धन्यस्योरः- कटकस्येदम् । अथ यथानामकं? चित्तकटरमिति वा व्यजनक- पत्रमिति वा ताल-वृन्त-पत्रमिति वा, एवमेव । पदार्थान्वयः-धनस्स-धन्य अनगार के कडिपत्तस्स-क्रटि-पट्ट का इमे- या रूवे-इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुआ से जहानामए-जैसे- उट्टपादेति वा-उष्ट्र का पैर होता है अथवा जरग्गपादेति वा-बूढ़े बैल का पैर होता है इसी प्रकार जाव-यावत् सोणियत्ताए-मांस और रुधिर की सत्ता से नहीं पहचाने जाता था। धन्नस्स-धन्य अनगार के उदरभायणस्स-उदर-भाजन का इमे-इस प्रकार का तप- जनित लावण्य हुआ से जहा०-जैसे सुक्कदिएति वा-सूखी हुई मशक होती है अथवा भजणयकभल्लेति वा-चने आदि भूनने का भाजन होता है अथवा कट्ठकोलंब- एति वा-काष्ठ का कोलम्ब (पात्र विशेप) होता है एवामेव-इसी प्रकार उदरं-उदर सुक्कं-सूख गया था, धन्न०-धन्य अनगार पांसुलियकडाणं-पार्श्व भाग की अस्थियों के कटकों का इमे० -इस प्रकार की सुंदरता हुई से जहा०-जैसे थासया- वलीति-दर्पणों (आरसी) की पक्ति होती है वा-अथवा पाणावलीति वा-पाण- भाजन विशेष की पक्ति होती है अथवा मुंडावलीति वा-स्थाणुओं की पक्ति होती है तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ५७ --- इसी प्रकार धन्य अनगार की पांसुलिएं भी हो गई थीं । धन्नस्स-धन्य अनगार के पिट्टिकरडयाणं-पीठ की हड्डी के उन्नत प्रदेशों की अयमेयारूवे०-इस प्रकार की तप-जनित सुन्दरता हो गई से जहा०-जैसे कन्नावलीति वा-कान के भूपणों की पक्ति होती है गोलावलीति वा-गोलक-वर्तुलाकार पापाण विशेपों की पक्ति होती है वट्टयावलीति वा-वर्तक -लाख आदि के बने हुए बच्चों के खिलौनों की पक्ति होती है एवामेव०-इसी प्रकार तप के कारण धन्य अनगार के पृष्ठ-प्रदेशों की भी सुन्दरता हो गई थी । धन्नस्स-धन्य अनगार के उरकडयस्स-उर-(वक्ष- स्थल)कटक की अय०-इस प्रकार की सुन्दरता हो गई से जहा जैसे चित्तकट्ट- रेति वा-गौ के चरने के कुण्ड का अधोभाग होता है अथवा वियणपत्तेति वा- बांस आदि के पत्तों का पङ्खा होता है अथवा तालियंटपत्तेति वा-ताड़ के पत्तों का पड़ा होता है एवामेव०-इसी प्रकार धन्य अनगार का वक्षःस्थल भी सूख गया था। भूलार्थ-धन्य अनगार के कटि-पत्र को इस प्रकार का तप-जनित लावण्य हुया जैसे ऊँट का पैर हो, बूढ़े बैल का पैर हो । उसमें मांस और रुधिर का सर्वथा अभाव था । धन्य अनगार का उदर-भाजन इतना सुन्दराकार हो गया था जैसे सूखी मशक हो, चने आदि भूनने का भाण्ड हो अथवा लकड़ी का, वीच में मुड़ा हुआ, पात्र हो । उसका उदर भी ठीक इसी प्रकार सूख गया था । धन्य अनगार की पार्श्व की अस्थियां तप से इतनी सुन्दर हो गई थीं जैसे दर्पणों की पंक्ति हो, पाण नामक पात्रों की पंक्ति हो अथवा स्थाणुओं की पंक्ति हो । धन्य अनगार के पृष्ठ-प्रदेश के उन्नत भाग इतने सुन्दर हो गये थे जैसे कान के भूपणों की पंक्ति हो, गोलक-वर्तुलाकार पापाणों की पंक्ति हो अथवा वर्तक-लाख आदि के बने हुए बच्चों के खिलौनों की पंक्ति हो । इसी प्रकार धन्य अनगार के पृष्ट- प्रदेश भी सूख कर निर्माण हो गये थे । धन्य अनगार के उग(वनःस्थल )-कटको की इतनी सुन्दरता हो गई थी जैसे गौ के चरने के कुण्ड का अधोभाग होता है, वांम आदि का पहा होता है अथवा ताड के पत्तों का पहा होता है । टीक इसी प्रकार उसका वनःस्थल भी मुख कर मांग और रुधिर से रहित हो गया था। टीका-~-उम मूत्र में कम से धन्य अनगार के कटि, उदर, पांसुलिका, पृष्ठ-प्रदेश और वक्षःस्थल का उपमा द्वारा वर्णन किया गया है। उनका कटि-प्रदेश लप के कारण मांग और रुधिर मे रहित हो कर ऐना प्रतीत होता था जसे ऊँट ५८ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः mar,Arv A wnlNAher या बूढ़े बैल का खुर हो । इसी प्रकार उनका उदर भी सूख गया था । उसकी सूख कर ऐसी हालत हो गई थी जैसी सूखी मशक, चने आदि भूनने के पात्र अथवा कोलम्ब नामक पात्र-विशेष की होती है । शुष्क आदि शब्दों की वृतिकार निम्न- लिखित व्याख्या करते हैं : शुष्कः-शोपमुपगतो दृतिः-चर्ममयजलभाजनविशेषः । चणकादीनां भर्जनम्-पाकविशेषापादानं तदर्थं यत्कभल्लम-कपालं घटादिकर्परं तत्तथा । शाखि- शाखानामवनतमयं भाजनं वा कोलम्ब उच्यते काष्ठस्य कोलम्ब इव काष्ठकोलम्बः, परिदृश्यमानावनतहृदयास्थिकत्वात् । कहने का तात्पर्य यह है कि धन्य अनगार का उदर भी सूखकर उक्त वस्तुओं के समान वीच में खोखला जैसा प्रतीत होता था। इसी प्रकार उनकी पांसुलिएं भी सूखकर कांटा हो गई थी । उनको इस तरह गिना जा सकता था जैसे-दर्पण की पंक्ति हो या गाय आदि पशुओं के चरने के पात्रों की पंक्ति अथवा उनके वांधने के कीलों की पंक्ति हो । उनमे मांस और रुधिर देखने को भी न था। यही दशा पृष्ठ-प्रदेशों की भी थी । उनमें भी मांस और रुधिर नहीं रह गया था और ऐसे प्रतीत होते थे मानो मुकुटों की, पापाण के गोलकों की अथवा लाख आदि से बने हुए बच्चों के खिलौनों की पंक्ति खड़ी की हुई हो । उस तप के कारण धन्य अनगार के वक्षःस्थल (छाती) मे भी परिवर्तन हो गया था। उससे भी मांस और रुधिर सूख गया था और पसलियों की पंक्ति ऐसी दिखाई दे रही थी मानो ये किलिज आदि के खण्ड हों अथवा यह वांस या ताड़ के पत्तों का बना हुआ पङ्घा हो । इन सब अवयवों का वर्णन, जैसा पहले कहा जा चुका है, उपमालङ्कार से किया गया है । इससे एक तो स्वभावतः वर्णन मे चारुता आगई है, दूसरे मे पढ़ने वालों को वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने मे अत्यन्त सुगमता प्राप्त होती है । जो विपय उदाहरण दे कर शिष्यों के सामने रखा जाता है, उसको अत्यल्प-बुद्धि भी बिना किसी विशेष परिश्रम के समझ जाता है। हां, यह ध्यान रखने योग्य है कि धन्य अनगार का शरीर यद्यपि सूख कर कांटा हो गया था किन्तु उनकी आत्मिक शक्ति दिन-दिन बढ़ती चली जा रही थी। अब सूत्रकार धन्य अनगार के शेष अवयवों का वर्णन करते है ।

तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ५९ rAurr. धन्नरस बाहाणं से जहानामते समि-संगलियाति वा बाहाया-संगलियाति वा अगत्थिय-संगलियाति वा एवामेव० । धन्नरस हत्थाणं० से जहा० सुक्क छगणियाति वा वड-पत्तेति वा पलास-पत्तेति वा एवामेव० । धन्नस्स हत्थंगुलियाणं० से जहा० कलाय-संगलियाति वा मुग्ग० मास०. तरुणिया छिन्ना आयवे दिन्ना सुक्का समाणी एवामेव० । धन्यस्य बाह्वोः० अथ यथानामका शमी-सङ्गलिकेति वा, वाहाया-सङ्गलिकेति वा अगस्तिक-सङ्गलिकेति वा, एवमेव० । धन्यस्य हस्तयोः० अथ यथानामका शुष्क-छगणिकेति वा वट- पत्रमिति वा पलाश-पत्रमिति वा, एवमेव० । धन्यस्य हस्ताङ- लिकानाम् अथ यथानामका कलाय-सङ्कलिकति वा मुद्ग० माप० तरुणिका छिन्नातपे दत्ता सती, एवमेव० । पदार्थान्वयः-धन्नस्स-धन्य अनगार की चाहाणं-भुजाओं की तप से इतनी सुन्दरता हुई से जहानामते-जैसे समिसंगलियाति वा-शमी वृक्ष की फली अथवा बाहायासंगलियाति वा-वाहाया-एक वृक्ष विशेष की फली अथवा अग- त्थियसंगलियाति वा-अगस्तिक नामक वृक्ष की फली सूखकर हो जाती है एवामेव- इसी प्रकार उनकी भुजाएं भी मांस और रुधिर के अभाव से सूग्य गई थीं। धन्न- स्स-धन्य अनगार के हत्थाणं०-हाथों की सुन्दरता इस प्रकार हो गई धी से जहा- जैसे सुक्क छगणियाति वा-सूवा गोबर होता है अथवा वडपत्तेति वा-वट वृक्ष के सूखे हुए पत्ते होते हैं अथवा पलासपत्तेति वा-पलाय के मून्चे हुए पत्ते होते हैं. एवा- मेवरू-उनके हाथों से भी गांस और रुधिर सूब गया था । धनस्स-धन्य अनगार की हत्थंगुलियाणं-हाथ की अंगुलियों का तप से रोमा लावण्य हुआ से जहाथ- , ६० ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः " जैसे कलायसंगलियाति वा-कलाय की फलियां अथवा मुग्ग०-मूंग की फलियां मास-मास की फलियां जो तरुणिया-कोमल २ छिन्ना-तोड़ कर प्रायवे-धूप में दिन्ना-रखी हुई सुक्का समाणी-सूख कर मुरझा जाती हैं एवामेव-इसी प्रकार धन्य अनगार की अंगुलियां भी रुधिर और मांस से रहित हो कर सूख गई थीं। उन में केवल अस्थि और चर्म ही अवशिष्ट रह गया था। मूलार्थ-~~-मांस और रुधिर के अभाव से धन्य अनगार की भुजाएं इस प्रकार हो गई थीं जैसे शमी, बाहाय और अगस्तिक वृक्ष की सूखी हुई फलियां हो । धन्य अनगार के हाथ सूख कर इस प्रकार हो गये थे जैसे सूखा गोवर होता है अथवा वट और पलाश के सूखे पत्ते होते हैं । उस तप के प्रभाव से धन्य अनगार की अंगुलियां भी सूख गई थीं और ऐसी प्रतीत होती थीं मानो कलाय, मूंग अथवा माप (उड़द) की फलियां जो कोमल २ तोड़ कर धूप में रखी हुई हों । जिस प्रकार ये मुरझा जाती हैं इसी प्रकार उनकी अंगुलियां भी मांस और रुधिर के अभाव से मुरझा कर सूख गई थीं। टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की भुजा, हाथ और हाथ की अंगुलियों का उपमा अलङ्कार से वर्णन किया गया है । उनकी भुजाएं और अङ्गो के समान तप के कारण सूख गई थीं और ऐसी दिखाई देती थीं जैसी शमी, अगस्तिक अथवा बाहाय वृक्षों की सूखी हुई फलियां होती हैं। अगस्तिक और बाहाय का ठीक २ निश्चय नहीं हो सका है कि ये किन वृक्षों की और किस देश में प्रचलित संज्ञा है । वृत्तिकार ने भी इनके लिए केवल वृक्ष विशेप ही लिखा है। सम्भवतः उस समय किसी प्रान्त में ये नाम प्रचलित रहे हों। यही दशा धन्य के हाथों की भी थी। उनसे भी मांस और रुधिर सूख गया था तथा वे इस तरह दिखाई देते थे जैसा सूखा गोबर होता है अथवा सूखे हुए वट और पलाश के पत्ते होते हैं। हाथ की अंगुलियों में भी विचित्र परिवर्तन हो गया था । जो अंगुलियां कभी रक्त और मांस से परिपूर्ण थीं, वे आज सूख कर एक निराली शोभा धारण कर रही थीं। सूख कर उनकी यह हालत हो गई थी जैसे एक कलाय, मूंग अथवा माप (उड़द) की फली की--जिसको कोमल ही तोड़

तृतीयो वर्गः]
भाषाटीकासहितम् ।
[६१
-
कर धूप मे सुखा दिया हो-दशा होती है । वह पहले का मांस और रुधिर तो उनमे
देखने को भी शेप नहीं रह गया था । यदि उनको कोई पहचान सकता था तो
केवल अस्थि और चर्म से जो उनमें अवशिष्ट रह गये थे।
बाहु शब्द यद्यपि उकागन्त है तथापि निम्न-लिखित सूत्र से उसको
आकागन्त आदेश हो जाता है। अतः सूत्र में आया हुआ 'बाहाणं' पद प्राकृत
व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है । किसी को अन्यथा भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए ।
सूत्र यह है:
वाहोरात् ॥८११॥३६॥ वाहुराब्दस्य स्त्रियामाकारान्तादेशो भवति । वाहाए जेण
धरिओ एकाए ।। स्त्रियामित्येव । वामे अरो वाहू ।।
इस प्रकरण में तप की ही महिमा विशेष रूप से वर्णन की गई है । साथ
ही उपमा अलङ्कार से शरीर के सौन्दर्य का भी वर्णन किया गया है । यद्यपि
सामान्यतः ज्ञान, दर्शन और चारित्र तीनों को मोक्ष के प्रति कारणता है तथापि
चारित्र की प्रधानता दिखाने के लिये उसका पृथक् वर्णन किया गया है।
अब सूत्रकार धन्य अनगार की ग्रीवा, हनु, ओप्ठ और जिहा का वर्णन
करते है :-
धन्नस्स गीवाए० से जहा० करग-गीवाति वा कुंडि-
या-गीवाति वा उच्चट्ठवणतेति वा एवामेव० । धन्नरसणं
हणुआए से जहा० लाउय-फलेति वा हकुव-फलेति वा
अंब-गद्वियाति वा एवामेव० । धन्नस्स उट्ठाणं से जहा०
सुक्क-जलोयाति वा सिलेस-गुलियाति वा अलत्तग-गुलिया-
ति वा एवामेव।धन्नस्स जिव्भाए. से जहा० वड-पत्तेति
वा पलास-पत्तेति वा साग-पत्तेति वा एवामेवः ।
धन्यस्य ग्रीवायाः अथ यथानामका करक-विति वा
कुण्डिका-ग्रीवेति बोच्चस्थापनक इति वा, एवमेव० । धन्यस्य

६२ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः हनोः अथ यथानामकमलाबु-फलमिति वा हकुब-फलमिति वा आम्रएटिकेति वा, एवमेव० । धन्यस्योष्ठयोः० अथ यथानामका शुष्क-जलौकेति वा, श्लेष्म-गुटिकेति वाक्तक-गुटिकेति वा, एव- मेव० । धन्यस्य जिह्वायाः० अथ यथानामकं वटपत्रमिति वा पलाश-पत्रमिति वा शाक-पत्रमिति वा, एवमेव । पदार्थान्वय:-धन्नस्स-धन्य (अनगार) की गीवाए०-ग्रीवा की ऐसी आकृति हो गई थी से जहा०-जैसी करगगीवाति वा-करवे (मिट्टी का छोटा सा पात्र ) की ग्रीवा होती है अथवा कुंडियागीवाति वा-कुण्डिका ( कमण्डलु) की ग्रीवा होती है उच्चट्ठवणतेति वा-अथवा उच्चस्थापनक- ऊँचे मुंह वाला वर्तन होता है एवामेव०-इसी प्रकार उनकी ग्रीवा भी सूखकर लम्बी दिखाई देती थी । धन्नस्स-धन्य अनगार का हणुाए-चिबुक-ठोडी ऐसी सुन्दर हो गई थी से जहा०-जैसे लाउयफलेति वा-तुम्बे का फल होता है हकुव- फलेति वा-कुब-वनस्पति विशेष का फल होता है अथवा अंबगट्ठियाति वा-आम की गुठली होती है एवामेव०-इसी प्रकार धन्य अनगार का चिवुक भी मांस और रुधिर से रहित हो कर सूख गया था । धन्नस्स-धन्य अनगार के उट्ठाणं-ओठ ऐसे हो गये थे से जहा०-जैसे सुक्कजलोयाति वा-सूखी हुई जोक होती है अथवा सिलेसगुलियाति वा श्लेश्म की गुटिका होती है अथवा अलत्तगगुलियाति वा- अलक्तक-महदी की गुटिका होती है एवामेव०-इसी प्रकार धन्य अनगार के ओंठ भी मुरझा गये थे । धनस्स-धन्य अनगार की जिम्भाए-जिह्वा ऐसी हो गई थी से जहा०-जैसे वडपत्तेति वा-वट वृक्ष का पत्ता होता है अथवा पलासपत्तेति वा- पलाश वृक्ष का पत्ता होता है अथवा साकपत्तेति वा-शाक के पत्ते होते हैं एवामेव०- इसी प्रकार धन्य अनगार की जिह्वा भी सूख गई थी। मूलार्थ-धन्य अनगार की ग्रीवा मांस और रुधिर के प्रभाव से सूख कर इस तरह दिखाई देती थी जैसी सुराई, कुण्डिका (कमण्डलु) और किसी ऊंचे मुख वाले पात्र की ग्रीवा होती है। उनका चिबुक (ठोडी) भी इसी प्रकार सूख गया था और ऐसा दिखाई देता था जैसा तुम्बे या हकुब - तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [६३ ~~ Mon का फल अथवा आम की गुठली होती है । अोठों की भी यही दशा थी। वे भी सूख कर ऐसे हो गये थे जैसे सूखी हुई जोंक होती है अथवा श्लेष्म या मेंहदी की गुटिका होती है। उनमें रक्त का विलकुल अभाव हो गया था। जिह्वा में भी बिलकुल रक्त का अभाव हो गया था, वह ऐसी दिखाई देती थी जैसा वट वृक्ष का अथवा पलाश (ढाक) का पत्ता हो या सूखे हुए शाक का पत्ता हो । टीका -~~-इस सूत्र में धन्य अनगार की ग्रीवा, चिबुक, ओठ और जिह्वा का उपमा अलवार से वर्णन किया गया है । ग्रीवा में भी अन्य अवयवों के समान मांस और रुधिर का बिलकुल अभाव हो गया था । अतः वह स्वभावतः लम्बी दिग्वाई देती थी। सूत्रकार ने उनकी उपमा लम्बे मुख वाले सुराई आदि पात्रों से दी है। इसके लिए सूत्र मे एक 'उच्चस्थापनक' पद आया है, जो इसी प्रकार का एक पात्र होता है । जो चिवुक कभी मांस और रुधिर से परिपूर्ण था उसकी आज यह दगा हो गई थी जैसी एक सूखे हुए तुम्वे के या हकुब ( एक प्रकार का वनस्पति ) के फल की होती है अथवा वह ऐसी दिखाई देती थी जैसे एक आम की गुठली हो। जो ओंठ कभी विम्बफल के समान रक्त थे वे तप के कारण सूखकर बिलकुल विवर्ण हो गये थे । उनकी आकृति अब इस प्रकार हो गई थी जैसी श्रेप्म और मूबी हुई मेहदी की गुटिका होती है । जिहा भी सूख कर वट वृक्ष के पत्ते के समान अथवा पलाश (ढाक) के पत्ते के समान नीग्स और रूखी हो गई थी यह मत्र तप आत्म-शुद्वि के ही लिये होता है। यह भी इस वर्णन से मिद्ध होना है कि उत्कृष्ट तप ही आत्म-शुद्धि की मामर्थ्य रखना है और इसी के द्वाग कर्मों की निर्जरा भी हो सकती है । यह वान अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि तप मदा सम्यक ज्ञान और सम्यग दर्शन पूर्वक ही सिद्ध हो सकता है । जब तक सम्यक् ज्ञान और सम्यग् दर्शन न हो तब तक केवल नप से कोई भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता। अय सूत्रकार धन्य अनगार के नाक आदि अगों के विषय में कहते हैं, धन्नस्सनासाए से जहा अंबग-पसियाति वा अंबा- डग-पेसियातिवा मातुटुंग-पेसियाति वा तरुणिया० एवा- ६४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः WM मेव० । धन्नस्स अच्छीण० से जहा० वीणा-छिड्डेति वा बद्धीसग-छिड्डेति वा पाभातिय-तारिगा इ वा एवामेव०। धन्नरस कण्णाणं० से जहा० मूला-छल्लियाति वा वालुक० कारेल्लय-छल्लियाति वा एवामेव० । धन्नस्स सीसस्स से जहा० तरुणग-लाउएति वा तरुणग-एलालुयत्ति वा सिण्हालएति वा तरुणए जाव चिट्ठति एवामेव धन्नरस अणगारस्स सीसं सुकंलुक्खं णिम्मंसं अट्ठि-चम्म-च्छिर- ताए पन्नायति णो चेव णं मंस-सोणियत्ताए, एवं सव्वत्थ, णवरं उदरभायण-कण्ण-जीहा-उट्ठा एऍसिं अट्ठीण भन्नति चस्मच्छिरत्ताए पण्णाय इति भन्नति । धन्यस्य नासिकायाः० अथ यथानामकाम्रक-पशिकेति वाम्रातक-पेशिकेति वा मातुलुङ्ग-पेशिकेति वा तरुणिका० एव- मेव० । धन्यस्याक्ष्णोः० ० अथ यथानामकं वीणा-छिद्रमिति वा वद्धीसक-छिद्रमिति वा प्राभातिक-तारकेति वा, एवमेव० । धन्य- स्य कर्णयोः० अथ यथानामका मूल-छल्लिकेति वा वालुक-छल्लि- कति वा कारल्लक-छल्लिकेति वा, एवमेव० । धन्यस्य शीर्षकस्य० अथ यथानामकं तरुणकालाबुरिति वा तरुणकालुकमिति वा सिहालकमिति वा तरुणकं यावत्तिष्ठति, एवमेव० धन्यस्यान- गारस्य शीर्ष शुष्कं रुक्षं निर्मासमस्थि-चर्म-शिरावत्तया प्रज्ञायते नो चैव नुमांस-शोणितवत्तया। एवं सर्वत्र नवरमुदरभाजन-कर्ण- जिह्वौष्ठेषु (एतेषु) अस्थीति (पदं) न भण्यते, चर्म-शिरावत्तया तृतीयो वर्गः भापाटीकासहितम् । [६५ -NAV ~~~~~ -- Jv-~ प्रज्ञायन्त इति भण्यते । पदार्थान्वयः-धन्नस्स-धन्य अनगार की नासाए-नासिका तप-तेज से ऐसी हो गई थी से जहा०-जैसी अंबगपेसियाति वा-आम की फांक होती है अथवा अंबाडगपेमियाति वा-अम्रातक-अम्बाडा की फांक होती है अथवा मातुलुंगपेसियाति वा-मातुलुङ्ग-वीजपूरक फल की फांक होती है जो तरुणिया- कोमल ही काट कर धूप में सुखा दी गई हो एवामेव०-यही दशा धन्य अनगार की नासिका की भी हो गई थी । धन्नस्स-धन्य अनगार की अच्छीणं०-आंखों की यह दशा हो गई थी से जहा०-जैसे वीणाछिड्वेति-वीणा के छिद्र की होती है अथवा बद्धीसगछिड्डेति वा-बद्धीसक नाम वाले वाद्य विशेष के छिद्र की होती है अथवा पाभातियतारगा इ वा-प्रभात समय का नारा होता है एवामेव०--इसी प्रकार धन्य अनगार की आंखे भीतर धंस गई थीं । धन्नस्स-धन्य अनगार के करणाणं-कानों की यह दशा हो गई थी से जहा-जैसे मूला-छल्लियाति वा-मूली का छिल्का होता है अथवा वालुक-चिर्भटी की छाल होती है अथवा कारल्लय-छल्लियाति वा- करेले का छिल्का होता है एवामेव०-इसी प्रकार धन्य अनगार के कान भी सूग्य गये थे । धन्नस्स-धन्य अनगार के सीसस्स-शिर ऐसा हो गया था से जहा०-जैसे तरुणगलाउएति वा-कोमल तुम्बक अथवा तरुणगएलालुएति वा-कोमल आलू अथवा सिण्हालएति वा-सिस्तालक-सेफालक नामक फल विशेष जो तरुणए-कोमल जाव-यावत-तोड़कर धूप मे कुम्हलाया हुआ चिट्ठति-रहना है एवामेव०-इमी प्रकार धन्नम्म-धन्य अनगार का सीसं--शिर सुक्कं-शुष्क हो गया लुक्ख-रूक्ष हो गया णिम्मंस-मांस रहित हो गया और केवल अविचम्मच्छिरत्ताए-अस्थि, चर्म और नामा-जाल के कारण पन्नायति पहचाना जाना था नो चेव गं-न कि मंसमो- गियत्ताए-गास और मधिर के कारण एवं-इसी प्रकार मन्चत्य-मब अगों के विषय में जानना चाहिए णवरं-विशेषता इतनी है कि उदरभायण-उदर-भाजन कन्न-कान जीहा-जिता उट्टा-ओंठ एगोस-एनके विषय में अट्ठी-'अम्धि याद पर ग भन्ननि-ही कहा जाना. क्योंकि इनमें अस्थि नानी होनी अनः केवल चम्गन्छि- नाए-वर्ग और नाया जाल से पएगाय इति-जाने जाने थे इस प्रकार भन्नति- पाना लागि । अधीन जिन स्थानों में अस्थि नानी उनके विषय में वन नर्म ६६ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः और शिरा वाले होने से इतना ही कहना चाहिए । मूलार्थ-धन्य अनगार की नासिका तप के कारण सूख कर ऐसी हो गई थी जैसी एक आम, आम्रातक या मातुलुंग फल की फांक कोमल २ काट कर धूप में सुखा देने से हो जाती है। धन्य अनगार की आंखें इस प्रकार दिखाई देती थीं जैसा वीणा या बद्धीसग (वाद्य विशेप) का छिद्र हो अथवा प्रभात काल का टिमटिमाता हुआ तारा हो । इसी तरह उनकी आंखें भी भीतर धंस गई थीं । धन्य अनगार के कान ऐसे हो गये थे जैसे मूली का छिल्का होता है अथवा चिर्भटी की छाल होती है या करेले का छिल्का होता है। जिस प्रकार ये सूख कर मुरझा जाते हैं इसी प्रकार उनके कान भी मुरझा गये थे । धन्य अनगार का शिर ऐसा हो गया था जैसा कोमल तुम्बक, कोमल आलू और सेफालक धूप में रखे हुए सूख जाते हैं इसी प्रकार उनका शिर सूख गया था, रूखा हो गया था और उसमें केवल अस्थि, चर्म और नासा-जाल ही दिखाई देता था किन्तु मांस और रुधिर नाममात्र के लिये भी शेप नहीं रह गया था। इसी प्रकार सब अङ्गों के विषय में जानना चाहिए। विशेषता केवल इतनी है कि उदर-भाजन, कान, जिह्वा और ओंठ इनके विषय में 'अस्थि' नहीं कहना चाहिए, किन्तु केवल चर्म और नासा-जाल से ही ये पहचाने जाते थे ऐसा कहना चाहिए, क्योंकि इन अङ्गों में अस्थि नहीं होती। टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की नासिका, कान, आंखे और शिर का वर्णन पूर्वोक्त अङ्गों के समान ही उपमा अलङ्कार के द्वारा किया गया है । शेप सब अर्थ मूलार्थ में ही स्पष्ट कर दिया गया है । इस सूत्र में अनेक प्रकार के कन्द, मूल और फलों से उपमा दी गई है। उनमे से आम्रातक, मूलक, वालुंकी और कारेलक ये कन्द और फल विशेषों के नाम हैं। तथा 'आलुकं-कन्द-विशेषस्तच्चानेकप्रकारकं भवति । परिग्रहार्थमेलालुक- मित्युक्तम् ।' अर्थात् आलुक एक प्रकार का कन्द होता है, जो आजकल आलू के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार सूत्रकार ने धन्य अनगार धन्य अनगार के पैर से लेकर शिर तक सब अगों का वर्णन कर दिया है। इसमें विशेपता केवल इतनी ही है कि उदर-भाजन, तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ६७ जिह्वा, कान और ओठों के साथ 'अस्थि' शब्द का अन्वय नहीं करना चाहिए । शेष सब अगों के साथ "सुक्कं लुक्खं णिम्मंसं-" इत्यादि सब विशेषण लगाने चाहिएं। अव सूत्रकार प्रकागन्तर से धन्य अनगार के शरीर का वर्णन करते हैं:- धन्ने णं अणगारे णं सुक्केणं भुक्खेणं पात-जंघोरुणा विगत-तडिकरालेणं कडि-कडाहेणं, पिट्ठमवस्सिएणं उदर- भायणेणं, जोइजमाणेहिं पांसुलि-कडएहिं, अक्ख-सुत्त- मालाति वागणिज्ज-मालाति वा गणेजमाणहिं, पिट्टि-करं- डग-संधीहिं, गंगा-तरंग-भूएणं उर-कडग-देस-भाएणं सुक्क-सप्प-समाणाहिं बाहाहिं, सिढिल-कडालीविव चलं- तेहिं यअग्ग-हत्थेहिं, कंपणवातिओ विव वेवमाणीए सीस- घडीए, पव्वाय-वदण-कमले, उन्भड-घडामुहे, उव्वुड्ड- णयणकोसे, जीवं जीवेणं गच्छति, जीवं जीवेणं चिट्ठति, भासं भासिस्सामीति गिलाति३ । से जहाणामते इंगाल- सगडियाति वा जहा खंदओ तहा जाव हुयासगे इव भास-रासि-पलिच्छन्ने तवेणं, तेएणं, तवतेयसिरीए उव- सोभेमाणे २ चिट्ठति । (सूत्रम् ३) धन्यो न्वनगारो नु शुष्केण (बुभुक्षायोगात् रूक्षेण), पाद-जङ्घोरुणा, विकृत-तटिकरालेन कटि-कटाहेन, पृष्ठमवधि- तेनोदर-भाजनेन, (निासतया) दृश्यमानः पार्थस्थि-कटकै रक्षसूत्र-मालेति वा गणित-मालेति वा गण्यमानैः पृष्ठ-करण्डक- , , , ६८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः , , सन्धिभिर्गङ्गा-तरङ्गभूतेनोरः-कटकदेश-भागेन,शुष्क-सर्प-समाना- भ्यां बाहुभ्याम् , शिथिल-कटालिकेव चलद्भ्यामग्र-हस्ताभ्याम् , कम्पन-वातिक इव वेपमानया शीर्ष-घट्या (लक्षितः), अम्लान- वदन-कमलः, उद्भट-घट-मुखः, उद्वृत्त-नयनकोशः, जीवं जीवेन गच्छति, जीवं जीवेन तिष्ठति, भाषां भाषिष्य इति ग्लायति३ । अथ यथानामकेगाल-शकटिकेति वा यथा स्कन्दकस्तथा यावद् हुताशन इव भस्म-राशि-प्रतिच्छन्नस्तपसा, तेजसा, तपस्तेजः- श्रियोपशोभमानस्तिष्ठति । (सूत्रम् ३) पदार्थान्वयः-धन्ने-धन्य अणगारे- धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार णं-दोनों वाक्यालङ्कार के लिए हैं सुक्केणं-मांस आदि के अभाव से सूखे हुए भुक्खेणं-भूख के कारण रूखे पड़े हुए पादजंघोरुणा-पैर, जङ्घा और अरु से विगततडिकरालेणं-मांस के क्षीण होने से पार्श्व भागों की अस्थियां नदी के तट के समान भयङ्कर रूप से जिसमे उन्नत हो रही थीं ऐसे कडिकडाहेण-कटिरूप कटाह-कच्छप-पृष्ठ या भाजन विशेष से, पिट्ठमवस्सिएणं-यकृत् , प्लीहा आदि के क्षीण होने से पीठ के साथ मिले हुए उदरभायणेणं-उदर-भाजन से, जोइजमाणेहि-निर्मास होने से दिखाई देते हुए पांसुलिकडएहि-पार्श्वस्थि-कटक से, अक्खसुत्तमालाति वा-रुद्राक्ष के दानों की माला अथवा गणिजमालाति वा-गिनती की माला के दाने जिस प्रकार गणेजमा- हिं-पृथक् २ गिने जा सकते हैं इसी प्रकार मांस के अभाव से पृथक् २ गिने जाने वाले पिट्टिकरंडगसंधीहिं-पृष्ठ-करण्डक की सन्धियों से, गंगातरङ्गभूएणं- गङ्गा नदी की तरङ्गों के समान उरकडगदेसभाएणं-वक्षःस्थल रूपी कटक--वंशदलमय- चटाई के विभाग से सुक्कसप्पसमाणहि-सूखे हुए सर्प के समान बाहाहि-भुजाओं से सिढिलकडालीविव-शिथिल लगाम के समान चलंतेहिं-कॉपते हुए अग्गहत्थेहि- अम-हस्त-हाथों से कंपणवातियो विव-कम्पन-वातिक रोग वाले पुरुष के समान वेवमाणीए-कम्पायमान सीसघडीए-शिर रूपी घटी से युक्त वह धन्य अनगार पवायवदणकमले-मुरझाए हुए मुख वाला उन्भडघडामुहे-ओंठों के क्षीण होने से भयङ्कर घट के मुख के समान मुख-कमल वाला उव्वुडणयणकोसे-जिमके नयन- - तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । कोश भीतर घुम गये थे जीव-जीवन को जीवेणं-जीव की शक्ति से गच्छति-चलाता था न कि शरीर की शक्ति से जीवं जीवेणं चिट्ठति-जीव की ही शक्ति से खड़ा होता था भासं-भाषा भासिस्सामि-कहूंगा इति-विचार मात्र से भी गिलाति-ग्लान हो जाता था से-अथ जहा-जैसे खंदो-स्कन्धक जाव-यावत् भासरासिपलिच्छने- भस्म की राशि से ढके हुए हुयासणे-हुताशन-अग्नि के इव-समान तवेणं-तप तेएणं-तेज और तवतेयसिरीए-तप और तेज की शोभा से उवसोभेमाणे-शोभा- यमान होता हुआ चिट्ठति-विराजता है । सूत्रं ३-तीसरा सूत्र समाप्त हुआ। मूलार्थ-धन्य अनगार मांस आदि के अभाव से सूखे हुए, भूख के कारण रूखे पैर, जवा और ऊरु से, भयङ्कर रूप से प्रान्त भागों में उन्नत हुए कटि-कटाह से, पीठ के साथ मिले हुए उदर-भाजन से, पृथक् २ दिखाई देती हुई पसलियों से, रुद्राक्ष-माला के समान स्पष्ट गिनी जाने वाली पृष्ठ-करण्डक (पीठ के उन्नत-प्रदेशों) की सन्धियों से, गङ्गा की तरंगों के समान उदर-कटक के प्रान्त भागों से, सूखे हुए सांप के समान भुजाओं से, घोड़े की ढीली लगाम के समान चलते हुए हाथों से, कम्पनवायु रोग वाले पुरुष के शरीर के समान कांपती हुई शीर्ष-घटी से, मुरझाए हुए मुख-कमल से क्षीण अोष्ठ होने के कारण घड़े के मुख के समान विकराल मुख से और आंखों के भीतर धंस जाने के कारण इतना कृश हो गया था कि उसमें शारीरिक बल विलकुल भी बाकी नहीं रह गया था। वह केवल जीव के बल से ही चलता, फिरता और खड़ा होता था। थोड़ा सा कहने के लिये भी वह स्वयं खेद मानता था। जिस प्रकार एक कोयलों की गाड़ी चलते हुए शब्द करती है, इसी प्रकार उसकी अस्थियां भी चलते हुए सन्द करती थीं। वह स्कन्दक के समान हो गया था । भस्म से ढकी हुई आग के समान वह भीतर से दीप्त हो रहा था । वह तेज से, तप से और तप-तेज की शोभा से शोभायमान होता हुआ विचरता था। टीका-इस एक ही सूत्र मे प्रकारान्तर से धन्य अनगार के सब अवयवों का वर्णन किया गया है । धन्य अनगार के पैर जहा और ऊरु मांस आदि के अभाव से बिलकुल सूख गये थे और निरन्तर भूखे रहने के कारण विलकुल रूम हो गये थे । चिकनाहट उनमे नाम-मात्र के लिये भी शेप नहीं थी । कटि मानो कटाह (कच्छप की पीठ अथवा भाजन विशेष-हलवाई आदियों की बड़ी २ कढाई .

७० ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः था। वह मांस के क्षीण होने से तथा अस्थियों के ऊपर उठ जाने से इतना भयङ्कर प्रतीत होता था जैसे ऊंचे २ नदी के तट हों । पेट विलकुल मूख गया । उसमें से यकृत् और प्लीहा भी क्षीण हो गये थे । अतः वह स्वभावतः पीठ के साथ मिल गया था । पसलियों पर का भी मांस बिलकुल सूख गया था और एक २ साफ २ गिनी जा सकती थी। यही हाल पीठ के उन्नत प्रदेशों का भी था। वे भी रुद्राक्ष-माला के दानों के समान सूत्र में पिरोए हुए जैसे अलग २ गिने जा सकते थे । उर के प्रदेश ऐसे दिखाई देते थे, जैसी गङ्गा की तरङ्गे हों । भुजाएँ सूख कर सूखे हुए सॉप के समान हो गई थीं। हाथ अपने वश में नहीं थे और घोड़े की ढीली लगाम के समान अपने आप ही इधर-उधर हिलते रहते थे। शिर की स्थिरता भी लुप्त हो गई थी । वह शक्ति से हीन हो कर कम्पन-वायु रोग वाले पुरुष के शरीर के समान कापता ही रहता था । इस अत्युग्र तप के कारण से जो मुख कभी खिले हुए कमल के समान लहलहाता था अव मुरझा गया था । ओंठ सूखने के कारण नहीं के समान हो गये थे। इससे मुख फूटे हुए घड़े के मुख के समान विकराल हो गया था। उनकी दोनों आंखे विलकुल भीतर धंस गई थीं । शारीरिक बल विलकुल शिथिल हो गया था और केवल जीव-शक्ति से ही चलते थे अथवा खड़े होते थे । इस प्रकार सर्वथा दुर्वल होने के कारण उनकी यह दशा हो गई थी कि किसी प्रकार की बात-चीत करने में में भी उनको स्वयं खेद प्रतीत होता था और जब कुछ कहते भी थे तो अत्यन्त कष्ट के साथ । शरीर साधारणतः इस प्रकार खचपचा गया था कि जब वे चलते थे तो अस्थियों में परस्पर रगड़ लगने के कारण चलती हुई कोयलों की गाड़ी के समान शब्द उत्पन्न होने लगता था । कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्कन्दक का शरीर तप के कारण क्षीण हो गया था। इसी प्रकार धन्य अनगार का शरीर भी हो गया था। किन्तु शरीर क्षीण होने पर भी उनकी आत्मिक-दीप्ति बढ़ रही थी और वे इस प्रकार दिखाई देते थे जैसे भस्म से आच्छादित अग्नि होती है । उनका आत्मा तप से, तेज से और इनसे उत्पन्न कान्ति से अलौकिक सुन्दरता धारण कर रहा था। इस सूत्र में कुछ एक पदों की व्याख्या हमे आवश्यक प्रतीत होती है । अतः पाठकों की सुविधा के लिए हम उनकी वृत्तिकार ने जो व्याख्या की है उसको यहां दे देते हैं तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [७१ -~ ? 'उदरकडगदेसभाएणं' इति-उदर एव कटकस्य-वंशदलमयस्य देशभागो विभागः । 'सिढिलकडालीविव' इति शिथिला कटालिका-अश्वानां मुखसंयमनोपकरण- विशेपो लोहमयस्तद्वत् । 'उन्भडघडामुहे त्ति' उद्भटं-विकरालं क्षीणप्रायदशनच्छदत्वाद् घटकस्येव मुखं यस्य स तथा ।' यहां यह शङ्का उपस्थित होती है कि 'उद्भटघटमुखः' इस कथन से मुख पर मुख-पत्ती बंधी हुई तो सिद्ध नहीं होती ' समाधान में कहा जाता है कि यहां पर सूत्रकार का तात्पर्य केवल तप के कारण क्षीण शरीर के वर्णन से ही है, धर्मोपकरणों के वर्णन से नहीं । यदि वे शरीर के अन्य धर्मोपकरणों का वर्णन करते और इस का न करते तो यह शङ्का उपस्थित हो सकती थी। किन्तु यहां तो किसी का भी वर्णन नहीं मिलता। उपकरणों का वर्णन जब वे अनशन के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गये, तब किया गया है। वहां उनके वस्त्र और पात्रों का उल्लेख मिलता है । अतः सिद्ध यह हुआ कि यहां सूत्रकार को उनका केवल शारीरिक वर्णन ही अभिप्रेत था। यदि इस प्रकार न माना जाय तो उनके कटि-पट्ट आदि अङ्गों के वर्णन के साथ चौलपट्ट आदि का भी वर्णन अवश्य मिलता। इस प्रकार तो उपस्थ इन्द्रिय के वर्णन न करने से लोग यह भी कहने लगेगे कि धन्य अनगार की जननेन्द्रिय भी नहीं थी । अतः इसमें कोई सन्देह नहीं रहा कि धन्य अनगार के मुख पर धर्म-ध्वज (मुखपत्ती) सदैव बंधी रहती थी। कुछ एक हस्त-लिखित प्रतियों मे कुछ पाठ-भेद भी मिलता है। यहां उनका देना उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि किसी में मेघकुमार का और किसी में स्कन्धक का उदाहरण दिया गया है । जो इस विषय मे विशेप जानना चाहे, उनको उक्त कुमारों का वर्णन पढ़ना चाहिए । अब सूत्रकार धन्य अनगार की उस समय के अन्य मुनियों में प्रधानता दिखाते तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे, गुण- सिलए चेतिते, सेणिए राया। तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे समोसढे परिसा णिग्गया सेणिते हुए कहते हैं:

७२ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः नि० धम्मकहा। परिसा पडिगया। तते णं से सेणिए राया समणस्स० ३ अंतिए धम्म सोच्चा निसम्म समणं भगवं महावीरं वंदति णमंसति २ एवं वयासी इमंसि णं भंते ! इंदभूति-पामोक्खाणं चोद्दसण्हं समण-साह- स्सीणं कतरे अणगारे महा-दुक्कर-कारए चेव महा-णिज्जर- तराए चेव ? एवं खलु सेणिया! इमासिं इंदभूति-पामो- क्खाणं चोदसण्हं समण-साहस्सीणं धन्ने अणगारे महा- दुक्कर-कारए चेव महा-णिज्जरतराए चेव । से केणद्वेणं भंते ! एवं वुच्चति इमासिं जाव साहस्सीणं धन्ने अणमारे महा-दुक्कर-कारए चेव, महा-णिजर० ? एवं खलु सेणिया! तेणं कालेणं तेणं समएणं काकंदी नामनगरी होत्था। उप्पि पासायवडिंसए विहरति । तते णं अहं अन्नया कदाति पुव्वाणुपुव्वीए चरमाणे गामानुगामं दुतिजमाणे जेणेव काकंदी णगरी जेणेव सहसंबवणे उज्जाणे तेणेव उवागते। अहापडिरूवं उग्गहं उ० संजमे जाव विह- रामि । परिसा निग्गता। तहेव जाव पव्वइते जाव बिल- मिव जाव आहरति । धन्नस्स अणगारस्स पादाणं सरीर-वन्नओ सव्वो जाव उवसोभेमाणे २ चिट्ठति । से तेणद्वेणं सेणिया ! एवं वुच्चति इमासिं चउदसण्हं साहस्सीणधन्ने अणगारे महा-दुक्कर-कारए महा-निजरताए तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ७३ चेव । तते णं सेणिए राया समणस्स भगवतो महावीर- स्स अंतिए एयमढे सोच्चा णिसम्म हट्टतुट्ठ० समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिण-पयाहिणं करेति २ वंदति णमंसति २ जेणेव धन्ने अणगारे तेणेव उवा- गच्छति २ धन्नं अणगारं तिक्खुत्तो आयाहिणं करेति २ वंदति णमंसति एवं वयासी धण्णेऽसि णं तुम देवाणु० सुपुण्णे सुकयत्थे कय-लक्खणे सुलद्दे णं देवाणु- प्पिया! तव माणुस्सए जम्म-जीविय-फले तिकटु वंदति णमंसति २ जेणेव समणे० तेणेव उवागच्छति २ समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो वंदति णमंसति २ जा- मेव दिसं पाउन्भूते तामेव दिसं पडिगए । (सूत्रम् ४) तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहं नगरम् , गुण- शैलकं चैत्यम् ,श्रेणिको राजा । तस्मिन् काले तस्मिन् समये श्रमणो भगवान् महावीरः समवस्तृतः । परिषन्निर्गता, श्रेणिको निर्गतः । धर्मः कथितः परिषत्प्रतिगताः । ततो नु स श्रेणिको राजा श्रमणस्य भगवतो महावीरस्यान्तिके धर्मं श्रुत्वा निशम्य श्रमणं भगवन्तं महावीरं वन्दति नमस्यति, वन्दित्वा नत्वा चैवमवादीत् “एषां भदन्त ! इन्द्रभूति-प्रमुखानांश्चतुर्दशानां श्रमण-सहस्राणां कतरोऽनगारो महा-दुष्कर-कारकश्चैव महा- निर्जरतरकश्चैव ?” “एवं खलु श्रेणिक! एपामिन्द्रभूति-प्रमुखाना- श्चतुर्दशानां श्रमण-सहस्राणां धन्योऽनगारो महादुप्कर-कारकश्चैव .

७४ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः महानिर्जरतरकश्चैव” “अथ केनार्थेन भदन्त ! एवमुच्यते एतेषां यावत् सहस्राणां महादुष्कर-कारकश्चैव महा-निर्जरतरकश्चैव ? एवं खलु श्रेणिक ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये काकन्दी नाम नगर्यभूत् । उपरि प्रासादावतंसके विहरति । ततो न्वहमन्यदा कदाचित् पूर्वानुपूर्व्या चरन् ग्रामानुग्रामं द्रुतन् यत्रैव काकन्दी नगरी यत्रैव सहस्राम्रवनमुद्यानं तत्रैवोपागतः । यथाप्रतिरूपक- मवग्रहमवगृह्य संयमेन यावद् विहरामि । परिषन्निर्गता । तथैव यावत्प्रव्रजितः। यावद बिलमिव यावदाहारयति । धन्यस्य न्वन- गारस्य पादयोः, शरीरवर्णनं सर्वं यावदुपशोभमानस्तिष्ठति । अथ तेनार्थेन श्रेणिक ! एवमुच्यते-एतेषांश्चतुर्दशानां श्रमण- सहस्राणां धन्योऽनगारो महादुष्कर-कारको महा-निर्जरतरकश्चैव। ततो नु स श्रेणिको राजा श्रमणस्य भगवतो महावीरस्यान्तिके एतमर्थं श्रुत्वा निशम्य हृष्टस्तुष्टो यावत् श्रमणस्य भगवतो महा- वीरस्य त्रिकृत्व आदक्षिण-प्रदक्षिणां करोति, कृत्वा वन्दति नम- स्यति च, वन्दित्वा नत्वा च यत्रैव धन्योऽनगारस्तत्रैवोपाग- च्छति, उपागत्य धन्यस्यानगारस्य त्रिकृत्व आदक्षिण-प्रदक्षिणां करोति, कृत्वा (तं) वन्दति नमस्यति, वन्दित्वा नत्वैवमवा- दीत्-धन्योऽसि त्वं देवानुप्रिय ! सुपुण्यः सुकृतार्थः कृत-लक्षणः सुलब्धन्नु देवानुप्रिय ! त्वया मानुषकं जन्मजीवित-फलमिति- कृत्वा वन्दति नमस्यति, वन्दित्वा नत्वा यत्रैव श्रमणः० तत्रै- वोपागच्छति, उपागत्य श्रमणं भगवन्तं महावीरं त्रिकृत्त्रो वन्दति नमस्यति, बन्दित्वा नत्वा च यस्य दिशः प्रादुर्भूत- , , तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ७५ स्तामेव दिशं प्रतिगतः । (सूत्रम् ४) पदार्थान्वयः-तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय रायगिहे-राजगृह नाम का णगरे-नगर था और उसके बाहर गुणसिलए-गुण- शैलक चेतिते-चैत्य । सेणिए-श्रेणिक नाम का राया-राजा राज्य करता था । तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय समणे-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरे-महावीर स्वामी समोसढे- समोसढे-उस गुणशैलक चैत्य में विराजमान हो गये यह समाचार पाकर परिसा-नगर की जनता णिग्गया-धर्म-कथा सुनने के लिए श्री भगवान् के पास गई सेणिते- श्रेणिक गजा भी नि०-गया धम्मकहा-श्री भगवान् ने धर्म-कथा की और परिसा-परिपद् पडिगया-अपने २ घर वापिस चली गई । तते णं-इसके अनन्तर से-वह सेणिए-श्रेणिक राया-राजा समणस्स-श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के अंतिए-पास धम्म-धर्म को सोचा-सुनकर और उसका निसम्म-मनन कर समणं-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरं-महावीर की वंदति-वन्दना करता है उनको णमंसति २-नमस्कार करता है, वन्दना और नमस्कार कर एवं-इस प्रकार वयासी कहने लगा भंते-हे भगवन् ! इमासिं-इन इंदभूतिपामोक्खाणं-इन्द्रभूति प्रमुख चोद्दसएहं-चौदह समणसाहस्सीणं-हजार श्रमणों में कतरे-कौनसा अण- गारे -अनगार महादुक्करकारए चेव-अति दुष्कर क्रिया करने वाला है और महा- णिज्जरतराए चेव-महाकर्मों की निर्जरा करने वाला है ? यह सुनकर श्री भगवान् कहने लगे सेणिया-हे श्रेणिक एवं खलु-इस प्रकार निश्चय से इमासिं-इन इंदभूति- पामोक्खाणं-इन्द्रभूति-प्रमुख चोद्दसराह-चौदह समणसाहस्सीणं-हजार श्रमणों मे धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार महादुक्करकारए-अत्यन्त दुष्कर क्रिया करने वाला है और महाणिज्जरतगए चेव-बड़ा कर्मों की निर्जरा करने वाला है। यह सुनकर श्रेणिक राजा कहने लगा भंते-हे भगवन् ! से-अथ केणद्वेणं-किस कारण से एवं- इस प्रकार वुञ्चति-आप ऐमा कहते हैं कि इमासिं-इन जाव-यावत् इन्द्रभूनि-प्रमुख चौदह साहस्सीणं-हजार अनगारों में धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार ही महादुकर- कारए चेव-अत्यन्त दुष्कर तप करने वाला और महाणिज्जर-बडा कर्मों की निर्जरा करने वाला है ? उत्तर में श्री भगवान् कहने लगे सेणिया-हे श्रेणिक' एवं खलु- ?

७६] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः - -- से - इस प्रकार निश्चय से तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय का- कंदी-काकन्दी नाम-नाम वाली नगरी-नगरी होत्था-थी और वहां धन्य कुमार उप्पि-ऊपर पासायवडिंसए-श्रेष्ठ प्रासाद मे विहरति-विचरण करता था तते णं- उसी समय अहं-मैं अन्नया-अन्यदा कदाति-कदाचित् पुवाणुपुब्बीए-अनुक्रम से चरेमाणे-विहार करता हुआ गामाणुगाम-एक ग्राम से दूसरे ग्राम मे दूतिज- माणे-विहार करता हुआ जेणेव-जहां काकंदी-काकन्दी नाम की णगरी- नगरी थी जेणेव-जहां सहसंबवणे-सहस्राम्रवन उज्जाणे-उद्यान था तेणेव- वहीं उवागते-आया आहापडिरूवं-यथा-प्रतिरूप उग्गह-अवग्रह लिया और उ० २-अवग्रह लेकर संजमे०-संयम और तप के द्वारा अपनी आत्मा की भावना करते हुए जाव-यावत् विहरामि-विचरण करने लगा तव परिसा-परिपद् निग्गता- धर्म-कथा सुनने के लिए नगर से सहस्राम्रवन में उपस्थित हुई तहेव-उसी प्रकार धन्य अनगार भी आया और धर्म-कथा सुनकर पन्चइते-दीक्षित हो गया जाव- यावत् उसने कठिन से कठिन तप प्रारम्भ कर दिया और विलमिव-जिस प्रकार सर्प आसानी से विल मे घुस जाता है इसी प्रकार वह विना किसी लालसा के आहा- रेति-आहार करता है। फिर धनस्स-धन्य अणगारस्स-अनगार के पादाणं- पैर मांस और रुधिर से रहित होकर सूख गये इसी प्रकार सरीवन्नो-सारे शरीर का वर्णन कहना चाहिए । वह सवो जाव-सव अवयवों के तप-रूप लावण्य से उवसोभेमाणे-शोभायमान होता हुआ चिट्टति-विराजमान हो गया। से-अथ तेणटेणं-इस कारण सेणिया-हे श्रेणिक एवं-इस प्रकार बुच्चति-मैं कहता हूं कि इमासि-इन चउदसराह-चौदह साहस्सीणं-हजार मुनियों मे धन्ने-धन्य अणगारे- अनगार महादुक्करकारए-अत्यन्त कठिन तप करने वाला और महानिजरतराए चेव-. सब से श्रेष्ट कर्मों की निर्जरा करने वाला है तते-इसके अनन्तर णं-वाक्यालङ्कार के लिये है से-वह सेणिए-श्रेणिक राया-राजा समणस्स-श्रमण भगवतो-भगवान् महावीरस्स-महावीर के अंतिए-पास एयमटुं-इस बात को सोचा-सुनकर और उसका णिसम्म-मनन कर हद्वतुट्ठ०-हृष्ट और तुष्ट होकर जाव-यावत समणं-श्रमण भगवं-भगवान महावीरं-महावीर को तिक्खुत्तो-तीन बार आयाहिणपयाहिणं- आदक्षिणा और प्रदक्षिणा करेति २-करता है और आदक्षिणा और प्रदक्षिणा कर उनकी वंदति-वन्दना करता है और णमंसति २-नमस्कार करता है और - तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [७७ - वन्दना और नमस्कार कर जेणेव-जहां धन्ने-धन्य अणगारे-अनगार था तेणेव-वहीं उवागच्छति २-आता है और आकर धन्न-धन्य अणगारं-अनगार को तिक्खुत्तो- तीन बार आयाहिणपयाहिणं-आदक्षिणा और प्रदक्षिणा कर वंदति-उनकी वन्दना करता है और णमंसति-उनको नमस्कार करता है । वन्दना और नमस्कार कर एवं-इस प्रकार क्यासी-कहने लगा देवाणु०-हे देवानुप्रिय ' तुम-तुम धरणेसि- धन्य हो सुपुण्णे-तुम्हारे अच्छे पुण्य हैं सुकयत्थे-तुम कृतार्थ हुए कयलक्खणे- शुभ लक्षणों से युक्त हो देवाणुप्पिया-हे देवानुप्रिय 'माणुसए-मानुप जम्मजीविय- फले-जन्म के जीवन का फल तुमने सुलद्धे-अच्छी तरह प्राप्त कर लिया है तिकटु-इस प्रकार स्तुति कर वंदति-उनकी वन्दना करता है और णमंसति-उनको नमस्कार करता है और वन्दना और नमस्कार करके जेणेव-जहां समणे०--श्रमण भगवान महावीर स्वामी थे तेणेव- वहीं उवागच्छति २-आता है और आकर समणं-श्रमण भगवं-भगवान् महावीरं-महावीर स्वामी की तिक्खुत्तो-तीन बार वंदति-वन्दना करता है और उनको णमंसति-नमस्कार करता है, वन्दना और नमस्कार कर जामेव-जिस दिसं-दिशा से पाउन्भूते-प्रकट हुआ था तामेव-उसी दिसं-दिशा को पडिगए-वापिस चला गया । सूत्रं ४-चौथा सूत्र समाप्त हुआ। मूलार्थ-उस काल और उस समय में राजगृह नाम का नगर था। उसके बाहिर गुणशैलक नाम का चैत्य या उद्यान था । वहां श्रेणिक राजा राज्य करता था। उसी काल और उसी समय में श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी उक्त चैत्य में विराजमान हो गये । नगर की जनता यह सुनकर नगर से बाहर निकली और श्री भगवान् की सेवा में उपस्थित हुई और साथ ही श्रेणिक राजा भी उपस्थित हुआ। श्री भगवान् ने धर्म-कथा सुनाकर सब को सन्तुष्ट किया और सब लोग नगर को वापिस चले गये । श्रेणिक राजा ने इस कथा को सुन कर और उसका मनन कर श्री भगवान् की वन्दना की और उनको नमस्कार किया । फिर वन्दना और नमस्कार कर बोला-"हे भगवन् ! इन्द्रभूति-प्रमुख चौदह हजार श्रमणों में कौनसा श्रमण अत्यन्त कठोर तप का अनुष्ठान करने वाला और सब से बड़ा कर्मों की निर्जरा करने वाला है ?" यह सुनकर श्री भगवान् कहने लगे-" हे श्रेणिक ! इन्द्रभृति-प्रमुख चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार अत्यन्त कठोर तप का अनुष्ठान करने वाला और सब से बड़ा ७८] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम्। [ तृतीयो वर्गः कर्मों की निर्जरा करने वाला है।" (श्री भगवान् के मुख से यह सुनकर फिर श्रेणिक राजा ने कहा) "हे भगवन् ! किस कारण से आप कहते हैं कि चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार ही कठोर तप करने वाला और सब से बड़ा को की निर्जरा करने वाला है।" (श्रेणिक राजा के इस प्रश्न को सुनकर समाधान करते हुए श्री भगवान् कहने लगे) "हे श्रेणिक ! उस काल और उस समय में एक काकन्दी नाम वाली नगरी थी। उसके बाहर सहस्राम्रवन नाम का उद्यान था। (यह उद्यान सब ऋतुओं में हरा-भरा रहता था । काकन्दी नगरी म भद्रा नाम की एक सार्थवाहिनी रहती थी। वह धन-धान्य से परिपूर्ण थी। उसका धन्य नाम वाला एक पुत्र था, जो यौवनावस्था में विवाहित होकर ) श्रेष्ठ प्रासादों में सुख का अनुभव करता हुआ विचरण करता था। इसी समय कभी पूर्वानुपूर्वी से विचरता हुआ, एक ग्राम से दूसरे ग्राम में विहार करता हुआ मैं जहां काकन्दी नगरी थी और जहां सहस्राम्रवन उद्यान था वहीं पहुंच गया और यथा प्रतिरूप अवग्रह लेकर संयम और तप के द्वारा अपनी आत्मा की भावना करते हुए वहीं पर विचरने लगा। नगरी की जनता यह सुनकर वहां आई और मैंने उनको धर्म-कथा सुनाई । धन्य अनगार के ऊपर इसका विशेष प्रभाव पड़ा और वह तत्काल ही गृहस्थ को छोड़ कर साधु-धर्म में दीक्षित हो गया । (उसने तभी से कठोर-व्रत धारण कर लिया और केवल श्राचाम्ल से पारण करने लगा। वह जब आहार और पानी भिक्षा से लाता था तो मुझको दिखाकर) जिस प्रकार सर्प विल में बिना किसी परिश्रम के घुस जाता है इसी प्रकार विना किसी लालसा के आहार करता था । धन्य अनगार के पादों से लेकर सारे शरीर का वर्णन पूर्ववत् जानना चाहिए । उसके सव अङ्ग तप-रूप लावण्य से शोभित हो रहे थे। इसीलिए हे श्रेणिक ! मैंने कहा है कि चौदह हजार श्रमणों में धन्य अनगार महातप और महा-कर्मों की निर्जरा करने वाला है । जव श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के मुख से श्रेणिक राजा ने यह सुना और इस पर विचार किया तो हृदय में अत्यन्त प्रसन्न और सन्तुष्ट हुआ और इस प्रकार प्रफुल्लित होकर उसने श्रमण भगवान् महावीर स्वामी की तीन बार आदक्षिणा और प्रदक्षिणा की, उनकी वन्दना की और नमस्कार किया, वन्दना और नमस्कार कर जहां धन्य अनगार था वहां गया । वहां जाकर उसने धन्य अनगार - तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [ ७९ की तीन बार श्रादक्षिणा और प्रदक्षिणा की । वन्दना और नमस्कार किया तथा वन्दना और नमस्कार कर कहने लगा कि हे देवानु- प्रिय ! तुम धन्य हो, श्रेष्ठ पुण्य वाले हो, श्रेष्ठ कार्य करने वाले हो, श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त हो और तुमने ही इस मनुष्य जीवन का श्रेष्ठ फल प्राप्त किया है । इस प्रकार स्तुति कर और फिर उनको नमस्कार कर वह जहां श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी थे वहीं आगया। वहां श्रमण भगवान् को तीन बार नमस्कार किया और वन्दना की। फिर जिस दिशा से आया था उसी दिशा में चला गया। इस प्रकार चौथा सूत्र समाप्त हुआ। टीका-इस सूत्र का अर्थ मूलार्थ में ही स्पष्ट हो गया है। अतः इस विपय में कुछ भी वक्तव्य शेप नहीं है । हां, अव वक्तव्य इतना अवश्य है कि इस सूत्र से हमें तीन शिक्षाएं मिलती हैं । उनमें से पहली तो यह है कि जिसमें जो गुण हों उनका निःसङ्कोच-भाव से वर्णन करना चाहिए। और गुणवान् व्यक्ति का धन्यवाद आदि से उत्साह बढ़ाना चाहिए । जैसे यहां पर श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने किया। उन्होंने धन्य अनगार के कठोर तप का यथातथ्य वर्णन किया और उसको उसके लिये धन्य- वाद भी दिया। दूसरी शिक्षा हमे यह मिलती है कि एक बार जब संसार से ममत्व-भाव छोड़ दिया तो फिर सम्यक् तप के द्वारा आत्म-शुद्धि अवश्य कर लेनी चाहिए । यही संसार के इतने सुखों को त्यागने का फल है । जो व्यक्ति साधु बन कर भी ममत्व में ही फंसा रहे उसको उस त्याग से किसी प्रकार की भी सफ- लता की आशा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि इस प्रकार करने से तो वह कहीं का नहीं रहता और उसका इह-लोक और पर-लोक दोनों ही विगड़ जाते हैं। यहां धन्य अनगार ने हमारे सामने कितना अच्छा उदाहरण रखा है कि उन्होंने जब एक बार गृहस्थ के सारे सुखों को त्याग साधु-वृत्ति ग्रहण कर ली तो उसको सफल बनाने के लिये उत्कृष्ट से उत्कृष्ट तप किया और लोगों को बता दिया कि किस प्रकार तप के द्वारा आत्म-शुद्धि होती है और कैसे उक्त तप से आत्मा सुशोभित किया जाता है । तीमरी शिक्षा जो हमें इससे मिलती है वह यह है कि जब किसी व्यक्ति की स्तुति करनी हो तो उसमें वास्तव में जितने गुण हों उन सब का वर्णन करना ८० ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः चाहिये । कहने का अभिप्राय यह है कि जितने गुण उस व्यक्ति में विद्यमान हों उन्हीं को लक्ष्य मे रख कर स्तुति करना उचित है न कि और असत्य गुणों का आरोपण करके भी क्योंकि ऐसी स्तुति प्रशंसनीय होने के बजाय हास्यास्पद वन जाती है । ऐसी स्तुति हास्यास्पद ही नहीं बल्कि इससे स्तुति करने वाले को दोप भी लगता है । अतः झूठी प्रशंसा कर निरर्थक ही किसी को वाँसों पर नहीं चढ़ाना चाहिए । यही तीन शिक्षाएं हैं, जो हमें इस सूत्र से मिलती हैं । इनके द्वारा उन्नति की ओर बढ़ता हुआ आत्मा सुशोभित होता है। अव सूत्रकार धन्य अनगार के तप के अनन्तर की दशा का वर्णन करते हैं :- तए णं तस्स धण्णस्स अणगारस्स अन्नया कयाति पव्व-रत्तावरत्तकाले धम्मजागरियं० इमेयारूवे अब्भत्थिते ५ एवं खलु अहं इमेणं ओरालेणं जहा खंदओ तहेव चिंता आपुच्छणं थेरेहिं सद्धि विउलं दुरूहंति मासिया संले- हणा नवमासपरियातो जाव कालमासे कालं किच्चा उड्ढं चंदिम जा णव य गेविज विमाणपत्थडे उड्ढं दूरं वीति- वत्तित्ता सव्वट्ठसिद्धे विमाणे देवत्ताए उववन्ने । थेरा तहेव उयरंति जाव इमे से आयारभंडए। भंते त्ति भगवं गोतमे तहेव पुच्छति जहा खंदयस्स । भगवं वागरेति जाव सव्वट्ठसिद्धे विमाणे उववण्णे । धन्नस्स णं भंते! देवस्स केवतियं कालं ठिती पण्णत्ता ? गोतमा! तेत्तीसं साग- रोवमाई ठिती पन्नत्ता । से णं भंते ! ततो देव-लोगाओ कहिं गच्छिहिंति ? कहिं उववज्जिहिंति ? गोयमा!महा- विदेहे वासे सिज्झिहिति ५। तं एवं खलु जंबू !समणेणं तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [ ८१ जाव संपत्तेणं पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पन्नत्ते। (सूत्रं ५) पढमं अज्झयणं समत्तं । ततो नु तस्य धन्यस्यानगारस्यान्यदा कदाचित् पूर्व- रात्रापरात्र-काले धर्म-जागरिकैतद्रूपाध्यात्मिका ५ । एवं खल्वह- मनेनौदारेण यथा स्कन्दकः, तथैव चिन्तापृच्छणा। स्थविरैः सार्धं विपुलमारोहति ।मासिकी संलेखना,नवमास-पर्यायः,यावत् काल- मासे कालं कृत्वावं चन्द्र० यावन्नव च ग्रैवेयक-विमान-प्रस्तटा- दूर्ध्वं दूरंव्यतिक्रम्य सर्वार्थसिद्धे विमाने देवतयोत्पन्नः। स्थविरा- स्तथैवावतरन्ति। यावदिमान्याचारभण्डकानि। भदन्तेति गौतम- स्तथैव पृच्छति। यथा स्कन्धस्य भगवान् व्याकरोति यावत्सर्वार्थ- सिद्धे विमाने उत्पन्नः । “धन्यस्य नु भदन्त ! देवस्य कियन्तं कालं स्थितिःप्रज्ञप्ता ?” “गौतम!त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा स्थितिः प्रज्ञप्ता।" “स तु भदन्त ! ततो देवलोकात् कुत्र गमिष्यतीति ? कुत्रोत्पत्स्यतीति ?” “गौतम ! महाविदेहे वासे सेत्स्यतीति ।" तदेवं खलु जम्बु ! श्रमणेन यावत्संप्राप्तेन प्रथमस्याध्य- यनस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः । ( सूत्रम् ५) प्रथमाध्ययनं समाप्तम् । पदार्थान्वयः-तए-इसके अनन्तरं णं-वाक्यालङ्कार के लिए है तस्स- उस धनस्स-धन्य अणगारस्स-अनगार को अन्नया-अन्यदा कयाति-किसी समय पुनरत्तावरत्तकाले-मध्य-गत्रि के समय धम्मजागरियं-धर्म-जागरण करते हुए इमेयारूवे-इस प्रकार के अन्भत्थिते-आध्यात्मिक विचार उत्पन्न हुए अहं-मैं एवं- इस प्रकार खलु-निश्चय से इमेणं-इस अोरालेणं-उदार तप के कारण से जहा- जैसा संदो-स्कन्दक हुआ उसी प्रकार हो जाऊं और नदनुमार ही उनको जैसी स्कन्दक को हुई थी तहेव-उसी प्रकार चिंता-अनान करने की चिन्ना ८२ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः से उत्पन्न हुई उसी प्रकार आपुच्छणं-श्री भगवान् पूछा और पूछकर थेरेहि- स्थविरों के सर्द्धि-साथ विउले-विपुलगिरि पर दुरूहंति-चढ़ गया मासिया- मासिकी संलेहणा-संलेखना की नवमास-नौ महीने तक परियातो-संयम-पर्याय का पालन किया जाव-यावत् कालमासे-मृत्यु के समय कालं किच्चा के समय कालं किच्चा-काल के द्वारा उड़े- ऊंचे चंदिम-चन्द्रमा से जाव-यावत् य-पुनः णव-नव गेविज्जविमाण-पत्थडे- प्रैवेयक विमानों के प्रस्तट से उट्टे-ऊंचे दूर-दूर वीतिवत्तित्ता-व्यतिक्रम करके सव्वट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमाणे-विमान में देवत्ताए-देव-रूप से उववन्ने-उत्पन्न हो गया । थेरा-स्थविर तहेव-उसी प्रकार उयरंति-विपुलगिरि से उतर गये और जाव-यावत् श्री भगवान् से कहने लगे कि हे भगवन से-उस धन्य अनगार के इमे- ये आयारभंडए-आचार-भण्डोपकरण हैं अर्थात् ये उसके वस्त्र-पात्र आदि उपकरण हैं इसके अनन्तर भगवं-भगवान् गोतमे-गौतम तहेव-उसी प्रकार पुच्छति- श्री भगवान् से पूछते हैं जहां-जैसे खंदयस्स-स्कन्दक के विषय में पूछा था भगवं- श्री भगवान् इसके उत्तर में वागरेति-प्रतिपादन करते हैं कि जाव-यावत् धन्य अनगार सव्वट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमाणे-विमान में उववरणे-देव-रूप से उत्पन्न हो गया । णं-पूर्ववत् वाक्यालङ्कार के लिये है भंते !-हे भगवन् ! इस प्रकार से फिर गौतम स्वामी जी ने श्री भगवान से पूछा धनस्स-धन्य देवस्स-देव की केवतियं-कितने कालं-काल की ठिती-स्थिति पएणत्ता प्रतिपादन की है ? उत्तर में श्री भगवान् कहते हैं कि गोयमा ! हे गौतम तेत्तीसं-तेतीस सागरोवमाई- सागरोपम की ठिती-स्थिति पन्नत्ता-प्रतिपादन की है। णं-पूर्ववत् भंते-हे भगवन् ! से-वह धन्य देव ततो-उस देवलोगाओ-देवलोक से च्युत होकर कहि- कहां पर गच्छिहिंति-जायगा ? कहिं-कहां उववज्जिहिंति-उत्पन्न होगा ? भग- वान् इसके उत्तर मे कहते हैं गोयमा-हे गौतम ! महाविदेहे-महाविदेह वासे- क्षेत्र में सिज्झिहिति ५-सिद्ध होगा। तं-सो एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से जंबू-हे जम्बू ' समणेणं-श्रमण भगवान् ने जाव-यावत् जो संपत्तेणं-मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं पढमस्स-(तृतीय वर्ग के) प्रथम अज्झयणस्स-अध्ययन का अयमद्वे-यह अर्थ पन्नत्ते-प्रतिपादन किया है। सूत्रं ५-पञ्चम सूत्र समाप्त हुआ । पढम-प्रथम अझ- यणं-अध्ययन समत्तं-समाप्त हुआ। मूलार्थ-तब उस धन्य अनगार को अन्यदा किसी समय मध्यनात्रि में तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् [८३ धर्म-जागरण करते हुए इस प्रकार के आध्यात्मिक विचार उत्पन्न हुए कि मैं इस उत्कृष्ट तप से कृश हो गया हूं अतः प्रभात काल ही स्कन्दक के समान श्री भगवान् से पूछकर स्थविरों के साथ विपुलगिरि पर चढ़कर अनशन व्रत धारण कर लूं । उसने तदनुसार ही श्री भगवान् की आज्ञा ली और विपुलगिरि पर अनशन व्रत धारण कर लिया। इस प्रकार एक मास तक इस अनशन व्रत को पूर्ण कर और नौ मास तक दीक्षा का पालन कर वह काल के समय काल करके चन्द्र से ऊंचे यावत् नव ग्रैवेयक विमानों के प्रस्तटों को उल्लङ्घन कर सर्वार्थसिद्ध विमान में देव-रूप से उत्पन्न हो गया । तब स्थविर विपुलगिरि से नीचे उतर आये और भगवान् से कहने लगे कि हे भगवन् ! ये उस धन्य अनगार के वस्त्र- पात्र आदि उपकरण हैं । तब भगवान् गौतम ने श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी से प्रश्न किया कि हे भगवन् ! धन्य अनगार समाधि से काल कर कहां उत्पन्न हुआ है । भगवान् ने इसके उत्तर में कहा कि हे गौतम ! धन्य अनगार समाधि-युक्त मृत्यु प्राप्त कर सर्वार्थसिद्ध विमान में देव-रूप से उत्पन्न हुआ । गौतम स्वामी ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! धन्य देव की वहां कितने काल की स्थिति है ? भगवान् ने उत्तर दिया कि तेतीस सागरोपम धन्य देव की वहां स्थिति है। गौतम ने प्रश्न किया कि देवलोक से च्युत होकर वह कहां जायगा और कहां पर उत्पन्न होगा ? भगवान् ने कहा कि वह महाविदेह क्षेत्र में सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो निर्वाण-पद प्राप्त कर सब दुःखों से विमुक्त हो जायगा । श्री सुधर्मा स्वामी जी कहते हैं कि हे जम्बू ! इस प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् ने तृतीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का यह अर्थ प्रतिपादन किया है। पांचवां सूत्र समाप्त । प्रथमाध्ययन समाप्त हुआ। टीका-इस सूत्र में धन्य अनगार की अन्तिम समाधि का वर्णन किया गया है और उसके लिए सूत्रकार ने धन्य अनगार की स्कन्दक संन्यासी से उपमा दी है । इस प्रकार तप करते हुए धन्य अनगार को एक समय मध्य-रात्रि में जाग- रण करते हुए विचार उत्पन्न हुआ कि मुझ में अभी तक उठने की शक्ति विद्यमान है और मेरे धर्माचार्य श्री भगवान् महावीर स्वामी भी अभी तक विद्यमान हैं तो फिर ऐसी सुविधा होने पर भी मैं अनशन व्रत धारण क्यों न कर लू । इम विचार ८४ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग. के आते ही उन्होंने प्रातः काल ही श्री भगवान् की आना ली और आत्म-विशुद्धि के लिये पञ्च महाव्रतों का पाठ पढ़ा तथा उपस्थित श्रमण और श्रमणियों से क्षमा प्रार्थना कर तथा-रूप स्थविरों के साथ शनैः २ विपुलगिरि पर चढ़ गये। वहां पहुंच कर उन्होंने कृष्ण-वर्णीय पृथिवी-शिला-पट्ट पर प्रतिलेखना कर दर्भ का संस्तारक बिछाया और पद्मासन लगाकर बैठ गये। फिर दोनों हाथ जोड़े और उनसे शिर पर आवर्तन किया। इस प्रकार पूर्व दिशा की ओर मुख कर 'नमोत्थुणं' के द्वारा पहले सव सिद्धों को नमस्कार किया, फिर उसीसे श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी को भी नमस्कार किया और कहा कि हे भगवन् ! आप वहीं पर वैठ कर सब कुछ देख रहे हैं अतः मेरी वन्दना स्वीकार करें और मैंने पहले ही आपके समक्ष अष्टादश पापों का त्याग किया था अव मैं आपकी ही साक्षी देकर उनका फिर से जीवन भर के लिये परित्याग करता हूं । इनके साथ ही साथ अब अशन, पान, खाद्य और स्वाद्य पदार्थों का भी परित्याग करता हूं । अपने परम प्रिय शरीर के ममत्व को भी छोड़ता हूं तथा आज से पादोपगमन नामक अनशन व्रत धारण करता हूं। इस प्रकार श्री भगवान् की वन्दना कर और उनको साक्षी कर उक्त प्रण किया और उसीके अनुसार विचरने लगे । उन्होंने सामायिक आदि से लेकर एकादश अगों का अध्ययन किया और एक मास तक अनशन व्रत धारण कर अन्त में समाधि-मरण प्राप्त किया। उनकी सब दीक्षा की अवधि केवल नौ मास हुई, जिस में साठ भक्त अशन छेदन कर आलोचना द्वारा सर्वोत्तम उक्त समाधि-मरण प्राप्त किया। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यहां कहा गया है कि उन्होंने साठ भक्तों का परित्याग किया तो प्रत्येक को जिन्नासा हो सकती है कि भक्त किसे कहते है ? उत्तर मे कहा जाता है कि प्रत्येक दिन के दो भक्त अर्थात् आहार या भोजन होते हैं । इस प्रकार एक मास के साठ भक्त हो जाते हैं। इसके विपय में वृत्तिकार भी यही लिखते हैं-"प्रतिदिनं भोजनद्वयस्य परित्यागात्त्रिशता दिनैः पष्टिर्भक्तानां त्यक्ता भवन्ति" अर्थ स्पष्ट कर दिया गया है। इस प्रकार जब धन्य अनगार ने एक मास पर्यन्त अनशन धारण किया तो साठ भक्तों के परित्याग में कोई सन्देह ही नहीं रहता । उन भक्तों का परित्याग + अनगार स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुए यह सब स्पष्ट ही तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ८५ जब समीप रहने वालों ने देखा कि धन्य अनगार अपनी इह-लीला संवरण कर स्वर्ग को प्राप्त हो गये हैं, तो उन्होंने परिनिर्वाण-प्रत्ययक कायोत्सर्ग किया अर्थात् 'परिनिर्वाणम् -मरणं यत्र, यच्छरीरस्य परिष्ठापनं तदपि परिनिर्वाण- मेव, तदेव प्रत्ययो-हेतुर्यस्य स परिनिर्वाणप्रत्ययः' भाव यह है कि मृत्यु के अनन्तर जो ध्यान किया जाता है उसको परिनिर्वाण-प्रत्यय कहते हैं। यहां समीपस्थ स्थविरों ने धन्य अनगार की मृत्यु को देखकर कायोत्सर्ग (ध्यान) किया। फिर उनके वस्त्र-पात्र आदि उपकरण उठाकर लाये और श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के पास आकर और उनको धन्य अनगार के समाधि-मरण का समस्त वृत्तान्त सुना दिया और उनके गुणों का गान किया, उनके उपशम-भाव की प्रशंसा की तथा उनके उक्त वस्त्र आदि उपकरण श्री भगवान् को दिखा दिये । इतना सब हो जाने पर श्री गौतम स्वामी ने श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी की वन्दना की और उनसे प्रश्न किया कि हे भगवन् ! आपका विनयी शिष्य धन्य अनगार समाधि-मरण प्राप्त कर कहां गया, कहां उत्पन्न हुआ है, वहां कितने काल तक उसकी स्थिति होगी और तदनन्तर वह कहां उत्पन्न होगा ? इसके उत्तर मे श्री भगवान् ने कहा कि हे गौतम ! मेरा विनयी शिष्य धन्य अनगार समाधि- मरण प्राप्त कर सर्वार्थसिद्ध विमान मे उत्पन्न हुआ है, वहां उसकी तेतीस साग- रोपम स्थिति है और वहां से च्युत होकर वह महाविदेह क्षेत्र मे मोक्ष प्राप्त करेगा अर्थात् सिद्ध, बुद्ध और मुक्त होकर परिनिर्वाण-पद प्राप्त कर सब दुःखों का अन्त कर देगा। यह सुनकर श्री गौतम भगवान् परम प्रसन्न हुए । इस सूत्र से हमे शिक्षा प्राप्त होती है कि प्रत्येक व्यक्ति को आलोचना आदि क्रिया करके समाधि-पूर्वक मृत्यु प्राप्त करनी चाहिए जिससे वह मच्चा आराधक होकर मोक्षाधिकारी वन सके । इस प्रकार श्री सुधर्मा स्वामी श्री जम्बू स्वामी से कहते हैं कि हे जम्बू! जिस प्रकार मैंने उक्त अध्ययन का अर्थ श्रवण किया है उसी प्रकार तुम्हारे प्रति कहा है अर्थात मेरा यह कथन केवल भगवान् के कथन का अनुवाद मात्र है। इममें अपनी वुद्वि से कुछ भी नहीं कहा । तृतीय वर्ग का प्रथमाध्ययन समाप्त ।

अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः अव सूत्रकार उक्त वर्ग के शेष अध्ययनों का वर्णन करते हैं:- जति णं भंते ! उक्खेवओ। एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं काकंदीए णगरीए भद्दाणामं सत्थ- वाही परिवसति अड्ढा तीसे णं भद्दाए सत्थवाहीए पुत्ते सुणक्खत्ते णामं दारए होत्था अहीण० जाव सुरूवे० पंचधाति-परिक्खिते जहा धण्णो तहा वत्तीस दाओ जाव उप्पि पासायवडेंसए विहरति । तेणं कालेणं२ समोसरणं जहा धन्नो तहा सुणक्खत्तेऽवि णिग्गते जहा थावच्चा- पुत्तस्स तहा णिक्खमणं जाव अणगारे जाते ईरिया- समिते जाव बंभयारी । तते णं सुणक्खत्ते अणगारे जं चेव दिवसं समणस्स भगवतो म० अंतिते मुंडे जाव पव्वतिते तं चेव दिवसं अभिग्गह। तहेव जाव बिलमिव आहारेति संजमण जाव विहरति। बहिया जणवय-विहारं विहरति । एक्कारसं अंगाई अहिज्जति संजमेण तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरति । तते णं से सुण० ओरा- लेणं जहा खंदतो। यदि नु भदन्त ! उत्क्षेपः । एवं खलु जम्बु ! तस्मिन् काले तस्मिन् समये काकन्यां नगर्यां भद्रा नाम सार्थवाहिनी परिवसति, आढ्या० । तस्या नु भद्रायाः सार्थवाहिन्याः पुत्रः सुनक्षत्रो नाम दारकोऽभूत् । अहीनो यावत्सुरूपः पञ्चधात- तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [ ८७ परिक्षिप्तो यथा धन्यस्तथा । द्वात्रिशद् दातानि यावदुपरि प्रासा- दावतंशके विहरति । तस्मिन् काले तस्मिन् समये समवशरणम् । यथा धन्यस्तथा सुनक्षत्रोऽपि निर्गतः । यथा स्त्यावत्यापुत्रस्य तथा निष्क्रमणम् । यावदनगारो जात ई-समितो यावद् ब्रह्म- चारी । ततो नु स सुनक्षत्रोऽनगारो यस्मिन्नेव दिवसे श्रमणस्य भगवतो महावीरस्यान्तिके मुण्डो भूत्वा प्रवजितस्तस्मिन्नेव दिवसेऽभिग्रहम् । तथैव यावद् विलमिव आहारयति । वहिर्जन- पद-विहारं विहरति । एकादशाङ्गान्यधीते, संयमेन तपसात्मानं भावयन् विहरति । ततो नु स सुनक्षत्र औदारेण यथा स्कन्दकः। पढार्थान्वयः-जति-यदि णं-पूर्ववत् चाक्यालङ्कार के लिए है भंते !- हे भगवन् ! उक्खेवनो-आक्षेप से जान लेना चाहिए अर्थात् प्रथम अध्ययन का यह अर्थ प्रतिपादन किया है तो द्वितीय आदि का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है इत्यादि पूर्व सूत्रों से आक्षेप कर लेना चाहिए । एवं-इस प्रकार खलु-निश्चय से जंबू-हे जम्बू । तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय काकंदीए- काकन्दी गरीए-नगरी में भद्दा-भद्रा णाम-नाम वाली सत्थवाही-सार्थवाहिनी परिवसति-रहती थी जो अड्डा-सर्वसम्पन्ना थी । णं-पूर्ववत् तीसे-उम भद्दाए- भद्रा सत्थवाहीए-सार्थवाहिनी का पुत्ते-पुत्र सुणक्खत्तं-सुनक्षत्र णाम-नाम वाला दारए-बालक होत्था-हुआ जो अहीण-पांचों इन्द्रियों से परिपूर्ण था और जाव- यावत् सुरूवे-सुरूप था पंचधातिपरिक्खित्ते-वह पांच धायों के लालन-पालन मे था जहा-जैसे धरणे-धन्यकुमार के हुए थे इसी प्रकार बत्तीसायो-बत्तीस दायो- कन्याओं से विवाह हुए और उनके पितृ-गृह से बत्तीस दहेज आये । जाव-यावन उप्पि-ऊपर पासायव.सए सर्व-श्रेष्ठ प्रामाद में सुखों का अनुभव करता हुआ विहरति-विचरता था। तेणं कालेणं २-उस काल और उस समय मे समोमरण- श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी उम नगरी के बाहर सहस्रावन उद्यान मे विरा- जमान हुए । जहा-जिस प्रकार घण्णो-धन्य कुमार निकला था तहा-उसी प्रकार ।

८८ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः सुणक्खत्तेऽपि सुनक्षत्र कुमार भी णिग्गते-श्री भगवान् के मुखारविन्द से धर्म-कथा सुनने के लिये निकला और धर्म-कथा सुनने के अनन्तर जहा-जिस प्रकार थावच्चा- पुत्तस्स-स्त्यावत्या पुत्र का हुआ था तहा-उसी प्रकार सुनक्षत्र कुमार का भी- निक्खमणं-निष्क्रमण (दीक्षामहोत्सव) हुआ जाव-यावत् वह भी सांसारिक सव सुख और सम्पत्ति को छोड़कर अणगारे-अनगार अर्थात् साधु जाते-हो गया और ईरियासमिते-ईर्या-समिति वाला जाव-यावत् अन्य साधु के गुणों से युक्त हो कर बंभयारी-ब्रह्मचारी हो गया। तते-इसके अनन्तर णं-पूर्ववत् वाक्यालङ्कार के लिये है से-वह सुणक्खत्ते-सुनक्षत्र अणगारे-अनगार जं चेव दिवसं-जिसी दिन समणस्स-श्रमण भगवतो म०-भगवान् महावीर के अंतिए-समीप मुंडे-मुण्डित हुआ जाव-यावत् तं चेव दिवसं-उसी दिन अभिग्गह-अभिग्रह धारण कर लिया तहेव-उसी प्रकार जाव-यावत् जो कुछ भी भिक्षा से प्राप्त करता था उसको चिलमिव-सर्प जिस प्रकार विना प्रयास के बिल मे घुस जाता है उसी प्रकार वह भी श्राहारेति-बिना किसी लालसा और स्वाद के भोजन करता था और संजमेणं जाव-संयम और तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विहरति-विचरण करता था। इसी समय श्रमण भगवान् महावीर स्वामी बहिया-बाहर जणवयविहारं- जनपद-विहार के लिए विहरति-गये और इस बीच मे सुनक्षत्र अनगार ने एकारस- एकादश अंगाइ-अङ्गों का अहिज्जति अध्ययन किया फिर संजमेणं-संयम और तवसा-तप से अप्पाणं-अपनी आत्मा की भावेमाणे-भावना करते हुए विहरति- विचरण करने लगा । तते णं-इसके अनन्तर से-वह सुणक्खत्ते-सुनक्षत्र अनगार अोरालेणं-उदार तप से जहा-जैसा खंदतो०-स्कन्दक था वैसा ही हो गया । मूलार्थ-हे भगवन् ! इत्यादि प्रश्न का पहले सूत्रों से श्राक्षेप कर लेना चाहिए । (उत्तर में सुधर्मा स्वामी कहते हैं) हे जम्बू ! उस काल और उस समय में काकन्दी नाम की नगरी थी। उसमें भद्रा नाम की एक सार्थवाहिनी निवास करती थी। वह धन-धान्य सम्पन्ना थी। उस भद्रा सार्थवाहिनी का पुत्र सुनक्षत्र नाम वाला था । वह सर्वाङ्ग-सम्पन्न और सुरूप था । पांच धाइयां उसके लालन पालन के लिये नियत थीं। जिस प्रकार धन्य कुमार के लिए बत्तीस दहेज आये उसी प्रकार सुनक्षत्र कुमार के लिये भी आये और वह सर्व-श्रेष्ठ भवनों में सुख का अनुभव करता हुआ विचरण करने लगा। उसी समय श्री भगवान् महावीर तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [ ८९ स्वामी काकन्दी नगरी के बाहर विराजमान हो गये। जिस प्रकार धन्य कुमार उनके मुखारविन्द से धर्म-कथा सुनने के लिए गया था उसी प्रकार सुनक्षत्र कुमार भी गया और जिस प्रकार स्त्यावत्यापुत्र दीक्षित हुआ था उसी प्रकार वह भी हो गया। अनगार होकर वह ईर्या-समिति वाला और साधु के सब गुणों से युक्त पूर्ण ब्रह्मचारी हो गया । इसके अनन्तर वह सुनक्षत्र अनगार जिसी दिन मुण्डित हो प्रजित हुआ उसी दिन से उसने अभिग्रह धारण कर लिया। फिर जिस प्रकार मर्प विल में प्रवेश करता है उसी प्रकार वह भोजन करने लगा। संयम और तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरण करने लगा। इसी बीच श्री भगवान महावीर स्वामी जनपद-विहार के लिये वाहर गये और सुनक्षत्र अनगार ने एकादशाङ्ग शास्त्र का अध्ययन किया । वह संयम और तप से अपनी आत्मा की भावना करते हुए विचरण करने लगा। तदनु अत्यन्त कठोर तप के कारण जिस प्रकार स्कन्दक कृश हो गया था उसी प्रकार सुनक्षत्र अनगार भी हो गया। टीका-इस सूत्र में सुनक्षत्र अनगार का वर्णन किया गया है। सूत्र का अर्थ मूलार्थ में ही स्पष्ट कर दिया गया है। उदाहरण के लिये सूत्रकार ने स्त्या- वत्यापुत्र और धन्य अनगार को लिया है । पाठकों को स्त्यावत्यापुत्र के विपय में जानने के लिये 'ज्ञाताधर्म-कथागसूत्र' के पांचवे अध्ययन का विधि-पूर्वक अध्य- यन करना चाहिए और धन्य अनगार का वर्णन इसी वर्ग के प्रथम अध्ययन मे आ चुका है। इस मूत्र मे प्रारम्भ में ही "उक्खेवओ-उत्क्षेपः" एक पद आया है। उसका तात्पर्य यह है कि इसके साथ के पाठ का पिछले सूत्रों से आक्षेप कर लेना चाहिए अर्थात् उसके स्थान पर निम्नलिखित पाठ पढ़ना चाहिए :- “जति णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव संपत्तेणं नवमस्स अंगस्म अणुत्तरोववाइयदसाणं तश्वस्स वग्गस्स पढमस्स अज्झयणस्म अवमट्टे पण्णत्ते नवमस्म णं भंते ! अंगस्स अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स वितियस्म अज्झयणस्स के अढे पण्णत्ते ? (यदि नु भदन्त ! श्रमणेन भगवता महावीरेण यावत्संप्राप्तेन नवम- स्यागस्यानुत्तरोपपातिकदशानां तृतीयस्य वर्गस्य प्रथमस्याध्ययनस्यायमर्थः प्रक्षमः, ९० ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्ग. ! नवमस्य नु भदन्त ! अगस्यानुत्तरोपपातिकदशानां तृतीयस्य वर्गस्य द्वितीयस्याध्ययनस्य कोऽर्थः प्रज्ञप्तः ?) यह पाठ प्रायः प्रत्येक अध्ययन के प्रारम्भ में आता है। अतः उसको संक्षिप्त करने के लिये यहां 'उत्क्षेपः' पद दे दिया गया है । दूसरे सूत्रों में भी इसी शैली का अनुसरण किया गया है। जिस प्रकार श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के पास दीक्षित होकर धन्य अनगार ने पारण के दिन ही आचाम्ल व्रत धारण किया था इसी प्रकार सुनक्षत्र अनगार ने भी किया। जिस प्रकार व्याख्याप्रज्ञप्ति के द्वितीय शतक में स्कन्दक सन्यासी ने श्री श्रमण भगवान के पास ही दीक्षित हो कर तप द्वारा अपना शरीर कृश किया था ठीक उसी प्रकार सुनक्षत्र अनगार का शरीर भी तप से कृश हो गया। इस सूत्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जब कोई अपना लक्ष्य स्थिर कर ले तो उसकी प्राप्ति के लिये उसको सदैव प्रयत्न-शील रहना चाहिये और दृढ संकल्प कर लेना चाहिए कि वह उस पद की प्राप्ति करने में बड़े से बड़े कष्ट को भी तुच्छ समझेगा और अपने प्रयत्न में कोई भी शिथिलता नहीं आने देगा। जब तक वह इतना दृढ संकल्प नहीं करता तब तक वह उस तक नहीं पहुंच सकता । किन्तु जो अपने ध्येय की प्राप्ति के लिये एकाग्र-चित्त से प्रयत्न करता है वह अवश्य और शीघ्र ही वहां तक पहुंच जाता है, इसमे लेश-मात्र भी सन्देह नहीं । ध्यान रहे कि इसके लिये गम्भीरता की अत्यन्त आवश्यकता है। अव सूत्रकार इसीसे सम्बन्ध रखते हुए कहते हैं:- तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णगरे, गुण- सिलए चेतिए, सेणिए राया। सामी समोसढे परिसा णिग्गता, राया णिग्गतो। धम्म-कहा, राया पडिगओ, परिसा पडिगता । तते णं तस्स सुणक्खत्तस्स अन्नया कयाति पुव्वरत्तावरत्तकाल-समयंसि धम्मजा० जहा खंद- यस्स बहू वासा परियातो, गोतमपुच्छा, तहेव कहेति जाव तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ९१ सव्वद्वसिद्धे विमाणे देवे उववण्णे । तेतीसं सागरोवमाई ठिती पण्णत्ता । से णं भंते ! महाविदेहे सिज्झिहिति । एवं सुणक्खत-गमेणं सेसाबि अट्ठ भाणियव्वा, णवरं आणुपुव्वीए दोन्निरायगिहे, दोन्नि साएए, दोनि वाणिय- ग्गामे, नवमोहत्थिणपुरे, दसमोरायगिहे।नवण्हं भदाओ जणणीओनवण्हवि बत्तीसाओ दाओ।नवण्हं निक्वमणं थावच्चापुत्तस्स सरिसं, वेहल्लस्स पिया करेति । छम्मासा वेहल्लते, नव धण्णे, सेसाणं बहू वासा, मासं संलेहणा, सव्वट्ठसिद्धे महाविदेहे सिझणा । तस्मिन् काले तस्मिन् समये राजगृहं नगरम् , गुणशिलकं चैत्यम् , श्रेणिको राजा । स्वामी समवसृतः परिषन्निर्गता, राजा निर्गतः । धर्म-कथा, राजा प्रतिगतः, परिषत्प्रतिगता । ततो नु तस्य सुनक्षत्रस्यान्यदा कदाचित् पूर्वरात्रावरात्रकाल-समये धर्म- जागरिका ....। यथा स्कन्दकस्य बहूनि वर्षाणि पर्यायः । गोतम- पृच्छा । तथैव कथयति यावत्सर्वार्थसिद्धे विमाने देव उत्पन्नः। त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा स्थितिः । स नु भदन्त ! महाविदेहे सेत्स्यति । एवं सुनक्षत्र-गमेन शेषा अप्यष्ट भणितव्याः, नवर- मानुपूर्व्या द्वौ राजगृहे नगरे, द्वौ साकेते, द्वौ वाणिजग्रामे, नवमो हस्तिनापुरे, दशमश्च राजगृहे। नवानां जनन्यो भद्रा नवानामपि द्वात्रिंशद दातानि; नवानां निष्कमणं स्त्यावत्यापुत्रस्य सदृशम् । वेहल्लस्य पिता करोति । षण्मासा वेहल्लकः, नव धन्यः, शेपाणां , , ९२] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः - वहूनि वर्षाणि । मासं संलेखना, सर्वार्थसिद्धे, महाविदेहे सिद्धता। पदार्थान्वयः तेणं कालेणं-उस काल और तेणं समएणं-उस समय रायगिहे- राजगृह णगरे-नगर में सेणिए-श्रेणिक नाम वाला राया-राजा राज्य करता था उस वाहर गुणसिलए-गुणशिलक चेतिए-चैत्य था सामी-श्री श्रमण भगवान महा- वीर स्वामी उस चैत्य में समोसढे-विराजमान हो गये । तब परिसा-नगर की जनता णिग्गता-उनके मुख से धर्म-कथा सुनने के लिये निकली राया-राजा श्रेणिक भी णिग्गतो-निकला धम्मकहा-धर्म-कथा हुई और राया-राजा पडिगो-चला गया परिसा-परिपद् पडिगता-चली गई। तते-इसके अनन्तर णं-वाक्यालंकार के लिये है तस्स-उस सुणक्खत्तस्स-सुनक्षत्र अनगार अन्नया-अन्यदा कयाति-किसी समय पुञ्चरत्तावरत्तकालसमयंसि-मध्यरात्रि के समय में धम्मजा० धर्म-जागरण करते हुए जहा-जैसा खंदयस्स-स्कन्दक के विषय में कहा गया उसी प्रकार बहू-बहुत से वासा- वर्षों तक परियातो-पर्याय पालन कर काल-गत हो गया। तब गोतमपुच्छा- गोतम स्वामी ने प्रश्न किया तहेव-श्री भगवान् ने उसी प्रकार कहेति-प्रतिपादन किया कि जाव-यावत् सन्वट्ठसिद्धे-सर्वार्थसिद्ध विमाणे-विमान में देवे-देव-रूप से उववरणे-उत्पन्न हुआ है तेत्तीसं-तेतीस सागरोवमाइं-सागरोपम की ठिती- स्थिति पएणत्ता-प्रतिपादन की गई है। भंते-हे भगवन् ! से-वह वहां से च्युत होकर कहां उत्पन्न होगा ? हे गौतम! महाविदेहे-महाविदेह क्षेत्र में सिज्झिहिति- सिद्ध होगा । एवं-इसी प्रकार सुणक्खत्तगमेणं-सुनक्षत्र के (आलापक) आख्यान समान सेसा-शेप अट्ठ-आठ के विषय में अवि-भी भाणियव्वा-कहना चाहिए । णवरं-विशेषता इतनी है कि आणुपुबीए-अनुक्रम से दोन्नि-दो रायगिहे- राजगृह नगर में दोन्नि-दो साएए-साकेतपुर में दोन्नि-दो वाणियग्गामे-वाणिज- ग्राम में नवमो-नौवां हथिणपुरे-हस्तिनापुर में और दसमो-दशवां रायगिहे- राजगृह नगर मे उत्पन्न हुए नवराह-नौ की भद्दाओ-भद्रा नाम वाली जणणीबो- माताएं थीं नवएहवि-नौ की बत्तीसाप्रो-बत्तीस दामो-दहेज आये नवण्हं-नौ का निक्खमणं-निष्क्रमण थावच्चापुत्तस्स-स्त्यावत्यापुत्र के सरिसं-सदृश हुआ किन्तु वेहल्लस्स-वेहल्ल कुमार का निष्क्रमण पिया-पिता ने करेति-किया। फिर छम्मासा- छः मास की दीक्षा वेहल्लते-वेहल्ल अनगार ने पालन की और धणे-धन्य अनगार - - - तृतीयो वर्गः] भाषाटीकासहितम् । [९३ - - ने नव-नौ महीने की दीक्षा पालन की सेसाणं-शेष आठों की दीक्षा बहू वासा- बहुत वर्षों की थी। मासं-एक मास की संलेहणा-संलेखना सब ने की सबट्टसिद्धे- सर्वार्थसिद्ध विमान में सव उत्पन्न हुए महाविदेहे-महाविदेह क्षेत्र में सिझणा- सव सिद्ध गति प्राप्त करेगे। मूलार्थ-उस काल और उस समय राजगृह नगर में श्रेणिक राजा राज्य करता था। नगर के बाहर गुणशैलक नाम चैत्य में श्रमण भगवान् महावीर स्वामी विराजमान होगये । परिषद् धर्म-कथा सुनने को आई और राजा भी आया । धर्म-कथा सुनकर परिपद् और गजा चले गये । तदनु मध्यरात्रि के समय धर्म-जागरण करते हुए सुनक्षत्र अनगार को स्कन्दक के समान भाव उत्पन्न हुए । वह बहुत वर्ष की दीक्षा पालन कर सर्वार्थसिद्ध विमान में देव-रूप से उत्पन्न हो गया । उसकी वहां पर तेतीस सागरोपम की आयु है । वहां से च्युत होकर वह महाविदेह क्षेत्र में सिद्धि प्राप्त करेगा। इसी प्रकार शेप आठ अध्ययनों के विषय में भी जानना चाहिए । विशेषता केवल इतनी है कि अनुक्रम से दो राजगृह नगर में, दो साकेतपुर में, दो वाणिज-ग्राम में, नौवाँ हस्तिनापुर में और दशवां राजगृह नगर में उत्पन्न हुए । इनमें नौ की माताएं भद्रा नाम वाली थीं और नौ को बत्तीस २ दहेज मिले । नौ का निष्क्रमण स्त्यावत्यापुत्र के समान हुआ । केवल वेहल्लकुमार का निष्क्रमण उसके पिता के द्वारा हुआ । छः मास का दीक्षा-पर्याय वेहल्ल अनगार ने पालन किया, नौमास का धन्य ने । शेप पाठों ने बहुत वर्ष तक दीक्षा-पर्याय पालन किया । दशों ने एक २ मास की संलेखना धारण की। सब के सब सर्वार्थसिद्ध विमान में उत्पन्न हुए और वहां से च्युत होकर सब महाविदेह क्षेत्र में सिद्ध-गति प्राप्त करेंगे। टीका-इस सूत्र का विपय मूलार्थ और पदार्थान्वय में ही स्पष्ट है । अतः उसको यहां पर दोहराना ठीक प्रतीत नहीं होता । कहना केवल इतना है कि यहां बार-बार स्कन्दक को ही उदाहरण-रूप में रखा गया है, उसका ज्ञान हमे कहां से हो। इसी प्रकार म्त्यावत्यापुत्र के विषय में भी कहना आवश्यक जान पड़ता है । इनमे से पहले अर्थात् स्कन्दक स्वामी का वर्णन पञ्चम अद्ग के द्वितीय शतक में आचुका है और दूसरे अर्थात स्त्यावत्यापुत्र .

। ९४] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः का वर्णन छठे अङ्ग के पञ्चम अध्ययन में है। यह 'अनुत्तरोपपातिकसूत्र' नौवां अङ्ग है । अतः सूत्रकार ने उसी वर्णन को यहां पर दोहराना उचित न समझ कर केवल दोनों का उदाहरण देकर बात समाप्त कर दी है । पाठकों को इनके विषय में पूरा ज्ञान प्राप्त करने के लिये उक्त सूत्रों का अवश्य अध्ययन करना चाहिए। तब भी पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए हम इतना बता देना आवश्यक समझते हैं कि उक्त कुमारों के जीवन मे श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के पास धर्म-कथा सुनने को जाना, वहां वैराग्य की उत्पत्ति, दीक्षा-महोत्सव, परम उच्चकोटि का तपःकर्म, शरीर का कृश होना, उसी के कारण अर्ध रात्रि में धर्म-जागरण करते हुए अनशन व्रत के भावों का उत्पन्न होना, अनशन कर सर्वार्थ-सिद्ध विमान में उत्पन्न होना, जिससे महाविदेहादि क्षेत्रों में उत्पन्न होकर सिद्ध-गति प्राप्त कर सकें आदि ही मोटी बातें हैं, जिनके आधार से उक्त सूत्रों के स्वाध्याय में सहायता मिल सकती है, क्योंकि यही विषय हैं जिनके लिए स्कन्दक और स्त्यावत्यापुत्र को उदा- हरण में रखा है। इस सूत्र मे 'पूर्वरात्रापरात्रकाल' शब्द आया है जिसका अर्थ मध्य-रात्रि है । यही समय एक ऐसा है जव सारा संसार प्रायः सुनसान रहता है। अतः धर्म-जागरण करने वालों का चित्त इस समय एकाग्र हो जाता है और उसमे पूर्ण स्थिरता विद्यमान होती है। ऐसे ही समय मे विचार-धारा बहुत स्वच्छ रहती है और मस्तिष्क मे बहुत ऊंचे विचार उत्पन्न होते हैं । यही कारण है कि धन्य आदि अनगारों के उस समय के विचार उनको सन्मार्ग की ओर ले गये। सूत्र में द्विवचन के स्थान में 'दोन्नि' बहुवचन का प्रयोग हुआ है । इसका कारण यह है कि प्राकृत भाषा में द्विवचन होता ही नहीं । अव सूत्रकार प्रस्तुत सूत्र का उपसंहार करते हुए कहते हैं :- एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवता महावीरेणं आइग- रेणं तित्थगरेणं सयं-संबुद्धेणं लोग-नाहेणं लोग-प्पदीवेणं लोग-पज्जोयगरेणं अभय-दएणंसरण-दएणं अक्खु-दएणं भग्ग-दएणं धम्म-दएणं धम्म-देसएणं-धम्मवर-चाउरंत- तृतीयो वर्गः ] भापाटीकासहितम् । [९५ चक्क-वट्टिणा अप्पडिहय-वरनाण-दसण-धरेणंजिणेणंजाण- एणंबुद्धेणं बोहएणं मोक्केणं मोयएणं तिन्नेणं तारयेणं सि- वमयलमरुयमणंतमक्खयमव्वाबाहसपुणरावत्तयं सिद्धि- गतिनामधेयं ठाणं संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं तच्चस्स वग्गस्स अयमढे पन्नत्ते। (सूत्रं ६) अणुत्तरोववाइयद- सातो समत्तातो ॥ अणुत्तरोववाइयदसा णामं सुत्तं नवम- मंगं समत्तं ॥ श्रीरस्तु ॥ ग्रं १९२ । एवं खलु जम्बु ! श्रमणेन भगवता महावीरेणादिकरण तीर्थकरेण स्वयं सम्बुद्धेन लोक-नाथेन लोक-प्रदीपेन लोक-प्रद्योत- करेणाभय-देन शरण-देन चक्षुर्देन मार्ग-देन धर्म-देन धर्म-देशकेन धर्मवर-चतुरत्त-चक्रवर्तिनाप्रतिहत-वरज्ञान-दर्शन-धरेण जिनेन ज्ञापकेन बुद्धेन बोधकेन मुक्तेन मोचकेन तीर्णेन तारकेण शिवस- चलमरुजमनन्तमक्षयमव्यावाधमपुनरावर्तनं सिद्ध-गति-नामधेयं स्थानं संप्राप्तेनानुत्तरोपपातिकदशानां तृतीयस्य वर्गस्यायमर्थः प्रज्ञप्तः । ( सूत्रम् ६ ) अनुत्तरोपपातिकदशाः समाप्ताः॥ अनु- त्तरोपपातिकदशा नाम नवममङ्गं समाप्तम् ॥ श्रीरस्तु ॥ पदार्थान्वयः-एवं-इस प्रकार खलु-निश्वय से जंबू-हे जम्बू ! समणेणं- श्री श्रमण भगवता-भगवान् महावीरेणं-महावीर स्वामी ने जो अाइगरण-धर्म के प्रवर्तक हैं तित्थगरेणं-चार तीर्थों को स्थापन करने वाले हैं सयं-संबुद्धणं-अपने आप बोध प्राप्त करने वाले है लोगनाहेणं-तीनों लोकों के नाथ हैं लोकप्पदीवेणं- लोक में प्रदीप के समान प्रकाश करने वाले है लोगपज्जोयगरेण-लोकों को सूर्य के ममान प्रदीप्त करने वाले हैं अभयदएणं-अभय प्रदान करने वाले हैं सरणदएणं- ९६ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [ तृतीयो वर्गः VAN -~~-~- शरण देने वाले हैं चक्खुदएणं-लोगों को ज्ञान-चक्षु देने वाले हैं धम्मदएणं- उनको श्रुत और चारित्र रूप धर्म देने वाले हैं मग्गदएणं-और अज्ञान रूपी अन्धकार से मुक्ति-मार्ग दिखाने वाले हैं धम्मदेसएणं-धर्मोपदेशक हैं धम्मवरचाउ- रंतचकवट्टिणा-श्रेष्ठ धर्म के एकमात्र चक्रवर्ती हैं अप्पडिहय-अप्रतिहत वर-श्रेष्ठ नाण-ज्ञान दंसण-दर्शन धरेणं-धारण करने वाले हैं जिणेणं-राग और द्वेप को जीतने वाले हैं जाणएणं-छद्मस्थ ज्ञान-चतुष्टय को जानने वाले हैं वुद्धेणं-बुद्ध हैं अर्थात् जीव आदि पदार्थों को जानने वाले हैं वोहएणं-औरों को बोध कराने वाले हैं मोक्केणं-बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह से मुक्त हैं मोयएणं-अन्य जीवों को इस परिग्रह से मुक्त कराने वाले हैं तिनेणं-संसार-रूपी सागर को पार करने वाले हैं तारयेण और उपदेश के द्वारा औरों को इससे पार कराने वाले सिवं-सर्वथा कल्याण-रूप अयलं-नित्य स्थिर अरुयं-शारीरिक और मानसिक रोग और व्यथाओं से रहित अणंतं-अन्त-रहित अक्खयं-कभी भी नाश न होने चाले अवाबाह-पीडा अर्थात् सब प्रकार के दुःखों से रहित अपुनरावत्तयं- सांसारिक जन्म-मरण के चक्र से रहित सिद्धिगति-सिद्ध-गति नामधेयं-नाम वाले ठाणं-स्थान को संपत्तेणं-प्राप्त हुए उन्होंने अणुत्तरोववाइयदसाणं-अनुत्तरोप- पातिकदशा के तच्चस्स-तृतीय वग्गस्स-वर्ग का अयं-यह अहे-अर्थ पएणत्ते- प्रतिपादन किया है. सूत्रं ६-छठा सूत्र समाप्त हुआ अणुत्तरोववाइयदसातो-अनुत्तरो- पपातिकदशा समत्तातो-समाप्त हुई अणुत्तरोववाइयदसा णाम-अनुत्तरोपपातिक- दशा नाम का सुत्तं-सूत्र रूप नवममंगं-नौवां अङ्ग समत्तं समाप्त हुआ । मूलार्थ-हे जम्ब! इस प्रकार धर्म-प्रवर्तक, चार तीर्थ स्थापन करने वाले, म्वयं बुद्ध, लोक-नाथ, लोकों को प्रकाशित और प्रदीप्त करने वाले, अभय प्रदान करने वाले, शरण देने वाले, ज्ञान-चक्षु प्रदान करने वाले, मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले, धर्म देने वाले, धर्मोपदेशक, धर्मवर-चतुरन्त-चक्रवर्ती, अनभिभूत श्रेष्ठ ज्ञान और दर्शन वाले, गग-द्वेष के जीतने वाले, ज्ञापक, बुद्ध, बोधक, मुक्त, मोचक, स्वयं संमार-मागर से तेग्ने वाले और दूसरों को तगने वाले, कल्याण- रुप, नित्य स्थिर, अन्त-रहित, विनाश-रहित, शारीरिक और मानमिक प्राधि- व्याधि-रहित, पुनः-पुनः मांसारिक जन्म-मरण से रहित सिद्ध-गति नामक स्थान को प्राप्त हुए श्री श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अनुत्तरोपपातिकदशा के " तृतीयो वर्गः ] भाषाटीकासहितम् । [ ९७ तृतीय वर्ग का यह अर्थ प्रतिपादन किया है । छठा सूत्र समाप्त हुआ । अनुत्तरो- पपातिकदशा समाप्त हुई । अनुत्तरोपपातिकदशा सूत्र नामक नवमअङ्ग समाप्त हुआ। .. टीका-यह सूत्र उपसंहार-रूप है । इससे सब से पहले हमें यह शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक शिष्य को पूर्ण रूप से गुरु-भक्त होना चाहिए और गुरु-भक्ति करते हुए गुरु के सद्गुणों को अवश्य प्रकट करना चाहिए । जैसे इस सूत्र में श्री सुधा स्वामी ने, उपसंहार करते हुए, श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी के सद्- गुणों को जनता पर प्रकट किया है । वे अपने शिष्य जम्बू से कहते हैं कि हे जम्बू! इस सूत्र को उन भगवान् ने प्रतिपादन किया है जो आदिकर हैं अर्थात ( आदौ- प्राथम्येन श्रुतधर्माचारादि ग्रन्थात्मकं करोति तदर्थप्रणायकत्वे प्रणयतीत्येवंशीलस्तेना- दिकरेण ) श्रुत-धर्म-सम्बन्धी शास्त्रों के प्रणेता हैं, तीर्थङ्कर हैं अर्थात् (तरन्ति येन संसार-सागरमिति तीर्थम्-प्रवचनम् , तदव्यतिरेकादिह सङ्घः-तीर्थम , तस्य करण- शीलत्वात्तीर्थकरस्तेन) जिसके द्वारा लोग संमार रूपी सागर से पार हो जाते हैं उसको तीर्थ कहते हैं । तीर्थ सङ्घ-रूपी चार हैं । उनके करने वाले महापुरुष ने ही इस सूत्र के अर्थ का प्रकाश किया है । इसी क्रम से श्री सुधा स्वामी श्री भगवान के 'नमोत्थु णं' में प्रदर्शित सव गुणों का दिग्दर्शन यहां कराते हैं । जब कोई व्यक्ति सर्वन और सर्वदर्शी हो जाता है उस समय वह अनन्त और अनुपम गुणों का धारण करने वाला हो जाता है। उसके गुणों के अनुकरण करने वाला भी एक दिन उसी रूप में परिणत हो सकता है । अतः प्रत्येक व्यक्ति को उनका अनुकरण जहां तक हो अवश्य करना चाहिए । यही विशेषतः कारण है कि सुधा स्वामी ने लोगों की हित-बुद्धि से उन गुणों का यहां दिग्दर्शन कराया है, जिसमे लोग भगवान् के गुणों में अनुराग रखते हुए उनकी भक्ति में लीन हो जायं । भगवान हमें संसार-सागर में अभय प्रदान करने वाले हैं और शरण देने वाले है अर्थात (शरणम्-त्राणम, अज्ञानोपहतानां तद्रक्षास्थानम् , तच परमार्थतो निर्वाणम् , तद्ददाति इति शरणदः) अज्ञान-विमूढ व्यक्तियों की एकमात्र रक्षा के स्थान निर्वाण को देने वाले हैं, जिसको प्राप्त कर आत्मा सिद्ध-पट में अपने प्रदेश में स्थित भी अन्य सिद्ध-प्रदेशों में अलक्षित-रूप से लीन हो जाता है । जिन भगवान की भनि से ।

९८ ] अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् । [तृतीयो वर्गः ANA इतना सर्वोत्तम लाभ होता है । उनकी भक्ति कोई क्यों न करे अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति उनकी भक्ति में लीन होकर उस अलभ्य पद की प्राप्ति करनी चाहिए । भगवान् को अप्रतिहत-ज्ञान-दर्शन-धर वताया गया है उसका अभिप्राय यह है । (अप्रतिहते- कटकुट्यपर्वतादिभिरस्खलितेऽविसंवादके वाक्षायिकत्वाद्, वरे-प्रधाने ज्ञान-दर्शने केवललक्षणे धारयतीति-अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनधरस्तेन) अर्थात् किसी प्रकार से भी स्खलित न होने वाले सर्वोत्तम सम्यग् ज्ञान अर्थात् केवल ज्ञान और केवल दर्शन धारण करने वाले सर्वज्ञ और सर्वदर्शी भगवान् की जब शुद्ध चित्त से भक्ति की जायगी तो आत्मा अवश्य ही निर्वाण-पद प्राप्त कर तन्मय हो जायगा । ध्यान रहे कि इस पद की प्राप्ति के लिये सम्यग् ज्ञान-दर्शन और सम्यक् चारित्र के सेवन की अत्यन्त आवश्यकता है। जब हम किसी व्यक्ति की भक्ति करते हैं तो हमारा ध्येय सदैव उसी के समान बनने का होना चाहिए । तभी हम उसमें सफल हो सकते हैं । पहले हम कह चुके हैं कि कर्म ही सांसारिक बन्ध और मोक्ष के कारण हैं । उनका क्षय करना मुमुक्षु का पहला ध्येय होना चाहिए। जब तक एक भी कर्म अवशिष्ट रहता है तब तक कोई भी निर्वाण-रूप अलौकिक पद की प्राप्ति नहीं कर सकता है। उनका क्षय या तो उपभोग से होता है या ज्ञानाग्नि के द्वारा। यदि भोग के ऊपर ही उनको छोड़ दिया जाय तो उनका नाश कभी नहीं हो सकता। क्योंकि उनके उपभोग के साथ २ नये कर्म सञ्चित होते जाते हैं, जो उसको फिर उसी बन्धन मे डाल देते हैं। अतः ज्ञानाग्नि से शीघ्र उनका क्षय करना चाहिए । वह ज्ञान साधु आचरण के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । इसी लिये कहा भी है 'ज्ञानक्रियाभ्यां मोक्षः' अर्थात् ज्ञान और क्रिया के सहयोग से ही मोक्ष होता है । सिद्ध यह हुआ कि भगवद्-भक्ति के साथ २ सम्यग् ज्ञान और सम्यक् चारित्र का आसेवन भी आवश्यक है। इस प्रकार ज्ञान और चारित्र की सहायता से धन्य अनगार आदि और उनके समान अन्य महापुरुप अनुत्तर विमानों में देव-रूप से उत्पन्न होते हैं और जो इन विमानों में उत्पन्न होते हैं वे अवश्य ही मोक्ष-गामी होते हैं। अत एव प्रस्तुत सूत्र मे उन्हीं व्यक्तियों का वर्णन किया गया है, जो उक्त विमानों में जाकर उत्पन्न हुए हैं।

तृतीयो वर्गः] भापाटीकासहितम् । [ ९९ हमने जिस प्रति से यह हिन्दी अनुवाद किया है, वह 'आगमोदय-समिति' की ओर से प्रकाशित हुई है । कुछ एक हस्त-लिखित प्रतियों में पाठभेद भी मिलते हैं। हमने जिस प्रति का अनुसरण किया है, उसमें पाठ संक्षिप्त कर दिया गया है। क्योंकि उक्त समिति ने पहले अगों अर्थात् 'भगवतीसूत्र' और 'ज्ञाताधर्म-कथाङ्ग मूत्र' का पाठ यहां दोहराना उचित नहीं समझा, नाही हमे ठीक प्रतीत हुआ। अतः उदाहरण-स्वरूप स्त्यावत्यापुत्र आदि के नाम का उल्लेख ही स्थान-स्थान पर कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त भी पाठ-भेद हमें हस्त-लिखित प्रतियों में मिलते हैं, जैसे इस सूत्र की समाप्ति पर ही कुछ प्रतियों मे निम्नलिखित पाठ है- "अणुत्तरोववाइयदसाणं एगोसुयक्खंधो तिण्णि वग्गा तिसु चेव दिवसेसु उद्दि सिशंति । तत्थ पढमे वग्गे दस उद्देसगा, वीए वग्गे तेरस उद्देसगा, ततीयवग्गे दम उद्देसगा । सेसं जहा नायाधम्मकहा तहा णेयव्वा । अणुत्तरोववाइयदसाणं नवमं अंगं समत्तं ।। इस पाठ में प्रस्तुत सूत्र की संख्या का विषय वर्णन किया है। पाठ बिलकुल स्पष्ट है। इस पाठ को संग्रह पाठ भी कहा जाता है। इस सूत्र से अन्तिम शिक्षा हमे यह भी मिलती है कि उक्त महर्पियों ने महाघोर तप करते हुए भी एकादगाङ्ग सूत्रों का अध्ययन किया। अतः प्रत्येक व्यक्ति को योग्यतापूर्वक शास्त्राध्ययन में प्रयत्नशील होना चाहिए, जिससे वह अनुक्रम से निर्वाण-पद की प्राप्ति कर सके। अन्त मे हम अपने धर्म-प्रिय पाठको से विदा लेते हुए अभयदेव सूरि के ही शब्दों को नीचे उद्धृत किये देते हैं : शब्दाः केचन नार्थतोऽत्र विदिताः केचित्तु पर्यायतः, सूत्रार्थानुगतेः समुह्य भणतो यज्जातमाग:-पदम् । 'भाप्ये छत्र' तकजिनेश्वरवचोभापाविधौ कोविदः, संशोध्यं चिहिनादर्जिनमतोपेक्षा यनो न आमा ।। श्रीग्स्तु । अनुनरोपपातिकसूत्र की नपोगुण-प्रकाशिका हिन्दी-भाया-टीका समाप्त ।

- नमोत्थुणं समणस्स भगवओ महावीरस्स अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ३ २ शब्दार्थ-कोप अ-और ३२ । अज्झयणे-अध्ययन २४ अंगस्स-अङ्ग का ३', अट्ठ-आठ ६१ अंगाई-अगों का १६,४६, ८६ अट्ठट्टओ आठ-आठ १२ अंतं अन्त, देहावसान, मृत्यु २७ / अट्ठण्हं आठ के ( विषय में ) अंतिए, ते समीप, पास, नज़दीक ३६, ४६, अट्ठमस्स-आठवें का ७२, ७३, ८६ अट्टि-चम्म-छिरत्ताए हड्डी, चमड़ा और अंतेवासी-शिष्य १३ नसों से ५१, ६४ अंव-गट्टिया-आम की गुठली ६१ | अट्ठी-अस्थि, हड्डी ६४ अंव पेसिया आम की फाँक ६३ | अटे-अर्थ ३२, ११, २०, २४, २७२, ३२, अंबाडग-पेसिया आम्रातक-अम्बाड़े की ३४, ७३, ८१,६५ फाँक ६३ अडमाणे-घूमता हुआ (भिक्षा के लिए) ४५ अकलुसे-क्रोध आदि कलुपों से रहित ४६ अड्डा-ऋद्धि अर्थात् ऐश्वर्य वाली अक्खयं कभी नाश न होने वाला ६५ अयंत-अन्त-रहित, कभी नाश न होने अक्खसुत्त-माला-रुद्राक्ष की माला ६७ वाला अगत्थिय-संगलिया अगस्तिक वृक्ष की अणगारं अनगार को फली अणगारस्स-अनगार-माया-ममता को अग्ग-हत्थेहि हाथ के पन्नों से छोड़कर घर का त्याग करने वाले अच्छीण-आँखों का ५१,६४, ७२,८० अज-आर्य ३ अरणगारे-अनगार ८, १३,३६,४२२, ४५, अझयणस्स-अध्ययन का ११, ३४,८१ ४६, ४६२, ६७, ७२, ७३, ८६ अल्झयगा:अध्ययन , ११, २४, २६, अणमोचवणे-राग-द्वेप ने रहिन, विषयों में अनामतः ३५, ८६ ८,१३, ७३ ५६ साधु का २ शब्दार्थ-कोप ८०,९० अणायंविलं-अनाचाम्ल,आयंबिल नामक अभय-दएणं-अभय देने वाले ६४ तप विशेष से रहित ४२ अभयस्स-अभय कुमार का २० अणिक्खित्तेणं अनिक्षिप्त (निरन्तर), अभये अभय कुमार विना किसी बाधा के ४२, ४३ / अभिग्गह-प्रतिज्ञा, आहार आदि ग्रहण अणुज्झिय-धम्मियं उपयोगी,रखने योग्य४२ करने की मर्यादा वाँधना अणुत्तरोववाडयदसाणं = अनुत्तरोपपा अमुच्छिते-बिना किसी लालसा के, तिकदशा नाम वाले नवें अगशास्त्र का अनासक्त होकर केवल शरीर-धारण ३,८२, ११, २०, २४, २६, २७, के लिए ४६ ३२, ३४, १५ अम्मयं-माता को ३६ अणेग-खंभ सय सन्निविट्ठ-अनेक सैकड़ों अयं यह ३, २०, २४, २७, ३२, स्तम्भों ( खभों) से युक्त ३८ ५१, ५३०, ८१,६५ अण्णया अन्यदा, किसी समय ४६, ७२, अयल-अचल, स्थिर अरुयं-आधि व्याधि से रहित ६५ अदीणे-दीनता से रहित ४६ अलं-सब प्रकार के, पूर्णरूप से ३५ अन्नया देखो अण्णया अलत्तग-गुलिया मेंहदी की गुटिका ६१ अन्ने अन्न ४२ अवखंति चाहते हैं ४२, ४५ अपराजिते अपराजित विमान में २०, २७ / अवि-भी ८६ अपरितंतजोगी-अविश्रान्त अर्थात् निर अविमणे-बिना दुःखित चित्त के ४६ न्तर समाधि-युक्त ४६ अविसादी-विना विपाद (खेद ) के ४६ अपरिभूआ-अतिरस्कृत, नीचा न देखने अव्वाबाह-पीड़ा से रहित ६५ वाली ३५ असंसटुं-साफ हाथों से ४२ अपुणरावत्तयंम्बार २ जन्म-मरण के असिन्है बन्धन से रहित ६५ अह-मैं ३६, ७२, ८० अप्पडिहय-वर-नाण-दसण-धरेणं-अप्र अह-यथ-पक्षान्तर या प्रारम्भ सूचक तिहत (विन-याधा से रहित श्रेष्ठ ज्ञान अव्यय ४५. और दर्शन धारण करने वाले ६५ अहा-पज्जत्त-जितना कुछ भी, आवश्य- अप्पाणं अपने आत्मा की ४२,४३,४६,८६ कतानुसार मिला हुआ अप्पाणेणं आत्मा से ४६ अहापडिरूवं-यथायोग्य, उचित अभणुराणाते-आज्ञा होने पर, आज्ञा अहा सुहं-सुखपूर्वक ४२ मिल जाने पर ४२, ४३,४६ अहिजति अध्ययन करता है, पढ़ता अम्भत्थिते आध्यात्मिक विचार ? १६, ४६,८६ अम्भुगत-मुस्सिते-बड़े और ऊँचे ३७ / अहीए अध्ययन की, सीखी ३५ अन्भुजताए-उद्यम वाली ४५ अहीण-पूरा ३५,८६ ६४ अभओ अभयकुमार २० आइगरेणं धर्म के प्रवर्तक है अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ३ २ कन्याओं का में पूछना से ऊपर आइल्लाणं आदि के, पहले के तपस्वियों में ७२२ आउक्खएणं आयु के क्षय होने के इच्छामिन्मैं चाहता हूँ ४२ कारण १३ इति-समाप्ति-बोधक अव्यय, परिचया- आणुपुब्बीए-अनुक्रम से, नम्बर वार स्मक अव्यय ५३६, ५५ २०, २७, ६१ इन्भवर-कन्नगाण श्रेष्ठ श्रेष्टियों की आपुच्छ्इ, ति=पूछता है, पूछती है ३६', ४५ आपुच्छण-पूछना ८० इमंसि इनमें आपुच्छणा-धर्म-जिज्ञासा, धर्म के विपय इमासिं-इनमें १६ / इमे-ये १३, ३२, ८० आपुच्छति देखो श्रापुच्छइ इमेणं इससे आपुच्छामि-पूछता हूँ ३६ इमेयारूवे इस प्रकार के आयंविलं'आयंबिल' नामक एक तप, इसिदासे ऋपिटास कुमार ३२ जिसमें रूखा भात या अन्य कोई ई-समिते ईा-समिति वाला, यत्ना- प्रासुक धान्य केवल एक ही बार चारपूर्वक चलने वाला ३६,८६ खाया जाता है ४२, ४५ उक्कमेणं-उत्क्रम से, उलटे क्रम से, नीचे आयंबिल-परिग्गहिपणं-' आयंबिल' नामक तप की रीति से ग्रहण किया उक्खेवओ-आक्षेप, न कहे हुए वाक्यों हुश्रा ४२ का पीछे के वाक्यो से आक्षेप करना ८६ आयवेधूप में ५६ | उग्गह-अवप्रह, सम्मान, पूजा आदि ७२ आयार-भंडए-तप-साधन के उपकरण उच्च०=(उच-मज्मस-नीच) उच्च, मध्यम १३, ८० और नीच कुलों से आयाहिणं आदक्षिणा उच्चट्ठवणते-ऊँचे गले का पात्र विशेष ६१ आयाहिणं-पयाहिणं आदक्षिणा और उजाणातो-उद्यान से, वगीचे से ४६ प्रदक्षिणा उजाणे-उद्यान, बगीचा ३४, ७२ आरणच्चुप-धारण-ग्यारहवाँ देवलोक उझिय-धम्मियं-निरुपयोगी, फेंक देने और अच्युत-बारहवाँ देवलोक १३ योग्य ४२ आदरति-भोजन करता है ७२ उदृ-पाद-ऊँट का पैर आहारंभोजन ४६ उट्टाणं-आंठों की आहारेनि=भोजन करता है, खाता है ४६,८६, । उर्दू-ऊँचे १३,८० आद्विते कहा गया है. २४, ३२ । उरहेगारमी में ५१,५३ इन्दति, परिचय या समामि-सूचक उदरं पेट ६४ . उदर-भायण-दर-भाजन, पेटरूपी पात्र ६४ रंगाल-संगडियाकोयलों की गाडी ६७ उदर-भायणणं-दर-भाजन में ६७ दभूनि-पामोक्पाग-इन्दभूनि मादि उदर-भायगुस्स-उदर-भाजन की ७३ अव्यय शब्दार्थ-कोप उम्पि-ऊपर के समान ५१ १२, ३८, ७२, ८६ | ओयरंति-उतरते हैं १३ उभड-घटामुहे-घड़े के मुख ओरालेणं-उदार-प्रधान (तप से) विकराल मुख वाला ४६,८०,८६ उम्मुक-बालभावालकपन से अति- का-कितने क्रान्त, जिसने वचपन छोड़ दिया है ३७ कंक-जंघाकड्स नाम पक्षी विशेष की जवा ५३ उयरंति-उतरते हैं कंपण-वातिओ (विव) कम्पन-वातिक उर-कडग-देस-भाएणं वक्षस्थल (छाती) रोग वाले व्यक्ति के समान ६७ रूपी चटाई के विभागों से ६७ कट्ठ-कोलंबए-लकड़ी का कोलम्ब-पात्र उर-कडयस्स-छाती की ५६ विशेष उबसोभेमाण-शोभायमान होता हुआ ६७ उद्ययालि-उपजालि कुमार कट्ट-पाउया लकड़ी की खड़ाऊँ कडि-कडाहेणं-कटि (कमर) रूपी कटाह से६७ उववजिहिति-उत्पन्न होगा कडि-पत्तस्स-कटि-पत्र की, कमर की उववरणे,न्ने उत्पन्न हुआ १३२, ८०, ६१ का कान ६४ उबवायो-उपपात, उत्पत्ति कण्णाणं कानों की ६४ उवसोभेमाणे-शोभायमान होता हुआ ७२ कण्हो=कृष्ण वासुदेव ३६ उचागच्छति-आता है ४५, ७३० कतरे कौनसा ७२ उवागते आया ७२ कदाति कमी उन्बुड-णयणकोसे-जिसकी आँखें भीतर कन्नावली-कान के भूपणों की पङ्क्ति ५५ धुम गई थी ६७ कप्पति-उचित है, योग्य ४२ ऊरुस्स-ऊरुओं का ५३ कप्पे-कल्प-सौधर्म आदि देवों के नाम ऊरू दोनों ऊरु वाले द्वीप और समुद्र १३ एपर्सि-इनके विपय में ६४ कय-लक्खण-शुभ लक्षण वाला पक्कारस-ग्यारह १६, ४६,८६ कयाइ,ति-कदाचित् , कभी ४६,८०,६० एग-दिवसेणं एक ही दिन में ३८ एय-इस करग-गीवा-करवे (मिट्टी के छोटे से ७३ ६१ पात्र ) की ग्रीवा अर्थात् गला एयारूचे इस प्रकार का ५१, ५३२, ५५, करति-करते हैं १३ एवं इस प्रकार ३,८२, १२, १३२, २०, २४, ३४, ४२, ५३, ६४, ७२, करेति करता है ३६, ४५, ७३, ६१ ७३,८०,८६, ६१,६४ करेहकरो ४२ एवम्ही, निश्चयार्थ बोधक अव्यय २६ कल-संगलिया-कलाय-धान्य विरोप की एवामेव-इसी प्रकार ५१, ५३, ५५, ५६, फली ५१ ५६, ६१, ६३, ६४ कलातो-कलाएँ २७, ३५ एसणाए-एपरणा-समिति-उपयोगपूर्वक कलाय-संगलिया-क्लाय की फली आहार आदि की गवेपणा करने से ४५ , कहिं-कहाँ १३, ८० ५३ ३ Y६ २ अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् JAN hine -~~-~ ~ AAR M समान हुए uy ur कहेनि कहता है ६० १३, ८०,६० काउस्सग्गं कायोत्सर्ग, धर्म-ध्यान १३ खलु-निश्चय से ८२, १२, १३, २४, २७', काकंदी-काकन्दी नाम की नगरी ७२' ३२, ३४, ७२२, ८०,८६, ६४ काकजंघा कौवे की जाँघ, काक-जद्धा खीर-धाती-दूध पिलाने वाली धाय ३५ नामक ओपघि विशेष ५३ गंगा-तरंग-भूएणं-गडा की तरहों के कागंदी-काकन्दी नाम की नगरी ३४ ६७ कागदीए काकन्दी नगरी में ३५, ४६, ८६ गच्छति-जाता है कागंदीओ काकन्दी नगरी से ४६ गच्छिहिंति-जायगा १३, ८० कायंदी-काकन्दी नगरी ४५ गणिज्ज-माला-गिनती की माला ६७ कायंदी णगरीएकाकन्दी नगरी में ४५ गणेज-माणेहिं गिने जाते हुए ६७ कारेति बनवाती है ३७ गते-गया १३ कारेल्लय-छल्लिया करेले का छिलका ६४ गामानुगाम-एक गाँव से दूसरे गाँव ७२ १ कालंकाल, समय १३, ८० गिलाति-खेद मानता है, दुःखित होता है ६७ २ कालं-मृत्यु (से) १३,८० गीवाए-ग्रीवा की, गर्दन की ६१ काल-गते मृत्यु को प्राप्त होने पर १३ | गुण-रयण-गुरग-रत्न, तप १६ काल-गयं-मृत्यु को प्राप्त हुआ १३ गुणसिलए,ते-गुणशिल नामक चैत्य काल मासे मृत्यु के समय १३,८० या उद्यान १२, २७, ७२,६० कालि-पोरा कालि-वनस्पति विशेप का गूढदंते-गृढदन्त कुमार पर्व (मन्धि-स्थान) ५३ गेण्हंति-ग्रहण करते हैं १३ कालेणं काल से, समय से (में) ३, १२, २७, गेगहावेति ग्रहण कराती है ३४,३६, ७१२, ७२,८६, ६० गेवेज-विमाण पत्थडे-प्रेवेयक देवता के काहिति-अंत करेगा २७ निवास स्थान के प्रान्त भाग मे १३, ८० किन्चा करके १३,८० गोनम-पुच्छा-गौतम का पूछना कुंडियागीवा-कमण्डलु का गला ६१ / गोतम-सामी-गणधर गौतम म्यामी, श्री कुमारे-कुमार महावीर स्वामी के मुख्य शिप्य के-कौनसा ३, ११, २४, २७, ३२, ३४ गोतमा-हे गौतम ! केण?ण-किम कारण ७२ गोनम-गौतम स्वामी ४६,८० केवतियं-कितने १३, ८० गोयमा हे गौतम ! १३',८० कोणितो-कोगिक गजा ३६ , गोयमेगौतम स्वामी १३ खंदो-स्यन्दक मन्यामी ६५, गोलावली-एक प्रकार पं. गोल पन्चगें चंदन-यत्तचया-जो कुछ मन्यानी के विषय में कहा गया है १६ : चउदसण्हं चौदह का गदनो स्वन्दक मंन्यासी १६८६ चंदिम चन्द विमान १३,८० गंदयस्मरन्दक मन्यानी का (वान) चंदिमा-चन्दिरा युमार की पत्ति ७२ ६ शब्दार्थ-कोप Ant हुए, विहार करते चमखु-दएणं-ज्ञान-चक्षु प्रदान करने वाले ६४ । जति-देखो जइ चम्म-च्छिरत्ताए-चमड़ा और शिराओं जधा-जैसे १३ के कारण ६४ जमाली-जमालि कुमार ३६२ चरेमाणे-चलते हुए ७२ जम्म-जन्म चलंतेहि-चलते हुए, हिलते हुए ६७ जम्म-जीविय-फले जन्म और जीवन चिंतणा-धर्म-चिन्ता का फल ७३ चिंता चिन्ता जयंते-जयन्त विमान में २०, २७ चिट्ठति-स्थित है, रहता है, रहती है ४६,५१, जयण-घडण-जोग चरित्ते-जयन ( प्राप्त ५३, ६४, ६७, ७२ योगों में उद्यम ), घटन (अप्राप्त योगों चित्त-कटरे-गौ के चरने के कुण्ड के की प्राप्ति का उद्यम) और योग नीचे का हिस्सा (मन आदि इन्द्रियों का संयम) से चेतिए,ते-चैत्य, उद्यान, बागीचा १२, २७, युक्त चरित्र वाला ४६ ७१, ६० जरग्ग-ओवाणहा-सूखी जूती ५१ चेल्लणाए-चेल्लणा देवी के २० जरग्ग-पाद-बूढे वैल का पैर (खुर) चेव (चऽइव )=ठीक ही १६, ४२२, ५१, जहा=जैसा, जैसे १२२,२०,२७२, ३५, ३६, ६४, ७२, ७३, ८६० ४५, ४६, ४६, ६३, ६४२,६७,८०, चोदसण्हं-चौदह का ७२२ ८६,६० मुटुं-छटेण-पष्ठ पष्ठ तप से, जिस तप में जहा-णामए,ते यथा-नामक, जैसी, जैसा ५१, उपवास ६ भक्त या दो दिन के बाद ५३२, ५५, ५६, ६१, ६७ खोला जाता है १६ ४२,४३ जाणएणं ( छद्मस्थ ज्ञान-चतुष्टय को ) छट्ठस्सवि-छठे ( भक्त ) पर भी ४२ जानने वाले छत्त-चामरातो-छत्र और चामरों से जाणूणं-जानुओं का ५३ छमासा-छः महीने ६१ जाणेत्ता जानकर १३, ३७ छिन्ना-तोड़ी हुई ५१, ५६ १ जाते बालक ३५ जइ,ति-यदि ३, ८, ११, २४, २६, ३२, २ जाते-हो गया ३४, ४५, ८६ ३६, ८६ जं-जिस ७३ ४२९,८६ जामेव जिसी जंघाणं-जवाओं का जालिं-जालि अनगार को १३ जालिम्जालि कुमार या अनगार जंबुं-जम्बू स्वामी को जंबू-जम्बू स्वामी, सुधर्मा स्वामी के जालिस्स-जालि की १३, २७ १२ मुख्य शिष्य ३, ८, १२, २४, ३२, ३४, जालीकुमारो जालिकुमार ८०,८६, ६४ जालीवि-जालिकुमार भी १२ जणणीयो-माताएँ ६१ जावयावत्, पहले कही हुई बात को जण्वय-विहारं देश में बिहार ४६, ८६ फिर से न दुहराकर इम शब्द से जा जैसी ६५ ८, २७ r अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ७ ६० उसका आक्षेप सर्वत्र किया गया है ३', । णाणत्तं नानात्व, माता-पिता आदि का ८, ११, १२, १३२, २०,२४, २६,२७, वर्णन ३२, ३४, ३५२, ३७, ३८२, ३६, णाम-नाम वाली ३४ ४२, ४५, ४६२, ४६, ५३, ५५, ६४, णाम-नाम वाला ३५, २६२ ६७, ७२, ८०,८१,८६, ६० णिक्खंतो-गृहस्थ छोड़कर दीक्षित होगया १६ जावजीवाए-जीवन पर्यन्त ४२,४३ णिक्खमण-निष्क्रमण, दीक्षित होना ३६, ८६ जाहे जब ३६ णिग्गओ-निकला १२२ जिणे-राग-द्वेप को सर्वथा जीतने वाले णिग्गता-निकली 'जिन' भगवान ने ६५ णिग्गते निकला ८६ जियसत्तुं-जितशत्रु राजा को ३६ णिग्गतो-निकला जियसत्तू-जितशत्रु नाम का राजा ३५, ३६ णिग्गया निकली जिभाए-जिहा की, जीभ की ६१ हिम्मंस-मांस-रहित ६४ जीवेण-जीव की शक्ति से ६७°णिम्मंसा-मांस-रहित जीहा-जिह्वा, जीभ ६४ णो-नहीं, निपेधार्थक अव्वय ४२३,५१, जेणेव-जिसी ओर ४५, ७२', ७३' ५३, ६४ जोइज्जमाणेहिं दिखाई देती हुई ६७ तए-इसके अनन्तर ठाणं-स्थान को तओ-तीन ठिनी स्थिति ६२ तं-उस ४२,८०,८६ देणालिया-जंघा टेणिक पक्षी की जद्वा ५३ | तंजहा जैसे ८, २४, ३२, ३५ ढणालिया-पोरा ढेणिक पक्षी के सन्धि तच्चस्स-तीसरे ३२, ३४, ६५ ५३ । तते-इमके अनन्तर ८, १३, ३६, ४२२, णं वाक्यालवार के लिए अव्यय है, ४५२, ४६, ४६', ७२, ७३, ८६,६० जिमका इस प्रन्थ में हमने 'नु' से ततो इसके अनन्तर सस्कृत अनुवाद किया है ३२,८, ११, तत्थ-वहाँ ३५ १३, २४, २६, ३२२, ३४, ३५, ३७, तरणए-कोमल ६४ ३६, ४२६, ४५२, ४६, ४६,५२, तरूणग-एलालुप-कोमल आलू ६४.६७,७२२,७३,८०,८६,६० तरुणग-लाउए-कोमल तुम्बा रण-नहीं, निषेधार्थक अव्यय ४२, ४५२. ६४ : तमणिते-छोटी, कोमल ५३ रणगरी नगरी ३४.४५ तरुगिया-छोटी, कोमल ५२, ५३,६३ गरीप-नगरी में ८६ तवन्तेरा रणगरीतो-नगरी से ४६, ४६ , नव-तेय-सिरीप-तप और तेज की लक्ष्मी गगरे-नगर १२, २७. ७१, ले ६७ राममनिम्नमस्कार करता है. १२, ७२.७३' तव स्व लावन्न-तप के कारण उत्पन्न हुई -चिगेपता-चोधक अव्यय ६४ सुन्दरता १३२,८०, स्थान ६४ - ८ शब्दार्थ-कोप ८०,६१ तवसा-तप से ४६, ४६, ८६ । तेत्तीसं तेतीस तवेणं-तप से ६७ तेरस तेरह २६ तवो-कम्म-तप-कर्म १६ तेरसण्हवि-तेरहों की २७ तवो कम्मेणं-तप-कर्म से ४२, ४३ तेरसमे-तेरहवाँ २४ तरसम्मका ३६, ८०, ६० तेरसवि-तेरह ही २७ नहाउसी तरह १२, २७, ३६, ६७, ८६ तेसिं-उनके ३७ तहा-रूवाण-तथा-रूप, शास्त्रो में वर्णन तो तो ४५२ किये हुए गुणों से युक्त माधुओं का ४६ त्ति इति तहेव-उसी प्रकार १२, १३, २०, ४५, ७२, | थावच्चापुत्तस्स-स्थावत्या-पुत्र की, स्था- ८०,८६,६० वत्या गाथापत्नी का पुत्र, जिसने एक ताप-उस सहस्र मनुष्यों के साथ दीक्षा ली थी ताओउस १३ ३६, ८६ तामेव उसी ७३ थावच्चापुत्तो-स्थावत्या-पुत्र ३६ तारएण-दूसरों को ससार-सागर से पार थासयावलीदर्पणों (आरसियों) की करने वाले पक्ति ५५ तालियंट-पत्ते ताड़ के पत्तों का पता ५६ थेरा-स्थविर भगवान् १३, ८० ति इति, समाप्ति या परिचय बोधक थेराणं-स्थविर भगवन्तों का ४६ ८, १३, ५१, ५३३ थेरेहि स्थविरों के (से) १२,८० तिकट्ट-इस प्रकार करके दस-दश ८, ११, ३२, ३४ तिक्खुत्तो-तीन बार ७३ दसमे-दशवाँ, दशम ३२ तिरिण-तीन ८ दसमो-दशम, दशवा ६१ तिह-तीन का २० दाओ विवाह में कन्या-पक्ष से आने वाला तित्थगरेणं चार तीर्थो की स्थापना दहेज १२, ३८,८६ करने वाले ६१ दारए-बालक ३५, ८६ तिन्नेणं-ससार सागर से पार हुए ६५ : दारयं बालक को ३५ तीसे उम ३५, ८६ दिन्ना-दी हुई तुम्मेणं-आप मे ४२ ; दिवसं-दिन तुम-तुम ७३ । दिसं-दिशा को ७३ तेवे १३, ३२ दोहदंने दीर्घदन्त कुमार ताण-तेज से ६७ ' दीहलेणे-दीर्घसेन कुमार २४, २७ तेणं उस ३'. १२२. २७, ३४, ३६', दुतिजमाणे-विहार करते हुए ४६, ७१, ७२.८६, ६० दुमसेणे-टुममेन कुमार नेगट्टेणं-इस कारण ७२ , दुमेन्दुम कुमार तणेव-दमी पोर ४५, ७२, ७३. दुमति-ग्रारोहण करते हैं, चढ़ते हैं अव्यय ७३ ५१, ५६ -- 5, २० अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ७२ का दुरूहंति आरोहण करता है, चढ़ता है १२ / धारिणी-सुआ-धारिणी देवी के पुत्र २० दूर-दूर १३, ८० नंदादेवी-नन्दादेवी नाम वाली रानी देवस्स-देव की १३, ८० नगरी-नगरी देवत्ताए-देव-रूप से १३, ८० नगरीए-नगरी में देव-लोगाओ-देवलोक से १३, ८० नगरे-नगर २० देवाणुप्पियाणं-देवों के प्रिय (आप) नव-नौ ६१ १३, ३६ नवराह-नौ की ६१२ देवाणुप्पिया-देवों के प्रिय (तुम) ४२, ७२२ नवराहवि-नौवों की ६१ देवीराज-महिपी, पटरानी १२, २७ नवमस्स-नौवें ३.८ देवे देव ६१ नव-मास-परियातो नौ महीने की संयम- दोश्वस्स-दूसरे २४, २६, २७,२ ३२ वृत्ति दोण्हंन्दो का २० नवमेनौवाँ ३२ दोन्निदो का २७१, ६१ नवमो-नौवाँ ६१ धण्णस्स-धन्य कुमार या अनगार का ८० नवरं-विशेषता-सूचक अव्यय १२, २०, १धणे,ने=धन्य कुमार या अनगार ३२,४२, २७, ३६२ ४५२, ४६२, ४६२, ६७, ७२२, ७३, ६१ नाम-नाम वाली ७२ २ धणे-धन्य है ७३ नासाए-नामिका की, नाक की ૬૩ धराणो,नो-धन्य अनगार ८६२ निक्खमण=निष्क्रमण, गृहत्याग ६२ धन-धन्य कुमार नाम का ३५, ३७ निग्गओ-निकला धनस्स-धन्य कुमार या अनगार का ३६, निग्गता-निकली ५१, ५३, ५५, ५६, ६१, ६३, निग्गतो-निकला ६४,७२ निग्गया निकली ३,३६ धने, धन्नो देखो धरणे, धएणो निसम्भ-ध्यानपूर्वक सुनकर धम्म-धर्म पंच-पाँच २०, २७ धम्म-कहा-धर्म-कथा ७२, ६० पंचराई-पाँच का धम्म-जागरिय-धर्म-जागरण ८०, ६० पंच-धाति-परिस्वित्ते-पाँच धाइयों की धम्म-दपण-श्रुत और चारित्र रूप धर्म रना में रखा हुआ देने वाले ६४ पंच-धानि-परिग्गहित पाँच धाइयों का धम्म देसएण-धर्म का उपदेश करने वाले ६४ प्रहण किया हुआ ३५ धम्म-चर-चाउरंत चावहिणा-उत्तम पगति-भद्दा:-प्रकृति में भद्र, मौम्य धर्मरूपी चार गति और चार अवयव स्वभाव वाला १३ युक्त संसार के चक्रवर्ती ६४,६५ पग्गदियाए-प्रहरण की हुई, स्वीकार की धारिणी-धारिणी नाम की श्रेणिक राना की रानी १२ पज्जुनाग्मतिम्मेवा करता है ७२ ३६२ ८६ -~- हु शब्दार्थ-कोष पडिगए-चला गया ७३ की पडिगओ चला गया ६० पव्वतिते-प्रव्रजित हुआ ३६,४२, ८६ पडिगता-चली गई ६० पब्बयामिप्रवजित होता, दीक्षा ग्रहण पडिगया-चली गई ७२ करता हूँ ३६ पडिगाहेति-ग्रहण करता है ४६ | पञ्चाय-चदण-कमले जिसका कमलरूपी पडिग्गहित्तते ग्रहण करने के लिए ४२ मुख मुरझा गया था ६७ पडिणिक्खमति बाहर निकलता है ४६,४६ पाउणित्ता-पालन कर १२,१३ पडिदसेति-दिखाता है ४६ पाउन्भूते-प्रकट हुआ ७३ पडिवंधं-प्रतिबन्ध, विन्न, देरी ४२ / पांसुलि-कडएहि-पसलियों की पंक्ति से ६७ पढम-छठ्ठ-वनमण-पारणगंसि-पहले पांसुलिय-कडाणं पार्श्वभाग की अस्थियों पष्ठ व्रत (वेले) के पारण में ४५ ( हड्डियों) के कटकों की पढमस्स-पहले ८२, ११, २०, २४,३४,८१ पाण-पानी ४५ पढमाए-पहली ४५ पाणावली-पाण-एक प्रकार के वर्तनों पढमे पहले (अध्ययन) में २० की पंक्ति पण्णग-भूतेणं-सर्प के समान ४६ पाणिं हाथ ३८ परण(न)त्ता प्रतिपादन किये हैं ८, ११, पात-जंघोरुणा-पैर, जद्धा और ऊरुओं से ६७ १३, २६, ३२,८०,६१ पादाणं-पैरों की ५१, ७२ परण(न)त्ते-प्रतिपादन किया है, कहा है पाभातिय-तारिगा=प्रातःकाल का तारा ६४ ३२, ११२, २०, २४, २७२, ३२२, पायंगुलियाणं-पैरों की अँगुलियों की ५१ ३४, ८१, ६५ पायंगुलियातो-पैरों की अँगुलियाँ पण्णा(ना)यंति-पहचाने जाते हैं ५१, ६४२ पाय-चारेणं-पैदल ३६ पत्त-चीवराई-पात्र और वस्त्रों को १३ पाया-पैर पयययाए: अधिक यत्न वाली ४५ पारणयंसि-पारण करने पर, पारण के परिनिव्वाण-वत्तियं परिनिर्वाण प्रत्य- ४२ यिक, किसी की मृत्यु के उपलक्ष्य पासायवडि(ड)सए, ते श्रेष्ठ-सर्वोत्तम किया जाने वाला १३ १२, ३७, ३८, ७२, ८६ परियातो-संयम-वृत्ति या साधु-वृत्ति का पि-मी २७, ६० पिटि-करंडग-संधीहि-पृष्ठ-करण्डक परिवसइ-रहती है (थी) ३५ (पीठ के उन्नत प्रदेशों) की सन्धियों परिवसति-रहता है से परिसा-परिपद, श्रोतृ-गण ३, ३६, ७१, | पिट्टि-करंडयाण-पीठ की हदियों के उन्नत प्रदेशों की पलास-पत्ते-पलाश (ढाक) का पत्ता ५६, ६१ पिट्टि-मवस्सिएणं-पीठ के माय मिले हुए ६७ ३२ पव्वदते-प्रत्रजित हुआ, माधु-वृत्ति धारण पिट्टि-माझ्या पृष्टिमातृक कुमार समय में महल में ४२ पालन ६ ६७ ७२२, ६० अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् ११ ८ ने ४२, ६४ पिता-पिता २७ / चीणा-छिडे-वीणा का छेद ६४ पिया-पिता ६१ वुद्धणं-बुद्ध, ज्ञानवान् ६५ पुच्छति-पूछता है ८० बोद्धव्वे-जानना चाहिए पुट्टिले पृष्ठिमायी कुमार ३२ वोरी-करील्लम्बेर की कॉपल ५३ पुत्ते-पुत्र ३५, ८६ | वोहएणं-दूसरों को बोध कराने वाले पुनसेणे-पुण्यसेन कुमार २४ भंते हे भगवन् ! ३२,८२, ११, १३३, पुरिससेणे-पुरुषसेन कुमार २४, २६, २७, ३२२,३४,४२, ७२२, पुब्बरत्तावरत्तकाल-समयंसि-मध्य रात्रि ८०,८६, ६० के समय में ६० भगवं-भगवान् १३, ३६, ४२, ४६, ७१, पुन्वरत्तावरत्तकाले-मध्य रात्रि में ७२, ७३', ८०२ पुवाणुपुबीए-क्रम से ७२ भगवंता-भगवान् १३ पेढालपुत्ते-पेढालपुत्र कुमार ३२ भगवता-भगवान् पेल्लए-पेल्लक कुमार ३२ भगवतो भगवान् का ४६,७३,८६ पोरिसीए-पौरुपी, प्रहर, दिन या रात भगवया भगवान् ने ४६ के चौथे भाग में ४५ भजणयकभल्ले-चने आदि भूनने की फुतेहिं बड़े जोर से वजते हुए (मृदङ्ग कढ़ाई ५५ आदि वाद्यों के नाद से ३८ भत्तं भात ४५२ वंभयारीब्रह्मचारी ३६, २६ भद्द-भद्रा सार्थवाहिनी को ३६ वत्ती(त्ति?)संयत्तीस १३, ३७, ८६ भद्दा-भद्रा नाम वाली ३५, ३७, ८६ वत्तीसाए-बत्तीस ३८ भदाए-भद्रा सार्थवाहिनी का ३५, ८६ यत्तीसाओ बत्तीस ३८, ६१ भद्दामओ-भद्रा नाम वाली बद्धीसग-छिद्देन्बद्वीसक नामक बाजे भन्नति कहा जाता है ६४ ३७ वहवे बहुत से ४२ भवित्ता होकर ४२ यहिया बाहर ४६,८६ भाणियव्वं, व्या-कहना चाहिए २०,६१ वाम्बहुत ६० भावेमाणे भावना करते हुए ४२,४३, बारसम्यारह बालत्तणंचालकपन २७ भासंम्भापा, बोल यावत्तरिं-बहत्तर ३५ भास-रासि-पलिच्छग्ने राख के ढेर में यादाणे-भुजाओं की बादाया-संगलियाबाहाय नाम वाले वृत्त मामिस्मामि-कहूँगा विगेप की फनी ५६ : मुफ्रोण भूप मे ६७ याहार्दि-भुजाप्नों में ६७ : भोग-समत्व, त्य-भोग भोगने में समर्थ विलमिव चिल फेममान ३५,३३ युक्त) का छेद ६४ भवणं भवन ४६,८६ ६७ टकी हुई ६७ शब्दार्थ-कोप मेघ कुमार करने वाला करने वाला ७२० २७ मंस-सोणियत्ताए-मांस और रुधिर के मुंडावली-खम्भों की पंक्ति कारण ५१, ६४ मुंडे-मुण्डित ४२, ८६ मग्ग-दएणं मुक्ति-मार्ग दिखाने वाले ६४ मुग्ग-संगलिया-मूंग की फली ५१,५७ मज्झे-बीच में ३७ मुच्छिया मूछित ३६ ममं मेरा १३ मूला-छल्लिया-मूली का छिलका ६४ मयालि-मयालि कुमार ८ मेहो='ज्ञाता धर्मकथाङ्गसूत्र' में वर्णित मयूर-पोरा-मोर के पर्व (सन्धि-स्थान) ५३ १२ महता-बड़े भारी (समारोह से) ३६ मोक्कणं स्वयं मुक्त हुए ६५ महव्वले-महाबल कुमार, जिसका वर्णन मोयएण-दूसरों को ससार-सागर से 'भगवती सूत्र' में किया गया है ३५, ३६ मुक्ति दिलाने वाले महा-णिज्जरतराए-बड़े कर्मों की निर्जरा य-और ८५, ३२, ४२, ८० ७२' रामपुत्ते-रामपुत्र कुमार महा-दुक्कर-कारए-अत्यन्त दुष्कर तप रायगिहे-राजगृह नाम का नगर ३, १२, २०, २७, ७१, ६०,६१२ महादुमसेणमाती महानुमसेन आदि राया-राजा १२, २०, २७, ३५, ७१, ७२, महादुमसेणे महाद्रुमसेन कुमार २४ ७३, ६० महाविदेहे-महाविदेह (क्षेत्र) में १३,८०,६१२ रिद्ध(द्धि?)स्थिमिय-समिद्धे, द्धा-धन महावीरं-धर्म के प्रवर्तक श्री श्रमण भग धान्य से युक्त, भयरहित और सब वान महावीर स्वामी को ४२, ७२,७३२ प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त १२, ३४ महावीरस्स-श्री महावीर स्वामी का ४६, लट्ठदंते-लष्टदन्त कुमार ७३, ८६ लभति प्राप्त करता है ४५२, ४६ महावीरे-श्री महावीर स्वामी ३६, ४६, ७१ लाउय-फले-तुम्बे का फल ६१ महावीरेण श्री महावीर से ४३, ६४ लुक्ख-रुक्ष ६४ महासीहसेणे-महामिहसेन कुमार २४ लोग-नाहेणं-तीनों लोकों के स्वामी ६४ महासेणे महासेन कुमार २४ लोग-पज्जोयगरेण लोक उद्योतकर मा-नहीं, निषेधार्थक अव्यय ४२ (प्रकाशित करने वाले) माणुस्सए-मनुष्य सम्बन्धी ७३ | लोग-प्पदीवेणं लोकों में दीपक के मातुलुंग-पेसियामातुलुङ्ग-बीजपूरक की समान प्रकाश करने वाले फॉक ६३ / वंदति वन्दना करता है ४२, ७२, ७३ माया.ता-माता २०, २७ वग्गस्सन्वर्ग का ८, ११, २०, २४ २७, मासं एक मास ३२', ६५ मास-संगलिया-माप-उड़द की फली ५१,५६ वग्गा मासिया-एक मास की ८० वट्टयावली-लाख आदि के बने हुए बों मिलायमाणी-मुरझाती हुई के खिलौनों की पंक्ति ८, २० ६४ ६४ -- अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् १६ ६६ ८३ ३६ 6 ८१,६५ ८०,६१ ८० २७ वड-पत्तेचड़ का पत्ता ५६, ६१ । वेहल्लस्स-वेहल्लकुमार का वत्तव्यया-वक्तव्य, विषय २७ वेहल्ले वेहल्ल कुमार वयासी कहने लगा, बोला ३, ८, १३, ४२, वेहायसे-विहास कुमार ७२ संचाएति-समर्थ होती है वा-विकल्पार्थ-बोधक अव्यय ५१९, ५५५ संजमे-संयम में, साधु-वृत्ति में वाणियग्गामे वाणिज ग्राम नगर में संजमेणं-संयम से ४६, ४६, ८६ वागरेति कहते हैं संपत्तेणं मोक्ष को प्राप्त हुए ३२, ८, ११, वारिसेणेवारिसेन कुमार २०, २४, २६, २७, ३२२, ३४, वालुंक-छल्लिया चिर्भटी की छाल ६४ वावि (वाऽअवि)=भी ३७ संलेहणा-संलेखना, शारीरिक व मानसिक वासा-वर्प ६०, ६१ तप-द्वारा कपादि का नाश करना, वासाई,तिवर्ष तक १२, २० अनशनवत वासेन्छेन में १३, ८० संसटुंभोजन आदि से लिप्त (हाथों से चिउलं-विपुलगिरि पर्वत दिया हुआ) ४२ विगत-तडि-करालेगनदी के तट के सञ्चव-वही समान भयङ्कर प्रान्त भागों से ६७ सज्झायं-स्वाध्याय विजए,ये विजय विमान में २०२, २७ सत्त-सात २० विजय-विमाणे-विजय नामक विमान में १३ सत्थवाहि-सार्थवाहिनी को विपुलं-विपुलगिरि नामक पर्वत १२ सत्थवाही सार्थवाहिनी, व्यापार में विमाणे विमान में ८०,६१ निपुण स्त्री ३५, ३७, ८६ वियण-पत्ते बाँस आदि का पता ५६ । सदि-साथ विहरति-विचरण करता है १२, ३८, ४३, समपणं समय से (में) ३, १२, २७, ४६,४६, ७२, ८६ ३४, ३६, ७१,८६,१० विहामि विचरण करता हूँ ७२ समयमण भगवान् ४२, ७२,७३' विहरित्तने-विहार करने के लिए ४२ समण-माहण-यतिहि-किवण-वणीमगा- वीतिवत्तित्ता व्यतिक्रान्त कर, अतिक्रमण श्रमण, माहन (भावक), अतिथि, कर, उमको छोड़कर उससे आगे १३,८० कृपण और वनीपक (वाचक विशेप) ४२ बुशति कहा जाता है समग-साहस्सी हजारों मुनियों में बुत्त पडिबुत्तया-उक्ति प्रत्युक्ति से (भ्रमण महलों में) युत्ते-कहा गया है ३२ समास्सम्श्रमण भगवान् या वेजयंत वैजयत विमान में २०,२७ चवमाणीए-मापती हुई ६७ ममणे-मण भगवान ४६७२ चहल-पहायसा वाल पुम्मार 'गोर समणेगमग भगवान ने ३,६,११ विधायम गुमार २० २०,२५.२६,२७,३२, ३४,१२, ३६ १२,८० -- ७२' ७३, ८६ - । 1 शब्दार्थ-कोष २० प्राप्त भिक्षा समान फल विशेष ४६,८०,६४ का भाव, संयम-वृत्ति १२ समाणी होने पर ५१, ५६ सामन्न-परियातो-संयम-वृत्ति समाणे होने पर ४२२, ४६ सामली-करील्ले शाल्मली वृक्ष की कोंपल ५३ समि-संगलिया-शमी वृक्ष की फली ५६ सामाइयमाइयाइं-सामायिक आदि ४६ समुदाणं-घरों के समूह से सामी श्री श्रमण भगवान महावीर स्वामी समोसढे-पधारे, विराजमान हुए १२, ३६, १२, ६० ७१, ६० साहस्सीण-सहस्रों में-(सहस्रों का) ७२२ समोसरण-पधारना, तीर्थङ्कर का प्रधारना सिझणा-सिद्धि ६१ ३, ८६ सिभिहिति-सिद्ध होगा १३,८०,६१ सयं-अपने आप ३६ सिढिल-कडाली (विव) ढीली लगाम सयं-संवुद्धणं अपने आप बोध प्राप्त के ६७ करने वाले ६४ सिण्हालए-सिंस्तालक-सेफालक नामक सरण-दएणं-शरण देने वाले ६४ सरिसं-समान ६१ सिद्धि-गति-नामधेयं-सिद्धि गति नाम सरीर-चन्नओ-शरीर का वर्णन वाले ६५ सल्लति-करिल्ले शल्य वृक्ष की कोंपल ५३ सिलेस गुलिया श्लेष्म की गुटिका ६१ सबट्ठसिद्धेसवार्थसिद्ध विमान में २०२, सिवं-कल्याणरूप २७, ८०,६१ सीस-शिर सवत्थ-सर्वत्र, सब के विषय में ६४ सीस-घडीए-शिररूपी घट (घड़े) से ६७ सवो सब ७२ / सीसस्स-शिर की ६४ सब्बोदुए सब ऋतुओं में हरा-भरा रहने सीहसेणे-सिंहसेन कुमार २४ वाला ३५ सीहेमिह कुमार सहसंबवणे सहस्राम्रवन नाम वाला एक सीहो-सिंह, शेर १२, २७ बगीचा ३४, ७२ सुकयत्थे-सुकृतार्थ ७३ सहसंबवणातो सहस्राम्रवन उद्यान से ४६ सुक्कं-सूखा हुआ सावह ३५ सुक्क छगणिया-सूखा हुआ गोवर, गोहा ५६ साएए-साकेत पुर में ६१ सुक्क छल्ली-सूखी हुई छाल ५१ साग-पत्ते-शाक के पत्ते ६१ सुक्क-जलोया-सूखी हुई जोक सागरोवमाइं-सागरोपम, दश कोडाकोडी सुक्कदिए-सूखी हुई मशक पल्योपम प्रमाण का, काल का एक सुक्क-सप्प समाणाहि-सूखे हुए सर्प के विभाग जिमके द्वारा नारकी देवता की आयु मापी जाती है १३, ८०, ६१ सुक्का-सूखी हुई, सूखे हुए ५१, ५६ साम-करीले प्रियद्गु वृक्ष की कोंपल ५३ सुकातो-सूखी हुई सामन्न-परियागं-साधु का पर्याय, साधु सुकेण-सूखे हुए समान अनुत्तरोपपातिकदशासूत्रम् २०, २७ सुणक्खत्त-गमेणं-सुनक्षत्र के समान ६१ ) सेसं-शेप (वर्णन), बाकी २० सुणक्खत्तस्सन्सुनक्षत्र के ६० सेसा शेष सुणक्खत्ते-सुनक्षत्र कुमार ३२, ८६ / सेसाण-शेप का ६१ सुपुराणे-अच्छे पुण्य वाला ७३ सेसाणविशेष का भी सुमिणे स्वप्न में १२, २७ सेसावि-शेप भी ६१ सुरूवे-सुन्दर, अच्छे रूप वाला ३५, ८६ सोचा-सुनकर सुलद्धे-अच्छी तरह प्राप्त कर लिया है ७३ सोणियत्ताए,त्ते-रुधिर के कारण ५१ सुहम्मस्स-सुधर्म नाम वाले श्री महावीर ५३, ५५ स्वामी के पाँचवें गणधर और जम्बू सोलसम्सोलह १२, २०, २७ स्वामी के गुरु का ३) सोहम्मीसाण-सौधर्म और ईशान नामक सुहम्मे सुधर्मा स्वामी पहला और दूसरा देवलोक ७३ सुहय० (सुहुय-हुयासण इव)-अच्छी हकुव-फले-हकुव-वनस्पत्ति विशेष का तरह से जली हुई अग्नि के समान ४६ फल ६१ सुद्धदंते-शुद्धदन्त कुमार २४ हट्ठ-तुट्ट-प्रसन्न और सन्तुष्ट ४३, ७३ १से वह, उसके ८, १३, ४२, ४५', ४६, हणुपाए-चिचुक-ठोड़ी की ६२ ४६,५१,५३२, ५५, ५६, ६१७, हत्थंगुलियाएं हाथों की अंगुलियों की ५६ ६३, ६४, ६७, ७२,८०,८६,६० हत्थाणं हाथों की २से-अध, प्रारम्भ-बोधक अव्यय ७२ हत्थिणपुरे हस्तिनापुर में ६१ सेणिप श्रेणिक राजा १२, २०, २७, ७१, हल्ले-हल्ल कुमार २४ ७२, ७३, ६० हुयासणे (इव)-अमि के समान ६७ सेलिओ-श्रेणिक राजा १२, २७ होति होते हैं। सेणित श्रेणिक राजा ७१ । होत्था-था, थी ३४, ३५२, ५१, ७२,८६ सेणियान्हे श्रेणिक ७२

Ponted by
K. R. Jain, at the Manohar Electric Press,
Said Mitha Bazar, Lahore.
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1
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Annutroppatik Dasha Sutram

Author
Shri Atamaram Ji Maharaj
Title
Annutroppatik Dasha Sutram
File name
Annutroppatik Dasha Sutram
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2010/10
Publisher
Jain Shastar Karyalye Lahor
Language
Sanskrit
Pages
152
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
DLI number
327113
Barcode
99999990002596.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
9KGSbVmkq1o
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