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Sri Devi Mahatyam Chandi Navasathi Mantra Mala
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श्री देवी माहात्म्यम्
चण्डीनवशतिमन्त्रमाला
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(नवाङ्ग सहितः)
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प्रचारक:
श्री गोपानन्दनाथः
तिरुपति।
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श्री देवी माहात्यमु
चण्डीनवशती मन्त्रमाला
(संस्कृत)
पहला मुद्रण - 1999
प्रतियाँ - 1,000
© सर्वाधिकार श्री गोपानन्दनाथ के पास सुरक्षित प्रचारक.
मूल्य : Rs.72/-.
प्रतियाँ
श्री गोपानन्दनाथ
प्रचारक
घर नं. 18-1-33,
तिरुपति - 517507
के.टि. सडक,
डी.टी.पी. प्रकाशक
श्री सत्य साई ग्राफिक्स
18-1-4/डि1/ए2,
रामचन्द्रनगर, के.टि. सडक,
तिरुपति
-
मुद्रक :
एस. हेच. सिलिको स्प्रिंग्स एंटरप्रेजेस
3-4-862, जी 3, ग्रौन्ड फ्लोर,
हरषदम अपार्टमेन्ट्स,
बरकतपुरा, हैदराबाद - 500 027.
0:7564197
AT
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This book is published with the financial assistance
of Tirumala Tirupathi Devasthanams under their
Scheme Aid to publish religious book.
श्रीः शुभमस्तु नमस्सद्गणचण्डिकायै ॥ श्री श्री श्री गोपानन्दनाथ महोदयानां द्वारा श्रीललिता त्रिपुरसुन्दर्या आस्तिकलोकाय प्रदत्तः श्री चण्डीनवशती मन्त्रमालाग्रन्थः उपासकानां कल्पतरुरिव। सप्तशतीति लोके प्रचारेवर्तमानः श्रीमार्कण्डेय पुराणान्तर्गत देवीवृत्तान्तः शात्तेयवशं प्राप्तः तान्त्रिकरूपेण विपरिणम्य नकेवलं पराशत्त्युपासनायैव, अपितुकेषाञ्चन जीवनोपाधये मूलाधारभूत इति विषयःसर्वेषां विदितचर एव । लोककल्याणाय, विश्वशान्त्यै च कर्तव्यानि पारायणानि लौकिकवाञ्छासिद्धयै कर्तव्यत्वेन विपरिणतानीति कलियुगप्रभाव एवेति किमु वाच्यम् ? एतां दुस्थितिं निवारयितुं जगन्मातैव श्रीगोपनन्दनाथान हृदये प्रविश्य स्वयं नवशतीरूपेणाविर्भूतेत्यत्र मम नास्ति संशयलवोऽपि। जगन्मातुः नवत्वसङ्ख्याश्चाविनाभावस्सम्बन्धोस्ति। सङ्ख्यागणिते नवत्वसङ्ख्या पूर्ण सङ्ख्या। मन्त्रे ष्वणि जगन्मातृ सम्बन्धिषु नवत्वसङ्ख्यान्वितास्ति। कृतेऽपि, सभवत्यपि, सर्वस्यापि भगवत्याः सङ्कल्प एवेति दृढं विश्वशितारः इमं ग्रन्थं विमर्श नालम्। यद्युक्तास्तार्हि तेष्वास्तिक्यमेव नास्तीति रूढम् । तस्मात् जगन्मातुरनुग्रहेण रचितोऽयं ग्रन्थंः सर्वजनामोदेन सर्वेषु देवालयेष्वाचरणीयतां दृढं विश्वसितुणांमेषोस्मि। ग्रन्थकतीरं सद्गुणकल्पवल्लि सा जगन्माता अनुगृहीयात् ।। केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य रूपं च शतृभयकार्यतिहारि कुत्र । चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ।। इत्थं सिकिन्दराबाद जगन्मातृसेवायां 26-4-1991. बिजुमळ्ळ सूर्यनारायणशर्म सिद्धान्ती। (Translated from Telugu) ब्रह्मश्री गोपानन्दनाथमहाशयेभ्यः, नमांसि भवद्भिः प्रेम्णा प्रेषितं देवीमाहात्म्यं प्राप्तम्-- बहु नूतन विषयाणामवगमनेन महानन्दः समजनि। दुर्गासप्तशती परिचितानां नवशतीयं नेत्रोन्मीलिका। वामाचार इति कौल इति नाम्ना केचन स्वार्थपराः मानवेषु दैवत्वमपनयन्तः अनुचितमार्ग नयन्तः दैत्या इव परिवर्तत वैखरी परिशीलने कलियुगमानव परिस्थितिं स्मरन्मे मनः व्याकुलितम्। निर्मलमनसा भक्तिपूर्णहृदयेन मातरमाराधयती सदा सुखशान्ती लभ्यते इति धैर्य ग्रन्थास्यास्य पठनानन्तरं सज्ञातम् । एतावत्पर्यन्तमनुसृतासम्पूर्णमार्गेभ्यो जीवनं सक्रम मार्गे परिवर्तयन् लक्ष्यसाधने मुमुक्षुः कृतार्थो भवितुं अयंग्रन्थः महानुपकरिष्यति । प्रणामैः, Vijayawada, , मल्लदि सूरिशास्त्री। 2-6-1990. (Translated from Telugu) नवंबर १९९३ तिरुमल तिरुपति देवस्थान "सप्तगिरि" मासपत्रिकायां ग्रन्थसमीक्षा॥ श्रीदेवीमाहाम्यम् ॥ एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्तीति वेदवचनम् । सत्यमेकमेवाऽस्ति। विप्रास्तं बहुविधमभिवर्णयन्तीत्युपरिवचनस्य तात्पर्यम् । आराधकानां संस्कारानुसृत्य आराध्यदेवाः आराधना विशेषणश्च प्रतिस्विकाः। त्रिमूर्तीनां मूलभूतः शक्तिरूपेण देव्याराधनमिति यत् अनादिनः देवीभक्र्तेराश्रित सम्प्रदायः सः। देवीभागावतादिग्रन्थाः देव्याः प्राशस्त्यं सहस्रधोद्घाटयामासुः। कालक्रमेण देव्युपासनविधाने वामाचारस्समनुप्रविष्टः। एतस्मात् कारणत् सदाचारः अग्न्याहुतिं गतः। 'नाविरतो दुश्चरितात्' इत्यदि श्रुतयः योदुश्चरितात् दूरीभूतो न स्यात् स परतत्वं न जानीयादिति मुक्तकण्ठमुद्घोषयन् । अतो वामाचारपराणां मुक्तिः कथं सिद्ध्यति ? इमं विषयं निरुपयितुमेव श्रीगोपानन्दनाथमहोदयाः श्रीदेवीमाहात्म्यम् इति नामकं प्रकृतग्रन्थं प्रकाशितवन्तः। ते वामकौळाचारौ वेदसम्मितौ नेति सयुक्तिकं न्यरूपयन् । मार्कण्डेयपुराणान्तर्गत देवीमाहात्म्य प्रतिपादकघट्टः सप्तशतीति नाम्ना बहुलप्रचारं प्रापत् । वेदविज्ञानसम्पन्नाः श्रीगोपानन्दनाथ महाशयाः प्रमाणैरनैकैस्सा न सप्तशती, अपि तु नवशतीति ग्रन्थेस्मिन् न्यरूपयन्। श्लोकानां नवशतामन्त्रविभजने शास्त्रीयां पद्धतिमौचित्यं च पर्यगणयन् । सुप्रसिद्ध विद्वत्कवयः शतावधानिनः ब्रह्मश्री गौरिपेद्दि रामसुब्बशर्म महाभागाः ग्रन्थास्यास्य परिष्करणे भागिनोऽभूवन्निति मुदमावहति। चण्डीनवशतीग्रन्थस्य तैर्लिखितमुपोद्घातमपि सन्दर्भेस्मिन् स्मरणीयम्। पुस्तकेस्मिन् मन्त्राणां डा. राणी रामकृष्णमहोदयाः समीचीनां व्याख्यां समायोजयन् । व्याख्यानावसरे विशेषांशान् हृदयपथा व्यावृण्वन् । विवरणं प्रामाणिकमस्ति। व्याख्येयं पाठकानामनेक संशयोच्छेदिनी। अपेक्षितांशाननपहाय अनपेक्षितांशान्विहाय मन्त्रणां विवरणं दतवन्तो व्याख्यातारोऽभिनन्दनीयाः। ग्रन्थोऽयं देव्याराधनपरैस्सर्वैरवश्यं पठनीयः। समुद्राल लक्ष्मणय्य। (Translated from Telugu)
पण्डिताभिप्रायः
अस्तु वरश्रेयसे नित्यं वस्तु वामङ्गसुन्दरम् ।
यतस्तृतीयं विदुषां तुरीयं त्रैपुरं महः।।
श्रीविद्या अनादितः सम्प्रदायरूपेण समागच्छति । श्रीविद्योपास
अनुष्ठानपराः केवल जपपरा शतिचवर्तन्ते। श्रीचक्रार्चनपरेषु केषुचनम
वामाचारपद्धतिरेकाऽस्ति । तस्यां हस्तद्वयेन बिन्दुतर्पणादिकं विहितम्
इमं वामाचारं भागवतव्याख्याने श्रीधराचार्याः अन्ये शिष्टाश्च निरसितवन्त
वामाचारः सर्वदा परित्याज्यः।
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अस्माकं समयदक्षिणाचारावेव ग्राह्याविति वादो निर्विवादः। ब्रह्म
गोपानन्दनाथमहोदयाः सम्प्रदायेस्मिन् कृतार्था इति शृत्वा सन्तुष्टोसिस
"उवाच'' वाक्यानां मन्त्रत्व परित्यागपूर्वक नवशती विधानम् तृप्तिकरमसि
इति शम्॥
राणी नरसिंहशास्त्री
Narendrapuram,
वेदान्तशिरोमणिः, वेदान्त विशारदः,
तकीचार्यः, सहित्यशिरोमणिः
2-1-1991.
( (Translated from Telugu)
This is dedicated to Lord Vighneswara of Kanipakam, Chittoor Dist.
ब्रह्म श्री गोपानंदनादुलु - उसकी श्रीमति शीतारामम श्री नंदवरीक ब्रह्मण वंश में, मद्धिरेल के परिवार में (1907) पराभव नाम वर्ष में जनवरी (ईक्कीस) 21 को जन्म लिया ब्रह्म श्री गोपनंद नादुजी पूज्य गु. श्री श्री श्री जगन्मोहनानंद के पास उसकी चौबीस आयु मे ही श्री विद्यापुर्णदी ग्रहण करलिये । दक्षिण भारत में आविर्भाव हुए 27 ऐ नृसिंह क्षत्रों में पैदर चलकर संदर्श करके वहाँ तपकरनेवाले महानुभाव है । वैदिक सांप्रदाय के तरीव में श्री देवि पूजा विधानों को पुनरुद्धरण करके वामाचार क्रम में चलनवा सप्तशति को संस्कार करने की गुरु के आज्ञा के अनुसार देश भर में संचार कर वहाँ के प्रांतो में चलनेवाले श्री देवि पूजा विधानों को देखकर बहुत कष्टों के सहन करके सप्तशति को संस्कार करके तीन दशाब्दी के पहले 921 पूर्णश्र के सहित श्री देवि महत्यं चंडिनवशति मंत्रमाला नामक ग्रन्थ को प्रचुरण किय अब (प्रस्तुत) 93 साल के यह (गोपानंद) वैदिक सनातन धर्मों आचारण करते वेदमंत्रों के बड़प्पनों को, श्री देवि उपासनों में वैदिक सांप्रद तरीको को को प्रचार में लाने केलिए तीव्र कृषि कर रहे हैं । बहुत अनुभवज्ञ, आदमी श्री तिरुमलेश के पाद सन्निदि मे, तिरुपति में शांति से सरल जीवन बि रहा है। .. आप की अनुंग अर्धांगी श्रीमति सीतारामम जी भी सनातन धर्मपराया वैदिक धर्म संप्रदाय तरीकों को आचरण करनेवाली यह 80 साल के उम्र में पतिसेवा, विद्युक्त धर्मचरण कर्तव्य निर्वहणों को निग्रह से कर रहा हैं । माता के माताहूए (आप) साक्षात श्री अन्नपूर्ण की तरह विख्यात हुई
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Sri Gopanandanathulu & Smt. Seethanamamma
प्राक्कथन श्री देवी महात्म्यमु मार्कण्डेय पुराण में उदृत है । इसे महर्षि सुमेधस ने महाराजा रत एवं समधि नामक वैश्य को बताया था इस में देवी, जगन्माता की गरिमा तथा सुरों की चुंगल से देवताओं की रक्षा का भी उल्लेख है । यह हिन्दुओं का एक पावन ग्रन्थ है । इसका पठन - पाठन नवरात्रिके पर्वदिनों किया जाता है । इन नवरात्रियों में विशेष यज्ञ भी संपन्न किये जाते है । इन यज्ञों का योजन विश्व शान्ति एवं मंगल कामना से किया जाता है । इस ग्रन्थ में उदृत श्लोक दों के समान माने जाते हैं । भक्ति से देवी के गुण-गान करने वाले क्षद्धालुओं की डा, दुःख दर्द दूर होजाती है । तथा उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति भी होती है । इसे वी ने स्वयं इस ग्रन्थ में व्यक्त किया है । देवी पूजा की दो विधावों का उल्लेख वेदों में मिलता है । वे हैं - समयाचारा था दक्षिणाचारा । उन दोनों विधावों के मूलसिद्दान्त भक्ति, शुचि (निर्मालता) क्षद्धा था अहिंसा है । अनेकानेक धर्मावलंबियों के अकस्मात् आक्रमणों के बावजूद पने निर्मल एवं सदाचारों के कारण ही वैदिक धर्म जीवंत रहा है । वैदिक सम्प्रदाय अभिव्यक्त, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास नामक चार आश्रम धर्म सार में ही अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिए है । इन सभी आश्रम धर्मों का एक नि लक्ष्य मानव जीवन को शान्तिमय बनाये रखना ही है। त्रिक सम्प्रदाय जिसका उद्गम स्थान काशमीर माना जाता है, तान्त्रिक विधा 'अन्तर्गत ही समाहित है । नाम तथा विधाओं की भिन्नता होने पर भी, यह सम्प्रदाय भी देशों में व्यहृत है। 1. तान्त्रिक पद्धति के अवतार देवी, जगन्माता एक क्रूर, शक्ति - सम्पन्न, यानक रूप धारी तथा पंच मकार (मद्य, मॉस, मानिनी, मुद्रा तथा मीन) को चाहने . ली है। 2. देवी के लिए मनुष्य एवं पशुओं की बलि अनिवार्य है मगर उसे गोपनीय बना चाहिए।
3. किसी परिवार के सदस्य का सगे सम्बंधी इस पद्धति की अगर आलोचना करते है । तो उन्हे तत्काल मौत की धाट उतार देना चाहिए । 4. इस विधा के अनुसार अनैतिकता एवं उच्छंकलतापूर्ण जीवन तत्कालीन जीवन यापन के नियम बन गये है। इस विद्याका विस्तारपूर्ण एवं तर्क संगत विवरण परशुराम कल्पसूत्र, सेतु बन्धनम्, सौभाग्य भास्करम्, गुप्तावती, रत्नलोकम, नित्योत्सवम् आदि ग्रन्थों में मिलता है। . परशुराम विष्णु का अवतार है जो तान्त्रिक विधा का प्रचार नही किया होगा । तान्त्रिक विधा का प्रचार करने वाला परशुराम कल्पसूत्र के लेखक स्वयं परशुराम को मानना एक मन गढ़न्त कहानी है। वेदों में तान्त्रिक पद्धति का उल्लेख नही है । इसकी अनैतिकता एवं उच्छृखलता के कारण ऋषि मुनियों ने बहुत समय पहले ही तान्त्रिक विधा को अस्वीकार किया है । वैदिक सम्प्रदाय के द्वारा तिरस्कृत यह तान्त्रिक विधा थोड समय तक अदृश्य सारहकर, फिर से उसी की छाया में अपना रूप बदल कर विभिन्न, रूपों में पनपने लगी । उनकी योजना यह थी कि कुल पूजारतों भूयादभीष्ट फल सिद्धयों । वेदशास्त्रोक्त मार्गेण कुल पूजां करोति याः । तत्समीप स्थितानित्यं शिवेन सह शंकरी । इंद सत्यमिदं सत्यं सत्यं सत्यं न संशयः ।। इस विधा की व्याप्ति एक निर्धारित पद्धति से की गई है। कुछ चपल - चित्त पंडितों की व्याख्या यह थी कि मात्र वेदों के अनुसरण से इच्छा प्राप्ति नहीं होगी । मगर जब यह पंच मकार युक्त की जाती है तो सिर्फ कामनाओं की ही नही बल्कि मोक्ष की भी प्राप्ति होगी । यहाँ यह भी बताया गया है कि तान्त्रिक विधा वेद जितनी ही पुरानी है । अतः इसे निस्संकोच अपना सकते हैं । किन्ही मानसिक दुर्बलताओं के कारण कुछ पंडित तान्त्रिकों के शिकार बनगये . था ये पण्डित तान्त्रिक पद्धति को वैदिक सम्प्रदायों में समाहित करके, तन्त्रिक विधा के प्रचार में सहायक सिद्ध हुए है । (विस्तृत जानकारी में रुचि रखने वाले भक्त इस देशा में शोध करने के द्वारा जानकारी हासिल कर सकते है)। जैसे - जैसे यह विधा जन मानस द्वारा आदृत हुई है, वैसे - वैसे ये तान्त्रिक अपने कई पूजा विधि - विधानों को सामाजिक जीवन में भरते आये है । वे अपने तन्त्रों की प्राचीनता तथा प्रामाणिकता को सिद्द करने के प्रचार में, पहले वेदों को अनुसरित बताये गये तन्त्रों को अप्रमाणित बताने लगे है । वैदिक सम्प्रदाय में यह तान्त्रिक प्रदूषण इतने गहरे परतों तक पहुँच गया है कि इसकी पहचान एवं विभाजन दुस्साध्स बनगया है, विभाजन की इच्छा अगर रखें तो उसके लिए गहन अध्ययन एवं, वैदिक ज्ञान की आवश्यकता आ पडी है । वक्रबुद्धि वाले तान्त्रिक अपनी सफलता का विवरण ऐसे देते है। सर्वेभ्यश्चोत्तमा वेदा, वेदेभ्यो वैष्णवं परम । वैष्णवादुत्तमं शैवं, शैवा दक्षिण मुत्तमम् । दक्षिणादुत्तम वामं, वामात्सिद्धान्त मुत्तमम् । सिद्धान्तादुत्तमं कौलं, कौलात्पर तरं नहि ।। परिणामतः वैदिक सम्प्रदाय की पवित्रता तथा प्रमुखता कम होते नजर आने लगी जिसके कारण तान्त्रिक विधा की उन्नति के मार्ग सुगम बनते गये है । वैदिक धर्म के उद्धार के लिए जगद्गुरु श्री आदिशंकराचार्य के द्वारा स्थापित चार गुरु पीठ भी इस तान्त्रिक विधा के विस्तार को रोक नही पाये है । नवशतिका उद्गम् करीब सत्तर साल से अधिक पहले जब मैं अपने तीसरे दशक मे था मेरे गुरुदेव श्री श्री श्री जगन्मोहनानंद नाथ जी ने वैदिक सम्प्रदाय के अनुसार देवी पूजा करने की वेधा को तान्त्रिक प्रभाव से मुक्त कर, देवी महत्म्यम् को स्पष्ट करने वाली तथा आजप्रचलित दोष पूर्ण सप्रशति को सुधारने का उत्तर दायित्व मुझे सौपा । मुझे, प्रदत्त इस कार्य की पूर्ति करने हेतु, देवी पूजा की विभिन्न, पद्धतियों की जानकारी प्राप्त करने तथा शोध करने लम्बी यात्रा, करनी पड़ी, यात्रा के दौरान आश्चर्य की बात यह रही है कि सभी प्रान्तों में देवी की पूजा अपने साम्प्रदायिक रूप से विचलत होगई है । महाक्षेत्रों में भी यह विधि पूर्ण रूपेण प्रदूषित बनगई है। कई लोग पंच मकार एवं कुलाचार में निहित अनैतिकतासे परिचित होकर भी, तान्त्रिक विधा को प्राथमिकता देने लगे पीढ़ियों से चले आनेवाली वैदिक सम्प्रदाय रूपी संपत्ति की तुलना में, इस अनैतिक तान्त्रिक विधा से लोगों का प्रभावित होना एक अवांछित परिणाम है । । इस विषय सम्बन्धी गहन एवं गंभीर अध्ययन के पश्चात् मेरी यह धारणा बनी है कि, नवशति समयाचार में उदृत देवी पूजा की विधाओं में पहली है । नवरात्री पूजाकरते समय मेरी दिमाग में यह बात भी आयी है कि नवरात्रि, नवदुर्गा, नवचक्र, नवयोगिनी, नव कोण, नव आवरण, जैसे नवशति भी होगी । सप्रशति नही है । गणित की यह नौ अंक श्रुति के अनुसार (नव) श्री देवी के लिए व्यवहृत है । यह अंकों में सर्वोच्छ ही नहीं बल्कि देवी, जैसे अपने आप में पूर्ण भी है । इसके अलावा सात ना तो उच्चतम अंक है, नाही मानव गावमें अदृश्य रूप में स्थित सहस्रार चक्र आदि भी सात है । कुछ लोगों के विचार में ये सात है मगर यह अवास्तविक है । प्रकांड पंडित एवं ज्ञानी गुरु ही इन दो चक्रों की महत्ता की जानकारी दे सकते हैं। करवीर पीठ के अधिपति श्री श्री विद्यानरसिंह भारती स्वामी कृत श्री चण्डिकोपस्थि दीपिका में मेरी इस नवशति की भावना को पुष्टि मिली है । मेरी शोध - प्रक्रिया एवं उपर्युक्त ग्रन्थ की सहायता से मैं, दोषपूर्ण सप्रशति को नवशति के रूप में सुधारने का प्रयत्न करने लगा । जो इस दिशा में मेरा पहला कदम था । मेरे गुरु एवं भगवान की कृपा से देवी महत्म्यम् सम्बन्धी पौराणिक कथा तीन दशक पहले श्री देवी महात्म्यम् - चण्डी नवशति मन्त्रमाला के नाम से रोशनी में आयी है । माँ की प्रशस्ति के नौ सौ इक्कीस श्लोक एक माला के मोती जैसे पिरोये गये है । इन मन्त्रों में तान्त्रिक विधाएँ लुप्तकी गई है । देवी को परमसत्ता की पहचान दी गई है । तथा पुराण के जैसे ही देवी की सफलताओं को ब्रह्मविद्या नामक एक ही कहानी में स्पष्ट की गई है।
इस कार्य में मेरे मित्र स्व. श्री. गौरिपेद्दि राम - सुब्ब शर्मा जी (जो तेलुगु एवं संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे, मेरी सहायता की थी) कुछ ही साल बाद उनकी आकस्मिक मृत्यु से मुझे अत्यधिक क्षति पहुँची है। वामकेश्वर तन्त्र में नवशति का एक और उल्लेख मिलता है यथा - नवाणां नव चण्डी च नवावरण देवता : । नवश्लोक शतान्येवं, द्वितीयं नवरात्रयो : । एतद्रोप्य तमं सव न देयं यस्य - कस्यचित्। राज्यं देयं श्रियं देयं देया नवशती न च ।। नवशति का केवल योग्य व्यक्ति के हाथों सौंपने के संदेशसे, उसकी पवित्रता एवं परंपराकी रक्षा करने की सतर्कता दुगुना बन गई है । नवशति की स्पष्टता बताने वाला एक दूसरा संदर्भ यह बताता है कि नवशति वी पूजाकी विधाओं में सबसे पहली है । तथा पुराकल्पे इंद देवी महत्म्यम् नवशत श्लोकात्मकत्वा नवशति संज्ञामासीत वैदिक साहित्य में पद्म कल्प, ब्रह्म कल्प, स्वेतवराह कल्प नामक कल्प ताये गये है । पुराकल्प के शाब्दिक अर्थ से नवशतिके प्रारंभ किस कल्प में हुआ बताना मुश्किल है । मगर इसका उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि नवशति बहुत चीन समयों से आदृत है। कात्यायनी तन्त्र से यह भी जानकारी मिलती है कि सप्रशति का पूर्व रूप वशति था । ब्रह्मा इस नवशति के बृहद एवं विस्तृत रूप को भक्तों के अनुकूल क्षिप्त बनाने की प्रार्थना शिव जी से की थी । शिवजी ने इसे माना तथा नवशति को संक्षिप्त कर सप्रशति बनादिया । तब से शिवजी कृत रुद्र शति प्रशस्ति पायी है। ह तन्त्र का कहना है । उपर्युक्त कहानी सप्तशति को प्राचुर्य दिलाने के लिए त्रिकों की कल्पना होने की आशंका भी है । सप्तशति को शिवजी के निजी एवं वी कृति मानने के कारण यह आलोचना से परे है । फिर भी उपर्युक्त संदर्भ प्तशति का पूर्व रूप नवशति का होना साबित करता है ।
सप्तशति को मानने वाले भक्त गण मौन रूप से इसका अध्ययन करे तथा आत्मसाथ करें । तान्त्रिक पद्दति एवं सप्तशति में प्राप्त असंगतियों की कडी आलोचना की गई है । परन्तु तान्त्रिको के सशक्त प्रभाव से तथा वैदिक सम्प्रदाय को मानने वाले रूढ़ि वादियों के कारण कोई परिणाम नहीं निकला । फिर भी परंपरा को मानने वाले कई लोग सप्रशति का अन्धानुकरण करने लगे जिस से अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, पंच मकार को पुष्टि मिलने लगी। श्री देवी महात्म्यमु की अत्यन्त प्रभावोत्पादक एवं शक्ति संपन्न कहानी को तान्त्रिको, ने अपनी विधा के प्रचलन के उपयुक्त कल के रूप में उपयोग की थी। सपृशति में वैदिक सम्प्रदायों से युक्त पौराणिक कथाएँ ही ज्यादातर बताये गये है । सूत्र व्रयं तथा रहस्तवयं ये दोनों कृतियाँ, सप्तशति के पूरक माने गये है । जिनमें देवी को तामसिक रूप धारी बताया गया है । तथा उस देवी की पूजा में रक्त मद्य, माँस का समर्पण अनिवार्य है अन्यथा कृद्ध देवी के द्वारा श्राप दिये जाने का उल्लेख भी है। . एक ही ऋषि के द्वारा एक ही श्रोतागण को एक ही देवी के दो रूपों को ज्ञात कराना असमंजस लगता है । इस से यह साबित होता है कि सप्रशति की रचना किसी एक विशेष लक्ष्य को पूर्ति के लिए ही की गाई है । सप्तशति विधान पुराण के तेरह भाग श्री महा काली चरित, श्री महा लक्ष्मी चरित तथा श्री महासरस्वती चरित नामक तीन प्रधान कहानियों में विभाजित है जो सत्व, रजो, तमो गुणों के प्रतीक माने गये है। 1. हर कहानी में सम्बन्धित देवी की विजय को अलग - अलग न्यास तथा ध्यान श्लोंकों के माध्यम से बताया गया है । मगर उनमें उस देवी से सम्बन्धित वैदिक मन्त्रों को स्थान नहीं दिया गया है । 2. प्रारंभ में देवी कवच, अर्गला कीलक स्तोत्रों के साथ - साथ, रात्रि - सूक्त, चण्डी नवार्ण मन्त्र, जाप, सापोधार, सापोत्कलिन मंत्र आदि वैदिक मन्त्र भी शामिल किये गये है। 3. अन्त में रुद्रयामीलम् से देवी सूक्त (वैदिक तथा पौराणिक) सरस्वति, लक्ष्मी, काली सूक्त, शापोधर, शापोत्किलन मन्त्र शामिल किये गये है। 4. तान्त्रिक यन्त्र पूजा तथा बलि का भी वर्णन किया गया है । सप्तशति अपना रूप बदल कर देवी सप्तशति, दुर्गा सप्तशति, चण्डी सप्रशति आदि शीर्षकों से उपलब्ध है । प्रान्त के बदलने पर यद्यपि इस के विषय सम्बन्धी परिवर्तन पायेगये हैं, तथापि कुलाचार सम्बंधी मूल धारा सर्वमान्य है । तान्त्रिक विधा को आगे बढाने के लिए दिखलायी गई अधिक उत्सुकता के कारण विषय एवं विधा सम्बंधी परिवर्तन घरकर लिए हैं। सप्रशति को वेदिक कृति के रूप में साबित करने के लिए एक ऐसे वातावरण का सृजन किया गया है जहाँ हाल ही के प्रकाशनों में रुद्रयामीलम से लिये गये तीन सूक्त अदृश्य होगये है । क्या यह परंपरा को पखिर्तित करना नहीं है ? तीन कथाएँ पुराण में अभिव्यक्त देवी विजय की कहानियाँ तीन विभागों में वर्णित है मगर यह विभाजन न तो तीन देवियों की उपस्थिति के आधार पर, ना ही चण्डी नवार्ण मन्त्रों में उदृत बीजाक्षरों को आधार मानकर किया गया है । भक्त गण को देवी के तीन - तीन विभिन्न रूपों को मानकर पूजा करने तथा तीन भिन्न - भिन्न कहानियों को पढ़ने विवश किया गया है । अद्वैतवाद, नवार्ण मन्त्र, में व्यक्त परंपरागत भावनाओं को दूर कर देता है । तान्त्रिको के रहस्यवयम्, सूक्त वयम् के गहरे प्रभाव से देवी का सर्व रक्षक एवं शक्ति सम्पन्न रूप लुप्त होकर वह मात्र तामसी रह गयी है । कुलाचार को वैदिक सम्प्रदाय के समान मुख्य होने के विश्वास दिलाने ये तीन विचित्र एवं विभिन्न कहानियाँ गढ़ी गई है । सबसे परे गुणों की विविधताता को प्रधानता दी गई है न कि उनगुणों को नियन्त्रित करने वाली शक्तिसम्पन्न देवी को ।
मन्त्र विभाग शास्त्रों में बताये गये मूल नियमों के आधार पर पुराणों में उल्लिखित श्लोकों को मन्त्रों का रूप देना हमारा सम्प्रदाय रहा है । उन मन्त्रों को उच्चरित करते हुए यज्ञ, हवन आदि करने से देवी अपनी कृपा बरसाती है । इसके विपरीत अपूर्ण एवं दोष पूर्ण मन्त्रों के उच्छारण से सभी दिशाओं में हलचल मच जाती है । सप्रशति में इन नियमों का पालन न करते हुए केवल पूर्व निर्धारित संख्या को ही ध्यान में रखकर अपूर्ण मन्त्रों को पूर्ण मन्त्रों की दर्जा दी गई है । संख्या को बढ़ाने के लक्ष्य में श्लोकों की पुनरावृत्ति भी की गई है । या देवी सर्वभूतेषु विष्णु मये ति शब्दिता । नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥ जैसे श्लोकों का विभाजन संख्या की ओर ध्यान देते हुए ही कियागया है ऋषि उवाच आदि अपूर्ण वाक्य होने के नाते अपूर्ण मन्त्र भी होते है । जबतक दूसरे श्लोक नहीं पढ़ते हैं, उस में अभि व्यक्त विषय का पता नहीं लगता है । इसे एक दूसरे ही मन्त्र के रूप में गिनती की गई है, मगर पुराण में ऐसे मन्त्रों को अलग मन्त्र नहीं माना गया है। नियमों का पालन न करते हुए किये गये इस भारी प्रचार के बावजूद शीर्षक के अनुसार सात सौ श्लोक नहीं बनपाये है । अतः यह अनुमान लगाया जासकता है कि सप्रशति का नामांकन श्लोकों की रचना के पहले ही किया गया है, बल्कि मन्त्रों के रचनोपरान्त नहीं दियागया है । मन्त्रों की रचना के पहले ही संख्या बताकर लोगों को आकृष्ट करने की चेष्टा की गई है। नवार्ण मन्त्र 'ओंकार' अपने आप अनायास व्यक्त ध्वनि समूह ही मन्त्र है, वे मनुष्यों द्वारा लिखित नही है । दैवी शक्ति सम्पन्न ऋषि गण प्रकाश, ध्वनि एवं शक्ति (तेज) के दर्शन कर निर्धारित पद्धति के अनुसार उस ज्ञान को अपने शिष्यों तक पहचाये थे मन्त्र, असीम शक्ति को उत्पन्न करते है अतः उनका उच्चारण सही ढंग । से होना चाहिए । ये मन्न नियमित पद्धति से विचलित होने पर सम्बद्ध या असम्बद्ध सभी लोगों को हानि पहुँचाते है । वैदिक परंपरा में गुरु को आजतक मान्यता दी जारही है । गुरु, मान्त्र एवं देवता एक दूसरे के पूरक होते है । मन्त्रों की इस असीम शक्ति की ओर ध्यान देते हुए यह जानना उचित है कि उच्चारण सम्बन्धी प्रारंभिक जान कारी गुरु मुख सेही प्राप्त करनी होगी सम्प्रदाय से हठकर उन मन्त्रों को रेडियो, दूरदर्शन आदि से सुनकर अभ्यास करने या परंपरा विरुद्ध सामूहिक रूप से सिखाने वाले व्यक्ति से सीखने के परिणाम स्वरूप भक्त के शारीरिक व मानसिक स्वस्थता को ठेस पहुँचती है । हर कार्य साधना के पीछे गुरु की शक्ति निहित होती है । सप्तशति की प्रेरणा कोई खास पद्धति या मन्त्र नहीं है । चण्डी नवार्णमन्त्र ही सप्तशति का मूल मन्त्र है। चण्डी नवार्णमन्त्र के न्यास और ध्यान श्लोकों को तान्त्रिक विधा को सशक्त बनाने की योजना से, परंपरा के विरुद्ध परिवर्तित करने का साहस किया गया । तीन तीन देवताओं को ध्यान में रखते हुए सप्तशति बनायी गई है । यद्यपि मूलं मन्त्र नहीं बदला गया, तथापि तान्त्रिक विधा के अनुकूल उपर्युक्त साहस पूर्ण कदम उठाना गुरु परंपरा का उल्लंघन है । जिससे वह व्यक्ति अपनी पवित्रता खोकर गुरु के आशीर्वाद से दूर हो जाता है । उस के लिए किसी प्रकार की सांत्वना नहीं दी जायेगी। परंपरा से विचलित होने के कारण ऐसे व्यक्ति उस मन्त्र का प्रचलन नहीं कर सकता है। इसके अलावा तीन - तीन देवियों की एक काल में प्रार्थना करना जाप एवं ध्यान करने की प्रथा के विरुद्ध है । इस स्थितिमें भक्त न तो एकाग्रचित्त बन सकता है ना ही तल्लीन होकर देवी की प्रार्थना कर सकता है । उसे देवी के साथ एकाकार बनना दुस्साध्य है। तान्त्रिकों ने इस प्रकार का विभाजन किसी व्यक्ति की उन्नति अथवा शान्ति मय जीवन के लिए नहीं की थी बल्कि अपने किसी खास लक्ष्य से की थी। सप्तशति को परंपरागत मानना सत्य दूर ही नहीं बल्कि अर्थ रहित भी है क्यों कि भक्ति एवं वैय्यक्तिक सुरक्षा को मान्यता नहीं देकर संपूर्ण विधा को परिवर्तित किया गया है । (सप्तशति को परंपरायुक्त माननेवाले इस तथ्य को समझकर, स्वीकार करना अनिवार्य है)। योगनिद्रा मधु और कैटभ नामक राक्षस संहार की कथा सप्तशति में श्री महाकाली चरित्र शीर्षक के अंतर्गत है पुराणों के अनुसार जब भूमि डूब गई थी तब श्री महाविष्णु अपनी आखों को ही देवी का निवास स्थान बनाकर स्वयं योगनिदा में रहगये । उस समय विष्णु के कर्ण (कान) से राक्षस निर्गमित हुए । ब्रह्माने उन्हें देखकर उस देवी की प्रार्थना की जिसके ध्यान में विष्णु समाधिस्थ थे । देवी एक दिव्य प्रकाश का रूप धारण कर विष्णु के, चक्षु, मुह, नासिका आदि इन्द्रियो से निकलकर, ब्रह्मा के समक्ष प्रकटित हुई । राक्षस संहार करने में असमर्थ विष्णु को देखकर देवी ने राक्षसों को माया - मोहित किया, तत्पश्चात् विष्णु उन राक्षसों का संहार किया । यहाँ देवी ने राक्षस संहार के लिए काली रूप का धारण नहीं किया। तान्त्रिक योग निद्रा को काली का ही रूप मानते हैं, तथा काली तमोगुण का प्रतीक है । इसीलिए इसे देवी कथा का नाम दिया गया है । योग रहस्य के अनुसार योगनिद्रा साधारण तंद्रा नहीं होते हुए एक समाधिस्थ स्थिति होती है । ध्यान मुद्रा ज्ञान का प्रतीक है । ज्ञान सात्विक गुणों का फल है । समृद्ध ज्ञान ही समाधिस्थ स्तिति है । श्रुति के अनुसार तामग्नि वर्णाम तपसा ज्वलन्तीम वैरोचनीं कर्म फलेषु जुष्याम । देवी वैरोचनी, जो सात्विक गुणों का साकार रूप समाधिस्थ स्थिति में अग्नि के रंग की ज्योति बनकर भक्तों के समक्ष अभर कर आती है । अतः देवी तापसी है, मगर नींद या सुषुप्ति का प्रतीक तामसी नहीं है श्री महाविष्णु संसार के रक्षक है वे कभी भी साधारण प्राणी के जैसे आराम या निद्रा के लिए तडपते नहीं है । ब्रह्मा वेदों के कांति पुंज है तथा आप देवी की प्रशंसा परंपराणां - परमा' कहकर की है । ब्रह्म ने ॐ कार स्वरूपी देवी को कभी तामसी के रूप में नहीं देखा नाही उस रूप से उस की प्रशंसा की । अतः तान्त्रिकों की यह धारणा निराधार है । वे अपनी विधा की पुष्टि करने तामसी शब्द को पुराणों में भी स्थानांतरित किये है। महिषासुर वध में मद्य पान की कथा जब कभी धर्म को ग्लानि पहुँचती है, तब दुष्ट - दमन एवं शिष्ट रक्षा करने उद्युत होने वाली देवी को नित्या कहकर स्तुति की । महिषासुर, इस कहानी में देवी की महिमा बताने का एक कारण बनगया है । सभी देवताओं के दैवी प्रकाश देवी मे समाहित है अतः देवी मानवी नहीं है । राक्षसों के वध करने के पहले देवी ने उत्तम पानम की थी जिसे सुधा या अमृत कहा गया है, जिसके पान से देवता अमर होगये हैं, अपने क्रूर कर्मों के कारण ही राक्षसों को सुधा नहीं मिली थी, तथा सुधा का नमिलना ही इन दोनों के बीच वैर बनकर रहा । राक्षस एवं देवता मधु-पान स्वच्छन्द रूपसे करते थे । मगर मधु तथा अमृत दोनों भिन्न भिन्न है । साधारणतः लोग सुधा का अर्थ मधु मानकर गलत करते है । वैदिक सम्प्रदाय को प्रदूषित कर, अपनी विधा को विस्तृति देने के लिए तान्त्रिकों इस संदर्भ को उपयुक्त माना । मधु एवं मधु - पान के परिणामों को वे प्रमुख मुद्दे बना लिए थे सर्वदेवशरीरेभ्यों आविर्भूता सभी देवताओं के तेजपुंज का समीकरण के नाम से स्तुति की जाने वाली देवी को तान्त्रिकों ने उन्मादा' मद्यपान से उन्मत्त होकर सुद-बुध खोई हुई मानवी मानी थी । द्राक्षा - आसव स्वच्छ मधु है तथा देवी ने इसे महिसासुर वध संदर्भ में ग्रहण किया । तान्त्रिकों के द्वारा उल्लिखित ध्यान श्लोकों में देवी अपने हाथ एक पात्र धारण कर दर्शन देती है । उन्होंने देवी को एक साधारण शराबी के रूप में वर्णित किया । देवी के हाथ में स्थित यह कटोरी मधु से भरी रहती है तथा अपनी मादकता को बढ़ाने हेतु देवी यदा कदा एक - एक घुट रस पिया करती है तथा इस के न होने पर वह तडप जाती है। ने एक तान्त्रिक ने देवी के मधु-पान मुद्रा का निस्संशय श्री महालक्ष्मी का रूप माना है । तान्त्रिकों ने द्राक्षा - रस को इतनी प्राथमिकता दी है तथा वे मानते है कि देवी ने इस रस को ग्रहण करने से ही अपनी खोई हुई शक्ति को पुन: पाकर राक्षसों का वध करने की सफलता पायी है । तान्त्रिको ने यह भी कहा है कि पुनः पुनः घूट - दूर छूट आसव पीने से देवी पुनरुत्तेजित होती है अतः मधुपान अनिवार्य ही नहीं बल्कि उसके बिना देवी का कोई अस्तित्व ही नहीं है । तान्त्रिकों की मद्यपान के पक्ष में एक और समर्थन भी है । गीता के अनुसार रजोगुण सम्पन्न व्यक्ति मधु पानोन्मत्त यक्ष तथा राक्षसों की प्रार्थना ही करता है । देवी को रजोगुण सम्पन्न मध्यम चरिता भी कहा गया है । तान्त्रिकों की धारणा यही है कि देवी के मधुपानासक्त होना दोष या असंगत नहीं है । तान्त्रिकों के समर्थन से यह मालूम होता है कि वे देवी को यक्षी या राक्षसी ही मानते थे । इसके विपरीत पुराणों में यह बताया गया है कि राक्षसों ध्वंस धंस किये गये पृथ्वी के भागों में प्राणशक्ति पुनः भरने के लिए देवी ने अमृत पान की थी । (माँ संपूर्ण विश्व का ही रूप है) न कि मधुपान तान्त्रिकों के अनुसार देवी की आँखों की लालिता का कारण मधु - पान ही है । माता की विजय प्राप्ति के मूल में उनकी महत्ता को न मानते हुए, केवल मधु को ही महत्वपूर्ण मानते हुए तान्त्रिक वैदिक सम्प्रदाय को नियंत्रित करने की अपनी योजना को स्पष्ट करते हैं। यहाँ हमें पुनश्चरित करना चाहिए कि शरणार्थी को सहायता एवं मुक्ति प्रदान करने निरन्तर रत देवी अपने हाथ में अमृत मात्र की धारणा की है । महिषासुर जैसे राक्षसों का संहार करने की परम सत्ताधारी देवी एक साधारण मानवी बनकर मधुपान के लिए तरसती नही है । यह तान्त्रिकों की कल्पना है । इस के अलावा वेदों के अनुसार देवी को नाद, बिन्दु एवं कला स्वरूपिणी है । बिन्दु का अर्थ है केन्द्र यह बिन्दु सर्वस्व के लिए अनदेखी प्रारंभिक बिन्दु है । इस केन्द्रस्थिति में देवी नाम रूप लिंग से परे होकर सत् - चि आनंद रूपिणी बनकर रहती है । जिसकी महानता त्रिमूर्ति भी नही जान सकते है । लोगों की कल्पना से दूर यह एक अन्तर्निहित शक्ति है। नाद - ध्वनि जो बिन्दु से उत्पन्न होकर अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रकला के रूप में स्थानांतरित होकर प्रकट होती है । त्रिनेत्र धारी देवी की नेत्रों में दस अग्नि कलाएँ बारह सूर्य कलाएँ तथा सोलह चन्द्र - कलाएँ अविभक्त रूप में प्रकट होती है। देवी बिन्दु, नाद कालातीत भी कहलाती है । इन सभी से निर्गमित तेजपुंज से सर्वोच्छ तेज - पुंज देवी की आंखों में स्पष्ट होती है । देवी की प्रशस्ति सर्वारुणा नाम से कीजाती है । इसलिए यह स्पष्ट होता है कि देवी की आंखें प्रारंभसे ही लालिमा से भरी है । अतः तान्त्रिकों की यह कथा सही नहीं है कि देवी के नेत्र मधुपान के पश्चात् अरुण बनगई है । सनातनों के द्वारा बताया गया अर्थ भी तर्क संगत है । किसी विषय के गहन विचार विमर्श के कारण भी आंखों में लालिमा छा जाती है । देवी के आविर्भाव का एक मात्र लक्ष्य राक्षस संहार है । देवी के अलावा संसार की कोई सत्ता इस दिशा में सफलता प्राप्त नहीं कर सकती है । विश्वमाता होने के कारण, विश्व के सभी की भलाई चाहते हुए, राक्षसों से इनकी रक्षा करने उद्युत होती है । महिषासुर जैसे क्रूर राक्षस संहार के लिए गहरी एकाग्रता संभाव्य है । (महिषासुर तथा देवी के बीच युद्ध की कहानी पढ़िए) । इन परिस्थितियों में देवी की आंखें लाल होना प्राकृतिक है । वैदिक सम्प्रदाय के विरुद्ध तान्त्रिक देवी की परमसत्ता को मानवीय घरातल पर लाना चाहता है। रहस्य त्रयम तान्त्रिकों के अनुसार रहस्यत्रयम सप्तशति का पूरक है । इसमें तीन अंक । तान्त्रिक रहस्यत्रयम को महर्षि वेदव्यास के प्रस्थानत्रयम के बराबर होने की दावा करते हैं । महर्षि वेदव्यास के द्वारा प्रस्थान त्रयम पर की गई टिप्पणी वैदिक सम्प्रदाय का आधार स्तंभ माना जाता है । रहस्यत्रयम को मार्कण्डेय पुराण से लेने की दावा से तान्त्रिकों ने वेदव्यास को इस के कृतित्व पर बाध्य बना दिया है । महर्षि वेदव्यास विष्णु का अवतार है । तथा महर्षि मार्कन्डेय वैदिक सम्प्रदाय के उत्कृष्ट बुद्धिजीवी है । इनके द्वारा कुलाचार को वैदिक सम्प्रदाय से अधिक प्रधनता दिये जाने की बात मात्र तान्त्रिकों के द्वारा लोगों को गुमराह करने की चेष्टा ही है । कहाँ रहस्यत्रयम कहाँ प्रस्थान त्रयम । दोनों की तुलना ही नहीं की जा सकती है । रहस्यत्रयम का प्रारंभ ही न्यूनतम अनुकरण मात्र महसूस होता है । तथा राजा सुरत के अनुरोध पर ही महर्षि सुमेघस श्री देवी के विभिन्न अवतारों के बारे में सब कुछ बताया । पुराणों में उल्लिखित स्तोत्र वेदों के बराबर है (जैसे पहले बताया गया है) राजा सुरत देवी के बारे में संपूर्ण जान कारी प्राप्त कर, मर्दा सुमेघस का अभिवादन कर श्री देवी की तपस्या करने निकले । आगे इन दोनों के बीच किसी प्रकार का वार्तालाप नहीं हुआ थी, नाही पुराणों में रहस्यत्रयम क उल्लेख मिलता है। महर्षि सुमेघस के द्वारा बताई गई श्री देवी की कथा की समाप्ति के पश्चा राजा के ध्यानस्थ होने के पहले दोनों के वार्तालाप में रहस्यत्रयम का प्रारंभ हुआ है। itho महर्षि सुमेघस राजा के सभी शंकाओं का निवारण कर देवी की कथा को प्रश्नोत्तरों के माध्यम से स्पष्ट किया था । देवी स्तोत्रों के अध्ययन से यह मालू होता है कि देवी के बारे में बताने का और कुछ शेष नहीं था । रहस्यत्रयम की गोपनीयता बनाये रखने कोई ऐसी खास बात नहीं थी अगर वह इतनी महत्ता रखती है तो पुराणों में इसका उल्लेख क्यों नहीं कियागर है।? । रहस्य त्रयम् देवीको एक भयंकर तामसी, शराबी तथा हाथ में किसी मनुष के रक्त सिक्त शीशधारी बताती है । यह रूप पुराणों में अंकित मूर्ति के बिलकुर भिन्न है । रहस्य त्रयम् में वर्णित पूजा सामग्री, ऐसे न करने पर पहुँचने वाली ी की धमकी निश्चित रूप से कुलाचार को ही स्पष्ट करता एक ही ऋषि, एक ही श्रोता गण से परस्पर विरोधी कथन नहीं कर सकत है । ऋषि को भगवान कहकर संबोधित करते हुए राजा के ऋषि से पूछे - जाने प भी ऋषि देवी के रूप को बदल कर कुलाचार को उत्कुष्ट नहीं बता सकता है । ऋषि सुमेघस वैदिक सम्प्रदाय के कट्टर अनुयायी थे । उनका आश्र शान्तिमय जीवन का एक साकार रूप था, जहाँ पर सात्विक एवं क्रूर जानव अपनी - अपनी प्राकृतिक वैषम्य को भूलकर रहा करते थे । उस प्रकार के शान्तिपूर पर्यावरण को बनाये रखना, अहिंसा तथा अनुशासन के मार्ग पर नियमबध्द जीव बिताने वाले महान ऋषि की ही बड़प्पन है ।
उपर्युक्त तथ्यों पर गौर करने से यह स्पष्ट होता है कि महर्षि सुमेघस के द्वारा कुलाचार की प्रशंसा किये जाना अविश्वसनीय ही नहीं अपितुरहस्य त्रयम् में व्यक्त वार्तालाप कहानी में असंगत भी है । इसलिए यह पूर्ण रूपेण एक कल्पित मन गाढन्त तथा निराधार कहानी है। रहस्यत्रयम की कहानी अनावश्यक तथा असम्बद्ध है क्योंकि इसका एक मात्र लक्ष्य केवल तान्त्रिक विधा का प्रचलन ही है । इसे देवी माहत्म्यम् के पूरक मानना न्याय संगत नहीं है अत: यह विरोध प्रकट करने योग्य है , कुछ लोगों का मत यह है कि रहस्यत्रयम् के श्लोक केवल राजा से ही बताये गये है । अतः कुलाचार की प्रशंसा करने वाला रहस्य त्रयम् के श्लोक वैदिक सम्प्रदाय अनुयायी के लिए नहीं बताये गये है। उन लोगों ने यह भी कहा कि ये श्लोक मात्र पठनीय है । उन श्लोकों में व्यक्त शाब्दिक अर्थ छोड़ सकते है । क्यों कि मधु - पान आदि उनलोगों के लिए अनुसरणीय नही है । यह कथन कुलाचार की प्रशंसा करने पर विवश करते हुए वैदिक सम्प्रदायावलंबियों पर की गई जुल्म ही है। उपर्युक्त कथन फिर भी निराधार ही है क्यों कि यह कथा ऋषि ने केवल राजा से ही नहीं बल्कि वैश्य से भी बतायी थी जो मद्यपान के निषेध को मानने वाला ही था। सप्रशति के अनुयायियों के पास इन प्रश्नों के कोई उत्तर नहीं है कि जब वे मद्यनिषेध - को मानने ही वाले थे तो वैदिक सम्प्रदाय को मानने वाले कुलाचार की प्रशंसा क्यों करे । उन पर इस विधा का थोपने का कारण क्या है ? बलि तान्त्रिक विधा के आधार स्तंभ मद्य, मानिनी, तथा मनुष्य या पशु बलि है । ये तान्त्रिक जानते थे कि वैदिक सम्प्रदाय के अनुयायी उन्हें अपने आंगन में कदम तक नहीं रखने देते हैं । सप्तशति को व्यवहृत बनाने के लिए छागामावेतु कूष्मांडम नामक योजना को वे लोग बनाये थो इसके अनुसार वैदिक संप्रदायवलंबी जब कभी देवी को कूष्मांड समर्पित करते हैं, तो इसे यों समझे कि वे किसी बकरी को ही इस रूप में बलि चढ़ारहे हैं।
तामसगुण की बलि देने के प्रतीक के रूप में कूष्मांड चढ़ायी जाती है । तान्त्रिक इस विश्वास को अपनी विधा के अनुकूल बदलने के प्रयत्न किये ।कुलाचार की इस पद्धति को वैदिक सम्प्रदाय पर थोपा गया, जब कि इस सम्प्रदाय में मनुष्य या पशु बलि की कोई आवश्यकता ही नहीं थी । अहिंसा वैदिक सम्प्रदाय का लक्ष्य है तथा निरीह जानवरों की बलि से स्वर्ग की नहीं बल्कि नकर की प्राप्ति होती है विचित्रता तो यह है कि सप्तशति की ओर आकृष्ट लोग बकरी की बलि चढ़ाने अपने आप को असमर्थ पाकर असंतुष्ट बन जाते थे । लोगों का एक ऐसा भी विभाग था जो बिना हिचक जन्तु को बलि चढ़ाते हुए, अपने आपको ही वास्तविक वैदिक सम्प्रदायावलंबी कहकर, अहिंसा को मानने वाले औरों को तान्त्रिक की संज्ञा देते थे। ऐसे लोग वैदिक सम्प्रदायिक मूल्यों के पतन के क्रम को दर्शाते है । यहाँ यह बताना असंगत नहीं है कि कूष्मांड में तामसगुण को नियन्त्रित करने के गुण होते हैं । अतः यह तामस गुण का प्रतीक नहीं है । देवी पर श्राप यह तान्त्रिकों के द्वारा बताया गया एक आकर्षण बिन्दु है, देवी श्री राजराजेश्वरी परमसत्ता है तथा ऐसी कोई भी सत्ता नहीं है जो देवी को श्राप देसके, मगर सप्तशति के मन्त्र को देवी को गहन श्राप से मुक्त कराने की शक्ति दी गई है । कहीं इस धारणा का समर्थन नहीं मिलता है ।इसीलिए तान्त्रिकों का यह कथन भी निराधार है । उपर्युक्त उल्लेखों से यह साबित होता है कि सप्तशति कुलाचार की ओर झुकाव दिखाती है । तान्त्रिकों का पूर्ण लक्ष्य यही था कि वैदिक सम्प्रदायावलंबी कुलाचार की प्रशंसा करे तथा उसका आदर करें । यह येष्टा वैदिक सम्प्रदायावलंबियों पर एक प्रकार का आक्रमण ही था। एक और विचित्र बात यह भी है कि सप्तशति की इन कमियों को जानते हुए भी कुछ पण्डित सप्तशति के परिवर्धन करने अस्वीकार करते थे । कुछ लोग अनदेखी परंपरा कहते हुए सप्तशति का अन्धानुकरण करते हैं तो कुछ लोग परिवर्तन एवं परिवर्धन करने से मिलने वाले दुष्परिणामों के भय से इसे न मानने के लिए अपनी विवशता व्यक्त करते हैं । अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए इस प्रकार के भय को लोगों में व्याप्त किये थे । श्री मद् भगवद्गीता में उदृत सुष्टि के प्राणियों का वर्गीकरण को यहाँ प्रस्तुत करना तर्कसंगत ही होगा। यजन्ते सात्विका देवान् यक्षा रक्षांसि राजसा: । प्रेतान्भूत गणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ सात्विक गुणसम्पन्न जनता देवताओं को, रजोगुण संपन्न यक्ष एवं राक्षसों को तथा तमोगुण सम्पन्न प्रेतात्माओं की प्रार्थना करते है । कुलाचार नर एवं जन्तु बलि की प्रेरणा के साथ - साथमध्यरात्रि में श्मशान में मद्य आदि से पूजा करने की विधि को लाद देती है । सप्तशति को मानते हुए कुलाचार के प्रचलन में साथ देने वाले भक्त, देवी को प्रेतात्मा का रूप ही मानते हैं, न कि वेदों में अभिवर्णित बहुविधा का रूप । अन्ततः सप्तशति को तान्त्रिकों की दिमागी शिशु मानते हुए, देवी को सप्तशति के द्वारा वर्णन करना एक निरर्थकही नहीं, हानिकारक प्रयास ही कहना पड रहा है । अतः लोगों से मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि वे आगे दी गई सूचना की ओर ध्यान दें । हमारा वैदिक सम्प्रदाय मानवमूल्यों को धरातल मानकर सात्विक मार्ग पर चलते हुए मोक्ष प्राप्तकरने का संकेत देता है। कही कुछ कालिमा के चिह्न मिलते हैं तो भी वे केवल तान्त्रिकों के द्वारा उत्तर काल में सम्मिलित किये गये है। गुरु, देवता तथा मन्त्र पवित्र साधन है, जिनके बिना मुक्ति साध्य नहीं है । 4. हमारे सम्प्रदाय ने चण्डी नवार्ण मन्त्र को ब्रह्म विद्या अर्थात् सर्वोच्छ ग्रन्थ की दर्जा दी है। तान्त्रिक लक्षणों का उल्लेख वैदिक सम्प्रदाय में नहीं मिलता है । उसी प्रकार पुराणों में सप्तशति का उल्लेख भी नहीं है । 6. पूरक माने जाने वाला रहस्यत्रयम का उल्लेख पुराणों में नहीं मिलता है । यह तान्त्रिकों का ही देन है। 1. 2. 3. 5.
7. सप्तशति यद्यपि श्लोक तथा मन्त्र माला है, तथापि ये शीर्षक के अनुरूप सात सौ नहीं है। 8. चण्डी नवार्ण मन्त्र के आधार पर ही जीवित सप्तशति के लिए नतो कोई अलग मन्त्र है ना ही गुरु मुख से उपदेश लेने की कोई विशेष विधा है । 9. तान्त्रिकों के द्वारा अभिव्यक्त संकेतों के अनुसार सप्तशति देवी को तामसी का रूप देती है। 10. पुराणों में देव्युवाच जैसे शब्दों के लिए पूर्ण मन्त्रों की दर्जा दिया गया है कुछ लोगों की यह धारणा गलत है । 11, वैदिक समप्रदायों को लुप्तकर तान्त्रिक विधा के प्रचलन की कुबुद्धि से तान्त्रिकों के द्वारा की गई रचना ही सप्तशति है । कुछ लोगों के दिल में यह शंका अवश्य उत्पन्न होती है कि पुराण में उल्लिखित देवी शब्द, चण्डी, चामुण्डी, दुर्गा लक्ष्मी तथा काली इनमें किस संज्ञा से सम्बद्ध है । इस शंका का कारण तान्त्रिकों का गहन प्रभाव ही है। 12. 'स्त्रोत्र मात्रेण सिद्धयति', कीलकम में उदृत ये शब्द भी देवी महात्म्यम् से सम्बन्धित हैं न कि सप्तशति से । सप्तशति का उल्लेख कीलकम में नहीं मिलता है। अतः सप्तशति का पठन मात्र से सर्वस्व पाने की तान्त्रिकों की दावा गलत है। । देवी स्वयं यह बताती है कि वह एक ही है अन्यान्य उसके रूप है । इन रूपों का धारण कारण वश हुआ है, चण्डी, ललिता, शिवा, शिवशक्तव्य रूपिणी, आब्रह्मकीट जननी - इन सभी को देवी अपने ही रूप मान ती है । अणोणीयान, महतो महीयान कहकर वेदों ने देवी की प्रशंसा की, सारे शक्तियों की मूल शक्ति ही देवी है । देवी राज राजेश्वरी नवचक्राधीश्वरी है । यह श्री चक्र में दर्शाया गया है । कही भी देवी सप्तचक्राधीश्वरी नहीं है, देवी ॐ कार रूपिणी है तथा वेदों का दिव्य तेज ही देवी है । अतः हमारे वैदिक सम्प्रदायो के अनुसार देवी की ही पूजा होनी चाहिए ।
। वर्तमान समयों में देश, जाति धर्म आदि से परे हर स्थान पर हिंसा अपनी विविधताओं में विस्तृत है तथा मानवीय एवं नैतिकमूल्यों का ह्रास होना साधारण सा बन गया है । परिस्थिति ऐसी गंभीर बनगई है कि मानव मूल्य अपने न्यूनतम बिन्दुतक पहुँचगये हैं । कहीन कही नारी तथा बच्चों पर जुलुम किये बिना दिन ढलता नही है । नारी के प्रति अशिष्ट व्यवहार मानव समाज के लिए श्राप ही है। हमारे सम्प्रदाय के अनुसार मातृत्व की क्षमता रखने वाली सभी प्राणी (मनुष्य, पशु, पक्षी) देवी के ही रूप है । इसीलिए इनके प्रति आदर प्रकट करना चाहिए । ऐसे स्थानों में देवता रमण करते हुए प्रसन्नता देते है । हमारे सम्प्रदाय में नारी के लिए ऐसा उत्कृष्ट स्थान दिया गया है । तान्त्रिक विधा को जो भी नाम दिया गया हो, उसे अनावश्यक मान्यता देना ही विस्त्रुत अशांति का मूल कारण है । आज पृथ्वी पर कोई ऐसी नैतिक शक्ति नहीं है जो शक्ति सम्पन्न बनकर इस हिंसा को रोक सके मूल भूत मान्यतायें झुकाव एवं आकर्षणों में परिवर्तनों के बिना समाज में शान्ति एवं सामंजस्य पूर्ण जीवन साध्य नहीं होगा। नवशति, देवी को सर्वोत्कृष्ट मूर्धन्य सत्ता मानकर वैदिक सम्प्रदाय के अनुसार देवी पूजा की प्रथा को बल देता है । जनता की प्रगति एवं शान्तिमय जीवन, मूलभूत भावनाओं के परिवर्धन से ही साध्य होता है । दैवी संदेश का प्रचलन ही नवशति का लक्ष्य है ।नवशति मेरी या कोई नूतन कृति नहीं है । यह बाद की पीढ़ियों के द्वारा आनादृत प्राचीन नियमों का पुनरुत्थान मात्र ही है । देवी महात्म्यम देवी को जगन्माता के रूप में दर्शाते हुए पुराणों के जैसे ही बताई गई एक कथन है । इस में किन्ही निर्धारित नियमों के अनुसार मन्त्र विभाजन किया गया है। इस संदर्भ में (त्वं) (असि) आदिको कोष्टक में अंकित किया गया है ताकि भक्त गण श्लोको का रसास्वदन के साथ साथ आत्मसात भी करले । सब से मुख्य बात यह है कि यह कहानी तान्त्रिक प्रभाव से मुक्त है । तथा इसमें वैदिक सम्प्रदाय के मूल्यों का पुनरुत्थान किया गया है ।
यह कार्य राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगोंको देवी की पूजा के बारे में तथा देवी महात्म्यम् की जानकारी हासिल करने सहायक सिध्द होगा । तान्त्रिकों के द्वारा बतायी गई धारणायें एवं रुढिवाद से हित एवं अनहित को जानने की सहायता भी यह देती है । मेरा यह भी विखास है कि इस कार्य से वेद सम्मत देवी पूजा विधि का पुनरुत्थान होने के साथ साथ विश्व शान्ति भी सम्पन्न हो सकती है । अन्ततः इस दैवी कार्य को अन्तिम सोपान तक पहुँचाने अपनी सहायता जिन - जिन लोगों ने प्रदान की थी, उस सभी के प्रति मैं आभार प्रकट करता orico श्री डी रामशेषय्या जी, (असिस्टेन्ट पोस्टमास्टर जनरल पद से अवकाश ग्रहण कियेथे ।) श्री देसिराजु वेंकट सुब्बाराव जी इस कार्य में पूर्णरूपेण मग्न थे, उन्हें सस्नेह आभार प्रकट करता हूँ। चिरंजीवी तल्लिपाक सतीश चन्द्र बालाजी बी.टेक., अपने संक्रिय योगदान के लिए विशेष आभार के योग्य है । माता चण्डी से मेरी यही विनती है कि इन पर तथा इन के परिवार पर माँ की कृपा वृष्टि हो, जिस से उनकी सर्वांगीण उन्नति हो । १ टी.टी.डी. देवस्थानम् के श्री के.वी.एस. कृष्णप्रसाद शर्मा जो वहाँ के वेद पाठशाला के संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित हैं, अपनी व्यस्तता के बावजूद इस कार्यके निरीक्षणार्थ अपनी कीमती समय निकाले थे, उनके प्रति मैं हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ । इस पुस्तक के रूपांकन में श्री. हरिश्चन्द्र, प्रसाद शर्मा जी के द्वारा बरती गई सतर्कता सराहनीय है । मैं माँ चण्डी से इन सभी सज्जनों के लिए तथा उनके पारिवारिक सदस्यों के लिए सुख, शान्ति एवं प्रगति प्रदान करने की प्रार्थना करता हूँ। माँ की कृपा से संपूर्ण विश्व शान्तिमय बने रहे । श्री गोपानन्दनाथुलु
श्रीः
श्री चण्डीनवशतीनवाङ्गविधिः
श्री गुरुभ्यो नमः हरिः ॐ
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये॥
श्री महागणाधिपतये नमः।
ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् ।
आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ।।
-- श्री हयग्रीवपरब्रह्मणे नमः ।
सत्यज्ञानसुखस्वरूपममलं क्षीराब्धिमध्यस्थितम् ।
योगारूढमतिप्रसन्नवदनं भूषासहस्त्रोज्ज्वलम् ।
त्र्यक्षं चक्रपिनाकसाऽभयवरान् बिभ्राणमर्कच्छविम्।
छत्रीभूतफणीन्द्रमिन्दुधवळं लक्ष्मीनृसिंहं भजे ॥
श्री लक्ष्मीनृसिंहपरब्रह्मणे नमः ।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं ।
वातात्मजं वानरयूधमुख्यं
श्रीरामदूतं शिरसा नमामि॥
श्री आञ्जनेयपरब्रह्मणे नमः ।
1
प्रकाशमध्यस्थितचित्स्वरूपाम्। वराभये सन्दधतीं त्रिनेत्राम् । सिन्दूरवर्णाङ्कितकोमलाङ्गीम् । मायामयीं तत्त्वमयीं नमामि ।। तत्त्वस्वरूपायै श्री 'नमश्चण्डिकायै नमः' । अथ संकल्पः शुभतिथौ श्रीमान् श्रीमतः गोत्रोद्भवस्य .... नामधेयस्य, धर्मपत्नीसमेतस्य, सपुत्रकस्य, सपुत्रीकस्या सकुटुंबस्य, क्षेमस्थैर्य, विजय, अभयायुरारोग्य ऐश्वर्याभिवृद्ध्यर्थं, धर्मार्थकाममोक्षचतुर्विधफलपुरुषार्थसिद्धयर्थम् , (तद्वारा) मम शरीरे वर्तमान, वर्तिष्यमाण, आधिभौतिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक- वशात्संभवितसर्वारिष्टनिवारणार्थम् सर्वापमृत्युनिवारणार्थम् आयुष्याभिवृद्ध्यर्थम्, मम शत्रुकृतसर्वकृत्यवशात्, असूयावशात्, अभिचारवशात्, प्रयोगसङ्कटवशात्, पापकृत्यवशात्, ग्रहचारवशात्, महादशावशात्, अन्तर्दशावशात् विदशावशात्, सूक्ष्मदशावशात्, प्राणदशावशात्, नामनक्षत्रवशात्, जन्मनक्षत्रवशात्, षष्ठ्यंशचक्रदोषवशात्, रिप्फषष्ठाष्टम स्थानवशात् , अंगग्रह, उपग्रहदोषवशात्, पितृसंबंधदोषवशात्, पुत्र, पुत्रिकासम्बन्ध दोषवशात्, मातृसम्बन्धदोषवशात्, मातामही मातामहसम्बन्धदोषवशात्, जायासम्बन्धदोषवशात्, श्वश्रु सम्बन्ध, श्वशुरसम्बन्ध, स्नुषासम्बन्ध, मातुलश्यालकभागिनेयादि सम्बन्धदोषवशात्, प्रभुसम्बन्धदोषवशात्, परिचारिकासम्बन्ध दोषवशात्, स्नेहसम्बन्धदोषवशात्, दुराचारवशात्, अधिकार सम्बन्धदोषवशात्, वश्याकर्षण, विद्वेषण, स्तंभनोच्चाटनमारण 2 कार्यवशात्, असन्धि उद्भव पैशाचिकवशात्, भूतावेशवशात्, खचरदोषवशात् , शिवनारायणभक्तिप्रमाददोषवशात् गुरु, मातृ, पितृ आज्ञोल्लङ्घनदोषवशात्, सर्वपापवशात्, आगामि सञ्चितप्रारब्धवशात्, सम्भ्रमकृतव्यापारदोषवशात् , सङ्घ- भोजन, कूटभोजन, धर्मशालान्नभोजन, मठान्नभोजनपापवशात्, विक्रयान्नविषान्नभोजनवशात्, विषवस्तुविषान्नदानवशात्, षण्णवति पितृक्रिया त्यागदोषवशात्, कुलदेवतापराध दोषवशात्, आयुहीनदोषवशात्, रोगकारणवशात्, क्रिमिकीटकादिजन्तु ताडनवशात्, पातक, उपपातकदोषवशात्, बालायुकल्पायु- मध्यायुर्गण्डादिदोषवशात् , एभिः आदितैः सम्भूतैः यथामति अनुभवस्थितैः सर्वदोषैश्च संभवात् महापापात् विमुक्तिं सम्पाद्य, सुखेन जीवितं नेतुं नवाङ्गसहित श्री चण्डीनवशतीमन्त्रमाला- पाठाख्यं कर्म करिष्ये ।। आदौ गणपति, श्रीदेवीनवशतीपुस्तकं यथाशक्ति पूजयित्वा गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुस्साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ सद्गुरुपदाम्भोजद्वन्द्वं शिरसि नत्वा M
अथ नवागः॥
न्यासमावाहनं चैव नामान्यर्गळकीलके।
हृदयं च दळं चैव ध्यानं कवचमेव च ।।
१. अथ न्यासः॥
अस्य श्री न्यासमहामन्त्रस्य, मार्कण्डेय ऋषिः ।
अनुष्टुप्छन्दः श्री महादेवी देवता ! ह्रीं बीजम्। श्रीं शक्तिः । क्लीं
कीलकम् । मम इष्टकाम्यार्थसिद्ध्यर्थे न्यासजपे विनियोगः॥
ॐ पादयोरायै नमः।
ॐ जङ्घयोर्ब्रह्माण्यै नमः।
ॐ ऊर्वोः रुद्राण्यै नमः।
ॐ नितम्बे नारसिम्यै नमः।
ॐ नाभौ चामुण्डायै नमः।
ॐ जठरे पार्वत्यै नमः।
ॐ उरसि शिवदूत्यै नमः।
ॐ दक्षिणभुजे वैष्णव्यै नमः।
ॐ वामभुजे माहेश्वर्यै नमः।
ॐ हृदये शिवायै नमः।
ॐ कण्ठे माहेन्द्रयै नमः।
ॐ मुखे कात्यायन्यै नमः।
ॐ शिरसि माहेश्वर्यै नमः।
ॐ भूमौ शाकम्भर्यै नमः।
4
ॐ अन्तरिक्षे कौशिक्यै नमः।
ॐ सर्वाङ्गेषु श्री चण्डिकायै नमः।
इति न्यासः॥
लघु षोढान्यासः॥
(महायागसमये क्रियते)
गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशिपीठकैः।
षोढा विच्छिन्नरूपत्वात्योढान्यास इतीरितः ।।
श्रीगणेशन्यासः॥
अस्यश्री महागणपतिन्यासमहामन्त्रस्य गणक ऋषिः,
शिरसि निभृद्गायत्रीछन्दः, मुखे श्रीमहागणपतिर्देवता, हृदये मम
सर्वाभीष्ट-सिद्धयर्थे श्रीमहागणपतिन्यासजपे विनियोगः।।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ग्लां इत्यादि करहृदयन्यासः॥
ध्यानम् ॥
श्लो॥ बीजापूरगदेक्षुकार्मुकरुजा चक्राब्जपाशोत्पल ।
व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशप्रोद्यत्कराम्भोरुहः।
ध्येयो वल्लभया, सपद्मकरया, श्लिष्टोज्ज्वलद्भूषया।
विश्वोत्पत्तिविपत्तिसंस्थितकरो विघ्नेश इष्टार्थदः ॥
लमित्यादि पञ्चपूजा-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गं-
अं विघ्नेश-श्रीभ्यां नमः ।
आं विघ्नराज - ह्रीभ्यां नमः ।
इं विनायक - पुष्टिभ्यां नमः ।
5
na
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गं
ईं शिवोत्तम - शाान्तिभ्यां नमः ।
उं विघ्नकृत् - पुष्टिभ्यां नमः ।
ऊं विघ्नहन्तृ - सर्वतोभ्यां नमः ।
ऋ विघ्नरातिभ्यां नमः।
ऋ गणनायक - मेधाभ्यां नमः ।
लूं एकदन्ति - कान्तिभ्यां नमः।
लू द्विदन्ति - शान्तिभ्यां नमः।
एं गजवक्त्र - मोहिनीभ्यां नमः ।
ऐं निरञ्जन - जटाभ्यां नमः ।
ॐ कपर्दि - पार्वतीभ्यां नमः
औं दीर्घमुखि - ज्वालाभ्यां नमः।
अं शङ्खवर्ण - नन्दाभ्यां नमः ।
अः वृषध्वज - संयशोभ्यां नमः।
कं गणनाथ-कामरूपाभ्यां नमः।
खं गजेन्द्र - ग्रामाभ्यां नमः।
गं शूर्पकर्ण - तेजोवतीभ्यां नमः।
घं त्रिलोचन - सत्याभ्यां नमः।
डं लम्बोदर - विघ्नेशाभ्यां नमः।
चं महानन्द - सुरूपिणीभ्यां नमः।
छं चतुर्मूर्ति - कामदाभ्यां नमः।
जं सदाशिव - मदजिह्वाज्वालाभ्यां नमः।
झं आमोद - विकटाभ्यां नमः।
6
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गं -
जं दुर्मुख - घूर्णिताननाभ्यां नमः।
टं सुमुख - भूतिभ्यां नमः।
ठं प्रमोद - कलदूतीभ्यां नमः।
डं एकपाद - सतीभ्यां नमः।
ढं द्विजिह्व - रमाभ्यां नमः।
णं शूराय - मानुषाय नमः।
तं कर - मकरध्वजाभ्यां नमः।
थं षण्मुख - विकर्णाभ्यां नमः।
दं वरद - भृकुटिभ्यां नमः।
धं वासुदेव - लज्जाभ्यां नमः।
नं वक्रतुण्ड - दीर्घशोणाभ्यां नमः।
पं द्विरण्ड - धनुर्धराभ्यां नमः।
फं सेनानी - यामिनीभ्यां नमः।
बं ग्रामणी-रात्रिभ्यां नमः।
भं मत्त - चन्द्रिकाभ्यां नमः।
मं निमित्त - शशिप्रभाभ्यां नमः।
यं त्वगात्मने - मेघवाहनदीप्तिभ्यां नमः।
रं असृगात्मने - जटिचपलाभ्यां नमः।
लं मांसात्मने - मुण्डिधात्रिभ्यां नमः।
वं मेदसात्मने - खड्गदुर्गिभ्यां नमः।
शं अस्थ्यात्मने - वरेण्यसुभगाभ्यां नमः।
घं मज्जात्मने -वृषकेतनशिवाभ्यां नमः।
7
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गं-
सं शुक्रात्मने - क्षत्रियदुर्भगाभ्यां नमः।
हं प्राणात्मने - गणेशगुहकान्ताभ्यां नमः।
ळं शिवात्मने - मोघनाथकाळिकाभ्यां नमः।
क्षं परमात्मने - गणेश्वरकालजिह्वाभ्यां नमः।
इति मातृकास्थानेषु विन्यसेत्।
मनुः
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं ....स्वाहा ।(गुरुमुखैकवेदितं
जपेत्)
लमित्यादि-
दिग्विमोकः
इति श्री गणेशन्यासः॥
00
अथ नवग्रहन्यासः।।
॥
श्लो॥ ध्यायेद्गहान् शक्तियुतान्हस्तैः शस्त्रादिबिभ्रतः।
रविमुख्यान्कामरूपान् सर्वाभरणभूषितान् ।
स्वोचितानि च रूपाणि शिवाज्ञाधारिणीं शुभाम् ॥
ॐ ३ अं... अः ह्रीं सूर्याय, भगवते रेणुकाम्बादेव्यै नमः
(हृदधः रक्तवर्णध्यानं)।
ॐ ३ यं रंलं वं सं सोमाय भगवते अमृताम्बादेव्यै नमः
(भ्रूमध्ये श्वेतवर्णध्यान)।
ॐ ३ कं ... डं अं अङ्गारकाय भगवते वामाम्बायै नमः
(ललाटे हरिद्वर्णध्यान)।
ॐ ३ चं . . . अं बुं बुधाय भगवते ज्ञानरूपायै नमः
(हृदये पीतवर्णध्यानं)॥
ॐ ३ टं... णं बृं बृहस्पतये भगवते यशस्विन्यम्बादेव्यै नमः
(स्तनयोर्मध्ये पुष्यरागवर्णध्यान)।।
ॐ ३ तं . . . नं शुं शुक्राय भगवते शङ्कर्यम्बादेव्यै नमः
(कण्ठे पाण्डुर (वज्र) वर्णध्यान)।
ॐ ३ पं... मंशं शनैश्चराय भगवते धात्र्यम्बादेव्यै नमः
(नाभौ कृष्णवर्णध्यान)।
ॐ ३ शं षं सं हं रां राहवे भगवते कृष्णाम्बादेव्यै नमः
(मुखे नीलधूम्रवर्णध्यान)।
ॐ ३ ळं क्षं के केतवे भगवते धूम्राम्बादेव्यै नमः
(शिरसि हरिद्राधूम्रवर्णध्यान)।
9
श्लो॥ रक्तं श्वेतहरिद्वर्णं पीतं रक्तं च पाण्डुरं । कृष्णं धूम्रं च धूम्रं च भावयेद्रविपूर्वकान् ।। कामरूपधरास्सर्वे दिव्याभरणभूषिताः। वामोरुन्यस्तहस्ताश्च रक्षाऽभयवरप्रदाः। ग्रहन्यासेन यस्त्वेवं स्वशरीरं तु विन्यसेत् । ग्रहकर्तृकदुःखेभ्यो मुच्यते स स्वयं प्रिये ॥ पापग्रहाश्च शुभदा ग्रहन्यासस्य पुण्यतः। एतन्यासेन माहात्म्यं वक्तुं शक्तो न पार्वति ॥ इति नवग्रहन्यासः॥ अं॥ अथ नक्षत्रन्यासः॥ अस्यश्री नक्षत्रन्यासस्य, ब्रह्म ऋषिः, गायत्री छन्दः, परमात्मा देवता, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, श्रीं कीलकम् । शिंशुमारचक्रस्थितकुमारगणनाथप्रीत्यर्थे नक्षत्रन्यासे विनियोगः॥ आदित्याय नमः - चन्द्राय नमः- शिरसे ॥ ब्रह्मणे नमः शिखा ॥ आदित्याय नमः अना। कव ।। चन्द्राय नमः- आदित्यचन्द्रब्रह्मभ्यो नमः करतल ।। अस्त्राय।। भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः 10 त॥ - म।। कनि ।। नेत्र ॥ -
ध्यानम्॥
श्लो॥ ज्वलत्कालाग्निसङ्काशाः वरदाऽभयपाणयः।
अतिपार्थोश्विनीमुख्या सर्वाभरणभूषिताः॥
१. ॐ ३ अं आं क्षोभिणी नाम, अश्विनीसहित
अश्विनीदेवतायै नमः ॥ ललाटे- ॥
२. ॐ ३ इंई सूक्ष्मरूपिणी नाम यमसहित
भरणीदेवतायै नमः ॥ दक्षनेत्रे -॥
३. ॐ ३ उं ऊं अम्बा नाम अग्निसहित
कृत्तिकादेवतायै नमः ॥ वामनेत्रे - ॥
४. ॐ ३ ऋ ॠ तुष्टी नाम प्रजापतिसहित
रोहिणीदेवतायै नमः ॥ दक्षश्रोत्रे - ॥
५. ॐ ३ लूं लूं
पुष्टी नाम सोमसहित
मृगशीर्षादेवतायै नमः । वामश्रोत्रे - ॥
६. ॐ ३ एं ऐं मति म रुद्रसहित
आर्द्रादेवतायै नमः ॥दक्षनासापुटे-॥
७. ॐ३ ॐ औं धृति म अदितिसहित
पुनर्वसूदेवतायै नमः ॥वामनासापुटे॥
८. ॐ ३ कं शान्ति म बृहस्पतिसहित
पुष्यमीदेवतायै नमः ॥ कण्ठे-॥
९. ॐ ३ खं गं स्वस्तिमतिर्नाम सर्पसहित
आश्रेषादेवतायै नमः ॥दक्षांसे - ।
१०. ॐ ३ घं ऊँ
कान्तिर्नाम पितृदेवतासहित
मखादेवतायै नमः ॥ वामांसे-
11
११. ॐ३ चं नन्दिनी नाम अर्यमासहित
पूर्वफल्गुनीदेवतायै नमः। दक्षभुज़े -।।
१२. ॐ ३ छं जं विघ्ननाशिनी नाम भगसहित
उत्तरफल्गुनीदेवतायै नमः॥वामभुजे -।।
१३. ॐ ३ झं अं तेजोवती नाम सवितासहित
हस्तादेवतायै नमः ॥ दक्षमणिबन्धे-।।
१४. ॐ३ टं ठं त्रिनयना नाम त्वष्टासहित
चित्रादेवतायै नमः ॥वाममणिबन्धे।।
१५. ॐ ३ डं
लोलाक्षी नाम वायुसहित
स्वातीदेवतायै नमः ॥ दक्षस्तने ।
१६. ॐ ३ ढंणं
कामरूपिणी नाम इन्द्राग्नीसहित
विशाखादेवतायै नमः ॥ वामस्तने - ।।
१७. ॐ३ तं थं
मालिनी नाम मित्रसहित
अनुराधादेवतायै नमः।। नाभौ - ।।
१८. ॐ ३ दं धं हंसिनी नाम इन्द्रसहित
ज्येष्ठादेवतायै नमः ॥ दक्षकट्यां - ॥
१९. ॐ ३ नं पं फं माता नाम निऋतिसहित
मूलादेवतायै नमः । वामकटयां- ।।
२०. ॐ३ बं मलयाचलवासिनी नाम आपस्सहित
पूर्वाषाढादेवतायै नमः ॥ दक्षोरौ - ।
२१. ॐ ३ भं
सुमुखी नाम विश्वेदेवसहित
उत्तराषाढादेवतायै नमः॥ वामोरौ - ।।
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१२. ॐ ३ मं
नलिनी नाम विषवणसहित
श्रवणादेवतायै नमः ॥ दक्षजानौ - ॥
१३. ॐ ३ यंरं
सुभ्रू नाम वसुसहित
धनिष्ठादेवतायै नमः । वामजानौ - ।।
१४. ॐ ३ लं
शोभना नाम वरुणसहित
शततारादेवतायै नमः ॥ दक्षजङ्घायां।
१५. ॐ ३ वं शं सुरनायिका नाम अजैकपादसहित
पूर्वाभाद्रादेवतायै नमः।।वामजङ्घायां-।।
२६. ॐ ३ षं सं
कालकण्ठी नाम अहिर्बुध्यसहित
उतराभाद्रादेवतायै नमः ॥ दक्षपदे - ।।
२७. ॐ ३ हं लं क्षं कान्तिमती नाम पूषासहित
अं आं रेवतीदेवतायै नमः॥ वामपदे ।।
इति नक्षत्रन्यासः॥
अथ योगिनीन्यासः॥
१. ॐ मुद्गौदनासक्ता मूलाधारे चतुर्दळस्थिता, वंशंषं संवर्णाश्रया
साकिनी नाम योगिनी श्री पादुकां पूजयामि नमः।।
२. ॐ दध्यन्नासक्तहृदया, स्वाधिष्ठाने षड्दळस्थिता, बं भं मं
यं रं लं वर्णाश्रया, काकिनी नाम योगिनी श्रीपादुकां
पूजयामि नमः॥
३. ॐ गुडान्नप्रीतमानसा, मणिपूरे, दशदळस्थिता डं ढंणं तं थं
दं धं नं पं फं वर्णाश्रया लाकिनी नाम योगिनी श्रीपादुकां
पूजयामि नमः॥
13
४.ॐ स्निग्धौदनप्रिया, अनाहते, द्वादश दळस्थिता कं खं गं घं
डंचं छं जं झं अं टं ठं वर्णाश्रया राकिनी नाम योगिनी
श्रीपादुकां पूजयामि नमः॥
५.ॐ पायसान्नप्रिया, विशुद्धे, षोडशदळस्थिता अं आंइंईं उंऊं
ऋ ॠ लंठें एं ऐं ॐ औं अं अः प्राणवर्णाश्रया, डाकिनी
नाम योगिनी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।।
६.ॐ हरिद्रान्नैकरसिका, आज्ञायां द्विदळस्थिता, हं क्षं वर्णाश्रया
हाकिनी नाम योगिनी श्री पादुकां पूजयामि नमः।।
७.ॐ सौंदनप्रीतचित्ता सहस्त्रारे सहस्रदळयुता, अकारादि
क्षकारान्तवर्णाश्रया, याकिनी नाम योगिनी श्री पादुकां
पूजयामि नमः।। (अकारादिक्षकारान्तवर्णाः वक्तव्याः)
इति योगिनीन्यासः॥
अथ राशिन्यासः ॥ (सर्वरक्षाकरः)
१. ॐ ३ अंआं मेषाय नमः।।
दक्षपदे (रक्तवर्णध्यानं)॥
२. ॐ ३ इं... ॐ वृषभाय नमः।
दक्षिणवृषणे (श्वेतवर्णध्यानं)।
३. ॐ ३ ऋ ... लूं मिथुनाय नमः।
दक्षकक्षे (हरिद्वर्णध्यानं)॥
४. ॐ ३ एं ऐं कर्कटाय नमः।।
दक्षिणहृदये (रक्तवर्णध्यान)।।
14
५. ॐ ३ ॐ औं सिंहाय नमः।।
दक्षबाहुमूले (श्वेतवर्णध्यानं)॥
६. ॐ ३ अं अः शं....क्षं कन्यकायै नमः।
दक्षमस्तके (पाण्डुरवर्णध्यानं)।
७. ॐ ३ कं ... डं तुलायै नमः ।।
वाममस्तके (पिगळवर्णध्यान)।
८. ॐ ३ चं....अं वृश्चिकायै नमः।
वामबाहुमूले (पिङ्गळवर्णध्यान)।
९. ॐ ३ टं....णं धनुषे नमः ।।
वामहृदये (बभूवर्णध्यान)।
१०. ॐ ३ तं .... नं मकरायै नमः।
वामकक्षे (कर्पूरवर्णध्यानं)॥
११. ॐ ३ पं .... मं कुम्भाय नमः।
वामवृषणे (असितवर्णध्यानं)।
१२. ॐ ३ यं...वं मीनाय नमः ।।
वामपादे (धूम्रवर्णध्यानं)।
रक्तं श्वेतं हरिद्वर्णं रक्तं श्वेतं च पांडुरं ।
पिङ्गळं पिङ्गळं बभ्रु कर्पूरासितधूम्रवान् ।।
इति द्वादशराशिन्यासः॥
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1
३ ३
अथ पीठन्यासः॥
अथ पीठानि विन्यस्य सर्वतीर्थमयानि
वासितासितारुणा श्यामां हरः पीतान्यनुक्रमात्॥
श्यामान् रक्ताम्बरान् सर्वान् सर्वालङ्कारभूषितान् ।
सशक्तिकान् स्मरेत्कामान् पीठस्थान् चन्द्रसंयुतान् ।
मातृकास्थानेषु न्यासः
ॐ ३ अं कामरूपपीठाय नमः।
ॐ ३ आं वारणासीपीठाय नमः।
ॐ ३ इं नेपाळपीठाय नमः।
ॐ ३ पौण्ड्रवर्धनपीठाय नमः।
उं हेमकूटेश्वरीपीठाय नमः।
ॐ ३ ऊं कन्याकुब्जपीठाय नमः ।
ॐ ३ में पूर्णगिरिपीठाय नमः।
ॐ ३ ऋ अर्बुदाचलपीठाय नमः ।
ॐ ३ लूं आम्लातकेश्वरपीठाय नमः ।
लूं एकाम्रपीठाय नमः।
एं तिस्रोतपीठाय नमः।
ॐ
३ ऐं कामकोटिपीठाय नमः।
ॐ ३ ॐ कैलासपीठाय नमः ।
ॐ ३ औं भृगुनगरपीठाय नमः।
ॐ ३ अं केदारपीठाय नमः।
ॐ ३ अः चन्द्रपुरीपीठाय नमः।
ॐ ३ कं श्रीपुरपीठाय नमः ।
ॐ ३ खं कामगिरि (पीठं वा) एकवीरपीठाय नमः।
16
ॐ ३
ॐ ३
ॐ ३ गं जालन्धरपीठाय नमः । ॐ ३ घं माळवीपीठाय नमः। ॐ ३ डं कुळूहपीठाय नमः। ॐ ३ चं ३ चं देवकोटिपीठाय नमः। ॐ ३ छं गोकर्णपीठाय नमः। ॐ ३ जं अमृतेश्वरीपीठाय नमः । ॐ ३ झं ३ झं अट्टहासपीठाय नमः। ॐ ३ जं विरजापीठाय नमः। ॐ ३ टं राजगृहपीठाय नमः। ॐ ३ ठं महापद्मपीठाय नमः। ॐ ३ डं कोल्हापुरीपीठाय नमः । ॐ ३ ढं एलापुरीपीठाय नमः। ॐ ३ णं ॐकारपीठाय नमः। ॐ ३ तं ३ तं जयन्तीपीठाय नमः। ॐ ३ थं थं उज्जयिनीपीठाय नमः। चित्रक (वामदेव) पीठाय नमः । ॐ ३ धं ३ धं क्षीरक (सवित्रु) पीठाय नमः । हस्तिनापुरीपीठाय नमः। ॐ ३ पं उड्डीशपीठाय नमः। ॐ ३ फं प्रयागपीठाय नमः। भद्रगिरिपीठाय नमः। ॐ ३ भं भं मायापुरपीठाय नमः । ॐ ३ मं चामुण्डेश्वरीपीठाय नमः। ॐ ३ यं मलयगिरिपीठाय नमः। दं 17 ॐ ३ रं श्रीशैलपीठाय नमः। ॐ ३ लं मेरुगिरिपीठाय नमः । ॐ ३ वं गिरिवरपीठाय नमः । ॐ ३ शं महेन्द्रपुरीपीठाय नमः । ॐ ३ षं वामनपीठाय नमः । ॐ ३ सं हिरण्यपुरीपीठाय नमः। ॐ ३ हं मुख्यदेवपुरी (लक्ष्मीपुरी वा)पीठाय नमः । ॐ ३ ळं ओड्याणपीठाय नमः । ॐ ३ क्षं छाया, छत्रेश्वरपीठाय नमः। एते पीठास्समुद्दिष्टा मातृकारूपसंस्थिताः । सर्वाम्नायस्य विषया पूर्वषोढा प्रकीर्तिताः। इति लघुषोढान्यासं संपूर्णम् ॥ श्रीपरांबापरशिवार्पण मस्तु -॥ २. अथावाहनम्॥ श्लो।। मन्त्राक्षरमयीं देवीं मातृकारूपधारिणीम्। नवदुर्गात्मिकां साक्षात्कन्यामावाहयाम्यहम्।। इति मूलमन्त्रेण हृदयकमलमध्ये देवीमावाह्य- लमित्यादिपूजा. इत्यावाहनम् . 18 or ३. अथ नामानि॥ अस्य श्रीदेवीरहस्यनामस्तोत्रमालामहामन्त्रस्य, श्रीदक्षिणा- मूर्ति ऋषिः, अनुष्टुप्छंदः चिन्तामणिश्रीमहाविद्येश्वरीदेवता, ऐं बीजं क्लीं शक्तिः, सौः कीलकम् श्री देवीप्रसादसिध्यर्थे रहस्यनाम- पारायणे विनियोगः॥ ॐ ऐं - क्लीं - सौः इत्यादि करहृदयन्यासः।। ध्यानम्॥ सकुङ्कुमविलेपनामळिकचुम्बिकस्तूरिकाम्। समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम्। अशेषजनमोहिनीं अरुणमाल्यभूषाम्बराम्। जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मराम्यम्बिकाम् ।। गुरुध्यानं ॥ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी। चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता ।। उद्यद्भानुसहस्त्राभा चतुर्बाहुसमन्विता। रागस्वरूपपाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ।। मनोरूपेक्षुकोदण्डा पञ्चतन्मात्रसायका। निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला ।। चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा। कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता॥ अष्टमीचन्द्रविभ्राजदळिकस्थलशोभिता। मुखचन्द्रकळङ्काभमृगनाभिविशेषका ।। 19 २ ३ ४
६
७
on
१०
वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका।
वक्त्रलक्षीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना।
नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता।
ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा।।
कदम्बमञ्जरीक्लुप्तकर्णपूरमनोहरा ।
ताटङ्कयुगळीभूततपनोडुपमण्डला॥
पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः।
नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा॥
शुद्धविद्याकुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला।
कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा।
निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भसितकच्छपी।
मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा॥
अनाकलितसादृश्यचुबुकश्रीविराजिता।
कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्थरा।।
कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता।
रत्नप्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता ।।
कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी।
नाभ्यालबालरोमाळिलताफलकुचद्वयी।
लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा।
स्तनभारदळन्मध्यपट्टबन्धवळित्रया।
११
१२
१३
१४
१५
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१६
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१८
२०
अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी।
रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता॥
कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता।
माणिक्यमकुटाकारजानुद्वयविराजिता।।
इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका।
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता ।।
नखदीधितिसञ्छन्ननमज्जनतमोगुणा।
पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा ॥
शिजानमणिमञ्जीरमण्डितश्रीपदाम्बुजा।
मराळीमन्दगमना महालावण्यशेवधिः॥
सर्वारुणाऽनवदयाङ्गी सर्वाभरणभूषिता।
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा ।।
सुमेरुमध्यशृङ्गस्था श्रीमन्नगरनायिका।
चिन्तामणिगृहान्तस्था पञ्चब्रह्मासनस्थिता ।।
महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी।
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी।
देवर्षिगणसङ्घातस्तूयमानात्मवैभवा ।
भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता ।।
सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरवजसेविता।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता।।
21
२१
२२
२३
२४
२५
चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता।
गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता ।।
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२७
२८
२९
३०
किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता।
ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा।
भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता।
नित्या पराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका।
भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता।
मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषिता।
विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता।
कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा ॥
महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता।
भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणी।।
करागुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः।
महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका॥
कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका।
ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा ।।
हरनेत्राग्निसन्दग्धकामसजीवनौषधिः।
श्रीमद्वाग्भवकूटकस्वरूपमुखपङ्कजा।
कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी।
शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी।
३१
३२
३५
22
मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकळेबरा।
कुलामृतैकरसिका कुलसङ्केतपालिनी ।।
कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौळिनी कुलयोगिनी।
अकुला समयान्तस्था समयाचारतत्परा ।। ३७
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ।।
आज्ञाचक्रान्तराळस्था रुद्रग्रन्थिविभेदिनी।
सहस्त्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी।।
३९
तटिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरिसंस्थिता।
महाशक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तुतनीयसी ॥
श्रीशिवा शिवशक्तत्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका॥ ४०
इति रहस्यनामानि ॥
BE
४. अथ अर्गळम् ॥
अस्य श्रीअर्गळस्तोत्रमहामन्त्रस्य, स्वर्णाकर्षणभैरव ऋषिः,
अनुष्टुप्छन्दः, श्री महालक्ष्मीचण्डिकादेवता, अंबीजं, गं शक्तिः, लं
कीलकम्, श्रीमहालक्ष्मीचण्डिकाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
ॐ अं गं लं - इत्यादि करहृदयन्यासः ॥
ध्यानम्॥
प्रकाशमध्यस्थितचित्स्वरूपां
वराभये सन्दधतीं त्रिनेत्राम् ।
सिन्दूरवर्णाङ्कितकोमलाङ्गीं
मायामयीं तत्त्वमयीं नमामि ।।
23
4 or २ ३ ४ ५ श्रीमार्कण्डेयः एकापि त्रिविधा ख्याता नवधाऽनेन कीर्तिता। तस्या भेदाह्यनन्ताश्च तन्माहात्म्यं शिवोदितम् ।। या देवी स्तूयते नित्यं विबुधैर्वेदपारगैः। सा मे वसतु जिह्वाग्रे ब्रह्मरूपा सरस्वती ।। जय त्वं देवि चामुण्डे ! जय भूतापहारिणि । जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ते॥ जयन्ती मङ्गळा काळी भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते ।। मधुकैटभविद्रावि विधात्रिवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। महिषासुरनि शविधात्रिवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। वन्दिताघ्रियुगे देवि देवसौभाग्यदायिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। शुम्भस्य वै निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ 24 ६ ७ ८ १०
नतेभ्यः सर्वदा भत्तया चण्डिके प्रणताय मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
११
स्तुवद्भयो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
१२
१३
१५
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
प्रचण्डदैत्यदर्पनि चण्डिके प्रणताय मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरी ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या त्वमम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥
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१८
२०
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२१
२२
२३
२४
हिमाचलसुतानाथपूजिते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।।
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥
पुत्रान्देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥
पत्नी मनोरमां देहि मनेवृत्तानुसारिणीं ।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
एवं नवशतीसङ्ख्या वरमाप्नोति संपदः ।।
भुक्त्वा तु सकलान्भोगानन्ते शिवपदं व्रजेत् ॥
इत्यर्गळम् ॥
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५. अथ कीलकम् ॥
अस्यश्री कीलकस्तोत्रमहामन्त्रस्य, विशुद्धज्ञान ऋषिः,
अनुष्टुप्छन्दः, श्रीचण्डिका देवता, क्लां बीजं, क्लीं शक्तिः, क्लू
कीलकम्, श्रीचण्डिकाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।।
क्लामित्यादि करहृदयन्यासः
ध्यानम्॥
शोणप्रभ सोमकलावतंसं पाणिस्फुरत्पञ्चशरेक्षुचापम् ।
प्राणप्रियं नौमि पिनाकपाणेः कोणत्रयस्थं कुलदैवतं नः ।।
ऋषिरुवाच
विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेयः प्राप्तिनिमित्ताय नमःसोमार्धधारिणे।
सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ।।
सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलानपि ।
एतेन स्तुवतां देवि स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ।।
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते ।
विना जाप्येन सिद्धयेत सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।
समग्राण्यपि सिध्यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ।।
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुह्यं चकार सः ।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम् ।।
27
२
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८
or
१०
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेव न संशयः।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः॥
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ।।
यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटं।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गंधर्वो जायतेऽवने ।।
न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते।
नाऽपमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।
ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत ह्यकुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ।।
सौभाग्यादि च यत्किञ्चिदृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥
शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः ।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ।।
ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
सरहस्यार्चनोपेतः समस्तफलमश्रुते ।।
इति कीलकम् ॥
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१
२
अथ गुरुकीलकम् ॥
पुरा सनत्कुमाराय दत्तमेतन्मयानघ ।
संवर्ताय ददौ तच्च न चान्यस्मै ददौ च तत् ।।
सर्वत्र चण्डीपाठस्य प्राचुर्येण महीतले।
ब्रह्मकाण्डः कर्मकाण्डः तन्त्रकाण्डश्च सर्वदा।
अभूत्प्रतिहतोऽनेन शीघ्रसिद्धिप्रदायिना।
तथा तेषां च सार्थक्यं कर्तुं कामेन भूतले ॥
दानप्रतिग्रहत्वेन मन्त्रोऽयं कीलितो मया।
दानप्रतिग्रहाख्यं यत्कीलकं समुदाहृतम् ।।
तदारभ्य च मन्त्रोऽयं कीलकेनाभिकीलितः।
न सर्वेषां भवेत्सियै ये कीलकपराङ्मुखाः ।।
ये नराः कीलकेनेमं जपन्ति परया मुदा ।
तेषां देवी प्रसन्ना स्यात्ततः सर्वाः समृद्धयः॥
३
४
६
त्वत्प्रसूतस्त्वदाज्ञप्तस्त्वद्वासस्त्वत्परायणः।
त्वन्नामचिन्तनपरस्त्वदर्थेऽहं नियोजितः॥
८
मयार्पितमिदं सर्वं तव स्वं परमेश्वरी ।
राष्ट्र बलं कोशगृहं सैन्यमन्यच्च साधनम् ।।
त्वदधीनं करिष्यामि यत्रार्थे त्वं नियोक्ष्यसि ।
तत्र देवी सदा वर्ते तवाज्ञामेव पालयन् ।।
इति सञ्चिन्त्य मनसा स्वार्जितानि धनानि च ।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ।।
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समर्पयेन्महादेव्यै स्वार्जितं सकलं धनम् ।
राष्ट्रं बलं कोशगृहं नवं यद्यदुपार्जितम् ।।
अस्मिन्मासि मया देवि तुभ्यमेतत् समर्पितम्।
इति ध्यात्वा ततो देव्याः प्रसादात्प्रतिगृह्य च ॥
विभज्य पञ्चधा सर्वं त्र्यंशान्स्वार्थं प्रकल्पयेत् ।
देवपित्रतिथीनां च क्रियार्थं त्वेकमादिशेत् ।।
एकांशं गुरवे दद्यात्तेन देवी प्रसीदति।
तस्य राज्यं बलं सैन्यं कोशः साधु विवर्धते ।।
नानारत्नाकरःश्रीमान्यथा पर्वणि वारिधिः।
ज्ञात्वा नवाक्षरं मन्त्रं जीवब्रह्मसमाश्रयम् ।।
तत्त्वमस्यादिवाक्यानां सारं संसारभेषजम् ।
नवशत्याख्यमन्त्रस्य यावज्जीवमहं जपम् ।।
कुर्वंस्ततो न प्रमादं प्राप्नुयामिति निश्चयम् ।
कृत्वा प्रारभ्य कुर्वीत ह्यकुर्वाणो विनश्यति ॥
माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत् ।
अनिराकरणं मेऽस्तु अनिराकरणं मम ॥
इति वेदान्तमूर्धन्ये छान्दोग्यस्य प्रपञ्चनात्।
प्रारभ्य तत्परित्यागो न तस्य श्रेयसे मतः॥
नाब्रह्मवित्कुले तस्य जायते हि कदाचन ।
न दारिद्र्यं कुले तस्य यावत्स्थास्यति मेदिनी ।।
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प्रतिसंवत्सरं कुर्याच्छारदं वार्षिकं तथा।
तेन सर्वमवाप्नोति सुरासुरसुदुर्लभम् ।।
अन्यच्च यद्यत्कल्याणं जायते तत्क्षणे क्षणे।
सत्यं सत्यमिदं सत्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ।।
पुत्राय ब्रह्मनिष्ठाय पित्रा देयं महात्मना।
अन्यथा देवता तस्मै शापं दद्यान्नसंशयः।।
इति गुरुकीलकम् ॥
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६. अथ हृदयम्॥
अस्य श्री चण्डिकाहृदयस्तोत्रमहामन्त्रस्य, मार्कण्डेय
ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, श्रीचण्डिका देवता, ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः,
हूं कीलकम्, श्रीचण्डिकाप्रसादसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।।
ॐ ह्रामित्यादि न्यासः।
ध्यानम्-
सर्वमङ्गळमाङ्गळ्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोस्तु ते ।।
ब्रह्मोवाच ॥
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि विस्तरेण यथा तथम् ।
चण्डिका हृदयं गुह्यं श्रुणुष्वेकानमानसः ।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ह्रां ह्रीं हूं जय जय चामुण्डे, चण्डिके,
त्रिदशमणिमकुटकोटीरसंघट्टित चरणारविन्दे, गायत्रि, सावित्रि,
सरस्वति, महाहिकृताभरणे,भैरवरूपधारिणि, प्रकटितदंष्ट्रोग्रवदने,
31
घोरे, घोरानने, ज्वलज्ज्वलज्ज्वालासहस्रपरिवृते, महाट्टहास बधिरीकृतदिगन्तरे, सर्वायुधपरिपूर्णे, कपालहस्ते, गजाजिनोत्तरीये, भूतवेताळबृन्दपरिवृते, प्रकन्पितचराचरे, मधुकैटभ, महिषासुर, धूम्रलोचन, चण्ड, मुण्ड, रक्तबीज, निशुम्भ, शुम्भादि- दैत्यनिष्कण्टके, कालरात्रि, महामाये, शिवे, नित्ये, इंद्राग्नि, यम, निति, वरुण, वायु, सोमेशानप्रधान-शक्तिभूते, ब्रह्म, विष्णु, शिवस्तुते, त्रिभुवनाधाराधारे, वामे, ज्येष्ठे, वरदे, रौद्रि, अम्बिके, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, शख़िनी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा, शिवदूती, महासरस्वती, महालक्ष्मी, महाकाळीस्वरूपे, नादमध्यस्थिते, महोग्र-विषोरगफणामणिघटितमकुट कटकादिरत्न - महाज्वालामय- पादबाहुकण्ठोत्तमाङ्गे, मालाकुले, महामहिषो- परिसंस्थिते, गन्धर्वविद्याधराराधिते, नवरत्ननिधिकोशे, तत्त्वस्वरूपे, वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मिके, शब्दस्पर्शरूप- रसगन्धादिस्वरूपे, त्वक्चक्षुश्रोत्रजिह्वाघ्राणमहाबुद्धिस्थिते, ॐ ऐकार, ह्रीङ्कार, क्लीङ्कारहस्ते, आं क्रों आग्नेयनयनपात्रे प्रवेशय २, द्रां शोषय २, द्रीं सुकुमारय२, श्रीं सर्वं प्रवेशय२, त्रैलोक्यवरवर्णिनि समस्तचित्तं, वशीकुरु२, मम शत्रून् शीघ्रं मारय २, जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्था-स्वस्मान् राज, चोराग्नि, जल, वात, विष, भूत, शत, मृत्यु, ज्वरादि स्फोटकादि नानारोगेभ्यो नानापचारेभ्यो, नानापवादेभ्यः परकर्म, मन्त्र, तन्त्र, यन्त्रौषध शल्य, शून्य, क्षुद्रेभ्यः सम्यक् मां रक्ष रक्ष ।। ॐ ऐं ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्रौं ह्रः स्फ्रां, स्क्री, स्पूँ, स, स्फ्रौं, स्फ्रः मम सर्वकार्याणि साधय साधय हुं फट् स्वाहा ।। (इति एकविंशतिवारं जपेत् ॥ इति हृदयम् ॥ 32 ७. अथ दलम् ॥ ॐ नमो भगवति जय जय चामुण्डे, चण्डि, चण्डेश्वरि, चण्डायुधे, चण्डरूपधारिणि, ताण्डवप्रिये, कुण्डलीभूतदिङ्नाग- मण्डलीकृतगण्डस्थले, समस्तजगदण्डसंहारकारिणि, परे, अनन्तानन्तरूपे, शिवे, अहिशिरोमालालङ्कृतवक्षस्थले, महाकपालफालोज्ज्वलन्मणिमकुटचूडावतंसचन्द्रखण्डे, महाभीषणे, देवि, महामाये, षोडशकलापरिवृतोल्लासिते, महादेवासुरसमरनिहितरुधिराीकृतालम्बिततनुकमलोद्भासितकरे सम्पूर्णरुधिरशोभित - महाकपोलवक़्तहासिनि, दृढतरनिबध्यमान रोमराजीसहित - हेमकाञ्चीदामोज्ज्वलितवसनारुणीभूत नूपुरप्रज्वलित महीमण्डले, महाशम्भुरूपे, महाव्याघ्रचर्माम्बरधरे, महासर्पयज्ञोपवीतिनि, महाकालि, कालाग्निरुद्रकालि, कालसकर्षिणि, कालनाशिनि कालरात्रि, नभोभक्षिणि, नानाभूतप्रेतपिशाचगणसहस्त्रसञ्चारिणि, नानाव्याधिप्रशमनि, सर्वदुःखशमनि , सर्वदारिद्र्यनाशिनि , गात्र विक्षेपकलकलायमान कङ्काळधारिणि, सकलसुरासुर, गन्धर्व यक्ष, विद्याधर, किन्नर, किम्पुरुषादिभिः स्तूयमानचरिते, सर्वमन्त्राधिकारिणि, सर्वशक्ति प्रधाने, सकललोकपावनि, सकलदुरितप्रक्षाळिनि, सकललोकैक जननि ब्राह्मि, माहेश्वरि, कौमारि, वैष्णवि, शखिनि, वाराहि, इन्द्राणि, चामुण्डे, महालक्ष्मि, महाविद्ये, योगीश्वरि, योगिनि, चण्डिके, माये, विश्वरूपिणि, सर्वाभरणभूषिते, अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल, पाताळादि, भूर्भुवस्सु- वर्महर्जनस्तपस्सत्याख्य चतुर्दशभुवनैकनाथे, महाघोरे, 33 प्रसन्नरूपधारिणि, ॐ नमः पितामहाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमश्शिवायेति सकललोकजप्यमान ब्रह्म, विष्णु, महेश्वर रूपिणि, दण्डकमण्डलुधारिणि, सावित्रि सर्वमङ्गळप्रदे सरस्वति, पद्मालये, पार्वति, सकलजगत्स्वरूपिणि, शङ्ख, चक्र, गदा पद्मधारिणि, परशु, शूल, पिनाक टङ्कधारिणि, शर, चाप, शूल, करवाल, खड्ग, डमरुकाकुश, गदा परशु, तोमर, भिन्दिपाल भुशुण्डी, मुद्गर, मुसल, परिघायुधदोर्दण्डसहस्त्रे, चन्द्रार्कवह्नि- नयने, इन्द्राग्नि, यम, निति, वरुण, वायु सोमेशानप्रधान- शक्तिहेतुभूते, सप्तद्वीपसमुद्रोपर्युपरिव्याप्ते, ईश्वरि, महाप्रपञ्च- मालालङ्कृतमेदिनीनाथे, महाप्रभावे, महाकैलासपर्वतोद्यानवन- विहारिणि, नदी, तीर्थ, देवतायतनालङ्कृते, वसिष्ठवामदेवादि- महामुनिगणवन्द्यमानचरणारविन्दे, द्विचत्वारिंशद्वर्णमाहात्म्ये, पर्याप्त वेद, वेदाङ्गाद्यनेकशास्त्राधारभूते, शब्दब्रह्ममयि, लिपिदेवते,मातृकादेवि चिरं मां रक्ष रक्ष, मम शत्रून् हुङ्कारेण नाशय नाशय, भूत, प्रेत, पिशाचादीनुच्चाटयोच्चाटय, समस्तग्रहान् वशीकुरु वशीकुरु, मोहय मोहय, उन्मादयोन्मादय, विध्वंसय विध्वंसय, द्रावय द्रावय, श्रावय श्रावय, स्तोभय स्तोभय सङ्क्रामय सङ्क्रामय, सकलारातीन् मूर्ध्नि स्फोटय स्पोटय, मम शत्रून् शीघ्रं मारय मारय, जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थास्वस्मान् राज, चोराग्नि, जल, वात, विष, भूत, शत्रु मृत्यु, ज्वरादि नानारोगेभ्यो, नानाभिचारेभ्यो, नानापवादेभ्यो, परकर्म, मन्त्र, तन्त्र, यन्त्रौषध, शल्य, शून्य, क्षुद्रेभ्यः सम्यक् मां रक्ष रक्ष ।। ॐ श्रीं ह्रीं क्ष्नौं मम शत्रुसर्वप्राणसंहारकारिणि हुं फट् स्वाहा । इति दलम्॥ *** 34
८. अथ ध्यनम् ।।
हे निर्धूतनिखिलध्वान्ते, नित्यमुक्ते, परात्परे,
अखण्ड ब्रह्मविद्यायै, चित्सदानन्द रूपिणि,
चण्डिके, त्वां
वयं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा! अद्वैतब्रह्मविद्याधिगमार्थं
हृदयाम्बुजे सन्ततं चिन्तयामः ॥
अहं चिन्तयामि ॥
इति ध्यानम् ॥
९. अथ कवचम्॥
अस्य श्रीदेवीकवचस्तोत्र महामन्त्रस्य, ब्रह्मऋषिः,
अनुष्टुप्छन्दः, इच्छा, ज्ञान, क्रिया, शक्तिस्वरूपिणी श्री आद्यादि
महालक्ष्मीर्देवता ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः हूं कीलकम् श्री आद्यादि
महालक्ष्मीप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः
हां इत्यादिन्यासः॥
ध्यानम्॥
शंखं चक्रमथो धनुश्च दधतीं विभ्रामितां तर्जनीम् ।
वामे शक्तिमसिं शरान्कलयती तिर्यक्तिशूलं भुजैः।
सम्बद्धं विविधायुधैः परिवृतां मन्त्री कुमारीजनैः ।
ध्यायेदिष्टवरप्रदां त्रिनयनां सिंहाधिरूढां शिवाम् ।।
35
१ वाणीपतेर्वरविमोहितदुष्टदैत्य- दाहिदष्टमनुजारिकुलाहितानि । तच्छृङ्गमध्यनटनेन विहन्यमाना। रक्षां करोतु मम सा त्रिपुराधिवासा ।। शङ्खासिचापशरभिन्नकरां त्रिनेत्राम् । तिग्मेतरांशुकलया विलसत्किरीटाम् । सिंहस्थितां ससुरसिद्धनुतां च दुर्गाम् । दूर्वा निभां दुरितवर्गहरां नमामि ।। मार्कण्डेय उवाच यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् । यन्नकस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ।। ब्रह्मोवाच- अस्ति गुह्यतमं विप्र! सर्वभूतोपकारकं । देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने । प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्ढघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदा प्रोक्ता नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना । अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ।। २ ३ ६ 36
७
or
११
न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥
यैस्तु भत्त्या स्मृता नूनं तेषामृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति दैवेशि रक्षसे तान्नसंशयः ।।
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ।।
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मसना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया।
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता।
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः।
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
शङ्ख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्गायुधमनुत्तमम् ।।
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।।
१२
१३
१४
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१६
37
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेयामग्निदेवता॥
दक्षिणे रक्ष वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्या वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी।
१८
रक्षेदुदीच्यां कौमारी ईशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा।।
१९
एवं दशदिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः स्थातु विजया स्थातु पृष्ठतः॥
२०
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणेचाऽपराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ।
२१
मालाधरी ललाटे च भृवौ रक्षेद्यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भृवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ।।
२२
२३
शखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोरवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ।।
दन्तानक्षतु कैमारी कण्ठमध्ये च चंडिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके।
२४
२५
38
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमङ्गळा ।
ग्रीवायां भद्रकाळी च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥
२६
नीलग्रीवा बहिः कण्ठे नलिकां नलकूबरी।
खड्गधारिण्युभी स्कन्धौ बाहू मे वज्रधारिणी ।।
२७
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।
नखाञ्च्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेन्नलेश्वरी ।।
२८
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
हृदयं ललितादेवी ह्युदर शूलधारिणी।
२९
३०
नाभिं च कामिनी रक्षेद्गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
भूतनाथा च मेद्रं च गुदं महिषवाहिनी ॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घ महाबला प्रोक्ता जानुमध्ये विनायकी ।
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठेऽमितौजसी।
पादाङ्गुळीः श्रीधरी च पादाधस्थलवासिनी ।।
३२
नखान्दंष्ट्राकराळी च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपाणि कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥
३३
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥
३४
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पद्मवती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ।।
३५
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शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्ष मे धर्मचारिणि ।।
प्राणापानौ तथा व्यानसमानोदानमेव च।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत् प्राणं कल्याणशोभना ॥
३७
रसं रूपं च गंधं च शब्दं स्पर्शं च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥
३८
अयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मी च सदा रक्षतु चक्रिणी ।।
३९
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ।
४०
धनेश्वरी धनं रक्षेन्मार्ग क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ।।
४१
रक्षाहीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।।
४२
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्र हि गच्छति ॥
४३
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तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।।
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परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।
निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रामेष्वपराजितः॥
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।।
४६
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः।
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्ये चापराजितः।
४७
जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः।
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूता विस्फोटकादयः।।
४८
स्थावरं जङ्गमं चापि कृत्रिमं चापि यद्विषम्।
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।।
४९
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः।
सहजाः कुलजा माला ढाकिनी शाकिनी तथा।
५०
अन्तरिक्षचरा घोरा ढाकिन्यश्च महाबलाः।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।।
५१
ब्रह्मराक्षसवेताळाः कूष्माण्डाभैरवादयः।
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।।
५२
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५३
५४
मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले ।।
जपेन्नवशती चण्डी कृत्वा तु कवचं पुरा।
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी।
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ॥
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ।।
इति कवचम्॥
५५
इति समयाचारनवाङ्गविधिः॥
श्रीः
श्री चण्डीनवशतीमन्त्रमाला
प्रथमाऽध्यायः
हरिः ॐ
ॐ नमश्चण्डिकायै
RASHTri
१.
२.
३.
४.
क्रौष्टुकिरुवाच
ॐ मार्कण्डेय महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
वक्तुमर्हस्यशेषेण देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ।।
ॐ मन्वन्तरे पुरा स्वामिन् मही केन प्रकाशिता।
कोऽयं सावर्णिको नाम मनुसंज्ञत्वमागतः।।
ॐ का चेयं चण्डिका देवी महामायेति गीयते।
यया सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।।
ॐ तदुत्पत्तिं महायोगिन् वद सर्वज्ञ विस्तरात्।
परोपकारहेतुत्वाद्यथावत्प्रणतस्य मे ।।
ॐ स्वायंभुवाद्याः कथितास्सप्तैते मनवो मम ।
तदन्तरेषु ये देवा राजानो मुनयस्तथा।।
ॐ अस्मिन् कल्पे सप्त येऽन्ये भविष्यन्ति महामुने।
मनवस्तान् समाचक्ष्व ये च देवादयस्तथा।।
श्री मार्कण्डेय उवाच
ॐ सावर्णिस्सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद्गदतो मम ।।
43
५.
६.
७.
९.
ॐ महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः ।
स बभूव महाभागस्सावर्णिस्तनयो रवेः ।।
ॐ स्वारोचिषेऽतरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः ।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥
१०. ॐ तस्य पालयतस्सम्यक् प्रजाःपुत्रानिवौरसान् ।
बभूवुश्शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ।।
११. ॐ तस्य तैरभवद्युद्धमतिप्रबलदण्डिनः।।
१२. ॐ न्यूनैरपि स तैयुद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः॥ (आसीत्)
१३. ॐ ततस्स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत्।
आक्रान्तस्स महाभागस्तैस्तथा प्रबलारिभिः ।।
१४. ॐ अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः।
तनयैश्च महावीर्यैरिपक्षवशं गतः।
कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥
१५. ॐ ततो मृगया व्याजेन हृतस्वाम्यस्स भूपतिः।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥
१६. ॐ स तत्राश्रममद्राक्षीद्विजवर्य सुमेधसः ।
प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ।।
१७. ॐ तस्थौ कञ्चित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः ।
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ।।
१८. ॐ ममत्वं चाभवत्तस्य प्रयुक्तं विष्णुमायया ।
१९. ॐ सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः।
कथं नु वर्तते राज्यं बलादपहृतः परैः ॥
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत्।
मद्भुत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा ॥
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२०. ॐ न जाने स प्रधानो मे शूरो हस्ती सदा मदः।
मम वैरिवशं यातः कान्भोगानुपलप्स्यते ॥
२१. ॐ ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ।
अनुवृत्तिं धृवं तेऽद्य कुर्वंत्यन्यमहीभृताम् ।।
२२. ॐ मम भार्या वरारोहा पुत्रश्चातीव शोभनः ।
सद्मानि स्वर्गसदृशान्यप्सरःप्रतिमास्त्रियः॥
२३. ॐ असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिस्सततं व्ययम् ।
संचितस्सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ।
२४. ॐ एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ।।
२५. ॐ तत्र विप्राश्रमाभ्यासे वैश्यमेकं ददर्श सः।
निरस्तं पुत्रपौत्राद्यैः स्वजनैः परिवर्तितम् ।
विचरन्तं वनोद्देशे दुःखितं दीनमानसम्॥
२६. ॐ स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः।
सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ।।
२७. ॐ तत्त्वमाख्याहि भद्रं ते यत्ते मनसि वर्तते ।
दुःखमत्र च ते नास्ति यश्शोकस्सोऽपि नश्यति ।।
२८. ॐ इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितं ।
प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ।
२९. ॐ समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ।।
३०. ॐ पुत्रैर्दारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ।
विहीनस्स्वजनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्।
वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबंधुभिः ।।
45
३१. ॐ सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् । प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः ।। ३२. ॐ किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु सांप्रतम् (न वेद्मि)। ३३. ॐ कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः (न वेद्मि)। ३४. ॐ एतन्मनसि राजेन्द्र वर्ततेऽहर्निशं मम ।। ܀ राजोवाच- ३५. ॐ यैर्निरस्तो भवान्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः । तेषु किं भवतस्स्नेहमनुबध्नाति मानसम्।। वैश्य उवाच- ३६. ॐ एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः।। ३७. ॐ किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ।। ३८. ॐ यैस्सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः । पतिस्वजनहार्द च हार्दितेष्वेव मे मनः ।। ३९. ॐ किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते । यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बंधुषु ।। ४०. ॐ तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते । ४१. ॐ (तत्) किं करोमि यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ।। श्री मार्कण्डेय उवाच- ४२. ॐ ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ।। 46 ४३. ॐ समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्ह तेन संविदम्। उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ ।। राजोवाच- ४४. ॐ भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत्।। ४५. ॐ दुःखाय यन्मे मनसस्स्वचित्तायत्ततां विना ।। ४६. ॐ ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि । जानतोऽपि यथाऽज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम ।। ४७. ॐ अयं च निष्कृतः पुत्रैदारैर्भूत्यैस्तथोज्झितः । स्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति ।। ४८. ॐ एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यंतदुःखितौ । दृष्ट दोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ॥ ४९. ॐ तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि । ममास्य च भवत्येषा विवेकांधस्य मूढता ।। ऋषिरुवाच - ५०. ॐ ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे ।। ५१. ॐ विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक् ।। ५२. ॐ दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे । केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ।। ५३. ॐ ज्ञानिनो मनुजास्सत्यं किं नु ते न हि केवलम् । यतो हि ज्ञानिनस्सर्वे पशुपक्षिमृगादयः ॥ 47 ܀ ५४. ॐ ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् । मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः ।। ५५. ॐ ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतंगाञ्छाबचंचुषु । कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा। ५६. ॐ मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषास्सुतान्प्रति । लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि । ५७. ॐ तथापि ममतावर्ते मोहगते निपातिताः । महामायाप्रभावेन संसारस्थितिकारिणा ।। ५८. ॐ तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः। महामाया हरेश्चैतत्तया संमोह्यते जगत् ॥ ५९. ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ ६०. ॐ तया विसृज्यते विश्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । ६१. ॐ सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।। ६२. ॐ सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ।। ६३. ॐ संसारबंधहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ राजोवाच- ६४. ॐ भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्। ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ॥ ६५. ॐ यत्स्वभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ।। 48
ऋषिरुवाच -
६६. ॐ नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ।।
३७. ॐ तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।।
३८. ॐ देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा।
उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ॥
६९. ॐ योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ।
आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः॥
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ।
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ।।
३०. ॐ स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः।
दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ।।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः।
विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ।।
विश्वेश्वरी जगद्धात्री स्थितिसंहारकारिणीम्।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ।।
ब्रह्मकृत - देवीस्तोत्रम्
११. ॐ त्वं स्वाहा (असि)।
१२. ॐ त्वं स्वधा (असि)।
३. ॐ त्वं हि वषट्कारः (असि)।
१४. ॐ (त्वं) स्वरात्मिका (असि)॥
१५. ॐ (त्वं) सुधा (असि)।
६. ॐ त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता (असि)।
49
७७. ॐ (त्वमेव) अर्धमात्रा स्थिता नित्या याऽनुच्चार्या-
विशेषतः॥
७८. ॐ त्वमेव संध्या (असि)।
७९. ॐ (त्वं) सावित्री (असि)।
८०. ॐ त्वं वेदजननी (असि)।
८१. ॐ (त्व) परा (असि)।
८२. ॐ त्वयैतद्धार्यते विश्वम् ।।
८३. ॐ त्वयैतत्सृज्यते जगत् ।।
८४. ॐ त्वयैतत्पाल्यते देवि ।।
८५. ॐ त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ।।
८६. ॐ (हे जगन्मये! त्वं) विसृष्टौ सृष्टिरूपा (असि)।
८७. ॐ (त्व) स्थितिरूपा (चासि) पालने।
८८. ॐ (त्व) तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ।।
८९. ॐ (त्वं) महाविद्या (असि)।
९०. ॐ (त्वं) महामाया (असि)।
९१. ॐ (त्वं) महामेधा (असि)।
९२. ॐ (त्वं) महास्मृतिः (असि)।
९३. ॐ (त्वं) महामोहा (असि)।
९४. ॐ (त्वं) भगवती (असि)।
९५. ॐ (त्वं) महादेवी (असि)।
९६. ॐ (त्वं) महासुरी (असि)।
९७. ॐ सर्वस्य (मूल) प्रकृतिस्त्वं हि (असि)।
९८. ॐ (त्वं हि) गुणत्रयविभाविनी (असि)।
९९. ॐ (त्वं) कालरात्रिः (असि)।
50
१०७-१.
१००. ॐ (त्वं) महारात्रिः (असि)॥
१०१. ॐ (त्वं) मोहारात्रिश्च (असि)।
१०२. ॐ (त्वं) दारुणा (रात्रिरसि)।
१०३. ॐ (त्वं घोररात्रिरसि)।
१०४. ॐ त्वं श्रीः (असि)।
१०५. ॐ त्वं ईश्वरी (असि)।
१०६. ॐ त्वं ह्रीः (असि)।
१०७. ॐ त्वं बुद्धिः (असि)।
ॐ त्वं बोधलक्षणा (असि) ।
१०८. ॐ (त्वं) लज्जा (असि)।
१०९. ॐ (त्वं) पुष्टिः (असि)।
११०. ॐ (त्वं) तथा तुष्टिः (असि)।
१११. ॐ (त्वं) शान्तिः (असि)।
११२. ॐ (त्वं) क्षान्तिरेव च (असि)।
११३. ॐ (त्वं) खड्गिनी (असि)।
११४. ॐ (त्वं) शूलिनी (असि)।
११५. ॐ (त्वं) घोरा (असि)॥
११६. ॐ (त्व) गदिनी (असि)।
११७. ॐ (त्वं) चक्रिणी (असि)।
११८. ॐ (त्वं) तथा शंखिनी (असि)।
११९. ॐ (त्वं) चापिनी (असि)।
१२०. ॐ (त्वं) बाणभुशुंडीपरिघायुधा (असि)।
१२१. ॐ (त्वं) सौम्या (असि) ।।
१२२. ॐ (त्वं) सौम्यतरा (असि)॥
१२३. ॐ (त्व) अशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी (असि)।
51
१२४. ॐ (त्वं) परापराणां परमा (असि)।
१२५. ॐ त्वमेव परमेश्वरी (असि)।
१२६. ॐ यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाऽखिलात्मिके।
तस्य सर्वस्य या शक्तिस्सा त्वं किं स्तूयसे मया ।।
१२७. ॐ यया त्वया जगत्स्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् ।।
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ।।
१२८. ॐ विष्णुश्शरीरग्रहणमहमीशान एव च ।
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान्भवेत्॥
१२९. ॐ सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता।
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ।।
१३०. ॐ प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ॥
१३१. ॐ बोधश्च क्रियतामस्य हंतुमेतौ महासुरौ ।।
१३२. ॐ एवं स्तुता (आसीत्) तदा देवी तापसी तत्र वेधसा।
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहंतुं मधुकैटभौ ।।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः।
(सा देवी) निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।।
१३३. ॐ उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः।
एकार्णवेऽहिशयनात्॥
१३४. ॐ ततस्स ददृशे च तौ।
मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ।
क्रोधरक्तेक्षणौ हंतुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ।।
52
१३५. ॐ समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान्हरिः। पञ्चवर्षसहस्त्राणि बाहुप्रहरणो विभुः। १३६. ॐ तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ। उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो वियतामिति केशवम् ।। श्री भगवानुवाच - १३७. ॐ भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि । १३८. ॐ किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मया ।। ऋषिरुवाच- १३९. ॐ वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत्। विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः ।। १४०. ॐ प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वन्मृत्युरावयोः । आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ।। १४१. ॐ तथेत्युक्त्वा भगवता शंखचक्रगदाभृता। कृत्वा चक्रेण वै छिन्ने जघने शिरसी तयोः।। १४२. ॐ एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् । प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श्रुणु वदामि ते ॥ इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणान्तर्गत सावर्णिकमन्वन्तर कथान्तर्गत देवीमाहात्म्यान्तर्गतो मधुकैटभवधत्वेन प्रसिद्धः मूलश्लोकमन्त्रविभागे नवशतीमन्त्रमालायां प्रथमाऽध्यायः समाप्तः।। श्री परमेश्वरार्पणमस्तु ।। 53
RAVEEN
श्री.
द्वितीयाऽध्यायः
ॐ नमश्चण्डिकायै
AMADHAN
MRAYARI
ऋषिरुवाच -
१४३. ॐ देवासुरमभूयुद्धं पूर्णमब्दशतंपुरा।
महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे ।
१४४. ॐ तत्रासुरैर्महावीयैर्देवसैन्यं पराजितम्।
जित्वा च सकलान्देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः ।।
१४५. ॐ ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम्।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ।।
१४६. ॐ यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् ।
त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ।।
१४७. ॐ सूर्येद्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च ।
अन्येषां चाधिकारान्स स्वयमेवाधितिष्ठति ।।
१४८. ॐ स्वर्गान्निराकृतास्सर्वे तेन देवगणा भुवि ।
विचरन्ति यथा मा महिषेण दुरात्मना ।।
१४९. ॐ एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् ।
शरणं वः प्रपन्नास्स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ।।
ऋषिरुवाच
१५०. ॐ इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः।
चकार कोपं शंभुश्च भृकुटीकुटिलाननौ ।।
54
ब
१५१. ॐ ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः ।
निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणश्शंकरस्य च ।।
१५२. ॐ अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ।।
१५३. ॐ अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ।।
१५४. ॐ अतुलं तत्र तत्तेजस्सर्वदेवशरीरजम् ।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ।।
१५५. ॐ यदभूच्छांभवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् ।।
१५६. ॐ याम्येन चाभवन् केशाः ।।
१५७. ॐ बाहवो विष्णुतेजसा (अभवन्) ।
५८. ॐ सौम्येन स्तनयोर्युग्मं (अभवत् ।।
५९. ॐ मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् ।।
६०. ॐ वारुणेन च जंघोरू (अभवताम्।।
६१. ॐ नितंबस्तेजसा भुवः(अभवत् ।।
६२. ॐ ब्रह्मणस्तेजसा पादौ (अभवताम्।।
६३. ॐ तदगुल्योऽर्कतेजसा (अभवन्) ।।
६४. ॐ वसूनां च करामुल्यः (अभवन् ।
६५. ॐ कौबेरेण च नासिका (अभवत्) ।।
६६. ॐ तस्यास्तु दन्तास्संभूताः प्राजापत्येन तेजसा ।।
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55
१६७. ॐ नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ।।
१६८. ॐ भ्रुवौ च (जज्ञे) संध्ययोस्तेजः ।।
१६९. ॐ (जज्ञे) श्रवणावनिलस्य च ।।
१७०. ॐ अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ।।
१७१. ॐ ततस्समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम्।
तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः ।।
१७२. ॐ ततो देवा ददुस्तस्यै स्वानि स्वान्यायुधानि च ।।
१७२-१. ॐ ऊचुर्जय जयेत्युच्चैर्जयन्ती ते जयैषिणः ।।
१७३. ॐ शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकभृत् ।।
१७४. ॐ चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाट्य स्वचक्रतः ।।
१७५. ॐ शखं च वरुणः (ददौ)।
१७६. ॐ शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः ।।
१७७. ॐ मारुतो दत्तवान् चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ।।
१७८. ॐ वज्रमिन्द्रस्समुत्पाट्य कुलिशादमराधिपः (ददौ)।
१७९. ॐ ददौ तस्यै सहस्त्राक्षो घंटामैरावताद्गजात् ।।
१८०. ॐ कालदण्डाद्यमो दण्डं (ददौ)।
१८१. ॐ पाशं चाम्बुपतिर्ददौ ।।
१८२. ॐ (ददौ) प्रजापतिश्चाक्षमालाम् ।।
१८३. ॐ ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ।।
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१८४. ॐ समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् (ददौ) दिवाकरः ।।
१८५. ॐ कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम् ।।
१८६. ॐ (ददौ) क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे।
चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ।।
अर्थचन्द्रं तथा शुभं केयूरान्सर्वबाहुषु ।
नूपुरौ विमलौ तद्वद्वैवेयकमनुत्तमम् ।
अगुलीयकरत्नानि समस्तास्वगुलीषु च ।।
१८७. ॐ विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ।
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाऽभेद्यं च दंशनम् ।।
१८८. ॐ अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम्।
अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् ।।
१८९. ॐ (अददत्) हिमवान्वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च।।
१९०. ॐ ददाव शून्यं सुधया पानपात्रं धनाधिपः ।।
१९१. ॐ शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ।
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम् ।।
१९२. ॐ अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा।
संमानिता ननादोच्चैस्साट्टहासं मुहुर्मुहुः ।।
१९३. ॐ तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं (आसीत् )नभः ।।
१९४. ॐ अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ।।
१९५. ॐ चुक्षुभुस्सकला लोकाः ।।
१९६. ॐ समुद्राश्च चकंपिरे ।।
57
॥
२०२.
१९७. ॐ चचाल वसुधा।
१९८. ॐ चेलुस्सकलाश्च महीधराः ।।
१९९. ॐ जयेति देवाश्च मुदा तामूचुस्सिंहवाहिनीम् ।।
२००. ॐ तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः।
२० १. ॐ दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः ।
सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः ।।
ॐ आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः ।
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः ।।
२०३. ॐ स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा।
पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् ।।
क्षोभिताशेषपातालां धनुानिस्वनेन ताम्।
दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद्व्याप्य संस्थिताम् ।।
(अष्टाशीतिसहस्त्रेण सखीभिः परिवारिताम् )।
२०४. ॐ ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ।
शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् ।।
२०५. ॐ महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः।
युयुधे (देव्या सह) (चतुरङ्गबलान्वितः)।
२०६. ॐ युयुधे चामरश्चान्यश्चतुरङ्गबलान्वितः ।।
२० ७. ॐ (अयुध्यत) रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः।।
२०८. ॐ अयुध्यतायुतानां च (रथानां) सहस्त्रेण महाहनुः ।।
२०९. ॐ (अयुध्यत) पञ्चाशद्भिश्चनियुतैः
(रथैः) असिलोमा महासुरः।।
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..
१०. ॐ (रथानां) अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे।
११. ॐ गजवाजिसहस्त्रौघैरनेकैरुग्रदर्शनः ।
वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत ।।
युतः कालो रथानां च रणे पञ्चशतायुतैः।
युयुधे चासुरैस्तत्र तावद्भिः परिवारितः ।।
उग्रास्यश्चोग्रवीर्यश्च त्रिनेत्रश्च महाबलः।
करालश्च तथा ताम्रोऽन्धकश्चैव महासुरः ।।
दुर्धरो दुर्मुखश्चैव युयुधे च तथोद्धतः ।।
१२. ॐ बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः ।
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः ।।
१३. ॐ अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः।
युयुधुस्संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः ।।
१४. ॐ कोटि कोटि सहस्त्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ।
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः ।।
१५. ॐ अथ युद्धं समभवद्देव्या सह सुरद्विषाम् ।
लोकक्षयकरं घोरं यथा स्याद्भूतसम्प्लवः ।।
१६. ॐ (ते महासुराः)तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ।।
युयुधुस्संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः ।।
१७. ॐ (ते महासुराः) केचिच्च चिक्षिपुश्शक्तीः (देव्यां) ।।
१८. ॐ केचित्पाशान् (चिक्षिपुः देव्याम् ।।
१९. ॐ तथापरे देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः ।।
२०. ॐ सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका।
लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी ।।
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२२१. ॐ अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः ।
मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी ।।
२२२. ॐ सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेसरी ।
चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः।।
२२३. ॐ निश्श्वासान्मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेम्बिका।
त एव सद्यस्सम्भूता गणाश्शतसहस्त्रशः ।।
२२४. ॐ युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः।
नाशयन्तोऽसुरगणान्देवीशत्तत्युपबृंहिताः ।।
२२५. ॐ अवादयन्त पटहान्गणाः (तस्मिन्युद्धमहोत्सवे)।।
२२६. ॐ शङ्खांस्तथापरे (अवादयन्त तस्मिन्युद्धमहोत्सवे)।।
२२७. ॐ मृदङ्गांश्च तथैवान्ये (गणाः)
तस्मिन्युद्धमहोत्सवे (अवादयन्त) ।।
२२८ ॐ ऋषिभिस्तूयमानास्तु जयं प्रार्थ्य दिवौकसाम् ।।
२२९. ॐ ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिरिष्टिभिः।
खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् ।।
२३०. ॐ (ततो देवी) पातयामास चैवान्यान्
घण्टास्वनविमोहितान् ॥
२३१. ॐ (ततो देवी) असुरान् भुवि
पाशेन बध्वा चान्यानकर्षयत् ।।
२३२. ॐ (ततो देव्या) केचित् (असुराः)
द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैः ।।
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३३. ॐ (ततो देव्या) तथापरे (असुराः)
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते ।।
३४. ॐ (ततो देव्या) वेमुश्च केचित् (असुराः)
रुधिरं मुसलेन भृशं हताः ॥
३५. ॐ (ततो देव्या) केचित् (असुराः)
निपतिता भूमौ भिन्नाश्शूलेन वक्षसि ।।
१३६. ॐ (ततो देव्या) निरन्तराश्शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे।
सेनानुकारिणः प्राणान्मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः।।
२३७. ॐ (ततो देव्या) केषाञ्चित् (असुराणां)बाहवश्छिन्नाः।।
२३८. ॐ (देव्या)छिन्नग्रीवाः (कृताः)तथापरे (असुराः)।
२३९. ॐ शिरांसि (भुवि) पेतुरन्येषां (असुराणाम् ।।
२४०. ॐ अन्ये (असुराः)मध्ये विदारिताः ।।
२४१. ॐ विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुा महासुराः ।।
२४२. ॐ एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः ।।
(उर्त्यां पेतुः)॥
२४३. ॐ छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः ।।
२४४. ॐ कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः ।।
२४५. ॐ ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः ।
(एतावति महाराज कबंधार्बुदकोटयः ।।
क्षणे क्षणे समुत्पन्ना देव्या युयुधिरे पुनः।।)
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२४६. ॐ कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशत्तवृष्टिपाणयः ।
तिष्ठ तिष्ठेत्यभाषन्त देवीमन्ये महासुराः ।।
(तिष्ठ तिष्ठेति चोक्त्वान्ये देव्या युयुधिरे मृथे।
रुधिरैविप्लुताङ्गाश्च सङ्ग्रामे लोमहर्षणे ॥)
२४७. ॐ पातितैरथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा ।
अगम्या साऽभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः ।।
२४८. ॐ शोणितौघा महानद्यस्सद्यस्तत्र प्रसुत्रुवुः ।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ।।
२४९. ॐ क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम्।
२५०. ॐ स च सिंहो महानादमुत्सृजन् धुतकेसरः।।
शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ।।
२५१. ॐ देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं तथासुरैः ।
यथैना तुष्टुवुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ।।
इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणान्तर्गत सावर्णिकमन्वंतरकथान्तर्गत देवी-
माहात्म्यान्तर्गतो महिषासुरसैन्यवधत्वेन प्रसिद्धः मूलश्लोकमंत्रविभागे
नवशतीमंत्रमालायां द्वितीयाऽध्यायः समाप्तः।।
श्री परमेश्वरार्पणमस्तु
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शाम म श्रीः तृतीयाऽध्यायः ॐ नमश्चण्डिकायै ऋषिरुवाच- २५२. ॐ निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः । सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धमथाम्बिकाम्॥ २५३. ॐ स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः । यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः॥ २५४. ॐ तस्य च्छित्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान् जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ।। २५५. ॐ (ततो देवी )चिच्छेद च धनुस्सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम्॥ २५५-१. ॐ (ततो देवी) विव्याध चैनं गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः ।। २५६. ॐ स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । अभ्यधावत्ततो देवी खड्गचर्मधरोऽसुरः ।। २५७. ॐ सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि । आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ।। २५८. ॐ तस्याःखड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन । २५९. ॐ ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ।। 63
:
२६०. ॐ चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः ।
जाज्वल्यमानं तेजोभीरविबिम्बमिवाम्बरात् ।।
२६१. ॐ दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत ।
२६२. ॐ तच्छूलं शतधा तेन (देवीशूलेन) नीतम्।।
२६३. ॐ (शतधा तेन देवी शूलेन) स च महासुरः(नीतः) ।।
२६४. ॐ हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ।
आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ।।
२६५. ॐ सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्याः ।।
२६६. ॐ तामम्बिका द्रुतं ।
हुङ्काराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ।।
२६७. ॐ भग्नां शक्तिं निपतितां
दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः (देव्याम्) ।
चिक्षेप चामरश्शूलम् ॥
२६८. ॐ बाणैः तदपि साच्छिनत् ।।
२६९. ॐ शूलं च विफलं दृष्ट्वा धनुरादाय दानवः ।
देवीं सवाहनां बाणैस्सोऽविध्यत्कृतलाघवः ।।
२७०. ॐ ततस्सिंहस्समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः ।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा।
२७१. ॐ युध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ ।
युयुधातेतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ।।
२७२. ॐ ततो वेगात्खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा।
करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक् कृतम् ।।
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३. ॐ उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः ।।
१४. ॐ दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च (देव्या) निपातितः ॥
१५. ॐ देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम् ।।
६. ॐ बाष्कलं भिन्दिपालेन (जघान परमेश्वरी) ।।
१७. ॐ बाणैस्तानं (जघान परमेश्वरी)।
८. ॐ तथान्धकं (जधान परमेश्वरी)।।
१९. ॐ उग्रास्यं (त्रिशूलेन जधान परमेश्वरी) ॥
१०. ॐ उग्रवीर्यं च (त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी)।
१. ॐ तथैव च महाहनुं (त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी) ।।
१२. ॐ त्रिनेत्रं च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ।।
१३. ॐ (देवी) बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः।।
१४. ॐ (देवी) असिनैवासिलोमानमच्छिनत्सा रणोत्सवे ।।
८५. ॐ (देवी) उग्रदर्शनमत्युग्रैः खड्गपातैरपातयत्।।
८६. ॐ (देवी) दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् ।।
८७. ॐ कालं च कालदण्डेन कालरात्रिरपातयत् ।।
८८. ॐ गणैस्सिंहेन देव्या च जयक्ष्वेडा कृतोच्चकैः ।।
८९. ॐ एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः ।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥
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२९०. ॐ (सोऽसुरः) कांश्चित्तुण्डप्रहारेण
(देवीनिश्श्वासोद्भवान् गणान् माहिषेण
स्वरूपेण पातयामास भूतले)।
२९१. ॐ (सोऽसुरः) खुरक्षेपैस्तथापरान्
(माहिषेण स्वरूपेण पातयामास भूतले)।
२९२. ॐ (सोऽसुरः) लागूलताडितांश्चान्यान्
(माहिषेण स्वरूपेण पातयामास भूतले )।
२९३. ॐ (सोऽसुरः) (अन्यान् गणान्)
शृङ्गाभ्याञ्च विदारितान् ।
(माहिषेण स्वरूपेण पातयामास भूतले)।
२९४. ॐ (सोऽसुरः)वेगेन कांश्चित् (गणान् )
(माहिषेण स्वरूपेण पातयामास भूतले)।
२९५. ॐ (सोऽसुरः) अपरान् (गणान् ) नादेन
(माहिषेण स्वरूपेण पातयामास भूतले)।
२९६. ॐ (सोऽसुरः) भ्रमणेन च (तान् गणान् )
(माहिषेण स्वरूपेण पातयामास भूतले)।
२९७. ॐ (सोऽसुरः) निश्श्वासपवनेनान्यान् (गणान् )
(माहिषेण स्वरूपेण) पातयामास भूतले ।।
२९८. ॐ निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः ।।
२९९. ॐ कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ।।
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३००. ॐ सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः ।
शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च ।।
३० १. ॐ वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत ।।
३० २. ॐ (तस्य महिषासुरस्य) लागूलेनाहतश्चाब्धिः।
प्लावयामास सर्वतः ।।
३० ३. ॐ (तस्य महिषासुरस्य) धुतशृङ्गविभिन्नाश्च
खण्डं खण्डं ययुर्घनाः ॥
३०४. ॐ (तस्य महिषासुरस्य) श्वासानिला-
-स्ताश्शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ।।
३०५. ॐ इति क्रोधसमाध्मातमापतंतं महासुरम् ।
दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाऽकरोत् ।
३०६. ॐ सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम् ।
३०७. ॐ तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृथे ।।
३०८. ॐ (स महिषासुरः) ततो व्याघ्रोऽभवत् ।
(सा देवी तं बबन्ध)॥
३०९. ॐ (स महिषासुरः) पश्चात् खड्गः (अभवत् ।
(सा देवी तं बबन्ध)॥
३१०. ॐ (स महिषासुरः) पोत्री ततः परं (अभवत्) ।
(सा देवी तं बबन्ध)॥
३११. ॐ ततस्सिंहोऽभवत्सद्यः ।
(सा देवी तं बबन्ध)॥
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३१२. ॐ यावत्तस्याम्बिका शिरः । छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ।। ३१३. ॐ तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः। तं खड्गचर्मणा सार्थम् ॥ ३१४. ॐ ततस्सोऽभून्महागजः ।। ३१५. ॐ (स गजरूपो महिषः) करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च ।। ३१६. ॐ कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ।। ३१७. ॐ ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः । तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ।। (महिषः प्राक् ततो व्याघ्रः खड्गः पोत्री हरिः पुमान्। गजोऽथ महिषो भूयो मायावी सोऽभवन्मृथे)। ३१८. ॐ ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमं । पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ।। ३१९. ॐ ननद चासुरस्सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः । विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ।। ३२०. ॐ सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः । उवाच तं मदोद्भूतमुखरागाकुलाक्षरम् ।। ३२१. ॐ गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् । मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥ ऋषिरुवाच- ३२२. ॐ एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽरूढा तं महासुरम् । पादेनाक्रम्य कंठे च शूलेनैनमताडयत्॥ 68
३२३. ॐ ततस्सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्तदा ।
अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या वीर्येण संवृतः ।।
३२४. ॐ अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः ।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्वा निपातितः।।
(एवं स महिषो दैत्यस्सभृत्यस्ससुहृद्गणः।
त्रैलोक्यसुखदायिन्या तया देव्या निपातितः
त्रैलोक्यस्थैस्तथा भूतैर्महिषे विनिपातिते।
जयेत्युक्तं तदा सर्वैस्सदेवासुरमानुषैः ।।
३२५. ॐ ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् ।।
३२६. ॐ प्रहर्षं च परं जग्मुस्सकला देवतागणाः ।।
३२७. ॐ तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सहदिव्यैर्महर्षिभिः।।
३२८. ॐ मुमुचुः पुष्पवर्षाणि दिवि देवा विमानगाः ।।
३२९. ॐ जगुर्गन्धर्वपतयः।।
३३०. ॐ ननृतुश्चाप्सरो गणाः ।।
३३०-१. ॐ ततस्सुरगणास्सर्वे देव्या इन्द्रपुरोगमाः
स्तुतिमारेभिरे कर्तुं निहते महिषासुरे ।।
महिषान्तकरीसूक्तम्
मकुटम्
"तां दुगी दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम्।
नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम्"।
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ऋषिरुवाच -
३३१. ॐ शक्रादयस्सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये
तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या ।
तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा
वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ।।
३३२. ॐ देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्तया
निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या ।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां ।
भक्त्या नतास्स्म।।
३३३. ॐ विदधातु शुभानि सा नः ।।
३३४. ॐ यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो
ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च।
सा चण्डिकाऽखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चासुरभयस्य मतिं करोतु ।।
३३५. ॐ या श्रीः (लक्ष्मीः) स्वयं सुकृतिनां भवनेषु
(अस्ति) (सा स्वयं त्वमेवासि)।।
३३६. ॐ तां त्वां नतास्स्म परिपालय देवि विश्वम् ।।
३३७. ॐ (या) अलक्ष्मीः (अस्ति) पापात्मनां
(भवनेषु सा स्वयं त्वमेवासि) ।।
३३८. ॐ तां त्वां नतास्स्म परिपालय देवि विश्वम् ।।
३३९. ॐ (या) कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः (अस्ति)
(सा स्वयं त्वमेवासि )।
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३४०. ॐ तां त्वां नतास्स्म परिपालय देवि विश्वम् ।।
३४१. ॐ (या) श्रद्धा (अस्ति) सतां (हृदयेषु)
(सा स्वयं त्वमेवासि)॥
३४२. ॐ तां त्वां नतास्स्म परिपालय देवि विश्वम्।।
३४३. ॐ (या) कुलजनप्रभवस्य (हृदयेषु)।
लज्जा (अस्ति) (सा स्वयं त्वमेवासि)।
३४४. ॐ तां त्वां नतास्स्म परिपालय देवि विश्वम् ।।
३४५. ॐ किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत् ।
(सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु)।।
३४६. ॐ किं (वर्णयाम) तव वीर्यमसुरक्षयकारि भूरि
(सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु)।
३४७. ॐ किं (वर्णयाम) चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि ।
सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ।।
३४८. ॐ (हे देवि ! त्वं ) हेतुस्समस्तजगतां (असि)।
३४९. ॐ (हे देवि ! त्वं ) त्रिगुणापि देवैर्न ज्ञायसे ।।
३५०. ॐ (हे देवि ! त्वं ) हरिहरादिभिरपि (न ज्ञायसे)।
३५१. ॐ (हे देवि ! त्वं ) अपारा (असि) ।
३५२. ॐ (हे देवि ! त्वं ) सर्वाश्रया (असि)।
३५३. ॐ (हे देवि ! ) अखिलमिदं जगत् (तव) अंशभूतम् ।।
३५४. ॐ (हे देवि ! त्वं ) अव्याकृता हि (असि) ।
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३५५. ॐ (हे देवि ! त्वं ) परमा (असि) ।।
३५६. ॐ (हे देवि ! ) प्रकृतिस्त्वं (असि) ।।
३५७ ॐ (हे देवि ! ) (त्वं) आद्या (असि)।।
३५८. ॐ यस्यास्समस्तसुरता समुदीरणेन
तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि ।(सा) स्वाहासि वै ।।
३५९. ॐ पितृगणस्य च तृप्तिहेतुः।
उच्चार्यसे त्वमत एव जनैस्स्वधा च ।।
३६०. ॐ या मुक्तिहेतुरविचिंत्य महाव्रता त्वं ।
(विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि)।
३६०-१. ॐ (या ) अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः ।
(विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि)।
३६०-२. ॐ मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषैः ।
विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि ।।
३६१. ॐ (हे देवि ! त्वं ) शब्दात्मिका (असि)।
३६२. ॐ (हे देवि ! त्वं) सुविमला (असि)।
३६३. ॐ (हे देवि ! त्वं ) ऋग्यजुषां निधानम् (असि)।
३६४. ॐ (हे देवि ! त्वं) उद्गीथरम्यपदपाठवतां
च साम्नां (निधानं असि)।
३६५. ॐ (हे देवि ! त्वं ) त्रयी भगवती (असि)।
३६६. ॐ (हे देवि ! त्वं ) भवभावनाय वार्ता च सर्वजगतां
परमार्तिहन्त्री॥
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३६७. ॐ मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा ।। ३६८. ॐ श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा (असि)। ३६९. ॐ गौरी (असि) त्वमेव शशिमौळिकृतप्रतिष्ठा ।। ३७०. ॐ दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा ।। ३७१. ॐ ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र- बिम्बानुकारिकनकोत्तमकान्तिकान्तम् । अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि वक़्तं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ।। ३७२. ॐ दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भृकुटीकराल- मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः। प्राणान्मुमोच महिषस्तदतीव चित्रम् ॥ ३७३. ॐ कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन (न जीव्यते) ।। ३७४. ॐ देवि प्रसीद परमा भवती भवाय (कल्पते) ।। ३७५. ॐ सद्यो विनाशयति कोपवती कुलानि ।। ३७६. ॐ विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेतत् नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ।। ३७७. ॐ ते संमता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः। धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ।। 73 ३७८. ॐ धाणि देवि सकलानि सदैव कर्मा- ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति ।। ३७९. ॐ स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादात् ॥ ३८०. ॐ लोकद्वयेऽपि फलदा ननु देवि तेन । ३८१. ॐ (त्वं) दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः ।। ३८ २. ॐ (त्वं) स्वस्थैस्स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।। ३८३. ॐ दारिद्रयदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाचित्ता ।। ३८४. ॐ एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । सङ्ग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि ।। ३८५. ॐ दृष्ट्यैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वासुरानरिषु यत् प्रहिणोषि शस्त्रम् । लोकान्प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ।। ३८६. ॐ खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम् । यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड- योग्याननं तव विलोकय तां तदेतत् ।। ३८७. ॐ दुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं (भवति)। 74 ३८७-३. ३८७-१. ॐ रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः ।। ३८७-२. ॐ वीर्यं च हन्तृहृतदेवपराक्रमाणाम् ।। ॐ वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ।। ३८८. ॐ केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र (न केनापि) ।। ३८९. ॐ चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ।। ३९०. ॐ त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा । नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त- मस्माकमुन्मदसुरारिभवम् ।। ३९१. ॐ (अतः) नमस्ते ।। ३९२. ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिस्वनेन च । ३९३. ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे। भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ।। ३९४. ॐ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते । यानि चात्यन्तघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ।। ३९५. ॐ खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके। करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मानक्ष सर्वतः ।। 75
ऋषिरुवाच -
३९६. ॐ एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैनन्दनोद्भवैः
अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ।।
भत्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैधूंपैस्सुधूपिता ।
प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ।।
३९७. ॐ वियतां त्रिदशास्सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम् ।
ददाम्यहमतिप्रीत्या स्तवैरेभिस्सुपूजिता ।।
कर्तव्यमपरं यच्च दुष्करं तन्निवेद्यताम् ।
तुष्टास्मि स्तोत्रमुख्येन तथैवाराधनेन च ।।
युष्माकं सोपहारेण भत्त्या प्रणतिपूर्वया ।
महिषोऽयं महावीर्यो निहतश्च मया रणे ।
जगतामुपकाराय किमन्यदवशिष्यते ।
करोमि भवतां कार्य सम्प्रीत्या दुष्करं महत् ।।
वरं च सम्प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ।
(इति श्रुत्वा प्रहृष्टास्ते कृताञ्जलिपुटा जगुः) ।
३९८. ॐ भगवत्या कृतं सर्वं न किञ्चिदवशिष्यते ।
यदयं निहतश्शत्रुरस्माकं महिषासुरः।
३९९. ॐ यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि ।
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः ।।
ॐ यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ।
तस्य वित्तर्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम्।
वृद्धये (भवेथाः)॥
४००.
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४० १. ॐ अस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथास्सर्वदाम्बिके । ४०२. ॐ ऐश्वर्यं विपुलं देहि मानसाह्लादकारकम् । अलमेतर्हि देवेशि त्रैलोक्यहितकाम्यया ।। पूर्वमेव वरं प्रादास्त्वमस्मद्वचनात्किल। वधायासुरवर्गस्य हिताय च दिवौकसाम्॥ ऋषिरुवाच - ४०३. ॐ इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथात्मनः । तथेत्युक्त्वा भद्रकाळी बभूवान्तर्हिता नृप ।। ४०४. ॐ इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा । देवी देवशरीरेभ्यो जगत्रयहितैषिणी ।। ४०५. ॐ पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाऽभवत्। वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ।। रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी। तच्छृणुष्व मयाऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ।। : इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणांतर्गत सावर्णिकमन्वंतरकथांतर्गत- देवीमाहात्म्यांतर्गतो महिषासुरवधत्वेन प्रसिद्धः मूलश्लोकमंत्रविभागे नवशतीमंत्रमालायां तृतीयाध्यायः समाप्तः।। श्री परमेश्वरार्पणमस्तु 77
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चतुर्थाऽध्यायः
ॐ नमश्चण्डिकायै
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ऋषिरुवाच
४०६. ॐ कश्यपस्य धनुर्नाम भार्यासीद्विजसत्तम ।।
४०७. ॐ तस्याः पुत्रत्रयं जज्ञे सहस्त्राक्षबलाधिकम् ।।
४०८. ॐ ज्येष्ठश्शुम्भ इति ख्यातो निशुम्भश्चापरोऽसुरः ।
तृतीयो नमुचिर्नाम महाबलपराक्रमः ।।
४०९. ॐ तत्र शुम्भनिशुम्भौ तु पराजेतुं दिवौकसः।
अप्राप्तयौवनावेव चेरतुस्तप उत्तमम् ।।
४१०. ॐ वर्षाणामयुतं दिव्यं देवविस्मापनं महत् ।
निराहारौ यतात्मानौ पुष्कर लोकपावने (चेरतुः)।।
४११. ॐ ततः प्रसन्नो भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।
मनोऽभिलषितान्कामांस्तयोः प्रादादनुत्तमान् ।।
४१२. ॐ अवध्यत्वं सुरैस्सिद्धैर्गन्धर्वैः किन्नरैनरैः ।
आवयोस्तु वधः कैश्चित् पुंभिर्न भवतु प्रभो।।
४१३. ॐ इति चाभ्यर्थितो ब्रह्मा ताभ्यां प्राह तथास्त्विति ।।
४१४. ॐ एवं लब्ध्वा वरं स्रष्टुः पीडयामासतुस्सुरान् ।।
४१५. ॐ ततश्शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः।
अभूद्युद्धं महाघोरं महिषस्य यथा पुरा ।।
निर्जित्य सकलान्देवान् पदं प्राप्य दिवौकसाम् ।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात् ।।
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४१६. ॐ तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च ।।
४१७. ॐ तावेव पवनधिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च।
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः (आसन्) ।।
४१८. ॐ तेषु तेष्वधिकारेषु लोकेषु च महीपते ।
स्वानेव प्रथितान् दैत्यान् तत्र तत्र न्ययोजयत् ।।
४१९, ॐ हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः ।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम् ।।
४२०. ॐ तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽपत्सु स्मृताखिलाः ।
भवतां नाशयिष्मामि तत्क्षणात्परमापदः ।।
४२१. ॐ इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम् ।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः ।।
अपराजितासूक्तम्
देवा ऊचुः
-
४२२. ॐ नमो देव्यै (नमः)।
४२३. ॐ (नमो) महादेव्यै (नमः) ।
४२४. ॐ (नमः) शिवायै सततं नमः ॥
४२५. ॐ (नमः) प्रकृत्यै (नमः)।
४२६. ॐ (नमो) भद्रायै नियताः प्रणतास्स्म ताम् ।।
४२७. ॐ (नमो) रौद्रायै (नमः)।
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४२८. ॐ नमो नित्यायै (नमः)।
४२९. ॐ (नमो) गौर्यै (नमः)।
४३०. ॐ (नमो) धात्र्यै नमो (नमः)।
४३१. ॐ (नमो) (नमः) ज्योत्स्नायै ॥
४३२. ॐ (नमो) इंदुरूपिण्यै (नमः) ।।
४३३. ॐ (नमः) सुखायै सततं नमः ।।
४३४. ॐ कल्याण्यै (वयं) प्रणताः।
४३५. ॐ (नमो) वृद्धयै (नमः) ।
४३६. ॐ सिद्धयै (नमः)।
४३७. ॐ कूम्र्यै नमो नमः ॥
४३८. ॐ (नमो) नैऋत्यै (नमः)।
४३९. ॐ भूभृतां लक्ष्य (नमः)॥
४४०. ॐ (नमः) शर्वाण्यै ते नमो नमः ।।
४४१. ॐ दुर्गायै (नमः)॥
४४२. ॐ दुर्गपारायै (नमः) ।
४४३. ॐ सारायै (नमः) ।
४४४. ॐ सर्वकारिण्यै (नमः)।
४४५. ॐ ख्यात्यै (नमः)।
४४६. ॐ तथैव कृष्णायै (नमः)।
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४४७. ॐ धूम्रायै सततं नमः॥
४४८. ॐ अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः॥
४४९. ॐ नमो जगत्प्रतिष्ठायै (नमः) ।
४५०. ॐ देव्यै नमः।
४५१. ॐ कृत्यै नमो नमः ।।
४५२. ॐ या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४५३. ॐ या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४५४. ॐ या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४५५. ॐ या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४५६. ॐ या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४५७. ॐ या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४५८. ॐ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
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।
४५९. ॐ या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६०. ॐ या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६१. ॐ या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६२. ॐ या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६३. ॐ या देवी सर्वभूतेषु दान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६४. ॐ या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६५. ॐ या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६६. ॐ या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६७. ॐ या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४६८. ॐ या देवी सर्वभूतेषु धृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
४६९. ॐ या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
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७०. ॐ या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
७१. ॐ या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
१७२. ॐ या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४७३. ॐ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४७४. ॐ या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४७५. ॐ इंद्रियाणामधिष्ठात्री भूतानामखिलेषु च ।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः ।।
४७६. ॐ चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत् ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
४७७. ॐ स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्
तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नश्शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्रण्यभिहन्तु चापदः ।।
४७८. ॐ या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-
रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते ।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः
सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ।
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करोतु सा नश्शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ।।
ऋषिरुवाच -
४७९. ॐ एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती।
स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन ।।
४८०. ॐ शैलराजसुता पूर्वं ब्रह्मणस्सृष्टिकौशलम्।
प्रिया च या महेशस्य सर्वलोकहितैषिणी।।
४८ १. ॐ कालीत्युक्ता जगद्धात्री नर्मतश्शम्भुना सती ।
लेभे गौरं वपुर्दिव्यं तप्त्वा च परमं तपः ।।
४८२. ॐ कृष्णवर्णाच्छरीरात्तु शिवा नाम्ना च कौशिकी।
अतीव सुन्दरी रामा कृष्णवर्णा विनिर्गता ।।
४८३. ॐ सोवास चाम्बिकाभ्याशे सेवमाना सुतेव ताम् ।।
४८४. ॐ साब्रवीत्तान्सुरान्सुदंर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का।
शरीरकोशतश्चास्यास्समुद्भूताऽब्रवीच्छिवा ।।
४८५. ॐ स्तोत्रं ममैतक्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः ।
देवैस्समस्तैस्समरे निशुम्भेन पराजितैः ।।
४८६. ॐ शुम्भादीनसुरान्हत्वा प्रीतिं दास्यामि वज्रिणे।
इत्याकर्ण्य गिरं गौरी तामाह सुभगां ततः ।।
४८७. ॐ दक्षिणं हिमवच्छङ्ग गत्वा त्वं भारतान्तिके।
देवकार्यं विधायाशु पश्चादेहि ममान्तिकम् ।।
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ऋषिरुवाच -
१८. ॐ आज्ञाप्य कौशिकीमेवं अमराणां हिताय वै ।
नियुज्य तत्र तां देवीं गौरी स्नातुं जगाम ह ।।
१९. ॐ अथ स्नात्वा ययौ देवी शुक्लवासास्स्वमालयम् ।।
१०. ॐ शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निस्सृताम्बिका।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते ।।
११. ॐ तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया।।
१२. ॐ ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरं ।
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः ।।
१३. ॐ ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता सातीव सुमनोहरा ।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम् ।।
१४. ॐ नैव तादृक्क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम् ।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर ।।
१५. ॐ स्त्रीरत्नमतिचार्वगी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा ।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति।।
१६. ॐ यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे ।।
२७. ॐ ऐरावतस्समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात् (आच्छिद्य)।
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैश्श्रवा हयः।।
२८. ॐ विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे।
रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्धतम् ।।
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४९९. ॐ निधिरेष महापद्मस्समानीतो धनेश्वरात् ।। ५००. ॐ किञ्जल्किनी ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम् ।। ५०१. ॐ छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्त्रावि तिष्ठति ।। ५ ० २. ॐ तथायं (संप्रति ते गेहे तिष्ठति)। स्यन्दनवरो यः पुरासीत्प्रजापतेः ।। ५० ३. ॐ मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता ।। ५० ४. ॐ पाशस्सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे (अस्ति)। ५०५. ॐ निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः (परिग्रहे)। ५०६. ॐ वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी ।। ५०७. ॐ एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते। स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते ।। ऋषिरुवाच - (सुमेधाः) ५०८. ॐ निशम्येति वचश्शुम्भस्सतदा चण्डमुण्डयोः । प्रेषयाममास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम् ।। शुम्भ उवाच . ५०१. ॐ इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम । यथाचाभ्येति संप्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु ।। ऋषिरुवाच- ५१०. ॐ निशम्य दूतो राजोक्तं सुग्रीवो नयकोविदः । तथेति चोत्तवा प्रययौ स्वल्पसैन्यसमन्वितः ।। ॥ 86 ५११. ॐ स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने । सा देवी तां ततःप्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ।। ५१२. ॐ देवि दैत्येश्वरश्शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः। दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ।। ५१३. ॐ अव्याहताज्ञस्सर्वासु यस्सदा देवयोनिषु । निर्जिताखिलदैत्यारिस्स यदाह श्रुणुष्व तत्।। ५१४. ॐ मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः । यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक् ।। ५१५. ॐ त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः । तथैव गजरत्नं च (मया) हृतं देवेन्द्रवाहनम् ।। ५१६. ॐ क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः। उच्चैःश्रवससंज्ञं तु प्रणिपत्य समर्पितम् ।। ५१७. ॐ यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च । रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने ।। ५१८. ॐ स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम् । सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम् ।। ५१९. ॐ मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम्। भज त्वं चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः ॥ ५२०. ॐ परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्पप्ररिग्रहात् । एतद्बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज ॥ ऋषिरुवाच- ५२१. ॐ इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ। दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत् ।। 87 ५२२. ॐ सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम् । त्रैलोक्याधिपतिश्शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः ।। ५२३. ॐ किंत्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम् । श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा ।। ५२४. ॐ यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्प व्यपोहति । यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ।। ५२५. ॐ तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः। मां जित्वा किञ्चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥ दूत उवाच- ५२६. ॐ अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः । त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदने शुम्भनिशुम्भयोः ।। ५२७. ॐ अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि । तिष्ठन्ति संमुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका ॥ ५२८. ॐ इन्द्राद्यास्सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे। शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम् ।। ५२९. ॐ सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्थं शुम्भनिशुम्भयोः। केशाकर्षनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि ।। देव्युवाच- ५३०. ॐ एवमेतद्बली शुम्भो निशुम्भश्चातिवीर्यवान्। किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ।। 88
५३१. ॐ स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमाद्वतः ।
तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं (यत्) करोतु तत् ।
इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणान्तर्गत सावर्णिकमन्वन्तरकथान्तर्गत देवी
माहात्म्यान्तर्गतः शक्रादिकृतदेवीविभूतियोगस्तोत्रं, देवीसुग्रीवसंवादो
नाम मूलश्लोकमंत्रविभागे नवशतीमंत्रमालायां
तुरीयाऽध्यायस्समाप्तः।
श्री परमेश्वरार्पणमस्तु
| अथ पञ्चमाध्यायः ॐ नमश्चण्डिकायै BAAT ऋषिरुवाच - ५ ३२. ॐ इत्याकर्ण्य वचो देव्यास्स दूतोऽमर्षपूरितः । समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात् ।। ५३३. ॐ तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकासुरराट् ततः। सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम् ।। ५३४. ॐ हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः । तामानय बलाहुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम् ।। ५३५. ॐ तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि चोत्तिष्ठते परः। स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा ।। ऋषिरुवाच- ५३६. ॐ तेनाज्ञप्तस्ततश्शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः । वृतष्षष्ठ्या सहस्त्राणामसुराणां द्रुतं ययौ ।। ५३७. ॐ स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थितां । जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः । ५३८. ॐ न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति। ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम् ।। देव्युवाच - ५३९. ॐ दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः । बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम् ।। 90
ऋषिरुवाच -
५४०. ॐ इत्युक्तस्सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः ।
हुङ्कारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका तदा ।।
५४१. ॐ अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।
ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वथैः।।
५४२. ॐ ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम् ।
पपातासुरसेनायां सिंहो देव्यास्स्ववाहनः ।।
५४३. ॐ (स सिंहः) कांश्चित्करप्रहारेण दैत्यान् (जघान)।
५४४. ॐ (स सिंहः) आस्येन चापरान् (दैत्यान् जघान)।।
५४५. ॐ (स सिंहः ) आक्रम्य चाधरेणान्यान्
स जघान महासुरान् ॥
५४६. ॐ केषाञ्चित् (महासुराणां) पाटयामास
नखैः कोष्ठानि केसरी।।
५४७. ॐ तथा (केषाञ्चिन्महासुराणां) तलप्रहारेण
शिरांसि कृतवान् पृथक् ॥
५४८. ॐ (केचिन्महासुराः) विच्छिन्नबाहुशिरसः
कृतास्तेन तथापरे॥
५४९. ॐ पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां
(महासुराणां) धुत केसरः।।
५५०. ॐ क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना ।
तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना ।।
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५५१. ॐ श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम् । बलं च क्षपितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः ।। चुकोप दैत्याधिपतिश्शुम्भः प्रस्फुरिताधरः ।। ५५१-१. ॐ (ततश्शुम्भः) आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ।। ५५२. ॐ हे चण्ड, हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ । तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु।। ५५३. ॐ केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वस्संशयो युधि । तदाशेषायुधैस्सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम्।। ५५४. ॐ तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते। शीघ्रमागम्यतां बध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम् ॥ ऋषिरुवाच- ५५५. ॐ आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः । चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः ।। ५५६. ॐ अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं वादिनो द्रुतम् । गृहीतुकामास्तां देवीं शूलपट्टिशधारिणः ।। ५५७. ॐ ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम् । सिंहस्योपरिशैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने । ५५८. ॐ ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्धताः । आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः ।। ५५९. ॐ ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन्प्रति ।। ५६०. ॐ कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा। 92
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काल्या उद्भवः
६१. ॐ भ्रुकुटीकुटीलात्तस्या ललाटफलकाहृतम् ।
काली करालवदना विनिष्कान्तासिपाशिनी ।।
६२. ॐ (सा काली) विचित्रखट्वाङ्गधरा अहिमालाविभूषणा।
द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्करक्तातिभैरवा ।।
अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा।
निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङमुखा ।।
सा वेगेनाभिपातिता घातयन्ती महासुरान् ।
सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तबलम् ॥
६३. ॐ (सा काली) पाणिंग्राहाङ्कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान्
समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान् ।।
६४. ॐ (सा काली) तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह ।
निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयत्यतिभैरवम् ।।
६५. ॐ (सा काली) एकं जग्राह केशेषु ।।
६६. ॐ (सा काली) ग्रीवायामथ चापरं (जग्राह)।
६७. ॐ (सा काली) पादेनाक्रम्य चैवान्यं (जग्राह)।।
६८. ॐ (सा काली) उरसान्यमपोथयत् ।।
१६९. ॐ (सा काली) तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः।
मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि।।
१७०. ॐ (सा काली) बलिनां तद्बलं सर्वमसुराणां
दुरात्मनां ममर्द ।।
२७१. ॐ (सा काली) अभक्षयच्चान्यान् ।।
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५७२. ॐ (सा काळी) अन्यांश्चाताडयत्तथा ।।
५७३. ॐ (काल्या) असिना निहताः केचित् ।।
५७४. ॐ (काल्या) केचित्खट्वाङ्गताडिताः ।।
५७५. ॐ (काल्या) जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा।
५७६. ॐ क्षणेन तद्बलं सर्वमसुराणां निपातितम् ।
दृष्ट्वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम् ।।
५७७. ॐ शरवषैर्महाभीमैीमाक्षीं तां महासुरः।।
छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तःस्सहस्त्रशः ।।
५७८. ॐ तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम्।
भभुयथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम् ।।
५७९. ॐ ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी।
काली करालवतान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला ॥
५८०. ॐ उत्थाय च महासिं 'हुँ' देवी चण्डमधावत ॥
५८१. ॐ गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत् ।।
५८२. ॐ अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् ।
५८३. ॐ तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा।
५८४. ॐ हतशेषं ततस्सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् ।
मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम् ।।
५८५. ॐ शिरश्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मौण्डमेव च।
प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम् ।।
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५८६. ॐ मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू । युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भ निशुम्भं च हनिष्यसि ।। ऋषिरुवाच- ५८७. ॐ तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ । उवाच कालीं कल्याणी ललितां चण्डिका वचः ।। ५८८. ॐ यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता । चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ।। इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणान्तर्गत - सावर्णिकमन्वन्तर- कथान्तर्गत - देवीमाहात्म्यान्तर्गतः चण्डमुण्डवधो नाम मूलश्लोकमन्त्रविभागे नवशतीमन्त्रमालायां पंचमाऽध्यायः समाप्तः।। श्री परमेश्वार्पणमस्तु ।। 95
षष्ठाऽध्यायः
ॐ नमश्चण्डिकायै
जसमा
ऋषिरुवाच
५८९. ॐ चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते ।
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः (चुकोप)।।
५९०. ॐ ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान् ।
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ।।
५९१. ॐ अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः ।।
(निर्यान्तु)॥
५९२. ॐ कम्बूनां चतुराशीतिनिर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ।।
५९३. ॐ कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै ।
(निर्गच्छन्तु ममाज्ञया)।
५९४. ॐ शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ।
५९५. ॐ कालकाः (असुराः) युद्धाय सज्जा निर्यान्तु,
आज्ञया त्वरिता मम॥
५९६. ॐ दौहृदाः (असुराः) युद्धाय सज्जा निर्यान्तु,
आज्ञया त्वरिता मम॥
५९७. ॐ मौर्याः(असुराः) युद्धाय सज्जा निर्यान्तु,
आज्ञया त्वरिता मम ।।
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५९८. ॐ कालकेयास्तथाऽसुराः । युद्धाय सज्जा निर्यान्तु, आज्ञया त्वरिता मम ।। ऋषिरुवाच- ५९९. ॐ इत्याज्ञप्याऽसुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः । निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ।। ६००. ॐ उत्पाता बहवस्तत्र प्रादुरासन् सहस्त्रशः। ६०१. ॐ उत्पातमेघा ववृषुरस्थिशोणितकर्दमम् ।। ६०२. ॐ क्रव्यादा व्यनदन घोरं शिवाश्चापि ववाशिरे ।। ६० ३. ॐतानुत्पाताननादृत्य प्रययौ स हिमाचलम् ।। ६० ४. ॐ आयातं चण्डिका (कौशिकी) दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम् । ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ।। ६०५. ॐ ततस्सिंहो महानादमतीव कृतवान् नृप ।। ६०६. ॐ घण्टास्वनेन तन्नादमम्बिका चोपद्व्हयत् ॥ ६०७. ॐ धनुर्व्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा। निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ।। ६०८. ॐ तन्निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम् । देवी (कौशीकी) सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिता :।। ६०९. ॐ एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम् । भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः ।। ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः।। 97 ६१०. ॐ यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम् । तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान् योद्धमाययौ ।। ६११. ॐ हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः । आयाता ब्रह्मणशक्तिः ब्रह्माणी साऽभिधीयते ।। ६१२. ॐ माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी। महाहिवलया प्राप्ता चन्द्रलेखाविभूषणा ।। ६१३. ॐ कौमारीशक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना । योद्धमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी ।। ६१४. ॐ तथैव वैष्णवीशक्तिर्गरुडोपरिसंस्थिता । शङ्खचक्रगदाशार्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ।। ६१५. ॐ यज्ञवाराहमतुलं रूपं या बिभ्रतो हरेः । शक्तिस्साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ।। ६१६. ॐ नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः । प्रप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ।। ६१७. ॐ वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरिस्थिता। प्राप्ता सहस्त्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ।। ६१८. ॐ ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः । हन्यन्तामसुराश्शीघ्रं मम प्रीत्याह चण्डिकाम् ।। ऋषिरुवाच- ६१९. ॐ ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्ततिभीषणा। चण्डिकाशक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ।। 98 ६२०. ॐ सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता। दूतत्वं गच्छ भगवन् पार्थं शुम्भनिशुम्भयोः।। ६२१. ॐ ब्रूहि शुम्भ निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ । ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः।। ६२२. ॐ (हे दैत्याः) त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवास्सन्तु हविर्भुजः। यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ।। ६२३. ॐ बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकांक्षिणः । तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः।। ऋषिरुवाच- ६२४. ॐ यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवस्स्वयम् । शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततस्सा ख्यातिमागता । ६२५. ॐ तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याश्शर्वाख्यातं महासुराः । अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता ।। ६२६. ॐ ततः प्रथममेवाग्रे शरशत्तवृष्टिवृष्टिभिः । ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ।। ६२७. ॐ सा च तान् प्रहितान् बाणान् शूलशक्तिपरश्वथान् । चिच्छेद लीलयाध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ।। ६२८. ॐ तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान् । खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन् कुर्वन्ती व्यचरत्तदा ।। ६२९. ॐ कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः । ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून् येन येन स्म धावति ।। 99
६३०. ॐ माहेश्वरी त्रिशूलेन (दैत्यान् जघान)।
६३१. ॐ तथा चक्रेण वैष्णवी (दैत्यान् जघान)।
६३२. ॐ तथा शक्त्यातिकोपन दैत्यान् जघान कौमारी ।।
६३३. ॐ ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः ।
पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥
६३४. ॐ तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः ।
वराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥
६३५. ॐ नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान् ।
नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगन्तरा ।।
६३६. ॐ चंडाट्टहासैरसुराः शिवदूत्याभिदूषिताः॥
६३७. ॐ (तयाऽभिदूषिता असुराः) पेतुः पृथिव्याम् ॥
६३८. ॐ पतितांस्तान् चखादाथ सा तदा ।।
६३९. ॐ इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान् ।
दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ।।
६४०. ॐ पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान्मातृगणार्दितान् ।
योद्धमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः।।
६४१. ॐ भागिनेयो महावीर्यस्तयोश्शुम्भनिशुम्भयोः ।
क्रोधवत्यास्सुतो ज्येष्ठो महाबलपराक्रमः।।
६४२. ॐ रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः ।
समुत्पतति मेदिन्यास्तत्प्रमाणस्तदाऽसुरः।
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६४३. ॐ युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशत्तया महासुरः।।
६४४. ॐ ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत्॥
६४५. ॐ कुलिशेनाहतस्यास्य बहु सुस्त्राव शोणितम् ।।
६४६. ॐ समुत्तस्थुस्तदा योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ।।
६४७. ॐ यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः ।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः।।
६४८. ॐ ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः ।
समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ।।
६४९. ॐ पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा।
ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जातास्सहस्त्रशः ।।
६५०. ॐ वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह ।।
६५१. ॐ गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ।।
६५२. ॐ वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्त्रावसम्भवैः।
सहस्त्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ।।
६५३. ॐ शक्त्या जघान कौमारी (रक्तबीजं महासुरम् )।।
६५४. ॐ वाराही च तथासिना (जघान रक्तबीजं महासुरम
६५५. ॐ माहेश्वरी त्रिशूलेन (जधान )।
रक्तबीजं महासुरम् ॥
६५६. ॐ ब्रह्माणी ब्रह्मदण्डेन (पाटयामास हृदये)।।
६५७. ॐ नारसिंही नखायुधैः ।
पाटयामास हृदये न चचाल तथापि सः ।
101
६५८. ॐ स चापि गदया दैत्यस्सर्वा एवाहनत्पृथक् ।
मातङ्गः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ।।
६५९. ॐ तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि ।
पपात यो वै रक्तौघस्तेनासन् शतशोऽसुराः ।।
६६०. ॐ तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैस्सकलं जगत्।
व्याप्तमासीत्॥
६६१. ॐ ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ।।
६६२. ॐ ततो बभाषिरेऽन्योन्यं दिवि देवा विमानगाः ।
न चेदृशस्सम्बभूव भविता वा महासुरः।
न साम्प्रतं जगति वा रक्तबीजसमः क्वचित् ।।
६६३. ॐ तान्विषण्णान्सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्त्वरा।
उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु ।।
६६४. ॐ मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबीजान्महासुरात् ।
रक्तबिन्दून् प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना ।।
६६५. ॐ भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान् ।
एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ।।
६६६. ॐ भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रान चोत्पत्स्यन्ति चापरे ।
रक्तबीजो महादैत्य एवं निर्मूलमेष्यति ।।
ऋषिरुवाच
६६७. ॐ इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजधान तम्।
६६८. ॐ मुखेन काली जग्राह रक्तबीजस्य शोणितम् ।।
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१६९. ॐ ततोऽसावाजघानाशु गदया तत्र चण्डिकाम् ।।
७०. ॐ न चास्या वेदनां चक्रे गदा पातोऽल्पिकामपि ।।
७१. ॐ तमप्यप्रातयद्देवी गदया दुष्टचेतसम् ।।
७२. ॐ चामुण्डां स गदापातैर्मुखे कट्यां समाहनत् ।।
७३. ॐ लाघवं तस्य तदृष्ट्वा चण्डिका चण्डविक्रमा ।
परिघाग्रेण घोरेण वक्षस्येनमताडयत् ।।
६७४. ॐ तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्त्राव शोणितम् ।
यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा संप्रतीच्छति ।।
६७५. ॐ मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः ।
तांश्चखाधाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम्।।
६७६. ॐ देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभि ऋष्टिभिः ।
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् ।।
६७७. ॐ स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ।
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः ।।
६७८. ॐ तथान्ये बहवो दैत्या मातृभिश्च निपातिताः ।।
६७९. ॐ ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ।।
६८०. ॐ तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः॥
६८१. ॐ गन्धर्वाप्सरसस्सिद्धा ननृतुः पुष्पवर्षिणः ।।
इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणान्तर्गत-सावर्णिकमन्वन्तर
कथान्तर्गत-देवीमाहात्म्यान्तर्गतो रक्तबीजासुरवधत्वेन प्रसिद्धः
मूलश्लोकमन्त्रविभागे नवशतीमन्त्रमालायां
षष्ठाऽध्यायः समाप्तः।।
श्री श्री श्रीः
103
सप्तमाऽध्यायः
ॐ नमश्चण्डिकायै
KHE
ET
राजोवाच
६८२. ॐ विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम ।
देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम् ।।
६८३. ॐ भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते।
चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः।।
ऋषि रुवाच
६८४ . ॐ चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते ।
शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे।
६८५. ॐ हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन् ।
अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययाऽसुरसेनया।
६८६. ॐ तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः ।
संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः ।।
६८७. ॐ आजगाम महावीर्यश्शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः ।
निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः ।।
६८८. ॐ ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः ।
शरवर्षमतीवो मेघयोरिव वर्षतोः।।
६८९. ॐचिच्छेदास्तान् शरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः।।
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६८९-१. ॐ (चण्डिका) ताडयामास चाङ्गेषु
शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ ॥
६९०. ॐ निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम्।
अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम्॥
६९१. ॐ ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम् ।
निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम् ।।
६९२. ॐ छिन्ने चर्मणि खड्गे च (देव्यां) शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः।।
६९३. ॐ (देवी) तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम्।।
६९४. ॐ कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः।
(देव्यां चिक्षेप)।
६९५. ॐ आयातं मुष्टिघातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत्।।
६९६. ॐ आविध्याथ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति ।।
६९७. ॐ साऽपि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता।
६९८. ॐ ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम् ।
आहत्य देवी बाणौधैरपातयत भूतले ।।
६९९. ॐ तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे ।
भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः (शुम्भः) प्रययौ हंतुमम्बिकाम् ।।
७००. ॐ स रथस्थस्तदात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः ।
भुजैरष्टाभिरतुलैाप्याशेषं बभौ नभः।।
105
७०६.
७०१. ॐ तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत् ।।
७०२. ॐ (तथा देवी) ज्याशब्दं चापि
धनुषश्चकारातीव दुस्सहम् ।।
७० ३. ॐ (देवी) पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च।
समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना।।
७० ४. ॐ ततस्सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः ।
पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश ।।
७०५. ॐ ततः काली (चामुण्डा) समुत्पत्य गगनं
मामताडयत् कराभ्याम् ।।
ॐ तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः ।।
७०७. ॐ अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह ।।
७०८. ॐ तैश्शब्दैरसुरास्त्रेसुश्शुम्भः कोपं परं ययौ ।।
ॐ दुरात्मन् तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा।
तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः।।
७०९. ॐ शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा।
आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया।
७१०. ॐ सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम् ।
(तं सिंहनादं) निर्घातनिस्वनो घोरो जितवानवनीपते ।
७११. ॐ शुम्भमुक्तान् शरान् देवी शुम्भस्तत्प्रहितान् शरान्।
चिच्छेद स्वशरैरुग्नै श्शतशोऽथ सहस्त्रशः।।
७१२. ॐ ततस्सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम् ।।
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७०८-१.
७१३. ॐ स तदाभिहतो भूमौ मूर्छितो निपपात ह ।।
७१४. ॐ ततो निशुम्भस्सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः ।
आजघान शरैर्देवीं काली केसरिणं तथा ।।
७१५. ॐ पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः ।
चक्रायुतेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम्।।
७१६. ॐ ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी ।
चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैस्सायकांश्च तान् ।।
७१७. ॐ ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम् ।
अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः ।।
७१८. ॐ तस्यापतत एवाशु खड्गेन शितधारेण
गदां चिच्छेद चण्डिका ।।
७१९. ॐ स च शूलं समाददे ।।
७२०. ॐ शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरानम्।
हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका ।।
७२१. ॐ भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निस्सृतोऽपरः।
महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन् ।।
७२२. ॐ तस्य निष्क्रमतो देवी प्रहस्य स्वनवत्तदा ।
शिरश्चिच्छेद खड्गेन ।।
७२३. ॐ ततोऽसावपतद्भुवि ।।
७२४. ॐ ततस्सिंहश्चखादोग्रदंष्टा क्षुण्ण शिरोधरान् ।।
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७२५. ॐ (अन्यान्) असुरांस्तांस्तथा (कृत्वा) काली (चखाद)।। ७२६. ॐ शिवदूती तथा (कृत्वा) अपरान् (चखाद)। ७२७. ॐ कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशर्महासुराः ।। ७२८. ॐ ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः।। ७२९. ॐ माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे ।। ७३०. ॐ वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि । ७३१. ॐ खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः ॥ ७३२. ॐ वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथाऽपरे ।। ७३३. ॐ नखैर्विदारिताश्चान्ये नारसिंह्या महासुराः ।। ७३४. ॐ केचिद्विनेशुरसुराः।। ७३५. ॐ केचिन्नष्टा महाहवात्।। ७३६. ॐ भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूती मृगाधिपैः ।। ऋषिरुवाच- ७३७. ॐ निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम् । हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ।। ७३८. ॐ बलावलेपदुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह। अन्यासां बलमाश्रित्य युध्यसे यातिमानिनी ।। ७३९. ॐ एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा (अस्ति)। पश्यैता दुष्ट! मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥ 108 ऋषिरुवाच- ७४०. ॐ ततस्समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् । तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ।। ७४१. ॐ अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता । तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥ ऋषिरुवाच - ७४२. ॐ ततः प्रववृते युद्धं देव्याश्शुम्भस्य चोभयो । पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥ ७४३. ॐ शरवरिशतैश्शस्त्रैस्तथास्त्रैश्चैव दारुणैः। तयोर्युद्धमभूद्धयस्सर्वलोकभयङ्करम् ।। ७४४. ॐ दिव्यान्यस्त्रणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका । बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ।। ७४५. ॐ मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी । बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ।। ७४६. ॐ दिव्यवर्षसहस्त्रं तु गतमासीद्विशां पते। देव्याश्शुम्भस्योभयोस्तु युध्यतोश्च भयङ्करम् ।। ७४७. ॐ विमानस्थास्तदा देवा ऋषयश्च बभाषिरे। न नाप्येवं विधं युद्धं प्रागासीद्भविता न च ।। ७४८. ॐ ततश्शतशरैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः।। ७४९. ॐ सापि तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ।। ७५०. ॐ छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे। ७५१. ॐ चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ।। 109
७५२. ॐ ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् ।
आभ्यधावत तां देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ।।
७५३. ॐ तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका।
धनुर्मुक्तै श्शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम् ।।
७५४. ॐ (तस्य) अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह ।।
७५५. ॐ हताश्वस्स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः ।
जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिका निधनोद्यतः ।।
७५६. ॐ (चण्डिका) चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैश्शरैः।।
७५७. ॐ तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ।।
७५८. ॐ स मुष्टिं पातायामास हृदये
दैत्यपुङ्गवः देव्याः॥
७५९. ॐ तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ।।
७६०. ॐ तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले ।।
७६१. ॐ स दैत्यराजस्सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥
७६२. ॐ (स दैत्यराजः) उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं ।
गगनमास्थितः॥
७६३. ॐ तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ।।
७६४. ॐ नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् ।
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥
७६५. ॐ ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह।
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ।।
110
७६६. ॐ स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगतः।
अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया।
७६७. ॐ तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम्।
जगत्यां पातयामास भित्त्वाशूलेन वक्षसि ।।
७६८. ॐ स गतासुः पपातोल् देवीशूलाग्रविक्षतः ।
चालयन् सकलां पृथ्वी साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ।।
७६९. ॐ ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन्दुरात्मनि ।
जगत् स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ।।
७७०. ॐ उत्पातमेघास्सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः।
सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥
७७१. ॐ ततो देवगणास्सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
बभूवुनिहते तस्मिन् ॥
७७२. ॐ गन्धर्वा ललितं जगुः।।
७७३. ॐ अवादयंस्तथैवान्ये ।।
७७४. ॐ ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।।
७७५. ॐ ववुः पुण्यास्तथा वाताः॥
७७६. ॐ सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ।।
७७७. ॐ. जज्वलुश्चाग्नयश्शान्ताः ।।
७७८. ॐ शान्ता दिग्जनितस्वनाः ।।
७७९. ॐ मुमुचुः पुष्पवर्षाणि दिवि देवा विमानगाः ।।
111
७८०. ॐ धर्मकाण्यवर्तन्त देवा जाता हविर्भुजः ।। इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणान्तर्गत - सावर्णिकमन्वन्तर- कथान्तर्गत - देवीमाहात्म्यान्तर्गतो निशुंभशुंभ वधत्वेन प्रसिद्धः मूलश्लोकमन्त्रविभागे नवशतीमन्त्रमालायां सप्तमाऽध्यायः समाप्तः।। श्री परमेश्वरार्पणमस्तु ।। 112 श्रीः अष्टमाऽध्यायः | श्री आद्यादि महादेवी कात्यायनी सूक्तम् । ॐ नमश्चण्डिकायै ऋषिरुवाच- ७८१. ॐ देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्रास्सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् । कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभात् विकासिवक्त्रांशु विकाशिताशाः ।। देवा ऊचुः- ७८२. ॐ देवि प्रपन्नार्ति हरे प्रसीद ।। ७८३. ॐ प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।। ७८४. ॐ प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वम् ।। ७८५. ॐ त्वमीश्वरी (असि) देवि चराचरस्य । ७८६. ॐ आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतस्स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतत् आप्यायते कृत्स्नमलद्ध्यवीर्ये ।। ७८७. ॐ त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या (असि)। ७८८. ॐ (त्वां) विश्वस्य बीजं (असि)। 113
७८९. ॐ परमासि माया।
संमोहितं देवि समस्तमेतत् ।।
७९०. ॐ त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ।।
७९१. ॐ विद्यास्समस्तास्तव देवि भेदाः ।।
७९२. ॐ स्त्रियस्समस्तास्सकला जगत्सु (तव देवि भेदाः)।
७९३. ॐ त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् ॥
७९४. ॐ का ते स्तुतिस्स्तव्यपरा परोक्तिः ।।
७९५. ॐ सर्वभूता यदा देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ।।
७९६. ॐ सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोस्तु ते ।।
७९७. ॐ कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनी।
विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोस्तु ते ।।
७९८. ॐ सर्वमङ्गळमाङ्गळ्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोस्तु ते ।।
७९९. ॐ सृष्टिस्थितिविनाशानां हेतुभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोस्तु ते ।।
८००. ॐ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यातिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ॥
८०१. ॐ हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणी रूपधारिणि ।
कौशाम्भः क्षरिके देवि नारायणि नमोस्तु ते॥
114
८०२. ॐ त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि ।
माहेश्वरी स्वरूपेण नारायणि नमोस्तु ते ।।
८०३. ॐ मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे ।
कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोस्तु ते ।।
८०४. ॐ शङ्खचक्रगदाशार्गे गृहीतपरमायुधे ।
प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोस्तु ते ।।
८०५. ॐ गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।
वाराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोस्तु ते ।।
८०६. ॐ नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे ।
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोस्तु ते ।।
८०७. ॐ किरीटिनि महावजे सहस्त्रनयनोज्ज्वले ।
वृत्र प्राण हरे चैन्द्रि नारायणि नमोस्तु ते ।।
८०८. ॐ शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्ये महाबले।
धोररूपे महारावे नारायणि नमोस्तु ते ।।
८०९. ॐ दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोस्तु ते ।।
८१०. ॐ कालरात्रिस्वरूपेण त्रैलोक्यमथनोद्यते ।
महाकालि महाशक्ते नारायणि नमोस्तु ते ।।
८११. ॐ महालक्ष्मि शिवे शान्ते सर्वसिद्धेऽपराजिते ।
मोहरात्रि महावीर्ये नारायणि नमोस्तु ते ॥
८१२. ॐ लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टे स्वधे धृवे ।
महारात्रि महामाये नारायणि नग्गेस्तु ते ।।
115
८१३. ॐ मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि ज्वालिनि ।
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोस्तु ते ।।
८१४. ॐ सर्वतः पाणिपादान्ते सर्वतोऽक्षिशिरोमुखे ।
सर्वतश्श्रवणघ्राणे नारायणि नमोस्तु ते ।।
८१५. ॐ सर्वेन्द्रियगुणाभासे सर्वेन्द्रियविवर्जिते ।
सर्वेन्द्रियार्थतत्वज्ञे नारायणि नमोस्तु ते ॥
८१६. ॐ सर्वदेवाधिदेवस्य शर्वस्यामिततेजसः ।
सर्वप्राणहरे शक्ते नारायणि नमोस्तु ते ॥
८१७. ॐ सर्वभूतशरीराणां विनाशोत्पत्तिकारणे।
सर्वावस्थागते देवि नारायणि नमोस्तु ते ।।
८१८. ॐ सर्वेषामेव भूतानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।
सर्वदुःखहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ।।
८१९. ॐ शक्त्या कल्पितसर्वाङ्गे सर्वाऽविद्याविनाशिनि ।
सर्वविद्यधिपे देवि नारायणि नमोस्तु ते ।।
८२०. ॐ सर्वरोगप्रशमनि सर्वोपद्रवनाशिनि ।
सर्वकामप्रदे देवि नारायणि नमोस्तु ते ।।
८२१. ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते ।।
८२२. ॐ एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम् ।
पातु नस्सर्वभूतेभ्यः कात्यायनि नमोस्तु ते ।।
८२३. ॐ ज्वालाकराळमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् ।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकाळि नमोस्तु ते॥
116
८२४. ॐ हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नस्सुतानिव ।।
८२५. ॐ असुरासृग्वसापकचर्चितस्ते करोज्ज्वलः ।
शुभाय खड्गो भवतु ॥
८२६. ॐ चण्डिके त्वा नता वयम् ।।
८२७. ॐ (हे देवि!) रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् (अपहंसि)।
८२८. ॐ त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिताह्याश्रयतां प्रयान्ति ।।
८२९. ॐ एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य
धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् ।
रूपैरनेकैर्बहुधात्ममूर्ति
कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या ।।
८३०. ॐ विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे-
ध्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या।
ममत्वगर्तेति महांधकारे
विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् ।।
८३१. ॐ रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा
यत्रारयो दस्युबलानि यत्र।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये
तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्।।
८३२. ॐ विश्वेश्वरी त्वं परिपासि विश्वम् ।।
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८३३. ॐ विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् ।।
८३४. ॐ विश्वेशवन्द्या भवती ।।
८३५. ॐ भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ।।
८३६. ॐ देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते:
नित्यं यथाऽसुरवधादधुनैव सद्यः।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु
उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ।।
८३७. ॐ प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानां वरदा भव ।।
देव्युवाच -
८३८. ॐ वरदाहं सुरगणा वरं यं मनसेच्छथ।
तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ।।
देवा ऊचुः
८३९. ॐ सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ।।
देव्युवाच
८४०. ॐ वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्या उत्पत्स्येते महासुरौ ।।
८४१. ॐ नन्दगोपकुले जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी।
८४२. ॐ पुनरप्यतिरोद्रेण रूपेण पृथिवीतले ।
आवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्ताश्च दानवान् ।।
118
८४३. ॐ भक्षयंत्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान् महासुरान् ।
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमा :।।
८४४. ॐ ततो मां देवतास्स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः ।
स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम् ।।
८४५. ॐ भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि ।
मुनिभिस्संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा।।
८४६. ॐ ततश्शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन् ।
कीर्तयिष्यन्ति मनुजाश्शताक्षीमिति मां ततः ।।
८४७. ॐ ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः ।
भरिष्यामि सुराश्शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ।
शाकम्भरीति विख्यतं तदा यास्याम्यहं भुवि ।।
८४८. ॐ तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् ।
दुर्गादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ।।
८४९. ॐ पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले।
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात्।।
८५०. ॐ तदा मां मुनयस्सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः ।
भीमादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ।।
८५१. ॐ यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ।
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसङ्ख्येयषट्पदम् ।।
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम्।
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः ।।
119
८५२. ॐ इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति । तदा तदाऽवतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ।। इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणान्तर्गत - सावर्णिकमन्वन्तर- कथान्तर्गत - देवीमाहात्म्यान्तर्गतो नारायणीस्तुतिनीम मूलश्लोकमन्त्रविभागे नवशतीमन्त्रमालायां अष्टमाऽध्यायः समाप्तः।। श्री परमेश्वरार्पणमस्तु ।। *** 120
श्रीः
नवमाऽध्यायः
ॐ नमश्चण्डिकायै
SAR
ETHERE
देव्युवाच -
८५३. ॐ एभिःस्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यस्समाहितः ।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्॥
८.५४. ॐ मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम् ।
कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद्वधं शुम्भनिशुम्भयोः ।।
(न तेषां दुष्कृतं किञ्चित् )।
८५५. ॐ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः ।
श्रोष्यन्ति चैव ये भत्तया मम माहात्म्यमुत्तमम्॥
(न तेषां दुष्कृतं किञ्चित् ) ॥
८५६. ॐ न तेषां दुष्कृतं किञ्चित् दुष्कृतोत्था न चापदः।
भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम् ।।
शतृतो न भयं तेषां दस्युतो वा न राजतः।
न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सम्भविष्यति ।।
८५७. ॐ तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितः ।
श्रोतव्यं च सदा भत्तया परं स्वस्त्ययनं महत् ।।
८५८. ॐ उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान्।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम ।।
८५९. ॐ यत्रतत्पठ्यते सम्यनित्यमायतने मम ।
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सान्निध्यं तत्र मे स्थितम् ।।
:
121
.
८६०. ॐ बलिप्रदाने पूजायां अग्निकार्ये महोत्सवे।
सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च ।।
८६१. ॐ जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम् ।
प्रतीक्षिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथाकृतम् ।।
८६२. ॐ शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी ।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः ।।
सर्वबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसमन्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ।।
८६३. ॐ श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयश्शुभाः ।
पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान् ।।
८६४. ॐ रिपवस्संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते ।
नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम् ।।
८६५. ॐ शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुस्स्वप्नदर्शने ।
ग्रहपीड़ासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम ।।
८६६. ॐ उपसर्गाश्शमं यान्ति (माहात्म्यं शृणुयान्मम)।
८६७. ॐ ग्रहपीडाश्च दारुणाः (शमं यान्ति)
(माहात्म्यं शृणुयान्मम)॥
८६८. ॐ दुस्स्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते ।
(माहात्म्यं शृणुयान्मम)॥
८६९. ॐ (मम माहात्म्यं पठनादेव)
बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम् ।।
122.
.
.
4.
८७०. ॐ (मम माहात्म्यं पठनादेव )
सङ्घातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम् ।।
८७१. ॐ (मम माहात्म्यं पठनादेव )
दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम् ।।
८७२. ॐ रक्षोभूतपिशाचानां (मम माहात्म्यं)
पठनादेव नाशनम् ॥
८७३. ॐ सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम् ।।
८७४. ॐ पत्रपुष्पौषधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः ।
विप्राणां भोजनोमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम्।
अन्यैश्च विविधैर्भोगप्रदानैर्वत्सरेण या।
प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृदुच्चरिते श्रुते ।।
८७५. ॐ श्रुतं हरति पापानि (जन्मनां कीर्तनं मम)।
८७६. ॐ तथारोग्यं प्रयच्छति (जन्मनां कीर्तनं मम)।
८७७. ॐ रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम ।।
८७८. ॐ युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम् ।
तस्मिन् श्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते ।।
८७९. ॐ युष्माभिस्स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिः कृताः।
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम् ।।
८८०. ॐ अरण्ये प्रान्तरेवापि दावाग्निपरिवारितः ।
दस्युभिर्वा वृतश्शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः ।।
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः ।
राज्ञा कृद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा।
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आघूार्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे। पतत्सु चापि शस्त्रेषु सङ्ग्रामे भृशदारुणे।। सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्थितोऽपि वा। स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत सङ्कटात् ।। ८८१. ॐ ममप्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा। दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम ।। ऋषिरुवाच- ८८२. ॐ इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा। पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत ।। ८८३. ॐ तेऽपि देवा निरातङ्कास्स्वाधिकारान् यथा पुरा । यज्ञभागभुजस्सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः ।। ८८४. ॐ दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देव्या रिपौ युधि । जगद्विध्वंसके तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे ।। निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः।। ८८५. ॐ एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः । सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम्। ८८६. ॐ तयैतन्मोह्यते विश्वम् ।। ८८७. ॐ सैव विश्वं प्रसूयते ।। ८८८. ॐ सा याचिता च विज्ञानं (प्रयच्छति)। ८८९. ॐ (सा) तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ।। 124
८९०. ॐ व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर ।
महामाया महादेवी महाकालीस्वरूपया।।
८९१. ॐ सैव (संहार) काले महाकाली ॥
८९२. ॐ सैव सृष्टिर्भवत्यजा।।
८९३. ॐ स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी।।
८९४. ॐ भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे ।।
८९५. ॐ सैवाभावे तथाऽलक्ष्मीविनाशायोपजायते ।।
८९६. ॐ स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्गन्धधूपादिभिस्तथा।
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ।।
ऋषिरुवाच -
८९७. ॐ एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।
एवं प्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ।।
८९८. ॐ विद्या तयैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया ॥
८९९. ॐ तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः।
मोह्यते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे ।।
९००. ॐ तामुपैहि महाराज शरणं परमोश्वरीम् ।
स्तुतां देवैश्च गन्धर्वैः ऋषिभिश्च मुमुक्षुभिः।
आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ।।
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श्रीमार्कण्डेय उवाच -
९० १. ॐ इति तस्य वचश्मृत्वा सुरथस्स नराधिपः।
प्रणिपत्य महाभागं तमृषि संश्रितव्रतम् ।।
निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च ।
जगाम सद्यस्तपसे ।।
९०२. ॐ स च वैश्यो महामुने।
निर्विपणोऽतिममत्वेन जगाम सद्यस्तपसे ।।
९० ३. ॐ सन्दर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनमास्थितः ।
स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन् ।।
९० ४. ॐ तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम्।
अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः।।
९०५. ॐ एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वषैर्यतात्मनोः ।
परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ।।
९०६. ॐ यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन ।
मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददाम्यहम् ।।
श्री मार्कण्डेय उवाच -
९०७. ॐ ततो वने नृपो राज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि ।
अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्।।
९०८. ॐ सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं ववे निर्विण्णमानसः ।
ममेत्यहमिति प्राज्ञस्सङ्गविच्युतिकारकम् ।।
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देव्युवाच -
९०९. ॐ स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान् ।
हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति ।।
९१०. ॐ मृतश्च भूयस्सम्प्राप्य जन्मदेवाद्विवस्वतः ।
सावर्णिको नाम मनुर्भवान् भुवि भविष्यति ।।
९११. ॐ वैश्यवर्य त्वया यश्च वरो मत्तोऽभिवाञ्छितः।
तं प्रयच्छामि संसिद्धयै तव ज्ञानं भविष्यति ।।
श्री मार्कण्डेय उवाच
९१२. ॐ इति दत्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् ।
बभूवान्तर्हिता सद्यो भत्तया ताभ्यामभिष्टुता ।।
९१३. ॐ एवं लब्धवरो राजा सुरथः क्षत्रियर्षभः ।
ऋषेराश्रममागत्य तस्मै सर्वं निवेद्य च ।।
९१४. ॐ ततस्तदाज्ञया स्वीयं जगाम नगरं प्रति ।
हत्वा शत्रून् मदोद्रिक्तान् प्राप्य राज्यमतन्द्रितः ।।
९१५. ॐ बुभुजे पृथिवीं सर्वां ततस्सागरमेखलाम् ।
यावज्जीवं सुखं भुत्तवाऽष्टममन्वन्तरे पुनः ।
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः।।
९१६. ॐ वैश्यश्च निर्ममो ज्ञानी देव्याराधनतत्परः।
तीर्थेषु विचरन् गायन् भगवत्या गुणानथ।
कालातिवाहनं कुर्वन् मुक्तबन्धश्चचार ह ।।
९१७. ॐ एतत्ते कथितं विप्र देव्या माहात्म्यमुत्तमम्।
नानावतारचरितप्रभावैरुपबृंहितम्।।
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९१८. ॐ य एतच्च पठेन्नित्यं श्रद्धया प्रयतो नरः । सर्वान्कामानवाप्नोति शुतवर्ष च जीवति ।। ९१९. ॐ यावज्जन्म कृतं पापं ब्रह्महत्या पुरस्सरम् । जपात्तु सकृदेतस्य क्षयं याति न संशयः ।। ९२०. ॐ य एतत्पुस्तकं नित्यं भत्त्या सम्पूजयेन्नरः । गृहे तस्य धनं धान्यं सम्पद्वद्धिश्च जायते ।। ९२१. ॐ नाधयो व्याधयो घोरा न च तस्करवैरिभिः। पुत्रपौत्राभिवृद्धिश्च जायते चण्डिकाज्ञया ।। इति श्रीमार्कण्डेयमहापुराणान्तर्गत सावर्णिकमन्वन्तर- कथान्तर्गत - देवीमाहात्म्यान्तर्गतो देवीपारायणफलश्रुतिनीम मूलश्लोकमन्त्रविभागे नवशतीमन्त्रमालायां नवमाऽध्यायः समाप्तः।। श्री परमेश्वरार्पणमस्तु ।। 128
श्री:
श्री देवी जयमाला
हीङ्कारासन गर्भितानलशिखां सौःक्लीं कळाबिभ्रतीम् ।
सौवर्णाम्बरधारिणीं वरसुधाधौतां त्रिनेत्रोज्ज्वलाम् ।
वंदे पुस्तक पाशमङ्कुशधरां स्त्रग्भूषितामुज्ज्वलाम् ।
त्वां गौरी त्रिपुरां परात्परकळां श्रीचक्र सञ्चरिणीम् ।।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुन्दरि जय जय ।
ॐ ३ हृदयदेवि जय जय । ॐ ३ शिरोदेवि जय जय ।
ॐ३ शिखादेवि जय जय । ॐ ३ कवचदेवि जय जय ।
ॐ३ नेत्रदेवि जय जय । ॐ ३ अस्तदेवि जय जय ।
ॐ ३ कामेश्वरि जय जय। ॐ ३ भगमालिनि जय जय।
ॐ३ नित्यक्लिन्ने जय जय। ॐ ३ भेरुण्डे जय जय।
ॐ ३ वह्निवासिनि जय जय । ॐ ३ महावज्रेश्वरि जय जय ।
ॐ ३ शिवदूति जय जय । ॐ ३ त्वरिते जय जय ।
ॐ ३ कुलसुन्दरि जय जय । ॐ ३ नित्ये जय जय ।
ॐ३ नीलपताके जय जय । ॐ ३ विजये जय जय ।
ॐ ३ सर्वमङ्गळे जय जय । ॐ ३ ज्वालामालिनि जय जय।
ॐ ३ विचित्रे जय जय । ॐ ३ श्रीविद्ये जय जय ।
ॐ ३ दक्षिणामूर्तिमयि जय जय । ॐ ३ नारायणमयि जय जय ।
ॐ ३ ब्रह्ममयि जय जय। ॐ ३ सनकमयि जय जय ।
ॐ३ सनन्दनमयि जय जय । ॐ ३ सनातनमयि जय जय ।
ॐ ३ सनत्कुमारमयि जय जय । ॐ ३ सनत्सुजातमयि जय जय ।
ॐ ३ वसिष्ठमयि जय जय । ॐ ३ शक्तिमयि जय जय ।
ॐ ३ पराशरमयि जय जय। ॐ ३ कृष्णद्वैपायनमयि जय जय ।
ॐ ३ पैलमयि जय जय। ॐ३ वैशम्पायनमयि जय जय ।
ॐ ३ जैमिनिमयि जय जय । ॐ ३ सुमन्तुमयि जय जय ।
ॐ ३ श्रीशुकमयि जय जय । ॐ ३ गौडपादमयि जय जय ।
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ॐ ३ गोविन्दमयि जय जय । ॐ ३ श्रीविद्याशङ्करमयि जय जय। ॐ ३ पद्मपादमयि जय जय । ॐ ३ हस्तामलकमयि जय जय । ॐ ३ त्रोटकमयि जय जय । ॐ ३ सुरेश्वरमयि जय जय। ॐ ३ विद्यरण्यमयि जय जय । ॐ ३ महादेवानन्दनाथमयि जय जय । ॐ ३ कराळाञ्जनेयानन्दनाथमयि जय जय । ॐ ३ जगन्मोहनानन्दनाथमयि जय जय । ॐ ३ गोपानन्दनाथमयि जय जय । ॐ ३ त्रैलोक्यमोहन चक्रस्वामिनि जय जय । ॐ ३ प्रकटयोगिनि जय जय। ॐ ३ अणिमासिद्धे जय जय । ॐ ३ लघिमासिद्धे जय जय । ॐ ३ महिमासिद्धे जय जय । ॐ ३ ईशित्वसिद्धे जय जय । ॐ ३ वशित्वसिद्धे जय जय । ॐ ३ प्राकाम्यसिद्धे जय जय। ॐ ३ भुक्तिसिद्धे जय जय । ॐ ३ इच्छासिद्धे जय जय । ॐ ३ प्राप्तिसिद्धे जय जय । ॐ ३ सर्वकामसिद्धे जय जय। ॐ ३ ब्राह्मि जय जय । ॐ ३ माहेश्वरि जय जय। ॐ३ कौमारि जय जय। ॐ३ वैष्णवि जय जय । ॐ३ वाराहि जय जय । ॐ ३ माहेन्द्रि जय जय । ॐ ३ चामुण्डे जय जय। ॐ ३ महालक्ष्मि जय जय । ॐ ३ सर्वसंक्षोभिणि जय जय । ॐ ३ सर्वविद्राविणि जय जय । ॐ ३ सर्वाकर्षिणि जय जय। ॐ ३ सर्ववशङ्करि जय जय । ॐ ३ सर्वोन्मादिनि जय जय । ॐ ३ सर्वमहङ्कुशे जय जय । ॐ ३ सर्वखेचरि जय जय। ॐ ३ सर्वबीजे जय जय। ॐ३ सर्वयोने जय जय। ॐ ३ सर्वत्रिखण्डे जय जय । ॐ ३ त्रिपुरे जय जय । II. सर्वाशापरिपूरकचक्रस्वामिनि जय जय । ॐ ३ गुप्तयोगिनि जय जय। ॐ ३ कामाकर्षिणि जय जय । ॐ ३ बुद्ध्याकर्षिणि जय जय। ॐ ३ अहङ्कुराकर्षिणि जय जय। ॐ ३ शब्दाकर्षिणि जय जय । ॐ ३ स्पर्शाकर्षिणि जय जय। ॐ ३ रूपाकर्षिणि जय जय। ॐ ३ रसाकर्षिणि जय जय। ॐ३ गन्धाकर्षिणि जय जय। ॐ ३ चित्ताकर्षिणि जय जय । 130 ॐ ३ धैर्याकर्षिणि जय जय । ॐ ३ स्मृत्याकर्षिणि जय जय । ॐ३ नामाकर्षिणि जय जय। ॐ३ बीजाकर्षिणि जय जय । ॐ ३ आत्माकर्षिणि जय जय। ॐ ३ अमृताकर्षिणि जय जय। ॐ ३ शरीराकर्षिणि जय जय । ॐ ३ त्रिपुरेशि जय जय । III. सर्वसंक्षोभण चक्रस्वामिनि जय जय। ॐ ३ गुप्ततर योगिनि जय जय । ॐ ३ अनङ्ग कुसुमे जय जय । ॐ ३ अनङ्ग मेखले जय जय । ॐ ३ अनङ्ग मदने जय जय। ॐ ३ अनङ्ग मदनातुरे जय जय । ॐ ३ अनङ्ग रेखे जय जय। ॐ ३ अनङ्ग वेगिनि जय जय । ॐ ३ अनङ्गाकुशे जय जय । ॐ ३ अङ्गमालिनि जय जय । ॐ ३ त्रिपुरसुन्दरि जय जय । IV. सर्वसैभाग्यदायक चक्रस्वामिनि जय जय । ॐ ३ सम्प्रदाय योगिनि जय जय। ॐ ३ सर्वसंक्षोभिणि जय जय । ॐ ३ सर्वविद्राविणि जय जय। ॐ ३ सर्वाकर्षिणि जय जय । ॐ ३ सर्वाह्लादिनि जय जय । ॐ ३ सर्वसंमोहिनि जय जय । ॐ ३ सर्व स्तम्भिनि जय जय । ॐ ३ सर्व जृम्भिणि जय जय । ॐ ३ सर्ववशङ्करि जय जय । ॐ ३ सर्वरञ्जनि जय जय । ॐ ३ सर्वोन्मादिनि जय जय। ॐ ३ सर्वार्थ साधनि जय जय । ॐ ३ सर्वसम्पत्ति पूरणि जय जय। ॐ सर्वमन्त्रमयि जय जय । ॐ ३ सर्वद्वन्द्व क्षयङ्करि जय जय। ॐ ३ त्रिपुरवासिनि जय जय । V. ॐ ३ सर्वार्थसाधक चक्रस्वामिनि जय जय । ॐ ३ कुल योगिनि जय जय। ॐ ३ सर्वसिद्धिप्रदे जय जय । ॐ ३ सर्व सम्पत्पदे जय जय । ॐ ३ सर्वप्रियङ्करि जय जय। ॐ ३ सर्व मंगळकारिणि जय जय। ॐ ३ सर्व कामप्रदे जय जय । ॐ ३ सर्वदुःख विमोचनि जय जय। ॐ ३ सर्वमृत्युप्रशमनि जय जय । ॐ ३ सर्वविघ्न निवारिणि जय जय । ॐ ३ सर्वाङ्ग सुन्दरि जय जय । ॐ ३ सर्वसौभाग्यदायिनि जय जय । ॐ ३ त्रिपुराश्री जय जय। 131 ३
VI. ॐ ३ सर्वरक्षाकर चक्रस्वामिनि जय जय ।
ॐ ३ निगर्भ योगिनि जय जय । ॐ ३ सर्वज्ञे जय जय ।
ॐ३ सर्व शक्ते जय जय । ॐ ३ सर्वैश्वर्य प्रदायिनि जय जय ।
ॐ ३ सर्व ज्ञानमयि जय जय। ॐ ३ सर्वव्याधिविनाशिनि जय जय ।
ॐ ३ सर्वाधार स्वरूपे जय जय। ॐ ३ सर्व पापहरे जय जय ।
ॐ ३ सर्वानन्दमयि जय जय । ॐ ३ सर्वरक्षास्वरूपिणि जय जय ।
ॐ ३ सर्वेप्सितार्थप्रदे जय जय । ॐ ३ त्रिपुरमालिनि जय जय ।
VII. सर्वरोगहर चक्रस्वामिनि जय जय।
ॐ ३ रहस्य योगिनि जय जय । ॐ ३ वशिनि जय जय ।
ॐ ३ कामेश्वरि जय जय। ॐ ३ मोदिनि जय जय ।
ॐ३ विमले जय जय । ॐ ३ अरुणे जय जय।
ॐ ३ जयिनि जय जय । ॐ ३ सर्वेश्वरि जय जय।
ॐ ३ कौळिनि जय जय । ॐ ३ त्रिपुरासिद्धे जय जय ।
VIII. ॐ३ सर्वसिद्धिप्रद चक्रस्वामिनि जय जय ।
ॐ ३ अतिरहस्य योगिनि जय जय।
ॐ३ बाणिनि जय जय। ॐ ३ चापिनि जय जय ।
ॐ ३ पाशिनि जय जय । ॐ ३ अङ्कुशिनि जय जय ।
ॐ ३ महाकामेश्वरि जय जय । ॐ ३ महावज्रेश्वरि जय जय ।
ॐ ३ महाभगमालिनि जय जय । ॐ ३ त्रिपुराम्बिके जय जय ।
IX. ॐ ३ सर्वानन्दमय चक्रस्वामिनि जय जय ।
ॐ ३ परापर रहस्य योगिनि जय जय ।
ॐ ३ महामहाकामेश्वरि जय जय ।
ॐ३ महामहा श्रीचक्रनगर साम्राज्ञि जय जय ।
ॐ३ महा राजराजेश्वरि जय जय ।
ॐ ३ परब्रह्म स्वरूपिणि जय जय।
श्री ह्रीं ऐं नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमः।
इति श्रीदेवी जयमाला
श्रीः श्रीः श्रीः
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श्रीः श्री देव्यपराधस्तवम् २ ३ ४ ६ अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। पुत्रोय (पुत्रीय) मिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ।। आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं । पूजामार्गं न जानामि त्वं गतिः परमेश्वरि ।। यहत्तं भक्तिमार्गेण पत्रं पुष्पं फलं जलं । निवेदितं च नैवेद्यं तद्ग्रहाणानुकम्पया ।। कर्मणा मनसा वाचा त्वत्तो नान्या गतिर्मम । अन्तश्चारेण भूतानां द्रष्टी त्वं परमेश्वरि ।। नाथे योनिसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्यहं । तेषु तेष्वचला भक्तिरच्युतायां सदा त्वयि ।। देवी धात्री च भोक्त्री च देवी सर्वमिदं जगत् । देवी जयतु सर्वत्र या देवी साऽहमेव च ।। साधु वाऽसाधु वा कर्म यद्यदा चरितं मया । तत्सर्वं कृपया देवी गृहाणाराधनं परम् ।। ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि यन्मया क्रियते शिवे । तवकृत्यमिदंकृत्यमितिज्ञात्वा क्षमस्व मां ।। मत्समः पातकी नास्ति पापनी त्वत्समा नहि। एवं ज्ञात्वा महादेवी यथायोग्यं तथा कुरु॥ यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । क्षन्तुमर्हसि तद्देवि यच्छ मे स्खलितं मनः ।। गुह्यातिगुह्यगोत्रीत्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं । सिद्भिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि ।। ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।। ॐ शांतिश्शांतिश्शांतिः। 133 ७ ८ ९ १० ११ -RH