Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Prachin Pandit Aur Kavi

Dvivedi,mahaveer Prasad · 2011/01

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गा-समाव का तिरसा पुष
M
प्राचीन
पंडित और कवि

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.
प्राचीन
पंडित और कवि
श्रीदुलारेलाल भार्गव

चुनी हुई पुस्तकें मतिराम प्रथावली देव और विहारी बिहारी रखाकर २७, am, EEEEEE ॥ Ins), १७ उपा भवभूति अनुराग-वाटिका ठाकुर-उसक पल्लव सुयहवतन अनघ पंचवटी संलाप प्रतिध्वनि स्वदेश-संगीत सुमन भारत भारती विरहिणी ग्रजागना प्रिय प्रवास चोखे चौपदे चुभते चौपदे जरासघ वध महाकाव्य दुर्योधन-वध हिंदी काव्य नवरम वागवान नवीन वीन या नदीमे दोन रहोम कवितापलो कविरा मीर निर्मात्य दागे जिगर हिंदी के मुमरमान कवि पद्य प्रसून . ה ה ה ב Manana हिंदी की मय तरह की पुस्तकें मिलने का एक मात्र पता- संचालक गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय २६-३०, अमीनाबाद-पार्क, लखनक

गगा-पुस्तकमाला का तिरसठवां पुष्प
प्राचीन पंडित और कवि
लेपक
महावीरप्रसाद द्विवेदी
गंगा पुस्तकमाला-कार्याल
२१३०, प्रमोमाबाद पार्क
लग्चनऊ
बिनीयाति
रोमो ९ि८३ [मारी )
(

६
प्राचीन पंडित और कवि
अतएर पद्मावती नगरी यहीं रही होगी, इसमें संदेह नहीं।
यहाँ पुरानी इमारतों के कुछ चिह्न और धुस्स अब तक
विद्यमान है। वे सब ईसा की पहली शताब्दी से आठवीं
शताब्दी तक के हैं। प्राचीन नाग-वंश के राजाओं के सिके
तो अाज तक सैकड़ों मिल चुके हैं और अब तक मिलते
जाते हैं। ईसा की पहली या दूसरी शताब्दी का एक शिला-
लेख भी संस्कृत में मिला है। लिपि उसकी ब्राही है।
ग्वालियर-राज्य के पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष, मिस्टर
एम्० वी० गर्ने, ने इस लेख का संपादन किया है । लेख में
मणिभद्र-नामक देवता की मूर्ति की स्थापना का उल्लेख
है। यह मूर्ति भी टूटी-फूटी अवस्था में मिली है। लेख
राजा शिवनंदी के समय में खोदा गया था। पर इस राजा
का कुछ भी ऐतिहासिक हाल श्रय तक नहीं मालूम हुआ।
पराया के निवासी परंपरा से सुनते आये है कि वहाँ पहले
एक प्रसिद्ध राजधानी थी और अनेक प्रतापी नरेश यहाँ हो
गये हैं। यहाँ तक कि वे लोग संकल्प में "पद्मावती महा.
सगमक्षेत्रे" का अर तक उल्लेख भी करते हैं। इससे सिद्ध
है कि मालतीमाधर में भवभूति को उल्लिनित पद्मावती
नगरी यहीं पर थी जहाँ पर अप पनाया-नामक छोटा-सा
गॉच है। यदि आठवीं शताब्दी में ग्वालियर के आसपास
कामांत विदर्म-देश कहाता रहा हो तो, कुछ लोगों के अनु-
मान के अनुसार, पद्मावती ही भवभूति की जन्मभूमि

মুন্নিা
पापुर हो सकता है। अन्यथा बरार में यह कहीं और हो
जगह रहा होगा।
इस छोटी-सी पुस्तक में प्राचीन विद्वानों के विषय में
लिने गये लेखों का संग्रह है। सुखदेव मिश्र बहुत पुराने
नहीं, पर कल की भी बात आज पुरानी हो जाती है। इस
रष्टि से भी नये नहीं, क्योंकि उनको मी हप इस समय
कोई दो मी घर्ष हो चुके। इसके सिवा उनके चरित में
विलक्षणतापूर्ण पुछ अलीकिक मानें भी निमे विशेष
मनोरजन हो सकता है। इस समद केलेलों में कषियों के
समय कम का विचार नहीं किया गया। लेए पहले
का है उसे पहले, जी उमर पाद का पद उमक शाद
रममा गया। प्रतपय पद माम लेम्बों समय के
अनुसार
बपियों और पडित समय के अनुसार नहीं।
यदि यह पुस्तक हिंदी के प्रेमियों की पमा माई तोहम
भित्र-भित्र पिपयों के अपने प्रयाप्य लेग मी पुग्तकम्प में
प्रकाशित करेंगे।
कमल मेस,
महारप्रसाद दिली

सूची
04
१
२२
४६
६२
१-भवभूति
२-लोलि राज
३-फारसी-कवि हाफिज
४-बद्धाचार्य शीलमद्र
५-मधुरवाणी
६-सुखदेव मिश्र
७-हौरविजय सूरि
-प्राचार्य दिङ्नाग
७०
..
१०७
१२८
.

प्राचीन पंडित और कवि
भवभूति
प्राचीन कवियों, पंडितों और नाटककारों के विषय में दो
पक को छोड़कर हिंदी के अन्य अनुरागी सजन प्रायः कभी
उप लिखने ही नहीं। हिंदी का साहित्य इस प्रकार के
निबंधों मे शून्य-सा हो रहा है । जैसे और-बार बातों में
मैंगला भीर मराठी भाषा का माहित्य दिदी के साहित्य से
या हुआ है. वैसे ही यह इस विषय में भी है। महामहो
पाध्याय मतीशः विद्याभूषण, परित विष्णु कृपा शान्त्री
विपणकर भीर पडित माधवराव बबटेश लेले इत्यादि
निशानों में, भानी-अपनी देश-भाश मेंभयभूति के विषय
में बहुत पहिला प्रोग्रेमा विलमन, मर मानियर
ििलगाम, कोलम, मांगरकर और दल इत्यादि ने भी
मरभूति और उसके बालों की प्रसंगा करने में अपनी
नगरी मदुपयोग किया परंतु, हिदी में, उदाना
एमालेमाने Micा
विमानानं कालिदास, भपति, पाव, गु नं.
रंग पानविधी पर, मराप निबंध

२
प्राचीन पंडित और कवि
लिखकर इन पाँचों के समाहार कानाम "संस्कृत कविपंचक"
रक्खा है। शास्त्री महाशय ने भवभूति को छोड़कर शेष चार
कवियों के समय का निरूपण भी यथाशक्य किया है और
उनके विषय में, जहाँ तक संभव था, गवेषणा भी की है।
परंतु भवभूति के समय के विषय में उन्होंने बहुत ही
कम लिसा है । उनके कयन का श्राशय यह है-फेवल
मृच्छकटिक, प्रबोधचंद्रोदय, नागानद इत्यादि नाटकों
में और दशकुमारचरित इत्यादि प्रथों में उस समय के
जनसमूह की स्थिति का कुछ परिचय मिलता है। इसलिये
भवभूति को कालिदास का समसामयिक मानने की
अपेक्षा जिस समय ये ग्रंथ निर्मित हुए है उस समय के
श्रासपास उसका अस्तित्व स्वीकार करना विशेप
युक्तिसगत है।
विष्णु शास्त्री ने जिनका नाम दिया है वे प्राय साती
शताब्दी के ग्रंथ है । जैसे इन ग्रंथों में दीर्घ समासों की
प्रचुरता है, वैसे ही भवभूति के नाटकों में भी है । जैसे इनमें
चौद्ध-धर्मावलंबियों के चरित का कहीं-कहीं चित्र सींचा
गया है, वैसे ही भवभूति के मालतीमाधव में भी खोंचा
गया है। इसीलिये विष्णु शास्त्री ने शूद्रक, कृष्ण मिश्र, वाण
और दही के समय के सन्निकट भवभूति का होना अनुमान
दिया है। इतना ही लिसकर वे चुप हो गए हैं, भवभूति
के समय का विशेप निरूपण उन्होंने नहीं किया।

-
.
भयभूति
राजतरगिहा के चतुर्थ तरग में लिखा है-
कधिपतिराजश्रीमरभूत्यादिसेरित.
जिनो ययी यशोगमा तद्गुणस्तुतिपन्दिताम्
(श्लोक १४५) ।
अर्थात्, वाक्पतिराज और भवभूति प्रादि कवियों से
मेगा किए गए यशोरमाने (ललितादित्य से) परास्त
होकर उस विजयी का गुण गाया। यशोवर्मा नाम का राजा
मा १३ से ७२६ ईसवी तक कनीज के राज्यासन पर
मामीन था । इस यशोवर्मा को काश्मीर के राजा ललिता.
दित्य ने परास्त किया, और भनभूति को अपने साथ पह
काश्मीर ले गया । इसमे यह सिद्ध कि भयमूति, अष्टम
शादी के प्रारंभ में, कान्पामाधिप यशोपा की सभा
में, उमा आधित दोकर, विद्यमान पानिएव "पह कहना
समुचित नहीं जान पड़ता कि भयभूति को राजामय था,
यदि उमेराजाध्यता नो उमके तीनों नाटकों का प्रयोग
कामप्रियनाथ को यात्राको केममय क्यों होता", पिण
शाम्बी की यद उलिलिपुल निराधार माभूति को
सामामयम्पयाकाप्रियगायकीपात्राहीसमप
राम नाटकका को प्रयोग या, मगोकारण
होगा! मामू में पोषों को तमा में ग्यान पाने
আগে খান বা, খানা
परापमंडरामारामारीntrane

प्राचीन पडित और कवि " हीन होकर स्वदेश को लौटने पर, शायद उसने उन्हें बनाया हो, अथवा राजधानी की अपेक्षा यात्राओं में अधिक जन- समूह एकत्र होने के कारण उसी अवसर पर शायद उसने अपने नाटकों का प्रयोग किया जाना प्रशस्त समझा हो। कुछ वर्ष टुप, डॉक्टर वूलर को एक "गौडयदो" (गौड़वध)- नामक प्राकृत कान्य मिला। इस काय को श्रीयुत पांडुरंग ने बंबई मेंछपाकर प्रकाशित किया है। इसके कर्ता वही वाकपति- राज है, जो यशोवर्मा की सभा में विद्यमान थे। उन्होंने "गौड़- वध" में यशोवर्मा का विस्तृत वृत्तात लिखा है और तद्वारा गौरदेश के राजा का पराजय वर्णन किया है । इस काव्य में वारूपतिराज ने अपनी कविता के संबंध में लिखा है-- प्राकृत भवभूइजलहिनिग्गयकब्बामयरसकणा इव स्फुरन्ति जस्स बिसेसा अजबि बियहेसु कहापबधेलु सस्कृत भवभूतिजलविनिर्गतका-यामृतरसकणा इव स्फुरन्ति यस्य विशेपा अद्यापि विकटेषु कथाप्रवन्धेषु अर्थात्, भवभूतिरूपी जलनिधि से निकले हुए कान्यरूपी अमृत के कणों के समान जिसके निवधों में अनेक विशेष- विशेष गुण अद्यापि चमक रहे हैं । इससे भी वाक्पतिराज के साथ भवभूति का, यशोवर्मा के यहाँ अष्टम शताब्दी के प्रारंभ में, होना सूचित होता है।

५ नवमृति काइ वर्षप, हमारे मित्र पटिनामावगर, बंकटेश लेले धी, प में, एक प्राचीन इम्न लिखित माननीमाधर को पुस्तक मिनी । उसमें "महकुमारिलगिप्यमभरभूति" लिखा है । "गीय" को भूमिकाम भी लिया है कि दीर में मालतीमाधर को एक पुस्तक मिली है, जिसमें "इति- पुमारिल शिष्यरतं" लिखा है । एमाग्लि मह सप्तम शनादी के अन में हुए हैं। अनएर भभूति का अहम शादी के प्रावि में होना मप्र प्रसार मुमगत है। शंकरदिग्विजय में लिया कि बिगालभनिका और पाखरामायणा मादि के का राजशेष यदी शकराचार्य गए थे. और उनके बनाए. नाटकमावार्य ने देनेये। इससे गोबर और शंकर को ममकालीनता प्ररर होती। নীল বা খাকামা ম দিশৰ- पभूध परमीप भुर. फरि पुग नन प्रपेट गुपि ममाम् पुनयों भवभूतिरंषया এ বার শনি राजभर अपांना पागामोशिपिए। फिर महरिनेम मिया, भदरी नपतिमाम गे ममिय था, पर नम्बर Time मारो Immuी मा गम kिimयापि mmmmmite प्राचीन पंडित और कवि . के अनुसार भवभूति का समय राजशेखर से कुछ ही पहले, अर्थात् अष्टम शताब्दी के प्रारम में, होना भी सिद्ध है। सप्तम शतान्दी के मध्य में होनेवाले वाण कवि ने अपने हर्षचरित में जिन कवियों के नाम दिए हैं, उनम भवभूति फा नाम न दिया जाना भी वाण के अनतर भवभूति का होना सिद्ध करता है। भवभूति ने महावीरचरित, मालतीमाधव और उत्तर- रामचरित-ये तीन नाटक लिखे है। इनमें से अंतिम में अल्प और पहले के दोनों नाटकों में किचित् विशेष रूप से उसने अपने जन्मस्थान आदि का वृत्तांत लिखा है। महावीरचरित में अपने चिपय में जो कुछ भवभूति ने लिखा है, वह यह है- "अस्ति दक्षिणापथे पद्मपुरं नाम नगरम् । तत्र केचि. तैत्तिरीयिण काश्यपाश्चरणगुरव, पक्तिपावना. पचाग्नयो घृतवता. सोमपीथिन उडम्बरा ब्रह्मवादिन. प्रतिवसन्ति । तदामुप्यायणस्य तत्र भक्तो वाजपेययाजिनो महाकवे पचम. सुग्रहीतनान्नो भट्टगोपालस्य पौत्र. पवित्रकीतीलकंठस्या- त्मसम्भवः श्रीकठपदलांछनो भवभूति म जातूकीपुत्रः। *डॉक्टर भाडारकर लिखते हैं कि शाजघर-पद्धति में- निरवद्यानि पद्यानि यदि नाटयस्य का क्षति भिक्षुकक्षविनिक्षिप्त किमिक्षुनीरसो भवेत् यह श्लोक भवभूति के नाम से निर्दिष्ट है, जिमसे सूचित होता है कि इस कवि ने इन तीन नाटकों के अतिरिक और भी कोई अन्य लिया है, क्योकि यह श्लोक इन तीनों पुस्तकों में नहीं पाया जाता।

७ मरभूति श्रेष्ठ, परमहमानां महागामियागिराः यथार्थनामा भगवान् यस्य माननिधिगुरु अर्थात्, दक्षिण में पमपुर नाम नगर हे, जहाँ यजुर्वेद को तैत्तिरीय शाखा का अध्ययन करनेवाले, व्रतधारी, सोम- याकारी, पक्रिपावन, पवाग्निक, प्रलवादी, काश्यपगोत्रीय उइघर बापण रहते है । उनके यहाँ वाजपेय-या करनेवाले, पुण्यशील, भट्ट गोपाल नामक महाकवि का प्रादुर्भाव हुआ। मह गोपाल के गोत्र, और पवित्रकीर्ति पिता नीलकंठ तथा माता जादूकों के पुत्र, श्रीरंट-उपाधि भूषित भषमूनि का यही जन्म हुआ। परमहंमा में श्रेष्ट और महतियों में अगिरा के ममान जिम( भयभूति )के गुरु भगवान् भाननिधि' नाम यथार्थ में माननिधिही है। का माराध यि शाली ने, अपने माभूति-नामा निया में मार लिाना:- "दक्षिणदेश के अंर्गत पर नगर में अपर नाम नोनिष्ठ प्रामणगले उदफेवरा में गोपालमा जन्म दुमा गोराम्ब भा रे नीलांटनामा पुत्र मा और मीनार নথনি মাগমুশিয়া মাসামানসূচী। गोई मेयर विभा- पीनाम मनीषारामानेगा।" पतु मयि में होने अधिक माही, मनापुर गए। "prfiewit

प्राचीन पंडित और कवि
महावीरचरित से जो पतियाँ हमने उधृत की हैं वही
पहिया, कुछ परिवर्तित रूप में, मालतीमाधव में भी है।
यहाँ उनका श्रारंभ इस प्रकार छुपा है-"प्ररित दक्षिणा-
पथे विदर्भेषु पद्मनगर नाम नगरम् "-जिससे सिद्ध होता
है कि दक्षिणापथ के विदर्भ-देश में पद्मपुर अथवा पद्मनगर
था। विदर्भ का आधुनिक नाम बरार हे, परतु वरार-प्रात
पद्मपुर का कहीं पता नहीं। यह नगर इस समय अस्तित्व
हीन हो गया जान पड़ता हे । मालतीमाधव के टीकाकार
जगद्धर ने पमपुर और पद्मावती में अभेद बतलाया है,
यह
ठीक नहीं। पद्मावती, मालतीमाधव में वर्णन किए गए
मालती और माधव के विवाहादि का घटना-स्थल है।
डॉक्टर भांडारकर का मत है कि भवभूति का जन्मस्थान
चरार में कहीं चॉदा के पास रहा होगा । वहाँ कृपणा-यजुर्वेद
की तैत्तिरीय शासावाले अनेक महाराष्ट्र ब्राह्मण अब तक रहते
हैं। उनकी देशस्थ संशा है और उनका सूत्र प्रापस्तंर है ।
चाँदा के दक्षिण और दक्षिण पूर्व उसी घेद और उसी सूत्रयाले
अनेक तैलंग ब्राहाण मी रहते हैं। भयभूति ने अपने नाटकों
में गोदावरी का जो वर्णन किया है उससे जान पड़ता है कि
घद्द उस नदी से विशेष परिचित था। पगपुर शायद गोदा
घरी के तट पर ही अथवा कहीं उसके पास ही रहा होगा।
मालतीमाधव की घटनाएँ पद्मावती-नगरी में हुई है।
कनिने इस नगरी के चित्रों का कुछ-कुछ पता दिया है।

भवभूति
चतुर्थ अक के अत में माधर से उमका सना मरद कहता
है-"नदुत्तिष्ठ पारासिधुसम्भेटमगाध नगरोमेर प्ररि-
--" जिससे विदित होता है कि पाग ओर सिंधु नाम
की दो नदियों के सगम पर पद्मावती नगरी बसी थी। इस
बात को कवि ने नपम सक के प्रारम में पुनरपि पुष्ट किया
है। वहाँ उसने लिया है-
पभावतीविमलपारिविशालसिन्धु.
पारासरिरपरिकरच्छननो सिमर्ति
उत्तुङ्गमीधारमन्दिरगोपुराह
मंघपाटितविमुक्क्रमियान्तरिक्षम्
संपाधिमाति लयमा ललिताम्मिलित
रमागमे जनपदप्रमदाय
गोगर्मिगनियनवोपलमालमारि-
सेयोपकष्टविपिनासल पिभान्नि
ari 4 लगानदी का नो नाम माश
भिल नित ोमा मि पण
मामा मी पानी थी। जो अप में, र मागे,
-
"अर मधुमखिभुरोपमा मगर मपानी
पनिगरप्रति गुपण विधिपाराय।"
में यह भी जामा मधुमयों मारी
मां और माना fuy AIRAT मुमरि.

प्राचीन पडित और कवि
नामक शंकर का मंदिर था । जनरल कनिहम और पंडित
वामन-शिवराम आपटे का मत है कि ग्वालियर-राज्य के
अतर्गत मालवा-प्रांत का नरवर-नगर हो प्राचीन पद्मावती
है। नरवर सिंध( प्राचीन सिंधु ) नदी पर बसा है, और
उसके पास ही पार्वती (प्राचीन पारा), लोन (प्राचीन
लवणा) और मधुवर(प्राचीन मधुमती ) नदियाँ बहती
है । यह पहचान जॅचती तो ठीक है, परंतु पारा और सिंधु
के संगम से नरवर कोई २५ मील है। इसी से डॉस्टर
भाडारकर कहते हैं कि नरवर से हटकर, कहीं दूसरे स्थान
पर, पद्मावती रही होगी। विक्रमादित्य के समय से ही और
प्रांतों की अपेक्षा मालवा-प्रात ने विद्या-चुद्धि में विशेष ख्याति
प्राप्त की थी। इसी से राजमत्रियों तक के लड़के विदर्भ देश
से पद्मारती में श्रान्वीक्षिकी-विद्या(न्याय शास्त्र) पढने श्राते
थे। संभव है, विदर्भ से कान्यकुब्ज जाते समय, अथवा
काश्मीर से लौटते समय, भवभूति पद्मावती ही के मार्ग
से गया हो, और उस नगर की तथा उसके निकट बहनेवाली
नदियों की शोभा प्रत्यक्ष देसकर मालतीमाधय में उनका
वर्णन उसने किया हो। पमावती में विद्या की विशेष चर्चा
थो, अतएर भवभूति का वहाँ जाना कोई आश्चर्य की बाट
नहीं।
विष्णु शास्त्री चिपलूणकर ने अपने निवध में यह बात
सिद्ध की है कि जैसे एक ही अर्थ के व्यंज पृथक पृथक् पद्य

भवभूति कालिदास ने अपने पृथक्-पृथक् प्रथों में लिखे हं घेसे भर- भूति ने नहीं लिये । श्रर्यात् भवभूति ने एक ही भार का पिपपया करके उसे अनेक स्थलों में पद्य-पर नदी किया। यद हम भी मानते है। परंतु शास्त्रीजी के इस करने से हम सहमत नरी फि "विचारों के विषय में, हम, यहाँ पर, एक मान और करना चाहते है । यह यह कि वे स्वयं कधि के पौर फाप्यों का किचिन्मान भी श्राधार उनको नहीं." নারী বা প্রায় সাযয যা কি নিজ নামে। में उपरे पर्यवती परियों की छाया तक नहीं पाई जाती। स्वयं शाररोजी पोपक मा उदाहरण मिला है, जिसम সামূদিন মােয়র ই-~ এ যেন সীম ঘণ" रनोप का मार र फालिदाम-टर मंगम के "ग्गामासिंगप प्रगयपिना धानुग. शितायाम्"म ग्लो. फा गाय पप यहां पर भारीजी में गपतिता शिष्य यो कानिहामी गुर, में मद गपा - न पनपीरिया और पारि समाप में शानदार महापगे frपनि रिसा भनेर Frit Trirarei शोधोगदानु.स Farmer frmirti Hanummer Fr ता 44 - -

प्राचीन पडित और कवि
.
"
कालिदास, शूद्रक और क्षेमेंद्र, ये तीनों कवि भवभूति
से पहले हुए है । इनको उक्लियों की छाया भवभूति के पद्यों
में, अनेक स्थलों पर, पाई जाती है। यह चाहे इन कवियों
के काव्यों के पाठ से भवभूति के हृदय में उत्पन्न हुए
सस्कार विशेष का फल हो, चाहे यों ही घुणाक्षर-याय से
पूर्व कवियों की उक्तियों का भाव उसकी उक्तियों में आ
गया हो। कुछ ही क्यों न हो, कहीं-कहीं साम्य अवश्य है।
अनेक विद्वानों का मत है कि भवभूति ने पहले महावीर
। चरित, फिर मालतीमाधव और फिर उत्तररामचरित लिखा
है। इन ग्रथों की लेख प्रणाली, इनके अर्थ-गौरव और इनके
रसाल भावों का विचार करने से यह सिद्धांत युक्तिसंगत
जान पड़ता है । महावीरचरित में वोर, मालतीमाधव में
भंगार और उत्तररामचरित में करण-रस की प्रधानता है।
इन नाटकों में क्या गुण है, और क्यों भवभूति की इतनी
प्रशंसा होती है, इन सब बातों का विचार विष्णु शास्त्री ने
बड़ी ही योग्यता से अपने निबंध में किया है। अनेक उत्तमो.
चम पद्य उद्धत करके उन्होंने उनकी युक्ति-पूर्ण समीक्षा की
है। भवभूति के नाटकों के कथानक की मी शास्त्रीजी ने
प्रशंसा की है। परंतु मालतीमाधव के कथानक के सबंध
में, डॉक्टर मांडारकर फी सम्मति उनको सम्मति से नहीं
मिलती। डॉक्टर साह का कथन है कि इस नाटक में
जो श्मशान-वर्णन है, यह असंबद्ध सा हे मृल कथानक में

भवभूति घड जोड-सा दिया गया है। ये यह भी कहते हैं कि कपाल- कुटला के द्वारा मालती का हरण किया जाना कति ने केवल इमलिये दिखाया है, जिससे पियोगियों की दशा का वर्णन करने के लिये उसे अवसर मिले। डॉक्टर भांडारकर ने और भी दो यक याते, शास्त्रीजी के मत के प्रतिकूल, कहीं हैं। डॉक्टर साहब के यतलाए हुए दोष ऐसे है जोसामाय जनों के ध्यान में नहीं पा सकते । नाटर शाल के प्राचार्यों की दृष्टि में ऊपर कदी बातें चाहे भले ही सदोष हो, परंतु हम, সে মিথয় মযৱ গৰৰ কাজি ময়মবি কা স্কি মা मशान वर्णन अद्वितीय है। बीमत्म रस का ऐसा मच्छा उदाहरण मस्हन के और नाटकों प्रथा कायों में हमने नदी देवा । भयभृति का विमलभ-वर्णन भी एक अद्भुत यातु है। अतपय भयभूमि के ये दोष यदि दोष कहे जा सकते हैं मोक्षाप है। यदि यह इन उपर्युक बातों को मालतीमाव मे निकाल लता, सोहम धीमरस और दियोगार के भाषिक रम से परिप्नुन उम्पनी अनूटी परिता में भी पथिग रहने। पंडित मात्रपराप कटेश लेल ने भवभूति मरनाटकों को समालोचना मराटी मेंकी र अनेर बार दिनार है, परतु म नोट में निध में हम समय वों का विचार नहीं माने। पाने बारेमनाने का कारण पति मे मी पर ही fan पY ार में निम

,
प्राचीन पडित और कवि
वस्तुजात और पात्रों के क्रिया-कलाप आदि से उस यात का
पता लगता है। जिस समय भवभूति का प्रादुर्भाव हुश्रा
उस समय, इस देश में, बौद्ध धर्म का हाल हो रहा था।
पष्ट शताब्दी में उद्योतकर, सप्तम शताब्दी में कुमारिल भट्ट
और अष्टम शताब्दी में शकराचार्य ने बोद्ध धर्म को उच्छिन्न
करने में कोई बात उठा नहीं रक्खी। वैदिक धर्म के प्रतिपा
दन और बौद्ध धर्म का सहार करने के लिये इन महात्माश्री
ने जो कुछ किया है वही भवभूति ने भी किया है। इन्होंने
स्पष्ट रीति से बोद्ध धर्म का खडन किया है, परंतु भवभूति
ने स्पष्ट कुछ नहीं कहा। अनेक स्थलों पर अपने नाटकों
में वैदिक धर्म की श्रेष्ठता पोर बौद्ध धर्म की हीनता के
उदाहरण दिसलाते हुए, दोनों प्रकार के धर्मावलपियों
को दिनचर्या का चित्र खींचकर, भवभूति ने सब मर्म
अभिनय देसनेमालों के सम्मुख उपस्थित कर दिया है,
जिसका यही तात्पर्य है कि चैटिक धर्म प्राध और बौद्ध
धर्म त्याज्य है।
मालतीमाधव की प्रसिद्ध पानी कामदकी यौद्ध संन्या-
सिनी थी। वह अपने श्राश्रम धर्म के विपरीत मालती और
माधन को विवाह-सून से वॉधने के बसेड़े में पड़ी थी।
उनकी शिष्य सौदामिनी बोद्ध संप्रदाय का त्याग करके
अघोरघंट और कपालमुडला के तात्रिक जाल में फंसी
थी। ये तात्रिक से दुराचारी और नृशस थे कि अपनी

भवभूति पदेनी चामुंडा के सन्मुष, समय-समय पर नरबलि दिया करते थे । मालतीमाधर का यह चिन बौद्ध धर्म के अध-पतन का दर्शक है। वैदिक धर्म के अनुयायियों की श्रेष्ठता का चित्र धौरवरित और उत्तरचरित में है। इन दोनों नाटकों में रामचद्र, राधमग, लर, कुश, सोधातकि, जनक, पशिष्ट, विश्वामित्र और जानरी आदि के विमोहारा भर- भूति ने ब्रह्मचारी, गृहन्य, पानमन्ध, राजा, प्रजा और तपत्रिवर्ग के प्राचारों और प्यारा पा ऐमा अन्धा श्रादर्श दिखलाया है, जिसरी देगने से वैदिक धर्म का स्वरुप नेनो पे सन्मुग उपस्थित हो और उस पर प्रांतरिफ असा उपन हुए मिना नदी रहती। गाँधी के पारियों पं. पाचरणानुरुप दो प्रकार पं. उपचार লা ভিন্ন নিদিন যন্ত্রে নয়তমা স্ত্রী •ালনা फा भैरहेको काश से दिखाया। इस पर प्रतीत ताने या सय पर धर्म की सुरक्षा सुधिन घरले जिप देगांगताप मन में उस घोरपनाया उमर पिया। भगत it fami पोर धर्मदा करा लिए पर मटार प्रयोnirnा, गुभाने समें firmlar मालिशपर, मार front air. माटोको Far- Trit

प्राचीन पंडित और कवि
यही भावना मन में उत्पन्न होती है कि बौद्ध धर्म निस्सार
और वैदिक धर्म परम सारवान है।
नाटक लिखने में भवभूति का श्रासन कालिदास से कुछ
ही नीचे है। कोई-कोई तो उसे कालिदास का समकक्ष और
कोई-कोई उससे भी चढ गया बतलाते हैं । भवभूति ने
मनुष्यों के आंतरिक भावों का कहीं-कहीं ऐसा उत्कृष्ट और
पेमा सजीव चित्र खींचा है कि उसे देखकर कालिदास
का विस्मरण हो जाता है। खेद है, उसकी इस अद्भुत शक्ति
का विकाश देखने और उसके द्वारा एक अकथनीय शानद प्राप्त
करने के लिए केवल हिंदी जाननेवालों का मार्ग रद्ध-सा हो
रहा है। हॉ, यह सत्य हे कि एक पुराने लेखक ने भवभूति
के तीनों नाटकों के अनुवाद हिंदी में किए हैं, परंतु, जहाँ तक
हम समझते हैं, उनके अनुवादों से भवभूति की अलौकिक
कविता का अनुमान होना तो दूर रहा, उन्हें पढ़कर पढने-
वालों के मन में मूल-कविता के विषय में घृणा उत्पन्न होने
फा भय है । कहाँ भवभूति की सरस, प्रासादिक और महा-
श्राहाद-दायिनी कविता और कहॉ अनुवादकजी की नीरस,
श्रव्यवस्थित और दोपदग्ध अनुवादमाला ! परस्पर दोनों में
सौरस्य विपयक कोई सादृश्य ही नहीं ! कौड़ी-मोहर,
श्राकाश पाताल और ईख इंद्रायण का अंतर ! अपने कथन
को सत्यता को सिद्ध करने के लिए हम, यहाँ पर, मालती-
माधव से दो एक उदाहरण देना चाहते हैं, जिनको देखकर
-

- - भवभूनि पदनेवाले स्थालोपुलाफ न्याय से मूल और अनुवाद का अंतर सममा जायेंगे अपनी ससी लगिका के धोसे माघर का आलिंगन फरणे, अनंतर उसे पहचान जब उससे मालती घट गई, नय माधय कहता है- पफीकृतस्पचि निपितः इवारपाट्य निर्मुग्नपीनकुघयुश्मलयाऽनया मे। परिवारदरिचन्दनचन्द्रफात. निम्य दर्शवलमृणालदिमादिवर्ग । मापार्य-अन्न पौन-पयोधर-कपी मुकुलों को धारण करनेवाली इस मानती ने, कपूर हार, परिचंदन, चंद्रकांत- मगि धन (सियार), मृणाल और दिम प्रादि शीतल पदापों को धीभूत पर, उन्दै पकत्र निचोड़, मेरी त्वचापर फालेप-सा लगा दिया। इसका अनुसार मुनिए- जानुपर चंदन रसमोरी, दिपता गुनार नियोग: उमरे उर(!)मोदिप पापनि, मादपूर साहिएगायति। गम पार NET, मार और दिम को मार Er, TER रस को दिय! गादी Frm:परमो कादि में foreir Trmarri गापामा tim

प्राचीन पडित और कवि
यही भावना मन में उत्पन्न होती है कि बौद्ध धर्म निस्सार
और वैदिक धर्म परम सारवान है।
नाटक लिखने में भवभूति का श्रासन कालिदास से कुछ
ही नीचे है । कोई-कोई तो उसे कालिदास का समकक्ष और
कोई-कोई उससे भी बढ गया बतलाते हैं । भवभूति ने
मनुष्यों के शांतरिक भावों का कहीं-कहीं ऐसा उत्कृष्ट और
पेसा सजीव चित्र खींचा है कि उसे देखकर कालिदास
का विस्मरण हो जाता है। खेद है, उसकी इस अद्भुत शक्ति
का विकाश देखने और उसके द्वारा एक अकथनीय शानदमाप्त
करने के लिए केवल हिंदी जाननेवालों का मार्ग रद्ध-सा हो
रहा है। हॉ, यह सत्य है कि एक पुराने लेखक ने भवभूति
के तीनों नाटकों के अनुवाद हिंदी में किए हैं, परंतु, जहाँ तक
हम समझते है, उनके अनुवादों से भवभूति की अलौकिक
कविता का अनुमान होना तो दूर रहा, उहें पढ़कर पढ़ने-
वालों के मन में मूल-कविता के विषय में घृणा उत्पन्न होने
फा भय है । कहाँ भवभूति को सरस, प्रासादिक और महा-
पाहाद-दायिनी कविता और कहाँ अनुवादकजी की नीरस,
अव्यवस्थित और दोषदग्ध अनुवादमाला ! परस्पर दोनों में
सौरस्य विषयक कोई सादृश्य ही नहीं ! कौड़ी-मोहर,
आकाश पाताल और इंग्य इद्रायण का अंतर ! अपने कथन
को सत्यता को सिद्ध करने के लिए हम, यहाँ पर, मालती-
माधव से दो एक उदाहरण देना चाहते है, जिनको देखकर
-

- A भवभूति पढ़नेवाले म्यालीपुलाफन्याय से मूल और अनुवाद का अंतर समझ जायेंगे- अपनी सती लागिका के घोसे माघर का आलिंगन फरकी, अनंतर उसे पहचान जय उससे मालती हट गई, नप माधय पड़ता है- एकीटनस्त्रचि निपिप्त इचारपत्य निर्मुग्नपीनकुटफुमलयाऽनया में। কাবিনন্যান- निम्य दशेयलमृणालदिमाविवर्ग.॥ मापा-मरने पीन-पयोधर-रुपी मुकुलों को धारण परनाली समालनी ने, फापर हार, परिचदन, चद्रकांत- मणिपरा (सियार), मृणाल और हिम ग्रादि शीतल पदाधी को पीभूत परो, चन्दै एपात्र निचोद, मेरी त्वचापर एनरं ग्म का रोप-सा रागा दिया। इसका यनुयाद मुनिए- अनु तुपार चंदन रस पोरी, दिरपत अग गृनाल निचोरी, उमरे उर(!)मा दिप पारति, I पर तग धारि साति। गुमका पति मृगास चार दिन की कार Er, rate or को मोविश! मूल में पदी tar भूतकालिका में रति, ETE TRोन दिपाशार गोगा माल - लोलिंबराज भिन्न-भिन्न भापानों के कवियों और विद्वानों के जीवन- चरित प्रकाशित होने से अनेक लाभ है। ऐसे चरितों के द्वारा उन-उन कवियों और विद्वानों की अलौकिक प्रतिभा के उदाहरणों श्रादि से पढ़नेवालों का बहुत मनोरंजन होता है । संस्कृत-कवियों के वृत्तज्ञान से तो समधिक और भी लाभ होता है। संस्कृत भाषा हमारी मातृभाषा हिंदी की जननी है और उसके परिशीलन की ओर प्रवृत्त होना इस प्रात ही के नहीं, इस सारे देश के निवासियों का परम धर्म है । सस्कृत के कवियों की कविता की आलोचना पढ़ने और उनके चरित का थोड़ा-बहुत ज्ञान होने से उस भापा की और मनुष्यों की प्रवृत्ति होना अधिक संभव है। लोलिंवराज से वैद्यक विद्या के जाननेवाले संस्कृतज्ञ, औरों की अपेक्षा अधिक परिचित है, क्योंकि लोलिबराज का प्रसिद्ध ग्रंथ वैद्यजीवन चिकित्साशास्त्र का प्रथ है। परंतु लोलिवराज वैद्य ही नहीं, किंतु एक प्रसिद्ध कवि और रसिकये। किसी प्राचीन विद्वान् के विषय में कुछ लिसने के लिए लेसनी उठाते ही पद्दते यह प्रश्न उठता है कि यह

लोलिपराज
कौन था, कय दुपा, कदा रहा और कौन-कौन ग्रंथ उसने
लिये । परतु इन बातों का उत्तर देने में प्राय. इत-सफल
धोना पटता है । यह गैद को पात हे; परंतु क्या किया
जाय, यश नहीं । किमी-किसी यिरले विद्वान् को छोड़कर
औरोने अपने प्रथों में, अपने विषय में, कुछ लिसा दी
नहीं। श्रीर, लिसा भी है तो बहुत थोड़ा । जिसने कुछ
लिगा भी है उसने अपने लेस में ऐसी अत्युक्तियाँ कही है,
और उस लेस को कयितारूपी येष्टन से इतना लपेटा है, कि
उसमें से ऐतिहासिक तत्व हुदरिफालना यदा कठिन काम
है। सोलिपराज भी उपर्युक्त दोष से नहीं यचे घ शपने
प्रया में अपने लिए पारने
"एमने अपनी जंघा कामास अग्नि में रन पर पायती
को प्रसन्न किया। पार्यो । दमको दूर पिलाया। दम एफ
पही में १०० गाक यता मकने है। दम पारियों को नारक
करियों के यादगद गारिया जायालादी
दम गामा | राजाओं को सना हम भूप है।"
पार पानी प्रगंगा में शाप निरा, पानु पर
arraार पद हुए, हय , धीर
बनाम।
HTTीन मय
पास
Timimaritrarian IE
FINITer rौपापोmumt.

- . प्राचीन पडित और कवि लोलिवराज के वनारे हुए हैं । इनके नाम ह-चमत्कार- चितामणि, रत्नकलाचरित, वैद्यविलास और लोलिवराजीय । पर ये हमारे देखने में नहीं पाये और शायद छपे भी नहीं। उनके प्रसिद्ध तीन ग्रंथों में से पहले दो वैद्यक विषय के है और अंतिम में कृष्ण का चरित है । इन ग्रंथों में पहला ग्रथ वैद्यजीवन ही अधिक प्रसिद्ध है। तीसरे, अर्थात् हरिविलास में, नंद के धर कृष्ण के पहुँचाये जाने से लेकर उद्धव-संदेश तक की कथा है। काशी से निकलनेवाली काशीविधा-सुधा निधि-नामक संस्कृत पुस्तक के दूसरे भाग के सोलहवे अक में, लोलिवराज के विषय में, पडित येचनराम शर्मा इन प्रकार लिखते है- दिवाकर सूरि के सुत लोलिपराज राजा भोज के सम- कालीन, सूर्य नामक नरेश के पुन, हरिहर को सभा के पडित थे। चे दाक्षिणात्य ब्राह्मण थे, यड़े विषयी थे, महा- मूर्ख थे। उनका बड़ा भाई जीविका के लिए देश विदेश घूमा करता था और चे दिन-रात न जाने कहॉ रहकर भोजन के समय घर में उपस्थित होते थे प्रोर अपने पदे भाई की स्त्री के परोसे हुए भोजन को श्रास्ठ सारर फिर राहर चले जाने थे । एक दिन उनकी दुर्वृत्ति से अत्यंन सिन होकर उनके भाई की स्त्री ने उनके सामने से बाली खींच ली और मद्ध होकर कहा-"रे दुष्ट ! घर से बाज ही तृ निकल जा। आज तक व्यर्य दी मने तेरा पालन पोपण किया।" ये चाफ्य

लोलिपराज
लोलिपराज को विष में घुमाये हुए वाणा के समान तगे।
पे तुरत घर से बाहर हो गये और दक्षिण ससटंग नामक
पर्वत पर जाकर वहाँ स्थापित पी हुई भट्ठारह मुजावाली
देवी कोरियामाति के निमित, प्रसार करने लिए तपस्या
करने लगे। लोलिपराज को तपस्या से प्रसन्न होकर देवी
ने उनमें 'तथास्तु' कहकर उनकी कामना पूरी की। तप से
सोतियराज मदापति, महापटित, मदान गायक और गहान
गये।
पंचनरामी ने हम पार्ता को 'जनयुति' कहा है। यद्यपि
म विषय का प्रामाणिक लेग्य में यहीं नहीं मिला,
तथापि एसपी पुद सूचना लोलिंपरा ये प्रयों में मिलती
पा---
रस पागा CID सुपर भासारंगापर
पापा मग भयभाय भने।
यमन म्यागनि ! पीमा गमुगाने
নয়ামাখাযাথিয়ানা।
पापा में शांति Arizो कोई
entinयों में सम्पपिसी, कागती, m
HTriमिनी, हा मुशापानी, मगर uri
infrnar many
iपनियो
mimirmir.

प्राचीन पंडित और कवि इससे लोलिबराज का शाक्त होना और सप्तशृग स्थित अष्टादश-भुजावाली देवी की उपासना करना सिद्ध है। इससे यह भी सिद्ध है कि वे दाक्षिणात्य थे, क्योंकि सप्त- शृंग-पर्वत दक्षिण ही में है । देवी की उपासना का परिचय लोलिपराज अपने वैद्यावतस प्रथ में भी देते है। वहाँ आप । कहते हैं- , हुतवहहुतजंघाजानुमांसप्रभावा- दधिगतगिरिजाया स्तन्यपीयूषपान. । रचयति चरकादीन् वीक्ष्य वैद्यावतंस कविकुलसुलतानो लाललोलिम्बराज.॥ अर्थात् जघा और गॉठ के मास को काट-काटकर अग्नि में होम करने के प्रभाव से प्रसन्न होनेवाली पार्वती के दुग्ध- रूपी अमृत का पान प्राप्त करनेवाला, कविकुल का सुल्तान (बादशाह), लोलिवराज, चरक श्रादि ग्रंथों को देसकर वैद्यावतम की रचना करता है। गिरिजा ने प्रसन्न होकर जिसे पुत्रवत् अपना स्तन पान कराया, वह कवियों का वादशाह हो गया तो क्या श्राश्चर्य ! उसे कधियों, वैद्यों, ज्योतिषियों, गायकों और सभी विषयों के विद्वानों का शाहशाह होना चाहिए । पडित गट्टूलाल और अयिकादत्त व्यास इत्यादि आधुनिक विद्वान् भी शरीर के मास का एक भी टुकड़ा हरन किये चिना दी एक घड़ी में सौ अनुष्टुप श्लोकों को रचना कर सकते

लोलियराज
.
थे। अन लोलिपराज की गर्वोति कोई गाझिन दुई।
गिरिजा या स्तन पान पाकर यदि गणेय पोर कात्तिश्य की
घरावरी उन्होंने न की तोपरा किया। हम यह नहीं करते
कि नोलियराज की उति नृपा नहीं, पार्वती उन पर
घनश्य प्रसन हुई होगी। दम यह कहते है कि पार्वती की
प्रसरता का कोई विशेष लश्यमा लोलिपरास को गति में
नहीं मिलता। लोलिपराज के तीनों प्रय, जो उपलब्ध हुए
पहुत छोटे-छोटे है । यद्यपि उनशी फरिता सास और
मावादियो, तथापि यह कालिदास, भवभूति चार धौदर्य
आदि की कविता की परापरी नहीं कर सकती, और दा
पारियों को शायद गिरिमा के सानपान का सीमाम्य न
मा दुया था। संगन, लोलियम ने और कोई पद्धन
प्रय पायदा, शिनका एना श्री सप फिनी दोन सगा
दो, अथपा देशपिसाकारत नए दोहों।
आर मिस अगति पार किया गया है उसमें
पदी गरस पाका प्रमगोलियम
गपारिवाणिair trerयत पर पदोन
दीदी गाना नया गुमाएका ir.
हीनदीmarrग समय v Informa
at मामलो, पिपाट गर
milamमोनादाणी मीmar,
TerrtarriATE--

प्राचीन पंडिन और कवि यह श्लोक अपह्न ति अलंकार का एक बहुत अच्छा उदा हरण है, परंतु इतने से लोलिपराज को भोज का सम कालीन बतलाता युक्तिसंगन नहीं। हम नहीं कह सकते कि यह पद्य किस लोलिंब से सबंध रखता है, वैद्यजीधन आदि के कर्ता लोलिवराज से, अथवा इस नाम के और किसी दूसरे कधि से । फिर इसका भी क्या प्रमाण कि किसी ने नोज के अनतर उनके और लोलिपराज के नाम से यह श्लोक नहीं बना डाला १ चरलाल-मित्र के संकलित किये हुए भोजप्रबंध को जब हम देखते हैं तब वहाँ कालिदास, भारवि, भवभूति, माघ, मरिलनाथ, श्रीहर्ष आदि सभी कवियों की उक्तियाँ भोज के विषय में पाई जाती हैं। जिन कवियों का वहाँ नाम पाया है उनमें परस्पर सैकड़ों चर्प का अंतर है। इसीलिए ऐसे श्लोकों से ऐतिहासिक तत्त्व का पता लगाना कठिन है। फिर, मोज एक विद्वान् राजा था, वह करियों को श्रादर की दृष्टि से देखता था। अतएव यह कहना कि उसने लोलिवराज को हूँठ को उपमा दी, मानों उसके सिर पर अरसिकता और असभ्यता का मुकुट रखना है। लोलिपराज की कविता में श्राधुनिकता के चिह्न पाये जाते है। उनमें से फारसी के शब्द "सुलतान" और "पाद- शाह" बड़े ही जाज्वल्यमान चिह है । ऊपर एक श्लोक दिया जा चुका है जिसमें सोलिवराज ने "सुलतान" शब्द का लोलियराज । M प्रयोग किया है। एक श्लोक भय हम वधारतंस से चार उद्धत करते है, जिसमें "पादशाद" शद पाया हे- समम्तधापतिपूजनीयो दिगद्दमाश्लिष्टयश शरीर। गुणिप्रिय ग्रन्थममु प्यतानी- ल्लोलिम्राकत्रिपादशाह। दिशापिगी नियों में जिसके यशोरूपी शरीर का पातिगन किया है, जो समस्न राजवर्ग का पूजनीय है। जो फपियों का पादशाद है--मे लोतियराज ने गुणवानों पोप्रोनिपान सप्रफी रचना की। गुपयानों के प्रतिपाय इस घेद्यायनम में रानी और उनमें पेशा के अनुसार पदायों के गुणोप या गर्जन रस पय में अपने को सप राजाओं का पूजनीय पदपार और चपा यशशरीरको दिगम में पहुँचाकर लोसिय- गी पियों के मारयाद पर गरे। "पEITE" सौर "मुरातार" शपल पाा शी साशी है कि उस गाय मुगलम' का प्रमेश दक्षिा में हो गया था और समद्वारा पहननमे शारमी गाद लोगों में पारा तक पहुंच गरे । गनिमें घोर पापामाit गम्प पहल पुगापापांमाद परसे परी मुगermil पाnिing Tekr मुग पाणि ३२ प्राचीन पडित और कवि का उदय हुआ है। अर्थात् वे कोई चार पाँच सौ वर्ष के इधर ही हुए है। भोज के समय लोलियराज का होना, बिना किसी हद पेतिहासिक प्रमाण के, नहीं माना जा सकता । लोलिंबराज ने जिन सूर्य और हरिहर राजाओं हैं महाजनमडल नामक गुजराती पुस्तक के कर्ता ने लोलिंबराज का होना शक १५५५ अर्थात् १६३७ ईसवी के लगभग माना है। इससे हमारे कथन की पुष्टि होती है । इस पुस्तक में लिखा है कि लोलिंगराज जुन्नर के निवासी थे। यह नगर दक्षिण में पूना जिले में है। परतु ये सब बातें निराधार लिखी गई हैं । इनका कोई प्रमाण इस पुस्तक में नहीं । लोलिंगराज के तपस्या करने और अपने शरीर का मास होमन श्रादि के विपय में भी इसमें प्राय वही बातें लिखी है जो हमने रिखी । इस पुस्तक में इतना अधिक लिखा है कि लोलिंगराज की ना रतकला "बादशाह' की एडकी थी। बादशाह ने लोबिराज से पून कि हमारी गर्भवती रानी के लडका होगा या लडकी। पूछने के समय बादशाह की युगा क्या उनके पास सडी थी। उसे देखकर लोलियराज ने कहा कि मेरा उत्तर ठीक निकलने पर यदि आप मुझे यह कन्या देना स्वीकार करें तो मैं श्रापके प्रश्न का उत्तर बतलाइ । बादशाह ने यह बात अंगीकार कर ली । लोटिंबराज ने कहा, यापकी रानी के पुत्र होगा। पुत्र ही हुआ और वह कन्या लोलियराज को मिल गई। उसके साथ उन्होंने विवाह किया और उसका नाम रनकला रक्सा । यदि यह बात सत्य है नो रोलिंबराज भी हमारे पडितराज जगजाय राय के साथी हुए। परतु महाजनमडल के कर्ता ने इन बातों का कोई प्रमाण नहीं दिया । यह भी नही लिखा कि वह "यादशाह" कौन था शोर कहाँ का था। यादशाह की युवा लडकी का एक अपरिचित के सामने, अपन पिता के पास, सडा रहना हमें तो सभर नहीं जान पड़ता।

-
।
.
लोलिपराज
का नाम अपने ग्रंथों में दिया है उनका कुछ भी पता नहीं
चलना। चोल, कर्णाटक, पांडव और अांध्रदेश के राजाओं
की जो नामावली भरतकात हुई है उममें इन राजाओं
का नाम नहीं । जान पड़ता है, ये कोई छोटे मांडलिक राजा
थे। यधक का प्रसिद्ध अथ धाम्भह, चरक और मुश्रुत से
कुन पौडे का है। हम वाम का उल्लेख गोलियराज
ने अपने पंचायत में लिया है, जिससे यह सिरहेकि
'नागिपराज पाभ पीछे हुए है । और यागमन का
Hয শি ঋী ব্যার্থ মামা। যান
जाता।
कमोतियरा ने अपने में अपनी मामा मामा को
मी मामा के कई उदाहरण मार दिये जा चुके है।
पद पाएर उदारा दम भार देते है, पयोंकि उसने
होने अपने पिता का मान है। यदलीय र.
जीयन के अंत में:-
গ্রাথমি reralr.
मामा गाविदा दियाराम्भोधिप्रपामापतिः ।
उप दिलासा मागिता সা
पानगरपामिनानिपराम पि:
in a refrhmin : गामपिता
Triami anim,frre pune
भाimbarami
sary

.
प्राचीन पंडित और कवि
लोलिवराज के ग्रंथों में वैद्यावतंस बहुत ही छोटी पुस्तक
है। जैसा ऊपर कहा गया है, उसमें केवल ५८ श्लोक है।
और उनमे पदायों के गुण-दोप का विरण है । वैद्यावतस
के आदि और अत में लोल्विराज ने मगलाचरण के जो दो
श्लोक लिये है चे, सानुप्रास होने के कारण, बहुत ही मनो
हर है। उनमें से पहला श्लोक यह है-
अनुकृतमरकतवर्णा
शोभितकर्णा कदम्बकुसुमेन।
नखमुखमुखरितवीणा मध्ये क्षीणा शिया शिव कुर्यात् ॥
मरकतमणि के वर्ग का जिसने अनुकरण किया है, कदर
पुष्प से जिसके कान शोभित हे, नख से जो वीणा का
बजा रही है--ऐसी क्षीणकटी शिवा (पार्वती) मंगल करे !
दूसरा, अर्थात् वैद्यावतंस का ५७याँ श्लोक यह है-
अधरन्यतविंवा जितशशिविम्या मुखमभया।
गमनाविरलविलम्बा निपुल नितम्या शिवा शिवं पुर्यात् ।।
अपने अधरों से विवाफल का धिकार करनेवाली और
मुख की कांति से चद्रविय को जीतनेवाली, मंदगामिनी
तथा विस्तृत-नितव शालिनी शिना मगल करे!
यह अनुमान होता है कि चैद्यावतस लोलिपराज का
पहला प्रथ है। इसमें इन दो श्लोकों के अतिरिक्ष, हमारी
समझ में, एक ही और श्लोक है जिसे बहुत अच्छी करिता
कह सकते है । करेले के गुणों का वर्णन करते हुए लोलिब
राज उसकी प्रशंसा इस प्रकार करते है-

मोतिदराज
s
নানা গ্রনিমা যা অন ঘন খামখা নি।
থালিমঃ বজাৰৰ ন ননন ফানু ?
খান, লিঙ্গীয় যা বিনা ক্ষী সিযা স্নান যে
এ গ্রামে যা যা হলাে সা ন স হ ৪ g
মমনা যে? সে জানি ফ নত শ্বাণ
চা বানায় ।
না প্রায় গা ঘিনালা, খাৰিা
परने से जान पटना कि रियिशाम को लोलिग्गज
বানর ঘী খনা । শ খ বিৰা না খা
, জিলাৰ ইল বা পথ বা দা নিল।
৪ লী । R বাদ যায় মই ফুল
লীলা বননি যান। ঘঘিা মস
{} শনিবাণ দা অনিনা । সঘন ঘড়া যদি
t, না হয় ৭ দিন ধাশী
ঘী যে । যা পাম
বিশ্ব
ও মা বাবা বা Tা-
॥ গে না । যা
rexi frའ ་ নেয়।
স) মােখা মা মা প
#*#* ঘা = গ +
r rশা মানে খামু ন দিল ।
? ঃ ;
ঘাম মম পবি ।

३८
प्राचीन परित और कवि
कठोर चाणों से पीड़ा पहुँचाने लगा, गुणवान् राजा के
समान शृंगार-रस ने ऊंची प्रतिष्ठा पाई, और नवला कामिनी
की लजा के समान रात्रि ने कम-क्रम से कृशता स्वीकार
की, अर्थात् छोटा होना प्रारंभ किया । देखिए, कैसी मनोहर
उपमाओं के द्वारा, कैसी सरल रीति से, लोलिंबराज ने
वसंत का श्रागमन वर्णन किया है। इनकी उपमाएँ प्रायः
बहुत अच्छी हैं । हरिविलास से शरद्धर्णन का एक श्लोक
हम और उद्धृत करते है-
वृद्धाङ्गनेव विजही सरिदुद्धतत्वं,
वेदान्तिनामिज मत शुचि नीरमासीत् ।
चद्रे प्रभा युवतिवक्त बाभुताभू.
द्विद्वत्कवित्वमिव फेकिरुतं न रेजे।
वृद्ध स्त्री के समान नदियों ने अपनी उद्धतता छोड़ दी,
वेदांतियों के मत के समान जल स्वच्छ हो गया, कामिनी के
मुखमंडल के समान चद्रमा अधिक शोभायमान हुश्रा, और
विद्वानों की कविता के समान मोरों की केका अरोचक हुई।
इस पथ के चोये चरण में लोलिंगराज ने एक अमूल्य वात
कही है। सच है, विद्वान् होने से ही कोई कवि नहीं हो
जाता । यदि उसमें कवित्व-शक्ति का स्वाभाविक
चीज नहीं, तो मनुष्य चाहे जितना उड्ड विद्वान् हो, उसकी
कविता कदापि सरत ओर मनोहारिणी नहीं होती। रस ही
फनिता का प्राण है और जो यथार्थ कवि है उसकी कविता

लोलिपराज .
में रस अवश्य होता है। नीरस फपिना करिता ही नहीं।
सोलिपराजयजीवन में ठीक कहा है-
यतो मनारसा भाति कविताकुलकामिनी।
अर्थात, कविता-रूपिणी फुल-कामिनी नीरस होने से
शोमा नहीं पाती।
लोलियराज के प्रयों में बंधजीन सपसे श्रेष्ठ है। यद्यपि
इसका विषय ययक है, तथापि इसे फायही कहना चाहिए।
इसमें कान्य प्रायः समो लक्षण विधमान है । फोर लोक
सा मी जिसमें गोलियराज ने कोई-न-कोई मनोरंजक
उहिमपही हो। इसमें उदोंने अपनी अच्छी फपित्य शक्ति
दिया। पाती के स्तन पान भरने का प्रभाय यदि कदी
पशिदोगा तो सोच में दशिन होतामो
मशाली अंघों से गुना कि पंजीयन यही
गर शोधियों मी सय प्राय: समन भराएर अयर्थ है।
उपमें जो फाप, सुनाई, पिना सा गुध दिगार नहीं
नाम मोतिराम भगोत्री माफगाको
माधन पाया और दिनानिमी मोफ में उमारे
railwn यि अभिviगारिक
नापामरामानमें पानी मा पर,
पर, जान, मनिरापदी rrrI
पही पण nि REETC.Tign
गोलिय मेiml

४०
प्राचीन पंडित श्रोर कवि
इसमें सव मिलाकर पॉच विलास है, और, प्रत्येक विलास
में नीचे लिये अनुमार विपययोजना और श्लोक संख्या है-
विलास विपय
श्लोक-सख्या
.
प्रथम
ज्वर-प्रतीकार
द्वितीय अतीसार और ग्रहणी-प्रतीकार २६
तृतीय कासश्वास-प्रतीकार
३६
चतुर्थ राजयक्ष्मादि-रोग-प्रतीकार
पंचम वाजीकरण
जोड़ २०५
अब लोलिंबगज की रसिकता के दो-चार उदाहरण
लुनिए । वैद्यजीवन के प्रारभ में नाप कहते हैं-
येपां न चेतो ललनासु लग्न
मग्न न साहित्यसुधासमुद्रे ।
ज्ञास्यन्ति ते किं मम हा प्रयासा.
नन्धा यथा चारवधूपिलासान ।।
जिन्होंने साहित्यरूपी सुधा-समुद्र में डुबकी नहीं लगाई
और जिनका मन ललनात्रों में लीन नहीं, वे इस नंथ की
रचना करने में होनेवाले मेरे परिश्रम को उसी प्रकार न
जान सकेंगे जिस प्रकार नेत्रहीन मनुप्य वार वनिताओं के
हाव-भावों को नहीं जान सकते । वैद्यजीवन बनाने में क्या
आपको सचमुच ही यहा परिश्रम दुना
?
एक घड़ी में सौ

- लोलियराज लोया यनानेवाले को २०५ श्लोक लिपी में जितना धम हो सकता हे १ यह घात लोलिंग को टुत यथार्थ कि जिमेनादित्य शास्त्र का मान नहीं बह रवि के कर्तव्य को अच्छी तरह नहीं जान सकता। श्रीपठचरित में लिया है न साहित्यन्दिा परम गुर" क्यजित् प्रपने फरीनाम । पालग्यते तन्मणमम्मानीय যিলামের न तलरिदु.॥ अात. साहित्य शास्त्र के मा चिना, एपियों गुण परछी तरह नहीं पिम्तार पाने । नेल का द पानी ही पर फलना। मोगियराम पो उपमा पान की । पापिये बहन नहीं है, नियापि मो शुटीनी है कि उनो फाग वानी यादो में किगरी हो जाना मी उपमा प्राय मार-रगामी TATE यो पफ मुशिए- पदामा म प्रयामि Firruariffari ! माता निरी समामा पालना mmitTTPrizा दाद kenar nam प्राचीन पंडित और कवि धी-चेल धन-नागरमोथा धान्य-धनियाँ विश्व-साँठ अर्थात, जिसको प्रतीसार नहीं है उसे इन श्रोधियों के होने से कोई लाभ नहीं । इनके काढ़े मे अतीसार जाता रहता है। एक छोटा-सा फूट श्लोक सुनिए- रावणस्य सुतो हन्यात् मुखारिजधारित । श्वसन कसनं चापि तमिवानिलनन्दन ॥ अर्थात्, मुखकमल में रखने से रावण का लड़का, श्वास और खॉसी दोनों का वैसे ही नाश करता है जैसे उसका (रावण के लडके का) नाश परनसुत ने किया था। हनूमान् के हाथ से मारे जानेवाले रावण के लड़के का नाम अक्ष था। अक्ष बहेड़े को कहते हैं। श्रथांत बरेको मुंह न रखने से श्वास और खॉमी जाती रहती है। लोलिपराज को एक पहिलोपिका सुनाकर हम इस व्यापार से विरत होंगे- मिन्दन्ति के फुलरफर्गपालि फिमव्यय यति रते नवोढा। सम्बोधन नु किमु कपित्त निहन्तियामोसाद त्वमेव ।।

लोलियराज हे दामोरु (अच्छी जत्रावाली)!तु मुझे यह बतला कि हाथियों के मस्तक का विदारण फोन करता है? उत्तर-- 'सिंहा.' । यह भी यतला कि नगला कामिनी रतोत्सव के समय किस अन्यय का उधारण चार-यार करती है ? उत्तर- 'न' । यह भी तू यतला फि 'न' शब्द का सयोधन क्या है? उतर-'न' और यदी यतलाकिरतपित्त का नाम कौन औषधि करती है ? उत्तर -'मिहानन' । अर्थात् "सिंहा, न, "इन तीनों शब्दों को पपत्र करने से 'न' मागे होने के कारण सिंहा' के सिगो का लोप हो गया और 'सिंहानन ' सम्म सिद्ध हुआ। मिदानम नाम असे का है। अरसे पे काढ़े से पित्त आता रहता है। पंजीयन की कविता यदुन मनोहारिणी है। परंतु अब अधिम उमरगा उपत करने की जरूरत नहीं। लोलिपराज की जितनी कपिता उपलाया है उससे पद प्रमाणित होता कि मयि धे। उनकी कविता में शिना दोष नहीं। या. उना म्यामायिक कपि होने का समान है। अस. १६.१३ फ़ारसी-कवि हाफिज हाफिज फारसी का बहुत बड़ा कवि हो गया है । उसे फारसी के कवियों का शाहशाह कहना चाहिए । गुलिस्ता और दोस्तों के लिखनेवाले शेखसादी से भी, कविता में उसकी बरावरी नहीं की जा सकती। कविता से जहाँ तक संबंध है हाफिज को फारसी का कालिदास कहना चाहिए । हाफिज़ में कवित्व शक्ति प्रपूर्व थी । यह स्वाभाविक कवि था। उसकी उक्तियाँ ऐसी भावगर्भित और ऐसी नैसर्गिक हैं कि पढ़ते ही हृदय पर विलक्षण प्रभाव उत्पन्न करती है। प्रेम, पूल्यभाव और प्रातक- सभी यथास्थान मन में प्राविभूत हुए विना नहीं रहते। ऐसे गंभीर भाव, ऐसी हृदयद्रावक उप्तियाँ, सरल होकर भी ऐसी परिमाजित भाषा, फारसी में, हाफिज के "दीवान" में ही मिल सकती है, अन्यत्र बहुत कम। परंतु ऐसे महाकवि के जीवन का बहुत ही कम वृत्तांत जाना गया है । हाफिज का नाम मुहम्मद शम्सहीन है । हाफिज उसका तखल्लुस था । अपने दीवान में उसने इस तखल्लुस का बहुत ही अधिक प्रयोग किया है। इसीलिए वह मुख्य नाम से प्रसिद्ध नहीं, तसल्लुस से ही प्रसिद्ध है। अपने

फारसी-कषि हाफिज
हाफिज के माता पिता अच्छी दशा में थे, परतु हाफिज
ने दरिद्वारस्या ही में अपनी उन पिताई । यह बात उसकी
करिता से चित होती है। यह फारस के शीराज़ नगर
में, इंसा को चौदहवीं सदी के प्रारम में, उत्पन्न हुआ और
यही बुड्दा हाकर मरा। यह ठोक-टोक नहीं मालूम कि
किम सन्, किस महीने और किस तारीख को उसका
जन्म हुआ, परंतु उसके मरने का समय निश्चय-पूर्वक शान
शीराज में उसकी ओ नाम है उस पर २१ दिजरी, ।
भधात् १३७३ ईसयो, गुदा हुया है। उस पर एक शायर
ने उसके मरने की तारी भी यद तिगो:-
وراع أدل علي حواحد حان
ارور لعاري
چو در داکا متلي بالت مدول
و کار از هاكا وصلي
که شمع دود
निग अपने मामी फिर
कि गमप ना रे नामा
शुरामुगमा यात मजिस
वित्री हा प्रमुग्या
मगर
मोपडादाशित जी fr
की RITAIT, ar(MERI
ममा पाकमा file Times

प्राचीन पडित और कवि
दी हो गया। शेख मुहम्मद अत्तार नाम के प्रसिद्ध फर्कार
से उसने दर्शन-शान सीखा । कुछ दिनों में हाफिज भी इन
शेख साहब का अनुयायी हो गया । उस पर शाह के बजीर
हाजी फयामुद्दीन की चट्टी कृपा थी । उसने विशेष करके
हाफिज ही के लिए एक कॉलेज खोला । उस कॉलेज में
हाफिज कुरान पढ़ाने पर मुकर्रर हुया ! परतु हाफिज का
स्वभाव वहुत ही उच्छृ खल था । वह मद्यप भी था। उस
याहरी दिखाच विलकुल पसद् न था । वह कहता था कि
अमीर और गरीय दोनों का ईश्वर एक ही है। उसके तिए
मसजिद, मदिर और गिरजाघर तुल्य थे । इसलिए उसरे
साधी अध्यापकों तथा और और विद्वानों ने भी हाफिज के
आचरण पर कटाक्ष करना प्रारंभ किया। हाफिज से भी
मौन नहीं रहा गया। उसने भी अपनी कविता में उन लोगों
की खूय दिल्लगी उड़ाई और उनकी अंध-धर्मभीरता, उनके
दाभिक आचरण और उनके मिथ्या विश्वासों पर, मोका
हाथ आते ही, बड़े ही मर्मभेदी न्याय कहे। हाफिज को
लोग कुछ-कुछ नास्तिक समझते थे। और और पातों के
सिवा इसका पफ कारण यह भी था कि हाफिज ने मंसूर
नाम के पहुंचे हुए फकीर की प्रशंसा में कविता की थी।
यह फनीर अपने को "अन्ल-हन" ( अहं ब्रह्मास्मि ) कहता
था । यही दुर्दशा करके उसे फांसी दी गई थी, परंतु अत
तक वह "श्रनल-हा" ही कहता रहा।

फारसी कवि हाफिज
हाफिज़ की कीति बटुन गोत्र देश-देशांतरों में फैल गई।
सकी मनोमोहिनी कविता का रस-पान करके लोग मत्त
ने लगे। अनेक शक्तिशाली बादशाहों और अमीरों ने उसे
न्छे अच्छे पारितोषिक भेने । किमी किसी ने हाफिज़ को
हे प्रेम से अपने यहाँ आने का श्रानादन किया। मुनते है,
क्षिण में, बीजापुर के यादशाह मददशाद यहमनी ने भी
शामिन अपने यहाँ, इस देश में, पधारने के लिए
मामंत्रण के साथ जहाज भेजा था। म आमंत्रण को
फिज ने मीकार भी कर लिया था। यहाँ तक कि.
लोम्नान को गाने के लिए घर शीराम से चल भी दिया
दिसामुद्रिक सफर में उमे कुछ फार टुमा । इमलिए कुछ
प्रभाकर या. शीराज़ को लौट गया । उस समय यंगाले
मुमनमा शार ने नी, गुना है, उसे बुलाया था,
रंतु उसी प्रादर-पूक दम निमत्रप नमो मम्मीनार
कर दिया। पर अधिगया एन मुरमार के
कुल पदन-गुनने ar, पक बार हामिज म पाt
वापर यह जाने में उगे प्रममतामा भारी दिनों
पोरन माग और frerit Mm
martinामा में रोमीट
पिपरीमा!
फिर पापाम पर लिप में पामराम
imi rean में मात्र और

-
प्राचीन पंडित और कवि
ये दरवेश दीवाने हाफिज़ से अच्छी अच्छी उप्तियाँ सुना
कर यात्रियों को प्रसन्न करते है । जिस जगह हाफिज को
समाधि है उसका नाम खाके मुसल्ला है।
हाफिज ने यद्यपि और कई छोटी-छोटी किताबें लिखी है,
परतु उसका दीवान सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वह हाफिज
की कही हुई उत्तमोत्तम गज़लों का समूह है। प्रत्येक राजल
में पॉच से लेकर सालह तक चैत है । प्रायः प्रत्येक अतिम
वैत में हाफिज ने अपना नाम दिया है। हाफिज की
गजलें वर्ण-क्रमानुसार रससी गई है। इससे यह नहीं जाना
जाता कि कौन गजल पहले और कौन पीछे बनी है।
हाफिज़ की कविता के विषय में बहुत मत-भेद है । कोई
कोई कहते हैं कि उसमें केवल पार्थिव प्रेम और लौकिक
बातों का वर्णन है । परतु कोई-कोई इसके प्रतिकुल मत
देते हैं। वे कहते है कि हाफिज ने जो कुछ कहा है सब
अलौकिक और अपार्थिव विषय में कहा है-अर्थात्
उसकी कविता केवल हकानी है, यह केवल ईश्वर-विषयक
है। यह मत सूफी-सप्रदाय के मुसलमानों का है । वे
ज की कविता को ईश्वर पर घटाते है और कहते है
उसका यथार्थ भोर समझने की युजी केरल उन्हीं के
। परतु जिन्होंने हाफिज़ की कविता का बहुत
किया है और चिरकाल तक उसके परिशीलन
उसमें पार्थिन विषय

फारसी-कवि हाफिज नी है और अपार्थिव भी । उसका सृष्टि-सादर्य-वर्णन, उसकी मनोमोहिनी भंगारिक उक्तियाँ और मद्य प्राशन विर- यक उमके विलक्षगा कथन प्रादि का विचार करके विद्वानों का मत है कि इन सब बातों को हाफिज ने ईश्वर को लक्ष्य करके नहीं कहा । इन बातों का माधुता अर्थात् प्रकोरी से बहुत कम सयंध है। हाफिज की कविता स्वाभाविक है। उसकी कल्पना शक्ति बाहुन उदंड है। उसको किमी किमी कल्पना को सुनकर त्य में प्रातक-सा उत्पन्न हो जाता है। उसने कोई-कोई यात बहत ही अद्भुत कही है। उसके दीवान की कामावृ. सियों यलिन, लदन और पेरिस में छपी है। उसकी कविता में अनुवाद भी विदेशी भागों में हो गये है। मर विलि. ऑस और अपापोल, यमामन और शिहर बेलाट मादि ने उस पर गहुन पुछ लिहाया के श्रीगुन ० एम् जौहरी, एम० ए०, एल गल० बी० ने भी जापाने हामिला मनुवाद गरेजी में लिया। प्रारिम में शामिल कविमा तना प्रति प्रसार कि महानि मामानिक मनुष्यों को यह कल राती kar भी अमीर मनी TRA पिता माना निगमान में मर करने पाistrina कोमको met और पमा मा मत

प्राचीन पंडित और कवि
परिहार करते हैं। हाफिज फारित का सबसे अधिक प्यारा
ओर प्रसिद्ध कवि है।
फारिम के विद्वान् समालोचकों का मत है कि हाफिज
की कविता निकम्मी-दुपित-टहराई जा सकती है, परतु
उनकी तुलना और पिसी कविता से नहीं की जा सकती।
उसको करिता शन्वयालंकार का सच्चा उदाहरण है। उसकी
समता उसी से हो सकती है और किसी से नहीं । वह
वहीं है। हाफिज ने जो कुछ कहा है, नया ही कहा है।
उसकी उफ्तियों में उच्छिष्टता नहीं । उसमें दोष हो सकते हैं,
परंतु वैसे दोप उसी में पाये जा सकेंगे, और कहीं नहीं।
उसकी कविता में जो रमणीरता है वह उसी में है। उसे
अन्यत्र हूँढना व्यर्थ है।
हाफिज के वरावर प्रतिभाशाली कवि होना दुर्लभ है।
उसके समान ललित और मधुर-मापो दूसरा कवि, संस्कृत
को छोड़दर, और भापात्रों में नहीं पाया जाता। हाफिज
की कविता का शानद, उसके दीवान को फारसी ही में
पढ़ने से, अच्छी तरह ना सकता है। अनुवाद में यह रस
नहीं पाता। हाफिज़ को, पडितराज जगनाथराय की तरह
अपनी कविता का गर्व भी था | उसने कई जगह, इस
विषय में, गाप्तियाँ कही है ये गालियाँ चाहे सचमुच
ही अभिमान-जन्य हों और चाहे यों ही स्वाभाविक रीति
पर उसके मुंह से निकत गई हो। पर उसके मुंह से उसकी
.

फारसी-कवि हाफिज
गांनिया भी अच्छी लगती है। ये उसी प्रकार निकली
है जमे फूलों से मकरद टपाता हे अथवा इक्षु मे रम
निकलता है।
यहाँ पर, हम, हाफिज की रसपती करिता के दो चार
नमूने देना चाहते हैं और साथ ही मुशी नानकचदी
का किया दुमा पद्यात्मक अनुवाद भी हम प्रकाशित
أدرك التدمت كشور دوست
مردا اگر
دیارباعة ارگیس وے میرے دوست
शरांतर
सबा अगर गुजरे पादत् यक्रियरे दोस्त ।
थियार नफहप मन गे मुसंपरे दोन ।।
अपाद
पवन माग जो की जाय तू मेरे प्राणप्यार है !
उमरा सुगा में दुले साना गुगध कारण।
یا او د وشكراده ای اندانم
اگر مد و ادي پیام ار اور دوست
HIMR गुमान बारशारम |
अगर मर भारी पक्षाने प्रारम्न ।।

प्राचीन पंडित और कवि
श्रनुवाद
प्यारे की है शपथ करूँ मै तुझ पर नौछावर निज प्राण !
एक संदेसा प्राणनाथ का जो तू मुझको देवै भान ।।
(३)
اگر چذابه دراں دعوات راشد دار
کرا دیده بياور عدارے ار در دوسمت
अक्षरांतर
अगर चुनाँच दरों हजरतन न पाशद वार।
वराय दीद बियावर गुवारे अज दरे दोस्त ॥
अनुवाद
और न जो तू जाने पावै उसके सम्मुख किसी प्रकार।
नैनों के अंजन को रजकण लादे उसका द्वार बुहार।
(४)
دارد
ليت مدام
دل نوں
پارت رلدا چه کام دارد
अक्षरांतर
दिल शोके लयत मुदाम दारद ।
यारय ज लवत चि काम दारद ॥
अनुवाद
मन में तेरे अधर की रहत निरंतर चाह ।
कौन हेत जाने हगे कछू न याकी थाह ॥

फारसी करिहाफिज
راده منوی
ماں شوب واو
در ساعر دل مدام دارد
अक्षराना
जॉशरयते महगे बादप शौक।
दर सागरे दिल मुदाम दारद ।।
अनुवाद
मधुरामव-अनुराग अरु प्रेम-चारुपी-बार।
अंतर घट में भर र निज मन मुकुर निहार ॥
وولدد رل بار دام
در دام به نام دارد
प्रहरीतर
शोगदए जा यार दापम् ।
दर मे पता गुलाम दाद ।
भागार
पगरी मटकी लगी जारे मन को लागी
प्राग पाग में बार या साल गुण या
بار ما شدند أنكر
اردوش حامی رم دارد

-
बौद्धाचार्य शीलभद्र
एक समय था जब भारतवर्ष के बड़े-बडे विद्वान् चीन
लका और तिब्धत श्रादि देशों में जाकर विद्या और धर्म की
शिक्षा देते थे। एक यह समय है कि हमी को अन्यान्य देशों
में जाकर विद्योपार्जन करना पड़ता है। विदेशी धर्माचार्य
अब हमें यह उपदेश देने श्राते हैं कि तुम्हारा धर्म निसार
है, हमारे धर्म को स्वीकार करने ही से तुम्हें मुक्ति मिलेगी।
खैर, इसका कुछ रज नहीं, उत्थान और पतन सबके पीछे
लगा हुश्रा है। रज इस बात का है कि हम अपने पूर्वजों
की कीर्ति को, पांडित्य को, पराकम को बिलकुल ही भूल
गये हैं। उसका स्मरण तक हमें नहीं । हम यह भी नहीं
जानते कि चीन ऐसे सभ्य देश के पडित हमारे पूर्वजों के
चरणों पर मस्तक रखने और उनसे विद्या धर्म सीलने
शाते थे। इन बातों के जानने के कुछ तो साधन कम रह
गये है, कुछ हम लोगों में उनके जानने की प्रवृत्ति ही कम
है। इसी से शीलभद्र ऐसे प्रख्यात पडित का नाम तक लोग
भूल गये थे। चीन से जो प्रवासी इस देश में पाये थे उनके
अंयों से इस अद्वितीय विद्वान् के विषय में बहुत-सी बाते
जानी गई है। उनके तथा दो एक चौद्ध ग्रथों के आधार पर

बौद्धाचार्य शीलभद्र
"डान" नामक अँगरेजी मासिक पुस्तक में गोलमट पर
एक लेख प्रकाशित हुआ है। उसे पढ़ने से शीलमद्रका
सक्षिप्त वृत्तात मालूम हो सकता है।
शीलभद्र छडी शताब्दी में थे। नालंद विश्वविद्यालय
केचे अध्यक्ष थे। भारतवर्ष भर में उस समय कोई भी शास्त्रश
विहान उनका समकक्ष न था। ये यही शीलभद्र है जिनके
पैरॉपर प्रसिद्ध धीनी प्रयासो हेनसाग ने अपना मस्तक
रक्खा था। ये पूर्वी घंगाल के रहनेवाले थे। दात जिले के
रामपाल-गाय में इनका जन्म हुआ था। यह गौर उस ममर
समनट-राज्य की राजधानी । पालवशी राजाओं के
पहले पदों प्रायशी राजानों का गज्रपा | गोलन
का अम राजघश में माथा । यदि राज्याधिकारी
इदा मे ये अपना देशन होइले मो, बहन ममाथा, उन्
राजासन मा हो जाना ! परंतु राज्यशालिनी मात्रा
विधाप्रामिदी को उन्होंने श्रेष्ट सममा । सा पर या
माको धर्म के नि माया ये समादप ।
उस समय मालंददी पीडीत मधमे भंड रिपालपया।
उममें १५० माग गे मार मार पिril
विशन का। ममप मापापको मार
गीतमा
जापानीसमद्र अधिष्ठिमा पर माय
निमामा-मामी नि र सामाजिवित र

।
प्राचीन पंडित और कति
चुके थे। योद्धों की माध्यमिक शाखा के प्राचार्य नागार्जुन
इसी विश्वविद्यालय के ग्राचार्य थे। यहीं उन्होंने बौद्ध धर्म के
अनुयायियों को इस नई शाखा के सिद्धांतों का उपदेश किया
था। महापंडित नागसेन ने यहीं से अपने उपदेशों के द्वारा
ग्रीक नरेश मीनोन्ट्रसी की शंकाओं का समाधान कर
उसके हृदयांधकार का नाश किया था। इसी विश्वविद्यालय
के प्राचार्य-पद को सुशोभित करनेवाले गुणमति बोधिसत्व
ने सारय-दर्शन का संडन बड़ी ही निर्भयता से करके यौद्ध
मत को प्रकटता सिद्ध को थी । इमी निश्वविद्यालय की
बदौलत प्रभामित्र नाम पंडित ने चीन में बौद्ध धर्म को
प्रचार किया था। इस नालंद-विश्वविद्यालय के जिनमित्र
नामक पंडित को तिब्बत नरेश ने अपने देश में बुलापर
चौद्ध धर्म के सिद्धातों का ज्ञान प्राप्त किया था। चद्रपात
स्थिरमति, ज्ञानचंद्र और शीघ्रबुद्ध श्रादि पांडित्य-व्योम
मंडल के चमकते हुए तारे यहीं उदित हुए
शीलभद्र का श्रादि नाम दंतदेव था । लड़कपन ही से
चे विलक्षण प्रतिभाशाली और तीक्ष्ण-बुद्धि ये। सोलह ही
वर्ष की उम्र में उन्होंने वेद, सांख्य, न्याय और वैद्यक-शास्त्र में
पारदर्शिता प्राप्त कर ली। पर इतने ही से शीलभद्र को
संतोप न हुश्रा । विद्यापरिशीलन विषयक उनकी पिपासा
न वुझी। उस समय नालंद का विद्यालय भारतवर्ष में अपना
द्वितीय न रखता था। आप वहीं पधारे । इतनी छोटी उन्न
-

योद्धाचार्य शीलभद्र
में ढाका छोड़कर अाप मगध पाये। उस समय महापडित
धर्मपाल नालद के विद्वान थे। यही नहाँ में सब से श्रेष्ठ
प्राचार्य थे। शीलभद्र के बुद्धिमानय ने उनको मोहित कर
लिया। थोड़े ही समय में शीलमद ने अपन विद्यागुर के
विद्या भाडार को ग्रहण करके अपने हृदय, घट धार जिला
के अर्पण कर दिया।
इसके बल समय बाद दक्षिण से पक पडिनराज मगर
नरेश की सभा में आये। उन्दी प्राचार्य धर्मपाल का
सामार्थ के लिए तलकारा । धर्मपाल सभा में गुलाये
गये, पर ददेर ने गुरु का शारा करने जाने में रोका।
मेरे रहते मेरे गुरु से शास्त्रार्थ पदसंघद पडित मुझ पराम्न
कर ले, तब मेरे गुरुदेव का मुआयना करे। अन्यथा यह
नहीं सकता। धर्मपाल भरने मग्गिय की योग्यता से
अच्छी तरह परिचित थे। उन्होंने कहा-
"मिनिम्तु" - "गमा पर' ।
एमादय से और अभ्यास मला पारा
मापयप दरदिया नाय कामे.
पलाकर मनाय. नारदा मामन भरा!
म मादनासा न मा
का मामांगवारपा। पर मन
मराममाधान मिल गया arr
में अपना करिया बिलाए | my

की उन्न १०६ वर्ष की थी। उनके सिर में एक भी चालन
इसके तीन वर्ष बाद ह्वेनसांग बजासन तीर्थ (बुद्धनगया)
शीलभद्र के सम्मुख उपस्थित किया। उस समय शीलभद्र
६८
प्राचीन पंडित श्रोर कवि
से पीड़ित थे। बोधिसत्त्वों ने उन्हें चौद्ध धर्म का प्रचार
करने और उस धर्म में दृढ़ विश्वास रखने का उपदश
दिया। इसके बाद वे अदृश्य हो गये। शीलमढ़ का रोग
भी जाता रहा । बोधिसत्वों ने चीन से आनेवाले प्रवासी
ह्वेनसाग को बौद्ध धर्म का मर्म सिखलाने की भी
श्राशा दी।
में पहुंचा । यह खबर सुनते ही शीलभद्र ने ४ "श्रम"
उसे लेने भेजे । ह्वेनसांग ने इस प्रामत्रण को बड़े भक्तिभाव
से स्वीकार किया। तीर्थाटन करते हुए वह नालंद पहुंचा।
२०० श्रमणों ने नालंद के विश्वविद्यालय के फाटक पर
श्राकर उसकी अगवानी की । एक सहस्र बौद्धों ने स्तुति
पाठ किया । बड़े समारोह से ह्वेनसांग विश्वविद्यालय में
लाया गया । जब वह सभामडप में पहुंचा
श्रेष्ठ श्रासन दिया गया। वहाँ के प्रधान भिक्षु ने श्राशा दी
कि जब तक द्वेनसांग वहाँ रहे उसका वही श्रादर
जाय जो एक भिक्षु या उपाध्याय का फरना चाहिए । कुछ
देर विश्राम करने के बाद २० अध्यापकों ने हेनसाग को
तय उसे एक
किया
रद्द गया था। ये बिलकुल सल्याट हो गये थे । हेनसाग
ने दंड-प्रणाम किया और शीलभद्र के पैरों को बड़ी भक्ति

योडाचार्य शीलभद्र
से चूमा । शीतमद ने हेनमाग को अपने कर-कमलों से
उठाया और याशीर्वाद दिया । इनसाग उसी दिन से
नालंद विश्वविद्यालय का विद्यार्थी या और कई वर्ष पाँ
रफ बौद्ध आमाँ का उमने अध्ययन किया।
एप्रिल

प्राचीन पडित और कवि
(६) भास्कर दीक्षित-श्रात्मपरीक्षा प्रादि का कर्ता ।
गजा रघुनाथ स्वयं संस्कृत और तैलंगी भाषा के अनेक
ग्रंथों का कर्ता धा । उसके संस्कृत के मुरय मुख्य प्रथ
।
2
(१) पारिजात-हरण (२) नलाभ्युदय (३) अच्युताभ्युदय
(४) रामायण-सार-सग्रह, (५) महाभारत-सार-सग्रह। इन
के सिवा एक रामायण भी उसने तैलगी भाषा में लिखी थी।
राजा रघुनाथ नायक एक दिन अपने दरबार में दरबारी
स्त्रियों से घिरा हुया बैठा था। उनमें से एक ने उसकी
रची हुई आंध्र-भापा की रामायण से कुछ ऽलोक गाकर
सुनाये। दूसरी ने उसको राम-भक्ति की प्रशंसा की। इससे
उसके मन में जो विचार उत्पन्न हुए वे मधुरवाणी के निम्न
लिखित श्लोकों में वर्णित है-
हरेश्चरिवं ह तत्र रामकथासुधा कर्णरसायन न.।
आम्वाद्यमानाऽपि सहनवारमयातयामैव सुखस्य दोग्धी।
रसोत्तरं रामकथानुवन्धि काय मया करिपतमान्धवाण्या!
कार्य कया संम्तवाग्भिरतदित्येवचित्ते गणयनिवासीत् ॥
भावार्थ-रामचरित हजार चार सुनने से भी तृप्ति नहीं
होती। मैने गांव-भाषा में राम का जो चरित गान क्यिा
है उसे कौन सी सम्कृत में लिख सकती है।
यही सोचते हुए राजा दरवार से उठ गया। उसी रान
को भगवान रामचंद्र ने म्यान में दर्शन देकर उससे कहा-
६

मधुरवाणी
"चिंता मत कर । तेरी इस इच्छा को मधुरमणी पूर्ण
रंगी"। दूसरे दिन रघुनाथ भूप ने मधुग्यागी को र.
रबिन गमायण का संस्कृतानुवाद करने की प्रागा दी।
यह कहने की प्रारभ्यक्ता नहीं कि मधुरवाणी ने अपने
संरक्षक की साहा का पालन घटी भी योग्यता से
किया।
धमकाव्य में ४ मा और १५०० ग्लोक। प्रथम मर्ग
के पदले अरतीम ग्लोकों में अनेक देवाचतामों की स्तुति
और प्रार्थना है। अगले १ लोगों में (३-४ में)
भामांकि, प्याल, कालिदाम, पागा और मात्र प्रादि प्राचीन
नियों की प्रामा। एस यादो में
(४३-४५ में गोल अाधुनिक परियों की निदा
। निलिमित तालीम स्लोर में उमा गुपिना
को दरमा नकार विभूषित गौदर्यशागिती गुदनों में
.
मन्याता पाभि शांतिपसिामनाया।
पम्तूरिकामाfini गुमपि ।
एप पारगा गुनाग rarr
गमा nimiriritrintime
पर मिme infrom IR free
गा, र म सपने Myrmer
ORRERAR TIRI

प्राचीन पंडित और कवि
इसके अागे रामायण की ग्राख्यायिका प्रारभ होती है।
दूसरे, तीसरे और चौथे सर्ग में दशरथ और उनके या का
वर्णन है । पाँचवें और छठे सर्ग में रामजन्म और उनकी
चाल्य-लीला है। विश्वामित्र का श्रागमन, यज्ञ-रक्षा, ताडका
ग्ध, अहल्या उद्धार, धनुष-भंग, विवाह और परशुराम
सनाद का वर्णन सातवें और आठवे सर्ग में है। अगले
६ सर्गों में वनवास, सीता हरण, राम और सुग्रीव की मित्रना,
वालि-वध और सीता की खोज आदि के संबंध की समस्त
कथायें है । यहाँ तक की कथा ११५ पन्नों में पूरी हुई है।
श्रागे के पन्ने नहीं मिलते । पर, श्रागे, तीन फुटकर (१२६,
१०६, १४० ) पन्नों को देखने से मालूम होता है कि कथा
अधूरी नहीं छोड़ी गई।
मधुरवाणी ने इस पथ में अपनी काव्यमधुरता का
अच्छा परिचय दिया है। वास्तव में उसका असली नाम
यह न था । यह तो केवल गुण विशिष्ट उपनाम मात्र था,
जैसा निम्नलिखित श्लोक से मालूम होता है-
चतुरमधुरवाणी सम्यगाफर्ण्य यस्या-
स्सदसि मधुरवाणी नाम दत्तं त्वयैव ।
सरसरुतिविधाया साधुमेधाविशेषा.
स्वधिकपटुरशेपास्वम्वुजाक्षीपु सैषा ।
यह उपनाम उसे राजा रघुनाथ का दिया हुआ था।
घद कैनी निदुपी और कला-कुशल थी, और उसकी

मधुरवाणी
कपित्य शक्ति कितनी बदौ-चढ़ी थी, यह उसी के मनोहर
गदों में हम, यहाँ पर, लिपते है-
चातुर्यमेति करिता चतुर्विधानु
धोगायलाकरन भवति प्रशीणा।
प्रसामिय निपुगमति पाणिनीये
मेधा व्यक्ति वा विविधाजधाने ॥
तत्तारम्परिकार्धनिर्मितगतश्लोकी फणिग्रामगी--
पाणीपातशास्त्रपुणयमुन्मीलधश श्रीजुषा ।
चौगावादफलागिनोदममरे कृत्या ममन्यात
सप्रससदि साधु प्रयति या दत्ता कोद्रना।
मगुरपाणी घोणा घजाने में प्रत्यंत प्रयोगायो। संटन
और तलगी भाग में करिता करने की इसे अनुन नकि
प्राप्त यो । पद शुकी थी, साधी जड़ी में १०० लोक
बना पानी थी। भर्यात् एक मिनट मेंलो से भी
अधिक। यह क्या TOTRAमाको पात, शिर
मचाना शानियनिए ! फेयरन मायु
निय--अामासादिमी पहा Freमा
सीर एमाImmore faii
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भनिगोशिमmrint मोमी को गिन
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1
७६
प्राचीन पंडित और कवि
।
-
यद्यपि कवि ने अपनाही और अपने सरक्षक की प्रशसा
के देर के ढेर लगा दिये है, तथापि अपने माता पिता ओर
निवास स्थान का कुछ भी हाल नहीं लिसा । श्रतएव हम
उसका विशेप वृत्तात जानने में असमर्थ है। हम इतना हो
जानते है कि उसने एक विद्वान् घराने में जन्म लिया था।
उसके प्रथ मे इतना और भी पता लगता है कि वह अद्वैन
मत की अनुयायिनीधी।
इम काव्य की हम्त-लिखित पुस्तक तैलगी लिपि में है।
ऐसा जान पड़ता है कि वह स्वय मधुरवाणो के हाथ की
लिनी हुई है, प्योंकि उसमें जो संशोधन किये गये है वे
पुस्तक के मूल लेखक हो के हाथ के मालूम होते है।
पुरनक मारसोर-प्रात में पाई गई है। नायक-राजाओं के
समय में जोर और माइमोर में घनिष्ठ संबंध था।
इन सब बातों से सिद्ध होता हे कि मधुरवाणी माइमोर
प्रांन ही की रहनेवाली थी। सेर, जो हो, इसमें सदेह नहीं
कि वह नारी रत थी। वह अपने समय की शिक्षिता
स्त्रियों में शिरोम थी। मालूम होता है कि उस समय
स्त्री-शिक्षा उन्नतावस्था में थी। उस तरफ विदुषी और
कला कुशल स्त्रियों की कमी न थी।नले रघुनाथ नायक
ही के दरबार में अनेक विद्यानों और कलानों में निपुण
कितनी ही स्त्रियाँ विद्यमान थीं। यह बात आगे लिये
श्लोकों से मालूम होती है-

७७
मधुरवाणी
विपश्चिकायां चनुरा. प्रगभा शास्त्रेऽतिदक्षास्सरसम्बन्धे ।
समीपमेतस्य समेत्य केऽपि सुनृजना म्यम्वरला व्यवृण्वन् ।।
सर्वात्तरस्वादिमसम्नान्ध्रप्रयन्धनिर्माणपवैलिमानि
यशासि भूयाम्यवतारयन्त्यस्महन्नशम्मति सरोज्नया ।।
भारतवर्ष के लिए यह रकम गोरव की रात नहीं
कि अभी तीन ही सौ वर्ष पूर्व यहाँ कान्य रचने की
शशि रखनेवाली अनेक विदुषी खियाँ जन्म लेनी थीं।
क्या भारत आने प्राचीन गीग्न को फिर कमी प्रास
करेगा?
जूला १६०८

--
नबर १० और ११ वैमवाडे ही के कवि हैं,परतु, इसका पता
प्राचीन पडित और कवि
(६) शभुनाथ मिश्र । खजुरिगॉच । १२ मील । खजुरि
गॉव के राजा यदुनाथसिंह के कवि और वैस-वशावली
के लेसक।
(१०) चिरजीव । लोग कहते है कि इन्होंने महाभारत
का अनुवाद हिंदी में किया है।
(११) महानंद वाजपेयी* । इन्होंने वृहच्छिरपुराण का
अनुवाद हिंदी में किया है।
(१२) पंचम । डलमऊ । २० मील ।
(१३) गगादयालु द्विवेदी। निसगर । २ मील । संस्कृत
के अच्छे विद्वान्, हिंदी और सस्कृत दोनों के उत्तम कवि,
सगीतशास्त्र के पारदर्शीं । इनका शरीर-पात हुए अभी थोडे
(१४) गुणाकर त्रिपाठी। कॉथा । २६ मील । सस्कृत
और हिंदी दोनों के अच्छे कवि ।
(१५) कालीचरण वाजपेयो । विगहपुर ।
१२ मील।
(१६) मून कधि । असोथर । २६ मील । अनेक ग्रंथों
के कर्ता, जिनमें से राम-रावण का युद्ध मुख्य है ।
(१७) सुदर कधि। असनी। १४ मोल । रस प्रयोग
के कर्ता।
नहीं लगता कि वे कहा के निवासी थे।
ही दिन हुए।
*

मुखदेव मिश्र
१
(१८) शिवलाल दुरे । डोडियामेरा। ३ मील । अनेक
पुस्तका के कर्ता, जिनमें से नखसिख शोर पट-ऋतु मुरय है।
इनम से कुछ कवि टोक सराड़े के नहीं। परतु उनका
रसवाड़े के बहुत ही पास या । सोलइवें शतक में हुए
नरहरि और हरिनाय मी हमारे यहाँ से,२४ मीत दूर,
प्रसनी के रहनेवाले ये प्राचीन ममय म म मात में अनंत
कवि हो गये है, उन सयका टीक ठीक पना लगाना अर
असंभवमा है। वर्तमान काल में भी, हम भूभाग में, कई
प्रसिद्ध रिकान और पडित हुए । मस्टन के अच्छे पिहान,
हिंदी और मारत में यान से प्रचलिखनेवाले, शिक्षा
दिमाग में एक अलेपद का, याहुत दिनों तक, उपभोग
करनेवाले, और श्रागरे के नूगल परम
धार
मजन कीर्ति सुधार के सपादश, पडित पर पाजयी
एमी मान फैरनेवाले यीनका मकान नितारानामा
गांव में यह गौर हमारे यहा रोगाय दो मास र
। খাবার মােড়, নথি জীগ ক্ষারক
पनापाले भीर रशी को पन परिदान, पंडित
माराप्रमाद मित्र मोदी सरकार पर
में पा । पर गोपालपुर गरिन।
समावीलापुरको मितिमा
भावना मान HिIM T"गुदेर"
नियन, परंतु पद पर काय होई नाम में भर
-
-

८२
प्राचीन पंटित और कवि
है और अपनी पुस्तकों में इन्होंने अपना नाम सुखदेव ही
लिया है। इसी से हमने भी इनका यही नाम लिराना उचित
समझा। ग्रियर्सन साहव और शिवसिंह सेंगर ने, इनके
विषय में, बड़ा गड़बड़ किया है। एक जगह आप इनको
"सुखदेव मिसर" लिखते है और कपिला के रहनेवाले
बतलाते है । दूसरी जगह आप इनका नाम "सुखदेव कवि"
लिखते है और अंतर्वेद (गंगा-यमुना के बीच का भाग
इनका देश बतलाते हैं। तीसरी जगह श्राप इनका नाम
"सुखदेव मिसर फघि" लिखते है और दौलतपुर इनका
स्थान बतलाते है । नियर्सन साहब ने अपनी पूर्वोक्त पुस्तक
विशेष करके शिवसिंह सरोज के आधार पर ही लिसी है।
कहीं कहीं तो आपने शिवसिंह के लेख का शाब्दिक अनु
याद तक कर डाला है। इससे शिवसिंह-सरोज में सुखदेव
जी के विषय में जो गड़बड़ है वही ग्रियर्सन साहब की
पुस्तक में भी है । साहव को शिासिंह सरोज श्रादि में जैसा
मिला है वैसा ही उन्होंने अपनी पुस्तक में लिख दिया है।
नियर्सन साहब ने यह पुस्तक लिखकर हम लोगों पर बहुत
उपकार किया है। हम उनके कृतज्ञ है और बहुत कृतज्ञ है।
जहाँ तक कवियों का सही-सही हाल उनको मिला यहाँ तक
उन्होंने लिसा । जान-बूझकर उन्होंने लिखने में बेपरवाही
नहीं की। परंतु कहीं-कहीं उनके लेख में भ्रम जस्र हो
गया है। एक जगह श्राप लिखते है--
।

मुसदेव मिय "शाधू हरिश्चट का कपिरचनामा भी एक सर्व- प्रिय प्रथ हे। उसमें पारस वर्णन के पद्यों का संग्रह अम्नु । सुखदेवजी की जन्मभूमि, गंगा के किनारे, "कपिलमुनि की वसाई" कपिला-नामक नगरी है। घे कान्यकुब्ज ग्राहगा, हिमकर के मिथ्र, थे। विद्याद उनका कपिला ही म टुया । जगन्नाथ और खुलासीराम दो पुत्र भी उनके यही रुप । लरकपन में उहोंने मामूली तौर पर मन का थोड़ा-सा अभ्यास किया। जय के यो धुप और दो पुत्र भी उनके हो चुके तर जो कुछ र दोंने पढ़ा लिया था वह उन्हें काही न मालम या । उनके हदय में अधिक विधीपान की च्या उत्पन्न हुई।तिए ये पगारम गरे । वहाँ पर दिनी विदान सन्यासी से मरा पड़ने लगे। एघकाल तक पढ़े परिध्रग मे विपास्पयन करने और गत-रात भर अध्ययन में निमान गहने सो। गुनते थे सपने मायापक संन्यामी कोहीमान पर ले थे। पर पार रात को बहुत देर तक अपने पार पा रिकाने । उन पाली मयामी गदागी समर लिपीपा में मर जायगा। सम्पानाजी पानी गुगापो ATTITम गमा tr मनमा निरriyar मिर की ज्योति गुपदा का

प्राचीन पडित और कवि
उन्होंने उस ज्योति को भक्तिभाव-पूर्वक प्रणाम किया और
अपना पाठ याद करके सो रहे ।
दूसरे दिन प्रात काल जव वे फिर अपना पाठ लेने लगे
तब उन्होंने पढते समय बहुत कुछ प्रगल्भता दिखाई और
बुद्धिमानी से भरे हुए अनेक प्रश्न करने श्रारभ किये।
उनका यह बुद्धिमावर्य देखकर उनके अध्यापक महात्मा
को आश्चर्य हुश्रा । उन्होंने सुखदेवजी से इस वैलक्षण्य का
कारण पूछा। तब उन्होंने रात की बात बतलाई। इस पर
संन्यासी ने कहा कि अब आपको पढ़ने में अधिक परिश्रम
करने की आवश्यकता नहीं। श्रापको श्रव विद्या प्राप्त हो
गई समझिए । ग्रंथावलोकन-मात्र आपके लिए अथ दरकार
है। इस घटना के अनतर सुखदेवजी अपने उस विद्यागुरु
संन्यासी से शीघ्रता पूर्वक प्रथालोकन करने लगे और
थोड़े ही दिनों में तत्र और साहित्यशास्त्र में निष्णात हो गये।
यह बात सुरादेवजी के वशजों को परपरा से मालूमा,
होती चली आई है। वे एक सिद्ध पुरुष और महात्मा थे,
यह बात उनके अनेक अलोकिक कृत्यों से भी प्रकट होती
है। पर इसका निश्चय नहीं किया जा सकता कि यह कर
की बात है। न तो सुखदेवजी के जन्म-मरण का समय हो
शात हे और न यही बात है कि वे बनारस गये पोर
कितने दिनों तक बदॉ रहे । परंतु जिन राजाओं और ता
ल्लुनदारों के यहाँ ये रहे उनके समय का विचार करने से
-

मुमत मिश्र
यह सिद्ध होता है कि ये ७० और उसनरी के बीच
में विद्यमान थे। इससे उनको दुय कोई वेद सो वर्ष बोले ।
यह यात सुसदेवजी के शिष्य शभुराय के नयों से भी स्पए
है। शिरमित मेंगर, गमविलास-गमायगा के कर्ता शभुनाय
को बटीजन कदन है श्रीर पनालपीमा इन्यादि के कर्ता
कोरिपाटी बतलाते।। परंतु, या लोग कहते है कि
दोनों पक ही व्यक्ति है। यही नहीं, किंतु भगवनराय ग्वाची
परदा गानेवाले शभुनाय भी यही है । रामबिलास में
शनाय तिलने-
पमु-प्रद मुनि शरावर 'यग्न हित फागुन पो मान ।
अनुनाथ पविता दिन कोदा गमशिलामा
घोर परि मोर के चरनन होपो पर।
निमण पपिना पनि यो मारे जान ||
किलपानीमाप :-
जोमनि जागि मान्सर।
रपि ।
कति अंप एं मौत 17 माग
शादी में
पता कि नानादि
मार गार पा ? पता
furrear मा गुगनीri x xm
मी | Firs for
KTere armer
है

प्राचीन पंडित और कवि
में असोथर एक सवा है। वहाँ पर, उस समय, भगवतराय
खीची नामक एक राजा था । वह बड़ा गुगाग्राही था।
उसी के यहाँ सुखदेवजी रहे। सुखदेवजी के गुणों पर यह
राजा इतना लुब्ध हो गया कि उनका शिष्य होकर वह
सेवक बन गया। वहाँ सुसदेवजी का बड़ा सम्मान हुअा।
माउस साहब ने फतेहपुर गजेटियर के परिशिष्ट में भगवत
राय खोची का हाल लिखा है। यह स्य कवि था। कई
पुस्तकें उसो लिखी थीं। परंतु अब उनका कुछ पता नहीं।
भगवंतराय ने बहुत वर्षों तक वादशाह को मालगुजार।
नहीं दी । वह स्वतत्र हो गया था और दो एक चार बादशाही
फौजों को उसने परास्त भी किया था। परतु १७६० ईसवी
में
वह दगा से मारा गया।
सुखदेवजी शाक्त थे। वे तारा के उपासक थे। यंत्र द्वारा
उसकी वे विधि पूर्वक पूजा अर्चा किया करते थे। इस
प्रकार की पूजा में मद्य-मास की भी श्रावश्यकता होनी
है, अतएव यह सामग्री भी सुखदेवजी को इकट्ठी करनी
पड़ती थी । यह वात लोगों ने भगवतराय से कह दी।
सुनकर उसे श्राश्चर्य हुआ। ऐसे विद्वान्, ऐसे पडित और
ऐसे अच्छे कधि की पूजन-सामग्री में मद्य-मांस ! उसको
इस बात पर निश्वास न हुधा । इसलिए उसने खुद इसकी
सत्यता अथना असन्यता की जॉच करनी चाही। एक
दिन, जिस समय उसके भादमियों ने उसे खबर दी कि

सुखदेव मिश्र
मिनजी विधि-पूर्वक पूजा करने जाते है उसी समय, यह
मिश्रजी के पास आकर उपस्थित हुश्रा। ऐसे दुसमय में
भगवंतराय को भाया देख मुपदेवजी के चेहरे पर माध,
श्रारचर्य वीर पृणा के चिद्ध प्राधिभूत हो आये। परंतु
भगवंतराय को उन्होंने पासन दिया और थाने का कारगा
पूदा । उसने कहा कि पूजा के समय सिर्फ श्रापका पी
करने पाया है। इस समय पूजन की सामनी के बीच पक
पात्र में मध योर एक पत्तल में माय भी दका पुमा रा
था। भगवंतराय के थाने के समय सुबोवती पूजन में
निमान थे, परंतु उससे पाने पर उन्होंने पूजा पगित पर
दो और उसकी तरफ ये मुखातिय दो गये।
देर तफ और और याने फारने हे सनतर, भगया.
रापन पदों पर रफर हुए मर पदापों का नाम पदा
मुपदेयसी ने गपके नाम पतला शुभदिया। गमा
मम पात्र और पतन की पारी आई । पंप
"সে বিশ্ব শী সয় নাসার গল্প ঘি মুখ নি
जब रमीपति मि RAT
नाम मा में होने लगी नकार दिगंएगी
fruit
Trir में श स में गुरल
TRE IT
पापा को हुाम
fruir, इन दोनों का मन मोmarAIRYE
पानामा, निपाने में

प्राचीन पडित और कवि
.
.
श्रानाकानी की। जय दो बार कहने पर भी उसे खोलने का
वैर्य न टुश्रा तव सुखदेवजी ने उस पात्र और पत्तल के
ढकन को खुद खोल दिया । सोलते ही, उनके कहने के
मुताविक, उनमें दूध और गुइरल के फूल देस पड़े। यह
करके सुसदेवजी ने फूलों से भरी हुई वह पत्तल तारा के
यंत्र के ऊपर जोर से उलट दी श्रोर दूध
भी उसी पर डाल
दिया। फिर आपने पूजन नहीं किया और उसी वक्त यहाँ
से प्रस्थान करने को तैयार हो गये। यह सव लीला देखकर
भगवंतराय चकित हो उठा। उसने अनेक प्रकार से क्षमा
प्रार्थना की। उसके यहाँ बहुत-से और पडित तथा कवि थे।
उनको भी मध्यस्थ करके उसने अपना अपराध क्षमा कराने
की कोशिश की परंतु सब व्यर्थ हुश्रा। सुखदेवजी उसी
दिन वहाँ से चले आये और फिर कभी वहाँ नहीं गये ।
दौलतपुर से २ मील दूर, गगा के किनारे, धकसर नाम
का एक गाँव है । उसके पास ही चडिका का एक प्राचीन
मंदिर है। सुखदेवजी असोथर से रवाना होकर वहीं पाये
और एक कुटी में विरक्तवत् रहने लगे।
चडिका के मंदिर से थोड़ी दूर पर अड़ियाखेरा
नामक एक गॉर था। उसमें मर्दनसिंह नामधारी एक
नअल्लुकदार थे । उनको राव का खिताय था। उस
प्रांत में उनकी प्रभुता सूब बढी-चढ़ी थी। बादशाह
टन्होंने कई परगनों की मालगुजारी वसूल करने का ठेका
से

सुखदेव मिश्र
ले लिया था। सर मर्दनसिंह के अनिम घशन राम
गमवश हुए । उन्दाने, अमान्यपश, १८५७ ईमनी में,
अंगरेजों से प्रतिकूलता की और वापी हो गये। इसथा
फाल यह हुआ कि उनकी रियासन अगरेजी गर्ममटर
पोपानल में भस्म हो गई, और, अंत में पकड़े जाक,
एश्मर में, उनको फाँसी हुई। इस समय इनकी रामाणी
के मदारी में गीटों, भेटियों श्रीर तोमरियाँ भादि
अमंगल जानवरों का निष्कंटक राय है।
पकमर में नुगमनी की रयानि प्रतिदिन पढ़ने
सगी ! याहुत यादी उफे शिप्प गये। उनकी प्रामा
और रिताई जय राय मामिद ने सुनी नप उगों भी
अरे मिलने की उमठा पुर । मिरार ये इतने प्रसर
Frरिये भी उनके शिष्य हो गरे । पर्दा भी परांजर में
नरनिदोपकर मी पुटीमें मादी गाम
पोपमा युगामी रहती शीप गुपडी मरा
और परिनपा पारती धोरिमोशनी का nt
FF पाल
यिनी, पोीि पामा
रिपद गारितापी-TRI मिा पा! ॥
सोशल मिमोगमmsar
- Trai, rì 3 • tin my
Fral rem winterrum
गर रोKET IN RITERAR Time

। ६० प्राचीन पंडित और कवि देखने का इरादा किया । लोगों के प्रवाद पर उनको विश्याप्त न हृया । श्रतएच एक दिन वे स्वयं सुसडेयजी की फुटी में श्राये । सुखदेवजी महात्मा थे ; उन्होंने अतर्मान से मर्दनसिंह के श्राने का कारण जान लिया। अतपय, जहाँ राव मर्दनसिंह उनकी फुटी के प्रांगण में प्रार तहाँ उन्होंने कहा-"साही, राव साहब के लिए श्रासन ले श्रा" । यह कहते ही वह सुस्वरूपा स्त्री कुटी के भीतर से श्रासन लेकर निकली। यथास्थान उसने शासन विधा दिया । विद्याफर वह राब के सामने ही दूसरी पोर बाहर चली गई। श्रासन विछ जाने और मर्दनसिंह के बैठ जाने पर, फिर सुखदेवजी ने साही को पुकारा और जल लाने की आशा दी । पूर्ववत् फिर एक बेसी ही साही कुटी से निकली । उसने जल दिया और वह भी वाहर चली गई सुखदेवजी की याज्ञा के अनुसार तीसरी साही पान लाई चौथो पुष्पमाला लाई, पाँचवीं कुछ और लाई । इस प्रकार दस पॉच साही उस कुटी के भीतर से निकलीं और अपना अपना काम करके बाहर चली गई। यह लीला देखकर राव मर्दनसिंह हैरान हो उठे, श्रातक और भक्तिभाव से उनकी अजय हालत हो गई। उन्होंने सुखदेवजी को चार- वार सप्रेम और सभय प्रणाम किया और अपनी अविकता पर खेद प्रक्ट किया । राव मर्दनसिंह की इस कारवाई से मिश्र महाराज के पूजन पाठ में कोई व्यतिकम या मिन तो

मुत्रदेव मिश्र
प्राया न था, इसलिए उन्होंने राप पर कोर प्रदर्शन
न करके उनसतापराध को क्षमा कर दिया। तव से रार
मर्दनसिंह उनकी बहन ही इजत करने लगे। उनके लिए
एक स्थान उन्होंने अपनी राजधानी में बना दिया ।
नहीं मुखबिजी रहने और पूजा पाठ तथा फायालाप में
अपने समय का सत्यय करने लगे।
साठियारा में कवियों का रखा थार था । यहाँ
राजार में रहकर तीर्थराज नामक एक कधि ने संस्थत.
समरतार का हिंदी अनुवाद दिया । यद ज्योतिष का
प्रध है, इसमें युद्ध विषय है। मुमदेवजी के शिष्य
गंभूनाय मिपाठी भी बटुन दिशों तक आदियारा में रहे
उन्होंने पताल-शितिका का भापातर दिदगार
किया और मुाषितामणि का दिदीपा में । उन्होंने
শিলাম কে মা ও না ।
নাফি ম ম বাঘ নিন নি। সে সময়
उगाय और परवी मिद हुए। गंभुरापटीया
ग में Rafrai प्राय में भर देर पर
पनी में नाव काaurtele unमें मानन्तिों
।
पारगामी परि।
राम rint xि प्रो र
पोकीमोANTARTIMI
Tityराग

प्राचीन पडित और कवि
प्रकाश जय अमेठी के राजा हिम्मतसिंह की राजधानी में
पहुँचा तव हिम्मतसिंह को भी उनके दर्शनों की उस्कठा
हुई। सुखदेवजी अमेठी गये । वहाँ भी उनका खूब सम्मान
हुया । तब से चे कुछ दिन डोडियापेरा और कुछ दिन अमेठी
में रहने लगे। जो राजा या तालुकेदार इनसे मिलता वह
इनका शिप्य हुए बिना न रहता । हिम्मतसिंह ने भी इनसे
गुरदीक्षा ली।
जिस समय सुखदेवजी अमेठी में ये, एक ब्राह्मण का
लड़का मर गया । उस ब्राह्मण ने सुखदेवजी का माहात्म्य
सुना था । इसलिए लड़के का निजीव शरीर लाफर सुखदेव
जी के स्थान के सामने रख दिया और अत को उस शरीर
को वहीं छोड़ वह अपने घर चला आया। सुखदेवजी बडे
सकट में पढ़े। बहुत सोच-विचार के अनतर उन्होंने देवी
की स्तुति श्रारभ की, जिसका अंतिम पद्य यह था-
जान तुही और लजा तुही
तुही लक्ष्मी है सीतले मेरी गुसाइनि ।
नापनो के मोहिं जानती हो
में सदा ही पगे रहीं तेरे ही पायनि ।
जाहि निवाजै निहाल है जाइ सो
जानत हाँ सब तेरे सुभाइनि ।
तेरो भिसारी हो भौस दे मोहिं
तू राजि ले बाल बढ़ी ठकुराइनि ।
.

मुखदेव मित्र
1
सुनते हैं, इसके समय होने ही उस बालक के शरीर में
मावसंचार हो पाया।
एक बार डोदियारा के राव मर्दनसिंह बीमार हुए।
बीमारी यहाँ ना बदी कि जीने की आशा न रही। उस
समय सुखद्रवजी अमेठी में थे। इसलिए वहाँ से उनको
लाने के लिए श्रादमी गये। मिश्रजी आये तो नहीं, परंतु जो
गोग उनको बुलाने गये थे उनसे उन्होंने कह दिया कि
गणि राष मदनसिंह की हालत बहुत बुरी है तथापि थे
मरेंगे ही। यह कहकर उन्होंने दो सस्कृत-श्लोक और एक
सिंदी सर्वया उनको दिया। सवैया यह था--
अरि महल फोरि फने करिके
पर-फौजन फारि के नाखिये है।
बहुसंख्यक छंद प्रबध बनाय
हमें अस रायरो माखिये॥
अकुलाने कहा मरदाने श्री
रस भीनन ते तुम्हें चाखिर है।
रघुनायक राम को गाई तुम्हे
में रहिये जग रामिरे॥
पीरिये पर लेकर भादमी दिया
सर ममि शिपमाया में गंगा Eिxata
सुमोको मापी वि ather
स नो पारिता सुना दी जाय;
am

।
प्राचीन पंडित और कवि
प्रकाश जव अमेठी के राजा हिम्मतसिंह की राजधानी में
पहुँचा तव हिम्मतसिंह को भी उनके दर्शनों की उत्कंठा
हुई । सुखदेवजी अमेठी गये। वहाँ भी उनका खूब सम्मान
टुमा । तब से ये कुछ दिन डोडियारा और कुछ दिन न मेडी
में रहने लगे। जो राजा या तालुकेदार इनसे मिलता वह
इनका शिष्य हुए बिना न रहता । हिम्मतसिंह ने भी इनसे
गुरदीक्षा ली।
जिस समय सुखदेवजी अमेठी में थे, एक ब्राह्मण का
लटका मर गया । उस ब्राह्मण ने सुखदेवजी का माहात्म्य
सुना था । इसलिए लड़के का निर्जीव शरीर लाकर सुखदेव
जो के स्थान के सामने रख दिया और अत को उस शरी
को वहीं छोड़ वह अपने घर चला आया। सुखदेवजी, बड़े
संकट में पड़े। बहुत सोच-विचार के अनतर उन्होंने देवी
को स्तुति प्रारभ की, जिसका अतिम पद्य यह था-
तुही और लाजा तुही
तुही लक्ष्मी है सीतले मेरी गुसाइनि ।
आपनो के मोहिं जानती हो
मे सदा ही परो रहीं तेरे ही पायनि ।।
जाहि निवाजै निहाल है जाइ सो
जानत हाँ सब तेरे सुभाइनि ।
तेरो भिखारी हो भीख दे मोहिं
तू राति ले वाल बड़ी ठकुराइनि ।
घान

।
.
सुखदेव मिश्र
सुनते हैं, इसके समाप्त होते ही उस बालक के शरीर में
प्रास-संचार हो पाया।
एक यार डोडियासेरा के राम मनसिंह बीमार हुए।
बीमारी यहाँ तक बढ़ी कि जीने की श्राशा न रही। उन्न
समय सुखदेवजी अमेठी में थे। इसलिए यहाँ से उनको
जाने के लिए आदमी गये । मिजो आये तो नहीं, परंतु जो
लोग उनको बुलाने गये थे उनसे उन्होने कह दिया कि
क्चपि राय मर्दनसिंद की हालत बहुन नगरी है तथापि वे
मरेंगे नहीं। यह कदर उलौने दो सस्कृत श्लोक और एक
दो सचेया उनको दिया। मोया यह था-
अरि-मडल फोरि फले पारिक
पर-फाजिल फारि के नापिये है।
यस यफ दप्रयध बनाय
धर्म जम रायरो भानिये ॥
अकुलाने कदा मदारी से
रस धीनाने तुम चापि है।
रघुनायक राम की नाई गई
जा में रशियन राय
बने जिप पर महिलामा
मिह नियमाशा मंगा सेमिनार मा
थे। मुखदेवी शो मा गोजि गरि मर्दननिश
मोला सुना
दोन

,
प्राचीन पडित और कवि
सकें तो दिखा दी जाय, और यदि यह भी न कर सकें तो
गंगाजल में घोलकर पिला दी जाय । सुनने और देखने की
शक्ति क्षीण हो जाने से, यह कविता जल से धोकर, किसी
तरह उनको पिला दी गई, कपिता का कागज़ শান্ত
में घोलकर यही जल उनके मुंह में डाल दिया गया ।
कहा जाता है कि इसके थोड़ी ही देर बादराब मर्दन
सिंह ने श्रॉसें खोल दी और वे, कम-क्रम से, नीरोग
हो गये।
जिस मर्दनसिंह के ऊपर सुखदेवजी की इतनी कृपा थी
उसका परित्याग मापने एक जरा सी बात पर कर दिया।
महात्माओं की सभी बातें विलक्षण होती है । एक दफे श्राप
अमेठी से डोडियासेरा वापस 'श्राये । यहाँ पाकर देखते हैं
तो मौरावाँ निवासी निशाफर नामक एक पंडित इनके स्थान
में ठहरे हुए है । इनके आते ही राव के आदमी इनके ठहराने
और सेवा शुश्रूषा में लग गये। परंतु एक पडित और
इजतदार प्रादमी को, जो भूल से मिश्रजी के स्थान पर
ठहरा दिये गये थे, निकाल देना उचित न समझा गया।
इसलिए मिश्रजी से प्रार्थना की गई कि श्राप तब तक अपने
से भी अच्छे एक अन्य स्थान पर ठहरें। परंतु अपने स्थान
पर दूसरे का ठहराया जाना सुखदेव महाराज को सहन
न टुना। उन्होंने किसी की विनती और किसी की प्रार्थना
न मानी। जो लोग उनकी सांत्वना करने आये थे, उनसे

मुखदेव मिश्र
आपने केवल इतना ही कहा कि अर यहाँ निशाकर रहने
सगे है तो निशाचर दी रहेंगे। अापने कुपित होकर यह भी
बहा कि हम क्या हमारे वश का कोई भी आदमी थर यहाँ
न भाधेगा। मुखदेवजी की पासी सत्य निकली। भर
राडियाभेरा में सचमुच ही निशाचर रहते है। उनके बगजों
में से केवल एक सुजान नामक मित्र बुछ काल नक
दियाम्बरा के राय के प्राथय में रहे। परतु उनक पटुंब
का ममूल नाश हो गया । यह शायद मुखदेवजी के
माशोरलंघन का दो फरा हो।
अहियारा घोडयर सुगदेवजी तिर पमरा गरे
और यहाँ पर अपनी पुरानी पुटी म रही लगे । यद्यपि रार
मनसिंह ने बहुत मनाया और फिर पायदा ले जाने की
माम कोशिश की, परशु पाप किसी तरह जाने पर राजीन
एए! इन घटनामों से मुगदेवानी को जिसमे ए
प्रमाना हो गए। परंतु राज-यमाओं में पटने चार पाया
साए परने का मारो घमासाग गया था
গণ ফি লাঘ শনা খান বা না ।
सुगममा यही रहा frm {RIES
শ্য যা পাখি যমী ও
कामना
Tiririttenfrar
कारा Prime afterials
1

प्राचीन पंडित और कवि
.
पूछा--"पंडितजी यह क्या कह रहा है" ? आपने तत्कात
उत्तर दिया-
द्वार दमामे ना वजत कहत पुकार-पुकार ।
हरि न भजे ते पशु भये परत चाम पर मार ॥
इसे सुनकर नवाव बहुत खुश हुश्रा ।
दौलतपुर से पाँच मील पर मुगरिमऊ-नामक एक
अच्छी रियासत है । इसके तअल्लुकेदार राजा कहलाते हैं।
चैसों में अस्ले इन्ही को, इस तरफ, राजा को पदवी प्राप्त
है। जब तक ये अपने अंगूठे से तिलक नहीं करते तब तक
दूसरे तअल्लुकदारों या राजाओं का तिलकोत्सव सिद्ध नहीं
ने
माना जाता । विद्रोह के वक्त यहाँ के तत्कालीन राजा
अॅगरेजों की बहुत सैरख्याही की । इस उपलक्ष्य में उनको
यहुत-सा इलाका भी मिला। सुखदेवजी के समय में वहाँ
देवीसिंह नामक राजा थे। मुरारिमऊ और डोडियारा में
बहुत दिनों से विरोध चला पाता था। इसलिए रामा
देवीसिंह ने अपने विरोधी मर्दनसिंह के कवि को श्राश्रय देने
में अपनी बड़ाई समझी । इसलिए वे मिश्री को अपने यहाँ
लाये और उनके शिष्य हुए।
सुखदेवजी पर गजा देवीसिह की भक्ति बढ़ती गई । जय
से सुखदेवजी ने कपिला को छोड़ा था तब से उन्होंने अपने
स्त्री-पुन और कुटुंब से कुछ भी संबंध न रक्ता या। किसी
से अपने घर का पता तक उन्हाने न बतलाया था। परत
-

सुसदेव मिश्र
राजा देवीसिंह ने उनको यहाँ तक प्रसन्न किया कि उन्होंने
अपने घर का ठीक-ठीक पता पतला दिया। तब से राजा
देवीसिंद उनसे अपनी स्त्री और पुषों को बुलाने के लिए
अनुरोध मरने लगे। रगद धुरी होती है, जिस बात क
पीछे पड़े रहो यद, एक न एक दिन, सिच ही हो जाती है।
मुगदेवजी ने राजा देवीसिंह को प्रार्थना स्वीकार कर ली।
तर यह विचार दरपेश हुया कि आपके लिए मफान कहाँ
पर ग्ने । मुरवदेवी गंगा को य? मत थे । सुनने ई, पफ
दिन, श्राप दौलतपुर के पास गगा-शान के लिए याये।
धार पर आपोगान फिया और पूजन के अनंतर पिपु.
सदननामा पाठशारम किया। पाठ Rमा मधुश्रा या
দি বা গুড়া ৪ খন কি আং যায় । কে। আর
में कोई तीन भाग पर, दौलतपुर में, भागफा पाठ प्रतम
एसा मय आपने पर फिर लिपvिधान की गही
जगह रोक योगी पान, सिर पया था, स्पोलिने
पापही पर फापना दिया और उन पर
को भी पपिता में Traininगुणपणी
पपिपा पुमा, दाह पर ITTE
गंदे, नगारिया में
मी grimari, IITTAR TITANT
सरगम antarni niri
- पर दिनापी।

1
प्राचीन पंडित और कवि
सुखदेवजी को कई जगह चढ़ी-पट्टी जागीरें मिलता
थीं, परंतु, उनके वंशजों का कथन है, उन्होंने उनको लेन
स्वीकार नहीं दिया। वे कहते थे कि हमको किसी प्रकार
की संपत्ति अपेक्षित नहीं, जो कुछ दिन-भर में मिलता
उसे शाम तक देवार्पण कर देना ही हम अपनी परिमित
प्राप्ति का सदुपयोग समझते हैं। परंतु राजा देवीसिंह ने
बहुत कुछ कह-सुनकर दौलतपुर लेने पर उनको राजी
किया। उन्होंने उसे खुद तो लिया नहीं, अपने लडकों को
दिला दिया । बहुत दिनों तक सुखदेवजी के वंशजों का
अधिकार इस गाँव पर रहा, परतु, बाद में, कई कारणों
से, वह उनके हाथ से निकल गया। इस गॉच के पास, गगा
के किनारे, एक पका घाट है और कई शिवालय भी है।
पुटीर भी कई बने हुए हैं, जहाँ कभी-कभी साधु-संन्यासी
श्राकर ठहरा करते हैं।
दौलतपुर में भी सुखदेवजी की सिद्धि की एक-दो
परीक्षायें हुई। उनसे मिलने और उनके दर्शन करने के लिए
लोग दूर दूर से आते थे, यह बात प्रसिद्ध है। सुनते हैं।
एक बार, गगातट पर, जल के बिलकुल सन्निकट, वे पूजा
कर रहे थे। इतने में एक महात्मा उनसे मिलने आये। कुछ
टेर तक वार्तालाप के अनतर उन्होंने सुखदेवजी के हाथ में
एक गुटिका दी और कहा कि यह बड़े काम की चीज है।
इसे मैंने बड़े परिश्रम से पाया है। इसमें यह गुण है कि इसे

दोराता
सौर
सुखदेव मिश्र
मुन में रखने से अनेक अलौकिक काम करने की शक्तिया
जाती है। यह सुनकर मिश्रजी ने कहा-"बस, इसमें इतना
दी गुग्ण हे !" यह कहकर उन्होंने उसे गगा में फेंक दिया।
इस पर यह आगतुक घटुत कुपित हुया और उनको युग
भसा फहने लगा। यह देखकर मुसदेवजी ने अपने दोनों
हाथों की अजली यनाकर चुपचाप गंगा के भीतर डाली
और उसमें भरी हुई वैसी ही फोई यीस-पचीस गुटिकायें
निकाली। तय उस महात्मा से आपने कहा कि इनमें से
मापकी जो गुटिका हो उसे श्राप पाहचानफर रोल । यह
अघटित घटना देनफर पहातुक अपार
सुगदेवजी की स्तुति परता या मार्गस्य हुशा।
एक और भी इसी तरह की घटना एका यार हुई। म
पार भी ये पूजा कर रहे थे कि एफ शिक्षा मे मिला
मार और उाफ देवसिंहासा पा मुरप, दिशा दाय लगाये,
अपनी सगा फेर दिया | तुज्या दीया पात गुपयशी
पान में साई त्याही पद निदाना, धारा, मिर
गंदर नशे गण दो गया | ये पास गदी का एक मनुष्य
रमे मारे।
मिनरल मुमती माया गद गगना
जी TET गायु सीमही TIRE
: पी पद mkrnar
धारमा

विचार पिंगल उन्होंने गौड़ में नहीं बनाया । उसे उन्होंने
1
घे कहते हैं कि सुसदेवजी कभी गौड़ नहीं गये ओर वृत
प्राचीन पंडित और कनि
सुखदेवजी के चार ग्रथ प्रसिद्ध है-रसाव, वृत्त-विचार
पिंगल, गंगारलता और फाजिल-अली-प्रकाश । डोडिया
रोरा के राव मर्दनसिंह के लिए उन्होंने रसाव बनाया,
श्रमेटी के राजा हिम्मतसिंह के लिए वृत्त-विचार-पिंगल
बनाया; मुरारिमऊ के राजा देवीसिंह के लिए शृगारतता
बनाई, और नवान पाजिल-अलीखों के लिए फाजित
अली प्रकाश बनाया। रसाव में नायिका भेद है, वृत्त
विचार में वृत्तों के लक्षण और उदाहरण हैं, और फाजिल
अली-प्रकाश में साहित्य के सब अंगो-काव्य के गुण-दोष
लक्षण, व्यंजना और अलंकार आदि का वर्णन है । परनु
हम यह नहीं कह सकते कि श्रृंगारलता में क्या है। न
हमने इस पुस्तक को देखा और न यहाँ (दौलतपुर में )
इसके विपय से कोई श्रभिन मिला।
शिवसिंह के अाधार पर ग्रियर्सन साहब कहते है कि
सुसदेवजी गौढ़ में अर्जुनसिंह के बेटे गजा राजसिंह के
यहाँ भी थे और वहाँ उनको कविराज की पदवी मिली
थी। वे और शिवसिंह यह भी कहते है कि गौड़ में उन्होंने
वृत्तविचार नामक छंदोविषयक एक प्रथ बनाया, जो हिंदी
के छदोग्रंथों में सबसे अच्छा समझा जाता है ! परंतु
सुखदेवजी के दशजों को इस बात की विलकुल सयर नहीं।

सुखदेव मिश्र अमेठी में हिम्मतसिंह के लिए बनाया । उसके प्रारंभ में उन्होंने हिम्मतसिंह को आशीर्वाद कहा है, यथा-- "मुग्वदेव सदाशिव मुदित मन हिम्मतसिंह नरिंद कहै।" कविराज की पदनी भी गौर से उद नहीं मिली। ये अपने फाजिल अगा-प्रकाश में लिसने है- अलद्दयार-खों भुजपली सुमति सूर सिरताज । जिन्हे दियो कविराज पद वो गरीय निया॥ उसमे साफ जाहिर है कि फाि को पटची को अलादयारों ने भी धी, गौर-नरेन ने नदीं। मुसदेयजी क बनाये हुए प्रयों में प्रियसीधीर शिनि पक टंदा विचार पिंगल पतलान है। पद शायद किसी दूसरे सुपदेय का पनाया हुना होगा । घे यह भी लिखते हैं कि नपदयजी ने अध्यात्मा श्री दशप नाम पं; मोदी प्रपना, परतु म पात भी दानापुर- निपाणी धुड्युमिध शाभिाना प्रकाशित परी। TAT मा किन भी शायद पिनी मरे मुग्ण बमार पुग्नक मारे ऐप में न Reमें मयि नाही पर मरने । परिप बमिलती, सनया, पाका निinat मातm frienीमा Mati marrier संti . घे कहते हैं कि सुखदेवजी कभी गौड़ नहीं गये और वृन- प्राचीन पंडित और कपि सुसदेवजी के चार ग्रंथ प्रसिद्ध है-रसाव, वृत्त-विचार पिंगल, भंगारलता और फाजिल अली-प्रकाश । डोडिया खेरा के राच मर्दनसिंह के लिए उन्होंने रसाव बनाया, अमेठी के राजा हिम्मतसिंह के लिए. वृत्त विचार-पिंगल बनाया; मुरारिमऊ के राजा देवीसिंह के लिए गारलता बनाई, और नवाब फाजिल-अलीसा के लिए फाजिस अली-प्रकाश बनाया। रसाव में नायिकाभेद है, वृत्त विचार में वृत्तों के लक्षण और उदाहरण है, और फाजिल अली-प्रकाश में साहित्य के सब अंगों-काव्य के गुण-दोष, लक्षण, व्यंजना और अलंकार आदि का वर्णन है। परंतु हम यह नहीं कह सकते कि श्रृंगारलता में क्या है। न हमने इस पुस्तक को देखा और न यहाँ (दौलतपुर में } इसके विषय से कोई अभिश मिला। शिवसिंह के आधार पर प्रियर्सन साहब कहते हैं कि सुपदेवी गौड़ में अर्जुनसिंह के बेटे राजा राजसिंह के यहाँ भी थे और वहाँ उनको कविराज की पदवी मिला थी। घे और शिवसिंह यह भी कहते है कि गोद में उन्होंने वृत्तचिचार नामक छंदोविषयक एक अथ बनाया, जो हिंद के छदोग्रंथों में सबसे अन्छा समझा जाता है । परंतु सुखदेवजी के वंशजों को इस बात की विलकुल खबर नहीं। . विचार पिंगल उन्होंने गौड़ में नहीं बनाया । उसे उन्होंने - सुखदेव मिश्र अमंटी में हिम्मतसिंह के लिए बनाया । उसके आरंभ में उन्होंने हिम्मतसिंह को आशीर्वाद कहा हे, यथा- "मुखदेव सदाशिव मुदित मन हिम्मतसिंह नरिंद कदें।" कविरार की पदवी मी गौड़ ने उह नहीं मिली। ये अपने फाजिल अली प्रकाश में लिखते है- प्रलयार-सॉ भुजवली सुमति पूर सिरताज । जिन्ह दियो कविराज पद यड़ो गरीय नियाज ॥ इसमे माफ जाहिर है कि कविता को पदवी दनको अमहयारखों ने दी धी, गोट-नरेश ने नहीं। गुग्वदेवजी नारे हुए ग्रंथों में प्रियर्सन और शिसिंद पर शे पचार पिंगल पनलाने है। यह शायद किसी दूसरे मुपदेप । पनाया हुआ होगा। यद मो लिया कि उम्मायनी यायामप्रकाश धीर दशरथराय नाम मोदी ययगारे. परंतु म पान में भी पासपुर- मिमि प्रकाशित पर है। EAR मत नो गारद तिर गुग्गोष -बनाये। पुतहमारे देशोrial परिषय शिष पानी का मार्ग ! पनि पाकी मिना शो, म प ध म पापा ri TRY farmer Perurrectinkatfor

१०६ प्राचीन पडित और कवि
परमपददानी सिद्धि निधि की निसानी
घट-घर में समानी चहूँ चेदन चखानी है।
महिषासुर मारि चंड-मुडहि विदारि
रक्तबीजहि सहारि शुभ दानवै रिसानी है ।
महा मरदानी गहे कठिन कृपानी कहि
सीतल सयानी तिहूँ लोकन में जानी है।
दादि सुनि लीजै, मेरे नैन करि दीजै,
सुनि पाथर पसीजै तू नो श्रादि महरानी है।
यह कविता धुरी नहीं है । "कविराज" के वश
में
उत्पन्न कवि के सर्वथा अनुरूप है।
श्रस्टोवर १६००
--

हीरविजय सूरि
जैनियों में दीरविजय सुरि नाम के एक बड़े महात्मा और
बई विद्वान हो गरे है। वे अकयर यादशाह के समय में थे।
देव-विमल-गगि शत हीरसौभाग्य-नामक कान्य से उनका
बहुनाल हाल मालूम दोमकता है। इस काप्य म अकार,
उसको राज्यव्यवस्था, उसफे धार्मिक विचार शादि के सबध
म मी यहुन-सी बात है। जैन पंडितां पर पद विननी पर
करता था, उनको प्रार्थना को यह कहां तक मानना था -
और उनको फिनने शादर की ए से देग्रता , इन amil
कामी पना हरमीमाग्य में लगता जगाराम
नाम का एक और मी प्रथ मन में उससे भी न
আপা কা স্নান মা ক ম য যা মিলা ।
समी धर्मा और नंप्रदायों के दामासों सरपति
থানা যুব ঘন বা গান ফr
लिए मदेव नारनाna II और मारपाई
जहां से ni. Star Tr
नंदिर REAT
गगन रहना ! लो माग kirefore
बोगी मन Cli xanami nrnar.
HAT Irrfantri amiaam

- प्राचीन पंडित और कवि फरमान लेकर अहमदाबाद गये थे उन्हीं के साथ वे फतहपुर के लिए पैदल रवाना हुए । पट्टन, सिद्धपुर, सिरोही, मेड़ता श्रादि जिन जिन स्थानों में वे पहुंचे सभी कहीं वहाँ के अधिकारियों और प्रतिष्ठित पुरुषों ने उनका यथेष्ट सत्कार किया। जब वे सॉगानेर पहुंचे तव अपने शिप्य विमलहर्ष को बादशाह के पास, अपने प्रागमन का सूचना देने के लिए उन्होंने भेजा । बादशाह ने थानसिंह आदि अपने अफसरों को श्राशा दी कि बड़ी धूमधाम के साथ हीरविजय सूरि की अगवानी की जाय । शाही अफसर और अनेक प्रमुख जैन फौज, रथ, घोड़े और हाथी लेकर सांगानेर पहुंचे। उनके साथ सूरि महाराज फतहपुर श्राये । वहाँ एक रात जगमल कछवाहे के महल में ये रहे। दूसरे दिन चे शाही दरबार में उपस्थित हुए । परंतु उस समय श्रकवर एक बहुत आवश्यक- और महत्त्व का काम कर रहा था। इस कारण उसने हीर विजय सूरि की सेवा-शुश्रूपा का काम अगुलफल को सौंपा। अबुलफपल हीरविजय सूरि को अपने महल में ले गया। वहाँ उसने बड़े ही भक्ति भाव से उन्हें विठाया । कुछ देर बाद उसने हीरविजय सूरि से धर्म-संघधिनी बातें पछीं। उसके प्रश्न का सारांश हीरमौभाग्य के अनुसार नीचे दिया जाता हे- अबुलफाल ने कहा-"हमारे कुरान में लिखा है कि परने पर मुसलमान धर्म के अनुयायियों के शरीर, धरोहर 1 - हीरविजय सूरि के तोर पर, पृथ्वी के पेट में ररा दिये जाते है । प्रलयांत में उन सब शरीरों की आत्मायें अपनी-अपनी सायगसे निकल- कर खुदा नाम के परमेसर के सामने खड़ी होंगी। पदा उस समय सब के पुण्य पाप का विचार, पक्षपातरहित छोफर, रंगा । सयको पुण्य ओर पाप का फल उस समय पर उमी तरह देगा जिस तरह कि पृथ्वी, उसमें बोये गये याज्ञा का फल, देती है। कुछ वर्ग को भेज दिये जायेंगे, जिन्द नाना प्रकार के भोग-प्रादि -प्राप्त होंगे और कुछ परक को भेजे जायंगे, जदों उन्हें अनिर्वचनीय दुव भोगने परेंगे। हे महात्मा! आप कृपा फरफे यसलाप कि कुरान में जो ये बातें लिखी ये सच है या देशल भाषा राम के समान निर्मूल है।" বন सूरे पुरानाति निक्षिप्यते भ्याग प ा दमातिथियों पर ren যৌধুয়াশা सिपिरियो माय गृप्या परिपकडे गला गोपिना Imu पानिमायाति पुनार nyri FA मा म प re Am mera . •गर THAR शिम पार rrrm arrint rrar Timeagk fort {tirre,ril

११२
प्राचीन पंडित और कवि
इस प्रश्न को सुनकर हीरविजय सूरि ने पूर्वोक्त सिद्धांत
कासडन कई श्लोकों में करके, अंत में यह कहा कि नतो इस
संसार का कोई पैदा ही करनेवाला है और न कोई इसका
नाश ही करनेवाला । इसमें ये जो अनेक प्रकार की विभि
भतायें देस पढ़ती है उनका कारण प्राणियों ही के प्राक्कन
कर्म है । अतएव मेरी राय में फिनी स्रष्टा का अस्तित्व
मानना बंध्या-पुत्र का अस्तिल मानने के समान है-
कर्ता च हर्ता निजकर्मजन्यवैचिच्यविश्वस्य न कश्चिदस्ति ।
बंध्यात्मजन्मेव तदस्ति भावोऽसनेच चित्ते प्रतिभासते तत् ॥
यह सुनकर अवुलफल बहुत खुश हुश्रा--
इदं गदित्वा विरते मुनीन्द्रे शेरा. पुनर्वाचमिमामुवाच ।
विज्ञायते तद् बटुगावाचि चीचीच तथ्येतरता तदुक्तौ ॥
अर्थात् , शत्रुलफल ने यह कहा कि इस दशा में यही
कहना पड़ता है कि हमारी धर्म-पुस्तकों में यदुत-सी तथ्येतर
चाते है। यहाँ पर यह याद रखना चाहिए कि ससार
कर्तृत्व श्रादि के संबंध में हीरविजय का बतलाया हुया
सिद्धात जैन-धर्म के अनुयायियों का सिद्धात है।
श्रकवर को काम से फरसत होने पर, सूरि महोदय शाही
द्रवार में बुलाये गये । वहाँ जाने पर क्या हुनासो जगद
गुरु-काव्य के प्रणेता के एक श्लोक से अवगत कीजिए--
चगा हो गुरुजीतिवाफ्यचतुरो हस्ते निजं तत्करं
कृत्या सूरियरान्निनाय सदनान्तर्वस्त्रयद्धाहणे।
के

हीरविजय हि
तारीगुरवस्तु पाटसमलं नारोपय तस्तदा
वसायामुपरीति भूमिपतिना पृट किनगुरो॥
अकयर ने पूछा-"गुरुजी ! चने तो हो ?" अकरर को
हिंदी का यह नमूना ध्यान में रखने लाया है। फिर उनका
हाथ पकडकर कर उन्ह महलों के भीतर ले गया और
বিন থং বিয়ানা বারা। এ হালিম ননন
पर पैर रखने से इनकार कर दिया। इस पर अपर को
आश्चर्य हुधा और सूरि महोदय से उसने इसका कारण
[া। সনগামী ৪ ঘন বং বিনয় ঘন কী গ্লাম।
नहीं है-त्यादिवाने जर अकसर ने सुनी तर इसे और
भी आन्चर्य हुश्रा। जैन साधु मयारी नहीं रपते, ये मदा
पंदल ही चलते हैं। श्रतएर धोविय भी दमदाबाद में
पंदा ही प्रापे ६, या मर कर भय मान्य को
सीमा न रही। र तिथिममादर-मधिी पाने दो
মুগদা বিদী গ্রানা বা rি
में धर्म परमार और गुरु के निति |
पमा मिरा और गोकपा दोहोरि
कोनिता र मिEि देर arr
पडून प्रमा! या पानी
एकमेंट दी । पास मौज
माल किया पाTarakariaris
Frmaratein

inclination to admit them to our association,
intention of theu hearts, we feel a porerful
प्राचीन पंडित और कवि
अकयर के इस फरमान का अनुवाद भी मालकम सादव ने
अपनी पुस्तक में दिया है। उसे हम ज्यों का त्यों नीचे प्रका
शित करते हैं-
"IN THE NAME OF GOD GOD IS GREAT
"Firman of the Emperor Jalalodeen
Mahomed Akbar Shah, Padsha,
Ghazce
"BE it known to the Moottasuddies of
Malwa, that as the whole of our desires
consist in the performance of good actions,
and our virtuous intentions are constantly
directed to one object, that of delighting
and gaining the hearts of our subjects, etc
"We, on hearing mention made bf persons,
of any religion or faith, whatever, who
pass their lives in sanctity, employ their
time in spiritual devotion and are alone
intent on the contemplation of the Deity;
shut our eyes on the external forms of
their worship, and considering only the

दीरविजय त्रि from a wish to do what may be acceptable to the Deity On this account, having heard of the extra-ordinary holiness and of the severe penances performed by Hirbuzisoor and his disciples, who reside in Guzerat and are lately come from thence, fra have ordered them to the presence, and they have been ennobled by having permission to hiss the abode of honour "After having recensed their dismissal ard leave to proceed to their own country, Clicy made the following request -That if the King, protector of the poor, rould resue orders that during the ivelse days of the mont): Bhadon, called Pulchoqesur (« hich are held by the Jains to be particularis lols) no cattle atould be platshtered in the cities worse their trilis paskie, Bjerg Vould thereby le exalted in the eyes of the rld, ue ce of turn 0; DIT filmale rould in ipzuru, 'srd!, seliimaa nisje is would in recriptae bilini,

प्राचीन पंडित और कवि
अकयर के इस फरमान का अनुवाद भी मालकम साहव ने
अपनी पुस्तक में दिया है । उसे हम ज्यों का त्यों नीचे प्रका.
शित करते हे-
"IN THE NAME OF GOD GOD IS GREAT
"Firman of the Emperor Jalalodeen
Mahomed Akbar Shah, Padsha,
Ghazee
"BE it hnown to the Moottasuddies of
Malwa, that as the whole of our desires
consist in the performance of good actions,
and oui virtuous intentions are constantly
directed to one object, that of delighting
and gaining the hearts of our subjects, etc
"We, on hearing mention made bf persons
of any religion or faith, whatever, who
pass their lives in sanctity, employ their
time in spiritual devotion and are alone
intent on the contemplation of the Deity,
shut our eyes on the external forms of
their worship, and considering only the
intention of their hearts, we feel a powerful
inclination to admit them to our association,

हौरविजय सूर्ति from a wish to do what may be acceptable to the Deity On this account, having heard of the extra-ordinary holiness and of the severe penances performed by Hırbujisoor and his disciples, who reside in Guzerat and are lately come from thence, we have ordered them to the presence, and they have been ennobled by having permission to kiss the abode of honour "After having recened their dismissal and leave to proceed to their own country, They made the following request --That if the king, protector of the poor, vould Issue Corders that during the twelve dev's of the month Bhadon, called Putchoresur ( hich are lield by the Jains in lie particularly Holy) no mttle should lx claughtered in lle cities where their tribes risale, thing mouli tirebir lk Carlied in the pripts Art, e forlu, thin 1110% of 3 uralker na livin: anin sin uild it in, and the sctisrs of liifajetet seitdfis retraitelis to Gru, प्राचीन पंडित और कानि अकबर के इस फरमान का अनुवाद भी मालकम साहय ने अपनी पुस्तक में दिया है। उसे हम ज्यों का त्यों नीचे प्रका. fra ma- "IN THE NAME OF GOD GOD IS GREAT "Firman of the Emperor Jalalodeen Mahomed Akbar Shah, Padsha, Ghazec "BC it known to the Moottasuddies of Malwa, that as the whole of our desires consist in the performance of good actions, and our virtuous intentions are constantly directed to one object, that of delighting and gaining the hearts of our subjects, etc “We, on hearing mention made bf persons of any religion or faith, whatever, who pass their lives in sanctity, employ. time in spiritual devotion and are alone intent on the contemplation of the Deity, shut our eyes on the external forms of their worship, and considering only the intention of their hearts, we feel a powerful inclinativ., them to our association, their

हीरविजय सूरि
कारमान अकबर बादशाह पाजी का-
"सूचे मुलतान के बड़े बड़े हाकिम, जागीरदार, करोड़ी
और सब मुत्सद्दी (कर्मचारी ) जान ले कि हमारी यही
मानसिक इच्छा है कि मारे मनुप्या ओर जोर-जंतुओं को
सुख मिले, जिममे सब लोग अमन चैन से रहकर परमात्मा
की पारायना में लगे रहे। इससे पहले शुभचिंतक तपम्बी
अपचंद मूरिखरतरगच्छ इमारी मेया में रहता था । जब
उसको भगाङ्गति प्रकट हुई तर इमने उसको अपनी यही
पशाही को मिहरयानियों में मिला लिया । उसने प्रार्थना
की कि इससे पहले हीरपिजय सूरि ने सेवा में उपनि
मे का गौरव प्राप्त किया था और हर माल १२ दिन
मांगे थे, जिामे वादशादी मुरकों में कोट जाय माग म
आप भीर कोई प्रादमी किसी पी, माली और नरें
सरश जी को बटन है। उसकी माना irrch
गई थी। अब में भी आशा करता है frur ,
पा मोर मादाम म शुभचिक पर
বশি মন #নী মা দুধা দে না পি।
हिमा, गुम
कामामी मे मगर RIRE
rinaariमार
पोपमा नो frau TRA
भादमी के गान

१२०
प्राचीन पडित और कवि
मकाम श्राजार जांदार मोरेन गदद । व अस्ल
खुद श्रॉनस्त कि चूं हजरते वेचूँ अज वराए श्रादमी चर्दी
न्यामतहाय गूना मुहय्या करदा श्रस्त । दर हेच वक्त दर
श्राजार जानवर न शवद् । पशिझमे जुदरा गोर हेबानात
न साजद । लेकिन बजेहत् वाजे मसालह दानायान पेश
तजवीज नमूदा अंद। दरींबिला भानार्य जिनसिंह सूरि
उर्फ मानसिंह व अरज अशरफ प्रसाद रसानीद् कि
फरमाने कि कल अर्जी यशरह सदर अज सुदूर याफ्ता
बूद गुम शुदह । विनायरॉ मुताधिक मजमून हमा
फरमान मुजद्दद फरमान मरहमत फरमूदैम् । मे वायद
कि हस्खुल मरतूर अमल नमूदा च तकदीम रसानद ।
च अज फरमूह तखल्लुफ इनहिराफ न वरजंद ।
दरी वाव निहायत एहतमाम च दगन् अजीम लाजिम
दानिस्ता तराइयुर घ तव दुल वकवायद यॉराह न दिहंद ।
तहरीरन् फीरोज रोज सी व यकुम माह सरदाद इलाही
सन् ४६।"
।
(१) “व रिसालए मुकल हजरतस्सुलतानी
दौलत-खॉ दर चौकी ( उमटे उमरा)।"
(२) "जुब्दतुलआयान राय मनोहर दर नोयत वाताया-
नवीसी, प्राजा लालचद् ।"
जोधपूरनिनामी मु शो देवीप्रसादजी ने इसका अनुवाद
हिंदी में इस तरह किया है-

रोपमा माटोrthwifra
मानमिक इच्छा है कि सारे मनुष्यों और जीव-जंतुओं को
जयचदरिसरतरगच्छ दमारी सेया में गदता था। जप
उसकी मगरनहि प्रकट हुई तर दमने उसयो अपनी पली
सादशादी की मिदरयानियों में मिला लिया । उमने प्रार्थना
गधे, सिम पादशादी मुल्कों में पो जीप माग न
जार को प्रारमी पिसी पाणी, मदगी धार
गजीना पो पर न । उनको प्राधानTTI
मणिपमा मामी साम दाम पर दरमा font
दीरविजय सूरि
१२१
परमान अकबर बादशाह गाजी का-
"सूने मुलतान के बड़े बड़े हाफिम, जागीरदार, परोही
और सर मुन्सही (कर्मचारी जान ले कि हमारी यही
गुर मिले, जिसमे सब लोग अमन चैन से रहकर परमात्मा
शारापना में लगे रहे। इससे पहले शुभचिंतक तपम्धी
की कि इससे पहले होगविजय स्रि ने सेना में Trfine
होने का गौरय प्रात दिया था और हर माल ५ दिन
दघीयप भी भाशा पाता
और मापन
शुभविक mil
Heart rry remix

प्राचीन पडित और कवि पशुओं का मरघट न बनाये। परंतु कुछ कारणों से अगले बुद्धिमानों ने वैसी तजवीज की है। इन दिनों प्राचार्य जिनसिंह उर्फ मानसिंह ने अर्न कराई कि पहले जो ऊपर लिसे अनुसार हुक्म हुआ था वह खो गया है। इसलिए हमने उस फरमान के अनुसार नया फरमान इनायत किया है। चाहिए कि जैसा लिख दिया गया है वैसा ही इस श्राजा का पालन किया जाय । इस विषय में बहुत बड़ी कोशिश और ताकीद समझकर इसके नियमों में उलट- फेर न होने दिया जाय । ता० ३१ खुरदाद इलाही सन् ४६ । हजरत बादशाह के पास रहनेवाले दौलतखों के हुक्म पहुँचाने से, उमदा अमीर और सहकारी राय मनोहर को चौकी और ग्वाजा लालचंद के पाकिया (समाचार), लिखने की बारी में लिखा गया।" इस फरमान से स्पष्ट है कि सूरि को बारह दिन के लिए जीवहिला न की जाने के विषय में तो फरमान मिला ही था। उनके बाद जयचन्द्र सूरि को भी एक सप्ताह के लिए फरमान मिल गया था। अकार ने हीरविजय को जगद्गुरु की पदवी दी। इसके याद होरविजय ने शांतिचंद्र-नामक पंडित को उपाध्याय बनाकर अकवर के दरबार में छोड़ दिया और १५८४ ई० में अापने फतहपुर से प्रस्थान किया। कुछ दिन ये प्रयाग में रहे और कुछ दिन फिर आगरे में। तदनंतर आप गुजरात .

।
-
हीरविजय हि
को लोट गये। चार महीने, मार्ग में, पाप सिरोदी रहे।
२५८७ में वे पाटन पहुंचे।
इयर शांति ने प्रकार की तारीफ म रुपारसकोग
नाम की एक पुस्तक नाइ । उसमें उमने अकरा के योदार्य
ओर कारण्य-दर्शक सारे मझार्यों का उल्लेख किया।
इस पुस्तक को शातिन के मुख से सुराकर अकयर को
थटुन सगीर दुथा। श्रनक, पाटन में हीरविजय का दर्शन
करने के अभिप्राय से शांतिचंद्र जगतापुर से विदा होने
लगे तब प्रकार ने अपने हिमा प्रतिरक फरमान को एक
फापो उनके हाथ में दी । उसम उसने पहिला के समय की
प्राधि को और मी या दिया और जजिया नामक कार
उठा दिये जाने का भी टुपम दिया--
उयरता शुगि मशिनिमादधे
नतिरेप तनुपकर स्यार।
मनमुद ही मकर को उठाकर मे पत पड़ी
मानिनिगरा दिखना । शी के भने जापा
मागान शिधान प्रारदपार में रहे।
भानुचंद्र मिशिदनाम गामिति
मंदगोदाटीमानियाnirn
अनिमा मे mixt m
नि का मामimarate

१२४ प्राचीन पंडित और कवि - "इति श्रीपादशाहश्रीअफव्यरजलालुद्दीनपुर्यसहस्रनामा- ध्यापकश्रीशत्रुक्षयतीर्थकरमोचनाद्यनेकसुस्तनिद्यालयमहोपा. व्यायश्रीभानुचन्द्रगणितच्छिप्याप्टोत्तरशतावधानसापकप्र. मुदितपादशाहधीश्रकन्दरप्रदत्तजशफहमरदाभिधान महोपा. ध्यायधीसिद्धिचन्द्रगणिविरचितायां कादम्बरीटीकायामुत्तर- खण्डटीका समाप्ता।" इससे मालूम हुआ कि सिद्धिचंद्र के शतावधान से प्रसन्न होकर अकबर ने उन्हें खुशाम को उपाधि से भूपित किया था। इससे यह भी विदित हुआ कि भानुचंद्र ने अकार को सूर्यसहस्रनाम पढ़ाया था और शत्रुजय तीर्थ के यात्रियों को जो कर देना पड़ता था उसे भी उन्होंने अफवर से माफ करा दिया था। परतु हीरविजय सूरि के परामर्श से ही भानुचंद्र ने यह काम किया था। इसके लिए उन्हें काश्मीर जाना पड़ा था। यह वात १५६३ ईसनी की है। इसके बाद विजयसेन हरि को भी बुलाकर अकबर ने 'अपने यहाँ रखा। अनेक धार्मिक विषयों में उनसे अकयर ने चार्तालाप किया। उस समय वहाँ एक प्रकार का धार्मिक सम्मेलन-सा था । अनेक विद्वान् राजधानी में उपस्थित थे। उनसे विजयसेन सूरि का शास्त्रार्थ हुश्रा । उन्होंने ३६३ विद्वान् प्रतिवादियों का पराभव किया । उनको विद्वत्ता पर मुग्ध होकर अकवर ने उन्हें स्वामी की पदवी

हीरविजय सूरि
दी और विजयरत ने भानुचंद्र को उपाध्याय की पदयी ।
इस पदवीदान का जलमा बड़ी धूमधाम से हुआ ।
कृपारसफोश के कर्ता का कथन है कि इस उपलक्ष्य में
शेख ननुतफरा ने ६०० रुपये और कितने ही घोडे
श्रादिहिरे-
शेपो रुपपपटशती व्यतिकरे तथान्यदानादिभिः ।
सन् १५८७ ईमपी में नीरविजय नि चार महीने पाटन
में रहे । १४ में शाह मोपर्गिक तेजपाल का प्रदान की।
मुपाशीर अनंत को मूर्तियों की उन्होंने प्रतिष्ठा कराई।
१५६० में इसी तेजपाल को प्रार्थना पर शत्रुजय तीर्थ में
सूरि महोदय ने शादीचर का मशिनने पी धर्मरिया
का ममापन किया। पर पाद मोजार नांधों में पर्यटन
और निधार पर पर पय में रिक्तिय गरि १४६.
मी में,गरी मोर दिया। शादीया पेमदिर में
घात सपा शिता-सर, माय, TIR
भी मिझोता रपार में दर्गापति
का पड़ा मा IT शिक्ष्य में nिam में
विरा-
Emairririrampuri
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Pr:frrain ment

प्राचीन पंडित और कवि
विजयसेन के विषय में है-
ये च श्रीमदकचरेण दिनयादाकारितः सादर
श्रीमल्लाभपुर पुरन्दरपुरं व्यक्तं सुपर्वोत्करै ।
भूयोभिर्वतिभिषुधै. परिवृता वेगादलंचक्रिरे
सामोदं सरस सरोरुहवन लीलामराला इव ॥
श्रस्तु । पुराने जैन पडितों की बदौलत संस्कृत भाषा
के साहित्य की बहुत वृद्धि हुई और इस देश में पशुहिंसा
की कमी भी बहुत कुछ हुई। श्रतएव इस विषय में वे सर्वथा
अभिनदनीय हैं।
ऊपर, एक जगह, विजयप्रशस्ति-नामक महाकाव्य का
उरलेख हुआ है । उसमे २१ सर्ग है । हीरसोभाग्य की तरह
उसमें भी हीरविजय सूरि का चरित है। साथ ही, अंत के
पुछ सगौं में, विजयसेन सूरि और निजयदेव सूरि का भी
वर्णन है। इसके कर्ता का नाम हेमविजय गणि है। परंतु
समप्र फाग्य इनका लिखा टुना नहीं। सोलह सर्ग लिख
चुफने पर इनकी मृत्यु हो गई। अतपत्र अवशिष्ट पाँच सर्ग
इनके गुरुभाई गुणविजय गणि ने बनाकर काव्य-पूर्ति की।
गुणविजय ने इसकी एक टीका भी, विमाम-सवत् १६८८ में
बनाई। यह सटीफ-फाप्य वनारस की जैन-यशोधिजय पाट
शाला के अधिकारियों ने छपाकर प्रकाशित किया है।
संपादन बढी योग्यता मै हुया है। पंडित हरगोविंद
घरदास ने इसका संशोधन किया है। कोई सात सौ पृष्ठों

हीरविजय हि की जिद पँधी हुई पुस्तक है और पांच रुपये में मिलती है । इसके नसर्ग में हीरविजय हि और अश्यर के समा गम का वर्णन है। उसमें भी प्राय पहायात निनका उरलस इस लेख में, ऊपर, पिया जा चुका है। इतिहान- रष्टि से यह फान्य बड़े महाच का है। रचना इसफो प्राय. सरस और अर्थगाभीर्य-पूर्ण है।

- - श्राचार्य दिड्नाग महामहोपाध्याय डॉक्टर सतीशचंद्र विद्याभूपण, एम्. ५०, पी० एच डी०, का लिखा हुश्रा-चौद्धन्याय-नामक एक लेख चंगीय साहित्य परिपत्पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। उसमें अनेक बौद्ध विद्वानों और उनके न्याय प्रथा का उल्लेख है। प्राचार्य दिट्नाग का भी संक्षिप्त वृत्तांत उसमें है। वह विशेष मनोरजक है और महत्त्वपूर्ण भी है। अतएव उसका प्राशय नोवे लिखा जाता है- दिइ नाग का जीवनचरित दिड्नाग असाधारण नैयायिक थे। दक्षिण में काची- नगरी के पास सिंहवक-नमा गॉच में उनका जन्म हुना। वे जन्म से ब्राह्मण थे। वौद्ध धर्म में दीक्षित होकर नागदच- नामक बौद्ध गुरु के ये शिष्य हुए। नागदत्त वात्सी-पुत्रीय- नामक हीनयान संप्रदाय के अंतर्गत थे । इस संप्रदाय के धर्म-प्रथ त्रिपिटक का अच्छी तरह अध्ययन करके दिट्नाग ने महायान-संप्रदाय में प्रवेश करने की चेष्टा की। श्रतएन प्राचार्य सुचधु के वे शिष्य हुए । उनसे महायान सप्रदाय के सारे बौद्ध ग्रथ उन्दाने पढे । महायान विद्या की अधिष्ठात्री देवी का नाम मंजुश्री है।

प्राचार्य दिनाग
मुनते हैं, विटनाग की भक्ति से प्रसन्न होकर यह स्वर्ग से
मृत्यु लोक में आई और दिट्नाग के सामने उपस्थित हुई।
उसकी कृपा से दिट्नाग सारे शास्त्रों के असाधारण भाता
हो गये। एफ चार घे नालद के विश्वविद्यालय के अधि.
कारियों के द्वारा पुलाये गरे । घहों उन अधिकारियों की
प्रेरणा से उन्होंने मुदुर्जयनामक प्राण दार्शनिक को
परास्त करके धीर धर्म की विजय-पताका उड़ाई। उन्होंने
चौर भी अनेक मामा-साफिकों को हराकर अपनी कॉनि-
कीमुदी से लोक समाज को धलित किया। इस उपलक्षा
में उद त-युगप की पदयो मिली । उरीसा और महाराष्ट्र
पशों में परिभ्रमण करके रिनाग में अनेक तीन र
मन का बडन किया। महाराष्ट्र देश के जिस पिदार में
ही ये इसका नाम था साग-विहार । हीराधान
में उन्होंने मापालिम नामदे समीती पोरम में
दासिन दिया मिना sir शिमला में विदाम
नधान । पेशीम पारमिता, नाशिपारमिता, दीर्द
पारमिता, भारमिता आमा पारमिता, समर
गांसगारो पारद पी, पाmari ।
নাম rি fাশথ বিৰগৰ পথ নি
बारे पनि विकासको न Tr m
गिरीभूपाल प्रा लिया! AREmaintain!
xixitriarrinोग।

प्राचीन पहित और कवि . भारत के कितने ही स्थानों में दिट्नाग को भ्रमण करना पड़ा था। सभी कहीं वेतर्क-युद्ध में प्रवृत्त हुए थे। जिस निर्दयतासे वे अपने प्रतिपक्षी पर श्रामण करते थे, प्रतिपक्षी भी उसी निर्दयता से उन पर आक्रमण करता था । उनका जीवन इसी बात-प्रतिघात-इमी लड़ाई-झगडे-में बीता। जिस मल्ल-युद्ध में वे प्रवृत्त हुप ये उसका अवसान उनके मरने पर भी न हुमा । जो ग्रंथ वे लिख गये है, उत्तर- काल में, अनेक पंडितों को उन सभी प्रयों के मत के खंडन के लिए कमर कसनी पड़ी। मेघदूत-काव्य में दिङ्नाग का "न्थूलहस्त" परिहार करने के लिए महाकवि कालिदास फो मेघ को सावधान करना पड़ा। ब्राह्मण वंशीय नैयायिक उद्योतकर ने अपने न्याय-वार्तिक- प्रथ के श्रारंभ में दिड्नाग को "कुताकि" की पदवी से चिभूपित किया । सर्वदर्शनस्वतंत्र वाचस्पति मिश्र ने दिड्नाग को "भ्रांत मदंत" कहकर उनकी भ्रांति के निया रण की चेष्टा की। मलिनाथ ने दिमाग को "अद्रिकल्प" विशेषण से विभूषित किया । कुमारिलभट्ट और पार्थसारथि मिथ ने दिड्नाग पर अवाघ बाण-वर्षा की। सुरेश्वराचार्य आदि वेदांतवेत्ताओं और प्रमाचद, विधानद नादि जैन दार्शनिकों ने दिङ्नाग का मत लुप्त करने के लिए बहुत प्रयास किया। यहाँ तक कि पीछे-पीछे किसी-किसी बौद्ध नैयायिक को भी दिक्षनाग के ग्रंथों के किसी-किसी मत 2

आवार्य दिड्नाग
खडन का प्रयत्न करना पड़ा। दिट्नाग सचमुर ही यार
पुरुष थे। उनमें असामान्य मनोपल और दैहिक तेज था।
यदि ऐसा न होता तो अनेक दिशायों से किये गये तो
आघात सहन फरक येइनो समर तक की जीन रहते।
दिड्नाग को प्रय भारत से लुर हो चुके हैं । नेपाल में भी
घे रक्षित नहीं, किंतु पृषी से एकदम ही लुप्तप्राय नहीं
हुए । तिम्चत में दिल्नाग के प्र य यश पूर्वक मभित हैं।
दिर नाग का प्रापिभांश-कान
अनुमान या दें कि ५०० ईसी में दिनाग जापित थे।
उन गुर भाचार्य यमुपंधु ८० शारी में पिमान थे।
दिनाग को दोषयों पर गुराइ, ५५७५६१ मधी में,
चीनी भाषा में दुधा। जिस पमर यांध-देश में विनाग
का प्रादुर्भाव हुआ, जार पर उमा ममप दक्षिण में
पशननीय नरेजीमा साधिगत्या पसरपंधीर नरेगा
में से अधिकाग नरेश पौस धारयुगामी ।
दिमाग का प्रमाण मयुषर
विद्गात पापं प्रान RT FATTYek
समय मादेशगी गगरी पारा शिन
पर नही मी TriRTru पीना
नेगी ! माTririk मा पर
जिन
मानniti miri
merH TRET मामप्रमाबगर |

१३२ प्राचीन पडित भोर कवि ईश्वरकृष्ण के साथ विट् नाग का विरोध सुनते हैं, जिस समय दिड्नाग प्रमाण-समुच्चय का पहला श्लोक बनाया उस समय भीपण भूकंप हुआ । आध- देश प्रकाश-पुज से चारों तरफ समुज्ज्वल हो उठा और सय कहीं कोलाहल मच गया। इसके अनंतर एक दिन ईश्वरकृष्ण नामक एक ब्राह्मण दार्शनिक दिङ्नाग के शैल- विहार में पाया। उस समय दिड्नाग विहार में न थे। दिनाग-लिखित प्रमाण-समुच्चय का पहला श्लोक जो इश्वरकृष्ण की दृष्टि में पड़ा तो वे उसे फाड़कर चलते बने। दिड्नाग ने आश्रम में लौटकर देखा तो श्लोक नदारद । श्रतएव उन्होंने उसे फिर लिसा । ईश्वरकृष्ण ने दुवारा श्राकर उस श्लोक को फिर नष्ट कर दिया। तीसरी दफे दिनाग ने फिर भी उसे लिपिबद्ध किया। इस दफे उपद्रव- कारी को सावधान करने के लिए, श्लोक के नीचे, उन्होंने इस आशय का एक लेख लिख दिया-"इम नम्रता पूर्वक निवेदन करते हैं, कोई इस श्लोक को, खेल के बहाने मी, नष्ट न करे। अर्थगाभीर्य में यह श्लोक अतुलनीय है। इस श्लोक के भाव-सबंध में यदि कोई हमारे साथ विवाद करना चाहे तो वह हमारे सामने उपस्थित हो। हमारी अनु पस्थिति में उसे कापुरुपता न करनी चाहिए।" दिङ्नाग धौद्ध मिक्षु थे । नियमानुसार भिक्षा के लिए उन्हें रोज़ बाहर नगर में जाना पड़ता था। ऐसे हो समय - प्राचार्य दिङ्नाग में श्यररुमा फिर भी उनके विहार में आये। उन्होंने इस लोक के नीचे दिग्नाग को प्रार्थना पढ़ी। पढ़ने मे उनके उदय में साधु भाव का संचार हो पाया। ये चुपचाप यहाँ खरे रहे। विधार को लौटने पर दिदनाग उनके माय तर युद्ध में प्रवृत्त हो गये। शर्त यह दुर कि जो परास्त झोपह विजेता का धर्म प्रक्षण करे। पर परामो, पर उन्होंने दिट्नाग का धर्म न सकार किया। दिनाग ने जर उन्हें शर्म की याद दिलानर मनोयारकर सपा ने विटनाग के विहार में आग लगा दी। पर जलकर भस्म हो गया। दिनागो पाम पागी-पाजोपया मर जल गया। दिनारा यहुत चिंतित हुए। उन्होंने गोवा- "इम एक मनुष्य फोमानापमा और लोगों के लिए मुष्टि प्रालि का उपायाम गे" उन्होंने अपने पो पात पिर मामा- लिम्बने का निवारा दिया। मीर पाhिingी उनणे सामोसार पा Tutr मान- "पण, nafranfirst Ti Art निपान TATARTI गुरु | RAT सारेrijration पारनrn} Trimmer Pratar tir RRERAir Rirrjrial महाutta!'

१३४ प्राचीन पंडित और कवि यह कहकर मंजुश्री अतर्धान हो गये । उस अवसर पर दिड्मंडल बड़े हो समुज्जल प्रभापुज से प्रकाशित हो गया। आंध-देश का राजा दिइनाग के पास आया और उसने अनुरोध किया कि श्राप हेतु-विद्या-शास्त्र की अवश्य रचना करके उसे समाप्त कीजिए । तव दिड्नाग ने प्रमाण-समुच्चय- नामक प्रथ लिखना प्रारभ कर दिया। प्रमाण समुच्चय का प्रतिपाद्य विषय प्रमाण-समुच्चय का छद अनुष्टुप् है। हेमवर्मा नाम का एक भारतीय बौद्ध पडित था । उसी ने दे-प-शे-स नामक तिव्वतीय राज-लामा के साथ प्रमाण-समुच्चय का अनुवाद तिब्बतीय भापा में किया। तिब्धत के शे-पइ-गेने नामक बिहार में यह अनुवाद कार्य समाप्त हुआ। तिब्बतीय भाषा में इस ग्रंथ का नाम है-"छे-म-कुत" । ग्रंथ के प्रारंभ में दिड्नाग ने लिखा है- "जो जगत् का हितसाधक और प्रमाण का अवतार- रूप है उसी सर्वशरण्य महागुरु सुगत के चरणों में सिर रखकर, इधर-उधर विखरे हुए प्रमाण-विषयक वचनसमूहों का पफत्र संग्रह करके, में इस प्रथ की रचना करता हूँ।" ग्रंथांत में दिदनाग ने लिखा है- "सर्वदेशीय तार्किकों का पराभव करनेवाले और हाथी के सदृश वलसंपन्न दिट्नाग ने, अपने ही रचे हुए श्लोकों का संग्रह करके, इस प्रथ का प्रकाशन किया।" -

प्राचार्य दिनाग
२३५
प्रमाण-समुख्य ६ परिच्छेदों म निभाता है-
() प्रत्यक्ष, (0) म्यार्थी गुमास, (३)परानुमान,
(४) प्रिपरेनु, (५) प्रत्यक्ष उपमान और शप-पान,
(६) जात्युत्तर विचार।
एमफे भागे विद्याभूषण महाशप में प्रमाग गुरुय
लिखी गई याता का विषेचन विस्तार , सायकिया।
उस विवेचन फोहम यो देते हैं, पयोफि पाठनों में से बहुत
कम को पदचिकर दोगा।
लेवाग्भ में टॉपटर विद्याभूषण ने पालिकाय की उस
उतिका उरलेप किया जिममें दिनाग, "रपूलहस्त"
की बात है। यह उति मंपदा को चौदह IIT मोणे
परया में यथा-
"दिएनागानां पगि परिदग्न गुनहगारलगन्"
जिस पर्वत पr पर था जमरोरपाना माना
मेव मेयर पाता शिरा र पर्यंत क ऊपर
में उपता पा पागे नप पिता को दियो मन
में यदभम
उजि.पही गपंग निको
सामानही माना। गौर, सागस
जप पदारमा राजाला RIME
उता सिमाई गापमं Arfmain
होना अपने को frRNR MEENA
परंतु पातु भी शारगे REM

प्राचीन पंडित और कवि अपने भ्रम का ज्ञान हो जायगा। इससे सिद्ध है कि कालिदास की उक्ति का प्रकृत संबंध दिग्गजों से ही है। दिङ्नाग नाम आ जाने से श्लेप-शुक्ति से यदि उन्होंने श्राचार्य दिनाग पर कटाक्ष किया हो तो यह भी असभव नहीं। दिड्नाग अवश्य ही बड़े उद्धत और अतुल अवलेप- पूर्ण थे। यदि किसी प्रकार यह बात सप्रमाण सिद्ध हो आय कि मेघदूत का पूर्वोक्त पद अवश्य ही श्लिष्ट पद है तो कालिदास के समय-संबंध में भी यह निश्चय हो जाय कि वे ५०० ईसवी के ही श्रासपाल विद्यमान थे , ईसा के ५६ वर्ष पहले, विक्रमादित्य की सभा में, न थे। अगस्त १६१५

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Prachin Pandit Aur Kavi

Author
Dvivedi,mahaveer Prasad
Title
Prachin Pandit Aur Kavi
File name
Prachin Pandit Aur Kavi
Text
OCR done
Citation
1913
Published
2011/01
Publisher
Ganga Pushtak Mala Karyalaya Lucknow
Language
Sanskrit
Pages
124
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546498
Barcode
4990010024967.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
9MphBrQiXmC
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