Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shyama Rahasya Tantra
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- ENE विपय सूची। प्रथम परिच्छेद में, देवी कालिका का द्वाविंशत्यक्षर मंत्र निर्यण काली सा- माहात्म्य कथन । दक्षिण कालिका का मंत्र और तितके विषय में श्रुति प्रमाण स- पर्या विधि और गुरु ध्यान, कुलगुरु निणग, अंकुश मुद्रा कथन, तांत्रिकी साध्या, प्रयोग निरूपण, कालिका की गायत्री और यागस्पान कथन धेनु मुद्रा, द्वार देवता और आसन विधि वर्णन, विगया माहात्म्यादि कथन, नाविध वर्णन, कराङ्गन्यास कपन, वर्णन्यात कथन, प्रयोग वर्णन, श्रीकंठन्याम, पोडान्यास और तत्वन्या ।। द्वितीयपरिच्छेदमें,मनन्तरयमन, पड़ङ्गन्याम विषय पुष्पमाला और होमर तृतीय परिच्छेद में, पीठन्याम, काम कला वर्णन कूममुद्रा और देवी विधि, देवी का ध्यानांतर वर्णन, यंत्र निर्माण पात्र और वहि पूना कथन, विषय, प्रयोग, द्विविध मुद्रा कथन, मांगादि शोधन कथा और भषगुंठन मुद्रा, कीर्तन, त. त्वमुद्रा, तत्वशुद्धि कीर्तन, आवाहनादि मुद्रा कथन खडङ्गादि मुद्रा और रश्मिवृन्द देवताकथन, पूनाकी दिनिर्णय उपचार और पूनामें निषेधा घिवर्णन, पूमाका मंत्र कपन पूना विधि कीर्तन, पुष्पनियम वर्णन, पुष्पदान विधान गुरुक्ति कथन देवीके पति मेरयवाक्य समस्त भैरवनाम क्थन इनकी पूनाका क्रम वर्णन रहम्यमाला,वर्णमाला और करमाला, अष्टांग प्रणाम और पानविधि वग शांतिस्तांत्र- चतुर्थ परिच्छेद में, कर्पूर स्तव वास्वरूपास्तव, दक्षिण कालिका का कवच, दक्षिण कलिका का स्तोत्र, कवनांतर वर्णन, कालिका सहस्रनाम स्तोत्र ।। पंचा परिच्छेद में, पुरश्चरण विधि, शक्ति शोधन, इस का प्रयोग ॥ पष्ठ परिच्छेद में, कालिका के पृथक् २ मंत्र कथन । सप्तम परिच्छेद में, विद्यामाहात्म्य । अष्टम परिच्छेद में, आचार क्रम वर्णन ॥ नषम परिच्छेद में, कुण्डगोलोद्भवादि ग्रहण विधि शुद्ध मंत्रौपघ वर्णन ॥ . दशम परिच्छेद में, सामान्य साधन कीर्तन शिवाबलि प्रकरण समयाचार कसिन ।। एकादश परिच्छेद में, मंत्रसिद्धि प्रकार ॥ द्वादश परिच्छेद में, काम्य प्रयोग, तद्विषयक विशेष विधि वर्णन मानियम ॥ त्रयोदश परिच्छेद में, महिषमर्दिनी की पृमा विधि उक्तपुमा विषयमें पुरन्धरण महिपमाईनी का स्तर ॥ चतुर्दश परिच्छेद में, नय दुर्गाका मंत्र, श्मशान विशेष वर्णन साधन स्थान कीरीन विहित शव साधन निषिद्ध शव साधन शव साधन प्रकरण । पंचदश परिच्छेद में, मंकारानर साघन अशक्त पक्षका पुरश्चरण || काम्यही भाष कुण्ड नियम दक्षिण कालिकाके सर्व सिद्धिदायक कवच। श्रीब्रह्मकृत कालीस्तच कालिकोपार्नपद् इत्यादि २ ऐसे अमूल्य ग्रंथकामू० २, डाकत्यय । पाई॥ " ॥ श्रीगणेशायनमः॥ अथ श्यामारहस्य तंत्रम् । भाषाटीका सहितम् । । मंगलाचरण। गणेशसिद्धिसदनं शारदासुखदायिनीम् । शंकर शंकर नत्वा सर्वापन्निवारणम् ॥ कन्हैयालालमिश्रोहं हरि शंकर शास्त्रिणा । प्रेरितोयुपकाराय तान्त्रिकानांमहात्मनाम् ॥ स. भीष्टप्रदांगभ्रां साधकानांमनोरमाम् । श्यामारहस्यतंत्र- स्य कुर्वेव्य ख्यांसुमंगलाम् ॥ प्रथमः परिच्छेदः। देवींदानवदैत्यदर्पनिवहानुन्मूलयन्तीं शिवां ब्रह्मानन्दम- हेशमौलिमणिभिः संसेवितांघिद्वयाम् । मत्वा श्रीगुरुपादप- द्मपरमा मोदामृतप्लावितः पूर्णानन्दगिरिस्तनोति विमलां श्यामारहस्याभिधाम् ।। स्वतन्त्रं वीरतन्त्रञ्च तन्त्रं फेत्कारिणी तथा । कालिकाकु लसर्वस्वं कालीतंत्रच चामलम् ॥ जो दानव और दैत्य गोंका दर्प उन्मूलन करते हैं ब्रह्मा विष्णु और महेश्वरादि ईश्वर श्रेष्ठगण भी जिनके दोनों चरणोंकी सेवा करते हैं उन्हीं देवी शिवाको प्रणाम करके और श्री गुरुके चरणारविन्द के परमानंद सुधा संदोहमें प्लावित होकर पूर्णानंदगिरि श्यागारदस्य नाम्नी अतीव दुर्लभ तंत्र संहिता प्रणयन करते हैं ।। १ ।। स्वतंत्रवीरतंत्र, फेन् कारिणीतंत्र कालिकाकुल सर्वस्व, काकीतंत्र, यायक, २ श्यामारहस्य भा० टी० । कुलचूडामणिश्चैव कुमारीतंत्रमेवच । कुलार्णवं तथाका. लीकल्पं भैरवतन्त्रकम् ॥ कालिकाकुलसद्भाव तथा चोत्तर तन्त्रकम् गुरूणांच मतं ज्ञात्वा साधकानां तथा मतम् ।। शुद्धवुद्धि स्वभावार्थ वक्ष्यामि मोक्षकारिणीम् ॥ तदुक्तं स्वतन्त्रे। क्रोधीशं विन्दुयुक्कान्ते ! त्रिमूर्त्यग्निसमायुतम् । त्रि- लिखेत् परतो देवि ! हुंकारद्वयमेव च । मायाद्वयं समालि- ख्य अत्रिसंवर्तसूक्ष्मयुक् ॥ त्रैकालिके सप्तवर्णान् पूर्ववत परमेश्वरि ! | स्वाहान्तेयं महाविद्या द्वाविंशत्यक्षरापरा ॥ अनया सदृशी विद्या नास्ति ज्ञानेतु मामके ॥ कुमारीतन्त्रेऽपि । भैरव उवाच । अतिगुह्यतर ह्येतत्ज्ञानात्मकंसनातनम् । अतीव च सुगो- प्यश्च कथितुं नैव शक्यते । अतीव च प्रियासीति कथयामि तव प्रिये ! ।रूपाणि बहुसंख्यानि प्रकृतेः सन्ति भाविनि !॥ तेषां मध्ये महेशानि ! कालीरूपं मनोहरम् । विशेषतः क- लियुगे नराणां भुक्तिमुक्तिदम् । तस्यास्तुपासकाश्चैव ब्रह्म विष्णुशिवादयः।चन्द्रः सूर्यश्च वरुणः कुवेरोऽग्निस्तथापरः। कुलचूडामणि, फुमारीतंत्र, कुलार्णव, कालीकल्प, भैरवतंत्र, कालिकाकु लसद्भाव, उत्तातंत्र, एवं गुरुवर्ग और साधकगणोंका मत यह सब विशेष जानकर शुद्ध बुद्धि स्वभावार्थ यह मोक्ष जनक साहिता कीर्तन करंगा ॥ कुमारीतंत्र में भैरवने कहा है कि काली का विषय अत्यन्त गृह्यतर है। यह अतीव गुप्त रक्ख । किसी के निकट न कहै, तुम मेरी अत्यन्त मियहो, इसकारण तुम्हारे निकट कहता हूं। हे भागिनि ! प्रकृति के बहुसंख्यक रूप हतिनमें हे महेश्वरि ! काळीरूपही मनोहर है । विशेषतः कलियुग में यह काली रूपही संपूर्ण कोकको भुक्ति मुक्ति प्रदान करना है। नाविणु, और शिवादि ईश्वरगण और चन्द्र, मर्य, वरुण, .. - प्रथम परिच्छेद। दुर्वासाश्च वशिष्ठश्च दत्तात्रेयो बृहस्पतिः । वहुनर किसिहो। केन सर्वे देवा उपासकाः ॥ कालिकायाः प्रसादेन भुक्तिमु क्तिःकरेस्थिता ॥ तस्या मन्त्रं प्रवक्ष्यामि यतो रक्षेद्युगत्रय- म्। ककारं वह्निसंयुक्तं रतिविन्दुसमन्वितम् ॥ त्रिगुणंच ततः कूर्च युग्मं लज्जायुगं तथा । दक्षिणे कालिके चेति पूर्ववीजा- नि वेश्येत् ।। वहिजायावधिः प्रोक्तः कालिकाया मनुर्मतः । न सुसिध्याद्यपेक्षास्ति नारिमित्रादिदूषणम् ॥ 'श्रुतिरपि-अथहनां ब्रह्मरन्धे ब्रह्मस्वरूपिणीमाप्नोति सु-: भगां त्रिगुणयुक्तां कामरेफेन्दिरां विन्दुमेलनरूपां एतत्रि गुणितामादौ तदनु कूर्चद्वयम् । कूर्चीजज्ज-व्योमषष्ठस्वर बिन्दुमेलनरूपम् । तदेव द्विरुच्चार्य भुवनां द्वयम् । भुवना तु व्योमज्वलनेन्दिरा शून्यमेलनरूपा । तदुक्तं-दक्षिणे का- फुघर, अग्निदुर्वासा, वशिष्ठ,दत्तात्नेय,वृहस्पति, अथवा अधिक कहनेसे क्याहै ? समस्त देवताभी उसी के वशीभूत हैं । कालिंकाके. प्रसाद से मुक्ति मुक्ति करस्थ होती है । उसका मंत्र कहता हूं। ककारको वह्नि संयुक्त और रति विन्दु समन्वित करके त्रिगुणित कर फिर कुर्चयुग्म और लज्जायुग्म ग्रहण करके " दक्षिणे कालिके" यह पद मिलाय संपूर्ण पूर्व वीज वेष्टन करने चा- हिये । अंतमें वक्षिजाया संयुक्त कर इसकोही कोळी मंत्र कहते हैं ।। * इसमंत्र में किसीमकार मुसिद्धादि की अपेक्षा नहीं है । अरिमित्रादि दुषणभीनहीं है इसके मननमात्रही पुरुपशिवमय होसक्ताई और सपूर्णसिद्धियों का ईश्वरल लाभ होताहै । इसमें किसी प्रकारका परिश्रम करना नहीं होता * इसका सन्निवेश इस प्रकार है । क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ हूँ ही ही दक्षिणे काले के फ्री क्री की हूँ हूँ हूँ ह्रीं ह्री स्वाहा । वह्नि शब्द में र, रतिविन्दु शब्द में दीर्घईकार का परचन्द्र विन्दु है, तो क x xim+ = ही इस प्रकार हुआ.। इस को त्रिगुणित करने से क्रीं क्रीं क्रीं होता है । कूर्च शब्द में हूँ , उज्जा शब्द में ही पहि माया शब्द में स्वाहा ।। ।
श्यामारहस्य भा० टी० । लिके तवाभिमुख्यता । तदनु वीजसप्तकमुच्चार्य बृहदा- नुजायामुच्चरेत् । मत्वा शिवमयो भवेत् । सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । गतिस्तस्यास्ति नान्यस्य स तु नारीश्वरः स तु दै- त्येश्वरः स तु सर्वेश्वर इति ॥ भैरव उवाच। नात्र चिन्ताविशुद्धिर्वा नारिमित्रादिदूषणम् । न वा प्रया सवाहुल्यं समयासमयादिकम् ॥ देवैर्देवत्वविषये सिद्धेः खे- चरसिद्धये । पन्नगैराक्षसैर्वन्यैर्मुनिभिश्च सुमुक्षुभिः ॥ कामि भिर्मिभिश्चार्थलिप्सु भिः सवितां पराम् । न चित्तव्ययवा हुल्यं कायक्लेशकर न च ॥ तत्र यश्चिन्तयेन्मन्त्री सर्व सिद्धि समृद्धिदाम् ॥ तस्य हस्ते सदैवास्ति सर्वसिद्धिर्न संशयः। गद्यपद्यमयी वाणी सभायां तस्य जायते ॥ तस्य दर्शनमा- त्रेण वादिनो निष्प्रभां गताः।राजानोऽपि च दासत्वं भजन्ते किं परे जनाः। वढेः शैत्यं जलस्तम्भ गतिस्तम्भं विवस्वतः।। समय असमयकी भी अपेक्षा नहीं है । देवगण देवत्व सिद्धिके लिये सिद्ध गण खेचर सिद्ध के लिये, कामीगण धार्मिगण, और द्रव्य की इच्छा करने वाले मनुष्य अपने अपने अभिप्राय सिद्धिके लिये इस भगवती कालिकाकी परिचर्या करते हैं । इस में वित्तव्यय (धनकाव्यय )वा काय क्लेश स्वीकार करना नहीं होता है। देवी कालिका सर्वविध सिद्ध और संपूर्ण समृद्धि प्रदान करती है । जो मत्र शील पुरुप इनकी चिन्ता करताहै, समस्त सिदि सर्वदा उसके हस्तगत् रहती है इस विषय में संदेह नहीं है। अधिक क्या समामें उसके मुख़से गद्य पद्य मयावाणी प्रादुर्भूत होती है । उसको देखते ही वादीगण तत्काल निष्पभ (प्रभाहीन ) होते हैं। अन्यकी बात क्या कहूं स्वयं नरपतिगण भी उसका दासत्व करते हैं। वह व्यक्ति अग्निको भी शी. तक जलको भी स्तम्भित मूर्यकी गतिको भी अवरुद्ध, दिनको भी रात्रि ५. प्रथम परिच्छेद । दिवारात्रिव्यत्ययञ्च वशीकत्तुं क्षमो भवेत् । सर्वस्यैव जन- स्यैव बल्लभः कीर्तिवर्द्धनः ॥ अन्ते च भजते देव्या गणत्वं दुर्लभं नरैः । चन्द्रसूर्यसमो भूत्वा वसेत् कल्पायुतं दिवि। न तस्य दुलभं किञ्चिद् यः स्मरेत् घोरदक्षिणाम् ॥ अथास्याः सपर्याविधिर्लिख्यते-ब्राह्म मुहूर्ते उत्थायवद्ध पद्मासनः शिरः स्थाधोमुखशुक्लवर्ण-सहस्रदलकमलकर्णि- कास्थ-शशहीनशरदिन्दुसुन्दर-चन्द्रमण्डलांतर्गतहंसपीठे निजगुरुं ध्यायेत् ॥ यथा-शुद्धस्फटिकसङ्काशं शुद्धक्षौमवि- राजितम् । गन्धानुलेपनं शान्तं वराभयकराम्बु जम् ॥ मन्द स्मितं निजगुरुं कारुण्येनावलोकिनम् । वामोरुशक्तिसंयुक्तं शुक्लाभरणभूपितम् ॥ स्वशक्त्या दक्षहस्तेन धृतचारुकलेव- रम् । वामे धृतोत्पलायाश्च सुरक्तायाः सुशोभनम् ॥ परानन्द रसोल्लासलोचनद्वय पङ्कजम् ॥ और रात्रिको भी दिन करके सबको वशीभूत करने में समर्थ होता है शत्रु- मित्र आत्मपर ( अपना पराया ) सब लोकोंका घल्लभ और कीर्ति बंधन होता है शरीर छोडकर चरम में देवीका सुदुर्लभगणत्व लाभ करताहै चन्द्र सूर्यकी समान होकर अयुतकल्प ( दशकल्प ) वर्ग में अवस्थित कर- है। फलतः जो व्यक्ति दक्षिण कालिका और श्मशान कालिका का स्मरण करता है उसको कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता ।। अब देवीकी पूजाविधि लिखते हैं। ब्राह्ममुहूर्तमें उठ, बद्ध पद्मासनछो मस्तक वअधोमुखमें संस्थित शुक्लवर्ण सहस्रदळ कमल कणिका में अधिष्ठित शरत्का- लीन शशहीन चन्द्रमाकी समान मुन्दर चन्द्रमण्डल अन्तर्गत हंस पीठमें निज गुरु को ध्यान करे । पथा वह शुद्ध स्फटिक सनिम, शुद्ध तीम विराजित, गंधानुलिप्त, शमगुण विशिष्ट, वराभयकर-पद्म समन्वित, मृदुहास्य समलं- कृत, सकरुण दृष्टि संपन्न और इनके वामऊरू में शक्ति विराजमान है। उनके समस्त आभरण शुक्ल वर्ण हैं, स्वकीय शक्ति दक्षिणहस्त में तदीय मुचारु कळेवर धारण किया है और उत्पल हस्त में होने से उन का वाम भाग शोभा पाता है तिसके द्वारा उनकी परम शोभा का संचार हुआ है ता श्यामारहस्य मा० टी० । इति ध्यात्वा दिव्याभिषेकेण गुरुणा संप्रदायानुगतकृत- नामपूर्वकमानसैरुपचारैराराध्य ऐं ह्रीं श्रीं हसथहसक्षमलव- रयुं हसथ- श्रीअमुकानन्दाय श्रीअमुकदेवशर्मा श्रीगुरु पादुकां पूजयामि । इति गुरुपादुकां नत्वा दशधा जपसमर्पणं कृत्वा प्रणमेद् यथा- अज्ञानतिमिरान्धस्यज्ञानालनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ अथ सारदाटीकाकारश्रीराघवभट्टमतेन तुशक्तिविषयेगु- रोवा॑नम् । शुक्लवर्णमेव न गौरम् । तदितरविषये शुक्लमेवेति निश्चितं वचनद्वयदर्शनात् । तद्यथा- श्वेताम्बरधरं गौरं श्वेताभरणभूषितम् । भपिच-रक्तमा ल्याम्बरधरं सुरक्तं पद्मविस्तरम् ॥ इति तु असमीचीनम् । श्वतवर्ण गुरोर्ध्यानान्तरं भवति शक्तिविषये तु तथा दर्शनात् । यथा ज्ञानार्णवे। ब्रह्मरन्धे सहस्रारे कर्पूरधवलो गुरुः । तस्मात् सम्प्रदाया नु गत्या गुरोर्ध्यानं कुर्यात् ॥ इति शेषः । अथ गुरोराज्ञां गृहीत्वा मूलाधारपद्मकर्णिकास्थत्रिको णान्तर्गत-स्वयम्भू लिङ्गवेष्टनी प्रसुप्तभुजगाकारां साईत्रि- उनके नेत्र कमल परमानंद रासोल्लास में विकसित हैं । अनन्तर गुरुकी पा- दु का पूना पुरःसर उसमें दशवार नमस्कार करके जप समर्पणान्तर प्रणाम करे । यया-जो शान अंजनशलाकाकी सहायतासे अप्तान तिमिरमें अंधी भूत (भंधे) लोकोंके चतु उन्मीलित करते हैं, उन्हीं श्रीगुरुको नमस्कार है। मान्तर श्री गुरुकी आता ग्रहण कर, मूनापार पन कार्गका स्थित त्रिकोण-मध्यगत स्वपम्भू लिंगको जिन्हों ने येष्टन किया है, निनका आकार प्रमुप्त (सोते हुऐ ) भुमंग (सर्प) की समान है, जो सार्द भिव लग परिमित भौर विपत् मममा और नीरार गुरुर की समान सनुमा प्रथम परिच्छेद । वलयां विद्युत्पुञ्जप्रभां नीवारशूकतन्वी कुलकुण्डलिनी इष्ट देवतास्वरूपां हुंकारेण हंसइति मनुना वधे वनदहनयोगात् सचैतन्यां विधाय ब्रह्मवर्मना परमशिवे नीत्वा चन्द्रमण्डले कुलगुरून् ध्यायेत् । तदुक्तं कालिकास्मृतौ । मूलाधारे स्मरेदिव्यं त्रिकोणं तेजसां निधिम् । तस्याग्निरे- खामानीय अध-ऊर्द्ध व्यवस्थिताम् ॥ नीलतोयदमध्यस्थत- डिल्लेखेव भासुरम् । नीवारशूकतन्वीञ्च सुपीता भास्करोप- माम् ॥ तस्याः शिखाया मध्येच परमोर्द्ध व्यवस्थिताम् । स ब्रह्मा स स्वरःशान्तःस शिवःपरमस्वराट् । स एव विष्णुःस प्राणःस कलाग्निःस चन्द्रमाः ॥ इति कुण्डलिनी ध्यात्वा सर्व • पापैःप्रमुच्यते । स महापातकेभ्यश्च पूतो भवति । सर्वसिद्धिं कृत्वा भैरवो भवति। वापन्न है उन्ही इष्ट देवता स्वरूप कुल कुण्डलिनी को हुंकार सहित इंस इत्यादि मंत्रमें जागरितकर ब्रह्मवर्त्म योग व परम शिवमें लाकर उसमें संयुक्त करै । अनन्तर उनके सहित कुल गुरु इत्यादि सबका एकत्र ध्यान करै । कालिका स्मृति में भी कहा है कि मूलाधार में जो तेजोनिधि दिव्य त्रिकोण विराजमान है उसको स्मरण कर, उस में अग्नि रेखा आनयनपू वक उस शिखाके मध्य अध. ऊर्द्धमें जो अवस्थिति करनी है, जो नीलतो यद मध्यस्थ तडिल्लेखा (विजलीके रेख) की समान परम विकटस्वर भावयुक्तहै जो नीवार शुकरकी समान अतिसूक्ष्म स्वरूप संपन्न है जो सुंदर पीतवर्ण और भास्कन्सदृशीहैं उन्हीं परम उर्दी व्यवस्थिता कुलकुण्डलिनीका ध्यानकरै । क्योंकि वही ब्रह्मा, वहीं विष्णु, वही स्वर्ग. वही परम-स्वप्रकाश शिव. वहीं प्राण वही कालाग्नि और वही चन्द्रमा हैं । इसप्रकार कुल कुण्डलिनीका ध्यान करनेसे सर्व प्रकार के पाप दूरहोतेहैं। वही क्या संपूर्ण महा पातकों सेभी परम विशुद्धि प्राप्त होतीहै और सर्व विध-सिदि संग्रह सहित भैर बत्व लाभ होता है।
. श्यामारहस्य भा० टी० । अथ कुलगुरून् ध्यायेत् यथा-कुलचूडामणौ । मूलादिब्रह्म रन्ध्रांन्तं गुणं ध्यात्वा गुरुं स्मरेत् ।प्रहादानन्दनाथाख्यं सक लानन्दमेवच ॥ कुमारानन्दनाथाख्यं वशिष्ठानन्दनाथकम् । क्रोधानन्दसुखानन्दौ ध्यानानन्दं ततःपरम् ॥ वोधानन्द त- तश्चैव ध्यायेत् कुलमुखोपरि । महारसरसोल्लास हृदयाघूर्ण लोचनाः ॥ कुलालिङ्गानसंभिन्ना चूर्णिताशेषमानसाः। कुल शिष्टैःपरिवृत्ता पूर्णान्तःकरणोद्यताः ॥ वराभययुताःसर्वे कुल तन्त्रार्थवादिनः। एवं कुलगुरून्नत्वा विसृज्य कुलमातृकाम् । कुल स्थाने समा नीय स्नानार्थ तीर्थमाश्रयेत् । शाक्तं कुलगुरुं वत्स! स्मृतं कुलसुखावहम् ॥ रहस्यमद्भुतं प्रोक्तं गोप्तव्यंपशु शङ्कटे । कुलनाथं परित्यज्य ये शाक्ताः परसेविन । तेषां शि- क्षा च यागश्च अभिचाराय कल्पते । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कुळ चूडामाणे में सब कुछ गुरुओं का निर्देश कियाहै। यथा मूलादि ब्रह्म रन्धान्त काध्यान करके गुरुका स्मरण करे । प्रथम प्रहलादा नन्दनाय फिर यथा क्रमसे सकलानद नाय, कुपारानन्दनाथ, पशिष्टा नंद नाथ, क्रोधानन्द नाथ, सुखानन्दनाथ ध्यानानन्द नाथ, वोधानन्द नाथ, इनका ध्यान करे । यह सब कुल गुरु पद वाच्यहैं । इनका हृदय परमानंद रसमें उल्क सित. लोचन पूर्णित और अन्त करण पूर्णभाव युक्त है। कुछ शिष्य गणों ने इनको वेष्टन कर रक्खा है, यह सभी वरा भय सपन्न एवं सभी कुल और तंत्रार्थवादी है। इसमकार कुल गुरु गोंको प्रणामकर विदादे. कुल मातृकाको कुल स्थान में लाकर स्नानार्थतीर्थका आश्रयकर शाक्तकुल गुरुही कुल मुख देनेवाले कह कर निर्दिष्ट हुए हैं । इस विषयमें जो अद्भुत रहस्य कथित हुआहै उसको पशु संकट में गायन करै। जो शाक्त कुलनाथको परित्यागकर अपर (दूसरे) की सेवाकरते हैं, उनकी शिक्षा और याग समस्तही अभिचार में परिकल्पित होते हैं । इसी कारण सर्व प्रयत्न से कुलीन गुरुका आश्रय ग्रहण करें ।
प्रथम परिच्छेद। कुलीनं गुरुमाश्रयेत् ॥ कुलीनःसर्वविद्यानामधिकारीक्षि भीय ते। दीक्षागुरुः स एवात्मा सर्वमन्त्रस्य नापरः ॥ अन्यच्च श्रुतौ । प्रकाशमानां प्रथमे प्रयाणे प्रतिप्रयाणेऽप्यमृतायमानाम् । अन्तःपदव्यामनुसश्चरन्तीमानन्दरूपामवलां प्रपद्ये ।। इति । अहं देवो न चान्योऽस्मि ब्रह्मैवाहं न शोकभाक् । सच्चिदा- नन्दरूपोऽहमात्मानमिति भावयेत् ॥ प्रातःकृत्यमवश्यमेव नित्यं करणीयम् । प्रातःकृत्यमकृत्वा तु यो देवीं भक्ति तोऽर्चयेत् । तस्य पूजा च विफला शौचहीना यथाक्रिया ॥ अर्थ नद्यादौ गत्वा कालिकारूपं सर्व विभाव्य सुवर्ण रज- तात्मकं कुलगर्भमनामातर्जनीपुधृत्वाआचम्य मूलं स्मरन्। मलापकर्षकं कृत्वा आचम्य ॐ अद्येत्यादि कुलदेवताप्रीति कामो मन्त्रस्नानमहं करिष्ये इति सङ्कल्प्य जले त्रिकोण फुलीन गुरूही सर्व विद्या के अधिकारी कहकर परिगणित हैं । वही दीक्षा गुरू हैं । क्योंकि वही सव मंत्रोंकी आत्मा है, अन्य कोई नहीं । श्रुतिमें भी कहा है, जो प्रथम प्रयाण में प्रकाशमान, मति प्रयाण में अ- मृतायमान् और अन्त पदवी में अनुसरण करती हैं, उन्ही आनन्द रूपिणी अवला की शरण ग्रहण करता हूं । तथाहिमैंही देवमैं अन्य कोई नहीं । मैंही ब्रह्म। सुतरां किसी कालमेंही मुझको शोक भोगकरना नहीं होता। मैंही सचि दानंद विग्रह । आत्मा को इसरूपमें भावनाकर । नित्य अवश्यही प्रातः कृत्य करना चाहिये । जो व्यक्ति प्रातः कृत्य न करके भक्ति सहित देवीकी अर्चना करता है, उसकी वह पूजा शौच हीन क्रियाकी समान विफल होती है । अनन्तर नद्यादि में गमन और सर्वतो भाव में कालिमा के रूपकी चिन्ता कर, अनामा और तर्जनीमें सुवर्ण रजतात्मक कुलगर्भ धारण पूर्वक आचमन सहित मूल मंत्र स्मरणान्तर अघ मर्पण करै । तदनन्तर आचमन करके " भय त्यादि" कह संकल्प कर जलमें त्रिकोण चक निर्माण और . २ .
१० श्यामारहस्य भा० टी० । चक्रं कृत्वा सूर्यमण्डलादङ्कशमुद्रया तीर्थमावा . मूलान्ते ॐ आत्मतचाय स्वाहा विद्यातत्वायस्वाहा । शिवतत्त्वाय स्वाहा । इति आचामेत् अथवा ॐ ह्रीं स्वाहा । इत्यनेन त्रिराचम्यात्मानं निःसंप्रोक्ष्य मूलेन मृत्तिकया अङ्गलेपनं कृत्वा मूलं पठन् कुम्भमुद्रया स्वमूर्ध्नि निर्जलमभिषिच्यां- गुलीभिः श्रवणादीनि सप्तच्छिद्राणि संरुध्य त्रिनिमज्जेत् । तदुक्तं कुमारीतन्त्रे- वेदायश्च तथा माया स्वाहेत्याचमनं मतम्।नीलतन्त्रेऽपि- मृतकुशानपि संगृह्य गत्वा जलान्तिकं ततः ॥ मलापक पकं कृत्वा मन्त्रस्नानं समाचरेत् । विद्यया त्रिर्निमज्यैव आचामेत् पयसा पुनः॥ कुलचूडामणौ। कृष्णरक्तहरिन्नीला विविधा मम मूर्तयः । तत्र यत्कुल अंकुश मुद्राकी सहायतासे सूर्य मण्डलसे तीर्थ आवाहन पुरः सर मूल मंत्र जपके अन्तमें आत्म तत्वाय इत्यादि कहकर आचमन करना चाहिये। अथवा उगे ही स्वाहा इत्यादि विधानसे तीन वार आचमन और तीनवार आत्मा को संमोक्षण पूर्वक मूलमंत्र नपकी सहायतासे मृतिका ग्रहण और उससे अंग लेपन कर मूल मत्रका पाठ करै । पाठ के अन्त में कुम्भ मुद्राकी सहायता से अपने मस्तक में तीनवार जल सेचन ( माँये से तीन बार जल गिराना ) कर संपूर्ण अंगुलियों के साहचर्य कही २ में श्रवणादि सप्तछिद्र संरूद्ध करके तीनधार निमग्न होवे । कुमारीतंत्रमें कहा है कि,वेदादि माया और स्वाहा इत्यादिही आचमन कह कर परिगणितहैं । नीलसन्तों भी कहा कि, मृत्तिका और कुशग्रहण पूर्वक जलान्ति (बावड़ी) को गमन और अघमर्षण करके मंत्रस्नान करै । विद्या तत्वकी सहायतासे तीनबार अवगाहन कर पुनार जळ ग्रहणपूर्वक आचमन करनाचाहिये । कुल चूडामणि में कहा है कि, मेरी समस्त मूर्ति कृष्ण, रक्त हग्नि और गीत इत्यादि भेद से नाना प्रकार हैं । निनगें जो कुलशिष्य है - प्रथम परिच्छेद। शिष्यश्च स तदूयं परामृशन् । दिवं सर्वामथोर्वीश्च पाताल भूतसम्भवाम्। भावान्तःकुलदर्भेण स दर्भःकुलपुत्रकः ॥ कुलपात्रे तु दूर्वाश्च सतिलं सजलं ततः। गृहीत्वा कुलदेवस्य प्रीतये स्नानमाचरेत् ॥ कृतसङ्कल्प एवादी कुलचक्रं जले न्य सेत् । जलस्थानात् समानीय कुलमुद्रांकुशेन च ॥ कुलती- नि तत्रैव समावाह्य शिवात्मकं । तत्वोयञ्च त्रिधापीत्वा त्रिधाच प्रोक्षणं मनोः॥ अथ अंकुशमुद्रा । यथा ज्ञानार्णवे- दक्षमुष्टिं विधायाथं तर्जन्यंकुशरूपिणी। अंकुशाख्या म- हामुद्रा त्रैलोक्याकर्षणक्षमा॥ तीर्थावाहनमन्त्रो यथा। श्रीक्रमसंहितायां- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावे रिजलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥ अथ स्वतन्त्रेऽपि । मूलं पठन् मूनि तोयं मुद्रया कुम्भसंज्ञया । क्षिप्त्वा वह वैसीही परामर्श, पूर्वक आचमन और कुळपात्र में दूर्वा एवं तिल सहित जल ग्रहण करके कुलदेवकी भीति के लिये स्नान करैः। अनन्तर संकल्प कर, जल में कुल यक निक्षेपपूर्वक जल स्पान से आय, उस स्थानमें ही कुल मु. दांकुश द्वारा संपूर्ण कुल तीर्थों का आवाहन कर वह शिवात्मक जल तीनबार पान और तीनबार मंत्रका प्रोक्षण को। अंकुशमुद्रा ? यया?--ज्ञानार्णवमें दश मुष्टि विधान पूर्वक तर्जनी को अंकुश रूपिणी करे । इसकाही नाप अंकुशाख्य महामुद्राहै । इसके द्वारा त्रैलोक्य आकर्पण कर सकताहै । तीर्थावाइनमत्र यथा-श्री क्रम संहिता में गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा सिन्धु, कावेरी तुम संपूर्ण जलमें, सन्निहित (स्थित ) होमो । स्वतन्त्रमें भी कहा है, यथा-साधकान गण्य पुरुष मूल मंत्र पाठकरके कुम्म पद्रा द्वारा मस्तको जलका छींटादे तीन बार । श्यामारस्य भा० टी० ।. वारत्रयं देवि ! आचामेत् साधकाग्रणीः । आत्मविद्याशिव- स्तव्यस्ततो यागगृहं विशेत् ॥ कुम्भमुद्रा यथा गुप्तार्णवे। दनांगुष्ठे परांगुष्ठं क्षिप्त्वा हस्तहयेन तु । सावकासाश्चैव मुष्टिं कुम्भमुद्रां विदुर्वधाः! सप्तच्छिद्राणि संरुध्य ततो मज्जे विधा सुधीः॥ आत्मविद्याशिवैस्तत्वैराचामेत् साधकाग्रणीः। वहिजायां ततो दत्त्वा शुद्धेन पयसा प्रिये !॥ ॐमानध्वनि वञिणि महाप्रतिशरे रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा ।इाते शिखावन्धनम् । मूलेन तिलकं कृत्वा पूर्ववदा- चम्य वैदिकी सन्ध्यां विधाय तांत्रिकी सन्ध्यां कुर्यात् । तदुक्तं कुमारीकल्पे- प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य मानान्ते च ध्वनीति च । वजिणीतिप दं प्रोकं महाप्रतिशरे तथा ॥ रक्षद्वयं हुं फट् स्वाहा इति च तदनन्तरम् ।। अनेनैव च मन्त्रण रक्षा कुर्याद्विचक्षणः ॥ रक्षामिति शिखाबन्धनरूपेण वस्त्राञ्चले ग्रन्थिवन्धनरूपे ण वा कादित्यर्थः। सारदाटीकायाञ्च- उक्तेनैव विधानेन कृत्वा स्नानञ्च तान्त्रिकम् । वैदिकी तान्त्रिकी सन्ध्यां कृत्वा तर्पणमाचरेत् ॥ कर । अनन्नर मात्मतत्त, विद्यातत्व, और शिवतत्व सहित याग गृहमें प्रविष्टहोवे । कम्भ मुद्राका नियम यहीहैकि दक्षिण हाथ के अंगूठे में वायें हाथका अंगूठा-निक्षेप करके दोनों हाथों के द्वारा परस्पर असश्लिष्ट भावमें मुष्टिवधन (मुट्ठीवांधने ) को कुभ मुद्रा कहते हैं । अनन्तर परम धीमान् साधक सप्तचिद्र सवरण ( ढक ) करके तीनवार अवगाहन पूर्वक आत्म तत्व, विद्या तत्त्व, और शिव तत्व द्वारा आचगन करै । अनन्तर निर्मल जल द्वारा वहिनाया को दान करके "जों मानवनि" इत्यादि मत से शिखा बंधन और मूल मत से तिलक करके पूर्ववत् आचमन सहित वैदिकी संध्या विधानान्तर तान्त्रिमी सध्या करै ।। आचमन प्रथम परिच्छेद । तान्त्रिकीसन्ध्या यथा तदुक्तं तत्रैव । पुनराचम्य विन्यस्य षडङ्गमपि मन्त्रवित् । वामहस्ते जलं गृह्य गलितोदकविन्दु भिः ॥ सप्तधा प्रोक्षणं कृत्वा मूर्ध्नि मन्त्रं समुच्चरन् । अव शिष्टोदकं दक्ष हस्ते संगृह्य बुद्धिमान् ॥ इड़याकृष्य देहान्तः क्षालित पापसञ्चयम् । कृष्णवर्णं तदुदकं दक्षनाड्या विरे- चयेत् ॥ दक्षहस्ते च तन्मंत्री पापरूपं विचिन्त्य च। पुरतो वज्रपापाणे प्रक्षिपेदवमन्त्रतः ॥ अन्यत्रापि। पडङ्गन्यास माचर्य वामहस्ते जलंततः । गृहीत्वा दक्षिणे चैव संपुटं कारयेत्ततः ॥ शिववायुजलपृथ्वीवह्निवीजैस्त्रिधा पुनः । अभिमन्त्रयं च मूलेन सप्तधा तत्वमुद्रया ॥ निक्षिपे त्तज्जलं मूनि शेष दक्षे विधाय च । शरीरान्तःस्थितं पापं चालयेत् साधकाग्रणीः॥ a तांत्रिकी संध्या यथा?-पुनरि आचमन और पडणविन्यास पूर्वक वाम हस्त में जल ग्रहण कर गलित उदक बिन्दु समूह में (सडे हुएजल के बूंदों में) सप्तवार प्रोक्षण और मस्तक में मंत्र समुच्चारणांतर अब शिष्ट उदक दक्षिण हाथ में संग्रह कर इडा द्वारा आकर्षण और देहान्तर्वर्ती पाप समूह प्रक्षालन करै । फिर कृष्ण वर्ण उस उदक को दत्तनाही द्वारा विरेचन और दक्षिण हाथ में उस को पाप रूपसे चिन्ताकर अस्त्र मत्र में पुरोवर्ती वज्र पाषाण में उस जलको प्रोक्षण करे । अन्यत्र भी कहा है कि, पडगन्यास करके वायें हाय में नळ ग्रहण पूर्वक दक्षिण हाथ में संयुट करना चाहिये । फिर शिव वायु, जल, पृथ्वी और वहि वीज की सहायता से पुनार तीनवार अमि मंत्रित, और मूल मत्र में तत्त्व मुद्रा द्वारा सातवार वह जल गस्तक में न्यस्त करै। अवशिष्ट जल दक्षिण हाथ में लेकर शरीरान्तः स्थित पाप प्रक्षाल न करै ॥
. wr. श्यामारहस्य भा०टी० । अथ प्रयोगः । पूर्ववदाचम्य पडङ्गन्यासं कृत्वा वामहस्ते जलंनिधाय दक्षहस्तेनाच्छाद्य हं यं वं लंरं इति त्रिरभिमंत्र्य मूलमुच्चरन् गलितोदकविन्दुभिः तत्वमुद्रया मून सप्तधा भ्युक्षणं कृत्वा शेषजलं. दक्षहस्ते समादाय तेजोरूपं ध्यात्वा इड़याकृष्यं देहान्तः पापं प्रक्षाल्य कृष्णवर्ण तज्जलं पापरूपं ध्यात्वापिङ्गलया विरिच्य पुरः कल्पितवज्रशिलायां फडिति प्रक्षिपेत् । इति तांत्रिकी सन्ध्या । ततः हस्तौ प्रक्षाल्याचम्य जले यन्त्रं ध्यात्वा सावरणां देवतामावाह्य ऐशाने ऐं श्री अमुकानन्दनाथभैरवस्तृप्यता- मिति देवतीर्थन त्रिः सकृद्वा शुद्धोदकेन सन्तप्र्य वहीं पर मगुरुं नैर्ऋत्यां परापरगुरुं वायव्यां परमेष्टिगुरुं पूर्ववत् संतर्य मध्ये श्रीअमुकदेवता तृप्यतामिति यथाशक्तितःसन्तप्र्य,ए- कैकांजलिना परिवारान् सन्तर्पयेत्। अशक्तश्चेत् मूलमुच्चरन् अब प्रयोग कहते हैं-पूर्वगत् आचमन तदुपरान्त यथा क्रमसे पड़ा न्या. स, वाम हस्तमें जल ग्रहण, दक्षिण हस्तमें आच्छादन, हं, ब, इत्यादि मंत्र में अभिमंत्रण, मूल मंत्र उच्चारण, गलित उदक विन्दु द्वारा तत्त्व मुद्रांकी सहायता से मस्तक में सप्तबार अभ्यक्षण, अवशिष्ट जल दक्षिण हस्त ग्रहण, तेजो रूपमें ध्यान इडाद्वारा आकर्षण पूर्वक देहान्तर्वर्ती पाप मनालन और कृष्णवर्ण उस जलका पापरूप में ध्यान और पिंगलाद्वारा विरे चन, यह सम्पूर्ण कार्य करने के पीछे पुरः कल्पित प्रथम कल्पित बज शिला में अस्व मंत्रसे प्रक्षेप करे। यही तान्त्रिकी संध्या है। अनन्तर हस्तप्रक्षालन आचमन, जलमें मंत्र ध्यान, आवरण सहित देवता का आवाहन, ऐशान में ऐं श्री अमकानंद इत्यादि कहकर देवतीर्थ में तीनवार वा एकबार विशुद्ध जल द्वारा तर्पण-यह संपूर्ण कार्य यथा क्रम से संपादन पूर्वक वनि में परम गुरु, नेतमें परापर गुरु, वायवीमें परमेष्टि गुरु-इनको पूर्ववत् सन्तृप्त करके मध्य में, श्री अमुक देवता तृप्त होवे, यह कहकर, यथाशक्ति उनके तर्पण सहित एक एक अंजुली द्वारा आचरण सत्रका तृप्ति विधान कर । अशक्त ( असमर्थ ) होने में मूल मंत्र उच्चारण करके आयुध, में - प्रथम परिच्छंद। सायुधसपरिवार-सबाहन-महाकालसहित--श्रीदक्षिणका- लिकामाता तृप्यतामिति त्रिः सप्तधा वा ऋपीन् भैरवांतान् स्वकल्पोक्तविधिना स्वपित्रादीनपि सन्तर्प्य दूर्वाक्षतरक्तपु. पादिना अध्यं कृत्वा ह्रीं हंसः मार्तण्डभैरवाय प्रकाशश- क्तिसहिताय इदमध्ये स्वाहा इति सूर्याय त्रिरयं समुत्थाय दत्त्वा सूर्यमण्डले देवीं ध्यात्वा दूर्वाक्षतविल्वपत्रजवापुष्पा. दिनाअर्घ्य कृत्वा देवीगायत्रीमुच्चरन् महाकालसहितायै श्री- मदक्षिणकालिकायै इदमयं स्वाहा इत्यय दत्वा गायत्री यथाशक्तितःप्रजप्य देव्यै समर्पयेत् । तदुक्तम् । तर्पणादौ प्र. युञ्जीत तृप्यतां महाकालभैरवः पिता । मूलान्ते तर्पयामीति स्वाहान्तं तर्पणं मतम् । एवंविधि तर्पणन्तु कृत्वा पापक्षयो भवेत् ॥ कुलचूडामणौ च । भैरवाय च देवाय भैरवेण च कर्तृणा । भैरवाख्यं प्रदात परिवार, वाहन और महाकाल सहित श्री दक्षिण कालिका माता तृप्त होवें यह कहकर तीनवार वा सावार भैरवान्त ऋपिगणों के और स्वकल्पोक्त विधान में अपने पित्रादिकोंका भी तर्पण करके दूर्वा, अक्षत और रक्त पु- प्पादि द्वारा अर्घ्य सहित ही इंसः इत्यादि मंत्र में तीनवार सूर्य के सामने हो, अर्घ्य दे, मूर्य मण्डल में देवी का ध्यान करना चाहिये । फिर दूर्वा, अक्षत, विन्वपत्र, और जवा पुष्पादि द्वारा अर्घ्य प्रस्तुत करके देवी गायत्री उच्चारण पूर्वक श्री दक्षिण कालिका के उद्देश्य में वह अर्घ्य दे, यथा शक्ति गायत्री का जपकर देवी को समर्पण करै । जैसा कहा है तर्पण के आदि में, तृप्यतां महाभैरवः पिता इस प्रकार प्रयोग करक, फिर मूलांत में "तर्पयामि, इस प्रकार पद संयुक्त कर, शेप में स्वाहा शब्द मिलाले । वो तर्पण होता है । इस प्रकार तर्पण करने से पाप क्षय होते हैं। फल चू डामणि में कहा है, प्रथम मंत्रोच्चारण करके भैरव देवको भाव कटुक भैर- चारूप प्रदान करै । फिर लिंगानुरूप में दाता और दान गृहीता, को पत्र , . श्यामारहस्य भा०टी० । व्य मन्त्रमुच्चार्य पूर्वतः ॥ दातृदानगृहीतॄश्च ततो लिङ्गानु रूपतः। भैरवी भैरवात्मानं भावयेत् यदशपत. ॥ श्राद्धे वि वाहे दाने च स्नानेनाङ्गप्रपूजने । एव चिन्तापरे देवः प्रसी दति न संशयः ॥ अन्यच्च। एवमेव विधानेन यथाशक्ति च तर्पयेत् । मार्तण्डभैरवा येति त्रिरर्य कल्पयेत्ततः॥ कुलचूडामणौ च । कुलसूर्याय देवाय त्रिरर्य तु प्रकल्प्य च । देवी पितृ नृपश्चैव तर्पयेत् कुलवारिणा ॥ नन्दिकेश्वरसंहितायाञ्च । यावन्नदीयते चाध्य भास्कराय निवेदनम् । तावन्न पूज येद्विष्णुं शङ्करं वा सुरेश्वरीम् दिनेशाय तु चोत्तिष्ठन् वारिणा चाञ्जलित्रयम् । अष्टोत्तरशतावृत्या गायत्री प्रजपेत् सुधीः॥ भैरवी और भैरवात्मा की भावना करनी चाहिये। श्राद्ध, विवाह, दान स्नान और अग पूजन में इस प्रकार भावना परायण हाने से भगवान भैरव प्रसन्न होने हैं, इसमें सदेह नहीं । और भी कहाई, इस प्रकार के विधान में ही यथा शक्ति तर्पण करके "मार्तण्ड भैरवीय,, इस प्रकार कहकर तीन चार अर्घ कल्पना करें। कुल चूडामणि में कहा है, भगवान् कुल सूर्य के उद्देश्य में तीनअर्य क ल्पित करके, कुल सलिल द्वारा देवी, पितृगण और देवगणों का तर्पण क रना चाहिये । नन्दिकेशर साहेता के मतमें भास्कर को अर्घ्य निवेदन न करके विष्णु वा महादेव अथवा महश्वरी की पूजा न करै । उठकर सूर्यको तीन अजुली जलद, विशिष्ट विधान में अष्टोत्तर शत (१०८) चार गा- यत्री जप करै । उस गायत्री का प्रयोग यहहै, यथा; प्रथम में "कालिकायै । .
मथम परिच्छेद। कालिकायै पदं प्रोक्त्वा विद्महे तदनन्तरम् श्मशानवा- सिनी डेन्तां धीमहीति ततो वदेत् ॥ तन्न घोरे पदं प्रोच्य प्रचोदयात् पठेदिति । अस्याः प्रभावमात्रेण महापातकको. टयः ॥ सद्यःप्रलयमायान्ति साधकस्य च नान्यथा। राव- णस्य वधाच्चैव रामचन्द्रो विमोचितः ॥ गुरुदाराकर्पणाच्च देवश्चन्द्रो विमोचितः । मातृवधात् परशुरामो मोचितोऽस्याः प्रसादतः ।। सुरापानाच्च श्रीकृष्णो दत्तात्रेयस्तथैव च । एव- मेया महाविद्या गोप्तव्या चैव सुन्दरि ! ॥ महापातकयुक्तो ऽपि प्रजपेदशधा यदि । सत्यं सत्यं महादेवि ! मुक्तो भवति तत्क्षणात् ॥ अथ कुलचूडामणौ च । उत्थाय कुलवस्त्रे च परिधाय कुलेन तु । तिलक कुलरू- पञ्च कृत्वाचम्य कुलेश्वरः॥ स्वतन्त्रेऽपि मोक्षार्थी रक्तवस्त्रेण भोगार्थी श्वेतवाससा । मारणे फिर " विद्महे" तदुपरान्त श्मशानवासिन्ये धीमहि" तदनन्तर- "तन्नोघोरे प्रचोदयात" यह पद संयुक्त करै । इस गायत्री के प्रभाव मात्रसे साधक के करोडों महा पातक शीघू नाश होते है, यह अन्यथा नहीं है । इस के ही प्रभाव से श्री रामचन्द्र जी रावण वध के पाप से विमुक्त हुएथे और भगवान च द्रमा गुरु पत्नी गमन करके मुक्त हुएथे । इस केही प्रसाद से परशुरामजी ने मातृ वध के पातक से छुटकारा पाया या एव श्रीकृष्ण और दत्तात्रेय इस केही प्रभाव द्वारा सुरापान जनित पातक से मुक्त हुए थे हे सुन्दरी । इस प्रकार से यह महा विद्या गुप्त रखनी चाहिये । इस का दश वार जपकरने से महा पातक करने परभी, तत्काल उद्धार होता है, यह सत्य सत्यही कहता हूं ॥ स्वतन में कहा है, गोक्षार्थी रक्तवस्त्र, भोगार्थी स्वेतवस्ख मारणार्थी कृष्ण - ३ श्यामारहस्य भा० टी० । कृष्णवस्त्रञ्च वश्ये रकं सदा गृही ॥ उच्चाटे व्याघ्रचर्माणि वृक्षत्वक् स्तम्भकर्मणि । परिधाय ततो मन्त्री यागभूमिमयो विशेत् ॥ तन्त्रान्तरे च। ततश्च साधकश्रेष्ठो हदि मन्त्रं परामृशन् । अवहिर्मानसो योगी यागभूमिमथो विशेत् ॥ जलशंखं करे कृत्वा गत्वा हारि महेश्वरि !।क्षालयद्धस्तपादौ च वक्ष्यमाणेन वर्मना यागस्थानानि यथा।-फेत्कारिण्याम् । एकलिङ्गे श्मशाने वाशून्यागारे चतुष्पथे। तत्रस्थः साध- येद् योगी विद्यां त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ पञ्चक्रोशान्तरे यत्र न लिङ्गान्तरमीक्षते । तदेकलिङ्गमाख्यातं तत्र सिद्धिरनुत्तमा ॥ मुण्डमालातन्त्रे च। नदीतीरे विल्वमूले श्मशाने शून्यवेश्मनि । एकलिङ्गे पर्वते वा देवागारे चतुष्पथे ॥ शवस्योपरि मुण्ड चं जले वस्त्र, वश्यार्थी रक्तवस्त्र, उच्चाटनार्थी व्याघ्रचर्म और स्तम्भनार्थी वृक्षकी छाल पारकर यागभूमि में प्रवेश करै। तंत्रान्तर में कहा है, अनन्तर साधक श्रेष्ठ हृदयमें मंत्र परामर्शन पूर्वक अवहिर्मनस्क ( एकाग्र मनसे ) और योग परायण होकर यागभूमिमें प्रवेश करै । हेमहेश्वरि हायमें जल शंख धारण पूर्वक द्वार देशी गमन करके वक्ष्यमाण विधान में हाथ और पैर पक्षालन करै । फेकारिणी में समस्त याग स्थान इस प्रकारसे निर्देश कियेहै । यया: एक लिंग, श्मशान, शून्य गृह और चतुष्पथ ( चौराहे ) में अवस्थिति कर योगा वलम्बन सहित त्रिभुवनेश्वरी विद्याकी साधना करै । जहां पंचक्रोश (पाँचकोश ) मेंभी लिङ्गान्तर लक्षितनहो, उसकोही एक लिंग कहते हैं । उस स्थान मेंही अनुत्तम सिद्धि संग्रह होती हैं। मुण्डमाला तंत्रमें कहाहै, नदी तर, विस्व मूल, श्मशान. शून्य गृह एक लिंग, परत, देवालय, चतुष्पथ. शवके ऊपर. शव मुण्ड. कण्ठ पुरित जल. . , प्रथम परिच्छेद। वा कण्ठपूरिते । संग्रामभूमौ योनौ वा स्थले वा विजने वने । यत्र कुत्र स्थले रम्ये यत्र वा स्यात् मनोलयः ॥ अन्यत्रापि । ऊपरे पर्वते वापि निर्जने वा चतुष्पथे। देवागारे देवशुन्ये विल्वमूले नदीतटे । स्वगृहे निर्जनारामे तथा चाश्वत्थस- निधौ। अधेतेषामकतमं स्थानमाश्रित्य यत्नतः ।। ओं वजोदके हुं फट् स्वाहा । अनेन जलं सबेन अनीय भासनयभ्युक्ष्य उपरि उपविश्य ओं ही विशुद्ध्यै सर्वपापानि शमय अशेषविकल्पमपनय ? फट् स्वाहा इति पादौ प्रक्षाल्य पूर्ववदाचामेत् । तदुक्तं कुमारीकल्प । ओं वनोदके हुं फट् स्वाहामन्त्रेण मन्त्रवित् । जलमा- नीय सव्ये तुआसनं शोधयेत्ततः ॥ प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य लज्जा- वीजं तथैव च । ततो विशुध्यन्ते सर्वपापानि शमयेदथ ॥ अशेषान्ते विकल्पं स्यात् अपनयेति ततःपरम् । कूर्चचीज भवेन्मन्त्रं पादप्रक्षालने प्रिये ! ॥ संग्राम भूमि योनि, स्थन, विजन, वन, इनसब स्थानों में अथवा जहां मन- काळयहोसके, इसपकार रमणीक स्थल में साधना करै । अन्यत्र कहार, उज्जट (भीमरूप ) पर्वत, निर्जल चतुष्पथे, देवालय, विलल मूल, नदीतट, स्वटइ, निर्जन, उपचन, पापलके समीप, इनमें एक उत्तमस्थान आश्रप करके, यत्न पूर्वक "उगे वादके" इत्यादि मंत्रसे सव्यहस्तमें जललेकर भासन अभ्युक्षण और उसके ऊपर उपवेशन ( बैठ ) करके, डों ही विशुद्ध इत्यादि मंस से पांवधोनेकेपीछे पूर्वको समान आचरण करै । कुमारी कल्पदंभी इसी प्रकार कहाहै । यथा- वचोदक" इत्यादि मलसे जलळाकर आसन शोधन करै । फिर प्रथम प्रणव अर्थात् डों उद्धार करके, तनुपरान्त लज्जावीम अर्थात् ही उदृत करे । अनन्तर "विशुद्ध सर्व पापानि शमयेद" कहकर अशेष विकल्पं अपाय यह पद संयुक्त करे । फिर करवीन अर्थात् ईशब्द संयुक्त करै । तो मंत्रका प्रयोग इसमकार हुआ, डॉ ही विशुद्ध सर्व पापानि शमयेत अशेप विकल्प मय नय हुं फट् स्वाहा" | प्रिये ! यही पाद प्रक्षालन मत्रह श्यामारहस्य मा० टी० । सिद्धार्थस्तिल संमिश्रः प्रोत्सार्य त्वासने विशेत् ॥ अन्यत्रापि। भूतापसर्पणं कुर्यात् मन्त्रेणानेन साधकः । यस्मिन् कृते स्थले भूता दूरं यान्ति सुरार्चने ॥ स्थितेषु सर्वभूतेषु नैवेद्य मण्डलं तथा । विलुम्पति सदा लुब्धा न च गृह्णन्ति देव- ताः ॥ तस्माद् यत्ने न कर्त्तव्यं भूतानामपसर्पणम् ॥ कुमारीतन्त्रेऽपि। प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य सर्वविघ्नांस्ततः परम् । उत्सारय ततो हुं फट् स्वाहा च तदनन्तरम् ॥ अनेनैव च मन्त्रेण विना- नुत्सारयेत् सुधीः । प्रणवं पूर्वमुद्धृत्य रक्ष रक्ष तदन्तरम् । हुं फट् स्वाहेति मन्त्रेण भूमिश्च परिशोधयेत् ॥ ततः पवि., प्रवजादौ प्रणवं पूर्वमुद्धरेत् ॥ धर्मद्वयं ततश्चैव फट् स्वाहा तदनन्तरम् । अनेनैव विधानेन कुर्य्याद् भूम्यभिमन्त्रणम् ॥ अथ आसनानि यथा-तदुक्तं मत्स्यसूक्ते । मृदुचूड़कमासीनश्चान्येषु कोमलेषु वा । विस्तारेषु स- संपूर्ण विघ्न परम्परा अक्षत, सिद्धार्थ और तिळकी सहायता से प्रोत्सारित (गिरकर ) होकर आसनपर विराजमान होवे । अन्यत्र भी कहा कि सा. धक इस मंत्र द्वारा भूतापसर्पण करै , इस के द्वारा भूमिस्थ समस्त भूत दूर सेही भागनाते हैं जो सम्पूर्ण भूत होने से लुब्ध होकर सर्वदा नैवेद्य मण्डल विलुप्त करताहै देवगण उसको ग्रहण नहीं करते । इसीकारण यत्नसहित भूत गणों की अपसर्पणा करै । कुमारी तंत्र में भी कहा है, प्रथम जगे फिर "स. र्च विघ्नान्" फिर "उत्सारय" फिर (हूं फट् स्वाहा) अर्थात् (ों सर्वषि घ्नानुतसारयस्वाहा ) इत्यादि मंत्र से संपूर्ण विघ्न उत्सारित करके फिर में रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा, इत्यादि मंत्र से भूमि शोधन और तदुपरान्त 'डों पवित्रवज्र, इत्यादि मंत्र से भूमि का अभि मंत्रण करे ।। अब समस्त आसन विधि लिखी जाती है । मृदुवा अच्हक अथवा को • म म परिवाद । माश्रित्य साधयेत् सिद्धिमुत्तमाम् ॥ अर्वाक् परमासतो ग- र्भमृतमाहुर्मुदुं बुधाः। चूड़ोपनयनेहींनं मृतमचूड़कं विदुः॥ निवृत्तचूड़को वालो हीनोपनयनः पुमान् । यो मृतः पञ्चमे वर्षे तमेव कोमलं विदुः॥ स्वतन्त्रेऽपि। कम्बले लोहिते वापि कृष्णे वा व्याघ्रचर्मणि । संन्यासी ब्रह्मचारी च विशेत् कृष्णस्य चर्मणि ॥ मत्स्यसूक्तेऽपि। कृष्णसारद्वीपचर्म अचूड़कम्बलं तथा । पीतवस्त्रञ्च शुक्लं वा भासनाय प्रकल्पयेत् ॥ मुण्डमालातन्त्रे। व्याघाजिनं सर्वसिद्ध्यै ज्ञानसिद्ध्यै मृगाजिनम् । वस्त्रा- सनं रोगहरं वेत्रज प्रीतिवर्द्धनम् ॥ कौषेयं पुष्टिदं प्रोक्तं क- म्बलं सर्वसिद्धिदम् । शुक्लं वा यदि वा रक्तं विशेषाद्रक्तक. मल और विस्तार आदि अन्यान्य आसनमें आसीन होकर | जिस भांति सिद्धि साधन में प्रवृत्तहोवे । छै महीने के अनधिक जो गर्भ में रहकर मर गया है, उसकोही पंडित गण मृदुकहते हैं। जिसका चूडा व उपनयन नहीं हुआ और उसी अवस्था में मरगया है, उस को अचूडक कहते हैं । जिस चालक का चूड़ा करण व उपनयन नहीं हुआ है, इसी अवस्था और पांचवें वर्ष में मरगया है, पंडितगण उस को कोमल कहते हैं । स्वतंत्र में भी कहा है कि लोहित ( लाल ) व कृष्ण ( काला) कम्बल अथवा व्याघ्र चर्म वा कृष्ण चर्म इन सब आसनों में संन्यासी और ब्रह्मचारी उपवेशन करें अर्थात् वैठें 1 मत्स्यमूक्त में भी कहा है, कृष्ण सार और व्याघ्र चर्म, अडूचक, कम्बल, पीत वा शुक्लवस्त्र, इन सब में आसन कल्पना करै । मुण्डमाला तंत्र में कहा है व्याघ्र चर्म में सर्व सिदि, मृग चर्म में ज्ञान सिद्धि वस्त्राशन में रोगनाश, वेनासन में प्रीतिवर्द्धन, कोपेय आसन में पुष्टि और कम्बल में सर्व सिद्धिलाभ होती है । शुभ्र वा रक्त विशेषत. रक्त कम्पळ, सग्राम .
श्यामारहस्य भा० टी० । म्बलम् ॥ मृदुकोमलमास्तीर्णं संग्रामे पतितं हि यत् । ज़- न्तुव्यापादितं वापि मृगं वापि वरासनम् ॥ गर्भच्युतं, वा नारीणामथवा योनिजां त्वचम् । सर्वसिद्धिप्रंदञ्चैव सर्व भोगसमृद्धिदम् ॥ त्वचं वा यौवनस्थानां कुर्यादीरवरास- नम् । श्मशानकाष्ठघटितं पीठं वा यज्ञदारुजम् ॥न दीक्षितो विशेज्जातु कृष्णसाराजिने गृही । उदासीनवनासीनस्ना- तकब्रह्मचारिणः ॥ कुशाजिनाम्वरेणाढ्यं चतुरस्रं समन्ततः। एकहस्तं हिहस्तं वा चतुरंगुलमुच्छ्रितम् ॥ विशुद्धे आसने कुर्यात् संस्कारे पूजनं वुधः ।। इति अत्र मृतासनमश्यमेव प्रत्यवायश्रवणात् । कालीतन्त्रे- मृतासनं विना देवि ! यो जपेत् कालिंकां नरः। तावत्कालं नारकीस्यात् यावदाभूतसंप्लवम् ॥ यत्त स्वतन्त्रादौ कम्बला. द्यासनमुक्तं तन्न स्वतन्त्रासन। किन्तु मृतकयुतमिति वोद्धव्य म् । मृताभावे विष्टरमिति । तदुक्तं- में पतित वा जन्तु कर्तृक व्यापादिव ( जानवरों से घायल ) मृग उत्कृष्ट आसन अथवा स्त्रियों का गर्भच्युत अथवा योनि, जात त्वक् ससिद्धि दान और सब प्रकार से भोग समृद्धि विधान करती है । गौचनस्य गणों के स्वर में भी वीर वरासन करै । इप्रशानकाg का वा यज्ञ दारु की पीठ भी उत्कृष्ट आसन है । दीक्षितं गृहीव्यक्ति कभी कृष्णसार के अंजिन में उपवेशन न करै । उदासीन, वनासीन स्नातक यह कुश अमिन और व स्वाट्य, समचतुष्कोण, एकहस्त वा दो हस्त परिमिति, चार अंगुल आसन में उपवेशन करै कालीतंत्र में कहा है, मतासन के बिना जो व्यक्ति देवीकालिका का जप करता है, वह यावद मळय नरक में वास करता है। अतएव स्वंतत्रादि में जो कम्बलादिका आसन कहा है यह स्वतंत्र भासन नहीं मृतकयक समझना चाहिये मृतके अभाव में विष्टर आसन ग्रहण कर सो कहा है यया ? -मृताभाव में विष्टरको शवरूप में कल्पना करना चाहिये । है - प्रथम परिच्छेद। मृताभावे विष्टरञ्च शवरूपंप्रकल्पयेत् । अथ भूमो त्रिकोणमण्डलं कृत्वा तत्र आधारशक्त्यादि- भ्यो नमः इति संपूज्य तदुपरि विहितासनमारोप्य कृतान लिः पठेत् । तदुक्तं मेरुपृष्ठे ऋषिः प्रोक्तःसुतलं छन्द ईरितम् । कूर्मोहि देवता देवि ! भासनाय प्रकल्पयेत् ॥ विनियोग तु ततः कृत्वा पठेत् । धृत्वा समन्ततः । पृश्चि! त्वयाधृतालोको देवि ! त्वं विष्णुना धृता ॥ त्वञ्च धारय मां नित्यं पवित्रं कुरु चासनम् । इतिधृ- त्वा तु देवेशि ! कुशास्तत्रैव दापयेत् ॥ मायावीजं समुच्चा- र्य आधारशक्तिमुच्चरेत् । कमलासनमालिख्य डे नमोऽन्तं प्रपूजयेत् ॥ कुमारीकल्पेऽपि। आकारान्तं सुरेखेच वनरेखे ततःपरम् । हुं फट् स्वाहेति कुर्यात्तु मण्डलञ्च शवासने ॥ वीरासनेनोपविशेत् संपूज्या सनमेव च। अनन्तर भूमि में त्रिकोण मंडळ की रचना करके उस में [ आधार श क्त्यादिभ्यो नमः ] इत्यादि कह विशेष प्रकार से पूजा कर उस के ऊपर विहितासन स्थापन पूर्वक कृताञ्जलि होकर पाठ करै । सो कहा मेरु पृष्टऋापि, सुतलछंद, कर्म देवता, आसन के लिये कल्पना करै । फिर इस प्रकार पाठ करें कि [ हे पृथ्वी ! तुपने सब लोकों को धारण किया है, विष्णु तुमको धारण करते हैं । अतएव तुम मुझको नित्य धारण और मेरे आसनको पवित्र करो । ] यह कहकर समस्त कुश,धारण और उसमें प्रदान पूर्वक माया वीज और आधार शक्ति उच्चारण और तदुपरात [ कमला. सनाय नम ] कहकर पूजा करै । कुमारी कल्प में भी कहा है, प्रथम आ: कार, फिर (सुरेख ) और फिर ( वनरेख ) में [ई फट् स्वाहा ] कह कर अवासन में मण्डल की रचना करै । फिर श्रासन की पूजा करके वीरासन में विराजमान होथे । अनन्तर आसन के ऊपर तीन कुश डालकर ( ही है । यथा ४ श्यामारहस्य भा० टी० । अथ आसनोपरि कुशत्रयं दवा ह्रीं आधारशक्तये कम- लासनाय नमः इति संपूज्य आःसुरेखे वजरेखे हुं फट् स्वाहा इति मन्त्रेण तत्र मण्डलिकां कृत्वा तदुपरि वीरासने उपवि. श्य विजयां स्वीकुर्यात् । तदुक्तं भावचूडामणौ। विना हेतुकमास्वाद्य क्षोभयुको महेश्वरः। न पूजां मम व्च्च न ध्यानं न च चिन्तनम् ॥ तस्माद्भुक्त्वा च पीत्वा च पूजयेत् परमेश्वरीम्। विजयाकल्पेऽपि संविदासवयोमध्ये संविदैव गरीयसी। संविप्रयोगस्तेनेई पूजादौ साधकोत्तमैः । कर्तव्या च महापूजा करणीया सुनि न्दितैः॥ अन्यत्रापि। आनन्देन विनाभ्रशो न च तृप्यन्ति देवताः । तस्मात् पूजादौ विजयास्वीकारः कार्यः। सा पुनश्चतुर्की । ब्राह्मणी -- . " । आधार शक्तंय कमलासनायनम ) इत्यादि मंत्र से पूजा करके, फिर आ मुरेख, में वनरेख में (हु फट् स्वाहा ) इत्यादि मंत्र से उस में मंडलिका करके उसके ऊपर वीरासन में बैठकर विजया स्वीकार में प्रवृत्त हो । भार चूडामणि में कहा है । यथा विजया स्वीकार न करने से, महरबर भी क्षोभ युक्त होकर मेरी पूजा, ध्यान और चिन्ता नहीं करसकते । इसी कारण भी जन और पान करके परमेश्वरी की पूजा करे । विजया कल्प में भी कहा है, सम्बिद और आसव में सावद ही श्रेष्ठ है । इसी लिये साधक प्रबर पुनादि में सम्बिद प्रयोग करे । अन्यत्र भी कहा है आनन्द अर्यात संविट के बिना ना खण्डित होती है, देवतागगों को भी तृप्ति लाभ नहीं होती। इसी कारण पनादि में विजगास्नीकारकांच्य है। यह विजया चारप्रकार यथा- प्रथम परिच्छेद । चत्रिया वैश्या शूद्राच । श्वेतरक्तंकृष्णपीत प्रसूनभेदाः । । तासां शुद्धिर्विजयाकल्पानुसारेण लिख्यते । संविदे ब्रह्म 'सम्भूते ब्रह्मपुत्रि सदानधे ॥ भैरवाणाञ्च तृप्त्यर्थं पवित्रा भव सर्वदा । ओं ब्राह्मण्यै नमः स्वाहा । साधयेदपरांततः॥ इत्यनेन अभिमन्त्रणम् । सिद्धिमूले प्रिये ! देवि ! हीनबोधप्रबोधिनि । राजप्रजा वशङ्कारि शत्रुकण्ठत्रिशूलिनि ॥ ऐं क्षत्रियायै नमः स्वाहा शोधयेदपरांततः।अज्ञानेन्धनदीप्ताग्ने ज्वालाग्नेज्ञानरूपिणि। आनन्दस्याहुतिं प्रीतिं सम्यग्ज्ञानं प्रयच्छ मे। ह्रीं वैश्यायै नमः स्वाहा शुद्रां संशोधयेत्ततः ॥ नमस्यामि नमस्यामि' योगमार्गप्रवोधिनि। त्रैलोक्यविजये मातःसमाधिफलदाभव॥ ब्राह्मणी, त्रिया, वैश्या और शूद्रा । यह श्वेत, रक्त, कृष्ण भौर पीतवर्ण है कुसुम भेद में इस प्रकार चारभेद कल्पित हुए हैं। विजया कल्पानुसार उस की शुद्धि लिखीजाती है। हे सम्बिदे ! तुम ब्रह्म से उत्पन्न हुई हो । तुम ब्रह्म की पुत्री हो । तुम सब प्रकार से पाप सम्पक हीन हो भैरवगणों को दान करने के लिये ही तुम्हारी सृष्टिहुई है। तुम सर्वदा पवित्रहो । तुम्ही ब्रह्मा- णीहो । तुमको नमस्कार है । यह कह "स्वाहा" समुच्चारण पूर्वक अपराका • साधन करै । यथा-तुम सिद्धिकी मूळ कारण हो । तुम सबकी परम प्रीति भाजनहो । तुम्ही स्वमकाश युक्त हो । तुम्ही बुद्धिहीन गणों को प्रबोधित । करती हो । तुम्ही राजा और प्रनां दोनों को वशीभूत करती हो । तुम्ही । शत्रु कण्ठको त्रिशूलिनी हो । तुम्ही क्षत्रिया हो तुमको नमस्कार है यह कह । कर "स्वाहा" प्रयोग पूर्वक अपरा का साधन करै । यथा-तुम अज्ञानरूप । धनको पावक स्वरूप हो । तुम्ही ज्वालाग्नि हो । तुम्ही ज्ञान रूपिणी हो तुम मुझ को सम्यग् ज्ञान एवं प्रीति और आन्दाहुती प्रदान करो। तुम्ही वैश्या हो, तुमको नमस्कार है यह कहकर प्रयम " श्री और अन्त में स्वाहा उच्चारण करके शूद्राका साधन करै यथा-'तुम योग मार्ग प्रबोधिनी हो । तुम्ही त्रैलोक्य विजया हो । तुमको नमस्कार है, नमः स्कार है । हे मात: ! तुम मेरी समाधि का फल प्रदान करो । तुम्ही शूद्रा -- + ६ श्यामारहस्य भा०टी० । ह्रीं शूद्रायै नमः स्वाहा ओं अमृते अमृतोद्भवे अमृत- वर्षिणि पदं ततः ॥ अमृतमाकर्षय द्वन्द्व सिद्धिं देहि ततःपरम् । अमुकं मे ततो ब्रूयात् वशमानय ततःपरम् । द्विठान्तोऽयं मनुः प्रोक्त श्चतु नाञ्च शोधने ॥ उत्तरतन्त्रे च। मूलमन्त्रं ततो देवि ! तस्योपरि नियोजयेत् । आवाह नादिमुद्रांच धेनुयोनी ततःपरम् ॥ दिग्बन्धश्छोटिकाभिश्च तालत्रयपुरःसरः । दिव्यदृष्टया तथा पार्णिघातैर्विघ्नान् वि. घातयेत् ।। सप्तधा तर्पयेत् ब्रह्मरन्धे मूलं जपेत् मनुम् । गुरु पने सहस्रारे तथा सङ्केतमुद्रया ॥ त्रिधैव तर्पयेत् मंत्री सा, धकः सिद्धिमानसः । ऐं वद वद पदं ब्रूयात् वाग्वादिनि हो, तुमको नमस्कार है । यह कह पूर्व में "ही" और अन्त में " स्वाहा प्रयोग करके प्रथम ओं अमृते अमृतोद्भवे अमृत वर्षिणी" पद बंधन पूर्वक फिर यथाक्रमसे "अमृतमाकर्षय अमृतमाकर्षय सिद्धिं देहि अमुकं मे वश्चमा नय स्वाहा" इत्यादि पद परम्परा प्रयोजित कर इसका अर्थ यही है तुम अ मृता और अमृत से उत्पन्न हुई हो एवं अमृत वर्षण करती हो । अतएप अमृत को आकर्षण करो आकर्षण कग मुझको सिदि प्रदान करो, अमुक को मेरे वशमें लाओ। यही मंत्र उल्लिखित चतुर्विध दि जया शोधन में प्रयोनित होता है। उत्तर तंत्र में भी कहा है, यथा-हे देश अनन्तर उसके ऊपर मूल मंत्र नियोजित करें। फिर आवाहनी. धन और योनिमुद्रा का प्रयोग है, तालत्रय [तीन ताल ) प्रदान सहित छोटिका द्वारा दिग्बन्धन, दिव्य दृष्टि सहकृत पाणि घात द्वारा समस्त निघ्नों को उत्सा रित सानवार तन और मूल मंत्र जप करना चाहिये । सापक मिडिको कामना से तीन बार गुरु पद्म सहसार में संकेत मुद्रा प्रदर्शन पूर्वक तर्पण मोर " पद पट, इत्यादि मन्त्र से मुखमें आहुति प्रदान करें।
मथम परिच्छेद। ततःपरम् ।। मम जिह्वाग्रे स्थिरा भव सर्वपदं ततः । सत्वर. शङ्करी स्वाहेति मंत्रेण जुहुयान्मुखे ॥ संकेतमुद्रया तत्त्वमुद्रया इत्यर्थः। अथ साधकः वामकोर्वे अमुकानन्दनाथश्रीभैरवगुरु- पादुकाभ्योनमः। दक्षिणकर्णोद्वेगां गणपति मध्येइष्टदेवतां नमस्कृत्य सामान्योदकेन पूजस्थानादिकमभ्युक्ष्य स्वदक्षिणे गन्धपुष्पादिकं वामे सुगन्धिजलं देवतायाः पश्चिमे कुलदे- बताया द्रव्याणि अन्यत् पानश्च देवतावामे धारयेत् । तदुकं कुलचूड़ामणौ। कुलासनं ततो धृत्वा तदभ्यर्च्य यथासुखम् । कुलासनं ततो बवा गुरुपूजाक्रमेण च ॥ आत्मशुद्धिं पीठशुद्धिं शृणु शुब्यादि भैरव । कृत्वा चायं ततो विहान् कुर्यात् कुल- विचेष्टितम् ॥ दीक्षिताभिः कुलीनाभिर्युवतीभिः कुलात्म- भिः । देवतागुरुभक्ताभिर्वाञ्छितं यागभूमिषु ॥ नानावि- इस मंत्रका अर्थ यही है, तुम वाग्वादिनी हो । अतएर मेरे वाक्यस्फूर्ति करो । मरी जिह्वा के अग्र स्थिर हो इत्यादि । यह संकेत मुद्रा शब्द में सत्व मुद्रा समझनी चाहिये। अनन्तर सापक वाम कोर्ट में, अमुकानंद नाय श्री भैरव एसके शा- का युगल में नमस्कार दक्षिण कोर्ट में गां गणपतिको नमस्कार और मध्यमें इष्ट देवताको नमस्कार करके, सामान्य उदक द्वारा पूजा स्थानादि अभ्युक्षित कर अपने दक्षिण में गंध पुप्पादि, देवता के बाम में मुगंधि जल पश्चिममें कुल देवता के सब द्रव्य और भन्यविध पान देवता के बाम में घा- रण करै । कुल चूडामणि में कहा है, यथा-अनन्तर फुलाशन धारण कर- के, यथा मुख में उसकी अभ्यर्चना और गुरु पूजा के क्रमसे उसका बंधन करै । अनन्तर आत्मशुद्धि और पाठ शद्धि करके, याग भूमि में देवता, और गुरु गणों के प्रति मकि शालिनी, दीक्षिता, कुलीन युवती गणोंका वांछित, कुलाचार विधि बोधित अर्ध्य विधान पूर्वक विविध गंध और पुरुष श्यामारहस्य:भा० दी । धानि पुष्पाणि गन्ध्यानि विविधानि च । कर्पूरजातीधूपादि वासितं पटवासितम् ॥ ताम्बूलं देयद्रव्यञ्च धूपदीपादिकंच यत् । सर्वालङ्कारभूषाभिर्भूषितः कोलिकेश्वरः ॥ मूलमन्त्र जततोयैःप्रोक्षित स्थापयेत्ततः । सर्वस्वं दक्षिणे स्थाप्यं वामे चाय निवेदयेत्। पश्चिमे देवतायाश्च कुलद्रव्याणि धारयेत्॥ पश्चिमे पृष्ठे इत्यर्थः । कालिकापुराणेऽपि-मदिरां पृष्ठतो दद्यादन्यपानञ्च वामतः। कुलार्णवेऽपि-आत्मस्थानमनु द्रव्यं देहशुद्धिस्तु पंचमी। यावन्न कुरुते देवि ! तावदेवाचनं कुतः ॥'मार्चनादेहशुद्धि स्तु प्राणयोगादिभिः प्रिये ! पड़ङ्गानि न्यसेन्मन्त्री मात्मा शुद्धिरितीरिता ॥ गृहीत्वा मातृकावर्णमूलमन्त्राक्षराणि तु। क्रमोत्क्रमाद्विरावृत्तिर्मन्त्रशुद्धिरितीरिता॥ पूजाद्रव्यादि सं- प्रोक्ष्य मूलास्त्राभ्यां विधानतः । धेनुमुद्रां दर्शयेच्च द्रव्यशु- द्धिरितीरिता ॥ पीठे देवी प्रतिष्ठाप्य सकलीकृत्य मन्त्रवित्। . । कपर और जाती धूपादि सुवासित ताम्बूल और दीपादिदेय द्रव्य मूल, मंत्र जप्त सलिळमें प्रोक्षित करके स्थापित करें । तिसकाळ सर्व अर्ककारादि भू. पणों से भूपित होवे । सर्वस्त्र दक्षिण में स्थापित करके वाम में अयं नि. वेदन और देवताके पश्चिम में समस्त कुल द्रप धारण करे यहाँ पश्चिम शब्द पृष्ठ वाचकहै । कालिका पुराण में भी कहा है, हे देवि ! आत्म शुदि स्थान शुद्धि, मंत्र शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, और देह शुदि न करने से किसी प्रकार म. चना सिद्धि नहीं होसक्ती । हे प्रिये ! माण योगादि द्वारा मान करने से देह शुद्धि सम्पन्न होती है। मंत्रशील पुरुप पडङ्गन्यास करें। इसकाही नाम आत्म शुदि है। गातका वर्ण और मत्रके समस्त अक्षर ग्रहण करके कपोत् क्रमानुसार दो घार आधि कर । इसकाही नाम मंत्रशुदि है। मूड और भख मंत्र में विधानानुसार पूजा द्रव्यादि भलीभांतिप्रोषित करके पेन पदा प्रदर्शन करनेको दृष्य शद्धि कहते हैं। मंत्रविन साधक देवी को पीड मूल प्रथम परिच्छेद। मूलमन्त्रेण दीप्तात्मा अभिभाव्योदकेन च ॥ त्रिवारं प्रोक्ष- येविहान् देहशुद्धिरितीरिता । पंचशुद्धिं विधायेत्थं पश्चाद् यजनमाचरेत् ॥ अन्यत्रापि । पंचशुद्धिविहीनेन यत् कृतं न च तत् कृ. तम् । पंचशुद्धिं विना पूजा अभिचाराय कल्पते ॥ आत्म शुद्धिः स्थानशुद्धिमन्त्रस्य शोधनं तथा । द्रव्यशुद्धिहशुद्धिः पञ्चशुद्धिरितीरिता ॥ अथ कुमारीकल्पे। पुष्पाधिष्ठाने पुष्पस्य प्रणवं पूर्वमुद्धरेत् । ततोऽभिषेकेति पदं शताभीति ततःपरम् ॥ सेकेति च पदं प्रोक्त्वा हुं फट् स्वाहा ततःपरम् । अनेन मनुना देव्याः पुष्पाधिष्ठानमेव च ॥ प्रणवं पुष्पकेतुश्च तथा राजाहतेऽपि च । शताय सम्यगुक्त्वा च सम्बद्धाय ततश्च ओं ॥ पुष्पे पुष्पे महापुष्पे सुपुष्पे पुष्प सम्भवे। पुष्पचयावकीर्ण हुं फट् स्वाहेति ततः परम् ॥ वि- शोध्य पुष्पमेतेन जलं पूर्ववदाहरेत् ॥ में प्रतिष्ठापिता और दीप्तात्मा होकर, मूल मंत्रमें अभिवादित करके उदक द्वारा तीनवार मोक्षण कर इसकाही नाम देर शुद्धि है । इस प्रकार पञ्चविध शुदि विधान करके फिर यजन कार्य में प्रवृत्त होना चाहिये । अन्यत्र भी कहा है । उल्लिखित पंच शुद्धि हीन होकर जो कियाजाता है, वह न करने में ही है। पंच शुद्धिके बिना पूजा करने से वह अभिचार रूप में कल्पित होती है । आरम शुद्धि, स्थान शुद्धि, मंत्र शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, और देह शुद्धि इनका ही नाम पच शद्धि है । कुमारी कल्पमें भी कहाहै, पुष्पापिष्ठान समयमें प्रथम प्रणव उद्धार करके फिर शताभिसेक पद संयुक्त कर "हुं फट् स्वाहा" प्रयोजित करै । इस में नो मंत्र हो उस के पदने पर देवीका पुष्पाधिष्ठान करके फिर प्रणवोदार - क "पुष्प केतु" इत्यादि पद प्रयोग सहित नो मत्र हो, तिसको पढ पुष्प श्यामारहस्य भा०टी० । मों शताभिषेक भओं शताभिषेक हुं फट् स्वाहेति मंत्रण पुष्पमधिष्टाय ओं पुष्पकेतु राजार्हते शताय सम्यक् सम्ब. द्धाय इति पुष्पमभिमन्त्र्य पूजाद्रव्यादिकं मूलान्ते फहित्य नेन अम्युक्ष्य धेनुमुद्रया अमृतीकृत्य वामपार्णिघातत्रयं फ- डिति भूमौ कृत्वा तर्जनीमध्यमाभ्याम् ऊर्बोद्ध तालत्रयं दत्त्वा.तर्जन्यंगुष्ठाभ्यां छोटिकाभिर्दशदिग्बन्धनं कुर्यात्।दि. व्यदृष्ट्या दिव्यान् विघ्नानुत्सार्या रमिति चतुर्दिक्षु वहि प्राकारं ध्यात्वा मूलमन्त्रेण स्वदेहं संमार्य प्रणायामं कुर्यात् । तथा मूलाधारे नमः संयोज्य दक्षिणांगुष्ठेन दक्षिणनासापुटं धृत्वामूलमंत्रं प्रणवं वा षोड़शवारं जपन् वामेण वायुमापू. र्य कनिष्ठानामिकाभ्यां वामनासापुटमपि विधृत्य तमेवचतुः पष्ठि वारं जपन् वायुं कुम्भयित्वा पुनस्तं द्वात्रिंशद्वारं जपन् शुदि करके पूर्ववत् सलिल आहरण करना चाहिये । “ओं शताभिषेक" इ. त्यादि मंगसे पुष्पाधिष्ठान करके "ओं पुष्प केतु राजाई।" इत्यादि मंत्र से पुष्प को अभिमंत्रण और मूलके अन्त में फद् शब्दप्रयोग पूर्वक पूजा द्रव्या- दि करा अभ्युक्षण करै । अनन्तर धेन मुद्रा द्वारा अमृती करणान्तर" फट । शब्द पुरःसर भूमि में तीनवार वाम पादुका पाणि (बाये पैरका आघात) पात और तर्जनी मध्यमाकी सहायता से ऊर्द में तीनताल मदान करके तर्जनी और अंगुष्ट द्वारा छोटिका प्रयोग सहित दशदिक् बंधन करे। फिर दिव्य दृष्टि द्वारा समस्त दिव्य चिन उत्सारित और रम, इत्यादि मंत्र से चारों दिशा में वह्नि प्राकार ध्यान करके, मूळ मंत्र से स्वकीय ( अपनी ) देह मार्जन पूर्वक प्राणायाम करै । यथा-मूलाधार में मन संयोजित और दक्षिण अंगुष्ठ में दक्षिण नासापुद् धारण करके, सोलह बार प्रणर या मूड मंत्रका जप समाधान करनेपर वाम नासाद्वारा वाय आपूरण, एवं कनिष्ठा और अनामिका द्वारा वाम नासापद धारण और (६४) चौसठवार प्रण: पजप पुरःसर घायुको कुम्भित करें | फिर पुनरि पत्तीसमार नप करके प्रथम परिच्छेद। दक्षिणेन वायुं रेचयेत् । एवं क्रमोत्क्रमेण प्राणायामत्रये कृते एक प्रणायामः । इत्थं वारत्रयं कुर्यात् । तदुक्तं स्वतन्त्रे। पार्णिघातकरास्फोटसमुदश्चितवतकैः । तालत्रयमथो दद्यात् सशब्दं सम्प्रदाय च ॥ तुचन्द्रनेत्रवासासदा- धिकैः प्रिये !!मात्राभिः प्रणवं जप्त्वा पूरकुम्भकरेचकैः ॥ प्राणायामं ततः कृत्वा भूतशुद्धिं ततश्चरेत् ।। अन्यत्रापि। मनो जीवात्मनःशुद्धिःप्राणायामेन जायते ॥ कालीतंत्रेऽपि । प्राणायामत्रयं कुर्य्यान्मूलेन प्रणवेनवा । ज्ञानावर्णवेऽपि । कनिष्ठानामिकांगुष्ठैर्यन्नासापुटधारणम् ।। प्राणायामः स विज्ञेयस्तर्जनीमध्यमे विना ॥ अथ गौतमीये। भूतशुद्धिं लिपिन्यासं विना यस्तु प्रपूजयेत् । विपरीतं फलं दद्यादभक्त्या पूजनं यथा ॥ ततो भूतशुद्धिं कुर्यात् । तथा मूलाधारपद्मात् कुलकु- दक्षिण में वायुका रेचन करै । इस प्रकार क्रमोन क्रमानुसार तीन माणाया- म विहित होनेपर एकमात्र प्राणायाम् साधित होता है । इस प्रकार तीन बार करें । स्वतंत्र में वही कहा है । यथा-पाणिघात और कराधात द्वारा शब्द सहित तीन ताळ प्रदान करै । फिर सोलहनार और बत्तीमवार प्रणव जपनेपर पूरक कुंभक और रेचक द्वारा प्राणायाम कर भूत शुद्धि करें । अ- न्यत्र भी कहा है, प्राणायाम नारा मन और जीवात्मा की शुद्धि होती है। कालीतंत्रमें भी कहा है, मूलमन वा प्रणव जप सहित तीनधार प्राणायाम करे । ज्ञानार्णव में भी कहा है, कनिष्ठा और अनामिका द्वारा नासा पुद धारण करनेको प्राणायाम कहने हैं । इस में तर्जनी और मध्यमाका प्रयोग करना नहीं होता गौतमीय में कहा है, भूतशुद्धि और लिपिन्यासन करके पूजा करने से अभक्ति कृत पूनाकी समान उसप्ते विपरीत फल लाभ होता है। फिर भूतशुद्धि का मूलाधार पद्मसे सोतेहुए सर्प को समान आकृति - श्यामारहस्य भा० टी० । ण्डलिनी प्रसुप्तभुजगाकारां साईत्रिवलयां स्वयम्भूलिङ्गवे- ष्टिनी विपतन्तुतनीयसी तडित्पुञ्जप्रभां हंस इति मन्त्रेण पृथिव्या सह स्वाधिष्टानं समानीय तत्रस्थजले पृथिवीं वि. लीनां विचिन्त्य तस्माजलेन सह मणिपूरस्थवहौ तज्जलं वि. लीनं विचिन्त्य तस्मान्मणिपूरात् वाहिना सह अनाहत मा. नीय तत्रस्थवार्यो वहि लीनं ध्यात्वा तस्मान्मरुता जीवा- स्मना सह विशुद्धस्थाकाशे वायुं लीनं कृत्वा तस्मादाकाशेन सह आज्ञाचक्रस्थमनसि आकाशं लीनं विचिन्त्य मनो नादे लीनं विधाय धरणी ध्वनि समर्पयेत् । ततः सहस्रदलकम लकर्णिकास्थचन्द्रमण्डलमध्यत्रिकोणान्तर्गतविन्दुरूपपरम- शिवे कुण्डलिनी जीवात्मानञ्च नित्यैकरूपतां विभाव्य प्रा णायामविधिना यमिति वायुवीजं धूम्रवर्ण पोड़शवारं जपन् पापपुरुषेण सह शरीरं संशोप्य रमिति वह्निवीजं रक्तवर्ण शालिनी सादत्रिवल ( साढतीनवल ) धारिणी स्वयंभूलिंग वष्टिनि, मृणा- ल तन्तु की समान अतीव सूक्ष्म स्वरूपिणी तडित पुंजकी समान प्रमाशा लिनी कुल कुण्डलिनी को हंस इति मंत्र में पृथ्वी सहित स्वाधिष्ठान में आनयन तत्रस्त्र जल में पृथ्वी विलीन है इस प्रकार चिन्तन, मणि पुरस्थ अग्नि में वह जल लीन हुभा है इस प्रकार विभावन, उस मणि पुरसे वह के सहित अनारन में आनयन और तत्रस्थ जल में अग्नि लीन है इस मका र ध्यान करें । फिर उस स वायु और जीवन के सहित विशुद्धस्थ आकाश में चागुको लीन करके उस स्थान से आकाशके सहित आज्ञा चक्रस्य मन में भाकालको लीन ध्यानकर मनको नादगें लीन और पृथ्वी ध्वनि समर्प- ण करे अनन्तर सहम दल लमल कणिका में प्रतिष्ठिन नन्द्र मण्डल मध्य पी त्रिकोण के अन्तर्गत विन्दुरूप परम शिर में कुण्डलिनी और जीवा गा, इन दानाको नित्य एकरूपमें चिन्ता करके प्राणायाम विधानानुसार 'गम' यह प्रमाण नागीन गोपचार जपका पार पुपके गहिन शरीर प्रथम परिच्छेद । चतुःषष्टिवार जपन् तं संदह्य वमिति वरुणवीजं शुक्लवर्ण द्वात्रिंशद्वारं जपन् तद्भवामृतवृष्टया निष्पापं शरीरम् उत्पा- य लमिति पृथ्वीवीजेन पीतवर्ण ध्यायन् शरीरं सुदृढ़ीकृत्य सोऽहमिति मन्त्रेण कुलकुण्डलिनीममृतलीलां पञ्चभूतजी- वात्मानश्च ब्रह्मपथेन स्वखस्थाने नियोजयेत् । तदा देवी- रूपमात्मानं ध्यात्वा हृदि हस्तं निधाय जीवं न्यसेत् ॥ यथा-आं ह्रीं क्रों हंसः श्री दक्षिणकालिकायाः प्राणा इह प्राणा आं ह्रीं क्रों हंसः अमुष्याः जीव इह स्थित । आं ह्रीं को हंस अमुष्याः सर्वेन्द्रियाणि आं ह्रीं को हंसः अमुष्याः वामनश्चक्षुः श्रोत्रधाणप्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा । इति जीवं न्यसेत् ॥ तदुक्तं स्वतन्त्रे संहारक्रमयोगेन पञ्चतत्वं समुद्धरेत् । शोपदाहलवान् कृत्वा वाय्वग्निसलिलाक्षरैः ॥ ततो न्यासं प्रकुर्वीत फेका- रीतन्त्र ईरितम् ॥ का शोधन कर तदनन्तर ।' यह रक्तवर्ण वह्नि वीज चौसठवार जप और उसको दग्ध करके वम् यहशुक्लवर्ण वरुण वीन बत्तीसवार जप और उससे समुद्त अमृत दृष्टिके द्वारा निप्पाप शरीर समुद्भावन पूर्वक, लम, इस पीतवर्ण पृथ्वीवीजके ध्यान सहित शरीरको दृढ करें । फिर' सोह' मंत्र से अमृत को- लोकल कुण्डलिनी और पंचम्त जीवात्मा को ब्रह्माध योग में स्वस्वस्थान में नियोजित करें। तितकाल देवी का रूप और आत्मा दोनों का ध्यान और हृदय में हस्तन्यस्त करके जीव न्याप्त करना चाहिये । यथा--आंहीं को' इत्यादि मंत्र से जीवन्यास करै । स्वतंत्र में, कहा है, यथा संहार क्रम योगके अनुसार पंचतत्व समुद्धार एवं वायु भी और सलिलातर में शो- पण दाहन और प्लावन करके फेत्कारिणी नंत्र मनसे जीवन्यास करें । - श्यामारहस्य मा. टी. अन्यत्रापि। देवीरूपं ततो ध्यायेदात्मानं कमलेक्षणे । ततो जीवं प्र- विन्यस्य पाशादित्यक्षरेण तु ॥ प्राणमन्त्रेण मुक्तेन ततोऽ.' मुष्याः पदं ततः । प्राणा इति पदं पश्चादिह प्राणाः पदं ततः ॥ सर्वेन्द्रियाण्यमुष्यान्ते वाडानो नयनं ततः । श्रोत्र- घाणपदात् प्राणा इहागत्य सुखं चिरम् । तिष्ठन्तु वहिजा- यान्तः प्राणमन्त्रोऽयमीरितः ॥ प्रकारान्तरञ्च ज्ञानार्णवे- विपरीतं प्राणमन्त्रं विलिखेत् पाशपूर्वकम् । प्राणप्रतिष्ठा मन्त्रोऽयं सर्वकर्माणि साधयेत् ॥ अमुष्या इति पदानि वोद्धव्यानि इति साम्प्रदायिकाः अमुष्याःस्थाने पष्टयान्तं नाम प्रयोक्तव्यं तदुक्तं नारायणीये- अमुकपदं यद्रूपं यन्त्रमन्त्रेषु दृश्यते । साध्याभिधानं त- द्रूपं तत स्थाने नियोजयेत् ॥ कुमारीकल्पेऽपि- भूतशुद्धिं विधायेत्थं देवीरूपेण चिन्तयेत् ।। अन्यत्रभी कहा है, गथा--हे कम क्षणे ! देवीरूप और आत्मा का ध्यान करके पाशादि तीन अक्षरों के सहित जीवन्यास करै । तिसकाळ प्राणमंत्र धारण करना चाहिये । उसकी विधि यही है प्रथम अमुप्या पद फिर माणाः अनन्तर इह प्राणाः अमुयाः सन्द्रियाणि बाडमनोनयन प्राण श्रोत्रपदात् प्राणा इहागत्य सुखं चिरः तिष्ठन्तु स्वहा । इसकाही नाम प्राण मंत्र है। मानार्णव में कहा है, विपरीत प्राणमंत्र पाश पूर्वक दिखना चाहिये। इसकाही नाम प्राण प्रतिष्ठा मंत्र है। इस मंत्र प्रभाव से संपूर्ण कर्म सापन किये जाने है । मुमारी करूपमें भी कहा है, इस प्रकार भतादि विधान पर प्रथम परिच्छेद । ओं प्रां ह्रीं क्रों फट् स्वाहा अनेन कायवाचित्तशोधनं कृत्वा रक्ष हुं फट् स्वाहा अनेन हृदि हस्तं दत्वा आत्मरक्षां विधाय स्ववामे लतां गुरुदेवतां नवयौवनगर्वितां विधाय भूतशुद्धिं प्राणायामान् कारयित्वा यथोक्तमाचरेत् । तदुक्तं तत्रैव । प्रणवं पूर्वमुच्चार्य विशेषासनमेव च। हुं फट् स्वाहा मनुः प्रोक्तं कायवाक् चित्तशोधने । रक्ष हुं फट् ततः स्वाहा मन्त्रः स्यादात्मरक्षणे ॥ ततः षोडशवर्षीयां नारीमा- नीय मन्त्रवित् । युवती वा मदोन्मत्तां सुवेशां चारुहासि- , नीम् ॥ सदा कामाभिलषितां सिन्दूराङ्कितभालिकाम् । { साधके प्रेमसम्पन्नां वामे संस्थापयेत् वुधः । तस्याश्च भूतशु यादीन् कृत्वा तु मातृकां न्यसेत् । प्राणायामं मातृकाश्च । कारयित्वा यथाविधि ॥ अथ ऋष्यादिन्यासं कुर्यात् । यथा । कृताञ्जलिः भैरव ऋषिरनुष्टुप्छन्दः श्रीदक्षिणकालिका देवता ह्रीं वीजं हुं के देवी के रूपकी चिन्ता करै । और 'आं ही इत्यादि मंत्र काय वाक्य और चित्त शोधन करके रक्ष हु इत्यादि मंत्रसे हृदयमें हस्तदान पूर्वक आत्म रक्षा करै फिर अपने वाम पेंनव यौवन गर्षिता गुरु देवता विधान करके भूतशुद्धि और प्राणायामके पीछे ययोक्त आचरण कर उसमें ही यह कहा है । यथा-प्रणव उच्चारण करके फिर हुं फट् स्वाहा उच्चारण करे, यही काय वाक् और चित्त शोधन मंत्र है । अनन्वर रक्ष हुं फट् इत्यादि मंत्र से आत्मरक्षा करै । तदनन्तर मंत्रविद् साधक षोडश वर्षीय, मुवेश, सहासिनी सर्वदा कामाभिलापिनी, सिंदूर चर्चित मस्तक, युक्त साधक के प्रतिप्रेम भाव युक्त, मदोन्मत्त युवती रमणी लाकर बाम में संस्थापन और उसकी भूत शद्धि आदिक किया सम्पादन पूर्वक मातृका न्यास करें और यथा विधि प्राणायाम एवं मातृका और निष्पादन पूर्वक ऋष्यादि न्यास में होवे । यया कृतांजलि होकर इस प्रकार कहै, 'भैरव ऋपि, अनुष्टुप छंद, दक्षिणा कालिका देवता, इत्यादि । प्रवृत्त , श्यामारहस्य भा०टी० ॥ शक्तिः क्रीं कीलकं रक्षार्थकाममोक्षपुरुषार्थचतुष्टयसिद्धिपुर्व कदिव्यज्ञनद्रुतकवित्वपाण्डित्यसिद्धये विनियोगः । इत्यभि. लष्य पुष्पेण अनामिकया वा न्यसेत् । यथा । शिरास भै- रवऋषये नमः मुखे अनुष्टुप्छन्दसे नमः । हृदि श्रीदक्षि. णकालिकायै नमः गुह्ये ही वीजाय नमः पादयोः हुं शक्तये नमः सर्वाङ्गे की कलिकाय नमः । तदुक्तम् । भैरवोऽस्य ऋषिः प्रोक्तः उष्णिक्छन्द उदाहृतम् । देवता कालिका प्रोक्ता लज्जाबीजन्तु कीलकम् ॥ शक्तिस्तु कूर्व वीजं स्यादनिरुद्धसरस्वती। कवित्वार्थे विनियोगः एवमृ. स्थादिकल्पना ।। कवित्वार्थे विनियोगः इत्युपलक्षणम् । यद्यस्याभिलषित तदर्थे विनियोगः इत्यर्थः । तन्त्रे विविधश्रवणात् । तदुक्तं कालीक्रमे। कीलकं चाद्यवीजन्तु चतुर्वर्गार्थसिद्धये । कुलचूडामणौ । भैरवोऽस्य प्रविः प्रोक्तः उष्णिक्छन्द उदीरितम् ॥ दक्षिणाकालिका देवी चतुर्वर्गफलप्रदा । अथ तन्त्रान्तरे। ऋर्पि न्यसेन्मूर्ध्नि देशे छन्दस्तु मुखपङ्कजे ॥ देवतां । दये चैव वीजन्तु गुह्यदेशके । शक्तिस्तु पादयोश्चैव सर्ग कीलकं न्यसेत् ॥ तत्रान्तर में कहा है, मस्तक में ऋपिन्याप्त करे । मुख पन में मंद हदक में *देवता, गुह्य देश में सीन, दोनों पैरों में शक्ति भौर सदमें कीलक Eि | ।
मथम परिच्छर। गौतमीये । ऋषिश्छन्दोऽपरिज्ञानान्न मन्त्रः फलभाग् भवेत् । नैर्वीयं याति मन्त्राणां विनियोग अजानताम् ॥ अथ कराङ्गन्यासौ।ओं हां अंगुष्ठाभ्यां नमः इत्यंगुष्ठयोः। ओं ह्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा इति तर्जन्योः । ओ हूं मध्यमा- भ्यां वपट् इति मध्यमयोः । ओं हैं अनामिकाभ्यां हुँ इति अनामिकयोः । ओं ह्रौं कनिष्ठाभ्यां वौषट् इति कनिष्ठयोः। ओं हः करतलपृष्ठाभ्यां नमः इति करतलपृष्ठयोः इति क. रन्यासः । अथवा सर्वत्र नमस्कारान्तेन करन्यासः । ततः ओं हां हृदयाय नमः इति हृदि तर्जनीमध्यमानामिकाभि- यंसेत् । ओं ह्रीं शिरसे स्वाहा इति शिरसि तर्जनीमध्य- माभ्याम् । ओं हूं सिखायै वषट् इति शिखायां मुष्टिकृता- धोमुखांगुठेन । ओं हैं कवचाय हुं इति कवचे हस्तद्वयांगु- लीभिः । ओं ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् इति नेत्रत्रये तर्जनीम- ध्यमानामिकाभिः । ओं हः करतलपृष्ठाभ्यां फट् इति कर- तलपृष्ठयोः । ततः ओं ह्रः अस्त्राय फट् इत्यनेन तर्जनीम- स्त करै । गौतमीय में कहा है, ऋपि और छंद न जाननेसे मंत्र फलदायक नहीं होता और उसका विनियोग भी निवार्य होता है । अब करागन्यास लिखते है । "गे ही अंगुष्ठाभ्यां नमः" इत्यादि । इस काही नाम करन्यास है । अथवा सर्वत्र नमस्कार के अन्त में करन्यास करें। अनन्तर "डों हां हृदयायनमः" यह कहकर हृदय में तर्जनी, मध्यमा और . अनामिका द्वारा न्याप्त करै । ग ही इत्यादि कहकर तर्जनी और मध्यमा द्वारा मस्तक में न्यास करे । गे ही इत्यादि कहकर मुष्टिकृत अधो मुख अं- गष्ठ में शिखान्यस्त करै । 'गे हैं इत्यादि कहकर दोनों हाथों की सब अंगुलि- यों से करच में न्यास करै । 'डों हो' इत्यादि कहकर तर्जनी,मध्यमा और अनामिका द्वारा नेत्र में तीन न्यास करें। 'डों हाः' इत्यादि कहकर करतल पृष्ठ में न्यास करें "डों हू: अस्त्राय फट्" इत्यादि कहकर तर्जनी श्यामारहस्य भाटी । ध्यमाभ्यां मूर्ध्नि ऊोर्ध्व तालत्रयं दत्त्वा छोटिकाभिदर्श दिग्वन्धनं कुर्यात् ॥ तदुक्तं कालीतन्त्रे। अङ्गन्यासकरन्यासौ यथावदभिधीयते । पदीर्घभाजा वीजेन प्रणवाद्येन कल्पयेत् ॥ हृदयाय नमः प्रोक्तं शिरसे वह्निवल्लभा । शिखायां वषडित्युक्त्वं कवचाय हुमीरितम् ॥ नेत्रत्रयाय वौपट् स्यादस्त्राय फट् प्रकीर्तितम् । वीज मंत्रा धीज न तु पारिभाषिकम् ॥ तन्त्रान्तरे स्मरणात् । । स्वतन्त्रेऽपि। प्रणवं चाद्यवीजञ्च पदीर्घस्वरभाषितम् । कुर्यात् षड़ गविन्यास मूलखण्डलयेण वा ॥ अथ प्रकारः। आद्यसप्तवीजेन हृदयम् । द्वितीय खण्ड पड़तरण शीर्षम् । तृतीयखण्डनवाक्षरेण शिखायाम् । पुनरां येन कवचम् । द्वितीयेन नेत्रत्रयम् । तृतीयखण्डेनास्त्रम् । इत्थं वा अङ्गन्यासं कुर्यात् । भैरवतन्त्रेऽपि। पड़गानि न्यसेन्मन्त्री त्रिः सकृद्वा यथाक्रमम् ॥ और मध्यमाद्वारा मस्तक में ऊोई तीन ताल प्रदान करके कन अंगुली से दशदिक् वंधन करे । काली तंत्र में कहा है, यथा अंगन्यास और कर न्यास यथावत् कथित होते हैं । प्रणवादिछ दीर्घ स्वरांत वीज द्वारा यथा क्रम से "हृदयायनम शिरसे स्वाहा" इत्यादि प्रयोग करै । स्वतंत्र में भी कहा है, मणव और दीर्घ स्वर भापित आद्य बीज पटक और मूल वीज के तीन खंड द्वारा पडङ्ग विन्यास करै । आद्य सप्तवीम द्वारा हृदय, द्वितीय खण्ड पडक्षर द्वारा गस्तक, तृतीय खण्ड नवाक्षर द्वारा शिखा इत्यादि क्रमसे अंगन्यास करें।
प्रथम परिच्छद।
अथवर्णन्यासं कुर्यात् । अं आंइ ई उ ऊ घर लं
नमो हृदि ए ऐ ओ औ अं अः कं खं ग घ नमो दक्षभुजे।
डं च छ ज झ अं। टं ठंडं ढं नमो वामभुजे। णं तथं दंधं
नं पं फंवं भं नमो दक्षजवायाम् । म य र ल वंशं पं संह
क्षं नमो वामजवायां न्यसेत् । तदुक्तं काली तने।
एवं यथाविधि कृत्वा वर्णन्यासं समाचरेत् । अ आ इई
उ ऋ र ल ल वै हृदये न्यसेत् ॥ए ऐ ओ औ ततः अंमः
क ख ग घ पुनस्ततः । उक्त्वा च दचिणभुजं स्टशेत् साधक
सत्तमः॥ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ तथा पुनः ।
इति वामभुजेन्यस्य । ण त थ द पुनः स्मरेत् । ध न प फ
पभ दक्षिणेज के न्यसेत् । म य र ल व श ष स ह क्ष धाम
जवके । तथैतलिखितवर्णस्वरसात् विन्दुरहितवर्णन्यासः।
विरूपाक्षमते तु सविन्दुरेव न्यासप्रमाणम् । तदुक्तं कवचे
लिखिष्यामः।
ऋपिब्रह्मा भवेन्छन्दोगायत्री मातृका पुनः। देवता व्यं-
अनं वीजंशक्तयस्तु स्वरास्ततः ॥ अव्यक्तं कीलकं ज्ञेयंन्यास
उक्तः क्रमेण तु।
उक्त इति पूर्वोक्तऋष्यादिक्रमवत् । क्रमेण न्यसेदित्यर्थः ।
षडङ्गं मातृकायाश्च साधकःकारयेत्ततः।
स्वराणां क्लीवहीनानां ऋ ऋल लू रहितानामित्यर्थः ।
एवं विधिना मातृका पडङ्गं कृत्वा ध्यायेत् यथा-
अनन्तर वर्णन न्यास करे । यथा-अं आं इत्यादि ब्रह्मऋपि गायत्री
चंद, मावका देवता, व्यंजन वर्णवीज, समस्त स्वरशक्ति, अव्यक्त कीलक
क्रमानुसार न्यास करै । अनन्तर साधक मातृका देवी का पडङ्गन्यास
कर और विधि विधान से मात्रका का पहगन्यास करके ध्यान करे
।
६
श्यामारहस्य भा०टी० । शरत् पूर्णेन्दुशुभ्रां सकलगुणमयीं लीलरक्तत्रिनेत्रां शु. क्लालङ्कारभूपां शशिमकुटजटाटोपयुक्तांप्रसन्नाम् । पुस्तीस पूर्णकुम्भान् बरमाप दधतीं शुक्लपट्टाम्बराढ्यां वाग्देवीं प- अवक्तां कुचभरन्मिताम् चिन्तयेत् साधकेन्द्रः ॥ एवं ध्यावा ललाटादिक्रमेण अकारादिक्षकारान्तं क्रमे ण न्यसेत् । यथा। श्रीक्रमे। ब्रह्मरन्ध्रे तथा वक्ते वेष्टने नयनद्वये । श्रुतिनासापुटइन्द्र ग. एडोष्ठद्वयकेऽपिच ॥ दन्तयुग्मे च मूर्दास्ये पड़र्णान् पोड़- श न्यसेत् । दोःपत्सन्धिषु साग्रेषु पार्श्वयुग्मे न्यसेत् पुनः ॥ पृष्ठनाभिद्वये चैव जठरे विन्यसेदथ। त्वगसृड्मासमेदोऽस्थि मज्जशुक्राणि धातवः ॥ प्राणजीवौ च परमो यकारादिषु संस्थिताः । एवं क्रमेण देवेशि न्यस्तव्या एतदात्मिकाः॥ हृदोर्मूलेऽपि विन्यस्य तथापरगले न्यसेत् । करमूले हृदार । . यथा-शरत्काल के पूर्ण चन्द्रमा की समान शुभ्रवर्णा, नाना विध गुण युक्त चंचल और लोहितवर्ण तीननेत्र युक्त श्वेत वर्ण के भूपणों से भूषित, पुस्तक, पाल्य ( माळा ) और पूर्ण कुंभ धारिणी, श्वेतवर्ण, पट्ट बत्र में मण्डित देह, पनकी समान वदन मण्डल युक्त और कुचभरे । नमित देह वाम् देवताको चिन्ता करै । इस प्रकारसे ध्यान करके, ललाटादिक्रमसे यथा क्रम अकार से क्षकार पर्यन न्यास करना चाहिये । यथा-श्रीक्रममें कहाहै, ब्रह्मरन्ध्र, बदन, वेष्टन, दो नेत्र, दो श्रवण, दो नासापुट, गण्ड और दो ओप्ठ दन्त युग्म और मस्तक, इन सबमे सोलह स्वर विन्यास करे । बाहु भौर पद सचि, दोनों पार्श्व, पृष्ठ और नाभि, जठर इन सबमें न्यास करै । त्वक, अस्थि, मांस, मेट, शोणित, मज्जा, शुक्र, सब धातु प्राण नीव, यह यकारादि में प्रतिष्ठित है। हे देवि ! उल्लिखित क्रमानु सार वह २ समस्त वर्ण उस उस पदार्थ में न्यस्त (संयुक्त) करै । हद मूलमें विन्यास करके फिर शपर गल में पियाम करना चाहिये । अनन्तर हृदयमे आरभकरके कर मूल मयम परिच्छद भ्य पाणिपादयुगे तथा ॥ जठराननयोाप्तिं न्यासेदित्यर्ण रूपिणीम् ॥एवं ज्ञानार्णवे।अन्यच्चललाटमुखवृत्ताक्षीत्यादि। अथ प्रयोगः-अंनमो ब्रह्मरन्ध्रे ललाटे वा आं नमो मुख वृत्ते एवं क्रमेण मकारपर्यन्तं विन्यस्य । यं त्वगात्मनेनमः। रं असृगात्मने नमः। लं मांसात्मने नमः । रं मेदात्मने नमः। वामांशे ककुदि वा शं असगात्मने नमः।पं मजात्म ने नमः । सं शक्रात्मने नमः । हं प्राणात्मनेनमः । लं जी. वात्मने नमः । शं परमात्मने नमः इति विशेषः॥ पंचाशदचरन्यासः क्रमेणैव प्रकाशितः । ओमाद्यन्तोन मोऽन्ताश्च सविन्दुर्विदुवर्जितः । मायालक्ष्मीवीजपूर्वोन्यस्त. व्य उच्यते वुधैः । ललाटेऽनामिकामध्ये विन्यसेन्मुखवृत्तके तर्जनीमध्यमानामा वृद्धानामा च नेत्रयोः ॥ अंगुष्ठं कर्णयो- Hष्य कनिष्ठांगुष्ठकोनसोः । मध्यास्तिस्रो गण्डयोश्च मध्य- पाणि पाद युग ( हाथपैर ) एवं जठर और आननमें वर्ण रूपिणी व्याप्ति (व्याप्तहोनेवाली ) न्यस्त करें । अव प्रयोग वर्णित होताहै 1-यया ओं नमो ब्रह्मरन्ध्र इत्यादि क्रमसे मकार पर्यन्त विन्यस्त करके यंत्चगात्मा को नमस्कार ,अमृतात्माको नमस्कार लमांसात्मा को नमस्कार, 'र' मेद आत्मा को नमस्कार वामस्कन्ध वा कुकुद (कंधे ) में श असगात्मा को नमस्कार पं मज्जात्माको नमस्कार सं शुक्रा त्याको नमस्कार हं प्राणात्मा को नमस्कार; ल जीवात्मा को नमस्कार, क्ष परमात्मा को नमस्कार, इत्यादि विधान में न्यास कार्य समायन करै । कमा नुसार यह पञ्चाश दक्षर न्यास प्रकाशित हुआ। इस के आदि अन्त में जोम, अन्त में नमः शब्द और विंदु प्रयोग करना चाहिये । अथवा विन्दु न देने पर भी चलता है पण्डित गण कहते हैं, प्रथममाया और लक्ष्मीबीज न्यस्त करना चाहिये । ललाट, अनामिका और मुख मण्डल में यथा क्रम से तर्जनी, मध्यमा और अनामिका, दोनों नेत्रों में वृद्धा, दोनों कणों में अंगुष्ठ नासिका के दोनों विद्रों में कनिष्ठा और अंगुष्ठ, दोनों गंदमें मध्यत्रय (नी १४ श्यामारहस्य भा. टी. । मामोष्ठयोन्यसेत् ॥ अनामांदन्तयोन्यस्य मध्यमामुत्तमांगके। मुखेऽनामा मध्यमांच हस्तेपादे च पार्श्वयोःकनिष्ठानामिका मध्यास्तास्तु पृष्ठे प्रविन्यसेत् । ताः सांगुष्टा नाभिदेशे सर्वाः कुक्षी च विन्यसेत् ॥ हृदये च तलं सर्वमंसयोश्च ककुत्स्थले। हृत्पूर्व हस्तपत्कुक्षिमुखेपुतलमेवहि ॥ एतास्तु मातृकामुद्राः क्रमेण परिकीर्तिताः । अज्ञात्वा विन्यसेद्यस्तु न्यासः स्पात स्य निष्फलः॥ अथ श्रीकएठन्यासो यथा। विन्यसेन्मातृकास्थाने श्रीकण्ठादीन्यथाक्रमम् । पूणों दर्यादिभिः सार्द्ध मातृकार्णसमन्वितान् ॥ श्रीकंठोऽनन्त सूक्ष्मौ च त्रिमूर्तिरमरेश्वरः । अर्धीशोभारभूतिश्चातिथीशः स्थागुको हरः ॥ झिएटीशो भौतिकः सद्योजातश्चानुमहे- श्वरः । भकूरश्च महाशैलः पोडश स्वरमूर्तयः ॥ पश्चात नों के बीच में ) दोनों ओष्ठ में मध्यमा, दोनों दंत पंक्ति में अनामा, उचः मांग में मध्यमा, मुख में अनामा, हस्त में मध्यमा, पाद और दोनों पार्य में कनिष्ठा और अनामिका, और पृष्ठ में तत्तत् अंगुली न्यस्त करके नाभि में उसके सहित अंगुष्ठ और कुक्षि में वह सब विन्यस्त करै। अनन्तर हृदय में दोनों अंशमें, ककुत् [ कंधा ] प्रदेश में हस्त, पद, कुशि और मुख में का सब विन्यस्त करै । यह सम्पूर्ण मातृका मुद्रा यया क्रम से कही गई । इन को न जान कर विन्यास करने से वह न्यांस सर्वदा निष्फळ होता है। अब श्री कंठन्यास कहते हैं । यया मातृका स्थान में पूर्णोदरी प्रकृति के सहित मातृका वर्ण युक्त श्रीकण्ठादि यया क्रम से न्यस्त करे। श्री कंड अनन्त, सूक्षा, विधि अमरेश्वर, अधीश, भार मविश अतिथीश, स्याणक र, झिण्टाश, भौतिक, सद्योजात, अनुग्रोवर, अफर, महाशील, और पदादेर, यह सोलह स्परकी मूर्ति हैं। इन कोही भी करादि कहते हैं। - प्रथम परिच्छेद । क्रोधीशचण्डेशपञ्चान्तकशिवोत्तमाः । अथकरुद्रकूर्मेकनेत्रा ईचतुराननाः ॥ अजेशः सर्वसोमेशस्तथा लांगलिदारुको । अर्द्धनारीश्वरश्चीमाकान्तश्चापाढिदंडिनौ । स्युरत्रिमीनमे पाख्या लोहितश्च शिखी तथा । छगलांडदुरंडेशौ समहाका लवालिनौ। भुजङ्गेश पिनाकीश खड्गेशाख्यावकेश्वरः॥श्वेत भृग्वीशन कुलिशिवाः समवर्तकः स्मृतः॥ एते रुद्राः स्मृता रक्काधृतशूलकपालकाः । पूर्णोदरी स्याद्विजया शाल्मली तदनन्तरम् ॥ लोलाक्षी वर्तलाक्षी च दीर्घघोणा समीरिता। सुदीर्घमुखी गोमुख्यो दीर्घजंघा तथैवच ॥ कुम्भोदयूंर्व्व केशी च तथा विकृतमुख्यपि । ज्वालामुखी ततो ज्ञेया प- श्चादुल्कामुखी तथा ॥ चुल्लीमुखी विद्यामुखी चैताः पोड़श शक्तयः। महाकालीसरस्वत्यौ सर्वसिद्धिसमन्विते ॥ गौरी त्रैलोक्यविद्याच मन्त्रशक्तिस्ततः परम् । आत्मशक्तिर्भूतमा ता तथा लम्बोदरी मता ॥ द्राविणी नागरी भूयः खेचरी चैत्र मंजरी। रूपिणी वीरणी पश्चात् काकोदर्यपि पूतना ॥ , . और कोधीश, चण्डेश, पंचात्मक, शिवोत्तम, एकरुद्र, कर्म, एकनत्र, अर्द चतुरानन, अजेश, सर्व सोमेश, लांगळ, दारक, अर्द्धनारीश्वर, उमाकांत आषाढी, दंती, अत्रि, मीन, मेप, लोहित, शिखी, छागलण्ड, द्विगएडश, महाकालवाली, भुजंगेश, विणाकीशः खड्गेश, वकेश्वर, श्वेतभृग्वाश, न- कुली, शिर, सम्वर्तक, इन को रुद्र कहते हैं। यह सररक्त वर्ण और सभी शूळ एवं कपाल धारी हैं । और पूर्णोदरी, विजया, शाल्मली लोलाक्षी, वर्तुळाक्षी, दीर्घ घोणा, दीर्घ मुखी, गोमुखी, दीर्य जंघा, कुम्भोदरी, ऊर्द केशी, विकृतमुखी, ज्वालामुखी, उरकामखा, चुन्ळीमुखी, विद्यामुखी, यह सोलह शक्तिहैं । महाकाली, सरस्वती, गौरी, लोक्यविधा, मंत्रशक्ति, आ. स्मशक्ति, भूतमाता, लम्बोदरी, द्राविणी, नागरी, खेचरी, मञ्जरी, रूपिणी, कारिणी, काकोदरी, पूनना, भद्रकाली, योगिनी, शतिनी, गर्जिनी, कालरा- काम इत्यादि । पुनार अनुसाप और रिलोम कम से मातृका स्थान श्यामारहस्य भा० टी० । स्याद्भद्रकाली योगिन्यौ शंखिनी गर्जिनी तथा । सकालरा. त्रिकुब्जिन्यौ कपर्दिन्यपि वञिणी ॥ जया च सुमुखी प्रोक्ता रेवती माधवी तथा वारुणी वायवी प्रोक्ता पश्चाद्रचौविदा- रिणी ॥ ततश्च सहजालक्ष्मीर्व्यापिनी माययान्विता । एता रुद्राङ्कपीठस्थाः सिन्दूरारुणविग्रहाः । रक्तो पलकपालाव्या अलंकृतकराम्बुजाः॥ अथ प्रयोगः यथा । अं श्रीकण्ठपूर्णोदरीभ्यां नमः इति ललाटे। आं अनन्तवीजाभ्यां नमः इति मुखवृत्ते । एवं क्र. मेण सर्व कुर्यात् । अथ पोढान्यासः। तदुक्तं वीरतन्त्रे । केवलां मातृकां कृत्वा मातृकां तारसंपुटाम् । मातृकापुर टितं तारं न्यसेत् साधकसत्तमः॥ ओं अंओं एवं तथैव'मातृकापुटितं एवं कामपुटितं तत् पुटितं कामम् । शक्तिपुटितं तत्पुटितां शक्तिम्। लज्जापुटित तत्पुटितां लज्जाम् । मन्त्रपुटितात् तत्पुटितं मन्त्रम् । पुरन वि, मिनी, कपर्दिनी, वज्रिणी, नया, सुमुखश्वरी, रेवती, माध्वी, वारुणी वायवी, चनोविदारिणी, सहना, लक्ष्मी और माया, यह रुद्रगणों की आ पीठस्थ और सभी सिंदूर की समान लोहित शरीर सभी रक्तोत्पल और कपाल इम्ता और समस्तही अलंकृत कराम्बुम है । इन का प्रयोग । यया- डॉ श्री कण्ठपर्णोदरी दोनों को नमस्कार है । यह कहकर ललाट में न्यास करे । इत्पादि। अब सोदाम्पास कथित होता है । वीर तंत्र में कहा है, केवळ मातृका विधान पूर्वक प्रणय पुटित मातृका और मातृका पुटिन मणा विन्यस्त को। यया 'नो यं वो इस प्रकार मातृका पुटित और काम पटित एवं तत्पुटित । प्रथम परिच्छेद । लोमविलोमतः केवलमन्त्रं मातृकास्थाने न्यस्य अष्टोत्तरश- तेन व्यापकं कुर्यात् । इति गुप्तेन दुर्गाया अङ्गपोढ़ा प्रकीर्तिता। तारायाः कालि कायाश्च तन्मुख्याश्च तथापि वा ॥ कृतेऽस्मिन्न्यासवर्ये तु सर्व पापं प्रणश्यति ।विपापमृत्युहरणं ग्रहरोगादिनाशनम् ।। दुष्टसचा विनश्यन्ति शत्रवोयान्ति मित्रताम् कविता लहरी तस्य द्राक्षारस परम्परा ॥ अणिमाद्यष्टसिद्धिस्तु तस्य हस्ते व्यवस्थिता। कायिकं वाचिकं वापिमानसश्चापि दुस्कृतम् ॥ सर्व तस्य विनाशत्वं याति न्यासस्य चिन्तनात् । पुरस्कृत्य क्षयं याति यत्किञ्चिदुपपातकम् यद्रूपं दृश्यते योहि स तद्रूप उच गच्छति यं नमन्ति महेशानि ! षोढ़ापुटतिविग्रहाः । अल्पायुः स भवेत् सद्यो देवता कम्पतेभिया ॥ अथ तत्वन्यासः । मूलविद्या स्वतन्त्रे । आत्मविद्या शिवैस्तत्त्वैस्तत्वन्यासं समाचरेत् ॥ में केवल मंत्र न्यास करके अष्टोत्तर शत द्वारा व्यापक विधान करै । इसकाही नाम दुर्गा और कालिका का अंग पोढा है । इस पोढ़ा विधान करने से सम्पूर्ण पाप नष्ट होते है । विष और अपमृत्यु दूर होती है, गृहरोगादि दूर होते है, दुष्ट सत्व विनाशित होते है शत्रुओं में मिल अता होती है मुखसे द्राक्षारसधारा की समान रसमयी कविता लहरी नि- गत होती है, अणिमादिक आठ सिद्धि हस्तगत होती हैं, कायिक, वाचिक और मानसिक पाप सम्पूर्ण इस न्यासके चिंतामात्र से ही तत्काळ दूर होते हैं, और जो कुछ उपपातक हैं, वहभी इसी प्रकार नष्ट होते है, हे महेशानि ! पोढा पुटित विग्रह व्यक्ति गण जिसको नमस्कार करते है, वह व्यक्ति शीघ्र अल्पायु होता है और देवतागण भी उसके भयसे कम्पित होते है । अब तत्व न्यास कथित होताहै ! स्वतन्त्र में कहा है, आत्म तत्व, विद्या तत्व और शिवतत्व द्वारा तत्व न्याय करें । फिर जीव न्यास करै । जैसा ५८ श्यामारहस्य भा०टी० । अथ जीवन्यासं कुर्यात् । यथा कुमारीतन्त्रे । ब्रह्मरन्ध्रे भ्रुवोमध्ये ललाटे नाभिदेशके । गुह्ये वक्तेतु सर्वांगे सतवीजान् क्रमान् न्यसेत् ॥ अथ प्रयोगः-माधवीजमुच्चार्य नमो ब्रह्मरन्ध्र एवं दि. सीयबीजं श्रुवि । तृतीयं भाले चतुर्थ नाभी पंचमं गुह्ये षष्ठं वक्ते । सप्तमं सर्वांगे न्यसेत् । ततः प्रणवपुटितमूलेन व्या. पकन्यासं कुर्यात् नवधा सप्तधा पंचधा वामस्तकादिपाव पर्यतं पादादिमस्तकांतं न्यसेत् । तदुक्तं भैरवतन्त्रे- पंचधा नवधा वापि मूलेन सप्तधा तथा ॥ व्यापकं कुर्यादित्यादि । स्वतन्त्रेऽपि मूलेन व्यापकं न्यासं नवधा कारयेत् प्रिये ॥ इविमहामहोपाध्यायश्रीपरमहंसपरिव्राजकश्रीपूर्णानन्दगिरिविरचिते श्यामारहस्येन्यासांतविवरणनामप्रथम परिच्छेदः । कि कुमारी तन्त्र में कहा है, ब्रह्मरन्ध्र, 5, ललाट, नाभिदेश, गुह, बक (मुख) और सर्वांग में यथाक्रम से सप्तवीन न्यस्त करै। प्रयोग यथा-आयवीन उच्चारण करके ब्रह्मरन्ध्र में नगः इस प्रकार की फिर द्वितीय वीज 5 में, तृतीय वीज ललाट में, चतुर्थ वीज नामिमें, पंचम वीन गुह्य में, पष्ठ वीज वक्र में और सप्तम वीज सर्वाग में न्यस्त करै । फिर प्राय पुष्टित मूल मन्त्र में व्यापक न्याप्त करके नव (९)बार, सार वार, वा पांचवार मस्तकादि पद पर्यत और पादादि मस्तक पर्यंत न्याप्त करै । भैरव तंत्रमें इसी प्रकार कहा है,-पथा पांचवार, नववार, अथवा सातबार मूलकी सहायतासेव्यापकन्यास करे, इत्यादि । स्वतंत्र में भी का, है प्रिये ! मूळकी सहायता से नौ धार व्यापक न्यास करना चाहिये । इतिश्री महामहोपाध्याय श्रीपरमहंसपरिवाना श्रीपूर्णानंदगिरि विरषित श्यामारहस्य मापाटीकासहित न्यासान्त विमरण नाम प्रथमपरिच्छेदः ॥ १ ॥ aur , द्वितीय परिच्छेद.। अथ द्वितीयः परिच्छेदः। वक्ष्ये दृष्टादृष्टफलप्रदम् । गुरुध्यानं प्रकु- यथा पूर्व विशालधीः ॥ स्नायाच विमले तीर्थे पुष्करे- विन्दुतीर्थेन वा स्नायात् पुनर्जन्म न विद्यते ।। शिवतीर्थकेऽस्मिन् ज्ञानाम्बुपूर्णेऽथततःशरीरे। स्नाति तयोः सदायः किं तस्य गाङ्गैरपिपुष्करैर्वा । स्नानम् ॥ समायोगोयस्मिन् काले प्रजायते।सां सन्ध्या समाधिस्थैः प्रतीयते ॥ इति सन्ध्योपासनम् ॥ अथ मूलधारात् कुलकुण्डली सोमसूर्याग्निरूपिणीं समु- परविन्टुं निर्भिद्य देहदेवतां तर्पयेत् । तदुक्तं- चन्द्रार्कानलसंजुष्टाकुलितं यत् परामृतम् । तेनामृतेन तर्पयेचेन देवताम् ॥ इति तर्पणम् । । जिसके द्वारा दृष्ट अदृष्ट फल प्राप्त होता है इससमय वही अन्तर्यजन कहते । विशाल बुद्धि पुरुष पूर्वको समान यथाविधानसे गुरुका ध्यान कर और विमल पुष्कर तीर्य में अथवा विन्दु तीर्थ में स्नान करै, तो पुनर्ज- नहीं होता। ईडा और पम्ना इन दोनों को शिव तीर्थ कहते है । यह जळसे पूर्ण हैं । जो व्यक्ति ब्रह्म सलिलमें अर्थात् इन दोनों तीर्थ में स्नान करता है उसको गंगाजल अथवा पुष्करके नलमें स्नान करने कोई. आवश्यकता नहीं है । यह स्नान वर्णित हुआ । जिप्त समय शिव शक्ति इन दोनों का मिलाप होता है कल निष्ठगणों की वही संध्या है परायण होनेपर उसकी प्रतीत होसक्ती है । संध्योपासन वर्णित हुई। अनन्तर मूलाधार से सोम सूर्याग्नि रूपिणी कुल कुण्डलिनी को समुत्था- पित ( उठाना ) और परविन्दु को निर्भेद करके देह देवताका तर्पण करै । वही कहा है, यथा--जो परमामृत चन्द्र सूर्य और अग्नि से संजुष्ठ (मिलित) और भाकुकित है, उसी दिव्य अमृतसे. देवताका नर्पण करै । यह तर्पण श्यामारहस्य भा०टी० । ब्रह्मरन्ध्रादधोभागे यच्चांद्रं पात्रमुत्तमम् । कलासाधनं संपूर्य तर्पयेत्तेन खेचरीम् ॥ इत्यर्य साधनम् । आधारे लिङ्गनाभी हृदयसरसिजे तालुमूले ललाटे हेपत्रे षोड़शारे द्विदशदशदल द्वादशाः चतुष्के । वासान्ते पान- मध्ये डफकठसहिते कण्ठदेशे स्वरांश्च । हक्षौ कोदण्डमध्ये न्यसतु विमलधीास सम्पत्तिसिद्ध्यै ॥ इति मातृकार्यान् कण्ठच्छदक्रमेण ध्यायेत् । अथ षडंगन्यासः। तदुक्तं गौतमीये । इज्यमानहृदर्थोऽयं हृदये स्याच्चिदात्मकः । क्रियते स. त्परत्वेन हृन्मन्त्रेण ततः परम् ॥ सर्वज्ञादिगुणोत्तुंगे संविद्रूपे परात्मनि । क्रियते. विषयाहारः शिरो मन्त्रेण देशिकः ॥-ट्ट- च्छिरोरूपसिद्धो नियता भावनादृढ़ा। क्रियते निजदेहस्यशि- खामन्त्रेण देशिकः ॥ मन्त्रात्मकस्य देहस्य मन्त्रवाच्येन ते. जसा । सर्वतो धर्ममंत्रेण अहन्यहनि संवृतिः॥ घर्णित हुआ। ब्रह्मर-ध्र के अधोभाग में, जो चंद्र संबंधीय पात्र हैं, उसको कलासाधन की सहायता से पुरण करके उसके द्वारा खेचरीका तर्पण करै। इसकाही नाम अर्ण साधन है । विमल बुद्धि साधक आधार में, लिंगनाभि में, हृदय सरोज में, तालु मूल में, ललाट में, पोशारमें, द्विदश दशदल में, पड़ दक पदमें, चतुर्दल में वा सान्त में और वाल में एवं रुक, फ, उ, ठ, सहित कण्ठदेश में और कोदण्ड में न्यास सम्पत्ति सिद्धि के लिये इ, उ, आ, और संपूर्ण स्वर संयुक करै । इस प्रकार से कण्ठच्छद क्रमानुसार समस्त मात्र का पर्गका ध्यान करे ॥ अब पडद्न्यास कीर्तन किया जाता है । गौतमीय में कहा है, हृदयमें जो चिदात्मक वस्तु है, वह सयकोही सायनीय है अर्थात् सपकोही उसका सापन करना चाहिगे । इसी कारण तत्पर होकर हन्मव द्वारा उसकी सा. धना करे । सम्चिन मालात परगान्मा का का है । समादि गण परम्परा पी सहायनागे उस परमामा ने मंमार में मयको भगता उनमा लाभ द्वितीय परिच्छेद । इति अहिंसनीयवह्विलक्षणम् । यत्र क्षणे हिंसाणांहिंसो पाया न प्रवर्तते इत्यर्थः। • यो ददाति परं ज्ञानं संविद्रूपे परात्मनि । हृदयादिमयं तेजः स्यादेतन्मैत्रसंज्ञितम् ॥ आध्यात्मिकादिरूपं यत् सा- धकस्प विनाशयेत्।अविद्याशतमंत्रं तत्परं धाम समीरितम् ॥ इति षडङ्गन्यासं विधाय ध्यानं कुर्यात् । यथा उदया. करपद्धत्यां। शक्तिद्वयपुटांतस्थं लक्षदयसुसंस्थितम् । ज्योतिस्तत्वमयं ध्यायेत् कुलाकुलनियोजनात् ॥ अथवा-शृङ्गाटद्वयमध्यस्थं शक्तिद्वयपुटीकृतम् । सदा समरसं ध्यायेत् कालं तत्कुलयोगिनाम् ॥ अन्यच्च-किरणस्थं तदग्निस्थं चंद्रभास्करमध्यगम् ॥ महाशून्येन यत्कृत्वा पूर्णस्तिष्ठति योगिराट् ॥ महाशून्य इति सर्वोपाधिविनिर्मुक्ते। पूर्ण इति सर्वोपाधि विनिर्मोक्षात् विभागविरहात् पूर्ण एव भवतीति । अथवा निरालम्बपदेशून्ये यत्तेज उपपद्यते। तदर्भमभ्यसेन्नित्यं ध्यान तत्कुलयोगिनाम् ॥ किया है। साधक शिरो मंगकी सहायतासे उस में उलिखित चिदात्मक वस्तु की साधना करते हैं इसकाही नाम अहिंसनीय वहि लक्षण है । इस प्रकार पडन्यास विधान पूर्वक ध्यान करनाचाहिये । जैसे-उदयाकर पद्धति में कहा है-फुलाकुळ नियोजन सहित ज्योतिस्तत्वमय ध्यान करै । अथवा शृङ्गारद्वितय ( भाल मध्य में ) मध्यस्थित और दो शक्ति पुटित समरस ध्यान करै । अन्यत्रभी कहा है, उपाधि शून्य, आलम्बन शून्य ब्रह्मपदमें जो तेज सत्पन्न होता है, उसी अन्तःकरणस्थ तेनका बारम्बार ध्यान करे । यही कुन योगी गणों का ध्यान है।
। ५२ श्यामारहस्य भा० टी० । तदर्भमिति अन्तःकरणस्थं अभ्यसदिति वारंवारं कुर्या- दित्यर्थः॥ इति ध्यानम् ॥ अचयन् विषयैःपुष्पैस्तरक्षणात्तन्मयो भवेत् । न्यासस्तन्म- यताबुद्धिः सोऽहम्भावेन पूजयेत् ॥ तन्मयेति तदेवात्मतत्त्वज्ञानम् । सोऽहमिति तत्वम्पदबो- धनार्थ परिचिन्तनमात्रम् । विषयपुष्पाणि यथा- अमायमनहङ्कारमवादमपदं तथा। अमोहकमदम्भश्चत. स्वाक्षोभकं तथा ॥ अमात्सर्यमलोभञ्च दशपुष्पविदुर्बुधाः अहिंसा परमं पुष्पं पुष्पमिन्द्रियनिग्रहम् ॥ दयापुष्पं क्षमापुष्पं ज्ञानपुष्पञ्च पञ्चमम् । इत्यष्टसप्तभिः पुष्पैः पूजयेत् परमेश्व- रीम् ॥ इति पूजनम् । माला पंचाशिकाप्रोक्ता सूत्रं शक्तिशिवात्मकम् । प्रथिता कुंडलीशक्तिः कल्पान्ते मेरु संस्थिता । एवं विधिना वर्णमालामुपस्कृत्य क्षमेरुरूपं कृत्वा अका- .. भली भांति पुष्प की सहायता से पूजा करने पर तत्काल सापक तन्मय होता है । तन्मयता बुद्धि का नाम न्यास है । सोह-भाव में पूजा करनी चाहिये । यहा तन्मयता शब्द में आत्मतत्व ज्ञान है । सोह शब्द में तत्व, पद शोधनार्य, परिचिन्तन् मात्र पूना का उपकरण, यही मावार्य है । वि. पय पुष्प शब्द में अमाया, अन अहकार, अमोह, अमद, अमात्सर्य अलोभ, इत्यादि समझना चाहिये । इसके अतिरिक्त, अहिंसा इन्द्रिय निग्रह, दया, तमा और शान, इन पाँचको मी पुष्प कहते हैं । इन सब पुष्पों में परमेश्वरी की पना करनी चाहिये । इसकाही नाम पूजा है। पश्चाशत (पचास ) वर्णकी माला एवं शिव और शक्ति को भूत्र कहते हैं। इस प्रकार विधान से वर्ण माला उपाहत ( बनाप ) कर, कार से .
दतीय परिच्छेद । कम् ॥ प्रकृति कमळं चैव शेष पृथ्वीं तथैव च । सुधाम्बुधि मणिद्वीपं.चिंतामणिगृहं तथा ॥ श्मशानं पारिजातञ्च तन्म ले रत्नवेदिकाम् । तस्योपरिमणेः पीठंन्यसेत् साधकसत्तमः।। चतुर्दिक्षु मुनीन् देवान् शिवांश्च शवमुण्डकान्। धर्माश्चैवाप्य वर्माश्च पादगात्र चतुष्टये ॥ । पादगात्र चतुष्टयन्तु-दक्षांस-क्षमुख-दक्षजहा-दक्षपाव दिकम् ॥ हृदि कन्दं तथा पद्मं सूर्य सोमं महेश्वरि।वैश्वानरं तथा सत्वं रजश्चैव तमस्तथा । भात्मानश्चैव विन्यस्य शक्तिं हृत्प प्रकेन्यसेत् । आत्मानमितिमात्मशब्देनात्मचतुष्टयमुच्यते।शक्तिर्यथा- इच्छा ज्ञाना क्रिया चैव कामदा कामदायिनी । रतीरति प्रेयानंदा तथैव च मनोन्मनी ॥ वाग्भवं प्रथमं चोक्त्वा प- ाय तदनंतरम् । अपरायै द्विरूपायै हेसो वाच्यावतःपरम् ।। दाशिव महाप्रेत डेंतं पद्मासनं तथा । नम इत्येव मंत्रोऽयं ठिन्यास उदाहृतः। एवं पीठे देहमये चिंतयेदिष्टदेवताम् ॥
स्वरूप है। इस प्रकार कामकलाका ध्यान करें। यह ध्यान अत्यन्त गा m अब कामकला वर्णित होती है। यपा-मुख विन्दु की समान आकार युक उसके निम्न में कुच युगल । वह सर्वविध विद्यारूपी अमृत में पूर्ण । णे देवता और भूतवर्ग उसके अन्तर्निवष्ठ हैं सम्पूर्ण देवता उसको नमस्कार करते हैं वह सब प्रकार के भाहलाद में परिपूर्ण और सबकी वशीकरण श्यामारहस्य भा० टी०। अथादौ कामकलारूपमात्मानं विभाव्य मूलाधारात् कुंड लिनी परमशिवांतं ध्यात्वा चंद्रामृतेन संप्लाव्य करकच्छपिक या पुष्पं गृहीत्वा सुपुम्नया आवाह्य हृदयाष्ट दलरक्त पद्ममध्ये ध्यायेत् । तदुक्तं स्वतंत्रे ॥ अतः कामकला ध्यानमावाह्य कालिकां शिवाम् । कूर्मा ख्यमुद्रया पुष्पैश्चक्रमध्ये निधापयेत् ॥ अथ कामकला यथा। , मुख विंदुवदाकारं तदधः कुचयुग्मकम् । सर्वविद्या मृता पूर्ण सर्ववाग्विभव प्रदम् ॥सर्वार्थसाधकं देवि सर्वरंजन कार कम् । तदधः सपराईच सुपरिष्कृतमण्डलम् ॥ सर्व देवादि भूतान्तःसर्वदेवनमस्कृतम् । सर्वाहादसुसंपूर्ण सर्ववश्यप्रव. श्यकम् ॥ एतत् कामकलाध्यानं सुगोप्यं साधकोत्तमें। अनन्तर आदि में काम कलारूप आत्मा की विशेष प्रकार भावना कर मूलाधार से परम शिव पर्यन्त कुण्डलिनी के ध्यानान्तर चन्द्रामृत द्वारा सप्लानित और कर कच्छपिका ( कछुई ) द्वारा पुष्प ग्रहण पूर्वक सपना द्वारा आवाहन करके हृदयस्थ अष्टदल रक्त पद्ममें ध्यान करना चाहिये । खतन में यही कहा है । यथा-अतएव काम कला का ध्यान करके परम मंगल रूपिणी कालिका को आवाहन कि कुसुम मुद्राकी सहायता मस्त पुप्प निवेदन करके चक्र में सन्निधापित ( स्थापित ) करै। सविध वाग्विन प्रदान और सविध मनोरथ समाधान और सबका मनो रंजन करती है। उसके नीचे अपराई सुपरिष्कृत मण्डलमें अलकृत है । सेस sho २७ तृताय पारच्छद। श्रीक्रमेऽपि- ' . या सा मधुमती नाम्ना मायामोहन कारिणी । वाह्या- भ्यन्तरयोगेन चिन्तनीयाञ्च तां शृणु ॥ त्रैलोक्यमेकरूपेण- स्वात्मानमेकरूपिणम् । एकाकृतिस्वरूपेण सर्व शान्तिं विचिन्तयेत् ।। कामयेत् कामिनी सर्वी देवीमीश्वररूपिणीम् । चिन्ययेत् सुन्दरी देवी सर्वव्यापककारिणीम् । ईकारः सर्व- मन्त्रः स्यादपर स्याच्चतुष्टयम् । विन्दुत्रयस्य देवेशि ! प्रथमे देवि ! वक्त के । विन्दुद्वयं स्तनद्वन्द्वं हृदि स्थाने नियोज- येत् । हकारार्द्धकलां सूक्ष्मां योनिमध्ये विचिन्तयेत् ॥ तथा कामकलारूपां मदनांकुरगोचरे । उद्यदादित्यसङ्काशां सिन्दू • राभा स्तनद्वये॥ विंदु सङ्कल्प्य वक्तेत स्फुरदीपशिखां प्रिये। आधाराद्ब्रह्मरन्ध्रान्तं तन्त्रमार्गेण भावयेत् ॥ कामविंदुरह , देवि तत्रस्था परमेश्वरीम् । शिवशक्तिमयीदेवि तदधःस्थात् कुचद्वयम् ॥ तदधः सपरार्द्धच चिद्रूपां परमां कलाम् । सापि रखना चाहिये । श्री क्रममें भी कहा है, मधुमती नामक जो माया सब को उत्पन करती है, बाहर और भीतर उसकी जिसमें चिन्ता करनी चाहिये सो श्रवण करो | एकरूप में त्रैलोक्य, एकरूम में वो आत्मा और एकबर में सर्वविध शान्ति की चिन्ता करनी चाहिये । उस वर रूपिणी देवी को यावतीय कामिनी रूपमें और सर्व व्यापक कारिणी मुंदरी रूपमें ध्यान करै । प्रथम देवीके वश में तीन विन्दु और हृदय में दो विन्द स्वरू स्तन द्वन्द्व ( दोनों छाती ) नियोजित करके सूक्ष्म हकारार्द्ध काल योनि में चिन्ता करै । फिर मदनांकुर गोचर में कामकला रूपकी भावना करनी चाहिये । यह कामकला उदय हुए प्रभाकर ( चद्रमा की समान और सिंदग्बत् आभा युक्त है । हे प्रिये ! दोनों स्तन में विन्दु कल्पना करके बदन मण्डल में आधार से ब्रह्मान्न पर्यंत तत्र मार्गानुसार स्फूर्तियती की दीप शिखारूप में चिंता करै । मैही वह विन्दुरूप काम हूं । साक्षात् पर मेश्वरी उम विंदु में विराजमान है । उमके अधोवी दोनों कुच शिवशक्ति श्यामारहस्य, भा. टी। कुण्डलिनी शक्तिः कामकलास्वरूपिणी ॥ सा शिखा. वर्त्म गच्छन्ती भित्त्वा ग्रन्थि चतुर्दश । प्रविश्य परमार्गन्तु सूक्ष्ममार्गस्वरूपिणी ॥ सापि च त्रिविधा सृष्टिब्रह्मविष्णुस्व- रूपिणी । सञ्चिन्त्य साधक श्रेष्ठस्त्रैलोख्यं वशमानयेत् ॥ तत्ते कथिनं देवि कामकलाविनिर्णयम् । गोप्तव्यं हि प्रयोन यदि च्छेदात्मनो हितम् ॥ अथ कूर्ममुद्रा यथा। कालिकापुराणे । वामहस्तस्य तर्जन्यां दक्षिणस्य कनिष्ठिकाम् । तथा . क्षिणतर्जन्यां वामांगुष्ठेन योजयेत् ॥ प्रोन्नतं दक्षिणांगुष्ठं वा मस्य दक्षिणादिकाः । अंगुलीर्योजयेत् पृष्ठे दक्षिणस्य कर स्यच ॥ वामस्य पितृतीर्थेन मध्यमानामिके तथा । अधोमुखे चते कुर्यात् दक्षिणस्य करस्यच॥कूर्म पृष्ठसमं कुर्यादक्षिण करस्य च । एवंविधः सर्व सिद्धिं ददाति पाणिकच्छपः । भय हैं उसके अधोभाग स्थित सपरार्द्ध चित् स्वरूपिणी परमा कला है। इस काही नाम कामकला स्वरूपिणी कुण्डलिनी शक्ति है । यह चौदह ग्रंथि भेद कर शिस्लावर्म में गमन और सूक्ष्ममार्ग रूप एवं परमार्यमें प्रवेश करती है। पही प्रिविधा सृष्टि और यही ब्रह्मा विष्णु स्वरूपिणी है। इसकी चिंता करने से साधक श्रेष्ठ होकर तीनों लोकोंको वशीभून करसक्ता है। हेदेषि मैने तुम्हारे निकट यह कामकलाका स्वरूप कीर्तन किया। अपने हित की कामना होने से इसका यत्न सहित गृप्त रखना चाहिये। कप पुद्रा यथा--कालिका पुराण में लिखा है वाम हस्तकी तर्ननी निग हस्तकी कनिष्ठ अंगुलि और दक्षिण हस्त की तमनी में बाम स्त का अंगुट पोगना ( मिलाय ) करके दक्षिण हस्त के अगुष्ठ को ऊंचा कर काम हस्त की मध्यपादि सब अंगुलि दक्षिण हस्त के कोड़ में, न्यरत करे । फिर वाम उस्त की तर्जनी और अंगृष्ठ के मध्य भाग में दक्षिण हम्त की अनामिका और मध्यमा अधोमुख में संयोजित करके, दक्षिण हम्न का प्रदेश कदएकी पनि समान ऊंचा करना चाहिये। इसका नाम A हनीय परिच्छेद। र्यात्तु नयनामे तु निर्माल्य नयनद्वयम् । समं काय शिरो प्रीवं कृत्वा स्थिरतरो बुधः। ध्यानं समारभेन्मन्त्री सर्वपाप विनाशनम् ॥ ध्यानं यथा स्वतंत्रे। देव्या ध्यानं प्रवक्ष्यामि सर्वदेवोपसेविताम् । अनाद्रि निभां देवीं करालवदनां शिवाम् ॥ मुण्डमालावकीर्णासा मुक्तकेशी स्मिताननाम् । महाकाल हृदम्भोजे स्थितां पीन पयोधराम ॥ विपरीतरतासक्तां घोरदंष्ट्रां शिवै सह । नागय ज्ञोपवीताञ्च चन्द्रार्द्धकृतशेखराम् ॥ सर्वालङ्कारयुक्ताश्च मुण्ड मालाविभूषिताम् । मृतहस्तुसहस्रेस्तु काञ्चीबद्धां दिगम्ब रीम् ॥शिवाकोटिसहस्तु योगिनीभिर्विराजिताम् । रक्तपू णमुखाम्भोजां मदपान प्रमत्तकाम् ॥ वलथर्कशशिनेत्रान्तु वहिविन्दुयुताननाम् । विगतासुकिशोराभ्यां कृतकर्णावतं पाणि कच्छप वा कूर्म मुद्रा है । इसके द्वारा सर्व प्रकार की सिदि संग्रहीत होती है। दोनों नेत्र निर्मालित ( बंदकर ) करके नासाग्रमें इसका विधान करे एवं काय, शिर और प्रीया समभावमें रख, स्थिर तरहो ध्यानमें मवृत्त होरे । वो समस्त पाप नष्ट होते हैं । ध्यान यया स्वतंत्र में कहाहै, संपूर्ण देवता जिसकी सेवा करते हैं, उसी देवीका ध्यान कहता है। वह अंजन पर्वत सन्निभा, स्वप्रकाश युक्त, कराळ बदना, परम मंगळ स्वरूपिणी मुक्तिकेशी, स्मेरानना, मुण्डमाला; समलंकृत गळदेश युक्त, महाकालके हत पद्ममें अधिष्ठिता पीन पयोधरा, विपरीत रतासक्त, शिवागण परिवेष्ठता भयंकर दंष्ट्रा संपन्न सर्व यज्ञोपवी- त में अलंकना अर्द्धचंद्रकृत शेखर शालिनी सलिंकार भूपित, मुण्डमाला में अलंकृत, सहस सहस्र मृत हस्निके कानी दाम में विमण्डित, दिग्बना, शिवा कोटि सास की समभि व्याहारिणी योगिनियों में परिवारिता, रक्तपूर्ण मुखपबसे मुशोभिता, पदपान में मत्त भावापन, सूर्य, सोम और भामरूप सीन नेत्र में विमण्डित हैं । उसका बदन मंडल शोणित संसर्ग.स तृतीय परिच्छेद। कण्ठावसक्तमुण्डाली गलद्रुधिरचर्चिताम् ॥ कर्णावतंसता नीतशवयुग्मभयानकाम् । घोरदंष्ट्रां करालास्यां पीनोन्नत पयोधराम् ॥ शवानां करसंघातैः कृतकांची हसन्मुखीम् । सृक्कद्वयगलद्रक्तधाराभिःस्फुरिताननाम् ॥ घोररूपां.महारौद्रीं श्मशानालयवासिनीम् । दन्तुरां दक्षिणव्यापिमुक्तालम्बिच 'चोच्चयाम् ॥ शवरूप. महादेव हृदयोपरि संस्थिताम् । शिवा- भि|ररावाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम् ॥ महाकालेन च समं विपरीतरतातुराम्। भजेत्रिजगतां धात्री स्मेराननसरोरुहाम् एवं संचिन्तयेत् काली धर्मकामार्थ सिद्धिदाम 1ो अथानयोरेकतरेण देवीं ध्यात्वा मानसोपचारैराराध्य पूर्व वजपहोम कृत्वा नमस्कार स्तोत्रपाठं च कुर्यात्॥ यंत्र नि: र्माणार्थ पात्राणि यथा मुंडमालातंत्रे -1 । . श्यामा और दिगम्बरी है। उसके कंठमें मुण्डमाला दोलायमान है। गिरती 'हुई रुधिर धारा में उसका कलेवर चर्चित होता है। उसके कर्ण में शव युग्मकी भूपण है। उमसे वह भयानक हुई है । उसके दंया घोर भावापनहें पयोधरै पानामत हैं शिव सम्हके कर समूह में उसकी काची कोंधनी ) निमितहुई है। उसका बदन मण्डल सँहास्य है। उसके दोनों सका(गल्फ) से जो रुधिर धारा गिरती है जिसके द्वारा उसका आनन प्रस्फुरित (खिला) हुआ है। वह घोर रूपा, एवं रौद्रकृति और श्मशान में वास करती है । वह शवरूप महादेव के हृदयोपरे अवस्थिति करती है। शिवागण भयंकर स्वर से उसके चारों ओर चीतकार करती है । वह महाकाल के संग विपरीत रतमें मत्त हैं। वह त्रिजगत् की धात्री है । उसको चदन सरोह मृ? मद हॉस्प में अलकन है। धर्म, कामार्य-सिदि दायिनी कालिका की इस रूप में चिती करें। इन दोनों के एकत्तर ध्यान द्वारा देवीका ध्यान करके, मानस उपचार समूह में आराधना कर पूर्वकी समान जिप होम सहित नमस्कार स्तोत्र पाठ करें। + श्यामारहस्य भा०टी०। ताम्रपाले कपालेवा श्मशाने काष्ट निर्मिते । शनि भौम दिने वापि शरीरे मृतसम्भवे । स्वर्णरौप्ये च लौहेवा चक्रम भ्यर्च्य यत्नतः ॥ स्वतन्त्रेऽपि। इत्यं विन्यस्तदेहः सन् चक्रराजं समालिखेत् ॥ सुवणे रजते ताने पाषाणे वाष्टधातुषु ॥ इति ॥ अथ वहिः पूजार्थ वक्ष्यमाणगन्धाष्टकलिप्ते स्वर्णादिकुं. ण्डगोलस्वयम्भू कुसुमागुरुलिप्ते वा स्वर्णरजतताम्र शलाक- या विन्दुकण्ठकेन पुष्पेण वा मन्त्रमुच्चरणन् । विन्दुमाया युत त्रिकोणपंचवृत्ताष्टदलपद्मचतुरस्रं चतुर्दारात्मकम् यन्त्र- राजंलिखेदिति सत्सम्प्रदाया वदन्तिातथाच कालीतंत्रे, आदौ त्रिकोणं विन्यस्य त्रिकोणं तद्वहिन्यसेत् । ततो वे विलिखेन्मन्त्री त्रिकोणत्रयमुत्तमम् ॥ ततो वृत्तं समालि ख्य लिखेदष्टदलं ततः । वृत्तं विलिख्य विधिवल्लिखेत् नूपुर युग्मकम् ॥ यंत्र निर्माणार्थ सम्पूर्ण पात्र यथा-मुंडमालातंत्र-ताम्रपात्र में, कपाल में, श्मशान काष्ठ निर्मिन पात्र में, शनिवा मंगलवार में मृत व्यक्ति के देह में मु. वर्ण चांदी वा कोहे के पात्र में यत्न सहित यंत्रकी अभ्यर्चना करै सत्र में भी कहा है इस प्रकार अंगन्यास करके सुबर्ण, रजत, ताम्र, पाषाण, अथवा अष्टधातु में यंत्रराज अंकित करें। अनंतर वहिः [ वाहिरी ] पूना के लिये निम्न लिरिवत अष्टविध गंध में विलिप्त प्रदेश में सवर्ण, रमत (चांदी) वातान निर्मित शलाका अथवा विकएटक पृषद्वारा मंत्रोच्चारण सहित विद और मायावीज युक्त त्रिकोण पंचवृत्त अष्टदछ पद चतुरस और चतुर्दार युक्त यंत्रराज अंकित करै । सब संप्रदायगण इसमकार कहते हैं । तथा कालीतंत्र में भी लिखा है, आदि में त्रिकोण विन्यस्तकरके उसके बाहर त्रिकोण विन्यस्त करना चाहिये। अनंबर उत्कृष्ट विधान से तीन त्रिकोण अंकित करे । तदनंतर गोलाकार लिखकर अष्टदल लिवना चाहिये । विहित विधान में वृत अंकितकर दो नपर हनीय परिच्छेद। स्वतन्त्रेऽपि। स्वयम्भू कुसुमंकुण्डगोलोत्थं रोचनागुरु । काश्मीरमृग- नाभी च शिलञ्च चन्दनद्वयम् ॥ एष गन्धः समाख्यातः सर्वदा चण्डिकाप्रियः । एतेन गन्धयोगेन योनिचक्रं समा- लिखेत् ॥ योनिद्वयं ततः कुर्यात् कोणषट्कं ततः प्रिये ! । ततश्चाष्टदलं भूमि चतुर्दारैः समन्विताम् ॥ एतत्ते कथितं चक्रमत्र पुष्पावलि किरेत् ॥ कुमारीकल्पेऽपि । भादौ त्रिकोणं विन्यस्य त्रिकोणं तद्वहिन्यसेत् । वहि- त्रिकोणमालिख्य कोणषट्कं लिखेदहिः ॥ मध्ये तु वैन्दवं चक्रं वीजमायाविभूषितम् । षट्कोणात् तु वहिवृत्तं ततोऽ- दलकं लिखेत् ॥ वहिवृत्तेन संयुक्तं नूपुरैकेण संयुतम् । ज्ञात्वैवं मुक्तिमाप्नोति यन्त्रराजं न संशयः ॥ एतत् तु वि. लिखेत्ताने कुण्डगोलविलेपिते । स्वयम्भू कुसुमैयुक्त कुंकु- मागुरुसविते ॥ (पृथ्वीपर ) लिखे स्वनत्र में भी इसीप्रकार लिखा है, यथा-स्वयम्भू कुसुम गोरोचन, अगर काश्मीर (केशर ) मृगनाभि, शिळ (सिहलोजय ) रक्त चंदन और श्वेत चदन, इनकाही नाम गप है । यही सर्वदा चंडिका को प्रिय है । इस गधयोग मेंही योनिचक्र लिखना चाहिये । फिर दो योनि लिखकर कोणषटक् पाउन करै । अनंतर अष्टदल और चतुर्दार समन्वित भूमि लिखे । तुम्हारे निकट यह चक वर्णन किया। इस चक्रमही पुष्पाजलि बिकरण करै । हमारी कल्प में भी कहा है, प्रयम त्रिकोण अकित करके उसके बाहर त्रिकोण अकित करै । बाहिरी त्रिकोण लिखकर बाहिरकाण षटक् संयुक्त करना चाहिये । मध्य में चीन और माया विभूषित विंदुचक्र लिखकर पदकोण से वाहिरे अष्टदल और वृत्त सयुक्त करना चाहिये । इस प्रकार वहिवृत्त और भू पुरैक समन्वित यत्रराज जानसकने से निसंदेह मुक्ति लाभ होती है । स्वयम्भ कुसुम महित कुम्कम और अगर स. " - श्यामारहस्य भा. टी - . ननु उक्तं पञ्चदशकोणं कथमुक्तं स्वतन्त्रादि तन्त्रवि रोधात् । न च वाच्यं कालीतन्त्रमतमिति तत्रैव- पूजायां षट्कोणपदश्रुतेः । तद्यथा। काली कपालिनी कुल्लां कुरुकुल विरोधिनीम् । विप्र- चित्तान्तु संपूज्य वहिः षट्कोणके बुधः ।। इति वहिरुपादान व्यर्थमेव । अन्तः पदकोणा भावात् वचनान्तरदर्शनाच्च । तथा कालीतन्त्रे । पंचशक्तिं समालिख्य अधोवक्तां सुलक्षणाम् ॥ कालिकाश्रुतौ च। त्रिकोणं त्रिकोणं नवकोणं पद्मम् । कुलसम्भवेऽपि। त्रिकोणं विन्यसेत् पद्मे पुनश्चापि त्रिकोणकम् नवकोण पुनस्तत्र तन्मध्ये स्थापयेत् शिवाम् ॥ तस्मात् पट्कोणमत्र शक्त्यात्मकमिति । ननु एवं त्रिकोण मन्वित एव कुण्ड गोल विलिप्त ताम्रपात्र में उल्लिखित यंत्र राज लिखना चाहिये । यदि कहो कि यहांपर किस प्रकार से पन्द्रह कोण का उल्लेख किया है ? इसमें स्वतत्रादि के सहित विरोध होता है । तो यह का लीत का मत है । इस प्रकार नहीं कहसकते । क्यों कि कालीतत्र में ही के समय परकोण शब्द प्रयोजित हुआ है। यथा-ज्ञानवान् साधक ना. हरके पट्कोण में काली, कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला, विरोधिनी, और विमचित्ताको पूजा करके, इत्यादि । प्रस्तावित स्थल में वहिस्थ समस्त उपा. दान व्यर्थहआजाता है । क्योंकि अत पदकोण का अभाव और बचनांतर भी दिखाई देता है । कुलसभा में भी कहा है त्रिकोण त्रिकोण नवकोण इत्यादि । पन में विकाण विन्यस्न करके पुनार त्रिकोण अकित करना चाहिये । पुनार नवकोण पद्म इत्यादि लिखकर तिसमें शिवा का स्थापन करै । इसाकारण इस स्थान में पद्माण शक्रयात्मक समझना चाहिये यदि पूजा - तृतीय परिच्छेद। इयान्तर्गतभैरवीचक्रवत् नवकोणं मतान्तरं स्यात् नैवं तदा तत्रैव पूजायां महाविरोधः । तद्यथा कुलसंम्भवे। काली कपालिनी कुल्लां कुरुकुल्लां विरोधिनीम् । विप्रचित्तां न्यसेच्चैव वहिः षट्कोणके वुधः॥ उग्रामुग्रप्रभां दीप्तां पर- त्रिकोणके न्यसेत्। नीलां घनांवलाकाञ्च तथैवापरके त्रिके। मातां मुद्रां मिताञ्चैव परत्रिकोणके बुधः ॥ एतदुक्तं भवति षट्कोणावरणांते अपरत्रिकोणके त्रया वरणम् तथापरे त्रिकोणत्रयं अपरं त्रयं यजेदित्यस्य अर्थो भवन्मते तु त्रिकोणं नास्त्येव त्रिकोणशब्दस्य केवल त्रिको- णात्मके शृङ्गाटके शक्तित्वात् । न च वाच्यं नवयोनेर्वाह्यको- णाष्टकस्पैकैककोणपदशक्तिरिति । तत्रिपञ्चारपीठानुपपत्तेः समग्रचक्र पूजाभावाच्च । तस्मात् नवयोन्यात्मकमिति भावः । वस्तुतस्तुस्वतन्त्रादितंत्रभेदात् षट्कोणांतर्गतत्रि- कोणात्मकमपि यन्त्रान्तरं भवति । यतः पट्कोणश- ब्दस्यपारिभाषिके शक्तिरन्यत्र लक्षणा । नहि कोऽपि दृष्ट " यहहै, तो दो त्रिकोणके अन्तर्गत भैरवी चक्रको समान नवकोण मतान्तर हुआजाताहै। किन्तु यह नहीं है क्योंकि इस प्रकार होनेसे पूजाके अन्तमें महा- विरोधि उपस्थित होताहै । यथा-कुल सम्भवमें कहाँहै, बुद्धिमान साधक बहिः पट कॉणको काली, कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला, विरोधिनी और विष चिन्ताको न्यस्त करके अपर त्रिकोणमें उना, उग्रप्रभा, और दीप्ताको एवं 'अन्यतर त्रिकोण मेंनीला, घना, वलाका, और अपर त्रिकोणमें मात्रा, मुद्रा और मिताको विन्यस्त करै । तो कहा जायगाकि पद कोणके आवरणांत में अपर त्रिकोण तीन आवरणमालहैं । जोहो, यहां नव योन्यात्मक समझना चाहिये । वस्तुगत्या, स्वतंत्रादि तत्रभेद में इस प्रकार कहा है पट कोण के अन्तर्गत निकोणात्मक यन्त्रान्तर भी होसकता है । क्योंकि पट्कोण शब्द का अर्थ अपरिभाषक- अर्थ शक्ति है। अन्यत्र लक्षणा समझनी ६१ श्यामारहस्य भा०टी०। परिकल्पनां विहाय अदृष्टं कल्पयति यत् तु कालीतन्त्रे षट् कोणमुक्तं तत् तु तन्मते योद्धव्यम् । अन्यत्र कल्पने माना भावात्। न चैकदैवतमने यन्त्रद्वयकल्पने विरोध इति वाच्यम्। तारा तन्ने। एकदैवतमन्त्रस्य विविधयन्त्रदर्शनात् । एतत्तु तस्याः पूजायाममे लिखिष्यामः। अथ स्वर्णादिसिंहासने पुरतो यथोक्तयन्त्रं संस्थाप्य तदु परि पूजयेत् यथा।हीं आधारशक्तये नमः ओं प्रकृत्यै नमः। ओं कूर्माय नमः । ओं अनन्ताय नमः । लं पृथिव्यै नमः। ओं सुधाम्बुधये । ओंमणिद्वीपाय । औं चिन्तामणि गृहाय । ओं श्मशानाय । ओं पारिजाताय । ओं रनवेदिकायै । भों मणिपीठाय । दिक्षु ओं नमो देवेभ्यः परितः ओं वहुमांसा स्थिमोदमानशिवाभ्यः ओं शवमुण्डेभ्यः । पूर्वादिचतुर्दिक्षु ओं धर्माय ओं ज्ञानाय ओं वैराग्याय ओं ऐश्वर्याय । वहृय दि दिनु ओं अधर्माय ओं अज्ञानाय ओं अवैराग्याय ओं अनैश्वर्याय । मध्ये ओं अनन्ताय ओं पद्माय मंअर्कमण्ड लाय उं सोममण्डलाय में वह्निमण्लाय सं सत्त्वाय रं रजसे तं तमसे मां आत्मने अं अन्तरात्मने पं परमात्मने ही ज्ञा. चाहिये । कोई व्यक्ति भी दृष्टपरि कल्पना त्याग करके अदृष्ट कल्पना में प्रवृत्त नहीं होता । कालीतंत में जो पणकोण शब्द लिखागया है, वह उसकाही मत समझना चाहिये । अन्यत्र कल्पना करने से मानाभाव संघटित होता है । एक दैवत मंत्र में दो यत्र कल्पना करने से विरोध होती है यह भी नहीं कइसक्ते । क्योंकि तारातंत्र में एक दैवतयंत्र के अनेकयंत्र लिखेगये हैं, यह विषय उसकी पूजा में पीछे लिखानायगा ॥ अनन्तर सुवर्णादि सिंहासन के पुरोभाग में यथा शक्ति यत्र स्थापन करके उसके उपर पूजा करनी चाहिये । यथा- -हीं आधार शक्तिको नम. - । तृतीय परिच्छेद। नारमने। पत्रमूले पूर्वादितः ओं इच्छायै ओं ज्ञानायै ओं क्रियायै भों कामिन्यै नओं कामदायै भो रत्यै भो रतिप्रिया. औं भानन्दाय । कर्णिकायां ओं मनोन्मन्यै । मध्ये ऐं प. रायै ऐं अपरायै ऐं परापरायै हेसौः सदाशिवमहाप्रेतपद्मास नाय नमः। इति पीठपूजां कुर्यात् । नमोऽन्तेन सर्वत्र।ततः कलसस्थापनं कुर्यात् । तत्र लक्षणमाह तन्त्रान्तरे कलाकंदं गृहीत्वा तु देवानां विश्वकर्मणा । निर्मितोऽयं सुरैर्यस्मात् कलसस्तेन उच्यते । पद्मपादाचार्यास्तु कला सेवते इति कलसः। . सौवर्ण राजतं वापि मानिक्यं वा यथोदितम् । क्षालये दनमंत्रेण कुम्भं सम्यक् सुरेश्वरि ! इति स्वतंत्रे । अथ प्रयोगः स्ववामे विदुषट्कोणचतुरस्रं कृत्वा सामा- न्योदकेनाभ्युक्ष्य तत्र आधारशक्तये नमः इति पूजयेत् ततो नम इति क्षालिताधारं तत्र निधाय मं वह्निमण्डलाय दश स्कार है । ओं प्रकृतिको नमस्कार है। ओं कर्मको नमस्कार है इत्यादि घि- धान से पीठ पूजा करनी चाहिये । सर्वत्रही नमस्कार शब्द प्रयोग करना चाहिये। फिर कलस स्थापन करें । तंत्रान्तर में उसका लक्षण निर्देश किया है यथा-विश्वकर्मा देवताकी कला ग्रहण करके यह निर्माण किया है इसी. लिये इसका नाम कलस हुआ है । पद्म पादाचार्य के मत में कला सेवन करवी है, इस अर्थ में कलस है । सवर्ण, चांदी अथवा मृतिका का निर्मित कळस ययोक्त विधान से ग्रहण करके " हे मुरेश्वरि ! " भन मंत्र में प्रक्षालित करें। प्रयोग यथा-अपने वामभाग में विन्दु पदकोण चतुरन (पारोंभोर) लिखकर सामान्य जल द्वारा अभ्युक्षित पूर्वक उसमें आधार शक्तिको नम- स्कार है इसप्रकार कहकर पूजा करै । अनन्तर नमः शब्द प्रयोग सहित काक्षित माधारको तिसमें स्थापन करके "म" इत्यादि मंत्रसे विशेष प्रकार इशामारहस्य भा०टी० । कलात्मने नम इति संपूज्य फडिति क्षालितघट रक्तवस्त्र माल्यादिभिरलंकृत ओं इति देवीवुद्ध्या मण्डलोपरि निधा- य अर्कमण्डलाय द्वादशकलात्मने नम इति संपूज्य मूलमु- चरन् कारणेन तं संपूज्य द्रव्यैः उं सोममण्डलाय पोडशक- लात्मने नम इति दत्वा फडिति दर्भेद्रव्यं सन्ताड्य हुँ इ. त्यवगुण्ठ्य मूलेन वीक्ष्य नमः इत्यभ्युक्षणं कृत्वा मूलेन ग- न्धमादाय ओमिति मंत्रेण कुम्भे पुष्पं दवा शापमोचनं कुर्यात् । तदुक्तं स्वतंत्रे। ततश्च कारणं द्रव्यं समानीय घटेस्थितम् । वेष्टितं रक्त वस्त्रेण रक्तमाल्येन भूपितम् ॥ वामभागे महेशानि! मण्ड, लं चतुरस्रकम् । ततः संस्थापयेद्भक्त्या देवीबुद्ध्या वरानने । मण्डले कलसे द्रव्ये वहधर्कशशिमण्डलम् ॥ पूजयेदित्यर्थः भावचूडामणौ। स्ववामभागे पट्कोणं तन्मध्ये ब्रह्मरन्ध्रकम् । लिखित्वा पूजा करनी चाहिये । इसके उपरांत "फद" शब्दसे प्रक्षालित वस्त्र और मालादि द्वारा अलंकृत करके ओं इति मंत्र से देवी बुद्धिमें मंडल के ऊपर स्थापन और “अर्कमण्डलाय" इत्यादि मन से विशिष्ट विधानद्वारा पूजा कर, फिर मूलोचारण सहित कारण की सहायता से पूजा करके "" इत्यादि मंत्र से दान, फट् शब्दसे दर्भ द्वारा द्रव्य संताडन, हूं शब्दसे अवगु ण्ठन ( परदा ) मूल मंत्र से वीक्षण “नम:" शब्द से अभ्युक्षण, और मूल की सहायता से गंध ग्रहण पूर्वक ओं इति मंत्र से कुम्भ में पुष्प दान करने के पीछे शाप मोचन करें । स्वतंत्र में कहा है, यथा-अनंतर कारण और द्रव्य आनयन पूर्वक घटको रक्तवस्त्र में वैष्ठित और रक्तमान्य में भूपितकरके चामभाग के चतुरस्र मण्डल में देवी बुद्धि से भक्ति सहित स्थापन करना चाहिये । मण्डल कळस और द्रव्य इन सब में अमि सूर्य और चंद्र मण्डल की पूजा करे ॥ भाषचूडामणि में कहा है, अपने वामभाग में पद्कोण में और तिसके म. को रक्त तृतीय परिच्छेद । तत्र कुम्भ वै सौवर्ण राजतञ्च वा ॥ तानं भूमिमयं वापि यद्वा लौहविवर्जितम् । तन्त्रान्तरे। आधारे स्थापयेन्मन्त्री सौवर्ण वाथ राजतम् । कांस्य मृण्मयं वापि घटमव्रणशालिनम् ॥ सौवर्ण भोगदं प्रोक्तं . राजतं मोक्षदं स्मृतम् । कांस्य कान्तिकरश्चैव मृण्मयं पु- ष्टिदं भवेत् ॥ अथ काव्यशापविमोचनं कुर्यात् तदुक्तं । कुमारीतन्त्रे। अन्यच्च शृणु देवेशि ! यथा पानादिकर्मणि । दोयो न जायते देवि ! तान् वै मन्त्रान् शृणुष्व मे ॥ एकमेव परं ब्रह्म स्थूलसूक्ष्ममयं ध्रुवम् । कचोद्भवां ब्रह्महत्यां तेन ते नाशयाम्यहम् ॥ सूर्यमण्डलसम्भूते ! वरुणमण्डलसम्भवे ! ध्य ब्रह्मरन्ध्र लिखकर उसमें सुवर्णमय, रजतमय, ताम्रमय अथवा मृतिकामय कुम्भ [घट ] स्थापन करै । लोह कुंभ का त्याग करना चाहिये । तंत्रान्तर में कहाँ है, साधक आधार में सुवर्ण, रजत, [ चांदी ] कांस्य [ कांसी ] मृत्तिका इन सबके अन्यतर निर्मित ब्रह्महीन कलस स्थापन करै । सुवर्ण कुम्भ स्थापन में भोग लाभ होता है । रजत कुम्भ से मोन होती है। कांसी के कुम्भ से कांति लाभ होती है । और मृत्तिका कुम्भस पुष्टि विहित होती है इसके उपरान्त शुक्र शापविमोचन करना चाहिये । कुमारीतंत्र में कहा है यथा-हे देवेशि ! इस समय जिस में पानादि करके दोपोत्पत्ति नहींहोसक्ती वही सब मंत्र कहता हूं, अवण करो । परब्रह्म अद्वितीय स्वरूप और स्थळ सूक्ष्ममय हैं । उनका किसी काळ में क्षय व ध्वन्श नहीं होता । मैं उनकी सहायतासेही तुम्हारी कच जनित [कचको मारने की ब्रह्महत्या दूर करूंगा। हे देवि ! तुम मूर्य मण्डल से उत्पन्न और वरुण मण्डल से संभूत श्यामारहस्य भा० टी०। अमावीजमये देवि ! शुक्रशापादिमुच्यताम् ॥ देवानां प्र. णदो वीजं ब्रह्मानन्दमयं यदि । तेन सत्येन देवेशि ! ब्रह्म हत्यां व्यपोहतु ॥एवं मन्त्रत्रयेणैव अभिमन्थ्य सुरां शुभाम्। प्रदद्यात् कालिकायै च ततो नैवेद्यभुग्भवेत् ।। इति मन्त्रत्रयं द्रव्योपरि त्रिर्जपेत् । ओं रां रों रू रेरौं रः ब्रह्मशापविमोचनं द्रव्योपरि दशधा जपेत् । ह्रीं श्रीं क्रां की , मैं क्रौं क्रः सुराकृष्णशापं विमोचय अमृतं सावय स्रावय स्वाहा । इति कृष्णशापविमोचनं दशधा जपेत् । यथोत्तरतन्त्रे- हंसः शुचि सद्वसुरन्तरीक्षं सद्धोता वेदीषदतिथिदूरो नसत् नृपवर दृशत् सद्वयोम सदजा गोजा ऋतजा अत्रि. जा तं बृहत् । इति ऋचा वारत्रयं द्रव्यमभिमन्न्य तदु. परि मानन्दभैरव्यौ ध्यायेत् । यथा सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशीतलम् । अष्टादशभु- जैर्युक्तं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ॥ अमृतार्णवमध्यस्थं ब्रह्मप हुई हो । तुम्ही अमा वजिमयी हो । शुक्र शाप से विमुक्त होभो । मणव यदि देवतागणों का ब्रह्मानन्दमय वीज है तो उसी सत्य बल से ब्रह्महत्या दूर होवे । इस प्रकार मत्रत्रय की सहायता से मुराका ब. मिमंत्रण करके वह देवी कालिका को प्रदर्शन करै । फिर नैवेद्य भोजन क. रना चाहिये । द्रम्पके ऊपर इस प्रकार मात्रय जप करै । अनन्तर ओंरा इत्यादि ब्रह्मशाप, विमोचन, मंत्र द्रव्य के ऊपर दशवार जपना चाहिये । तदुपरांत " ही श्री" इत्यादि कृष्णशाप विमोचन मंत्र दशबार जपकरे । जैसा कि उचर तंत्र में कहा है "हंसः शुचि" इत्यादिऋद्वारा तीनवार द्रव्य का अभिमंत्रण करके उसके ऊपर आनंद और भैरव का ध्यान करें। यथा जो करोड मूर्य की समान प्रभायुक्त और करोड चंद्रकी समान भतिशय ची- बल हैं जो अष्टादश ( अठारह ) अनायुक्त, पंचवदन और तिलोचन है, तृतीय परिच्छेद । मोपरिस्थितम् । वृषारूढ़ नीलकण्ठं सर्वाभरणभूषितम् ॥ कपालखट्वाङ्गधरं घण्टाडमरुवादिनम् । पाशांकुशधरं देवं गदामूषलधारिणम् ॥ खड्गखेटकपट्टीशं मुद्रं शूलदन्तकम् । विचितखेटकं दण्ड वरदाभयपाणिनम् ॥ लोहितं देवदेवेशं भावयेत् साधकोत्तमः॥ एवं ध्यात्वा हस क्ष म ल व र यूं आनन्दभैरवाय वपट् इत्यानन्दभैरवं त्रिः संपूज्य आनन्दभैरवीं ध्यायेत् यथा- भावयेच सुधां देवी चन्द्रकोव्याननप्रभाम् । हेमकुन्दे- न्दुधवलां पञ्चवक्तां त्रिलोचनाम्॥ अष्टादशभुजैर्युक्तां सर्वा- नन्दकरोयताम् । प्रहसन्तीं विशालाक्षी देवदेवस्य सम्मुखीं । एवं ध्यात्वा ह स क्ष म ल व र पी सुधादेव्यै चौपद इति आनन्दभैरवी संपूज्य द्रव्योपरि त्रिकोणचक्र विलिख्य जो अमृतसागर में विराजमान और ब्रह्मरूप पद्म के ऊपर अवस्थिति करते हैं, जो उपभवाहन, नीलकंठ और सब प्रकार के भूपणों से भूषित हैं, जो कपाल और खट्वांग धारण एवं घंटा और डमरू बजाते हैं, जो पाश, अं कुत्र, गदा, मूशल, खड्ग, खटक, पटिश, मुद्गर, शूल, विचित्रखेटक, दण्ड, वर, अभय यह सब धारण करते हैं, उन्हीं लोहित वर्ण देव देवेशकी भावना करे । इस प्रकार ध्यान करके तीनबार ह स इत्यादि मगलोच्चारण सहित मानन्द भैरवको भळी भाति पूजा करै । फिर आनन्द भैरवी का ध्यान करना चाहिये । यथा-सुधा देवीकी भावना करै उसके आनन ( मुख) की प्रमा करोड करोड चंद्रमाकी समान है । उसका वर्ण हेम और फन्दकी समान धवल मावसम्पन्न है । वह पञ्चवक्रा, पिलोचना, अष्टादश भुमा युक्त, सर्वानंद करनेमें उद्यत, हास्यमुखी विशालाक्षी और देव देवेशकी सं- पुखी है । इस प्रकार ध्यान और 'ह, स' आदि मंत्र में विशेष प्रकारसे पूजा करके द्रष्य के ऊपर त्रिकोण चक्र अकित और उसमें त्रिपक्ति क्रम से 'म सेविसर्ग पर्यंत सोलह स्वर, क से त पर्यंत ११ ओ, य, से स पर्यंत सोलह . - ७२ श्यामारहस्य भा० टी० । तत्र त्रिपंक्तिक्रमेण आदि १६ कादि १६ थादि १६ । हं लं दं मध्यलसितं विलिख्य शिवशक्त्योः समायोगाद्रव्यमध्ये अमृतवं विचिन्त्य धेनुमुद्रया अमृतीकृत्य वं इति वरुण- वीज मूलमंत्रं चाष्टधा तदुपरि जप्त्वा देवतामयं भावयेदि- ति द्रव्यशुद्धिः । तदुक्तं खतंत्रे । ततश्च भावयेद्रव्ये मध्येऽलक्तनिभं प्रिये !। अकथादि- भिस्त्रिपङ्क्त्या तु हलक्षं मध्यमण्डितम् ॥ पूर्वोक्तयोनिमु. द्रायां शिवशक्त्योः समागमम् । अमृतं चिंतयेद्रव्यमष्टधा- प्यमृतं जपेत् ॥ अष्टधा मूलमन्त्रश्च जपेद्धृत्वा घटं ततः । एतत्तु कारणं देवि ! सुरसनिषेवितम् । अतएव तस्य नाम सुरेति भुवनत्रये । अस्य गन्धः केशवस्तु तेन गन्धेन को- लिकः ॥ सुरया पूजयेत् देवी दक्षिणां कालिकां शुभाम् । ततः शङ्ख वीरपात्रं स्थापयेन्मध्यभागताः॥ श्रीविद्योतक- मेणैव ततः पूजां समारभेत् ।। व्यंजन वर्ण स्थापन पूर्वक उसमें 'हं, लं, और कं लिखना चाहिये। फिर शिव और शक्तिके समायोग द्रव्यमें अमृतत्वकी चिन्ता कर धेनु मुद्रा द्वारा अमृती करणांतर 'व, इति वरुण वीज के सहित पूलमंत्र आठजार उसके ऊपर जप कर देवता की भावना करै । इसका नामही द्रव्य शुद्धि है। स्व. तंत्र में यही कहा है। यथा- हे प्रिये ! अनन्तर द्रव्य में अलक्त ( लाख ) की समान प्रभायुक्त त्रिपं. क्ति क्रम में 'अ, के, और स्वादि द्वारा अलंकृत मध्य मंडित " की भावना कर और पूर्वोक्त योनिमुद्रा में शिव और शक्ति के समागम और द्रव्यको अमृतरूप में चिन्ता करके आठचार उसी अमृतका जप करना. चाहिये । संगही संग आठवार मूळमंत्रका जपकर हे देवि ! संपूर्ण देवतागणही इसकारण की सेवा करते हैं इसीलिये इसका नाम तीनों भुवनों में मुरा कह. कर विख्यात हुआ है । स्वय केशव इसकी गंध है अनंतर मध्यभागमें शंख और वीरपात्र स्थापन करके श्रीविद्या कथित क्रमानुसार पूजा करनी चाहिये। ह, ल, तर ७३ तृतीय परिच्छेद। समयाचारेऽपि। सामान्यायं ततः कृत्वा पयसा साधकोत्तमः। तज्जलै- मण्डलं कृत्वा पात्राणि स्थापयेदथ ।। कुमारीतन्त्रेऽपि। ततोऽयं कारयेन्मन्त्री तया नार्या सुवेशया । अर्घ्यद्र- व्यमय पात्रे निःक्षिपेट्यत्नतः सुधीः॥ कुण्डगोलोद्भवं द्रव्यं स्वयम्भू कुसुमं तथा । नाधमों जायते देवि ! महामंत्रस्य मुण्डमालायाञ्च । रक्तचन्दनविल्वादिजवाकुसुम वर्वरैः । अर्घ्य दत्वा महे शानि ! सर्वकामार्थसिद्धये ॥ सुरया चाय दानेन योगिनी नां भवेत् प्रियः।महायोगी भवेद्देवि ! पीठप्रक्षालितैजलैः। स्वयम्भू कुसुमे दत्ते भवेत् पट्कर्म भाजनः सुशीतलजले- ऽपि कस्तूरीकुंकुमान्वितैः । कुण्डगोलोत्थवीजैर्वा सर्वसि- द्धीश्वरो भवेत् साधने ॥ . समयाचार में भी कहा है. अनन्तर जल द्वारा सामान्य अर्घ्य प्रदान करके साधकोत्तम उस जलमंडल विधान पूर्वक संपूर्णपात्र स्थापन करै । कुमारीतंत्र में भी कहा है। अनन्तर साधक इस संदर वेशधारिणी रमणी द्वारा अर्घ विहित करके यत्न पूर्वक अयपात्र में अर्घ्य स्थापन करै । हे देवि! महामंत्र का साधन करने से कभी अधर्म संघटित नहीं होता | मुण्डमाला में भी कहा है, हे महेशानि ! रकचंदन, विल्व, और जवादि कुमम का अर्घ्य दान करने से सब मकार की कामना और अमीर सिद्ध होता है । सगअर्घ्य स्वरूपदान करने से साधक योगिनी गणों का प्रिय होता है । हे देवि ! पाठ मजालित जल में महायोगी होसकता है । स्वयम्भू कमुपदान करने से पट्कर्म भाजन होता है । कानून और कुंकमांकित सुशीतल जल और कुंड गोल १० ७४ श्यामारपस्य भा० टी० । जवादिना कृतार्थे तू पूर्वशोधितद्रव्यं किञ्चित् क्षिपेत् ॥ तदुक्तं श्रीक्रमे। अर्घ्य विधौ । पूर्वन्तु शोधितं द्रव्यं गुप्ते नैव तु संक्षिपेत् । अथवा ताराप्रकरणे च । शंखस्थितं तोयपूर्ण जवापुष्पञ्च वर्वरम् । चन्दनं चार्ककु. सुमं शुद्धाञ्चैवापराजिताम् ॥ आदानञ्च विशेषेण नित्यपू. जाक्रमः स्मृतः। अथात्मयन्त्रयोर्मध्ये। ईकारगर्भत्रिकोणकवृत्त पट्कोण चतुरस्र विलिख्य चतुरले पूं पूर्णशैलाय नमः । उ उड्डीयमानपीठायनमः जांजालन्ध. रपीठाय नमः कां कामरूपपीठाय नमः इति संपूज्य षट्को. णे पड़ङ्गानि मूलखण्डत्रयेण त्रिकोणाग्रं दक्षोत्तरं संपूज्य मध्ये आधारशक्तिं संपूज्य त्रिकोणवृत्तषट्कोणभूपिताधार तत्र संस्थाप्य नम इति सामान्यार्योदकेनाभ्युक्ष्य तत्र वहे देशकलाः पूजयेत् । यं धूमाचिपे नमः । वं उमायै नमः । लं समुद्भूत वीज प्रदान करने से सर्व सिद्धीश्वरत्व लाभ होता है । जवादि कुसुमसे अर्घ्य विधान करके पूर्व शोधिन द्रव्य किंचित् निक्षेप कर श्रीक्रम में अर्घ्य विधि में यही कहा है । यथा, पूर्व शोधित द्रव्य गुप्तानुसारही नि- क्षेप करै । अथवा ताराप्रकरण में कहा है । यथा- शंख स्थित जल पूर्ण जवा पुष्प, घर चन्दन, अर्ककुसुम, विशुद्ध अपराजिता [विष्णु क्रांता] यह सम्पूर्ण द्रव्य नित्य पूजा में प्रदान करै ।। अनन्तर आत्मयंत्र में कार गर्भित त्रिकोणक वृत्त पदकोण और चतुः कोण लिखकर उस चतुष्कोण में "पू पूर्ण शैलाय" इत्यादि कहकर विशि- ए विधान से पूना करनी चाहिये । फिर मूलखड त्रयानुसार पडग त्रिको जाना और मध्य में आधार शक्ति की पूजा करके उसमें त्रिकोणवृत्त और पटकोणं भूषित अ धार स्थापनान्तर "नम , शब्द प्रयोग सहित सामान्य अर्घ्य सलिन से अभ्यत्रण करके उसमें अनिके दश कला की पूजा करें ।
तृतीय परिच्छेद। ज्वलिन्यै नमः ।वं ज्वालिन्यै नमः। शं विस्फुलिगिन्यै नमः। षं सुश्रियै नमः । सं स्वरूपायै नमः । हं कपिलायै नमः । ल हव्यवहायै नमः । शंकव्यवहायै नमः इति संपूज्य मं व- न्हिमण्डलाय दश कलात्मने अर्घ्य पात्रासनाय नमः । इति संपूज्य षट्कोणे पड़ॉ मध्ये व्यस्तमूलेन देवीम् इष्ट- वा कपालादिपात्रं फडितिक्षालितं तत्राधारोपरि संस्थाप्य सूर्यमण्डलं तत्र यजेद्यथा । के भं तपिन्यै ख व तापिन्यै गं फं धूम्रायै धं पं मरीच्यै ऊँ नं ज्वलिन्यै चं धं रुच्यै छं दं सुषुम्नायै जं थं भोगदायै झ तं विश्वायै अंणं वोधिन्यै टं ढं धारिण्यै ठंडं क्षमायै नमोऽन्तेन संपूज्य अं अर्कमण्ड लाय द्वादशकलात्मने अर्घ्य पात्राय नमः। इतीष्ट्वा त्रि- कोणवृत्तपट्कोणं पात्रमध्ये विलिख्य समस्तव्यस्तमन्त्रेण त्रिकोणं संपूज्य वमिति वरुणवीज मूलमंत्रं विलोममातृका ञ्च पठित्वा घटस्थकारणामृतेन विभागमय॑ संपूर्य्य शेष जलेन पूरयेत् । ततो दूर्वाक्षतरक्तचन्दनजवा श्वेतापरा- जिताकरवीरविल्ववर्वरीकुन्दसुगन्धिद्रव्याणि शुद्धि मीनमुः द्राकुण्डगोलादिकञ्च संशोध्य तत्र निःक्षिप्य सोममण्डलं यथा--"यंधूमाचिये, इत्यादि फिर पदकोण में पडंग और मध्य में देवीकी पूजाकरके "फद, शब्द से प्रतालिव कपाळादि णत्र उस आधारके ऊपर स्थापन पूर्वक उसमें सूर्यमण्डलकी पूजा करै । यथा-"के भं तपिन्यै, इत्यादि विधान से पूजा करके पात्र में त्रिकोणवृत्त और पदकोण लिखकर समस्त और व्यस्त मंत्र से त्रिकोणकी पूना एव वरुणवीन. मूलमंत्र और विलोम-पातृका पाठकरके घटस्थ कारणामृत द्वारा त्रिमाग्य अर्पा संपूरण और अवशिष्ट जल द्वारा पूर्ण करना चाहिये । अनन्तर दूर्वा, अक्षत रक्तचंदन जवा, अर्क, पुष्प, वतअपराजिता, करवीर, बिल्व, वी, कुन्द और संपूर्ण सुगंधि द्रव्य शुद्धि और मीन मुद्रा संशोधन और उसमें निक्षेप करके सोम ७ श्यामारहस्य भा० टी० । पूजयेद्यथा । अं अमृतायै नमः 0 मानदायै नमः इंपुषायै नमः ई तुष्ट्यै नमः उं पुष्ट्यै नमः ॐ रत्यै नमः ऋ धृत्यै नमः शशिन्यै नमः लं चन्द्रिकायै नमःलू कान्त्यै नमः एं ज्योत्स्नायै नमः ऐं श्रियै नमः ओं प्रीत्यै नमः औं अं. ङ्गदायै नमः अं पूर्णायै नमः अः पूर्णामृतायै नमः उं सोम- मण्डलाय पोडशकलात्मने अर्घ्यपात्रामृताय नमः इति सं. पूज्य पूर्ववद्यन्त्रं कारणैः लिखित्वा त्रिकोणत्रिरेखायां अं १६ कं १६ थं १६ मध्ये हं लं क्ष विलिख्य मूलखण्डनयेण त्रिकोणमिष्ट्वा षट्कोणे षड़ङ्गानि संपूज्य । गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥ इत्यनेनांकुशमुद्रया सूर्यमण्डलात्तीर्थमावाह्य आनन्द- भैरवभेरव्यो पूर्वोक्तक्रमेण संपूज्य पूर्वादिक्रमेण पञ्चरत्नं य- जेद्यथा । ग्लुं गगनमण्डलेभ्यः स्लु स्वर्गरत्नेभ्यः प्नु पाता- लरत्नेभ्यः म्लुं मर्त्यरत्नेभ्यः न्लं नागरत्नेभ्यः इति नमोऽ- न्तेन पूजयेत् । अथैषां भेदोऽपि लिख्यते । . मएदलकी पूजा करनी चाहिये । यया-"अं अमृताय,, इत्यादि । अनन्तर पूर्वकी समान कारण में यत्र लिखकर त्रिकोण त्रिरेखा में यया क्रमसे अं १६, कं १६ ऑयं १६ और मध्य में ह ल त स्थापित करके तीन मूत. खंड में त्रिकोण की पूना करनी चाहिये । अनन्तर पहंग पूना करके.गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी इनके जळमें सलिधि कर अंश मुद्राको सहायता से सूर्य मंडल से तीर्थ आवाहन और पूर्वोक्त विधान से आनंद भैरप और भैरवी ची पूजा कर पूर्वादि प्रमो पंचरत्न का पनन करे । यथा-"लं, त्यादि । अब इसका मेद लिखते हैं।
तृतीय परिच्छेद। तदुक्तं यामले। मांसन्तु विविधं प्रोक्तं जलभूचरखेचरम् । गोधा चैवा- श्वमहिषवराहाजमृगोद्भवम् ॥ महामांसाष्टकं प्रोक्तं देवता- प्रीतिकारणम् ॥ मांसाभावे तदनुकल्पं निक्षिपेत् । तदुक्तं समयाचारे । लवणाकपिण्याकगोधूममांसपञ्चमम् । लशुनञ्च म- हादेवि ! मांसप्रतिनिधी स्मृतम् ॥ मत्स्यन्तु त्रिविधं प्रोक्तं उत्तमाधममध्यमम् । उत्तमं त्रिविधं देवि ! शालपाठीनरो- हितैः ॥ प्रवीणं करंटकहीनं तैलाक्तं स्वादुसंयुतम् । देव्याः प्रीतिकरंचैव मध्यमं स्याच्चतुर्विधम् ॥ क्षुद्राणि तानि सर्वा- णि अधमान्याहुरुत्तमाः ॥ मुद्रा द्विविधा यथा कुलार्णवे। त्रैहेयं मण्डलाकारं चन्द्रविम्बनिभं शुभम् । चारुपक्कं म- यथा यामळ में कहा है यथा--जलचर, भूचर और खेचर भेद में पास तीन प्रकार है । गोधा, अश्व, महिष, पराह, अज, मृग, गो, नर, यह आठ महा- मांसही देवताको प्रसन्न करते हैं। ऐसा कहा है । मांस के अभाव में उनका (उसकी सदृश ) अनुकल्प निक्षेप करै । समयाचार में यह कहा है। यथा-- लवण आईक ( अदरख ) पिन्याक गो धूम, मोस, लासन यह कई द्रव्य मांस के परिवर्तनमें प्रदान किये जाते हैं। मत्स्य त्रिविध कहे हैं । यथा -उत्तम, अधम और मध्यम । उत्तम अन्य तीन प्रकार है । यथा-शालीन, पाठीन और रोहित । इनमें जो प्रवीण, कंटक रहित तैलाक्त और स्वादु है वही देवी का भौति जनक है मध्यम भी चार प्रकार है और संपूर्ण क्षुद्र जातीय मत्स्य अघमश्रेणी में परिगणित हैं। मुद्रा दो प्रकार है । यथा--कुलार्णव में कहा है । जो बीह (जो ) से उत्पन्न हुई और जो मण्डलाकार और चंद्रबिम्बकी समान चारुकर शोभित .
श्यामारहस्य भा०टी० । नोहारि शर्कराद्यैः प्रपूरितम् ॥ पूजाकाले देवताया मुद्रेषा परिकीर्तिता ॥ यामलेऽपि । भृष्टधान्यादिकं यद्यञ्चर्वणीयं च चर्वयेत् । तेषां संज्ञा कृता मुद्रा महामोदप्रवर्धिनी ॥ कुलकुसुमभेदं त्वग्रे लिखिष्यामः । अथैषां शुद्धिर्लिख्यते। तदुक्तं भैरवतन्त्रे। ओं प्रतद्विष्णु स्तरते वीर्येण नृगोलभीमकुचयोर्गरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षिपन्ति भुवनानि विश्वः ॥ अनया मांसमभिमन्न्य । त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मोमुक्षीय मामृतात् ॥ इत्यनया मत्स्यं संशोध्य । ओं तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तद्विप्रासो हिरण्य- वो जावांसः समिन्धते । विष्णोर्यत् परमं पदं इति ऋचा मुद्रामभिमन्य। ओं विष्णुर्योनि कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंपतु । आसिं- मनोहारिणी और शर्करादि परिपूरित है, देवता के पूजा काल में यहीपद्रा कही गई है । यागल में भी कहा है। भ्रष्ट ध्यानादि जो कुछ चर्षणीय है, उसका नाम मुद्रा रक्खा गयाहै। क्योंकि तिसके द्वारा महामोद वदित होता है इसके उपरांत फुल कुमम भेद लिखा जायगा, इस समय उसकी मुद्धि लिसीनाती है । भैरवतन्त्र में कहाहै "ओं एतद्विष्ण" इत्यादि कहकर मांग का अभियंत्रण करके "व्यम्बक यजामहे , इत्यादि पदोभारण सरित मत्स्य का सशोधन करै । फिर “ओं तद्विष्णोः, इत्यादि कहकर मृदाका और "ओं विष्णयोंनि इत्यादि के प्रयोग सहिन कुण्डोयादि . " तृतीय परिच्छेद। चतु प्रजापतिर्धाता गर्भ दधातु ते ॥ गर्भ धेहि सिनीवालि ! गर्भ धेहि सरस्वति ! । गर्भ ते आश्विनौ देवावाधत्तां पु. करनजो॥ प्ठे क्लुं म्लं वं स्वाहा अमृते अमृतोद्भवे! अमृतवर्षिणि ! अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहा । इति कुण्डोद्भवादिकमभिमं- त्यसर्व हुमित्यवगुण्ठ्यं धेनुमुद्रया अमृतीकृत्य तालत्रयं दि- ग्वन्धनं च कृत्वा सर्वेपामुपरि मूलमन्त्रं सप्तधा जपेत् । इति मांसादि शोधनम्। ततःऐं ह्रीं सौं ब्रह्मरससम्भूत मशेषरसप्तम्भवम् । आपू. रित महापात्रं पीयूषरससंयुतम् ॥ अखण्डैकरसानन्दकरे पर सुधात्मनि । स्वच्छन्दस्फुरणामत्र निधेहि कुलरूपिणि । अ. कुलस्थामृताकारे शुद्धज्ञानकरे धरे ॥ अमृतत्वं निधेह्यस्मिन् वस्तुनि क्लिन्नरूपिणि । तद्रूपेणैकरस्यच्च कृत्वा ह्येतत्स्वरूपि णी ॥ भूत्वा परामृताकारं मयि चित्स्फुरणं कुरु । एभिमन्त्रैरय॑मभिमन्य मध्ये कामकलां विलिख्य तत्र इष्टदेवतामावाह्य तालत्रयं दशदिग्बंधनं च कृत्वा हुमित्यव- गुण्ठनमुद्रया अवगुण्ठ्य वमिति धेनुमुद्रया अमृतीकृत्य का अमिमंत्रण करके सबका अवगुण्ठन ( परदा ), और धनु मुद्रा द्वारा अमृती करणान्तर तीनताल प्रदान सहित दिग्बंधन और फिर सब के ऊपर सातबार मूलमंत्रका जप करना चाहिये । इति मांसादि शोधनम् ॥ । अनन्तर "ऐं ही,, इत्यादि मंत्र परम्परा से अर्घ्य का अभिमंत्रण और मध्य में कामकला लिख, उस में इष्ट देवता का आवाहन और तीन ताळ सहित दश दिग्बन्धन कर के अवगुएठन और धेनु मुद्रा में अमृती करण करै । फिर योनिमुद्रा प्रदर्शन सहित "इसौनमः कह पूजा ८० -- श्यामारहस्य भा०टी० । योनिमुद्रां प्रदर्श्य हंसौ नम इतीष्ट्वा शंखमुद्रांप्रदय षड़ ड्रेन सकलीकृत्य मत्स्यमुद्रया आच्छाद्य मूलमन्त्रं तदुपरि द. शधा जप्त्वा देवतारूपमयं भावयेत् ततः। पुष्पाञ्जलित्रयं दत्त्वा धूपदीपौ प्रदर्शयेत् ! इति संक्षिप्ताय॑ साधनम् । सम्पूर्ण प्रकारस्तु मत्कृततत्त्वानन्दतरङ्गिण्याम् अनुस- न्धेयः । पूजासमाप्तिं यावत् तावदयं न चालयेत् ॥ अथ अवगुण्ठनमुद्रायथाज्ञानार्णवे। सव्यहस्तकृता मुष्टिर्दीर्घाधोमुखतर्जनी । अवगुण्ठनमुद्र- य मभितो भ्रमिता सती ॥ मध्यमे गुटिकाकारे तर्जन्युपरि संस्थिते। अनामिकामध्य गते तथैव हि कनिष्ठके ॥ सर्वा एकत्र संयोज्य अंगुष्ठपरिपी: डिताः । योनिमुद्रा समाख्याता त्रैलोक्योत्पत्तिमातृका ॥ कर, शुखमुद्रा प्रदर्शन और पडङ्गको सहायतासे 'सफळीकरण करै । फिर मत्स्य मुद्रा से आच्छादन और तिसके ऊपर दशबार मूलमत्र जपकर देव ता रूप में अध्यकी भावना करनी चाहिये अनन्तर तीन पुष्पाञ्जलि प्रदान करके धूप और दीप प्रदर्शन करै । इसका नाम सक्षिप्त अर्घ्य साधन है । सब, मकार तत्वानन्द तरगिनी में अनुसंधान करें। अवगुण्ठन मुद्राका प्रकार यया-मानार्णरे । सव्यहाथ की मुट्ठी पाकर तर्जनीको लम्म भावगे अधोमुख कर भ्रामिन ( घुमाना ) करने से अवगुण्ठ- नघुना होती है । उसी मानार्णव में कहा है, दोनों मध्यमाको गुटिकाकार करके दोनों तर्मनाक कार स्थापित और दोनों कनिष्ठको अनामिका के मगन करके फिर सरसो एका सोमित कर अंगुष्ठ द्वारा परिपीडित करै । इसकाही नाम योनिपटा है यह योनिमुद्रा मोरयोत्पत्रिकी जननी तदुक्तं तत्रैव 7 तृतीय परिन्देद। ८१ शंखमुद्रा यथा तन्त्रान्तरे। घाममुष्ट्यन्तरेऽगुष्ठं नियोज्य सरलांगुलीः। दक्षिणस्य करस्येव वामांगुष्टन संस्पृशेत् ॥शंखमुद्रेयमाख्याता मन्त्रवि- गिरनुत्तमा। देवताङ्गे पड़गश्च सकलीकरणंभवेत् । दक्षपाणि पृष्ठदेशे वामपाणितलं क्षिपेत् । अंगुष्ठौचालयेत् सम्यङ्मद्रेयं मत्स्य रूपिणी ॥ ततो देव्या अध्य॑ गृहीत्वा ॥ घटश्रीपात्रयोर्मध्ये पात्रे च स्थापयेत्ततः। घटसमीपे गुरुपानं ततो भोगपात्रं ततः शक्तिपात्रं योगिनी पात्रं वीरपात्रं वलिपात्रं पायाचमनीयपात्राणि सामान्यायः व्युत्क्रमेण स्थापयेत् । ततः शुद्धिसहितकारणेन् तत्त्वमुद्रया श्रीगुरुपादुकां स्मरन् तत्पात्रामृतेन श्रीअमुकानन्दनाथ गुरु पादुकां तर्पयामि, नमः इति निलकृद्धा मूर्ध्नि सन्तर्य एवं परमगुरु-परापरगुरु-परमेष्टिगुरूनपि सन्तर्पयेत् । ततः श्री वरूप है । शंखमुद्रा यथा--अंगुष्ठको चाममुष्ठि के अन्तर में मविष्ट और दक्षिण इस्त की सब अंगुलियों को सरल करके बामहस्त के अंगुष्ठ द्वारा स्पर्श करै। मंत्र विद्गण इसकोही शंखमुद्रा कहते है । दक्षिण हस्त के पृष्ठभाग में बाम इस्तकी हथेली न्यस्तकर दोनों अंगुष्ठकी चालना करै । इसका नाम मत्स्यमद्रा है। अनन्तर देवीकी आज्ञा ग्रहण करके घर और श्रीपात्र दोनों में समस्त पात्र स्थापन करै । यथा-घटके समीप में गुरुपात्र फिर भोगपात्र फिर शक्ति पात्र, योगिनीपात्र, वीरपात्र, वलिपात्र, पाद्य और नाचमनीय सब पात्र और सामान्य अर्य विपरीत क्रम में स्थापन करै । अनन्ता शुद्धि के सहित कारण और सत्य मुद्रा द्वारा श्री गुरु को पादुका स्मरण करके उत्प्स पात्र के अमृत द्वारा " श्री अमुकानन्द , इत्यादि कहकर तीन बार वा एकबार मस्तक में सन्तर्पण पूर्वक परम गुरू परापर गुरू और पर- मेष्ठी गुरू, इनका भी विशेष प्रकारसे तर्पण करै । अनन्तर यथाविधि मत्रो- श्यामारहस्य भा०टी०। पात्रान् मूर्धि श्रीआनन्दभैरवं तर्पयामि नमः इति मन्त्रण त्रिः सन्तर्प्य ततो दी सायुधां सवाहनां सपरिवारां हृदि सन्तर्पयेत् ॥ अथ तत्त्वमुद्रा यथा । स्वतन्त्रे । अंगुष्ठानामिकायोगाद्वामहस्तस्यपार्वति। तर्पयेत कालिकां देवीं सायुधां सपरीकराम् ॥ अथ तत्वशुदिं कुर्यात् । तदुक्तं श्रुतौ । ओं प्राणापानव्यानोदानसमाना मे शुद्ध्यन्तां ज्योतिरह विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा ॥ १॥ओं पृथिव्यप्तेजोवा वाकाशीन मेशुद्धयन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा ॥ २ ॥ प्रकृत्यहङ्कारद्धिमनः श्रोत्राणि मे इत्यादि ॥३॥ ओं वकूचनु र्जिाघ्राणवचांसि मे इत्यादि ॥ ४ ॥ ओं पाणिपादपायूपस्थशब्दा मे इत्यादि॥५॥ओं स्पर्शरूपगन्धा- काशानि मे इत्यादि ॥६॥ओं वायुनेजःसलिलभूम्यात्मानोमे. 'शुद्ध्यंतांज्योतिरहं विरजाविपाप्माभूयासंस्वाहा।।७॥इति सप्त. भि ऋग्भिर्विमृश्य कारणेन करतलं सम्माय॑ दक्षहस्ते त्रिको धारण सहित श्री आनंद भैरवका तर्पण करके फिर तीनवार हृदय में आ- युध वाहन और परिवारके सहित देवीके तर्पण में प्रवृत्त होना चाहिये । तत्वमुद्रा; यथा- --स्वतंत्र में कहा है, वामहस्तका अंगुष्ठ और अनामिका दोनों में देरी कालिका का आयत्र और परिवार सहित तर्पण करें। फिर तत्वशुद्धि करनी चाहिये । श्रुति में कहा है, यथा-'ओप्राणापान, इत्यादि साव प्रकार स् द्वारा विमर्षण (विचार) कारण द्वारा करतल संमार्जन और दक्षिण हस्त में त्रिकोण लिख यपोक्त विधान में तत्वशुदि करें । अन- न्तर ऋक् पास्त्रदैवत मंत्र द्वारा श्री पात्र से विइ स्वीकार करके भी पात्र तृतीप परिच्छेद। गंलिखित्वा कलायसदृशीं शुद्धिं दक्षिणवामभुजसंमुखमध्येषु निधाय वामहस्तांगुष्ठमध्यमानामायोगैरेका गृहीत्वा मन्त्रान्ते ह्रीं श्रीं भात्मतत्वेन स्थूल देहं शोधयामि । स्वाहा। अनेनम- धःस्थांशुद्धिं स्वीकृत्य ह्रीं श्रीं विद्यातत्वेन सूक्ष्मदेहंशोधयामि स्वाहा । अनेन दक्षिणस्थां स्वीकृत्य ह्रीं श्रीं शिवतधेन परदेहं शोधयामि स्वाहा । अनेन उत्तरस्थां स्वीकृत्य ह्रीं श्रीं सर्व तत्त्वेन तनुश्याश्रयं जीवं शोधयामि स्वाहा। अनेन वामदक्षि णमध्यस्थां स्वीकृत्य वस्त्रेण हस्तौ विशोध्य हस्ताभ्यां सर्वा- इंमार्जयेदिति तत्वशुद्धिः । विस्तृतिस्तु मत्कृततत्त्वानन्दत. रगिण्यामनुसन्धेया। ततः श्रीपात्राद्विन्दुस्वीकारम् आ ज्वलतीति ऋग्भिः स्वदेवत मन्त्रेण वा कृत्वा श्रीपात्रामृतेन पूजोपकरणभ्युक्ष णात् सर्व ब्रह्ममयं भवेदिति । ततः सिंहासनस्य पूर्वदक्षिण पश्चिमोत्तरेषु त्रिकोणवृत्तं विलिख्य ऐं ह्रीं हूं मण्डलाय नमः। इति मण्डलान् संपूज्य पूर्व वां वटुकाय नमः। इति गन्धा- दिभिरिष्ट्वा अर्घ्यपूर्णसलिलमांसमीनमुद्रापुष्पयुतं वलिमुप स्कृत्य वलिपात्रामृतेन वामांगुष्टानामाभ्याम् उतस्मृजेत् अने. न । एहि देवीपुत्र वटुकनाथ ! कपिलजटाभारभास्कर ! स्थ अमृत द्वारा पूनाकी उपकरण अभ्युक्षित करने से संपूर्ण ब्रह्ममय होता है । तदनन्तर सिंहासनके पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर की ओर गोलाका- र त्रिकोण लिख समस्त मंडळकी पूजा कर पूर्व भाग में गंधादि द्वारा पदक की पूजा करनी चाहिये । पूनाके अन्त में अर्ध्य पूर्ण जल, मांस, मीनमुद्रा और पुष्पयुक दलि प्रस्तुत करके वलिपात्रन्ध अमृतके सहित वाम हस्त के अंगुष्ठ और अनामिका द्वारा उत्सर्जन (छोड़ना) करे । इस का मंत्र यह है, "एोहि देवीपुत्र,, इत्यादि अनन्तर योगिनी गणोंकी अर्चना करके दक्षिण . त्रिनेत्र ! ज्वालामुख! सर्वविघ्नान् नाशय नाशय सर्वोपचा- रसहितवलिं गृह्ण गृह्णस्वहा एपवलिवटुकाय नमः। दक्षिणे यं योगिनीभ्यो नमः इति योगिनीः समभ्यर्च्य दक्षानामांगु- ठाभ्यां पूर्ववद्वालिम् अनेन दद्यात् । जर्व ब्रह्माण्डतो वा दिवि गगनतले भूतले निस्तले वा पाताले वा तले वा पवनसलिलयोर्यत्र कुत्रस्थिता वा । क्षेत्रे पीठोपपीठादिषु च कृतपदा धूपदीपादिकेन प्रीतः देव्यः स- दा नः शुभवलिविधिना पान्तु वीरेन्द्रवन्द्यान् ॥ सर्वयोगिनीः हूं फट् स्वाहा । एप वलियोगिनीभ्यो नमः। पश्चिमे क्षा क्षेत्रपालमभ्यर्च्य वाममुष्टिकृतदीर्घया तर्जन्या वलिं दद्यात् अनेन । क्षांक्षी चं क्षौं क्षःक्षेत्रपाल! धूपदी- पसहितं वलिंगृह गृह्ण गृह स्वाहा एप वलिः क्षेत्रपालायनमः। उत्तरे गां गणेशमभ्यर्च्य दण्डाकारसर्वागुलि मध्यवृद्धयोगैर्व लिंदद्यात् । गांगी गं गणपतये विरोधिसर्वजनमेव संमारय स्वाहा । एप वलिगणपतये नमः । अथ स्ववामे पूर्ववत म- हस्तकी अनामिका और अगष्ठद्वारा पूर्ववत् पलि उत्सृष्टकरै । तिस समय यह मंत्र कहना चाहिये। यथा-ब्रह्मांडके ऊर्द्धमें, स्वर्ग वा गगनतळमें, भूतळ अथवा , निस्तलमें,पातालमें अथवा अतळमें, अनिळ (वायु) में अथवा सलिलमें, क्षेत्र में अथवा पीठ और उपाठादि में, अथवा जहां जहां अवस्थित हों, धूप और दीपादिके सहित यह पवित्र वलिविधान करता हूं, देवीके प्रतिप्रीति वशतः वही वीरेन्द्र वंदनीय योगिनीगण मेरी रक्षा करै । इस प्रकार योगिनी गणों को बलि प्रदान पूर्वक पश्चिम क्षेत्रपाल की पूजा करके वाम मुष्टि कृत् दीर्घ तर्जनी द्वारा उसके उद्देश में वलि प्रदान करै । अनन्तर उत्तरमें गणेशकी। अर्चना करकै सब अगलियों को दण्डाकार कर वृद्ध और मध्यम योगी उसके उद्देश में वलिदान करनी चाहिये । फिर अपने वाम भागमें विद " ८५ तृतीय परिच्छेद । पडलं कृत्वा ऐं ह्रीं व्यापकमण्डलाय नमः इति संपूज्य तत्र साधारणवलिं संस्थाप्य मूलेन अभिमन्त्रय गन्धपुष्पं धूपदी पादिना तं संपूज्य ओं ह्रीं सर्वविघ्नकृद्भयः सर्वभूतेभ्य हुं फट् नमः एप वलिः सर्व भूतेभ्यो नमः। इति तत्त्वमुद्रया उ- त्सृजेत् । सशक्तश्चेत् सर्वभूताय वलिमेकं दद्यात्। ततः पूर्व वत् षडङ्गन्यासं कृत्वा कामकलां विभाव्य तरुणदिवाकरारु णकुसुमाञ्जलिं कूर्ममुद्रया गृहीत्वा मूलाधारात् कुण्डलिनी ब्रह्मपथे परशिवान्तं ध्यात्वा हृदयाप्टदलपीठे समानीय मू-. लेन मूर्ति कल्पयेत् । तदुक्तं तन्त्रान्तरे । देवीं सुषुम्नामार्गेण आनीय ब्रह्मरन्ध्रकम् । वामनासापुटे धृत्वा निर्माल्यं स्वाञ्जलिस्थितम् । पुष्पमारोप्य तत्पुष्पं प्रतिमादौ निधापयेत् ॥ भैरवतन्त्रे च। ततः पूर्वोक्तरूपां तांध्यायेञ्चैव हि दक्षिणाम् । योगिनी चक्रसंहितां महाकालसमन्विताम् ॥ मण्डल रचना और उसकी पूजा करके उसमें साधारण वलि स्थापन, पूछ मंत्र में अभियंत्रण, गंध, पुष्प, धूप, और दीपादि द्वारा अर्चना करके तत्व मुद्रा द्वारा उत्सर्जन करें | समर्थ होने पर सर्वभून को एक वलि मदान करै । अनन्तर पूर्वकी समान खडङ्ग न्यास, काम कला विभावन, तरुण । दिवाकर की समान अरुण वर्ण कुसुमाञ्जलि कर्म मुद्रा द्वारा ग्रहण पूर्वक कुण्डलिनीका मूलाधार से परम शिव पर्यन्त ब्रह्म पथमें ध्यान और हृदयाष्ट दल पीठमें समानयन करके मूल मंत्र द्वारा तदीय मूर्ति कल्पना करै । तंत्रा तरमें कहा है । यथा-देवीको सुपुम्ना मार्ग एवं ब्रह्मरन्ध्रमें आनयन और वाम नासापुटमें ध्यान करके अपनी अंजुलिस्य पुष्प आरोपण और वही पुष्प प्रतिमादि में स्थापन करै । भैरव तन्त्रमेंमी कहाहै, यथा-अनन्तर पूर्वोक्त रूपमें देवी दक्षिणाको योगिनी चक सहित और महाकाल की समामि - श्यामारहस्य भा०टी० । कालीतन्त्रेऽपि। ततो हृदयपद्मान्तःस्फुरन्ती परमां कलाम् । यन्त्रमध्ये समावाह्य न्यासजालं प्रविन्यसेत् ॥ कुमारीकल्पेऽपि। ततो हृदयपद्मांतः स्फुरंतीविद्युताकृतिम्।सुपुम्नावर्त्मना नीत्वा शिरःस्थाने महेश्वरीम् ॥ ततो वै हृदयासन्ने पुष्पां- तरे समाह्वयेत् । नासया वा महादेवि वायुवीजेन मंत्रवित्॥ देवेशीति च मंत्रेण विंदुनावाहयेत्सुधीः ।। अथ पूर्वोक्तरूपं ध्यात्वा दीपादीपांतरमिति च परशिवे संयोज्य यमिति वायुवीज़मुच्चरन् वामनासापुटपथेन देवी कुसुमाजलावानीय मंत्रमध्ये समावाहयेत् भनेनमंत्रेण ॥ देवेशि भक्तिसुलभे! परिवारसमन्विते । यावत्वां पूजयि. ष्यामि तावत्वं सुस्थिरा भव ॥ दे इति यन्त्रमध्ये देवी समावाह्य महाकाल सहित श्रीद. व्याहारिणी (कहनेवाळी ) चिन्ता करनी चाहिये । काली तंत्रों भी कहाहै, अनन्तर हृदय पद्मके अभ्यन्तर ( भीतर ) में दीप्यमान परमाकळाको यन्त्र श्रावाहन करके न्यास जळमें न्यस्त करै । कुमारी कल्पमें भी कहाहै, अनन्तर हृदय पके अन्तरमें स्फुरमाण और सौदामिनीको समान आकार शोभना महेश्वरीको सुपुम्न वर्म द्वारा शिरस्थानमें लेजाकर हृदयके आसन्न पुष्पा न्तरमें आवाहन करे । अनन्तर पूर्वोक्त प्रकार जप और ध्यान करके दीपसे दीपान्तर की समान परम शिवमें संपोजित कर वायु वीन उच्चारण सहित वाम नासा पुर द्वारा देवीको कुमुपाञ्जलि में आनयन और मंत्रमें आवाहन करै । निप्त समय इस प्रकार पत्र कहना चाहिये । तुम्ही देवतागणों की ईपरी और सबकी शक्ति स्वरूप हो । तुपको सहन में ही प्राप्त हुभा जाता है। मैं जबतक तुम्हारी पूजा करूं, तबतक तुम सपरिवार में मुस्थिर होकर स्थिति करो । इस प्रकार यंत्र में देवी का सम्यग् प्रकार आवाहन करके - तृतीय परिच्छेद । क्षिणकालिके! इहागच्छ इहागच्छ इहतिष्ठ इहतिष्ठ इहसग्नि हिता भव इह मन्निरुद्धा भूत्वा पूजां गृहाण । इत्यावाह्य पूर्ववज्जीवन्यासं लेलिहामुद्रया कुशविष्टरेण वा कृत्वा हुं इत्यवगुण्ठ्य पड़ड्न सकलीकृत्य परमीकरणं कृत्वा छोटि- काभिः दशदिग्वंधन विधाय अमृतीकरणं च कृत्वा कृतांज- लिदेवीनामसम्बोधनांते ओं स्वागतं कुशलमिदमासनमिहा- स्यतामिति वदेत् । अथ आवाहनादिमुद्रा यथा । दक्षिणामूर्ति संहितायाम्। ऊलिलिमधःकुर्यादियमावाहनीभवेत् । इयन्तु विप- रीता स्यात्तदा वै स्थापनी भवेत् ॥ ऊवागुलौ मुष्टियोगा तदेयं सन्निधापनी । अन्तरांगुष्ठयुगला तदेयं सन्निरोधनी ॥ अथ लेलिहामुद्रा यथा। तर्जनीमध्यमानामासमं कुर्यादथोमुखम् । अनामायां क्षिपे- फिर श्री दक्षिणा कालिका महा कालके सहित-इस स्थान में अधिष्ठान करो, अधिष्ठान करो, सन्निहित होओ, सनिरुद्ध होभो, मेरी पूजा ग्रहण करो, इत्यादि कहकर आवाहन और पूर्ववत् लेलिहा मुद्रा वा कुश विष्टर द्वारा जीव न्यासकर यथा कमसे अवगंठन, पडङ्ग द्वारा सफलीकरण और परमी करण एवं छोटिका द्वारा दश दिग्बन्धन और अमृतीकरण समाधान करने के अन्त में हायनोडकर देवीके नाम संबोधनातमें "ओस्वागत" इत्यादि कह । आवाहनादि मुद्रा यथा--दक्षिणापूर्ति संहिता- में कहा है, ऊर्दअंजलिको अधः करने से आवाहनी मुद्रा होती है। इसके विपरीत करनेसे ही स्थापनी मुद्रा होती है। दोनों हापकी मुट्टी बांधकर दोनों अंगूठों को ऊंचा करने से सविधायिनी मुद्रा होती है । दोनों हाथ के दोनों अंगूठे अन्तः भविष्ट करने से सविरोधिनी मुद्रा होती है | तर्जनी, मध्यमा - .
श्यामारहस्य भा०टी०। दृत्वा मृदु कृत्वा कनिष्ठिकाम् ॥ लेलिहानाममुद्रेयं जीव- न्यासे प्रकीर्तिता। अञ्जलिं चाय॑वत् कृत्वा परमीकरणं भवेत्॥ ततः खड्गमुण्डवराभययोनर्दिर्शयित्वा प्रतिचक्रे रश्मि वृन्ददेवतामावाहयेत् । तदुक्तं स्वतन्त्रे। ध्यात्वा देवीं समावाह्य योनिमुद्रान्तु दर्शयेत् । खड्गमुण्ड वराभीतिपरां योनिन्तु दर्शयेत् । ततश्च प्रतिचक्रेषु देवीमा- वाहयेत् सदा ॥ अथ खड्गादिमुद्रा यथा। कनिष्ठानामिके वध्वा स्वांगुष्टेनैव दक्षतः । शेषांगुलीस्तु प्रसृते संपृष्ठे खड्गमुद्रिका ॥ अन्तरांगुष्टमुष्टिश्च कृत्वा वामकर स्य च। मध्यमायां दक्षिणस्य तथालम्बय प्रयत्नतःमध्यमेना थे तर्जन्या अंगुष्ठाभ्यां विमृष्य चं। दक्षिणं योजयेत् पाणिं वाममुष्टी च साधकः ॥दर्शयेद्दक्षिणेभागे मुण्डमुद्रेयमुच्यते। . आर अनामिका को समभाव में अधोमुख करके अनामिका में वृद्धांगुलि निक्षेप और कनिष्ठ अंगुलिको सरलभावमें स्थापनकर । यह मुद्रा जीवन्यास में प्रपोग करनी चाहिय । अंजुलीको अग्रवत् करनेसे परमीकरण होती है। अनंतर खड्ग, मुण्ड, पर अभय और योनि मुद्रा प्रदर्शन करके प्रतिचक्र में रश्मिवृंद देवताका आवाहन करै । स्वतंत्रमें कहा है, यथा देवीका ध्यान और सम्यग्मकार आवाहन करके योनिमुद्रा प्रदर्शन करावै । तिस काल खजमुद्रा मुण्डमुद्रा, वर मुद्रा और अभय मुद्रा प्रदर्शन करके पीछे प्रतिचक्र में देवीका आवाहन करना चाहिये। खड्गादि मुद्रा यथा--दक्षिण हाय के अंगूठे से बामहस्तकी फनिष्ठा और अनामिका को वांध तर्जनी और मध्यमा को परस्पर संश्लिट कर प्रसारित करने मे खड्गम्दा होती है । यामहस्तकी मुट्ठी बांध और अंगठेको तिस में मृतीय परिच्छेद। ८६ वरदाभयमुद्राञ्च वरदाभयवत् करे ॥ तर्जन्यनामिकेमध्ये कनिष्ठादिक्रमेण तु करयोर्योजयिसैव कनिष्ठामूलदेशतः ॥ अंगुष्टाग्रन्तु निःक्षिप्य महायोनिः प्रकीर्तिता ।। अथ रश्मिन्ददेवता यथा । कालिकोपनिषदि । ओं काली कपालिनी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी । विप्र चित्ता उग्रा उग्रप्रभा दीप्ता नीला घना वलाका च । मात्रा मुद्रामिता चैव दशपञ्चमकोणगा ॥ इति । आसां ध्यानम् यथा कालीतन्त्रे । सर्वाः श्यामा असिकरा मुण्डमालाविभूषणाः । तर्जनी वामहस्तेन धारयन्त्यश्च संविताः ॥ इति पूर्वादिपञ्चदशकोणे ध्यात्वा आवाहयेत् । तद्वच्च फेत्कारिण्याम् । प्रवेशित, कर दक्षिण इस्त की मध्यमाको यत्न सहित आलम्बित और मध्यमा के सहित तर्जनी व अंगुष्ठान में सयोजित और वाममुट्ठी में दक्षिण हाय बांधकर दक्षिणभाग में प्रदर्शन करै । इसकाही नाम मुण्डमुद्रा है। दक्षिण इस्तकी सव अंगुलियों को अधोमुख में प्रसारित करनेपर वर मुद्रा होती है । वामहस्तकी सव गुलियों को अर्द्धमुख करके प्रसारित करने पर अभयमुद्रा होती है। दोनों हायकी तर्जनी, अनामिका मध्यमा और कनिष्ठाको परस्पर संयोजित करके दोनों कनिष्ठा के मूल देश में अंगुष्ठाङ्ग निक्षेप करने से महायोनिमुद्रा होती है ।। रश्मिवृन्द देवता । यथा -कालिकोपनिपद् में कहा है, काळी, कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला, विप्रचिन्ता, उग्रा, उग्रप्रभा, दीप्ता, नीला, घना, कलाका, मात्रा, मुद्रा, अमिता, यह पंचदश [ पद्ह ] रस्मिदेवता हैं। इनका ध्यान यथा-कालीतत्रे-यह सभी श्यामवर्ण, सभी असिहस्त, सभी मुण्डमाला विभूपित, और सभी बामहस्त द्वारा तर्जनी धारण किये हैं, यह कहकर पूर्वादि पचदश कोण में ध्यान करके आवाहन करें । फेत्कारिणी में भी १२ श्यामारहस्य भा. टी. । ततः पूर्वादिकोणेषु वामावर्तेन विन्यसेत् ततः पूर्वास्यस्तहले ब्राह्मयादिकं ध्यात्वा आवाहयेत् । तद्यथा कुलसम्भवे । महीमण्डलतश्चापि ब्राह्मी नारायणी तथा । माहेश्वरी च चामुण्डा कौमारी चापराजिता । वाराही च तथा: पूज्या नारसिंही तथैव च ॥ आसां ध्यानं यथा। ब्रह्माणी हंससंरूढां स्वर्णवर्णी चतुर्भुजाम् । चतुर्वक्तां त्रिने त्राञ्च ब्रह्मकूर्चच पङ्कजम् ॥ दण्डपद्माक्षसूत्रंच दधतीं चारु हासिनीम् । जटाजूटधगं देवीं भावयेत् साधकोत्तमः॥नारा; यणी महादीप्तां श्यामां गरुड़वाहिनीम् । नानालङ्कारसंयुक्तां चारुकेशां चतुर्भुजाम् ॥ घण्टां शखं कपालंच चक्रं सन्दध ती पराम् । मधुमत्तमदोल्लोलदृष्टिं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥ माहेश्व रीं वृषारूढां शुभ्रां त्रिनयनान्विताम् । कपालं डमरुंचैव वर- कहा है, अनंतर पूर्वादि कोणमें वामावर्त क्रमसे चिन्पासकरै । फिर ब्राह्मी इत्यादि का ध्यान करके आवाहन करना चाहिये । यथा कुल संभव में कहा है, वाहिरी मण्डल में ब्राह्मी, नारायणी माहेश्वरी चामुण्डा, कौमारी अपराजिता, बाराही और नारसिंही की पूजा करै । इनका ध्यान । यथा, प्रमाणी हंसपर सवार होती । वह श्वेतवर्ण, चतुर्भुना, चतुर्वका, त्रिनेत्रा, ब्रह्मकुर्च [ पात्रविशेष ] पंकन [ कमळ ] दण्ड और अक्ष सूत्रं धारण करती है । साधक इसी चारुहासिनी जटाजूट धारिनी ब्रह्माणीकी चिंता करे। नारा रणी अत्या दीपि शालिनी, श्यामवर्ण, गरुड वाहिनी,विविध अलंकार धी. रिणी और सुंदर केशपाश शोभिनी है उसके चार हस्त हैं। उन में घंटा, शंख, कपाल और चक्र विराजमान रहना है। उसकी दृष्टि मधुमत्त मदलोका [ मदसे चंचल ] और सांग सौंदर्य में पूर्ण है । माहेश्वरी वृषभ [ल] पर भारोहण करता है। वह सभा त्रिनयना, एवं उमके हाथमें पर, अभय, गम, कपाल, रमर और टंक [ श विशेष ] शोभा पाना शरीर सा. , - .
तृतीय परिच्छेद। दाभयशूलकम् । टङ्कच दधतीं देवीं नानाभरणभूषिताम् ।। चामुण्डामहासां प्रकटितदशनां भीमवक्ता त्रिनेत्रां नीलाम्भोजप्रभाभां प्रमुदितवपुपां नारमुण्डालिमालाम् । खड़े शूलं कपालं नरशिरघटितं खेटकं धारयन्ती प्रेतारूढ़ा प्रमत्तां मधुमदमुदितां भावयेच्चण्डरूपाम् ॥ कौमारी कुंकुमप्रभा त्रिनेत्रां शिखिसंस्थिताम् । चतुर्भु- जां शक्तिपाशमंकुशाभयधारिणीम् ॥ नानालङ्कारसंयुक्तां प्र- मत्तां परिचिन्तयेत् ॥ अपराजितांच पीताभामक्षसूत्रवरप्र- दाम । कपालं मातुलाङ्गच दधतीं परिचिन्तयेत् ॥ वाराही धूम्रवर्णीच वराहवदनां शुभाम् फलकखगमूषलहलवेदभुजै र्युताम् । नारसिंही नृसिंहस्य विभ्रती सदृशं वपुः ॥ अत्र काम्या पूर्वी दिक् न त्वन्या विशेषवचनात् । यत्र रवेरुदयः किंवा पूज्यपूजकयोरन्तरा इति । आगमे सर्वदेव त पूजने पूज्यपूजकयोरन्तर एव पूर्वा दिक् कार में भूपितहै । चामुण्डा दांत निकालकर अट्टहास करतीहै । वह भीमवका त्रिनेत्रा नीलोत्पळकी समानप्रभा प्रमुदित शरीर,और नृमुराद(नरमुण्ड)मालासे विभूषितहै । उसके हाथमें खड्ग,शूल, नरकपाल, और खेटक (आकाशमें चरने वाळे ग्रह ) शोभायमान है । वह मधु मदमें प्रमुदित और प्रमत्त होकर प्रेतके ऊपर मारूढ़ होती है। उसका रूप अत्यन्त भयंकर है। साधक उसकी उक्त रूप में भावना करै । कौमारी की प्रभा-कुंकुम के समान है। उसके तीन नेत्र, शिखी (मोर ) वाहन, चार भुजा, हाथों में शक्ति, पाश, अंकुश और अभय, एवं कळेवर विविध अलंकार में विभूषित है । अमृत पान करके वह अत्यन्त मत्त भावापन्न हुई है । साधक इस रूपमें उसकी चिन्ता करै । अ- पराजिता पीतवर्ण, अन, सूत्र और वरमदा, कपाल एवं मातुळा धारिणी है । इस रूप में उप्तकी चिन्ता करै । वाराही धूम्र वर्ण, वराह की समान बदनयुक्त और चार भुना में फलक, खड्ग, मूशल और तूण धारण करतीहै । नारसिंही नृसिंह की समान शरीर धारिणी है। " - श्यामारहस्य भा०टी० । तदुक्तं राघव भट्टेन। यत्रैव भानुस्तु वियत्युदेति प्राचीति तां वेदविदो वदन्ति । अथान्तरा पूजकपूज्ययोश्च सदागमज्ञाः प्रवदन्ति तान्तु ॥ अन्यच्च । देवसाधकयोरन्तः पूर्वाशा दिगिहोच्यते ॥अपि च। पूज्यपूजकयोरन्तः पूर्वाशैव निगद्यते ॥ तन्त्रान्तरेऽपि । होतुःपूर्व पूर्वभागं प्रदिष्टं सव्यं भागं दक्षिणन्त्वांगमः। दक्ष विन्द्यादुत्तरं भागमग्रथं प्रज्ञावाद्भिः पश्चिम भागमुक्तम् ॥ अग्न्यमिति संमुखमित्यर्थः ॥ यत्तु । पुरन्दरमुखो मंत्री पूजयेत् त्रिपुरां यदि । देवीपश्चात्तदा प्रा- ची प्रतीची त्रिपुरेश्वरः॥ इति गुप्तार्णववचनम्, तत्तिपुराविषये वोद्धव्यम् । देवी मात्रविषयकल्पने अन्यथा भवेत् । अथ मूलमन्त्रांते । श्री पूर्वदिशाही पूजादि में कामनीय है, अन्य दिशा नहीं । इस विषय में विशेष वचन हैं जिस दिशा में सूर्य का उदय होता है, अथवा पूर्जक का अन्तरा अर्थात् व्यवधान है, उसकोही पूर्वदिशा कहते हैं आगम में कहा है संपूर्ण देवताकी पूजा में पूजा और पूजक के अन्तरकोही पूर्व दिशा कहते हैं राघवमट्ट ने भी इसीप्रकार कहा है । यथा-जिस ओर आकाश में सूर्य उ- दय हों, वेद विद्गण उसकाही पूर्वदिक् शब्द में निर्देश करते हैं । आगमन व्यक्तिगण पूजा और पूजक के अन्तरकोही पूर्वदिशा कहते हैं । अन्यत्र भी कहा है, यथा-देवता और साधक इन दोनों के अन्तरको पूर्व दिशा कहते हैं । फिर भी कहा है, पूज्य और पूजक के अतरकोही पूर्वदिशा कहते हैं । तलांतर में भी लिखा है, होता के पूर्व को पूर्वभाग, सव्यको दक्षिणभाग, दक्षिणको उत्तर भाग और समुख को पश्चिमभाग कहते हैं। मानचित् और आगमवित् व्यक्ति गणोंका इसीप्रकार मत है । तो जो गुप्तार्णव में लिखा है कि पुरंदर मुख में विराजमान होकर गिपुरा देवीको पूजा करे, उसको त्रि पुरा विषयक समझना चाहिये । अनतर मूलमंत्र के अंत में श्री महाकाल .
* तृतीय परिच्छंद। महाकालसाहितांश्री दक्षिणकालिकां तर्पयामीति त्रिःसन्तl सायुधां सपरिवारांच तर्पयेत्। ततोऽष्टादशोपचारैः षोडशोप चारैर्दशोपचारैः पंचोपचारैर्वा देवी पूजयेत् तदुक्तं स्वतन्त्रे। आवाहयेत् प्रतिदले मूलदेवीं च तर्पयेत् । तर्पयेत् का- लिकां देवी सायुधां सपरीकराम् । पाद्यादिभिर्मूलदेविं सं- पूज्य तर्पयेत् पुनः ॥ अथोपचारा यथा । तदुक्तं फेत्कारिण्याम् ॥ असनावाहने चाध्य पाद्यमाचमनं तथा ॥ स्नानं वासोपवी. तञ्च भूपणानि च सर्वशः । गन्धपुष्पं तथा धूपदीपावन्नञ्च तर्पणम् ॥ माल्यानुलेपनञ्चैव नमस्कारविसर्जने । अष्टादशो पचारैस्तु मन्त्री पूजां समाचरेत् ॥ मन्त्ररत्नावल्यान्तु । पद्यार्थ्याचमनीयञ्च स्नानं वसनभूषणम् । गन्धपुष्पधूप सहित श्रीदक्षिणा कालिका का तर्पण करता हूं यह कह तीन बार तर्पण करके आयुध और परिवार के सहित पुनर्वार तर्पण करना चाहिये । अ- नंतर अष्टादश [ अठारह ] वा पोडश [ सोलह ] या दश वा पच विध उपचार से देवीकी पूजा करै । स्वतत्र में इसीप्रकार कहा है, यथा-प्रति- दळ में आवाहन करके मुळ देवी का भी तर्पण करें । देवी कालिका का और परिकर सहित तर्पण एवं पाधादि द्वारा मूल देवी की पूजा करके पुन- वार तर्पण करना चाहिये । सव उपचार । यथा-फत् कारिणी तत्र में कहा है । आसन, आवाहन अय, पाध, आचमन, स्नान, वाय, उपवीत, समस्त भूषण, गध, पुष्प, धूप, दीप, अन्न, तर्पण, माल्पानुलेपन, नमस्कार, विसर्जन, इन अठारह उपचार से पूजा करै । मंत्ररत्नावली में कहा है, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान, वसन, आभूषण, गध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, श्यामारहस्य भा० टी० । दीपनैवेद्याचमनं ततः ॥ ताम्बूलमर्चना स्तोत्रं तर्पणञ्च नमस्कूिया । प्रयोजयदर्चनायामुपचारांस्तु षोड़शः भन्यच्च । अयं पाद्य निवेद्याथ तथैवाचमनीयकम् ॥ मधुपर्काचमन- ञ्चैव तथा गन्धप्रसूनके ।। धूपदीपौ च नैवेद्य दशोपचारक स्मृतम् । गन्धादिका नैवेद्यान्ता पूजा पञ्चोपचारिका ॥ अथ पूजायां विधेयो यथा । कालीकल्पे । श्रीपदं पूर्वमुद्धृत्य पादुकापदमुद्धरेत् । पूजयामि ततः पश्चात् पूजयेदङ्गदेवताः ॥ काल्यादयः पूजनीयाः क्रमेण परमेश्वरि !। स्वाहा होमे तर्पणे च तर्पयामीति संस्मरेत् ॥ देवीदक्षिण महाकलं पूजयेत् यथा । कुमारीकल्पे । देव्यास्तु दक्षिणे भागे महाकालं समर्चयेत् ॥ कालीकल्पेऽपि। महाकालं यजेद यत्नात् पश्चादेवीं प्रपूजयेत् ॥ अर्चना, स्तोत्र, तर्पण, नमस्कार यह पोडश उपचार पूनाके समय प्रयोग करै । अन्यत्र भी कहा है | अर्घ्य और पाद्य निवेदन करके फिर आचमन मधुपर्क आचमनीय,, गध, पुष्प, धूप, दीप, और नैवेद्य निवेदन करें। इन काही नाम दश विध उपचार है गध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य इन कई द्रम्पको एकत्र में पच उचचार कहते हैं पूना का निषेध । यथा-कालीकल्प में कहा है,प्रथम श्रीपद उद्धार करके फिर पादुकापद उद्धृत करै । अनतर 'पूजयामि' पद प्रयोग करना चाहिये फिर संपूर्ण अंग देवताओं की पूजा करके यथाक्रमसे कल्पादि की पूजा करनी चाहिये। देवीके दक्षिणमें महाकालकी पूनाकरनी चाहिये। यथा कुमारी कल्प में कहा है, देवी के दक्षिण भाग महाकाल की पूना करै । कालीकम्प में भी कहा है, यत्न सहित महाकाल की पूना करके फिर देवीकी भर्षना में प्रवृक्ष होवे ।।
तृतीय परिच्छेद। अथ मन्त्रों यथा।ओं क्षौं यां रा लां वां कौं महाकाल- भैरव ! सविघ्नान् नाशय नायश ह्रीं श्रीं फट् स्वाहा अनेन पायादिभिराराध्य त्रिस्तर्पयित्वा मूलदेवी पूजयेत् । तथा मूलान्ते च ततः पायं महाकालसाहित-श्रीदक्षिणकालिकायै नम इति पादयोः पाद्यं दद्यात् । केषाञ्चिन्मते तु । महा- कालसहितपदसम्बलितदेवीनामप्रयोगो न भवतीति सा. म्प्रदायिकाः। अथ अयं शिरसि दद्यात् । एवम् आचमनीयं मधुपर्कञ्च । वमिति वरुणवीजान्ते मुखपङ्कजे दद्यात् । स्नानीय नम इति स्नानीयं दत्त्वाशुद्धदुकूलेनाझंप्रोन्माय वि चित्र पट्टवस्त्रकस्तूरीकुंकुमचन्दन सिन्दूरकज्ज्वलमुकुट कु- एडल ताटङ्कहारनय शङ्खकङ्कणाङ्गदग्रीवा भूपणकांचीनूपुर रत्नांगुरीयकायाभरणानि विविधपद्मादिरचितमाल्यादीनि निवेद्य केवलं पुनराचमनीयं दद्यात् । तदुक्तम् । पायञ्च पादयोर्दद्यात् नासामन्त्रेण मन्त्रवित् । शिरो- पूजा का मंत्र । यथा--"डों क्षौ" इत्यादि । इस मत्र से पाद्यादि द्वारा आराधना करके तीनवार तर्पण सहित मूल देवीकी पूजा करै । मूल मंत्रसे पूजाकर तदीय पदमें पाद्य निवेदन करै । किसी किसी के मतसे महाकाल सहित पद संयुक्त देवी के नाम का प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं है । अनन्तर मस्तक में अर्घ्य दान-करै । इस प्रकार वरुण चीन सहित मुख क- मल में भाचमनीय, और मधुपर्क प्रदान करना चाहिये । अनन्तर स्नानीय दान और विशुद्ध दुयूल (इपट्टा) में अंग ढककर विचित्र पद् वस्त्र, कस्तूरी कुंकुम, चंदन, सिद्र, कजल ( मुकुट ) कुएडळ, ताटक, तीन हार, शंख, कंकण, अंगद, ग्रीवाभूपण, काश्ची, नपुर, और रत्नांगरीय इत्यादि समस्त आभरण और विविध पद्मादि रचित माल्यादि निवेदन पूर्वक-केवळ पुन- चार भाचमनीय प्रदान कर जैसा कहा है । यथा-- नासान्त के समय पाद - श्यामारहस्य भा०, टी० । मन्त्रेण देवेशि ! अयं दद्याच्छिरोपरि ॥ आचमनं मधुप- कैच स्वधामन्त्रेण देशिकः । स्नानं गन्धं हृदा दद्यात् पुष्पाणि चौपडित्यपि ॥ ततो निवेदयामीति दद्यात् सर्व महेश्वरि ! । स्वधामन्त्रेण वरुणमन्त्रण इत्यर्थः । स्वधेत्याचमनीयंच त्रिवारं मुखपङ्कजे । तन्त्रान्तरे च। नमः स्वाहा स्वधा चैव वौषडिति यथाक्रमम् । स्वहा सन्निधिपाठाच्च आचमनीयं स्वधोत वकारमध्य- पाठो युक्त एव भवति तन्न समीचीनम् । अत्रागमे प्रायः स. ङ्केतेनैव मन्त्रोंद्धारः क्रियते एकमन्त्रोद्धारेऽपि कुत्रापि तत्तद- क्षरेण कुत्रापि पर्यायशब्देनापि तत्तन्मन्त्रोद्धारो दृष्ट इति 'उकारमध्यपाठो युक्तः न तु वकारमध्यः अन्यथा राधवभट्ट धृतवचनविरोधापत्तेः । तद्यथा,। मधुपर्क मुखे दद्यात् जलमन्त्रेण देशिकः । किंच वारुणेन युगल में पाय निवेदन करके शिरोमंत्रसे शिरके ऊपर अय, स्वधा मंत्रसे आचमन और मधुपर्क, गन्ध हृन्मंत्र से स्नान, और चौपद् इत्यादि मंत्र से समस्त पुष्प निवेदन करै ।। यहां स्वधा मंत्र शब्द में वरुण मंत्र समझना चाहिये । क्योंकि तन्त्रा. न्तर में कहा है, स्वधा मंत्रसे तीनवार मुख पंकज में आचमनीय मदान क- । फिर कहा है, नग स्वाहा स्वधा और वौषट् यया क्रमसे इत्यादि । इस स्थान में स्वधा, यह वकार मध्य पाठ-किसी क्रमसे ठीक नहीं है । इस आ. गम माय संकेत में मंत्रोदार किया गया है । एक विध मंत्र के उद्धार में भी कहीं उमी उस मंत्र द्वारा, और पर्याय शब्दद्वारा भी तत्तत् मंत्रका उ. द्धार किया गया है। यह देखा जाता है सुतरा उकार मध्य पाठही युक्त है, यकार मध्य पाठ संगत नहीं है । अन्यथा राघव भट्ट धृत वचन के सहित विरोध संघटित होता है । यथा-जल मत्र से मुख में मधुपर्क प्रदान करे ।
.. तृतीय परिच्छेद। तु मन्त्रेण मधुपर्क मुखाम्बुजे ॥ इति न च वाच्यं मधुपर्क विषयमेवेदं वचनमिति। मधुपर्काचमनयोरेकमन्त्रेण दानात् सुधेति पाठो युक्तः एवेति निश्चितम् । ततो मध्यमानामिकांगुष्टे गन्धं नम इति गन्धम् अंगुष्टतर्जनीभ्यां पुष्पाणि वौषडिति पुष्पैः संपूज्य सा' क्षतं स्वयम्भू कुसुमादिकञ्च वोपडिति मन्त्रेण दचा धूप पात्रं फडिति संप्रोक्ष्य नम इति इष्ट्वा पुरतो निधाय वाम तर्जन्या संस्पृशन् धूपं निवेदयामीतिं श्रीपात्रामृतेन उत्स्ट- ज्य गजध्वनि मन्त्रमातः स्वाहेति घण्टा संपूज्य वामहस्तेन तां वादयन् मध्यमानामिकांगुष्ठेधूपंदत्वा देवतागायत्री मूल- मन्त्रंच जप्त्वा त्रिधा उत्तोलनं कृत्वा देवीं धूपयेत् । अथ स. म्मुख दीपभाजनं संस्थाप्य पूर्ववत् प्रोक्षणपूजने कृत्वा वा- ममध्यमया दीपपात्रं स्पृशन् दीपं निवेदयामीति निवेद्य घ- एटां पूर्ववत् वादयन् मध्यमानामिकामध्ये दीपपात्रमंगुष्टाये किंच वारुण मंत्र से मुख पद्म में मधुपर्क इत्यादि । यह वचन मधुपर्क विषयक है, इसप्रकार नहीं कहसक्ते । क्योंकि मधुपर्क और आचमन दोनों के एक मंत्रयोग में मदान वशतः सधा के परिवत में 'स्वधा' यह पाठही युक्ति युक्त होता है। यही स्थिर किया सिद्धांत है ।। अनंतर यथोक्त मंत्रोचारण सहित गंध और पुष्प द्वारा पूजा करके बौ- पद मंत्रसे अतत सहित स्वयम्भू कसमदान फट्यंत्र से धूपपात्र मोक्षण, पूजन सम्मुख में स्थापन और बाम तर्जनी द्वारा स्पर्श करना चाहिये । फिर घटा की पूजा और वामहस्त द्वारा उसका बादन, मध्यमा, अनामिका और अं- गुष्ठ द्वारा धूपदान, देवता, गायत्री और मूलमंत्र जप और तीनवार उत्तो- लन करके देवीको धूपित करै । अनतर सम्मुख में दीपपात्र स्थापन एवं पूर्ववत् प्रोक्षण और पूजन निष्पादन करके वामहस्त की मध्यमा द्वारा दी- पपात्र स्पर्श, दीप निवेदन, पूर्ववत् घंटा वादन, एवं पूय मध्यमा और अनामिका के मध्य में अंगुष्ठान द्वारा दीपपान धारण करके गदर्शन . 4 श्यामारहस्य भा० टी० ण धृत्वा दर्शयेत् । ततो मधुद्रव्यं सम्मुखे कृत्वा ओं का- लि ! कालि ! महाकालि ! हूं हूं अमृतमासवं विधिवत् कुरु कुरु स्वाहा इति मन्त्रेण सप्तधा अभिमन्य च ग्रासमुद्रया पात्रमादाय दक्षिणपाणिना शुध्यादिकं गृहीत्वा कराभ्यां संयोज्य मूलमन्त्रान्ते शुद्धयादिसहितमास निवेदयामीति दद्यात् । ततो नैवेद्यं स्वर्णादिपात्रे कृत्वा त्रिकोणमण्डलोपरि पुरतः संस्थाप्य हुमित्यवगुण्व्य यमिति वायुवीजेन संशोध्य रमिति वह्निवीजेन संदह्य वमिति वरुणवीजेन धेनुमुद्रया . अमृतीकृत्य तदुपरि मूलं सप्तधा प्रजप्य वामांगुष्ठेन नैवेद्य-- पात्रं स्पृशन् नैवेद्यं निवेदयामीति दक्षिणहस्तं तवमुद्रया उत्सृजेत् । ततो जलगण्डूषं दवा प्राणादिपञ्चमुद्रां दर्श- यन् वामहस्ते ग्रासमुद्रां दर्शयेत् । ततः पुनराचमनीयं दत्त्वा कर्पूरादियुक्तताम्बूलं वामांगुष्ठेन धृत्वा ताम्बूलं निवेदयामी- ति दद्यात् । सर्वमय॒जलेन उत्सृजेत् । ततस्तन्त्रमुद्रया कर तदुपरांत मधु द्रव्य सन्मुख करके 'ओं कालिकालि' इत्यादि मंत्र से सात बार अभिमंत्रित करने के पीछे ग्रास पुद्रा. द्वारा पात्र ग्रहण, दक्षिणास्त द्वारा शुध्यादि संग्रह और दोनों हाथों से मिलायकर मूलमंत्र के अंत में शुध्यादि सहित आसव निदन करन चाहिये । अनंतर सुवादियान में नैवेद्य करके त्रिकोण मण्डल के ऊपर सन्मुख स्थापन, कूर्च मंत्र से अवगुण्ठन वायुवीज की सहायता से संशोधन वह्नि वीज द्वारा संदहन, वरुणबीज की सहायता से धेनुमुद्रा योग में अमृतीकरण, उसके अपर सातवार मूलमन्त्र जप, और याम अंगुष्ठ से पात्रको स्पर्श करतत्व मुद्रा द्वारा उत्सर्जन करे । फिर जलगएड्प प्राणादि पंचमुद्रा प्रदर्शन करने के पीछे वाम इस्त्र में ग्रास मुद्रा दिखानी चाहिये । तदनंतर पुनरि आचमनीय प्रदान करके बांये हाय के भगुटे से कर्पूरादि युक्त ताम्बळ ग्रहण कर उसको निवेदन और समस्त अर्ग नल के राहिन उत्समन करे । अनंतर तत्वमुद्रा सहित अामन द्वारा । .
तृतीय परिच्छेद। अर्ध्यामृतेन देवीं त्रिः संतर्य योनिमुद्रां दर्शयेत् ॥ तदुक्तं तन्त्रान्तरे। मध्यमानामिकाभ्यान्तु अंगुष्ठाग्रेणपार्वति ! । दद्याच्च विमलं गन्धं मूलमन्त्रेण देशिकः ॥ अंगुष्ठतर्जनीभ्यान्तु चक्रे पुष्पं निवेदयेत् । यथा गन्धं तथा देवि ! धूपं दद्याद्विचक्षणः॥ मध्यमानामिकाभ्यान्तु मध्यपर्वणि देशिकः। अंगुष्ठाग्रेण दे- वेशि ! धृत्वा दीपं निवेदयेत् ॥ उत्तोलनं त्रिधा कृत्वा गाय- या मूलयोगितः। तन्त्रात्यमुद्रया देवि ! नैवेद्यच निवेदयेत् ॥ मूलेन आचमनं ताम्बूलं तेन मुद्रया दद्यात् । सारदाटीकायाञ्च। धूपभाजनमंत्रण प्रोक्ष्याभ्यर्च्य हृदात्मना । मन्त्रेण पूजि तां घण्टां वादयन् गुग्गुलं दहेत् ॥ अन्यत्रापि। गजध्वनि ततो मन्त्रमातः स्वाहेत्युदीर्य च । अभ्यर्य वा. दयन् घण्टा सधूपैधूपयेत्ततः॥ तन्नांतरे च। ततः समर्पयेत् धूपं घण्टाचादनसंयुतम् । एवं दीपदाने घंटा वादनमिति साम्प्रदायेकाः । देवीको तीनवार तृप्त करके योनिमुद्रा दिखा । तंत्रातर में कहा है यथा-- मध्यमा, अनामिका और अंगुष्ठान द्वारा मूलमंत्र की सहायता से बिमळगंध दान करनी चाहिये । अंगुष्ठ और तर्जनी द्वारा चक्र में पुप्प निवेदन एवं गंध और धूप दान करें । मध्यमा, अनामिका, और अंगुष्ठान द्वारा मध्यपर्व में दीप धारण करके निवेदन और मूलमंत्र से तीनवार गायत्रीको उत्तोलन करके तत्वान मुद्रा प्रदर्शन करने के छ नैवेद्य निवेदन करै । शारदा के में कहा है, धूप भाजन मंत्र में प्रोक्षण, हृन्मत्र में अभ्यर्चन (पूना ) और 'फट् की सहायता से पूजित घंटा वनायकर गुग्गल जलाना चाहिये । त. न्त्रांतर में कहा है, अनंतर घंटा वनाने के संग धूप निवेदन करें । साम्प्र. , श्यामारहस्य भा०टी०। . अथ गन्धादिनिवेदनस्थानम् यथा यामले। निवेदयेत् पुरोभागे गन्धं पुष्पंच भूषणम् । दीपं दक्षिणतो दद्यात् पुरतो न तु वामतः ॥ वामतस्तु तथा धूपमग्रे वा न तु दक्षिणे । नैवेद्यं दक्षिणे चापि पुरतो न तु पृष्ठतः ॥ दीपमिति घृतयुक्तञ्चेत् दक्षिणे तैलयुक्तंचेद्वामे इति सा- म्प्रदायिकाः । एवं सिता वर्तिश्चेत् दक्षिणतः रक्ताचेद्वामतः संमुखे तु न नियमः। नैवेद्यमिति सिद्धान्नं चेत् देवतावामे आमान्न चेदक्षिणे इत्यपि वोद्धव्यम् । अथ पुष्पनियमो यथा मुण्डमालायाम् । पुष्पाण्यपि तथा दद्यात् रक्तकृष्णसितानि च । श्वेतं रक्तं जवापुष्पं करवीरं तथा प्रिये !॥ टगरं मल्लिका जाती माल ती यूथिका तथा धुस्तूराशोकवकुलं श्वेतकृष्णापराजिता ।' दायिक गणोंने दीपदान में भी इसीप्रकार घंटा बनाने की विधि निर्देश की है । गंधादि निवेदन के स्थान यया-यामल में कहा है,। पुरोमाग में गंध, पुष्प और भूपण, दक्षिण में दीप, वाम में धूप और दक्षिण में नैवेद्य प्रदान करें। दीप कभी सम्मुख वा वाम में न दे । और नैवेद्य भी कभी सन्मुख चा पीछे से निवेदन न करै । साम्प्रदायिक मतसे घृतयुक्त प्रदीप दक्षिण में और तेल युक्त दीप बाम में निवेदन करै । इसप्रकार श्वतवर्षि ( सफेदवर्ती) दक्षिण में और रक्तवर्ती वाम में प्रदान करनी चाहिये । मन्मुख नहीं नैवेद्य सिद्धान होने से देवता के नाम में और आसन न होने से दक्षिण में, यह समझना चाहिये। पुष्प नियम । यया-मुण्डमाला तंत्र में कहा है। रक्त, कृष्ण और श्चत वर्ण समस्त पुष्प प्रदर्शन करें । मत और रक्त भेद में द्विविध जया और द्विविध करवीर, टगर (सुहागा) मल्लिका, जाती (चमेली) मालती, थी, धुस्तर, अशोक, वकुल, शम और कृष्ण मेद में दो मस्तार की भ.. ।
१०१ तृतीय परिच्छेद। वकपुष्पं विल्वपत्रं चम्पकं नागकेशरम् । मल्लिका झिारोटका कांची रक्तं यत् परिकीर्तितम् ॥ अर्कपुष्पं जवापुष्पं वर्वरंच प्रियं भवेत् । अष्टम्यांचं विशेपेण तुष्टा भवति पार्वती॥ पद्म पुष्पेण रक्तेन सन्तुष्ठाः सर्वदेवताः कृष्णं वा यदि वा रक्तं का- लिका वरदा भवेत् ॥ श्मशानधूस्तुरेणैव तुष्टा स्वप्नावती परा । अन्यपुष्पैश्च विविधैः सन्तुष्ठा देवि ! पार्वती ॥ आम- लक्यास्तु पत्रेण तुष्टा भवति पार्वती । अष्टम्यांच चतुर्दश्यां नानापुष्पैः समर्चयेत् ॥ श्मशाने रात्रिशेषेवा शनिभौमदि- ने तथा। मत्स्यसूक्ते। सुगन्धिश्वेतलोहित कुसुमैरर्चयेहलैः॥ विल्वैर्मरुवकाद्यै- श्च तुलसीवर्जितैः शुभैः। ओड्रपुष्पैर्विशेषेण वज्रपुष्पेण मिनि तम् ॥ सर्व पुष्पं प्रदातव्यं भक्तियुक्तेन चेतसा । देवानामि. त्युपलक्षणं देवीनामिति वोद्धव्यम् ॥ पराजिता ( विष्णुकान्ता ) वक पुष्प,विल्वपत्र, चंपक, नागकेशर, मल्लिका पीलीकटसरैया कांची ( तरी चोटली ) और अर्क पुष्प (आकका फूल ) यह सब देवीको प्रिय हैं । विशेष करके अष्टमी में यह सब प्रदान करने से पार्वती तुष्ट होती हैं । रक्तवर्ण पद्म पुष्प प्रदान करने से संपूर्ण देवता संतुष्ट होते हैं । कृष्ण वा रक्तवर्ण जो कोई पुप्पप्रदान कियाजाय उससे कालिका चरमदान करती है । स्वभावती श्मशान धुस्तूर ( श्मशान का धतूरा ) सेही : संतुष्ट होती है । अन्यान्य विहित पुष्प और आमलकी के पत्र प्रदान करने से, पार्वती प्रसन्न होती हैं। अष्टमी और चतुर्दशी में शनि और मंगळवार में, श्मशान में वा रात्रिके शेप में, विविध पुष्प दान सहित अर्चना करें। म. स्य सूक्त में कहा है, सुंदर गंधयुक्त श्वेत और लोहित, वर्ण कुसुम(पुष्प ) बिल्व, मरुवक विशेषतः प्रोद पुष्प [ गुडहर पुष्प ] और वजू पुष्प मिश्रित समस्त पुप्प भक्तियुक्तचित्तसे प्रदानकरै,तुलसी मदान न करै । तन्त्रान्तरमें 11655 .
श्यामारहस्य भा०टी०। तदुक्तं तन्त्रांतरे। देवीपूजा सदा कार्या जलजैःस्थलजैरपि। विहित नि- पिद्धैर्वा भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ पूजनीया सदा भक्त्या नृणां शीघ्रफलाप्तये ॥ अथ पुष्पदानविधानम् यथा तदुक्तं सारदाटीकायां। पुष्पं वा यदि वा पत्रं फल नेष्टमधोमुखम् । दुःखदं तत्स- माख्यातं यथोत्पन्न तथार्पणम् ॥ अधोमुखं फलं नेष्टं पुष्पां जलिविधौ न तत्। अथ नैवेद्यं यथा। तदुक्तं मत्स्यसूक्ते। ' पायसं कृपरं दद्यात् शर्करागुड़संयुतम् । गव्यं मुखे मधु- पयस्तथान्यानि निवेदयेत् ॥ शालमत्स्यञ्च पाठीनं गोधा मांसमनुत्तमम् ।अन्नश्च मधुनायुक्तं यत्नाद्दद्याच मन्त्रवित्॥ कृपर तिलतण्डुलमित्यर्थः । पाठीनं वोयालाख्यमत्स्य मित्यर्थः। कहा है विहित हों अथवा निषिद्ध हों, जलन और स्थलन पुष्पों के द्वारा भक्ति युक, दिल से सर्पदा देवी की पूजा करने से शीप्रफळ काम से। पुष्प विधान । यथा-शारदा टीका में कहा है पुप्प वा फल अथवा पत्र अधोमुख होकर न दें, इससे दुःख उपस्थित होता है । जिस रूप में वह सब उत्तम हुए हैं उसीमावर्षे अर्पणकरै । पुष्पांनाले प्रदान करने के समय अधोमुख होकर फलदान की विधि विहित नहीं है । अब नैवेद्य दानकी विधि लिखी जाती है मत्स्पमत में कहाहै पायस (खील ) शर्करा गृह समेत कार गम्प दुग्ध[गायका दुग्ध ] मधु और अन्यान्य समस्त द्रव्य निवेदनकरै । मंत्रविद सापक यत्न पूर्वक शाल्पमत्स्य, पान, गोधामांस और मयुक्त मनप्रदान पारे ।इस स्पळमें कृपर शब्दमें तिल, डलहों । पाठीन शब्दमें पोदाळ मरस्प तृतीय परिच्छेद । अन्यत्रापि । कन्दुपक्कं स्नेहपक्कं घृतसंयुक्तपायसम् मनःप्रियंच नैवेयं दद्यादेव्यै पुनः पुनः॥ कन्दुपक्कं भृष्टतण्डुलपृथुकादिकम् स्नेहपक्कं लड्डुकादि । कुमारीकल्पेऽपि। ताम्बूलंच सकर्पूरं नारिकेलं सशर्करम् । पायसं सघृतंचैव आर्द्रकं सगुई तथा ॥ सतण्डुलं तिलंचैव दपि चैव सशर्कर- म् । जम्बीरं पनसंचैव आम्रातकफलं तथा ॥ कदलीं तिन्ति ड्रींचैव श्रीफलं फलमुत्तमम् । करंजं वकुलंचैव ताल खजूर मेव च ॥ अन्यानि च सुगन्धीनि स्वादूनि च फलानि च ।। मुण्डमालायामपि । दधि क्षीरं गुड़श्चान्नं पायसं शर्करान्वितम् । पायसं क्षौद्रमांसंच नारिकेलं समोदकम् ॥ शशक मेषकंचैव आर्द्र कंच सशर्करम् । शालमत्स्यंच पाठीनं शकुलं गड़कं तथा ।। मद्गुरं चेलिपं दद्यात् मांसं माहिषमेव च। पक्षिमांसं वरा- समझना चाहिये। अन्यत्र भी कहा है । यथा-कन्दपक्क, स्नेहपक घृतसमक्त पायस और इच्छानुसार मनकी प्रियनैवेद्य बारम्बार गदानकर कन्दपक शब्दमें भ्रए तण्डुळ पृथूकादि जानना स्नेह पक शब्दमें लड्डूकादि। कुमारीकल्पभी कहा है । यथा कर्पूर सहित ताम्बूल शर्करा के संग नारिकेल [ नारियल ], घृत सहित खीर गुड सहित अदरख तण्डुल सहित तिल शर्करा सहित दधि, जम्बीर, [ नींबू] पनस [कटहर] आम्रतक [ अम्बाडा ] कदली सिन्तिडी [विषाविल ] श्रीफल, करन, वकुल, ताल, खजूर एवं अन्यान्य सुस्वाद और सगन्धित सम्पूर्ण फल प्रदान करै । मुण्डमाला में कहा है दधि, दूध, गुड सहित पायस, नौद्रमांस, नारिकेल, मोदक, अन्न, खरगोश, मेप मिड] शर्करा सहित अदरख, शाल, पाठीनमत्स्य,शफल,गडक, मगर, इळिप, भैसे का मांस,पक्षीमांस, नानासम्भूत,डिम्बकालावकरा,महामांस,गोधिका हरिणी श्यामारहस्य भा०टी०। रोहे ! डिम्ब नानासमद्भवम् ।। कृष्णच्छागं महामांसं गोधिकां हरिणीं तथा। जलजे मत्स्यमांसे च गण्डकीमांस मेव च ॥ नानाव्यानदुग्धानि व्यञ्जनानि वहूनि च ॥ नैवेद्यपात्रं यथा। यामले । तैजसेषु च पात्रेषु सौवर्णे राजते तथा । ताम्र वा प्रस्तरे वापि पद्मपत्रेऽवा पुनः । यज्ञदारुमये वापि नैवेद्यं कल्पयेत् बुधः। सर्वाभावे तु माहोश ! स्वहस्तघटितंयदि। यद्योग्यमर्थ्य पात्रे तु तद्विधाय निवेदयेत् । अन्यस्तोथैर्यदुत्सृष्टमय पात्र स्थितंच यत् ॥ न गृह्णाति महादेवी दत्तं विधिशतैरपि । अथ कृताञ्जलिः!श्रीदक्षिणकालिके! आवरणं ते पूजया. मीति आज्ञा गृहीत्वा अग्नीशासुरवायव्यसंमुख दिक्षुचदेव्याः पड़ने वा पड़ङ्गदेवतांध्यात्वान्यासोक्तमन्त्रेण यजेत् तदुक्तं कुलार्णवे। अग्नीशासुरवायव्यमध्यदिवङ्गपूजनम् । इति । मांस, गण्डकी मांस एवं अनेक व्यजन और दूध प्रदान करै । नैवेद्य पात्र यथा-यामले विविध तैनस पात्र में अथवा सुवर्ण के पात्र में वा चांदीके पान में या तांबे के पात्र में किंम्बा पत्थर और पद्मपन में अपना यज्ञदारुमय पात्र में नैवेद्य कल्पना करै । हे महेशानि ! इन सबका अभाव होनेसे स्वहस्त गठित उपयुक्त अर्यपात्र में नैवेद्य निवेदन करै । इनके बिना अन्यपात्र में शत शत विधि अनुसारभी प्रदान करनेसे महादेवी उसको ग्रहणनहीं करती। अनन्तर हाथ जोडकर "श्री दक्षिणकालिके" इत्यादि कह, आज्ञाप्रहण कर अमिकोण, वायुकोण, नेतकोण और ईशान कोण के, सन्मुख एवं दिक समूह अथवा देवीके पडंग में पडंग देवता का ध्यान करता हुआ न्यासोक्त मंत्र से पूजा करें । फुनाव में कहा अग्निकोणादि चतप्कोण मध्य भाग और दिशागोंमें अन पूजा करनी चाहिये । तन्त्रान्तर में भी कहा है है यथा- तृतीय परिच्छेद । १०५ तन्त्रान्तरे च। इवा हृदयमाग्नेय्यामैशान्यान्तु शिसे यजेत् नैर्ऋत्यांच शिखा पूज्या वायव्यां कवचं यजेत् ॥ अभ्यर्च्य पुरतो नित्यं दिक्षु वास्त्रमथार्चयेत् । अपिच । वन्ह्यादिदिचु वा पूज्या तत्तदङ्गेषु च क्रमात् ॥ ध्यानं यथा। तुषारस्फटिकश्यामनीलकृष्णारुणार्चिपः । वरदाभयधा- रिण्यः प्रधानतनवस्त्रियः ॥ अथ गुरुपंक्तित्रयं पूजयेत् । तदुक्तं सारदादीकायाम् । वायव्यादीशपर्यन्तं गुरुपंक्किं समर्चयेत् । तदशक्तो गु. रुचतुष्टयं तदशक्तौ गुरुत्रयम् ॥ तदेवत ऋषिमात्रं वा । अथ गुरुपंक्तिर्यथा । तदुक्तं भा- वचूड़ामणौ। भैरव उवाच। मातदेवि ! महामाये ! चन्धमोक्षप्रवर्तिनि ! । इदानी श्रोतुमिच्छामि गुरुक्रममनुत्तमम् ॥ अग्निकोण में हृदय की पूजा करके ईशानकोण में मस्तक, नैर्ऋतकोण में शिखा और वायुकोण में कवच की पूजा करनी चाहिये । पूजा के अन्त में सन्मुख सब ओर प्रत्रकी पूजा करनी चाहिये । फिर कहा है, अग्नि इ- त्यादि दिशाओं में उन उन सब अहों सहित यथा क्रमसे देवीको पूजा करें। ध्यान यथा--तुपार इत्यादि । अनन्तर तीन गुरु पंक्तियों की पूजा करनी होती है। सारदा टीका में कहा है । यया-वायुकोण से ईशानकोण प- र्यन्त पंक्तिकी पूजा करै । इस में असमर्थ होने से गुरु चतुष्टय और इसमें भी असमर्थ होने से गुरुत्रय अथवा तदैवत ऋषि मात्रकी पूजा कर- नी चाहिये ॥ अब गुरु पंक्ति लिखी जाती है । भाव चूडामणि में कहा है, यथा,-भैरव ने कहा हे माता देवि महामाये ! तुम वन्धन और मुक्तिकी हेतु हो अव गुरु १४ . १०६ श्यामारहस्य भा०टी० । । देव्युवाच । गुरुक्रमस्तु बहुधा मन्त्रविस्तारगौरवात् । कालीनामप्य- नादित्वात् तत् कथं कथयामि ते ॥ न ज्ञात्वा गुरुकुलं ह्येवं नष्टमार्गो भविष्यसि । नष्टमार्गा नात्र विद्ये न ताहा फलं. गोचरम् ॥ गुरूणां शिष्यभूतानां नास्ति चेत् सन्ततिक्रमः मन्त्रतन्त्राश्च विद्याश्र निष्फला नात्र संशयः ॥ विंशति पुरुषान् वापि नवसप्तत्रयोऽपि वा । अज्ञात्वा गुरुवंशानां शिष्यश्च नष्टसन्ततिः॥ स्ववंशादधिकं ज्ञेयं गुरुवंशं महाशुः भम्। जनकादधिको ज्ञयो मन्त्रदश्च महेश्वर!॥ तस्मात् सर्व त्र देवेश ! संक्षेपात्शृण तान् गुरून्।आदौ सर्वत्र देवेश ! मन्त्रदः परमोगुरुः॥ परापरगुरुस्त्वं हि परमेष्टिरहं ततः। सर्वतन्त्रेषु विद्यासु स्वयं प्रकृतिरूपिणी ॥ ततः पुरुपरूपश्च ततः स्वगुरुसन्ततिः। ते. नैव हि मदंशाश्च मद्भक्ताश्च विशेषतः ॥ शैवमन्त्रेषु पुरतः सर्वत्रसिद्धि दायिकः । दिव्यौघा गुरवो देव ! सिद्धौघा'गुर क्रम श्रवण करने की मेरी इच्छा है देवी ने कहा भगवती काळी अनादि है। उनके मंत्र भी अनेक प्रकार है इसलिये गुरु क्रमभी अनेक विधि में कि छिन्न है अतएव किस प्रकार उसका वर्णन करूं? हे देव ! कुल गुरुको न जानने से नष्ट मार्ग होना होता है । नष्ट मार्गकी विद्या साधन में किसी प्रकार का फल उत्पन्न नहीं होता गुरुके वंशको अपने वंशकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ जानना चाहिये । हे महेश्वर ! जो मंत्र देता है उसको पिताकी अपेक्षा. भी अधिक जानना चाहिये । अतएव हे देवेश ! संप से गुरु गणों का विषय श्रमण करो । प्रथम सर्वत्र मंत्र दाता गुरुतो सब से श्रेष्ठ हैं। तुम परापर गुरु और मैं परमेष्ठी गुरु हूं सम्पूर्ण तप और विद्या में मेंही स्वयम प्रकृति गौर तिमके पीछे अपने गुरुकी समिति है उसमें भी विशेष करके गदीप भक्तगण गो भग सम्पद ! दिपाय, सिद्धीय, और मान .
तृतीय परिच्छेद। वस्तथा ॥ मानवौघाः समासेन कथयामि तवाग्रतः । तत्रा- दौ कालिका देवी तस्याः शृणु गुरुक्रमम् ।। महादेवी महादे व त्रिपुरा चैव भैरवः । दिव्यौघाः गुरवः प्रोक्ताः सिद्धौघान् कथयामिते ॥ ब्रह्मानन्दः पूर्णदेवश्चलश्चित्तश्च लोचनः । कुमारः क्रोधनश्चैव वरदः स्मरदीपनः ॥ माया मायावती चैव मानवौघान् शृणु प्रिये ! ॥ विमनः कुशलश्चैव भीमः शूरः सुधाकरः। मीनो गोरक्षकश्चैव भोजदेवः प्रजापतिः ॥ मूलदेवो रन्तिदेवो विघ्नेश्वरहुताशनौ । समरानन्दसन्तोषौ कालिकागुरवः स्मृताः॥ अथ देवीं प्रति भैरववाक्यम् । तदुक्तं तन्त्रार्णवे। दिव्या वसन्ति ये नित्यं सिद्धभूमाविहापि च ॥ मानवी घा मानवेषु मम रूपधराः सदा ।आनन्दनाथशब्दान्ता गुर वः सर्वसिद्धिदाः ॥ स्त्रियोऽपि गुरुरूपाश्च अम्बान्ताः परि बाघ भेद से गुरु तीन प्रकार हैं संक्षेप से तुम्हारे निकट इनका वृत्तान्त क. हती हूं। तिनमें देवी कालिका प्रथम है । तिनका गुरु क्रम श्रवण करो। माादेवी और महादेव एवं त्रिपुरा और भैरव यह दिव्योष गुरु हैं। सि- दोघ गुरु का वृत्तान्त कहती हूं, श्रवण करो। ब्रह्मानंद, पूर्णदेव, चलचित्त, लोचन, कुमार, क्रोधन, वरद, स्मरदीपन, माया, मायावती, यह मानवीय गुरू हैं । और विमल, कुशल, भीम, शूर, सुधाकर,मीन, गोरक्षक, भोजदेव, प्रजापति, मूलदेव, रन्तिदेव, विघ्नेश्वर, हुताशन, समरानन्द, सन्तोष, यह कालिका गुरु हैं। देव के प्रति भैरववाक्य । यया-तन्त्रार्णवे-जो मेरारूप धारण पूर्वक मनुष्यगण सिद्ध भूमि में और इस लोक में बास करते हैं वह दिव्यस्वरूप गुरुगण मानवौघ नाम से परिगणित हैं उनको आनंदनाथ कहते हैं वह सर्व विध सिद्धि विधान करते हैं । इनमें गुरुरूपिणी स्त्रियों को अम्बा शब्द में क १०८. श्यामारहस्य भा०६० । कीर्तिताः । मानवौधान्तिके देवि ! स्वगुरुं परिपूजयेत् ॥ अथवा प्रातःकृत्येषु यत्सामान्यगुरुकुलमुक्तं तदेवार्चयेत् । तद्यथा भावचूडामणौ। 'अथवा सर्व शास्त्रेषु गुरवः पूर्वसूचिताः। कुलचूडामणौ च। एकचित्तमना भूत्वा शृणु वत्स ! समाहितः । येषु येषु च मन्त्रेषु ये ये ऋपिगणाः स्मृताः ॥ ते ते पूज्याः सपर्या- दौ संक्षेपाद्गदितं यया अज्ञात्वा गुरुकुलं वा गुरुत्रितयमर्चये त् ॥ चतुष्टयं वा सङ्कोचो न च कार्यस्ततः परम् । गुरुःपरम गुरुश्चैव परापरगुरुस्तथा ॥ परमेष्टि गुरुश्चैव कथिता. गुरव स्तव । गुरुपूजां विना वत्स ! यदि पूजां समाचरेत् ॥ नि. फला मम सा पूजा ज्ञातव्या साधकोत्तमैः । निर्गुण तत्तदेव स्यात् सगुणं कुलपूजनम् ॥ कुलावलोकनं चेत् स्यात् कुतः प्रोक्षणमार्जनम् । क्व च स्थानं क्व वा शुद्धिः क्व च न्या. . -अथवा संपूर्ण 1 निर्देश करते हैं । हे देवि ! मानवौष गुरु के अन्तिक में अपने गुरुकी पूजा करै । अथवा प्रातकृत्य में जिन सामान्य कुलगुरु का उल्लेख है, तिनकी अर्चना करनी चाहिये । भाव चूडामणिमें कहा है । यथा-- शास्त्रही गुरुाण पूर्व भूचित हुए हैं। कुल चूडामणि में कहा है. हे वत्स एक चित्त, एक मना और सावधान होकर श्रवण करो। जिस जिस मंत्र के जो जो ऋपि हैं, पूजाके प्रथमही उनकी पूजा करनी चाहिये । कुलगुरू के न जानने स गुरु त्रितियवाचतुष्टयकी पूजा करै । इसमें किसी प्रकार का संकोच न करे । गुरु, परमगुरु, और परापर गुरु इन मबका वृत्तान्त तुमारे निकट वर्णन किया । हे वत्स ! गुरुकी पूजा न करके जो पूजा करीजाती है उस दीप की शांति के लिये कुल पूजा करै । जिस स्थान में जो विगुण है. इसप्रकार पूजा करने में वह सगुग होती है । यदि कुनको दृष्टिपात हो, तो . तृतीय परिच्छेद। १०९ सविशोधनम् ॥ दीक्षापभुः कुलीनः स्यात् कुलात्मा वटुके- श्वरः। स्वगेहे गुरुमानीय कुलरूपं गुरुं स्मरेत् ॥ गुरुकमञ्च कथितं गोपनीय प्रयत्नतः॥ न देयं यत्र कुत्रापि योगभ्रष्टे च शिष्यके । वैष्णवे शक्ति तन्त्रेवा गाणपत्येऽथवा पुनः । नि. जं गुरुं परं ध्यात्वा ततो गुरु चतुष्टयम् ॥ पूजयित्वा यजेहे. वं न च संकोचमाचरेत् ॥ श्रीमहादेव्यम्बायाः श्री पादुकां पूजयामि नमः इति सं- पूज्य गुरुपात्रामृतेन त्रिः सकृद्वा तर्पयेत् । एवं महादेवान- न्दनाथ गुरुपादुकां पूजयामि नम इति संपूज्य पूर्ववत् पूज- येत्। एवं क्रमेण गुरुपंक्तित्रयं संपूज्य मानवोधान्तस्वगुरुंगुरो गुरुं तद्गुरुंच पूजयेत् तर्पयेच्च। ततो रश्मिवृन्ददेवताःपूजयेत् यथा वाह्ये त्रिकोणस्य सम्मुखे ओं कालिकायाः श्रीपादुकां प्रोक्षण और मार्जन का फिर क्या प्रयोजन है ? इसके अतिरिक्त स्थान शुद्धि और न्यास शोधन की भी क्या आवश्यकता है ? कुली नहीं दीक्षा का प्रभु और कुलात्माही साक्षात् बटुकेश्वर है । इसकारण गृह में गुरु को लाकर कुलंगुरु रूप में भावना करै । तुम्हारे निकट गुरुक्रम का वर्णन किया। अत्यन्त यत्न सहित इसको गुप्त रक्खै । जिस किसी को प्रदान न करें। वैष्णव, शक्तितन्त्र अथवा गाणपत्य में अपने गुरूका ध्यान करके फिर गुरू चतुष्टय की पूजा करके देवयजन में प्रवृत्त होना चाहिये। किसी प्रकार भी संकोच न करे नमस्कार करने के पीछे श्रीमहादेवी अम्बाकी श्री पादुका पूजकर गुरुपात स्थित अमृत से तीनबार वा एकवार तर्पण करै । इसप्रकार महादेवानंद नाय गुरुकी पाटका में नमस्कार पूर्वक पूजा करके पूर्ववत् देव पूना और तर्पण करना चाहिये । इस प्रकार क्रमानुसार विधि से गुरु पंक्ति अयकी पूजा करके, मान चौघान्तख गुरु, गुरुके गुरु और तिसके गुरूकी - जा करनी कर्तव्य है। पूर्ववत् तर्पण भी करै । फिर रश्मिद देवताओं की पुजा में प्रवृत्त होना चाहिये । यथा-वाह्य में त्रिकोण के सन्मुख ओंकार ११० . श्यामारहस्य भा० टी० । पूजयामि नमः । इति पाद्यादिभिः संपूज्य योगिनीपात्रा- मृतेन तत्त्वमुद्रयातर्पयेत्।एवं देव्या वाओं कपालिनी दक्षे कुल्लां तदन्तस्त्रिकोणे ॐ कुरुकुल्लां ॐ विरोधिनी ॐ विप्रचि- त्ताम् । तस्यान्तस्त्रिकोणे ॐ उग्रां ॐ उग्रप्रभाओं दीप्तांत- दन्तस्त्रिकोणे ओ मात्रां ओं मुद्रां ओं मितां पाद्यादिना त्रिः संपूज्य पूर्ववत्तर्पयेत् । ततोऽष्टदलपने पूर्वादिक्रमेणाष्टशकीः पूजयेत् । यथा ओं आं ब्रह्माण्याः श्रीपादुकां पूजयामि नम इति पाद्यादिभिः संपूज्य तर्पयेत् । अग्नौ ओं ई नारायणी दक्षिणे ओं ऊं माहेश्वरी नैर्ऋत्यां ओं ऋ चामुण्डां वारुणे ओं लू कौमारी वायौ ओं ऐं अपराजिताम् उत्तरे औ औं वाराहीम ईशे अं अः नारसिंहीम पूर्ववत् संपूज्य तर्पयेच्च त. दुक्तं श्रुतौ द्वितीयचतुःषष्ट्यष्टादशद्वादशचतुर्दशषोडशस्वर भेदेन प्रथममेव प्रणवण आवाहनञ्च तेनैव पूजनं विदुः । कुमारीकल्पेऽपि। ब्रह्माद्याः पूजयेत् पत्रे पत्राग्रे भैरवान् यजेत् । लोकपा- लांस्तथा वाह्य तदस्त्राणि च तद्दहिः॥ उच्चारणकरके काळीकी श्रीपादुका पूनताहू नमस्कार' कर इसप्रकार पाचादि द्वारा पूजाकर तत्वमुद्रा की सहायता से योगिनी पात्रस्य अमृत द्वारा तर्पण कर इसप्रकार देवीक वाममें कपालिनी, दक्षिणमें कुल्ला, तदन्तर्वी त्रिकोण में कुरुकुल्ला, विरोधिनी और विप्रचित्ता, तिसके अन्तस्य त्रिकोण में उग्रा उग्रममा और दीप्ता तिसके अन्तस्थ त्रिकोण में मात्रा मुद्रा और मिता, इन सव देवियोंकी पाधादिसहित ओंकार समुच्चारण करने के पीछे पूर्ववत् तर्पण प्रवृत्त होना चाहिये । अनन्तर अष्टदल पद्म पूर्वादि कमसे अष्टशक्तिकी पूजा करे। यथा- - 'ओं भी ब्रह्माणी इत्यादि' श्रुति में भी कहा है-दो, तीन, चार, छै, भाट, दश, पारस, चौदह वा सोलह स्वर-भेद से प्रमही प्रणव द्वारा आवाहन और पूजा करनी चाहिये । कुमारीकल्पमें भी कहा, पत्र में ब्रह्मादि की. पत्रके अग्नमें भैरवादिकी. बाहर समस्त लोकपालोंकी और उसके पार उनके सर भत्रों की पूजा करनी चाहिये ।
तृतीय परिच्छेद। अथ भैरवाः । यथा ज्ञानार्णवे। असिताङ्गो रुरुश्चण्डः क्रोधश्चोन्मत्तभैरवः। कपाली भीषण श्चैव संहारश्चाष्टमः स्मृतः ।। एषां मंत्रो यथा । ह्रस्वार्णा विन्दुसंयुक्ता वाङ्मायापूर्वभूषिता । इति । भत्र प्रयोगः । पूर्वादिवामावर्तेन ऐं ह्रीं अं असिताङ्ग भैरव श्रीपादुकां पूजयामि नमः ऐं ह्रीं इं रुरुभैरव ऐं ह्रीं उं चण्ड भैरव ऐं ह्रीं क्रोधभैरव ऐं ह्रीं लूं उन्मत्तभैरव ऐं ह्रीं एक- पालिभैरव ऐं ह्रीं ओं भीषणभैरव ऐं ह्रीं अंसंहारभैरव पूज येत्तर्पयेच्च । ततो भूपुरे इन्द्रादिलोकपालान् यथा पूर्वादितः नां इन्द्र श्रीपादुकां एवं वां वह्नि यां यम क्षां नियंति वां वरुण यां वायु शां कुवेर हां ईशाननिऋति वरुणयोर्मध्ये ह्रीं अनन्त इन्द्रेशानयोर्मध्ये आं ब्रह्मणः श्रीपादुकामित्यादि। तहहिः तदस्त्राणि पूजयेत्तर्पयेच्च । तथा वं वनश्रीपादुकाम् । एवं शं शक्ति । दं दण्ड । खं खड्गापां पाश । अं अंकुश। गंग दा। शुं शूल। पं पद्म । चं चक्र श्रीपादुकामित्यादि अथैव अब भैरव गणों का वृत्तान्त लिखा जाता है । ज्ञानार्णव में कहा है, अ. सितार, रुरु, चण्ड, क्रोध, उत्तम, कपाली, भीषण, और संहार, यह आठ भैरव हैं, इनका मंत्र यया-मथम वाग् वीन अर्थात् 'ऐ और माया वीज अर्थात् "" प्रयोग करके फिर विन्दु अर्थात् अनुस्वार युक्त हस्ख वर्ण भ- र्थात् अई, इत्यादि संयुक्त करे, प्रयोग यथा-पादि वामा वर्तमें "ऐं ही अ" इत्यादि विधान से समस्त भैरव की पूजा और तर्पण करके भूपुर में इन्द्रादि समस्त लोक पालोंकी पूजा करै । यथा--"नां इन्द्र श्रीपादुका इ- त्यादि" | अनन्तर उनके सब अस्त्रोंकी पूजा करै । यथा-"वं वज श्री. पादकां इत्यादि । अनन्तर इस प्रकार क्रमानुसार अनुलेपन, गन्ध, पुष्प, । .
श्यामारहस्य भाटी । क्रमेण सर्वावृति देवतानुलेपनगन्धपुष्पधूपदीपद्रव्यादिभिः संपूज्य त्रिः सकृद्रा पूजयेत् तर्पयेच्च । तदुक्तं कुलार्णवे। त्रिवार तर्पयद्वापि सकृद्वापि यथेच्छया । कालीतन्त्रे। सर्वासामपि दातव्या वलिपूजा तथैव च । अनुलेपनकं गन्धं धूपदीपो च पालकम् । त्रिस्त्रिः पूजा प्रकर्तव्या सर्वासामपि साधकैः ।। अतएव सर्वासांवलीनां शक्तीनां पूजने त्रिवारमवश्यमेव दर्शयेत् । ततो देव्या अस्त्रं पूजयेद् यथा । देवविामोर्ख हस्ते ख खङ्गम् अधो में मुण्डं दक्षोद्धे अंभयम् अधोवं वरं पूजये तर्पयेच । तनः पड़झं विन्यस्य पूर्ववदेवीं ध्यात्वा गन्धपुष्पाक्षतकुसुमधूपदीपं दत्त्वा पूर्ववद्घण्टां वादयन् धूपं दीपं दर्शयेत् । ततः पानीयादिद्व्यं दत्त्वा पूर्ववन्नैवेद्यादिकं निवेद्य त्रिस्तर्पयेत् । योन्यादिमुद्रां दर्शयेत् । ततः पुष्पा . धूप, दीप, और द्रव्यादि द्वारा सव भावृति देवताओं की पूना करके तीन वार वा एक बार पूना और तर्पण करें । कुलार्णव में इसी प्रकार कहा है। यथा-तीन वार वा एक बार नेप्सी इच्छा हो तर्पण करे। काली तंत्र में कहा है सब को वलि, पूना, अनुछेपन, गन्ध, धूप, और दीप मदान एवं तीन तीन चार पूजा करे । अनन्तर देवीके अस्त्रको पूमा करनी चाहिये । यया-देवीके पाम और ऊद इस में "ख" होने से खड्गकी, अधोभाग में होनेसे मण्ड की, दक्षिणहस्त के जद में 'अं होने से अपप की भौर अधोमाग में होने से परकी पूना और तर्पण करै। फिर पटङ्गविन्यास करके पूर्वको समान देवी का ध्यान, गन्ध, पुष्प, भात, कुमुप, धूप और दीपदान एवं पूर्व घण्टा समाकर धूप, दीप दिखानी पाहिये । अनंतर पानी पादिद्रपदान कर तृतीय परिच्छेद । अंलित्रयेणं पञ्चभिर्वा देवी सायुधसपरिवारमहाकालसहित- श्रीपादुकां पूजयामि नम इति संपूज्य त्रिस्तर्पयेदिति । कालीतन्त्रेऽपि । एवं पूजां पुरा कृत्वा मूलेनैव यथाविधि । नैवैद्यादीन् यथाशक्त्या दद्यादेव्यै पुनः पुनः ॥ ततो वै दशवारन्तु दीपं दत्त्वा च साधकः । पुष्पादिकं पुनर्दद्यान्मूलेनैव यथाविधि ॥ कुमारीकल्पेऽपि। ततो नीराजनं कुर्यात् दशवारं प्रदीपकैः । अस्यार्थः आरात्रिकविधिना दीपान् प्रज्वाल्य देवताम- स्तकान्तं नीत्वा परिभ्राम्य नीराजनं कुर्यादित्थं दशधा । अरात्रिकविधानन्तु श्रीतत्वचिन्तामणावनुसन्धेयम् । अथ पञ्चमायैर्देवी परितोषयेत् । तदुक्तम् । पूजयेच्च महादेवीं सुरामांसझसादिभिः । अन्नैर्नानावि- धैश्चापि तोषयेत् साधकोत्तमः ।। श्रथ मुण्डमालातन्त्रे । सुरादानप्रशंसा । सुरादानेन देवेशि ! महायोगीश्वरो भवेत् । सुरा तु त्रि. पूर्ववत् नैवेद्य इत्यादि निवेदन और तीनवार तर्पण करे तिस काल में यो- न्यादि मुद्रा दिखानी चाहिये । अनन्तर तीन वा पांचवार पुष्पाञ्जलि दे देवीकी ययोक्त विधान से पूजाकर तीनवार तर्पण करै काली तंत्र में भी कहा है, इस प्रकार पूजा करके मूलमंत्रसे ययाविधि देवाके उदेश में यथा शक्ति नैवेद्यादि बारम्बार निवेदन करे । अनन्तर दशवार दीपदान करके मूलमंत्रानुसार ही यथाविपि पुष्पादि प्रदान करै । कुमारी कल्पमें भी कहा है, अनन्तर प्रदीप द्वारा नीराजन करना चाहिये । तदनन्तर पंच मकागदि. द्वारा देवी का परितोप करें । जैसा कहा है। यया -हे देवि ! महादेवी पार्वतीकी मयमांस और मत्स्यादि अनेक प्रकार अन्न द्वारा पूना और उन को संतुष्ट करके इत्यादि । मुण्डमाला तंत्रमें मुरादानकी प्रशंसा करी है । १६ ११४ श्यामारहस्य भा०टी० । विधा देवि ! स्फाटिकी डाकिनी तथा ॥ कालिकी स्फाटि- कीदाने धनवृद्धिरनुत्तमा । डाकिनीदानमात्रेण वैश्यः सर्वो भवेत् ध्रुवम् ॥ कालिकीसुरया देवि ! योऽर्चयेत् परमेश्वरी- म् । गुटिकालनसम्भारिमारणोच्चाटनादिभिः ॥ महासिद्धी- श्वरो भूत्वा बशेत् कल्पायुतं दिवि । अर्ये दत्ते महेशानि ! महासिद्धिरनुत्तमा ॥ अथोत्तरे त्रिकोणमालिख्य मांसतिलरक्तपुष्पभक्तानि ए. कीकृत्य तत्र संस्थाप्य ओं ह्रीं श्रीं दक्षिणायै कालिकायै स्वाहा एष वलिनम इति उत्सृज्य नैर्ऋत्यां धारयेत् । तदुक्तम् । पूजान्ते भोजनादौ दा वलिंदद्याच्चसाधका इति। वलिमुत्थाप्य नैवेद्यं नैर्ऋत्यां दिशि धारयेत् ॥ ततः प्राणायामादिकं कृत्वा काम कलां विभाव्य शि- रसि गुरुं ध्यात्वा हृदि देवीं भावयन् मनसा अष्टोत्तरसहस्रं . यथा-हे देवेशि । सुगदान करने से महा योगीश्वर होता है । हे देवि ! सुरा तीन प्रकार है यथा स्फाटिकी, डाकिनी और काजिकी, स्फाटिकी मुरादान करने से अनुत्तम धन वृद्धि और डाकिनी दान करने से समस्त वशीभूत होते हैं जो व्यक्ति कानिकी सुरा द्वारा परमेश्वरि की पूजा करता है, वह महा सिद्धीश्वर होकर अयुतकल्प स्वर्ग में वास करता है हे महेशानि ! अर्घ्यदान करने से अनुत्तम महासिद्धि लाभ होती है । अनन्तर उत्तर में त्रिकोण लिखकर मांस, तिल, रक्तपुष्प, भक्त यह सब एकत्र करके उस में स्थापन और ययोक्त मंत्रसे उत्सर्जन पूर्वक नैर्ऋत कोण में धारण करै । जैसा कहा है, नाके शेप में वा भोजनके आदि में महेसरि को वलि प्रदान करनी चाहिये । अनन्तर उत्कृष्ट बलि उत्थापित करके नैत दिशा में नै. वेद्य धारण करै । तदनन्तर प्राणायामादि करके, कामकला विभावन, शिर गुरुका ध्यान, हृदय में देवी की चिन्ता रहस्यपाळा, वा करमाला अथवा घर्णमाका छारा मन मन में भयोत्तर सहन जप और पुनरि प्राणायाम तृतीय परिच्छेद । रहस्यमालया वर्णमालया करमालया वा प्रजप्य पुनः प्रा. णायाम विधाय अर्घ्यजलं पुष्पादिकं गृहीत्वा । गुह्यातिगुह्यगोप्ती वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । सिद्धिर्भव तु मे देवि ! स्वत्प्रसादात् सुरेश्वरि । इत्यनेन तेजोमयं जपफलं देव्या दक्षहस्ते समर्पयेत् तदुक्तं कालीतन्त्रे । ततः सावहितो मन्त्री गुरुं नत्वा शिरःस्थितम् । देवीं ध्यात्वा चाष्टोत्तरसहस्रं प्रजपेन्मनुम् ॥ तेजोमय जपफलं देव्या हस्ते समर्पयेत् । गुह्यातिगुह्यगोप्ती त्वमिति मन्त्रेण मन्त्रवित् ॥ अथ रहस्यमाला यथा तदुक्तं कालीतंत्रे। दन्ताक्षमालया देवि ! राजदन्तेन मेरुणा।प्रजपेदित्यर्थः तस्य द्वादशपटलेऽपि। दंतेन कालिकायास्तु पूर्वोक्ता भुवि दुर्लभा । । सहित भय जल और पुष्पादि ग्रहण पूर्वक तेजोमय जप फल, देवी के दक्षिण हायमें समर्पण करै । समर्पण करने के समय इस प्रकार कहना चा- हिये । हे दवि ! तुम गुह्यादिगुह्य गोप्ता हो । मेरा कियाहुआ यह जप ग्रहण करो। इसके प्रभावसे मुझको सिद्धि प्राप्त हो, काळी तंत्रमें भी कहा है, अ- नन्तर साधक सावधान होकर मस्तक में गुरुको नमस्कार और देवी का ध्यान करके अटोचर सहस्रबार मंत्र जप और तेनोमय जप फळ देवीके द. क्षिण हाय में समर्पण करें । तिसकाल गुह्याति गुह्य गोता इत्यादि मंत्र कह- ना चाहिये। अब रहस्यमालाका वृत्तान्त लिखते हैं। कालीतंत्र में कहा है, दन्त और अक्षमाला रामदन्त और मेरु द्वारा जप कर देतमाला अत्यंत दुर्नप है।
११६ श्यामारहस्य भा०टी०॥ प्रिये !॥ इति मुण्डमालायांच। नाडीभिर्यर्थिता माला महासिद्धिप्रदा भवेत् । तत्रैव सर्वशाक्तैः। नवांगुल्यास्थिमाला च ग्रथिता पर्वभेदतः । सर्वसिद्धि. प्रदा मोक्षदायिनी वरवर्णिनी !॥ नाडीसंग्रथनं कार्य र- तेन वाससा तथा । सदा गोप्या प्रयत्लेन मातुश्च जारवत् अथ वर्णमाला यथा। विशुद्धेश्वरमहातन्त्रे । मालाविधानं परमं शृणु पार्वति ! तत्वतः । येनानुष्ठित मात्रेण मन्त्रः सिध्यन्ति तत्क्षणात् ॥ अनुलोमविलोमेन मन्त्रं जप्त्वा विधानतः। मन्त्रेणान्तरितं वर्ण वर्णेनान्तरितं मनुम् ॥ कुर्याद्वर्णमयी मालां सर्वमन्त्रप्रदीपनीम् । चर- मार्ण मेरुरूपं लमयेन्न कदाचन ॥ रहस्यमेतत् परमं मयोक्तं ते यशस्विनि ! । त्वया गुप्ततरं कायं नाख्येयं यस्य कस्य चित् ॥ इसके द्वारा कालिकाका जप करै । मुण्डमाला में कहा है, नाड़ी द्वारा प्राय: त माला महासिदि विधान करती है। उस में ही लिखा है हे वर वर्णिनि ! नवांगलि परमित अस्थिमाला सर्वसिद्धि प्रदान और मोक्ष विधान करती है रक्तस्त्र द्वारा नाड़ी संप्रथन करना चाहिये। जननी के उपरतिके समान सर्मदा यत्नपूर्वक इसको गुप्त रक्खे । वरनमाला यथा-विशुदेश्वर महातंत्र में कहा है, हे पार्वती ! यथायप विधानसे मालाविधान श्रवण करो। यह अतीव श्रेष्ठ विषय है। इसके अ. नुष्ठान मात्र से ही तत्काल सब मंत्र सिद होते हैं । मंत्रदाता के विभेद अनु. सार अनुलोम विलोम क्रम मंत्रद्वारा वर्णको और वर्ण दारा मंत्रको अंत- रित करके 'वर्णमयीमाला बनाये । इसके द्वारा सम्पूर्ण मंत्र अनुपाणित हो तेहैं । मेरुरूप चरम वर्णका कभी उल्लंघन न करे । हे यशस्वनि ! मैंने तुमारे निकट यह परम रहस्य कीर्तन किया । तुम इसको अत्यन्त गुप्त रखो ।
तृतीय पाररछेद। ११७ मतान्तरमुक्तं यामले यथा। सविन्दुवर्ण मुच्चार्य पश्चात् मन्त्र जपेत् सुधीः । क्षमेरुकं जल्पयित्वाजपेत्तन्नातिलब्येत्॥ अनुलोमविलोमस्थक्लृप्तया वर्णमालया। जपेन्मेरु समाश्रित्य लड्न तस्य नाचरेत् ।। अष्टोत्तरजपादादौ वर्गाष्टकं प्रयोजयेत् । अकचटतपयश इत्ययं चाष्टवर्गः । मुण्डमालायाश्च । मेरुहीना या माला मेरुलका च या भवेत् । अशुद्धाति- प्रकाशाच्च सा माला निष्फला भवेत् ॥ अथ करमाला यथा । तदुक्तम् । टहत्श्रीक्रमे । तर्जन्यग्रे तथा मध्ये यो जपेत् सतु पापकृत् । अनायामा स्त्रयं पर्व तर्जनीमूलपर्वणि ॥ जपेदित्यर्थः । मुण्डमालायाञ्च। अत्रांगुलिजपं कुर्यात् सांगुष्ठांगुलिभिर्जपेत् । अंगुष्ठेन जिस किसीको प्रदान न करना यामल में अन्य प्रकार कहा है यया-सिं. दूर सहित वर्णोच्चारण पूर्वक फिर मंत्रका जप करै वरूपपेरुजल्पन पूर्वक जप करना चाहिये । उसको उलंघन न करें । मेरु अर्थात् नकार आश्रय करके अनुलोम विलोम का क्रमानुसार जप करे, उनको उलंघन न करे। आदि में अष्टवर्ग अर्यात भ, क, च, 2, त, प, य, श, प्रयोग करके भष्टोत्तर जप करै । मुण्डमाला में कहा है. मेरुहीनमाला जिसप्रकार अशुद्ध होने से निष्फल होती है, मेरुलंघा मालासे भी इसी प्रकार कोई फल लाभ नहीं होता। करमाला यया-वृहत् श्रीक्रम में कहा है. जो व्यक्ति तर्जनी के अनमें वा मध्य में जप करता है वह पाप करता है। अपने तीन पर्व कनिष्ठा के तीन पर्व मध्यमा के तीन पर्व और तर्जनी का मूल पर्व, यह सबही जप में प्रसिद्ध हैं । मुण्डमाला में कहा है-अंगुली द्वाग जप करै । अंगुष्ठ द्वारा ११८ श्यामारहस्य भा. टी.॥ विना कर्म कृतं तदफलं भवेत् ॥ आरभ्यानामिकामध्यात् प्रादाक्षिण्यक्रमेण तु । तर्जनीमूलपर्यन्तं करमाला विधीयते मेरुं प्रदक्षिणीकुर्वन् अनामामूल पर्वतः । मेरुलइनदोषान्तु अन्यथा जायतेफलम्॥मध्यमात्रितयाग्राह्या अनामामूल मेव च। अनामामध्यपत्रि मेरुं कृत्वा न लंघयेत् ॥ सर्जन्यमे तथा मध्ये यो जपेत्तु भ्रमान्नरः । चत्वारि तस्य नश्यन्ति आयुर्वि- या यशो वलम् ॥ हंसपारमेश्वरेऽपि। पर्वद्दयमनामायाः परिवर्तन वै क्रमात् । पर्वत्रयं मध्य- मायास्तर्जन्येकं समाहरेत् ॥ शक्तिमाला समाख्याता सर्वतंत्र प्रदीपिका । नित्यं जपं करे कुर्यात् न तु काम्यं कदाचन ॥ मुण्डमालातन्त्रे च। जपं नित्यं करे कुर्यात् न तु काम्यप्रबोधनात् । अयं क्रमो निशायां करणीयः। जप करना चाहिये । अंगुष्ठ के बिना अनुष्ठित कर्ममात्रही विफल होता है। अनामिका के मध्य से आरम्भ करके मादतिएय क्रमसे तर्जनी के मूळ पर्यंत करमाला विहित होती है । अनामा के मूळ पर्व में मेरुकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये । मेरु के उलंघन करने से उस दोष से विपरीत फळ सं- घटित होताहै। मध्यमा त्रितय और अनामाका मूळपर्व ग्रहण करे. अनाया के मध्य पर्व को मेरु करके उलंघन न करे। जो व्यक्ति भ्रम के वश होकर तर्जनी के अन और मध्य में जप करताहै. उसकी आयु, विधा, यश, और वळ यह चार नष्ट होते हैं । इसपरमेश्वर में भी कहा है । परिवर्तन द्वारा क्रमानुसार पर्वतय. मध्यमा के तीन पर्व और तर्जनीका एक पर्व समाहत करे. इसका नाम सर्वतंत्र प्रदीपिका शक्तिमाला है। करमाला से नित्य अप कर काम्पजप न करे । रात्रि में इसप्रकार अनुष्ठान कर. बलि पूजादि सं. पूर्ण कर्म सर्वदा रात्रि में कियेनाते हैं। कालीविद्या के प्रसाद से समवप तृतीय परिच्छेद। बलिपूजादिकं सर्व निशायां क्रियते यदि । तत्तदक्षयतां याति कालीविद्याप्रसादतः ॥ कुलचूडामणौ च । रात्रौ पर्यटनं कुर्या रात्री शक्तिप्रपूजनम् । न करोति कथं देवीसाधकः कौलिको भवेत् ॥ तदुक्तं कालिकापुराणे । छोगन्तु वामतो दद्यान्माहपं वितरेत् पुनः। दक्षिणे वामतो दद्याद् अग्रतो देहशोणितम् । नाभेरधस्ताद्रुधिरं पृष्ठभागस्य वा प्रिये ! । स्वगात्ररुधिरं दद्यान्न कदाचित् साधकः ॥ नोष्ठस्य चिबुकस्यापि नेन्द्रियाणां तथैव च । कण्ठाधो ना. भितश्चोर्दू हृद्भागस्य प्रयत्नतः ॥ पार्श्वयोश्चापि रुधिरं दुर्गायै विनिवेदयेत् । न च रोगादिकादगान्नान्यघाताच्च भै- रव ! सौवर्णे राजते पाले कांस्याधारे च मानवः । निधाय देव्यै दद्यात्तु तदुक्तं मन्त्रपूर्वकम् ॥ यद्यद् हृदयसंजातं मांसं रक्तपिधानतः। तिलमुद्गप्रमाणं वा देव्यै दद्यात्तु भक्ति- तः ॥ षण्मासाभ्यन्तरे भक्तः काममिष्टमवाप्नुयात् ॥ होते हैं। कुलचूडामणि में कहा है. रात्रि में पर्यटन और रात्रि मेंही शक्तिकी पूजा करै । कालीपुराण में कहा है. वामदिशा में वकरी और भंसा प्रदान करै. दक्षिण वाम और अग्र में देह का रुधिर प्रदान करै । हे प्रिय ! नाभि के अधोभाग का और पृष्ठ देश का रुधिर प्रदान करै । अपने गात्रका रुधिर कभी प्रदान न कर होठ, कमर और इन्द्रियगणों का भी रुधिर मदान नहीं करना चाहिये । कण्ठका अधः और नाभि का ऊर्द्ध हृद्भाग का रुधिर और दोनों पार्श्व का रुधिरा यत्न सहित देवी दुर्गाको निवेदन करै । रोगादि युक्त अङ्गका रुधिर कभी प्रदान न करें। स्वर्ण, चांदी अथवा कांसी के पात्र में रुधिर स्थापन पूर्वक अभिमंत्रित करके देवीको दान करै । इसमकार रक्तदान १२. श्यामारहस्य भा० टी० । कुमारीकल्पेऽपि । नराश्यागास्तथा मेषा महिषाः शशकास्तथा । एतेषा. ञ्चैव रक्तानि देयानि परमेश्वरि !॥ मुण्डमालायाञ्च । ईपद्रक्तं घृतेनातं निशायां दिवसेऽपि वा । वलिं दद्या. द्विशेषेण कृष्णपक्षे शुभे दिने ॥ छागे दत्ते भवेद्वाग्मी म. स्ये दत्ते कविध्रुवम् । महिषे धनवृद्धिः स्यान्मृगे भोगफलं लभेत् ॥ खगे दत्ते समृद्धिः स्याद् गोधिकायां महाफलम् ॥ नरे दत्ते समृद्धिः स्यादिष्ट सिद्धिरनुत्तमा । ललाटहस्तहृद- यशिरोभ्रमध्यदेशतः ॥ स्वदेहरुधिरे दत्ते रुद्रदेह इवापरः।। चाण्डालवलिदानेन महासिद्धिः प्रजायते ॥ ईपद्रक्तमिति मत्स्यमांसविशेषणं तत्प्रकरणस्थलिखित- वचनात् । नरवलिस्तु न विप्रेण विधेयः । करने से भक्त दो महीने में इष्ट कामना लाम करता है। कुमारीकल्प में भी कहा है । नर, बकरी, भेड, भैंसा और खरगोश इन सबकारक्त प्रदानकरै। मुएमाला में भी कहा है, दिन में वा रात्रि विशेष करके कृष्णपक्ष और शम दिन में कुछ एक रक्तवर्ण घृताक्त बलिप्रदान करै । बकरीका दान करने से वाग्मी होता है मत्स्य का दान करने से निश्चय कवि होता है, भैंसे का दान करने से धनवृद्धि होतीहै, मृगका दान करनेसे भोगफळ लाभ होता है पत्नी का दान करने से समृदि संग्रह होती है । गोधिका का दान करने से महाफळ लाभ होता है. नर वली का दान करने से समृद्धि और अनुत्तम इष्टसिदि प्राप्त होजाती है । लळाट, हस्त, हृदय, मस्तक, भूमध्य इन सन स्थानों से अपने देह का रुधिर प्रदान करने पर द्वितीय रुद्र होता है । चा टाळ के पलिप्रदान करने से महासिदि सघटित होतीहै । ऊपर जो कुछ एक रक्तवर्ण कहागया वह मत्स्यमांस का विशेषण तत् प्रकरण लिखित पचनानुसारही वह प्रमाणित होताहै । ब्राह्मण को नर बलिदेना निसिद्ध है।
तृतीय परिच्छेद।
१२१
तदुक्तं यामले।
• राजा नरवलिं दद्यान्न्यान्योऽपि परमेश्वरि ।
तत्रापि न तु विप्रेण । ततो वक्ष्यमाणमन्त्रेण देवीं स्तुत्वा
प्रदक्षिणत्रयं विधायाष्टप्रणाम कुर्यात्
तदुक्तं कालीतन्त्रे।
ततो वै शिरसि पुष्पं दत्त्वाष्टाङ्गं प्रणम्य च ।
अथ प्रदक्षिणं यथा ।
। प्रसार्य दक्षिणं हस्तं स्वयं नम्रशिराः पुनः । दक्षिणं
दर्शयन् पाश्र्वं मनसापि च दक्षिणः ॥ त्रिधा च वेष्टयेत्
सम्यक् कालिकायाः प्रदक्षिणम् । सर्वान् कामानवाप्नोति
पश्चान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥
अष्टाङ्गप्रणामो यथा।
दोभ्यां पद्यांश्च पाणिभ्यामुरसा शिरसा दृशा । मनसा
वचसा चेति प्रणामोऽष्टाङ्ग ईरितः ॥
यह यामल में कहा है । यथा--हे परमेश्वरि राजागण नरवलि प्रदान करें ।
और कोई नहीं । इसी से लिखानाता है, ब्राह्मण के पक्षमें नरबलि दान की
विधि सिद्ध नहीं है ।
अनन्तर वक्ष्यमाण मंत्र से देवी का स्तव और तीन प्रदक्षिणा करके,
'अष्ट प्रणाम करें। जैसा कालीतंत्र में कहा है. अनन्तर मस्तक में पुष्प दान,
प्रणाम करके इत्यादि । तदनन्तर प्रदक्षिणाकर । यथा-दक्षिणं
हाथ पसार नत्र शिरा होकर दक्षिण पात्र प्रदर्शन पूर्वक मन मनमें का
लिका देवी को प्रदक्षिणा के क्रमसे तीनचार वेष्टन करै। तो सम्पूर्ण की.
मना की, सिद्धि और पीछे मोक्षलाभ होती है । अष्टाङ्ग प्रणाम यथा-दो
हाय दो पैर दो पाणि मस्तक पक्ष, चक्ष, मन और वाक्य इन आठ अङ्गो से
प्रणाम करनेको अष्टाङ्ग प्रणाम कहते हैं असमर्थ होने से गणाम यथा-दो
और अष्टाशा
श्यामारहस्य भा. टी. । H- अशक्तौ प्रणामः यथा। बाहुभ्याञ्च सजानुभ्यां शिरसा वचसा धिया । पञ्चा- ङ्गकः प्रणामः स्यादुदितः परिकीर्तितः ।। ततः सामयिकैः सह पानादिकं कुर्यात् । यथा चक्रा- कारेण पंक्त्याकारेण वा भिन्नासने साधकैः सह शक्तिभिश्च युग्मायुग्मक्रमेण पद्मासनेनोपविश्य सामयिकललाटे चन्द. नाक्षतं दत्त्वा शिवशक्तिवुद्ध्या पुष्पं दद्यात् । ततो यदि गुरु- स्तिष्ठति तत्रादौ गन्धचन्दनपुष्पादिना तं प्रपूज्य तत् पात्रं तस्मै दवा प्रणमेत् । गुरोरभावे तत् पात्रं जले क्षिपेत् । ततः पात्रंशुद्धिसहितं शक्त्यै दत्त्वा सामयिकेभ्योऽपिज्येष्ठानुक्रमेण वीरपात्रात् परामृतं शुद्धिसहितं दद्यात् । ततः सामयिकोऽपि भक्त्या हस्ताभ्यां गृहीत्वा मूलमन्त्रं तदुपरि अष्टधा जप्त्वा पूर्ववत् आनन्दभैरवानन्दभैरव्यो सन्तर्प्य गुरुं देवताञ्च तर्प- चाहु और दो जानु, मस्तक वाक्य और बुद्धि इन पर अङ्गों के द्वारा प्रणाम करने को पनाग प्रणाम कहते है। अनन्तर सामयिक गणों के सहित पानादि करै। यया-चक्राकारबा पक्तिके आकारमें भिन्नासनमें साधकगणों के सङ्ग युग्म युग्म शक्ति सहित क्रमानुसार पद्मासनपर विराजमान होकर ललाट में चन्दन और अक्षत - दान पूर्वक शिवशक्ति चुदिसे पुष्प प्रदान करै । अगन्तर यदि गुरु हों, तो आदि में गन्ध, चन्दन और पुष्पादि द्वारा उनकी पूजा और वह पात्र उन को प्रदान करके प्रणाम करना चाहिये । गुरुका अभाव होने से वा पान जलमें फेंकदे, फिर शुदि सहित पात्र शक्तिको दान करके सामपिकगणों कोपी ज्येष्टानक्रम दारा वीरपात्रसे परामृत शुद्धि सहित प्रदान करे। मन- सर सापपिक भी भक्ति सहित दो हस्तद्वारा ग्रहण और उसके ऊपर भर पार पनपत्र जपकर पूनकी समान आनन्दभैरन और मानन्द भरपी दोनों तृतीय परिच्छेद। १२३ येत् । ततस्तु शुद्धिं कुर्यात् । ततश्चक्रनायकस्तैः सह पात्र- चन्दनञ्चरत् । श्रीमद्भरवशखरप्रविलसच्चन्द्रामृतप्लावितं क्षेत्राधीश्वरयोगिनीजनगणैः सिद्धः समाराधितम् । आन- न्दार्णवकं महात्मकमिदं यज्ञत्रिखण्डामृतं वन्दे श्रीप्रथम कराम्बुजंगतं पात्रं विशुद्धिप्रदम् ।। इति अभिवन्ध वामहस्तेन पात्रमुत्तोल्य वन्दनं कृत्वा गृह्णामीति गुरुशक्तिसाधकाज्ञां गृह्णीयात् । ते च जुषस्व इति ब्रूयुः ततो मूलाधारात् कुण्डलिनीमिष्टदेवतास्वरूपां विभाव्य गुरुपादुकां स्मृत्वा शिवोऽहमिति विचिन्त्य हस्ताभ्यां पात्रं गृहीत्वा मूलमन्त्रमुच्चरन् कुण्डलिनीमुखे देवतां तर्पयेत् । तदुक्तम् उदयाकरपदत्याम् । कृत्वा मन्नतनुं स्मरेद् गुरुपदं देवीकलां चिन्मयी प. श्चात् पालवरं परामृतयुतं दीपैर्युतं प्रोजलैः । पुष्पादिष्व. का तर्पण करके गुरु और देवसाका तर्पण करै । फिर शुद्धि विधानमें प्रवृत्त होना चाहिये । तदनन्तर चकनायक उनके सहित पात्र की वंदना करें। तिसकाळ इस प्रकार कहना चाहिये, मैं यह कराम्बुमात विशुद्धि प्रद श्री प्रथम पात्र की वंदना करताहूं। श्रीमद्भरवके शेखर में भलीभांति से शोभा- यमान चन्द्र के अमृतमें यह पात्र आप्लाचित है । क्षेत्र के अधीश्वर योगिनी जनगण और सिद्धगण इस की आराधना करते हैं । यह आनन्दका सागर है। इस प्रकार अभिवंदना करके वाम हाय में पात्र उठाय और वंदना करके "ग्रहण करता हूं" इस प्रकार कह, गुरु शक्ति और साधक की आज्ञा ग्रहण करनी चाहिये । वह भी उपयोगकर हैं इस प्रकार कह । अनन्तर मूलाधार से इष्टदेवता स्वरूप कुण्डलिनी की भावना करके गुरु पादुका का स्मरण अपनी शिवरूप में भावना, दोनों हाथों में पात्र ग्रहण और मूलमंत्र उच्चार- ण पूर्वक कुण्डलिनी के मुख अर्पण करे । उदयाकर पद्धति में जैसा क- हाहै, यथा--मंत्रतनु विधानपूर्वक गुरुपद और चिन्मयी देव कलाका स्मर- *ण करके फिर दीप और कजल युक्त परामृत समन्वित पावर और पुष्पा- १२४ श्यामारहस्य भा० टी० । भिमन्त्रितं च नियतं सम्मोहकञ्चासवं ये संचिन्त्य पिव- न्ति यान्ति खलु ते भुक्तिञ्च मुक्ति पराम् ॥ तन्त्रान्तरे च। सिन्दूरतिलकं भाले पाणौ च मदिरारसम् । कृत्वा पर- गुरुं ध्यायेत् तथा देवीञ्च चिन्मयीम् ॥ इति । ततः पात्रमाधारोपरि संस्थाप्य पूर्ववत् पात्रं गृहीत्वा पा- वन्दनं कुर्यात् ।। हेमं मीनरसावह दयितया दत्तश्च पेयादिभिः किञ्चि- चञ्चलरक्तपङ्कजदृशा तस्यै समावेदितम् । वामे स्वादुवि- शुद्धिशुद्धिकरणं पाणौ विधायात्मके वन्दे पात्रमहं द्वितीय- मधुनानन्दैकसंवर्द्धनम् ॥ ' इत्यादिना पुनस्तेन च क्रमेण परामृतं गृहीत्वा पात्रव. न्दनं यथा। दि में अभिमंत्रिन सम्मोहक आसनको चिन्ता करताहुआ उसका पान करने से निसन्देह भक्ति और पुक्ति लाभ होतीहै । तत्रांतर में भी कहा है । भा- लमें सिंदूरका तिलक और पाणिमें मदिरा रस करके, परम गुरु और देवी चिन्मयों का ध्यान करै । अनन्तर आधारके ऊपर पात्र स्थापन और पूर्व की समान पात्र ग्रहण करके, पात्र की वदना करनी चाहिये । विसकाल इस प्रकार कहै, मैं अपने वाम पाणि में यह हेममय द्वितीय पात्र विधान पूर्वक वंदना करता हूं। यह मीन रसावह और दयिता कतृक प्रदत्त है । पेयादि द्वारा उस दयिता के कमलकी समान नेत्र कुछ एक चचल और रक्तवर्ण हुए हैं। मैंने उसको ही यह प्रदान किया । यह जिस प्रकार विशुद्धि और शुद्धि विधान करता है, इसी प्रकार एकमात्र आनद भी वढावा है। यह का जसके द्वारा कमसे परामृत ग्रहणकर वक्षमान विधानसे तीसरे पात्र की बंदना करै । यथा-मैं इस तीसरे पात्र की वन्दना करता है। यह सम्पूर्ण वेद और तृतीय परिच्छेद। सर्वानायकलाकलापकलितं कौतूहलद्योतनं चन्द्रोपेन्द्र- महेन्द्रशम्भु वरुणब्रह्मादिभिः सेवितम् । ध्यातं देवगणैः परं मुनिगणैर्मोक्षार्थिभिः सर्वदा वन्दे पात्रमहं तृतीय मधुना स्वात्माववोधक्षमम् ॥ इति तृतीयपात्रम् । मद्यं मीनरसावह हरिहरब्रह्मादिभिः पूजितं मुद्रामेथुन- धर्मकर्मनिरतं क्षाराम्लतिक्ताश्रयम् । आचार्याष्टकासन्धु- भैरवकलामांसेन संशोधितं पायात् पञ्चमकारतत्वसहितं पात्रं चतुर्थ नमः॥ इति चतुर्थपात्रम् । आधारे भुजगाधिराजवलये पात्रं महीमण्डलं मद्यं स. ससमुद्रवारिपिषितं चाप्टौ च दिग्दन्तिनः । सोऽहं भैरवम- चयन प्रतिदिनं तारागणेरन्वितैः मादित्यप्रमुखैः सुरासुर- गणे राज्ञाकरैः किन्नरैः॥ चौसठ कला में परिपुष्ट एवं कौतूहल उद्दीपित करता है । इन्द्र, उपेन्द्र, चंद्र, शम्भु, वरुण और ब्रह्मादि इसके सेवक हैं देवगण और मोक्षार्थी मुनिगण सदा इसका ध्यान करते हैं और इस के द्वारा स्वात्म बोध लाभ होता है। अ. नन्तर चौथेपात्र की वदना करै यथा--इस पंच मकार में तत्व सहित चतु. र्य पात्र और मद्यको नमस्कार है यह सबको पालन करे । हरिहर ब्रह्मादि इस मौनरसावह पात्र और मयकी पूजा करते हैं । इस में क्षार, अम्ल और तिक्त तीनही है। फिर पांचवें पात्र की वंदना करै । यथा- यह आधार अनन्तका कुण्डलन स्वरूप है यह पात्र उसमें मही मण्डल स्वरूप है। यह मद्य उस में सप्त सागरका जल स्वरूप है। मैं, प्रति दिन आज्ञाकर और किङ्कर की समान आदित्यप्रमुख सुरासुरगण और तारा गणों में क्षित होकर भैरव की पूजा करता हूं । यह कहकर पचम पात्र की वंदना करै । अनन्तर जबत- ।
१२६ श्यामारहस्य भा० टी० । इति पञ्चमपात्रम। ततो यावन्न चलते दृष्टिर्यावन्न चलते मनः। तावत् पानं प्रकुर्वीत पशुपानमतः परम् ॥ अथ अस्य प्रमाणं यथा । तदुक्तं रुद्रयामले । साधकेभ्यश्च शाक्तेभ्यो दद्यान्निर्माल्यचन्दनम् । साम- यिकः समं कुर्यात् देवि ! पानादि भक्षणम् ॥ अन्यत्रापि। निवसेच्चक्ररूपेण पड्क्त्याकारेण वा यथा । शक्तियुक्तो वसेद्वापियुग्मायुग्मविधानतः॥शिवशक्तिधियासर्व चक्रमध्ये समचयेत् ॥ तन्त्रान्तरे च। ततः पुष्पं समादाय गुरोः पाने निवेदयेत् । गुरवे च निवे थाथ भूत्यै दवा स्वयं हरेत् ॥ भावचूडामणौ च । साक्षाद्यदि गुरुन स्यात्तदा तोये विसर्जयेत् ॥ क दृष्टि चचल वा मन चलायमान न हो तबतक पान करना चाहिये । इसके पीछे पशुपान होता है। इसका प्रमाण यथा-रुद्रयामल में कहा है. शाक्त साधकगणोंको निर्मल चन्दन दान और सम्भाव में पानादि भक्षण कार्य करै । अन्यत्र भी कहा है चक्राकार या पक्ति के अकारमें शक्ति युक्त होकर, युग्मर विधानसे उपवेशन और शिवशक्ति बुद्धि से चक्र में सबकी भलीभांति पूजा करै । तत्रान्तर में भी कहा है । अन्नत्तर पुष्प ग्रहण करके गुरु के पात्र में गुरुको निवेदन करके भूति के उद्देश से दान पूर्वक स्वय संग्रह करै । भावपुढामणिमें कहा सानात् यदि गर न हों तो जल में विसर्जन करै । पात्रका परिमाण . १२७ PM तृतीय परिच्छेद । अत्र पात्रपरिमाणं यथा--तदुक्तं कुलसारे। नयनाग्निवाणसंख्यकर्षस्तु परमेश्वरि । हेतुपात्रं प्रकर्तव्य मित्युक्तंकुलशासने ॥ इतोऽप्यधिकपात्रन्तु न कर्त्तव्यं हि साधकैः ॥ कर्ष लौकिकमित्यर्थः तदुक्तं कुलोडीसे। गुञ्जा द्वादशमासः स्यात्तदष्टौ कर्पमुच्यते ॥ अथ उत्तरतन्त्रे। अनुज्ञा पुरतो लब्ध्वा गृह्णामीति स्वयं वदेत् । जुपस्वे- त्यभ्यनुज्ञातो गुरुणा वा कुलीनकैः ॥ गृह्णीयाञ्चस्वयं सिद्धो. पद्धपद्मासनः सुधीः ॥ कुलार्णवे च । एकासननिविष्टा ये भुञ्जीरन्नकभाजने । नेकपात्रे पिबे- युश्च ते यान्ति नरकाधमे ॥ एकपात्र इति समिलित्वा एकपात्रेण पिवेत् न तु वारं वारं द्रव्यपाने भिन्न भिन्नं पात्रं कुर्यात् । अनुष्टानापत्तेः । यथा--कुळसार में कहा है. हे परमेश्वरि ! एकादश कप परिमाण में इंतु पात्र प्रस्तुत कर कुलशासन में भी इसीप्रकार कहा है. सापक कभी इसकी अपेक्षा अधिक पात्र प्रस्तुत न करै कुलोडोस में कहा है. वारगुजा में एक मास. आठ मास में एक कर्प ॥ उत्तरतन्त्र में कहा है. प्रथम अनुज्ञा काम करके 'स्वय ग्रहण करता हूं' यह कहना चाहिये । फिर गुरु वा फुलीनगण कर्तृक अनुज्ञात हो पद्मासन बन्धन पूर्वक स्वयं ग्रहण करै, कुलार्णव में कहा है. जो एक भासनपर त्रि- राजमान है. वह एक पात्र में भी भोजन और एक पात्र में द्रव्यपान न क. रने से नरकथाम में गमन करते हैं । यहाँपर एकपात्र शब्द में यहीसमझना चाहिये कि सब मिलकर एकपात्रमें पानकरै बारम्बार द्रव्य पानके लिये पृथक श्यामारहस्य भा०टी० । न कुर्यात् पात्रशङ्करमिति वचनविरोधात् । सम्प्रदायविरो. धाच। विना मये न या पूजा विना मांसेन तर्पणम् । विना शक्त्या च यत् पानं तत् सर्व निष्फलं भवेत् ॥ स्वशक्तिं वीरशक्ति वा दीक्षितां गुरुपूजनीम् । पाययित्वा पिवेदव्य- मिति शाक्तस्य निर्णयः ॥न पद्यां च स्पृशेत् पात्रं न विन्दु पातयेदधः । नैकहस्तेन दातव्यं न मुद्रावर्जितं पुनः ॥ नार्च येदेकहस्तेन न पिवेदेकपाणिना। अन्योन्यवन्दनं कृत्वा पिबे. त्तदमृतं पुनः ॥ सव्ये नोद्धृत्य पात्रन्तु मुद्रां कृत्वापसव्यतः। विना सङ्गेन योगेन न कुर्याद्व्यसङ्गतिम् ।। साधारं नोद्धरेत पातमाधारे च विनिक्षिपेत् । पात्रं न चालयेत् स्थानात् न कुर्यात् पात्रशङ्करम् सशब्द न पिवेव्यं तथैव तं न पूरयेत् । नं स्थूल नैव सूक्ष्मञ्च पात्रं कुर्यात् मनोरमम् ॥ उच्छिष्टं न पृथक् पात्र प्रस्तुत न करें । क्योंकि पात्र सङ्कर करना ठीक नहीं है. इस बचन के संग विरोध और सम्मदाय विरोध भी मंघटित होता है । मय बिना पूजा मांस विना तर्पण और शक्ति बिना पान सर्वथा निष्फल होताहै अपनी शक्ति वा वीर शक्ति अथवा गुरुको पान कराकर स्वयं द्रव्यपान करै । यही शक्तिका निर्णय है । पद द्वारा पात्रस्पर्श वा बूदें नीचे न गिरावे । एक हाथ से कभी न दे. और मुद्राके बिना भी प्रदान न करै । एक हाय से पूना वा एक हाथ से पान भी नहीं करना चाहिये । परस्पर की बन्दना करके पुनर्वार वह अमृत पान करै । सव्य हाथ में पात्र लेकर और अपसव्य हाथ से मुद्रा विधान करके द्रव्यपानं करना चाहिये । संग बिना और योग विना कदापि पान न करें। आधार के सहित पात्र न उठावे आधार मेंही पात्र निक्षेप करै । स्वस्थान से पात्रकी चालना और पात्र संकर न करै । शब्द सहित द्रव्य पान वा शब्द सहित उसका पूर्ण न करे । जो घड़ा भी नहो और छोटा भी. न हो इसप्रकार मनोहरं पात्र निर्माण । तृता, पारद । १२९ स्पृशेच्चके कुलद्रव्याणि सुन्दरि !। वहिः प्रक्षाल्य च करौ कुलद्रव्याणि दापयेत् ॥ निष्ठीवनमधोवायु चक्रमध्ये विवर्ज- येत् । चक्रमध्ये घटे भग्ने पात्रेच पतिते भुवि ॥ दीपनाशे च शान्त्यर्थ श्रीचक्र कारयेत् सुधीः । स्वपानस्थितहेतुंच न द. याद्धैरवाय च ॥ दत्ते च सिद्धिहानिः स्यात् क्रुद्धा भवति योगनी । परीहासं प्रलापंच वितण्डां वहुभाषणम् ॥ औदा. सीन्यं भयं क्रोध चक्रमध्ये विवर्जयेत् । नान्योन्यं ताड़येत् पात्रं न पात्रमानयेदधः । गुरुशक्तिसुतानांच गुरुज्येष्ठ कनि. ष्ठयोः । उच्छिष्टं भक्षयेत् स्त्रीणां नान्योन्योच्छिष्टमर्पयेत् ॥ चक्रमध्ये च नियमं नान्यथा पतनं भवेत् । कनिष्ठानां स्वशि. ष्याणां दद्याच्चोच्छिष्टमेव हि ॥ दद्यात् स्नेहेन योऽन्येभ्योः स भवेदापदां पदम्। अन्यत्रापि। शक्त्युच्छिष्टं पिवे व्यं वीरोच्छिष्टञ्च चर्वणम् पीत्वा पीत्वा करै । हे मुंदरि ! उच्छिष्ट हाथ से चक मध्यस्थ कुल द्रव्य स्पर्श न करै । चाहिरे हाय धोकर कुल द्रव्य दान करै । निष्ठीवन और अघोवायु चक्र में इनका व्यवहार न करै । चक्र में घट टूट जाने पर. पात्र गिरजाने पर और दीपक के बुझ जानेपर शान्ति के लिये श्रीचक्र बनाना चाहिये । अपने पात्रस्थ हेतु भैरवको मदान न करै । क्योंकि भैरवको प्रदान करने से सिद्धि की हानि और योगिनी क्रोधित होती हैं चफ में यह सब बातें न करै यथा- हास्य, पळाप, वितण्डिता बहुत बोलना उदासीनता, भय और क्रोध परस्पर पात्रकी ताडना और पात्रको अधस्थ न करे। गुरु उनकी शक्ति और कन्या गुरुका ज्येष्ठ और कनिष्ठ भ्राता और स्त्रीगणों की उच्छिष्ट भोजन करें। उनको कभी उच्छिष्ट प्रदान न करै । चक्र में इन सय नियमों का पालन करना चाहिये । पालन न करने से पतन होता है। अपने शिष्य के कनिष्ठ होने से उस को उच्छिष्ट मदान करै । जो व्यक्ति स्नेह के वश होकर अन्यको प्रदान करता है, वह सम्पूर्ण आपदाओं का आस्पदं होता है अन्यत्र भी कहा है शक्ति, और वीरका उच्छिष्ट द्रव्य पान चर्वण और भक्षण करै । वारम्बार १२० श्यामारहस्य मा०टी०। पुनः पीत्वा पुनः पतति भूतले ॥ उत्थाय च पुनः पीत्वा पु. नर्जन्म न विद्यते । ततः शान्तिस्तोत्रं पठेत् । तदुक्तं डामरे। पीत्वा पेयं जनैः सार्द्ध शान्तिस्तोत्रं ततः पठेत् । नश्य न्तु प्रेतकुष्माण्डाः नश्यन्तु दूपका नराः ॥ साधकानां शि. वाः सन्तु आम्नायपरिपालिनाम् । जयन्ति मातरः सर्वाः जयन्ति योगिनीगणाः ॥ जयन्ति सिद्धिडाकिन्यो जयन्ति गुरुपङ्क्तयः । जयन्ति साधकाः सर्वे विशुद्धाः कौलिकाश्च ये ॥ समयाचारसम्पन्ना जयन्ति पूजका नराः। नन्दन्ति चाणिमासिद्धा नन्दन्ति कुलपालकाः ॥ इत्याद्या देवताः स. न्तु तृप्यन्तु वास्तुदेवताः । चन्द्रसूर्यादयो देवास्तृप्यन्तु मम भक्तितः ॥ नक्षलाणि ग्रहा योगाः करणा राशयश्च ये। सर्वे ते सुखिनों यान्तु सर्वा नद्यश्च पक्षिणः ॥ पशवस्तुर गाश्चैव पर्वताः कन्दरायुताः। रुपयो ब्राह्मणाः सर्वे शान्ति पान काके पुनरि पान कर और पृथिवी में गिरें फिर उठे और फिर पान करें इस प्रकार करने से फिर जन्म ग्रहण करना नहीं पड़ता। अनन्तर शान्तिस्तोत्र पाठकरना चाहिये । डामर में कहा है। यथा लोकों के सहित पेय पानपूर्वक यह कह शान्ति स्तोत्र पाठ करै कि मेत और सम्पूर्ण क मांड नष्ट हो सम्पूर्ण दूपक लोक भी विनाशको प्राप्त हों. आम्नाय-पयवर्ती साधकगणोंका मंगळहो मात्रगणोंकी जय हो.योगिनीगणों की भी जयहो.सिद्धि डाकिनीगणों की भी जयहो. गुरु पंक्तिगणोंकी भी जय हो. सर्वथा शुद्धचित्त साधक और कौलिकगणोंकी भी जयहो. सदाचारयुक्त पूजकगणोंकी भी जय हो. अणिमा सिद्ध व्यक्तिगण आनन्द में रहैं. कुलपाळगण भी आहलाद में रहे. देवतागण अनुकुल हों वास्तुदेवता तृप्त हो. सूर्य चंद्रादि देवगण भी मेरी भक्ति से तृप्त हो. नक्षत्रगण, ग्रहमण समस्त करण और राशि तृप्त हो सम्पूर्ण नदी, सम्पूर्ण पत्तो, सम्पूर्ण पश, और संपूर्ण पर्वत सुख विधान करें. ऋषिगण और ग्रामणगण सब में सदाशांति सम्पादन करें, जो भद्रप्रकृति है, वह यान्तु विनाश- तृतीय पारच्छेद। कुर्वन्तु सर्वदा ॥ शुभा मे विदिताः सन्तु मित्रास्तिष्ठन्तु पू. जकाः । ये ये पापधियः स्वभूषणरताः स्वनिन्दकाः पूजने दैवाचारविमत्तनष्टहृदया भ्रष्टाश्च ये साधकाः। दृष्ट्वा च क- मपूर्वमन्दहृदया ये कोलिका दूषका स्ते ते मत्र समये श्रीभैरवस्याज्ञया ॥ ये द्वेष्टारः साधकानां सदै- वाम्नाय दूषकाः । डाकिनीनां मुखे यान्तु तृप्तास्तपिशितैस्तु ताः ॥ पशवो नाशमायान्तु मम निन्दाकराश्च ये । द्वेष्टारः साधकानाञ्च ते नश्यन्तु शिवाज्ञया । ततो यथाविधिना शिवशक्तिसमायोगं कृत्वा देवीपादेषु आत्मानं समर्प्य श्रीपात्रमुत्तोल्य देव्या उपरि त्रिधा भ्राम- यित्वा मूलमुच्चरन् श्रीदक्षिणकालिके पराङ्मुखार्य स्वाहा इति अयं दत्त्वा तदुपरि पुनः संस्थाप्य संहारमुद्रया देवी स्वहृदि समानीय श्रीदक्षिणकालिके पूजितासि क्षमस्वेति मुझे विदित हो. जो पूजक हैं वह मेरे मित्रपक्ष में अवस्थिति करें. जो पाप बुद्धि आत्मपम्भरी, स्वनिन्दक देवाचार विमत्त और नएहृदय हैं. इसके अ तिरिक्त जो भ्रष्टाचार युक्त है वह साधकगण और जो दूपक हैं वह समस्त कौलिक श्रीभैरव की आज्ञा से इसप्तमय विनाशको माप्त हों । जो साधक गणों से द्वेप करता है. आम्नाय की निन्दा करता है वह डाकिनींगों के मुख में जाय । डाकिनीगण उसका मांस भक्षण करके तृप्ति लाम करें । समस्त पशु नष्ट हों. जो मेरी निन्दा करै उसका भी विनाश हो और जो साधकगणों से द्वेष करते हैं, वह भी सब श्रीशिव की आज्ञा से नष्ट हो । इसप्रकार शान्ति कवच पाठ करके यथाविधि शिवशक्ति का संयोग विधान और देवी के चरण में आत्माको समर्पण और श्रीपात्र उठाकर देवी के ऊपर तीनधार उसको घुमाय मूलोच्चारण सहित अर्घ्यदान करने के पीछे उसके ऊपर पुनार उसका स्थापन और संहार मुद्रा द्वारा देवीको अपने हृदयमें लाकर "श्रीदक्षिण कालिके ! यह मैंने तुम्हारी पूजाकरीः क्षमाकरी" १३२ श्यामारहस्य भा० टी० । विसृज्य ऐशान्यां मण्डलिकां कृत्वा निर्माल्येन निर्माल्यवा- सिन्यै नमः इति मण्डले त्रिः संपूजयेत् ॥ तदुक्तं कुमारीकल्पे। देवताग्रे तु सम्भोगे देवताप्रीणनं भवेत् । संभोगन्तु परं कृत्वा देवी हृदि समानयेत् ॥ कृतकृत्यो भवेन्मत्री नात्र कार्या विचारणा ॥ अथ आत्मसमर्पणमंत्रो यथा। इतः पूर्व प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतो जाग्रतस्वप्नसुयुत्यव- स्थया स्वकायेन मनसा वाचा कर्मणा हस्ताभ्यां पद्याम. दरेण शिश्ना यत् स्मृतं यदुक्तं यत् कृतं तत्सर्वं ब्रह्मार्पणं भ- वतु स्वाहा । मदीयञ्च सकलं श्रीदक्षिणकालिकाचरणे सम र्पित मस्तु । ओं तत् सत् ॥ अथ कालीतन्त्रे च । विसृज्य परया भक्त्या सन्निधापनमुद्रया । उद्वास्य ह. यह कहकर विसर्जन और ईशानकोण में मएडलिका बनाकर उसमें निर्मा- न्य द्वारा तीनवार बनकी पूजा करनी चाहिये । जैसा कि कुमारीकल्प में कहा है, देवता के आगे सम्भोग समय देवता की प्रीति सम्पादन करनी चाहिये. इत्यादि । आत्म समर्पणमत्र यथा-आदि अन्त में माण बुद्धि देह और धर्माधि कारतः जाग्रत्, स्वप्न और मुपप्ति अवस्था में स्वकीय, शरीर, मन, वाक्य, कर्म, हस्त, पद, उदर और शिश्न इनसब के द्वारा जो विचारा है. चा जो कहा है. वा जो किया है. वह समस्त ब्रह्मार्पण हो. स्वाहा । मैं और मेरा सब कुछ श्रीदक्षिण कालिका के चरणमें समर्पण हो । ओं तत्सत् । का- लीतत्र में भी कहा है. परमभक्ति सहित देवीको विसर्जन पूर्वक समिधापनी मुद्रा से हृदय में स्थित कर तन्मय होना चाहिये। पुरश्चरण के समय भी तृतीय परिच्छेद। दये देवीं तन्मयो भवति ध्रुवम् ॥ पुरश्चरणकालेऽपि पूजा चैषा प्रकीर्तिता। भैरवतन्त्रेऽपि। सहृदये च बहिर्देवी समर्प्य विधिवत् पुनः । निर्माल्यं वै शुचौ देशे नैवेद्यं भक्षयेत्ततः ॥ ततः श्रीपात्रामृतं स्वपात्रे कृत्वा स्वीकृत्य भूमौ पात्रं न्युजी कृत्य तदुपरि पुष्पं निक्षिप्य पात्रप्रक्षालनं कृत्वा गोपयेत् । तदुक्तम् तन्त्रान्तरे। अादिवन्दनमाचर्य अामृतं पिवेत्ततः। न्युजीकृत्य स्वयं पात्रं तत्र पुष्पं विनिक्षिपेत् । प्रक्षाल्य गोपयेत् पात्रं तत्व चिन्तापरो बुधः॥ ततस्तदमृतस्निग्धभूमो मायावीजं विलिख्य 'कनिष्ठां- गुलिना तिलकं कुर्यादनेन ॥ यं यं स्पृशति पादेन यं यं पश्यति चक्षुपा। स एव दा. सतां याति यदि शकसमो भवेत् ॥ इसीप्रकार पूना कही गई है, भैरवतंत्र में भी कहाहै. अपने हृदय के घहिरभाग में देवी को पुनर यथा विधि निर्माल्य अर्पण करके, पचित्र प्रदेश में नैवेद्य भक्षण करै अनन्तर श्री पानस्थ अमृत अपने पात्र में करके स्वीकार सहित भूमि में न्यूज भावसे रखकर उसके ऊपर पुष्प निक्षेप और पाद म. लालन पूर्वक गुप्त रक्खे । तंत्रांतर में कहा है । यथा--अादि वंदनाचरण करने के पीछे अध्यामृत पान करै स्वयं पात्र न्यूजीकृत करके उस में निक्षेप करना चाहिये । अनन्तर पात्र प्रक्षालन करके तत्व चिन्ता परायण हो उस को गुप्त रक्खे । तदनंतर उसी अमृतके संसर्गसे परम शीतल भावापन्न भूमि में माया वीज लिखकर कनिष्ठ अंगली से तिलक करै । फिर तिलक करके जिस व्यक्तिको पद द्वारा स्पर्श और जिसके प्रति दृष्टिपात करीजाय, वह व्यक्ति इंद्रकी समान होनेपर भी दास होता है। अनन्तर मस्तक में इंद्र लेप १३४ श्यामारहस्य भा० टी०। ततो यंत्रलेपं मूर्तिं कृत्वा नैवेद्यं सर्वदेवाय साधाकय च दत्त्वा शेपं स्वीकृत्य सोऽहमिति भावयेत् । वाह्यतो वैष्णवा. चारपरायणौ निःशङ्को यथासुखं विहरेत् ।। तदुक्तं कुलचूडामणौ । ब्रह्मरन्ध्र गुप्तस्थाने यत्रलेपंतु धारयेत् । नास्तिकेभ्यो न पशुभ्यो न मूर्खेभ्यो न वा द्विजे ॥ कुलीनाय च दातव्यं भ. थवा जलमध्यतः । ततः सोऽहमिति ध्यात्वा वैष्णवाचारत- त्परः ॥ हरिनाम्नाजातभावो भावाखिलविचेष्टितः। चौरवद्वि- चरेकः सदा संग विवर्जितः ॥ यामलेऽपि । नैवेद्यं त्रिपुरादेव्या वांछन्ति विबुधाः सदा । तस्माइयं सुरश्रेष्ट ! ब्राह्मणे वैष्णवेऽपिच ॥ मह्यं शुक्राय सूर्याय गणे. शाय यमाय च । वहये वरुणायापि वायवे धनदाय च ॥ ईशानाय महेशानि ! साधकाय प्रदापयेत् ॥ अत्र त्रिपुरापदमुपलक्षणमिति । . करके सर्वदेव और साधक को नैवेद्य दान और अवशिष्ट अंश स्वयं स्वी. कार पूर्वक अपनपे को शक्तिरूप में भावना और वाहर वैष्णवाचार परा: मण एवं निःशंक होकर यथामुख में विहार करै । कुलचूड़ामणि में कहा है यथा--गुप्त स्थान ब्रह्मरंभ में लेप धारण करे । नास्तिक, पशु वा मूर्ख, इनको न दे । कुलीन कोही प्रदान और जलमें निक्षेम करें। फिर अपनपे की शक्तिरूप चिंता करके वैष्णवाचारकी समान परायण और हरिनाम में आविष्ट चित्त होकर, समस्त संग छोड़ अकेला चोरकी समान विचरण करे। इसीलिये ब्राह्मण, बैष्णव, मुझे, शत्र, सूर्य गणेश, यम, अग्नि वरुण, वायु, कुवेर, और साधकको प्रदान करना चाहिये । यहां त्रिपुरा शब्द उपलक्षण मात्र सर्वत्र देवीकोही समझना चाहिये । अनन्तर देवीको विसर्जन करने वृतांय परिच्छद। अथ देवीविसर्जनानन्तरं पानादिकं कुर्यात् तदुक्तं कुलार्णवे। दिव्य देव्यग्रतः पान वीरमेकांतवासिनम् । अन्यत्रापि । पानन्तु त्रिविधं प्रोक्तं दिव्यवीरपशुक्रमैः ॥ दिव्यं देव्यप्रतो ध्यायेद् वीरं वीरासनस्थितम् । तृतीयन्तु पशोः पानं पाप कृत् शोकमोहकृत। उदयाकरपदत्याम्। असंस्कृतं वृथा पानं संस्कृतं भैरवः स्वयम् । चक्रपूजा विधौ प्रोक्तं सर्वसिद्धिकरं शुभम् ॥ असंस्कृतं पशोः पानं कलहोद्वेगकारकम् । संस्कृत सिद्धिजनकं प्रायश्चित्तादि दू. पणम् ॥ मंत्राणां स्फुरणं तेन महापातकनाशनम् । आयुः के पीछे पानादि करै । फुलार्णव में कहा है ! यथा-वीके सन्मुख, दिव्य और वीरपान इत्यादि । अन्यत्रभी कहा है, दिव्यवीर औ पशु क्रमानुसार 'पान तीन मकार है । तिनमें देवीके सन्मुख जो पान कियाजाता है, उसका नाम दिव्य पान है, वीरासन स्थित पानको वीर कहते हैं । एवं पशुपान पाप, शोक और मोह उत्पादन करता है । उदयाकर पद्धति में कहा है कि असं- स्कृत पान च्या पान और संस्कृत पान साक्षात् भैरव स्वरूप है । उसको चक्र पूजाविधि में सर्वसिद्धिकर कहते हैं । संस्कृत पानही पशु पान है । उससे कलह और उद्वेग उत्पन्न होता है। संस्कृत पान सिद्धिदायक है। इस पानसे ही मंत्रादि सबकी स्फूर्ति होती है और संपूर्ण महापातक नष्ट होते हैं । सम्कत पान करफे दान करने से जिस प्रकार आयु, श्री कांति और श्यामारहस्य भा. टी. 1 श्रीकांतिलौभाग्यं भवेत् संस्कृतपानतः नष्टेश्वर्य खेचरस्वं पतनं विधिवर्जनात। इतिमहामहोपाध्यायश्रीपरमहमपरिव्राजकश्रीपूर्णानन्दगिरिविरचिते श्यामारहस्ये सपर्यापर्यायस्तृनीय परिच्छेदः ।। अथ चतुर्थः परिच्छेदः । अथ स्तुतिः । यामले। कर्पूरं मध्यमांत्यस्वरपरिरहितं सेंदुवामाक्षियुक्तं । बीजं ते मातरेतत्रिपुरहरवधु ! तिः कृतं ये जपंति । तेषां गद्यानि पद्यानि च मुखकुहरादुल्लसंत्येव वाचः। स्वच्छंदं वांतधारा धररुचिरुविरे सर्वसिद्धिं गतानाम्॥१॥ईशानं सेंदुवामश्रवण सौभाग्य संचय होता है, असंस्कृत पान से इसी प्रकार ऐश्वर्य भ्रष्ट और पतन होता है। इतिश्री महामहोपाध्याय श्रीपरमहंसपरिवामक श्रीपूर्णानंदगिरि विरचित श्यामारहस्य श्रीपण्डितहरिशंकर कृत भाषाटीकासहित सपथ पर्याय नामक तृतीयपरिच्छेद ॥ ३ ॥ अब देवीकी स्तुति वर्णित होती है । यामळ में इस प्रकार स्तव लिखा। यथा-कर्पूर शब्दका मध्यम अक्षर "पू" और अन्तका अतर "र" निकाळ ने से जो 'क' और 'र' अवशिष्ट रहते हैं, इनको स्वरहीन करनेसे "क" इस मकार पद सिद्ध होता है । इस "क" में दीर्घ ईकार और अनुस्वार मिला ने से "क्री" यह वीज निकलता है । हे जननि ! हे त्रिपुर हर गृहिणी । यही तुम्हारा बीन है। जो इस वीजको त्रिगुणित करके जप करता है, सब प्रकार की सिद्धि उसके अंक गामिनी होती है और उसके मुख विवर से भी गद्य पधषयी वाणी बराबर निकलती रहनी है ॥ ॥ ॥ हकारमें रेफ । चतुर्थ परिच्छेद । परिगतं वीजमन्यत्महेशि ! द्वंद्वं ते मंदचेता यदि जपति जनो वारमेकं कदाचित् । जित्वा वाचामधीशं धनदमपिचिरं मोहयन्नम्वुजाक्षीवृंदं चंद्रार्द्धचूडे ! प्रभवति हि महाघोरवा- लावतंसे !।' २॥ ईशो वेश्वानरस्थः शशधरविलसद्वामने- सेण युक्तं वीजं ते द्वन्द्वमन्यद्विगलितचिकुरे ! कालिके ! ये जपन्ति । द्वेष्टार घ्नति ते च त्रिभुवनमपि तेवश्यभावं नय. न्ति सृक्वद्वंद्वारधाराप्रकटितवदने दक्षिणे ! कालिकति ३ अवं वामे कृपाणं करकमलतले छिन्नमुण्डं तथाधः सव्ये चाभीवरञ्च त्रिजगदघहरे ! दक्षिणे कालिके च । जप्त्वैत- नामवर्ण तव मनुविभवं भावयन्त्ये ततम्ब ! तेषामष्टौ करस्थाः दौर्घ इकार और अनुस्वार मिलाने से 'ही' यह जो पद बनता है, यह तु- मारा अन्य एक बीज है नितान्त स्वल्पवृद्धि व्यक्तिभी यदि द्विगुणित कर के इस वीजका कदाचित एकवार जप करे, तो वह वृहस्पति को भी जय कुवेर को भी परास्त और कमलकी समान नेत्रवाली स्त्रियोंको भी मोहित करके सबके ऊपर अपना प्रभुत्व प्रचार करने में समर्थ होता है ॥ २ ॥ हे मुक्तकेशि ! हे चन्द्रार्द चूडे ! हकार का पिछला अक्षर 'र' दीर्घ ईकार और अनुस्वार मिलाने से उपरोक्त तुम्हारा जो 'ही, नामक चीन उद्धृत होता है । उसको दुगुना करके जो व्यक्ति जप करता है वह विपक्ष पक्ष का नाश और त्रिभुवन के वशीभूत करने में समर्थ होताहै ॥ ३ ॥ तुम दक्षिण अर्थात् सबकेही प्रति अनुग्रह शालिनी हो । और कालिका अर्थात् सबकीही सृष्टि स्थिति और लय करती हो । तुम्हारे दोनों होठोंसे एक रुधिर धारा गिरती है । तुम्हारे बाई ओर के ऊदहस्त में कृयाण, अश स्थितकर कमलतल में छिन्नमुण्ड. दक्षिण और के ऊर्दहस्त में अभय और भवस्थ हस्त में वर विराजमान है। तुम्हीं तीनों जगत् के पापहरण करती हो । तुम्ही कालकी पत्नी हो. तुमको कुछभी असाध्य नहीं है । तुम्हारा बदन सर्वदाही उल्लसित और सर्वदा प्रसन्न भावयुक्त है । जो तु- म्हारा नाम जपकर तुम्हारे मंत्र विभव की भावना करता है, अणिमादिक , श्यामारहस्य भा. टी0। . प्रकटितवदने सिद्ध्यस्यम्बकस्य ॥ ४॥ वयं वह्नियुक्तं दि. धुरतिकलितं तत्रयं कूर्चयुग्मं लज्जायुग्मंच पश्चात् स्मितमु- खि! तथधष्ठद्वयं योजयित्वा।मातर्ये येजपंति स्मरहरमहिले! भावयंतःस्वरूपं ते लक्ष्मीलास्थलीलाकमलदलदृशःकामरूपा भवति ॥ ५ ॥ प्रत्येकं वा वयं वा इयमपि च परं वीजमयं- तगुह्य त्वन्नान्ना योजयित्वा सकलमपिसदाभावयतो जपंति। तेषां नेत्रारविन्दे विहरति कमला वक्तशुभ्रांशुविम्बे वाग्देवी छिन्नमुण्डस्रगतिशयलसत्कण्ठि पीनस्तनाढ्ये ॥ ६॥ गता. सूनां वाहुप्रकरकृतकाञ्चीपरिलसन्नितम्वां दिग्वस्त्रां त्रिभुव. नविधात्री त्रिनयनाम् । श्मशानस्थे तल्पे शवहृदि महाका- आठसिद्धि उसके अधिकार होती हैं ॥४॥ तुम सदाही हास्यमुखी हो। तुम्ही त्रिभुवनकी जननी हो । तुम्ही स्परहरा अर्थात् तुम शरण होतेही मनुष्यका दु:यादि हरण करती हो । तुम्ही महिला अर्थात् सबकी पूजनीय और से वनीय हो । जो भक्तिभाव से तुम्हारे स्वरूपकी भावना करके 'क्री की क्री हुं हु ही ही स्वाहा, तुम्हारे इस वीज का जप करता है, वह कमकदल की समान लक्ष्मीकी लास्य लीलास्थली और कामरूप होता है ॥ ५ ॥ तुम्हीं स्वप्रकाश स्वरूप हो । जो सर्वदा ध्यान परायण हो तुम्हारे नाग के सहित पोजना कर उल्लिग्वित समस्त वीज में एक, दो, तीन अथवा समस्त बीज का जप करता है, कमला उसके नेत्ररूपी अरविंद में और वाग्देवी उसके बदनरूपी चन्द्रविम्न में सर्वदा विहार करती हैं । तुम्हारा कंठ देश मुएड. माला से अत्यन्त विकसित हुआ है । तुम्ही दैत्योंका संहार करने के समय मलयकालीन महामेघ की सगान घोर गंभीर शब्द करती हो ॥ ६ ॥ तुम्ही सवको जन्म देती हो । समस्त शबळे पाहु परम्परा में विरचित कांचीदाम के संसर्ग से तुम्हारे नितम्म विम्ब अतिशय सुशोभित हुए हैं । तुम्ही दि. बसना और त्रिनयना, एवं त्रिभुवनकी विधात्री और महाकाल के सहित प्रकृति पुरुषगत लीला विहार में आसक्त हो । जो व्यक्ति श्मशानस्थित रारूप और शय हृदय में आरोहण करके तुम्हारे इस रूपका ध्यान करता चतुर्थ परिच्छेद। लसुरंतप्रसक्तां त्वां ध्यायन् जननि ! जड़चेता अपि कविः ॥७॥ शिवाभिघोराभिः शवनिवहमुण्डास्थिनिकरैः परं सं- कीर्णायां प्रकटितचितायां हरवधूम् । प्रविष्ट सन्तुष्टामुपरि सुरते नातियुवती सदा त्वां ध्यायन्ति क्वचिदपि न तेषां प- रिभवः ॥ ८॥ वदामस्ते किंवा जननि ! वयमुच्चेर्जधियो न धाता नापीशो हरिपि न ते वेत्ति परमम् । तथापि त्व. द्भक्तिर्मुखरयति चास्माकमपि ते तदेतत् क्षन्तव्यं न खलु 'पशुवोधः समुचितः ॥ ६ ॥ समन्तादापीनस्तनजघनग्- यौवनवतीरताशक्तो नक्तं यदि जपति भक्तस्तव मनुम् । वि. वासास्वां ध्यायन् गलितचिकुरस्तस्य वशगाः समस्ताः सि. है, वह जडवृद्धि होने पर भी कवि होता है ।। ७ ।। भयंकर प्रकृति समस्त शिवागण तुमको चारों ओर से घेरे रहती हैं । तिस अवस्थामें तुम शवपुण्ड और अस्थि परम्परा में परिटत अति विस्तृत चित्ता भूमि में प्रवेश कर के संतुष्ट हृदय से विपरीत विहार में प्रवृत्त होती हो । तुम्हारा यौवन किसी काल में भी क्षयको प्राप्त नहीं होता। जो व्यक्ति सर्वदा तुम्हारे इस रूपकी भावना करता है, उसका किसीकाल में, किसी देश में, और किसी अवस्थामें भी पराभव नहीं होता ।। ८ ॥ हे जननि ! जडवृद्धि मैं तुम्हारे विषय में अधिक और क्या कहूं ? मेरी बात दूर रदै स्वयं ब्रह्मा, महादेव और चामु. देव भी तुम्हारे विषय में विशेष किसीप्रकार अवगत नहीं है । हे तमोरूपिणी । तथापि तुम्हारी भक्ति मुझको मुखरित करती है इसीलिये मै न जानकर भी क्या कहनेको या और क्या कहकर तुम्हारा स्तव करताहूं। अतएव, मुझ को क्षमा करना चाहिये । कहूं क्या मैं पशुती समान हूं। मेरे प्रतिरोप प्र. काश करना उचित नहीं है ॥ ६ ॥ तुम्हारा भक्त यदि रात्रि पीन श्रोणि पयोधरा नव यौवन शालिनी रमणी के सहित निधुवनलीला रसमें आसक्त और विवस्त्र होकर तुम्हारा ध्यानवधारणाके पीछे तुम्हारे मंत्रका जप करता है, तो समस्त सिद्ध मण्डली उसके वशीभूत होती है और वह व्यक्ति कवि .
१४० श्यामारहस्य भा० टी० । छौघाः भुवि चिरतरं जीवति कविः ॥ १० ॥ समाः सुस्थी- भूतां जपति विपरीतां यदि सदा विचिन्त्य त्वां ध्यायन्नति: शयमहाकालसुरताम् । तदा तस्य क्षीणीतलविहरमाणस्य विदुषःकराम्भोजे वश्याःस्मरहरवधु! महासिद्धिनिवहाः ११॥ प्रसूते संसारं जननि ! जगतीं पालयति च समस्तं क्षित्यादि प्रलयसमये संहरति च । अतस्त्वं धातापि त्रिभुवनपतिःश्री पतिरपि महेशोऽपि प्रायःसकलमपिकिंस्तौमि भवतीम् ॥१२॥ अनेके सेवन्ते भवदधिकगीर्वाणनिवहान् विमूढ़ास्ते मातः ! किमपि न हि जानन्ति परमम्।समाराध्यामायां हरिहरविरि- ञ्चयादिविबुधैः प्रपन्नोऽस्मि खैरं रतिरसमहानन्दनिरताम् ॥ ॥ १३॥ धरित्रीकीलालं शुचिरपि समीरोऽपि गगनं त्वमेका होकर चिरकाळ जीवित रहता है ॥ १० ॥ तुम साक्षात् संहार रूपसे सब को हरण और मायारूप से सबका बंधन करती हो । तुम्ही महाकालके सहित विपरीत अर्थात विशिष्ट विधान से संगता होकर समस्त संसार में अनुकूल विधानसे विहार करती हो । जो व्यक्ति स्वस्थ चित्तौ एकवत्सर सदा विशेष प्रकार चिंता करके तुम्हारा ध्यान धारणा करताहै इस पृथ्वी में बिहार करते करते ही अणिमादिक समस्त महासिद्धि उस विद्वान् सा. धकके कर कमल में वश्य होती हैं ॥ ११ ॥ हे जननि ! तुमने ही इस जगद को उत्पन्न किया है, तुम्ही इसका पालन करती हो और तुम्ही इसका प्र. लय के समय संहार करती हो । अतएव तुम्ही ब्रह्मा, तुम्ही विष्णु, और तुम्ही महादेव हो । फलतः सबकुछ तुम्ही हो । अतएव मैं और तुम्हारा क्या स्तव करूं॥ १ ॥ १२ ॥ हे जननि ! अनेक व्यक्ति तुमको त्यागकर अन्यान्य देवतागणों की उपासना करने हैं, वह नितांतमोहाच्छन है इसी लिये तुम जो सबसे श्रेष्ठ हो, इस पातको वह नही जानते । जो हो, में अ. पनी इच्छासे एकमात्र तुम्हारी ही शरणहूं। क्योंकि मैं जानता हूं, सयं हरि, हर और ब्रह्मादि प्रमुख देवतागण मी केवळ तुम्हारीही भाराधना करती और या भी जानता हूं कि केवक तुम्ही रति, रस, परमानंद और समस्त रसकी निख्य (भाकर ) वरूप हो ॥ १३ ॥ तुम्ही गिरीशरमणी अर्थात् महादेर ।
चतुर्थ परिच्छेद । । १५१ कल्याणी गिरिशरमणी कालि ! सकला । स्तुतिः का ते मातस्तव करुणया मामगतिकं प्रसन्ना वं भूयाः भवमनु न भूयान्मम जनः ॥ १४ ॥ श्मशानस्थः सुस्थो गलितचि. कुरो दिक्पटधरः सहस्रं वळणां निजगलितवीर्येण कुसु. मम् । जपंस्तत्प्रत्येकं मनुमपि तव ध्याननिरतो महाकालि ! स्वैरं स भवति धरित्रीपरिवृढ़ः ॥ १५ ॥ गृहे सम्मार्जन्या परिगलितवीजं हि कुसुमं सुमध्याहे नित्यं विरचयति चिता- यां कुजदिने । समुच्चार्य प्रेम्णा मनुमपि सकृत् कालि ! सततं गजारूढ़ो याति क्षितिपरिवृढ़ सत्कविवरः ॥ १६ ॥ स्वपुष्पैराकीणं कुसुमधनुषो मन्दिरमहो पुरो ध्यायन ध्यायन् की भार्या हो । अर्थात् तमोगुणके आश्रय महाकालके संग विहार करती हो । तुम समस्त कल्याणका आळय और स्वरूप हो । तुम्ही काली अर्थात् सृष्टि, स्थिति और महार करनेवाली हो । तुम्ही पृथी, तुम्ही जल, तुम्ही भनि, तमी वायु और तुम्ही आकाश हो ! इस प्रकार तुप एक होनेपरमी सबकुछ हो अतएव तुम्हारी स्तुति और क्या करूं ? हे जननि ! मैं सर मांति से गतिहीन हूं। अतएर तुम अपने गुणसे करुणा करके मेरे प्रति प्रस- म्न होमो । जिससे कि फिर इस पाप संसारमें मुझे जन्म ग्रहण करना न हो ॥ १४ ॥ जो व्यक्ति श्मशान प्रदेश में अवस्थान पूर्वक मुक्तकेश और नम बेषसे अपने विगलित वीर्य के सहित हजार अर्कपुष्प (आक के फूल) प्रदान करनेपर तुम्हारे ध्यान में मग्न हो तुम्हारे प्रत्येक मंत्रका अप करता? वा इच्छा करतेही समस्त पृथ्वी का भद्वितीय अधिपति होता है ॥ १५ ॥ जो व्यक्ति मंगल के दिन इमशान में जाकर मध्याह्न समय सम्मानी और विनिलित वीर्य के सहित अखंड चिकर प्रदान करता है और तिसके संग एकवार प्रेममें भरकर तुम्हारा मंत्र उच्चारण करता है, वह संपूर्ण पृथ्वी का अधिपति और सत् कवि गणों में अग्रणी हो हार्यापर चढकर गमन करवा है ॥ १६ ॥ आहा ? तुम्हारे प्रति भक्तिके वश होकर सन्मुख व पुरुष में समाकर्णि काम मंदिरका बारम्बार ध्यान कर यदि तुम्हारे मंत्रका जप किया १४२ श्यामारहस्य भा० टी० । यदि जपति मातस्तव मनुम् । स गन्धर्वश्रेणीपतिरिव क- वित्वामृतनदीनदीनः पर्यन्ते परमपदलीनःप्रभवति॥१७॥ त्रिपञ्चारे पीठे शवशिवहृदि स्मेरवदनां महाकालेनोच्चैर्म- दनरसलावण्यनिरताम् । समासक्तो नक्तं खयमपि रतान- न्दनिरतो नरो यो ध्यायेत् त्वां भवजननि ! स स्यात् स्म- रहरः ॥ १८ ॥ स लोमास्थि स्वैरं पललमपि मार्जारमपि ते परं चौष्ट्र मैपं नरमहिपयोश्छागमपि वा । वलिं ते पूजाया मयि विरलवक्त वितरतां सतां सिद्धिः सर्वा प्रतिपदमपूर्वा प्रभवति ॥ १६ ॥ वशीमन्त्रं लक्षं प्रजपति हविष्याशनरतो दिवा मातयुप्मचरणयुगलध्याननिरतः। परं नक्तं नग्नो निधुवनविनोदेन च मनुं जपेल्लक्षं स स्यात् स्मर की जाय, तो गंधर्व गणों का अधिपत्य काम होता है कवित्वरूप अमृत नदीरूप में वह आविर्भूत होता है, किसी समय भी उसको दैन्य ( दीनता आक्रमण नहीं सरसका, चरम में परम पद प्राप्ति योगसघटित होता है और वह सदाके लिये सबका प्रभु होसक्ता है ॥ १७ ॥ हे जननि ! तुम शवरूर शिव के हृदय और निमार पीठमें सम्मित वदन से आरोहण करके महाकालके सहित अत्यन्त मदन के रस लावण्यमें निरतहुई हो। जो व्यक्ति रात्रि में सायं समासक्त चित्तसे रसानद होकर तुम्हारा इस प्रकार ध्यान करताहै वह स्मरहर (महादेव ) होता है ॥ १८ नो मर्त्यलोक वासी सत् पुरुप.पूनाके समय विडाल (बिलाई ) ऊंट, मेष, महिष, मनुष्य, और छाग इन सबका मांस और लोम सहित अस्थि तुम्हारे उद्देश से प्रदान करता है समस्त अपूर्व सिद्धि प्रतिपद में उसके वशीभूत होती हैं ॥ १६ ॥ हे जननि ! जो व्यक्ति दिन में वशी और हविष्याशी होकर तुम्हारे चरण गुगलका ध्यान धारण सहित एकाग्रचित्त से तुम्हारे मन का लक्षवार जप करता है एवं रात्रि में मम और निधन विनोद में मग्न भावापन्न हो इस प्रकार लक्षनप करता है, वह पृथ्वीवक में साक्षात् स्मरहर ( श्रीमहादेव ) . चतुर्थ परिच्छेद । हरसदृक्षः क्षितितले ॥२॥ इदं स्तोत्रंमातस्तव मनुसमुद्धा- रणजनु स्वरूपापं पादाम्बुजयुगलपूजाविधियुतम् । नि. शाद्धं वा पूजासमयमधि वा यस्तु पठति प्रलापस्तस्यापि । प्रसरति कवित्वामृतरसः ॥ २१॥ कुरङ्गाक्षीवृन्दं तमनुसरति प्रेमतरलं वशस्तस्य क्षौणीपतिरापि कुवेरप्रतिनिधिः । रिपु- कारागार कलयति च तं केलि कलया चिरं जीवन्मुक्तःप्रभ- वति स भक्तः प्रतिजनुः ।। २२ ।। इति महाकालविरचितं स्वरूपाख्यं स्तोत्र सम्पूर्णम् । अथोत्तरतन्त्रे कवचं लिख्यते । कैलासशिखरारूढ़ भैरव चन्द्रशेखरम् । वक्षःस्थले समा. सीना भैरवी परिपृच्छति ॥ भैरव्युवाच। देवेश ! परमेशान ! लोकानुग्रहकारक !। काचं सूचितं की समान होता है।॥२०॥ हे जननि ! जो व्यक्ति आधीरात के समय अथवा पूनाकालकेसमय तुम्हारे युगल चरणारविन्दोकी पूना प्रासक्तहोकर तुम्हारा मंत्राद्धरण जनित यह स्वरूपाख्यस्तव पाठ करवाहै, उसव्यक्तिका मापभी साक्षात् कवित्व रूप अमृत रसमें परिणत होकर सर्वत्र फैलजाताहै ॥ २१ मृग नयनी स्त्री गण मी प्रेप चंचला होकर उसके अनंगत होती हैं, स्वयं राजा लोग भी उसके घशीभूत होते हैं इस के अतिरिक्त वह कुवेर का भी प्रति निधि होता है, उस के समस्त शत्रुगण कारागार में वास करते है एवं वह जीवन्मुक्त--और चिरकाल केलि कला संयुक्त होता है । अधिक क्या कई, प्रति जन्म में वह व्यक्ति इसी प्रकार होता है ॥ २२ ।। इति महाकालविरचित स्वरूपाख्य स्तोत्र समाप्तम् । उत्तर तंत्र में भगवती कालिया का कवच लिखा है । यथा चंद्रशेखर मैं- रवके कैलाश शिखर पर विराजमान थे, तिसी समय भैरवी ने उनके पक्ष स्थल में विराजमान होकर पूछा । भैरवी ने कहा, आप देवतागणों के भी ई- श्वर और परमेश्वर है आपही लोकॉपर अनुग्रह करते हैं । अापने प्रथम मेरे - ॥ १४४ श्यामारहस्य भा०टी०। पूर्व किमर्थ न प्रकाशितम् ॥ याद मे महती प्रीतिस्तवास्ति कुलभैरव !! कवचं कालिकादेव्याः कथयस्वानुकम्पया ॥ श्रीभैरव उवाच । भप्रकाश्यमिदं देवि!नरलोके विशेषतः । लक्षवार वारि- तासि स्त्रीस्वभावाद्धि पृच्छसि ।। देव्युवाच। सेवका बहवो नाथ! कुलधर्मपरायणाः। यतस्ते त्यक्तजीवा सा शवोपरि चितोपरि ॥ तेषां प्रयोगसिद्ध्यर्थ स्वरक्षार्थ विशेषतः । पृच्छामि बहुशो देव ! कथयस्व दयानिधे ! ॥ भैरव उवाच । कथयामि शृणु प्राज्ञे ! कालिकाकवचं परम् । गोपनीय पशोर स्वयोनिमपरे यथा ॥ सर्वविद्यामहाराज ! सर्वदे. वनमस्कृते !॥ प्रति देवीकाळका के कवचकी सूचना दीथी, सो किसलिये उसको प्रकाश नहीं किया ? हे कुल भैरव ? यदि मेरे पति आप की विशेष प्रीति है, तो कपा पूर्वक देवी कालिका के कवनका कीर्तन कीजिये। श्रीभैरवने कहा हे देवि ! इस कवचका प्रकाश करना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। विशेषतः नरलोक में तो प्रकाश करना ही नहीं चाहिये । इसीलिये मैने तुमको काखबार निवारण किया, सौभी तुम श्री स्वभावके वश होकर फिर वही पूछती हो। देवीने कहा ईनाय ! अनेक सेवक हैं, वह समस्त कुलधर्म परायण और सभी जीवनकी आशा त्याग शव और चिताके ऊपर अवस्थिति करते हैं, उन के प्रयोगकी सिदि और विशेष करके उनकी रक्षा के लिये ही मैं बारम्बार जिज्ञासा करती हूं । आपमी दया सागर हैं, अतएव कीर्चन कीजिये । भैरव ने कहा हे माझे ! श्रवण करो, देवि कालिका के कवचका कीर्तन कर ताई । पशुगणों के निकट कभी इसको प्रकाश न करै। यह समस्त विद्या का महारानी स्वरूप हैं। इस कारण समस्त देवता इसको नमस्कार करते हैं।
चतुर्थ परिच्छद। कालिकाकवचस्य भैरव पिरुष्णिक्छन्दः अद्वैतरूपिणी श्रीदक्षिणकालिका देवता ह्रीं बीजं हुं शक्तिः क्री कीलकं सर्वार्थसाधनपुरःसरमन्त्रसिद्धी विनियोगः । सहस्रारे महापझे कपुरधवलो गुरुः॥वामोरुस्थिततच्छक्तिः सदा सर्वत्र रक्षतु । परमेशः पुरः पातु परापरगुरुस्तथा ॥ परमेष्ठी गुरुः पातु दिव्यसिद्धिश्च मानवः । महादेवी सदा पातु महादेवः सदावतु ॥ त्रिपुरो भैरवः पातु दिव्यरूपधरः सदा । ब्रह्मानन्दः सदा पातु पूर्णदेवः सदावतुः। चलच्चित्तः सदा पातु चेलाञ्चलश्च पातु माम् ॥ कुमारः क्रोधनश्चैव वरदः स्मरदीपनः । माया मायावती चैव सिद्धौघाः पा- न्तु सर्वदा ॥ विमलः कुशलश्चैव भीमसेनः सुधाकरः। मीनो गोरक्षकश्चैव भोजदेवः प्रजापतिः ॥ कुलदेवो रन्तिदेवो वि घ्नेश्वरहताशनः।सन्तोपः समयानन्दःपातु मां मानवासदा॥ कालिकाकवच का ऋपि भैरव, छंद उगिक, देवता अद्वैत रूपिणी श्री दक्षिण कालिका, वीज ही, शक्ति हुं, कीलक की, और सर्वार्थ साधन के पीछे मंत्रसिद्धिके लिये इसका विनियोग जानना चाहिये । जो सहस्रार महापद्म में विराजमान हैं, जो कर्पूर की समान धवलवर्ण और शक्ति जिनका वाम ऊरु सर्वदा आश्रय करती है, वही गुरुदेव सर्वदा रक्षा करें परमेश और पगपरगुरु, एवं परमेष्ठी गुरु और दिव्य सिद्ध पुरुष पुरोभाग की रक्षा करें। महादेवी सर्वदा पालन और महादेव सर्वदा रक्षा करै ।दिव्यरूपधारी त्रिपुर भैरव सर्वदा रक्षा करें । ब्रह्मानंद सर्वदा रक्षा करें । पूर्णदेव सर्वदा रक्षा करें। चलच्चित सर्वदा रक्षा करें । चेलांचळ सर्वदा रक्षा करें । कुमार क्रोधन, वरद स्मरदीपन, माया, मायावती, और सिद्धौघ यह मेरी सर्वदा रक्षा करें । विमल, कुशल, भीमसेन, सुधाकर, मीन, गोरक्षक, भोजदेव, प्रजापति, कुलदेव, रन्तिदेव, विघ्नेश्वर, हुताशन, संतोष, यह सब मेरी रक्षा करें । समयानंद से आनन्दनाथ पर्यत मनुष्यगण और अम्बान्ता मातृगण . १९ १४६ श्यामारहस्य भा०टी० । सर्वेऽप्यानन्दनाथान्ताः अम्बान्ता मातरःक्रमात् । गणनाथः सदा पातु भैरवः पातु मां सदा ॥ वटुको नः सदा पातु दुर्गा मां परिरक्षतु । शिरसः पादपर्यन्तं पातु मां घोरदक्षिणा ॥ तथा शिरसि मां काली हृदि मूले च रक्षतु । संपूर्णविद्यया देवी सदा सर्वत्र रक्षतु ॥ क्रीं क्रीं क्रीं वदने पातु हृदि हुं हुं सदावतु। ह्रीं ह्रीं पातु सदाधारे दक्षिणे कालिके हदि । क्री क्रीं क्रीं पातु मे पूर्व हुं हुं दक्षे सदावतु ॥ ह्रीं ह्रीं मां पश्चिमे पातु हुं हुं पातु सदोत्तरे ॥ पृष्ठे पातु सदा स्वाहा मूला सर्वत्र रक्षतु । पड़ों युवती पातु पड़ङ्गेषु सदेव माम् । मन्त्रराजः सदा पातु ऊर्ध्वाधो दिग्विदिस्थितः । चक्रराजे स्थिता- श्चापि देवताः परिपान्तु माम् ॥ उग्रा उग्रप्रभा दीप्ता पातु पूर्व त्रिकोणके । नीला घना वलाका च तथापरत्रिकोणके ॥ मात्रा मुद्रामिता चैव तथा मध्यत्रिकोणके । काली कपालि: नी कुल्ला कुरुकुल्ला विरोधिनी ॥ वहिः पट्कोणके पान्तु वि. यथा ऋमसे मेरी रक्षा करें । गणनाथ सर्वदा मेरा पालन करै । भैरव सदा मेरी रक्षा करें । बटुक और दुर्गा सर्वदा मेरी रक्षा करें । घोर दक्षिणा मेरे मस्तक से चरणपर्यंत की रक्षा करें । देवीकाली मेरे मस्तक और हृदय की रक्षा करें । देवी सम्पूर्ण विद्या सहित सर्वदा सर्वत्र मेरी रक्षा करें । की क्रीं क्रीं बदनकी रक्षा करें । ई हु सर्वदा हृदयकी रक्षा करे। ही ही दक्षिणा कालिका आधार के सहित हृदयकी रक्षा करै । क्री की मेरे पूर्व दिशा, हुँ हुँ दक्षिण दिशा, ही ही पश्चिम दिशा, और हुं हुं मरे उत्तर दिक्की सर्वदा रक्षा करें । स्वाहा मेरी पीठ और मूला मेरी सर्वन युवती मेरी सर्वाङ्ग एवं मंत्रराज मेरे ऊर्द्ध व नीचे दिशा और विदिशा में अवस्थान करके सर्वदा रक्षा करें । चक्रराज और संपूर्ण देवता भी इसीप्रकार अवस्थिति करके स- पदा मेरी रक्षा करें । उग्रा, उपमा, दीप्ता मेरे पूर्व त्रिकोणक, नीला, घना और बलाका मेरे अपर त्रिकोणक, मात्रा, मुद्रा और मिता मेरे मध्य त्रिकोण क काली कपालिनी, बल्ला, कुरुकल्ला, निरोधिनी और विनित्ता मेरे वहि: - । - १४७ चतुर्थ परिच्छेद । प्रचित्ता तथा प्रिये ! । सर्वाः श्यामाः खद्धरा वामहस्ते न तर्जनाः ॥ ब्राह्मी पूर्वदले पातु नारायणी तथाग्निके । माहे. श्वरी दक्षदले चामुण्डा राक्षसेऽवतु ॥ कौमारी पश्चिमे पातु वायव्ये चापराजिता । दाराही चोत्तरे पातु नारसिंहीं शिवे- ऽवतु ॥ ऐं ह्रीं असिताङ्गः पूर्वं भैरवः परिरक्षतु । ऐं ह्रीं रु. रुश्चाग्निकोणे ऐं ह्रीं चण्डस्तु दक्षिणे ॥ ऐं ह्रीं क्रोधो नैर्छ: तेऽव्यात् ऐं ह्रीं उन्मत्तकस्तथा । पश्चिमे ऐं ह्रीं मां कपाली वायुकोणके ॥ ऐं ह्रीं भीषणाख्यश्च उत्तरेऽवतु भैरवः । ऐं ही संहार ऐशान्यां मातृणामङ्कगा शिवाः ॥ ऐं हेतुको व- टुकः पूर्वदले पातु सदैव माम् । ऐं त्रिपुरान्तको वटुक आ- नेय्यां सर्वदाऽवतु ॥ ऐं वह्निवेतालो वटुको दक्षिणे मां स- दाऽवतु । ऐं अग्निजिह्ववटुकोऽव्यात् नेत्यां पश्चिमे तथा ॥ ऐं कालबटुकः पातु ऐं करालबटुकस्तथा । वायव्यां ऐं एकः - पातु उत्तरे वटुकोऽवतु ॥ ऐं भीमवटुकः पातु ऐशान्यां दि- शि मां सदा । ऐं ह्रीं ह्रीं हुं फट् स्वाहान्ताश्चतुःषष्टिमातरः ॥ ऊर्ध्वाधो दक्षवामाग्रे पृष्ठदेशे तु पातु माम् । ऐं हुं सिंह- षट्कोणक की सर्वदा रक्षा करें । यह समस्त श्यामवर्ण एवं सभी खड्ग' और तर्जनी धारिणी हैं। नामी मेरे पूर्वदल नारायणी अग्निदल माहेश्वरी दक्षिणदल, चामुण्डा नैऋानदल, कौमारी, पश्चिमदल, अपराजिता, वायुदल और बाराही उत्तरदलकी सर्वदा रक्षा करें । असिताङ्ग भैरव मेरे पूर्व रु रु अग्निकोण चण्ड दक्षिण, क्रोध नैऋत, उन्मत्त पश्चिम, कपाळी वायुकोण भीपण उत्तर संहार ऐशानी, बटुक पूर्वदल, त्रिपुरान्तक वटुक आग्नेय, और बनि वेताल पदक दक्षिण दलकी सर्वदा रक्षा करें । अग्नि जिबी च. टुक मेरे नैत, काल वटुक पश्चिम, कराल बटुक वायब, एक बटुक उत्तर और भीम पटक ऐशान दलको सर्वदा रक्षा करें । स्वाहान्ता चतुःपटि (६४) मातृगण मेरे ऊपर नीचे सन्मुग्व और पचावकी रक्षा करें । सिंह व्याघ्र ।
श्यामारहस्य भा० टी० । व्याघ्रमुखी पूर्वे मां परिरक्षतु ॥ ऐं कां की सर्पमुखी अग्नि कोणे सदाऽवतु । ऐं मां मां मृगमेपमुखी दक्षिणे मां सदा- ऽवतु ॥ ऐं चो चौं गजराजमुखी नात्यां मां सदाऽवतु । ऐं में में विडालमुखी पश्चिमे पातु मां सदा ॥ ऐं खौं खों क्रोष्टुमुखी वायुकोणे सदाऽवतु । ऐं हां हां ह्रस्वदीर्घमुखी लम्बोदरमहोदरी ॥ पातु मामुत्तरे कोणे ऐं ह्रीं ह्रीं शिवको. णके । ह्रस्वजवतालजङ्गप्रलम्बोष्ठी सदाऽवतु ॥ एताः इम शानवासिन्यो भीपणा विकृताननाः । पातु मां सर्वदा दे. व्यः साधकाभीष्ट पूरिकाः ॥ इन्द्रो मां पूर्वतो रक्षेदाग्ने ययामग्निदेवता । दक्षे यमःसदापातु नैर्ऋत्यां नैतिश्चमाम्।। वरुणोऽवतु मां पश्चात् वायुमी वायवेऽवतु। कुवेरश्चोत्तरपायात ऐशान्यान्तु सदाशिवः ॥ ऊर्द्ध ब्रह्मा सदा पातु अधश्चानन्त देवता । पूर्वादिदिस्थिताः पान्तु वज्राद्याश्चायु धाश्च माम् ॥ कालिकाऽवतु शिरसि हृदय । कालिकाऽवतु आधारे कालिका पातु पादयोः कालिकाऽवतु ॥ दिक्षु मां कालिका मुखी मेरे पूर्वदिक सर्प सुमुखी मेरे अग्निकोण, मृग, मेपमुखी मेरे दक्षिण, गजरान मुखी मेरे नैर्ऋतकोण, विडाळामुखी मेरे पश्चिम, क्रोपुखी मेरे बाय कोण, लम्बोदर महोदरी और ह्रस्व दीर्घमुखी मेरी उत्तर और ऐशानकोण एवं इस्व जंघा ताल जंघा और प्रलम्बष्ठी सदा मेरी रक्षा करें । यह सभी श्मशान वासिनी सभी मीपण प्रकृति सभी विकृत मुखी और सभी साधक का अभीष्ट पूर्ण करती हैं। यह सब सदा मरी रक्षा करें । इन्द्र मेरे पूर्व दिक् अग्नि देवता आग्नेयकोण, यम दक्षिणादिक, नैऋतिनतकोण वरुण पश्चिम, वायु वायुकोण, कचेर उत्तरदिर और ऐशानकोण में सदा रक्षा करें ब्रह्मा मेरे ऊर्द्ध अनन्त देवत्ता मेरे अधः और वजादि सम्पूर्ण आयत्र पूर्वादि दिक्में अवस्थिति करके मेरी रक्षा करें । देवी कालिका मेरे मस्तक, हृदय पाद, आधार, समस्त दिशा, विदिशा, नीचे और ऊपर एवं चर्म, मांस, शो.
चतुर्थ परिच्छेद । १४९ पातु विदिक्षु कालिकाऽवतु । ऊर्व मे कालिका पातु अधश्च कालिकाऽवतु चर्मामृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशक्राणि मेऽवतु । इन्द्रियाणि मनश्चैव देहं सिद्धिञ्च मेऽवतु ॥ आकेशात् पादपर्यन्तं कालिका मे सदाऽवतु । वियति कालिका पातु पथि मां कालिकाऽवतु ॥ शयने कालिका पातु सर्वकार्येषु कालिका । पुत्रान् मे कालिका पातु धनं मे पातु कालिका ॥ यत्र मे संशयाविष्टास्ता नश्यन्तु शिवाज्ञया । इतीदं कवचं देवि ! ब्रह्मलोकेऽपि दुर्लभम् ॥ तब प्रीत्या मा ख्यातं गो. पनीय स्वयोनिवत् तर नाम्नि स्मृते देवि ! सर्वयज्ञफलं ल- भेत् ॥ सर्वपापः क्षयं याति वाञ्छा सर्वत्र सिध्यति । नाम्नाः शतगुणं स्तोत्रं ध्यानं तस्मात् शनाधिकम् ॥ तस्मात् शता. धिको मन्त्रः कवचं तच्छताधिकम् । शुचिः समाहितो भूत्वा भक्तिप्रद्धासमन्वितः ॥ संस्थाप्य वामभागेतु शक्तिं स्वामि- . णित, मेद, भस्थि, मन्ना, और शक, एवं सिद्धि मेरे इन्द्रिय और मन की सर्वदा रक्षा करे । देवी कालिका मरे केश से पाद पर्यन्त और मेरी आकाश, पथ, शयन, एवं सब कार्य में रक्षा करें । और मेरे पुत्र और धन की भी इसी प्रकार रक्षा करें ।। जिन के ऊपर मेरा सन्देह है, देवी की आज्ञासे वह सब नष्ट हो । हे देवि ! यही देवी कालिका का कवच है । यह ब्रह्मलोक में भी दुर्लभ है, अपनी योनिकी समान सर्वदा इसको गुप्त रक्खे । केवल तुम्हारी प्रीति के वश होकर ही मैंने इसका वर्णन किया। हे देवि! तुम्हारा नाम स्मरण करनेसेही समस्त यज्ञका फल लाभ होता है, समस्त पातक क्षय होते हैं, सर्वदा सर्वत्र समस्त वांबासिद्धि होती है तुम्हारे नाम की अपेक्षाभी तुम्हारा स्तोत्र शतगुग श्रेष्ठ है और सु- 'म्हारा ध्यान उस स्तोत्र की अपेक्षा भी शतगण श्रेष्ठ है, तुम्हारा मंत्र उस 'ध्यान की अपेक्षा शतगण श्रेष्ठ भावापन और तुम्हारा करच उस मंत्र की अपेक्षा भी शनगग श्रेष्ठ है । शचि, समाहिन और भक्ति श्रद्धा समन्वित हो. " चतुर्थ परिच्छेद । .. स्तस्यैव सर्वत्र वायुतुल्यः सदा भवेत् । दीर्घायुः कामभोगीशो गुरुभक्तः सदा भवेत् ॥ अहो कवचमाहात्म्यं पठमानस्य नि- त्यशः । विनापि नययोगेन योगीशसमतां ब्रजेत्॥भृर्जवचि समालिख्य चक्रं तन्त्रविनिर्मितम् । मध्यत्रिकोणे संलिख्य साध्यसाधकयोर्लिपिम् ॥ उद्धरेन्मूलमन्त्रश्च मातृकार्णेन वे. प्टयेत्। लघुमिश्रेण चन्द्रेण चन्दनाभ्यां सुरेश्वरि!॥ एतन्मन्त्रं महेशानि! सुरासुरसुदुर्लभम्।गोरोचनाकुंङ्कमाभ्यां तद्वाह्ये क- वचंलिखेद ॥ श्वेतसूत्रेण संवेष्टय लाक्षया परिमण्डयेत्। पञ्चा- मृतैः पञ्चगव्यैः स्नापयित्वा शुभेऽहनि ॥ संपूज्य देवतारूपं गुटिकां सर्वकामदाम् । प्राणप्रतिष्ठामन्त्रेण प्राणंतत्र नियोज- येत अन्तोनिं ततो ध्यात्वा तत्र संस्थापयेत् वुधः । एपा तु गुटिका देवि! कण्ठलग्नाऽखिलप्रदा॥शीर्षे वश्यकरी देवि ! नाभौ स्तम्भनकारिणी । वद्ध्वावाम भुजे ह्येषा वैरिपक्षक्ष समान जहां इच्छा हो, वहां जासक्ता है एवं दीर्घायु और गुरुभक्त होता है इच्छानुसार वह समस्त विषय भोग करसक्ता है । अहो इस कवचका माहा- रम्य नित्य पाठ करने से साधक नवयोग के पिनाही योगेश्वर की समान होजाता है । भूर्जत्वको तंत्र विनिर्मित चक्र अंकित और मध्य त्रिकोण को साध्य साधक दोनों की लिपिळेखन पूर्वक मूलमंत्र का उद्धार करके मा- तृका वर्ण में वेष्टित करै । हे सरेश्वरी ! लक्षमिश्र कपूर और द्विविध चंदन तारा यह सुरासर दुर्लभ मंत्र लिखकर उसके बाद्य में गोरोचना और कुंक म द्वारा कवच किखना चाहिये | अनन्तर सफेद डोरसे वेष्टन करके लाता ( लाख ) द्वारा मंडित करै । फिर पंचामृत और पञ्चगव्य में स्नान कराकर शुभदिन में देवता रूपिणी, सकलाभी साधिनी गुटिका की भली सहित प्राण प्रतिष्ठा मंत्र द्वारा उस में प्राण नियोजित करै। फिर अन्तोनिका ध्यान करके, उस में स्थापन करना चाहिये । हे देवि ! यह गुटिका कंठ लग्ना होने से संपूर्ण प्रदान करतीहै । शीर्ष में स्थापित होने से सबका वशीकरण समाधान करती है नाभि में रखने से सबको स्तंभित करती भांति पूजा श्यामारहस्य भा. टी. । यङ्करी ॥ जेठरे रोगदमनी पुत्रदा हृदि संस्थिता । विद्याकरी ललाटस्था सिखायान्तु यशःप्रदा ॥ सर्वकामप्रदा देवी सर्व रोगक्षयङ्करी । दक्षिणे वाहुमूले वै यदि तिष्ठति सर्वदा ॥ तदा सर्वार्थसिद्धिःस्याद् यद्यन्ममनसिवर्त्तते।त्यहात्तुकवचस्यास्य पठनाद्धारणाप्रियासर्वान् कामानवाप्नोति तवस्नेहात् प्रका. शितम् । गुरोःपादप्रसादेन सद्विद्या यदि लभ्यते ॥ तथैव क- वचं देवि । ना जप्त्वा गुरुपादुकाम् । तत्फलं नाशमाप्नोति परे नरकमाप्नुयात् ।। सत्यं सत्यं पुनःसत्यं सत्यं सत्यं पुनः पुनः। न शक्नोमि प्रभावन्तु कवचस्यास्य वर्णितुम् ॥ यस्मै कस्मै न दातव्यं कवचञ्च सुदुर्लभम् । न देयं परशिष्येभ्यः कृपणेभ्यः सुरेश्वरि ॥ शिष्याय भक्तियुक्ताय सेवकाय तथैव च । गुरुभ क्तिविहीनाय परदाररताय च ॥ निन्दकाय कुलीनाय दाम्भि है, वाई भजा में बाधने से विपक्ष पक्षका क्षय कारिणी होती है, जठर में रखने से रोग दमनी होती है, हृदय में स्थित होने से पुत्र दायिनी होती है, ळला. ट में रहने से विद्या मदान करती है शिखामें रखने से यश विधान करतीहै, एवं सर्वरोग क्षय और सब प्रकार की कामना का साधन करती है। और यदि सर्वदा वाहु मूल में रहे तो मन में जो इच्छा करीजाय, वही सर्व अभीष्ट सिद्ध होना है। हे प्रिये ! इस कवचका धारण वा उसके पाठ करने से तीन दिन में ही सब प्रकारकी कामना सफल होती है। मैंने तुम्हारे प्रति स्नेह के वश होकर इसको प्रकाश किया। श्री गुरुके चरण प्रसाद से यदि सदविद्या काम करीजाय, तो इस प्रकार से संपूर्ण मनोरयही सिद्ध होते हैं । हे देवि! इस कवचका जप न करने से निःसंदेह नरक लाभ होता है, मैं यह सत्यही सत्य कहता हूं, और पुनरि सत्यही सत्य कहता हूं। इस कवचका प्रभाव वर्णन करने में मेरी सामर्थ नहीं है। यह अत्यन्त दुर्लभ है । जिस किसी को इसका प्रदान न करे। हेमरेश्वरी ! पराये शिष्प और कपणादिको भी इसका प्रदान न करै । भक्तियुक्त शिष्प और सेवकको हो यह देना चाहिये । जो व्यकि भक्ति हीन परदार रत, निन्दक, दाम्मिक, और अकुलीन है, उसको दान करना ।
पतुर्य परिच्छेद । काय च सुन्दरि। यो ददाति निषिद्धेभ्यः कवचं मम्मुखात् श्रुतम् ॥ तस्य नश्यन्ति देवेशि ! आयुः कीर्तियशःश्रियः। न हिंसन्ति सदा देवि ! योगिन्यो मातृमण्डलात् ॥ परे नर- कमाप्नोति जन्मकोटिशतानि च । देयं शिष्याय शान्ताय गु- रुभक्तिपराय च ॥ सर्वलक्षणयुक्ताय तत्तन्मन्त्रयुताय च ॥ इत्युत्तरतन्त्रे कालीप्रस्तावे कालीभैरवसंवादे श्रीमदक्षिणकालिकाकवचं सम्पूर्णम् । विरूपाक्ष उवाच । नमामि गुरुमक्षोभ्यं मंतशक्तिसमन्वितम् ।.प्रसन्नं ज्ञान- मज्ञानं हेतुं बुद्धिप्रकाशकम् ॥ गजेंद्रवदनं नौमि रक्तं विघ्न विदारकम् । पाशांकुशवराभीति लसद्भुजचतुष्टयम् ॥ भैरवः सर्वदा पातु ऋपिर्मे शिरसोपरि । मुखे छन्दः सदा पातु त्रि. ष्टुप् च विजयात्मकम् ॥ गुणत्रयमयी शक्तिः परशक्तिस्तु ईड़िता । ब्रह्मवरूपिणी पातु हृदयै मम कालिका ॥ वीज- विहित नहीं है । जो व्यक्ति मेरे गुषसे इसको सुनकर इस प्रकार निपिद्ध व्यक्तिगण को इसका प्रदान करता है, हे देवोश ! उसकी आयु, कीर्ति, यश, और श्री संपूर्ण नष्ट होती है मरने के पीछे उसको शतशत कोटि जन्म में नरक काम होता है । शान्तस्वभाव, गुरुभक्ति परायण सर्वलक्षण लक्षित और तत्तत् मंत्र युक्त शिष्यकोही इसका मदान करे। विरूपाक्षने कहा, निनको किसी प्रकार विकार वा अवसाद ( आलस्य) नहीं है, जो मंत्रशक्ति युक्त हैं जो युद्धिको प्रणयन करते हैं और जो सब के कारण स्वरूप हैं, उन्हीं प्रसन्न स्वरूप मागमूर्ति गुरुको नमस्कार । जो गजे- न्द्र वदन, रक्तवर्ण और विघ्नविनाशन एवं पाश, अंकुश, चर, और अगय के संसर्ग से जिनकी चारों भुना भलीभांति शोभायुक्त हुई है, उन्हीं गणप- तिको प्रणाम करता हूं। भैरवऋपि सर्वदा मेरे गस्तककोपरि रक्षा करें। विजयात्मक दृष्ट्रपछंद सदा मेरे मुख मण्डल की रक्षा करै । जो तिगुणमयी शक्ति स्वरूप, और जो सब की पूनिता साक्षात् परमशक्ति है, यह ब्रह्म २० श्यामारहस्य भा०टी०। स्वरूपिणी पातु क्रीङ्कारी शक्तिरूपिणी । हूं शक्तिः सर्वदा पातु सर्वरक्षास्वरूपिणी ।। महाकालः सदा पातु महाभीम पराक्रमः। ददातु मम कामानि सर्वसिद्धीश्वरो यतः॥ आदि लुवर्णपर्यन्ताः हृदये मममातृकाः। एघान्ते डादि चान्ताच रक्षन्तु बाहुयुग्मके ॥ नभामध्यगता वर्णा मादिक्षान्तास्तथैव च । सविन्दवः सदा पान्तु जङ्घयोरुभयोर्मम ॥ भूतप्रेतपि- शाचाद्या विघ्नदेहास्तथा पुनः। पृथग्भावाः समध्याश्र वर्णा रक्षन्तु मां सदा ॥ समस्तरोमकूपेषु मर्मस्थानेषु सन्धिषु । नाड़ीधातुविकारेषु रक्षन्तु मम मातृकाः ॥ शक्तिराधाररूपा या सा पातु परमेश्वरी । अवर्णः सर्वदा पातु सर्व देवमयः स्वयम् ॥ फणागताऽवनिः पातु समुद्रः पातु मां सदा । रत्न द्वीपः सदापातु रक्षन्तु कल्पपादपाः ॥ श्मशानपीठकः पातु पातुमा मानवेदिका ।सदाशिव महाप्रेत शवो मां परिरक्षतु ॥ स्वरूपिणी कालिका मेरे हृदय देशकी रक्षा करें । जो वीनस्वरूपिणी, वा शक्ति स्वरूपिणी क्रीवारी मेरी रक्षा करें । सर्वरक्षा स्वरूपिणी हुं शक्ति सर्वदा मेरी रक्षा करे । महाभीम पराक्रम महाकालभी सर्वदा मेरी रक्षा करे। वह संपूर्ण सिदिके अधिनायक हैं । अतएव मेरी संपूर्ण कामना पूर्ण हैं। 'अ' से ल पर्यन मातृका गण मेरे हृदय 'ए' से 'घ, पर्यंत और "क, से पर्यंत मातृका गण मेरी दोनों बाहु, आकाश मध्यगत समस्त वर्ण और 'भ, से 'क्ष, पर्यंत सव मातृका गण विन्दुके सहित सर्वदा मेरे दोनों जंघा की रता करें । भूत, प्रेत और पिशाचादि, समस्त विघ्न देह और समंध्यपर्ण समूह सदा मेरी रक्षा करें । मातृका गण मेरे समस्त रोमकूप ( रंगों के ग8) समस्त मर्म स्थान, समस्त सन्धिस्थल, समस्त नाड़ी और धान की रक्षा करें । जो आधाररूपी शक्ति हैं, वह परमेश्वरी मेरी रक्षा करे ! सपं सर्वदेवमय भवर्ण सदा मेरी रक्षा करे । कणस्थिता, भवनि, समुद्र, रल द्वीप, कल्प, पादप समूह, रमशान पीठ, मानदि सदा शिर और महाप्रेत १५५ चतुर्थ परिच्छेद। द्वारदेशे द्वारपाला योगिन्यः पान्तु मां सदा । सिद्धयोऽष्टी सदा पान्तु पूदिवसुदिग्गताः ॥ काली कपालिनी कुल्लां कु- रुकुल्लां तथैवच । विरोधिनी विप्रचित्तां नमामि सर्वसिद्धये ॥ एतास्तु वशयोगिन्यो वहिः पट्कोणकेस्थिताः। रक्षन्तु मां सदा देव्यो मातरो भक्तवत्सलाः॥ उग्रामुग्रप्रभां दीप्तां न. माम्यात्मविभूतये । सर्वसिद्धिं प्रयच्छन्तु पान्तु मां पुत्रवत् सदा ॥ नीलां घनां वलाकांच प्रणमामि समुत्सुकः । सर्ववि- धनान् समुत्सायं रक्षन्तु कलुषार्णवात् ॥ मात्रामुद्रामितानां च नमामि चरणाम्बुजम् । देवीप्रेम सखीनांच शरणं यामि सिद्धये ॥ एताः पंचदशे कोणे एकैका वरदा सदा। तर्जनी वामहस्तेन खड्गं दक्षिणपाणिना ॥ मुण्डमाला धराः शीर्षे अब यह सर्वदा मेरी रक्षा करें । द्वारदेश में द्वारपाल और योगिनी गण एवं पूर्वादि अष्टदिक स्थित अष्ट विष सिद्धि सदा मेरी रक्षा करै । मैं सर्व विध सिदि साधनकी कामना से काली कपालिनी, कुल्ला कुरु कुल्ला, विरो- धिनी विप्रचित्ता इनको नमस्कार करता हूं | यह छै वश योगिनी बाहर के पदकोण में सदा अवस्थिति करती हैं । यह सभीभक्त वत्सला, सभी देवी और सभी जगत की जननी स्वरूप हैं । यह सर्वदा मेरी रक्षा करें। मैं आ- स्म विभूति के लिये उग्रा उग्रप्रभा और दोसा, इनको भी प्रणाम करता हूं। यह मुझको सर्वविधि सिद्ध प्रदान और पुत्रकी समान सदा पालन करें । में उत्सुक हृदय से नीला, घना, और वलाका इनकोभी प्रणाम करता हूं। यह मेरे संपूर्ण विघ्न दूर करके मुझको कन्नुप सागर ( पाप समुद्र ) से पार करें । मैं मात्रा, पुद्रा और मिता, इनके चरण कमलों में भी प्रणत होता हूं। या सभी देवी की प्रेम सखी हैं । सिदिळाम होने की वासना से इनकी शर- ण ग्रहण करता हूं। यह प्रत्येक वरदा और पंचदश कोण में एक एक क्रमसे स्थिति करती है। इनके वाम हस्तमें तर्जनी औ दक्षिण हाथ में खड्ग है । और मस्तक में मुण्डमाला है। यह सभी नीले अंजन के ढेरकी समान, सभी १५६ श्यामारहस्य भा० टी०। नीलाञ्जनचयोपमाः । शत्रुभ्यः सिद्धिदाश्चण्डाः पान्तु मां कालिका प्रियाः॥ वहिःपद्मदलान्ते तु ब्रह्माण्याद्यष्टशक्तयः। रक्षन्तु मे प्रयच्छन्तु सर्वसिद्धिं दयान्विताम् ॥ ब्रह्माणी पातु मां पूर्वे सर्वाः शिववरप्रदाः । वहो नारायणी पातु सर्व का- मार्थ सिद्धिदा ! माहेशी दक्षिणे पातु सर्व मङ्गलकारिणी। चामुण्डा नेते पातु सर्वशत्रुप्रमर्दिनी ॥ कौमारी पश्चिमे पातु शक्तिहस्ता विसूदिनी। अपराजिता च वायव्या पातु मां जयदा शुभा ॥ उत्तरे पातु वाराही वरदा घोररूपिणी ना. रसिंही सदापातु ऐशान्यां भयनाशिनी।एतास्तु वरविद्यायाः शक्तयश्चाष्ट देवताः। ब्रह्मविष्णुशिवादीनां तेजोभिन्नकलेवरा॥ सूर्य्यन्दुवह्निपीठे तु वैन्दवे परमेश्वरी । नमामि दक्षिणामूर्ति कालिकां परभैरवीम् ।। भिन्नाजनचयप्रख्यां प्रवीनशव सं. स्थिताम् । गलच्छोणितधाराभिः स्मेराननसरोरुहाम् ॥ पी. कालिकांकी प्रिय, और सभी प्रचंड प्रकृति, और सभी शत्रु गणों को भी .सिद्धि प्रदान करती हैं । यह मेरी रक्षा करें। बाहरके पद्मदलांत में ब्रह्माणी इत्यादि अष्टशक्ति दयायुक्त होकर मेरी रक्षा और सर्वविधि सिद्धि प्रदान करै । शिव परप्रदा ब्रह्माणी मेरे पूर्वदिक, सर्व कामार्य सिद्धिदा नारायणी आग्नेय कोण सर्व मंगल कारिणी माहेशी मेरे दक्षिण दिक, सर्व शत्रु मदिनी चामुण्डा मेरी नैनत कोण शक्तिहस्ता कौमारी मेरी पश्चिम दिक, जयदा और शुभ स्वरूपा अपराजिता मेरी वायुकोण, घोररूपिणी घरदा वाराही मेरी उत्तर दिक और भय नाशिनी नारायणी मेरी ईशान कोण में सदा रक्षा करें। यह परविद्या रूपिणी कालिकाकी अष्टशक्ति है और ब्रह्मा, वि. प्णु एवं शिवादि के तेजसे उत्पन्न हुई हैं। स्वयं परमेश्वरी कालिका विन्दुमय सूयेन्दु पनिपीठ में स्थिति करती है। उन्होंपर भैरवी दक्षिणा मूर्ति को नमस्कार करता हूं। वह काळे भजन के देरकी सदृश प्रवीण शब्द के कार अवस्पिनि करती हैं। विगलित शो.
चतुर्थ परिच्छेद । नोन्नतकुचद्वन्द्वां पीनवक्षोनितम्बिनीम् । दक्षिणे मुक्तकेशां च दिगम्बरविनोदिनीम् ॥ महाकालसमाविष्टां स्मेरानन्दो- परि स्थिताम् । सुखसान्दस्मितामोदमोदिनी मदविह्वलाम् ॥ आरक्तसुखसान्द्रादिनेत्रालीभिर्विराजिताम् । शवद्वयकृतो. त्तंसां सिन्दूर तिलकोज्ज्वलाम् ॥ पञ्चाशन्मूर्तिघटितमालां शोणितलोहिताम् । नानामणिविशोभाढ्यां नानालङ्कारशो- भिताम् ॥ शवास्थिकृतकेयूरशसकङ्कणमाण्डिताम् । शववक्षः समारूढां लेलिहानां शवं क्वचित् ॥ शवमांसकृतमासां सा- दृहासां मुहर्मुहुः। खङ्गमुण्डधरां वामे सव्येऽभयवरप्रदाम् ॥ दन्तुराञ्च महारौद्री चण्डनादातिभीपणाम् । शिवाभि?- णित धारा के संसर्ग से उनका मुखकमळ विकसित होगया है। उनकेदोनों पयोधर पीनोन्नत हैं, उनका वक्षस्थल और नितन्त्र पीवर ( मोटे) भाव युक्त है । वह दक्षिण विगलित केश पाश में दिगम्बर के सग विहार क- रती हैं । और महाकाल के सहित सर्वदाही परमानंद रसभोग में आसक्त रहती है। मुखकी मौढता से वह जिस प्रकार स्मित मुखी हैं, इसी प्रकार आनंद मोहनी और मद विह्वला हुई हैं, और उनके लोचन परम्परा भी इसीमकार सुखको प्रौढता से रक्तवर्ण और निधन उनकी अतीव शोभा उत्पन्न हुई है । उनके कर्णमूळ शव युगल के भूपण से अलंकृत हैं । उ- न्होने सिन्दूर तिलक के संसर्ग से अत्यन्त विकस्वर मत्तिं धारण करी है । उनके हाथ में पञ्चाशत ( पचास ) मूर्ति निर्मित माला विराजमान है। उन के कळेवर ने शोणित ( रुधिर ) के संसर्ग से लोहित ( लाल ) वर्ण धारण किया है ! अनेक मणियों की निकटता से उनकी शोभाकी सीमा नहीं है । अनेक अलंकार पहरने से उनको शोभा समुद्भूत हुई है। वह शवास्थि निर्मित केयूर, कंकण और शंख में विमण्डित और शव हृदयं में आरोहण करके कभी शवलेहन ( पुरदे का चाटना ) और कभी शव मांस ग्रास एवं वारम्बार अट्टहास करती हैं । उनके वामहस्त में खड्ग और मुण्ट, एवं दक्षिणहस्त में अभय और वरमुद्रा है । उनकी दाढ़ें अ- श्यामारहस्य भा०टी० । ररावाभिवेष्टितां भयनाशिनीम् ॥ माभैर्माभैः स्वभक्तेषु ज- ल्पन्तीं घोरनिखने।यूयं किमिच्छथब्रूथ ददामीतिप्रभाषिणीम् त्वं गतिः शरणं देवि ! त्वं माता परमेश्वरी !! पाहि मां करुणासान्द्रे ! नमस्ते परमेश्वरी ! ॥ नमस्ते कालिके ! दे. वि ! नमस्ते भक्तवत्सले ! । मूर्खतां हर मे देवि ! प्रति भाप्रतिदायिके ! ॥ गद्यपद्यमयी वाणी तर्कव्याकरणादि. काम् । अनधीतगतां विद्यां देहि दक्षिणकालिके ! ॥ जयं देहि सभामध्ये धनं देहि धनागमे । देहि मे चिरजीवित्वं कालिके ! रक्ष दक्षिणे ! ॥ राज्यं देहि यशो देहि पुलान् दारान् धनं तथा । देहान्ते देहि मे मुक्तिं जगन्मात ! नं. त्यन्त तीक्ष्ण स्वभाव और दृश्य अत्यन्त प्रचंद, और नाद अत्यन्त भयंकर है। तिनके द्वारा उन्होंने अत्यन्त भीषणमूर्ति परिग्रह करी है। समस्त शि- वागण घोर शब्द से उनको घेरकर विचरण करती हैं। वह सबकाही भप विनाश करती है और घोर निस्वनसे भक्तगणोंको 'भय नहीं यह वारंवार कहकर आश्वस्त (धीरज बँधाना ) करती हैं और कहती तुम क्याइच्छा करती हो, सो कहो, मैं वही प्रदान करूंगी । हे देवि ! तुम्ही गवि तुमी शरण, तुम्ही परमेश्वरी और तुम्ही जननी हो । अधिक क्या, तम सदाही करुणारस में आई रहती हो । मेरी रक्षा करो। हे परमेश्वरी ! तुमको न- मस्कार है । तुम्ही देवी कालिका हो, तुमको नमस्कार है । तुम्ही भकास का हो. तुमको नमस्कार है । हे देवि ! मेरी मूर्खता परण करो । तुम सा को प्रतिमा ( प्रताप ) प्रदान करती हो । तुम्ही दक्षिण कालिका हो मुझको गद्यपद्यमपी तर्क पाकर्णादि की वाणी और अनपातगवा विद्या (जो नही पदी है ) प्रदान करो । मुझको सभा में नप प्रदान करो। धनमदान करो और चिरजीवित्व प्रदान करो । हे दक्षिणकाग्नि मेरी रक्षा करो। नुम्मी जगत्की माता हो, तुमको नमस्कार है । तुम मम को राज्य, पत्र, पुत्र, कात्र और विषपदान करो । और दोके अन्त में नागम ।
चतुर्थ परिच्छेद । मोऽस्तु ते ॥ मङ्गला भैरवी दुर्गा कालिका त्रिदशेश्वरी । उमा हेमवती कन्या कल्याणी भैरवेश्वरी ॥ काली ब्राह्मी च माहेशी कौमारी माधुसूदनी । वाराही वासनी चण्डा स्वां जगुर्मुनयो मुदा ॥ उग्रतारेति तारोति शिवेत्येकजटेति च । लोकोत्तरेति बालेति गीयते कृतिभिः सदा ॥ यथा का. ली तथा तारा तथा छिन्ना च कुल्लुका । एकमूर्तिश्चतुर्भिश्च देवि ! त्वं कालिकापरा ॥ एकद्वित्रिविधा देवि ! कोटिधा- ऽनन्तरूपिणी । अङ्गानाकर्नामभेदैः कालिकति प्रगीयते ॥ शम्भुः पञ्चमुखेनैव गुणान् वक्तुं क्षमो न ते । चापलं यत् कृतं सर्व क्षमस्व शुभदा भव ॥ प्राणान् रक्ष यशो रक्ष पुत्र. दारधनं तथा । सर्वकाले सर्वदेशे पाहि दक्षिणकालिके ! ॥ यः संपूज्य पठेद्रक्षां दिवा वा सन्ध्ययोस्तथा । अवाप्य म- मुक्ति प्रदान करो । मुनिगण आहलाद सहित तुमकोही मंगळा, भैरवी, दुर्गा कालिका, त्रिदशेश्वरी, उमा ,ईमवती, कन्या, कल्याणी, भैरवेश्वरी, काली ब्राह्मी, महेशी, कौमारी, मधुसूदनी, वाराही, वासी, और चण्डा कहते हैं। और कृतिगण तुमकोही उग्रतारा, तारा, शिवा, एकजटा, लोकोत्तरा, और वाला कहकर स्तव करते हैं जो काली हैं, वही तारा वही चिन्ना, और वही कुन्ला है। हे देवि ! तुम्ही इन चारों में एक मति कालिका हो। तुम्हारी भ. पेक्षा श्रेष्ठ वा विशिष्ठ अन्य कोई नहीं है और कोई भी तुम से भिन्न नहीं है। सब तुम्ही हो । तुमही एक द्वित्रिविधा एवं तुम्ही काटिषा भौर अनन्तरू- पिणी हो । तुम्ही अङ्गान और नाम भेदसे काळिका कहकर गाईजाती हो शभु पंच मुखसे भी तुम्हारे गुण वर्णन करने मे सपर्य नहींहैं। अतएव मैंने जो चलता करी है उसको अपने गुणसे क्षमा करके शुभदा होगी और मेरे प्राण की रक्षा करो। यशकी रक्षा करो। स्त्री पुत्र औ धन की रक्षा करो। हे दक्षिण कालिके ! मेरी सर्वकाळ और सर्वदेश में रक्षा करो। जो व्यक्ति भलीभांति पूना करके दिवा वा संध्या समय यह रक्षा पाठ करता ११० श्यामारहस्य भा०टी० । हती प्रज्ञां सर्वकामांस्ततो लभेत् ॥ यद्यद् प्रार्थयते चित्त तत्तदाप्नोति का कथा । स्वयं लक्ष्मीर्वसेदेहे मुक्तिः करगता पुनः॥ इति रुद्रयामले उत्तरतन्त्रे दक्षिणकालिका कवच समाप्तम् । अथ स्तोत्रम् । महाकालभैरव उवाच । - स्तवराजं शृणु राम ! सर्वकालमनोहरम् । यस्य स्मरण मात्रेण कालिका संप्रसीदति यद्भक्तस्त्वं यदेवास भृगुवंश- समुद्भव!। गोपनीयं प्रयत्नेन पठनीयं परात्परम् ॥ कालिस्तो- त्रं मम प्रेयः कस्मैचिन्न प्रकाशितम् । कथ्यते त्वदनुरोधात सर्वपापप्रणाशननम् ॥ शृणु राम ! शृणु राम ! शृणु राम ! है, वह महती प्रज्ञा (वृद्धि ) लाम करके सब प्रकार की कामनाके पारको माप्त होता है और मन में जो प्रार्थना करता है, वही उसको प्राप्त होती है। इस विषय में और बात क्या है ? स्वयं लक्ष्मी उसके देह में वास करती है और मुक्ति भी उसके कर गामिनी होती है। अनन्तर स्तोत्र लिखाजाता है। यथा--- महाकाल भैरव ने कहा, स्तवराज श्रवण करो। यह सर्वकालमें ही मन हरण करता है । इसके केवल स्मरणमात्रसे ही देवी कालिका परम प्रसन्न होती हैं । तिसपरभी तुम भक्त हो और तुम ने भृगुवंश में जन्म ग्रहण किया है, इस कारण तुम्हारे प्रति इसको कहता हूं । यह परात्पर स्तवराज अति यत्नपूर्वक गुप्त रक्खै और पाठ करें। यह काली स्तोत्र मेरा परम प्रियतर है। इस कारण किसी के भी निकट इस का प्रकाश नहीं किया है । केवल तुम्हारे अनुरोधसेही इसको कहताइ । इस का पाठ करने से समस्त पाप दूर होते है । हे राम ! श्रवण कगे,श्रवण करो, श्रवण करो । सदा गुप्त रक्खे, गुप्त रक्खे, गुप्त रक्खे । गणरात्र में शक्ति के सहित नग वेश और मुक्तकेश होकर लाल चंदन, सिन्दूर, पंचविध उपचार विशेषतः मत्स्य, माम और मुरादि व ताम्मूल प्रदान करनेके पीछे महाकाळ रतातरा महाकाली की पूजा करके प्रथम तीर्थपान विधान, फिर तामूळ हे राम!
चतुर्थ परिच्छेद । सदैव हि । गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं न संशयः ॥गणरात्रे मुक्तकेशो नमः शक्तिसुसङ्गतः। रक्तचन्दन सिंदूरैस्तथा पं. चोपचारकैः ॥ मत्स्यमांससुराद्यैश्च ताम्बूलैश्च विशेषतः । पूजयित्वा महाकाली महाकालरतातुराम् ॥ तीर्थपानं विधा. यादौ ताम्बूलं भक्षयेत्ततः । भगलिंगामृतं मध्ये निवेदयेत् सुसाधकः । जपित्वा च महामंत्रं कालीरूपं मनोहरम् । मन- सा चिंतयेत्कालीं पठन् स्तोत्रंतु साधकः ॥ रक्षोयक्षपिशाचे. भ्यो नित्यं रक्षाकरं परम् । प्रसन्ना कालिका तस्य पुत्रत्वे- नानुकम्पते ॥ दक्षिणे कालिके ! मातर्मुण्डमालाविभूषिते ।। भक्तत्राणव्यग्रचित्ते ! यमजाड्यं विनाशय ॥ ज्वलच्चिता- ग्निमध्यस्थे । परिवारसमन्विते ! । त्वत्पदाम्भोजमापन्नं रक्ष मां पुत्रवत् सदा ॥ महामेघच्छविन्यासे ! मुक्तकेशि ! चतुर्भुजे!। पाण्डित्यं कविताश्चैव मह्यं देहि महेश्वरि ! ॥ चामोर्श्वे च महाखङ्ग विधारयसि शङ्करि ! । अधोलस- च्छिन्नमुण्डे ! मम विघ्नं विनाशय ॥ अभय दक्षिणे चोर्वे भक्षण और मध्यमें भग लिङ्गामृत निवेदन करें । फिर कालीरूप मनोहर महा मंत्र जपकर स्तोत्र पाठ सहित मन मन में देवी कालिका की चिंता करे। उस की यत, राक्षस और पिशाचसे यह स्तव नित्य रक्षा करता है । इसका पाठ करके ध्यान करनेसे देवी कालिका साधकको पुत्र भाव से अनुकम्पित कर ती है और उसके प्रति प्रसन्न होती हैं । इस प्रकार उनका स्तव करना चा- हिये । हे दक्षिण कालिके । हे मातः ! हे मुण्डमाला विभूपिते ! हे भक्तत्रा- णव्यग्रचित्ते ! मेरी यम यंत्रणा विनाश करो। हे प्रज्वलित चिताग्नि मध्यस्थे! हे परिवार समन्विते ! मैं तुम्हारे चरणारविन्द की शरण हुआ हूं, मेरी सर्व- दा पुत्रकी समान रक्षा करो । हे महामेघ स्वरूपिणी । हे मुक्तकेशि! हे च- तुर्भुजे ! हे महेश्वरि ! मुझको पाण्डित्य और कवित्व प्रदान करो। शंकर ! तुम बामोर्द्ध में महा खड्ग धारण करती हो । उसके अधोभाग में चिन्न मु- श्यामारहस्य भा० टी० । तथाधःपाणिना वरम् । कण्ठसंसक्त मुण्डालि ! महा कालि ! नमोऽस्तु ते ॥ सततं त्वत्स्वरूपं ये स्मरन्ति साध कोत्तमाः । तेषां समस्तशास्त्रेषु गतिरव्याहता सदा ।। चि. न्तयामि च स्वन्नाम रक्ष मां सर्वतः सदा । दिगम्बरी करा. लास्यां घोरदंष्ट्रां भयानकाम् ॥ कर्णमूले शवयुग्मां स्थूलतुः इपयोधराम महारौद्री महाघोरां श्मशानालयवासिनीम् श. वपाणिसमूहैश्च कृतकाञ्ची हसन्मुखीम् । पोष्ठप्रान्तगलव- क्तधाराविस्फुरिताननाम् ॥ मुण्डालीसंस्रवद्रक्तैः सर्वाङ्गे चारुचर्चिताम् ।शिवाभि|ररावाभिश्चतुर्दिक्षुसमन्विताम्॥ पूजाकाले पठेद् यस्तु सद्भावपुलको बुधः । स भवेत् का. लिकापुत्र इति ख्यातिमुपागतः॥ रजस्वलाभगं पश्यन् जत्रा एड विलसित होता है । मेरे विघ्न विनाश करो। तुम्हारे दक्षिण हस्तके ऊद में अभय और उसके अधोभाग में वर विराजमान है । तुम्हारे कंठदेश में मुण्डमाला लम्बायमान है। तुम्ही महाकाली हो । तुपको नमस्कार है । जो साधकोत्तम सदा तुम्हारे स्वरूप को चिन्ता करते हैं, उनकी समस्त शास्त्र में ही सर्वदा अव्याहतगति सञ्चारित होती है । इसीलिये । मैं घुम्हारे नामकी चिन्ता करता है । मेरी सम्पर प्रकार से सदा रक्षा करो। तुम्ही दिगमरी तुम्ही कराल वदना और घोर दशना हो । तुम्ही अत्यन्त भीपण स्वरूप हो। तुम्हारे कर्ण में शव युग्म विराजमान है । तुम्हीं पीनोन्नत पयोधरा हो। तुमी महारौद्री और महाघोरा हो ! तुम्ही मशानालय निवासिनी हो । तुम्हारे कटिदेश में शव पाणि समूह निर्मित काञ्चीदाम शोभापाता है। तुम्हारा वदन मण्डल सर्वदा हास्य विकसित है। तुम्हारे होठ प्रान्त से रुधिर धारा निक कती है, तिससे तुम्हारा बदन मण्डल विकसित होउठा है । तुम्हारा साज शर मुएड से विगलित रुधिर धारा में चारु चर्धिन है । शिवागण तुमको चा. रों ओर से घेरकर घोर रचसे शब्द करती हैं। जो व्यकि पूना के समय सः द्भावके गावेश से पुलकित होकर इस स्तबका पाठ करता है, वह कालिका के पुत्र नाम से विम्मान होता है जिम्मलाका राष्ट्र देख, मालीका महामंत्र चतुर्थ परिच्छेद । कालीमहामनुम् । स्तवेनानेन संस्तुत्य साधकः किं न साध- येत् ॥ अष्टोत्तरशतंजप्त्वा योनिमामंत्र्य मंत्रवित् ॥ संगम्य पठनादस्य सर्वविद्येश्वरो भवेत् । मातेव दक्षिणा तस्य सर्वत्र हितकारिणी। तस्य देहे सदा काली वसेद्राम ! न संशयः॥ पूजाजपविहीनाय स्त्रीसुरानिंदकाय च । षण्मार्गस्य रोधका य गुर्वभक्ताय सर्वदा । शृणु वत्स ! प्रयत्नेन स्तवमेन न दर्श- येत् । प्रमादादर्शनाद्वापि तस्यसिद्धिर्भवेन्न हि ।। । इति कालिकापरमरहस्ये कालीहृदये महाकालभैरवपरशु- रामसंवादे श्रीदक्षिणकालिकास्तवः समाप्तः । तन्त्रान्तरोक्तकवचम् यथा-भैरव उवाच । .' कालिका या महाविद्या कथिता भुवि दुर्लभा । तथापि हृदये शल्यमस्ति देवि ! कृपां कुरु ॥ कवचन्तु महादेवि ! , कथयस्वानुकम्पया । यदि नो कथ्यते मातर्विमुञ्चामि तदा तनुम् ॥ जप करताहुआ इस स्तव द्वारा स्तव करने से साधकका क्या साधित नहीं होता ? मंत्रविद साधक अष्टोत्तर शत जप और योनि आमंत्रण करके, इस स्तवका पाठ करने से समस्त विद्याका ईश्वर होता है । दक्षिण कालिका जन- नी की समान सर्वदाही उसके हितका अनुष्ठानकरतीहैं । हे राम ! उसके देह में वह सदा वास करती हैं, इस विषय में संदेह नहीं है। जो व्यक्ति पूजा मही करता नप नहीं करता घरन स्त्री और मुराकी निन्दा करता है एवं गुरुके प्रति भक्तिरहित और सन्मार्ग के वहित है । हे वत्स ! सुनो, उसको कभी इस मंत्रका उपदेश न करै । प्रमाद के वश उपदेश करनेसे कभी सिद्धि लाम नहीं होती। सन्त्रान्तरोक्त कवच यया -भैरवने कहा, हे देवि ! यद्यपि तुम ने कालि का का पृथ्वी दुर्लभ महामंत्र कीर्तन किया, परन्तु तो भी मेरे हृदय में काटा गदाहुवा है अतएव कृपा करनी चाहिये । हे पहादेवि ! अनुग्रह पूर्वक कब- च कीर्तन करो। हे मातः यदि आप कीर्तन न करेंगी, तो कलेवर परित्याग करूंगा। T मे श्यामारहस्य भा० टी० । देव्युवाच । शङ्कापि जायते वत्स ! तब स्नेहात् प्रकाश्यते । 'नव- क्तव्यं न दातव्यमतिगुह्यतरं महत् ॥ कालिका जगतां मा- ता शोकदुःखविनाशिनी । विशेषतः कलियुगे महापातकहा- रिणी ॥ काली मे पुरतः पातु पृष्ठतश्च कपालिनीं । कुल्ला दक्षिणे पातु कुरुकुल्ला तथोत्तरे ॥ विरोधिनी शिरः पातु प्रचित्ता च चक्षुपी । उग्रा में नासिकां पातु कौँ चोग्रप्रभा तथा ॥ वदनं पातु मे दीप्ता नीला च चिबुकं तथा । घना ग्रीवां सदा पातु वलाका वाहुयुग्मकम् ॥ मात्रा पातु करद्वन्द्वं व क्ष्यो मुद्रा सदावतु । मिता पातु स्तनद्वन्द्व योनिमण्डलदे- वताः ॥ ब्राह्मी मे जठरं पातु नाभिं नारायणी तथा । ऊरू माहेश्वरी पातु चामुण्डा पातु लिङ्गकम् ॥ कौमारी च कटी पातु जतायुग्मं तथैव च । अपराजिता च पादौ मे वाराही वि- देवीने कहा, हे वत्स ! यद्यपि मुझको शका उत्पन्न होती है. किन्तु तो भी तुम्हारे प्रति स्नेह प्रयुक्त होने से प्रकाश करती हूं । यह अति गुह्यतर महाकवच किसी के निकट नहीं कहना चाहिये और किसीको इसका प्रदान भी न करै । कालिका जगत् की जननी और शाक दुख विनाशिनी हैं । विशेष करके कलियुग में महापातक हारिनी हैं । काली मेरी सन्मुख रक्षा करें, कपालिनी मेरे पृष्ठ कुल्ला, मेरे दक्षिण कुरुकुल्ला मेरे उत्तर, विरोधिनी मेरे मस्तक, चिपचित्ता मेरे नेत्र युगल, उमा मेरी नासिका, उग्रप्रभा मेरे कर्ण युगल, दीप्ता मेरे वदन मण्डल, नीला मेरी चिनुक, पना मेरी ग्रीवा, बलाका मेरी वाहुयुग्म, मात्राकर युगल, मुद्रावतस्थल और मितास्तन युगकी स- र्वदा रक्षा करें । ब्राह्मी मेरे जठर, नारायणी नाभि, माहेश्वरी दोनों ऊरू चामुण्डा लिंग, कौमारी कटि, और दोनों नंया, अपराजिता दोनों पैर, वाराही समस्त अंगली और नारसिंही संधि स्थलकी रक्षा करें । मेरा को चतुर्थ परिच्छेद । १६५ पातु चांगुलीः ॥ सन्धिस्थानं नारसिंही पत्रस्था देवताऽव- तु । रक्षाहीनञ्च यत् स्थानं वर्जितं कवचेन तु ॥ तत् सर्व रक्ष मे देवि ! कालिके घोरदक्षिणे !। ऊर्ध्वमधस्तथा दिक्षु पातु देवी स्वयं वपुः ॥ हिंस्रेभ्यः सर्वदा पातु साधकञ्च ज. लाधिकात् । दक्षिणा कालिका देवी व्यापकं मे सदावतु ॥ इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेद्घोरदक्षिणाम् । न पूजाफल- माप्नोति विघ्नस्तस्य पदे पदे ॥ कवचेनावृतो नित्यं यत्र त. त्रैव गच्छति । तत्र तत्राभयं तस्य न क्षोभं विद्यते क्वचित् ॥ इति दक्षिणकालिकाकवचं समाप्तम् । अथ सहस्रनामस्तोत्रम् यथा-श्रीशिव उवाच । कथितोऽयं महामन्त्रः सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः । यामासाद्य मया प्राप्तमैश्वर्यपदमुत्तमम् ॥ संयुक्तः परया भक्तथा य. थोक्तविधिना भवान् । कुरुतामर्चनं देव्यास्त्रैलोक्यविजि. गीषया । स्थान रताहीन और कवच वर्जित है, घोर दक्षिणा देवी कालिका उन स- मस्त स्थानकी रक्षा करै । देवी स्वयं ऊपर नीचे और समस्त दिशाओं में हिंस्रगण और जल से मेरे कळेवर की रक्षा करें । देवी दक्षिण कालका सर्वदा व्यापक भाव से मेरी रक्षा करें । जो व्यक्ति इस कवचको न जान- कर, घोर दक्षिणा की भंजना करता है, उसको पूना के फलकी प्राप्ति नहीं होती, और पद २ में विघ्न उपस्थित होता है । नित्य इस कवच में आवृत होकर जिस किसी स्थान में गमन क्यों न कियाजाय, सर्वत्रही अभय लाभ होता है, कहीं भी क्षोभ उपस्थित नहीं होता। ॥ इतिदक्षिणकालिकाकाकाचसमाप्त ॥ अब देवी कालिका का सहस्रनाम स्तोत्र लिखाजाता है। श्री शिव ने कहा कालिका का यह सर्वमन्त्रोचमोत्तम महामंत्र कथित हुआ है । मैंने इसी मंत्रको णकर इसप्रकार सर्वोत्कृष्ट ऐश्वर्य पद लाभ किया है । तुम परमभक्ति सहित यथोक्त विधान अनुसार त्रैलोक्यनय की कामना से देवी की आराधना करो।
दानवों का विनाश करती है । वह जिस प्रकार रुधिर मिय है, इसीप्रकार श्यामारहस्य भा. टी. श्रीराम उवाच । प्रसन्नो यदि मे देव ! परमेश ! पुरातन ! । रहस्यं परमं देव्याः कृपया कथय प्रभो ! ॥ विनार्चन विना होम विना न्यासं विना वलिम् । विना गन्धं विना पुष्पं विना नित्योदि- तां क्रियाम् ॥ प्राणायाम विना ध्यान विना भूतविशोधनम्। विना दानं विना जापं येन काली प्रसीदति ॥ शिव उवाच । पृष्टं त्वयोत्तमं प्राज्ञ ! भृगुवंशसमुद्भव ! । भक्तानामपि भक्तोऽसि त्वमेव साधयिष्यसि ॥ देवी दानवकोटिन्नी ली. लया रुधिरप्रियाम् । सदा स्तोत्रप्रियामुग्रां कामकौतुकला. लसाम् ॥ सर्वदानन्दहृदयामासवोत्सवमानसाम् । माध्वी कमत्स्यमांसानुरागिणीं वैष्णवी पराम् ॥ श्मशानवासिनी प्रेतगणनृत्यमहोत्सवाम् । योगप्रभावां योगेशी योगीन्द्रह श्रीरामने कहा, हे परमेश ! हे पुरातन । हे देव । यदि आप मेरे प्रति प्रसन्न हैं । तो भली भांति अनुग्रह प्रदर्शन पूर्वक देवी कालिका का रहस्य कीर्तन कीजिये । बिना पूजा, विना होम, चिनान्यास, बिना दलि, दिना गध, पिना पुष्प, चिना नित्योदित क्रियां, चिना प्राणायाम, विना ध्यानादि ना भूतशुद्धि, विना दान, और विना जप के जिससे काली प्रसन्न होती हैं, सो कहो ॥ शिवने कहा हे भृगवश समुद्भव ! तुम भली भांति जान सम्पन्न हो । इसीलिये अति श्रेष्ठ प्रश्न किया है । तुम्ही भक्तगणों में उत्तम हो । इसका रण तुम्ही सिद्धि काम करोगे । वह देवी कालिका लीला पूर्वक करोड़ र स्तव करने से अत्यन्त उल्लसित और परितुष्ट होती है। वह प्रचंड प्रकृति और काम कौतुक लालसा के वश वतिनी है । वह सर्वदा सानंद हृदया और आसपोत्सव मानसा है,मधु, मांस और मत्स्यमिय, परमवैष्णवी श्मशान वासिनी मेनगणों के नृत्यमहोत्सवा, योगप्रभवा, योगेशी और योगीन्द्राणी ।
चतुर्य परिच्छेद । दयस्थिताम् ॥ तामुग्रकालिकां राम ! प्रसादयितुमर्हसि । तस्याः स्तोत्रं परं पुण्यं स्वयं काल्या प्रकाशितम् ।। तव तत् कथयिष्यामि श्रुत्वा वत्सावधारय । गोपनीयं प्रयत्नेन पठ- नीय परात्परम् ॥ यस्यैककालपठनात् सर्वे विघ्नाःसमाकुलाः नश्यन्ति दहने दीप्ते पतङ्गा इव सर्वतः ॥ गद्यपद्यमयीवाणी तस्य गङ्गाप्रवाहवत् । तस्य दर्शन मात्रेण वादिनो नि- प्रभां गताः॥ तस्य हस्ते सदैवास्ति सर्वसिद्धिर्न संशयः। राजानोऽपि च दासत्वं भजन्ते किं परेजनाः ? ॥ निशीथे मु- क्तकेशस्तु नग्नः शक्तिसमाहितः । मनसा चिन्तयेत् काली महाकालेन लालिताम ॥ पठेत् सहस्रनामाख्यं स्तोत्रं मोक्ष- स्य साधनम् । प्रसन्ना कालिका तस्य पुत्रत्वेनानुकम्पते ॥ यथा ब्रह्मामृतैर्ब्रह्मकुसुमैः पूजिता परा ॥ प्रसीदति तथानेन स्तुता काली प्रसीदति ॥ के हृदयका आथय करती हैं। हे राम ! तुम उन्हीं उग्र कालिका का प्र. साद संग्रह करो। उनका स्तोत्र परम पवित्र है। उन्होंने स्वयं उसका मकाश किया है । हे वत्स ! वह स्तोत्र मैं तुमसे कहता हूं । तुम इस को अवधारण करो । तुम इस परात्पर स्तोत्र का अत्यन्त यत्न सहित पाठ और गुप्त रख- कर इसकी रक्षा करो । इस स्तोत्र के एक काळीन पठनपात्रसेही सम्पूर्ण विन समाकुल होते हैं। और प्रज्वलित अमिमें पतित पतंगकी समान तत्काल नष्ट होते हैं । पाठक के मुख से गंगामवाह की समान गद्यपध मयी वाणी अनर्गल निकलती है, उसके दर्शन पात्र से ही समस्त वादी निष्प्रभ (प्रभा हीन ) होते हैं और निसंदेह समस्त सिदि उसके करगत होती हैं। अपर मनुष्यकी वात क्या कहूं, राजागण भी उसके दास होते हैं । निशीथ (आधी रात) समय शक्ति के सहित मिलित होकर मुक्तकेश और नम वेश से मन मन में महाकाल लालिता देवी कालिका की चिन्ता करै । अनन्तर जो मोक्ष प्राप्तका अद्वितीय उपाय है, उसी सहस्र नामाख्यस्तोत्र के पाठमें प्रवृत्त होना चाहिये । तो देवी कालिका प्रसन्न होकर उसपर पुत्रभाव से कृपा करती हैं । ब्रह्मामृत और ब्रह्म कुसुम द्वारा पूजा करने से वह परादेवी जिस ।
चतुर्थ परिच्छेद ।। पराजिता । उमा उग्रप्रभा दीप्ता विप्रचित्ता महावला ॥नी. ला धना मेघनादा मात्रा मुद्रा मितामिता। ब्राह्मी नाराय- णी भद्रा सुभद्रा भक्तवत्सला ॥ माहेश्वरी च चामुण्डा वा- राही नारसिंहिका वज्राङ्गी वजकङ्काला नृमुण्डस्रग्विणी शिवा ॥ मालिनी नरमुण्डालीगलद्रक्तविभूपणा । रक्तचन्द नसिक्ताङ्गी सिंदूरारुणमस्तका ॥ घोररूपा घोरदंष्ट्रा घोरा घोरतरा शुभा । महादंष्ट्रा महामाया सुदती युगदन्तुरा ॥ सुलोचना विरूपाक्षी विशालाक्षी त्रिलोचना । शारदेन्दुप्र- सन्नास्या स्फुरत्स्मेताम्बुजेक्षणा ॥ अहहाला प्रफुल्लास्या- स्मेरवक्ता सुभाषिणी । प्रफुल्लपद्मवदनास्मितास्या प्रियभा- पिणी । कोटराक्षी कुलश्रेष्ठा महती बहुभापिणी । सुमतिः कुमतिश्चण्डा चण्डमुण्डातिवेगिनी ॥ प्रचण्डा चण्डिका चण्डी चर्चिता चण्डवगिनी । सुकेशी मुक्तकेशी च दीर्घकेशी महाकचा प्रेतदेहकर्णपूरा प्रेतपाणिसुमेखला। प्रेतासना प्रि- कुलकाता, अपराजिता, उग्रा, उपप्रभा, दीक्षा, विप्रचित्ता, महावला, नीला, घना, मेघनादा, मात्रा, मुद्रा, पिता, असिता, ब्राह्मी, नारायणी, भद्रा, सुम- द्रा, भक्तवत्सला, माहेश्वरी, चामुण्डा, बाराही, नारसिंही, बज्राङ्गी, बजक- शाळा, नृमुण्डमालिनी, शिवा, मालिनी,नरमुण्डाली गन्द्रत विभूपणारंतचं- दन दिग्यांगी, सिन्दारुणमस्तका, घोररूपा, घोरदंष्ट्रा, घोरा, घोरतरा, शुभा, महादंप्यूा, महामाया, मुदती, युगदन्तरा, सुलोचना, विरूपाक्षी, वि- शालाक्षी, निळोचना, शरदेन्द्र प्रसन्नास्या स्फुरत् स्मेराम्बुजेक्षणा, अट्टहास्या प्रफुल्लास्या, स्मेरवक्त्रा, सुभापिणी, प्रफुल्लपनवदना, स्मितास्या, प्रियभापि- णी, कोटराक्षी, कुलश्रेष्ठा, महती, वहुभापिणी, सुमति, कुमति, चण्डा, चण्ड मुण्डा, अतिवेगिनी, प्रचण्डा, चण्डिका, चण्डी, चर्चिता चण्डदेगिनी, सकेशी, मुक्तकेशी, दीर्घ केशी, महाकचा, प्रेतदेह कर्णा, प्रेतपाणि स्पेखला, प्रेता- सना, मियोना, प्रेतभूमि कृताळया, श्मशान वासिनी, पुण्पा, पुण्यदा, कुळ , २२ श्यामारहस्य भा० । टी. यप्रेताप्रेतभूमिकृतालया। श्मशानवासिनी पुण्या पुण्यदा कुलपण्डिता । पुण्यालया पुण्यदेहा पुण्यश्लोका च पावनी। पूता पवित्रा परमा परा पुण्यविभूषणा । पुण्यनाम्नी भीति हरा वरदा खड्गपाशिनी ॥ नृमुण्डहस्ता शान्ता च छिन्नम- स्ता सुनासिका । दक्षिणा श्यामला श्यामा शान्ता पीनोन्न- तस्तनी ॥ दिगम्बरी घोररावा मुक्कान्तरक्तवाहिनी । घोररा- वाशिवासङ्गानिःसङ्कामदनातुरामत्ताप्रमत्तामदनासुधासिंधु निवासिनी । अतिमत्ता महामत्ता सर्वाकर्षणकारिणी ॥ गीत प्रिया वाद्यरता प्रेतनृत्यपरायणा । चतुर्भुजा दशभुजा अष्टाद- शभुजा तथा । कात्यायनी जगन्माता जगतीपरमेश्वरी। जग. इन्धुर्जगद्धात्री जगदानंदकारिणी ॥ जगजीववती हैमवती माया महालया।नागयज्ञोपवीताङ्गी नागिनी नागशायिनी॥ नागकन्या देवकन्या गान्धारी किन्नरी सुरी। मोहरात्री महा रात्री दारुणाभां सुरासुरी ॥ विद्याधरी वसुमती यक्षिणी यो. पण्डिता, पुण्यालया, पुण्यदेहा, पुण्यश्लोका, पावनी, प्ता, पवित्रा, परमा. परा, पुण्पषिभूपणा, पुण्पनाम्नी, भीतिहरा, वरदा, खड्गपाशिनी, नमुण्डा स्ता, शान्ता छिन्नमस्ता, सनासिका, दक्षिणा, श्यामला,श्यामा, शांता पीनो- सतस्ननी, दिगम्बरी, घोररावा, एकातरक्तवाहिनी, घोररावा, शिवासंगा; निसंगा, मदनातुरा, मत्ता प्रमत्ता, मदना, सुधासिन्ध निवासिनी अतिमत्ता, महामत्ता, सर्वाकर्षण कारिणी, गीतमिया, रायरता, प्रेत नृत्यपरायण चतुर्भगा, दशभुजा, अष्टादश भुमा, कात्यायनी, जगन्माता, जगता परमेश्वरी, जगद्वन्ध, नगद्धात्री, जगदानन्द कारिणी, जगजीवयती, हमवती, माया, महालया, नागयो, पपीताही, नागिनी, नागशायिनी, नाग कन्या, देवकापा, गान्धारी, विन्नरी, सुरी, मोहरात्रि, महारात्रि, दार गाभा, सुगमरी, विद्यामग, यसमता, यक्षिणी, योगिनी, जग रासी, चतुर्य परिच्छेद। गिनी जरा । राक्षप्ती डाकिनी वेदमयी वेदविभूषणा ॥ श्रुति. स्मृतिमहाविद्या गुह्यविद्यापुरातनी। चिंताचिंता स्वधा स्वाहा निद्रातंद्राचपार्वती ॥ अर्पणानिश्चलालोलासर्वविद्यातपस्विनी गङ्गा काशी शची सीता सती सत्यपरायणा ॥ नीतिः सुनीतिः सुरुचिस्तुष्टिः पुष्टिधृतिः क्षमावाणी वुद्धिर्महालक्ष्मीलक्ष्मी- र्नीलसरस्वती ॥ स्रोतवती स्रोतवती मातङ्गी विजया जया। नदी सिन्धुः सर्वमयी तारा शून्यनिवासिनी ॥ शुद्धा तरङ्गिणी मेधा लाकिनी बहुरूपिणी । सदानन्दमयी सत्या सर्वानन्द स्वरूपिणी ॥ सुनन्दा नन्दिनी स्तुत्या स्तवनीया स्वभाविनी। रङ्किणी टकिनी चित्रा विचित्रा चित्ररूपिणी। पद्मा पद्मालया पद्ममुखी पद्मविभूषणा । शाकिनी हाकिनी क्षान्ता राकिणी रुधिरप्रिया भ्रान्तिर्भवानी रुद्राणी मृडानी शत्रुमर्दिनी ॥ उपेन्द्राणी महेशानी ज्योत्स्ना चेन्द्रस्वरूपिणी । सूर्यात्मिका रुद्रपत्नी रौद्री स्त्री प्रकृतिः पुमान् ॥ शक्तिः सूक्तिमतिमती भुक्तिमुक्तिः पतिव्रता । सर्वेश्वरी सर्वमाता शर्वाणी हरव. डाकिनी, चेदमयी वेदविभ्पणा, श्रुति, स्मृति, महाविद्या, गृह्यविद्या, पुरातनी, चिन्ता, अचिन्ता, स्वधा, स्वाहा, निद्रा, सन्द्रा, पार्वती, अपर्णा, निधळा, लोका, सर्वविद्या, तपस्विनी, गङ्गा काशी, शची, सीना, सती, सत्यपरायण, नीति, सुनीति, सुरुचि, तुष्टि, पुष्टि, धृति, क्षमा, वाणी, बुद्धि, महालक्ष्मी, लक्ष्मी,नील सरस्वती,स्रोतस्वनी,स्रानानो, पातली,विया,गया,नदी, सिन्ध, सर्वमयी, तारा, शून्य निवासिनी शुद्धा, तरंगिणी, मेधा, लाकिनी, बहुरूपि- णी, सदानन्दमयी, सत्या, सर्वानन्द, स्वरूपिणी, सुनंदा, नन्दिनी, स्तुत्या, स्तवनीया, स्वभाविनी, रंकिणी, दंकिणी, चित्रा, विचित्रा, चित्ररूपिणी, पद्मा, पद्माळया, पद्ममुखी, पद्मविभूषणा शामिनी, हाकिनी, सान्ता, राकिनी, रुधिर प्रिया, भ्रान्ति, भवानी, रुद्राणी, मृडानी, शत्रमर्दिनी, उपेंद्राणी, महे- शानी, ज्योत्सा, इन्द्रस्वरूपिणी, सूर्यात्मिका, रुद्रपत्नी, रौद्री, स्त्री, प्रकृति, पुमान, शक्ति मुक्ति, मतिमती, भक्ति, मुक्ति, पतिव्रता. सर्वेश्वरी, सर्वमाता, " , - .
१७२ श्यामारहस्य भा. टी. ल्लभा ॥ सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भाव्या भव्या भयापहा। की ही पालयित्री शर्वरी तामसी दया॥ तमिस्रायामिनी स्था च स्थिरा धीरा तपस्विनी। चावडी चञ्चलालोल जिह्वा चारुचरित्रिणी॥त्रपा पावती लज्जा निर्लज्जा ही रजोवती। सत्त्ववती धर्मनिष्ठा श्रेष्ठा निष्ठुरवादिनी ॥ गरिष्ठा दुष्टसंही विशिष्टा श्रेयसी घृणा । भीमा भयानका भीम नादिनी भीः प्रभावती। वागीश्वरी श्रीर्यमुना यज्ञक: यजुःप्रिया । ऋ. क्सामावनिलया रागिणी शोभनस्वरा ॥ कलकण्ठी कम्बु कण्ठी वेणुवीणापरायणा । वशिनी वैष्णवी स्वच्छा धाती त्रिजगदीश्वरी ॥ मधुमती कुण्डलिनी ऋद्धिः सिद्धिः शुचिः स्मिता । रम्भोर्वशी रतीरामा रोहिणी रेवती रमा ॥ शङ्खिनी चक्रिणी कृष्णा गदिनी पद्मिनी तथा । शूलिनी परिघास्त्राच पाशिनी शाईपाणिनी ॥ पिनाकधारिणी धूम्रा शरभी वन: मालिनी। वजिणी समरप्रीता वेगिनी रणपण्डिता ॥ जटिनी शर्वाणी, हरवल्लभा,सर्वज्ञा, सिद्धिदा, सिद्धा,भाव्या,भव्या भयापहा, कत्ती, इत्ती, पालयित्री, शर्वरी, तामसी, दया, तमिस्रा, यामिनीस्था, स्थिरा, धीरा, तपस्विनी, चावंगी,चंचला, लोलजिह्वा,चारुचरित्रिणी,पा, पावती, ना निर्लज्जा, ही, रनोवती, सत्ववत्ती, धर्मनिष्ठा, श्रेष्ठा, निष्ठरवादिनी, गरिष्ठा, दुष्टसंहित्री, विशिष्टा, श्रेयसी, घृणा, भीमा, भयानका, भीमनादिनी, भी, प्रभावती, वागीश्वरी, श्री, यमुना, यज्ञकी, यजुः प्रिया, शुक्सामायनिज या, रागिणी, शोभनस्वरा, कलकण्ठी, कम्बुकण्ठी, वेणुवीणा, परायण, व शिनी, वैष्णवी, स्वच्छा, धात्री, त्रिजगदीश्वरी, मधुमती,कुण्डलिनी, ऋद्धि सिद्धि, सुचिस्मिता, रम्भा, उर्वशी, रति, रामा, रोहिणी रेवती, रमा, नी, चक्रिणी, कृष्णा, गदिनी, पद्मिनी, शलिनी, परिवाना, पाशिनी, शा. पाणिनी, पिनाकधारिणी, धूम्रा, शरभीवनमालिनी, पत्रिणी, समरीता, वेगिनी, रणपण्डिता, नटिनी, पिम्मिनी, नीला, लावपाम्नधि, चन्द्रिका ' , . शंखि.
चतुर्थ परिच्छेद । विम्बिनी नीला लावण्याम्बुधिचन्द्रिका । धलिप्रिया सदा- पूज्या पूर्णा दैत्येन्द्रमाधिनी ॥ महिषासुरसहश्री वासिनी रक्तदन्तिका । रक्तपा रुधिराक्तागी रक्तखर्परहस्तिनी ॥ रक्त. प्रिया मांसरुचिरासवासक्तमानसा । गलच्छोणितमुण्डालि- कण्ठमालाविभूषणा ॥ शवासना चितान्तस्था माहेशी वृष- वाहिनी। व्याघ्रत्वगम्बरा चीनचेलिनी सिंहवाहिनी ॥ वाम- देवी महादेवी गौरी सर्वज्ञभाविनी । वालिका तरुणी वृद्धा वृद्धमाता जरातुरा ॥ सुभ्र विलासिनी ब्रह्मवादिनी ब्राह्मणी मही । स्वप्नावती चित्रलेखा लोपामुद्रा सुरेश्वरी ॥ अमो- घाऽरुन्धती तीक्ष्णा भोगवत्यनुवादिनी । मन्दाकिनी मन्द- हासा ज्वालामुख्यसुरान्तका ॥ मानदा मानिनी मान्या माननीया मदोद्धता । मदिरा मदिरोन्मादा मेध्या नव्या प्रसादिनी ॥ सुमध्यानन्तगुणिनी सर्वलोकोत्तमोत्तमा । जपदा जित्वरा जेली जयश्रीर्जयशालिनी ॥ सुखदा शुभदा सत्या सभासंक्षोभकारिणी । शिवदूती भूति मती बलिमिया, सदापूज्या, पूर्णा, दैत्येंद्रपन्थिनी, महिषासुरसंहन्त्री, वासिनी,रक्त दंतिका, रक्तपा रुधिरांगी, रक्तखरिदस्तिनी, रक्तप्रिया, मांसरुचि, आसपासक्त मानसा,गळच्छोणितमुण्डाली,कण्ठमाला विभूपणा,शवासना,चितान्तस्या,माहे शीवृषवाहिनी, व्याघ्रत्वगम्बरा, चीनचेलिनी, सिंहवाहिनी, वामदेवी,महादेवी गौरी, साज्ञपाविनी, वालिका, तरुणी, वृद्धा, युद्धपाता, जरातुरा, मुबू, वि- लासिनी, ब्रह्मवादिनी, ब्रह्माणी, मही, स्वप्नावती, चित्रलेखा, लापामुद्रा, मुरेश्वरी, अमोघा, अरुन्धती, तीक्ष्णा, भोगवती, अनुवादिनी, मन्दाकिनी, मन्दहास्य, ज्वालामुखी, असुरान्तका, मानदा, मानिनी, मान्या, माननीया, मदोद्धता, मदिरोन्मादा, मध्या, नव्या, मसादिनी, मुमध्या, अनन्तगुणिनी, सर्वलोकोत्तमा, जयदा, जित्वरा, जेत्री. जयश्री, जयशालिनी, मुखदा, शु- भदा, सत्या, मभासक्षोभकारिणी, शिवदती, भूतिमती. विभूति, भीषणाम- , श्यामारहस्य भा० टी०। विभूति पणानना ॥ कौमारी कुलजा कुन्ती कुलस्त्री कुलपालिका । कीर्तिर्यशस्विनी भूपा भूष्या भूतपतिप्रि- या ॥ सगुणा निर्गुणा धृष्टा निष्ठा काष्ठा प्रतिष्ठिता । धान- ठा धनदा धन्या वसुधा स्वप्रकाशिनी ॥ उर्वी गुर्वी गुरुश्रे- ठा सगुणा त्रिगुणात्मिका। महाकुलीना निष्कामा सकामा- कामजीवना॥ कामदेवकला रामाभिरामा शिवनर्तकी। चि. न्तामणिकल्पलता जाग्रती दीनवत्सला ॥ कार्तिकी कीर्ति- का कृत्या अयोध्या विषमा समा । सुमन्त्रा मत्रिणी घूर्ण हादिनी क्लेशनाशिनी ॥ त्रैलोक्य जननी दृष्टा निर्मासामः' नोरूपिणी । तड़ागनिम्नजठरा शुष्कमांसास्थिमालिनी ॥ अवन्ती मथुरा माया त्रैलोक्यपावनीश्वरी । व्यक्ताव्यता नेकमूर्तिः शर्वरी भीमनादिनी ॥ क्षेमकरी शङ्करी च सर्व सम्मोहकारिणी। ऊर्द्धतेजस्विनी क्लिन्ना महातेजस्विनीतथा।। अद्वैता भोगिनी पूज्या युवती सर्वमङ्गला । सर्वप्रयङ्करी भो. , . ना, कौमारी, कलना, कृन्ती, कुछत्री, कळपालिका, कीर्ति, यशश्विनी, भूषा, भूष्या, भूतपतिप्रिया, सगुणा, निर्गुणा, धृष्टा, निष्ठा, काष्ठा, प्रतिष्ठिता, ध- निष्ठा, धनदा, धन्या, वसुधा, स्वमकाशिनी, उर्ची, गुवी, गुरुश्रेष्ठा, सगुणा, त्रिगुणात्मिका, महाकुलीना, निष्कामा, सकामा, कामा, कामजीवि नी, कामकला, रामा, अभिरामा, शिवनर्तकी,चिन्तामणिकल्पकला,जामती, दीनवत्सला, कार्तिकी, कीर्तिका, कुत्या, अयोध्या, विषपा, समा, ममन्त्रा मंत्रिणी, पूर्णा, हलादिनी, क्लेशनाशिनी, लोक्य जननी, दृष्टा, निर्मासा, मनोरूपिणी, तडागनिम्नजठरा, शुष्कमांसास्थिमालिनी, अवन्ती, मथुरा, माया, त्रैलोक्यपावनी, ईश्वरी, व्यकाव्यक्ता, अनेकत्ति, शर्वरी, भीमना दिनी, क्षेमकरी, शहरी, सर्वसम्मोहकारिणी, ऊर्दतेजसिनी, लिम्ना, महा तेजस्विनी, अद्वैता, भोगिनी, पूज्या, युक्ती, सर्वमंगला, सर्वपिपरी, भी.
+ चतुथ पारच्छद। ग्या धरणी पिशिताशना ॥ भयङ्करी पापहरा निष्कलङ्का व- शङ्करी । आशा तृष्णा चन्द्रकला निद्रान्या वायुवेगिनी ।। सहस्रसूर्यसङ्काशा चंद्रकोटिसमप्रभा । चहिमण्डलसंस्था च सर्वतत्त्वप्रतिष्ठितः ॥ सर्वाचारवती सर्वदेवकन्याधिदेवता । दक्षकन्या दक्षयज्ञनाशिनी दुर्गतारिका ॥ इज्या पूज्या वि. भी तिः सत्कीर्तिर्ब्रह्मरूपिणी । रम्भोरुश्चतुरा राका जयन्ती करुणा कुहुः ॥ मनस्विनी देवमाता यशस्या ब्रह्मचारिणी। ऋद्धिदा वृद्धिदा वृद्धिः सर्वाचा सर्वदायिनी ॥ आधाररू- पिणी ध्येया मूलाधारनिवासिनी । आज्ञा प्रज्ञापूर्ण मनाश्व- न्द्रमुख्यनुकूलिनी ॥ वावदूका निम्ननाभिः सत्या सन्ध्या दृढ़व्रता । आन्वीक्षिकी दण्डनीतिस्त्रयी त्रिदिवसुन्दरी ॥ ज्वलिनी मालिनी शैलतनया विन्ध्यवासिनी । अमेया खे चरी धैर्या तुरीया विमलातुरा ॥ प्रगल्भा वारुणीच्छाया शशिनी विस्फुलिगिनी । भुक्तिः सिद्धिः सदाप्राप्तिः प्राका- म्या महिमाणिमा ॥ इच्छासिद्धिर्विसिद्धा च वशित्वोद्ध ग्या, धरणी, पिशितासना, भयङ्करी, पापहरा, निष्कलंका, वशंकरी, भाशा, तृष्णा, चंद्रकला, निद्रा, वायुगिनी, सहन सूर्य, संकाशा, चंद्रकोटिसमप्र. भा, चनिगंटळसंस्था, सर्वतत्वप्रतिष्टिता, सर्वाचारवती, सवदेवकन्या, अधि देवता, दक्षकन्या, दत्तपनाशिनी, दुर्गतारका, इज्या, पूज्या, विभीति, सत्कीति, ब्रह्मरूपिणी, सम्भोरु, चतुरा, राका जयंती, करुणा, कुहु, मन- स्विनी, देवमाता, यशस्या, ब्रह्मचारिणी, ऋद्धिदा, वृद्धिदा, वृद्धि, सर्वादा, सर्वदायिनी, आधाररूपिणी, ध्येया, मूलाधारनिवासिनी, आज्ञा, प्रज्ञा, पू- जमना, चंद्रमुखी, अनुकूलिनी, वावद्का, निम्ननानि, सत्या, संध्या, दृढ- व्रता, आन्वीक्षिकी, दण्डनीति, त्रयी, त्रिदिवसुंदरी, ज्वलिनी, ज्वालिनी, शैलतनया, विंध्यवासिनी, अमेया, खेचरी धैर्या, तुरीया, विस्फुलिंगिनी, भु- क्ति, सिद्धि, सदामाप्ति, प्राकाम्या, पहिमा, अणिमा, इच्छा, सिद्धि, विसि- सा, बशिवोर्दनिवासिनी, लघिमा, गायत्री, सावित्री, भुवनेश्वरी, मनोहरा, .
श्यामारहस्य भा०टी०। निवासिनी । लघिमा चैव गायत्री सावित्री भुवनेश्वरी ॥ मनोहरा चिता दिव्या देव्युदारा मनोरमा । पिङ्गला कपिला जिह्वारसज्ञा रसिका रसा ॥ सुपुम्नेड़ा भोगवती गान्धारी नरकान्तका । पाञ्चाली रुक्मिणी राधाराध्या भीमाधिराधि- का ॥ अमृता तुलसी वृन्दा केटभी कपटेश्वरी । उग्रचण्डे- श्वरी वीरा जननी वीरसुन्दरी ॥ उग्रतारा यशोदाख्या दै. वकी देवमानिता । निरञ्जना चित्रदेवी क्रोधिनी कुलदीपि. का ॥ कुलवागीश्वरी वाणी मातृका द्राविणी द्रवा । योगे- श्वरी महामारी भ्रामरी विन्दुरूपिणी ॥ दूती प्राणेश्वरी गुप्ता वहुला चामरीप्रभा। कुब्जिका ज्ञानिनीज्येष्ठा भूशुण्डी प्रकटा तिथिः द्रविणी गोपनी माया कामवीजेश्वरी क्रियाशाम्भवी केकरा मेना मूपलास्त्रा तिलोत्तमा ॥ अमेयरिक्रमा क्रूरा स. म्पत्शाला त्रिलोचना । सुस्थी हव्यवहा प्रीतिरुप्मा धूम्रा चिरङ्गन्दा ॥ तपिनी तापिनी विश्वा भोगदा धारिणी धरा । " चिता, दिव्पा, देवी, उदारा, मनोरमा, पिंगळा, कपिला, निवा, रसमा रसिका, रसा, सुपुम्ना, ईड़ा, भ.गवती, गांधारी, नरकांतका, पाञ्चानी. रुक्मिणी, राधा, आराध्या, भीमा, अधिराधिका, अमृता, तुळसी, वृन्दा कैटभी, कपटेश्वरी, पनचएडेश्वरी, चीरा, जननी वारसदरी, उग्रतारा, पर शोदा, भारुपा, देवकी, देवमानिता, निरञ्जना, चिलंदनी, क्रोधिनी, कुब्दी पिका, कुळवागीश्वरी, वाणी, मातृका, द्वाविणी, दवा, योगेशरी, महामारी, भ्रामरी पिंदुरूपिणी, दूती, माणेश्वरी गुप्ता, बहुला, चामरी, प्रभा, कुनिका शानिनी, उपेष्ठा, एडी, प्रकटा, अतिपि, द्रविणी, गोपनी, माया, कामयी जेश्वरी, क्रिया, शाम्भवी, केकरा, मेना, मुषलाना, तिलोचमा, अमेयरिक मा, फरा, सम्पत्शाला, खिलोचना, मुस्थी, हव्यवहा प्रीति, उमा धूम्रागि, आदा, तपिनी, तापिनी, विना भोगदा, धारिणी. परा, . -- चतुर्थ परिच्छेद । . १७७ त्रिखंडाबोधिनी वश्या सकला शब्दरूपिणी वीजरूपाम. हामुद्रायोगिनी योनिरूपिणी अनङ्गकुसुमानङ्गमेखलानहरू । पिणीवजेश्वरीचजयिनी सर्वद्वन्द्वक्षयङ्करी । षडङ्गयुवती यो- गयुक्ता ज्वालांशुमालिनी ॥ दुराशया दुराधारा दुर्जया दुर्ग- रूपिणी । दुरन्ता दुष्कृतिहरा दुध्येया दुरतिक्रमा ॥ हंसेश्वरी त्रिकोणस्था शाकम्भर्यनुकम्पिनी । त्रिकोणनिलया नित्या परमामृतरक्षिता ॥ महाविद्येश्वरी श्वेता भेरुण्डाकुलसुन्द- री । सरिता भक्तिसंसका भक्तवश्या सनातनी ॥ भक्ता- नन्दमयी भक्तभाविका भक्तशङ्करी । सर्वसौन्दर्यनिलया सर्वसौभाग्यशालिनी ॥ सर्वसंभोगभवना सर्वसौख्यनिरूपि- णी । कुमारीपूजनरता कुमारीव्रतचारिणी । कुमारीभक्ति- सुखिनी कुमारीरूपधारिणी । कुमारीपूजकप्रीता कुमारीप्री- तिदा प्रिया ॥ कुमारीसेवकासका कुमारीसेवकालया। आ- नन्दभैरवी वाला भैरवी वटुभैरवी ॥ श्मशानभैरवी काल- भैरवी पुरभैरवी । महाभैरवपत्नी च परमानन्दभैरवी ॥ सु. त्रिखंडा,बोधिनी,वश्या,सकला,शब्दरूपिणी,वीजरूपा,महामुद्रा, योगिनी,योनि रूपिणी,अनकम्मा, अनंगमेखला,अनरूपिणी, वजेश्वरी,जयिनी, सर्वद्वन्द्व क्षयंकरी, पहङ्गापवती, योगयुक्ता, ज्वालाशमालिनी, दुराशया, दुराधारा दुर्ज- या, दुर्गरूपिणी, दुरन्ता, दुष्कृतिहरा, दुपैया, दुरतिक्रमा, इंसश्चरी, त्रिको- णस्था, शाकम्मरी, अनुकम्पिनी, त्रिकोणनिलया, नित्या, परमामृतरञ्जिता, महाविधेश्वरी, रवेत्ता, भेरुण्डा, कुलसुंदरी, त्वरिता, भक्तिसंसक्ता, भक्तव, श्या, सनातनी, मक्तानंदमयी, भक्तभाषिका, भक्तशङ्करी, सर्वसौदर्यनिलया, सर्वसौभाग्यशालिनी, सर्वसंभोगभवना, सर्वसौख्यनिरूपिणी, कुमारीपूजन- रता, कपारीव्रतचारिणी, कुमारीभक्तिमुखिनी, कुगारीरूपधारिणी, कुमारी- पूजकपीता, कुमारीपीतिदा, प्रिया, कुमारीसेवकासङ्गा, कुमारीसेवकालया, भानन्दभैरवी, बालाभैरवी, बटुभैरवी, श्मशानभैरवी, कालभैरवी, पुरभैरवी, . , . - श्यामारहस्य भा० टी० । धानन्दभैरवी च उन्मादानन्दभैरवी । मुक्तानन्दभैरवी.च. तथा तरुणभैरवी ॥ ज्ञानानन्दभैरवी च अमृतानन्दभैरवी। महाभयङ्करी तीवा तीत्रवेगा तपस्विनी ॥ त्रिपुरा परमेशानी) सुन्दरी पुरसुन्दरी । त्रिपुरेशी पञ्चदशी पञ्चमी पुरवासिनी ॥ महासप्तदशी चैव पोडशी त्रिपुरेश्वरी । महांकुशस्वरूपा च महाचक्रेश्वरी तथा ॥ नवचक्रेश्वरी चक्रेश्वरी त्रिपुरमालि- नी। राजराजेश्वरी धीरा महात्रिपुरसुन्दरी ॥.सिन्दूरपूररु चिरा श्रीमत्रिपुरसुन्दरी। सर्वाङ्गसुन्दरी रक्ता रक्तवस्त्रोत्तरी- यिणी ॥ जवा यावकसिन्दूररक्तचन्दन धारिणी । जवा यावक सिन्दूररक्तचन्दन रूपधृक् ॥ चामरी वालकुटिल, निर्मलश्यामकेशिनी । वजूमौक्तिकरत्नाढ्य किरीटमृकुटो- ज्ज्वला ॥ रत्नकुण्डल संसक्तस्फुरदगण्ड मनोरमा । कुञ्जरे श्वरकुम्भोत्थमुक्तारजित नासिका ॥ मुक्काविद्रुम माणि- क्यहाराढ्यस्तन मण्डला । सूर्यकान्तेन्दुकान्तायस्पर्शाश्म कण्ठभूपणा ॥ वीजपूरस्फुरद्वीज दन्तपङ्क्तिरनुत्तमा । महाभैरवपत्नी, परमानंदमैरवी, सधानन्दभैरवी, उन्मादानंदमैरवी, मुक्तानंद भैरवी, तरुण भैरची, ज्ञानानंदभैरवी, अमृतानंदभैरवी, महाभयङ्करी, तीमा, तीब्रवेगा, तपस्विनी, त्रिपुरा, परमेशानि, सन्दरी, पुरन्दरी, त्रिपुरेशी, पञ्च दशी, पञ्चमी, पुरवासिनी, महासप्तदशी, पोडशी, त्रिपुरेश्वरी, महांकुशस्व: रूपा, महाचक्रेश्वरी, नव चक्रेश्वरी, चकेवरी, त्रिपुरभाकिनी, राजराजेश्वरी, धीरा, महात्रिपुरसुंदरी, सिंद्रपूरुचिरा, श्रीमत्रिपुरसुंदरी, सद्रिसुंदरी, रक्ता, रक्तवस्त्रोचरियिणी, जवायावकसिंदूरक्तचंदनधारिणी, जापावक सिंदूररक्तचंदनसाधृरु, चामरीबाटफटिकनिर्मळश्यामकेशिनी, बज्रमौक्तिक रत्नाट्यकिरीटमुटोज्वला, रकाण्डलसमक्तस्फरद्गण्डमनोहरा, कुञ्जरेवर कुम्भोत्यमुक्तारंजितनासिका, मुक्ताविट्टममाणिक्यहाराट्यस्तनमण्डला, सूर्य कानंदकांताव्यस्पर्शश्पकठभूपणा, पानपूरस्फुरदजिदंतपंक्ति, भन तमा, का. .
चतुर्थ परिच्छेद । कामकोदण्डकाभुमभ्रूकटाक्ष प्रवर्षिणी ॥ मातङ्ग कुम्भव क्षोजा लसत्कोकनदेक्षणा । मनोजशष्कुलीकर्णा हंसी. गति विड़म्बिनी ॥ पद्मरागाङ्गद ज्योतिर्दोश्चतुष्क प्रका- शिनी । नानामणि परिस्फूर्जच्छुद्धकाञ्चन कङ्कना ॥ नागेन्द्रदन्तनिर्माणवलयाङ्कितपाणिनी । अंगुरीयकचित्राङ्गी विचित्रक्षुद्रघण्टिका॥ पट्टाम्बरपरीधाना कलमजीरशिजिनी। कर्पूरागुरुकस्तूरीकुङ्कमद्रवलेपिता ॥ विचित्ररत्नपृथिवीकल्प- शाखितलस्थिता । रत्नद्वीपस्फु रद्रक्तसिंहासनविलासिनी । षट्चक्रभेदनकरी परमानन्दरूपिणी । सहस्रदलपद्मान्तश्च- न्द्रमण्डलवर्तिनी ॥ ब्रह्मरूपशिवकोडनानासुखविलासिनी। हरविष्णुविरिश्चीन्द्रग्रहनायकसेविता॥शिवा शैवाचरुद्राणी तथैव शिववादिनी । मातङ्गिनी श्रीमती च तथैवानन्दमे- खला ॥ डाकिनी योगिनी चैव तथोपयोगिनी मता । माहे- श्वरी वैष्णवी च भ्रामरी शिवरूपिणी ।। अलम्वुपा वेगवती कोधरूपा सुमेखला । गान्धारा हस्तिजिह्वा च ईड़ा चैत्र शु. मकोदण्डकाभुग्नकटाचमर्पिणी, मातगमवक्षोना, लसदकोकनदेक्षणा, मनोजशकुलीकणा, हसीगतिविटम्बिनी, पारागागदज्योतिहोचतुप्काका- शिनी, नानामणिपरिस्फूर्जतशुदकाशनकङ्कणा, नागेंद्रदंतनिर्माणवलयांकित पाणिनी, अंगुरीयकचित्रांगी, विचिनक्षुद्रघण्टिका, पट्टाम्बरपरीधाना, कल मञ्जीरशिजनी, कर्पूरागुरुकस्तूरी ककुमद्रवलेपिता, पिचिनरत्नपृथ्वीचल्पशा- खितलस्थिता, रत्नद्वीपरफ़ाद्रतसिंहासनविलासिनी, पट्चक्रभेदनकरी, पर- मानंदरूपिणी, सहस्रदळपमालबद्रमंडळचर्तिनी, ब्रारूपशिचकोड़नानामुख विलासिनी, हरविष्ण विरश्चींद्रग्रइनायक सेविता, शिवा, शेवा, रुद्राणी, शिववादिनी, मावहिनी, श्रीमती, आनदमेखला, डाकिनी, योगिनी, उपयो. गिनी, माहेश्वरी, वैष्णवी, भ्रामरी, शिवरूपिणी, अलंबुपा, वेगवती, गोधरू पा, सुमेखला, गांधारी, हस्तिजिह्वा, ईडा, शुभङ्करी, पिंगला, ब्रह्मतीसपु .
१८० ३यामारहस्य भा० टी० । भङ्करी ॥ पिङ्गला ब्रह्मदूती च सुषुम्ना चैव गन्धिनी । भा. स्मयोनिब्रह्मयोनिजगद्योनिरयोनिजा ॥ भगरूपा भगस्था.' त्री भगिनी भगरूपिणी । भगामिका भगाधाररूपिणी भ. गमालिनी ॥ लिङ्गाख्या चैव लिङ्गेशी त्रिपुराभैरवी तथा। लिङ्गगीतिः सुगीतिश्च लिङ्गस्था लिङ्गरूपधृक् ॥ लिङ्गमाना लिङ्गभवा लिङ्गलिङ्गा च पार्वती । भगवती कौशिकी च प्रेमा चैव प्रियंवदा गृध्ररूपा शिवारूपा चक्रिणी चक्ररूपधृक् । लिङ्गाभिधायिनी लिङ्गप्रिया लिगनिवासिनी ॥ लिङ्गस्था लिङ्गनी लिङ्गरूपिणी लिङ्गसुन्दरी । लिङ्गगीतिर्महा प्रीता भगगीतिमहासुखालिङ्गानामसदानन्दाभगनामसदागतिः। लिङ्गमालाकण्ठभूषा भगमालाविभूषणा ।' भगलिङ्गामृत. प्रीता भगलिङ्गामृतात्मिका । भगलिङ्गार्चनप्रीता भगलिश स्वरूपिणी ॥ भगलिङ्गस्यरूपा च भगलिङ्गसुखावहा ॥ स्वयम्भू कुसुमप्रीता स्वयम्भू कुसुमार्चिता । स्वयम्भू कुसमप्राणा स्वयम्भूकुसुमोत्थिता । स्वयम्भूकुसुमस्नाः म्ना, गन्धिनी, आत्मयोनि, ब्रह्मयोनि, जगदयोनि, अयोनिजाः भगरूपा, भगस्याती; भगिनीं; भगरूपिणी; मगात्मिका, भगाधाररूपिणी, भगमालि- नी, लिंगाख्या,लिंगेशी, त्रिपुराभैरवी,लिंगगीति,सगीति, लिंगस्या,लिंगरूप- धृक्ष, लिंगमाला, लिंगभवा, लिंगलिंगा,पार्वती,भगवती,कौशिकीपमा, प्रियम्न दा,ध्ररूपा,शिवरूपा, चक्रिणी,चक्ररूपक,लिंगाभिदायिनी, लिंगप्रियालिंग निवासिनी, लिंगस्था, लिगिनी, लिंगमापिणी, लिंगसुन्दरी, लिंगगीति, महा प्रीता, भगगीति,महामुरचालिंगनामसदानदा, भगनामसदागति, भगनामस: दानंदा,लिंगनामसदागति, लिंगमालाकंठभूगा, भगमालाविभूपणा, भगलिंगा मृतपीता, मगलिंगमृतात्मिका,मगलिंगानप्रीता,भगलिंगस्वरूपिणी,भगलि गस्वरूपा, भगलिंगमुखावहा, स्वयंभूमसमप्रीता, स्वयंमकुसुमानिता, स्वयम्भ फुमापाणा, स्वयम्भू कुम्मोत्थिता, स्वयम्भूकममस्नाता, सयम्भूपपतर्षिता चतुर्य परिच्छेद । सा स्वयम्भू पुष्पतर्पिता ॥ स्वयम्भूपुष्पघटिता स्वयम्भूपुधा- रिणी । स्वयम्भूपुष्पतिलका स्वयम्भूपुष्पचर्चिता ॥ स्वय. म्भूपुष्पनिरता स्वयम्भूकुसुमग्रहा । स्वयम्भूपुष्पयज्ञाशा स्वयम्भूकुसुमात्मिका ॥ स्वयम्भूपुष्पनिचिता स्वयम्भूकुसु- मप्रिया । स्वयम्भूकुसुमादानलालसोन्मत्तमानसा ॥ स्वय- म्भूकुसुमानन्दलहरीस्निग्धदेहिनी। स्वयम्भूकुसुमाधारा स्व- यम्भूकुसुमाकुला ॥स्वयम्भूपुष्पनिलयास्वयम्भूपुष्पवासिनी। स्वयम्भूकुसुमस्निग्धा स्वयम्भूकुसमात्मिका ।। स्वयम्भूपुष्प करिणी स्वयम्भूपुष्पपाणिका। स्वयम्भूकुसुमध्याना स्वयम्भू कुसुमप्रभास्वयम्भूकुसुमज्ञाना स्वयम्भूपुष्पभोगिनी।स्वयंभू कुसुमोल्लासा स्वयम्भूपुष्पवार्षिणी॥स्वयम्भूकुसुमोत्साहास्व. यम्भूपुष्परूपिणी। स्वयम्भूकुसुमोन्मादास्वयम्भूपुष्पसुन्दरी॥ खयम्भू कुसुमाराध्या स्वयम्भू कुसुमोद्भवा । स्वयम्भू कुसु. मव्यमा स्वयम्भू पुष्पपूर्णिता ॥ स्वयम्भू पूजक प्रज्ञा स्वय- म्भू होतृमातृका । स्वयम्भू दातृरक्षित्री स्वयम्भू रक ता- स्वयम्भूपृष्पयटिता, स्वयम्भू पुष्पधारिणी, स्वयम्भू पुष्पतिलिका, स्वयम्भूपृष्प चर्चिता स्वयम्भू पुष्पनिरता,स्वयम्भू कुममग्रहा, स्वयम्भूपुष्पयमांशा, स्वयम्भू कुममात्मिका, स्वयम्भू पुष्पनिचिता, स्वयम्भू कुसमादान लालसोन्मत्त मा. नसा, स्वयम्भू कुसमानन्द लहरी, स्निग्धदेहिनी स्वयम्भ कुममाधारा, स्वय. म्भुकमुमाकुळा, स्वयम्भू पुप्प निलया, स्वयम्भू पुष्प वासिनी, स्वयम्भू, कुमम स्निग्धा, स्वयम्भू कुसमात्मिका, स्वयम्भू पुष्प कारिणी, स्वयम्भू, पुष्प पाणिका, स्वयम्भू कुसमध्याना, स्वयम्भू कुसुमप्रभा, स्वयम्भू कुसुम शाना, स्वयम्भ पुष्प भोगिनी, स्वयम्भू कुसमोल्लासा, स्वयम्भू पुष्प वर्षिणी, स्वयम्भू कुममोत्साहा, स्वयम्भू पुष्प रूपिणी, स्वयम्भूकमुमोन्मादा, स्वयम्भू पुप्प सुन्दरी, स्वयम्भू कुसुमाराध्या, स्वयम्भू कुसुपोद्भवा, स्वयम्भू कुमम उपमा, स्वयम्भ पुष्प पूर्णिता, सयम्भू पुनक प्रना, स्वयम्भू होवपाका, १८२ श्यामारहस्य भा०टी०। रिका ॥ स्वयम्भू पूजकग्रस्ता स्वयम्भू पूजकप्रिया । स्वय: म्भू वन्दकाधारा स्वयम्भू निन्दकान्तका ॥ स्वयम्भू प्रद सर्वस्वा स्वयम्भू प्रदपुत्रिणी । स्वयम्भू प्रदसस्मेरा स्वयम्भू प्रदशरीरिणी । सर्वकालोद्भवप्रीता सर्वकालोद्भवात्मिका । सर्वकालोद्भवोद्भावा सर्वकालोद्भवोद्भवा । कुण्डपुष्पसदा; प्रीतिर्गौलपुष्पसदारतिः ॥ कुण्डगोलोद्भवप्राणा कुण्डगो- लोद्भवात्मिका । स्वयम्भू वा शिवा धात्री पावनी लोकपा वनी ॥ कीर्तिर्यशस्विनी मेधा विमेधा शुक्रसुन्दरी । भ. श्विनी कृत्तिका पुष्या तेजस्का चन्द्रमण्डला । सूक्ष्मासूक्ष्मा वलाका च वरदा भयनाशिनी ॥ वरदाभयदा चैव मुक्ति वन्धविनाशिनी । कामुका कामदा कान्ता कामाख्या कुल सुन्दरी ॥ दुःखदा सुखदा मोक्षा मोक्षदार्थ प्रकाशिनी । दुष्टादुष्टमतिश्चैव सर्वकार्य विनाशिनी ॥ शुक्राधारा शुक्र: रूपा शुक्रसिन्धु निवासिनी । शुक्रालया शुक्रभोगा शुक्र । सर्व . स्वयम्भू दावरक्षित्री, स्वयम्भू रक्ततारिका, स्वयम्भू पूनकप्रस्ता, स्वयम्भू मक प्रिया, स्वयम्भू चन्दकापारा, स्वयम्भू निन्दकान्तका, स्वयम्भ प्रदसर्व- स्वा, स्वयम्भू पदपुत्रिणी, स्वयम्भू प्रदसस्मेरा, स्वयम्भू मद शरीरिणा, कालोद्भवमर्माता, सर्व काळोद्भवात्मिका, सर्वकालोद्भवोद्भावा, सर्वकाळोवो- दवा, कुएउपप्प सदामीति, गोलपप्पसदारति, कुण्डगोळोद्भव प्राणा, कुण्ड गोलोद्भवात्मिका. स्वयम्भुवा, शिवा, धात्री, पावनी, लोक पावनी, कीर्षि यशचिनी; मेधा; विपेधा शकसुंदरी; अश्विनीः कृत्तिका, पुष्प, तेजस्का, चं- द्रमडळा, सूक्ष्मामूक्ष्म, वलाका, वरदा, भयनाशिनी, वरदा, अभयदा,मुक्तिरंध विनाशिनी, कामुकाकामदा, कान्ता कामाख्या, कुलमन्दरी,दुखदा मुखदा मोता, मोक्षदार्य, प्रकाशिनी, दुष्टा, दृष्टपति, सर्वकार्यविनाशिनी, शुक्रापारा क्ररूपा शुफसिन्ध, निवासिनी, सकाळया, शुक्रगोगा,शक्रपुमा, सदारति, नतुर्थ परिच्छेद। जासदारतिः ॥ शुक्रपूज्या शुक्रहोमसन्तुष्टा शुक्रवत्सला । शुक्रमूर्तिः शुक्रदेहा शुक्रपूजकपुत्रिणी ॥ शुक्रस्था शुक्रिणी शुक्रसंस्पृहा शुक्रसुन्दरी। शुक्रस्नाता शुक्रकरी शुक्रसेव्याति शुक्रिणी ॥ महाशुक्रा शुक्रभवा शुक्रवृष्टिविधायिनी । शुक्रा- भिधेया शुक्रारं शुक्रवन्दकवन्दिता ॥ शुक्रानन्दकरी शुक्र सदानन्दाभिधायिका । शुक्रोत्सवा सदाशुक्रपूर्णा शुक्रमनो रंमा ॥शुक्रपूजकसर्वस्वा शुक्रनिन्दकनाशिनी । शुक्रात्मिका- शुक्रसम्पत् शुक्राकर्षणकारिणी ॥ शारदा साधकप्राणा सा- धकासकमानसा । साधकोत्तमसर्वस्वा साधकाभक्तरक्तपा ॥ साधकानन्दसन्तोषा साधकानन्दकारिणी ।आत्मविया ब्रह्म विद्या, परब्रह्मस्वरूपिणी ॥ त्रिकूटस्था पञ्चकूटा सर्वकूटश- रीरिणी । सर्ववर्णमयी वर्णजपमालाविधायिनी ॥ श्रीशिव उवाच । इति श्रीकालिकानामसहस्रं शिवभापितम् । गुह्याद्गुह्य तरं साक्षात् महापातकनाशनम् ॥ पूजाकाले निशीथे च स. पूज्या,शुक्रहोम, सन्तुष्टा,शुक्रवत्सला,शक्रमूर्ति,शक्र, देहाः शुकप्जक, पूत्रिणी शुकस्था, शुक्रिणी, शूक्रसंस्पृहा, शुक्रसुन्दरी, शुफलाता,शककरी, शुक्र, सेव्या अतिशुक्रिणी, महाशका,शुकमवा,शुक्रदृष्टि,विधायिनी, शुक्राभिधेया, शुक्राही शुक्रवंदन. बंदिता,शुक्रानन्दकरी, शुक्रसदानदाभिधायिका, शुक्रोत्सवा, सदा- शुक्र, पूर्णा,शुकमनोरमा, शुक्रपुनकसर्वस्वा, शुक्रनिंदक, नाशिनी,शुक्रात्मिका शुक्रसम्पत्, शुक्राकर्षण, कारिणी, सारदा, साधकमाणा, साधकासक्तमानसा साधकोत्तम, सर्वस्वा,साधका,पक्त,रक्तपा, साधकानन्द सन्तोपा, साधकानद कारिणी, आत्मविद्या, ब्रह्मविद्या, परब्रह्म स्वरूपिणी, त्रिकूटस्या, पचकूटा, सर्व कूट, शरीरिणी, सर्ववर्ण मयी और वर्ण जयमाला विधायिनी ॥ महादेव कथित श्री कालिका के यह सहस्रनाम गुह्य से गहतर और सा- क्षात महापातक विनाश करते हैं रात्रि अथवा दोनों सध्याओं में पूना के १८४ स्तो वळि, एवं मनोहर धूप और दीप निवेदनपूर्वक भक्तियुकहो महामनु अपार श्पामारहस्य भा०टी० । ध्ययोरुभयोरपिालभते गाणपत्यं स यः पठेत् साधकोत्तमः। यः पठेत् पाठयेद्वापि शृणोति श्रावयेदथ । सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति कालिकापुरम् ॥ श्रद्धयाऽश्रद्धया वापि यः कश्चिन्मा नवःस्मरेत् । दुर्ग दुर्गशतं तीर्खा स याति परमां गतिम् ।। न्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना । श्रुत्वा त्रमिदं पुत्रान् लभते चिरजीविनः॥ यं यं कामयते कामं पठ न स्तोत्रमनुत्तमम् । देवीपादप्रसादेन तत्तदानोति निश्चितम्॥ स्वयम्भूकुसुमैः शुक्रैः सुगन्धिकुसुमान्वितैः। जवायावकसिं- दूररक्तचन्दनसंयुतैः॥ मत्स्यमांसादिभिर्धारो मधुभिः साज्य पायसैः भक्त्योपनीतर्मन्त्रैण शोधितैः सह पञ्चमैः । पञ्चोप चारनैवेद्येलिभिर्वहुशोणितैः। धूपदीपैर्महादेवी पूजयित्वा मनोहरैः ॥ जप्त्वा महामनुस्तोत्रं पठेद् भक्तिसमन्वितः। नन्यचेताः स्थिरधीर्मुनकेशो दिगम्बरः॥शवारूढश्चितास्थो समय इसका पाठ करने से साधकोत्तम और गाणपत्य प्राप्त होजाता है। जो व्यक्ति इसका पाठ करता है और कराता है अथवा जो व्यक्ति इस सहल नामको सुनता और मुनाता है वह सर्वदा पापों से छुटकर कारिका पुर में गमन करता है। श्रद्धा से अथवा अश्रद्धा से जो कोई इसको भार करता है वह दुर्ग और नर्ग उत्तरणकर परम गतिको प्राप्त होता है। जो स्त्री वंध्या, चा काकवंध्या, या मृत्वत्सा है, वह इस स्तोत्र के मनने से पिर जीवी पुत्रलाभ करती है । जो जो कामना करीजाय, इस स्तोत्रके पाठ कर ने और देरी के मसाद से निसंदेह वह सब पूर्ण होती है । भक्ति सहित समम्मू कुमुम, शुक्र, मगधित पुष्पयुक्त जवा (गुडहल ) यावक (गखका रंग) सिंदूर, लाल चंदन, मत्स्पमांसादि, मधु, घृत सहित खीर, पचमकार सहित और पंचोपसार सहकद नैवेद्य, बहुत रुधिर युक्त अनेक इस स्तोतको पौ। जो व्यक्ति मुक्तकेश, नग्नवेश, स्थिर मन और मनन्य चितसे शक में आरोहण, वा चिता शाम में अबस्थान, वा श्मशानारूप में धाषित . , चतुर्थ परिच्छेद। १८५ वा श्मशानालयमागतः । शून्यालयगतो वापि शय्यास्थो वा शिवात्मकः ॥ स भवेत् कालिकापुत्र इतिख्याति मुपागतः । सर्वविद्यावतां श्रेष्ठो धनेन च धनाधिपः ॥ वायुतुल्यवलो लोके दुर्जयः शत्रुमर्दनः । सर्वसङ्कटमुत्तीर्णः सर्वसिद्धिसम- न्वितः ॥ मधुमत्या स्वयं देव्या सेव्यमानःस्मरोपमः । महेश योगीन्द्रःसर्वसत्त्वपुरस्कृतः ॥ कामिनीकामरूपोऽसौ स- र्वाकर्षणकारकः । जलसूर्येन्दुवायूनां स्तम्भकोराजवल्लभः॥ यशस्वी सत्कविर्धीमान् सन्मनी कोकिलस्वरः। वहुपुत्री गजाश्वानामीश्वरो धार्मिकःकृती ॥ मार्कण्डेय इवायुष्मान् जरापलितवर्जितः । नवयौवनयुक्तःस्यादपि वर्षसहस्रभाक् ॥ बहु किं कथ्यते तस्य पठतःस्तोत्रमुत्तमम् । न किंचिदुर्लभ लोके यदयत् मनसि वर्त्तते । ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्ग गमन अथवा शून्यालय ( शूना मकान ) में विराजमान, किम्वा शय्या पर शयन करके इसमकार से पाठ करे, तो वह व्यक्ति शिवमय और का- ळिका के पुत्र नाम से सर्वत्र विख्यात होता है । और समस्त विद्वानों में अग्रगण्य होता है । धन में कुरेर की समान और वायु की समान वलयुक्त होकर सब लोकों से दुर्जय होता है और शत्रुगणों का मर्दन सब प्रकार के संकट से पार उतरना सर्व प्रकारकी सिद्धि संकलन और कामदेवकी स- मान अधिगमन करता है । स्वयं देवी मधुमती उसकी सेवा में प्रवृत्त होती । वह महादेवजी की समान योगीन्द्र और समस्त सत्वका अग्रणी का मिनीगणों को कामरूप, सबका आकर्षण करनेवाला, जळ, सूर्य और चाय का स्तम्भिक राजवल्लभ, यशस्वी, सत्कवि, परमयुद्धिमान, सब विषयों में अच्छी परामर्थ देने को समर्थ, कोकिल की समानकलकण्ठ, अनेक पुत्रोंका पिता, गन और अधादि सबका ईश्वर धार्मिण, कुनीमार्कण्डेयको समान दीर्घायु जराहीन, पलित विहीन नवयौवन युक्त और सहस्र वर्ष जीबी होता है। अधिक कहने से और क्या है ? इस उत्तम स्तोत्रके पाठ करने से जो कुछ मन में इच्छा होती है, वह कुछ दुर्लभ नहीं होती। ब्रह्महत्या, सुरापान, २४ १८६ श्यामारहस्य भा० टी० । नागमः । सर्वमाशु भवत्येव स्तवस्यास्य प्रसादतः । रजस्व, लाभगं पश्यन् जप्त्वा काली महामनुम् । स्तवेनानेन संस्तु.' त्य साधकाकिं न साधयेत् ॥ परदारपरो वापि जप्त्वा मंत्र पठन् स्तवम् । कुवेर इव वित्ताढ्यो जायते साधकोत्तमः ।। अष्टोत्तरशतंजप्त्वा योनिमामत्रय तत्त्ववित् । संगम्य पठनाद स्य सर्वविद्येश्वरो भवेत् ॥,दिगम्बरो मुक्तकेशः शय्यास्थो मैथुनी नरः । जप्त्वा स्तुत्वा महाकाली खचरोजायतेऽचि. रात् ॥ शुक्रोत्सारणकाले च जपपूजापरायणः। श्मशानका लिकां स्तुत्वा वाणीव सत्कविर्भवेत् ॥ आलोकयन् चिंतयन् वा विवस्त्रां परयोपिताम् । जप्त्वा स्तुत्वा महाकाली सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ सुरतेषु मर्नु जप्त्वा स्तुत्वा भगवतीं शिवाम् । सर्वपापैः परित्यक्तो मानवः स्यात् शुकोपमः ॥ कुहुपूर्णेन्दुस- . चौर्य, गुरुपत्नी गमन, इत्यादि समस्त पातक इसस्तवके प्रसाद से शीघ्र नष्ट होते है । उदकी का कुल मंदिर देखकर काली और तदीय महामन्त्र के नप सहित इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक किस वस्तु का साधन नहीं करसक्ता ? जो व्यक्ति परदार परायण अर्थात् पराई स्त्री में रत है, वह भी मंत्र जपने के पीछे इस स्लवका पाठ करने से कुवेर की समान वित्तान्य (धनवान ) और साधकोत्तम होते हैं । तत्वरित साधकयोनि आमन्त्रण करके संगम के पीछे इस स्तव का पाठ करने से सम्पुर्ण विद्या का घर होता है । जो व्यक्ति दिगम्बर (नाम ) मुक्तकेश ( खुलेवाल ) शयपास्थ शय्यापर स्थित ) और मैथुनी होकर महाकाली का जप और स्तव क- रता है, वह शीघ्र खवर होता है शुक्रोत्सारण समय में जप पूजा परायण होकर श्मशान काळिका का स्तव करने से साक्षात् वाणी की समान स. स्कवि होनाता है । बसन हीन पराई स्त्री का दर्शन चा चिन्तन करके महाकाली का जप और स्तव करने से सवप्रकारके पाप दूर होते हैं । मुरत समप मंत्र जप और भगवती शिवा का स्तर करने से मनुष्य शक के साश चतुर्थ परिच्छेद । क्रांतिचतुर्दश्यष्टमीषुच । नाम्यां मङ्गलदिने पठेत् स्तोत्रं सुसाधकः ।। भौमावास्यां निशीथे च चतुष्पथगतो नरः। मासभक्तवलिं दत्वा सदग्धमीनशोणितम् ॥ अष्टोत्तरशत जप्त्वा पठन्नामसहस्रकम् । सोऽदर्शनो भवेदाशु देवगंधर्व सेवितः ॥ येन सेन प्रकारेण कालीस्तुतिपरायणः । स्तम्भ येदखिलान् लोकान् राजानमपि मोहयेत् ॥ आकर्षयदेवकन्या वेशयेदपि केशवम्।मारयेदखिलान् दुष्टानुच्चाटयर्तिशात्रवान् नरमार्जारमहिपच्छागमूपिकशोणितासास्थिमासैःसमधुभिः सौवीरे दुग्धपायसः॥योनिलक्षणतोयेनभगलिंगामृतेन च । शुकैः पूजाजपान्ते तु काली सन्त साधकः ॥ सहस्रनाम- भिर्दिव्यैःस्तौति भक्तिपरायणः । मातेव दक्षिणा तस्य सर्वत्र हितकारिणी ॥ परनिन्दापरद्रोहपरदारपराय च । खलाय और सर्व पाप से रहिन होता है । श्रेष्ठ साधक अमावस्या, पौर्णमासी, संफ्रान्ति, चतुर्दशी (चौदश ) अष्टमी और नवमी इन सब तिथि और 'मंगळवार में उल्लिखित स्तव पाठ करै । अमावस्या के निशीथ रात्रि ) समय चौराहे में गमन करके दग्ध मौन और शोणित सहित बलिमदान पूर्वक अष्टोत्तर शत नाम सहस जप करने से साधक अदर्शन होनाता है। एवं देव और गंधर्वगण सेवा करते हैं । जिस किसी प्रकार से कालीस्तुति परायण होकर इस स्तवका पाठ करने से साधक समस्त लोक को स्तम्भित राजाको भी मोहित, देवकन्या को भी आकर्षित, केशवको भी वशीकृत, समस्त दुष्टगणों को विनाशित और समस्त शगों को उच्चारित किया- ‘जाता है । जो व्यक्ति अस्थि, मांस, मधु, दुग्य पायस और योनिलक्षणा नुसार भग लिङ्गामृत और शुक्र प्रदान सहित जप और पूजा करके कालीका . सन्तर्पण पूर्वक भक्ति परायण होकर दिव्य सहस्र नाम द्वारा स्तव करता है दक्षिण कालिका जननीकी समान सर्वत्र उसकाहित करती हैं । जो व्यक्ति परनिन्दक, परद्रोही, परदार परायण, खक, परतन्त्र, भ्रष्ट, असाधक, शिव के प्रति भक्ति रहित, दुष्ट स्वभाव, दपक, दुरात्मा, हरिभक्ति विहीन, पर- * . .
श्यामारहस्य भा०टी० । । परतन्त्राय भ्रष्टायासाधकाय च ॥ शिवाभक्ताय दुष्टाय दू. पकाय दुरात्मने । हरिभक्तिविहीनाय परदारपराय च ॥ पृ. जाजपविहीनाय स्त्रीसुरानिन्दकाय च । न स्तवं दर्शयेदेवि ! सन्दर्य शिवहा भवेत् ॥ कुलीनाय महोत्साय दुर्गाभक्ति- पराय च । वैष्णवाय विशुद्धाय भक्तियुक्ताय मन्त्रिणे ॥ अ. द्वैतानन्दरूपाय निवेदितरताय च । दद्यात् स्तोत्रं महाका- ल्याः साधकाय शिवाज्ञया ॥ गुरुविष्णुमहेशानामभेदेन म- हेश्वरीम् । स्वमन्त्रां भावयेत् मन्त्री महेशः स्यान्न संशयः ॥ स शाक्तः शिवभक्तश्च स एव वैष्णवोत्तमः । संपूज्य स्तौति यः कालीमद्वैतभावमावहन् ॥ देव्यानन्देन सानन्दो देवी- भक्तेन भक्तिमान् । स एव धन्यो यस्यार्थे महेशो व्यग्रमा नसम् ॥ कामयित्वा यथाकामं स्तवमेन मुदीरयेत् । सर्वरो. गविनिर्मुक्तो जायते मदनोपमः ॥ चक्र वा स्तव मेनं था दार पर, पूजा जप रहित, स्त्री निन्दक, और मरा निंदक है, उसको इस स्तवका दर्शन भी न करावे । दिखाने से शिव घातक होता है । जो कु. लीन, महोत्साहयुक्त, दुर्गा के प्रति भक्ति युक्त, वैष्णव, विशुद्ध स्वभाव, भ. क्ति संयुक्त, मंत्र साधन तत्पर, और अद्वैतानंद स्वरूप, एवं महाकाली का साधक है, उसकोरी शंकर की आना से यह स्तोत्र प्रदान करै । गुरु विष्ण और महेश्वर के अमेद में महेश्वरी की भावना करने से साधक साचात् म- हेश्वर शेजाता है। इस में संदेह नहीं है । जो व्यक्ति अद्वैत भाव अवलम्बन पूर्वक कालीकी भली भोति पूजा करके स्तव करता है, वही शाक्त, वही शिव भक्त और वही वैष्णवोचम है। जो व्यक्ति देवी के आनन्द मेंही भानन्द मान और देवीकी भक्ति मेंही भक्तिमान है, यही धन्य है। श्री महादेव जी सदा उसकेही लिये व्यग्न चिन रहते हैं । यथा- 'इस स्तवका पाठ करने से सर्वरोग विनिर्मुक्त, और मदनीयम (कामदेवकी सपान उपमा योम्प ) होता है । जो व्यचि चक्रपा इस स्तव को मया . काम कामना करके चतुर्थ परिच्छेद। १८६ धारयेदङ्गसङ्गतम् । विलिख्य विधिवत् साधुः स एव कालिका तनुः ॥ देव्यै निवेदितं यद्यत् तस्यांशं भक्षयेन्नरः । दिव्य- देहधरो भूत्वा देव्याः पार्श्वचरो भवेत् ॥ नैवेद्यनिन्दकं दृष्ट्वा नृत्यन्ति योगिनीगणाः । रक्तपानोद्यताः सर्वे मांसास्थिचर्व- पोद्यताः ॥ तस्मान्निवेदितं देव्यै दृष्ट्वा श्रुत्वा च मानवः । न निन्देत् मनसा वाचा सर्वव्याधिपरांमुखः ॥ आत्मानं का- लिकात्मानं भावयन् स्तौति यः शिवाम् । शिवोपमं गुरु ध्यात्वा स एव श्रीसदाशिवः ॥ , यस्यालये तिष्ठति नून मेतत् स्तोत्रं भवान्या लिखित विधिज्ञैः । गोरोचनालक्तककुंकमाक्तसिन्दूरकर्पूरमधुद्रवेण ॥ न तस्य चौरस्य भयं न दस्योमनोरथो नाशनिवहिभीतिः। उत्पातवायो रपि नात्र शङ्का लक्ष्मीः स्वयं तत्र वसेदलोला। विधि लिखकर अंगसंगत ( अंग के संग ) धारण करताहै, वहीं साधु और वही काली देह होता है । देवीको जो २ वस्तु निवेदन करीजाती है, उसका केवळ अंशमात्र भक्षणकरने से दिव्यदेह और देवीका पार्वचर (निकट- वर्ती होजाता है । जो व्यक्ति नैवेद्य की निन्दा करता है, योगिनीगण उसको देखकर नाचती हैं, एवं उसका रक्त पीने में उद्यत और मांस व अस्थि चाबनेको उद्यत होती हैं । इसलिये देवी के उद्देश से निषेदित द्र- व्य देखकर व मुनकर, वाक्य वा मन द्वारा निन्दा न करने से समस्त व्याधि दूर होती है । जो व्यक्ति आत्माको कालिकात्मा जानकर उसका ध्यान धारण सहित स्तव करता है, और गुरुको भी उसी की समान वि- चारता है, वही व्यक्ति साक्षात् श्री सदा शिव है । जो व्यक्ति विधि जा- ननेवाले व्यक्ति की सहायता से गोरोचना, महावर, कंकमाक सिंदूर, कपूर, और मधु मुद्रा द्वारा भवानी का यह स्तव लिखकर गृह में प्रतिष्ठापित क. रता है, उसको चोरमय नहीं रहता, उसका दस्यु [ तस्कर ] भय दूर होता है, इसके अतिरिक्त वज्र और अग्नि मय भी दूर होता है । उसके उस गृह में स्वयं लक्ष्मी अचल होकर वास करती है, और उत्पात वायुकी आशंका १८८ श्यामारहस्य भा० टी० । परतन्त्राय भ्रष्टायासाधकाय च ॥ शिवाभक्ताय दुष्टाय दू पकाय दुरात्मने । हरिभक्तिविहीनाय परदारपराय च ॥ पू. जाजपविहीनाय स्त्रीसुरानिन्दकाय च । न स्तवं दर्शयेदेवि!, सन्दर्य शिवहा भवेत् ॥ कुलीनाय महोत्साय दुर्गाभक्ति- पराय च । वैष्णवाय विशुद्धाय भक्तियुक्ताय मन्त्रिणे ॥ अ. द्वैतानन्दरूपाय निवेदितरताय च । दद्यात् स्तोत्रं महाका• ल्याः साधकाय शिवाज्ञया ॥ गुरुविष्णुमहेशानामभेदेन म- हेश्वरीम् । स्वमन्त्रां भावयेत् मन्त्री महेशः स्यान्न संशयः ।। स शाक्तः शिवभक्तश्च स एव वैष्णवोत्तमः । संपूज्य स्तौति यः कालीमद्वैतभावमावहन् ॥ देव्यानन्देन सानन्दो देवी- भक्तेन भक्तिमान् । स एव धन्यो यस्यार्थे महेशो गविनिर्मन्य मन्त्रसिद्ध्यर्थमादौ पुरश्चरणविधिर्लिख्यते तदुक्तं कालीतन्चे। आदौ पुरष्कृियां कुर्वन् नियमेन यथाविधि । लक्षमेकं जपेद्वियां हविष्याशी दिवा शुचिः ॥ रात्रौ ताम्बूलपूरास्य नसम् ॥ कामगि चिन पार भी पद ग्रहण नहीं करसकी । जो व्यक्ति देवी कालिका के पादारविन्द में एकाग्र चित्त होकर यह अनन्त पुण्ययुक्त स्तव पाठ करता है, वह सम्पूर्ण मनोरय होकर सम्पर प्रकार से पूना फल के विधानको प्राप्त होता है ॥ इतिश्री महामहोपाध्याय श्रीपरमहंसपरिव्रामक श्रीपूर्णानंदगिरि विरचित श्यामारहस्य श्रीपण्डितहरिशंकरकृत मापाटीकासहित चतुर्थपरिच्छेद ॥ ३॥ अन मन्त्रसिद्धि के लिये आदी पुरश्चरण विधि कहते है । काठीतन्त्र में कहा है । यथा-प्रयम यथाविधि नियमान दिन में हषिप्यासी और चतुर्थ परिच्छेद। धारयेदङ्गसङ्गतम् । विलिख्य विधिवत् साधुः स एव कालिका तनुः ।। देव्यै निवेदित यद्यत् तस्यांशं भक्षयेन्नरः । दिव्य- देहधरो भूत्वा देव्याः पार्श्वचरो भवेत् ॥ नैवेद्यनिन्दकं दृष्ट्वा नृत्यन्ति योगिनीगणाः । रक्तपानोद्यताः सर्वे मांसास्थिचर्व- णोद्यताः ॥ तस्मानिवेदितं देव्यै दृष्ट्वा श्रुत्वा च मानवः । न निन्देत् मनसा वाचा सर्वव्याधिपरांमुखः ॥ आत्मानं का- लिकात्मानं भावयन् स्तौति यः शिवाम् । शिवोपमं गुरु ध्यात्वा स एव श्रीसदाशिवः ॥ यस्यालये तिष्ठति नून मेतत् स्तोत्रं भवान्या लिखित विधिज्ञैः। गोरोचनालक्तककुंकमाक्तसिन्दूरकर्पूरमधुद्रवेण ॥ तस्य चौरस्य भयं न दस्योमनोरथो नाशनिवह्निभीतिः । सर्पिषा दिवा । मधुना वासिता मिश्रतोयेन वसेदलोला। देवीञ्चाभिषिञ्चत्तोयैस्तर्पणञ्च दशांशतः तदशांश धु और तर्दशा " पवित्र होकर पुरष्करण पूर्वक एकलक्ष जप करै । फिर रात्रि में ताम्बूल पूरित बदन से राययापर शयन करके इसमकार लक्ष्यमान जप करना चा- हिये । तो साधक मिद मंत्र और प्रयोग योग्य होता हैं, नहीं तो नहीं । जीवहीन देही जिस मकार कोई कार्य नहीं करसक्ता, पुरश्चरण हीन मंत्र दाता भी इसी प्रकार किसी प्रयोग के साधन में समर्थ नहीं होता । इस कारण सापक सत्तम आदि में पुरश्चर्या करै, कभी अनाचार में प्रवृत्त न हो इतस्ततः अर्थात् इधर उधर उच्चारण न करे, विशेषतः पशु हिंसा दूर करें। देवीके उद्देश से बलिदानके अतिरिक्त और सर्वत्र हिंसाका त्याग करें। अन्य मंत्र पुरस्काकार में निंदाका भी परित्याग करै । अनन्तर प्रयोग में प्रवृत्तहोना चाहिये । स्वतन्त्र में भी कहा है दिन में इविष्याशी और पवित्र होकर कक्ष जप और उसके दशांस में इवि. द्वारा होम करै । हे परमेश्वरी! दिवाभाग में तीर्थ सकिळ दुग्ध, मधु, घृत और मधुवासित मिश्रनल द्वारा देवीको अभिाषिक्त और दशांशतः जल द्वारा उनका तर्पण करना चाहिये। .
श्यापारहस्य भा०टी०॥ कर्त्तव्यमवश्यकम् । यदि न्यूनाधिकं कुर्याद् व्रतभ्रष्टो भ वेन्नरः॥ मुण्डमालायाम्। प्रातःकालं समारभ्य जपेन्मध्यन्दिनावधि । प्रथमेऽहनि यजप्तं तजप्तव्यं दिने दिने । न्यूनाधिकं न जप्तव्यं आस मातेः सदा जपेत् । संख्यापूणों निजद्रव्यैर्जपसंख्यादशांश तः ॥ यथोक्तकुण्डे जुहुयाद् यथाविधि समाहितः । अथवा प्रत्यहं जप्त्वा जुहुयात्तदशांशतः । ततो होमदशांशन्तु जले संपूज्य देवताम् ॥ तर्पणादिकं कार्यमित्यादि । कुलसम्भवेऽपि । स्नातः शुक्लाम्बरधरः शुचिः प्रयतमानसः । दिवा चैव प्रकर्तव्यं सर्वकामार्थसिद्धये ॥ ताराप्रदीपे च । विविच्य विधिवद्विद्वान् मण्डलं सुमनोहरम् । तस्मिन् चाहिये । न्यूनाधिक करने से व्रत भ्रष्ट होता है । मुण्डमाला में भी कहा है कि प्रातकाल से आग्भ करके मध्यान्ह काल पर्यन्त जप करै । प्रथम दिन जितना जप करें, प्रति दिन उतनाही जप करना चाहिये । न्यून्याधिक मा न करै असमाप्ति में सर्वदा जप करै । सख्या पूर्ण होनेपर अपने द्रव्यसे जप सरूपाका दशांश यथोक्त कुण्डमें समाहित होकर यथाविधि होम करे। अथवा प्रतिदिन जप करके उसका दशांश परिमाण होम करना चाहिये । अनन्तर जल में होम दशांश के परिमाण से देवता की पूजा करके तर्पणादि करे । कुलसभा में कहा है-स्नानपूर्वक पवित्र हो, सफेद वस्त्र पहर एकाग्रचित्र से दिवाभाग में सर्व कामार्य सिद्धि के लिये विहित विधान से जप करें। तारामदीप में भी कहा है-विद्वान साधक विहित विधान से परम मनोहर पश्चम परिच्छेद । कलसमारोप्य वाचतोयः प्रपूरयेत् ॥ निक्षिप्य नवरलानि तत्र गन्धाष्टकं पुनः । आवाह्य पूजयेत्तत्र देवीमावरणैः सह ।। कलसाग्रे जपेत् मन्त्रं संख्यया पूरणावधि । ततः पूर्ण समा- गत्य गुरुदेवो विधानतः ॥ अभिपिश्चेत् शिष्यमूर्ति कलसो- दरवारिभिः । ततः शिष्यः प्रयत्नेन धनायेस्तोषयेद्गुरुम् ॥ तथे विधिना लक्ष प्रजप्य तहशांशहोमं तहशांशतर्पणं तहशांशाभिपेकं तदशांशब्राह्मणभोजनं कारयेत् । तदशक्ती होमादिसंख्याद्विगुणजपो विप्रेण कार्यः । क्षत्रियेण त्रिगु- णजपः वैश्येन चतुर्गुणजपः । शूद्रेण पञ्चगुणजपः कार्यः। तदुक्तं कुलप्रकाशे। यद्यद विहीयेत् तत्संख्याद्विगुणं जपम् । कुर्वीत त्रि- चतुःपञ्चसंख्यया साधकोत्तमः ॥ मएडळकी विवेचनाकर उसमें कलश स्थापन पूर्वक काय सलिल से उसको पूर्ण करै । अनन्तर नवरत्न डालकर पुनार गधाटक प्रदान पूर्वक देवीका आवरण के सहित आवाहन और पूजा करै । जबतक जप पूर्ण न हो तष सक कला के आगे संख्यानुसार मंत्रका जप करना चाहिये । अनन्तर जप पूर्ण होनेपर गुरुदेव विधानानुसार कळसोदर जल से शिष्यके मस्तक में अभिषेक करै । तब शिष्य यत्न सहित धनादि प्रदान करके गुरुदेवको संतुष्ट करे ॥ इस प्रकार विधानानुसार न जप, जप का दर्शश होम, होम का दशांश तर्पण, तर्पण का दशा अभिषेक, और अभिषेक का दशांश ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये । इस में असमर्थ होने से होमादि संख्या को दूना जप करै । क्षत्रियों के पक्ष में- तिगुना नए उचित है वैश्य का चौगुना और शूद्रको पचगुना जप करना चा. हिये । कुल प्रकाश में कहा है, यया-जिस जिस अग की हानि हो, उस संख्याका दून. जप करें । अथवा,वीन चार और पांचगण भी जप A ।
। १९६ श्यामारहस्य भाटी अन्यत्रापि । होमकर्मण्यशक्तानां विप्राणां द्विगुणोजपः । इतरेषाञ्च वर्णानां त्रिगुणादिः समीरितः ॥ गुरुं सन्तोषयेदेवं मन्त्राः सिध्यन्ति मन्त्रिणः । मुण्डमालायाञ्च । : होमायशक्तो देवेशि ! कुर्यात्तु द्विगुणं जपम् । यदि पू. ज्याद्यशक्तः स्यात् द्रव्याभावेन सुन्दरि ॥ केवलं जपमा त्रेण पुरश्चर्या विधीयते ॥ .. अथात्र ब्राह्मणभोजनमवश्यमेव । तदुक्तं कुलप्रकाशे- एकमङ्गं विहीयेत मन्त्रसिद्धिमवाप्नुयात् । अन्नश्चतुर्विधः देवि ! पदार्थैः षडूसैरपि ॥ सुभोजितेपु विप्रैषु सर्व हि सः फलं भवेत् । सम्यसिद्धैकमन्नस्य पञ्चाङ्गोपासनैव हि ॥ सर्वे मन्त्राश्च सिध्यन्ति तत् प्रसादात् कुलेश्वरी !! . करना चाहिये । अन्यत्रभी कहा है कि ब्राह्मण होम करने में असमर्थ होने से दूना जप करें । अन्यान्यवर्ग गणोंके पक्ष में त्रिगुणादि जप विहित है । इसी प्रकार गुरुको सन्तुष्ट करै । तो समस्त मंत्र सिद्ध होते हैं । मुण्डमाला में कहा है, हे देवेशि ! होमादि में असमर्थ होने से दूना जप करै । हे म. न्दरी ! द्रव्याभावके कारण पूजादि में असमर्थ होने से केवल जंप मात्रानुः सार पुरश्चर्य विधान करै । इस स्थल में अवश्यही ब्राह्मण भोजन करावे । कुल प्रकाश में कहा है यया-हे देवि चार कार के अन्न और के प्रकारके रस पदार्थ का ब्राह्मणगणों को भलीभांति भोजन कराने से सम. स्त सफल होता है । एकमात्र मंत्र के भलीभांति सिद्ध होने पर पंचाग उपासः नाही विधि विहित है। उसके प्रसादसे अन्यान्य समस्त मंत्र सिद्ध होते हैं।
पञ्चम परिच्छेद । अन्यत्रापि। : सर्वदा भोजयेद्विप्रान् कृतसाङ्गत्वसिद्धये । विप्राराधन- मात्रेण व्यङ्गं साङ्गं भवेत् सदा ॥ तन्त्रान्तरेऽपि। कृत्वा मन्त्रजपं मन्त्री पुरस्काराय संयतः । दशांशं जु- हुयादग्नौ यथोक्तविधिना तु यः ॥ यद्वा जपचतुर्थाशं स्वा. हान्तं मूलमुच्चरन् ततो होमदशांशंतु स्वाहान्तं तर्पये लैः ।। तर्पणस्य दशांशेन नमोऽन्तं मूलमुच्चरन् । अभिपिञ्चेत् स्व- मूर्धानं जलैः कुम्भाख्यमुद्रया ॥ फेत्कारिण्यां। स्वाहान्तेनैव मन्त्रेण कुर्याद्धोम वलिं तथा । मन्त्रान्ते नाम संयोज्य तर्पयामीति तर्पणम् ॥ इति पाशावकल्पः । अथ एकवीराकल्पे विशेषो यथा तदुक्तं कुलचूडामणौ। पुरश्चरणकालेऽपि परयोषां प्रपूज्य च । दीक्षितां वस्त्रपु- अन्यतभी कहा है कतसाङ्गत्व सिद्धिके लिये सर्वदा ब्राह्मणों को भोजन करावे । केवल ब्राह्मण गों की आराधना करनेसेही अंगहीन भी पूर्णाङ्ग होता है । तंत्रतिर में भी कहा है कि, मंत्र साधक मंत्र जप पुरश्चरण के लिये संयत हो अग्नि में यथोक्त विधानानुसार द्वादशांश होम करै । अथवा जपका चतुर्थाश स्वाहान्त मूलमंत्र बच्चारण करके जल द्वारा होमका दशांश स्वाहा- न्त तर्पण करै । तर्पण के द्वादशंत नमोन्त मूलाधारण सहित कुलमुद्रा प्रद. र्शन पूर्वक जल द्वारा अपनी मूर्दाका अभिषिक्त करै । फेत्कारिणी में कहा है, स्वाहान्त मंत्रसेही होम और वलिविधान करै । अनन्तर मंत्रके अंत में नाम मिलाकर "तर्पण करता हूँ" यह कहकर तर्पण करना चाहिये । इस का नाम पाशव कल्प है। एक बीरा कल्प में भी इसी प्रकार कहा है । वि- शेष यया-फुल्लचूडामणि में कहा है कि, पुरश्चरणके समयभी दीक्षिता पर- , श्यामारहस्य भा०टी०॥ प्पायै ज्यैः पायससम्भवः ॥ आरम्भकाले नियतं स्वयं पक्वान्नभोजनम् । नानाविधं पिष्टकञ्च नानारससमन्वितम् ॥ दुग्धं दाध घृतं तकं नवनीतं सशर्करम् । उपलाखण्डचूर्ण च नानाविधरसायनम् ॥ नारिकेलं कपित्थंच नागरकं सुदर्शन म् । लिम्पाकं वीजपूरञ्च दाडिमीफलमुत्तमम् ॥ नागरगफलं चैव नानागन्ध विलेपनम्। चन्दनं मृगनाभिश्च श्रीखण्डं नव- पल्लवम् ॥ टङ्कन लोध्रकचैव जलजंबनजंतथानानाशैलसमुद्भूत तं नानालङ्कारभूषितम् ॥ शून्यगेहे समानीय अध्योदक वि. भूषितम् । अमृतीकरणं कृत्वा शक्तीश्चाभिमुखं नयेत् ॥ शक्तिर्यथा-तदुक्तं तत्रैव। ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्राच कुलभूषणा । धेश्या ना पितकन्या चरजकी योगिनी तथा विशेषवैदग्ध्ययुताः सर्वा एव कुलाना॥ अथ दीक्षिताष्टशक्तीः क्रमेण संस्थाप्य पूर्वावरटार्य- स्त्री की पूजा करके वस्त्र और पुष्पादि सहित पायस संभव विविध भोज्य वस्तु प्रदान करें। आरंभ काल में स्वयं नियत पकान भोजन, नाना प्रकार पिष्टक विविधरस, दूध, दधि, घृत, तक (मठा ) नवनीति (माखन ) शर्करा, उपलाखएडचूर्ण, अनेक भांति रसायन, नारिकेल, (नारियल) कपित्या (कैय ) नागरंग (नारंगी) विविधगंध विपन, चंदन, मृगनामि ( कस्तूरी) श्रीखंड, नवपल्लाटकन, मलन कमल, वनन (कमल एवं विविध शैलजोध, घ अनेक भांतिके अलंकार औ अर्पोदक ( अर्घ्य का जल) शून्यगृह में काय अमृतीकरण पूर्वक समस्त शकित सन्मुख करे। समस शक्ति यथा-उस ही जैसा कहा है कुल भूषणा, बामणी, सत्रिया, वैश्या. शूद्रा, वेश्या, नापित कन्या, रमकी; और योगिनी, यह आठ शक्ति है इन सबकाही भली भांति पैदग्धीयुक्त और पुलांगना होना आवश्यक है। अनन्तर दीतिता अष्ट अ किको यथाक्रम स्थापन करके पूर्वको समान घट भार भर्ष पासादि भी प. में पञ्चम परिच्छेद । पात्रादिकं स्थापयित्वा अर्योदकेन तामभ्युक्ष अमृतमन्त्रण धेनु मुद्रया अमृतीकृत्य अष्टशक्तिरूपभेदं ज्ञात्वा ब्राह्मण्या- अष्टशक्तीनां संज्ञादिनामकरणं क्रमेण कृत्वा भासनादिकं गन्धपुष्पं दद्यात् । तदुक्तं तत्रैव। अष्टकन्यारूपभेदं विलोक्यामर्षचेष्टितम् । ब्राह्मण्याद्यष्ट शक्तीनां नामभिः कृतसंज्ञकाः ॥ आसनंच ततो दत्वा स्वाग- तं च पुनः पुनः । अयं पायंच पानीयं मधुपर्क जलं तथा ॥ स्नापयेद्गन्धपुष्पाद्यैः केशसंस्कारमाचरेत् । धूपयित्वा ततः केशान् कौशेयंच निवेदयेत् ततः स्नानान्तरे पीठमास्तीर्य पादुकाद्वयम् । दत्वा तत्र समासीनां नानालङ्कारभूषणैः ।। भूपयित्वाऽनुलेपंच गन्धं माल्यं निवेदयेत् ॥ ततस्तां तां शक्तिं पूजाप्रकरणोक्तक्रमेण ध्यात्वा तासां तिष्ठापन पूर्वक अर्घ्य के जलसे भभ्युक्षण और अमृत मंत्र सहित घेनमुद्रा द्वा. रा अमृतीकरण के पीछे अष्टशक्ति के रूप से अवगत होकर ब्राह्मण्यादि अष्ट शक्ति की संज्ञा और यथाक्रमसे नाम करण समाहित करके आसनादि गंध पुष्प दान करना चाहिये उस में ही कहा है। यया अष्टकन्याका रूप भेद और अमर्ष चेष्टित विलोकन पूर्वक ब्राह्मणादि अपशक्तिके नाम द्वारा संज्ञा साधन वारंवार स्वागतवाद सहित आसन सह अय, पाद्य, पानीय मधुपर्क और जल दान कर। अनन्तर गंध पुष्पादि द्वारा स्नान कराकर केश संस्करण समा- हित और फिर केशपाश धूपित करके कौशेय निवेदन करना चाहिये । त- दनन्तर स्थानान्वर में पीठ आस्तीर्ण और दो पादुका दान करके उक्त पीठ में विराजमान हो अनेक अलंकार और भूषण द्वारा उस को भुषित कर मान्य, गंध और अनुलेपन निवेदन करें । अनन्तर पूजा प्रकरणोंक्त क्रमानुसार उन शक्तियों का ध्यान और उनके मस्तक में श्यामारहस्य भा. टी.! मूर्ध्नि ब्रह्माण्यादिमातृः समावाह्य जीवन्यासादिकं गन्धपु. पधूपदीपान् नानाद्रव्यानुरंजनादिकं दत्वा तासांसव्यकर्ण क्रमेण स्तोत्रं पठेत् । तदुक्तं तत्रैव । तां तां शक्तिं समावाह्य मूर्ध्नि तासां समानयेत् । भोज्यं मण्डपमध्ये तु स्वर्णपात्रे सुशोभने ॥ चव्यं चोष्यं लेह्यं पेयं भक्ष्य भोज्य निवेदयेत् ॥ अदीक्षिता यास्तास्तत्र ततो मायां निवेदयेत् । तासां सर्वेषु कर्णेपु ततस्तोत्रं समाच रेत् ॥ मातदेवि ! नमस्तेऽस्तु ब्रह्मरूपधरेऽनघे ! । कृपया हर विघ्नं मे मन्त्रसिद्धिं प्रयच्छ मे ॥ महेशि ! वरदे ! देवि! परानन्दस्वरूपिणि । कृपया हर विघ्नं मे मन्त्रसिद्धि प्रयच्छ मे । कौमारि ! सर्वविद्यशे ! कुमारकीड़ने ! परे! कृपयेत्वा- दि।विष्णुरूपधरे! देवि! विनतासुतवाहिनि!कृपयेत्यादि। वाराहि ! वरदे ! देवि ! दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे! । कृपयेत्यादि । 1 ! पञ्चम परिच्छेद । शक्ररूपधरे ! दोष!शक्रादिसुरपूजिते ! ॥ कृपयेत्यादि । चा- मुण्डे ! मुण्डमालासृचर्चिते ! विघ्ननाशिनि ! कृपयेत्यादि। महालक्ष्मिमहामाये ! क्षोभसन्तापनाशिनि ! ॥ कृपयेत्या- दि । पितृमातृमये देवि ! पितृमातृवहिष्कृते ॥ एके ! वहुविधे ! देवि ! दिव्यरूपे ! नमोऽस्तुते ॥ एतत् स्तोत्रं पठेद् यस्तु कर्मारम्भेषु संपतः । वहुविघ्नान् समालो- क्य तस्य विनो न जायते ॥ कुलीनस्य द्वारदेवाः कथिता- स्तव पुत्रक ! । दक्षिाकाले नित्यपूजासमये नार्चयेयदि ॥ तस्य-पूजाफलं वत्स ! नीयते यक्षराक्षसैः । आचम्य सुख- वासादिताम्बूलञ्च निवेदयेत् ॥ ततो दद्यात् पुनर्माल्यं ग- न्धचन्दनपङ्कितम् । विसृज्य प्रदक्षिणीकृत्य वरं प्रार्थ सुखी हे शत्ररूपधरे ! हे देवि 1 हे शकादिसुर पूजिते ! कृपा इत्यादि । हे चाम- ण्डे ! हे मुण्डमाला से विगलित शोणित चर्चिते ! हे विधनाशिनी ! कृपा इत्यादि । हे महालक्ष्मी ! हे महामाये ! हे लोग सन्ताप विनाशिनी ! कृपा इत्पादि । हे मितिमातृमपे । हे देवि । हे मितिमातृवहिप्कने ! हे एके ! हे बहुविधे ! हे देवि ! हे दिव्यरूप धारिणी ! तुमको नमस्कार है। जो व्यक्ति संयत होकर कारंभ के समय इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसको कभी किसी प्रकार का विघ्न नहीं होता ।। हे वत्स ! तुम्हारे निकट समस्त कुलीन द्वार देवताका वर्णन किया। पा काल में और नित्य पूजा के समय यदि उनकी पूजा न करीनाय, हे वत्स ! उसकी समस्त पूजा यत और राक्षसगणों से नीयमान अर्थात "हण करानाता है । यदि वह भोजनके समय ब्रीडा परायण [ लज्जायुक्त तो उस गृह के बाहर रहकर जबतक स्तोत्र पाठ करें, तबतक उनकी होती है। आचमन करके मुख चासादि ताम्बूल निवेदन करे । अनं. पीठ पर गंध चंदन पङ्कित मान्यदान और प्रदक्षिणा करके वर प्रार्थना वेदा देकर सुखी होवे । और यदि गमन न करे, तो अपनी कन्या २०२ श्यामारहस्य भा० टी० । भवेत् ॥ अन्या यादि न गच्छन्ति निजकन्या निजानुजा अग्रजा मातुलानी वा माता वा तत्सपत्निका॥ वयसो जातितो वापि हीना वा परमा कला । पूज्या कुलवरैः सर्वैर्निजाहङ्का- रवर्जितैः ॥ सर्वाभावे एकतरा पूजनीया प्रयत्नतः। संस्कृता- संस्कृता वापि सपतिर्निष्पतिश्च या ॥ पूर्वाभाव परा पूज्या मदंशयोपितो यतः । एकश्चेत् कुलशास्त्रज्ञः पूजार्हस्तत्र भै- रव ! ॥ सर्वे सुरादयः पूज्याः सत्यं ब्रह्मशिवादय । एका चेत् युवती तत्र पूजिता चावलोकिता ॥ सर्वा एव परादेव्यः पूजिताः कुलभैरवः!। आदावन्ते च मध्ये च लक्षपूर्ती वि. शेषतः ।। न पूजयति चेत् कान्तां तदा विप्नैर्विलुप्यते । पूर्वा जितफलं नास्ति का कथा परजन्मनि ॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यदीच्छेदात्मनो हितम् । ममापि क्रोधसन्तापशमनं विघ्नना- शम् ॥ यत्नतः पूजनीयाः स्युः कुलाकुलजनाः सुत ! । अपनी अनुजा ( अपनी बहन ) और अग्रजा ( वडी बहन ) मातुकांनी [ मांई माता वा अपनी सपत्नी और बयस वा जाति में हीन होने से भी अन्यान्य परमाकन्या, इनकी कुलवर व्यक्ति अहंकार छोड़कर पूजा करै । सबके अभाव में एककीही यत्नपूर्वक पूना करै । इस विषय में संस्कृता वा असस्कृता सधवा वा विधवाका विचार न करै । पूर्वा के अभाव में परा की पूजा करै । कयोंकि स्त्रीमात्रही मेरा अशहै । हमरव । कुलशास्त्रज्ञ यदि एकहो, तौ पूजाके योग्य पात्र है, इस में संदेह नहीं, यह सत्य है ब्रह्मा शिवादि और देवतादि सब की पूजा करै। किन्तु एकमात्र युवती भी उपस्थित क्षेग में पूजिता और अवलोकित्ता होने से समस्त परमा देवीकी पूजा करीजाती है। आदि, अन्त, मध्य, और विशेपतः लक्ष पूरण समय में यदि कान्ताकी पूजा न करी जाय, तो विन समूह के आक्रमण में विलुप्त होना पडता है और पूर्वानित फल भी विनष्ट होता है पूर्व जन्म की बात और क्या कहूं अत एवं यदि अपने हितकी कापना हो, और मेरे क्रोध सन्तापकी शान्ति और विघ्ननाशवी अभिलाषा हो तो सर्व प्रयत्न सहित कुलाकुळ समस्त नन - । पञ्चम परिच्छेद । अथैतेन क्रमेण लक्षजपादौ मध्ये अन्ते च शक्तीः पूजयेत् । ततो रात्रौ प्रथमप्रहरगते पञ्चमेनैव देवीं संपूज्य गुरुं शिरसि हृदि देवींच ध्यावा शिवोऽहमिति भावयन् जपं कुर्यात् तृतीयप्रहरं यावत् । तदुक्तं मुण्डमालायाम् । गते तु प्रथमे यामे तृतीयप्रहरावधि । निशायाञ्च प्रज. तव्यं रात्रिशेषे जपेन्न हि ॥ स्वतन्त्रेऽपि। रात्रौ मांसासवैर्देवी पूजयित्वा विधानतः । ततो नमा स्त्रिय नग्नो रमन् क्लेदयुतोऽपि वा ॥ जपेल्लक्षं ततो देवि ! होमयेत् ज्वलितानले । योनिकुण्डेस्थिते सर्पिर्मासमत्स्पयुतं भृशम् ॥ दशांशं तर्पयेन्मद्यमांसमिश्रः सुसाधकः । तर्पणस्य दशांशन्तु अभिषिच्य जगन्मयीम् ॥ दशांशं भोजयेत् साधु साधकं कालिकाप्रियम् ।मचं मांसञ्च मत्स्यंच चर्वणंच प्रदा- की पूजा करै । तदनन्तर उल्लिखित क्रमानुसार लक्ष जप के आदि मध्य और अन्त में समस्त शक्ति की पूजा करनी चाहिये । अनन्तर रात्रि का प्रथम प्रहर बीतनेपर पंचमकार द्वारा देवी की पूजा करके रहस्यमाला की सहायता से मस्तक में गुरू और हृदय में देवी का ध्यान करताहुआ भात्मा को शिवस्वरूप जानकर जप करै । तीसरे पहर पर्यन्त इसी प्रकार जप क- रना चाहिये । मुण्डमाला में कहा है----रात्रि का प्रथम याम घीतने पर तृ. तीय याम पर्यंत जप करें। रात्रि के शेप में जप न करै । स्वतंत्र में भी कहा है रात्रि में देवी की मांस और आसब द्वारा यथाविधानसे पूजा करके फिर स्वयं नम और नग्न स्त्री के संग संगत हो क्लिन्न देह ( खेदयुक्त देह ) से लक्ष जप और योनि कुण्डस्थित प्रज्वलित अग्नि में घृत मांस और मत्स्य युक्त होम करें। फिर होमका दशांश मद्य और मांस की सहायता से तर्पण कर- ना चाहिये । तर्षण के दशांश में जगन्मयी का अभिषेक करके कालिका के प्रिय पात्र साधक को उसका दशांश भोजन करायै । एवं मद्य, मांस, मत्स्य .
२०४ श्यामारहस्य भा टी० । पयेत् ॥ ततस्तु तोषयेद्भकया गुरुं स्वर्णादिभिः प्रिये ! एतत् कल्पद्वयाढविमन्त्रैःसिध्यात निश्चितम् ॥ विना पीत्वा सुरां: भुक्त्वा मांसं गत्वा रजस्वलाम् । यो जपेडक्षिणां देवीं तस्य दुःखं पदे पदे ॥ कालीतन्त्रेऽपि। तर्पणस्य विधि वक्ष्ये येन कार्याणि साधयेत् । तर्पयेच्च पयोभिश्च रक्तधारायुतैस्तथा ॥ मज्जाभिश्च तथा तद्वत् स्व- कीयेन कचेन च । आकर्षितायाः कन्यायाः कुलप्रक्षालनेन च ॥ मेपमाहिपरक्तेन नररक्तेन चैव हि । मूषमारिरक्तेन तर्पयेत् परदेवताम् ॥ एवं तर्पणमात्रेण साक्षात् सिद्धीश्वरी भवेत् । कविता जायते तस्य द्राक्षारसपरम्परा ॥ बृहस्पति- समो भूत्वा दिविवद्भुवि मोदते । न तस्य पापपुण्यानि जी- वन्मुक्तो भवेद्धवम् ॥ और चर्वण प्रदान करके स्वर्णादि प्रदान पूर्वक भक्ति सहित गुरुके सन्तोष साधन में प्रवृत्त होना हिये । हे देवि! इस प्रकार दोनों कम्पका अनुष्ठान करने से निसदेह मत्रसिद्धि होती है सरापान, मांस भोजन, और रजस्वला स्त्री से विना गमन किये दक्षिण कालिका का जप करने से पद पद में दुःख ग्रस्त होता है । काली तत्र में भी कहा है, जिसके द्वारा कार्य मात्रकी सिद्धि हाती है, वही तर्पण विधि कहता हु । रक्तधारा मिश्रित जल, स्वकीय कर (अपने वाल) और मज्जा, आर्पित कन्याकाकुल प्रक्षालन, भेट भौर भैसे का रक्त, नर शोणित, मूषिक और मारि की अमुक ( चरवी ) इन सब के द्वारा परदेवता कालिकाका तर्पणकरै । तर्पण करतेही साक्षात् सिद्धीपर होगाता है । मुखसे द्राक्षा रस परम्परा की समान कविता लहरी निकलती है, वृहस्पति को समान होकर स्वर्गको समान पृथिवी में भी परममुख पूर्व क विहार कियाजाताहै, पाप पुण्य कुछ नहीं रहता और निसंदेह जीवन्मुक्ति लाभ होती है।
२०५ . पश्चम परिच्छेद। उत्तरतन्त्रेऽपि। योनिरूपं हि कुण्डं वै कृत्वा वितस्तिमात्रतः । हस्तवि. स्तारितस्तावत् कृत्वा चापि तथाप्यधः । तत्र कार्या हि मन्त्रेण भग्निस्थापनिका क्रिया । महाकालाय देवाय दद्याच प्रथमाहुतिम् ॥ एवमायेन मांसेन अक्तेन रुचिरेण च । कृ- ष्णपुष्पेण साज्येन सरक्तेन विशेषतः ॥ आमिषादिभिरप्येवं श्मशाने जुहुयात् सुधीः॥ कुलसम्भवेऽपि। रात्रौ नग्नो मुक्तकेशा मैथुनेनापि तत्त्वतः । प्रकर्त्तव्यं प्र- यलेन सर्वकामार्थसिद्धये ॥ द्विजानां चैव सर्वेषां दिवा वि- धिरिहोच्यते ॥ शूद्राणाञ्च तथा प्रोक्तं रात्राविष्टं महाफल. म् । यद्यत् कामयते कामं तत्तदाप्नोति नित्यशः ॥ कालिकाश्रुतौ च । अथ हैनां कालिकामनुजापी यः सदा । श्रद्धाज्ञानवैरा. ग्ययुक्तः शाम्भवदीक्षासु रतः। उत्तर तंत्र में भी कहा है अघोदिक में एक हाय विस्तारित वितस्ति प्र- माण योनिरूप कुएड निर्माण करके उस में मंत्रानुसार अग्निस्थापन क्रिया कर और भगवान महाकालको प्रयम आहुति प्रदान करै । इस प्रकार उ- स्कृट मांस, रुचिरमक, कृष्ण पुष्प, विशेषतः घृन सहित रक्त, और आमि- पादि से श्मशान में होम करें । कुलोद्भव में भी कहा है, रात्रिकाल के समय नमवेश और खुले केश मिथुन धर्मका अनुसरण पूर्वक यया तत्व प्रयत्न स- हित सर्व कामार्थ सिदिके लिये कर्तव्यानुष्ठान में प्रवृत्त होना चाहिये । स- मस्त द्विजाति और शूद्रगणों की दिवाविधि इस स्थल में वर्णित होती है। तो रात्रि में ही अभीष्ट महा फळ होता है, जो जो कामना करीजाती है, नित्य वह सब काम होती है | कालिका श्रुतिमें भी कहा है। जो व्यकि स. वंदा शुद्धामा, ज्ञान और वैराग्पानयुक्त और शाम्भर, दीना, परायण . , -- २०६ श्यामारहस्य भाटी । शाक्तेषु वा दिवा ब्रह्मचारी रात्रौ नग्नो मैथुनासक्तमा नसः ॥ जपपूजादिनियमो योपित्सु प्रियकर सुभगोदकेन तर्पणम्। तेनैव पूजनं सर्वदा कालीरूपमात्मानं विभावयेत् । स शा; को भवति । सर्वहत्यां तरते । अथ पञ्चमसर्वयोपिदाका- रेण सर्वमाप्नोति विद्यां पशु धनं धान्यं सर्वशक्तिञ्च कवि- स्वञ्च नान्यः परमः पन्था विद्यतेऽतो मोक्षाय ज्ञानाय ध; यि तत्सर्व भूतं भव्यं यत्किंचिदृश्यादृश्यमानं स्थावरजङ्गमं तत्सर्वम् । कालिकातन्ते तु, तत् प्रोक्तं वैदिकश्रुति मनुजापी सपाप्मानं तरति । सतु अगम्यागमनं तरति । स भ्रूणहत्या सर्वपापं तरति । सर्वसुखमाप्नोति सर्व जानाति सर्वन्यासी तरति भवति स विविक्तो भवति सर्ववेदाध्यायी भवति स सर्वजापी भवति स सर्वशास्त्रार्थवेत्ता भवति सर्वयज्ञाधिकारी होकर देवी कालिका का जप करता है, एवं दिनमें ब्रह्मचारी, और रात्रि में मैथुनासक्त चित्त और नग्न होकर जप पूनादि नियमानुष्ठान में प्रकृत' होता है और स्त्री गणों का प्रियकर होकर सुभग जन्म से तर्पण पूजन और सर्वदा आत्मा को कालीरूप में चिन्तन करता है, वह सर्व यापिदासक्त और समस्त हत्या से उत्तीर्ण होता है । पञ्च मकार द्वाग विद्या, पशु, धन, धान्य, सवका वशीकरण, तथा कवित्व इत्यादि समस्त विषय प्राप्त होमा ता है । इस की अपेक्षा अन्य श्रेष्ठ पंथ नहीं है । इसके द्वारा मोक्षलाभ, ज्ञानलाभ और धर्मलाभ, होता है । भून, भविष्यत, दृश्य, अदृश्य, स्थावर, जंगम जो कुछ है, यह समस्तही इसका स्वरूप है। कालिका तंत्र में भी कहा है, यथा-जो व्यक्ति मंत्र जप करता है, वह श्रुत और स्मृत सब से अव: गत होता है, समस्त पापों से उत्तीर्ण हाता है, अगम्यागमन अतिकम कर- ता है, भ्रूणहत्या (गर्भ गिराना) का पातक दूर होता है। इस प्रकार वह संपूर्ण पापों से छूट जाता है और सपूर्ण सुख लाभ करता है, सर्वप्न होता- है, सर्व संन्यासी और समस्त शास्त्र के अर्थ से अवगत होता है, इसके म पश्चम परिच्छेद। भवति । अरयो मित्रभूता भवन्ति । इत्याह भगवान् शिवः । निर्विकल्पेन मनसा यः सर्व करोति अथैवं पुरश्चरणशीलः प्रयोगार्हो भवति । अथादौ शक्तिशुद्धिर्विलिख्यते । अदी- क्षिताङ्गनासङ्गात् निन्दाश्रुतेः। तदुक्तं भावचूडामणौ- अदीक्षिताङ्गनासङ्गात् सिद्धिहानिः प्रजायते । तत्कथा- श्रवणे श्रद्धा तत्तल्पागमनं यदि। स कुलीनः कथं देवीं पू. जयेत् परमेश्वरीम् ॥ श्रीक्रमेऽपि । संशोधनमनाचर्य स्त्रीषु मापु साधकः । कृतेऽपि सि- तिहानिः स्यात् क्रुद्धा भवति चण्डिका ॥ तस्मात् शक्तिशुद्धिः कार्या। तदुक्तं कोलतन्त्रे। अभिपेकाद् भावशुद्धिर्मन्त्रस्योच्चारणात् .शुचिः । रति तिरिक्त सर्व वेदाध्यायी, सर्वजापी, सवयज्ञों का अधिकारी, सब पापों से मुक्त, और हम दोनों का मित्र होता है । भगवान शिवने इस प्रकार कहा है कि जो व्यक्ति निर्विकल्प चित्त से समस्त करसक्ता है और पुरश्चरण करता है, वहीं प्रयोग योग्य होता है अव प्रथम शक्तिशुद्धि लिखीजाती है। क्योंकि अदीक्षिता अगना (स्त्री) के संसर्ग से मनुष्य को निन्दनीय होना पडता है, इस प्रकार श्रुति प्रसिद्ध है । भावचूडामणि में कहा है । यथा --अदीक्षिता स्त्री का संसर्ग करने से सिद्धिकी हानि होती है। ऐसी स्री की बात सुनने में श्रद्धा और उसकी शय्या में गमन करने से वह व्यक्ति किसपकार परमेश्वरीकी पूजा करसक्ता है ? श्रीक्रम में भी कहा है -~-साधक श्री पुरुषका सशोधन न करके प्रवृत्त होनेसे सिद्धिका व्याघात (विघ्न) होताहै और देवी चण्डिका भी कोधित होती है । इसीलिये शक्ति शुद्धि करनी चाहिये । काळतन्त्र में कहा है, यथा-अभिषेक में प्रवृत्त होने से भाव शुद्धि होती है, मत्र के उच्चारण में २०८ श्यामारहस्य भा० टी०। काले महेशानि ! दीक्षादानेन कन्यका ॥ सुरया रेतसा वापि जलेन मनुनाथवा ॥ सम्भोगेऽभिषिचेन्नारी रण्डा वा मन्त्रव. जिताम् ।आदौवाला समुच्चार्य त्रिपुरांच समुच्चरेत्॥नमःशब्दं समुच्चार्य इमां कान्तां ततो वदेत् । पवित्री कुरुशब्दान्ते मम शक्तिं कुरु प्रिये ! वह्निजायां समुच्चार्य शुद्धिमन्त्रं सुरेश्वरि । अनेन मनुना देवि ! अभिशिक्ताः स्त्रियः सदा । रममाणो भ्रमेन्नित्यं सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ॥ इह लोके परंभोगं भुक्त्वा सिद्धि मवाप्नुयात् ॥ अन्यत्रापि । भानीय कन्यकां दिव्यां घृणालज्जा विवर्जिताम्। स्त्रकांन्ता परकान्तां वा दीक्षितां यौवनान्विताम् ॥ पूजकः पूजयेन्नित्यं वामपावें निवेश्य च । स्वीयकल्पोक्त विधिना न्यासजालं प्रविन्यसेत् ॥ ततोजपेत् स्त्रियं गच्छन् देवीं त्रिभुवनेश्वरीम्। भी इसी प्रकार होती है । संभोग काल में सुरा, शुक्र, जल अथवा मन्त्र द्वारा रंडा वा मंत्र वर्जिता स्त्रीको अभिषिक्त करै । प्रथम वाला पद प्रयोग करके फिर 'त्रिपुरायै' इस प्रकार शब्द उच्चारण पूर्वक नमः शन्द योग- नान्तर 'इमां कान्ता' इसप्रकार कहै । फिर पवित्री कुरु शब्द प्रयोग करके 'ममशक्ति कुरु' इस प्रकार पद योजना करने के पीछे स्वाहा शब्द उधारण करै । यही शुद्धि मंत्र है । हे देवि ! इस मंत्र द्वारा समस्त स्त्रियोंको अ. भिषिक्त करके सर्वदा विहार प्रसंग में भ्रमण करने से सर्व सिदि लाभ और ऐहिक समस्त मोग संग्रह करके परलोक में भी परमसिदि संकलन कर सक्ता है । अन्यत्र भी कहा है, कान्ता हो अथवा परकान्ता हो, जिसको घृणा नहीं, लज्जा नहीं और जिसकी दीक्षा हुई है, इसमकार नवयोरन शालिनी दिव्य स्वरूपिणी कन्या का लायकर वाम पार्श्व में स्थापन पूर्वक पूजक नित्य पूजा करे। और स्वकीय कन्पोक्त विधान से न्यास जाल प्र. विन्यास में प्रवृत्त होवे । अनन्तर उस स्त्री के सहित संगत होकर त्रिभुवने २०६ पश्चम परिच्छेद । शक्तौ विशेषो यथा कुमारी तन्त्रे। नटी कपालिनी वेश्या रजकी नापिताङ्गना । ब्राह्मणी शू- द्रकन्या च तथा गोपालकन्यका ॥ मालाकारस्य कन्यापि नवकन्याः प्रकीर्तिताः । एतासु कांचिदानीय ततस्तद्योनि मण्डले ॥ पूजयित्वा महादेवीं ततो मैथुनमारभेत् । धर्मा- धर्म हविर्दी आत्माग्नौमनसा स्रुचा ।। सुषुम्नावर्मना नित्य मक्षवृत्ती जुहोम्यहम् । स्वाहान्तोऽयं महामन्त्र आरम्भे प- रिकीर्तितः ॥ ततो जपेत् स्त्रियं गच्छन् देवीं त्रिभुवनेश्वरीम् । प्रकाशाकाश हस्ताभ्या मवलम्व्य महीस्रुचम् ॥ धर्माधर्म कलास्नेह पूर्णमग्नौ जुहोम्यहम् । स्वाहान्तोऽयं महामन्त्रः शुक्रत्यागे प्रकीर्तितः॥ अथास्य प्रयोग-निशायां शक्तिं पूर्वोक्तां स्ववामभागे समानीय तस्यागात्रे स्वकल्पोक्तन्यासान् विधाय, अदीक्षिता वरी देवी का जप करै । तिनमें शक्ति का विशेष है । यथा-कुमारी तंत्र में कहा है, नटी, कपालिनी, वेश्या, धोवन, नाई की कन्या, प्रामणी, शूद्र क- न्या, गोपाल कन्या, माळी की कन्या, यह नव कन्या कही गई हैं। इनमें किसी कन्याको लाकर उसके कुल्लागार महादेवीकी पूजा करके फिर मिथुन धर्ममें प्रवृत्त होना चाहिये । धर्म और अधर्मरूप हवि द्वारा प्रज्वलित आत्मा रूप अग्नि में मनरूपी श्रुच द्वारा मुपम्नावर्त्म योग में मैं होम करता हूँ । यही कार्यारंम का महामंत्र है। अनन्तर स्त्री से संगत होकर, त्रिभुवनेश्वरी देवी का जप करे प्रकाश और अप्रकाशरूप दोनों हाथकी सहायतासे उन्म- नीरूप अवपात्र अवलम्बन करके धर्म और अधर्म कलारूप स्नेहपूर्ण अमि में होम करता है। यही शुक्र त्यागका महामंत्र है। अब इसका प्रयोग कहामाता है । रात्रि काळके समय पूर्वोक्त शक्तिको अपने वामभाग में आनयन और तिसके गात्र में स्वकल्पोक्त न्यास विधान . श्यामारहस्य मा० टी० । चेत्तदा पूर्वोक्ताभिषेकमन्त्रेण तीर्थादिना अभिषेकं कृत्वा त- स्याः कर्णे अभेदवुद्ध्या मन्त्रमुच्चारयेदिति शक्तिशुद्धिः। ततो मकार पंचमेन देवीं संपूज्य मूलान्ते धर्माधर्मेत्यादि पठन् मातृपीठे पितृमुखं दत्वा जपं कुर्यात् । ततो मूलान्ते प्रका. शाकाशेत्यादि पठन् तत्वमुत्सृजेत् । अथवा मातृपीठे पित मुखं दत्वा जपं कुर्यात् सावरणां देवींध्यात्वा शिवोऽहमिति भावयन् उभयोः सङ्गमं कृत्वा पूर्ववज्जपादिकं कुर्यादित्य पर प्रकार:। इतिमहामहोपाध्यायश्रीपरमहंसपरिव्राजक श्रीपूर्णानन्दगिरिविरचित श्यामारहस्ये पञ्चम परिच्छेदः। और अदीक्षिता होने से पूर्वोक्त अभिषेक मंत्र से तीर्थादि द्वारा अभिषेक सम्पादन पूर्वक उसके कान में अभेद बुद्धिसे मंत्र उच्चारण करै। इसकाही नाम शक्तिशुद्धि है । अनन्तर पंच मकार द्वारा देवी की पूजा करके मूहांत में धर्म और अधर्मरूपी हचि द्वारा, इत्यादि पाठ और मातृपीठ में पितृमुख दान पूर्वक जप करना चाहिये । अनन्तर मूलात में प्रकाश और अप्रकाश रूप दोनों हाथों के द्वारा, इत्यादि पाठ करके तत्व उत्सर्जन अथवा मापीठमें पितमुख दान पूर्वक जप करें। फिर आवरण सहित देवी का ध्यान और अपनेप को शिव विचार, दोनों का संगम साधन कर पूर्व की समान जपा. दि करना चाहिये। इतिश्री महामहोपाध्याय श्रीपरमहंसपरिवामक श्रीपूर्णानंदगिरि विरचित श्यामारहस्य मुरादाबाद निवासी कात्यायनगोतोद्भव मिश्न मुखानन्द मनु पंडित कन्हैयालाल मिश्र कृत भापाटीकासहितपञ्चमपरिच्छेद ॥ ५ ॥ A पष्ठ परिच्छेद । अथ षष्ठः परिच्छेदः। अथ मन्त्रभेदाःनिरूप्यन्ते । तदुक्तं सिद्धेश्वरतन्त्रे। अथ वक्ष्यामि ते देवीं कालिका भवदुःखहाम् । यां ज्ञा- वा साधको भोगान् भुक्त्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ मूकोऽपि कवितामेति धनेन च धनाधिपः । वलेन पवनः साक्षात् रू. पेण च मनोहराः ॥ मन्त्रोद्धारं शृणुष्वेमं गुह्याद् गुह्यतरं प्रिये ! । खान्तादिवह्निमारूई वामनेत्रेण संयुतम् ॥ चन्द्रा- द्रविन्दुना मूर्ध्नि भूपितं परमेश्वरि ! । खान्तादि वामनेत्रस्थं वह्निचन्द्रसमन्वितम् ॥ वीजरत्नमिदं प्रोक्तं साक्षात् कल्प- द्रुमं प्रिये ! । मादन चन्द्रवीजस्थं भूतस्वरसमन्वितम् ॥ चन्द्रार्द्धविन्दुभूपाढ्यं सम्पूर्ण सिद्धिदं मनुम् । अस्यैवाशेप- माहात्म्यं वक्तुं नाहं महेश्वरि ! | तथापि कथ्यते देवि ! सं.. क्षेपादस्य यत्फलम् । मोक्षार्थी लभते मोक्ष कैवल्यं परमं पदम् ॥ देवीरूपं जगत् पश्येत् वैधं तत्र विवर्जयेत् ॥ अब देवी कालिका के समस्त मंत्र पृथक् पृषक कहते हैं। सिद्धेश्वर तंत्रमें कहा है, यथा ---अब तुम से देवी कालिका का वृत्तांत कहते हैं । वह संसा- रका दुख दूर करती हैं, उन के जान ने से साधक समस्त भोगों को भोग मुक्तिलाम करता है, मूक (गंगा ) भी कवि होता है, और धन में कु. वेर, वलमें पवन, और रूप में साक्षात् सब से मनोहर होता है । हे पिये! जो गुह्य से भी गहतर है। वही मंत्रोद्धार कहता हूँ, श्रवण करो । वर्गादि अर्थात् क, वहि अर्थात् र, वामनेत्र अर्थात् दीर्घ इकार, और चन्द्राद बिंदु अर्थात् • चंद्रविन्दु । इनके मिलने से ( क+र+ई =क्री ) यह पद बना । यही कालिका देवी का मंत्र है । इस मंत्र का माहात्म्प वर्णन करने में मेरी सामर्थ नहीं है, किन्तु तो भी संक्षेपसे इसके फलका वर्णन करता हूं। मो. क्षागी, मोक्ष कैवल्प और परम पदको प्राप्त होता है । इस जगत्को देवी .. श्यामारहस्यं भा० टी० । अथ मन्त्रान्तरं तत्रैव तदुक्तम् । मन्त्रान्तरं प्रवक्ष्यामि शृणु पार्वति ! सादरम् । यस्यारा- धनमालेण सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥ अप्रकाश्यं परं गुह्य न देयं यस्य कस्यचित् । न कुत्रापि समाख्यातं तव स्नेहादि- होच्यते ॥ पूर्वोक्तमन्त्रराजस्य शेषवर्णद्वयं प्रिये ! । संहार- सृष्टिमार्गेण बन्धुभ्योऽपि न दर्शयेत् ॥ मन्त्रस्य स्मरणादेव सकृदप्पस्य सुन्दरि ! । कोटिजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥न कुत्रापि समाख्यातं तव स्नेहादिहोच्यते । पू. वोक्तमन्त्रराजस्य शेषवर्णद्वयं प्रिये! ॥ संहारसृष्टिमात्रेणमूकः काव्यं करोति च । तस्य दर्शनमात्रेण वादिनो मूकसंकुलाः॥ द्वन्द्वभावं परित्यज्य किमन्यद्वहुजल्पितः । यद्यत् प्रार्थयते चित्ते तत्तदाप्नोति नित्यशः ॥ ऋषि स्याज्ञैरवो देवोऽनुष्टु- प्छन्दः प्रकीर्तितम् । देवता कालिका प्रोक्ता चतुर्वर्गफलप्र. रूपमें दर्शन करै । इस में किसी प्रकार द्वैध न करै । अनन्तर इस सिदश्वर तंत्रमें ही मन्त्रांतर कहा है, यथा-हे पार्वती ! मन्त्रांतर वर्णन करता हूं, आदर पूर्वक श्रवण करो। इसकी आराधना मात्रसेही सब प्रकार की सि. दि अधिकार में होती है । यह परम गुह्य है, जिस किसीको इसका प्रदान वा प्रकाश नहीं करना चाहिये । मैने कहीं भी इसका वर्णन नहीं किया है। केवळ तुम्हारे स्नेहवशतः कहता हूं। हे प्रिये ! पूर्वोक्त मंत्रराजके शेप दो वर्ण संहार सृष्टि मार्ग के क्रमसे नन्धुगणों को भी न दिखावे । हे मुन्दरी! इस मंत्र के सकृत स्मरणमात्रसेही तत्काल कोटि जन्मार्जित (करोड़ जन्मके. असंचित ) पातक नष्ट होते हैं यह मंत्र मूक व्यक्तिको भी कवि करता है, उसके केवळ देखते ही वादीगण भी मूक और नितांत आकुळ मावयुक्त होते हैं और तत्काळ द्वन्द्वभाव परित्याग करते हैं अधिक और क्या कह 'जो जो मन में इच्छा करीजाय, वहनित्य प्राप्त होती है । इस मत्रके मापिभैरव,खद अनु एप,देवता कालिका, वर्ग मर्गफल प्रदान करते हैं। हे पार्वती ! आदर पूर्वक २१३ पष्ठ परिच्छेद । दा ।। ध्यानमस्याः प्रवक्ष्यामि शृणु पार्वति ! सादरम् ॥ नीले. न्दीवरसन्निभां त्रिनयनामापीनतुङ्गस्तनीम् । भास्वन्मौलि किरीटभोगिलसनां वीणां भुर्विभ्रतीम् ॥खड्ग मुण्डवरा. भयां स्मितमुखी मोहान्धकारापहाम् । ध्यायेत् सम्यगनाकु. लेन मनसा प्रेतासनां कालिकाम् एवं ध्यानपरो देवि! स. र्वान् कामानवाप्नुवात् । उक्तपीठे महेशानि ! ततः पूजां स. माचरेत् ॥ रात्री द्वितीययामे च अशक्ती दिवसेऽपि च । हेमादिपात्रमादायकुर्यान्मन्त्रं विचक्षणः ॥ अष्टपत्रं लिखेत् पद्मं चतुद्वीरसुशोभितम् । तन्मध्ये त्रिस्त्रिकोण स्यात्तन्मध्ये विलिखेन्मनुम् ॥ अथ दक्षिणावत् प्रातःकृत्यादि व्यापकन्यास समाचरे- त् । तत्र विशेषो यथा तत्रैवोक्तम् । आचान्तो मूलमन्त्रेण शिखां वद्ध्वा तु मन्त्रतः । स्वा- श्रवण करो इसका ध्यान कहता हूं । उसकी आमा नील कमलकी समान, तीन नयन, मोटे और ऊंचे पयोधर, मुज परम्परा में वीणा, खड्ग मुण्ड, वर और अभय शोभायमान, मुखमण्डल सम्मित, उसके देखन वा विचारने से मोहान्धकार दूर होनाता है। प्रेत उसका आसन है । भलीभांति अनाकुल चिचसे उस कालिका का ध्यान करने से संपूर्ण कामना पूर्ण होती है। हे महे- श्वरि ! दूसरे याम में पूजा करनी चाहिये । असमर्थ होने से दिन में ही करे। विलक्षण व्यक्ति होमादिक पात्र ग्रहण करके मंत्र करण में प्रवृत्त होवे । चतु- र सुशोभित अष्टपद्म लिखै । तिन में एक त्रिकोण अंकित करके मंत्र वि. न्यास करें। अनन्तर दक्षिणावत् प्रातः कृत्यादि व्यापक न्यास करे, विनमें विशेष यही है। उस में ही कहा है । यथा-मूलमत्र से आचमन और शि- खावधन पूर्वक स्वाहांत मूल उच्चारण करके "सर्ववश्य करी" इस प्रकार पद प्रयोग करें। हे देवि ! उल्लिखित यंत्रसे शिखाबाघिनी चाहिये। फिर मूलमंत्र उ.
श्यामारहस्य भा०टी० । वा कृत्वा जपेत् । गतिस्तस्यास्तीति. नान्यस्य इह गतिः । ओं सत्यं तत् सत् । अथ हैन गुरुं परितोष्य गोभूहिरण्यादिभिलीयात् म. न्त्रराजन् । गुरुः शिष्याय सत्कुलीनाय विद्याभक्ताय शुश्रू- 'षवे मन्त्रं दत्त्वा स्वयं परिपूज्य निशायां विहरेत् । एकाकी शिवगेहे लक्षं तदर्द्ध वा जप्त्वा मन्त्रं दद्यात् । भों तत् सत् । सत्यं नान्यप्रकारेण सिद्धिर्भवतीह कालिकामनोर्वा भावने. ति त्रिपूर्वा मनोर्वा सर्वस्य दुर्गामनोर्वा स्वयं शिवोपरि। ओं तत् सत् इति सर्वाविद्यामिति पूर्वोक्तद्वाविंशत्यक्षाः प्रथम वीज वा धीजद्वयं वा वीजत्रयं वा केवलनाम वा वीजत्रय- पुटितं नाम वा जपेदित्यर्थः । कालीहृदयविद्याश्च सिद्धविद्यां महोदयाम् । पुरा येन यथा जप्त्वा सिद्धिमापुर्दिवौकसः ॥ कामाक्षरं वह्निसंस्थ मि. यथा-अनन्तर एक, दो, तीन, अथवा तीन नाम पुटित करके प्रथम समस्त विद्या का जप करै । इस लोक में केवल उसीकी सद्गति होती है, अन्यकी नहीं । अनन्तर गुरूको गौ, भमि और सुवर्ण इत्यादि से सन्तुष्ट करके मंत्र रान ग्रहण करै । गुरू भी सत्कुलीन, विद्याभक्त, श्रुपूषा परायण शिष्यको उसका दान और स्त्रीको स्पर्श करके स्वयं भलीभांति उसकी पूजाकर राति काल में विहार करें । एकाकी शिव-गृह में लक्ष वा इसका आधा जपकर शिष्यको प्रदान करना चाहिये । इसके अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से काळीमंत्र की सिद्धि नहीं होती । त्रिपुरामंत्र और दर्गामंत्र की भी उक्त गित धान से सिदि होती है। यहां समस्त विद्या शब्द में यही समझना चाहिये कि पूर्वोक द्वाविंशत्यक्षरा विद्या का प्रथम वीज, वा दो वीज वा तीनधीन अथवा केवळ नाम किम्बा तीन वीज पुटित नाम जप करै । कालीहदय विद्याही सिद्ध विद्या है । उसके प्रभाव से चतुर्वर्ग अर्थात् अर्थ, धर्म, काम मोक्ष की प्राप्ति होती है । देवतागणोंने पहिले इस विद्या का जप करकेही सिदि लाभ करी है। कामातर वहिबंध एवं रमा और नाद मिन्दु युक्त ॥ ।
२१७ पष्ठ परिच्छेद। न्दिरानादविन्दुभिः । मन्त्रराजमिदं ख्यातं दुर्लभ पापचेत- साम् ॥ सुलभं पुण्यचित्तानां साधकानां महात्मनाम् । त्रि- गुणा तु विशेषेण सर्वशास्त्रे प्रवोधिका ॥ अनया सदृशी विद्या अनया सदृशो जपः । अनया सदृशी पूजा न हि सारस्वतप्रदा ॥ आकर्षण वशीकारमारणोच्चाटनं तथा । शांतिपुष्ट्यादिकर्माणि सांधयेदनयाचिरात् ॥ किं वक्तव्यम- जेनापि वर्णितुं नैव शक्यते । जिह्वाकोटिसहस्त्रैस्तु वक्तकोटि शतरपि॥अनया सदृशी विद्या अनया सदृशो जपः। अनया सदृशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति ॥ ध्यानपूजादिकं सर्व स साधनपुरष्क्रियाम् । अनिरुद्धसरस्वत्याःसमानां समुदीरयेत्॥ अथ कुलचूडामणौ। ब्रह्मा सरस्वती गुप्तो देवतासुखसंयुता । वीजव्यक्तिस- माकीर्णः कालीमन्त्र उदाढतः ॥ एकं वा द्विगुणं वापि त्रि. होनेसही इस विद्या का उद्धार होता है । इसका नाम मंत्रराज है। यह पाप चेतागणों को दुर्लभ है, पुण्य चित्त महात्मागण सहनोगही लाभ करते हैं । विशेषतः यह विद्या निगुण शालिनी और सर्व शास्त्रकी प्रबोध जननी है। इसकी समान विद्या वा इसकी सहश जप अथवा इसकी समान सारस्वत प्रदा पूजा नहीं है । इस विद्या के प्रभाव से आकर्षण, वशीकरण, मारण, उच्चाटन, शान्ति और पुष्पादि समस्त कार्यों का शीघ्र साधन होसका है । अधिक और क्या कहूं ? स्वयं ब्रह्मा भी जिह्वा कोटिसहस्र (करोट इ. जार जीभ ) वा सौ करोड वक्र द्वारा भी इसका वर्णन नहीं करसके, इस की समान जिस प्रकार विद्या और जप नहीं है, इसी प्रकार इसकी समान ज्ञान भी नहीं है । और होगा भी नहीं । साधन पुरश्चरण एवं ध्यान और पुजादि समस्त अनुरुद्ध सरस्वती की समान है। कुलचूडामणि में कहा है-~~-क्री यह कालीमंत्र एक वा द्विगुण वा त्रिगुण २८ २१८ श्यामारहस्य भा०टी०। गुणं वापि भैरव । जप्त्वा कर्षयति स्वैरं स्थावर जङ्गमादि. कम् ॥ एपा गुह्या महाकाली गुह्याद् गुह्यतरा स्मृता ।। सिद्धेश्वरतन्त्रे च। शृणु देव ! प्रवक्ष्यामि एकाक्षरमर्नु प्रिये !। यस्य वि. ज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तश्च साधकः ॥ गुह्याद् गुह्यतरं मन्त्रं न देयं प्राणसंशये । खान्तं हि वह्निमारूढं सव्येतरदृगन्त्रिः तम् । चन्द्रविन्दुसमायुक्तं पर गुह्यं महेश्वरि ! ॥ अथ विशेषो यथा। तदुक्तं कुलचूडामणौ- पूर्व वीजं ततः शक्तिं वीजेन मूर्तिकल्पना । षड् दीर्घभा- जा वीजेन कुर्यादङ्गानि नामतः ॥ अथास्या ध्यानं यथा ।, तदुक्तं तत्रैव। ध्यायेत् काली करालास्यां दंष्ट्राभीमविलोचनाम् । स्फु. जप करने से इच्छानुसार स्थावर और जंगमादिको आकर्षण करसक्ता है। यह गुह्य महाकाली गुह्य से भी गुह्यतर है । सिदेश्वरतंत्र में भी कहा है । हे प्रिये ! एकाक्षर महामंत्र कहता हूं, श्रवण करो । जिसके विज्ञानमात्रसे साधक जीवन्मुक्त होता है। यह मंत्र गुह्यसे भी गुह्यनर है । प्रमाण संशय उपस्थित होने पर भी यह किसीको न दे हे महेश्वरी ! खान्त अर्यात का वनि संस्थ अर्थात् रकार युक्त, सम्येतर दृगन्वित अर्थात् दीर्घ ईकार युक्त और चन्द्र विन्दु संयुक्त होने से (क्री ) यह पद बनता है, यही परम गुण एकातर मंत्र है। इस विषय में विशेष यथा--कुलचूडामणि में कहा है प्रथम बीम और फिर शक्ति स्थापन पूर्वक वीज द्वारा मूर्ति कल्पना कर छै ( ६ ) दीर्घसर युक्त वीज हारा नामानुसार अंग विधान करै। इसका ध्यान यया-उस में ही कहा है, काली का ध्यान करे। वह कराल वदना, दंष्ट्रामीपणा, और विलोचना है। उनकी कांची शोभाय.
पष्ठ परिच्छेद। रच्छवकरश्रेणीकृतकाची दिगम्बरीम् ॥ वीरासनसमासीनां महाकालोपरि स्थिताम् । श्रुतिमूलसमाकीर्णमृकणी चण्ड- नादिनीमा मुण्डमालागलद्रक्तचर्चितां पीपरस्तनीम्। मदिरा- स्वादनास्फालकम्पिताखिलमेदिनीम् ॥ वामहस्ते खड्गमुण्ड धारिणी दक्षिणे करे । वराभययुतां घोरवदनां लोलजिति- काम् ॥ शकुन्तपक्षसंयुक्तबालकर्ण विभूपणाम् । शिवाभि- घोररावाभिः सेवितां प्रणयोदिताम् ॥ चण्डहासचण्डनाद- दण्डास्फालैश्च भैरवः । गृहीत्वा नरकङ्कालं जयशब्दपराय. णैः ॥ सेवितां किल सिद्धौधै सुनिभिः सेवितां तथा । एवं तां कालिकां ध्यात्वा पूजयेत् कुलनायकः ॥ सर्व सिद्धिप्रदा देवी हेलयापि च चिन्तिता । ततः सा दक्षिणा नाम्ना लिषु लोकेषु गीयते ॥ मान शवकर ( मृतकहस्त ) द्वारा धनीहुई है । वह दिगम्बरी ( नग्न ) वी. रासन में विराजमान और महाकालके ऊपर अवस्थिति करती हैं। उनके 'होठ कर्ण मूलपर्यंत विस्तीर्ण हैं । उनक नाम मचण्ड है । मुण्डमाला द्वारा विगलित रुधिर धारा से उनका कलेवर चर्चित होता है। उनके दोनों स्तन पीचर ( मोटे ) भावयुक्त हैं । वह मदिरा पान करके तज्जनित आस्फालन से संपूर्ण पृथ्वी को कम्पायमान करती हैं। उनके सामहस्तमें खड्ग और मुंड, दक्षिण हस्त में वर और अभय है । वह घोर वदना और लोक रसना हैं घोररावा अर्थात् घोर शब्द करनेवाली समस्त शिवागण उनकी सेवा कर- सी।वह सबके प्रति प्रणय परायण हैं। समस्त भैरव प्रचंड हास्य, प्रचंड शब्द और प्रचंड आस्फालन सहित नर कङ्काल ( मनुका खांखड ) ग्रहण करके और समस्त सिद्ध संघ और मुनिगण जयजय शब्द से उनकी सेवा में प्रच होते हैं । कुलनायक इस प्रकार कालिका का ध्यान करके पूजा करी उपेक्षा से ध्यान करने पर भी वह सब प्रकार की सिद्धि प्रदान करती हैं। इसीलिये उनके नाम ने विभवन में दक्षिणा कहकर प्रसिद्धि लाभ करी है।
२२० श्यामारहस्य,मा० टी० । स्वतन्त्रेऽपि। ध्यानं शृणु वरारोहे ! साधकानां सुदुर्लभम् । शवारूढ़ा महाभीमां घोरदंष्ट्रां वरप्रदाम् ॥ हास्ययुक्तां त्रिनेत्राञ्च क- पालकत्रिकाकराम् । मुक्तकेशी लोलजिह्वां पिवन्तीं रुधिरं मुहुः ॥ चतुर्बाहुयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत् ॥ इति ॥ अथास्याः पूजनम्-सिद्धेश्वरतन्त्रमतेन दक्षिणावत् कि- न्तु अव्यवहितविद्यावदिति । तदुक्तम् । . ऋपिन्यासं पूजनश्च देव्यास्तु पूर्ववद्भवेदिति । पुरश्चरणे ऽपि लक्षसंख्यजपः कार्यः । तदुक्तं तत्रैव। एवं ध्यात्वा जपेन्मन्त्रं लक्षमेकं विधानतः । तदशांशं विधानेन ततो होमादिकल्पनम् ॥ पूर्वोक्तमन्त्रराजस्य जप. मेवं वरानने ! । अथान्यत् संप्रवक्ष्यामि कालिकामन्त्रमुत्त- ' A खतत्र में भी कहा है, हे वरारोहे ! साधकगणों को जो ध्यान दुर्लभ है, वह श्रवण करो । वह शवासना, महाभीपणा, घोर दशना, वरमदा, हास्य शोभना, त्रिलोचना, कपाल और कर्तृकाधरा ( कपाल और कैंची) मुक्त केश, लोळ रसना, चतुर्भुजा, वरामयकरा, और बारबार रुधिर पानकरती हैं। इसप्रकार उनका ध्यान करें ।। अव उनकी पूजा लिखीजाती है । सिद्धेश्वरतंत्र के मत से दक्षिणावद किन्तु अव्य बहित विद्यावत् है । यह कहा है । यथा-देवी का ऋषि न्यास और पूना पूर्वकी समान करनी चाहिये । पुरश्चरण से भी लक्षसख्या में जप करना चाहिये । उसमेंही कहा है । पया-इसप्रकार से ध्यान करके विधानानुसार एकलक्ष जप और इसके दांश होमादि कम्पमें प्रवृत्त होचे । है परानने ! पूर्वोक्त मंत्रराज का इसीप्रकार जप करै । अब देवी कालिका का अन्यतर श्रेष्ठ मत्र कहता इ, जिसके विज्ञानमात्र सी साधक २२१ पठ परिच्छेद । मम् ॥ येन विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तश्च साधकः । स्कन्धा- रूढ़महाकाली शिवादीश्वरसंयुता ॥ चन्द्रार्द्धविन्दुनाकान्ता तत्परोज्वलनाक्षरम् । नानाविन्दुकलासा महामन्त्रोदितः प्रिये ! ॥ इन्द्रारूढदिवानाथो भगतूर्यः स्वरान्वितः । क- लोविंदुसमायुक्तः कथितः कामतः प्रिये ! ॥ गोप्तव्योऽयं म. हामन्त्रो न देयो यस्य कस्यचित् । गुरुभक्ताय शान्ताय द- द्योदान्ताय चैव हि ॥ ध्यानं पूजादिकं देवि! सर्व पूर्ववदा- चरेत् । एकलक्षेण सिद्धिः स्यात् पुरश्चरणकर्मणि ॥ इति ।। अथ प्रकारान्तरं तदुक्तं कालीतन्त्रे । अभ्रातः संप्रवक्ष्यामि मन्त्रं कल्पद्रुमं परम् । येन जप्तेन विधिवत् सिद्धयोऽष्टौ भवन्ति हि ॥ अस्य स्मरणमात्रेण पलायन्ते महापदः । यस्य स्मरणमात्रेण वाचश्चित्रायते तृ- णाम् ॥ यज्ज्ञानादमरत्वञ्च लभेन्मुक्ति चतुर्विधाम् । ये ज- पन्ति परां देवीं नियमेन च संस्थिताः ॥ देवास्तांस्तु नम- जीवन्मुक्त होजाता है । "ही" यह महामंत्र गुप्त रक्खै । जिस किसी को इसका प्रदान न करै । जो व्यक्ति गुरुपक शान्त और दान्त (जितेन्द्रिय ) है, उसकोही इसका प्रदान करना चाहिये । हे देवि ! इसका ध्यान और पूजादि ममस्त पूर्ववत् विधानानुसार करै । पुरश्चरण कार्य में एकळा जप से सिद्धि होती है। अव प्रकारान्तर वर्णित होता है । कालीतंत्र में कहा है । यथा-इसके उपरान्त साक्षात् कल्पवृक्ष की समान सर्वोत्कृष्ट ( सब से श्रेष्ठ ) मंत्र कहता हूं । इसका विधिवत् जप करने से आठ प्रकार की सिद्धि हस्तगत होती है इसके स्मरण मात्रसेही समस्त महाआपद दूर होती हैं। और मनुष्यको वि- चित्र वाक्य उत्पन्न होते हैं । इसके विज्ञानमात्र से ही चार प्रकारकी मुक्ति और अमरत्व लाभ होता है । जो नियम के अनुसार होकर परादेवीका 4- २२२ .. श्यामारहस्य भा०टी०। स्यन्ति किं पुनर्मानवादयः । वृहस्पतिसमो वाग्मी धनैर्धन पतिर्भवेत् ॥ कामतुल्यश्च नारीणां रिपूणां स यमोपमः। तस्य पादाम्बुजद्वन्द राज्ञां किरीटभूषणम् ॥ तस्य भूति विलोक्यैव कुवेरोऽपि तिरस्कृतः। य एनां चिन्तयेदेवी नियतः पितृकानने ॥ तस्य चाज्ञाकराः सर्वे सिद्धयोऽष्टौ भवन्ति हि ॥ तस्यैव जननी धन्या पिता तस्य सुरोपमः। संप्रदाये च वक्ता स य एनां वेत्ति तत्त्वतः ॥ अस्य विज्ञानमालेण कुलकोटीः समुद्धरेत् । नन्दन्ति पितरः सर्वे गाथां गायन्ति ते मुदा ॥ अपि नः स कुले कश्चित् कुलज्ञानी भविष्यति । स धन्यः स च विज्ञानी स कवि स च पण्डितः ॥ स कुलीन स च कृतीस वशी स च साधकः । स ब्राह्मणः स वेदज्ञः सोऽग्निहोत्रीसदीक्षितः ॥ स तीर्थसेवी पीठानां स निवासी सासर्वदः । स सोमपायी स व्रती स यज्वा स परन्तपः॥ जप करता है, उसको संपूर्ण देवतागण नमस्कार करते हैं । मनुष्यादि की वा और क्या कहूं ? वह व्यक्ति वृहस्पति की समान वाग्मी, धन में धन पति, स्त्रीगणोंको कामदेवको समान और शत्रगणों को यमकी समान होता है, उनके दोनों चरणारविन्दों में राजा लोगों के किरीट का भूपण होता है। उसका विभव देखकर कुबेर तिरस्कृत होते हैं, जो व्यक्ति पितृ कानन में नियम परायण होकर इस देवीकी चिंता करता है, अष्टसिद्धि उसकी आमा कारी होती हैं । उस की ही जननी धन्य और उसी के पिता देवता की समान है, इस के विज्ञान मात्र से ही करोड कुळ का उदार होता है। उस के पितृगण आनंदित होते हैं और आहलाद में भर कर इस प्रकार गाया गाते हैं कि, हमारे कुळ में क्या कोई कुल नाना होगा ॥ १०॥ जो न्यकि इस के मन स्वरूपसे अवगत है, वही धन्य, वही विज्ञानी, वहीकवि वही पण्डित, बही फुटीन, वही कृती, वही साधक, वही ब्राह्मण, वो बेदन वहीं अमिहोत्री, वही दीक्षित, वही तीर्थ सेवी, वही सब पीठस्पळ का अं. विनिवासी, वही सर्वद, सोमपायी, व्रती, यागशील, परन्तप, और संन्यासी, , पष्ठ परिच्छेद। स सन्यासी स योगी वस मुक्तो ब्रह्मविच्च सः। स वैष्णवः स शैवश्च स सौरः स च गाणपः ॥ स च विज्ञानवेत्ता च य एनां वेत्ति तत्वतः। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सर्वावस्थासु सर्वदा ॥ एनां ध्यत्वा जपेन्मन्त्री सुखमोक्षमवाप्नुयात् ॥ विद्यारत्नं प्र- वक्ष्यामि श्रुत्वा कर्णावतंसवत् । मायाद्वन्द कूर्चयुग्म मैत्रान्त मादनत्रयम् ॥ मायाविन्द्वीश्वरयुतं दक्षिण कालिके पदम् । संहारक्रमयोगेन वीजसप्तकमुद्धरेत् ॥ एकविंशत्यक्षराढ्यस्ता- रायः कालिकामनुः । पूर्वोक्तमन्त्रराजस्य कुर्यात् पूजां वि. चक्षणः। भैरवतन्त्रेऽपि। 'मायाद्वयं कूर्चयुग्मं मैत्रान्तं मादनत्रयम् । मायावहीश्वर- युतं दक्षिणे कालिके पदम् ॥ संहारक्रमयोगेन वीजसप्तकम- द्धरेत् । एकविंशत्यक्षराढ्यस्ताराद्यो विश्वपूजितः॥ आकाश वामकर्णेन युतं विन्दुविभूषितम् । चतुर्थवीजमाख्यातं त्रैलो. क्यवशकारणम् । स्वाहान्तश्च त्रयोविंशत्यक्षरोमन्त्रराजकः। विशत्यर्णा महाविद्या स्वाहा प्राणविवर्जिता।ध्यानपूजादिकं सर्व दक्षिणावदुपाचरेत् ।। वहीं योगी, वहीं मुक्त, वही ब्रह्मज्ञ, वही वैष्णव, वही शैव, वही सौर, वही गाणपत्य, और वही विज्ञान वेत्ता हैं । इस लिये सब प्रयत्न सहित सर्वदा सर्व अवस्था में इस का ध्यान करके जपकरै । तो सुखी और मोक्ष भागी होता है। अब उल्लिखित विद्या रत्न कहता हूं । यह कर्ण का साक्षात् अवतंश है, श्रवण करो। डों ही,हीं, हु, हुं,की, क्रीं क्री, हुं, हुं, ही, ही, यह एक वि- प्रत्यक्षर मंत्र विश्व पूजित है, इस के उपरांत स्वाहा प्रयोग करने से त्रयो विंशत्यतर होता है । एवं स्वाहा और प्रणव निकालने से विंशत्यक्षरा महा विद्यारूप में परिणत होता है । इसकी ध्यान पूजादि समस्त दक्षिणाव की समान उपाचरण करें। - २२४ श्यामारहस्य भा० टी० । सिद्धसारस्वततन्त्रेऽपि। शृणु' दो ! प्रवक्ष्यामि कालिकामन्त्रमुत्तमम् ।मायाद्वयं कूर्चयुग्मं मैत्रान्त मादनत्रयम् ॥ मायाविंद्वीश्वरयुतं दक्षिणे कालिके पदम् ।संहारक्रमयोगेन वीजसप्तममुद्धरेत्॥द्वाविंश- त्यक्षरी विद्या वहिजायान्विता शुभा॥ कालिकाया महावि- या सिद्धिदा भुवनत्रये ॥ मायावीजैः पड़गानि महादेव्याः प्रकल्पयेत् ॥ भैरवो हि ऋपिश्छन्दोऽनुष्टुप् काली च देवता ।। अथ अन्यप्रकारम् । तदुक्तंकालीतन्त्रे। अथ वक्ष्ये महाविद्यां सिद्धिविद्यां महोदयाम् । ईश्वरेण पुरा प्रोक्तां देवी हृदय संस्थिताम् ॥ अस्या ज्ञान प्रभावेण कलयामि जगत्रयम् । प्रणवं पूर्व मुच्चार्य हृल्लेखावीज मुद्धरेत् ॥ रतिवीजं समुद्धृत्य प्रपंचमभगान्वितम् । ठद्र- येन समायुक्का विद्याराज्ञी प्रकीर्तिता ॥अनया सदृशी विद्या सिद्धेश्वर तंत्र में भी कहा है । हे देवि ! श्रवण करो, उत्कृष्ट कालिका मंत्र कहता हूं। मैं ही, ही, हु, हु क्री, क्री, क्री, दक्षिणे कालिके क्री, श्री क्री, हु, हु, ही, ही, स्वाहा । यह द्वाविंशत्यक्षरा विद्या साक्षात् कालिका है । इसका नाम महा विद्या है । यह तीनों भुवनमें ही सिद्धि प्रदान करती । माया वीज द्वारा देवी की पटग कल्पना करें। इस के ऋपि भैरव, छंद अनुष्टुप और देवता कालिका है। काली तत्र में अन्य प्रकार कहा है । यया । जिस के द्वारा निर्वाण मुक्ति लाभ होती है, वहीं सिद्ध विद्या महाविद्या कीर्तन करताहूं । देवीकी हृदय स्थिता यह विद्या महादेव ने स्वयं पहिले कही है । मैं इस केही ज्ञान के प्रभाव से शिभुवनकी सृष्टि स्थिति और संहार करताइ । प्रथम प्रणव उच्चारण करके फिर हल्लेखा वीज अर्थात् " ही " यह पद प्रयोग करै । फिर रति वीज अर्यात् । क्रीं । विन्यस्त करके मगान्वित अर्थात् एकार संयुक्त प पष्चम अर्थात् म मिलाकर खाहा के सहित अन्वित (युक्त) करै । इस का साकल्य में प्रयोग यही है । ओं ही की मे स्वाहा । इसका नाम विद्या .
षष्ठ परिच्छेद । २२५ कालीतन्त्रे सुगोपिता । वीजंच वीजमस्याश्च हल्लेखा शक्ति रुच्यते ॥ षदीर्घमायावीजेन प्रणवाद्येन कल्पयेत् । अष्टाङ्ग- कं ततोन्यस्य ध्यात्वा देवीं शिवो भवेत् ॥ खड्गोद्भिन्नेन्दु- विम्बस्रवदमृतरसनावितागी त्रिनेत्रा सव्ये पाणौ कपालाद्ग- लदसृजमथो मुक्तकेशी पिबन्ती। दिग्वत्रा वद्धकांची मणि- मयमुकुटाद्यैः संयुता दीप्तजिह्वा पायानीलोत्पलाभा रविश- शिविलसत्कुण्डलालीढ़पादा॥ जपेविंशतिसाहसं सहजैकेण संयुतम् । होमयेत्तदशांशेन मृदुपुष्पेण मनवित् ॥ त्रिकोण कुण्डमासाद्य सिद्धविद्यः शिवो भवेत् । पूजनंच प्रयोगच दक्षिणावदुपाचरेत् ।। एकाक्षऱ्या महाकल्प समानं सर्वमेव वा । रक्तपद्मस्य होमेन साक्षादै श्रवणो भवेत् ॥ विल्वपत्र- स्य होमेन राज्यं भवति निश्चितम् । रक्तप्रसून होमेन वशये राक्षी है । कालीतन्त्र में इसकी समान विद्या परमगुप्त रूपसे रक्षित हुई है। बीज इसका बीज और हलेखा इसकी शक्ति है । पड दीर्घ मायावीन द्वारा प्रणव युक्त करके कल्पना करै । अनन्तर प्रयान्यास करके देवीका ध्यान करने से साक्षात् शिव होता है । इसकी पुजादि समस्त दक्षिण कालिकाकी पूजा के समान करनी चाहिये । इसका ध्यान यथा-खड्ग खंडित इन्दु- खण्ड से जो अमृतरस विगलित होता है तिसके द्वारा उसका सर्वाङ्ग छावित है। उनके तीन नयन हैं। सव्य हस्त में नरकपाल है । उस कपाल से जो रुधिर गिरता है वह मुक्तकेशा हुई उसको पान करती है, वह दिग्बसा हैं, उसकी कमर तगडी के द्वारा अलंकृत है, उसके मुकुटादि मणिमय है, उस की जिह्वा अतीव उज्जव भाव युक्त है। उसकी आभा नीलकमळकी समान है, उसके दोनों चरण मत्यालीढ हैं । इस यंत्रसे एकविंशति सहस्त्र अर्थात् इक्कीस हजार जप करै । इसका दशांश मृद पुष्प द्वारा होम करै । त्रिकोण कुण्ड बनाकर इसप्रकार होम करने से विद्या सिद्ध और शिवस्वरूप लाभ होता है। लालकमल से होम करने पर साधक साक्षात् वैश्रवण (कुवेर) होजाता है। वेलपत्र के द्वारा होम करने से निसंदेह राज्य लाभ होता है, २२६ श्यापारहस्य भा०टी० । दखिलं जगत् ॥पीतपुप्पस्य होमेन स्तम्भयत् विश्वमप्यथ। मालतीपुष्प होमेन साक्षाद्वाक्पति सन्निभः ॥ कृष्णपुष्पस्य होमेन शत्रून् मारयतेऽचिरात् । अत्र सर्वस्य होमेन संख्या स्यादयुतं किल ॥ अस्याः स्मरणमात्रेण महापातक कोटयः। सद्यः प्रलयमायान्ति साधकः खेचो भवेत् ॥ अथ कालिकामन्त्रान्तरं तदुक्तं स्वतन्त्रे । श्मशानकालिकामन्त्रं शृणुष्वावहिता शिवे ! । वाणी मायां ततो लक्ष्मी कामवीजं ततःपरम् ॥ कालिका संपुटत्वेन च तुष्कं वीजमालिखत् । एकादशार्णा देवेशि ! चतुर्वर्गप्रदायि नी॥ ऋपि गुर्वृहच्छन्दो देवता कालिकापरा । श्मशाना- या च यां माये वीजशक्ती महेश्वरि !॥ कीलकं कामवीजंतु शृणु पूजाविधिं प्रिये ! चतुर्द्विस्त्रिश्चतुर्वणैर्विद्यामनं पड़ङ्गकम्॥ लाल पुष्प के द्वारा होम करनेसे समस्त जगत् वशीभूत होता है । पीलेपुष्प द्वारा होम करने से विश्व ससार स्तम्भित होता है । मालनी पुष्प के द्वारा होम करने से साक्षात् वाक्पति की समानता लाभ होती है ! काले पुष्प के द्वारा होम करने से शत्रफलको तत्काल निर्मुल करसक्ता है । इस स्थल में सबकी होग संख्या अयुत ( दश हजार ) है । इसके स्मरणमात्र सेही करोढ करोड महापातक तत्काल नष्ट होते है और साधक खेचरत्व लाम करता है ।। स्वतत्र कालिका का महामन्त्र कहागया है, यथा-हे शिवे ? श्मशानका लिका का मत्र मन लगाकर श्रवणकरो ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं यह एकादशातर मंत्र, शमशान कालिका का मत्र है । इसके द्वारा चतुर्वर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ, काम मोक्षकी प्राप्ति होती है । इसके ऋषि भृगु, छन्द, हत्, देवता परात्पर रू. पिणी कालिका, पानीज और मायाशक्ति और कीलक कामवीज है । हे प्रिय ' इस की पूजा विधि का वर्णन करताह, मुनो । चार, दो तीन २२७ पष्ठ परिच्छेद । विन्यस्य ध्यानं कुर्वीत कालिकायाः समाहितः । अजनाद्रि निभां देवीं श्मशानालयवासिनीम् ॥ त्रिनेत्रां मुक्तकेशीच शुष्कमांसातिभीपणाम् । पिङ्गाक्षी वामहस्तेन मद्यपूर्णकपा- लकम् ॥ सद्यः कृत्तशिरो दक्षहस्तेन दधतीं शिवाम् । स्मि- तवक्तां सदा चाममांसचर्वणतत्पराम् ॥ नानालङ्कारभूपाङ्गीं नृत्योन्मत्तां सदासः । एवं ध्याता जपेदेवीं श्मशाने तु विशेषतः ॥ गृहे वापि गृहस्थश्च मत्स्यैमासैः सुशोभनैः । नग्नो भूत्वा महापूजां कुर्याद्रात्रौ विशेषतः ॥ पद्मं चाप्टदलं वृत्तं तद्वारा धरणीतलम् । चतुरिसमायुक्तं मध्ये मूलं स. मालिखेत् ॥ दलेष्वष्टासु विलिखेत् कवर्गाद्यष्टवर्गकम् । ध- रण्यां विलिखेदाचं चतुष्कञ्च चतुष्ककम् ॥ पूर्वादि चोत्त- रान्ताशां मध्ये देवी प्रपूजयेत् । ब्राह्मयाद्याः पूजयेन्मातृद- अथवा चारों वर्ण के द्वारा पडङ्ग विद्या मंत्र विन्यस्त कर समाहित हो देवी कालिका का ध्यान कर वह अजन पर्वत की समान, मशानालय वासिनी त्रिनेत्रा मुक्तकेशी, शुष्कमामा अतिभयंकर और पिङ्गाक्षी हैं । उनके वाम हस्त में मद्य पूर्ण कपाल दक्षिण हाथ में सद्य छिन्न मत्तक, और उनका बदन मण्डलस्मित विकसित ( प्रसन्नता से खिलाहुआ) है । यह सर्वदा आम मांस चर्वण करती हैं, वह अनेक गहनों से भूपिताही और राशि राशि आम मांस पान करके सदा नृत्य में उन्मत्त है । इस प्रकार ध्यान करके जप करना चाहिये । विशपतः श्मशान आश्रय करके जप करै । अथवा गृहस्थ घर में भी शोभित मत्स्य और मांस प्रदान पूर्वक नग्न होकर महा- पूजा करै । रात्रि में इसमकार पूजा करनाही विशेष विधि है । अष्टदल पर और उसके बाहर चतुर युक्त धरणी तक में मूल अंकित करै । अष्ट- दल में कवर्गादि अष्टवर्ग लिखकर धरणी में श्राय चतुष्क प्रत्येक में अंकित कर मध्य में पूर्वादि उत्तर दिन में देवीकी पृना करनी चाहिये । पूर्व की समान अष्ट मावदल में ब्राह्मी इत्यादि की अर्चना करै । है प्रिये ! - श्यामारहस्य भा०टी०। लेष्वष्टासु पूर्ववत् । भैरवानसिताङ्गाद्यान् धरण्यां पूजयेत् प्रिये !॥ अथ पुरश्चरणनियमो यथा-तदुक्तं स्वतन्त्रे । वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं तदशांशेन होमयेत् । वर्णलदं मन्त्र- वर्णसंख्याजपमित्यर्थः । रजखलां स्त्रियं गत्वा रेतोरुधिरसं. युताम् ॥ मयं चारविधं मांसं मत्स्यं बहुविध प्रिये ! । नैवेयं चात्मसात् कृत्वा कालीभक्तिपरायणः । तदा भोगच मोक्ष- ञ्च लभते नात्र संशयः ॥ । अथ मन्त्रान्तरम् । कामवीज समालिख्य कालिकायै पदं लिखेत् ।नमोऽन्तेन च देवेशि ! सप्तार्णो मनुरुत्तमः ॥ सर्वाङ्ग कालिका देवी अन्यत् फिर धरणीतळ पर असिताङ्ग इत्यादि भैरव गणों के पूजन में मवृत्त होना चाहिये ॥ अब पुरश्चरण-नियम कदाजाता है । यथा-स्वतंत्र में कहा है, वर्ण लक्ष मंत्र जपकर उसके दशांश में होम करै । वर्णलक्ष शब्द में मंत्र वर्णकी संख्यानुसार जप है । रजस्वला श्री के सहित संगत और काली के प्रति- भक्ति परायण होकर शुक्र शोणित संयुक्त मद्य आठ प्रकारका मांस, अनेक प्रकार के मत्स्य और नैवेद्य प्रात्मसात् ( भक्षण करने ) से भुक्ति ( भोग) मुक्ति ( मोक्ष ) लाभ होती है । इसमें संदेह नहीं । अब मन्त्रान्तर लिखाजाता है। प्रथम 'क्ली' फिर 'कालिकायै' और त. परान्त 'नम:' शब्द प्रयोग करे। अर्थात् 'क्ली कालिकाय नमः साधक या . ।
२२९ सप्तम परिच्छेद । सर्वन्तु पूर्ववत् । गुरोश्चापिकृपां लब्ध्वा सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् इतिमहामहोपाध्यायश्रीपरपइंसपरिवाजक श्रीपूर्णानन्दगिरिविरचिन श्यापारहस्ये पंत्रभेदविवरणनाम पठः परिच्छेदः। अथ सप्तमः परिच्छेदः। अथ विद्यामाहात्म्यं । तदुक्तं कालीतन्त्रे गुणं समस्तविद्यानां वाग्भिः स्तोतुं न शक्यते । वक्तको टिसहस्रेस्तु जिह्वाकोटिशतैरपि ॥ सर्वसिद्धिप्रदा भूमिरनि- रुद्धसरस्वती। तस्मात् तस्या ज्ञानमात्रात् सिद्धयोऽष्टौ भवन्ति हि॥ अनिरुद्धसरस्वत्या ज्ञानमात्रेण साधकः। पाण्डित्ये च सप्ताक्षर मंत्र गुरुकी कृपा से काम करने पर सब प्रकारको सिदि लाभ क- रने में समर्थ होजाता है ।। इतिश्री महामहोपाध्यायश्रीपरमहंसपरिवामक श्रींपूर्णानंदगिरि विरचित श्यामारहस्येमाघाटीकासहितमन्त्रभेदविवरणनाम षष्ठपरिच्छेदसमाप्त ॥ ६ ॥ अव विद्या माहात्म्य कहाजाता है । काली तंत्र में कहा है । यथा- करोड़ हजारवक और करोड-शत जिवा प्राप्त होने पर भी वाग्मी व्यक्ति समस्त विद्याओं कास्तव नहीं करसकता । अनुरुद्ध सरस्वती सब प्रकारकी सिदि प्रदान करती है । इस लिये उनके ज्ञान मात्रसे आठ प्रकारको सिदि संग्रह होती है। अधिक क्या साधक अनिरुद्ध-सरस्वती के ज्ञान मात्र से ही पाण्डित्य और कवित्व शक्ति में स्वयं वार पति की समान होता है।
श्यामारहस्य भा०टी० । कवित्वे च वागीशसमतां व्रजेत् ॥ तस्य पाण्डित्यवैदग्ध्य विचित्रपदजल्पनात् । देवा अपि विलज्जन्ते किं पुनमानुषा- दयः ॥ अपि चेत् त्वत्समा नारी मत्समः पुरुषोऽस्ति चेत् । अनिरुद्धसरस्वत्याः समानो नास्ति वैभुवि ॥ अस्या जपो ब्रह्मजपो महाशोके महोत्सवे । महामोहे महासौख्ये महा- दारिद्र्यसङ्कटे ॥ योगसंसाधनं सम्यग् ध्यानमस्या न संश- यः।महापदि महापापे महाग्रहनिवारणे ॥ महाभयमहोत्पाते महाशोके महोत्सवे । महामोहे महासौख्ये महादारियस- ङ्कटे ॥ महारण्ये महाशून्ये महाज्ञाने महारणे । दुरापदि दुरावासे दुर्भिक्षे दुर्निमित्तके ॥ समस्तक्लेशसंघात स्मरणा- देव नाशयेत् । अस्या ज्ञानं ज्ञानमेव ध्यानमस्याश्च चिन्तं. नम् ॥ तस्मादस्याः समा विद्या नास्ति तन्त्रे न संशयः । श्मशानशयनो वीरः कुलस्त्रीभिर्विहारवान् ॥ कुलामृतनिषेवी उसके पाण्डित्य वैदग्ध ( पांडित्य की चतुरता ) और विचित्र पद जल्पना से देवता गण और पंडित गण लज्जित होते हैं, मनुष्यादि को तो पातही क्या है, कदाचित् तुम्हारी समान स्त्री और मेरी समान पुरुषहो किन्तु अनि रुद्ध-सरस्वती की समान कोई नहीं है । इस का जप साक्षात् ब्रह्म जप है। ज्ञान, शोक, महोत्सव, महामोह महा सौख्य, महा दारिद्रसंकट सर्वत्रही यह जप ब्रह्म जप होता है । इस का ध्यान भी सब प्रकार समुदय योग स्वरूप है, इस में संदेह नहीं । महा आपद, महापाप, महाग्रहनिवारण, महा भय महोत्पात, महा शोक ? महोत्सव, महा मोह, महा सौख्य, महा दारिद्य संकट, महा बन, महा शून्य, महा ज्ञान, महारण, दुरावास, दुर्भिक्ष, दुनिमिच और समस्त क्लेश उपस्थित होनेपर इसका स्मरणकरै । इसका ही ज्ञान ज्ञान है, इसकाही ध्यान आत्मचिन्तन है । इसी कारण तंत्र में इसकी समान विद्या नहीं है । जो व्यक्ति श्मशान में शयन करके वीराचार अबलम्बन और कुळ स्त्रीगणों के समभिन्याहार में बिहार और कुलामृन निपेत्रण पूर्व का २३१ सप्तम परिच्छेद । च कालीतत्वार्थचिन्तकः । ब्रह्मादि वने तस्य संमो नास्ति कुतः परः ॥ स एव सुकृती लोके स एव कुलभूषणः । धन्या च जननी तस्य येन देवी समर्चिता ॥ धनेन धननाथश्च तेज- साभास्करोपमः। देगेन पवनो ह्येष येन देवी समर्चिता। गा- नेन तुम्वुरुः साक्षात् दानेन वासबो यथा। दत्तात्रेयसमो ज्ञानी येन देवी समर्चिता ॥ वहिरिव रिपोर्हन्ता गङ्गेव मलनाशकः । भुवि सूर्यसमः साक्षादिन्दोरिव सुखप्रदः ॥ पितृदेवसमःसाक्षात् कालस्पेवदुरासदः । समुद्र इव गम्भीरो निभृतेरिव दुर्द्धरः।। वृहस्पतिसमो वक्ता धरणीसदृशः क्षमी। कन्दर्पसदृशः श्रीमान् येन देवी समर्चिता ॥ सर्वभाग्ययुतो लोके कुलज्ञानी भविष्यति । तेषां मध्येऽपि यः कोऽपि का- लीसाधनतत्परः ॥ त्यजसि त्वं न कदाचित् पुमांसं परमं प्रियम् । मादृशन्तु क्वचित् काले त्यजसि त्वं शुचिस्मिते ! ॥ ली के तत्वार्थ की चिन्ता करता है, ब्रह्मादिक भी उसकी समान नहीं हो सकते, अन्यकी तो वातही क्या है ? वही व्यक्ति सुकृती, वही कुलभूपण और उसी की जननी धन्य है वही धन में कोर के समान, तेज में सूर्य के समान वेग में पवन के समान, गान में तुम्बुरू के समान, दान में वासबकी समान, और ज्ञान में दत्तात्रेय की समान, होता है और वही व्यक्ति अमि की समान शत्रुविनाश करता है, गंगा की समान मल नाशकरता है, चन्द्रमा की समान मुख देता है, अग्नि की समान पवित्रता साधन करता है । हे शम्भो ! वह व्यक्ति यमकी समान काल को भी दुराक्रम्य वागीश्वर की समान गंभीर निति की समान दुर्द्धर वृहस्पति की समान वक्ता धरणीकी समान क्षमा शील और कामदेव की समान स्त्री गणों को मनोहर होता है । आहा | संसार में यही सौभाग्य है कि मनुष्यको लोक में कुल ज्ञानी होना चाहिये और इस के अतिरिक्त काली साधन में तत्पर होना चाहिये । हे शुचिस्मते ! यद्यपि तुम मेरी समान व्यक्ति को किसी समय
२३२
श्यामारहस्य भा० टी०।
किन्तु कालीज्ञानिनञ्च त्यक्ष्यसि न कदाचन । न हि का
लीसमा पूजा न हि कालीसमं फलम् ॥न हि कालीसमं
ज्ञानं न हि कालीसमं तपः । ये गुणाः परमेशस्य पञ्चक-
त्यविधायिनः ॥ ते गुणा सन्ति सर्वेऽपि कालीतत्वस्य ज्ञा.
निनः । कालिकाहृदयज्ञानी कालीसाधनतत्परः ॥ देववत्
मानुषो भूत्वा लभेत् मुक्तिं चतुर्विधाम् । इति ते कथितं
सम्यक् कालिकातत्वमुत्तमम् ॥ भनेन सम्यगास्थाय सर्व
कामफलं लभेत् ॥
इति श्यामारहस्ये विद्यामाहात्म्पकथनं नाम
सप्तमः परिच्छेदः।
.
.
त्यागकरदो, किन्तु अपने परमप्रिय पुरुषको कभी नहीं छोडती हो, और
जो व्यक्ति कालीज्ञान युक्त है अर्थात् जिसको काली का मान है, उसका
भी तुम कभी त्याग नहीं करती हो । कालीकी समान पूजा नहीं, कालीकी
समान फल नहीं, काली की समान ज्ञान नहीं और काली की समान तप
स्या नहीं है, साक्षात् परमेश्वर का पंचकृत्य विधान करने से जो समस्त
गुण उत्पन्न होते हैं, कालीतत्व के भी वही सब गुण है इसमें अन्यथा नहीं
है । जो व्यक्ति कालीहृदय ज्ञानी और सत्य साधन में तत्पर है,
होकर भी देवताकी समान होकर चार प्रकार की मुक्ति लाभ करता है ।
यह मैंने तुम्हारे निकट कालिकातत्वका वर्णन किया।
वह मनुष्य
इतिमहामहोपाध्यायश्रीपरमहंसपरिवामकश्रीपूर्णानन्दगिरिविरचित
श्यामारहस्येमाषाटीकासहितविद्यामाहात्म्यकथननाम
सप्तमपरिच्छेदसमाप्त ॥ ७ ॥
अष्टम परिच्छेद । अथ अष्टमः परिच्छेदः । .. अथ आचारक्रमो लिख्यते तदुक्तं कालीतन्त्रे । ईश्वर उवाच । अथाचारं प्रवक्ष्यामि यत्कृतेऽमृतमश्नुते । सर्वभूतहिते युक्तः समयाचारपारगः ॥ अनित्यकर्मसंत्यागी नित्यानुष्ठान तत्परः । परायां देवतायाञ्च सर्वकर्मनिवेदकः ॥ अन्यम- न्त्रार्चनश्रद्धा मन्पमन्त्रप्रपूजनम् । कुलस्त्रीवीरनिन्दाञ्च तथा वेश्योपसङ्गमम् ।। स्त्रीपु रोपं प्रहारञ्च वर्जयेत् मति- मान् सदा । स्त्रीमयञ्च जगत् सर्वं चिन्तयेत् साधकोत्तमः ॥ स्त्रीद्वेषो नैव कर्तव्यो विशेषात् पूजनं स्त्रियः । जपस्थाने महाशङ्ख निवेश्योर्ध्व जपं चरेत् ॥ स्त्रियं गच्छन् स्पृशन् प. श्यन् विशेषात् कुलजां शुभाम् ॥ भक्षस्ताम्बूलमद्यांश्च भ- क्ष्यद्रव्यान् यथारुचीन् । मांसमत्स्यदधिक्षौद्र पयः शाकाय अंब आचार क्रम लिखाजाता है । काळीतन्त्र में कहा है । यथा-ईश्वर (शंकर ) ने कहा -अनन्तर जिसके द्वारा अमृत भोग कियाजाता है उसी श्राचार क्रमको कहता हूं । सर्व भूतोंके हित्तानुष्ठान में आसक्त और समया बार पतपणा होना चाहियो, अनिवफ वाप' और नित्यकर्म के अनुसार में तत्परताका अवलम्बनकर, परदेवतामें समस्त कर्म निवेदनकर अन्य मंत्र की अर्चना में श्रद्धा, अन्य मंत्र की पूजा, कुलस्त्री और वीर व्यक्ति की निंदा, उन में वेश्योपहारण स्त्री गणों के प्रति क्रोध दिखाना और उनको प्रहरण इन सब बातों का सर्वदा परित्याग करै,समस्त जगत् को स्त्री पय देखे, और स्वयं भी स्त्री मयहो, स्त्री गों के प्रति दोष परित्याग करे, विशेष प्रकार से उनकी पूजा करे, जपस्थान के ऊर्द्ध भाग में महा शंख निवेशित करके जप करें, स्त्री के एवं विशेष करके कुछजा और शुद्ध स्वभाव स्त्री के सहित संगतहो, उसको स्पर्श कर ताम्यूळ, गद्य, यथा रुचि भक्ष्य द्रव्य, मांस, दधिक्षाद्र दुग्ध, ऐक्षव, और भक्कादि अनेक प्रकारके खाद्य स्वयं , २३४ । श्यामारहस्य भा० टी० । मैक्षवम् ॥ भक्तायशेष भक्ष्याणि दत्वा तत्र अपं चरेत् । दिकालनियमो नास्ति स्थित्यादिनियमस्तथा ॥ न जपेका- लनियमो नार्चादिषु वलिष्वपि । स्वेच्छानियम उक्तोहिम हामन्त्रस्य साधने॥वस्त्रासनस्थानदेह स्पर्शादिगेहवाधनात् ॥ नास्त्यशुद्धिरिह कापि निर्विकल्पं मनश्चरेत् । सुगन्धि श्वेत लौहित्यकुसुमैरर्चयेतत्तः । वन्यैर्मरुकायैश्च तुलसीवर्जितः शुभैः ॥ पेयं चयं तथा चोष्यं भक्ष्यं भोगं गृहं सुखम् । स. वंच युवतीरूपं भावयेद् यतमानसः॥ कुलजां युवतीं वीक्ष्य नमस्कुर्यात् समाहितः । यदि भाग्यवशेनैव कुलदृष्टिस्तु जायते ॥ तदेव मानसीं पूजां तत्र तासां प्रकल्पयेत् । वाला वा यौवनोन्मत्तां वृद्धा वा सुन्दरीं तथा ॥ कुत्सितां वा महा: दुष्टों नमस्कृत्य विभावयेत् । तासां प्रहारं निन्दाच कौटि- ल्पमप्रियं तथा।। सर्वथा न च कर्तव्यमन्यथा सिद्धिरोधकृत। भक्षण और उस को प्रदान करके जप करै । इस विषय में दिक् काल का नियम और स्थित्यादि की भी व्यवस्था नहीं है, बलि और पूजा में भी इसी प्रकार कालादि का निपम नहीं है, केवल मन को निर्विकल्प (ए काय) करना चाहिये, किसी प्रकार द्वेषभाव का प्राश्रय न करे, मुन्दर गध युक्त श्वेत और लाल वर्ण के कुल कुसुमसे एवं विच और मरुषकादि समस्त पुष्पद्वारा पूजा करे, तुलसीके द्वारा पूना न करे,चर्य चोप्य लेस, पेप भोग मौर मुख, व गृह जिसमें मन आसकहो, उन सब को युक्ती रूप में भावना करें, यदि फलजास्त्रीदिखाई दे तो सावधान होकर उसको नमस्कार करे, यदि भाग्यवश फुल दृष्टि संघटित हो, तो समकाल के समय ही बस की मन मन में पूना करनी चाहिये । वह बाला हो यौवनोन्मता, वृद्धा, मुन्दरी, फरिप्तत भौर दुष्टा, जो कोई क्यों न हो, नमस्कार करके चिन्ताकरे । उसको कभी हार न करे, निन्दा न करे, उनको टिळता न दिसा, भिप अनुष्टान न करे, भली भांति इन सब कार्यों को दूर करे, दर न करने से सिाद में पिन होता है, तो गणही देवता, खी गणही माण, पारसी , अश्म परिच्छेद। लियो देवाः स्त्रियः प्राणाः स्त्रिय एव विभूषणम् ॥ स्त्रीस- हिना सदा भाव्यमन्यथा स्वस्त्रियामपि । विपरीतरता सा तु भविता हृदयोपरि ॥ नाधर्मो जायते सुभ्र ! किंच धर्मो महान् भवेत् । स्वेच्छाचारोऽत्र गदितः प्रचरेत् हृष्टमानसः ।। इत्याचारपरः श्रीमान् जपपूजादितत्परः। पानतः कुलतन्वीं- नां परतत्त्वे प्रलीयते ॥ कौलतन्त्रेऽपि । शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि कौलिकाचरणं यथा । पाने भ्रा. न्तिर्भवेद् यस्यघृणा स्याद्रक्तरेतसोः॥शुद्धौ चाशुद्धता भ्रांतिः पापशङ्का च मेथुने । स भ्रष्टः पूजयेदेवीं चण्डीमत्रं कथं ज- पेत् ॥ रोगी दुःखी भवेद्देवि ! रौरवे नरके वसेत् । पंचमानु परं नास्ति शाक्तानां सुखमोक्षयोः ॥ भावरूपा च या देवी रेतःप्रीता सदानधे !। रेतसा तर्पणं तस्या मथैर्मासैः सम गणही निषा है, इस कारण सर्वदा स्त्री संगी होनाचाहिये, अन्यथा अपनी स्त्री का संसर्गी हो, उस स्त्री के हृदयोपरि विपरीतरताहोने से भी कुछ अधर्म नहीं होना; वान महान् धर्म संचित होता है, इस विषय 'में खेच्छाचार लिखा गया है, परमहष्ट चित्त से आचरण करे, इस प्रकार आचार परायण और पूनादिमें तत्पर होकर, कुलाइनागों का पान करने से परम सत्व में लयको प्राप्त होता है | कौलतन्त्र में भी कहा है । हे देवि ! श्रवण करो, कोरका चरण कीर्तन करता हूं । पान में भ्रांतिमान, शोणित और शुक्र में घृणामान, शुद्धि में अशद्धज्ञानवान् भोर मैथुन में पाप शनायान् हाने से, सर्बया भ्रष्ट होजाता है। देवीकी पूजा में और उसके मन्त्र जप में फिर अधिकार नहीं रहता, रोग और इस समस्त सदा आक्रमण करते है, रौरव नरक में सदा पास होता है। पर मकार की अपेक्षा शाक्तगणों के सुख और मोक्ष साधन का अग्य पाय नहीं है । हे अन ! देवी चण्डिका भावरूप हैं इसलिये सर्वदासी रेत प्रिय हैं । इसीलिये मथ और मांस की सगान रेतः मारा ।
श्यामारहस्य भारी । प्रिये ! ॥ केवलैः पंचमैदेवि ! सिद्धो भवति साधकः। ध्या. वा कुण्डलिनी शक्तिं रमन् रेतो विमुञ्चयेत् ॥ अमन्त्रा च यदा नारी रसाद यत्नात्तु लभ्यते । आत्मदेहस्वरूपेण तत्कणे मंत्रमुच्चरेत् ॥ ततश्च शक्तिरूपा स्यात् भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी रम्भा च उर्वशी मुख्या या नारी गगने भुवि ॥ पाताले वा स्थिता या च तस्या नाथस्तु कौलिकः । तस्यापि वा या नार्यस्तस्याः शृणु विधिं प्रिये ! ॥ गुरुरेव शिवः साक्षात तत्पत्नी परमेश्वरी । मनसा कर्मणावाचा रमणं तत्रवर्जयेत् ॥ तस्य देवपदे भक्तो मुक्ति प्राप्य परां व्रजेत् । गुरोः स्नुषा गुरोः कन्या तथा च मन्नपुत्रिका ॥ एतस्या रमणं वज्र्य ब्रह्मघ्नं मानसेऽपि च । कौलिकस्य च पत्नी च सा साक्षा दीश्वरी शिवे ! ॥ तस्या रमणमात्रेण कौलिको नारकी भवेत् । मातापि गौरवाद्वा अन्या या विहिताः स्त्रियः॥ भूतियागे उनका तर्पण करै । हे देवि ! साधक केवल पष्चमकार तत्व द्वाराहीसिदि लाभ करता है । कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करके, रमण करता हुआ, रेत विसर्जन कर, मत्रहीन रमणी के रस और यत्न वलसे प्राप्त होने पर यात्म देह स्वरूप उसके कानमें मन्त्र उच्चारण करे, तो वह शक्तिरूप होकर मोग और मुक्ति प्रदान करती हैं, आकाश, पाताल अथवा पृथिवी में रम्मा और उर्ची प्रमुख जो सम्पूर्ण वरानना हैं, कौलिकही उनके नाथ हैं। तिन में उन वर्जनीय रमणी की विधि श्रवण करो । गुरुही साक्षात् शिव और उनकी पत्नीही साक्षात् महेश्वरी है । अतएव कायमन वचन से उनके स हित ससर्ग परित्याग करै । गुरुकी पुत्रवधू, गुरुकी कन्या, अथवा गुरुकी मन्त्रपत्रिका, इनका मी ससर्ग वर्जन कर, मन मन में भी संसर्गी होने से ब्रह्महत्या के पातक का भागी होना होता है। शिव.कौळिकको पनी भी साक्षात् महेश्वरी है, अतएव उस के संसर्गमात्र से कौलिक को नरक गामी होना होता है, जननी को भी गौरव साहित वर्मन करे. जननीकी अष्टम परिच्छेद । च कर्तव्ये विचारो मंत्रवित्तमः । अन्यस्थाने विचारे च दे. वीशापः प्रजायते ॥ शिवहीना च या शक्तिर्दूरं तां परिवर्ज येत् । अभिपेकाद् भवेत् शुद्धिमन्त्रोच्चारणतः श्रुतौ ॥ पंच. मेन च देवेशि ! सर्वपापैः प्रमुच्यते । केवलेनाद्ययोगेन सा- धको भैरवो भवेत् ॥ द्वितीयेन महेशानि ! पूजको ब्रारूप भाक् । केवलेन तृतीयेन महाभैरवतां नजेत् ॥ चतुर्थेन तु तत्वे न भुवि पूज्यैकनायकः । परे च परतां याति मम तुल्यः परेश्वरि ! ॥ पंचमेन भवेद्योगी सर्वसिद्धिपरायणः । इतीदं कथितं देवि ! सुगोप्यमतियत्नतः ॥ न देयं पशवे देवि ! कुलनिन्दापराय च । कुलाचारगृहं गत्वा भक्त्या पापविशुद्धये॥ याचयेदमृतं ज्ञानं तदभावे जलं पिवेत्। कुलाचारो हि यच्छ- क्या दत्तं पात्रन्तु भक्तितः ॥ नमस्कृत्य प्रग्रहीयात् अन्यथा नरकं व्रजेत् ॥ समान सम्पूर्ण विहित स्त्री भी वजनीय हैं । भूतियाग के समयही विचार करें । अन्य स्थल में विचार करने से देवी शाप देती है । जो शक्ति शिव हीन है, उसको दूरसेही विसर्जन करै । अभिषेक और कर्ण में मन्त्र दान करनेसेही शुद्धि संघटित होती है । हे देवेशि । पञ्चमकार तत्त्व द्वाराही सरकार का थप दूर होता है। केवल आदि योग सेही साधक भैरव होजाता है । द्वितीय योग में पूजा करने से ब्रह्मका स्वरूप प्राप्त होता है- केवळ तृतीय द्वारा आराधना करने से, महाभैरव होजाता है. चतुर्ष तत्व द्वारा पूजा करने से, एक नायक एवं मेरी समान होजाताई. पञ्चतत्व द्वारा पूजा करने से सर्व सिद्धि परायण योगी होता है । हे देवि ! मैंने जो यह कहा, अति यत्न से और अत्यन्त गुप्तरूप से इसकी रक्षा करै । हे देवि ! पशु और कुळनिन्दक को इसका दान न करै । कुलाचार गृह में गमन कर के पाप शदि के लिये भक्ति सहित ज्ञानरूप अमृत की प्रार्थना करे। उसके न होने से जल पान करै । कुलाचार शक्ति के द्वारा जो पात्र भक्तिपूर्वक दान करै, नमस्कार के पुरस्कार में उसे श्रद्धा सहित ग्रहण करै । इसके श्यामारहस्य भा० टी. । अन्यत्रापि। वृथा कालं न गमयेत् द्यूतक्रीडादिना सुधीः। गमयदेव. तापूजाजपयागस्तवादिना ॥गुरोःकृपालापकथास्तोत्रागमवि- लोकनैः। गमयेदनिशं कालंन वदेत् परदूषणम् ॥ प्रत्यक्षे वाप- रोक्षेवा प्रत्यहं प्रणमेद् गुरुम् । गुरोरने पृथक् पूजामौद्धत्यञ्च विवर्जयेत् ॥ दीक्षां व्याख्यां प्रभुत्वञ्च गुरोरगे न कारयेत् । गुरुशय्यासन यानं पादुकोपानही तथा ॥ स्नानोदकं तथा च्छायां लकनं न कदाचन । श्रीगुरुं कुलशास्त्राणि पूजास्था- नानि यानि च ॥ भक्त्या श्रीपूर्वक देवि ! प्रणम्य परिकी- येत् । गुरुनाम न भाषेत जपकालादृते प्रिये ! ॥ श्रीनाथ देवस्वामीति विवादे साधने वदेत् । उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरी- यान् मन्त्रदः पिता ॥ तस्मान्मन्ये च सततं पितुरप्यधिक अन्यथा करने से, नरक में गमन करना होता है । अन्यत्र भी कहा है- सुबुद्धि व्यक्ति तक्रीटादि के द्वारा वृथा काळ व्यतीत न करे, देवताकी पूजा जप याग और स्तवादि द्वारा उसको वितावे । अधिक क्या गुरुकी कपा अलापवार्ता स्तोत्र और बागम विलोकन इत्यादि द्वारा मर्वदा काळ विताने में प्रवृत्त होवे; पराये दूषणको दूर करै । प्रत्यक्ष अथवा अपरोध में प्रतिदिन गुरुको प्रणाम करै । गुरु के सन्मुख में पृयक् पूजा और औदत्य त्याग कर और कमी दीक्षा व्याख्या भौर प्रभुत्व प्रकाश न करे । गुरुकी शरया, आसन, यान, पादुका, उपानव, मानकाजल, छाया इन सबकोकभी उलंघन न कर. श्री गुरु, कुलशास्त्र, पूजास्थान, इन सबको भक्ति सहित प्रणाम करके, श्री पूर्वक परिकार्चन करै । हे प्रिपे । जप समय के अतिरिक और किसी समय गुरुका नाम उच्चारण न करै । विवाद मौर साधन समय में 'श्रीनाप देवस्वामी' इसमकार कहना चाहिये । जनक और ब्रमदाता इनदोनों में मन्नदादाही श्रेष्ठ है। इसलिपे गुरुको पिता की अपेक्षा भी सदा अधिक मान करना चाहिये । पसाचार और गुरु इनकी मन में भी निंदा २३९ मष्टम परिच्छेद। गुरुम् । कुलाचारं गुरुं देवं मनसापि न निन्दयेत् ॥ कुलस्त्री- वीरनिन्दाञ्च वर्जयेत् मतिमान् सदा । अन्तः शाक्ता वहिः शैवाः सभायां वैष्णवा मताः ॥ नानामूर्तिधराः कौलाः वि. घरन्ति महीतल ॥ निगमे तु- गुरुणालोकितः शिष्य उत्तिष्ठेदासनं त्यजेत् । गुरुणा स- दसदापि यदुक्तं तन्न लड़येत् ॥ रभसं मैथुनं मिथ्या यो व. देदन्तिके गुरोः । सयाति नरकं घोरं भैरवेण च भाषितम् ॥ सक्रान्तिनवमी पूर्णा चाष्टमी च चतुर्दशी । एकादशी व्य. तीपाते कर्मलोपं न कारयेत् ॥ तत्त्वहीनं कृतं कर्म जपकर्म च निष्फलम् । शाम्भवी कुप्यते तेभ्यो ब्रह्महत्या दिने दिने । भावचूडामणौ च। एकाकी निर्जने देशे श्मशाने निर्जने वने । शून्यागारे न. दीतीरे निःशङ्को विहरेत् मुदा ॥ वीराणां जपकालस्तु सर्व- । न करे, बुद्धिमान व्यक्ति सर्वदा कुळ स्त्री और वीरगणों की निन्दा परि- त्याग करे । कोळगण अन्तर में शाक्त, बाहिर शेव और सभा में वैष्णव इसप्रकार विविध मूर्ति धारण करके पृयिनी में विचरण करें । निगममें कहा के दर्शन मान सही शिष्य आसन त्याग करके छठ खडा हो । गुरु जो कहे सत् वा असत् होने से भी, उसका उल्लंघन न करे । गुरुके निक- टरभस मैयन और मिथ्या कहने से, घोर नरक में गमन करना होता है। स्वयं भैरव ने भी यह कहा है । संक्रान्ति, नवमी, पौर्णिमा, अष्टमी, चतुर्द- शी, एकादशी और व्यतीपात इन सम्पूर्ण में कर्तव्य कर्मका लोप न करें। तत्वहीन कर्म और फलहीन जप करने से शाम्भवी देवी कुपित होती हैं। और दिन दिन ब्रह्महत्या का भी पातक सञ्चित होता है । भावचूडामणि में कहा है-अकेले निर्जन स्थान में, निर्जन श्मशान में, शून्पगृह में, नदी पुरिन में निशक और मन के आनन्द में विहार करें । बीरगणों का अप । श्यामारहस्य मा०टी० । कालः प्रशस्यते । सर्वदेशे सर्वपीठे कर्तव्यं नात्र संशयः ॥ अन्यदुक्तम् । स्वकुलान्ते पुरश्चर्या कार्या रात्रौ च नान्यथा। वेदही ने द्विजे जात्या यथा न श्रुतिसंस्क्रिया ॥ विष्णुभक्तिं विना देवि ! भक्तिर्नेव यथा भवेत् । शक्तिज्ञानं विना मुक्तिर्यथा हास्याय कल्पते ॥गुरुं विना तथा तंत्रे नाधिकारःकथञ्चन । पतिहीना यथा नारी सर्वकर्मविवर्जिता ॥ कुलं विना तथा दिव्यो वीरो वा मम साधकः। नाधिकारीति कौलेषु तस्माद् यत्नपरो भव ॥ अविनीतं कुलं यस्य स कथं मम पूजकः । तस्माद् यत्नात तथा कार्य यथास्था विनयान्वितम् ॥ इति तन्त्रचूडामणौ च । विष्णुभक्तो यदा देव ! कुलदीक्षापरो भवेत् । पुत्रदारधनं तस्य नाशयामि न संशयः ॥ कुलं देवं द्विजं हित्वा वैष्णवं काल सर्व काल में ही प्रशस्त है, सब स्थान एव समस्त पीठ में करना चा- हिये, इस में सन्देश नहीं । प्रकारान्तर में भी उद्देश किया है । यथा स्वकुला न्तमें पुरश्चरण करै । रात्रि में उसको करना चाहिये । इस के अन्यथा न करे वेदहीन ब्रह्माण में जिस प्रकार श्रुति का सस्कार नहीं होता, विष्णु भक्ति हीन व्यक्ति में जिस प्रकार भक्ति नहीं होती, शक्ति ज्ञान विना जिस प्रकार मुक्ति हास्य का कारण होती है, गुरुके अतिरिक्त तंत्र में भी ऐसेही किसी प्रकार अधिकार नहीं उत्पन्न होता । पतिहीन स्त्री जिस प्रकार किसी कार्य की नहीं, वीर अथवा मेरा साधक विसी प्रकार कुल विना भ्रष्ट होता है। किसी प्रकार कौल में आधिकारी नहीं होता । इस लिये यत्न परायण होवे । जो फळ पिनय हीन है, वह किसमकार मेरे पूजक होसकते हैं ? अतएव जिस से विनपान्वित होनाय, यत्न पूर्वक उसको ही करै ।। सन्त्र चूडामणि में कहा है । हे देवि ! विष्ण भक्त के यक दीक्षापरायण होने से, में निसन्देह उपकी नी, पुन और धन विनाश करती । कुछ ९४१ अष्टम परिच्छेद । देशिक यदि । करोति कुलशिष्योऽसौ भ्रष्टो भवति साधकः। हविरारोपमात्रेण वह्निर्दीतो यथा भवेत् । कुलदेवमुखात् तद्दत् तथा दीप्तो भवाम्यहम् ॥ दीक्षणात् पूजनाद्धोमात्तथा दृष्ट्य वलोकनात् । यत्किञ्चित् ज्ञानमात्रेण पशुना निर्जितोमृतः॥ साधकस्य महापापं दत्वा तस्य हराम्यहम् । पशोर्विद्यां समा साद्य यदि पूजापरो भवेत् ॥ तस्य वक्तं समालोक्य कुल वक्तं विलोकयेत् । पशूपदिष्टं यत्किंचित् क्रियते कुलसा- धकैः ॥ तत्तत्कर्म महादेव ! अभिचाराय कल्प्यते । यदि दैवात् पशोविद्यां लभ्यते कुल वुधैः ॥ द्विजस्य कौलि- की प्राप्य पुनर्विद्या मुपालभेत् । अज्ञानाद् यत् कृतं कर्म नालोच्य कुलकौलिकीम् ।। क्षमस्व देवि ! तत्पाप हर देवि ! कृपां कुरु । एवं प्रार्थ पुनर्दीक्षां कुर्यात् साधकसत्तमः । अन्यदुक्तं तत्रैव । मनसा वचसा देव ! कुलाकुलगुरुं यदि । निन्दा करोति देव ब्राह्म को त्याग करके, वैष्णव को गुरु करने से, साधक को निश्चय ही भ्रष्ट होना पड़ता है । घृत के आरोपण मात्रसेही अग्नि जिस प्रकार प्रज्वलित हो उठती है, मैं कुल देव के मुखसेही उसी प्रकार जाग्रत होती हूं। पशुके निकट विद्या ग्रहण करके, पूजापरायण होने से, उसका बदन देख कर कुल वक्र अबलोकन करें । कुळ साधक पशुगणों को जो कुछ उपदेश करें, हे महादेव ! वह समस्तभी अभिचार रूप से परिणत होता है। यदि दैवाद कुळज व्यक्तिगण पशुके निकट चिया लाभ करळे तो पुनार कौलिक ब्राह्म के आश्रय में विद्या ग्रहण करें । अज्ञान वशत कुल कौलिक आलोचना करके जो किया है, हे देवि ! क्षमाकरके वह पाप हरण पूर्वक कृपा वितरण करो, इस प्रकार प्रार्थना करके, पुनार दीक्षित होवें । इसीसे प्रकारान्तर में कहाहे । यथा-मन और वाक्प द्वारा कुळाकुलगुरुकी निंदा करने से उस २४२ श्यामारहस्य भा. टी. पापो यस्तस्योपरि च जायते ॥ एतत् शास्त्रप्रसङ्गन्तु एतत् पुस्तकदर्शनम् । पशोरग्रे न कर्त्तव्यं प्राणान्तेऽपि कदाचन ॥ कृत्वा सूर्यमुखं दृष्ट्वा स्मर्तव्यः कुलनायकः । पशुना यः सहालापः सहशय्या सहासनम् ॥ संसर्गश्चैव मेवान कुलीन- स्य महात्मनः । पातकं न तु चैतेषां संक्षये पुण्यराशयः ॥प्र. भवन्ति न तीर्थानि न गङ्गा न च काशिका। महाविद्याजपा- देव चत्वारि पातकानि च ॥ नश्यन्ति च न संसर्गःक्षयंयाति कदाचन । अज्ञानात् पशुसंसर्गो यदि दैवात् प्रजायते ॥ तदा द्वादशवर्षाख्यं व्रतार्थ यत्नमाचरेत् । कुलीनायाः समीपस्थः कुलसेवापरायणः॥ उच्छिष्टभोजी तन्नामजापी चतत्पतेरपि। तदा ह्येतां समाभ्यर्य यत्नैश्च परितोष्य च॥शुचिर्भूत्वा परां विद्यां गृहीत्वा शुद्धिमानुयात् । व्रताशक्तो यदि भवेत् सुवर्ण कुलतोषकृत् ॥ दद्यात् कुलाय पापानां क्षयार्थ कुलसाधकः । को पातक उत्पन्न होता है। यह श्रेष्ठ शास्त्र और इस पुस्तक का दर्शन पशुगणों को प्राणान्त होनेपर भी न करावे । कराने से सूर्यमुख दर्शन करके कुळ- नायक का स्मरण करै । महात्मा कुलीन, पशु के सहित अलाप, शयन, अ- वस्थान और संसर्ग करने से, उन दोनों में जो पातक उत्पन्न होता है, वह क्षय होकर किसी क्रम से पुष्प संचय नहीं होता. तीर्थ गला और काशी भी उसको क्षय नहीं करसक्ती अधिक क्या महाविद्या का जप करने से भी उल्लिखित चारों पातक क्षयको प्राप्त नहीं होते। अज्ञान वशतः देवात् यदि पशुका संसर्ग संघटित हो तो द्वादश वरुप व्रतका प्राचरण करने के लिये यत्न करै । कुलीन के समीपस्थ और कुळ सेवा परायण होकर, उसकी और उसके पति की उच्छिष्ट भोजन और नामजप सहित भक्ति पूर्वक उस की पूमा और परितोप विधान एवं पवित्र होकर, परा विद्या प्रहण करने से, शुद्धि लाभ होती है । व्रत में असमर्थ होने से, फुल साधक कुळ और पापक्षयार्य सुवर्ण दान करें । ज्ञान पूर्वक संसर्ग करने पर किसी मत सेमी अष्टम परिच्छेद। ज्ञानात् संसर्गमासाय शुद्धिं प्राप्नोति नैव च ॥ पशुभ्यो भा. पणाच्चैव योनिमालभ्य साधकः । नानाक्लेशसमायुक्तो नर- कान् प्रतिपद्यते ॥ न चैवं दक्षियेन्नाम न चान्यदर्शनञ्चरेत् । मम शास्त्रकथाञ्चाये प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ कर्मणा मनसा वाचा पशुशास्त्राङ्गपूजनम् । प्रकुर्वन्ति महापापास्त्याज्याश्च कुलपांशुलाः ॥ निर्जीवकाष्ठे लोष्ट्र वा शर्करायां तृणेऽपि वा। सर्वत्र चिन्तिता चाहं न पशोर्मित्रविग्रहे।चेतनाधिष्ठितं सर्व सुखं दुःखं प्रकल्पितम् । तत्रैव चेतनाभावान्नियमो नास्ति तादृशः ॥ प्रसन्ना तेन गोतव्या कुलीनैः सिद्धिहेतवे । अन्यदुक्तं तत्रैव । दीक्षायां कुलपूजायां शिष्यत्वे यदि वा गुरौ । लज्जापरं कुलं तत्र नित्यापि नित्यनिद्रिता ॥,अधस्तादृष्टिमात्रेण तस्य विद्या ह्यधोमुखी । निमीलनान्मृता विद्या वोधनान्मारयेद् ध्रुवम् ॥ पार्वावलोकनेनैव व्याधि दारिद्यपीड़िता । चतु. दिगरलोकेन उच्चाटनगता भवेत् ॥ एतादृशं कुलं देव ! .. शुद्धि लाभ नहीं होती । साधक पशु के सहित सम्भापण करने से योनि आळभन पूर्वक नाना क्लेश भोग करके नरक परम्परा को प्राप्त होते हैं । यान, मन, और वाक्य द्वारा मी पशुशास्त्रान पूजा करने से महापापी कुल पांशुल और त्याज्य होता है । निर्जीव काष्ठ, लोष्ट्र, शर्करा, तृणसर्वग्रही मैं चिन्तिता होती हूं । केवळ पशु के मित्र विग्रह में नहीं । दीक्षा कुल पूना शिष्यत्व और गुरु इन सब में कुल यदि बचा परापणं होकर अघोष्टि करें तो उसकी विद्या अधोमुखी होती है । नेत्र चन्दकरने से वि. धा में मृत्यु होती है, वोधन अर्थात् आत्मा गौरव अवलंघन करने से नष्ट होजाता है पाव अवलोकन करने से, व्याधि और दारिद्य पीडा उपस्थित होती है, चारों ओर अवलोकन करने से उच्चाटन गत होना पड़ता है।
२४४ श्यामारहस्य भा० टी० ॥ यदि कुर्यात् कथंचन तदा कुलगुरुं प्रार्थ कार्यद्वीक्षणं ततः। उपद्देष्टा यदादेव तदा पुत्री तु कन्यका॥ पूजाहाच तदा देवी तदामाता नसंशयः॥ सर्वथा पितृपुत्रीभ्यां मूलयोगेन दृश्यते। तत्कृते पापवुद्ध्या वै उभौ नरकगामिनौ । चुम्बके अन्यशा स्त्रज्ञे पशुग्रामे च भैरव ! । न वक्तव्यं न कर्त्तव्यं न च वा. च्यं कथंचन ॥ एवं कृते गुरौ शिष्ये ममशापो भविष्यति । शिवागमे च। शक्त्युच्छिष्टमविचार्य पिवेच्चकेश्वरो यदि ॥ घोरञ्च नरकं याति कुलमार्गे पतेद्धवम् । तस्माद्विचार्य यत्नेन श- क्त्युच्छिष्टं पिबेत सुधीः ॥ आनन्दं कारयेद्वीरस्तत्वं निभ्री- न्तितः पिबेत् । शक्तिः शिवः शिवः शक्तिः शकिब्रह्मजना- र्दनः ॥ शक्तिरिन्द्रावधिः शक्तिः शक्तिश्चन्द्रोग्रहो ध्रुवम् । शक्तिरूपं जगत् सर्व यो न जानाति नारकी। वीरतन्त्रेऽपि । स्नानादिमानसं शौचं मानसः प्रवरो जपः । पूजनं मा. हे देवि! यदि किसी भांतिसे इसमकार घटनाहो. तो कुलगुरुकी प्रार्थना करके उनको देखें । अन्य शास्त्रज्ञ और पशु इन से कभी न कहै. कहने से गुरु शिष्प दोनों को मैं शाप देती हूं । शियागम में कहा है. चकेश्वर विचार विहीन होकर शक्तिको उच्छिष्ट पान करने से घोर नरक में गमन करता है और कुलमार्ग शे पतित होता है । इसलिये विचार करके शक्तिको उच्छिष्ट यत्न सहित पान करे । भ्राति रहित होकर तत्वपान और आनन्द करना चाहिये । शक्ति शिव और शिवही शक्ति है. और शक्तिही ब्रह्म, शक्तिही विष्णु, शक्तिही इन्द्रादि देवगण, शक्तिही चन्द्र और समस्त, ग्रह, फलतः सम्पूर्ण जगतही शक्तिरूप है । जो व्यक्ति या नहीं जानते, वही नारकाह। वीरवन में भी कहा है, मानस जपही जप, मानसस्नानही स्नान मानस - अष्टम परिच्छेद। नसं दिव्यं मानसं तर्पणादिकम् ॥ सर्व एव शुभ कालो ना. शुभो विद्यते कवित् । न विशेषो दिवा रात्रो न सन्ध्यायां महानिशि ॥ सर्वदा पूजयेद्देवीं सुनातः कृतभोजनः । म- हानिश्यशुचौ देशे वलिं मन्त्रेण दापयेत् ॥ एतेन दिवसेऽपि पञ्चतत्वेन संपूजनं कार्यमिति सूचि- तम् । यत्तु। रात्रावेव महापूजा कर्तव्या वीरवन्दिते !। इति स्वतन्त्रवचनम् । न दिने सर्वथा कार्या शासनात् मन्त्रसुव्रते ! । हवि. ष्याशी दिवा लक्षं पुरश्चारी तु यो जपेत् । तत्र मात्रं दिवा पूजा पशुवबुधवन्दिते ! ॥ इति स्वतन्त्रवचनम्, तत्तु पुरश्चरणविषये वोद्धव्यमि- ति । तत्र रानावेव इति शब्दस्वरसात् सामान्याधिकारपर इति ब्रूमः । कालीतन्त्रादिस्वरसाच्च । तत्तु जपेन कालनि- यमम् इति पुरैव लिखितम् । एवं छिन्नमस्तातन्त्रेऽपि । सिद्धमन्त्रे न दोषः स्यान्नाशीचे नियमेऽपि च । न क- शौचही शौच, मानस पूनाही पूना और मानस तर्पणादिही तर्पणहै सम्पूर्ण कालदी शुभकाल है. अशम काल किसी काल में भी नहीं है। दिन,रात्रि सन्ध्या और महारात्रि किसी में भी दोप नहीं है । स्नान और भोजन कर के सर्वदा देवीकी पूजा करे । महारात्रि में अपवित्र प्रदेश में मन्त्रोचारण के सहित वलिप्रदान करें इसके द्वारा दिन में भी पञ्चतत्त्व से पूजा कर, प- वित्र होनेपर फिर जो कहा है. हे वीरवन्दते ! रात्रि मेंही पूजा करै। यह स्वतंत्र का वचन है । स्वतंत्रमें यह भी कहाहै, शाशन वशतः दिनमें पूजा न कर इविप्याशी और पुरश्चारी होकर जो व्यक्ति लक्ष्य जप करताहै, इसमें दिनकी पूजामात्र पशुकी समान है । स्वतंत्रका यह बचन पुरश्चरण विषयक है छिन्नमस्ता तंत्र में भी कहा है, सिद्ध मंत्र में अशीच वा भनियम होने से ।
२४६ श्यामारहस्य भा० टी० । ल्पना दिवारात्रौ न च सन्ध्यावसानकम् ॥ सदेव पूजयेन्म- न्त्री मैथुने तु विशेषतः। किन्तु-न पश्येत् पतितां नग्नामुन्मत्तां प्रकटस्तनाम् ॥ दिवसे न रमेन्नारी तयोनिं नैव वीक्ष्ययेत् ॥ कुलार्णवेऽप्येवम् । तत्प्रकरणत्वात् पुरश्चण वा इति । अथ रुद्रयामले। पशोः सम्भाषणादेवि ! मन्त्रासद्धिर्न जायते । पशुस्तु द्वि- विधो देवि ! दीक्षितोऽपि भवेत् पशुः ॥ दीक्षितश्च कुलाचार निन्दको द्विविधः पशुः । गोलकेन सहालापात् स्पर्शात् स. म्भावसंस्कृतात् ॥ न सिध्यति महेशानि ! सत्यं सत्यं वदा- म्यहम् विकल्पिता न सिध्यन्ति जपात् सिध्यन्ति लोकदाः॥ तस्मादेतत् परित्यज्य सिद्धिः स्यात् केवलाजपात् । वीरह- त्या वृथापानं वीरजायानिपेवणम् ॥ महापातकमित्याहुः को- दोप नहीं है । उसमें दिन रात्रि वा सन्ध्यावसान कल्पना भी नहीं है । सर्वदाही पूजा करै ।। रुद्रयामळ में कहा है-हे देवि ! पशुके सहित सम्मापण करने से मंत्र सिदि नहीं होती । पशु विविध हैं दीक्षित भी पशु होता है, दीक्षित और कुळचार निंदक यह दो प्रकार के पशु हैं, हे महेशानि ! गोलोक के सहित आलाप उसको स्पर्श और उसके साहित सद्भाव करने से भी में सत्य ? कहता हूं, कि सिद्धि लाभ नहीं होती । जिसके मन में दुवया है, उसको भी सिदि नहीं होती, । जप करने से सिद्ध होता है, इसलिये इसको परि- त्याग करके जप करें, तो सिदि लाम होती है। हे कुळेश्वरी ! वीरहत्या, वृथापान, और वीरपत्नी गमन यह कई कार्य कौलिक गणों के महापापक २४७ नवम परिच्छेद । लिकानां कुलेश्वरि ! अर्थाद्वा कामतों वापि लोल्यादपि च यो नरः । लिङ्गयोनिरतो मंत्री रौरवं नरकं व्रजेत् ॥ इतिमहामहोपाध्यायश्रीपरमहंसपरिव्राजक श्रीपूर्णानन्दगिरिविरचिते श्यामारहस्ये पुरुषार्थ साधनाचार विवरणनामा एमः परिच्छेदः। अथ नवमः परिच्छेदः। अथ कुण्डगोलोद्भवादिग्रहणविधिः। तदुक्तं तन्त्रान्तरे। आनीय प्रमदां मत्तां दीक्षितां यौवनान्विताम् । स्वका- न्तां परकान्तां वा घृणालज्जाविवर्जिताम् ॥ परांमुखोपवि- टस्तु निशायामर्द्धरात्रके। हेतुयुक्तं सताम्बूलं दत्त्वा न्यासान् विधाय च ॥ मौली कुन्तलकर्षणं नयनयोराचुम्बनं गण्ड- योर्दन्तेनाधरपीड़नं हृदि हतिर्मुष्टया च नाभौ भगे । कक्षा कण्ठकपोलमण्डलकुचोणीपु देया नखाः। सीमन्ते लि- हकर परिगणित हैं। जो व्यक्ति अर्थ काम और लोभ वशत: लिंगयोनि में रत होता है वह रोरवनरकमें गमन करता है । इतिश्री महामहोपाध्याय श्रीपरमहंसपरिबानक श्रीपूर्णानंदगिरि विरचित श्यामारहस्येमापार्टीकासहितपुरुषार्थसाधनाचारविवरण नामअष्टमपरिच्छेदसमाप्त ॥ ८॥ अब फण्ड गोलोद्भवादि ग्रहण विधि कहीजाती है । तन्त्रान्तर में कहा है। यथा-अपनी स्त्री हो, अथवा पराई स्त्री हो, मत्त दीक्षित, यौवना वित और घृणा लज्जा रहित, स्त्रीको लाकर अर्द्धरात्रि में परांमुख बैठाल श्यामारहस्य भांटी। खनं नखैरुरसिजं गृह्णीत गाढ़ ततः । कुर्वीताविरतं मनोभव गृहे मातङ्गलीलामिति ॥ जंघांगुष्ठपदोगुल्फहननं चान्योन्य तः कामिनोः ॥ आं ई हुं ह्रीं ब्लें अमुकी द्रावय स्वाहा इति विन्यसेत् । ऐं ह्रींचपले चलच्चित्तान्तु रेतो मुंच द्वयं पठेत्॥ ब्लु क्लीं स्त्रीं क्लीं देवेशि ! द्राविणीवीजमुत्तमम् । तस्यां योनी न्यसेद्विद्यां मैथुनं कारयेत् प्रिये ! ॥ शुद्धमन्त्रौषधेनैव यो. निप्रमथनं चरेत् । मथ्यमाने पुनस्तस्यां जायते तत्वमुत्तमम् ॥ गृह्णीयात् तत् प्रयत्नेन द्रव्यं कुलोद्भवं शुभम् । निःशङ्कमा हितं द्रव्यं गृहीत्वा तेन पूजयेत् ॥ सान्निध्यं जायते देवि ! सर्वकाममुपालभेत् । कुण्डोद्भवामृतं द्रव्यं कथितं दुर्लभ मया ॥ पञ्चमीयामलेऽपि । चयं चोप्यं निवेद्याथ वस्त्रालङ्करणादिकम् । पूजयेदक्षतैः शुक्रेस्तस्या मदनमन्दिरम् ॥ भावयेत् कामतत्त्वेन तासु त. त्वं न चोत्सृजेत् । शुद्धमन्त्रौषधेनैव मथयेन्मदनालयम् ॥ हेतु युक्त ताम्बूल प्रदान सहित वक्ष्यमाण मंत्र से न्यास करै । यया- 'ई इत्यादि । तदीय कुलगृह में विद्यान्यास करके मैथुन धर्म में प्रवृत्त होना चाहिये । फिर शुद्ध मंत्रौपधी के द्वारा उस रति गृह को मय । मयने से उस में उत्तम तत्व उत्पन्न होता है । इसकाही नाम कुण्डोद्भव द्रव्य है। यह पवित्र द्रव्य अत्यन्त यत्न सहित ग्रहण करे । इस में किसी प्रकार की शंका न करै । ग्रहण करने के पीछे उसके द्वारा पूजा करै । पूजा करने से देवी का सान्निध्य (निकटता) लाम और संपूर्ण कामना पूर्ण होती हैं ! यह मैने इस कुण्डोद्भव अमृत का वर्णन किया। यह अत्यन्त दुर्डम पदार्य है। पंचमी यामल में भी कहा है-चर्व, चोप, वन और अकारादि निवेदन करके अक्षत और शुक्र द्वारा उस के कुल मंदिर की पूना और काम तत्व द्वारा भावना करे। उस में कमी तत्व उत्सर्मन न करे। शुद्ध पुनस्तस्या जायते नवम परिच्छेद। मध्यमाने तत्त्वमुत्तमम् । गृहीयात् तत् 'प्रयत्नेन द्रव्यं कुण्डोद्धवं शुभम् ।। अथ शुद्धमन्त्रौषधं यथा तदुक्तं कुलोड्डीशे । मायागच्छ पदं शुक्रस्तम्भनकारिणि ठद्वयम् ॥ अनेना- ऊपरागे च जातीमूलं समानयेत्। एतद्धृत्वा साधकेन्द्रःशु- क्रस्तम्भनमाचरेत् ॥ इति । गोलोद्धव तथा देव ! गृह्यते च विधानवित्। कुलजां दीक्षितां मत्तां पतिहीनां विचक्षणाम् ॥ शक्तियोग्यां स्वरूपाञ्च अनपत्यां समानयेत् । सुन्दरीं शो- भनां दिव्यां पीनोन्नतपयोधराम् ॥ द्विरष्टवर्षदेशीयां सदा कामाभिलाषिणीम् । पूर्वोक्तक्रमयोगेन कृत्वा न्यासादिक ततः ॥ तत्वं प्रगृह्य यत्नेन पूजार्थ साधकोत्तमः । इदं गोलो- ' द्भवं द्रव्यं देवतास्सृष्टिकारकम् ॥ अनेन पूजयेद् यो हि सर्व- काममुपालभेत् । स्वयम्भू कथयिष्यामि पूजार्थसाधकोत्तमः॥ मंगोषध द्वारा तदीय कुल गृह मयित करें । मथन करने से उस में पुनर्वार उत्तम तत्व उत्पन्न होता है । वह कुण्डोद्भव शुभ द्रव्य यत्न पूर्वक ग्रहण करें। अब शुद्ध मंत्रौपथ का तान्त कहते है । कुलोड्डीश में कहा है । यथा- ही आगच्छ शुक्र स्तम्भन कारिणि स्वाहा " यह मंत्र उचारण पूर्वक सूर्य के उपराग समय में चमेली की जडलावै । अनन्तर उसका धारण करके शुक्र स्तम्भन संमाचरण करै । हे देव ! इसी प्रकार विधानानुसार गोलोद्भव द्रव्य भी ग्रहण करे । कुलजा, दीक्षित, मत्त, पतिहीन विचक्षण, शक्ति योग्या, स्वरूपा, अनपत्या, सुन्दरी, शोभना, दिब्यापीनानत पयोधरा, पो- डशवर्ष देशीय, और सर्वदा कामामिलापिणी रमणी को लाकर, पूर्वोक्त ऋायोगानुसार न्यासादि विधान और फिर पूजा के अर्थ यत्न पूर्वक तत्व प्रहण करै । इसकाही नाम गोलोद्धव द्रव्य है । यह देवताओं काभी सृष्टि कारक है । जो व्यक्ति इस के द्वारा पूजा करता है, उस की समस्त कामना पूर्ण होती है । 'अब स्वयम्भ का कथन करते हैं । साधकोत्तम पूजा के श्यामारहस्य भा. टी. । पूर्ववन्न्यासवर्यन्तु कारयेदेवि ! सुन्दरि । तस्यास्तु मदना गारे पूजये त्परमेश्वरीम् ॥ स्वयमक्षोभितो भूत्वा साधक पञ्चमी यजेत् । स्वेच्छा तुमती शक्तिः साक्षादवी सुरे- श्वरि ! ॥ तस्याः पुष्पं स्वयं यत्तद्रक्षणीयं प्रयत्नतः । वस्त्रा लङ्कारपुष्पेण शक्तिञ्च पूजयेत् सदा ॥ यथा काले तथा पुष्पं स्वयं तद्गोपयेत् सकृत् । गृहीत्वा तत्प्रयत्नेन स्वयम्भू कुसुम चरेत् ॥ स्वयम्भूपुष्पयोगेन साक्षतन समर्चयेत् । विद्यां स्व. भावती जप्त्वा क्षिप्रमाकर्पणादिकम् ॥ देवताश्च महानागा राक्षसा दानवाश्च ये राजानश्र स्त्रियः सर्वा नित्यं वश्या भ. । वन्ति हि ॥ . मुण्डमालायाम् । स्वयम्भू कुसुमं देवि ! त्रिविधं भुवि जायते । आषोडशा. दनूढ़ाया उत्तमा सर्वसिद्धिदा॥वलात्कारेण ऊढ़ाया मध्यमा भोगवर्धिनी । रजोयोगवशादन्या चाधमा फलदायिनी ॥ अर्थ पूर्व की समान न्यास चर्य विधान करै । उस के कुलागार में परमेश्वरी की पूजा और स्वयं क्षोभ रहिन होकर पंचमी की पूजा की देवी शक्ति इ. च्छानुसार ऋतुमती होती हैं । उनके उस पुष की स्वयं अत्यन्त यत्न सहित रक्षा कर । वस्त्र, अलंकार और पुष्प द्वारा सर्वदा शक्ति की पूजा करनी चाहिय । शक्ति स्वयं यथा समय में वह पुष्प सकृत् गुप्त करती हैं । यत्न पूर्वक उसको ग्रहणकरके स्वयंभू कुसुम रूपमें व्यवहार करै । शीघूता सहित आकर्षणादि जपकरके अक्षत सहित स्वयम्भू द्वारा स्वमावती विद्या की पूजा में प्रवृत्त होना चाहिये । तो देवगण, महानागमण, राक्षसगण दानव गण, राजागण, और स्त्रीगण आदि नित्य सभी वशीभूत होते हैं । मुण्डमाला में कहा है, हे देवि ! पृथ्वी में तीन प्रकार स्वयम्भू कुमम उत्पन्न होता है। मथम सोलह वर्ष पर्यन्त अनुढा । इसके द्वारा उत्तमा सिदि लाभ होती है। दूसरा बलात्कार सहित उहा; यह मध्यम सिद्धि विधान करता है। तीसरा नवम परिच्छेद। तन्त्रचूडामणौ च । शृणु वत्स! कुलद्रव्यमाहात्म्यं परमं शुभम् । यत् प्राप्य कुलदेवेन लभ्यते वाञ्छितं महत् ॥ अमावस्यातिथौ देवी स्वयम्भू मध्यवर्तिनी।अमृत वर्पते सातु त्रिदिनं पृथिवीत्तले तस्यां तिथौ कुलदेवि ! यदि विद्यां समुच्चरेत् । पूर्वसेवा भव- त्यत्र प्रत्युच्चारण मेव हि ॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कुलं वीक्ष्य जपं कुरु । दृष्टया च अमृतं देवगलितं परिगृह्य च ॥ साधयेत् साधनं सर्व कुलाचारस्य सिद्धये । शिवहीना यदा शक्तिः सर्गादौ वर्षते यतः ॥ तदेव परमं द्रव्य स्वयम्भूकसुमाख्यक- म् । स्वयम्भूकुसुमं द्रव्यं लैलोक्ये चापि दुर्लभम् ॥ क्वचिद्द- न्धर्वराजेन लभ्यते वा नराधिपः । यदि तल्लभ्यते देव ! ला. क्षारससमन्वितम् कस्तूरीकुंकुमाक्तश्च वटीं कृत्वा सुगोपयेत्। मन्त्रराजं समालिख्य पूजयेद् यदि साधकः ॥ येतेनाक्षतयो- गेन मधुमतीसिद्धमानयेत् । सुप्तादिदोपयुक्ता ये मन्त्रा वि. रजो योग से उत्पन्न, इस के द्वारा अधम सिद्धि लाम होती हैं । तत्र चूहा मणि में कहा है, हे वत्स ! कुल द्रव्य का माहात्म्य श्रवण करी । जिस के प्राप्त होने से कुल देव महत् वांछित लाभ करते हैं। देवी अमावस्यातिथि में स्वयंभू मध्य वर्तिनी होकर तीनदिन पृथ्वी तल में अमृत की वर्षा करती दृष्टि द्वारा वहदेव गलित अमृतग्रहण करके कुळाचार सिद्धि के लिये समस्त साधन का साधन कर । शक्ति शिव हीन होकर गृष्टि की आदि में वर्षण क. रती हैं, इसी लिये उस परम दय को स्वयंभू कलम कहते हैं। यह स्वयभू कुसुम त्रिभुवन में दुर्लभ है । गंधर्वराज अथवा राजा लोग कदाचितही उस को प्राप्त होते हैं। हे देव ! यदि उसको लाभ कियाजाय, तो उसकी ला. वारस, कस्तूरी और कुकृम में संयुक्त बटी करके अतीव गुप्तभाव से रक्षा करै । साधक मत्र राज लिखकर यदि इसकी पूजा करता है, तो देवी मधु गती सिद्धि समाधान करती हैं। अधिक क्या, जो सम्पूर्ण मंत्र और विद्या हैं श्यामारहस्य भा०टी० । द्याश्च कीर्तिताः ॥ प्रबुद्धास्तत्प्रयोगेण यावत् सा पुनरागता। ततः प्रयोग विद्यानां मन्त्रादीनाञ्च कारयेत् ॥ एवं प्रवुद्धा भवति नैव तादृक् कदाचन । एतत् त्रयाणां मध्ये तु स्वय- म्भू कुसुमं महत् ॥ श्रीक्रमेऽपि । कस्तूरीकुंकुम रक्तचन्दनागुरुकादिकम् । नानासुगंधिकं दत्वा एकीकृत्य तु साधकः ॥ एतेनाक्षतयोगेन पूजयेत् परमेश्वरी: म्। स्वयम्भू कुसुमैः पूजां प्रत्यहं यः समाचरेत् । तस्य म- धुमतीसिद्धिरधीना देवि ! जायते ॥ अथ दूतीयजनविधिः। याममात्रगते रात्री कुलगेहगतः पुमान् ताम्बूलपूरितमु. खो धूपामोदसुगन्धिभिः रक्तचन्दनलिप्ताङ्गो रक्तमाल्यानुल. पितः । रक्तवस्त्रपरीधानो लाक्षारुणगृहेस्थितः ॥ रक्तमाल्ये. न सवीतो रक्तपुष्पविभूषितः । पञ्चीकरण सङ्केतैः पूजयेत् कुलनायिकाम् ॥ मुम्पादि दोप युक्त कहकर परिगणित हैं, उस प्रयोग से वह सम्पूर्ण प्रबुद्ध होती हैं। इसी लिये विद्या और मंत्र का प्रयोग करना चाहिये ।। तो वह समस्त इसी प्रकार प्रयुद्ध होते हैं, इनतीनों में स्वयभू कुमुमही प्रधान है। श्री क्रममें भी कहा है, कस्तुरी, कुंकम, लालचंदन, अगर इत्यादि अनेक प्रकार के सुगंधिक एकी कृत और दान करके अक्षत योग में परमेश्वरी की पूजा करे, जो व्यक्ति प्रति दिन स्वयंभू कुमम द्वारा पूजा करता है मयुमती सिदि उस के आधीन होती हैं। इस के उपरान्त दूतीपूनादि लिखते हैं। रात्रि के याममात्र बीतनेपर ध्या मेद सुगन्धि सहित ताम्बूल मुखमें पूर्ण करके रक्तचन्दन से लिप्तांग, रक्त मान्य से अनुलेपित रक्त पुप से अलंकृत, और रक्त वनसे आवृत होकर, फुटगृह में गमन करके लालारुण गृह में अवस्थान पूर्वक पंचीकरण अंकेत मारा नायककी पूजा करें । कुलनापिका, यथा, उस में ही कहा है। , २५३ . -~- नवम परिच्छेद। कुलनायिका यथा। तदुक्तं तत्रैव । नटी कपालिनी वेश्या पुकसी नापिताङ्गना । रजकी रज. की चैव सैरिन्ध्री च सुभाषिणी ॥ घटिका घटिका चैव तथा गोपालकन्यका । विशेषवैदग्ध्वयुताः सर्वा एव वराङ्गनाः ।। गुरुभक्ता देवभक्ता धृणालज्जाविवर्जिताः। संगोपनरताःप्राय स्तरुण्यः सर्वसिद्धिदाः ॥ एवं यथोदितां प्रसूनतूलिकोपरि संस्थाप्य पूजामारभेत् । तदुक्तं तत्रैव । अद्वैताचारसम्पन्नां घृणालनाविवर्जिताम् । सदनुष्ठान- निरतां सात्विकी भक्तिसंयुताम् ॥ देवताभावसंयुक्तां गुरु- भक्तां दृढ़वताम् । ईर्षालस्येन रहितां समयां भक्तवत्सलाम् ॥ चातुर्योदार्यदाक्षिण्यकरुणादिकलान्तिाम् । रूपयौवन- सम्पन्नां शीलसोभाग्यशालिनीम् ॥ सदा परिगृहीतां वा यद्वा सङ्केतमागताम् । अथवा तत्क्षणायातां मदनानलता- नटी, कपालिनी, वेश्या पुक्कसी, नापितांगना, रजकी रञ्जकी, सैरिन्धी, घटिका और गोपाल कन्या इन सब में ही भलीभांति, वैदग्ध्य युक्त, वरांगना, गुरु भक्त, देवभक्त, घृणा लज्जा रहित, संगोपनरत और प्राय, साही तरुणी और सवही सर्व सिद्धिमद होती हैं । इस प्रकार प्रसून तूलिका के ऊपर स्थापन करके यथोक्त विधान से पूजा का आरम्भ करै । उस में ही कहा है । यथा, अद्वैता चारयुक्त घृणा लज्जा रहित सदअनुष्ठान निरत, सत्वग- णान्वित, भक्तिमम्पन्न, देवता के प्रति सद्भाव शालिनी, गुरुभक्ति परायण दृढव्रत, ईपरिहित, आलस्य विहीन भक्तवत्सल, चातुर्य ( चतुरता ) औ. दार्य ( उदाता) दाक्षिण्य, और कारुण्यादि सम्पन्न, रूप यौवन विशिष्ट शीक सौभाग्य शालिनी, सर्वदा परिगृहीत अथवा सकेत मात ( माग में प्राप्त हुई) किम्बासनसणात उपस्थिता (तत्काळप्राप्तईई) कामानळ-सन्तपित, , २५४ श्यामारहस्य भा. टी.। पिताम् ॥ विलिप्तां रक्तगन्धेन रक्ताम्बर विभूषिताम् । सु. गन्धिवद्धकुसुमां सर्वाभरणभूपिताम् ॥ स्वधूपधूपितां तन्वीं दूतीकर्मणि योजयेत् । एवं भूतां यजेत्ताश्च प्रसूनतूलिको परि, ॥ व्यङ्गाही विकृताङ्गी वा सविकल्पकमानसाम् । व. पीयसी पापरतां क्रूरामत्यन्तलोलुपाम् ॥ अभक्तां मनसा दीनां वर्जयेत् साधकोत्तमः । समानीय कलं सोऽपि गुरुभक्तमनन्तरम् ॥ स्नातं शुद्धदुकूलादि अनुलेपनशोभि. तम् स्वलंकृतं गतं श्रान्तिं स्वागतं चासनं तथा ॥ निवेश्य तूलिकामध्ये प्रसूनेन सुगन्धिना । चन्दनागुरुकर्पूर कस्तूरी कुंकुमादिभिः॥ समाकीर्णे स्वपर्यड्डे पूजयेत् कलनायिकाम् । अङ्गन्यासकरन्यासौ प्राणायामस्ततः परम् ॥ विधाय मातृका न्यासं कुलाङ्गेऽपि प्रविन्यसेत् । ततः पूर्वोक्तशिधेना घटाऱ्या स्थापनादिकम् । विधाय तद्वराङ्गेषु पूजयेत् परमेश्वरीम् ॥ रक्तगन्ध से विलिप्त रक्त वस्त्र से विभूपित, सुगन्धित कुमुमबद्ध, सर्वाभरण- सुशोभित स्वपपित, कशतन, ऐसी स्त्रीको दुती कार्यमें नियोजित और प्रसून तुलिकाके ऊपर पूजा करै । जिसका अंगविकून, वाव्यागभावयुक्त जिस का मन द्वैत भाव युक्त, जिसको लोभ अतिमवल, जिसकी प्रवृत्ति पापमें आसक निस के हृदय में कुग्लिता, निस की भक्ति, जिसकामन अति हीन और जिसकी अवस्था अधिक हुई है, इस प्रकार की रमणी को वर्जन करे । अनन्तर गुरु भक्त कुल आनयन होकर श्रमदूर करने से उसको स्वागत ५ र्थक बैठाले । इस के उपरान्त तूलिका में निवेशित करके सुगन्धित कुसम, चन्दन, अगर, कपूर कस्तूरी, और कुपादि द्वारा समाः कीर्ण पद में कुलनायक को पूजा में प्रवृत्त होवे । प्रथम अनन्याम और करन्पास, फिर प्राणायाम, तिसके पीछे मातृकान्यास, विधान करके क लाम में भी न्यास करे, अनन्तर पूर्वोक्त विधान से घट अर्घ्य स्थापनादि विधान करके तिसके रात में परमेशरी की पूजा करनी चाहिये । उममें .
नवम परिच्छेद । तदुक्तं तत्रैव। पूजयेदपि पल्यङ्कमध्ये मण्डूकमग्रतः । कालाग्निरुद्रमा. धारशक्तिं कूर्ममनन्तकम् ॥ वराहं पृथिवीं कन्दं मृणालं के. शराण्यपि । पद्मश्च कर्णिकाञ्चैव मण्डलञ्च समर्चयेत् ॥ धर्म वैराग्यमैश्वर्यं ज्ञानमज्ञानमेव च । अनैश्वर्यमवैराग्य. मधर्ममपि पूजयेत् ॥ आत्मतत्त्वं ज्ञानतत्वं परतत्वञ्च पूज येत् । गन्धपुष्पाक्षतादीनि दत्वा तत्रेय धूपयेत् ॥ तस्योपरि कुलं स्याप्यं पूजानुष्ठानमेव च । पूजयेच्च ततस्तस्यां पंचका. मान् समाहितः ।। ह्रींचैव कामवीजं क्लीं कन्दर्पो हुं च म- न्मथः । ब्लु मकरकेतनश्चैव स्त्री चैव हि मनोभवः ॥ ओं- कारादिनमोऽन्तंच कुसुमैर्गन्धसंयुतैः । अचयित्वा चतुर्दिनु पूजयेत् कुलनायकः॥ वटुकं भैरवंचैव दुर्गाच क्षेत्रपालकम् ॥ तन्त्रान्तरे च । वाग्भवं कामवीच स्त्रीबीजं कामराजकम्। हसन्ले मा- त्मकं दत्वा आधारशक्तिमुच्चरेत् ॥ श्रीपादुकां ततो दत्वा पू- ही कहा है, यथा-पल्यङ्क में प्रथम मण्डूक की फिर कालानि, रुद्र, आधार शक्ति, कूर्म, अनन्त, वराह, पृथिवी कन्द, मृणाल, केशर समूह, पनकर्णिका और मण्डल इनसबकी अर्चना एवं धर्म, वैराग्य, ऐश्वर्य, ज्ञान अज्ञान, अ- नैश्वर्य, अवैराग्य और अधर्म इनकी पूजा करै । फिर आत्मतत्त्व, ज्ञानतत्त्व और परतत्त्वकी पूजा करके गन्ध, पुष्प और अक्षतादि दान करके उससेही धूपित करें, अनन्तर उसके ऊपर कुल और पूजानुष्ठान करके समाहित हो उसमें पञ्चकामकी अर्चना करनी चाहिये । ह्रीं क्लीं इत्यादि मंत्र से गन्ध पु. प्पादि द्वारा पूजा करके, चारोंओर वटक, भैरव, दुर्गा, और क्षेत्रपालादि की पूजा करै । तन्त्रान्तर में भी कहा है-प्रथम "ऐं क्लीं" इत्यादि प्रयोग करके आधार शक्ति का उच्चारण और फिर श्रीपादका पद प्रयोग करके "पूज- २५६ . श्यामारहस्य भा०टी० । जयामि वदेत्ततः । अनेन मनुना तस्या ललाटे सुमनोहरम् ॥ त्रिकोण तत्र संलिख्य सिन्दूराद्यैर्वरानने ! ॥ उत्तरतन्त्रे च। तस्या मूर्ध्नि त्रिकोणंच यन्त्रमालिख्य साधकः । महाप्रे. तासनं मध्ये अधो वालांच पूजयेत् ॥ मौली गणेशं केशाग्रे कुलाध्यक्ष ललाटके। दुर्गा भ्रुवोस्तथा लक्ष्मी रसनायां स. रस्वतीम् ॥ स्तनद्वये वसन्तंच मदनंच प्रपूजयेत् । मुखे सुः धाकरं पृष्ठे ग्लं वीजानन्तरोदिते ॥ दक्षिणांशं समाश्रित्य आशिरश्चरणावधि । पूज्याः कामकलास्तस्याः साधकाङ्गेषु साधकः ॥ श्रद्धाप्रीतीरतिश्चैव भूतिः कान्तिमनोरमा । विमला मोदिनी घोरा मदनोत्पादिनी मदा ॥ मोहिनी दी- पनी चैव शोधिनी शाङ्करी तथा ॥ रखनी चैव मदना कला स्वरविभूषिता । ततश्चन्द्रकलाः पूज्याः आशिरश्चरणावधि । पृष्ठा वशा च सुमना रतिः प्रीति तिस्तथा ॥ सिद्धिः सौम्या मदन के मुख में यामि" कहकर । इस मंत्र से उसके ललाट में सिन्दादि द्वारा मुमनोर त्रिकोण लिखकर इत्यादि । उत्तर तंत्र में भी कहा है. तिसके मस्तक में त्रि: कोण गन्त्र लिखकर मध्य में मेतासन के अधोभाग में वाला के मौलि में गणेश के केशान में कुलाध्यक्ष के ललाट में दुर्गा के दोनों भाओं में कमी की मिना में सरस्वती के दोनों स्तनों में वसन्त के और पूना करे. और पृष्ठ में ग्लू" वीजका उच्चारण करना चाहिये । अनन्तर इसके दक्षिणांशको आश्रय करके चरणसे मस्तक पर्यन्त कामाला सरकी पूमा कर, अदा, प्रीति, रति, मति, कान्ति मिला, मोदिनी, पोरा, मदनी सादिनी, मदा, मोहिनी, दीपनी, चौधनी, शहरी, रजनी और मदना इनका नाम पळा है । चरणसे पातक पर्यन्त, उन उन पन्द्रकला सीमी पूमा करनी पारिंग, पृष्ठा, पा, मुमना, रति.प्रीति, धृति, सिदि, सौम्पा, मरीचि - नवय परिच्छेद। मरीचिश्च तथा चैवांशुमालिनी। मदिरा शशिनीच्छाय तथा सम्पूर्णमण्डला॥तुष्टिश्च अमृता चैव पूज्याश्चन्द्रकला इमाः। स्वरैरेव प्रपूज्या हि सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥ ललिताव्याप्तिदीपिकायान्तु । भगे तदीये विद्यन्ते नाड्यस्त्रित्रः प्रधानिकाः । एका तु नाडिका सौरी चान्द्री चान्या च नाडिका ॥आग्नेयी चापरा ज्ञेया पूजयेत्ताञ्च साधकः । अम्बु स्रवति चान्द्री हि पुष्पं सवति भानवी ॥ वीजं स्रवति चाग्नेयी तास्तु नामभिरर्चयेत् वाग्भवाद्यैर्नमोयुक्तैः पूजयेत् सुप्रसन्नधीः ।। उत्तरतन्त्रेऽपि। पूजयेन्मदनागारे रक्तगन्धेन चर्चिते । भगमालामनुं प्रो. च्य त्रितारानन्तरं तथा ॥ ऐं ह्रीं श्रीं हुं ब्लु क्लिन्ने ततः परम् । सर्वाणीति भगानीति वशमानय मे ततः । स्त्रीं ह्रीं क्लीं ब्ली क्लीं भगमालिन्यै नमः स्वाहा ॥ पूजयित्वा तु तच्चकं गन्धैः पुष्पै स्तथाक्षतैः । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्विविधैः कुलसाधकः ॥ अंशुमालिनी, मदिरा, शशिनी, छाया, सम्पूर्ण मण्डला तुष्टि, अमृतो यह चन्द्रकला है। सर्वे कार्यो सिद्धि के लिये, स्वर द्वारा इनकी पूजा करें। बलिता व्याप्तिदीपिका में कहा है, उनके वरांग में तीन प्रधान नादीहै पहली का नाम सौरी, दुसरी का नाम चान्द्री, और तीसरी का नाम आनयी है। साधक उसकी पूजा कर, चान्द्री, नाड़ी जल, सौरी पुष्प और आगेयी चीन श्रवण करती हैं, प्रत्येक का नाम उच्चारण करके पूजा करै । प्रसन्नचित्त से वाग्बीजादि, नम शब्द की सहायता से पूजा करनी चाहिये । उत्तर तंत्र में भी कहा है, तिसके वरांग को रक्त, गन्ध द्वारा चर्चित करके, उसमें भगमाला उच्चारण पूर्वक 'ऐं ही ' इत्यादि मंत्र प्रयोग के सहित पूजा करे। इस प्रकार गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और विविध नैवेद्य द्वारा निस के २५८ श्यामारहस्य भा०दी। विधाय नन्दितां तांच तदुच्छिष्टं स्वयं हरेत् । अर्चयेद्वन्धपु. प्पायैः स्वशिरस्तदनन्तरम् ॥ मूलमन्त्रं ततः भओं ह्रीं नमः शिवाय ततः परम् । यजेत्तु तत्पुरा घोरे सद्योजातेश्वरानाप। निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या च तदनन्तरम् । शान्तिश्च शा- न्त्यतीता च पड़झं तदनन्तरम् ॥ समग्रमविद्यामुच्चार्य त्रिकोणचैव पूजयेत् । अन्यत्रापि। इहाप्यावाहनं नास्ति जीवन्यासोऽपि नैव च ॥ अथैनां विधिना पोडशोपचारैः इष्टदेवीं प्रपूजयेत् । तदुक्तं उत्तरतन्त्रे। अवधूतेश्वरी कुब्जां कामाख्यां समयामपि। राजेश्वरी कालिकाञ्च तथा दिकर वासिनीम् ॥ महाचण्डेश्वरी तारां पूजयेत्तत्र साधकः । तदनुज्ञां ततो लब्ध्वा दत्वा ताम्बूल- मुत्तमम् ।। शिवञ्च तत्र निःक्षिप्य गजतुण्डाख्यमुद्रया। . . . चक्रकी पूना और उसको आनन्दिना करके, उसकी उच्छिष्ट स्वयं भोजन करै । तदनन्तर गध और पुष्पादि द्वारा अपना मस्तक अर्चित करै । अनन्तर मूल मंत्र और 'गे ही नमः शिवाय' कहकर सद्योजातेश्वर गणों की भी पूजा करै । फिर निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शांति, शान्तातीता, पडा और त्रिकोण, इन सबकी पूजा करै । अन्यत्र भी कहा है कि, 'आवाहन और जीवन्यासभीनहीं है। अनन्तर यथा विधि पोडशउपचार द्वारा इष्टदेवी की पूजा करनी चाहिये । उत्तर तंत्र में भी कहा है, मुन्ना, कामाख्या, समया,राजेश्वरी, कालिकादिकरवासिनी, महाचण्डेश्वरी, और तारा, इनकी पूजा करनी चाहिये । फिर उनकी आज्ञा ग्रहण और श्रेष्ठ साम्बूल दान करके उसमें गमतुएडाख्य मुद्रा द्वारा शिव निक्षेप करै । गन इस अवधतेश्वरी + नवम परिच्छेद । २९९ गजतुण्डा मुद्रा यथा। अंगुष्ठानामिकामध्या योन्याकारेण योजयेत् । गजतुण्डा- कृतिर्देवीम् इत्याह भगवान् हरः ।। अत्राप्यारम्भे त्यागे च धर्माधर्महरीत्यादि मन्त्रद्वयं गृ. ह्यवचनान्तरदर्शनात् तद्यथा । शिवशक्तिसमायोगो यत्र यत्र प्रजायते । तत्र तत्र स्वयं ग्राह्यो धर्माधर्मादिको मनुरिति ।। ततोऽष्टोत्तरसहस्र मष्टोत्तरशतं वा अक्षुब्धो जपेत् । तदुक्तम् उत्तरतन्त्रे। प्रजपेत् क्षोभरहितश्चाष्टोत्तरसहस्रकम् । शतमष्टोत्तरं वापि अक्षुब्धस्थिरमानसः ॥ जपान्ते तज्जपं देव्यै समर्प्य तदनन्तरम् । क्षुब्धां मनोभवसुखैः पूजयेत् सुचिरा रसात् ॥ गलचक्रदलं तस्माद् गृहीत्वा कुण्डगोलकं । अयस्थापनय- त्राङ्कं चन्दनादिषु योजयेत् ॥ तुएडा मुद्रा । यथा--अंगुष्ठ, अनामिका और मध्यमा योनि के भाकार में योजना करै । तो गजतुण्डा कृति होती है। भगवान शिवने देवी से इस प्रकार कहा है, इस स्थान में भारम्भ और त्याग के समय धर्माधर्मरूप हवि द्वारा, इत्यादि मंत्र प्रयोग करना चाहिये । गृह्य वचनान्तर देखकरही इस प्रकार कहाजाता है । यथा-जिस जिस स्थल में शिवशक्ति का सपायोग हो उस उस स्थल मेंही धर्माधर्मादि मंत्रका प्रयोग करै । अनन्तर लोभ र- हित होकर अष्टोत्तर सहस्र वा अष्टोत्तर शत जप करै । उत्तर तंत्र में कहा है कि क्षोम रहित होकर अविकत और स्थिर चित्त से अष्टोत्तर सहस्र वा अष्टोचर शत नप करना चाहिये । जपके अन्त में वह जा देवीको समर्पण करके फिर मनोभव सुख के आवेश से जन्धभावा कुल नासिकाकी पूजामें प्रवृत्त होवे । तिससे गलचक दल और कुंडगोलक ग्रहण करके चन्दनादि में अर्ण स्थापन यंत्रास योजना करे | मानार्णव में विशेष निर्देश किया है।
श्यामारहस्य मा०टी०। ज्ञानार्णवे विशेषो यथा। शिवशक्तिसमायोगो योग एव न संशयः ॥ चीत्कारो यन्त्ररूपस्तु वचनं स्तवनं भवेत् ॥ आलिङ्गनन्तु कस्तूरी कर्पूरं चुम्बनं भवेत् । नखदन्तक्षतान्यत्र पुष्पाणि विविधानि च ॥ मैथुनं तर्पणं विद्धि धीर्यपातौ विसर्जनम् । इति । कुलार्णवे च । आलिङ्गन चुम्वनं च स्तनयोमर्दनं ततः। दर्शनं स्पर्शनं योनेर्विकाशं लिङ्गघर्पणम् ॥ प्रवेशः स्थापनं शक्तेर्नवपुष्पाणि वर्जयेत् ॥ रुद्रयामलेऽपि। संयोगाजायते सौख्यं परमानन्दलक्षणम् । कुलामृतं प्र. यलेन गृह्णीयाद् दुर्लभं नरः ॥ तेनामृतेन दिव्येन तर्पयेत्रि- पुरां पराम् । सान्निध्यात् तत्क्षणाद् याति प्रीता सिद्धिं प्रय- च्छति ॥ समस्तदेवतानाञ्च तर्पणंच सदामृतैः गुरूणां सा. धकानांच सर्वेषां तर्पणं भवेत् ॥ तेनामृतेन दिव्येन सर्वे तु- यथा-शिव शक्ति का समायोगही योनहै इसमें संशय नहीं । शीतकार सा- क्षात् यंत्र वचन स्तव कस्तूरी आलिंगन, कपूर, चंबन, विविध पुष्प नखदन्त तत, एवं तर्पण, मैथुन, और वीर्य पात विसर्जन, जाने । कुलार्णव में कहा है, आलिंगन, दर्शन, स्पर्शन, इत्यादि नव पुष्पको त्याग करना चाहिये । रुद्रयामल में कहा है. संयोगसेही परमानन्द स्वरूप सौख्य उत्पन्न होता है। प्रयत्न सहित कुलामृत गृहण करै । क्योंकि वह सहनमें प्राप्त नहीं होसका। उसी दिव्य अमृत से देवी त्रिपुराका तर्पण करै । तो वह व्यक्ति देवी के सानिध्य से तत्काल सिद्धि लाभ करता है । अधिक क्या इस अमृत के द्वारा समस्त देवता, गुरुवर्ग, और साधकगणों का सर्वदा तर्पण होता है । उस अमृतसेही सब संतुष्ट होते हैं । सापक जो कामना करे वहीतत्काल 1 दशम परिच्छेद। टा भवन्ति च । यत्कामं कुरुते मन्त्री तत्क्षणादेव सिध्यति। समयार्णवे च। कुलामृतं समादाय ततोऽध्ये वा क्षिपेत् बुधः ।। इतिमहामहोपाध्यायश्रीपरमहसपरिव्राजक श्रीपूर्णानन्दगिरिविरचिते श्यामारहस्ये कुसुमोप्तादननाय नवमं परिच्छेदः। अथ दशमः परिच्छेदः। अथ सामान्यसाधनम् । तदुक्तं कालीतन्त्रे । अथोच्यते कालिकायाः सामान्य साधनं प्रिये!। कृतेन येन विधिना पलायन्ते महापदः॥ शिवावलिश्च दातव्यःसर्व सिद्धिमभीप्सु भिः। महोत्पाते महायोगे महादोषे महामहे ।। महापदि महायुद्धे महाविग्रहसंकुले । महादारियशमने म- सिद करसका है । समयार्णव में भी कहा है-कुलामृत ग्रहण अर्य निक्षेप करै ।। इतिश्री महामहोपाध्याय श्रीपरमहंसपरिमानक श्रींपूर्णानंदगिरि विरचित श्यामारहस्येपं० हरिशङ्करजीशास्त्रीकृतभापाटीकासहितकुममोत्पाद नामनवमपरिच्छेदसमाप्त ॥९॥ - अब सामान्य साधन कहाजाता है । कालीनंत्र में कहा है, हे प्रिपे ! अब कालिका का सामान्य साधन कहता हु ! इसका विधि पूर्वक अनुष्ठान करने से समस्त महा आपदा पलायन करती हैं संपूर्ण सिद्धि की कामना करनेवाले व्यक्तिगण शिवा वलिप्रदान करें । महोत्पात, महोयोग, महादोष, महाग्रह, महाआपद, महायुद्ध, महाविग्रह, महादरिद्रता, महा दुःस्वम महा.
२६२ श्यामारहस्य भा. टी01 हादुःस्वप्नदर्शने ॥ महाशान्तौ महारण्ये महास्वस्त्ययने त- था । घोराभिचारशमने घोरोपद्रवनाशने ॥ कूटयुद्धादिश- मने कूटशत्रुनिवारणे । राजादिभयशान्त्यर्थं राजक्रोधोपशा- न्तये ॥ न ददाति वलि यस्तु शिवायाः शिवतृप्तये । सपा- पिष्ठो नाधिकारी कुलदेव्याः प्रपूजने ॥ कुलीनं नावमन्येत कुलजां परिपूजयेत् । कुलजेषु प्रसन्नेषु कालिकासन्निधिर्भ- वेत् ॥ अहो धन्यवतां लोके जानाति कुलदर्शनम् । तेषां म- ध्ये च यः कोऽपि कुलदेवी समर्चयेत् ॥ कुलाचारविहीनो यः पूजयेत् कालिकां नरः । स स्वर्गमोक्षभागी च नस्यात् स. त्यं न संशयः॥ आयुरारोग्यमैश्वर्य वलं पुष्टिर्महद्यशः। क. विता भक्तिमुक्ती च कालिकापदपूजनात् ।। कुलचूडामणौ। कुलवारे कुलाष्टम्यां चतुर्दश्यां विशेषतः । योगिनीपूजन शान्ति, महारण्य ( महावन ) महास्वस्तयन, घार अभिचार, घोर उपद्रव कूटयुद्धादि, कूटचक्र, राजादिमय, वा राजादि का क्रोध, इन सबकी शान्ति और निराकरण के लिये शिवावलि देनी चाहिये । जो व्यक्ति शिवकी तृप्ति के लिये शिवा पलिप्रदान नहीं करते, उन पापियों का कुळदेवता की पूना में अधिकार नहीं है । कुलीन का अपमान न कर, कुलजा की पूजा करें । कुलजागणों के प्रसन्न होने से देवी कालिका का सान्निध्य लाभ होता है । अहो ! जो व्यक्ति कुळ दर्शन से अवगत है । उनकी संसार में धन्यवान पुरुषों में गणना होती है । और उन में जो कोई देवी की अर्चना करता है, वही श्रेष्ठ है । कुलाचार विहीन होकर, कालिका की पूजा न करने से वर्ग और मोक्ष के लाभ से वचित होना होता है । में सत्यही कहता हू. इस में कोई संदेह नहीं है. कालिका की पद पूजा क. रने से, आय, आरोग्य, ऐश्वर्य बल, पति, महायश, कविता, भोग और मोन काम होती हैं । कुलचूडामणि में कहा है । कुलवार की कुळाष्टमी . .
. दाम परिच्छेद । तत्र प्रधान कुलपूजनम् ॥ यथा विष्णु तियो विष्णुः पूजितो वांछितप्रदः। तथा कुल तिथौ दुर्गा पूजिता वरदायिनी ॥ अथ कुलवारादयो यथा तदुक्तं यामले । रविश्चन्द्रो गुरुः सौरिश्चत्वारश्च कुला मताः ॥ भौमशुक्रो कुलाख्यौ तु वुधवारः कुलाकुलः । द्वितीया दशमी पष्ठी कु. लाकुलमुदाहृतम् ॥ विषमाश्चाकुलाः सर्वाः शेपाश्च तिथयः कुलाः । वारुणा भिजिन्मूलं कुलाकुलमुदाहृतम् ॥ कुलानि समधिष्ठानि शेपभान्यकुलानि च । तिथिवारे च नक्षत्रे अ- कुलस्थायिनो जनाः ॥ कुलाख्ये जापको नित्यं साम्यंचैव कुलाकुलम् ॥ एवं कुलबाररादिकं ज्ञात्वा साधकः कर्म कुर्यात्। अथशिवावीलप्रकारः तदुक्तं कुळचूडामणौ । विल्बमूले प्रान्तरे वा श्मशाने वापि साधकः।मांसप्रधा- नं नैवेद्यं सन्ध्याकाले निवेदयेत् ॥ कालिकालीति वक्तव्ये विशेर करके चतुर्दशी में योगिनी को पूना ही प्रधान कुल पूना है । विष्णु तिथि विष्णु की पूजा करने से. यह जिस प्रकार वांछित प्रदान करते हैं। कुल तिथि में दुर्गा की पूजा करने से, वह उसी प्रकार वरदायिनी होती हैं। कुचागदि यथा-यामळ में कहा है. रवि, चन्द्र, गुरु, सौरि, यह चार बार कुल वार कहकर परिगणित , भौम और शुक्र वार को भी कुलवार कहा । बुधबार कुळाकुळ विख्यात है । द्वितीया, दशमी, षष्ठि यह कई तिथि भी कुळाकुल शब्द में निर्दिष्ट हैं । सम्पूर्ण शेप तिथिही कुलतिथि है इन में जो विपम हैं, जिसमकार तृतीया और पंचमी, वह सवहीं अकुल है, पारुण, अभिजित्, आर्द्रा, म्ल इन सवनक्षत्रों को कुळाकुल कहते हैं, सा- धक इस प्रकार कुळवारादि से अवगत होकर, कर्मानुष्ठान में प्रवृत्त होवे ।। अब शिवालिप्रकार कहा जाता है । कुलच्दामणि में कहा है, यथा- पेल की जड़, प्रान्त का श्मशान, इन सब स्थलों में सन्ध्याकाल के समय पास प्रधान नैवेद्य निवेदन करनी चाहिये उस समय 'कालि कालि' जाता है , श्यामारहस्य पा. दी। तत्रोमा शिवरूपिणी । पशुरूपासमायाति परिवारंगणैःसह। भुक्त्वा रौति यदेशान्यां मुखमुत्तोल्य सुस्वरम् । तदैव मङ्गलं तस्य नान्यथा कुलदूषणम् ॥ अवश्यमन्नदानेन नियतं तोष येत् शिवाम् । नित्यश्राद्धं तथा सन्ध्यावन्दनं पितृतर्पणम् ॥ तथैव कुलदेवीनां नित्यता कुलपूजने । पशुरूपां शिवां देवीं योनार्चयति निर्जने ॥ एकया भुज्यते यत्र शिवयादेव भैरव!। शिवाभावेन तस्याशु सबै नश्यति निश्चितम् ॥ जपपूजागि धानानि यत्किञ्चित् सुकृतानि च । गृहीत्वा शापमादाय शि- वा रोदिति निर्जने ॥ एकया भुज्यते यत्र शिवया देव भैरव ! वांछनाद्विगुणं कर्म सगुणं साधयेद्यतः ॥ तेन सर्वप्रयत्नेन कर्त्तव्यं पूजनं महत् । राजादिभयमापन्ने देशान्तरभयादिके ॥ शुभाशुभानि कार्याणि विचिन्त्य वलिमाहरेत् । गृह्ण देवि ! महाभागे ! शिव कालाग्निरूपिणि ! ॥ शुभाशुभफलं व्यक्त इसप्रकार वाक्य प्रयोग करने से, शिव रूपिणी उमा पशुरूप से परिवार गणों के सहित वहां समागत होती हैं । वह तत्समस्त भक्षण करके उनके ऐशान दिक में पुख उत्तोलन पूर्वकं मुस्वर में शब्द करने से मंगल है, नहीं तो कुलदूपण है सदा अन्नदान द्वारा अवश्य शिवाका सन्तोष विधान करै । नित्यबाद, सन्ध्यावंदन, पितृतर्पण, कुल देवी गणों की पूना यह सब कार्य नित्य साधन करै । जो व्यक्ति निर्जन में पशुरूपा देवी शिवा की अर्चना नहीं करता, और जिस स्थल में एकमात्र शिवा भक्षण करे, शिवाके अभाव में उसका सम्पूर्ण विनष्ट होता है, इस में कोई सन्देह नहीं । अधिक क्या शिवा उस का जप, पूजा, और विधान एवं मुकृति इत्यादि जो कुछ है। वह सम्पूर्ण ही ग्रहण और शाप प्रदान करके निर्जन में रोदन करती हैं । इस लिये सर्व प्रयत्न से शिवा की पूजा करै । रानादि का भय उपस्थित और देशान्तर भय संघटित होने से शुभाशुभ समस्त कार्य को भली भांति से चिन्ता करके, वलि आहरण करै । हे शिव ! तुम्ही कालानि स्वरूपिणी देशप परिच्छेद। ब्रूहि गृह्ण वलिं तव । एवमुच्चार्य दातव्यो वलिः कुलजन प्रियः। यदि न गृह्यते वत्स ! तदा नैव शुभं भवेत् । शुभ यदि भवेत्तस्य भुज्यते तदशेषतः ॥ एवं ज्ञात्वा महादेव । शांतिस्वस्त्ययनं चरेत् । कुलाचारं दक्षिणाख्यं कथितं तव सु. बतम् ॥ न कस्मैचित् प्रवक्तव्यं यदीच्छेच्छुभमात्मनः । नि- जने चैव कर्तव्य न चैव जनसन्निधो ॥ न पितुः सन्निधाने व. न मातुः सुतसन्निधौ । किं वा पक्षिपतङ्गादिदर्शनेनैव कार- येत् ॥ पाताले मण्डले वापि गहरे वा सुयन्त्रिते । कुलपुष्पं कुलद्रव्यं कुलपूजां कुले जपम् ॥ कुरुं कुलपतिश्चापि मालां कुलाकुलम् । कुलचक्रं कुलध्यानं सर्वथान प्रकाशयेत्॥ प्रकाशात् सिद्धिहानिः स्यात् प्रकाशाद् वन्धनादिकम् प्रका. शान्मवनाशः स्यात् प्रकाशादेव हिंसनम् ॥ प्रकाशान्मृ. तुम्ही महाभाग, और तुम्ही स्वप्रकाश और दिव्य लीलाविग्रह मयी हो । तुम यह वलिग्रहण करो, और शुभाशुभ फल व्यक्त करके कहो । इस प्रकार सच्चारण करके, वलिपदान करना चाहिये, हे वत्स ! शिवा यदि चलि ग्रहण न करें तो शुभ नहीं होता । और यदि वह सम्पूर्ण भवण करे, तो वह गंगल होता है, हे महादेव ! इस प्रकार अवगत होकर, शान्ति ख- स्त्ययन करें । तुम्हारे निकट यह दक्षिणाख्य कुलाचार कीर्तन किया । अपनी हितकामना की अमिलाप होने से किसी से भी इस को न कहै । निर्जन ही में रिधान करै । मनुष्य के समीप न करे । अधिक क्या पिता के समीप भी न करें । माता के और पुत्र के समीप भी न करै । अथवा पक्षी और पतंगादि के साक्षात में भी इस को न करै । कुल पुष्प कुलपूजा कुल द्रव्य, कुलजप, गुरु, कुलपति, कुलमाला, कुलाकल, कुळचक, कुलध्यान यह समस्त सर्वथा प्रकाश न करै । प्रकाश करने से सिद्धि में विघ्न होताहै बन्धनादि संघटित होता है, मंत्र विनष्ट होता है । हिंसा आपतित होती है, और मृत्यु लाभ होती है । इस लिये किसी प्रकार से प्रकाश न करें ।
श्यामारहस्य भा. टी। त्युलाभः स्यात् न प्रकाश्यं कदाचन । पूजाकाले च देवेशि ! यदि कोऽप्यत्र गच्छति ॥ दर्शयेद्वैष्णवी मुद्रां विष्णुन्यास तथान्तरम् । प्रकाशाद्यदि गुप्तिः स्यात् तत्प्रकाशेन दूषणम् ॥ 'गोपनाद्यदि व्यक्तः स्यात् नं गुप्तिः साभिधीयते । कदाचिद नहानिस्तु न च व्यक्तिः कदाचन ॥ अथ समयाचारः । तदुक्तं तत्रैव । शृणु पुत्र ! रहस्यं मे समयाचारसम्भवम् । येन हीना न सिध्यान्त जन्मकोटिसहस्रशः ॥मानवः कुलशास्त्राणां कुल चर्यानुसारिणाम् । उदारचित्तः सर्वत्र वैष्णवाचारतत्परः ।। परनिन्दासहिष्णुः स्यादुपकाररतः सदा ! पर्वते विपिने चैत्र निर्जने शृन्यमण्डपे ॥ चतुष्पथे कलामध्ये याद दैवाद् गति- र्भवेत् । क्षणं ध्यात्वा मन जप्त्वा नत्वा गच्छेद् यथासुखम् ॥ प हे देवेशि ! पदि कोई पूना काल में तहांगमन करे तो उसको वैष्णवी मुद्रा और वैष्णवी न्यास दिखलावे । इस प्रकार प्रकाश यशसे यदि गुप्त किया जाये, तो उस में कोई दोष का विषय नहीं होसकना । और गोपन करने से, यदि प्रकाश होजाय, तो गोपन न करै । कदाचित् अंग हानि होने पर भी प्रकाश न करें। अब समयाचार लिखने हैं । कुनचूडामणि में कहा है. हे पुत्र ! मेरे प्रति समपाचार रहस्य श्रवण करो। जिसके न होने से करोड सहस जन्ममें भी सिद्धिलाभ करनेकी सार्थ उत्पन्न नहीं होती । सर्वदा सर्वत्र उदारचित और वैष्णव भानार में तत्पर होवें किसी के निन्दा करने से उसको सान कर; सर्वदा गनप्प के उपकार में रत होवे । पर्वत निर्जन वन, शून्यमण्डल और चार में पदि देवात् गमन कियागाय तो तण काळ पान करके पंचना और प्रणाप करने के पीछे यथा मखमें गमन करे । गृका दर्शन दशम परिच्छेद । गृधं वीक्ष्य महाकाली नमस्कुर्यादलक्षितम् । क्षेमङ्करौं त- था वीक्ष्य जम्बुकीं यमदूतिकाम् ॥ कुररं श्येनभूकाको कृ- णमार्जारमेव च । पूर्णोदरि ! महाचण्डे ! मुक्तकेशि ! वलि- प्रिये !" कुलाचारप्रसन्नास्ये ! नमस्ते शङ्करप्रिये! श्मशा- नस्थं शवं दृष्ट्वा प्रदक्षिणमनुवजन् ॥ प्रणम्यानेन मन्त्रेण मन्त्री सुखमवाप्नुयात् । घोरदंष्ट्रे ! कठोराक्षि ! किचिश- ब्दप्रणादिनि । ॥ घुष्टघोररवास्फाले ! नमस्ते चितिवासि- नि । । रक्तवस्त्रां रक्तपुष्पां विलोक्य त्रिपुरात्मिकाम् ॥ प्रण- मेदण्डवमाविमं मन्त्रमुदीरयन् ।वन्धूकपुष्पसङ्काशे ! त्रि- पुरे ! भयनाशिनि ! ॥ भाग्योदयसमुत्पन्ने ! नमस्ते वरवर्णि नि!। कृष्णवस्त्रं तथा पुष्पं राजानं राजपुत्रकम् ॥ हस्त्यश्व- रथशस्त्राणि फलकान् वीरपौरुपान् । महिषं कुलदेवंच दृ. ष्ट्वा महिपमर्दिनीम् ॥ जयदुर्गा स्मरेन्मन्त्री शतविघ्नन करनेसे देवीमहाकालीको गुप्तरूपसे नमस्कार कर। क्षेमकरी, जम्बूकी, यमदू- तिका, कुरर, श्येन, मकाक आकृष्णमानऔर अर्यात कालीविल्लीकादर्शन करने से इस प्रकार मंत्र कहै, हे पूर्णोदरी ! तुम्ही महाचण्डा, मुक्तकेशी वलिप्रिणा और शङ्करकी प्रिया हो, तुम्ही कुलाचार प्रसन्नास्या हो । तुपको नमस्कार है मशन और शब देखने पर प्रदक्षिणा के क्रम से अनुगमन करके प्रणाम पूर्वक वक्ष्यमाण मंत्र कहने से सुख लाभ होता है । मंत्र यथा- चिति- वासिनी ! तुम्हारी दाडे अत्यन्त भयंकर है, तुम्हारे नेत्र अति कठोर हैं । तुम किंचित् शब्द से गर्नन और घुट घोर रव से आस्फालन करती ' हो । तुम को नमस्कार है । रक्तवस्त्रा और रक्तपुष्पा त्रिपुरामिका के दर्शन करने से दण्डकी समान भूमि में वक्ष्यमाण मंत्र से प्रणाम करै । हे त्रिपुरे ! तुम भय नाशिनी हो, बन्धूक पुष्पकी समान तुम्हारी आमा है । हे वर वर्णिनी! भाग्य उदय होने सेही तुम्हारा आविर्भाव हुआ है, तुमको नमस्कार है। कृष्णवस्त्र, पुण राना, राजपुत्र; इस्ती, अश्व, रथ, शस्त्र, फलक, वीर पौरुण मौर महिप, इन सब के देखने पर पहिष मर्दिनी जय दुर्गा का स्मरण करै, २६८ श्यामारहस्य भा०टी० । लिप्यते। जयदेवि ! जगद्धात्रि ! त्रिपुराये ! त्रिदैवते ! ॥ भक्तेभ्यो वरदे ! देवि ! महिषन्नि ! नमोऽस्तुते । मद्यभाण्ड समालोक्य मत्स्यं मांसं वरस्त्रियम् । दृष्ट्वा च भैरवी देवीं प्रणम्य विमृषेन्मनुम् ॥ घोरविघ्नविनाशाय कुलाचारसमृद्ध ये । नमामि वरदे देवि ! मुण्डमालाविभूपिते ! ॥ रक्तधा- रासमाकीर्णवदने ! त्वां नमाम्यहम् । एतेषां दर्शने देवि ! यदि नैवं प्रकुर्वते ॥ शक्तिमन्त्रं पुरस्कृत्य तस्य सिद्धिर्न जा. यते । एतेषां मारणोच्चाटौ हिंसनं वाग्भवादिभिः ॥ कुरुते यदि पापात्मा मद्भक्तः स कथं भवेत् । प्रधानांशसमुद्भूता एते कुलजनप्रियाः ॥ डाकिन्यश्च तथा सर्वा मदंशाः शृणु भैरव ! । लब्धसिद्धिसमायोगात् डाकिनीहिंसनं यदि ॥ - तो साधक शतविघ्नसे भी आक्रान्त नहीं होता तिस काल इस प्रकार मंत्र कहै, हे देवि ! जगद्धात्री तुम्हारी जय हो । हे त्रिपुरे ! तुम्ही पाय देवता हो । तुम्ही त्रिदेवता हो। तुम्ही भक्तोंको घर देती हो । तुमनेही महिषासुर का विनाश किया है । तुमको नमस्कार है । मद्यपात्र, मत्स्य, मांस भौर वरस्त्री के देखनेपर देवी भैरवी को प्रणाम करके यह मंत्र कहै, हे देवि वरदे ! हे मुण्डमाला विभूपिते ! मै घोर विघ्नविनाश और कलाचार समृद्धिक छिपे तुपको नमस्कार करता हूं । हे देवि ! तुम्हारा वदन मण्डल रुधिर धारासे समाकीर्ण है । तुम को नमस्कार करता हूं । हे देवि इनका दर्शन होनेपर यदि शक्ति मंत्र पुरस्कृत करके इस प्रकार अनुष्ठान न कियाजाय, तो उस की सिद्धि हानि होती है यदि पापात्मा वाग्भवादि द्वारा इसका मारण, उच्चाटन, और हिंसन करै, तो वह किस प्रकार से हमारा मक होसत्ता है ! हे भैरव ! मुनो । संपूर्ण फुलनन पियव्यक्ति मेरे प्रधान अंश उत्पन हैं, और समस्त डाकिनी मेरी ही अंश है। सिदियोग में पास होनेपर यदि कोई डाकिनीगणों की भयत्रा दानवगण, और विशेषकरके मेरे मतगण, एकादश परिच्छेद । अथवा दानवानाञ्च मद्भक्तानां विशेषतः । वटुकानां भैर- वाणां तस्य सिद्धिर्न जायते ॥ 1 इतिश्रीमहामहोपाध्यायश्रीपरमहसपरिव्राजक श्रीपूर्णानन्दगिरिविरचिते श्यापारहस्ये दशमः परिच्छदः । अथ एकादशः परिच्छेदः । अथ मन्त्रसिद्धिप्रकारों लिख्यते । तदुक्तं वीरतन्त्रे। अथातः संप्रवक्ष्यामि गुरुसिद्धिपरम्पराम् । रहस्य मंत्र सिद्धस्तु पुरश्चर्यादिभिर्विना ।। गोपितं कोटिशास्त्रेषु इदानीं प्रकटीकृतम् । एवं ज्ञात्वा विशेषज्ञो गोपयेत् प्रीतये मम ॥ एतत् प्रकाशनात् लोके महाहानिः पदे पदे । बटुकगण और भैरवगणों की हिंसा करता है, तो सिद्धिलाभ से वंचित होता है। इतिमहामहोपाध्यायश्रीपरमहंसपरिवामकश्रीपूर्णानन्दगिरिविरचित श्यामारहत्यमापाटीकासहित सामान्यसाधननाम दशमपरिच्छंदसमाप्त || १०॥ अब मन्तसिद्धिकी विधि लिखते हैं। वह विधि वीरतन्त्र में लिखी है। अब इसके अनन्तर विशेष सिद्धि की परंपरा वर्णन करते हैं । पुरश्चरण आदि न करने से मन्त्रसिद्धि अवश्य गुप्त रइजाती है | जो विधि करोड़ों तन्त्र शास्त्रों में छिपी पड़ी थी उसी को अव मगट करते हैं । ऐसा जानकर विद्वान को चाहिये मेरी नीति के लिये इसे गुप्तही रक्खै । क्योंकि इसे प्रकाशित करने से संसार में पग २ के ऊपर विशेष हानिहोगी। उन प्रभाव सपन भ- . .. श्यामारहस्य भा०टी०। शिवशिखिसितभान पञ्चमान्त्यस्वराढ्यं द्वितयमिदमपूर्व वीजमुग्रप्रभायाः । क्षणमपि स्वमणीनां मण्डलांतर्षिभाव्य क्षपयति दुरदृष्ट वादिराट् जायते सः ॥ १॥ स जयति रिपु वर्गान् वादिराज्ञो विवादे लसति च रमणीनां चित्तचौरश्चि. रायुः । कलयति कविराजैरप्रदृष्टं सुकाव्यं मधुमतिरपि हेया किं पुनः सिद्धसद्धाः ॥ २ ॥ कुलयुबतिसुयोनौ मन्त्रवर्णान् विलिख्य निखिलनिगमवर्णान् सुप्तदोषादिदृष्टान् । विदित गुरुकुलांतर्वाह्यवाविधिज्ञो मनुपुटितसुधीमान् साधयेदान्त चेताः ॥ ३ ॥ कुलपथमनुसन्ध्यां योऽपि तासां स्त्रभूमौ सब जननि ! जनोयं नर्पयेत्तीर्थतोयैः । रुधिरभवसुपुष्पैर्गन्धमा ल्यानुलेपै रचितयुवतिवेशस्त्वद्धिया ध्यायते सः ॥ ४ ॥ प. रिचरति समस्तैन्यासपूर्वैः प्रसिद्धस्तव परिकरजालैयोंनि गवती का दूसरा यह अपूर्व वीज मंत्र है, कि शिव शिखि शुक्र और सूर्य इन के अन्त में छठेस्वर का संयोगकरके और मणिमय मण्डलके मध्य छिन भरभी ध्यानकरके जो देखता है वह वाग्मी होजाता है ॥ १ ॥ वह व्यक्ति राजा के समक्ष किसी प्रकार के वादविवाद में शत्रु वर्ग का जपकरता है, चिरंजीव होकर विकासवती स्त्रियों का चित्त चोर उनके सदा प्रसन्न रहता है । और विशेष क्या कहें वडे २ कवीश्वरों को भी दुष्प्रधर्ष ऐसे काव्य बनाने में समर्थ होजाता है ।। २ सुन्दर कुलीन युवती स्त्री के.......स्थान में मन्त्र के अक्षरों को लिखकर और स्वम दोप आदिमें देखहुए समस्त निगमाक्षरों को गुरु कुल में कहकर वाहमार्ग विधि को जान के और भपने चित्तको अच्छी तरह दमन करके मनुवर्णों से संपुटित कर भली प्रकार सा. धन करै ।। ३॥ जो व्यक्ति नित्यसंध्या के समय कुल क्रमागत विधिके अनु सार उनके उसी स्थान में हे मातः ! यह तुम्हारा दास तीर्यानीत जलों से तर्पण करता है । और गुडहल के फूल और ग-धमालादि चन्दन से सो का पंप बनाय तुम्हारा ध्यान करे ॥ ४ ॥ जो पुरुष न्यास पूर्णक तुम्हारी पूनाकी सामग्री से चक्र में पूजन करके सन्दर फल में उत्पन्न समस्त २७१ एकादश परिच्छेद । चक्रे प्रपूज्य । सुविमलकुलजां त्वां ह्रीघृणावर्जितां यः स्वय- मपि रचिताङ्गः क्षोभकृद्योगिनीनाम् ॥ ५ ॥ पशुरिपुकुलच- कं संस्पृशन्मध्यशाखां कुलपतिकुलनाथष्ठद्वयं योजयित्वा । मनुपुटितविमृग्यं योजयेत्तद्वहिर्यो जननि ! तव कलानां को- विदां.कामरूपः ॥ ६ ॥ कुमतिरहितचित्तः संलिखेत्तां विधा मे विगतभयविवादध्वान्तजालः सुधांशुः । तव चरणतलांत धूलिजालैर्विशालैः चिरकलितवपुस्तधर्मभिर्देवपूज्यैः ॥ ७ ॥ परिचरति स विज्ञो मोक्षच-धिपश्च मदनमदबधूनां वीज; मुद्धृत्य शक्तिम् । तदनु कठिनबीजं ज्ञानचक्रं तदन्तर्यदिन- पति मदन्तर्भावमासाद्य सद्यः ॥ ८॥ सुरनगरगतिज्ञैः सिद्ध वृन्दैः प्रपूज्यः शिवभृगुमदपृथ्वीशक्तियुक्तः स्वसिद्धम् । हरि हरचतुरास्यस्वस्वभूति प्रसूतं परमवररसज्ञः क्षोभकृत् का- हुई लज्जा और दया रहित तेराध्यान करता है वह योगियों के भी चित्त में सोम करताहै ॥ ५ ॥ हे जननि ! जो साधक मध्यशाखाका स्पर्श करपशरिपु कुळ चक्रकी कुलपति कुलनाथ और दो प-ट से युक्तकर और मनुवर्णसे अन्यथा युक्त कर पूजन करता है वोह काम रूप व्यक्ति तुम्हारी कलाओं को मानता है ॥ ६ ॥ अपने चित्र से कुमति को दूरकर उसे तीन प्रकार लिम्वे और अपने चित्तस भयविपाद और कपट जालको दूरकर तुम्हारे चरणपांशुको शरीरमें लिप्तकर देवपूज्य प्रकारसे पूजन करै ।। ७॥ जो साधक विशेषज्ञान संपन्न और मोक्ष मार्गाचरण का वनके म...............वा... शक्ति का उद्धरण करके तत्पश्चात् कठिन वीज को फिर ज्ञान चक्र को लिख कर जपकरता है तब वह अपने का.. ...संवन्धी मनोरय सिद्धि को शीघूही मातहो जाता है ।। ८ देव लोक में जाने के तई समर्थ ऐसे सिद्धों के द्वारा पूजनीय शिव भृगु मद और पृथ्वी का शक्ति से युक्त ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर की निज २ विभूति से विभूपित सिद्ध यन्त्रकी पूजा करने से स्त्रियों के २७२ श्यामारहस्य भा० टी०।, मिनीनाम् ॥ ९ ॥रतिपतिरपि वाचां श्रीपतिःसार्वभौमःमृ. गमदकठिनाधः कामवीजं तदने । भुवनभयविनाशः क्षोभि. णी योजयित्वा जपति यदि सकृद्धा चिन्तते वीरसिंहः । (कुलयुवतिकुलान्तः क्षोभकृत कामभावः)॥१०॥ पाठांतरम्। मदनमदलताधः शक्तिबीजं नियोज्य स्मरहरहरिरूपी • कामरूपः कुवेरः । रिपुकुलहरिणाक्षी लोचनाम्भोजविाड् विपुलजलनिषेकात् खण्डितांतःस्थतापः ॥ ११ ॥ शिवमृग मदमूलं लोभमूलं समूलं भजति यदि गुरूणां वर्ममूलं.वि. मृग्यम् । निधिरपि निशिनाथो गीष्पतिः क्षुद्रचेताः यदि भः वति तदेतन्मुख्यमुर्वीपतिलम् ॥ १२ ॥ वरुणरण घ्राणमेकं विवयं तदुपरि मृगचिन्हं द्वन्द्वमेतद्भवान्याः । निखिलमनुवरेण्यं मोक्षदानकदक्षं सदसदमयधर्मा क्षेपह- न्मन्त्रराजम् ॥ १३ ॥ अनल शिसिधर्म वादिराजं स्वतंत्रम् विवर्य परावर भावको जानकर उनके चित्त को तुभित करदेता है ॥ ९ ॥ फिर जो व्यक्ति कामवीन को स्थापित कर 'जवनभयविनाशक्षामणी' यह संयुक्त कर एक बारभी जपकरता अथवा ध्यान करता है वोइ काम तुज्य मन्दर लक्ष्मीवान और समस्त भूमिका अधिपति होजाता है ॥ १०॥ त्रियों की.. यंत्र के नीचे शक्ति बीज को नियुक्त कर काम विष्णु और महादेव का इच्छानुसार रूपवना के अधिक जल से स्नान करने के कारण शरीर का सन्ताप शांत कर ॥ ११॥ जो व्यक्ति ध्यानकरता है वह भी विशप धनी और विद्वान् होजाता है चिशप क्या उसे सार्व भौमपदवीभी प्राप्त होजाती है ॥ १२ ॥ वरुण रणरहित एकघाण को छोड फिर मवानी के अन्दरूप उसके ऊपर मृगचिन्ह लिप्तकर सम्पूर्ण मंत्रों में श्रेष्ठ मोक्षदेने में निपुण ऐसे मंत्र.राजका जप कर ॥ १३ ॥ श्राम बीज को उसके जार स्थापनका भवानी का वीन मंत्र जपने से सब सिद्धि प्रास होती हैं इस को गुरुता का एकादश परिच्छेद । भवसमनययुक्तं वीजमेतनवान्याः । द्वितयमाप विसानं वक्तुमीशो महेश:किमिह कमलजन्माजन्मधारासहलैः॥१४॥ इह भजति य एनं मन्त्रराजं सुभाग्यैः भवति जननि ! यु. प्मत्पादपद्मोत्थजन्मा। त्यजसि परपुमांसं मादृशं क्वापि काले न खलु न पुनरर्थ्य तस्य किञ्चित् कदाचित् ॥ १५ ॥ विहि- तगुरुमुखादा वालकाद्वा पशोर्वा लिखितमपि सुबुझ्या प्रा. प्य कसमादकस्मात् । स्मररिपुपुरपारे मोक्षचर्याश्च पारे पर- मपदविलीनः सर्वसौभाग्यभागैः॥ १६ ॥ अनलपुरविभागे कालिकावक्तवीजं तदपि यदि विदध्यादक्षतं सान्तवर्णम् । नयनयुतलकारं मस्तके नामयुक्तं तदन विकटदंष्ट्रासोत्कटं वीजयुक्तम् । जपति यदि समस्तं गुह्यगुह्यातिगुह्य त्रिजगति किमिहास्ते क्लेशलभ्यं कथञ्चित् ॥ १७ ॥ क्रमपठितमपूर्व सर्वमेवानुवध्यं मनुमपि परवाच्यं तस्य मध्यस्थरूपम्। भज- ति याद चिदानन्दात्मचकेवलोऽसौ विपिनभुवि मनुष्यः को- तुकी कामदेवः ॥ १८ ॥ इति ते कथितं सर्व रहस्यं परमाद्भु- केवल शिवजी वर्णन करसक्ते हैं और ब्रह्मा तो सहस्रों जन्म में भी वर्णन नहीं करसक्ते ॥ १४ ॥ हे माता जो पुरुप तुम्हारे इस सर्वोत्तम यंत्रका जप करता है वह अवश्यही तुम्हारे चरणकमलों में प्राप्त होजाता है और जो पुरुप तुम्हारा मंत्र जप करने से विमुख हैं उनकी मुगति का कोई उपाय नहीं ॥ १५ ॥ विधानसे अथवा गुरु बालक या अज्ञानीके मुखसे सुनकर अपवा अपनी बुद्धिसे लिखकर किम्बा चाहें जिस प्रकारसे माप्त करके इस मंत्रको जप करने से संपूर्ण सौभाग्य को प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ अनलपुर विभाग में कालिका मुखवीनको लिखकर फिर पूर्ण अन्त्यवर्ण लिखे फिर दो ककार लिखे पुनः मस्तकोपरि नामको युक्त करै तौ जप करने से उसे कुछभी दुष्प्राप्य नहीं रहता ॥ १७ ॥ इस अपूर्व मंत्रको कमसे पढके मध्य में मनुवर्ण का ध्यान करें और निर्जन बन में जपै तो वह. मनुष्य कामदेव को समान कौतुकी होजाता है ।। १८ ॥
श्यामारहस्य भा०टी० । he तम् । यथानुक्रमतो लोके किं न साधयति योगिराट् ॥ इति श्रीपूर्णानन्दपरमहसविराचिने श्यामारहस्ये मन्त्र साधनोपाय एकादशः परिच्छेदः। अथ द्वादशः परिच्छेदः। अथकाम्यप्रयोगोलिख्यते । तदुक्तं कालीतन्त्रे। अथ काम्यविधि वक्ष्ये येन सर्वत्र सर्वगः। साधकः सा- धयेत् सिद्धिं देवानामपि दुर्लभाम् ॥ कुलागारं पुष्पितायाः दृष्ट्वा यो जपते नरः । अयुतैकप्रमाणेन साधकः स्थिरमान- सः ॥ केवलं गुप्तभावेन स तु विद्यानिधिर्भवेत् ॥ अयुतैकप्रमाणेति दिनत्रयं व्याप्य अयुतं जपेदित्यर्थः । हमने यह परम अद्भुत रहस्य तुपसे वर्णन किया इसके द्वारा योगी पुरुष भला क्पा सिद्ध नहीं करसक्ता अर्थात्-सबकुछ सिद्ध प्राप्त होगातीहै ॥ १९ ॥ इतिमहामहोपाध्यायश्रीपरमहंसपरिवानकीपूर्णानन्दगिरि विरचितश्यामारहश्यमापाटीकासहित मनसाधनोपाय एकादश परिच्छेदः ॥ ११ ॥ अब काममयोग लिखानाता है । कालीतत्र में कहा है । इसके उपरान्त काम्पविधि कहता है । जिसके द्वारा साधक सर्वत्र सर्वश होकर सर्व देवग- गीको भी दुईम सिदि साधन करता है । जो साधक पुष्पिताका कलागार दर्शन करके स्थिरचित मारा एक ययुत केवल गुप्त भाव से जप करता है या विधानिधि होता है । यहां एक अयुत परिमाण शब्द से तीनदिन व्यापी भमुन मप करे, यही भर्य है। यह रात्रिमही करे, दिनमें नहीं। क्योंकि दिन द्वादश परिच्छेद । २७५ इदन्तु रानावेव कर्तव्यं न तु दिवसे विविधविधिनिन्दाश्रु. तेरिति। संस्कृताः प्राकृताः सर्वा लौकिका वैदिकास्तथा । वश- मायान्ति ते सर्व साधकस्य न चान्यथा ॥ कुलसर्वस्वेऽपि। ऋतुमत्या भगं पश्यन् यो जपेदयुतं नरः । अनुकूलाहि तद्वाणी गद्यपद्यमयी भवेत् ॥ छन्दोवद्धा परा वाणी तस्य वक्तात् प्रजायते ॥ अथ कालीतन्त्रे। अथवा मुक्तकेशश्च हविष्यं भक्षयन्नरः । प्रजप्य चायुतं प्राज्ञ एतदेव फलं लभेत् ॥ नग्न पररतां पश्यन् अयुतं यस्तु साधकः । प्रजपेत् स भवेत् सद्यो विद्याया वल्लभः स्वयम् ॥ - तस्य दर्शनमात्रेण वादिनः कुण्ठतां गताः । गद्यपद्यमयी पाणी सभायां तस्य जायते ॥ तन्नाम्ना सुधियः सर्वे प्रण- मन्ति मुदान्विताः । तस्य वाक्यपरिचयात् जड़ा भवन्ति वाग्मिनः॥ में विविध विधि निन्दा श्रुति हैं इस प्रकार अप करने से संस्कृत माकन, लो- किक, वैदिक, सभी साधक के वशीभूत होते हैं, इसमें अन्यथा नहीं होता। कुळसर्वस्व में भी कहा है, अनुमती का कुलागार देखकर अयुत जप करने से गधषयमयी छन्दोबद्ध उत्कृष्ट और अनुकूलवाणी चक्रसे (मुखसे निकल- ती है। कालीतंत्रमें कहा है, अथवा मुक्तकेश होकर हविष्य भक्षण और अ- युत जप करने से इसी प्रकार फळ लाभ होता है । जो साधक परताका द- भन करके अयुत जप करता है, वह शीघ्र विधावल्लभ होता है । उसके द- नपात्र से ही वादीगण कुण्ठित होते हैं समा उसके मुख से गद्यपद्यमयी पाणी निकलती है। उसके नाममात्रसे सुधीगण सानन्दचित्तहो प्रणाम करते । है उसके वास्यके परिचयमात्रसे ही संपूर्ण वाग्मी जड़ होते हैं । सारसाई- २७६ श्यामारहस्य भाटी । सारसर्वस्वेऽपि । नग्नां परस्त्रियं वीक्ष्य यो जपेदयुतं नरः। स भवेत् स. विद्यानां पारगः सर्वदैव हि ॥ कवित्वं जायते तस्य वाचा जीवसमो भवेत् । अथवा मुक्तकेशश्च हविष्यं भक्षयन्नरः॥ प्रजपेदयुतं तावदेवं प्रतिनिधिर्भवेत् । धनकामस्तु यो वि. द्वान् महदैश्वर्यकामुकः ॥ वृहस्पतिसमो यस्तु कवित्वं कामयेन्नरः । अष्टोत्तरशतं जप्त्वा कुलमामन्त्रय मन्त्रवित् ।। मैथुनं यः प्रयात्येषः स तु सर्वफलं लभेत् । लतारतेषु जप्त- व्यं महापातकमुक्तये ॥ लता यदि न संसर्गः तदा रेतःप्र. यत्नतः । समुत्सार्य जपेन्मन्त्री धर्मकामार्थसिद्धये ॥ महा- चीनद्रुमलतावेष्टितः साधकोत्तमः । रात्री यदि जपेन्मन्त्रं सैव कल्पलता भवेत् ॥ महाचीनद्रुमलतावेष्टनेन च यत् फलम् । तस्यापि पोड़शांशेन कलां नाहन्ति ते शवाः । श- वासनाधिकफलं लतागेहप्रवेशनम् ॥ स्वमें भी कहा है, नम परस्त्री का दर्शन करके अयुत जप करने से, सर्वदाही संपूर्ण विद्याका पारग, कवि और वृहस्पति की समान होजाता है । अथवा मुक्तकेश होकर, हविष्य भक्षण पूर्वक, अयुत नप करनेसे, उक्तरूप प्रतिनिधि त्व लाभ होता है, जो व्यक्ति इन काम और अतिशय ऐश्वर्य काम एव सह- पति की समान कवित्व की कामना करता है । अष्टोत्तरशत जप और कुल आमन्त्रण करके, गैथुन करता है, उसकी समस्त कामनाही सफल होती है। लतारत में महापातक छटानकेलिये जप करना चाहिये, लताका यदि संसर्ग न हो सो यनप्तहित शुक्र समुत्सारण पूर्वक धर्म कामार्य सिद्धकेलिये जप करै । साधाोत्तम राशिकाल में महाप्राचीन द्रुमलता वेष्टित होकर यदि मात्र जप करे, तो पलता होती है, महापाचीन इमलता बटन द्वारा जो फर लाभ होना , मैं उसके पोदशांशका एकांशभी नहीं होसका, मतागृहमें प्रश करनेपर शयामन की अपेक्षा भी अधिक फन लाभ होता है। ।
२७, द्वादश परिच्छेद । अथ विशेषो यथा । तदुक्तं कुलचूडामणौ । रजोऽवस्था समालोक्य तन्मूलेष्विष्टदेवताम् । पूजयि- त्वा महारानी त्रिदिनं पूजयेन्मनुम् ॥ लक्षपीठफलं देव ! लभते नात्र संशयः । वेतालपादुकासिद्धिं खड्गसिद्धिश्च भै- रव ! ॥ अञ्जनं तिलकं गुप्तिं साधयेत् साधकोत्तमः ॥ प्रजपेदिति । प्रतिदिनमष्टोत्तरसहस्रमित्यर्थः । यत्र जापे च होमे च संख्या नोक्ता मनीषिभिः । तत्रेयं गणना प्रोक्ता गजाप्टकसहस्रकम् ॥ पृथ्वीमृतुमती वीक्ष्य सहस्रं यदि नित्यशः । तदा वादी सुसिद्धान्तः हतः क्षि. तितलं विशेत् ॥ पर्वते हस्तमारोप्य निर्भयः शुद्धमानसः । कवित्वं लभते सोऽपि अमृतत्वञ्च गच्छति ॥ पद्मं दृष्ट्वा तथा विन्दुं खञ्जनं शिखिनं तथा । चामरं रविविम्बञ्च ति- लपुष्पं सरोवरम् ॥ त्रिशूलं वीक्ष्य जप्त्वा च शतशः शुद्धमा . इस विषय में विशेष यह है यया-कुळचूड़ामणिमें कहा है, रजोवस्था रम-' णीको देखकर महारात्रि काळके समय उसके मूळमें इष्ट देवताकी पूजा करके तीनदिन मन्त्र की आराधना करें । हे देवि ! इस में लतपीठफळ लाभ होता है इसमें सन्देह नहीं है, और साधक इसके द्वारा बेतालसिदि, पादुकासिद्धि, खड्गादिसिद्धि, अञ्जन और तिलकसिद्धि एवं गुप्त साधन करता है । इस स्थल में प्रतिदिन अष्टोत्तरशत जप करना चाहिये, यही मभिप्रेत है । जिस अपमें वा जिस होम में मनीषिगणों ने जप संख्या निर्देश नहीं की है, उस में अष्टोचर सहस्र जप करना चाहिये, यही समझे। पृथिवी को ऋतुमती दे- नित्य सहस्त्र जप करनेपर, मुसिद्धांत वादीमी पराहत होकर, तिति तक में प्रवेश करते हैं, और पर्वत में हस्तारोपण करके, निर्भय और शुद्ध चित्तहोकर कवित्व और अमृत लाभ करते हैं, पन, विन्दु, खञ्जन, शिखी, चामर, रविविम्म, तिपुष्प, सरोवर और त्रिशूल दर्शन करके, शतशः शुद्ध खकर, .
। ૨૭૮ श्यामारहस्य माही । वतः। सुप्रसादं सुवचनं सुलोचनं सुहास्यकम् ॥ सुवेशं सुभ गं गन्धं सुजन सुखमेवच । लभते च यथा संख्यं शृणु पार्व- ति! सादरम् । महाचीनक्रमेणैव देवीं ध्यास्वा प्रपूज्यच॥त- द्रुमोद्भवपुष्पेण पूजयेद्भक्तिभावतः । स भवेत् कुलदेवश कुलक्रमगतः शुचिः ॥ ब्रह्मतरोमहापद्मे देवीं ध्यात्वा यथा विधि । तत् सुर्धारसधारेण तर्पयेन्मातृकानने ॥तिथिक्रमेणसं. ख्याभिलताभिष्टितो यदि । तदा मासेन सिद्धिःस्यात् सह स्रजपमानतः ॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां हिगुणं यदि दृश्यते । तदैव महती सिद्धिर्देवानामपि दुर्लभा । जपकल्पमहादेवि! शृणुष्ठा कमलानने ॥ स्वायं कर्तुमशक्तश्चेत् सम्प्रदायनिदोऽ थवा ॥ देशिकेन पुरश्चर्या कारयेन्मन्त्रसिद्धये ॥ तथाच योगिनीहृदये। तस्माउजपं स्वयं कुर्याद् गुरुं वा कारयेद्बुधः । गुरोरभावे विप्रश्च सर्वप्राणिहिते रतम् ॥ गृहीत्वा भाग्यतो मन्त्रमिम चित्तसे यथा संख्या जप करनेपर, सुप्रसाद, मुवचन, मुलोचन, महास्य, सुवेश, मुभग, सुगन्ध, सुनन, और सुखलाभ कियाजाता है, हे देवि ! मा. दर श्रवण करो। महामाचीन क्रमानुसार,देवीका ध्यान और पूना करके, उस वृनोद्भव पुष्प द्वारा भक्तिभावसे पूजा करनी चाहिये । तो कुलदेव, कुळक्रम सर्वदा शुद सत्व होजाता है, ब्रह्मतरुके यहा परमें देवीका यया विषि ध्यान करके तदीय सुधारस धारा से मालकानन में तर्पण करे। तिथि क्रमानुसार लतावेष्टित होकर, संख्या क्रमसे सास जप करनेपर, में सिदिगम होती है । अष्टमी और चतुर्दशी में द्विगण प्रमाण अप करने से देवगणों को भी दुर्लभ महतीसिद्धि प्राप्त होजाती है । हे महादेवि ! जप कर श्रवण करो स्यं जप करने में समर्थ होनेपर मंत्र सिदिके लिये गुरुद्वारा पुर भरण कराळे, योगिनी हदय कहा है, इसलिये सयं अप करे, प्रपा गुरू द्वारा कराये गुरुके अभाव में संपूर्ण प्राणियों के हित में निरत ब्रामणके बारा , गत, और एक महीने द्वादश परिच्छेद । २७९ सद्गुरुवसतः । पुरश्चर्यामवश्यं हि कुर्वीत विजितान्मनः ॥ उत्तरतन्त्रेऽपि। सर्वस्वेनापि कर्त्तव्यं पुरश्चरणमुत्तमम् । अन्यथा नाधि- कारः स्यात् तस्य पूजादिषु प्रिये ! ॥ कारयित्वा पुरश्चर्या मन्त्रिण शास्त्रवेदिनम् । वस्त्रालङ्कारवसुभिः प्रीणयेद् देवता. दिया। ततोऽस्य मन्त्रसिद्धिः स्याद् देवता च प्रसीदति ॥ अथ कुलसारे। एवंविधविधानेन पुरश्चारी भवेन्नरः।लक्ष्यसंख्यं जपेदेवि! होम कुर्यात्दशांशतः॥ विल्वपत्रेण वा देवि! तथानीलाम्बु. जेन च । शर्कराघृतयुक्तेन मधुयुक्तेन वा पुनः ॥ एवं हुत्वा ततो देवि! तर्पणश्च तथा पुनः । तर्पयेत शुद्धदुग्धैश्च तथा च विमलैर्जलेः॥ कुम्भाख्यमुद्रया देवि ! अभिषेकं स्वमूनि । ब्राह्मणान् भोजयेव्यैः पदार्थः पडूसैरपि । विप्राराधनमा. श्रेण व्यङ्ग साङ्गं भवेद् यतः। गोभूहिरण्यवसुभिस्तर्पयेद्देशिकः कराळेचे, भाग्य चशत: सदगुरुके मुखसे मंत्र ग्रहणकरके अवश्य पुरश्चरण कर, उत्तर तंत्रमेंभी कहा है, सर्वस्व देकर विहित विधानसे पुरन्धरण करै,न करने से पूजादि में अधिकार नहीं होता, शास्त्रवित् मंत्री द्वारा पुरश्चरण कराके है. पता बुद्धिमें वस्त्र, अलङ्कार और धन द्वारा उसको प्रसन्न कर, तो मंत्रसिद्धि और देवतामी प्रसन्न होते हैं । फुलासार में कहा है, इस प्रकार विधानानुसार पुरश्चरण करके लक्ष सख्या जप और उसका दशांश होम करै । विल्वपत्र अथवा नीलपद्म, शर्करा, घृत, और मधुयुक्त करके होम करना चाहिये, हे देवि ! इस प्रकार होप और त पंण करके पुनार शुद्ध दुग्ध द्वारा तर्पण और विमल जल द्वारा कभमुद्रा के संयोगसे स्वकीय मस्तक में अभिषेक, और पदविध- रणयुक्त द्रव्य द्वारा मामणोंको भोजन करावे, ब्राह्मणगणों की आराधना मात्रसे अमहीन भी सा होता है, गो, भूमि, स्वर्ण और धन द्वारा तर्पण करना चाहिये ।
श्यामारहस्य भा०टी० । . सुधीः ॥ देशिकाय ततो देवि! दक्षिणां विभवावधि । दातव्य परमप्रीत्य कार्यसिद्धिमभीप्सु भिंः ॥ देशिके परितुष्टे च तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः । एवंविधं जपं कृत्वा सर्वसिद्धिमुपा. लभेत् ॥ अथ जपनियमः । तदुक्तं कुलार्णवे । लक्षमात्र जपेद् यस्तु महापापैः प्रमुच्यते । लचद्दयेन पा- पानि सप्तजन्मभवान्यपि । महापातकमुख्यानि नाशयेन्नात्र संशयः ॥ चतुर्लक्षं जपेद्देवि ! महावागीश्वरो भवेत् । कुवेर इव देवेशि ! पञ्चलक्षात् न संशयः॥ षड्लक्षजपमात्रेण म. हाविद्याधरो भवेत् । सप्तलक्षजपानमन्त्री खेचरी मेलको भ- वेत् ॥ अष्टलक्ष् जपन्मन्त्री देवपूज्यो भवेन्नरः। अणिमायष्ट- सिद्धीनां नायको भवति प्रिये ! ॥ वरदास्तस्य राजानः योषितस्तु विशेषतः । नवलक्षप्रमाणानि यो जपेत् का. लिकामनुम् ॥ रुद्रमूर्ति स्वयं का ही साक्षान्न संशयः । अनन्तर देशिक को जिस प्रकार विभव है, तदनुसार कार्यसिदिकी अभि छापासे परम प्रीतिपूर्वक दक्षिणादेवे । देशिकके परितुष्ट होनेपर सपूर्ण देवं ता तुष्ट होते हैं इस प्रकार जप करने से सर्वसिदि संग्रह होती है। इसके उपरान्न जप नियम कहते हैं । कुलार्णव में कहा है लतमात्र जप करने से समस्त महापातक दूर होते हैं, दो लक्ष जप करने से, सप्तजन्म समुद्भुत सम्पूर्ण पाप दूर होते हैं और सम्पूर्ण महापातक भी दूर होते हैं इसमें संदेह नहीं. हे देवि ! चार लक्ष जप करने से महावागीश्वर होजाता है पांच लक्ष जप करने से कुबेर की समान लाम होती है. इसमें सन्देश नहीं। छप लक्ष जप करने से खेचरी मेळकत्व लाम होती है । अष्ट अक्ष जप करने से, देवगण भी पूमा करते हैं. और अणिमादि अष्ट सिदि का नायक होजाता है। नरपतिगण विशेषतः योषिगण बरदान करते हैं। नव लक्ष प्रमाण से यह कालिका मंत्र जप करने से, साक्षात् स्त्र दर्ता की - द्वादश परिच्छेद। २८१ सर्वन्यः सदा सुस्थः सर्वसौभाग्यवान् भवेत् ॥ यत्र वा कुत्रचिद्भागे लिङ्गं स्यात् पश्चिमामुखम् । स्वयम्भूर्वाणलिङ्गं वा वृपशून्यं जलस्थितम् ॥ पश्चिमायतनं वात्र इतराद्वापि सुनते ! । शक्तिक्षेत्रेषु गङ्गायां नद्यां पर्वतमस्तके । पवित्रे सुस्थले देवि ! जपेद्विद्यां प्रसन्नधीः ॥ अथं यामले। एवं कृतपुरश्चर्यः स्वयं वा गुरुणाऽथवा । सर्वकामसमृ. । द्विः स्यात् प्रयोगानथ चारयेत् ॥ भैरव तन्त्रेऽपि । महापीठे शिवक्षेत्रे शून्यागारे चतुप्पथे। पूजयित्वा गन्ध , पुष्पेधूपदीपानुलेपनैः॥ कालिकां परमेशानी जपेदयुतमानक- म् ।अष्टम्यांच चतुर्दश्यां संक्रान्त्यां पूर्णिमातिथौ ।। भौमकु. यां विशेपेण स्वयं वा गुरुणाऽथवा । जपेत्सहस्रमानन्तु साष्टं शतमथापिवा । होमयेन्मधुरोपेतैः पायसैः सर्वसिद्धये ॥ रुद्र मूर्ति होजाता है। इसमें सन्देह नहीं, और सम्पूर्णही बन्दना करते हैं. सर्वदाही स्वास्थ्य सुख भोग करता है । और सर्व विध सौभाग्यही संगृहीत होता है । लिङ्ग, वाणलिङ्ग अथवा स्वयम्भू लिग, पश्चिम मुख विराजमान हो इसप्रकार जो कोई स्थान हो, और शक्तिक्षेत्र, गंगाक्षेत्र, पर्वत शेखर और पवित्र मुस्थल में प्रसन्नचित्त से मंत्रजप करै ।। यामल में कहा है-इसमकार स्वयं वा गुरुकी सहायता से पुरश्चरण कराकर सर्पविधि काम समृद्धि संग्रह पूर्वक सम्पूर्ण प्रयोग में प्रवृत्त होवे । भैरव तंत्र में भी कहा है, महापीठ, शिवक्षेत्र, शून्यागार, और चौराहे में गंध, पुष्प, धूप, दीप और अनुलेपन द्वारा परमेश्वरी कालिका की पूजा करके अयुत परिमाण जप करै । अष्टमी, चतुर्दशी, संक्रांति, पूर्णिमा और विशेषतः भौम, अमावस्या, इन समस्त में स्वयं वा गुरुकी सहायता से सहस पासा. एशत जपं और सर्व सिद्धि के लिये मधुरोपेता पायस द्वारा होम करै।
२८२ श्यामारहस्य मा. टी.। F कुलसर्वस्वेऽपि। कारयित्वा स्वस्त्ययन दिजेनागमदिना । प्रतोष्य दक्षि- णाभिस्तं वसेत् कल्पायुतं दिवि ॥ कुलसारसंग्रह। पुण्यकाले युगाद्यायां पुष्ये मूलोत्तरासु च । सुगन्धिकुसु. मैर्देवीमर्चयित्वा वरानने ! ॥जपेत् साष्टसहस्त्रैस्तु तर्पयेद् दु. ग्धखण्डकैः । महतीं श्रियमाप्नोति राजानस्तस्य किङ्कराः॥ वीरतन्त्रे च। आनीय देशिकं शुद्धं जितेन्द्रियञ्चापि द्विजम् । कार यति जपं रात्रौ पूजयित्वा महेश्वरीम् ॥ गन्धताम्बूल धूपायै नैवेद्यैश्च पृथग्विधैः । अष्टोत्तरसहस्रन्तु साष्टंशतमथापि वा। प्रत्यहं कारयेद्धीमान् यावत्रिंशदिनं भवेत् । पूर्णमासे तुं म- न्लशं तोषयेत् धनधान्यकैः ॥ पुत्रवत् पालयत्येषा कालिका- साधकं सदा । अवश्यं कालिकामन्त्र जपो रात्रीमतःप्रिये!॥ कल सर्वस्व में भी कहा है. आगम वेदी घालणके द्वारा स्वस्त्ययन समाहित करके दक्षिणा द्वारा उसका परितोप विधान करने से, अयुतकल्प तक स्वर्ग में वास करसक्ता है । कलसार संग्रह में भी कहा है, पुण्यकार: गाया, पुष्य, मूल, उत्तरा, इन सब में सुगन्धि कुसुमसमूहसे देवी की अर्चना करके अष्टसहस्त्र जप और दुग्ध खण्ड द्वारा तर्पण करनसे महासमृद्धि लाम और राजागण भी सवक होते हैं। वीरतंत्र में भी कहा है, जितेंद्रिय, यूब स्वभाव, देशिकको लाकर, महेश्वरी की पूजा करके रात्रि में जप कराये । गंध, ताम्बूल, धूप और दीणदि पृथक् विधि नैवेद्य द्वारा अप करके, एक महीनेतक प्रतिदिन अष्टोत्तर सहसवा साट सहस जप करना चाहिये । गास पूर्ण होने पर धन और धान्य द्वारा उसी मन्तको सन्तुष्ट करने पर देवी कालिका माधकको पत्रको समान पालन करती है । ।प्रये ! रात्रि २८ । द्वादश परिच्छेद। पूज्यो गुरुः सदा चास्मिन् परमोऽपि गुरुस्तथा । परमेष्ठि गुरुश्चैव परापरगुरुस्तथा ॥ उत्तरोत्तरतश्चैपां प्रशस्ता जपक- मणि । गुरुर्न रूचो द्रष्टव्यो नापि क्षुब्धस्तथैव च ॥ इदं रहस्य देवेशि ! नाभक्ताय प्रदर्शयेत् । कुलज्ञाय सुशीलार पदान्याय महात्मने ॥ गुरुभक्ताय शान्ताय सर्वभूतहितार च। प्रदद्याद् दशिको देवि ! विधानं कालिकामतम् ॥ अथ निशायां दीक्षितायां कुलनायिकां समानीय व्यापक न्यासं कुर्यात् । प्रथमं साधकश्रेष्ठो देवीकूटस्य मन्त्रवित् । विलिख्य मन्त्रं पूर्वोक्तं पूजपेत्कुलबर्मना ॥ पीठदेवीं प्रथमे च पूजयेद् ग- न्यपुष्पकैः । महाभागं ततो मूलदेवीमावरणैःसह ॥ लक्षकतत्र जप्त्वा तु चोड्डीयानं ततोविशेत्। देवीकूटस्योत पादपद्मोपरि। तत्पीठे योगनिद्राख्यां पूजयित्वा ततो जपेत् ॥ निजेष्ट •देवतां तत्र जपेत लक्षं समाहितः। उड्डीयानमरुयुगमित्यर्थः । . में कालिका के मन्त्रको अवश्य जप करै । जप समय गुरु, परमगुरु परमेष्ठी गुरु, और परापर गुरु इनकी सर्वदा पूजा करनी चाहिये, नप कार्य में इन की उत्तरोत्तरता प्रशस्तई, गुरुकारुतीन देखे,औरक्षुब्धमीनदेखे है देखि। यह रहस्य अमक्त से न क है, कुलज्ञ, सशील, वदान्य, महात्या, गुरुभक्त शान्त और सर्वभूत के हित में निरत, इस प्रकार व्यक्ति कोही विधानुसार यह कालिका मत प्रदान करै ।। अनन्तर रात्रिकाल के समय दीक्षिता कुलनायिका को बुलाकर व्यापक न्यास करें । प्रथम साधक श्रेष्ठ देवी के पाद पोपरि पूर्वोक्त पत्र लिखकर कुलवानुसार पूजा करें । गन्ध पुष्प द्वारा आदि में पाठदेवी की अर्चना करके फिर सम्पूर्ण आवरण के सहित मूल देवी की पूजा करे। तहां बत नप करके उमयुग में प्रवेश और उसी पीठ में योग निद्राख्यकी पूजा करके जप करना चाहिये । वहां समाहित होकर अपने इएदेवको अर्थना सहित
२८४
श्यागारहस्य भा० टी० ।
कामरूपं ततो ध्यात्वा तत्र कात्यायनी जपेत् । कामरूपं
प्रजापतिमित्यर्थः।
तत्रापि लक्षमानेन जप्त्वा मन्त्रं समाहितः । ततःपूर्णरई
गत्वा यजेचण्डी ततो जपेत् ॥ पूर्णगिरौ शिरसि इत्यर्थः ।
यजेदिति मूलदेवीं सावरणां प्रपूज्य लक्षं जपेदित्यर्थः ।
कामरूपान्तरे वत्स ! कामाख्यांप्रथमं यजेत् । कामरूपं
विन्दुचक्रं जप्त्वा रात्रौ समाहितः॥ संख्यापूतौ पुनः पृच्छेत्
का वं देवि ! कुलोत्तमे ! । एवं कृते विस्मृतश्चेत् स्वनाम
गोत्रकान्यपि ॥ तत्रेष्टदैवतैरेव शृणुष्व वरमुत्तमम्। ततःप्र-
णम्य देवेशी शृणुयाद्वरमुत्तमम् ॥ एवं जपवशादेव पुनः
पूर्वोक्तमाचरेत् । अक्षोभितकुलाचारपरिचर्यापरायणः ।
थवा सर्वपीठेषु यजेन्महिपमर्दिनीम् ॥ ततः प्रसन्ना भवति
स्वैरं कुलवरं प्रिये ! । ततो जप्त्वा मूलमन्त्रं सर्वसिद्धीश्वरो
भवेत् ॥
इतिपूर्णानन्दपरमहसविरचिते इपामारहस्ये द्वादशः परिच्छेदः।
लक्ष जप करै । फिर प्रजापतिका ध्यान करके कात्यायनी की अर्चना के
अनन्तर तहां लत जप और फिर मन्तक में समागत होकर चण्डीकी पूजा
और जप करे। हे वत्स । काम रूपान्तर में प्रथम कामाख्या की आराधना
करके फिर राशि में समाहित होकर कामरूप विंदुचक्र का जप करे। संल्या
पूर्ण होनेपर फिर पूंछे. हे देवि । कुलोत्तमे ! तुम कौन हो ? इस प्रकार
पूछनेपर वह यदि विस्मित हों, तो अपना नाम और गोत्र कहै । अथवा
अक्षोभित चित्त से कुलाचार परिचर्या परायण होकर ,समस्त पीठ में देवी
महिषमर्दिनी की पूजा करै । तो वह इच्छानुसार कुळवरके प्रति प्रसन्न होती
है, अनन्तर मूळमन्त्र जप करने से सर्व सिद्धि का ईश्वर होता है ।
इतिमहामहोपाध्याय श्रीपरमहंसपरिमानकत्रीपूर्णानन्दगिरि विरचित
पामारहस्यपापाटीपासहितद्वादश परिच्छपसमाप्त ॥१२॥
२८५ त्रयोदश परिच्छेद। अथ त्रयोदशः परिच्छेदः। अत्र ग्रन्थगौरवभयात् महाभयादिपीठक्रमोन लिखितः। किन्तु सर्वपीठे महिषमर्दिनीपूजायाः विहितत्वात् तत् क्रमो लिख्यते । तदुक्तं कुलचूडामणौ। भैरव उवाच । मातर्महिषमर्दिन्याः सङ्केतं कथयस्व नः । कुलाचारस्य र्ससिद्धौ भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये ॥ श्रीदेव्युवाच । सृष्टिस्थितिविनाशानामादिभूता महेश्वरी। गोप्या सर्व प्रयत्नेन शृणु तां कथयामि ते ॥ त्रैलोक्यवीजभूतान्ते संबो धनपदं ततः। सृष्टिसंहारवों द्वौ निष्टा महिषमर्दिनी ॥ अस्यार्थः-मदनरिपुशक्तिवीजान्ते महिषमर्दिनीपदमा- भिमुख्यार्थेनोद्धृत्य वह्निललनामुद्धरेदिति ॥ अतिगृह्यतरा विद्या सृष्टिस्थितिविधायिनी । सर्वदेवस- । ग्रंथ गौरव के भय से महाभयादि पीठकम नहीं लिखी जाती । किन्तु सम्पूर्ण पीठ में महिषी मर्दिनी की पूजा प्राप्त होजाती हैं । इसलिये उस- काही क्रम लिखते हैं, कुलचूडामणि में कहा है, यथा--भैरव ने कहा हे मातः ! कुलाचार ससिद्धि और भुक्ति मुक्ति प्रसिद्धि के लिये महिपी म- दिनीका सकेत निर्देश कीजिये ।। श्री देवीने कहा, सृष्टि स्थिति विनाशकी आदिभून महेश्वरी को सर्व प्रयत्न से गुप्त रक्से, मै तुम्हारे निकट उसका विषय वर्णन करती हूं, श्रवण करो। "ही महिपनदिनी साहा" यह प्रति राधार विद्या सारी स्थिति वि.
। श्यामारहस्य मा०टी० । र्वसिद्धिवीजभूता सनातनी ॥ न कस्मैचित् प्रदातव्या क थिता सिद्धिदायिनी । अत्यन्तगुरुभक्ताय शिष्याय यदि कथ्यते । तदाष्टवर्ण वक्तव्यं न वीज नापि साधनम् ॥ साधरणी प्राणविद्या ढल्लेखा सिद्धिगोचरा । एतत्पूर्वस्थिता देवी गुरुसिद्धिप्रणाशिनी । विशेषतः कलियुगे महासिद्ध्यौ घदायिनी । गुरूणां कुलनाथानां महाशापप्रदायिनी ॥ जय दुर्गा त्वया प्रोक्ता परमा सिंहवाहिनी त्रैलोक्यवीजभूतान्ते सा परा मर्दिनी कुलम् ॥ वरंवह्निप्रियायुक्ता देवाननसमन्वि ता। दत्ता ते परमा विद्या डेयुक्ता हृदयान्विता ॥ सर्वत्र कुल शास्त्रज्ञे ! महाशापप्रदायिनी । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गोप्तव्ये यं नवाक्षरी । अष्टलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशाशं हुनेत्ततः। नारदो- ऽस्य ऋषिः प्रोक्तश्छन्दोगायत्रयमीरितम् ॥ देवता महि- पघ्नीय पूर्व वीज परापरा ॥ अथ अस्याः पूजाक्रमः। प्रातःकृत्यादि स्नानादिकं घि- धाय द्वारदेवताः पूजयेत् ॥ तदुक्तं तन्वान्तरे। ऊोडुम्बरके विघ्नं महालक्ष्मी सरस्वतीम् ॥ ततो द- धान करती है, एवं सम्पूर्ण देवता और सम्पूर्ण सिद्धि की बीज स्वरूप है. मैंने जो तुम्हारे निकट यह सिद्धि दायिनी सनातनी विद्या वर्णनकी, किसी को भी इसका प्रदान न करना । जो व्यक्ति अत्यन्त गुरुभक्त है, उससे यदि कहना हो तो अपवर्ण मंत्र कहै, वीज वा साधन न कहै । यह विद्या कलियुग • में महासिदि विधान करती है, और कुलनाय गुरुगणको महाशाप प्रदान के रनी है । यह मंत्र अष्टलक्ष जप करें। जपका दशांश होम करना चाहिये । ना रद इसके ऋपि, गायत्री इसका छन्द, महिषमर्दिनी इसको देवता, और प. रापरा इसका पूर्वपीन है । इसकी पूजाका क्रम यह है, यया~मातः कृत्या दि और स्नानादि करके संपूर्ण द्वार देवताको पूजा करै । तंत्रान्तर में का है, गळरकी उर्दशाखा में विघ, महालक्ष्मी और सरस्वती की, दक्षिणशा.
२८७ जयादश परिच्छद। क्षिणशाखायां विघ्नं क्षेत्रे शमध्यतः । तयोः पार्श्वगते गंगा यमुने पुष्पवारिभिः ॥ देहल्या मर्चयेदत्रं प्रतिद्वारमितिक- मात्।ततस्त्रिविधविद्योत्सारणं स्थापनंभूतशुन्दिं प्राणायामंच पूर्ववत् कृत्वा ऋष्यादिन्यासान् कुर्यात् । तदुक्तम् । नारद- ऋषिगायत्रीच्छन्दः श्रीमहिषमर्दिनी देवता ह्रीं वीजं स्वाहा शक्तिर्महिषमर्दिनीकोलकं चतुर्वर्ग इत्यभिलप्य पूर्ववत् न्य- सेत् । तदा करन्यासं कुर्याद् यथा । ओं महिषहिंसके ! हुं फट् अंगुष्ठाभ्यां नमः। ओंमहिपशत्रो !सर्वे हुं फट् तर्जनीभ्यां स्वाहा ओं महिपं हिंसय हुं फट् मध्यमाभ्यां वषट् । महिषं हन हन देवि ! हुं फट् अनामिकाभ्यां हुँ । ओं महिषमर्दि नि ! हुं फट् करतलपृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट । इति न्यस्य एवं पञ्चापश्चाङ्गेषु अङ्गन्यासं कृत्वा ऊवद्धितालत्रयं कृत्वा दशदिग्बन्धनं कुर्यात् । तदुक्तं तत्रैव। ओं महिपहिसके ! हुं फट् हृदयाय नमो हदि ।ओं म. हिपशत्रो ! सर्वे हुं फट् शिर उदीरितम् ॥ ओं महिपं हिंसय हुं फट् शिखामन्त्र उदीरितम् । ओं महिपं हन हन देवि ! हुँ फट् कवच इत्यपि ॥ ओं महिषमर्दिनि । हुं फट् अस्त्राणि शृणु भैरव ॥ खा में क्षत्रेश की, मध्य में विघ्नकी और उनके पार्श्वगत गङ्गा एवं यमुना की पुष्पवारि द्वारा पूजा करके, देहली में अत्रकी अर्शना करै । इस प्रकार क्रमानुसार प्रति द्वारमें पूना कानी चाहिये । अनन्तर तीनों विद्याका उत्सा- रण स्थापन, भूतशुद्धि और पूर्ववत् प्राणायाम् करके ऋष्यादि न्यास में मवृत्त होवे वही कहा है, यथा-नारदमापि, गायत्रीछन्द, श्रीमहिपमहिनी कीळक, और चतुर्ग विनियोग हैं, इस प्रकार करके, पूर्ववत न्यास करें । तिस समय करन्यास करना चाहिये । यया--ओं महिपहिसके इत्यादि । १ २८८ श्यामारहस्य भा० टी० । ततः पूर्ववन्मातृकान्यासव्यापकन्यासौ कृत्वाकुलकुसुमादि ना वृत्तषोड़शदलकेशराष्टदलाष्टवर्णयुक्तं वृत्तचतुरस्रं चतुर्दार कर्णिकाढ्यवीजात्मकं यन्त्र निर्माय पुरतः सिंहासने संस्था-- प्य तत्राधारशक्त्यादिपीठदेवताः च संपूज्य पूर्ववदर्घ स्था- पनादिकं कृत्वा देवी ध्यात्वा पूजयेत् तदुक्तं तत्रैव। ध्यायेत् काली महादेत्य युद्धवासरसोन्मुखीम् । दक्षिणे चक्र खड्गी च वाणशूलौ तथैव च ॥ वामे शंख तथा चर्म ध- नुस्तर्जनमेव च । विभ्रती कालतीब्रोरुमहिपाङ्गनिपेदुषीम् ।। पीताम्बरधरां देवीं पीनोन्नतकुचद्वयाम् । जटामुकुटशोभा- ढ्यां पितृभूमिसुखावहाम् एवं ध्यात्वा मानसोपचारैः संपूज्य आवाहनादिकं कृत्वा षोडशोपचारैः देवीं पूजयेत् । अङ्गमन्त्रैरङ्गानि संपूज्य कामा. तदनन्तर पूर्ववत मातृका न्यास और व्यापक न्यास करके कुळ कुसुमादि द्वारा वृत्त पोडशदल केशराष्ट दलाष्ट वर्णयुक्त वृत्तचारों ओर चतुरिकणि- कान्य वीजात्मक यंत्रनिर्माण एवं सम्मुख सिंहासन में स्थापन पूर्वक उस में आधारशक्त्यादि पीठदेवताकी पूजा करे और पूर्ववत् अादि स्थापन सहित उसका ध्यान करें। उसी में कहा है, यथा-महादैत्य के सहित यु. दासवरसोन्मुखी देवी कालिका का ध्यान करै । उनके दक्षिण रस्त में चक्र खद्ग, शूल, और शव है, वाम हस्त में शंख, चर्म, धन और तर्जन है । वह काळकी समान तीव्र प्रकृति और विपुल पराकप पहिष के अंग में पद न्यस्त कियेहुए हैं, उनके परिध्येय पीतवर्ण है। उनके दोनों कुच पानामत हैं । जटा और मुकुट के संसर्ग से उनकी अतिशय शोभा प्रादुर्भत हुई है। वह पितृ भूमिका सुख विधान करती है । इसप्रकार ध्यान करके मानस उपचार से पूजा करता हुआ आवाहनादि विधान के सहित पोटश उपचार से अर्चना करै । अनमत्र द्वारा सम्पूर्ण अंगकी आराधना करके पूर्वोक्त २८९ प्रयोदश परिच्छेद। रूपां दिशि पर्यन्तं पूर्वोक्तप्रहादानन्दनाथादिगुरुपंक्तिं गुरु- परमगुरुपरमेष्टिगुरूंश्च पूजयेत् । पूर्वाद्यष्टदले आं दुर्गायै ई वरवर्णिन्पै ऊं आद्यायै एं कनकप्रभायै ऐं कृत्तिकाय ओं अ- भयप्रदाय औं कन्याय अः स्वरूपायै नम इति पूजयेत् । तदुक्तं तन्वान्तरे। आदौ दुर्गा ततौ वणी ततोऽपि आद्यकायाम् । ततः कनकप्रभाश्चैव कृत्तिकामभयप्रदाम् ॥ कन्यकाश्च स्वरूपाश्च यजे त्पूर्वादितः सुधीः ।। कुलचूडामणौ। अष्टपने यजदेवी दुर्गाद्यां दीर्घपूर्विकाम् । दीर्घशब्देन अत्र पारिभापिकंग्रहणम् । तेन आई ऊ ए ऐ ओ औ अः इति शारदाटीकाकारेणोक्तम् । ततो देव्या दक्षोद्धहस्ततःपत्राग्रे, यं चक्राय नमःव खड्डाय नमःलं वाणाय नमः वं शूलाय न. मः। वामोर्वतः शं शङ्खाय नमः चं चर्मणे नमः हं तर्जनाय नमःसंधनुपे नमः इति पूजयेत् । तदुक्तं तत्रैव । आयुधानि पलाशाग्रे यादभिः क्रमशो यजेत् । ततोऽष्ट- प्रहलादानन्द नायादि गुरु पंक्ति, गुरु परमगुरु और परमेष्टि गुरुकी पूजा करे। पूर्वादि अष्टदलमें "आंदुर्गायै" इत्यादि विधानस अर्थना करनी चाहिये । त्रान्तरमें कहा है, आदिमें दुर्गाकी फिर वर्णाकी श्राद्याकी फिर तदनंतर यथाक्रमसे कनकपमा, कृत्तिका, अभयपदा, कन्याका और स्वरूपाकी पूर्वादि क्रमसे पूजा करै । कुळचूडामणि में कहा है, अष्टपत्र में दीर्घस्वर के महित दुर्गाकी अर्चना करनी चाहिये । अनन्तर देवी के दक्षिण हस्त के अर्द में पत्रान में "यंचक्राय" इत्यादि कहकर पूना कर इसीसे यह कहाहै यथा- पात्रान में "" इत्यादि कहकर सम्पूर्ण आयुध की क्रमानुसार पूजा करें । - २९० IF श्यामारहस्य मा० टी० । दलबाह्ये ब्रह्माण्याद्यष्टशक्तीः प्रपूज्या चतुरस्र पूर्वादिक्रमेण लोकपालान् तदहिस्तदस्त्राणि पूजयेत् । तदुक्तं तत्रैव । ब्रह्माण्याद्यास्ततः पश्चात् लोकपालान् ततो वहिः । तद. स्त्राणि सिद्धमन्त्री प्रयोगञ्च समाचरेत ॥ ततः पुनर्देवी सं. पूज्य यथाशक्ति जपं कृत्वा अध्यंजलपुष्पाभ्यां गुह्यातिगुह्य मन्त्रेण देव्या वामकरे जपं समर्प्य स्तुतिं कृत्वा प्रदक्षिणा- ष्टाङ्गप्रणाम विधाय देवीं वहाद विसर्जयेदिति । अथ पुरश्चरणनियमो यथा। अष्टलक्षं जपेन्मन्त्रं तदशांशं हुनेत्ततः । ततो होमदशां. शतर्पणं तदशांशाभिषेकं तदशांशब्राह्मणभोजनमिति पुरश्च- णाङ्गत्वाद् दक्षिणा । होमद्रव्यनियमो यथा । वशयत्तिलहामन नरान्नरपतनिपि । सिद्धार्थेजुहुयान्मन्त्री अनन्तर अष्टदल के बाहिर ब्राह्मणी इत्यादि अष्टशक्ति की पूजा करके चारों और पूर्वादि क्रमप्ते सम्पूर्ण लोकपालोंकी और उनके बाहिर अस्त्र समूहकी अञ्चना करे । इसी से यह कहा है | यथा-प्रथम ब्राह्मणी इत्यादिकी फिर चाहिर सम्पूर्ण लोकपालोंकी और उनके अस्त्र समूह का प्रयोग विधान करे। अनन्तर पुनर्वार देवीकी पूजा करके यशाशक्ति नप सहित अग्रजल और पुष्ण द्वारा गुह्याति गुह्य मंत्र से देवीक वापहस्त में वह जप समर्पण और स्तम करके प्रदक्षिणा के सहित भांग प्रणाम के पीछ देवीको अपने हृदय में विसर्जन करै । पुरश्चरण का नियम यथा-अष्टलक्ष मत्र से नप और उसका दशांश होम करके होम का दशांश तर्पण पर्तण का दशांश अभिषेक, अभिषक का दशांश ब्राह्मणों को भोजन करावे | यह पुरश्चरण की अंगशत दक्षिणा है, होम द्रव्य का नियम यथा-तिल द्वारा होम करने से राजागणों को वश में किया जाता है । सिदार्य द्वाग होम करे, तो तत्तणाव मुक्त होता है।
त्रयोदश परिच्छेद । रोनर्मुच्येत तत्क्षणात् ॥ पद्मं हुत्वा यजेत् शत्रून् दुर्वाभि शा- न्तिमेव च । पलाशकुसुमैः पुष्टिर्धान्यः धान्यश्रियं लभेत् ॥ का- कंपक्षैः कृतो होमो द्वेष वितनुते नृणाम् । मरीचहोमैमरणं रिपुराप्नोति सर्वदा ॥ क्षुद्राभिचारभूतादीन् ध्यात्वा देवीं वि- नाशयेत् । कुलचूडामणौ। प्रयोगहोमसंशये सहस्रवसुसंज्ञकम् ॥ एषा विद्या महा- विद्या न देया यस्य कस्यचित्। यदि भाग्यवशाहेवि! कुलदेवी कुलोत्तमैः । दीक्षिता कुलजाभिस्तु सिद्धिदा सेव नान्यथा ॥ गुप्तरहस्योक्तं महिपमर्दिन्याः कवचं लिख्यते । भैरव उवाच । মৃত্যু देवि ! प्रवक्ष्यामि मर्दिन्याः कवचं शुभम् । यस्या- राधनमात्रेण महाभैरवतां व्रजेत् ॥ देवैर्देवत्वरिपये सिद्धैः पद्म द्वारा होम करने से सम्पूर्ण शत्रुभों को जीता जाता है । दर्जा द्वारा होम करने से शांति प्राप्त होती है । पलाश कुसुम से पुष्टि और धान्य से धान्य समृद्धि लाभ होती है । कामपक्ष द्वारा होम करने से, लोकों के प्रति विद्वेष विस्तृत किया जाता है । मरीच द्वारा होम करने से शत्रु की सर्वदा पृत्य होती है । और देवी का ध्यान करने से क्षुद्राभिपर भूतादि विनष्ट होनाते हैं । कुलचूडामणि में कहा है । प्रयोग और होम संशय में अष्टसहस्र जप करै । यही विद्या महा विद्या है । जिस किसी को न देवे । हे देनी ! यदि भाग्य वश कलोचम और कुळनागण कुल देवी को दीक्षिता करै । तो वहीं सिद्धि प्रदान करती हैं। इस के अन्यथा नहीं होती । अब गुप्तरहस्य कथित महिपमदिनी का कवच लिखते हैं। भैरव ने कहा हे देवि ! श्रवण करो महिपमर्दिनी का परम पवित्र करन वर्णन करताहू, जिस की आराधना मात्र सही महा भैरव होनाता है । देव २९२ । श्यामारहस्य भा०टी० खचरसिद्धये । पन्नगैराक्षसैमयमुनिभिः सेवितं सदा ॥ भ. स्थाः कवचं महापुण्यं स्वयं वक्ताद् विनिऽमृतम् । भूप्रदेशे समे शुद्धे पुष्पप्रकरसंकुले । कल्पयेदासनं धीमान् कोमल कम्बलासनम् ॥ वामे गुरुं पुनर्नवा दक्षिणे च गणाधिपम् । मध्ये तु मर्दिनीं नत्वा सर्वे रक्षन्तु मां सदा ॥ आग्नेय्यां नै- ते पातु चैशान्यां वायवे तथा । उत्तरे पातु ललिता जि. हाललनभीषणा ॥ कौमारी पश्चिमे पातु धनदा च दिशो दशः । शाकिनी डाकिनी पातु मर्दिनी पातु सर्वदा ॥ कल्प वृक्षः सदा पातु विघ्ने च रक्तदन्तिका । एतास्तु वरयोगिन्यो रक्षन्तु साधकाग्रतः॥ पठत्वा पाठयिता च कवचं सिद्धि दायकम् । पठेन्मासत्रयं मन्त्री वारमेकं तथा निशि ॥ रात्री वारत्रयं जप्त्वा नाशयेद्विघ्नमेव च । जपन्सासत्रयं विद्यां रा- जानं वशमानयेत् ॥ भीतो भयात् प्रमुच्येत देवि ! सत्यं न गण देवत्व सिद्धि के लिये, सिद्धगण खेचरच साधन के लिये, और पन्नग राक्षस, मर्त्य, और मुनिगण, स्व अभिलाप सम्पादनार्थ सर्वदा इस की सेवा करते हैं । यह महा पुण्य काच स्वयं इनके मुख से निकला है । बुद्धि मान साधक, सम, शुद्ध और पुष्प समूह से समाकीर्ण भूमिप्रदेश में कोमल कमलासन कल्पना करके, वाम में गुरु, दक्षिण में गणाधिप और मध्य में महिनी को प्रणाम करके कहै, सम्पूर्ण मेरी सर्वदा रक्षा करो । मिना, ललना, भीषणा ललिता मेरे आग्यो, नैर्ऋन, ऐशान, वायव, और उत्तर में रसा करें । कौमारी पश्चिम में और धनदा दशोदिशाओं में रक्षा करें। शाकिनी, ढाकिनी और मर्दिनी, मेरी सर्वदा रक्षा करें। कला रन और रक्तदन्तिका विध्न के समय मेरी रक्षा करें । यह सब परयोगिनी, सापक को भग्रनः रक्षा करें । यह सिदि दापक करच पाठ करके और पाठ क. राके, तीन महीने तक रात्रि में एकबार पाठ करे । रात्रिकाल के समप तीन वार जप करने से विघ्न नष्ट होते हैं । तीन महीने इस मकार जप करने से रामागगों को भी रश किया जाता है, और भय से मुक्त होना है । " . . ।
M त्रयोदश परिच्छेद । संशयः । अप्रकाश्य मिदं गुह्यं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ स. स्कुलीनाय शान्ताय सुजने दम्भवजिते । दद्यात् स्तोत्रमिदं पुण्यं सर्वकर्मफलप्रदम् ।। कवचं यो न जानाति जपेन्महि- पर्दिनीम् । दारिद्रयत्वं भवेत्तस्य सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ अनया सदृशी विद्या नास्ति तन्त्रेषु गोपिता ॥ इति कवचं समाप्तम् । अथ स्तुतिः तदुक्तं कुलचूडामणौ । भैरव उवाच । मञ्चित्ते चर चण्डि ! चूर्णितदुराचारप्रचण्डासवे स्वैरं दारय भूवि दुर्धरदबद्रोहोमिमर्मास्पदः । तेनायं निरुपद्रुतो निरुपमश्रीपादपद्माटवीप्रान्तानन्तवशान्तरे मम मनोहंस- श्चिरं नन्दतु ॥ १॥ हित्वा चण्डि ! हिरण्यदारणपटुप्रोदा- मदन्तांगुलिः स्फालत्कल्पसुमेरुसादरसटाटोपं नृसिंह सुराः। मातस्तत् पशुपाशपेशलपटुश्रीपाद संसेविन सेवन्ते करि- वैरिणं किमरिभि तिर्भवत् सेविनाम् ॥ २ ॥ चण्डि ! वद्विषयान्तरक्षणपदं श्रोत्रान्तरं चोद्धतं तत्तत्वं पुरुष प्रकृत्यनगतं ब्रह्मादिभिर्गीयते । तस्मादेवि ! समस्तदैवत सुधासारेकधामस्फुरत् श्रीमत्पादसरोज चुम्बनपरं मामद्य सम्भावय ॥ ३ ॥ मन्निद्रा यदि वास्तु तत्कुलपथा- यह सत्य कहता हूं । इस में संशय नहीं । यह कवच गुप्तरक्खे । प्रकाश न करै । जिस किसी को भी न देवे । सकुलीन, शांत, मुजन और दम्भ रहित व्यक्ति को ही यह सर्व कर्म फलप्रद पवित्र स्तोत्र प्रदान करै । जो व्यक्ति कवच न जानकर, महिषमर्दिनी का जपकरता है, मैं सत्य सत्य कह उसको दारिद्य दुःख उपस्थित होता है । इस की समान सम्पूर्ण तंत्र में गुप्त विद्या दुमरी नहीं है । इति कवच समान || 9.
श्यामारहस्य भा० टी० । चाराद्वरं मास्तु वा कीर्तिः केशवकौशिकार्चनकरी नैवास्तु सत्सन्निधिः। मातब्रह्महरिस्मरारिहुतभुग्दैत्यारिसेवापदश्री. मत्पादसरोजचिन्तनविधो चित्तं सदैवास्तु नः ॥ ४ ॥ निर्दि- टोऽस्मि यदि त्वदीयपदयुपूर्वापरीभावने निर्दिष्टस्य तदा म. मापि विरलं किंवास्तु सिद्धास्पदम् । तस्मादेवि ! कृपाभवा- ञ्छितभवं श्रीपादपद्मद्वयं मच्चित्ते क्षतसम्पदि प्रसरतु क्षेम- करि ! क्षम्यताम् ॥ ५ ॥ स्वात्मानं परिरभ्य भूतपतिरप्यु. न्मादमासादितः स्वैरं जीवनरक्षणेस च कृती नैवाभविष्यत् प्रभुः । देवाद्विच्युतचन्द्रचन्दनवनप्रागल्भगर्भस्रवन्माध्वी. पूर्णभवत्पदैककमलामोदेन नास्वादितः ॥ ६॥ हाहा मात- रनादिमोहजलधिव्याहारसिद्धाखिलब्रह्मानन्दरसाभिषेकनि- रसस्वान्तोदरैर्मादृशः। अस्माकं सुरवृन्दनिर्भरमनस्तापाभिभू- तिक्षमश्रीमद्भक्तिरसातिदुर्दिनपरीणाहः सदा सर्पतु ॥ ७ ॥ यत्पाद स्फुरदंशुजालजठराचण्डांशुकोटिस्खलत्स्वान्तध्वान्त विसारिनिर्मलचिदानन्दत्रयं दैवतम् । स्वर्ग संसृजते स्थिति वितनुते सृष्टिं पुनर्लुम्पतेप्रोद्धिन्नाञ्जननीलनरिजमहञ्चित्ते त. देवास्तु नः ॥८॥या शश्वन्महिपच्छलस्फुरमिलद्गर्भावधार स्फरद्भक्तान्तः प्रसरत्तमस्तमशिरो देत्यं समालम्वते । सा दुर्गा भयदुर्गदुर्गतिहरा लम्बान्तरत्रासिनी दृप्यदैवत वैरिमारणपटुजीयाजयाहादिनी ॥ ९॥ नृत्यरखेटकचामरां जनचरच्चकाद्यखड्गावर स्फायच्छैलशिली मुखोच्छलदन ल्पाजिच्युतास्त्रायुधौ । वाञ्छावात-विसर्पिनर्तितशिरः साटोपदुष्टासुरत्रुट्यरखण्डविखण्डिता खिलशकुंतक्षुत्पिपा- साकुलैः ॥ १० ॥ काञ्चीकल्पविरामकालकलितां ती.
1 त्रयोदश परिच्छेद । बोरुसम्पादकोन्मायन्माहिपतिर्यगायतशिरः शृङ्गान्तराल- स्थले । वर्णैवर्णसुपत्रमध्यकलिते रक्षाश्रुती मातृभिः सेव्ये चारुवराङ्गने रणमुदा चूर्णायमानां स्मरेत् ॥ ११ ॥ ऊली- धःक्रमसव्यवामकरयोश्चक्र दरं कर्तृका खेटं वाणधनुस्त्रि- शूलभयकृन्मुद्रां दधानां शिवाम् । श्यामा नीलघनोच्चकुन्त लचयप्रोन्नद्धजूटारफलद्वीरास्फाललसत्करालवदनां घोराह हासोद्भटीम् ॥ १२ ॥ एवं ये भवदेवि ! मूर्तिमनघां ध्याय- न्ति दुर्गादिभिः । शक्राद्यैरपि पूजितां परपुरक्षोभादिकं कु- र्वते । राज्यं शत्रुजयः सदर्थधिषणा काव्यामृतं देशिकः स्तम्भोच्चाटनमारणादिकृतिनां तेषां स्वयं जायते ॥ १३ ॥ स्तोत्रं ते चरणारविन्दयुगलध्यानावधानान्मया मन्त्रोद्धार- कुलोपचाररचितं गुप्तोपदेष्टा यदि । ये शृण्वन्ति पठन्ति दे- वि ! सहसा श्रीमोक्षकामादयस्तेषां हस्तगता भवन्ति ज. गतां मातनमस्ते जयः । इति स्तुतिःसमाता । चितामध्ये च यो दद्याद् वलित्रितयमुत्तमम् । कालरात्रि महाकालि ! कालिके ! घोरनिस्वने !। गृहणिमं वलिं मात देहि सिद्धिमनुत्तमाम् । कालिकायं वलिं दत्त्वा पंचगव्यन सुन्दरि!॥अस्थिसंप्रोक्षणंकृत्वा पीठमंत्रंन्यसेत्ततः।भूर्जे वा वटपत्रे वा तत्र पीठमनु न्यसेत्॥पीठमास्तीर्यतस्मिन् वै न्यसे हे कालिक ! हे महाकालि ! तुम्ही कालरात्रि और तुम्ही जगवकी जन- नी हो । मेरी यह वलि प्रहण करो। और मुझ को अनुत्तम सिद्धि प्रदान करो। यह कहकर चिता में श्रेष्ठ विधान से तीन बलिप्रदान करै । हे म. न्दरि ! वलिप्रदान करके पश्चगव्य द्वारा अस्थि सम्मोक्षण पूर्वक पाठमंत्र न्यास करै । भोजपत्र वा वटपत्र पर पाठ मंत्र न्यस्त करना चाहिये। उस में पाठ आस्तीर्ण करके वीरासन न्यास करै । हे देवेशि उसी वीरासनद्वारा - श्यामारहस्य भा दी। द्वीरासनं ततः । वीरासनेन देवोश! रक्षा दिक्षु प्रकल्पयेत् ॥ कृचयुग्मयं देवि ! मायायुग्मं ततः परम् । कालिके ! घोर दष्ट्रे ! च प्रचण्ड ! चण्डनायिके !॥दानगन् द्रावयेत्युक्त्वा हनेति द्वितयं ततः । शवशरीरमहाविघ्नं छेदय द्वितयं ततः॥ द्विठाते वर्मशस्त्रान्त वीराहीऽयं मनुर्मतः । अनेन मंत्रण लोष्ट्रं पावें दिक्ष विनिः क्षिपेत् ॥ तन्मध्ये भैरवो देवो न विघ्नैःपरिभूयते । यादप्रमादाद्देवेशि ! साधको भयविह्वलः ॥ ततस्तैस्तैः सुहृद्वगै रक्षिता नाभिभूतयः । अर्केन्दुसितवादया- लमूलनिर्मितवर्त्तिकाम् ॥ प्रदीपं तत्र संस्थाप्य अस्त्रं तन्त्र प्र- पूजयेत् । हते तस्मिन् महादीपे विध्नैश्च परिभूयते ॥ तद धश्रास्त्रमन्त्रेण निखनेत् कुलदीपकम् । तत्तत् कल्पविधानेन भूतशुद्ध्यादिकं चरेत् ॥ सोढ़ां वा तारकं वापि विन्यस्य पू: जनं ततः। मन्त्रध्यानपरो भूत्वा जपेन्मन्त्रमनन्यधी॥ एका चारों ओर रक्षा कल्पना करके प्रथम दोनों कूच अनन्तर "कालिका पोर दष्ट्रे प्रचण्ड चण्ड नायिक दानवान द्रावय हन हन शवशरीर महाविघ्नं के दय छेदय स्वाहा फद" इस प्रकार प्रयोग करें । इसका नाम पीठ मन्त्र है। इस मंत्र द्वारा पार्च में और सम्पूर्ण दिशाओं में लो निक्षेप करै। तो फिर समस्त विघ्न माफमण नहीं करसक्ते । हे देवेशि ! साधक यदि प्रमाद वशतः भप विह्वळ हो, तो उन्हीं २ सुहृद वर्गों से रक्षित होता है । फिर अभिभूव नहीं होता । तिस काळ अर्केन्द सित वाट्याळकी पर्तिका प्रदीप और अन्न तहां संस्थापन कर के पूजा करनी चाहिये । उस प्रदीपके विनष्ट होनेपर विघ्न परम्परा पराभूत करते हैं । उसके अधोभाग में असमंत्र से कुलदीप खनित और तत्तत कल्प विधानानुसार भूत शुदि इत्यादि करे । एव पोढा अथवा तारक पास करके फिर पूना में प्रवृच और मंत्र ध्यान परायण होकर अनन्य मित्त से जप करै । एकातरी होने पर वीस हजार * २९७ v त्रयोदश परिच्छेद । घरी यदि भवेत् दिक्सहस्रं ततो जपेत् । ट्यक्षेरे चाष्टसाह स्रं यक्षरे त्वयुता कम् ॥ अतःपरन्तु मंत्रज्ञो गजांतकस- हस्रकम् ॥.निशाप्रान्तं समारभ्य उदयांतं समाचरेत् ॥ अन्यत्रापि। "पंचोपचारेणं पुरतो देवतां परिपूजयेत् । यद्यसत्यभयं वापि नेत्रे वस्त्रेण बंधयेत् ॥ ततोऽर्द्धरात्रिपर्यन्तं यदि किञ्चिन्न पश्यति । जयदुर्गामनुनाय॑ तेनैव सर्पपान् क्षिपेत् ॥ जयदुर्गामन्त्रो यथा। तदुक्तं टहन्मत्स्यसूक्ते । तारो दुर्गे युगं रक्षि ततो ढान्तं सलोचनम् । द्विठान्ता जयदुर्गेयं विद्या वेद्या दशाक्षरी ॥ तिलोऽसि सोमदैवत्यो गोसवःसृष्टिकारकः । पितृणां स्वर्गतुष्ट्यर्थ मानान्तु स रक्षकः ॥ भूतप्रेतपिशाचानां विप्नेषु शान्तिकारकः । इति जपे. ध्यतरी होने पर अष्टसहस्र यक्षरी होने पर अयुताई और इसके उपरांत पाठहजार जपकरै । प्रातःकालसे उदयास्त पर्यंत जप करना चाहिये ।। भन्यत्र भी कहा है-पंच उपचार से देवीकी भलीभांति पूजा करै। यदि असत्य भय हो, तो वन द्वारा दोनों नेत्र पंद करै । अनन्तर यदि अर्द्धरात्रि पर्यत कुछ न देखा जाय, तो जय दुर्गा का मंत्र उच्चारण करके उसके द्वारा अर्घ्य प्रदान कर समस्त सरसों बखरे । जय दुर्गा का मंत्र, यया-~-वृहद मत्स्यमूक में कहा है, प्रयम तार अर्थात् ओं फिर दुर्गे युग्म अर्थातू दुर्गे २ इसके उपरान्त सलोचन अर्थात् इस्व इकार युक्त ढांत अर्थात् मून्य णकार सहित रक्षिपद प्रयोग करके फिर द्विगन्ता अर्थात् स्वाहा शब्द प्रयोग करें। तो "ओं दुर्गे दुर्गे रत्रिणी स्वाहा" इस प्रकार मंत्र हुभा । यही जय दुर्गा का दशाक्षर मंत्र है यह मंत्र उच्चारण करके समस्त तिळ वखरे, तिस काल इस प्रकार कहना चाहिये "तिलोसि इत्यादि,, | यह कहकर ईशानादि दिशा .
२९८ श्यामारहस्य भा०टी० । क्षिप्त्वा तिलानात्मचतुर्भागे शिवादितः ॥ ततः सप्तपदं य- स्वा पुनस्तत्रैव सविशेत् । देवं तत्रापि संपूज्य पूजयेन्मनुमु. त्तमम् ॥ निर्भयः प्रजपेद् यावत् सिद्धिरग्रे भवेन्नरः । तत् सत्यं कारयित्वा च वरयेद्वर मुत्तमम् ॥ यदा पलिं प्रार्थयतेनरं कुंजर मेव वा । दिनांतरे च दास्यामि स्वीकृत्य च गृह ब- जेत् ॥ परेऽह्नि च ततो दगत् पिप्टेन नवकुंजरान् ॥ यवोद्भवेन धान्योद्भवेन वा । तदुक्तं तन्त्रान्तरे। यत्र क्षेत्रमयं वापि शालिधान्योद्भवंच वा । चन्द्रहासेन विधिवत् तत्तन्मन्त्रेण घातयेत् ॥ चन्द्रहासेनार्द्धचन्द्राकृति खड्गेन इत्यर्थः । नीलतन्त्रेऽपि। जपादौ तु वलिं दद्यात् पश्चादपि वलिं हरेत् जपमध्ये वा देहि देहीति भापते ॥ तदापि च वलिं दद्यात् महिषं छागमेव वा । न दिक्षु वीक्षणं किंचिन्न च बन्धुस- । अपान्ते के क्रम से आत्म चतुर्भाग में सम्पूर्ण तिल चखेरकर सात ( पद ) चकर उसी स्थान में प्रवेश और देवता की पूजा करके मन्त्र की पूजा करे । अनंतर निर्भय होकर जबतक सिद्धि सन्मुख न हो तबतक जप करना चा हिये । सिद्धि सन्मुख होनेपर उसको सत्य पाशमें बद्ध करके वरकी प्रार्थना करै । तिस काल वह सिदि नर वा हस्ती जिस किसी पलिकी प्रार्थना करे, दिनान्तर में दिव कहकर स्वीकार करके गृह में गमन करै । दूसरे दिन या वा धान्यके लोष्ट्र द्वारा विनिर्मित नौ (९) कुञ्जर प्रदान करें । तन्त्रान्तर में भी कहा है. यया-चन्द्रहास अर्थात् अर्द्धचन्द्राकृति खड्ग द्वारा क्षेत्रमय था शालि पा यमय तत्तत् इस्त्पादि यया विधानसे गोचारण पूर्वक निपा. तित करै । नीलतंत्र में कहा है-जपके आदि में वलिदान पूर्वक शेष में भी पठिप्रदान करै । और जप के अन्त में वा जप में जब दो दो को, तरही दाग वा मेप की बलि देवे । किसी और भी दृटिपात न करें। अपमा .
त्रयोदश परिच्छेद। मागमः ॥ जलादिदुर्गसाणां दक्षिणां विभवावधि । गुरवे गुरुपुत्राय तत्पत्न्यै वा प्रदापयेत् ॥ सम्यक् सिद्धैकमनस्य नासाध्यमिह किंचन । बहु मन्त्र रतः पुन्सः का कथा शिव श्मशानविशेषो यथा तदुक्तं कुलसद्भावे । श्मशानालयमागत्य मुक्तकेशो दिगम्वरः । जपेदयुतसं रुपन्तु सर्वकामार्थसिद्धये ॥ तत्रैव प्रेतमारुह्य प्रजपेन्मन्त्रमु. तमम् । अयुत मैथुनीभूत्वा विभीः सत्यपरायणः । स याति परमां सिद्धिं देवैरपि सुलभाम् । आकर्षणवशीकारमारणो. चाटनादिकम् ॥ स्तम्मन मोहनञ्चैव द्रावणं त्रासनं तथा । वाग्मित्वञ्च धनित्वञ्च वहुपुत्रत्वमेव च ॥ बहुपल्लभतामेति सर्वप्रियत्वमेव हि । स याति खेचरत्वं च देवैरपि सुदुर्लभम् ॥ पंधवान्धवोंके सहित सम्मिलित न होवे । अकेले ही इस कार्यको करै । जिस प्रकार अपना विभव हो उसी के अनुसार गुरुको अथवा गुरुके पुत्रको वा गुरुकी स्त्री को दक्षिणा देनी चाहिये । यदि एकमात्र भली भांति सिद्ध न हो तो भी कुछ असाध्य नहीं होता । इस स्थल में बहुत मंत्र रत पुरुषका अधिक क्या वर्णन करै वह व्यक्ति साक्षात् शिव है ।। श्मशान में और विशेष विधि है जिस किसी प्रकार से मंत्र साधन नहीं होता कुलसद्भाव में कहा है-श्मशानालय में जाय मुक्त केश और दिगम्बर होकर सर्वकामार्थ सिद्धि के लिये अयुव जप करै । मेत के ऊपर आरोदण करके इसपकार अनुष्ठान में प्रवृत्त होये । मैथनीभूत और सत्य परायण हो- कर भय दर करने के उपरान्त इस प्रकार अयुत जप करने से देवगणों को भी सुर्छिम परम सिद्धि लाभ होती है । अधिक क्या ? आकर्षण, वशीकरण पारण, उच्चाटन, स्तम्मन, मोहन, द्वावण, वासन, वाग्मित्व, घनित्य, वह पुत्र मोर बहु वल्ळभा इन सम्पूर्ण को माप्ति होती है । इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण का प्रिय हाजाता है, और देवगणोंको भी दुर्लभ खेचरत्व लाम श्यामारस्य भाटी । न जरा न चमृत्युश्च न रोगो न च घातनम् । अथवा स भवे. नित्यं कर्तुर्विशतिसिद्धियुक् ॥ स्वदेहरुधिराक्कैश्च विल्वपत्रैः सहस्रशः। श्मशानेऽभ्यर्च्य देवींच वागीशसमतां व्रजेत् ।। कालीतन्त्रे च। महाचीनद्रुमलनामज्जाभिर्विल्वपत्रकम् । सहस्रं देवीम- भ्यर्च्य श्मशाने साधकौत्तमः ॥ तदा राज्यमवाप्नोति यदिनै वं पलायते । अनादित्यं यथा दृष्ट्वा लक्षं जपति भूमिपः ॥ निर्मलांच ततो दृष्ट्वा वश्यार्थमयुतं जपेत् ॥ भैरवतन्त्रेऽपि। श्मशाने योपितमन्त्री संपूज्य ऋतुगां शुभाम् रक्तचन्द नसिक्ताङ्गी रक्तवस्त्रैरलंकृताम् ॥ तावत् पुष्पैर्मनुं प्रोष्य ततो ध्यायेच्च चण्डिकाम् । पूजयित्वा लभेत् राज्यं यदि न त्रित- यायते ॥ मेषमहिपरक्ते न वाग्मित्वं तस्य जायते । धनित्वं होता है । जरा ( बुढापा ) आक्रमण नहीं करसक्ती मृत्यु भी फिर नहीं होती, समस्त रोग भी फिर त्रिसीमा में नहीं आसक्ते, शोक दुःखादि भी दूर होजाते हैं । श्मशान में इस प्रकार शवपर आरोहण करके अपनी देह के शोणिताक्त सहस्र बिल्वपत्र से देवी की आराधना करने पर बागीशकी समान होजाता है । कालीतत्रमें भी कहा है ? महा प्राचीन इमळताकी मज्जा सयुक्त सहस्र विलापन द्वारा रमशान में देवी की पूजा करके यदि पाप न न किया जाय तो राज्य लाभ होता है । अनादिता में अवलोकन करके लक्ष जप करने से जिस प्रकार राजा होजाता है निर्माला में दर्शन करके तिसी प्रकार सम्पूर्ण वशीकरण के लिये अयुत जप करै । भैरवतन्त्र में भी कहा है, साधक श्मशान में ऋगामिनी सत्स्वभाव रमणी की पूजा करके रक्तचन्दन सिताही रक्तपन्न गएिडता चण्डिकाके ध्यान में प्रवृत होतो राज्य लाम करने में समर्थ होता है। मेप और मीप के रक द्वारा पूषा करने से वाग्मित्व लाम होता है, धनित प्राप्त होता है, और सिद्धि प्रयोदश परिच्छेद। जायते तस्य सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥ वचसा स भवेज्जीवो भ- नेन च धनाधिपः । श्राज्ञया देवराजोऽसौ रूपेणैव मनोभवः। बलेन पवनो ह्येप सर्वतत्वार्थसाधकः। साधितं शोधितं मांसं सास्थि दद्यात् सदा वलिम् ॥ मूपमांसं छागमांसं मैपं मा- हिपमेव च । सर्व सास्थि प्रदातव्यं तथा लोमसमन्वितम् ॥ अजीवं खनखच्छिन्नं केशं संमार्जनास्पदम्। निवेदयेत् ३म- शाने च सर्वसिद्धिप्रदं भवेत्॥ नारीरजोऽन्वितं कृत्वा पत्राणां शतमुत्तमम प्रत्येकं प्रजपेन्मन्त्रं ततो होम समाचरेत् ॥ युगा नामयुतं देवि! पूजिता दक्षिणा भवेत् । सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य वाग्मी धीरश्च जायते ॥ न तस्य दुर्लभं किंचित् पृथिव्यां त. स्य जायते। कुलसद्भावेऽपि। रेतोयुक्तेन पुष्येण चार्कस्यैव सहस्रशः । श्मशानेभ्यर्च्य समुत्पन्न होती हैं। अधिक क्या ? वह वाक्य में वाक्पति की समान होता है । धन में कुबेर होता है । आज्ञा में देवराज होता है, रूप में कामदेव होता है, बल में पवन को समान होता है । इस प्रकार वह सर्व विध त चार्य साधक होता है । साधित और शोषित करके अस्थिके सहित मांस वलि प्रदान करै । मषिकमांस, छागांस, समस्त लोम और अस्थि के सहित प्रदान करना चाहिये । अपने नखद्वारा छिन्न और समार्जनास्पद केश ३१शान में निवेदन करने से सर्वसिद्धि प्रद होता है । नारी के रजोयुक्त करके शतविन्यपत्र प्रदान पूर्वक होम करै । प्रत्येक पत्र भदान के समय मत्र प्रयोग करना चाहिये । अयुतवार जप करके पूजा करने से दक्षिणा देनी चाहिये । इस प्रकार दक्षिणा के अनन्तर फल सर्वविध सिद्धि सघ- टित होती हैं । इस के अतिरिक्त वाग्पी और धीर होजाता है, पृथिवी में भी फिर कुछ दुर्लभ नहीं होता । कुल सद्भाव में भी कहा है, शुक्र सयुक्त सहस पुष्प द्वारा श्मशान में दवो कालिका की पूजा करने से, सर्व अर्क श्यामारहस्य भा०टी० । काली तु सर्वसिद्धिं स विन्दति ॥ धनवान् बलवान् वाग्मी सर्वयोपित्प्रियः सुखी। जायते नात्र सन्देहो महाकालपचो यथा ॥ श्मशाने शयनं यस्य शवासनगतः पुमान् असकृञ्च जपेन्मन्त्रं सर्वसिद्धिप्रदोभवेत् ॥ तर्पयेच्च शवास्ये तु रक्तमांसा दिभिस्तथा। त्रिभिर्मन्त्रमुदीर्यैवं सर्वसिद्धिर्भवेत्ततः ॥ तर्पये. च्च पयोभिश्च रक्तधारायुनेस्तथा रेतोभिश्च तथा तद्वत् स्व: कीयेन कचेन च मैथुनाजितयोपायाः कुलप्रक्षालनेन च मेष माहिषरक्तेन नररक्तेन चैव हि ॥ मूपमार्जाररक्तन वाग्मित्वं तस्य जायते । वलित्वं जायते तस्य सर्वसिद्धिश्च जायते॥ भावचूडामणौ। सर्वसिद्धिप्रदं साक्षान्महापातक नाशनम् । सर्वपाप हर- ञ्चैव सर्वरोग विनाशनम् ॥ नान्यत् सिद्धिप्रदंदेवि ! वीर साधन वर्जितम् । महावलो महाबुद्धिर्महासाहसिकःशुचिः॥ विध सिदिलाभ होती है, एवं धनवान् , बलवान् , वाग्मी, सम्पूर्ण स्त्रियों का मिय और सुखी होता है । महा काळ ने स्वयं यह कहा है, अतएव इस विषय में किसी प्रकार सन्देह नहीं । जो व्यक्ति शवके आसन और श्मशान में शयन करके वारम्बार जप करता है, वह सर्वसिदि प्रद होता है । रक्त और मांसादि द्वारा शव वदन में तर्पण करने से सर्व विधि सिद्धि लाम होती है । तीन मंत्र उच्चारण करने चाहिये । अधिक क्या ? रक्त धारायुक दुग्ध द्वारा शुक्र द्वारा, अपने कच द्वारा, मैथुन प्रसक्त रमणी के कुल प्रक्षालन द्वारा, मेप, महिप, और मनुप्प रक्त द्वारा एवं मूष और मा. और के शोणित द्वारा तर्पण करने से वाग्मित्व वनशालिव, और सर्व सिद्धि का अधीश्वरत्व उत्पन्न होता है, भाव चूडामणिमें भी कहा; हे देवि! बीर साधन जिस प्रकार साक्षात् कार से सर्वसिदि प्रदान करता है, संपूर्ण मा पातक नष्ट करताहै, समस्त पाप हरण करता और संपूर्ण रोगों को करता इस प्रकार अन्य किसी सिदिसे संभव नहीं। महाबल महाद्धि महासाहसिक त्रयोदश परिच्छेद। महास्वच्छो दयावांश्च सर्वभूतहितेरतः । तेषां कृते महादेवि! वीरसाधन मुत्तमम् ॥ । रहत्श्रीक्रमसंहितायाम्। नास्मात्परतरं किंचित्सत्वरं सिद्धिदायकम् । सर्वसिद्धि र्भवत्येव अहोराले कलौयुगे ॥ द्वापरे तच्च मासेच त्रेतायां वत्सरेणच । कृते च दशभिर्वः सत्ये सिद्धिर्न संशयः ॥ ' अथाष्टम्यां चतुर्दश्यां कुजवारे वा प्रथमप्रहराभ्यंतरे गुरुं देवीश्च नत्वा वीरवेशो यात्रां कुर्यात् ॥ तदुक्तं तन्त्रान्तरे। घटी वन्धनवस्त्रंच मूलेन परिधाय च । तवार्थेन पुनर्व- खं मूलेनाङ्गविलेपनम् ॥ कृतोष्णीशश्च मूलेन सिंदूरेणोद्ध पुण्ड्रकम् । इष्टदेवं गुरुं नत्वा यात्रा प्रहरमध्यतः । कार्या- च साधकैः सार्द्ध हृदि मंत्रं परामृपन् । अक्षुब्धो भुक्तभो- शुचि, महास्वच्छ, दयावान, और सर्चभूतों के हित निरत, पक्तिगणों के लिये वीर साधन की सृष्टिहुई है । वृहत् श्रीक्रम संहिता भी कहा है, इसकी अपेक्षा शीघ्र सिदिदायक और कुछ नहीं है । कलियुग में अहोरात्र के म- ध्यमें ही सर्वविध सिद्धिनाभ होती है । द्वापर में एकमास में त्रेता में एक वर्ष में, और सत्ययुग में दशवर्ष में सिद्धिलाभ होती है । इस में सन्देह नहीं । अनन्तर अष्टमी में वा चतुर्दशी में पङ्गलवार में प्रथम महरके मध्य में गुरु और देवीको प्रणाम करके, वीर वेश में यात्रा करै । तन्त्रांतर में कहा है, मूळमंत्र घटी वस्त्र परिधान, मूकमत्र में अङ्ग विलेपन, मूलमंत्र में उष्णीप बन्धन, और मूलमत्रमें ही सिंदूरका ऊर्द पण्डक विधान करके इष्टदेवता और गुरुको म- णाम एवं हृदयमें मन्त्र परामर्शन पूर्वक साधक गणों के समभिव्याहार में पहर में यात्रा करै । यदि वीर साधक हो, तो किसी प्रकार जुन्ध न होवे, श्यामारहस्य भा०टी० ज्यस्तु यदि स्याद्वीरसाधकः ॥ दिव्यो वा पशुभावो वा भु. क्त्वा साधन माचरेत् ॥ अथ साधनस्थानम्। तदुक्तं भावचूडामणौ। शून्यागारे नदीतीरे पर्वते निर्जनेऽपि वा । विल्वमूले श्म- शाने वा तत्समीपे बनस्थले ॥ अष्टम्यांच चतुर्दश्यां पक्ष योरुभयोरपि ॥ भौमवारे तमिस्त्रायां साधयेत् सिद्धि मुत्त माम् । उपचार समादाय कुलामृतरसन्तथा ॥ गुड़ाईक रसेनैव सुरा तु ब्राह्मणस्य च । गौड़ी च छत्रियस्यैव माध्वी वैश्यस्य तत्र वै ॥ .कदलीमधुसंमिश्रश्वानत्वचि रसैः सुरा। सर्व शूद्रस्य संप्रोक्तं यत्र वा तद्रुचिर्भवेत् ॥ गृहीत्वा तत्र दातव्यं सर्व नैव च संस्पृशेत् ॥ अन्यत्रापि। द्विजानामनुकल्पन्तु न साक्षाच्च विकल्पितम् ॥ भोजन करले । दिव्यही हो, अथवा पशुभावही हो, भोजन करके साधन में . मवृत्त हो। साधन स्थान यथा-भावच्डामणिमें कहा है, शून्पागार,नदीतीर, पर्वत निर्जन, विलमूल, श्मशान, इसके समीप का प्रदेश, अथवा वनस्थळ इन सम्पूर्ण स्थान में दोनों पक्षकी अष्टमी वा चतुर्दशी में भौमवार में रात्रि में उत्कृष्ट सिदि साधन में प्रवृत्त होवे । उपचार, फलामृतरस, ब्राह्मण होने से गुह और अदरकरस निर्मित मुरा, एवं क्षत्रिय गोडी और वैश्य माधी मुरा समभिव्याहार में लेने । शूदके पक्ष में कदली और मधु मिश्रित : करत्व को रस निर्मित मुरा प्रशस्त है । यह समस्त प्राण करके वहां देो । सयं कुल स्पर्शन को । अन्यत्र भी कहा है, द्विजगणों का मनकनर त्रयोदश परिच्छेद। तदुक्तं रुद्रयामले। सत्यक्रमाच्चतुर्वर्णैः क्षीराज्यमधुपिष्टकैः । त्रेतायां पूजिता देवी घृतेन सर्व वर्णिभिः ॥ मधुभिः सर्व वर्णेश्च पूजयेद् द्वापरे युगे । पूजनीया कलौ देवि ! केवलैर्वा सबैश्च तैः ॥ मासमक्तंच शुद्धान्नं धूपदीपादिकं तथा । तिलाः कुशाश्च सर्वाश्च स्थापनीयाः प्रयत्नतः ।। भय पूर्वोक्तान्यतमस्थानं गत्वा सामान्याय॑ विधाय पूर्व मुखो मूलान्ते फटकारं दवा यागभूमि प्रोक्ष्य गुरुगणेशव- टुकयोगिनीभ्यः पूर्वादितः संपूज्य पूर्वोक्तविधानेन मंत्रभूमौ विलिख्य ये चात्रेत्यादि पूर्वोक्नमंत्रेण भूमौ पुष्पांजलित्रयं दत्त्वा प्रणम्य श्मशानाधिपतिभ्यः पूर्ववद्वलिं दत्त्वा अघोर मंत्रेण शिखावन्धनं विधाय स्वदर्शन मंत्रांते आत्मानं रक्ष रक्षेति हृदि हस्तं दत्वा हृद्रक्षां विधाय पूर्वोक्तक्रमेण भू- साचात् विकल्पित नहीं । रुद्रयामल में कहा है, सत्ययुग में चारों वर्ण यया कमसे सीर, आज्य, मधु और पिटक द्वारा, लेतामें सम्पूर्ण वर्णही घृत द्वारा द्वापर में मधुद्वारा, और कलियुग में संपूर्ण वर्ण केवल आसप द्वारा देवी की पूजा करें । मांस भक्त शुद्धान्न, धूप और दीपादि एवं तिल और संपूर्ण कुश यत्न सहित स्थापन करने चाहिये । अगन्तर पूर्व कथित अन्यतम स्थान में गमन करके सामान्य अर्घ्य दि. पान के सहित पूर्व मुख वैठ मूलान्त में फद्द्वार दान पूर्वक यागभूमि म. पालन और पूर्वादि दिशा में गुरु, गणेश, बटुक और योगिनी गणो की पूजा करके पूर्वोक्त विधानामुपार भूमि में तीन पुष्पाञ्जलि दान और प्रणाम करै । फिर इमशान के अधिपति गणों को पूर्व की समान वलि देकर अघोर मन्त्र से शिखा बंधन रिधान और खदर्शन मन्त्र के अन्त में आत्मा की रक्षा कर, इत्यादि कहकर, हृदय में हाथ लगाय हद् रक्षा करै । फिर पूर्वोक श्यामाररस्य मा. दी। तशुझ्यादिकं विधाय जयदुर्गामंत्रेण दिनु सर्पपं विकीर्य तिलोऽसीत्यादिना तिलान् विकीर्य विहितासन समीपं गच्छेत् ॥ तदुक्तं तन्त्रान्तरे। गुरुपूजादिकं सर्व पूर्वोक्तमन्त्रमुच्चरेत् । ये चात्रेत्यादि मं- त्रेण भूमौ पुष्पांजलिं क्षिपेत ॥ श्मशानाधिपतीनांतु पूर्वपति लमाहरेत् । अघोरास्त्रेण मंत्रेण शिखावन्धनमाचरेत् ॥ वंद- र्शनेन वा रक्षामुभाभ्यां परिकल्पयेत् । मायास्फ़रद्वयं वर्म प्र. स्फुरद्वितयं पुनः घोरघोरतरेत्यन्ते तनुरूपपदं ततः। चटयुग्म तदन्ते च प्रचटद्वितयं पुनः॥ हनयुग्मं समुद्धृत्य सहस्रारस्व रूपकम् । वर्मास्त्रांनं महामंत्र सुदर्शनं प्रकीर्तितम् ।। भूतशुः द्धिं ततः कृत्वान्यासजालं प्रविन्यसेत् । जयदुर्गाख्येन मनुः ना सर्पपान् दिक्षु नि.क्षिपेत् ॥ क्रमसे भूनशुध्यादि करके और जय दुर्गा मन्त्र से दर्शदिशाओं में सरसों विखेर, तिलोप्ति इत्यादि । मन्त्र से सम्पूर्ण तिल फेंक कर, विहित आसन के समीप गमन करें। तन्त्रान्तर में भी कहा है ! सम्पूर्ण गुरु पनादि में पूर्वोक्त मा उच्चारण और चार इत्यादि मंत्र से भूमि में पुष्पाञ्जलि निक्षेप और स्मशानापि पतिगणों के संदेश से पूर्व की सपान वळि आहरण, अघोरासमन्त्र से शिक्षा नन्धन सपाचरण और स्वदर्शन पत्र से रक्षा कल्पना करनी चाहिये ही ही पर स्फर ह प्रस्फर माफ घोर घोरतरा घट पर प्रपट प्राट हर इन फट् "। इसकाही नाम स्वदर्शन मत्र है । अनतर भूतार करके, न्यास नाल परिम्परत और जय दुर्गा मात्र से सम्पूर्ण सरसों सबस दिशाभों में सावरे।
। । त्रयोदश परिच्छेद । अथ विहितशवो यथा तदुक्तं भावचूडामणौ। . यष्टिविद्धं शूलविद्धं खलविद्धं पयोमृतम्। रज्जुबद्धं सर्पद प्टे चण्डालं चाभिभूतिकम् ॥ तरुणं सुन्दरं शूद्रं रणे नष्टं समु ज्वलम्। पलायनविशून्यन्तु संमुख रणवर्तिनम् ॥ एतेषाम- न्यतमं ग्राह्यमित्यर्थः। अथ निषिद्धशवो यथा तदुक्तं तत्रैव । स्वेच्छामृतं हिवपंच वृद्धं स्त्रियं द्विजं तथा। अन्नाभावे मृतं कुष्ठिनं सप्तवर्द्धकं तथा ॥ एवं चाष्टशतं त्यक्त्वा पूर्वोक्ता न्यतमं शवम् ॥ गृहीत्वा मूलमंत्रेण पूजास्थानं समानयेत् ।। नीलतन्त्रे च । चाण्डालं चाभिभूतं वा शीघ्र सिद्धिफलप्रदम् । कालीतन्त्रेऽपि। ब्राह्मणं गोमयं त्यक्त्वा साधयेवीरसाधनम् । अथ शवसमीपं गत्वा ओं फट् इति शवमभूक्ष्य ओं हुं विहित शव यया-भावचूडामणि में कहा है यष्टिविद्ध, शूलविद्ध, खड्ग विद, जळमृत, रज्जाद, सर्पदष्ट, चण्डाल, तरुण सुंदर शूद्र जो पलायन न करके सन्मुख समर में युद्ध करके विनष्ट हुया हो ऐसे व्यक्तियों में से अन्यतम व्यक्तिको आसनार्य ग्रहण करे । निषिद शव यथा-उसी में यह कहा है अपनी इच्छा से मरादि वर्ष वृद्ध, खी, द्विन, अन्न के अभाव से मरा, कुष्ठी, सप्तवार्दक, यह अपविध शव त्याग करके पूर्वोक्त अन्यतम शब ग्रहण और मूलमंत्र से उसको पूजा- स्थान में लाये नीवतंत्र में कहा है-चाण्डाल अथवा अभिभूत यह दो शव शीघ्र सिदिफल प्रदान करते हैं । कालीतंत्र में कहा है-ब्राह्मण और गो मय वर्जन करके वीरसाधन में प्रवृत्त होये । अनन्तर शवसमीप गमन और 'मा फट् मंत्र से शवको अभ्युक्षण और 'ओं मृतकाय' इत्यादि मंत्र से ३०८ श्यामारहस्य.भाटी मृतकाय नमः फट् इति शवोपरि पुष्पाञ्जलिसयं दत्वा.सः शपूर्वकम् वक्ष्यमाणमन्त्रेण प्रणमेत् ।' : .. तदुक्तं भावचूडामणौ । प्रणवाद्यस्त्रमन्त्रेण शवञ्च प्रोक्षणञ्चरेत् । प्रणव कूर्च- वीजञ्च मृतकाय नमः फट् ॥ पुष्पाञ्जलित्रय दत्त्वा प्रणमत स्पर्शपूर्वकम् ॥ हे वीर ! परमानन्द ! शिवानन्द ! कुलेश्वर!। आनन्दभैरवाकार ! देवीपर्यङ्कसंस्थित ! ॥ धीरोऽहं त्वां प्र. पद्यामि उत्तिष्ठ चण्डिकार्चने । प्रणम्यानेन मन्त्रेण क्षालयेत् तदनन्तरम् ॥ अथ सुगन्धिजलन शव सुलाप्य वाससाज लमुद्धृत्य धूपैधूपिते गन्धचन्दनादिभिःश प्रलिप्य तत् क- टिदेशे धृत्वा, पूजास्थानं समानयेत् । . ; तदुक्तं नीलतन्वे । तारं कूर्च मृतकाय नमोऽन्तं मन्त्रमुद्धरेत् । शवस्नपनमः शव के ऊपर तीन पुष्पांजलि प्रदान एवं स्पर्श पूर्वक वक्ष्यमाण मंत्र से णाम करै । भावंचूडामणि में कहा है । यथा-प्रणवादि अस्त्रमन्त्र से शाको मोक्षण ‘ओं हुँ, इत्यादि मंत्र से तीन पुष्पांजलि दान और पर्श करके : णाम करै । हे वीर ! हे परमानन्द ! हे शिवानन्द ! हे आनन्द भैरवागार। में वीर और फुलेश्वर देवीके पर्यकमें अवस्थिति करके तुम्हारी शरणागतमा हूं। तुम चण्डिका की अर्चना में उत्थान करो 1 इस मंत्रसे प्रणाम करके सिसके पीछे उसका अभ्युक्षण करै ।। अनन्तर सुगन्धित जल से भली भांति शवको स्नान करार और बस द्वारा उत्तम रूप से पोछकर घ्य द्वारा धुपित और गंध चंदनादि द्वारा लिप्त करके उसकी कमर पकडकर पनास्थान में कावे। नीम का यथा-'ओं ई पूर्णमृत कापनमः यह या रकमान कराने का मंत्री धूप बारा धुपित और गंपादि द्वारा पिला करने से उधारण प्रयोदश परिन्छेद। न्त्रोऽयम् इत्यादि । धूपैः सुधूपितं कृत्वा गन्धादिना प्रालिप्य च । रक्तातो यदि देवेश ! भक्षयेत् कुलसाधनम् ॥ ततः कुशशय्यायां पूर्वशिरः कृत्वा शवं स्थापयेत् । । तदुक्तं तत्रैव। कुशशय्यां परिस्कृत्य तत्र संस्थापयेत् शवम् । एलालव- ङ्गकर्पूरजातीखदिरसारकैः । ताम्बूलं तन्मुख दया शव कु- व्दधोमुखम् ॥ स्थापयित्वा तस्य पृष्ठ चन्दनेन विलेपयेत् । बाहुमूलादि कट्यन्तं चतुरस्र विभाव्य च ॥ मध्ये पद्मं चतु. द्वार दलाष्टकसमन्वितम् । ततश्चैनेयमजिनं कम्बलान्त- रितं न्यसेत् । तन्त्रान्तरे च । गत्वा शवस्य सान्निध्य धारयेत् कटि देशतः । ययुपद्राव येदस्य दद्यान्निष्ठीवन शवे ॥ पुनःप्रक्षालनं कृत्वा जपस्थानं समानयेत् ॥ ततो द्वादशांगुलमानानि यज्ञकाष्ठानि दशविक्षु संस्थाप्य पूजयेत् तत्र इन्द्रादिदशदेवताः। यदि रक्काक्त हो तो कुळसाधक को भक्षण करती है । अंनंतर कुशशय्यामें शवकों पूर्वशिरा करके स्थापन करै । नीलतंत्र में कहा है. यथा-कुशशय्या स्वच्छ करके उस में शवको स्थापन पूर्वक इलायची लवङ्ग (लोंग ) कपूर चमेळी, और खदिरसार द्वारा ताम्ब्ल प्रस्तुत करके शव के मुख में देवे । उसका अधोमुख और उसका पृष्ठदश चन्दन द्वारा अनुलिप्त करै । अनंतर बाहुपूल से कटि पर्यंत चारों ओर भावना करके मध्य में दलाएक समन्वित चार पद्म भावना और कम्बलान्तरित आसन विन्यस्त करना चाहिये । तन्त्रान्तर में कहा है । शव के समीप में गमन करके कटिदेश धारण करें। यदि उपद्रव करे, तो उसके गात्र में निष्ठीवन देवे । पुनार प्रज्ञालन करके अपस्थान में लाये । अनन्तर द्वादश अंगुल परिमाण यजकाष्ठ सम्पूर्ण दिशा ओं में स्थापन करके उसमें इन्द्रादि दश देवताको पूजा करनी चाहिये ।
रे श्यामारहस्य भा० टी० । विषमिन्द्राय संलिख्य सुराधिपतये ततः । इमं बलिं गृह युगं गृह्णापरयुगं ततः ॥ विघ्ननिवारणं कृत्वा सिद्धिं प्रयच्छ ठद्वयम्। अनेन मनुना पूर्व वलिं दद्याञ्च सामिषम् ॥ साध्य नामादिकम् कृत्वा पूर्ववद्वलिमाहरेत् । सर्वेषां लोकपालानां ततःसाधकसत्तमः॥ तत्र अयं क्रमः। लं इंद्राय सुराधिपतये ऐरावतवाहनाय वजहस्ताय शक्तिपारिषदाय सपरिवाराय नमः । इति संपू. ज्य वलिं दद्याद् यथा । औं इंद्राय सुराधिपतये इमं बलिं गृह गृह गृह्णापय गृह्णापय विघ्ननिवारण कुरु सिद्धिं प्रयच्छ स्वा- 'हा । एष पलिः इन्द्राय नमःवं वहये तेजोऽधिपतये मेषारू. ढ़ाय शक्तिहस्ताय इत्यादि पूर्ववत् संपूज्य बलिं दद्यात् । ओं वह्नये तेजोऽधिपतये इत्यादि पूर्ववत् । यं यमाय प्रेताधिपतये दण्डहस्ताय महिषवाहनाय इत्यादिना संपूज्य बलिं दद्यात् अनेन ओ यमाय प्रेताधिपतये इत्यादि पूर्ववत् क्षां निर्धत ये रक्षोऽधिपतये स्ववाहनाय खड्गहस्ताय इत्यादि पूर्ववत् सं. पूज्य वलिं दद्यात् भनेन ओं नितये रचोऽधिपतये इत्यादि पूर्ववत् वं वरुणाय जलाधिपतये मकरवाहनाय पाशहस्ताय इत्यादिना पूर्ववत् । वं वायवे वाय्वधिपतये अंकुशहस्ताय मृगवाहनाय इत्यादिना पूर्ववत् संपूज्य वलिं दद्यात् भनेन। ओं वायवे वाय्वधिपतये इत्यादि पूर्ववत् । ओं कुवेराय य- "रिप इन्द्राय,, इत्यादि मंत्रसे पूर्वकी और आमिप सहित बलि देने । साध्य 'नामादि करके पूर्व की समान सम्पूर्ण लोकपालों के उद्देश से बलिप्रदाय करनी चाहिये । वलिमदान का मंत्र यह है " इन्द्राय,, इत्यादि सरकार सम्पूर्ण लोकपात्रों की बलि आहरण कर शके अधिष्ठात्री देवतास्यादि + । प्रयोदश परिच्छेद । क्षाधिपतये गदाहस्ताय नरवाहनाय इत्यादिना संपूज्य वलिं दद्यात् अनेन । ओं कुवेराय यक्षाधिपतये इत्यादिना पूर्ववत् औं ईशानाय भूताधिपतये शूलहस्ताय वृषवाहनाय इत्यादि ना पूर्ववत् निर्ऋतिवरुणयोर्मध्ये ओं अनन्ताय नागाधिपत- ये चक्रहस्ताय रथवाहनाय इत्यादिना पूर्ववत् संपूज्य बलिं दद्यात् अनेन ओं अनन्ताय इत्यादि पूर्ववत् । इन्द्रे- शानयोर्मध्ये आंब्रह्मणे लोकाधिपतये पद्महस्ताय हंसवाह- नाय इत्यादिना पूर्ववत् संपूज्य आं ब्रह्मणे इत्यादिना पूर्ववत् शवाधिष्ठातृ देवताभ्यो वलिं दद्यात् चतुपष्टियोगिनीभ्यो नमः । डाकिनीभ्यो नमः। अथ पूजासामग्री समीपे भुवि चोत्तरसाधकञ्च संस्था- प्य मूलांत ह्रीं फट् शवाय नमः इत्यादिना आसनं संपूज्य मूल मुच्चरन् अश्वारोहणक्रमेण शवोपरि उपविश्य स्वपाद- तले कुशान् दत्वा शवकेशान् प्रसार्थ जुटिकान् वध्वा गुरु देवींच नमस्कृत्य प्राणायामपङ्गन्यासान् कृत्वा पूर्वोक्तवी- रासनं दशदिक्षु मनुना लोष्ट्राणि निःक्षिप्य संकल्पं कुर्यात् को भी वलिप्रदान करें । उसका मंत्र यह है । "चतुर पष्टि योगिनीभ्योन- मः इत्यादि ॥ अनन्तर समीपस्य भूप्रदेश में पूजासामग्री और उत्तर साधक को स्थापन मूलान्त में " ही फट् इत्यादि " मत्र से आसन की पूजा, मूलोचारण के स- हित अश्वारोहण और क्रमसे शक्के ऊपर बैठ, अपने पादल में सम्पूर्ण कुश दान शबके केशपाश प्रसारण शिखा बन्धन, गुरु और देवीको नमस्कार प्राणायाम और पडङ्गन्यास समाधान पूर्वोक्त वीरासन वधन और दशादि. शाभों में मंत्र द्वारा कोट्र निक्षेपकरके संकल्प करना चाहिये । मावजूदाम, श्यामारहस्य मा०टी० । तदुक्तं भावचूडामणौ। पूजाद्रव्यं सन्निधौ च दूरे चोत्तरसाधकम् । समानगुण सम्पन्नं मान्त्रिक विजितेंद्रियम् ॥ अभिषेकविधि ज्ञात्वा दे. वां भावयेत् पराम् संस्थाप्यात्मानमभ्यर्च्य स्वमन्त्रान्ते ततः परम् ॥ फडित्यनेन मन्त्रेण तत्राश्वारोहणं विशेत् । कुशान् पादतले दवा शवकेशान् प्रसार्य च ॥ दृढ़ निव- ख्य जुटिकां कृतसङ्कल्पसाधकः ॥ तन्त्रान्तरे। शवोपरि समारुह्य गुरुपूजादिकं चरेत् । प्राणायाम विधा- • याथ दिसु लोष्ट्राणि निःक्षिपेत् ॥ ततः स्वामे शवसमीपे अर्घ्य पात्रादिकं संस्थाप्य शव. जुटिकायां पीठपूजादिकं कृत्वा षोडशोपचारैः देवीं संपूज्य शवमुख देवीं कारणेन त्रिः सन्तर्पयेत् । तदुक्तं भावचूडामणौ । तत्र देवीं सुसंपूज्य उपचारैः सुविस्तरैः । णि में कहा है । यया-समीप में पूजा द्रव्य और दूर में उत्तरसापक को स्थापन करै । यह उत्तर सापक समान गुण सम्पन्न है मंत्रविद और विधि तेन्द्रिय हों अनन्तर स्वम प्रांतर में आत्मा की अभ्यञ्चना करके फिर "फद" त्यादि मन से अधारोहण क्रमसे उपवेशन, पादतल में सपूर्ण कुश दान, शव के केशकलाप प्रसारण और दृद्रमकार से शिखा घन करके, कृत सकन्प हावे । तन्त्रांतर में कहा है, शवके ऊपर आरोहण और गुरु पूनादि समा चरण एवं प्राणायाम विधान करके सम्पूर्ण दिशा में सपस्त कोष्ट्र निसप करै । अनन्तर अपने वाम में शवसमीप में अयपात्रादि स्थापन और शर की जटिका पीठ पूजादि विधान पोटशउपनार से देवी की आराधना रके, शयके मुख में कारण द्वारा तीनवार तर्पण करै । भाषचूडामणि मेंका। है । यथा-वहां देवी की सम्पर प्रकार से पूजा करके मुविस्तर उपचार --
त्रयोदश परिच्छेद ।
नीलतन्त्रे च।
शवास्ये विधिवद्देवी देवताप्यायनं ततः।
ततःशवादुत्थाय तस्य संमुखं गत्वा वक्ष्यमाणमन्त्रं पठेत्।
तदुक्तं भावचूडामणौ।
उत्थाय समुखे स्थित्वा पठेद्भक्तिपरायणः । ओं वशो मे
भव देवेश ! ममामुकपदं ततः ॥ सिद्धिं देहि महाभाग !
कृताश्रमपदां वर !। ततो मूलमन्त्रं पठन् पट्टसूत्रेण शवपा.
दइयं दृढ़ निवध्य वक्ष्यमाणमन्त्रेण रक्तचन्दनादिना त्रि.
कोणचक्रं विलिखेत् ।
तदुक्तं तन्त्रान्तरे।
मूल मन्त्रमुच्चरन् मन्त्री शवपादद्वयं ततः । पट्टसूत्रेण
वनीयात् येनोत्थातुं न शक्यते ॥
भावचूडामणौ।
ओं भीमभीरुभयद्राव ! द्रव्यलोचनभावक | त्राहि मां
देवदेवेश ! शवानामधिपाधिप ! ॥ इति पादतले तस्य त्रि
द्वारा इत्यादि । नीलतंत्र में भी कहा है-शवके मुख में यथा विधान से
देवी और देवता का आप्यायन करके, शव से उठे । उसके सन्मुख गमन
पूर्वक वक्ष्यमाण मंत्र पाठ करै । भावडामणि में कहा है । यथा-उठ और
सन्मुख में अवस्थान करके भक्तिपरायण होकर " ओ शवो में" इत्यादि
मंत्र पाठ करै । अनन्तर मूल मंत्र पाठ के अन्त में पट्टसूत्र द्वारा शवके दोनों
पाद दृढ रूप से बांध कर वक्ष्यमाण मंत्र से रक्त चन्दनादि द्वारा त्रिकोण
चक लिखना चाहिये । तंत्रांतर में कहा है, यया-साधक मूल मंत्र उच्चारण
करके, फिर पट्ट सूत्र द्वारा शव के दोनों पाद दृढप्रकार से बांधे । तो शव
फिर उठ नहीं सकता, भावच्डामणि में कहा है, " ओं भीम मौरुद्भयो ।
इत्यादि मंत्र से शव के पदतल में त्रिकोण चक्र लिख । तो शव उठनहीं
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१२ श्यामारहस्य मा०टी० । तदुक्तं भावचूडामणौ । पूजाद्रव्यं सन्निधौ च दूरे चोत्तरसाधकम् । समानगुण सम्पन्नं मान्त्रिक विजितेंद्रियम् ॥ अभिषेकविधि ज्ञात्वा दे. वां भावयेत् पराम् संस्थाप्यात्मानमभ्यर्च्य स्वमन्त्रान्त ततः परम् ॥ फडित्यनेन मन्त्रेण तत्राश्वारोहणं विशेत् । कुशान् पादतले दचा शवकेशान् प्रसार्य च ॥ दृढ़ निव- व्य जुटिकां कृतसङ्कल्पसाधकः ।। तन्वान्तरे। शवोपरि समारुह्य गुरुपूजादिकं चरेत् । प्राणायाम विधा. • याथ दिक्षु लोष्ट्राणि निःक्षिपेत् ॥ ततः स्ववामे शवसमीपे अर्घ्य पात्रादिकं संस्थाप्य शव. जुटिकायां पीठपूजादिकं कृत्वा षोडशोपचारेः देवीं सपूज्य शवमुखे देवीं कारणेन त्रिः सन्तर्पयेत् । तदुक्तं भावचूडामणौ । तत्र देवीं सुसंपूज्य उपचारैः सुविस्तरैः । गि में कहा है । यया-समीप में पूजा द्रव्य और दूर में उत्तरसापक को करे । यह उत्तर साधक समान गुण सम्पन्न है मत्रविद और विमि तेन्द्रिय हो अनन्तर स्वमाप्रातर में आत्मा की अभ्यञ्चना करके फिर "फद" इत्यादि मन से अश्वारोहण क्रमसे उपवेशन, पादतल में सपूर्ण कुश दान, शव के केशकलाप प्रसारण और दृढ़प्रकार से शिखा बधन करके, कृत सकल्प हावे । तन्त्रांतर में कहा है, शवक ऊपर आरोहण और गुरु पूनादि समा चरण एवं प्राणायाम विधान करके सम्पूर्ण दिशा में समस्त कोष्ट्र निक्षेप करै । अनन्तर अपने बाम में शवसमीप में अयपात्रादि स्यापन और शप की जटिका पीट पूजादि विधान पोदशउपनार से देवी की आराधनाक रके, अपके मुख में कारण द्वारा तीनवार तर्पण करे । भाषामणि में। है । यथा-वहाँ देवी की सम्यक् प्रकार से पना करके मुविस्तर उपचार स्थापन त्रयोदश परिच्छेद । स्वनाम कथयस्व मे । इत्युक्तः संस्कृतेनैव निर्भयस्तु पुनर्ज- पेत्॥ पुनश्चेत् मधुरं वक्ति वक्तव्यं मधुरंततः। ततः सत्य कार- यित्वा वरन्तु प्रार्थयेत्ततः ॥ यदि सत्यं न करोति वरं वानप्रय. च्छति। तदा पुनर्जपेद्धीमान् एकाग्रमानस स्तथा ॥नररूपवि नातत्रदेवोऽपिनापसर्पति । यत्नतस्तेनवोद्धव्यो नरो वा देव. योनयः माता मातुःस्वसावापि मातुलानी तथैवच । आगत्य चिहं कुरुते माययाच्छाद्य विग्रहम् ॥ उत्तिष्ट वत्स ! ते कार्य सर्व यातु न संशयः। प्रभातसमयोजातस्त्वपिता कोशते गृहम् ॥ प्रायो विमत्सरा लोका राजानो दण्डधारिणः। क. दाचित् केन वा दृष्टस्तदा किंचिद् भविष्यति ॥ इत्यादि विविधैक्यिनं च जापं परित्यजेत् । मृताः पितृगणास्तत्र दूरदेशनिवासिन ॥ वान्धवास्तत्र गच्छन्ति देवरूपधरास्त- था । स्त्रीपुत्रसेवकादीश्च गृहीत्वा नियतैः परै ॥ रुदन्तः पु. त्रकाः सर्वे भ्रातरोऽनुजशिष्यकाः । निजकांतांगसंस्पर्श व- मैंने हस्ती इत्यादि जो प्रार्थना की है वह दिनतिर में दान करो । इससमय भापका नाम क्या है, कहो । संस्कृत में इसप्रकार कहे । पुनर निर्भय हो- कर जप करै फिर यदि मधुरभाव से बात कहै तो मधुरभावसे उसका उत्तर देना चाहिये । अनंतर सत्य कहलाकर घरकी याचना करें | पदि सत्य न कहै. और वर भी न दे तो पुनर्वार एकाग्र चित्त से जप करै नररूप के अ. तिरिक्त तहां देवता भी अपसर्पण नहीं करते । इसलिये यन सहित सम- झना चाहिये. कि मनुष्य अथवा देवयोनि कोई नहीं । तिस काल मातः मातृवसा अथवा मातुलानी इन सम्पूर्ण के वेश में आगमन करके चिह्न करती हैं और इस प्रकार कहती हैं है वत्सः ! उठो नि:संदेहही तुम्हारा कार्य नष्ट हुआ। यह देख मातःकाल हुआ है. तुम्हारे पिता गृह में प्राकोश प्र. काश करते हैं। सम्पूर्ण मनुष्य भी प्रायः मत्सर विशिष्ट और राजागण भी दप्रयोग करते हैं । कदाचित कोई देखले तो क्या होगा ? इत्यादि धिषिय " श्यामारहस्य भा०टी०। कोणं चक्रमुल्लिखेत् । येनोत्थातुं न शक्नोति शवश्च निश्च- लो भवेत् ॥ शवहस्तद्वयं पार्श्वयोः प्रसार्य तदुपरि कुशान् दत्वा तत्र स्वपादौ निधाय पुनः प्राणायामं कृत्वा शिरसि गुरुं हृदि दे: वींच ध्यात्वा ओप्टाधरसंपुटौ विहितमालया विभीर्जपेत् । तदुक्तं तत्रैव । उपविश्य पुनस्तस्य वाहू निःसार्या पार्श्वयोः। हस्तयोः कुशमास्तीर्य पादौ तत्र निधापयेत् ॥ ओष्ठौ संपुटको कृ. त्वा स्थिरचित्तः स्थिरेन्द्रियः । तदा देवी हृदिध्यात्वा मौ. ली जपमथाचरेत् ॥ अत्रापि श्मशानसाधनक्रमेण जपः कार्यः । यद्यर्द्धरा- त्रिपर्यन्तं किञ्चिन्न लक्ष्यते । तदा पूर्ववत् अयं तिलान् विकिरन् सप्तपादगमनादिकं कृत्वा जपं कुर्यादिति । चलासने भय नास्ति भये जाते वदेत्ततः । यद्यत् प्रा. र्थयसे देवि ! दातव्यं कुञ्जरादिकम् ॥ दिनान्तरे तु दास्यामि सकता और चल भी नहीं सकता । शव के दो हस्त, दो पात्र, प्रसारित और उसके ऊपर समस्त कुशस्थापित, और उस में अपने दोनों पदस्थित करके, पुनर्वार प्रणाम के सहित मस्तक में गुरु का और हृदप में देवी का ध्यान पूर्वक प्रौष्ठाघर संपुटित करके निर्भय जप करना चाहिये । उस में कहा है, यथा-पुनार उपविष्ट होकर, दोनों पार्श्व में दोनों वाहु प्रसारित और दोनों हरतों में कुश भास्तृत करके उस में दोनों पद स्थापित करे । एवं स्थिरचित्त और स्थिर इन्द्रिय होकर, अधर और औष्ठ संपुटित करके, देवी के ध्यान सहित मौली जपमें महत्तहो। इसस्थल में भी श्मशान साधनके क्रम से जपकरना कर्तव्य है । यदिगदरात्रि पर्यंत कुछ भी न देखानाय, तो पूर्व की समान अर्घ्य और तिल विखर एवं सप्तपद गमन करके जप करें। आ. सन चलित होने पर भप न करे । तिस समय इस प्रकार कहे, हे देवि ! .
त्रयोदश परिच्छेद । एवं कृत्वा तु बहुधा न चाकृतविबुद्धयः । अवश्यं तत्र दा- तव्यं न च प्रत्यक्षतां क्वचित् ॥ भैरवा बटुकाश्चैव कुलशा- परायणाः । एतच्छास्त्रप्रसङ्गेन कृत्याकुटिलविग्रहाः ॥ पु- त्रो भूत्वा हरेविद्यां नारी भूत्वा विमोहयेत् । तस्मात्तत्तु भ. वेदोपात् विचारे यत्नमाचरेत् ॥ सत्ये कृते वरं लब्ध्वा स. त्यजेच्च जपादिकम् । फलं जातमिति ज्ञात्वा जुटिकां मो- चयेत्ततः॥ अन्यत्रापि। शवं प्रक्षाल्य संस्थाप्य बन्धनं मोचयेत् पदम् । पदे चक्र मार्जयित्वा पूजयित्वा जले क्षिपेत् ॥ शवं जलेऽथ ग. ते वा निःक्षिप्य स्नानमाचरेत् । ततस्तु स्वगृहं गत्वा वलिं दद्यात् दिनान्तरे ॥ अस्यां रात्रौ येषां देवानां यजमानोऽहं ते गृह्णन्तु इमं वलिम् । इति भावचूड़ामणौ । हो, तो विचार करके ग्रहण करै । स्वयं शिव ने यह बात कही है । क्यों कि देवगणों के कार्य अनेक प्रकार हैं । वह सहज में जानने दुष्कर हैं । भैरव और सम्पूर्ण बटुक कुल शास्त्र परायण हैं । इस लिये परिमाण में दोप उत्पन्न होने से, यत्न पूर्वक विचार करै । सत्य कहने से वर लाभ करके, जपादि त्याग करना चाहिये । और फळ होगया है यह जान ने पर जटिका भी छोड देवे । अन्यत्र भी कहा है । यथा-शव को प्रक्षालन और स्थापन करके वन्धन खोल देवे । और पदस्थित चक्र का मार्जन कर के पूना करता हुआ जल में निक्षेप करके स्नान करै । अनन्तर अपने गृह में गमन करके, दिनान्तर में वलिप्रदान करै । उप्तका मंत्र यह है, स्मिन् रात्री ,, इत्यादि । भावचूडामणि में इस प्रकार कहा है । - श्यामारहस्य मा०टी० । स्त्राद्याभरणादिकम् ॥ गृहीत्वा नीयतेतत्र पानकैस्तद्धयंत्यजेत् वान्धवैस्तत्र दिवसे शङ्का तत्र प्रजायते ॥ यदि न चुभ्यते . तत्र तदा किं वा न लभ्यते । स्त्रीरूपधारिणी देवी द्विजरू- पधरः पुमान् ॥ वरं गृहेति शब्दं वै त्रिरात्रान्ते वरं लभेत् । साधुना साधुना वापि योषिच्चेद् वरदायिनी ॥ तदा वीरपं. तेस्तस्य किं न सिध्यति भूतले । निष्पापपुरुषेणैव कुलीने. नैव संस्कृता ॥ असंस्कृतवरा देवी पापं युङ्क्ते न संशयः । संसुखेऽसंमुखे चापि संस्कृतं षक्ति चापरम् ॥ सैव देवी न सन्देहा स देवो भैरवः स्वयम् । न चेदेवं भवेच्चैव मायाघ- टितविग्रहः ॥ वरं न वरयेत्तत्र न किञ्चित् प्रवदेत्ततः । स चेत् संस्कृतमाख्यानं वक्ति वक्तव्यमीदृशम् ॥ न चेत् स्वयं कौलिकोऽपि वरं ग्राह्यं निराकुलम् । अथवा उत्कटं किञ्चित ज्योतिर्वा नीललोहितम् ॥ शब्दो वा जायते सम्यगमृतं वापि लभ्यते । विचार्य तद्गृहीतव्यमेवं शिवेन भाषितम् ॥ वाक्य प्रयोग करने पर भी जप परित्याग न करै । तिस समय मृत पितृगण और दूर देश वासी मृत वांधवगण देवतारूप धारण करके तहां आगमन करते हैं । इन से भी यदि साधकको क्षोभ न हो और यदि कुछ काम न करसके तो देवी स्त्री रूप धारण और द्विजरूप धर पुरुष वेप ग्रहण करके तीन रात्रि के अंत में तहां आगमन पूर्वक "वर ग्रहण कर, यह कहकर शब्द करती हैं । इस प्रकार भच्छा या बुरा नो हो, देवी के सी वेश से घरदेने में उद्यत होनेपर वीर पति का क्या नहीं साधित होता ? सन्मुख अथवा असन्मुख यदि संस्कृत करके वात कहैं. तो वह स्त्री निसन्देह स्वयं देवी, और यह पुरुष निःसंदेह हो साक्षात् भैरव है । यदि वह न हो तो मायापटित विग्रह समझना चाहिये । फिर किसी प्रकार वरकी प्रार्थना न करै । और किसी प्रकार यातभी न कहै । पुरुप यदि संस्कृन में बात कहै, ने इस प्रकार कहै । अथवा यदि कुछ नी लोविर्ण उत्कट ज्योति श्रीवर्धन, सिसी मकार शब्द सपन और सम्पर प्रकार से अमृत लाभ ३१७ त्रयोदश परिच्छेद। एवं कृत्वा तु बहुधा न चाकृतविबुद्धयः । अवश्यं तत्र दा- तव्यं न च प्रत्यक्षतां कचित् ॥ भैरवा वटुकाश्चैव कुलशा- स्वपरायणाः । एतच्छास्त्रप्रसङ्गेन कृत्याकुटिलविग्रहाः ॥ पु- त्रो भूत्वा हरेविद्यां नारी भूत्वा विमोहयेत् । तस्मात्तत्तु भ. वेदोषात् विचारे यत्नमाचरेत् ॥ सत्ये कृते वरं लब्ध्वा स. त्यजेच्च जपादिकम् । फलं जातमिति ज्ञात्वा जुटिकां मो- चयेत्ततः॥ अन्यत्रापि। शवं प्रक्षाल्य संस्थाप्य बन्धनं मोचयेत् पदम् । पदे चक्र मार्जयित्वा पूजयित्वा जले क्षिपेत् ॥ शवं जलेऽथ ग. ते वा निःक्षिप्य स्नानमाचरेत् । ततस्तु खगृहं गत्वा वलिं दद्यात् दिनान्तरे॥ अस्यां रात्रौ येषां देवानां यजमानोऽहं ते गृह्णन्तु इमं वलिम् । इति भावचूडामणौ । हो, तो विचार करके ग्रहण करै । स्वयं शिव ने यह बात कही है । क्यों कि देवगणों के कार्य अनेक प्रकार हैं । वह सहज में जानने दुष्कर हैं । भैरव और सम्पूर्ण बटुक कुल शास्त्र परायण हैं । इस लिये परिमाण में दोप उत्पन्न होने से, यत्न पूर्वक विचार करै । सत्य कहने से वर लाभ करके, जपादि त्याग करना चाहिये । और फळ होगया है यह जान ने पर जटिका भी छोड देवे । अन्यत्र भी कहा है । यया-शव को प्रक्षालन और स्थापन करके बन्धन खोल देवे । और पदस्थिन पक्रका मार्जन कर के पूजा करता हुआ जल में निक्षेप करके स्नान करै । अनन्तर अपने गृह में गमन करके, दिनान्तर में बलिप्रदान करै । उसका मंत्र यह है, “अ. स्मिन् रात्री ,, इत्यादि । भावचूडामणि में इस प्रकार कहा है । .
३१८ श्यामारहस्य भा०टी० अथ तैस्तु चित्दमशाननरकुञ्जरशूकरात् । दत्त्वा पिष्ट- मयाने कर्तव्यमुपवोधनम् ॥ परेऽहि नित्यमाचर्य पञ्चगव्यं पिवेत्ततः । ब्राह्मणान् भोजयेत्तत्र पञ्चविंशतिसंख्यकान् । पञ्च पञ्च विहीनान् वा क्रमाच्चैव दशावधि । ततः स्नात्वा च भुक्त्वा च निवसेदुत्तमस्थले ॥ यदि न स्यादिप्रभोज्यं तदा निर्धनतां ब्रजेत् । तेन चेन्निर्धनस्तस्य तदा देवः प्रकु. प्यति ॥ त्रिरात्रं वाथ पड्रानं नवरात्रन्तु संयमेत् । स्त्रीश- य्यां यदि गच्छेद्वै तदा व्याधि भवेत् च हि ॥ गीतं श्रुत्वा च बधिरो निश्चक्षुर्नृत्यदर्शनात् । यदि वक्ति दिने वाक्यं त. दास्य मूकता भवेत् ॥ पञ्चदशदिनान्ने त देहे देवस्य सं- स्थितिः । गोब्राह्मणानां निन्दाश्च न कुर्याच कदाचन ॥ देवगोब्राह्मणादीश्च प्रत्यहं संस्पृशेत् शुचिः । प्रातर्नित्यक्रि- यान्ते तु विल्वपत्रोदकं पिवेत् ॥ ततः मायाञ्च गङ्गायां प्राप्ते अनन्तर पिष्टक निर्मित पूर्व याचित नर, कुज्जर और शुकर दान करके उस दिन उपवास करना चाहिये । दूसरे दिन नित्य कर्म के अन्त में पंच गव्य पान करके पच्चीस ब्राह्मणों को भोजन करावे । पन्दरह या दश ब्राह्मणों के भोजन कराने परभी हानि नहीं है ब्राह्मण भोजन के उपरांत स्नान और भोजन करके उत्तम स्थळ में अवस्थिति करै । ब्राह्मणों को भोजन न कराने से साधक निर्धन होता है, और यदि निर्धन हो तो देवता रुष्ट होते हैं । तीन रात्रि वा छप रात्रि अथवा नौ रात्रि गुप्त रहना चा- हिये । स्त्री शय्या में गमन करने से, व्याधि प्रस्त होता है, गीत श्रवण करने से वधिर होता है । नृत्य देखने से नेत्रहीन होता है । दिन में बात कहने से मक होता है । पन्दरह दिन के उपरांत देह में देवता का अधि छान होता है । गो ब्राह्मण की निन्दा कभी न करै । शुद्ध होकर नित्य देव, गौ और ब्राह्मण को स्पर्श करना चाहिये । प्रात काल के समय नित्य क्रिया के उपरांत विल्वपत्रोदक पान को । फिर सोलहवां दिन उपस्थित होने पर गंगा में स्नान काना चाहिये स्वाधा के अन्त में मन -
चतुर्दश परिच्छेद ।
पोड़शवासरे। स्वाहान्तमूलमुच्चार्य तर्पणान्ते नमः पदम् ॥
एवं शतत्रयादू देवान् वैतर्पयेजलैः । स्नानतर्पणशून्यस्य
न स्यादेवस्य तर्पणम् । इत्यनेन विधानेन सिद्धिं प्राप्नोति
मानवः । इह भुक्त्वा वरान् भोगान् अन्ते याति हरेः पदम् ।
असाझं वापि साङ्गं स्यात निष्फलं सफल भवेत् ॥ कृत्वा
साधनमेवैतत् शक्तेः प्रियतरो भवेत् । शवाभावे श्मशाने वा
कायं वै वीरसाधनम् ॥ यो भावो यस्य वै प्रोक्तस्तैीवैर्यदि
नार्चयेत् । दशाहकायोगेन भ्रष्टो भवति, साधकः ॥ कुल-
मन्त्रं गृहीत्वा न यावत् बुद्धिः प्रजायते । नोपदिश्येत्तत्र भावं
न रूप तत्र सन्दिशेत् ॥
इति श्यामारहस्य त्रयोदशः परिच्छेदः।
मंत्र उच्चारण करके, तर्पण के अन्त में 'नमः' शब्द प्रयोग करें । इस
प्रकार जल द्वारा तीनसौ से ऊर्ध्व देवता गणों का तर्पण करना चाहिये ।
स्नान और तर्पण शून्य होने से देव तर्पण में अधिकार नहीं होता । इस
मकार विधानानुसारसेही लोकमै सिद्धि होती है, और इसलोकमें संपूर्ण उत्कृष्ट
भोग भोग करके परलोक के समय हरिपद में लीन होता है। अधिक
क्या, इस के द्वारा अंगहीन मी पूर्णाङ्ग होता है। और निष्फल सफल हो-
ता है, इस के अतिरिक्त यह शव साधन करने से शक्ति का मियतर होगाता
है । शव का अभाव होने से श्मशान में वीर साधन करना चाहिये जिन
का जो भाव कथित है, वह यदि उस भाव से अर्चना न करै । तो दश
क्रमयोग में ही भ्रष्ट होजाता है, इस विषय में भाव उपदेश न करै । रूपभी
निर्देश न करै । कुल से मंत्र ग्रहण करके जिस प्रकार समझे उसी भाव
में प्रवृत्त होये ॥
इतिश्रीमहामहोपाध्याय श्रीपरमहंसपरिचानक श्रीपूर्णानन्दगिरिविरचित
श्यामारहत्य पं० कन्हयालाल मिश्न कृत मापाटीकासहित
त्रयोदश परिच्छेदः समाप्तः ॥ १३ ॥
३२० श्यामारहस्य भा० टी० । अथ चतुर्दशः परिच्छेदः । अथ प्रकारान्तरसाधनम् । तदुक्तं कालीतन्त्रे। शृणु देवि ! वरारोहे ! वीरसाधनमुत्तमम् । नृणां शी. प्रज्ञानात्यै प्रकारान्तरमुच्यते ॥ चतुष्पथे चतुर्दिक्षु पुरुष हृदयं खनेत् । जीवितं ब्रह्मरन्ध्रौ दीपं प्रज्वालयेदथ ॥ म. ध्ये तथा खनेदेकं तत्र शुद्धासनं भवेत् । पूर्वोक्तेन च मार्गेण तत्र संस्कारमारभेत् ॥ महाकालादिदेवेभ्यो वलिं पूर्ववदा- हरेत् । कल्पोक्त पूजां संपूज्य जपेत् प्रयतमानसः ॥ दन्ता- क्षमालया चैव राजदन्तेन मेरुणा । दिग्वासाःप्रजपेन्मन्त्र- मयुतं सर्वदैवतम् ॥ जपान्ते च वलिं दवा दक्षिणा विभ- वावधि । सर्वसिद्धीश्वरो विद्वान् सर्व देव नमस्कृतः ॥ भ. थवा विजनेऽरण्ये अस्थिशय्यासनो नरः। उदयान्तं दिवा अव प्रकारान्तर साधन कहते हैं-काली तन्त्र में कहा है, हे देवि ! श्रवणकरो, सम्पूर्ण साधनों से श्रेष्ठ वीरसाधन कीर्तन करता हूँ। कोकमें शीघ्र फलप्राप्ति के लिये प्रकारान्तर वर्णित होताहै । पुरुष चतुप्पदमें चारों ओर हृद खनन और ब्रह्मरन्ध्र में जीवित प्रदीप प्रज्वलित कर । मध्यभाग में अन्य एक खनन करना चाहिये । उप्तसे ही शुदासन होताहै । पूर्वोक्त मार्गानुसार उसमें संस्कार आरम्भ करना चाहिये । मशकालादि देवगण को पूर्वको समान वलिमदान करै । कन्पोक्त पुना करके एकाग्रचित्त से जप करना चाहिये । नग्न होकर.दन्त और अक्षमाला एवं राजदन्त और मेरु- मालाद्वारा सर्वदैवत मन्त्र भयुतबार जप करै । जपान्त में वलिपदान पूर्वक विभवके अनुसार दक्षिणा दान करनेसे, सर्वसिद्धिका अधीश्वर, विद्वान और सम्पूर्ण देव नमत होनाता है। अथवा निर्जन वनमें अस्थि की शरपा और भस्थि का आसन करके उदयास्त दिनमान जप करने से - चतुर्दश परिच्छेद । जप्त्वा सर्व सिद्धीश्वरो भवेत् ॥ विल्ववृक्षे निजकोड़े शव- मारोप्य यत्नतः। नृसिंहमुद्रया वीक्ष्य जपेन्मातृकया यदि ॥ सहस्र तत्र वै जप्त्वा सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । वंटमूले शवं नीत्वा तत्र देवीं प्रपूज्य च ॥ सुप्त्वा तत्र मनुं जप्त्वा सर्व सिद्धीश्वरो भवेत् । करकाञ्ची समादाय मुण्डमालाविभू- पितः ॥ तेनैव तिलकं कृत्वा तत्तद्भस्मविभूषितः । श्मशाने च सकृजप्त्वा सर्व सिद्धीश्वरो भवेत् ॥ कुंकुमागुरुकस्तूरी रोचना घनचन्दनम् । कर्पूर पद्मरागञ्च केशरं हरिचन्दनम् ॥ एकत्र साधितं कृत्वा प्रत्येकं साधयेत् सुधीः । जिह्वाग्रे रु- धिरं वीर आकाशे च समाहरेत् ॥ तेनैव वटिकां कृत्वा भ- द्रकालीं ततो जपेत् । नीला नीलपताकाञ्च लोलजिह्वां क- रालिकाम् ॥ ललाटे तिलकं कृत्वा साधको वीरभीः स्वयम् । महाष्टमीनवम्यास्तु संयोगे पुरतः स्थितः ॥ छागमहिपमेषा. सर्वसिद्धिका अधीश्वरत्व संग्रह होता है । अथवा विल्ववृत में आनी गो- दीमें शवको यत्नपूर्वक बैठाल करके नृसिंह मुद्रा प्रदर्शन सहित मालका द्वारा जप कर इस प्रकार सहस्र जप करनेपर सर्व प्रकार की सिद्धि मा- धीन होती है । अथवा वटवृक्षके मूलदेश में शवको लाकर देवी की पूजा करके उत्त में शयन करताहुभा मंत्र जप करनेपर भी सर्वसिद्धिका ईश्वर होजाता है । अथवा शवगणोंकी काश्ची ग्रहण करके, मुण्डमाला में विभू- पित होकर उससेही तिलक और उस भस्मसेही अङ्गविलिप्न करै । उस अवस्थाके समय श्मशान में सकृत जप करने से सर्वसिद्धिका अधीश्वर होताहै। कुंकुम, अगर, कस्तूरी, रोली धनचन्दन, कपूर, पराग, केशर हरिचन्दन, एकत्र साधित करके प्रत्येकको साधित करें । इसके द्वारा वटि- का करके, फिर भद्रकाली, नीला, नीळपताका, लोळनिहा, और कराळका का जप करताहाललाट में तिलक करने से, वीरगणों को भी भगोत्या. दन कियानाता है। महाष्टमी और नवमीको सपि में सन्मुख अवस्थिति करके, चारों ओर छाग, महिप और मेप सबके शवको निक्षेप करे । विस ४॥
३२२ श्यामारहस्य भा. टी० । णां चतुर्दिक्षु शवान् क्षिपेत् । कबन्धान मण्डपूजाच दी. पादिभिरलंकृताम् ॥ मध्ये कवन्धमास्तीर्य तत्र गन्धर्वस पधृक् । ताम्बूलपूररक्तास्य मञ्जनालितलोचनम् ॥ कृत्वा तत्र मर्नु जप्त्वा सर्व सिद्धीश्वरो भवेत् । वियत्रययुतं देवि! नेत्रान्तं चन्द्रभूपितम् ॥ वीजं प्रत्येकदेवान मिति तासाच पार्वति ! । मूलमन्त्रण मन्त्रज्ञो जपेत् सार्द्धशतद्वयम् ॥ जिह्वाग्रे रुधिरं गृह्ण चामुण्डे ! घोरनिःस्वने ! । वलिं छित्वा वरं देहि रुधिरं गगनेऽमले ॥ कालि ! कालि ! प्रचण्डोगे! ततोऽस्त्रं कवचं ततः । कालिकेयं समाख्याता वीराणां हि- तकाम्यया ॥ कूर्चयुग्मं महादेवि ! लीलया कथितं तव । चन्द्रखण्डसमायुक्तं ततो नीलपदं ततः । पताके हुँ फड़न्ते च पूर्वकूटमनुमतः ॥ सुगुप्तेयं महाविद्या तव स्नेहादिहो- दिता । जयश्रीकरणी देवी पताका रणस्थले ॥ तेन नील- पताकेयं योज्या वै नीलसाधने । उग्रचण्डा महाविद्या या पुरा कथिता प्रिये ! ॥ लोलजिह्वा तु सा प्रोक्ता संयोज्या समय सम्पूर्ण कवन्ध और दीपादि सम्ह में अलंकृत सम्पूर्ण मुण्डभी इस प्रकार निको करने चाहिये । मध्य काल मातरण पूर्वक ताम्स पूर्ण द्वारा वदनमण्डल रक्तवर्ण और दोनों नेत्र अञ्जनाङ्कित करके, मंत्र जा करने से सर्वसिद्धिका अघीश्वर होजाता है । नेत और चन्द्रभूषित सी- नों आकाश प्रत्येक देवताकेही चीज है मूलमंत्र सहित यह बीन साईशत जप करे । तिप्त समय इस प्रकार कहै, है चामुण्टे ! योनिस्वने । मि पान में रुधिर ग्रहण करो । पलि छेदन करके, । वरदो । वीरगणको रित कामनासे देवी कालिका का विषय कार्चन किया। देवी कालिका रचम्म ल में पताका की समान जय श्री विधान करती है । इस हिप नील सा धन में नाक पताका की योजना करनी चाहिये । हे प्रिय ! मन को पूर्व में परामिषा नगण्या का विषय कीर्तन किया। उसको मोलमिया ।
चतुर्दश परिच्छेद । नीलसाधने । या सा विद्या महातारा सा करालेति कीर्ति ता ॥ भूमिपूरसमायुक्ता सामावस्या शुभोदया। भाद्रपुष्क- रयोगे च तस्यां वीरवरोत्तमः ॥ विष्णुकान्तां समानीय निःक्षिपेत् मन्त्रभूमिषु । तत्र तां साधितां कृत्वा तदिने मृ. तहटके ॥ तत्र प्रसारितं मत्स्यमेकं मूल्येन दापयेत् । तज्ज. लेनाभिषेकञ्च पूर्ववच्च शवोपरि ॥ साधितां विजयां तस्य उदरे मुखवर्मना । क्षिप्त्वा तत्र खनेन्मत्स्यमखनाजित- लोचनः॥ तिलकी पूर्वद्रव्येण उत्थाय च मर्नु जपेत् । स्वयं तत्र भगवान् भैरवो लगुडाङ्कितः ॥ भ्रमातीतस्ततो वीर स्तं विलोक्य जपेन्मनुम् । यदि भाग्यवशादेवि ! लगुडस्तत्र लभ्यते । तदा स्वयं भैरवोऽसौ स्वयं वीरेश्वरो भवेत् । मत्स्य मानीय देवेशि ! निःक्षिपेत् पितृकानने ॥ तत्रासकृज्जपित्वा च देवतामेलन भवेत् । तत्र नत्वा महादेव महादेवीञ्च भा. विनि !॥ तद्भस्मतिलकं कृत्वा स्वयं वीरेश्वरो भवेत् । निशा कहते हैं। भाद्रमास के समय पुष्कर योग में चिरचिटा लाकर मंत्र भूमि में निसेप और उस में उसको साधित करके उसदिन एक मट्टी की हांडी में प्रसारित मत्स्य लाकर प्रदान करै । अनन्तर उस जल से पूर्व की समान शक्के ऊपर अभिषेक करके उसके उदर में मुख मार्गयोग में साधित विजया निक्षेप करता हुभा अञ्जनाङ्कित लोचन से मत्स्य को सनित करै । फिर पूर्व द्रव्य से तिलक करके, उत्थान पूर्वक जप में प्रवृत्त होवे । स्वयं भगवान भैरव गडांकित होकर तहां प्राविभूत होते हैं । उनका दर्शन करके मंत्र जप करें । हे देवि ! यदि वहा भाग्य वश से लगुडलाभ हो, तो साधक स्वयं भैरव होता है । हे देवेशि ! उल्लिखित मत्स्यलाकर, पिन कानन में निक्षेप पूर्वक तहां बारम्बार जप करने से, देवता के सहित मेल होता है। हे भाविनी ! तहां महादेव और महादेवी को नमस्कार करके उनकी भस्म से तिलक करने पर, स्वयं वीरेश्वर होजाता है । हे देवि ! रात्रिकाल के 1 श्यामारहस्य भा. टी. यां मृतहट्टे च उन्मत्तानन्दभैरव ॥ दिग्वासा विमली भस्म भूपणो मुक्तकेशकः। कृपाणखड़हस्तश्च जपेन्मातृकया यदि । तदा तस्य महादेवि! सर्वसिद्धिःप्रजायते। डाकिनी योगिनी वापि अन्यां वा भूतकाङ्गनाम् ॥ तत्र चानीय संपूज्य सर्व सिद्धीश्वरोभवेत्। सर्वेषां जीवहीनानां जन्तूनांनीलसाधने । ब्राह्मणं गोमयं त्यक्त्वा साधयेद्वीरसाधनम् । मृतासनं विना देवि पूजयेत् पार्वती शिवाम् ॥ तावत्कालं वसेघोरे यावदा हृतसप्लवम् । महाशवाःप्रशस्ताः स्युः कालीकावीरसाधने । क्षुद्राःप्रयोगे कर्तृणां प्रशस्ताः सर्वसिद्धिदाः। एवं नीलकम देवि ! कथितञ्च तवानघे ! ॥ न कस्यचित् प्रवक्तव्यं मम प्रीत्या महेश्वरि ॥ श्रीदेव्युवाच। ज्ञातमेतन्मया देव ! त्वत्प्रसादान्महेश्वर !! अशक्तानान्तु में देव ! पुरश्चरणमुच्यताम् ॥ समय श्मशान प्रदेश में नग्नवेश मुक्त केश भस्म भूषित कलेवर शुद्ध पानस कृपाण और खड्गहस्त से यदि मातृका द्वारा जप कियाजाय । तो सम्पूर्ण सिद्धि सम्पन्न होता है । डाकिनी, योगिनी, अथवा भूतांगना को त लाकर, पूजा करने से संबविध सिदि का अधीश्वर होजाता है। नील साधन में ब्राह्मण और गोमय वजन करके, अन्यान्य सम्पूर्ण जन्तुओं की शव लाकर, वीर साधन करे । मृतासन के अतिरिक्त देवी पार्वती की पूजा करने से यावत् प्रलय तक घोर नरक में वास करना होता है । काति का और चोर साधन में संपूर्ण महा शव प्रशस्त हैं। और समस्त नद्रन प्रयोग साय में मशस्त और सर्व सिद्धि की हेतु होती हैं। देवि ! में ने या तुम्हारे निकट नील क्रम कीर्तन किया । हे महेश्वरि । हमारी प्रसनता के लिये इसे अन्य किसी से न कहे ॥ श्रीदेवी ने कहा है देव महेश्वर ! मैं भापके प्रसाद द्वारा इससे मरगत ई अर अशरूपक्षका पुरश्चरण कार्सन कीनिये ।।
। चतुर्दश परिच्छेद । भैरव उवाच । श्मशानेषु पुरश्चर्या कथितादेवि ! दुर्लभा ॥ अथवाऽन्य प्रकारेण पुरश्चरणमुच्यते । कुजे वा शनिवारे वा नरमुण्डं स. मायुतम् ॥ पंचगव्येन मिलितं चन्दनाविशेषतः। निक्षि. प्य भूमौ हस्तार्द्धमानतः कानने वने ॥ तत्र तदिवसे रात्री सहस्रं यदि मानवः । एकाकी प्रजपेन्मन्त्रं स भवेत् कल्पपा- दपः ॥ अथवान्यप्रकारेण पुरश्चरणमिष्यते । शवमानीय तद् द्वारि तेनैव परिखन्यते ॥ तदिनात् तदिनं यावत् जपेदष्टोत्तरं शतम् । स भवेत् सर्वसिद्धीशो नात्र कार्या विचारणा । अ. थवान्यप्रकारेण पुरश्चरण मिष्यते अष्टम्यांच चतुर्दश्यां पक्ष योरुभयोरपि ॥ सूर्योदयात् समारभ्य यावत् सूर्योदयान्त रम् । तावज्जप्त्वा निरातङ्कः सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥ अथवा न्यप्रकारेण पुरश्चरणमिष्यते । चन्द्रसूर्यग्रहे चैव ग्रासावधि विमुक्तितः। यावत्संख्यं मन जप्त्वा तावद्धोमादिकं चरेत् । भैरव ने कहा है, हे देवि ! श्मशानही इलम पुरश्चर्यानिर्दिष्ट हुई है। अथवा अन्य प्रकार भी पुरचरण होता है। कहता हू. श्रवण करो! माळवार मा शनिवार में पंचगव्य विशेप करके चन्दनादि द्वारा मिलित और संयुक्त नरमुण्ड भूमि अथवा वन में आधे हायकी परिमाण निक्षेप करके यदि उस दिन रात में अकेला सहस्र जप करै । तो वह व्यक्ति कल्पवृत होता है। अथवा अन्यकार भी पुरश्चरण कियामाता है । शब लाकर उसी द्वार में खननकर उस दिन अष्टोत्तर शत जप करने से सर्व विष सिदि का अपी वर होजाता है । इसमें द्विधा करने की आवश्यकता नहीं । अथवा अन्य प्रकार मी पुरश्चरण कियाजाता है । दोनों पक्षकी अष्टमी और चतुर्दशी में मूर्योदय से अस्त पर्यंत निरातङ्क होका जप करने से सर्व सिद्धिका अघि नायक होमाता है । अथवा अन्य प्रकार भी पुरश्चरण कियाजाता है। चंद्र और सूर्प के ग्रहण समय पास से मोक्ष पर्यंत यावद संख्यक मत जप करके ३२६ श्यामारहस्य भा०टी० सूर्यग्रहणकालाद्धि नान्यः कालः प्रंशस्यते ॥अत्र यद्यत् कृतं सर्वमनन्तफलदं भवेत् । तावदिति जपदशांशहोमादि- कमित्यर्थः । ग्रहणे चन्द्रसूर्यस्य शुचिः पूर्वमुपोषितः। नणं समुद्रगामिन्यां नाभिमात्रोदके स्थितः॥ यदा शुद्धोदके स्ता त्वा शुचौ देश समाहितः । स्पर्शाद्विमुक्तिपर्यंतं जपं कुर्याद नन्यधीः ॥ अनन्तरं दशांशेन क्रमाद्धोमादिकं चरेत् । तदन्ते महती पूजां कुर्याद् ब्राह्मण भोजनम् ॥ ततो मन्त्रस्य सिद्धय र्थ गुरुं संपूज्य तोपयेत् ॥ अथ कालीतन्त्रे। शरत्काले चतुर्थ्यादि नवम्यत विशेषतः। भक्तितः पूज- यित्वा च रात्रौ तावत् सहस्रकम् । ॥ जपेदेकाकी विजने के वलं तिमिरालये। अष्टम्यादि नवम्यंतमुपवासपरो भवेत् ।। अन्यत्र गुरुमार्गस्य लईनं नैव कारयेत् । अथवान्यप्रकारेण जपका दशांश परिमाण होम करै । सूर्यग्रहण की अपेक्षा अन्य काल श्रेष्ठ नहीं है । इस समय जिस जिस कार्य का अनुष्ठान कियाजाता है वह सम्पूर्ण ही अनन्त फल प्रसव करना है चंद्र सूर्य के ग्रहण से पूर्व दिन उपवास करके अचि पूर्वक समुद्रगामिनी नदी में नाभि पर्यत अवस्थिति करके समा- हित चिच से शुद्धोदक में स्नान पूर्वक शुद्ध प्रदेश से स्पर्श मुक्ति पर्यन्त अनन्य मन से जप करै । अनन्त दशाश परिमाण प्रम से होमादि करके पीछे देवी की भली भांति पूजा पूर्वक ब्राह्मणों को भोजन करावे । अनन्तर मंत्र सिद्धिके लिये गुरुकी अभ्यर्चना करक उनका परितोप करे ।। कालीतंत्र में कहा है शरतकाल के समय चतुर्थी से नवमी पर्यन्त भक्ति सहित भळी भांति पूना करके रात्रि में केवल अकेला अन्धेरे में बैठकर ह नार जप करे । अष्टमी से नवमी पर्यंत उपचास परायण होरे । गुरु मार्गो उलयन न करे । अथवा अन्य प्रकारभी पुरश्चरण विधामाता चतुर्दश परिच्छेद। पुरश्चरणमिष्यते ॥ अष्टमीसन्धिवेलायां अष्टोत्तरलतागृहम् । प्रविश्य मन्त्री विधिवत् ताःसमभ्यर्च्य यत्नतः ॥ पूर्वोक्तफ- लमासाद्य पूजादिकं समाचरेत् । केवलं कामदेवोऽसौ जपेद- प्टोत्तरं शतम्॥ तासान्तु पत्रमूलेन उग्रां संपूज्य कर्णिके । मन्त्रसिद्धिर्भवेत् सद्यो लतादर्शनपूजनात् ।। अथवान्यप्रका- रेण पुरश्चरणमिष्यते । आकृष्णयोः कुलागारे भावयेन्मन्त्र मेव च ॥ प्रपूज्य तत्र संस्कारं कृत्वा तस्यै निवेद्य च । कि- चित् जपं मनु नीत्वा देवताभावतत्पर ॥ तां विसृज्य नम स्कृत्य स्वयं जप्त्वा सुसंयतः।प्रातः स्त्रीभ्यो वलिंदत्वा मन्त्र सिद्धिर्न संशयः ॥ अथवान्यप्रकारेण पुरश्चरणमिष्यते । गुरुमानीय संस्थाप्य देववत् पूजनं विभोः ॥ वस्त्रालङ्कार- हेमाद्यैः सन्तोष्य गुरुमेव च । तत्सुतं तत्सृताश्चैव तत्प- नीचं विशेषतः ॥ पूजयित्वा मनुं जप्त्वा सर्व सिद्धीश्वरो अष्टमीको सन्धि बेला में अष्टोत्तर लता ग्रह में प्रवेश और यथा विधान से यस्न सहित उन सबकी पूजा करके पूर्वोक्त फल लाभ होनेपर पूनादि में प्रवृत्त होवे । अष्टोत्तर शत जप करने से कामदेव होता है । उनके पत्र मुळ द्वरा उग्राकी अर्चना करने से लतादर्शन और उसका पुजन प्रयुक्त शीघ्र मंत्र सिद्धि संघटित होती है । अथवा अन्य प्रकार भी पुरश्चरण होता है। कृष्णवर्णा रमणीकी कुलागार में मंत्र भावना और उसमें पूजा एवं संस्कार करके उस रमणी को निवेदन पूर्वक कुछ एक परिमाण मत्र जप करै । फिर देवता की समान तत्पर होकर उस रमणी को नमस्कार के अनतर विदा देकर स्वप भली भाति सयम सहित जप के अंत में प्रातः काल के समय सम्पूर्ण स्त्रोको वळिमदान करने से निःसदेह मन्त्र सिद्धि होती है । अपना अन्य प्रकार भी पुरश्चरण कियाजाता है । गुरुको बुलाय स्थापन पूर्वक देवता की समान पूजन और वन अळंकार एव होमादि द्वारा उनका सं- तोप सम्मादन और उनके पुत्र कन्या विशेष करके पत्नी की अर्चना करके मंत्र जप करनेसे सम्पूर्ण सिद्धि आधीन होती हैं। अथवा अन्य प्रकारभी पुर- .
३२८ श्यामारहस्य मा. दी। भवेत् । अथवान्यप्रकारेण पुरश्चरणमिष्यते ॥ सहस्त्रारे गु. रोः पादपद्मं ध्यावा प्रपूज्य च । केवलं देवभावेन जप्त्वा सिद्धीश्वरो भवेत् ॥ गुरवे दक्षिणां दद्याद् यथाविभवमा- स्मनः । गुरोरनुज्ञामात्रेण दृष्टमन्त्रोऽपि सिध्यति ॥ गुरुं वि. लक्ष्य शास्त्रेऽस्मिन् नाधिकारः सुरैरपि । एषाञ्च मन्त्रत न्त्राणां प्रयोगः क्रियते यदि ॥ गुरुवक्तं विना देवि ! सि. द्धिहानिः प्रजायते । एतत्तन्त्रंच मन्त्रंच शिष्येभ्योऽपि न दर्शयेत् । भन्यथा प्रेतराजस्य भवनं याति निश्चितम् ॥ भथ कालिकादर्शनार्थ साधनान्तरेमालिख्यते । प्रदोषे शून्यगृहं गत्वा उत्तराभिमुख उपविश्य भूतशुद्धयादिकं न्या- सान्तं विधाय सिन्दूरेण नवकोणवृत्ताष्टदलवृत्तचतुरस्त्रचतु रात्मक यन्तं विलिख्य संमुखे कुमार्याः शक्तिवीजं लि- खित्वा पुरतः संस्थाप्य तत्र पीठपूजां विधाय द्वादश प्रा. णायामं कृत्वा देवीं ध्यायेद् यथा । चरण कियाजाता है । सहस्रबार गुरुके घरण कमलों का ध्यान और पूना करके केवल देवभाव में जप करने से सिद्धीवर होजाता है । गुरु को विभव के अनुसार दतिया देवे । गुरुकी आज्ञामाल से दृष्ट मत्र भी सिद्ध होता है । गुरुको लंघन करके सरगणों को भी इस शानमें अधिकार उपम नहीं होता। हे देवि ! गुरु से विमुख होकर इन सम्पूर्ण मंत्र तंत्रों का प्रयोग करने से सिदिकी हानि होती है। यह तंत्र और मंत्र शिष्यगनों वो भी न दिखावे. दिखाने से निःसदेह प्रेतराम के भवन में गमन करना होता है। अब कालिका का दर्शनार्थ साधनान्तर लिखते हैं। सायकाल के समय शून्य गृह में गमन भौर उराभि मुख बैठकर भूत भुदि इत्यादि से न्यास पर्यंत निधान भौर सिंदर द्वारा नरकोण वृत्त अष्टदल च चतुरस्र और चारात्मक यंत्र भाङ्कित करै । फिर सन्मुख कुमारी का शक्तिीम रित कर पुरोपाग में स्थापन और उसमें पीठपूमा विधान एव द्वादश माणायाम समाधान करके देवी का ध्यान करना चाहिये । यथा-नर कपाल में .
पतुरा पार । नृकपालसमारूढां नरमालाविराजिताम् । कृष्णाभ्रस- निभा रक्तवासोपरि विभूषिताम् ॥ चतुर्बाहुधरां देवीं दि. व्यालङ्कारशोभिताम् । निशामुखं समारुह्य यावद् यामद्वयं भवेत् ॥ तावत्कालं जपेन्मन्त्रं कालिकादर्शनोत्सुकः।चन्दना वीतनृशिरःशवोपरि विराजितः ॥ घृतप्रदीपमालाभिस्तथैव परिवेष्टितः । मुण्डोपरि भवेन्मुण्डो भयमोहविवर्जितः ॥ ऊ- वास्यः प्रजपेन्मन्त्रं दीपालोकनतत्परः। मुण्डोपरि भवे- न्मुण्डस्तीपंच निधापयेत् ॥ पूजयेन्मूलमन्त्रेण कुर्याद्देव्या विलक्षणः। सिंदूरमण्डलं कृत्वा नवकोणसमन्वितम् ॥ श. क्तिवीजन्तु तन्मध्ये लिखित्वान्येः समावृतम् । वहिरप्टदलं पद्मं तेनैव कारयेवुधः। तत्राताह्य जगद्धात्री कालिकां कृष्ण विग्रहाम् । पूजयेद्विधिवद्देव्ये नवरात्रं समाहितः ॥ ततस्तुष्टा जगद्धात्री कालिका परमेश्वरी । सर्वसम्पत्तिदा देवी साधक स्यानुकम्पया ॥ नेदं प्रकाशयेद् मन्त्रं प्राणैःकण्ठगतै- अधिरूढ नरमाला से विभूपित कृष्णाभ्रसन्निभा, रक्तवस्त्र के ऊपर विराजित चारभुजा धारण किये । दिव्यालङ्कार शोभित देवीकी निशा मुखसे दो याम हय पूजा और ध्यान करके उनका दर्शनोत्सुक होकर मंत्र जप में प्रवृत्त होवे । तिस काळ चारों ओर घृतका दीप रखकर शवके ऊपर बैठ मोह भय रहित होवे । और मुण्ड के जार मुण्ड होवे । कास्य और दीप दर्शन तत्पर होकर मंत्र जप और मण्डके ऊपर दीप सन्निविष्ट करै । और मूळ मंत्र से पूना करके देवी के देखने में प्रवृत्त होवे । फिर नव कोण समन्वित सिन्दुर मण्डल विधान करके उस में शक्ति वीज विन्यस्त और अन्य चीज समूह में उस शक्ति वीजको परिवृत करे । अनतर सिंदूर द्वाराही वाहिर अष्ट दल पद्म लिखकर उसमें जगद्धात्री कृष्ण विग्रहा कालिका का आवाहन करके समाहित होकर नौराति यथा विधान से उनकी पूजा करनी चाहिये । वो नगदात्री परमेश्वरी कालिका तुष्ट होकर दया प्रकाश के पीछ साधक , श्यापारहस्य भा० टी०। रपि । शिष्याय भक्तिहीनाय भैरवेन हि भाषितम् ॥ इति श्यामारहस्ये चतुर्दश परिच्छेदः । अथ पञ्चदशःपरिच्छेदः। अथ काम्यहोमार्थ कुण्डनियमो यथा तदुक्तं यामले। शान्यै चोक्तं तथारोग्ये कुण्डञ्च चतुरस्रकम् । आकर्षणे त्रिकोणं स्यात् उच्चाटे वर्तुलं तथा ॥ मारणेच तथा योज्यं वर्तुलं मंत्रभिः सदा ॥ देव्युवाच। देवदेव ! महादेव ! भक्तानां प्रीतिवर्द्धन ! । कालिका या महाविद्या निर्दिष्टा न प्रकाशिता। को सर्वविध सम्पद भदान करती हैं। प्राण कण्ठगत होने परभी इस को प्रकाश न करे । इति श्रीमहामहोपाध्यायधीपरमहंसपरिव्राजक श्रीपूर्णानन्दगिरिविरचित श्यामारहश्य १० कन्हैयालाल मिश्र मुरादाबाद निवासी कृत भापाटीकासहित चतुर्दश परिच्छदः समासः ॥ १४ ॥ अब काम्य होमार्य कुण्ड नियम लिखते हैं । यथा-पापल में कहा है, शांति और आरोग्य कर्म में चतुरसविधान करे। आकर्षण में त्रिकोण कुंद करना चाहिये । उच्चाटन में गोलाकार करै । मारण में भी गोल फुड की योजना करनी कर्तव्य है॥ श्री देवी ने कहा हे देव देव ! हे महादेव ! आप भक्तगणों की प्रीति पर्दन करते हो। आप ने पूर्व में जो महाविद्या कालिका का विषय निश कियाथा वह प्रकाश नहीं किया, उसको कहो, मैं सुनने के लिये उन्मुक हुई है।
पञ्चदश पारच्छद ।। श्रीमहादेव उवाच । लक्ष लक्षसहस्राणि वारितासि मया पुनः । स्त्रीस्वभा- वान्महादेवी ! पुनस्त्वं परिपृच्छसि ॥ अत्यन्तदुर्भम् देवी ! कवचं सर्वकामदम् । तथापि कथयाम्यद्य तब प्रीत्या वरा- नने ! ॥ उक्तं पुरा महादेवी ! श्रूयतां तत् कृपामयि ! । कवचाज्ञानतो देवी ! विद्यासिद्धिन जायते ॥ श्रीदेव्युवाच । कथ्यतां कवचं देव ! यदि स्नेहोमयि प्रभो । अन्यथा जगतां नाथ ! प्राणांस्त्यजामि निश्चितम् ॥ श्रीमहादेव उवाच । कवचं कथयिष्यामि सुगोप्यमतिदुर्लभम् । गोपनीयं प्र. यत्नेन स्वयोनिवद्वरानने ! ॥ पूर्वस्यां पातु काली च कपाली दक्षिणेऽवतु । कुल्ला रक्षतु पाश्चात्ये कुरुकुल्ला तथोत्तरे ॥ विरोधिनी तथैशान्यां विप्रचित्ताग्निकोणके । नेते पातु चोया च वायावुग्रप्रभावतु ॥ दीप्ता तु रक्षतां शीर्ष नीला. श्री महादेव ने कहा, मैं तुमको लक्ष लत सहस्रबार निवारण करता हूं तथापि तुम स्त्री स्वभाव वशतः पुनार जिज्ञासा करती हो । देवी कालिका का यह कवच अत्यन्त दुर्लभ और सर्वविध कामना पूर्ण करता है । तथापि तुम्हारे प्रति प्रीति वशतः अन वह कहता हूं । यह कवच न जानने से विद्या सिद्धि नहीं होती ॥ श्री देवी ने कहा । हे विभो ! यदि मेरे प्रति स्नेह हो, तो कवच कीर्तन कीजिये । अन्यथा हे जगत् के नाय ! निश्चयही प्राण त्याग करूंगी। श्रीमहादेवने कहा अति दुर्लम कवच कीर्तन करता हूं. अतियनके सहित अपनी योनिकी समान इसको गुप्त रखना चाहिये । काली पूर्वदिक में रक्षा करें । कपाली दक्षिणदिक में रक्षा करै । कुल्ला पश्चिम में और कुरुकुल्ला विरोधिनी ऐशान में, विचित्ता अग्निकोणमें, उमा नैॠत में, उस ममा वायुकोण में, दीप्ता मस्तक में, नीला मुखमण्डल में, घना कण्ठ में बळाका । उत्तर - रयामारहस्य भा०टी० । - व्यान्मुखमण्डले । घना रक्षतु कण्ठे च वलाका हृदयेऽवतु ॥ नाभौ मात्राजयोश्च मिता मुद्रावतु ध्वजे । ब्रह्माण्याचा महादेव्याः सर्वत्र पान्तु सर्वदा ॥ श्लोकत्रयं महापुण्यं प. ज्ज्ञात्वा मत्समो भवेत् । तत्र स्नेहान्महादेवि कथयामि सुदुर्लभम् ॥ श्रीपरमशिव उवाच । सर्पिःसागरविस्फुरन्मणिमयद्वीपे कदम्बान्विते गेहे रत्न. मये शवस्य हृदये रत्नामृतेशानने । वर्गाद्याननमिलोचन मयीं श्रीदक्षिणां कालिकां सद्यश्छिन्नशिरःकरां भगवती ध्यायन्ति, पुण्याशयाः ॥ मद्याघूर्णितलोचनत्रयमहाशोभा- मयी योषितां लक्षैः सेवितपादपद्मयुगलां श्रीभैरवीद्योति- ताम् । श्रीमत्कालमुखे मुखं निदधतीं चान्द्रीं कलां विभ्रती तां ध्यायन्ति सुसिद्धये भगवतीं तद्भावनानन्दिता ॥ मां- हृदय में मात्रा नाभि में मिता दोनों जंघाओं में, मुद्रा ध्वज में, और बा- ह्मणी इत्यादि महादेवीगण सर्वत्र मेरी रक्षा और पालन करें। हे देवी! जो तीन श्लोक परम पवित्र और जिन के जाननेसे, मेरी समान होता है । अब तुम्हारे स्नेह के अनुरोध से बहदुर्लभ तीन इकोक कीर्तन करता हूं । जिनका आशय पवित्र है । वही सपिःसागर में शोभमान मः हिमप द्वीप में दमम्मान्वित रत्न गृह में शबके हृदय में सडिन्न कर परं परा में सुशोभित की रुपणी, श्री दक्षिणा कालिका का जो ध्यान करता है ॥ ॥ जो तदीय भावना रूप परमानन्द सन्दोह भोग करता है। वही सिद्धि के लिये भगवती कालिका का वक्ष्यमाण ध्यान करता है। पान वशनः तीनो नेप्र पूीयमान होगाने से उनकी अत्यन्त शोभा उत्सन ही है । लक्ष लक्ष नि उनके दोनों चरणारविन्दों की सेवा करती। उन्होंने सर्प शोभादय और सर्व सौभाग्य सम्मन काल के मास में मुख स्थापन करके चान्द्रो कला धारण की है ॥ २॥ गो मांस और अमरूप दुग्ध . पादश परिच्छेद। सास्टग्दुग्धखण्डच्छरितमधुमहापानमत्ता हसन्तीम् अट्टा कालकालं कहकहडमिति प्रोल्लसन्तीम् सखीपु । नृत्यप्रो. दामहासोन्मदमुदितमहाभैरवानन्दवीची मातङ्गं खण्डय- न्तीमभयवरकरां कालिकां तां भजामः ॥ इदन्तु दिव्यं क- वचं मनोज्ञ देयं कदाचिद् गुरुवेऽपि नैव । महद्धयात् स्नेह- रसेन दत्ता हानिः शरीरेण च साधकेषु ॥ यस्मादिदन्तु कवचं लभ्यते बहुपुण्यतः । तेन दत्तन्तु सकलं सद्गुरुं परमं प्रिये ! ॥ यस्मै तस्मै न दातव्यं प्राकृ. तेभ्यो विशेषतः । प्रकाशे सिद्धिहानिः स्यात् तस्माद् यत्तेन गोपयेत् ॥ गुरुपादप्रसादेन यदि काली प्रलभ्यते । जप्त्वा काली महाविद्यामिदन्तु कवचं पठेत् ।। अज्ञात्वा कवचं देवि! कालिका चेत् प्रजप्यते। स नाप्नोति फलं तस्मात् परत्र नरकं ब्रजेत् ॥ सर्वत्र सुलभा विद्या कवचन्तु सुदुर्लभम् ॥ शरीर खण्ड में विच्चरित मधु अतिमात्र पान करके मत्तभावापन्न हुई हैं । जो नृत्यशतः अतिशय उद्दाम भावापन्न और महा हास्योन्माद स परम अपो. दित महा भैरव के आनन्द लहरी स्वरूप और जो इस्ती को पकडकर खंड खण्ड करती है । उसी वराभयकरा कालिका की भजना करता है ॥ ३ ॥ यह विद्या मनोज्ञ कवच गुरु को भी न देवे । महाभय वा स्नेह रस प्रयुक्त दान करने से शरीर के सहित साधक की हानि होती है । क्योंकि पुञ्जी कृत पुण्य प्रभाव सेही यह कवच लाभ होता है । इसी कारण जिस को तिसको, विशेषतः प्राकृत व्यक्तिगणों को न देवे । और प्रकाश करने से भी सिद्धि की हानि होती है । इस लिये यत्न महित गुप्त रखे । गुरु के पाद प्रसाद से यदि देवी कालिका को लाभ कियानाये । तो काली महा विद्या का जप करके यह कवच पाठ करै । हे देवि ! यह काच न जानकर काली का मंत्र जप करने से. उसका फल लाभ नहीं होता । और अन्त काल के समय नरक संघटित होता है । काली का मंत्र सर्वत्र सुलम, किन्तु कवच अत्यन्त दुर्लभ है । इस लिये शरीर, धन और स्त्री द्वारा गुरुको .
३३४ श्यामारहस्य भा०टी० । धनदारेण गुरुं सन्तोष्य तत् पठेत् ॥ सफला रजनी पूजा दि. वापूजा च निष्फला। तस्मात् सर्वप्रयत्नेन रजन्यां कवचं स्मरेत् । विवादे च रणे द्यूते विद्यायां कवितागमे । राजगहे विचारे च सर्वत्रेद पठेन्नरः ॥ मोहनस्तम्भनाकर्षमारणोच्चाट नं तथा । कवचस्मरणावि ! जायंते सर्वसिद्धयः ॥ अथवा किमिहोक्तेन सत्यं सत्यं मम प्रिये । प्रत्यक्षा दक्षिणा का- ली वरं यच्छति सुंदरि ! ॥ गुरौ च कवचे तंत्र यंत्रे देवीं सदा भजेत् । गुरुस्त्राता महादेवः कवयः प्रयच्छति ।। इदंतु कब- चं प्राप्य हेलनं कुरुते तु यः। भचिरान्मृत्युमाप्नोति मम तु. ल्योऽपि साधकः ॥ स माता जनकश्चैव स गुरुःसच पूजितः। स सर्वदःस आचार्यः कवचं यःप्रयच्छति ।। इति श्रीरुद्रयामले महातंत्रे श्रीदक्षिणकालिकायाः परमशिवोक्तं सर्वसिद्धिदं कवचं समाप्तम् ॥ सन्तुष्ट करके, यह पाठ करना चाहिये । रात्रि में पूजा करने से वह सफल होती है । दिन में पूजा निष्फल होती है, इस लिये सर्व यत्न से रात्रि में कवच स्मरण करै । विवाद, गुद, यूतक्रीडा, विद्या, कवितागम, राजगृह विचार सर्वत्र यह कवच पाठ करे । हे देवि ! इस कवच के स्मरण मात्र से ही मोहन, स्तम्भन, आकर्पण, पारण और उच्चाटन इत्यादि सर्वविध सिदि लाभ होजाती है । अथवा इस विषयमें और क्या कहूं ? सत्य सत्य ही कहता हूँ, देवी दक्षिणा कालिका प्रत्यक्ष होकर वरदान करती। गुरु में कवच में तंत में और यंत्र में सर्वदा देवी की मजना करै । गुरुही त्रा. नकर्ता है। क्योंकि यह कवच दान करते हैं। जो व्यक्ति इस कवन को मात करके उन के प्रति अथदा करता है। वह मेरी समान होने परमी भपिरामृत्यु के मुख में पसित होता है । जो व्यकि यह करप प्रदान करें। यही माता, वही पिता, पहरी गुरु, नही पमित, परी मामार्य, और वरी मपूर्ण दान करता है। ति दक्षिण फालिका का पाम शिवोक्त सिदि . दापका काम समान ॥
पञ्चदश परिच्छेद । नमामि कृष्णरूपिणी कृष्णाङ्गयाष्टिधारिणीम् । समग्रत- खसागर मपारपार गहराम् ॥ शिवाप्रभां समुज्ज्वलां स्फु. रच्छशाङ्कशेखराम् । ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रदीप्तिभास्क- राम्॥ महेन्द्रकश्यपार्चितां सनत्कुमारसंस्तुतीम् । सुरासुरेन्द्र वन्दितां यथार्थनिर्मला ताम् ॥ अतर्यरोचिरूर्जितां विकार है " देवी कालिका को नमस्कार करता है । वह साक्षात् कृष्ण रूपिणी अर्यात् संहार स्वरूप हैं । उनको अगाष्टि कृष्ण अर्थात् तमोगुण से व्यवच्छिन्न है । वह सम्पूर्ण तत्त्व की सागरस्वरूप हैं। वह अपार अर्थात् उनकी सीमा वा अवधारण नहीं है, और सहन में भी उनको प्राप्त नहीं किया जाता। वह पारा अर्थात् भक्तगण उनको सहजमें ही लाभ करते हैं । वह गह्वरा अर्थात् अतीव दुर्विज्ञय स्वरूप हैं । वह शिवा अर्थात् कल्याणस्वरूप हैं । वह प्रमा अर्थात् सूर्य चन्द्रादि ज्योतिरूप से सम्पूर्णको प्रकाश करती हैं। वह सपुज्ज्वला अर्थात् विज्ञान ज्योतिस्वरूप हैं । वह स्फुरत् अर्थात् सत्स्वरूप प्रकृति हैं । वह शशाङ्का अर्थात् अमृतके आधार हैं । वह शेखरा अर्याद सबसे श्रेष्ठ हैं । वही सबकी ललाट अर्थात् अदृष्ट स्वरूप हैं । वही रत्न अर्थात् सबसे उत्कृष्ट है । वह भास्करा अर्याद सम्पूर्ण प्रपाकी खानस्वरूप हैं । वह जगत् अर्थात् जन्ममृत्यु हैं । प्रभास्वरूप स बारम्बार आविर्भाव और तिरोभाव साधन करती हैं । वह पदीप्ति अर्थात् सम्पूर्ण चैतन्यज्योति स्वरूप हैं । वह भास्करा अर्थात् वही चैतन्य ज्योतिको नित्य प्रकाश करती हैं । वही महेश्वर अर्थात् सम्पूर्ण महत् पदार्थ से श्रेष्ठ है और वही कश्यप अर्थात् सम्पूर्ण के आश्रय हैं । वह आदि देव भी उनकी अर्चना करते हैं। जो सनत् अर्यात सर्वदाही विराजमान हैं। किसी समय जिनका अभाव वा तय नहीं और जो कुमार अर्याद सम्पूर्ण अमङ्गल विनाश करते हैं। वह भी उनका स्तव करतेहै । मुर और असुरगणके मी ईश्वर सम्पूर्ण उनकी बन्दना करतेहैं। वह यथार्थ चरम सत्यस्वरूप हैं। वह निर्मला अर्थात् शुदसत्वस्वरूप हैं। वह अद्भूता अर्थात् परमअश्चर्यस्वरूप हैं। तर्क द्वारा उनको प्राप्सनहीं कियाजाता। वह साक्षात् ज्योति स्वरूपहैं । वह अजिता अर्याद अपने स्वरूपसे सम्पूर्णको मृतास्थिनिर्मितस्त्रजां मृगेन्द्रवाहनायजाम् । सुशुद्धतत्वतो पणां त्रिवेदपारभूपणाम् ॥ भुजङ्गहारहारिणी कपालखस कुठारपाशचापिनी कृतांन्तकामभेदिनीम् । शुभांकपालमा- लिनी सुवर्णकल्प शाखिनीम् ॥ श्मशानभूमिवासिनीं द्वि- बून ममतापाश में बद्ध करके रखती हैं वह मृगेन्द्रबाहना अर्थात् उन्होंने स्वयं श्यामारहस्य भा० टी० दोषवर्जिताम् । मुमुक्षुभिर्विचिन्तित धारिणीम् । सुधार्मिकोपकारिणी सुरेन्द्रवैरिघातिनीम् । अधः कृत करती हैं । मुमुचुगण उनकी चिन्ता करते हैं। विशेष तत्त्व अर्थात् जगभ्रम निराकृत होने से, जो विज्ञान योग उत्पन्न होता, है, उनके प्रभार से ही उन को जाना जाता है । विशेष अर्थात् सांख्य, तत्त्व अर्थात् ज्ञान योग द्वाराही उनका स्वरूपं अव्यक्त हुआ है। वह मृतास्थि अर्थात् प्रना काल के समय अपनपे में सम्पूर्ण हरण करती हैं वह निर्मित सजा अर्थात सम्पूर्णको माया के बलसे निर्माण करके उस माया जनित अज्ञानसे म हिंसा धर्मको अपने आधीन किया है। वह अपना अर्थात् सबके आगे . त्पन्न हुई हैं। वह सुशुद्धा अर्थात् निरवच्छिन्न स्वत्वस्वरूप हैं । वह तत्व तोपणा अर्थात् एकमात्र सत्य द्वाराही संतोष लाभ करती हैं । वह तीनो वेद के पार अर्थात् अतीत हैं। वह भूपणा अर्थात् सबकोही आविर्भावमात्र से मुशोभित करती हैं। वह सदा अर्थात् सत्स्वरूपसे सम्पूर्ण पाप्त करती हैं । वह औचित्यैकलक्षणा अर्थात् जो कुछ न्याय सङ्गत है. वह वही है । वर मनोनरी अर्थात् उन्होंने संसारबन्धन का हेतु भूत रजोगुणका वंस किया है । वह लक्षणा अर्थात् संसार की सर्वत्र सर्वदा समस्त वस्तमें उनको देखा जाता है । यह भुनङ्ग अर्थात् भोगासक्त पुरुषों की हार अर्थात संसार की माप्ति हरण करती हैं। वह कपाळ खएट धारिणी अर्यात सम्पूर्ण ही अदृष्ट को परिचालन करती है । वह धार्मिकगणों का उपकार और सुरेन्द्रगणों के वैरी विनाश करती है । वह कुठार पायचापिनी अर्याद ऐदन पन्धन निराकरण करती है । यह कनान्त की कामना भेद अर्थात् माय निवारण करती हैं । यह सम्पूर्ण सौभाग्य रूपिणी हैं। वह कपाल मालिनी अपात् समागण भूपिन है । वह सुवर्णा । पम्प शालिनी अपात् समस्त पंचदश परिच्छेद । जेंद्रमौलिभाविनीम् । तमोऽन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम् ॥ सहस्रसूर्यराजिकां धनन्जयोग्रकारिकाम् । सु- शुद्धकालकन्दलां सुभृङ्गवृन्दमंजुलाम् ॥ प्रजापिनी प्रजावती नमामि मातरं सतीम् । स्वकर्मकारणेगति हरप्रियांच पार्व- तीम् ॥ अनन्तशक्तिकान्तिदां यशोऽर्थभुक्तिमुक्तिदाम् । पुनः पुनर्जगद्धितां नमाम्यहं सुरार्चिताम् ॥ जयेश्वरि ! त्रिलो. चने ! प्रसीद देवि ! पाहिमाम् । जयन्ति ते स्तुवन्ति ये". शुभ लभन्त्यमोक्षतः ॥ सदैव ते हताद्विपः परं भवन्ति स- की मनोकामना पूर्ण करती हैं । वह श्मशान अर्थात् प्रळय स्वरूपहैं । वह भू. मि अर्थान् सम्पूर्ण की स्थिति सका हैं। वह वासिनी अर्पात उन्होंने संपूर्ण को व्याप्त और भावृत किया है । वह द्विजेन्द्रमौलि भाविनी अर्थात संपूर्ण द्विजेन्द्र मस्तक द्वारा उनकी पूजाकरते हैं । वह तपोन्धकार यामिनी अर्थात् महा प्रलयरात्रि हैं। वह शिवकी अर्थात् सर्व मङ्गलमय पुरुष की समाव कामिनी अर्थात् प्रकृति हैं । वह सहस्र सूर्य की समान प्रकाश युक्त हैं । वह धन और वही जय हैं । वह उग्रकारका अर्थात् महा प्रळयादि संघटित क- रती हैं। वह प्रनापिनी अर्थात् सबही उनका जपकरते हैं । वह प्रजावती अर्थात् संपूर्ण संसार ने उनसे जन्म ग्रहण किया है। वह सब की माता हैं। वह सती अर्थात् सर्वकाल सर्वदेश में स्थिति करती हैं । उनको प्रणाम करता हूं। वह हरप्रिय अर्यात् साक्षात् मायारूपसे सम्पूर्ण को मोहित करके उनकी प्रीति आकर्षण करती हैं। वह पार्वती अर्थात् अङ्कारस्वरूप हैं । वह अनन्त शक्ति हैं। वह कान्तिदा अर्थात् माया प्रसव करती हैं । वह भक्ति मुक्ति और यशका साधन हैं । वह जगत् का हितकरने वाली और मुख देनेवाली हैं। इस लिये सम्पूर्ण उनकी अर्चना करते हैं। मैं भी इमी कारण बार वार उनको नमस्कार करता हूं । तुम्ही जया, तुम्ही ईश्वरी, तुम्ही त्रिलो. चना अर्थात् त्रिभुवन के लोचन अर्थात् ज्ञानस्वरूप हो । अतएव प्रसन्न हो और मेरी रक्षा करो। जो तुम्हारा स्तव करते हैं, वह जय लाम करते है। वही शुभ संग्रह करते हैं । वही सर्वदा शत्रुसंहार करते हैं। एवं वही