Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Patanjal Yogadarshan Tatha Haribhadri Yogavashika
Front matter
మ్యాంayanatara
समर्पण।
श्रीमान् प्रवर्तक कान्तिविजयजी !
आपके प्रति मेरी अनन्य साधारण पूज्य बुद्धि
है, इसका कारण न तो स्वार्थ ही है और न
अंधश्रद्धाः आपके विद्यानुराग, शास्त्रप्रेम
'और निवद्य साधुभावसे मैं आकर्पित
हुआ हूं-इसीसे यह पुस्तक प्राप
के करकमलोंमें सादर समर्पित
करता हूं.
आपका सेवक,-
सुखलाल.
DawaiBUDDAIDUNGADGORATE
SumanAmasatrapatanADRISHTRAMATIOGROATARIA
-
जजजजजजजजजजx
विषयानुक्रमणिका. . १ ६६ ४ . . विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ- विषयानुक्रमणिका महर्षि पतञ्जलीकी दृ- परिचय गिविशालता प्रस्तावना आचार्य हरिभद्रकी यो- योगदर्शन गमार्गमें नवीन दिशा १९ योगशब्दका अर्थ उपसहार दर्शनशब्दका अर्थ पातञ्जलयोगदर्शन वृत्तिसह १ योगके आविष्कारका श्रेय ४ योगर्विशिका सटीक आर्य सम्रतिकी जट योगवृत्तिका सार और आर्य जातिका लक्षण १० योगविशिकाका सार ज्ञान और योगका सब- योगसूत्रवृत्ति तथा योगविं- शिकावृत्ति प्रमाणरूपसे न्ध तथा योगका दरजा ११ आये हुए अवतरणोका व्यावहारिक और पार- वर्णक्रमानुसारी परिशिष्ट मार्थिक योग न० १ योगकी दो धारायें १४ | योगसूत्रवृत्ति और योगवि. योग और उसक सा शिकाटीकामें आये हुए हित्यक विकामका दि. अवतरणोंका क्ती और ग्दर्शन ग्रन्थके नाम निर्देशस- योगशास्त्र ३८बन्धी परिशिष्ट न०२ १४१ ११४ O परिचय. पाठकोंकि ममक्ष प्रस्तुत पुस्तक उपस्थित करते हुए मका संक्षेपमें परिचय कगना जरूरी है। शुरूमें प्रस्तावना रूपले योगदर्शन पर एक विस्तृत निवन्ध दे दिया गया है जिनमें योग तथा योग-मम्बन्धी साहित्य आदिसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक बातों पर सप्रमाण विचार किया गया है। तत्पश्चात् इस पुस्तकमें मुख्यतया योगसूत्रवृत्ति और सटीक योगविशिका इन दो ग्रन्थोंका संग्रह है, तथा साथमें उनका हिंदी सार भी 'दिया हुआ है । अतएव उक्त दोनों ग्रन्थोंका, उनके कर्ता 'आदिका तथा हिंदी सारका कुछ परिचय कराना आवश्यक है, जिमसे वाचकोंको यह मालुम हो जाय कि ये प्रन्थ कितने महत्त्वपूर्ण हैं, और इनके कर्ताका स्थान कितना उच्च है। साथ ही यह भी विदित हो जाय कि मूल ग्रन्थों के साथ उनका हिंदी मार देनसे हमारा क्या अभिप्राय है । आशा है इस परिचय- को ध्यानपूर्वक पढनेस वाचकोंकी रुचि उक्त दो अन्योंकी ओर विशेप रूपमे उत्तेजित होगी, ग्रन्थकर्ताओंके प्रति बहु- मान पैदा होगा। और हिंदी सार देख कर उससे मूल ग्रन्थक भावको ममझ लेने की उचित आकांक्षा पैदा होगी। (१) योगसूत्रवृत्ति - यह वृत्ति योगसूत्रांकी एक छोटी सी टिप्पणिम्प व्याख्या है। योगसामे सांगोपांग योगमप्रिया है, जो मांख्य-सिद्धान्तके आधार पर लीखी गई है। उन सूत्रों के ऊपर सबसे प्राचीन और सबसे अधिक महत्त्वकी टीका महर्षि व्यासका भाष्य है। यह प्रसन्न गंभीर और विस्तृत भाष्य सांरय सिद्धान्त अनुसार ही रचा गया है, पर वृत्ति जैन प्रक्रियाके अनुमार रची गई है। अतएर जिम जिम (२) विषयमं मांख्य और जैन शास्त्रका मत-भेद है तथा जिस जिस विपयमें मतभेद न होकर सिर्फ वर्णन-पद्धति या सांकेतिक शब्द मात्रका भेद है उम उम विषयके वर्णनवाले स्वोंके ऊपर ही वृत्तिकारने घृत्ति लीखी है, और उसमें भाष्यकारके द्वारा निकाले गये सूत्रगत आशयके ऊपर जैन प्रक्रियाके अनुसार या ती आक्षेप किया है या उस आशयके माथं जैन मन्तव्यका मिलान किया है। दूसरे शब्दों में यों कहना चाहिए कि यह वृत्ति योगदर्शन तथा जैन दर्शन सम्बन्धी सिद्धान्तोंके विरोध और मिलानका एक छोटा सा प्रदर्शन है । यही कारण है कि प्रस्तुत वृत्ति मय योग कि ऊपर न हो कर कतिपय सूत्रोंके ऊपर ही है । योग सूत्रों की कुल संख्या १९५ की है और वृत्ति मिर्फ २७ सूत्रोंके ऊपर ही है । सब सूनोंको घृत्ति न होने पर भी प्रस्तुत पुस्तकमे हमने सूत्र तो सभी दे दिये हैं पर भाष्य तो सिर्फ उन्हीं सत्रोंका दिया है जिन पर वृत्ति है । ऐसा कर- नके मुख्य दो कारण हैं (१) सूत्रोंका परिमाण घडा नहीं है और (२) वृत्ति पढनेवालेको कमसे कम मूल सूत्रों के द्वारा भी मंपूर्ण योगप्रक्रियाका ज्ञान करना हो तो इमके लिए अन्य पुस्तक हूँढने की आवश्यकता न रहे । इमके विपरीत भाष्यका परिमाण बहुत बड़ा है और यह कई जगह अच्छे ढंगमे छप भी चका है । यद्यपि वृत्ति पहनेवालेको योगदशनके मौलिक मिद्वान्त जानने हो तो उसका यह उद्देश्य भाष्य बिना देग्वे भी मिद्ध हो सकता है । फिर भी वृत्तिवाले धोका उप- यागो भाष्य उम उम प्तन के नीचे इस लिए दिया है कि पृत्ति ममनने में पाठकांको अधिक सुभीता हो, क्योकि यत्तिकारने भाष्यकारक आशयको ध्यानमें रम कर ही अपनी वृत्तिमें चय मतभेद और ऐकमत्य दिपाया है। कयल जन दर्शनफो जाननंधाले मंकुचित दृष्टिके कारण यह नहीं जानते कि अन्य दर्शनके साथ जैन दर्शनका किन किम सिद्धान्तम कितना और कैमा वास्तविक मतभेद या मतैक्य है । इसी प्रकार केवल चैदिक दर्शन को जाननेवाले विद्वान् भी एकदेशीय दृष्टिके कारण यह नहीं जानते कि जैन दर्शन किन किन बातो- में वैदिक दर्शनके साथ कहाँ तक और किस प्रकार मिल जाता है। इस पारस्परिक अज्ञानके कारण दोनों पक्षके विद्वान तक भी बहुधा, एक दूसरेके ऊपर आदर रखना तो दूर रहा, अनुचित हमला किया करते हैं, जिमसे साधारण वर्गम भ्रम फैल जाता है और वे खंडन मंडनमें ही अपनी शक्तिका सर्च कर डालते हैं। इस विषमताको दूर करने के लिए ही यह वृत्ति लिखी गई है। यही कारण है कि इसका परिमाण बहुत छोटा होने पर भी इसका महत्य उससे कई गुना अधिक है। जैन दर्शनकी भित्ति स्याद्वाद सिद्वान्तके ऊपर खडी है। प्रामाणि- क अनेक दृष्टियोंके एकत्र मिलानको ही स्यावाद कहते हैं म्याद्वाद सिद्वान्तका उद्देश्य इतना ही है कि कोई भी समय- दार व्यक्ति किसी यस्तुके विषय में मिद्वान्त निधित करते ममय अपनी प्रामाणिक मान्यताको न छोडे परन्तु माय ही दूसरोंकी प्रामाणिक मान्यताओंका भी आदर करे । मचमुत्र स्याद्वादया मिद्धान्त हृदयकी उदारता. दृष्टिकी विशालता, प्रामाणिक मतभेदकी जिज्ञामा और यस्नुको विविध-रूपता गयाल पर ही स्थिर है। प्रस्तुत वृत्तिके द्वारा उमय कत्ताने उत्सः स्यादादया मंगलमय दर्शन याग्य जिशामुकि. लिप मुलभ कर दिया है। हम तो यह कदम तनीक भी संकोच नहीं है कि प्रस्तुत वृत्ति जैन और यांग दर्शन मिलागयी हरिमें गंगा यमुनाफा मंगमस्थान दै. जिनमें मतभेदम्प जलया पर्ग भेद होने पर भीदानायी पफरमताही अधिक।
- वृत्ति के महत्त्यका पृग बयाल उमको मनन पूर्वक उदार दृष्टिम पढने पर ही आमकता है। ( . ) योगविंशिका-य -यह मूल ग्रन्थ प्राकृतम है। इमका परिमाण और विषय इमके नाममं प्रमिद है, अर्थात् यह थीम गाथाओंका योग मम्बन्धी एक छोटा मा ग्रन्थ है। इनके प्रणे ताने यीम बीम गाथाओंकी एक एक विशिका ऐमी बीम' विशिकाएँ रची हैं, जो सभी उपलब्ध है। उनमें प्रस्तुत योग- विशिकाका सग्रहयौं नंबर है, इसमें योगका वर्णन है। इसके प्रणेतार्क संस्कृत भाषामें भी जैन दृष्टिके अनुसार योग पर बनाये हुए योगविंदु, योगदृष्टिममुच्चय और पोडशक ये तीन ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं जो छप चूके हैं । इमके सिवाय उनका बनाया हुआ योगशतक नामका अन्य भी सूना जाता है । एक ही कर्ताके द्वाग एक ही विषय पर लिखे गये उक्त चार्गे अन्योंकी वस्तु क्या क्या है और उसमें क्या समानता तथा या असमानता है इत्यादि कई प्रश्न धावकोंके दिलमें पैदा हो सकते हैं जिनका पूरा उत्तर तो ये उक्त प्रन्योंके अवलोकन के द्वारा ही पा सकेंगे, फिर भी हमने प्रस्तुत पुस्तकमें इसका अलग सूचन किया है जिनके लिए हम पाठकोंका ध्यान प्रस्ता. १ वीम वीसीयों के नाम इस प्रकार है-~-१ अधिकारविशिका, • अनादि विशिमा, ३ कुलनीतिलोकधर्मविश्किा, ४ चरमपरावर्नविशिका, ५ बीजादिविशिका ६ सद्धर्मविशिमा, ७ दाननिधिविशिका, ८ पृजाविधिविशिका, ९ श्रावधर्मविशिका ५. श्रावप्रतिमाविश्किा, ११ यनिधर्मविशिका, १२ शिक्षाविशिका, १३ भिक्षा विशिका, १४ तदन्तरायशुद्धिनिर्विशिका, १५ आलोचनार्विशिका, १६ प्रायश्चिन- विशिका, १७ योगविधानविनिका, ९८ के पलहाननिशिका, १५ सिद्धविशिश, मिदमुपविगिका।
. चना पृष्ठ ५९ परके "आचार्य हरिभद्रकी योगमार्गमें नवीन दिशा" नामक पेरेकी और खीचते हैं। योगविशिकाकी योगवस्तुका स्थूल परिचय तो पाठक वहीं कर ले, पर उसमें एक मामाजिक परिस्थितिका चित्रण है जिसका निर्देश यहाँ करना उपयुक्त है. हर एक देश, हर एक जाति और हर एक समाजमें धार्मिक गुरुओंकी तरह धर्मधूर्त गुरुओंकी भी कमी नहीं होती। वैसे नामधारी गुरू भोले शिष्योंको धर्मनाशका भय दिग्वा कर धर्मरक्षाके निमित्त अपने मनमाने ढंगसे धर्मक्रियाका उपदेश देते हैं और धर्मकी ऑटमें शास्त्रविरुद्व व्यवहारका प्रवर्तन कराया करते हैं, ऐमे धर्मढागी गुरुओंको खबर जैसे 'आवश्यक नियुक्तिमै श्रीभद्रबाहुस्वामीने ली है वैसे बहुत मक्षेपम पर मार्मिक रीतिमे योगविंशिकामें भी ली गई है । उसमें से पावडिओको संबोधित करके कहा गया है कि “मंघ या जैन- नीर्थ मनमाने ढंगमे चलनेवाले मनुष्योंके ममुदाय मात्रका नाम नहीं है, ऐसा ममुदाय तो संघ नहीं किन्तु हड्डियका ढेर मात्र है । मच्चा जैन-तीर्थ या महाजन तो शास्त्रानुकल चलने बाला एक व्यक्ति भी हो मकता है। इसलिए तीर्थक्षाके नाम अशुद्ध प्रथाको जारी रखना यही बास्तबमें तीर्थनाश है, क्योंकि शुद्ध धर्मप्रथाका नाम ही तीर्थ है जो अशुद्ध धर्मप्रथामे नष्ट हो जाता है" । इमके सिपाय योगविशिफाके अन्तिम भाग में रूपी, अरूपी ध्यानका भी अन्छा वर्णन है। यह ग्रन्थ छोटा होनेमे इममें जो कुछ वर्णन है यह मंक्षिप्त ही है, पर इमली मंस्थत टीका जो हम ग्रन्थके माथ ही दे दी गई है यह बात 7 दया दिनानियुक्ति गया .. म ११९ ।
- म्पष्ट और मांग परिपूर्ण है । मूलपर उसको टोकामं टीका- कारने पूग प्रकाश डाला है, जिसका पुरा परिचय तो उस टीकाके देखनेस ही ही मकेगा। पाठकोमे हमाग अनुरोध है कि ये योगविशिकाकी टी- काको पढकर टीकाकारकी बहुश्रुतगामिनी बुद्धि और अनेक- शारदोहनका थोडे ही में आस्वाद ले। ग्रन्थकर्ता-ऊपर जिस वृत्तिका परिचय कराया गया है, उसके रचयिता जैन विद्वान उपाध्याय यशोविजयजी हैं । योगविंशिकाको टीकाके कर्ता भी ये ही हैं । वृत्तिके मूलरूप योगसूत्रके प्रणेता वैदिक विद्वान् महषि पतञ्जलि है और मूल योगविशिकाके रचयिता जैन विद्वान् आचार्य हरिभद्र हैं। इस प्रकार यहाँ ग्रन्धकारूपमे उक्त तीन व्यक्तिआंका परिचय कराना आवश्यक है। (१) पतञ्जलि-इनके जन्मस्थान, माता, पिता. समय आदिके विषय में विद्वानोंने बहुत ऊहापोह किया है पर अभीतक यही निश्चित नही हुआ कि योगसूत्रकार पतञ्जलि. पाणिनीय व्याकरणत्व पर भाष्य रचनेवाले महाभाष्यकार-- नामसे प्रसिद्ध पतञ्जलिसे जुदा थे या दोनों एक ही थे। महा. भाष्यकार और योगसूत्रकार पतञ्जलिकी भिन्नता या एकता मम्बन्धमें आजतक कीगई खोजोंमे अधिक विचार प्रदर्शित करनेके लिए न तो हमने पर्याप्त अवलोकन ही किया है और न उसकी अधिक गवेषणा करनेके लिए अभी हमें समय हो प्राप्त है, इसलिए इस विषयके जिज्ञासुओंके लिए हम सरल भावसे अन्य विद्वानोंकी गपणाओंको देखनेको ही सिफा- रिश करते हैं।
(७) हम अन्य इतिहास विद्वानोंके इस अनुमानके आधार पर सिर्फ संतोष मान लेते हैं कि योगसूत्रकार यदि महाभाष्यकार ही थे तो उनका समय इ. पूर्व दूसरी शताब्दी माना जाना चाहिए और यदि दोनों भिन्न थे तो योगसूत्रकार पतञ्जलिका समय इ. के बाद दूसरीसे चौथी शताब्दी तकमें माना जाना चाहिए । अस्तु! पतञ्जलिके वाह्य आवरणको निश्चित रूपसे जाननेका साधन अभी पूर्णतया प्राप्त न होने पर भी इनकी विचार-आत्माका साक्षात् दर्शन योगसूत्र में हो ही जाता है जो कम सौभाग्यकी बात नही है। इनकी आत्मा इतना काल बीत जाने पर भी योगसूत्रोंमें जागती है। जिसके पास एक बार आनेवाला पापाण हृदय व्यक्ति भी सिर झुकाये बिना. किंबहुना दासानुदास हुए बिना नहीं रह सकता । इनके योग- सूत्रका थोडे में परिचय करनेके अभिलाषिओंका ध्यान दम प्रस्तावना पृष्ठ ३८ पर 'योगशास्त्र' शीर्षक पेरेकी ओर खींचते हैं और इनके महर्षिपनका परिचय करनेकी इच्छावालोंका "महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टिविशालता" शीर्षक भागकी ओर खींचते है प्रस्तावना पृ. ४६ (२) हरिभद्र-इस नामके येताम्बर मंप्रदायमें अनेक आचार्य हुए हैं । पर योगविशिकाके कर्ता प्रस्तुत हरिभद्र उन सबमें पहले है जो याकिनि महत्तरा सूनुके नाम और १४४४ ग्रन्थप्रणेताके रूपसे प्रसिद्ध है उनका समय वि. की आठवीं नवीं शताब्दी अभी निर्णय किया गया है। उनके जीवनका हाल अभी तक जो कुछ प्रकट हुआ है उमकी अपेक्षा अधिक १ देखो वुड अनुवादित योगदर्शनकी इग्लीश प्रस्तावना । देखो श्रीजिन विजाजी रिखित हन्भिद्रमुरिका म्मयनिर्णय जैन मारित्याशीधर अब । ३ देखो प हरगोरिददाम लिपित जीवनचरित।
(८)
.
1
लिखने की अभी हमारी तैयारी नहीं है, अलबत्ते यह हमारा
खयाल हुआ है कि उनके जीवन पर पूरा प्रकाश डालनेके
वास्त जैसा चाहिए वैसा उनके ग्रन्थोंका गहरा अवलोकन
अभीतक किसीने नहीं किया है वैसा अवलोकन करके निश्चित
सामग्रीके आधार पर विशेष लिखनेकी हमारी हार्दिक इच्छा
है। परंतु ऐसा सुयोग कर आवैगा यह कहा नहीं जा सकता।
अतपय अभीतकके उनके ग्रन्थोके अवलोकनमे उत्पन्न हुए
भावको मिर्फ एक, दो वाक्योम जना देना ही ममुचित है।
जैन आगमो पर सबसे पहले संस्कृतमें टीका लिग्वने.
याले, भारतीय समग्र दर्शनोंका मबसे पहले वर्णन करने-
पाले, जैन शास्त्रके मूल सिद्धान्त अनेकान्तपर तार्किक
रोतिसे व्यवस्थित रूपमें लिखनेवाले और जैन प्रक्रियाके
अनुसार योगविषय पर नई रीतिसे लिखनेवाले ये ही
हरिभद्र हैं। इनकी प्रतिभाने विविध विषयके जो अनेक
ग्रन्थ उत्पन्न किये हैं उनसे केवल जैन साहित्यका हो नहीं
किन्तु भारतीय संस्कृत, प्राकृत साहित्यका मुख उज्ज्वल है।
१ यह कथन सर ग्रन्योरी अपेक्षान समझना अन्यथा हरिभाम्कि
पहले भी योगविषय पर लिखनेवाले विशिष्ट जैनाचार्य हुए हैं, जिनके अनेक
पाक्योंरा अवतरण देन हुए हरिभटमग्नि योगदृष्टि ममुचयो टीकाम योगाचार्य'
म प्रनिष्ठामूचा नामम उदय क्यिा है इसके लिए दया याम. श्री. १५.
१०,००, 3. आदिमीटीस
अवतरण वाक्योम माफ जान पटना है कि योगाचार्य जनाचार्य दी। यह
नहीं कहा जा सकता है विभेम्बर या दिगम् । उनका जमली नाम क्या
होगा गो भी मालम नरी, इमो गि विद्वानोरी गोज करनी चाहिए । गम्भा है
उन किमी प्रन्यरी उपलब्धिम या अन्यत्र उखन सिंगर प्रमाग अधिर
पनपन, नरे ।
इनके बनाये हुए जो १४४ट' ग्रन्थ कहे जाते हैं वे मब लब्ध नहीं है परन्तु आज जितने उपलब्ध हैं वे भी हमारे लिए तो सारी जिन्दगी तक मनन करने और शास्त्रीय प्रत्येक विषयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिए पर्याप्त हैं। यशोविजय-ये विक्रमकी सत्रयीं, अठारहवीं शताब्दी- में हैं। इनका इतिहाम अभीतक जो कुछ प्रकाशित हुआ है यह पर्याप्त नहीं है । इनके विशिष्ट इतिहासके लिए इनके मभी अन्योंका मांगोपांग बारीकीके साथ अवलोकन आवश्यक है। इसके लिए समय और स्वास्थ्य चाहिए जो अभी तो हमारे भाग्यमें नहीं है पर कभी इस कामकी तैयारी करनेकी और ब- हुत लक्ष्य हता है। अस्तु अभी तो वाचक-यशीविजयका परि- चय इतनेहीमें कर लेना चाहिए कि उनकी सी ममन्वयशक्ति रखनेवाला, जैन जैनेतर मौलिक ग्रन्थों का गहरा दोहन करने- चाला, प्रत्येक विषयकी तह तक पहुँच कर उस पर ममभाव पूर्वक अपना स्पष्ट मन्तव्य प्रकाशित करनेवाला, शास्त्रीय य लौकिक भापामे विविध साहित्य रच कर अपने मरल और कठिन विचारोंको सब जिज्ञासु तक पहुंचाने की चंदा करने- चाला और सम्प्रदायमें रह कर भी सम्प्रदायके बंधनकी पग्या न कर जो कुछ उचित जान. पडा उस पर निर्भयता पूर्वक लिखनेवाला, केवल प्रवेताम्बर, दिगंबर समाज में ही नहीं बल्कि जैनेतर समाजमें भी उनका मा कोई विशिष्ट विद्वान अभी तक हमारे ध्यान में नहीं आया। पाटक म्मरगम रक- यह अत्युक्ति नहीं है। हमने उपाध्याय जीके और दुमरे विद्वानोंक ग्रन्योंका अभीतक जा अल्प मात्र अनलान किया है उसके आधार पर तोल नापकर ऊपरके याय लिये है। निःमन्देह श्वेताम्बर और दिगम्बर ममाजमें अनेक बहुश्रुत घिद्वान हो गये हैं. वैदिक नथा बौद्र मम्प्रदायमें भी प्रचंड . (१०) विद्वानको कमी नहीं रही है। खास कर वैदिक विद्वान् तो मदाहीसे उच्च स्थान लेते आये हैं, विद्या मानों उनकी बपौती ही है। पर इममें शक नहीं कि कोई बौद्ध या कोई वैदिक विद्वान् आज तक ऐसा नहीं हुआ है जिसके ग्रन्थके अवलोकन से यह जान पडे कि वह वैदिक या बौद्ध शास्त्रके उपरान्त जैन शास्त्रका भी वास्तविक गहरा और सर्यव्यापी ज्ञान रखता हो। इमक विपरीत उपाध्यायजीके ग्रन्योंको ध्यानपूर्वक देखने- वाला कोई भी बहुश्रुत दार्शनिक विद्वान् यह कहे विना नहीं रहेगा कि उपाध्यायजी जैन थे इमलिए, जैनशास्त्रका गहरा ज्ञान तो उनके लिए सहज था पर उपनिषद्, दर्शन आदि वैदिक ग्रन्थोंका तथा बौद्ध ग्रन्थोंका इतना वास्तविक, परिपूर्ण और स्पष्ट ज्ञान उनकी अपूर्व प्रतिभा और काशी मेयनका ही परिणाम है। हिंदी सारका उद्देश्य-ग्रन्यका महत्त्व, उसकी उपयो- गिता पर निर्भर है। उपयोगिताको मात्रा लोकप्रियताकी माधाम निषित होती है। अच्छा ग्रन्य होने पर भी यदि मर्य साधारणमें उसकी पहुँच न हुई तो उसकी लोकप्रियता नहीं हो मकती। जो अच्छा प्रन्य जितने ही प्रमाण अधिक लोक- प्रिय हुआ देखा जाता है उसका लोगों तक पहुँचानेकी उतनी ही अधिक चेष्टा की गई होती है। गीताफा उतना अधिक प्रचार कभी नहीं होता यदि यिविध भाषाओम विविध रूपसे उमका उलया न होता, अतण्य यह मावीत है कि शास्त्रीय भापाय ग्रंथीको अधिक उपयोगी और अधिक लोकप्रिय बना. नेका एक मात्र उपाय लौकिक भाषाओंमें उनका पग्यितन करना है। भारत वर्षके मादित्यको भाग्तके अधिकांश भागमें फैलानेका माधन उमको गष्ट्रीय हिंदी भाषामें परिवर्तित करना यही है। हमी कारण प्रस्तुत पुम्नकम मूल मूल योगसूत्र वृत्ति और मटीक योगविंशिका छपवाने के बाद भी उनका हिंदी मार पुम्नकके अन्तमें दिया गया है।मार कहनेका अभिप्राय यह है कि वह मूलका न तो अक्षरशः अनुवाद है और न अविकल भावानुवाद ही है। अविकल भावानुवाद नहीं है इस कथनसे यह न ममंझना कि हिंदी माग्में मूल ग्रंथका अमली भाव छोड दिया है, जहॉतक होमका मार लिखनेमें मूल ग्रन्यके अमली भावकी ओर ही खयाल रक्खा है। अपनी औरने कोई नई बात नहीं लिखी है पर मूल ग्रन्थमें जो जो बात जिन जिम क्रममे जितने जितने संक्षेप या विस्तारके साथ जिम जिम टॅगमे कही गई है वह मव हिंदी सारमें ज्यों की त्यों लानेकी हमने चेष्टा नहीं की है। दोनो मार लिखनेका ढेंग भिन्न भिन्न है इसका कारण मूल ग्रंथोंका विषयभेद और रचना भेद है। पहले ही कहा गया है कि वृत्ति मब योग सत्रोके ऊपर नहीं है। उसका विपय आचार न होकर तत्वज्ञान है। उमकी भाषा साधारण संस्कृत न होकर विशिष्ट मंस्कृत अर्थात् दार्शनिक परिभाषासे मिश्रित संम्कृत और बहभी नवीन न्याय परिभा- पाके प्रयोगसे लदी है। अतएव उसका अक्षरशः अनुवाद या अविकल भावानुवाद करनेकी अपेक्षा हमको अपनी स्वीकृत पद्धति ही अधिक लाभदायक जान पडी है। वृत्तिका सार लिम्ब- ने में यह पद्धति रखी गई है कि सूत्र या भाष्यके जिस जिम मन्तव्य के माथ पूर्णरूपसे या अपूर्णरूपसे जैन दृष्टिके अनुमार वृत्तिकार मिल जाते हैं या विरुद्ध होते हैं उम उस मन्तव्यको उम उस स्थानमें पृथकरण पूर्वक संक्षेपमें लिखकर नीचे वृत्ति- कारका संवाद या विरोध क्रमशःसंक्षेपमें सूचित कर दिया है। मब जगह पूर्वपक्ष और उत्तर पक्षकी सब दलीलें सारमे नहीं दी है। सिर्फ मार लिखने में यही ध्यान रक्खा गया है कि वृत्तिकार कोम बात पर क्या कहना चाहते हैं।
योगन वृत्तिके अधिकारी तीन प्रकारके हो मकते हैं। पहले विशिष्ट विद्वान् । दुमरे मंस्कृत भाषाको माधारण जाननेवाले किन्तु दर्शनप्रेमी । तीमरे मंस्कृत भाषाको बिल्कुल नहीं जान- नेपाले किन्तु दर्शनविद्याकी रुचियाले। पहले प्रकारके अधि. फारी ती हिंदी सारके मियाय ही मूल ग्रन्थ देग्न मकगे उनके लिए यह मार नहीं है । दूसरे प्रकारके अधिकारीको मूल ग्रन्थ मुगम हो सके और तीमरे प्रकारके अधिकारीको मूल वस्तु मान सुगम हो मके इम इष्टिमै धृत्तिका मार लिखा गया है। योगचिशिका गाथाबद्ध स्वतन्त्र अन्य है। उमका विषय योग (चारित्र) है और उन पर परिपूर्ण ममर्थ टीका है हम लिए इमका मार लिम्बनेकी पद्धति भिन्न है। प्रत्येक गाथाका नंबरवार भायानुमारी अर्थ लिवकर उनके नीचे खुलासेके तौर पर टीकाका उपयोगी अंश लेकर मार लिया गया है। प्राकृत, संम्यत कम जाननेपर या बिल्कुल नहीं जानने पर भी जो जैन योग जिशामु हैं उनको न तो बुद्धि पर बोझ ही पढे और न यम्नु दी अज्ञात रहे मष्टिम अर्थात् य अधिकारिऑको यि- शेष उपयोगी होम इम पगालमें यह मार लिया गया है। दोनों मार विशेष उपयोगी हामक सम इष्टिमें हमने ममय और धमकी परया न करमारको विशेष उपयोगी बनानेकी घंटा की है, फिर भी मचिभेद या अन्य किमी कारणमे जिमको पर भी कमी जान पडे घद हमें पचित करे या म्ययं उम क- माको दूर करनको चंष्टा करे। यामार प्रदर्शन--भौगर्मि लाचार होनये. कारण पदन, टिपन आदिशा मेरा सय काम पराधिन है. अतएव इत्माद होनपर भी गा कभी मम्भव नहीं कि योग्य महागोय. अभा. गमें प्रम्मत पुम्नक मुनी नगार हो पाती। पाठ! आराम पुस्तकको सच मुच मेरे परम श्रद्राम्पद उन महायकोंको महा- यताका ही परिणाम समझें, मैं तो इममें म्वल्प निमित्त मात्र रहा हूँ। वे सहायक हैं प्रवर्तक श्री कान्तिविजयजीके शिष्य मुनि श्री चतुरविजयजी और उनके शिष्य लघुवयम्क मुनि श्री पुण्यविजयजी । हस्तलिखित प्रतीको संपादित कर उन परमै प्रेम कापी करना, मुफ देखना तथा हिंदीसारका मंशो- धन करके उसके मुफोको देखना आदि सब बौद्धिक तथा शारी- रिक काम उक्त लघुवयस्क मुनिने ही प्रधानतया किये हैं। उनके गुरु श्री चनुरविजयजी महाराजने उक्त काममें सहायता देनेके अलावा प्रेस, छपाई तथा अर्थसे संबंध रखनेवाली अनेक उल- झनीको सुलझाया है। निःसन्देह उक्त दोनों गुरु शिष्यकी सहृदयता, उत्साह शीलता और कुशलता सिर्फ मेरे ही नहीं बल्कि सभी माहित्यप्रेमीके धन्यवादके पात्र है। संक्षेपमें निष्पक्षभावस इतना ही कहूँगा कि हीयमान साधुभावका विरलरूपसे आज जिन इनि गिनि घ्यक्तियों में दर्शन होता है उनमें प्रवर्तकजीकी गणना निःसंकोच भावसे की जानी चाहिए। प्रवर्तकजीके ही गुण उक्त दोनों गुरु शिष्योंमें, खासकर उक्त लघुवयस्क मुनिमें उतर आये हैं यह बात उनके परिच- यम आनेवाला कोई भी स्वीकार किये बिना न रहेगा। योगसूत्रवृत्तिकी एक ही लिखित प्रति न्यायांभोनिधि आत्मारामजी महाराजके भाण्डारसे मिल सकी थी जिसके उपरमे प्रेस कापी तैयार की गई । उस प्रतिम यत्र तत्र कई जगह अक्षर, पद या याक्य तक खंडित हो गये थे। दूसरी प्रतिके अभावमें उस मंडित भागकी पूर्ति यहुधा अर्थानुसंधानजनित कल्पनामे किंवा उपाध्यायजीके ही रचित शाम्रबार्तासमुनय- टीका आदि अन्य ग्रन्थों में पाये जानेवाले ममान विषयक (१४) वर्णनके आधारसे की गई है। फिर भी कई जगह त्रुटित पाटकी पूर्ति नहीं हो मको । जहाँ कल्पनाद्वारा पूर्ति की गई है वहाँ कोष्टक आदि खाम चिद किये हैं या नीच फुट नोटमें यूचना की है। योगविशिकाक सम्बन्धमें भी वही बात है क्योंकि उसकी टीकाको भी एक ही नकल मिल मकी। उस एक नकलको बोज नीकालनेका श्रेय प्रवर्तकजीके ही स्वर्गवामी शिष्य मुनि श्री भक्तिविजयजीको ही हैं। वह एक नकल कालके गालम जा ही रही थी कि सौभाग्यवश उक्त मुनिजीको मिल गई । प्रमंग ऐसा हुआ कि अमदावादमें किसी श्रावकके वहाँ कचरेकै रूपम पुराने पन्ने पडे थे, जिनको उक्त मुनिजीने देखा और उनसे उनकी उपाध्यायजी कृत योगविशिका टीकाकी एक अखंड नकल मिली जो उनके स्वहस्तलिखित ही है । यद्यपि उपाध्यायजीने श्री हरिभद्रकृत वोमों विशिकाओंके ऊपर टीका लिखी है जैसा कि योगविंशिकाटीकाके इस अन्तिम उल्लेबसे स्पष्ट है- इति महोपाध्यायश्रीकल्याणविजयगणिशिष्यमुख्यपरिङ- तश्रीजीतविजयगणिसतीर्थ्यपण्डितश्रीनयविजयगणिचरणका मलचञ्चरीकपण्डितश्रीपद्मविजयगणिसहोदरोपाध्यायश्रीजस- विजयगाणिसमर्थितायां विंशिकाप्रकरणव्याख्यायां योगविशि- काविवरणं सम्पूर्णम् ॥ तथापि प्रस्तुत एक विशिकाकी टोकाके सिवाय शेष उन्नीस बिशिकाओंको टीकाएँ आज अनुपलब्ध हैं। न जाने ये नाशका ग्रास हो गई, या कहीं अज्ञात रूपसे उक्त एक टीकाकी नरद्द कुडे कचरे के रूपमें किमी संग्रह लोलुपके द्वारा रक्षित होंगी। अस्तु, जो कुछ हो पर अब भी इतना मौभाग्य है कि मूल मूल वीसों विशिकाएँ कुछ खंडित रूपमें, कुछ अशुद्ध- रूपमें भी उपलब्ध हैं । छाया,महित उनको प्रकाशित करने का तथा हो सका तो साथमें हिंदो मार देनेका हमारा विचार है। हमारा निवेदन है कि जिनके पास उक्त सब विशिकाएँ या उनकी अपूर्ण, पूर्ण टीकाएँ हो वे हमें सूचित करें, क्योंकि यह सार्वजनिक संपत्ति है, एकवार जैमा छपा प्रायः फिर वैसा ही रहता है। छपने के बाद लिखित प्रतियोंको कौन देखता है। इस दशाम छपानेसे पहले अधिकसे अधिक मामग्रीके द्वारा संशोधन आदि करना यही सच्ची श्रुत-भक्ति है। हमारा काम प्राप्त सामग्रीका उपयोग करना मात्र है । इस लिए पुण्यशाली महानुभावोंका यह कर्त्तव्य है कि ये लिखित प्रति आदि अपने पास जो कुछ साधन हो उसको देकर प्रकाशककै निःस्वार्थ कार्यको सरल करें। पहले इस पुस्तकको पाँच सौ नकलें नीकलयानेका इरादा था पर पीछे हजार नकलं नीकलवानेका विचार हुआ। किन्तु उस समय एक तरह उतने कागज न थे और न तुरत मिल ही सकते थे, इसलिए निरुपाय होकर दो किममके कागजों पर पाँच सौ पाच सौ नकले नीकलवानी पडी हैं। फिर भी धारणासे कुछ अधिक मॅटर बढ जाने के कारण और कई दिनों तक कोशीश करने पर भी एक जातिके मोटे अन्टिक कागज न मिलनेसे अन्त में लाचार होकर करीब दो फर्म दुमरी किम- मके मोटे कागज पर छपवाने पड़े हैं । अस्तु जो कुछ हो याध कलेयरम थोडी सी विभिन्नता हो जाने पर भी पुस्तकका आन्तरिक स्वरूप एक ही प्रकारका है जिस पर वस्तुग्राही पाटा संतोप कर लेयं ।
। प्रस्तुत पुस्तकम आर्थिक महायता तीन व्यक्तिआंकी ओ- रसे प्राप्त है। जिसमें मुख्य भाग बडोदावाले शाह चुनीलाल नगतमदामका है, प्रांतीजवाल शेट मगनलाल करमचंद और भावनगरवाले शेठ दीपचंद गांडाभाइकी धर्मपत्नी बाह मोतीवारकी भी आर्थिक मददका हममें हीस्सा है अतएव उक्त तीनो महानुभाव धन्यवाद के भागी हैं। अन्तमें विचारशील पाठकोंसे हम इतना ही निवेदन करते हैं कि वे इस पुस्तकमें जो कुछ त्रुटी देखें वह हमें सूचित करें। भावनगर वि. म. १९७८ निवेदक- सुखलाल संघजी. फाल्गुन क्गा १३ रवि.
प्रस्तावना. प्रत्येक मनुष्य व्यक्ति अपरिमित शक्तियोंके तेजका पुञ्ज है, जैसा कि सूर्य । अत एव राष्ट्र तो मानों अनेक सूर्योका मण्डल है। फिर भी जब कोई व्यक्ति या राष्ट्र असफलता या नैराश्यके भँवरमें पडता है तब यह प्रश्न होना सहज है कि इसका कारण क्या है ? । बहुत विचार कर देख- नेसे मालूम पडता है कि असफलता व नैराश्यका कारण योग- का (स्थिरताका) अभाव है, क्योंकि योग न होनेसे बुद्धि संदेह- शील बनी रहती है, और इससे प्रयत्नकी गति अनिश्चित हो जा- नेके कारण शक्तियां इधर उधर टकराकर आदमीको वरवाद कर देती हैं। इस कारण सत्र शक्तियोंको एक केन्द्रगामी बनाने तथा साध्यतक पहुंचानेके लिये अनिवार्यरूपसे सीको योगकी जरूरत है। यही कारण है कि प्रस्तुत xव्या- ख्यानमालामें योगका विषय रखा गया है । इस विषयकी शास्त्रीय मीमांसा करनेका उद्देश यह है कि हमें अपने पूर्वजॉकी तथा अपनी सभ्यताकी प्रकृति ठीक मालूम हो, और तद्वारा प्रार्यसंस्कृतिके एक अंशका थोडा, पर निश्चित रहस्य विदित हो। * गजरात पुरातत्व मंदिरफी ओरसे होनेवाली प्रार्यविद्या- व्याख्यानमालामें यह व्यारयान पढा गया था।
[२] योगदर्शन. योगदर्शन यह सामासिक शब्द है। इसमें योग और दर्शन ये दो शब्द मौलिक हैं। योग शब्दका अर्थ-योग शब्द युज् धातु और घन् प्रत्ययसे सिद्ध हुवा है । युज् धातु दो हैं । एकका अर्थ है जोडनो और दूसरेका अर्थ है समाधि-मनः स्थिरता । सामान्य रीतिसे योगका अर्थ संबन्ध करना तथा मानसिक स्थिरता करना इतना ही है, परंतु प्रसंग व प्रकरण के अनु- सार उसके अनेक अर्थ हो जानेसे वह बहुरूपी बन जाता है । इसी बहुरूपिताके कारण लोकमान्पको अपने गीतारह- स्य गीताका तात्पर्य दिखाने के लिये योगशब्दार्थनिर्णयकी विस्तृत भूमिका रचनी पड़ी है। परंतु योगदर्शनमें योग शब्दका अर्थ क्या है यह बतलानेके लिये उतनी गहराइमें उतरनेकी कोइ आवश्यकता नहीं है, क्यों कि योगदर्शनविष- यक सभी ग्रन्यों में जहां कहीं योग शब्द आया है वहां उसका एक ही अर्थ है, और उस अर्थका स्पष्टीकरण उस उस ग्रन्थमें गण ७ हेमचंद्र धातुपाठ. २ युर्जिच समाधो गण ४ ." ३ देखो पृष्ट ५५ से ६० १ युजूंपी योगे "
[३]
ग्रन्थकारने स्वयं ही कर दिया है। भगवान् पतंजलिने
अपने योगसूत्र में चित्तवृत्ति निरोधको ही योग कहा है, और
उस ग्रन्थमें सर्वत्र योग शब्दका वही एक मात्र अर्थ विव-
क्षित है। श्रीमान हरिभद्र सरिने अपने योग विषयक सभी
प्रेन्थों में मोक्ष प्राप्त कराने वाले धर्मव्यापारको ही योग कहा
है। और उनके उक्त सभी ग्रन्थों में योग शब्दका वही एक
मात्र अर्थ विवक्षित है । चित्तवृत्तिनिरोध और मोक्षप्रापक
धर्मव्यापार इन दो वाक्योंके अर्थमें स्थूल दृष्टिसे देखने
पर बडी भिन्नता मालूम होती है, पर सूक्ष्म दृष्टिसे देखने
पर उनके. अर्थकी अभिन्नता स्पष्ट मालूम हो जाती
है, क्यों कि 'चित्तत्तिनिरोध' इस शब्दसे वही क्रिया या
व्यापार विवक्षित है जो मोक्षके लिये अनुकूल हो और
जिससे चित्तकी संसाराभिमुख वृत्तियां रुक जाती हों।
'मोक्षप्रापक धर्मव्यापार' इस शब्दसे भी वही क्रिया विव-
क्षित है। अत एव प्रस्तुत विषयमें योग शब्दका अर्थ
स्वाभाचिक समस्त आत्मशक्तियोंका पूर्ण विकास करानेवाली
१ पा. १ स्. २-योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।
२ योगविन्दु श्लोक ३१-
अध्यात्म भावनाऽऽध्यानं समता वृत्तिसंक्षयः ।
मोक्षण योजनाद्योग एष श्रेष्ठो ययोचरम् ।।
योगविंशिका गाथा ॥१॥
[४] क्रिया अर्थात् आत्मोन्मुख चेष्टा इतना ही समजना चाहीये । योगविषयक वैदिक, जैन और बौद्ध ग्रन्थों में योग, ध्यान, समाधि ये शब्द बहुधा समानार्थक देखे जाते हैं। दर्शन शब्दका अर्थ-नेत्रजन्यज्ञान, निर्विकल्प (निराकार) बोधे, श्रद्धा, मेत आदि अनेक अर्थ दर्शन शब्दके देखे जाते हैं। पर प्रस्तुत विषयमें दर्शन शब्दका अर्थ मत यह एक ही विवक्षित है। योगके आविष्कारका श्रेय-जितने देश और जितनी जातियोंके आध्यात्मिक महान् पुरुषोंकी जीवनकथा तथा उनका साहित्य उपलब्ध है उसको देखनेवाला कोई भी यह नहीं कह सकता है कि श्राध्यात्मिक विकास अमुक देश और अमुक जातिकी ही बपौती है, क्यों कि सभी देश और सभी जातियोंमें न्यूनाधिक रूपसे आध्यात्मिक विकास- वाले महात्माओंके पाये जानेके प्रमाण मिलते हैं। योगका १ लोर्ड एवेरीने जो शिताकी पूर्ण व्याख्या की है वह इसी प्रकारको है:-" Education is thy harmonious development of all our faculies. २ दृशृं प्रेक्षणे-गण १ हेमचन्द्र धातुपाठ. ३ तत्त्वार्थ अध्याय २ सूत्र ह-श्लोक वार्तिक. २ ५ षड्दर्शन समुच्चय-श्लोक २-"दर्शनानि पठेवात्र"इत्यादि. ६ उदाहरणार्थ जरयोस्त, सु, महम्मद धादि. " ४ १ [५] संवन्ध आध्यात्मिक विकाससे है। अत एव यह स्पष्ट है कि योगका अस्तित्व सभी देश और सभी जातियों में रहा है। तथापि कोइ भी विचारशील मनुष्य इस बातका इनकार नहीं कर सकता है कि योगके आविष्कारका या योगको पराकाष्ठा तक पहुंचानेका श्रेय भारतवर्ष और आर्यजातिको ही है। इसके सबूतमें मुख्यतया तीन गाने पेश की जा सकती हैं। १ योगी, ज्ञानी, तपस्वी आदि आध्यात्मिक महापुरुषोंकी बहुलता; २ साहित्यके आदर्शकी एकरूपता; ३ लोकरुचि। १ योगी, ज्ञानी, तपस्वी आदि आध्या- स्मिक महापुरुषोंकी बहुलता-पहिलेसे आज तक भारतवर्ष आध्यात्मिक व्यक्तियोंकी संख्या इतनी बडी रही है कि उसके सामने अन्य सत्र देश और जातियोंके आध्यात्मिक व्यक्तियोंकी कुल संख्या इतनी अन्प जान पडती है जितनी कि गंगाके सामने एक छोटीसी नदी। २ साहित्यके आदर्शकी एकरूपता-तत्व- झान, आचार, इतिहास, काव्य, नाटक आदि साहित्यका कोइ भी भाग लीजिये उसका अन्तिम आदर्श पहुधा मोद ही होगा। प्राकृतिक दृश्य और कर्मकाण्डके वर्णनने वेदका बहुत बडा माग रोका है सही, पर इसमें संदेह नहीं कि यह [६] वर्णन वेदका शरीर मात्र है। उसकी श्रात्मा कुछ और ही है-वह है परमात्मचिंतन या आध्यात्मिक भावोंका आवि. करण । उपनिपदोंका प्रासाद तो ब्रह्मचिन्तनकी वुन्याद पर ही खडा है। प्रमाणविषयक, प्रमेयविषयक कोई भी तत्व- ज्ञान संवन्धी सूत्रग्रन्थ हो उसमें भी तत्त्वज्ञानके साध्यरूपसे मोक्षका ही वर्णन मिलेगा। आचारविपयक सूत्र स्मृति आदि सभी ग्रन्थों में माचारपालनका मुख्य उद्देश मोक्ष ही १ वैशेषिकदर्शन अ०१ सू०४- धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधाभ्यां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसम्॥ न्यायदर्शन अ० १ सू० १- प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्क निर्ण- यवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छल जातिनिप्रहस्थानानां तत्व- ज्ञानान्निःश्रेयसम् ॥ सांख्यदर्शन अ० १- अथ त्रिविधदुःसात्यन्तनिचिरत्यन्तपुरुपार्थः ।। वेदान्तदर्शन अ. ४ पा० ४ सू० २२-- अनापतिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात ।। जैनदर्शन तत्त्वार्य अ० १ सू०१- सम्यग्दर्शनशानधारिमाणि मोक्षमार्गः || - TA [७] माना गया है । रामायण, महाभारत आदिके मुख्य पात्रोंकी महिमा सिर्फ इस लिये नहीं कि वे एक बडे राज्यके स्वामी थे, पर वह इस लिये है कि अंतमें वे संन्यास या तप- स्थाके द्वारा मोक्षके अनुष्ठानमें ही लग जाते हैं। रामचन्द्रजी प्रथम ही अवस्थामें वशिष्ठसे योग और मोक्षकी शिक्षा पा लेते हैं । युधिष्ठिर भी युद्ध रस लेकर वाण-शय्यापर सोये हुचे भीष्मपितामहसे शान्तिका ही पाठ पढते हैं। गीता तो रणांगणमें भी मोक्षके एकतम साधन योगका ही उपदेश देती है । कालिदास जैसे शृंगारप्रिय कहलानेवाले कवि भी अपने मुख्य पात्रोंकी महत्ता मोक्षकी ओर झूकनेमें ही देखते है । जैन आगम और बौद्ध पिटक तो निवृत्तिप्रधान होनेसे १ याज्ञवल्क्यस्मृति अ० ३ यतिधर्मनिरूपणम् ; मनुस्मृति अ० १२ श्लोक ८३ २ देखो योगवाशिष्ठ. ३ देखो महाभारस-शान्तिपर्व. ४ कुमारसंभव-सर्ग ३ तथा ५ तपस्या वर्णनन्. शाकुन्तल नाटक अंक ४ कण्वोक्ति, भूत्वा चिराय पतुरन्तमहीसपत्नी, दोप्यन्तिमप्रतिरयं तनयं निवेश्य । भर्चा वदर्पितकुटुम्पमरेण सार्थ, शान्ते करिष्यसि पदं पुनराश्रमेऽस्मिन् ॥
[-] मुख्यतया मोक्षके सिवाय अन्य विषयोंका वर्णन करनेमें बहुत ही संकुचाते हैं । शब्दशास्त्र में भी शब्दशुद्धिको तस्व- ज्ञानका द्वार मान कर उसका अन्तिम ध्येय परम श्रेय ही माना है। विशेप क्या ? कामशास्त्र तकका भी आखिरी उद्देश मोक्ष है। इस प्रकार भारतीय साहित्यका कोई भी स्रोत देखिये, उसकी गति समुद्र जैसे अपरिमेय एक चतुर्थ पुरुषार्थकी ओर ही होगी। शैशवेऽभ्यस्तविद्यानाम् यौवने विषयैपिणाम् । वार्द्ध मुनिवृत्तीनाम् योगेनान्ते तनुत्यजाम् ।।८। सर्ग? शथ म विषयश्यावृत्तात्मा यथाविधि सूनवे, नृपतिककुदं दत्त्वा यूने सितातपवारणम् । मुनिवरतरुच्छायां देव्या तया सह शिश्रिये, गलितवयसामिवारणामिदं हि फुलव्रतम् ॥७०, ३ रघुवंश. १ द्वे प्राणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यन् । शब्दब्रह्माणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ च्याफरणात्पदसिद्धिः पदसिद्धरर्थनिर्णयो भवति । अर्थात्तत्वज्ञान तन्वज्ञानात्परं श्रेयः ।। श्रीहेमशब्दानुशासनम् अ० १ पा० १ सू० २ लघुन्यास. २ " स्थायिरे धर्म मोक्षं घ कामसूत्र अ०२ पृ०११ Bombay Edition. "
[]
३ लोकरुचि- आध्यात्मिक विषयकी चर्चावाला
और खासकर योगविषयक कोइ भी ग्रन्थ किसीने भी लिखा
कि लोगोंने उसे अपनाया । कंगाल और दीन हीन अवस्थामें
भी भारतवपीय लोगोंकी उक्त अभिरुचि यह सूचित करती
है कि योगका सम्बन्ध उनके देश व उनकी जातिमें पहलेसे
ही चला आता है। इसी कारणसे भारतवर्पकी सभ्यता
अरण्यमें उत्पन्न हुइ कही.जाती है। इस पैतृक स्वभावके
कारण जब कभी भारतीय लोग तीर्थयात्रा या सफरके लिये
पहाडों, जंगलों और अन्य तीर्थस्थानों में जाते हैं तब वे
डेरातंयु डालनेसे पहले ही योगियोंको, उनके मठोंको और
उनके चिततकको भी ढुंढा करते हैं। योगकी श्रद्धाका
उद्रेक यहां तक देखा जाता है कि किसी नंगे वावेको
गांजेकी चिलम फूंकते या जटा बढ़ाते देखा कि उसके मुंहके
धुंएमें या उसकी जटा व भस्मलेपमें योगका गन्ध पाने
लगता है । भारतवर्षके पहाड, जंगल और तीर्थस्थान भी
बिलकुल योगिशून्य मिलना दुःसंभव है। ऐसी स्थिति
अन्य देश और अन्य जातिमें दुर्लभ है। इससे यह अनुमान
करना सहज है कि योगको आविष्कृत करनेका तथा परा-
१ देसो पवियर टागोर फत
" Thur in Indin it us
. etc."
साधना पृष्ठ ४.
In the forests that our
anilisation had its butih.
[१०] काष्ठा तक पहुंचानेका श्रेय बहुधा भारतवर्षको और आर्य- जातिको ही है। इस यातकी पुष्टि मेक्षमृलर जैसे विदेशीय और भिन्न संस्कारी विद्वान्के कथनसे भी अच्छी तरह होती है। आर्यसंस्कृतिकी जड और आर्यजातिका लक्षण--उपरके कथनसे आर्यसंस्कृतिका मूल आधार क्या है यह स्पष्ट मालूम हो जाता है । शाश्वत जीवनकी उपादेयता ही आर्यसंस्कृतिकी भित्ति है। इसी पर आर्यसं- स्कृतिके चित्रोंका चित्रण किया गया है। वर्णविभाग जैसा सामाजिक संगठन और आश्रमव्यवस्था जैसा वैयक्तिक जीवनविभाग उस चित्रणका अनुपम उदाहरण है। विद्या, रक्षण, विनिमय और सेवा ये चार जो वर्णविभागके उद्देश्य हैं। उनके प्रवाह गार्हस्थ्य जीवनरूप मैदानमें अलग अलग वह कर भी वानप्रस्थके मुहानेमें मिलकर अंतमें संन्यासा- श्रमके अपरिमेय समुद्रमें एकरूप हो जाते हैं। सारांश यह है कि सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक आदि सभी संस्त- तियोंका निर्माण, स्थूलजीवनकी परियामविरसता और श्रा- This concentration of thought (पकाग्रता) or one-pointedness as the Hindus called it, is something to us almoso unknowl. इत्यादि देयो पृ २३- योल्युम १-सेकेंड युक्स प्रोफ धि ईस्ट मेक्षमूलर-प्रस्तावना. - [११] ध्यात्मिक जीवनकी परिणाम सुन्दरता उपर ही किया गया है। अत एव जो विदेशीय विद्वान् आर्यजातिका लक्षण स्थूलशरीर, उसके डीलडोल, व्यापार-व्यवसाय, भाषा, आदिमें देखते हैं वे एकदेशीय मात्र हैं। खेतीवारी, जहाज- खेना, पशुओंको चराना आदि जो जो अर्थ आर्यशब्दसे निकाले गये हैं वे आर्यजातिके असाधारण लक्षण नहीं हैं। आर्यजातिका असाधारण लक्षण परलोकमात्रकी कल्पना भी नहीं है क्यों कि उसकी दृष्टिमें वह लोक भी त्याज्य है। उसका सच्चा और अन्तरंग लक्षण स्थूल जग- के उसपार वर्तमान परमात्मतत्त्वकी एकाग्रबुद्धिसे उपासना करना यही है । इस सर्वव्यापक उद्देश्य के कारण आर्यजाति अपनेको अन्य सब जातियोंसे श्रेष्ठ समझती आइ है । ज्ञान और योगका संवन्ध तथा योगका दरजा--व्यवहार हो या परमार्थ, किसी भी विषयका ज्ञान तभी परिपक समझा जा सकता है जब कि ज्ञानानुसार आचरण किया जाय । असलमें यह आचरण ही योग है। Biographies of Words & the Home of the Aryans by far Maller page 501 २ ते तं मुत्तमा स्वर्गलो. कं, विशालं क्षीणे पुण्ये मृत्युलोक विशन्ति। एवं भयोधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ने । गोना २०६ शोक २१ ।। ३ देसी Aplo's Sou-krit to Inglis!: Dictionary.
[१२]
अत एव ज्ञान योगका कारण है । परन्तु योगके पूर्ववर्ति जो
ज्ञान होता है वह अस्पष्ट होता है। और योगके बाद
होनेवाला अनुभवात्मक ज्ञान स्पष्टं तथा परिपक्क होता है।
इसीसे यह समझ लेना चाहिये कि स्पष्ट तथा परिपक
ज्ञानकी एक मात्र कुंजी योग ही है। आधिभौतिक या
आध्यात्मिक कोह भी योग हो, पर वह जिस देश या
जिस जातिमें जितने प्रमाणमें पुष्ट पाया जाता है उस देश
या उस जातिका विकास उतना ही अधिक प्रमाणमें होता
है। सच्चा ज्ञानी वही है जो योगी है। जिसमें योग या
एकाग्रता नहीं होती वह योगवाशिष्ठकी परिभापामें ज्ञानन्धु
१ इसी अभिप्रायसे गीता योगिको तानीमे अधिक कहती है.
गीता श्र... श्लोक ४६-
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन! ।।
२ गीता अ०५ श्लोक ५-
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थान तद्योगैरपि गम्यते ।
एक सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।।
३ योगवाशिष्ठ निर्वाण प्रकरण उत्तरार्ध सर्ग २१.
न्याचष्टे यः पठवि घशानं भोगाय शिस्पिपत् ।
यतदं न स्वनुष्टाने शानबन्धुः स उच्यते ॥
आत्मज्ञानमनासाद्य ज्ञानान्तरलनेन ये |
सन्तुष्ट पटचेष्टं ते ते स्मृता ज्ञानयन्धयः ।। इत्यादि.
-
, - [१३] है । योगके सिवाय किसी भी मनुष्यकी उत्क्रान्ति हो ही नहीं सकती, क्यों कि मानसिक चंचलताके कारण उसकी सब शक्तियां एक ओर न वह कर भिन्न भिन्न विपयोंमें टकराती है, और क्षीण हो कर यों ही नष्ट हो जाती हैं। इसलिये क्या किसान, क्या कारीगर, क्या लेखक, क्या शोधक, चया त्यागी सभीको अपनी नाना शक्तियोंको केन्द्रस्थ करेनेके लिय योगे ही परम साधन है । व्यावहारिक और पारमार्थिक योग- योगका कलेवर एकाग्रता है, और उसकी आत्मा अहंत्व ममत्वका त्याग है । जिसमें सिर्फ एकाग्रताका ही संबन्ध हो वह व्यावहारिक योग, और जिसमें एकाग्रताके साथ साथ अहंत्व ममत्वके त्यागका भी संबन्ध हो वह पारमार्थिक योग है। यदि योगका उक्त आत्मा किसी भी प्रवृत्ति-चाहे वह दुनियाकी दृष्टिमें वाह्य ही क्यों न समझी जाती हो- वर्तमान हो तो उसे पामार्थिक योग ही समझना चाहिये। इसके विपरीत स्थूलदृष्टियाले जिस प्रवृत्तिको आध्यात्मिक समझते हों, उसमें भी यदि योगका उक्त प्रात्मा न हो तो उसे व्यवहारिक योग ही कहना चाहिये । यही यात गीताके साम्यगर्भित कर्मयोगमें कही गई है। १ ०२ श्लोक ४८- योगस्थः फुरु फर्माणि सहं यस्या धनखय!। सिद्धपसिद्धयोः ममो भूत्वा ममत्वं योग उन्यते ।। - [१४] योगकी दो धारायें--व्यवहार में किसी भी व- स्तुको परिपूर्ण स्वरूपमें तैयार करनेके लिये पहले दो बातोंकी आवश्यकता होती है । जिनमें एक ज्ञान और दूसरी क्रिया है। चितेरेको चित्र तैयार करनेसे पहले उसके स्त्र- रूपका, उसके साधनोंका और साधनोंके उपयोगका ज्ञान होता है, और फिर वह ज्ञान के अनुसार क्रिया भी करता है तभी वह चित्र तैयार कर पाता है। वैसे ही आध्यात्मिक क्षेत्रमें भी मोक्षके जिज्ञासके लिये वन्धमोक्ष, आत्मा और यन्धमोक्षके कारणोंका तथा उनके परिहार, उपादानका ज्ञान होना जरूरी है। एवं ज्ञानानुसार प्रवृत्ति भी प्रापश्यक है। इसी से संक्षेपमें यह कहा गया है कि "ज्ञानक्रियाभ्याम् मोक्षः" योग क्रियामार्गका नाम है । इस मार्गमें प्रवृत्त होनेसे पहले अधिकारी, आत्मा आदि प्राध्या- त्मिक विपयोंका श्रारंभिक ज्ञान शास्त्रसे, सत्संगसे, या स्वयं प्रतिभा द्वारा कर लेता है। यह तत्वविषयक प्राथमिक ज्ञान प्रवर्तक ज्ञान कहलाता है। प्रवर्तक ज्ञान प्राथमिक दशाका ज्ञान होनेसे सबको एकाकार और एकसा नही हो सकता। इसीसे योगमार्गमें तथा उसके परिणामस्वरूप मोषस्वरूपमें ताचिक भिन्नता न होने पर भी योगमार्गके प्रवर्तक प्राथमिक जानमें कुछ भिन्नता अनिवार्य है। इस १ [१५] प्रवर्तक ज्ञानका मुख्य विपय आत्माका अस्तित्व है । आ- त्माका स्वतन्त्र अस्तित्व माननेवालों में भी मुख्य दो मत हैं-पहला एकात्मवादी और दूसरा नानात्मवादी । नानात्म- वादमें भी आत्माकी व्यापकता, अव्यापकता, परिणामिता, अंपरिणामिता माननेवाले अनेक पक्ष हैं। पर इन वादोंको एकतरफ रख कर मुख्य जो आत्माकी एकता और अनेक- ताके दो वाद हैं उनके आधार पर योगमार्गकी दो धारायें हो गई हैं। अत एव योगविषयक साहित्य भी दो मामि विभक्त हो जाता है। कुछ उपनिपदें,' योगवाशिष्ठ, हठ- योगप्रदीपिका आदि ग्रन्थ एकात्मवादको लक्ष्यमें रख कर रचे गये हैं। महाभारतगत योग प्रकरण, योगसूत्र तथा जैन और बौद्ध योगग्रन्थ नानात्मवादके आधार पर रचे गये हैं। योग और उसके साहित्यके विकासका दिग्दर्शन-आर्यसाहित्यका भाण्डागार मुख्यतया तीन भागोंमें विभक्त है-चैदिक, जैन और बौद्ध । वैदिक साहि- त्यका प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद है। उसमें आधिभौतिक और आधिदैविक वर्णन ही मुख्य है । तथापि उसमे श्राध्या- १ ब्रह्मविद्या, सुरिफा, चूलिका, नादविन्दु, ब्रह्मविन्दु, अमृतपिन्दु, ध्यानपिन्दु, तेजोधिन्दु, शिसा, योगतत्त्व, हंस.
[१६] त्मिक भाव अर्थात् परमात्मचिन्तनका अभाव नहीं है। परमात्मचिन्तनका भाग उसमें थोडा है सही, पर वह इतना अधिक स्पट, सुन्दर और भावपूर्ण है कि उसको ध्यानपूर्वक देखनेसे यह साफ मालूम पड जाता है कि तत्कालीन लोगोंकी दृष्टि केवल वाह्य न थी। इसके सिवा उसमें १ देखो" भागवताचा उपसंहार " पृष्ठ २५२. २ उदाहरणार्थ कुछ सूक्त दिये जाते हैं:- ऋग्वेद मं. १ सू. १६४-४६- इन्द्रं मित्रं वरुणममिमाहुरथो दिव्यः स सुपणों गरुत्मान् । एक सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः। भाषांतर:-लोग उसे इन्द्र, मित्र, वरुण या अग्नि कहते हैं। वह सुंदर पांखवाला दिव्य पक्षी है। एक ही सत्का विद्वान् लोग अनेक प्रकारसे वर्णन करते है । कोइ उसे अग्नि, यम या वायु भी कहते हैं। ऋग्वेद मण्ड. ६ सू.६ वि मे कणों पतयतो विचक्षुर्वीदं ज्योतिर्हृदय आहितं यत् । विमे मनश्वरति दूर आधीः किंस्विद् वक्ष्यामि किमु नु मनिष्ये ॥६॥ विश्वे देवा अनमस्यन भियानारत्वाममे ! तमसि वस्थिवांसम् । वैश्वानरोऽवतूनये नोऽपर्योऽवनूतये नः ॥ ७ ॥ भाषांतर:-मेरे कान विविध प्रकारकी प्रवृत्ति करते हैं। मेरे नेत्र, मेरे हृदयमें स्थित ज्योति और मेरा दूरवर्ति मन (भी) [१७] ज्ञान, श्रद्धा, उदारता, ब्रमचर्य आदि आध्यात्मिक उच्च मानसिक भावोंके चित्र भी बड़ी खूबीबाले मिलते हैं। इससे विविध प्रवृत्ति कर रहा है। मैं क्या कहूँ और क्या विचार फरूँ ? | ६ | अंधकारस्थित हे अग्नि ! तुजको अंधकारसे भय पानेवाले देव नमस्कार करते हैं। वैश्वानर हमारा रक्षण करे । अमर्त्य हमारा रक्षण करे । ७ ॥ पुरुपसूक्त मण्डल १० सू ६. ऋग्वेदः- सहस्रशीर्पा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमि विश्वतो वृत्वात्यविष्ठदशाङ्गुलम् ॥ १॥ पुरुष एवेदं सर्व यद्भूतं यच्च भव्यम् ।। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिगेहति ॥ २॥ एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुपः । पादोस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥ भाषांतर:----( जो ) हजार सिरवाला, हजार सवाला, हजार पॉववाला पुरुष (है) वह भूमिको चारों ओरसे घेर कर (फिर भी ) दस अंगुल बढ़ कर रहा है । १। पुरुष ही यह सय फुछ है-जो भूत और जो भावि । (वह) अमृतत्वका ईश अन्नसे बढ़ता है। २। इतनी इमकी महिमा--इससे भी १ मं.१० सू.७१ ऋग्वेद । २ मं. १० सू०१५१ ऋग्वेद । ३ मं. १० सू. ११७ ऋग्वेद । ४ मं. १० सू. १० ऋग्वेद ।
[१८] यह अनुमान करना सहज है कि उस जमानेके लोगोंका झुकाव आध्यात्मिक अवश्य था। यद्यपि ऋग्वेदमें योगशब्द वह पुरुप अधिकतर है। सारे भूत उसके एक पाद मात्र उसके अमर तीन पाद स्वर्ग में हैं । ३ । क सूक्त मं. १० सू. १२१ ऋग्वेदः- हिरण्यगर्भः समवर्तता भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१॥ य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिपं यस्य देवाः । यस्य च्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविपा विधेम ॥२॥ भाषांतर:-पहले हिरण्यगर्भ था। वही एक भूत मात्रका पति बना था। उसने पृथ्वी और इस आकाशको धारण किया। किस देवको हम हविसे पूजें १ । १ । जो आत्मा और बलको देनेवाला है। जिसका विश्व है। जिसके शासनकी देव उपासना करते हैं। अमृत और मृत्यु जिसकी छाया है। किस देवको हम हविसे पूर्जे १२ ऋग्वेद मं. १०-१२६-६ तथा ७- को श्रद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः। अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आ बभूव ।। इयं विसृष्टिर्यत आ पभूव यदि वा दधे यदि वा न | यो अस्याध्यक्ष परमे व्योमन्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद।। 1 .
[२६]
अनेक स्थानों में आया है, पर सर्वत्र उसका अर्थ प्रायः
जोडना इतना ही है, ध्यान या समाधि अर्थ नहीं है।
इतना ही नहीं बल्कि पिछले योग विषयक साहित्यमें ध्यान,
वैराग्य, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि जो योगप्रक्रिया प्रसिद्ध
शब्द पाये जाते हैं वे ऋग्वेदमें बिलकुल नहीं हैं। ऐसा होनेका
कारण जो कुछ हो, पर यह निश्चित है कि तत्कालीन
लोगोंमें ध्यानकी भी रुचि थी । ऋग्वेदका ब्रह्मस्फुरण जैसे
जैसे विकसित होता गया और उपनिपदके जमानेमें उसने
जैसे ही विस्तृत रूप धारण किया वैसे वैसे ध्यानमार्ग भी
अधिक पुष्ट और साङ्गोपाङ्ग होता चला । यही कारण है
कि प्राचीन उपनिषदोंमें भी समाधि अर्थमें योग, ध्यान
भाषांतर:--कौन जानता है-कौन कह सकता है कि यह
विविध सृष्टि कहाँसे उत्पन्न हुइ ? | देव इसके विविध सर्जनके
पाद (हुवे ) हैं । कौन जान मावा है कि यह कहांसे आई ?
यह विविध सृष्टि कहांसे आई और स्थिति में है या नहीं है ? यह
यात परम व्योममें जो इसका अध्यक्ष है वही जाने-कदाचित्
वह भी न जानता हो।
१ मंडल १ सूरत ३४ मंत्र मं. १० सू. १६६ मं.५1
मं. १ सू. १८ मं. ७ मं १. सू. ५ मं. ३ । मं. २ २.८
मं १ | मं. ९ सू. ५८ मं
[२०] आदि शब्द पाये जाते हैं। श्वेताश्वतर उपनिपदमें तो स्पष्ट रूपसे योग तथा योगोचित स्थान, प्रत्याहार, धारणा आदि योगागोंका वर्णन है । मध्यकालीन और अर्वाचीन अनेक उपनिषदें तो सिर्फ योगविषयक ही हैं, जिनमें योगशास्त्रकी तरह सांगोपांग योगप्रक्रियाका वर्णन है। अथवा यह कहना १ ( क ) तैत्तिरिय २-४ । कठ २-६-११। श्वेताश्वतर २-११, ६-३ । (ख) छान्दोग्य ७-६-१, ७-६-२, ७-७-१, ७-२६-१। श्वेताश्वतर १-१४ । कौशीतकि २-२,३-३, ३-४, ३-६। २ श्वेताश्वतरोपनिषद् अध्याय २--- त्रिरुन्नत स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिरुध्य । प्रझोडपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥८॥ प्राणाप्रपीडयेह सयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोससीत । दुष्टाश्वयुक्तमित वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ १॥ समे शुचौ शर्करावहिवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः । मनोनुकूते न तु चक्षुपीडने गुहानिवावाश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥ इत्यादि. ३ प्राविद्योपनिषद्, चरिकोपनिषद्, चूलिकोपनिषद्, नाद- बिन्दु, ब्रह्मायिन्दु, अमृतबिन्दु, ध्यानविन्दु, तेजोबिन्दु, योग. शिसा, योगतत्त्व, हंस | देसो द्युसेनकृत-" Philosophy of the Upanishad's [२१] चाहिये कि ऋग्वेदमें जो परमात्मचिन्तन अंकुरायमाण था वही उपनिपदोंमें पल्लवित पुष्पित हो कर नाना शाखा प्रशा- खाओंके साथ फल अवस्थाको प्राप्त हुवा । इससे उपनिपद- कालमें योगमार्गका पुष्टरूपमें पाया जाना स्वाभाविक ही है। उपनिषदोंमें जगत, जीव और परमात्मसम्बन्धी जो ताविक विचार है, उसको भिन्न भिन्न ऋपियोंने अपनी दृष्टिसे सूत्रोमें ग्रथित किया, और इस तरह उस विचारको दर्शनका रूप मिला। सभी दर्शनकारोंका आखिरी उद्देश मोक्ष ही रहा है, इससे उन्होंने अपनी अपनी दृष्टि से तन- * प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्ताययवतर्कनिर्णय- वादजल्पवितण्डाहेत्वाभासन्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्वज्ञाना- निःश्रेयसाधिगमः । गौ० सू० १-१-१॥ धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्गसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधा- भ्यां तत्त्वज्ञानानिःश्रेयसम् ॥ वै० सू०१-१-४॥ अथ त्रिविध- दुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः सां० १० १-१ । पुरुषार्थ- शून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशाक्त- रिति । यो० सू० ४-३३॥ अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दान् ४-४-२२ २, सू.। मम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः तत्त्वार्य १-१ जैन ६० बौद्ध दर्शनका तीमरा निरोध नामक आर्यसत्य ही मोक्ष है। .
[२२] विचार करनेके बाद भी संसारसे छुट कर मोक्ष पाने के साथ- नोका निर्देश किया है । तच्चविचारणामें मतभेद हो सकता है, पर आचरण यानी चारित्र एक ऐसी घस्तु है जिसमें सभी विचारशील एकमत हो जाते हैं। विना चारित्रका तत्वज्ञान कोरी बातें हैं। चारित्र यह योगका किंवा योगां- गोंका संक्षिप्त नाम है। अत एव सभी दर्शनकारोंने अपने अपने सूत्रग्रन्थों में साधन रूपसे योगकी उपयोगिता अपश्य बतलाइ है । यहां तक की-न्यायदर्शन जिसमें प्रमाण पद्ध- तिका ही विचार मुख्य है उसमें भी महर्षि गौतमने योगको स्थान दिया है। महर्षि कणादने तो अपने वैशेपिक दर्शनमें यम, नियम, शौच आदि योगांगोंका भी महत्त्व गाया है। सांख्यसूत्र में योगप्रक्रियाके वर्णनाले कइ सूत्र हैं। ब्रह्म- १ समाधिविशेषाभ्यासात् ४-२-३८ । अरण्यगुहापुलिना- दिपु योगाभ्यामोपदेशः ४-२-४२। तदर्थ यमनियमा- भ्यामात्मसंस्कारो योगायाध्यात्मविध्युरायैः ४-१-४६ ।। २ अभिपेपनोपवासब्रह्मचर्यगुरुकुनपासवानप्रस्थयज्ञदानप्रोक्षण- दिनक्षत्रमन्त्र कालनियमाश्चादृष्टाय । ६-२-२ | अयतस्य सुधिभोजनादिभ्युदयो न विद्यते, नियमाभाषा, विनाले वार्थान्तरत्वाद् यमस्य | ६-२-८। ३ रागोपदवियानम् ३-३० । वृत्तिनिरोधात् तस्मिाद्धः , [२३] सूत्रमें महर्षि वादरायणने तो तीसरे अध्यायका नाम ही साधन अध्याय रक्खा है, और उसमें प्रासन ध्यान आदि योगांगोंका वर्णन किया है। योगदर्शन तो मुख्यतया योगविचारका ही ग्रन्थ ठहरा, अत एव उसमें सांगोपांग योगप्रक्रियाकी मीमांसाका पाया जाना सहज ही है। योगके स्वरूपके सम्बन्धमें मतभेद न होनेके कारण और उसके प्रतिपादनका उत्तरदायित्व खासकर योगदर्शनके उपर होनेके कारण अन्य दर्शनकारोंने अपने अपने सूत्र ग्रन्थों में थोडासा योगविचार करके विशेष जानकारीके लिये जिज्ञा- सुओंको योगदर्शन देखनेकी सूचना दे दी है। पूर्वमीमां- सामें महर्षि जैमिनिने योगका निर्देश तक नहि किया है सो ठीक ही है, क्योंकि उसमें सकाम कर्मकाण्ड अर्थाद धूम-मार्गकी ही मीमांसा है । कर्मकाण्डकी पहुंच स्वर्गतक ३-३१। धारणासनस्वकर्मणा तत्सिद्धिः ३-३२ । निरोध- श्छर्दिविधारणाभ्याम् ३-३३ स्थिरसुसमासनम् ३-३४। १ प्रासीनः संभवात् ४-१-७ | ध्यानाच ४-१-८। अच- लत्रं चापेक्ष्य ४-२-९। स्मरन्ति च ४-१-१० । यनैकापता तत्राविशेषात् ४-१-११ । २ योगशास्त्राचाध्यात्मविधिः प्रतिपत्तव्यः । न्यायदर्शन ४-२-४६ भाप्य ।
[२४] ही है, मोक्ष उसका साध्य नहीं । और योगका उपयोग तो मोक्षके लिये ही होता है। जो योग उपनिपदोंमें सूचित और सूत्रोंमें सूत्रित है, उसीकी महिमा गीतामें अनेक रूपसे गाई गई है। उसमें योगकी तान कभी कर्मके साथ, कभी भक्तिके साथ और कभी ज्ञानके साथ सुनाई देती है। उसके छठे और तेरहवें अध्यायमें तो योगके मौलिक सब सिद्धान्त और योगकी सारी प्रक्रिया आ जाती है। कृष्णके द्वारा अर्जुनको १ गीताके अठारह अध्यायों में पहले छह अध्याय कर्मयोग बिचके छह अध्याय भक्तियोग प्रधान और अंतिम छह अध्याय ज्ञानयोग प्रधान हैं। २ योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१०॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ।। ११ ।। तत्रैकामं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद् योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ समं कायशिरोमीवं धारयन्नचलं स्थिरः। संप्रेक्ष्य नासिकानं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीना चारित्रते स्थितः । मनः संयम्य मचित्तो युफ पासीत मत्सरः ॥१४|| १०६ प्रधान, [२५] गीताके रूपमें योगशिक्षा दिला कर ही महाभारत सन्तुष्ट नहीं हुआ । उसके अथक स्वरको देखते हुए कहना पड़ता है कि ऐसा होना संभव भी न था। अत एव शान्ति- पर्च और अनुशासनपर्वमें योगविपयक अनेक सर्ग वर्तमान हैं, जिनमें योगकी अथेति प्रक्रियाका वर्णन पुनरुक्तिकी परवा न करके किया गया है। उसमें पाणशय्यापर लेटे हुए भीष्मसे बार बार पूछनेमें न तो युधिष्ठिरको ही कंटाला आता है, और न उस सुपात्र धार्मिक राजाको शिक्षा देनेमें भीष्मको ही थकावट मालूम होती है । योगवाशिष्ठका विस्तृत महल तो योगकी भूमिकापर खडा किया गया है। उसके छह प्रकरण मानों उसके सुदीर्घ कमरे हैं, जिनमें योगसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी विषय रोचकतापूर्वक वर्णन किये गये हैं। योगकी जो जो बातें योगदर्शनमें संक्षेपमें कही गई हैं, उन्हींका विविधरूपमें विस्तार करके ग्रन्थकारने योगवाशिष्ठका कलेवर बहुत बढा दिया है, जिससे यही कहना पडता है कि योगवाशिष्ठ योगका ग्रन्थराज है। पुराणमें सिर्फ पुराणशिरोमणि भागवतको ही देखिये, उसमें योगका सुमधुर पद्योंमे पूरा वर्णन है। १ शान्तिपर्व १९३, २१५, २४६, २५४ इत्यादि । अनुशासनपर्व ३६, २४६ इत्यादि । २ पैराग्य, मुमुचुन्यव- हार, उत्पत्ति, स्थिति, उपशम और निर्वाण । ३ स्वन्ध ३ ग- ध्याय २८ । स्वन्ध ११, अ० १५, १९, २० धादि । .
" [२६] योगविषयक विविध साहित्यसे लोगोंकी रुचि इतनी परिमार्जित हो गई थी कि तान्त्रिक संप्रदायवालोंने भी तन्त्र- ग्रन्थों में योगको जगह दी, यहां तक कि योग तन्त्रका एक खासा अंग बन गया। अनेक तान्त्रिक ग्रन्थों में योगकी चर्चा है, पर उन सबमें महानिर्वाणतन्त्र, पदचक्रनिरूपण श्रादि मुख्य हैं। १ देखो महानिर्वाणतन्त्र ३ अध्याय । देखो षट्वनिरूपण. ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्योग योगविशारदाः। शिवात्मनोरभेदेन प्रतिपत्तिं परे विदुः ॥ पृष्ठ ८२ Tantrik Texts में छपा हुआ समत्वभावनां नित्यं जीवात्मपरमात्मनो। समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षण ॥ पृ०६१ " यदत्र नात्र निर्मासः स्तिमितोदधिवत् स्मृतम् । स्वरूपशून्यं यद् ध्यानं तत्समाधिविधीयते ।। पृ०६०, त्रिकोणं तस्यान्तः स्फुरति च सततं विद्युदाकाररूपं । वदन्तः शून्यं तत् सकलसुरगणैः सेवितं चातिगुमम् ।। पृ.६०, "आहारनिहर्हारविहारयोगाः सुसंवा धर्मविदा तु कार्या:" पृ०६१" ध्यै चिन्तायाम् स्मनो यातुश्चिन्ता तत्त्वेन निश्चला । एतद् ध्यानमिह प्र सगुणं निर्गुणं द्विधा । सगुणं वर्णभेदेन निगुणं केवलं तया ।। पृ० १३४ , [२७] जब नदीमें बाढ आता है तब वह चारों ओरसे बहने लगती है। योगका यही हाल हुआ, और वह आसन, मुद्रा प्राणायाम आदि वाह्य अंगों में प्रवाहित होने लगा। बाह्य अंगोंका भेद प्रभेद पूर्वक इतना अधिक वर्णन किया गया और उसपर इतना अधिक जोर दिया गया कि जिससे वह योगकी एक शाखा ही अलग बन गई, जो हठयोगके नामसे प्रसिद्ध है। हठयोगके अनेक ग्रन्थों में हठयोगप्रदीपिका, शिय- संहिता, घेरएडसंहिता, गोरक्षपद्धति, गोरक्षशतक आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं, जिनमें आसन, बन्ध, मुद्रा, पट्कर्म, कुंभक, रेचक, पूरक आदि बाह्य योगांगोंका पेट भर भरके वर्णन किया है, और घेरण्डने तो चौरासी आसनको चौरासी लाख तक पहुंचा दिया है । उक्त हठयोगप्रधान ग्रन्थों में हठयोगप्रदीपिका ही मुख्य है, क्यों कि उसीका विषय अन्य ग्रन्थों में विस्तार रूपसे वर्णन किया गया है। योगविषयक साहित्यके जिज्ञासुओंको योगतारावली, विन्दुयोग, योगबीज और योगकल्पद्रुमका नाम भी भूलना न चाहिये । विक्रमकी सत्रहवी शताब्दी में मैथिल पण्डित भवदेवद्वारा रचित योगनिबन्ध नामक हस्त- लिखित ग्रन्थ भी देखनेमें आया है, जिसमें विष्णुपुराण श्रादि अनेक ग्रन्थोंके हवाले दे कर योगसम्बन्धी प्रत्येक विषय पर विस्तृत चर्चा की गई है।
[२८]
संस्कृत भाषामें योगका वर्णन होनेसे सर्व साधारणकी
जिज्ञासाको शान्त न देख कर लोकभापाके योगियोंने भी
अपनी अपनी जवानमें योगका अलाप करना शुरु कर दिया।
महाराष्ट्रीय भाषामें गीताकी ज्ञानदेवकृत ज्ञानेश्वरी
टीका प्रसिद्ध है, जिसके छठे अध्यायका भाग बडा ही
हृदयहारी है। निःसन्देह ज्ञानेश्वरी द्वारा ज्ञानदेवने अपने
अनुभव और वाणीको अवन्ध्य कर दिया है। सुहीरोवा
अंबिये रचित नाथसम्प्रदायानुसारी सिद्धान्तसंहिता भी
योगके जिज्ञासुओंके लिये देखनेकी वस्तु है।
कबीरका बीजक ग्रन्थ योगसम्बन्धी भाषासाहित्यका
एक सुन्दर मणका है।
अन्य योगी सन्तोंने भी भाषामें अपने अपने योगानु-
भवकी प्रसादी लोगोंको चखाई है, जिससे जनताका बहुत
बडा भाग योगके नाम मात्रसे मुग्ध बन जाता है।
अत एव हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला आदि
प्रसिद्ध प्रत्येक प्रान्तीय भाषामें पातञ्जल योगशास्त्रका अनुवाद
तथा विवेचन आदि अनेक छोटे बडे ग्रन्थ बन गये है ।
अंग्रेजी आदि विदेशीय भाषामें भी योगशास्त्रपर अनुवाद
आदि बहुत कुछ बन गया है, जिसमें वूडका भाप्यटीका
सहित मूल पातञ्जल योगशास्त्रका अनुवाद ही विशिष्ट है ।
१ प्रो. राजेन्द्रलाल मिन, स्वामी विवेकानंद, श्रीयुत्
रामप्रसाद आदि कृत
,
[२६] जैन सम्प्रदाय निवृत्ति-प्रधान है। उसके प्रवर्तक भग- वान् महावीरने बारह सालसे अधिक समय तक मौन धारण करके सिर्फ आत्मचिन्तनद्वारा योगाभ्यासमें ही मुख्यतया जीवन बिताया। उनके हजारों शिष्य तो ऐसे थे जिन्होंने घरवार छोड कर योगाभ्यासद्वारा साधुजीवन विताना ही पसंद किया था। जैन सम्प्रदायके मौलिक ग्रन्थ आगम कहलाते हैं। उनमें साधुचर्याका जो वर्णन है, उसको देखनेसे यह स्पष्ट जान पडता है कि पांच यम; तप, स्वाध्याय आदि नियम; इन्द्रिय-जय-रूप प्रत्याहार इत्यादि जो योगके सास अङ्ग हैं, उन्हींको साधुजीवनका एक मात्र प्राण माना है। जैनशास्त्रमें योगपर यहां तक भार दिया गया है कि पहले तो वह मुमुक्षुओंको आत्मचिन्तनके सिवाय दूसरे कायोंमें प्रवृत्ति करनेकी संमति ही नहीं देता, और अनिवार्य रूपसे प्रवृत्ति करनी आवश्यक हो तो वह निवृत्तिमय प्रवृत्ति करनेको कहता है। इसी निवृत्तिमय प्रवृत्तिका नाम उसमें अष्टप्रवचनमाता है। साधुजीवनकी दैनिक और रात्रिक चउदसहि समसाहस्साहिं छत्तीसाहिं अनिपा- साहसीहिं उक्वाइसून। २ देसो पाचाराग, सूत्रकृतान, उत्तराध्ययन, दशवैकालिक, मूलाचार, धादि । ३ देखो उत्तराध्ययन अ. २४ । १ [३०] चर्या में तीसरे प्रहरके सिवाय अन्य तीनों प्रहरोंमें मुख्यतया स्वाध्याय और ध्यान करनेको ही कहा गया है। यह बात भूलनी न चाहिये कि जैन आगमोंमे योग- अर्थमें प्रधानतया ध्यानशब्द प्रयुक्त है । ध्यानके लक्षण, भेद, प्रभेद, आलम्बन आदिका विस्तृत वर्णन अनेक जैन आगोंमें है । अागमक बाद नियुक्तिका नंबर है। उसमें भी आगमगत ध्यानका ही स्पष्टीकरण है। वाचक उमा- स्वाति कृत तत्त्वार्थसूत्र में भी ध्यानका वर्णन है, पर उसमें १ दिवमस्स चउरो भाए, कुन्जा भिक्खु विअक्खणो । तो उत्तरगुणे कुजा, दिणभागेसु चउसु वि ॥ ११ ॥ पढम पोरिसि सज्झायं, बिइअं झाणं झिआयइ । तइआए गोअरकालं, पुणो चउत्थिए सझायं ।। १२ ।। रत्तिं पि चउरो भाए भिक्खु कुज्जा विश्रखणो । तो उत्तरगुणे कुजा राईभागेसु च उसु वि ॥ १७ ।। पढमं पोरिसि सज्झायं, बिइअं झाणं झिायइ । तइआए निमोक्खं तु चउत्थिए भुजो वि सज्झायं ।। १८॥ उत्तराध्ययन अ० २६ । २ देखो स्थानाग ०४ उद्देश ११ समवायाङ्ग स० ४। भगवती शतक-२५ उद्देश ७ | उत्तराध्ययन अ०३०, श्लो०३५। ३ देखो आवश्यकनियुक्ति कायोत्सर्ग अध्ययन गा. १४६२ -१४८६ । ४ देखो अ०९ सू० २७ से आगे ।
[३१] आगम और नियुक्तिकी अपेक्षा कोई अधिक बात नहीं है। जिनभद्रगणी क्षमाश्रमणका ध्यानशतक आगमादि उक्त अन्थोंमे वर्णित ध्यानका स्पष्टीकरण मात्र है, यहां तकके योगविषयक जैन विचारोंमें आगमोक्त वर्णनकी शैली ही प्रधान रही है। पर इस शैलीको श्रीमान् हरिभद्रसूरिने एकदम बदलकर तत्कालीन परिस्थिति व लोकरुचिके अनु- सार नवीन परिभाषा दे कर और वर्णनशैली अपूर्वसी बना- कर जैन योग-साहित्यमें नया युग उपस्थित किया । इसके सबूतमें उनके बनाये हुए योगविन्दु, योगदृष्टिसमुच्चय, योग- विशिका, योगशतक और पोडशक ये अन्य प्रसिद्ध हैं। इन ग्रन्थोंमें उन्होंने सिर्फ जैन-मार्गानुसार योगका वर्णन करके ही संतोप नहीं माना है, किन्तु पातञ्जलयोगसूत्र में वर्णित योगप्रक्रिया और उसकी खास परिभापाओं के साथ जैन संकेतोंका मिलान भी किया है। योगदृष्टिसमुच्चयमें १ देखो हारिभद्रीय यावश्यक वृत्ति प्रतिक्रमणाध्ययन पृ०५८१ २ यह प्रन्य जैन प्रन्यावालमें उल्लिखित है पृ० ११३ । ३ समाधिरेष एवान्यैः संप्रज्ञातोऽभिधीयते । सम्यकप्रकर्षरूपेण वृत्त्यर्थमानतस्तथा ॥ ४१८ ।। असंप्रज्ञात एपोऽपि समाधिर्गीयते परैः। निरुद्धाशेपवृत्त्यादिवत्स्वरूपानुवेधतः ॥४२०॥ इत्यादि. योगविन्दु।
[३२] योगकी आठ दृष्टियोंका जो वर्णन 'है, वह सारे योगसा- हित्यमें एक नवीन दिशा है। श्रीमान् हरिभद्रसूरिके योगविषयक ग्रन्थ उनकी योगा- भिरुचि और योगविषयक व्यापक घुद्धिके खासे नमूने है। इसके बाद श्रीमान् हेमचन्द्रमूरिकृत योगशास्त्रका नंबर आता है। उसमें पातजल-योगशास्त्र-निर्दिष्ट आठ योगा- गोंके क्रमसे साधु और गृहस्थ जीवनकी आचार-प्रक्रियाका जैन शैलीके अनुसार वर्णन है, जिसमें प्रासन तथा प्राणा- यामसे संबन्ध रखनेवाली अनेक बातोंका विस्तृत स्वरूप है। जिसको देखनेसे यह जान पडता है कि तत्कालीन लोगोंमें हठयोग-प्रक्रियाका कितना अधिक प्रचार था। हेमचन्द्रा- चायने अपने योगशासमें हरिभद्रमुरिक योगविपयक ग्रन्थोंकी नवीन परिभाषा और रोचक शैलीका कहीं भी उल्लेख नहीं किया है, पर शुभचन्द्राचार्य के ज्ञानार्णवंगत पदस्थ, पिएडस्थ, १ मित्रा तारा बला दीपा स्थिरा कान्ना प्रभा परा । नामानि योगदृष्टीनां लक्षणं च निबोधत ॥ १३ ॥ इन आठ दृष्टियोंका स्वरूप, दृष्टान्त आदि विषय, योग- जिज्ञासुओंके लिये देखने योग्य है। इसी विषयपर यशोविजय- जीने २१, २२, २३, २४ ये चार दात्रिंशिकायें लिखी हैं। साथ ही उन्होंने संस्कृत न जाननेवालोंके हितार्थ आठ दृष्टि- योंकी सज्झाय भी गुजराती भाषामें बनाई है .
।
[३३]
रूपस्थ, और रूपातीत ध्यानका विस्तृत व स्पष्ट वर्णन किया
है । अन्तमें उन्होंने स्वानुभवसे विक्षिप्त, यातायात, श्लिष्ट
और सुलीन ऐसे मनके चार भेदोंका वर्णन करके नवीनता
लानेका भी खास कौशल दिखाया है। निस्सन्देह उनका
योगशास्त्र जैनतत्त्वज्ञान और जैनाचारका एक पाठ्य ग्रन्थ है।
इसके बाद उपाध्याय-श्रीयशोविजयकृत योगग्रन्थोपर
नजर ठहरती है। उपाध्यायजीका शास्त्रज्ञान, तर्ककौशल
और योगानुभव बहुत गम्भीर था। इससे उन्होंने अध्या-
स्मसार, अध्यात्मोपनिपद् तथा सटीक बत्तीस बत्तीसीयाँ
योग संबन्धी विपयोंपर लिखी हैं, जिनमें जैन मन्तव्योंकी
सूक्ष्म और रोचक मीमांसा करनेके उपरान्त अन्य दर्शन
और जैनदर्शनका मिलान भी किया है। इसके सिवा
१ देखो प्रकाश ७-१० तक | २ १२ वाँ प्रकाश श्लोक
२-३-४। ३. अध्यात्मसारके योगाधिकार और ध्यानाधिकारमें
प्रधानतया भगवद्गीता तया पारसलसूत्रका उपयोग करके अनेक
जैनप्रक्रियाप्रसिद्ध ध्यानविपयोंका उक्त दोनों अन्योंके साथ
समन्वय किया है, जो बहुत ध्यानपूर्वक देखने योग्य है।
अध्यात्मोपनिषद्के शास्त्र, ज्ञान, क्रिया और साम्य इन चारों
योगोंमें प्रधानतया योगवाशिष्ठ तथा तैत्तिरीय उपनिषद्के
धाक्योंका अवतरण दे कर तात्त्विक ऐक्य बतलाया है। योगा-
वतार पत्तीसीमें सास कर पातखल योगके पदार्थाका जनप्रक्रिया के
अनुसार स्पष्टीकरण किया है।
[३४] उन्होंने हरिभद्रसूरिकृत योगविंशिका तथा पोडशकपर टीका लिख कर प्राचीन गूढ तत्त्वोंका स्पष्ट उद्घाटन भी किया है। इतना ही करके वे सन्तुष्ट नहीं हुए, उन्होंने महर्षि- पतञ्जलिकृत योगसूत्रोंके उपर एक छोटीसी वृत्ति भी लिखी है। यह वृत्ति जैन प्रक्रियाके अनुसार लिखी हुई है, इस- लिये उसमें यथासंभव योगदर्शनकी भित्ति-स्वरूप सांख्य- प्रक्रियाका जैनप्रक्रियाके साथ मिलान भी किया है, और अनेक स्थलोंमें उसका सयुक्तिक प्रतिवाद भी किया है । उपाध्यायजीने अपनी विवेचनामें जो मध्यस्थता, गुणग्राह- कता, सूक्ष्म समन्वयशक्ति और स्पष्टभापिता दिखाई है ऐसी दूसरे आचार्योंमें बहुत कम नजर आती है। एक योगसार नामक ग्रन्थ भी श्वेताम्बर साहित्यमें है। कर्ताका उल्लेख उसमें नहीं है, पर उसके दृष्टान्त आदि वर्णनसे जान पडता है कि हेमचन्द्राचार्यके योगशास्त्रके १. इसके लिये उनका ज्ञानसार जो उन्होंने अंतिम जीवनमें लिखा मालूम होता है वह ध्यानपूर्वक देखना चाहिये । शास्त्रवार्तासमुच्चयकी उनकी टीका(पृ०१०)भी देखनी आवश्यक है। २. इसके लिये उनके शास्त्रवाप्तिमुपयादि प्रन्थ ध्यान- पूर्वक देखने चाहिये, और खास कर उनकी पातखल सूत्रवृत्ति मननपूर्वक देखनेसे हमारा कथन अक्षरशः विश्वसनीय मालूम पडेगा।
[३५] आधारपर किसी श्वेताम्बर आचार्यके द्वारा वह रचा गया है। दिगम्बर साहित्यमें ज्ञानार्णच तो प्रसिद्ध ही है, पर ध्यानसार और योगप्रदीप ये दो हस्तलिखित ग्रन्थ भी हमारे देखने में आये हैं, जो पद्यवन्ध और प्रमाणमें छोटे हैं। इसके सिवाय श्वेताम्बर दिगम्बर संप्रदायके योगविषयक ग्रन्थोंका कुछ विशेष परिचय जैन ग्रन्थावलि पृ० १०६ से भी मिल सकता है। बस यहांतकहीमें जैन योगसाहित्य समाप्त हो जाता है। चौद्ध सम्प्रदाय भी जैन सम्प्रदायकी तरह निवृत्तिप्रधान है। भगवान् गौतम बुद्धने बुद्धत्व प्राप्त होनेसे पहले छह वर्ष- तक मुख्यतया ध्यानद्वारा योगाभ्यास ही किया। उनके हजारों शिप्य भी उसी मार्ग पर चले। मौलिक बौद्धग्रन्थों- में जैन आगमोंके समान योग अर्थमें बहुधा ध्यान शब्द ही मिलता है, और उनमें ध्यानके चार भेद नजर आते हैं। उक्त चार भेदके नाम तथा भाव प्रायः वही हैं, जो जैनदर्शन तथा योगदर्शनकी प्रक्रियामें हैं। चौद्ध सम्प्रदायमें समाधि- १. सो खो अहं ब्राह्मण विविश्व कामेहि विविध अकुस- लेहि धम्मेहि सवितर्फ सविचारं विवेकज पीतिसुखं पढमज्मानं उपसंपज विहासि; वितक विचारानं चूपसमा अग्मत्तं संपसादनं चेतसो एकोदिभावं अवितर्फ अविचारं समाधिजं पीतिसुखं दुनि- यज्मानं उपसंपज विहासि; पीविया प विरागा उपेक्सको प .
-
[३६]
राज नामक ग्रन्थ भी है । वैदिक जैन और बौद्ध संप्रदायक
योगविषयक साहित्यका हमने बहुत संक्षेपमें अत्यावश्यक
परिचय कराया है, पर इसके विशेष परिचयके लिये--
लोगस् कॅटलॉगॉरम्, वो० १ पृ० ४७७ से ४८१ पर जो
योगविषयक ग्रन्थोंकी नामावलि है यह देखने योग्य है।
विहासि, सतो च संपजानो सुखं च कायेत पटिसनेदेसि, यं तं
अरिया श्राविक्खन्ति-उपेक्खको सतिमा सुखविहारीऽति तति-
यज्झानं उपसंपन्ज विहासिं, सुखस्स च पहाना दुक्खस्स च
पहाना पुयशव सोमनस्स दोमनस्सान अत्यंगमा अदुक्खमसुत्रं
उपेक्षासति पारिसुद्धिं चतुत्थज्झानं उपसंपज मज्झिमनिकाये
भयभेखसुत्त विहासि।
इन्ही चार ध्यानोंका वर्णन दीघनिकाय सामञ्चकफलसुत्तमें
है। देखो प्रो. सि. वि. राजवाडे कृत मराठी अनुवाद पृ ७२ ।
वही विचार प्रो. धर्मानंद कौशाम्बी लिखित बुद्धनीलासार
संग्रहमें है । देसो पृ. १२८ ।
जैनसूत्र में शुक्लध्यानके भेदोंका विचार है, उसमें उक्त
सवितर्क आदि चार ध्यान जैसा ही वर्णन है । देखो तत्त्वार्थ
अ०६ सू०४१-४४ ।
योगशानमें संप्रज्ञात समाधि तथा समापत्तिोंका वर्णन
है। उसमें भी उक्त सवितर्क निर्वितर्क आदि ध्यान जैसा ही
विचार है । पा. सू. पा. १-१७, ४२, ४३, ४४१
१धिआडोरे पाउमटकृत लिझिगमें प्रकाशित १८९१
की प्रावृत्ति ।
[३७] यहां एक वात खास ध्यान देनेके योग्य है, वह यह कि यद्यपि चैदिक साहित्यम अनेक जगह हठयोगकी प्रथाको अग्राह्य कहाँ है, तथापि उसमें हठयोगकी प्रधानतावाले अनेक ग्रन्थोंका और मार्गोका निर्माण हुआ है। इसके विप- रीत जैन और बौद्ध साहित्यमें हठयोगने स्थान नहीं पाया है, इतना ही नहीं, बल्कि उसमें हठयोगका स्पष्ट निपेध भी किया है। १ उदाहरणार्थ:- सतीपु युक्तिप्वेतासु हठानियमयन्ति ये। चेतस्ते दीपमुत्सृज्य विनिम्नन्ति तमोऽसनैः ।। ३७ ॥ विमूढा कर्तुमुद्युक्ता ये हठाञ्चेतसो जयम् । वे निबध्नन्ति नागेन्द्रमुन्मत्तं विसतन्तुभिः ॥ ३८॥ चित्तं चित्तस्य वाऽदूरं संस्थितं स्वशरीरकम् । साधयन्ति समुत्सृज्य युक्ति ये तान्हतान् विदुः ॥३६॥ योगवाशिष्ठ-उपशम प्र० सर्ग ६२. २ इसके उदाहरणमें बौद्ध धर्ममें बुद्ध भगवानने तो शुरुमें कष्टप्रधान तपस्याका आरंभ करके अंतमें मध्यमप्रतिपदा मार्गका स्वीकार किया है-देखो बुद्धलीलासारसंग्रह. . जैनशास्त्र में श्रीभद्रयाहुन्वामिने अावश्यपनियुक्तिमें " असा- संण णिरुंभइ" १५२० इत्यादि उक्तिसे हठयोगका ही निरा- करण किया है। श्रीहेमचन्द्राचार्य ने भी अपने योगशास्त्र में [३८] योगशास्त्र-ऊपरके वर्णनसे मालूम हो आता है कि-योगप्रक्रियाका वर्णन करनेवाले छोटे बडे अनेक ग्रन्थ हैं । इन सब उपलब्ध ग्रन्थोंमें महर्पि-पतञ्जलिकृत योगशास्त्रका अासन ऊंचा है । इसके तीन कारण हैं-१ ग्र- न्थकी संक्षिप्तता तथा सरलता, २ विषयकी स्पष्टता तथा पूर्णता, ३ मध्यस्थभाव तथा अनुभवसिद्धता । यही कारण है कि योगदर्शन यह नाम सुनते ही सहसा पातञ्जल योग- सूत्रका स्मरण हो आता है । श्रीशंकराचार्यने अपने ब्रह्ममू- भाष्यमें योगदर्शनका प्रतिवाद करते जो " अथ स- म्यग्दर्शनाभ्युपायो योगः " ऐसा उल्लेख किया है, उससे इस बातमें कोई संदेह नहीं रहता कि उनके सामने पात- खल योगशास्त्रसे भिन्न दूसरा कोइ योगशास्त्र रहा है । क्यों कि पातञ्जल योगशास्त्रका प्रारम्भ अथ योगानुशा- सनम्" इस सूत्रसे होता है, और उक्त भाष्योल्लिखित वाक्य- में भी ग्रन्थारम्भसूचक अथ शब्द है, यद्यपि उक्त भाष्यमें " तन्नाप्नोति मनःस्वास्थ्यं प्राणायामः कर्थितं । प्राणस्यायमने पीडा तस्यां स्यात् चित्तविप्लवः ।। इत्यादि उक्तिसे उसी बावको दोहराया है। श्रीयशोविजयजीने भी पातञ्जलयोगसूत्रकी अपनी वृत्तिमें (१-३४) प्राणायामको योगका अनिश्चित साधन कह फर हठयोगका ही निरसन किया है। १ ब्रह्मसून २-१-३ भाप्यगत । .
[३६] अन्यत्र और भी योगसम्बन्धी दो उल्लेख हैं, जिनमें एक तो पातजल योगशास्त्रका संपूर्ण सूत्र ही है, और दूसरा उसका अविकल सूत्र नहीं, किन्तु उसके सूत्रसे मिलता जुलता है। तथापि “अथ सम्यग्दर्शनाभ्युपायो योगः" इस उल्लेखकी शब्दरचना और स्वतन्त्रताकी ओर ध्यान देनेसे यही कहना पडता है कि पिछले दो उल्लेख भी उसी भिन्न योगशास्त्रके, होने चाहिये, जिसका कि अंरा “अथ सम्यग्दर्शनाभ्युपायो योगः यह वाक्य माना जाय । अस्तु, जो कुछ हो, आज हमारे सामने तो पतञ्जलिका ही योगशास्त्र उपस्थित है, और वह सर्वप्रिय है । इसलिये बहुत संक्षेपमें भी उसका बाह्य तथा आन्तरिक परिचय कराना अनुपयुक्त न होगा। इस योगशास्त्र के चार पाद और कुल सूत्र १६५ हैं । पहले पादका नाम समाधि, दूसरेका साधन, तीसरेका विभूति, स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः" ब्रह्मसूत्र १-३-३३ भाष्यगत । योगशास्त्रप्रसिद्धाः मनसः पञ्च वृत्तयः परिगृह्यन्ते, "प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः नाम" २-४-१२ भाष्यगत | पं वासुदेव शास्त्री अभ्यंकरने अपने ब्रह्मसूत्र के मराठी अ- नुवादके परिशिष्टमें उक्त दो उल्लेखोंका योगसूत्ररूपसे निर्देश किया है, पर "अथ सम्यग्दर्शनाभ्युपायो योगः" इस उल्लेख के संबंध में कहीं भी ऊहापोह नहीं किया है. २ मिलाओ पा. २ सू. ४४ । ३,मिलामो पा. ' सू.६। १
।
[४०]
और चौथेका कैवल्यपाद है । प्रथमपादमें मुख्यतया योगका
स्वरूप, उसके उपाय और चित्तस्थिरताके उपायोंका वर्णन
है । दूसरे पादमें क्रियायोग, आठ योगाश, उनके फल तथा
चतुर्ग्रहका मुख्य वर्णन है ।
तीसरे पादमें योगजन्य विभूतियोंके वर्णनकी प्रधानता
है। और चौथे पादमें परिणामवादके स्थापन, विज्ञानवादके
निराकरण तथा कैवल्य अवस्थाके स्वरूपका वर्णन मुख्य
है। महर्षि पतञ्जलिने अपने योगशास्त्रकी नीव सांख्यसि-
द्धान्तपर डाली है। इसलिये उसके प्रत्येक पादके अन्तमें
" योगशास्त्रे सांख्यप्रवचने" इत्यादि उल्लेख मिलता है।
"सांख्यप्रवचने" इस विशेपणसे यह स्पष्ट ध्वनित होता है
कि सांख्यके सिवाय अन्यदर्शनके सिद्धांतोंके आधारपर भी
रचे हुए योगशास्त्र उस समय मौजुद थे या रचे जाते थे
इस योगशास्त्रके ऊपर अनेक छोटे बडे टीका ग्रन्थ है, पर
१ हेय, हेयहेतु, हान, हानोपाय ये चतुर्गृह करलाते हैं।
इनका वर्णन सूत्र १६-२६ तक है।
२ व्यास कृत भाष्य, वाचस्पतिकृत तत्त्ववैशारदी टीका,
भोजदेवकृत राजमार्तड, नागोजीमट्ट कृत वृत्ति, विज्ञानभिक्षु कृत
वार्तिक, योगचन्द्रिका, मणिप्रभा, भानागणेशीय वृत्ति, बालरामो-
सीन कृत टिप्पण धादि।
.
+
,
[४१] व्यासकृत भाष्य और वाचस्पतिकृत टीकासे उसकी उपादेयता बहुत बढ़ गई है। सब दर्शनोंके अन्तिम साध्यके सम्बन्धमें विचार किया जाय तो उसके दो पक्ष दृष्टिगोचर होते है। प्रथम पक्षका अन्तिम साध्य शाश्वत सुख नहीं है। उसका मानना है कि मुक्तिमें शाश्वत सुख नामक कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, उसमें जो कुछ है वह दुःखकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही। दूसरा पक्ष शाश्वतिक सुखलाभको ही मोक्ष कहता है । ऐसा मोच हो जानेपर दुःखकी आत्यन्तिक निवृत्ति आप ही आप हो जाती है । वैशेषिक, नैयायिक, सांख्य, योग और बौद्ध- दर्शन प्रथम पक्षके अनुगामी है । वेदान्त और जैनदर्शन, दूसरे पक्षके अनुगामी हैं। १॥ तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्ग:" न्यायदर्शन १-१-२२ । २ ईश्वरकृष्णकारिका १। ३ उसमें हानतत्व मान कर दुःखके प्रात्यन्तिक नाशको ही हान कहा है । ४ बुद्ध भगवानके तीसरे निरोध नामक आर्यसत्यका मतलब दुःख नाशसे है । ५ वेदान्त दर्शनमें ब्रह्मको सच्चिदानंदस्वरूप माना है, इसीलिये उसमें नित्यसुखकी अभिव्यक्तिका नाम ही मोक्ष है । ६ जैन दर्शनमें भी आत्माको सुसस्वरूप माना है, इसलिये मोर में स्वाभाविक सुसकी अभिव्यक्ति ही उस दर्शनको मान्य है।
[४२] योगशास्त्रका विषय-विभाग उसके अन्तिमसाध्यानुसार ही है। उसमें गौण मुख्य रूपसे अनेक सिद्धान्त प्रतिपादित हैं, पर उन सबका संक्षेपमें वर्गीकरण किया जाय तो उसके चार विभाग हो जाते हैं। १ हेय २ हेय-हेतु ३ हान ४ हानो- पाय । यह वर्गीकरण स्वयं सूत्रकारने किया है। और इसीसे भाष्यकारने योगशास्त्रको चतुर्युहात्मक कहा है। सांख्पमू- में भी यही वर्गीकरण है । बुद्ध भगवान्ने इसी चतुर्ग्रहको आर्य-सत्य नामसे प्रसिद्ध किया है। और योगशास्त्रके आठ योगाङ्गोंकी तरह उन्होंने चौथे आर्य-सत्यके साधनरूपसे आर्य अष्टाङ्गमार्गका उपदेश किया है । दुःख हेय है, अविद्या हेयका कारण है, दुःखका १ यथा चिकित्साशास्त्रं चतुर्म्यहम्-रोगो रोगहेतुगरोग्यं भैषज्यमिति, एवमिदमान शास्त्रं चतुर्दूहमेव । तद्यथा-सारः संसारहेतुर्मोक्ष मोक्षोपाय इति । तत्र दुःखबहुलः सं गरो हेयः । प्रधानपुरुपयोः संयोगो हेयहेतुः। संयोगस्यात्यन्तिको निवृत्ति- हनिम् । हानोपाय: सम्यग्दर्शनम् । पा० २ सू० १५ भाध्य । २ सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाचा, सम्यक् फर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि । बुद्धलीलासार संग्रह. पृ. १५० ॥ ३ " दुःखं हेयमनागतम्" २-१६ यो. सू। ४ द्रदृदृश्ययोः संयोगो हेय हेतु: २-१७1 तस्य हेतुरचिद्या"२-२४ यो.मू.। ,
[४३]
श्रात्यन्तिक नाश हान है, और विवेक-ख्याति हामका
उपाय है।
उक्त वर्गीकरणकी अपेक्षा दूसरी रीतिसे भी योगशा-
स्त्रका विपय-विभाग किया जा सकता है । जिससे कि उसके
मन्तव्योंका ज्ञान विशेष स्पष्ट हो । यह विभाग इस प्रकार
है-१ हाता २ ईश्वर ३ जगत् ४ संसार- मोक्षका स्वरूप,
और उसके कारण ।
१ हाता दुःखसे छुटकारा पानेवाले द्रष्टा अर्थात्
चेतनका नाम है। योग-शास्त्रमें सांख्य वैशेपिर्क, नैयायिक,
बौद्ध, जैन और पूर्णप्रज्ञ (म) दर्शनके समान द्वैतवाद
"तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम्"
२-२६ यो. सू । २ "विवेकख्यातिरविसवा हानोपायः
२.२६. यो. सू । ३ "पुरुपबहुत्वं सिद्ध” ईश्वरकृष्णकारिका-
१८।४ " व्यवस्थातो नाना "-३-२-२०-वैशेषिकदर्शन ।
५ "पुद्गलजीवास्त्वनेकद्रव्याणि"-५-५. सस्वार्थसूत्र-भाष्य ।
६ जीवेश्वरभिदा चैव जडेश्वरभिदा तथा ।
जीवभेदो मिथश्चैव जडजीवभिदा तथा ।
मिथश्च जडभेदो यः प्रपञ्चो भेदपञ्चकः ।
सोऽयं सत्योऽप्यनादिश्व सादिश्वेन्नाशमाप्नुयात् ॥
सर्वदर्शनसंग्रह पूर्णप्रज्ञदर्शन |
.
"
[४४] अर्थात अनेक चेतन माने गये हैं। योगशास्त्र चेतनको जैन दर्शनकी तरह देहप्रमाण अर्थात् मध्यमपरिमाणवाला नहीं मानता, और मध्वसम्प्र- दायकी तरह अणुप्रमाण भी नहीं मानता, किन्तु सांख्य, वैशेषिक, नैयायिक और शांकरवेदान्तकी तरह वह उसको व्यापक मानता है। इसी प्रकार वह चेतनको जैनदर्शनकी तरह परिणामि- १ "कृतार्थ प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्" २-२२ यो स्. । २. " असंख्येयभागादिपु जीवानाम् " । १५ । "प्रदेशसंहारविसर्गाभ्यां प्रदीपवत् " १६-तत्त्वार्थसूत्र अ०५ । ३. देखो "उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्"। ब्रह्मसूत्र २-३-१८ पूर्णप्रन भाप्य । तथा मिलान करो अभ्यंकरशाषी करा मराठी शांकरभाष्य अनुवाद भा. ४ पृ. १५३ टिप्पण ४६ । "निष्क्रियस्य तदसम्भवात् " सां. सू. १-४६. निष्क्रियस्य-विभोः पुरुषस्य गत्यसम्भवात्-माप्य विज्ञानभितु । ५. विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा।" ७-१-२२-चै. द.। ६. देखो व्र. सू. २-1-२९. भाग्य । ७. इसलिये कि योगशास्त्र यात्मस्वरूपके विषय में सांख्य- सिद्धान्तानुसारी है। . "नित्यावस्थितान्यरूपाणि" | "उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सन्"। २६ । "सदायाव्ययं नित्यम्" 101वत्वार्थसूत्र १०५ भाष्य सहित ४.
" [४५] नित्य नहीं मानता, और न बौद्ध दर्शनकी तरह उसको क्षणिक-अनित्य ही मानता है, किन्तु सांख्य आदि उक्त शेष दर्शनोंकी तरह वह उसे कूटस्थ-नित्य मानता है। २ ईश्वरके सम्बन्धमें योगशास्त्रका मत सांख्य दर्शनसे भिन्न है । सांख्य दर्शन नाना चेतनोंके अतिरिक ईश्वरको नहीं मानता, पर योगशास्त्र मानता है । योगशास्त्र-सम्मत ईश्वरका स्वरूप नैयायिक, वैशेपिक आदि दर्शनों में माने गये ईश्वरस्वरूपसे कुछ भिन्न है। योगशास्त्रने ईश्वरको एक अलग व्यक्ति तथा शास्त्रोपदेशक माना है सही, पर उसने नैयायिक आदिकी तरह ईश्वरमें नित्यज्ञान, नित्यईच्छा और नित्यकृतिका सम्बन्ध न मान कर इसके स्थानमें सत्त्वगुणका १. देखो ई० कृ० कारिका ६३ सांख्यतत्त्वकौमुदी । देखो न्यायदर्शन ४-१-१० । देखो ब्रह्मसूत्र २-१-१४ । २-१-२७ । शांकरभाष्य सहित । २. देखो योगसूत्र. " सदाज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्रभोः पुरुपस्य अपरिणामित्वात्" ४-१८| "चिरप्रतिसंक्रमायास्तदाऽकारापत्ती स्वबुद्धिसंवेदनम्" ४--२२ । तथा " द्वयी चेयं नित्यता, कूटस्थ- नित्यता, परिणामिनित्यता च । तत्र कूटस्थनित्यता पुरुपत्य, परिणामिनित्यता गुणानाम्" इत्यादि ४-३३-भाष्य । ३ देखो सांख्यसूत्र १-६२ आदि ।
[४६] परमप्रकर्ष मान कर तद्द्वारा जगउद्धारादिकी सब व्यवस्था घटा दी है। ३ योगशास्त्र दृश्य जगत्को न तो जैन, वैशेपिक, नैयायिक दर्शनोंकी तरह परमाणुका परिणाम मानता है, न शांकरवेदान्तदर्शनकी तरह ब्रह्मका विवर्त या ब्रह्मका परिणाम ही मानता है, और न चौद्धदर्शनकी तरह शून्य या विज्ञानात्मक ही मानता है, किन्तु सांख्य दर्शनकी तरह वह उसको प्रकृतिका परिणाम तथा अनादि-अनन्त-प्रवाह- स्वरूप मानता है। ४ योगशास्त्रमें वासना, क्लेश और कर्मका नाम ही संसार, तथा वासनादिका अभाव अर्थात् चेतनके स्वरूपाव- स्थानका नाम ही मोक्षं है। उसमें संसारका मूल कारण अविद्या और मोक्षका मुख्य हेतु सम्यग्दर्शन अर्थात् योग- जन्य विवेकख्याति माना गया महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टिविशालना-यह पहले है १ यद्यपि यह व्यवस्था मूल योगसूत्रमें नहीं है, परन्तु भाष्यकार तथा टीकाकारने इसका उपपादन किया है । देसो पातखल यो सू पा. १ सू २४ भाष्य तथा टीका । २ तदा द्रष्टुः स्वरूपावस्थानम् । १-३ मेगसूत्र ।
[४७] कहा जा चुका है कि सांख्य सिद्धान्त और उसकी प्रक्रियाको ले कर पतञ्जलिने अपना योगशास्त्र रचा है, तथापि उनमें एक ऐसी विशेपता अर्थात् दृष्टिविशालता नजर आती है जो अन्य दार्शनिक विद्वानोंमें बहुत कम पाई जाती है। इसी विशेषताके कारण उनका योगशास्त्र मानों सर्वदर्शन- समन्वय बन गया है। उदाहरणार्थ सांख्यका निरीश्वरवाद जब वैशेषिक, नैयायिक आदि दर्शनोंके द्वारा अच्छी तरह निरस्त हो गया और साधारण लोक-स्वभावका झुकाव भी ईश्वरोपासनाकी ओर विशेप मालूम पडा, तर अधिकारि- भेद तथा रूचिविचित्रताका विचार करके पतञ्जलिने अपने योगमार्गमें ईश्वरोपासनाको भी स्थान दिया, और ईश्वरके स्वरूपका उन्होंने निष्पक्ष भावसे ऐसा निरूपण किया है जो सवको मान्य हो सके। पतञ्जलिने सोचा कि उपासना करनेवाले सभी लोगोंका साध्य एक ही है, फिर भी वे उपासनाकी भिन्नता और उपासनामें उपयोगी होनेवाली प्रतीकोंकी भिन्नताके व्या- १ "ईश्वरप्रणिधानाद्वा" १-३३ । २ केशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः" "तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्"। "पूर्वेषामपि गुरुः कालेना- नवच्छेदात्"। (१-२४, २५, २६) . [४] मोहमें अज्ञानवश आपस आपसमें लड मरते हैं, और इस धार्मिक कलहमें अपने साध्यको लोक भूल जाते हैं। लोगोंको इस धज्ञानसे हटा कर सत्पथपर लानेके लिये उन्होंने कह दिया कि तुम्हारा मन जिसमें लगे उसीका ध्यान करो । जैसी प्रतीक तुम्हें पसंद आवे वैसी प्रतीककी ही उपासना करो, पर किसी भी तरह अपना मन एकाग्र व स्थिर करो। और तद्द्वारा परमात्म-चिन्तनके सच्चे पात्र पनों । इस उदारताकी मूर्तिस्वरूप मतभेदसहिष्णु आदेशके द्वारा पतञ्जलिने सभी उपासकोंको योग-मार्गमें स्थान दिया, और ऐसा करके धर्मके नामसे होनेवाले कल- हको कम करनेका उन्होंने सच्चा मार्ग लोगोंको बतलाया । यथाऽभिमतध्यानाद्वा १-३६ इसी भावकी सूचक महाभारतमें- ध्यानमुत्पादयत्यत्र, संहिताबलसंश्रयात् यथाभिमतमन्त्रेण, प्रणवाद्यं जपेत्कृती ॥ शान्तिपर्व प्र. १६४ श्लो. २० यह उक्ति है। और योगवाशिष्ठमें- यथाभिवाञ्छितध्यानाचिरमेकतयोदितात् । एकतत्त्वधनाभ्यासाप्राणस्पन्दो निरुध्यत ।। उपशम प्रकरण सर्ग ७८ लो. १६ यह कि है। or - .
. [४] उनकी इस दृष्टिविशालताका असर अन्य गुण-प्राही आचा- योपर भी पडा, और वे उस मतभेदसहिष्णुताके तत्त्वका मर्म समझ गये। १. पुष्पैश्च बलिना चैव वनैः स्तोत्रैश्च शोभनैः । देवानां पूजन ज्ञेयं शौचश्रद्धासमन्वितम् ॥ अविशेषेण सर्वेषामधिमुक्तिवशेन वा । गृहिणां माननीया यत्सर्वे देवा महात्मनाम् ।। सर्वान्देवान्नमस्यन्ति नैकं देवं समाश्रिताः । जितेन्द्रिया जितक्रोधा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ चारिसंजीवनीचारन्याय एष सतां मतः। नान्यथावेष्टसिद्धिः स्याद्विशेषेणादिकर्मणाम् ॥ गुणाधिक्यपरिक्षानाद्विशेषेऽप्येतदिष्यते । अद्वषेण तदन्येषां वृत्ताधिक्ये तथात्मनः ॥ योगबिन्दु श्लो. १६-२० जो विशेषदर्शी होते हैं, वे तो कीसी प्रतीक विशेष या उपासना विशेषको स्वीकार करते हुए भी अन्य प्रकारको प्रतीक माननेवालों या अन्य प्रकारकी उपासना करनेवालोंसे द्वेष नहीं रखत, पर जो धर्माभिमानी प्रथमाधिकारी होते हैं वे प्रतीकभेद या उपा- सनाभेदके व्यामोहसे ही प्रापसमें लड मरते हैं। इस अनिष्ट तसको दूर करनेके लिये ही श्रीमान् हरिभद्रसूरिने उक्त पद्यों में प्रथमाधिकारीके लिये सब देवोंकी उपासनाको लाभदायक यत- आठ- . [५०] वैशेषिक, नैयायिक आदिकी ईश्वरविषयक मान्यताका तथा साधारण लोगोंकी ईश्वरविषयक श्रद्धाका योगमार्गमें उपयोग करके ही पतञ्जलि चुप न रहे, पर उन्होंने चैदिके- लानेका उदार प्रयत्न किया है। इस प्रयत्लका अनुकरण श्री- यशोविजयजीने भी अपनी " पूर्वसेवाद्वात्रिंशिका " रष्टियोंकी समाय आदि अन्थोंमें किया है। एकदेशीयसम्प्र- पायाभिनिवेशी लोगोंको समजाने के लिये 'चारिसंजीवनीचार न्यायका उपयोग उक्त दोनों प्राचार्योने किया है । यह न्याय बडा मनोरखक और शिक्षाप्रद है। इस समभावसूचक दृष्टान्तका उपनय श्रीज्ञानविमलने आठदृष्टिकी सज्माय पर किये हुए अपने गूजराती टबेमें बहुत अच्छी तरह घटाया है, जो देखने योग्य है। इसका भाव संक्षेपमें इस प्रकार है। कीसी स्त्रीने अपनी सखीसे कहा कि मेरा पति मेरे अधीन न होनेसे मुझे वडा कष्ट है, यह सुन कर उस प्रांगन्तुक सखीने कोई जडी खिला कर उस पुरुषको बैल बना दिया, और वह अपने स्थानको चली गई। पतिके बैल चनजानेसे उसकी पली दुःखित हुई, पर फिर वह पुरुषरूप चनानेका उपाय न जाननेके कारण उस बैलरूप पतिको चराया करती थी, और उसकी सेवा किया करती थी। कीसी समय अचानक एक विद्याधरके मुखसे ऐसा सुना कि अगर बैलरूप पुरुषको संजीवनी नामक जही चराई जाय तो वह फिर असली रूप [१] तर दर्शनोंके सिद्धान्त तथा प्रक्रिया जो योगमार्गके लिये सर्वथा उपयोगी जान पडी उसका भी अपने योगशास्त्रमें बडी उदारतासे संग्रह किया। यद्यपि बौद्ध विद्वान् नागार्जुनके विज्ञा- नवाद तथा प्रात्मपरिणामित्ववादको युक्तिहीन समझ कर या योगमार्गमें अनुपयोगी समझ कर उसका निरसन चौथे पाद में किया है, तथापि उन्होंने बुद्धभगवान्के परमप्रिय चार नार्यसत्योंका हेय, हेयहेतु, हान और होनोपाय रूपसे स्वी- कार निःसंकोच भावसे अपने योगशास्त्रमें किया है । धारण कर सकता है । विद्याधरसे यह भी सुना कि वह जडी अमुक वृक्षके नीचे है, पर उस वृक्षके नीचे अनेक प्रकारकी वनस्पति होने के कारण वह स्त्री संजीवनीको पहचाननेमें असमर्थ थी। इससे उस दुःखित स्त्रीने अपने चैलरूपधारि पतिको सप वनस्पतियाँ चरा दी । जिनमें संजीवनीको भी वह बैल घर गया, और बैलरूप छोड कर फिर मनुष्य बन गया। जैसे विशेष परीक्षा न होने के कारण उस स्त्रीने सय वनस्पतियोंके साथ संजीवनी खिला कर अपने पतिका कृत्रिम वैलरूप छुडाया, और असली मनुष्यत्वको प्राप्त कराया, वैसे ही विशेष परीक्षाविकल प्रयमा- धिकारी भी सय देवोंकी समभावसे उपामना करते करते योगमार्गमें विकास करके इष्ट लाम कर सकता है । १ देसो सू० १५, १८॥ २ दुःख, समुदय, निरोष सौर मार्ग ।
[२]
जैन दर्शनके साथ योगशास्त्रका सादृश्य तो अन्य सब
दर्शनोंकी अपेक्षा अधिक ही देसनेमें आता है। यह बात
स्पष्ट होनेपर भी बहुतोंको विदित ही नहीं है, इसका सबब
यह है कि जैनदर्शनके खास अभ्यासी ऐसे बहुत कम है
जो उदारता पूर्वक योगशास्त्रका श्रमलोकन करनेवाले हों,
और योगशास्त्रके खास अभ्यासी भी ऐसे बहुत कम हैं
जिन्होंने जैनदर्शनका बारीकीसे ठीक ठीक अवलोकन किया
हो । इसलिये इस विषयका विशेष खुलासा करना यहाँ
अप्रासनिक न होगा।
योगशास्त्र और जैनदर्शनका सादृश्य मुख्यतया तीन
प्रकारका है । १ शब्दका, २ विपयका और ३ प्रक्रियाका ।
१ मूल योगसूत्रमें ही नहीं किन्तु उसके भाष्यतकमें
ऐसे अनेक शब्द हैं जो जैनेतर दर्शनों में प्रसिद्ध नहीं हैं, या
बहुत कम प्रसिद्ध हैं, किन्तु जैन शास्त्रमें खास प्रसिद्ध हैं।
जैसे-भवप्रत्यय, सवितर्क सविचार निर्विचार, महावत, कत
१ "भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।" योगसू. १-१६।
" भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् " तत्त्वार्थ अ. १-२२ ।
२ ध्यानविशेषरूप अर्थमें ही जैनशास्त्रमें ये शब्द इस प्रकार
हैं" एकाश्रये सवितः पूर्वे" (तत्वार्थ अ. ९-४३)
-
भाष्य " तत्त्वा- [५३] कारित अनुमोदित, प्रकाशावरण, सोपक्रम निरूपक्रम, वज्रसं- सविचार प्रथमम् अविचार द्वितीयम् ६-४४ । योगसूत्रमें ये शब्द इस प्रकार आये हैं.-"तन श- ब्दार्थज्ञानविकल्पैः सकीर्णा सवितर्का समापत्तिः"" स्मृतिपरि- शुद्धौ स्वरूपशून्येार्थमात्रनिर्भासा निर्वितको" "एतयेव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता १-४२, ४३, ४४॥ ३ जैनशास्त्रमें मुनिसम्बन्धी पाँच यमोंके लिये यह शब्द बहुत ही प्रसिद्ध है । " सर्वतो विरतिर्महायतमिति " तत्त्वार्थ श्र०७-२ भाष्य । यही श द उसी अर्थमें योगसून २-३१ में है। ४ ये शब्द जिस भावके लिये योगसूत्र प्रयुक्त हैं, उसी भाव में जैनशास्त्रमें भी आते हैं, अन्तर सिर्फ इतना है कि जैवप्रन्थोंमें अनुमोदितके स्थानमें बहुधा अनुमत- शन्द प्रयुक्त होता है । देखो-तत्त्वार्थ, अ. ६-६। ५ यह शद योगसूत्र २-५२ तथा ३-४३ में है। इसके स्थानमें जैनशास्त्र में ज्ञानावरण शब्द प्रसिद्ध है। देखो तत्त्वार्थ, अ ६-११ आदि। ६ ये शब्द योगसूत्र ३-२२ में हैं। जैन कर्मविषयक साहि- त्यमें ये शब्द 'हुत प्रसिद्ध है। तत्त्वार्थ में भी इनका प्रयोग हुमा है, देखो-अ २-५२ माप्य । ७ यह शब्द योगसूत्र (३-४६ ) में प्रयुक्त है। इसके स्थानमें जैन प्रन्योंमें । वसपमनाराचसंहनन' ऐसा शब्द मिलता है । देखो तत्त्वार्थ (1० ८-१२) भाष्य | २-३१ में . , , + [५४ ] हनन, केवली, कुशल, ज्ञानावरणीयकर्म, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सर्व, क्षीणक्लेश, चरमदेह आदि । २ प्रसुप्त, तनु आदिक्लेशावस्था, पाँच यम, योगज- १ योगसूत्र (२-२७) भाष्य, तत्त्वार्थ (अ० ६-१४)। २ देखो योगसून (२-२७) भाप्य, तथा दशका- लिकनियुक्ति गाथा १८६ । ३ देखो योगसूत्र (२ ५१ ) भाष्य, तथा आवश्य:- नियुक्ति गाथा ८६३ । ४ योगसूत्र (२-२८) भाष्य, तत्त्वार्थ (अ० १-१।। ५ योगसूत्र (४-१५) भाष्य, तत्त्वार्थ (अ० १-२) । ६ योगसूत्र ( ३-४९) भाष्य, तत्त्वार्थ (३-४९)। ७ योगसूत्र (१-४) भाष्य । जैन शास्त्र में बहुधा क्षीणमोह 'क्षीणकषाय' शब्द मिलते हैं। देखो तत्त्वार्थ (अ०९-३८)। ८ योगसूत्र (२-४) भाष्य, तत्त्वार्थ (अ० २-५२)। ६ प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार इन चार अवस्थाओंका योगसूत्र (२-४ ) में वर्णन है । जैनशास्त्रमें वही भाव मोह- नीयकर्मकी सत्ता, उपशमक्षयोपशम, विरोधिप्रकृतिके उदयादिकृत व्यवधान और उदयावस्थाके वर्णनरूपसे वर्तमान है। देखो योगसूत्र (२-४) की यशोविजयकृत वृत्ति । १० पाँच यमोंका वर्णन महाभारत श्रादि प्रन्थोमें है सही, पर [५५] न्य विभूति, सोपक्रम निरुपैमक्रम कर्मका स्वरूप, तथा उसके उसकी परिपूर्णता " जातिदेशकालसमयाऽनवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाबतम् " (योगसूत्र २-३१) में तथा दशवैकालिक अध्ययन ४ थादि जैनशास्त्रप्रतिपादित महावतोंमें देखनेमें शाती है । १ योगसूत्रके तीसरे पादमें विभूतियों का वर्णन है, वे विभू- वियाँ दो प्रकारकी हैं। १ वैज्ञानिक २ शारीरिक । अतीताऽना- गतमान, सर्वभूतस्तज्ञान, पूर्व जातिज्ञान, परचित्तज्ञान, भुवनझान, चारान्यूहज्ञान, आदि ज्ञानविभूतियाँ हैं। अन्तर्धान, हस्तिवल, परकायप्रवेश, अणिमादि ऐश्वर्य तथा रूपलावण्यादि कायसंगत, इत्यादि शारीरिक विभूतियाँ हैं। जैनशास्त्र में भी अवधिशान, मनःपर्यायज्ञान, जातिस्मरणज्ञान, पूर्वज्ञान आदि ज्ञानलब्धियाँ हैं, और प्रामौषधि, विद्युडोपवि, श्लेष्मौपधि, सर्वोपधि, जंघा- चारण, विद्याधारण, क्रिय, आहारक आदि शारीरिक लब्धियाँ हैं। देखो आवश्यकनियुक्ति (गा० ६६, ७०) लन्धि यह विभूतिका नामान्तर है। २ योगभाष्य और जैनमन्यों में सोपक्रम निरुपम मायु- कर्मका स्वरूप बिल्कुल एकसा है, इतना ही नहीं बल्कि उस स्वरूपको दिखाते हुए मान्यकारने (यो. सू. ३-२२) के भाध्यमें आर्द्र वस्त्र और तृणराशिके जो दो शान्त लिसे हैं, थे आवश्यफनियुक्ति ( गाया-६५६ ) तथा विशेषावश्यक भाष्य (गाथा-३.६१) आदि अनशाप सर्वत्र प्रसिद्ध है, पर . .
[५६] दृष्टान्त, अनेक कार्योंका निर्माण आदि । तत्त्वार्थ (भ० -२५२) के माध्यमें उक्त दो दृष्टान्तोंके उपरान्त एक तीसरा गणितविषयक दृष्टान्त भी लिखा है। इस विषयमें उक्त व्यासभाध्य और तत्त्वार्थभाप्यका शाब्दिक सादृश्य भी बहुत अधिक और अर्धसूचक है। " यथाऽऽवस्त्रं वितानितं लघीयसा कालेन शुष्येत् तथा सोपक्रमम् । यथा च तदेव सपण्डित चिरेण संशुष्येद् एव निरु- पक्रमम् | यथा चामिः शुष्के कक्षे मुक्तो वातेन वा समन्ततो युक्तः क्षेपीयसा कालेन दहेत् तथा सोपक्रमम् । यथा वा स एवाऽनिस्त- णराशौ क्रमशोऽवयवपु न्यस्तश्चिरेण दहेत्. तथा निरुपक्रमम् ( योग ३ २२) भाष्य । यथाहि संहताय शुष्पस्यापि तृणरा- शेरवयवशः क्रमेण दह्यमानस्य चिरेण दाहो भवति, तस्यैव शिथि- नप्रकीर्णोपचितस्य सर्वतो युगपदादीपितस्य पवनोपक्रमाभिहत- स्याशु दाहो भवति, तद्वत् । यथा वा संख्यानाचार्यः करणलाघ- धार्य गुणकारभागहाराभ्यां राशिंछेदादेवापवर्तयति न च संख्ये- यस्यार्थस्याभावो भवति,तद्वदुपक्रमाभिहतो मरणसमुद्धातदुःखातः कर्मप्रत्ययमनाभोगयोगपूर्वक करणविशेषमुत्पाद्य फलोपभोगलाघ- धार्थ कर्मापवर्तयति न चास्य फलाभाव इति ॥ किं चान्यत् । यथा वा धौतपटो जलार्द्र एव संहतश्विरेण शोपमुपयाति । स एव च वितानितः सूर्यरश्मिवाय्वभिहतः क्षिप्रं शोषमुपयाति । (अ०२-५२ भाष्य। १ योगरलसे योगी जो अनेक शरीरोंका निर्माण करता [५७] ३ परिणामि-नित्यता अर्थात् उत्पाद, व्यय, धौम्य- रूपसे विरूप वस्तु मान कर तदनुसार धर्मधर्मीका विवेचन इत्यादि। इसी विचारसमताके कारण श्रीमान् हरिभद्र जैसे जैना- चायोंने महर्षि पतञ्जलिके प्रति अपना हार्दिक आदर प्रकट करके अपने योगविषयक ग्रन्थों में गुणग्राहकताका निर्भीक है, उसका वर्णन योगसूत्र (४-४ ) में है, यही विषय वैक्रिय-श्राहारक-लब्धिरूपसे जैनप्रन्थों में वर्णित है । १ जैनशास्त्रमें वस्तुको द्रव्यपर्यायस्वरूप माना है। इसी. लिये उसका लक्षण तत्वार्थ (१०५-२६ ) में " उत्पादव्य- यध्रौव्ययुक्त सत" ऐसा किया है। योगसूत्र ( ३-१३, १४) में जो धर्मधर्मीका विचार है वह चक्क द्रव्यपर्यायउभयरूपता किंवा उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य इस त्रिरूपताका ही चित्रण है भिन्नता सिर्फ दोनों में इतनी ही है कि-योगसून सांख्यसिद्धा- न्तानुसारी होनेसे "ते वितिशक्तः परिणामिनो भावाः सिद्धान्त मानकर परिणामवादका अर्थात् धर्मलक्षणावस्थापरि- रणामका उपयोग सिर्फ जहमागमें अर्यात् प्रकृति में फरता है, वनमें नहीं। चौर जैनदर्शन तो "सर्वे मावाः परिणामिनः" ऐसा सिद्धान्त मानकर परिणामवाद अर्थात् स्पाव्ययरूप पर्यायका उपयोग जह चेतन दोनोंमें करता है। इतनी मिनता होनेपर भी परिणामयादी प्रक्रिया दोनोंमें एक सी है। " यह , [५] परिचय पूरे तोरसे दिया है, और जगह जगह पतञ्जलिके योगशास्त्रगत खास साङ्केतिक शब्दोंका जैन सङ्केतोंके साथ मिलान करके सङ्कीर्ण-दृष्टिवालोंके लिये एकताका मार्ग खोल दिया है । जैन विद्वान् यशोविजयवाचकने हरिभद्रसूरि- सूचित एकताके मार्गको विशेष विशाल बनाकर पतञ्जलिके योगसूत्रको जैन प्रक्रियाके अनुसार समझानेका थोडा किन्तु मार्मिक प्रयास किया है। इतना ही नहीं बल्कि अपनी बत्ती- सियोंमें उन्होंने पतञ्जलिके योगसूत्रगत कुछ विषयोंपर खास बत्तीसियाँ भी रची हैं। इन सब बातोंको संक्षेपमें बतलाने का १ उक्तं च योगमार्गस्तपोनिषूतकल्मपैः । भावियोगहितायोचैर्मोहदीपप्तमं वचः ॥ ( योग. वि. श्लो. ६६) टीका ' उक्तं च निरूपितं पुनः योगमार्गहरध्यात्मविद्भिः पतञ्जलिप्रभृतिभिः ॥ एतत्प्रधानः स- च्छ्राद्धः शीलवान् योगतत्परः । जानात्यतीन्द्रियानांस्तथा चाह महामतिः ।। ( योगदृष्टिममुच्चय श्लो १००) टीका ' चाह महामतिः पतञ्जलिः'। ऐसा ही भाव गुणग्राही श्रीयशो- विजयजीने अपनी योगावतारद्वात्रिंशिकामें प्रकाशित किया है । देखो-लो. t. २० टीका। २ देसो योगबिन्दु श्लोक ४१८, ४२० । ३ देखो उनकी बनाई हुई पातखलसूत्रवृत्ति । ४ देखो पातञ्जलयोगलक्षणविचार, ईशानुप्रहविचार, यो- गावतार, लेशहानोपाय और योगमाहात्म्य द्वात्रिंशिका । " तथा [५] उद्देश्य यही है कि महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टिविशालता इतनी अधिक थी कि सभी दार्शनिक व साम्प्रदायिक विद्वान् योग- शास्त्र के पास आते ही अपना साम्प्रदायिक अभिनिवेश भूल गये और एकरूपताका अनुभव करने लगे। इसमें कोई संदेह नहीं कि-महर्षि पतञ्जलिकी दृष्टि-विशालता उनके विशिष्ट योगानुभवका ही फल है, क्योंकि जब कोई भी मनुष्य शब्दज्ञानकी प्राथमिक भूमिकासे आगे बढ़ता है तब वह शब्दकी पूंछ न खींचकर चिन्ताज्ञान तथा भावनाज्ञानके उत्तरोत्तर अधिकाधिक एकताचाले प्रदेशमें अभेद आनंदका अनुभव करता है। आचार्य हरिभद्रकी योगमार्गमें नवीन दिशा-श्रीहरिभद्र प्रसिद्ध जैनाचार्यों में एक हुए। उनकी बधुश्रुतता, सर्वतोमुखी प्रतिभा, मध्यस्थता और समन्वयश- क्तिका पूरा परिचय करानेका यहाँ प्रसंग नहीं है । इसके- लिये जिक्षासु महाशय उनकी कृतियोंको देख लेवें । हरिभ- द्रसरिकी शतमुखी प्रतिभाके स्रोत उनके बनाये हुए चार- १ शब्द, चिन्ता तथा भावनाज्ञानका स्वरूप श्रीयशोविजय. जाने अध्यात्मोपनिषदें लिसा है, जो आध्यारिफ लोगोंको देसने योग्य है अध्यात्मोपनिषद् मो. ६५, ७४ । २ द्रव्यानुयोगविषयफ-धर्मसंग्रहणी श्रादि १, गणिता- नुयोगविषयक-क्षेत्रसमास टीका प्रादि २, घरएकरणानुयोग- [६.] अनुयोगविषयक ग्रन्थों में ही नहीं बल्कि जैन न्याय तथा भारतवयि तत्कालीन समग्र दार्शनिक सिद्धांतोंकी चर्चावाले ग्रन्थों में भी बहे हुए हैं। इतना करके ही उनकी प्रतिमा मौन न हुई, उसने योगमार्गमें एक ऐसी दिशा दिखाई जो केवल जैन योगसाहित्यमें ही नहीं बल्कि आर्यजातीय संपूर्ण योग- विषयक साहित्यमें एक नई वस्तु है। जैनशास्त्रमें आध्या- त्मिक विकासके क्रमका प्राचीन वर्णन चौदह गुणस्थान- रूपसे, चार ध्यान रूपसे और बहिरात्म आदि तीन अवस्था- ओंके रूपसे मिलता है। हरिभद्रसरिने उसी आध्यात्मिक विकासके क्रमका योगरूपसे वर्णन किया है । पर उसमें उ- न्होंने जो शैली रक्खी है वह अभीतक उपलब्ध योगविषयक साहित्यमेंसे किसी भी ग्रंथमें कमसे कम हमारे देखने में तो नहीं आई है। हरिभद्रसरि अपने ग्रन्थों में अनेक योगियोंका नामनिर्देश करते हैं। एवं योगविषयक ग्रन्थोंका उल्लेख करते विषयक-पञ्चवस्तु, धर्मबिन्दु आदि ३, धर्मकथानुयोगविषयक - समराइचकहा आदि ४ प्रन्थ मुख्य हैं। १ अनेकान्तजयपनाका, पड्दर्शनसमुच्चय, शानवार्चास- मुच्चय आदि। २ गोपेन्द्र ( योगबिन्दु श्लोक. २००) कालातीत (योग- विन्दु श्लोक ३००)। पतञ्जलि, भदन्तभास्करबन्धु, भगवदन्त(त्त) वादी (योगदृष्टि० श्लोक १६ टीका )। ३ योगनिर्णय आदि ( योगदृष्टि० श्लोक १ टीका )।
[६१] हैं जो अभी प्राप्त नहीं भी हैं । संभव है उन अप्राप्य ग्रन्थोंमें उनके वर्णनकी सी शैली रही हो, पर हमारे लिये तो यह वर्णनशैली और योग विपयक वस्तु विल्कुल अपूर्व है । इस समय हरिभद्रमूरिके योगविषयक चार ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं जो हमारे देखने आये हैं । उनमेंसे षोडशक और योग- विंशिकाके योगवर्णनकी शैली और योगवस्तु एक ही है। योगविंदुकी विचारसरणी और वस्तु योगविशिकासे जुदा है। योगदृष्टिसमुच्चयकी विचारधारा और वस्तु योगाचंदुसे भी जुदा है । इस प्रकार देखनेसे यह कहना पड़ता है कि हरि- भद्रसूरिने एक ही आध्यात्मिक विकासके क्रमका चित्र भिन्न भिन्न ग्रन्थों में भिन्न भिन्न वस्तुका उपयोग करके तीन प्रका- रसे खींचा है। कालकी अपरिमित लंबी नदीमें वासनारूप संसारका गहरा प्रवाह बहता है, जिसका पहला छोर (मूल ) तो अनादि है, पर दूसरा (उत्तर) छोर सान्त है । इसलिये मुमुक्षु- ओंके वास्ते सबसे पहले यह प्रश्न बडे महत्त्वका है कि उक्त अनादि प्रवाहमें आध्यात्मिक विकासका आरंभ कबसे होता है ? और उस आरंभके समय आत्माके लक्षण कैसे हो जाते हैं जिनसे कि प्रारंभिक आध्यात्मिक विकास जाना जा सके। इस प्रश्नका उत्तर प्राचार्यने योगबिंदुमें दिया है । वे कहते हैं कि-"जब आत्माके ऊपर मोहका प्रभाव घटनेका प्रारंभ होता है, तभीसे आध्यात्मिक विकासका सूत्रपात हो जाता [६२] है । इस सूत्रपातका पूर्ववर्ती समय जो आध्यात्मिकविकास- रहित होता है, वह जैनशास्त्रमें अचरमपुद्गलपरावर्तके नामसे प्रसिद्ध है। और उत्तरवर्ती समय जो आध्यात्मिक विकासके क्रमवाला होता है, वह चरमपुद्गलपरावर्तके नामसे प्रसिद्ध है। अचरमपुद्गलपरावर्तन और चरमपुद्गलपरावर्तनकालके परिमाणके बीच सिंधु और बिंदुका सा अंतर होता है। जिस आत्माका संसारप्रवाह चरमपुद्गलपरावर्त्तपरिमाण शेष रहता है, उसको जैन परिभापामें 'अपुनर्वधक और सांख्य- परिभाषामें 'निवृत्ताधिकार प्रकृति' कहते हैं । अपुनर्बन्धक या निवृत्ताधिकार प्रकृति आत्माका आंतरिक परिचय इतना ही है कि उसके ऊपर मोहका दवाव कम होकर उलटे मोहके ऊपर उस आत्माका दबाव शुरू होता है। यही आध्यात्मिक विकासका बीजारोपण है। यहींसे योगमार्गका श्रारंभ हो जानेके कारण उस आत्माकी प्रत्येक प्रवृत्तिमें सरलता, नम्रता, उदारता, परोपकारपरायणता आदि सदा- चार वास्तविकरूपमें दिखाई देते हैं । जो उस विकासोन्मुख श्रात्माका बाह्य परिचय है"। इतना उत्तर देकर प्राचार्यने योगके प्रारंभसे लेकर योगकी पराकाष्टा तकके आध्यात्मिक विकासको क्रमिक वृद्धिको स्पष्ट समझानेके लिये उसको १ देखो मुत्त्यद्वेषद्वात्रिंशिरा २८ । २ देखो योगबिंदु १७८, २०१॥
[६३] पाँच भूमिकाओं में विभक्त करके हर एक भूमिकाके लक्षण बहुत स्पष्ट दिखाये हैं । और जगह जगह जैन परिभाषाके साध चौद्ध तथा योगदर्शनकी परिभाषाका मिलान करके परिभाषाभेदकी दिवारको तोडकर उसकी ओटमें लिपी हुई योगवस्तुकी भिन्नभिन्नदर्शनसम्मत एकरूपताका स्फुट प्रदर्शन कराया है । अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और वृत्तिसंक्षय ये योगमार्गकी पाँच भूमिकायें हैं। इनमेंसे पहली चारको पतंजलि संप्रज्ञात, और अन्तिम भूमिकाको असंप्र- ज्ञात कहते हैं । यही संक्षेपमें योगबिन्दुकी वस्तु है। योगदृष्टिसमुच्चयमें आध्यात्मिक विकासके क्रमका वर्णन योगबिन्दुकी अपेक्षा दुसरे ढंगसे है। उसमें आध्यात्मिक विकासके प्रारंभके पहलेकी स्थितिको अर्थात् अचरमपुद्गलपरा- वर्त्तपरिमाण संसारकालीन आत्माकी स्थितिको अोषदृष्टि कहकर उसके तरतम भावको अनेक दृष्टांत द्वारा समझाया १ योगबिंदु, ३१, ३५७, ३५६, ३६१, ३६१, ३६५ । २ “यत्सम्यग्दर्शनं बोधिस्तत्प्रधानो महोदयः । सत्त्वोऽस्तु बोधिसत्त्वस्तद्धन्तैपोऽन्वर्थतोऽपि हि ॥२७॥ वरबोधिसमेतो वा तीर्थक्द्यो भविष्यति । तथाभव्यत्वतोऽसौ वा बोधिसत्त्वः सतां मतः" ॥२७४॥ योगबिन्दु । ३ देखो योगविंदु ४१८, ४२० ।
[६४]
है, और पीछे आध्यात्मिक विकासके प्रारंभसे लेकर उसके
अंततकमें पाई जानेवाली योगावस्थाको योगदृष्टि कहा है।
इस योगावस्थाकी क्रमिक वृद्धिको समझानेके लिये संक्षेपमें
उसे पाठ भूमिकाओं में बाँट दिया है। चे पाठ भूमिकायें
उस ग्रन्थ पाठ योगदृष्टिके नामसे प्रसिद्ध हैं। इन आठ
दृष्टिनोंका विभाग पातंजलयोगदर्शन-प्रसिद्ध यम, नियम,
आसन, प्राणायाम श्रादि पाठ योगांगोंके आधार पर किया
गया है, अर्थात् एक एक दृष्टि में एक एक योगांगका
सम्बन्ध मुख्यतया बतलाया है। पहली चार दृष्टियाँ योगकी
प्रारम्भिक अवस्थारूप होनेसे उनमें अविद्याका अल्प अंश
रहता है । जिसको प्रस्तुत ग्रंथमें अवेद्यसंवेद्यपद कहा है।
अगली बार दृष्टिोंमें अविद्याका अंश बिल्कुल नहीं रहता)
इस भावको आचार्यने वेद्यसंवेद्यपद शब्दसे जनाया है। इसके
सिवाय प्रस्तुत ग्रंथमें पिछली चार दृष्टियोंके समय पाये जाने-
वाले विशिष्ट श्राध्यात्मिक विकासको इच्छायोग, शास्त्रयोग
और सामर्थ्ययोग ऐसीबीन योगभूमिकाओंमें विभाजित करके
उक्त तीनों योगभूमिकाओंका बहुत रोचक वर्णन किया है।
१ देखो-योगदृष्टिसमुच्चय १४ ।
२
४
"
"
२-१२।
[६५] आचार्यने अन्तमें चार प्रकारके योगियों का वर्णनकरके योगशास्त्रके अधिकारी कौन हो सकते हैं ? यह भी बतला दिया है । यही योगदृष्टिसमुच्चयकी बहुत संक्षिप्त वस्तु है । योगविंशिकामें आध्यात्मिक विकासकी प्रारंभिक अव- स्थाका वर्णन नहीं है, किन्तु उसकी पुष्ट अवस्थाओंका ही वर्णन है। इसीसे उसमें मुख्यतया योगके अधिकारी त्यागी ही माने गये हैं । प्रस्तुत ग्रन्थमें त्यागी गृहस्थ और साधुकी आवश्यक-क्रियाको ही योगरूप बतलाकर उसके द्वारा आ- 'ध्यात्मिक विकासकी क्रमिक वृद्धिका वर्णन किया है । और उस आवश्यक-क्रियाके द्वारा योगको पाँच भूमिओंमें विभा- जित किया है । ये पाँच भूमिकायें उसमें स्थान, शब्द, अर्थ, सालंबन और निरालंबन नामसे प्रसिद्ध हैं । इन पाँच भूमि- काओंमें कर्मयोग और ज्ञानयोगकी घटना करते हुए आचा- येने पहली दो भूमिकाओंको कर्मयोग और पिछली तीन भूमिकाओंको ज्ञानयोग कहा है । इसके सिवाय प्रत्येक भूमि- कामें इच्छा, वृत्ति, स्थैर्य और सिद्धिरूपसे आध्यात्मिक विकासके तरतम भावका प्रदर्शन कराया है। और उस प्रत्येक भूमिका तथा इच्छा, प्रवृत्ति आदि अवान्तर स्थितिका ल- क्षण बहुत स्पष्टतया वर्णन किया है। इस प्रकार उक्त १ योगविंशिका गा० ५, ६ ।
[६६] पाँच भूमिकामाकी अन्तर्गत भिन्न भिन्न स्थितिओंका वर्णन- करके योगके अस्सी भेद किये हैं, और उन सबके लक्षण बतलाये हैं, जिनको ध्यानपूर्वक देखनेवाला यह जान सकता है कि मैं विकासकी किस सीढ़ीपर खडा हूँ। यही योगविं- शिकाकी संक्षिप्त वस्तु है। उपसंहार-विषयकी गहराई और अपनी अपूर्ण- ताका खयाल होते हुए भी यह प्रयास इस लिये किया गया है कि अबतकका अवलोकन और स्मरण संक्षेपमें भी लिपिबद्ध हो जाय. जिससे भविष्यत्में विशेप प्रगति करना हो तो इस विषयका प्रथम सोपान तयार रहे। इस प्रवृत्तिमें कई मित्र मेरे सहायक हुए हैं जिनके नामो- ब्लेख मात्रसे मैं कृतज्ञता प्रकाशित करना नहीं चाहता । उनकी आदरणीय स्मृति मेरे हृदयमें अखंड रहेगी। पाठकोंके प्रति एक मेरी सूचना है। वह यह कि इस निबंध अनेक शास्त्रीय पारिभाषिक शब्द आये हैं। सास- कर अन्तिम भागमें जैन-पारिभाषिक शब्द अधिक है, जो बहुतोंको कम विदित होंगे उनका मैंने विशेष खुलासा नहीं किया है, पर खुलासावाले उस उस ग्रन्थके उपयोगी स्थलोंका निर्देश कर दिया है, जिससे विशेपजिज्ञासु मूल- ग्रन्थद्वारा ही ऐसे कठिन शब्दोंका सुलासा कर सकेंगे।
[६७] अगर यह संक्षिप्त निबंध न होकर खास पुस्तक होती तो इसमें विशेष खुलासोंका भी अवकाश रहता। इस प्रवृत्तिके लिये मुझको उत्साहित करनेवाले गुजरात पुरातत्व संशोधन मंदिरके मंत्री परीख रसिकलाल छोटालाल हैं जिनके विद्याप्रेमको मैं नहीं भूल सकता। लेखक- संयत् १९७८ पौष यदि ५ भावनगर. सुखलाल संघवी.
No text on this page.
॥ अहम् ॥ न्यायाम्भोनिधि-श्रीमद्विजयानन्दसूरिभ्यो नमः श्रीमद्-न्यासपिप्रणीतभाप्यांशसहित भगवत्पतञ्जलिमुनिविरचितं पातञ्जलयोगदर्शनम्। (न्यायविशारद-न्यायाचार्य-श्रीमद्यशोविजयवाचकवरविहितया जैनमतानुसारिण्या लेशव्याख्ययोपवर्धितम् ) एं नमः ॥ ऐन्द्रवृन्दनतं नत्वा वीरं सूत्रानुसारतः । वक्ष्ये पातञ्जलस्यार्थ साक्षेपं प्रक्रियाश्रयम् ॥१॥ अथ योगानुशासनम् ॥१-१॥ तस्य ( संग्रज्ञातासंप्रज्ञातरूपद्विविधयोगस्य ) लक्षणाभिधि- सयेदं सूत्रं प्रववृते- योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ १-२॥ भाष्यम्-सर्वशन्दाग्रहणात् संप्रज्ञातोऽपि योग इत्या- ख्यायते । चित्तं हि प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलत्वात् त्रिगुणम्।
[२] प्रख्यारूपं हि चित्तसत्त्वं रजस्तमोभ्यां संसृष्टमश्वर्यविषयप्रियं भवति।तदेव तमसानुविद्धमधर्माज्ञानावैराग्यानैश्वर्योपगं भवति। तदेव प्रक्षीणमोहावरणं सर्वतः प्रद्योतमानमनुविद्धं रजोमात्रया धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपगं भवति । तदेव रजोलेशमलापेतं स्वरूपप्रतिष्ठं सत्त्वपुरुपान्यताख्यातिमात्रं धर्ममेघध्यानोपगं भवति । तत् परं प्रसङ्घयानमित्याचक्षते ध्यायिनः चितिश- क्तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा दर्शितविपया शुद्धा चानन्ता च; सत्त्वगुणात्मिका चेयमतो विपरीता विवेकख्यातिः इत्य- तस्तस्यां विरक्तं चित्तं तामपि ख्यातिं निरुणद्धि । तदवस्थं संस्कारोपगं भवति । स निर्बीजः समाधिः । न तत्र किश्चित् संप्रज्ञायत इत्यसंप्रज्ञातः। (२०) सर्वशब्दाग्रहणेऽप्यत्तिलाभादग्याप्तिः संप्रज्ञा इति " क्लिष्टचित्तवृत्तिनिरोयो योगः " इति लक्षणं सम्यग् , " समितिगुप्तिसाधारणं धर्मव्यापारत्वमेव योगत्वम् " इति स्वस्माकमाचार्याः । तदुक्तम्-" मुक्खेण जोयणाओ जोगो सयो वि धम्मवावारो" [ योगविंशिका. गा० १] तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ १-३॥ वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ १-४॥ १ सत्त्वपुरुपान्यताख्यातिमानं चित्तं धर्ममेघार्यन्तं । २ विवेकर गातेः योधकमेतत्सदम् ।। यद्वा :
[३] वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥ १-५॥ प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥ १-६॥ तंत्र प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥१-७॥ विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ .१-८ ।। शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥१-६॥ अभावप्रत्ययालम्वना वृत्तिनिद्रा ॥१-१०॥ अनुभूतविषयासंप्रमोपः स्मृतिः ॥१-११ ॥ भाष्यम्-किं प्रत्ययस्य चित्तं स्मरति आहोस्त्रि- द्विपयस्य ? इति । ग्राह्योपरक्तः प्रत्ययो ग्राह्यग्रहणोभयाकारनि- र्भासः तथाजातीयकं संस्कारमारभते । स संस्कारः स्वव्यञ्ज- काञ्जनः तदाकारामेव ग्राह्यग्रहणोभयात्मिकां स्मृति जन- यति । तत्र ग्रहणाकारपूर्वा घुद्धिः, ग्राह्याकारपूर्वा स्मृतिः। सा च द्वयी-भावितस्मर्तव्या चाभावितस्मर्तव्या च । स्वमे भावि- तस्मर्तव्या। जाग्रत्समये त्वभावितस्मर्तव्येति । सर्वाः स्मृतयः प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतीनामनुभवात्प्रभवन्ति । सर्वा- चैता वृत्तयः सुखदुःखमोहात्मिकाः, सुखदुःखमोहाश्च क्लेशेषु व्याख्ययाः। सुखानुशयी रागः । दुःखानुशयी द्वेपः । मोहः १ एतत्पदं मुद्रितपुस्तके न दृश्यते : [४] पुनरविद्येति। एताः सर्वा वृत्तयो निरोद्धन्याः । आसां निरोधे सम्प्रज्ञावोऽसम्प्रज्ञातो वा समाधिर्भवति । (य०) अत्र विकल्पः शब्दान्नाऽखण्डालीकनिर्भासोऽसत्ख्या- त्यसिद्धः, किन्तु "असतो त्यि णिसेहो" इत्यादि भाष्यद्वच- नात्खण्डशःप्रसिद्धपदार्थानां संसर्गारोप एव, अभिन्ने भेदनिर्भासा- दिस्तु नयात्मा प्रमाणैकदेश एव । निद्रा तु सर्वा नाऽभावालम्बना, स्वप्ने करितुरगादिभावानामपि प्रतिमासनात् । नापि सर्वा मिथ्यैव, संवादिस्वप्नस्यापि बहुशो दर्शनात् । स्मृतिरप्यनुभूते यथार्थतत्ता- ख्यधर्मावगाहिनी, संवादविसंवादाभ्यां द्वैविध्यदर्शनाद्, इति तिस- णामुत्तरवृत्तीनां द्वयोरेव यथायथमन्तर्भावात् पञ्चवृत्त्यभिधानं स्वरुचितप्रपञ्चार्थम् । अन्यथा क्षयोपशमभेदादसङ्घयभेदानामपि संभवात् , इत्याई तसिद्धान्तपमार्थवेदिनः । अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥ १-१२ ॥ तत्र स्थितौ यलोऽभ्यासः ॥ १-१३ ॥ स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः ॥ १-१४॥ दृष्टानुअविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १-१५॥ १ विशेषावश्यकमाष्यगा. १५७९ , [५] तत् परं पुरुषख्यातेमुणवेतृष्ण्यम् ॥ १-१६ ॥ भाग्यम्-दृष्टानुश्रविकविषयदोषदर्शी विरका पुरुषः दर्शनाभ्यासात्तच्छुद्धिप्रविवेकाप्यायितबुद्धिर्गुणेभ्यो व्यक्ताव्यक्तधर्मकेभ्यो विरक्त इति । तद्वयं चैराग्यम् । तत्र यदुत्तरं तज्ज्ञानप्रसादमात्रम् । तस्योदये प्रत्युदितख्यातिरेवं मन्यते-प्राप्तं प्रापणीयम् , क्षीणाः क्षेतव्याः क्लेशाः, छिन्न: लिएपर्वा भवसंक्रमः, यस्याविच्छेदाजनित्वा म्रियते मृत्वा च जायत इति । ज्ञानस्यैव परा काष्ठा वैराग्यम् । एतस्यैव हि नान्तरीयक कैवल्यमिति । (य०) विषयदोपदर्शनजनितमापातधर्मसन्यासलक्षणं प्रथमम् , सतत्त्वचिन्तया विषयौदासीन्येन जनितं द्वितीयापूर्वकरणभाविता- त्त्विकधर्मसन्यासलक्षणं द्वितीय वैराग्यम्, यत्र क्षायोपशमिका धर्मा अपि तीयन्ते क्षायिकाश्चोत्पद्यन्ते इत्यस्माकं सिद्धान्तः ।। वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमा-- संप्रज्ञातः ॥ १-१७॥ अथासंग्रज्ञातः समाधिः किमुपायः किस्वभावो वा इति. विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः।१-१८॥ भाष्यम्-सर्वदृचिप्रत्यस्तमये संस्कारशेपो निरोधश्चित्तस्य १ 'पुरुषदर्शनाभ्या' इत्यपि ।
[६] समाधिरसंप्रज्ञातः। तस्य परं वैराग्यमुपायः । सालम्बनो ह्यभ्यासस्तत्साधनाय न कल्पत इति विरामप्रत्ययो निर्वस्तुक आलम्बनीक्रियते, स चार्थशून्यः । तदभ्यासपूर्व चित्तं निरा- लम्बनमभावप्राप्तमिव भवतीत्येप नि:जः समाधिरसंप्रज्ञातः।। (य०) द्विविधोऽप्ययं अध्यात्मभावनाध्यानसमतावृत्तिक्षयभे- देन पञ्चधोक्तस्य योगस्य पञ्चमभेदेऽवतरति । वृत्तिक्षयो ह्यात्मनः कर्मसंयोगयोग्यतापगमः, स्थूलसूक्ष्मा ह्यात्मनश्चेष्टा वृत्तयः, तासां मूल हेतुः कर्मसंयोगयोग्यता, सा चाकरणनियमेन प्रन्थिभेदे उत्कृ- एमोहनीयबन्धव्यवच्छेदेन तत्तद्गुणस्थाने तत्तत्प्रकृत्यात्यन्तिकवन्ध- व्यवच्छेदस्य हेतुना क्रमशो निवर्तते । तत्र पृथक्त्ववितर्कसविचा- रैकत्ववितर्काविचागस्यशुक्लध्यानभेदद्वये संप्रज्ञात: समाधिर्वृत्त्य- र्थानां सम्यग्ज्ञानात् । तदुक्तम्-" समाधिरेप एवान्यैः संप्रज्ञा- तोऽभिधीयते । सम्यक्प्रकपरूपेण वृत्त्यर्थशानतस्तथा ॥ १ ॥ (४१८ यो. वि. ) निर्वितर्कविचागनन्दास्मितानि सस्तु पर्या- यविनिर्मुकशुखद्रव्यध्यानाभिप्रायेण व्याख्येय(यः),यन्नयमालम्च्यो- कम्-" का अरइ के पाणंदे ? इत्थं पि अग्गहे परे " इत्यादि । क्षपश्रेणिपरिसमागी फेवलज्ञानलाभस्त्वसंप्रहातः समाधिः, भाव- मनोवृत्तीनां प्राह्यग्रहणाकारशालिनीनामवप्रहादिक्रमेण तत्र सम्य- क्परिशानामावान् । अत एव भावमनसा संशाऽभावाद् द्रव्यमनसा १ माघागग १-३-३४.फा अरतिः क आनन्दः अवापि अप्रहश्चरेत् । ?
[७] प तत्सद्भावात्केवली नोसंज्ञीत्युच्यते । तदिदमुक्कं योगपिन्दी- " असंप्रज्ञात एपोऽपि समाधियते परैः। निरुद्धाशेषवृत्त्यादि- तत्स्वरूपानुवेधतः||१|| धर्ममेघोऽमृतात्मा च भवशत्रुः शिवोदयः। सत्त्वानन्दः परश्चेति योज्योऽत्रैवार्ययोगतः ॥२॥" (४२०-२१) इत्यादि । संस्कारशेपत्वं चात्र भयोपग्राहिकाशरूपसंस्कागपेक्षया व्याख्येयम् , मतिज्ञानभेदस्य संस्कारस्य तदा मूलत एव विनाशात् । इत्यम्मन्मतनिष्कर्ष इति दिक् । प्रकृतं प्रस्तूयते-- स खल्वयं द्विविधः, उपायप्रत्ययो भवप्रत्ययश्च । तत्रो- पायप्रत्ययो योगिनां भवति । भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १-१६ ।। भाष्यम्-विदेहानां देवानां भवप्रत्ययः । ते हि स्वसं- स्कारमात्रो पगतेन चित्तेन कैवल्यपदमिवानुभवन्तः स्वसंस्कार- विपाकं तथाजातीयकमतिवाहयन्ति । तथा प्रकृतिलयाः साधि- कारे चेतसि प्रकृतिलीने कैवल्यपदमिवानुभवन्ति, यावन्न पुनरावर्ततेऽधिकारवशाच्चित्तमिति ।। य०) उपशान्तमोहत्वेनोक्तानां लवसप्तमानां ज्ञानयोगरूप- समाधिमधिकृत्येदं प्रवृत्तम् । एतदस्म] न्मतम् ।। श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ १-२०॥ १ मात्रोपयोगेन' इत्यपि, . [-] तत्राधिमात्रौपायानाम्- तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ १-२१ ॥ मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेयः ॥१-२२॥ ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ १-२३ ।। क्लेशकर्मविपाकाशयरपरामृष्टः पुरुपविशेष ईश्वरः ॥ १-२४ ॥ तत्र निरतिशयं सर्वज्ञवीजम् ॥ १-२५ ॥ स एपः- पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ १-२६ ।। भाप्यम्-पूर्वे हि गुरवः कालेनावन्छिद्यन्ते । यत्रावच्छे- दार्थेन कालो नोपावर्तते स एष पूर्वेपामपि गुरुः। यथाऽस्य मर्गस्यादी प्रकर्पगत्या सिद्धः तथातिकान्तसर्गादिप्यपि प्रत्येतन्यः॥ (य०)-अन वयं वदामः-फालेनानवन्छेदादिक नेश्वरस्यो- पास्यवावन्दकम् | सायं तु तथासंभवदपि दीपायजन्यतायच्छे- दफत्वेन निटामुकेश्वरसिद्धौ साक्षिभावमालम्यते । 'नित्यमुक्त ईश्वर:' इत्यभिधाने घ व्यक्त एव यदतोव्याघातः, मुन्धनविशेषार्थवाद- न्धपूर्वस्यैव मोक्षस्य व्यवस्थितः, अन्यथा घटादेरपि नित्यमुतत्वं - [8] दुर्निवारम् । केवलसत्त्वातिशयवत: पुरुषविशेषस्य कल्पने च केव- लरजस्तमोऽविशयवतोरपि कल्पनापत्तिः । कथं चैवमात्मत्वावच्छे- देनानादिसंसारसंयन्धनिमित्ततोपपत्तिः ? | ईश्वरातिरिक्तात्मत्वेन तथात्वकल्पने च गौरवम् । केवलसत्त्वोत्कर्षवदृष्टपुरुषकल्पने च नित्यज्ञानाद्याश्रयो नैयायिकाद्यभिमत एव स किं न कल्प्यते ? , तस्मात्सकलकर्मनिर्मुक्ते सिद्ध एव भवतीश्वरत्वं युक्तम् , उपासनाप- यिककेवलज्ञानादिगुणानां तत्रैव संभवात् । अनादिशुद्धत्वश्रद्धापि प्रवाहापेक्षया तत्रैव पूरणीया । यदाहुः श्रीहरिभद्राचार्या:-"एसो अाइमं चिय सुद्धो य तो अणाइसुद्धो ति। जुत्तो य पवाहेणं ण अन्नहा सुद्धया सम्मं ॥१॥ (अनादिविशिका. २२) सिद्धानामनेकत्वात् इति श्रद्धा न पूर्यत इति चेत्, न, सिद्धेवरवृत्त्यत्यन्ताभावप्रतियोग्यविशयत्ररूपस्यैकत्वस्य सिद्धानामनेकवेऽयबाधात्सलयारूपस्यैकत्यस्य चाप्रयोजकत्वात् । गम्यतां वा समप्यतया तदपि, स्वरूपास्तित्वसादृश्याम्तित्वयोर- विनिर्भागवृत्तित्वस्य सार्वत्रिकत्वात् । जगत्कर्तुः सर्वथैकस्य पुरुष- स्पाभ्युपगमे च जगत्कारणस्य शरीरस्यापि बलादापत्तिः, कार्यले सकर्तृकत्वस्येव शरीरजन्यत्वस्यापि व्याप्तेरभिधातुं शक्यत्वादिति । तस्य च सिद्धस्य भगवत ईश्वरस्यानुग्रहोऽपि योगिनोऽपुनर्यन्धका- द्यवस्थोचितसदाचारलाभ एव, न त्वनुजिघृक्षारूपस्तस्या रागरूप- स्वात्, तस्य च द्वेषसहचरितत्वात् , रागद्वेषवतश्चतरवदनाराध्यत्वा- दिति संक्षेपः ॥ प्रकृतम्--- " एक ईश्वरः [१०] तस्य वाचकः प्रणवः॥१-२७ ।। तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ १-२८ ॥ ततःप्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ।१-२९॥ व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्ति- दर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्त- विक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ १-३०॥ दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेप- सहभुवः ।।१-३१।। तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्वाभ्यासः ॥ १-३२॥ मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य- विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ १-३३ ॥ भाष्यम्-ता सर्वप्राणिपु सुससंभोगापत्रेषु मैगी भान- येत् । दुःसितेषु करुणां, पुण्यात्मकेषु मुदितां, अपुण्यशीले- पूपेक्षाम् । (३०)-अस्मवाधार्यास्तु-"परहिसपिन्ता भैवी परदुःसविना- शिनी तथा फरणा । परसुख तुष्टिमुदिता परदोपोपेक्षणमुपेक्षा ॥१॥" इति बसयित्वा ॥ उपकारिस्वजनेवरसामान्याता
“
"
[११]
चतुर्विधा मैत्री | मोहासुखसंवेगाऽन्यहितयुता चैव करुणा तु
॥ २ ॥ सुखमात्रे सद्धेतावनुबन्धयुते परे च मुदिता तु । करुणा
तु बन्धनिर्वेदतत्त्वसारा ह्युपेक्षेति ॥ ३ ॥” इति भेदप्रदर्शनपूर्व
एताः खल्वभ्यासात् क्रमेण वचनानुसारिणां पुंसाम् । सद्-
त्तानां सततं श्राद्धानां परिण मन्त्युचैः ॥४॥ इति परिकर्मः
विधिमाहुः । तत्त्वमत्रत्यमम्मत्कृतपोडशकटीकायाम् | प्रकृतम्-
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ १-३४ ॥
भाष्यम्- कौट्यस्य वायो सिकापुटाभ्यां प्रयत्नविशे-
पाद्वमनं प्रच्छर्दनम् , विधारणं प्राणायामः, ताभ्यां मनसः
स्थितिं संपादयेत् ॥
(य०)-अनैकान्तिकमेतत् , प्रसह्य ताभ्यां मनो व्याकुली-
भावात् " ऊसासं ण णिरंभइ" ( आवश्यकनियुक्ति १५१०)
इत्यादि पारमर्षेण तनिषेधाच, इति वयम् ।।
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनि-
वन्धनी ॥ १-३५॥
विशोका वा ज्योतिष्मती ॥ १-३६ ॥
वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ १-३७ ॥
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥ १-३८ ॥
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ १-३९ ॥
[१२] परमाणुपरममहत्वान्तोऽस्य वशीकारः॥१-४०॥ क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥ १-४१ ।। तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सविता समापत्तिः ॥ १-४२ ॥ स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥१-४३॥ एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥ १-४४ ॥ सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ १-४५ ॥ ता एव सवीजः समाधिः ॥ १-४६॥ भाष्यम्-ताः चतस्रः समापत्तयो पहिर्वस्तुवीजा इति समाधिरपि सचीजः । तत्र स्थूलेऽर्थे सवितर्को निर्वितर्कः सूक्ष्मेऽर्थे सविचारो निर्विचारः स चतुर्थोपसंख्यातः समा- घिरिति ॥ (य०)-पर्य योपरक्तानुपरक्तस्थूलसूदमद्रव्यभावनारूपाणा- मेवासां गुप्तध्यानजीवानुमूवानां चित्तकाम्यकारिणीनामुपशान्त- [१३] मोहापेक्षया सबीजत्वम् , क्षीणमोहापेक्षया तु निर्बीजत्वमपि स्यात् इति त्वाईतसिद्धान्दरहस्यम् ॥ निर्विचारवैशारोऽध्यात्मप्रसादः॥ १-४७ ॥ ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥ १-४८ ॥ सा पुनः- श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ १-४९ ॥ भाप्यम्-श्रुतमागमविज्ञानं तत् सामान्यविपयं, नह्या- गमेन शक्यो विशेपोऽभिधातुम् , कस्मात् ? न हि विशेपेण कृतसंकेतः शब्द इति । तथाऽनुमान सामान्यविषयमेव, यत्र प्राप्तिस्तत्र गतिः, यत्राप्राप्तिस्तत्र न भवति गतिरित्युक्तम् अनुमानेन च सामान्येनोपसंहारः । तस्माच्छ्रतानुमानविपयो न विशेपः कश्चिदस्ति इति । न चास्य सूक्ष्मव्यवहितविप्रक- टस्य वस्तुनो लोकप्रत्यक्षेण ग्रहणम् , न चास्य विशेपस्या- प्रमाणकस्याभावोऽस्तीति समाधिप्रज्ञानिह्य एव स विशेपो भवति भूतसूक्ष्मगतो या पुरुपगतो वा । तस्माच्छ्रुतानुमान- प्रज्ञाभ्यामन्यविषया सा प्रज्ञा विशेषार्थत्वादिति ।। (य०)-"संध्येव दिनरात्रिभ्यां केवलाच श्रुतात्पृथग्। बुधै- रनुभवो दृष्टः केवलार्वारुणोदयः ॥१॥" इत्यस्मदुक्तलक्षणलक्षिता- १ज्ञानसार अष्टक २६ श्लो. १।२"केवलश्रुतयोः" इत्यपि. , .
, [१४] नुभवापरनामधेया शास्त्रोक्तायां दिशि, तेदतिक्रान्तमतीन्द्रिय विशेपमवलम्बमाना तत्त्वतो द्वितीयापूर्वकरणभाविसामध्ययोग- प्रभवेयं समाधिप्रज्ञा, इति युक्तः पन्थाः । प्रकृतम्- समाधिप्रज्ञाप्रतिलम्भे योगिनः प्रज्ञाकृतः संस्कारो नवो नवो जाय - तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिवन्धी ॥१-५०॥ तस्यापि निरोधेसर्वनिरोधान्नि/जःसमाधिः॥१-५१॥ ॥ इति पातञ्जले साड्डयप्रवचने योगशास्त्रे समाधिपादः प्रथमः ॥ उद्दिष्टः समाहितचित्तस्य योगः। कथं व्युत्थितचित्तोऽपि योगयुक्तः स्यात् ? इत्येतदारभ्यते- तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥२-१॥ भाप्यम्-नातपस्विनो योगः सिध्यति, अनादिकर्मक्लेश- चासनाचित्रा प्रत्युपस्थितरिपयजाला चाशुद्धिर्नान्तरेण तपः मंभेदमापद्यत इति तपस उपादानम् । तच चित्तप्रसादनम- याधमानमनेनासेव्यमिति मन्यते । स्वाध्यायः प्रणवादिपवि- त्राणां जपः मोक्षशास्त्राध्ययनं था। ईश्वरप्रणिधानं सर्व- क्रियाणां परमगुरौ अर्पणं तत्फलसंन्यासो वा । २ शास्त्रातिप्रान्तम् ।
" (य०)-"बाह्यं तपः परमदुश्वरमाचरध्वमाध्यात्मिकस्य तपसः परिहणार्यम। इत्यस्मीयाः ॥ सर्वत्रानुष्ठाने मुख्यप्रवर्तक- .शास्त्रस्मृतिद्वारा तहादिप्रवर्तकपरमगुरोईदये निधानमीश्वरप्रणिधा- नम् । तदुक्तम्-" अस्मिन् हृदयस्थे सति हृदयस्थस्तत्त्वतो मुनीन्द्र इति । यस्थिते ५ तस्मिन् नियमारपर्वार्थसंसिद्धिः ॥ १ ॥ इत्यादि, इत्यस्मन्मतम् ।। समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ।। २-२॥ अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥२-३॥ अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदारा- णाम् ।। २-४ ॥ भाष्यम् ---अत्राविद्या क्षेत्रं प्रसवभूमिरुत्तरेपामस्मिता- दीनां चतुर्विकल्पितानां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् । तत्र का प्रसुप्तिः ? चेतसि शक्तिमानप्रतिष्ठानां बीजभावोपगमः, तस्य प्रबोध आलम्बने संमुखीभावः, प्रसंख्यानवतो दग्ध- क्लेशबीजस्य संमुखीभूतेऽप्यालम्बने नासौ पुनरस्ति, दग्ध- बीजस्य कुतः प्ररोह इति । अतः क्षीणक्लेशः कुशलश्वरमदेह इत्युच्यते । तत्रैव सा दग्धवीजभाषा पञ्चमी क्लेशावस्था, नान्यति । सतां क्लेशानां तदा वीजसामर्थ्य दग्धमिति विपयस्य संमुखीभावेऽपि सति न भवत्येषां प्रबोधः इत्युक्ता प्रसुतिर्दग्धवीजानामप्ररोहश्च । तनुत्वमुच्यते-प्रतिपक्षभावनो- [१६] पहत्ताः क्लेशास्तनवो भवन्ति । तथा विच्छिद्य विच्छिद्य तेन तेनात्मना पुनः पुनः समुदाचरन्तीति विच्छिन्नाः । कथं? रागकाले क्रोधस्यादर्शनात् । न हि रागकाले क्रोधः समुदा- चरति । रागश्च कचिद् दृश्यमानो न विपयान्तरे नास्ति । नैकस्यां स्त्रियां चत्रो रक्त इति अन्यासु स्त्रीपु विरक्तः, किन्तु तत्र रागो लन्धवृत्तिः, अन्यत्र भविष्यद्वृत्तिरिति स हि तदा प्रसुप्ततनु- विच्छिन्नो भवति । विपये यो लब्धवृत्तिः स उदार, सर्व एवैते क्लेशविपयत्वं नातिकामन्ति । कस्तर्हि विच्छिन्नः प्रसुप्त- स्तनुरुदारो वा क्लेशः १ इति, उच्यते-सत्यमेवैतत्, किन्तु विशिष्टानामेवैतेषां विच्छिन्नादित्वं, यथैव प्रतिपक्षभावनातो निवृत्तस्तथैव स्त्रव्यजनेनाभिव्यक्त इति सर्व एवैते क्लेशा अविद्याभेदाः। कस्मात् ? सर्वेषु अविद्यैवाभिप्लवते । यद- विद्यया वस्त्वाकार्यते तदेवानुशेरते क्लेशाः, विपर्यासप्रत्यय- काले उपलभ्यन्ते, क्षीयमाणां चाविद्यामनु क्षीयन्त इति ॥ (य०)-अप्राविद्यादयो मोनीयकर्मण श्रौदायिकभाववि- शेषाः । तेषां प्रसुप्तत्वं तजनककर्मणोऽयाघाकालापरिक्षयेण कर्मनिपेकामायः । तनुत्वमुपशमः क्षयोपशमो वा। विच्छिन्नत्वं प्रतिपक्षप्रकृत्युदगादिनाऽन्तरितत्वम्। उदारत्वं चोदयावलिकामात- त्वम्, इत्यवसेयम् ।। अनित्याशुचिदुःखानात्मनु नित्यशुविसुखात्म- ख्यातिरविद्या ।। २-५॥
[१७] भाग्यम्-अनित्यकार्ये नित्यख्यातिः, तद्यथा-ध्रुवा पृथिवी, ध्रुवा सचन्द्रतारका द्यौः, अमृता दिवौकसः इति । तथाऽशुचौ परमवीभत्से काये-" स्थानादीजादुपएम्भान्नि:- स्पन्दानिधनादपि । कायमाधेयशीचत्वात्पण्डिता पशुचिं विदुः ॥१॥” इत्यशुचौ शुचिख्यातिदृश्यते । नवेव शशाङ्कलेखा कमनीयेयं कन्या मध्वमृतावयवनिर्मितेव चन्द्र मित्वा निःसतेच ज्ञायते, नीलोत्पलपत्रायताक्षी हावगर्भाभ्यां लोचनाभ्यांजीवलोकमाश्वासयन्तीवेति, कस्य केनाभिसंबन्धः? भवति चैवमशुचौ शुचिविपर्यासप्रत्यय इति । एतेनापुण्ये पुण्यप्रत्ययः, तथैवानर्थे चार्थप्रत्ययो व्याख्यातः । तथा दुःखे सुखख्यातिं वक्ष्यति, " परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गु- रणवृत्तिविरोधाच दुःखमेव सर्व विवेकिनः" [२.१५.] इति, तत्र सुखख्यातिरविद्या । तथानात्मन्यात्मख्यातिः- बाह्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु भोगाधिष्ठाने वा शरीरे पुरुषो- पकरणे वा मनसि अनात्मन्यात्मख्यातिरिति । तथैतदन्य- त्रोक्तम्-" व्यक्तमव्यक्तं वा सत्त्वमात्मत्वेनाभिप्रतीत्य तस्य संपदमनु नन्दत्यात्मसंपदं मन्धानः, तस्य चापदमनु शोच- त्यात्मव्यापदं मन्वानः स सर्वोऽप्रतिवुद्धः इति । एपा चतुष्पदा भवत्यविद्या मूलमस्य क्लेशसंतानस्य कर्माशयस्य च सविपाकस्येति । तस्याश्वामित्रागोप्पदवद्वस्तुसतयं विशे- यम् । यथा नामित्रो मित्राभायो न मित्रमानं किंतु तद्विरुद्धः [१] सपत्नः । यथा वाऽगोष्पदं न गोष्पदाभावो न गोष्पदमानं किन्तु देश एव ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम् । एवमविद्या न प्रमाणं न प्रमाणाभावः किन्तु विद्याविपरीतं ज्ञानान्तरम- विद्येति ॥ दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥२-६ ॥ भाष्यम्-पुरुषो दृक्शक्तिवुद्धिर्दर्शनशक्तिरित्येतयोरेक- स्वरूपापत्तिरिवास्मिता क्लेश उच्यते । भोभोग्यशक्त्योरत्य- न्तविभक्तयोरत्यन्तासंकीर्णयोरविभागप्राप्ताविच सत्यां भोगः कल्पते । स्वरूपप्रतिलम्भे तु तयोः कैवल्यमेव भवति, कुतो भोगः' इति । तथा चोक्तम्-"बुद्धितः परमपुरुपमाकारशी- लविद्यादिभिर्विभक्तमपश्यन् कुर्यात् तत्रात्मवृद्धि मोहेनेति"। सुखानुशयी रागः ॥२-७ ॥ भाष्यम्-सुखाभिज्ञस्य सुखानुस्मृतिपूर्वः सुखे तत्साधने वा यो गर्द्धस्तृष्णा लोभः स राग इति ॥ दुःखानुशयी द्वेषः ।। २-८ । भाष्यम्-दुःखाभिज्ञस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो दुःखे तत्साधने वा यः प्रतियो मन्युर्जिघांसा क्रोधः स द्वेपः ॥ खरसवाही विदुपोऽपि तयारूढोऽभिनिवेशः॥२-९॥ माप्यम्-सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीनित्या भवति, "मा न भूयं, भूयासम्" इति। न चाननुभूतमरणधर्मकस्पपा भ- यत्यात्माशीः । एतया च पूर्वजन्मानुभवः प्रतीयते । स चाय- - [ १६ ] मभिनिवेशः क्लेशः स्वरसवाही कृमेरपि जातमात्रस्य प्रत्यक्षा- नुमानागमैरसंभावितो मरणत्रास उच्छेददृष्ट्यात्मकः पूर्वज- न्मानुभूतं मरणदुःखमनुमापयति । यथा चायमत्यन्तमूढेषु दृश्यते क्लेशस्तथा विदुपोऽपि विज्ञावपूर्वापरान्तस्य रूढः, कस्मात् ? समाना हि तयोः कुशलाकुशलयोमरणदुःखानु- भवादियं वासनेति ॥ य०)-अत्राविद्या स्थानाङ्गोक्तं दशविध मिथ्यात्वमेव! 'अस्मि- ताया अदृश्ये (श्च दृश्ये दगारोपरूपत्वे चार्माव:(?) बौद्धदृश्यह- गैक्यापत्तिस्वीकारे तु दैष्टिवादसृष्टिवादापत्तिः ?) । अहङ्कारमम- कारवीजरूपत्वे तु गगद्वेषान्तर्भाव इति । रागद्वेषौ कषायभेदा एव । अभिनिवेशश्चोदाहतोऽर्थतो भयसंज्ञात्मक एव, स च संज्ञान्त- रोपलक्षणम् , विदुषोऽपि भय इवाहारादावप्यभिनिवेशदर्शनात् । केवलं विदुषा(पोऽप्रमत्ततादशायां दशसंज्ञाविष्कम्भणे न कश्चि- दयमभिनिवेशः। संज्ञा च मोहाभिनिवेशः, संज्ञा च मोहाभिव्यक्तं चैतन्यमिति सर्वेऽपि क्लेशा मोहप्रकृत्युदयजभाव एव, अत एव क्लेश- क्षय कैवल्यसिद्धिः, मोहक्षयस्य तद्धेतुत्वात् इति पारमर्षरहस्यम्।। १ स्थानागसूत्रे १० स्थाने । २ अस्मिताया अपि दृश्ये हगारोप- रूपत्वे इशि वा दृश्यारोपरूपत्वे मिथ्यास एवान रिमावः। आरोपा- नङ्गीकारे 'बौद्धदृश्य' इत्यादिना दृष्टिसृष्टिवादापत्तिदोषः। (दृष्टिसृष्टि- वादप्रक्रियालेशस्तु अद्वैतसिद्धि पृ०५३३ । 'मिद्धान्तलेश' परिच्छेद २ श्लो. ४. आदिपु )1३ 'दृष्टिसृष्टिवांद' इति स्यात् । .
- [ २० ] ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः॥२-१० ॥ भाष्यम्-ते पञ्च क्लेशा दग्धबीजकल्पा योगिनश्चरिताधि- कार चेतसि अलीने सह ते वास्तं गच्छन्ति । (य०)-द्वीपमोसंबन्धियथाख्यातचारित्रया इत्यर्थः ।। स्थितानां तु वीजभावोपगतानां- ध्यानहेयास्तवृत्तयः ।। २-११ ॥ क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः॥२-१२ सति मूले तद्विपाको जात्यायुभोंगाः ॥२-१३ ॥ भाष्यम्-सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो विपाकारम्भी भवति, नोच्छिन्नक्लेशमूलः । यथा तुपावनद्धाः शालितण्डुला अदग्ध- चीजभाषाः प्ररोहसंमः भवन्ति, नापनीततुपा दग्धवीज- भावा वा, तथा क्लेशावनद्धः कर्माशयो विपाकप्ररोही भवति, नापनीतक्लेशो न प्रसंख्यानदग्धक्लेशवीजभावो वेति । स च विपाकस्त्रिविधो जातिरायुर्भोग इति । तत्रेदं विचार्यते-किमकं कर्मकस्य जन्मनः कारणम् ? अथकं कर्मान जन्माक्षिप- तीति ? । द्वितीया विचारणा-किमनेकं कर्मानेकं जन्म निर्वतयति ? अथाने कमैकं जन्म निर्वर्तयति ? इति । न तावदेकं कर्म एकस्य जन्मनः कारणम्, कस्मात् ? अनादि- कालप्रचितस्यासंख्येयस्यावशिष्टस्य कर्मणः सांप्रतिकस्य च फलक्रमानियमात् अनाश्वासो लोकस्य प्रसक्तः, स चानिष्ट इति । न च कर्मानेकस्य जन्मनः कारणम् , कस्मात् !
[२१] अनेकेषु जन्मस्वेकैकमेव कर्मानेकस्य जन्मनः कारणमित्य- वशिष्टस्य विपाककालाभावः प्रसक्तः, स चाप्यनिष्ट इति । न चाने कर्मानेकजन्मकारणम् , कस्मात् ? तदनेक जन्म युगपन्न भवतीति क्रमेण वाच्यम्, तथा च पूर्वदोषानुपङ्गः। तस्माजन्मप्रायणान्तरे कृतः पुण्यापुण्यकर्माशयमचयो विचित्रः प्रधानोपसर्जनभावनावस्थितः प्रायणाभिव्यक्तः एकमघट्टकेन मरणं प्रसाध्य सम्मूच्छित एकमेव जन्म करोति, तच्च जन्म तेनैव कर्मणा लब्धायुष्कं भवति । तस्मिन्नायुपि तेनैव कर्मणा भोगः संपद्यत इति । असौ कर्माशयो जन्मा- युर्भोगहेतुत्वात्रिविपाकोऽभिधीयते । अत एकभाविकः कर्माशय उक्त इति । दृष्टजन्मवेदनीयस्त्वेकविपाकारम्भी भोगहेतुत्वाव, द्विविपाकारम्भी चा भोगायुर्हेतुत्वात्, नन्दीश्वरवन्नहुपवद्वेति । क्लेशकर्मविपाकानुभवनिर्मिताभिस्तु वासनाभिरनादिकालसंमू- छितमिदं चित्तं चित्रीकृतमिव सर्वतो मत्स्यजाल ग्रन्थिमि- रिवाततं इत्येता अनेकभवपूर्विका वासनाः। यस्त्वयं कर्माशय एष एवैकभविक उक्त इति । ये संस्काराः स्मृत्तिहेतवस्ता वासनाः, ताथानादिकालीना इति । यस्त्वसाकविका कर्माशयः स नियतविपाकश्वानियतविपाकश्च । तत्र दृष्टजन्म- वेदनीयस्य नियतविपाकस्यैवायं नियमः, न त्वदृष्टजन्मवेदनी- यस्यानियतविपाकस्य । कस्मात् ? यो ह्यदृष्टजन्मवेदनी- १ 'कर्मसु' इति.
[२२] योऽनियतविपाकस्तस्य त्रयी गतिः, कृतस्याविपकस्य नाशः, प्रधानकर्मण्याचापगमनं वा, नियतविपाकप्रधानकर्मणाभि- भूतस्य वा चिरमवस्थानमिति । तत्र कृतस्याविपकस्य नाशो यथा-शुक्लकर्मोदयादिहैव नाशः कृष्णस्य । यत्रेदमुक्तम्- " द्वे वे ह वै कर्मणी वेदितव्ये, पापकस्यैको राशिः पुण्य- कृतोऽपहन्ति । तदिच्छस्व कर्माणि सुकृतानि कर्तुमिहैव ते कर्म कवयो वेदयन्ते " । प्रधानकर्मण्यावापगमनम् , यत्रेद- मुक्तम्-"स्यात्स्वल्प: संकरः सपरिहारः स प्रत्यवमर्पः कुश- लस्य नापकर्षायालम् । कस्मात् ? कुशलं हि मे बहन्यदस्ति, यत्रायमावापं गतः स्वर्गेऽप्यपकर्पमल्पं करिष्यति" इति । नियतविपाकप्रधानकर्मणाभिभूतस्य चिरमवस्थानम् , कथ- मिति ? अदृष्टजन्मवेदनीयस्यैव नियतविपाकस्य कर्मणः समानं मरणमभिव्यक्तिकारणमुक्तम्, न त्वदृष्टजन्मवेदनीयस्यानियत- विपाकस्य । यत्त्वदृष्टजन्मवेदनीयं कर्मानियतविपाकं तन्नश्येत् आवापं वा गच्छेत् । अभिभूतं वा चिरमप्युपासीत यावत् समानं कर्माभिव्यञ्जकं निमित्तमस्य न विपाकाभिमुखं करो- तीति । तद्विपाकस्यैव देशकालनिमित्तानवधारणादियं कर्म- गतिश्चित्रा दुर्जाना चेति । न चोत्सर्गस्यापवादाभित्तिरित्ये- कमविकः कर्माशयोऽनुज्ञायत इति ।। (य०) अत्रेदं मनाग मीमांसामहे-'जात्यायुभोंगा विपाक:" इत्यवधारणमनुपपन्नं, गङ्गामरणमुद्दिश्य कृतेन त्रिसन्ध्यस्तवपाठा- - [२३] दिना जनितमदृष्टं गहामरणे विपच्यते इत्यस्यापि शास्त्रार्थत्वादायुप इव मरणस्यापि 'विपाककल्पातिरेकात् । किं च जन्म-श्राद्य- क्षणसंयन्धरूपमायुःप्रतिलम्भनद्वारा [य] दि पूर्वकर्मविपाकः स्यात तदोचरोत्तरक्षणानामपि तथात्वापत्तिः, श्रायुपैव तदुपसंप्रहे च जन्मनोऽपि नवोपसंग्रहो युक्तः, तस्माजन्मपदं गतिजात्यादि- नामकर्मकृतजीवपर्यायोपलक्षणम् । गत्यादिभोगत्वावच्छिन्ने च गत्यादिनामकर्मप्रकृतीनां पृथक्पृथकारणत्वमवश्यमेष्टव्यम, अन्यथा संकरापत्तेः । आयुरपि मनुष्याद्यायुभेदेन जीवनपर्यायलक्षणं चतु- विघं फलभूतं, तजनकमायुष्कर्माऽपि च चतुर्विधमवश्यमभ्युपग- मनीयम् । भोगपदेनावशेषकर्मपटकफलमुपलक्षणीयम् , ज्ञानावर- गादिकले ज्ञानावरणीयादीनां पृथक्पृथकारणत्वस्यान्वयव्यतिरेक- सिद्धत्वात् । पूर्वापरभावव्यवस्थितजन्मान्तरीयकर्मप्रचयस्य ताह- शोत्तरजन्मफलभोगे हेतुत्वं तु दुर्वचम् , कचित्फलक्रमवैपरीत्यस्यापि दर्शनाद् । बुद्धिविशेषविषयत्वादीना कर्मप्रचयफलप्रचयावनुगमय्य हेतुहेतुमद्भावाभ्युपगमे तु घटपटादिकार्यप्रचयेऽपि दण्डपेमादीनां तथा [हेतु ] हेतुमद्भावापत्तिः । अनन्यगतिकत्वात्कर्मफलभोग- स्थल एवेत्थं कल्प्यते नान्यत्रेति चेत्, न, अवगतभगवत्प्रवचन- रहस्यस्यानन्यगतिकत्वासिद्धेः। तथाहि -प्रारम्भनद्धमेकमेशायुष्कर्म प्रायणलब्धविपाकमेव जन्म निवर्तयति, कर्मान्तराणि च कानि- १-विपाककोटिप्रविष्टत्वात् इति भावः । २ तथैवोप' स्यात् अथवा ' तेनैवोप' इति स्यात् । ३ ' स्वादिना' स्यात्। - [ २४ ] चित्तज्जन्मनियतविपाकानि, कानिचिन्नानाजन्मनियतविपाकानि, कानिचिदनियतविपाकानि वा । तत्राद्यैर्नामगोत्रवेदनीयैः संवलित- मायुर्मवीपमाहिताव्यपदेशमभुते, यत्रान्ये प्रारब्धसंज्ञां निवेशयन्ति | एकास्मन्भवे आयुर्द्वयस्य बन्ध उदयश्च प्रतिषिद्ध एवेति न जन्मान्तरसंकरादिप्रसङ्गः । नन्दीश्वरनहुपादीनामप्यायुःसंकराभ्यु- पगमे जन्मसंकरो दुर्निवारः। प्रायणं विना हि नायुष्कर्मान्तरोद्रो- धः। शरीरान्तरपरिणामे प्रायणाभ्युपगमे च वक्तव्यं जन्मा- न्सरमिति । तस्माद्वैक्रियशरीरलाभसदृशोऽयं नैकस्मिन् जन्मन्या- युद्धयमाक्षिपतीत्यलं मिथ्यादृष्टिसंघटेन । तस्मादेकभविकः कर्माशय इति भवोपप्राहिकर्मापेक्षयैव युक्तम्, नान्यथा, कर्मानु- भवनिर्मितानां वासनानामनेकजन्मानुगमाभ्युपगमेऽर्थतः कर्मान्त- राणा स्यैव तथोपगमात् । क्रोधादिवासनानामपि मोहनीय- कर्मभावस्वरूपत्वात्, अन्यथा जातिव्यक्तिपक्षयोर्वासनाया दुनि- रूपत्वादिति प्रतिपत्तव्यम् । भवोपग्राहिकर्मणोऽप्यायुष्फरूप- स्यैकभविको कथं • सप्तजन्मविप्रत्यप्रदकर्मविपाकोपपत्तिः ? इति चेत् , देवनारकयोरेकमेव भवग्रहणं पञ्चेन्द्रियतिर्यामनुष्ययोः सप्ताष्टौ भवप्रहणानि, पृथ्वीकायिकादीनामसंख्येयानि कायस्थितिः इत्यादि सिद्धान्तोतक्रमेण तादृशगतिजातिनामकर्मादिसंचयसध्री- धीनतादृशनवायुःपरम्परानुबन्धान्नेयमनुपपत्तिरस्माकम् । भवतु, नै- कमेव कर्म प्रारब्धतामभुते, किन्तु तत्तत्क्षणवर्तिबह्वल्पसुखदुःखहेतु- १.णामेव ' इति शुद्धम् । . - , [२६] पाकभेदेन कर्मणां नानाविपाकत्वाद्भवविपाक्यायुष्प्रकृतिविपाकस्य प्रायणोद्धोध्यत्वेऽपि सर्वत्र तथा वक्तुमशक्यत्वात् । दृश्यते हि निद्रा- दिविषाकोदोधे कालविशेषस्यापि हेतुत्वम्, न च दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, स्वानन्तरकर्मविपाकोद्वधिद्वारा प्रायणस्याप्रिमसंतत्युद्धोधकत्वस्वी- कारे चातिप्रसङ्गः, नानाभवसंततिद्वारघटनायास्तत्र तत्पूर्व च वक्तुं शक्यत्वात् । प्रधानत्वमपि कर्मण एकायुष्परिप्रहं विना दुर्वचम् । नोकत्र भवे नानागतियोग्यकर्मोपादानेऽन्ते इदमेव फलवदित्य- घान्यनियामकमस्ति, आयुस्त्वेकत्र भवे एकवारमेव बध्यत इति तदनुसारेणान्ते तादृग्लेश्योपगमात्, “ यल्लेश्यो म्रियते तल्लेश्येपू. त्पद्यते " इति प्राग्भवबद्धमायुस्तादृशलेश्यया विपाकप्रारं प्रधानी- भवदन्यकर्माण्युपगृहातीति सर्व [सं] गच्छते । प्रधानकर्मण्या- वापगमनाविकमपि "मूलप्रकृत्याभिन्नाः, संक्रमयति गुणत उत्तराः प्रकृतीः। नन्वात्माऽमूर्तत्वादध्यवसायप्रयोगेण ॥” इत्यायुक्तनीत्या संक्रमविधिपरिज्ञानं विना न कथमप्युपपादयितुं शक्यम् , अन्यथा कि कुत्र संक्रामति ? इति विनिगन्तुमशक्यत्वात् । तस्मादत्रार्थेऽस्म- स्कृतकर्मप्रकृतिवृत्ति सम्यगवलोक्य वीतरागसिद्धान्तानुरोधि कर्मा- शयस्वरूपं व्याख्येयमिति कृतं विस्तरण ।। प्रकृतं प्रस्तुम:- ते हादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥२-१४॥ कथं तदुपपाद्यते- परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच , : [२७] दुःखमेव सर्व विवेकिनः ॥ २-१५ ॥ भाष्यम्-सर्वस्यायं रागानुविद्धश्वेतनाचेतनसाधनाधीन: सुखानुभव इति तत्रास्ति रागजः कर्माशयः । तथा च द्वेष्टि दुःखसाधनानि मुह्यति चेति द्वेपमोहकृतोऽप्यस्ति । तथा चोक्तम्-" नानुपहत्य भूतान्युपभोगः सम्भवतीति हिंसा- कृतोऽप्यस्ति शारीरः कर्माशयः" इति । विषयसुखं चावि- येत्युक्तम् । या भोगेप्विन्द्रियाणां तृप्तरुपशान्तिस्तत्सुखम्, या लाल्यादनुपशान्तिस्तद् दुःखम् । न चेन्द्रियाणां भोगाभ्यासेन वैतृष्ण्यं कर्तु शक्यम् । कस्मात् ? यतो भोगाभ्यासमनु शिव- र्धते रागः कौशलानि चेन्द्रियाणामिति । तस्मादनुपाय: सुखस्य भोगाभ्यास इति । स खल्वयं वृश्चिकविपभीत इवा- शीविषेण दटो यः सुखार्थी 'विपयाननुव्यवसितो महति दुःखपङ्के मम इति । एपा परिणामदुःखता नाम प्रतिकूला सुखावस्थायामपि योगिनमेव क्लिन्नाति । अथ का ताप- दुःखता ? सर्वस्य द्वेषानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनस्तापानु- भव इति तत्रास्ति द्वेषजः कर्माशयः। सुखसाधनानि च प्रार्थयमानः कायेन वाचा मनसा च परिस्पन्दते, ततः परम- नुगृह्णात्युपहन्ति चेति परानुग्रहपीडाभ्यां धर्माधर्मावुपचि. नोति । स कर्माशयो लोभान्मोहाच भवतीत्येपा तापदुःख- १॥ विपयानुवासितः इत्यपि ।
[२८] तोच्यते । का पुनः संस्कारदुःखता ? सुखानुभवात्सुखसंस्का- राशयो दुःखानुभवादपि दुःखसंस्काराशय इति । एवं कर्मभ्यो विपाकेज्नुभूयमाने सुखे दुःखे वा पुनः कर्माशयप्रचय इति । एवमिदमनादि दुःखस्रोतो विप्रसृतं योगिनमेव प्रतिकूलात्मक- त्वादुद्वेजयति । कस्मात् ? अक्षिपात्रकल्पो हि विद्वानिति, यथोर्णातन्तुरक्षिपात्रे न्यस्तः स्पर्शन दुःखयति, नान्येषु गात्रावयवेपु, एवमेतानि दुःखानि अक्षिपात्रकल्पं योगिनमेव निश्नन्ति नेतरं प्रतिपत्तारम् । इतरं तु स्वकर्मोपहृतं दुःखमु- पात्तमुपातं त्यजन्तं त्यक्तं त्यक्तमुपाददानमनादिवासनावि- चित्रया चित्तवृत्त्या समन्ततोऽनुविद्धमिवाविद्यया हातव्य एवाहङ्कारममकारानुपातिनं जातं जातं वाह्याध्यात्मिकोभय- निमित्तास्त्रिपणिस्तापा अनुप्लवन्ते । तदेवमनादिदुःखस्रोतसा व्युद्यमानमात्मानं भूतग्रामं च दृष्ट्वा योगी सर्वदुःखक्षयकारणं सम्यग्दर्शनं शरणं प्रपद्यत इति । गुणवृत्तिविरोधाच मेव सर्च विवेकिनः । प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिरूपा गुणाः परस्परा- नुग्रहपरतन्त्रा भूत्वा शान्तं घोरं मूंढ वा प्रत्ययं त्रिगुणमेवा- रभन्ते । चलं च गुणवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम् । रूपातिशया वृत्त्यतिशयाच परस्परेण विरुध्यन्ते । सामान्यानि त्वतिशयैः सह वर्तन्ते । एवमेते गुणा इतरेतराश्रयेणोपार्जि- तसुखदुःखमोझत्यथा इति सर्वे सर्वरूपा भवन्ति । गुणप्रधा- नभावकृतस्त्वेषां विशेष इति । तस्माद् दुःखमेव सर्च विवेकिन [२६] इति । तदस्य महतो दुःखसमुदायस्य प्रभवपीजमविद्या । तस्याश्च सम्यग्दर्शनमभावहेतुः । यथा चिकित्साशास्त्रं चतुर्व्य- हम्, रोगो रोगहेतुरारोग्यं भैपज्यमिति, एवमिदमपि शास्त्र चतुर्म्यहमेव । तद्यथा-संसारः संसारहेतुः मोक्षो मोक्षोपाय इति । तत्र दुःखबहुलः संसारो हेयः। प्रधानपुरुपयोः संयोगो हेयहेतुः । संयोगस्यात्यन्तिकी निवृत्तिर्हानम् । हानोपायः सम्यग्दर्शनम् । तत्र हातुः स्वरूपमुपादेयं हेयं वा न भवितुम- हेति इति, हाने तस्योच्छेदवादप्रसङ्गः, उपादाने च हेतुवादः, उभयप्रत्याख्याने शाश्वतवाद इत्येतत्सम्यग्दर्शनम् । तदेत- च्छास्त्रं चतुर्ग्रहमित्यभिधीयते ।। (य०)--निश्चयनयमतमेतद्, यदुपजीव्याह स्तुतौ महावादी- "भवबीजमनन्तमुज्झितं विमल ज्ञानमनन्तमर्जितम् | न च हीनक. लोऽसि नाधिक: समता नाप्यतिवृत्त्य वर्तसे ॥ १॥" इति । हेयं दुःखमनागतम् ॥ २-१६ ॥ तस्माद्यदेव हेयमित्युच्यते तस्यैव कारणं प्रतिनिर्दिश्यते- द्रष्टदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥२-१७॥ दृश्यस्वरूपमुच्यते- १ सिद्धसेनदिवाकरः २ चतुर्थद्वात्रिंशिका श्लो. २९ ॥ ३'चाप्यनिवृत्त्य' इति मुद्रिते पाठांतरं ।
[३०] प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगा- पवर्गार्थ दृश्यम् ॥ २-१८ ॥ दृश्यानांतु गुणानां स्वरूपभेदावधारणार्थमिदमारभ्यते-- विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥२-१९॥ भाप्यम्-तत्राकाशवाय्वग्न्युदकभूमयो भूतानि शब्दस्प- शरूपरसगन्धतन्मात्राणामविशेषाणां विशेषाः। तथा श्रोत्र- त्वचक्षुर्जिहाप्राणानि बुद्धीन्द्रियाणि, वाक्पाणिपादपायूप- स्थानि कर्मेन्द्रियाणि, एकादशं मनः सर्वार्थमित्येतान्यस्मिता- लक्षणस्याविशेषस्य विशेपाः, गुणानामेप पोडशको विशेष- परिणामः । पडविशेपाः, तद्यथा-शब्दतन्मात्रं स्पर्शतन्मात्र रूपतन्मात्रं रसतन्मात्र गन्धतन्मात्रं चेत्येकद्वित्रिचतुष्पश्चल- क्षणाः शब्दादयः पञ्चाविशेषाः, षष्ठश्चाविशेषोऽसितामात्र इति । एते सत्तामात्रस्यात्मनो महतः पडविशेषपरिणामाः। यत्तत्परमविशेपेभ्यो लिङ्गमा महत्तचं तसिन्नेते सत्तामात्र मह्त्यात्मन्यवस्थाय विवृद्धिकाष्ठामनुभवन्ति । प्रतिसंसृज्य- मानाश्च तसिन्नेव सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय यत्तनिःसत्ता- सत्तं निःसदसन्निरसदव्यक्तमलिङ्गं प्रधानं तत्प्रतीयन्ति। एप तेपां लिङ्गमात्रः परिणामो निस्सत्तासत्तं चालिङ्गपरिणाम इति । अलिङ्कायस्थायां न पुरुषार्थों हेतु लिङ्गावस्थायामादौ पुरुषा- .
[३१] र्थता कारणं भवतीति नासौ पुरुषार्थकृतेति नित्याऽऽख्यायते । त्रयाणां त्ववस्थाविशेषाणामादौ पुरुषार्थता कारणं भवति । सर्वार्थो हेतुर्निमित्तं कारणं भवतीत्यनित्याख्यायते । गुणास्तु सर्वधर्मानुपातिनो न प्रत्यत्तमयन्ते नोपजायन्ते, व्यक्तिभिरे- वातीतानागतव्ययागमवतीभिर्गुणान्वयिनीभिरुपजननापायध- का इव प्रतिभासन्ते । यथा देवदत्तो दरिद्राति, कस्माद ! यतोऽस्य नियन्ते गाव इति गवामेव मरणात्तस्य दरिद्राणं न खरूपहानादिति समः समाधिः । लिङ्गमात्रमालङ्गस्य प्रत्यासन्नं तत्र तत्संसृष्टं विविच्यत्ते क्रमानतिवृत्तेः। तथा पड- विशेषा लिङ्गमात्रे संसृष्टा विविच्यन्ते परिणामक्रमनियमात् । तथा तेष्वविशेषेषु भूतेन्द्रियाणि संसृष्टानि विविच्यन्ते । तथा चोक्तं पुरस्ताद्-"न विशेपेभ्यः परं तत्त्वान्तरमस्ति "-इति विशेषाणां नास्ति तच्चान्तरपरिणामः । तेषां तु धर्मलक्षणा- वस्थापरिणामा व्याख्यास्यन्ते । (य०) भागभावप्रध्यसामानभ्युपगमे सर्वमेतदुक्तमनुपपन्नम् । सदुक्तमकलङ्कन ." कार्यद्रव्यमनादि स्यात्प्रागभावत्य निहो । प्रध्वंसस्यापलापे तु तदेवानन्ततां ब्रजेत् ॥ ॥” तदुपगम तु द्रव्यप्रर्यायोभयरूपत्वाद्वस्तुनः सर्वत्र लक्षण्येन कथंचिदेषा व्यव- स्था युज्यतापीति वयं वदामः ।। द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२-२॥ १ स चार्थों' इत्यपि।
तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २-२१ ॥ कस्मात्- कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारण- त्वात् ॥२-२२ ॥ संयोगस्वरूपाभिधित्सयेदं सूत्रं प्रववृते-- स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२-२३॥ यस्तु प्रत्यक्चेतनस्य स्वबुद्धिसंयोगः- तस्य हेतुरविद्या ॥२-२४ ॥ हेयं दुःखं हेयकारणं च संयोगाख्यं सनिमित्तमुक्तम्, अतः परं हानं वक्तव्यम्- तदभावात् संयोगाभावा हानं तद् दृशेः कैवल्यम् ॥ २-२५॥ अथ हानस्य कः प्राप्युपायः ? इति- विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२-२६ ॥ तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २-२७ ॥ सिद्धा भवति विवेकख्यातिहानोपायः । न च सिद्धि- रन्तरेण साधनम् इत्येतदारभ्यते- [३३] योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीतिरा विवेक- ख्यातेः ॥२-२८॥ तत्र योगाङ्गान्यवधार्यन्ते- यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान- समाधयोऽष्टावङ्गानि ॥२-२९ ॥ अहिंसासत्यारत्येयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥२-३०॥ ते तु- जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥२-३१॥ भाष्यम्-तत्राहिंसा जात्यवच्छिन्ना मत्स्यवन्धकस्य मत्स्ये- वेव नान्यत्र हिंसा । सैव देशावच्छिन्नान तीर्थे हनिष्यामीति । सैव कालावच्छिन्ना न चतुर्दश्यां पुण्येऽहनि हनिप्यामीति । सैक निभिरूपरतस्य समयावच्छिन्ना देवत्राह्मणार्थे हनिप्या- मीति । यथा च क्षत्रियाणां युद्ध एव हिंसा नान्यत्रेति । एभिर्जातिदेशकालसमयैरनवच्छिन्ना अहिंसादयः सर्वथैव प्रति- पालनीयाः । सर्वभूमिपु सर्वधिपयेषु सर्वथैवाविहितव्यभिचारा सार्वभौमा महाव्रतमित्युच्यन्ते । १" वाविदित-" इति ।
[३४] (य०)-सर्व राब्दगर्भप्र तेहया महानतानि, देराशन्दर्भम- तिज्ञया चाणुव्रतानीति पुनः पारमर्षविवेकः । एकवचनं चात्र सर्व- प्रतिज्ञया पञ्चानामपि तुल्यत्वाभिव्यक्त पर्थम् ।। शौचतंतोपतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥२-३२।। भाप्यम्-तत्र शौचं मृज नादि जनितं मेध्याभ्यवहरणादि च बाह्यम् । आभ्यन्तरं चित्तमलानामाक्षालनम् । (य०-भावाचानुपरोध्येव द्रव्यशौचं याह्यमादेयमिति तत्वदर्शिनः ॥ एतेषां यमनियमानाम्- वितर्कवाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ २-३३ ॥ वितर्का हिंसादयः कृनकारितानुमोदिता लोभ- क्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञा- नानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥२-३४॥ प्रतिपक्षभावनाद्धेतोहेया वितर्का यदा स्युरप्रसवधर्माण- स्तदा तत्कृतमैश्वर्य योगिनः भवति, तद्यथा- अहिंसाप्रनिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥२-३५॥ सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ २-३६ ।।
[३५] अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥२-३७ ॥ ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥२-३८ ॥ अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंवोधः ॥२-३९ ॥ शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥२-४० ॥ किञ्च- सत्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्यन्द्रियजयात्मदर्शन- योग्यत्वानि च ॥२-४१ ॥ सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥ २-४२ ॥ कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥ २-४३ ॥ स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥२-४४॥ समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥२-४५ ॥ उक्ताः सह सिद्धिभिर्यमनियमाः । आसनादीनि चच्यामः । तत्र- स्थिरसुखमासनम् ॥ २-४६ ॥ प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥ २-४७ ॥ ततो द्वन्द्वानभियानः ॥२-४८ ॥ -
[३६]
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोगतिविच्छेदः
प्राणायामः ॥२-४९ ॥
स तु-
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसङ्ख्याभिः
परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥ २-५० ॥
बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥२-५१ ॥
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥२-५२ ।।
धारणासु च योग्यता मनसः ॥२-५३ ॥
अथ का प्रत्याहारः ?-
खविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रि-
याणां प्रत्याहारः ॥२-५४ ॥
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ २-५५ ॥
भाष्यम्--शब्दादिप्वव्यसनमिन्द्रियजय इति केचित् ।
सक्तिर्व्यसनं व्यस्पत्येनं श्रेयस इति । अविरुद्धा प्रतिपत्ति-
याय्या । शब्दादिसम्प्रयोगः स्वेच्छयेत्यन्ये । रागडेपाभावे
मुखदुःसशून्यं शब्दादिनानमिन्द्रियजय इति केचित् । चिरी-
काम्यादप्रतिपत्तिरेवति जंगीपव्यः। ततश्च परमा त्वियं पश्यता
[३७] यश्चित्तनिरोधे निरुद्धानीन्द्रियाणि, नेतरेन्द्रियजयवत् प्रयत्न कृतमुपायान्तरमपेक्षन्ते योगिन इति ।। (य०)—व्युत्थानध्यानदशासाधारणं वस्तुस्वभावभावनया स्वविषयप्रतिपत्तिप्रयुक्तरागद्वेषरूपफलानुपधानमेवेन्द्रियाणां परमो जयः इति तु वयम् । तथोक्तं शीतोष्णीयाध्ययने (प्राचाराग. अध्ययन ३ उद्दे० १.)-" जस्सिमे सद्दा य रूपा य गंधा य रसा य फासा य अभिसमन्नागया भवंति से प्रायवं नागवं वेयवं धम्मवं बंभवं " इत्यादि । अत्र "अभिसमन्वागता" इत्यस्य अभीत्याभिमुख्येन मन:परिणामपरतन्त्रा इन्द्रियविपयादत्युपयो- गलक्षणेन (?) समिति सम्यक्स्वरूपेण नैते इष्टा अनिष्टा वेनि निर्धारणया अनु पश्चादागताः परिच्छिन्ना यथार्थस्वमावेन यस्ये- त्यर्थः, स आत्मवानित्यादि परस्परमिन्द्रियजयस्य फलार्थवादः । अन्यत्राप्युक्तम्-" ण सक्का रूवमद्दटुं चक्खू विसयमागयं । रागहोसा उ जे तत्य ते भिक्खू परिवजए॥१॥” इत्यादि । चित्तनिरोधादतिरिक्तप्रयत्नानपेक्षत्वं तु परमेन्द्रियजये ज्ञानैकसाध्ये प्रयत्नमात्रानपेक्षत्यादेव निरूप्यते, तथा च स्तुतिकार:- संय- तानि तवा(न चा)क्षाणि न चोच्छ्वलितानि च । इति सम्यक्प्रति- पदा(घ)[व]येन्द्रियजयः कृतः॥१॥” इति । न च प्राणायामा- दिहठयोगाभ्यासश्चित्तनिरोधे परमेन्द्रियजये च निश्चित उपायोऽपि, १ सिद्धसेनदिवाकरः। .
[३८] " उसासं ण णिरुभइ "[आव० नि० १५१० ] इत्याद्यागमेन योगसमाधानविनत्वेन बहुलं तस्य निषिद्धत्वात् । तस्मादध्यात्म- भावनोपहितसमतापरिणामप्रवाही ज्ञानाख्यो राजयोग एव चित्ते- न्द्रिय[जय त्य परमेन्द्रियजयस्य चोपाय इति युतम् ।। ॥ इति पातञ्जले साङ्ख्यप्रवचने योगशास्त्रे साधननिर्देशो नाम द्वितीयः पादः॥ देशवन्धश्चित्तस्य धारणा ॥३-१ ॥ तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥३-२॥ तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।। ३-३॥ त्रयमेकत्र संयमः ॥३-४॥ तजयात् प्रज्ञालोकः ॥३-५॥ तस्य भूमिपु विनियोगः ॥ ३-६ ॥ त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥ ३-७॥ तदपि वहिरहं निर्वीजस्य ॥३-८॥ अथ निरोधचित्तनणेषु चलं गुणवृत्तमिति कीदृशस्तदा चित्तपरिणामः-
[३४]
व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरो-
धक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥३-९॥
तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥३-१०॥
सर्वार्थकाग्रतयोः क्षयोदयों चित्तस्य
ततः पुनः समाधिपरिणामः ॥३-११ ॥
शान्तोदितो तुल्यप्रत्ययो चित्तस्यै-
काग्रता परिणामः ॥३-१२ ॥
एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा
व्याख्याताः ॥३-१३ ॥
शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥३-१४॥
मान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥३-१५ ॥
परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥३-१६॥
शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरस्तत्प्रवि-
भागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥३-१७ ।।
संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम् ॥३-१८॥
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥ ३-१९ ॥
[४०] नव तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्॥३-२०॥ कायरूपसंयमात्तग्राह्यशक्तिस्तम्भे चतुष्प्रकाशा- सम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥३-२१॥ सोपक्रम निरूपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त- ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ।। ३-२२॥ मैत्र्यादिपु बलानि ॥३-२३ ॥ वलेषु हस्तिवलादीनि ॥ ३-२४ ॥ प्रवृत्या लोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टार्थ- ज्ञानम् ॥३-२५॥ भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥ ३-२६ ।। चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥ ३-२७ ।। ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥ ३-२८ ॥ नाभिचके कायव्यूहज्ञानम् ।। ३-२९ ।। कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥ ३-३० ॥ कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ।। ३-३१ ।। मूर्धज्योतिपि सिद्धदर्शनम् ॥३-३२ ॥ प्रातिभावा सर्वम् ॥ ३-३३॥
[४१]
हृदये चित्तसंवित् ॥ ३-३४ ॥
सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो
भोगः परार्थत्वात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम्॥३-३५॥
ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता
जायन्ते ॥ ३-३६ ॥
ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥ ३-३७ ॥
बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच चित्तस्य
परशरीरप्रवेशः ॥३-३८ ॥
उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग
उत्क्रान्तिश्च ॥३-३६ ॥
समानजयाज्वलनम् ॥३-४०॥
श्रोत्राकाशयोः संवन्धसंयमादिव्यं श्रोत्रम् ॥३-४१॥
कायाकाशयोः संबन्धसंयमाल्लघुतुलसमापत्तेश्चा-
काशगमनम् ॥३-४२ ॥
पहिरकल्पितावृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशा-
वरणक्षयः ॥३-४३ ॥
[४२] स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्भूत- जयः ॥३-४४॥ ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मा- नभिधातश्च ॥३-४५॥ रूपलावण्यवलवजसंहननवानि काय- संपत् ।। ३-४६॥ ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रिय- जयः ।। ३-४७॥ ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधान- जयश्च ।। ३-४८॥ सत्त्वपुरुपान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥३-४९ ॥ तद्वैराग्यादपि दोपवीजक्षये कैवल्यम् ॥३-५०॥ स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गमयाकरणं पुनरनिष्ट- प्रसङ्गात् ॥३-५१ ॥ पणतस्कमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥३-५२॥ तस्य विषय विशेष उपविप्यते- .
[४३] जातिलक्षणदेशेरन्यतानवच्छेदातुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥३-५३॥ तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ।। ३-५४ ।। प्राप्तविवेकजज्ञानस्याप्राप्तविवेकजज्ञानस्य वा- सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥३-५५॥ भाप्यम्-यदा निभृतरजस्तमोमलं बुद्धिसत्वं पुरुषस्या- न्यताप्रत्ययमात्राधिकारं दग्धक्नेशवीजं भवति तदा पुरुषस्य शुद्धिसारूप्यमिवापन्नं भवति । पुरुपस्योपचरितभोगाभावः शुद्धिः। एतस्यामवस्थायां कैवल्यं भवति ईश्वरस्यानीश्वरस्य वा विवेकजज्ञानमागिनः इतरस्य वा । न हि दग्धक्लेशवीजस्य ज्ञाने पुनरपेक्षा काचिदस्ति । सत्त्वशुद्धिद्वारेणैतत्समाधिजमैश्वर्य ज्ञानं चोपक्रान्तम् । परमार्थतस्तु ज्ञानाददर्शनं निवर्तते, तस्मिन्निवृत्ते न सन्त्युत्तरे क्लेशाः, क्लेशाभावात् कर्मविपाका- भावः । चरिताधिकाराश्चतस्यामवस्थायां गुणाः न पुनदृश्य- त्वेनोपतिष्ठन्ते । तत् पुरुषस कैवल्यं, तदा पुरुषः स्वरूपमा प्रज्योतिरमलः केवली वतीति ॥ (य०)-अत्रेदं चिन्त्यम्-ऐश्वर्य लब्धिरूपं न समाधिरूप. संयमजन्यं, वैचित्र्यप्रतियोगिनस्तस्य विचित्रक्षयोपशमादिजन्य- त्वात् । एकत्र नयरूपस्य च संयमस्य चित्तस्थैर्य एवोपयोगो , [४४] बाहुल्येन, आत्मद्रव्यगुणपर्यायगुणस्य [रूपस्य] च तस्य शुक्लध्या- नशरीरघटकतया कैवल्यहेतुत्वमपि । ईश्वरस्यानीश्वरस्य वा विवेक- ज्ञानवतस्तदभाववतो [वा] "सत्त्वपुरुपयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्" इत्यप्ययुक्तम् , विवेकजं केवलज्ञानमन्तरेणोक्तशुद्धिसाम्यस्यैवानु- पपत्तेः । “ दग्धलेशीजस्य शाने पुनरपेक्षा नास्ति' इत्युक्त- नियुक्तिकत्वादात्मदर्शनप्रतिबन्धकस्यैव कर्मणः केवलज्ञानप्रतिय- न्धकत्वेन तदपगमे तदुत्पत्तेरवर्जनीयत्वान्निष्प्रयोजनस्यापि फल- रूपस्य तस्य स(स्व)स्वसामप्रीसिद्धत्वात्। न हि प्रयोजनक्षतिभिया सामग्रीकार्य नार्जयतीति । तदिदमुक्तम्-" लेशपतिर्मतिज्ञानान्न फिश्चिदपि फेवलात् । तमःप्रचयनिःशेषविशुद्धिप्रभवं हि तत् ॥१॥" इति गुणविशेषजन्यत्वेऽप्यात्मदर्शनवन्मुक्तो तस्याव्यमि- चारित्वं तुल्यम् । वस्तुतो शानस्य सर्वविषयकवं स्वभावः, छद्म- स्थस्यं च विचित्रज्ञानावरणेन स प्रतियध्यत इति । निःशेषप्रति- मन्धकापगमे शाने सर्व विषयकत्वमावश्यकम् । तदुक्तं-"शो शेये फयमम: स्यात् असति प्रतिबद्धरि दाऽमिर्दाहको न स्यात् कथम- प्रतियन्धकः" ।। ( योगभिन्दु. ४३१.) इति । एतेन विवेकजं सर्वविषयकं ज्ञानमुत्पन्नमपि सत्त्वगुणवेन निवृत्ताधिकारायां प्रकृती प्रविलीयमानं नात्मानमभिस्पृशतात्यात्मार्थशून्यनिर्विकल्प- विद्रूप एप मुक्तौ व्यवतिष्ठत इत्यप्यपास्तम् । चित्त्यावच्छेदेनैकर विषयकत्यस्वभावकल्पनाद, अर्थशून्यायां पिति मानामावाद्, विम्मरूपस्य पित्सामान्यस्याविवर्तस्म कल्पनेऽपित्सामान्यस्यापि - [४५] तादृशस्य कल्पनापत्तेः व्यवहारस्य बुद्धिविशेषधभैरवोपपत्तेः, यदि चाचित्सामान्यनिष्ठ एवाचिद्विवर्तः कल्प्यते तदा तुल्यन्याया- चिद्विवोंऽपि चित्सामान्यनिष्ठ एवाभ्युपगन्तुं युक्तो न तु चिदचि- द्विवाधिष्टानमेव कल्पयितुं युक्तं, नयादेशस्य सर्वत्र द्रव्ये तुल्यप्र- सरत्वात् । कौटस्थ्यं त्वात्मनो यच्छ्रुतिसिद्धं तदितरावृत्ति- स्वाभाविक ज्ञानदर्शनोपयोगवत्त्वेन समर्थनीयम् । निर्धर्मकत्वं चितः कौटस्थ्यमित्युक्तौ तत्र प्रमेयत्वादेरप्यभावप्रसङ्गात , तथा च " सचिदानन्दरूपं ब्रह्म" इत्यादेरनुपपत्तिः । असदादिव्यावृत्ति- मात्रेण सदादिवचनोपपादने व चित्त्वमप्यचिद्वधावृत्तिरेव स्यादिति गतं चित्सामान्येनापि । यदि च " उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सद् इति गुणस्थलोपदर्शितरीत्या स (द)लक्षणं सर्वत्रोपपद्यते तदा संसा- रिमुक्तयोरसाकर्येण स्वविभावस्वभावपर्यायैस्तवाधमानं बन्धमो- क्षादिव्यवस्थामविरोधेनोपपादयतीति, एतजैनेश्वरप्रवचनामृतमा- पीय " उपचरितभोगाभावो मोक्षः" इत्यादि मिथ्यादृग्वचनवा- सनाविषमनादिकालनिपीतमुद्वमन्तु सहृदयाः!। अधिकं लतादौ ।। ॥इति पातञ्जले साङ्ख्यप्रवचने योगशास्त्रे विभूतिपादस्तृतीयः॥ " जन्मौपधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ॥४-२॥ तत्र कायेन्द्रियाणामन्यजातीयपरिणतानाम्- जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥ ४-२॥
[१६] निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥४-३॥ यदा तु योगी बहून् कायानिर्मिमीते तदा किमेकमन- स्कास्ते भवन्त्यथानेकमनस्काः ? इति- निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥ ४-४ ॥ प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥४-५॥ तत्र ध्यानजमनाशयः ॥४-६ ॥ यत:- - कौशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधभितरेषां ॥४-७॥ ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासना. नाम् ॥ ४-८॥ जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्य स्मृतिसं- स्कारयोरेकरूपत्वात् ॥४-९ ॥ तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥४-१० ॥ हेतुफ़लाश्रयालम्वनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥४-११॥
[४७] नास्त्यसतः संभवो न चास्ति सतो विनाश इति द्रव्य- त्वेन संभवन्त्यः कथं निवर्तिप्यन्ते वासना इति- अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्धभेदाधर्मा- गाम् ॥४-१२ ॥ भाष्यम्-भविष्यद्वयक्तिकमनागतम्, अनुभूतव्यक्तिक- मतीतं, स्वव्यापारोपारूढं वर्तमानं, अयं चैतद्वस्तु ज्ञानस्य ज्ञेयम् । यदि चैतत्स्वरूपतो नाभविष्यन्नेदं निर्विषयं ज्ञानमुद- पत्स्यत । तस्मादतीतानागतं स्वरूपतोऽस्तीति । किञ्च भोगभागीयस्य चापवर्गभागीयस्य वा कर्मणः फलमुत्पित्सु यदि निरूपाख्यमिति तदुद्देशेन तेन निमित्तेन कुशलानुष्ठान न युज्येत । सतश्च फलस्य निमित्तं वर्तमानीकरणे समर्थ नापूर्वजनने । सिद्धं निमित्तं नैमित्तिकस्य विशेषानुग्रहणं कुरुते नापूर्वमुत्पादयतीति । धर्मी चानेकधर्मस्वभावस्तस्य चाध्वभेदेन धर्माः प्रत्यवस्थिताः । न च यथा वर्तमान व्यक्तिविशेपापन्नं द्रव्यतोऽस्ति एवमतीतमनागतं च । कथं सहि ? खेनैव च्यङ्गेन स्वरूपेणानागतमस्ति, स्वेन चानुभूत- व्यक्तिकेन स्वरूपेणातीतमिति । वर्तमानस्यैवाध्वनः स्वरूप-- च्यक्तिरिति न सा भवत्यतीतानागतयोरध्वनोः । एकस्य चाध्वनः समये द्वावध्वानी धर्मिसमन्वागतौ भवत एवेति नाभूत्वाभावस्त्रयाणामध्वनामिति ॥
- [४८] (10)---द्रव्यपर्यायात्मनेवाध्वत्रयसमावेशो युज्यते नान्यथा, निमित्तस्वरूपभेदस्य परेणाप्यवश्याश्रयणीयत्वात् । तथा चाभूत्वा भावाभावयोरपि पर्यायव्यस्वरूपाभ्यां म्याद्वाद एव युक्तोऽन्यथा प्रतिनियतवचनव्यवहाराद्यनुपपत्तरिति तु श्रद्धयं सचेतसा ।। ते व्यक्तसूटमा गुणात्मानः ॥४-१३ ॥ यदा तु सर्वे गुणाः कथमेकः शब्द एकमिन्द्रियमिति- परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥४-१४ ॥ भाष्यम्-प्रख्याक्रियास्थितिशीलानां गुणानां ग्रहणा- मकानां करणभावेनैकः परिणामः श्रोत्रमिन्द्रियम्, प्राधा- स्मकाना शब्दमानक: परिणामः शब्दो विषय, इति, शब्दादीनां मूर्तिसमानजातीयानामेकः परिणामः पृथ्वीपर- माणुस्तन्मात्रावयवस्तेषां चैका परिणामः पृथ्वी गौः वृक्षः पर्वत इत्येवमादिर्भूतान्तरेष्वपि स्नेहोष्एयप्रणामित्त्वावकाश- दानान्युपादाय सामान्यमेकविकारारम्भः समाधेयः॥ (य०)--एकानेकपरिणामस्यावादाभ्युपगमं विना दुःश्र- द्वानमेतत् ॥ कुतश्चैतदन्याग्यम् - वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोविभक्तः पन्थाः ॥४-१५॥
[४] न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥४-१६॥ तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ।४-१७ यस्य तु तदेव चित्तं विपयस्तस्य- सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरि- णामित्वात् ॥४-१८॥ भाय्यम्-यदि चित्तवत्प्रभुरपि पुरुषः परिणमेत तदा तद्वि- पयाश्चित्तवृत्तयः शब्दादिविपयवद् ज्ञाताज्ञाताः स्युः। सदा- ज्ञातत्वं तु मनसस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वमनुमापयति ॥ (य०)-ज्ञानरूपस्य चित्तस्यात्मनि धर्मितापरिणामः सदा समिहितत्वेन तस्य सदाज्ञातत्वेऽप्यनुपपन्नः, शब्दादीनां कादा- चित्कसन्निधानेनैव व्यञ्जनावप्रहादिलक्षणेन ज्ञाताज्ञातत्वसंभवात्। अत एव केवलज्ञाने शक्तिविशेपेण विषयाणां सदा सन्निधानाद् ज्ञानावच्छेदकत्वेन तेषां सदाज्ञातत्वमबाधितमिति तु पारमेश्वर- प्रवचनप्रसिद्धः पन्थाः ॥ प्रकृतम्- स्यादाशङ्का चित्तमेव स्वाभासं विषयाभासं च भवि- प्यत्यनिवत- १ तत्त्रमाणकं ' इत्यपि । २ 'पि नानुपन्नः' इति स्यान् ।
[५०] न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥४-१९॥ . एकसमये चोभयानवधारणम् ।। ४-२० ।। स्यान्मतिः स्वरसनिरुद्धं चित्तं चित्तान्तरेण समनन्तरेण गृह्यत इति- चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसं- करश्च ॥४-२१ ॥ - कथम् ?-- चितेरप्रतिसंक्रमाधास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धि- संवेदनम् ॥ ४-२२ ॥ अतश्चैतदभ्युपगम्यते- द्रष्टदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ।। ४-२३ ।। भाष्यम्-मनो हि मन्तव्येनार्थेनोपरतं, तत्स्वयं च विप- यत्वाद्विपयिणा पुरुषेणात्मीयया वृत्याभिसंबद्धं, तदेतचित्तमेव द्रष्टदृश्योपरत्नं विपयविपयिनिर्भासं चेतनाचेतनस्वरूपापन्नं विपयात्मकमप्यचिपयात्मकमियाचेतनं चेतनमिव स्फटिकम- विकल्पं सर्वार्थमित्युच्यते । तदनेन चित्तसारूप्येग्ग भ्रान्ताः केचित्तदेव चेतनमित्याहुः। अपरे चित्तमानमेवेदं सर्वम्, नास्ति मल्वयं गवादिर्घटादिश्व सकारणो लोक इति । अनुकम्पनी- [५१] यास्ते । कस्मात् ? अस्ति हि तेषां भ्रान्तिबीजं सर्वरूपाकार- निर्भासं चित्तमिति । समाधिप्रज्ञायां प्रज्ञेयोऽर्थः प्रतिनिम्बी- भूतः तस्सालम्पनीभूतत्वादन्यः । स चेदर्थः चित्तमा स्यात् कथं प्रज्ञयैव प्रज्ञारूपमवधार्येत । तस्मात्प्रतिबिम्बीभूतोऽर्थः प्रज्ञायां येनावधार्यते स पुरुष इति । एवं ग्रहीतग्रहणग्राह्यस्व- रूपचित्तभेदात्रयमप्येतजातितः प्रविभजन्ते ते सम्यग्दर्शिनः तैरधिगतः : पुरुष इति ॥ (य०)--वयं तु ब्रूमः-अग्निरूपात्मके प्रकाशे संयोग विनाऽपि यथा स्वत:प्रकाशकत्वं तथा चैतन्येऽपि प्रतिप्राणि परानपेक्षतयानुभूयमाने, अन्यथाऽनवस्थाव्यासङ्गानुपपत्त्यादिदो- पप्रसङ्गात् । परप्रकाशकत्वं च तस्य क्षयोपशमदशायां प्रतिनिय- तविषयसंन्धाधीनम् । क्षायिक्यां च दशायां सदा तन्निरावरण- स्वभावाधीनम् । तच्चैतन्यं रूपादिवत्सामान्यवदस्सन्दात्मकानुपादा- नकारणवेन गुण इति गुण्याश्रित एव स्यात् । यश्च तस्य गुणी स एवात्मा । निर्गुणत्वं च तस्य सांसारिकगुणाभावापेक्षयैव (न) अन्यथा, (तस्य ) स्वाभाविकानन्तगुणाधारत्वाद् । विम्ब- भूतचितो निलेपत्ताभ्युपगमे च तत्प्रतिविम्बप्राहकत्वेन बुद्धौ प्रका- शस्यानुपपत्तिः, बिम्बप्रतिबिम्बभावसंबन्धस्य द्विष्ठत्वेन द्वयोरपि लेपकत्वतौल्यात् । उपचरितबिम्बत्वोपपादने चोपचरितसर्व विषय- स्वायुपपादनमपि तुल्यमिति नयादेशविशेषपक्षपातमात्रमेतत् ॥ - प्रकृतं प्रस्तुमा [५२] तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थ संहत्य- कारित्वात् ॥४-२४॥ विशेषदर्शिन आत्मभावभावनानिवृत्तिः॥४-२५॥ तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥४-२६॥ तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः॥४-२७॥ हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥ ४-२८ ।। प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेधर्म- मेघः समाधिः ॥४-२९ ॥ ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ४-३० ॥ तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्थानन्त्याज्ज्ञेय- मल्पम् ॥४-३१।। भाष्यम्-सर्वैः क्लेशकर्माधरणैर्विमुक्तस्य ज्ञानस्यानन्त्यं भवति । श्रावरकेण तमसाऽभिभूतमावृतं अनन्तं ज्ञान- सत्वं फचिदेव रजसा प्रवर्तितमुद्घाटितं ग्रहणसमर्थ भवति । तत्र यदा सर्वैरावरणमलैरपगतं भवति तदा भवत्यस्यानन्त्यं, ज्ञानस्पानन्त्याज्ञेयमल्पं संपवते, यथाऽऽकाशे खद्योतः। यप्रेदमुतम्-"अन्धो मणिमविंध्यत्तमनगुलिराययत् । अ. ग्रीवस्तं प्रत्यमुश्चत्तमजिदोऽभ्यपूजयत् ॥१॥" इति ।।
[५३] (40)-अयुक्तमेतत् । ज्ञानस्य ज्ञेयांश एवावरणस्यावार- कत्वात् , स्वरूपावरणेऽचैतन्यप्रसङ्गात् । ज्ञानानन्त्ये ज्ञेयानन्त्य- स्यापि धौन्गात् । उक्तं च-सूक्तं चात्मपरात्मकर्तृकर्म जाव पद्- पदमिति दिग्॥ ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्ति- गुणानाम् ॥ ४-३२॥ अथ कोऽयं क्रमो नाम ? इति- क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्याह्यः क्रमः ॥४-३३ ॥ भाष्यम्-क्षणानन्तर्यात्मा परिणामस्यापरान्तेनावसानेन गृह्यते क्रमः । न ह्यननुभूतक्रमक्षणा नवस्य पुराणता वख- स्यान्ते भवति । नित्येषु च क्रमो दृष्टः । द्वयी चेयं नित्यता, कूटस्थनित्यता परिणामिनित्यता च । तत्र कूटस्थनित्यता पुरुषस्य, परिणामिनित्यता गुणानाम् । यस्मिन् परिणम्यमाने तत्वं न विहन्यते तन्नित्यम् । उभयस्य च तत्त्वानभिधाता- मित्यत्वम् । तत्र गुणधर्मेपु युद्धयादिषु परिणामापरान्तनि- प्रायः क्रमो लन्धपर्यवसानो नित्येषु धर्मिषु गुणेष्वलन्धपर्य- वसानः । कटस्थनित्येषु स्वरूपमात्रप्रतिष्ठेषु मुक्कपुरुषेषु स्वरू- [५४] पास्तिता क्रमेणैवानुभूयत इति ।। तत्राप्यलब्धपर्यवसान: शब्दपृष्ठेनास्तिक्रियामुपादाय कल्पित इति ॥ (य०)--सर्वत्र द्रव्यतयाऽक्रमस्य पर्यायतया च क्रमस्यानु- भवात् समाक्रमानुविद्धत्रैलक्षण्यस्यैव सुलक्षणत्वात् कूटस्थनित्य- तायां मानाभावः । पर्याये च स्थितिचातुर्विध्याद्वैचित्र्यमिति प्रवचनरहस्यमेव संयुक्तिकमिति तु श्रद्धेयम् ॥ प्रकृतम्- अथास्य संसारस्य स्थित्या गत्या च गुणेषु वर्तमान- स्यास्ति क्रमसमाप्तिन वा ? इति । अवचनीयमेतत् । कथम् । अस्ति प्रश्न एकान्तवचनीयः सर्वो जातो मरिष्यति । ॐ भो इति । अथ सो मृत्वा जनिष्यत इति विभज्य वचनीयमेतत् । प्रत्युदितख्यातिः क्षीर्णतृष्णः कुशलो न जनिष्यते इतरस्त मनिष्यते । तथा मनुष्यजातिः श्रेयसी न वा श्रेयसी ? इत्येवं परिपृष्टे विभव्य वचनीयः प्रश्नः, पशूनुद्दिश्य श्रेयसी, देवान् भूषीश्वाधिकृत्य नेति । अयं त्ववचनीयः प्रश्नः संसारोऽय- मन्तवानथानन्त इति ? । कुशलस्यास्ति संसारक्रमपरिसमा- तिर्नेवरस्पेति अन्यतरावधारणे दोषः। तसादयाकरणीय एवायं प्रश्न इति ।। गुणाधिकारक्रमपरिसमाप्ती कैवल्यामुक्नम्, तत्स्वरूपमव- धार्यते-- पुरुषार्थशून्यानों गुणानां प्रतिप्रेसवः केवल्यं ..
10999395990
[५]
स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्निरिति॥४-३४॥
॥ इति श्रीपातञ्जले योगशास्त्रे साहयप्रवचने
कैवन्यपादश्चतुर्थः॥
अयं पातञ्जलस्वार्थः किञ्चित्वसमयादितः ।
दर्शितः प्राज्ञयोधाय यशोविजयवाचकैः ।।१।।
...
समाप्तोऽयं ग्रन्थः
180920300939bar
॥ अहम् ॥ श्रीमद्-हरिभद्रमरिसंदर्भिता श्रीमद्यशोविजयोपाध्यायविरचितव्याख्यासंवलिता योगविशिका। - ।। एँ नमः ॥ अथ योगविंशिका व्याख्यायते- मुक्खेण जोयणाओ, जोगो सम्बो विधम्मवावारो। परिसुद्धो विन्नेओ, ठाणागओ विसेसेणं ॥१॥ मुक्खेण ' ति । 'मोक्षण' महानन्देन योजनात् 'सर्वोऽपि धर्मव्यापार:' साधोरालयविहारभाषाविनयभिचा- टनादिक्रियारूपो योगो विज्ञेयः, योजनाद्योग इति न्यु- स्पत्यर्थानुगृहीतमोक्षकारणीभूतात्मव्यापारत्वरूपयोगलक्षणस्य सर्वत्र घटमानत्वात् । कीदृशो धर्मव्यापारो योगः ? इत्याह- 'परिशुद्ध प्रणिधानाद्याशयविशुद्धिमान, अनीहशस्प द्रव्यक्रियारूपत्वेन तुच्छत्वात् , उक्तं च-"आशयभेदा एते, सर्वेऽपि हि तवतोऽवगन्तव्याः । मावोऽयमनेन विना, चेष्टा द्रम्पक्रिया तुच्छा ॥" (पोडशक ३-१२) 'एते' प्रणिधा- नादयः सर्वेऽपि कथञ्चितिक्रयारूपत्वेऽपि तदुपलक्ष्या भाशय- - , . क [५७] मेदाः, 'अयं ' च पश्चप्रकारोऽप्याशयो भायः, अनेन विना 'चेष्टा' कायवाननोव्यापाररूपा द्रव्यक्रिया 'तुच्छा असारा अभिलपितफलासाधकत्वादित्येतदर्थः ॥ अथ के ते प्रणिधानाधाशयाः ? उच्यते-प्रणिधानं प्रवृत्तिर्विजयः सिद्धिर्विनियोगश्चेति पञ्च, आह च-"प्रणिधि-प्रवृत्ति-विन- जय--सिद्धि-विनियोगभेदतः प्रायः। धर्म राख्यातः, शुभा- शयः पञ्चधात्र विधौ ॥" (पो०३-६ ) इति । तत्र हीन- गुणद्वेपाभावपरोपकारवासनाविशिष्टोऽधिकृतधर्मस्थानस्य क- तव्यतोपयोगः प्रणिधानम् , उक्तं च-" प्रणिधानं तत्समये, स्थितिमत्तदधः कृपानुगं चैव । निरवद्यवस्तुविषयं, परार्थनि- प्पत्तिसारं च ।।" (पो०३-७) 'तत्समये' प्रतिपन्नधर्म स्थानमर्यादायां 'स्थितिमत्' अविचलितस्वभावम् , 'तदधः' स्वप्रतिपन्नधर्मस्थानादधस्तनगुणस्थानवर्तिपु जीवेषु ‘कृपा- नुगं' करुणापरम् , न तु गुणहीनत्वाचेषु द्वेषान्वितम् शेपं सुगमम् ।। अधिकृतधर्मस्थानोद्देशेन तदुपायचिपय इति- कर्तव्यताशुद्धः शीघ्रक्रियासमाप्तीच्छादिलक्षणोत्सुक्यविर- हितः प्रयत्नातिशयः प्रवृत्तिः, आह च-"तत्रैव तु प्रवृत्तिः, शुभसारोपायसङ्गत्तात्यन्तम् । अधिकतयत्नातिशयादौत्सुक्य- विवर्जिता चैव ॥" (पो० ३-८) 'तत्रैव ' अधिकृतधर्म- स्थान एव शुभ:-प्रकृष्टः सारो-नैपुण्यान्वितो य उपाय- स्तन संगता । विमजयो नाम विनस्य जयोऽस्मादिति व्यु- . " .
[५] त्पच्या धर्मान्तरायनिवर्तकः परिणामः । स च जेतव्यविनत्रै- विध्यात्रिविधः, तथाहि-यथा कस्यचित्कएटकाकीर्णमार्गावती- र्णस्य कण्टकविघ्नो विशिष्टगमनविघातहेतुर्भवति, तदपनयनं तु पथि प्रस्थिवस्य निराकुलगमनसंपादक, तथा मोक्षमार्गप्र- वृत्तस्य कण्टकस्थानीयशीतोष्णादिपरीपहरुपद्भुतस्य न निरा- कुलप्रवृत्तिः, तत्तितिक्षाभावनया तदपाकरणे त्वनाकुलप्रवृत्ति- सिद्धिरिति कण्टकविनजयसमः प्रथमो हीनो विजयः । तथा तस्यैव ज्वरेण भृशमभिभूतस्य निराकुलगमनेच्छोरपि तत्कर्तु- मशनुवतः कण्टकविप्नादधिको यथा ज्वरविनस्तञ्जयश्च विशिष्ट- गमनप्रवृत्तिहेतुस्तथेहापि ज्वरकल्पाः शारीरा एव रोगा विशि- धर्मस्थानाराधनप्रतिवन्धकत्वाद्विनास्तदपाकरणं च "हिया- हारा मियाहारा" (पिंडनियुक्ति -गा० ६४८) इत्यादिसूत्रो- क्तरीत्या तत्कारणानासेवनेन, 'न मत्स्वरूपस्यैते परीपहा लेशतोऽपि बाधकाः किन्तु देहमात्रस्यैव इति भावनाविशेषण वा सम्यग्धर्माराधनाय समर्थमिति ज्वरविजयसमो मध्यमो द्वितीयो विमजयः । यथा च तस्यैवाध्वनि जिगमिपोदिग्मोह- विनोपस्थिती भूयो भूयः प्रेर्यमाणस्याप्यध्वनीनैर्न गमनो- त्साहः स्यात्तद्विजये तु स्वयमेव सम्यग्ज्ञानात्परैश्चाभिधीयमा. नमार्गश्रद्धानान्मन्दोत्साहतात्यागेन विशिष्टगमनसंभवस्तथे- द्वापि मोक्षमार्गे दिग्मोहकम्पोमिथ्यात्वादिजनितो मनोविनमो विधस्तजयस्तु गुरुपारतन्त्र्येण मिथ्यात्वादिप्रतिपक्षभावनया । [५९] मनोविभ्रमापनयनादनपच्छिन्नप्रयाणसंपादक इत्ययं मोहवि- मजयसम उत्तमस्कृतीयो विजयः। एते च त्रयोऽपि विम- जया श्राशयरूपाः समुदिताः प्रवृत्तिहेतवोऽन्यतरवैकल्येऽपि तंदसिद्धरित्यवधेयम् उक्तं च-" विमजयस्त्रिविधः खलु, विज्ञेयो हीनमध्यमोत्कृष्टः । मार्ग इह कण्टकज्वरमोहजयसमः प्रवृत्तिफलः ॥" (पो० ३-४) इति। अतिचाररहिताधिकगुणे गुर्यादौ विनयवैयावृत्त्यवहुमानाद्यन्विता हीनगुणे निर्गुणे या दयादानव्यसनपतितदुःखापहारादिगुणप्रधाना मध्यमगुणे चोपकारफलवत्यधिकृतधर्मस्थानस्याहिंसादेः प्राप्तिः सिद्धिः, उक्तं च-" सिद्धिस्तत्तद्धर्मस्थानावाप्तिरिह तात्विकी ज्ञेया । अधिके विनयादियुता, हीने च दयादिगुणसारा ॥" (पो० ३-१०) इति ॥ स्वप्राप्तधर्मस्थानस्य यथोपायं परस्मिन्नपि संपादकत्वं विनियोगः, अयं चानेकजन्मान्तरसन्तानक्रमेण प्रकृष्टधर्मस्थानावाप्रवन्ध्यो हेतुः, उक्तं च-" सिद्धेश्वोत्तर- कार्य, विनियोगोऽवन्ध्यमेतदेतस्मिन् । सत्यन्वयसंपत्त्या, सुन्दरमिति तत्परं यावत् ॥" (पो०३-११) 'अवन्ध्यं न कदाचिनिष्फलं 'एतत् ' धर्मस्थानमहिंसादि, 'एतस्मिन्' विनियोगे सति 'अन्वयसंपत्त्या' अविच्छेदभावेन 'तत् । विनियोगसाध्यं धर्मस्थानं सुन्दरम् । ' इतिः' भिन्नक्रमः समात्यर्थश्च, यावत्परमित्येवं योगः, यावत् 'परं' अकृष्टं धर्मस्थानं समाप्यत इत्यर्थः । इदमत्र हृदयम्-धर्मस्तावद्रागा- - . . H [६.] दिमलविगमेन पुष्टिशुद्धिमञ्चित्तमेव । पुष्टिश्च पुण्योपचयः, शुद्धिश्च धातिकर्मणां पापानां क्षयेण या काचिनिर्मलता, तदुभयं च प्रणिधानादिलक्षणेन भावेनानुवन्धवद्भवति, तदनु- उन्धाच शुद्धिप्रकर्पः संभवति, निरनुवन्धं च तदशुद्धिफलमे- चेति न तद्धर्मलक्षणम् , ततो युक्तमुक्तं "प्रणिधानादिभावेन परिशुद्धः सर्वोऽपि धर्मव्यापारः सानुबन्धत्वाद् योगः " इति । यद्यप्येवं निश्चयतः परिशुद्धः सर्वोऽपि धर्मव्यापारो योगस्तथापि 'विशेपेण' तान्त्रिकसंकेतव्यवहारकृतेनासा- धारण्यन स्थानादिगत एव धर्मव्यापारो योगः, स्थानाद्यन्यतम एव योगपदप्रवृत्तेः सम्मतत्वादिति भावः ॥ १ ॥ स्थानादिगतो धर्मव्यापारो विशेषेण योग इत्युक्तम्, तत्र के ते स्थानादयः ? कतिभेदं च तत्र योगत्वम् ? इत्याह- ठाणुन्नत्थालंबण-रहिओ तंतम्मि पंचहा एसो। दुगमित्थ कम्मजोगो, तहा तियं नाणजोगो उ ॥२॥ 'ठाणुनत्थेत्यादि । स्थीयतेऽनेनेति स्थान-आसनवि- शेषरूपं कायोत्सर्गपर्यवन्धपद्मासनादि सकलशास्त्रप्रसिद्धम् , ऊर्छ:-शब्दः स च क्रियादाबुचार्यमाणसूत्रवर्णलक्षण:, अर्थः-शब्दाभिधेयव्यवसायः, आलम्बनं-बाह्यप्रतिमादिविष- १" नाणजोगा उ" इत्यपि । -- - .. " [६१] पध्यानम् , एते चत्वारो भेदाः, ' रहितः' इति रूपिद्रव्याल- म्पनरहितो निर्विकल्पचिन्मात्रसमाधिरूप इत्येवं 'एपः' योगः पञ्चविधः 'तन्त्रे' योगप्रधानशास्त्रे, प्रतिपादित इति शेषः, उक्तं च-"स्थानोलम्बनतदन्ययोगपरिभावनं सम्पक् । परतत्वयोजनमलं, योगाभ्यास इति समयविदः ॥" (पोड. १३-४ ) इति । स्थानादिषु योगत्वं च " मोक्षकारणीभूता- त्मव्यापारत्वं योगत्वम्" इति योगलक्षणयोगादनुपचरितमेव । यत्तु यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाध- योऽष्टावङ्गानि योगस्य" (पातं. सू०२-२६) इति योगा- गत्वेन योगरूपता स्थानादिषु हेतुफलभावेनोपचारादभिधीयत इति पोडशकवृत्तायुक्तं तत् " चित्तवृत्तिनिरोधो योगः" (पा० यो० द० १-२) इति योगलक्षणाभिप्रायेणेति ध्येयम् । अत्र स्थानादिपु 'द्वयं' स्थानोर्णलक्षणं कर्मयोग एव, स्थानस्य साक्षादूर्णस्याप्युच्चार्यमाणस्यैव ग्रहणादुच्चारणांशे क्रियारूप- स्वात् । तथा 'त्रय' अर्थालम्बननिरालम्बनलक्षणं ज्ञानयोगा, तुः। एवकारार्थ इति ज्ञानयोग एव, अर्थादीनां साक्षाद् ज्ञानरूपत्वात् ॥२॥ एप कर्मयोगो ज्ञानयोगो या कस्य भवतीति स्वामि- चिन्तायामाह- २ ' तत्त्वविदः' इत्यपि ।
[६२] देसे सव्वे य तहा, नियमेणेसो चरित्तिणो होइ। इयरस्त बीयमित्तं, इत्तु ञ्चिय केइ इच्छंति ॥ ३ ॥ 'देसे सब्वे य'ति । सप्तम्याः पञ्चम्यर्थत्वाद्देशतस्तथा सर्व- तश्व चारित्रिण एव 'एप' प्रागुक्तः स्थानादिरूपो योगः 'निय- मेन' इतरव्यवच्छेदलक्षणेन निश्चयेन भवति, क्रियारूपस्य ज्ञानरूपस्य वाऽस्य चारित्रमोहनीयक्षयोपशमनान्तरीयकत्वात् , श्रत एवाध्यात्मादियोगप्रवृत्तिरपि चारित्रप्राप्तिमारभ्यैव ग्रन्थ- कृता योगबिन्दी प्ररूपिता, तथाहि-"दशादिभेदतश्चित्र- मिदं चोक्तं महात्मभिः । अत्र पूर्वोदितो योगोऽध्यात्मादिः संप्रवर्तते ।। १॥" (३५६ श्लोक ) इति, 'देशादिभेदतः देशसर्वविशेषाद् 'इदं' चारित्रं 'अध्यात्मादिः' अध्यात्म १ भावना २ श्राध्यानं ३ समता ४ वृत्तिसंक्षयश्च ५, तत्राध्यात्म उचितप्रवृत्तेर्वतभृतो मत्र्यादिभावगर्भ शाखाजीवादितत्त्वचि- न्तनम् १, भावना अध्यात्मस्यैव प्रतिदिनं प्रवर्धमानश्चित्तवृत्ति- निरोधयुक्तोऽभ्यासः २, श्राध्यानं प्रशस्तैकार्थविपयं स्थिरप्र- दीपसदृशमुत्पातादिविषयसूक्ष्मोपयोगयुतं चित्तम् ३, समता अविद्याकल्पितेष्टानिष्टत्वसंज्ञापरिहारेण शुभाशुभानां विषयाणां तुल्यताभावनम् ४, वृत्तिसंक्षयश्च मनोद्वारा विकल्परूपाणां शरीरद्वारा परिस्पन्दरूपाणामन्यसंयोगात्मकवृत्तीनामपुनर्भा. चेन निरोधः ५। अथैतेपामध्यात्मादीनां स्थानादिषु कुत्र .
[६६) कस्थान्तर्भावः इति चेद, उच्यते-अध्यात्मस्य चित्रभेदस्य देवसेवाजपतत्त्वचिन्तनादिरूपस्य यथाक्रमं स्थाने ऊर्णेऽर्थे च । भावनाया अपि भाव्यसमानविषयत्वात्तत्रैव | ध्यानस्याल- म्बने । समतावृत्तिसंक्षययोश्च तदन्ययोग इति भावनीयम् । ततो देशतः सर्वतश्च चारित्रिण एवं स्थानादियोगप्रवृत्तिः संभवतीति सिद्धम् । ननु यदि देशतः सर्वतश्च चारित्रिण एव स्थानादिर्योगः तदा देशविरत्यादिगुणस्थानहीनस्य व्य- वहारेण श्राद्धधर्मादौ प्रवर्तमानस्य स्थानादिक्रियायाः सर्वथा नष्फल्यं स्यादित्याशङ्कयाह-'इतरस्य' देशसर्वचारित्रिव्य- तिरिक्त [स्य ] स्थानादिकं 'इत एव ' देशसर्वचारित्रं विना योगसंभवाभावादेव 'बीजमात्रं' योगबीजमानं 'केचिद् । व्यवहारनयप्रधाना इच्छन्ति । " मोक्षकारणीभूतचारित्रतत्र- संवेदनान्तर्भूतत्वेन स्थानादिकं चारित्रिण एव योगः, अपुन- चन्धकसम्यग्दृशोस्तु तद्योगवीजम्" इति निश्चयनयाभिमतः पन्थाः । व्यवहारनयस्तु योगवीजमप्युपचारेण योगमेवेच्छ- तीति व्यवहारनयेनापुनर्बन्धकादयः स्थानादियोगस्वामिना, निश्चयनयेन तु चारित्रिण एवेति विवेकः । तदिदमुक्तम्- अपुनर्बन्धकस्यायं, व्यवहारेण तात्त्विकः । अध्यात्मभाव- नारूपो, निश्चयेनोत्तरस्य तु ॥२॥” (यो० वि० ३६८ श्लोक. इति । अपुनर्वन्धकस्य उपलक्षणात्सम्यग्दृष्टेश्च 'व्यव- - " [६४] हारेण 'कारणे कार्यत्वोपचारेण ताचिकः, कारणस्यापि कथञ्चित्कार्यत्वात् । 'निश्चयेन' उपचारपरिहारेण 'उत्तरस्य तु ' चारित्रिण एव ॥ सकृद्वन्धकादीनां तु स्थानादिकमशुद्ध- परिणामत्वान्निश्चयतो व्यवहारतश्चन योगः किन्तु योगाभ्यास इत्यवधेयम् , उक्तं च-" सदावर्त्तनादीनामतात्त्विक उदा- हृतः। प्रत्यपायफलप्रायस्तथा वेपादिमात्रतः ॥३॥ (यो० वि० ३६६ श्लोक.) सकृद्-एकवारमावर्तन्ते--उत्कृष्टां स्थिति बनन्ति य ते सदावर्तनाः, श्रादिशब्दाद्विरावर्तना- दिग्रहः, 'अतात्त्विकः' व्यवहारतो निश्चयतश्चातत्वरूपः॥३॥ तदेवं स्थानादियोगस्वामित्वं विवेचितम्, अथैतेवेच प्रतिभेदानाह- इकिको य चउद्धा, इत्थं पुण तत्तओ मुणेयव्यो । इच्छापवित्तिथिरसिद्धिभेयओ समयनीईए ॥४॥ 'इक्किको यत्ति । 'अत्र' स्थानादौ 'पुनः' कर्मज्ञानवि- भेदाभिधानापेक्षया भूयः एफैकश्चतुर्की 'तचतः' सामान्येन शापि परमार्थतः 'समयनीत्या' योगशास्त्रप्रतिपादितपरि- पाट्या 'इच्छाप्रवृत्तिस्थिरसिद्धिभेदतः' इच्छाप्रवृत्तिस्थिर- सिद्धिभेदानाश्रित्य 'मुणेयव्यो' त्ति ज्ञातव्यः ॥ ४ ॥ तानेव भेदान् विपरीपुराह- - [६५] तज्जुत्तकहापीईइ संगया विपरिणामिणी इच्छा। सव्वत्थुवसमसारं, तप्पालणमो पवत्ती उ ॥ ५ ॥ तह चेव एयवाहग-चिंतारहियं थिरत्तणं नेयं । सव्वं परत्थसाहग-रूवं पुण होइ सिद्धि ति॥६॥ 'तज्जुत्तकहा' इत्यादि । तद्युक्तानां-स्थानादियोगयु- तानां कथायां प्रीत्या-अर्थयुभुत्सयार्थबोधेन वा जनितो यो हर्पस्तल्लक्षणया संगता-सहिता 'विपरिणामिनी' वि- धिकर्टबहुमानादिगर्भ स्वोल्लासमात्रायत्किञ्चिदभ्यासादिरूपं विचित्रं परिणाममादधाना इच्छा भवति, द्रव्यक्षेत्राद्यसामग्र्ये- खागसाकल्याभावेऽपि यथाविहितस्थानादियोगेच्छया यथा- शक्ति क्रियमाणं स्थानादि इच्छारूपमित्यर्थः। प्रवृत्तिस्तु 'सर्वत्र' सर्वावस्थायां ' उपशमसारं' उपशमप्रधानं यथा स्यात्तथा 'तत्पालनं' यथाविहितस्थानादियोगपालनम् , 'श्रो' ति प्राकृतत्वात् । वीर्यातिशयाद् यथाशास्त्र- मङ्गसाकल्येन विधीयमानं स्थानादि प्रवृत्तिरूपमित्यर्थः॥ ५॥ तह चे' त्ति । 'तथैव ' प्रवृत्तिवदेव सर्वत्रोपशमसारं स्थानादिपालनमतस्य-पाल्यमानस्य स्थानादेधिकचिन्तार- हितं स्थिरत्यं ज्ञेयम् । प्रवृत्तिस्थिरयोगयोरेतावान् विशेप:--- यदुत प्रवृत्तिरूपस्थानादियोगविधानं सातिचारत्वाद्धाधकचि- ૫ [६६] न्तासहितं भवति । स्थिररूपं त्वभ्याससौष्ठवेन निर्वाधकमेव जापमानं तजातीयत्वेन वाधकचिन्ताप्रतिघाताच्छुद्धिविशेपेण तदनुत्थानाच तद्रहितमेव भवतीति । 'सर्व' स्थानादि स्व- सिन्नुपशमविशेषादिफलं जनयदेव परार्थसाधक-स्वसन्निहि- तानां स्थानादियोगशुद्धधभाववतामपि तत्सिद्धिविधानद्वारा परगतस्वसदृशफलसंपादकं पुनः सिद्धिर्भवति । अत एव सि- दाहिंसानां समीपे हिंसाशीलाअपि हिंसां कर्तुं नालम् , सिद्ध- सत्यानां च समीपेऽसत्यप्रिया अप्यसत्यमभिधातुं नालम् । एवं सर्वत्रापि ज्ञेयम् । 'इतिः' इच्छादिभेदपरिसमाप्तिसूचकः। अत्रायं मत्कृतः संग्रहश्लोकः-" इच्छा तद्वत्कथाप्रीतिः, पालनं शमसंयुतम् । पालनं (प्रवृत्तिः) दोपभीहानिः स्थैर्य सिद्धिः परार्थता ॥१॥ " इति ॥६॥ उक्ता इच्छादयो भेदाः, अथैतेपा हेतूनाह- एए य चित्तरूवा, तहाखओवसमजोगओ टुति। तस्स उ सद्धापीयाइजोगमओ भव्वसत्ताणं ॥ ७ ॥ एए य'ति । 'एते च ' इच्छादयः 'चित्ररूपाः परस्परं विजातीयाः स्वस्थाने चासङ्घयभेदमाजः, 'तस्य तु' अधिकृतस्य स्थानादियोगस्यैव श्रद्धा-इदमित्थमेवेति प्रति- पधिः, प्रीति:-तत्करणादौहर्षः, प्रादिना धृतिधारणादिपरि- प्रहस्तयोगतः 'भब्यसचाना' मोक्षगमनयोग्पानामपुनर्बन्ध- .
- [६७] कादिजन्तूनां 'वथाक्षयोपशमयोगतः' तत्तत्कार्यजननाकुल- विचित्रक्षयोपशमसंपल्या भवन्ति, इच्छायोगादिविशेषे आश- यभेदाभिव्यङ्गयः क्षयोपशमभेदो हेतुरिति परमार्थः । अत एवं यस्य यावन्मात्रः क्षयोपशमस्तस्य तावन्मात्रेच्छादिसंपच्या मार्गे प्रवर्त्तमानस्य सूक्ष्मवोधाभावेऽपि मार्गानुसारिता न न्या- इन्यत इति संप्रदायः ॥७॥ इच्छादीनामेव हेतुभेदमभिधाय. कार्यभेदमभिधत्ते- अणुकंपा निव्वेओ, संवेगो होइ तह य पसमुत्ति। एएसिं अणुभावा, इच्छाईणं जहासंखं ॥ ८ ॥ 'अणुकंप' ति । 'अनुकम्पा' द्रव्यतो भावतश्च यथा- शक्ति दुःखितदुःखपरिहारेच्छा, 'निर्वेदः' नैर्गुण्यपरिज्ञा- नेन भवचारकाद्विरक्तता, संवेगः' मोक्षाभिलापः, तथा 'प्रशमश्च' क्रोधकण्डूविपयवृष्णोपशमः, इत्येते 'एतेषां' इच्छादीनां योगानां यथासङ्ख्यं अनु-पश्चाद् भावाः 'अनु- भावाः' कार्याणि भवन्ति । यद्यपि सम्यक्त्वस्यैवैते कार्यभू- तानि लिङ्गानि प्रवचने प्रसिद्धानि तथापि योगानुभवसिद्धानां विशिष्टानामेतेपामिहेच्छायोगादिकार्यत्वमभिधीयमानं न विरु- ध्यत इति द्रष्टव्यम् । वस्तुतः केवलसम्यक्वलामेऽपि व्यवहारे- णेच्छादियोगप्रवृत्तेरेवानुकम्पादिमावसिद्धेः । अनुकम्पादि- सामान्ये इच्छायोगादिसामान्यस्य तद्विशेपे च वदिशेपस्य . .
--
[६]
हेतुत्वामित्येव न्यायसिद्धम् । अत एव शमसंवेगनिर्वेदानुकम्पा-
ऽऽस्तिक्यलक्षणानां सम्यक्त्वगुणानां पश्चानुपूव्य लाभक्रमः।
प्राधान्याचेत्थमुपन्यास इति सद्धर्मचिंशिकायां प्रतिपादितम् ।।
८॥ तदेवं हतुभेदेनानुभावभेदेन चेच्छादिभेदविवेचनं कृतम्,
तथा च स्थानादायककस्मिन्निच्छादिभेदचतुष्टयसमावेशादे-
तद्विपया अशीतिर्भेदाः संपन्ना एतनिवेदनपूर्वमिच्छादिभेद-
भिन्नानां स्थानादीनां सामान्येन योजनां शिक्षयन्नाह-
एवं ठियम्मि तत्ते, नाएण उ जोयणा इमा पयडा।
चिइवंदणेण नेया, नवरं तत्तण्णुणा सम्मं ॥ ९॥
'एवं' इत्यादि। एवं' अमुना प्रकारेणेच्छादिप्रतिभेदै-
रशीतिभेदो योगः, सामान्यतस्तु स्थानादिः पश्चभेद इति
'तत्त्वे ' योगतत्त्वे 'स्थिते' व्यवस्थिते 'ज्ञातेन तु दृष्टान्तेन
तु चैत्यवन्दनेन इयं 'प्रकटा' क्रियाभ्यासपरजनप्रत्यक्षवि-
पया ' योजना' प्रतिनियतविपयव्यवस्थापना 'नवरं' केवलं
तत्वज्ञेन 'सम्यग् ' अवैपरीत्येन ज्ञेया ॥ ९ ॥ तामेवाह-
अरिहंतचेइयाणं, करेमि उस्सग्ग एवमाइयं ।
सद्धाजुत्तस्स तहा, होइ जहत्थं पयन्नाणं ॥१०॥
एयं चऽत्थालंवण-जोगवओ पायमविवरीयं तु।
इयरेसिं ठाणाइसु, जत्तपराणं परं सेयं ॥ ११ ॥
[६] 'अरिहंत ' इत्यादि । “अरिहंतचेइयाणं करेमि काउ- स्सग" एवमादि चैत्यवन्दनदण्डकविपयं 'श्रद्धायुक्तस्य' क्रियास्तिक्यवतः ' तथा ' तेन प्रकारेणोच्चार्यमाणस्वरसंप- न्मात्रादिशुद्धस्फुटवर्णानुपूर्वी लक्षणेन 'यथार्थ' अभ्रान्तं पदज्ञानं भवति, परिशुद्धपदोच्चारे दोपाभावे सति परिशुद्धपद- ज्ञानस्य श्रावणसामग्रीमात्राधीनत्वादिति भावः ॥ १०: 'एयं च' ति। एतच्च परिशुद्धं चैत्यवन्दनदण्डकपदपरिज्ञानम् , अर्थ:-उपदेशपदप्रसिद्धपदवाक्यमहावाक्येदंपर्यार्थपरिशुद्धज्ञा- नम्, आलम्बनं च-प्रथमे दण्डकेऽधिकृततीर्थकृद् , द्वितीये सर्वे तीर्थकृतः, तृतीये प्रवचनम् , चतुर्थे सम्यग्दृष्टिः शासनाधि- ठायक इत्यादि, तद्योगवता-तत्प्रणिधानवतः 'प्रायः' बाहु- ल्येन 'अविपरीतं तु' अभीप्सितपरमफलसंपादकमेव, अर्था- लम्बनयोगयोनियोगतयोपयोगरूपत्वात् , तत्सहितस्य चैत्य- वन्दनस्य भावचैत्यवन्दनत्वसिद्धेः, भावचैत्यवन्दनस्य चामृता- नुष्ठानरूपत्वेनावश्यं निर्वाणफलत्वादिति भावः । प्रायोग्रहणं सापाययोगवद्वयावृत्त्यर्थम् । द्विविधो हि योगः- सापायो निरपायश्च, तत्र निरुपक्रममोक्षपथप्रतिकूलचित्तवृद्धिकारणं प्राकालार्जितं कर्म अपायस्तत्सहितो योगः सापायः, तद्रहि- तस्तु निरपाय इति । तथा च सापायार्थालम्बनयोगवतः कदाचित्फलविलम्बसम्भवेऽपि निरपायतद्वतोऽविलम्बन फ- लोत्पत्तौ न व्यभिचार इति प्रायोग्रहणार्थः । । इतरेप' .. .
[७.] भलम्बनयोगाभाववतामेतचैत्यवन्दनसूत्रपदपरिज्ञानं 'स्था- नादिषु यत्नवा ' गुरूपदेशानुसारेण विशुद्धस्थानवर्णोद्य- मपरायणानामालम्बनयोगयोश्च तीव्रस्पृहावता 'परं' केवलं श्रेयः, अर्थालम्बनयोगामावे वाचनायां प्रच्छनायां परावर्व- नायां वा तत्पदपरिज्ञानस्यानुप्रेक्षाऽसंवलितत्वेन "अनुपयोगो द्रव्यम्" इतिकृत्वा द्रव्यचैत्यवन्दनरूपत्वेऽपि स्थानोर्ण योग- यत्नातिशयादालम्बनस्पृहयालुतया च तद्धत्वनुष्ठानरूप- वया भावचैत्यवन्दनद्वारा परम्परया स्वफलसाधकत्वादिति भावः ॥ ११ ॥ स्थानादियत्नाभावे च तचैत्यवन्दनानुष्ठान- मप्राधान्यरूपद्रव्यतामास्कन्दनिष्फलं विपरीतफलं वा स्था. दिति लेशतोऽपि स्थानादियोगाभाववन्तो नैतत्पदानयोग्या इत्युपदिशन्नाह- इहरा उकायवासियपायं अहवा महामुसावाओ। ता अणुरूवाणं चिय, कायव्वो एयविन्नासो॥१२॥ इहरा उत्ति । ' इतरथा तु ' अर्यालम्बनयोगाभाव- वां स्थानादियत्नाभावे तु तत् चैत्यवन्दनानुष्ठानं 'कायवा- सितप्राय' सम्मूर्छनजप्रवृत्तितुल्यकायचेष्टितप्राय मानसो- पयोगशून्यत्वात्, उपलक्षणाद्वाग्वासितप्रायमपि द्रष्टव्यं, तथा चाननुष्ठानरूपत्वान्निष्फलमेतदिति भावः । 'अथवा' इति दोपान्तरे, तचैत्यवन्दनानुष्ठानं महामृपावादः, "स्थानमौन- - [७१] ध्यानैरात्मानं म्युत्सृजामि" (ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि")इति प्रतिज्ञया विहितस्य चैत्यवन्दनकायोत्सर्गादे। स्थानादिभङ्गे मृपावादस्य स्फुटत्वाद, स्वयं विधिविपर्ययन- वृत्तौ परेपामेतदनुष्ठाने मिथ्यात्वबुद्धिजननद्वारा तस्य लौकि- कमृपावादादतिगुरुत्वाच, तथा च विपरीतफलं तेपामेवदनुष्ठान सम्पन्नम् । येऽपि स्थानादिशुद्धमप्यहिककीादीच्छयामु- प्मिकस्वकादिविभूतीच्छया वैतदनुष्ठानं कुर्वन्ति तैपामपि मोक्षार्थकप्रतिज्ञया विहितमेतत्तद्विपरीतार्थतया क्रियमाणं विप- गरानुष्ठानान्तर्भूतत्वेन महामृपावादानुवन्धित्वाद्विपरीतफलमे- वेति । विषायनुष्ठानस्वरूपं चेत्थमुपदर्शितं पतञ्जल्याधुझमे- दान् स्वतन्त्रेण संवादयता ग्रन्थकृतच योगविन्दौ-" विष गरोऽननुष्ठानं, तद्धतुरमृतं परम् । गुर्वादिपूजानुष्ठानमपेक्षादि- विधानतः ॥१॥" (१५५ श्लो)' विषं ' स्थावरजङ्गम- भेदभिन्नम् , ततो विषमिव विषम्, एवं गर इव गरः, परं गरः कुद्रव्यसंयोगजो विपविशेषः, 'अननुष्ठानं ' अनुष्ठानाभासं, 'तद्धेतुः' अनुष्ठानहेतुः, अमृतमिवामृत अमरणहेतुत्वान, भ- पेक्षा-इहपरलोकस्पृहा, आदिशब्दादनाभोगादेच यद् वि- घान-विशेपस्तस्मात् ॥ " विर्ष लग्भ्याद्यपेक्षातः, इदं सचि- तमारणात् । महतोऽल्पार्थनाज्ञेयं, लघुत्वापादनाचथा।'२॥" (१५६ श्लो) लब्ध्यादेः-लन्धिकीयादेः अपेचातः-स्पृहाता 'इदं अनुष्ठानं विषं 'सचिचमारणात् परिशुद्धान्तःकरण- " . .
. [७२] परिणामविनाशनात् , तथा महतोऽनुष्ठानस्य 'यन्पार्थना तुच्छलम्ध्यादिप्रार्थनेन लघुत्वस्यापादनादिदं विषं ज्ञेयम् ।। "दिव्यभोगामिलापेण, गरमाहुर्मनीषिणः । एतद्विहिवनी- त्यैव, कालान्तरनिपातनात् ॥३॥" (१५७ श्लो.) एतद' श्र. नुष्ठान ऐहिकभोगनिस्पृहस्य स्वर्गभोगस्पृहया गरमाहुः 'विहि- तनीत्येव.' विपोक्तनीयैव, केवलं कालान्तरे-भवान्तररूपे निपातनाव-अनर्थसम्पादनात् । विपं सद्य एव विनाशहेतु, गरश्च कालान्तरेणेत्येवमुपन्यासः ।। " अनाभोगवतश्चैतदननु- ष्ठानमुच्यते।सम्प्रमुग्धं मनोऽस्येति, ततश्चैतद्यथोदितम् ॥णी" ( १५८ श्लो) 'अनाभोगवतः' कुत्रापि फलादावप्रणिहित- मनसः 'एतद् ' अनुष्ठानं 'अननुष्ठानं ' अनुष्ठानमेव न भवतीत्यर्थः। सम् इति समन्ततः प्रकर्पण मुग्धं सन्निपातोप- हतस्येवानध्यवसायापन्नं मनोऽस्य, 'इतिः' पादसमाप्तौ । यत एवं ततो यथोदितं तथैव ।।" एतद्रागादिदं हेतुः, श्रेष्ठो योगविदो विदुः। सदनुष्ठानभावस्य, शुभभावांशयोगतः ॥४॥" (१५६ श्लो) 'एतद्रागात् ' सदनुष्ठानबहुमानात् 'इदं' आदिधार्मिककालभावि देवपूजाघनुष्ठानं ' सदनु- प्ठानभावस्य' ताचिकदेवपूजाद्याचारपरिणामस्य मुक्त्यद्वेषण मनाग मुक्त्यनुसारेण वा शुभभावलेशयोगात् ' श्रेष्ठः ' अव- न्ध्यो हेतुरिति योगविदो । विदुः' जानते ।। जिनोदित-- मिति त्वादुर्भावसारमदः पुनः । संवेगगर्भमत्यन्तममृतं . - - . [७३] मुनिपुङ्गवाः ॥६॥" (१६० श्लो०) जिनोदितमित्येव 'भावसारं' श्रद्धाप्रधानं 'अदः' अनुष्ठानं 'संवेगगर्भ' मोक्षाभिलापसहितं 'अत्यन्तं' अतीच अमरणहेतुत्वादमृत- संज्ञमाहुः 'मुनिपुङ्गवाः' गौतमादिमहामुनयः ॥ एतेषु त्रयं योगाभासत्वादहितम्, द्वयं तु सद्योगत्वाद्धितमिति तत्त्वम् । यत एवं स्थानादियलाभाववतोऽनुष्ठाने महादोपः 'तत्' तस्मात् अनुरूपाणामेव ' योग्यानामेव 'एतद्विन्यासः' चैत्यवन्दन- सूत्रप्रदानरूपः कर्तव्यः ॥१२ क एतद्विन्यासानुरूपा इत्याकाहायामाह- जे देसविग्इजुत्ता, जम्हा इह वोसिरामि कायं ति। सुव्बइ विरईए इम, ता सम्मं चिंतिथव्व मिणं ॥१३॥ 'जे' इत्यादि । ये 'देशविरतियुक्ताः' पञ्चपगुण- स्थानपरिणतिमन्तः ते इह अनुरूपा इति शेपः । कुतः ? इत्याह-यस्मात 'इह' चैत्यवन्दनसूत्रे "व्युत्सृजामि कायम्" इति श्रूयते, इदं च विरतौ सत्यां संभवति, तदभावे काय- व्युत्सर्गासम्भवात् , तस्य गुप्तिरूपचिरतिभेदत्वात् , ततः सम्य- क् चिन्तितव्यमेतत् यदुत " कायं व्युत्सृजामि" इति प्रति- ज्ञान्यथानुपपत्त्या देशविरतिपरिणामयुक्ता एव चैत्यवन्दना- नुष्ठानेऽधिकारिणः, तेपामेवागमपरतन्त्रतया विधियत्नसम्भ- चेनामृतानुष्ठानसिद्धेरिति । एतच्च मध्यमाधिकारिग्रहणं तुला- , [७] दण्डन्योयनाद्यन्तग्रहणार्थम्, तेन परमामृतानुष्ठानपराः सर्व- विरतास्तत्त्वत एव तद्धत्वनुष्ठानपराः । अपुनर्बन्धका अपि च व्यवहारादिहाधिकारिणो गृह्यन्ते, कुग्रहविरहसम्पादनेनापुनर्व- न्धकानामपि चैत्यवन्दनानुष्ठानस्य फलसम्पादकतायाः पश्चा- शकादिप्रसिद्धवादित्यवधेयम् । ये त्वपुनर्बन्धकादिभावमप्य- स्पृशन्तो विधिबहुमानादिरहिता गतानुगतिकतयैव चैत्यवन्द- नाद्यनुष्ठानं कुर्वन्ति ते सर्वथाऽयोग्या एवेति व्यवस्थितम् ॥ १३ ॥ नन्वविधिनापि चैत्यवन्दनाद्यनुष्ठाने तीर्थप्रवृत्तिर- व्यवच्छिमा स्यात्, विधेरेवान्वेपणे तु द्वित्राणामेव विधिपराणां लाभात् क्रमेण तीर्थोच्छेदः, स्यादिति तदनुच्छेदापाविध्यनु- ठानमप्यादरणीयमित्याशङ्कायामाह- तित्थस्सुच्छेयाइ वि, नालंवण जं ससमएमेव । सुत्तकिरियाइ नासो, एसो असमंजसविहाणा॥१४॥ 'वित्थस्स' इत्यादि । 'अत्र' अविध्यनुष्ठाने तीर्थो- च्छेदाधपि नालम्बनी (नम्), तीर्थानुच्छेदायाविध्यनुष्ठानमपि कर्तव्यमिति नालम्बनीयम् । 'यद् ' यस्मात् 'एवमेव भविध्यनुष्ठाने क्रियमाण एव 'असमञ्जसविधानात् ' विहि- वान्यथाकरणादशुद्धपारम्पर्यप्रवृत्त्या सूत्रक्रियाया विनाशः, स १ श्रीहरिभद्रसूरिकृतः। २" तित्थस्सुच्छेयाइ वि, एत्यं नालंयणं जमेमेव" इति भवेत् । - [७५] एप तीर्थोच्छेदः । नहि तीर्थनाम्ना जनसमुदाय एव तीर्थम् , आज्ञारहितस्य तस्यास्थिसङ्घातरूपत्वप्रतिपादनात् , किन्तु सू- त्रविहितयथोचितक्रियाविशिष्टसाधुसाध्वीश्रावकश्राविकासमु- दायः, तथा चाविधिकरणे सूत्रक्रियाविनाशात्परमार्थतस्तीर्थ- विनाश एवेति तीर्थोच्छेदालम्बनेनाविधिस्थापने लाभमि- च्छतो मृलक्षतिरायातेत्यर्थः ॥ १४ ॥ सूत्रक्रियाविनाशस्य- वाहितावहतां स्पष्टयन्नाह- सो एस वंकओचिय,न य सयमयमारियाणमविसेसो एयं पि भावियव्वं, इह तित्थुच्छेयभीरूहि ॥ १५॥ सो एस 'त्ति । ' स एपः' सूत्रक्रियाविनाशः 'वक्र एव' तीर्थोच्छेदपर्यवसायितया दुरन्तदुःखफल एव । ननु शुद्धक्रियाया एव पक्षपाते क्रियमाणे शुद्धायास्तस्या अलाभा- दशुद्धायाश्चानगीकारादानुश्रोतसिक्या वृत्त्याक्रियापरिणाम- स्य स्वत उपनिपातातीर्थोच्छेदः स्यादेव, यथाकथञ्चिदनुष्ठा- नावलम्बने च जैनक्रियाविशिष्टजनसमुदायरूपं तीर्थ न व्य- वच्छिद्यते, न च कर्तुरविधिक्रियया गुरोरुपदेशकस्य कश्चि- होपः, अक्रियाकर्तुरिवाविधिक्रियाकर्तस्तस्य स्वपरिणामाधी- नप्रवृत्तिकत्वात, केवलं क्रियाप्रवर्तनेन गुरोस्तीर्थव्यवहाररक्ष- णाद्गुण एवेत्याशङ्कायामाह-न च स्वयंमृतमारितयोरवि- शेपा, किन्तु विशेप एव, स्वयंमृते स्वदुष्टाशयस्यानिमित्तत्वान . , [७६] मारितेच मार्यमाणकर्मविपाकसमुपनिपावेऽपि स्वदुष्टाशयस्य निमित्तत्वात्, तद्वदिह स्वयमक्रियाप्रवृत्तं जीवमपेक्ष्य गुरोर्न पणम्, तदीयाविधिप्ररूपणमवलम्ब्य श्रोतुरविधिन- वृत्तौ च तस्योन्मार्गप्रवर्तनपरिणामादवश्यं महादूपणमेव, तथा च श्रुतकेवलिनो वचनम्-"जह सरणमुवगयाणं, जीवाण सिरो निम्तिए जो उ । एवं पायरियो वि हु, उस्सुत्तं पण्ण- तो य ॥१" न केवलमविधिप्ररूपणे दोपः, किन्तु विधि- प्ररूपणाभोगेऽविधिनिषेधासम्भवात् तदाशंसनानुमोदनापत्तेः फलतस्तत्प्रवर्तकत्वादोष एव, तस्मात् " स्वयमेतेऽवि- धिप्रवृत्ता नात्रास्माकं दोपो वयं हि क्रियामवोपदिशामो न एतावन्मात्रमपुष्टालम्बनमवलम्ब्य नोदासितव्यं परहितनिरतेन धर्माचार्येण, किन्तु सर्वोयमेनाविधिनिपेधेन विधावेव श्रोतारः प्रवर्तनीयाः, एवं हि ते मार्गे प्रवेशिता, अन्यथा तून्मार्गप्रवेशनेन नाशिताः । एतदपि भावितव्यमिह तीर्थोच्छेदभीसभिः-विधिव्यवस्थापनेनैव धेकस्यापि जीवस्य सम्यग् बोधिलाभे चतुर्दशरज्ज्वात्मकलोकेऽमारिपटहयादना- तीर्थोन्नतिः, श्रविधिस्थापने च विपर्ययात्तीर्घोच्छेद एवेति । यस्तु श्रोता विधिशास्त्रभरण कालेऽपि न संवेगभागी तस्य धर्मश्रापणेऽपि महादोप एव, तथा चोक्तं ग्रन्यकृतव पोड- १ "यथा शरणभुगताना जीवानां शिगेनिकृन्तति यस्तु । एमापार्योऽपिपलूरसूत्रं प्रशापयंश्च ।।" २ 'प्रविधि'-इवि स्यात् । त्वविधिम् " - . [७७] शके-"यः शृण्वन् सिद्धान्तं, विपयपिपासातिरेकतः पापः। प्रामोति न संवेगं, तदापि यः 'सोऽचिकित्स्य इति ॥ १ ॥ नैवविधस्य शस्तं, मण्डल्युपवेशनप्रदानमपि । कुर्वन्नेतद्गुरुरपि, तदधिकदोषोऽवगन्तव्यः ॥२॥" (पो० १०-१४-१५) मण्डल्थुपयेशनं-सिद्धान्तदानेयमण्डल्युपवेशनम् । तदधिक- दोपः' अयोग्यश्रोतुरधिकदोपः, पापकर्तुरपेक्षया तत्कारयितु- महादोपत्वात् । तस्माद्विधिश्रवणरसिक श्रोतारमुद्दिश्य विधि- प्ररूपणेनैव गुरुस्तीर्थव्यवस्थापको भवति, विधिप्रवृत्त्यैव च तीर्थमव्यवच्छिन्नं भवतीति सिद्धम् ॥ १५ ॥ ननु किमेताव- गुढार्थगवेपण्या?, यहुभिर्जनैः क्रियते तदेव कर्तव्यं 'महा- जनो येन गतः स पन्थाः" इति वचनात्, जीतव्यवहारस्यैवे- दानी बाहुल्येन प्रवृत्तेस्तस्यैगऽऽतीर्थकालभावित्वेन तीर्थ- व्यवस्थापकत्वादित्याशङ्कायामाह- मुत्तूण लोगसन्नं, उहण य साहुसमयसम्भाव। सम् पयट्टियव्वं, बुहेणमइनिउणबुद्धीए ॥१६॥ 'मुत्तूण' त्ति । मुक्त्वा ['लोकसंज्ञा'] "लोक एव प्रमाणं" इत्येवरूपां शास्त्रनिरपेक्षां मति 'उड्डूण यत्ति घोड्दा च 'साधुसमयसद्धावं ' समीचीनसिद्धान्त [रहस्य] 'सम्यग्' विधिनीत्या प्रवर्तितव्यं चैत्यवन्दनादौ 'युधेन' पण्डितेन 'अतिनिपुणघुद्ध्या' अतिशयितसूक्ष्मभावानुधाविन्या मत्या। १ 'शृण्वन्नपि सिद्धान्तं ' इत्यपि । .
" [७] साधुसमयसद्भावश्चायम्-" लोकमालम्ब्य कर्तव्यं, कृतं बहु- भिरेव चेवातदा मिथ्यादृशां धर्मो, न त्याज्य: स्यात्कदाचन ॥१॥ (ज्ञानसारे २३-४) स्तोका आर्या अनार्येभ्यः, स्तोका जैनाश्च तेष्वपि । मुश्रद्धास्तेष्वपि स्तोकाः, स्तोकास्ते- प्यपि सस्क्रियाः ॥ २ ॥ श्रेयोऽर्थिनो हि भूयांसो, लोके लोकोत्तरे च न । स्तोका हि रत्नवणिजः, स्तोकाश्च स्वा- त्मशोधकाः ॥ ३ ॥ (ज्ञानसारे २३-५ ) एकोऽपि शास्त्रनीत्या यो, वर्तते स महाजनः। किमज्ञसाथैः ? शतमप्य- न्धानां नैव पश्यति ॥४॥ यत्संविग्नजनाचीर्ण, श्रुतवाक्यै- स्वाधितम् । तज्जीतं व्यवहाराख्यं, पारम्पर्यविशुद्धिमत् ।।५।। यदाचीर्णमसंविग्नः, श्रुतार्थानवलम्बिभिः । न जीतं व्यवहा रस्तदन्धसंततिसम्भवम् ॥ ६॥ भाकल्पव्यवहारार्थ, श्रुतं न न्यवहारकम् । इतिवमहत्तन्वे, प्रायश्चित्तं प्रदर्शितम् ।। ७ ॥ तसाच्छुतानुसारेण, विध्येकरसिकैर्जनः । संविग्रजीतमालम्ब्य- मित्याज्ञा पारमेश्वरी ॥८॥" ननु यद्येवं सर्वादरेण विधि- पक्षपातः क्रियते तदा "अविहिकया वरमकयं, असूयवयणं मणंति सचन्न् । पायच्छित्तं जम्हा, अकए गुरुयं कए लहुरं ॥१॥" इत्यादि वचनानां का गतिः । इति चेत् , नैतानि पचनानि मूलत एवाविधिप्रचिविधायकानि, किन्तु विधिप्र- १ अविधिकारमहवं अस्ववचनं भणन्ति सर्वज्ञाः । प्रायश्चितं यस्मादफते गुरु कृवे लघुकम् ।। .
. [७] • वृत्तायष्यनाभोगादिनाविधिदोपश्छद्मस्थस्य भवतीति तनिया न क्रियात्यागो विधेयः । प्रथमाभ्यासे तथाविधज्ञानामावाद- न्यदापि वा प्रज्ञापनीयस्याविधिदोपो निरनुबन्ध इति तस्य तादृशानुष्ठानमपि न दोपाय, विधिबहुमानाद् गुर्वाज्ञायोगाच तस्य फलतो विधिरूपत्वादित्येतावन्मात्रप्रतिपादनपराणीति न कश्चिद्दोपः । अवोचाम चाध्यात्मसारप्रकरणे-" अशुद्धा- पि हि शुद्धायाः, क्रिया हेतुः सदाशयात् । तानं रसानुवेधेन, स्वर्णत्वमुपगच्छति ॥ १॥" (२-१६ श्लो.) यस्तु विध्य- बहुमानादविधिक्रियामासेवते तत्कर्तुरपेक्षया विधिव्यवस्थाप- नरसिकस्तदकर्ताऽपि भव्य एव, तदुक्तं योगदृष्टिसमुच्चये अन्य- कृतर-" तात्त्विकः पक्षपातश्च, भावशून्या च या क्रिया । अनयोरन्तरं ज्ञेयं, भानुखद्योतयोरिव ॥१॥” (२२१ श्लो०) इत्यादि । न चैवं तादृशषष्ठसप्तमगुणस्थानपरिणतिप्रयोज्य- विधिव्यवहाराभावादस्मदादीनामिदानीन्तनमावश्यकाद्याचर- णमकर्तव्यमेव प्रसक्तमिति शङ्कनीयम् , विकलानुष्ठानानामपि "जा जा हविज जपणा, सा सा से बिजरा होइ । इत्यादिवचनप्रामाण्यात् यत्किश्चिद्विध्यनुष्ठानस्पेच्छायोगसंपा- दकतदितरस्यापि वालाधनुग्रहसम्पादकत्वेनाकर्वव्यत्यासिदे। १ " मधिगच्छति ॥ इत्यपि । २ " या या मवेधवना सा सा तस्य निर्जरा भवति 1 [८०] इच्छायोगवद्भिर्विकलानुष्ठायिभिगीताथैः सिद्धान्तविधिप्ररू- पणे तु निर्भरो विधेयस्तस्यैव तेषां सकलकल्याणसम्पादक- त्वात् , उक्तं च गच्छाचारप्रकीर्णके-"जैइ वि ण सके काउं, सम्म जिणभासियं अणुट्ठाणं । तो सम्म मासिञ्जा, जह भणियं खीणरागेहिं ।। १॥ ओसन्नो वि विहारे,- कम्म सोहेइ सुलभवोही य। चरणकरणं विसुद्ध, उववृहतो परूवितो २"(गाथा ३२-३४) इति। ये तु गीतार्थाज्ञानिरपेक्षा वि- ध्यभिमानिन इदानीन्तनव्यवहारमुत्सृजन्ति अन्यं च विशुद्धं व्यवहार संपादयितुं न शक्नुवन्ति ते चीजमात्रमप्युच्छिन्दन्तो महादोपभाजो भवन्ति । विधिसम्पादकानां विधिव्यवस्थाप- कानां च दर्शनमपि प्रत्यूहव्यूहविनाशनमिति वयं वदाम: ॥ १६ ॥ अर्थमं प्रसक्तमर्थ संक्षिपन् प्रकृतं निगमयन्नाह- कथमित्थ पसंगणं, ठाणाइसु जत्तसंगयाणं तु। हियमेयं विन्नेयं, सदणुट्ठाणतणेण तहा ॥१७॥ ' कयमित्थ ' ति । 'कृतं ' पर्याप्त पत्र प्रसङ्गेन प्ररूपणीयमध्ये स्मृतार्थविस्तारणेन ' स्थानादिपु' प्रदर्शित- " यदापि न शक्यं कर्तु मम्यग्जिनमापितमनुष्टानम् । तत्सम्यम्भापद्यथा भणित क्षीणरागैः।। अक्सन्नोऽपि विहारे फर्म शोधयति सुलभबोधिश्च | चरणकरणं विशुद्धमुपहन प्रह- पयन् ।। . " - . [८१] योगभेदेषु ' यत्नसंगतानां तु' प्रयत्नवतामेव 'एतत् ' चैत्यवन्दनाद्यनुष्ठानं 'हितं' मोक्षसाधकं विज्ञेयम् , चैत्यब- न्दनगोचरस्थानादियोगस्य मोक्षहेतुत्वे तस्यापि तत्प्रयोजक- त्वादिति भावः । 'तथा' इति प्रकारान्तरसमुच्चये । सदनु- ठानत्वेन,योगपरिणामकृतपुण्यानुबन्धिपुण्यनिक्षेपाद्विशुद्धचि- त्तसंस्काररूपया प्रशान्तवाहितया सहितस्य चैत्यवन्दनादेः स्वातन्त्र्येणैव मोतहेतुत्वादिति भावः । प्रकारभेदोऽयं नयभे- 'दकृत इति न कश्चिद्दोपः ॥ १७ ॥ सदनुष्ठानभेदानेव प्ररूप- यंश्वरमत दे चरमयोगभेदमन्तर्भावयन्नाह- एयं च पीइभत्तागमाणुगं तह असंगयाजुत्तं । नेयं चउन्विहं खल, एसो चरमो हवइ जोगो॥१८॥ एयं च 'त्ति । एतच्च ' सदनुष्ठानं प्रीतिभक्त्याग- माननुगच्छति तत् प्रीतिभक्यागमानुगं-प्रीत्यनुष्ठानं भक्त्य. नुष्ठानं वचनानुष्ठानं चेति त्रिभेदं तथाऽसंगतया युक्तं असं- गानुष्ठानमित्येवं चतुर्विधं ज्ञेयम् । एतेपां भेदानामिदं स्वरू- पम्-यत्रानुष्ठाने प्रयत्नातिशयोऽस्ति परमा च प्रीतिरुत्पद्यते शेपत्यागेन च यत्क्रियते तत्पीत्यनुष्ठानम्, आह च- " यत्रादरोऽस्ति परमः, प्रीतिश्च हितोदया भवति कर्तुः । शेपत्यागेन करोति यच तत्प्रीत्यनुष्ठानम् ।। १ ।। १०-३ ) एतत्तुल्यमप्यालम्पनीयस्य पूज्यत्वविशेषयुद्ध्या (पो० ६ " [८२] विशुद्धतरव्यापारं भक्त्यनुष्ठानम् , आह च-गौरवविशेपयो- गाद्बुद्धिमतो यद्विशुद्धतरयोगम् । क्रिययेतरतुन्यमपि, ज्ञेयं तद्भक्त्यनुष्ठानम् ॥ २॥" (पो०१०-४) प्रीतित्वभक्तित्वे संतोष्यपूज्यकृत्यकर्तव्यताज्ञानजनितहर्पगतौ जातिविशेपो, श्राह च अत्यन्तवल्लभा खलु, पत्नी तद्वद्धिता च जन- नीति । तुल्यमपि कृत्यमनयोतिं स्यात्प्रीतिभक्तिगतम् ॥३॥ (पो० १०-५) 'तुल्यमपि कृत्यं ' भोजना- च्छादनादि 'ज्ञातं ' उदाहरणम् । शास्त्रार्थप्रतिसंधानपूर्वा साधोः सर्वत्रोचितप्रवृत्तिर्वचनानुष्ठानम् , आह च-" वच- नात्मिका प्रवृत्तिः, सर्वत्रौचित्ययोगतो या तु | वचनानुष्ठान- मिदं, चारित्रवतो नियोगेन ॥ ४ ॥ (पो० १०-६) व्यवहारकाले वचनप्रतिसंधाननिरपेक्षं दृढतरसंस्काराचन्दन- गन्धन्यायेनात्मसाद्भूतं जिनकल्पिकादीनां क्रियासेवनमसङ्गा- नुष्ठानम् , अाह च-" यत्त्वभ्यासातिशयात् , सात्मीभूतमिव चेष्यते सद्भिः । तदसङ्गानुष्ठानं, भवति त्वेतत्तदायेधात् ॥ ५॥" (पो० १०-७) ' तदावेधात् ' वचनसंस्कारात्, यथाऽऽद्यं चक्रभ्रमणं दण्डव्यापारादुत्तरं च तजनितकेवल- संस्कारादेव, तथा भिक्षाटनादिविपयं वचनानुष्ठानं वचनव्या- पाराद् असमानुष्ठानं च केवलतजनितसंस्कारादिति विशेषः, ग्राह च-"चभ्रमणं दण्डासदभाये चैव यत्परं भवति । वचनासङ्गानुष्ठानयोस्तु वजापर्क नेयम् ।। ६ ।।" (पो० .
. [८३] १०-८) इति ॥ 'खलु' इति निश्चये । एतेष्वनुष्ठानभेदेषु 'एप' एतदः समीपतरवृत्ति (पति)वाचकत्वात्समीपाभिहितास- शानुष्ठानात्मा चरमो योगोऽनालम्बनयोगो भवति, सङ्गत्मा. गस्यैवानालम्बनलक्षणत्वादिति भावः ॥ १८ ॥ आलम्पन- विधयैवानालम्पनस्वरूपमुपदर्शयन्नाह- आलंवणं पि एयं, रूवमरूवी य इत्थ परमुत्ति। तग्गुणपरिणइरूवो, सुहुमोऽणालवणो नाम ॥१९॥ आलंबणं पि' ति । आलम्बनमपि 'एतत् ' प्राक- रणिकयुद्धिसंनिहितं 'अत्र' योगविचारे 'रूपि' समवस- रणस्थजिनरूपतत्प्रतिमादिलक्षणम्, 'च' पुनः 'अरूपी परमः' सिद्धात्मा इत्येवं द्विविधम् । तत्र तस्य-अरूपिपरमा- मलक्षणस्यालम्बनस्य ये गुणा: केवलज्ञानादयस्तेषां परि- णतिः-समापत्तिलक्षणा तया रूप्यत इति तद्गुणपरिणतिरूपः सूक्ष्मोऽतीन्द्रियविपयत्वादनालम्बनो नाम योगः, अरूप्याल- म्बनस्येपदालम्बनत्वेन " अलवणा यवागः " इत्यवान नश्पदप्रवृत्तेरविरोधात् । “ सुहुमो पालंबणो नाम" ति कचित्पाठस्तत्रापि सूक्ष्मालम्बनो नामप योगस्ततोऽनालम्बन एवेति भाव उन्नेयः, उक्तं चानाधिकारे चतुर्दशपोडशके १" मुहुमो पालंपणो " इति पाठान्तरम् ।
, . [८४] ग्रन्थकृतैव -" सालम्बनो निरालम्बनश्च योगः परो द्विधा ज्ञेयः । जिनरूपध्यानं खल्वाधस्तत्तत्त्वगस्त्वपरः ।। १॥" (१४-१) सहालम्बनेन-चक्षुरादिज्ञानविपयेण प्रतिमादिना वर्तत इति सालम्बनः । आलम्बनात् -विपयभावापतिरूपा- निष्कान्तो निरालम्बनः, यो हि च्छमस्थेन ध्यायते न च स्वरूपेण दृश्यते तद्विपयो निरालम्बन इति यावत् । जिनरू- पस्य-समवसरणस्थस्य ध्यानं खलु आद्यः' सालम्बनो योगः । तस्यैव-जिनस्य तत्त्वं-केवलजीवप्रदेशसङ्घातरूपं के वलज्ञानादिस्वभावं तस्मिन् गच्छतीति तचत्वगः, 'तुः' एवार्थे, 'अपरः' अनालम्बनः, अत्रारूपितत्त्वस्य स्फुटपिप-- यत्वाभावादनालम्बनत्वमुक्तम् । अधिकृतग्रन्थगाथायां च विपयतामात्रेण तस्यालम्बनत्वमनूद्यापि तद्विपययोगस्येपदा- लम्बनत्वादनालम्बनत्वमेव प्रासाधीति फलतो न कश्चिद्विरोप इति स्मर्तव्यम् । अयं चानालम्बनयोगः “शास्त्रसंदर्शितो- पायस्तदतिकान्तगोचरः। शत्युरेकाद्विशेपेण, सामर्थ्याख्यो. यमुत्तमः ॥१॥" (योग० समु०३ श्लोक) इति श्लो- कोक्तस्वरूपक्षपकश्रेणीद्वितीयापूर्वकरणभाविक्षायोपशामकक्षा- न्त्यादिधर्मसन्न्यासरूपसामर्थ्ययोगतो निस्सङ्गानवरतप्रवृत्ता या परतत्त्वदर्शनेच्छा तल्लक्षणो मन्तव्यः, श्राह च-"साम- र्ययोगतो या, तत्र दिदृक्षत्यसगशक्याढया। साऽनालम्ब . . [८५] नयोगः, प्रोक्तस्तददर्शनं यावत् ॥१॥" (पो० १५-- ) 'तत्र' परतत्त्वे द्रष्टुमिच्छा दिदृक्षा 'इति' एवंस्वरूपा असङ्गशक्क्या-निरभिष्वङ्गाविच्छिन्नप्रवृत्त्या आढया-पूर्णा 'सा' परमात्मदर्शनेच्छा अनालम्बनयोगः, परतत्त्वस्यादर्शनं-अनु- पलम्भं यावत् , परमात्मस्वरूपदर्शने तु कैवलज्ञानेनानालम्ब- नयोगो न भवति, तस्य तदालम्बनत्वाद । अलब्धपरतत्व- स्तल्लाभाय ध्यानरूपेण प्रवृत्तो हनालम्बनयोगः, स च क्षपकेण धनुर्धरेण क्षपकश्रेण्याख्यधनुर्दण्डे लक्ष्यपरतत्त्वाभि- मुखं तद्वेधाविसंवादितया व्यापारितो यो चाणस्तत्स्थानीयः, यावत्तस्य न मोचनं तावदनालम्बनयोगव्यापारः, यदा तु ध्यानान्तरिकाख्यं तन्मोचनं तदाऽविसंवादितत्पतनमात्रादेव लक्ष्यवेध इतीपुपातकल्पः सालम्बनः केवलज्ञानप्रकाश एव भवति, न त्वनालम्बनयोगो (ग) व्यापारः, फलस्य सिद्ध- त्वादिति निर्गलितार्थः। आह च-" तत्राप्रतिष्ठितोऽयं, यतः प्रवृत्तश्च तत्त्वतस्तत्र । सर्वोत्तमानुजः खलु, तेनानाल- म्बनो गीतः ॥१॥ द्रागस्मात्तदर्शनामिषुपातज्ञातमात्रतो क्षेयम् । एतच्च केवलं तद , ज्ञानं यत्तत्परं ज्योतिः ॥ २॥" (पो० १५-६, १०) ' परतत्वे 'अप्रतिष्ठितः १॥ प्रोक्तस्तदर्शनं यान्" इति पाठानुसारेण यशोभद्र- सरिणा व्याख्याता । तथाहि-प्रोक्तस्तत्त्ववेदिमिः तस्य- परतत्त्वस्य दर्शनमुपलग्भस्तद्यावन्" इति । तत्र [८६] अलब्धप्रतिष्ठः सर्वोत्तमस्य योगस्य-अयोगाख्यस्य अनुजः- पृष्ठभावी ।। 'तद्दर्शनं ' परतत्वदर्शनं 'एतच्च' परतत्वदर्शनं 'केवलं' सम्पूर्ण 'तत् ' प्रसिद्धं यत् तत् केवलज्ञानं 'परं' प्रकृष्टं ज्योतिः स्यात् ।। अत्र कस्यचिदाशङ्का-इपुपातज्ञातात्प- रतत्वदर्शने सति केवलज्ञानोत्तरमनालम्बनयोगप्रवृत्तिर्मा भूत, सालम्बनयोगप्रवृत्तिस्तु विशिष्टतरा काचित्स्यादेव, केवलज्ञा- नस्य लब्धत्वेऽपि मोक्षस्याद्यापि योजनीयत्वात्, मैवम् , केवलिनः स्वात्मनि मोक्षस्य योजनीयत्वेऽपि ज्ञानाकामाया अविपयतया ध्यानानालम्बनत्वात्क्षपकश्रेणिकालसम्भविवि- शिष्टतरयोगप्रयत्नामावादावर्जीकरणोत्तरयोगनिरोधप्रयत्नाभा- वाचार्याक्तनकेवलिव्यापारस्य ध्यानरूपत्वाभावादुक्तान्यतरयो- गपरिणवेरेव ध्यानलक्षणत्वात् । आह च महाभाष्यकार: "सुदृढप्पयत्तवावारणं णिरोहो व विजमाणाणं । भाणं करणाण मयं, ण उ चित्तणिरोहमित्तागं ॥१॥ (विशेपा- वश्यक-गाथा ३०७१ ) इति । स्यादेतद्, यदि आपकश्रेणि- द्वितीयापूर्वकरणभावी सामर्थ्ययोग एवानालम्बनयोगो ग्रन्थ- कृताभिहितस्तदा तदप्राप्तिमतामप्रमत्तगुणस्थानानामुपरत. सकलविकल्पकल्लोलमालानां चिन्मात्रप्रतिवन्धोपलब्धरत्नत्र- यसाम्राज्यानां जिनकल्पिकादीनामपि निरालम्बनध्यानमसं- सुदृढप्रयत्नव्यापारणं निरोधो वा विद्यमानानाम् । ध्यानं करणानां मतं न तु चित्तनिरोधमात्रम् ।। " [७] गताभिधानं स्यादिति, मैवम् , यद्यपि तत्त्वतः परतत्त्वलक्ष्य- वेधाभिमुखस्तदविसंवादी सामर्थ्ययोग एव निरालम्बनस्त- थापि परतत्वलक्ष्यवेधप्रगुणतापरिणतिमात्रादर्वाक्तनं परमा- स्मगुणध्यानमपि मुख्यनिरालम्बनप्रापकत्वादेकध्येयाकारपरि- णतिशक्तियोगाच निरालम्बनमेव । अत एवावस्थात्रयभावने 'रूपातीतसिद्धगुणप्रणिधानवेलायामप्रमत्तानां शुक्लध्यानांशो निरालम्बनोऽनुभवसिद्ध एव । संसार्यात्मनोऽपि च व्यवहा- रनयसिद्धमौपाधिक रूपमाच्छाद्य शुद्धनिश्चयनयपरिकल्पित- सहजात्मगुणविभावने निरालम्बनध्यानं दुरपसवमेव, परमा- स्मतुल्यतयाऽऽत्मज्ञानस्यैव निरालम्बनध्यानांशत्वात् तस्यैव च मोहनाशकत्वात्। आह च-"जो जाणइ अरिहंत, दव्यत्तगुणत्तपञ्जयत्तेहिं । सो जापइ अप्पाणं, मोहो खलु जाइ तस्स लयं ॥१॥” इति । तस्मादूपिद्रव्यविषयं ध्यानं सालम्बनं अरूपिविपयं च निरालम्बनमिति स्थितम् ॥१६॥ श्रथ निरालम्बनध्यानस्यैव फलपरम्परामाह- एयम्मि मोहसागरतरणं सेढी य केवलं चेव । तत्तो अजोगजोगो, कमेण परमं च निव्वाणं ॥२०॥ १॥ यो जानात्यहतो द्रव्यत्वगुणवपर्यायौः । स जाना- स्यात्मानं मोहः सलु तम्य याति लयम ॥ - - , . [८] 'एयम्मि 'त्ति । 'एतस्मिन् ' निरालम्बनध्याने लब्धे मोहसागरस्य-दुरन्तरागादिभावसंतानसमुद्रस्य तरणं भवति । ततश्च ' श्रेणिः 'क्षपकश्रेणिनियूंढा भवति, सा ह्यध्यात्मा- दियोगप्रकर्षगर्मिताशयविशेषरूपा । एप एव सम्प्रज्ञातः समाधिस्तीर्थान्तरीयैर्गीयते, एतदपि सम्यग्-यथावत् प्रक- ण-सवितर्कनिश्चयात्मकत्वेनात्मपर्यायाणामर्थानां च द्वीपादी- नामिह ज्ञायमानत्वादर्थतो नानुपपन्नम् । ततश्च 'केवलमेव केवलज्ञानमेव भवति । अयं चासम्प्रज्ञातः समाधिरिति परै- मीयते, तत्रापि अर्थतो नानुपपत्तिः, केवलज्ञानेश्शेषवृत्यादि- निरोधालब्धात्मस्वभावस्य मानसविज्ञानवैकल्यादसम्प्रज्ञात- त्वसिद्धेः। अयं चासंप्रज्ञातः समाधिर्द्विधा-सयोगिकेवलिभावी अयोगिकेवलिभावी च, आयो मनोवृत्तीनां विकल्पज्ञानरूपा- णामत्यन्तोच्छेदात्सम्पद्यते । अन्त्यश्च परिस्पन्दरूपाणाम् , अयं च केवलज्ञानस्य फलभूतः। एतदेवाह-ततश्च' केवलज्ञानलाभादनन्तरं च 'अयोगयोगः' वृत्तिवीजदाहायो. "वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमासम्प्रभावः । (पावं. योग०१-१५)।२"विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्का- रोपोऽन्यः " ( पातं० १-१८) " यदभ्यासपूर्व चित्तं निरा- लम्बनमभावप्राप्तमिव भवतीलेप निर्धीजः समाधिरसम्प्रातः॥" इति १-१८ सूत्रमाध्ये व्यामपिः। or [0] गाख्या समाधिर्भवति, अयं च " धर्ममेघः" इति पातञ्ज- लैर्गीयते, " अमृतात्मा" इत्यन्यैः, "भवशत्रुः" इत्यप, "शिवोदयः" इत्यन्यैः, " सत्त्वानन्दः" इत्येकी, "परश्च इत्यपरैः । ' क्रमेण ' उपदर्शितपारम्पर्येण ततोऽयोगयोगात परमं ' सर्वोत्कृष्टफलं निर्वाणं भवति ॥ २० ॥ , . ॥ इति महोपाध्यायश्रीकल्याणविजयगणिशिष्यमुख्य- पण्डितश्रीजीतविजयगणिसतीर्थ्यपण्डितश्रीनय- विजयगणिचरणकमलचञ्चरीकपण्डितश्रीपद्म- विजयगणिसहोदरोपाध्यायश्रीजसविजय- गणिसमर्थितायां विंशिका प्रकरण- व्याख्यायां योगविंशिका- विवरणं सम्पूर्णम् ॥ १॥ तदेव रजोलेशमलापेतं स्वरूपप्रतिष्ठं सत्त्वपुरुपान्यवा- रूपातिमानं धर्ममेघभ्यानोपगं भवति" इति पातं. यो. १-२ माध्ये व्यासपिः।
No text on this page.
उपाध्यायजी श्रीयशोविजयजी कृत- योगवृत्तिका सार. ----- प्रथम पाद। सूत्र २-सूत्रकारने सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात ऐसे दो योग-जैसा कि पा० १ मू० १७-१८-४६-५१ में कहा है-मानकर उनका चित्तवृत्तिनिरोध' ऐसा लक्षण किया है । इस लक्षणमें उन्होंने 'सर्व' शब्दका ग्रहण इस लिए नहीं किया है कि यह लक्षण उभययोग साधारण है। सम्प्रज्ञात योगमें कुछ चित्तवृत्तियाँ होती भी हैं पर असम्प्र- ज्ञातमें सब रुक जाती हैं। अगर 'सर्वचित्तवृत्तिनिरोध' ऐसा लक्षण किया जाता तो असम्प्रज्ञात ही योग कहलाता, सम्प्रज्ञात नहीं । जब कि 'चित्तवृत्तिनिरोध' इतना लक्षण किया है तब तो कुछ चित्तवृत्तियोंका निरोध और सकल चित्तवृत्तियोंका निरोध ऐसा अर्थ निकलता है जो क्रमशः उक्त दोनों योगमें घट जाता है। सूत्रकारका उपर्युक्त श्राशय जो भाष्यकारने नीकाला है उसको लक्ष्यमें रखकर उपाध्यायजी कहते हैं कि-सर्व- शब्दका अध्याहार न किया जाय या किया जाय, उभय- पक्षमें सूत्रगत लक्षण अपूर्ण है। क्योंकि अध्याहार न . [१२] करनेमें संप्रज्ञात योगका तो संग्रह हो जाता है पर विक्षिप्त अवस्था जो सूत्रकारको योगरूपसे इष्ट नहीं है और जिसमें कितनीक चित्तवृत्तियोंका निरोध अवश्य पाया जाता है उसमें अतिव्याप्ति होगी। यदि उक्त अतिव्याप्तिके निरासके लिये अध्याहार किया जाय तो सम्प्रज्ञातमें अव्याप्ति होगी, क्योंकि उसमें सब चित्तवृत्तियाँ नहीं रुक जाती । इस तरह 'सर्व' शब्दका अध्याहार करनेमें या न करने में दोनों तरफ रज्जु- पाशा होनेसे 'क्लिष्ट पदका अध्याहार करके योगः लिष्टचित्तवृत्तिनिरोधः" इतना लक्षण फलित करना चाहिए, जिससे न तो विक्षिप्त अवस्थामें अतिव्याप्ति होगी और न सम्प्रज्ञातमें अव्याप्ति । यह तो हुई सूत्रको ही संगत करनेकी पात, पर श्रीहरिभद्र जैसे आचार्यकी सम्मति बतलाकर उपाध्यायजी जैन शैलीके अनुसार योगका लक्षण इस प्रकार करते हैं- 'जो धर्मव्यापार-अर्थात् स्वभावोन्मुख या चेतनाभिमुख क्रिया-समितिगुप्ति स्वरूप है वहीं योग है। क्योंकि उसीसे मोक्षलाभ होता है ।" सूत्र ११-पाद १ सूत्र ६ से ११ तकमें निरोध करने योग्य पाँच वृत्तियोंका निरूपण है । इसपर उपाध्यायजीका कहना यह है कि-सूत्रकारने वृत्तियोंके जो पाँच भेद किये है सो तात्विक नहीं किन्तु उनकी रुचिका परिणाममात्र है । क्यों कि विकल्प, निद्रा और स्मृति ये पीछली तीनों वृत्तियाँ यथार्थ तथा अयथार्थ उभयरूप देसी जाती हैं, इस- ' [१३] लिये उनका समावेश प्रमाण और विपर्यय ( अप्रमाण) इन दो वृत्तियों में ही हो जाता है । अतएव वृत्तिके दो ही वि- माग करने चाहिये । यदि किसी न किसी विशेषताको लेकर अधिक विभाग करना हो तोफिर पाँच ही क्यों ? क्षयोपशम- (योग्यता) की विविधताके कारण असंख्यात विभाग किये जा सकते हैं। विषयके न होते हुए भी जो बोध सिर्फ शब्दज्ञानके वलसे होता है वह विकल्प है । जैसे । आकाशपुष्प ' ऐसा कहनेसे एक प्रकारका भास हो ही जाता है। इसी तरह 'चै- तन्य यह श्रात्माका स्वरूप है' ऐसा सुननेसे भी भास होता है । यह दोनों प्रकारका भास विकल्प है। पहले प्रकारका विकल्प विपर्यय-कोटिमें सम्मिलित करना चाहिये, क्योंकि थाकाशपुप्प ' यह व्यवहार प्रामाणिक-सम्मत नहीं है। दूसरे प्रकारका विकल्प जिसमें भेदबोधक पष्ठीविभक्तिके वलसे आत्मा पौर चतन्यका भेद भासित होता है वह नय अर्थात् प्रमाणांशरूप है । क्योंकि ऐसे विकल्पका व्यवहार शास्त्रीय च प्रामाणिक-सम्मत है । प्रमाणांश कहनेका मतलब यह है कि व्यवहाकी दृष्टि कभी भेदप्रधान और कभी अभेद- प्रधान होती है। दोनों दृष्टियोंको मिलानेसे ही प्रमाण होता है । दृष्टिको अपेक्षा या नय कहते हैं । वस्तुतः अात्मा च- तन्यस्वरूप है, पर उसके अनेक स्वस्पोमेंसे जर चतन्यस्व- [६४] रूपका कथन करना हो तब भेददृष्टिको प्रधान रखकर प्रामा- णिक लोकभी ऐसा बोलते हैं कि चैतन्य यह आत्माका स्व- रूप है । इस कथनसे यह सिद्ध है कि जो जो 'माकाशपुष्प आदि विकल्प अशास्त्रीय है वह सब विपर्ययरूप हैं। और 'चैतन्य यह पुरुषका स्वरूप है ' इत्यादि जो जो विकल्प शास्त्रप्रसिद्ध है वह सब नयरूप होने से प्रमाणके एक देशरूप हैं । निद्रावृत्ति एकान्त अभाव विषयक नहीं होती। उसमें हाथी घोडे आदि अनेक भावोंका भी कभी कभी भास होता है, अर्थात् स्वम अवस्था भी एक तरहकी निद्रा ही है। इसी तरह वह सच भी होती है। यह देखा गया है कि अनेक वार जागरित अबस्थामें जैसा अनुभव हुआ हो निद्रामें भी वैसा ही भास होता है, और कभी कभी निद्रामें जो अनु- मन हुआ हो वही जागने के बाद अवरशः सत्य सिद्ध होता है। स्मृति भी यथार्थ अयथार्थ दोनों प्रकारको होती है। श्रतएव विकाध यादि तीन वृत्तियों को प्रमाण विपर्ययसे अलग कहने की खास आवश्यकता नहीं है। संत्र १६--सूत्रकारने योगके उपायभूत वैराग्यके अपर और पर ऐसे दो भेद किये हैं, उनको जैन परिमापामें उतारकर उपाध्यायजी खुलासा करते हैं कि-महला पैराग्य 'पापा. तधर्मसंन्यास' नामक है, जो विपयगत दोपोंकी भावनासे शुरू शुरूमें पैदा होता है । दूसरा वैराग्य 'वाचिकधर्मसंन्यास' - [५] नामक है, जो स्वरूपचिंतासे होनेवाली विषयोंकी उदासी- नतासे उत्पन्न होता है । जिसका संभव आठवें गुणस्थानमें है, और जिसमें सम्यक्त्व चारित्र आदि धर्म हायोपशमिक अवस्था-अपूर्णता-को छोडकर ज्ञायिकभाव-पूर्णता-को प्राप्त करते हैं। सूत्र १८--सूत्रकारने संप्रज्ञात और असंप्रज्ञात ये दो योग कहे हैं। जैन प्रक्रियाके साथ मिलान करते हुए उपा. ध्यायजी कहते हैं कि-अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और वृत्तिसंक्षय इन पाँच भेदोंमें जो पाँचवाँ भेद वृत्तिसंक्षय है उसीमें उक्त दोनों योगका समावेश हो जाता है। आत्माकी स्थूल सूक्ष्म चेष्टायें तथा उनका कारण जो कर्मसंयोगकी योग्यता है, उसके हास-क्रमशः हानि-को वृत्तिसंक्षय कहते हैं। यह वृत्तिसंचय ग्रंथिभेदसे होनेवाले उत्कृष्टमोहनीयकर्म- मंघसंबंधी व्यवच्छेदसे शुरू होता है, और तेरहवें गुणस्थानमें परिपूर्ण हो जाता है । इसमें भी पाठवेंसे चारहवें गुणस्थान. चकमें पृथक्वचितर्कसविचार और एकत्ववितर्कविचार नामक जो शुक्लध्यानके दो भेद पाये जाते हैं उनमें संपन्नात योगका अंतर्भाव है। संप्रज्ञात भी जो निर्वितर्कविचारानन्दा- स्मितानिर्मासरूप है यह पर्यायरहितशुद्धद्रव्यविषयक शुक्र- भ्यानमें अर्थात् एकत्ववितर्कविचारमें अन्तर्भूत है। असं- प्रज्ञात योग केवलज्ञानकी प्राप्तिसे अर्थात् तेरहवें गुणस्पान- [१६] कसे लेकर चौदहवें गुणस्थानतकमें आजाता है। इन दो गुणस्थान में जो भवोपग्राही अर्थात् अघातिकर्मका संबन्ध रहता है वही संस्कार है । और उसीकी अपेक्षासे असंप्रज्ञा- तको संस्कारशेप समझना चाहिये, क्योंकि उस अवस्थामें मतिज्ञानविशेषरूप संस्कारका संभव नहीं है अर्थात् उस समय द्रव्यमन होनेपर भी भावमन नहीं होता । सूत्र १४-सूत्रकारने विदेह और प्रकृतिलयों में जो भवप्रत्यय (जन्मसिद्ध) योगका पाया जाना कहा है उसकी संगति जैनमतके अनुसार लवसप्तम देवों-अनुत्तर विमान- वासी-में करनी चाहिये, क्योंकि उन देवोंको जन्मसे ही ज्ञानयोगरूप समाधि होती है। सूत्र २६-सूत्र २४, २५, २६ में ईश्वरका स्वरूप है। भाष्यकार और टीकाकारने ईश्वरके स्वरूपके विषयमें सूत्र- कारका मंतव्य दिखलाते हुए मुख्यतया उसके छह धर्म पतलाये हैं । जैसे-१ केवल सच्चगुणका प्रकर्ष, २ जगत्क- तत्व, ३ एकत्व, ४ अनादिशुद्धता-नित्यमुक्तता, ५ अनुग्र- हेच्छा और ६ सर्वज्ञत्व। उपाध्यायजी उक्त धौमसे (क) पहले दो धर्मीको अर्थात् केवलसच्चगुणप्रकर्प और जगत्कर्तृत्वको जैनदृष्टिसे ईश्वरमें अस्वीकार ही करते हैं, (स ) तीन धर्मोंका अर्थात् एकत्व, अनादिशुद्धता और अमुग्रहेच्छाका कथंचित् समन्वय [१७] करते हैं, और (ग) एकधर्मका अर्थात् सर्वज्ञपनका सर्वथा स्वीकार करते हैं। (क) सत्त्वगुण जो जड प्रकृतिका अंश है वह तथा जगत्कर्तृत्व इन दो धर्मोका सम्बन्ध ईश्वरमें युक्तिसंगत न होनेसे जैनदर्शनको मान्य नहीं है । (ख) एकत्व शब्दके संख्या और सादृश्य ये दो अर्थ होते हैं। जैनशास्त्र ईश्वरकी एक संख्या नहीं मानता, वह सभी मुक्त श्रात्माओंको ईश्वर मानता है। अतएव उसके अनुसार ईश्वरमें एकत्वका मतलव सदृशतासे है । जब ईश्वर कोई एक ही व्यक्ति नहीं है तब जैनप्रक्रियाके अनुसार यह भी सिद्ध है कि अनादिशुद्धता मुक्तजीवोंके प्रवाहमें ही घट सकती है, एक व्यक्तिमात्रमें नहीं। अनु- प्रहकी इच्छा जो रागरूप होनेसे द्वेप सहचरित होनी चाहिये उसका तो ईश्वरमें सम्भव ही नहीं हो सकता, अतएव जैन- शास्त्र कहता है कि ईश्वरोपासनाके निमित्तसे योगी जो सदा- चार लाभ करता है वही ईश्वरका अनुग्रह समझना चाहिये। ईश्वरमें सर्वज्ञत्व जैनशाखको वैसा ही मान्य है जैसा कि योगदर्शनको, पर जैनमतकी विशेषता यह है कि सर्वज्ञत्व दोपोंके नाशसे उत्पन्न होता है। अतएव वह नित्यमुक्तताका साधक नहीं हो सकता। सूत्र ३३-उपाध्यायजी कहते हैं कि-जैनशास्त्र भी [8] मैत्री आदि चार भावनाओंको चित्तशुद्धिका उपाय मानता है, और मैत्रीका अर्थ उसमें विशाल है। सूत्रमें सुखी प्राणिको ही मैत्रीभावनाका विषय बतलाया है, पर जैना- चार्य प्राणिमात्रको मैत्रीका विपय बतलाते हैं। इसके सिवाय उपाध्यायजीने पोडशकप्रकरणके चतुर्थ और तेरहवें पोडश- कके अनुसार चारों भावनाओंके भेद और उनका स्वरूप भी बतलाया है। सूत्र ३४-जैनशास्त्र प्राणायामको चित्तशुद्धिका पुष्ट साधन नहीं मानता, क्योंकि उसको हठपूर्वक करनेसे मन स्थिर होनेके बदले व्याकुल हो जाता है। सूत्र ४६.-चित्तका ध्येयविषयके समानाकार बन जाना उसकी समापत्ति है । जब ध्येय स्थूल हो तब सवितर्क, निर्वितर्क और ध्येय सूक्ष्म हो तब सविचार, निर्विचार; इस तरह ममापत्तिके चार भेद हैं, जो सभी सवीज ही हैं और संप्रज्ञात कहलाते हैं । जैनशास्त्र में समापत्तिका मतलब उन भावनाओंसे है जो भावनायें चित्तमें एकाग्रता उत्पन्न करती हैं और जिनका अनुभव शुक्लध्यानवाले ही श्रात्मा करते हैं। पर्यायसहित स्थूल द्रव्यकी भावना सवितर्क समापत्ति, पर्यायरहित स्थूल द्रव्यकी भावना निर्वितर्क समापत्ति, पर्यायसहित सूक्ष्म द्रव्यकी भावना सविचार समापत्ति, और पर्यायरहित सूक्ष्म द्रव्यकी भावना निर्विचार समापत्ति है।
[8] इन भावनाओं को मोहकी उपशम दशामें अर्थात उपशम- अणिमें सम्प्रज्ञात समाधिकी तरह सवीज और मोहकी चीण भवस्था अर्थात् आपकौणिमें असम्प्रज्ञात समाधिकी तरह निज घटा लेना चाहिये। सूत्र ४६-नैनप्रक्रियाके अनुसार मृतंमरामज्ञाका स- मन्वय इस प्रकार है-जो समाधिप्रज्ञा दूसरे अपूर्वकरण अर्थात् पाठवें गुणस्थानमें होनेवाले सामर्थ्ययोगके पलसे प्रकट होती है, और जो शास्त्रके द्वारा प्रतिपादन नहीं किये जा सकनेवाले अंतीन्द्रिय विषयोंको अवगाहन करती है, अतएव जो प्रज्ञा न तो केवलज्ञानरूप है और न श्रुतज्ञान- रूप; किन्तु जैसे रातके खतम होते समय और सूर्योदयके पहले अरुणोदयरूप संध्या रात और दिन दोनोंसे अलग पर दोनोंकी माध्यमिक स्थितिरूप है, वैसे ही जो प्रजा श्रुत- शानफे अंतमें और केवलज्ञान के पहले प्रकट होने के कारण दोनोंकी मध्यम दशा रूप है, जिसका दूसरा नाम अनुभव है, उसीको ऋतम्भराप्रज्ञा समझना चाहिये। द्वितीय पाद । सून १-जैसे भाग्यमें चित्तकी प्रसन्नताको बाधित नहीं यरनेवाला ही तप योगमार्गमें उपयोगी कहा गया है, पस [१००] ही जैनशास्त्र भी अत्यन्त दुष्कर ऐसे वाह्य तप करनेकी सम्मति यहांतक ही देता है, जहांतक कि आभ्यन्तर तप अर्थात् कपायमन्दताकी वृद्धि हो, और ध्यानकी पुष्टि हो । जैनशास्त्रके अनुसार ईश्वरप्रणिधानका मतलब यह है कि प्रत्येक अनुष्ठान करते समय शास्त्रको दृष्टिमम्मुख रख करके तद्वारा उसके आदि उपदेशक वीतराग प्रभुको हृदयमें स्थान देना। सूत्र ४अस्मिता श्रादि चारों क्लेशोंकी जड अविद्या है, और चारों क्लेश प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार इस प्रकारकी चार चार अवस्थावाले हैं । इस विषयका समन्वय जैनपरि- भाषामें इस प्रकार है-अविद्यादि पाँचों फ्रेश मोहनीयकर्मके प्रौदयिकभाव-विशेषरूप हैं। अबाधाकाल पूर्ण न होनेके कारण जबतक कर्मदलिकका निपेक (रचनाविशेष)न हो तयतककी कर्मावस्थाको प्रसुप्तावस्था समझना चाहिये । कर्मका उपशम और क्षयोपशम भाव उसकी तनुत्व अवस्था है। अपनी विरोधी प्रकृतिके उदयादि कारणोंसे किसी कर्म- प्रकृतिका उदय रुक जाना वह उसकी विच्छिन्न अवस्था है। उदयावलिकाको प्राप्त होना कर्मकी उदार अवस्था है। सूत्र :--सूत्रकारने सूत्र ५ से 8 तकमें पाँच फेशोंके लक्षण कहे हुए हैं उनका जैनप्रक्रियाके अनुसार समन्वय इस प्रकार है- , - [१०१] अविद्याको जैनशास्त्रमें मिथ्यात्व कहते हैं। स्थानाङ्गसूत्र में मिथ्यात्वके दस भेद दिखाये हैं। जैसे-अधर्ममें धर्म, धर्ममें अधर्म, अमार्गमें मार्ग, मार्गमें अंमार्ग, असाधुमें साधु, सा- धुमें असाधु, अजीवमें जीव, जीवमें अजीव, और अयुङ्गामें युक्त, तथा युक्तमें प्रयुक्त ऐसी बुद्धि करना । अस्मिता आरोपको कहते हैं आरोप दो प्रकारका है- दृश्य अर्थात् प्रपंचमें द्रष्टा-चेतन का आरोप और द्रष्टामें दृश्य- का आरोप। यह दोनों प्रकारका आरोप यानि भ्रम जैन परि- भापाके अनुसार मिथ्यात्व ही है । यदि अस्मिताको अहंकार ममकारका चीज मान लिया जाय तो वह राग या द्वेष रूप ही है। राग और द्वेप कपायके भेद ही हैं। अभिनिवेशका उदाहरण भाष्यकारने दिया है कि मैं कभी न मखं, सदा बना रहूं, अर्थात् मरणसे भय और जीवि- तकी आशा, यह जैनपरिभाषा अनुसार भयसंज्ञा ही है । भयसंज्ञाकी तरह अन्य-अर्थात् माहार, मैथुन और परिग्रह- संज्ञाको भी अभिनिवेश ही समझना चाहिये, क्योंकि भयके समान श्राहार आदिमें भी विद्वानोंकाभी अभिनिवेश देखाजाता है। विद्वानों में अभिनिवेशका अभाव सिर्फ उस समय पाया जाता है जब कि वे अप्रमत्तदशामें वर्तमान हों और अप्रमत्त- मापसे उन्होंने दस संज्ञाओंको रोक दिया हो । संज्ञा यह मोहका विलास या मोहसे व्यक्त होनेवाला चैतन्यका फरण [१०२] ही है। इस प्रकार सभी क्लेश जैन संकेतके अनुसार मोह- नीयकर्मके औदायकभावरूप ही हैं। इसीसे योगदर्शनमें क्ले- शक्षयसे कैवन्यप्राप्ति और जैनदर्शनमें मोहचयंसे कैवल्य प्राप्ति कही गई है। सूत्र १०-सूक्ष्म-अर्थात् दग्धवीज सदृश-क्लेशाका नाश चित्तके नाशके साथ ही सूत्रकारने माना है | इस बातको जैनप्रक्रियाके अनुसार यों कह सकते हैं कि जो क्लेश अर्थात् मोहप्रधान घातिकर्म दग्धवीजसदृश हुए हों, उनका नाश बारहवें गुणस्थानसंबंधी यथाख्यात चारित्रसे होता है। सूत्र १३-प्रस्तुत सूत्रके भाप्यमें कर्म, उसके विपाक और विपाकसंबंधी नियम आदिके विषयमें मुख्य सात पातें ऐसी हैं जिनके विषयमें मतभेद दिखा कर उपाध्यायजीने जैनप्रक्रियाके अनुसार अपना मन्तव्य बतलाया है । वे सात बातें ये हैं-१ विपाक तीन ही प्रकारका है । २ कर्मप्रचयके बंध और फलका क्रम एक सा होता है, अर्थात् पूर्ववद्ध कर्मका फल पहले ही मिलता है और पश्चात्बद्ध कर्मका फल पथात् । ३ वासनाकी अनादिकालीनता और कर्मा- शयकी एकभविकता अर्थात् वासना और कर्माशयकी भि- मता। ४ कर्माशयकी एकमविकता और प्रारब्धता । ५ कर्माशयका उद्बोधक मरण ही है, अर्थात् जन्मभर किये १ पा०४ सू०३-३४१२ तत्त्वार्थ अध्याय १० सूत्र १ [१०३] हुए कर्माशयका फल मरणके बाद ही मिलता है। ६ मरणके समय कर्माशयका फलोन्मुख होना यह उसकी प्रधानताका लक्षण है, और उस समय फलोन्मुख न होना उसकी गौणताका लक्षण है । ७ गौणकर्मका प्रधानकर्ममें आवाप- गमन अर्थात् संमिलित होकर उसमें दब जाना । इनके विषयमें क्रमशः जैनसिद्धांत इस प्रकार है-१ विपाक तीन ही नहीं बल्कि अधिक हैं, क्योंकि वैदिक लोगोंने ही गंगामरणको अदृष्ट विशेषका फल माना है, जो सूत्रोक्त तीन विपाकोंसे भिन्न है । तात्त्विक दृष्टि से देखा जाय तो कमसे कम ज्ञानाचरण आदि थाट विपाक तो मानने ही चाहिये। २ यह एकान्त नियम नहीं है कि जो कर्मव्यक्ति पूर्व- बद्ध हो उसका फल प्रथम ही मिले और पश्चात्यद्ध कर्मव्य- क्तिका फल पीछे मिले, किन्तु कभी कभी कर्मके बन्धन और फलक्रममें विपर्यय भी हो जाता है । ३ वासना भी एकप्रकारका कर्म अर्थात् भावकर्म है अतएव वासना और कर्म ये दो भिन्न तत्व नहीं हैं। ४ एकभविकताका नियम सिर्फ आयुष्कर्ममें ही लागू पह सकता है । ज्ञानावरणादि अन्य कर्म अनेकमविक मी होते हैं। प्रारब्धता-विपाकयेयता-का नियम भी सिर्फ आयु- , [१०४] फर्ममें लागू पडता है, क्योंकि अन्य सभी कर्म विपाको- दयके सिवाय अर्थात प्रदेशोदयद्वारा भी भोगे जा सकते हैं। ५ मरणके सिवाय अन्य अर्थात् द्रव्य, क्षेत्र, काल आदि निमित्त भी कर्माशयके उद्बोधक होते हैं । ६ मरणके समय अवश्य उदयमान होनेवाला कर्म श्रायु ही है, इस लिये यदि प्रधानता माननी हो तो वह सिर्फ आयुष्कर्ममें ही घटाई जा सकती है, अन्य कर्नामें नहीं। ७ गौणकर्मका प्रधानकर्ममें आवापगमन होता है यह पात गोल-माल जैसी है। पावापगमनका पूरा भाव संक्र- मणविधिको विना जाने ध्यानमें नहीं आसकता, इस लिये कर्मप्रकृति, पंचसंग्रह आदि ग्रन्थोंमेंसे संक्रमणका विचार जान लेना चाहिये। सूत्र १५-सूत्रकारने संपूर्ण दृश्यप्रपंचको विवेकिके लिये दुःखरूप कहा है, इस कथनका नयदृष्टिसे पृथक्करण करते हुए उपाध्यायजी कहते हैं कि दृश्यप्रपंच दुःखरूप है सो निश्चय- दृष्टिसे, व्यवहारदृष्टिसे तो वह सुख दुःख उभयरूप है । इस पृथक्करणकी पुष्टि वे सिद्धसेनदिवाकरके एक स्तुतियाक्यसे करते हैं । उस वाक्यका भाव इस प्रकार है "हे वीतराग ! तूने अनंत भववीजको फेंक दिया है, और अनंत ज्ञान प्राप्त किया है, फिर भी तेरी कला न तो कम हुई है और न अ- धिक, तू तो समभाव अर्थात् एक रूपताको ही तारण, धारण [१०५] किये हुए है।" इसमें जो अनंत भक्वीजका फेंकना कहा गया है सो संसारको निश्चयदृष्टिसे दुःखरूप माननेसे ही घट सकता है। सूत्र ११-इसमें भाष्यकारने सृष्टिसंहार क्रमको सां- ख्यसिद्धांतके अनुसार वर्णन किया है। सांख्यशास्त्र सत्का- र्यवाद मानता है अर्थात् असत् का उत्पाद और सत् का प्रभाव नहीं मानता । इसपर उपाध्यायजी कहते हैं कि उक्त सिद्धांत एकांतरूप नहीं मानना चाहिये, क्योंकि एकांतरूप मान लेने में प्रागभाव और प्रध्वंसाभावका अस्वी- कार करना पडता है, जिससे कार्यमें अनादि-अनंतताका प्रसंग आता है जो इष्ट नहीं है। इसलिये उक्त दोनों अभाव मान कर कथंचित् असत् का उत्पाद और सत् का अभाव मानना चाहिये । ऐसा मान लेनेसे वस्तुमात्रकी द्रव्यपर्याय- रूपता घट जायगी, और इससे उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यरूप जो वस्तुमात्रका त्रिरूप लक्षण है वह भी घटित हो जायगा। सूत्र ३१--सूत्रकारने जाति, देश, काल और समय- आचार व कर्त्तव्य-के बंधनसे रहित अर्थात् सार्वभौम ऐसे पॉच यमोंको महाव्रत कहा है । इस विषयमें जैनप्रक्रिया बतलाते हुए उपाध्यायजी कहते हैं कि-सर्व शब्दके साथ अहिंसादि पाँच यमोंकी जय प्रतिज्ञा की जाती है तब वे महावत कह- लाते हैं, और देश शब्दके साथ जब उनकी प्रतिज्ञा ली जाती है तब वे अणुव्रत कहलाते हैं।
.
[१०]
किसीको नहीं ( ३) जिसको सर्वज्ञत्व प्राप्त होता है उसको
भी मुक्ति प्राप्त होनेपर अर्थात् मन, शरीर श्रादि छूट जाने
पर वह नहीं रहता, क्योंकि सर्वज्ञत्व यह मनका कार्य है
आत्माका नहीं, आत्मा तो कूटस्थ-निर्विकार चेतनस्वरूप है।
इन तीनों बातोंके विपयमें जैनशास्त्रका जो मतभेद है
उसीको उपाध्यायजीने दिखाया है-(१) सुख, दुःख
प्रादिरूप भोग संसार अवस्थामें आत्माका वास्तविक विकार
है, मनका नहीं। इसलिये मुक्तिका मतलब संसारकालीन
वास्तविक भोगके अभावसे है, आरोपित भोगके अभावसे
नहीं। (२) विवेकख्याति (जैन परिभाषानुसार सम्यग्दर्शन)
से और क्लेश आदिके अभावसे मोक्ष होता है सही, पर
क्लेशका अभाव होते ही सर्वज्ञत्व अवश्य प्रकट होता है ।
मुक्तिके पहले क्लेशकी निवृत्ति अवश्य हो जाती है, और
क्लेश (मोह) की निवृत्ति हो जाने पर सर्वज्ञत्व (केवलज्ञान)
अवश्य हो जाता है । (३) मुक्ति पानेवाले सभी आत्मा-
ओंको सर्वज्ञत्व नियमसे प्रकट होता है इतना ही नहीं, बल्कि
वह प्रकट होने पर कायम रहता है, अर्थात् मुक्ति होने पर
चला नहीं जाता । क्योंकि सर्व विषयक ज्ञान करना यह
आत्माका स्वभाव है, मनका नहीं । संसारदशामें आत्माको
ऐसा ज्ञान न होनेका कारण उसके ऊपर आवरणका होना
है । मोक्षदशामें श्रावरणके न रहनेसे उक्त ज्ञान आप ही
.
[१०] आप हुआ करता है, ऐसा ज्ञान होते रहनेसे आत्मामें कूट- स्थत्वके भंगका जो पण दिया जाता है वह जैन शास्त्रका भूषण है । क्योंकि जैन शास्त्र केवल जड (प्रकृति ) को ही उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यरूप नहीं मानता, किन्तु चेतनको भी उत्पाद, व्यय, धौव्यरूप मानता है। चतुर्थ पाद. सूत्र १२-प्रस्तुत सूत्रमें वस्तुके प्रत्येक धर्मकी भावि, भूत और वर्तमान ऐसी तीन अवस्थायें मान कर उसमें अध्यभेद अर्थात् कालकृत भेदका समावेश बतलाया गया है, और वर्तमानकी तरह भूत तथा भावि अवस्थाका भी अपने अपने स्वरूपमें प्रत्येक धर्मके साथ संबंध है ऐसा कहा है। इस मन्तव्यका जैन प्रक्रियाके साथ मिलान करते हुए उपाध्यायजी कहते हैं कि वस्तुको द्रव्यपर्यायरूप माननेसे ही पूर्वोक्त अध्वभेदकी व्यवस्था घट सकती है अन्यथा नहीं। वस्तुको द्रव्यपर्यायरूप मान लेना यही स्याद्वाद है । ऐसा स्याद्वाद मान लेनेसे ही सब प्रकारके वचन-व्यवहारकी ठीक ठीक सिद्धि हो जाती है । सूत्र १४--सूत्रकारने सांख्य प्रक्रियाके अनुसार त्रिगु- णात्मक प्रकृतिका एक परिणाम मान कर कार्य में एकताके [११०] व्यवहारका समर्थन किया है । इस प्रक्रियाके स्वरूपके द्वारा स्याद्वाद पद्धतिका समर्थन करते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि एकसे अनेक और अनेकसे एक परिणाम माननेवाली स्यावाद शैलीका स्वीकार करने ही से उक्त सांख्य प्रक्रिया घट सकती है। सूत्र १८-इस सूत्रमें आत्माको अपरिणामी साबीत किया है । इसका समर्थन करते हुए भाष्यकारने कहा है कि शब्द आदि विषय कभी जाने जाते हैं और कमी नहीं । इसलिए चित्त तो परिणामी है, परंतु चित्तकी वृत्तियाँ कभी अज्ञात नहीं रहती। इसलिए आत्मा अपरिणामी अर्थात् कूटस्थ ही है । इस मन्तव्यका प्रतिवाद करते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि जैसा चित्त परिणामी है पैसा आत्मा भी। आत्माको परिणामी मान लेने पर भी चित्तकी सदाज्ञातता कोई बाधा नहीं आती, क्योंकि चित्त ज्ञान-रूप है और ज्ञान आत्माका धर्म है। धर्म होनेसे वह आत्माके सन्निहित होनेके कारण कभी अज्ञात नहीं रहता । शब्द आदि विषय कभी ज्ञात, और कभी अज्ञात होते हैं। इसका कारण यह है कि शब्द आदि विषयका इन्द्रियके साथ जो व्यञ्जनाव- ग्रहरूप सम्बन्ध है वह सदा नहीं रहता अर्थात् कभी होता है और कभी नहीं । यद्यपि इन्द्रियके द्वारा शब्द आदि विषय सदा नहीं जाने जाते परन्तु केवलज्ञानद्वारा सदा ही । .
[१११]
जाने जाते हैं। क्योंकि केवलज्ञानमें एक ऐसी शक्ति है
जिससे वह शब्द आदि विपयोंको सदा ही जान लेता है ।
सूत्र २३-उन्नीससे तेईसतकके पाँच सूत्रोंमें सूत्रकारने
जो कुछ चर्चा की है उससे आत्माके विषय में सांख्यसिद्धा-
न्तसम्मत तीन बातें मुख्यतया मालूम होती हैं। वे ये हैं-
( १ ) चैतन्यकी स्वप्रकाशता । (२) जो चैतन्य अर्थात्
चिति-शक्ति है वही चेतन है अर्थात् चिति-शक्ति
स्वयं स्वतंत्र है। वह किसीका अंश नहीं है और
उसके भी कोई अंश नहीं हैं। अतएव वह निर्गुण है ।
(३) चिति-शक्ति सर्वथा कूटस्थ होनेसे निर्लेप है। इन
बातोंके विषयमें जैन मन्तव्यके अनुसार मतभेद दिखाते
हुए उपाध्यायजी अन्तमें कहते हैं कि ये बातें किसी नयकी
अपेक्षासे मान्य की जा सकती हैं सर्वथा नहीं। उक्त बातोंके
विषयमें मतभेद क्रमशः इस प्रकार है-
(१) चैतन्य स्वप्रकाश भी है और परप्रकाश भी ।
उसकी स्वप्रकाशता अग्निके प्रकाशके समान अन्य पदार्थके
संयोगके सिवाय ही प्रत्येक प्राणिको अनुभव-सिद्ध है।
चैतन्यकी परप्रकाशता आवरणदशामें विपयके सम्बंधके
अधीन है और अनावरण-दशामें स्वाभाविक है।
(२) चैतन्य यह शक्ति (गुण) अर्थात् अन्य मूल
तचका अंश है; वह अन्य तत्त्व चेतन या आत्मा है।
-
[११२] उसमें चैतन्यकी तरह दूसरे भी अनन्त गुण (शक्तियों) हैं, अर्थात् आत्मा अनंत गुणोंका आधार है। वह जो निर्गुण कहा जाता है उसका मतलब उसमें प्राकृतिक गुणोंके प्रभावसे है। (३) आत्मा एकांत-निर्लेप नहीं है उसमें संसार- अवस्थामें कथंचित् लेपका भी संभव है । सूत्र ३१-भाष्यकारने प्रस्तुत सूत्रके भाष्यमें सांख्य मतके अनुसार ज्ञानको सत्त्वगुणका कार्य कह कर उसे प्राकृ- तिक बतलाया है, और कहा है कि निरावरण दशामें ज्ञान अनन्त हो जाता है जिससे उसके सामने सभी ज्ञेय (विपय) अल्प बन जाते हैं, जैसे कि आकाशके सामने जुगनू । इन दोनों बातोंका विरोध करते हुए घृत्तिकार जैन-मन्तव्यको इस प्रकार दिखाते हैं-ज्ञान प्राकृतिक अर्थात् अचैतन्य नहीं है किन्तु यह चैतन्यरूप है । यह बात नहीं कि ज्ञानके अनन्त हो जानेके समय सभी ज्ञेय अल्प हो जाते हैं, बल्कि ज्ञानकी अनन्तता ज्ञेयकी अनन्तता पर ही अवलम्बित है अर्थात् ज्ञेय अनन्त हैं । अतएव उन सबको जाननेवाला निरावरण ज्ञान भी अनन्त कहलाता है । सूत्र ३३-इसकी व्याख्या भाप्यकारने क्रमका स्वरूप दिखाते हुए कहा है कि नित्यता दो प्रकारकी है । (१) कूटस्थ-नित्यता अर्थात् अपरिणामि तच्च । (२) परिणामि-
-
[११३]
नित्यता अर्थात् परिवर्तनशील तत्त्व । इनमेंसे पहली नित्यत.
पुरुष (आत्मा) में है और दूसरी प्रकृतिमें ।
इस पर जैन मतभेद दिखाते हुए घृत्तिकार कहते हैं कि
कूटस्थनित्यता मानने में कोई सबूत नहीं। आत्मा हो या
प्रकृति समीमें परिणामिनित्यता ही है, अर्थात् वस्तुमात्रमें
द्रव्यरूपसे नित्यता और पर्यायरूपसे अनित्यता युक्तिसंगत
होनेके कारण सबका एकमात्र लक्षण " उत्पाद, व्यय,
ध्रौव्य" ऐसा ही करना चाहिये।
[११४]
योगविंशिकाका सार.
.
-
गाथा १-मोक्ष-प्राप्तिमें उपयोगी होनेके कारण यद्यपि
सब प्रकारका विशुद्ध धर्म-व्यापार योग ही है तथापि यहाँ
विशेष रूपसे स्थान आदि सम्बन्धी धर्म-व्यापारको ही योग
जानना चाहिए।
खुलासा-जिस धर्म-व्यापारमें प्रणिधान, प्रवृत्ति,
विनजय, सिद्धि और विनियोग इन पॉच भावोंका सम्बन्ध
हो वही धर्म-व्यापार विशुद्ध है। इसके विपरीत जिसमें
उक्त भावोंका सम्बन्ध न हो वह क्रिया योगरूप नहीं है ।
उक्त प्रणिधान आदि भावोंका स्वरूप इस प्रकार है-
(१) अपनेसे नीचेकी कोटीवाले जीवोंके प्रति द्वेप
न रख कर परोपकारपूर्वक अपनी वर्तमान धार्मिक भूमिकाके
कर्तव्यमें सावधान रहना यह प्रणिधान है ।
(२) वर्तमान धार्मिक भूमिकाके उद्देश्यसे किया
जानेवाला और उसके उपायकी पद्धतिसे युक्त जो चञ्चलता-
रहित तीन प्रयत्न वह प्रवृत्ति है।
(३) जिस परिणामसे धार्मिक प्रवृत्तिमें विघ्न नहीं
आते वह विघ्न-जय है । विघ्न तीन तरहके होते है, १ भूख,
प्यास आदि परीपह, २ शारीरिक-रोग और ३ मनो
[११५] विभ्रम । ये विघ्न धार्मिक प्रवृत्तिमें वैसे ही बाधा डालनेवाले है जैसे कहीं प्रयाण करनेमें रास्तेके काँटे-पथ्थर, शरीर-गत ज्वर और मनोगत दिग्भ्रम । तीन तरहका विघ्न होनेसे उसका जय भी तीन प्रकारका समझना चाहिये। (४) ऐसी धार्मिक भूमिकाको प्राप्त करना जिसमें पडोंके प्रति बहुमानका भाव हो, बराबरीवालोंके प्रति उप- कारकी भावना हो और कम दरजेवालोंके प्रति दया, दान तथा अनुकंपाकी भावना हो वह सिद्धि है । (५) अहिंसादि जो धार्मिक भूमिका अपनेको सिद्ध हुई हो उसे योग्य उपायोंके द्वारा दूसरोंको भी प्राप्त कराना यह विनियोग है। स्थान आदि क्या क्या है और उसमें योग कितने प्रकारका है यह दिखलाते हैं- गाथा २---स्थान, ऊर्ण, अर्थ, आलंबन और अनालं- बन ये योगके पाँच भेद हैं। इनमेंसे पहले दो कर्मयोग है और पिछले तीन ज्ञानयोग हैं। खुलासा-(१) कायोत्सर्ग, पर्यकासन, पद्मासन आदि आसनोंको स्थान कहते हैं । (२) प्रत्येक क्रिया आदिके समय जो सूत्र पढ़ा जाता है उसे ऊर्ण अर्थात् वर्ण या शब्द समझना चाहिए । (३) अर्थका मतलब स्त्रार्थ ज्ञानसे है। (४) बाह्य प्रतिमा आदिका जो ध्यान वह आलंबन - [११६ ] है। ( ५ ) रूपी द्रव्यके आलंबनसे रहित जो शुद्ध चैतन्य- मात्रकी समाधि वह अनालंबन है। स्थान तो स्वयं ही क्रिया- रूप है और सूत्रका भी उच्चारण किया जाता है इसीलिए स्थान तथा ऊर्णको कर्मयोग कहा है। ऊपर की हुई व्याख्यासे यह स्पष्ट है कि अर्थ, आलंबन और अनालंवन ये तीनों ज्ञानयोग हैं। योगका मतलब मोक्षके कारणभूत प्रात्म-व्यापारसे है । स्थान आदि आत्म-व्यापार मोक्षके कारण हैं इसलिए उनकी योग-रूपता सिद्ध है ।। स्थान आदि उक्त पाँच योगके अधिकारिओंको बतलाते हैं- गाथा ३--देशचारित्रवाले और सर्वचारित्रवालेको यह स्थान आदि योग अवश्य होता है। चारित्रवालेमें ही योगका संभव होनेके कारण जो चारित्ररहित अर्थात् अपु- नधक और सम्यग्दृष्टि हो उसमें उक्त योग चीजमात्ररूपसे होता है ऐसा कोई आचार्य मानते हैं । खुलासा-योग क्रियारूप हो या ज्ञानरूप, पर वह चारित्रमोहनीयकर्मके क्षयोपशम अर्थात् शिथिलताके होनेपर अवश्य प्रकट होता है । इसीलिए चारित्री ही योगका अधिकारी है, और यही कारण है कि ग्रन्थकार हरिभद्रसू- १ जो फिरसे मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति नहीं बांधता वह अपुनबंधक कहलाता है।
[११७] रिने स्वयं योगबिंदु, अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और वृत्तिसंक्षय इन पाँच योगोंकी संपत्ति चारित्रमें ही मानी है । यह प्रश्न उठ सकता है कि जब चारित्रीमें ही योगका संभव है तब निश्चयदृष्टिसे चारित्रहीन किन्तु व्यवहार- मात्रसे श्रावक या साधुकी क्रिया करनेवालेको उस क्रियासे क्या लाभ, इसका उत्तर ग्रंथकारने यही दिया है कि- " व्यवहार-मात्रसे जो क्रिया अपुनर्वधक और सम्यग्दृष्टिके द्वारा की जाती है वह योग नहीं किन्तु योगका कारण होनेसे योगका बीजमात्र है । जो अपुनर्वधक या सम्यग्दृष्टि नहीं है किन्तु सकृद्धधक या द्विधक आदि है उसकी व्यावहारिक क्रिया भी योगबीजरूप न होकर योगाभास अर्थात् मिथ्या-योगमात्र है । अध्यात्म आदि उक्त योगोंका समावेश इस ग्रंथमें वर्णित स्थान प्रादि योगोंमें इस प्रकार है-अध्यात्मके अनेक प्रकार हैं। देव-सेवारूप अध्यात्मका समावेश स्थानयोगमें, जपरूप अध्यात्मका समावेश ऊर्ण-योगमें और तत्त्वचिंतनरूप अध्यात्मका समावेश अर्थयोगमें होता है। भावनाका भी समावेश उक्त १ जो मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति एक वार बांधनेवाला हो वह समृद्धन्धक या सदावर्तन कहलाता और जो वैसी स्थिति दो वार बांधनेवाला हो वह द्विवन्धक या द्विरावर्तन कहलाता है।
. - [११] सीनों योगमें ही समझना चाहिये । ध्यानका समावेश आ- संचन योगमें है और समता तथा वृत्तिसंक्षयका समावेश अनालंबन योगमें होता है । स्थान आदि योगके भेद दिखाते हैं- गाथा ४-उक्त स्थान आदि प्रत्येक योग तत्त्वदृष्टिसे चार चार प्रकारका है । ये चार प्रकार शास्त्रमें ये हैं-इच्छा, प्रकृति, स्थिरता और सिद्धि । उक्त इच्छा आदि भेदोंका स्वरूप बतलाते हैं- गाथा ५, ६-जिस दशामें स्थान आदि योगवालोंकी कथा सुन कर प्रीति होती हो और जिसमें विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेवालोंके प्रति बहुमानके साथ उल्लासभरे विविध प्रकारके सुंदर परिणाम अर्थात् भाव पैदा होते हों वह योगकी दशा इच्छा-योग है । प्रवृत्तियोग वह कहलाता है जिसमें सब अवस्थामें उपशमभावपूर्वक स्थान प्रादि योगका पालन हो । जिस उपशमप्रधान स्थान आदि योगके पालनमें अर्थात् प्रवृत्तिमें योगके बाधक कारणोंकी चिंता न हो वह स्थिरता योग है। स्थानादि सब अनुष्ठान दूसरोंका भी हितसाधक हो तब वह सिद्धियोग है ।। खुलासा- हर एक योगकी चार अवस्थायें होती हैं, जो क्रमशः इच्छा, प्रवृत्ति, स्थिरता और सिद्धियोग कहलाते हैं। (१) जिस अवस्थामें द्रव्य, क्षेत्र आदि अनुकूल [११६] साधनोंकी कमी होनेपर भी ऐसा उल्लास प्रकट हो जिससे शास्त्रोक्त विधिके प्रति बहुमान-पूर्वक अल्पमात्र योगाभ्यास किया जाय वह अवस्था इच्छायोग है। (२) जिस अव- स्थामें वीर्योल्लासकी प्रबलता हो जानेसे शास्त्रानुसार सांगो- पांग योगाभ्यास किया जाय वह प्रवृत्तियोग है । (३) प्रवृत्तियोग ही स्थिरतायोग है, पर अंतर दोनोंमें इतना ही है कि प्रवृत्तियोगमें अतिचार अर्थात् दोपका डर रहता है और स्थिरतायोगमें डर नहीं रहता। (४) सिद्धियोग उस अवस्थाका नाम है जिसमें स्थानादि योग उसका आचरण करनेवाले आत्मामें तो शांति पैदा करे ही, पर उस आत्माके संसर्गमें आनेवाले साधारण प्राणियोंपर भी शांतिका असर डाले। सारांश यह है कि सिद्धियोगवालेके संसर्गमें आनेवाले हिंसक प्राणी भी हिंसा करना छोड़ देते हैं और असत्यवादी भी असत्य बोलना छोड़ देते हैं अर्थात् उनके दोप शांत हो जाते हैं। उक्त इच्छा आदि योगभेदोंके हेतुओंको कहते हैं- गाथा ७-ये विविध प्रकारके इच्छा आदि योग प्रस्तुत स्थान आदि योगकी श्रद्धा, प्रीति आदिके सम्बन्धसे भव्य प्राणिोंको तथाप्रकारके क्षयोपशमके कारण होते हैं। खुलासा-इच्छा आदि चारों योग आपसमें एक दूसरेसे भिन्न तो हैं ही, पर उन सबमेंसे एक एक योगके - - [१२०] भी असंख्य प्रकार हैं । इस विविधताका कारण क्षयोपशम. भेद अर्थात् योग्यताभेद है। यहाँ भन्यप्राणिका मतलब अपुनबंधक तथा सम्यग्दृष्टि आदिसे है । इच्छा आदि योगोंका कार्य- गाथा ८-इन इच्छा आदि उक्त चारों योगोंके कार्य क्रमसे अनुकम्पा, निर्वेद, संवेग और प्रशम है ।। खुलासा-अनुकम्पा आदिका स्वरूप इस प्रकार है- (१) दुःखित प्राणिोंके भीतरी और बाहरी दुःखोंको यथाशक्ति दूर करनेकी जो इच्छा वह अनुकम्पा है । (२) संसाररूप कैदखानेकी निःसारता जान कर उससे विरक्त होना निर्वेद है । (३) मोक्षकी अभिलापाको संवेग कहते हैं । (४) काम, क्रोधकी शान्ति प्रशम है । अब स्थान प्रादि योगभेदोंको दृष्टांतमें घटा लेनेकी सूचना करते हैं- गाथा 8--इस प्रकार योगका सामान्य और विशेष स्वरूप तो दिखाया गया परंतु उसकी जो चैत्यवंदनरूप दृष्टांतके साथ स्पष्ट घटना है अर्थात् उसको चैत्यवंदनमें जैसे विभाग-पूर्वक उतार कर घटाया जा सकता है उमे ठीक ठीक तत्चनको समझ लेना चाहिये ।। अब चैत्यवन्दनमें योग घटा देते हैं- [१२१] गाथा १०-जब कोई श्रद्धावाला व्यक्ति 'अरिहंत चेहयाणं करेमि काउस्सग्गं ' इत्यादि चैत्यवंदन सूत्रका यथाविधि (शुद्ध) उच्चारण करता है तब उसको शुद्ध उच्चारणसे चैत्यवंदनसूत्रके पदोंका यथार्थ ज्ञान होता है । खुलासा-स्वर, संपदो और मात्रौ आदिके नियमसे शुद्ध वर्णोका स्पष्ट उच्चारण करना यह यथाविधि उच्चारण अर्थात् वर्णयोग है । वर्णयोगका फल यथार्थ पदज्ञान है, अतएव जब चैत्यवन्दन सूत्र पढ़ते समय वर्णयोग हो तभी सूत्रके पदोंका ज्ञान यथार्थ हो सकता है। गाथा ११-यह यथार्थ पदज्ञान अर्थ तथा आलंबन योगवालेके लिए बहुत कर अविपरीत (साक्षात् मोक्ष देने- वाला) होता है और अर्थ तथा पालम्बन-योगरहित किन्तु स्थान तथा वर्ण योगवालेके लिए केवल श्रेय (परम्परासे मोच देनेवाला) होता है। खुलासा-जो अनुष्ठान मोक्षको देनेवाला हो वह स- दनुष्ठान है । सदनुष्ठान दो प्रकारका है, पहला शीघ्र (मा- क्षात्) मोक्ष देनेवाला, दूसरा विलंबसे (परम्परासे) मोक्ष देनेवाला । पहलेको अमृतानुष्ठान और दूसरेको तद्धेतु-अनु- छान कहते हैं। १ उदात्त, अनुदात्त, स्वरित । २ विश्रान्तिस्थान | ३ हस्व, - दीर्घ, प्लुत। -
“
[१२४]
अननुष्ठान समझना चाहिये । इसी तरह चैत्यवंदन करते
समय ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं चोसिरामि"
इन पदोंसे स्थान, मौन, और ध्यान आदिकी प्रतिज्ञा की
जाती है। ऐसी प्रतिज्ञा करनेके बाद स्थान, वर्ण आदि
योगका भंग किया जाय तो वह चैत्यवन्दन महामृपावाद
होनेसे निष्फल ही नहीं बल्कि कर्मबंधका कारण होनेसे
अनिष्टफलदायक अतएव अननुष्ठान है।
स्थान, वर्ण आदि योगोंका सम्बन्ध होनेपर भी जो
चैत्यवन्दन स्वर्ग आदि पारलौकिक सुखके उद्देश्यसे
किया जाता है वह गरानुष्ठान और जो धन, कीर्ति
श्रादि ऐहिक सुखकी इच्छासे किया जाता है वह
विपानुष्ठान है । गरानुष्ठान और विपानुष्ठान मृपावा-
दरूप है, क्योंकि पारलौकिक और ऐहिक सुखकी
कामनासे किये जानेके कारण उनमें मोक्षकी प्रतिज्ञाका
स्पष्ट भङ्ग है । इस प्रकार अननुष्ठान, गरानुष्ठान और विपा-
नुष्ठान ये तीनों चैत्यवंदन हेय हैं। इसी कारणसे योग्य
अधिकारियों को ही चैत्यवंदनसूत्र सिखानेको शास्त्रमें कहा
गया है । इस चैत्यवंदनके उदाहरणसे अन्य सब क्रियाओंमें
सदनुष्ठान और असदनुष्ठानका रूप स्वयं घटा लेना चाहिये।
चैत्यचन्दनके लिए योग्य अधिकारी कौन है यह
दिसाते है-
-
[१२५] गाथा १३--जो देशविरतिपरिणामवाले हों चे चैत्य- वन्दनके योग्य अधिकारी हैं। क्योंकि चैत्यवन्दनसूबमें इस शब्दसे जो कायोत्सर्ग करनेकी प्रतिज्ञा सुनी जाती है वह विरतिके परिणाम होनेपर ही घट सकती है। इसलिए यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि देशविरति परिणामवाले ही चैत्यवन्दनके योग्य अधि- "कायं योसिरामि" कारी हैं ।। खुलासा-चैत्यचन्दनके अंदर " ताव कायं, ठाणेणं इत्यादि पाठके द्वारा कायोत्सर्गकी प्रतिज्ञा की जाती है। कायोत्सर्ग यह कायगुप्तिरूप विरति है, इसलिए विरति परिणामके सिवाय चैत्यचंदन-अनुष्ठान करना अनधिकार- चेष्टामात्र है। देशपिरतिवालेको चैत्यवन्दनका अधिकारी कहा है सो मध्यम अधिकारीका सूचनमात्र है। जैसे तरा- जूकी डण्डी चीचमें पकडनेसे उसके दोनों पलडे पकडमें आ जाते हैं जैसे ही मध्यम अधिकारीका कथन करनेसे नीचे और ऊपरके अधिकारी भी ध्यानमें आ जाते हैं। इसका फलित अर्थ यह है कि सर्पपिरतियाले मुनि को चैत्यवन्दनके ताविक अधिकारी हैं और अपुनर्वधक या सम्यग्दृष्टि व्यव- हारमात्रसे उसके अधिकारी हैं, परन्तु जो कमसे कम अपु- नधक भावसे भी खाली हैं श्रतएव जो विधिवहुमान करना नहीं जानते वे सर्वथा चैत्यवन्दनके अनधिकारी हैं।
[ १२६ ] ससे वैसे आत्माओंको चैत्यवन्दन न तो सिखाना चाहिए और न कराना चाहिए । चैत्यवन्दनके अधिकारकी इस चर्चासे अन्य क्रियाओंके अधिकारका निर्णय भी स्वयं करलेना चाहिए । जो लोग ऐसी शङ्का करते हैं कि प्रविधिसे भी चैत्य- वन्दन आदि क्रिया करते रहनेसे दूसरा फायदा हो या नहीं पर तीर्थ चालू रहनेका लाभ तो अवश्य है । अगर विधिका ही खयाल रक्खा जाय तो वैसा अनुष्ठान करनेवाले इने- गिने अर्थात दो चार ही मिलेंगे और जब वे भी न रहेंगे तब क्रमशः तीर्थका उच्छेद ही हो जायगा। इसलिए कमसे कम तीर्थको कायम रखने के लिए भी अविधि-अनुष्ठानका आदर क्यों न किया जाय ? इसका उत्तर उन शङ्कावालोंको ग्रन्थकार देते हैं- गाथा १४-अविधि अनुष्ठानकी पुष्टिमें तीर्थके अनु- च्छेदकी बातका सहारा लेना ठीक नहीं है, क्योंकि अविधि चालु रखनेसे ही असमञ्जस अर्थात् शास्त्रविरुद्ध विधान जारी रहता है, जिससे शास्त्रोक्त क्रियाका लोप होता है यह लोप ही तीर्थका उच्छेद है। खुलासा-अविधिके पक्षपाती अपने पक्षकी पुष्टिमें यह दलील पेश करते हैं कि प्रविधिसे और कुछ नहीं तो तीर्थकी रक्षा होती है, परन्तु उन्हें जानना चाहिए कि तीर्थ [१२७] सिर्फ जनसमुदायका नाम नहीं है किन्तु तीर्थका मतलय शास्त्रोक्त क्रियावाले चतुर्विध संघसे है। शास्त्राज्ञा नहीं मान- नेवाले जनसमुदायको तीर्थ नहीं किन्तु हड्डीओंका संघात- मात्र कहा है । इस दशामें यह स्पष्ट है कि यदि तीर्थकी रक्षाके बहानेसे अविधिका स्थापन किया जाय तो अन्तमें अविधिमात्र याकी रहनेसे शास्त्रविहित क्रियारूप विधिका सर्वथा लोप, ही हो जायगा। ऐसा लोप ही तीर्थका नाश है, इससे अविधिक पक्षपातियोंके पल्लेमें तीर्थ-रक्षारूप लाभके बदले तीर्थ-नाशरूप हानि ही शेष रहती है जो मुनाफेको चाहनेवालेके लिए मूल पूँजीके नाशके बराबर है ।। सूत्रोक्त क्रियाका लोप अहितकारी कैसे होता है यह दिखाते हैं- गाथा १५---यह अथात् अविधिके पक्षपातसे होनेवाला सूत्रोक्त विधिका नाश वक्र (अनिष्ट परिणाम देनेवाला) ही है। जो स्वयं मरा हो और जो मारा गया हो उन दोनोंमें विशेषता अवश्य है, यह बात तीर्थके उच्छेदसे डरनेवालोंको विचारना चाहिए । खुलासा-जो शिथिलाचारी गुरु भोले शिष्योंको ध- मके नामसे अपनी जालमें फाँसते हैं और प्रविधि (शास्त्र विरुद्ध ) धर्मका उपदेश करते हैं उनसे जब कोई शास्त्र-- विरुद्ध उपदेश न देनेके लिये कहता है तब वे धर्मोच्छेदका [ १२८] भय दिखा कर विगड कर बोल उठते हैं कि "जैसा चल रहां है वैसा चलने दो, वैसा चलते रहनेसे भी तीर्थ (धर्म) टिक सकेगा । बहुत विधि (शास्त्र अनुकूलता) का ध्यान रख- नेमें शुद्ध क्रिया तो दुर्लभ ही है, अशुद्ध क्रिया भी जो चल रही है वह छूट जायगी और अनादिकालीन अक्रियाशीलता (प्रमादवृत्ति) स्वयं लोगोंपर आक्रमण करेगी जिससे ती- र्थका नाश होगा।" इसके सिवाय वे अपने प्रविधिमार्गके उपदेशका पचाव यह कह कर भी करते हैं कि "जैसे धर्मक्रिया नहीं करनेवालके लिए हम उपदेशक दोष भागी नहीं हैं चैसे ही प्रविधिसे क्रिया करनेवाले के लिए भी हम दोपभागी नहीं । हम तो क्रियामात्रका उपदेश देते हैं जिससे कमसे कम व्यावहारिक धर्म तो चालु रहता है और इस तरह ह- मारे उपदेशसे धर्मका नाश होनेके बदले धर्मकी रक्षा ही हो जाती है। ऐसा पोचा बचाव करनेवाले उन्मार्ग-गामी उपदेशक गुरुओंसे ग्रंथकार कहते हैं कि एक व्यक्तिकी मृत्यु स्वयं हुई हो और दूसरी व्यक्तिकी मृत्यु किसी अन्यके द्वारा हुई हो इन दोनों घटनाओंमें बडा अन्तर है | पहली घटनाका कारण मरनेवाले व्यक्तिका कर्म मात्र है, इससे उसकी मृत्युके लिए दूसरा कोई दोपी नहीं है । परन्तु दूसरी घटनामें मरनेवाले व्यक्तिके कर्मके उपरान्त मारनेवालेका दुष्ट प्राशय भी नि- [१२] मित्त है, इससे उस घटनाका दोपभागी मारनेवाला अवश्य है। इसी तरह जो लोग स्वयं अविधिसे धर्मक्रिया कर रहे हैं उनका दोप धर्मोपदेशकपर नहीं है, पर जो लोग प्रविधिमय धर्मक्रि- याका उपदेश सुन कर उन्मार्गपर चलते हैं उनकी जवाबदेही उपदेशकपर अवश्य है। धर्मके जिज्ञासु लोगोंको अपनी क्षुद्र स्वार्थवृत्ति के लिए उन्मार्गका उपदेश करना वैसा ही विश्वास- घात है जैसा शरण में आये हुएका सिर काटना । जैसा चल रहा है ऐसा चलने दो यह दलील भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी उपेक्षा रखनेसे शुद्ध धर्मक्रियाका लोप हो जाता है जो वास्तवमें तीर्थोच्छेद है । विधिमार्गके लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहनेसे कभी किसी एक व्यक्तिको भी शुद्ध धर्म प्राप्त हो जाय तो उसको चौदह लोकमें अमारीपटह बजवाने- कीसी धर्मोन्नति हुई समझना चाहिए अर्थात् विधि पूर्वक धर्मक्रिया करनेवाला एक भी व्यक्ति प्रविधि पूर्वक धर्म- क्रिया करनेवाले हजारों लोगोंसे अच्छा है । अतएव जो परोपकारी धर्मगुरु हों उन्हें ऐसी दुर्बलताका श्राश्रय कमी न लेना चाहिये कि इसमें हम क्या करें ? हम तो सिर्फ धर्म- क्रियाका उपदेश करते हैं, श्रविधिका नहीं। धर्मोपदेशक गुरुओंको यह बात कभी न भूलनी चाहिए कि विधिका उपदेश भी उन्हींको देना चाहिये जो उसके श्रवणके लिये रसिक हों । अयोग्य पात्रको ज्ञान देनेमें भी महान् अनर्थ [१३०] होता है, इसलिए नीच आशयवाले पात्रको शास्त्र सुनानेमें उपदेशक ही अधिक दोपका पात्र है। यह नियम है कि पाप करनेवालेकी अपेक्षा पाप करानेवाला ही अधिक दोपभागी होता है । अतएव योग्यपात्रको शुद्ध शास्त्रोपदेश देना और स्वयं शुद्ध प्रवृत्ति करना यही तीर्थरक्षा है, अन्य सव बहाना मात्र है। उक्त चर्चा सुन कर मोटी बुद्धिके कुछ लोग यह कह उठते हैं कि इतनी वारीक वहसमें उतरना वृथा है, जो बहुतोंने किया हो वही करना चाहिए, इसके सबूतमें महाजनो येन गतः स पन्थाः यह उक्ति प्रसिद्ध है। श्राज कल बहुधा जीतव्यवहारकी ही प्रवृत्ति देखी जाती है। जबतक तीर्थ रहेगा तबतक जीतव्यवहार रहेगा इसलिए उसीका अनुसरण करना तीर्थ रक्षा है । इस कथनका उत्तर ग्रन्थकार देते हैं- गाथा १६-लोकसंज्ञाको छोड कर और शास्त्रके शुद्ध रहस्यको समझ कर विचारशील लोगोंको अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धिसे शुद्ध प्रवृत्ति करना चाहिए ।। खुलासा-शास्त्रकी परवा न रख कर गतानुगतिक लोकप्रवाहको ही प्रमाणभूत मान लेना यह लोकसंज्ञा है । लोकसंज्ञा क्यों छोडना ? महाजन किसे कहते हैं और जीत- व्यवहारका मतलब क्या है ? इन बातोंको समझानेके लिए
[१३१] .
ज्ञानसारके जो श्लोक टीकामें उद्धृत किये गये हैं वे बहु
महत्वपूर्ण है, इसलिए उनमेंसे कुछका सार दिया जाता है-
यदि लोगोंपर भरोसा रख कर ही कर्तव्यका निश्चय
किया जाय अर्थात् जो बहुतोंने किया वही ठीक है ऐसा
मान लिया जाय तो फिर मिथ्यात्व त्याज्य नहीं समझा
जाना चाहिए, क्योंकि उसका सेवन अनेक लोक अनादि
कालसे करते आये हैं।
अनायासे आर्य थोड़े हैं, आर्योंमें भी जैनोंकी अर्थात्
समभाववालोंकी संख्या कम है। जैनोंमें भी शुद्ध श्रद्धावाले
कम, और उनमें भी शुद्ध चारित्रवाले कम हैं।
व्यवहार हो या परमार्थ, सब जगह उच्च वस्तुके अधि-
कारी कम ही होते हैं, उदाहरणार्थ-जैसे रत्नोंके परीक्षक
(जौहरी) कम, वैसे आत्मपरीक्षक भी कम ही होते हैं ।
शास्त्रानुसार वर्तन करनेवाला एक भी व्यक्ति हो तो
वह महाजन ही है। अनेक लोग भी अगर अज्ञानी हैं तो
चे सब मिल कर भी अन्धोंके समूहकी तरह वस्तुको यथार्थ
नहीं जान सकते।
संविग्न (भवभीरु ) पुरुषने जिसका आचरण किया
हो, जो शास्त्रसे बाधित न हो और जो परम्परासे भी शुद्ध
हो वही जीतव्यवहार है।
,
[१३२] शास्त्रका आश्रय न करनेवाले असंचिन पुरुषोंने जिसका आचरण किया हो यह अन्ध-परम्परा मात्र है, जीतन्य- वहार नहीं। क्रिया विल्कुल न करनेकी अपेक्षा कुछ न कुछ क्रिया करनेको ही शास्त्रमें अच्छा कहा गया है, इसका मतलब यह नहीं कि शुरूसे अविधिमार्गमें ही प्रवृत्ति करना, किन्तु उ- सका भाव यह है कि विधिमार्गमें प्रवृत्ति करने पर भी अ- गर असावधानी वश कुछ भूल हो जाय तो उस भूलसे डर कर बिल्कुल विधिमार्गको ही नहीं छोड देना किन्तु भूल सु- धारनेकी कोशीस करते रहना। प्रथमाभ्यासमें भूल हो जा- नेका सम्भव है पर भूल सुधारलेनेकी दृष्टि तथा प्रयत्न हो तो वह भूल भी वास्तवमें भूल नहीं है । इसी अपेक्षासे अ. शुद्ध क्रियाको भी शुद्ध क्रियाका कारण कहा है । जो व्यक्ति विधिका बहुमान न रख कर अविधिक्रिया किया करता उसकी अपेक्षा तो विधिके प्रति बहुमान रखनेवाला पर कुछ भी न करनेवाला अच्छा है। मूल विपयका उपसंहार करते हैं- गाथा १७–प्रस्तुत विषयमें प्रासंगिक विचार इतना ही काफी है । स्थान आदि पूर्वोक्त पॉच योगोंमें जो प्रयत्न- शील हों उन्हींके चैत्यवन्दन आदि अनुष्ठानको सदनुष्ठानरूप समझना चाहिए।
[१३३] खुलासा-मुख्य बात चैत्यवन्दनमें स्थानादि योग घटानेकी चल रही थी, इसमें प्रसंगवश तीर्थोच्छेद क्या वस्तु है ? और तीर्थरचाके लिए विधिप्ररूपणाकी कितनी आ- वश्यकता है ? इत्यादि प्रासंगिक विषयकी चर्चा भी की गई। अब मूल बातको समाप्त करते हुए ग्रन्थकारने अन्तमें यही कहा है कि चैत्यवंदन आदि क्रिया धर्मका कलेवर अर्थात् चाह्यरूप मात्र है । उसकी आत्मा तो स्थान, वर्ण आदि पू. वोक्त योग ही हैं। यदि उक्त योगोंमें प्रयत्नशील रह कर कोई भी क्रिया की जाय तो वह सब क्रिया शुद्ध, शुद्धतर, शुद्धतम संस्कारोंकी पुष्टिका कारण हो कर सदनुष्ठानरूप होती है और अन्तमें कर्मक्षयका कारण बनती है । सदनुष्ठानके भेदोंको दिखाते हुए उसके अन्तिम भेद अर्थात् असंगानुष्ठानमें अन्तिम योग (अनालम्बनयोग )का समावेश करते हैं- गाथा १८-प्रीति, भक्ति, वचन और असंगके सम्ब- न्धसे यह अनुष्ठान चार प्रकारका समझना चाहिए । चार- मेसे असङ्गानुष्ठान ही चरम अर्थात् अनालम्बन योग है। खुलासा-भावशुद्धिके तारतम्य ( कमीवेशी) से एक ही अनुष्ठानके चार भेद हो जाते हैं । वे ये हैं-(१) प्रीति- अनुष्ठान, (२) भक्ति-अनुष्ठान, (३) वचनानुष्ठान, और (४) असङ्गानुष्ठान ।
[१३४ ] इनके लक्षण इस प्रकार हैं-(१) जिस क्रिया प्रीति इतनी अधिक हो कि अन्य सब काम छोड कर सिर्फ उसी क्रियाके लिए तीव्र प्रयत्न किया जाय तो वह क्रिया प्रीति- अनुष्ठान है । (२) प्रीति-अनुष्ठान ही भक्ति-अनुष्ठान है। अन्तर दोनों में इतना ही है कि प्रीति-अनुष्ठानकी अपेक्षा भक्ति-अनुष्ठानमें आलम्बनरूप विषयके प्रति विशेष आदर- बुद्धि होनेके कारण प्रत्येक व्यापार अधिक शुद्ध होता है । जैसे पत्नी और माता दोनोंका पालन, भोजन, वस्त्र आदि एक ही प्रकारसे किया जाता है परन्तु दोनों के प्रति भावका अन्तर है। पत्नीके पालनमें प्रीतिका भाव और माताके पालनमें भक्तिका भाव रहता है, वैसे ही बाहरी व्यापार समान होनेपर भी प्रीति-अनुष्ठान तथा भक्ति-अनुष्ठानमें भावका भेद रहता है । (३) शास्त्रकी ओर दृष्टि रख करके सब कार्योंमें साधु लोगोंकी जो उचित प्रवृत्ति होती है वह वचनानुष्ठान है । ( ४ ) जब संस्कार इतने दृढ हो जायँ कि प्रवृत्ति करते समय शास्त्रका स्मरण करनेकी आवश्यकता ही न रहे अर्थात् जैसे चन्दनमें सुगंध स्वाभाविक होती है वैसे ही संस्कारोंकी दृढताके कारण प्रत्येक धार्मिक नियम जीव- नमें एकरस हो जाय तब असङ्गानुष्ठान होता है। इसके अधिकारी जिनकल्पिक साधु होते हैं। वचनानुष्ठान और असङ्गानुष्ठानमें फर्क इतना ही है कि पहला तो शास्त्रकी प्रेरणासे किया जाता है और दूसरा उसकी प्रेरणाके सिवाय [ १३५] शास्त्रजनित संस्कारोंके वलसे; जैसे कि चाकके घूमनेमें पहला धूमाव तो डंडेकी प्रेरणासे होता है और पिछेका सिर्फ दंडजनित वेगसे। असङ्गानुष्ठानको अनालम्बन योग इसलिए कहा है कि-" संगको त्यागना ही अनालम्बन है"। योगके कुल अस्सी भेद बतलाये हैं सो इस प्रकार- स्थान, ऊर्ण आदि पूर्वोक्त पाँच प्रकारके योगके इच्छा, प्रवृत्ति, स्थिरता और सिद्धि ऐसे चार चार भेद करनेसे वीस भेद हुए। इन बीसमेंसे हर एक भेदके प्रीति-अनुष्ठान, भक्ति- अनुष्ठान, वचनानुष्ठान और असङ्गानुष्ठान ये चार चार भेद होते हैं अतएव बीसको चारसे गुनने पर अस्सी भेद हुए । आलम्बनके वर्णनके द्वारा अनालंबन योगका स्वरूप दिखाते हैं- गाथा १६-आलम्बन भी रूपी और अरूपी इस तरह दो प्रकारका है । परम अर्थात् मुक्त आत्मा ही अरूपी बाल- म्यन है, उस अरूपी पालम्बनके गुणोंकी भावनारूप जो ध्यान है वह सूक्ष्म ( अतीन्द्रिय विषयक) होनेसे अनाल- म्बन योग कहलाता है ।। खुलासा-योगका ही दूसरा नाम ध्यान है । ध्यानके मुख्यतया दो भेद हैं, सालम्बन और निरालम्बन | बाल- म्बन (ध्येय विषय ) मुख्यतया दो प्रकारका होनेसे ध्यानके उक्त दो भेद समझने चाहिए। आलम्बनके रूपी और अ- - [१३६] रूपी ये दो प्रकार हैं । इन्द्रियगम्य वस्तुको रूपी ( स्थूल ) और इन्द्रिय-अगम्य वस्तुको अरूपी (सूक्ष्म ) कहते हैं। स्थूल आलम्बनका ध्यान सालम्बन योग और सूक्ष्म पाल- म्बनका ध्यान निरालम्बन योग है, अर्थात् विपयकी अपे- क्षासे दोनों ध्यानमें फर्क यह है कि पहलेका विपय आँखोंसे देखा जा सकता है और दूसरेका नहीं । यद्यपि दोनों ध्या- नके अधिकारी छमस्थ ही होते हैं, परन्तु पहलेकी अपेक्षा दुसरेका अधिकारी उच्च भूमिकावाला होता है। अर्थात् पहले ध्यानके अधिकारी अधिकसे अधिक बढे गुणस्थान तकके ही स्वामी होते हैं परन्तु दूसरे ध्यानके अधिकारी सातवें गुणस्थानसे लेकर बारहवें गुणस्थानतकके स्वामी होते हैं। श्रासनारूढ वीतराग प्रभुका या उनकी मूर्ति आदिका जो ध्यान किया जाता है वह सालम्बन और परमात्माके ज्ञान आदि शुद्ध गुणोंका या संसारीथात्माके औपाधिक रूपको छोड कर उसके स्वाभाविक रूपका परमात्माके साथ तूलना पूर्वक ध्यान करना निरालम्बन ध्यान है अर्थात् निरालम्बन प्यान आत्माके ताचिक स्वरूपको देखनेकी निःसंग और अखंड लालसारूप है । ऐसी लालसा आपकश्रेणी सम्बन्धी दूसरे अपूर्वकरणके समय पाये जानेवाले धर्मसंन्यासरूप सा- मय॑योगसे होती है। हरिमद्रमरिने पोडशकमें पापमोचनके एक रूपकके द्वारा अनालंचन ध्यानका स्वरूप समझाया है सो इस प्र.
शास्त्रमें, [१३७] कार है-क्षपकआत्मारूप धनुर्धर, आपकर्णारूप धनु- पके ऊपर अनालम्बनयोगरूप बाणको परमात्मतत्त्वरूप लक्ष्यके सम्मुख इस तरह चढाता है कि वाण छूटनेरूप श्रनालम्बन ध्यानकी समाप्ति { जिसको ध्यानान्तरीका कहते हैं ) होते ही लक्ष्यवेधरूप परमात्म- तत्त्वका प्रकाश होता है, यही केवलज्ञान है जो अनालम्बन ध्यानका फल है । आत्मतत्त्वके साक्षात्कारके पूर्वमें जबतक उसकी प्रवल आकाङ्क्षा थी तबतकका विशिष्ट प्रयत्न निरा- लम्बन ध्यान है, परन्तु केवलज्ञान होनेपर आत्मतत्त्वके साक्षात्कारकी इच्छा न रहनेसे अनालम्बन ध्यान नहीं है तो भी आत्मतत्त्वविपयक केवलज्ञानरूप प्रकाशको सालम्बन योग कह सकते हैं । यहाँ यह जानना चाहिए कि केवलि- अवस्था प्राप्त होनेके बाद जबतक योगनिरोधके लिए प्रयत्न नहीं किया जाता तबतककी स्थितिको एक प्रकारकी- विश्रान्ति मात्र कह सकते हैं, ध्यान नहीं; क्योंकि ध्यान विशिष्ट प्रयत्नका नाम है जो केवलज्ञानके पहले या योग- निरोध करते समय होता है ।। उक्त रीतिसे सालम्बन, निरालम्बन ध्यानका वर्णन करके अघ निरालम्बन ध्यानसे होनेवाले फलोको क्रमसे दिखाते हैं- गाथा २०- इस निरालम्बन ध्यानके सिद्ध हो जाने पर मोहसागर पार हो जाता है यही क्षपकश्रेणीकी सिद्धि ।
- [१३] है, इस सिद्धिसे केवलज्ञान और केवलनानसे प्रयोग नामक योग तथा परम निर्वाण क्रमशः होता है ।। खुलासा-मोहकी रागद्वेषरूप वृत्तियाँ पौद्गलिक अध्यासका परिणाम है और निरालम्बन ध्यानका विषय शुद्ध चैतन्य है। अतएव मोह और निरालम्बन ध्यान ये दोनों परस्पर विरोधी तत्व हैं। निरालम्बन ध्यानका प्रारम्भ हुआ कि मोहकी जड कटने लगी, जिसको जैनशास्त्रमें क्षप- कश्रेणीका आरम्भ कहते हैं । जब उक्त ध्यान पूर्ण अवस्था तक पहुंचता है तय मोहका पाशबंधन सर्वथा टूट जाता है, यही क्षपकश्रेणीकी पूर्णाहुति है। महर्षि पतञ्जलिने जिस ध्यानको सम्प्रज्ञात कहा है वही जैनशास्त्रमें निरालम्बन ध्यान है । क्षपकश्रेणीके द्वारा सर्वथा वीतराग दशा प्रकट हो जाने पर आत्मतत्वका पूर्ण साक्षात्कार होता है, जो जैनशास्त्र में केवलज्ञान और महर्षि पतञ्जलिकी भाषामें असम्प्रज्ञात योग कहलाता है। केवलज्ञान हुया कि मान- सिक वृत्तियों नष्ट हुई और पीछे एक ऐसी अयोग नामक योगावस्था पाती है जिससे रहे-सहे घृत्तिके बीजरूप सूक्ष्म संस्कार भी जल जाते हैं, यही विदेह मुक्ति या परम निर्वाण है 110 VIDYA HATIYA | समता SNA Sant [१३६] योगसूत्रवृत्ति तथा योगविशिकावृत्ति प्रमाण- रूपसे आये हुए अवतरणोंका वर्ण- क्रमानुसारी परिशिष्ट. नं०१ श्लोक. श्लोक. पृष्ठ. ७८ કર ८२.) एकोऽपि शाखनीत्या ७२, एतद्रागादिदं हेतुः ६३ | पताः खल्वभ्यासात् ७८ | पसो इमं चिय ७९ प्रो ओसन्नो वि विहारे ९ अत्यन्तवल्लभा खलु अनाभोगवश्चैत- अपुनर्बन्धकस्यायं विहिकया वरमकयं अशुद्धापि हि शुद्धाया असतो णत्थि णिसेहो असंप्रज्ञात एपोऽपि अस्मिन् हृदयस्थे सति प्रा आकल्पव्यवहारार्थ आशयभेदा एते इ इच्छा तद्वत्कथाप्रीति ६ ३१ का अरइ के आणंदे कार्यद्रव्यमनादि स्या- ७८ । क्लेशपक्तिर्मतिज्ञानान् ग गौरवविशेषयोगात् च चक्रभ्रमणं दण्डात् ८२ ८२ उपकारिस्वजनेतर- ८० ऊसासं ण णिरंभा जइ दि ण सई काउं ११ जस्सिमे सद्दा य ३८ । जह मरणमुधगयाणं [१४०] जा जा हविज जिनोदितमिति जो जाण अरिहंते शो शेये कथमज्ञः ७२ बाह्यं तपः परमदुश्वर- ८७ भववीजमनन्तमुज्झितं २९ ण सक्का रूयमद्दटुं N ३७ । मुक्खेण जोअणाओ मूलप्रकृत्यभिन्नाः तत्राप्रतिष्ठितोऽयं तत्रैय तु प्रवृत्तिः तस्माच्छुतानुसा- तात्त्विक पक्षपात- ८२ ५७ | यं यं चापि स्मरन् भापं ७८ | यत्रादरोऽस्ति परमः ७९ यत्त्वभ्यासातिशयातू यत्संविज्ञजनाचीण यदाचीर्णमसंविः ७२ यमनियमासन- દર य शृण्वन् सिद्धान्तं ७८ ७७ दिव्यभोगामिलापेण देशादिभेदतश्चित्र- द्रागस्मात्तददर्शन- घ. धर्ममेघोऽमृतात्मा च ७८ ७ नैवंविधस्य शरतं- लोकमालम्ब्य कर्तव्यं च. वचनात्मिका प्रवृत्तिः ૮૦ ७७ विघ्नजयनिविध विपं गरोप्ननुष्ठान विषं लब्ध्यापेक्षातः ७१ ६० ५७) शास्त्रसंदर्शितोपाय- २७ ' श्रेयोऽर्थिनो हि भूयांसो ७८ परहितचिंता मैत्री प्रणिधानादिभावेन प्रणिधानं तत्समये प्रणिधिप्रवृत्तिविघ्न- [१४१] मयतानि तयाक्षाणि सदावर्तनादीनां सम्ध्येव दिनरात्रिभ्यां समाधिरेष पवान्यैः सामर्थ्ययोग्यता या सालम्बनो निरालम्च- सिद्धिस्तनधर्म- सिद्धेश्वीत्तरकार्य सुखमात्रे सद्धता- सुदढप्पयत्तयावारणं मूक्तं चात्मपरार्थ- म्तोका आर्या अना- स्थानोर्णार्यालम्बन- ७८ ६ ५९ हियाहारा मियाहारा [१४२] योगसूत्रवृत्ति और योगविंशिकाटीकामें आये हुए प्रातरणों- का कर्ता और ग्रंयके नाम निर्देश संबंधी परिशिष्ट. २ - (आप)- ( आचारांगसूत्र पत्र ६) शीतोष्णीयाध्ययन (आचारांगगत) पत्र ३७ । स्थानाज पत्र १९॥ (भगवतगीता पत्र २५) गच्छाचार पत्र८०1 महावादी (सिद्धसेन दिवाकर)-(वारिशिका पत्र २९ ।) स्तुतिकार:-पत्र ३७ (कुन्दकुन्द)- (प्रयचनसार) पत्र ८७ 'जोजाणइ अरिहंते'प्र-१गा-८४! माप्यकृत्-- (जिनभद्रगणिक्षमाश्रमण)-(विशेषावश्यक पत्र ४) महामाप्यकार- (जिनभद्रगणिक्षमाश्रमण)-(विशेषावश्यक पत्र ८६१) १ एमे कोटामे हमारा मतलब यह है कि-उम उम स्थानमें प्रधकारने आचार्य मा प्रथम उवेव नहीं किया किन्तु हमने अपनी ओरमे मोज करके सूचन रिया है। • इम स्तुतिकार शब्दमे अपरारको मिद्धमेन अभिप्रेत है या ममन्तमा, इमा पता हमें अभी नहीं लगा। - -4 [१४३] पतञ्जलि- (योगसूत्र पत्र ६१) अकलङ्कपत्र ३१। हरिभद्र- (योगविशिका पत्र २।) अनादिविशिका पत्र ९। सद्धर्मचिंशिका पत्र ६८। योगबिन्दु पत्र (६) ७ (४४) ६२ (६३-६४) ७१.७२) । पोडशक पत्र ११ (५६-५७-५९) ६१-७६ (८१-८२) ८३ (८५)। योगदृष्टि समुचय-पत्र ७९ (८८)। (यशोभद्रसूरि )- पोडशकवृत्ति पत्र ६१॥ यशोविजय- पोडशक टीका-पत्र-११ । (ज्ञानसार पत्र-१३-७८ ।) कर्मप्रकृति वृत्ति-पत्र-२६ । पत्र-१५॥ संग्रहमलोक पत्र-६६॥ सद्धर्मबिशिका (टीका) पत्र-६८ । अलब्धकर्डनाम-अलब्धग्रन्धनाम- १५-२६-३७-४४-०३-७८-७९ ।
पुस्तक मिलनेका पता- आत्मानन्द जैन पुस्तक प्रचारक मण्डल. ठि० रोशन मुहल्ला. आग्रा शहर (यू. पी.) श्री जैन आत्मानन्द सभा. ठि० प्रात्मानन्द भवन- भावनगर-(काठियावा)
BHAVAN'S LIBRARY
This book should be returned within a fortnight from the dite
ist marked below
Date of Issue
Date of Issue
Date of Issue
Date of Issue
1 SEP 1980
3 JUL 1977
8 APR 1983