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Prashanvyakaran Sutram Khand-ii

Suri,gyanvimal · 2012/08

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समर्पण परमपूज्य, धर्मधुरंधर, जैनशासन नभोनभोमणि, मुविहितसाधु शिरोमणि, जैनागम परिशीलनशाली, सद्धर्मोपदेष्टा, विद्वज्जनवृंदवंदनीय, आवाळब्रह्मचारी, व्याख्यानवाचस्पति कवि दिवाकर, परमकृपालु गुरुदेव अनुयोगाचार्य श्री १००८ श्री पंन्यासमवर श्रीमद् रंगविमलजी महाराज साहेबना करकमलमां आपश्रीनी प्रेरणा उपदेश अने लागणीथी आ महामूल्य ग्रंथरत्न प्रकाश पामे छे ते प्रश्नव्याकरणांग ग्रंथना प्रतिपादित विपयरूप पंचाश्रवत्यागी अने पंचसंबरने जीवनमा एकमेक करनार, एवा दीर्घ तपस्वी शास्त्रविशारद आप महापुरुष मारा परमतारक गुरुदेवने आ ग्रंथ समपी कृतार्य थाउंछु एज भवदीय लघु शिष्य कनकना कोटि वंदन.

व्याक०
प्रश्न
२
परमपूज्य शास्त्रविशारद शासनसम्राट् महान् क्रियोद्धारक तपागच्छाधिपति जगत्पूज्य
सूरिपुरन्दर ज्ञानविमलसूरीश्वरस्तुत्यष्टकम् ।
सदाचारप्रख्यं विहितजनसख्यं सुमनसम् । क्रियोद्धारे दक्षं समवहितलक्ष्यं प्रभुपदे ।
अमोघेः सद्दोधेः प्रशमितभविवातविपदम् । नमामि ज्ञानाब्धिं गुरुवरमहं ज्ञानविमलम् ॥ १॥
प्रलिताः पापोघैः सुकृतचयहीनाः प्रतिपदम् । समुद्विग्ना भूरिव्यसनशतकीर्णा भविजनाः।
सुधां यद्दोधाख्यां सपदि परिपीय प्रवत्रजुः । नमामि ज्ञानाब्धिं गुरुवरमहं ज्ञानविमलम् ॥२॥
प्रणीय प्राकर्मप्रदहनपटून संस्कृतमया-ननेकान् सरन्थान् स्थिरतरधिया ज्ञानजटिलान् ।
जिनप्रोक्तानर्थान् जननिकरसंज्ञापनपरम् | नमामि ज्ञानाब्धिं गुरुवरमहं ज्ञानविमलम् ॥३॥
तपस्तप्त्वा तीनं कठिनतरकर्मद्रुपरशुः। सितध्यानैः साक्षात्कृतपरतरज्योतिपपरम् ।
सदा सिद्धान्तानां प्रकटितसुतत्त्वगुरुतरम् । नमामि ज्ञानाब्धिं गुरुवरमहं ज्ञानविमलम् ॥ ४॥
विधाय द्राकर्मप्रलयमतुलाति प्रददतम् । विधाय प्राज्यासद्गतिगमनदानज्ञर्तिवहान्।
निधाय स्वान्ताजे प्रभुचरणपनं सुविमलम् । नमामि ज्ञानाब्धिं गुरुवरमहं ज्ञानविमलम्॥५॥

ज्वलन्तं क्रोधाग्निप्रशमनरसोत्सारितशिखम् । दृढं कामं ब्रह्मव्रतधृतिसमुन्मूलितवलम् | परां मायां दूरं झटिति प्रविधाय व्रतधरम् । नमामि ज्ञानाब्धिं गुरुवरमहं ज्ञानविमलम् ॥ ६॥ विशुद्धश्रामण्यक्षपितनिखिलाहः समुदयम् । गुरूपास्ति सम्यक् सुकृतततिं लभ्यां विदधतम् । समीचीनज्ञानेः प्रविलयितमोहान्धतमसम् । नमामि ज्ञानाब्धि गुरुवरमहं ज्ञानविमलम् ॥७॥ मदोजस्कं वीरप्रभुसमुपदिष्टार्थनिपुणम् । भवाब्धौ निर्मग्नान् दुरितकलितान् तारणपरम् । कपानिमुक्तं मतिसुकृतिगाम्भीर्यसदनम् । नमामि ज्ञानाब्धिं गुरुवरमहं ज्ञानविमलम् ॥ ८॥ संवदहिनवद्वयाञ्जसमिते मासे शुभे कार्तिके । तत्पक्षे धवले तिथौ प्रतिपदि वारे शुभे भास्करे। स्तोत्रं भक्तिभरेण रंगविमलनैतन्मुदा निर्मितम्।जीयादन महीतलेऽतिविपुले यावत्सुधोग्रांशुको।

मन्ना
३
व्या.
प्रश्नव्याकरण बीजो भाग छपाववामा आर्थिक सहाय आपनार सदगृहस्थोनीयादी-
र १९७) मालपाडाना पंचो तरफथी शा, हजारीमलजी
नागजीमा
रु १३८) पूरण गामना पंचो तरफथी
र ५१) शा. ताराचंद मोतीजी गाम यांकडीया पडगाम
र ५०) श. मोतीजी कसेनाजी
रु १५) शा. कानरुपजी धरमाजी
रु १३) शा. देवाजी तलकाजीनां यहु
जीवीवाइ तरफथी
, ११) शा. परखाजी दोलाजी
३) शेठ तलकाजी हीराजी
रु ६०) परचुरण सद्गृहस्थो तरफथी
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1
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प्रस्तावना शान, दर्शन अने चारित्रना उच्च आदर्श शोभता जैनदर्शनमा ज्ञान या अंगप्रथोर्नु ऊचुं स्थान छे. तीर्थंकर भगवंतो तीने स्थापे छे ते तीर्थमा बादशांगी तीथसम मनाय छ, ने तेनुं अस्तित्व न होय तो तीर्थनो अभाव मनाय. अर्थात् जैनदर्शनना आमा समान भागम ग्रंथो छ, ने ते भागममंथोने अनुलक्षीने ज जैनदर्शनना जा तमाम साहित्यको विकास अने परिवर्धन थयां छे. आ अंग वार छे. तेमा दृष्टिवाद घणां वर्षों थयां नाश पाम्यु होवाथी अगियार अंगो विद्यमान छ तेमा प्रश्नव्याकरण दसमें अंग तरीके प्रसिद्ध छे. अन्यर्नु नाम आ अन्य नाम प्रश्नव्याकरण सूत्र छे, या प्रश्नव्याकरण दशा छे. आ बन्नेनो अर्थ प्रश्नव्याकरणनी विद्यमान पन्ने वृत्तिओ जणावतां कहे छे के जेमा प्रभो-अंगुष्ट विगैरे विद्या प्रश्नोर्नु वर्णन होय ते प्रश्नव्याकरण अने कोइक ठेकाणे आ मन्थनु नाम प्रश्नव्याकरण दशा छे तेनो अर्थ-जेमां विधाओने प्रतिपादन करनारां दश अध्ययनो-ग्रन्थनी पद्धतिओ छे ते प्रश्नव्याकरण दशा, परंतु उपर जणावेल बन्ने रीतिना अर्थ आजे विद्यमान प्रश्नव्याकरण प्रन्थमा उपलब्ध नथी. आजे तो प्रश्नव्याकरण मुद्रित छे तेमां अने आ छपाइ तैयार थती प्रतिमां ने दश अध्ययनो छे. ते दरेकमां पांच आश्रवद्वार अने संवरद्वार विवेचन छे. हिंसा मृषा चौरी अब्रह्म अने परिग्रह ए पांच आश्रव. अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य अने १. तिथंकरे अतित्थे तिथं जाय पढमगणहरे, चाउवण्णो संघो.

प्रश्न अपरिग्रह ए पांच संवर मळी कुल दस विपयोने दस अध्ययनोमा खुब विस्तृत रीते प्रतिपादन कया छे. तो पण आ प्रन्थमां 'प्रथम विद्याओ व्याक० प्रतिपादन हतुं ते घातनो स्वीकार वृत्तिकार सूरिपुरंदर श्रीमद् अभयदेवसूरि महाराज करी हाल पांच आश्रव अने पांच संवरना प्रतिपादननो कइ रोते संबंध छे ते जोडता कहे छे के “विद्याओना प्रतिपादनरुप प्रश्नव्याकरणनो व्युत्पत्ति अर्थ पहेला हतो पण हाल तो पांच आश्रव अने पांच संपरर्नु प्रतिपादन मळे छे, अथवा तो महाज्ञानी पूर्वाचार्योए आ युगना नजीवा कारणे विद्याओनो उपयोग करनार पुरुषोना स्वभावने जाणी ते विद्याने बदले पंचाश्रव अने पांच संवरनु वर्णन कर्यु लागे छे." आ बावतमा रिपुंगव श्रीमद प. ज्ञानविमलसूरि महाराज पू. अभयदेवसूरि महाराजे जणावेल प्रश्नव्याकरण प्रश्नव्याकरण दशा अने तेना अर्थने पूर्ण रीते स्वीकार कर्या उपरांत जणावे छे के- आ प्रश्नान्दि विद्याओ पांच आश्रवनो त्याग करी पांच संवर रूप संयममा जीवता महापुरुषोने ज उत्पन्न थइ शके. माटे संयमवाळोज विधा- वाळो थह शके तेथी संयमना स्वरूपर्ने प्रतिपादन ते परिणामे विद्याना प्रतिपादनरूप छे. --अंगुष्ठादिप्रश्नविधास्ता व्याक्रियन्ते-अभिधीयन्तेऽस्मिन्निति प्रश्नव्याकरणम् क्वचित् 'प्रश्नव्याकरणदशा 'इति दृश्यते, तर प्रश्नानां-विद्याविशेषाणां यानि व्याकरणानि तेषां प्रतिपादनपरा दशा-दशाध्ययनप्रतियद्धाः ग्रंथपतयः इति प्रश्न- व्याकरणदशाः [प्रश्नव्याकरण पृ. १.] अयं व्युत्पत्यर्थोऽस्य पूर्वकालेऽभूत् , इदानीं त्वाथवपञ्चकसंवरपञ्चकन्याकृतिरेवोपलभ्यते .. २. विशिष्टसंयमयतां क्षयोपशमवशात् प्रश्नादिविद्यासंभवात् ततः संयमवानेव तद्वान् अतस्तत्स्यरूपमवतारितवान्- शान चि० पृष्ठ ६. १.प्रश्ना:- ग्रन्थविपय आ प्रन्थमा श्रीमद् ज्ञानविमळमूरिजोए हेय अने आदेय आ बे तत्वो उपर खुबज विस्तीर्णपणे प्रतिपादन कयु छे. पांच आश्रव हेय छे, अने पांच संवर आदेय छे. आ हेय अने आदेयरूप पांच आश्रव अने संवरनी उत्पत्तिना कारणो तेनो प्रभाव फळ अने असर विगेरे खुब मह- त्वपूर्ण विवेचन छे. साधे साथे जैनदर्शन अने जैनेतरदर्शनोना अनेक अवतरणो मूकी ग्रन्थने खुरज सुस्पष्ट कयों छे. ग्रंथमकाशन अंगे आजथी ग वर्ष पहेलां परमपूज्य गुरुवर्य कवि दिवाकर पंन्यास श्रीमद् रंगविमळजी गणिवरे सूरिपुंगव श्रीमद् आचार्यश्री ज्ञानविमळसूरीश्वरजी रचित- वृत्ति न्यारे अमदावादमां देवशाना पाडामां विमळना उपाश्रयमा प. पू. पं. दयाविमळजी महाराजना भंडारमा जोइ त्यारथी तेओन दील आयी अपूर्व कृति जरुर प्रसिद्ध कराय तो मारुं ए निर्णय साथे प्रसिद्ध करवान शरु कयु, दैवयोगे एज भंडारमांथी परमपूज्य पं. मुक्तिविमळजी गणिवरना हाये तैयार करायेल बीजी प्रति पण मळी आवी, आथी प्रकाशित थता आ ग्रंथ प्रत्ये वधारे आदर थयो, आ प्रतिना प्रकाशनमा मुख्यत्वे बे प्रतिओनो उपयोग करवामां आव्यो छे..एक डहेलाना उपाश्रयनी प्रतिनो भने बीजी देवशाना पाडामा विमळ- गच्छना उपाश्नयमां प. पू. पं. श्री दयाक्मिळजी महाराजना भंडारनी प्रतिनो जो के प्रकाशननी दृष्टिए बन्ने प्रतिओमां एके प्रति शुद्ध नथी, छतां डहेलाना उपाश्रयनो प्रति अक्षरे सारी अने जुनी छे. अने जे प्रतिने अनुलक्षीने ज मूख्यत्वे आ ग्रंथ प्रकाशन थयु छे. उक्त सूरीश्वरजीनी कृतिओनो मन | रचनाकाळ १७७३ सुधी छे, 'ग्यारे आ प्रतिनो लेखनकाळ संवत १७९३ फागण वद ३ मंगळवार छ, अर्थात् तेओना काळधर्म पछी आ ग्रंथ | व्याफ० पीस वर्ष बाद लखायो छे. आ वृत्तिमा प्रासंगिक श्लोको खुबज छे ने ते कर्त्यांनी विद्वत्ता सूचवे छे. खुब श्लोकोने लइने अथवा लेखकदोप वगैरेने लइ केटलोक जग्याए तो जे ग्रन्थ नाम सूचव्युं होय ते प्रन्थने बदले कोइ जुदोज ग्रन्थ होय तेवु बन्या छतां तेमज केटलाक अधिकारोनी मिश्रणता होवा छतां यथाशक्य पयोनां स्थळो अने अधिकारोना मूलस्थानो तपासी तेने शुद्ध करवा प्रयत्न कयों छे. आ ग्रन्थमा लब्धिस्तोत्र तेमज पिंडनियुक्ति जेवां संपूर्ण ग्रन्थो संक्षिप्तपणे दाखल कर्या छे, तेमज मूळ वृत्तिमा जे न होय तेवा पणा अधिकारो अन्य अन्य ग्रन्थोना आ ग्रन्थमा दाखल कर्या छतां ग्रन्थने त्रुटक के क्षत न थाय तेवी श्रीमद् ज्ञानविमसूरिजीए आ वृत्तिमाखुपज काळजी सेवीछे. अमने प्रकाशनमा ज्यां ज्यां घटक अशुद्ध के अपूर्ण लाग्य त्या अमे [ ] मां मूत्यु छे जेधी मूळकारना आशयनो ख्याल आये, आ ग्रन्थना प्रकाशनमा प्रतिपत्रे जेटलु मूळ तेटली व्याख्या राखवाथी मूळ अने व्याख्यानी संगतता द्वारा रहेजे अर्थ समजी शफाय तेवी रीते प्रकाशन करवामां आव्युं छे, कोइ पग जिज्ञासु आ ग्रन्थना पठन पाठननो लाभ लेशे तो आ प्रकाशन सफळ थयु मानीश, प्रेसदोष, दृष्टिदोप के स्खलनाने अंगे थयेली मूलोनी क्षमा मागी विरसुं . सं. १९९५ भा. सु.५ व्याख्यानयाचस्पति विवर्य परमपूज्य श्रीमत् पंन्यास रंगविमलगणिवर विनेयाणु कनकविमल १. संवत् १७९३ वर्षे फाल्गुनमासे कृष्णपक्षे तृतीयायां तिथौ कुजपारे सिद्धियोगे सफलभट्टारक थोथीथी १०८ विजय- प्रभसूरि तशिप्यसफलयाचकचक्रचक्रवत्ति महोपाध्याय श्री श्री १०८ विमलविजयगणि तशिप्य महोपाध्याय थी श्री १९ धी शुभविजयगणि तशिष्यसकलपंडितश्रीगंगचिजयगणि तशिप्य पं. श्री नयपिजयेन लिपीता आत्मायें. एज टी.

प्रश्नव्याकरणसूत्र- मूकार तथा निकारनो टुंफ परिचय मा पपना गरपिता सफल जैन श्रमणसपना माध आधारभूत पूज्य प्रवर गणधर भगवान सुधर्मास्यामीजी छे. भगवान महार परमारमाए कैपल्पसान पाम्या पछी साधु साध्वी श्रावक प्रायिकाप चतुर्विध संपनी स्थापनारप तीर्थ स्थाप्यु. गनुपियनगर्नु मूगर मप्रगप्प भंग थमपसंयना आप महापुरपो ते अगिमार गणधर भगवंतो छ, जे महापुरुषोए भगवान महावीर पासेगी "उन्ने पर विगमे या धुवे या "रूप त्रिपदी पामी पोतपोताना तीक्ष्ण क्षयोपशमहाराभिनभिन्न द्वाद- गी-सिनगणीनी रचना करी जगतमा रहेल तमाम पदापों अने तेमा थनारा प्रत्येक रूपान्तरो के जे भापामा उतरवाने होप गे सर्वना अनंतमा भागने तेमणे पोतानी वादगीमा उता. ते द्वादशांगीनो साता जिनसदृश थाय तेयो महोर पार पण घेन्यालीमगत महापोरदारा सिद्ध करी. मा भगिमार गणधर मगयंतो परस्पर शयाने सरपा होया छतां दीर्घायुषी पांचमा गणधर सुधर्मास्वामीनी द्वादशांगीज परंपराप जैनधामनमा प्रचार पामी. कारणके सुधर्मास्यामि भगवंत सिपायना दसे गणधर भगवंतो थोडा काळमां निर्वाण पाम्पा, मने तेमनी प्राषित द्वादशांगी पण तेमनी साथे लुप्त थई गर. माजे जे जिनागम मूळ स्वरूप अर्थक्पे भावरपे के अन्यरुपान्तरे विद्यमान छे ते सर्नु मूळस्थान सुधर्मास्वामी भग- गनी द्वारांगी है. भाजे विद्यमान जे मागममयो छे ते सर्व पूज्यनयर सुधर्मास्वामी रचित छे. मा प्रसन्याकरणास्य अगिमार अंग पैफीन दश अंग छे. ते पण सुधर्मास्वामी भगवते रचेलुं छे, जे पू. अभयदेवसूरि महारागनी पृतिनी मम्तायनाथी सहेजे जणाय छे.

व्याक० मश्न. ६ अस्य च श्रीमन्महावीरवर्द्धमानस्वामिसम्बन्धी पश्चगणनायकः श्रीसुधर्मस्वामी सूत्रतो अन्यूस्वामिनं प्रणयनं चिफीर्षः संबन्धाभिधेयप्रयोजनप्रतिपादनपरां अम्यू...इत्यादि गाथां. आ सुधर्मास्वामि गणधर भगवंत परमात्मा महावीर प्रभुना 'आद्य पट्टधर छे. तेमनुं जन्मस्थळ विगेरेनु स्वरूप नीचे मुजय छे.. फोल्लाग नामना गाममा धमिल्ल पिता भहिला माताना पुत्र, चोदे विद्याना पारगामी प्रभु. महावीरना दर्शन अने उपदे- शायी प्रतिबोध पामी ५० वर्षनो उम्मरे भगवान महावीरने पोताना परमतारक स्वीकारी ३० वर्ष महावीर परमात्मानी सेवा कर्या बाद महावीर प्रभुना निर्वाण पछी चार वर्षे केवल्यशानने प्राप्त करी ८ वर्ष मुधो केवलसाननी परिपालमा करी १०० सो. वर्ष पूर्ण आयुष्य पारी निर्वाण पाम्या. काळभमे आ पूर्वमहर्पिना रचेला महाकिमती रत्नसमान आगमोना गूढ अर्थी अने आमन्याओ फाळना प्रभायने ला ओली थती बुद्धि अने धीरजने लइने विस्मरण थतां तेमज दुष्काळ विगेरेना उपद्रवोने ला नाट थतां देखी शममातमा 'स्कंदिला- चार्य मथुरामा अने नागार्जुनरिय वळामां-बलभीमां श्रमणसंमेलनद्वारा जे जे अवस्थामां ने महपिओने फंठे जंटला जेटला प्रमाणमां ग्रंथो उपलब्ध थया तेनो संग्रह कर्यो. ने त्यारयाद थोडाज घनतमा पू. देवद्धिंगणि क्षमाथमणभगवते आगम तथा अन्य अन्य पूर्वपुरुपोना ग्रंथोने साधुसंमेलनद्वारा एकत्र करी पुस्तकारुद फर्याः १. श्रीमद्वीरजिनेन्द्रस्य विनेयो विश्ववल्लभः येनाऽधीतानि पूर्वाणि सुधर्मास्यामिनाऽद्भूतम् [विबुधषिमलतपहावल्यां] २. कल्पसूत्र पृ. १८६ तमे फोल्लागसन्निवेशे घम्मिलविमस्यः.. ....इत्यादि वर्णन यं १. जिनवचन च दुष्पमकालयशादुच्छिन्नप्रायमिति मत्वा भगवद्भिर्नागार्जुन-स्कंदिलाचार्यप्रभृतिभिः पुस्तेकेपुन्यस्तम् [फलिस सर्पक्ष हेमचन्द्रसूरिकृत योगशास्त्रप्रकाश ३ ग्लोक १२०]... २. पल्लहिपुरंमि नपरे देवढिपमुह सयलसंधेहि, पुत्ये आगमलिहिआ नवसयअसीमायो घोराओ. [कल्पसूत्र पृ. १४४] •ur FIR मल आगमको तेमज पूर्वमहर्षियोना प्रतिपादित करेल प्रन्योना रहस्योने स्फुट करनार्य विवरणोरूप से से मोनापियानो मेने वियरपल मिन मिन जुदा जुदा अनेक ग्रंथोनी रचनाद्वारा जैनशासन अविछिन प्रभायशाळी आज- गधी गों. मागगंग, गूगशंग, अपांग, समयापांग, विवाहप्राप्ति (भगयतीजी) साताधर्मकथांग, उपासकदशंग, अंतस्तदशांग, अनु- नरोगनिदशांग, प्रश्नध्याकरण भने विपाकसूच ए अगिआर अंग छे. यारk अंग वीरसंवत १००० लगभग विच्छेद पाम्यु. 4 .३३ मा गरिपुंगव शीलांकाचार्य भाचारांगम्य उपर तेमज पाहरिगणिनी सहाययो सूयगडांग उपर संस्कृत भाषामा गुपत पमत्कारिक गनिमी रयो ऐ. जे आजे उपलब्ध छे. आ ये अंग सियाय वीजा नये अंगो उपर पण तेज आचार्यपुंगवे टीका पनी ती. परंतु उपपेग घे टोकामो सिवाय नये टीकाओ विच्छेद पामयाथी आचार्य अभयदेवसूरि महाराजे नव अंगो उपरगन नपी टोमामो पनायो. प्रश्नण्याकरण उपर माजे मुरम्य पे गृतिमो उपलब्ध छे. एक सूरिसुंगव अभयदेवरि महाराज रचित वृत्ति अने योजी महान् फियोनारक धीमद् मानयिमद्धमूरि महाराजनो रचित पृत्ति छे. ते यन्ने वृत्तिकारोनो परिचय पण आवश्यफ छे. जैनदर्शनमां महामायक ग्रंथकार तरीके अभयदेयमरिना नामवाळा पांच महापुरुष थया छे. अभयदेवसूरि (राजगच्छीय) १. प्रभाषक चरित. अभपदेयसूरिनबंध श्लोक १०४-१०५ तथा पुरातनप्रबंधसंग्रहे-अभयदेवसूरिविहरन् पल्यपुरे श्रीवर्धमा- मरिपु दिय गतेपु अभयदेयमीणां तपस्थितानां महादुर्भिक्षे सिद्धान्तास्तवृत्तयोऽपि त्रुटिताः, यवस्थितं तदपि दुरववोध. स्यान् गित गात शासनदेयी राघो प्रभु जगौ यदादयं मुक्त्या नयागांनां वृत्ति फुरु सरिराह-'सुधर्मस्वामीकृतसिद्धान्तविवरण- फरणे मन्नमनित्यादुन्ग्समरूपणादनन्तसंसारित्वम् । परं त्यामनुल्लङ्गयां फरिप्यामि' देव्योकम्-यत्र यस सन्देहस्तत्राऽहं स्मर्तव्या सीमन्धरस्यामिपाश्यांद् सन्देहमर फुयें प्रभुमिम्रन्यपूर्णतापधि यावदाचाम्लाभिग्रहोऽग्राहि...इत्यादि.

व्याक० प्रश्व० जेमणे संमतितर्फ जेवा महान् ग्रन्थ उपर तत्त्ववोध विधायिनी टीका बनावी छे के जेनुं प्रतिबिंव जैनदर्शनमा परंपराए समग्न न्यायग्रन्थोमां पडयु छे, ने जेना संतानीय धनेश्वरसूरि तथा प्रवचनसारोद्धारनी वृत्तिकार विगेरे महर्षियो छे. वीजा अभयदेवसूरि नागगच्छीय रामसूरि-चंद्रसूरि-देवसूरि-अभयदेवसूरि ए रीते संवैध धरावे छे. तेमनो समय यारमी शताब्दि आसपासनो गणाय छे. श्रीजा अभयदेवसूरि रुद्रपलीय गच्छना स्थापक छे. चोथा अभयदेवसूरि प्रसिद्धमलधारी हेमचंद्रसूरिना गुरु के. उपरना चार सूरिएंगयो नवांगवृत्तिकार अभयदेवरिथी भिन्न छे ते वस्तु आपणने तेमणे जणावेल प्रशस्तिमा सूचधेल गुरुना अने गच्छना नामथी समजाय छे. आचार्य जिनेश्वरसूरि के जे घुद्धिसागर नामे प्रसिद्ध छे तेमना शिप्य अभयदेवसूरि महाराज आ प्रश्नव्याकरण सूचना रचयिता छे, अने तेमनी रचल वृत्तिना संशोधक द्रोणसूरिजी छे, ते वात तेमनी प्रशस्तिथी स्पष्ट जणाय छे. उक्तसूत्रना वृत्तिकार अभयदेवसरिजी महाराज सं. १०८८ मां सोल वर्षनी उम्मरे आचार्यपदारुढ थया छे, तेमणे प्रथम शातास्त्रनी वृत्ति सं. १९२० मा रची अने त्यारपछीथी चीजा अंगोनी वृत्ति ११३३ लगभग पूर्ण करी छे. नवांगवृत्ति उपरांत पट्- स्थानक भाष्य, हरिभद्रसूरिकृत पंचाशक पर वृत्ति तथा आराधनाकुलक पंचनिम्रन्थी प्रकरण विगेरे अनेक ग्रन्थो रच्या मेओना स्वर्गवास कपडवंजमां सं. ११३५ मां थयो छे. श्री प्रश्नट्याकरणसूत्र उपर बीजी वृत्ति शास्त्रविशारद सूरिपुंगय श्रीमद् ज्ञानविमलसूरिश्वरजी महाराजनी के तेमनो परिचय नीचे मुजव छे. श्रीमाळोओनी ऊत्पत्ति अने अनेककिंवदंतिमोथी जोडायेल मारवाडमा आवेल भिन्नमाल नगरमां विशाओशयालना वैचा- विभूषण श्रेष्ठी घासबजीपिता अने कनकावती भातानी कुक्षिप सं. १६९४ मा मंगळप्रभाते पुत्रनो जन्म थयो, संसारी अवस्थामां ७ व्याक प्रश्न ८ फर्यु ने ते दरमियान शरीर क्षीण थतां सं. १७८२ ना आसो वदि ४ ना रोजे गुरुवारे वृद्धवये कालधरी पाम्या. सूरिपुंगवना फालधर्मथी मांडीने ४०) चालीस दीवस सुधी अमारी पडह अने धर्म उत्सव सकळ संघे कों. तेमज तेमना स्मरणनिमित्ते सकरपरामां पगलायुक्त दहेरी करावी. जे दहेरी माजे पण विद्यमान छ भने तेमनो संगृहित शानभंडार पण खारवाडाना संवेगी-विमळगच्छीय उपाश्रयमा विद्यमान छे. जे प्रश्नव्याकरण ग्रन्थनी टीका करतां अभयदेवसुरि महाराज शरुआतमा जणावे छे के- अशा धयं शास्त्रमिदं गभीर, प्रायोऽस्य फूटानि च पुस्तकानि सूत्र व्यवस्थाप्यमतो विमृश्य, व्याख्यानकल्पादित एवं नैव ॥ १॥ भने अन्ते जणाये छे के, परेषां दुर्लक्ष्या भवति हि विवक्षा स्फुटमिदं विशेषावृष्धानामतुलबचनशानमहसाम् निरस्नायाधीभिः पुनरतितरां माशाजनैः ततः शास्त्रार्थ मे बचनमनघं दुर्लभमिह ।। मर्थात् आ प्रश्नच्याकरण शास्त्र कुट ग्रन्थ छे, मारा जेवार करेली व्याख्या उपर ध्यान न आपतां संबंध मेळवी व्याख्या करवी वगेरे जणावयुं ते प्रश्नन्यारुरणनी महागंभीरता सूचक छे. आ ग्रन्थना स्वपर शास्त्रतत्त्वज्ञाता शासनसम्राट् तपागच्छाधिपति चार्यदेवेश श्रीमद् पू. शानविमळसरीश्वरजी महाराजे अभयदेमरिनी टोकाने अनुलक्षी खुधज सरल बनाववा प्रयत्न कयों छे. ने जेमां ते खूबज सफळता पाम्या छे. तेमणे अभय- देवरिनी टीकामां नहिं वृत्ति करायेल तेवा एकेक पदनो संस्कृत छाया अने पदेपदनी व्याख्या आपी छ, तदुपरांत तेमनीटीका तेमना शाननी गंभीरता अने पहुश्रुतता जणाये छे. तेमणे छेदग्रन्योयी मांडी जैन अने जैनेतरना अनेक ग्रन्थोना पुरावा अने सातिमोथी आ ग्रन्यने सुयज महत्त्वपर्यो यनान्यो छे. आ ग्रन्थम प्रसंगने अनुसरीने अनेक अधिकारो मापी आ प्रथने घणो रसमय वनान्यो छ, अर्थात् फुट गणातो आ ग्रन्थ तेमनी तार्किक अने निपुण शक्तिथी सर्वजनभोग्य बनान्यो छे: ८ शापिमहानि माग परम प्रमापक यानंदपिमटरिने स्मरण करावे तेचा प्रतिमासंपन्न थण छ, जे आनंदविमळ गरि मारे मागणीभोप पन का के- भएपः मलि गयो गो गमो र गर्षिताः आनंदयिमलादन्यो धन्यो नास्ति महीतले । [मालयी पिता स्तुतिः] महान शिरोधार करनार मानयिमनमरि महाराज पट्टी वे क्रियो धार पंडित हर्षयिमळगणि पंडित कीतिविमळगणी, H. तामिद्धतीगणि, पं. भोरयिमरगणि मुधो सतत् पाल्यो पण पछीयो तेमां स्खलना थतां ते महान् क्रियोधार कर पान माप मा प्रपना गृनिकार मरिसम्राट भीमद् प.मानधिमळसूरीश्वरजीने ललाटे लपायु. जे आजसुधी ते कियोधार गारो मारे. पू. श्रीमद् मानयिमलमूरीश्वरजी महाराजे आ टीका उपयंत भित्र भिन्न विषयोना अनेक ग्रन्थो नीचे मुज. पना बनाया ज्ञाननिमल गरि महाराजे आचार्यपद लीया पहेलां मुनिश्री नयविमळनी अवस्थामां वनावेल ग्रन्थोनी यादि १मरमर रशंत उपनयमाळा ७ साडावणसो गाथानो याळाययोघ. २ माशुन रास. ८ प्रग्नद्वात्रिंशिका स्वोपन बाळावयोध. ३म्यामी रास. ९ श्रीपाल चरित्र संस्कृत गद्य. शिराजगिरास. ५ नपतव्य पाळाययोध. १० दश दृष्टान्तनी सज्झाय. ६ प्रमाणात बाळाययोध. ११ स्तवनो संज्झायो पदो स्तुतिओ.

व्याक० 10 ९ श्रीमद् ज्ञानविमळहिनी अवस्थामा चनावेल ग्रन्थोनी यादि १२ प्रश्नव्याकरण वृत्ति. १९ अध्यात्म कल्पद्रुम पाळावयोध.. १३ संसार दावानवृत्ति. २० पाक्षिकसूत्र वाळाययोध. १४ वारजतनो रास. २१ योगदृष्टि सज्झाय पाळाययोध. १५ रोहिणी अशोकचंद्र रास. १६ दीवाळी कल्प वाळावबोध. २२ चंद्रकेवळी गस. १७ आनंदघन चोवीशी थाळावयोध. २३ शांतिनाथ अने पार्यनाथनो कळश. १८ पण भाष्य वाळाक्योध. २४ स्तवनो सझायो पदो कळश स्तुतिमो विगेरे. आ उपरांत तेमनी घणो कृतिओ नष्ट था संभवे छे. पूज्य आचार्य मानविमळसूरिनुं विशिष्ट जीवनचरिघनो आध संग्रह परम पूज्य गुरुदेव श्रीमद् पंन्यास मुक्तिथिमळजी गणियरे प्राचिन स्तवन रत्नसंग्रह नामना पुस्तकमा संग्रह फों छ, ने त संग्रहने अनुसरीने श्री मोहनलाल दलीचंद देशाइकृत प्राचीन गुर्जरकवि भा. २ जनसाहित्यनो संक्षिप्त इतिहास तेमज मुनि. श्री कनकविमळजीए तैयार करेल उक्त सूरिना चरित्रमा विगैरे खूप खूब तेमना जोयनने लगतुं साहित्य छ, यधु जिज्ञासुए त्यांथी जोइ लेवु. अहिं तो पुस्तकनी प्रस्तायनाने लइ टुंक निर्देश कयों छे. १. सकलाईत् स्तबक- नमस्कार न्याय लिख्यो अर्थी बालावयोधरुपे भ० मानविमलसूरि साधर्मिकजन घोधमाटर सं. १७७३ वर्षे महा शुदि ११ शनौ दिने सुरतमध्ये [ मुनि है. वि. सं. शा. वदोदरा.]

। श्रीमद् ज्ञानविमलमूरिविरचित प्रश्नव्याकरणांग-प्रथमभागगतपद्यसंग्रहः पत्र पृ. पं. पत्र पं. पव पृ. नाणं च दंसणं चेर २१ २ / कंटकस्य प्रतीक्ष्णत्वं २८.११२ एक एव हि भूतात्मा ३०१ ५ पर्म नाणं तओ दया २१ ६ / प्राप्तव्यो नियतिवलाथयेण नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि ३०१ सूयनानं महड्डिया २१११ योऽर्थः ? २८ २६ अकर्ता निर्गुणो भोक्ता ३० १ १४ हेया पासवपुनपावा २१ १३ / पित्र खाद व चारुलोचनें! २८ २ १४ । यस्मान वध्यते नापि ३०२ २ जीयो संवरनिग्झरमुफ्खो २११४ / आसीदिदं तमोभूतं इत्यादि कालः सृजति भूतानि अलं भासइ अरहा २२ ३ पद्य सप्तकं २९ १ ८-१४ / रविरुष्णः शशी शीतः न भवति धर्म श्रोतः ३१ ३ / जले विष्णुः स्यले विष्णुः २९ २ ५ माप्तव्यमर्थ लभते मनुष्यः ३० २ १३ सामाइयमाइयं मुयनाणं ४२ ५ / पृथिव्यामप्यहं पार्य! २९ २ ६ द्वीपादन्यस्मादपि मज्झं विषयकपाया २११ ९/ सो किल जलय समुत्ये सा सा संपद्यते'बुद्धिः एगिदिएम पंचसु २१११२ पद्यपष्ठं २९ २ ९-१४ ब्रह्मा येन कुलालवनियमितो ३१.१ ५ असंखोसप्पिणी उस्सपिणीओ २१ १ १३ / एवमेके वदंति मोसं दुसाध्यप्युधमतस्मुसाध्यं ३११ अद्धतेरसवारस २१ ११४ एगो आया ३० १ १ / कालो सहाव.नियई. १ ८ ९ ६४ २ ११ च्याक ७ घौद्धं नैयायिक सांख्यं यस्यास्तिस्य मित्राणि ४ नामापिस्रोति संहादि मन्ना जैन सांख्य जैमिनीयं १ रान्ये सारं वमुधा ६१ २ ५ सर्वेऽनर्या विधीयन्ते काला सूजति भूतानि ३२१ ८ पदारभते कर्म कामः जानामि ते रूपं वर १ घालव २ कौलव ३ ३७ १ ९ । सइ भुनइति भोगो ६२ १ ५ / यह लोकेऽधपरे नराणां चौरः चौराको मन्त्री ५३ २ १० ( हरिहरहिरण्यगर्भप्रमुखे रसा पगामं न निसेवियन्ना भलनं १ कुशलं २ तर्जा३ नवि किंचि अणुन्नायं ८ मशान्तवाहि चित्तस्य पधत्रयी ५३ २ १२-१४ । सन्मार्गे तापदास्ते ६३ २ ३ | दृश्यं वस्तु परं न पश्यति पुढवि ७ दग ७ अगणि ७ ५९ १ ११ कि किंण कुणइ ६३ २ ८ निघाडकडनिक्खेवप्पहार तैनसकामणवन्तो ५९१ १४ फम्पः स्वेदः श्रयो मूर्जा ६४ १ १ ये रामरावणादीनां व्यक्तितोऽसंख्यभेदास्ताः ५९ २ १ जो सेवइ कि लद्दइ ६४ १ २ दुःखात्मकेषु विषयेषु लक्षाश्चतुरशीतिश्च ५९ २ कृशः खः काण: नइ ठाणी संटता विकृता चैव ५) तिव्यकसाओ बहुमोह-परिणओ६४ १ तो पढिों उक्तोभयस्वभावा ५९ २ ६ अरिहंगसिद्धचेइन ६४ १ न मांसभक्षणे दोपो सीयादी जोपीओ-पधपञ्चकं ६० २ ६ । संजइचउत्यभंगे ४ । हिमवंत सागरं धीरं ३ . ७ ४ ४ ६६२ १४ ६८१ १० ९ ७ पुएइ भाइणिज्जे सेणावर गाहावद ७० १ ६/ रिपहो उ होइ पट्टो ७ वर्जयेद्विदलं शूली नेसप्पे पाडुपए ७१ १ १ लीला विलासो विच्छित्ति ८२ १ १२ / व्रणेः श्चयथुरायासी महापमय पथ ४ संघयणं संहाणं ८४ २ ११ / परदाराऽनिवृत्तानामिह नेसप्पंमि निवेसा ७१ १६-१३/ विर्यचो मानवाः देवाः ८८१ इत्यादि पधपञ्चक ग्रामोहत्या हवः स्यात् ७१ २ १२ / सन्वापफलयुक्तस्य ८५ २ मुग्धमृगनयनयुगळे ! समुद्ररिमयोऽ १ क्षोभ्यः २ ७३ १ १०/ धर्म शीलं कुलाचार ८५ २ नरपसु जाई अक्खडाई अस्थिप्वाः मुखं मांसे ७४ १ ११ / श्लयसद्भावना धर्मा ८५ २ १० इत्यादि पधत्रयोदशी ९० २ एफदिग्गामिनी कीतिः ७७१ अकीर्तिकारणं योपित् ८५ २ १२ । संसारमूलारम्भाः ९१ २ श्रीमद् ज्ञानविमलसूरिविरचितपश्चव्याकरणांगे द्वितीयविभागगत प्रासंगिकपद्यसंग्रहः पल्लाणकोडी जणणी सत्यं शौचं तपः शौचं ३ २ १३ / देसणमिह सम्मत्त निधिद्व एत्य वयं इक्कं विय २२१३ / रिउसामण्णं तम्मत्तगाहिणी अणुकम्पऽकाम णिज्जर ३ १ ३ / सम्माणु सन्व विरई इत्यादि गाथात्रयी ५१ ९-१३ सम्मत्तमिय लद्धे कि वीए पदियाए ३१ १० । अस्तित्वमस्तिभावेन ५२ १ म१०सा०पृ०४०४ ८ ४ २ १२ / वेयगमवि सासायण यावत्तरि कलाकुसला जो सप्तपएण बहु एए अन्नेय वह जेसि ९१ ३ संसहमसंसहा १३ २ व्याक तथा हि योगमाहात्म्यात् ६१६ | अक्खीण महाणसीया ९१ ९ एगराइयं छ णं भिक्खु योगशास्त्रवृत्ति पू. १०-२ अक्खीण महालया जे पञ्चाशक पृष्ठ २८३-२ १५२ योगिनां योगमाहात्म्याद ६१ ७-१०, संमिन्न चकि जिन हरि ९२६ साह? दोवि पाए योगशास्त्रटत्ति इत्यादि पद्यपश्चकं पृ.१०-२) अरिहंत चक्कि केशव इत्यादि अशादश पञ्चाशकान्तर्गतविंशतितमःश्लोकः वीरासणं तु सिंहासणे व्य नखा केशा रदाश्चापि पधत्रयं ९२११-१३, १५२ १० ६२ १ योग० वृत्ति पृ. १२--२ चक्कं छत्तं दंडो इत्यादि आयावणा उ तिविदा १५ २ १२ किय मक्खिय निक्खित्तं तथा हि तीर्थनाथानां ६२ २ पपत्रयं १० २ २-५ पि. नि. गा.५२१ योगपत्ति पृ. १२-२/ संसटेयर हत्यो प्राशी-दाढा तग्गय सोलस उगम- दोसा १७१ पि०नि०पृ. २५२ पि. नि. पृ. १४६ रिज-सामण्णं तम्मत्त गाहिणी ७१ ११ । दनिओ जत्तिए बारे विवलं वत्सुविसेसेण अहाकम्मुदसिय इत्यादि ७२ १ मासाइ सत्तं वा १२२ ९ पद्ययं १७२ मु. तत्वार्य पृ. १०१ पश्चाशकान्तर्गतान्तिमे पनाशके ) तं पुण जे जस्स १७ २१४ निण सासण पडिणीयं ८ १ १४ वेणा सत्तेण मुत्तेण पि: वि. गा.८ १ . जाति यमुरेस १८ ११४ छकाय दयावंतोऽपि ३३ १ १० । वेयण वेयावच्चे इरियहाए ४२११३ पि.नि. गा. २३० उदेसियंमि नवगं ३६ २ ४ पिं०नि० गा० ६६२ पाहा निमिने इत्यादि २४ ११० पि०नि० पृ. ११७ वमे ३९५ गाया वृत्तौ | पंथसमा नत्यि जरा ४११ १४ पिं०नि० पृ. १७७ गागागं पि. नि: गा. ४०८-४०९ / परियटिए अभिहले भाविय जिणवयणाणं नियामा स्पविरोधानी तमे ३९५ गाथा वृत्ती ४२ २ ३ बलावरोधिनिर्दिष्ट ४२२ ९ पिं.नि. पृ. १२३ | मुहमा पाहूडिया विय पिं०नि०६६७ वृत्ती नारर्ग भाति स्थायाः २५१ ७ तमे ३९५ गाथा वृत्ती विपया विनिवर्तन्ते पि. नि. पृ. १२३ | सो एसो जस्स गुणा ३७ ११२ देहमि असलिहिए २५ १. ९ पिं०नि० गा०४९१ इत्यादि गाथाद्वयं पिं.नि.पृ. १२३ / पत्तीस करला पुरुसस्स ४१ २ ९ म. ति. दाणं न होई अफलं २६ २१४ पिं०नि० पृष्ठ १७३ आयके उस्सग्गे कोई पेवर सगो २८ १ ५ अबहूयं अहबहसो ४१ २११ म.ह..पृ.२१५ पिं०नि० पृ.१३९. पिं०नि० गाथा ६४६ । नित्यय पडिकुट्टो ४४ २-१४ कृष्णा भंसयते वणे प्रश्न तणडगल छारमल्लग दशहारि.पू. २१०- म. पृ. १७९ गत गाथा ६४३ व्याक पश्वाशक १ गत गाथा २७६ २७७ । गृहह थायसहावं ७ असणाझ्या चउरो इत्यादि भापाणं भन्ते ५१ १ २ म. गाया ६४३ गत पधं पथचतुष्टपी ४५ १ पश्चाशक मज्ञापनासूत्र १२पद १५ सूत्र पृ.७७९ कोउय १ भूइकम्मे ५८ २ ९ सत्येनाऽपिवेच्छीतो ४८ ११३ शृङ्गार हास्य करुया म. गाथा ६४४ भियं सत्यं वाक्यं ४८ १ १४ । वयणतिय लिंगतिय ५३ २ ९ । सइविग्गदशीलतं सुरा सत्याद्वाक्यात् ४९१ २ [ पुद्धिए निएउणं ५४१ म. गाथा ६४५ नणरय सम्मय उवणा ४९१ ५७ १ ५ । उमग्गदेसणा मग ५९ १ १४ दशवै. हारि. दृत्ति पृ. १०८ तथा म. | प० पृ. १८० गाथा ६४१ वृत्ती म. गाथा ६४६ सा. पृ. २६१ । कंदप्पदेव किनिस ७. एयाओ विसेसेणं उप्पन्न मिस्सिया विगय ० पृ. १७९ गत ६४१ गाथा भ.पृ. १८३ दश हारि.प. २०९-२लोकप्रकाश पृ. ३१२ कंदप्पे कुपकुए ४ } तेऽमुविहियाय मन्ने ६२ २ आमंगणी आणचणी म. पृ.१७९ गत गाथा ६४२ | वेयावच्चं वावडभावो इत्यादि गायाद्वयं ५० १ १३ मुयनाण केवलोणं ५८१ ४ । भरिहंत मिद्ध चेइय १२ ५ जो संजभो वि एयासु अपुषस्य गतिनास्ति ग्रतानां ग्रामनरी हि ६८१ ५/ अहो चौलुक्यपुत्रीणी ५ दंसण वय सामाइय ८० ११२ एकनभवरी दा ६८१ ५/ चन्द्रवत्रा सरोजाक्षी ६ म. गाथा ९८० थिय नारीरौदीच्या ६८२ ५ ८ ८२ १ १० राइभत्त परिणाए भनेकानि सम्माणि ६८२ ६ चेटिका परिवारोऽपि ७५ ११० म. पृष्ठ २९६ मियामः कुषतिष्ठामः ६८ २ १० / हावो मुखविकारः स्यात् ७५ २ अट्ठा गट्ठा हिंसा ८२ २ म. गाथा ८१८ नवि किंनि भन्नार्य ६८ २ १३ / लीला विलासो विच्छित्तिः ७५ २ १३ अंबे अंबरिसी चेव देवदाणयगन्धच्या ८३ २ ९ ६९१ ८ इस्तपादाङ्ग विन्यासो ७६ २ ८ म. गाथा ८५-८६ मेहुणपभर परं ७१२ ७ स्त्रीकान्तं वीक्ष्य नाभि ७६ २ १० / समओ१ वेयालियर उवसग्ग ३८४ २ ४ अमामवारी बामणो न ७२१ जहा दवग्गी पउरिंधणो ७८ १ ६ पुढवि दग अगणि ८४ २ नित्यं यच फलाकलापकलितः ७२१ ५ / जह अभंगण लेवो ८ ओरालियं च दिवं इष्टानामर्थानां ७४ २ ६ / पुढवाइस आरंभो ७९ १ १० । उक्खित्तणाए संघाडे इत्यादि स्थानासनगमनानां ७ जाई कुल बल रूवे गाथाद्वयं ८४ २ १४ विलासो नेप्रमो शेयः ७४ २ ८/ वसहि कह निसिज्जि खुहा पिवासा सीउण्हं पिग् ग्रामगी विधयायाः ४) खंती मव अजव इत्यादि गाथाद्वयं ८५२ ४ ७ w ७ मश्न ८ पुंडरिय१ किरियाणर ८५२ ९ पडिसेहणसंहाणे जं पि चत्यं च पायं वा व्याक० १३ । भवण१ वणर जोड़ ८५ २ ११ (पंच णाणावरणे णव इत्यादि गायाद्वयं ९३ २ १२ दस उद्देसणकाला ८५.२ १४ रायणियस्स सेहो ८८१ अन्भत्य विसोहिए ९४१ ९ वय छक्कमिदियाणं इत्यादि जब गोधूम बीहि फंगु ९० २ लज्जा दय संयम ९५ ११० गाथाद्वयं ८६ १ ६ | विडमुन्भेइम लोणं ९१ २ ५/ भंभा मउंद महल ९७ ११३ सत्य परिण्णा लोक विजओ ८६ १ १० यत्तीस किर कनला ९२ १ अरुणांदुंबर स्पर्श पिंडेसण सेज इरिया ८६ १ १२ पिं.नि.गाथा ६४२ स्थूल१ मारुकार महाकुप्ठ ३ १०० १ ७ उग्धाई अणुग्याई समस्तैरपि ८६ १ ११ / वेयण येयावच्चे पृषक ९२ २ १२ १०० १११ अट्ठ निमित्तंगाई पुराणोदक भूयिष्ठाः ८६२ पि. नि.गाथा ६६२ से ण तसे न चउरंसे ८७ १ ६ काहे अछित्ति अदुवा मूयो१ दणोर जवन्नं ३ ९३ ११३ इत्यादि गायाद्वयं १०२ ११४ ४ १३ प्रश्नव्याकरणागस्य विषयानुक्रमः पृष्ठ १ ४७-१ पृष्ठ १८-२ १८-२ ३-३८ प्रथमं संवरद्वारम् मयबारे अहिंसायाः नामानि अहिंसायाः कारकाः एकत्रिंशद् मेदभिप्रलब्धिस्यरूपम् के जीयानां का लम्धयो! प्रयोविंशतिरत्नपदपोविचारः संगपासपटयियारः पत्तिलक्षणं दत्तिस्यरूपम् च मिथुप्रतिमास्यरूपम् नपकोटिपरिशुद्धाहारनिर्देशः उद्गमोत्पादनेषणादोपशुखाहारनिर्देशः उनमदोपस्वरूपम् १ आधाकर्मस्वरुपम् २ उद्देशिकस्यरूपम् ३ पूतिकर्मस्यरूपम् १२ ४ मिथजातस्वरुपम् ५ स्थापनादोपस्यरूपम् ६ प्राभृतकदोपस्यरूपम् ७ प्रादुष्करणदोपस्वरुपम् ८ फ्रीतदोष स्वरूपम् ९ अपमित्यदोष स्वरुपम् १० परिवर्तितदोष स्वरुपम् ११ अभिहतदोष स्वरुपम् १२ उद्भिनदोप स्वरूपम् १३ मालापहृतदोष स्वरुपम् १४ आच्छेद्यदोष स्वरुपम् १५ अनिःसृष्टदोष स्वरुपम् १६ मध्यपूरफदोष स्वरुपम् अवान्तरमेदसहितोत्पादनादोपस्वरुपम् १ धात्रीदोप स्वरुपम् २० २० २० २० २१ २२ २२-२३ २३ २३-२४ २४-२९ २४-२५ १७-३५ १८-१ व्याक० प्रश्न ३०-१ ३०-२ ३१-३३ ३४ ३४-१ ३४-२ २ दूतीदोपस्वरूपम् ३ निमित्तदोष स्वरुपम् ४ भाजीविका दोष स्वरूपम् ५ वनीपकदोप स्वरुपम् ६ चिकित्सादोप स्वरुपम् ७ क्रोघदोष स्वरूपम् ८ मानदोष स्वरूपम् ९ माघादोष स्वरूपम् १० लोभदोष स्वरूपम् ११ संस्तवदोष स्वरूपम् १२ विद्यादोप स्थरूपम् १३ मन्त्रदोष स्वरूपम् १४ चूर्णदोष स्वरूपम् १५ योगदोष स्वरूपम् १६ मूलदोष स्वरूपम् अवान्तरमेदभिन्नैपणादोपस्वरूपम् १ शद्वितदोष स्वरुपम् २ प्रक्षितदोष स्वरूपम् २५ २६ २६ ૨૬-૧૭ २७ २७-२ २७-२ ૨૨ २८-१ २८-१ ૨૮-૨ २८-२ २८-२ ૨૮-૨ २९ २९-३५ ३ निक्षिप्तदोष स्वरुपम् ४ पिहितदोप स्वरुपम् ५ संहतदोप स्वरुपम् ६ दायकदोष स्वरूपम् ७ उन्मिथितदोप स्वरूपम् ८ अपरिणतदोप स्वरूपम् ९ लिप्तदोष स्वरूपम् १० छदितदोष स्वरूपम् द्विचत्वारिंशदोष यन्त्रकम विशोधि अविशोधिकोटिस्वरूपम् प्रथम संवरद्वारे प्रथमा भावना प्रथम संवरद्वारे द्वितीया भावना प्रथम संवरद्वारे तृतीया भावना प्रथम संवरहारे चतुर्थी भावना संयोजना दोषरहिताहारनिदेशे पञ्चग्रासैपणादोपस्वरूपम् आहारकरणे पट् कारणवर्णनम् अभोजनकारणानि पट् ३६ ३८-३९ ३९ ३९-२ ३९-४० ४१ ४२ ४२ १४ पीर मोशन पोर्ग पिनगर स्वायम् प्रामपामारे सभी मारना दिलीप गारद्वारम् पापम्प या महिमा ग पविध मत्यरा पाधि गपमागस्वरयम् पापिय सत्यगृण मागस्यम्यम् मायिधासरयायामागस्यपम् सत्यमणि कीरत न पकन्य फोरस पायमिति पर्णन जितीययग्वारे मामा भायना जिनीयमापनायां योनिमा लीपभायना लोमोन सेपितयः तुर्षमापनायां न मेतर्य पशमीभाषनायां दागोन पिपेयः फांदपिकाचशुभभायनापविशतिनिरूपणं तृतीयं संवरद्वारम् ६०-७० भदत्तादानपिरमणस्वरुपम् ६० पदव्ये एप्टे कया भावनया परिसतव्यं ४७-६० सद्ग्रहणे प्रक्षणविधिनिरूपण ४७-५२ वृतीयसंपराराधन पस्तुधिविजयासो नाग्नी प्रथमा भायना ६४ ४९-२ अनुमातसंस्तारकग्रहणात्मिका द्वितीया भावना ६४-६५ ४२-२ यस्तुराव्या-परिफर्मवर्जना तृतीया भावना ५०-२ अनुशातभक्तादि-भोजनलक्षणा चतुर्थी भापना ६६ साधर्मिकविनयकरणनाम्नी पश्चमी भावना ५२-२ चतुर्थ संवरद्वारम् ६७-७८ ब्राह्मचर्यस्वरूपम् ६७-७२ यथास्त्रीसंसक्ताश्रयवर्जनलक्षणा पथमा भावना ७३ नारीजनमध्ये कथा न कथयितव्या ५६ इति द्वितीया भावना खीयपनिरीक्षणवर्जननानी तृतीया भावना कामोदयकरवर्जनरुपा चतुर्थी भावना ७६ ७७-७८ ८२-२ व्याक० मन० ७९-८९ ९० प्रणीत भोजनवर्जनरुपा पञ्चमी भावना पञ्चमं संवरद्वारं परिग्रह विरमणे-- असंयम निरुपणाद्-अशातान्तानां वर्णन रागद्वेपनिरुपणं दण्डत्रयनिरुपण कपायनिरुपणं पंचक्रियानिरुपणं पड़ लेश्यानिरुपणं सप्तभयनिरूपणं अप्पमदस्थाननिरुपणं नवग्रह्मचर्यगुप्तिनिरूपणं दशश्रमणधर्मनिरुपणं श्रमणोपासकमतिमानिरुपणं ७९-२ ७९-२ ७९-२ ७९-२ ७९.-२ द्वादशभिक्षुप्रतिमानिरुपणं प्रयोदशक्रियास्थाननिरुपणं चतुर्दशभूतग्रामनिरुपणं पंचदश पारमाधार्मिकनिरुपणाद् आशातनान्तं निरूपणम् परिग्रहविरतौ संवरपादपः पंचमसंघरद्वारोपसंहरणं भिक्षा असन्निधिनिरुपणं परिग्रहविरतभिन्नविशेपणानि शब्दे निस्पृहतानाम्नी प्रथमा भावना चक्षुरिन्द्रियसंवरनाम्नी द्वितीया भावना घाणेन्द्रियसंवरनाम्नी तृतीया भावना जिवेन्द्रि रनाम्नी चतुर्थी भावना स्पर्शेन्द्रियसंवरनाम्नी पंचमी भावना पंचमसंबरदारसंक्षेपणं प्रश्नव्याकरणोपसंहारः प्रशस्तिश्च १०० ૧૦૨ २०३ १०६ ध १५ परमपूज्य-शान्तमूति धीमत् पन्यास दयाविमलगणिवरपादपोम्यो नमः तपागच्छाधिपति सूरिपुरन्दर श्रीमद् ज्ञानविमलसूरिवृत्त्युपेतम् प्रश्नव्याकरणसूत्रम् [द्वितीय विभाग संवरद्वारस्वरूपः] जंबू !-एचो संवरदाराई पंच चोच्छामि आणुपुन्चीए । जह भणियाणि भगवया सव्वदुहविमोक्खणट्टाए वन प्रथममहिंसा-जीवदयालक्षणं संवरद्वारमभिवक्तुकामस्तत्प्रतिपादनार्थ शिष्यमामध्येदमाह- जम्यूचि-हे जम्यू इतव आश्रवभणनाऽनन्तरं अवसरायातः संवर:-कर्मणामनुपादानं तस्स द्वाराणीव द्वाराणि-उपायाः संवरद्वाराणि पञ्च वक्ष्यामि-भणियामि, आनुपूर्व्या-प्राणातिपातविरमणादिक्रमेण यथा भणितानि भगवता महावीरेण श्रीवर्द्धमानस्वामिना, यथा. शन्दैनेति-अविपर्ययमात्रेणेति, अहिंसासाधयं न तु युगपत्सकलसंशयव्यवच्छेदसर्वखसभापानुगामिभाषादिभिरतिशपैः सर्वदुःखवि- मोक्षणार्थमिति १

ज्ञान वि०
मनव्या
धृत्ति
संवरद्वारे
अहिंसाया
नामानि
| ॥१॥ पढम होइ अहिंसा वितिय सच्चवयणति पन्नत्तं । दत्तमणुनाथ संवरो य यंभचेरमपरिग्गहत्तं च ॥२॥ तस्य
| पदम अहिंसा तसथावरसम्वभूयखेमकरी। तीसे सभावणाओ किंची वोच्छं गुणुदेसं ॥३॥ ताणि उ इमाणि
| सुब्बया महब्बयाई लोकहियसब्बयाई सुयसागरदेसियाई तवसंजममहब्वयाई सीलगुणवरव्ययाई सच्चजवन्व-
प्रथम संवरद्वारं भवति अहिंसा १, द्वितीय सत्यवचनमिति प्ररूपित भगवद्भिः २, तृतीयं अदत्तविपक्ष दचं-वितीर्ण अशनादि
अतुन्नातं खामिजीवतीर्थकरगुरुमिरिति भोग्यतया, संवरोचि दत्तानुज्ञातग्रहणलक्षणः संपरस्तृतीयः ३ चतुर्थ प्रहाचर्य शीलं ४ पञ्चम
| अपरिग्रहत्त्वं च संघरौ ॥२॥
तेषु पञ्चसु मध्ये प्रथम संचरद्वार अहिंसा-जीवधातवर्जन
'कल्लाणकोडिजणणी दुरंतदुरियारिवग्गनिट्ठवणी,, इक्कुचिय जीवदया भणिया वरनाणदंसीहिं ॥१॥ इति
कीदृशी ? प्रसस्थावराणां सर्वेषां भूतानां क्षेमकरणशीला कुशालकारिणीत्यर्थः, तस्या अहिंसायाः सभावनायास्तु-भावनापश्च.
कोपेताया अग्रे वक्ष्यमाणायाः किञ्चित् अल्पं अल्पं वक्ष्ये गुणोदेश-गुणोत्कीर्चन मिति ३
यानि संवरशब्देन अभिहितानि तानि नामानि है सुनत ! शोभनव्रत ! जम्बूनामन् ! महावि-करणत्रयेण यापजीवं सर्व-
विषयनिवृत्तिरूपत्वात् महांति अशुप्रतापेक्षया वा बृहन्ति प्रतानि-नियमा-यमा वा। लोके धृतिदानि जीवलोकचित्तवास्थ्यकारीणि,
१ एवं पञ्चानवस्याऽपि प्रतिपक्षिपञ्चसंपरान् उक्त्वा परं मुख्यसंवरस्य द्वारं सम्यक्त्वं मया न कथितं यात्रा सविस्तरेण सम्य-
पत्वरूपाधिकारोऽत्र वाच्यः
॥१॥

. याई नरगतिरियमणुपदेवगतिविवजकाई सव्वजिणसासणगाई कम्मरयविदारगाइं भवसयविणासणकाई वुह- सपविमोयणकाई सुहसयपवत्तणकाई कापुरिसदुरुत्तराई सप्पुरिसनिसेवियाई निव्वाणगमणसग्गप्पणायकाई संवरदाराई पंच कहियाणि उ भगवया ॥ तत्थ पढम अहिंसा जा सा सदेवमणुयासुरस्स लोगस्स भवति दीवो यपाथुतसागरे देशितानि यानि फधिवानि, तथा तपः-पूर्वकर्मनिर्भरणफलं संयमः-पृथिव्यादिसंरक्षणलक्षणोऽभिनवकर्मानुपादान- फलसादूपाणि प्रतानि तपःसंयमयोर्नास्ति व्यय:-क्षयो येषु तानि, तथा शीलं-भोगेषु संकल्पसमाधान, गुणाध विनयादयः तैर्वराणि प्रधानानि पानि तानि तानि शीलगुणवरव्रतानि, तथा सत्यं मृपावादवर्जनं आर्जवं-मायावर्जन तत्प्रधानानि ब्रतानि यानि तथा सत्यार्जवाव्ययानि चा, तथा नरकतिर्यगमनुजदेवगतीविवर्जयन्तीति-मोक्षप्रापणेन तासां गतीनां व्युच्छेदकानि यानि, सर्वजिनः शिष्यन्ते-प्रतिपाद्यन्ते यानि सर्वजिनशासनानि । कर्मरजो विदारयन्ति-स्फोटयन्ति तानि विदारकानि, भवशतविनाशकानि अतएव दुःखशवपिमोचकानि, सुखशतप्रवर्तकानि । पुनः कीदृशैः कापुरुषैः कातरैर्दुखेन उत्तीर्यन्ते निष्ठां नीयन्ते इति । सत्पुरुपैर निपेवितानि सत्पुरुषप्राप्ततीराणीत्यर्थः, इह च पुरुपग्रहे स्त्रीणामुपलक्षणं न तन्निपेधोज्न प्रतिपत्तव्यः, बहु वाच्यं तत्तु ग्रन्थान्तरादवसेयं । पुनः कीदृशानि निर्वाणगमनमार्ग इव माग्गों मोक्षमार्गों यानि तानि, तथा वर्गप्रयाणकानि-देहिनां खगें गमने प्रयाणकानि प्रापणकानि यानभूतानि या सर्वत्र कर्मधारयस्तानि, महावतसंजिवानां संवरद्वाराणि पश्च संख्याकानि । एतेषां एवन्माहात्म्यं कथं ? विशिष्टपणे- तृत्वात् वदाइ भगवता-श्रीमन्महावीरेण कथितानि अतो हैतोः स्वर्गापवर्गप्रदानीति भावः इति प्रथमसंपराध्ययनप्रस्तावना । तत्र तेषु पञ्चसु मध्ये प्रथम-आधं संवरद्वार अहिंसा, किंभूता? सदेवमनुजासुरलोकस्य भवति, द्वीपो यथा गाधोदधिमध्यममानां "

शान०वि०
संवरद्वारे
अहिंसाया
नामानि
प्रश्नाच्या
पृत्ति
॥२॥
ताणं सरणं गती पइट्ठा निव्वाणं १.निव्वुई २ समाही ३ सत्ती ४ कित्ती ५ कंती,६ रती य ७ विरती य ८ सुर्य-
गतित्ती ९-१० दया ११ विमुत्ती १२ खन्ती १३ सम्मत्ताराहणा १४ महंती १५ घोही १६ बुद्धी १७ धिती १८
| नानाश्वापदकदम्पककथितवेगमहोम्मिमालामध्यमानगात्राणां प्राणिनामाश्वासस्थान द्वीपो भवति, द्विधा गता आपो यस्मिन्निति
'दीपं तथा अहिंसा संसारोदधिमध्यगतानां व्यसनशतचापदपीडितानां संयोगवियोगवीचिविधूरगात्राणां त्राणं मवति, तस्याः संसा-
| रोत्तारहेतुत्वान् अहिंसा द्वीपतुल्या । यथा वा दीपः अन्धकारनिराकृतहासराणां हानोपादानविमूढमनसां तिमिरनिराकरणेन प्रवृति-
| कारणं भवति तथा अहिंसाऽपि शानावरणीयकर्मतिमिरनिराकरणविशुद्धियुद्धिप्रभापटलप्रवर्तनेन सकलशुभप्रवृत्तिहेतुत्वात् दीप व दीपः,
तथा त्राणं परेपामापनिवारणत्वात्, शरणं तथैव संपदा संपादनत्वात् , पुनः कीदृशी गम्यते आधीयते श्रेयोभिरिति गतिः,
प्रतिष्ठते आसते सर्वगुणाः सुखानि वा यस्यां सा प्रतिष्ठा, १ निर्वाण मोक्षन्तदेतत्त्वात् , २ निर्वृत्ति-वास्थ्यं दुनिरहितत्वात् , ३
| समाधिः समताशक्तिकारणात् , ४ शांतिः परद्रोहविरतिः, ५ कीर्तिर्यशः ख्यातिः, ६ कान्तिः शोभाकारणत्वात् , ७ रतिः-सर्वेषां
| रागहेतुत्वान्, ८ विरनिनिवृत्तिः, १-१० श्रुतं श्रुतज्ञानं तदेव अङ्गं कारणं यस्याः सा 'पढमं नाणं तओ दया' इति पाठात् , तृप्तिः
| संतोपस्तस्य हेतुत्वात् तृप्तिः, ११दया देहिरक्षा, १२तया विमुच्यते प्राणीसकलबधबन्धनेभ्यो यया सा विमुक्तिः, १३क्षान्तिः क्रोधनिग्रहः
वनिताऽहिंसाऽपि धान्तिः, १४ सम्पन्प्रतीतिरूपं सादादे सम्पर पोधो या तस्य आराधना-सेवना, १५ महंती सर्वधर्मानुष्ठानाना
मध्ये बृहती यदुक्तं-निदिट्ट एत्य वयं इक चिय जिणवरेहिं सव्वेहि,पाणाइवायवेरमणमवसेसा तस्स रक्खवा ॥१॥
१ घेट इति भाषा । २ निर्दिष्ट अत्र वनं एकमेव जिणवरी सवैः, प्राणातिपातविरमणमयशेषाणि तस्य रक्षार्थम् ॥१॥
.
-
"
॥२॥

--
समिदी १९ रिद्धि २० विद्धी २१ ठिती २२ पुट्ठी २३ नंदा २४ भद्दा २५ विसुद्धी २६ लद्धी २७ विसिदिट्टी २८
फरलाणं २९ मंगलं ३० पमोओ ३१ विभूती ३२ रक्खा ३३ सिद्धवासो ३४ अणासवो ३५ केवलीण ठाणं ३६ सिवं
१६ चोधिः-सर्वधर्मप्राप्तिः अहिंसा-अनुकम्पा सा च घोधिकारणं यथा-अणुकम्पऽकामणिजरयालतवे दाणविणयविन्भङ्गे
संजोगविप्पजोगे घसणूसवइडिसकारे ॥१॥ इत्यावश्यकनियुक्तिवचनात् १७ तथा पुद्धि-साफल्यकारणत्वात् तथा च-
पायत्तरिकलाकुसलापंडिय पुरिसा अपंडिया चेव । सव्वकलाणं पवरं जे धम्मकलं न याति ॥१॥ धर्मश्थाहि.
सेव, १८ पृतिचित्तदादर्थ, १९समृद्धिा-आनन्दहेतुत्वात्, २० ऋद्धिः लक्ष्मीहेतुत्वात्, २१वृद्धिः पुण्यप्रकृतिसम्पादनाव, २२स्थितिः
सायपर्यवसितमोक्षस्थितिहेतुत्वात् , २३ पुष्टिः पुण्योपचयकारणत्वात् , पुरा पापापचयः पुष्टिा, २४ नन्दयति स्वं परं वा इति नन्दा,
२५ भद्र-कल्याणं स्वस परेषां वा करोतीति भद्रा । २६ तथा विशुद्धिः-पापक्षयोपायत्वेन जीवनिर्मलतास्वरूपत्वाद, २७ लन्धिः
फेवलभानादिलन्धिनिमित्तत्त्वात् , २८ विशिष्टदृष्टिः-प्रधानदर्शनं स्याद्वादमित्यर्थः अन्यदर्शनस्याऽप्राधान्यमेव यदुक्तं---
कितीए पढियाए पयकोडीए पलालभूयाए, जत्थेत्तियं न नायं परस्स पीडा न कायव्वा ॥१॥
२९ कल्यं-आरोग्यं तत्मापकत्वात्कल्याणं, ३० मङ्गलं-दुरितोपशमकत्वाद, ३१ प्रमोदः हर्पोत्पादकत्वात् , ३२ विभूति:-सर्व-
१ अनुकम्पाऽकामनिर्जरायालतपोदानविनयविभङ्गाः । संयोगविप्रयोगों व्यसनोत्सवद्धिसत्काराः ॥१॥
२ वासप्ततिफलाकुशलाः, पण्डितपुरुषाः अपण्डिताथैव । सर्पफलानां प्रवरां, ये न धर्मकलां जानन्ति ॥१॥
३ किं तया पठितया पदफोट्या, पलालभूतया । ययत् न ज्ञातं परस्य पीडा न फर्त्तव्या ॥१॥

ज्ञान०वि० प्रश्न०व्या० संवरद्वारे अहिंसाया नामानि वृत्ति - | ३७ समिई ३८ सील ३९ संजमो ४० त्तिय सीलपरिघरो ४१ संवरो ४२ य गुती ४३ ववसाओ४४ उस्सओ ४५ जन्नो ४६ आयतणं ४७ जतण ४८ मप्पमातो ४९ अस्सासो ५० वीसासो ५१ अभओ५२ सव्वस्सवि अमाघाओ ५३ चोक्ख ५४ पवित्ता ५५ सूती ५६ पूया ५७ विमल ५८ पभासा ५९य निम्मलतर ६० त्ति एवमादीणि निय- | मदिसंपनिमित्तत्वात्, ३३ रक्षा-जीवरक्षणस्वभावत्वात् , ३४ सिद्ध्यावासो-मोक्षनिबन्धनत्वात् , ३५ अनाथवः कर्मबन्धनिरोधोपाय- स्वात् , ३६ केवलिनां स्थानं केवलिनामहिंसैव वत्र व्यवस्थितत्वात् योगनिरोधत्वाद् अन्यथा जावं च णं आरम्भे समारम्भे वहइ इत्यादिसूत्रविरोधापरित्यं बहुवक्तव्यमस्ति तत्तु नोक्तं । ३७ शिव-निरुपद्रवहेतुत्वात् , ३८ समितिः-सम्यक्प्रवृचिरूप- स्वात् अहिंसासमितिः, ३८ शील समाधानरूपत्वात् , ४० संयमः-हिंसोपरतत्वात् , ४१ शीलं सदाचारो ब्रह्म वा तस्य गृहं चारित्र- | स्थानं, ४२ संवरच प्रतीतानाश्रपत्वेन, ४३, गुप्तिः अशुभाना मनाप्रभृतीनां रोधः, ४४ विशिष्टः शोमनः अवसायः अपिकलभावसंप- | प्रत्वात् विशिष्टव्यापारः, ४५ उच्छ्यो-भावोन्नतित्वं, ४६ यज्ञो-भावदेवपूजा, ४७ आयतनं-गुणानां आश्रयः, ४८ यजनं-अभ- यस्य दानं यतनं वा-प्राणरक्षणप्रयत्ना, ४९ अप्रमादः प्रमादवर्जन, ५० आश्वासः परमप्तिहेतुत्वाद, ५१ विश्वासो-विसंभः प्राणिनां, ५२ अभयः सर्वप्राणिगणस्य निर्भयत्वं, ५३ अमाघातः अमारि: मरणरहितत्वात् , ५४ चोक्षा पवित्रा पवित्रादपि पवित्रा एकार्थ- शब्दद्वयोपादानात् अत्यर्थ पवित्रा अथवा ५५ पविवत् वज्रवत् त्रायते इति पवित्रा, ५६ शुचि:-भावशौचरूपा आह च- सत्यं शौचं तपः शौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । सर्वभूतदया शौचं, जलशौचं च पञ्चमं ॥१॥ इति ५७ पूता पवित्रा पूजा वा भावतो देवताया अर्चनं, ५८-५९ विमलः प्रभासा च तभिबन्धनबाद , ६० निर्मलं-कर्मरजोरहित " , " गगुणनिम्मिपाई पनयनामाणि होति अहिंसाए भगवतीए [सूत्रं २१] एसा सा भगवती अहिंसा जा सा भी- पाण विष मरणं, पानी पिय गमण, तिसिपाणं पिय सलिलं, खुहियाण पिच असणं,समुहमज्ञ व पोतवहणं, पाषाण पाममपर्य, दुइटिगाणं च मोसहियलं, अडवीमज्ञ विसत्यगमणं, रत्तो विसिट्टतरिका अहिंसा नामा युद्धपिजलमगणिमारपयणस्मइपीजहरितजलघरथलचरग्यहचरतसथावरसव्वभूयखेमकरी एसा भगवती श्री मोतीति निर्मलका एरमादीनि-एवं प्रकाराणि निजक-स्वफगुणनिष्पादितानि निम्मिवानि यथार्थानीत्यर्धः, पर्यायनामानि वमाथिवानि मान्ति इत्यर्थः । अहिंसाया दपायाः भगवत्याः इति पूजावचनं । पपा निनामार्घमाया भगवती पूज्या अहिंसा कीशी? या सा प्रसिद्धा भीतानां-मयप्राप्तानां देहिनां शरणमिर शरणं गवानं १ पधिपा विहापोगमनमिय गमनं पया पक्षिां गतौ गमनापारः आकाशं तद्वत् सकलधर्माणामाधारः अहिंसा २ पि- सानामिर गति-जतं प्राणरधगत्यात् ३ क्षुधितानामिय अशनं भोजनं 'अन्नं प्राणा घृतं तेज इति वचनाद ४ समुद्रमध्ये पति- गाना पया पोलपहनं प्रपदणाणं ५ चतुष्पदानां पया आश्रमपदं-गोष्ठतुल्य आश्रमे यथा चतुप्पदास्तिष्ठन्ति ६ दुःखस्थिताना च पया ओपति यापीरिताना औषधिस्तोपकारिणी ७ अटवीमध्ये यथा सार्थवाहागमनं यथा सार्थपविररण्ये मुखकत्तथा अहिंसा। एलेम्पोऽपि विशिष्टता प्रधानतरा अहिंसा शरणादीनामपि विशेषणेभ्यः या सा, पृथ्वी जल-अफाय: अनिस्तेजस्कायः मारुतो- पाया पनसतिः पीना शाल्यादयः हरिताहणादयः जलचरा मत्स्यादयः स्थलचराश्यतुप्पदाः खचरा:-पक्षिणः प्रसा द्वीन्द्रियादयः स्पाराः पृषिप्यादयः एतेषां सर्वभूतानां क्षेमकरी कल्याणकरी एषा भगवती पूज्या अहिंसा या सा प्रसिद्धा एतादशी अहिंसकै

मानवि०
संवरद्वारे
अहिंसाया
कारकाः
.
.
अहिंसा जा सा, अपरिमियनाणदसणधरेहिं सीलगुणविणयतवसंयमनायकेहिं तित्थंकरहिं सव्वजगजीववच्छ-
प्रश्नया लेहिं तिलोगमहिएहिं जिणचंदेहिं सुक्षु दिहा ओहिजिणेहिं विषणाया उज्जुमतीहिं विदिट्ठा विपुलमतीहिं वि.
पृत्ति
पुरुषः प्रकाशिता तामाऽऽह-
अपरिमितं-अमेयं ज्ञानदर्शनं येषां ते तैरित्यर्थः, शीलं-समाधानं तदेव गुणः शीलगुणः विनयतपःसंयमाय तान् नयंति पाप-
॥४॥ यन्ति ते नायकाः स्यख परेपो वा तैस्तीर्थकरैदशाङ्गसङ्घप्रथमगणधरद्भिः तिथं भंते 'तित्थं चाउवण्णे संघे पवयणे पढ-
मगणहरे वा' इति वचनात् , सर्वजगजीयवत्सलैः योगक्षेमकारित्वात् करुणोपेतः, त्रैलोक्यमहितैस्तीर्थकरनामकर्मणः जगत्पूज्पनी-
यत्वात् , जिनचन्द्रः-कारुण्यैकनिशाकरैः जिनाः-सामान्यकेवलिनस्तेषां मध्ये चन्द्रा इव चन्द्रास्तैः, सुप्ठु शोभनतया दृष्टा केवला.
लोकनतः स्वरूपतः कार्यतश्च । सम्यग् विनिश्चिता तत्र गुरूपदेशतः कर्मक्षयोपशमाद्वा बाह्याभ्यन्तरकारणतः, कार्यतस्तु अस्याः प्रम-
नयोगात माणव्यपरोपणकदपि हिंसा प्रतिपक्षरूपत्वात् यतनापरिणामेनेति प्रोक्ता। विशिष्टावधिज्ञानिनस्तैरपि विज्ञाता ज्ञपरिजया युद्धा
विशिष्टतया ज्ञाता, प्रत्याख्यानपरिक्षया च सेविता । प्राची सामान्यग्राहिणी मतियां ते ऋजुमतयस्तैः ऋजुमतिमिदृष्टा अवलोकिता,
विपुला-विशिष्टविशेषग्राहिणी मतियां ते विपुलमतयस्तैर्विपुलमतिभिर्विशेषतो दृष्टा, ऋजुमति-विपुलमतिदिभेदा अपि मनापर्यवज्ञा-
निनः कथ्यन्ते सार्द्धद्वयद्वीपस्थितसंक्षिपञ्चेन्द्रियमनोगतपर्यायवेदिनस्तैर्नितरां दृष्टा रिउसामण्णं तम्मत्तग्गाहिणी मइ रिउम-
ईय घडमित्तं चिन्तियमणेण नाणं पायं मणोदब्वे, विउला विसेसगाहिणी मई सा विउलमई नाणम्मि मयसो-
वणिय वा पाडलीपुत्तो घडोणेण ॥२॥ इति विशेषस्तु नन्दीतो ज्ञेयः । उत्पादाग्रायणीयादिचतुर्दशपूर्वधरैरधीवा थुतान्तर्गुम्फिता
+
॥४॥

दिता पुव्यपरेहिं अधीता पेउव्वीहिं पतिना, आभिणियोहियनाणीहि, सुयनाणीहिं, मणपजवनाणीहिं, केवल- नाणीहिं, आमोसहिपत्तेहिं, खेलोसहिपत्तेहिं, विप्पोसहिपत्तेहिं, जल्लोसहिपत्तेहि, सब्बोसहिंपत्तेहिं, सती पठिता, विकुर्विभिः-चैक्रियलब्धिधारिभिः मतीर्णा आजन्म पालिता इत्यर्थः, आभिनियोधिकज्ञानिभिः-मतिज्ञानवद्भिस्तथा श्रुतं- आचाराङ्गादि वदध्येभिः श्रुतज्ञानवद्भिः सम्यक्प्रकारेण यतनया अनुचीर्णा प्रतिक्षणं प्रतिक्षणं आचरिता, मनापर्यवज्ञानिभिः केवल. शानिमिः आमर्श:-स्पर्शः स एव औपधिरिव औषधिः सर्वरोगप्रहर्तृत्वात् तपश्चरणप्रभावात् लब्धिविशेषः तेन प्राप्ता येते तैः एवं सर्वत्र योज्यं । खेलो-निष्ठीपनं तदेव औपधिरिव औषधिस्ता प्राप्तास्तैः, विड्रपा-मूत्रपुरीपाययवा अथवा विडत्ति विट्-विष्टा पत्ति-प्रश्रवण मूत्र शेपं तथैव व्याख्यातं, जल्ल:-शरीरमलस्तदेव औपधिरूपं येषां ते वैः जल्लोपधिलब्धियद्भिः, सर्व एव आमादयः लब्धयः उक्ता अन्ये च बहवः अवयवाः सर्वा अपि औषधयस्ता लब्धाः-प्राप्तास्तैः, अथ प्रसङ्गादागतं लब्धिखरूपं किश्चिदवयोधाय लिख्यते सम्माणु सम्वविरई मेल-विप्पाऽमोस खेल सम्वोसही। विउव्वी आसीविस ओही रिउ विउले केवलयं ॥१॥ संभिन्न की जिंण हरि घले चारण (व्य गणहर पुलाए ।आहारग महुघयखीरआसयो कुँवुद्धीय ॥२॥ 'पीपमई पैंयाणुसारी अफैखीणग तेय सीयलेसाइ । इय सयल लधिसंखा भविषमणुयाणमिह सव्वा ॥३॥ इति पूर्वाचार्यप्रणीतगाधाप्रयं विचार्यते- ज्ञान वि० प्रश्नव्या० घृत्ति लन्धि- स्वरूपम् ॥५॥ . तत्र तत्वार्थश्रद्धानरूपं सम्यक्त्वं स्याद्वादमतमतीतिः अस्तित्वमस्तिभावेन, नास्तित्वं नास्तित्वभावनैः । उभयत्वमेक- भावेपु तत्वं स्याजिनभाषितं ।।शा इत्यादिरूपं तच्चानेकविध यदुक्तं- दंसणमिह सम्मत्तं तं पुण नन्नयतित्तत्थ] सहहणरूव । खइयं खोयसमियं तहोवसमियं च नायव्वं ॥१॥ धेयगमधि सासायण पञ्चविहं होद चत्तमिच्छत्तं । आयारमट्ठभेयं जो पालेइ तस्स सम्मत्तं ॥२॥ इत्यादिरूपा लन्धिा-प्रापणं सम्यक्त्वलब्धिः १, पृथक्त्वपल्योपमस्थितिमिथ्यात्वाऽपनयतो अणुव्रतप्रापणलन्धिः-अणुलब्धिः, समतम्मियलढे पलियपहुत्तेण सावओ होइ, चरणोवसमखयाण सागरसंखंतरा हुति ॥१॥ इति वचनात् , [प्रवचन वृत्ति पृ० ४०४] जीवो यदा ग्रन्यिमेदं कृत्वा सम्यक्त्वं प्राप्नोति ततो पश्चात् अन्त कोटिस्थितिमध्यात् पलियपहुत्तत्ति केऽपि द्विप- ल्पस्थितिन्युना क्रियते केऽपि त्रिपल्पोपमन्यूना क्रियते एवं यावत् नवपल्योपमपर्यन्तं तदा देशविरतस्य प्राप्तिः स्यात् । अणुशरीरकर- णशक्तिः यथा विशच्छिद्रमपि प्रविशति तत्र चक्रवर्तिभोगानपि भुङ्क्ते इत्यणुलन्धिः । तथा सर्वविरतिलब्धिः सप्तदशधा संयमप्रापणं पञ्चा. श्रवविरमण पश्चेन्द्रियनिग्रहः फपायजयः दण्डत्रयविरतिप्रापणं तदेव लन्धिः सर्वविरतिलब्धिः । मलो-जल्ल, कर्णवदननासिकानयन- जिह्वासमुद्भवः शरीरसंभवय यत्प्रभावात्सुगन्धीभवन् सर्वत्र मेपजीभावं भजते सा लब्धिर्मललब्धिः, लब्धिशब्दस प्रतिपदं पोजना कार्या, सा मलौषधिलब्धिः कसाऽपि शरीरकैदेशे समुत्पद्यते कस्खाऽपि सर्वस्मिन् शरीरे, यदि स तेन आत्मानं परं वा व्यपगवरोग- मिति बुझ्या लिम्पति तदा व्याधेरपगमो भवति ४॥ मूत्रस्य पुरीपस्य वाऽवयवो विगुड् इत्युच्यते । अन्ये तु विग्रुद् विष्टा प्रश्रवणं च ते द्वे औषधी यस्य विगुडोपधिरित्याहुः, अन्ये वित्ति विष्टा ताः संति पत्ति पासवणं 'एए अन्ने य यहु जेसि सुरहिणोऽय- , यवा रोगोवसमसमत्वाते हुन्ति ओपहीपत्ता'।५।आमर्शणं आमर्शः संस्पर्शनं स एव औपधिर्यस्या सा वाऽमर्शपधिः,करादि- संस्पर्शमात्रादेव व्याध्यपनयनसमर्थः लन्धिलब्धिमवोरमेदोपचारात् साधुरेवाऽमीपध्यादिलब्धिमानित्यर्थः, एवं शेपपदेविति भाव- नीयं, इदमत्र तात्पर्य तत्प्रभावात् स्वहस्तपादाद्यवयवपरामर्शमात्रेणैवाऽऽत्मनः परस्य वा सर्वेऽपि रोगाः प्रणश्यन्ति सा आमौंषधिलब्धिः ६ खेल-लेमा तल्लब्धिमन्तो यदि आत्मानं परं वा रोगापनयनयुद्ध्या परामृशन्ति तदा तद्रोगापगमः । तथा चोक्तं योगशाखान्तर- लोकवृत्तौ तथाहि- तथाहि योगमाहात्म्यात् योगिनां कफविन्दवः। सनत्कुमारादेरिव, जायन्ते सर्वच्छिदः ॥१॥ [मुद्रित योगशाखयुत्नौ पृ०१०-२] योगिनां योगमाहात्म्यात् पुरीपमपि कल्पते। रोगिणां रोगनाशाय, कुमुदामोदशालि च ॥२॥ मलः किल समानातो, द्विविधः सर्वदेहिनां । कर्णनेत्रादिजन्मैको द्वितीयस्तु वर्भवः॥३॥ योगिनां योगसंपत्ति-माहात्म्यात द्विविधोऽपि सः। कस्तूरिकापरिमलो रोगहा सर्वरोगिणां ॥४॥ रोगिणां कायसंस्पर्शः, सिञ्चन्निव सुधारसैः। क्षिणोति तत्क्षणं सर्वानामयानामयाविनाम् ॥५॥ सर्वे एवे पिण्मूत्रकेशनखादयोऽवयवाः सुरमयो व्याध्यपनयनत्वादौषधयो यस्याऽसौ सर्वोपधिः, अथवा सर्वा आमशॉपध्यादिकाः औपघयो यस्यैकस्याऽपि साधोः सा सौंपधिः तथा चो-

पानवि०
-
(०च्या
धृति
लन्धि-
स्वरूपम्
॥६॥
नखा केशा रदाश्चान्यदपि योगिशरीरजं । भजते भैपजीभावमिति सर्वोपधिः स्मृता ॥१॥
तथाहि-तीर्थनाथानां, योगभृचक्रवर्तिनां। देहास्थिसकलस्तोमः, सर्वः स्वर्गपु पूज्यते॥२॥ [मुद्रित योगशास-
वृत्ति पृ. १२-२]
किं च मेघमुक्तमपि वारि यदंगसंगमानदीवाप्पादिगतमपि सर्वरोगहरं भवति । तथा विपमूच्छिता अपि यदंगसङ्गे वातसह-
| देव निर्विपाः स्युः । विपसंपृक्तमप्यन्नं यन्मुखप्रविष्टं सदविपस्यात्-महाविपन्याधिवाधिता अपि जीवा यवचः-श्रवणमात्रादर्शनाच वीत-
विकाराः स्युः, एष सर्वोऽपि सर्वोपधिमकार: 61
वैक्रियलब्धिरनेकधा तद्यथा महत्त्वं-मेरोरपि महत्तरशरीरकरणसामर्थ्य १ लघुत्वं-वायोरपि लघुतरशरीराफरणं २ गुरुत्वं
बज्रादपि गुरुशरीरतया इन्द्रादिभिरपि प्रकृष्टबलैर्दुस्सहता वा ३ प्राप्ति मिस्थस्याकुल्यग्रेण मेरुपर्वताग्रप्रभाकरादिस्पर्शसामर्थ्य ४ अप्सु
| भूमाविव प्रविशतो गमनशक्तिः अस्थिय भूमावुन्माननिमअने वा प्राकाम्यं ५ इशित्वं त्रैलोक्यस्य प्रभुता तीर्थकरत्रिदशेश्वरसद्धि-
| विकुर्वणे ६ वशीत्वं-सर्वजीयवशीकरणलब्धिः ७ अप्रतिधातिवं अद्रिमध्येऽपि निशझं गमनशक्तिः ८ अन्तर्धानमदृश्यरूपता ९
कामरूपित्वं युगपदेव नानाप्रकाररूपविकुर्वणशक्तिः १० इत्यायनेकविध क्रियलब्ध्यन्तर्गता अणिमादयः सिद्धयो भवन्ति ॥९॥
आशी-दाढा तग्गय महाविसासीविसा दुधिह भेया। ते कम्मजाइभेएणणेगहा चविहविगप्पा॥१॥ आश्यो
बद्नमध्यगतदंष्ट्रास्तासु विष येपो ते 'आग्रीविपा, आशीरिष्टप्रशंसायां दंष्ट्राया पवनाशिनामित्पनेकार्थतिलकवचनात् ते द्विपा जातितः
कर्मतय, जातितो पृश्चिकमण्डकोरगमनुष्यजातयः, वृश्चिकविपं तूत्कर्पतोऽर्द्धभरतममाणशक्तिः परं न केनाऽपि कृता कुर्वाणा कारिप्य-
॥६॥

. . माणा घा, मण्डूकविष भरतक्षेत्राप्रमाणं, भुजङ्गविपं जम्बूद्वीपमान, मनुष्यविप समयक्षेत्रप्रमाणं शक्त्या इति जानितः, कर्मतश्च पञ्चे- न्द्रियतिर्यग्योनयो मनुष्या देवांश्वासहस्रारान्ता एते तपश्चरणानुष्ठानतोऽन्यतो वा गुणत आशीविपवृश्चिकादिसाध्या क्रियां कुर्वन्ति, शापनदानादिना पर व्यापादयन्ति, देवास्तु अपर्याप्तावस्थायां तच्छक्तिमन्तो ज्ञेयाः, ते हि पूर्वभवे समुपार्जिताशीविपलब्धयः सहस्रा. रान्तर्देवेष्वपि नवोत्पन्नाः प्राग्भवविकाशी विपलब्धिसंस्कारेण अपर्याप्तापस्थायामाशीविपलब्धयो व्यवहियन्ते, पर्याप्तावस्थायां संस्कार- स्यापि निवृत्तिरिति न तत् व्यपदेशभाजः, तेऽपि शापादिना पर व्यापादयन्ति परं न तल्लब्धिव्यपदेशो, भवप्रत्ययतस्तथारूपसामर्थ्य- स्य सर्वसाधारणस्वात, गुणप्रत्ययो हि सामथ्यविशेपो लब्धिरित्याशीविपलब्धिः १० ओहीत्ति अवशब्दो-अधः शब्दार्थः अवो-अधोऽधो विस्तृतं वस्तु धीयते परिच्छिद्यतेऽनेनेत्यवधिः, अथवा अवधिर्मर्यादा रूपिष्वेव द्रव्येषु परिच्छेदकतया प्रवृतिरूपा तदुपलक्षितं ज्ञानं तस्य लब्धिा-प्राप्तिरवधिलब्धिः। सा तु भवप्रत्ययगुणप्रत्ययिकमैदाभ्यां क्षयोपशमवैचित्र्यतः द्रव्यक्षेत्रकालभावभेदात्मनः असंख्येयभेदास्ते तु आवश्यकवृत्तिनन्दीत्यादिभ्योऽवसेयाः ११ । शाजुमतिरिति ज्वी-सामान्यग्राहिणी मतिघंटोऽनेन चिन्तित इंति, रिउ-सामपणं तम्मत्तग्गाहिणी रिउमइ मणोनाणं । पायं विशेपविमुह घडमित्तं चिन्तियं मुणइ १ ऋजुमतिः-प्रायो बाहुल्येन विशेषविमुख-देशकालाधनेकपर्यायपरित्यक्तं परेण चिन्तितं जानाति सा प्राजुमतिलब्धिः १२ विपुला-विशेषग्राहिणीमतिर्विपुलमतिः घटः सौवर्णः पाटलिपुत्रीयः । १ अदीद्वीपप्रमाणं । २ अष्टमदेवलोकं यावत् ।

ज्ञान०वि०
लब्धि-
स्वरूपम्
-
प्रश्नाच्या
वृत्ति
॥७॥
विउलं वत्थुविशेसेण नाणं तग्गाहिणीमइ विउला । चिन्तिपमणुसरह घडं पसंगओ पनवसपाहि ॥१॥
तथा विपुलं-विस्तीर्ण घटादेविशेषणानां देशकालादीनां मानसंख्यास्वरूपं तग्राहिणी मतिः, सा च परेण चिन्तितं घटं प्रसङ्गतः
पर्यायसहितैरुपेतं अनुसरति, सौवर्णो राजतो मृन्मयो वा अद्यतनो वा महान् अपपरकस्थित इत्याद्यपि प्रभूतविशेषविशिष्टघटं परेण
चिन्तितमवगच्छवीत्यर्थः, इदमत्र तात्पर्य मनापर्यायज्ञानं देषा ऋजुमतिविपुलमतिश्य, तत्तश्च सामान्यवस्तुमात्रचिन्तनप्रतिमना-
परिणामग्राहि किश्चिदविशुद्धतरमर्द्धतृतीयाकुलहीनमनुष्यक्षेत्रविषयं ज्ञानं जुमतिः, पर्यायशतोपेतघटादिवस्तुविशेषचिन्तनप्रवृत्तमनो-
द्रव्यग्राहि स्फुटतरं-सम्पूर्ण मनुष्यक्षेत्रविषयं ज्ञानं विपुलमतिः । तत्र ऋजुमतिज्ञानं याति विपुलमतिस्तु केवलज्ञानहेतुः । यद्यपि सामा-
न्यविशेषे सत्यपि मनापर्यवज्ञाने दर्शन न भवति,कथं सामान्यविशेषधर्मस्तु बोघे एव तिष्ठति, यथा मतिश्रुतयोः सामान्यविशेपे सत्यपि
दर्शनं नास्ति तद्वदवाऽपि ज्ञेयं, दर्शनस्यानाकाररूपत्वादत्र तु साकरोपयोगे सामान्यविशेषात्मको बोधधर्मो ज्ञेयः, न तु दर्शनावरण-
गतदर्शनधर्मो विवक्षितः, अन पहुवक्तव्यं तनु तश्यावृत्ति-विशेषावश्यकपतितो शेयमिति मनःपर्यवज्ञानलब्धिः १३ मि० तत्वार्थ-
वृत्ति पृ० १०१
केवलं असहायं-मत्यादिज्ञाननिरपेक्षत्वात् , निरावरणं, सम्पूर्ण केवललब्धिा प्रतीता १४ ।
संमिन्नति-या सर्वैरपि शरीरप्रदेश मृणोति स संभिन्मश्रोता एकेनापीन्द्रियेण समस्तापरेन्द्रियैर्गम्यान् विषयान् योऽवगच्छति
स इत्यर्थः । संभिन्नानि परस्परत एकरूपतामापनानि श्रोतांसि इन्द्रियाणि यस्येति वा-अथवा द्वादशयोजन विस्तृतस्य चक्रिसैन्यस्य
युगपत् ब्रुवाणस्य तत्र्यसंघातस्य वा समकालमास्फाल्यमानस्य सम्मिन्नान् उक्षणतो विधानतश्व परस्परविभिन्नान जननिवहसमुत्था-
-
॥७॥

न शंसकाहलमेरीमाणदशादितूर्यसमुद्भवशब्दान युगपदेव विशेषतया भृणोति स संमिन्नश्रोतोलन्धिमान् ॥१५॥
पकचतित्व १६ अर्हवं १७ पमुदेवत्वं १८ बलदेवत्वं १९ एता ऋद्धयस्तु ग्रन्थान्तरात्तवर्णनतः सुवोधाः।
अप अतिशयगमनागमनलन्धिसंपन्नाधारणास्ते च द्विधा जहाचारणा विद्याचारणाव, ये चारित्रपवित्राः पठाद्यनिदानतपोविशेष-
प्रमावतः रातातिशयगत्या गतिलब्धियुक्तास्ते चारणाः, ते प्रथमोत्पातेन प्रयोदर्श रुचकद्वीपं यान्ति, पलमानाः प्रथमोपातेन
नन्दीघरे, द्वितीयोत्पातेन यत गतास्तमाऽऽयान्ति, ऊर्ध्वमेकेनैव मेरुशिरसि पाण्डकवनं, वलन्तो एकेन नन्दनवन, द्वितीयेन खस्थानं,
तेपो चारिवाऽविशपप्रमावती लब्धिः स्याचतो लग्युपजीवनौत्सुक्यप्रभावतः प्रमादसम्मवाचारित्रातिशयनिवन्धना लन्धिरपि हीयते,
वतो वलन्तो द्वाभ्यामुत्साताभ्यां स्वस्थानं यान्तीति । ये पुनविद्यातिशयतः अष्टमादितपोविशेषतः समुत्पन्नगत्या गविलन्धयस्ते विद्या-
पारणा, वे चोत्पावेनैकेन मानुष्योचर, द्वितीयेन नन्दीश्वरं यान्ति, वलन्तः स्वस्थानं एकेनैव, ऊर्ध्वमेकेन नन्दनवन, द्वितीयेन पाण्डु-
फवन, पकेनैव संस्थान, ते रविकराऽऽतपं स्वीकृत्य गच्छन्ति । विद्याचारणा हि विद्यावशाद्भवन्ति, विद्या च-परिशील्यमाना
स्फुटा स्फटतरा जायते,दवः प्रविनिवर्धमानस्य शक्त्यतिशयसंभवादेकेनैवोत्पातेन खस्थानमायान्ति, एवं बहुधाजलचारणाः पत्रचारणा
पुप्पचारणा: अग्निशिखाचारणाः पर्वताग्रशृङ्गसंचारिण इत्यादिका लब्धिः चारणलब्धिः ॥२०॥
पूर्वाणि चतुर्दशापि उत्पादादयस्तदध्ययनगणनशक्तिः पूर्वलब्धिः ॥२१॥
गणधरलन्धिमणघरपदप्राप्तितअन्मन्येव सिद्धेस्तीर्थकरशासनाधिपपदप्रापका प्रसिद्धा ॥२२॥ पुलाकलब्धि: पुलाकचारित्रजन्या।
जिणशासणपडिणी, वृष्णिजा चकवहिसेणं पि। कुविओ मुणी महप्पा, पुलायलद्वीइ संपुण्णा ॥१॥॥२३॥

ज्ञान०वि० प्रश्न०च्या घृत्ति लब्धि- स्वरूपम् 11८11. ' आहारकशरीरकरणशक्ति:-कश्चिचतुर्दशपूर्वधरविन् यति ऋद्धिप्राप्तो निगोदादिसंशयविच्छेदनार्थ जिनदिफाति-दर्शनार्थ वा स्वशरीरं हस्तप्रमाणमनुत्तरसुरादप्यतिभासुर विकुळ विदेहस्थजिनपाव मोचयति तत् पृच्छनमात्रेणव अवस्थस्य संशयो याति यया सा- ऽऽहारकलब्धिः ॥२४॥ मधु-शर्करादिमधुरद्रव्यं सर्पि-घृत अविशायि गन्धादि घृतं, क्षीरं चक्रवतिगोसत्कं दुग्धं तेषां य आसवोऽतिशायी रसो अथवा आसवा धातुदीप्रकारिणो द्रव्या चा एतत्वादोपमानवचना भैरखाम्यादिवत् तद्वत् आश्रवति खादुत्वं यद्वचनं याति, अथवा यत् पात्र- | पतितं कदनमपि मधुधीरसस्पिवीर्यविपाक जायते, यद्वचनं शरीरादिदुःखसंतप्तानां मधुसप्पिक्षीरादिवत् सन्तर्पकं भवति ॥२५॥ कोयुद्धत्ति कोष्ठागारे स्थापितानामसंकीर्णधान्यबीजानामविनष्टानां भूयसां यथा कोष्ठेऽवस्थान तथा परोपदेशादयधारितानां श्रोता. नामर्थवीजानां भूयसामनुस्मरणमन्तरेणाऽविनष्टानामवस्थानात् कोष्ठयुद्धिः। यथा कोष्ठकनिक्षिप्तधान्यानि इव सुनिर्गला अविस्मृतत्वा- चिरस्थायिनः सूत्रार्था पां ते, कोष्ठे इव धान्य या युद्धिः आचार्यमुखाद्ययावन्निगती सूत्रार्थी वदवस्थानावेच धारयति न किमपि तयोः सत्रार्थयोः कालान्तरेऽपि गलति सा कोष्ठवुद्धिः २६ सुकृष्टे-वसुमतीक्षेत्रे क्षित्युदकाधनेककारणविशेषापेक्षं बीजमनुपहतं यथाऽनेकधीजकोटिप्रदं भवति तथैव ज्ञानावरणीयादिक्षयोप- शमातिशयलाभादेकार्थवीजश्रवणे सत्यनेकार्थवीजता प्रतिपचिरीजयुद्धिः २७ पदानुसारिणवेधा अनुश्रोतः पदानुसारिणः, प्रतिश्रोतः पदानुसारिणः, उभयपदानुसारिगः, तत्र आदिपदस्सार्थ अन्य च परत उपश्रुत्य आअन्त्यपदादर्थग्रन्थं विचारयितुं समर्थमतयोऽनुश्रोतःपदानुसारिणः । अन्त्यपदस्यार्थ ग्रन्यं च परत उपश्रुत्य ततः प्रातिकू. ॥८॥ + येनादिपदाद् अर्धग्रन्थविचारपटवः प्रतिश्रोतापदानुमारिलन्धयः । मध्यपदस्थार्थ ग्रन्थं च परकीयोपदेशादधिगमाद्यतावधि परिच्छि- अपदसमूहप्रतिनियतार्थग्रन्थोदघिसमुत्तारणसमर्थाऽसाधारणाविशयपटवः उभयपदानुसारिणः जो सुत्तपएण यहु, सुयमणुधावइ पयाणुसरि सो। जो अत्य पएणत्य, अणुसरइस बीयबुद्धीयओ॥१॥ इति वचनात् ॥२८॥ अक्सीण पामल्पमपि अन्नं पाने पतितं श्री गौतमादीनामिय बहुभ्यो दीयमानमपि नक्षीयते तेऽक्षीणमहानसाः,अक्षीणं येना- ऽऽनीतं भैधे पहुमिरपि-लवसंख्यैरप्यन्यैस्तृप्या भूले नक्षीयते यावदात्मना भुक्तं सत् निष्ठा यातीत्यक्षीणलब्धिः। कारणे कार्यो- पचाराद एवं अक्षीणमहानसलधिरपि। परिमितभूमिप्रदेशेऽपि अपरिमिते इव तत्राऽसंख्याता देवादयः परस्परं वाधारहिता वृद्धलघुत्वाद स्थितिविवेकभाजः तीर्थकरपर्पदीव मुखमासत इति अक्षीणमहालयलब्धिवन्तः यतः-- अपवीण महाणसीया भिक्खं जेणाणीयं पुणो तेण। परिभुत्तं चिय खन्नइ पहुएहिंवि न उण अन्नेहिं ॥१॥ अफपीणमहालया जे, परिभूमिसु अपरिमिउव्वजणा। चिट्ठइ अव्यावाहाऽसंखजणायुड्डलहुभावा ॥२॥२९ । तेयत्ति तेजोलेश्यालब्धिा-क्रोधाधिक्यात प्रतिपन्थिनं प्रति मुखेनाऽनेकयोजनप्रमाणक्षेत्राश्रित्तवस्तुदहनदक्षतीव्रतस्तेजोनिसर्जन शक्तिः, इह यः खलु शमी निरन्तरं पष्ठतपः करोति पारणकदिने च सनखकुल्मापमुष्टया जलचूलकेनैव एकेन आत्मानं यापयति तस्य पपमासान्ते तेजोलेपालब्धिरुपयत्ते ३० सीयत्ति-शीतलेश्यालन्धिा-अगण्यकारुण्यवशादनुग्राह्यं प्रति तेजोलेश्याप्रशमप्रत्यलशीतलतेजोविशेपविमोचनसामर्थ्य । पुरा किल थपते-गोशाला कूर्मग्रागे. करणारसिकान्तःकरणतया प्रभूत्यूकासंततितायिन वैशिकायनं बालतपस्विनं अहेतुकलहकलनतया अरे!

ज्ञान०वि०
प्रश्वव्या०
पृत्ति
लन्धि.
स्वरूपम्
युकाशय्यातरेत्यायनर्थोक्तिभिः कोपाटोपाध्मातमकरोत् तदाशिकायितपस्वी तस्य दुरात्मनो दाहाय यजदहनदेश्यां तेजोलेश्या
विससर्ज । तत्कालमैव भगवान् वर्धमानस्वामी प्रगुणितकरुणस्तत्प्राणत्राणाय प्रचुरपरितापोच्छेदछेको शीतलेश्याममुश्चदिति शीतले-
| इयालन्धिः ३१
आदिशब्दात् प्रज्ञादयोऽपि प्रकृष्टथुतावरणवीर्यान्तरापक्षपोपशमाविर्भूता अनधीतद्वादशांगचतुर्दशपूर्वाऽपि सन्तो यमर्थ
चतुर्दशपूर्वी निरूपयति तस्मिन् विचारलच्छेऽप्यर्थेऽतिनिपुणप्रज्ञाः प्रज्ञधिमन्तः श्रमणाः । एता लन्धयः स्युरिति संक्षेपार्थ: ।
अथ येषां येषां या या लब्धयो भवन्ति न भवन्ति पूर्वोक्तास्ताः प्रसंगतोऽवयोधाय लिख्यन्ते-संभिन्न १ चकि २ जिन ३ हरि
४ बल ५ चारण ६ पूव्य ७ गणहर ८ पुलाका ९ हार १० वर्ज शेषा एकविंशविलन्धयो भन्यस्त्रीणां सिद्धिगमनयोग्यानां भवन्ति ।
| तथा मल्लिखामिनः स्त्रीत्ये प्रभूतलन्धिसर्वत्वं तीर्थकरत्वं चाऽभूत् तदाश्चर्यभूतत्वान गण्यन्ते। अमन्यपुरुषाणामपि पोडश न भवन्ति
पञ्चदश भवन्ति १सम्म २अणु ३सव्व ४विपुल ५केवल ६ऋजुमई एते पद् , पूर्वोक्ता दश एवं पोडशवर्ज शेषाः पञ्चदश भवन्ति,
क्षीरावलन्धिरपि अभव्यस्त्रीणां न भवति, अभव्यत्रीणां चतुर्दशैव भवन्ति, यदुक्तं-
अरिहंतचकिकेशववलसंभिन्ने य चारणे पुव्या। गणहर-पुलाय आहारगं च, न हु भवियमहिलाणं ॥१॥
अभवियपुरिसाणं पुण दस पुचिलाउ केवलितं च । उज्जुमई विउलमई तेरस एयाओ नहु हुन्ति ॥२॥
अमविय महिलाणंपि हु एयाओ इंति भणियलद्धीओ। महुखीरासवलद्धीवि नेय सेसा विय अविरुद्धा ॥३॥
नारकाणां सम्यक्त्व १ अवधि २ वैक्रिय ३ लन्धयो भवन्ति । सुरासुराणां तु पूर्वोक्तास्तिस्रः तेजोलेश्या सहिताश्चतस्रः, गर्म-
॥९॥

, जसंनिपश्चेन्द्रियतिर्यक्षु देशविरतियुक्ताः पञ्च,युगलिपु सम्यक्त्वलब्धिका १ पर्याप्तस्थूलवायुपु वैक्रियलन्धिः १ स्थूलैकेन्द्रिय-अपर्याप्त पृषिव्यवनस्पत्यादिपु न कापि केचित् सास्वादनं च, अपर्याप्तविकलेषु न काऽपि लब्धिः, अपर्याप्तसुरनारकेषु सम्यक्त्वावधिलब्धी समुछिमेषु यक्ष्मेपु न काऽपि लब्धिः, रत्नप्रमादागतानां तद्भवसिद्धिकाणां सर्वा अपि ॥३३॥ शर्कराप्रभादागतानां चक्रिवर्ज त्रिंशत 1३० बालकागतानां हरिबलवर्ज २८ भवन्ति । पङ्कादागतानां जिनवर्ज २७ भवन्ति । धूमादागतानां ऋजुमति यावत् द्वादशलब्धयो भवन्ति उद्भवसिद्धरभावात्१२ । तमामभादागतानां सम्यक्त्वदेशविरती लब्धी द्वे सर्व विरतेरभावादन्यासां प्रतिषेधः २। तमातमाप्रमा- दागतानां सम्यक्त्वलम्धिरेका नाऽन्यासंभवन्ति । वैमानिकादागतानां तद्भवसिद्धिकानां सर्वा अपि ३१॥ भवनपति-व्यन्तर-वान- व्यन्तर-ज्योतिष्फेभ्य आगवानां जिन हरिवर्ज २९ भवन्ति। अनुचरविजयादिचतुर्यः समागतानां ३० । तिर्यग्भ्यो नरेभ्यश्च समागतानां तीर्धकचक्रिहरिवलवाः २७ भवन्ति । पृथव्यवनस्पतिभ्यः समागतानां अपि एता एव २७ लब्धयो भवन्ति। विक- लेन्द्रियेभ्य आगतानां विपुलमतिप्रभृतिलब्धिसमुदाय विहाय पूर्वोक्ताः सम्यक्त्वादिद्वादशलब्धयो । मिथुननिकरेभ्य आगतानां सुर- वचतसः सम्मोहि वेउन्धि सतेया ४ इत्युक्तेः । सूक्ष्माग्निपवनेभ्य आगतानां न काऽपि लब्धयो भवन्ति । सङ्ख्यातायुष्कमव्य. नराणां स्त्रीणां च प्रवरा शिवलब्धिर्भवति । एतावता विजयादिवत् युगलिनोऽपि मुक्तिगामिनः। सर्वार्थविमानात् च्युताः चतुःकृत्वः कृतोपशमणिकाहारकशरीराः जिनाः गणधराध नियमेनैव तदभवे सिद्विगामिनो भवन्ति । लोकान्तिकदेवाः सप्ताष्टमवैर्मुक्तिगामिन- स्वदधिपतयः एकापतारिणश्वेत्यादयो लब्धिविचाराः आवश्यकवृत्तिमवचनसारोद्धारवृत्ति-लब्धिस्तोत्रादिग्रन्थान्तरादवसेयाः ७ अब तु प्रापनकृते किश्चिल्लिखित इति । प्रवचनसारोद्धार-४२८-४३२]

ज्ञान वि०
त्रयोविंशति
रत्नपदवी
विचारः
प्रवक्त्या
सूचि
॥१०॥
प्रयोविंशतिरत्नपदयीविचारो यथा-
चक उत्त दंडो खग चम्मं च मणीय कागणीया एोंदी सत्त रयणाणि पणिदिरयणाणि तह सत्त॥१॥
सेणावई १गाहावई २ वड़ई ३इत्थी ४ पुरोहिओ५ तुरओ६ गयरयणं ७ चकीणं चउद्दस एयाणि रयणाणि ॥२॥
तित्थयर १५ चक्कि १६ हरि १७ बल १८ केवलनाणं १९ मुणीय २० समत्तं २१ मंडलिय २२ देशविरई २३
तिगवीसं रयणपदवीणं ॥३॥
रत्नप्रभाती निर्गता सप्तैकेन्द्रियवर्ज पोडशपदव्यः[वी] प्राप्नुवन्ति । शर्करात आगता चक्रिपंदवर्ज पञ्चदश, चालुकावः
आगताः हरिबलवर्ज त्रयोदश, पातः आगताः चक्रिहरिवलतीर्थव द्वादश, धूमातः आगताः केवलिवज ११, तमःप्रभातः आगताः
साधुपदवीवजं दश १०, तमस्तमःप्रभातः आगताः गजतुरगसम्यक्त्वरत्नपदवीत्रयं लभन्ते । भवनव्यन्तरज्योतिष्कदेवेभ्यो निर्गता-
|स्तीर्थकरवासुदेवपदवी पर्ज २१ पदवी प्राप्नुवन्ति । पृथिव्यवनस्पतिभ्य उद्घृत्तानां तीर्थकचक्रिवलवासुदेवपदचीवर्स १९ पदव्यो-
भवन्ति, तेजोवायुम्यो निर्गता सप्तैकेन्द्रियरत्नं गजाश्वरत्नानि चाऽनुभवन्ति । विकलेन्द्रियेभ्य उद्धृत्ताः तीर्थचक्रिवलहरिकेवलिबजे
| 'अष्टादशपदवी प्राप्नुवन्ति, मनुष्येभ्यो तिर्यग्भ्यो निर्गताः तीर्थकृचक्रिहस्सिलवर्ज एकोनविंशतिपदवीः १९ प्राप्नुवन्ति, सौधर्म-
शानेम्य आगतात्रयोविंशतिपदवीरनुभवन्ति, सनत्कुमारादिदशदेवलोकेन्य आगतानां सप्तैकेन्द्रियरत्नपदवीपर्ज पोडश भवन्ति, नव-
| वेयकेभ्य आगतानां समैकेन्द्रियरत्नपदवी-अश्वगजरत्नपदवीवर्ज चतुर्दश मवन्ति १४, अनुत्तरविमानेम्प आगताः तीर्थकच्चक्रि-
॥१०॥

वीजवुद्धीहिं, कुद्वयुद्धीहिं; पदाणुसारीहि संभिन्नसोतेहिं, सुर्यधरेहिं, मणवलिएहिं, वयवलिएहिं, काययलिएहिं नाणयलिएहि, दंसंणवलिएहि, चरित्तवलिएहि, खीरासवेहिं, मधुआसवेहिं, सप्पियासहि, अक्खीणमहाणसि- पहिं चारणेहि, विजाहरेहिं, चउत्थभत्तिएहिं, एवं जाव छम्मासभत्तिएहिं, उक्खित्तचरएहि,निक्खित्तचरहिं, अंतचरपहि, पंतचरएहिं, लूहचरएहि, अनइलापहि, समुदाणचरएहिं, मोणचरएहिं, संसट्टकप्पिएहिं, तजाय- पलकेवलज्ञानमुनिसम्यक्त्वमांडलिकदेशविरतिप्रभृत्यष्टौ पदवी प्राप्नुवन्ति, शेपाः पञ्चदश न । प्रसङ्गादिति अपि लिखितम् । द्रव्य- लोकप्रकाश पृष्ठ- अथ प्रस्तुतं वन्म:-बीजकल्पा बुदियेंपो ते तैः, कोष्ठ इव बुद्धिर्येषां ते तैः, पदं प्रति अनुसरणशीला घुद्धियेगा ते ते, संभिन्नानि एकार्थग्राहीणि इन्द्रियाणि येषां ते तैः संभिन्नश्रोतोभिः,श्रुतधरैः, मनसा पलं येषां ते दुईऽपि कार्य अक्षोभ्यचेतसः, पण्मासं यावर प्रत्युत्तरदाने प्रतिक्षोभ्यवचसा दुर्गादिन प्रति निराकरणशीला पचनपलिनस्तैः, काया शरीरं परीपहादिभ्यः कम्प्रवलं येषां ते कापपलिनस्तैः, ज्ञानेन मत्यादिना पलिनस्तैः दर्शनं निश्शंकितादितच्चश्रद्धानरूपं तेन चलवन्तस्तैः, चरित-पदकायसंयमः कर्मणां चयस्य रिक्तीकरणं चारित्रं तेन बलवद्भिः, क्षीराश्रयलब्धिमद्भिः, मध्चाश्रवलब्धिमद्भिः, सपिः घृतं तदास्वादवाक्यलब्धिमद्भिः, अ. क्षीणा महानसिकलब्धिमद्भिः एतेषां सर्वेपामपि पदानां अर्थो व्याख्यातोऽस्ति, अद्गुहादिप्रश्नोतरविद्यामद्भिः, चतुर्थभक्तिमद्भिः- एकान्तरोपकासकारिकै चतुर्थभक्तशब्दा-एकक्षपणपर्यायः, एवं पष्ठभक्तकै-उपवासद्वयकारकैः, अष्टममक्तकैः-उपवासत्रयकारकैः, एवं, दसम-दुवालस-चोदस-सोलस-मास-दोमास-तिमास-चउमास-पश्चमात-पण्मासा एतनपाकारकैः, एवं तपोधिकारान् द्रष्टव्यम् । . . ,

ज्ञान०वि०
संस्कृष्टादि
विचार:
.
निच्या
इति
-
॥११॥
,
उत्क्षिप्त पाकमाजनात् उद्धृतं तं चरन्ति-गवेषयन्ति ते उरिक्षप्तचरास्ता, निक्षिप्त पाकस्पालीस्थित गवेषयन्ति ते निक्षिप्तचरास्तैः, अंत
| बल्लचणकादिधान्यं चरन्ति ते तैः, तदेव धान्यं भुक्तावशेष प्रान्तं तत् गवेषयन्ति ते अन्तप्रान्तचरास्तैः, रूक्षं निःस्नेहं विदलादि तं
चरन्ति ते वैः, एतादृशं भैक्ष्यप्राप्ताऽप्राप्तौ सत्यां ग्लान-दन्यं न धारयन्ति ताटशैचिंयम, समुदान बहुगृहं समुदापिभक्षं तं चरन्ति
ते नै, मौन-पार्थना-चाटुवाक्यसंयमा चरन्ति ते तैः, निर्दोषानमोजिभिरित्यर्थः, संसृष्टकल्पिकैः-संसृष्टो-अभिग्रहरूपकल्प
आचारो येषां ते संसृष्टकल्पिकास्तैः, संसृष्टादिविचारस्त्वेवं-
संसट्टेपरहत्थो मत्तोविय दब्ब सावसेसेहिं । एएसु अडभंगा नियमा गहणेसु ओजेसु ॥१॥
दातुः सम्बन्धी हस्तः संसृष्टोऽसंसृष्टो वा भवति येन च कृत्वा भिक्षां ददाति, तदपि पात्रं संसृष्टमसंसृष्टं वा, द्रव्यं सावशेष इवरद्वा
निरवशेष एतेषां च त्रयाणां पदानां संसृष्टहस्त-संसृष्टपात्र-सावशेषद्रव्यरूपाणां परस्परसंयोगतोऽष्टौ भङ्गा भवन्ति, ते चाज्मी-संसृष्टो
हस्तः संसृष्टं एवं सावशेष द्रव्यं १ संसृष्टो हस्तः संसृष्टं पात्रं निरवशेष द्रव्यं २ संसृष्टो हस्तः असंसृष्टं पात्रं सावशेष द्रव्यं ३ संसृष्टो
| हस्त: असंसृष्टं पात्रं निखशेष द्रव्यं ४ असंसृष्टो हस्तः संसृष्टपात्रं सावशेष द्रव्यं ५ असंसृष्टो हस्तः संसृष्टं पात्रं निरवशेपं द्रव्यं ६ असं.
सृष्टो हस्त: असंसृष्टं पात्रं सावशेष द्रव्यं ७ असंसृष्टो हस्तः असंसृष्टं पात्रं निरवशेषं द्रव्य ८ एतेषु चाऽष्टभङ्गेषु मध्ये ओजस्म-विषमेषु
प्रथमतृतीयपञ्चमसप्तमेषु ग्रहणमोदनस्य कर्तव्यम् , न च समेपु-द्वितीय-चतुर्थ-पष्ठाष्टमेषु मङ्गेषु । इयं चान भावना-इह हस्तो पात्रं
चा द्वे वा खयोगेन संसृष्टे चा भवतः, असंसृष्टे तद्वशेन पश्चात्कर्म सम्भवति किं तर्हि द्रव्यावशेषे न, क्याहि-यत्र द्रव्यं सावशेषं तत्रैव
| साध्वर्थ खरंटिते अपि न दात्री प्रक्षालयति, भूपोऽपि परिवेषणसम्भवान् यत्र तु निरवशेष-द्रव्यं तत्र साधूनां दानानन्तरं नियमतः
॥११॥

. . . . संसट्ठकप्पिएहि, उवनिहिएहि, सुद्धसणिएहि, संखादत्तिएहि, दिट्ठलाभिएहि, अदिट्टलाभिएहिं, पुट्ठलाभिएहि, आपंपिलिएहिं, पुरिमडिएहिं, एक्कासणिएहिं, निम्वितिएहिं, भिन्नपिंडवाइएहिं, परिमियपिंडवाइएहि, अंताहा- रेहि, पंताहारेहिं, अरसाहारेहिं, विरसाहारेहिं, लूहाहारेहिं, तुच्छाहारेहि, अंतजीविहि, पंतजीविहिं, लूहजी- स्तद् द्रव्यापारस्थाल्या हस्तं पात्रं वा प्रक्षालयति, नतो द्वितीयादिपु भङ्गेषु द्रव्ये निरवशेषे पश्चात्कर्म सम्भवात् न कल्पते विसमेषु पश्चात्कर्म असम्भवात् कल्पते इति संसृष्टादिविचारः पिण्डनियुक्त्यादिभ्योऽवसेयः।' तजातं तत्प्रकारेण जातं यरद्रव्यं तदेव कल्पो येषां ते तैः, उपनिधिप्रत्यासत्रं चरन्ति ते उपनिधिकास्तः, शुद्धपणिकैः शक्ति- तादिदोपपरिहारिणस्तैः, संख्याप्रधानाभिः पञ्चमादिपरिमाणवतीभिर्दत्तिभिः सद्भक्तादिपात्रप्राप्तलक्षणाभिश्वरन्ति ये ते संख्यादत्ति- कास्तै, दचिलक्षणं चैतत् । दत्तिओ जत्तिए वारे खिवह य होति तत्तिया अवोच्छिन्ननिवाया दत्तीओ होंति दवम्मि ॥१॥ दृश्यमानस्थानादानीतं गृहन्ति ते दृष्टिलामिकास्तैः, एवं अदृष्टपूर्वेण दीयमानं गृहन्ति ते तैः, इदं साधूनां कल्पते इत्येवं प्रश्न- पूर्वक ये लन्धं गृहन्ति ते पृष्टलाभिकास्तर, सर्वदा आचाम्लमेव येप ते तैः, पुरिमार्द्ध पारणकेऽपि येषां ते तैः, एतावता पठाष्टमादि पारणेष्वपि तत्तपोवद्भिः, एकाशनकं पारणेऽपि येषां तै, निर्वत्तिकतपोवद्भिा, भिन्नपिंडेति भिन्नः-स्फुटितः पिण्डस्य-ओदनस्प पात:-पात्रपतनं येषां ते भिन्नपिण्डपातिाकास्तैः, एतावता दायकइस्तेभ्यः स्वयमेव निसृष्टपिण्डग्राहि अभिग्रहपद्रिा, परिमितग्रहावे- १ पिण्डनियुक्ति पृष्ठ २५-२ यतिदिनचर्या पृष्ठ १७८-२ " " - "

द्वादश भिक्षु
प्रतिमा
स्वरूपम्
ज्ञान०वि०
विहि, तुच्छजीविहि, उचसंतजीगिहि, पसंतजीविहि, विवित्तजीविहि,अवीरमहुसप्पिएहि, अमजमंसासिएहि,
प्रश्नच्या शादिना वृचिसंक्षेपेण रिंडपाविकास्तैः, अन्त-धान्याऽपेक्षया वल्लकवणकादि प्रान्तं पूर्वकरणात् गवेषगायाः पूर्व अथवा प्रान्तं तदेव
पृत्ति शीतपर्युपितं तदेव आहारो येषां ते तैः, अरसं हिंग्यादिभिरसंस्कृतं, विरसं-पुराणत्वात् , गतरसं-निःसार, रूक्ष-स्निग्धविकृत्यादिभिः
रहितं, तुच्छं तदपि अल्पत्वात् वदाहारादिभिः, अन्तं पूर्वोक्तं तेन जीवितं एपां ते तैः । सदाकालं यावत् इति सर्वत्र योज्यं । अन्त-
॥१२॥ जीविभिः प्रान्तजीविभिः रूपजीविभिः, तुच्छबीविभिः, प्राप्ताऽप्राप्तौ सत्यां उपशान्ततपा जीवित्तं येषां ते ते, उपशान्तत्वं पहिया
वदनचक्षुपादिना, मशान्तत्व-अन्तर्वृत्या क्रोधादुपशमेन बा, विविक्तैर्दोपविकलैर्भक्तादिभिर्जिनितं येषां ते तैः, अक्षीरमधुसस्पिष्कर
एतावता दुग्धमधुरक्षौद्रनवर्जकैः, नास्ति मद्यमांसादीनामशन पां ते तैः, स्थानं त्वग्वर्तनस्थानाभिग्रहविशेषेण आददते इति स्थाना-
दिकास्तैः अथवा स्थान-निषीदनं तिष्ठन्ति ते तैः, प्रतिमया स्थायिभिः-कायोत्सर्गेण भिक्षुपतिमया मासिक्यादिक्या तिष्ठन्ति ये
ते तथा तैः, अथ प्रसङ्गादागतं प्रतिमाखरूपं लिख्यते-
(मासाइ सत्तं वा पढमा ८विय९तइय १० सत्तराइ दिणा। अहोराई ११ एगराई १२ भिक्खुपडिमाण धारसगं ।।
मासादयो-मासप्रभृतयः सप्तांता सप्तमासावसानाः एकैकमाप्तवृद्ध्या सप्त प्रतिमा भवन्ति, वत्र एको मासः परिमाणमस्याः सा
एकमांसिकी १, एवं द्विमासिकी द्वितीया २, त्रिमासिकी.तृतीया ३, यावत् सप्तमासिकी सप्तमी ७, पढमति सप्तानां प्रतिमानां उपरि
प्रतिमा प्रथमा द्वितीया तृतीया एतात्र तिस्रोऽपि क्रमेण अष्टमी नवमी दशमी समरात्रिदिवा परिमाणा, अहोराइत्ति अहोरात्रं परिमाणं
१ पञ्चाशकप्रन्यान्तरान्तिमपञ्चाशक भिक्षुपतिमाधिकारः
॥१२॥

अस्या सा अहोरात्रिकी एकादशी प्रतिमा ११, एगराइत्ति-एकारात्रिर्यस्यां सा एकरात्रिकी द्वादशी प्रतिमा इत्येवं भिक्षुप्रतिमाणा- साधुप्रतिवाविशेषाणां द्वादशक भवन्ति । अर्थताः कीदृशो मुनिः प्रतिपद्यते । तत्र संहननं पचऋपभनागचादेराद्यत्रयान्यतरदेतद्युक्तो छत्पन्तपरीपहसहनसामर्थ्यवान् , धृति- वित्तवास्थ्य तयुक्तः, महासत्वः सात्विक अनुकूलमतिकूलोपसर्गेप्यपि वर्ष विपाद न कृतवान, सद्भावनाभावितान्तःकरणः प्रतिमानु- टानेन भावितात्मा तुलनापञ्चकेनापि धृतिमान् यदुक्तं- तवेण सत्तेण सुत्तेण एगत्तेण वयेण य । तुलना पंचहा वुत्ता पडिम पडिवजओ॥१॥ मावितात्मा कथं ? सम्यग्-यथागतं तथा गुरुणाऽऽचार्येण वाऽनुज्ञातः यदागुरुरेव प्रतिपत्ता सदा व्यवस्थापिताऽऽचार्येण गच्छेन वाऽनुमनस्तदा गच्छ एव साधुसमुदायमध्येऽवतिष्ठन् निर्मात आहारादिविपये प्रतिमाकल्पपरिकर्मणि परिनिष्ठितः, परिकर्मपरिमाणं तु मासिक्यादिपु सप्तसु या यत्परिमाणा प्रतिमास्तस्यास्तत्परिमाणमेव परिकर्म, तथा वर्षासु नैताः प्रतिपद्यन्ते, न च परिकर्म करोति, यथा-आधद्वयमेकच वर्षे, तृतीयचतुथ्यौं चैकैकस्मिन् वर्षे, अन्यासां विसृणां एकत्र एकत्र वर्षे प्रतिकर्म, अन्यत्र च प्रतिपत्तिस्त- देचं नघभिर्वराधाः सप्त समाप्यन्त इति। श्रुतमपि उत्कृष्टतस्तु दश असपूर्णानि पूर्वाणि-किश्चिदूनानि । सम्पूर्णदशपूर्वधरो हि अमो. घवचनत्वात् धर्मदेशनया भन्योपकारित्वेन तीर्थवृद्धिकारित्वात् प्रतिमादिकल्पं न प्रतिपद्यते। जघन्यतस्तु नवमपूर्वस्य प्रत्याख्याननाम- कस्य तृतीयवस्त्वाचाराख्यं तद्भागविशेष यावदित्यर्थः । स्याजघन्योऽल्पीयानपि श्रुताधिगमः श्रुतज्ञानं खत्रतोऽर्थतश्च । एतत् श्रुतवि- रहिवो हि निरतिशयज्ञानरहितत्वात् कालादीन् न जानाति, तीर्थकरादीनां वचनानुसारतः स्कन्धकादिवत् करोत्यल्पश्रुतवानपीत्यर्थः । ,

ज्ञान०वि०
द्वादश भिक्षु
प्रतिमा
स्वरूपम्
प्रश्नच्या
वृति
॥१३॥
तथा त्यक्तदेहममत्वः, दिन्यमानुपरधोपद्रवसहिष्णुर्जिनकल्पिकवत् परीपहसहः, एषणापिण्डग्रहणेऽप्येतादृशः-
१संसट्टमसंसट्टा २उद्धड ३तह अप्पलेवडा चेव४ । उग्गहिया५ पग्गहिया उजियधम्मा य७ सत्तमिया ॥१॥
वयाख्यानं यथा-
पिण्ड:-समयमाझ्या मक्तं तस्य एपणा-ग्रहणप्रकारः असंसृष्टा हस्तपात्राभ्यां १ संसृष्टा इस्तपादाभ्यां २ पूर्वोक्ताष्टमेदं उद्धृतं
पाकस्थानात् स्याल्यादौ स्खयोगेन भोजनजावमुदत्तं ततोऽसंसृष्टे हस्ते संसृष्टे पाने संसृष्टे हस्ते असंसृष्टे पात्रे गृह्णतः ३ अल्पसब्दोभा-
ववाचकः निर्लेप वल्लकचणकादि गृह्णतः ४ अवगृहीता भोजनकाले भोक्तुकामस्य शरावादिपूपहृतमेव भोजनजातं यत् तद्गृह्णतः ५
प्रगृहीता भोजनवेलायां भोक्तुकामाय दातमुद्यतेन करादिना मगृहीतं पदोजनजातं भोक्ता भोक्तुं वा स्वहस्तादिना तद्गृह्णतः ६ उ
झयत्ति-कायपरित्यागाईमन्नं अन्यच द्विपदादयोऽपि नेच्छन्ति तदहं त्यक्तं वा गृहतः, तासां सप्तानामेपणानां मध्ये आधयोईयोरग्रहणं
पञ्चसु ग्रहण। तन्मध्ये पुनरपि विवक्षितदिवसे अन्त्यानां पञ्चानां द्वयोरभिग्रहः एका मक्ते एका च पानके इति आहारनिर्मितिः। उप-
धिरपि एपणाद्वपलब्धा एव वस्त्रेपणा चतुष्टयमस्ति तदिदं कासिकाादिष्टमेव च वस्त्रं ग्रहीष्यामि १ प्रेक्षितमेव ग्रहीष्यामि २ परिभक्त
मायमेवोत्तरीयादि ३ तदपि उज्झितर्मिकमेवेति ४
अथ एवं कृतपरिका गच्छाद्विनिष्कम्प तत्र यद्याचार्यादि प्रतिपत्ता तदाऽल्पकालिकं सावन्तरे खपदनिक्षेपं करखा शुमेषु
द्रव्येषु शरीरं वासित्वा शरत्काले सकलसाचामन्त्रणं क्षामणपूर्वकं निःशल्यो निष्कपायो मासिकी प्रतिमा प्रतिपद्यते। दचिरविच्छि.
मदानरूपा एकैवानस्याऽज्ञातोञ्छरूपस्य उवुत्तादतरेपणा पञ्चकगृहीतस्याऽलेपकारिणः कृपणादिभिरजिघृक्षितस्य एकस्वामीसत्कस्यैव
॥१३॥

गुर्विणी पालवत्सा पीयमानस्तनीभिः देहलीकस्यान्तः पदमेकं विनस्याऽपरं बहिर्व्यवस्थाप्य दीयमानस्य तथा पानकाहारस्यकैय तत्र मासिकपा मतिमायां दतिर्मवेदिति ॥ यथा जलस्थलदुर्गादौ स्थितस्य यत्रास्तं याति सूर्यस्तत् स्थानात् जलाऽग्न्यादेः पदमात्रमपि क्षेत्र न गच्छति आदित्योदयं यावत् । तथा ज्ञातो-ज्ञातः प्रतिमापन्नोऽयं तत्र ग्रामादौ अहोरात्रमेवाऽवतिष्ठति नवधिकामिति, अज्ञा- ततया तु द्विरात्रमयतिष्ठति न परतः । तथा दुष्टव्याघ्रहस्तिसिंहश्वापदादीनां मयं न, मरणभीत्या पदमात्रमपि न गच्छति दूरतः, एवमादिनियमसेवी छायात उष्णे उष्णतः छायायां गमनमपि न कुर्वति शरीरहेतोः। ग्रामानुग्रामं विचरति यावदखण्डो मासः, अन्पेऽपि वहयो नियमा प्रतिपत्तव्याः, तथा चरणप्रविष्टदारुकण्टकशर्करादिकं न स्फेटयति, अक्षिगतं रेणु तृणमलादिकं वा नापनयति, तथा संस्तारकोपाश्रयादीनां याचनार्थ संशयितसूत्राओं या गृहादेर्वा प्रश्नार्थ तृणकाष्ठादीनामनुज्ञापनार्थ प्रश्नितसूत्रादीनां वा कृते द्विारे वा वक्ति न तु वारंवार भापान्तरं वक्ति प्रतिमा यावत् । तथा आगन्तुकागारविवृतागारवृक्षमूल एव वसतित्रयं वसति नत्वन्यत्र । तत्र यत्र कार्पटिकादय आगत्य वसन्ति तदागन्तुकागारं, यदधः कुड्याभावादुपरि चाच्छादनाभावात् विवृतगृहं, अनाच्छादितं वृक्षमूलं करीरादितरुमूलं साधुवर्जनीयदोपरहितं तथा चाऽह्नि प्रदीप्ताग्निभयादुपाश्रयान्न निर्गच्छति। अय कदाचित् कोऽपि चाहादौ गृहीत्वा कर्पति तदा निर्यात्येव करचरणमुखादिकं प्राशुकजलेन नांग प्रक्षालयति तदन्यसाधयो हि पुष्टालम्बने पादादि प्रक्षालयन्ति अपि । इत्यायनेकाभिग्रहक्रियायुक्तो मासपूरणानन्तरं साधुसमुदाय उपैति विभूत्या, कथं ? गच्छ स्थानासन्नग्रामे आगत्य आचार्यास्तु वत्मवृत्तिमन्विच्छन्ति ततो नृपादीनां निवेदनं यथा प्रतिपालितपथमाप्रतिमारूपमहातपाः साधुर- प्रागवः ववो नृपादिलोकै श्रमणसंघेन चाऽभिनन्यमानस्तत्र प्रवेश कुरुते । ततो बहुभानार्थ तदन्येषां च श्रद्धावृद्ध्यर्थ प्रवचनप्रभावनार्थ

शान० वि०
द्वादश भिक्षु
प्रविमा
प्रश्वव्या०
स्वरूपम्
.
॥१४॥
च एवं प्रथमा उक्का।
शेषाः एवमलेनैव क्रमेण द्विमासिकी त्रिमासिकी पावत् समप्रतिमाः सप्तमासिक्या नयर केवल प्रथमायाः सकाशादियान विशेपो
यसो दत्त्यस्तासु बर्दन्ते, तत्र द्वैमासिकपा मक्तपानस्य प्रत्येक दत्तिद्वयं, त्रिमासिक्या मक्तपानस्य प्रत्येकं दत्तित्रयं यावत् सप्तमा-
सिक्यों भक्तस्य पानस्य च सप्तदत्य इति ।
अथाष्टमी सप्तम्या अनन्तरं अष्टमी प्रथमसप्तरात्रिंदिवा प्रथमा, तत्र चतुर्थ चतुर्थेन-एकान्तरोपवासेन आसितव्यं, अपानकेन
| चतुर्विधाहाररहितेनेत्यर्थः । इह च पारणके आचाम्लं कर्तव्यं दत्तिनियमस्तु नास्ति इति विशेषः । तथा उत्तानके-उर्ध्वमुखे पाधे वा
शयितो निपयावान् समपूततयोपविष्टो वा तथा कापचेष्टाविशेषनिवर्तनं स्थानं पूर्वोक्तं कृत्वा ग्रामपहिः स्थित्वा पोरान् रौद्रान् देवना
कवादीन् मानुप्यतैरविकतानुपसर्गान् सहन्ते, अविकम्प्रमनाः शरीराभ्यामचल इति ८
द्वितीयापि द्वितीया सप्तराविदिवा द्वितीया प्रतिमा इदृश्येव सर्वासु क्रियासु, परं उत्कटिकासनो-भूमो अविन्यस्तपादतया
उपविष्टः तथा लगुडगुसंस्थितं काष्ठं तद्वत् शयनः मस्तकपाणिकाभिरेव पृष्ठप्रदेशेनैव वा स्पृष्टभूमागः, तथा दण्डवत् यष्टिवदायतो-
| दण्डायतः पादप्रसारणेन भूमिन्यस्तायतः शरीरः स एव दण्डायतका, वा दिवा रात्रौ दिव्याद्युपसर्गान सहते ९
तृतीयाऽपि सतरात्रिंदिवा तृतीयाऽप्येवारश्येव नवरं सानं गोदुहिका-गोदोहनसमाकारं गोदोहनप्रवृत्तस्यैव पुतयोः पाणि-
भ्यां संयोगेऽग्रपादतलाभ्यामवस्यानक्रिया। तथा वीराणां दृढसंहनतानामासनं वीरासनं, सिंहासनाधिरूतस्य भूमिन्यस्तपादस्य
| सिंहासनाधपनयने सत्यपि अंचलितः सन् तथैवास्थानरूपं तत्स्थानं स्थितं, यद्वा वामपादो दक्षिणस्योरोरुपरि यत्र क्रियते वामकरस्य
॥१४॥

तलस्योपरि दक्षिणकरतलमुत्तानं नामिलनं च यत्र विधीयते तद्वीरासनं । अथवा आनकुब्जो वा आम्रफलवक्राकारेणावस्थिता,एवमे- वास्तिस्रोऽपि प्रथमसतरात्रिंदिवाया एकविंशतिदिवसैर्यान्तीति १० अधैकादशी एवमेवोक्तरीत्या अहोरात्रिकी भवति, नवरं केवलं.पठं भक्तं भोजनार्जनीयतया पष्ठभक्त-उपवासद्वयरूपं, तत्र उप- वासदये हि चत्वारि भक्तानि वय॑न्ते, एकाशनेनैव तदारभ्यते तेनैव निष्ठां यान्तीत्येवं पड्भक्तवर्जनरूपं भवति । तदपि अपानकं चतुर्विधाहारवर्जनमित्यर्थः तथा ग्रामनगरेम्यो बहिस्तादयाघारितपाणिक प्रलंबभुजस्य स्थानमवस्थानं भवति । इयं चाहोरात्रिकी प्रतिमा दिनत्रयेण याति इत्येकादशी ॥११॥ अहोरात्रिक्पनन्तरं अहोरात्रिकी प्रतिमावदेकरात्रिकी प्रतिमा भवति, अष्टमभक्तेन उपवासत्रयेण अपानकेन स्थानमवस्थानं तत् कत पहिष्टाग्रामात् तथा इपत् प्राग्भारगत ईपत् कुब्जो नद्यादिदुस्तरीस्थितो वाऽसौ स्यात् , तथाऽनिमेपनयनो-नियतपुद्गलदृष्टियथा स्थितगात्रो गुप्तेन्द्रियः संहृत्य द्वौ अपि पादौ जिनमुद्रया व्याधारितपाणिस्तिष्ठति लम्बितयाहु तागरूपा पालने कियान् लामो भवति । तदाह- ऐगराइयं च णं भिक्खु पडिम सम्म अणुपालेमाणस्स। इमे तओ ठाणाहियाओ भवन्ति तं जहा ओहिनाणे समुप्पज्जेजा, मणपज्जवनाणे वा समुप्पज्जेजा, केवलनाणे वा असमुप्पन्नपुब्वे समुप्पज्जेजा, विराहणे पुण उम्मायं वा लभेज्झा, दीहकालियं पा रोगायकं पाउणेजा, केवलिपन्नत्ताओ धम्माओ भंसेना, इति वचनात् । १ पञ्चाशकपृष्ठ २८३-२

চান
प्रश्नाच्या
गचि
प्रथम
संवरद्वारे
प्रतिमा
स्वरूपं
-
॥१५॥
ठाणाइपहि, पडिमंठाईहिं,ठाणुफडिएहिं, वीरासणिएहिं, सजिएहिं, डंडाइएहिं, लगंडसाईहिं, एगपासगेहिं,
आपावरहिं, अप्पावरहि, अणिदुभएहिं, अकंडुयाहिं, धुतकेसमंसुलोमनखेहि, सज्वगायपडिकम्मविप्पनुफेहि,
इयं प्रविमा राप्रेरनन्तरं अष्टमकरणात् चतूरात्रिदिवसमाना सात् , यदुक्तं:-
साह९ दोवि पाए बग्धारियपाणि ठायइ ठाणं । वाघारियलंबिभूओ अंते य इमाइ लद्धीओ ॥१॥
इति लेनवः प्रतिमास्वरूपं लिखित विस्तरतस्तु दशाश्रुतस्कन्धचूर्णिवृत्तितः तथा प्रवचनसारोद्धारावश्यकनियुक्तिवृत्तितो-
| बसेपमिति।
स्थाने उत्कटिका येषां ते तैः, वीरासनं भून्यस्तपादस्य सिंहासनोपवेशनमिव तदस्ति येषां ते तैः, निपया समपुतोपवेशना तया
| चरन्ति ते तैः, दण्डस्येव आयतं स्थानं येषां ते वैः, लगइ-दुःसंस्थित काष्ठं तद्वव शिरः प्रपाणीनां चूलाग्रेण शेरते ये ते लगंडशायि-
नस्ता, उस्त-
चीरासणं तु सिंहासणे व्च जहमुफजाणुगणिविट्ठो। दंडगलगंड उवमा आयत कुजे य दोण्हं पि॥१॥
इति पुचौ एक एवं पार्थ भूम्या शय्यंते न द्वितीयेन पाचन भयन्ति इत्येकपाधिकास्तैः, आतापनरातापनाकारिभिस्तैः-
आपावणाउ तिविहा उफोसा मन्झिमा जहन्ना य । उफोसओ णिवन्ना णिसण्ण मज्झा ट्ठियजहन्ना ॥१॥
१ भटावरपनाशकान्तर्गतशितितमः स्लोकः २ आतापना तु त्रिविधा उत्कृप्या मध्यमा जघन्या च । उत्कृष्टा तु मुप्तस्य मध्यमा
निरणस्प स्थितस्य जपण्या ॥
.
॥१५॥

समणुनिन्ना, सुयधरविदितत्थकायबुद्धीहिं धीरमतिबुद्धिणो, य जे ते आसीविसउग्गतेयकप्पा, निच्छ्यववसाय- पजत्तफयमतीया, णिच्च सज्झायज्झाणअणुपद्धधम्मज्झाणा, पंचमहव्ययचरित्तजुत्ता, समितासमितिसु, समि- प्रावरणेन यजिता वनाच्छादनरहितः, अनियाः अपरित्यक्ताः शरीरतो निष्ठीवनं मुखश्लष्माणां अपरिष्ठापकास्तैः, अंकण्डयनका- स्कैः, धूताः-संस्कारापेक्षया त्यक्ताः केशश्मथुरोमनखा यैस्ते वैः, नत्र केशा:-शिरोजाः श्मश्रु-दंष्ट्रिका कूर्च लोम तदन्यव सर्व अंग. रोमापि, नखाः करचरणप्रवृद्धाः । किंबहुना सर्वगात्रे सर्वस्मिन्नपि देहे प्रतिकर्म अभ्यंगादि तस्मात् विनमुक्तैः रहितैः इत्यर्थः। विभू. पाऽभावात् तारशः साधुभिरियमहिंसा समनुचीर्णा आसेविता इत्यर्थः । थुतधरा:-सूत्रधरास्तैर्विदितो ज्ञातः अर्थकाय:-तत्वज्ञानराशिः श्रुताभिधेयो यया सा विदिताकाया तादशी बुद्धिर्येषां ते तैः। तथा धीरा-अक्षोभ्या स्थिरा वा मतिरवग्रहादिका घुद्धिः-उत्पत्यादिका वा येषां ते वथा, ये ते तथा आशीविंपा-नागास्ते च-उग्रतेजसश्च-तीवप्रभावाः तीवविपास्तत्तुल्यास्तत् सदृशाः शापादिदानेनोपधातका- रित्वानेऽपि । तथा निश्चयो-वस्तुनिर्णयो व्यवसाय उद्यमः पुरुषाकारस्तयोः पर्याप्तयोः-परिपूर्णयोः कृता विहिता मतिधुद्धियैस्ते । तथा पाठान्तरे णिच्छयवसाय विणीय पज्जत्त कयमतीया तत्र निश्यव्यवसायौ विनीतौ आत्मनि प्राप्तौ ये ते पर्याप्ता चमरकता चमत्कार प्रापिता मतियस्ते । पुनः नित्यं-सदा स्वाध्यायो-याचनादि, ध्यान-चित्तनिरोधरूपं दुनित इति गम्यं तदेव अनुबद्धं सततं धर्मध्यानमाज्ञाविषय १ अपायविचय २ विपाकविचय ३ संस्थानविचयरूपं येषां ते तथा, पञ्चमहाव्रतरूपं चारित्रं तेन युक्ता ये वे तथा, समिताः सम्यग् प्रवृतिमत्ता, वा अथवा सुष्ठु शोमनं समिति एकीभावेन [ग] पापं येषां ते तथा शमि- १ श्लेप्मादिक याहिर न काटें २ खरज पाणि न खणे इति भाषा ३ दाढी मुंछि ।

ज्ञान०वि०
प्रश्नच्या
प्रथम
संबरद्वारे
अहिंसायाः
कारकाः
तपावा, उचिहजगवच्छला, निचमप्पमत्ता, एएहि अन्नेहि य जा सा अणुपालिया भगवती इमं च पुढविदगअ.
गणिमारुयतरुगणतसथावरसव्वभूयसंयमदयट्ठयाते सुद्धं उञ्छं गवेसिय अकतमकारिमणाइयमणुधि, अकी-
यकडं, नवहि य कोडिहिं सुपरिसुद्ध,
तपापाः त्यक्तकल्मपा वा, पवियजगद्वत्सला:-पड्जीवनिकायहिताः, नित्यं-सदा अप्रमत्ताः-प्रमादरहिताः सर्वाऽपि कर्मधारयः ।
| एते पूर्वोक्तगुणयुक्तास्तैः अन्यैरपि अनुक्तलक्षणगुणपतिः या पूर्वोक्तनामाऽलंकृतपती सा अहिंसा भगवती पूज्या तारशगुणैर्मह-
पिभिः अनुपातिता संवरद्वारहार्दैन।
अथ अहिंसाप्रथमसंवरद्वारपालकस्य यद्विधेयं तत् उच्यते-इमं प्रत्यक्षतया प्राप्तं पृथिवी दकं-पानीयं अग्निः मारुतो-वायुः
| तृणगणो-वनस्पतिसमुदायः सा-दीन्द्रियादयः स्थावरा:-पृथिव्यादिपञ्चकं सर्वभुतप्राणिनां संयमो-रक्षणस्तनिमिता या दया रूपा
वस्या अर्थ किं कर्तव्यमित्याह-
शुद्ध-निर्देपणं अशनादि गवेपितव्यं, उञ्छं-उत्पाटितक्षेत्रगतकणादानं यथा क्षेत्रे पतितकणग्रहणं उञ्छः तथा साधुनाऽपि गृह-
स्वार्थ कृतनिष्पादितान्नग्रहणं अन्वेपितव्यं, वत् कीदृशं ? अकृतं-साध्य दायकेन अनिष्पादिन, न चाऽन्यैः सह कारापितं, आकारितं,
अनाहूतो तिस्स] गृहस्थेन साधोरनिमन्त्रणपूर्वकदीयमानं अनुद्दिष्टं यावन्तिकादिभिर्विवर्जितं, अफ्रीतकृतं तदेय अपश्चितं नाभिश्व
कोटिभिः सुपरिशुद्धं न हन्ति १ न घातयति २ मन्तं नाऽनुजानन्ति ३ न पचति ३ नं पाचयति ५ पचन्तं नाऽनुजानन्ति ६ न
| क्रीयाति ७ मापयति ८ फ्रीणन्तं नाऽनुजानन्ति ९ तथा दशमिश्च दोपैषिप्रमुक्तं यदुक्त-
.
॥१६॥

दसदिय पोसहि विप्पमुक्कं, उग्गमउप्पायणेसणासुद्ध,
साकिय १ मकिग्वय २ निक्खित्तं ३ पिहिय ४ साहारिय ५ दायगु ६ म्मीसे ७ । अपरिणय ८ लित्त ९ छड्डिय
१० एसणदोसा दस हवंति ॥११॥ पिंड० नि० गा० ५२१
उद्गम उत्पादन एपणा-गवेपणा दायकाता: उद्गमा १३ उत्पादना ग्राहकाजावा: १६ एपणा पिंडदोपाः १० तथा शुद्धो यः
पिण्यास तया तार उर्छ।
अप शुद्धग्रहणार्थ पिण्डदोपानाऽऽह-
सोतस उग्गमदोसा सोलस उपायणा य जे वोसा। दस एसणाय दोसा गासे पण मिलिय सगयाला ||१||
सत्र उद्गमनं उद्गमः पिण्डस्योत्पत्निस्तद्विपया आधाकर्मादयो दोपा उद्गमदोपाः पोडश दायकात् समुत्पद्यन्ते सतितपिण्डस्यैव ।
तथा उत्पादन उत्पादः स एव उत्पादना मूलतः शुद्धस्याऽपि पिण्डस्य धाव्यादिमिः प्रकारे उत्पादनं तद्विपया दोपा उत्पादना दोषा
ग्राहकात् उत्पद्यन्ते तेऽपि पोटश । तथा दश एपणा दोपाः एपण-गवेषणं एपणा अशनादेहणकाले शकिवादिभिः प्रकारः अन्वेषण
वरिपया दोषा एपणा दोपा दश । प्रयोऽपि मिलिता द्विचत्वारिंशद्भवन्ति । तत्रोद्गमदोपानामग्राहमाह-
१० पि० पृ० १४६
शक्तिः प्रक्षित: निक्षितः पिहितः संहृतः दायफदुएः उन्मिथः । अपरिणतो लिस: छदितः एषणादोपा दश भवन्ति ॥१॥

प्रथम
संघरद्वारे
पिण्डोद्गम-
दोपाः
अहाकम्मु१देसियर पूइकम्मे य३ मीसजाए य४। ठवणा५ पाहुडियाए६ पाओयर कीय८ पामिये ॥१॥
परियहिए १० अभिहडे११ भिन्ने१२ मालाहडे इय१३ अच्छिज्जे?४
अणिसटे१५ अज्झोयरए१६ सोलसपिंडग्गमे दोसा ॥२॥
व्याख्या-तत्र आधान-साधुनिमित्तं मनसः प्रणिधानं यथा अमुकस्य साधोः कारणेन मया भक्तादि पाचनीयं तया आधया
| कर्म प्रतिकर्मक्रिया आधाकर्म तद्योगात् भक्ताद्यपि आधाकर्म इह दोपाभिधानप्रक्रमेऽपि यद्दोपवतो (भक्तादि) अभिधानं तदोपदोप-
वतोरभिधानाभेदविवक्षया एकमेव द्रष्टव्यं । तथा तदाधाकर्मादि ग्राहिणं पृथिव्यायुमर्दोद्भूतपानाशनादिग्राहिणं साधु तदायकं वा अधः-
संयमाद्वा अघो नरकगतौ नयन्ति तदधाकर्म । तथा आत्मानं चरणात्मानं तस्य हंतीति निचयनयमाश्रित्य चरणविधाते ज्ञानदर्शन-
विधातोऽवश्यं स्यात् यतस्तयोवरणफलत्वात् न त्योर्विधावः पृथगुक्तः, अन्त्यग्रहणे पूर्वयोग्रहणं कृतमेव ।
अथ व्यवहारनयमाश्रित्य चरणपाते इत्तरयोचिनाशः साद्वा नवेति कथं यदा मिथ्यात्वं याति तदा न ते तदभावे तु ते तयोः
| सद्भावादिति-स्वातामिति । चरणविघाते तयोविघातसद्भावादिति आत्मगुणान् हन्तीति आत्मानमपि उच्यते। तत्राधाकर्मणः ते
[पुण जे जस्सेत्यादिद्वाराष्टकव्याख्यानं तु सोदाहरणं पिण्डनियुज्यादिभ्योऽवसेयमत्र तु शब्दार्थेन व्याख्यायते-
उद्देसियत्ति-उद्देशेन उद्देशनमुद्देशो यापदधिकादिचिन्तनं तेन निवृत्तं उद्देशिकं तच्च द्विविध ओपेन १ विमागेन २ तत्र ओप:-
१ पिंडनियुक्ति गा० ९२-९३
२ तं पुण जे जस्स जद्दा जारिस मसणे य तस्स जे होसा ५। दाणे य ६ जहा पुच्छा ७ छटणा सुद्दीय तह योच्छं ॥८॥ पिंडपिशुद्धि
।
॥१७॥

सामान्यविभागः पृथक्करणं अत्र भावना अदचं सत् केनाऽपि किमपि न लभ्यते मिक्षाचरा बहवः कतिपया भिक्षा वयं दम इति विचार्य कतिपयाधिकतंदुलप्रक्षेपेण यनिवृत्तमननादि तदोघोदेशिकं सामान्येन वपरविभागाकरणभावात् । तथा विवाहप्रकरणादिपु यदुद्धरितं तत् पृथक् कृत्वा दानाय कल्पितं सद्विभागोदेशिकं, विभागेन खसत्ताया उत्तार्य पृथक् कृतत्वात् विभागौदेशिकं । तत्रोपोदेशिकं प्रायेण भवति इति कश्चिदनुभूतदुर्भिक्षबुभुक्षः संप्राप्तसुभिक्षो गृहस्थश्चिन्तयति यथा जीविताः स्मो वयं कथमपि दुर्भिक्षे तदिदानी प्रति अर्थिजनसम्पूर्णभोजनशक्त्यभावे मम कियत्यपि भिक्षा दातुं युक्ता । यतो 'अदत्तफलाद कुत्राऽपि किमपि नोपलम्यते कृतस्यैव प्राप्तिरिति' श्रुतिः, ततो गृहिणा पुण्योपार्जनवुझ्या प्रतिदिवसं भक्तपानं पच्यते, यः कोऽपि समागमिष्यति तस्य मिक्षादानार्थमेतावत् खार्थमेतावत् इति विभागरहितमेव तन्दुलानधिकतरान् प्रक्षिपति तदुदेशिकं । विभागोदेशिकं पुननिधा-उद्दिष्ट १ कृतं २ कर्म ३ च तत्र खार्थमेव निष्पन्नमशनादि भिक्षाचराणां दानाय यत् पृथक् कल्पित तदुदिष्टं १, यत्पुनरुद्धरितं शाल्योदनादि भिक्षादानाय करम्बादिरूपतया कृतं वन कृतं २, यत्पुनर्विवाहप्रकरणादिपूद्धरिवं मोदकचू- दि तद्भूयोऽपि गुडपाकदानादिना भिक्षाचराणां दानाय मोदकादिरूपतया कृतं तत्कर्म ३ । एवमेकैकमपि चतुर्दा-उद्देश १ समुद्देश २ आदेश ३ समादेशमेदात् , तत्र त्रिविधमपि विभागोद्देशिकं यावन्तो भिक्षवः समाग- मिष्यन्ति तेषां देयमित्युद्देशः । यदा पुनः पाखण्डिनां देयत्वेन कल्पितं तदा समुद्देशाख्यं २। यदा श्रमणानां शाक्यादीनां देयमिति चिन्तितं तदादेशाख्यं ३ यदा निग्रन्धानां महवयतीनामेव दास्सामीति तदा समादेशकं नाम ४ । यदाप- जावंति यमुद्देसं पाखंडीणं भवे समुद्देसं। समणाणं आएसं निग्गंथाणं समाएसं ॥१॥ पि०नि० गा• २३० . .

प्रयम
संवरद्वारे
पिण्डोद्गम-
दोपाः
सर्वसंख्यया विभागौदेशिकं द्वादशधा भवति ।
अथाऽधाकर्मोद्देशकयोः को विशेष ? इत्युच्यते यत् प्रथमत एव षद्कायोपमर्दनेन साध्वर्थ निष्पादितं तद आधाकर्म, यत् पुनः
प्रथमतः खार्थनिप्पादितं सत् भूयोऽपि पाककरणेन पच्यते तत् उद्देशिकं २।
प्रतिकर्मेति-उद्गमादिरहिततया स्वतः पवित्रस्य भक्तादेरपरस्साऽविशुद्धकोटिकमक्तादेवयवेन सह संपृक्तं मिलितं पूर्व कर्म-करणं
पूतिकर्म. अयं भावः यथा सौरभ्यमनोहरत्वादिगुणैर्विशिष्टमपि शाल्योदनादिमोज्यं कुथिताऽशुचिगन्धादिद्रव्यलवेन युक्तं अपचित्रं
स्यात् , सजनजनैः परिहार्य च, तथा निरतिचारचारित्रिणो यतेः साविचारवयाऽपवित्रत्वकरणेन अविशोधिकोटीनामवयवमाप्रेणाऽपि
| संयुक्तः शुद्धोऽप्याहार उपमुज्यमानो भावपूतेः कारणत्वात् पूतिखि दुर्गन्ध इप, आधाकम्मिकाऽवयवलेशेनाऽपि संसृष्टा स्याली चटु-
ककरोटिकादयोऽपि पूतित्वाद्वजनीया इति ३
मीसजाएति-मिश्रेण कुटुम्बमनःप्रणिधानं साधुप्रणिधानमीलनरूपेण मावेन जातं पाकादिकं यद्भक्तं तन्मिथजातं, आत्मना कुटु-
|म्बेनाऽपि साधुनाऽपि भुज्यते इत्येवं मिथ । तदपि विधा, यावदर्थिकमिश्रं १, पाखंडिमिश्रं २, साधुमिश्रं च ३, तत्र मिश्रत्वं तु
यावदर्थिकादि विमिरात्मयोग्यं च एकत्र पच्यते तन्मिश्र, श्रमणमिश्रं पाखण्डिप्यन्तावात् पृथा नोक्त ४
ठवणत्ति-स्थाप्यते साधुनिमित्तं कियन्तं कालं निधीयते सा स्थापन स्थापना साधुभ्यो देयमिति बुझ्झा रक्षणं सा स्वस्थाने बुल्ली.
स्थाल्यादौ परस्थाने सुस्थितभाजनादौ सदपि चिरकालं इत्वरकालं च साधुदाननिमित्तं धार्यमाणमशनादिकं वा ५
पाहुडिए त्ति कस्मैचित् पूज्याय इष्टाय वा बहुमानपुरस्सरीकरणाय यदी वस्तु दीयते तत्प्राभूतकमुच्यते, प्रामृतमेव प्रामृतिका
॥१८॥

, प्र इति प्रकर्षेण, आ इति साधुदानलक्षणमर्यादया, भृता-निवर्तिता यका भिक्षा सा प्राभृतिका । सा च द्विविधा सक्ष्मवादरभेदात्। तत्र चादरारम्भविषया यादरा स्थूला इत्यर्थः, खल्पारम्भविषयतया तु सूक्ष्मा. एकैकाऽपि द्विविधा ओसकणेन अवसरणेन च, तर खा. योगमवृत्तिकालं मर्यादीकृत्य उर्च परतः आरम्भस्य यत् करणं तत् ओसफणं, तथा स्वप्रयोगप्रवृत्तिकालावधेः अर्याग् यत् आरंभस करणं यत् अवरक्कणमभिधीयते । इह हि केनापि श्रावकेण कुत्राऽपि नगरे निजापत्यस्य विवाहं कर्तुमारेमे, लग्नं च भव्यं दत्तं ज्योति- कण, परं तस्मिन समये अन्यत्र विहवत्वेन तत्र गुरवो न सन्ति, ततोऽसौ श्राद्धो विकल्पयति अस्मिन् विवाहलग्ने संखड्यामनेका- शनखाद्यादिमनोरमायां क्रियमाणायां जनसायमेव सर्व ब्रजति न तु अविनां किश्चिदुपयोगं याति । फियदिनानन्तरं विहारक्रमेण श्री गुरवोऽपि आगन्तारः श्रूयन्ते तत् समय एव विवाहः कर्नुम् युज्यते येन साधूनामशनादिकं पुष्कलं ददामि इत्यादि विचिन्त्य निट- कित लग्नात्परतो गुरूणामागमनसमये विवाहं करोति एवं च विवाहदिनस्योत्स्वाकणं कृत्वा यदुपस्क्रियते भक्तादि सा यादरा ओसका णभाभृतिका १ । तथा कश्चित् श्रावकः सपुत्रादेविवाहदिनं निष्टशितं तदिनादागेव साधवस्तवागतास्ततोऽसौ विचारयति मया साधना विपुलं विशिष्टं भक्त्यादि पुण्यार्थ देयं, परं विवाहादिके पर्वणि विशाल भत्यादि भवति पर मत्पुत्रवियाह यदि जाति तदा गुरयोऽ- न्यत्र विहरिष्यन्ति इति विचार्य तत्रस्थ एव अन्यलग्नं स्थापयति, अयं च भविष्यत्कालभाचिनो विवाहलमस्य अवष्कणं कृत्वा यदु- पस्क्रियते भक्तादि सा चादरावष्कणप्राभृतिका २। १ विवाहादिप्रकरणं.

प्रथम
संचरद्वारे
पिण्डोद्म-
दोपाः
अथ काचित्कुटुम्बिनी सूत्रकर्तनादिव्यापारपरायणा रुदता शिशुना भोजनं याचते 'मातमें भोजनं देहि तत्र तदवसरे प्रत्यास.
भगृहे भिक्षामटन् साधुसंघाटकस्तया दृष्टस्तं दृष्ट्वा कर्ननादिलोभतः रुदन्तं शिशुं प्रत्यवक् मा रोदीस्त्वं ? इह गृहानुगृहं प्रविशन् साधुः
संघाटका समेष्यति तस्य दानाय उत्थिता सती तवाऽपि तत्समय एव भोजनं दास्यामीति उक्त्वा क्रमेणागते साधुसंघाटके तस्मै
दत्वा बालकस्याऽपि प्रदत्तं भोजनं । इह च यत्र समये बालकेन याचितं तदैव तथा कर्तुमुचितस्य पुत्रभोजनदानस्य भविष्यत्कालभा-
विना साधुभिक्षादानेन समये पत्करणं तदुवकणं, नत्र या प्रामृतिका सा सूक्ष्मोत्वष्कणप्राभृतिका १ । तया काचित् गृहस्थिनी कर्त्तनं
| कुर्वती भोजनं याचमान बालकं प्रति वदति कर्त्तयामि तावत्पूणिकामेका पश्चात्ते भोजनं दास्यामीति, अत्रान्तरे साधुरागतस्तत उ.
त्याय तस्मै भिक्षा ददती बालकस्य भोजनं ददाति । इह च यत्पूणिकाकर्तनसमात्यनन्तरं दातव्यतया चालकाय प्रतित्राते साधु-
निमित्तमर्वागुत्थानेन पदर्यागेर बालकस्य भोजनदानं तदवकणदानं सा समावष्कणमाभृतिका २ इयं च प्राभृतिका साध्वर्थ:
मुत्थिताया पालकभोजनदानं तदनंतरं इस्तधावनादिनाऽष्कायमर्दनहेतुत्वात् अकल्पनीयं ६
पाउयरत्ति साधुदाननिमित्तं वह्निप्रदीपमण्यादिस्थापनेन भित्ताद्यपनयनेन वा पहिनिष्कास्य धारणेन वा प्रादुःप्रकटनं देयय-
| स्तुनः करणं प्रादुष्करणं, तच्च द्विधा प्रकाशकरणं प्रगटकरणं च । तत्र कोऽपि श्रावका साधु मक्तिमान अचक्षुर्विपयतया साधुनाम-
कल्प्यमिति विचिन्त्य तस्य भक्तादेः प्रकाशनार्थ भास्वरमणि तत्र स्थापयति अग्निप्रदीपं वा कुरुते गवाक्षजाल्यादि उद्घाटयति लघु-
तरं द्वारं बृहद्वारं करोति कुड्यच्छिद्रादि विदधाति इत्यं यत् स्थानं स्थितस्यैव देयवस्तुनः प्रकाशनं तत्प्रकाशकरणं । यत्पुनर्गृह.
मध्यवत्तिचुल्ल्यां खगृहाथं राधाशनादेरन्धकारादपसार्य बहिः चुल्यास्तद्वयतिरिक्तेऽन्यस्मिन् प्रकाशप्रदेशे सावर्थ स्थापनं प्रगटकरणं
॥१९॥

एतग योरपि प्रादुरकरणयोः पद्कायोपमर्दप्रवृत्तिदोपादिसद्भावात् साधुभिर्वजनीयमिति ७॥ कीयत्ति-क्रीतं यत्सावध मूल्यादिना गृहीतं वचतुर्दा यथा आत्मद्रव्यनीतं १ आत्मभावक्रीत २ परद्रव्यङ्गीतं ३ परभावक्रीतं ४ वा आत्मना स्वयमेव द्रव्येणोजपन्तादितीर्थशेषरूपपरावर्त्तादिकारिगुटिका-सौमाग्यादिसंपादकरक्षादिरूपेण प्रदानतः परमावर्य मनादि गृयन्ते वदात्मद्रव्यङ्गीतम् । दीपाश्चाय-उजयन्ताद्रितीर्थशेषादिसमर्पणानन्तरमेव दैवयोगेन तस्य गृहिणो अकस्मादेव ज्वरा- दिमान्य जातेऽनेन साधुनाऽहं निराकुलः सन् ग्लानीकृत इत्यादि प्रजल्पतः शासनस्य मालिन्यं स्यात् , तद्राजादिना ज्ञाते सति राजा- दयः कर्षणकुट्टनादिकं विदभ्यः, तथाऽयतो मन्दः सन् वेन शेषादिना समपितेन नीरोगः संपद्यते तदा चाटुकारिण एते यतयः इत्यु- शाहो लोकस्य जल्पतो मवेत् , तथा निर्माल्यादिप्रदानेन प्रगुणशरीरस्य गृहव्यापारादिषयोजकतया पदजीवघातपातः कर्मवन्धः स्थादित्यादयः, तथा आत्मना स्वयमेव भक्ताय धर्मकथकवादिक्षपातपाकविममुखर्धर्मकथा(पलक्षणेनाऽन्येन भावेन आक्षिप्तम्यो जनेभ्यो यदानादि गृह्यते तदात्मना क्रीतम् । दोषाशात्र निजनिर्मलतपोनुष्ठानमलिननिष्फलीकरणादयः । तथा गृहस्थेन यतिनि- मिर्ष सचित्ताचित्तमियमेदेन द्रव्येण कृत्वा यदशनादिक्रीतं तत्परद्रव्यनीतं । अत्र पद्कायविराधनादयः प्रतीता एव दोपाः । तथा परेण 'मंखेन-विज्ञान प्रदर्शनधर्मकथादिरूपेण वा भावेन परमावर्ण्य यत्नतो गृहीतं यत्तत्परभावक्रीतं, इत्थंभूते परे भावक्रीते प्रयो दोपार, एकं तावत्की, द्वितीयं अन्यस्मात् गृहात् आनीय नीतमित्यम्याहृतं, आनीयानीय चैकत्र स्थाप्यते तत्स्थापितमिति क्रीवरीविः ८. १ मंरा-फेदारफो या पर्ट पट्टिकं या उपदर्य लोकमावर्जयति स भवः।

मयम संबरद्वारे | पिण्डोद्गम- दोपाः पामिच्चेति अपमित्यंभूयोऽपि तव दास्यामीत्येवमभिधाय यत्साधुनिमित्तमुच्छिन्नं गृह्यते तदपमित्यकं प्रामित्यकंचा तद् द्विविध लौकिकं लोकोत्तरं च । तत्र लौकिकं यद्गृहस्थेन परस्मादुच्छिन्नं गृहीत्वा घृतादिवस्तु बतिभ्यो दीयते । दोपाथ दासत्व-निगडत्व नियन्त्रणादयः । लोकोत्तरं च वखादिविषयं साधूनामेव परस्परमवसेयं, तदपि द्विविधं कोऽपि कस्याऽपि सक्तं एव वस्रं गृह्णाति यथा कियदिनानि परिभुज्य पुनरपि तत्समर्पयिष्यामि कोऽपि पुनरेवं तावत् दिनानामुपरि तवैतत् सदृशं परं यखं दास्यामि । तत्र प्रथम प्रकारे शरीरादिमलेन मलिनीभूते यदि वा पाटिते चौरादिना गृहीते मार्गपतिते वा तस्मिन् वस्त्रादिक कलहादयो दोपाः, द्वितीये च प्रकारेऽन्यवस्त्रादिक याचमानस्य तस्य . दुष्कररुचेविशिष्टतरेऽपि दत्ते महता कप्टेन रुचिरापादयितुं शक्यते ततस्तमाश्रित्य कलहा- दयो दोपा सम्भवन्तीति ९ । परियति परिवत्तितं यत् साधुनिमित्तं कृतपरावर्त तद्वैधं लौकिक लोकोत्तरं च, एकै द्विविधं तद्- द्रव्यविषयं च अन्यद्रव्यविपर्य च, तद्व्यविषयं यथा-कुथित घृतं दचा साधुनिमित्तं सुगन्धिघृतं गृह्णाति इत्यादिरूपं, अन्यद्रव्य विषयं यथा कोद्रवरं समर्पयित्वा साधुनिमित्त शाल्योदनं गृह्णाति इदं च लौकिकमेव । लोकोत्तरं अपि साधोः साधुना सह वस्त्रादि- | परिवर्तनखरूपं द्विधा भावनीयं दोपाश्चात्राऽपि प्राग्वदेव १०। अभिहडेत्ति-अभि साध्वभिमुर्ख हृतं गृहस्थेन स्थानान्तरादानीतं अभिहतं, तद्विधा, आचीर्ण अनाचीणे, तत्राऽनाचीणं द्विविधं प्रच्छन्नं च प्रगट च, सर्वथा साधूनां अभ्याहृतत्वेन यदपरिज्ञानं तत्प्रच्छन्नं यत्पुनः अभ्याहृतत्वेन जातं तत्प्रगटम् । एकैक- मपि द्विविधं स्वग्रामविपयंः परग्रामविषयं च, यस्मिन् ग्रामे साधुर्वसति स किल खग्रामः, शेषस्तु परग्रामः, काचित् भक्तिमती श्रा. विका साधूनां प्रतिलाभनायाभ्याहृता शङ्कानिकृत्यर्थं पाहुणमिपेणोपाश्रये मोदकाचानीय साधुसम्मुखमेवं वदति यथा भगवन् ! भात- ॥२०॥ - मात्गेहादी संखंडयां इदं लब्धम् । यदा मया खजनानां गृहे ग्रहेणकमिदं गृहान्नीतं तैश्च रोपादिना केनापि कारणेन न गृहीतं, सम्पति वन्दनार्थ प्रविष्टा यदि युष्माकमिदमुपकरोति तदा गृह्यतो । ततः सा यत् ददाति तत्मच्छन्नं स्वग्रामविपयमभ्याइतं । यदेतत् साधुम्यो दीयते तदा महत्पूण्यं- अथ केचित् साधवो दूरे तिष्ठन्तः केचित् प्रत्यासन्नाः परमन्तराले नदी विद्यते, ततस्तेऽप्कायविराधनाभयानागमिष्यन्ति, आगता अपि प्रचुरमोदकानि वीक्ष्य शुद्धमिति कथ्यमानेऽप्याधाकर्मशया न ग्रहीष्यन्ति ततो यत्र ग्रामे साध्वो निवसन्ति तत्रैव प्रच्छन्नं गृहीत्या बजाम इवि तथैव कृते ते भूयोऽपि चिन्तयन्ति यदि साधूनाऽऽहूप दास्पामस्ततस्तेऽशुद्धमाशङ्कय न ग्रहीष्यन्ति, तस्मात् द्विजातिभ्योऽपि किमपि दद्म इत्येवं चिन्तयित्वा कस्मिविद प्रदेशे द्विजातिभ्यः स्तोकं दातुमारब्धं, तत उच्चारादिकार्यार्थ निर्गताः केचन साधवो दृष्टाः ततस्ते निमश्रिताः, भो साधव ! अस्माकमुद्धरितमोदकादिकं प्रचुरमवतिष्ठति ततो यदि युष्माकं किम- प्युपकरोति तर्हि तत्प्रतिगृह्यता, साघवोऽपि शुद्धमिति ज्ञात्वा गृह्णन्ति, एतत्प्रच्छन्नं परग्रामविषयमम्याहृतम् । परंपरया ज्ञाते च परिष्ठापनीयमिति । तथा कथित् साधुभिक्षामटन क्वाऽपि गृहे मविष्टः, तत्र गौरवार्हस्वजनभोजनादिकं मारम्धं वर्त्तते, तदानीं साघवे मिक्षादानाऽवसरो नास्ति इत्यादिभिः कारणैः केचित् श्राद्धाः स्वगृहात् साधोरुपाश्रये मोदकादिकमानीय यद् ददाति तत्मकटं स्वग्राम- विषयमभ्याहृतं, एवं परग्रामविषयमपि प्रकटं अनाचीण क्षेयम् । अथाचीणे पुनविधा क्षेत्रविपयं गृहविपयं च, तत्र क्षेत्रविषयमपि त्रिविधं उत्कृष्टं मध्यम जघन्यं च, तत्र कस्मिंश्चित् महति गृहे भूरिभुजानकजनपतिरुपविष्टा तस्यायेकस्मिन् पर्यन्ते साधुसंघाटको १-प्रेषितं । २ आचीर्णानाचीर्णमेदभिन्नाभ्यातदोपस्वरूपम् पिं०नि० १०२ , द्वितीयेपु देयमशनादि तिष्ठति, न च साधुसंघाटको जनसंकुलछुप्तिभयात् तत्र गन्तुं न शक्नोति । ततो हस्तशतप्रमितक्षेत्रादानीत प्रथम यद्गृह्मावि तदुत्कृष्टक्षेत्रादपद्दतमाचीर्णम् । हस्सशतात्परतस्त्वानीतं निपिद्धमेव । मध्यमक्षेत्राभ्याहृतं पुनः करपरिव दुपरि यावद्धस्तशतं संवरद्वारे पिण्डोद्गम- किश्चिन्यून भवति तावद्विज्ञेयम् । करपरिवत्त क्षेत्रं तु जघन्यम् । करपरिव! नाम हस्तस्य किञ्चित्मलम्बनं, यथा काचित् दात्री दोपाः उर्जा उपविष्टा वा खयोगेनैव निजफरगृहीतमोदकमण्डकादिका प्रसारितबाहुस्तिष्ठति सा च तथा स्थिता साधुसंघाटकं दृष्ट्वा करस्थि. मोदकादिमिस्तं निमन्त्रयते स च करस्यापः पात्रकं धारयति सा च भुजा वालपति किश्चिन्मुष्टिं शिथिलयति ततो मण्डकादिषात्रे पनतीदं जघन्यक्षेत्रविषयमाचीर्ण । गृहविषयमन्याहृत पुनरित्थं पतिस्थितानि त्रीणि गृहाणि सन्ति । तत्र यदि साधुसंघाटको भिक्षा गृह्णाति तदा एकः साधुः एकत्र धर्मलाभिते क्षेत्रे गृह्यमाणभिक्षागृहे उपयोगं ददानो भिक्षा लाति, अपरस्तदनुवत्ति द्वितीयः साधुसं- | पाटकस्तु धर्मलाभितगृहादपरयोहयोरानीयमानभिक्षयोरुपयोगदायकहस्तविपयादिकं ददाति यदि शुद्ध जानाति तदा गृहत्रयादानी- तमशनादिकं आचीणं चतुर्धगृहादेस्त्वनाचीर्णमिति ११ । उब्भिन्नेति-उद्भेदनं उद्भिन्नं साधुम्यो धृतादिदाननिमितं कुतुपादेर्मुखस्य गोमयादिस्थगितस्पोद्घाटन तद् द्विधा-पिहितोद्भिन्नं कपाटोद्भिनं च, तत्र यत् छगणकाग्नितापितजन्तुसचित्तपृथ्वीकायप्रभृतिभिः रूपद्रव्यैः पिहितद्वारं प्रतिदिनमपरिभोग खण्डगुडघृतादिभृतकुतुपकुशूलादिकं साधुदानाय उद्घाटयति तद् दीयमानं खण्डादि पिहि- तोद्भिर्म, यत्पुनरपवरकादेनिश्चलनिभृतदत्तकपाटस्य प्रतिदिनमनुद्घाटितद्वारस्य साधुदाननिमित्तं कपाटमुद्घाट्य खण्डादि यत् दीयते । ॥२१॥ तत् कपाटोनिनम् । प्राग्वर्णितदोपाः पद्जीवविराधनादिकास्तथाहि-कुतुपादिमुखमुद्घाव्य घृतादिकं साधुदानाऽनन्तरं शेषरक्षणार्थ १पि०नि० पृ० १०५ भूयोऽपि कृतुपादिमुखं सचित्तेन पृथवीकायेन जलेनाीकृत्योपलिम्पति पृथिवीकायान्तः समुद्गफकीटिकादयोऽपि संभवन्ति तेपामपि विराधनाऽथवा कोऽप्यभिज्ञानार्थ जतुकादिकं ददाति ततस्तेजकायघातो यत्राऽग्निस्तन वायुरपीति पदकायघातस्तथा च कुतुपादिलेप- निमिनं दावा कदाचित् वृश्चिकादिभिर्दश्यते तदा प्रवचनमालिन्यं । तथा पुत्रादिदाने ऋये विक्रये चाऽपि पापप्रवृत्तिः। तथाऽपिधानीकृते विस्मृत्या मूपिकादयो जीवा विनश्यन्ति । कपाटोद्भिन्नेऽप्येवं दोपाः तथाहि-कपाटात् प्राक् कथमपि पृथिवीकायो जलभृतः करको वा चीजपूरादिकं वा मुक्तं भवति, तदा तस्मिन्नुद्घाटिते तद्विराधना जलभृते च करकादौ च लुठयमाने भिद्यमाने वा पानीयं प्रसर्प बासनचुल्यादौ प्रविशेत्तदा अग्निकायविराधनाऽपि, यत्राऽग्निस्तत्र वायुरपि, अथ भूमिकाविवरगतं जलं कीटिकादिकमपि विनाशे प्रसकायविराधना, अतो द्विविधमपि उद्भिन्नं न ग्राह्यं । यदा तु कुतुपादीनां मुखबन्धः प्रतिदिन छोड्यते वध्यते नतुमुद्राव्यतिरेकेण केवलवस्त्रादिग्रन्थिना बध्यते तदा साध्यर्थे उद्भिद्य दीयते तदा साधुना गृह्यते, कपाटोद्भिन्नमपि यत्र प्रतिदिनं उद्घाटयने कपाट- उल्लालक-अर्गलिका यदि भूमिर्पितो न भवति तदा कपाटोद्भिन्नमपि कल्पत इति १२ भालापहृतेति-मालातः सिक्ककादेरपहृतं साध्वर्थ आनीतं यद्भक्तादिकं तन्मालापहृतं । तचतुर्धा-ऊर्यमालापहृतं, अधोमालापहृतं, उमयमालापहृत, तिर्यग्मालापहृत । तत्र ऊर्ध्वमालापहृतं-विधा, जघन्योत्कृष्टमध्यमभेदात् , तत्र ऊर्च विलगितोचसिक्ककादेहीतम- शक्तत्वेनोत्पाटिताभ्यां पाणिभ्यां पादाघोभागाग्रेतनफणाभ्यां भूमिन्यस्वाभ्यां दाच्या निजचक्षुपाऽदष्टं यद्गृहीतमशनादि तत्पाणि- मात्रोत्पाटनस्तीकक्रियागृहीतत्वाजघन्यमूलमालापहृतं, यच्च निश्रेण्यादिकमारुह्य प्रसादोपरितालाद दाव्या गृहीतं तनिश्रेण्यादिरो- १पिं० नि० पृ० १०७ प्रथम संवरद्वारे | पिण्डोद्गम- दोपाः |हणाद्गुरुक्रियागृहीत्वात् उत्कृष्टं मालापहृतं, अनयोर्मध्यवर्ति मध्यमम् । तथा साध्वयं भूमिगृहादौ प्रविश्य तत्र स्थितं भक्तादि यदा- नीय ददावि तदघोपचिमालापहृतं । नयोष्ट्रिकाकलशमछुपाकोटकादिस्थितं किश्चित् सकष्टतया दात्री ददाति वदुभयमालापहृतं, तथा वृहत्तरोश्चैस्तरकुम्भ्यादिमध्ये स्थितस देयस्य ग्रहणाय दाता पार्युत्पाटनं करोति तेनो_श्रितव्यापारता, येन त्वधोमुखं बाहुं व्या- | पारयति तेनाऽधोगतव्यापारता, यदाच पृथुलमित्यादिस्थिते स्कन्धसमोचप्रदेशप्राये दीर्घगवाक्षादौ विर्यप्रसारितबाइक्षिप्तेन हस्तेन गृहीत्वा यद्देयं प्रायेण दृष्टयाऽदृष्टं दाता दत्ते तत् तिर्यग्मालापहृतं तिर्यग्माला-मित्यादिस्थितगवाक्षादिरूपादपहृतं वा इति ज्ञेयम् । मालाशन्देन उच्चप्रदेश एवाभिधीयते तत्कथं भूमिगृहाघोगृहादीनां मालाशब्दः कथ्यते । इति न वाच्यं, यतो लोकरूढ्या उच्चप्रदे- श्वानको मालागन्दः इह तु मालाशब्द: समयमसिया भूमिगृहोर्चाऽधोभूम्यादिषु सर्वत्र कथ्यते, दोपाधान मञ्चकमनिकोदूखला- दिवारुप पाणि वा उत्पाठय उर्वावलगितसिक्ककादिस्थितमोदकादिग्रहणे कथमपि स्खलति निपतति दात्री तदाधः स्थितानामपि पीपिलिकादीनां पथिव्यादीकायानां च विनाशः, दान्याच हस्तपादाद्यवयवमङ्गं विसंस्थूलपतनतासंभवाद प्राणव्यपरोपणमपि स्यात् , तया च प्रवचनोहाहो यया-साध्य भिक्षां ददानः परासुरभूत्तस्मादमी अदृष्टाः सन्तः कल्याणकारिणः इत्यादयो बहवो दोपास्तस्मात् मालापहृतं साघुमिन ग्राह्य, यञ्च पुनर्ददरसोपानादीनि सुखावताराणि सुखावलोक्यानि तान्यारुह्य ददाति तन्मालापहृतं न भवति, केवलं सापुरपि वैषणाशुद्धिनिमित्र प्रासादस्योपरि दर्दरादिना चटति, अपवादपदे दौर्लभ्यलामे च भूमिस्थोऽपि ततोऽप्यानीतं गृह्णाति १३ आन्छेजस इति आच्छियते अनिच्छतोऽपि भृत्यापुत्रादेः सकाशात् साधुदानाय यदशनादि गृह्यते तदाच्छेचं, तर विविधं स्वामिविपयं, १ पि०नि० पृ० ११० ॥२२॥ SRO प्रभुविषयं, स्तेनविपयं च । तत्र ग्रामादिनायका-स्वामी गृहमात्रनायका-प्रभुः स्तेनयोरः, ततो ग्रामादिखामी संयतान्निरीक्ष्य भद्रक | वया कलहेनाऽकलहेन वा बलादपि साधुदानाय कौटुम्विकेभ्यः सकाशात् आच्छेद्य यतिभ्यो ददाति तत् स्वामिविपर्य । तथा यद्गो. | रक्षककर्मकरपुत्रपुत्रीवधूभार्यादिसत्कमेतेभ्यो अनिच्छद्भयोऽपि गृहीत्वा गृहस्वामी साधुभ्यो दुग्धादिकं ददाति तत्मभुविपयं आच्छेद्य । तथा स्तेना अपि केचित् संयतान् प्रति भद्रका भवन्ति ततस्ते मार्गे आगच्छन्तः कदाचित् तथाविधसार्थसार्धमागतान् भोजनार्थ कृतावस्थितैः सार्थस्य मध्ये भिक्षामटन्तः परिपूर्णतामप्राप्नुवन्तश्च संयतान् दृष्ट्वा तन्निमित्तमात्मनो वाऽर्थाय साथिकेभ्यो बलादाच्छिद्य पाथेयादि यद्दत्तवन्तस्ततस्तेनविषयमाच्छेद्यं । एतत् त्रिविधमप्याच्छेद्यं साधूनामकरप्यं । अप्रीतिकलहात्मयावान्तरायप्रद्वेषायनेकदोप- संभवात् । केवलं स्तेनाऽऽच्छिद्येऽयं विशेपो येषां सम्बन्धिभक्तादि बलादाच्छिद्य चौराः साधुभ्यो ददति त एव सार्थिका यदि स्तेनर्बलादाप्यमाना एवं ब्रुवन्ते अस्मदीयं सर्व चौरैगृहीतव्यं, ततो यदि चौरा युष्मभ्यं दापयन्ति ततो अस्माकं महान संतोप इति यदि तैरनुज्ञाता मुनयो दीयमानं चौरैरपि गृह्णन्ति पश्चाचौरेषु अपगतेषु भूयोऽपि ततो गृहीतं द्रव्यं तेभ्यः समर्पयन्ति यदा तदानीं चौरमयादस्माभिर्गृहीतं संप्रति ते गतास्तदात्मीयं द्रव्यं यूयं गृह्णीय, एवमुक्ते यदि ते समनुजानते यदा युष्मभ्यमेवास्माभिर्दत्तं तर्हि सुञ्जते कल्पनीयत्त्वादिति १४ अनिसृष्टम्-न निसृष्टं स्वामिभिः साधुदानार्थमननुज्ञातं यत्तदनिःसृष्टं, तत्रिधा साधारणानिसृष्एं, | जदनानिसृष्टं, चोल्लकानिसृष्टं । तत्र साधारण बहुजनसामान्यं, चोल्लकं स्वस्वामिना पदातिभ्यः प्रसादीक्रियमाणं कौटुम्बिकेन वा क्षेत्रादिस्थितकर्मकरेभ्यो दीयमानं देशीयभापया भक्तमुच्यते, जड्नो हस्तिभिरनिसृष्टमननुज्ञातं न कल्पते साधूनां, तत्र साधारणा- पि०नि० ११३

KA
प्रथम
संवरद्वारे
पिण्डोद्गम-
दोपाः
निसृष्टं या गृहादिस्थिततिलकुट्टितेलवस्तुलड्डुकदध्यादिदेयवस्तुमेदेनाऽनेकथा, तत्र धाणकादियन्द्र तिलकुट्टीतैलादिकं हट्टे वस्त्रा-
| दिकं गृहेऽशनादिकं बहुजनसाधारणं च सर्वैः स्वामिभिरननुज्ञातं यदेकः कश्चित् साधुभ्यो प्रयच्छति तत्साधारणानिसृष्टं । तथा चोल्लको
द्विविधः छिन्नोऽच्छिनच, तत्र कोऽपि कौटुम्विका क्षेत्रगतहालिकानां कस्याऽपि पार्श्व कृत्वा भोजनं प्रस्थापयति, स यदा एकैफ-
हालिकयोग्यं पृथक पृथक् भाजनं कृत्वा प्रस्थापयति तदा स चोल्लकच्छिन्नो । यदा तु सर्वेषामपि मालिकानां योग्यमेकस्यामेव
स्याल्पां कृत्वा प्रेपयति तदा सोऽच्छिन्नः, तत्र यथोल्लको यस्य निमित्तं छिन्नः स वेन दीयमानो मौलस्वामिना कौटुम्विकेन दृष्टोऽदृष्टो
या सापना कल्प्यते च्छिन्नेन तस्य स्वकीयीकृतस्य दत्तत्वात् , अच्छिन्नोऽपि कौटुम्बिकेन येषां हालिकानां योग्यः सचुल्लकस्तैश्च
| साधुभ्यो दानाय अनुन्नातो दृष्टाऽदृष्टो वा कल्पते तैः पुनरननुज्ञातो न कल्पते एव द्वैपान्तरायपरस्य कलहादिदोपसम्भवात् । तथा
जना निसृष्टं हस्तिनो भक्तं मिण्ठेनानुन्नावं अपि राज्ञा हस्तिना वाऽननुज्ञातत्वात् न कल्पते, हस्तिनो भक्तं राज्ञः सम्बन्धि ततो राज्ञा-
| ननुवावस्य ग्रहणे ग्रहणाकर्षणवेपोदालनादयो दोपा भवन्ति । तथा मदीयाज्ञामन्तरेणैव साधवे पिण्डं ददाति कदाचित् मिण्ठं स्वाधि-
काराशियति ततस्तस्य पृत्तिच्छेदः साधुनिमित्त इति साधोरन्तराय इति । राज्ञाऽननुज्ञातत्वाद् अदत्तादानदोपश्च । तथा गजस्य
| पश्यतो मेष्ठस्पाऽपि सत्कं न गृहीतव्यं गजो हि सचेतनस्ततो मदीयकवलमध्यात् मुण्डैरपि पिण्डो गृह्यते इत्येवं विचार्य यथायोग
मागे परिप्रमन् उपाश्रये तं साघु दृष्ट्वा तमुपाश्रयं पातयति साधुं च कथमपि मारयति १५ ।
असोयरति अघि-आधिक्येन पूरण स्वार्थदत्ताशनादेः साध्यागमनमधिगम्य तद्योग्यभक्तसिद्ध्यर्थ प्राचुर्येण भरणमध्यवपूरः
१पि०नि० पृ० ११५
॥२३॥

, स एव अध्यवपूरकः स्वार्थ कप्रत्ययविधानात् तद्योगाङ्गतायष्यध्यवपूरकः । तत्रिधा खगृहयावदर्थिकमिश्रः, स्वगृहपाखण्डिमिश्रच, खगृहश्रमणमिश्रस्तु खगृहषाखण्डिमिश्रेऽन्तर्भावित इति पृथग नोक्तः। तत्र यावदधिका-प्रथममेवारिसंधुक्षणस्थालीजलमक्षेपादिरूपे आरम्मे स्वाथै निष्पादने पश्चात् यथासंभव प्रयाणां यावदर्थिकादीनां अर्थाय अधिकतरान् वण्डलादीन् प्रक्षिपति एपोऽध्यवपूरका अत- एवास्प मिश्रजातानेदो यथा मिश्रजातं तदुच्यते यत्प्रथमत एव यावदथिकाद्यर्थमात्मार्थ च मिश्रं निष्पाद्यते, यत्पुनः प्रथमं आरभ्यते स्वार्थ पश्चात् प्रभूतान् अर्थिनः पाखण्डिनः साधुन् वा समागतानवगम्यते तेपामर्थायाधिकतरं जलतण्डुलादि पक्षिष्यते सोऽध्यवपूरक इति । अत्र व स्वगृई यावदक्षिके मिश्रऽध्यवपूरके शुद्धभक्तमध्ये यावन्तः कणाः कार्पटिकाद्यर्थ पश्चात् क्षिप्ताः तावन्मानं स्थायाः पृथग् क्रियते कापेटिकैम्यो वा दत्ते सति शेषसुद्धरितं भक्तं सत् साधूनां कल्पते । अतएव चाऽयं विशोधिकोटिर्वक्ष्यते तथा स्वगृह- पासण्डिमिश्रे स्वगृहसाघुमिश्रे च शुद्धमक्तमध्ये पतिते पूर्तिभवति यदि तावन्मानं स्याल्या पृथक्कृतं दत्तं वा पाखण्डथादिभ्यस्तथापि शेष न कल्पते । यतः सकलमपि नद्भक्तं पूनिदोपदुष्टं भवतीति १६ उक्ताः पोडश उद्गमदोपार, ! अथोत्पादना दोपानाऽऽह- घाइ दुइ निमिचे-इति गाथाद्वयं पूर्वोक्तं वाच्यं, तत्र धयन्ति पियन्ति बालका यां इति धीयन्ते धार्यन्ते पालकानां दुग्धपानाद्य- थमिति वा, धात्री चालपालिका, सा च पञ्चधा-क्षीरधात्री १ मञ्जनघात्री २ मण्डनधात्री ३ क्रीडनधात्री ४ उत्संगधात्री ५ च । इह १ पोडशोद्गमदोषस्वरूपम् पिंडनियुक्ति पृष्ठ ३४-११६ यावत् २ धाई दुइ निमित्त आजीव वणीमगे तिगिच्छा य । कोहे माणे माया लोमे य हवंति दस एए ॥१॥ पुयि पच्छा संथप विजा मंते य चुन्न जोगे य। उप्पायणाइ दोसा सोलसमे मुलकम्मे य ॥२॥ पि०नि० गा० ४०८-४०२

प्रथम
संवरद्वारे
पिण्डोत्पा-
दनदोपाः
च धात्रीत्वस्य यस्करणं कारापणं वा धात्रीशन्देनोक्तं, तथा धायाः पिण्डो धात्रीपिण्डो, एवं इत्यादिष्वपि भावनीयमिति, इपमन्त्र
भावना-कश्चित् साधुभिक्षार्थ पूर्वपरिचितगृहे प्रविष्टो, रुदन्तं चालकं विलोकयन् तन्मातरमाह यतोऽयं दारकोऽद्यापि क्षीराहारः क्षीरें
| विना रुदति तन्मयं मिक्षा मंच दत्वा पश्चादेनं स्तन्यं पायय, यद्वा प्रथममेनं पायय पश्चात् भिक्षां देहि, यदि वा अलं भिक्षया,
| संप्रति एनं पायय, अहमन्यत्र गत्वा पुनः समेष्यामि, यदि वा तिष्ठ त्वं निराकुला अहमेवाऽस्मै कुतोऽपि क्षीरमानीय दास्यामीति
वयं धात्रीत्वं करोति । तथा मतिमान् निरोगश्चिरायुः बाल स्तन्यं पायितः स्यात् इति श्रुते अपमानितस्तु विपरीतो भवति दुर्लमें
खल लोके पुत्रमुखदर्शनं अतः सर्वाण्यन्यानि कर्माणि मुक्त्या बालकं स्तन्यं पाययेति एवं च क्रियमाणे बहवो दोपा भवेयुः । तथाहि-
बालकमाता भद्रकत्वादातमानसा सत्याऽऽधाकर्मादिकं कुर्यात् , तथा बालकः स्वजातो वा अन्पो वा प्रातिश्मिकादि चालकमात्रा
सह साधोः संभावयेत् , चाटुकरणदर्शनात् यदि वप्तर वा वालजननी मवेत्तदा रोपं बहेदही प्रजितस्य महती परकीया तप्तिः, तथा
वेदनीयकर्मविपाकवशात् पालकस्य कदाचिन्मान्ये संजाते मदीयपुत्रोऽनेन लोचनीकृत इत्यादि साधुना सह कलहकरणात् प्रवचनमा-
| लिन्य इति दोपाः। अथवा कस्यापीभ्यगृहे बालधापनपरां धात्री खबुद्धिप्रपश्चन अन्यां भार्या तत्र स्थापयन् धात्रीत्वं करोति, यथा क-
चित् साधुभिक्षाचर्या मविष्टः महेभ्यगृहे सशोका काश्चिदवलोक्य पृच्छति-किमयावृतिपरा दृश्यसे! सा माह साधर्मिकमुने! दुःख
दुःखसहायकस्यैव कथ्यते, को दुःखसहायो भवत्याः ? सा प्राह यो निशम्य दुःखप्रतिकार करोति । मुनिः प्राह-मां मुस्वा कोऽन्य.
| स्तथाभूतः । सा प्राह भगवन् ! स्फेटिताऽहं अपरधाच्या इभ्यगृहात् तेन विषण्णा, ततः साधुरुत्पन्नाभिमानो वक्ति तत्र स्थापयामि ततो
। यथेप्सितां भिक्षां ददामीति इत्यभिधाय स्फेटितुमिष्टाया धाच्या अदृष्टत्वात् स्वरूपं अजानन् तस्या एव पार्थे [अभिनव स्थापितायाः
॥२४॥

स्वरूपं] पृच्छति । सा कि तरुणी मध्यमा वृद्धा वा प्रतनुस्तनी स्थूलस्तनी कूपरस्तनी वा मांसला कशा कृष्णा गौरी वेत्यादि पृष्ट्वा च, तत्रेश्वरगृहे गतः सन् तं पालकमालोक्य गृहस्वाम्यादि समक्षं धात्रीदोपान् वक्ति । यथा-वृद्धा धात्री अपलस्तन्या तां धयन् दारका अपला संपवते, कशा धात्री स्तोकस्तन्या व धयन् शिशुरपि परिपूर्णस्तन्याभावात शिशुरपि कृश एव, स्थूलस्तन्या स्तन्यं धयन् कोमलाङ्गत्वात् कुनचंपितवाघाणः सन् चिपिटघाणः स्यात् , कूर्पराकारस्तन्यारस्तनं धयन् बालः सदैव स्तनाभिमुखदीर्घाकृतमुखतया शूचीसदृशवदनचिर्पटनेत्रय स्यात् । यत उक्तं- निःस्थामा स्थविसं धात्री, सूच्यास्यः कूपरस्तनीम् । चिपिटः स्थूलवक्षोजा, धयंस्तन्वीं कृशो भवेत् ॥१॥ जाडयं भवति स्थूरायाः, तनुक्यास्त्वयलंकरं । तस्मान्मध्यवलस्थायाः, स्तन्यं पुष्टिकरं स्मृतं ॥२॥ तथामिनवस्थापिता धात्री येन वर्णेन उत्कटा भवति तेन तां निन्दति यथा- कृष्णा भ्रंशयते वर्ण, गौरी तु यलवर्जिता । ततः श्यामा भवेद् धात्री, बलवर्णैः प्रशंसिता ॥१॥ इत्यादि। एतद्वचः गृहस्वामी श्रुत्वा स्थविरत्वादिस्वरूपां वर्तमानधात्रीं परिभाव्य स्फेटयति तो साधुसंमतां धात्री करोति । सा च प्रमुदिता तस्मै साधवे विपुलां भिक्षा प्रयच्छति इति-धात्रीविण्डोनाचीर्णः । अत्र पहयो दोपाः तयथा-या स्फेटिता सा विद्वेष याति धक्ति चाऽनया सह साधुर्यथेच्छ रमते इत्यलं दत्ते । अतिद्विष्टा सती विपादिदानतो मारयत्यपि । या चिरंतनी स्थापिता साऽपि चिन्तयति चित्ते यथा-ऽनेनाग्रेवनी स्फेटयित्वा मां धात्री कता तथा कदाचिदन्ययाऽभ्यर्थितो मामपि स्फेटयिष्यति ततस्तथा करोमि यथाऽयं १.पिं०नि० पृ० १२३-२

प्रथम
संवरद्वारे
पिण्डोत्पा.
दनदोपाः
न भवति इति विचिन्त्यं विपादियोगेन मारयेदित्यादयो बहवो दोपाः। एवं मजनधात्रीत्वकरणे कारापणे क्रीडनककधात्रीत्वकरणे
| कारापणे दोपाः परिभावनीयाः ॥१॥
दूती परस्परसंदिष्टार्थकथिका ततो तीत्वकरणेन-सन्देशकथनेन या पिण्ड उपार्जितो यतिना स दूतीपिण्डः स द्विविधः स्वग्रामे
परग्रामे च । तत्र यस्मिन् ग्रामे साधुर्वसति तस्मिन्नेव ग्रामे यदि सन्देशं कथयति तदा स्वग्रामदूती । यदा तु परग्रामे गत्वा सन्देशं कथ-
यति तदा परग्रामदूती । सैकैकाऽपि द्विधा प्रकटा, प्रच्छन्ना च, मच्छन्ना पुनद्विधा एका लोकोत्तर विषया द्वितीयसंघाटिकसाधोरपि गुप्ता
| इत्यर्थः। द्वितीया पुनर्लोक-लोकोत्तरविपया पाचवत्तिनो जनस्य संघाटिकद्वितीयसाधोरपि गुप्ता इति भावः । ततः कथिद् साघुर्भिक्षा-
कते व्रजन् विशेषतस्तल्लामार्थ तस्यैव ग्रामस्य सम्बन्धिनः पाटकान्तरे ग्रामान्तरे वा जनन्यादेः सत्कं पुत्रिकादि पुरतो गत्वा सन्देश
कथयति, यथा सा तव माता सा तब पिता भ्रातादिर्वा, त्वयाऽत्राऽऽगन्तव्यमित्यादि तत्संमुखं वदति । एवं स्वपक्षपरपक्षयोनिम्बई
भृण्वतोः कथनात् स्वग्रामपरग्रामविषयं दृतीत्वं । तथा कश्चित्साघुः कयाचिदुहित्रा मात्रादिकं प्रति स्वग्रामे परग्रामे वा सन्देशकथनाय
प्रार्थितः । ततस्तत्सन्देशक अवधार्य तजनन्यादि पार्थे गतः, सन्नैवं चिन्तयति दूतीत्वं तु गर्हित सावद्यत्वात् ततो द्वितीयसंघाटक-
साधुर्मा दूतीदोपदुष्टं माज्ञासीत , तदर्थ भणयन्तरेणेदं भणति, यथा-श्राविकऽतिमुग्धा सा तव पुत्री यतः-सावधयोगरहितानस्मान
प्रति वदति यथेदं प्रयोजनं मदीयागमनादिकं मातुस्त्वया कयनीयमिति साऽपि दक्षतयाऽमिमायं ज्ञात्वा द्वितीयसंघाटकचित्तरक्षणार्थ
प्रति भणति यथा-चारयिष्याम्यहं तां पुनस्त्वां न वदिष्यति इति संघाटकसाघोरपि गोपयितुमिष्टं न लोकस्येति लोकोचरप्रच्छन्नं
स्वग्रामपरग्रामविषयं वृत्तीत्वं । उभयप्रच्छन्नं पुनरेवं यथा काचित् साधु प्रति वदत्ति मजनन्यास्त्वमेवं कथयेस्तत्कार्य तव प्रतीतं यथा
"
॥२५॥

त्वं जानासि तथैव संपन्न इति, इह चं साधुसंघाटकस्य शेषलोकानां च सन्देशार्थानवेगमादुर्भयप्रच्छन्नंदूतीत्वं। दोपाथ सर्वत्र गृह- | स्यव्यापारादिना जीवोपमर्दादय इति दूतीदोप: २ निमित्तेत्ति निमित्तं अतीताद्यर्थपरिज्ञानहेतु शुभाशुभचेष्टातहेतुकं ज्ञानं निमित्वज्ञान, तत्करणेन पिण्डो निमित्तपिण्डः। यथा कोऽपि साधुः कथयति तव अतीनदिने सुखदुःखलाभालामादि जातं, आगामिदिने वा राजप्रसादिकं भविष्यति, संप्रति वाद्यैव दिने अमुकं अगुकं भवतीति भविष्यति चा, तेऽपि गृहस्था लाभालामसुखदुःखजीवितमरणादिविपर्य निमित्तं पृष्टमपृष्टं वा धृष्टेन तेन कथ्य- मानमालोक्यावर्जितमानसास्तस्मै मुनये मोदकादिकां विशिष्टविपुलां भिक्षां ददते दापयन्ति वा स निमितपिण्डः साधूनामनाचीर्णः, आत्मपरोभयविषयाणां वघादिदोषाणामनेकेपामत्र संभवादिति ३ आजीवत्ति आजीवनं वृत्तिराजीविका सा पञ्चधा-जातिविपयः १ कुलविषयः २ गणविपय:३ कर्मविषयः ४ शिल्पविषयश्च ५। एकैकोऽपि द्विधा-सूचया १ ऽसूचयार च। सूचा-वचनरचनाविशेषेण कथनं, असूचा-अस्फुटवचनेन, तत्र सूचया-स्वजातिप्रकटनेन- ताविमुपजीवति । यथा कश्चित् साधुभिक्षामटन् द्विजवेश्म प्रविष्टः, तत्र द्विजपुत्रं यागहोमादिक्रियां सम्यग्कुर्वन्तं वीक्ष्य तजनकाग्रे स्वजातिप्रकटनाय वक्ति यथा समिघमत्र-आहुतिस्थानं यागकालघोपादयः क्रियाः सम्यक् असम्यक् वा भवन्ति । तत्र समिधः पिप्प. लादीनामाशाखाखण्डरूपा, मत्राः प्रणवादिका वर्णरचना, आहुतिः अग्न्पादौ घृतक्षेपरूपा स्थान-उत्कटिकादि यागोऽश्वमेधादि, कालः प्रभातादि, घोप उदात्तादि, सर्व यथा प्रतिपादितं तथा क्रियते सा सम्यविक्रया तद्विपरीता न्यूना अधिकतया वा विपर्ययेण था क्रियते साऽसम्यविक्रया। अयमपि त्वरपुत्रः सम्यक् क्रियां कुर्वाणः श्रोत्रियस्य पुत्र! ज्ञायते इत्येवमुक्ते स द्विजो पति अवश्य

प्रयम
संवरद्वारे
पिण्डोत्पा.
दनदोषाः
त्वं बामणोऽसि तच्छ्रुत्वा मौनेन स्थितं एतच्च सूचया जाति प्रकटनं । असूचया तु पृष्टोऽपृष्टो वा आहारार्थ खजाति प्रकटयति यथाऽहं
ब्राह्मणः, अत्र चाऽनेक दोपाः स द्विजो यदा भद्रकस्तदा स्वजातिपक्षपातात् प्रभूतमाहारादिकं पक्त्वाऽपि ददाति आधाकर्मदोपः।
अथ अग्रीतस्तदा भ्रष्टोऽयं पापात्मा ब्रह्मत्वं त्यक्तवानिति विचिन्त्य खगृहानिष्कासनादि करोति एवं क्षत्रियादिजातिकुलादिप्वपि
भावनीय ४
वणीमम्गति वनु याचने प्रायो दायकाभिमतेषु श्रमणादिष्वात्मानं भक्तं दर्शयित्वा पिण्डं याचते इति बनीपकः। कविधति-
निग्रन्थशाक्यतापसपरिवाजकाजीविकद्विजप्राघूर्णश्वानकाकशुकादिभक्तानां गृहस्थानां गृहं भिक्षा भ्रमन प्रविष्टस्ततस्तेषां पुरतोऽशनादि-
लाभार्थ नियन्यादिगुणवर्णनेनात्मानं तद्भक्तं दर्शयति । तथाहि स कदाचित् प्रविष्टो निग्रन्थमक्तश्रावकगृहे निग्रंथानाश्रित्य वदति-
| भो श्रावक ! तथैते गुरवः सातिशयज्ञानभूषिता यहुश्रुता इत्यादिको प्रशंसां, शाक्योपासकगृहे शाक्पान् एवं तापस-परिव्रजकाजी-
विकद्विजानप्याश्रित्य तदानतद्गुणप्रशंसाकरणेन वनीपकत्वं विज्ञेयं । तथाऽतिथिभक्तानां पुरत एवं वक्ति इह प्रायो लोकः परिचितेषु
उपकारकेषु का ददाति, अखिन्न अतिथिजनं पूजयति तस्यैव दानं जगति प्रधानमिति, श्वानभक्तास्तु किन्तु एते श्वानः कैलासप-
वैतादागत्य यक्षा एव श्वानरूपेण पृथवीं संचरन्ते, तत एतेषां दानेन वैश्रमणः प्रसन्नीभूय धनं ददाति । एवं काकादिष्वपि भावनीयं,
इत्थं वनीपकत्वकरणेन पिण्डो बहुदोपाय भवति । यथाऽधार्मिमके धाम्मिके वा पाने दानं दत्तमपिन निष्फलं भवतीत्येवमुक्तेपात्रदा-
नस्य पात्रतया प्रशंसनेन स त्यक्ताचारः सात् , किं पुनः कुपात्रानेव शाक्यादीन् साक्षात् प्रशंसतः उक्तं च-
दाणं न होइ अफलं पत्तमपत्तेसु संनिजुज्जंतं। इय. भणिए.विय दोसो, पसंसओ किं पुण अपत्ते ॥१॥
॥२६॥

एवं शाक्यादिप्रगंसने लोके मिथ्यात्वं स्थिरीकृतं भवति । यथा साधवोऽप्यमन् प्रशसंति तस्मादेतेषां धर्मः सत्य इति । यदि ते शाफ्यादिभक्ता मद्रकास्तदा इत्थं प्रशंसां श्रुत्वा तद्योग्यमाधाकर्मादि कुर्वते तद् गृद्धतया कदाचित्तद्धर्ममपि प्रतिपघेरन् , लोकेऽपि वचनीयता पाटुकारिण आहाराययं श्वान र लाटपटयकारिणः । यदि ते प्रत्पनीकास्तदा गृहनिष्काशनादि कुर्युरिति साधूनां तेपो प्रशंसने मृपावादः । अनुमोदनद्वारा प्राणातिपातादयोऽपि स्युरित्यर्थः ५ चिकित्सा इति० चिकित्सनं चिकित्सा-रोगमतीकारः तदुप- देशो या सापि द्विधा सूक्ष्मा यादरा च, तत्र सूक्ष्मा औषधवैद्यकज्ञापनेन वा, बादरा स्वयं चिकित्साकरणेन अन्येभ्यः कारापणेन वा। पथा कविगृही ज्वराकान्तस्तस्य गृहे गतं साधुं दृष्ट्वा पृच्छति भगवन्मदीयस्य व्याधेःमतीकार जानीपे १ स वक्ति भोः श्रावक! यायो व्याधिस्तव ममाऽपि तादृश्येवमभूत् परममुकेनौपधेन शान्त इति । अनेन अज्ञगृहस्थस्य भैपज्यकरणाऽभिप्रायेणौपधसूचनं कृतं । अथवा रोगिणा चिकित्सा पृष्टा वदति किमहं वैयो येन प्रतिकार जाने एवं चोक्ते रोगिणोऽनभिज्ञस्य सतोऽस्मिन् विपये वैद्य पृच्छन्ति सूननं कृतं यक्ष्मा विचिकित्सा । पादरा तु यदा स्वयं वैद्यीभूय साक्षादेव यमनविरेचनकाथादिकं करोति कारापयति या, वदा एवं कृते गृही मुदिती भिक्षा विपुलां यच्छति इति द्विविधोऽपि पिण्डोऽप्यनाचीर्णः । अनेके दोषाः संभवन्ति, यथा-चिकित्साकरणकाले कन्दमूलफलादि जीवसाया, काथादिकरणे पट्कायविराधना, वसायोगोलकसमो गृही प्रगुणीकृतोऽनेकजीवघातं कुर्यात् । तथा यदि देव- योगा चिकित्स्यमानस्याऽपि रोगिणो व्याधेराधियं जायते, तदा कृपितस्तत्पित्रादिभिराकप्य राजकुलादौ ग्राहयेत् , तथाहारादिलु- ब्धमानाः चिकित्सादि कुर्वन्तीति प्रवचनमालिन्य स्यादिवि ६ पिं०नि० १३२

मथम
संबरद्वारे
पिण्डोत्पा-
दनदोपाः
कोहेत्ति फ्रोधः कोपस्तद्धेतुकः पिण्डः क्रोधपिण्डः, किमुक्तं भवति ? कस्यचित् साधोः सम्बन्धिनमुघाटनमारणशापादिक
विद्याप्रमावं तपःप्रभाव सहस्रयोधित्वादिखवलं च राजकुलवल्लभत्वं च ज्ञात्या शापदानेन वा कस्यचित् मारणायनर्थरूपं क्रोधफलं
| साक्षादेव दृष्ट्वा भयाद गृहस्थेन यस्तस्मै दीयते स क्रोधपिण्डः । अथवा अन्येभ्यो ब्राह्मणादिभ्यो दीयमानो याचमानोऽपि साधुर्यदा
न लभते तदा अलब्धिमान् सन् कुप्येत् कुपिते च सति तस्मिन् साधुः कुपितो भव्यो न भवतीति यद्दीयते स क्रोधपिण्डः । अथ
च सर्वत्र कोप एव पिण्डोत्पादने मुख्यकारणं द्रष्टव्यं, विद्याप प्रभृतीनि तु तद कारणान्येवेति । न विद्यापिण्डादिभिरस मित्रत्वं
आशङ्कनीय क्रोधादिष्वेवान्तर्भावात् इति ७
मानो-गर्वस्तहेतुकः पिण्डो मानपिण्डः अपमर्थ:-कश्चिद्यतिः कैश्विदपरैः साधुभिरिति उक्तस्त्वं लब्धिमान् ज्ञापसे यद्यद्य
भोजयिष्यसि इत्यादि वाक्यैरुत्तेजितो अथवा नन्वयम् किमपिन]सिद्ध्यति इत्यपमानतो या गर्वध्मातचेता अथवा लब्धिप्रशंसादिक-
परैर्वांच्यमानमाकर्ण्य यत्र कुत्राऽप्यह बजामि तत्र सर्वथाऽपि लमे, तथैव जनो मो प्रशंसति इत्येवं प्रबर्द्धमानमानः कस्यापि गृहिणः
पाच गत्वा तं गृहिणं तैस्तैर्वचनजातैर्दानविषयेऽभिमाने च दापयति । स च गृही तथाऽभिमानपरः शेपकलत्रादिके निने लोके दातु-
मनिच्छत्यपि यदशनादिकं ददाति स मानपिण्डः ८
मायत्ति माया-परवञ्चनात्मिका बुद्धिस्तपा कश्चित् साधुर्मत्रयोगायुपायकुशलः खकीयरूपपरावृत्यादि कृत्वा यन्मोदकादिक उपा.
जयति स मायापिण्डः, इयमत्र भावना-कविधतिः अद्याऽहं सिंहकेसरादिमोदकादिकं गृहीष्यामीवि बुद्धता अन्यद् वठवणकादिल-
१ िनि० १३३ । २ पतनाको विण्डनियुक्तौ ४८१ गाथायां लोभपिण्डे न्यस्तोऽत्र तु मायापिण्डे
॥२७॥

1 . भ्यमानमपि यम गृहाति तन्मायापिण्ड: ९ लोमेन सारस लोपटथात् पूर्व तथाविधयुद्ध्यभावेऽपि यथामावं प्रचुर लम्यमानं लपनश्रीप्रभृतिकं भद्रकर इति कृत्वा यद्गृहा- तिस लोमपिण्डा, यथा पायसादिलब्धेऽपि खण्डशर्करादि कुतोऽपि लभ्यते तदा शोमनतरमिति रूपो योऽध्यवसाय: पर्यटन सल्लभते | स लोभपिण्ड इदं च क्रोधादिकचतुष्टयमपि साधूनां न कल्पते, प्रद्वेषकर्मबन्धप्रवचनलाघवादिदोषसंभवात् १० यथा- फोहे घेवर खवगो, माणे सेवइय खुडुओ नायं । मायाइसाढभूइ, लोभे केसरय साहु त्ति ॥१॥ इति पिण्डनियुक्तिगतोदाहरणत्वात् । पुब्धि पच्छासंथवोत्ति संस्तयो विधा, वचनसंस्तवः सम्बन्धसंस्तवश्वा तत्र वचनं भाषा तद्रूपो यः संस्तवो वचनसंस्तवः । सम्बन्धिनो-मात्रादयः वसादयश्च तद्रूपो यः संस्तवः सम्बन्धसंस्तवः। एकैकोऽपि-द्विधा पूर्वसंस्तयः पश्यात्संस्तयश्च । तत्र देये लन्धे पूर्वमेव दातारं गुणैर्वर्णपति स पूर्वसंस्तवः। यत्तु लब्धे सति दातारं गुणैर्वर्णयति स पश्चात् संस्तवः । इयमत्र भावना-कश्चिद्यतिर्भिधार्थ भ्रमन् कश्चिदीश्वरगृहं निरीक्ष्य सत्यैरसत्यैरौदार्यादिगुणैः स्तौति पूर्ववार्चादिभिर्याशा उदारत्वेन संथुतास्तादृशा एव दृष्टाः यस्पेशा गुणाः सर्वत्र प्रस्फुरन्ति इत्यादि संस्तवपूर्व दानात् । तथा पश्चात् त्वदीयदर्शनेवाऽस्माकं मनोलोचने च शीतले जाते इत्याधनेकचाटुवचनानि वक्ति, उभयरूपेऽप्यस्मिन् मायामृपावादाऽसंयमानुमोदनादयो बहवो दोपा मन्ति सम्पन्धेऽप्येवमेव माव्यं । तथा असति सम्पन्धे युनक्ति यादृशी तव माता तादृशी ममाऽपि अस्ति तामालोक्याथूणि क्षरन्ति, अथवा वव मार्या सदृशी मयाऽपि भार्या मुक्ता, अथवा यादृशास्तव पुत्रास्तादृशाः ममाऽपि सन्ति इत्यादिसम्बन्धो योजयति, अथवा कल्प- १ क्रोधमानमायालोमपिण्डोपरि दृष्टान्तचतुष्कं पि० नि० पृ० १३३-१३९ । २ पिं०नि० पृ० १३९ -

प्रयम
संवरद्वारे
.
.
पिण्डोत्पा.
दनदोपाः
यति त्वं जननीप्राया ममाऽस्ति मगिनीदुहिताप्राया इत्येवं कृते हि वहयो दोपास्तथा हि-ते गृहिणो यदि भद्रकास्तदा साधौ तत्सति-
वन्धो भवेव पतिवन्धे च सति आधाकर्मादिकं कुचंति, अथ पान्तास्तर्हि अयमस्माकं स्वस्थ कार्पटिकायस्य जनन्यादिकल्पनेनाप-
भ्राजनां विधते, तत् एवं विचिन्त्य निष्काशनादिकं कुर्युः, अधृत्याथुमोचनादि कुर्वन् मायाची एपोऽस्माकं आवर्जनादिनिमित्तं चाटु-
कानि करोतीति निन्दा । तथा ममेदृशी माना आसीदिति मृतस्य पुत्रस स्थानेऽयं मत्पुत्र इति पुझा तस्मै स्वस्नुपादिदानं घशूरी-
दृशी ममासीदित्युक्ते विधयाँ कुरण्डौ वा निजसुतां दद्यादित्यादयश्च बहवो दोपास्ततः संस्तवपिण्डो यतीनामकल्प्य इति ११
विजामते य ति द्वारद्वयं वक्ष्यते तत्र विद्या-प्रज्ञप्त्यादिखीरुपदेववाधिष्ठिता जपहोमसाध्याक्षरविशेषपद्धतिः, पुरुषरूपदेववाधिष्ठि-
| तपाठमात्रसिद्धो वाऽक्षरपद्धतिमन्त्रः, तद्वयापारणेन य उपजीव्यते पिण्डः, दोपाश्चात्र यो विद्ययाऽभिमश्रितः सन् दानं दाप्पते स
खभावस्थो जातः कदाचित् पदिष्टोऽन्यो वा तत्पक्षपाती प्रद्विष्टः सन् मतिविद्यया स्तम्भनोचाटनमारणादि कुर्यात् , तथा विद्यादिना
परद्रोहकरणरूपेण जीवनशीलाश्चैते लोकगहों तथा कार्मणकारिण हमे इति राजकुले च राजा ग्रहणाकर्षणवेपपरित्यागजनकदर्थनमारणा-
दीनि कुर्यादित्यादयः १२-१३
चूर्णयोगत्ति द्वारद्वयं चूर्णयोगः अञ्जनयोगश्च, तत्र चूर्णो नयनाञ्जनादि, अन्तर्धानादिफलः योगः पादलेपादि सौभाग्यदौर्भाग्य-
करः, एतद्व्यापारणेन यः उपाय॑ते पिण्डः स चूर्णपिण्डः, योगपिण्डश्य । दोपाधावाऽपि पूर्ववद्भायनीयाः। ननु चूर्णयोगयोर्द्वयोः
क्षोदरूपत्वे सति अनयोः परस्परं को विशेषः येन भिन्नतया उक्तः। सत्सं उच्यते-परं कायस्प बहिरुपयोगी चूर्णः अंतश्योपयोगी
१पिं०नि० पृ० १४१ १ २ पि०नि० पृ० १४३
"
॥२८॥

योग इति । यतोऽसावभ्यहार्योऽनाहायच तदा द्विविधो भवेत्तत्र जलपानादिना अभ्यहार्यः, पादलेपादिनाऽन्यभ्यबहार्यः इति विशेष:१४-१५ मूलकम्मैयत्ति मूलकर्म-अतिगहनभववनस्य मूलं कारणं सावधक्रिया मूलकर्म, तत्र गर्भस्थंभन-गर्भाधान-गर्भपात-गर्भशात- उस्थितयोनिस्वकरणादिना उपापते पिण्डः स मूलकर्मपिण्डः, अयं च साधूनां न कल्पते सकारणनिष्कारणेऽपि प्रद्वेषप्रवचनमालिन्य- जीवविधातायनेकदोपसंभवात् , तथाहि-गर्भस्तंभन-गर्भशातने च साधुकृते सति प्रद्वपो भवति । ततः शरीस्पाऽपि नाशः गर्भाधान- पत्त्या योनित्वकरणे यापजीवमैथुनप्रचिः गर्भाधानादिपुत्रोत्पनौ इष्टा भवति, शवयोनित्वकरणात् पुनर्भोगान्तरायादीनि स्युरिति १६ उक्ताः पोडशाऽप्युत्पादना दोपाः । अथ एपणादोपानाऽऽह- संकिंग १ मक्खिय २ निक्वित्त ३ तत्र शक्तिमाधाकर्मादिदोपसम्भावित अत्र चतुङ्गी ग्रहणे शङ्कितो भोजनेऽपि शङ्कित इति प्रथमः १ ग्रहणे शक्तिो भोजने न द्वितीयः २ भोजने शक्षितो न ग्रहणे हनीय: ३ न ग्रहणेनाऽपि भोजने चतुर्थः ४ तत्रायेषु त्रिषु भनेषु पोडशोद्गमदोपनवैपणारूपाणां पञ्चविंशतिदोपाणां मध्ये येन दोपेणाशक्तिवं भवति तं दोपमाप्नोति, किमुक्तं भवति यदा- घाकर्मत्पेन शहित गृह्णाति भो वा तेन दोपेन सम्बध्यते चतुर्थभने तु वर्तमानः शुद्धो न केनाऽपि दोपेण सम्बध्यत इत्यर्थः । एतेपा चैवं संभवः, यथा कश्चित् साधुः खभावतो लजावान् काऽपि गृहे भिक्षार्थ गतः, प्रसुरां भिक्षां लभमानो मनसि शकते किमत्र मचुरा भिक्षा दीयते न च लजया प्रष्टुं शक्नोति, एवं शक्ष्या गृहीत्वा शङ्कित एव मुले इति प्रथमभङ्गवर्ती, तथा कश्चित् साधुमि- १ पिं०नि० पृ० १४४ । २ पिं०नि० पृ० १४७ .

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प्रथम
संबरद्वारे
एपणा
दोपाः
क्षार्थ गतः तथैव शङ्कितताः प्रचुरा मिक्षामादाय स्खवसतिमागत्य भोजनावसरे दोलायमानं तं दृष्ट्वा अपरः साधुर्विज्ञावभिक्षादाद-
गृहव्यतिकरस्तदाशयं ज्ञात्वा भणति भोः साधो ! यत्र या भिक्षा प्राप्ता वस्य गृहे महत्प्रकरणं लामनकं या प्रचुरं कुतोऽप्यागवं वत्
| श्रुत्वा विगतशङ्कस्तगुले इति द्वितीयभगवर्ती, तथा कश्चित् साधुरिम्पगृहात् मजुरां भिक्षां निशक्तिो लात्वा वसतावागत्य अन्यान्
साधून या गुरोः पुरतः खभिक्षानुस्यां भिक्षा आलोचयतः श्रुत्वा संजातशतितश्चिन्तयति, यथा यादृश्येव मया मिक्षा प्रचुरा लन्या
| वाशी अन्यैरपि साधुसंघाटकैलब्धा तन्मनसाधाकर्मादिदोपदुष्टं भुआनस्तृतीयमद्भाक् ॥१॥
मक्खियत्ति प्रक्षितं, पृथिव्यादिना अवगुण्ठितं, तद् द्विघा सचित्तमक्षित अचित्तप्रक्षित, वन सचित्तप्रक्षित विविधं पृथव्यन्वन-
| स्पतिकायप्रक्षित च, तब शुष्केण-आण वा पृथ्वीकायेन देयं मात्रकं इस्तो वा यदि प्रक्षितो भवति तदा सचिचपृथ्वीकापन्नक्षितम् ।
| अप्कायनक्षिते चत्वारो भङ्गा पुरस्कर्म पश्चात्कर्म सस्निग्ध उदका- चतत्र दावा दानपूर्व साध्य कर्म हस्तमात्रादेलपवालनादि
पुरः क्रियते, तत् पूर्वकर्म । यत् पुनर्मकादेदर्दानात् पश्चात् क्रियते सत् पधारकर्म । सस्निग्धमीपलक्ष्यमाणजलखरण्टितं हस्तादि, उदका
स्पष्टोपलम्यमानजलसंसर्ग, तथाभूत पनस]फलादीनां सद्यः कृतैः लक्ष्णखण्डैः खरण्टितं यत् हस्तादि तद्वनस्पतिकायमक्षित, शेपैस्तु
तेजःसमीरत्रसकायैक्षितं न भवति तेजस्कायादिसंसर्गेऽपि लोके प्रक्षितशब्दप्रवृत्यदर्शनात् । अचितनक्षित द्विधा गर्हितमगर्हितं च,
गर्हितं वसादिना लिप्तं इतरत् घृतादिना, तत्र सचित्तम्रक्षित न कल्प्यवे, अचिचनक्षितं तु लोकनिन्दादिना न ग्राछ, घृतादिना प्रक्षित
तु कल्प्यते २
१ पि०नि० पृ० १४१
॥२९॥

'निक्खिचेति निक्षिसं सचित्तोपरि स्थापित, पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पवित्रसत्वेन पोदा, पुनरेकै द्विधा अनन्तरं परम्परं च, अन- न्तरं अव्यवधानेन तब सचित्ते मृदादौ यत्पक्वान्नमण्डकादिकं आनन्तर्येण व्यवस्थापितं तदनन्तरनिक्षिप्त, तदेव नवनीतादि पकानादि का जलमध्यस्थितेषु नाचादिषु स्थितं परम्परनिक्षिप्तं, तथा वनौ पर्पटादि यत् प्रक्षिप्यते एतदनन्तरनिक्षिप्तं यत्पुनरग्रे उपरि सापिते पिठरादौ क्षिप्तं तत्परम्परनिक्षिप्तं, तथा वातोत्पाटिता शालिपर्पटकादि अनन्तरनिक्षिप्तं यछनोत्पाटयते तत्तत्र निक्षिप्तमुच्यते इति विष- क्षया परम्परनिक्षिप्तं तु पवनपूरितदृत्यादि उपरिस्थितमण्डकादि । तत्र वनस्पत्यनन्तरनिक्षिप्त सचित्तत्रीहिकाफलादिषु अपूपामण्डका. दिन्यस्तं, परम्परानिक्षिप्तं तु हरितादीनामेवोपरिस्थितेषु पिठादिषु निक्षिप्ता अपूपादयः। तथा त्रसेऽनन्तरनिक्षिप्ते वलीपर्दादिपृष्टोपरि स्थितेषु पिठरादिषु अपूपमोदकादयो निक्षिप्ता, परम्परनिक्षिप्तं तु बलीव दिपृष्टनिवेशितकुतूपादिभाजनेषु निक्षिप्ता घृतमोदकादय इति । अत्र च पृथिव्यादिषु सर्वेष्वयनन्तरनिक्षिप्तं देयवस्तु यतीनामकल्पनीयमेव भवति सचित्तपृथ्वीकायापरि स्थितत्वेन संघ. हादिदोपसम्भवात् । परम्परनिक्षिप्तं पुनः सचित्तादिसंघट्टादिपरिहारेण यतनया ग्राधमपीति । अथ केवलं तेजस्काये परम्परनिक्षितस्य ग्रहणमाथित्य विशेष प्रतिपाद्यते, ययेथुरसा पाकस्थानेऽग्नेरुपरिस्थिते कटादादौ यदि कटाहः सर्वतः पाश्चेषु मृत्तिकया अवलितो भवति दीयमाने चेक्षुरसे यदि परिशाटो नोपजायते सोऽपि च कटाहो विशालमुखो भवति, सोऽपि चेक्षुरसोऽचिरक्षिसो भवति इति कृत्वा यदि नात्युष्णो भवति स यदा दीयते तदा कल्पते, इह यदि दीपमानस्पेक्षुरसस्य कय. मपि विन्दुः बहिः पतवि तर्हि सलेप एवाऽऽवर्तते । ननु चुल्लीमध्यस्थिततेजस्कापमध्ये पवति ततो मृत्तिकयावलिप्त इत्युक्तं, तथा विशा. १ पिं०नि० पृ० १५०. , प्रथम संवरद्वारे एपणा दोपाः लमुखादादा कप्यमाणउदश्चनपिठास्य कर्णे न लगति ततः पिठरस्य न भङ्ग इति[न], तेजस्कायविराधनेन गृह्यते, अत्युष्णे च आत्म- | विराधनादयो दोषाः तथा च पदकायविराधनेति संयमविराधना वेति ३ । 'पिहियत्ति पिहितं सचिचेन स्थगित तदपि पोदा पूर्ववत् , एकैकमपि द्विधा अनन्तरं परम्परं च पूर्ववद्भावनीयम् । तथापि लिख्यते- सचित्तपृथिवीकायेनाऽवष्टब्धं मण्डकादिसचित्तपृथिवीकायानन्तरपिहितं पृथिवीकायगर्भपिठरादिपिहितं सचित्पृथिवीकायपरम्पर- पिहितं, तथादि-हिमादिनाऽवष्टब्धं मण्डकादिसचित्ताप्कापाऽनन्तरपिहितं हिमादिगर्भपिठरादिना पिहितं सचित्ताऽप्कापपरम्परापि- | हितं, तथा स्थाल्यादौ संस्वेदिमादीनां मध्येऽङ्गारं स्थापयित्वा हिड्वादि वासो यदा दीयते तदा तेनाऽङ्गारकेण केपाश्चित् संस्वैदिमादी- नां संस्पर्शोऽस्तीति तेजस्कायानन्तरपिहितं चनकादिकमपि मर्मुरादिक्षिप्तमनन्तरपिहितं ज्ञातव्यं, अङ्गारभृतेन शरावादिना वा स्थगित |पिठरादि परम्परपिहित तथा तत्रैवाऽङ्गारधूपितादौ अव्यवहितमनन्तरपिहितं तथैव वायौ द्रष्टव्यं, यत्राऽग्निस्तप्रवायुरिति वाक्यात् समीरणभृतेन तु बस्तिना पिहित परम्परपिहित तथा फलादिना अतिरोहितेन पिहित वनस्पत्यनन्तरपिहितं फलभृतेम [छब्बपिठ- रादौ छन्वकस्थाल्यादौ स्थितेन फलेन] व्यक्यादिना पिहितं परम्परपिहितमपीति तथा मण्डकमोदकादिकमुपरि सश्चरत् पिपीलिका. पतिक नसाऽनन्तरपीहितं कीटिकाद्याकान्तशरावादिना पिहितं त्रसपरम्परपिहितं, तत्र च पृथिवीकायादिभिरनन्तरपिहितं न कल्पत एव यतीनां संघट्टादिदोपसम्भवात् , परम्परया पिहितं तु यतनया ग्राह्यमपीति, तथाऽचिचेनाऽप्यचित्ते देयवस्तुनि पिहिते चतुभङ्गी १ पि०नि० पू० १५४ -- . पथा-गुरुकेण गुरुकै पिहितं १, गुरुकं लघुकेन २ लघुकं गुरुकेन ३ लघुकं लघुकेन ४ । तत्र प्रथमन्तीयभङ्गयोरग्राह्य गुरुद्रव्यस्यो- पाटने हि कथमपि तस्य पाते पादादिभङ्गसम्भवाद, द्वितीयचतुर्थयोस्तु ग्राह्य, उत्कदोपाऽभावात् देययस्त्वाधारस्य पिठरादेगुरुत्वे. ऽपि ततः करोटिकादिना दोषाऽसम्मवात् ।। साहारिपति-संहत अन्यत्र प्रक्षिप्तं यत्र येन करोटिकादिना कृत्वा भक्तादिकं दातुमिच्छती दात्री तत्राऽन्यत्र दातव्यं किमपि सनिनमपिचं मिश्रं वा स्निग्धं वतस्तद् देयमपि अन्यत्र स्थानान्तरे क्षिप्वा तेन ददाति एतत् संहृतमुच्यते । तच्च देयं कदाचित् सचि- तेषु पृषिष्यादिषु मध्ये क्षिपति कदाचिदचित्तेषु कदाचिन्मिश्रेषु ततो मिश्रस्य सचित्तेऽन्तर्मावाद, सचित्ताचित्तपदाम्यां चतुर्भङ्गी यथा सचिने सचिचसंहृतं १ अचिने सचिनं २ सचिचे अचितं ३ अचिचे अचिनं ४ तत्रायेषु त्रिपु भङ्गेषु सचिचसंघट्टादिदोपसंभवात् न प्रायं । चतुर्थभने तु व्याविधदोपाभावे सवि कल्पते । अत्राऽप्यनन्तरपरम्परप्ररूपणा पूर्ववत् कर्त्तव्या । यथा-सचित्तपृथिवीमध्ये, यदा सहरति तदाऽनन्तरसचित्तपृथिवीकायसहतं, यदा तु सचिचवीथिकायस्योपरिस्थिते पिठरादौ संहरति तदा परंपरसचिचपृथिवीकाय: संहत एवमकायादिष्वपि भावनीयं, अमन्तरसंहृते न ग्राह्य परंपरसंहृते तु सचित्तपृथिवीकायाधसंघसने ग्रामिति ५ दीयगचि दायकदोषदुष्टं दायकथानेकप्रकारः वथाहि स्थविर, अप्रभुः, पंडका, कम्पमानकायः, ज्वरितः, अंधो, बालो, मत्तः, उन्मनः, शिक्षकरः, छिन्नचरणो, गलत्कुष्टो, पद्धः, पादकारूढा, फण्डयन्ती, पेपयन्ती, भजमाना कुतं लोठयन्ती, पंजयन्ती, दलय- न्ती, विरोलपन्ती, भुचाना, आपनसचा, बालवत्सा, पकायान् संघट्टयन्ती, वानेव विनाशयन्ती, सप्रत्यपाया चेति, तत एव. पिं०नि० पृ० १५६।२ पिण्डनियुक्तिगत ५७२-५७७ गाथासु थाले घुझे...पज्जणिज्जाए यावत् दायकदीपस्य चत्वारिंशभेदाः वर्णिताः - . . - ० 10 प्रथम संवरद्वारे एपणा एपणा -- " मादिस्वरूपे दातरि ददति न कल्पते वत्र स्थविरः सप्ततिवर्षाणां मतान्तरे पष्टिवर्पाणामुपरिवर्ती स च प्रायो गलल्लालो भवति ततो देयमपि वस्तु गलल्लालया सरण्टिा भवतीति तद्हणे लोके जुगुप्सा । तथा अप्रभुः गृहस्स अस्वामी अन्येन केनाऽपि दीयमानं न कल्पते, घनिफस्याऽमिनायाऽज्ञातवा- दिना द्वेषः साद, तथा धनिकेन दत्ताजस्तदा कल्पतेऽपीति । तथा कम्पमानहस्तश्च भवति, तदुस्तकम्पनवशाइयं वस्तु भूमौ लिप- तति, वत्र पद्जीवनिकायविराधना । तथा च प्रायो स्थविरो गृहस्स अप्रभुभवति ततस्तेन दीयमाने कोऽस्याऽधिकारो वृद्धस्येति गृह- खामिनियुक्तान्यस्य प्रक्षेपः स्यादिति, तथा स्वरूपेण दृढशरीरो भवति स्वयं अधिकारी भवति, तदा दीयमानं कल्पतेऽपीति । तथा नपुंसकादमीक्ष्णं भिक्षाग्रहणे अतिपरिचयात्तस्य नपुंसकस्य साधोळ वेदोदयो भवेत् , ततो नपुंसकस्य साचाद्यालिङ्गनाद्यासेवनेनोमय- स्थाऽपि कर्मबन्धः, तथा एते अहो नपुंसकादपि निष्कृष्टाः गृहंति इति जननिन्दा भवेत् ततो न ग्राह्यं अपवादतस्तु वर्द्धितकच्चिप्पि- नकमत्रोपहतऋषिशप्तदेवशतादिपु केपुचिदप्रतिसेवितेषु नपुंसकेषु ददत्सु गृह्यतेऽपीति । तथा कम्पमानकायोपि भिक्षादानसमये देयं | समानयन् भूमौ परिशाटयेत् , तथा साधुभाजनादहिभिक्षा क्षपयेत् , देयपात्रकं वा पातनेन स्फोटयेत् ततो न कल्पते, सोऽपि यदि दृद्धभिक्षाभाजनग्राही भवेद पुत्रादिभिदृढहस्तो भिक्षां दाप्यते तदा कल्पतेऽपीति । एवं ज्वरितेऽपि दोपाः भावनीया किञ्चिज्ज्वरिता. द्विवाग्रहणे ज्वरसंक्रमणमपि साधोमवेद तथा जने उड्डाहो यसोऽमी आहारलम्पटा ज्वरपीडितादपि गृहन्ति, यदि असंचरिष्णुज्वरो भवेत् तदा गृह्यतेऽपीति । तथा अन्धात् भिक्षाग्रहणे उड्डाहः यदमी औदरिका भिक्षा दातुमशक्नुवतोऽपि मिक्षा गृह्णन्तीति, तथाऽप- स्थन् पझ्या भूम्याश्रितपट्जीवनिकायघात विदधाति इत्यादयो दोषाः, अथ स यदि पुत्रादीनां धृतइस्तो भवति तदा गृझतेऽपीति । , ॥३१॥ .

, वथा पालो जन्मतोऽवर्षाभ्यन्तरवर्ती तस्मिन् दीयमाने न कल्पते, मात्रायसमक्षं यदाऽऽदने तदा एते लुण्टाका इव दृश्यन्ते साधवा, सवृत्तान इति जनापवादः, मात्रादीनां च विनामुपरि विद्वेष: स्यादतो न ग्राह्य, यदि मात्रादिभिः कार्यवशादन्यत्र गच्छनि- पलिकस्य कधितं भवेदेतत् त्वया गृहागताना साधूनी देयमिति ततो गृह्यतेऽपीति कलहादेरभावादिति । तथा च मत्तः पीतमदिरादि- मिस्स च मिक्षा ददन् मचतया साधोरालिङ्गनं ददाति, भाजनं वा मिनत्ति कश्चिद्ददन् आसवं वमति, वमन् साधुपानं खरण्टयति, ततो लोकगहीं 'धिगमी अशुचयो ये मत्तादपि गृहन्ति, कोऽपि मत्ती जल्पत्ति वा रे मुण्ड ! किमत्रायातस्त्वमिति ब्रुवन् घातमपि फरोति, ततो न कल्पते, यदि तप्प पार्श्वे कविङ्गवति तदपरोद्धा तदा कल्पतेऽपीति । तथा उन्मत्तो सो ग्रहग्रहीतो वा तस्मिन्नप्येते एक वमनव िदोपा भावनीयाः, तथा मत्तोऽपि यदि भद्रकोऽलक्ष्यमदय भवति तथा उन्मत्तोऽपि यदि शुचिर्भद्रकच भवति तदा कल्पत इति । तथा छिन्नकरो मूत्रायुत्सर्गादौ जलशौचाभावात् अशुचिरेव तेन च दीयमानं ग्रहणे जनगीं इत्यादयो दोपाः, परि- शाटिहस्तात्पतने पदजीवघातः पारस्फोटनादयो भाव्याः। च्छिन्नचरणेऽप्येत एव भाव्या: केवलं पादाभावात् तस्य भिक्षादानाय चलतः प्रायो नियमतः पतनं भवेत् , तथा सति भूम्याश्रितपिपीलिकाप्रभृति प्राणीविनाशः तथा च्छिन्नकरोऽपि यदि सागारिकाऽभावे ददाति तदा यतनया गृह्यतेऽपीति । च्छिन्नचरणोऽपि यदि उपविष्टो ददाति असागारिकं च स्थानं भवेत् तदा गृह्यते । तथा गलत्कु- टीपुरुपाद्यमाणेऽपि तदीयोप्लासत्वक्संस्पर्श-अर्धपक्षरुधिरस्वेदमललालादिमिः साधोः कुष्टसंक्रमो भवेत् , सोऽपि चेन्मण्डलप्रसूति- रूपकुष्टकीर्ण कायः सन् सागारिकामावे यदा ददाति तदा कल्पते न शेपकुष्टिनः सागारिक वा पश्यति । तत्र मण्डलानि वृत्ताकारदगु- विशेषरूपाणि प्रसतिनखविदारणेऽपि चेतनाया: ससंवेदन असंविचिः] माति । तथा करविषयकाष्ठमयपन्धनरूपेण हस्तांदुना पादविप- .

प्रथम
संवरद्वारे
एपणा
दोपाः
| यलोहबन्धनरूपेण निगडेन च पद्धे दातरि भिक्षा प्रपच्छति दुःखं तस्य स्यात् , तथा मूत्रात्सर्गादौ शौचाऽभावात् ततो मिक्षाग्रहणे
लोकजुगुप्सा ततो न ग्राह्यं, यदा पादबद्धहीनस्ततश्च पीडामन्तरेण गन्तुं शक्तस्तदा ग्रहीतुं कल्पतेऽपीति, बद्धोऽपि यदोपविष्टः सन्
दत्ते सागारिको न पश्यति तदा ग्राहमपीति बन्धस्तु प्रतिषेध एव न भजना। तथा पादुकयोः काष्ठमयोपानहोरारूढस्य भिक्षादानाय
प्रचलतः कदाचिद् दुःस्थितत्वेन पतनं स्यात् अतो न ग्राह्यं, अथ पादुकारुढोऽपि यद्यचलो भवति तदा कारणे कल्पते । तथा
कण्डयन्त्या उदुखले तंदुलादिकं छण्टयन्त्या न गृह्यते यतः सा उदूखलक्षिप्तशाल्यादि बीजसंघट्टादि करोति, तथा दानाद पूर्व पश्चाद्वा
| जलेन हस्तघावनादि दोपं वा विदध्यात् ततो न ग्राी, अत्रापि अपवादतः कण्डनायोत्पाटित मुशलं न च तस्मिन् मुशले काञ्च्यां
बीजलग्नमस्ति अत्राऽवसरे समायातः साधुस्ततो यदि सा पतनाद्यनर्थरहिते गृहकोणादौ मुशलं स्थापयित्वा ददाति तदा कल्पतेऽपीति ।
तथा पिंपन्ती शिलापां तिलामलकादि प्रमृगन्ती यदा भिक्षादानायोत्तिष्ठति तदा पिष्यमाणतिलादिसत्काः काश्चिमखिका सचित्ता
अपि. हस्तादौ लगिताः संभवन्ति ततो भिक्षादानाय हस्वादि प्रस्फोटने भिक्षा या ददत्या भिक्षासंपर्कतस्तासां विराधना भवति पूर्व-
कर्मपश्चातकर्मादयोऽपि अप्कायविराधना संभवति, अतो नैव (कल्पते), एषाऽपि पेषणसमाप्तौ मापुकं वा पिंपती यदि ददाति तदा
| कल्पते । तथा भज्यमाना चुल्लया कडिल्लकादौ चनकादीन् स्फेटयती तस्यां मिक्षा ददत्या वेलालगनेन कडिल्लकक्षिप्तगोधूमचणका-
दीनां दाह सति प्रदेपादयो दोपा स्युः। अत्राऽपि यत् सचिचं गोधूमादि कडिल्लके क्षिप्तं तत् भ्रष्टोचारितमन्यच्च नाद्यापि फरे गृहीत.
| मस्मिन्नवसरे आयातः-साधुरागतः ततो यदि उत्थाय ददाति तदा कल्पते । तथा इंतत्यां वस्त्रेण रूतपोणिका-सूम्ररूपां कुर्वन्स्यो
तथा लोठयन्त्या-लोढत्यां कासः कणकेन रूततया. विदधत्यां तथा विक्षुवत्या रूतं कराभ्यां पौन:पुन्येन विरलं कुर्वन्त्यां तथा
॥३२॥

पिअपन्या पिअनेन रूतं विरलं कुर्वन्त्यां न गृह्यते। देयलिदृढहस्तधावनादि पश्चात्कर्मादयो दोपाः । कार्यासकादिसचित्तसंघट्टसंभवो मयवि, इह च कर्त्तने यदि सत्रस्य श्वेततातिशयोत्पादनाय शङ्खचूर्णेन हस्तौ न खरण्टयति खरण्टनेऽपि यदि जलेन न प्रक्षालयति उदा कल्पते, लोठनेऽपि यदि हस्ते धृतः कर्पासो न स्यात् कार्यासिकाद्वा यदि उत्तिष्ठती न घट्टयति तदा गृह्यते, विशुवत्यां पित. पन्त्यां च यदि पक्षात्कर्म न भवति तदा कल्पतेऽपीति । तथा दलयन्ती घरटेन गोधूमादि चूर्णयन्त्यां-हि दलयन्त्यां घरक्षिप्तवी. असंघद्वहस्तधापने जलविराधना वा दलयंत्यपि सचित्तमुद्गादिना दल्यमानेन सह घरट्ट मुक्तवती । अत्रान्तरे च साधुरायातस्ततो यदि अनिष्ठति अचेतनं वा भ्रष्टमुद्गादिकं दलयती तर्हि तद्धस्तात् कल्पते ५. तथा विरोलयन्ती दध्यादि मथ्नाति यदि दध्यादि संसक्तं मध्नाति तर्हि नेन संसक्तदष्यादिना लिप्तकरत्वात् भिक्षा ददती तेपा रसजीवानां वधं विदध्यात्, अत्राऽपि चेदं असंसक्तं दध्यादि मध्नाति उदा कल्पते । तथा मुआना दात्री भिक्षादानार्थ आचमनं करोत्याचमने च क्रियमाणे उदकं विराध्यते, अथ न करोत्या- चमनं वर्हि लोके जुगुप्सा उक्तं च- छमायक्यावन्तोऽपि संजओ दुल्लहं कुणइ घोहिं । आहारे नीहारे दुगंछिए पिंडगहणे य॥१॥ तया आपनसच्चायां भिक्षां ददत्यां न यावं, यवस्तस्या दानार्थमु/भवन्त्या गर्भवाधा भवेत् , तत्रापि स्थविरकल्पिकानां मासाष्टकं यावत् तस्करणे कल्पते बेलामासे न कल्पते । अथ च यथोपविश्यतया वेलामासे दीयते तदा गृह्यते । वथा यालवत्सा-पालकं भूमौ मचिकादौ वा यदि स्थाप्य भिक्षा ददाति तर्हि वालकं तं मारिसारमेयादयो मांसखण्डं शश- प्रथम संवरद्वारे एपणा दोपाः कशिशुस्विाऽऽकृष्य विनाशयेयुः, तथा आहारखरष्टितौ शुष्को हस्तौ कर्कशौ भवतस्ततो भिक्षा दत्त्या पुनर्दाव्या हस्ताभ्यां गृह्यमाणस बालख पीडा स्यात् , अथ च यस्या पालको आहारे लगति भूमौ मुक्तः सन् न रोदिदि तहिं तस्या हस्तात् कल्पतेऽपीति, स्थविरकल्पि. कानां, तथा आहारं गृहन् पालः प्रायः शरीरेण पुष्टो भवति ततस्तं माआरादयः पीडां [न] कुर्वन्ति, ये तु जिनकल्पिका भगवन्तस्ते निरपवादत्वात् श्रुतवलेन गर्भाधानादि ज्ञात्वा मूलत एव आपनसचा सघालवत्सां च सर्वथा परिहरन्तीति । तथा पदकायान्-पृथव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसरूपान् संघट्टयन्ती हस्तपादाभ्यां शरीरावयवेन स्पृशती तानेर पदकायान् व्यापा- दयन्ती समावतो वा संपतं प्रेक्ष्य यदि ददाति तदा तद्धस्तात् ग्रहीतुं न कल्पते । तथा सप्रत्यपाया-सम्भाव्यमानविनास्तत्र अपायात्रिधा तद्यथा तिर्यगुर्घमघव, तत्र तिर्यग् गवादिभ्यः, ऊर्च उत्तरंगकाठादेः, अधः सर्पकण्टकादेः, इत्थं त्रिविधानामपायानामन्यतममापायं युद्ध्या सम्भावयन् न ततो भिक्षा गृहीयादिति। अथ पदकायं संघट्टयन्त्यां सप्रत्यवायायो नापवादः सर्वथा न कल्पत एव, शेपेषु तु पुनरपवादो दर्शितः। तथा क्षिपती यतीन् दृष्ट्वा साधुदानोद्यता पदकायान् भूमौ क्षिपति-भूमौ मुश्चति, तथा साधारणं-वाह्वायत्तं वा स्वयं ददती, चोरिकया गृहीतं वा ददती, तथा परकीयं ददती, पराथै का- पटिकादीनां कल्पितं तदेव ददती, तथा या स्त्री साधुदानोवता स्वाभीतः स्थापयती बलीस्नकूर, तथा उत्तयत्ती नमयती पिठरा- दिस्खाल्यादि, अत्र च कण्डूयन्तीत्यारभ्य सर्वाणि विशेषणानि स्त्रीमुख्यत्यादुक्तानि, पुरुषेष्वपि भावनीयानीति, अत्राऽपवादोऽपि वयाविघदौलम्यद्रव्ये सातिशयज्ञानपूर्वकत्वात् ग्राह्यमपीति, प्रायः दापकदोषाश्चत्वारिंशदुक्ताः एवमन्येऽपि दायकदोपाः स्वयं शास्त्रान्त- ॥३३॥ M - रतय परिमान्य परिहर्चव्याः ६ पष्ठः। उम्मीसत्ति उन्मिभं-सचित्तसंमिश्र-इह कथित् गृहस्था केवलं वस्तु इदं वतिने वितीर्यमाणमल्पं सादिति लजया पृथग्यस्तु. द्वपदाने वेला लगति इत्यौत्सुक्येन मिलितं वस्तुद्वयं मित्रं भवतीति भक्त्या तथा सचित्तभक्षणभङ्गो भवत्वेतेषां इति प्रत्यनीकतया, अनामोगेन या साधूनां कल्पनीयतपा उचितपूरणादिकं अकल्पनीयतया मुनीनामनुचितेन करमन्दकदाडिमकुलिकादिना मिथयित्वा यद् ददाति तन्मिश्रम् । अत्र च कल्पनीयाऽकल्पनीये द्वे अपि वस्तुनी मिश्रयित्वा यद् ददाति तदुन्मिश्र, संहरणं तु यद्धाजनमदेयं | वस्तु वदन्यत्र फाऽपि स्थगनिकादौ संहृत्य ददाति तदुन्मिश्रसंहृतयोर्भेदः ७१ अपरिणयत्ति अपरिणत-अप्रासुकीभूतं तत्-ओघतो द्विधा द्रव्यतो भावतश्च पुनरेकैकं द्विधा दावृविषयं गृहीविपयं च । तत्र द्रव्यरूपमपरिणत यत् पृथिवीकायादिकं खरूपेण सजीयं । यत्पुनर्जीवेन विप्रमुक्तं तत्परिणतमिति । तच्च यदा दातुः सत्तायां वर्तते बदा दाविपयं, यदा तु गृहीतः सत्तायां तदा गृहीविषय, तथा द्वयोर्वहूनां वा साधारणे देयवस्तुनि यद्येकस्य कस्यचिद् ददामीत्येचं भावः परिणमति न शेषाणामेतद्भावतो दातृविषयं अपरिणतं साधारणाऽनिसृष्ट दायकपरोक्षत्वे, दातृभाषापरिणतं दायकसमक्षत्वेत्व- नयोमेंदः । तथा द्वयोः साध्वोः संघाटकरूपेण भिक्षार्थ गृहं गतयोरेकस्य साधोरेतल्लभ्यमानमगानादिकं शुद्धमिति मनसि परिणतं तद् द्वितीयस्य गृहीतविषयभाषापरिणतं, एतच साधूनां न कल्पते शङ्कितत्वात् कलहादिदोषसम्भवाच ८। १ अध उन्मिश्रदोपवर्णने पिण्डनियुक्तिगाथा ५९६ वृतो वणिताभोगानाभोगवर्णनं सङ्कीर्ण जातं प्रतिभाति २ पि०नि० पृ० १६५-१६७ यावत् वर्णनम्

प्रथम
संवरद्वारे
एपणा
दोषाः
'लित्तत्ति-हस्तपात्रादिलैपचारित्वात् लिप्तं दुग्धदधितेमनादि तत्पुनरुत्सर्गतः साधूनां न ग्राह्यं, रसाभ्यवहारलाम्पट्यवृद्धिप्रस-
गाव , दध्याधिलिप्तहस्तप्रक्षालनादिरूपपश्चात्कर्माद्यनेकदोपसद्धावाच किन्तु अलेपकृदेव वल्लचनकौदनादिकं, तथाविधशच्यभावे च
निरन्तरस्वाध्यायाध्ययनादिकमपि पुष्टकारणमाश्रित्य लेपदपि कल्पते । तत्र च लेपकृति ग्राह्यमाणे दातुः सम्बन्धी हस्तः संसृष्टो
असंसृष्टो वा भवति, येन च कृत्वा भिक्षां ददाति तदपि मात्रकं करोटिकादिकं संसृष्टं [असंसृष्टं] वा द्रव्यमपि देयं सावशेष निरवशेपं
|वा, एतेपां च प्रयाणां पदानां संसृष्टहस्तसंसृष्टपात्रसावशेषद्रव्यरूपाणां सप्रतिपक्षाणां परस्परसंयोगेनाऽष्टौ भेदा भवन्ति, ते चाऽमी
संसृष्ट हस्तः संसृष्टपात्रं सावशेपं द्रव्यं १ संसृष्टहस्तः संसृष्टपात्रं निरवशेष द्रव्यं २। संसृष्टो हस्तो असंसृष्टं पात्रं सावशे द्रव्यं ३
संसृष्टो इस्तो असंसृष्टं पात्रं निरवशेष द्रव्यं ४ असंसृष्टो हस्तः संसृष्टं पात्रं सावशेपं द्रव्यं ५ असंसृष्टो हस्तः संसृष्टं पात्रं निरवशेष
द्रव्यं ६ असंसृष्टो हस्तो असंसृष्टं पात्रं सावशेपं द्रव्यं ७ असंसृष्टो हस्तो असंसृष्टं पात्रं निरवशेष द्रव्यं ८ ।
एतेषु चाष्टसु भङ्गेषु प्रथमतृतीयपञ्चमसप्तमेपु ग्रहणं कर्त्तव्यं न समेपु-द्वितीयचतुर्थपष्ठाटमेपु नैव ग्रहणं, इयमत्र भावना-इह च
हस्तो पात्रं वा द्वे स्खयोगेन संसृष्टे वा भवेता, असंसृष्टे वा न तदशेन पश्चात्कर्म सम्भवति, किं तर्हि ? द्रव्यावशेपेन । तथाहि-यन्त्र द्रव्यं
सावशेष नत्र ते साध्य खरण्टितेऽपि न दात्री प्रक्षालयति, भूयोऽपि परिवेपणसम्मवात् । यत्र तु निरवशेष द्रव्यं तत्र साधुदानानन्तरं
नियमतस्तद् द्रव्याधारस्थालं हस्तं पात्रं वा प्रक्षालयति ततो द्वितीयादिषु भङ्गेषु द्रव्ये निरवशेपे पश्चात्कर्मसम्भवान कल्पते ।
प्रथमादिषु पश्चात्कर्म असम्भवाद कल्पते इति ९
१ पतवर्णनं पि०नि० गाथा ६२६ वृत्ती
-
॥३४॥

मूलभेद दा ४ उद्म सर्पमेदाः ६३ २ उत्पादन सर्वमेदाः ४० पपणादोप उनमदोषमूल उत्तर उनमदोषमूल उत्तर उत्पादनादोपू उत्तर उत्पादनदोप- उत्तर मेवनामानि मेदाः मेदनामानि मेदाः मूलमेदनामानि मेदाः) मूलमेदनामानि मेदाः नामानि १ बाधाकर्म ४१० परायचित ६ / १ धात्रीदोपः ५/१० लोम १ शङ्कितं २ योदेशिक १२ ११ अभिहतं ६/२ दूती ११ पूर्वसंस्तवः २ नक्षित पश्चात् संस्तवः ३ प्रतिकर्म १ ३ निमित्तम् ૨ ३ निक्षिप्त १२ (१२ उभिन २ १२ विद्या ४ मिथदोप ४ पिहितं १२ ४ आजीविका ३ १० १३ मालापद्धत १३ मन्त्र १ ५ संहृतं ८ ५स्थापना ५ चनीपकः १ ६ दायक ४० १४ आच्छे ३ १४ चूर्ण ६ माभृतिका ६ चिकित्सा २ ७ उन्मिथित ३ १५ अनिःसृष्टं ७ प्रादुप्फरणं ८ अपरिणत ૨ ७ क्रोध १६ अध्यवपूरक ३ ९ लिप्त की ८मान सर्वमेदाः १६ ६३ १० छहित सर्वमेदाः १६ ४० ३ ९ अपमित्यम् २ ९ माया सर्पमेदाः १० १०१ एपणा सर्वमेदाः १०१ सर्वा २०४ ४ ४ १५ योग ४ १ ८ -- प्रथम संवरद्वारे एपणा दोपाः ईदितमिति-छदित-उजिसतं त्यक्तमिति पर्यायः तच्च विधा सचित्तं अचित्तं मिश्र, तदपि कदाचित् छायते[द्यते] सचिनमध्ये, कदाचिदचित्तमध्ये, कदाचिन्मिश्रमध्ये, तत उभयत्रापि मिश्रस्य सचित्त एवान्तर्भवति । छेदते सचिचाचित्तद्रव्ययोराधारभूतयोराधेय. | भृतयोय संयोगतश्चतुर्भङ्गी तद्यथा सचित्ते सचित्तं १ अचित्ते सचित्तं २ सचित्ते अचित्तं ३ अचिचे अचित्तं ४ अत्र चायेषु त्रिषु भङ्गेषु सचित्तसंघट्टादिदोषसंभवाद न कल्पते चरमे पुनः पारिशाटिसद्भावात् न कल्पते परिशाटौ च महान् दोपः तथाहि- उप्णय द्रव्यस्य छईने भिक्षा ददमानो दह्यते भूम्याश्रितानां च पृथिव्यादीनां दाहः स्यात्, शीतद्रव्यस्य भूमौ पतने च भूम्या. श्रिताः पृथिव्यादयो विराध्यन्ते, भूमिपतिते च मधुविन्द्दाहरणं यथा कश्चिद्धर्मघोपाख्यमत्री गृहीतव्रतो विहरन् वास्तकपुरे जगाम, तत्र वास्तकमत्रिगृहे मिक्षार्थ गतो, दीयमानमधुघृतान्वितपा. | यसादधोमुखमधुबिन्दुपातदर्शनात् दोपमन्वेष्य निर्गतः। तच्च गवाक्षस्थो वास्तको विलोक्य कुतो भिक्षा न गृहीता इति यावचिन्तयति तापत्तत्र भूपवितमधुविन्दुके मक्षिका [तद्] योगाद्गृहकोकिला तद्योगात् सरटस्ततो मार्जारस्तं प्रति प्राघुर्णकः श्वा पावितः तदनु- वास्तव्यः श्वास्तयोः कलहे तत्सामिनो विरोधादन्योन्यसंग्रामोऽभूत् । ततो वास्तकेन चिन्तितं अहो अनेनैव कारणेन मुनिना भिक्षा न जगृहे । धन्यः स इति भावयोगात् जातजातिस्मृतिः देवतापितसाधूपकरणः स्वयंबुद्धो जात इति संक्षेपार्थः । उक्तास्तावत् संक्षेपतो द्विचत्वारिंशद् दोपाः सप्रभेदाचतुरधिका द्विशती विस्तरार्थिना तु पिण्डनियुक्तिवृत्तितः सोदाहरणा अवग- १ पिं० नि० गाथा ६२७ वृत्तौ ॥ २ पिं०नि० पृ० १६९ तमे 'छईने सचित्तावित्तमिधद्रव्याणामाधारभूतानामाधेयभूतानां च'। ३ पतदुदाहरणं पिच नि० ६२८ गाथा वृत्तौ धर्तते ॥ ४ पि०नि० पृष्ठ ३४-१६९ यावत् सर्व पिण्डदोपवर्णनम् ॥३५॥ ट त तल्या अत्र तु सुखावलोपाय लेशमात्रतो व्याख्याताः। अर्थतेपामविशोधिविशोधिकोटिविवेचनार्थमाह-सर्वा अपि पिण्डैपणा नवसु कोटिसु विभागे अवतरन्ति ता एवाऽऽह न स्वयं इन्ति, न स्वयं क्रीणाति न च पचतीति प्रयं, एवं का राप]णानुमतिभ्यामपि यथा नाऽन्येन घातयति न क्रीणापयति न पाचयति वथा नाऽपरेण हन्यमानं क्रीयमाणं पच्यमानमनुमोदते मीलिताचैता नवकोटयः एभिनवभिः पदैः पिण्डविशुद्धिः सर्वाऽपि संगृह्यते इति मायार्थः। इह पूर्व पोडशविध उद्गमदोष उक्तः स च सामान्यतो द्विधा भवति तद्यथा-विशोधिकोटिरूपः अविशोधिकोटिरूपश्च, तत्र यद् दोपदृष्टै मक्ते तावन्मात्रेऽपनीते सति शेष कल्पते स दोपो विशोधिकोटिः शेषस्त्वविशोधिकोटिः। तत्र ये दोपा अविशो. धिकोटिरूपा ये च विशोधिकोटिरूपास्तानाह- संप्राधाकर्म समभेद, उद्देशिकस्य विभागौद्देशिकस्य चरमनिकं कर्ममेदसक्तमन्त्यमेव भेदत्रयं, पुतिर्मक्तपानरूपा, मीसत्ति मिश्रजातं पाखण्डिगृहमिश्र साधुगृहमिश्र, घरमा अन्त्या वादरा इत्यर्थः [र्थी] माभृतिका, अध्यवपूरस्य स्वगृहपाखण्डिमिश्रं स्वगृहसा- धुमिश्ररूपमन्त्पर्य एते उद्गमदोपा अविशोधिकोट्यः । अस्यां चाऽविशोधिकोट्याश्यवेन शुष्कसिक्थादिना तथा भक्तादिना लेपेन बालकवणकादिना अलेपेन संस्पृष्टं यदशुद्धभक्तं तस्मिन् उज्झितेऽपि यत् अकृतकल्पत्रये पाने शुद्धमपि भक्तं पश्चात् परिगृह्यते तत्पूति- तरमवगन्तव्यं । शेषा ओघौदेशिक नवविधमपि च विभागौदेशिकमुपकरणपूतिर्मिश्रस्यायो भेदः । स्थापना सूक्ष्मताभृतिका प्रादुष्करणं १ पिण्डनियुक्ति पृष्ठ ११६ तो पृष्ठ ११९ यावत् कोटिवर्णनं २ पिण्शनियुकि पृष्ठ ११६ तमे ३९३-३९४-३९५ गाथावृत्तौ सविशेषवर्णन -

प्रथम
संवरद्वारे
विशोधि
अविशोधि
कोटि-
स्वरुपम्
घवगपचुपचायियवत्तदेहं च फासुयं च न निसज्जकहापओयणक्खासुओवणीयति न तिगिच्छामंतमूलभेस.
क्रीतं प्रामित्यक परिवर्तन अभ्याहृतं उद्भिद्यं मालापहृतं आच्छेद्यमनिसृष्टः मध्यवपूरकस्यायोमेदश्चेत्येवरूपा विशोधिकोटिः। विशुद्ध्य-
ति शेपं शुद्धमक्तं पस्मिन् उधृत्ते यद्वा विशुद्ध्यति पात्रमकृतकल्पत्रयमपि यस्मिन्नुज्झिते सा विशोधिकोटिः उक्तं च
'उदेसियंमि नवगं उवगरणे जं च पूइयं होइ । जावंति य मीसगयं, अज्झोयरए य पदमपदं ॥१॥
परियटिए अभिहडे, उन्भिन्ने मालो हडे इय । अच्छिन्ने अणिसिट्टे पाउयर कीयपाभिचे॥२॥
| सुष्टुमा पाहुडिया विय, वियगहिविय]पिंडो य जो भवे दुविहो । सव्वोवि एस रासी, विसोही कोडी मुणेयव्वा ।
इवच भिधामटता पूर्व पात्रे शुद्धभक्तं गृहीतं, ततस्तत्रैवाऽनाभोगादिकारणवशात् विशोधिकोटिदोपदुष्टगृहीतं कथमपि ज्ञातं, तथैव-
द्विशोधिकोटिदोपदुष्टं मया गृहीतं, ततो यदि तेन विनाऽपि निर्वहति तहिं सकलमपि तद्विधिना परिष्ठापयति । अथ न निर्वहति ततो
पदैव विशोधिकोटिदोपदुष्टं तदेव तावन्मा परिक्षाय परित्यजति । यदि पुनरलक्षितेन सदृग्वर्णगंधादितया पृथग परिज्ञातुमशक्येन
मिश्रं मपति, यथा द्रवेण तक्रादिना तदा सर्वस्याऽपि तस्य विवेका, कृते च सर्वात्मना विवेके यद्यपि केचित् सूक्ष्मावयवा लगिता भव-
ति तथापि पाने अकृतकल्पेऽपि अन्यत् परिगृहन् शुद्धसाधुरेपणीयभोजीनित्यक्तभक्तादेविंशोधिकोटित्वादिति अलं प्रसङ्गेन, एवमन्य-
मनुवक्ताऽपि शय्यातरपिण्डराजपिण्ड-अग्रपिण्ड कान्तार-दुर्भिक्ष-भक्तायनेकदोपाः शाखान्तरादवसेया। अथ सूत्रप्रस्तुतं लिखामः।
व्यपगताः पृथग्भूताः देयवस्तुसंभया आगन्तुका वा कम्यादयः च्युताः मृताः परतो वा देयवस्तु-आश्रिवाः पृथिवीकायि.
पिण्डनियुक्ति पृष्ठ ११७ तमे ३९५ गायापत्तौ तिम्रो गाथाः
॥३६॥

+ जकजहेडं, न लक्खणुप्पायसुमिणजोइसनिमित्तकहकप्पउत्तं, नवि डंभणाए, नवि रक्खणाते, नवि सासणाते, नवि भणरक्वणसासणाते भिक्खं गवेसियव्य, नवि वंदणाते, नवि. माणणाते, नवि पूयणात, नवि वंदणमाण- कादयो वा। चइयत्ति [चाचियत्ति] त्याजिता वा देयद्रव्यात् पृथरकारिता दायरेन चत्तत्ति खयमेव वा पृथग्भूता देदा यस्मात् उच्छाद तत्तथा। प्राशुकच प्रगतप्राणिका व्यपगतचेवनापर्यायः तादृशं शुद्ध सदपि कथं लब्धं तदाऽऽह-न-निषेधे निपट-गोचरगत आसने उपविश्य कथाप्रयोजन-धर्मकथाव्यापारः तस्य यत् करणं तदकरणेन यत् प्रासं तत्र शुद्धं न-नैव चिकित्सा-रोगप्रतीकारः मत्रश्च-चेटिकादिदेवाधिष्ठिताक्षरानुपूर्वी मूल-वृक्षवल्लयादीनां भेपर्ज च-द्रव्य संयोगरूप हेतु:- कारणं लाभापेक्षया यस्य गोचरगतस्य तत्तथा । न-निषेधे स्त्रीपुरुषादीनां लक्षणं-स्त्रीपुरुपवेण्यादीनां लक्षणं, उत्पावा:-प्रकृतिविकारा:, सुमिणति निद्राविकारः, ज्योति-नक्षत्रं चन्द्रयोगादि निमित्त-चूडामणिशाखादिना अतितादिभावसंपादनं, कथा-कामशास्त्रार्था- दिका, कुहकं-परेषां विसयोत्पादपयोगः एभिः आक्षिप्तचेतोदायकेन व्यापारितं तं भैक्षं न शुद्धं । तथा नाऽपि दम्मेन-मायामयोगेन, नाऽपि रक्षणया दायकस्य वस्तुनः, नाऽपि शासनया-शिक्षणया पुत्रवत्सकगृहादीनामिति गम्यं, नाऽपि उक्तत्रयसमुदायेनेत्याह- दम्भ-रक्षण--शासनादितो, नैव भक्ष्यं-मिक्षासमुहो वा गवेपयितव्यं अन्वेषणीयं । किंच पुनः नैव वन्दनया-स्तवनेन सो एसो जस्स गुणा वियरंति आयरिया दस-दिसासु इहरा कहासु सुणिमो पचक्खं अन्न दिट्ठोऽसि ॥१॥ १ पपः स प्रत्यक्षः यस्य गुणा आचरिता दस दिशासु अन्यथा कथासु श्रूयते अद्य प्रत्यक्षं दृष्टोऽसि ॥१॥ तथा पिंडनियुक्तिगत । ४९१ तमो श्लोकः एतत्सरश एव -

प्रथम
संवरद्वारे
अहिंसाया
कारकाः
पूयणाते भिक्खं गवेसियव्यं, नवि हीलगाते नवि निंदणाते नवि गरहणाते नवि हीलणनिंदणगरहणाते
भिकर्ष गवेसियवं,नवि मेसणाते नवितजणाते नवि तालणाते नवि भेसणतजणतालनाते भिक्खं गवेसियव्वं,
नवि गारयेण नवि कुहणयाते नपि वणीमयाते नवि गारवकुहणवणीमयाए भिक्खं गवेसियचं, नवि मित्तयाए
-नापि माननया-आसनादिदानेन प्रतिपल्या वा, नाऽपि पूजनया-तीर्थमाल्यदानमस्तकगन्धक्षेपमुखवस्त्रिकाऽक्षमालिकादाना.
दिलवणया, नाऽपि उक्तत्रयलक्षणया वन्दन-मानन-पूजनहेतुभूतया, मैक्ष्यं नैव गवेषयितव्यं । नाऽपि हीलनया जात्युद्घाटनतः,
नाऽपि निन्दनया दापकदोपोद्घाटनेन वा, नाऽपि गईणया-लोकसमक्षं दायकनिन्दया, न-निषेधे उक्तत्रयलक्षणया हीलणनिंदणगर-
इणया मैत्यं नैव गवेपयितव्यं । नाऽपि-नैव भेपणया-दायकस्य अनर्पयतो भयोत्पादनेन, नाऽपि तर्जनया-ज्ञास्यसि रे दुष्ट इत्यादि
रूपया, नाऽपि वाडनया चपेटादिदानतः, नैव-निषेधे उक्तत्रयरूपेण मेषणतर्जनतालनारूपेण हेतुना भैक्ष्य-आहारादि न गवेषयि.
|तव्यं । नाऽपि गौरवेण-गण राजपूजितोऽहं इत्याघभिमानेन, नापि कुधनवया-दारिद्रथमावेन इत्यादि प्राकृतत्वेन अथवा कुहनं
दम्मचर्या तया अन्तः क्रोधोद्भूतमुखमिष्टत्वेन वा, वनीपकवृत्या वा अस्माकं सर्व याच्यमानमेव भवतीति याचनापरेण, न-नैव
उक्तमयरीत्या गारव-कुहण-वणीमगरूपेण हेतुना मैक्ष्यं पिण्डं न गवेषयितव्यं । नैव मित्रभावमुपगतस्य दायकं प्रति तेन हेतुना,
नाऽपि प्रार्थनया-याचनया किन्तु साधुवेपदर्शनेनैव दायकस्य हर्पोत्पत्तिः पडिरूवेण सेवित्ता मियं कालेण भक्त्रए त्ति इति
वचनात् । नाऽपि सेवनया सामिभृत्यवत् , नाऽपि युगपत् उक्तत्रयमीलकेनेत्याह मैक्ष्यं गवेपयितव्यं यद्वा एभिर्हेतुभिर्नेव ।
१ प्रतिरूपेण सेवित्वा मित कालेन भक्षयेत्
॥३७॥

. . नवि पत्थणाए नवि सेवणाए नवि मित्तपत्थणसेवणाते भिक्खं गवेसियव्वं, अनाए, अगढिए, अदुहे, अदीणे, अविमणे, अकलुणे, अविसाती, अपरितंतजोगी, जयणघडणकरणचरियविणयगुणजोगसंपउत्ते, भिक्खू भिक्खे- सणाते निरते। इमं च णं सव्वजगजीवरक्षणदयट्ठाते पावयणं भगवया सुकहियं अत्तहियं पेचाभावियं आगमेसि. मई सुद्धं नेयाउयं अकुडिलं अणुत्तरं सव्वदुखपावाण विउसमणं (सु०२२)। तस्स इमा पंच भावणातो पढमस्स तदा किं पुनः कया रीत्या गवेषणा कार्या इत्याह । अज्ञातः-खयं स्वजनादिसम्बन्धाकथनेन गृहस्थैरपरिज्ञातखजनादिभावस्तेन, तथा अग्रथिवः-मातेऽपि सम्बन्धे आहारादिपु अपतिवद्धः, अद्विष्ट:-आहारेषु दायकेपु वा अदुष्ट, अदीन:-अक्षुभितः, अविमना- न विकतमानसः अलाभादिदोपाद , अकरुणो-न दयास्थानं न्यग्वचित्वात् , अविषादी-अविपादवचनोऽदीन इत्यर्थः, अपरितान्ताः- अथान्ताः योगा:-मनःमभृतयो यस्य सः अपरितान्तयोगी सदनुष्ठानेषु अत एव यतनं-प्राप्तेषु संयमयोगेपु अथवा यतनं उद्यमः घटनं च-अप्राप्ते घटसंप्राप्ते संयमे करणं-विधिः योजनं, चरितः सेवितः विनयो येन स परिवपिनयः, गुणयोगात् क्षमादिगुणैः संप्रयुक्तः। तथा पदास कर्मधारयः । एतादृशो भिक्षुः भिक्षेपणायां निरतो भवेदिति सम्बन्धः । इमं चत्ति इदं पुनः पूर्वोक्तगुणभैक्ष्यादिप्रतिपा- दनपरं इति योगः,सर्वजगजीवरक्षणरूपा या दया तदर्थ प्रावचनं शासन भगवता श्रीमहावीरेण पूज्योत्तमेन सुष्टु:-शोभनत्वेन कथित- न्यायायाधितत्वेन, आत्मनां-जीवानां हितं हितकरणत्वाद, प्रेत्य-जन्मान्तरे भवति-शुद्धफलतया परिणमति इत्येवं शीलं प्रेत्यमा. विक, आगामिकाले मद्र-कल्याण यतस्तदाऽऽगमिष्यत् मद्रं । शुद्ध-निर्दोष, नेयाउयं ति नैयायिक-न्यायवृत्ति, अकुटिलं-मोक्षं प्रति ऋजु, अनुचरं-प्रधानत्वात् , सर्वेषौ दुःखानामसुखाना पापानां च तत्कारणानां व्यपगममुपशमकारकं यत्तत्तथा । अथ यदुक्तं 'तीसे , ,

प्रथम
संवरद्वारे
भावना
वयस्स होंति, पाणातिवायवेरमणपरिरक्षणट्टपाए पढम ठाणगमणगुणजोगजुंजणगंतरनिवातियाए दिहिए
ईरियचं, कीडपयंगतसधावरदयावरेण निचं पुष्फफलतयपवालकंदमूलदगमट्टियवीजहरियपरिवज्जिएणः संमं,
एवं खलु सब्बपाणा न हीलियव्वा, न निंदियव्वा, न गरहियव्या, न हिंसियव्वा, न छिदियव्वा, न भिदियचा,
न वहेपव्या, न भयं दुक्खं च किचि लम्मा पावे एवं ईरियासमितिजोगेण भावितो भवति अंतरप्पा अस.
भावणाए उ किश्चि वोच्छं गुणदेसं ति तत्र काः मावना अस्यां जिज्ञासायामाह-
तस्य प्रथमवतस्य इमा वक्ष्यमाणाः प्रत्यक्षाः पञ्च मावना भाव्यन्ते-प्रथमव्रतस्य भवन्ति, प्राणा-जीवास्तेषां अतिपातो नाशस्तस्य
विरमणलक्षणस्वरूपं तस्य परिरक्षणार्थ प्रथमभावनाऽवस्थितिः कोपयुज्यते तदाऽऽह-स्थान-निपीदनं गमनं-चलनं तयोर्गुणयोगं प्रव.
धनोपघातवर्जनलक्षणो गुणस्तस्य योगः-सम्बन्धस्तं योजयति-करोति या सा, युगं धूसरं युगान्तरे-युगप्रमाणभूभागे निपतति या
सा पुगान्तरनिपातिका ततः कर्मधारयः ततस्तया दृष्टया-चक्षुपा ईरितव्यं गन्तव्यं, केनेत्याह-कीटा:-क्षुद्रजन्तवः ईलिकाया:
पता:-शलभाः बसस्थावरास्तेषु दयापरेण, नित्यं-सदा पुष्पफलत्वक् प्रवालः-पल्लवाङ्करः कन्दमूलं दकं-जलं मृत्तिका बीजहरित-
प्रमुस्वपरिवर्सनेनेति सम्यक् शोभनत्वेन अथ इयर्यासमित्या प्रवर्त्तमानस्य यत् स्याचदाऽऽह-
एवममुना प्रकारेण सलु-निधितं सर्वमाणा:-सर्वजीयाः न हीलयितव्या:-अवज्ञातव्या, न निन्दितव्या न गहितन्या: गर्दा च
परसमई, तथा हिंसितव्याः पादक्रमणेन, एवं न छेदितव्याः द्विधाकरणेन, न मेतन्या:-स्फोटनेन अण्डादीनां, न व्यथितव्याः
परितापनादिना पीडोत्पादनेन वा, न-निपेधे भयं-भीतिः दुःखं च-शरीरादि किश्चित् अल्पं अपि लभ्या:-योग्याः प्रापयितुं ये इति
॥३८॥

पलमसकिलिनिवणचरित्तभावणाए अहिंसओ सुसंजओ सुसाह, वितीयं चमणेण पावएणं पावकं अहम्मियं पारणं निस्संसं वयंघपरिकिलेसयाटुलं मरणभयपरिफिलेससंकिलिटुं न कयावि मणेण पावतेणं पावर्ग किंचि- विज्ञापवं । एवं मणसमितिजोगेण भावितो ण भवति अंतरप्पा असवलमसंकिलिनिव्वणचरित्तभावणाए अहिंसओ संजओ सुसाह, ततियं च यतीते ६ निपातो पायपालधारे एवं ये प्राणिनः । इर्यासमितिण्यापारेण भावितो-यासितो भवति अन्तरात्मा-जीवः किविध इत्याह ? अशवलेन- पारित्रमालिन्यरहितेन हस्तकर्मरात्रिभोजनादिलक्षणकविंशतिमितैन असंक्लिष्टेन-विशुद्धयमानमनःपरिणामवता निवणेन अक्षतेन- अममितेन पारिप्रेण-सामापिकादिना भावना वासना यस्य सः अशवल-असंक्लिनिवणचारित्रभावना अथवा अशपल-असंक्लि- शादिहेतुभूवया भावनपा अहिंसका, सुसंयतो-मृपावादाद्युपरतिमान् सुसाधुर्मोक्षसाधक इति एपा प्रथमा भावना । द्वितीया पुनरिना मनसा पापं न ध्यातव्यं एतदेवाऽऽह-मनसा पापकेन पापकमिति ततश्च पापकेन-दुष्टेन सता मनसा पाप- फेन पापकमिति न यातव्यं इति सम्पन्यः । पुनः किंभूतं पापमित्याह-अधार्मिकाणामिदमाधार्मिकं तत् दारुणं निशंसं निःशूकं- दयारर्जितं । वपन्धन-हननेन यमनेन परिकेशेन-परितापनेन च तैर्यहुलं-व्याप्तं । मरणभयपरिलेशसंक्लिष्टप्रचुरं-न कदापि कस्मिन्नपि समये पापकेन-मनसा-पाप-प्राणाविपातात्मकं किश्चिदपि अल्पमपि न ध्यातव्यं एकाग्रतया न चिन्तनीयं । एवमनेन प्रकारेण मनः समितियोगेन-निचसत्प्रवृत्तिलक्षणव्यापारेण भावितो भवति अन्तरात्मा-जीवः कीदृशः सन् इत्याह असयल-असंक्लिष्ट निर्वणचा- रित्रमावनपा हेतुभूतया अहिंसको-दयावान् सुसंयतो-गुप्तेन्द्रियव्यापारः सुसाधु-अंतरुपशमवर्ती इति द्वितीया ।

प्रथम संवरद्वारे भावनाः IOCL4 पापिपाते पावकं [अहम्मियं दारुणं निसंसं वहयंघपरिकिलेसबहुलं जरमरणपरिकिलेससंकिलिटुं न कयावि तीए पावियाते पावन किंचिवि भासियव्वं एवं वयसमितिजोगेण भावितो भवति अंतरप्पा असवल- | मसकिलिहनिव्वणचरित्तभावणाए अहिंसओ संजओ सुसाह, चउत्थं आहारएसणाए सुद्धं उञ्छ गवेसियध्वं अन्नाए अकहिए, अदीणे, अकलुणे, अविसादी, अपरितंतजोगी, जयणघडणकरणचरियविणियगुणजोग. संपओगजुत्तो, भिक्खू, भिक्खेसणाते जुत्ते, समुदाणेऊण भिक्खाचरियं उंछं घेत्तूण आगतो गुरुजणस्स पासं अब तृतीया पुनर्भावना च सुवचनसमितः पत्र वाचा पापं न भणितव्यमिति आह-वतीते पावियाते पूर्ववत् काकुभाषया अध्येयं, पापात्मिकया पापकं, नवरं आधार्मिकं दारुणं निःशूकं-निर्दयं वधवन्धनपरिक्लेशप्रचुरं, जरामरणपरिक्लेशसंक्लिएं, न कदापि पापिकया, पाचा पापात्मकं-प्राणिघातात्मकं, न कदापि भापितव्यं, एवममुना प्रकारेण वचनसमितियोगयुतो भावितो भवति अन्तरात्मा-जीव: असपल-असंक्लिए-निगचारित्रमावनया कृत्या अहिंसकः संयतः सुसाधुरिति तृतीया । चतुर्थभावना-या आहारं अशनादि चतुर्धा [तेषां] एपणा पूर्वोक्ता तया शुद्धं, उञ्छ-गृहसमुदायगतं गवेषयितव्य इदमेव भाव- पितुमाह-अन्नाती-अनपगतो दायकजनरयं श्रीमान् प्रवजितोऽस्ति इति न झातः, अकथितः खयमेव यथाहं श्रीमान् पूर्वमभूवं इति, अप्राप्ती अदीनः अथवा दीनोऽहं पूर्वमिति, अकलुपः-आशयशुद्धः, कुत्रचित् 'अगढिए अदुट्टे' इत्यपि पाठः तत्र अगृद्धिकः अ. द्विष्टः दायकादायकोपरि समचित्तः, अविषादयान , अपरितान्तयोगी-अथान्तत्रिकरणयोगः। यतनं-घटनं निष्पादनं करणं धरणं मूल- १ मुद्रितप्रती न । २ मदते मदुट्टे पाठारतरे ॥३९॥ - - गमणागमणातिपारे परिणामेपडिते, आलोयणदायणं च दाऊण गुरुजणस्स गुरुसंदिवस वा जहोवएसं नि- रागारं पमपमतो, गुणरपि अणेसाणाते पयतो, पडिपमित्ता पसंते आसीणसुहनिसन्ने मुहुत्तमेत्तं च झाण- गुहजोगनाणमम्मायगोपियमाणे, धम्ममणे, अविमणे, सुहमणे, अविग्गहमणे, समाहियमणे, सद्धासंवेगनिज- रमणे, पतपालभावियमणे उहे जण य पमहत्तु जहारायणिपं निमंतइत्ता य साहवे भावओ य विइपणे य गुगोगरगुण नेन परितः सेवितः पिनपयोगयुक्तः सम्पर प्रयोगे व्यापार संयमलक्षणस्तेन युक्तः। भिक्षुः साधुः भैल्यैपणापा योग- पक्ष:, गामुदापि अटिया मिधान गोचर उंछमिन उंछनं अल्पाल्पगृहीतमैक्ष्यं गृहीत्वा आगतः गुरुजनस्य पाच-समीपं गमना- गमना:तिभागना प्रविक्रमन पिथिक दंढकेन प्रतिक्रान्तो निचितपापः। आलोचनं-अयथा गृहीतमक्तपाननिवेदनं तयोरुपदर्शनं पला गुरुवनस्य-गुरसंदिष्टस्य वा समस्य पयोपदेश-उपदेशाऽनविक्रमेण निरविचार-दोपवर्जनेन अप्रमत्तः, पुनरपि अनेषणाया अपरिशावानासोनिनदोषपापा प्रयत:-प्रपत्नरान् इति प्रतिक्रम्य च कायोत्सर्गकरणानन्तरं कीदृशः प्रशान्तः-अनुत्सुकः, आसी. ना-उपरिटः गुनियः अनायाधिवाल्या पदवयस्य कर्मधारयः। ततो मुहूर्तमानं च कालं ध्यानेन धर्मादिना शुभयोगेन-संयमव्या- पारेण गुरुरिनपकरणादिना मानेन-ग्रन्यानुप्रेक्षणरूपेण साध्यायेन-अधीतगुणनरूपेण वा गोपित-विषयान्तरगमनेन निरुद्धं मनो येन म गया। अवएर धर्म-भुवनारियरूपे मनो यस्य स तथा श्रुतमना इत्यर्थः। तथा अविमना:-अशून्यचित्तः, शुभमना:-असंक्ति- एपेका, अधिग्रहमना:-अकलहवा अयुग्रहमना वा-अविधमान-असदभिनिवेश इत्यर्थः। सम-तुल्यं रागद्वेपानाऽऽकलितं आदित- अपनी आत्मनि मनी पेन स समाहितमनाः अथवा शमेन-उपशमेन च अधिकं मनो यस्य स समाधिकमना वा शमे-उपशमे

प्रथम
संवरद्वारे
भावनाः
गुरुजणेणं उपविढे संपमजिऊण ससीसं कायं सहा करतलं अमुच्छिते, अगिद्धे, अगढिए, अगरहिते, अण-
झोववणे, अलुद्धे, अणुतहिते, असुरसरं अचवचदं अचुतमविलंबियं अपरिसाडि आलोयभायणे जयं
स्थापितं मनो येन गुरुणा दत्ते अदत्ते संप्रदायादीनां अस्था[तापितमना इत्यर्थः । अथ श्रद्धा-तवार्थश्रद्धानं संयम-योगविपयोचामि-
लापा, संवेगव-मोक्षमार्गामिलापः संसारभयं वा निजरा-कर्मक्षषणं मनसि यस्य स श्रद्धासंवेगनिर्जरमनाः । प्रवचनवात्सल्यभावितमना
वा, उत्थाय च प्रहृष्टतुष्टोऽतिशयप्रमुदितः यथा रत्नाधिक-यथाज्येष्ठं निमन्त्र्य-आहूय आमन्त्र्य साध साधून साधर्मिकान्-श्रद्धाप-
वचनलिङ्गादिभिः समानान्-धर्माचारान् भाववश्व भक्तस्तद्गुणानुमोदी वितीर्ण दत्ते च, गुरुजनेन मुंव त्वमिदमशनादीन् अनुझाते च
| सति [भक्तादौ], गुरुणा उपविष्टे दत्तासने सौम्य अत्र तिष्ठ इत्यनुज्ञया उपविष्टः संप्रमृज्य च प्रतिलेख्य मुखवस्त्रिकारजोहरणादिना वा
सशीप-समस्तकं सकार्य-सनखकरतच अमूच्छिता-आहारविपये मूढिमानं न गतः, अगृद्धः-अमाप्तेपुरसेषु अनाक्षिावान् , अग्र-
पिता-रसानुगतरसः, अगर्हितः-आहारविपये अक्तगईः, अनप्युपपन्नो-न रसेपु एकाग्रमनाः, अलुब्धो-लोमरहितः नोदरपिशाच
| इत्यर्थः, न आत्मागरीररूपस्तस्य अर्थों यस्येत्यनात्मिकार्थः परमार्थकारीत्यर्थः । कया रीत्या? आहारमाहारयति तदाऽऽह अंसुरसरं
एवंभूतं शब्दरहित । अचपचवेति शब्दरहितं । अहुत-अनुत्सर्क अविलम्बित-न अतिमन्दं अपरिशाट-परिशाटि दोपवर्जित अपरि-
शाटि भुंजिला इति, अग्रेवनपदेन सह क्रियायोगः। आलोकमुखे भाजने पृथुलमुखे अथवा आलोके प्रकाशे नाऽन्धकारे, पिपीलीका-
चालादीनामनुपलम्भाव, तथा भाजने-पात्रे, पात्रं विना जलादिसंपतिवसचादर्शनाद, यतं-मनोवाकायसंयमत्वात् प्रयत्नेनादरेण
१सरस राग नहीं इति माषा २ पचयाट नहीं मापा
,
॥४०॥

-- पपत्तेण वषगयसंजोगमणिगालं च विगयधूमं पुनः की ? व्यपगवसंयोजनादोपरहित, अगिंगालं विगवरागं, विगतमं-देपरहितं यदुक्तं-रागेण सइंगालं दोसेन सघूमगं रियाणाहिचि वचनाद । अप किथित् संयोजनादि पश्चग्रासैपणादोपानाह-तत्र प्रथम संयोजना पश्चकापेक्षया संयोजनं संयोजना उत्कर्पोत्पादनं-द्रव्यस्य द्रष्यान्तरेण मीलनं सा द्विधा उपकरणविषया भक्तपानविषयाच, एकैकाऽपि द्विविधा पायाम्पन्तरभेदमिन्ना । तत्र उपकरणविषया बाह्य. संयोजना यथा कश्चित् साधुः कुत्रापि गृहे भव्यं चोलपट्टादिकं प्राप्य पुनर्विभूषार्थ तदुचितं पट्टीप्रभृतिक मार्गयित्वा वसते हिरेव प्राणोमीवि । अभ्पन्तरा तु बसतो निर्मठचोलपट्टादिकं परिधाय विभूषानिमि तदनुरूपामेव निर्मला नांदिपट्टी परिदधाति । तथा मिक्षाधं हिण्डमानः सन् क्षीरादिकं तथा अनुकूलद्रव्यैः खंडादिभिस्सह रसगृध्रया विशेपरसोत्पादनाय पहिरेव संयोजयति एपा बाह्य- भक्तपानविपया संयोजना । अभ्यन्तरा पुनर्यद्वसत्तावागत्य भोजनवेलायां संयोजयति । सा च त्रिधा, पात्रकपिपया कबलकविषया मुख- विपया प, वत्र मोजनसमये यत् पायसादिकं खण्डादिना यद्रोचते तद्रसगृद्ध्या तेनैव सह एकस्मिन् पाने संयोजयति सा प्रथमा, यदा तु हस्तगतमेव फरलतया सुकुमारिकादि खण्डादि सह संयोजयति सा द्वितीया । यदा पुनर्मण्डकादिकं मुखे प्रक्षिप्य पश्चात् गुडादिक प्रक्षिपति तदा तृतीया । अपवादवाऽध एकैकं साधुसंघाटकं प्रतिप्रचुरघृतादिप्राप्ती सत्या भोजनाऽनन्तरं यदि कथमपि यदुद्धरितं भवति तद् उद्धरितघृतादिनिर्गमनार्थ खण्डादिभिरपि संयोजना भवति तत् न दोपाय । उद्धरितं हि घृतादि न खण्डादिकमन्तरेण मण्डकादि- १ पिंडनियुक्ति ६५९ । २ पि०नि० पृ० १७२

प्रथम
संवरद्वारे
ग्रासैपणा.
दोपाः
मिरपि सह मोक्तुं न शक्यते प्रायस्वप्तत्वात् तच न परिष्ठापनं युक्तं,घृतादिपरिष्ठापने स्निग्धत्वात् पश्चादपि पिपीलिकादिप्रणाशसंभवात् ,
तथा ग्लानस्य भव्यभवनार्थ वा यद्वा भक्तारोचकिनः प्रधानाहारलालितस्य सुखोचितस्य राजपुत्रादेवा साधूचितेन संयोगरहित.
| माहारेणाऽऽद्यापि सम्यम्भावितस्य मोक्षस्य वा निमित्तं रसगृयापि संयोजना कल्पत एवेति । इदानी प्रमाणमाह-
कुर्कुटमण्डप्रमाणमात्रा कवला द्वात्रिंशत् तत्र कुर्कुटी द्विधा द्रव्यकुर्कुटी भावकुर्कुटी च, तत्र साधोः शरीरमेव कुर्कुटी तन्मुख अण्डक
तवाऽक्षिकपोलोपभ्रुवां विकृतमनापाद्य यः कवलो मुखे प्रविशति तत्प्रमाणं कवलस्य । अथवा कुर्कुटी पक्षी तस्या अण्डकं तस्य प्रमाणं
| कालस्य तथा यायन्मात्रेण कवलेन भुक्तेन न न्यूनता नाप्यत्याध्मातमुदरं भवति धृतिश्च विशिष्टा संपद्यते ज्ञानदर्शनचारित्राणां
च पृद्धिरुपजायते तावत्प्रमाणो आहारो भावकुर्कुटी तस्य द्वात्रिंशत्तमो भागः अण्डकं तत्प्रमाणं कालस्य, ततो द्वात्रिंशत्कवलाः पुरुष-
स्प लियास्तु अष्टाविंशतिः क्लीवस्य चतुर्विशतिः । उक्तं च तंदुलवेयालिके-
पत्तीसं करला पुरुसस्स आहारो इत्थीयाए अट्ठावीसं चतुविसं पंडयस्स चि। अधिकाहारस्तु अजीर्यमाणः सन्
पापये पमनाय मृत्यवे च भवति । यदुक्तं--
अइपहुयं अइयहुसो, अइपमाणेण भोयणं भूत्तं । हाहेज व चमिज व मारिज व तं अजीरंतं ॥१॥
इदानीमगारदोपमाह-रागेण अन्नस्य वा तद्दातुः प्रशंसारूपेणाऽऽस्वादयन प्रासुकमायाहारं कुर्वाणः स्वचारित्रं साङ्गार चरणधनस्य
अङ्गारमयनत्वात् । अत्र मावार्थस्तु इह द्विधा अंगारः द्रव्यतः भावतश्य, तत्र द्रव्यतः कृशानुदग्धाः खादिरादिवनस्पतिविशेषाः भावतो
१ वि०नि० पृ० १७३ २ पिण्डनियुक्ति गाथा. ६४६
॥४॥

. रागामिना निर्दग्धं चरणेन्धनं, तथा यथा दग्धेन्धनं धूमे गते सति अङ्गार इत्युच्यते, एवमिहाऽपि चरणेन्धनं रागाग्निना निर्दग्धं सत् अङ्गार इत्युच्यते, ततश्च भोजनगतविशिष्टगन्धरसास्वादवशेन संजाततद्विषयमूर्छस्य सतः अहो मृष्टं अहो सुसंस्कृतं अहो स्निग्ध अहो सुपचं अहो सुच्छिन्नं सुहृतं अहो सरसं वेत्यादि प्रशंसातः सहाङ्गारेण यदर्तते तत्साझारमिति २ इदानीं धूमदोपमाऽऽह-द्वेषेण अन्नस्य तद्दायकस्य वा निन्दात्मकेन अमनोज्ञममधुराहारं भुजानश्चारित्रं-चरणं सध्मकं करोति निन्दात्मकं कलुपस्वभाव धूमसन्मित्रत्वात् , अत्राऽप्ययं भावार्थः-इह द्विविधो द्रव्यतो भावतश्च तत्र द्रव्यतो अर्धदग्धानां काष्ठानां सम्पन्धी, मावतो उपामिना दद्यमानस्य चरणेन्धनस्य सम्पन्धी कलुपभावो-निन्दात्मका, ततो यथाऽऽङ्गारत्वमप्राप्त ज्वलदिन्धन धूम कथ्यते एवं द्वेषाग्निना दह्यमानं चरणेन्धनमपि साधूनां सधूमं ततश्च भोजनमपि गतरूप-विगंध-विरसास्वादतो जावतद्विपयव्य- लीकचित्तस्य सतो अहो विरसं विगन्धं अपक्वमसंस्कृतमलवणमेवेति निन्दावशात् धूमेन सह वर्तते यत् तत् सधूमं चारित्रमिति । अधुना कारणमाह-वेयणवेयावच्चे इत्यादीनि पद् कारणानि प्रत्येकं भोजनेऽभोजने च ज्ञेयानि, तथा क्षुद्वेदनोपशमनाय भुजीतेति सर्वत्र क्रियासम्पन्धः घुभुक्षा हि न शक्यते सोढुं सर्ववेदनातिशायित्वाक्षायाः 'छुहा समा चेपणा नत्थी ति वचनात् तथा धैयावृत्त्यकरणार्थ बुभुक्षितोऽपि हि गुर्वादीनां चयापत्यं कर्तुं न शक्नोति । तथा इर्यासमितिः सैव निर्जराणिमिर- Nमानतयाऽर्थस्तस्मै चुभुक्षापीडितस्य हि चक्षुामपश्यतः कथमीर्यासमितिपरिपालनं स्यात् , तथा संयमार्थाय क्षुधानों हि प्रेक्षाः । १ पिं० नि० गाथा ६६२ वेयणवेयावच्चे इरियहाए य संजमट्ठाप तह पाणवत्तियाए छदं पुण धम्मचिंताप २ पंथ समा मस्थि जरा दारिदसमो य परिभयो नस्थि । मरणसम नत्थि भयं लुहां समा धेयणा नत्थि ॥१॥ पिं०नि० पृ० १७७ प्रथम संवरद्वारे ग्रासपणा- दोपाः - प्रमार्जनादिलक्षणं विधातुमलं [न] अतः संयमाभिवृद्ध्यर्थ, तथा प्राणा उसासादयो बलं वा प्राणास्तेपो तस्य वा निः-पालनं तदर्थ प्राणसंधारणार्थमित्यर्थः, यद्वा प्राणप्रत्ययं बलं जीवितनिमित्तं अविधिना उपक्रमेण नियमाणेऽहिंसा स्यादत एवोक्तं भावियनिणययणाणं ममत्तरहियाण नत्धि हु विसेसो। अप्पाणमि परंमिय तो यज्जे पीडमुभए वि ॥१॥ पठं पुनरिंदं कारणं यदुत धर्मचिन्तायै धर्मध्यानचिन्ता [श्रुतधर्म चिन्ता वा ग्रन्थपरावर्तनचिन्तनवाचनादिरूपा, इयं हि उभय- रूपाऽपि युरक्षालिवचेतसो [न] वस्या-ध्यानसंमवादिति । इह च यद्यपि वेदनोपशमादीनां शाब्दकृत्या तदुपलक्षिते भोजनफलस्वेन प्रतीतिस्तथापि वैविना निषेधवननादर्थवृत्या कारणत्वमेवैपामुपदर्शित अप आलंकादीनि पडेप अमोजनकारणन्याह-- आके ज्वरादौ रोगे समुत्पन्ने न भुञ्जीत-उपवासान् कुर्वतो हि मायेण ज्वरादयो यांति, यदुक्तं- वेषिलाविरोधिनिर्दिष्ट ज्वरादौ लखनं हित । [ोचतेऽनिलश्रमकोधशोककामक्षतज्वरान् ॥१॥ वयोपसर्गे देवमनुष्यविर्यग्भवे संजाते सति तिविक्षपाहतुभूतया उपसर्गसहनार्थमित्यर्थः उपसर्गाश्च अनुकूलप्रतिकूलभेदाद द्विविधाः तय माता-पितृ-कलपादिस्वजनकृतोऽनुकूलास्ते हि स्नेहादिना प्रवज्यासेवनार्थ कदाचिदुपतिष्ठन्ते तत्रोपसर्गोऽयमिति मत्वा नाश्नीयात्, यतस्तमुपपासान् कुर्वन्तं वीक्ष्य वनिश्चयावगमान्मरणादिमयाद्वा मुञ्चतीति, प्रतिकुलोपसर्गश्च कुपितराजादिकृतम्त. प्राऽपि न मुजीत विहितोपवासं हि साधु समीक्ष्य राजादयोऽपि प्रायेण संजातदया पुनन्ति इति । तथा ब्रह्मचर्यगुमिनिमित्तं-मैथुनव्रत- १पि०नि० गापा १६७ तो ॥४२॥ . -- - अपग्योपंजणाणुलेवणभूयं संजमजायामायानिमित्तं संजमभारवहणट्ठयार भुजेजा पाणधारणट्ठयाए संजएण संरक्षणार्थमित्यर्थः उपवासान् हि विदधतः कामः काम-दरमुपकामति यदुक्तं- विषया विनिवर्तन्ते, निराहारस्य देहिनः इति वचनाद , तथा माणिदयाहेतोः जीवरक्षणार्थ जलवृष्टौ मिहिकापाते मचित्तरजःपातादौ प्रभूतसूक्ष्ममण्डकिकामसकिकाकोद्रविकादिसच्चसंसक्तायां भूमौ प्राणिदयानिमित्तमटनं परिहरन भुञ्जीत, तथा तपोहेतोस्तपकरणनिमिचं एकद्विव्याधुपवासकरणेन पण्मासान्तं यावत्तपः कुर्वतो न भोजनसंभवः, तथा शरीरस्य व्यवछेदः परिहार- स्तदर्थ, इह हि शिष्यनिष्पादनादिसकलकर्तव्यताऽनन्तरं पाधान्ये वयसि संलेखनाकरणेन यावजीवानशनप्रत्याख्यानकरणयोग्य- मात्मानं कृत्वा भोजन परिहरेत् नाऽन्यथा, शिष्यनिष्पादनाधभावे प्रथमे द्वितीये या वयसि शरीरपरित्यागार्थमनशनप्रत्याख्यानकरणे जिनामाभगः स्यात् , संलेखनामन्तरेणार्तध्यानादिसंभवाच यदुक्तं- 'देहमि असंलिहिए सहसाधाऊहिं बिजमाणाहिं । शायइ अज्झाणं सरीरिणो चरिमसमयम्मि ॥१॥ छुहयेयणवेयावचे, संजमसुहज्झाण पाणरक्खट्ठा। पाणिदया तवहेङ, छपुण धम्मचिन्ताए ।।२।। इति पट्कारणानि आयंके उसग्गे यंभगुत्तीय पाणरावट्ठा । तव संलेहणमेवमभोयणं छसु कुविज्जा ॥१॥ इत्यादिप्यपि विचार्य भोजनं विदध्यात् तदपि भोजन कीदृशं सूत्रकार इति- अक्षय धुरः उपाअनं अक्षोपाखनं तच व्रणानुलेपनं ते-भृते प्राप्ते यत्र तत् तथा तत्कल्पमित्यर्थः, संयमयात्रा संयमप्रवृत्तिः सैव . १ प्रयचनसारोद्धारवृत्ति पृष्ठ २१४-२ पंक्ति ५तो पृष्ठ २१५-२ पंक्ति २ यावत् अन्युनातिरिक्त अत्र न्यस्तं प्रतिभाति

प्रथम
संवरद्वारे
शय्यातर
स्वरूपं
समियं एवं आहारसमितिजोगेणं भाविओं भवति अंतरप्पा असथलमसंकिलिनिव्वणचरित्तभावणाए अहिं.
सए संजए सुसाह,
मात्रा ममाण अर्थो वा संयमयात्रामा निमित्त हेतुर्यत्र तत्तथा, किमुक्तं भवति ? संयममारवहनार्थतया, यथाऽक्षय उपाञ्जनं भारवह-
नक्षम तथा संयमसाधनशरीरं तत आहारमंतरा संयमभारक्षमं न भवति इति कारणात् भुञ्जीत, पुनः कारणान्तरमाऽऽह-प्राणधार-
गार्थतया-जीवितव्यसंरक्षणायेत्यर्थः, संयतेन-साधुना समितं यतनापूर्वकं एवममुना प्रकारेण आहारसमितियोगेन भावितो भवति
अन्तरात्मा असबलअसंक्लिष्टनिवणचारित्रभाषनया हेतुभूतया अहिंसकः संयतः सुसाधुरिति चतुर्थीभावना
अथ प्रसङ्गादागतशय्यातरपिण्डसाऽपि किञ्चिल्लिख्यते-शय्यया साधुसमर्पितगृहलक्षणया दुस्तर-संसारसागरं तरतीति शय्या-
तरः स द्विधा कन्यः प्रभु यतिप्रदत्तोपाश्रयस्वामी प्रभुसंदिष्टो वा तेनैव स्वामिना यत् कृतप्रमाणतया निर्दिष्टो भवति [तेय यः
प्रभुः स एको वा मवेदनेको वा] प्रभुसंदिष्टोऽप्येको वा अनेको वा भवति तत्र चतुर्भङ्गी एकः प्रभुः एक संदिष्टः १ एकः प्रभुः
अनेके संदिष्टाः २ अनेके प्रभवः एकः संदिष्टः ३ अनेक प्रभयोऽनेकप्रभुसंदिष्टाः ४ ते च शय्यावरा एको वाऽनेके वा ते त्याज्या।
परमौयं भावनाऽपवादपदे यथा अनेकेषु-बहुपु शय्यातरेषु सत्सु एक कमप्यपवादपदेन शय्यातरं स्थापयेत् , इयमत्र भावना, बहु-
जनसाधारणा यसतिः काऽपि प्राप्ता तत्र च समाचारीविचारचतुराः श्राद्धा यदि एवं वदन्ति एकं कमपि शय्यातरं स्थापयत मा
१ प्रवचनसारोझार ८००-८०८ गाथागतवृतितो शम्यातरस्वरूपं उद्धरितं प्रतिभाति. २ पतदपि स्खलितं प्रवचनसारोद्धार
तितो पस्तं
.
॥४३॥

an- सर्वानपि परिहरत इति तदा एकं शय्यातरं स्थापयित्वा शेषगृहेषु मिक्षा गृहन्ति, यद्वा पहवस्तत्र साधवस्ततो यदि · सर्वेऽपि संस्त- रन्ति तदा सर्वानपि शय्यानरान् कुर्वन्ति, असंस्तरणे चैकं शय्यावरमिति ग्रहणविधिश्वाऽयं यथा द्वयोः शय्यावरयोरेकान्तरभिक्षान- हणवारको भवति त्रिषु शय्यातरेषु दृतीयदिने एवं वारकेण भिक्षां गृहन्तीति अथाऽयं शय्यातरः कदा भवति तदाऽऽह कस्मिंश्चित् साथै ग्रामादौ वा उपित्वा सुप्त्वा इत्यर्थः, चरमं प्रामातिकमावश्यक प्रतिक्रमणमन्या स्थानान्तरे गत्वा यदि कुर्वन्ति तदा द्वावपि शय्यातरौ भवतः, इदं च प्रायसः सार्थादौ संभवति आदिशब्दाचौरा वस्कन्दमयादिपरिग्रहः । अन्यथा तु प्रकारान्तरसद्भावे भजना शय्यातरस्य विकल्पना यस्य गृहे स्थिताः स च अन्यो या शय्यातरी भवति, भजनामाऽऽह--- यदा रात्रेश्चतुरोऽपि प्रहरान् जाग्रति साधवः आवश्यकमन्यत्र कुर्वन्ति तदा मूलोपाश्रयस्वामी शय्यातरो न भवति । किन्तु सुप्ते वा शयने वा प्राभाविकावश्यक वा शय्यातरो भवति अयं भावार्थः शय्यातरगृहे सकलां रात्रि प्राक् जागरित्वा प्रामातिक प्रतिक्रमणम- न्यत्र कुर्वन्ति तदा [मौलः शय्यातरो न भवति किन्तु यद्गृहे प्रतिक्रमणं कृतं स एव, अथ शय्यातरगृहे रात्रौ सुवा जागरित्या वा प्राभाविकप्रतिक्रमणं कुर्वन्ति तदा] स एव शय्यातरो भवति, यदा तु वसतिसंकीर्णतादिकारणादनेकोपाश्रयेपु साधयस्तिष्ठन्ति तदा यत्राचार्यः स्थितः स एव शय्यातरो नाऽन्य इति । ननु साधूनां गृहमर्पयित्वा गृहेशो यदा देशान्तरं व्रजति तदा स शय्यातरो भवति वा न वेति प्रश्नः, कश्चिद् गृहस्थः साधूनां २ प्रवचनसारोद्धारवृत्तिगता पतत्पंक्तिः स्खलिता दृश्यते

प्रथम
संवरद्वारे
शय्यावर
पिण्डदोषाः
सवेश्म दत्त्वा सपुत्रदारः पुत्रकलत्रादिसकललोकपरिवृतो वाणिज्यादिभिः कारणैस्तमेव देशमन्यं वा व्रजेत् , तत्रापि स्थितो यदि तस्य
गृहस्य खामी स एव शय्यातरो भवति, न पुनरदेशान्तास्थितत्वात्तस्य शय्यातरत्वं न भवतीति । अथायं शय्यातरः कस्य सम्बन्धी
| परिहरणीयस्तदेवाऽऽद-लिङ्गमात्रधारिणोऽपि साधुगुणरहितस्यापीत्यर्थः सम्बन्धी शय्यातरो वर्जनीयः आस्ता यावदितरस्य चारित्रिण
| इति, स च साधुस्तं शय्यातरपिण्ड परिहरतु या भुतां वा तथापि वयः ।
अथ साधुगुणैर्वियुक्तस्य शय्यातरः कसात्परिहियते ? उच्यते-साधुगुणैर्युक्तस्याऽयुक्तस्य वा शय्यातरः सर्वथा परिहर्तव्यः,
अत्राथै मघापणो दृष्टान्तस्तथाहि-
महाराष्ट्राख्यदेशे सर्वेष्वपि महट्टेषु मद्यं भवतु मा वा तथापि तत्परिज्ञानार्थिध्वजो वध्यते, तं च दृष्ट्वा सर्वेऽपि मिक्षाचरादयो-
ऽभोज्यमिति कृत्वा परिहरन्ति । एवमसायपि साधुगुणैर्युक्तो वाऽयुक्तो वा भवतु तथाप्यस्य रजोहरणध्वजो दृश्यते इति कृत्वा शय्या-
तरः परिहियते इति शय्यातर-पिंडग्रहणे कियन्तो दोपाऽस्तानाह-
सीकर : प्रतिष्टो निपिद्धः शय्यातरपिण्डः शय्यावरग्राहिणां तीर्थकराज्ञाभङ्गः अन्नाय उञ्च्छं चरह विशुद्धमिति आगम-
पचनात् अज्ञातस्य अविदितस्य राजादिनयजितत्वेन उञ्छवृत्या यद्गैयं तदज्ञातमुच्यते तदेव प्रायः साधूनां ग्राह्य तत्तु शय्यातर-
पिण्डग्रहणे न भवति, शय्यातरपिण्डग्रहणे सति उद्गमादिदोषाः स्युः तथा खाध्यायादिश्रवणादिभ्यः प्रीतः शय्या तरः]क्षीरादिस्निग्ध.
द्रव्यं ददाति तच्च गृहता गार्थामावो विमुक्तिर्न स्यात् तथा अलाघवता तत्र विशिष्टाहारलामेनोपचितत्वात् शरीरालाघवं च भवति ।
१ तित्थयर परिकहो अण्णायं उग्गमो वि य | सुज्झे । अविमुनि यऽलाघवय दुलहसेज्जा वि उच्छेओ ।
॥४४॥

तया प यसति दुर्लभा मपति येन किल वसतिया तेन आहाराद्यपि देवमिति गृहिणां भयोत्पादनात् , तथा दानभयात् विच्छेदो मवेत् यमतिदानस्येति गम्यं । वघा पूर्वपश्चिमजिनौ[मुवा] द्वाविंशतिजिनमध्यमतीर्थकद्भिः विदेहजैश्च महाविदेहक्षेत्रसमुत्पन्नः सर्वैरपि तीर्थकररेख आघाफर्मादि निपिद्धं मध्यमजिनानां तु यदर्थ कृतं तत् तस्यैवाऽकल्प्यं शेषाणां तु कल्पत एव इत्यादि विमर्शः, परं मागारिकस्य शय्यातस्य पिंडस्तु सर्वैरपि निषिद्ध एवेति । अयं सागारिकपिण्डो द्वादशधा अशनपानखादिमस्खादिम ४ रजोहरण- वस्त्रपारकम्बलशूचीपिपलककर्णशोधननखस्दन १२ भेदात् निषिद्ध एवेति तृणडगलादिकस्त्वपिण्डः, यदुक्तं तृणडगलछारमल्लगसेनासंधारपीढलेवाई। सिजायरपिंडो सो न होइ सेहो सउवहिओ॥१॥ यदि शय्यातरस्प पुत्रापुत्री वा वस्त्रपात्रादिसहिता वा प्रजेत्तदा शय्यातरपिण्डो न भवतीति। तथा साधुसमुदायस्य बाहुल्याद प्रथमालिकापानकाद्यर्थ वा शय्यातरगृहे पुनः पुनः प्रविशत्सु साधुपु सत्सु शय्यातरः आधाकर्मादिदोपानामपि कारणात् , प्रथमालिका इति कोऽर्थः क्षुलकग्लानादीनां प्रथमत एवं भोजनं पानकं प्रतीतं, तथा निरन्तरस्वाध्यायकरणेन च-चारित्रेण वाऽऽयजिताः सागारिका दोपमपि कुर्युरितिहेवोर्न प्रास इति शय्यातरः कियत्कालं यावत् अपवादतो भवेत् तदाऽऽह- अयं पाहोरात्रात्परतोऽशय्यातरः, इदमत्र हृदयं यत्रोपितास्ततः स्थानात् यस्यां वेलायां निर्गता द्वितीयदिने तावत्वेलायाः परतो. ऽशय्यावरः, वयाऽपवादतो ग्लानत्वादिकारणे शय्यातरपिण्डोऽपि ग्राह्यते, अगाढे पुनः शीघ्रमेव शय्यातरपिण्डग्रहणं क्रियते, नि- मन्त्रणे घ-शम्पातरनिर्बन्धे सकन वे गृहीत्वा पुनः पुनः प्रसङ्गो निवारणीयः, दुर्लभे च क्षीरादिद्रव्ये आचार्यादीनां प्रायोग्येऽन्यत्रा- ऽलमरमाणे तत्रैव गृहन्ति, अशिवे-दुष्टव्यन्तरोपद्वादिके अवमौदायें दुर्भिो वा अन्यत्र भिक्षायामलभ्यमाने शय्यातरगृहेऽपि भिक्षा .

प्रथम संवरद्वारे शय्यावर पिंडदोपाः पंचमं आदाननिक्खेवणसमिई पीढफलगसिजासंथारगवत्थपत्तकंबलदंडगरयहरणचोलपट्टगमुहपोत्तिगपाय- पुण्णादी वा गृहन्ति, राने च मद्विष्ट सति सर्वत्रभैष्यनिवारिते प्रच्छन्नं तद्गृहेऽपि गृहन्ति । अन्यत्र तस्करादिमये वा तत्रापि गृहन्ति मिक्षादिके सार्थविपये अग्रगोचरवायाममाव्यमानायां तत्र दिने तत्राऽवस्थिती सत्यां सागारिकगृहेऽशय्यातरे जायमाने सति पिण्डग्रहणं कृत्वा एकशः प्रच्छन्नतया पुनः शय्यातरं विधाय अन्यत्र गत्वा भोक्तव्यं, पुनस्तत्राऽऽगत्य सुप्तव्यं परं निद्रायमाणे न भाव्यं, तदुक्वं असणाइया चउरो पाउच्छणवत्थपत्तकंवलयं । सूइघुरकन्नसोहण, नहरणिया सागारियपिंडे ॥१॥ न हवई अवमेराया, दुढे खुदाइवंतरा लोवे । सत्यापभिइकम्मे संकिणीवसही पभिइए ॥२॥ इचाइ विसमकज्जे सासणकज्जेसु अप्पणो कज्जे । नाणाइयाइ लाभे, संधरणे न होई सागरिओ ॥३॥ जह इंदिय तुठ्ठिकए सिजायपिंडमुवगमिज कया। तित्थयराणां य आणा, पडिसेहकरो य सोउ मुणी ||४|| इति शप्पातरपिण्डविचारो लेशतो दर्शिता, अथ प्रस्तुतं वच्मः । पत्रममावना वस्तु-आदाननिक्षेपलक्षणं तं प्रतिपादयन्नाऽऽह-पीठादिद्वादशधा उपकरण प्रसिद्ध पीठं चतुरसादिसंस्थानमयं आसन फलगपदिका, सेजा-शरीरप्रमाणः संस्तारकः तृणमयो दर्भादि सार्द्धहस्तद्वयमाना, वस्त्रं-कपासखंगिकभंगिकादिमयं, कम्बल उष्णमिय, दण्डको यष्टिः, रजोहरण धर्मवजः, चोलपट्टका-परिधानववं, मुखपोचिका, पादपोच्छनक । १ वाजोह रवि भाया । २ पुरुणु इति भाषा , ॥४५॥ १ - . .

एयंपि संजमस्स उपचूहणट्टयाए, पातातपदंसमसगसीयपरिरक्षणट्टयाए,उपगरणं रागदोसरहितं परिहरितव्वं, संजयेण निच्चं पडिलेहणपप्फोडणपमजणाए अहो य राओ य अप्पमत्तेण होइ सययं, निक्खियचं, च गिपिह- यवंर मायणभंडोवहिज्वगरणं, एवं आयाणभंडनिक्खेवणासमितिजोगेण भाविओ भवति अंतरप्पा अस- पलमसंकिलिनिव्वणचरित्तभावणाए अहिंसए संजते सुसाह। एवमिणं संवरस्स दारं सम्म संवरियं होति सुप्प- एतत् अपिशब्दादन्यदपि संयमस्य उपदणार्थ संयमपोपणा-साधननिमि तदर्थतया वा, वातावपदंशमशकशीतपरिसामस्त्येन रक्षणार्थ यत्किश्चिदपि, उपकरण-संयमसाधनस्योपकारक रागद्वेपरहित-ममत्वमावविरहितं क्रियाविशेषणमिदं तत्सर्व परिभोक्तव्य न विभूपादिनिमित्तमिति भावना, संपतेन-साधुना नित्यं-सदा तथा प्रतिलेखनया-चक्षुर्व्यापारेपा प्रेस्फोटनया-आस्फोटनेन प्रमा- संनया-रजोहरणादिरूपतया, पडिलेहणा चक्सुसा पप्फोडा वधूटनं किचा नर्तनाममार्जना करतलेपु बहिरुचालनं इति व्याख्या अनि रात्री च अनमचेन सता सततं भवितव्यं, निक्षेतव्यं-स्थानादौ मोक्तव्यं, गृहीतव्यं वा आदातव्यं किं तत् इत्याह-भाजन-पात्रं माण्ड-मृन्मयं पात्रं, उपधिश्व पखादि एतत् अयलक्षणमुपकरणं उपकारकं चारित्रस्येति गम्यम् । एवममुना प्रकारेण आदानमांड- निक्षेपणा प्राकृतशैलीवशात् व्यत्ययेन कर्मधारयः । समितियोगे यो भावितो-वासितो भवति अन्तरात्मा संयतारमा असपरं- अपहिलं असं क्लिष्टनित्रणचारित्रमावनया हेतुभूतया अहिंसका संयतः सुसाधु: एवं पूर्वोक्तप्रकारेण इदं प्रत्यक्षगत संवरस्य-अनाश्रवस्य द्वार-उपायः सम्यक संवृतं आसेचितं भवति, किंभूतं सुप्रणिधानवर १ अनोडा पखोडा इति भाषा।

प्रथम
| संवरद्वारे
शय्यावर
| पिंडदोषाः
णिहियं इमेहि पंचहि वि कारणेहिं मणवयणकायपरिरक्खिएहिं, णिचं आमरणतं च एस जोगोणेयव्यो, घिति-
मया मतिमया अणासवो अकलुसो अच्छिद्दो असंकिलिहो सुद्धो संवजिणमणुन्नातो, एवं पढम संवरदारं
फासियं पालियं सोहियं तिरियं किहियं आराहियं आणाते अणुपालियं भवति, एयं नायमुणिणा भगवया
पन्नवियं परूवियं पसिद्धं
सुरक्षित गुप्स, कैः कृत्वा एभिः पञ्चभिः कारणैः भावनाभिर्भावितैः अहिंसापालनहेतुभिः मनोवाक्कायपरिरक्षितैरिति तथा। नित्यं
सदा आमरणान्तं च-मरणरूपमन्नं यावत् पालनीयत्वात् एष योगोऽनन्तरोदितभावनापञ्चकरूपो. व्यापारी नेतन्यो चोधन्यः
| कनेत्याह-मायुकेन धृतिमता-स्वसचिचेन, मतिमता-युद्धिमता किंभूतोऽयं योगः अनाश्रवः-नवकर्मानुपादानरूपः अतएव अक-
लपोऽपापः शुभाध्यवसायत्वात् , अच्छिद्रा-कर्मनीरप्रवेशाऽभावात् , अपरिश्रवा-न परिश्रवतीति पापजलनिषेधत्वाद , असंक्लिष्टो-न
चिचसंशरूपः, अतएव शुद्धो निर्दोषः, सर्वजिनैः-सर्वतीर्थकरैरनुज्ञातो अनुमतः, एवमीर्यासमित्यादिभावनापश्चकयोगेन प्रथम संव-
रद्वारं यहिंसालक्षणं, फासितं स्पृष्टं उचिते काले विधिना प्रतिपन्न, पालितं सम्यग् उपयोगेन प्रतिचरितं, शोधित-अन्येषामपि तदुचि-
ताना दानात् अतीचारयजनाद्विशोधित-निरतीचारिकतं, तीरित-तीर-पार प्रापितं, कीर्तितमन्येपामुपदिष्ट, आराधित-एभिरेवप्रकारे-
निष्ठो मापितं, आजया-सर्वज्ञवचनेन अनुपालितं भवति पूर्वकालीनसाघुभिवानु-पश्चात् पालितमिति केनेदं व्याख्यातमित्याह-
एवमिति उक्तरूपं जातमुनिना क्षत्रियविशेषरूपेण यतिना श्रीमन्महावीरेणेत्यर्थः ।
किंविधन ? भगवता-ऐश्वर्यादिभगार्थपदकयुक्तेन प्रज्ञापित-सामान्यतो विनेयेभ्यः कथित, प्ररूपितं-छेदमेदपंथनेन, प्रसिद्ध
-
॥४६॥

सिद्ध, सिद्धवरसासणमिणं, आपवितं, सुदेसितं, पसत्थं, पढमं संवरदारं समत्तं ति वेमि ॥शा[सू० २३] प्रख्यात, सिद्ध-प्रसिद्धप्रमाणेन प्रतिष्ठितं, सिद्धानां-निष्ठितार्थानां वरा प्रधाना शासना-आज्ञा यस्मिन् तत् वरशासनमेतत् प्रापरित उष्टापितं तथा अप:-पूजा तस्य आपा-प्राप्तिआता यस्य तदर्घापितं अथवा अर्थापितं, सुष्ट देशितं सदेवमनुजासुरायां पर्पदि नानाविधनपगममङ्गप्रमाणोपेतेः शब्दरर्या अभिहिते, प्रशस्तं मगल्यमिति । प्रथमं संवरद्वार। इति शब्द:-समासौ, ब्रवीमिति- सर्वशोपदेशेन न तु खमनीपिकया पूर्वोत्तप्रकारेण भावनया सद्वत् अहमपि नवीमि विनेयजनान् । समाप्त इति प्रश्नव्याकरणांगस्य दशमस्य पठे अध्ययने व्याख्यातः संवरद्वारप्रथमार्थो वृत्तिमुपजीव्य इति प्रथमसंवरद्वारम् ॥ इति श्री सूरिपुरन्दरज्ञानविमलसूरिरचिते ॥प्रश्नव्याकरणे प्रथम संवरहारं संपूर्णम् ॥

॥ अथ द्वितीयं संवरद्वारात्मकं सप्तममध्ययनम् ॥
द्वितीय
संवरद्वारे
सत्यस्य
महिमा स्व-
रूपं च.
"
अथ सनफ्रमसम्बन्धः-अनन्तराध्ययने प्राणातिपातविरमणं उक्तं, तच्च संपूर्ण सम्यग्तयाऽलीकवचोचिरमणव्रतानामेव भवति
इति हेतोरलीकविरतिः प्रतिपादनीया इत्यनेन सम्बन्धेन सम्बद्ध द्वितीयमध्ययनमारम्यते अस चेदमादि सूत्र-
जंपितिपंच सघवपणं सुद्ध, सुचियं, सिवं, सुजाय, सुभासियं, सुव्वयं, सुकहिये, सुदिह, सुपतिहियं,
सुपहियजसं, सुसंजभियवयणवुइयं, सुरवर-नरवसभ-पवरवलक्ग-सुविहियजणबहुमयं, परमसाहुधम्म-
घरणं, तपनियमपरिग्गहियं,
जत्रिवि शिष्यामश्रणं द्वितीय पुनः संवरद्वारं सत्यं वचः सद्भशो मुनिभ्योः सजनेभ्यो गुणिभ्या यदर्थेभ्यो वा हितं सत्यं यदाऽऽह-
तद्वचनं सत्यवचनं कीदृशं ? तदाऽह-शुद्धं-निर्दोष, अतएव शुचिकं पवित्रं, शिवं शिवहेतु, सुजात-शुभविवक्षोपन, शोभनमा-
पितं वागरूपं वा शुभमिनितं सुखाथितं वा, अतएव शोमननियमरूपं सुव्रतं, शोभनो मध्यस्थो [रागद्वेषादौ] कथकः प्रतिपादको यस्य
सत्यस्येति सुकथित, सुदिति अतीन्द्रियार्थदशिभिः दृष्टं अपवर्गादिहेतुतयोपलब्ध, सुप्रविष्ठित-समस्तप्रमाणैरुपपादितं सुप्रतिष्ठित,वस्थ
महत्तमपुरुषस्य यशः अव्याहतख्यातिक, सुसंयमितवचनैः-सुनियत्रितवचनैरपि संवादिवचनरुक्तं यस्य वत्तथा, सुखराणां-इन्द्रादीनां,
नरामाणा-चक्रवरादीनां प्रवरपलबतां इरिप्रतिहादियोवृपुरुषाणां सुविहितस-सुसाधुजनस्य बहुमतं संमतं यत् तत्तथा, परमसा.
नां-उत्कृष्टमुनीनां धर्मचरणं-धर्मानुष्ठानं यत्नत्तथा । उपोनियमाभ्यां परिगृहीतमङ्गीतं यत्तत्तथा, यथा तपोनियमौ सत्यवाटीटा.
॥४७॥

. मुगतिपदेसकं, घ लोगुत्तमं ययमिणं । विनाहरगगणगमणविनाणसाहक' सग्गमरगसिद्धिपहदेसकं, अवि. तह त सपं। उज्जयं, अकुडिल, भूयत्यं अस्थतो, विसुद्धं, उज्जोयकर, पभासकं भवति सच्चमावाण जीवलोगे अविसंचावि, जहत्यमधुरं पचय दयिवयंव जं तं अच्छेरकारकं अवत्यंतरेसु बहुएसु माणुसाण। सचेण महास- मेव स्पाना नाऽपरस्पति भावः । सुगतिपथदेशकं च, लोके सत्यवचनमेव उत्तमं द्रव्यमिति न हि सत्यात्परं किमपि निधानमिविवच- नाद, तमिदं च वक्ष्यमाणं पुनः कीदृशं ? विद्याधराणां गमनगामिन्यो या विद्यास्तेषां सायकं सत्यभापिणामेव विद्याः सिद्ध्यन्ति इति माः, वर्गमार्गस्य यापदनुत्तरप्राप्तेः सिद्धिपधस्य च देशक-प्रवर्तकं यत् तत् तथा, अवितर्थ-वितथत्वरहितं मिथ्याभावरहितं तत् संव- रदारं द्वितीयं सत्यवचनं । पुनः फजुकं-अजुभावप्रवर्तितत्वात् , अकुटिलखरूपत्वात् अकुटिलं, भूतः सद्भुतोऽर्थः पदार्थः अभिधेयो पस्य तद्भूता अर्थक प्रयोजनापन इति भावः, अतो हेतोर्विशुद्धं-निदोपं, उद्योतकर-प्रकाशकरण, प्रभापक-प्रतिपादकं भवति केषां? कस्मिन्नित्याह-सर्वमाधाना-सर्वपदार्थानां जीवरूपलक्षितो लोको जीवलोकस्तस्मिन् लोके जीवाजीवाधारक्षेत्रे प्रभापकं-देशक अवि- संवादि-अव्यभिचारि यथार्थमितिकृत्वा, मधुरं-कोमलं, प्रत्यक्षेण देवतमिव देवता इव यचचदाश्चर्यकारि-विसयकारितदीशं वचनं केर शामित्याह-तदेव पदं विशिष्य व्याख्यानयन्ति अवस्था-कष्टदशा तस्या अन्तराणि-छिद्राणि तेषु अवस्थाविशेषेपु प्रापितेषु पहुए मनुष्याणां यदुक्तं- सत्पेनाऽसिर्भवेच्छीतोऽगाधाम्बुधिरपि स्थलम् । नासिः छिनत्ति सत्येन सत्यान्न दशते फणी॥१॥ उदेय दि सत्पेन हेतुना महासमुद्रमध्ये विष्ठति न निमअति, मूह-नियवदिग्गमनं अप्रत्ययं अयं तुंडं अनीकं वा तत्प्रवर्तकजन-

द्वितीय
संवरद्वारे
सत्यस्य
महिमा स्व-
रूपं च
मुहमोवि मूदाणियावि पोया सच्चेण य उदगसंभमंमिवि न बुज्झइ, न य मरंति थाहं ते लभंति ! सच्चेण यं
अगणिसंमममिवि न डझंति उज्जुगा मणूसा। सच्चेण य तत्ततेल्लतउलोहसीसकाई छिबंति धरेंति न य उज्झति
मणूसा। पब्वयकडकाहिं मुचंते न य मरंति सच्चेण य परिग्गहिया। असिपंजरगया समराओवि णिइंति अणहा
|य सबबादी। वहथंघभियोगवेरधोरेहिं पमुचंति य अमित्तमज्झाहिं निइंति अणहा यसचवादी। सादेव्वाणि य
स्योत्पाता येषां ते नेऽपि योहित्या-यानपात्राऽपि तथा सत्येन च उदकसंभ्रमेऽपि-उदकष्ठवेऽपि संभ्रमकारणत्वात् तत्राऽपि न बुज्झन्ति
नसाव्यन्ते । न च नियन्ते मरणं प्राप्नुवन्ति, साधं-तलं च लभन्ते । सत्येन हेतुना अग्निसंभ्रमेऽपि-अग्निसंदीपनेऽपि न दह्यन्ते
ऋजुका-आर्जवोपेताः नराः-मनुष्याः। च-पुनः सत्येन हेतुभूतेन तप्त-उष्णीकृतं यत् वैलं त्रपु-फांश्यं अयः-लोहं सीसकानि छिचन्ति
हस्तांजलिमिधारयन्ति परं न च दसन्ते जुका मनुष्याः। पर्वतेकदेशान् कटकान् प्राप्य आत्मानं मुच्यन्ते 'झाप' इति भापा
तदपि कुर्वन्ते परं नैव नियन्ते सत्येन परिगृहीता-युक्ताः । खड्गपारशक्तिपञ्जरगताः-खगशक्तिव्यग्रकारिपु पुरुपैः वेष्टिता अपि सम-
रात्-सत्रामा निर्गच्छन्ति-यान्ति अनघा:-अक्षतगात्रा इत्यर्थः, ते के ? सत्यवादिनः पुरुषाः सत्यप्रतिज्ञाः। वधो-यष्टयादिना बन्यो-
| रज्जादिना वियोगः इष्टयस्तुनाशलक्षणः भैर-अमित्रैः सह ताडनसंयमनं बलात्कारपोरशानवेभ्यः प्रमुच्यन्ते अमित्रमध्यात् निगच्छन्ति
यान्ति स्वस्थान असतानाः सत्यवादिनः निर्दोषगात्राः । सानिध्यानि च कुर्वन्ति देवता निजशपथादिविकटकायेऽपि देवताः सानिध्य
कुर्वन्ति सत्यपननरतानां पुरुषाणां नेतराणामितिमावः । यता--.
मिपं सत्पं वाक्यं हरति हदयं कस्य न जने ? गिरं सस्पां लोकः प्रतिपदमिमामर्थयति च । 4.
॥४८॥

देवपामो करेंति सवयणे रताणं । तं.सचं भगवं तित्थकरसुभासियं दसविहं, चोदसपुचीहिं पाहुडत्यविदितं, मुरा सत्याद्वाफ्याद् ददति मुदिताः कामितफलं अतः सत्याद्वाक्पाग्रतमभिमतं नास्ति भुवनेः॥१ यसादेवं तस्मात् देवीस्तं सत्यं द्वितीयं महानतं भगवद्-भट्टारकं तीर्थफरमापित-जिनैः सुष्कृतं दशप्रकार-जनपदसंमतादिभेदेन, दशविषसत्यस्वरूपं यथा--- जणवप१ सम्मयः२ टवणा३ नाम ४ रूवे५ पडुच्च सच्चे य ६ । ववहार ७ भाव८जोगे९दशमे उवम्म सचे य१०॥२॥ प्पाटपा-उनपदसत्यं यथा-कोकणादिपु पयः पिञ्चजलं नीरमित्यादि देशप्रसिद्ध है। संमतसत्यं या लोकसंमतत्वेन प्रसिद्धा भाषा यया कुमुदवलयतामरसानां समानेऽपि पङ्कजत्त्वों गोपालजनो अरविन्दमेव पङ्कजं मन्यतेन शेपेषु इति समवसत्यं २ । स्थाप- नासत्यं प्रविमादिरूपा अमुद्रादिन्यास समुपलम्य क्रियन्ते यथा एकैका पुरतो विन्दुद्वयसहित: उपलभ्या शतं विन्दुवयसहित सहस्रं तथा विशरिकादो [मट्टिकादौ] मापकार्यापणोऽयमित्यादिका३ । नामसत्यं यथा-कुलं अवर्द्धयन्नपि कुलबर्द्धन इत्यादिका रूपसत्यं यथा-दम्मतो गृहीतवतो यतिरिति भाषा ५ प्रतीतसत्यं यथा वस्त्वन्तरमाश्रित्या यथा. अनामिकायाः कनिष्ठामधिकृत्या दीर्घत्वं मध्य- मामधिकृत्याच हस्पत्यमिति६ व्ययद्दारमत्यं यथा-गिरिदद्यते गलति भाजन, तृणादिदाहे गिरिर्दहति, उदके श्रवति गलति भाजनमित्ति मतीति: ७.भावसत्यं यथा यो वर्णादिः यस्मिन्नुत्कटो भवति तेन या सत्या सा भावसत्या यथा सत्यपि पञ्चवर्णसंभवे बलाका शुक्ला शुको नील इत्यादि प्रवीतिः ८ योगसत्यं यथा-दण्डयोगात दण्डी पुरुषः छत्रयोगात् छत्रीति ९ उपमासत्यं यथा-समुद्रवत्तडागः १ पश्यकालिक हारिगद्रीयावृत्ति पृष्ठ:२०८. तथा अपचनसारोद्धार पृष्ठ.२६१ .

.
10
द्वितीय
संबरद्वारे
सत्यादि
भाषामेदाः
चन्द्रवन्मुखं एकदेशग्रहणेनेति १० दशधा सत्यवचनं । अथ प्रसङ्गादन्येऽपि भाषामेदा लिख्यन्ते-असत्याऽपि दशधा भाषा-
कोहे १ माणेर माया लोभेट पेज्जे५ तहेव दोसे य६। हास७ भय८ अक्खाइय९ उवग्याइय णिस्सिया दसहा ॥२॥
क्रोधनिःसृता क्रोधाद्विनिर्गता तस्य आशयदुष्टत्वात् सत्यं असत्पं वा ब्रूते तत्सर्वं मृपा एव १ माननिःसृता पूर्वमननुभूतमप्यैश्वर्य
| आत्मोत्कर्षख्यापनायऽनुभूतमस्माभिरपि बहूश इत्यादिरूपा २ मायानिःसृता यत्परवञ्चनामिनायेण सत्यमसत्यं वा मापते ३ लोम.
निःसृता लोमाभिभूतः कूटतुलादिकृत्वाऽयथोक्तप्रमाणं वदति ४ प्रेमनिःसृता प्रेमवशात् यथाऽहं तव दासः पुत्र प्रति जनकस्त्वमि-
त्यादिरूपा ५ द्वेषनिःसृता यत्प्रतिनिविष्टजगत्पूज्यतीर्थकरादीनामप्यवर्णवादं भापते ६ हास्यनिःसृता हास्यरसेन-क्रीडारसतोऽसमञ्जसं
| भापते ७ भपनिःसृता तस्करादिभयेनाऽसमञ्जसभाषणं निर्धनोऽहं ज्ञात्वा हीनो वा ८ आख्यायिकानिःसृता यथा-कयासु असंमान्या-
मिधानं मूलदेवादिवत् धूर्ताख्यानवत् ९ उपधातनिःसृता चोरस्त्वमित्यभ्याख्यानरूपा १० इवि असत्या भाषा दशधा !
यद्यपि सत्यं भापते तथापि दुष्टाशयत्वेनाऽनुबन्धविपाकोदयादसत्यमेवेति मृषा ।
अथ सत्यामृषा दशधा यथा
उप्पन्न मिस्सिया १ विगय २ तदुभय ३ जीवाजीव ५ उभयमिस्सा ६।
अणंत ७ परित्ता ८ अद्धा९ अद्धदामिस्सिया १० दसमा ॥१॥
व्याख्या-तत्र उत्पन्नमिश्रिता यथा-कस्मिविद्ग्रामे नगरे वा ऊनेषु अधिकेषु दारकेषु वा जातेषु दशदारका अध अस्मिनगरे
१.१ पशवकालिक हारिभद्रीयावृत्ति पृष्ठ २०९-२ गत गाथा तथा लोकप्रकाश पृष्ठ ३१२...
॥४९॥

जाता इति उत्पमामिश्रिता अनुत्पन्नस्सह संख्यापूरणात्मिका १ एवं मरणकथने विगतमिश्रिता २ तया जन्मतो मरणतो वा कृतपरि- माणस्य विसंवादेन व उत्पनविगतमिश्रिवा ३ जीवमिश्रिता यथा प्रभुतानां जीवता स्वोकानां च मृतानां शङ्खशङ्खनकादीनां एक- राशी हटे यदा कश्चिदेवं वदति-अहो महानयं जीवराशिस्तदा जीवमिश्रिता ४ यथा प्रभूतेषु मृतेषु स्वोकेषु जीवत्सु कश्चिदेवं वक्ति महानयं मृतो जीवराशिस्तदा अजीवमिश्रिवा सत्यामृपात्वं चास्या मृतेषु सत्यत्वात् जीवत्सु मृपात्वादिति भावनीयं ५ तस्मिन्नेव राशी एतान्नोऽय जीवन्त एतावन्तो मृता एवेति नियमेनाऽवधारयतो विसंवादे जीवाऽजीवमिश्रता ६ मूलकादिकमनन्तकार्य तस्यैव सत्तः पाण्डुपप्रेरन्येन वा केनचित्प्रत्येकवनस्पतिना मिश्रमवलोक्य सर्वेऽप्यनन्तकायिक इति अनन्तमिश्रिता ७ तथा प्रत्येकवनस्पति- संपातमनन्तकायमिश्रमवलोक्य सर्वेऽपि-प्रत्येकवनस्पतिरूपोऽयं पिण्ड इति वदतः प्रत्येकमिश्रिता ८ यथा कश्चित् कान त्वरयन् पर्वमाने दिवसेऽप्येवं वदति उदिष्ठ गात्रिर्जातेति रात्रौ चा वर्तमानायां उत्तिष्ठोद्गतः सूर्य इति अद्धामिश्रा ९ तथा दिवसस्य रात्रे एकदेश्योद्धा यथा प्रथमपौरुप्यामेव वर्तमानायां कथित् कश्शन त्वरयन्नेवं वदति चल चल मध्याही जात इत्यादिरूपा अद्धाद्धामिश्रिता १० । एवं दसपा सत्यामृपा । अथाऽसत्याऽमृपा द्वादशविषा एपा हि प्रागुक्तसत्यादिभाषाविकलत्वात् न सत्या नाऽपि मृपा नाऽपि सत्यामृपा केवलं व्यवहा- रमानप्रचिहेतरित्यसत्यामृपा भाषा झेया यथा- आमंतणी आणवणी-२ जायणी ३तह पुच्छणीय ४ पण्णवणी । पचक्खाणी भासा ६ भासा इच्छाणुलोमाय७ १ दशयेकालिक-धारिमद्रीयसि पृष्ठ २१०-१ गत गाथा २७६-२७७

द्वितीय
संवरद्वारे
सत्यादि
भाषामेदाः
--
अणभिग्गहिया भासा भासाय अभिग्गइंमिबोधब्बा। संसयकरणी भासा१० वोग्गड अब्योगडा चेव ॥२॥
व्याख्या-आमत्रणी. यथा, हे देवदत्त इत्यादिका.१ आज्ञापनीकी कार्ये परस्य प्रवर्तना इदं कुरु. इत्यादिरूपा.२ याचनी यथा,
| कस्याऽपि वस्तुविशेषस्य देहीति माषारूपा ३ पृच्छनी अविज्ञातस्य संदिग्धस्य कस्यचिदर्थस्य परिज्ञानाय तद्विदः पार्थे पृच्छना ४
प्रज्ञापनी विनीतविनेयस्य-विनेयजनस्य उपदेशदानं यथा प्राणिवधानिवृत्ताः पाणिनो भवान्तरे दीर्घायुष इत्यादिरूपा. ५ याचमानस्य
प्रतिषेधवचना प्रत्याख्यानी इच्छानुलोमा यथा-कश्चित् कचन कार्यमारभमाणः कञ्चन पृच्छति स प्राह करोतु भवान् ममाप्येतदिष्टं
| इत्पादिरूपा ७ अनभिगृहीता भाषा यथा बहुषु कार्येषु समुपस्थितेषु कश्चित् । कञ्चन पृच्छति किमिदानीं करोमि स प्राह-सुन्दरं ते
यत्मतिभासते उत्कुरु इत्यादिका, ८:अभिगृहीता. यथा इदानीं इदं कर्तव्य इदं नेतिरूपा ९.संशयकरणी :भाषा एका वाक्. अनेकार्था:
भिधायिनी सती परस्पर संशयं उत्पादयति यथा सैंधवमानयेत्युक्त सैन्धवशब्दो-लवणवस्त्रवाजिषु तत्रा निर्धारिता वाक् १० व्याकृताः
| प्रगटार्था-स्पष्टार्थरूपा.११ अन्याकृता-अतिगम्भीरशब्दार्था अव्यक्ता वा अभावार्थत्वादिति १२ द्वादशधाऽसत्यामृपा भाषा एवं द्वि-
चत्वारिंशदास्तत्र एकेन्द्रियास्त्वभापकाः द्वित्रिचतुरिन्द्रियेषु सत्यादिभाषाप्रतिषेधस्तेषुः सम्यक्परिज्ञानपरवननाघभितापाऽसम्भवात् ,
लिपपश्चन्द्रिजा अपि सम्यक् यथावस्थितवस्तुप्रतिपादनाऽभिप्रायेण . भाषन्ते नापि परविप्रतारणबुद्ध्या, किन्तु यदा भाषन्ते तदा
कुपिता अपि पर मारयितुकामा अप्येवमेव मापन्ते अतस्तेषामपि भाषाऽसत्यामृपा, किं सर्वेषामपि ? न, किन्तु जातिस्मरणलब्धिमतां
तथाविधक्षयोपशमवशात् विशिष्टव्यवहारलब्धि प्रतीत्य तियश्चोऽपि चतुर्विधां भाषा:माषन्ते । शेपा भापकजीवाचतस्रोऽपि भाषा भाषन्ते,
तत्र साधूनां वे भापे प्रधभान्तिमे भवत इत्यादि.भूयान् विचार प्रज्ञापनकादशपदादवसेय इति
॥५०॥

- महरिसीण यसमयप्पदिन्न, देविंदनरिंदभासियत्यं, वेमाणियसाहियं, महत्थं, मंतोसहि विजासाहणत्यं, चारणग- "भापाणं भन्ते किमादिया कि पवहा किंसंठिया किंपजवसिया गोयमा भापा णं जीवादीया शरीरप्प- भवा वजसंठिया लोगपजवसिया पण्णत्ता भासा कओ य पभवति काहिं समएहिं भासती भास? भासा कतिप्पयारा ? कति वा भासा अणुमयाओ ? सरीरप्पभवा भासा दोहिं समरहिं भासती भासं । भासा च उप्पयाराई दोषिह य भासा अणुमयाओ" २ इत्यादि विचारोऽवसेयः। अब दशवैकालिकाधनुसारेण सामान्यतः साधूनां द्वे एव मापे मापितव्ये अतिशयवतां तु यथार्ह लामालामं विचार्य चतस्रो. ऽपि भाषाः अनुमताः इति बोध्यम् । तथा चतुर्दशपूर्वविद्भिः प्राभृतार्थ विदितं पूर्वगतांशविशेपाऽभिधेयतया ज्ञातं, तथा महीणां समयेन-सिद्धान्तेन प्रतिज्ञात सम- यप्रतिज्ञा सिद्धांतालापकपाठरूपेण निग्गंथे पावयणमिति वचनात् , देवेन्द्रनरेन्द्र पितो जनानामुक्तोऽर्थस्तत्साध्यधर्मादिर्यस्य तत् तथा, अथवा देवेन्द्रनरेन्द्राणां भासितः प्रतिमातोऽर्थः प्रयोजनं यस्य तत्तथा अथवा देवेन्द्रादीनां भापिता अर्थाः-जीवादयो जिनवचनरूपेण येन तचथा, पुनः वैमानिकानां साधित-प्रतिपादितं उपादेयतया जिनादिभिरथवा वैमानिकैः साधितं कृतं सेवितमिति, महाथ-महाप्र- योजन, तदेवाऽऽह-मत्रौपधिविद्यानां साधने नस्य अर्थः-प्रयोजनं तस्य सत्यं विना त सिद्धाभावात् , तथा चारणगण-विद्याचारणा- १ प्रज्ञापनासूत्र ११ पद-१५ सुत्र पृष्ठ ७७९ ।

.
द्वितीय
संवरद्वारे
सत्यस्य
महिमा स्व-
रूपं च
णसमणसिद्धविज,मणुयगणाणं बंदणिज्ज,अमरगणाणं अञ्चणिज्ज, असुरगणाणं च पूणिज्ज,अणेगपाखंडिप-
रिग्गहित, जं तं लोकमि सारभूयं, गंभीरतरं महासमुद्दामओ, घिरतरगं मेरुपय्वयाओ, सोमतरगं चंदमंडलाओ,
दित्ततरं सूरमंडलाओ, बिमलतरं सरयनयलाओ, सुरभितरं गंधमादणाओ, जेविय लोगम्मि अपरिसेसा मंत-
जोगा जवा य विजा य जंभका य अत्याणि य सत्याणि य सिक्खाओ य आगमा य सञ्चाणिवि ताई सचे
दिवृन्दानां श्रमणानां सिद्धविद्या-आकारागामिनी वैक्रियकरणादिपयोजना यस्मात् तत्तथा मनुजगणानां च वन्दनीयं स्तुत्यः धन्यः
| सत्यभापी अर्थ इति, अमरगणानां यन्तरज्योतिष्कानां च अचनीयं पुष्पादिभिः सर्वत्रासनव्यन्तः प्रतिपादितमहिमा सत्यभापिणा-
| मिति गम्योऽर्थः, असुरगणानां भवनपत्यादीनां पूजनीयं पूज्यं गन्धमाल्यादिभिः, अनेकपाखण्डिभिः परिगृहित तेऽपि सत्यभाषिणां
चरणशरणं कुर्वन्ति, नानाविधवविभिरङ्गीकृतं, यत् तद् सत्यं लोके सारभूतं प्रधानत्वेन ख्यातं, गम्भीरतरं-अलब्धमध्यं महासमुद्रात्-
| अक्षोम्पत्वात् , स्थिरतरं मेरुपर्वतात् अचलितत्वेन, सौभ्यतरं चन्द्रमण्डलात अतिशयेन सन्तापोपशमहेतुत्वात् , दिप्ततरं सूर्यमण्डलात्
। यथावद्वस्तुप्रकाशनेन, विमलतरं शस्नभस्तलात् अतिनिर्दोपत्वाद , सुरभितरं गन्धमादनाद्-गजदन्तकगिरिविशेषात् तत्र चन्दनवृक्षाः
| बहवस्सन्तीति सुगन्धतरसहृदयानामतीव हृदयावर्जकत्वात् , येऽपिच लोके अपरिशेषा-निःशेषा मात्रा:-शुभशुभतमा भावा हरिणेगमेपि-
आहूतोऽपायाः मन्त्रादयो योगा-वशीकरणादिप्रयोजना द्रव्यसंयोगाः, जपाश्च-मन्त्रविद्याजपनानि, विधान-प्रज्ञप्त्याद्या, नृम्भकाच-
तिपालोकवासिनो देवषिशेपाः दशया, अखादीनि-बाणादीनि क्षेप्यायुधानि, शस्त्राणि-खगादीन्यक्षेप्यायुधानि, शिक्षा-कलाग्रहणादीनि
शास्त्राणि, आगमा-सिद्धान्तः अर्थात् अन्यान्यपि सर्वाणि तानि सत्ये प्रतिष्ठितानि, असत्यवादिनां न केऽपि मत्रा खसाध्यसाधकीभावं
.
॥५१॥

पइट्ठियाई, सचंपिय संजमस्स उवरोहकारक किंचि न वत्तव्यं, हिंसासावजसंपउत्तं, भेयविकहकारक, अणत्थवा- पकलहकारक, अणजं, अववायविवायसपउत्तं, चेलंब, ओजधेजयहुलं, निल्लनं, लोयगरहणिलं, दुदि, दुस्सुयं, अमुणियं । अप्पणो थवणा परेसु निंदा-न तंसि मेहावी, ण तंसि धन्नो, न तंसि पियधम्मो, न तसि कुलीणो, न तंसि दाणपती, न तसि सूरो, न तंसि पडिरूयो, न तंसि लहो, न पंडिओ, न बहुस्सुओ, नवि य तंसि तबस्सी, ण यावि भवन्तीति भावः। तथा तादृशं सत्यमपि यत् संयमस्योपरोधकारकं संयमवाधकं तत् किमपि न वक्तव्यं किंभूतं तदित्याह- हिंसया-जीववधेन-सावयेन च पापोपेताऽऽलापादिना सम्प्रयुक्तं सहित यत् तत्तथा । भेदचारित्रभेदः विकहा-विसंवादिकारुया- दिका कथा तव कारकं यत् वद तथा, अनर्थवादो-निम्मयोजनो जल्पः कलहश्च-कलिस्तत्कारकं यत् तत्तथा, अनार्य-अनार्यप्रयुक्त अन्याययोग्यं तं, अपवादः-परदूपणाभ्याख्यानं विवादी-विप्रतिपत्तिस्तत् सम्प्रयुक्तं सहितं तत् तथा, वेलम्बिकं-परेपां विडम्बनाकारि ओजो-पलं धैर्य च-धृष्टता ताभ्यां बहुलं, अतएव निर्लज्ज-अपेतलज, लोके-साधुलोके गर्हणीयं निन्य, दुर्दष्टं-सम्यग्तया नेक्षितं, दुःश्रुतं-सम्यगाकर्णीतं, असम्यक्तया मुणित-ज्ञातं, आत्मनः-स्वस्य स्तुतिः श्लाघा परेपामन्येषां निन्दा-अवर्णवादः तदेवाऽऽह- नतंसि चि त्वं न भवसि मेधावी-प्राज्ञः अपूर्वश्रुतदृष्टग्रहणशक्तियुक्तो मेधावीत्युच्यते, न त्वं धन्योऽसि धन्यवानसि, न त्वं प्रियधर्माऽसि, तथा न त्वं कुलीनः कुलजावः, न त्वं भवसि दानपतिर्दानदाता इत्यर्थः, न भवसि त्वं शूरः-पराक्रमवान्, न त्वमसि प्रतिरूपः यस्मिन् दृष्टे रूपवान् स्मर्यते, न त्वमसि.लएः-सौभाग्यवान , न त्वमसि पण्डितो-बुद्धिमान् , न त्वमसि सुथुतः श्रुतमा- ,

द्वितीय
संवरद्वारे
सत्यस्य
महिमा
|स्वरूपंच
,
| परलोगणिच्छियमतीऽसि, सव्वकालं जातिकुलरूववाहिंरोगेण वाविजं होवि वजणिज्जं दुओ उवयारमतिकतं
एवंविहं संचपि न वत्तव्यं । अह केरिसकं पुणाई सचं तु भासियवं?, जं तं दग्वेहिं पनवेहि य गुणेहि कम्मेहि
बहुविवेहिं सिप्पैहिं आगमेहि य नामक्खापनिवाउवसम्मतद्वियसमाससंधिपदहेउजोगियउणादिकिरियाबिहा.
बाधीतबहुशास्त्रः, नाऽपि त्वं तपस्वी-क्षपकः, न चाऽपि परलोकविपये निश्चिता-नि:संशया मतिर्यस्याऽसौ न च त्वं भवसि। सर्वकालं
आजन्मावधि किं बहुना उक्तेन वर्जनीयविषयवचनं कथ्यते, जातिकुलरूपव्याधिरोगेण चाऽपीति यद्भवति पीडाकारितवचनं तत्
सत्यमपि वर्जनीयमित्यर्थः, इह जान्यादीनां समाहारद्वन्दः, तत्र जातिविपक्षः कुलं-पितृपक्षः रूपं सुभगता व्याधिः-कुष्टादिरोगा,
| शीघ्रघाती ज्वरादिः वा-विकल्पे अपि-पुनरर्थे दुहओत्ति द्रोहवान् त्वं अथवा दुहतो-द्विधा द्रव्यतो भावतच उपचारं पूजामतिक्रान्तः
एवंविधस्त्वं एवं सद्भूतार्थमपि न वक्तव्यं ।
अथ कीदृशं ? पुनर्वाच्यं पुण्णाइत्ति इह पूर्ववाक्यार्थापेक्षयोत्तरवाक्यार्थस्य विशेषद्योतनार्थ सत्यमपि भापितव्यं । यत् तत् तद्र्व्यैः
त्रिकालवचिभिः पुद्गलादिमिः, वस्तुपर्थवैश्व नवीनपुराणादिभिः, क्रमवत्तिमिश्च गुणैर्वर्णादिभिः, सहभाविभिः कर्मभिः कृष्यादिव्यापारैः
उरक्षेपणावक्षेपणादिभिर्वा, बहुप्रकारैः शिल्पैः चित्रकर्मादिविज्ञानश्च आगमाः सिद्धांतार्थास्तैः युक्तं । पुनः कीदृशं सत्यं नाम द्विधा व्यु:
सन-अव्युत्पन्नमेदात् तत्र व्युत्पन्न देवदत्तादि अव्युत्पन्नं उित्थ डवित्यादि, आख्यातपदं-क्रियापदं आत्मनि परस्मै उभयपदीरूपं
| त्रिकालात्मकं तं यथा-अकरोत् करिष्यति करोतीत्यादिरूपं तद् तदर्थयोतनाय तेषु तेषु स्थानेषु योजनीय, निपतन्ति तथा तथार्थयोत-
नार्थेषु ते निपाता च वाह खलु इत्यादिरूपाः, तथा उपसृज्यन्ते-धातुसमीपे इत्युपसर्गाः अर्थो बलात्कारेण धातुना यैः कृत्वा प्राप्यते
॥५२॥

. गधातुसरविभत्तिवन्नजुत्वं यथा-प्र-परा-सम्-अपि-अनु इत्यादिरूपाः, यथा तस्मात् हितं तद्धितं इत्यादि अर्थाभिधायका ये प्रत्ययास्ते तद्धिवाः तदंतं पदं वद्धितपदं यथा-अण् इफण् इत्यादिप्नत्ययाः यथा. गोरपत्यं गव्यः, नाभेरपत्यं नामेय इत्यादिकं, तथा समसनं समासः अनेकेषां पदा- नामेकीकरणरूप, वा तथा. अनेकासां विभक्तीनामेकविभक्तीकरणं तत्पुरुष-द्वन्द्व-बहुविहि-द्विगु-कर्मधारयसमासास्तेषां पदं समास- पदं यथा राजपुरुष इत्यादिरूपं, सन्धिरन्योऽन्यसंयोजना तत्पदं सन्धिपदं यथा दधीदं भवत्यत्रेत्यादिरूपं, तथा पदं विभक्त्यन्त सुपन्वं तिगन्तं च, यथा घटः । हेतुः-साध्याऽविनाभूतत्वलक्षणो यथा नित्यः शब्दः कृतकत्वात् , पर्वतोऽयं वद्विमान् धूमादित्यादि हेतुपदं,योगिकं.यदा,तेषामेव द्वधादिसंयोगेन एकनामकरणं यथा पद्मनाभः नीलकन्तः इत्यादिरूपं यौगिक पदं तथा उपकरोति सेनया अभियाति अभिपेणयति इत्यादिरूपं वा यौगिकं, उणादिकं यथा उकण् प्रत्ययान्तं मिनः भैक्ष्यमिति तथा अत-सातत्यगमने अतति सातत्येन नैरन्तर्येण गच्छति वान् तान् भावान् पर्यायानिति आत्मा अत्र मनिद्र प्रत्यय उणादिका आशु खादु इत्यादि उणप्रत्ययान्तं ! तथा क्रियाविधानं सा च, क्रियाविधिः कान्तप्रत्ययान्तविधिरिति यथा पचति इति पाकः एवं पाठकः कुम्भं करोतीति कुम्भकार: इत्यादि सिक्रियाविधिपदं अथा धातयो-भ्वादयः भू-सत्तायां अस्-भुवि इकब्-करणे इत्यादिरूपाः । स्वरा-अकारादयः पहजादयो वा कचिसा इति पाठः तत्र रसाः शृङ्गारादयो नव यथा- शृङ्गार, हास्यर करुणा३, रोद्र४ वीर५ भयानका ६ वीभत्सा द्भुत८ शांताश्व९ नव नाट्ये रसाः स्मृताः॥१॥ विभक्तया-प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी पठी सप्तमी सम्बोधनी चेत्यादिरूपाः, सप्तवर्णाः कादयः व्यसनानि, खराः द्वितीय संवरद्वारे पोडशविघ- वचन स्वरूपम् तिकल्लं दसविहंपि सचं जह भणिय तह य कम्मुणा होइ दुवालसविहा होइ, भासा, वयर्णपिय होड़ सोलसविह, इस दीर्घर प्लुताई ख्या मात्रोच्चारणकालविशेषरूपा एभिः युक्तं एकस्मिन् शब्दे नाम्नि वा यत्र तत् सत्यवाक्त्वेन प्ररूपितमिति । अथ तदेतत् सत्यं भेदत आइ त्रैकाल्यं त्रिकालविषयं दशविधमपि सत्यं भवतीति योगः, तत्र दशविधं सत्यं भाषा- मेदेषु पूर्वमुक्त जणधय-समय-ठवणे ति गाथायां यथा भणितं येन प्रकारेण दशविधं सत्यं सद्भतार्थतया भवति तथा तेनैव प्रकारेण कर्मणा वा अक्षरलेखनादिक्रिया सद्भूतार्थक्रियाऽपि सत्यरूपैव कार्या एतावता न केवलं दशविधं सत्यं वाच्यं किन्तु इस्तक- मदिक्रिया लेखनादिक्रियाऽपि अव्यभिचारितयैव कन्या परव्यसनस्याऽकुटिलाध्यवसायस्य च तुल्पत्वादिति । तथा द्वादशविधा च भवति भाषा यथा-प्राकृत-संस्कृत-मागध-पिशाच-सौरसेन-अपभ्रशाख्याः तत्र अपभ्रंशस्य देशविशेषेण भूरिभेदाः इयमेव पविधा | मापा गद्य-पद्यमेदेन द्वादशया भवतीति। यथा वचनमपि पोडशविधं भवतीति तदाऽऽह- वयणतियं लिंगतियं कालतिय तह परोक्ख पचव ११ अवणीयाइ चउर्फ १५ अज्झत्थं चेव सोलसमं ॥१२॥ व्याख्या-तत्र वचनत्रयं एकवचन-द्विवचन बहुवचनरूपं यथा घटः घटी घटाः वृक्षः वृक्षौ वृक्षाः देवः देवी देवाः इत्यादि रूपत्रयं । लिङ्गत्रयं स्त्रीपुनपुंसकरूपं, कुमारी वृक्षः कुण्डं, कालत्रिकं अतीतानागतवर्तमानरूपं यथा अभूत-भविष्यति भवति अकरोत् करिष्यति करोति । तथा प्रत्यक्ष करोति असो इदं कार्य पठनादिकं, परोक्षं यथा कृतमनेन कार्य एस्तने दिने, उपनीतवचनं यथा- | गुणौघोपनयनरूपं यथा रूपवानयं मनीषी इत्यादिरूपं, १ अपनीतवचनं यथा-गुणापमयनरूपं यथा-दुःशीलोऽयं दुर्भापणोऽयं २ उप- नीत-अपनीतवचनं यत्र एकादिगुणं वर्तयित्वा पश्चादपनीतगुणवाक्यं उच्यते यथा-रूपवान्-अयं किन्तु दुःशीलः ३ विपर्ययेणाऽपि ॥५३॥ ROO एवं अरहंतमणुनायं समिक्खियं संजएण कालंमि य वत्तव्वं (सू० २४) इमं च अलियं पिसुण-फरुस-कडय-चवलवयणपरिरक्षणट्टयाए पावयणं भगवया सुकहिये, अत्तहियं, पेवाभाविक, आगमेसिभई, सुद्धं, नेयाय, अकुडिलं, अणुत्तरं, सव्यदुक्वपावाणं विओसमणं, तस्स इमा पंच अपनीत-उपनीतवचनं भवति दुःशीलः परं रूपयानित्यपि भवति ४ अध्यात्म वचनं यथा-अभिप्रेतमर्थ गोपयितुकामस्य सहसा तस्यैव भणनं यथा दुःखितोऽहमिति अथवा आत्मानं अधिकृत्य अध्यात्मभावनया यत् योजनं तदप्याध्यात्ममुच्यते इत्यादिमा- पात्मकं सत्यादि स्वरूपावधारणप्रकारेण यत् भवति तदनुज्ञातं साधूनां भापात्वेनोपादनीयमित्यर्थसमर्थना सर्वत्र कार्या। ननु जिनानुज्ञातमपर्यालोचितं संयतेनाऽकाले न वक्तव्यमिति हृदयं । यदाऽऽह वृत्तिकार:- बुद्धिए निएउणं भासेना उभयलोय परिसुद्धं । सपरोभयाण जं खलु न सव्वहा पीडजणगं तु ॥१॥ एतदर्थमेव जिनशासनमिति । एवमित्थंभूतं यद्वचनं तदर्हता भगवता अनुज्ञातं, समीक्षितबुद्ध्या पर्यालोचित संयतेन-संयम- पता काले-अवसरे वक्तव्यं । इदं च प्रत्यक्षं प्रवचन मिति योगः, अलीकमसद्भुतार्थ पिशुनं-सूचकं परोक्षस्य परस्य च दूपणोद्भापर्क अतएव फरुप-अनार्य भापाकटुकमनिष्टार्थ, चपलं-उत्सुकतया असमीक्षितं यद्वचनं वाक्यं तस्य परिरक्षणार्थ रक्षायै शासनमिदं प्रवचनमित्यर्थः भगवता- श्रीमहावीरेण, सुष्टु शोभनतया कथितं, आत्महित-जीवस्य हितहेतुकं, प्रेत्य-परलोकभावनया युक्तं, अतएव आगमिध्यद्भद्रं-भावि. १ बुद्धया विचार्य मापेतोभयलोकपरिशुद्धं । स्वपरोभयेषां यत् खलु न सधैया पीडाजनकं तु ॥ .

द्वितीय संवरद्वारे सत्यव्रत भावनाः भावणाओ। बितियस्स वयस्स अलियवयणस्स.वेरमणपरिरक्षणवयाए पदम सोऊण संवरदं परमदं सुद्ध जा. णिउण न वेगिर्य, न तुरिय, न चवलं, न कडुय, न फरुसं, न साहस, न.य परस्स पीलाकरं सावनं, संचं च हियं चमियं च गाहगं च सुद्धं संगयमकाहलं च समिक्खितं संजतेण कालंमि.य वत्तव्वं । एवं अणुवीतिसमिति- जोगेण भाविओ भवति अंतरप्पा संजप करचरणनयणवयणो सूरो सचज्जवसंपुन्नो। कल्पाणकारि, शुद्ध-निदोष, न्यायोपपन्न नैयायिकं, अकुटिलं-ऋजुत्वात् , नास्ति असादुत्तरं प्रधानं अन्यत् किमपि, अतएव सर्वदुःखपापानां-शुभाशुभफर्मणां विशेषेण, उपशमनकारक, तस्य द्वितीयवतस्य.इमा अग्रे वक्ष्यमाणाः पञ्चभावनाः चिन्तनीयाः । द्वितीयव्रतस्य अहिंसापेक्षया, अलीकवचनस्य घेरमणं-विरतिः तस्याः परि-सामस्त्येन रक्षणार्थ प्रथमभावना अनुचिन्त्य समि- |तियोगलक्षणसाधुः आकर्ण्य सद्गुरुसमीपे संवरद्वंति-संवरस्य प्रस्तावात् मृपावादविरमणस्य प्रयोजनलक्षणं तदेव अर्थः प्रयोजनं यस्य तथा तं,परमार्थ हेयोपादेयवचनैः सुष्टु-सम्यातया एतत् ज्ञात्वा न-नव निषेधे वेगवत-विकल्पवन संशयापन्न न त्वरितं शीघ्रत्वेनाऽ- विमृश्य, न चापल्य चपलस्वभाववद , न कटुकं अर्थात् परिणामे विरसं, न परुपं कठिनं वर्णतः, न साहसं साहसप्रधानं अनकितं,न च | परस्प जन्तोः पीडाकर, मानसिकदुःखोत्पादक, सावयं-संपापं प्राणापहारित्वात् सत्ये नैव वक्तव्यं ? कीदृशं पुनर्वक्तव्यं तदाऽऽव-सत्य- | सद्भूतार्थ हितं आयतौ हितं पध्य तोपोत्पादनतः, मितं परिमिताक्षर, ग्राहक प्रतिपाद्यार्थस्य प्रतीतिजनक, शुद्ध-पूर्वोक्तदोषरहित, सं- गतं-उपाधिरहितं, अकाहलं अमन्मनाक्षरं, समीक्षितं पूर्व बुया पर्यालोचित, एतादृशं संयमवता-साधुना, काले-अवसरे वक्तव्यं नाऽ न्यथा । एवममुना प्रकारेण अनुचिन्त्य-पर्यालोच्य, भाषणरूपया समित्या सम्यग्योगयुक्तो भवति अन्तरात्मा-जीवः सम्यग्यतना- ॥५४॥ - Avorite . , / वितियं कोहों में सेवियवों, कुद्धों चंडिकिणो मपूसो अलियं भणेज, पिसुणं भणेज, फरुसं भणेज, अलिय पिसुण फरुसं भणेज, कलहं करेजा, वे करेजा, विकह करेजा, कलहं वरं विकहं करेजा, संच हणेज, सील हणेज, विणयं हणेज, सचं सील' विणयं हणेज, वेसो हवेव, वत्युं भवेज, गम्मो भवेज, वेसो वत्यु गम्मो भवेन, एवं अन्नं च एवमादियं भणेन कोहग्गिसंपलित्तो तम्हा कोहो न सेवियव्वो। एवं खंतीइ भाविओं भवति अंतरप्पा संजयकरचरणानचणवयणो सूरो सञ्चजवसंपन्नो, युक्त करचरण-नयन-वदनः समाहितेन्द्रियः सन् शूर:-पराक्रमी सत्यार्जवसंपन्नो भवति एषा प्रथमा भावना ? द्वितीयभावनायां क्रोधनिग्रहणं तदेवाऽऽह-क्रोधो न सेवितव्यः कस्माद्धेतोस्तदाऽऽह-क्रुद्धः-कुपितः चाण्डिक्यं-रौद्ररूपत्वं सञ्जातं अस्येति चांडिक्यितो मनुष्यो-नरः अलीकं भणति-मिथ्या भापते, पिशुनं-मर्म मापते, परुष कर्कश मापते, अलीकं पिशुनं परुपं त्रय मपि भापते, कलहवाक् कलह करोति, चैरं करोति, विका-परासमंजसमापणं करोति, विकथां क्रियमाणः कलहं वैर विकथा त्रय- मपि कुर्याद , सत्य-सद्भवार्थ इन्याद-नाशयेत् , शील-सदाचारं नाशयेत्, विनयं-मानाभावं नाशयेत् , सत्यं शीलं विनयं त्रिकमपि हन्यात्-नाशयेत् , वेपो-द्वेष्योऽप्रियो भवेत् , वस्तु-गृहं दोषाणामिति शेपः दोपवेश्म भवेत् , गम्यं परिभवस्थानं भवेत् , वेश्यो वस्तु- गम्यं त्रयमपि भवेद, एतत् अन्यत् वक्तव्याविरिक्त एवमादिकमेवजातीयं भणति, क्रोधाग्निप्रदीप्तः सन् सम्यक् प्रज्वलितो भवति, तस्मात् क्रोधो न सेवितव्यः । एवं प्रकारेण क्षान्त्या-उपशमेन प्रकर्पण भावितो भवति, अन्तरात्मा-जीवः सम्यक् यतनायुक्तः कर- चरणनपनवदनः समाहितेन्द्रियः सन् शूरो-पराक्रमी. सत्यार्जवसंपन्नो भवति इति द्वितीयभावना २ द्वितीय संवरद्वारे सत्यवत भावना ततियं लोभोन सेवियब्यो लदो लोलो भणेज अलियं, खेत्तस्स व वत्थुस्स व कतेण १ लदो लोलो भणेज अलियं, कित्तीए लोभस व कएण २ लदो लोलो भणेन अलियं, रिद्धीय च सोक्खस्स च कएण ३ लदो लोलो भणेन अलियं,भत्तस्सव पाणस च करण ४ लुतो लोलो भणेज अलियं, [पीढस्स व फलगस्स य करण ५ लुदो लोलो भणेज अलियं] सेनाए व संधारकस्स व करण ६ लदो लोलो भणेज अलियं, वयस्स व पत्तस्स व करण ७ लुतो लोलो मणेन अलियं, कंवलस्स व पायपुंछणस व कएण ८ लुदो लोलो भणेच अलियं, सीसस्त व अथ तृतीयायां भावनायो लोभो न सेवितव्यः कस्मादित्याह- लुब्धो-लोमवान्, लोलो-व्रते चपलः मोल-भापयेत् अलीक-फूटवचन क्षेत्रस्य ग्रामनगरादेः सेतु-केतूमयात्मकस वा वास्तु- गृहं सात-उच्छ्रित-उभयात्मकं भूमिर्वा तस्य कृते तदर्थ लुब्धो-लोमवान् लोलो भणेज इति पूर्ववदर्थः, कीर्तिः ख्यातिः तदर्थकते तथा लोभस्य परिवारादीनां पुष्टिकृते औपधादिप्राप्तिहेतोः मुन्धो लोभवान् लोलो-व्रते चपलः भणेत्-मापयेत् अलीकं-कूटवचनं २। अदि-संपत् वस्पाः कृते मुखहेतोः शीतलछायादिसुखहेतोः कृते लुब्धो लोलो भापयेत् अलीकं ३ तथा भक्तस्य-अशनस्य पानस्य च कृते लुन्धो-लोलो भापयेत् अलीकं ४ । [पीठस्य कृते फलकस्य कृते वा लुब्धो लोलो मापयेत् अलीकं । ५] सिजा-वसतिः तदर्थ एवं संस्तारकस्य कृते यत्र प्रसारितपादैः सुप्यते सा शय्या तस्याः कुत्ते अर्द्धवतीयस्तममाणः संस्तारकः तस्य कृते लुब्धो लोलो] अलीकं भापयेत् ६। वस्त्रं-चोलपट्टादि, पात्रं-अशनादिग्रहणभाजनं तयोः कृते लुब्धो-लोलो मापयेत् अलीकं ७॥ कम्बलं-वर्णामयं वखं पादप्रोञ्छनं कम्बलखण्डः रजोहरणादिर्वा तस्य कृते उन्धो-लोलो भापयेत् अलीकं वा शिष्यस्य साधोः शिष्यिणी-साध्वी १. एतत्पङ्क्तिस्तट्टीका व अत्र नास्ति किन्तु अभयदेवसरिकृत वृत्तौ द्वयमपि विद्यते।" .

सिस्सीणीए व कएण ९ लदो लोलो भणेन अलियं, अनेसु य एवमादिसु पहुसु कारणसतेसु लदो लोलो भणेन अलियं । तम्हा लोभो न.सेवियचो, एवं मुत्तीय भाविओ भवति अंतरप्पा संजयकरचरणनयणवयणों सूरों सधजयसंपन्नो। चउत्थं न भाइयव्यं भीतं खुभया अइंति लहुयं भीतो अवितिन्जओ मणूसो भीतो भूतेहिं धिप्पड़ भीतो अनंपिलु भेसेजा, भीती तक्सजमंपिहु मुएना, भीतो य भरं न नित्थरेजा, सप्पुरिसनिसेवियं च मग्गं भीतो न समत्यो अणुचरिज, तम्हा न भातियव्वं, भयस्स वा वाहिस्स पा रोगस्स या जराए वा मच्चुस्स वा तस्याः कृते लुब्धः लोलपः भापयेत् अलीकं ९ । अन्येषु-इत्यादिप्रकारेषु बहुपु कारणशतेष्वपि व्यक्तमेव लुब्धो लोलो भणति अलीके तस्माद्धचोलोमो न सेवनीयः, एवममुना प्रकारेण मुक्तिनिर्लोमता तया भावितो भवति अन्तरात्मा-जीवः सम्यक्तया वशीकृतः सुसमादिवकरचरणनयनवदनः शूरः सत्यार्जवसंपन्नः । एषा तृतीया भावना ३ अथ चतुर्थी भावना-न भेतव्यं अंतरभाव निधेयं, खुक्यिालंकारे भीतः पुमान् अइति एति आगच्छति किं लघुकं सत्त्वसार- वर्जितत्वेन तुच्छं-आत्मानं वेदते लघुकं शिघ तथा भीतो अद्वितीयः सहायो न भवति कस्याऽपि मनुष्यो-नरः, भीतो-भूतैः प्रेतैर्वा गृह्यते अधीश्रीयते-आधीयते । तथा भीतः अन्यमपि भापयेत् , भीतः तपःप्रधानः संपमः तपःसंयममपि हुर-लंकारे मुच्येत्-त्यजेत् अलीकमपि ब्रूयादिति रहस्यं अहिंसादिरूपत्वात् संयमस्योक्तत्वात् , भीतः पुमान् महत्कार्यादि न निस्तरेत्-निर्वाहयेत् , सत्पुरुष/- रपुरुनिषेवितं-सेवितं मागं सम्यक्-वानक्रियादिकं अनुचरित-आसेवितं न समर्थो भवति । यत एवं तस्मादेतोःन भेतव्यं भयहे- तो हाव दुष्टतिर्यग्मनुष्यदेवादे तथा आत्मोद्भवादपि न मेवव्यं, तानेवाऽऽह-व्याधेः-छुटादेः क्रमेण प्राणापहारिणः रोमन क .

द्वितीय
संवरद्वारे
सत्यवत
भावना:
.
अनरस वा एवमादियास एवं धेज्जेण भाविओ भवति अंतरप्पा संजयकरचरणनयणक्यणो सुरो सबनर्वसंपन्नो।
"पंचमक हासन सेवियन्वं अलियाई असंतकाई जति हासइत्ता परपरिभवकारणं च हासं, परपरिषायप्पियं च
हासं,परपीलाकारगं च हासं, भेदविमुत्तिकारकं च हासं,अन्नोन्नजणियं च होज हासं,अन्नोनगमणं च होन मम्म
अलोनगमणं च होज कम्मं कंदप्पाभियोगगमणं च होज हासं, आसुरियं किब्विसत्तणं च जणेज हासं, तम्हा
शीघ्रतरं प्राणापहारकाद ज्वरादेः जरा-चयोहानिरूपा तस्याः मृत्योर्मरणाद्वा, अन्यस्माद्वा ताशात् इष्टवियोगादेः इत्येवमादिकाद
भयोत्पादकात् न मेतव्यं, एवमनया भावनया धैर्येण सत्वेन मावितो भवति, अन्तरात्मा-जीवः संयतः साधुः वशीकृतकरचरण-
नयनवदनः शूरः पराक्रमवान् संयमसाधने सत्यार्जवसंपनो युक्तः ४ इति चतुर्थीमावना
अथ पश्चमीमावना तस्यां पञ्चमीभावनायां किं वस्तु इत्याह-यदुत हास्यं न सेवितव्यं परिहासो न विधेयः यतः अलीकानि
| सद्भूतार्थनिहवरूपाणि असंन्ति असद्भूतानि वचनानि अशोमनानि वा अनुपशमप्रधानानि जल्पन्ति ब्रुवते, हासइतेत्ति हासवन्तः
परिहासकारिणः-परपरिभवकारणं च हास्यं अपमानताहेतुरित्यर्थः, परपरिवादान्यदूषणाभिधायकं प्रियं-इष्टं यस्मिन् हास्ये भवति, परेषां
| पीडारकं हास्यं भवति, मेदश्चारित्रभेदः विमुक्तिविंगतनिःस्पृहत्वं अथवा विमूर्तिविकृतनयनवदनादित्वेन विकृतशरीराकृतिः तद्भेदका.
| रकं हास्यं सीता उपहास्येन संग्रामो जात इति संप्रदायः। अन्योऽन्यं परस्परं जनितं कृतं हास्य भवेत् , अन्योऽन्यं गमनमधिगमकं
मर्मादिस्थानकापर्क हास्यं भवति, तथा परस्परं गमनं दुश्चेष्टितादिकर्मप्रच्छन्नपारदार्यादि मर्मोद्घाटनं हास्यं भवेत् , कांदपिका
हास्यकारिणों देवविशेषाः मांडविशेषा वा आमियोगाश्च अभिओगा निर्देशकारिणः देवा वा तेषु गमनहेतुत्वात् तत्प्रापणगतिहेतु हास्प
॥५६॥

हासंन सेवियव मवेत, आमुरियत्व किल्विपत्वं र हास्यं भवेत् तद्गतिप्राप्तिहेतु हास्यं तस्मात् हास्यं न सेवितव्यं भवति, अयमभिप्रायो यथा हास्यरतिः हास्यप्रियः साधुश्चारित्रलेशप्रभावात् देवेषु उत्पद्यमानः कांदर्पिकैषु आभिओगेषु च उत्पद्यते न महर्दिषु इति दास्पः अनयति उक्तं यदुक्तं- जो संजओ वि एयासु अप्पसत्यासु वद्दइ कहिं चि सो तविहेसु गच्छइ सुरेसु भइओ चरण विहीणो॥१॥ कंदामिभावनानां अशुभं पञ्चकं च प्रसङ्गाव गाथाभेदेनाऽऽह- 'कंदापदेव? किब्बिस अभिओगाई आसुरिय४ संमोहा५ एसा हु अप्पसत्या पंचविहा भावणा तत्थ ॥१॥ व्याख्या-कंदर्पः कामस्तत्प्रधाना नादिनिरन्तरया विटप्राया देवविशेपास्तेपामियं कांदप्पी स चासौ भावना च कांदपिकी भावनार एवं देवानां मध्ये किल्पिपाः पापाः अतएवास्पृश्यादिधर्मका देवाश्च ते किल्चिपास्तेपामिय किल्विपीकी स चाऽसौ भावना च किल्वियी भावना २ आ-समन्तात् आभिमुख्येन युज्यन्ते-दासकर्मणि व्यापार्यन्ते इत्याभियोग्या:-किङ्करस्थानीयदेवविशेषास्तेषा मियमामियोगिकी स चाऽसौ भावना च आभियोगिकी भावना ३ असुरा-भवनपतिविशेपदेवास्तेपामियं आसुरी स चाऽसौ भावना च आसुरीमावना ४ संमुखंतीति संमोहा मूढात्मनो देवविशेपास्तेपामियं संमोही एपा हु-निश्चितं पञ्चविधाऽपि भावना अप्रशस्ता-संक्लिष्टा- भावनास्तत्तत्वभावाभ्यासरूपा भणितेत्यर्थः, आसां च मध्ये संयतोऽपि सन् यो यस्यां भावनायां वर्चते कथश्चिद्भावमांधात् सात- १. प्रवचनसारोद्धार पृष्ठ १८०-१ गत गाथा ६४१ वृसौ एतत्पद्यमुपलभ्यते ।२ प्रवचनसारोद्धार पृष्ठ १७९ गत ६४१ गाथा

द्वित्तीय
संवरद्वारे
'अशुमपन
विशति
भावना-
स्वरूपम्
द्विधेष्वेव कंदादिप्रकारेषु देवेषु गच्छति चारित्रलेशप्रभावात् , ये पुनः सर्वथा चारित्रहीनः स भाज्यो विकल्पनीयः कदाचित्तदुचि
तेषु सुरेष्वेवोत्पद्यते कदाचिच्च नारकतिर्यक्षु मानुषेविति एताश्च पञ्चाऽपि भावनाः प्रत्येकं पञ्चविधाः सत्यः पञ्चविंशत्यो भवन्ति तासां
भेदानाह-प्रथमपश्चवियां कान्दीभावनामाह-
कंदप्पे१कुक्कुएर दुस्सीलत्तयर हासकरणे य४ परविम्हियजणणेविअ कंदप्पोणेगहा तह य ॥१॥
व्याख्या-कन्दणे १ कौकुच्ये २ दुःशीलत्वे ३ हास्यकरणे ४ परविस्मयजननेऽपि च विषये भवन्ति पञ्च प्रकाराः परमेका
अनेकधास्ता उच्चैःवरेण हसनं तथा परस्परपरिहासः तथा गुदिना सह निष्ठुरवाक्यं हास्यादिना स्वेच्छालापा तथा कामकथाकवनं
एवं च कुरु इति विधानद्वारेण कामोपदेशस्तथा कामप्रशंसा कंदर्पशन्देनोच्यते, कुकुचो-मांडचेया तद्भावः कौकुच्यं तत् द्वेधा-काय.
कौवन्यं वारुकौकुन्यं तत्र कायकौकुच्यं यत् खयमेव हसन् ध्रुनयनादिभिर्देहावयवैस्विकारकैस्तथा चेष्टां करोति, वाक्कोकुष्यं यथा-
परिहासप्रधानस्तस्तैर्वचनजातैर्विविधजीवविस्तैर्मुखातोद्यवादितया च परं हासयतीति २ तथा दुष्टं शीलं खमावो यस्य स तद्भावः दुःशी-
लस्वं, तत्र यरसंभ्रमावेशवशाद अपर्यालोच्य द्रुतं द्रुतं मापते यश्च परत्काले कन्दर्पोदुरप्रधानाऽनस्तितवलीपर्द इव द्रुतं द्रुतं गच्छति
यञ्च सर्वत्राऽसमीक्षितकार्य द्रुतं द्रुतं करोति पच स्वभावस्थितोऽपि तीब्रोद्रेकवशार्पण स्फुट नीचचल्लवति तद् दुःशीलत्वं ३ तथा
भांड इत्र परेपो छिद्राणि-विरुपवेषभाषणविषयाणि निरन्तरमन्वेषयन् विचित्रैस्तादृशैरेव वेषवचनैर्यद् दृष्ट्टणामत्मनच हासं जनयति
१एतक्ष्यों 'जो संजओ' पद्यस्य ॥ २ मवचनसारोद्धार पृष्ठ २७२ गत ३४२ गाथा। ३'हत स्थाने 'दुतं' म. सारोबारात
स्फुटोछतं
॥५७॥

वन दास्यकरयं ४ क्या परेप विस्मयजनकै तथा इन्द्रजालप्रभृतिभिः प्रहेलिकाकुहेटिकादिमिश्च तथाविषप्राम्पलोकासिदैर्यत्स्वयमवि स्मयमानो बालिशप्रायजनस्य मनोविनममुत्पादयति तत्परविस्मयजननं ५ अथ देवकिल्लिपीभावनामाह- सुपनाणं केवलीण२ धम्मायरियाण३ संघसाहणं ५ माई अवण्णवाई किब्बिसियं भावणं कुणइ ॥१॥ युतज्ञानस्य द्वादशांगरूपस्य १ केवलज्ञानवता २ धर्माचार्याणां-धर्मोपदेष्ट्टणो ३ संघस्य-साधुसाध्वीश्रावकश्राविकासमुदायस्य४ साधूनां-पतीनां ५ अवर्णो-अश्लाघा असद् दोपोद्घाटनं वदतीति अवर्णवादी मायी च स्वशक्तिनिगृहादिना मायावी देवकिल्बि- पीभावना करोति इति वाक्यार्थः। श्रुवज्ञानस्याऽवर्णवादो यथा-पृथिव्यादयः कायाः षड्जीवनिकायाः शस्त्रपरिज्ञाध्ययनादिषु बहुशो यथा वर्ण्यन्ते । वथा ब्रतानि-प्राणातिपातनिवरयादीनि प्रमादा-मयादयः अग्रमदास्तद्विपक्षभूता भूयः भृया कध्यन्ते, अधिकं अधिक न किश्चिदपि पुनरुक्तदोषः । अन्य मोक्षार्थ यतितव्यमिति हेतोः किं ने सूर्यप्राप्त्यादिना ज्योति शास्त्रेण ? तथा मोक्षार्थमभ्युद्य- सानो मुनीनां कि योन्यादिप्राभृतोऽपनिबन्धनेन ? भवहेतुत्वाचस्य किं प्रयोजनमित्याचवर्णवादः, केवलिनामवर्णवादो यथा-किमेषां झानदर्शनोपयोगी क्रमेण भवत उत युगपद ? तब यदि क्रमेणेति पक्षोऽङ्गीक्रियते, तदा ज्ञानकाले न दर्शनं दर्शनकाले न ज्ञानमिति परस्परावरणवा प्राझव कथं निरावरणता। अथ युगपदिति द्वितीयपक्षः कक्षीजियते तदप्ययुक्तः योरप्येककालत्वादेकतापतिः प्राप्नोति, तदा खखावरणक्षयात्को गुण १ प्रवचनसारोद्धार छ १७९ गत गापा ६४३

-
द्वितीय
संवरद्वारे
अशुभ पञ्च
विंशति
भावना-
स्वरूपम्
इत्यवर्णवादः २ धर्माचार्याणां अवर्णवादो यथा न शोभनैतेषां जाति ते लोकव्यवहारकुशला न चैते औचित्यं विदन्ति इत्यादि विविध
गुरुन् प्रति भापते, न चैतेषां विनयवृत्या वर्चते तेषां ये प्रातिकूल्यमाजस्तैः सह सांगत्यमिति,तथा अहितछिद्राण्यन्वेपयन् सर्वसमक्षं
गुरूणामेवाऽसवोऽपि दोपान् वदति सर्वदैव च तेषां प्रतिकूलतामाचरतीति ३ संघस्यावर्णवादो यथा-यहवः श्वापशुशृगालादीनां संघा-
स्तकोऽयं संघो भवतामाराध्य इति वदति ४ साधूनामवर्णकादो यथा-नाऽमी साधवः परस्परं सइन्ते, अत एव देशान्तरं परस्परस्पर्द्धया
भ्रमन्ति अन्यथा त्वेकत्रैव संहत्या निष्ठयुः, तथा मायाचितया सर्वदैव लोकावर्जनार्थ मन्दगामिनः, महतोऽपि च प्रत्यैव निष्ठुरास्तदैव
रुष्टास्तदैव च तुष्टाः, तथा गृहिभ्यस्तैस्तैः चादुवचनैरात्मानं रोचयन्ति, सर्वदा सर्ववस्तुसंचयपराश्चेत्यवर्णवादः ५ अन्यत्र सन्बसाहणंति
पठित्या भायीति भिन्नेव पश्चमी भावना प्रतिपादिता यथा-
गूहइ आयसहावं छायेई गुणे परस्स संतेवि । चोरोव्व सव्वसंकी गूढाचारो हवइ मायी ॥१॥
अथाभियोगीभावनां पञ्चमेदामाऽऽह-
कोउय१ भूइकम्मे २ पसिणेहिं ३ तह पसिणपसिणेहिं ४ तहय निमित्तण चिय ५ पंचवियप्पा भवे साय ॥१॥
व्याख्या-कौतुकेन १ भूतिकर्मणा २ प्रश्नेन ३ प्रश्नाप्रश्नन ४ निमित्तेन ५ पञ्चविकल्पा भवेत् सा आभियोगिकीभावना, तत्र
कौतुकं वालादीनां रक्षादिकरणनिमित्तं स्वपनकरभ्रमण-अभिमत्रण-धूथूकरण-धूपन-विलेपनादि यत्क्रियते व कौतुकं १ तथा
वसतिशरीरमाण्डकशय्याधान्यादिरक्षणार्थ भस्मसूत्रादिना यत्परिवेष्टनकरण तवभूतिकर्म २ तथा यत्परस्य पार्थे लाभालामादि पृच्छयते
१प्रपचनसारोद्धार ,१८१ पृष्ठ गत ६४३ गाथा वृची पतत्पद्यं । २ प्रवचनसारोचार पृष्ठ १७९ गत गाथा ६४४
२%
॥५८॥

.. खरं या अंगुष्ठदर्पणवोपसमतेलादिषु दृश्यते स प्रश्नः ३ तथा स्वप्ने स्वयं विद्यया कथितं घटिकायवतीर्णदेवतया वा कथितं सद यदन्यस्मै शुमाग्नुभजीवितमरणादि परिकथयति स प्रश्नाप्रश्नः ४ तथा निमित्तं अतीतानागतवर्तमानवस्तुपरिज्ञानहेतुनि विशेषः ५ एतानि च भूतिकर्मादीनि गौरवादिनिमित्तं कुर्वाणः साधुरभियोगनिमित्त कर्म बध्नाति, अपवादपदेन तु गौरवरहितः सन्नतिशय- माने यतिनिस्पृहत्या यदा करोति वदाऽसौ आराधक एव उच्चगोत्रं च वनावि तीर्थोन्नतिकरणादिति । अयागुरीभावनामेदानाह- सहविग्गहशीलत्तं १ संसत्ततवो २ निमित्तकहणं च ३ निशिवियावियअवरा ४ पंचमगं निरणुकंपत्तं ॥१॥ प्याख्या-सदा विग्रहशीलत्वं १ संसक्ततपः २ निमित्तकथनं च३ निःकृपतापि अपरा ४ पश्चमकं निरनुकम्पत्वं ५ सदा-सर्व- फार विग्रहशीलत्वं पश्चादतनुतापिताया क्षमणादावपि प्रसत्य प्राप्त्या च विरोधानुबन्धः १ तथा संसक्तस्याहारोपधिशय्यादिपु सदा प्रविपदमावस्प आहारावर्थमेव तपोऽनशनादितपश्चरणं संसक्ततपः २ तथा त्रिकालिकस्य लाभालाभसुखदुःखजीवितमरणविपयस्य निमित्तस्य कयनमभिमानाभिनिवेशाव्याकरणं तथा त्रिविधनिमित्तमप्यकैकं पट्विधं तदपि द्विविधमेवेति ३ तथा स्थायरादिसत्त्वेष्व- बीवप्रतिपल्या गवणः कार्यान्तरन्यासक्तः सन् गमनासनादि यः करोति कृत्वा च नाऽनुतप्यते केनचिदुक्तः सन् स निकपस्तद्भावो निःकृपठाः ४ तथा यः परं कृपापात्रं कुतश्विद्धतोः कम्पमानमपि दृष्ट्वा सत्क्रूरतया कठिनभावः सन् अनुकम्पाभाग न भवति स निस्नु फम्पस्तदायो निरनुकम्पत्वं ५। अथ संमोहीभावनापञ्चभेदानाऽऽह- उमग्गदेसणा १ मग्गदूपणं २ मग्गविपडिवित्तीय ३मोहो य मोहजणणं५ एवं सा हवइ पंचविहा ॥१॥ १ अपचनसारोद्धार पृष्ठ १७९ गत गाथा ६४५ २ प्रवचनसारोद्धार पृष्ठ १७९ गत गाथा ६४६ RAM.EO द्वितीय संबरद्वारे অন্ত বস্তু विशति भावना- स्वरूपम एवं मोणेण भाविओ भवई अंतरप्पा संजयकरचरणनयणवयणो सुरो सचजवसंपन्नो, एवमिणं संवरस्स दारं व्याख्या-उन्मार्गदेशना १ मार्गदपर्ण२ मार्गविप्रतिपत्ति३ मोहो ४मोहजननं च५ एवं संमोही भावना भवति पञ्चविधा, तथा पारमार्थिकानि ज्ञानादीन्पश्यन् एव तद्विपरीतं धर्ममार्ग यदुपदिशति सा उन्मार्गदेशना १ तथा पारमार्थिक ज्ञानदर्शनचारित्रलक्षणं भावमार्ग तत्प्रतिपन्नांश्च साधून पंडितमानी खमनीपिकानिमित्तैः जातिपणर्य दृष्यति तन्मार्गदपणं २ तथा तमेव ज्ञानादिमार्ग असदुपणैपयित्वा जमालिवद्देशतः उन्मार्ग यत्प्रतिपद्यते सा मार्गविप्रतिपतिः ३ तथा निकामं उपहतमतिः सन् अतिगहनेषु ज्ञानादिविचारेषु यत्सुह्यति यच्च परतीधिकसम्बन्धिनी नानायिघो समृद्धिमालोक्य मुह्यवि स संमोहः कुशास्त्राणि बहुमन्यते इत्यर्थः ४। तथा स्वभावेन कपटेन चा दर्शनाचारेपु परस्पर मोहमुत्पादयति तन्मोहजनन ५ एताच पञ्चविंशतिरपि भावना सम्यक्चारित्र- विघ्नविधायित्वादशुमा इति हेतोः यतिभिः परिहर्तव्या यदुक्तं- एयाओ विसेसेणं परिहरइ चरणविग्धभूयाओ एय निरोहाउ चिय सम्म चरणं पि पावंति ॥१॥ प्रसङ्गात् अशुभभावनाविचार उक्तः विस्तरार्थिना तु दशाश्रुनस्कन्धनियुक्तिवृत्तितोऽवसेयः इति मङ्गलं भूयात् । एवमुक्तरीत्या हास्यप्रयोगेण वर्जितो मौनेन वचनसंयमेन भावितो भवति अन्तरात्मा-जीवः सम्यक्यतनायुक्तः करचरणनयनवदनः समाधिवान् इन्द्रियः शूरः-पराक्रमी संयमयोगे सत्यार्जवसम्पन्नः। एवमित्युक्तप्रकारेण इदं उक्तं संवरद्वारं। चरित-सेवितं भवति, सुष्ठु-शोभनतया १ प्रवचनसारोद्धार पृष्ठ १८३ गत पद्यसदृशं पतत्पयं । २ अशुभ पञ्चविंशति भावनास्वरूपम् प्रवचनसाराधार पृष्ठ १७९-१८३ पृष्ठोपलब्ध गाथा ६४१-६४६ विवरणतो अन्युनातिरिकं अत्रोपन्यस्तं प्रतिभाति, किन्तु प्रयचनसारोद्धारगताशुभभावनाप्रतिपादनपराणि पञ्चविंशतिपद्यानि पत्र न न्यस्तानि ॥५९॥ .

सम्म संचरियं होइ सुप्पणि हियं इमेहिं पंचहिवि कारणेहिं मणवपणकायपरिरक्खिएहिं निच्चं आमरणतं च एस जोगोणेयव्वो धितिमया मत्तिमया अणासवो अकलसो अच्छिदो अपरिस्साची असंकिलिट्ठो सव्वजिण- मणुनाओ, एवं वितिय संवरदारं फासियं पालियं सोहियं तीरियं किट्टियं अणुपालियं आणाए आराहियं भवति, एवं नायभुणिणा भगवया पन्नवियं परूवियं पसिद्ध सिद्धवरसासणमिणं आपवितं सुदेसियं पसत्यं पितियं संपरदारं समत्तं तिमि ॥२॥ (सू०२५) प्रणिहित-स्थापित एभिः पञ्चभिः कारणैः मनवचनकायत्रियोगैः परिरक्षितैः नित्यं-सदा आमरणान्त-जन्मावधिर्यन्तं, प्रशान्तयोगः प्रसन्नता प्राप्तो योगो ज्ञातव्यः, धृतिमता मतिमता श्रीमन्महावीरेण उक्तः अनाश्रयः, अकलुपः, अछिद्रः, अपरिश्रावी, असंक्लिष्टः, सर्वजिनैरनुज्ञातः एवममुना प्रकारेण द्वितीयं संवरद्वार स्पर्शितं पालित शोधितं तीरितं कीर्तितं अनुपालितं आज्ञया यथावत् आराधितं भवति एवमनया रीत्या ज्ञातमुनिना भगवता प्रज्ञापित प्ररूपित प्रसिद्ध सिद्धवरमधानशासनमिदं आपवितं पूजितं कथितं शोमन- रीत्या दर्शितं प्रशस्तं द्वितीयं प्राणातिपातविरमणवतापेक्षया अलीकविरमणव्रतं समाप्ति प्राप्तम् ॥२॥ इति सप्तमाध्ययनविवरण समाप्तम् ॥२॥ इत्यादि पदानि पूर्ववक्ष्याख्यातानीति ।। इति मनव्याकरणास्य दशमस्य सप्तमाध्ययने किञ्चित् द्वितीयसंवरद्वारार्थः ख्यात इह मयका १ ॥इति प्रश्नव्याकरणे द्वितीय संवरद्वारं संपूर्णम् ॥

॥अथ तृतीयं संवरद्वारात्मकं अष्टममध्ययनम् ॥
तृतीय
संवरद्वारे
अदत्तादान-
विरमण
स्वरूपम्
-
अथ सूत्रक्रमसम्बन्धः अनन्तराध्ययने मृपावादविरमणं उक्तं, तबादत्तादानविरमणबतानामेव अदत्तादानविरमणसुनिर्वाहे भवति
इत्यदत्तादानविरमणमभिधातव्यं भवति, इति तदनेन प्रतिपाद्यते इत्येवं संवद्धमदत्तादानसंवराध्ययनमारभ्यते तस्य चेदमादित्रम् ।
जंबू । दत्तमण्णुण्णायसंवरो नाम होतिततियं सुव्यता! महव्वतं गुणवतं परदञ्चहरणपडिविरइकरणजुत्तं
अपरिमियमर्णततपहाणुगय-महिच्छमणवयणकलुस-आयाणसुनिग्गहियं, सुसंजमिय-मणहत्त्वपायनिहुर्य
जम्बूरित्यामन्त्रणं दस-पितीर्ण अनादिक अनुज्ञासं च प्रातिहारिकपीठफलकादि ग्रामिति शेपः इत्येवरूपः संवरः दत्तादाना-
नुनावं संवरं इत्येवनामकं भवति तृतीयसंवरद्वारमितियोगः तत् कीदृशमित्याह-
हे मयत । है जम्यूनामन् ! महायतमिदं तथा पुनः कीदृशं गुणानाम्-ऐहिकामुष्मिकोपकाराणा कारणभूतं तं-गुणवतं कीदृशं
परद्रव्यहरणं प्रति विरतिकरणयुक्त-विरमथकारणं, अपरिमिता अपरिमाणा द्रव्यविपये या अनन्ता-अक्षया तृष्णा विद्यमानद्रव्याव्यये.
? मला तया यदनुगवं प्राप्तं तत् अपरिमिताऽनन्ततृष्णानुगतमहेच्छं यत्तद, मनो-मानसं, वचन-वाक् ताभ्यां यत् कलुपं परधनविषयत्वेन
पापरूपं आदान-ग्रहणं तेन ततो वा नियमितं-पत्रितं यत्तथा, पुनः कीदृशं सुष्टु-सम्परतफा संपमित-संघृतं मनस्तेन मनसा हेतुभूतेन
इस्तौपादौ निमृती-निवली परपनादानकार्यादुपस्तौ यस्मिन् तत् अनेन विशेषणेन मनोवाक्काय निरोध: wwint of
॥६॥

निग्गंध, णेहिक, निरुतं, निरासवं, निम्भय, विमुत्ते, उत्तमनरयसभ-पवरपलवग-सुचिहितजणसंमत, परम- साधम्मचरणं, जत्थ य गामागर-नगर-निगम-खेड़-कब्बड-मय-दोणमुह-संचाह-पट्टणासमगयं च किंचि दव्वं मणि-मुत्त-सिलप्पवाल-कंस दूस-रयय-घरकणग-रयणमादि पडियं पम्हु विप्पणटुं न कापति कस्सति कहेउं वा गेण्हिर या अहिरनसुवनिकेण समलेटुकंचणेणं अपरिग्गहसंधुडेणं लोगंमि विहरियञ्चं, जंपिय हो. जाहि दव्यजातं खलगत भ्यन्तरग्रन्थिरहितं, निष्टिकं-सर्वधर्मप्रकर्षपर्यन्तपत्ति, निरुक्तं-सर्वरुपादेयतया निरुक्तं अव्यभचारि, निराश्रवं कर्मादानरहि तं निर्भयं-राजादिभयरहितं, विमुक्त लोभदोपाव, उत्तमनरफ्भाणां प्रवरपलबतां च सुविहितजनस्य-साधुलोकस्य संमत-अभिमतं यस्य तत्तथा, परमसाधूनां-उत्कृष्टमुनिवराणां धर्मचरणं-धर्मानुष्ठानं यत्तत्तथा । यत्र-तृतीयसंपरद्वारे ग्राम-आगर-नगर-निगम-खेड- कर्यट-मडंय-द्रोणमुख-पत्तन-आश्रम, इत्यादयः शब्दाः पूर्वव्याख्याताः तद्गतं च दत्तं किञ्चिद् अनिर्दिष्टस्वरूपं द्रष्टव्यम् तदेवाह मणि-मौक्तिक-शिला-प्रवाल-कांस्य-रुप्य[दृष्य] रजत-वरकनक-रत्नादिसर्वद्रव्यजातं पतित-भ्रष्टं वस्त्राश्चलादेः, विस्मृतं-मुक्तं सन् , प्रनष्टस्वामिकं गवेपयद्भिरपि न प्राप्तं न कल्पते-न युज्यते, कस्यचित्-असंयतस्य कथयितुं-प्रतिपादयितुं अदत्तग्रहणप्रवर्त्तनं माभूदिति कृत्वा गृहीतुं-आदातुं साधोः निवृत्तत्त्वात् तेन साधुना दृष्टे परद्रव्ये कया भावनया वर्तितव्यं तदाह- म विद्यते हिरण्य-सुवर्ण यस्य तेन समे-तुल्ये उपेक्षणीयतया लेष्टु प्रस्तरं काञ्चनं च यस्य स तेन, अपरिगृहत्वात् सुसंवृत्तेन सुसंयतेन-साधुना लोके-मर्यलोके व्यवहर्तव्यम् , यदपि च भवेत् हि-निश्चितं द्रव्यजातं-द्रव्यप्रकारः, कीदृशं ? खलं-धान्यराशि- खेत्तगतं रनमंतरगतं वा किंचि पुष्फ-फल-तयप्पवाल-कंद-मूल-तण-कट्ठसकरादि अप्पं च बहुं च अणुं च तृतीय धूलग वा न कप्पती उग्गहमि अदिण्णमि गिहिजे, हणि हणि उग्गहं अणुन्नविय गेणियचं, वज्जेयचो संवरद्वारे सब्यकाल अचियत्तघरपवेसी, अचियत्तभत्तपाणं अचियत्त-पीढ-फलग-सेजा-संधारग-वत्थ-पत्त-कंवल-दंड- 'अदनादान- ग-रयहरण-निसेज-चोलपदृग-मुहपोत्तिय-पायपुंछणाइ भायणभंडोयहिउधकरणं, परपरिवाओ, परस्स दोसो विरमण करणभूमिः तत्र गतं, क्षेत्रं-सस्योत्पत्तिस्थानं तत्र गतं-प्राप्तं, अरण्यमध्यगतं, [जलगतं, स्थलगतं वा, इति पाठान्तरे] किञ्चिदनिर्दिष्ट- स्वरूपम् गतं, पुप्प-फल-स्वक् प्रयालोङ्करः कन्दो-भूमिगतः मूलं-तदुपरिवत्ति तृणं शूकादिहरितादिळ, काप्ठं प्रतीतं शर्कराः कर्करादयः अल्प-स्तोकं, पहु-प्रनुरं अणु-सर्पवादि, स्थूलं-महत्प्रमाणं तथैव न कल्पते न युज्यते, अवग्रह[हे]गृहं [६] स्थण्डिलादिरूपे अदत्ते- स्वामिना अननुज्ञाते गृहीतुं 'जे इति निपाते' यत् किश्चित् निषेधे । अय तहणे विधिमाह-अनुज्ञाप्य-यह भवदीयावग्रहे इदं च साधुयोग्यं द्रव्यं गृहीध्यामीति पृष्टे तव स्वामिना एवं कुरुत इति उक्तः तदा गृहीतव्यं इति स्वामिना गृहीतव्यम् , वर्जितव्यः सर्वकालं यथा सदा अप्रीतिमतां साधून् प्रति तेषां गृह-प्रवेशो गमनं गृहगमनमिस्पर्षः, अनीतिकारिणां यत् मक्तं-अशनं पानं, अप्रीतिकारिणां संबंधि पीढफलकशय्यासंस्तारकं वस्त्रं, पात्रं, कंपलं, दण्डकं, रजोदरणक, निपया-आसनादि, चोलपट्टा-परिघावनवलं, मुखपोचिका, पादपोंछनक-ऊर्णामयकंबलखण्डा, भाजन-पात्रं, भाण्डं- मृण्मयं पात्रं, उपधिय-वखादि त एव उपकरणानि-संयमसाधनानि द्वन्द्व समासः तत्सर्व परस्य परकीयं अदत्तमेतत् स्वामिनाऽननु ॥६॥ सावं इति कृत्वा वर्जनीयं एव। तथा परपरिवाओ विकत्यनं वर्जनीयम् , तया परस्य दोपो-दष्णं द्वेषो वा वर्जनीयः, तथा परदूपणभाषणं । . " . . परमापसेण संग गेहद परस्स नासेइ जंप सुफ,दाणस्स प अंतरातियं दाणविप्पणासो,पेसुन्नं चेव मच्छरितं स, गेविष पीद-फलंग-सेना-संधारग-पत्थ-पाय-कंपल-मुहपोत्तिप-पायपुंछणादिभायणभंडोपहिउपकरणं असंदिमागी । असंगहम्नी, तयतेणे य, पइतेणे य रूयतेणे य, आयारे चेव भावतेणे य, सहकरे, झज्झकरे, मारगुरुभ्यामननुमावस्येन वज्यं, अदत्तलक्षणं पेदं "सामीजीवादत्त" इति लक्षणाव । तथा परस्याचादिः ग्लानादेर्व्यपदेशेन- प्पाजन या गृहाति-आदने पैपापूरपकारादिस्यत्वेनाऽन्येन च वर्जयितव्यं आचार्यादरेष दायकेन दत्तत्वात् , तथा परस्परसंबंधो नागपनि अपगन् अपानुने या तं वदपि वर्जयितव्यं, दानस्य वा आन्तरायिकं-विमं दानविप्रनाशो दत्तादानलोपा,तथा पैशून्यं-- पिशुनक, मरमरित्वं गुणानाममहनं तीर्थकराननुसावत्वा वयं, योऽपि च पीठ-फलक-शय्या-संस्तारक-यख-कंबल-मुख. पोरिक एनेपा शम्दाना शन्दार्याः पूर्व न्यायणिता इति पादपोंछनादिमाजनमांडोपधि-उपकरणं इत्यादि पदार्थः जातीनां | आपापरतानादीनां असंविभागी एपणागुणविशुद्धलन्धं सन् न विमजते नाराधयति प्रवमिदं इति संबंधः। असंग्रहरुचिरितिकोऽर्थः? गोपायरणस्प एपगादोपविमुक्तस्प प्राप्तस्य उदरमरित्वेन नार्पयामीति अविद्यासंग्रहे रुचिर्यस्यासौ असंग्रहरूचिः कीदशा परतेन वपना पौरः समावत: करामनगारं दृष्ट्वा कवित्पृच्छति भोः साधो ? गच्छे मासक्षपणकः श्रुतः स त्वमेवेति पृष्टे असन्नपि मम्-पारमानं तदुपपन्तं प्रते, अथवा धुर्चतया पक्ति साधयः धपणकारिण एव भवन्ति श्राद्धस्तु मन्यते, एवं सकलसाधुसाधारण- पपनमाविष्फरोति इति तेन वनस्वी पूर्व भगवान् श्रुतः स त्वं मेनेत्युक्ते आत्मानं तद्रूपं संपादयन् वचस्तेनः रूपस्तेनो यथा, तत्र रूपं देषा शारीरगुन्दरता मुविहितसाधुनेपथ्यं वा यथा- तृतीय संबरद्वारे | अदत्तादान- विरमण स्वरूपम् नविन फलहकरे, वेरकरे, विकहकरे, असमाहिकरें, सया अप्पमाणभोती सततं अणुबद्धवेरे य, तिब्वरोसी, से तारि- पन्नाच्या सए नाराहए चयमिणं। इति अह फेरिसए पुणाई आराहए चयमिणं ?, जे से उपहिभत्तपाणसंगहणदाणकुसले, अचंतयालदुब्यलगि- लाणयुद्धखवग-पवत्तिआयरियउवज्झाए, सेहे, साहम्मिके, तवस्सीकुलगणसंधचेइयढे य निज्जरही वेयावचं ॥६२॥ तेऽसुविहियाय मन्ने जेसि जल्लेण फासियं अंगं । मलिणा य चोलपट्टा दोगिण य पाया समक्खाया ॥१॥ तथा आचारे साधुसामाचारीविषयस्तेनो-यथा स त्वं यः क्रियारुचिः श्रुतः इति कथिते समुद्भावयति स आचारस्तेन(ः) मावस्य-श्रुतज्ञानादिविशेषस्य स्तेनौरः, तथा शब्दकरो रात्रौ महता शब्देन उच्चारयन् गृहस्थभापया भापको वा, येन गणस्य भेदो मपति तद्वाक्यं ब्रूते स झञ्झकरः, कलहहेतुकृद्वाक्यं जल्पति स कलहकरः, वैर-विग्रहस्तत्कथाकारी चा वैरकरः, स्यादिकथाकारी, असमाधि-चित्तौद्वेगं करोति इत्यसमाधिकरः तथा, सदा-सर्वदा अपमाणभोजी-द्वात्रिंशकवलाधिकाहारी, सतत-निरन्तर अनु- पद-प्रारब्धं वैरफर्म-प्रत्यर्थिभावं येन स तथा, तीबरोपी-सदाकोपः, स तादृशः-पूर्वोक्तस्वरूपः नाराययति एतद्बत-निरतिचाररूपं अपादानविरमणमिति गम्यम् । अध कीरशः सन् एतमतमाघपति प्रश्नार्थः अथ परिप्रश्नार्थे योऽसौ उपधि-भक्तपानसंग्रहणं मिलितवस्तुनः दानं साधर्मिक- । उनेभ्यः, तयोः कुशलो-विधिज्ञो यः स आराधकः, अत्यन्तं यो पालः-सप्ताप्टवर्षीयः अव्यञ्जनजातो घा, दुर्वलो-कृशाङ्गः, यस्य भक्तं मुक्त सत् सप्तधातुतपा न परिणमति-न जीर्यते स ग्लाना, वृद्धः पष्ठिहायनः पर्यायेण वा, आपको-विकृष्टतपस्वी मासक्षपणादि ॥६२॥ OM अणिस्सियं पापिहं दमविहं करेति, न य अचियत्तस्स गिहं पविसइ, न य अचियत्तस्स गेण्इ भत्तपाणं, न य अपियत्तस्स सेवर, पीद-फलग-सेना-संथारग-यस्थ-पाय-कंचल-डंडग-रयहरण-निसेज-चोलपट्ट्य-मुहपो. तिप-पायपुंगणाइ-भायण-भडोचहिउवगरणं न य परिवार्य परस्त जपति, ण यावि दोसे परस्स गेण्हति, निरन्तर कर्ता, सीदन्तं प्रति चरणधर्म प्रयते प्रपर्चावयति स प्रपर्चका, आचार्यो-गणनेता सदाचार चरति स्वयं अन्यानाचरयति | म आचार्यः, उप-समीपे सूत्रार्थमध्यापयति इत्यूपाध्यायः, अभिनवप्रवजितः शैक्षः, एकथद्धारुचिः साधर्मिकः श्रुतलिंगप्रवचन- रिति, तपस्वी विकृतित्यागी चतुर्थादि भक्तकारी या, कुलं चांद्रादिकं, एकाचार्यवाचनीकसमुदायः गणो, गच्छ: कौटिकादि, तत्समुदायमक्तिक संघः, चैत्यानि-जिनप्रतिमा एतासां योऽर्थः प्रयोजनं यस्य स तथा तत्र च निर्जरार्थी-फर्मक्षयंकर्तुकामः, यापत्य-व्यावृत्तं निराकतकर्मरूपं उपष्टंभादीनां । अनिश्रितं-यशाकीर्त्यादी(दि)वाञ्छानिरपेक्षम् , बहुविधं-बहुपकारं ययस्योचितं दस मकारं कुर्वन्ति यत:-- येयावचं वावडभायो श्य धम्मसाहणनिमित्तं, अन्नाइयाण विहिणा संपायणमेस भावत्थो ॥१॥ अरिहंत सिद्धर चेदय३ आयरिय४ गिलाण५ सेहाणं साहम्मिय७ कुल८ गण९ संघ१० संगर्य तमिह कायव्वं॥ पहुषि-मक्तपानदानभावनानेकप्रकार करोतीति, तथा न च-नैव अग्रीतिकारिणो गृहं प्रविशति, नैव अग्रीतिकर्तुः गृहे भक्कं- अमनं पानं ग्राहयेव, न च अग्रीविक ः सेवते पीठ-फलक-शय्या-संस्तारक-ख-पान-कंवल-दंडक-जोहरण-निपद्या-चोलपट्टक मुखपरां पादनोंछनके माजनानि-पात्रादीनि, भाण्डं, उपधिः, उपकरणं । न च परिवाद-परदोपं चाटुवाक्यं वा परस्य-अन्यस्य जल्पति- १ अन्यत्र तु 'यायरिय १ उपग्झाए थेर तबस्सी' हति पूर्यपादं । २ मुद्दपत्ति इति भापा ।

सान०वि०
प्रश्नाच्या
पुति
तृतीय
संबरद्वारे
अदत्तादान
विरमण
भावना
स्वरूपम्
॥३॥
परववएसेवि न किंचि गेण्हति,न य विपरिणामेति किंचि जणं न याविणासेति, दिन्नसुरूयं दाऊण य न होइ
पच्छाताविए संविभागसीले संग्गहोवरगहकुसले से तारिसते आराहने वयमिणं ।
इमं च परदब्वहरणवेरमणपरिरक्षणट्ठयाए पावयणं भगवया सुकहितं, अत्तहितं, पेचाभावितं, आगमे.
सिभई, सुद्धं, नेपाउयं, अकुडिलं, अणुत्तरं, सव्वदुक्वपावाण विओवसमणं ।
| भापते, न चापि परदोपान् गृह्णाति, परव्यपदेशेन-ग्लानादिव्याजेनापि न किञ्चिद्गृह्णाति एतावता मायां पिघाय किमपि न गृहति
(गृहाति), न च केपामपि चेतः विपरिणमति-दानादिपर्माद्विमुखीकरोति किञ्चिदपि जनं, नापि नाशयति अपलपनद्वारेण, किश्चिदपि
सुकृतं दत्वं एतावता परगुणान् प्रकटीकुरुते न तु तदपलपनम् , देयं-वैयावृत्त्यादिकार्य दत्त्वा-कृयाऽपि न भवति पश्चात्तापिक:-पया-
| तापवान् , कृर्त नोपचारयति-संविभागकारी भवति उपध्यादिद्वादशविधानां साधर्मिकेभ्य इति शेषः, संग्रहे-शिष्यादिसंग्रहे उपग्रहे
तेपामेव मक्तश्रुतादिदानेन उपष्टंभवया अवलंघने कुशलो-दक्षः सः-पूर्वोक्तः, तादृशः-तादृशगुणयुक्तः साधुः आराषको-गृहीतप्रति-
पालको भवति, इदं व्रत-अदत्तादानविरतिलक्षणं तृतीयं व्रतम्-
इमं वचनं परद्रव्यहरणविरमणस्य परिरक्षणं-पालनं स एव अर्थ-प्रयोजनं यस्य स वथा तस्यैव, प्रवचनमिदं प्रावनिक,
भगवता-श्रीमहावीरस्वामिना, सुष्ठु-उपकारबुद्धया कथितम् , आत्मनः हितकारकम् , प्रेत्य-परलोकेऽपि भावित-वासितम् , आगामि-
काले मद्र-कल्याणकारि आसनसिद्धत्वात् , शुद्धं-निर्दोषम्, न्यायोपपत्रम् , अकुटिलं ऋजुत्वेन युतम् , अनुत्तरं-नास्ति उत्तर-प्रधान
अस्मात् बतादुपरि इति, सर्पदुक्खपापानां न्युत्सर्जनकारकं नाशकम् ,
.
॥६॥

तरम मा पंग भाषणानो तनियरस होति परदचहरणरमणपरिरक्षणव्यार, पढम देवकुल-सभा- पगा-यमानगमल-आराम-कंदरागर-गिरिगुहा-कम्मउजाण-जाणसाला-फुषितसाला-मंडव-सुन्नघर-सु- माणणारणे असमि प पयमादिमि दग-महिप-यीज-हरित-तसपाणअसंसत्ते अहाफडे फासुए विवित्ते पमापे उपस्मा होइ विहरियव्यं, आहाफम्मयालुले पजे से आसित-संमजि-ओवलितसोहिय-छायण-दूम- वरण-उमरूपम्य इमास्येति-अस्यैयादत्तिविरतिरूपस्य, पंचसंख्याका भावना-संयमशरीरे व्रतवासनारूपाः तृतीयत्रतस्य भव- नि पाद्रव्यहरगविरमणपरि-सामस्त्वेन रक्षणार्थ, तत्र प्रथमा वस्तुविविक्तवासोनाम्नी भावनामाह-देवकुलं यक्षादिग्रह, सभा- माजनम्यान, प्रश-पानीपशाला, नावसध-परिमाजकस्थानम् , पक्षमूलं प्रतीतम् , माधवीलतादियुक्चदंपतीरमणाश्रयो वनविशेष:- पारामः, कंदरा-दरी, आकरो-लोहायुत्पचिः (तिस्थानम् ), गिरिगुफा प्रतीता, कर्म-लोहादि परिकर्म्यते-क्रियते तत् परिकर्म, उपानं-पुपादिमदाधसंकुलं उत्सवादी पहुजनमोग्यम् , यानशाला-रथादीनां रक्षणगृहम् , कुप्यशाला-गृहोपकरणशाला, मंडप:- पमाात्म (निर्मिवपरागृहविशेषः), शून्यगृह-निर्मानुष (निर्मानुपनिशान्तम् ), श्मशानं-मृगकजनप्रेतभूमिः, लयन-शैलगृहम् , आपणः-पापस्थानम् ततः सगाहार द्वन्दा, अन्यस्मिन्नपि-एवं मकारे उपाश्रये विहर्त्तव्यम् इति । किंभूते उपाश्रये ? दकमुदकम् , मृषिका-प्रथिवीकापरूपा, पीजानि-शाल्यादीनि, हरितानि-दर्शदीनि, असा प्राणाः[माणिनः] द्वीन्द्रियादयः तैः असंसक्तोऽनायुक्तः (वस्मिमिति), यया हते-गृहस्पेन स्वार्थ निप्पादिते, माशुके-निर्जीवे, विविक्ते-रुपादिदोपरहिते, अतएव प्रशस्ते-शुभनिमित्ते उपा. थये-पसी भावि विदर्तव्य-आश्रितन्यं शयनादि वा विधेयम् । यस्मिन् स्थाने न बसितव्यं उदाह-आधया-साधुमनस्याधाय- . . . -

धानवि०
प्रश्नाच्या
शचि
तृतीय
संवरद्वारे
अदत्तादान
विरमण
भावना
स्वरूपम्
॥६॥
लिंपण-अणुलिंपण-जलण-भंडचालण अंतो पहिं च असंजमो जत्थ बढ़ती संजयाण अहा वजेयब्यो हु उव-
स्सओ से तारिसए सुत्तपडिकुट्टे । एवं विवित्तवासवसहिसमितिजोगेण भावितो भवति अंतरप्पा निचं अहि-
फरणकरणकारावणपावकम्मविरतो दत्तमणुन्नायओग्गहरुती ।
पितीयं आरामुनाणकाणणवणपदेसभागे जं किंचि इकडं या कठिणगं च जंतुगं [जवर्ग] च परामेरकुच-
आश्रित्य तया पृथिव्याधारंभः क्रियते तदाधाकर्म तेन बहुलं-बहुप्रचुरं यत्र स तथा एवंविधोपाश्रयो वयः, अनेन मूलगुणदूपितस्य
परिहारः उक्तः। पुनः कीदृशम् आ-ईपद सितं-सिञ्चितम् , समार्जितम् कचवरापनयेन, उपलिप्त-उत्कपितं जलाभिसिञ्चनेन, शोभि-
तम् चन्दनमालाचतुष्कपूरणादिना, छादनं-उपरि दर्भादिना छादनम् , दुमन-सेढिकया धवलनम् , लिपनं छगणादिना, सकृत्
लितायाः भूमः (मे) पुनर्लेपन अनुलेपनम् , शीतापनोदाय वरेज्वलनं, भांडपालनं-प्रकाशहेतो जनानामितस्ततः करणं समाहार-
द्वन्दः, अन्तर्मध्येयहियोपाश्रयस्य तत्र असंयमो-जीवविराधना यस्मिन् उपाश्रये वर्तते, संयतानां साधूनां अर्थाय हेतवे तादृशः
सावद्योपाश्रयो वसतिः वर्जनीय इत्यर्थः । हु निधयेन स तादृशा सूत्रप्रतिक्रुटः-आगमनिपिद्धः । एवं-उक्तप्रकारे विविक्ते-एकान्ते
बासः-स्थानं बसतिर्यस्य स ससमितियोगयुक्तो भावितो-चासितः अन्तरात्मा जीवः, निच-सदा, अधिकरणकारापणानुमतिपाप-
कर्मविरतो-निवृत्तः सन् दत्तं स्वाम्यादिभिः अनुशातः-सूत्रोक्तस्तादृशो योऽवग्रहो-ग्रहपाय वस्तु उत्र रूचिर्यस्यासौ साधुः इति
प्रथममावना ॥१॥
द्वितीयामाह अनुज्ञातसंस्वारग्रहणात्मिकां, आरामः उद्यानम्, पूर्व व्याख्याती नगरासनं सामान्यवृक्षोपेवं काननम् , नगराद्-
-
-
॥६॥

, - कुसन्म-पलालमूयगपव्यय-पुष्फ-फल-तप-पवाल-कंद-मूल-तण-कह-सफरादी गेहद सज्जोयहिस्स अहा न कप्पर उग्गहे अदिमि गिण्हे जे हणि हणि उग्गहं अणुन्नविय गेपिहयव्वं एवं उग्गहसमितिजोगेण भावितो भवति अंतरप्पा निचं अहिकरणकरणकारावणपावकम्मविरते दत्तमणुनायओग्गहरुती। दवति वनम् , एतेषां यः प्रदेशो-विभागस्तत्र यत्किञ्चिद्रहणीय वस्तु भवति तदाह इक्कुर्ड-तृणविशेषः, कथिनक-पंड(द)वणं, जलाशयगत तृणं, परा:-कृणविशेषाः, मेरा-मुंजसरिका, कूर्चा-येन वृणविशेषेण कुविन्दाः कूर्चान् कुर्वन्ति, कुशदर्भयोः आकारभेदः तथा बहुमूलो दमः अमूलः कुशः, पलालं-व्रीहिकंग्वादिधान्यानां तुपाः, मूयका:-मेदपाटदेशजातयस्तणविशेपाः, पर्वजास्तणवि. शेपा ग्रन्थिजातयः, पुष्पफल-त्वक्-प्रवाल-कंद-मूल-तृण-फा() शर्कर-कर्कराः प्रतीता एव पुनस्ता आदिर्यस्य तत्तथा गृहाति, किमर्थं गृहावि तदाह-शख्या-उपधिः संस्तारकरूपस्य उपरि अधो पा चकारार्थः तदर्थ-तन हेतवे गृह्णाति न कल्पते-न युज्यो। अपग्रहे अनुज्ञातेऽपि उपाश्रये मध्यगतणाद्यपि अनुज्ञां बिना गृहीतुं न कल्पते एतावत्ता तदपि न ग्राहाम्, एतदेवाइ यत्किश्चिदपि विलोक्यते (यस्मिन्) तत् (अहातस्मिन्) अहनि अहनि-प्रतिदिनं उपाश्रयाद्यनुज्ञावत् सर्व अनुज्ञाप्य गृहीतव्यम् , एवं-उत्तपत्र- नीत्या अपग्रहसमितियोगेन, भात्रिनो-वासितो भवति अंतरात्मा जीवः नित्यं-सदा, अधिकरणकारापणपापकर्मविरतो, दत्त-अनु. शातावग्रहरचिः द्वितीया भावना २ १. भाषा रोहीसादि ॥२ डीलोचिहो इति भाषा ,

तृतीय
नभी
..या०)
संवरद्वारे
| अदनादान-
विरमण
भावना
स्वरूपम्
॥६५॥
ततीपं पीढफलगसेवासंथारगट्टयाए सक्यो न चिंदियव्यो न छेदणेण भेयणेण सेना कारेयव्वा जस्सेव
उपत्मते पसेन से तत्व गवसेना, न य विसमं समं करेजा, न निवायपवायउस्सुगत्तं न डंसमसगेसु खु.
भिपव्यं अग्गी घूमो न काययो, एवं संजमयलुले संवरयहुले संवुडबहुले समाहिबहुले धीरे कारण फासयंतो
मयं अन्झप्पज्झाणजुत्ते समिए एगे चरेन धम्मं, एवं सेवासमितिजोगेण भावितो भवति अंतरप्पा निचं
अहिकरण-करणकारावण-पावकम्मचिरते दत्तमणुनायउग्गहरुती ।
तृतीपा भावना वस्तुमय्यापरिकर्मवर्जना नाम, तचैवंप्रकारेणाह-पीठफलकशय्यासंस्तारकार्थनाय वृक्षस्तरुन छैदि-
तम्या, नद्भम्पाश्रितपधादीनां कर्चनेन पाषाणादीनां च भेदनेन शुय्या-शयनीयं न कारयितव्यम् (व्या), तथा यस्पैव-गृहपतेः
उपायये-बसतो यसेन-निवासं करोति शय्या-गपनीयं तत्रैव गवेषयन् न च विपमा (मा) अतिसमां कुर्यात् , न नितिमातोत्सु.
| कत्ल कुर्यात, उत्सुकत्यं-हा ! कथं स्वात् एवं न कार्यम्, न च दंशमशकेषु विपये क्षुमितव्यम् , ततश्च दंशायपनयनार्थ अग्निधूमौ वा
न कर्मयो। एवं-उतप्रकारेण संयमबहुल:-प्रधिव्यादियतनाप्रवरः प्राणातिपाताद्याश्रवद्वारनिरोधः संवरः तत्प्रचुरः, कपायेन्द्रियजयन
दमनपाला, समाधिः-चिचम्वास्थ्यम् तेन पहलः, धीरो-पुद्धिमान् , अक्षोभ्यो वा परीपहोपसर्गादिकं कायेनास्पृशत् न मनोरथमात्रेण
तृतीयं संवरद्वारम्, सततं-निरन्तरम् अध्यात्मनि-आत्मानमधिकृत्य आत्मालंघनं ध्यान-चित्तनिरोधस्तेन युक्तो यः स तथा, तत्रा-
रमप्पानं-अमुकोऽहं, अमुर्कासस्से, अमुकधम्मट्ठाणहिए तन्चिराहणेत्यादिरूपं समितः समितिभिः एको(s)सहायोऽपि
गगापमानान् परन्-अनुतिष्टेन् धर्म चारित्रधर्म एवं शय्यासमितियोगेन मावितो-चासितो भवति' अन्तरात्मा जीवः नित्य-सदा
॥६५॥

. पउत्पं साहारणपिंडपातलाभे सति भोत्तव्यं संजएण समियं न सायपाहिकं, न खद्धं, ण वेगित, न तुरियं, न पयलं, न साहसं, न य परस्स पीलाकरसावलं तह भोत्तव्वं जह से ततियवयं न सीदति, साहारण- पिंउपायलामे सुहुमं अदिनादाणयपनियमयेरमण, एवं साहारणपिंडवायलाभे समितिजोगेण भावितो भवति अंतरप्पा नि अहिकरणकरणकारावणपावकम्मविरते दत्तमणुन्नायउग्गहरुती। अहिकरणकारापणपापकर्मविरवः, दत्त-अनुज्ञात-अवग्रहरुचिः इति तृतीयभावना ३ अथ चतुर्थीभावनावस्तु अनुज्ञातभक्तादिभोजनलक्षणं नाम, तचैवंप्रकारेणाऽऽह सत्रकार इति, साधारण:-संघाटिकादिसा. घर्मिकस्य सामान्यो यः पिण्डः तस्य च-पतद्ग्रहलक्षणस्य पात्रे-वाधिकरणे लाभो-दायकाव सकाशाद प्राप्तिः स साधारणपिंडमात्र. लाभस्तव सति भोक्तव्यम्-अभ्यवदतव्यम्, परिभोक्तव्यं च केन कथमित्याह-संयतेन-साधुना सम्यग् यथादनादानं वसति()भवति तथा सम्यक्त्वमाह न च शाकम्पादिकं साधारणस्य पिण्डस शाकम्पाधिके भागे भुज्यमानं साधारणसंघाटिकादिपु प्रीतिरुत्पद्यते न सदं २ प्रगुरं ३ मोजने अप्रीतिरेव, न वेगितं ग्रासस्य गलने वेगवत् , न त्वरितं मुखक्षेपे, न चपलं चपलहस्तग्रीवादिरूपकायचलनवत् म साहममवितकितम् , अतएव न च परस्य पीडाकरं च तत् सावधं चेति परपीडाकरं सावधं किंबहुनोक्तेन तथा भोक्तव्यं संयतनेन नित्यं यथा से क्या संयतस तृतीयं व दत्तम् न सीदति-न भ्रंशति, साधारणपिण्डपात्रलामे साधारणसंघाटिक-आहारोपधिवता- दिलामे सति सम-मुनिपुणं अतिशवेन रक्षणीयत्वादणु अदचादानविरमणलक्षणेन कुत्रापि नियंति य भणसा इति पाठः । तत्र अद- पादानविरमणलक्षणवते नियंत्रितं वशीकृतं मानसं यस्य स तेन, एवं साधारणपिण्डपावलामे सति, समितियोगेन भावितो-वासितो .

प्रश्नाच्या पचि तृतीय संवरद्वारे अदत्तादान विरमण भावना स्वरूपम् ॥६६॥ पंचमग साहम्मिए विणओ पउंजियव्यो, उपकरणपारणासु विणओ पंउजियव्यो, वायणपरियणासु भान०वि०विणओ पजियव्यो, दाणगहणपुच्छणासु विणओ पउंजियव्यो, निक्खमणपवेसणासु विणओ पउंजियचो, अग्नेसु य एवमादिसु पहुसु कारणसएसु विणओ पउंजियब्वो, विणओवि तवो तवोवि धम्मो तम्हा विणओ पउंजियव्यो, गुरुसु साहसु तपस्सीसु य, विणओ पउंजियव्वो एवं विणतेण भाविओ भवइ अंतरप्पा णिचं भवति अन्तरात्मा जीपः नित्पं सदा अधिकरणकारापणपापकर्मविरतः दत्तं अनुझावं अवग्रहरुचिः भवतीति चतुर्थी भावना पश्चमीभावनामाह किं नाम वस्तु साधर्मिकविनयकरणभावनापकारमाह-साघमिकजनेषु विनयः प्रयोक्तव्यः, आत्मनो वा अन्यस्य उपकारणं ग्लानाद्यवस्थायां स्वयं करणं अन्येन उपकारणं तथा तपसः श्रुतस्कन्धादिश्रुतस्य व्यापारगमनं पारणा तयोविनयः प्रयोक्तव्या, विनयभेच्छाकारादिदानेन बलात्कारपरिहारादिलक्षणेन एकनान्यत्र च गुर्वनुज्ञया भोजनादिकत्यकारिण इत्यादिरूपो चिनयः कर्तव्यः । तथा वाचना सूत्रग्रहण, परावर्तना गुरुदत्तसूत्रस्यैव गुणनं तयोविनया प्रयोक्तव्यः वंदनदानादिलक्षणः, तथा दानं लन्यस्यान्नादेर्लानादिम्यो वितरणं ग्रहणं तस्यैव पारणदीयमानस्यादानं पृच्छना विस्मृतम्घार्थप्रश्नः एतासु विनयः प्रयोक्तव्यः, तत्र दानग्रहणयोः गुर्गनुज्ञालक्षणः पृच्छनासु यानुवंदनादिदानस्तद्रूपो विनयः निर्गमनं वसतेः प्रवेशनं तत्रैव तयोविनयः आवश्यिकी निपे- धिक्यादिकरण अथवा हस्तप्रसाधनपूर्वकं भूममार्जनानंतरं पादनिक्षेपणम् तथा अन्येष्वपि एवमादिषु बहुम्वपि बहुप्रकारेण शतेषु विनयः प्रयोक्तव्यः कन्यः, करमाटेतोः एवं विनयः सर्वत्र प्रयोक्तव्यः केवलं विनय एव न किन्तु विनयस्तपः अभ्यन्तरतपोमेदेषु पठित- त्वात् पुनः विनयो धर्मः संयमो वा तस्य चारित्रांशत्त्वात् तस्मात् कारणात् विनया प्रयोक्तव्यः, केषु ? इत्याह-गुरुघु-पूज्येषु साधुपु- . ॥६६॥ - rotika अधिकरणकरणकारावणपावकम्मविरते दत्तमणुनायउग्गहरुइ ! एमिणं संवरस्स दारं सम्म संचरिय होइ सुप. णिहियं एवं जाव आपवियं सुदेसितं पसत्यं ॥ (सू० २६) ततियं संवरदारं समत्तंतिबेमि ॥३॥ गुणज्येष्ठेषु तपस्विपु च-अष्टमादिक्षपणादिकारिपु वा विनयः प्रयोक्तव्यः । एवं-उक्तमकारेण विनयेन भावितो वासितो भवति यस्य अन्तरात्मा जीवः नित्यं-सदा अधिकरणकारापणपापकर्मविरतः दत्तमनुज्ञाताऽवग्रहरुचिर्भवतीति पंचमी भावना एवं उक्तनीत्या इदं व्याख्यानं यत् संवरस्य तृतीयाश्रवादचादानविरमणरूपस्प सम्यक् प्रकारेण आचरितं भवति । "एवमिण संवरस्सदारं सम्म संचरिय होद सुप्पणिहिं कारणेहि मणवयणकायपरिरक्खिएहिं णिचं आमरणंतं च एस जोगो णेयध्यो | धितिमता मतिमता अणासवो अकलुसो अछिदो अपरिस्साची असंकिलिट्ठो सुसुदी सव्यजिणमणुनाओ एवं ततियं संवरदारं फासिय पालिय सोहियं नीरियं किट्टियं सम्मं आराहियं आगाए अणुपालितं भवति एवं णायमणीणा भगवया पण्णवियं परूवियं पसत्यं पसिद्ध सिद्धवरसासणमिणं आपवियं सुदेसियं तइयं संवरद्वारं संमत्त" । इदं सर्व निगमनस्त्रं पुस्तकेषु किञ्चित् साक्षादेवं व्याख्यातमस्ति कुत्रचिन्न लिखितं अर्थस्तु प्रथमर्सवरद्वारे व्याख्यातमस्ति ततोयसेय इतिशब्द:-परिसमाप्तौ पूर्ववदेव वाच्यः समाप्तमष्टमाध्ययनविवरणं श्रीप्रश्नव्याकरणांगस्य दशमस्य पाष्टमाध्ययनं व्याख्यातं च सदर्थ तृतीयं संवरद्वारं । इति तृतीयं संवरद्वार। इति श्रीमद् ज्ञानविमलसूरीश्वरविरचिते प्रश्नव्याकरणे तृतीयं संवरद्वारं समाप्तं

चतुथ
मान०वि०
प्रश्न०व्या०
प्रति
॥ अथ चतुर्थं संवरद्वारात्मकं अष्टममध्ययनम् ॥
संवरद्वारे
ब्रह्मचर्य
स्वरूपम्
॥७॥
अथ सूत्रक्रमसंबंधः व्याख्यातं तृतीयं संवराध्ययन, अथ चतुर्थं ब्रह्मचर्यसंवराध्ययनमारभ्यते, अस्य च पूर्वेण सह सूत्रक्रमत एवं
संबंघो यदनन्तराज्यपनेऽदत्तादानविरमणाभिधानसंवरमणनानंतरं चमचेरैति-चमचर्याभिषानं संवरद्वारं उच्यते इति शेषः । किं रूपं
वत् ब्रह्मचर्यसंपरस्येति प्रस्वायनास्त्रमाह-
जंबू! एत्तो यभधेरै उत्तमतयनियमणाणदसणचरित्तसम्मत्तविणयमूलं, संयमनियमगुणप्पहाणजुत्तं, हिम-
बामणा-शीलेन, ज्ञानेन का चरणं-प्रवर्तनं ब्रह्मचर्य एतावता सुशीलानामेव ब्रह्मचर्य कुशीलानां नैवेत्यागतम् । जम्बूरित्यामंत्रणं
शिष्यस्य, इतो-ऽदचादानविरतेः, "च" पुनरथे, चतुर्थ संवरद्वारं ब्रह्मचर्याभिधानं, तत् कीदृशं उदाराः-प्रधानाः ये तप प्रभृतयः
क्या तपोऽ-नशनादि, नियमा:-पिण्डविशुद्ध्यादयः उत्तरगुणाः, ज्ञान-विशेषयोघो वस्तुनः, दर्शनं-सामान्ययोपा(धोऽ)वलोकनं,
चारित्र-सावधयोगविरतिरक्षणम् मिथ्यात्वमोहनीयक्षयोपशमजनितजीवपरिणामः सम्यक्त्वम् , विनय:-अभ्युत्थानोपचाररूपा,
एतेषां पदानां द्वन्द्वस्तेपो मूलमिव मूल-कारणं यत्तत्तथा । पुनः कीदृशं संयमा:-अहिंसादयः, नियमा:-द्रव्याद्यभिग्रहाः पिण्ड-
| विशुयादयो वा ते गुणानां मध्ये प्रधानास्तैर्युक्तं तचया । पुनः कीदृशं ? हिमवतः-पर्वतविशेषः तस्मादपि महत् तेजस्विकं एता.
"
"
॥६७॥

. यंतमहंततेयमंत, पसत्यगंभीरथिमितमझ, अजवसाहुजणाचरितं, मोक्खमगर्ग विसुद्धसिद्धिगतिनिलयं, सासय- मल्यापाहमपुणभयं, पसत्यं, सोम, सुभ, सिवमचलमक्खयकर, जतिवरसारक्खितं, सुचरिय, सुसाहिय, नवरि वता यतानो मध्ये महद गुरुकं यतः "मतानां ब्रह्मचर्य हि निर्दिष्टं गुरुकं व्रतम् । तजन्यपुण्यसंभारसंयोगात् गुरुरुच्यते" ॥१॥ अन्यैरप्युक्त- "पफतथतुरो वेदाः ब्रह्मचर्य च एकतः। एकतः सर्वपापानि, मयं मांसं च एकतः" ॥१॥ इति वचनात् अतएर पगस्त-शोमनं गंभीर-अतुच्छं, कातरैर्दुरनुचरत्वाद् स्तिमिन-स्थिरं मध्यं देहिनः अन्तःकरणं यत्तत्तथा एतावता कशीलानां लन्धिः सिद्धिवापि न । ततएव आर्जवैः-जुतागुणोपेतः साधुभिः आचरित-आसेवितम् , पाठान्तरव्याख्याने प्रशस्तै गंभीर प्रक्षा स्थिरमध्यैः मध्यस्थै रागद्वेपानाकुल(लि)तैरेवादी(क) साधुजनैः सेपितमित्यर्थः मोक्षगतेर्मार्ग तत्प्रापकत्वात् , अथवा वादशः साधुजनैराचरितं मोक्षमार्ग यत् तत् , विशुद्धद्धा)-रागद्वेपादिदोपामावतो निर्मला या सिद्धि()-कृतकृत्यता सैव गम्यमानत्वात् पिशुदसिद्धिगविल) जीवस्वरूपं तस्य(1)निलयं-स्थान, "सिद्धानां गति(क) सिद्धिरेवेति वचनात्" । शाश्वतः(त) साद्यपर्यवसितत्वात् , अय्यारापः() क्षुधादिपाधारहितत्वाद, अपुनर्भवं पुनः संसाराभापाद, प्रशस्त-प्रधानं उक्तगुणसद्भागद , सौम्यं-रागाद्यभावात् , शुभ-सर्वप्रिपत्वात् , शिव-विभाभावात् , अचलं-स्पंदनादिक्रियाशून्यम् , अक्षतं पूर्णमासीचंद्रवत् आहादकर तादृशं ब्रह्मचर्य यति- चरैः संरक्षित-पालिवं, सुपरित-शोभनानुष्ठानं, सुष्ठु साधित-शोभनतया प्रतिपादित-कथितं, नवरं-केवलं, मुनिवरैर्महर्षिभिः,. महा-

।
धान वि०
प्रश्नाच्या
प्रचि
चतुर्थ
संघरद्वारे
ब्रह्मचर्य
स्वरूपम्
॥६॥
मुणिवरेहिं महापुरिसधीरसूरधम्मियपित्तिमताण य सया विसुद्ध सव्वभावजागाणुचिन्नं, निस्संकिय, निभयं,
नित्तुसं, निरापास, निझवलेवं, नियुतिघरं, नियमनिप्पकंप, तवसंजममूलदलियम्म, पंचमहब्वयसुरक्खियं,
पुरुपैः जात्यादिगुणोपेतः, धीराः-उच्चमाः, धीराणां मध्येऽपि शूरा-धात्यंतमहासचधनाः, ते च, धार्मिका धर्मशा(शी)लाः, धृति-
मंतो-पर्यवंतः पामेव कर्मधारयः सादृशानां सदा विशुद्धं-निर्दोपं । अनेन किं साधित
"अपुरस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च, तस्मात्पुत्रमुखं दृष्ट्वा पश्चादम चरिष्यसि इति निरस्तम् अतः तदुक्तं-
"अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम, दिवंगतानि विप्राणामकृत्वा कुलसंततिम्"
अतः शीलं सदा विशुद्धम् , सर्वभव्यजनानुचरितं मव्यकल्याणयोग्यमित्यर्थः, निकितं-अशंकि ब्रह्मचारी हि सर्वजनानां
निःशंकनीयो भवति विषयनिःस्पृहत्वात् , निर्भयं-ब्रह्मचारी हि निर्भयो भवति, निस्तुपं-विशुद्धतंदुलकल्पम् , निरायासं-न खेदका-
रफ, निरुपलेपं-सेहरहितम्, निवृत्तिः-चित्तवाथ्यं तस्य गृहं इव (गृह), यतः
"किं (क्य)यामः कुत्र तिष्ठामा, किं चूमः, किं च कुर्महे रोगिणश्चितयंत्येयं, नीरोगा:सुखमासते" अतो नी-
होगा ब्रह्मचारिणति गम्प, सपोनियमेन अपश्यंभावेन निष्पकंप-अविचलं तपःसंयमयोर्मूलदलिकयोग्य, नेम्यं आदिभूतद्रव्यमि-
त्यर्थः अथवा निम वा तत्सदृशं इत्यर्थः मतांतरहिंसामृपावादानपि स्यादित्यर्थः
"म वि किंचि अणुन्नायं पडिसिद्ध वा वि जिणवरिन्देहिं मुत्तुं मेहुणभावं ण तं विणा रागदोसेहिं ॥१॥
1 नेष किशिमातं प्रतिपिद्धं पाऽपि जिनवरेन्द्र मुफ्त्वा मैथुनमा यस् न तद्विना रागद्वेषौ५१॥
.
।
-
॥६८॥

.
समितियुत्तिगुतं, माणयरकवाडसुकपरफायणमझप्पदिनफलिह, संन्नयद्धोच्छइयदुग्गइपह, सुगतिपहदेसगं च
लोगुत्तम, प वपवपविर्ण पउमसरतलागपालिभूयं, महासगडअरगतुंयभूयं, महाविदिमरुक्खक्खंधभूय, महा.
नगरपागारकयाडफलिह भूयं रज्जुपिणिदो व इंदकेतू विसुद्धणेगगुणसंपिणद्धं, जमि य भगंमि होइ सहसा
वया पंचानां महामवाना मध्ये मुष्ठ-अत्यंत रक्षगं-पालनं यस्य तत्तथा समितिरी(मिरी)र्यादिभिः गुप्तिभिः-मनोगुस्यादिभिः
वसत्यादि(मि) नवनिर्वा गुप्त-रक्षितम् , पानप्रधानं ध्यानमेव कपाटं सुकृतं सुविरचितरक्षणार्थ यस तत्तथा, अध्यात्म-अनुभवज्ञा-
नरूपोपयोगः तदेव दतः कपाटद्धीकरणार्थ [परिषः-स्फटिकोऽर्गला यस्य तत्त्था, सन्नद्ध बद्ध इव आच्छादित इव निरुद्धो दुर्गति-
पयो येन वया, मुगतिपयस्य दर्शकम् , लोकोत्तम(म्) प्रतमिदं यदुक्तं
"देववाणयगन्धव्या जक्खरक्खसकिन्नरा पंभचारि नमसंति दुफरंजे करंति ते ॥१॥
पयैः उपलधिर्व सर पग्रसर-स्वतः संभवो जलाशयविशेषः, तडागश्च स एव पुरुषादिकृतं(त:) पद्मसरसोऽतिमनोहरत्वात
उपादेयत्वं, तत्तुल्यो धर्मः तस्स पालिभूतं रक्षकत्वेन, महाशकटारका:-क्षान्त्यादिगुणास्तेषां तुंबभूत--आधारभूतं न नामिभंगे शकटा
वति इति, महाविटपक्ष इव-विस्तारभूरुद्द इस आश्रिवाना परोपकारमारित्वाद्धर्मः तस्स स्कंधभूतं तस्मिन् सति सर्वधर्मशाखिन उत्पा-
पमानत्यान, महानगरं विविधसुखहेतुत्वात् , प्राकार इव, कपाट इव, परिघ इय, रक्षाकरणत्वात् वदत् । रज्जुपिनद्ध इव-देवरक
वेष्टित इम, इन्द्रकेतुः-महदुत्सवप्पजः, विशुद्धा येऽनेकगुणा:-धैर्यादयस्तैः संपिनई-परिघृतं यस्य तत्तथा। यस्मिन्-ब्रह्मचर्य भने सति
१ देवदानपगान्धयां यक्षराक्षसकिनरार, ब्रह्मचारिणं नमस्यन्ति, यद् दुफर वत्ते कुर्वन्ति ॥१॥

शानचि. प्रश्न व्या चतुथ संवरद्वारे ब्रह्मचर्य स्वरूपम् ॥६९॥ सव्वं संभग्गमदियमथियचुनिय-कुसल्लिय-पव्ययपडिय-खंडिय-परिसडिय-विणासिंयं विणयसीलतवनियः मगुणसम्हं तं यंभं भगवंतं गहगणनक्खत्ततारगाणं वाजहा उडुपत्ती मणिमुत्तसिलप्पयालरत्तरयणागराणं च जहा समुघो वेलिओ चेव जहा मणीणं जहा मउडो चैव भूसणाणं, वत्थाणं चेव खोमजुयलं, अरविंद चैव पुप्फजेडं, गोसीसं चेय अफसात् सर्व सदाचारयतं संभग्नं भवति किंचन(किंवत् )घटयत् , मर्दितं-मथितं दधीव निर्लोडि(ठि)त, चूर्णितं चनकपिटमित्र, कुशु. ल्यिा अंत:प्रविष्टतोमरादेः शल्येन शरीरमिव भग्नं सब पुनः सञ्ज न भवति तद्वत् ब्रह्मचर्यमपीति ज्ञेयम् । पर्वतपतितगंडशैल इब, पासादशिखरादेः कलशादिरिव अघोनिपतितं दण्ड इव विभागेन परिच्छिन्नं शटितं-कुष्टाद्युपहतांग इव, विनाशितं च-भस्मीभूत(त) पयनविकीर्ण दारु इव निस्सनाकं ब्राह्मयतं भग्नं सत् एतादृशं असारं भवति एतेषां पदानां द्वन्द्वः कर्मधारयो वा किमेवं भवतीत्याह, विनय-गीत-तपोनियमगुणानां वृन्द-समूहो यस तत्तथा तदेवं लक्षण ब्रह्मत्रतं भगवन्त-भट्टारकं पूज्यं किंवत् इत्याद इह सम्हशन्दस्य छदिसत्वात् नपुंसकनिर्देशः, ग्रहगणनक्षत्रतारकाणां च मध्ये यथा उडुपतिः-चन्द्रः प्रवर:-प्रधानः इति योगा, तथैव मतानां मध्ये इदं प्रतं पा शब्दः पूर्व विशेषणापेक्षया समुच्चये वा, मणयश्चंद्रकान्तायाः, मुक्ताफलानि, शिलाप्रवालानि- विद्रुमाणि, रक्तरतानि-पद्मरागादीनि तेषां आकरा-उत्पचिभूमयो ये वे तथा तेषां वा यथा समुद्रः प्रवरस्तथेदं ब्रह्मवत्तमिति शेपः । चय-रत्नविशेपो यथा मणीनां मध्ये वधेदं ब्रह्मवतं प्रवरं इति दृश्यम् , भूपणानां-आमरणानां मध्ये यथा मुकुटः किरीटम् , वस्त्राणां मध्ये यथा धौमयुगलं कासिफत्वक्वस्त्रस्य प्रधानत्वात् तथेदं नक्षत्रतम् , इह च 'इव' शन्दो यथार्थे दृष्टव्या, पुष्पानां मध्ये अरविन्दं . , . ॥६९।।

. चंदणाणं, हिमयंतो चेव ओसहीणं, सीतोदा चेव निन्नगाणं, उदहीसु जहा सयंभुरमणो, स्यगवर चेव मंडलि- फपव्ययाणं, पयरो एरावण इव कुंजराणं, सीहोव्व जहा मिगाणं, पवरो पधकाणं चेव वेणुदेवे, धरणो जह पण्ण- गइंदरापा, कप्पाणं चेय भलोए, सभासु य जहा भवे सुहम्मा, ठितिसुलवसत्तमन्च पवरा, दाणाणं चेव अभ. यथा ज्येष्ठ तथेदं ब्रह्मचर्यम् , चंदनानां मध्ये मोशीपाभिधानं चंदनं प्रधान तथेदं ब्रह्मवतम् , हिमवानिव औषधीनां मध्ये यथा हिम- | घान्-गिरिविशेषः औषधीनामद्भुतकार्यकारिवनस्पतिविशेषाणां उत्पत्तिस्थान तथाऽऽमोपध्यादीनामागमप्रसिद्धानामिदमेव ब्रह्मवत- | मुत्पत्तिस्थानम् , यथा निग्नगाना-नदीनां मध्ये शीतोदा प्रवरा तथेदं ब्रह्मवतम् , उदधिषु यथा स्वयंभूरमणः-अन्तिमः समुद्रः महत्वेन प्रवरः वदं बसवतम्, यथा मांडलिकपर्वताना-मानुपोचरकुंडलवररुचकवराभिधानानां मध्ये रुचकवर:-त्रयोदशद्वीपः प्रवरः एष तथेदं अक्षवतं प्रवरमिति, यथा कुखराणां मध्ये ऐरावणः-शक्रगजः तथेदं ब्रह्मव्रतमिति, सिंहो यथा मृगाणां मध्ये-आटव्यपशूनां मध्ये प्र- | घर:-प्रधानस्तधेदं प्रक्षमतप, परकानां प्रक्रमात् सुपर्णकुमाराणां मध्ये यथा वेणुदेवः प्रवरस्तद्वद्तमिदम् , धरणो यथा पनगेन्द्राणां- सुजगवराणां राजपन्नगेन्द्राणां मध्ये प्रवरस्तद्वदिदं ब्रह्मवतम् , कल्पानां-देवलोकानां मध्ये यथा ब्रह्मदेवलोकः तत् क्षेत्रस्य महत्वाद (तद्व- दिदं वक्षनवम् ) समासु मध्ये यथा सुधर्मा सभा प्रतिभवनविमानभाविनी उत्पादसभा, व्यवसायसमा, अभिपेकसमा, अलंकारसभा, सुधर्मसभा आसु पंचसु मध्ये सुधर्मासमा प्रवरा भवति तथेदं व्रतम् , स्थितिपु-आयुष: स्थितिपु मध्ये लवस(३)त्तमानुत्तरसुरभवस्थि- विर्वा शब्दो यथार्थे प्रवरा-प्रधाना तथेदं व्रतम् , तत्रकोनपंचाशत् उच्छ्वासानां लवो भवति ब्रीह्यादिस्तंवलवनं वा लवः तत्प्रमाणः कालोऽपि लयः ततो लवैः सप्तमैः सा प्रयध्यते सा लवससमेति आख्याते विवक्षिताध्यवसायविशेषस्य मुक्तिसंपादकस्यापूर्यमाणैर्या

भान०वि०
प्रमाव्या
चतुर्थ
संवरद्वारे
ब्रह्मचर्य
स्वरूपम्
11७०||
यदाणं; किमिराउ चेव कंवलाणं, संघयणे चेव वनरिसमे, संठाणे चेव समचउरंसे, झाणेसु य परमसुकज्झाणं,
णाणेसु य परमकेवलं तु सिद्धं, लेसासु य परमसुफलेस्सा, तित्थंकरे जहा चेव मुणीणं, वासेसु जहा महाविदेहे,
गिरिसु गिरिराया चेव मंदरवरे, वणेसु जह नंदणवणं, पवरं दुमेसु जहा जंबू, सुदंसणा वीसुयजसा जीए
नामेण य अयं दीयो । तुरगवती, गयवती रहवती, नरवती, जह धीसुए चेव, राया रहिए चेव जहा महारहगते,
स्थितिप्यते सा लबसप्तमेत्युच्यते, तत्र दानानि धानधर्मोपष्टंभाधनेकमेदानि तेपी मध्येऽभयदान-निर्भयप्रदान श्रेष्ठं तदिदं ब्रह्मयतम् ,
कंवताना-बासोविशेषाणां ऋमिरागः-रक्तकंबल इव प्रवरः सभूमिगतरागः (नद्वदिदं व्रतम् ), संघयणानां मध्ये वर्षभनाराचं
प्रधानं तवायतम , संस्थानानां मध्ये समचतुरस्र संस्थान प्रधानं तवदिदं ब्रह्मग्रतम् , पानेषु परमशुक्लष्पानं चतुर्थभेदरूपं प्रपरं
प्रधानं वया मतेषु इदं बदवतम् , जानेषु आमिनियोधिकादिषु पंचकेषु मध्ये परमं केवलं श्रेष्ठ तदिदं ब्रह्मावतं प्रधान तुरेवकारार्थः, सिद्धं
या प्रवरतया संपूर्णतयाज्य सिद्धमित्यर्थः, लेश्यासु परमशुकलेश्या. श्रेष्ठा तथैवेदं ब्रह्मवतं श्रेष्ठम् , तथा-तेनैव प्रकारेण चैव-निश्चित
मनीनां मध्ये तीर्थकरः प्रधानस्तद्वदिदं ब्रह्मयतम्, वपु-क्षेत्रेषु यथा महाविदेहः श्रेष्ठः (तत्र) सनातनधर्मत्वात् तथा व्रतेपु ब्रह्मवतम् ,
गिरिपु राजा यया मंदरखरो-बूद्वीपस्थ मेरुगिरिराजः तथेदं व्रतानां मध्ये ब्रह्मवतम् , वनेषु यथा नंदनवनं प्रवरं देवानां अतिरमणशी-
लखाद कल्पद्रुमयत्वाध तथेदं व्रतम् , द्रुमेपु-यक्षेषु यथा जंयः, सुदर्शना-अनादृतदेवस्य स्थानं विश्रुतयशाः विख्यातकीर्तिः यस्याः
नामा कला अयं द्वीपो जंबूद्वीप इति संझिकस्तद्विदं ब्रह्मवतम् । यथा तुरगपतिरश्वपतिः, गजपतिः गजानीका, रथपतिः, नरपतिः
चतुरंगिणीसेनायुक्तो यधा विश्रुतो-विख्यातो राजा श्रेष्ठः प्रधानस्तद्वद्विदं व्रतं विख्यातम् , यथा रथिको-महारथिको रथगतः परेषां
"
॥७॥

एवमणेगा गुणा अहीणा भवंति पछमि पंभचेरे जमि य आराहियमि आराहियं वयमिणं सव्वं, सील तवो र विणओ य, संजमो य, खंती गुत्ती.मुत्ती तहेव इहलोइयपारलोइयजसे य, कित्ती य, पचओ य, तम्हा निहुएण पंभचेरं परियन्वं, सवओ विसुद्धं, जावचीवाए जाव सेयटिसंजउत्ति, एवं भणियं वयं भगवया, तं च इम- अनमिभवनीयो भवति तदेतद्मवधरः पुमान् उपद्रवानामनभिभूतो मवति, अप निगमयमाह एक्मनेके गुणाः यस्मिन् मते अहीना: प्रकृष्टाः आधीमा आयत्ता भवंति केत्याह-एकस्मिन् ब्रह्मचर्यत्वे सर्वे- गुणाः स्थिता इति दर्शितं, कथं यस्मिन् व्रते आराधिते पालिते सति आराधितं व्रतमिदं निर्ग्रन्थप्रवज्यालक्षणं सर्ववतं शीलं-मनः सभाधान, तपोऽमिलापविरतिरूपं, विनय:-क्रोधादित्यागः, संयमश्च अनिदानरूपः, क्षान्ति:-क्रोघत्यागः, गुप्तिर्मानसविकारसंवृतिः, सक्तिनिर्लोभो या सिद्धिर्या, तथैवेति समुच्चये, इहलौकिकपारलौकिकिन्यः सिता यशांसि कीयश्च प्रत्ययश्च साधुवादः आराधिता भवंति इति प्रक्रमः, तत्र या पराक्रममवं, कीर्तिः दानपुण कलभूता, क्या सर्व दिग्गामि यशः, एकदिग्गामिनी कीर्तिः, सजनधौरेय इत्यादि प्रनीति: मत्यप इति शब्दार्थाः। एवंभूतं व्यावर्णित तसान्निभृतेन-नियलेन ब्रह्मचर्यवतमासेवनीयम् पालनार्थ ? किंभूतं, मनःप्रभृतिफरणप्रययोगेन शुद्ध-निरवर्ष, यावत् भवतया प्रतिज्ञातं आजन्मेत्यर्थः यावत् श्वेतास्थिः एतावता शोपितमांसरुधिरादिः वादशः संयतः-साधुः ब्रह्मवतपालनाय उद्यतः, एवं-वक्ष्यमाणं भणितम्-कथितम् व्रतमिदं केनेत्याह ? भगवता-ज्ञानवता पूज्येन श्रीमहावीरेण, वय इदं वचनं पद्यमयप्रभृतिक तोटकछंदोरूपेण काव्येन

न०वि०
प्रभ०ध्या
चतुर्थ
संवरद्वारे
ब्रह्मचर्य
स्वरूपम्
७१॥
पंचमहव्वयसुव्वयमूलं, समणमणाइलसाहुसुचिन्नं । वैरविरामणपजवसाणं, सव्वसमुधमहोदधितित्थं ॥१॥
तित्थकरेदि सुदेसियमग्गं, नरयतिरिच्छविवजियमग्गं । सव्वपवित्तिमुनिम्मियसारं, सिद्धिविमाणअवं-
गुपदारं ॥२॥
देवनरिंदनमंसियपूर्य, सव्वजगुत्तममंगलमग्गं । दुद्धरिसं गुणनायकमेकं, मोक्वपहस्स वडिंसकभूयं ॥३॥
पंच महायतनामकानि सुष्ठु-शोभनवतानि तेषां मूलमिव मूलं यत्तत् , कीदृशं समणति समावं यथा भवति तथा, अनाविलैः-
अकलुपैः शुद्धखमाः साधुभिः पतिभिः सुष्ठु चरितं आसेवित, पुनः कीदृशं ? पैरस्य-परस्परामर्पस्य विराम करग-उपशमनप्रापणं
निवर्तनपर्यवसानफलं यस्य तथा "मेतृणप्पभवं वेरं वेरप्पभवा दुग्गई" इतिवचनात् ब्रह्मवते तदुपशम इत्यागतम् ,
सर्वेभ्यः
समुद्रेभ्यः सकाशात् महान उदधिः स्वयंभूरमणः तात् यदुरुचरत्वेन तत्र तीर्थमिव तीर्थ संसारदुस्तरणे तीर्थमिव-तरणोपायम् ॥१॥
वीर्धकः-जिनः सुष्टु-शोमनतया उपदर्शितमार्ग गुप्यादि तरपालनोपायम्, पुनः कीदृशं? नरकतिर्यक्संबंधी विवर्जितो-निषेधितो
गतिर्मागों येन तथा तम् , सर्वाणि पवित्राणि-समस्तपावनानि सुष्टु: निमितानि-शोमनविहितानि साराणि-प्रधानानि येन तत्तया,
सिद्धर्मोक्षस्य विमानानां च स्वर्गलोकानां च अपावृतं-अवगुणीकृवं उद्घाटित द्वार-मुखं येन "शीलव्वयधरो न दुग्गइ गमण:
सीलो इति वचनात् ॥२॥ देवानां नराणां च इन्द्रः नमस्थिता नमस्थिता नमस्कृता येन तथा तेपी पूज्यं-अर्चनीयं यत्तत्तथा । सर्व
जगदुत्तमानां मंगलानां मार्गः-उपायः अग्रं वा-प्रधानं यत्तत्तया, दुर्द्ध-परैरनमिभवनीय, सकलगुणांना नायकम् प्रधानत्वेन अथवा
गुणान् नयनीति वा, तथा एकं-अद्वितीयम्, एतत् , सदृशं नान्यद्रतमिति, मोक्षपथस्य-सम्यग्दर्शनादेः अवसभूतं-शेखरकल्प
॥७१॥

GORI
जेण सुद्धचरिएण भवइ सुर्यभणो सुसमणो सुसाइ सुइसी सुमुणी ससंजए स एव भिक्खू जो सुद्धं चरति
यंभचेरं, इमं च रतिरागदोसमोहपवड्ढणकरं किंमज्म-पमाय-दोसपासस्थ-सीलकरणं अभंगणाणि य तेल्लम-
प्रधानमित्यर्थः इति काव्यत्रयार्थः ॥३॥
तथा येन ब्रह्मचर्येण शुद्धचरितेन-सम्यग् आचरितेन भवति सुबामणो यथार्थनामत्वात् "अनमचारी ब्राह्मणो न" यदुचि-
महे "नित्यं यश्च कलाकलापकलिता प्राज्ञोऽपि विज्ञानवान् विद्यावेदविशारदोऽपि यतिरप्याश्चर्यकृच्छास्त्रवित्,
धीरोदात्तगुणैरलंकृततनुस्ताहर पुनर्नो यदि स्वीयाक्षाणि वशीकरोति पुरुषः किं तस्य पुंस्त्वं भुचि" इति वचनात् ,
सुश्रमणः-सुतपाः, सुसाधुः-शोभनमुनिः, सुशोभनऋषिः-पदकायसंरक्षकः, सुमुनिः सम्यक्ज्ञानवान् , सुसंयतः सम्यक्यतनावान
स एव भिक्षुः-भिक्षणशीलः कर्ममेदनखभावः यः शुद्धं चरति प्रक्षचर्यम्,
इदं अबझ पुनः कीदृशं तदाह-रतिष-विषयाभिष्वंगा, रागच पित्रादिषु महरागा, द्वेषश्च प्रतीतः, मोहश्च-अज्ञानं, एषां प्रव-
ईनं करोति तत्तथा, किं मध्यमस्य किं शब्दस्याक्षेपार्थत्वात् मध्यमः-प्रमादः अथवा प्रमाद एव मध्यदोपः तत्करणशीलत्वात् असार-
मिवासारस् तथा पार्श्वस्थानो-ज्ञानाचारादिवहिर्वतिनां साध्वामासानां शीलं अनुष्ठानं निष्कारणं शय्यातराभ्याहृतादि पिण्डपरिभोगादि
पार्श्वस्थस्य शीलकरणं पदप्रयस्य कर्मधारयः तस्य करणं-आसेवनं यत्तत्तथा एतदेव । पार्श्वस्थशीलं व्याख्यानयति, अभ्यञ्जनानि
१ सफलफलाकलापकलितोऽपि कविरपि पण्डितोऽपि हि प्रकटितसर्वशास्त्रतत्त्वोऽपि हि वेदविशारदोऽपि हि। मुनिरपि वियति
विततनानाभुतविभ्रमदर्शकोऽपि हि, स्फुटमिह जगति तदपि न स कोऽपि हि यदि नाक्षाणि रक्षति ॥१॥

हान०वि०
प्रश्न.पा.
पति
चतुर्थ
संवरद्वारे
ब्रह्मचर्य
स्वरूपम्
॥७२॥
जणाणि य अभिक्खणं कक्ख-सीस-कर-धरण-वदण-धोवण-संवाहण-गायकम्म-परिमद्दणाणुलेवण-थुन्न-
चास-धूवण-सरीरपरिमंडण-घाउसिक,हसिय-भणिप-नहगीयवाइयनडनहकजल्लमल्लपेच्छणवेलंघक जाणि य
सिंगारागाराणि य अन्नाणि य एवमादियाणि तवसंजमवंभचेरघातोवघातियाई अणुचरमाणेणं पंभचेरं बजे-
यव्वाइं सम्वकालं, भाषेयव्वो भवइ य अंतरप्पा इमेहिं तवनियमसीलजोगेहिं निचकालं, किं ते ?-अण्हाणक-
घृतवशाम्रक्षणादिना, तैलमअनानि-तैलसानानि च, अभीक्ष्ण-अनवरतं, कक्षा-बाहुमूल[]शीर्पकरचरणवदनानां घावनं-प्रक्षालनं,
सेवाघनं गात्रकर्म च-हस्तादिगाप्रचंपनरूपं, गात्रपरिकर्म-अंगपरिकर्म परिमर्दनं-सर्वतः शरीरमलनं, अनुलेपनं च-विलेपनम् , चूर्ण:-
गंगद्रव्यधोद्रे पासव-शरीरादिवासनम् , घूपनं वा शुरुधूमादिभिः, शरीरपरिमंडनं च, एतत्सर्व चाकुशिकं, बकुशं-करघुर)चारित्रं
प्रयोजनं यस्येति वाशिक न तु भूषणं, नखकेशवस्तुसमारचनादिकं तदेवाह बाकुशिकम् । इसितं-हासः, भणित-प्रक्रमाद्विकृतम् ,
नाट-नृत्यम् , गीत-गानम् , वादितं-पटहादि वादनम्, नटा:-नाटयितारा, नर्तकाश्च ये नृत्यं कुर्वन्ति ते, जल्ला-वस्त्राखेलका,
मल्लाः प्रतीताः बाहादिभिः खेलति तेषां प्रेक्षणं नानाविधवंशखेलनादिसंबंधि वैलंबका:-प्रविडंबकाः विदपका-4हासिका इति एतेपी
इन्दः, छांदसत्वात् विभक्तिलोपो दृष्टव्यः ते सर्वे वर्जनीया इति योगः आंतरविभक्तिवशात् ज्ञेयम् , किंबहुना यानि च वस्तूनि
शृङ्गारागाराणि-शृङ्गाररसगेहानि अन्यानि अपि-उक्तव्यतिरिक्तानि, एवमादिकानि-एवं प्रकाराणि, तपासंयमनाचर्याणां घातब दे-
शतः, उपघातच सर्वतो विद्यते येषु तानि सर्वघातोपघातकानि, किमत आह अनुचरता-आसेवमानेन ब्रह्मचर्य वर्जयितव्यानि सर्वकालं.
१दोरना रमणार भाषा
॥७२॥

, . अवंतधावणसे पमलजल्लयारणं मूणवयकेसलोए य खम-दम-अचेलग-खुप्पिवास-लाघव-सीतोसिण-कसे- जा-भूमिनिसेना-परघरपवेस-लद्धावलद्ध-माणावमाणा निंदण-दसमसग-फास-नियम-तव-गुण-विणयमा- दिएहिं जहा से घिरतरकं होइ यंभचेरं । इमं च अवंभचेरविरमणपरिरक्खणट्टयाए पावयणं भगवया सुकहियं, अन्यथा ब्रह्मचर्यो व्याधातो भवति इति योगः, तथा भावयितव्यश्च भवति अन्तरात्मा ब्रह्मचर्यवता एवं भावनीयं, मया अंतरात्मा अनया रीत्या पालनीयः सर्वदा एभिः-वक्ष्यमाणैः तपोनियमशीलयोगैः नित्यकालम् , कि ते तद्यथा अस्मानक-वा स्नानरहितत्वं, 'दंतधावनं प्रतीतम्, स्वेदः-प्रस्वेदः मल:-फक्खडीभृतः कठिन(नम् ), जल्लो-मलविशेषः अथवा जल्ल:-शरीरजन्यमलः, मल:- साधारणमल, मौनव्रत-विकथामावः, केशलुच:-केशापनयनं प्रतीतम् , क्षमा-क्रोधनिग्रहः, दमश्व-इन्द्रियनिग्रहः, अचेलक-वस्त्रा. भावः, क्षुत्पिपासा च प्रतीता, लाघवं च-अल्पोपधित्वं, शीतोष्णे च प्रतीते, काठशय्या फलकादिशयनं, भूमिनिपया-भूमिशयनादि, परपर [गृह] प्रवेशः शय्यामिक्षायाचनाद्यर्थम् , लब्धे वाऽभिमताशनादौ अलब्धे च तदप्राप्तौ लन्धेष्वेव यो मानो-लब्धिवानहमित्या- दिरूपः, [अलब्धे च] अपमानश्व-दैन्यं, निंदन-क्लेशा, दंशमशकस्पर्शाथ, नियमाश्च-द्रव्याघभिग्रहाः, तपोऽनशनादिका, गुणाः-- मूलगुणोत्तरगुणादयः, विनयोऽभ्युत्थानादिरूपः, एतेपो द्वन्द्वः इत्येवमादियोगः यथा-येन प्रकारेण "से" तस्स मुनेः ब्रह्मचर्यवत स्थिरतरं-निचलं भवति, इदमेतद्ब्रह्मचर्यवतपरिरक्षणार्थ-आसेवनार्थ, प्रावचनिक-प्रवचनस्येदं, भगवता-श्री महावीरेण सुष्टु- शोभनतया कथितं-उपदेशितम् , कीदृशं ? प्रेत्य-परलोके सुखकारित्वात् भाविक-भावनायुक्तं, आगमिष्यद्भद्र-आगामिकाले श्रेय १"दातण इति" भांपा .

,
,
मान०वि०
प्रभ०या०
प्रति
चतुर्थ
संवरद्वारे
ब्रह्मचर्य
भावनाः
॥७३॥
पेवाभाविक, आगमेसिभई, सुद्धं, नेयाउयं, अकुडिलं, अणुत्तरं सव्वदुक्खपावाण विउसवणं ।
तस्स इमा पंच भावणाओ चउत्त्ययस्स होति अयंभचेरवेरमणपरिरक्षणट्टयाए, पढमं सपणासण-घर-
दुयार-अंगण-आगास-गवक्ख-साल-अभिलोयण-पच्छचत्युक-पसाहणक-पहाणिकावकासा अवकासा जे य
वैसियाणं अच्छंति य जत्य इथिकाओ अभिक्खणं मोहदोसरतिरागवडणीओ कहिंति य कहाओ बहुविहाओ
स्करत्वात् , शुद्ध-निर्दोष, न्यायोपपन-नैयायिक, अतएव अकुटिलं ऋजु, अनुत्तर-एतस्मादन्यत् प्रधानं न, सर्वदुःखपापानां विशे-
पेण उपशामकं तनाशकत्वाद
तस्य-प्रमचर्यग्रतस्य इमा अग्रे वक्ष्यमाणाः पश्चसङ्ख्याका भावना चतुर्थवतस्य भवन्ति, अब्रह्मचर्यविरमणव्रतपरिरक्षणार्थ तत्र
मयमभावनावस्तु यथास्त्रीसंसक्ताथयवर्जनलक्षणं तचैत्र-शयन-शय्या, आसनं सिंहासनं विष्ठरं, गृह-गेई, द्वार-तस्यैव मुखं प्रवेशन-
रूपं, अगण-गृहमध्यभागः, आकाश-अनाच्छादितस्यानं, गवाक्षो वातायन:, शाला-माण्डशाला गृहोपस्करस्थानं, या स्थित्वा
अमिलोक्यते जनः तदमिलोकस्थानं उन्नतभूप्रदेशः, पच्छवत्युगं पश्चाद्वास्तुकं-पवाद्गृहं वर्चादिस्थानं, वा प्रसाधन-मंडनक्रिया तस्य
करणस्थानं, स्नानक्रियास्थानं, तस्या आश्रया स्थानकानि तेषां पदानां द्वन्द्वः, तत एते सर्वे स्त्रीसंसक्ता-स्त्रीजनादिसंक्लिष्टा वर्जनीया
इति योगः तथा ये च अवकाशा-आश्रयाः स्थानका निवेश्या या विषयतृपितानां वा तेषां आसने च तिष्ठन्ति च यत्र येषु अवकाशेषु
लियः किंभूवास्ताः १ अमीक्ष्ण-अनपरतं मोहदोपस्य-अज्ञानदोषस्य रतेः रागस्य-कामरागस्य वर्द्धना धृद्धिकारिकाः यास्ताः, तथा
कथयन्ति च कथा बहुविधाः बहुप्रकारा जातिकुलरूपनेपथ्यसंबंधिन्यः स्त्रीसंबंधिन्या पुरुषाः खियो वा यत्रेति बहुप्रकारं वर्जनीयाः।
.
-
॥७३॥

तेवि हु बजाणिज्जा, इस्थिसंसत्तसंकिलिहा अन्नेवि य एवमादी अवकासा ते हु बजणिज्जा । जत्थ मणोविम्भमो वा भंगो वा भंसणा चा अहं रुदं च हुज्ज झाणं तं तं वजेजवज भीरू अणायतणं अतपतवासी एवमसंसत्तवास- वसहीसमितिजोगेण भावितो भवति, अंतरप्पा, आरतमणविरयगामधम्मे, जितेंदिए, पंभचेरगुत्ते १। यत्र वेश्याश्रयाः यत्र सहयः स्त्रीकथाकथन हुर्वाक्यालंकारे ते ब्रह्मचर्यवना वर्जनीया। एवं स्त्रीसंबंधिसंक्लिष्टा न केवलं उक्तरूपा वर्ज- नीयाः अन्येऽपि च एवमादयः अवकाशा-आश्रया वर्जनीयाः इति ज्ञेयं, हु-क्यालंकारे निश्चयाथै च । किंबहुना यत्र स्थाने मनसो विभ्रमः ब्रह्मवतं पालयामि नवेत्येवंरूपश्च शृङ्गाररसप्रभवमनसो अस्थिरत्वं जायते कदाचिच्च "चित्तवृत्तेरनवस्थितत्वं शृङ्गा- रजो विभ्रम उच्यते", भङ्गो वा ब्रह्मव्रतस्य सर्वमङ्गः, अंशना देशतो भङ्गा, आतं-इष्टविषयसंयोगामिलापरूपं रौद्रं वा भवेत् ध्यान तदुपायभूतहिंसावादत्तग्रहणानुबन्धिरूपं तत्तदनायतनमिति योगात् वजनीयाः । को वर्जयेदित्याह-अवधभी पापाद्विस्यका स वय॑ते इति अथवा वजं च वजसत्वात् पापमेव अनायतनं-अलाभस्थानं साधूनामनाश्रय इति । किंभूतः १-सायद्यमीरुः अंते इंद्रियाननुकूले प्रान्त-स्थाने तत्रैव वंशनशीलः अन्तप्रान्तवासी तत्रैव प्रकृष्टतर आश्रये वसनस्वभाव इत्यर्थः । अथ निगमयन्नाह- एवं अनन्तरोक्तस्त्रीभिरसंसक्तवासो-वसतिः योऽसौ साधुः तद्विपयो यः समतियोग:-सदाचरणप्रवृत्तिसम्बन्धः स तथा तेन मा- वितो-वासितो अंतरप्पा-अन्तरात्मा जीवः किंविधः-विधिमर्यादीकृत्य आस-रतं ब्रह्मचर्य मनो यस्य स आरतमनाः, विरतो-निवृत्तो ग्रामस्पेन्द्रियवर्गस्य धर्मो लुन्धतया स्वविषयेन्द्रियग्रहणस्वमायो यस्य स तथा पदद्वये कर्मधारयः, अतएव जितेन्द्रियः, ब्रह्मचर्य गुप्तः इति प्रथमा भावना, नवि० ०व्या संवरद्वारे ब्रह्मचर्य भावना ७४॥ वितिय नारीजणस्स मज्झे न कहेयब्वा कहा विचित्ता विन्योयविलाससंपउत्ता, हाससिंगारलोइयकहव्व मोहजणणी न आवाहविवाहपरकहाविय इत्थीणं वा सुभगदुभगकहा चउसद्धिं च महिलागुणा न वन-देस- द्वितीयमावनावस्तु-किमित्याह ? नारीजनस्य मध्ये-स्त्रीपर्षदांत नो-निषेधे कथा कथयितव्या का इत्याह-कथा-याक्मपश्चर- चना विचित्रा वा तत्र ज्ञानोपष्टम्भादिकारणवमिति गम्यं, कीदृशी कथा वर्जनीयेत्याह- विन्चोकविलाससंप्रयुक्ता-तत्र वियोकलक्षणं चेदं "इप्टानामर्थानां प्राप्ताभिमानगर्वसंभूतः स्त्रीणामनादरकृतो विन्योको नाम विज्ञेयः ॥१॥" विलासलक्षणं चेदं "स्थानासनगमनानां हस्तभूनेत्रकर्मणां चैव। उत्पद्यते विशेपो या श्लिष्टः स तु विलासः स्यात् ॥१॥" अन्ये त्वापिलासो-नेत्रजो ज्ञेयः इति । हासो-दास्पाभिषानो रसविशेषः शृङ्गारोऽपि रसविशेपस्तयोः स्वरूपमिदं, हासो- हास्यप्रकृतिविकतालपेपचेष्टाभ्यो भवंति परस्त्रीभ्यः स च भूता स्त्री हास्यवती । शृङ्गारोऽपि द्विघा संभोगो विप्रलम्भश्च एतत्प्रधाना या कथा, लौकिकी अविद्धजनसंबंधिनी कथा-वचनरवना सर्वमोहजनका मोहोदीरका, वाशब्दो विकल्पार्थः, तथा न-नैव। आवाहो- नवपरिणीववधूवरस्य आकारणं, विवाहश्य-पाणिग्रहणं तत्प्रधाना या वरकथा-परिणेतकथा तदुत्कर्पजनका प्रधाना वा सा कथा न कथयितव्या। तथा स्त्रीगो ताः सुभगदुर्भगा वा भवतीत्येवंरूपा न कथयितव्या कथा। चतुःपष्टिश्च महिलागुणाः आलिंगनादीनाम- धानां कर्मणां प्रत्येकमाष्टमेदत्वेन चतुष्पष्टिर्जायते, गीतनृत्यौचित्यादयोऽपि नामतः चतुःपटिभेदा अपि संति वा वात्स्यायनप्रसिद्धा आसनादिमेदा तत्प्रधाना कथा अपि न कथयितव्या, तथा न-नैव देशकुलरूपनामनेपथ्यपरिजनकथा या न वाच्या व ७४॥

जाति-फल-भय-नाम-नैरत्य-परिजणादायि इत्थियाणं अन्नापि य एवमादियाओ कहाओ सिंगारकलुणाओ सपसंजमयंभरपातोययातिगामओ अणुपरमाणेणं पंभचेरं न कहेयन्वा, न सुणेयव्या. न चिंतेयन्वा, एवं इत्थी- प्रमः। राम लाटादिदेशपंधेन ग्रीणां वर्णन यथा-लाटदेशीयाः कोमलपचना रतिनिपुणाः सुस्तन्यो भवन्ति, जातिकथा यथा-धिर ग्रावणी वियया या जीवन्ती मृता इव, धन्या मन्पे जने शूद्रा पतिलक्षेऽप्यनिन्दिता । कुलकथा यथा- अहो पौलस्यपुत्रीणां साहसं जगतोऽधिकं । पत्युम॒त्यो विशत्यनौ या प्रेमरहिता अपि ॥१॥ रूपकया यथा- पन्द्रयमा सरोजाक्षी, सद्गीः पीनधनस्तनी । किं लाटीनामतः सास्य देवानामपि दुर्लभा ॥१॥ नामस्या यथा-सा मुन्दरी सत्यं सौन्दर्यातिशयसमन्विवत्वात् , नेपथ्यं-वेपस्तत्कथा पा-धिग् नारीरौदीच्या यहुवसनाच्छादितांगलतिकत्वात्, यद्यौवनं न यूनां चक्षुर्मोदाय नो भवति॥१॥ सदा परिजनफया यथा-- चेटिका-परिवारोऽपि, तस्या कान्तो विचक्षणः। भावज्ञः स्नेहवान् दक्षो, विनीतः सत्कुलस्तथा ॥१॥ किंबहुना अन्याऽपि च एवमादिका उक्तप्रकाराः खी-सम्बन्धिनी कथाः शृङ्गारकरुणा:-शृङ्गारमृदयः शृङ्गाररसेन कारुण्यवाक्प्र- पादिकार, कीटशी: ? तपासयमब्रह्मचर्योपयाविनीः न कथाः कथयितव्याः। केनेत्याह-ब्रह्मचर्यमनुचरता पुंसा साधुना न श्रोत- ज्याः अन्यतः सकाशात् , न चिन्तयितव्याः मनसाऽपि यतिजनेनेति ज्ञेयं । अप दितीयभावना निगमपन्नाह-एवं स्वीकयाविरतिः एवममुना प्रकारेण स्त्रीकथाविरतिसमितियोगेन मावितो-वासितो भवति .

मानवि०
प्रनष्पा०
इचि
चतुर्य
संवरद्वारे
ब्रह्मचर्य
भावनाः
॥७५॥
कहविरतिसमितिजोगेणं भावितो भवति अंतरप्पा आरतमणविरयगामघम्मे जितिदिए यंभचेरगुत्ते ।।
ततीयं नारीण हसित-भणितं चेट्टिय-विपेक्षित-गइ-विलासकीलियं विन्योतियनदृगीतवातियसरीरसंठा-
ण-पन्न करचरणनयणलायन्न-रूव-जोव्वण-पयोहरा-धर-वत्थालंकारभूसणाणि य गुज्झोक्कासियाई अन्नाणि
अन्तरात्मा-जीवः आरतमना विधि-मर्यादया पित्तप्रामधर्मः, विजितेन्द्रियः-विजितविषयव्यापारः, इति प्रगट एव सूत्रार्थ इति
द्वितीया भावना २।
अथ तृतीयभावनावस्तु स्त्रीरूपनिरीक्षणवर्जनं तत्प्रधाना भावना या सा चैवं-
नारीणां-स्त्रीणां हसितं, हास्यं विकारं नर्मादि मणितं सरागसंभोगविप्रलंमद्वयात्मकशब्दादि चेष्टित-हस्तन्यासादिकरपालनारूपं,
विप्रेक्षित-निरीक्षितं कटाक्षादिना धूचेष्टादिना, गतिर्गमनं मंथरालसपदस्थापनचेष्टाविशेषा, विलासो-हावभावादिलक्षणः, तत्र
हायो-मुग्यविकारः स्पात, भावो-चित्तसमुद्भवः, विलासो-नेत्रजो ज्ञेयः, विभ्रमो घ्युगांतयोः ॥१॥
तथा विभ्रमो-वैपचेष्टितः, इत्यादिरूपः, क्रीडितं-युवादि क्रीडा एषां समाहारद्वन्द्वः 'विमोकित रतोत्पत्तिजनक संभाषणं
वा, नाटयं नृत्य, गीतं गानं, पादितं वीणादिवादनं, शरीरसंस्थानं हखदीर्घोन्नतादिलक्षणं, वो गौरादिलक्षणः, करचरणनयनवदनानां
लावण्य-ठवणिमा स्पृहणीयतारूपं, तथा रूपं चाकृति:-आकारः, यौवन तारुण्य, पयोधरौ-स्वनौ, अधरोज्यस्तन ओष्ठा, वस्त्राणि
१ लीलाविलासो-विच्छितिविम्योकः कोलकिञ्चित मोहायितं कुट्टमितं ललितं विद्वतं तथा ॥१॥
विभ्रमधेत्यलंकारा स्त्रीणां स्वाभाविका दश इति तत्प्रदिपादकशास्त्रालक्षणान्यवसेयानीति
-
॥७५॥

पएपमादिया तवसंजमर्षभचेरघामोवघातियाई अणुचरमाणेणं यंभचेरं न चक्खुसान मणसा न वयसा पत्थे. पवाई पायकम्माई। एवं इत्थीरूपविरतिसमितिजोगेण भावितो भवति अंतरप्पा आरतमणविरयगामधम्मे जिदिए मधेरगुत्ते ३३ पउत्थं पुवायपुव्यकीलियपुव्वसंगंथगंथसंथुया जे ते आवाहविवाहचोल्लकेसु य तिथिसु जन्नेसु उस्सवेसु यसनानि, अलंकारा-हारादयः, भूषणं च मंडनादिना शोभाकरणं एतेषां पदानां द्वन्दः ततस्तानि न प्रार्थयितव्यानीति शेषः । तथा गुमायकाशिकानि लअनीयसानत्वाव स्थगनीया आच्छादनीया अवकाशा देहास्यवो श्रोणिनितम्बयोन्यादयः अन्यानि अपि हासा- दिकारणाणि एवमादिकानि स्थानकानि तपःसंयममचर्योपयातकानि कुविकल्पोत्पचिदेशाः अनुचर्य अनुचरता-ब्रह्मवतमासेवता यतिना न चक्षुषा द्रष्टव्यानि अभिलापतया दृटाइहिं न पभातीत्यर्थः । न मनसा चिन्तयितव्यानि । अनिदानं चारित्रं तवेवोदा- गफले इति वचनाद वचसा न प्रार्थनीयानि इमानि रम्याणीत्यपि वाग्मात्रेणैव नोक्तव्यानीत्यर्थः । पावकानि-पापजनकत्वात् पाप- कर्माणि, एवमुक्तप्रकारेण स्त्रीरूपविरतिसमितियोगेन मावितो भवति अन्तरात्मा-जीव: आरतमना-विरतग्रामधर्मा जितेन्द्रियो-मुनिः मनचर्यगुसो भवति इति तृतीया भावना ३ अथ चतुर्थभावनावस्तु यत्कामोदयकरं दर्शन-मणन-स्मरणं भवति तद्वयमित्याह-तञ्चैव-पूर्वरतं गृहस्थाश्रमसम्बन्धिनी कामर- तिः पूर्वक्रीडितं-गृहस्थावस्थाथयं घूतादिक्रीडनं तथा ये पूर्वार्थकालभाविनः संगंथाः संबंधाश्च श्वसुरकुलसंबंधाः शालक-शालिकादयः अथवा तद्भास्तित्पुत्रादयः संस्तुता:-परिचितीकता दर्शनभाषणादिमिः ततः एतेषां पदाना द्वन्द्वः तत एते सर्वे श्रमणेन अनभिलष-

मान०वि०
चतुर्थ
संवरद्वारे
०च्या०
प्रति
ब्रह्मचर्य
भावना
१७६॥
पसिंगारागारचारवेसाहिं हावभावपललियविक्खेवविलासगतिसालिणीहिं अणुकूलपेम्मिकाहिं सद्धिं अणुभूया
सयणसंपओगा उदुसुहवरकुसुमसुरभिचंदणसुगंधिवरवासधूवमुहफरिसवत्थभूसणगुणोववेया रमणिज्जाउन
णीया अलक्ष्याः द्रष्टुं कथयितुं स्मर्नु नोऽपि योग्याः इति सम्बन्धः । के ते ? वा वक्ष्यमाणाः इत्याह आवाहा-वधूवरानयनं,
विवाहः पाणिग्रहणं, पालकर्म पालानां नामकरणं, यत्पूडाकरणमुण्डनं, अन्नप्रासनादिकं सर्व ततस्तेषु चाब्दस्य पूर्ववाक्यापेक्षया समु.
पार्थः, तिथिषु अनंगप्रयोदशीप्रभृतिषु, यज्ञेषु, नागपूजासु उत्सवेषु, यात्रासु जनसमुदायेषु, स्त्रीभिः सार्द्ध शयनासनसंपयोगास्ते न
लभ्याः द्रष्टुमिति योगः किंभृताभिः ? शृंगारागारचारवेपाभिः-शृंगाररसागारभूताभिः शोभननेपथ्याभिः स्त्रीभिरिति गम्यं । किं भू.
तामिः नीभिः १ हावभावनललितविक्षेपविलामशालिनीमिः, तत्र हावभावलक्षणं पूर्वोक्तं प्रललितलक्षणं चेदं-
हस्तपादाङ्गविन्यासो भुनेत्रोष्ठमयोजितः । सुकुमारो विधानेन ललितं तत्मकीर्तितं ॥१॥
अप्रयत्नाचितो घम्मिटा श्लथवन्धनः, असमंजसविन्यस्तमंजनं नयनाब्जयोः तथा अनादरवद्धग्रन्धिर्जपनवाससः वसुधालम्बि-
केशपाय सस्तांशुका जघने हारविन्यासो रसनायास्तथोरसि यतः स्त्री कांतं वीक्ष्य नाभि मकटयति दोमूलं दर्शयंती न्यस्तमंड-
नादिकं वितनोति इत्यादिलक्षणैविक्षेपो ज्ञेयः । विलासगतिविलासेन गमनं एतैः या शोमन्ते शालन्ते तथा वामिः। तथा अनुकूल-
मप्रतिकूलं प्रेम-प्रीतियां नास्ताभिः स्त्रीभिः साई-सह अनुभूता-वेदिता भयनानि शय्यायामेका वसनं तथा सम्प्रयोगाव-संपर्काः
अपनसंयोगाः । कथंभूताः ऋतुसुखानि कालोचितानि पातुसुखानि यानि घरकुसुमानि परसुरभिचन्दनं च सुगन्धा घरचूर्णरूपा
वासव धूपय शुमस्पर्शनि या वस्त्राणि च भूपणानि च तालवृन्तादीनि भोगोपष्टम्भदायकानि वा एतेषां पदानां द्वन्द्वः तेषां ये गुणा-
१ अप्रयत्नेन रचितो घम्मिला.....इत्यादिश्लोकचतुष्टयो अमयदेवीयावृत्ती अन तु तद्भावार्थो संगृहीतः
॥७६॥

पाउरनर-नार-मह-माह-मुहिक-पेलंपग-कहग-पग-लामग-आइफ्खग-लंग्य-मंग-तूणइल्ल-तुंचवीणि. ग-सालापर-पकरणाणि प पाहणि महुरसरगीतसुस्सराइं अनाणि य एवमादियाणि तवसंजमयंभचेरघातोव- गानियाई अशुपरमाणेणं भरं न तातिं समणेण लम्भा द न कहेउं नचि सुमरि जे, एवं पुवरयपुवकी- लिपपिरतिममितिजोगेण नरपेका युक्तालया ताः, तया रमणीयातोपगेयप्रचुरनटांदिप्रकरणानि तद् द्रष्टुं नलम्यानीति सम्पन्धः । ते के इत्याह ? तथा नटाः नाटपितारः अन्यान् प्रति, नर्चकाः ये नृत्यन्ति स्वयं, जल्ला-परमखेलकाः, मल्ला प्रतीता, मौष्टिका:-ये मुष्टिमिः प्रहरन्ति रमन्ते वा, विषयावहासिमा कपका:-क्याप्रपन्धाख्यायिकाः पाठका अध्येतारः, प्लवका ये उत्प्लुत्य नद्यादिकं तरन्ति, लासका ये रासकान् गापन्ति उपसन्दप्रयोक्तारो भाडा वा मङ्गलपाठका इति, आख्यायिका ये शुभाशुभं कथयन्ति, लंखा-वंशानखेलकाः, भखाचित्रफ- BAI भिधाकाः, तुणाला:-तूणाभिधानवाद्यवादकाः मुखचनेरिका तुम्बवीणिका-वीणावादका,तालाचरास्तालवादकाः प्रेक्षाकारिणो पाएनेपा पदानां तेषां प्रकरणानि क्रिया पुनः बहुविधानि-अनेकविधानि. मधुरस्वराणां-कलध्वनीनां गायकानां यानि गीतानि- गपानि नोमनपदनादिसरविशेषाणि तानि तथा,किं पहुना ? अन्यान्यपि एवमादिकानि उक्तप्रकारच्यतिरिक्तान्यपि तपःसंयमब्रह्मचर्य- पानोपयातकानि अनुचरता-आसेवमानेन एतावता ब्रह्मचारिणा न-नैव श्रमणेन-साधुना,लभ्यानि-उचितानि द्रष्टुं-प्रेक्षितुं नयनाभ्यां, न फयपितु नाऽपि वचसा मुन्दरा एते, नाऽपि स्मर्नु चिन्तयितुं मनसाऽपि । अथ निगमयन्नाह-एवमुक्तप्रकारेण पूर्वरतं-पूर्वपरिचि- १ भारती मायिकी कोशिफ्यारभटयादिवृत्तयश्चतस्रो वाद्यानि वाद्यादीनि प्रकरणानि कथ्यन्ते ।

पान०वि० म०व्या. पूचि 1100 भावितो भवति अंतरप्पा आरयमणविरतगामधम्मे जिईदिए संभचेरगुत्ते ।। चतुर्थ पंचमग आहारपणीयनिद्धभोयणविवज्जते संजते सुसाहू चवगयखीर-दहि-सप्पि-नवनीय-तेल्ल-गुल- संवरद्वारे खंड-मच्छंडिक--महु-मज-मंस-खजक-विगतिपरिचत्तकयाहारे ण दप्पणं, न पहुसो, न नितिक, न सायसू ब्रह्मचर्य पाहिकं, न खद, तहा भोत्तव्यं जह से जायामाता य भवति, भावनाः वर-सम्भोगादिकं पूर्वफ्रीडितं तुतादिकं तेन-विरतिनिवृत्तिसमितियोगेन मावितो वासितो भवति अन्तरात्मा-जीवः आरतमना- चिरतग्रामघम्मा जितेन्द्रियः ब्रह्मचर्यगुप्तो भवति, इति चतुर्थी भावना ४ । अथ पश्चमभावनावस्तु मणीतभोजनवर्जननाम तदाऽऽह-आहारोऽशनादिः स एवंविधस्त्याज्य इति योगः कीदृशः १ प्रणीतो गलत्स्नेहविन्दुः स च निग्धभोजनं तस्य विवर्जको यः स तथा स एवंविधः संयतः-संयमवान् पदकायरक्षावान् , सुसाधुः-निर्वा- गयोग्यसाधनतत्परः, पुनः कीदृशः ? व्यपगता-अपगता क्षीरं-दुग्धं दधि तदेव स्त्यानीभूतं सर्पिघृतं नवनीतं प्रक्षणं तैलं गुलखण्डं मत्स्यंटिका पायखण्डा शर्करा वा मधु-मिष्टद्रव्यं क्षौद्रं वा; मद्य-मदिरा मांसं-पिशित खाद्यकलक्षणं अवगाहिमादिभेदं यद्यपि अमज्झमंसासिणो इति पाठात् साधुनामभक्षविकृतीनां त्याग एवमुक्ता, तथापि विकृतिसूत्रपाठत्वात् मद्यमांसायुक्तम् , अथवा पूर्व- भक्कानुस्मरणमपि भवति अतस्तत्परिहारार्थ सूत्रपाठानुक्रमो ज्ञेयः, एतेषां पदानां कर्मधारयः एतादृशो विकृतिकारि-विकारकारि त्यत आहारो येन स तथा, न-नैव निपेघे दर्पणं-दर्पकारकं नैव भुखते, उक्तव्यतिरेकादन्यदपि मदकारि नैव भुखते, पुनः न बहुशो ॥७७॥ दिनमध्ये न बहुवार, न नैत्यिक, न प्रतिदिनं, न प शाक-वनस्पत्यादि भवन्ति, न-भूपाधिकं शालनकं दालिप्रचुर नेत्यर्थः, तदपि । -

न भगति चिन्ममो न भरणा प धम्मस्स, एवं पणीगाहारविरतिसमितिजोगेण भावितो भवति अंतरप्पा
भारतमणविरागामाम्मे निदिए मिचेरगुत्ते ५। एयमिणं संपरस्स दारं सम्म संवरिय होइ सुपणि हितं हमेहि
पदिगि कारणेहि मणयपणफायपरिरपिणएहि णिचं आमरणंतं च एसो जोगो गेयव्यो चितिमया मतिमया
नाग-न प्रसनं उनोदपिधया क्या मोक्तव्यं, पया से तस्य प्रमचारिणः, यात्रा-संयमयात्रानिर्वादः मात्रापरिमाणतः भवति संय.
मनिसराप मानि, तपा मोक्तव्यं परं न नै। भवति धर्मस्य विनमो नंशना वा धर्मस्य । यदुक्तं-
जहा दपगी परिंधणो वणे समारुओ नोवसमं उबेइ।
प्रदिपनी वि पगाममोईणो, न पंभयारिस्स हियाय कस्स वि ॥१॥ तया दृश्यते-
जह अभंगण सेयोर, सगडणवणाण जत्तिओ होइ । इय संजमभरवहणयाए साहणमाहारो॥१॥
मना मावि पानूपनयन मोहोदयान्मनसो धर्म प्रति अस्थिरत्वं भ्रंशन वा चलनधर्म ब्रह्मचर्यलक्षणात् । अथ निगमय-
मार- प्रनीताहारविरतिसमितियोगेन भावितो-चासितो भवति अन्तरात्मा-जीवः तादृशः साधुः आरतमना:-विरतिग्रामघा
निन्द्रिपा प्रमाग गुप्तो मरति साधुः इति पञ्चमी मावना ५।
एमुकमफारंग इदं संपरद्वार संधूत रक्षितं भवति सुष्टु-शोभनत्या प्रणिहित-स्थापितं मनसा इत्येतैः पञ्चभिः कारणैः भवना-
१ पपा पपातिक प्रगुरुधने पने समारतो नोपराममुपैति । एपमिन्द्रियाग्निरपि प्रकामभोजिनो ने ब्रह्मचारिणो हिताय कस्यचित् ॥१॥
२ पथा गम्यानलेपो एफटाक्षमणयोर्यायन्ती भवतः पयं संयमयहनार्थ साधूनामाहारः ॥१॥

मान०वि०
प्रा०च्या
वृति
चतुर्थ
संवरद्वारे
ब्रह्मचर्य
भावनाः
॥७८॥
अणासयो अफलुसो अच्छिदो अपरिस्सावी असंकिलिट्टो सुद्धोसव्वजिणमणुन्नातो, एवं चउत्थं संवरदारंफासियं
पालितं सोहितं तीरितं किदित आणाए अणुपालियं भवति, एवं नायमुणिणा भगवया परूवियं पसिद्ध सिद्धव.
रसासणमिणं आघधियं सुदेसितं पसत्य [सू०२७] चउत्थं संवरद्वारं समत्तं त्तिवेमि ॥४॥
भिः कृत्वा, मनोवाकायपरिरक्षितैः नित्य-सदा आमरणान्-यावजीवमित्यर्थः, एपः कथ्यमानो योगः संवररूपो ज्ञातव्यः धृतिमता-
धैर्यवता मतिमता-धुद्धिमता कीदृशो योगः अनाथयो, विरतिरूपः, अंकलुपः-शुद्धाशया, अच्छिद्रो निर्दोषत्वात् , अपरिस्रावी-अनि-
दानरूपः, असंश्लिष्टो-दुर्यानरहितत्वाद , अतएव शुद्धो निर्दोषः सर्वजिनैः-सर्वतीर्थकरैः अनुज्ञातः एवमुक्तरीत्या चतुर्थ ब्रह्मचर्यलक्षणं
संबरदार संवरस्य मुखमिव मुख-दार स्पर्शित कायेन, पालितं पुननिरतिचारत्वेन, शोधित-गुर्वाज्ञानुसारेण, तीरित अधिकाऽधिको-
साहेन, कीर्तित पुनः पुनः स्मरणादिना, आतया अनुपालन एभिः विशेषणैमर्यादा प्राप्तं भवति एवममुना प्रकारेण, प्रातमुनिना-
शातपुत्रेण भगवता प्रज्ञापित, प्ररूपित, प्रसिद्ध-विख्यातं प्रधानशासनमिदं आख्यातं, सुष्ठु-देशितं कथितं, प्रशस्तं प्रधान, चतुर्थ-
संबरदार समाप्त नवमाध्ययनविवरणमिदं इति शब्दः-परिसमाप्तौ पूर्वपदेव वाच्यः ।
श्री प्रभव्याकरणांगस्य दशमस्य नवमाध्ययनम् व्याख्यातं च सदथं तुर्य ब्रह्मवतद्वारं ॥१॥
इति श्रीमद् ज्ञानविमलसूरीश्वरविरचिते
प्रश्नव्याकरणे चतुर्थ संवरद्वारं समाप्त
-
॥७८॥

॥ अथ पंचमं संवरद्वारात्मक दशमाध्ययनम् ।।
अप पंचमं परिग्रहविरमण संवरद्वारं व्याख्यायते, अस्य चाज्यमनुक्रमः पूर्व मैथुनविरमणमुक्तं तत्तु सर्वथा परिग्रहविरमणे कते
एवं भाति वदभिधापर्क पचर्म द्वारमारम्पते तस्येदमादिमं सूत्रम्-जंबू इत्यादि सूत्रानुक्रमो यथा-
जं! अपरिग्गहसंखुडे_य समणे आरंभपरिग्गहातो विरते विरते कोहमाणमायालोभा
जम्यूरिति शिष्यस्यामंत्रणम् , अपरिग्रहो-धर्मोपकरणवर्जनोपकरणम वर्जितः तथा संवृतश्च इन्द्रियकपायसंवरणेन संवृतः
तया यःमः तादृशः श्रमणो भवति चकारान्ब्रह्मचर्यादिगुणयुक्तः, एतदेव प्रपञ्चयन्नाह स च कीदृशः ? आरंभा-पृथिव्यायुपमर्दः,
परिग्रहो वाद्याभ्यन्तरमेदाद्विधा, कोऽसौ पासो ?-धर्मसाधनवजों धर्मोपकरणमूर्छा वा, इतरस्तु मिथ्यात्वाविरतिकपायप्रमाददुष्टयोगा-
पलंग्नरूपः, आह च
"दयाइसु आरंभो परिग्गहो धम्मसाहणं मोत्तुं । मुच्छा य तत्थ वज्झो इयरो मिच्छत्तमाइओ॥१॥"
अनयोः समाहारद्वन्द्वस्तसाद्विरतो निवृतो यः स श्रमणः । तथा क्रोध-मान-माया लोभाद्विरतः।
१ पृथिव्यादिप्यारम्भः परिप्रदो धर्मसाधनं मुफ्त्या मुर्छा च तत्र वाघः इतरो मिथ्यात्वादिकः ॥१॥

शानी प्रश्नाच्या पति संवरद्वारे रागादि- आशातना. न्तानां वर्णनं ॥७९॥ पगे असंजमे १ दो चेव रागदोसा २ तिनि य दंडगारवा य गुत्तीओ तिन्नि तिन्नि य विराहणाओ३ चत्तारि फसाया झाण-सन्ना-विकहा तहा य हुति चउरो ४ पंच य किरियाओ समितिइंदियमहब्बयाई च ५ अब मिथ्यात्वलक्षणांतरपरिग्रहविरतत्त्वं प्रपञ्चयन्नाह- एकोऽविवक्षितमेदत्वादविरविलक्षणैकस्वभावत्वाद, असंयमोऽसंयतत्वम् १ द्वाप रागद्वेपो बंधने इति शेपः।२ प्रयय दंडा-आत्मनो दण्डत्या दुष्पणिहितमनोवाकायलक्षणाः, गारवाणि गौरवाणि च गृद्ध्यभिमानाम्यां आत्मनः कर्मणो गौखहेतवः ऋद्धिरससायविषयाः परिणामविशेषाः त्रीणि इति प्रकृतमेव, तथा गुत्तीओ तिषिणत्ति गुप्तयो मनोवाकायलक्षणा- अनवप्रवीचाराऽप्रवीचाररूपाः ३, विश्व विराधना ज्ञानादीनां सम्पगननुपालनाः ||३|| चत्वारः कपायाः-क्रोधादयः, ध्यानानि-एकाग्रतालक्षणानि आरौधर्मशुक्लध्यानानि, संज्ञानं अनादिचेतनोद्भूतं विज्ञानं संशाः-आहार१मयरमैथुनश्परिग्रह४ संज्ञाभिधानाः, विकथा-विरुद्धवार-प्रपंचरचना कथा स्त्री-भक्त-देश-राजकथादिलक्षणाः एताथ भवन्ति ॥४॥ पंचक्रिया:-जीवव्यापारात्मिका: कायिक्यधिकरणिकी प्रापिकी-पारितापनिकी-प्राणातिपातक्रियालक्षणा भवन्ति, सर्वत्र क्रियापदं योज्यम , तथा निरवद्यप्रवृत्तिरूपाः ममितयः ई-भाषणादाननिक्षेपपरिष्टापनिकाख्याः, तथा इन्द्रियाणि स्पर्शन-रसन- -नेत्र-श्रोत्रादीनि, महाप्रवानि अहिंसा-नृतास्तेय ब्रह्माकिन्चनरूपाणि प्रतीतान्यत्रैव वर्णितानीति ५। . ॥७९॥ घाण- .

राजीवनिकामा छच साओ ६ सत्त भया७ अ य मया ८ नव चेव य बंभचेरवयगुत्ती ९ दसप्पकारे य सम- धम्मे १० एकारस य उवासकाणं ११ पृथव्योजोवायुवनस्पत्यादयः पद जीवनिकायाः, पद लेश्याः कृष्ण-नील-कापोत--तेजा-पम-शुक्लाख्याः ॥६॥ तथा सप्तभयानि-इहलोकभयं-खजातीयान्मनुष्यादेः, परलोकभयं-विजातीयातिर्यगादेः, तथा इहलोकभयं अत्रमवे, परलोक- भयं परभवे, आदानभयं-द्रव्याश्रितं भयम, अकस्माद्यं पाहानिमित्तानपेक्षं, आजीविकामयं-चिभयमित्यर्थः, मरणभयं, अश्लोक- भपमिति-अपयशाभयमिति सप्तभयाः ॥७॥ अष्टौ च मदा:-मदस्थानानि, जाई १ कुल २ बल ३ रूवे ४ तव ५ ईसरिए ६ सुए ७ लाभे ८॥८॥ "चसहि १ कह २ निसिजि ३ दिय ४ कुडतर ५ पुव्वकीलिए ६ पणीए ७ । अइमापाहार ८विभूषणाय ९ नव यंभगुत्तीओति ॥१॥" एवं लक्षणा नव ब्रह्मचर्यगुप्तयः ॥९॥ दशमकारश्च श्रमणधर्मः यथा-"खंत्ती १ मद्दय २ अन्नव ३ मुत्ति ४ तव ५ संयमे य ६ बोधव्वे । सचं ७ सोर्य ८ अकिंचणं ९ च यंभ १० च जइधम्मो १" ॥१०॥ एकादश चोपासकानां-श्रमणोपासकानां प्रतिमा यथा-दंसंण १ वय २ सामाइय ३ पोसह ४ पडिमाय ५ अयंभ६ सचिते ७ आरंभ ८ पेस ९ उदिह वजए १० समणभूए य ११ ॥ १ अपचनसारोद्धार गाथा ९८०-९९४ गत प्रतिपादितथावफप्रतिमास्वरूपादुद्धृतमशेष प्रतिभाति ॥ २ प्रवचनसारोद्धारगाथा ९८० ॥

शान.वि०
प्रश्नाच्या
पचि
पश्चम
संवरद्वारे
रागादि-
अशातना-
न्तानां
वर्णन
100||
अत्र व गाथायां प्रतिमेति उक्त:-स: कायोत्सर्गः तत्र दर्शनं सम्यचं १ बवानि अणुव्रतादीनि २ सामायिकं च सावधानव-
पयोगपरिवर्जनासेवनखरूपम् ३, पौषधं घाटमीचतुर्दशीप्रमुखेषु पर्वदिनानुष्ठेयोऽनुष्ठानविशेषः ४ प्रतिमा च कायोत्सर्गः ५ अब्रह्मम-
चमचर्य ६ सचित्तं चसचेतनद्रव्यं ७ इति समाहार द्वन्द्वः] दर्शनादिषु पञ्चसु पदेषु प्रतिमा शब्दो योज्यः, अब्रह्मादिषु पञ्चसुपदेषु
(अननसचिचयोस्तु) वर्जकशन्दो योज्या, आरम्मय-स्वयं कृप्यादिकरणं ८ प्रेपणं परेषां पापकर्मसु व्यापारणं ९ उद्दिष्टं च तमेय
श्रावकमुद्दिश्य सचेतनं सदवनीकृत्य पक्षं तदेव पर्नपति-परिहरवि स आरंभ-प्रेपोद्दिष्टवर्जका, प्रतिमेति शब्दः प्रकृतं १० । इह
व प्रतिमाप्रविमापतोरमेदोपचारात् प्रतिमावतो निर्देशः कृतः । तथा श्रमणः साधुः इव यः स श्रमणभूतो भूतशब्दस्योपमानार्थत्वात्
न तु तदैवेति, वशन्दः-समुच्ये एतावता एकादश श्राद्वानानुपासकानां प्रतिमाः प्रतिज्ञा अभिग्रहाः,
एतासाम् कालमानं यथा-प्रविमायां प्रथमायो एको मासः कालमान, द्वितीयायां द्वौ मासौ, तृतीयां प्रयो मासाः, चतुर्थायां
चतुर्मासाः, यावदेकादृश्यामेकादश मासाः, एतच कालमानं यद्यपि दशाश्रुतस्कन्धादिषु साक्षानोपलभ्यते तथाप्युपासकदशासु प्रति.
माप्रतिपक्षानो आनन्दादिश्रमणोपासकानां साईवर्षपंचकलक्षणं [पतिमैकादश]प्रमाणे प्रतिपादितम् , प्रवचनसारोद्धारादिषु तथैव
मणिवम् , तथा उत्तरोचरासपि नासु प्रतिमासु क्रियमाणासु पूर्वपूर्वप्रतिमाः प्रतिपादिताः सर्वा अपि क्रिया-अनुष्ठानविशेषरूपाः कर्त-
म्या एव । इयमन तात्पर्य द्वितीयायां प्रतिमायां प्रथमप्रतिमोक्तमनुष्ठानं निरवशेष कर्तव्यमिति । तृतीयायां तु प्रथमद्वितीयप्रति-
१ प्रयचनसारोद्वारे पृ० २९३ तमे पतधिकं योग्यमपि अप स्पलितं प्रतिभाति ॥ २ यत्र । ) पतचिन्हं न्यस्तम-
शुदयले गुरं । 1 पतसिहं त अधिक।
-
॥८॥

माद्वयोक्कमप्यनुष्ठान विधेयं एवं यावदेकादश्यां प्रतिमायां पूर्वप्रविमादशकोक्तं सर्वमप्यनुष्ठानं कार्यमिति अथ दर्शनप्रतिमाखरूपनिरूपणायाह, सम्यग्दर्शन-सम्यक्त्वं प्रथमा दर्शनप्रतिमा भवति इति कीदृशं सम्यक्त्वं-प्रशम-संवेग- निर्वेदानुकंपाऽऽस्तिक्यलक्षणः पंचगुणविशिष्टं वथा कुग्रहः-कुशाखाभिनिवेशः शंका-कांक्षा-विचिकित्सा-मिथ्यादृष्टिप्रशंसा-तत्संस्त- वरूपाः पंच सम्यक्त्वाविचारशल्यरहितम् ,अणुव्रत्तादिगुणविकलख योऽभ्युपगमः सा दर्शनप्रतिमा, सम्यग्दर्शनमविपत्तिः तत्र पूर्व यदि केवलं आसीत् तयापि शंकादिदोपराजाभियोगाद्याफारपवर्जितत्वेन यथावत् सम्यग्दर्शनाचारविशेपपरिपालनाभ्युपगमेन च प्रति- मात्वं संभाव्यते, कथमन्यया उपासकदशासु एकमासं प्रथमायाः प्रतिमायाः पालनेन व्यवहारः प्रतिपादितः इत्यादि ज्ञेयम् १ अथ द्वितीया-अणुव्रतानि स्थूलप्राणातिपातविरमणादीनि गुणवतानि शिक्षाप्रतानि वयंधाद्यतिचाररहितानि निरपवादानि च पारपतः सम्पक परिपालयतो द्वितीया २ तृतीयायां सामायिकपतिमायां सामायिक-सावद्ययोगपरिवर्जननिरवद्ययोगसेवनसभा कत-विहित देशतो येन सामायिककृतः, इदं तात्पर्य अप्रतिपन्नपौपधस्य दर्शनघतोपेतस्य प्रतिदिनं उभय-(काल)सम्पन्धि सामायिक- करणं तृतीया ३॥ चतुर्थी पौषधप्रतिमा यस्यां चतुर्दश्यष्टमीप्रभृतिदिवसेषु अमावस्यापौर्णिमादिषु पर्वतिथिपु, चतुर्विधमप्याहारशरीरसत्कारा- ब्रह्मचर्या()व्यापारपरिवर्जित(जन)रूपं परिपूर्ण पौपधम्, न पुनरन्यतरेणापि प्रकारेण हीनं सम्यक् विधिनाऽनुपालयति आसेवते। एतासु पतसप्वपि प्रतादिप्रतिमासु बंधादीन्-पंधवधच्छेदप्रभृतीन् पष्ठिसंख्याकान् द्वादशवतविषयान् (अतिचारान्) मयत्नतो वर्ज- यति-परिहरवीति ।

पान०वि०
प्रश्नध्या.
"
पञ्चम
संबरद्वारे
रागादि-
आशावना-
न्तानां
वर्णन
11८11
अथ प्रतिमाप्रतिमाखरूपं सम्पत्वं अणुव्रत-गुणन्नत-शिक्षाबतप्रतिमाचतुष्टयवान् स्थिरचित्त आराधकः [इतरो हि विराधको
भवति, यतोऽस्यां प्रतिमाया] निशि च चतुप्पयादौ कायोत्सर्गः क्रियते पौपदिनेष्वपि द्रष्टव्यः प्रतिमाकायोत्सर्गः किं प्रमाणं? एक
रानिप्रमाण चा सर्वरात्रिप्रमाणो वा अस्मानः सानवर्जक विकटे प्रकाशदेशे भुक्ते एवं दिवा न रात्रौ इत्यर्थः, दिवापि प्रकाशदेशे
दिवापि अवद्धपरिधानकन्छः दिवा ब्राह्मचारी रात्री परिमाणकन् प्रतिमाकायोत्सर्गरहितेषु दिवसेषु इत्यर्थः, कायोत्सर्गस्थितः कि
चिन्तपति इत्याह जिनगुणान् कामक्रोधादिनिजदोषान् तत्मतिपक्षभूतान् क्षात्यादिगुणान् धारयति पंचमासान् यावत् इति पंचमी।
अप षष्ठी प्रतिमामाह-शृंगारादिकथा-स्त्रीकथावळ शरीरमात्रविभूषादिकं कुर्वन् सत्रावपि मैथुनं वर्जयन चिचक्षोमविधायकं यत्
फिश्चिदपि तत्सर्व वर्जपन् पद मासान् पाप विचरति इति षष्ठी।
अथ सप्तमी-सप्तमातान् पावत् पूर्वोक्तक्रियायुक्तः सचिचं सचेतनं आहार-अशन-पान-खादिम-खादिमरूपं नैव आहारयति
इति सप्तमी ।
अथाष्टमी पूर्वोक्तक्रियायुतं अष्टमासान यावत् आरंभस्य पृथिव्याद्युपमर्दनलक्षणस्य खपमात्मना करणं विधानं वर्जयति इत्यष्टमी८।
नवमी पुन: पूर्वोक्तसकलक्रियावान् नवमासान् यावत् पुत्रमित्रम्राउप्रेष्यादिपरैरपि न कारापयति उभयजन्या हिंसा स्वयं कर-
मेऽपि कारापणेऽपि कम्यादीनामपि इति ज्ञेयं नवमी ९।
अथ दशमी-पूर्वोक्तक्रियायुक्तो दशमासान यावत् वदयं कृतं भक्तमोदनादि नैव भुजीत दूरे लन्यद सावधकरणं तत्र क्षुरमु-
१ एतदधिक प्रवचनसारोद्वारे पृष्ठ २९४ तमे
॥८॥

पारस य ण्डिवमस्तकः शिखां धारयति केवलस्तारशश्रावकः दशमप्रतिमास्थो यदि भूम्यादौ स्थापितं निधानादिकं जानाति तदा तत्पृच्छतां सुतादीनां च कथयति अकथिते सति वृत्तिच्छेदमाः अथ नैव जानाति तदा कथयवि अहं न जानामि एतापन्मुक्वा नान्यत् किमपि जल्पितुं कल्पते इति तात्पर्यार्थः, इति दशमी १०। अथैकादशीमाह-क्षुरमुण्डः कतलोचो वा रजोहरणपतगृहधारी साधूपकरणं गृहीत्वा श्रमणो निम्रन्थस्तद्वदनुष्ठानकरणात् स श्रमणभूतः साघुकल्पः गृहानिर्गत्य निखिलसाघुसमाचारीचरणचतुर समितिगुप्त्यादिसम्यगनुपालयन भिक्षार्थ गृहकुलप्रवेशे प्रति- | माप्रतिपन्नाय श्रमणोपासकाय मिक्षा दत्तेति भाषमाणः कश्चित्पृच्छति कस्त्वं तदा प्रविमाप्रतिपन्नः श्रमणोपासकोऽहमिति ब्रुवाणो ग्रामनगरादिषु अनगार इव मासकल्पादिना विचरत्येकादश मासान् यावदिति एतच उत्कृष्टतः कालमानमुक्तम् । जघन्यतः पुनरेका दिशा]पि प्रत्येकमन्तर्मुहर्चादिमाना एव तच्च मरणे वा प्रबजितत्वे वा सम्भवति नान्यथेति। तथा एकादशमासान् यावदित्येकादशी११ ॥ अथ उचरासु सप्तस्वपि प्रतिमासु आवश्यकचूण्यों प्रकारान्तरमपि दृश्यते तथाहि-"राइभत्तपरिणाए पंचमी सचित्ताहा- रपरिणाए छट्ठी दिया यंभचारी परिमाण कडा सत्तमी दिया विराओ वि बंभयारी असिणाणए वियडभोइ योसह केशमंसु रोम नहत्ति अहमी सारंभपरिणाए नवमी पेस[सारंभ]परिणाए दशमी उद्दिभत्तपाणवजए समणभूएत्ति एकादशी" इति दृश्यते इत्यादि भूयान् विचारस्तु ग्रन्थान्तरादबसेयः इति । १ प्रवचनसारोद्धार पृष्ठ २९६ तमे पतदालापको न्यस्तो ज्ञान०वि० प्रश्न०व्या वृत्ति पञ्चम संवरद्वारे | रागादि- अशावना न्तानां वर्णन . ॥८॥ भिक्खुपडिमा १२ किरियठाणा य १३ पारसयभिक्खुपडिमा-तथा द्वादश साधूनां भिक्षुणां प्रतिमा अभिग्रहविशेपास्ताश्चमा:-मासाइ सत्तता पढमा वीयाय तईय । सत्त राइदिणा अहोराई ११ एगराई १२ भिक्खुपडिमाण वारसंग ॥१।। तत्रैकमासिकी द्विमासिकी, त्रिमासिकी सप्तमी ( सप्तमासिकी एवं सप्त अष्टमी-नवमी-दशमी प्रत्येकं सप्तरात्रिदिवसमानाः, एकादशी अहोरात्रिदिवसमाना, द्वादशी एकरात्रिमाना वस्थाख्यानं तु पूर्वलिखितमस्ति ततो ज्ञेयम् । "तेरसकिरियाहाणा" त्रयोदश क्रियास्थानानि आत्मनो व्यापाररूपाः यथा- अट्ठा १-गट्ठा २-हिंसा ३ ऽकम्हा ४ दिट्ठीय ५ मोस ६ दिन्नेय ७ अजप्प ८ माण ९ मित्ते १० माया ११ लोमे १२ रियावहिया १३॥१॥ व्याख्या करणं क्रिया कर्मबन्धनिबन्धना चेष्टा तस्याः स्थानानि-मेदाः क्रियास्थानानि तानि च त्रयोदश वत्र अट्ठा णहा हिंसत्ति अन त्रिषु पदेषु प्राकृत्वात् चतुर्येकवचनस्य लोपो दृष्टव्यः ततो अर्थाय स्वपरप्रपोजनाय क्रिया अर्थक्रिया, अनर्थाय- खपरप्रयोजनाभावेन क्रिया अनर्थक्रिया, हिंसाय क्रिया हिंसाक्रिया, तथा अकस्मात् क्रिया, तथा दृष्टिविपर्यासाऽदत्तादानक्रिया, अध्यात्मक्रिया, मानक्रिया, अमित्रक्रिया मायाक्रिया, लोभक्रिया, ईपिथिकीक्रिया, इति, एतानि व्याचिख्यासुः प्रथमस्थानमाह प्रसस्थावरमाणिपु यः कश्चित् दण्डथं दण्डथते आत्मनोऽन्यो वा प्राणी येन, तथा स्वशरीरादेः] खजनाद्यर्थ वा राजनियोगाद्यर्थ या १.प्रवचनसारोद्धार गाथा ८१८ । 11८२॥

. पेन म अर्थदन्तः १ या पुनः फचिव सरटादिकं हकलास] भूपकादिकं या वनलतादिकं वा प्रयोजनं विनैव मारयित्वा छित्वा, स्पति मा अनक्रिया, २ । अयं सादिधरी या अस्मान् हिसितवान् हिनस्ति, हिसिष्यति वा मनसि विचार्य सपदेिवरिणो या यो दण्डं आरमने स हिंसादण्डः ३ अन्या मृगपक्षिसरीसृपप्रमृतीनां मारणाय शरलोप्ठ्वादिकं क्षिपति अन्य पुनर्हन्यात् अन्तराले स दप्टोकरमारंटः एवं माल्यादिकं अन्यस्मिन् छिंयमाने अन्य छियादिति अकस्मादण्डः ४ दृष्टेयुद्धेः विभ्रमो विपर्यासो मतिविभ्रमः मिग्रमपि सन् अमिन करता पातयेत् म दृष्टिविपर्यासो दृष्टिक्रिया, ५ आत्मार्थ परेषां चा अर्थाय यो मृपा वदति स मृपादण्डा, ६ गृपागदवन आत्मा नायकादीनां पराध घा अदत्तादानं कुरुते स अदत्तादानदंडकः ७ अध्यात्म मनः तत्र भयो या वानिमित्तान- पेषः शोकादि अमिमा एतावता यस्य संमुखं न कोऽपि किश्चिदनिष्टं जल्पति न कोऽपि विरूपं कुरुते तथापि हृदयेन किञ्चिदतिशयेन एमनाः माति तस्याध्यात्मिकी क्रिया भवति, तस्य पत्यारि कारणानि क्रोध-मान-माया-लोभाश्चत्यादीनि कारणानि अध्यात्मकि. पापा मपन्ति पापानिमितमनपेक्षमाम्यंतरनिष्कारणमन्तरेण क्रोधादिसमुद्भुतं दौर्मनस्य भवति तस्याध्यात्मिकक्रियेति तात्पर्याः ८ या पुनर्जातिमदादिना जाति-कुल-रूप-चल-श्रुत-तपो-लामैश्वर्यमदाष्टविधलक्षणेन मानेन मत्तः सन् परं हीलेइ खिसइ गरहइ एपा | किपा मानक्रिया ९ तथा यः पुनर्मातापितस्वजनादीना अल्पेऽप्यपराधे तीयं दण्डं कुरुते दहना कनवधताडनादिकं तन्मित्रपत्ति अमिप्रक्रियास्यानं सा अमिप्रक्रिया १० मायाक्रियास्थानं यया-मनसि अन्यत् वाचि अन्यत् आचरति अपि अन्यत् विसंवादि गुप्त- द्र सामर्थ्यः सन् फरोति एपा क्रिया मायाक्रिया ११ इतः उर्घ पुनर्लोभमत्ययिकी क्रिया सावद्यारंभा-पापव्यापारा परिपहेषु गाढ- पराकाधायुक्तः, श्रीपु कामभोगेषु अत्यंताशक्तः, आत्मानं गाढादरेण रक्षन् अन्यसवानां वधबंधनमारणादिलक्षणानि करोति एपा नवि० प्रश्न०व्या पूचि संबरद्वारे रागादि- आशातना- न्तानां वर्णन ८३|| भूयगामा १४ परमाधम्मिया १५ लोभप्रत्ययिकी क्रिया १२ ईरणं ईर्या-गमनं वद्विशेषः पंथा ईपियस्तत्रभवा ऐपिथिकी, इति व्युत्पत्तिमात्र प्रवृत्तिनिमित्तं तु केवल योगप्रत्यय उपशांतमोहादिगुणत्रयस्य सातवेदनीयकर्मस्य (ण:) बंधः सा ईपिथिकी, यथा साधोः समितिगुप्तिसंवृतस्स उपशांतमोह- क्षीणमोहसयोगिकेवलिलक्षणगुणस्थानत्रयवर्तिनः अप्रमत्स्य अत्राप्रमत्तग्रहणेनान्येषां कायप्रत्यपानां केवलं योगनिमित्तकर्मबंधोदया- संमवाद अप्रमत्तशब्देनार्थः । भगवतः यावञ्चक्षु-पक्ष्मांकवर्तिनः यावत् चक्षुर्निमेपोन्मेपमात्रोऽपि योगः संभवति तावत् सूक्ष्मा-एक- सामायिकपंधत्वेनेत्यलं सावधलक्षणा क्रिया भवति सा ईपिथिकीक्रिया त्रयोदशक्रियास्थानमिति' भूयग्गामाणय १४ तथा चतुर्दशभूतग्रामाः जीवसमूहाः तत्रैकेन्द्रियाः सूक्ष्माबादराश्च, द्वीन्द्रियाः श्रीन्द्रियाः चतुरिन्द्रियाः पंचेन्द्रियाः संझिनः असंज्ञिनश्चेति सप्त वा(ते) पर्याप्ताऽपर्याप्तभेदाद्विधेति १४ पंचदश परमाधार्मिका नारकाणां दुःखोत्पादकाः असुरकुमारविशेषाः ते चामी-अवे १ अंबरिसी२ चेच सामेय सवले विय ४ रूद्द ५ उवरुद्द ६ काले ७ महाकालेत्ति ८ आवरे १, असिपत्ते ९ घणु १० कुम्भे ११ यालू १२ वेयरणी इय १३ खरस्सरे १४ महाघोसे १५ एए पन्नरस परमाहम्मिया त्ति गाथा ॥ व्याख्या-परमाच ते अधामिकाथ संक्लिएपरि- णामत्वात् परमाधार्मिका-असुरविशेपास्ते च व्यापारमेदेन पंचदश मवि तत्र यः परमाधार्मिकदेवो नारकान अंचरतले नीत्वा निःशंक .१ प्रवचनसारोद्धार गाथा ८१८-८३५ वृत्तौ पृष्ठ २३७-२३९ तमे वर्णितत्रयोदशक्रियास्थान-निरूपणादत्रोद्धृतं प्रतिभाति ॥ २ प्रयचनसारोद्धार गाथा ८५-८६ घृत्तौ पृष्ठ ३२१-३२२ तमे पंचदशपरमाधार्मिकस्वरूपात्रोद्धृतं प्रतिभाति अक्षरशः ॥ 11८३॥

मुश्चति स अंबः१ यस्तु नारकान् निहत्य कल्पनिकामिः खंडशः कृत्वा भ्राष्ट्रपाकयोग्यान् करोति स अंबरीषा२ यस्तु रज्जुपाणिप्रहा- रादिना शातनपातनादि करोति वर्णतोऽपि श्यामः स श्यामः ३ यच अंभवसाहृदयकालेज्यकादीनि उत्पाटयति वर्णतोऽपि शवलास शवलः ४ यः कुन्तादिषु नारकान् प्रोतयति स रौद्रत्वाद्रौद्रः ५, यस्तु तेषां नारकाणां मुद्रादिना अंगोपांग विभनक्ति अतिरौद्रत्वात् स महारौद्रः ६ यः पुनः चुल्ल्यादिकं कण्ड्वादिपु पचति वर्णतोऽपि कालः स कालः ७ यश्च नारकाणां तीक्ष्णमांसानि खंडयित्वा खादति वर्णतश्च महाकालः स महाकालः८ असि:-खड्गस्तदाकारपत्रवद्वनं विकुऱ्या यस्तदाश्रिवनारकान् असिपत्रपातनेन तिलशः छिनत्ति सोऽसिपत्र: ९ यो धनुर्मुक्ताधचन्द्रादिभिर्वाणैः कर्णादीनां छेदनमेदनादि करोति स धनुपरः १० भगवत्यां तु महाकालानन्तरमसिः तोऽसिपत्रः ततः कुंभिरिति पठयते, तत्र योऽसिना नारकान् छिनत्ति सोऽसिः शेषं तथैव, यः कुम्भ्यादिषु तान् पचति स कुंभः ११ यः कदंवपुष्पाकारासु वनाझारासु वैक्रियवालुकासु सप्तासु चनकानिव तान्, पचति स वालुका १२ विरूपं वरणं असाः प्रयोजन सा वैतरणी यथार्था पूयरुधिरत्रपुताम्रादिभिरतितापात् कलकलायमानैः भृतां नदी विकुर्व्य तत्तारणार्थ या नारकान् कदर्थयति स वैतर- णिकः १३ यो वजकंटकाकुलं शाल्मलीवृक्षं नारकमारोप्य खरखरं कुर्वन्तं कुर्वन् वा कर्षति स खरखरः १४ यस्तु भीतान् अपलायमा. नान् नारकान् पशूनिव चाटेषु महायोपं कुर्वनिरुणद्धि स महाघोषः१५ एवमेते पंचदश परमाधार्मिकाः प्राग्जन्मनिबद्धसंक्लिष्टरक्रियाः पापाभिरता: पंचाग्न्यादिरूपं मिथ्याकप्रतपः कृत्वा रौद्रीमासुरगतिमनुप्राप्ताः संतो नारकाणामाधासु तिसृषु पृथिवीपु विविधवेदनाः | समुदीरयन्ति तथा कदीमानांश्च नारकान् दृष्ट्वा इहत्यमेषमहिपकुर्कुटादियुद्धप्रेक्षकनरा इच हृष्यन्ते हृष्टाश्चाट्टाहास चेलोत्क्षेपं त्रिप- धास्फालनादिकं च कुर्वन्ति किंबहुना ? यथैषामित्थ प्रीतिर्न तथा नितान्तकान्ते प्रेक्षणकादाविति ज्ञेयं इति पंचदशाऽपि परमाधार्मि-

धान वि०
प्र०व्या.
पश्चम
संवरद्वारे
रागादि-
आयातना.
न्तानां
वणन
॥८४॥
.
गाहासोलसया १६ असंजम १७ अवंभ १८ णाय १९
कसरूपम् ।
गाहा सोलसा य १६ गाहा सोलसयति गाथा पोडशानि गाथाभिधानं पोडशमध्ययनं येषां तानि गाथा पोडशकानि-मूत्रक
वांगस्य प्रथमश्रुतस्कन्धाध्ययनानि तानि चैतानि समओ १ वेयालियं २ उपसग्गपरिण्णाय ३ थोपरिणाय ४ निरयचि.
भत्ति ५ वीरत्थो य ६ कुसीलाण परिभासा ७ ॥१॥ वीरिय ८ धम्मो समाही १० मरग११ समोसरणागि१२
'अहा तहं १३ गंथो १४ जमईयं १५ तह गाहा १६ सोलसमं चेव अज्झयणमिति।
असंजभो१७ सप्तदशविधः असंयमः, स चाऽयं-पुढवि १ दग २ अगणि ३ मारुय ४ वणफई ५ वि ६ ति ७ चउ ८
पणिदि ९ अजीवे १०, पेह ११ उवेह १२ पमजण १३ खेचण १४ मणो १५ वइ १६ काय १७ जोगेहिं १ इति
सप्तदश योगाः, अन्यत्राप्युक्तं पंचाश्रवाद्विरमणः पंचेन्द्रियनिग्रहः कषायजयः दण्डत्रयविरतिश्चेति संयमः सप्तदशमेदः । तथा द्वादशा.
विरतिः प्रमादपंचकं वा, इति असंयमः तथा संयमादन्यः असंयम इति व्युत्पत्तिमात्रव्याख्यान क्षेयं ।
अवमं १८ अष्टादशविध अब्रह्म तच्चै ओरालियं च १ दिव्वं २ मण १ वय.२ कायाण ३ करण जोगेहिं । अणु-
मोयण १ करावण २ करणेण ३ द्वारसायंभंति १। औदारिक मनाप्रभृतिकरणनामनुमोदनादियोगैर्नवधा एवं दिव्यक्रिय-
भपीत्यष्टादशधाऽब्रह्ममेदं ज्ञेयं-
एगुणविसाए पाए १९ एकोनविंशतितिाध्ययनानि तानि चामूनि उक्खित्तणाए१ संघाडेर अंडे३ कम्मेप ४ सेलए५
॥८॥

असमाहिठाणा २० सथला २१ तुम्वे य ६ रोहिणी ७ मल्लि ८ मायंदी ९ चंदिमा उ य १० ॥१॥ दावहवे ११ उदगणाए १२ मंडुफे १३ तेयलीद य १४ गंदिफले १५ वरकंका १६ आइन्ने १७ सुसमा १८ पुंडरीए य १९ ॥२॥ इति ज्ञाताध्ययनानि, असमाहिठाणा २० असमाहिठाणा विंशतिरसमाधिस्थानानि-चित्तस्वास्थ्याश्रयाः, तानि चामूनि द्रुतचारित्ता १ अप्रमार्जित- चारिता २ दुःप्रमार्जित चारित्ता ३ अतिरिक्तशय्यासनिकत्वं ४ आचार्याभिमुखभापित्वं ५ स्थविरोपधातित्वं ६ भूतोपघातित्वं ७ | संज्वलनत्वं प्रतिक्षणरोपणत्वं ८ क्रोधनत्य-अत्यंतक्रोधशीलता ९ पृष्टमांसिकत्वं-परोक्षस्थावर्णवादित्वं १० अभीक्ष्णमवधारकत्वं शंकितस्यापि अर्थस्याप्यवधारकत्वं११ नवानामधिकरणानां क्रोधादीनामुत्पादनं१२ पुराणानाम् नेपामुदीरफत्वं १३ सरजस्कपाणिपादत्वं | १४ अकालखाध्यायकरण १५ कलहत्वं-कलहहेतुभूतकर्त्तव्यकारित्वं १६ रात्रौ महच्छन्देन उल्लापितत्वं शब्दकरणत्वं १७ झंझा- कारित्वं गणस्य चिसभेदकारित्वं मनोदुःखकारिवचनभाषकत्वं वा १९ सूर्यप्रमाणभोजित्वमुदयास्तमनं यावद्भोजित्वं १९ एपणायां गोचयां असमितत्वं चेति २० इति विंशतिरसमाधिस्थानानि ज्ञातव्यानि ॥२०॥ एकविंशतिः शबलाचारित्रमालिन्यहेतवः ते चामी-इस्तकर्मकरणं १ मैथुनमतिक्रमादिना २ रात्रिभोजनं ३ आधाकर्मणः । राग्यातरपिंडग्रदर्ण ५ उद्देसिकतीतापमित्यकाछेद्यानिसृष्टादेव भोजनं ६ प्रत्यख्याताशनादिभोजनं ७ पण्मासान्तर्गणाद्गणान्तरसंक्रमण वा अनिष्टया विचरणं वा ८ मासस्यान्तस्त्रिकृत्यो नाभिप्रमाणजलावगाहनं ९ मासस्थान्तस्त्रिर्मायायाः करणं १० राजपिंडादिना भोजन ११ आकुय्या प्राणातिपातकरणं १२ एवं मृपा. वादनं १३ अदत्तग्रहणं १४ तथैवात्यंतसचित्तपृथिव्यां कायोत्सर्गादिकरणं १५ एवं .

शान०वि० प्रश्नाच्या वृत्ति संवरद्वारे रागादि- आशावना. न्तानां वर्णन ॥८५॥ परिसहा २२ सूयगडझयण २३ देव २४ भावण २५ उद्देस २६ सोहं सरजस्कायिकायां कायोत्सर्गादिकरणं १६ अन्यत्रापि प्राणिवीजादियुक्ते कायोत्सर्गकरणं १७ आकुट्या भूलकंदादिकमोज १८ संवत्सरस्यान्तर्दशकृत्वो नामिप्रमाणजलावगाहना १९ संवत्सरस्यान्तर्दशमायास्थानकरगं २० अमीक्ष्ण शीतोदकप्लतहस्तादिनाऽशना- देहणं भोजनं २१ चेत्येकविंशतिः शवला: अतिक्रमपविक्रमादेर्यावत् सर्वत्र पदे ज्ञेयमिति ॥२१॥ परीसहाय २२-खुहा १ पिवासा २ सी उण्हं ३-४ ईसा ५ चेला ६ रई ७त्थीमो ८ चरिया ९ निसहिया १० सिजा ११ अकोस १२ वह १३ जायणा १४ ॥१॥ अलाभ१५ रोग१६तणफासा १७ मलसफारपरिसहा १८- १९ पन्ना २० अन्नाण२१ समतं २२ इय यावीसपरिसहा ॥२॥ इति परीषहाः ॥२२॥ सूपगडझयणा २३-त्रयोविंशतिः पत्रकताऽध्ययनानि तत्र समयादीनि प्रथमश्रुतस्कंधभवानि पूर्वोक्तानि षोडश द्वितीपश्रुत- स्कंधभवान्यध्यपनानि सप्त तपथा "पुंडरिय १ किरियाणं २ आहारपरिण ३ पञ्चक्खाण किरियाय ४ अणयार ५ र ६ नालंद एय ७ सोलसाई तेवीसं ॥१॥” इति त्रयोविंशतिः अध्ययनानि ॥२३॥ देवा २४-चतुर्विशतिर्देवाः तत्र गाथा "भवण १ वण २ जोइ ३ वेमाणियाप४ दश अह पंधेगविहा इति "घउ- वीसं देवा केह पुण पिति अरिहंता" इति ॥२४॥ तथा भावणति पंचविशतिविनाः ताथ प्रवचने प्रतिमहानत पंच पंचाभिहिताः स्वयमेवेति ज्ञेयाः॥२५॥ उद्देसणकाला २६ तथा पशितिः उद्देशनकाला दशाकल्पव्यवहाराणां तत्र गाथा-दस उद्देसणकाला दसाण उच्छेव हुँति ॥८५|| गुण २७ पकप्प २८ कापस्स दस चेव य यवहारस्स हुंति सव्वेवि छन्वीसं१ दशाकल्पानां दश उद्देशनकालाः दश व्यवहारकल्पानां पद उद्देशनकालाः कल्पस्य जीतव्यवहारकल्पस्येति एवं पविशतिज्ञेयाः॥२६॥ गुणनि सप्तविंशतिग्नगारगुणाः तत्र महामतानि पंच, ५६न्द्रियनिग्रहा: पंच ५ क्रोधादिविवेकाश्चत्वारः ४ सत्यानि त्रीणि ३ वत्र भावना सत्यं-शुद्धान्तरात्मा करणसत्य-यथोक्तक्रियाप्रतिलेखनादिकरणं योगसत्यं-मनाप्रभृतीनामविचलनं १७ क्षमा १८ विरा- गवा १९ मनम्मभृतिनिरोपाथ ३ एवं २९ नानादि संपन्नता २५ वेदनादि सहन२६ मरणांतिकोपसर्गसहनं चेति२७ अहवा "वय छम ६ मिदियाणं च निग्गहो ११ भावकरणसचं च १३ खमया १४ विरागया विय १५ मनमाईणं निरोहो य ॥१८॥१॥ एवं कायाण उफ २४ जोगमि जुत्तया २५ वेयणाह पीडणया सहणे २६ तहा मरणंते संलेहणाय २७ एए अणगार गुणा ||२||" विज्ञेयं ॥२७॥ पकप्पाय २८-पकप्पत्ति अष्टाविंशतिविधः आचारप्रकल्प: निशीतिमाचारांगमित्यर्थः स चैवं "सत्यपरिपणा १ लोकवि. जओ २ सीओसणिज्ज ३ सम्मत्तं ४ आवंति ५ धुव ६ विमोहो ७ उपहाणसुयं ८ महपरिपणा ९॥१॥" प्रथमस्य श्रुतस्कन्धस्याध्ययनानि द्वितीयस्य तु "पिंडेसण १ सेन २ इरिया ३ भासजायाय ४ वत्थेसणा ५ पाएसणा ६ उग्ग- हुपडिमा ७ सत्त सत्तिया ८ एवं १४ भावणा १५ विमुत्ती१६ इत्याचारांगस्य उग्घाई १ अणुग्घाई २ आरोवण ३ तिविहमो निसीहं तु इइ अहावीसविहो आयारपकप्प नामो त्ति ॥३॥" तत्र उद्घातिकं यत्र लघुमासादिकं प्रायश्चित

शान०वि०
प्रश्नध्या० ।
वृत्ति
पश्चम
संबरद्वारे
रागादि-
आशातना-
न्तानां
वर्णन
॥८६॥
पावसुत २९ मोहणिजे ३०
अनुद्घातिकं यत्र गुरुमासादि कल्पते २ आरोपणा च यत्र कस्मिविद्.प्रायश्चिते अन्यदप्यारोप्यते पर्यायछेदादिना या इत्यष्टाविंशतिः
आचारपकल्पाः॥२८॥
पावसुय २९ पापसुपति एकोनत्रिंशत् पापश्रुतप्रसंगास्ते चामी अट्टनिमित्तंगाई दिचु १ पायं २ तलिक्ख ३ भोमं ४
च ५ सर ६ वंजण ७ लक्रवणे ८ एकिक पुण तिविहं सुत्तं वृत्ति वार्तिक १ एवं २४ गंधव २५ नदृ २६ वत्यु २७
तिगिच्छ २८ घणुवेयसंजुत्त २९ इत्येकोनत्रिंशत्पापश्रुतानि ।।२९।।
मोहणिज ३० त्रिंशत् मोहनीयसानानि-महामोहबंधहेतवः, तानि चामूनि-जलान्तर्योलनेन प्रसजीवानां हिंसनं १ एवं हस्ता.
दिना मुखादिश्रीतापिहननं २ वर्धादिना शिरोवेटनं ३ मुद्गरादिना शिरोभिघातेन इननं ४ भवोदधिपतितजंतूनां द्वीपकल्पस्य
प्राणिनो इननं ५ सामर्थ्य सत्यपि घोरपरिणामात् ग्लानस्यौपधादिमिरप्रतिचरणं ६ तपस्विनो बलात्कारेण धर्माद्मसनं ७ सम्पग्द-
र्शनादि मोक्षमार्गस्य परेपा विपरिणामकरणेनापकारकरणं ८ जिनानां निंदाकरणं ९ आचार्यादेः खिसनं १० आचार्यादीनां ज्ञान-
दानादिमिरूपकारिणी कार्यप्वपि अप्रतितर्पण११ पुनः पुनरधिकरणस्य-नृपयाणकादिनादेः कथनं १२ वशीकरणादिकरणं १३ मत्या-
ख्यातमोगप्रार्थनं १४ अभीक्ष्णमबहुश्रुतत्वेप्यात्मनो बहुश्रुतत्वप्रकाशनं १५ एवमतपस्विनोऽपि तपस्वितामकाशनं १६ बहुप्राणिनां
अन्तधूमेनामिना हिंसनं१७ अकृत्यं स्वयंकृतस्यान्यशिरस्यावित्रिनं१८ विविधप्रकार र्मायया परवंचनं१९ अशुभाशयात सत्यस्यापि
सभायां मृति प्रशंसनं २० अक्षीणकलहत्त्वं २१ विश्रंभोत्पादनेन पाधनापहरणं २२ एवं परदारलोभनं २३ अकुमारत्वेनाध्यात्मनः
॥८६॥

सिद्धातिगुणा य ३१ जोगसंगहे ३२ कुमारत्वमणनं २४ एपमनमचारित्वेऽपि ब्रह्मचारित्वप्रकाशनम् २५ येनैश्वर्यत्वं प्रापितस्तस्यैव परोक्षे द्रव्यस्य लोमकरण २६ यत्प्र- मायेन ख्याति गतस्तस्य कश्चित् अन्तरायकरणं २७ राजासेनाधिपराष्ट्रचिंतकादेहुजननायकस्य हिंसनं २८ अपश्यतोऽपि । इयामीति मायया देवादिकमिति मणनं २९ अवक्षया देवेषु अहमेव देव इति प्रख्यापनं ३० इति त्रिंशन्मोहनीयस्थानानि सिद्धातिगुणा य ३१ सिद्धातिगुणाति एकत्रिंशव सिद्धानामादित एव गुणाः सिद्धगुणाः सिद्धानां वा आत्यंतिकाः गुणाः सिद्ध- गुणाः ते चामी-"से ण तसे न चउरंसे ण घट्टे ण परिमंडले ण आयते"इति संस्थानपञ्चकस्य निषेधतः वर्णपञ्चकस्य गंधद्व- पस्य रसपञ्चकस्य स्पष्टिकस्य वेदत्रयस्य एवं २८ अकायः २९ असंगः ३० अरूह ३१ श्चेति यदुक्तं "पडिसेहणसंहाणे ५ वण्ण ५ गंघ २ रस ५ फास ८ घेदे य ३ पणपण दु पण तिहा इगतीसाकाय असंगरुहा ॥१॥" अथवा क्षीणाभिनियो. घिकशानावरणः क्षीणश्रुतज्ञानावरण इत्यष्टकर्मभेदानाश्रित्य एकत्रिंशझेदा आह च पंचणाणावरणे णव दसणावरणे चत्तारि आउए अन्तो पंच सेसे दो दो भेया खीणाभिलावेण भणियव्या इगतीसं ॥१॥ सिद्धगुणाः । ज्ञानाव(रण) ५ दर्शनाव० ९ वेदनीय २ मोहनीय २ आयुः ४ नामक० २ गोत्रक० २ अन्तराय ५ प्रकृतयः क्षीणाः इति वाच्यम् । जोगसंगहे ३२ अथ द्वात्रिंशत्योगसंग्रहाः-युज्यन्ते इति योगाः मनोवाकायन्यापारास्ते चेह प्रशस्ता विवक्षितास्तेषां शिक्षा- चार्यगतानां आलोचनादिमिरपलापादिना प्रकारेण संग्रहणानि संग्रहाः प्रशस्तयोगसंग्रहत्वात् आलोचना अत एव तथोच्यते ते च १ आलोयणा णिरपलावे...यत्तीसं संगहा इति गाथापञ्चकम् ,

न०वि०
नाच्या
पञ्चम
संचरद्वारे
रागादि-
आशातना
न्तानां
वर्णन
द्वात्रिंशत् भवन्ति, तानाह-आलोयणत्ति तत्र प्रथम मोक्षसाधकयोगसंग्रहाय शिष्येण आचार्याय आलोचना दातव्या, इति कोऽर्थः?
शिष्येण सकीयापरापालोचना आचार्याय सम्यम् निर्मायतया कथयितव्या इत्यर्थः १, निरवलावे त्ति आचार्योऽपि मोक्षसाधकयो-
ति गसंग्रहायैय दत्चसमालोचनापां निरपलापत्वं, अपरिथावित्यं नाऽन्यस्मै कथयितव्यमित्यर्थः २ आवत्तीसु दढधम्मघात्ति प्रशस्त-
योग-संग्रहाय साधुना आपत्सु द्रव्यादिमेदाव सुदृढधर्मता कार्या सुतरी सुदृढधर्मणा भाव्यम् ३, अणिस्सिओवहाणेति शुभयोग
संग्रहायैव अनिश्रितत्वं च वदन्यनिरपेक्षमुपधानं च तपोऽनिश्रितोपघानं परसाहायाऽनपेक्षं तपो विधेयमित्यर्थः ४ सिक्खत्ति
॥८७॥
योगसंग्रहाय शिक्षा सेवितव्या सा च सूत्रार्थग्रहणरूपा, प्रत्युपेक्षाद्यासेवना चेति द्विविधा ५ णिप्पडिकम्मयत्ति तथैव निपति-
फर्मता शरीरस्य विधेया ६ अण्णाययत्ति तपसि अज्ञानता अप्रकटता कार्या यशः पूजाद्यर्थत्वेनाप्रकाशयद्भिस्तपः कार्यमित्यर्थः ७
अलोभयचि अलोमता विधेया ८ तितिक्षति तितिक्षा-परीपहादिजपः ९ अजयत्ति-धर्म अजुता भावः १० सुइत्ति सत्यं
संयमः इत्यर्थः ११ सम्मदिहित्ति सम्यग्दर्शनशुद्धिः १२ समाहियचि समाधिः चेतावास्थ्यम् १३ आयारे विणओचएति
द्वारद्वयं तयाचारोपगतः स्यात् मौनं कुर्यात् इत्यर्थः १४ विनयोपगतो भवेन मानं कुर्यादित्यर्थः १५ घिइमइयति धृतिप्रधानाम-
तितिमविरदैन्यं धर्म १६ संवेगति संवेगः संसारभयं मोक्षामिलापो वा १७ पणिहित्ति प्रणिधिर्माया सा न कार्या इत्यर्थः १८
मुविपिस्सदनुष्टानं १९ संवरत्ति आश्रयनिरोधः २० अत्तदोसोवसंहारेत्ति खकीयदोषस्य निषेधः २१ सयकामविरयत्ति
समस्तविपयर्थमुख्यं २२ पचक्याणेत्ति प्रत्याख्यानं मूलगुणविषयं २३ उत्तरगुणविषयं च २४ विउस्सगति व्युत्सगों द्रव्प-
मापमेदमिन्नः २५ अप्पमापति प्रमादवर्जन २६ लवालवेनि कालोपलक्षणं तेन क्षणे क्षणे समाचार्यनुष्ठान कार्य २७ संवर-
॥८७॥

तितीसा आसातणा सुरिंदा आदि जोगेनि पानमेव संवरयोगो ज्यानसंवरयोगः २८ उदए मारणतिएचि मारणांतिकेपि वेदनोदये नक्षोभः कार्यः २९ संगाणं परिणत्ति संगाणां विषयाभिष्यंगानां ज्ञपरिज्ञया ज्ञात्वा प्रत्याख्यानपरिक्षा कार्या ३० पायच्छित्त करणे इयत्ति प्रायश्चि- पकरण कार्ये ३१ आराहणयाय मरणंतेत्ति मरणरूपोऽन्तो मरणान्तस्तत्र सम्यगाराधना संयमः कार्यः ३२ इति द्वात्रिंशत् योग- संग्रहाः सदृष्टान्ता आवश्यकनियुक्तिष्टचितोऽवसेया विस्तराथिभिः तत्र द्रष्टव्यमिति तिचीसासायणा ३३ अथ त्रयस्त्रिंशदाशातना आयो-ज्ञानादीनां लाभस्तस्य शातना खंडना यथा भवति सा अशातनास्ताक्षेमाः रायणिपस्स सेहो पुरओ गंता भवइ आसायणा सेहस्स इत्येवमालापो दृश्यते तत्र रत्नाधिकस्य पुरओत्ति अग्रतः १ सपक्खे समानपवं समपाधै यथा भवति तथा समश्रेण्या गच्छति इत्यर्थः । चंक्रमणे स्थिते उपविष्टे गुरोरग्रे उभयोः पार्श्वे [आसन्ने] गंता स्थाता निपीदन एवं ९ शिष्यस्याशातना भवंति विचारभूमौ गतयोः द्वयोः पूर्वमाचमनं शैक्षस्याशातना १० एवं पूर्व गमनागमनालोचयतः तथा रात्रौ रत्नाधिकेन को जागर्ति इति पृष्टे तद्वचनमप्रतिशृण्वतः १२ तथा रात्निकस आलपनीयस्य पूर्वमालापयत आशावना १३ सन्धमशनादि पूर्व परमालोचयतः १४ एवमन्यस्योपदर्शयतः १५ एवं निमंत्रयतः १६ रात्निकमनापृच्छ्य अन्यस्मै भक्तादि ददतः १७ स्वयं प्रधानतरं भुजानस १८ कचित्प्रयोजने दिवापि रात्निकवाचाऽभतिशृण्वतः १९ रात्निकं प्रति वत्समक्षं वा बृहता गन्दन बहुभापमाणस्य २० व्याहृतेन मस्तकेन वंदे इति वक्तव्ये किं भणसि इत्यादि ब्रुवाणस्य २१ रात्निके प्रेरयति कस्त्वं प्रेरणाया. प्रवचनसारोद्धारवृत्ति गाथा १२९-१४९ यावदाशातना स्वरूपम्,

.
ज्ञानवि०
Toया
पञ्चम
संवरद्वारे
रागादि-
आशातना
न्तान
वर्णन
गणातियं करेत्ता एक्कुत्तरियाए पडिए तीसातो जाव उ भवे एकाहिका विरतीपणिहीसु, अविरतीसु य एवमादि-
सु पहसु ठाणेस, जिणपसाहिएसु, अवितहेसु, सासयभावेसु, अवहिएसुसंक कखं निराकरेत्ता सद्दहते सासणं
मदतः २२ हे आर्य ग्लानं कि न प्रतिचरसीत्यायुफ्ते त्वमेव किं न तं प्रतिचरसीत्यादि मणतः २३ गुरोः धर्म कथयति सति अन्य
| मनस्कता मनतो नानुमोदयतः २४ कथयति गुरौ न सरसीति वदतः २५ धर्मकथामाछिदतः २६ मिक्षावेला वर्तते इत्यादि वचनतः
पर्पदा मिदानस्य २७ गुरोः पर्पदोऽनुत्थितायास्तथैव व्यवस्थितायाः खदक्षत्वं जनयतो धर्म कथयत: २८ गुरोः संस्तारके निपीदतः
|२९ गुरोः संस्तारके पादपट्टनं कुर्वतः ३० उच्चासने निपीदतः ३१ समासने निपीदतः ३२ गुरौ किश्चित्पृच्छति तत्र स्थितस्यैवोत्तरं
ददतः ३३ इति प्रयसिंगदाशातना उक्ताः प्रयस्त्रिंशत्सुरेन्द्राः विशतिर्भवनपतिपु दश वैमानिकपु द्वौ ज्योतिप्केषु, चंद्रसूर्याणाम-
| संख्येयत्वेऽपि जाविग्रहणात् द्वावैव विवक्षिती, एको नदेवश्चक्रवर्ती जात्यापेक्षया इति प्रयस्त्रिंशत् इयं सह्वथा वक्ष्यमाणसूत्रगत्या न
| प्रतीयते तथापि ग्रन्यान्तरादपसेयेति.
एवमेकत्वादिसंख्योपेता असंयमादयो मावा भवन्ति, किंभूतेषु? एतेपु आदिम-प्रथम एकादिकं-एकद्विथ्यादिकं
किं कृत्वा सहया-सङ्घयाविशेषत्वं विधाय एकोत्तरिकया वृझ्या इति गम्यते पद्धितेषु संख्याधिक्यं प्राप्तेपु कियन्ती संख्यां यावद्व-
द्वितेपु इत्याह-तेत्तीसेत्ति पावप्रयखिंशनपति तापद्वक्तव्यम् , एकाधिकासु संख्यासु शंकादि निराकृत्यः शासनं श्रद्दधते स श्रमण इति
संबंधः। तया विरतया प्राणातिपातादिविरमणानि प्रणिधानानि विशिष्टैकाग्रत्वानि तेपु, अपिरसेपु अविरमणेपु, अन्येषु च उक्त
व्यतिरिक्तेषु एपमादिकेषु एवं प्रकारेषु बहुषु स्थानेषु पदार्थेषु संख्येयेषु चतुस्त्रिंशदादि यावदहुसंख्येयेषु, जिनशासितेपु-जिनप्रणीतेषु
॥८८॥

भगवतो अनिपाणे, मगार, अतु, अम्बमणक्यणकायगुत्ते (सू. २८) जो मो धारपरवगण-पिरतिपवित्थर-पबिहप्पकारो, सम्मत्तविसुद्धमूलो, घितिकदो, विणयवेतितो, निग्ग- लोम-पिपुलसमनिविपीणपयरसुजातखधो, पंचमहव्ययविसालसालो, भावणतयंतशाणसुभजोगनाणप- गमगपांगादित फे के मोक्ता, अश्विपु-सत्येषु आतमणी सत्यमेवेति वचनात् , शाश्ववभावेपु स्थाऽक्षयसमावेषु अतएवाव- रिपोर मांदा द्रव्यतया भावेषु, शङ्का-संदेहं कांधा-अन्यमवग्रहरूपां तां निराकृत्य-अपनीय सद्गुरुपयुपासनादिभिः, श्रद्धा पादानं तमेय सगं निशंक जं जिणेहिं पवेइयमिति प्रतीतिरूपं, शासन-प्रवचनं जिनस्य भगवतः स एव श्रमणः स की ? अनिदानः-देयेन्द्रायधायप्रार्थकः, अगौरयः-पाध्यादिगौरववर्जितः, अलुब्धो-अलम्पटः, अमूदो-दक्षा, मनोवचनकाय- गुतप पा सपा अपरिग्रहसंयतः श्रमणः इत्यर्थः अधुना अपरिग्रहत्यमेव वर्णपनाह योऽयं पस्यमाणविशेषणः संयरपादपः चरम संवरद्वारमिति संबंधः कीदृशः ? संवरपादपः, वीरवरस्य श्रीमन्महावीरस्य यद्वच- नामाता पा पिरतिः परिग्रहानितिः सैव प्रविस्तरो-विस्तारो यस्य स तथा, तब संवरपक्षे पहुविधप्रकारत्वं विचित्रविषयापेक्षया पपोपरामायथया च पादपपक्षे मूलफन्दादिविशेषापेक्षयेति ततः कर्मधारयः । तथा सम्यच्यमेव सम्यग्दर्शनमेव विशुद्धं निर्दोष मुलं-कन्दस्याश्योपगि यस्य स क्या, धृतिः-चिचस्वास्थ्यं सेव कन्दः-स्कन्धाऽधोमागरूपो यस्य स तथा । विनय एव वेदिका पार्यवः परिकररूपा पस्य स तथा पुनः कीदृशः १ प्राकृतस्यात् शन्दव्यत्ययः निर्गव-लोक्यगतं-भुवनत्रयव्यापकं अतएव विपुलं- पान०वि० प्रश्नःप्या पञ्चम संबरद्वारे परिग्रह विरती संकरपादप: २०१ ॥८९॥ | लववरंकुरघरो, बहुगुणकुसुमसमिद्धो, सीलसुगंधो, अणपहवफलो, पुणो य मोक्खवरवीजसारो, मंदरगिरिसिह- | रचूलिका इव इमस्स मोक्खवरमुत्तिमग्गस्स सिहरभूओ, संवरवरपादपो परिमं संवरदारं । जत्य न कप्पइ गामागर-नगर-खेड-कब्बड-मडंब-दोण-मुह-पट्टणा-समगयं च किंचि अप्पं व पहुं व विस्तीर्ण यद्यश:-ख्यातिस्तदेव निचितो-निविडः पीन:-पीवरो महान् सुजात:-सुनिष्पन्नः स्वन्धो यस्य सः तथा पुनः कीदृशः ? पंचमहायतान्पेव विशाला:-विस्तीर्णाः शाला:-स्कन्धशाखाः यस्य स तथा। पुनः कीदृशः ? भावना एवानित्यत्वादि त्वक् यस्य सः तथा, पुनः कीदृशः १ पानं च शुभयोगाव धर्मध्यानादि सहवापाराः ज्ञानं च-बोधविशेषः तान्येव पल्लववरांकुरा:-प्रवालप्रवरपरो. हांस्तान् धारयतीति यः स तथा सर्वत्र कर्मधारयः । बहवो ये गुणाः शुभफलरूपा वाऽतएव कुसुमानि त समृदो जातसमृद्धियः स | क्या, शीलं-ब्रह्म तथा ऐहिकफलानपेक्षप्रवृत्तिरेव या सदाचार समाधान वा तदेव सुगन्धः-सद्गन्धो यत्र स तथा, अनाश्रयः नवकर्मा- नुपादानं स एव फलं यस्य स तथा, अथवा अनाश्रवो वचनस्थितत्वं तदेव फलं यस्य आज्ञाफल इत्यर्थः पुनः कीदृशः १ पुनः पुनर्वरवीज-पोधिस्तदेव सारं मिंजालक्षणो यस्य स तथा, मंदरगिरिः-मेरुधराघरस्तस्य शिखरे या चूलिका ठा तथा इस साइप, अस्य-प्रत्यक्षस्य मोक्षवरे-भावमोझे सकलकर्मक्षयलक्षणे गंतव्ये मुक्तिरेव निर्लोभता यो मार्गः तस्य शिख- रभूतः-शेखरकल्पः कोऽसौ इत्याह संवर एव-आश्रवनिरोध एवं वरसादपः पंचप्रकारस्याऽपि संवरस्य उक्तरूपस्येति ज्ञेयं अथ परिमं संवरद्वार उपसंहरमाह-चरम संवरद्वार-आश्रवनिरोधमुखं इति पुनर्विशेषयति यत्र संवरद्वारे-परिग्रहविरमणलक्षणे | सति न कल्पते-न युज्यते परिगृहीतुं इति संबंधः किं तत् इत्याह-प्रामागारनगरखेटककर्बटमबद्रोणमुखपत्तनाश्रमगतं वा एतेषां ८९|| | अणुं व पूर्व प तसपावरकायवबजार्य मणसावि परिघेत्तुं ण हिरनसुवन्नखेत्तवत्यु, न दासीदासभयकपेसह- गगगयेलगं च, न जाणजुग्गसयणाइ, ण छत्तकं, न कुंडिया, न उवाणहा, न पेहुणवीयणतालियंटका, ण यावि अय-तउप-तंय-सीसक-कस-रपत-जातरूव-मणि-मुत्ताधार-पुडक संख-दंत-मणि-सिंगसेल-काय-वरचेल- पदानां व्याख्यानं पूर्व व्याख्यातमस्ति किश्चित् इति अनिर्दिष्टस्वरूपं सामान्य सर्वमेव इत्यर्थः अल्पं चा मूल्यतः बहुं वा मूल्यतः, एवं अणु पा-स्तोकप्रमाण, स्थुतं चा-महत्यमाणं, प्रसकायरूपं शंखादि सचैतनं अचैतनं चा, एवं स्थावरकायरूपं रत्नादिद्रव्यजातं पा पेतसापि आस्ता कायेन परिगृहीतुं न कल्पते । एतदेवाह-न-निपेघे हिरण्यं अपटितसुवर्ण रूप्यं सुवर्ण स्वर्ण क्षेत्र सेतुकेतूमया- मिकलयं, वास्तु-गृहं खानोनितोभयात्मकं गृहीत, न निषेधे दास:-कर्मकरः, दासी-फर्मकरी, भृतको-मूल्यक्रीतो दासः, प्रेष्यो -प्रामादौमोचनयोग्या, हया-अधाः, गजा:-हस्तिना, गव्या:-गोधनम् , एलक-अजादयो न कल्पते । न-निषेधे यान-शकटं रथादि, युग्यं आसनानि गोलदेशप्रसिद्धानि यानयुग्यासनानि, न-निषेधे छनक-आतपवारणं, न कुण्डिका-कमंडलू, न उपानहः पादरक्षणानि, न पेहुणानि-मयूरपिच्छव्यंजनानि,न वालपन्तकं व्यंजनादीनि, अन्यनिष्पन्नानि, न चापि निषेधे अन्यदपि अयो-लोई, तान अपु-वंग सीस काश्यं प्रतीतं, रजतं-रुप्प, जावरूपं सुवर्ण, मणयश्चन्द्रकान्तायाः, मुक्ताधारपुटकं-शुक्तिसंपुटं शङ्खतिरेखा, देवाः प्रतीवास्तदेवमणिः प्रधानगजर्दताः, अथवा दंतजो मणिः, नरमादादिमुक्तारूपं शृङ्ग-विपाणं, शैलाः पाषाणा:, काचवरम, -प्रधानकाच:, पाठान्तरे 'लेसेति इति पाठः तत्र श्लेपद्व्यं कचवरानिप्पन्न प्रधानवस्तु चेलं-वस्त्रं, चर्म-अजिन, एतेषां द्वन्द्वः एतानि १तरयं इति भाषा। -

पति
"
पवम
संवरद्वारे
परिग्रह
विरती
भिक्षा
असन्निधिः
"
भानविचम्मपत्ताई महरिहाई परस्स अज्झोववायलोभजणणाई परियड्लेउं गुणवओ न यावि पुप्फफलकंदमूलादियाई
HTRA सणसत्तरसाई सव्वधन्नाई तिहिवि जोगेहिं परिघेत्तुं ओसहभेसजभोयणट्टयाए संजएणं, किं कारणं ?, अप-
रिमितणाणदसणधरेहिं, सीलगुणविणयतयसंजमनायकेहिं, तित्थयरेहि, सव्वजगज्जीववच्छलेहि, तिलोय-
महिपहि,
॥९॥ अपपा एतेपा सत्कानि यानि पात्राणि-माजनानि तानि, तथा महाणि-महााणि अन्यान्यपि इत्यर्थः, परस्य-अन्यस्य, अध्युप-
| पात:-प्रणैकाग्रचित्तता लोभ-मू जनफानि यानि तानि परिकर्षपितुं-परिचर्दयितुं परिपालयितुं कस गुणवता (तो) मूल गुणा-
विपन्नस्य मिवोरिति शेपःन चापि गृहीतुं कल्पते, पुष्पफलकंदमूलादिकानि-वनस्पत्यादिशाकजातानि सनः सप्तदयो बीयादीनां
वानि सनसप्तदशकानि सर्वधान्पानि गृहीतुन कल्पते, जव १ गोधूम २ ग्रीहि ३ कंगू ४ मग ५ मास ६ निष्पाव७ आढकी
८ कुलत्य राजमाप १० कलाद ११ त्रिपुटक १२ चनक १३ राल १४ ला १५ अलसी १६ शण १७ इत्यादीनि
| धान्यानि प्रिभिरपि योगैः मनाप्रमृतिमिन कल्पते गृहीतं, किमर्थं वदाह औषधमैपज्यभोजनार्थाय, तन औषधं एकजात्यादि-
एकजातीयं एंटपादि मैपज्यं चूर्णादि, वथा औषधं एकांग, मैपज्यं द्रव्यसंयोगरूपं संयतेन-साधुना इति तृतीयाथै पष्ठी संपतस्य-
साधो को हेतु:-किं कारणं, कैरुच्यते न कल्पनीय, तदाइ-अपरिमितज्ञानदर्शनधरैः सर्वविद्धिः, शीलं-समाधान चित्तस्य गुणा:-
मूलगुणादयः, पिनयोऽभ्युत्थानादिक, तपःसंयमौ प्रतीतो तात्रयति-पृद्धि मापयति ये ते तथा तैः, तीर्थकरैः-शासनप्रवर्तक,
सर्वजगमीवरवानां)-प्रैलोस्पजीवानां वात्सल्पभूता (:)-हितचिंतकत्वात् बन्धुकल्पैरित्यर्थः, त्रैलोक्यमहितैः-त्रिभुवनपूज्यैः
--
॥१०॥

. जिगपरिदेहिं गम जोगी जंगमाणं विद्वान कम्पह, जोणिसमुच्छेदोत्ति तेण वजंति समणसीहा, जंपिय ओदण कम्माम-ज-तप्पण-मंगु-मुचिप-पसल-सूप-सफ्कुलि-वेदिम-वरसरक-चुप्त-कोसग-पिंड-सिहरिणि-व- मोपग-गीर-दहि-सरिप नवनीन-तेल-गुल-संद-मडिप-मपु-मन्त्र-मंस-वनक-चंजण विधिमादिकंपणीयं जिना-उपम्पीनरागास्नेपा परा:-कैलिनः तेषां इन्द्राः वीरनामकर्मोदयवर्तित्वात् ये तथा तैः, एपा-पुष्पफलवान्यरूपा, पोनि:-उत्पनि जनमाना-साना इत्ययों दृष्टा-उपलया केवलमानेन ततय न कल्पते, फरमादेवोरित्याह- पोनिगमुन्यो-योनिविषंमः कनु इति गम्यते, परिग्रहे औपच्याशुपयोगे च तेषां अवश्यं घंसो भावीति क्षेयं, तेनैव कारणेन पनि-परिहानि पुष्पफलादिकं मर्च पूर्वोक्तं, क इत्पाद श्रमणसिंध:-सुनिपुङ्गवाः । यदपि च ओदनादि तदपि च न कल्पते गंनिपीमा सपिहितानामिति गम्पं, तत्र ओदनं-कूर, कुल्मापा:-मापार, ईपरिखमा मुद्गादय इत्यन्ये गंजो-मोज्यविशेषः, वर्पण: गरपु मंगुषि-पदरादिपूर्णः, अमिपचि-नष्टं धान्यम्, पललंति-विलपिष्टम् सपा-मुद्गादिदालिजन्यो पिकारः, शफुली-विलपर्प- टिकाधिकार पेटिमा:-गुणदेशपसिद्धाः, परसारकाणि-पूर्णकोशकानि च रूदिगम्पानि तत्र फलपत्रादिविकारजन्यं भक्ष्यं वरसारकाणि, पिटममुगविकारजन्यानि पूर्णकोशान्यपि इति पदाः, पिंडा-गुडादिपिण्डाः, शिसरणी-गुडमिश्रदघि वदृत्ति-धनतीमनं दहीवडादि, मोदकं प्रतीतम् , धीरे-दुग्धम् , दधि, सर्पि-भृतम् , नवनी-प्रक्षणं, तेलं, गुडं, खंडं च प्रतीतम् मत्स्पंडिका-खंडविशेषः, मधु- मधमाकानि प्रतीवानि, तम मधु त्रिधा कुचिमाधिकनामरीकं, मयं द्विधा काष्टपिटोद्भवं, मांसं त्रिधा जलस्थलखचरोद्भवं, चर्म वा, १सोप इति भाषा . . . - T-

पञ्चम
संवरद्वारे
परिग्रह
विरती
भिक्षा
असन्निधिः
उवस्सए परघरे व रत्ने न कप्पती तंपि सन्निहिं काउं सुविहियाण, जंपिय उठिवियरचियगपज्जवजातं पकि-
पण-पाउकरण-पामिर, मीसकजायं, कीयकडपाहुडं च दाणटपुन्नपगडं समणवणीमगट्टयाए वा कयं, पच्छाकम्म,
खायानि-अशोकवयः व्यञ्जनानि-तफ्रादीनि शालनकादीनि चा एवेषां द्वन्द्वः एतेषां, विहिमाइयं-विधिरचना-पाकविशेपरचनाप्र-
गीत-प्रापित निग्यं वा उपाश्रये बसती परगृहे वा अरण्ये-अटव्यां न कल्पते-न संगच्छते, तदपि संनिधीकतुं यदुक्तं .
पिडमुन्मेहम लोणं तिल्लं सपि च फाणिय ण ते संनिहिमिच्छन्ति नायपुत्तवओरया ॥१॥इति वह भावं कर्तु इति
श्रेषा,मुविहिताना-परिग्रहवर्जने शोमनानुष्ठानानां सुसाधूना, यदपि च उद्दिष्टादिरूपं ओदनादि न कल्पते तदपि परिगृहीत सम्बन्ध
इत्याद-उदिष्टं नाम यापदधिकान् पाखण्डिनः श्रमणान-साधून घोद्दिश्य दुर्भिक्षापगमादौ यशिक्षावितरणं तदुदेशिकमुदिर, स्थापित
प्रयोजने याचित गृहस्थेन तदर्थ स्थापित यत्तत् , एवं रचितकं मोदकचूर्णादि सावाद्यर्थ प्रताप्य पुनर्मोदकतया रचितं, पर्यवी-
यस्यान्तर जातो यावत पर्यवजात अयमुद्देशिकमेदः कूरादिकं उद्धरित-दध्यादिना विमिश्रं करंवादिक पर्यायान्तरमापादितमित्यर्थः
तामिधानः । प्रकीर्ण-विक्षिप्त छर्दितपरिघाटीत्यर्थः अनेन छदिताभिधानदोष उक्तः । पाउकरणत्ति-प्रादुष्क्रियते अंधकारापवरकादेः
साध्वयं पहिस्करणेन दीपमण्यादिधरणेन वा प्रकाश्यते यत्तत्प्रादुकरणं, पामित्यकं अन्योन्यं पालयित्वा यद्दीयते तन , मिश्रजातं--
साध्वधं गृहस्सा याऽऽदित उपस्कतं, येण-मूल्येन फ्रीतं साधुदानायेति क्रीतकतं, प्रभूतमामृतकं साधुदानार्थ सवडीपूर्व घा
पथात् ततः पदयस्य कर्मधारयः, या शब्दः पूर्ववाक्यापेक्षया विकल्पार्थः, तथा दानमर्थो यस्य तदानमर्थ, पुष्पमेव अर्थो यस्य तव
२.मा ति माया
॥९॥

पुरेकम्म, निसिकम्म, मपिवयं, अतिरित्तं, मोहरं चेव सयग्गहमाहडं, महिउवलित, अच्छेनं चेव अणीसहूं जतं तिही जनेसु जसवेसु य अंतो पा पहिं व होज समणट्ठयाए ठवियं हिंसासावजसंपउत्तं न कप्पती संपिय परिघेर्नु। पुष्पार्य श्रमणा:-पंचविधा नित्यशाक्यतापसगैरिकाजीविका स एव अर्थः प्रयोजनं यस्य तत्तथा तदर्थ कृतं-निष्पादित, वनीपका:- पायकाः तदर्थ कनं एने चत्वारोऽपि उद्देशिकमेदाः, पया-दानानन्तरं भाजनघायनादिकर्म यप्राशनादौ तत्पश्चात्कर्म, पुरो-दाना- पूर्व इस्तधारनादिकर्म पूर्वकर्म, नैत्यिक-नित्यमवस्थितमेतत् प्रमाणं दातव्यमिति, प्रक्षित-उदकादिना संसृष्टं अयमेपणादोपः। अतिरिति-"पत्तीसं फिरकपला आहारो कुच्छिपूरओ भणिओ पुरिसस्स महिलयाए अठ्ठावीसं भवे फाला" ॥१॥ एवत्प्रमाणाविक्रान्तमयं च मंडलीदोपः, मोहरं नि-मौखपेण पूर्वसंस्तव-पश्चात्संस्तवादिना बहुमापितत्वेन यल्लम्यते उद मोहर यमुत्पादनादोपः, स्वयं-आत्मनादनं गृह्यते यत् तत्स्वयं ग्राचं दातॄणाममावेऽपि संलापादिना स्वयमेव धर्माशी:पूर्वक गृपते अयं अपरिणवाख्यदोपतिर्भवति, आइडचि-स्वमामादेः साधर्धमानी-आहतं, मट्टिोवलि ति-मृत्तिकाजतगोमयादिना उपलिप्तं, आच्छेद्य-पदाच्छिद्य-उद्दाल्य मृत्यादिन्यः स्वामी ददाति,प-निधितं, अनिसृष्टं-यहुसाधारणं सत् यत् एक एव ददाति एतादृशं पत्,तिथिपु-मदनत्रयोदश्यादिपु, पशेष-पापाटफेश, उत्सवेषु-न्द्रमहोत्सवादिपु, यात्रासु-जनसमुदायेषु, अन्तर्वहिवां उपाश्रयात् श्रमगार्थ स्थापितं-दानादौ प्रस्थापित, पुनः कीद ? हिंसालक्षणं यत् सावधं तत्सम्प्रयुक्तं न कल्पते तत्-किमपि पूर्वोक्तं सर्व परिगृहीत-लातुं, पिपनियुक्ति गाथा ६४२ पृष्ठ १७३.

संवरद्वारे
परिग्रह
विरती
मिक्षा
असन्निधिः
अह केरिसयं पुणाइ कप्पति?, जे तं एकारसपिंडवायसुद्धं, किणण-हणण-पयण-कयकारियाणुमोयण-
तवकोडीहिं सुपरिसुद्धं, दसहि य दोसेहिं विप्पमुझ, उग्गमउप्पायणेसणाए सुद्धं, ववगयचुयचवियचत्तदेह,
च फासुयं वगयसंजोगमणिंगालं, विगयघूमं, छठाणनिमित्तं, छकायपरिरक्षणट्ठा हणि हणि फासुकेण
अय-पुनः कीदृशं किंविधं सत् पुनः कल्पते-संगच्छते साधूनामिति यत् तत् पिण्डं तदाह-एकादशोत्तरपिंडपातशुद्ध-आचारस्य
द्वितीपथुतस्कन्धस्य प्रथमपिण्डेपणाध्ययने एकादश उद्देशादिभिः पिण्डपातेस्तैः शुद्ध-निर्दोषम् , पुनः कीदृशं ? किणण-मूल्यादिना,
इननं मादिच्छेदनेन, पचनं-पाकादिना, तथा कृतकारितानुमोदनानि खयं करणकारणानुमतयः तानि तथा त एव नव कोयो
विभागः कृत्वा सम्यग् परिशुद्ध-निदोष, दशभिश्व-शङ्कितादिदोपैः विप्रमुक्त-रहितं, आधाकर्मादय उद्गमदोपाः पोडश दायकादुत्प-
ते, घाच्यादप उत्पादना दोषा पोडश ग्राहकादुत्पयन्ते, एपणा गवेषणाभिधाना दोपा दश उद्गमोत्पादनैपणा तया शुद्धं, पुनः कीदृशं ?
पपगतो-गतः चेतनपर्यापादचेनत्वं प्राप्त, च्युतं-जीवनादिक्रियया विच्युतं-नेम्य एव आयुःक्षयेण, अंगित-त्यक्तदेहं परित्यक्तसं-
सर्गसमुत्यशक्तिजनिताशनादिपरिणामा एवं यचद् तथा, चा-समुचये, प्रासुकं-निर्जीवं पूर्वोक्तं कल्पत इति ग्रहीतुं, व्यपगतसंयोगम-
नंगारं विगतमं चेति पूर्वव्याख्यातमेव पदस्थानकनिमिचं यस्य मैक्ष्यस्य तत्तथा, तानि चामूनि
'वेयण १ चेयायचे २ इरियहाएय ३ संजमट्ठाए ४ तह पाणिवित्तीयाए ५ छठं पुण धम्मचिंताए ६ १,
वया पद्कायपरिरक्षणार्थ इति व्यक्तं, अहनि अहनि-प्रतिदिनं सदापीत्यर्थः, प्रकर्षण गताः असवः-प्राणाः यस्मिन्निति प्रासुकं
पिडनियुक्ति गाया ६६२
,
॥९२॥

भिवरोण यहियचं, जैपिग समणरस सुविहियस्स उ रोगायके याहुप्पकारंमि समुप्पन्न वाताहिकपि तसिभअतिरित्तकृषिय तह सग्निवातजाते, व उदयपत्ते, उज्जलपलविउलकावडपगाढदुक्खे, असुभकडयफ- कसे, पंडफलवियागे, महन्मए, जीवियंतकरणे, सव्यसरीरपरितावणकरे, न कप्पती तारिसेवि तह अपणो प्युत्पश्या वारशेन भक्ष्येण वनितव्यम् , यदपि च औपधादि वदपि संनिधीकतुं न कल्पते, यस्य साधो:-श्रमणस्य सुविहितस्य- अपविस्तस्य, "तु" क्पिालङ्कारे कदेत्याइ-रोगो-स्वरादिः स चासौ आवको-भयं-कृच्छ्रजीवितकारी वत्र, बहुप्रकारे-विविधे, समुन्याने-जाते, तथा वातादिकं तदादिकं पित्तसिंभयोर्चायुश्लेष्मणोः अतिरिखतेन-आधिक्येन कुपितकोपस्तं तथा महान् यः सनि- पात:-ग्रिदोषजः तआते-सत्यपि एतेषां द्वन्द्वः, तथा उदयप्राप्ते-उदिते प्रकटिते सति, उज्ज्वल-सुखलेशवर्जितं बलवत् कप्टेनापसर- जीयं विपुल-पहुकालवेयं, वितुलं वा-चीन-मना प्रभृतीन तुलां आरोपयति कष्टावस्थीकरोति इति त्रिकुलमित्यपि पाठः। अतएव कर्कशद्रव्यमिवाऽनिष्टं प्रगाढं-प्रकर्षवत् यत्पुनरेवमसुखं यत्र तत्तथा तत्र, किंभूतेत्याह, अत एव अशुभ:-असुखो वा कदुका-कटुकद्रव्य. यत् अनिष्टः परुषो यत्र दारुणवण्डः फलं-विपाको दुःखानुवंधिलक्षणो यस्य तत्तथा-तत्र, महद्भयं-इह लोकादिर्यस्य तत्तथा तत्र, किं पहरया, जीवितानकर, सर्वशरीरपरितापनकारक, न कल्पते-न युज्यते, तादृशेऽपि-रोगातवादी सोढुं न शक्यते तेन कारणेन पुटालम्पनं विना सानाधारापनार्थ सावनस्य कल्पतेऽपि यत:- फाई अछित्ति अदुवा अहीहं तवोपहाणेसु य उज्जमिस्सं । गणं वणीइए सारविस्सं सालंयसेवी समुवेई मो- पायम् १ इति वचनात्

पञ्चम
संघरद्वारे
परिग्रह
विरतो
भिक्षा
असनिधिः
-
परस्स या ओसहभेसज्ज भत्तपाणं च तंपि संनिहिकयं, जंपिय समणस्स सुविहियस्स तु पडिग्गहधारिस्स
भवति भायणभंडोवहिउवकरणं पडिग्गहो पादपंधणं पादकेसरिया पादटवणं च पडलाई तिन्नेव रयत्ताणं च
गोच्छओ तिन्नेव य पञ्चवा रयोहरण-चोलपट्टक-मुहणंतकमादीयं एयंपिय संजमस्स उपवूहणट्टयाए वायायव-
आत्मने परस्मैपदनिमित औषधं, भैपज्यं, भक्तपानं च तदपि संनिधीकृतं-संचयीकृतं परिग्रहविरतत्वात् यद्यपि श्रमणस्य -साधोः
| सुविहितस्य "तु" शब्दो भापामाप्रसूचकार्थः, पतद्गृहधारिणः सपात्रस्य भवति । भाजन-पात्रं, भाण्ड-मृण्मयं तदेव उपधिका-
| औधिक उपकरणादि-औपग्रहिकं अथवा भाजनं भांडं उपधिय इत्येवरूप उपकरणं एतदेवाह, पतद्गृहशब्देन पात्राणि उपलक्ष्यते १
| पात्रबन्धन-डोलिकारूपं २ पात्रकेसरिका या पाचप्रमार्जिनी पोत्तिका ३ पात्रस्थापनं-यत्र कंपलखंडे पानं निधीयते, पडलकानि
च-मिक्षानतरे पत्रिपच्छादनकानि वस्रखण्डानि, तिनेवत्ति-तानि च यदि सर्वस्तोकानि तदा त्रीणि भवन्त्येव अन्यथा पञ्च सप्तापि
भवन्ति । रजसाणं-पाप्रवेष्टनवखं, गोच्छकः-पावसाच्छादनरूपः प्रय एव प्रच्छादाः द्वौ सौत्रिको तृतीय और्णिकः, रजोहरण-
| प्रतीतं धर्मध्वज ऋपिचि तं चोलपः परिधानवस्र, मुखानन्तकं-मुखवखिका एतेषां द्वन्द्वः तत एतानि आदिर्यस्य तत्तथा, एत.
सर्व अपि संयमस्य उपहणत्वात् उपष्टंभार्थ न परिग्रहसंज्ञया यतः-
जंपि यत्धं च पायवा, कंपलं पायपुच्छणं, तंपि संजमलबट्टा, धारंति परिहरंति य १
न सो परिग्गही युत्तो नायपुत्तेण तादणा, मुच्छा परिग्गहो युत्तो इइ वृत्तं महेसिणार इत्यादि
-
॥९॥

दस-ममग-मीय-परिरक्षणद्वयाए उपगरणं रागदोसरहियं परिहरियव्यं संजएण णिचं पडिलेहणपफोडणप. मणाए अहो य राओ य अप्पमत्तण होइ सततं निक्खिवियव्वं च गिण्यित्वं च भायणभंडोहि उवफरणं, एवं से संजते, विमुत्ते, निस्संगे, निप्परिग्गहराई, निम्ममे, निन्नेहवंधणे, सव्यपावविरते, वासीचंदणसमा. गप्पे, समतिणमणिमुत्तालेकंचणे समे, य माणावमाणणार समियरते, समितरागदोसे, समिए, समितीसु सघा वातावपदंशमशकशीतपरिरक्षणार्थ तथा उपकरण-रजोहरणादिकं रागद्वेपरहितं यथा भववि तथा परिहर्तव्य-मोक्तव्यमि- त्यः । तथा एतेपा-पायादीनां उपकरणानां रक्षण हेतुपरिमाणादिकं वृहत्कल्पवृत्ति-प्रवचनसारोद्धार-पिण्डनियुक्तिवृत्यादिभ्योऽवसेयं, संपतेन-साधुना नित्यं सदा तथा प्रतिलेखना-प्रत्युपेक्षा निरीक्षण, प्रस्फोटनं धूननं उभाभ्यां सह प्रमार्जना-रजोहरणादिक्रिया सा स्था तस्या, अहोराधिदिन अप्रमत्तेन-अप्रमादिना भवितव्यं सततं-निरन्तरं यतः "अन्मत्य विसोहिए उवगरणं याहिरं परिहरंतो। अपरिग्गहोत्ति भणिओ जिणेहिं तिलुमसीहिं" १, निक्षिप्तव्यं भूमादौ मोक्तव्यम्, गृहीतव्यं चेवि किं तदित्याह भाजन-मांड-उपधि- उपकरणं- एपमनेन प्रकारेण संपता-संयमी, विमुक्ता-त्यक्तधनादिः निःसंगोऽभिष्वङ्गवर्जितः, निर्गतपरिग्रहरुचिर्यस्य स तथा, निर्ममो "ममेति" शन्दयर्जितः ममत्वरहितः, निर्गतस्नेहबन्धनः, सर्वपापविरतः, वास्यां-छेदनोपकरणायां अपकारिणि चंदने उपकारके च समानस्तुल्यः कल्प:-समाचारो-मानसिकविकल्पो यस्य स वथा द्वेपरागविरहित इत्यर्थः, समा-उपेक्षणीयत्वेन तुल्या कृणमणिमुक्ता यस्य स तथा, लेप्टुः-पत् प्रस्तरः काञ्चनं-सुवर्ण तत्रापि समभावः, समश्व हर्पदैन्याभावात् , मानेन पूजया सहापमानेन न्यकारो , - + +- पञ्चम संवरद्वारे परिग्रह विरत विशेषणानि सम्मरिटी समेय जे सब्बपाणभूतेसु से हु समणे, सुयधारते, उज्जुते, स साहू; सरण सव्वभूयाणं, सव्व- जगवच्छले, सबभासके, य संसारतहिते, य संसारसमुच्छिन्ने; सततं मरणाणुपारते, पारगे य सन्वेसिं संस- याणं, पवयणमायाहिं अहिं अट्ठकम्मगंटीविमोयके, अहमयमहणे, ससमयकुसले य भवति । सुदुक्खनि- दिवसेसे, अमितरयाहिरंमि सया तवोवहाणंमि य सुहजुते, खते, दंते, य हियनिरते, ईरियासमिते, भासा. मानापमानता यस्य सः (समः मानापमानौ यस्य स तथा) शमित-उपशमित रजा-पापं रतिविपयेषु स्यौत्सुक्यं येन सः शमितराग- द्वेषः, ममितः सम्यक् भावप्राप्तिः समितिपु ईर्यादिपु. सम्यग्दृष्टिः-सम्यग्दर्शनी, समः सम्यग्दर्शी यः सर्वप्राणभूतेषु प्राणा द्वीन्द्रिया- दिनमाः भूतानि-स्थावराः म एव श्रमणः इति वाक्यनिष्ठा । श्रुतधारकः, ऋजुकोऽवक्रः, उद्यतो वाऽनलसः, संयमी सुसाधुः-सुष्टु- निर्वाणमाका, शरणं-वाणं सर्वभूतानां पृथिवीप्रमुखाणां, सर्वजगदात्सल्यकर्ता हित इत्यर्थः, सत्यभापकच, संसारान्ते स्थितश्व-भव- मान्ते स्थितः, संसारममुच्छिन्नः-संसारोच्छेदकर्चा, सततं-निरन्तरं मरणानां पारगः-बहुत्वं अनन्तमरणापेक्षया सर्वदैव तस्य चालादि- मरणानि मरिष्यन्तीत्यर्थः, पारगव-सर्वेषां संगयानां छेदक इत्यर्थः, प्रवचनमबरमातृभिः अष्टाभिः-समितिपञ्चकगुप्तित्रयरूपाभिः कर- णभूनामिः, पुनः कीदृशः ? अष्टकर्मरूपो यो ग्रन्थितस्य विमोचको यः स तथा, अष्टमदमथनः-अष्टमदस्माननाशका, पुनः स्त्रसमयः- सिद्धान्तः तस्मिन कुशलः-चतुरो निपुणय भवति, सुखदुःखनिर्विशेषो-इदिरहितच, अभ्यन्तरस्यैव-शरीरस्य कार्मणलक्षणस्य शोप- कत्वात् अभ्यन्तरः प्रायविचादिः पविषस्य बाह्यस्यापि औदारिकलक्षणस्य तापकत्वात् बाह्यं अशनादि पविध अनयोश्च द्वन्दः तत अभ्यन्तरपाझे सदा-नित्यं तप एव उपधान-गुणोपष्टम्भकारितया उपधानं तत्र च, सुप्ठु युक्तः अतिशयेन उद्यता, धाता-धमावान् , . , ॥९४|| संवरद्वारे परिग्रह विरत विशेषणानि १ संखेविव निरंजणे, विगयरागदोसमोहे, कुम्मो इच ईदिएसु गुत्ते, जचकंचणगं जायस्वे, पोक्खरपत्तं व निरु- बलेवे, चंदो इव सोमभावयाए, सुरो व्व दित्ततेए, अचले जह मंदरे गिरिवरे, अक्खोभे सागरो व्य थिमिए, पुढधी च मन्यफाससहे, तवसा चिय भासरासिछन्निव्व जाततेए, जलियहुयासणो विच तेयसा जलंते, गोसीस. | गंदणंपिव सीयले, सुगंधे य, हरयो विव समियभावे, उग्धोसियसुनिम्मलं व आर्यसमंडलतलं व पागहभावण |पमानकर्मानुलेपः एतच विशेपण माविनि भूतोपचारबद्भाव्यते, सुविमलवरकांसस्य भाजनमिव विमुक्ततोयः श्रमणपक्षे तोयं संबंधहेतु- स्नेह, शंखवनिरञ्जनः श्रमणपक्षे रखनं जीवखरूपोपरंजनकारी(रि) रागादिकं यस्तु यस्य, अतएव विगतरागद्वेषमोहः, पुनः कीदृशः? कूर्म इस इन्द्रियेषु गुतः यथा कच्छपः धतुभिः पादै ग्रीवापंचमैश्च कदाचिद्गुसो-भवति, एवं साधुरपि इन्द्रिपाण्याधिय गुप्मो भवति । जारपकायनमिय जातरूपो रागादिव्यनाशात् लन्धखरूप इत्यर्थः, पबदलमित्र निरुपलेपः-भोगगृद्धि-लेपरहितः,चन्द्र इव सौम्य- नपा पाटान्तरे सौम्पमावतया अनुपतापकत्वेन सपरेपामपि शीतत्वात् , सूर्य इव दीप्ततेजास्तपस्तेजोयुक्तत्वात् , अचलो-निश्चलः परी. | पहादिभिः यथा मंदिरगिरिसरो मेरुरित्यर्थः, अशोम:-क्षोभवर्जितः औत्सुक्याभावात् सागर इव स्तिमितः लोलताकल्लोलरहित- ला, प्रथिवीवत्सर्वस्पर्शसहा- शुभाशुमस्पर्गेपु समचित्त इत्यर्थः, तपसाऽपि च हेतुभूतेन मसराशिवव यथा भस्मच्छन्नो यदिरंतज़- सविरहिः एन्नो भावि तया(थैय) श्रमणशरीरं तु पहिस्तु म्लान अन्तस्तु शुभलेश्यया दीप्यमानं भवति, ज्वलितहुताशन इव तेजसा चलन् माति, प्रमणपक्षे तेजोमानं भारतमोनाशकत्वात् , गोशीर्पचन्दनमिव शीतलो मनःसन्तापोपशमकत्वात् , मुगन्धिश्व शीलसो- गापा, उदकन्ट स-द्रह सम एव समिका सभापो यस्य स तथा, यथा वाताभावे हा समो भवति अभितस्त उन्नत जलोपरि- ॥९५॥ - मुदमार्य, मोंडीरे कुंजरोग्य, पसभेव्य जायथामे, सीहे या जहा भिगाहिवे होति दुप्पधरिसे, सारयसलिलं व सुदहिग, मारे घेव अप्पमत्ते, परिगविसाणं व एगजाते, ग्वाणुं चेव उडकाए, सुन्नागारेव्य अप्पडिकम्मे, सुमागारायणरसंतो निवापसरणपदीपज्ज्ञाणमिव निष्पकंपे, जहा खुरो चेव एगधारे, जहा अही चेव एगयिटी, जागामं भय निरालंचे, माग पः, उद्पृष्टं मुनिर्मलं आदर्शमंडलमिव प्रगटभावेन निर्मायतया-अनिगृहितभावेन सुस्वभावः-शोभनस्वरूपः शुद्धभावयति, मोटीर:- अर इस पराभवसैन्यापेक्ष्या परीपहसहने आरंभटगतः, पृषभवन जावस्थामा अंगीकृते महान् जावसामर्थ्यः, सिंह- पन् यथा मृगाणा दुधपः तया माधुः परीषहमृगाणां दुर्द्धयः मृगाधिप इति विशेषणं स्वरूपप्रतिपादनार्थ मृगाणां दुष्पयत्वं वा शृगाला परीपदास्तेषां दुप्पयार्य साधुनामेवेति गम्यं, शारदसलिलवत् शुद्धहृदयः, यथा शारदं जलं निर्मलं तथा साधुरपि शुद्ध- दपः, पथा मारण्डाभिधानः पक्षी अममत्तयकितो भवति, खड्गी-आदथ्यपशुविशेषः तस मस्तके एकमो भवति तद्वद्रागादिसहा- पकल्पादेवीभूवः,साणुरिस उर्घकायः कायोत्सर्गवेलायां,शून्यागारं यथा केनापि यथान संमायते न समरी इति भावः तद्वत् शरीरे अ. प्रतिकर्मा,पुनः कीदृशः शून्यापणस्य चांतमध्ये वर्तमानं किमिव किविध इत्याह-निर्वातशरणं प्रदीपध्यानमिव-वात्तवर्जितं गृहदीपज्वल. नमिर निष्पकंप:-दिव्यागुपसर्गेऽपि शुभध्याननिश्चला, यथाक्षुरेः एकधारो भवति एवं मुनिरपि उत्सर्गलक्षयो एकधारो चरति,यद्यप्यप- पादमार्गः सेव्यने नवाप्युत्मर्गमापर्धमेति कत्या, अघया मूलगुणसाधनमुत्सर्गः उत्तरगुणावलंबनमपवादः इत्यपि, यथा अहि: एक- टिः पलधः एवं साधुर्मोसाधने नकदृष्टिः, यथा आकाशं निरालंबनं न किनिदालंयनं एवं साधुर्यामनगरदेशकुलाचालंबनरहित

संवरद्वारे
परिग्रह
विरत
विशेपणानि
चिदगे पिय सन्चो विप्पमुयो, कयपरनिलए जहा चेव उरए, अपडियद्धे अनिलोब्य, जीयोव्य अप्पडिय-
गती, गामे गामे एकराय नगरे नगरे य. पंचरायं दूइजते य जितिदिए, जितपरीसहे, निमओ विऊ सचि-
ताचित्तमीसकेहि दहिं चिरापं गते, संचयातो विरए, मुत्ते, लहुके, निरवकंखे, जीवियमरणासविप्पमुक्के
निस्संधं निव्यणं चरितं धीरे कारण फासयंते, अज्झप्पज्झाणजुत्ते, नियुए, एगे चरेज धम्म।
इत्या, पथा विहगः-पक्षी सर्वतो विप्रमुक्तः एवं साधुरपि, परिग्रहनिमुक्तः तथा परकृतनिलयः, तथा उरगः-सर्पः परकते पिले
उमनि नया साधुरपि परकता यसतिराश्रयते, तथा वायुरिच यथा अनिलो वायुः प्रतिवरहितो भवति तथा साधुरपि प्रतिधरहितः,
यथा जीपः अप्रतिहतगतिः-श्रवारितगमनागमनस्तथा साधुरपि अप्रतिवंधविधारः, कया रीत्या तदाह-ग्रामे ग्रामे एकरानं यावत्
नगरे नगरे.च पंचरावं दर्जतेचि-विचरन् इत्यर्थः एन मिक्षाप्रतिमापनमापेक्षया यत्रं शेयं कृत एवंविधोऽसौ ? इत्याह
जिनेन्द्रियः-वशीकृतइन्द्रियग्रामः, जितपरीपदः, निर्भयो-गयरहितः,विद्वान्-गोतार्थः पाठान्तरे विशुद्धो-निरविचारः, पुनःकीह-
सचिनाचितमिश्रद्रव्येषु विगतो गनः संचयात् विरता, मुक्त इव मुक्तः निर्लोभ इत्यर्थः, लघुः गोस्वायत्यामात् , निर्गत-
कांश:-माधापतिः, जीविनमरणयोः आशंसा यांञ्छा तया विप्रमुक्तः, निःसंधिः चारित्रपरिणामव्यवच्छेदाभायात् निःसविधानम्,
नियंग-नितिचार चारित्रं यस्य स तथा, धीरो-युद्धिमान् धियं ईश्यति इति धीर:-अक्षोभ्यो या, कायेन-कायक्रियया न मनोर
घमाण स्पृशन्, सनत-निरन्तरं अध्ययनेन आत्मध्यानयुक्तः यः स तया, निभृतः-उपांत: निश्चलो पा, एको-रागादिसदाया-
॥९६॥

. इम प अपरिग्गाहबेरमणपरिरक्षणट्टयाए पायणं भगवया सुकहिय, अत्तहियं, पेवाभाविक, आगमेसि- भाई, सुद, नेपाउयं, अकुडिलं, अणुत्तरं, सचदुकाबपायाण विओसमणं, तस्स इमा पंच मावणाओ चरिमस्त वयस्स होति परिग्गहवेरमणरक्खणट्टयाए-पदम सोईदिएण सोचा सहाई मणुन महगाई, किं ने ?,वरमुरय-मुइंग-पणव-दडुर-कच्छभि-पीणा-विपंची-वल्लपि-वद्धीसक-सुघोस- भावान्, परेद-अनुपालयेत् , धर्म-पारिवलक्षणमिति, इमं पूर्वोक्तं सर्व परिग्रहविरमणव्रतपरिरक्षणार्थ, प्रवचनमार्ग-प्रावचनिक, भगवता-श्रीमहावीरेण मुष्ठ-शोभनतया कथितं उपदेशितम् , आत्मने हित-पध्यमिव, प्रेत्य-परलोके परमभावोपेतं, आगामिकाले भद्रमिन कल्याणकारी, युद्ध-निर्दोई, न्यायोपपन्नम् , अकुटिलं-जु, अनुत्तरं-प्रधान, सर्वदुःखपापानाम् उपशमनम् । वस्स-परिग्रहपिरमणमतस्य इमा-अग्रे वक्ष्यमाणा: पंचसंख्याका भावनाः-वासनारूपाः चरिमं-अन्तिमं यद्वतं तस्य भवन्ति परि- ग्रहविरमगरक्षणार्थम् पश्चाना मध्ये प्रथम-भावनावस्तु शब्दनिःस्पृहत्वं नाम, तथैवं श्रोत्रेन्द्रियेण-कर्णेन कृत्वा श्रुत्वा शब्दान्-भाषा- पर्याप्तिनिर्गतवर्णान् , मनोवाः-मनोरमाः संतो ये उद्भद्रकास्वान् के ते शब्दास्तानाऽऽह-वरा-प्रधानाः ये मुरजाः-महामर्दलाः अङ्कथ- आलिंग्यमेदार, मृदंगा:-लघुमर्दला: हरीतक्याकाराः,पणवा:-लघुपटहाः, दर्दुरा:-मृण्मयाः पटहाः चविनद्धमुखकलंशीका,कच्छमी- यापविशेषः, चीणा विपंची वालकी सर्वेऽपि वीणामेदाः, परं तश्रीणां विशेषाः, बद्धीसक-याचविशेष, सुघोपा-घंटाविशेषः, नंदिका- दादरत्र्य निघोंप,नानि चामनि-मंभा मउंद महल हुडा सिलमा य कुरड कांसाला काहल वीणा सो शंखो पणवो

संचरद्वारे
प्रथम
भावना
.
..
नदि-सूसरपरिवादिणि वंस-तृणक-पञ्चक-तंती-तल ताल तुडिय-निग्योसगीयवाझ्याईनड नहक-जल्ल-मल्ल-
मुहिक-वेलंमा कहक-पवक-लासग-आइरखक-लेख-मख-तूणइल-तुंबवीणिय-तालायर-पकरणाणि य यह
णि महरसरगीतसुरसराति। कंची-मेहला-कलाव-पत्तरक-पहेरक-पायजालग-घंटिय-खिखिणिण-रयणोरुजा
लिय, छुड़िय-उर-चलणमालिय-कणगनियलजालभूसणसदाणि । लीलचकम्ममाणाणूदीरियाई तरुणीजण-
य पारसमोर इति, समरपरिवादिनी-वीणाविशेषः, वंशो-वेणुः, तूणको वायविशेषः, पर्वकोप्येवमेव तत्री-वीणाविशेषः, तला-हस्त-
ताला, ताला:-कासिका, एतान्येव धुटितानि वाद्यानि तेषां यो निर्योपः शब्दः, तथा गीत-गेयं, यादितं च वायं सामान्यमिति
बन्दः ततस्तान् शुत्ता इति योगः, तथा नट-:
ट-ननक-जल्ल-मल-मौष्टिक-वर्डयक-कथक-प्लयक-लासग-आइक्खग[आख्यायक]
-लंस-मच-गाछ-तुषणिक-तलचराद्याः पूर्व व्याख्याता, तः प्रक्रियन्ते-क्रियन्ते यानि नटादिप्रकण करणानि-अंगवि-
पादीनि, महनि अनेकानि, मधुरसराणां-कलध्वनीनां गायकानां पानि गीतानि सुखराणि तानि श्रुत्वा श्रमणेन न सक्तव्यमिति
योगः । केपी केपी शन्दास्तेषां नामान्याह-काश्ची-फय्याभरणविशेषः, मेखलापि तस्यैव भेदः, कलापको-ग्रीवाभरणं,प्रतरकाणि-आभर-
पविशेषानि, पहेरकम-आमरणविशेषः, पादजालक-पादाभरणं, घटिका-महत्तमधुर्घः, किंकिण्या-क्षुद्रटिका, रयणत्ति-रत्नसंबंधी
| उर्वोः गृहपयोः जालं गननया, छुद्धियत्ति-लकिंकणीरूपं, नपुरं-पादाभरणम् , चालनकमालनकमपि तथैव पादाभरणं लोके
"गपती"इत्यादि भापारूपं वा, कनक-खणे. तन्मयनियल डा]-पादामरणविशेषः वय जालक-समूहः, एतान्येच भूषणानि तेषां ये
रविण्याक इति भाषा
.
1॥१७॥

- हमिपभणियालरिभितमंजुलाई गुणययणाणि य यहूणि महुरजणभासियाई अन्नेसु य एवमादिएसु सहेसु मणुसमापसुण तेसु समणेण सनियध्वं, न रजियव्यं, न गिज्झियब्वं, न हसियव्वं, न मुज्झियव्यं, न विनि. ग्याय, आवनियव्यं, न लुभियव्यं, न तुसियन्यं, न सई च मई च तत्व कुना, पुणरवि सोइदिएण सोचा साई अमणुप्तपापकाई, किंते?, अफोस-फरस-खिसण-अयमाणण-तजण-निम्भछण- शम्दाः ते नपा, नत्किभूतानि इत्याह १ लीलया चंक्रम्यमाणानां-हेलया कुटिलगमनं कुर्वाणानां उदीरितान्-संजातान् लीलामथरगमन जनिगन इत्यर्थः, पुनस्तरुणीजनस्त्रीजनः तेषां हसितानि स्मितानि-मणितानि माधुर्पविशिष्टध्वनिविशेषरूपाणि, कलरिमितानि-कलरति. सरपोतनावति, मंजुलानि-मनोहाणि वानि, तथा गुणवचनानि-स्तुतियादाँध, यहूनि-प्रचुराणि,मधुरजनमापिनानि-दएजनभणितानि, अन्यान्यपि उक्तव्यतिरिक्तानि अपि इष्टानि, इत्यादि बहुप्रकारास्वेषु-शब्देपु, मनोज्ञभद्रकेपु,न-निषेधे, तेषु शब्देषु श्रमणेन-साधुना म सक्तितव्यं-आसंगतया न भाव्यम्-न भवितव्यम् ,तेषु रागो न कार्यःन रंजिवव्यं,न गद्धितव्यं-अप्राप्तेषु वाञ्छा न कार्या, न हासो विषयः-विस्मयेनेति कृत्या, न मोहितव्यं वद्विपाकविचारे मूढतया न भवितव्यम् , तदर्थ आत्मनः परेषां वा विनिघातो न विधेयः पदयं न फेपाश्चिदप्यावर्जन कार्य, वष्ठामे लोमो-मूर्छा नो विधेयः, न तोटव्यं-तत्प्राप्तौ तोपो न विधेयः, न स्पर्शति या स्मरण सदिपये मतिं च उप-शन्देषु शुमेषु कुर्यात् । पुनरपि प्रकारान्तरेणाह-अन्यदप्युच्यते इत्यर्थः, श्रोत्रेन्द्रियेण श्रुत्वा शब्दान् अमनोज्ञान पापकान् अशुमान के ते इत्याह? तद्यया आक्रोशो-प्रियतां स्तेय(न)स्त्वमित्यादिरूपः, परुपः-रे मुण्ड इत्यादिरूपा, खिसनं-निन्दनं अशीलोऽसीत्यादिरूपं, अवमानना-अपूजा वंचनं गूधादिमया मलिना तथा तर्जना-ज्ञास्यसि रे अग्रेइति, निभर्सनं-मे दृष्टिपयादपसर, , + मावना - वित्तवयण-तासण-उक्कूजिय-कन्न-डिय-कंदिय-निरघुहरसिय-कलुण-विलवियाई अन्नेसु य एवमादिएसु पश्चम सदसु अमणुण्णपावएसु न तेसु समणेण रूसियचं, न हीलियध्वं, न निंदियध्वं, न खिसियवं, न चिंदियध्वं, संचरद्वारे न भिदियध्वं, न वहेयव्यं, न दुगुंठावत्तियाए लम्भा उप्पाएउं, एवं सोतिदियभावणाभावितो भवति अंतरप्पा प्रथम मणुन्नाऽमणुनसुभिदुन्भिरागदोसप्पणिहियप्पा साहू मणवयणकायगुत्ते संखुडे पणिहितिदिए चरेन धम्म । दीप्तवचन-रूसणवचन-कोपवाक्यं, त्रासनं-भयकारिखाक्यम्, उत्कृजित-अव्यक्तमहावनिकरणम्, रुदितं--अश्रुविमोचनेन "रु" रोदनं मप(ह)च्छन्देन, न्दित-आक्रन्दन-इष्टवियोगादौ, निर्घंटरसितम्-निघोंपरूपं भूगोलसूकरादिवत् फूत्कारः, कलुणम्-करुणोत्पा- दकम् , विलपितम्-आसिखररूपम् एतेषां इन्द्वस्ततस्तानि श्रुत्वा, अन्येषु इत्येवमादिकेषु शब्देषु अमनोज्ञेषु अतएव पापकेषु-अशुमेषु श्रमणेन साधुना"न"-निषेधे रोपितव्य-क्रोधो न उत्पादनीयः,न हीलितव्यं-नावक्षा कार्या,न निंदना(दिवव्य)-न निंदा कार्या खचित्ते न गर्दा कार्या लोकसमक्षम्, न खिसा अमनोशाएते इत्पादिरूपा(कार्या),न छिंदिवव्यं न द्रव्यच्छेदकार्यः,न भेदो विधेयः, अथवा न मेतन्यम् न घघस्तन्नाशः कार्पः,अथवा तेभ्यो भयं प्राप्य ते न हातव्याः, न जुगुप्सावृत्तिका लभ्या-उत्पादयितुं जनयितुं वा संज्ञादि- । नाऽपि इत्यर्थः निगमयन्नाह प्रथमा भावनामिति, एवं श्रोत्रेन्द्रियविपया भावना भावितो भवति अंतरात्मा-जीवः मनोज्ञाऽमनो- साम्या ये मुप्राप्तिशुमाऽशुमाः शब्दाः इति गम्यते तेषु क्रमेण यो रागद्वेषः तयोपिये प्रणिहिता-संघृत्तः आत्मा यस्य स क्या साधुः निर्वाणसाधनपरस, मनोरचनकायगुप्ता, संवृत्तः-संवरवान्, पिहितेन्द्रियः-निरुद्धपीका, प्रणिहितेन्द्रियो निश्चलेन्द्रियः संयमविषये, एतादृशः सन् धर्म-संवरधर्म चरेत् साधुः-मुनिः ।। इति प्रथमा भावना ॥१॥ ॥१८॥ - पिसियं पम्पिदिएण पासिय स्वाणि मणुनाई भइकाई सचित्ताचित्तमीसफाई कहे, पोत्थे य, चित्तकम्मे सेपफम्ने, सेले य, संतकम्मे य. पंचहि वण्णेहिं अणेगसंठाणसंथियाइं,गंठिमवेदिमपूरिमसंघातिमाणि,य मल्लाई पद्धविहाणि अहियं नयणमणसुहकराई, वणसंडे पव्वते य गामागरनगराणि य खुदिय-पुकावरिणि-वावी- पीहिय-गुंजालिय-सरसर पंतिय-सागर-दिल पंतिय-खादिय-नदी-सर-तलाग-पप्पिणीफुल्लुप्पलपुउम- दिनीय भाषगावस्तु चक्षुरिन्द्रियसंवरो नाम तथैवं-चक्षुरिन्द्रियेण दृष्ट्वा रूपाणि नरयुग्मादीनि मनोज्ञभद्रकाणि-मनोहरशुभकानि सचिवाचिचमिथकानि तेषु इत्याह कफ स्थाने काप्टे-पुत्तलिकादौ,पुस्तिका-पुस्तके, चित्रकर्म प्रतीतम् तस्मिन्, लेप्यकर्मणि-मृत्तिका (पा) भित्यादौ या, शैले-पापाणे, दंतकर्मणि तत्र किंभूते इत्याह, रूपनिर्माणक्रियायां पंचभिर्वणः युक्तानीति गम्यम् , तथाऽनेकसं- स्थानसंस्थितानि,ग्रन्थिम-प्रथनेन निष्पन्नम् मालावत् , वेष्टिम-घेटनेन जातं निभृतकुसुमं गेन्दुकवत,पूरिमं-वंशपूरितं प्रोतमुमनालवत् संघातिम-समूहेन निष्पन्न इतरेतरनिवेशितमालावत् एतेषां द्वन्दः, एमिः प्रकारः निमितानि यानि माल्यानि मालासु साधितानि पु. प्पाणि पाविधानि-अनेकप्रकाराणि अधिकतराणि नयनमनसा सुखकराणि यानि तथा तानि, वनखंडानि पर्वताश्च[तान] ग्रामाकर नगराणि प्रचीतानि.'क्षुद्रिका-जलाशयविशेषः परं लघुको, पुष्करिणी-पुष्करवती चतुकोणाचा,चापी-पर्जुला चतु:कोणाऽपि, दीपिका कूपाकारा मजुसारिणी, गुंजालिका-पक्रायतसारिणी वा, सरः खात-अखात-सरोवरादि सरसरपतिका एकस्मात् सरसः अन्यत् सरः सरसम्पलिका, सागरः-समुद्रा, धातुखानिपद्धतिः-पिलपशिका-खाविका-प्रगर्ता, नदी-निम्नगा, सस-खभावजो जलाशय विशेषः, नडागः कृतकं कासार, वप्पिणीति केदारः एतेषां पदानां द्वन्द्वः,किंभूतान् , फुल्लै-विकसितैः उत्पलैः-नीलोत्पलादिभिः पौः-सामान्यैः .

पक्रम
संवरद्वारे
द्वितीय
भावना
पडल्ल कुल-पंगुल-वामण-अंघिल्लग-एगचक्सु-विणिहय-सप्पिसल्लग-वाहिरोगीलियं विगयांणि य मयकक-
पादादौ काठिन्य यदुक्तं "प्रकुपिता वातपित्तश्लष्माधोऽधः प्रपन्नाः, वक्षोरजंघावरतिष्ठमानाः कालान्तरे पादमाश्रित्य शनैः शनैः
सोफमुपजनपति(न्ति) यत्तत् श्लीपदमेव वक्ष्यते ।
पुराणोदकभूयिष्टाः सर्वर्तुपुच शीतलाः । ये देशास्तेषु जायन्ते, श्लीपदानि विशेषतः॥१॥
पादयोईस्तयोर्वापि जायते श्लीपदं नृणाम् । कर्णोष्ठनासास्वपि च, क्यचिदिच्छन्ति तद्विदः ।।२।।
कुजः पृष्ठादौ पंगुल:-चंक्रमणाऽसमर्था, वामनः-इखसर्वशरीरः एते च मावापिढशुक्रशोणितदोपोद्भवाः कुब्जामनकादयो
भवन्ति । उक्तं च-गर्भवातप्रकोपेण दोहदे वाऽपमानित । भवेत् कुन्जः कूणिः पंगुको मन्मन एव यः॥१॥ इति ।
तथा अंधेछगति-अंध एय अंधिलको जात्यंधः, एकचक्खुत्ति-काणः, एतच्च दोपद्वयं गर्भगतस्योत्पद्यते जातस्य च, तत्तु गर्भ-
स्यस दृष्टिमागमप्रतिपन्न तेजो जात्यन्धकत्वं कुरुते तदेकाक्षिगत काणत्वं विधत्ते तदेव रक्तानुगत रक्ताक्षं, पित्तानुगत पिङ्गाक्षं, श्लेष्मा-
उगतच(तं च) शुल्लाक्षमित्यादि ज्ञेयम् । पिणिहयति-चिनिहत्तनारित्यर्थः तत्र यलावस्य चक्षुर्विहनेन अंधत्व काणत्वं या दर्शितम् ।
| सप्पिसलगति-सह पिसलकेन-पिशाचेन वर्तते यः स तथा ग्रहगृहीत इत्यर्थः, अथवा सर्पतीति सी पीठसपी स च गर्भदोषात्क-
| मंदोपाझपति, स किल पाणिगृहीतकाठः सर्वत्रातिशल्यकस्तब्धपुरुषाकार इत्यर्थः शल्यवान् शूलादिमिन्न इत्यर्थ । व्याधिना-विशिष्ट-
पीडया चिरस्थायी(पि) गदेन या, रोगेण वा सद्योपातिगदेन वा पीडितो यः स तथा । विगतानि मृतककलेवराणि, सकिमिण-
"राफो" इति भाषा
॥१०॥

खेवराणि सकिमिणकुहियं च दव्वरासिं अन्नेसु य एवमादिएसु अमणुन्नपावकेसु न तेसु समणेण रूसियव्वं जाय न दुगुंछावत्तियाकि लन्भा उप्पातेलं, एवं परिवदियभावणाभावितो भवति अंतरप्पा जाव चरेज धम्म २॥ ततियं धाणिदिएण अग्धाइय गंधाति मणुन्नमद्दगाई; किं ते १, जलयर-थलयर-सरस-पुप्फफल पाण- भोयण-फुह-तगर-पत्त-चोददमणक-मरुय-एलारस-पकमंसि-गोसीस-सरसचंदण-कापूर-लवंग-अगर कुं. कुहियचि-सहकृमिभिर्यः कुधितच, तथा द्रव्यराशि पुरीपादिदुगंछितद्रव्यसमूहं दृष्ट्वा तेपु-गंड्यादिपदसमुदायेषु, अन्येपु-एवमादिरूपेषु अमनोज्ञपापकेषु तेषु श्रमणेन न रोषितव्यं यावत् करणात् न हीलितव्यमित्यादीनि पद्पदानि न जुगुप्सायत्तिकाऽपि लभ्या उत्पा. दयितुं शुचिना योगेनेत्यर्थः, एवममुनाप्रकारेण चक्षुरिन्द्रियभावनामावितो भवति । अंतरात्मा जीवः यावत् स साधुर्धर्म चरेव- आसेवते इति द्वितीया भावना २॥ अथ तृतीयामाह-घ्राणेन्द्रियेण आघातुं योग्यानि यानि द्रध्याणि मनोज्ञानि भद्रकाणि-प्राणमनोनितिकराणि कानि तानि तद्यथा-- जले जातानि जलजानि, स्थले जातानि-थलजानि, सरसानि-आणि, पुष्पफलपानभोजनानि प्रतीतानि, कुंठ-गंघद्रष्पं, तगर(१) गन्धद्रव्यविशेषः, पत्रं-तमालपत्रम्, यत्ति-सर्वसुगंधद्रव्यविशेषः, दमणकः पुष्पजातिविशेषः, मैरूकः प्रतीतः, एलारस:-सुगन्धिफल विशेपरसा,पकमंसी-असंस्कृता मांसी-गन्धद्रव्यविशेषः, गोशीर्षाभिधानं यत् चन्दनं सरसं-आद्रं यत् चंदनं-श्रीखण्ड, कर्पूरः-धनसार: १.कोह' इति भाषा। २ 'घूया' इति भाषा.। ३ 'मरओ इति भाषा ।

पञ्चम
संवरद्वारे
तृतीया
भावना
म-कफोल-उसीर-सेयचंदण-सुगन्धसारंग-जुत्तिवरधूववासे उउयपिहिम-णिहारिमगंधिएसु अन्नेसु य एव.
मादिसु गंधेसु मणुन्नभइएसु न तेसु समणेण सब्जियन्वं जाव न सतिं च मई च सत्य कुना पुणरवि धाणि-
दिएण अग्घातिय गंधाणि अमणुनपावकाई कि ते?, अहिमड-अस्समड-हत्धिमङगोमड-विग-सुणग-सियाल
-मणुय-मजार-सीह-दीविय-मयकुहिय-विणढकिविण-बहुदुरभिगंधेसु अन्नेसु य एवमादिसु गंधेसु अम-
लवंगानि प्रतीतानि, अगुरु-दारुविशेषः कृष्णादिबहुमेदतः, कुंकुम-काश्मीरज केशरं, कझोलति-फलविशेषः, ओशीर-चीरणीमूलं, श्वेत-
चंदनं-चूर्णवासादिनपडा वास्पंदपट्टनं मलयज, सुगंधाना-सद्गन्धानां सारंगानां युक्तिः-पोजनं येषु ते तथा वरधूपवासेषु वतस्तान्
| आघाय तेषु योगाद, तथा ऋतुजः-खखकालान्वितः पिण्डिमो-बहुपरिमलत्वेन दूरनिर्यायी दूतरादागमनशीलो यो गंधः स विद्यते
। येषु ते तथा तेषु, अन्येषपि च एवमादिकेषु गन्धेषु उक्तानुक्तेषु शुभेषु मनोज्ञेषु भद्रकेषु-प्रधानेपु, रमणीयेपु तेषु-द्रव्यादिकपु, श्रम-
णेन साधुना न सक्तव्यं-आसक्तेन न भाव्यम् । यावत् शब्देन सर्वे पूर्वशब्दा ग्राह्या खकीयां मतिं च पुनरर्थे तत्र-विषयेषु न कुर्यात् ,
पुनरपि घाणेन्द्रियेण आघातुं योग्यानि यानि गंधानि अमनोज्ञानि-पापकानि कानि तानीत्याइ-मृतकानि-जीवनिमुक्तानि अहीनां-
| सर्पाणां मृतकानि, अश्वानां-हयानां मृतकानि, हस्तिनां मृतकानि, गवां मृतकानि, का (तेपां) श्वानानां-कुर्कुराणाम् शृगालानां
मनुजाना-मनुष्याणां मार्जाराणां सिंहानां दीपिनश्चित्रकास्तेपां मृतकानि-जीवरहितानि कुथितानि-द्वीन्द्रियादिजीवोपगतानि
विनष्टानि-पूर्वाकारविनाशेन (उत्तराकार प्राप्तानि), कृमिवति बहुदुरभिगंधानि या अत्यंत(त) अमनोज्ञगंधानि यानि तानि तादृशेषु
१ वरगडा इति भाग ॥
॥१०॥

, गुग्नपायएसुन तेसु समणेण रूसियव्वं न हीलियव्वं जाव पिहियपाणिदिय चरेज धम्म ३ । चउत्थं जिभिदिएण साइय रसालि उ मणुनभदकाई, किं ते ?, उग्गाहिमविविहपाण-भोयण-गुल कय बंडकप तेल्लषयकयभक्खेसु बहुविहेसु लवणरससंजुत्तेसु महुमंसबहुप्पगारमजिय-निहाणगदालियंव-सेहय- भाजनेषु अन्येप्वपि-एवमादिकेषु-उक्तानुक्तेषु गंधेषु अमनोझपापकेषु न तेषु श्रमणेन रोपितव्यम्-कोपो न कर्वव्यः, न हीलि. तच्या नफ्रादिमोटनेन यावत्करणेन न पिहितघाणेनापि भवितव्यम् किन्तु धर्म चरेत् साम्यभावं चरेत् । इति तृतीया भावना ॥३॥ अथ चतुर्थी भावनामाह-जिलेन्द्रियसंवरः एतदक्ष्यमाणः जिह्वेन्द्रियेण आखाद्य खाद्यरसाव सुमनोज्ञभद्रकान्-स्वादुस्वादुक्तः कान् तान् इत्याद तद्यथा-अवगाहा-स्नेहबोलनं तेन पाकतो जातं अवगाहिम-पक्वान्नं-खंडखाद्यादि, विविधं पानं-द्राक्षापानकादि, भोजनं- ओदन, गुडकर्य-गुडसंस्कृत, खंडकृत-खंडसंस्कृतं लड्डुकादि, तैलघृतकृतं-अपूपादि भक्ष्य-भोज्यं आखायेति संबंधः । तेषु भक्ष्येषु रा(राकु)लिकाप्रभृतिषु बहुविधेषु-विचित्रेषु लवणरससंयुक्तेषु "निर्लपणमस्वादु' इति वचनात् मधुमासे प्रतीते बहुभकारा मञ्जिका रमाद्वैततया प्रकृष्टमूल्यनिष्पादितं यत् "निट्ठाणति जा सयसहस्स"लक्षमूल्य(ल्योश्चेति यद्भवति तन्निबाणगं, दालिकाम्लं मरीचराजि- कादिना निष्पन्नं, सैन्धाम्लं संधानेन-आम्लिकादिना आम्लीकृतं, तथा दुग्धं दधि च प्रतीतम् , सरको गुडधातकीपुष्पादिना सिद्धः, मद्यवर:-पिटोद्भवः, वारुणी-मदिरापान(न) सीधुकापिशायन-संयोजितविशेषद्रव्यमयं तथा शाकं-अष्टादशरसशाकं ततस्तथा ते पहुप्रकारा यस्मिन् एतेषां सर्वत्र कर्मधारयः तेषु शाकाऽष्टादशता तचैवं- सुपो? दणोर जवनं३ तिन्नि य मंसाइ६ गोरसो जूसो८ भक्खा९ गुललावणिया१० मूलफला११ हरिययं१२ डागो१३

संवरद्वारे
चतुर्थी
भावना
दुद्ध-दहि-सरयमजवरवारुणीसीहुकाविसायणसायद्वारसबहुप्पगारेसु भोयणेसुय मणुन-यन्नगंधरसफासयहुद-
व्यसंमितेसु अन्नेसु य एवमादिएस रसेसु मणुन्नभद्दएसु न तेसु समणेण सज्जियव्वं जाव न सई च मति च
तत्य कुन्ना, पुणरवि जिभिदिएण सापिय रसातिं अमथुन्नपायगाई, किं ते ?, अरसविरससीयलुक्वणिनप्प.
पाणभोयणाई
होइ रसालू य१४ तहा पाणं१५ पाणीय१६ पाणगं१७ चेव । अट्ठारसमो सागो१८ निमबहओ लोइओ पिण्डो॥२॥
तिमेव मंसाईनि-जलचरादिसत्कानि, जूसोनि-शुंदी-तंदुल-जीरकभांडादिरसः भक्खगि-संडखाद्यादीनि, गुललापनिका-
गुलपर्पटिका लोकप्रसिद्धा गुडधाना था, सूपो-मुद्गादिः, तंदुलजवान, मूलफलमित्येकपदं, हरितकं वि-जीरकादिसंस्कृत, डागो व.
स्तुलादिमणिकाविशेषः, रसाल ति-आम्लमधुरफलादि, मजिका देशे आहारविशेषः, पानं-मयं, पानीयं-जलं, पानक-द्राक्षा-
पानकादि, सागोत्ति तत्र प्रसिद्भशाकं, तथा भोजनेषु विविधशालनकेषु घ, मनोजवर्णगंधरसस्पर्शनिवनानि, बहुद्रव्यैः संभृतानि-
| उपस्कृतानि वथा तेषु अन्येष्वपि एवमादिकेषु रसेपु, मनोज्ञभद्रकेषु "न" निषेधे तेषु श्रमणेन-साधुना न सक्तव्यं इति पूर्ववत् योज्यं,
वत्र स्त्रीयां मति न कुर्यात् । तथा पुनरपि जिह्वेन्द्रियेण आखाय रसान् तथाविधान्-अमनोज्ञान पापकान् कान् तान् इत्याह-
अरसानि-अहार्यरसानि हिंग्वादिमिरसंस्कृतानि इत्यर्थः, विरसानि-पुराणत्वेन विगतरसानि, शीतानि-अनौचित्येन शीतलानि,
| रूक्षाणि-निःलेहानि, निम्पित्ति-निर्याप्यानि निवलानि यानि पानभोजनानि तानि, तथा दोसीणत्ति-दोपान-रात्रिपर्युपितं तदपि
१ पलवेति मापा
.
"
-
॥१०२॥

दोसीणयायन-कुहिय-पूइय-अमणुन्न-विणट्ठसस्य-यहुदुन्भिगंधियाई तित्तकड्डयकसायबिलरसलिंडनीरसा. ई अग्नेसु य एमातिएसु रसेसु अमणुनपावएसु न तेसु समणेण रूसियव्वं जाव चरेज धम्म ४॥ पंचमगं पुण फासिदिएण फासिय फासाई मणुन्नभद्दकाई, कि ते?, दग-मंडव-हीरसेयचंदणसीयलविम- लजलविविहफुसुमसत्थर-ओसीरमुत्तिय-मुणालदोसिणापेहुणउक्खेवगतालियंटवीयणगजणिय-सुहसीयले य ध्यापन-विनष्टवणे, कुथित-कोयवत्पूतिक-अपवित्रं गंधतो वा कुथितपूतिकं अन्यानपि कुथितकारकं अतएव अमनो-अ. सुन्दरं, पिनष्ट-अत्यन्तविकतापसाप्राप्तस्तम् , सम्पत्ति-जीवानां सप्तमतियंत्र, बहुत एतावता घसजीव-नीलफूल्यादिसंसक्तं, बहुदुर- मिगंधी येन तत्वथा, तिक्तं च निम्यवद् , कटुकं च संठयादिवत् , [कपाय-विभीतवत् ] आम्लरसं तक्रादिवत्, लिंद्रवत्-सशैवल- | पुराणजलवत्, नीरसं च विगतरसं एतेषां द्वन्दः अतस्तानि आखाद्य तेष्विति योगः। अन्येष्वपि एवंमादिकेपु रसेपु अमनोज्ञेषु पाप- केषु एतेषु "न" इति निषेधे श्रमणेन-साधुना न रोपितव्यं पूर्ववत् । यावत् करणादिदं दृश्यं समताभावतया धर्म चरेत् वस्तुखमाव- मवगत्य न रोपनो कुर्यात् इति चतुर्थी भावना ॥४॥ अथ पंचमक भावनावस्तु स्पर्शनेन्द्रियसंवरस्तञ्चैवं-स्पर्शनेन्द्रियेण यानि स्पर्शयितुं योग्यानि स्पर्शानि तानिस्पृष्ट्वा इति योगः, मनोवानि भद्रकाणि-मनोहराणि कल्याणकारीणि, कानि तानीत्याह-दकमंडपाः-उदकमंडपा:-जलयंत्रस्थानानि,उक्तक्षरणयुक्ताः हीराः | निर्धारणा प्रतीताः, श्वेतचन्दनं-श्रीखंड, शीतलं-विमलं, निर्मल जलं-पानीयं, विविधाः-विचित्रप्रकाराः कुसुमानां सस्तरा:-शय- नानि, ओसीर-धीरणीमूलं, मौक्तिक-मुक्ताफलानि,मृणालं-पमनीलं, दोपायां-रात्रौ भवा दोषीणा(णा)-चन्द्रज्योत्स्ना एतेषां पदानां -

पम
संवरद्वारे
पञ्चमी
भावना
,
पवणे गिम्हकाले सुहफासाणि य बहणि सपणाणि आसणाणि य पाउरणगुणे य सिसिरकाले अंगारपतावणा
य आपवनिमय-सीयउसिणलहुया पजे उउसुहफासा अंगमुहनिचुइकरा ते अन्नेसु य एवमादितेसु
फासेसु मणुन्नभइएसु न तेसु समणेण सजियवं न रज्जियन्व] न गिलियावं, न मुग्झियव्वं, न पिणिग्याय
आयज्जियवं, न लुभियव्यं, न अज्झोववज्जियवं, न तूसियब, न हसियञ्चन सतिं च मतिं च तत्थ कुला,
द्वन्दा, पेवणानां-मयूरकाना ये उत्क्षेपका-चंद्रकास्तपा, तालवृन्तं-वीजनके एतानि पवनोदीरकानि वस्तुनि (वस्तूनि) तैनिता:-
उत्पादिताः सुखाः-मुखहेतयः, शीतलाम-शीताः ये ते तथा, तान् पवनान् स्पर्शति छ ? ग्रीष्मकाले-उष्णकाले, अन्यान्यपि सुख-
| सोनि बहुनि संति तान्याह-शयनानि-शय्यासंस्तराणि, आसनानि-सिंहासनादीनि, प्रावरणगुणाश्च-शीतापहारकादीन् क शिशि-
। स्काले-शीतकाले, अंगारप्रतापनाः शरीरसांगारप्रतापनाः ताथ, आतपः-सूर्पतापः, पुनः स्निग्धमृदुशीतलउष्णलघुकाः, आश्रये
ऋतुसुखा: हेमन्तादिकालविशेपे सुखकाराः सुखस्पर्शाः अंगसुख-शरीरसुखं, निवृतिः-मनम्वास्थ्यम् कुर्वन्ति ये ते तथा नान् ,
अन्येष्वपि एवमादिकेषु स्पर्शपु मनोज्ञभद्रकेषु "न" निषेधे तेषु स्पर्शपु श्रमणेन-साधुना न सक्तव्यं-आसक्ततया न भाव्य, न
शुद्धिः-नित्यं माताति) वांछा कार्या, न मुर्छा-लब्धेऽपि लोभो न कार्यः, "न" निषेधे तस्मिन्नर्थविशेपे निर्यात-निर्दयत्वं नाय-
जिंतव्यम्, न लोधव्यं-आशंसया न अध्यात्मनि तमैवार्थ उत्पादयितव्यं (न अध्यात्मनि स एवार्थ उत्पादयितव्यः) न तोपितव्य
|-संतोष्टव्यं सम्यग्ज्ञातमिति, हास्यो न कार्यः विस्मयतया, न खकीयां मतिं तत्र कुर्यात् , तथा पुनरपि पर्शनेन्द्रियेण स्पर्शितस्पर्शान्
प्रति अमनोशपापकानि कानि तानीत्याह-अनेको-बहुविधो धो-यष्टयादिमिः, बंधो-रज्ज्वादिभिः, वाइन-चपेटादिना, संयमन-
"
॥१०॥

पुणरवि फासिदिएण फासिय फासात अमणुनपावकाई, किंते ?,अणेगवध-बंध-तालणकण-अतिभारारोवणए अंगभंजण-सूतीनखप्पवेस-गायपच्छण-लक्खारसखारतेल्लकलकलंत-तउअसीसककाललोहसिंचण-हडियंधण | रज्जुनिगल-संकलहत्धंडुय-कुंभिपाकदहण-सीहपुच्छण-उभ्यंधण-सूलभेय-गयचलणमलण-करचरणकन्नना सोहसीसछैयण-जिन्भछेयणवसणनयणहिययदंतभंजण-जोत्तलयकसप्पहार-पादपण्हिजाणुपत्थरनिवायपील. णकविकच्छुअगाणि विच्छुयडफ्यायातवदंसमसकनिवाते दुट्टणिसज-दुन्निहिया-दुन्भिकक्खड-गुरुसीयउसि- संयमन यो विनाशः, अंकन-नसाय शलाकया अंककरणं, अतिभारारीपणं-शक्तिमनपेक्ष्य भारक्षेपणं, अंगभंजनम्-शरीरावयवमोटनम् , नसेषु मचीनां प्रवेशो यः स तथा, तथा गात्रस्य-शरीरस प्रक्षरणं केन कृत्वेत्याह ? त्वक् छदादिना लाक्षारसेन, क्षारेण, तैलादिना, कलकलशन्दं यत् करोति तत्कलकलं-अतितप्तमित्यर्थः तेन पुणा, सीसकेन-काललोहेन यत् सिंचित-निपेवनं तत्तथा, हडिबंधनं- खोडकक्षेपः, रज्ज्या निगडैः सकलनं हस्तांडुकेन यानि पन्धनानि तथा कुंभ्या-भाजनविशेपे पाका-पचनं, दहनं अमिना, सिंह- पुच्छने बद्धा उत्पाटन, उद्वन्धनं वृक्षादौ, शूलिका शूलपोतनं, गजचरणेपु लोलनं-मलनम्, कर्णनासौष्ठशीर्पच्छेदनं च प्रतीतम् , | जिह्वाच्छेदन-जिह्वाकर्षणम् , वृषणकर्पणम्, नयनोत्पाटनम् , हृदयकर्पणम् , दंतानां यद्भजनमामर्दनम् , यो-युपे वृपभाणां संयमन, लता-कंधा-कसा(शा)-वाघमयी रज्जुः तस्याः येषां ये महाराः, पादपाणिः-घुटिकाधः, जानुः, मस्तरा:-पापाणाः येषां यो निपातः पतनं स तथा, (य) पीडनं-यत्रपीडन, कपिकच्छु:-तीव्रकंडतिकारकः फलविशेषः, अग्निः-वह्निः, वृश्चिकदंशो वा, वातातपदंशम- १ दशकला इति भाषा - -

पश्चम
संवरद्वारे
पञ्चमी
भावना
णलुक्वेसु बहुविहेसु अनेसु य एवमाइगसु फालेसु अमणुनपावकेसु न तेसु समणेण रूसियव्यं, न हीलियन्यं,
न निंदियन्वं, न गरहियव्वं, न खिसियध्वं, न चिंदियध्वं, न भिदियध्वं, न वहेयव्वं, न दुगुंशवत्तियब्वं
च लब्भा उप्पाएउं, एवं फासिदियभावणाभावितो भवति अंतरप्पा। मणुन्नामणुनसुम्भिदुन्भिरागदोसपणि-
हियप्पा साहू मणवपणकायगुत्त संखुडेणं पणिहितिदिए चरेज धम्मं ५।
एवमिण संवरस्स दारं सम्म संवरिय होइ सुप्पणिहियं इमेहिं पंचहिवि कारणेहि,मणवयकायपरिरक्खिएहिं
| सकनिपातश्चेति द्वन्द्वस्ततस्तान् स्पृष्ट्वा, दुष्टनिपधा-क्षुद्रासनानि, दुर्निपीधिकाः कष्टसाध्यापभूमिः ताः स्पृष्ट्वा तेपु, कर्कश-गुरु-
शीतोष्ण कोषु बहुप्रकारेषु अन्येष्यपि एवमादिकेषु प्रकारेषु अमनोहरपापकारिपु श्रमणेन-मुनिना "न" निषेधे तेषु रोपितव्यं क्रो-
पात्मना वान्यं, न हीलितव्यं, न निदितव्यं, न गर्हितव्यं, न खिसितच्यं, न छेदितव्यं, "न" निषेधे वान् वघेतव्यं (हन्तव्यम्) न
| दुगंछापूति गुप्सा उत्पादयितुं (न दुगंछावृत्तिर्जुगुप्सा उत्पादयितव्या) लभ्या, एतेषामष्टानां पदानामर्थः पूर्वभावनया व्याख्याता,
एवमुक्तरीत्या स्पर्शनेन्द्रियभावनामाविता वासिता भवति ।
अन्तरात्मा जीवः मनोज्ञ(ञ) अमनोज्ञ(ने) सुष्ठुतया दुष्ठुतया रागद्वेषमणिधिन (ना) अस्थापित आत्मा यस्य स एतादृशः साधुरना-
गार मन(नोवचनकायगुन-गुप्तित्रयतत्परेण सुसंवृतेन-शान्तिभूतेन्द्रियेण, पिहिताश्रवद्वारेण धर्म-संयतधर्म चरेत् पंचमी भावना ॥५
अथ पंचमभावनानिगमनं इह पंचमसंवरः। शब्दादिषु रागद्वेषनिरोधनं यद्भावमावित्वेनोक्तं तत्तेपु तदनिरोधः परिग्रहः स्यादिति
ज्ञेयं अवएव परिग्रह एव विरमणं व्रतं तस्य रक्षणार्थ इति सर्वत्र भाव्यं यदाह जे सहरूवरसगंधमागए से य
॥१०४॥

निचं आमरणंतं च एस जोगो नेयव्यो धितिमया मतिमया। अणासवो, अकलुसो, अच्छिहो, अपरिस्सावी, अ- संकटोलि, सुद्धो, सव्यजिणमणुन्नातो, एवं पचम संघरदारं फासियं पालियं सोहियंतीरियं किहियं अणुपालियं आणाए आराहियं भवति, वायणंतरे पुण एयाणि पंचावि सुब्धय महव्ययाणि लोकधिइकराणि, सुयसागरदे- सिपाणि संयमसीलब्वयसवजवमयाणि, नरपतिरियदेवमणुयगइविवजयाणि, सम्वजिणसासणाणि, कम्मरय- विचारकाणि, भवसयविमोयगाणि, दुःखसयविणासकाणि, सुक्खसयपवत्तयाणिकापुरुपसुदुरुत्तराणि सप्पु- रिसजणतीरियाणि, निब्वाणगमणजाणाणि कहियाणि सग्गपवायकाणि पंचावि महब्वयाणि कहियाणि । पावए। गेही पओसं न करेज पडिए स होति दंते विरते अकिंचणे त्ति एवमिदं पंचमसंवरद्वारं सम्यक् प्रकारेण संघृतं भवति, सुप्ठ-शोमनतया प्रणिहित-स्थापितं एमिः पंचभिः कारणैः-भावनाकरणभृतैः, मनोवाक्कायपरिरक्षितेन आत्मना नित्यं- | सदा आमरणान्त-जन्मावधि यावत् एषः योगो नैतन्यः पाप्तव्यः केनेत्याह-धृतिमता मतिमता मुनिना पुन तिमता-धैर्यवतैव अना- श्रया संवर (र.) कथितः इति गम्यं । अकलुषः निर्मल(ला) रजोरहितः, अच्छिद्रा-न कोऽपि दोपावकाशः, अपरिसावी सकलगुणधारक- खात् सदाशयविशुद्धः अतएव असंक्लिष्टपरिणामः, ततः शुद्धः-निर्दोपः,सर्वजिनः सर्वतीर्थकरैः, अनुज्ञान:-आसेवितः कथितव, एवम्- अमुना प्रकारेण पंचमं संवरद्वार-परिग्रहविरमणलक्षणं "पंचमेति संख्यापूरणे मद" इति पश्चापि संवरद्वारं "जावावेकवचनं इति न्या- याद" स्पचित कायेन, पालितं-पुनः पुनः स्मरपेन, शोधितं गुर्वनुशया, तीरितं भावोन्नत्या यथा कालावधि सावशेषत्वेन, कीर्तित | चेतमोऽविस्मरणात् , अनुपालित पूर्वमुनि आ(न्या)सेवितमार्गेण, आजया आराधितं भवति, वाचनान्तरे पुनः एतानि पंचाऽपि हे सुवत !

प्रश्न्याक
रणास्यो
पसंहार
घडण-र
एवं नायमुणिणा भगवया महावीरेण पन्नवियं, परूवियं, पसिद्ध, सिद्ध, सिद्धवरसासणमिणं आपपियं, सुदे-
सियं, पसत्य, पंचमं संचरदारं सम्मत्तं ति बेमि ॥ एयाति चयाई पंचवि सुब्बय महाव्यपाइ हेउसयविचित्तपु-
क्खलाई कहियाई अरिहंतसासणे पंच समासेण संवरा वित्थरेण उ पणवीसतिसमियसहियसंचुढे सया जयण-
-सुविसुद्धदसणे एए अणुचरिय संजते चरमसरीरघरे भविस्सतीति (सू०२९) पण्हावागरणे णं एगो सुय-
| शोमननियम ? महाव्रतानि कीदृशानि लोके धृतिदानि, श्रुतसागरे-आगमे देशितानि,संयमशीलव्रतसत्यार्जवायने कगुणमयानि,नरक-
तिर्यग्-देव-मनुजचतुर्गतिविवर्जकानि, सर्वेषां जिनानां आसनानि आज्ञारूपाणि, कर्मरजोविदारकाणि, भवशतविमोचकानि दु(दुः)-
खशतविनाशकानि, सुखशतप्रवर्तकानि, कापुरुषजनैः दुस्तराणि-कातरजनदुष्पनि, सत्पुरुषजनतीरितानि-पालितानि, निर्वाण-
| गमनयानानि, स्वर्गप्रापकानि नियमतः पंचापि महानतानि कथितानि-उपदेशितानि केनेत्याह-
एवम्-अमुना प्रकारेण, ज्ञातमुनिना भगवता श्रीमहावीरेण प्रज्ञापितं हितोपदेशतः, प्ररूपितं अर्थतः भव्यानां पुरता, प्रसिद्ध-
विख्यात, सिद्ध-निष्ठा प्राप्तम् , वर(र)-अधान इदं शासन-आज्ञारूप, आख्यात-मर्यादयारक्षित, सुदर्शितं-सुष्ठु सम्यक्त्या दर्शितम् ,
| प्रशस्त निर्मलाशयत्वात्, पंचमं संवरद्वारं समाप्तम् , इति परिसमाप्तौ ब्रवीमि इति-पूर्ववत् श्रीसुधर्मस्वामी जंबू (५)प्रत्याह भगवदाझया
न तु स्वमनीपिकया इति अन निगमनार्थ इदं वाच्यम् ।
एतानि पंचापि हे सुबत !-शोभननियम! महाव्रतानि-संवररूपाणि हेतुशतैः-उपपत्तिशतैः, विविक्तैः-निर्दोपाः(पैः)
[विविच्य-विस्तारं कृत्वा इति) पुष्कलानि-विस्तीर्णानि यानि वानि कथितानि, तथा ये अनेके अईच्छासने-जिनागमे पंच समा-
॥१०५॥

क्खधो दस अज्झयणा एकसरगा दससु चेव दिवसेसु उद्दिसिजति एगंतरेसु आयंबिलेसु निरुद्धेसु आउत्तभत्त पाएणं अंग जहा आयारस्स (सू० ३०)॥ इति प्रश्नव्याकरणाख्यं दशमा सूत्रतः समाप्तम् ॥ ग्रन्थाग्रम् १३००] सेन-संक्षेपेन (ग) संवराऽसंवरद्वाराणि, विस्तारेण तु पंचविंशतिः प्रतिव्रतं भावनापंचकस्य संवरतया प्रतिपादिवानि । अथ संवरा- | सेविनो भविष्यति भाविनी (11) फलभूतामवस्थां दर्शयति, समिता-ईसिमित्यादिभिः पंचविंशतिसंख्याभिरनंतरोदिताभिर्भावनाभिः सहितो ज्ञानदर्शनाम्यां मन (नो)वचनकायैः सुसंवृत्तः-सुविहितो वा कपायेन्द्रियसंवरेण यः स तथा सदा-सर्वदा यतनेन प्राप्तः | संयमयोगेपु प्रयत्नेन घटनेन-अप्राप्त संयमयोगप्रात्यर्थघटनया सुविशुद्धरूपं दर्शन-श्रद्धानरूपं यस्य स तथा, एतान्-उक्तरूपान् संवरान् | अनुचर्य-आसेव्य सत्यं संयतः-साधुः चरमशरीरधरो भविष्यति इति भावः, वाचनान्तरे पुनः निगमनं यथा कार्मणशरीरस्य अग्रही- तव्यो भविष्यति इति भावः। इति श्री पंचम संचरद्वारं समाप्तं दशमाध्ययनविवरणम् । इतिशब्दः-परिसमाप्तो पूर्ववद्वाच्या श्रीमन- व्याकरणांगस्य दशमस्य दशममध्ययनम् व्याख्यातं च सदर्थं पंचमाकिञ्चनस्येदम् ॥१॥ प्रशस्तिः। नमः श्रीवर्धमानाय, नमः श्रीपार्श्वसंभवे। नमः श्रीभगवद्वाण्यै, नमो गुर्वये सदा ॥१॥ [अनुष्टुब्बृत्तम्] कुमततमोजलपतितं, येन क्रियोदारयानपात्रेण । उद्धृतमिह जगतीतलं, दत्वा श्रद्धाननव्यजलम् ॥२॥ १ घनं प्रत्यन्तरे

धृत्तिकार-
प्रशस्तिः
.
श्रीमदानन्दविमलाख्याः, सूरीन्द्रा जयन्तु ते विश्वे । श्रीमत्तपागणोदधि-मोल्लसनशारदेन्दुनिभाः ॥३॥
तेषां पट्टे जाता, गुणाधिका विजयदानसूरीन्द्राः श्रीहीरविजयसूरिस्तत्पद्देऽभूदमेयगुणः ॥४॥
येनाऽकन्वरभूपस्वान्ते, करुणा निवेशिता जतोः। अद्यापि तस्य कीर्ति-र्जागति तदीयतंत्रेषु ॥५॥
कूर्चालसरस्वतीति, विरुदं प्राप्तं च साहिना पुरतः । श्रीविजयसेनरि-जीतस्तत्पमाणिक्यम् ||६||
तत्पहोदयशैले, तरणिनिमा विजयदेवसूरीन्द्राः। सविजयसिंहयुक्ताः, प्रवचनवेशद्यकद्वाचः ॥७॥
तत्पप्रभुताया-स्तिलकसमो धन्यपुण्यजनसेव्यः । श्रीविजयप्रभसूरि-संजातो भव्यहर्पकरः॥८॥
सद्गच्छरत्नकल्पाः, क्रियाकलापेन शुद्धचरणभृतः । श्रीविनयविमलसुधियः, श्रीमत्सत्कीर्तिविमलयुजः ।।९।।
तच्छिप्याश्चरणधराा, कवयः श्रीधीरविभलनामानः । तच्छिप्यो नयविमलो, नयगमभंगप्रमाणपटुः॥१०॥
श्रीविजयप्रभसूरेः, प्रसत्तिमासाद्य हृद्यवैराग्यात् । प्राप्तानूचानपद, उपसंपदया विरागमनाः ॥११॥
सद्ज्ञानविमलसूरि-रवाप्तनामा तपागणे ख्यातः । तेनेदं शिशुचेष्टितमिव, विहितं विवरणं सम्यक् ॥१२॥
उपजीव्यपूर्ववृत्ति, यदन मतिमान्यतो मयारचितम् । समयविहीनं सद्भिस्तच्छोध्यं मयि कृपां कृत्वा ||१३||
यस्मात् सतां विधेया, नोपेक्षाः सर्वथा भवन्ति कदा | जगदुपकृतिनिपुणानामभ्यर्थनयाऽनया किं स्यात् ॥१४॥
आयः सुपरिगृहीतं, यत्किञ्चिदपि प्रकाशतामापत् । पूर्णन्दुना गृहीतो, हरिणोऽपि जगत्प्रकाशकरः ॥१५॥
अबार्थे खलु साहाय्य-कारिणः शांतिशालिनः कवयः। सुखसागरनामानः, कृतावधानास्तथा जाताः ॥१६॥
॥१०६॥

. प्रथमादर्श लिखिता-स्तैरेव हि तरणिपुरवरे रम्ये। विद्वदुभिर्वाच्यमाना, जयतु चिरं तत्त्ववोधफला ॥१७॥ यावन्महीमहेलाऽन्दू दिशति कुंडले मेरुं । ललामवद्धत्ते, लोकाग्रे शेग्वरोपमम् ॥१८॥ तावनंदत्वियं वृत्ति-नव्या भव्यावयोधदा। एतद्वाचनपुण्याद्, भवतु जनो पोधिरनयुतः॥१९॥ सप्तसहस्री सादां, संजाता सूत्रसंयुता चात्र । ग्रन्थाग्रमानमेतत्, निर्णीतं श्लोकमानेन ॥२०॥ येन कृतेयं पृत्तिः, सदर्धरम्या विबुधजनगम्या । स ज्ञानविमलसरिजयतु चिरं भव्ययोधकरः ॥२१॥ यन्माहात्म्पानागः, ज्वलनविधुरो बभूव धरणेन्द्रः । पुण्यादिविजयमह-स्स ददातु शिवं श्रीवामेयः॥२२॥ कृत्वा कृपां मम योधाञ्जनेन यचक्षुरञ्जनं चक्रे । स श्रीमान् मदीयगुरुः, सोधैकनिधिश्चिरं जीयात् ॥२३॥ इति श्रेयः संवत् १७९३ वर्षे फाल्गुनमासे कृष्णपक्षे तृतीयातिथौ कुजवासरे सिद्धियोगे सकलभट्टारक पुरन्दरभट्टारक श्री श्री श्री | १०८ श्रीविजयप्रभसूरिः तच्छिष्पसकलवाचकचकचक्रवति महोपाध्याय श्री श्री १०८ श्री विमलविजयगणितच्छिष्य महोपाध्याय श्री श्री १९ श्री शुभविजयगणि तच्छिष्य सकलपण्डितश्री ५ श्री गंगविजयगणि तच्छिष्य पं. श्री नयविजयेन लिपीकता आत्मार्थ | श्री धर्मधरानगरे पार्श्वनाथप्रसादात् श्रीरस्तु श्रेयोऽस्तु कल्याणमस्तु ।श्री। इति श्रीमत्सुधर्मस्वामिसुविहितपरंपरायातद्वादशशरदाचाम्लतपोविधान-तपाविरुदश्रीमजगचंद्रसूरि-पट्टा- लंकार-श्रीदेवेन्द्रसूरि-पद्दभूपण-श्रीमदर्मघोपसूरि-शिष्यश्रीसोमाभसूरि-पद्दतिलक-धीसोमतिलकसरि- पट्टोदयाचल-दिनमणिश्रीदेवसुन्दरसूरि-शिष्यश्रीसोमसुन्दरसूरि-शिष्य-तपागच्छभद्वारक-श्रीसुन्दर-

पृत्तिकार-
प्रशस्तिः
10
॥
श्रीमदानन्दविमलाख्याः, सूरीन्द्रा जयन्तु ते विश्वे। श्रीमत्तपागणोदधि-प्रोल्लसनशारदेन्दुनिभाः ॥३॥
तेषां पट्टे जाताः, मुणाधिका विजयदानसरीन्द्रा श्रीहीरविजयसुरिस्तत्पद्देऽभूदमेयगुणः ॥
येनाऽकन्वरभूपस्वान्ते, करुणा निवेशिता जतोः। अद्यापि तस्य कीर्ति-र्जागर्ति तदीयतंत्रेषु ॥५॥
कुर्चालसरस्वतीति, थिरुदं प्राप्तं च साहिना पुरतः। श्रीविजयसेनसूरि-जीतस्तत्पमाणिक्यम् ।।६।।
तत्पोदयशले, तरणिनिभा विजयदेवसूरीन्द्राः। सविजयसिंहयुक्ता, प्रवचनवेशद्यकृद्वाचः ॥७॥
तत्पमभुताया-स्तिलकसमो धन्यपुण्यजनसेव्यः । श्रीविजयप्रभसूरि-रसंजातो भव्यहर्पकरः॥८॥
तद्गच्छरनकल्पाः, क्रियाकलापेन शुद्धचरणभृतः । श्रीविनयविमलसुधियः, श्रीमत्सत्कीतिविमलयुजः ।।९।।
तच्छिष्याश्चरणधराः, कवयः श्रीधीरविमलनामानः । तच्छिप्यो नयविमलो, नयगमभंगप्रमाणपटुः ॥१०॥
श्रीविजयमभसुरेः, प्रसत्तिमासाद्य हृद्यवैराग्यात् । प्राप्तानूचानपद, उपसंपदया विरागमनाः॥११॥
सद्ज्ञानविमलरि-रवाप्तनामा तपागणे ख्यातः । तेनेदं शिशुचेष्टितमिक, विहितं विवरणं सम्यक् ॥१२॥
उपजीव्यपूर्ववृत्ति, यदन्न मतिमान्द्यतो मयारचितम् । समयविहीनं सदभिस्तच्छोध्यं मयि कृपां कृत्वा ॥१३॥
यस्मात् सतां विधेया, नोपेक्षाः सर्वथा भवन्ति कदा| जगदुपकृतिनिपुणानामभ्यर्थनयाऽनया किं स्यात् ॥१४॥
आयः सुपरिगृहीतं, यत्किञ्चिदपि प्रकाशतामापत् । पूर्णेन्दुना गृहीतो, हरिणोऽपि जगत्प्रकाशकरः॥१५॥
अत्रार्थे खलु साहाय्य-कारिणा शांतिशालिनः कवयः। सुखसागरनामानः, कृतावधानास्तथा जाताः ॥१६॥
॥१०६॥

प्रथमादर्श लिखिता-स्तैरेव हि तरणिपुरवरे रम्पे । विद्वभिर्वाच्यमाना, जयतु चिरं तत्त्वयोधफला ॥१७॥ पावन्महीमहेलान्दू दिशति कुंडले मेरुं । ललामवद्धत्ते, लोकाग्रे शेखरोपमम् ॥१८॥ तावदत्वियं पृत्ति-नव्या भव्यावयोधदा। एतद्वाचनपुण्याद, भपतु जनो योधिरनयुतः ॥१९॥ सप्तसहमी सादा, संजाता सूत्रसंयुता चात्र । ग्रन्थाग्रमानमेतत्, निर्णीतं श्लोकमानेन ॥२०॥ पेन कृतेयं वृत्तिः, सदर्धरम्पा वियुधजनगम्या । स ज्ञानविमलसूरिजयतु चिरं भव्ययोधकरः ॥२१॥ यन्माहात्म्यानागः, ज्वलनविधुरो पभूव धरणेन्द्रः । पुण्यादिविजयमहर्पे-स्स ददातु शिवं श्रीवामेयः॥२२॥ कृत्या कृपां मम योधाजनेन पचक्षुरअनं चके । स श्रीमान् मदीयगुरुा, सद्योधैकनिधिश्चिरं जीयात् ॥२३॥ इति श्रेयः संवत् १७९३ वर्षे फाल्गुनमासे कृष्णपक्षे तृतीयातिथौ कुजवासरे सिद्धियोगे सकलभट्टारक पुरन्दरभट्टारक श्री श्री श्री १०८ श्रीविजयप्रभारिः तच्छिष्यसकलवाचकचक्रचक्रवति महोपाध्याय श्री श्री १०८ श्री विमलविजयगणितच्छिष्य महोपाध्याय श्री श्री १९ श्री शुभविजयगणि तच्छिष्य सकलपण्डितश्री ५ श्री गंगविजयगणि तच्छिष्य पं. श्री नयविजयेन लिपीकता आत्मार्थ श्री धर्मधरानगरे पार्श्वनाथप्रसादात् श्रीरस्तु श्रेयोऽस्तु कल्याणमस्तु ।श्री। इति श्रीमत्सुधर्मस्वामिसुविहितपरंपरायातद्वादशशरदाचाम्लतपोविधान-तपाविरुदश्रीमजगचंद्रसूरि-पट्टा- लंकार-श्रीदेवेन्द्रसरि-पभूपण-श्रीमद्धर्मघोपसूरि-शिष्यश्रीसोमप्रभसूरि-पद्दतिलक-धीसोमतिलकसरि- पट्टोदयाचल-दिनमणिश्रीदेवसुन्दरसूरि-शिष्यश्रीसोमसुन्दरसूरि-शिष्य-तपागच्छभट्टारक-श्रीसुन्दर-

धृतिकार-
प्रशस्ति:
सूरि-शिष्य श्रीरत्नशेखरसूरि-शिष्य सद्गुणश्रीलक्ष्मीसागरसमान-श्रीलक्ष्मीसागरसूरि-शिष्यसुम-
तिसाधुसूरि पहभामिनीभालस्थ-तिलकायमानस्वष्टादश-शतश्रमणपरिवारपरिकलित-श्रीहेमविम-
लसूरि-पकमलापतिपराजितानेककुपाक्षिकपक्षसंक्षेपश्रीमत्तपागणसुविहित-साधुसभाचकोर
समुदायरंजनसकलकलापरिकलितकलाधरश्रीआनंदविमलसूरि-पट्ठोदयशैलचूलालंकारगग-
नतिलकभट्टारकश्रीविजयदानसूरि-पट्टभूपणश्रीमदकव्वरपातिसाहिहृदयकमलविकस्वर-
द्युतिपतिश्रीहीरविजयसूरि-पट्टभूपणसवाईविरुदधारक-श्रीविजयसेनसूरि-पसुवर्णा-
चलचूलायमानश्रीविजयदेवसूरि-शिष्यविजयसिंहमूरि-पहनंदनवनपारिजाताय.
मानभद्वारकश्रीविजयमभसूरि-पादपभोपासनसंप्राप्तोपसंपदभिस्तथा श्रीमत्त-
पागणगगनांगणदिनमणि-भधारकभधारक-श्रीमदानंदविमलसूरीश्वरमुख्य
शिष्य श्रीमद्धर्मसिंहगणिशिष्य-श्रीजयविमलगणिविनेय-श्रीकीतिविम-
लगणिपादपभोपसेवि श्रीविनयविमलगणिपद्दालंकृतिसमानश्रीधीरविम-
लगणिविनयशिष्यैःसंविज्ञपक्षीयनयविमलगणिभिरपरनामश्रीज्ञा-
नविमलसूरिभिविचिरतायां प्रश्नव्याकरणसूत्रवृत्ती
दशमाध्ययनं संपूर्णम् ।
॥१०७॥

इति प्रश्नव्याकरणसूत्रम्॥

Prashanvyakaran Sutram Khand-ii

Author
Suri,gyanvimal
Title
Prashanvyakaran Sutram Khand-ii
File name
Prashanvyakaran Sutram Khand-ii
Text
OCR done
Citation
1938
Published
2012/08
Publisher
Ahmedabad.,shantilal Hargovind Devishahno
Language
Sanskrit
Pages
241
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313279
Barcode
99999990321982.00
Scanning centre
Banasthali University
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Prashanvyakaran Sutram Khand-ii