Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Nazeer Akbarabadi
Front matter
No text on this page.
11681
157QQt
नजीर
अकबराबादी
और उनकी शायरी
सम्पादक
सरस्वती सरन कैफ
राज पा ल एण्ड सन्ज, दिल्ली
३
शरद जोशी
जन्म 21 मई 1931 उज्जैन (म. प्र.)
प्रथम सस्करण
अगस्त, १९५६
मूल्य
हेटरपया
प्रकाशन
राजपाल एण्ड सास
परमारी गेट, दिल्ली
मुदर
पुगातर प्रेस
हपरिन पुल, दिल्ली
१UP
सूची
परिचय
चयन
५-३०
३१-१०४
.
४२
नन्मे
१ ईश्वर-वदना
२ शंख सलीम चिश्ती
३ गुरु नानक
४ ईदुलपित्र
२ होली
६ पागरे की तराकी
७ रीछ का बच्चा
८ बचपन
६ जवानी
१० बुढापा
११ मौत का घडवा
१२ बरसात की बहारे
१३ कोरा वरतन
१४ तिल के लडडू
१५ भग
४७
०
५२
६१
७०
१६ मौत
८२
४
७६
५२
१७ बजारा नामा
१८ खुदा की खुदाई
१६ मुफलिसी
२० रोटिया
२१ आदमी-नामा
२२ हसनामा
२३ कहैयाजी का खेलकूद
८८
६२
६७
१००
गजल
फिर के निगाह चार-सू ठहरी उसी के रू-ब-रू
उसने तो मेरी चश्म को किल्ला नुमा बना दिया
जीवनी
--
No text on this page.
अगरेजी की एक कहानी का अतिम अश इस प्रकार है
'कयि ने मल्लाकर एक दिन कीर्ति से कहा, "प्यारी कीति ।
खुले पाम गली कूचो मे तू कमीनो से हमती बोलती है-तुझे
शर्म नही पाती । और मैं तेरे लिए खून पानी करता हू, तेरा
स्वप्न देखता हू, और तू मैरी हँसी उडाती है, मेरी तरफ पाख
उठाकर भी नहीं देखती।" कीति मटक कर चली गयी। जाते
समय मुंडकर उसने क्नसियो से एक अजीव प्रदाज से मुस्व
कर कवि की ओर देखा । इस तरह की मुस्कराहट उसके
चेहरे पर पहले कभी न दिखलायी पड़ी थी। जाते-जाते वह
धीरे से कह गयी-"अाज से सौ वर्ष बाद कब्रिस्तान म मै तुझ
से मिलूगी
n
यह कहने की हिम्मत तो खैर कोई नहीं कर सकता कि
सच्चे कवियो को हमेशा मरने के बाद ही कीति मिलती है किन्तु
इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि बहुधा ऐसा भी
होता है। इस बात का ज्वलत उदाहरण उर्दू के ख्यात नामा
कवि मिया 'नज़ीर अकबराबादी के जीवन से मिल जाता है ।
मिया 'नज़ीर' ने लगभग सौ वर्ष की आयु पायो । भारत जैसे देश
का निवासी होकर भी इतनी लम्बी उम्र पाना अपने जीवन के
अधिकारका आवश्यकता से अधिक उपयोग करना कहा जायेगा।
८
नजीर
विन्तु इतनी लम्बी उम्र के बावजद 'नजीर' को मतिम क्षणा
तक रवि के रूप में ग्याति 7 मिली । यही पयो ? उके मरने
के लगभग गत्तर वप याद तप भी पालोचर गए उन्हें एक प्रमुख
पवि के रूप में मानने से इन्कार करते रहे । वीसवी शताब्दी
मे लिये गये उर्दू माहित्य ये पुछ प्रमुरा इतिहासो-अब्दुल
हई कृत 'गुले-रप्रना' और अब्दुस्गलाम नदवी पृत शेत
हिन्द'-म 'नजीर' या वही उरलेस भी नहीं दिया गया।
अलवत्ता बीसवी शताब्दी पे मध्य पाल मे प्रापर मिया 'नजीर'
उभरे (यद्यपि इस समय कम में उनकी हड्डिया तर गल गयी
हागी)। और उभरे तो ऐसे उभरे यि पालोचको के पास
उनकी तिम्पृहता, धार्मिक महिष्णुना, देश-प्रेम, भ्रातृ भाय, पैनी
दृष्टि प्रादि की प्रशसा करने के अतिरिक्त और कोई चारा ही
नहीं रह गया। उनका 'गव ठाठ पडा रह जायेगा जय लाद
चलेगा बजारा' जैसी कविताए, जो उन्नीसवी शताब्दी के
आलोचको को दृष्टि म उपहासास्पद समझी जाती थी, अब
कविता-प्रेमियो के गले का हार हो गयी हैं । 'जन कवि' कहकर
उनको उछाला जा रहा है और लब्ध प्रतिष्ठ मालोचक उनकी
रचनानो के विभिन्न पहलुग्रो पर प्रकाश डालना जरूरी
समझते हैं।
इतना सब होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि
'नजीर' की स्याति का यह चरम काल है । मेरी अपनी समझ
मे तो अभी प्रालोचको को भी अधेरे में प्रकाश की एक-प्राध
ही किरण मिली है, साधारण काव्य प्रेमियो की तो बात ही
नजीर क्या है। अभी हम अपने दृष्टिकोण को इतना विस्तृत कर ही नही पाये हैं कि 'नजीर' की रचनामो के वास्तविक महत्व को समझे। उसे समझने के लिए हमें लगभग सौ वर्ष और लग सकते हैं। उन्नीमवी शताब्दी के अलोचको ने या तो 'नजीर' का जिन करना ही ठीक नहीं समझा है (क्योकि उनकी दृष्टि में वे प्रमुख कवि हो नहीं थे) या नवाव मुस्तफा खा 'शेफ्ता' जैसे पालोचको ने उन्हें काफी खरी खोटी सुनाते हुए याद किया है । उपेक्षा और बेकद्री की इस दलदल से 'नजीर' के काव्य को सबसे पहले १९०० ई० मे औरगाबाद कालेज के प्राध्यापक मोलवी सय्यद मुहम्मद अब्दुल गफूर 'शहबाज़' ने निकाला । इस शताब्दी म 'नजीर' पर जो कुछ लिखा गया है उसका आधार प्रो० शहबाज की प्रसिद्ध पुस्तक 'ज़िदगानी-ए-बेनजीर' है । इस पुस्तक मे जो खोज सामग्री है उससे अधिक आगे बढना किसी और के लिए सभव न हुआ, यद्यपि यह भी सही है कि प्रो० शहबाज ने इसमे मालोचक से अधिक प्रशसक का रवैया अपनाया है। 'जिन्दगानी-ए-बेनजीर' के बारे मे श्री सलीम जाफर ठीक ही लिखते हैं-"केन्टरबरी के डीन एफ डब्लू फैरट ने यीशु मसीह का जीवन चरित्र लिखा है। एक आलोचक ने इसके बारे में पहा है कि इसमे ईसा है तो, लेकिन फूलो मे छुपे हुए । यानी वर्णन-सौदर्य और अतिशयोक्ति-पूर्ण प्रशसा ने उनपर पर्दा डाल दिया है और वे निगाहो से प्रोझल हो गये हैं । यही मालोचना शब्दश प्रो० शहबाज कृत 'जिन्दगानी-ए-बेनजीर'
नजीर
पर लागू होती है । मगर सच तो यह है कि उनको खोज के
आगे कदम बढाना दुश्वार है।"
'मजीर' को जन्म तिथि का किसी को पता नहीं है।
डा० सक्सेना का खयाल है कि वे नादिरशाह के दिल्ली में
हमले के समय १७३६ या १७४० ई० में पैदा हुए थे। प्रो०
शहबाज़ के कथनानुसार उनका जन्म १७३५ ई० मे हुमा था।
खैर यह अतर कोई खास नहीं है । उनका जन्म-स्थान दिल्ली
था। केवल एक तजकिरे के अनुसार वे आगरे म पैदा हुए थे
लेकिन अय तजकिरो मे जन्म स्थान दिल्ली ही को माना
गया है।
जीवन-वृत्त
'नजीर' के जीवन वृत्त में कोई माके की बात नहीं है ।
दरअस्ल अगर वे खुद अपने बारे म कुछ लिखते तो कुछ ज्यादा
बातें मालूम होती । सो अपना जीवन वृत्त लिखना तो दूर की
बात है, अपनी रचनाओ को सपहीत करने को भी चिन्ता
उहोने नहीं की। प्रो० शहवाज को 'नजोर' का हाल जानने में
उनकी नवासी से, जो प्रो० शह्वाज के जमाने मे जिदा थी,
वडी मदद मिली । उनसे जो हाल मालूम हुए उसका खुलासा
यह है
'नज़ीरा नाम वली मुहम्मद था और उनके पिता का
नाम मुहम्मद फारूक था। उनकी मा प्रागरे के किलेदार नवाब
सुल्तान-खा की बेटी थी । 'मीर' की पैदाइश के बाद ही
दिल्ली पर लगातार मुसीबतें आने लगी। १७३६ ई. में
नजीर नादिर शाह का हमला हुआ। उसने दिल्ली को खब लूटा खसोटा और कले-ग्राम वर्पा कर दिया । दिल्ली की गलियो मे खून की नदिया बह गयी। इसके बाद भी बहुत दिनो तक दिल्ली में अशाति रही । अहमद शाह अब्दाली ने भी पैदरपै तीन बार--१७४८, १७५१ और १७५६ ईसवी म- दिल्ली पर हमले किये । मरहटो के भी आक्रमण हो रहे थे। चुनाचे 'नजोर' भी अपनी मा और नानी को साथ लेकर बाईस- तेईस साल की उम्र मे दिल्ली से अकबरावाद (सागरा) चले आये और वही ताजगज मे नूरी दरवाजे पर एक मकान लेकर रहने लगे । 'नज़ीर' आगरे मे बसे तो ऐसे बसे कि मर कर भी यही दफ्न हुए। आगरे मे उन्होने तहव्वरुन्निसा वेगम से विवाह किया। यह अहदी अब्दुरहमान-खा चगताई की नवासी और मुहम्मद रहमान खा की बेटी थी। मुहम्मद रहमान खा मलिको की गली मे रहते थे जो ताजगज मुहल्ले में थी । 'नजीर' के दो सताने थी, एक लडका गुलजार अली और एक लडकी इमामी बेगम । इमामी वेगम के एक लडकी हुई जिसका नाम विलायती बेगम था। विलायतो वेगम प्रो० शहबाज़ के वक्त में जिन्दा थीं और उन्होने 'जिन्दगानी ए-बेनजीर' के लिए बहुत-सी यावश्यक सामग्री दी। 'नजीर' का हुलिया फरहतुल्ला बेग यू लिखते है 'नज़ीर' का रग गदुम गू (गेहुआ), कद मियाना, पेशानी कची और चौडी, आखें चमकदार और बेनी (नाक) बुलद - १२ नजीर । थी। दाढी खशखाशी और मोठे बडी रखते थे। सिडकीदार पगडी, गाढे का अगरखा, सीधा पर्दा, नीची चोली, उसके नीचे कुरता, एक बरका पायजामा, पीतली जूती, हाथ मे शान- दार छडी, उगलियो मे फीरोजे और प्रकीक की अगूठिया।" उनकी योग्यता के बारे मे मिर्जा फरहतुल्ला बेग लिखते - "इल्मी काबलियत यह थी कि पाठ ज़वानें-अरबी, फारसी, उर्दू, पजावी, भापा, मारवाडी, पूरबी और हिदी जानते थे।" श्री सलीम जाफर का कहना है कि 'नजीर' का कद ठिंगना, रग सावला, दाढी नदारद, और अरबी नही जानते थे और जानते भी थे तो बहुत कम । उनका कहना है कि प्रो० शहबाज द्वारा सम्पादित 'नजीर' के दीवानो और 'नजीर का देस-प्रेम' मे जो तस्वीर दी गयी है उसमे दाढी नही है । अपने क्थन की पुष्टि मे वे स्वय 'नजीर' के निम्नलिखित शे'र देते । . कहते है जिसको 'नजीर' सुनिए टुक उसका बया था वो मुसल्लम' गरीव बुज़दिल-प्रो तरसदा जा फरल ने अल्लाह के उसको दिया उम्र भर इज्जतो-हुरमत के साथ पारचा - प्रो - प्रावो - ना' फहम न था इल्म से अरबी के कुछ भी उसे फारसी में हा मगर जाने या कुछ ई-व- मा १मध्यापक २ भीरु ३ पहा-साना ४ यह वह नजीर १३ , फदों - गज़ल के सिवा शौक न था कुछ उसे अपने इमो शौक में रहता था खुश हर जमा सुस्त - रविश, पस्ता-कद, सावला, हिन्दी-नज़ाद' तन भी कुछ ऐमा ही था कद के मुसाफिक मिया माथे पे इक साल था छोटा सा मस्से के तौर था वो पडा प्राय और अरुयो के दरमिया यजन सुवुक उसकी थी तिस पे न रखता था रोश' मोछे थी और कानो पर पट्टे भी थे पवा मा पोरी मे थी जिम तरह उसको दिल-अफसुदगी' वैसी ही थी उन दिनो जिन दिनो म था जवा लिखने की यह तर्ज थी कुछ जो लिखे था किताव पुस्लगी-प्रो सामी के उसके था खत दरमिया अगर इसके शब्दो पर जाइए तव तो श्री सलीम जाफर की बात ठीक माबित होती है लेकिन अगर 'नजीर' के पद्यो से उनके निरभिमानी स्वभाव का अंदाजा लगाकर 'पक्तियो के बीच म पढ़ने का तरीका अपनाया जाय तो मिर्जा फरहतुल्ला बेग यी बात गलत नहीं जान पडती। 'नजीर' मे दरबारी गायरो का सा अभिमान न था। उस जमाने की तहजीब के मुताबिक लोग अपने को छोटा कहा ही करते थे। तुलसीदास ने लिखा है "मो सम कौन कुटिल खल कामी ।" लेकिन इन शब्दो के आधार पर उन्हें ऐसा समझ लिया जाय तो इससे २ नस्ल से भारतीय ३ तिल ४ दाढी ५ रूई ६ बुढ़ापा ७ रजीदा रहता और बच्चाई लिखावट १ समय ८ पक्कापन
१४
नजीर
ज्यादा मससरापन और क्या होगा। जरा गौर कीजिए तो
मालूम हो जायेगा कि किसी निरभिमानी व्यक्ति का अपने
मझोले कद को नाटा और गेहुए रग को सावला कहना स्वा-
भाविक ही है । दाढी भी वे सशखाशी (छोटी) रखते थे । बडी
दाढी वुजुर्गी और सम्मान का चिह समझी जाती थी । 'नजीर'
ने अपने को छोटा दिलाने के लिए दाढी उडा ही दी । हो
सकता है कि उनके पहले दाढी न रही हो बाद मे रखने लगे
हो, गालिव ने भी तो ऐमा ही क्यिा था। यह भी ध्यान मे
रखिए कि 'नज़ीर' ने अपने पट्टो को रूई की तरह कहा है ।
इससे मालूम होता है कि वे अपना चित्र नही व्यग-चित्र खीच
रहे हैं। इसलिए उनके शब्दो को ज्यू का त्यू सही माना।
मुश्किल ही है।
खैर, कद, रगत या दाढी का बहुत महत्व नहीं है । यह
सारी वहस उनकी योग्यता के सिलसिले मे हुई जिसे बेग साहब
यथेष्ट और जाफर साहव मामूली मानते है। अरबो 'नजीर'
कम जानते थे लेकिन बिल्कुल न जानते हो ऐसा भी नहीं था।
फारमी अच्छी-खासी जानते थे और अन्य भारतीय भाषाए भी
उहे सून आती थी, यह उनकी रचनामो से मालूम हो जाता है ।
चुनाचे उह पाठ भाषायो का जानकार मानने म कोई दिक्कत
पैदा नहीं होती।
--
स्वभाव
'नजीर' सतोषी प्रकृति के मस्त जीव थे। उनकी आर्थिक
स्थिति बहुत मामूली रही-यद्यपि फाको की नौबत कभी नही
नजीर प्रायो-लेकिन रुपया उन्हे कभी आकृप्ट न कर सका । नवाब सआदत अली खा ने उन्हे लग्खनऊ बुलाया लेकिन उन्होने जाने से इन्कार कर दिया। इसी प्रकार भरतपुर के नवाब ने उन्हे बुलाया किन्तु वे वहा भी नही गये । कुछ दिन अध्यापन कार्य के सिलसिले म मथुरा भी रहे लेकिन उन्ह आगरा छोडना पसन्द न था, यहा की रगरलिया उन्हे कही नहीं मिल सकती थी इसलिए वे आगरे लौट आये और लाला बिलासराम के लडको हरवख्शराय, गुरुवरश राय, मूलच द राय, मनसुखराय, वशीधर और शकरदास को पढाने लगे। वेतन उनका सत्रह रुपया मासिक था । इसी मामूली तनख्वाह पर सारी उम्र मते गाते काट दी। सतोप के साथ ही जीवन का पूरा आनद लेना वे जानते थे। जवानी के दिनो म उन्होने रगरलिया भी की। उनकी रचनामो से मालूम होता है कि उन्हे वेश्याग्रो का काफी अनुभव था। विशेपत एक वेश्या मोती बाई से उन्हे बडा प्रेम था। इसके अलावा उहे पक्षियो के पालने का भी शौक रहा होगा। अपनी रचनायो म उहोने पक्षिया की जितनी जान- कारी दिसायो है उतनो किमो और ने नहीं दिखाई । यहा तक' कि उनके द्वारा वर्णित कुछ पक्षियो का नाम भी अाज तोग नहीं जानते । इसमे ताज्जुब की कोई बात नहीं है । पक्षियो के पालने का शौक जितना उन्नीसवी शताब्दी में लोगो को या उता आज के व्यस्त जीवन मै सभव नहीं है। इसलिए आज उनके जमाने के कई पक्षियो का पालना छोड ही दिया गया है
नजीर
और लोग उनका नाम भी भूल गये हैं।
मेले ठेलो आदि से भी 'नजीर' को दिलचस्पी थी, तैराकी
में भी वे दिलचस्पी लेते थे, कुश्ती का भी उहे शोक मालूम
होता है । गरज कि कोई शौक ऐसा न था जो 'नज़ीर' ने पूरा
न किया हो।
अत मे पच्चानवे वप की अवस्था मे १६ अगस्त १८३०
ईसवी को उनका देहावसान हो गया। यह सन उनके एक
शिष्य द्वारा कही गयी तारीख से मालूम होता है । लायल
साहब उनकी मृत्यु का समय १८३२ ईसवी बताते हैं लेकिन
इसका कोई सबूत नहीं देते । यह अटकल शायद उन्होंने इस
प्राधार पर लगायी होगी कि 'नजीर' के बारे में मशहूर था
कि वे मौ वष जिये । उनका जन्म सवत ११४७ हिजरी
(१७३५ ई०) माना गया है । इसी आधार पर उनके देहात
का समय १२४७ हि० (१८३२ ई०) लायल साहब ने मान
लिया। लेकिन क्विदती और अटकल की बजाय स्पष्ट तारीख
का प्राधार ही मानना चाहिए जो १८३० ई० म उनका देहात
बताती है । इस प्रकार ईरावी हिसाब से ६५ और हिजरी
हिसाब से १८ वर्ष की अवस्था मे 'नजीर' का देहात हुप्रा ।
मृत्यु का तात्कालिक कारण पक्षाघात था ।
'नजीर' ने बहुत लिखा । उनके रचित शे'र सबर सब
प्राप्य होते तो दो लाख से अधिक होते । लेकिन उहोने सुद
कुछ जमा ही नहीं किया। जो कुछ आज मिलता है (और वह
भी कम नही है-लगभग ६ हजार शे'र हैं) वह उनके प्रिय
नजीर
-
--
शिष्यो-लाला विलासराम के पुत्रो ने अपनी कापियो मे तिस
लिया था । इही शिष्यो द्वारा सुरक्षित निम्नलिखित सामग्री
मिलती है
(१) एक कुल्लियात उर्दू का जिसमे नश्मे और गजले
शामिल हैं।
(२) एक दीवान फारसी नज्मो का ।
(३) फारसी गद्य मे नौ पुस्तकें जिनके नाम यह है-
नरमीए-गुजी, कद्रमती, फह्म-करी, वपमे-ऐश,
रमनाए-जेबा,
हुस्ने-बाजार, तजें तकरीर तथा दो और जिनके नाम मुझे नहीं
मालूम हो सके।
नजीर' का काव्य
'नजीर' बहुत पुराने जमाने मे पैदा हुए थे । उन्होने लम्बी
उम्र पायी। उनके मरने के लगभग सो वर्ष बाद उनकी
रचनायो को ऐतिहासिक महत्व मिला । सभवत किसी और
साहित्यकार को कीति इतनी देर से नहीं मिली। इसीलिए
यह भी सुनिश्चित है कि 'नजीर' की कीर्ति का स्थायित्व भी
अन्य कवियो की अपेक्षा अधिक होगा। अभी तो सभवत
'नजीर' के काव्य की मा यता का शवकाल ही है । आइए
हम 'नजीर' के काव्य के महत्व को समझने का प्रयत्न करें।
नजीर' को उन्नीसवी शताब्दी के आलोचको ने जिनम
नवाव मुस्तफा-खा 'शेफ्ता' प्रमुख हैं, निकृष्ट कोटि का कवि माना
है। नवाब 'शेफ्ता' द्वारा लिखित उदू कवियो के तजकिरे
"गुलशने-वे-खार' की रचना के बहुत पहले ही 'नजोर' परलोक
नजोर वासी हो गये थे । शिन्तु यदि 'शेषता' जैसा विद्वान उनके जीवन काल ही मे उहे निकृष्ट योटि या पवि करार देता तो भी उहे चिन्ता न होती । 'जीर' ने कभी खुद को ऊचा कवि नहीं कहा, हमेशा अपने को साधारणता ये धरातल ही पर रसा। उन्होने अपने व्याक्तित्व का भी जो चित्रण किया है (जिसे हम पहले देम प्राये है) उसमें अपना हुलिया बिगाडकर रख दिया है । साहित्यिक कीति के पीछे दौडने की तो बात ही क्या है, उन्होने लसनऊ और भरतपुर के दरवारो के निम त्रयो को अस्वीकार करके जिम तरह मिलती हुई कीर्ति को भी ठोकर मार दी उसे देखकर आज के जमाने मे-जब कि साहित्य क्षेत्र मे हर तरफ कुण्ठा का बोल-बाला दिखायी देता है-हमारी पाखें पाश्चय से फटी रह जाती हैं। हम समझ हो नहीं पाते कि 'नजीर' क्सि मिट्टी के बने थे। मैने पहले कहा है कि 'नजीर' को अच्छी तरह समझने के लिए हमें अभी मो वप और लग जायेंगे। इस बात से कुछ साहित्यिक क्षुब्ध हो सकते हैं कि यह आधुनिक साहित्य ममज्ञता का अपमान है । कुछ लोग शायद बडे बडे कोप लेकर 'नजीर' की 'दुरुहता' का मुकाबिला करने के लिए तैयार हो जायेंगे। दरअस्ल 'नजीर' के महत्व को समझने के लिए पुस्तक ज्ञान की आवश्यकता नहीं के बराबर है। किंतु इसके लिए 'जीवन' का अध्ययन जरूरी है । जव मैं कहता हूं कि 'नजीर' को समझने मे अभी सौ वप और लगेंगे तो तात्पय यही होता है कि हमारी दाशनिक जिज्ञासा अभी 'ऊचे' मे उडाने भर रही है, प्रौढ होकर
नजीर
नीचे नहीं उतरी है। अभी हम 'उच्च' और 'असाधारण' ही
के चक्कर मे घूम रहे है, 'साधारण' के महत्व को नही समझे
हैं । 'नज़ीर' साधारणता के-सहज, स्वाभाविक, विशाल जीवन
के-कवि हैं, इसीलिए वे अाज के 'असाधारगता' के उन्माद
मे घुधले से नजर आते है । उन्नीसवी शताब्दी के कुहरे मे तो
उन्हें देखना सभव ही नही था।
बात कुछ अजीब सी मालूम होती है । है न ? लेकिन ज़रा
गौर से देखिए तो इसकी सत्यता स्पष्ट हो जायेगी। प्राचीन
काल मे धम-प्रवतको ने भी अपने नैतिकता के बुनियादी सिद्धातो
को जन-माधारण से मनवाने के लिए चमत्कारो का सहारा
लिया था। बाद के लोगो ने धर्म-प्रवतको की महान जीवनियो
से, जो तब तक उनके लिए असाधारण हो चुकी थी, प्रेरणा
प्राप्त की है। लेकिन 'पत्यरो और स्रोतो से उपदेश' लेने के
लिए शेक्सपियर जैसे मेधावो की चेतना अपेक्षित थी। मानव
मन अपनी अविकसित अवस्था मे असाधारणता से प्राकृष्ट
और प्रेरित होता है, और जैसे जैसे उसका विकास होता जाता
है वह साधारण वस्तुप्रो के महत्व को समझ जाता है और
उन्ही मे आनद लेता है । जीवन में यह तथ्य हर जगह दृष्टि-
गोचर होगा । यहा मैं केवल दो-एक उदाहरण देता पर्याप्त
ममझता हू । बच्चो को या तो परियो को कहानिया पसन्द
होती हैं या ऐमो कहानिया जिनम जानवर भी इमानो की तरह
बातें करें। उनकी कल्पना-शक्ति इतनी जोर की उछाल के
बगैर जागृत ही नहीं होने पाती। नौजवानो को असाधारण
नजीर पुरुषो के स्वाभाविक किन्तु असाधारण काय-कलाप ही प्रेरित करते हैं, चाहे वह महाराणा प्रताप और शिवाजी का शीय हो या बुद्ध, ईसा और गाधी के प्रेम और अहिंसा के सिद्धात। और प्रौढो को सबसे अधिक रस साधारण जीवन के दुख-सुख की कहानियो मे ही पाता है। शिक्षा और स्वाध्याय द्वारा बुद्धि के परिप्कार की विभिन्न मजिलो मे भी यही दिखाई देता है । अशिक्षित वर्ग अस्वाभाविकता की हद तक अमाधारण परियो ही से-उदाहरणाथ आल्हा और ऊदलही से प्रेरित हो पाते हैं किन्तु सुशिक्षित एव माहित्यिक रुचि रखने वाले व्यक्तियो को बुद्ध, कल्लू आदि जन-साधारण के जीवन ही से प्रेरणा मिल जाती है। बात कही से कही पहुंच गई। वहना सिफ यही है कि अभी तक जो भी उदू माहित्य सामने आया है उसका आधार असाधारणता है--चाहे वह तथ्यो को असाधारणता हो, चाहे साधारण तथ्यो से निकाले जाने वाले विशिष्ट सवव्यापी सिद्धातो की। इसके विपरीत मिया 'नजीर' विल्कुल साधारण वातो को विरकुल साधारण दृष्टि से देखते थे । कोई पूव निश्चित सिद्धात या पूर्वाग्रह (प्रेजुडिस ) उनके लिए वाधक नही बनता था। इसीलिए एक ओर तो उनके काव्य मे ऐसी सहज और सुन्दर गति पैदा हो गई है जो उनका एक विशिष्ट स्थान बना देती है और दूसरी ओर विशेष वादो, सिद्धातो, पूर्वाग्रहो और काव्य- शास्त्र के नियमो का चश्मा लगाकर उनकी इसी असाधारण साधारणता को देखना असम्भव नही तो दुष्कर अवश्य हो जाता है।
नजीर २१ प्रात्म-निर्भर पर्यवेक्षण उन्नीसवी शताब्दी की साहित्यिक चेतना सामन्त वर्ग ही तक मीमित थी इसीलिए उस समय के उर्दू तथा ब्रज भाषा के काव्य में प्रेम के क्रमश सूफीवादी और भक्ति-मार्गी रूप का दिग्दर्शन ही परम लक्ष्य था । बीसवी शताब्दी में साहित्यिक चेतना का अाधार विस्तृत हुआ, वह मध्य वर्ग तक पहुची, उसमे विषय बाहुल्य हुआ और उसे मुरयत राष्ट्रीयता और समाजवाद से प्रेरणा मिली। वीसवी शताब्दी की साहित्यिक चेतना के जनो मुख होने के फलस्वरूप लोगो का ध्यान 'नजोर' पर गया क्योकि वे जनसाधारण की बातें करते थे। राष्ट्रीयता- वादी साहित्यिक चेतना को भी 'नजीर' का काव्य पसद आया क्योकि उसमे भारतीय संस्कृति के दशन होते थे। नतीजा यह हुआ कि 'नजीर' को प्रशसा उनके 'जन-प्रेम' और 'राष्ट्रीयता' के आधार पर होने लगी। अगर आप किसी से पूछे कि गाधी जी की महानता का रहस्य क्या था, और वह उत्तर दे कि वे अगरेजी वडी सुन्दर लिखते थे, तो आपको कैसा लगेगा ? सभवत आप यही कहेगे, "भाई । यह ठीक है कि वे अगरेजो अच्छी लिखते थे, लेकिन उनकी महानता अच्छी अगरेजी लिखने मे नही बल्कि और ही बातो में निहित है।" मुझे 'नजीर' के वतमान अालोचको से बिल्कुल यही बात कहनी है। वे पूर्णत 'हिन्दुस्तानी' कवि थे, वे जन-साधारण के बारे में बाते भी करते थे--इन दोनो बातो मे किस कम्बख्त को शक है ? लेकिन 'मजोर' की महानता का
२२
नजीर
आधार इन दोनो बातो के अलावा और भी कुछ है और उसे
भी कुछ समझने की ज़रूरत है।
'नज़ीर' के काव्य की विवेचना के पहले एक बात और
सुन लीजिए । भारतीय-दशन के अनुसार ज्ञान की चरम सीमा
साधारण व्यावहारिक बुद्धि का लोप है। परमहस वही होता है
जिसकी व्यावहारिक बुद्धि केवल नवजात शिशु जितनी रह जाये।
मुझे 'नजीर' को परमहम सावित करने की कोशिश नहीं करनी
है । वे परमहस नही थे। किन्तु वे अपनी चेतना को विकसित
करके -~-मग्न चेतना (Sub-concious) स्प ही से सहो-
जन-साधारण के स्तर तक ले आये थे। उनमे इसी विकसित
चेतना के बाल-सुलभ कौतूहल के साथ ही प्रौढता को
विशाल दृष्टि भी थी। इसके बल पर वे पयवेक्षण की उस स्थिति
मे पहुच गये थे जहा सिद्धातो का सहारा लेकर समस्या का
समाधान करने की आवश्यकता नही पडती बलि स्वय समस्या
ही समस्या का समाधान वन जाती है। वास्तविकता भी यही
है कि समस्या ही सत्य है, समाधान तो कल्पना-मात्र है ।
उदाहरण के लिए 'मानवता' ही के विषय को लीजिए।
मानव की असरय परिभाषाए की गई हैं और अभी तक कोई
सर्वांगपूण नहीं हो सकी है । 'नजीर' ने मानव सम्बधी प्रश्न
को प्रश्न ही के रूप में सामने रखा है, मगर इस तरह साफ
खोलकर रखा है कि आदमी की पूरी तसवीर सामने आती है
और इस तरह आती है कि उसके ओर छोर का कुछ पता नही
चलता । उदाहरण स्वरूप उनके 'प्रादमी-नामा' के दो बद
देखिए
।
।
नजीर
या आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी पे तेग, को मारे है श्रादमी
पगडी भी आदमी की उतारे, है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुनके दौडता है सो है वह भी आदमी
मरने मे आदमी ही कफन करते हैं तयार
नहला-घुला उठाते हैं काधे पे कर सवार
कलमा भी पढते जाते हैं रोते हैं जार जार
सब प्रादमी ही करते हैं मुर्दे का कारोबार
और वह जो मर गया है सो है वह भी आदमी
'नजीर' को 'ऊचे' सिद्धातो का मोह नही था। ये
सिद्धात उन्हे अपने स्वाभाविक मनोभावो के प्रकाशन से रोक
कर उनके जीवन को हमारे जीवन की भाति कृत्रिम न बना
सके थे । केशवदाम का यह दोहा देखिए
'केसव' फेसन अस क्री जस अरिहू न कराहिं
चन्द्रवदनि मृगलोचनी बावा कहि कहि जाहिं
हमारे लिए प्राज यह दोहा मान परिहास की सामग्री है।
लेकिन क्या कोई दिल पर हाथ रखकर कह सकता है कि प्रौढा-
वस्था प्राप्त होने पर उसका हृदय भी यही नही कहता है ?
हा, यह जरूर है कि हमने सामाजिक व्यवस्था के लिए अपनी
सामर्थ्य के अनुसार कुछ नियम बनाये है और जब हमारी
भावनाए मर्यादा के इन नियमो से टकराती है तो हम उन्हे
दूसरो से छुपाते-छुपाते अपने से भी छुपाने लगते हैं। किन्तु
-
२४
नजीर
कलाकार को तो केवल मनोभावो के प्रयाशन से मतलव है।
सत्य का तकाजा यही है । सत्य के प्रकाशन के लिए साहस की
आवश्यकता है । 'नज़ीर' मे यह साहस इतना बढा हुआ था
कि स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने वाले जनसाधारण ही उसे
बर्दाश्त कर पाते, कृत्रिम जीवन के अभ्यस्त अभिजात वग के
लिए यह वर्दाश्त के बाहर की चीज़ थी। सत्य का सामना न
कर सकने पर उसे 'अश्लीलता' कहा जाता है । 'नजीर' पर
भी 'अश्लीलता' का फतवा लगा दिया गया क्योकि वे यह
पक्तिया भी लिख सकते थे
गर नायका उनमे कोई बूढी है कहाती
अलबत्ता बुढापे पे वो टुक रहम है खाती
फीकी सी, पुरानी सी लगावट है जताती
पर वह है हमको वो ज़रा खुश नहीं पाती
सव चीज़ को होता है बुरा हाए बुढापा
आशिक को तो अत्लाह न दिखलाए बुढापा
जब आप जी भर हंस लें तो ज़रा यह भी गौर कर
लीजिएगा कि उन्नीसवी शताब्दी के भारतीय समाज मे एक
प्रेमी के-वह कलाकार ही क्या होगा जो प्रेमी न हो-बुढापे
का इससे ज्यादा सही चित्रण कही और मिल सकता है
विरोधाभास
नजीर' अक्सर 'परस्पर विरोधी बातें कहते हैं। एक तरफ
वे कहते हैं कि "सब ठाठ पड़ा रह जायेगा जब लाद चलेगा
बजारा" और संसार को प्रसारता के गीत गाते हैं और विश्व
?
नजीर
के कण-कण मे ईश्वर के दर्शन करते है
हर आन मे हर बात मे हर ढग मे पहचान
आशिक है तो दिलबर को हर-इक रग में पहचान
दूसरी ओर वे निधनता की निन्दा और धन की प्रशसा
करने लगते है और दुनियादारी की बातें कहते-कहते यहा तक
कह डालते हैं
-
,
सच है कहा किसी ने कि 'भूखे भजन न हो'
अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटिया
वैराग्य और ईश-प्रेम की बातो के माथ ही 'नज़ीर' मेलो-
ठेलो, तैराकी, चिडियो, जानवरो की लडाई और लैला-मजनू
को कथा का भी वणन करने लगते है और खूब वणन करते
हैं । 'रोछ का बच्चा का एक वद देखिए
इक तरफ को थी सैकडो लडको की पुकारें
इक तरफ को थी पीरो-जवानो की कतारें
कुछ हाथियो की कीक और कटो की डकारें
गुल, शोर, मजे, मोड, ठठ, अम्बोह, बहारें
जब हमने किया लाके खडा रीछ का बच्चा
'नजीर' का यह 'परस्पर विरोध' आज के सिद्धातवादी-
बुद्धिवादी मस्तिष्क के लिए उलझन और खीझ का कारण बन
जाता है। सम्भवत इसीलिए अाधुनिक आलोचक उनकी
प्रशसा करते-करते मिभक जाते हैं। लेकिन आखिर क्या किया
जाय? जोवन यो तक और सिद्धातो के साचे मे फिट करके
तो नही रखा जा सकता । 'नजीर' का कसूर अगर कुछ है तो
सिर्फ इतना कि उन्होंने जोवन की विशालता को भी देखा पा
,
२६ नजीर और जीवन के परस्पर विरोधो मे सन्निहित मौलिक एकता को भी। इस तथ्य को समझते और मानते सभी हैं लेकिन 'नजीर' ने इसे 'देख लिया था और जो देखा उसे ईमानदारी से कह भी दिया। जहा तक जीवन-रूपी पुस्तक के विस्तृत अध्ययन का प्रश्न है मुझे 'नजीर' से आगे बढा हुआ साहित्यकार और कोई नही मिला-कम से कम पूर्वीय देशो मे । 'नज़ीर' ने लगभग ६५ वष की आयु भोगी और सच्चे अर्थों मे भोगी। ऐश आराम से न रहने पर भी उन्होने जीवन का पूरा आनद लिया, ससार की तथाकथित छोटी से छोटी बातो मे पूरी दिलचस्पी ली और उन सभी वातो को इस तरह सामने रख दिया कि और लोग भी जीवन का पूण उपयोग कर सकें। साधारण जीवन म उहोने जाडा, गर्मी, वरसात, तरबूज, कोरे बर्तन, आगरे की ककडी, तिल के लड्डू आदि में रस लिया। सौंदर्योपासना के क्षेत्र मे मनुष्यो के सौदय से लेकर बहार, चादनी, ताजमहल- सभी का जी भर अानन्द लिया। सोचने बैठे तो बचपन, जवानी बुढापा, मौत का बडका-सभी को सोच डाला। मेलो तमाशो में ईद, होली (होली मालूम होता है उनका प्रिय त्योहार था क्योकि उसपर दस नज्मे लिखी है), दीवाली आदि से लेकर क्वतर-बाजी, रीछ का बच्चा, गिलहरी का बच्चा-सब का तमाशा देख डाला। भक्ति भाव उमडा तो धार्मिक प्रतिबधो की भी परवा न की और हजरत मुहम्मद और हजरत अली से लेकर सूफी सत शेख सलीम चिश्ती और फिर नाना तथा - नजीर कृष्ण, महादेव के चरणो में भी श्रद्धा के फूल चढा दिये । और यह सब जी भर देखने-सुनने के बाद जब जीवन को नश्वरता का ध्यान आया तो 'बजारा नामा' और 'फकीरो की सदा' लिखकर सासारिक विषय-वासना मे फसे लोगो को चेतावनी देने लगे। गौर अत में ईश्वर के प्रेम में अपना पूरा अस्तित्व समर्पित करके अत मे 'मौत के धडके' को भी दूर कर डाला। जन्म से लेकर मरण-पर्यंत पूरे जीवन का इस उत्साह के साथ वर्णन कही और नहीं मिलता। यही 'नजीर' का पूण यथाथ- वाद है। पौरो ने हमे यथार्थवाद के नाम पर जीवन का कोई एक कोना उघाड कर दिखाया है, 'नजीर' ने सम्पूर्ण जीवन को उघाड कर रख दिया है और उसम शोख रग भर दिये हैं। औरो से हमे धरती के गोत वर्ग विशेप की पृष्ठ-भूमि म सुनने को मिले है, 'नजीर' ने धरती-आकाश के गीतो को सारी मानवता की पृष्ठ भूमि में पेश कर दिया है। पोरी ने विशिष्ट सिद्धातो के माध्यम से हमे जीवा के सत्य के अशत दर्शन कराये हैं, 'नजीर' ने सिद्धातो को ताक पर रखकर केवल अनुभूति और निरीक्षण के वर्त पर हम विशाल यथाथ ( चाहे तो उसे सत्य भी कह लीजिये) दिखलाने की कोशिश की है। औरो के यहा हमे असाधारणता का प्रेम मिलता है और उन्होने असाधारणता को भी साधारण बना दिया है, 'नजीर' २८ नजीर ने साधारण ही को असाधारण बना कर उसमें चमत्कार पैदा कर दिया है। हमारी निगाहे अभी इतने विशाल यथार्थ-सत्य के विराट रूप के दर्शन के लिए शायद कच्ची पडें । हमें आशा है कि शायद हम पायदा कभी उस सत्य को देख सकेंगे जिसे ' नजीर' ने डेढ-दो सौ वप पहले देख लिया था। कला और भाषा उदू के काव्य-शास्त्र को दृष्टि से 'नजीर' की रचनामो में वहुत-सी गलतिया होती है। वे रदीफ, काफिया, उच्चारण, ध्वनि सी दय की परवा करते नहीं दिखायी देते । एक तरह से यह कमजोरो' 'नजीर' के लिए अच्छी ही साबित हुई। काव्य- शास्त्र के बधनो मे रहने पर उनकी चेतना इतने उन्मुक्त रूप से प्रस्फुटित होती या नही इसमे सदेह है। फिर भी 'नजीर' उस हद तक काव्य-नियमो की पावदी तो करते ही है कि कवितानो मे सरनता रहे । वे काव्य सम्बधी नियमो के प्रति विद्रोह नही करते । हा, कभी-कभी उनकी उपेक्षा जरूर कर दिया करते हैं। इस उपेक्षा के दो कारण हो सकते हैं । एक तो यह कि 'नजीर' को क्सिी बवि से स्पर्धा नहीं हुई और उन्हे इस मैदान म जोर-आजमाई या मौवा न मिला। दूसरे यह कि वे दूसरो के कहने पर कविता रच दिया करते थे। मालूम नहीं कितने फत्रीरो, दुकानदारो प्रादि को उन्होने उनके मतलव की कविताएँ रचकर दी। इस दृष्टिकोण से की गई कविता का नतीजा काव्य- नजीर नियमो मे ढिलाई के भलावा और क्या होगा? फिर भी 'नजीर' के काव्य मे हम कलात्मक रूप से दो यात स्पष्ट दिखायी देती हैं (क) 'नजीर' ने अलकारो मे पीछा छुडाकर प्रत्यक्ष काव्य- क्ला के दर्शन कराये हैं । बीसवी शताब्दी में इस मीधी प्रसर डालने वाली शैली का काफी महत्व है लेकिन 'नजीर' ने उन्नीसवी- बलि अट्ठारह्वी-ताब्दी हो मे यह ज़रूरत महसूस कर ली थी। . (ग्य) 'नजीर' ने रूपको (Allegories) का प्रयोग उदू म शायद सबसे अधिक क्यिा है । 'हसनामा', 'बजारानामा' आदि इसके उदाहरण हैं जिनमे मनुष्य के क्षरण-भगुर जीवन को हस, वजारा प्रादि के रूपको मे प्रस्तुत किया है । यह प्रभाव 'नजीर' में स्पष्टत फकोरो की सगत से आया है और तत्सम्बधी विषयो ही पर की गयी कवितामो मे इस शैली का प्रयोग अधिकाधिक हुया है। उनकी नरम 'रीछ का बच्चा' के बारे मे भी कुछ पालोचको का मत है कि रीछ के रूप मे मन के साथ होने वाले सघर्पो का पणन है। भाषा के क्षेत्र म 'नज़ीर' से अधिक उदार कोइ उर्दू कवि नही हुआ है । उन्होने जन-सस्कृति ( जिसमे हिंदू संस्कृति भी शामिल थी ) का दिग्दर्शन कराया है, इसलिए चलताऊ और हिदी के शब्द भी बहुतात से प्रयुक्त किये हैं । व्याकरण-सम्बधी नियमो की दृष्टि से 'नज़ीर' की भापा 'मीर' और 'सौदा' के जमाने को उदू है जिसमे अाज की उर्दू जैसा परिष्कार और
No text on this page.
चयन
No text on this page.
चयन
No text on this page.
-
२
3
ईश्वर-वदना
इलाही तू फरयाज' है और करीम
इलाही तू गफ्फार है और रहीम
मुकद्दस , मुअल्ला', मुनरजा', अजीम
न तेरा शरीक और न तेरा सहीम'
जाते-बाला है मवसे कदीम
तेरे हुस्ने-कुदरत'' ने या किदगार"।
किये हैं जहा मे वो नयशो-निगार'
पहुचती नही अक्ल उन्ह ज़र्रा-वार'
तहय्युर'४ मे हैं देखकर बार-बार
हैं जितने जहा म जहीनो फहीम'५
जमी पर समावात" गर्दा किये
नजूम' उनम क्या-क्या दरख्शा'' क्येि
बेहद नुमाया
क्येि
अया' बहर२ से दुर्गे-मरजा२3 किये
हजर से जवाहर भी और ज़रों-मीम२५
शिगुफ्तार किये गुल ब फस्ले-बहार
अनादिल भी और कुमरी प्रो-ककसार
१ दानी २ कृपालु ३ क्षमाशील दयालु ५ पवित्र ६ उच्च
७ पवित्र ८ उच्च ६ हिस्सदार १० निर्माण कौशल ११ विधाता
१२ चित्र वचित्र्य १३ तनिक भी १४ हैरानी१५ बुद्धिमान १६ आकाश
१७ घूमने वाले १८ सितार १६ चमकने वाले २० बनस्पतिया
२१ प्रक्ट २२ समुद्र २३ मोती, मूगा २४ पत्थर २५ सोना-चादी
२६ प्रफुल्लित २७ बुलबुले २८ फास्ता और तीतर
नवातात.
३४ नजीर लया. वगे - वर्गो • नरूलो - गजर' शाखसार' तरावत से खुशबू से हगाम - कार रवा को सवा हर तरफ और नसीम' वया कब हो खिलकन' को अनवाय' का जो कुछ हस्र' होवे तो जावे कहा खुसूमन बनी - अादमे - सुश शरफ" उन सभी म इन्ही को दिया ये इस्लाम - ग्रो- ईमानो - दीने - कदीम, अता की इन्हे दौलते मारिफत' निको-मजिलत'५ हया, हुस्नो उरफत, अदव, मस्लहत तमीजो-सुखन'६ खुल्क खुश-मक्रमत' फरावा' दिये और नाजो अहसा हो किससे अदा हमे मेह से तूने पैदा किया किये और अत्ताफ२२ बे इन्तहा 'नजीर' इस सिवा क्या कहे सर झुका ये सब तेरे इकराम२३ है, या करीम । इबादत इताअत ४ १८ २० - नईम तेरा शुक्र . १ फ्ल, पत्ते, पड पौधे २ शाखाए ३ नमी ४ भरी ५ सुबह की हवा ६ ठडी हवा ७ सृष्टि ८ विस्मा ९ सीमा १० सुदर मानव जाति ११ सम्मान १२ ईश नान रूपी धन १३ पूजा १४ आनाकारिता १५ नेकी १६ बुद्धि और वारशक्ति १७ शिष्टाचार १८ या भाव १६ अत्यधिक २० ऐश्वय २१ कृपा २२ कृपाए २३ कृपाए
नजीर
३५
शैख सलीम चिश्ती
है दो जहाँ के सुल्ता हजरत मलीम चिश्ती
पालम के दीनो ईमा-हज़रत सलोम चिश्ती
सरदफ्तरे-मुसलमा' हजरत सलोम चिश्ती
मकबूले-खासे-यज्दा हजरत सलीम चिश्ती
सरदारे-मुल्के-इरफा हजरत सलीम चिश्तो
शाहो के बादशा हो बा-ताज बा-लिवा' हा
और किन्लए सफा हो और काबए-जिया हो
खिलकत के रहनुमा हो, दुनिया के मुक्तदा
तुम साहबे-सखा हो महबूबे किविया' हो
है तुम से जेबे-इमका" हज़रत सलीम चिश्ती
शाहो-गदा है तावेन' सब तेरी मुमलिकत के
लायक तुम्ही हो शाहा इस कद्रो-मजिलत'४ के
परव'५
है तुम्हारे सब ख्याने-मकमत"के
शाहा शरफ'तू बख्शे खालिक की सल्तनत के
और तुम हो मीरे-सामा"हजरत सलीम चिश्ती
१ मुसलमानो के नायव २ ईश्वर के परम प्रिय ३ज्ञान के
देश के राजा ४ झडे वाले ५ पवित्रता के पूग्य ६ प्रकारी के पूज्य
७ ससार ८ पथ प्रदशन ६ दानी १० ईश्वर के प्यारे ११ दुनिया
यो रोनर १२ मातहत १३ राज्य
१४ सम्मान
१६ कृपा का दान १७ इज्जत १८ ईश्वर १६ ससार के नायर
१५ पाले
नजीर
है नामे - पाक तेरा मशहूर शहरो बन म
करती हैं याद तुमको ये जाने हैं जो तन मे
है खुल्क' की तुम्हारे खुशबू गुलो ममन मे
खिदमत मे हैं तुम्हारी फिरदौस' के चमन म
जन्नत के हूरो-गिल्मा, हजरत सलीम चिश्ती
है सत्तनत जहा की सब तेरे जेरे-फरमा
चाकर हैं तेरे दर के फगफूर और खाका'
ख्वाने-करम पे तेरे है खल्क' मारी मेहमा
है हुक्म मे तुम्हारे जिन्नो परी- ओ - इसाँ
हो वक्त के सुलेमां हज़रत सलीम चिश्ती
-
तुम सबसे हो मुअज्जम और सबसे हो मुकरम
खिलकत हुई तुम्हारी सब नूर से मुजस्सम"
और खूबियाँ जहा की तुम पर हुई मुसल्लम"
अब-करम' से तेरे दायम' है सन्जो-खुर्रम ४
पालम का सब गुलिस्ता हजरत सलीम चिश्ती
पुश्तो-पनाह" हो तुम हर इक गदा-न-शह के
मुहताज हे तुम्हारी इक लुक की निगह के
१ शिष्टता २ गुलाब और वेला ३ स्वग
बादशाह ५ पुराने तुक बादशाह ६ ससार
& रचना १० पूर्णत
११ पूरी १२ कृपा के बादल
१४ प्रसन्न और हरा १५ सहारा
पुराने चीन के
७ महान ८ सम्मानित
१३ सदा
नजीर
३७
मजिल पे आके पहुचे सालिक' तुम्हारी रह के
खाके कदम तुम्हारी और चश्मरे मेहो-मह' के
हो रोशनी के सामां हजरत सलीम चिश्ती
क
पालम है सब मुअत्तर तेरे करम' की बू से
हुरमत है दोस्तो को हजरत तुम्हारे रू से
यह चाहता हू अब मैं सी दिल को प्रारजू से
रसियो 'नजीर' को तुम दो जग म आवरू से
ऐ मूजिदे हर-ग्रहमा हजरत सलीम चिश्ती
२ शाख
१ चलने वाले
६ हर कृपा करने वाले
३ सूय चद्र ४ सुगधित ५ कृया
३८
नजीर
गुरु नानक
कहते हैं नानक शाह जिन्ह वह पूरे हैं पागाह' गुरु
वह कामिल रहार' जग में है यू रोशन जैमे माह गुरू
मयमूद मुगद उम्मीद सभी बर लाते हैं दिलम्वाह गुरू
नित लुत्फो-करम' से करते है हम लोगो का निवाह गुरु
इस वस्शिश के इस अज़मत के हैं वाया नानक शाह गुरू
मव मीम झुका अरदास करो और हरदम वोलो वाह गुरू
हर पान दिलो विच या अपने जो ध्यान गुरू का लाते हैं
और सेवक होकर उनके ही हर सूरत बीच कहाते हैं
गुरु अपनी लुत्फो-इनायत से सुख चैन उसे दिखलाते हैं
खुश रखते हैं हर हाल उन्हे सब उनके काज बनाते हैं
इस बरिशश के इस अजमत के हैं बाबा नानक शाह गुरु
सब सीस झुका अरदास करो और हरदम बोलो वाह गुरू
दिन-रात मभो ने या दिल दे है यादे गुरू से काम लिया
सब मन के मकसद भरपाये खुश-वक्तो का हगाम' लिया
दुख दर्द में अपने ध्यान लगा जिस वक्त गुरू का नाम लिया
पल बीच गुरू ने पान उन्हे खुशहाल किया और थाम लिया
इस बख्शिश के इल अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरू
सब सीस झुका अरदास करो और हरदम बोलो वाह गुरू
५ अभिलाषा
१ नानी २ पूण ३ पथ प्रदशक
४ चद्रमा
६ कृपा ७ महानता ८ अभिलापाए ६ समय
नजीर
या जो-जो दिल की रवाहिश की कुछ बात गुरु से कहते है
वो अपने लुत्को शफकन' से नित हाथ उन्हो के गहते है
अल्ताफ से उनके सुरा होकर मव खूबी से यह कहते हैं
दुख-दर्द उन्हो के हरते है मौ सुख से जग मे रहते है
इस बख्शिश के इस अज़मत के है बाबा नानक शाह गुरु
मव सीस मुका अरदाम करो और हरदम बोलो वाह गुरू
जो हर दम उनसे व्यान लगा उम्मीद करम को घरते हैं
वो उन पर लुत्फो इनायत की हर आन तवज्जह करते हैं
असबाब खुशी और खूबी के घर बोच उन्हो के भरते हैं
आनन्द इनायत करते है सब मन की चिन्ता हरते है
इस बख्शिश के इस अज़मत के है बाबा नानक शाह गुरू
सव मीस झुका अरदास करो और हरदम बोलो वाह गुरू
जो लुत्फो-इनायत उनमे है कब वस्फ' क्सिी से उनका हो
वो लुत्फो करम जो करते है हर चार तरफ हैं जाहिर वो
अल्ताफ जि हो पर हैं उनके सो सूबी हामिल है उनको
हर आन 'नजीर' अव या तुम भी तो बाबा नानक शाह कहो
इस पशिश के इस अज़मत के हैं बाबा नाना शाह गुरु
सब सीस झुका अरदास करो और हरदम वोलो वाह गुरू
.
.
१ कृपा और स्नेह २ कृपाए ३ दया ४ गुण (वरणन)
नजीर
ईदुलफित्र
है प्राविदो' को तातो-तजरीद की सुशी
और जाहिदो' को जुह द की तमहीद की खुशी
रिन्द प्राशिको को है कई उम्मीद की खुशी
कुछ दिलवरो के वस्ल की कुछ दीद की खुशी
ऐसी न शब-परात न बकरीद की खुशी
जैमी हर एक दिल में है इस इद को खुशी
पिछले पहर से उठके नहाने की धूम है
शीरो - शकर सिवय्या पराने की धूम है
पीरो - जवा को नेअमत खाने की धूम है
लडको को ईदगाह के जाने की धूम है
ऐमी न शव बरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल म है इस ईद की खुशी
कोई तो मस्त फिरता है जामे - गराब से
गोई पुकारता है कि छूट अजाब से
कल्ला क्मिो का फूला है लड्डू की चाव से
चटकारें जी मे भरते है नानो कवाब से
ऐसी न शव-वरात न बकरीद की सुशी
जैसी हर एक दिल मे है इस ईद की सुशी
धामिक वृत्य । पालन
१ मस्तो २ उपासना ३ कमवाडिया
६ गराठी ७ दूध चीनी ८ मुसीबत
नजीर
४१
क्या ही मुप्रानके' की मची है उलट-पलट
मिलते हैं दौड - दोड ये वाहम' झपट-झाट
फिरते हैं दिलबरा के भी गलिया मे गट के गट
आशिक मजे उडाते हैं हरदम लिपट लिपट
ऐसी न शव-रात न बकरीद की खुशी
जमी हर एक दिल को है इस ईद को सुशी
काजल हिना गजव मिमी-प्रो-पान की घडी
पिगवाजें सुखं सौसनो, लाही को फुलझडी
कुरतो कभी दिया कभी अगिया कमी कडी
कह "ईद-ईद" लूटें हैं दिल को घडी घडी
ऐसी न शय-वरात न बकरीद की खुशी
जैसी हर एक दिल का है इस ईद की खुशी
-
रोजो की सस्तियो मन हाते अगर असीर
तो ऐसी ईद की न सुशी होती दिल पिजीर'
मब शाद हैं गदा' से लगा शाह ता वजीर'
देखा जो हमने ख्व तो सच है मिया 'नजीर'
ऐसी न शव-वरात न बकरीद की सुशी
जैसी हर एक दिल को है इस ईद की खुशी
१ गले मिलना २ आपस में ३ झुड ४ कद ५ मानदकारी
६ भिखारी ७ बादशाह स मत्री तक
४२
नज़ीर
होली
होली यो बहार पायो फरहत' की खिली कलिया
बाजो की सदानो से कूचे भरे और गलिया
दिलवर से कहा हमने टुव छोडिए छलवलिया
अब रंग गुलालो पो कुछ कीजिए रगरलिया
होली में यही धूमे लगती हैं बहुत
भलिया
है सब में मची होली अब तुम भी ये चरचा लो
रग्ववानो अवीर ऐ जा और मय को भी मगवालो
हम हाथ मे लोटा लें तुम हाथ में लुटिया लो
हम तुमको भिगो डालें तुम हमको भिगो डालो
होली मे यही धूमे लगती हैं वहुत भलिया
है तज जो होली की उस तज हंसो - बोलो
जो छेड है इशरत की अब तुम भी यही छेडो
हम डालें गुलाल ऐ जा ! तुम रग इधर छिडको
हम बोले 'अहाहाहो' तुम बोलो 'उहोहोहो'
होली मे यही धूमे लगती हैं बहुत भलिया
इस दम तो मिया हम तुम इस ऐश की ठहरावे
फिर रग से हाथो मे पिचकारिया चमकावें
कपडो को भिगो डालें और ढग कई लावें
भोगे हुए कपड़ो से आपस मे लिपट जावें
होली मे यही धूमे लगती है बहुत भलिया
१ मानद २ मावाजा ३ भली ४ दाराब
नजीर
४३
यह वक्त खुशी का है मत काम रसो रम' से
से रग गुलाल ऐ जा। और नाज़ के खमचम से
हस हस के बहम' लिपटें इस ऐश के आलम से
हम 'छोड' यह तुम से तुम 'छोड' रहो हम से
होली में यही धूमे लगती है बहुत भलिया
पडो पे जो आपस में अब 77 पडे ढलक
और पड़के गुलाल ऐ जा । रगी हो भवें पलके
कुछ हाथ इधर तर हो कुछ भीगें उधर अलके
हर पान हसें कूदें इशरत के मजे झलयें
होली मे यही घूमे लगती हैं बहुत भलिया
सुम रग इधर लामो और हम भी उधर पायें
कर ऐश की तय्यारी धुन होली की बर लावें
और रग के छीटो की आपस मे जो ठहरावें
जब खेल चुके होली फिर सीनो से लग जावें
होली में यही धूम लगती हैं बहुत भलिया
इस वक्त मुहय्या है सब ऐशो - तरब की दशै
दफ बजते हैं हर जानिव और वोनो-रुवाबो-ने'
हो तुम मे भी और हममे होली की है जो कुछ रे"
सुनकर ये 'नजीर' उसने हस कर ये कहा "मच है
होली मे यही लगती है बहुत भलिया"
.
.
१ भागना २ नापस में ३ प्रस्तुत ८ विलास ५ चीज ६ चीन,
रखाव और बामुरी ७ राय
नजीर
आगरे को तैराकी
जब परने पी रत मे दिलदार पैरते हैं
आशिक भी साथ उनके गमस्वार परते हैं
भोले सयाने नाला हुशियार पैरते है
पीरो - जवान लडके
अय्यार पैरते हैं
अदना' गरीव मुफलिस जरदार पैरते हैं
इस आगरे मे क्या क्या ऐ यार पैरते हैं
बरसात मे जो यावर चढता है खूब दरिया
हर जा' सुरी व चादर, वद और नाद, चकवा
मेडा, भवर, उछालन, चक्कर, समेट, नाला
भेंडा गभीर, तख्ता, कस्सी, पछाड गर्रा
वा भी हुनर से अपने हुशियार पैरते हैं
इस आगरे मे क्या क्या ऐ यार परते हैं
तिरबेनी मे गहाहा होती है क्या बहारें
सिलकत के ठठ, हजारो पैराक की कतारें
पैरें, नहावें, उछलें, कूदें, लडें, पुवारे
ले ले बो छीट गोते सा खा के हाथ मारे
क्या क्या तमाशे कर कर इजहार पैरते है
इस आगरे में क्या क्या ऐ यार पैरते हैं
जमना के पाट गोया सहले-चमन है बारे
पैराक उसमे पैरें जैसे कि चाद तारे
१ छोदे
२ निधन
३ धनी
५ दुनिया
६ दिखाकर
४ जगह
नजीर
४५
मुह चाद के से टुकडे तन गोरे प्यारे प्यारे
परियो से फिर रहे है मझधार और किनारे
कुछ वार पैरते हैं कुछ पार परते है
इस आगरे में क्या क्या ऐ यार पैरते हैं
कितने खडे है पैरें अपना दिखा के सीना
मीना चमक रहा है हीरे का ज्यू
नगीना
आधे बदन पे पानी आवे पे है पसीना
मौं' का बह चला है गोया कि इक करीना'
दामन कमर पे, वाधे दस्तार पैरते है
इस आगरे में क्या क्या ऐ यार पैरते हैं
जाते है इनमे क्तिने पानी पे साफ सोते
कितनो के हाथ पिंजरे कितनो के सर पे तोते
कितने पतग उडाते कितने सुई पिरोते
हुक्को का दम लगाते हस हस के शाद होते
सौ सौ तरह का कर कर विस्तार परते है
इस आगरे में क्या क्या ऐ यार पैरते हैं
कुछ नाच को बहारें पानी के कुछ किनारे
दरिया में मच रहे हैं इन्दर के सौ अखाडे
लबरेज गुलरुखी ५ से दोनो तरफ कगारे
बजरे व नाव चप्पू डोगे बने निवाडे
२ पक्ति
१ सव ईरान वा एक सीधा और मुदर वृभ होता है
३ पगडी
४ भरे हुए ५ मुन्दर व्यक्तियो
नजीर
हा जमपटी से होकर सरशार परते हैं
इग प्रागरे में मया मया ऐ यार परते हैं
नावो में यह जो गुल-र' ची में घर रहे हैं
जोडे बदन म रगी, गहो भभक रहे हैं
ता हवा में उड़ती तवले सडर रहे हैं
ऐशो तरव को धूम, पानी पक रहे हैं
सो ठाठ ये बनाकर प्रतवार' परते हैं
इग मागरे में यया क्या ऐ मार परते है
हर पान बोलते हैं सय्यद यवीर को जे
फिर इसके बाद अपने उस्ताद पीर की ज
मोरो-मुकुट पहैया जमुना ये तीर की जै
फिर गोल ये सब अपने खुर्दो क्योर मी जे
हर दम ये पर सुशी की गुपतार पैरते हैं
इस प्रागरे मे क्या क्या ऐ यार परते हैं
क्या क्या 'नजीर' या के हैं परने के वानी
है जिनके पैरने भी मुल्फो मे IT मानी
उस्ताद और सलीफा शागिद यारे जानी
सब खुश रहे, है जब तक जमुना के बीच पानी
क्या क्या हसी-सुशी से हर बार परते हैं
इस आगरे मे क्या क्या ऐ यार पैरते हैं
१ सुदरियो २ रास रग ३ ढग
४ छोटे-बडे ५ प्राविष्वारक
नजीर
४७
रीछ का बच्चा
कल राह में जाते जो मिला रीछ का बच्चा
ले आये वही हम भी उठा रीछ का बच्चा
सौ नेप्रमते मा-साके पला रीछ का बच्चा
जिस वक्त वडा रीछ हुमा रीछ का बच्चा
जब हम भी चले साथ चला रीछ का बच्चा
था हाथ म इक अपने मवा मन का जो सोटा
लोहे को कडी जिसपे खडकती थी सरापा'
काधे पे चदा झोलना और हाथ में प्याला
बाजार मे ले आये दिखाने को तमाशा
आगे तो हम और पीछे था वह रीछ का बच्चा
था रीछ के बच्चे के वो गहना जो सरासर
हाथो में कडे सोने के बजते थे झमक कर
कानो मे दुर' और धुधरू पडे पाव के प्रदर
वह डोर भी रेशम की बनाई थी जो पुर-जर
जिस डोर से यारो था बधा रीछ का बच्चा
झुमके वो झमकते थे पडे जिसपे करनफूल
मुक्कोश' की लडियो की पडी पीठ पर झूल
और उनके सिवा कितने बिठाये थे जो गुलफूल
यू लोग गिरे पडते थे सर-पाव की सुध भूल
गोया वो परी था कि न था रीछ का बच्चा
१ उपर से नीचे तक
चादी के तारो के काम की
२ माती
३ साने
'काम की ४ सोने-
४८
नजीर
.
२
इक तरफ को थी सैकडो लडको की पुकारें
इक तरफ को थी पीरो-जवानो की कतारें
कुछ हाथियो की कीक और ऊटो की डकारें
गुल, शोर, मजे, भीड, ठट्ठ, अम्बोह', बहारें
जब हमने किया लाके खडा रीछ का बच्चा
कहता था कोई हमसे "मिया प्रानो कलन्दर
वह क्या हुए अगले वो तुम्हारे थे वो वदर"
हम उनसे ये कहते थे, "ये पेशा है कल दर
हा छोड दिया बाबा उन्हे जगले के अदर
जिस दिन से खुदा ने ये दिया रीछ का बच्चा
मुद्दत मे अब इस बच्चे को हमने है सधाया
लडने के सिवा नाच भी है इसको सिखाया"
यह कहके जो ढपली के तई गत पे बजाया
इस ढब से उसे चौक के जमघट मे नचाया
जो सब को निगाहो मे खुवा रोछ का बच्चा
फिर नाच के वह राग भी गाया तो वहा वाह
फिर कहरवा नाचा तो हर इक बोली जवा "वाह"
हर चार तरफ सेती' कहे पीरो-जवा "वाह"
सब हसरे ये कहते थे "मिया वाह, मिया वाह,
क्या तुमने दिया खूब नचा रीछ का बच्चा"
जब कुश्ती को ठहरी तो वही सर को जो झाडा
ललकारते ही उसने हमे पान
लताड़ा
१ भोड
० फीर ३ जगल
नजीर
४६
गह' हमने पछाडा उसे, गह उसने पछाडा
इब डेढ पहर फिर हुमा कुश्ती का अखाडा
गो हम भी न हारे न हटा रीछ का बच्चा
यह दांव म पेची में जो कुश्ती के हुइ देर
यू पडते पे पैसे वि' आधी मे गोया बेर
सब नक्द हुए माके सवा लाख रुपे देर
जो कहता था हर इर से इमी तरह से मुह
"यारो तो लडा देसो जरा रीछ का बच्चा"
कहता था खडा जो कोई कर पाह, "अहा हा
इसके तुम्ही उस्ताद हो वल्लाह अहा हा
यह सहर किया तुमने तो नागाह पहा हा
क्या कहिए गरज आखिरश, ऐ वाह अहा हा
ऐसा तो न देखा न सुना रीछ का बच्चा"
जिम दिन से 'नजीर' अपने तो दिलशाद यही हैं
जाते हैं जिधर को उधर इरशाद यही हैं
मव कहते हैं, वह साहवे इजाद यही हैं
क्या देखते हो तुम सडे ? उस्ताद यही हैं
कल चौक म था जिनका लडा रीछ का बच्चा"
.
.
२ ईश्वर को मौगध
४ अचानक
५ आविष्कारत
५०
नजीर
बचपन
पिन्हा ले
क्या दिन थे यारो वह भी थे जब कि भोले भाले
निकले थी दाइ लेकर फिरती कभी दिदा' ले
चोटी कोई रखाले बद्धो कोइ
हमली गले मे डाले, मिन्नत कोई बढा ले
मोटे हो या कि दुबले गोरे हो या यि काले
क्या ऐश लूटते है मासूम भोले भाले
दिल मे किसी के हरगिज़ नै शम नै ह्या है
आगा भी खुल रहा है पीछा भी खुल रहा है
पहने फिरे तो क्या है नगे फिरे तो क्या है
या यू भी वाह वा है और वू भी वाह-वा है
कुछ खाले इस तरह से कुछ उस तरह से खाले
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले
मर जाये कोई तो भी कुछ उनका गम न करना
नै जाने कुछ बिगडना नै जाने कुछ सवरना
उनकी बला से घर म हो कैद या कि घिरना
जिस बात पर ये मचले फिर वह ही कर गुज़रना
मा ओढनी को, यावा पगडी को बेच डाले
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले
बुग
नौकरानी
२ न
नजीर
जो कोई चीज देवे नित हाथ प्रोटते है
गुड, बेर, मूली, गाजर सब मुह मे घोटते है
बावा की मोछ, मा की चोटी खसोटते हैं
गर्दो म अट रहे है खाको मे लोटते है
कुछ मिल गया सो पीले कुछ बन गया सो खाले
क्या ऐश लूटते है मासूम भोले भाले
जो उनको दो सा खालें फोका हो या सलोना
है बादशह से बेहतर जब मिल गया सिलीना
जिस जा पे' नीद आई फिर वा ही उनको सोना
परवा न कुछ पलग की नै चाहिए बिछौना
भोपू कोई बजाले फिरकी कोई फिरा ले
क्या ऐश लूटते है मासूम भोले भाले
यह बालेपन का यारो पालम अजव बना है
यह उन वह है इसम जो है सो बादशा है
और सच अगर्चे पूछो तो बादशा भी क्या है
अब तो नजीर' मेरी सबको यही दुआ है
जीतें रहे सभो के आसो-मुराद वाले
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले
.
.
१ जगह
नजीर
५२
जवानी
क्या ऐश की रखती है सब पाहग' जवानी
करती है बहारो के तई ग जवानी
हर पान पिताती है मै और भग जवानी
करती है कही सुलह कही जग जवानी
इस ढव के मजे रखती है और ढग जवानी
आशिक को दिखाती है अजव रंग जवानी
अल्ला ने जवानी का वो आलम है बनाया
जो हर कही पाशिक, कही रुसवा, कही शैदा'
फन्दे मे कही जो है कही दिल है तडपता
मरते हैं, सिसकते हैं, बिलखते हैं अहा-हा
इस ढव के मजे रखती है और ढग जवानी
आशिक को दिखाती है मजव रग जवानी
लडती है कही पाख, कही दिष्ट , कही सेन
झूठा है कही प्यार किसी से हैं लगे नैन
वादा कही, इकरार कही, सन कही नैन
ने जी को फरागत' है न आँखो के तई चैन
इस ढब के मजे रसती है और ढग जवानी
आशिक को दिखाती है अजब रंग जवानी
उल्फत है कही, मेह्रो-मुहब्बत है कही चाह
करता है कोई चाह कोई देख रहा राह
१ प्रावाज
२ शराव ३ प्रासन
४ दृष्टि ५ न
कारा
नजीर
साकी है, सुराही है, परोज़ाद हैं हमराह'
क्या ऐश हैं, क्या ऐश हैं, क्या ऐश हैं वल्लाह
इस ढव के मजे रखती है और ढग जवानी
आशिक पो दियाती है अजव रंग जवानी
गर रात किसी पाम रहे एश मे गलतान'
और वा से किमी और के मिलने का हुमा ध्यान
घबरा के उठे जब तो गिरे पाव पे हर प्रान
कहती है "हमे छोड के जाते हो किधर जान "
इस ढव ये मजे रसती है और ढग जवानी
आशिक को दिसाती है अजब रग जवानी
रस्ते म निकलते है तो होती है ये चाह
वह शोख, कि हो बद जिन्ह देव के राह
खासे है कोई हमके कोई भरती है आहे
पडतो हैं हर इक जा' से निगाहो पे निगाह
इस ढब के मजे रखती है और ढग जवानी
आशिक को दिसाती है अजब रंग जवानी
जाते हैं तवाइफ म तो वा होती है यह चाव
कहती है कोई इनके लिए पान बना नामो
कोई कहती है "याबैठो", कोई कहती है "या यायो"
नाचे है कोई शोख बताती है कोई भाव
इस ढब के मजे रखती है और ढग जवानी
आशिक को दिखाती है अजब रग जवानी
२ साथ
२ लोटते है
३ जगह
४ वेश्याओ
नजोर
हंस-हंस के कोई हुस्न की छलबल है दिसाती
मिस्मी कोई सुरमा कोई काजल है दिसाती
चितवन की लगावट कोई चचल है दिसाती
कुरती कोई अगिया कोई काजल है दिखाती
इस ढव के मजे रसती है और ढग जवानी
आशिक को दिखाती है अजब रग जवानी
कहती है कोई, "रात मेरे पास न पाये"
कहती है कोई, "हमको भी खातिर म न लाये"
कहती है कोइ, "किसने तुम्हे पान खिलाये ?"
कहती है कोई, "घर को जो जाये हमे खाये"
इस ढब के मजे रखती है और ढग जवानी
आशिक को दिखाती है अजब रग जवानी
क्या तुमसे 'नजीर' अब मैं जवानी की कहू वात
इस सिन' म गुजरती है अजब ऐश से औकात
महबूब परीजाद चले आते हैं दिन-रात
सरें हैं, बहारें हैं, तवाजे हैं, मुदारात'
इस ढब के मजे रखती है और ढग जवानी
आशिक को दिखाती है अजव रग जवानी
.
१भवस्था
२ प्रियतम
३ मत्तार
नजीर
बुढापा
क्या कहर है यारो जिमे पाजाए धुढापा
और ऐशे-जवानी के तई खाए बुढापा
इशरत को मिला साक मे गम लाए बुढापा
हर काम को हर बात को तरसाए बुढापा
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
मागे तो परीजाद ये रखते थे हम घेर
पाते थे चले आप जो लगती थी जरा देर
सो प्राके बुढापे ने किया हाय ये अधेर
जो दौड के मिलते थे वो अब लेते हैं मुह फेर
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
मर्जालस मे जवानो की तोसागर' हैं छलकते
चुहले हैं, यहारें हैं, परीरूहैं झमकते
हम उनके तई दूर से हैं रश्क' से तकते
वह ऐशो-तरब करते है हम सर हैं पटकते
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
१ (शराब के) प्याले
२ सुदरिया ३ ईर्ष्या ४ रास रग
नजीर
थे हम भी जवानी मे बहुत इश्क के पूरे
वह कौन से गुल-रू' है जो हमने नहीं धूरे
अब आके बुढापे ने किये ऐसे अधूरे
पर झड गये, दुम उड गयी, फिरते हैं लेंड्रे
सर चीज को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
क्या यारो उलट हमसे गया हाय ज़माना
जो शोख कि थे अपनी निगाहो का निशाना
छेडे है कोई डाल के दादा का बहाना
कोई ये कहे है कि "कहा जाते हो नाना?"
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
पाशिक को तो अल्लाह न दिसलाय बुढापा
बूढो मे अगर जावे तो लगता नही वा दिल
वा क्योकि लगे दिल तो है महबगो का मायल
महबूबो म जावें है तो सब छेड़ें है मिल मिल
क्या सरत मुसीबत है पडी प्रानके मुश्किल
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
पाघट हो हमारी अगर अरावारी गयी है
ता वा भी लगो साय यही स्वारी गयी है
१ गुरिया
२ प्रसिया
नजीर
५७
सुनते हैं कि कहती हुई पनिहारी गयी है
"लो देखो वुढापे म ये मत मारी गयी है"
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
दरिया के तमाशे को अगर जायें तो यारो
कहता है हर-इक देख के "जाते हो कहा को ?"
और हँस के शरारत से कोई पूछे है बद खू'
"क्यो, खैर है ? क्याखिज्र से मिलने को चले हो?"
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
नाशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
गर नाच में जावें तो ये हमरत है मताती
जो नाचे है काफिर वो नही ध्यान मे लाती
औरो की तरफ जावे तो पाखें है लडाती
पर हमको तो काफिर वो अगूठा है दिखाती
सब चीज को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढ़ापा
नायका उनमें
कोई बूढी है कहाती
अलबत्ता बुढापे पे वो टुक रहम है साती
फीकी-सी
पुरानी-सी लगावट है जताती
पर कहर है हमको यो जरा खुश नहीं पाती
गर
१ दुष्ट २ पानी के महाय देवता ३ अच्छी नहीं लगती
नजीर
.
मव चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
थे जैसे जवानी मे किये धूम
घडक्के
वैसे हो बुढापे मे छुटे पान के छक्के
सब उड गये काफिर वो नजारे वो झमक्के
अव ऐश जवानो को है और बूढो को धक्के
सब चीज को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
यह होठ जो अब पोपले यारो हैं हमारे
इन होठो ने बोसो के बडे रग हैं मारे
होते थे जवानी मे तो परियो के गुजारे
और अब तो चुडैल पान के इक लात न मारे
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
करते थे जवानी मे तो सब पाप से' आ चाह
और हुस्न दिखाते थे वो सब आन के दिल रवाह'
यह कहर बुढापे ने किया प्राह 'नजीर' पाह
अब कोई नही पूछता अल्लाह ही अल्लाह
सब चीज़ को होता है बुरा हाय बुढापा
आशिक को तो अल्लाह न दिखलाय बुढापा
.
.
१ स्वय ही २ मनमोहक
•मौत का डका
दुनिया के बीच पारो नत्र जोस्त' का मजा है
जोतों के वान्ने हो यह डाउ सब का है
पर मर गये तो माखिर सरजम सानेपा है
मैं बात है न बेटा में पार माया है
डरती है रमारो और जो भी पता है
मरने का नाम मा लो मराा परी मता
है दम को यात जो थे मालित ये सपो घर के
जब मर गये तो हरगिज़ घर के रहे 7 दर के
यूं मिट गये वि गोपा थे नक्श रहगुजर
पूछा न फिर पिनी ने यह ये मिया पिपरको
डरती है रूह यारो मोर जी भी मापसा है
मरने या शाम मत सो गरगा पुरी गता है
मरने के बाद उल्फत कोई न फिर जतागे
नै पाम बेटा आवे ने भाई मुह रागाने
जो देखे उनकी सूरत दहशत से भाग गाने
इस मग' की जफाए , पया गया नहीं बनाये
डरती है वह पारो मोर जी भी पता
मरो का नाम मरा तो गरगा धुरी पता है
सपा सरता
१ जिन्दगी २ पायोगी ग
७ निष्ठुरताएं
६ मौत
नजीर
६०
जव रह तन से निकली पाना नहीं यहा फिर
काहे को देखने हैं यह वागो-बोस्ता' फिर
हाथी पे चढके या फिर, घोडे पे चढके वा फिर
जब मर गये तो लोगो यह इश्रतें कहा फिर
डरती है रूह यारो और जी भी कापता है
मरने का नाम मत लो मरना बुरी बला है
घर हो बहिस्त जिसका और भर रही हो दौलत
असबाब इश्रतो के महबूब सूबसूरत
फिर मरते वक्त उनको क्योकर न होवे हसरत
क्या सरत बेबसी है क्या सख्त है मुसीवत
डरती है रूह यारो और जी भी कापता है
मरने का नाम मत लो मरना बुरी बला है
खाने को उनके नेअमत सौ सौ तरह की पाती
और वह न पावें टुकडा देखो टुक उनकी छाती
कौडी की झोपड़ी भी छोडी नहीं है जाती
लेकिन 'नजीर' सब कुछ यह मौत है छुडाती
डरती है रूह यारो और जी भी कापता है
मरने का नाम मत लो मरना बुरी बला है
.
.
१ बाग
२ प्रियतम
नजीर
वरसात को बहारें
हैं इस हवा में क्या क्या बरसात को वहारें
सब्जो की लहलहाहट बागात' की बहारें
बन्दो को झमझमाहट कतरात' की बहारें
हर बात के तमाशे हर घात की बहारें
क्या क्या मची है यारो बरसात की बहार
बादल हवा के ऊपर हो मस्त छा रहे हैं
झडियो की मस्तियो से धूम मचा रहे है
पडते हैं पानी हर जा' जल-थल बना रहे है
गुलजार भीगते हैं सब्जे नहा
क्या क्या मची है यारो बरमात को बहारें
मारे हैं मौज डाबर दरिया उमड रहे है
मोर-प्रो-पपीहे कोयल क्या क्या उमड़ रहे हैं
झड कर रही हैं झडिया नाले उमड रहे हैं
बरसे है मेह झडाझड वादल धुमड रहे हैं
क्या क्या मची हैं यारो वरमात की बहारें
फूलो की सेज पर सोते हैं कितने वन वन
सोहें गुलाबी जूडे फूलो के हार अबरन
कितनो को घर है खाता सूना लगे जो आगन
कोन म पड़ रही है सर मुह लपेट सोगन'
क्या क्या मची हैं यारो बरमात की बहारें
१ बागो २ बूदो ३ जगह ४ लहर ५ विरहिणी
६२
नजार
जो खुश है वह खुशी मे काटे है रात सारी
जो गम मे हैं उन्हो पर गुजरे है रात भारी
सीनो से लग रही है जो है पिया की प्यारी
छाती फटे है उनकी जो है विरह की मारी
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
अब विरहनो के ऊपर है सस्त बेकरारी
हर बूंद मारती है सीने उपर कटारी
बदली की देख सूरत कहती हैं वारी वारी
"है है' न ली पिया ने अब के भी सुध हमारी"
क्या क्या मची है यारो बरसात को बहारें
गाती हैं गीत कोई झूले पे करके फेरा
"मारू जी । आज कोजे या रैन का बसेरा"
है सुश कोई, किसी को है दो गम ने घेरा
मुह जद, वाल विसरे और आसो मे अधेरा
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
और जिनको अव मुहय्यारे हुस्नो की ढरिया हैं
सुर्स और सुनहरे कपडे, इथत की पेरिया हैं
महबूब दिलवरो की जुल्फे विखेरिया हैं
जुगनू चमक रहे हैं रातें अधेरिया है
क्या क्या मची हैं यारो वरसात की बहार
१ हाय-हाय २ प्रस्तुत
नज़ीर
कितनो को महलो अन्दर है ऐश का नजारा
या सायवान सुथरा या वाम का प्रसारा
करता है सैर कोई कोठे वा ले महारा
मुफलिस' भी कर रहा है पूले तले गुजारा
क्या क्या मची हैं यारो बरमात को बहारें
छत गिरने का किमी जा गुल-शोर हो रहा है
दीवार का भी धडका कुछ होश खो रहा है
डर डर हवेली वाला हर पान रो रहा है
मुफलिस सो झोपडे में दिलशाद सो रहा है
क्या क्या मची है यारो बरसात की बहारें
मुद्दत से हो रहा है जिनका मका पुराना
उठकर है उनको मेह मे हर प्रान छत पे जाना
कोई पुकारता है, "टुक मोरी खोल पाना"
कोई कहे है, "चल भी क्यो हो गया दीवाना"
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
मजो पे बीर बहूटी टीलो उपर धतूरे
पिस्सू से मच्छडो से रोये कोई बिसूरे
बिच्छू किसी को काटे कोडा किसी को धूरे
प्रागन मे कनसलाई कोनो मे कनखजूरे
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
१ गरीब २ प्रसन
नजीर
फुसी किसी के तन में सर पर किसी के फोडे
छाती पे गर्मी दाने और पीठ मे ददोडे
खा पूरिया किसी को हैं लग रहे मरोडे
आते है दस्त जैसे दौडें इराकी घोडे
क्या क्या मची हैं यारो वरसात की बहारें
कितने शराब पीकर हो मस्त छक रहे हैं
मैं' की गुलावी आगे प्याले छलक रहे हैं
होता है नाच घर घर घुघरू झनक रहे है
पडता है मेह झडाझड तवले खडक रहे हैं
क्या क्या मची है यारो बरसात की बहारें
हैं जिनके तन मुलायम मैदे की जैसे लोई
वह इस हवा मे खासी अोढे फिरें हैं लोई
और जिनकी मुफलिसी ने शर्मो हया है खोई
है उनके सर पे सिरकी या बोरिये की खोई
क्या क्या मची है यारो बरसात की बहारें
जो इस हवा मे यारो दौलत मे कुछ बडे है
है उनके सर पे छतरी हाथी उपर चढे है
हमसे गरीब गुरबा कीचड मे गिर पडे हैं
हाथो में जूतिया हैं और पायचे चढे हैं
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
नजीर
१५
है जिन कने' मुहय्या पक्का पकाया खाना
उनको पलग पे बैठे भडियो का हिज़ उठाना
है जिनको अपने घर का या नून तेल लाना
है सर पे उनके पसा या छाज है पुराना
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
कीचड से हो रही है जिस जा जमी फिसलनी
मुश्किल हुई है वा से हर इक को राह चलनी
फिमला जो पाव पगडी मुश्किल है फिर सभलनी
जूती गडी तो उनसे क्या ताव' फिर निकलनी
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
क्तिने तो दलदलो की कीचड से फम रहे है
कपड़े तमाम गदे दलदल मे बस रहे है
कितने उठे हैं मर मर कितने उकस रहे हैं
वह दुख मे फम रह हैं और तोग हँस रहे हैं
क्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
यह रुत वो है कि जिसमे खुर्दो कबीर खुश हैं
अदना' , गरीब, मुफलिस शाहो वजीर खुश हैं
माशूक शादो खुरम आशिक अमीर खुश हैं
जितने है अब जहा मे मब ऐ 'नजीर' खुश हैं
क्या क्या मची है यारो बरसात की बहारें
-
.
३ तावत ४ छोटे बडे ५ छाट ६ प्रमन
१ पास २ मजा
७ (प्रेम के) बदी
नज़ार
कोरा बरतन
कोरे वरतन ह वयारी गुलशन की
जिससे खिलती है हर कली तन को
बूद पानी की उनमे जब सनकी
क्या वो प्यारी सदा' है मन-सन को
ताजगी जी की और तरी तन की
वाह क्या वात कोरे वरतन की
कोरा पनिहारी का जो है मटका
उसका जोवन कुछ और ही मटका
ले गया जान पाव का खटका
दिल घडे की तरह से दे पटका
ताजंगी जी की और तरी तन की
वाह क्या बात कोरे बरतन की
कोरे कूजो को देख पालम मे
कूजे मिसरी के भर गये गम मे
यू वो रिसते है पाव' के नम म
जसे डूबे हो फूल शबनम मे
ताज़गी जी की और तरी तन की
वाह क्या बात कोरे वरतन की
१ मावाज
२ प्याला
३ पाना
४ तरा
जोर
६७
जिस सुराही में मर्द पानी है
मोती की याब पानी पानी है
जिन्दगी को यही निगानी है
दोस्तो यह भी बात मानी है
ताजगी जी वी और तरी तन की
वाह क्या बात कोरे बरतन की
जितने नररो नियाज' करते है
और जो पोरो से अपने डरते है
जव किला फूल पान धरते ह
वह भी कोरी हो ठिलिया भरते ह
ताजगी जी की और तरी तन की
वाह क्या वात कोरे बरतन की
कोरो पर जो 'नजीर' जोबन है
जोजरे म कहा वो खनखन है
जिस घडौंची पे कोरा बासन है
वह घडींची नही है गुलशन है
ताजगी जी की और तरी तन की
वाह क्या बात कोरे वरतन की
.
१ भेंट-पूजा २ पुराना वरतन
नजीर
तिल के लड्डू
जाडा म फिर खुदा ने सिलवाये तिल के लड्डू
हर एक स्वाचे में दिखलाये तिल के लड्डू
कूचे गली मे हर जा' विक्वाये तिल के लड्डू
हमको भी दिल से हैंगे खुश आये तिल के लड्डू
जीते रह तो यारो फिर साये तिल के लड्डू
उमदो ने सौ तरह की याकूतिया' बनायी
लौंगो में दारचीनी शक्कर भी ले मिलायी
गर्दी म दौलतो की सौ गम चीजें खायी
औरो ने डाल मिश्री मो पंडिया बनायी
हमने भी गुड मगाकर अधवाये तिल के लड्डू
रख ख्वाचे के रसकर पंकार यू पुकारा
बादाम-भूना चावो और कुरकुरा छुहारा
जाडा लगे तो इसका करता हू मै इजारा'
जिमका कलेजा यारो सर्दी ने होवे मारा
नौ दाम के वो मुझसे ले जाये तिल के लड्डू
जाडा तो अपने दिल मे था पहलवा सुझाडा
पर एक दिल ने उसको रगरग से है उसाडा
जिस दम दिलो जिगर को सर्दी ने पा लताडा
खम ठोक वू ही हमने जाडे को घर पछाडा
तन फेर ऐसा भभका जब खाये तिल के लड्डू
३ वृत्तरिया, बफ्यिा ४ फेरी वाला
५ ज़िम्मेदारी लेना
१ जगह
२ अमीरा
नज़ोर
६६
कल यार से जो अपने मिलने तई गये हम
कुछ पेडे उसकी खातिर खाने को ले गये हम
महबूब' हस के बोला, हैरत मे हो रहे हम
"पेडो को देस दिल म ऐसे खुशी हुए हम
गोया हमारी खातिर तुम लाये तिल के लडडू"
जब उस सनम के मुभको जाडे का ध्यान आया
सब सौदा थोडा थोडा बाजार से मगाया
आगे जो लाके रक्सा कुछ उसको खुश न पाया
चीजें तो वह बहुत थी पर उसने कुछ न खाया
तब खुश हुआ वो, उसने जब पाये तिल के
'लड्डू
जाडे मे जिसको हरदम पेशाव है सताता
उठिए तो जाडा लिपटे, नहीं मूत निक्ला जाता
उनकी दवा भी कोई पूछो हकीम से जा
बतलाये कितने नुसखे पर एक वन न पाया
आसिर इलाज उसका ठहराये तिल के लड्डू
जाडे मे अब जो यारो यह तिल गये हैं भूने
महबूबो वे भी तिल से उनके मजे है दूने
दिल ले लिया हमारा तिल-शकरियो के रू' ने
यह भी 'नजीर' लड्डू ऐसे बनाये तूने
सुन सुन के जिनकी लफ्जत घबराये तिल के लड्डू
.
.
१ प्रियतम २ प्रियतम ३ वहरा
७०
नजीर
दुनिया के अमीरो मे या विगया रहा डका
वरवाद हुए लशकर फोजो पा थवा डका
आशिय तो ये समझे हैं प्रव दिल में बना डका
जो भग पियें उनवा बजता है सदा डका
कूडी वे नकारे पर खतवे वा लगा डवा
नित भग पी और आशिक दिन रात वजा डका
उल्फत के ज़मरु द' को यह खेत को बूटी है
पत्तो की चमक उसके कमस्वाय की बूटी है
मुह जिसके लगी उससे फिर काहे को छूटी है
यह तान टिकोरे की इस बात पे टूटी है
कूडी के नकारे पर खतके का लगा डका
नित भग पी और पाशिक दिन रात बजा डका
--
.
हर आन खडाके से इस ढब का लगा रगडा
जो सुनके खडक उसकी हो बन्द सभी दगडा
चक्कान चढा गहरा और वाघ हरा पगडा
क्या सैर की ठहरेगी, टुक छोडके यह भगडा
कूडी के नकारे पर खतके का लगा डका
नित भग पी और नाशिक दिन रात बजा डका
१ पुखराज
नजोर
इक प्याले के पोते ही हो जायेगा मतवाला
आखो मे तेरी पाकर सिल जायेगा गुल्लाला
क्या-क्या नजर आवेगी हरियाली व हरियाली
श्रा, मान कहा मेरा, ऐ शोस भये लाला
कूडी के नकारे पर खतके का लगा डका
नित भग पी और पाशिक दिन रात बजा डका
हैं मस्त वही पूरे जो कूडो के अदर हैं
दिल उनके बडे दरिया जी उनके समन्दर हैं
बैठे हैं सनम' बुत हो और झूमत मदिर हैं
कहते हैं यही हस-हस पाशिक जो कल दर है
कूडी के नकारे पर खतके का लगा डका
नित भग पी और आशिक दिन रात बजा डका
मब छोड नशा प्यारे पोवे तू अगर सब्जी
कर जावे वही तेरी खातिर मे असर स जी
हर बाग में हर जा' म पाजावे नज़र सब्जी
तेरी भी 'नजीर' अब तो सब्जी मे है मरसब्जी
कूडी के नकारे पर खतके का लगा डका
नित भग पी और पाशिक दिन रात बजा डका
.
.
.
१ मूर्तियां २ मस्त फकीर ३ भग
४ दिल ५ जगह
नजीर
मौत
दुनिया में अपना जो कोई बहला वे मर गया
दिल तगियो से और कोई उक्ता के मर गया
आकिल' था वह तो आप को समझा के मर गया
बे-अक्ल छाती पोट के घबरा के मर गया
दुस पाके मर गया कोइ मुख पाक मर गया
जीता रहा न कोई हर-इक पावे मर गया
दिन रात दुन मची है यहा और पडे है जग
चलती है नित अजल की सना गोली पोर तुफग
जिसका कदम वढा वो मुमा वू ही वे - दिरग'
जो जी छुपा के भागा तो उसका हुआ ये रग
वह भागने मे तेगो - तबर खाके मर गया
जीता रहा न कोइ हर इक प्राके मर गया
गर लास इशरतो से है दिल म ये धूमधाम
या सी मुसीबतो से हुआ गम का अजदहाम'
आखिर को जव अजल ने किया प्रान कर सलाम
गम मे क्सिी हसी के कोइ हो गया तमाम
कोई हूर परिया छाती से लिपटा के मर गया
जीता रहा न कोई हर इक आके मर गया
१ बुद्धिमान २ स्वय ३ मौत ४ भाला ५ बदूप ६ तुरत
७ तलवार और फरसा ८ भीड
नजीर पढकर नमाज कोई रहा पाक बा - वजू कोई शराब पीके रहा मस्त कू - व - क. नापाको पाको मौत के ठहरी न - रू. कोई इबादतो से मुपा होके सुर्ख - ६ नापाक रू-सियाह भी पछता के मर गया जीता रहा न कोई हर इक आके मर गया बिरुफज गर किसी को हुई याद कीमिया या मुफलिसी' म एक ने खूने - जिगर पिया कोई जियादा उम्र से इक दम नही जिया सूखी किसी ने रोटी चवा गम मे जी दिया कलिया पुलाव जर्दा कोइ खा के मर गया जीता रहा न कोइ हर इक आके मर गया पहना लिवासे - सूब अगर इत्र का भरा या चीथडो की गुदडी कोइ प्रोडकर मरा आखिर को जब अजल की चली प्रानकर ह्वा पूले के झोपडे को कोइ छोडकर चला वागी मका महल कोई बनवा के मर गमा जीता रहा न कोई हर इक आके मर गया गर एक बे - वकार' हुग्रा एक कद्रदार मर पर लगा जब पान के तेगे-अजल का वार १ पवित्र २ गली-गली मे ३ सामन ४ उपासनाओं ५ नेक- नाम ६ बदनाम ७ रसायन जिसमे ताने को सोना बना लिया जाता है ८ निधनता ९ मास १० सम्मान रहित
नज़ोर
बेकद्री काम पायो पिसी का न कुछ वकार
था वेहया सो वह तो मुना खोके नगो-पार'
और जिसको शर्म थी सो वो शर्मा के मर गया
जीता रहा न कोई हर इक आके मर गया
कोई ठुड्डी' चावता था कोई मोठ और मटर
जिस दम कजा ने हाथ में ली तेग और सिपर'
काम पायी कुछ फकोरी न कुछ तख्त और छतर
यह खाक पर मुग्रा वो मुग्रा तस्त के उपर
थी जिसकी जैसी कद्र वो पतला के मर गया
जीता रहा न कोई हर इक प्राके मर गया
कितनो मे बढ के ऐसी बढी उल्फतो की चाह
जो जिस्मो - जान एक हुए उनके वाह वाह
आशिक़ मुत्रा तो मर गया माशूक खामख्वाह
माशूक मर गया तो वो आशिक भी करके ग्राह
उस गुल-बदन की कन्न उपर जाके मर गया
जीता रहा न कोई हर इस पाके मर गया
क्या काले पीले शक्ल के क्या गोरे गुल-अज़ार
आशिक कोई है और कोई माशूक तरहदार
ग्राकिल, हकीम-प्रोग्रामिलो-फाजिल' रिसालदार
पडित, नजूमी , वैद, चे दाना' चे होशियार
१ शम २ एक मोटा अनाज ३ ढाल ४ सुदर ५ फूल-से मुखडे
वाले ६ राज्य अधिकारी मोर विद्वान ७ ज्योतिषी
८ या
६ बुद्धिमान
नजोर
७५
दो दिन की शान हर कोई दिग्वला के मर गया
जोता रहा न कोई हर इक भावे मर गया
गया प्रोमो जातपात के, अशराफ' क्या नजीवर
किम्मत से फूटी कौडी किसी को न हो नसीन
जिस दम रजा के हाथ से बद प्राख को, हबीब
क्या होशियार-प्रो प्रापिल प्रो-दाना | क्या तबीय
पोई खाना खाय म गडवावे मर गया
जोता रहा न कोई हर इक प्राके मर गया
मरने के पहले मर गये जो प्रागिकाने जार
वह जिन्दए-प्रवद' हुए ता-हथ बरकरार
क्या कातिबाने-पहले-कलम खुश-नवीम कार'
जितनी किताबें देखते हो लाख या हजार
कोइ लिख के मर गया कोइ लिखवाके मर गया
जोता रहा न कोइ हर इक आके मर गया
पीगे-मुरीद, शाही गदा' मीर' और वजीर
सब पान के अजल के हुए दाम" में असीर'२
मुफलिस, गरीव, साहबे-ताजो अलम सरीर
कौन इस जहा म जिन्दा रहा ऐ मियां नज़ीर'
कोई हजारो ऐश को ठहरा के मर गया
जोता रहा न कोई हर इक आके मर गमा
.
१शरीप २ स्वानदानी ३ मित्र ४ निवित्सर ५ समर ६ वया-
मत तक ७ लेखक ८ मुलेखन क्लाबार राजा रव १० मरदार
११ जाल १२ बदी १३ ताज, झडे और तस्त वे मालिक
नजीर
,
-
बजारा-नामा
टुक हिसों हवा' को छोड मिया, मत देस बिदेस फिरे मारा
कज्जाक अजल' का लूटे है दिन-रात वजाकर नक्कारा
क्या बधिया, भसा, बैल, शुतुर क्या गौने पल्ला सर भारा
क्या गेहू, चावल, मोठ, मटर, क्या आग, धुपा और अगारा
सब ठाठ पडा रह जावेगा जब लाद चलेगा बजारा
गर त् है लक्खी बजारा और खेप भी तेरी भारी है
ऐ गाफिल तुमसे भी चढता इक और वडा ब्योपारी है
क्या शक्कर, मिसरी, कद, गरी क्या सांभर मीठा खारी है
क्या दास, मुनक्का, मोठ, मिरच, क्या केसर, लोग, सुपारी है
सब ठाठ पडा रह जावेगा जव लाद चलेगा बजारा
तू बधिया लादे वैल भरे जो पूरब पच्छिम जावेगा
या सूद बढाकर लावेगा या टोटा घाटा पावेगा
कज्जाक अजल का रस्ते में जब भाला मार गिरावेगा
धन दौलत नाती पोता क्या इक कुनवा काम न आवेगा
सव ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा वजारा
जब चलते-चलते रस्ते मे यह गौन तेरी रह जावेगी
इस बधिया तेरी मिट्टी पर फिर घास न चरने पावेगी
यह खेप जो तूने लादी है सब हिस्सो मे बट जावेगी
धी, पूत, जमाई, बटा क्या, बजारिन पास न आवेगी
सब ठाठ पडा रह जावेगा जब लाद चलेगा बजारा
१ लााच
२ डाकू
३ मौत ४ ऊंट
नज़ीर
७७
.
यह खेप भरे जो जाता है यह खेप मिया मत गिन अपनी
अब कोई घडी पल साग्रत' म यह खेप बदन की है कफनी
क्या थाल कटोरी चॉदी की क्या पीतल की डिविया ढकनी
क्या बरतन सोने चांदी के क्या मिट्टी की हंडिया चपनी
सब ठाठ पडा रह जावेगा जव लाद चलेगा बजारा
यह धूम-धडक्का साथ लिये क्यो फिरता है जगल जगल
इक तिनका साय न जावेगा मौकूफ हुआ जब अन और जल
घर-बार अटारी चौपारी क्या खासा, नैनसुख और मलमल
क्या चिलमन, परदे, फर्श नये क्या लाल पलग और रग-महल
मव ठाठ पडा रह जावेगा जव लाद चलेगा वजारा
कुछ काम न आवेगा तेरे यह लालो-जमरु द सीमो-जर
जब पूजी बाट म बिसरेगी हर पान बनेगी जान ऊपर
नौवत, नक्कारे, वान, निशा, दौलत, हशमत, फौजें, लशकर
क्या मसनद, तक्यिा, मुल्क मका, क्या चौकी, कुर्सी, तख्त, छतर
सब ठाठ पडा रह जावेगा जब लाद चलेगा बजारा
चयो जो पर बोझ उठाता है इन गौनो भारी-भारी के
जब मौत का डेरा प्रान पडा फिर दूने हैं ब्योपारी के
क्या साज जडाऊ, जर' जेवर क्या गोटे थान किनारी के
क्या घोडे जीन सुनहरी के क्या हाथी लाल अवारी के
सब ठाठ पडा रह जावेगा जब लाद चलेगा बजारा
.
२ बद
३ लाल और पुवराज
४ चांदी, सोना
१ घनी
५ मोना
७८
नजीर
मगरूर' न हो तलवारो पर मत भूल भरोसे ढालो के
मव पत्ता तोड के भागेंगे मुंह देख अजल के भालो के
क्या डिब्बे मोती हीरो के क्या ढेर खजाने मालो के
क्या बुकचे ताश , मुशन्जर के क्या तख्ते शाल दुशालो के
सव ठाठ पडा रह जावेगा जब लाद चलेगा बजारा
ग्या सरत मका बनवाता है खंभ तेरे तन का है पोला
त् ऊंचे कोट उठाता है वा गोर गढे ने मुह
खोला
क्या रैनी , खदक, रद बडे, क्या बुज, कनरा अनमोला
गढ, कोट, रहकला, तोप, किला, क्या शीशा दारू और गोला
सब ठाठ पडा रह जावेगा जव लाद चलेगा बजारा
हर पान नफे और टोटे म क्यो मरता फिरता है बन-बन
टुक गाफिल दिल मे सोच जरा है साथ लगा तेरे दुश्मन
क्या लौंडी, बादो, दाई, दिदा क्या बन्दा, चेला नेक-चलन
क्या मसजिद, मदिर, ताल, कुप्रा वया सेतीवाडी, फूल, चमन
सब ठाठ पडा रह जावेगा जव लाद चलेगा बजारा
जव मग फिराकर चायुक को यह वल बदन का हाकेगा
कोई ताज समेटेगा तेग कोई गौन सिये और टॉवेगा
हो ढेर अकेला जगल मे तू खाक लहद' की फांकेगा
उम जगल मे फिर प्राह "जीर' इस तिनका पान न झांकेगा
सब ठाठ पडा रह जावेगा जब लाद चलेगा वजारा
४ चद्र
१ पमडी २ एक तरह का प्रया हुमा पहा
३ वह पहा
जिस पर पेडों का डिजाइन हो
विले की छोटी दीवार
६ दीवार वे पह मूराख जिनम से यदों की मार की जाय । बूढी
नौकगनी ८ मौत ६ वन
नजीर न खुदा की सुदाई तनहा' ने उसे अपने दिले तग मे पहचान हर बाग मे, हर दश्त म हर सग' में पहचान बे-रग मे, बा-रग मे, नै-रग मे पहचान मजिल मे, मुकामात मे, फरसग में पहचान नित स्म म, और हिन्द मे और जग मे पहचान हर राह म हर साथ मे हर सग मे पहचान हर अक्षम' इरादे मे, हर प्राहग' मे पहचान हर धूम मे हर सुलह मे हर जग मे पहचान हर पान में, हर बात में, हर ढग में पहचान आशिक है तो दिलवर को हर इक रग में पहचान का पात कही, शाख कही, फूल कही बेल नरगिस कही, सौसन कही, वेला कही राबेल आजाद कोई सबसे, किसी का है कही मेल मलता है कोई राख, चमेली का कोई तेल करता है कोई, जुल्म को लेता है कोई भेल याँधे कही तलवार, उठाता है कोई सेल" अदना कोई आला, कोई सूखा, कोई डडपेल जब गौर से देखा तो उसी के है ये सब खेल हर पान मे, हर बात म, हर ढग में पहचान आशिक है तो दिलबर को हर इक रग मे पहचान १ फेवन १ जगल ४ रगीन ५ विभिन्नता ६ लगभग छ मील का एक माप ८ अफ्रीका १० अावाज ३ पत्थर ११ घूसा
८०
नजोर
माल
गाता है कोई शौक मे करता है कोइ हाल'
छाने है कोइ खाक उडाता है काइ
हसता है कोई शाद किसी का है बुरा हाल
रोता है कोई होके गमो दर्द म पामाल
नाचे है कोई शोख बजाता है कोई गाल
पहने है कोइ चीथडे प्रोढे है कोइ शाल
करता है कोई नाज दिखाता है कोइ बाल
जब गौर से देखा तो उसो को है ये सब चाल
हर यान म, हर बात में, हर ढग मे पहचान
आशिक है तो दिलबर को हर इव रग मे पहचान
जाता है हरम मे कोई कुरान बगल मार
कहता है कोइ दैर मे पोथी के समाचार
पहुचा है कोइ पार भटकता है कोई वार
बैठा है कोइ ऐश मे फिरता है कोई ज़ार
आजिज' कोइ, बेकस कोइ, जालिम कोई लठमार
मुफलिस कोई नाचार, तवगर' कोइ जरदार"
जख्मी कोह, मादा कोई, अच्छा कोइ बदकार
जब गौर से देखा तो उसी के हैं सब असरार'
हर प्रान मे, हर बात मे, हर ढग में पहचान
आशिक है तो दिलबर को हर इस रग में पहचान
२ पद-दलित
३ बाबा
१ सूफियो का मस्ती म नाचना
४ मदिर ५ विवा ६ घनी
७ धनी
नजोर
८१
मर्दी कही, गर्मी कही, जाडा कही बरसात
दोजख कही बैकुण्ठ कही अर्नो - समावात'
हूरें कही, गिल्मा पही, परिया कही जिन्नात
ऊजड कही, वस्ती वही, जगल कही देहात
मस्ती कही, राहत कही, गदिश कही सकनात'
भादी कही, मातम कही, नूर और यही जुल्मात'
तारे कही, सूरज कही, बुज और कही दिन-रात
जव गौर से देखा तो उमी के है तिलिस्मात'
हर पान मे, हर बात म, हर ढग मे पहचान
आशिक है तो दिलबर को हर इक रग में पहचान
क्या हुस्न कही पाया है अरलाह ही अल्लाह
क्या इश्क क्ही छाया है अल्लाह ही अल्लाह
क्या रंग ये रगवाया है अल्लाह ही अल्लाह
क्या नूर ये भमकाया है अल्लाह ही अत्लाह
क्या धूप है क्या साया है अल्लाह ही अल्लाह
क्या मेहर है क्या माया है अल्लाह ही अलाह
क्या ठाठ ये ठहराया है अल्लाह ही अल्ताह
क्या भेद 'नजीर' पाया है अल्लाह ही अल्लाह
हर पान म, हर बात मे, हर ढग म पहचान
आशिक है तो दिलबर को हर इक रग में पहचान
१ जमीन आसमान
२ घूमना ३ ठहरना ४ अधेरा ५ जादू
८२
नजीर
मुफलिसी
जय प्रादमी के हाल पे पाती है मुफलिमी'
दिम रिस तरह से उसका मतातो है मुफलिसी
प्यासा नमाम रोज़ बिठाती है मुफलिसी
भूखा तमाम रात सुलाती है मुफलिसी
यह दुस वो जाने जिस पे विनाती है मुफलिमा
जो महले-फपल प्रालिमो फाज़िल कहाते हैं
मुफलिम हुए तो क्लमा तलक भूल जाते है
पूछे कोई 'अलिफ' तो उसे 'वे' बताते है
वह जो गरीयो-गुरवा के लडके पढाते हैं
उनकी तो उम्र भर नही जातो है मुफलिसी
जब राटियो के बटने का प्राकर पड़े शुमार
मुफलिस को देवें एक तवगर' को चार-चार
गर और मागे वह तो उसे झिडके बार-बार
इस मुफलिसी का प्राह बया क्या करू में यार
मुफलिस को इस जगह भी चबातो है मुफलिसी
मुफलिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन पर
देता है अपनी जान को एक-एक नान' पर
हर प्रान टूट पडता है रोटी के स्थान पर
जिम तरह कुत्ते लडते है इक उस्तरबान पर
वसा ही मुफलिसो को लडाती है मुफलिसी
१ गरीवी २ विद्वान
४ रोटी
६ हडडी
३ मालदार
५ थाल
नजीर
६३
लाजिम है गर गमो म कोई गोरगुल मचाय
मुफलिस वगैर गम के ही परता है हाय-हाय
मर जाय गर कोई तो वहा से उसे उठाय
इम मुफलिसी की मारिया क्या क्या यह मैं हाय
मुर्दे को चैकफन के गडाती है मुफलिमो
क्या क्या में मुफलिमी की यहूँ स्वारी फाडियां
झाड बगैर घर म विसरती है भवडिया
कोने म जाले लिपटे हैं, छप्पर म मरिया
पैदा न होवें जिम जलाने को लपडिया
दरिया म उनके मुर्दे बहाती है मुफलिसी
बीवी को नथ न लड़के के हाथा बडे रहे
कपडे मिया के वनिये के घर मे पडे रहे
जव कडिया बिक गई तो बडहर मे पडे रहे
जजीर ने किवाड न
पत्थर गडे रहे
आसिर को ईट ईंट सुदाती है मुफलिसी
नक्काश' पर भी जोर जब पा मुफलिसी करे
सब रग दम में करदे मुसब्बर' के किरविरे
सूरत ही उसकी देस के मुह खिंच रहे परे
तसवीर और नक्श' मे वह रग क्या भरे
उमके तो मुह का रग उडाती है मुफलिसी
२चित्रवार ३ विकार
४ रेसानो
नजीर
जब मुफलिसी से होवे कलावत का दिल उदास
फिरता है ले तबूरे को हर घर के पास पास
इक पाव सेर आटे को दिल मे लगा के पास
गोरी का वक्त होवे तो गाता है वह विभास
या तक हवास उसके उडाती है मुफलिसी
मुफलिस जो व्याह वेटी का करता है बोल-बोल
पैसा कहा जो जाके वो लावे जहेज़ मोल
जोर का वह गला है कि फूटा हो जैसे ढोल
घर की हलालखोरी' तलक करतो है ठिठोल
हैबतरे तमाम उसकी उठाती है मुफलिसी
बेटे का ब्याह हो तो न भाई न साथी है
ने रोशनी न वाजे की आवाज़ आती है
मा पीछे एक मैली चदर प्रोढे जाती है
वेटा बना है दूल्हा तो बाबा बराती है
मुफलिस को यह बरात चढाती है मुफलिसी
दरवाजे पर जनाने वजाते हैं तालिया
और घर मे बैठी डोमनी देती हैं गालिया
मालिन गले की हार हो दौडी ले डालिया
सवका खडा सुनाता है बातें रिजालिया
यह ग्वारी यह खराबी दिखाती है मुपतिमी
, भगिन २डर
नजीर
२५
कोई "शूम, बेहया" कोई बोला "निखटट् है"
बेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्ट है
बेटे पुकारते हैं कि "वावा निखटू है"
बीबी ये दिन मे कहती है "अच्छा निग्वटू है"
आखिर निखटू नाम धराती है मुफलिसी
चूल्हा तवा न पानी के मटके में प्रावी' है
पीने को कुछ, न खाने को और न रकाबी है
मुफलिस के साथ सर के तई बेहिजाबी है
मुफलिस की जोरू सच है कि हा सबकी भाभी है
इजत सब उसके दिल की गवाती है मुफलिसी
मुलिस किसी का लडका जो ले प्यार से उठा
वाप उसका देखे हाथ का और पाव का कडा
कहता है कोई "जूती न लेवे कहीं चुरा"
उचक्का, चोर, दगाबाज, गठकटा
मौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफलिसी
दुनिया मे लेके शाह से ऐ यारो ता-फकीर३
खालिफ न मुफलिसी में किसी को करे असोर
अशराफ को बनाती है इक पान म हकोर
क्या क्या मे मुफलिसी की खरावी पहू 'नज़ीर'
वह जाने जिसके दिल को जलाती है मुफलिसी
नटसट,
.
३ फकीर तक
१ प्राय (पानी) ही २ खुलापन
५ वदी ६ दागको
नजोर
रोटिया
जव प्रादमी के पेट मे पाती हैं रोटिया
फूली नही बदन मे समाती हैं रोटियां
आँखें परी-रुखो' से लडाती है रोटियाँ
सोने उपर भी हाथ चलाती है रोटियां
जितने मजे हैं सब ये दिखाती हैं रोटिया
रोटी से जिसका नाक तलक पेट है भरा
करता फिरे है क्या वो उछल-कूद जा ब-जा'
दीवार फादकर काई कोठा उछल गया
ठठ्ठा, हसी, शराब, मनक, साकी, उस सिवा
मौ-सी तरह की धूम मचाती हैं रोटिया
पूछा किसी ने यह किमो कामिल' फकीर से
यह मेह्रो-माह हक ने बनाये हैं काहे से
वह सुन के बोला, "वावा, खुदा तुझको खैर दे
हम तो न चाँद समझे न सूरज हैं जानते
बावा हम तो यह नजर आती हैं रोटिया"
रोटी न पेट म हो तो फिर कुछ जतन न हो
मेले की सैर, स्याहिशे-बागो-चमन न हो
भसे गरीब दिल की खुदा से लगा न हो
सच है कहा किसी ने बि, "भूस भजन न हो"
अल्लाह को भा याद दिलाती हैं रोरिया
१ सुरियों २ हर जगह
३ पूण ८ गूर्य धद्रमा ५ यर
-
नजीर
८७
गेटो से नाचे प्यादा कवायद दिखा दिसा
भसवार नाचे घोडे सो कावा' लगा लगा
घुघरू को वाधे पंक' भी फिरता है नाचता
और इसके सिवा गौर से देखो तो जा-ब-गा
मो मो तरह नाच दिखाती है रोटिया
रोटी के नाच तो है सभो खल्क' म पडे
कुछ भांड भगते ये नही फिरते नाचते
यह रडियां जो नाचे है धूघट यो मुह पे ले
धूघट न जानो दोस्तो तुम जोनहार उसे
इम परदे म ये अपने कमाती है रोटियां
दुनिया में अब वदी न कही और निकोई है
या दुश्मनी व दोस्ती या तुन्द-सूई है
कोई किसी का और किसी का न कोई है
मय कोई है उसी का कि जिम हाथ डोई है
नौकर, नफर' गुलाम बनाती है रोटियाँ
रोटी का अब अजल से हमारा तो है खमीर
म्खी ही रोटो हक मे हमारे है शहदो-शीर'
या पतली होवे मोटी, खमीरोहो या कतीर'
गेहू, जुपार, बाजरे की जैसी हो 'नजीर'
हमको तो सब तरह की ग्युश पाती हैं रोटियां
.
.
एड २ हरकारा ३ दुनिया ४ हगिज ५ नेकी ६ क्रोधी
स्वभाव ७ नोकर' ८ आदि दिवस ६ दूध और शहद १० मामूली
पाटेवी
नजोर
प्रादमी-नामा
दुनिया में पादशह' है सो है वह भी प्रादमी
और मुफलिसो-गदा है सो है वह भी अादमी
जरदार, वे-नवा है सो है वह भी प्रादमी
नेअमत जो खा रहा है सो है वह भी आदमी
टुकडे चवा रहा है सो है वह भी आदमी
अब्दाल, चुत्व, गौस, वली' आदमी हुए
मुनकिर भी आदमी हुए और कुपर के भरे
क्या क्या करिश्मे करफो करामात' के लिए
हत्ता कि अपने जुह दो-रियाज़त के ज़ोर से
खालिक से जा मिला है सो है वह भी आदमी
फरौन ने किया था जो दावा खुदाइ का
शहाद भी बिहिश्त बनाकर खुदा हुआ
नमरूद भी खुदा ही कहाता था बरमला"
यह बात है समझने की आगे कहू
या तक जो हो चुका है सो है वह भी आदमी
या पादमी ही नार' है और आदमी ही नूर
या आदमी ही पास है और आदमी
कुल आदमी का हुस्नो कबह २ मे है या जहूर'
शैता भी आदमी है जो करता है मक्रो जोर
और हादी१४ रहनुमा ५ है सो है वह भी आदमी
१ बादशाह २ फकीरार निधन ३ धनी ४ निधन ५ यह सब
सूफियो के ऊचे दरजे ह ६ चमत्कार ७ यहा तक ८ तपस्या ६ ईश्वर
१० साफ ११ अाग १२ पाप पुण्य १३ जाहिर होना , पथ प्रदशक
१५ पथ प्रदशन
मै क्या
१3
नजीर
मसजिद भी आदमी ने बनायी है या मिया
वनते हैं आदमी ही इमाम' और खुत्ता-स्वारे
पढते हैं आदमी ही कुरान और नमाज या
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतिया
जो उनको ताडता है सो ह वह भी आदमी
या पादमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी पे तेग को मारे है आदमी
पगडी भी आदमी को उतारे है आदमी
चिल्ला के प्रादमी को पुकारे है आदमी
और सुन के दौडता है मो है वह भी आदमी
चलता है आदमी ही मुसाफिर हो, ले के भाल
और आदमी ही मारे है फासो गले में डाल
या आदमी ही सैद है और आदमी ही जाल
सच्चा भी आदमी ही निकलता है, मेरे लाल ।
और झूठ का भरा है सो है वह भी आदमी
या प्रादमी ही शादी है और आदमी विवाह
काजी, वकील प्रादमी और आदमी गवाह
ताशे वजाते आदमी चलते है खामखाह
दौडे है आदमी ही तो मशग्नल जला के राह
और व्याहने चढा है सो है वह भी आदमी
१ नमाज वे नेता २ धामिव वक्ता ३ शिकार
६०
नजीर
लगा
और आदमी नकीव' हो बोले है बार-बार
और आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवार
हुक्का, सुराही, जूतिया दोडे वगल मे मार
काधे पे रख के पालकी हैं दौडते वहार
और उसमे जो पडा है सो है वह भी मामी
बैठे है आदमी ही दुकानें लगा
और आदमो ही फिरते हैं रख सर पे ख्वाचा
कहता है कोई 'लो', कोइ कहता है "ला, रे ला"
किस-किस तरह की बेचे हैं चीज बना बना
और गोल ले रहा है सो है वह भी प्रादमी
तवले, मजीरे, दायरे, सारगिया बजा
गाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा व जा'
रडी भी आदमी ही चाते हैं गत लगा
और आदमी ही नाचें हैं और देख फिर मजा
जो नाच देखता है सो है वह भी आदमी
या आदमी ही लालो - जवाहर हैं ये - यहा'
और आदमी ही खाक से बदतर है हो गया
वाला भी प्रादमी है वि उल्टा है ज्यू तवा
गोरा भी आदमी है कि टुक्डा है चाद या
बदशक्ल बदनुमा है सो है वह भी प्रादमी
.
१ हटो बचा' पग्ने वान प्या- हर जगह
ममय
F
नज़ीर
इक आदमी हैं जिनके ये कुछ जर्क • वक' हैं
स्से के जिनके पाव हैं सोने के फर्क है
झमके तमाम ग़मे रो ता - 4 - शक हैं
कमवाव, ताश, शाल, दुशालो में गह
और चीथडो लगा है सो है वह भी आदमी
हैरा हूँ यारो देयो तो यह क्या मुआग' है
या प्रादमी ही चोर है और पाप ही थाग" है
है छीना झपटी और कही बाग ताग है
देखा तो आदमी ही यहा मिस्ले • राग है
फौलाद से गढ़ा है सो है वह भी आदमी
मरने म आदमी ही कफन करते है तयार
नहला-धुना उठाते है काधे पे कर
कलमा भी पढते जाते हैं रोते है जार जार
सब आदमी ही करते है मुरदे के कारोबार
और वह जो मर गया है सो है वह भी आदमी
अशराफ और कमीने से ले शाह ता-वज़ीर
यह आदमी ही करते हैं सब कारे-दिल-पिज़ीर'
या प्रादमी मुरीद है और आदमी ही पीर
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ 'नज़ीर'
ओर सव मे जो बुरा है सो है वह भी आदमी
सवार
१०
.
१ भडक्दार (कपडे) २ माथे ३ पश्चिम ४ पूर्व तक ५ ड्रो
६ स्वाग ७ चोरो को पता देने वाले ८ गरीफा है मत्री नव
१० अच्छे काम
१२
नजीर
हस-नामा
दुनिया को जो उल्फत का हुआ उसको सहारा
और उसने खुशी को मेरी खातिर' मे उतारा
दसी जो ये गफलत तो मेरा दिल ये पुकारा
आया था किसी शहर से इक हस बेचारा
इक पेड पे जगल के हुमा उसका गुजारा
चहूल, अगन, अवलके, छप्पा, बने, यर
मैना व बये, किलकिले, वगुले भो समन वर'
तोते भी कई तौर के टुइय्याँ कोइ लबर
रहते थे बहुत जानवर उस पेड के ऊपर
उसने भी किसी शाग्व पे घर अपना सवारा
चुलबुल ने किया उसकी मुहब्बत मे खुश-ग्राहग'
और कोकिले कोयल ने भी उल्फत को लिया सग
खजन मे कलिंगो मे थी चाहत की बजी चग
देखा जो तयूरो ने उसे हुस्न मे खुश रग
वह हस लगा सर की निगाहो मे पियारा
सोमुर्ग भी सौ दिल से हुए मिलने के शायक'
गढपस भी पंखियो के हुए झलने के लायक
सारस भी हवासिल भी हुए उसके मुसाफिक
जाज-प्रो-लगड प्रो-जर्रा प्रो शारी' हुए प्राशिक
शिकरो ने भी शक्कर से किया उसका मुदारा
१ जी २ सफेद पर वाले
३ गाना ४ चिडियो ५ एक
काल्पनिक वडा पक्षी
७ एक पोहदार पानी को चिडिया
बाज
६ सवार
नजीर
व
कुछ सब्जक-ओ-बडनक्के व कुछ टनटनो-बरें
पिंडखी से लगा टोटर - ओ - कुमरी - ओ - हरपवे
गोगाई, बगेरे च लटूरे पपोहे
कुछ लाल, चिडे, पोदने, पिद्दे ही न गश' थे
पडरी भी समझती थी उसे आख का तारा
चाहत के गिरफ्तार वटेरे, लवे तीतर
कब्को के तदो' के भी चाहत में बंधे पर
हुदहुद भी हुए हित के बढय्या इधर - उधर
जागो जगन' -प्रो त्तो प्रो-ताऊम' - ओ - कबूतर
सब करने लगे उसकी मुहब्बत का इशारा
शक्ल उमकी वही आके खुपी शाम चिडी के
दी चाह जता फिर वही भापू ने भी अप मे
हरियल भी हुए उमके बडे चाहने वाले
जितने गरज
उस पेड पे रहते थे परिंदे
उस हस पे उन सब ने दिलो-जान को वारा
ग्वाहिश ये हुई उसकी कि हर दम उसे देखें
और उसकी मुहब्बत से ज़रा मुह को न फेरें
दिन-रात उसे खुश रखें नित सुख उसे देवें
मोहवत जो हुई हस की उन जानवरो मे
यक चद रहा खूब मुहब्बत का गुजारा
४ कौन-चीन
१ पासत्त
२ एक सुटर पक्षी ३ तीतर
र भोर ६ पक्षी
नजीर
सव होके सुश उसको मए - उल्फन' लगे पीने
और पीत से हर इक ने वहा भर लिये सोने
हर प्रान जताने लगे चाहत के करीने'
उस हस यो जव हो गये दो-चार महीने
इक रोज वो यारो की तरफ देस पुकारा
या लुत्को करम तुमने किये हम पे हैं जो-जो
तुम सब को ये सूवी है कहा हम से बया हो
तकसीर कोई हम से हुई होवे तो यशो
लो यारो हम पर जावेंगे पल अपने वतन को
अव तुमको मुबारक रहे यह पेड तुम्हारा
अब तक तो बहुत हम रहे फुरसत से हम-पागोश"
अव यादे-वतन दिल की हमारे हुई हम-दोश'
जव हफ जुदाई का परिदो ने किया गोश
इस बात के सुनते ही जो हर इक के उड़े होश
सब बोले, "ये फुरकत' तो नही हमको गवारा
विन देखे तुम्हारे हम क्व चैन पडेंगे
इक आन न देखेंगे तो दिल गम से भरेंगे
गर तुमने ये ठहराई तो क्या सुख से रहेंगे?
हम जितने है सब साथ तुम्हारे ही चलेंगे
यह दद तो अव हम से न जावेगा सहारा
मिले जुल
१प्रेम मदिरा
२ढग ३ कृपाए
६ साथ ७ कान (सुनना) ८ विरह
नज़ीर
फिर हस ने यह बात कहो उनसे कि "ऐ यार
कुछ वत नही अव चलने की साग्रत' से है नाचार"
आखें हुई अश्को से परिंदो की गृहर-बार
इसमे जो शबे-कूच को हुई सुव्ह
नमूदार
पर अपना हवा पर वही उम हस ने मारा
वह हम जव उम पेड से वा को चला नागाह
मुह फेर के ईधर से वतन की ज्युही लो राह
देखा जो उसे जाते हुए वा से, तो पर आह
मब साथ चले उसके वो हमराह हवा-ख्वाह'
हर एक ने उडने के लिए पख पसारा
और हस की उन सबको रिफाकत हुई गालिब'
जब वा से चला वह तो हुई बेबसी गालिव
कुल्फत" जो थी फुरकत की वो सब पर हुइ गालिब
दो कोस उडे थे जो हुई मादगो" गालिब
फिर पर मे किसी के न रहा कुव्वतो-यारा'
पर उनके हुए तर ज्यूही दूरी को पडी प्रोस
रोये कि रिफाकत की करे क्योकि कदमबोस13
यक-थक के लगे गिरने तो करने लगे अफसोस
कोई तीन, कोई चार, कोइ पाच उडा कोस
कोइ पाठ, कोई नौ, कोइ दस कोस मे हारा
१ घडी २ पासू
२ माती बरमान वाली ४ कूच की रात
६ अचानक
८ दाम्ती ६ जोर पर १. दुस
११ थवावट १२ तात १३ पाव चूमना
प्रकट
प्रेमी
नजीर
जब बन न सके उनसे रफीकी' के जोवाकार
और इतने उडे साथ कि कुछ होवे न इजहार
जब देखी वो मुश्किल तो फिर आखिर के तई हार
कोई या रहा कोई वा रहा कोइ हो गया नाचार
कोइ और उडा आगे जो था सब मे करारा
थी उसकी मुहब्बत की जो हर एक ने पी में
समझे थे वो दिल मे बहुत उल्फत को वडी शै'
जव हो गये वेबस तो फिर आखिर ये
चीलें रही कौवे गिरे और बाज भी थक गये
उस पहली ही मजिल म किया सबने किनारा
दुनिया की ये उल्फत है तो उसकी है ये कुछ राह
जर शक्ल ये होवे तो भला क्योकि हो निर्वाह
नाचारी हो जिस जा' मे तो वा कीजिए क्या चाह
सब रह गये जो साथ के साथी थे 'नजीर' पाह
आखिर के तई हस अकेला ही सिधारा
.
१ मित्रता २ चीज़
३ राय
४ जगह
नजोर
कन्हैया जी का खेलकूद
नारीफ करू अब मैं क्या-क्या उस मुरली अधर बजैया की
नित मेवा कुज फिरैया की और बन बन गऊ-चरैया की
गोपाल, बिहारी, बनवारी, दुख हरना, मेह' वरैया की
गिरधारी, सुदर, श्याम वरन और हलधर जू के भैया की
यह लीला है उस न द-ललन, मनमोहन, जसुमति छैया को
रख ध्यान सुनो दडीत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की
इक रोज़ खुशी से गेंद तडी ले मोहन जमुना तीर गये
वा खेलन लागे हँस-हम के यह कहकर ग्वाल और बालन से
जो गेंद पडे जा जमुना मे फिर जाकर लावे जो फेके
वह पाप हो अतरजामो थे क्या उनका भेद काई पावे
यह लीला है उम न द ललन मनमोहन जसुमति-छैया की
रख ध्यान सुनो दडीत करो जै बोलो किशन रन्हैया की
वा किंगन मदन मनमोहन ने सब ग्वालन से यह बात कही
और आप ही भप से गेंद उठा उस कालीदह मे डाल दई
फिर आप ही भप से कूद पडे और जमुना जी मे डुबकी ली
मब ग्वाल सम्वा हैरान रहे पर भेद न समझे इक रत्ती
यह लोला है उस नन्द ललन मनमोहन जसुमति छया की
रख ध्यान सुनो दडौत करो जै बोलो विशन कन्हैया की
१ कृपा
६८
नजीर
यह बात सुनी व्रज नारिन ने तब घर-घर इसको धम मची
नद और जसोटा आ पहुँचे सुध भूल गई अपने तन की
ग्रा जमुना पर गुल-शोर हुआ और ठठठ वधे और भीड लगी
कोई प्रासू डाले हाथ मले पर भेद न जाने कोई भी
यह लीला है उस नन्द ललन मनमोहन जसुमति-छया की
रस ध्यान सुनो दडीत करो जै बोलो किशन कन्हैया की
जिस दह मै कूदे मनमोहन वा पान छुपा था इक काली
सर पाव से उनके प्रा लिपटा उम दह के भीतर देखते ही
फन मारे, पहुँचा जोर किये और पहरो तक वा कुश्ती की
फुकारें ली, बल तेज़ किये, पर किशन रहे या हंसते ही
यह लीला है उस नन्द ललन मनमोहन जसुमति-छया की
रख ध्यान सुनो दडौत करो जै बोलो किशन कन्हैया की
जव काली ने सौ पेच किये फिर एक क्ला वा श्याम ने की
इस तौर बढाया तन अपना जो उसका निकसन लागा जी
फिर नाथ लिया उस काली को इक पल भर मे, ना देर करी
वह हार गया और प्रस्तुत की, हर नागिन भी फिर पाव पडी
यह लीला है उस नन्द ललन मनमोहन जसुमति-छया की
रख ध्यान सुनो दडौत करो जै बोलो किशन कन्हैया की
उस दह म सुन्दर, श्याम वरन उस काली को जब नाथ चुके
ले नाथ को उसकी हाथ अपने फिर हर फन फार नृत्य किये
कर बस में अपने काली को मुसक्याने, मुरली अधर धरे
जव बाहर पाये मनमोहन सब खुश हो ज ज बोल उठे
यह तोला है उस नन्द ललन मनमोहन जसुमति-छैया की
ग्म ध्यान सुनो दडीत करो जै बोलो किशन व हैया की
नजीर
EE
-
ये जमुना पर उस वक्त खडे वा जितने आकर नर-नारी
देख उनको मब खुश-हाल हुए जव वाहर निकले बनवारी
दुस-चिंता मन से दूर हुए अानन्द की आई फिर वारी
सब दरशन पाकर शाद हुए और बोले "जै जै, बलिहारी"
यह लीला है उस नन्द ललन मनमोहन जसुमति छैया की
रख ध्यान सुनो दडीत करो जै वोलो किशन कन्हैया की
नन्द और जसोदा के मन म सुध भूली बिसरी फिर नाई
सुख चैन हुए, दुख भूल गये कुछ दान और पुन्न षी ठहराई
सव ब्रज-वासिन के हिरदै मे अानन्द खुशी उस दम छाइ
उस रोज़ उन्होंने यह भी 'नजीर' इक लीला अपनी दिखलाई
यह लीला है उस नद ललन मनमोहन जमुमति-छैया की
रख ध्यान सुनो दटोत करो ज बोलो किशन कन्हैया की
१००
नजीर
गजलें
वो रश्के-चमन' कल जो जेवे-चमन' या
चमन जुम्बिशे शाख से सीना जन था
गया मै जो उस विन चमन मे तो हर गुल
मुझे उस घडी असगरे - पैरहन' था
ये गुचा जो वेदद गुलची' ने तोडा
खुदा जाने क्मिका ये नक्शे - दहन' या
(किता)
तने-मुर्दा को क्या तकल्लुफ से रखना
गया वह तो जिससे मुजय्यन' ये तन था
कइ वार हमने ये देखा कि जिनका
मुशय्यन" बदन था मुअत्तर कफन था
जो कब्र -कुहा" उनको उखडी तो देखा
न अज्वे-बदन २ था न तारे-कफन था
'नज़ीर' प्रागे हमको हवस थी कफन की
जो सोचा तो नाहक का दीवानापन या
.
वो मुभको देख कुछ इस ढव से शर्मसार हुआ
कि मै या हो पे उसकी फक्त निसार हुआ
सभो को वोमे दिये हम के और हमे गाली
हजार शुक्र भला इस कदर तो प्यार हुआ
१ वाग का लम्जिन करन वाला (प्रयतम) २ बाग की गाभा
३ शाखामा का हिलना ८ सीना पीटता हुप्रा ५ कपडे में लगी
चिंगारी ६ पला । पूल तोड़ने वाला ८ मुह की नमवीर ६ गामित
१० शानदार ११ पुरानी वय १२ गरीर का मग १३ गमिटा
नज़ीर
२
हमारे मरने को हा तुम तो झूठ समझे थे
कहा रकीय ने, लो अब तो एतबार हुआ
करार करके न पाया वो सग दिल काफिर
पडें करार पे पत्थर, ये कुछ करार हुआ
?
गले का हार जो उस गुलबदन का टूट पडा
तो डर नज़र का वहीं उसको एक बार हुआ
क्सिी से और तो कुछ बस चला न उसका 'नजीर
निदान मेरे ही आकर गले का हार हुआ
.
रुख' परी, चश्म परी, जुल्फ परी, पान परी
क्यो न अब नामे - खुदा हो तेरे कुरवान परी
झुमके झुमके वो सुरैया के करनफूल, वो फूल
बुन्दे वाले परी, मोती परी और कान परी
मुस्कुराने की अदा जैसे चमक बिजली की
आन हंसने की कयामत, लबा - ददान परी
पाख मस्ती की भरी, शोख निगाहे चचल
कहर काजल की खिंचावट, मिसी-ओ-पान परी
क्या कहू उसके सरापा की मै तारीफ 'नजीर'
पद परी, धज परी, पालम परी और शान परी
हंसे, रोये, फिरे रुसवा हुए, जाके बये, छूटे
गरज हमने भी क्या-क्या कुछ मुहब्बत के मजे लूटे
१ चेहरा २ पाख ३ एक तारा-समूह ४ हाठ और दात
५ नसशिव
१०२ नज़ोर कलेजे म फफोले, दिल मे दाग और गुल हैं हायो पर खिले है देखिए हम में भी यह उल्फत के गुल बूटे (पिता) ये कहते ह कि पाशिक छूट जाता है अजीयन' से जब उमकी उम्र को लश्कर अजल' का पानकर लूटे हमारी म्ह तो फिरती है माशूको की गलियो मे 'नजीर' अब हम तो मर कर भी न इस जजाल से छूटे . . थे आगे बहुत जैसे कि खुश यार हमी से ऐसे ही तुम अब रहते हो वेजार' हमी से महफिल मे जो देखा तो इधर तुम हो खफा, और साकी को भी है हुज्जतो-तकरार हमी से औरो से जो कहते हो कि हम उनसे हैं नाखुश इसको तो फकत करना है इजहार हमी से समभेगा जो रत्बे को 'नजीर अहले-वफा के ता मिलने लगेगा वो तरहदार हमी से . उसके शरारे-हुस्न' ने शोला जो इक दिखा दिया तूर को सर से पाव तक फूक दिया जला दिया फिर के निगाह चार-सू ठहरी उसी के रूबरू' उसने तो मेरी चश्म को किन्ला नुमा बना दिया मैं हू पतगे • कागजी डोर है उसके हाथ में चाहा इधर घटा दिया चाहा उधर वढा दिया २ मौत ३ नाराज़ ४ प्रेमिया ५ सुदर (प्रियतम) ६ सौंदय की चिंगारी ७ चारा मोर ८ मामने १० वह चिह्न जो काव की दिशा दिखाने को बनाया जाता है १ कप्ट ६ प्राव
नजीर
तेशे' की क्या मजाल थी यह जो तराशे बे-सतू
था वो तमाम दिल का जोर जिसने पहाड ढा दिया
सुनके ये मेरा अर्जे-हाल यार रे यू कहा 'नजीर'
"चल बे, जियादा अबन बक तूने तो सर फिरा दिया"
गम यां यूं तो बडा हुस्न का बाजार रहा
मे फकत एक दुका का ही खरीदार रहा
देखा भै जब उसे फिर आईनए-चश्म' के बीच
ता-दमे-मग वही अक्म नमूदार रहा
पा फसा जो कोई इस दाम-गहे-हस्ती' मे
था जो दाना तो बहुत ज़ोस्त से बेज़ार रहा
वस जो होतातो न रहता कभी दुनिया मे 'नजीर'
था जो बेबस कोई दिन इसलिए लाचार रहा
ब- हस्वे अक्ल' तो कोई नहीं सामान मिलने का
मगर दुनिया से ले जावेंगे हम अरमान मिलने का
अजब मुश्किल है, क्या वहिए बगैर अज जान देने के
कोई नक्शा नजर आता नहीं -प्रामान मिलने का
१ पत्थर काटने की दाल २ वह पहाड जिसे वाटकर फरहाद
शीरी के लिए दूध को नहर लाया था ३ माख रूपी दपा ४ मरन
५ स्पष्ट ६ जीवन वा जाल ७ बुद्धिमान
६ बुद्धि के अनुमार
१०४
नजीर
.
(किता)
'नज़ोर' इक उम्र हम उस दिलरुवा' के वस्ल की खातिर
बहुत रोये, बहुत चीखे, पे क्या इमकान मिलने का
हमारी वेकरारी इजरायो' कुछ न काम आई
वो खुद ही आ मिला जब वक्त आया प्रान मिलने का
No text on this page.
+ ww