Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Gon Vilas Samudya

Ramridhi Sargi · 2011/08

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

cassassasaaradasarast
॥श्री॥
।। इस गुणविलाश छपाणे मैं प्रयलका तथा सहायफर्ता
सेठ श्रीमान् मोहणलालची पूनमचंद गोलला.
( अर्पण पत्रिका)
मीनासर वास्तव्य, वांठिया सेठजी,श्रीहजारी मलजी ऐसे उदार
दिलवथे, जिनोनं २२ समुदायवालोम, ज्ञानवृद्धिवास्ते,
सहस्रो मुद्रायें खर्च किया, अपणे समुदाई दीनहींनोका
उद्धार करणे में भी हरवख्त कटिबद्धथे, प्रार्थना
सफल करणा तो उनोंका परमशीलथा, इस
ग्रंथर्क छपाणमें भी अधिकांश सहायक
श्रीमान् हीथे, अब पग्लोकसिद्धाये, ऐसे
नररतको शांतिमिलो, उन श्रीमान्के
पात्र श्रीवहादरमलीभी अपणे
पितामहकीवरे दिनोदिन धर्ममें
दानशूरता दिखापगे, कारण
चीरोंके चीरही होते हैं.
SUPEURSDREASURI
Ram
SEASEASORSEEPERCEPEOPERAL

No text on this page.

राया, माता मनमें [अथ ऋपभदेवजीकी लावणी ।] ॥शीसनमा कसरे चीनती, चरणकमलमैं चितलाई जीरेचर० प्रापभ देव महाराज, करो सिद्धकाज, आज में जसगाऊ, टेर,] अवल हकीगत कहरे आपकी सरया- सिद्धधी चविया, माता कुवै आया, यहोन सुखपाया उदर मैं चासलिया, चवदै सुपना आपारे मातानं मा- ताका हुलसा जोहिया, गई पतीकै पास, अर्थ देवो भास, सुनो तुम मेरा पिया, [उडायणी] हे अय कहता राजा मुपना भला तो है आया, एहां आया, तुम यहोत खुसी रहो हुसी जिनराया, रख पांमियो जायके मंगल गवार, १० १, सुभ पेला जनम लियो प्रभु, इंद्रादिक मिलकर आये, मेरू पर- पतपर, जाय, देव सव आय, महोच्य करवाये, आठ- जानक कलस मंगाक, सुगंधजलसें भरवाये, प्रभुजीका जसगावै, धमर ढोलावे, प्रमूजी नथापे, [उडावणी] है इंद्राण्यां मिलकै भगतीसं मंगल गार्च, एहां गावे, अठाई महोच्म्व फरकै पीडा जाये, एहां जाये, इंद्र प्रभूजीसे करै यानती वर्ग लोकम में जाऊं, ०२, कंचन यरणी देह प्रमूकी वृषभ लंडन है सुग्वदाई, धनुप पांचस है काया मेरे मन भाया यही है अधिकाई, जुगला धर्म निवारै प्रमुजी कला पहोत्तर सिग्वलाई, घरसी दान प्रभु दिया, जगमैं जसलिया, फेर दीक्षा पाई, बहावणी] हे सय देवी देवता दीक्षा महोच्छ्वमैं आये, एहां आये, हे प्रभुजीके चरनमै लुल २ सीस नमापे, एहां नमाये, च्यार सहससे सीनी है दीक्षा जिन में निन उठ ध्या- ऊं, १०३, सास चौरासी पूरय आयू पीस लाख रक्षा

३
फसर पद, पूर्व साम दीक्षा पाली, गाम्नमें पानी, तां
भगवन पदे. महम परम पदमम्नरपा प्रगुणाकी रमा
करती गमी. मीरप पापागार, भगी हिमकार, मास
नगरोपांनी. [पहारगी कहे आवड महारमा प्रभुः
जीमा जसगात, यहां गान, देयो आगमग निगार
पही हम पान, गहा गान, गमगान आगो मेरे
आपका दरबाग मैं पाऊं, ४, शि
[नेमनायजीकी लापणी]
॥ कहती है राजननार मांगरियां सोय
हारो दिलजानी. मग गिरनार मीरी
मोरी नहीं मानी पिजांन यणापा
है जूगर प्रभू भाप, पपन कोड जाद
जन गणापर साग है, इन्द्रादिफ सराय
मतिपन मंगल गाये है, सरसरका पार
मा
भर मह हरणापे है, उहायणीमा
सारीरे, मारो पनदो पल हजार
दरभारीरे, जिनकी शोभा लगनी ,
सारीसहियां है, घूम
की पुकार मारीस
सो पगर भोजन

३ समझावै, नेम गयो तो जावोवाईजी और वींद तोहे परणावं, जुगमें पीद अनेक हमारी स० जोयारे चितम चार्य, परसनकर मनोगमपरलो यूंसम्खियां सय पतलाव, [उडायणी] हे जय राजुलयूं फरमाईरे, हमारे और पुरुष सपाई,हे मैं किसीई परचूंनाईरे,मारे एक पीद जादु राई सुण राजुलकी वात मारी स० सखी लगी सय पि- छताने ने०३. सय सखियां लेलार मारी स० चालीरा. जुलगद गिरनारे, उठी घटा घनघोर मारगमै मेहवरस्यो मुसलधारे, सप सखियां गई विण्ड मारी स० न्यारी २. हुपगईसारे, चीर सुकावण काज सती जय गईहै गुफाकै मझारे उडावणी] है सनी रहनेमी समझायोरे, उनकू धर्मको राह बनापो, हे जय रहनेमी सरमायोरे, सनी वारंवार खमायो, आवड महात्मा गावै मारीस० पिऊसे पहली गई निरयानी, ने०४, इतिपदं । ॥ प्रभु जाय च गिरनारीरे, पार्ने छोटी है राजुल- नारी, सुनी पशु पुकारी दयाचितधारी वारी ममताकू मारी विसारी, टेर, जलचरी बेचरी मरतांउवारी पाने मिरगाकी सुनी पुकारी, पशुवांको छोडदीना, प्रमुजा०१, महमारी वनमैं संजमीनो पंचमहाबनधारी, ऋद्धिना सागकीना, ०२ चौतीस अनिशय पैनीसवानी, प्रभु भये हैं केवल ज्ञानी, आवहनै छंद कीना, पमु जा०३ इतिपदं ॥

No text on this page.

- [निवेदन] ॥ पूज्य श्री श्री लालजी पिराज अच्छे सुशील क्षमा दपा निस्पृहता इंद्रीदमनादि व्यवहार नियासें विराजित साधु आर्यायें भाये वायोंसे सेवितचरण, आर्यावर्त्तम मसिद्ध एक महापुरुप है, किसी गृहस्य गृहस्थणीसें पन- व्यवहार नहीं करते धातकी नाडीफा चम्माभी इनका साधू कोई नहीं लगाता, कपडा रंगने नहीं, न साघुमै धोते हैं, रातपडे बाद सूर्य उदयनक धर्म ध्यानके वास्ते भी पह और इनके साधू स्त्रीकों अपनेपाम नहीं आणे देने, साधुओंके वास्ते जो मकान गृहस्यने यणघाया उसमें नहीं उतरेते हैं, गृहस्थका धातृ वगैरे पात्र काममें नहीं लाते हैं, कठोर ओर मर्मभेदक शब्द नहीं पोलते है, महानपूर्वाचार्य श्रीजिनदत्तमूरिः प्रमुगका पड़ा उप- गार जैनधर्मपर मानते हैं, पूर्याचार्यरचित आगम प्रकीर्ण पंचागीयुक्त मानते है, पावीम अभक्षका ग्वाणा पीणा पुरा ममानते हैं, व्याकरण पटण अच्छा फरमाते हैं, जिनमंदिरकी भक्ती करणेपालोंकी युराई नहीं करते हैं, यटके प्रावकका फुलापार धर्म फरमाते हैं, अपणे संग प्राहस्य दरदिमायर पोहपाणे पलेनो मना करने, निश्राकृम आहार नहीं देते, गृहम्पकों फहफार गमा- दिफ नहीं लिगाते हैं, मीधा लिया हुआ मिले जरूरी होप तो यहरते हैं, पिनपतिले पुनकादिक अपर्णपाम नहीं रखते हैं, न दिशापरोंग पुस्तफांसी पारमल संदर मंगपाते हैं, पापगाना आदिपमें पारागन पार और इनके साधु नहीं जाते हैं, प्रमों में पगपंपो भाटिय यापप नहीं कराने लपी यहा मारी यह औरतन पापीलोक करने लिफाफा फाई मार पहर ६ साधु नहीं नपास रखते हैं और पसे काम करणेयालेकों समझते हैं इत्यादि अनेक व्यवहारोंसे अपणे साघुर्वेषकों शोभारहे है, इत्यादि गुणोंकै विलाससे इस ग्रंयका नाम गुणविलास धरा गया है निश्चयसम्यक्ततो केवल विगर कोन कह सकता है, लेकिन अच्छा व्यवहार हमेस इस लोकपरलोक में लाभदायक है अढाई दीपके पनरे कर्म भूमी मैं रजोहरण पान और गुच्छके धारणेवाले जिना. ज्ञामुजब पंचमहाव्रत पालणेवाले अठार हजारशीलांग रथ धारणेवाले अखंड आचार चारित्र पालणेवाले एसें सर्व साधुओंको सिरसे मनसें चंदन करताहं, इस ग्रंथकों छपाते प्रथम ग्राहक वणकर- (सहायता देणेयाले श्रीमतोंक नाम) १० श्रीयुत जोरावर मल हिम्मतमल मालू श्रीयुत अगरचंद भैदान सेठी w श्रीयुत चांदमलजी डागा २८) श्रीयुत हस्तमल लिग्यमीचंद डागा २८॥ श्रीयुत सतीदासजी तातेद ११) श्रीयुत शिवदासजी कायडिया ११) श्रीमान्सेट पेमराज हजारीमल यांठियां ३००1111 श्रीयुत गणेशीलाल डालचंद मालू १॥ श्रीयुत लाभचंदजी श्रीमाल १५॥ श्रीयुत अगरचंदजी पूगलिया श्रीयुत मोहणलाल पूनमचंद गोला १५॥ [ये पुस्तक विगरम्ल्प बिकानेर पास भीनासरमें सेट पेमराज हजारी महकेपास मिलेगी, मूल्पसे विद्या. शालामें- ११॥

अथानुक्रमणिका. .... ૨ .... २९ ... ४९ ४९ ५० ... .... मंगलाचरण पादीमी बारामत सवइया १३ पापोंक उत्तर भारनाविहारा मरहमा ३१ सा पाच पादियोंपर चरचा साया ३१ सा मधनगल २१ सयकस सबस्दा ३१ मा साधुपर्णन सरदमा ३१ मा शुदरियाशिवाग ३ योगबाट मुनिको, सिशाप जिनओंकारा, पर प्रभु नमनाय त्रिभुवनतान, लावनी पानजिन दमा, सारी, प्रमु नमनाय नजगसाथ, लावणी, माहाविदहमे चोयो मारो, मीमंधरस्तवन, साधरम्याम इकचिननंदू होवेकर जोर्डन, राजगृहीनावासियाजी, जसिझाप पंदनवाला सारणी, सतानीक ओरदयिक देखत भूली ब्याट तमासा, टारगी, परम न चार यूहीनाचे, लावणी प्रीजिनवरदयाजी से उपदेशक सान विननमतसेगो कोई, लापणी फयो मांन बजाजी, सावनी मदानोप म्ब लगे प्याग १३ पथियो शिक्षा धूल भरी कियो चोमासो, टावणी पूजश्रीराटनारी मारणी, श्री श्रीमहाराज पूजनी ५३ ६६ .... ७० ... .... .... .... .... .... ... ७७ 4... ... ७९ ८० ... ८७ .... ... .... ८८ .... ... ९० ९२ .... ... .... श्रीहुकममुनि महाराज पूज श्रीलालजी लावणी मन वचकायसाय प्रभूसें, रुपनाथजीकी लावणी करले पूजचर्मका ध्यान० उदयचटजीरी लावणी हुकम मुनि दीपै जगमाही, लावणी मुन्नालाल मुनि महातपधारी, लावणी किरपा रामजीकी लावणी गैनचंदजी गुनवान, लावणी रूपचंदजीकृत सबइया ३ शरणमें आया तुमारीरे, कर्मचदजीमी लावणी १ मुनिकरमचदनी सहरबीकागे आया, लारणी २ पट्कायाके पीर मुनीमर कर्मचदीकी लावणी ३ कर्मचंदजी माहाराज जाउं बलिहारे लावणी ४ लावणी शोभालाटजीकी मिरदारोजीकी लावणी कायाम ज्ञान कर धरा ध्यान लावणी ध्यान नित धरता नेरारे पार्श्व मभु लावणी मुगतिरो मारग दोहिलो श्रावक करणी सिंझाय, ते श्रावक किम उतरपागे, ओ मारग नही साधरो, मिहाय मुगो २ अगरेज बहादुर गऊ अरजी करती ममह करणेकी प्रान्ति ऋषभदेवजीकी लावणी मीमनमार्क कर बीनती कहती है राजुलनार मोग महिया है प्रमु जाय चढे गिरनारी वान टोटी है राजदनारी .... १०२ ... .... .... १०१ १०५ १०७ .... ... .... .... 41 .... ... ... .... . १ २ . .... .... .. ....

(जाहिर खबर.) ॥ श्रीजिनापनमः विधानाला, बीकानेर, राजपूताना, उपाध्याय श्रीराम- लालजी गागःकी सर्फसे इतने पुस्तक छपकै प्रसिद्ध हुये हैं नगदी निछरा- चलसें मिटता है, परदेशी माहर्कोको । वी। पी। से भेजा जाताहै पैरंग- पत्र नहीं लेंगे, जो परदेशी प्राहक प्रथम पुस्तक । पी। पी। से मंगाकर फेर नहीं लेगा यह धोखावाज अपणे २ इष्टधर्मको गुनहगार वे मुख रह- रेगा पुर चिकणे कागज भारतवर्षके नामी निर्णयसागर प्रेसके अक्षर शुद्ध छपाई मसहूरहै, महाराज उपाध्याय श्रीजीके जैनसिद्धातानुसार प्रबल रतियुक्तिकेभी अमृतरसके पानकरपामिलापी हमेस इन प्रयोंके रसिक वगरहे हैं पदिये २, लीजिये २, विलंब न कीजिये, सारतत्व देखके धन्यवाद दीजिये, लौकीकसे वाकवहोप अभ्यामरस पीजिये- (एपे हुये ग्रंथांके नाम.) ॥ करुगावतीसी दादासाहिबके गुणानुवाद प्रत्यक्ष दरसाव देणंका मंगयुक्त पूजा ॥ निदमूर्ति भाग प्रथम ७) निद्धमूर्ति भाग द्वितीय ... 1) भाषफलोकोका रजगारी पंध, धर्म, धन, राजनीति, अनेक दृष्टांतयुक्त ।) ६ पाणायका अर्थ, कार्य सिद्ध देखगेकू शकुनावली, जीणा, मरणा, फाल, मुगल, जीन, हार, इत्यादि अनेक बात जांगने जन स्वरोदय जिन जामहोदभी, इसमें ३७ गायन पूना मंयुक्त सर्यविधि २७ रमसागर नूतन, इसमें जैनधर्मगादोंका सरं धर्म कय, योनयन, छोटेसवन, निणये, चो दान्ये, तपस्याविधि, १२ मासपा- पिकार, टाकी दो जनमर्मबाटोंके रामगे पोझ है 4.. .... 4... ....

- कुत्ता, स्याल, . वैद्य दीपक, ये अथ सवगृहस्थोके रखणे योग है रोगपासभी नहीं आ सके एसे खानपानका वर्ताव धरा गयहि, पदणेस मालम होगा, तारीफ क्या लिखें, मनुष्य, स्त्री, बालक, जानवर, और सब सरेकै जहरोंका इलाज, देशी, अंग्रेजी, होमियोपथी, और यूनानी, पथ्य, कुपथ्य, सब दयामोधन, और वणागेकी विधि, दयाधर्मवालोंके वास्तेही रचागयाहै, इसप्रथमें सर्वज्ञधर्मका नमूना है; शकुनशान, श्रीजिनदत्तसूरि रचित इसमें शकुन चिडी, कंडआ, हिरण, इत्यादि जानवरोंकी चेयसे आगे होणेवाला फल, सब मनुष्योंकी चेष्टासें शुभाशुभ फल, अंगकुरकणका फल, गिलेरी गिरणेका फल, मेध कब होगा, काल होगा, या मुकाल, इस वर्षमें फोन वस्तु नेन रहेगी, कोनमी मंदी विकेगी, मकान कराणे जमीनके धूलके रंगका शुभाशुभफल इयादि जागनेको ये ग्रंथ साक्षात केवल ज्ञानीका भान दिखती है महाजनसमुन्नावली, इममें मत्र ओमालोके अन्टग २ गोत्रोकी उत्पत्ती महेश्वरी, अग्रवाल, श्रावगी, नरमिंघपुरे; गोरारे, हबई, पोरवाल श्रीमाल, टपत्ती दमावीमा होगेका यमान ८४ गछोत्पत्ती, श्रीभोजगइस्पत्ती, पात्रोंको, आचार, विचार, शिक्षा परतर मृगछका पंचप्रतिक्रमण अर्थयुक्त इममें, सप्तस्मरण, भनामर, कल्याणमंदिर, छोटी शति, वृष्यति, ऋमिमंदर, जिनपंजर, विजयाहुत्त, दोसाबहार, जगर, नवग्रह शनिमंत्र तथा पूजाविधि, प्रतिक्रमण पाचोंकी करगेकी विधि, पोमविपि इन्यादि सब अर्थयुक्त.... .... 10 .04. ३) ५१ (इन सब पुस्तकोंके मिलणेका ठिकाणा.) ॥धीकानेर,मारवाड, उपाध्यायश्रीरामलालजीगणिः, विद्याशाला, मुंबई, विचता भोईवाडा, श्रीचिंतामणिजीका मंदिर, वा । श्री- जीवणमलजीगणिः, चंद्यपास, नाटपेट पत्र नहीं लगे, ये पुस्तक सब सरफारक ऐन मुजब रजीप्टर कराई हुयी है छापेगा सो सजा पार होगा, पुस्तक मंगाकर फेर लोटायगा यह अपणे इष्टधर्मसे हरामी फरेगा. । समसामुद्रक छप रहा है, इसमें स्वीका फल, सामुद्रक, सी, पुरुषोंके, शिरसे पैरतक, अच्छे और पुरे चिन्हों सब फल प्रगट किया है मापा कविता बंध है मूलग्रंथ रचीता भद्रबाहु स्वामी है, छंद रचपिता । श्रीरामलालजीगणिः है, इसमें कामयासका कुलसार दरमाया है, ज्ञानीको तो वैरानका मूल है, कामी पुरु- पॉकों कोक दरगा, ग्रंथनिदोंप है, ग्चमेवाले मूल. सर्वजगीत- रागकी वाकि अनुमार है, फिीकों आरमी; किमीकों तवा मझेगा, १

No text on this page.

भरोशान कांदया। नि अत्यान्दया वावीस समुदायः ॥ श्रीधर्मशीलसद्गुरुभ्यो नमः शाश्वतशाश्वत् सिद्धा- यतनस्य सिद्धेभ्यो नमः इति मंगलं ।। अयानेक पदानि लिख्यते। अथ चौबीस तीर्य करोंकी लावणी, चालपणिहारी, पौवीस जिन सय देव है, मुगतीकै दानाः सदा मैं तेरा जस गाताजी, टेर,भपभ अजिन महाराज, निरणकी जि. हाज बड़ी भारी, संमवकी वाणी सुखकारीजी, अभि- नंदन गुणधार सुमनकी लाई पलिहारी, पद्ममभुकी सु. रत पियारीजी, उहावी, जनममहोडवकरवाभणी, इंद्रादिक सह आय, मेरूगिरिले जायक, मंगल कलस दोलाय, नेकचार जो करणा है सो फरकै सब जाता, सदा में तेरा जस गानाजी,१,श्रीमुपारसनाथ जगत वि. क्षात प्रभुनंदा,मुविधि शीतल सुग्वकंदाजी, श्रेयांसवास- पुज्य, सेवा करता मुरनर इंदा, सेवकका फाटो भवः- दाजी, उडावणी, देवलोकांतिक आपक, प्रतियोध्या जि- नराय, तारो तारो जगमणी, पहया सयद मुणाय, तत. क्षण प्रभु संजम लेकर तोडे जगनाता, सदाम ते० २, विमल अनंत धरमनाथ सोलमा शांति जिन जाणो, जिनोंका ध्यान हिये आणोजी, कुंथुनाथ अरनाथ पहु. गुणपान पिछाणो, पम्प झूठी फुमति ताणोजी, उडावणी, च्यार कर्मधन धानिया, कीना जिन दूर तपतप फरणी सपकरी. पाम्या ज्ञान पटूर, पार तीरथसो थाप आप २ फिर करता कहलाता, मदा में ने० ३, मल्लिमुनिसुव्रत बीममा जाणां तुम भाई नमी है मयकं मुग्वदाईजी, रिठनमी पाग्म प्रभुको मामा हद छाई बीरमभु सासन यग्नाइजी. उडावणी. अष्टकर्मदल चुरक. पोहचा है निर- याण, अटल मुग्यों में जायक कीया आप अमयांन, ज- नम मरणकी निरमफाममे फेग्बी नहीं आना, सदामैं ने०४, चामो महागज रखो अब लाज आज मारी, सरणम आगाई यांनी. प्रभुगुण अनंत पावै नहीं अंत सुगी पियार, करनगुण इंद्रादिक हारजी. उडायणी, कनीराम जिनट गुण गाया मन अनि कोड. एक जिह्वा मेरे प्रभु. काहा ग गाउँ जोर अगम अगोचर तुम अ- विनामी पार कोण पाना मटा मग जम गानाजी ५. इति पदं ॥ अथ मवझ्या घनामरी चालग लिख्यते । चार्य आरं कंग वर्ष तीन माटी आठमहिना वाकी रह्या जदीर मुगत पधान्याई पीछे जिन शामनम मोरा मुनि- राज धया भारनिन्या ममारी पणा जीवनान्या है, स. म्चत अठारे पनरक मालन मुदिनवम मुक्रवार दिननिहर निकाल्या है, ईप करी देव गुरु धर्म नाम भेद करी बोटो मन झाल्यो मठा ज्यान गुमधाया है. मवइयो मवायो फीनो घनासरी नाम दीनो कृपा राम कह वचो पार दया पाल्यां है , चोयीशमा महावीर देव ज्यांन चूका कहै ज्यांके नामसेती माधो मुंडी मांग म्वाये है, गुरुगीनारथ दया देवी काथ्यो मंसार धी ज्यांकी निंद्याकर सट ज. नम गमाये है, जीवके वचापे मांहे पाप कहै दशआठ

३
कां करा मेलीने पोया टोकाने घेकाये है, देव गुरु धर्म
नीन तीनमें पता भिन्न सिद्ध पावडे में कयो न्याय
नर्क जाये है, सवइयोसवायो कीनो घनासरी नाम दीनो
कृपाराम कह दया पुन्यवांन पाव है, २, सान निहय
आगे दया उवाई में जिन कया आठमो निहय सिद्ध पा-
घटियमें चाल्यो है, याणियेको सुन ग्राम कंटालेको
वासी गुरु गीतारय दया देखी दुखसुं निकाल्यो है, अ.
विनीत हुवो गुरांकर दियो जुवो मोहकर्म उदप हुयो
सठ ग्वोठगे मत झाल्यो है, चूका फहे देव सतगुरांमें
यता दोष जीव घचायां पापवै योले जिमसाल्यो है,
सयइयो मयायो कीनो घनासीरी नाम दीनो कृपाराम
दयाधर्म पुन्यवान झाल्पो है, ३, जीव दयामुनामांहि ठाम
कहीं जिन जीवके घचायां पाप कठेही न जाणी है, दशमें
अंगरे मांह ग्यांनी दीनो फरमाय सय जीव दयाकाज
कही जिनवाणी है, सूत्र आगम टीकाचूर्णीपयन्ना माह
जिहां निहां जोवो जीवदयाही यवाणी है, दया मचे
कोई पुन्यवान रे घटमांह निहब कमाइ मांस खावै जिणां
• ताणी है, सवइयो सवायो कीनो घनासीरी नाम दीनो
ज्ञानीका वचन सत्त हिरदे, आणी है, ४, श्रेणक रा-
जारे सुत हाथी भवदया पाली मृगरथराजा दयाकाज
घान्यो मरणो, धर्मरूचि दयाघार करगया मेवो पार श्रे-
णक पटहो बजायो मुत्रांमें निरणो, नेमजिन दया पाली
छोड दी राजुल नारी मेतारज या पाली मेट दियो
मरणो, तेवीसमां जिनराय तापसके पासे जाय जीयांने
पचाय दियो नवकारको सरणो, सवइयो सवायो कीनो
घनासीरी नाम दीनो जीवदया धर्म पालो जोये चाहो
निरणो, ५, आज्ञामें आलम मत करो जिन वैणसुणी

Are TT मन मनी मीनिंग माजा तीन TATE जान मरिन गाग्निपिरा हम गारिनमार मिथ्यात्वीरी TITTET - + जाटार गां इधकार " मारणा करली- TARAT THAT नाम दोनो जे मूं HTTET . निहाय निकल इण - IT गम्प मागे ना हाना करमांग TET पाप नहीं | HIT डि. .. श्रा गान नाम 'म বাবা মা जानाAAt ... '''म ग गांधी Tণ সমৃদ্ধ माहमय मुगाना , पदान अगृत fir rurti 4. पाग मुगल मयों आवर आयकन नाममा नागरक मनाका मन . जनता नामा: कही. जिन गाहम नए पामयागा कांना पनामा नाम दाना न करवागनं पाह- कार गरिमा पारी श्रावन दान दिया हिमा र कती नियान का मान करा लीन দশ বা না যায় সে নির্না গলাসা দিম मांगलंयो. निसय कपट कर्ग योग मागम को, माको आशा वयं वान क्यों नहीं देगा, कलप मंमोग मिल्पांविना मंद नहीं कारागगर . किलरोक रैयणो, सवइयो सयायो कीनो घनासरी नाम दीनो पारख्यातो फरो पहतेलारे नहीं येवणो, ९, पाय- फरे तीन करण तीन जोग त्याग टुया भगवती स्त्र मांहे धीरजी बतायो है, अंपडजी आवकरा सातसेही शिष्य सारे तीन फरण तीन जोग पाप योसरायो है, श्रावकने दशाभूतस्कंध अमण भून कयो उपाईमें जिन सुसाहु बुलायो है, ज्ञाताजी सुत्रमाह ज्ञानी दीयो फरमाय श्रा- चकनी समानत नायक नाम पायो है, सबइयो समायो कीनो घनासरी नाम दीनो श्रावकने जहर पटको कहणो कठे आयो है, १०, कवाड देहेडी जिणमाहे नहीं साध- पणो उत्तराध्ययन अध्ययन पैनीसमोयतावेहै, जिहां नहीं कयाट देहेडी पहयो नाम जिहां मनोहर इत्यादिक रयां दोप थाये है, यहदकल्पमाहे रहलो साधुनें अभंग दुवार आर ज्यान रहणो जद पडदो पंधा है, गोचरीकी पटीकरो नामले निवघे ज्यांने कहणो गोचरीमें साधु आर ज्यांजी जाये है, सपदयो सपायो फीनो घनामारी नाम दीनो फराड निबंधी पटा फयादा जमाये है, ११ भगवती सतक पनरम फेरोनाम लेई चोर्यासमा महावीर ज्यांने पुफा के है, अणुकंपा करी जिन आपरो पचायो शिक्ष असता ओगण पोती मा आत देये है, ममणा- समणी कोई नदीमाह पहता हुये आज्ञाने उहंघ साधु आप फाढले है, अनुकंपा कीजे जिनपारको मिटायो दुम उत्तराध्यपन अध्ययन पनरमे जेय है, मवईयो सपायो कीनो घनासरी नाम दीनो ज्यांको पयो पार जिन पचनामें रचे १२, फालादिक यारकरो मरण पतापो धीर सोमल मरण जिननेमजी पतायो है, निल- घोडमा तिल पीर जीवनापोअरमरण गोसालेफरोपीर- ६ जीजताम है. दवारकाग दाह नेम जिणभाव्योम मुख मा. गश्रीगहाला निया ज्ञानामांही आयोह,महागतकश्रावक ग्वीका मग कहा गीतमजी मकी जिन प्रायच्छित्तदि- गया है. सबइया मवाया कीना बनाम नाम दीनो आगम विहार्गदम्याजिम फरमाया है । ३. पुन्यपार आज्ञामें नहीं आज्ञा बार नहीं छद वाग काया तो वाग्म युं गाय है, मनम नो अधा एम लाफा आग कंद्र कम आज्ञा माहे पुन्य आज्ञा बाहिर पाप याय है. उचाई मुत्रमादि ज्ञानी दीनो फुरमाय आज्ञा बाहिर पुन्यय र देवनाम जाव है, गामा- लाजमाली जाण लापमादि नज प्राण देव हु आराधक पद नहीं पाच है. मबदया मवाया काना बनामरी नाम दीनो आज्ञाका आराधक मुग्न मुगताका पाय है, १४, माधु आर ज्यारे महावन नववार माह आले अधकरी पाट कटही न आया है. आर क्यान पहली अन मांग चायो रावणको वीतराग देव मा मन बनाया है, आर ज्यान कबाद देवण बोलणको नाम माधुविना न्यारो मठ मुंहमु उठाया है. कयाह दंवण ग्यारणको नाम आयो जटं माधु भार ज्यारो पाठ भलाइ बोलायो है, सवइया मवायों कीनां घनामरी नाम दीनो बृहत्क- ल्पम आर ज्यान पडदा बंधाया है, १५, बाप दाप लगाये जिणांमें नहीं माधपणो कपटमुं वाले मठ ज्यान इम कवणी, आडंयरकाज इणभात पञ्चकग्वाण देवे दरशन- विनाधे आश्रय नहीं सेवी, कई गांम जावै हम सोगन करावै दुपचक्याण उपदंश साधूने नहीं देवणो, दरशण आयै कई आरंभ कराचे आय भाव नाही भावे यूं साधूनें नहीं लेयणो, सबढ्यो सवायो कीनां घनासरी नाम दीनो पारक्षातो करो वहतेलार नहीं वेवणो, १६, रायप्रसेणीमें ७ परदेशी राजा मुनीपासे समझ्यांन व्रत लिपा पीछे दान दिपो है. आरंभसहिन दानादिक प्रश्न पूछे मुयगहांग माह मुनिराज भून लीयोहै, दशमें अंगमें दान देवणो निधै जनै पीतरागदेव झूठा योलो चोर कयो है, दान- दया सुत्रांमांहि टांमारकही जिन दान दया निषेधे जिणा- फोटो हीयो है, सवड़यो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो दान दया रसई पुन्यवान पीयो है; १७, केसी समणने चित्र प्रधान कयो परदेशी धर्म सुण्यां घणीदया पालसी, समणभिक्षारी मुग्य इंडकर घोडो लेसी दोपद घोपद पणां जीयान उपारसी, आगम विहारी चित्र परधान सती कयो जाके हाये धर्म आव चार घोल घा. रसो, उपावसुं राजाने प्रधान लायो मुनिपासे पाणी मुणी राजा जाग्यो येही गुरु तारसी, मवड़यो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो राजन असार जाप्यो देखी ज्ञान आरसी, १८, अनंत चौवीसी सब दान दे संजम लीयो देवे देसी अनंती चोयीसी जिन कयो है, दान दियो चीर ज्यांने परीसह उपना कह सठ ज्यांन कहणो दान मल्लि जिन दिया है, पहर छदमस्य रही केवल ज्ञान लही आढूंही करम दही शिवसुख लीयो है, चवदे प्रकार दांन पटी लाभ कयो जिन नवभांन पुन्य न्यारो समुचपमें रयो है, सदइयो सवापो कीनो घनासरी नाम दीनो निहब गा- हरम भइयेलारे भइयो है,१९,यालकनी पोलीपोलधारी सुद्ध नहीं जिम निहवने वस्या भांड तीन लज्यार हितरे भांड योले विकल वेस्या नहीं शील शर्म निहब कहे घुकादेव गुरुमाई केहतरे, घोरादिक सुतनें सीखाये पोरी तरवानो जिम निहवाके दयारदिन याण देतरे, मुंजीपणो कपटपन दयारहित हुवे फुसंग निहवाको - मा. मन पाता गो मरिना, मडगे मवायो कीनो मामा मामा नो निदा पागल जिम नहीं हुये थे. पनि प्रनिगा योमराई आ- PITM मग मा निरा कोई कादेयांने Pाना मामा निकाल यो उनको "THE IT TIMमा पद बारमें IIT मार कलह मि. {"T! कहा भगवती में ant नाम दीनो HITI कपद कगर्ने THETAH THIपना यताये न दादादिक , हम मंजम +t. HTT . 1771.. T माना बगाये। म.HII ना नागरी नाम RAMERA I am काग मान.EW HITf का TM. गगन न पर मागलाय मा माधारकर- पाका गार नामा माला न बजे भटाराम जागिर लामाकाR. Aim पर भागीय काना माहा कन्या मकर मुत्र अगानि, गर्म- समानामभाव मा पा तिनमा माहादिक उदय মাই নি । না থাকা না না नाम दीनी ममता जी नियम मागि, अगजिन की मात्रामा प्रजाती अगद सानीसांचदमानिया, नीनी गाद चार मरिटी.

९ फापाले पुन्यपंध कयो निर्जराको नहीं दाम्बियो, मुपगडां. गमें कापी मिथ्या यार माम र मंसारमें गले कपटाईमल्प राम्पिो, निहब कपटकर योषां आगे हम कह मिथ्यात्वी आशा पार करणीने नानियो, मयइयो मयायो कीनो पनासरी नाम दीनो मिथ्यावी मिथ्यात एक अनुयो महारमागियो २४ मुशमिदानमार चाहदिरदमें धार निन्हयांको मन जापो भरपराई है. घोडनिन्याको मंग मानरूप लागो रंग दयादान गरि जांकी पटीही पु- न्याई है, गुगगीतार, भेटी मिथ्यामनदियों मेटी क्षमाका मागर गुरुभेटया मुम्बदाई, एनीमद्विसिटकाप संज- मर्नु मनताप सुगणामगनमुनि पदा गुरुभाई है, मा. इपो मवायोकीनो पनामरी नाम दीनो कृपाराम दया- थान फोरम मपाई २५ उगणीम माल पत्तीम मयदया पीना पपीश मुजमनीमाजोरीम रिदमें पारजो, पार घोले नरः जाप यायो टापा भंगमांय मोरही सिद्धांत सुपदिर विचारजो, जीयके पचायामांदी ज्ञानी पाप भयो नांहीं भगानीर पपनांने दराई निशारजो. अनंने नापीम जिन पर्म कपोनिन मिनाम नहीं कपो मन- जीपांने पार जो,मपापो मदापोकीनो पनामरी नान दोनो गृपाराम पर जीप दया नित पाल जो २२. अप कुंडलिया लिम्यते। गृहम्मीर परमापने, पटनायर स्पो पीर.फारटोरम घ पाकीसीर १पारी मार, मुट- मुंभाग्यो, हामी काट मारन, में जिनदार सदसजम भारापता परमपाटनी. मात्र - १० माधनं. वैठणवर ज्यो बीर जगरोग तपस्या करी, दुर- बन्द भयो गर्गर, निण कारण बैटणतणी. आजादी महा- वीर आजादी महावीर, माननजमुत्र देग्योः विनकारण नहीं कयो. चटणी मुत्रपत्री, मदवावीमे जिनतणा, कल्पातीनगुण धीर, जगगेग तपस्या कर्ग, दुग्थल थयो डारीर. निण कारण वैरण नणी. आजादीमाहावीर २ नि. न्वकाही भावना, बालायांने आय, दीया झोली पातरा, लारे चाल्या जायला चाल्या जाग. पटदो नारी कठी प्रमांक है निग्दोप, कपरम बाल झी. रमनारा गृद्धी. धका, जिहां लाव जिहां वाय. निहवकाही भावना, पोला यान आय दोपवनावपारका. पाने घोर अंधार, गंगान- मपनो हींगल, निग्राम बहोत प्रकार , चित्राम यहोत प्रकार. थाप बांधाभर माव, प्रध्यां नहीं देजुआय, नहीं मिद्धांत वता, बांघागुर चला मिल्या, नहीं पूछे निरधार, दोष बना पारका, पोते घोर अंधार ४ गृह- थीक घर जाराने. निहायकथा मुणाय, वृहत्कल्पमें घर- जियो, तीजे उशामायनीजे नईममाह, एक गापाको भाल्यो, उहां नहीं विस्तार, योही कारण सुंदाख्यो, कथा भाज्यू मांडीयो. नहीं मुत्रको न्याय, यई घरांम जायनें, निहव कथा मुणाय 'निय महामत्यां कहै, बैठी राव पाम, उत्तराध्ययनमे जिन कन्या, होवे शील विनाश १ होय शील विनाश, लोकमै अपजस धावै, बिनभायां यह पाम, राग्वतालाजन आये, योगा गुरुचला मिल्या, नहीं पूछनें ग्राम, निहय फैये महासयां, पेठी रामे पास ६जिन- कल्पीने परजिपा, पार पोल जिन आप, निहव तीन छिपायनें, देवे पार उथाप, १ देवे या उथाप कपट योपाभरमाय, समश्या करे पिमान, अजाण्या कप . गोताखावे, निहय करता कपट , एक पोल उत्थाप, कल्पीने परजिया, चार पोल जिन आप, ७ जंगलम आतापना, नहीं समणी आचार, उपासरेमरवणो, पांधी पार १ कपढो पांधी पार, वृहत्कल्पमें आयो, धमें उसेमांहि, श्रीमुख आपवतायो, कयाड जडयोन कयो, लोहिरदेमें धार, आरज्यांने रहवणो, कपडो यांध पार ८ महासत्यांनांम घरायनें, संजाय पटली देव, द. झोल्यां ले हायमें, घपर करती पेय १ व २ करती पेय सीखले भेला जावै, साधुस्वांगयणाय, जिणांको लायो खावे, व्यवहार सूत्रमें घरजियो, यिनकारण नहीं लेय महासत्यां नाम घरायने, संजाय पटली देव ९, निहवाई पहुंचायपा, गृहस्थी जावे लार, आगे जाय यारी फरे भोजन यहोत प्रकार १ भोजन पहोन प्रकार, त्यारकर भावना भावे, पोलापाने जाय, तुरत पातर ले आये, रस- नारा गृद्धिथका, जिहां लावै जिहां खाय, निहवा पोहचा यपा, गृहस्थी लारे जाय १०. भहारक भ्रामरकहै, जती ग्वमासण पोल, निहय के पै भावना, ये तीन समतोल १ ये तीनूं समतोल, बुलायां तीनं जाये, निहव साध फेवाय, सांग लेई भेग्य लजाये योपागुरुचेला मिल्या, नहीं आचारको तोल, भधारक भ्रामरक है, उतीखमासण घोल ११ गोसालांने दिग्वियां अन्यमत यध्या अनेर, जमालीन पy दियो, ज्ञानी प्रतक्ष देख १शानी प्रत्यक्ष देख, तिलांको छोटयतायो, पो- घानेश्म कहै, इणीमें स्यो गुणयायो, जिन सोमल मामण तणो, मरणो कहो विशेप, जो जो कारण जिन कया आगम ज्ञानी देख १२ आहार देवै भावर, थाने पास आण, रजी आदिक देखने, देवे फूंक अजाण १ देव

No text on this page.

गोतागाय, निहपकाला पापदणे, एकबोट याप.जिन
सपने पजिया, पार पनि भारगम
माताराना, मी ममी भावार, पागरम रया, शपदी
पांधी पार पापही पांधी पार, स्वपमें भागपां.
भाग उदगमाहि. श्रीगण आपलायो, शमार जपानां
कला माहिरदमें धार, भार ज्यान रहा, पापी पाणी
पार ८ महामन्यांनाम परापन, पंजार पदी दंपदा
गोल्पांह, पपर करती पंप १ पपपरमी पंप
मीबल भेला जाय, रामांगवणाग, जिणांफो काणे
पाय, प्यार सममें परजिषी, विनमारण नहीं टेप
महारत्यां नाम परापर्ने, मंशाप पटली देय ९, निायाएं,
पाई पायपा, शाशी जा सार, आगे लाग गरी पर
भोजन पहात प्रकार भोजन पहोत ममार, परफर
भाधना भाय, पालापाने जाय, तुरत पातर से आप. रम.
नारा गडियफा, जिहांदाय जिहां गाय, निहपार पाहमा
पपा, शाही मारे जाप १०.
भधारक प्रामरकर, जमी बमामा पोल, निहाय
भाषना, मीन समतोल १ तीन समतोल, बुलाया
सीनं जाय, निहूय साथ फेयाय, मांग रोई भीष नजायं
पापापुरपेला मिल्या, नहीं आचारफो तोल, भटारक
भ्रामरक है, जनाबमामण पोल ११ गोमालान दिवियां
अन्यमत या अनया, जमाली पy दियो, नानी प्रतक्ष
दगमानी प्रत्यक्ष देम्प, तिलांको त्यतायो, पो.
पान हम परणी यो एणधापो, जिन सोमल प्राण
रुणो, मरणो माहो विशेष, जो जो कारण जिन काया
आगम शानी देश १२ भादार देये भाय, धान पारी
आण, रजी भादिकापने, देव समजाण १ देवक.

No text on this page.

पनो धरतणो, खोली देखो चीत, लेख कराचे हाजरी, यातो फूडी रीन १आतो कूडी रीन, फेम परतीत न आये जो होय परतीत, नित्त क्यूं लेख कराये,आगे जिनकीधी नहीं, नहीं पताई रीन, कर जायनोधरतणो, खोली देखो चीन १९ आषाकमी आहारको, परनिख दीसे दोख, हीयाफ्ट भेला हुदै, पूजे घोघा लोक १ पूजे योधा लोक, हिप पतीनहीं आणे, निरदोपण जर आहार, किणीतर देतो जाणे,मीठो पाणी राबनो, आहारादिकदै लोक, आषाकर्मी आहारको, परतक्ष दीप दोप २० योपाने भर- मायवा, निहय मांडी जार, कह कोटी कह कांकरा, पारी रीगरफार १ पाटी रीगटकार, लेख ऊंचाहीं बचावै, जो देखणनें जाय, रागरंग करी रीझाय, अण समझ्यो भरमी पटे, समझू करे विचार, बोधाने भरमायबा, निहब मांडी जार २१ विन कारण नहीं सुषपणो, निग्रंथी साथ विहार, तुच्छपनेवण नहीं रावणो, नहीं उसादिक आहार १ नहीं उद्देसादिक आहार, भलोकर भूडोगेरे दोय घडी दिन रयां, उचारादिकनें पडिलरे, साप आर ज्यां साथ रहे, नहीं निशीत अधिकार, विन कारण नहीं सुधपणो, निग्रंधी माप विहार २२. नित लाये जो एकण घरसे,पारामें एक आहारजी, दश- मीकालिकनी में कयो, साधु नहीं अणाचारजी १ गाथा १०, श्री धीरजिनंद अनुकंपा कीपी, फोरी सन्दिगी सालो बचायो, छ लेझ्या उनस्यके होती, मोहकमै यस रागज आयो १, जीव उटाय धांयां मेले तो, जाय महा. बत पांचही भागी, या गाथा १९ मी पोल ४९ मां, यहा मन जिमायां तमतमा पोहचावे साख उमाध्ययन १४ में . संजतीरी यावर लागियां अणुकंपा साप करे ३, पहला

No text on this page.

है या शालीमारजी. २९, निनीय उमेद्वारमांमें पीर मांगा पार फया माधु ओर मार ज्यांन भेटा नहीं पणो, व्यवहार मे पांचनामें माधु नामुनिः भार स्यांक पामवचन शायधिस नाही यणो, निनीय उसे पोपे माधु मंजा गियांपिना आरम्पार पाम रे प्रप. नान कयणो, सापु भार त्यांने एक उपामर आदारा. दिकमने परतल्पमें उमे मीज फेयणो, सपायो मया- पो पीनी पनामरी नाम दोनो कारण आहारादिक, दयपो नदेवणो, १०. निहाय कपट कर पोषाने पताये पाठ साधु गर ज्यान भैलो भोगणानं रेषणो, प्ययहार उद्देमें माममा एमो पाठ नाही दीख कटे किम पोलो पाठ देगायोयूं फेवणो, उत्तराष्पपन मोलमै अध्पपन मोजी पाटमांन्त्री यंठे घटी दोय जिहां नहीं देयणो, उसराप्यपन निधीप प्यवहार पहिरकल्प आदि स्त्रीको परचो परज्यो पाट देर सेयपो, मयायो सबापो कीनो घनामरी नाम दीनो न्त्रीको फर फरसे ज्यांने इंकाई कंपणी : अचित्त द्रव्यादिक मेनी कोई पुन्यवांन आप आपको मोपापटारे दुजाकोटरायगे है,अशुभ गोगाम- पमांहि लियो कहो शुभयोग संयरमें ईमें किस्पो पापो है, सनत कुमार सीजे देव लोक ऋद्धि पाई पारोही ती. रयन मुम्ब शाता उपजापो है, नेमजिन पागमें विराज्या निण अबसर किमन माहापदे संजमदिरापो है, सबइयो सवापो कोनो पनासरी नाम दीनो ज्ञाता अंनगहमांह एमो पाठ आपो है ३२, अनुकंपा निरवय सावध काहीन सट पोयलांक घट घोचो यूटोही फसायो है, अनुकंपा निरयप मावच हुवांधी सठ धरमलालीमाई पिण फर पायो है, नंदिपेण सपदेश देने दिक्षादिराई चित्र परदेशी कशी बांमि ममझायो है. कोई मुख जयणा करी माग्ग बनायां शुद्ध कोई अजयणासुं मारग दिपायो है, मवयों मचाया कानी नामर्ग नाम दीनो मारग मावद्य निग्या किम पाया है. भगवती स. तक मोदमें उदम उठायां गलनांकी माला जोडा दंख्यो जगन्नाथजी,चोथा मुगनारमाहे छोटी बडी कही नहीं अठी दादां जोट मट वाघानं बहकानजी. ममकिन र. तन आवडगाम जिन को मम्पन्न न जाता मतमाहे वातजी, मम्यक्त ग्ल, दोट धम मम कया बनर- तनाको जो वहांत पवपानी, मवदयो मवायो कीनों घनामरी नाम दीनो ममफिन पायां निश्च मुगतीमं जा. नजी ३४ अन्नवस्त्रादिक दिया अबत मयाई कंह अवत तो दीधी लीधी आर्य नहीं पारकी, निहतांक श्रद्धापम अनन अम्पी जीव नाचे देय गुगलम्पी वाल ये विचार- रकी, भगवनी शतक पहल उडेम नवममें कयो अन- नकी क्रिया क्षत्री गजाक मारपी, चोगदिक वित्त आयो आकुल व्याकुल थयो घोड़ी क्रिया लाधां या है वाणी अणगारकी, मवड़यो मयायो कीनो घनासरी नांम दीनो पारवातो करो सद बयर न पारकी, ३५, मूल दृष्टांत कुण भात्मा जीय अम्पी निरवा भाव द्रव्य गुण पर्यापी है, अव्यादि अज्ञान जान तलावन में कियो हिसाय नियाकी आमुणों कपटाई है, मूल नव नाम कहेय दृजो दृष्टांत देय आश्रयजीय एक जुगल मिलाई है, तलावनें नालो एक उत्तर यूं देणो देव मुद्गल तलाप नालो एक कहयाई है, मयहपो सवायो फीनो धनासरी नाम दीनो नाम हवेलीको उत्तर देखाई है ३६ तीन करण सीन योग अठारे पापरा त्याग किया वर्णना गिणती भ.

गनी जातीगो.नीन कर्णमीन योग भहां पारामाग रियादीमा गा या पिशाणी.भान परण तीन पोग अटो पारगामिपा आनंदादिमाग अपामा दमा भाणी, नीन कर्णगीन गोग महाग पा. पग म्याग मिागणादिक भगवती मारि जिनमती, पयायो माया पानी पनागरी नाम दीनो अमरी पिनी दाज पारमाणीण. 19, पापगे पाणी पाणी पप आदि पपांन भनमें गिणे पनि इसमांतर पणो, राग्यांपादियांप भगोजागीपार माना मांजिनमानगगामेपणी, कालीमापकापारी. रारासंध यादिपापपोषांनंकलनहरेपणा, भगवती. मनपारमें पहंगेपांगमां पारनेगोकरीयोपाठदेगा भवणी, मया पपा कीनो पनागरी नामदीनो पार• म्यानोकरी यामटारे नहीं यणी १८ भगवती मनक- पीममें उमे भाठमांमें भापकने नीरपमं मानोपाजिनः पाणी, पादमसी मायने मामा कया जिन मीस- काच्या प्राध्यपन शीसमें जांगीर, धम्मिगा पन्माणुपा धर्मट आद देई मुमीनदा मुख्यपागुण उवाई पिणीद, मुपगटांगमा पर्माधर्म पक्ष दोप नीहां धर्मपक्षमाहे मापुमाया दोआणी', मघापो मयापी फीनो घनासरी नाम दीनो माधुर्ने मायकगुणयनासुंयपाणी, ३९, दशमीकालिकण्ठे अप्पपन आठमी गाथा अठार पा. सजदा जदा रिपा आणजी, मोलमापानसमाहे ग. ही घर पठेमा अनागार मिप्यान अग्रयमाणहाणी, आधारमी दोप धाय जायकादी अंतराप कोष अ- पृटी शीलपनहापाजी, इत्यादिक दोप घणा यंठा फा तीनमगा मपमी जराने रोगादी सुर ठाणजी, मायो १८ सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो दशमीकालिक देखो तजपवताणजी ४० वृहत्काल्प कयो तीजे उद्देसे अंतर घरमांहि सतरे योलकरणा वीतराग पालीया, अंतर घरको म्योटो अर्थ करीने निहय सट रसोडादिक घरकह योधाने यहकालिया, अंतरघरमं तपसीने जरारोगी यांने सतरेयोल करणा कह्या ईमें आगेचालीया, दशमीकालिक सुपगहां- गवृहत्कल्प ओर सुग्रामें यरज्यो पिणदेवे नहींवालीया, सवइयो सयायो कीनो घनासरी नाम दीनो अज्ञानमें सू. ताजिणां अज्ञानी सरणालिया, ४१ छटे गुणठाणे मनपर जय कपाय फुशील छद्मस रागसहित करी चूका कैवैहै, चारित्रनियंठायोग हेतु आदिककेतापाचे भयकेनाकरे संसारमें केता रवैहै, लारे पांचे तेतो भगर्वनमें यतायो सय इम पूछयां मूढ सफा जुयाय नहीं देवैहै, भगवंत जीवदया ऊपरें अध्ययन देख परिक्षातो करे नांही यह- तालारेवैवेहै, सबइयो सवायो कीनो धनासरीनाम दीनो कल्पातीत जिनकी घरापरी लेवेहै ४२ जानु परिमाणे नदी उतरे धर्म कहै पाणी संघटाहुं आहार देखी टल जाव है, कमाड निवेधी अने किवाढिया जहावैसठ जि- नकै उपर पसी फुजुगत मिलाये है, लड़की यापकी फेई गर्भवतीको नामलेय पद्मासयध्या उठ्यां वैठां दोपया. घेहै, हमकहे ज्यांने फेणो याको परमाण किसो कियाड किमाडी केना हाथको कयाय है, सयइयो सवायो कीनो धनासरी नांम दीनो निन्हवकपटकरी पोधाने पहका चैहै ४३ इसाभद्र श्रावकानें भावका चंदनाकीनी भगवंत अ. रुयस जिन नहीं पालिया, पोप्कलीजी संखजीरी हवेलीमें आया जिहां उपलाजी वंदना कीनी आसणादि दियालिया, खजीने पुष्कलीजी पोसामांह वंदनाकीनी कयो पालो आहार फरो संखजी नहीं हालिया, भगवतीमें यहुभाष ज्ञानी दिया फुर माय वंदना करी लियां पछे अपराध खमालिया, सवइयो सवायो कीनो धनासरी नाम दीनो अंपडने सिप्यां चंदनाकीनी उवाईमें चालिया ४४ उत्त- राभ्ययन अध्ययन डावीसमें छकारणसुं आहार करणो कहो नाम न्यारा २ धारजी, वेदना येयापच चैत्य इर ज्यांने संजमठाये जीतयनें अर्थ छठी धर्मनो विस्तारजी छफारण छोडणा यतायो वीतराग देव ज्यारा न्यारा २ नांम करत उचारजी, रोगर्ने परीपह जीवदया ब्रह्मचर्य अर्थ तपहेत शरीरत्याग कर दे संथारजी, सयइयो सवा- यो कीनो धनासरी नाम दीनो खाणेमें धर्म होतो क्यों तजे अण ४५ इति ऋपि कृपारामजीकृत सवड्या संपूर्णम् ॥ अथ भावनाविलास लिख्यते । प्रणमी चरण युग पास जिनराज जूके विधनके चूरण पूरण है आसके, हद दिलमांझि ध्यानयर श्रुत देवताको सेवेने संपूरत है मनोरथ दासके, ज्ञान दगदाता गुरु बडे उपगारी मेरे दिन कर जैसे दीपे ज्ञान परकासके, इनके प्रशाद कविराज सदासुख साज सपीए बनावत है भा. बना विलासके १ प्रथम दादश भावना नामानि, प्रथम अनित्य भाव दूनो असरण पुन तीजो है संसार चोयो एकत्व अत्यंत है, अन्य भाव पांचमो अशुधि भाव ध्ठो जांनि सातमो आश्रयसुनि महादुर दंत है, आठमो संपर भाप निर्जरा है नवमो सुदशमो है धर्मभाय मा. नत महंत है, सोकको स्वरूप राज इशारमो भाव पुन

१८
मवायो कीनो धनामरी नाम दीनो दशमीकालिक देगो
मजपमताणजी १० वृहत्कन्प कयो तीजे उद्देसे अंतर
घरमांहि मतरे पोलारणा वीतराग पालीया, अंतर घरको
गोटो अर्थ करीने निलय मठ रमोडादिक घरकह पोयांने
प.कालिया, अंतरगरमनपमीनं जरारोगी यांन मतरे पोल
करणा कशा में आगेगालीया, दशमीकालिक सुपगडां-
गदमा भोर मुनाम थरज्यो पिणदेवे नहींवालीया,
गयो गयायो कीनो धनामरी नाम दीनो अज्ञानमें सू.
मानियां मनानी मरणालिगा, ४१ छठे गुणठाणे मनपर
जय कपाप कशील छमम्प रागमदिन करी थूका कैयेह,
चारित्रनिपटायोग हेतु आदिकालापाचे भयकताकरे
गंगामें कंता स्य है, सारे पनि सेतो भगयंत पनायो
मय इम पूछयां मुरमका सुधार नहीं देवे?, भगयंत्र
जीवदा कारें अध्ययन देश परिक्षातो करे नांही पर
मालावियर, मइयो मयायो कीनो पनासरीनाम दीनो
कम्पानीन जिनकी पगरी लेवेद ४२ जानु परिमाणे
नदी ना धर्म की पाणी मंगवाणु आहार देगी टल
सार, कमाइ निम्बंधी अन रियाटिया जायेमट लि.
नक उपर एमी नगन मिला है, लहकी पापणी को
गमतीको नामलेय पदमागययां उया येठा दोषपा.
यो, दमक ज्यांने कंगोपाको परमाण किमोशिया
किमाडी ना हायको कल्याय है, मवइयो मयागो कीनो
धनामर्ग नाम दीनी निन्यापारकरी पापाने पहफा
मामह पाशानं पायक यंदनाजीनी मगयंत प.
राजिन नही पालिया, पाकलीनी मंगजीरीयसी में
भापति डालाजी वंदनाकानी भामणादिदिशालिगा,
मंगजीन नलीनी मामांह पंदनातीनी कयो पालों

आहार करो संखजी नहीं हालिया, भगवतीमें पहुभाय
ज्ञानी दिया फुर माय बंदना कर लियां पड़े अपराध
खमालिया, सवइयो सवायो कीनो घनासरी नाम दीनो
अंपडने सिप्यां वंदनाकीनी उवाईमें चालिया ४४ उत्त.
राध्यपन अध्ययन छावीसमें एकारणK आहार करणो
कयो नाम न्यारा २ धारजी, घेदना पेयावध चैत्य इर
ज्यांने संजमठाये जीतपनें अर्थ ज्टी धर्मनो विस्तारजी
सकारण छोटणा यतापो वीतराग देव ज्यांरा न्यारा २
नांम करत उपारजी, रोगने परीपह जीवदया ब्रह्मचर्य
अर्थ तपत शरीरत्याग फर दे संधारजी, सयदयो सवा.
यो कीनो घनासरी नाम दीनो गाणेमें धर्म होतो क्यों
तजे अणगारजी ४५ ति मपि कृपारामजीकृत सवइया
संपूर्णम् ॥
अप भावनाविलास लिस्यते ।
मणमी घरण युग पासजिनराज जूफ विधनके पूरण
पूरण है आसके, रद दिलमांसि प्यानघर श्रुत देवनाको
सेयेते संपूरत है मनोरथ दासक, ज्ञान गदाता गुरु पदे
उपगारी मेरे दिन फर मे दीप ज्ञान परकासक, इनके
प्रशाद कविराज सदासुख सात मपीए पनावत मा.
पना विलासक १ प्रथम दादश भावना नामानि, प्रथम
अनित्य भाय दूजो असरण पुन साजो है संसार पायो
एकत्व अत्यंत है, अन्य माव पांचमो अशुधि भाव
एठो जांनि सातमो आपसुनि महादुर दंत है, आटमो
संपर भाप निर्जरा, नवमो जुदशमो धर्ममाय मा.
नत महंत है, तोरको म्वरूप राज सारमो भाव पुन

म गि . त जा" 111 Trir म पि III योरिटम भार वाग्मा मनन , मा प्रथम अनिय भावना सन || गग निना रहार मानी, उतपति विपति मम्म गिनार ननन नित धनिया प जैन मन मम्ममनटगानामा माममा मारिया फलि यारे - inari for मलाई मामी मम्म मना मरना न अनुग अनि निमवि: Imमकी कमी पाप गगनागार नाम ममार पपई भम भगवान या समकान RTE आगम +1 খালা প पारा कानवानानाना . गद ददागाम गम HIमान मां विशन मा 1 6 पास कृदयको पाया पार नहान HAI मावत कहन मायराबनना । भाग जन. देखन हमारे भाग मारक ग गला .ान मा लग राम मलको दमन, भय मग प्रमा भावना कपन. । गोपई। जायदय पहलमरना, भार पनि जबली मशा. घिति पर भग करिग मा पादिन कांनांही माया माया.. मन मप्र घरी रहन परी घरी कही गगन पाकर मागको, दोधार पथ पाया गलनांहि टाप प जान पेन्यो परमानको इनाहीत देशही ग ।

स्वगकूल पडत अचिंत्यो आप दाय ज्यों सींचानको, सप आर जार राजमाया मोहजार अंतकाल सरण भजन भगवानको, ८ पवनके पूतसे प्रभूतजो सपूतयत कहातात तारंगेकी तिन्हों तात तारे हैं, घमघर सगरके तनय हजारसाठ निमित्तके आये देव पलमें प्रजारेहैं, द. रयकी कोडाकोटी अरय खरय जोडी नंदराजजूकू कहा मौततै निवारेहैं, अजर अमरराज महाराज सुखकाज जप्पजगदीन जिन्हें पनिन उधारे, ९, हंसगति गामनीजू देहति दामनीजू कामकोसी कामनीजू निरुपम नागरी. नमिराजजूक प्यारी असी हजार नारी रूपकी समारी एक एकहूं ते आगरी, निवान्यो न दाप जोर पंदनकी कीनी खोर कंकनको सुण्यो सोर उपत्यो घेरागरी, मिथु साको राजछोर मोहके बंधनोर नमें इंदकर जोर असो धर्मलागरी, १०, अय तृतीय संसारभावना कपन।दोहा। लखचोरासी चोहटा, व्यापारी तहां जीय, लाभ अलाम है शुभ अशुभ, पुरशंसार सदीव ११ सवइया ३१ सा. जलथल पादप पावक परमान पुन नर निरि नारक अमर अव तारीह, विकलकी फुलजाति जीवकी अनेक भांति असी चार लाख जोनी विविध विचारी है, या गनि आगनि अनंत चेर कर जीव मामयूं संसारको अर्थ अनु. सारीह, भ्रमत फरम भाय रहतचरीके न्याय कपहुकरी तो जीव कपहुक भारीह १२ चार गति चमवार धमत नपावै पार जीवकर्मचालमें अनंतकाल गयोह, विषयक- पाप मदमोह सुरा मतवारो जहन नहोत न्यारो जडगुण लह्योहै,कितहन ठहरात अघहै उरघजात पातज्यूंवधूलाको अविर परिणयो है, पाहीते संसार भाव धरहुचेतनराव अपनो सुभावगहि जोति रूप जपो है, २३ फयही उतंग

No text on this page.

दही पनगव्य १९ सपझ्या ३१ सा, पुगटजीय काल धर्म अधर्म नम पईपदव्यजू अवंडरूप जानीपै, पुगसमू- सिक और है अमूर्तिक जीव द्रव्य चेतन अजीव पांच मानीय, अपने स्वभाव धरि रहेहै सपेही द्रव्य यद्यपि मिले हैं तोऊन्यारो पहियानीये, योंही अन्य भाव जान राजजीव न्यारोमान निहचे निगमयांन संसयन आनीय २० न्यारो धन धाम गांमांम काम सय मात तात मात पारा अंतकाल पाइक, राज अविनासी लख चोरासी- को चासी फह होन न उदामी जगयासी सदभाइके, मिथ्या मन एश्यो वक्यो मिथ्या मेरी २ सप टरयो है विवेकरवि तमो धनठाइक, पाजीकुं संकलि जैसे बाजीगर अटजात पर एक पटक स्यालसो दिखाइकै २१ संध्याकादि नरुडार बैठे आप खग कुल राति यसि प्रात जन्पिारे २ जान है, लेतद बसेरा रातपंधी ज्यूं सराह- पीच जोरन है प्रीतजोट् होत न प्रभात है, गइयानके संग म्वाल होलन है सपदिन आवत प्रदोप गेह इकलो दिखात है, असें अन्यभाव मन आनियेतो राजकवि ज्ञानके उद्योन होत अज्ञान विसान है २२ अप अनुचि भावना पप्टम कपन, ॥ दोहरा ॥ अशुचि मिले यह ऊपजे, अशुचिहि पंध्यो पिंड, जैसी मारी होइहै, सोही हे मंड २३ सवइया ३१ सा, मांस हाडचा- मनस मेदगुदरसवस मना केस शुक्र रेतयह पिंड रच्यो है, शुचिको न अंस परसंस याकी फरे कोन घामको सामेला घेला मैलहीलं मच्यो है, महारूठो सूबो दूठ जिनमें अपूठ होत लंपट निपट लोमो लाल- पौ लच्यो है, ऐसो राजदेह पांम् कीजिये कहा सनेह पांर नेहकर नर कहो कोन पच्यो है, २४ अंपर अनूप

२२
अंग होत है मतंग चंग कबहु पतंग मूंग कीटक अकार
जू, कपहुक धनी निरधनी सुखी दुखी जीव कपहुक
वेदविप्र कबहु चमारजू, जेसे नट एक भेष थटन अनेक
थाट तेसें एक जीवके अनेक अवतार जू, घनघनागालि
भद्र थूलभद्र जंबू वडा त्यागी जे संसारकेजू अभय कु.
मार ज १४ अथ चतुर्थ एकत्व भाव कथन ॥ दोहरा ॥
जडतो करताह नहीं, करता चेतनराय, जो करता सोइ
भोगता, यह एकत्व सभाव १५ सवइया ३१ सा, कौन तेरे
माततात कौन तेरे अंगजात कौन भ्रात जात तेरे मब है
सयारथी, अरथ खटाऊ परलोकके घटाऊहोतधन;
घटाय लेत मिलके धनारथी, ताकी गति कोन बूझे खा.
रथके मोह बूझें भवमें अरूझे कोऊ नांही परमारथी,
चेतन विचार चित्त इकलोतो तूंमित्त उवट चलत आप
आप होऊ सारथी १६ एक असहाई आप करत है पुन्य
पार करमकू मेले आप आपही प्रमाथीज, स्वारथके काज
सय मिलत समाजराज वेदनीके उपजन न को संग
साथी जू, अंतकाल आवै जप आखर इकेले सय कहा
भयो काहके जू यहु रथहाथी जू, एक भाव मनधर माया
लोम परिहर भयेजू वैरागी त्यागी अतिथि अनाथी
१७ तेरोतो न कोऊजीव तूंहिपेनकाको यांहि आयो है
इकलोतूं इकेलो फिर जाइयो, काहे विराणेकाज
निघट कपटराज रहत है आठोंयाम धंधहीमें
घाइयो, दुकृत मुकृत दोऊं साथिहोहे तेरो सोऊ और
फेनकोज पुन्यपाप फल पाइयो, करे, हरे हैं आप इफेलोही
पुण्यपाप जीय असहाई एक यह ध्यान ध्याइयो १८,
अथ पंचम अन्यत्व भायना कपन, ॥ दोहरा ॥ न्यारो पे
उद्गलपंथ्यो, संसारी जियद्रव्य, ज्ञानी यूं न्यारोलम्बे, दूध

२३ दही नगव्य १९ सवइया ३१ सा, पुदलजीव काल धर्म अधर्म नम पईपदव्यज अखंडरूप जानीये, पुद्गलमू- र्तिक और है अमूर्तिक जीव द्रव्य चेतन अजीव पांच मानीय, अपने स्वभाव धरि रहेहै सही द्रव्य पद्यपि मिले हैं तोजन्यारो पहिचानीयै, योंही अन्य भाव जान राजजीव न्यारोमांन निहचे निगमयां न संसपन आनीयै २०न्पारो धन घाम गांमठांम कान सप मात सात मान न्यारा अंगाल पाइकै, राज अविनासी लम्ब पोरासी- को पानी कह होन न उदासी जगवासी सदमाइके, निध्या मन एक्यो वस्यो मिथ्या मेरी २ सय दक्यों है विवेकरवि तमो घनटाइके, पाजी संकलि जैसें बाजीगर ऊटजात पर एक बालकहूं यालमो दिखाइके २१ संध्याकालि तम्डार पठे आय ग्वंग कुल रानि पसि प्रात कठि न्यारे २ जान है, लेन बसेरा रातपंथी ज्यूं सराह- धीच जोरत है प्रीतजोलूं होन न प्रभात है, गइयानक संग ग्वाट डोलन है सयदिन आवत प्रदोष गेह इकटो दिखान है, असें अन्यभाव मन आनियेतो राजकवि ज्ञानर उधोन होन अज्ञान विटान है २२ अध अशुचि भावना पष्टम कथन, ॥ दोहरा ॥ अशुचि मिले यह ऊपजे, अशुचिहि पंथ्यो पिंड, जेसी मादी होइहै, तसोही है भंड सबड्या ३१ सा, मांस हाडचा. मनस मंदगुदरसयस मना केस शुक्र रेतयहै पिंड रच्यो है, शुचिको न अंस परमंस याकी करें फोन घामको सामेला घेला मैलही मच्यो है, महारूठो छो दृट जिनमें अपूट होन लंपट निपट लोभी लाल. पौ सच्यो है, ऐसो राजदेव यांर कीजिये कहा सनेह पांसू नेहकर नर कहो कोन यच्यो है, २४ अंपर अनूप 4

अंग होत है मतंग चंग कपहु पतंग भंग कीटक अकार
जू, कयरक धनी निरधनी सुस्ती दुखी जीव कयहुक
वेदविन कयह चमारजू, जेसे नट एक भेष घटत अनेक
धाट तेसे एक जीवके अनेक अवतार जू, घनघनाशालि
भद्र थूलभद्र जंबू यडा त्यागी जे मंमारकेजू अभय कु.
मार ज १४ अथ चतुर्थ एकत्व भाव कथन ॥ दोहरा ॥
जडतो करताह नहीं करना चेतनगव, जो करता सोइ
भोगता, यह एकत्व प्रभाव १५ सवइया ३१ मा, कौन तेरे
माततात कौन तेरे अंगजान कौन भ्रात जात तेरे सय है
सयारधी, अरथ ग्वटाऊ परलोकके बटाऊहोलधनकुं
घटाय लेन मिलके धनारथी, ताकी गति कोन बुझे सा.
रथके मोह चूझ भवमें अम्झे कोऊनांही परमारथी,
चेतन विचार चित्त इकेलोलो तूंहमित्त उपद पलत आप
आप हो सारथी १६ एक अमहाई आप करत हे पुन्य
पाप करमळू मेले आप आपही प्रमाथीजू, स्वारथके काज
सप मिलत ममाजराज येदनीके उपजतन को संग
साथी ज्, अंगकाल आवे जय आखर इकेले सय कड़ा
भयो काटके जू यह रथहाथी सू, एक भाय मनधर माया
लोम परिहर भये पैरागी सागी अतिथि अनाथी
१७ तेरोलो न कोजजीव तंहिपनकाको यांहि आयो है
इकेलो तूं इकलो फिर जाइयो, काहेक विराणेकाज
निपट फपदराज रहत है आठोयाम घंधही में
पाइयो, दुकृत मुगृत दोऊ साथिहोई तेरो सोस और
केनकोम पुन्यपाप फल पाइयो, फरहें हरे हैं आप केलोही
पुण्यपार जीय असहाई एक यह ध्यान ध्याइयो १८,
अथ पंचम अन्यख भायना कयन, ॥दोहरा ॥ न्यारोपे
पुदलपंप्यो, संसारी जियद्रव्य, शानी यूं न्यारोहले, दूध

२३ दही पनगव्य १९ मयझ्या ३१ सा, पुनरजीय फार धर्म अधर्म नभ पईपवन्यजू अग्वंडरूप जानीये, पुद्गलमू- तिक और है अमूर्तिक जीव द्रव्य चेतन अजीव पांच मानीय, अपने स्वभाव धरि रहेहै सपेही द्रव्य यद्यपि मिले हैं तोऊन्यारो पहिचानीपे, पोंही अन्य भाव जान राजजीय न्यारो मान निचे निगमयां न संसयन आनीये २० न्यारो धन धाम गांमठांम कांम सब मात सात मात न्यारा अंतकाल पाइकै, राज अविनासी लख घोरासी- को वासी कई होत न उदासी जगवासी सदभाइकै, मिथ्या मन छक्यो वक्यो मिथ्या मेरी २ सय टक्यो है विवेकरवि तमो धनठाइकै, याजीकू संकलि जैसें याजीगर जठजात पल एक बलकवं ग्यालसो दिखाइकै २१ संध्याकालि तम्हार वंटे आय बग फुल राति यसि प्रात जटि न्यारे २ जान है, लेतह बसेरा रातपंधी ज्यूं सराह- धीच जोरत है मीनजोलं होत न प्रभात है, गइयानके संग ग्वाल होलन है सपदिन आवन प्रदोप गेट इकेलो दिखात है, असे अन्यभाव मन आनियेतो राजकवि ज्ञानके उद्योन होत अज्ञान विलान है २२ अथ अशुचि भावना पाटम कथन, " दोहरा ॥ अशुधि मिले यह जपजे, अशुचिहि पंध्यो पिंड, जेसी माटी होइहै, तेसोही हे भंड २३ सवढ्या ३१ सा, मांस हाडचा- मनस मेदगुद्रसवस मना केस शुक्र रेतय पिंड रच्यो है, शुचिको न अंस परसंस पाकी करें कोन घामको सामेला घेला मैलही; मच्यो है, महारुटो झूटो दूठ जिनमें अपूट होन लंपट निपट लोभी लाल- घमें लच्यो है, ऐसो राजदेह यांसू कीजिये कहा सनेह पांसू मेहकर नर कहो कोन घच्यो है, २४ अंपर अनूप

२२
अंग होत है मतंग चंग कयह पतंग मूंग कीटक अकार
जू, कबहुक धनी निरधनी सुखी दुखी जीव कयहुक
वेदविप्र कबहु चमारजू, जेसं नट एक भेप थटत अनेक
थाट तेसें एक जीवके अनेक अवतार जू, धन्नयनाशालि
भद्र थूलभद्र जंबू घडा त्यागी जे संसारकेजू अभय कु.
मार जू १४ अथ चतुर्थ एकत्व भाव कथन ॥ दोहरा ।।
जडतो करताहे नहीं, करता चेतनराक, जो करता सोइ
भोगता, यह एकत्व स्वभाव १५सवइया ३१ सा, कौन तेरे
माततात कौन तेरे अंगजात कौन भ्रात जात तेरे सब है
सयारधी, अरथ खटाऊ परलोकके वटाऊहोतधनकुं
घटाय लेत मिलके धनारथी, ताकी गति कोन बूझे खा.
रथके मोह यूझें भवमें अरूझे कोऊ नांही परमारथी,
चेतन विचार चित्त केलोतो तूंहेमित्त उवद चलत आप
आप होऊ सारथी १६ एक असहाई आप करत है पुन्य
पाप करम• मेले आप आपही प्रमाथीजू, स्वारथके काज
सय मिलत समाजराज येदनीके उपजत न को संग
साधी ज्, अंतकाल आवै जय आखर इकेले सप कहा
भयो काइके जू यह रथहाथी जू, एक भाय मनधर माया
लोम परिहर भयेजू बैरागी लागी अतिथि अनाथी
१७ तेरोतोन कोऊजीव तूंहिपेनकाको यांहि आयो है
इकेलो तूं इकेलो फिर जाइयो, काहे• विराणेकाज
निघट कपटराज रहत है आठोंयाम धंधेहीमें
घाइयो, दुकृत सुकृत दोऊं साधिहाद तेरो सोऊ और
फेनकोज पुन्यपाप फल पाइयो, करेहँ हरे हैं आप इकेलोही
पुण्यपाप जीव असहाई एक यह ध्यान ध्याइयो १८,
अथ पंचम अन्यस्व भावना कपन, ॥ दोहरा ॥ न्यारोपे
पुद्गलयंध्यो, संसारी जिपद्रव्य, ज्ञानी यूं न्यारो लाग्दै, दूध

धीच जोरत है प्रीतजोल हाट दही घृतगव्य १९ सवइया अधर्म नभ पईपद्रव्य महल र्तिक और है अमूर्तिक जीवन मानीयै, अपने स्वभाव परि गरे मिले हैं तोऊ न्यारो पहिचानी राजजीव न्यारो मान निचे गिन २० न्यारो धन घाम गांमठांना न्यारा अंतकाल पाइकै, राज - को वामी कहूं होत न उदानी का मिथ्या मत छक्यो वक्यो नि विवेकरवि तमो धनठाइक, या ऊठजात पल एक म्वलका अनो संध्याकालि तम्डार बैठे आप म जटि न्यारे २ जान है, लेन बन संग ग्वाल होलन है सपदिन दिखात है, असे अन्यभाव ज्ञानके उद्योत होत अज्ञान Eि भावना पष्टम कथन, ॥ दास ऊपजे, अशुचिहि यंध्या सोही हे भंड २३ सवइया मनस मेदगुदूरसवस मः रच्यो है, शुचिको न अंम घामको सामेला घेला झूठो दूठ छिनमें अपूठ हो पमें लच्यो है, ऐसो राय यांस नेहकर नर कहो रि दुतो रामचि कहियेनि- वजीर्ण- कटितट पांच

No text on this page.

२५ फपाय घार दोपकै नियास है, राज देश भोजन नियाकी घात विरुयाए अविरति मिपायोग मिथ्याकर्म पास है, आप्रवकी भावनाए भाव हुभविकराज इनके नियारतही ज्ञानको प्रकाश, ३० अध अष्टम संपर भापना कपन, ॥दोहरा ॥ज्यू फुल आगम रामिर, ले पाटके पंध,त्यूही आयरो किपे, संपर भाय सुमंध ३१ सा, परण धरण धरजीवको यतन करे पोलत पचन अमे रागरोपना पद, भोजन विशुदि गृढ होप यो नरसनाके ग्रहन धरन यस्तु मन दयामें मद, फफ मट भून पिट् रुपमको सारियो जु अमी भांनि हारे में जंतुनाम नागडे, मनवप काय ती. नं गुपन परत निन इनहि निश्रेणी माधु मोक्षधांम जे पंड ३२ माणि पर भूपायप भदत्त मयुननि परिग्रह सोममूल पानिरूपो पोपह, इनको निरोप मोड पर एम्बानियतु यह सुम्पोतु जांनि संपर मंगोप है, संपरk प्रीति जार मोज उपदेश योग ओरनर उपदेश पृथा पंटगोपई, मोक्षपुरगोनपिच संपलमो पर मपनही भाीगण जीवनही मोपट, मंपर निर करशिन जीप गपेनिरं नारंगे किनही आगे अप धुतरतुरे, संपर समान और ज्ञानविज्ञान का परमाह सोजजोक मंपर सरनु, संपरको एकतर सुरद रम्य है तन मानो करम गरि पहुं नालस्तुर, दयदंत मेनारिज पाथि मुनिराज गजगुरुमातसे पानक ददतु ४ अपन. पमी निर्जरानापना पाप कपन, दोहा, तामुकादिनि- रा फर्मजुभातमीन सप सप पर भापपम जीर्ण- को मापन १५ सपापा १ मा. कमर दंगोंट करिनर सुंलपेर शाम पांमार मारतुएं मोर पदारिद, ए. फासन भाठोपाम घटना रीतिमांचि जारना पीट पांच मानना पापा जारि मा अावदनई मानयहि नगन रित नीर मन गांगर जाना मागविन निर्जग मामगर जापन जनार्गन निमनार जिने जगवामी नारजगम नानि ज्ञानीक गत वही निनग कामम गगमाग गरिपारि विपन वियोग- दुग्न भग्वायाम नापान TAT गामम इत्यादिक कष्ट- कर मरमवरममा निजग जाना र ज्ञानी दया. मम आपवम गागामर मरर मदद लिनकनं मि. लई डिशवति गामन :', प्रायांना विनय मिआय ध्यान का माग र गायक नारान तमाचजनकं, अंतरंग तप ग्यद मंद पानापत मान स्मिल यह मदा निज मनकु पयाम नादरा ना मनपान काय कम रमत्याग नान पट गर मनप उभय मिल हादश निर्जग पारस शम 'गत वनक, ८, अथ धर्म भावना दशमा कपन दोहग शुदधम पदको अग्ध पाटन व मम भवनलम ह जायक पारन माही धम्म ३५ मघदया : मा दानशील नप भाव चारांही विग पाउ विमल विजानदग दयामुम्ब दावाह, मो- भाका ममूहजाको विमद विवेक प्रछ निश्चय व्यवहार सार उभे शृंगमाी है, मंपदाको हेतु दुहु लोकनमे सुग्घ देन अमृत अवतधार संत वच्छ चाह, अंसी कामधेनु चरन विपनतृण राज तेरे चौर नितं नीकी भांति राग्वीहै ४० धरम अरथ काम नीनूवर्ग हितकाम उत्तम उदार सुविचार मनठानी ये, चार गतिमा झिसार मानवको अवतार साधन त्रिवर्गको चतुर चित्त आनीय, तीनोंमें प्रधान बुद्ध कहत धरम शुद्ध अर्थकांमको जुधर्म कारण पिछानीय, राजनर भव पाय धर्म जो करन मांहि पशु ज्यं विफलनाको जियन यजानीये ४१ मांनी जिन- वांनी जिन्हीनीके जाण पहचानी ज्ञानी धर्मध्यांनी जिन्हें तृसना तोरीहै, जिनोंकी अमूहना नगढा है न. योहाजेसें समिति आरूद प्रौदा जैसी प्रौदा गौरीहै, ले. तन अदत्ता अभेदांन मुंजूरता मत्ता कयह नहोत तत्ता माया मरोरीहै, धर्म भावधारी असे धन २ नरनारी इला पुत्र भरलसे धर्मरथ धोरीहै, ४२ अथ इज्ञा- रमी लोकवरूपभावना कथन, दोहरा, नायहकाहने घयो. काह घसोन आहि, सयंसिद्ध यह लोकहै, देखे जानीनाहि ४३ सातराज अरघ पाताल सातराज पुन चौद राजलोक गती आगत है । जीयकी, चौद राजलो. ककी मुधिति भांनि असी आहि उभप हाथ टेके फटि प्रति म तियकी, यांमें अमी ठौर कह नाही, जहां आ. तमकों नहींभई परामुनि जरा मृत्यु भीयकी, जाति जोनि कुलथान फरसे अनंत बेर दीव्यदृष्टि देख ज्यूं वि- लोकदृष्टिहीयकी, ४४, देवर मनीजो भ्रात काका मुत न्यानी पुन एक यालसंग पदसंबंध सहाने हैं, भ्रात तात मुन भरतार दादो मुसरसु पही पुरुष साथ तानके सुनाते है, पंधव वधू सौति साम् पधू दादी जननी जु इनो संपंध निजमातहीके भाते हैं, चैस्या सुतासुत जायो कर्म पस, सो उव्यायो भातसुना सुन जायो कर्म यसिसो जल्याहो मानसुन सुताराज अठारह नातेहै ४५ अर्थ: कुपेरमेन पालक ६ नाता देवर लगे भारका भाईक नाने १ भनीता लगे भाईका बेटा होणेसें २ भाई लगे सगीमाका जन्मा हुआ इम नाने ३ फाका लगे या- पका भाई होणेसें १ पेटा लगे शोकका बेटा होणेसें ५ पोता लगे मो सोकके जणे घेटेका येटा होणेसे ६, अथ कृवंग्टनम नाना भाई लगे एकमामें दोनही जन्मे टमवाम्ने ? बाप गे माकापनी होगम शोकका पुत्र मागमे येटा गे: आपटममं पण गई इम नाते भ. नार नंगकारा यार गम डाटा लगे 'देवरका बाप गाम ममग नंगे: अब मान कुयरम नामें, मा मया दिग्पात : मामी यह होम माजा लगे । दोनों गमनागमी या गाम्म माफ लगे २ पनीकी माटोम माम नग : मार बरसीवर होणम यह नग काग माग दाटी गे'. मग पंटम पैदा नई इम मच गमागमना । नानकी कथा जं. बग्निम दम गा मा माग्यही भाई विन पागाई वा नाट माता पिनमाय अमाताकी जांदाताई आपमम गजात भिर मजगजम भर- ना यादबल पर मन माता गरना जलाया लाप मदिरम व्रतन विनत समाना मिदानम विक्षाता है, लोकको बम्प प्रमा ज्ञाता बिन मा भार दुनियांक मार पार महापाम गनाई दादशमा दम भावना कथन. दोन मणिमाणिक मलमानिना मागमगंगभ- नेक यं दुग्लम नही जारा दालन माग्न एक ४७ मवहया ३' मा पल भयो जस भगा अनिल अगनिभयो पर पशु पंवीभया कलम करगर दव भगा दानव भयो नारकी निगोभयो जलपल नागमा भीषण भांगरे, नरभव धरम श्रवण जिन बर्गर व्रत पायेग धीर मकति अभंगर, अंचार मुविचार पदम गजमार शिवमुख माघनके उनमो. अंगरे १८ भी नर नर भय पापयोन, येर २ पायो है तो प्रीतिकर योषि दुरलभमु. देय गुरु धम्म परवनीक नीजीयन देबियन दरक्षण राषि . रहे दंभमु, निरंजन देव देव गुरु निरगंध सेव दयामूल घम मदा देख निरारंभसुं, जानकी जंजीर जर जकर पकर करि पंधमन गजराज समकिन शंभमुं ४९ देव गुरु धर्मको संयोग अंग पंग अति पायोतो प्रमाद् एक पल- हीनकी जियै, घरद पवधारी नाहकी जो होतस्यारी यहुल मंसारीको निगोद माग्नि दीजिये कोडीकाज हारिये नकनककी कोडि कहुं बचिक मतंग तुंग कहा ग्बर लीजिये, मिथ्या मत विपपान कीजिये नराज कवि पोधि सुधारस अति संपुटकै पीजिय ५० दीपयुगज मुनि शशि वरप जादिन जनमें पास नादिनकीनो राजकपि यह भावना विलास ५१ यह नीक कह जानिय पढिय भाषा शुद्ध मुम्बमंतोप अनि संपजै बुद्धि नहोय विरुद्ध ५२ इति श्री भावना विलास पंडित राजसिंह मुनिकृनं संपूर्ण ॥ तीतर व्याल विलार चिरी मकरा मफरी इन मांझि फसह, धूम सिहंदर यूं छविमां कण भूप दिवारण मांहि घसेहैं, तेंजु कियो अपणे रसकुं अपणे २रसते हुरसेहैं, जाघर कुंजु कहै अपणा घर ता घरमें घरके ऊबसे हैं,१, अथ पांच एक पक्षवादीयोंका मत, छठा सर्वज्ञस्या- द्वादीका सिद्धांत स्वरूप वर्णन चरचा लिख्यते । अरिहंत सिद्धसरि नमूं उपाध्याय मुनिराज पंचपर- मेष्टी नित नमूं सारे आतमकाज १ जिनपरवाणी सर- स्वती मनिविस्तारणमाय निहुलोकहितकारणी प्रमु पाणी सुखदाप २, गुरुगुणसागर आगरू नागर नवल अनूप कृपा करी मुझ तारिग, पायो जनस्वरूप ३ प्रणभु गुरुपदकमलकं स्याद्वादको भेद पंचवादी चरचा काहूं मना 7.1 , ITTTTT - THE गगा मना" मा. केवलीको F TRA पना गाना अंतर तुलन TE THT W T मन त मात्र मत मतां- माता गुपदान भव्य नि न मनमें वि. fাশাধন TET मि.गा मन- ाि गरमी, . 'rt To योग Ta Tीगो सपमा कहा नावाद माने * , गन + ... 4 . ...नही 11 मका HIR मानान प्रम : जन मन मायन ART पनगाकाहान डागा पान नानका काल. होतं मा कम पाक नाग न कर हाल मात्र माता कातिन गत्रयाग पाएर पारदर बहरत काटक भितदिनगना गर. जिनमत ना जानित गजाय का निराकार पक्षात को... मा समाव पाटी नगर, कलममा. | " ফুল না গম * পাস आमें, कारवार, मंद नहीं पागम मही करनाल । ही नहीं रग, जात जात दरबत पांनपल मांन २ पटचर थलपर पायी ऊहे म्वगमें, एकजिन मतनय डाणेविन जगजीव कद्दन निलोक टोक भूले पग २ में, ५, कांटे पोर यंबूलफे कोण कर तीक्ष्णना। इसकी सरलना कपटाई यगमें, विनांही सभाव मोर पंचकोण चित्तरता कोकिलाको सादवर स्वरभंगकगमें, विषधर मिरमणी विप हर ततकाल पवनको चलभाय घिरभावनगमें, एक जिनमतनय जाणविन जगजीव फहन निलोक टोक भूले पग २ में, ६, पृथयी कठिन पुन शीतलना जलमांहि पनि रे ऊंड इयं शाल आगमें, मंट उपशमें पाय हरडविरंच करे रवितपे गाशी सील सुम्मन नरकमें, पर इल्प उजे काय भावा- दिक भाव सय पिनांही खभाव कोर होन नवरगमें, एक जिनमननय जांणे दिन जगजीव फहत तिलोक लोक भूट पग २ में, ७, अथ भवितव्यता वादीके वचन, भवितव्यवादीकह मुणरे प्रभाव मूह भवितव्य पिन कोज काज न सरत है, अंघ मोर वसंनमें लागत है कई साम्ब के खिरे केई दांके अंपके परन है, उदत निरल पुन भ्रमन जंगलविच करत जनन कोर भायी नाटरत है, एकतिनमननय जानपिन जगजीव कहत निलोक लोकपचके मरत है,८, होत यके यसविन चिं. तन्यो मिलन आय विनाही जनन होनहार नर रत है, ब्रहमदत्तचक्री नैण फोडा है गुचाल तय सोले सहस देवमें काजन सरन है, झटका लागत कई रण माहे चचे नर नियतके यससास धीरन धरत है, एक जिन- मननय जाणे पिन जगजीव कहत निलोक लोक पचके मरतह, २, कोकह सकत है कोयल केसें रहे माण, पारधी तान्यो है तीर सींचाण फिरत हैं, पारधीको नागडस्यो मीचाणके लागो याण उडगई कोयल सो नियत करत है, जनम मरण जरा व्याधी रोग मोग जोग सुम्ब दुख भूम्बादिक नियत धरत है, एक जिनमतनय जाणे विन जगजीव कहत तिलोकलोक पपके मरतहै १०, अप फर्मयादीके वचन, नियत सभाष काल तीनही जुगनी ताल फर्मका अजय ग्याल कर्म यलयान है, कर्मश्री नर- क निरपंच नर मुरगति कर्मके यम निहुं लोकही हैरान है, कर्महीने युधियंत कर्महीने ऋद्धिमंत कर्महीने यु. द्विहीन मुरम्म अजान है, कर्महीने निरधन फिरत है पन २ जन २ पाम जीय मांगे मुनियान है, ११ को उक पृथवी जल अगन अनिल काय कोउक बनमपती फल पल पान, कोउ पाराज लोकर्म किरमा अलम्या कीडी धनग लोमटीही होत विकलान है, कोऊपर करी हरी रिच्छ कच्छ मच्छ मग पाल व्याल नोल कोल कर्म मनी स्वान, एक जिनमतनय जाग विन जगजीव कहतति लोकलोक अमन अशान है १२ कोउ महा सुंदर अनारूप जयंत कोड कृष्टीकपडो सो कुमीयोकुवान है, कोउच्छत्रपती राजा मंट माहकार लोक कोर दल. दरी नीपलाक पोर मानह, कोटक मीनल पुनयान लोक आणमांन कोटक क्रोधी लोक मांनतन पान है, एक जिनमतनय सांगविन जगनीय कहत तिलोक लोक भ्रमन अक्षान है, १३, कोटक पटरतदार चीर जरी माल जोटी को फाटेर पटहीन पान, कोरक आरोग मेवा क्षीर मांट मिमांन मीरो पड़ी मीरणी अनेक पकवान है, कोरकं मिन कुटी कोदराकी राप माटी मुम्मा दमा का न मिले माती पान, एक जिनमतनय जांण पिन सय जीय कहत तिलोक लोक भ्रमन अज्ञान है, १४, कर्महीने आदेसर जी; दुवादन माम अंतराय रही नहीं मिल्यो अमपान, वर्ष- मान स्वामीजीके पगपर रांधी वीर करके गुपालरीस खीला रोप्याफान है, तीर्थकर पति हरीहर इलघर मंडटीक सलयर खांन मुटतान है, एक जिनमतनय जाणेविन सप जीय कदत निलोक लोक भ्रमन अज्ञान है, १५, अप उधमयादी पचन, कहत उद्यमवादी कर्मसें न होत का होन, उधम काम उदामही सार है, उ. धमधी शुभाशुभ कर्म सुख दुग्न होत उद्यमी नपा पता सीलन तइयार है, लिखा गितगीत नाद चिन्न उदरामधी हाट खाट पार पर सरप नहपार है एक जिन. मननय जाणे विन मय जीव कहत तिलोक लोक हये मझधार ६, १६, लेउ पात तिल्ली तेल दधी राणी पट. मेल उद्यमी भिन्न होत धानुनको खार है, उधमधी हटखडे नाज पोये धरती में उद्यमी काट बला माही दैतडार है, उधमपी तुस दर करके पीसत पुन उद्यम रसोईकर खाय नरनार है, एक जिनमतनय जांणेविन सय जीय काहत मिलोक लोक हूये मझधार है, १७, उधमपी तपजप नितनेम पानध्यांन गृह। पास मांड- कर होत अणगार है, धन घाती दूर होत तात है उद्यम कर्म अंगज कहीं जतास कर्म किरतार है, उद्यमसे रंकराय धनधान्य योग भोग गदकोट सपकांम उद्यम प्रचार है, एक जिनमतनय आणविन जीप सप कहत तिलोक लोक ये मझधार है, १८, अध सर्वज्ञ स्याहा- दीके अपन, खेंचाताण करत पांचों वादी भिन्न रसा. जतन नपज्ञान कौनतंत सार है, बंचे को एक पक्ष - न . 12 पान, नागा - नीर मीना फिरन है. पारधीको नागडयो मानागा लागा वाणा उगई मोपल मो नियत करत , उनम मगा जग गाभी गंग मांग जोग मुम्ब दुख भग्नादि निगत परत कजिनमतनय जाणे बिन जगजीव र निगानगर र मग्न १०, अथ मादार नन नि ममात्र काल नीनही जुगनी लार TETT'म पलयान है, कर्मथी नर- + निम्न ना मान सम्मा बम बिनु लोकही हैरान सम्मान : पन मान मदिमत कम्महीने यु- दिन माग F:महान निरयन फिरत है ITE HIT नमान११ को उक पा र कान FEET बनमपनी फल THE THER'मा अलया कीडी चनमा , MEET काऊपर करी irI.. पाल मोल कोल क.म्म मना पान " मना विन जगजीय जाति - मन जान, • कार महा सुंदर अनुगमनान FE 4.1 मा कमीयाकुम्यान है मामलापता' मामा कोउ दल- दग नानलार चार यानं. 12. मातल पुनयान लोक भागमान कारभर कागा दार मानलन बान है, एक নিনননন নাগবিন রারা কল বিন্যা গা भ्रमन अज्ञान है, .. कोक परामर गीर जरी माल जाटोका कारट पदहान पान .. कोरफ भागंग मेघा क्षीर चांद मिमटान मांग पी मीरणी अनेक पकवान, कोरक मिलन कुटी कांदगी गप माटी गप्पा दमा टुकहा न मिले माना पान. एफ. भ जिनमतनय जांणे विन सय जीय फहत निलोक लोक भ्रमत अज्ञान है, १४, कर्महीने आदेसर जी दुवादम मास अंतराय रही नहीं मिल्यो अन्नपान है, पर्ध- मान स्वामीजीके पगपर रांधी ग्वीर करके गुपालरीस खीला रोप्याकान है, तीर्थकर घमापति हरीहर हलघर मंडलीक नलवर ग्वांन मुलतान है, एक जिनमतनय जाणेविन सय जीव कहत तिलोक लोक भ्रमत अज्ञान है, १५, अथ उद्यमवादी पचन, कहन उद्यमवादी फर्मसें न होत कछु होत है उद्यम काम उद्यमही सार है, उ. चमी शुभाशुभ फर्म सुग्न दुख होत उद्यमधी नया चला सीखत तइयार है, लिग्वन गिणनगीत नाद चिन उद्यमयी हाट खाट पाट पर सरय तइयार है एक जिन- मतनय जाणे विन सय जीव कहत तिलोक लोक हये मझधार है, १६, लेउ धात तिल्ली तेल दधी लूणी पट- मेल उद्यमी भिन्न होत धातुनको खार है, उद्यमी हलबह नाज पोवे धरनी में उद्यमयी काट खला माही देतहार है, उद्यमयी तुस दूर करके पीसत पुन उद्यम रसोईकर खाय नरनार है, एक जिनमतनय जांणेविन सय जीव कहत निलोक लोक ये मझधार है, १७, उद्यमी तपजप नित्तनेम पानध्यांन गृह । पास छांड- कर होत अणगार है, घन घाती दूर होत तान है उद्यम कर्म अंगज कहीं जै तास फर्म किरतार है, उद्यमसें रंकराय धनधान्य योग भोग गढकोर सघकाम उद्यम प्रचार है, एक जिनमननय जाणविन जीव सप फहत तिलोक लोक हूये मझधार है, १८, अध सर्वज्ञ स्यादा- दीके पचन, खेंचाताण करत है पांचों यादी भिन्न २ जा. तन नयज्ञान कौनतंत सार है, बचे कोउ एक पक्ष ५यास- - जाणि न दक्षताको मदनप जांगगिना जाणे जो गमा है. किमी मान टाटा नर कहीं जे गुम्जीवाको ताहिको दृष्टांत कही हात निमना रहे. एक जिनमननय जांणे विन मय जीव कहत नियोक लांक ट्रय मन्नयार है,१९, अंग कार मनमाने दावी ग्यवाद गिण्यो पांच जिण ग्रयों निणयम जमा दाम्या मह ग्राही तिण कयो दगी बांड जमा १3 ग्राही को नाग कान मूपमा• या है, दन ग्राही ममरमा पट दंग्य चौतारसो कहत है निलांक टाक पE पक्ष गया है आप मन साच कई मननके भाव झट राम ज्ञानी एक पक्ष वाद दूर नागा है.२०. मग कइष्टात दिक्ष करत प्रश्न एसो आग पील दादी वग मीन एनम ठानिये, गुरु कहे मांकटी मगम चले. पाच नर आच पीले छोटो पो गांम नही जाणिा गरि शामी जीवा जीय मानू पटु बाप बंटा पहली पार पक्ष दा कम पहला मानिये, आग पाल बाटा वडा निलांक कहीं ज कम एकेकी य. दाट कर पक्ष नही नागिरी " जमे पांच अंगलीसे लन हे कयलमुग्न टंक आणी "कवाद देगी नाभिडाइके, मना मिल मर्यही रणांगण मांडजिम मुमट ममुह मिल नीतन पहाइक, धनुप पणछ नीर न्यार्ग रह जयलग नयलग मार नहीं बना चढाइक, एम पांच मिल्या. विन काम नहीं होन कछु कहत लिलांक एक दीजै नव- हाहक २२ नंतु ममभाव पटकाल अनुक्रम होत नीपजे नियतवस विधन अनेक है, उद्यम हीते तंतुवाय भुक्ता- दिक भोगे कम पांचं पदारथ मिल्या होतकाज एक है, नियतीक यम हलुकम्मी हुईने जीय निकल्यो निगोद सेती पुन्यको विशेफ है, मानुप जन्म पाप सदगुरू पास जाय फहत तिलोक येण सुगन विवेक है, २३, भयथित सपो परिपाक भयो पेननके पंडित धीरज उहसियों निणवार है, भज्यक पभाव शिवगत गामी मुनियर सपस्या फरत अति धानकर्म ग्वार है, गर धीर धीर मीर तुरत भाजलतीर केवल दसनकर टाले अंधकार है, कहत है निलोफ प्रापि पांच पदारथ जोग शियपुर जा जीय होत नकार है, २४, सम्यत एकोनवीस ऊपर गुणतीस वैशाख कृष्ण दशमी तिथ दिन गुरुवार के, नियत सभावकाल कर्मको उद्यमवाद पांचोहीको मतपक्ष कामामु विचार के, आज्ञाविरद्ध होय मिथ्यामें दुप्कन तस्य मुरतापामें पूफ जाणो लीजाधे सुधारके, फहन है तिलोक ऋषि स्यादादपर्चासी कधी निर्मल होय मती मुणविसनारकै, २५, इति पंचवादी एकांत पक्ष निराकरण स्थाबादस्वरूपवर्णन जनधर्म न्यायानुसार संपूर्ण। ॥ श्रीसद्गुरुभ्यो नमः अथ मध्यमंगलाचरण । अरिहंत यारागुण सिद आठ मूलगुण मूरिस्क छत्तीस गुण शोभाकर राजे हैं, उवलाप शोभने पीसगुण दु. निर्वाच साधु मुनिराज गुण सत्तावीस छाजे हैं, सपके मिलाय घेने एकमो जु आठ भये धापना इनोंकी कर माला मुम्ब साते हैं, ज्ञानादिक तीनका सुमेरू वणाय भवि राम ऋदि मारक है सरच पाप भाजे हैं १, अय २४ तीर्थंकरोंका गुणवर्णन सवइया ३१ सा नाभि मर दयानंद छोडदिगा सपी फंद योगधारी जिन- चंद ममता मिटाई है, करीने फरमहाण पांम्पाहे अनंत . जान भविक विमल भाण कुमति उडाईहै, तरण तारण खांम पोहता शिवपुर ठांम तीन लोक ठांम २ कीरत स. पाईहै, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकवान आदि अ. रिहंत ध्यान महा सुखदाई है, १, छोडीने सरय आय जोग लियो जगनाथ सीयल चलायो साथ अमी रस- याणीहै, सुण २ रावराण साचो मनलीयो जाण आपा निस जिनआण किरिया प्रमाणी है, यालनाख्या कर्म पंम मूल नहीं राज्यो अंस उत्तर परमहंस पांम्या निर. पाणी है, भणे मुनिचंद्र भाण मुणहो विवेकयान अजित जिनंद ध्यान महा सुम्बदानी है, २, वीमण धीमणजेम आगनामें गिणेपम सनविण कियो नेम तजे राजकाज है, घातिया करम धाय केयल गिनान पाय उपगारी जि. नराज पांधी धर्म पाजहै, जीय घणा कीपारद क्षपनि- श्रेणी घढ पांमिया मुगन गर अविघल राजद, भणे मु. निपंड भाण मुणहो विवेकवान मंभय जिनंद ध्यान अ. सूट जिहान है, ३, दापीने अधिकम्प पर समापरी भूप करी चिनय रयूंप यार यार पंदणा, जगर्ने अधिर जाण मुफ्नो मीश्यारो भाग भपहर मंगयांन तोडा मोह फं. दणा, अपंड धारिन पाल मोक्ष गया कर्म टाल साम्य. ना मदाई काल लिया मुम्बकंदणा, भणे मुनिद भाण मुगहो विषकयान अंगमें हुलाम आण पंदो अभिनंदणा ४ मुमति मुमनिधार कृमतने दीवी टार सुमति भजन मार जिम गुण पातह, मुमतिमें रखा गुल मुमतिरा फल्या फल मुमति भूषण मूल दीठां दुमजात है, मुमति दातार मर अंधकार किपा र मुमनिरा रणदूर बाजे दिनरान, मणे मुनिचंद्रमाण गही वियेयान सु. मदिरा किया थार मुमनही आन, ५, हांगलू वरण महासुग्व मूल ६७, चंद्रमाला अणगार है करीन काम- + रखंड १६, चयदै र पटवंड ne - न साल मणी दिनरात जोगति दीयो जरिदह, तप जप ग्वपकर पर फेवलपर हुया पर मिद्धी, मुरः सानपर काम लेस करम नाम प अखट नणे मुनिचंद्र भाण मुणहो नि न्ययोग यांन किया नयनित, ६ नोगा- । ऋद्धि- पोधे जिनराय पटा कर्म घरमांक फरमकाट भोग तज की मार लियोमो: शिक्षकह, पीच गाजे ज्यूं साल है, राग-4 राव गाव शिवपुर पांग्या मुम चार पत्तीस मुनिचंद्र भाण सुणहो विशः गविष रिद्ध नेह उत्तम चारित्र से मन मुग्व प्यार आप भारी तेजपर ताप कुंथुजिनंद- फेरीहे, सुरनर कर संवर जाज इतारूहा देव पाजे जसरी है, * छिनक- कयान चंदाममु जिन- गीतांम रदे पिनवर अ- सीयरापनंद दही पृट मिया फेवल प६ उगट , कोड है, मेट दियो मिथ्याट गरि हरे पार है, भणे मुनि जिनंद ध्यान किया गयो मानानणे m. वेफयान भोग परिहर मा सगर्ने शीतलाव सुण पुण तणो हलाल मापाप है, । ints

No text on this page.

यो पारकी घो अदभून लाभ लीयो अनोपम ज्ञान दीयो दीन दयाल है, भणे मुनिचंद्र भाण सुणहो विवेकयान धर्मनाय ध्यान घरो तिरे भवजाल है, १०, बट खंड सिरदार घोमठ हजार नार हयगय परवार असूट मंदार है, अनुत्तर फांमभोग आय मिले पुन्ययोग क्षमा २ करे लोग कीरत अपार है, पमी प्रद्धि- तणो थाट तजलीनी शिव पाट आहहीं करमकाट हुया सिद्धमार है, चंद्रमाण चितधार शिक्षकहै, हितकार मंतनाथ तंतसार जपो कार है, १६, पवदे रतनसार अदभुत गुणकार नरवर अज्ञाकार पत्तीस हजार है, पोडस हजार मुर अज्ञाकारी तंतपुर पटग्वंड नरवर साराही सिरदार है नाटक यत्तीसविध रिद्ध सिद्ध नवनिद्ध महु छोडी हुवा मिद लीया सुग्व प्यार है, भणे मुनि चंद्रमाण मुण हो विवेकवान कुंथुजिनंद- ध्यान तारत संसार ई, १७, पजअसील ग्पयाज इतारूडा गजराज पियाद सममाज छिनक रोड है, जिनक- रोडगांम घोसठ हजार घांम पासवान दणीतांम रहे फर जोड है, पसी ऋद्वितजकर जोगलिया जिनवर अ- जर अमर पुर गपे करम नोड है, मणे मुनिचंद्रभाण गुण हो विवेकवान अरिनाथ ध्यान कियां मिटे करम कोड है, १८, विरकन रह्या आप जगको न लागो पाप परि हरै सहताप पंटा धरम पोत है, दयावंत म्यनदंत गुण तणो नहीं अंन उपगारी अरिहंत, टाली मिथ्या छोत है, घटमें गिनान घाल कादीया करमसाल परममें रहे लाल लीनी शिव जोत है,मणे मुनि चंद्रभाण सुणहो विवेकवान महिल जिन पान किया निरमल होन है १९, घीसमा जिनंद राय सांपलीमरतकाय चारित्रसुं चित्सलाय तजेदार है,

३८
है, भणे मुनिचंद्र भाण मुणहो विवेकयांन शीतल जिनंद
ध्यांन टाले भवताप हे १०, जान घोडे भगवान चढ़ा
महा पलवान शील शैन्या सावधान ममकित शेल है,
धीरज कटारी घार तपसारी सरवार गुणारी गुरज सार
पाप दिया पेलहै, जीत हुई जिनराय सुर नर लागा पाय
मुगनि यिराज्या जाय सदा सुन रेलहै, भणे मुनिगंद्र
भाण गुणहो वियेकयान श्रेयांम जिनंद ध्यान आप सुख
पंमार, ११, यासुराज्य जायाप्त शियपुर दिया गत आप
धमा अदभूत मंगर कपाय है, अठ लग्न दशवाम ली.
ग्दामणि गृहयाम परहरे मोहफाम नजे लोभ लायह,
धरीने शुकल यान पांगापद निरयाण सुरनर रायराम
पंदमिर नाय, मणे मुनिगंद्र भाण गुणही वियफ्यान
यानुपम्प जापान मादा गुणदाप . १२, विमल विमल
यंग अमल कमलमण मकल जीयारा मेण दीटा जागेग.
मंह, मुमता मिॉईशोम सा नहीं गल लोम समुदर
तुं अण क्षाम निरमल नेमह, मुरनर कान मार जनम
मरण जार निगमल निराकार लिया मुम्मम है, मणे गु.
निचंड भाग मुणही पियंकयान विमल विमल यग पि.
नामनिजमह, १३, अनोध्या पुरीना ईम आयु याग
सक्षमीम जोगलियो जगदीदा दगा दिल आगाई, काम
5म जम माम मारी या जगत काम जाय पणा टांम २
किया गुणयाणी, मुमदाई मुग्ना पारमन गुणकर
अजर अमरपुर थमा निरपानी, भगं मुनिगंद्र भाग
गुणो विकायान भगत जिनंद ध्यान दियकी निमागी
१२. धर्मनाय धम्मवार को पी पगार उपदेश
दियो पार मोटा कि पादर, याचा गंतर नेश दिया
ফল না থাকায় যা গদা , पन

४ . मचार गुण सणो नहीं पार मेरी बुद्धि अनुसार कीया 4 पवाण है, सयड्या पचवीस गापा गुण जगदीशभ- भणे गुणे निसदीस परत फल्याण है, संमत अगरेपास पचायन मापमास मुदि पांचम फले आस पार भला भाग है, भणे मुनि चंद्रमाण सुणहो विवेकपान धोवीस जिनंद ध्यान महामुष वाण. इति पीस जिन- स्तुति भीमपंधी पंडभाणजीकृत संपूर्णम् ।। [अब मुनिगुण ३२ सवइया ३१ सा] पापपंथ परिहरे मोक्षपंथ पगधरे अभिमान नहीं करे निद्यायनिवारी है, संसारको छोटयो संग आलस नहीं है अंग फर्मासुं करे जंग मोटा उपगारी है, मनमाहे नि- रमल हो गंगाको जल काटे है करम दल नक्तत्व घारी है, संजमकी करे खप पारे भेदे तपतप से अण- गारताकू चंदना हमारी है १ ज्ञानकरी भरपूर विकथासं रहे दूर तपस्या करण सूर मोटा अणारी है, तारण तरण ज्याज आतमाका सारे काज दोष सती आंण लाज गुणांरा भंडारी है, छोही सप खोटी मत चोखी रासे समफिन निरपद्य योले सत भूट परिहारी है, दई सुद्ध उपदेश घालत हे दया में रेस एमा अपगार ताई घंदना हमारी है, २तन सहे शीतताप जिन जीरो जपे जाप कर्म मल देवे फाप यात विचारी है, छोडदियो धन घांन घ्यावे हे शुकल ध्यान सुधार है सावधान कु- मति विहारी है, सुनाघर समधार नकरे देही की सार शील पाले खङ्ग पार विषय दुरयारी है, राग मेप मल दोप निरमल होयै घोप एसा अणगारताचं चंदना :- मारी है, ३ मियाको कपाण कीप पावणा यंध दीप ..

मानरी पाल माघ वहान कगर्ग है, नपम्पाका किया बाण दया निदाण जाग वान्या ई मधुर्ग बाण ध्यान की कटार्ग. मफिन मल, झार मान बोई चढया लाल धीरज की कर्ग दाल श्रमा नग्यारी है शीलम न्याल लार कम्माम मर गट गम अगमाग्नाकं वंदना हमार्ग है.४ पर्गमा उपना पर इब नहीं दिलगीर मटां रहे मगर दपन दिगार्ग ममता नांही शरीर पर जीवां जांण पार मनिन न पावे नीर पाप परिहारी है, मारणा कम्म मार नपम्याका वार्य नीर गव नहीं नक- मीर आनमाक नारी है मान पंच गयी मीर कोड़ी नही राब नीर राम अणगारताक वदना हमारी है.५ अपट आचार पाट दाय मय दर डाले जामण मरण जालं ममनाक मार्ग है नए वर्ग तनगालं नार्ग मोमो नहीं नाले विष दृष्टि पाळी वाले विशद विचारी है, छोइदियो रंग नाद को नहीं परमाद चम्ब अनुभी को म्बाद इयत विहार्ग बम तन मन याले , करम बन एमं अपगारनाक यदणा दमाग है ज्ञान ध्यान रह लीन जमनास माहे मान प्रवचन ग्म पोन शुद्ध गु- णधार्ग है. इट्टी पाच यमनिटाया घणा परीन देव गुरु धर्म तीन विशुद्ध विचारी है, दहीन पाइन क्षीण टुब नहीं ग्विण दीन कम्म कारं छीन छीन धर्मक यंपारी है. यथातथ्य पंथ जिन मुगतका मुन दिन एमे अणगार नावं यदना हमारी है, ५ जिन जीको लीयो धम्म मैट दियो मिथ्या नम काम भोग दिया वम नजी ऋद्धि मार्ग है, माकर काकर मम गाल योल्यां पाये गम दीना है आनम दम क्षमा गुण भारी है, वाईम परीमा मम सहे मुनि एकदम जाका कामं करे जम कुगति विडारी

रमिद्धांतमें रहे रम पाले नहीं पम पम पसा मुनिराज
नावं वंदना हमारी है, ८ मुगनि फालेर मग जोपामेल
पग सन मन राम्बे हग तजी मप जारी है, ज्ञान प्यान
रहे लग गुणांरो नहीं धग उपदेश देये जग फुमति
विमारी है, दुर्जन भर पग गालपोल्यां मुष अग हुये
नहीं धग धग समना अपारी है, नपस्याको झल्यो माग
मारण करम टग असे अणगार ताई चंदना हमारी है,
निरवध पोले पण सकल जीवारां सेण चारनमें पाय
मन आतमा मुधारी है, निरवद्य सेव लेण पसराय नि-
जमेण नारी सप जाणे येण शुद्ध ब्रह्मचारी है, साची
जाणो मन जैन पीजा सह मान फेन उपदेश देय ऐन
सग हितकारी है, ध्यान घरे दिन रंण समजणे बरी
मण ऐम अणगार तारू धंदना हमारी है १० करणी
कर कठिन दुरवल करे तन निर है कर मरन पोकड़ी
घदारी है, अशुद्ध न देव अग्न फुकथा न देयं कम धूट
ममजाणे धन्न समना तो सारी है, मारिये दुसट मन
गाय सप शुद्ध गण हरे नाही कीर्त धन महिमा यधारी
है विलंयन करे बिन ज्ञान भणे भिन भिन एसे अण.
गार नाक चंदना हमारी है, ११ अकल यहोत ही
साचो पंथ लियो इंढी रान दिन ताकी हुंडी प्रभुजी सि-
कारी, ज्ञान तरणी घणी पीक भिन्नरपाटे तीक सदा
रह निरभीक मापा सय टारी है, यया लीम दोपदार
निरोप वे अहार संजम रो यह भार लई नलिगारी
है, तप तेज रहे दीप परीपहर लेय जीप अमे मणगार
माक् यंदना हमारी है, १२ दिलसाफ निसदिन भजन है
भगवन मिथ्या सनी दूर मन मुनि गुणधारी है, अशुद्ध
नमाय अन तप कर ददेतन फोडी नहीं राख धन उती

माचरी पण मीच यात कगरी है, तापम्याका किया वाण दग्या निशाण जाण याच्या हे मधुर्ग वाण ध्यान की टार्ग है. मफिन मर झाल जान घोडे गढया लाल, धीरज की कर्ग दाल मा नग्यारी है शीलसे न्यालई लार कम्माम कर गट मे अणगाग्नाकं वंदना हमार्ग है. ४ पर्गमा उपनां पर हर नहीं दिलगीर मटा रहे सरीर पन रिगारी ममता नांही शरीर पर जीवां जाण पार मनिन न पनीर पाप परिहारी है. मारण कम मीर तपम्याका वाव नीर गव नहीं नक- मीर आतमाकं तार्ग है. मान पर गयी मीर कोड़ी नही गव नीर गम अणगारनाक वदना हमार्ग है,५ अग्बंड आचार पाले दोष मय इं टाल जामण मरण जाले ममनाकं मार्ग है, नप कर्ग नगाले नारी मांमो नही नाल विषं दृष्टि पाळी वाले विशद विचारी है, छोदियां ग नाद को नही परमाद चव अनुभो को बाद उधत विहाग है. यम कर तन मन वाले हे करम बन पसे पगारताक पदणा हमारी ई, ज्ञान ध्यान रह लीन जमुनाफ माई मान प्रवचन ग्म पनि शुद्ध गु- धारी है, इट्टी पांच बमकीनहाया घणा परवीन देव गुरु धर्म नीन विशुद्ध विचार्ग है. दहीन पाइन क्षीण हुवे नहीं ग्विण दीन कर्म काटे छीन छीन धम्मक यंपारी है, यथातथ्य पंथ जिन मुगनका मुन दिन एम अणगार ताकं वंदना हमारी है, जिन जीको लीयो धम्म मेट दिया मिथ्या तम काम भोग दिया वम तजी ऋद्धि मारी है, माकर काकर मम गाल योल्यां ग्वाचे गम दीना है आतम दम क्षमा गुण भारी है, वाईम परीमा मम महे मुनि एकदम जाको कामं कर जम कुगति विडारी

,
सजी पर अंपरासगरी, पिपरत गोगवट नभपर ज
मनट त सही भयतट आतमा उजरी है, पणो साफ
परी घट रहे जिन नामरट, पेमा अण. १८, शान घोडे
अरवार हया सन्त अपागार मिमापना पाजासार विधि-
सुं पजापन, संजम सिनाद टोप अधिक रया ओप
दया आउघ अनोप फर मैं संभापर्ने, दांन शील तप
भाप पारों मोटा अमराप साये हया सम माप मन मैं
उमायन, मुगनि किल्हारे मांप जंगकरी पमे जाप, ऐमा
अण. १९, काटत करमदर छोडदीपा मप एल परिहरै
फस्ट फल जो नहीं आरसी अनुकूल प्रतिकूल परीसहा
पर पर अपना रा अपल सोही काश सारसी, मेटे मोह
मिथ्या मल ग्यानतणी अटकल सीमाई ने परघल संसा
सप टारसी, आणीनं संतोप जल मेट दीपी सोभ झल
ऐसा गुगपारो सीप तिरे सोद्दी तारसी, २० संसार
नीन जीलील सिद्धांत में फरीझील साचै मन पालै सील,
नहीं जोय नारसी, पुरयल फरी देह गिरया गुणारा गेह
न्याती ती तज्यो नह माया जांणे छारसी, आतमारा
टाल दोप कर मांरो कर शोष मानराडक मुनी पेगाह
पजारसी दातार॑म रंकराय सह सेती समभाव एसा
अणगार सही तिरे सोही तारमी, २१, माय नींद गई
माग गंबू जेम उठया जाग विधि सुंलीयो पैराग छती
मादि छोडन, निमी यणी सजी नागरंचकन घरैराग तेम
जगदियो याग मायादल मोडने, अन्तर बुझाई आग
लपलेस नहीं लाग दिसरा मेटण दाग तपैतन तोडना,
पास करी मन धाग मालत मुगत माग ऐसा अणगार
इस जपु फर जोडने, २२, जीणो जिन मत झाल सोधि-
पा भीतर सास मुनी भए त माल चित जाणे चन्दणं,

४४ अद्धि छांडी है, धरत धरम धन छांडे नहीं एक छिन गौतम ओपमगिन धीर गुणधारी है, भलो उपदेश भन जुगतिसुं तारे जन एसे अणगार ताकू वंदना हमारी है, १३ तजय चंपेल तेल मांन सय दियो मेल विपरूप विपे बेल उपरथी उपाडी है, वधारे धर्म देल परीसाईं लेवे झेल खेलत उत्तम खेल साचा सुविचारी है, इंद्रियांकू देवे गोप क्षमासुं रखा है ओप करे नहीं मूलकोप गिरया अपारी है, सदा रहै निरलेप कम्माकू देवे खेप ऐसे अ. णागार ताकुं वंदना हमारी है, १४ भगवंत ज्ञानभेट, सुरत लगाई ठेट, मिथ्या मत दीयो भेट, अखंड आचारी है, शशि जिम दीसे सोम हुये नाही प्रति लोम संधारों करे छ भोम दया अधिकारी है, दिखाडत सुद्धराह स. फल जीवानां नाह मेट देवे भवदाह आतमा सुधारी है, थिरकत रहे सदा लोभ न धरे कदा एसे अणगार ताकू वंदना हमारी है, १५ दिलसाफ निसदिन भजत है भ- गवन मिथ्या सुर नाणे मन एसी इकतारी है, अधिक न ग्यावे अन तप करी दहै तन कोडी एक नहीं कन छती ऋद्धि छारी है, धारत धरम धन छोडे नहीं एक छिन गोमुन ओपमगिन धीर गुणधारी है, भलो उपदेश भन जुगत सुंतारै जन असे अणगार० १६ मिथ्या मोह उनमूल हिंसा तजी लघु थूल पूठ नहीं योले मूल सजी सय चोरी है, परिहयो मैथुन, नवविध तज्यो धन राते नहीं भग्वे अन धरमका घोरी है, मुगुरूकी पाले सीख कुपडे न भरे पीख भमरा ज्यूं लेथे भीष सजी सय जोरी है, भिन्नरभानै भेद मूल नहीं फरै खेद, एसे अण०१७ पर उन परगट मारे नहीं काय पद कृडरूंख देत फट सन समसेरी है, परजीने मनवट उनमूले मदअटकायासै . रफाट पाँ, शियपुर यार आंगे नहीं मदु आठ निरमः नेम, प्रत घर सजी ग्बाट परदत्त मर पाट प्राण ही अप शाट मुर अन्त मीम है, दुरमत दीवी दाट पादपा मणा मार पिर कर नरबाट दीयो ठाटोन -क्षमता गजाना मार कर्म रितु देव काट ऐमा अन- र मा मेरी नमीन है. २८. मह मेट दीवी मंश काही कारी कर फर पर जीने मन यक रेट दीवीरी. सई, पर हर काम पक कर नांही फेर कम रागढ़प करी रंक.पार दे कटीमई, भरीनगो मोय अंक टाटो नहीं कर देनद मग मटेक जगदीमर, अंजे मंजे नहीं मंन माई डेम दृध मंम नमो मह नर नार अमे मुनी मि.२२. मनस्ति हिप गुद पाटुन घरमा बुद्ध गट सेन मी ग्दि मन्ना मिटायनें, दिदमाश जैन दर नि- रमन मानिस दिया न विर विय आटम हायन, मान मोदनद कार नहीं टोकद न कया कई दगती कलापन, पूजीने परन पद रिकर देनरद मार माई बनिए मात्र, 307 भाई नीता काल कादीने मोहन निद्वन्नर चट दाद मुदी न. माल नहींगनेन्ट किमही पल महिनी र दाद निमागेत है, अंगयी फोटमाटर और जिनवर नमोजोर करन रन मगन और मंगा कर मांदि में हनगरोन है, ३१ जगत नली बुद्ध । पुरनार याने मदद मनंदन पंत है, नीमती जेनर इन नंतान नहीं गोन. कही गत जानुपरी । ना तोट है, पिल- ४६ लग्यो ज्ञान रंगलाल चालै ऋपनणी चाल सखरा लेवे सवाल नखरनि कंदणं, अनोपम ज्ञान आल खेलत उ. त्तम ख्याल वेग शिव करे भाल नमी नाभिनंदणं, घण दढ घाव घाल पापरिपु दैतपाल ऐसा अणगार ताईं बारबंदणं, २३ अङ्गे धरी उछरंग सुंदरी को तजै संग भाव नहीं कर भंग कुल सोभ करसी, आगम अस्थ अंग चित मांहै घरै चंग ज्ञान जिसो तोय गंग दया मग दरसी, राचत सक्षम रंग अरिहंत धरै अंग जोरावर करी जंग पाप पर हरसी, लीयां फिर जैनलिंग रहै सदा एक- रंग एसा अणगार इस वेग शिववरसी, २४, सिद्धान्त का येणसुणी माया नज हुआ मुनी गिरवा यहोत गुनी अंगमें उल्लासता, भिन्नरज्ञान भणी चोखा गुण लेतचुनी दया करतारै दुनी भला येण भासता, हरखत पाप हनी घटमें अकल घणी, धार जिन राजघणी दुरमति प्रासना, गीत नाद तुछ गिणी, पाल दैतकाम भणी ऐसा अण. गार एसे सुख लहै सासता, २२, उरसें गयो अन्धेर न. न्थरा सदीयी गेर फाहि मांहि घरै फेर सूर पीर सतमें, मन दृढ जेममेर शत्रुअघ पर सेर हणत है हेर हेर मुनी जिन मत मैं, साही सत्त समसेर घोर काल लीयो घेर जमहळू कियो जेर चतुराई चित्तमें, भगवंत येण भेर पजायत्त पर येर एसा अणगार इस गछै शिवगत मैं, २६, परम धरम पांम घरजत भाव घाम हणने हियारी होम ओर तजे दांमत, गच्छत नगर गांम ठहरे नहीं एकठांम जतना झू राय जाम कामी करै काम, घोर नार फीरी घाम तप करी टाले तांम निसदिन सिरनाम समरत सांमकं, सूरपणे संगराम करीनं सुधारै काम असा अणगार थे सिधावै शिव धाम, २७, कुमन जं.

जीरकाट रहै शिवपुर बाट आणे नहीं मद् आठ निरम- ल नेम है, व्रत धर तजी खाट परदत्त सबै पाट आणे नहीं अब चाट सुर अन्त सीम है, दुरमत दीवी दाट मया दया तणा माट घिर करै नरधाट हीयो ठाढो हेम है क्षमता खजाना वाट कर्म रिपु देवै काट ऐसा अण- गार ताक् मेरी तसलीम है, २८, सहु मेट दीवी संक फीही कारी फक फक यर जीने मन बक रेड दीपी री- सकूँ, पर हर काम पक कर नांही फेर कंख रागदेप करी रंफ काट दे कलीसकू, अरीनणो खोचे अंक टालो नहीं फरैटंक देतहै मुग तक जपैजगदीसक, अंजे मंजे नहीं अंव सोहे जेम दृध संग्य नमो सह नर नार असे मुनी ईसकं, २९, समकिन दिय शुद्ध यहुत घट भई बुद्ध रीट जेम तजी रिद ममता मिटायनें, दिलसाफ जेम दूध नि- रमल गुणनिध विद्या भणे विध विध आलस उडायने, मार देत मोह मद कार नहीं लोपे कद हेत फया कहै हद फापी है कपायने, पूजीने परम पद रिपुकर देतरद ऐसा अणगार ताकृ वंद सिर नांय, ३०, बुझाई भीतर माल फापदीयो मोहजाल सिद्धन्तर चल ढाल खुली ज्ञान जोत है, माया नहीं राख मूल किमही मैं पोल कूड मवि जीवतणी दूर टाल मिथ्या छोत है, अंगधी आलस छोड गांमपुर ठोर ठोर जिनवर तणो जोर करत उद्योत है, सुरत मुगत मांहि और पंछा कर नांहि ऐसे अणगार ताकू हमारी दंडोत है, ३१ जगतरी तजी युद्ध आतमांसे करै युद्ध तार याने भयोवृद्ध अखंडत पोत है, सण जेम देतसीख मीठो जम दूध ईन्च तंतयात ततीक मिथ्या तम खोत है, रातदिन रूटी रीत प्रमुजीK घरी प्रीत गाये रूटा गुणगीत तज्या सच तोत है, विचरै ज-

No text on this page.

m]
Hum HTLINITIEMणारे,
माSAMAnt
Runt
- HIMEkatuntuantitmnt
tittenmahant
गोm Htunt sint
Mmmetunint thvs गो
14 लोगोMUMIR TRो
Histmait Mentatunt पोरादि
पोको ५५ मोर
भौर Hina II सो
११ri Ati R KHोती
Avina tam
साRiter
१९१४ १५ meeta
Atter
girl ५९ ५.!
....... Rm

No text on this page.

२, पलदेवकी वाय सुणी कृपपाराय सखीयनसें जाय यह
फुर माया, परणायो नेम कृष्ण पोलाएम सखीधरके पेम
मन हुलसापा, किरसनकी पान किये परमान नेमीकू
आपके मिलमाया, होली फाग खेले घरके राग सय
सखी लाग व्याह मनाया, उग्रसेण राय जोकी कीना
दाय क्या जान सहाई हदभारी राजुलसी ना० ३,
मिल पन कोड जादवकी जोड नेमी घांध मोड रथपर
पढिया, पांद तोरण जाप सुण पशुवोंकी हाय दया चि-
तमें लाय रय फेर दिया, तजके संसार चहगये गिरनार
सुमती धार सुघरस पीपा फहे राजुलसती नवभवके
पती तुम छोटो मनी क्या गुना किया, मन छोडो हाथ
मुझे यो साथ तुम दीनानाथ हो उपगारी राजुलसी
नार०४, बरसी दांन दिया वनमें मंजम लीया काया
सफल कीया अपणाजीया, धनराजुल मार संजम धार
रहे नेमि तार समझाय दिया, इंद्रियों जीत नज जगकी
रीन प्रमुग्रीन कर ज्ञान लिया, चोपन दिन जान प्रमु
पहली आन लह शिवधान शुद्ध फांम किया, कई कनी.
राम भज आई याम प्रभूका नाम ले चितधारी राजुलमी
नार दीपी०५ इति पदं॥
[श्रीपार्श्वनाथजीरी लावणी टेर अलखके लावणीमें,]
॥ पास जिन ऐसा हेही पास जिन ऐसा बोहो मया
देव मेरा पास पास निनरई धम्में ध्यान सदा तेरा, देर
अवसेन राजा हेहो अश्वसेन राजा हेवो वटे नप धारी
सकलकलागुणमान जिनों घर वामादे नारी, नीन शानों-
से हेहो तीन ज्ञानोंसें आये उदर मातारे सुपना दहा
और चार देस माता हरवी भार राणीराजासें हेहोराणी

राजासें कहती मुपनातिण बेला पास पास नितरदं घरूं
में ध्यान सदा तेरा १ टेर, बनारस नगरी हेहोय. हेहो
प्रभु आप जनम लीया, चोसठ इंदर उपन कुमारी जनम
महोण्य कीया, नीलवरण काया हेहोनी० देखीने हुलसे
मेरा हीया, कमठ विद्वार नागळू तालो धरणेदर कीया,
सबी मन मोहे होकाइ दरस पास केरा, पास.२, तीस
वरसां लग हेहो नीस वरसां लग प्रमु रहै घरमांही,
वरसी दांन प्रभु देकर लीनो संजम सुखदाई, याईस ए.
रीसा हेहोया. प्रभु सचित लाये, तप जप करणी करके
प्रभु केवल पद पाये, करम खपाकर दिया शिवपुरमें डेरा
पास० ३, दामकी अरजी हेहोदा०, प्रभु सुणियो जिन
राया, किरपा करकै दीजो मुझकू शिवरूपी माया, जि.
नंद गुणगाया हेहोजि० सब काहके मन भाया, ओर
देव मय दिया छोड़ पारस चित लाया, कनीराम कहता
प्रभु मंटो भयफेरा, पास० ४, इति पदं ॥
[ लावणी दूसरी नेमनाथजीकी]
॥मभुनेमनाथ तजगये साथ मेंकहुं कयलग पात सापी
कहै राजुलनार मेरे जिनसे प्यार में जाऊ नेमके साथ
सम्बी, टेर, थे आठ मयोंके सजन मेरे करगये गमन उत
पात सखी, ना आप आये ना पानी लिम्बीना रखी कुछ
लोकात सखी, हुये थारेमास कर सकी हास जा दिनसे
चही परानसम्धी, फेरोंकी पार तजगये प्यार मन मार
मार पिसतात सपी, धुप कहांसें रई, दुमकासे कहूं
मन देखत पान सजान सम्बी, कहै राजुलनार मेरे जि-
णसे प्यार में जांऊ नेमके साथ सखी, १, मोहोकी झडी
में सूनी पड़ी थी जोपनमें मदमात सखी, अब आपा

सुझा मेरे दिलंडु घुमा अप निसंक गिरि जात सखी, रस्तेके पीच मच रहाकीच थी पिर खारुत घरसात सखी, भीजे हैं पीर परसे हैं नीर सती चीर सुफाणे जात सखी रहनेम भुला ज्ञान ध्यान हुला यो देखे उधाडा गात सखी फहरा० २ रह नेम पोल नहीं तेरे तोल है अदमुन रूप पिक्षात सम्बी, घरमांही रहो फिर कांसुप हो सुख विलसो मेरे साथ सखी, कह सती पिठाण मुणहो सुजाण तेरे दिलफ़ तूं समझातो जती, संजमकं घार फिर घंछे नार विकार तुझे हैं सात सती, सुण सती पण खुलगये नेण रहनेम ठिकाणे आत सखी राजु०३, रएनेमि धीर होगये धीर से तार दिया मुझ मात सावी केपल उपाय शियपुरकुं जाय करगये नाम विक्षात स्वी, सती भय सुधार रहनेमि तार हुई भ्रमरूप सा- क्षात सखी, दाखला दिया धन उसका जिया सुण समझे उत्तम जात सखी, बीकानेर गुलजार सेहर पे राम मुनि द गात सखी राजु०४, इति पदं । [अथ श्रीसीमंघर स्वामीका स्तवन लिख्यते। । महा विदेहमें चोयोआरोजिहां विराजो आप भरल क्षेत्रमें करूंजीपंदना जप सुं पांरोजाप मैं तो दरसणकर- सूंजी मैं तोसेवाकरसूजी म्हारेरे सतगुरूजीरीमतो सेवा फररंजी, १, सेवाकरसुं दरशणकरसुं निकोदि हाडो धन, फ्यातो जांणे फेवल ज्ञानी, के जांणे मारोमन म्ह- तोद० २, हंस पणादि नारी हंनी मुझहि पमें तेज आ- वगरी मारी आसंग होती,तो ईन करतो जज म्हंतोद०३, स्वामीजीतो माहरो साप म्हें स्वामीजीरोदाश वसरहा मारे हिवडे भीतर ज्यूं फूलनमें वास, म्हंतोद०,४,स्वामी ५४ . जीरी परत मरत याली लागे मोग निर तारा भणन घाप, पाणी मीठी होय म्हेंसोद०५ म्यामी जीतो सो. पन परणा दिप २ फरती देश नेणा दीठां लागे मीठा ज्यांरीकर सुंसव, मनोद००, अंतर जामीरा पारणा लेऊ बाडामें लगयार फरणा मागर किरपाकी जो भयमागरथी तार म्हतोद०७,म्वामीजीतो म्हारे मन में, ज्याप्या सगली देह, रूम ममें थम रहामार, ज्यं यादसमें मेह, म्हंतोद. ८, दूर दिसायर म्हारा माहय, मिलियां चाय मन्न, पपइयो पाणीने तरसे जूतरम म्हारो मत, म्हंतोद०१, म्हारो मनडो आये जाये, जहां बैठा जगनाथ, भावर भीतर कोही न गिर्खा, नहीं गिणुं दिनरात, म्हंतोद०१०, स्वामीजी तो मिलियां पीछे, रंगमें पडगयो पास, स्वामी जीरे आगल करता, मुणसी सप अरदास, म्हंतोद०११, म्हारेनें जिनवरजी सरग्या नहीं कोइ जगमें देव, जिन- परजी तो साचा साहय ज्यांरीकरसुं सेव म्हंतोद० १२, ओर देव म्हारे दाप न आवै, जीता रागर्ने देप ऋषि रा- यचंद इम कहे, केवल ज्ञानी एक म्हंतोद० १३, समन अठारे घरस छत्तीसे रेवाड रह्या च्यार रात सीमंधर मि. दरजी आगे जोआ दोन हाथ म्हंतोद. १४, इति पदं । [अथ सीमंधरजीरो दूसरो स्तवन लिख्यते ] ॥ श्रीसीमंधरसांम इकचित यंदू होकर जोडनें पूरय- देसे हो प्रभुजी परवखा नगरी पुंटरपुर सुख ठाम घेकर जोडी हो पावक चीनचे श्रीसीमंधर स्वाम इक- चित यंदू हो कर जोडने, १, चौतीस अतिशय हो प्रभु जी शोभता याणीपन रे ऊपर पीश एक सहस लक्षण हो प्रभुजी आगला जीता रागर्नेरीस इकचि० २, काया T . +7 गाया, सुण प्यारे जद मीट को ही आपा, मेला, देयता नुन्ट पणापे, पैस्याफे संगही पार स्टगेल धरण पेस्या ताई नारक जिमनपस्या को नो. पहोन पिस्ताय, अप कन्या न भाय, कन्या मोरजोदर माह, पारा सेटजी रम सन् गुण प्यारे घटाजी को प्पारे पापक फहं मोनाइलाईन प्यार पक साम मोनापार्ट कन्या मेट सेजारे पर दान पपन उपारे, भापार मंटर प्रापफ मेरे परमार, पाला सीकर मेट उस पापफरमेटने दुग्द पुरम पाला मेटने तुरट- करमानीमा पपन कुमा फुपूत्री मेट गाई, मः गुमी उदलाई, मुम मानी, तामांग, माता. दुम पर पंद परामेटजी भापा निजामा यहां से भाप, ग्ले पोपाप, सलो पार पाय, परमपिता । मुनीर, विण सगी जगमो मप पर जोग नहीं मुगप्यारे मुनि निा मुष प्यारे प्पारानी सानाजी सो निरमाही सगरी चाय, सुण प्यारे खोले हे पिनाका मैल चरण हाथोंका, सुण प्यारे मैल बोलते छूटाफेस मायाका, सुण प्यारे माथासें फेस लटका दो दो हाथोंका झेला, धन्नाजी केस सयारा, आंख्या आडे सुंटारा, सेठाणी पाप विचारा, धनदत्तजी सामाभारा, ये मेरी सोकडली होगा मने निकालै घर सुंवार, जिनकेज. ८, सेटसिधाया गांम अजी, सेठाणी मन उठियो पाप, रीस करी चंदनयाला पर, मूंढा पर दी एक दो थाप, पकड कतरणी मायो मुंड्यो, सभी केस कर डाल्या साफ, हाय हथकडी पां- वाम घेडी मूंद दई कोठामें आप, सुण, प्यार चंदण- पालाकं मूंदी कोठा माही, मुण प्यारे सेठाणी तो वा अपणेपी हरसि धाई, सुण प्यारे चंदणयाला पर एसी आफत आई, [भेला), म्हे केसी करी कमाई,आ पूर्व जन- मके मांही, म्हंधी राजाकी याई, अब हाटोहाट विकाई, जेसा यांधा जेसा भोगे जीव, अप क्यूं झांके आल जं. जाल, जिनकेज., घणाजी वांसे पैर यांध्यो, घणाजी पोकं दुखी करा वैर भाव ये जीव समझले, येतो टाला नहीं टरा, महा अघोरमें पाप कीया था वृक्ष सताया धाहरा, रतन हीडोलेमें झूलथी वहतो सुम्प सय रन्या घरा, सुण प्यारे चंदनयालाजी अपणा मन समझाती मुण प्यार करते लाग्यों पचखाण ज्ञान गुण गाती, सुण प्यारे, इस संकटमें वो जरान हीयभरानी, झला, जद सेठ गांमसे आया, घरताला जदिया पाया, जद ताला सैट बोलाया पाडोसण हाल सुनाया, सेठाणी तो पीहर गई चंदणवाला पर कर तकरार, जिनकेज० १०, माहावीर सामी प्रभूजी एसो अभिग्रह लीनो धार तेरा जोग मिले इक टोडां, जिनके हापसें यह अहार, रा.

जाकीतो कन्या होवे, मोल विकाणी बीच बजार, हाथ
हथकडी पांवों पैडी, सिर मुंडा हो एसी मार, सुण प्यारे
कारटो लग्यो तेलेको पारणो होचे, सुण प्यार सूपडे
आहार उडदोंका याकता जोवे सुण प्यारे सुद्ध परणामें
देहलीमें पेठी रोवै, एक तो पग देहली भाई, इक पग
वाहर हो भाई, आ जैसी मिले जोगवाई, नहीं मिले
नो लेणो नाई. इतना जोग नहीं जो मिल छच महीना
मुग ते लेलं आहार जिनकेज० ११, धनजी कह चंदण.
पाला तेलका पारना ले तूं कर, हाजर है उडदोका था-
कला, पिन परतण लाउं क्यों कर, आमा सामा लग्या
देखने, ओर वरतण नहीं आयो निजर पटो सूपडो
दल्यो धनजी लिया पाकला उसमें भर सुण प्यारे सू.
पढे माहे पडदोंका पाकला लीना सुण प्यारे घनाजी
जाके बंदणपालाई दीना, सुण प्यारे, चंदणपाला हा.
घोंमें सूपडा लीना, मिला) बंधन तेरा तोडा जाकर
लुहारकं लांग मेरे मन में पिस्ताउं, क्या गुण मूलाका
गाऊ, महावीर स्वामी प्रभु फरते गोचरी आनिकले ध.
नजीक बार जिनकेज० १२, आपा देख्या सती मुनीकं,
मन इनका हो गया हरिया, आहार पहावण लगी
मुनीकं महा सती सुंदर तिरिया, और जोग तो सय
मिला पिण नेणोंमें जल नहीं भरिपा, एक जोग नहीं
मिला जिणीसं पीर प्रभू पाटा फिरिपा, सुणप्यारे मुनि-
राज फिर गया आहार आप नहीं लीना सुण प्यार
चंदनपाला जिस घटी रोदन कीना सुण प्यारे पीछा तो
फिरो महाराज यूं हेला दीना, झला चंदणपालाजी
रोई, ये नेण परस रहे दोई, पीडा तो फिरो निर मोही,
मारतो संको नहीं सोई, दयावंत पर उपगारी भगवान

No text on this page.

जाकीतो कन्या होवे, मोल विकाणी पीच पजार, हाए हधकही पाया पेटी, सिर मुंडा हो एसी नार, सुण प्यारे फाटो लग्यो सेलेको पारणो होये, सुण प्यार मृपहे आहार उदोका पाकला जोयै सुण प्यारे सूद्ध परणाम देहलीमें पठी रोये, एक नो पग देहली माई, इक पग पाहर हो भाई, आ असी मिले जोगवाई, नहीं मिले सोलणो नाई. इतना जोग नहीं जो मिल एप महीना भुग ते लें आहार जिनकेज० ११, धनजी कहे पंदण- पाला सेलेका पारना ले तूं फर, हाजर हे उघदोका था. कला, पिन परतण लाउं क्यों कर, आमा सामा लग्या देखने, ओर धरनण नहीं आयो निजर परयो सूपडो देख्यो धनजी लिपा पाकला उसमें भर सुण प्यारे सू. पड़ माहे उददोंका याकला लीना मुण प्यार धनाजी जाके चंदणपालाई दीना, सुण प्यारे, चंदणमाला हा- धाम सूपडा लीना, मिला.] पंधन तेरा तोडाम जाकर लुहार लांऊ मेरे मन में पिस्ताउं, क्या गुण मूलाका गाऊं, महावीर स्वामी प्रभु करते गोचरी आनिकले ध. नजीक मार जिनकेज० १२, आया देख्या सती मुनीक, मन इनका हो गया हरिया, आहार याहावण लगी मुनी महा सती सुंदर तिरिया, ओर जोग तो सप मिला पिण नेणोंमें जल नहीं भरिया, एक जोग नहीं मिला जिणीसुं पीर प्रभू पाठ फिरिया, सुण प्यारे मुनि- राज फिर गया आहार आप नहीं लीना सुण प्यार चंदनयाला जिस घडी रोदन कीना सुण प्यारे पीछा तो फिरो म्हाराज यूं हेला दीना, [ झेला, पंदणपालाजी रोई, पण परस रहे दोई, पी तो फिरो निर मोही, मार तो संको नहीं सोई, दयावंत पर उपगारी भगवान

No text on this page.

म संघाती, म्हें मूलाका गुण गाती, मुझकू नहीं कष्ट नानी हुआ फैद पदवी पानी, सेठाणीकू सेठ बुलाई बाई मूला हो लाचार, जिनकेज० १६, आवत देखी इलाई चंदणपाला सांहमी दोडा, करी वंदना पडी घर- गमें जमी भई हाय न जोडा, तेरा गुन नहीं भूलूं माता करमोंका यंधन तोडा, क्षमा घरममें धारन कीना राग टेप सारा छोटा, सुण प्यारे, में ओगण गारी तूं गुणकी सागर है, सुण प्यारे.अय करोपारणो तूं सब गुनकी आग- रहे मुणप्पारे नगरीयाकोसंबी करदीउजागर है, अलाहुई मनमें घणी खुसाली, जद मूलाकै संग चाली, भोजनकी पुरमी थाटी, पारणो करो गुणवाली, कसो पारणो चंद- णपाला धनजीकघर मंगलाचार जिनकेज. १७, म्योल ओरा देबे मृटा रतनोंका भरिया भंडार उध्य चंदण- पालाका मूलाकर रही पारमवार, योही पापक ओर योही घेरा फेर आया धनजीकेटार, इस कन्याएं मोल लई में इसघनपर मेरा इखत्यार मुण प्यारे पायक ये एनजी यचन सुनाया, सुण प्यारे, ए रतनयर सिया जिस पर मेरा दाया, मुण प्यारे इस कन्याकं तो मेंई जाहरके लापा, मेलामूलाक है येस्या झूटी, तनै मिलेन फोडी फटी, पायक तेरी किम्मत रूठी फ्यूंपिये जहर- की पूंटी, मूला ओर पायक पैस्या इन तीनोंक होरही तकरार, जिनकेज०१८, इतनेमें हलकारा राजका धन- जीपर प, जिपकरके जमा हलकारा सप न लगाय, पैरा ओर पायक पक- चेही मांय, लगे पूछने राजा इनकं लाप, सुण प्यारे, पंपा नगरीका य प्यारे, धेची घनजीक

No text on this page.

धर्म संघाती, म्हें मूलाका गुण गाती, मुझ नहीं कष्ट पताती हुआ फैद पदवी पानी, सेठाणीवं सेठ बुलाई आई मूला हो सानार, जिनकेज० १६, आयत देखी मूलाईं चंदणयाला सांहमी दोडा, फरी यंदना पटी पर- में अभी भई हाय न लोटा, तेरा गुन नहीं भूलूं माता फरमोंका पंधन तोडा, क्षमा घरममें धारन कीना राग टेप सारा छोटा, सुण प्यारे, में ओगण गारी तूं गुणकी सागर है, सुण प्यारे.अप फरोपारणो तूं सप गुनकी आग- रहे मुणप्यारे नगरीयाकोसंपी फरदी उजागर है, झेलाई मनमें घणी सुसाली, जद मूलाकै संग पाली, भोजनकी पुरसी थाली, पारणो करो गुणवाली, कसो पारणो पंद. णपाला धनजीकघर मंगलापार जिनकेज० १७, बोल ओरा देग्वे मूला रतनोंका भरिया भंडार उध्य पंदग- पालाका मूलाकर रही पारमवार, योही पायक ओर पोही घेत्या फेर आया धनजीकेटार, इस कन्याकू मोल लई में इसघनपर मेरा इखत्यार मुण प्यारे पापक ये घनजीकृ यचन सुनाया, सुण प्यारे, ए रतनयर सिया जिस पर मेरा दाया, सुण प्यारे इस फन्याएं तो मेंई जहरके लाया, प्रेला मूलाक हे पैस्या झूठी, तने मिले न फोडी फुटी, पायक तेरी किस्मत रूटी फ्यूंपिये जहर- की चूंटी, मूला ओर पायक वस्या इन तीनोंके होरही तकरार, जिनकेज० १८, इतनेमें हलकारा राजका धन- जीकैघर पहुंची आप, छिपकरके उभा हलकारा सप सुणी पात यह कान लगाय, येस्सा ओर पायक पक- डक ले गया देख कपेटी मांय, लगे पूछने राजा इनकं फमें खड़ा किया है लाप, सुण प्यारे, चंपा नगरीका राजाजीकी पाई, सुण प्यारे, में हरलाया वैची धनजीके मतीकी मी प्रकार, जिनकजा १३, मुण करणाका वचन फिर भगवान मनी पर निजर पड़ी, देय रथा भगवान मतीक दोन नंणम लगी झही. जो धारासो जोग मिल गया आहार यहिगया उमी घडी, धन २ चंदणवाला महा मीयाम आप हो मती बड़ी. सुण प्यारे उस बग्न माग दवन कारज माग, सुण प्यारे उमी बन्न मनी मिणगार एमाले धाग, मुण प्यारे मिहामणी दान हापमाग अला] धोयांमुं दांन रगा देण भगवान रग है गा देवना लंग है कण, शुभ दान लगा वर्ण भनादान दिया मला दान दिया करे दवता जनकार जिन 17., मादायार काइ निनोंकी विवाह पार भाग पाना बजा देन भी ओर पप बना टि दर माग पणा बान काटा यरमाया ग्वमा ३ नानगा माग साना अपार मारदार भगवान अभिग्रह कायो दयना जाण मग यार मया मुणनाहितरे जोग वग्वाण मग ' गायनाम महणमे जाणं भव्य पिगण, मेगा पन्नाला पाला आपा बडाहमाम मन माई अचरज गया गमा क्या दोन दि. आननग दाणकारी वन संघरमयमंमार, जिनकजा ... चटणवाला पग पारणा अपणा कारज पुश्री बटभागन धनजीकानांमउ- जाल दिया, ह यह भागण कीना तो अपणे कुल मार दिया, गग टेप अहकार रम्मा चंदणवाला मार दिया मुणप्यार चदाणयाला कहे भरी एक मुणाऊं, सुणप्यार पहली मंग मानाका दरकाण पाऊं.मृण प्यारे दरशण कर पहली पाठ आहार मुकाऊं. [ोला.माना नानाग सुण पर पापा गया मार दिया ६३ धर्म संघाती, म्हें मूलाका गुण गाती, मुझकं नहीं कष्ट पतानी हुभा फैद पदवी पानी, सेठाणी सेठ पुलाई आई मूला हो लाचार, जिनकेज० १६, आवत देखी मूलाई चंदणयाला माहमी दोडा, फरी पंदना पढी घर- में ऊमी भई हाप न जोडा, तेरा गुन नहीं भूलूं माता फरमोंका पंधन तोटा, क्षमा घरममें धारन कीना राग ट्रेप मारा गेडा, मुण प्यारे, में ओगण गारी तूं गुणकी सागर है,सुण पार.अप फरोपारणो तूं मय गुनकी आग- रहे मुणप्पारे नगरीयाकोसंपी फरदी उजागर है, मेला हुई मनमें घणी सुमाली, जद भूदाके संग घाली, भोजनकी पुरमी थाली, पारणो करो गुणयाली, फरगे पारणो पंद- गपाला धनजीकैपर मंगलाघार जिनकेल. १७, ग्योल ओरा देगे मुला रतनोंका भरिया भंडार उध्य पंदन- पालाका मूलाकर रही पारमवार, योही पायक ओर पोही पेस्रा फेर आपा पनजीसार, इम कन्या मोल समें इमधनपर मेरा हापसार सुण प्यारे पापक से मनजीर पपन सुनापा, सुण प्यार, प रतनपर मिया जिम पर मेरा दापा, मुण प्यारे इम कन्या, तो मेंई जदरकसापा, सेतामूदाफ पमा पूठी, मने मिलेन फोटरी फटी, पापक मेरी किम्मत रुटी फ्यूपिये जहर- की पूंटी, मूला और पापक घस्सा इन मीनोंक दोरदी तफरार, जिनोज १८, इतने में हटफारा राजका पन- सीपर पहुँचौ माप, छिपकर जमा हलकारा मप मुणी पात पहफान लगाप, पेमा ओर पापक पर- सहे गा देश की मांप, दगे पूटने राजा इनवं कमें मादा किया है टाप, मुग पार, पंपा नगरीफा राजाजीसी पाई, मुग प्यारे, में रटाया ची पनीर ५४ ताई, सुणप्यारे, पायक राजाक् एसी घात सुणाई, [झेला,] कन्या भाणेजी मारी, पायक आसंग क्या धारी, इतनेमें भीड भई भारी, गई वैस्या निजर चोरारी पायक अपणो ओसर देखकै निजर चोर के भग गयो यार, जिनकेज. १९, दधियाहन राजाजी पाटा आया है चंपा नगरी, नहीं राणी नहीं पुत्री महलमें भूप करी चिंता जयरी, राजाजी परजाइँ कहै अय वात सुणो पर- जासगरी, म्हारो दुखतो भूल गयो पिण थारी घणी चिंता लगरी, सुण प्यारे, नहीं मेरी चंदणयाला नहीं मेरी राणी, सुण प्यारे, यो गई कियर थेयी कोई जाती जाणी सुण प्यारे परजा कहै राजा राणीकी खपर क- राणी, [मेला, एक सेट कहै चिठी आई, राजाकू वांच सुणाई, धन चंदणयालापाई, है नगरकोसंबीमांही, चंदनवालाजीकै हाथ भगवान दान यहलो सतकार जि. नकेज० २०, चंदणयाला दान दियो आ खयर पोहचगई यडी २ दूर, दधिवाहनराजा बोला, कन्यासुंमिलणो जाय जरूर, नगरकोशांयी आयाराजा हरख हुआ मनमें भरपूर, जाय मिला पुत्रीसें चंदणमालाके मुग्वयरसे नूर, मुण प्यारे, पुनीको देव राजाकोहीयो भर आयो सुण प्यारे, गद्गद् वाणी हो गई नैणजलछायो, सुण प्पारे, राजा कहै पुत्री अय जीव सुख पायो,[मेला. मुण चंदणपाला प्यारी, पदमावती माता पारी, ये सामल रहीके न्यारी, सोमाची पात यतारी, वर्तमान यरतोसो पुत्री राजाकहे कहो ततकार जिनकेज. २१, पुनी कहै मुणो पिताजी होणहार है समरथयान, आप कठे हैं कठे मेरीमानाने नजदिया यनमें प्राण, यीच यजारे हं बेचाणी कट रसोयो मान गुमान धन्ना सेठ पुत्री कर , ६५ लापा घणो पधायो म्हारो मान सुण प्यारे राजा पुत्रीस सुणी हकीगत सारी, सुणप्यारे, राजा फहे चंपापुरीचं घटो मरी पियारी सुणप्यारे पुत्री राजासें एसी अरज- गुजारी, मेला,में एसो अभि पहलीनो, संसार सवी तज दीनो, ओ जोग मिल्यो रंगभीनो, म्हारो मन मैं दृढकीनो, जद केवल भगवतऊपजे जद में लंगा संज- मभार, जिनके ज० २२, धन्ना सेठजी धनका थेला, भर राजाकी भेट करी, चंदण याला मिली पितासे, मनकी पाने कही सगरी, धन्य भाग मिलगई पितासें म्हारे मन एमी लगरी, दधिवाहन राजाजी पीछा आप गया चंपानगरी सुणप्यारे, राजाजी कह चिंताधी म्हारे मनमें तुणप्यारे राणीकी चिंता घणी लगी थी तनम, सुण- प्यारे पुनीसे मिला जर चिंता गई छिनमें, [ झेला,] पुत्री तो हुई बडभागी, वैरागमें इछालागी संसार तुरत जिन त्यागी धन पिरालय या जागी, दधिषाहन राजा कह पुत्री मातपिता दिया उजार जिनके ज० २३, धारा परस साहाय महीना छद मसत भगयांन रया इज्ञारे वर्ष पचवीस दिन इतना नपस्या में बीत गया, इशारा मास उगणीस दिनोंका इतरा आप पारणा कीया, फिर फेवल भगवान उपजा घणा जीयांतार दिया, मुणप्यारे, चंदण याला भगवानके लागी चरणा, सुण- प्यार मोहे दिक्षादो म्हाराज देर नहीं करणा, सुणप्यारे समारोह में लीया आपका सरणा, [शेला,] दीक्षा लै जनम सुधारा, ये पंच माहा नत धारा, सुत्सरफी रीतसें पारा, महा मनीज कारज सारा, छत्तीस हजार सत्योंने घंदण पालास लीया मंजमभार जिनके ज० २४, उग. णीसे गुण चास साल भादू महीना एकम बुधवार, सु.

सपाट न चार ना- मागार पाया जा "मी यात सुणाई, [ग मगा भाग माग पागा आमंग क्या मार्ग जनम भीर मा भाग गट या निज़र चोरारी शाम मा दबा निज़र लार के भग गयो यार जिना, नारन राजाजी पाछा आया ई नपा नगरी नगणना पत्री मालम भूप करी चिता न गारजा भय बात मुणो पर- जामगा गा गना भर गिण यांरी घणी चिता गरी म नग मर्ग दावाला नहीं मग मी मारमा सिर की कोई जाती जागा मा पार पाना THI गणाकी बयर क- गणी पा]" मा आई गजाकं यांच - नगरकामंघीमांही, चदनवालाना या भगवान दान पदमा ननकार जि. नंकज , २णा वा दान या आ खयर पोहचगई ची हावाहनगजा ला कन्यामुंमिलणो नगरपाठा! वा आगाराना हरग्ब हुआ जारमिला पत्राम नाबालाके मुम्बवरसे नर, मुण प्यारे त्राका दंग्य गजाकाहायों भर आयो गदगद वाणी हो गई नजल छायो, सुण प्यारे गजा कहे पत्री अय जीव मुम्ब पायो. [झला,] मुण चंदावाला प्याग. पदमावती माता धारी.थे सांमल रहीक न्यारी मामाची वात वनारी वर्तमान वरतोसो पुत्री गजाकहं कहो लतकार जिनकेज० २१, पुत्री कहै मुणा पिताजी होणहार है ममग्थवान, आप कठे हूं कर मरीमातान नदिया वनमं प्राण, बीच बजारे ई वेचाणी कर रया यां मान गुमान धन्ना मंठ पुत्री कर जाम नार मनम भरपर सूण प्यार लाया घणो पधायो महारोमांन सुण प्यारे राजा पुत्रीसें सुणी हकीगत सारी, मुणप्पारे, राजा कहे पंपापुरीहू चलो मेरी पियारी सुणप्यारे पुत्री राजासे एसी अरज- गुजारी, मेला,] में एसो अभि ग्रहलीनो, संसार सधी नज दीनो, ओ जोग मिल्यो रंगभीनो, म्हारो मन मैं दृढकीनो, जद फेवल भगवनई ऊपजे जद में लूंगा संज- मभार, जिनके ज० २२, धन्ना सेठजी धनका भेला, भर राजाकी भेट फरी, चंदण याला मिली पितासे, मनकी पानें कही सगरी, धन्य भाग मिन्टगई पितासें म्हारे मन पसी लगरी, दधिवाहन राजाजी पीछा आय गया पंपानगरी मुणप्यारे, राजाजी कह चिंताधी म्हारे मन में सुणप्यारे राणीकी चिंता घणी लगी थी तनमें, सुण- प्यारे पुनीसे मिला जप चिना मिटगई जिनमें, [ मेला,] पुनी तो हुई वहभागी, वैरागमें इछालागी संसार तुरत जिन त्यागी धन पिरालय दया जागी, दधियाहन राजा कह पुत्री मातपितार्क दिया उजार जिनके ज० २२, यारा परम साडाइच महीना पद ममत भगयांन रया इजार वर्ष पचवीस दिन इतना तपस्या में पीत गया, इशारा माम उगणीम दिनांका इतरा आप पारणा कीया, फिर फेवल भगवान उपजा घणा जीयांकं तार दिया, सुणप्यार, चंदण पाला भगवानके लागी धरणा, सुण- प्यारे मोहे दिक्षादो म्हाराज देर नहीं फरणा, मुणप्यारे मंसार छोड मैं सीया आपका सरणा, [झला, दीक्षा ले जनम मुधारा, ये पंच माहा व्रत धारा, सुत्तरकी रीतसे पारा, महा मनीज कारज मारा, छत्तीस हजार सत्योंने पंदण वाला, लीया संजमभार जिनके ज. २४, उग- णीसे गुण घास साल भादू महीना एकम बुधवार, सु.

रतरांम विरामण गाया चंदण यालाजीका अधकार, पांच महा बनधारी मुनीवं करूं बंदणा यारमयार, धन जायदकी रन भोमका जैन धरमका भरा भंडार, मुण- प्यारे अठारे पापोंकू त्यागे यडा वो यागी, सुणप्यारे ए पंच महाव्रत पाले वोही वैरागी, सुणप्यारे ये याईस परीमा महै मोही यडभागी, झला,ये महासती वडभा. गन, चंदण याला वैरागन, यो तवन सतीको धन धन, गुनीपेममें कियो वरनन, धनयो हे जैन धरमळू धार लेवे अपणा जनम सुधार जिनके ज०२५, इति पदं । [अथ वेराज लावणी लिख्यते] ॥ दग्यत भूली ख्याल तमासा याजी गरका है खलका यो संमार धू वसा यादल ओस बूंद बिजली चमका, टेर, सतगुरु शीग्यत माने क्युंनी जनम मरणका, दुख मिटता, दानशील तपभाव आराधो, संसार समदका फंद कटना, मंपर पोसा करो सामायक सुत्रसिद्धंतप- रचित्त धरता, बग्वाण यांणी सुणोरे सरधा पाप घटे जय पुन्य यधता, तवनमिझायां पोलो थोकडा नऊ पदारथ मुग्यकरता, जांणपणे आ समकित फरस्यां पापकरमसुं रहे डरता इती बुद्ध जो नहीं हुवे तो मोकार मंत्रहिरदे घरता, भाव चढायां भवने छदे मन पंछिन सब सिद्ध करता [उडावणी] चवदै पूरय विद्यासारी, भगवंत भाख्यो यो अधिकारी, अनंत तिरयंच तिरिया नरनारी, सरधा शुद्ध पांमे हितकारी, नोकार जप्यां उंचीगत पाम सियरमणी सुम्ब है तयका, यो संसार धुं०१, पची अप या तेऊ वाऊ यनस्पती या नस काया, छऊं कायाने मार रहो है आरंभ कर २ हरग्वाया, छेदन भे- दन फरस पासना गालीदे दे धमकाया, जिजिकेने दुग्व तूं देव पर जीवासुं विसाया, झूठ पोरी मैथुन सेवा परनारीमुं पिलमाया, स्वाद भोग सुखरसना पोखी पर• भय चिंता नहीं लाया, कोडी २ माया जोडी लालच स्लोभमें पटु छाया, आमा तृष्णा मेटी नांही करना है माया माया, (उहायणी) कृड कपट छल दर करता कोडीमटे जा सरना, जोट २ घरमें धन धरता भायां फुटपमें ग्योटा करता, जनममरण ये पुरा जगनमें ज्यूं कंपनीया हमका, यो संमार० २, मोषमान अहंकार भरा है, रागडेपमें रंगराता, जालफामी दगारे फटका अनेक हुन्नर तूं घालाना, मेणा मोसा देव लोकांन सा- घने कहा करमा, पडो आदमी पजे लोकांमें मिथ्यात तुमको मुहायता, पाप अठारे म्याच पांघे मोद करमर्म मदमाता. अनेक पस्त तं लैंव फराव पापकी पोट माये भरना, मानपिना सय फुटप कपीला पेटा स्टुगाई तरा धन पाना, पापगरम न पांघे एकलो नरक निगोदमें पह- जाना, [ उड़ावणी] सप मुनन्दपकी ग्रीन मगाई, पिना- मपारथ फर टलाई, घणा यल्लभ जो पाले पाई, पाप- उदै फेर नहीं कोई माई, मागर पल्योपम होना आउमा म्यूट जाय आतम दमका योमंमार० ३, महारा म्हारा कररमो मरण पारा मय पेपणका है, कनककामनी कृ. टमकपीला जीघर दंग्यका, ज्यूंबटाउ यामी लियो पंसी पंधपयाणा है, मरची होतो ग्यारे माग्य आम्बर परभय जाणा, मानपिता मप फुटम कपीटा मिटीया © अपाणा, विएर जाप सप जूमा मोहजाल मुर• भाणा, जरदा मुपारी पानपांनमें मंदां दिन इलाणा है, या पीर्य गप्पा मारे पोंही जनम गमाणा [उटा.

No text on this page.

मानमा ज्ञानीवचन पाहो रस्ता, नकसी हु. १, पाच प्रकारे काम भोगनुं सेरे सेवावै सारा करना, शब्दयरण गंधरूप फरमर्ने जहर बायकै फ्यूं मरता, आछी मूंडी कथा लोकारी करना आनम भारी करना, फेने मरावं केन विसरावै हरब २ आनंद धरना, आंयवंओर पं. बुन याद, आपरत मुन्नकिम पडता, रोग सोग दुग्न फलद दालिदर दुबमें दुन्च पैदा करना, [उडावणी] धारी म्हारी करतां दिन जाव, आमा सामा भाठा भि- डाव, सुख में दृग्वतं पैर घलाय, ज्यूं दीपक पटे पनंगा पेनन दुरगति फ्यूं पडना, नकसी० २, नरोतुं क्या मरा, अपहनका विसराना है, पुन्यपाप जो यांधा जी. चनें पैसाही फल पाना है, किण, माया दीवी भोगणने कोई कम्बवाली करता है, उस अपजम जो लिया कर- ममें जैसा करज पनाता है, पाप अटारे मेंघाजीवरे इणमें मुपही फसना है, स्वाद वाद् मुखकांम भोगमें कृयापु. सोका करता है, [उडावणी] रुच पाप यांधे तूं सोरा, उद आयां भोगना दोरा, लग्यचौरासी भुगने फोडा, आकयोर ओर तुंचा निपोली पापफल कडया लगता, नकसी, रिपाक मूत्रने मिरगा लोडो देखो पाप उदै आपा, हाथ पांच मुख आकार नांही राजा घर बेटा जाया, जीमण पाणी एकही सुरमें झाडा नाडा उणमें ताया, जो नदीको टोत सुमारे इनखा बडन घकापा, नरक सरीम्वा कुम्प सिनभास्या मलमूत्रमें लपर रहा, अत्यंत दुर्गध जगा गंधाव भयरे माही दकारहा, [उडा. पणी] गादी भरियो आहार करावै, उण भवर में कोई यन जावं, जो जाय तो मुरछा आय, विचित्रगति कर- मांकी भावी ज्ञानीवचन तूं रडरता, नकसी०४, मो.

No text on this page.

जोयक, भानी देयपिण इम कहो तिणमें मन जाणर नि-
समर पटकै, माण पाराया मती लूटक, जैसुम्न पाये
पारे जीवनो, विण २ आऊग्नो साये में ग्लूटके, निण २
को कर जायमी एटक, पेनहो नहीं मानी , गुग्यम
भाय मुणाय मयफ, आदि अनादरो लोनहीं अंतक,
भय २ मां तूं माफियो, नवघाटी उलांधीनं आयो
संभ मांनय भय पायक, कंपनीन फुट ऊपनो मुतरमें
पानी घणी पानक, ओ म्हागे पापन याम्हारी मायक,
मोह मापा फाम रहो. मोड़ मिल्या पणा रागने देपर,
मारली उनपनाप यिधत दरक, पतहो ऐनहो मांनी
५, नरनें नारीनो बोरे मंजोगक, भोगपनां मंमारना
भोगक, उनपन जोय जीय आंपणी, पिम्नार भाग्रमी
पंटर माहि, जिण जगामें - अपनो आयक, मांकड
मीररो पांधणो, नीचो मम्नक ऊंचा पायंफ, पानी
फने । गोद ममार, नग्न कने र मटियां, भायन
ऊपनो उदरमाहार शुम निग धरणगे कीगने आहारा,
अपनो मेगी कर रे हजारका, पार रे धार दयाधम्म मा.
रक, पेनादो महो मानधी, अनुचि जगामें अपनी
जीयर, पारो नपमाम मणी न्यायक. धमा
परकी रपो. मामाने दुपार पटान भूगश, निमदिन
भोगिणपती दुग्य, मुत्र आपारांगमें करणे, गर.
भने दुसरो किगेरे निपोरर मु मामटी माहानीन
पगेटकमगनपरण कीपी भार, पांपदीय मनी
मकान तारीफ, मुं गरम एवं भटगुणी पीक मुन.
रमें भागपा महारिक को नोमानी,नी-
मारे पादा गामदार. पपई पर नानिपी पाटर,
भठगुणी पंदनागरम जनमनां पिस फोरगुती पटे

No text on this page.

याला रूपेरापालक, मोहगी मिठाईनें चायल दालकै, भोजन नव २ भांतरां, गांधीयो दाखपाणी पीयो ठारकै, मनवांरा घले पेलीजी पारके, वसतमंगावै निका तुरत तइयारकै, कमी नहीं कोई पानरी, केलगर्भ हुंनी ज्यारी फापक, यादल जिमगई पिलायकै, सुम्प जो भोगीपाद भरपूरकै, देही ज्यारी देखना हुयगई धूडक, चेतहो घेतहो मानयी १२, सोवनरा सिंहासण हीडोलाजी खा. टके, विरदावली देवे धारण भाटक, गिदा दुले चायु- रमांनी ओटकै, जां नर नराने काल करगयो चोटकै, पो- हया नरक दुपारे घूजे होटक, लीजो सील द्यानणी ओटक, चोवाने चंदण तेल चपेटक, नारी मिली जाणे मोहन चलके, पालती चाल हंसगज गेलकै, भरतार जोडी मिली तो भणी कंचनवरणी हुती ज्यांरी देहकै, निणमाहे पल जल होयगई खेहक, प्रीतम पदमणीने दे गयो हक, साहिय राखता अधकोस नेहकै, फारमो जोयनकारी देहकै, इमजांणी घरममुं तूं राखजे नेहकै, पेतहो चेतहो मानयी १३, रमणी पिणराचरही संसारके, नितनया करती सिणगारक, इंद्रतणी जाणे अपछरा, दासी उभी रहती ये कर जोडक, एक चुलाच तो दश आये दोडके, सेज बैठी रहती मुंदरी चापती पीडाने सूंघती फूलक, कंतने पालीजी यसमानक, हुकम घर हुलायती, पेटा पहनें फुटुंय परयारक, लोपे नहीं कोई तेनी कारकै, पूरपलादेखोरे पुन्यपर कारकै, पांम्या सुख संसारना, नितनय करती कपडां रीज ल्सकै, गहणारा उन्मा कपडारी मंजूसके, कामीकनें गिणती नहीं इती. सदाई लीलविलासकै, एक दिन समान जाणती मासके, निण पाईरो निकल गयो सासक, जाय मसाणामें कर

No text on this page.

७५ सेना भरतारक, अक्षरी जामें गया, निजरा देवतां मोगयी नारक, प्रयतो पुरुष एकया नारक, सानाईज- पारो हुयोरे संहारक, नरक गया पणा जायसी, परनारी रोमोटोरे पापक, जीवन जोग्यो परमय खरापक, पेन- हो०१८, इसी सांभल भगवननी पाणके, फेयर धनिया पतुर मुजाणक, परनारी धुर परिहरे पायक प्रत स्टीया पारक, साचीजी पामेट समकिन सारकै, पहि- हमणाने पोसाकरे, सूपीजी पाले जिनयर आणक, तनहुसी देवविमाणक, घेनहो० १९, केदयक साधारा कर गुणग्रामक, केहीर करे दरसण कामकै, केहीक घमाणमुणे सदा केहीक नहीं सके आय पिणभापना राखेछै मनरे मां तो पण गरज सरै घणी, फेदीक छोट दिया घरयारक, केहीपक लीनोछै संजम भारक, मुगन गया घणा जायसी, इम परूपियो श्रीमानकै, शाटमरने संभाटो जो सुख विपाक चाल्योट पा- ठक, कुमर सुयाह यांच्या पुन्परा ठाठक, चतहो. २०, अधर सांगजो आजम्बो इसक, अधिर जाण जो कारमी देहके, अथिर जोपन धन सणजो, अधिर जाण जो पो परवारकै, इन जांणीने दाहो लीजो थैलारकै, दीजीये दोन तजिप अभिमानके, ममता रालीन घ्याइयै ध्या- नक, ज्ञान रतन जनन राखिये, मान टालनें विनय जो- कीजक, सीयलपाटीने सोजस लीजक, तपस्या करीने करम क्षय करो, करमांरो पंघ फिर धन लोभक, तेहने जीनीयांसु हुचे मोलक चेनहो० २१, धरमपर भाव जावै देवलोककै, मन गमना जठे मिले,थोककै रतन जडत घर आंगणो, नाटक पड रहा मत्तीस प्रकारक, कोडगमे देही- तपासुख भोगवं, करजेधयारे धेह घेई करे घणा, घोसद " मणरा हुबैजट मोतीकै,लाग रही जट, शिगमिग जोलक, पल सागरना आऊखा जुज लग रही जराने भूखकै, आवागमण आगलगी इसी लगाएं धारे हेत जुगनतो वेगी मिल जाचैतने मुगतकै, जठेरे सुखसै सासता चवद राज लोक ऊपर जांणकै, सिद्धसिल्लाछै तेहनो नामक, आवा गमण जठै नहीं ओ उपदेश कयोछै एमकै, शुभ चित्त तूं राख पेमकै, गुण उपजसी अनिघणा नरनारी मति कर• जो देपकै, जो तुमें चायोटो जीवनें चैनकै, सीख साचकर मांन जो एमकै, पेतहो चेनहो मानवी २२, इतिपदं ॥ [ अथ सात विसनकी लावणी] ॥ सात विसनमत सेयो कोइ, सब गुण ज्यो नरनार, इण सेव्यां कुण २दुग्धपाया, सो कह एक तार, एक चि. ससुंगुणिया सेती, जय निकलेगा सारजी, मतसेवो कोई विसन पुरा? परनिम्ब देखलो, [टेर, पांडय राजा मोटा राजवी, सूरवीर जोधार कृष्णशरीखा सायक यांहरे, पोते पल अपार, जूचे रमणरे, मांह नैस कांइ, हारी द्रोपदा नारजी, मत २, तीनपंडरा सायास कांइ, रायण राज माहाराप, सती मीताकुं लेकर आयो, धे ठो रंक गमाय, फीट २हयो मुल कर माही, धका नर. फमें खापजी, मम ३, सेट माकंदीतणाडीकरा, जिन रखने जिनपाल, मदन कीवीजक्ष देवता, लिपा आपरी सार, देयो देस जिनरिम्प विगीयो नव, नाग्य दीयो तत- फालजी मत०४, मांस आहारी नरये पापी, करै जीवारी घान, ढांढा ज्युं घरतारहेसकाइ, नही गिणे दीनरात, परभयमा, हसी म्बरायी नहीं, पालै कोई साथजी, मत०५, विषय विकाररा विकल हयोडा, रवै पेरासु साथ प्यार, नरकामा घणीज पड़सी, ज्युं जूत्यांरीमार, अमि घरणी पूललीसथार, चांपसी हीये मझार मत० ६, म. दरापान पीयन हो ज्यावै मनमाहै, टाज पाहणा मानवीस फीर, गली २ के मांह, सातविसन इह सेवै जिनोंका, जनम अक्यारथ जापजी, मत०७, चोरी फरै पारकीस कांड, कुलनै दाग लगावे, राजाहै लोकीक भंडे, फिट २ घणो योधावे, पांह पकड पैटयामें नारी, कोरडारी मार लगा जी, मत०८, संवत उगणीसै गुणता. लीस, माहावदीमझार, उदयचंदगुरु आज्ञासेती, जोह- फरी चितलाय, ऋपिहजारी वीनस काई विसन तज्यां मुख पापजी, मन०१, इतिपदं ॥ [अय धर्म बजाजकी लावणी] ॥ कयो मांन पजाजी सद्गुम्दै पूंजी मांड दुकानजी, (टेर काया रूप नगरके मांही, वैरागमालमो जाय रज मिथ्यामन पाहर कढायो, शुद्धभाव पाल विद्याप हो कमो०१, जिनपाणीको गजलै भारी, जरा फर्क मन जाण, माप रतने सतगुरदेवे, मतकर बेचानाणदो करो. २, जीवदपाका मुखमलमारी, रेसम, मंतोप, इव्वल जीणममता तपोसरे, ज्ञान दांमद रोकर कहो०३, तप- स्थाको यंदागरमारी, सारी नीलकी जांण, पसा च्या- पार फरो पेननजी, मिले तुझें निर्याणजी को०४, इतिपदं। [तेरा पंधीयोंके चरवाकी लावणी] ॥ स्तर परमपरा बारिवहरत गंगारा ये चाउ। ।। सदा मोहे सूत्र लगेप्पारा जिनोंसे होना निसतारा,

No text on this page.

५२ [अय थूलभद्रजीकी लावणी] ।। धूल भद्रजी कियो पोमासो दुफर २ चिमशाला, भनियोधी पारे प्रत दीया समझाई पैदयायाला, टेर,शा. नभंडारा बोल्पा मुनिवर हेनजुगनकर समक्षा, सख- चौरासी जीवाजोनिआ गतीचार फह पतलाये, तिच नारकी ओर देवता मनुष्यगतिया कहलावै, गल्यो काल अनंतनिगोदे नुरत ऐटो नहीं आये, [उटापणी] हेयो अजाण आंधो मिथ्यात्वी कहलाये, हेवो उसड पटता जिन मारग मुनिलावै, कामभोग विप जहर सरीखा विपाक फल मतखा आला, मनियो० १, जीपाजीव पुन्य पाप पतापा, आव संपरचितलाया, निर्जरायंघ अफ मोक्षभेदनय भिन्न २ कर पतलापा, पृथ्वी अप्प ओर संपाज वनस्पती ओर तसकाया, छकायाका नांव पनाया उणकै घरमें पिठलाया [उडायणी] यो प्रस थायर सुक्ष्म पादर पोले, यो परजापना अपरजापता खोले, पाप अठार सय समझापा जन्ममरणका भय आता प्रतियो० २, अष्टकमका भेद सुणापा प्रकृती ओर न्यारे २ समकित पांमी व्रत आदरिया यारे प्रत उन मुर प्यारे, मोहाक ममताने मारे तपसप फरणी अपकारे, पक्षीधनंतर हुई श्रावगासमझगई यो सपसारे, हयो दानशील तप भायफेर आराध, हेवा सम्यर पोसा फेर सामापकसाथै, पडिफमणो धाकरे रोजीनां नेमधर्म पाले आला, प्रति० ३, वनपाले दोपण टाले तपजप सं. जम ग्वप करता, पाईसपरीसा सेचे मुनीसर पारे भावना पित्त धरता, मन्न पचन काया घसीनी पांधु इंद्री पिर फरता, चार कपाय आठमद त्यागी इच्छा रहत

No text on this page.

८१ मर देष घरमें जार्य पूजागाधा फरै शोकसी आहार मुझनो चलाये, जिसपर मुनियर हाय जो फरमै सो पड- भागी कहताचे [उदावणी] हेयो उपयोगनहित यमकी कापा आनम, हेवो धनधन मुनियर मार अपणे दमयं, है मैं जा पलिहारी सीम नमा उनकं, साधु फरणी- पार उतरणी क्षमावणा गुण है सपाया, पीका०२, राज मटजी सालचंदजी मगन पांद मुनि तपधार, गपूजी रीकन फजोडी गंभीर मसजी मुम्मकार, आठ मुनिः मंग आपा पूजक इशा माफक रह मार, माहा सनियां महा. राज यिराज सात टाणासे अधिकार, सोनाजी जिवणाजी फहिय पान कवर विद्या घार, मिणगारांजी प्रेममय- रजी मो भाग भूसंजीरी पलिहार, [उहायणी] हेयो सतरे भेद संजमका गुण छाजे, बो तपस्या करके देग्यो सिंघ ज्यू गाज. हेयो धरम पर मो सय निर्जराक काज, आश्रय रोक मंपरमां है तप जपमें नहीं सरमार्य, वी. कान०६, अनाचार वावन टाल नवकलपी विहार कर, पार भावना भावं मुनीसर नववाह मुद मनमै घर, दोन बग्यत वग्याण याचना अष्ट कमाइं ग्वृष लरे, हेत जुगन दृष्टांन सवइया मिन भिन्न भिन्न फरक बयर पडे समनी परमती आर्य परिपदा पुन्यवंत दया धरम कर, जिनवर यांणी अमिय समापी आराध्यां दुम्म दर कर [जावणी हे गुण पहोत गुरुका फेणेमें नहीं माने, हयो छोडा जगत जंजाल भविः ममझाते देवो निज गुणपाते सो शिव पुरा जात, तंज करण गुण फर जि. यांरा ज्ञान ध्यान हुवा चिनचाया बीका० ५ इति पदं ॥ ११..

No text on this page.

किरिया पाले शुद्ध आचारे पंच महानत मेरुसम सि. रघारे महाराज भन्यजीवां मन भायाजी, शिव ३, फिर कईबरसांलग ज्ञान गुरांसें लीना महाराज सालसो थापन जाणोजी, क्या कानी सुदिके मांह सहर रतलाम- पिघाणोजी, मुनि विनयवैया बच कर साता उपजाई, महाराज पूज्य मन अनिहरखाणोजी, हे लेयो पूज्यपद आज वयं मुम्ब इम फर माणोजी, [ उडावणी] जय गुरु आग्रहमें पूजपद मुनि लीनो, पूज मस्तक हाय रग्ब द्दित उपदेश पडु दीनो, मुनि शुद्ध भावसे अमृत सम- रस भीनो, चारों संघ सन्मुख भोलावण पहु दीनो, महाराज चौध पूज्य स्वर्ग सिधायाजी, शियला० ४, मु. निसम भाव शांनि मूरत है प्यारी, महाराज संप गुण अघको पापाजी, ये भक्त पच्छल मुनिराज सर्वकों अधिक सुहायाजी, रतलाम सहर घउमासो पूरण करके महाराज फेर इंदोर सिधापाजी, फेई गांम नगर पुर विचर पाहु उपगार करायाजी, [ उदावणी ] मुनि जहां जावै जहां सपको लागै प्पारे, क्या अमृत यांणी मुनि मोहन गारे, मुनि जहां विचरे जहां कर पहुत उपगारे, तपस्या सामापक पोपध बन पहुधारे महाराज भव्य मन पहु हुलसायाजी शिव०५, फेर साल अठावन नये सहर पपासा महाराज जहां में दरशण पापाजी काई रोम २ हर म्याप हीया मेरा उमटायाजी, उस बखतधी मेरे मन में गुण कप गाऊ महाराज दिलमेरा लटया- याजी पिण धिरता नहीं थी जिसमें नहीं फुर गुण यथ गायाजी [उहायणी ] अप दीन दपाट दयानिधि तुम हो मेरे अय रग्यो हमारी लाज सरण झुतरे, कृपाकर का- रोलख चौरासी फेरे, दरशण कर पीटा आया फिर

No text on this page.

शायाजी शिपला०९, फिर साल नेसठे रतलाम आप पधारे महाराज प्राविक प्राविका मनमापाजी, की चउमासेकी अरज पूज्यसें आण मनायाजी ये पचन पू- ज्यका अमृतसम नित यरस, माहाराज गुणन सहुमन ललचायाजी, दिवान मुसद्दी ओरराज अहलकार फेई आयाजी, [उडावा ] जहां मुसलमानकेइ वखाण मु. णवा आये, उपदेश पूज्यका सुण फर पहु हरपाये, जहामद मांसफा त्याग किया शुद्ध भावं, फिर ठाकुर पटे का मिकार छुटाग, महाराज जन परमायक था. याजी, शिवलाल० १०, फिरकर चोमासोभाण पुरे पधारे, महाराज भव्य जीय यह हरवायाजी, एक ठाकुरकों समदाय यदद सेरा यचायाजी, फिरफइ जाल मध्यांका यंध करयाये, महाराज अनिसय गुण अधिका पायाजी, कांइ मूरत देख दिलमस्त हुवै घरम चितलायाजी, [उ. टायणी ] जो बग्वाण सुणया एक यार कोइ जाये, फिर नहीं कहणका काम तुरत चर आये, उपदेश सुणके दिल उनका हुलमाचे, करे आपसुं पचग्वाण त्याग मन भाव महाराज आपका गुण यष्टु छापाजी, शिवला० ११, फिर फोटेसें अजमेर जो आप पधारे महाराज नय टा. ऐसें आयाजी, यह हार मायके साथ घोमासो जाण मनापाजी, अजमेर पधाया मुणके झटमें आया महाराज दशाण फर प्रश्न थायाजी हवो हरष हिये उल्लास जोह फय गुणमें गायाजी [ उहायणी ] फहे हालकनइया थीकानेरकापासी, अजमेर लावणी जोडकै गाई खासी, घोसटे साल असाढ एकममुदि भासी सय श्रावक श्राविका मुणक हुआ हुलासी, महाराज पूज्यका सनस-

No text on this page.

८७ तो गुणपार आये नाई, जेसे पंगु चढे गिरपै मनमें हरख आनंद लाई, सुण पैराग पांमें लावणी कनी राम कहै सुम्वदाई उगणीस पचासे चोमासो भीनासर सुखकारी रुपना०५, इति पदं ॥ [पूज श्री उदयचंदजी महर्पिजीरी लावणी] ॥ फर ले पूज परणका ध्यान जिणासुं पाम सुख नि- धान, [टेर, मुरघर देश मालय माही जनम मोम सुथान उज्वल वंश उजागर अपना उदय चंद भूभान, करले० १, देख अनंत असार जगतनें, विपकी वेल समान, सम किनसेल संभाही सूरां, जठ खडेमै दान, करले० २, झान तुरीपर चढ़ कर बैठा, सुमती साज पलाण, तप तरवार दाल धीरजकी करता अष्ट करमकी हांण, करले ६, आदित्यजेम उद्योग करत है, मिथ्या मेटन जान, हेत उपदेश देत मुखकारी, उपगारी पद माण, फरले. ४, परंपरागत पद आचारज सोहत गुणकी खाण, मुनी सारांमें वृद्ध विराजे योही इंद्र विधान करले०५, देश २ का मरनें नारी, घरना चरणा ध्यान, पुन्यन पड माग हमारा, मिलिया दरापा, आन, क. ६, चारू मंगके धीच विराजे पंदितपणा वखाण, भरी समातोएसी दीप, जाणे फुलण श्रीजिनवाण, फ० ७, देव गुरुधरम परसाद सदा जोत जगान हीरालाल कह पूजजी दिन २ घढत पान, फरटे०८, इति पदं, ॥ [अय हुकम मुनीजीकी लावणी 1 ॥हफम मुनी दीप जगमाही मूरवीर हो रहा हपी सर तपस्साके मांही, टेर, कोटे कानी आपामुनीसर

No text on this page.

पयधारा, है कायासरीर सुंदराकार लगे पहु प्यारा है क्या छोटी पयमें प्रगटे है गुण सारा, सतसंगत साघोंकी करके सीम्या ज्ञान अपरम पारी, पद० १, उगणीस अड- सीसे सालमें रतनपुर लागे प्यारी, असाढ सुदनम्मजाण मंगलबार आण मुनि दीक्षाघारी, पूज उदयचंदजीकपास महा परत शुद्ध उधारी, रतन चंदजी गुरु किया चरण वितदिया यह आज्ञाकारी, [ उडायणी ] है क्या शुद्ध मन चित्तसें संजम मुनि परलीना, है क्या तजा जगत जंजाल या चितदीना, है क्या अल्प दिनोंमें ज्ञान ध्यान रंग भीना, विनय विवेक नेकगुण प्रगटे क्षमा गुण- पर तिखजारी, पट्०२, पंचमहामत सूधा पाल तप जप संजम खप करता, दोप ययातीस टार लेवे शुद्ध आहार भावना चित धरता, यारे भेदे तपस्या करके अप करमकू घेहरता, पाल शुद्ध आचार सूत्र अनुसार पापसें बैंड- रता [उदावणी] है क्या मतरे भेदे संजम मुनिवर पाले, है फ्या यावीस परीसाजीत दोप सहु टाले, हेक्या नवकटपी बिहार मुलकमें माल, पहु परसां लग पुज्य पासमें सुत्र उद्यमीनो भारी, पट्०३, गांमनगर पुर- पाटण विचरे महापाल विस्मचारी, नववाहसील पार लोप नहींकार जगमें महिमा सारी, गुण सत्ताईस दीपे मुनीसर कहूं कहांलग विस्तारी, तीन फरणम योग पाले शुद्धयोग निज आतमकू उजवारी [उडायणी, हे क्या स्वमती परमती पूछ परशन आई, हे क्या हेतजुगत दृष्टां- तसें दै ममझाई, हैक्या न्यायनीतकी रीतसें दे पाई, पचन जिनोंका सरधे सोही पांमें भवजलसे पारी पट्ः ४, मुन्नालालजी महागुणधारी थालचंदजी परउपगारी, सालचंदजी मुनिजाण हुफम गुण खाण चंद आतमतारी, १२या.स.

No text on this page.

पा, मरमोहन पेनगरप परपदा पर गं मगर पारे माजी महाराज मुनीगर मोरा, मांग गंगारी नरनार समीर नहीं रोरा, लिा महाशीरा गोरा, परियमणा और पोट पाकरा मी पायां और भाषा, धीरज..पांग महामन अजी पाट गुम मिदार मा. मागारा, पांच गुमनी तीन मनगुमी पुस्पार को पिलारा, पांडीगोप मुनीमर पटरम घोग गप मारा, पो. पणपाणी पाप मनीगर माघ मारग गई पारा, . तरे भेद मंजम मुनियर पाल, देय नपानपी पिटार मु. हममें माल, ये पापन अनागार टाले, पाटपरूप पर- भय पिंमा सनम मरण मप लापा पी०, दोप पपालीम राले मुनीमर आहार ग्रहलो पलाप, पारे भेदे कर सपम्या आट करमांन उदाप, पारे भावना भाय मुनीमर मपी जिनमर पाप, निरयच भापा पोले मुनीमर परम उपदेश में पिटमाये, इपे मग्या गंधारो मदा पलेपणा परता, रेये पाईम परीगामहे पापमह. रना, इलिगा मुक्तिमारगका रसमा, दरिया मापा और एपणा उपयोग महिन पमकरी कापा, धीर०४, सागी पैरागी नहीं मवादी नित्त बुलाया जाये नहीं, अवमर देखफर परम जाय अजाणतरतुं भाव मही, पछा गाया फरे घोकसी गाला गोली फरे नहीं, अपित्त पस्तुये सेये फरपती दोपण सागमो ये नहीं, हेये जिसपर 'उस पहभाग पहरण मुनि साय, घे हरवे पित्तहुलास भा. हार पाहाय यो भयसागरनिर साव, चित पिस पात्र मंजोग मुम्कट भयि जीयां मनभाषा पी०५, मीपल पार नययासुंक्षमा बडग हाप सहा, आदफर मांनं मारट्टापा घरममा पासरहा, गुण सत्ताईम दीपे मु.

No text on this page.

घरता, पापरूप रज दूरै हरता, जनम मरण ओर जरा तीनोंका भय घटमें लाया, भवि०३, नयवाड शीलपाल आठ प्रवचन चिनलाया, चार कपाय आठमद त्यागी रागढेप उपसमाविया, बारे भेदे करे तपस्या जिसका पार नाही, पड़ी तपस्या करी जिनोंने कहूं कठाताई [उडायणी] सोले पारणे सोले करिया, दिन यत्तीस अ- भिग्रह शुद्ध फलिया, धोवण आगार इता तप करिया, छुटकर तपस्या करी जिसीकी गिणती नहीं लाया, भवि० ४, सवादयाद इंदरी सप जीता समता चितधारी, धन्य पुरुप रसना घस करता जिन पुरुषोंकी पलिहारी, पूज पघाला वीकानेरमें छुथा उपगार भारी, सम्पर पोसा. दपा समायां नहीं आवै पारी, [उडावणी] पायोंमें त. पस्या हुई भारी, कहां लग महिमा कहुं जियांरी, जिन घरकी पार्टी पलिहारी, पांच महीना सुखसे चीता आ- नंद पशु पाया, भवि०५, दोन घखत पखाण देवे जद अमृतधारा परसै भविसीय पिराणी सुण २ हरखं सम कित शुद्ध फरस, यमनी परमती पृछ परसन दै उत्तर सुप्रन्याय, फोहमान कोऊ नहीं माने सप परसम भाव, उहावणी] न्याय नीत सब चितघरे हैं, पक्षपात दूर करें हैं, जो पुरुषोंका काज सरे है, एसे मुनीकै घरण भेटते दुरगति विरलाया भवि०६, गनचंदजी गुणवान जिनोंकी महिमा ड्यापा, कोट जिभासें करूं गुणतो पार नहीं पाया, पुनीलालजी चोखे चित्तसै छोडी जगमाया, दो. पठाणासे कियो चोमासो भविजीव मन भाया, जहा. पणी] कनीराम मन उधरंग आया, बुधसारू अलप गुण गाया, पेम मगन हुइ मेरी फापा, उगणीसे संतालीस- साल काती सुदि नवम.गाया, भविजी० इति पदं ।।

No text on this page.

. ९५ रज अय सुणो हमारी रे,, हीरालालजी पिताआपके, साकरयाई मान, कडपड गांममें जनम लियो सिरे, गां. घीयांरी जात लागती सथक् प्यारीरे, श्रीकर्म० १, उग- णीसे गुणचालीसमें, रतनचंदजी गुरुकीना आसोज सुदि तेरसदिन मंगल, संजमके रंगभीनां, छोडदी ममता सारीरे श्रीक० २, सनरे भेटे संजमधारी, दोप बयालीस टाल, ज्ञान ध्यान क्षमागुण भारी, जिन मारग उसवाले, लोभ ममताईं मारीरे श्री० ३, ज्ञान ध्यान मणनेतणो सरे, उद्यम कर दिनरात, धरम ध्यानमें दिन गमेसरे काई, नहीं दूसरी यात, मुनी मोटा उपगारीरे, श्रीका ४, बीकानेरका आवक आपिका, एककरे अरदास, चो- मासरो कलपतिकोस काई, फरो वीकाणेवास, अरजली जो अवधारीरे, श्रीक०५, फजोडी मटजी है गुणपंता, जुहारमलजी छाजे, सूरजमलजी मांगीलालजी, धर्म- ध्यांनमें गाजे, मुनीसर सप गुणधारी रे, श्रीक० ६, धर्म- ध्यांनका ठाठ घणेरा, तपस्या हुई अतिभारी दोन पावते वखाण घांचता मतमोहन गारीरे सुणे है सप नरना- रीरे श्रीक०७, महासतियां उगणीस विराजे, अधिक अधिक गुण दीपे, ज्ञान ध्यान ओर करै थोकडा, आठ कम्मा जीप, तपस्या इण विषधारीरे, श्रीक०८, रंग- जीकी धापांजीतो, नवठाणा- सोवै, धूलांजीतो इक- सठकीना और घणी तपस्या हो, करदिया अगता जारीरे, भीक०९, खेतांजीसी टीचमांजीक, थोक सैती. सको कीनो, मुगन कवरजी पानकपरजी, दोइकतीस जलीनो आठ ठाणा सुखकारीरे, श्रीक० १०, रतनकपर समुदायमें सिरे, सिरदाराजीरी घेटी, फलेकवरजी करी अठाई ठाणा दोष रहेली, सनियां सोभैसारीरे, श्री.

No text on this page.

लावै संझतो आहार धन २ भाग उसीका जिसका हाथ फरसाया, अ०६, हेजी पंचमहाव्रतधारी मुनिःकों, वंदन करूं त्रिकाल, समकिन होवै निरमलीस काई, पावै मं- गरमाल, अनाथी मुनिसें श्रेणिक समकित पाया अरे. ७, पार मुनिःजी संग आपक, तपसी ओर गुणघांन कजोडी मलजी जुहारी लालजी अर कमलजी गुणखान, क्या मांगीलालजी चपल बुद्धि दरसाया अरे० ८, उगणीसे घासठक मांदी, पीकाणे चोमास, चोमासो फेर करो कलपतो आ सयकी अरदास, हेक्या आवद माहानमा छंद जोड़कर गाया अरे हारे००, इतिपदं ॥ [अथ लावणी ऋपि करमचंदजीकी तीजी.] [आलाप, करजोडकै धीनती करं, घरणामें शीश न मायकै, गुरू गुणवरणन करूं, अज्ञा घडोंकी लापफे १, मातपिता ओर जनमनगरी, कहताहूं समझायकै, कोण गांममें लीनी दीक्षा योकहमें गायकै २, साधुसंतकी करे सेवा,वो नर चतुर सुजाण है, जो उनोंकी कर निंदा, यो मूरख नादान है ३, पार २ करताह अरजी तुमारे घर- णमें ध्यान है, करो घोमासो कलपतो अय अरज लेयो मान है, पट्कायाके पीर मुनीसर पंचमहानतके धारी पीका. नेरमें फियो है चोमासो फरमचंदजी मुनि उपगारी [टर] अवल हकीगत फहूं आपकी पांच मुनिसंग आये है, राजमलजी जुहारीलालजी, धनराज मन भाये है, मूर• समरजी मांगीलालजी एकसे एक सवाये है, विनयवंत सभी संतोंकू लुल २ सीस नमाये है [उडायणी] इथे पंचमहानत पालो उत्तम है किरिया, रेशुद्ध पालो शीट

No text on this page.

सुखशाता गुणसनाईस दीपे मुनीका क्षमारस पाता, दोप बयालीस टाल मुनीसर निरदोपण लाता निरदो. पण साना सर्व हितकारीरे गुन्शुभकारीरे, १, पंचम- हाबत पाले मोटका जिन आज्ञाअनुसार दानदयाका मारग यता मुमती गुपनीपार दोय वन्यनको वखाण देव पाले शुद्ध आचार मुनी ब्राह्मचारीरे गुम्सुखकारीरे, २,मन वचन काया वसकर टीनी रागद्वेपको मार पारे भेद करे तपस्या नवकल्पी करे बिहार पारे भावना भाय मुनीलर निरवध पोल विचार क्षमासुखकारीरे गुम्सुम्पकारीरे, ३, कजोडी मलजी जुवारीलालजी मुनि- पर हिनमारी, मरजमल ओर मांगीलालजी, वांदो नर- नारी, पोल थोकडा सीखणकेरा आदेश कर भारी आ- ननको तारीरे गुन्मुम्बकारीरे, ४, पावक माविका अरज करत है, मुनिवर मुणलेगा, कलपेसो चोमास पीकाणे दशण नित देणा, तेजकरण हे गारण आपकी भेट गुरु- परणा, अलप युध माहारीरे गुरुमुम्बकारीरे, ५, इतिपद।। [अथ लावणी शोभालालजी पीकी ।] ॥ जय भार नपोट रिपते ।। ॥अरिहंन सिद् आचार्या उचझाया मुनीराजरे पंचप- रमेटी नितन तारण नरणजिहाजरे १, गुणनके गुण गावमां पूरे जोमनकी पारे उत्कृष्ट रस उत्पन्न हुदै सारे घोसगटा काउरे दागुणीका गुण कोई गावगा दुम्बदरिद्र गमावेगा फल मनबंछिन पायेंगा पार सागरसें संघावेगा जीव पद काप न हणावेगा धर्म अहिंसा बतादेगा भक्ती गुरुकी जो करावंगा विधी में सीसन

No text on this page.

१०१ राधा आपसही, विनयभक्ति अपार नेकप्रकार करकै पहु ज्ञानलही, पूज्य श्रीमुम्ब प्रशंसा आपकी सुणीसो मुझसे मजाय कही, मुसजिभ्या हेएक गुण अनेक पारकैसें जो पही, [उटावणी] हेकोडकी मिल गुणकरै कोई आ- पका, हेसुरपतीनल पारसोई आपका, हेशुद्धक्रिया ज्ञान है दोई आपका, पंचमहाग्रत पालन विचरे दोपसह दरां टारी, शान० ४, पांचे मुमती सोहे मुनीसर वणगुप्तीके भंडारी, परकायाके पीर ज्ञान गुणधीर मम दम खम गुणभारी, नयवाडशील पाले मुनीसर दाविध जतीघ. मक धारी, अष्टमदको गार कपाय चार टार निजातम उजवारी, [उडायणी] हे मुनिचरण करण गुणधार मुणो नरनारी, हेदोप बैनालीस दार शुद्ध आहारी, हेपूज आणावरते राये घणो विचारी, पडिलेहण प्रतिक्रमण हमेसा सुपेशाम करता मारी ज्ञान०५, मृनभगवती पनवणादी भाव विविधमुनि फरमाये, हेनजुगत दृष्टांत देखें पहु संन भिन्न २ फर समझाये, अमृत समपाणी हमेसां दोनुंबवत मुनि परसाय, सुणकै मस्त होजाय भव्य हरवाप मजा आनंदपाव, [उहावणी] हेमुनिनय निक्षेपा सतभंज्ञादी जाणे, हेकर न्यायसहित परमाण पक्ष नहींटाणे, हे प्रष्ण उत्तर देवे सूत्रप्रमाणे, स्वाग संघ पहु हुवा बीकाण तपाका नहीं आ पारी, ज्ञान ६, शाल अहमठ चोमासो बीकाणे गोभानुनिकी हद- घाई मुनि देविचंद गेवर उमंग एनि ऋद्धि सिटकाई, मा. रजियां तेवीस ठाणसें प्रण समुदायकी सुम्वदाई, फरे सपस्या घणी म्बग्गी अपी जनम मफटपाई उहायणी] हेमपलाल कन्हइया एंद् जोडर गावे, हेसप साप सं. कोंको दुष्ट र सीम नमाय, हेनुसरित परोपही भरज

No text on this page.

१०३ मुभाव सरल माहा गुणखाणी, हेआगम अनुसारे पचन कहै सुखदानी, भिन्न २ ज्ञान सीखावै सपर्क पचन जि- नोंका है पाला, दुपार० ३, सीजांजी महाराजकी महिमा कह सुणो सप नरनारी, सोहतीस भाव अहो निस जि. नका क्षमातणा गुण है भारी, नरम वचन निरदोप पोलता राखे घणो दिल विचारी, रातदिवस करै ज्ञानका उपम काहूं फहालग विस्तारी, [उडावणी] हेक्या सोन. कंपर छगनांजी जीवणांजी सोहै, क्या पेमाजी घम्वता घरांजी मन मोहै, हेमाणकभूरांजी राजकंवर गुण दो, हरखांजी महाराज ग्याराजी पारे ठाणा शोभे आला, दुधर०४, नंदकवरजीक टोलेमें गुणवंती सतियां सारी, एकएकसें अधिक गुणोंमें विद्यावंत है अधिकारी, किरि- पा पातर सरल खभावी सरय सती महागुणधारी, को- इजिहा गुण करे हो जिनूंका नहीं आये उनका पारी, [उडावणी ] हेक्या आयड महातमा छंद जोड गाता है, हेदुख जाये दूर फेर सुखसंपत पाता है, ऐक्या आवक प्राविका दरश सदा पाता है उगणीसे और साठसा. लमें जोडकरी अनिरसाला, दुकर०५, इति पदं । . [अथ साधपणेकी लावणी लिख्यते ।। ॥ कायामें ज्ञान कर घरा ध्यान जिन जिगकी माया छोदिपा, होगया साध सप छोड वाद जिन समना रस भरपूर पीया, टेर, झुठे मात सय ग्रात भ्रात ये सब स्थारधके जनिलिया, परभूसे प्रीत तज जगकी रीत श्री- जिन मारग पहचान लिया, भजते अरिहंत रहते एवंट जिन चित मनसेती ध्यान किया, होगपा० १, तज हिना

No text on this page.

१०५ तपना तेरारे, श्रीते. ४, पडे नागकू काढउपाया, मेल्या वर्ग मझार, पद्मापति धरणेदर हवा, सुणा मंत्र नवकार, उठालिया तापसडेरारे, श्रीने०५, कमठमर हुआ मेघ- माली, प्रभुहुये अणगार, मेहबरसाये प्रभु न चलिये रचिया फैनहजार, कमठ मन भया अरारे श्रीते. ६, धरणेदर पदमावती सरे, आसण अधर उठाय, उपसरग टाल्या प्रभुजीका, आया जिणदिसि जाय, गावगुण प्रभु- फेरारे श्री०७, पारस केवल पांमिया सिरे, तीरथ पाया. पार, साधसाधी प्रावक श्राविका इसमें फरक नसार जगतमें किया उजेरारे श्री०८, पलते नागवं जिम तुम ताखो, तिम प्रभु मुन्नतार, हिमन मलसुत कनीरामकी अरजीये अयधार,मेटभव २का फेरारे पीने०९, इति पदं। [अथ मुक्तिमार्गकी दुकरता ढाल] ॥ मुगतिरो मारग दोहलो जीया चतुर मुजाण, [टर, पृथयी काया नहीं दिये, जाणो निज मातसमान, प्र. सथावरयासोवसे, घणाजीषा इंदीखाण, मु०१, पाणी. विना परजा हुसे, आसा फरेरे राजान, ऊंचो मुखफर जोवना, किरपा करो भगवान, मु०२, घेरे फरजन आपरा, तोपिण नहीं मिलेघान घसको खाप धरती पडे, ऊभा तजदै प्राण, मु०३, ते फापारो शसतर माफरो, पायू देवरे यधाय, उडता पढेरे पतंगिया, जीव पणा जलजाय, मु०४, तेज पाउरो नीमयो, मानयभव नहीं पाप, निरे जावै तिर्यंच में, घपो दुखिपोरे थाप, मु०५, टार सय चराने अदाबराका मा देश मापनको शिकार इससे हमारे मन न.]

No text on this page.

कर यांधियो, श्री श्रीकृष्णमुरार, आज्ञा दीधी आणंदसु, लेवो संजममार, मु० २१, सादी पारे परसां लगे, अझ्या श्रीवीरजिनंद, जीवद्यारो सिर सेहरो, यांध्यो त्रिसला. रेनंद, मु.२२, कालोरे मुखकीयो चोरनो, फेखो नगरम- झार, समुद्र पाल ते देग्रने, लीनो संजमभार, मु०२, हिंस्यामें चोरीरी नियमा कही, लूंटे जीवांतणां श्रृंद, कु. गुस्रो भरमावियो, होरयो अंधाधूंद, मु० २४, करण मुनीसर इमभणे, पालोवरत अखंड, जीवदयारो धर्मा. दरो, भाख्यो श्रीभगवंत, मु०२५, इनि पदं ।। [अप श्रावककरणीकी सिताय ॥श्रावक नाम धरायनें, पहयाकर अकाल, निणर्ने समजु श्रद्धता, मनमें आवलाज, १, दाल, यदि सोले जिनसो०, अॅडामारीने घड़ियां उडाव, मुदरी यदि फरीने दीखावै, सागे नहीं पारकी नारो, तेश्रावक किम उतर पारो, २, परनारीने रहे तफना, जिम ग्रहण मांहिं मंगता फिरता, यचन पदै अनिविकारो, २, तेल, मुक म्यापन पेटमरे, विसवास देयनें घाम फरे, टाले धर्म निंद मं. सारो, ३,०, नीर अहाण्या मांदि पर्द, भैमा जिम पैसीन रोल फर, पटै पीवणरो नहीं परिहारो ४, ते, फंदमृट भगवर्ने तर मूला, यह पीजारांप फर होला, पर्ट योरभन्दै सटसंहारो,०, ते०, यले गेररमेने पोल अपता, परनार नकरातूं फिरता, सपटेनो ग्बा मारी, ६,०, अमताक जिया मांहि ल, कपड़ी माई . जार पल, मो उत्तमरो नहीं आचारो, ७, ते, हुफो पीवने मांस मात्र, राधी भोजन निहादिवम तक, आप आधीतरे, पांधे पेटनी पाल, ओमारग नहीं साघरो [आंकडी, पेटा यह मापापना, असत्रीनं भरतार, सासू यह सगातणा, फहै समाचार, २ ओ०, लाभ अलाम भाग्वै पले, जोतपर्ने जोय, जनममरण पतायदै दोप तीसरो होप, ओ, जात जणावे आपरी, दीनदया मणोधाय, आहार नावै पातर, मूंदोदै फुमलाय, ४ ओ०, ओपय भैपज करे, यलेदेव सराप, क्रोधकरी लड़- विध लिये, ज्ञानी फयो पाप, ५ ओ०, मान माया लोभ फरी, हवा दोपण दश, पहिला परेने साये, करै घणो- उस, ६ ओ०, पारणदै विरदावली, भोजगर्ने भाट, अ- णदीपां ओगुणकरे, थोषो पेठो पाट, ७ ओ०, विद्या फोर कामण करे, यले मंत्रने चून, संजोगमेले सर्वथा, इसहां करै खून, ८ ओ०, उसासणारा दोपए, गलावै, गर्भ, उत्तम ए नहीं आदरे, माधुटाले सर्च, ९ ओ०, रसनाना लंपटीपका, मेल आहार संजोग, आछो मि. लियां राजी हुव, भूडो मिलियां सोग, १० ओ०, ताक २ जाच गोचरी, सावै ताजामाल, उवास व्रत कर नही, कुंदा वणरथा लाल, ११ ओ०, रसनारा गिरधीधका, आरामें जाय, लघुता लागे लोकम, निंचा धर्मनी पाप, २२ ओ०, उणदिन जायसकै नहीं, रहे रातरा ध्यान, प्रभाते जावै तेटियो, स्यूंपायो ज्ञान, १३ ओ०, भारी आहार भलीतरे, खाय ठंढोठार, भांगेवाड तोल्पांधका, पीछे हुये मांड, १४ ओ०, सवार मला घालिया, भलो दीयो पधार, तीपण आछीतरे कियो, पले कहे एमकार, १५ ओ०, चायटदालमें घी घणो, सरायने खाय, धारि- घने कर कोयलो, फापो सूत्तरमांय, १६ ओ०, निरसो आहार तीवणवले, नहीं मिरचनें लूंण, पारित्रमें निकले ,

No text on this page.

१११ समझक देखो साहिय, गऊ पहुन डरती, गरीय ओर साचार दीनमें, दूध पिटाके सुख करती, २, मेरा दुखमें कहूं किसी, कोणसुणै अरजी, ज्ञानी होयसो ज्ञानसे समझे, और सी गरजी, ६, दूध पिलाती पूत्र जनमती, दुनियां पालणवं, जमी दारका करूं गुजारा, हासल रा- जा७, यकग्रंय पढा जो पूरा, मेरीकदर जांणे, शोष संग्रहणी अजीर्ण खोवै, मेरी हाट यांणे,८, रक्तपित्त दही शिम्बरन सेनी, अनीसार जावे, नेत्ररोग सप और रनोंघी, धीस नास पाये, ९, सपी रोगपर दवा इनकी, दया संग यणती, पादी पित्त सप रोग मिटावे, एसा में मुणती, १०, दवा शुद्ध गोयरसे केई, गोमुत्रसे होनी, पांह सोप गोमूत्रसे मिटता, जहर फेई बोनी, ११, दूध दही घृत मार विगरनर, किसीके नहीं सरता, मुझसे पट और मुनको मार, एमा जुटम करता, १२, दूध दही घी घरमें परते, डाएज पैटनर, इतने मुख मेरे संगरहते, सष्ट पुष्ट सनई, १६, गाडी रपके पूत्र जुनते, खेती करन- नकं, इंधन और घरकी कर भोमा, गोपर नीपनवं, १४, स्पीक शिर घमर घोटाचे, शोमा पहुन करती, में- पता साचार होपकर, सरपा हियधरती, १९, इनि गौभरजी पदं ॥ [अय प्रसति ॥] ॥समक्ति कैलक्षण पही गुणका ग्राहक होप, जैसे जैसा समझ, रखे विरोधन कोय, १, सम परिणामीशनका कपलग कर पनाग, अन्यमनी शुभगुण परै, वोभी- नीका जाप, २, पनरुण कंचन सप सजे, नियाविकमा ११२ त्याग, जिन आज्ञामं चलतजो, सोही संतवड भाग, ३; उगणीमै अइमटमें, बुधजन किया विचार, संपवटै जिन धर्मम, तो होवे जयकार, ४, माने कर्त्ता तो कहा, नहीं मै कहा विशेष, मनमाने मानेविगर, नगई ममतारेख, ५; धर्म अनादि जैनका, देवपूज अरिहंत, शुद्धदेत उपदेशसो माधु बजैमन, , स्वादिकमें जो कहा, नय निक्षेपामूल, म्यादाद मचि जय बढे, यही धर्म अनुकूल, ७, गोले डा. गोत्रीप्रवर, वींझगज सुननेक, मोहणलाल पूनमशशि, सहभागी मुविवक, ८, इनके कहणेसे किया, संग्रहपाठक गम. छपायक परगट किया, तद्भक्तोंके काम, ९, या यक जीवण प्रेमचंद, अमरचंद गुणरास, बीकानेर मम्दे- गम, विद्याशाल प्रकाश, १०, जैसा जिसने रचदिया, माहान्टिग्या मुजाण, अगर अशुद्धि होयतो मुझ दोपण मतजाण ११, यायां भाया पढनही, मनमैं हरग्वित होप अधिक ओछ लिम्बने रहा, मिच्छामिफइमोय १२, इति॥

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

Gon Vilas Samudya

Author
Ramridhi Sargi
Title
Gon Vilas Samudya
File name
Gon Vilas Samudya
Text
OCR done
Citation
1913
Published
2011/08
Publisher
Mumbay,nirniya Sagar Press
Language
Sanskrit
Pages
147
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313898
Barcode
99999990311280.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
9nfd3h4c2Qk
Download PDF

Gon Vilas Samudya