Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Dada Shri Jinkushalsuri

Nahta Agarchand · 2011/03

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Front matter

प्रकाशक :-
नाहटा ब्रदर्स
४ जगमोहन मल्लिक लेन
कलकत्ता-७
प्राप्तिस्थान :-
परिचंदजी बोथरा
१२, पारसी बगान लेन
कलकत्ता-६
मुद्रक:
सेठ ब्रदर्स
७०बि, धरमतल्ला स्ट्रीट
कलकात्त-१३

श्री अभयजैन ग्रन्थमाला ग्रंथात २०
दादा श्री जिनकुशलसरि
लेखक
अगरचंद नाहटा
भँवरलाल नाहटा
द्रव्य सहायक :-
श्रीमान् प्रसन्नचंदजी वोथरा की स्मृति में
श्री परिचंदजी, श्रीचंदजी, गंभीरचंदजी बोथरा
कलकत्ता
प्रकाशक :-
नाहटा ब्रदर्स
४ जगमोहन मल्लिक लेन
कलकत्ता-७
द्वितीयावृत्ति
वीर संवत्
नि: शुल्क
२०००
२४८६

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प्राक्कथन -000- जैन शासन की महान् सेवा करने वाले प्रभावके आचायों में खरतर गच्छीय दादाजी के नाम से प्रसिद्ध युगप्रधान श्री जिनदत्तंसुरिजी, उनके सुशिष्य मणिधारी श्रीजिनचन्द्रसूरिजी उसी परम्परा के श्रीजिनकुशलंसूरिजी और युगप्रधान श्री जिनंचंद्रसूरिजी, इन चारों आचार्यों की बड़ी ख्याति है। भारत के कोने-कोने में उनके स्मारक गुंगमन्दिर, मूर्ति और पादुकाएं प्रतिष्ठित पूंज्यमान हैं। इनके प्रति जनसाधारण की अंट भक्ति है और इसके फलस्वरूप उन्हें हलौकिक और पारलौकिकं सुख सुविधाएं प्राप्त करने में सदा सहायता मिलती रहती है। यों तो आपकी स्तवना में सैकड़ों स्तुति, स्तोत्रं कई शताब्दियों से कविगण निरन्तर रचते आए हैं और पट्टावलियों आदिमें उनकी जीवनीका संक्षिप्त विवरण मिलता है पर आजके बुद्धिवादी युग में ऐतिहासिक प्रमाणों के आंधार से लिखे हुए उनके जीवनचरित्र की विशेप मांग है। हमने इसं आवश्यकता का अनुभव कर सं १९६१ में सम्राट अकंवर प्रतिबोधक युगप्रधान श्रीजिनचंद्रसूरिजी का विस्तृत Cr [ २ ] जीवनचरित्र शताधिक त्रंथों के आधार से तय्यार कर प्रका- शित किया था, और तभी से हमारी यह इच्छा रही कि इनसे पूर्ववर्ती तीनों दादासाह्व का ऐतिहासिक जीवन चरित्र भी शीव हो प्रकाशित किया जाय । उपयुक्त यु० श्री जिनचन्द्रसूरिजी की जीवनी के तो अनेक समकालीन साधन प्राप्त हो गए पर अन्य तीनों दादा गुरुओं में से श्री जिनदत्तसूरिजी का तो महत्वपूर्ण विवरण सं० १२६५ में रचित सुमति गणि कृत गणधर सार्द्धशतक वृत्ति में ठीक से मिलता है पर श्री जिनकुशलसूरिजी और जिनचंद्रसूरिजी के सम्बन्ध में परवर्ती पट्टावलियों के अतिरिक्त महत्वपूर्ण ऐति- हासिक साधन प्राप्त नहीं थे। संयोग से बीकानेर के उ० श्री क्षमाकल्याणजी के ज्ञानभण्डार में युगप्रधानाचार्य गुर्वा- वली की ८६ पत्रों की एक प्रति हमें प्राप्त हुई और उसमें इन दोनों आचार्यों का परिचय विशद रूप से प्राप्त हो गया। फलतः सं० १६६५ में उपर्युक्त गुर्चावली के मुख्य आधार से 'दादा श्रीजिनकुशलसूरि' नामक ग्रन्थ सिलहट में केवल ४-५ दिनों में लिखकर प्रकाशित किया गया । 'मणिधारी जिनचन्द्रसूरि' और 'युगप्रधान श्रीजिनदत्तसूरि' नामक ग्रन्थ भी प्रकाशित किये गये। हमारे लिखित चारों दादागुरुओंके जीवनचरित्रों की प्रमाणिकता से प्रभावित होकर पूज्य उपाध्यायजी श्रीलब्धिमुनिजी ने उनके आधार से संस्कृत पद्यबद्ध चरित्र तत्काल निर्माण कर भेजे । स्वर्गीय गणिवर्य उसके पश्चात्

गए
,
[३]
श्री बुद्धिसागरजी ने चारों चरित्रोंका गुजराती अनुवाद करवा
के अपने संपादकत्व में श्री महावीर स्वामी देरासर ट्रष्ट में
बम्बई से प्रकाशित करवा दिये । इससे गुजराती भाषा
भापियों के लिये दादागुरुओं के ऐतिहासिक परिचय प्राप्त
करना सुलभ हो गया। श्री जिनहरिसागरसूरिजी ने भी
चारों दादासाहव की पूजाएं हमारे लिखित चरित्रों के
आधार से बनाई, जो प्रकाशित भी हो चुकी है। इस तरह
हमारे ग्रन्थों का जैन समाज द्वारा समुचित आदर हुआ।
"दादा श्रीजिनकुशलसूरि" पुस्तक प्रकाशित हुए २२. वर्प हो
और वह अभी कई वर्षों से अप्राप्य थी, अतः उसका
प्रस्तुत नया संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें यथा
स्थान कुछ संशोधन किए गये हैं और किंचित परिवर्द्धन भी।
परिशिष्ठ 'ख' में श्रीजिनकुशलसूरि विरचित "शांतिनाथ
चरित्र" आगरा स्थिति विजयधर्मसूरि ज्ञानमन्दिर की संग्रह
पुस्तिका से नकल करके प्रकाशित किया जा रहा है,
एवं अन्य भी कतिपय अप्रकाशित स्तोत्रादि प्राचीन
प्रतियों से उद्धृत कर प्रकाशित किये जा रहे हैं जो प्रथम
संस्करण में नहीं थे। प्रथमावृत्ति में जो विशेप नामों
की सूची थी, जनसाधारण के लिये विशेप उपयोगी नहीं होने
से इस संस्करण में नहीं दी गई है।
श्री जिनकुशलसूरिजी की स्वर्गतिथि के सम्बन्ध में प्रथम
संस्करण में जो टिप्पणी श्री यह प्रस्तुत संस्करणमें नहीं दी गई।

[४]
क्योंकि एक विशिष्ट महापुरुष द्वारा मिती फाल्गुन कृष्ण १५
को श्रीजिन कुशलसरिजो के स्वर्गवास होने का देवी संकेत
मिलने पर उसे ही मान्य रखना उचित समझा गया।
अन्य भी कतिपय अप्रकाशित स्तोत्रादि प्राचीन प्रतियों से
प्रकाशित किए जा रहे हैं। उसी देवी संकेत से यह भी ज्ञात
हुआ है कि श्रीजिनकुंशलसूरिजी का अभी "कर्मेन्द्रदेव"
एवं
नाम है।
गुर्वावली में श्री जिनकुशलसूरिजी की कई मूर्तियां प्रति-
ष्ठित होने और उनके द्वारा कई स्तोत्र रचे जाने का उल्लेख है
पर उनमें से प्राचीन मूर्तियां कोई भी प्राप्त नहीं हुई और
स्तोत्र भी पूरे उपलब्ध नहीं हैं, जिनकी खोज की जानी
आवश्यक है। जिंस गुर्वावली के मुख्य आधार से यह
ग्रन्थ लिखा गया है वह श्रीजिनकुशलसूरिजी के स्वर्गवास के
४-५ वर्ष बाद तक की ही प्राप्त है। मालूम होता है कि
समकालीन व्यक्ति घटनाओं को साथ ही साथ लिखते रहे हैं
इसलिए इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ की प्रामाणिकता निर्विवाद है। यह
गुर्वावली पुरातत्त्वाचार्य जिनविजयजी से सम्पादित होकर
सिंघी जैन ग्रन्थमाला से प्रकाशित की जा चुकी है।
उसका हिन्दी अनुवाद भी श्रीजिनदत्तसूरि सेवासंघ द्वारा
प्रकाशित खरतर गच्छ इतिहास भाग १ में छप चुका है।
इस ग्रन्थ की भूमिका मुनि जिनविजयजी ने लिखने की
कृपा की थी अतः हम उनके अनेक अभारी हैं। इस ग्रन्थ
१

( ५ ) के परिशिष्ट में प्रकाशित श्रीजिनकुशलसूरि कृत श्रीजिनचंद्रसूरि चतुःसप्ततिका स्व० गणिवर्य वृद्धिसागरजी महाराजने लीवड़ी भण्डार से नकल करके और श्री जिनकुशलसूरि चतुष्पदिका की प्रतिलिपि स्वगीय पी० के० गोडेने भंडारकर ओरियन्टल इंस्टीट्यूट, पूना, की प्रति से करवा के भिजवाई थी अतः हम दोनों महानुभावों के अभारी हैं। श्री जिनकुशलसूरि सप्त- तिका की रचना उब्जयसागरजी ने सिन्धप्रान्त के मलिकवाहण नगर में की थी। यह रचना गुरुभक्तों में पर्याप्त प्रसिद्ध रही है, पर उनमें ७० पद्यों के स्थान में केवल १५पद्य ही पाये जाते हैं। सम्भवतः प्रतिदिन स्वाध्यायकी सुविधा के लिये मूल रचना का संक्षिप्तकरण कर दिया गया है। सं० १५०५ की लिखित प्रति में इसकी १४ गथाएं मिलती हैं इसलिये इसका संक्षिप्तरूप जयसागरोपाध्याय की विद्यमानता में ही प्रसिद्ध हो गया मालूम होता है। श्रीजिनकुशलसूरिजी की प्राचीन मूर्तियों में सं० १४८६ प्रतिष्ठित एकमूर्ति मालपुरा में थी जिसका फोटो श्रीनथमलजी चंडालियां से मंगवाकर इस ग्रन्थ में दिया है। * भक्तवत्सल गुरुदेवकी जीवनीकी यह द्वितियावृत्ति पाठकों के करकमलों में रखते हमें अत्यन्त हर्प हो रहा है। निवेदक- अगरचंद नाहटा, भँवरलाल नाहटा * यह मूर्ति अभी' मणिधारी जिनचन्द्रसूरिजी के स्मारक महरोली (दिल्ली) के शत्रुजय रचना मंदिर में पूज्यमान है जिसका लेख इस प्रकार है १- सवत् १४८६ वर्षे ज्येष्ठ सुदि ५ शुक्र सा0 रामदेव भार्या मूलादे पुत्र । २-सा० साहणकेन श्रेयाऽर्थ श्रीजिनकुशलसूरि मूर्ति का० ३- श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनवर्द्धनसूरि पट्ट प्र० श्रीजिन- चन्द्रसूरिमिः।

मुख्य व्यक्ति अजीमगंज निवासी धर्मिष्ट ओसवाल समाज-भूपण स्वर्गीय बाव प्रसनचन्दजी बोथरा वंगालके जैन समाज में धर्मिष्ट और संस्कारसम्पन्न परिवारों में अजीमगंज के बोथरा परिवार का स्थान महत्त्व- पूर्ण है। अभावग्रस्त और मध्यवित्त भाइयों पर इस परिवार के महामना श्री प्रसनचन्दजी बोथरा की कल्पवृक्ष की भांति सदा गहरी छाया रहती थी, इसी कारण आपका नाम आज भी समाज में बड़े आदर के साथ लिया जाता है । आपका जीवनसौरभ कीर्ति-कलापों से ओत-प्रोत था क्योंकि उदारभावना आपकी जीवन सहचरी थी। देव गुरु धर्म पर आपकी अटल आस्था थी और उसी श्रद्धा-भक्ति का बीज आपके वंश में विरासत रूप में पल्लवित और कुसुमित है। परिणामतः आज भी आपका परिवार-दान, शील, तप और भाव-चारों प्रकार के धर्मसौरभ से आमोदित है। यह सब पुण्यात्मा बाबू प्रसनचन्दजी साहब का पुण्यप्रभाव है, अतः पाठकों को यहां आपका संक्षिप्त परिचय कराया जाता है। श्रीमान् वावू प्रसनचन्द बोथरा का जन्म सं० १६४६ मिती वैशाख कृष्णा १.५ को अजीमगंज में हुआ था। आपके पिताजी का नाम सितावचन्दजी बोथरा था । आपकी शिक्षा अजीमगंज में हुई। सोलह वर्ष की उम्र तक आप. वहीं पर रहे । तदनन्तर आप कलकत्ता आये और पाट का व्यापार- दलाली का काम करने लगे। अपने सद्गुणों के कारण - स्वर्गीय वाव प्रसनचन्दजी बोथरा

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( २ ) आपने इस काम में बड़ी उन्नति की। आप बड़े ही मिलनसार और व्यवहारकुशल थे, इसलिये समस्त दलाल-परिपद में आप सर्वोपरि बन गए। आपके सौजन्य एवं उदार प्रकृति के कारण पाट के समस्त व्यापारी और दलाल-मण्डल में आपका वड़ा आदर-सम्मान था । सुयोग्य पुत्रों के स्कंधोंपर कार्यभार सोंपकर निवृत्त हो जाने की मर्यादा आर्य संस्कृति में पुरातन काल से चली आ रही है। जब आप ५२ वर्प के हो गए तो अपने तीनों सुयोग्य पुत्रों-परिचन्दजी, श्रीचन्दजी, गंभीरचन्दजी को सारा कारोबार का भार सौंपकर आपने विश्राम ग्रहण कर लिया। आप अपने समय का सदुपयोग धर्म-ध्यान में विताते हुए स्वधर्मी बन्धुओं की सेवा में सविशेप संलग्न रहते थे। आप बड़े दयालु और कोमल हृदय के थे। आपकी मनोभावना अत्यन्त विशाल और उदार थी। आपके दान स्रोत का अजस्रप्रवाह सतत चालू था और आशा करके आया हुआ कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था । सामान्य स्थिति के ओसवाल-वन्धु का दुःख-दर्द ज्ञातकर आप याचित- अयाचित यथोचित सहायता प्रदान करते रहते थे। आपमें यशोलिप्सा लेशमान भी नहीं थी। अत. गुप्तदान देनेमें अति- शय आनन्द का अनुभव करते और चुप-चाप वर्षभर की उप- भोग्य अभीष्ट वस्तु तदन्छु वर्ग के यहां भिजवा देने की प्राचीन परम्परा के परिपालन के कारण अजीमगंज का समस्त समाज आपके लिए तरस रहा है ।

अजीमगंज में धार्मिक और व्यवहारिक शिक्षा में प्रबन्ध का अभाव देखकर आपने अपनी धर्मपत्नी के स्मरणार्थ-श्री पवनकुमारी-ज्ञानमन्दिर नामक ज्ञानशाला की स्थापना की। इस संस्था का उद्घाटन समारोह सं० २००५ में सिद्धान्त- महोदधि, व्याख्यान वाचस्पति जैनाचार्य श्रीपूज्यजी श्रीजिन- विजयेन्द्रसूरिजी महाराज के कर-कमलों द्वारा कराया गया था। आज भी इस शिक्षण संस्था द्वारा अनेक बालक-बालि- काए शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। श्री प्रसनचन्दजी साधारणतया स्वस्थ और 'यथा नामस्त- थागुणः' के अनुसार प्रसन्न रहते थे। पर शरीर नाशवान है, रोम-रोम में रोगों का उत्पत्ति-स्थान है, कब कौनसा रोग उत्पन्न हो जाय ? पता नहीं। आप भी अकस्मात् माघकृष्ण ११ को अस्वस्थ हो गए। उपचार पर उपचार कराये गये पर "खूटी को बूटी नहीं" के अनुसार आप भवयात्रा की अवधि परिपूर्ण कर मिती माघ कृष्ण २३ को मध्यान्ह में साढ़े ग्यारह बजे इस नश्वर देह का त्यागकर परलोकवासी हो गए। आप आज संसार में नहीं हैं पर आपकी कीर्ति देह अमर है। आपके सुयोग्य पुत्र श्रीपरिचन्दजी साहब आदि लाखों रुपया सत्कार्यों में स्वधर्मीभक्ति आदि सप्तक्षेत्रों में सतत् व्यय कर रहे हैं । आपका सारा परिवार धर्मिष्ठ तपस्वी एवं सदाचारवान् है। दादासाहब के आप परमभक्त हैं, और उन्हीं गुरुदेव के परमभक्त अपने पूज्य पिताजी की स्मृति "दादा श्रीजिनकुशलसूरि" ग्रन्थ की यह आवृत्ति गुरुभक्तों के करकमलों में समर्पण करते हुए पितृभक्ति और गुरुभक्ति के द्विगुणित लाभसे लाभान्वित हो रहे हैं; अतःसाधुवादाह हैं।

प्रस्तावना श्वेताम्बर जैन संप्रदाय के जितने गच्छों का इतिहास उपलब्ध होता है उन सब में खरतर गच्छ का इतिहास.विशेष विस्तृत और विविध साधन संपन्न है। खरतर गच्छ की पट्टा- वलियां संख्या में भी खूब अच्छी मिलती है और रचनामें भी कई एक यथेष्ट पुरातन । पट्टायलियों के अतिरिक्त संस्कृत,प्राकृत और देश्यभापा में छोटी-बड़ी गुर्वावलियां, स्तुतियां और रास भास आदि कृतियां भी अनेक उपलब्ध होती हैं। अन्य प्रश- स्तियां, पुस्तक प्रेशस्तियां, मन्दिर प्रशस्तियां और मूर्तियां तथा पादुकाओं पर उत्कीर्ण छोटे-बड़े लेख भी सैकड़ों की संख्या में विद्यमान हैं। इन सब साधनोंका व्यवस्थित संग्रह और संक- लन किया जाय और उन सब को अच्छे ढङ्ग से संपादित और • प्रकाशित किया जाय तो उससे खरतर गच्छ के गौरव का और विस्तार का बड़ा मनोरंजक, प्रभावोत्पादक और वास्तविक इतिहास विद्वानों के सन्मुख उपस्थित किया जा सकता है। हमें, यह देखकर बड़ा आनन्द होता है कि इस गच्छ के एक श्रद्धाशील बन्धु-युगल-भाई, श्री. अगरचन्दजी नाहटा और श्रा भंवरलालजी नाहटाइस दिशामें खूब प्रशंसनीय प्रयत्न कर [ ख रहे हैं और अपने पूर्वाचार्यो और पूर्वजनोंकी कीर्ति को प्रकाश में लाने का पुण्योपार्जन कर रहे हैं। इससे पहले श्री जिनचन्द्रसूरि चरित्र और ऐतिहासिक जैन काव्यसंग्रह नामक दो पुस्तकें इन्होंने अच्छे ढङ्गसेसम्पादित कर प्रकाशित की हैं और अब यह दादा श्री जिनकुशलसूरिका चरित्र प्रकट कर रहे हैं। इसके सिवा ये दोनों वन्धु अन्यान्य पत्र-पत्रिकाएं आदि में इतिहास विषयक सामग्री को लक्ष्यकर छोटे-बड़े अनेक लेख, निवन्ध आदि लिख-लिख कर इस विपय. की खोज के प्रेमियों को कितनी ही नई बातें ज्ञात कराने का अभिनन्दनीय उद्यम करते हैं। मारवाड़ के इधर उधर के अनेक स्थानों में भ्रमण कर पुराने ग्रन्थ पत्र आदि सामग्री का संग्रह भी इन्होंने अपने स्थान (बीकानेर) में अच्छा कर रखा है और करते जा रहे हैं। अपने व्यवसायी जीवन के निमित्त, बंगाल और आसाम जैसे के देशों में, व्यापारिक कारो- वार में व्यस्त रहते हुए भी ये वन्धु इस प्रकार निरन्तर साहित्य सेवा में अपना योग्य देते रहते हैं और यथाशक्ति तन, मन और धन का सदुपयोग करते रहते हैं-जो अन्य जैन-बन्धुओं के लिये अवश्य अनुकरणीय और अनुमोदनीय है। श्री जिनकुशलसूरि का यह चरित्र प्रायः ऐतिहासिक तथ्य- परिपूर्ण है। विशुद्ध इतिहास में चमत्कारिक और अमानुपिक घटनाओं की कोई प्रतिष्ठा नहीं है। लेकिन हमारे देश के इति- हासका उपादान प्रायः चमत्कारमय वर्णन ही से परिपूर्ण होता [ ग ] है। हमारे मानसिक और वौद्धिक संस्कार परापूर्व से इस चमत्कारमय वातावरण से इतने ओत-प्रोत हो रहे हैं कि यदि हमारे किसी पूर्वज या महापुरुष के जीवन वृतांत में कोई चम- 'त्कारिक घटना का निर्देश जो हम न देख सके और न पा सके तो हमें इस व्यक्ति के वैशिष्ट्य में कोई विशेष श्रद्धा ही नहीं उत्पन्न हो सकती । इसलिये,हमारे पूर्वजों के इतिहासके आलेखन में हमें पद-पद पर इस चमत्कार अलङ्कार का दर्शन होता रहता है और बुद्धि और विचारशक्तिको गाह्य न होनेपर भी श्रद्धा और संस्कार के कारण हमें उसमें भक्ति रखनेकी भावना हो आती है। जिनकुशलसूरि के इस चरित्र में ऐसी कोई खास चमत्कारिक घटना का निर्देश नजर नहीं आता और प्रायः जितना वर्णन है वह सब ही ऐतिहासिक वास्तविकता का विधायक है । चरित्र लेखकोंने 'स्वर्गवासके पश्चात्वाले' शीर्षक के नीचे जो थोड़ासा, इन आचार्य के प्रभाव का महत्व बत- लाने के लिए कुछ चमत्कारिक वृतांत का उल्लेख किया है उसका सम्बन्ध चरित्रनायक के निज के मानवी जीवनके साथ कुछ भी नहीं है । वे सब उनके मृत्युके वादकी बातें है जो उनके भक्तगणों द्वारा प्रस्तुत की गई है। जिनकुशलसूरि के जीवन के साथ सम्बन्ध रखनेवाली सभी व्यक्तियों और प्रवृत्तियां, प्रायः उनके समकालीन उल्लेखों और प्रमाणों से सिद्ध और समर्थित होती हैं। इसलिए यह चरित्र एक प्रकार से शुद्ध इतिहास सिद्ध जीवन वर्णन (Pure Historical Biography) ही है।

- - [ ] इसमें कोई शक नहीं है कि श्री जिनकुशलसरि बरं चरित्र- वान् और प्रभावशाली पुस्य थे। ला न होता तो घरतर गच्छानुयायी वर्ग में, आज सैकड़ों वर्षों से इनके प्रति जो बड़ी उत्कट भक्ति और श्रद्धा चली आ रही है वह न होती। इस पुस्तक के परिशिष्ट (ख) में जो एक कृति दी हुई है उसके वर्णन से ज्ञात होता है कि मारवाड़, मेवाड़,मालवा, गुजरात, काठि- यावाड़, कच्छ, सिंध, पंजाब और दिल्ली आदि प्रदेशों के कई स्थानों में-जिनकी संख्या १०८ जितनी होती है-इनके स्तृप बने हुए हैं और वहां पर भक्तगण उनकी चरण स्थापनाकी बड़ी श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चा करते रहते हैं। इन भक्तजनों की यह बढ़ आशा है कि इनकी उपासना से उनके मनोवांछित की सिद्धी होती है। ऐसी श्रद्धा और तदनुसार सिद्धी का प्राप्त होना, इनके उत्कट चारित्र का ज्ञापक है। चारित्रवल के साथ इनमें ज्ञानबल भी बसेही उचकोटिका था, यह बात इनकी की हुई ग्रन्थ-रचना के देखनेसे सिद्ध होती है। छोटी बड़ी कृतियां जो कुछ इनकी उपलब्ध होती है उनसे ज्ञात होता है कि संस्कृत प्राकृत और प्रचलित देश भापा पर इनका पूरा प्रभुत्व था। कवित्व शक्ति भी इनमें बहुत उत्तम प्रकार की थी। प्रस्तुत चरित्र-लेखकों ने इनके न्याय, व्याकरण, साहित्य, अलङ्कार, नाटक; ज्योतिप, मंत्र-तंत्र आदि अनेक विद्याओं में सिद्धहस्त होने का जो उल्लेख किया है उसमें चाहे अत्युक्तिका अंश भलेही हो लेकिन असंभव कुछ नहीं है। , .

[ ङ ) इनकी ग्रन्थ-रचना में, वर्तमान में जो मुख्य कृति उपलब्ध है वह चैत्यवन्दना-कुलक-वृत्ति है। इस वृत्ति का स्वाध्याय करने का हमें प्रसंग मिला और उसके अवलोकन से हमें ज्ञात हुआ कि इनमें कवित्व और वक्तृत्व दोनों पूकार की शक्तियां उत्तम पूकार में विद्यमान होंगी। इस वृत्ति में प्रसंगवशात् जो कितनीक कथायें लिखी गई है, उनमें इनके पाण्डित्य और प्राज्ञता की सूचक बड़ी अच्छी-अच्छी चमत्कारिक पंक्तियां स्थान-स्थान पर उपलब्ध होती हैं । शृगाल और सर्प पुच्छ के दृष्टान्त जैसे बालप्रिय लौकिक आभाणकों को भी इन्होंने बड़े मनोरम ढङ्ग से सुन्दर पद्यों और आलंकारिक वाक्यों द्वारा गुम्फित फिये हैं। इच्छा तो होती है कि, यहांपर कुछ विस्तार के साथ, इस ग्रन्थ में से, इनके ऐसे विशिष्ट पाण्डित्य निर्देशक कुछ अवतरणादि उद्धृत करें, लेकिन इस छोटी सी पुस्तिका की बड़ी भूमिका लिख कर, इसके कलेवर को बढ़ाना, छोटे सिरपर बड़ी पगडी रखना जैसा असंगत मालूम होने के भय से, इस इच्छा का संवरण करना ही उचित मालूम दे रहा है । इस ग्रन्ध में सूरिजी ने सिद्धसेन दिवाकर और परमार्हत महाकवि धनपाल की कथायें लिखी हैं जिनमें इनकी कुछ ऐतिहासिक प्रियता भी दृष्टिगोचर होती है। जन समाज में परस्पर एकता और समानता का व्यवहार रहना चाहिए इस बात का भी इन्होंने स्पष्ट विधान किया है-जो वर्तमान में जैन-समाज को सबसे अधिक मनन और अनुसरण करने

( च )
योग्य है। इस विषय में साधर्मिकवात्सल्य वाले प्रकरण में
इन्होंने कहा है कि जैनधर्म का अनुवर्तन करने वाले सव'
मनुष्यों को परस्पर सम्पूर्ण बन्धुभाव और समान व्यवहार
वर्तना चाहिये-चाहे फिर कोई किसी भी देश और किसी भी
जाति में क्यों न उत्पन्न हुए हों । जो कोई मनुष्य सिर्फ नमस्कार
मन्त्र मात्र का स्मरण करता है वह भी जैन है और अन्य
जैनों का परम वन्धु है और इसीलिये उसके साथ किसी भी
प्रकार का भेद भाव न रखना चाहिये और किसी प्रकार का
वैर विरोध न करना चाहिए। धार्मिक एकता की दृष्टि से ये
विचार कितने उदार और अनुकरणीय हैं । जिनकुशलसूरि की
। साधर्मिक वात्सल्य के विषय में जिनकुशलसूरि का यह विधान
इस प्रकार है :-
तथा-स्वघुत्र-मित्र-कलत्रादिवन्धुभ्योऽपि साधर्मिकेषु स्नेहवन्धः
प्रचुरतरो विधेयः।
यत् उक्त-साहम्मियाओ अहिओ बंधुसुयाईसु जाण अणुराओ।
तेसिं न हु सम्मतं विन्नेयं समयनीईए ।।
तथा—जे भिन्नभिन्नजातयो भिन्नदेश-सम्भूतयो भवन्ति ते
जिनधर्म प्रपन्नाः परस्पर बान्धवा एव । तथा चोक्तम्-
अन्नन्न देसजाया अन्नन्नदेस वड्डिय सरीरा ।
जिन सासणं पवन्ना सव्वे ते बंधवा भणिया ।।
तम्हा सव्वप्पयत्तेण जो नम्मृक्कार धारओ।
सावगो सो वि दटुब्बो जहा परम बंधवो ॥
देखो-चैत्यवन्दना कुलक वृत्ति, पृष्ठ ३२३-४
-

( छ )
चरण-पूजा करने वाले भक्तजन यदि उनके इस कथन का बुद्धि-
पूर्वक अनुपालन करें तो, गुरुपूजा का सबसे उत्तम फल प्राप्त
कर सकते हैं और कम-से-कम अपने गच्छ का तो पूरा गौरव
बढ़ा सकते हैं।
अन्त में साहित्य-प्रिय भाई श्री भंवरलालजी नाहटा ने
इस पुस्तिका के प्रारम्भ में ये ये दो-चार पंक्तियां लिख देने के
लिए साग्रह अनुरोध करके, अपने पूर्वाचार्यो की स्तुति-पूजा
करने में मुझे भी सहयोग देने का जो अवसर दिया, तदर्थ में
इनका कृतज्ञ हूं और आशा करता हूं कि इन नाहटा-बन्धुओं
की तरह अन्य जैन-बन्धु भी जैन साहित्य और इतिहास को
प्रकाश में लाने के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करें करावें । इ.यलम्
वंशाखी पूर्णिमा १६६६
अनेकान्त विहार
जिनविजय
अहमदावाद

युगवर कमलेशा सूरि भाग्यालिकोशा भव जलधि तरण्डा वादिवाद प्रचण्डाः जिनकुशल यतीशा रूप लक्ष्म्या रतीशाः त्रिभुवन कमलंवैः पातु संसेव्यमाना ॥११॥ सं० १४०५. लि0 पट्टावली से।

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दादा श्री जिनकुशलसूरि :-
ޗެކިހަށިއި
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दादा श्री जिनकुशलसूरि पहला प्रकरण जन्म और दीक्षा प्रगट प्रभावी, कामित कल्पतरु, भक्तवत्सल परम पितामह श्री जिनकुशलसूरिजी जैन शासन के सुप्रसिद्ध महापुरुष थे। जैन समाज का बच्चा-बच्चा उन्हें दादाजी के नाम से पहिचा- नता है। भारत के कोने कोने में आपके स्मृति-मन्दिर, मूर्तियां और पादुकाएं प्रतिष्ठित हैं । आपके गुण वर्णनात्मक सैकड़ों स्तवन-स्तोत्र रचकर अनेक सुकवियों ने भक्ति कुसुमां- जलि समर्पण की है। ऐसे शासन प्रभावक गुरुदेव का पुनीत जीवन आलोकित करने का यह लघु प्रयास किया जा रहा है। जन्म मरुस्थल देश के सामियाणा (गढ सिवाना ) ग्राम में छाजहट गोत्रीय मं० देवराज के पुत्र मन्त्रिराज श्री जेसल १-इस गोत्र वाले साह उद्धरण श्री जिनपतिमूरिजी के समय में सरतर गच्यानुयायी हो गये थे। इस विषय में हमारे संग्रह के एक प्राचीन पत्र में मनोरंजक ऐतिहासिक वर्णन है अतः उस पत्र की दादा श्री जि नकुशलसूरि (जेल्हागर.) निवास करते थे। उनकी धर्मपत्नी जयतश्री की रत्नगर्भा कुक्षि से सं० १३३७ में आपका जन्म हुआ था। आप का जन्म नाम करमण रखा गया। शुक्लपक्षके चन्द्र की भांति अहर्निश बढ़ते हुए स्वजनों के चित्त को आह्लादित करने लगे। जब आप दस वर्ष के हुए तब खरतर गच्छ के प्रभावक आचार्य श्री जिनप्रबोधसूरिजी के पट्टधर कलिंकाल-केवली श्री जिनचन्द्रसूरिजी समियाणा पधारे। गुरुदेव का अमृततुल्य नकल परिशिष्ट में दी गई है। श्रीजिनकुशलसूरिजी और उनके गुरु श्री जिनचन्द्रसूरिजी एवं श्रीजिनपद्मसूरिजी, श्रीजिनभद्रसूरिजी आदि इसी वंश के थे । खरतर गच्छ की वेगड़ शाखा में तो अधिकांश आचार्य इसी वंश के हुए हैं । अब भी छाजहड़ गोत्रवाले खरतर गच्छानुयायी हैं। इस गोत्र की एक ऐतिहासिक प्रशस्ति अहमदाबाद से प्रकाशित "जैन प्रशस्ति संग्रह" में प्रकाशित हुई हैं। श्री नाहरजी के 'जैन लेख संग्रह' के लेखांक २५०५ में इस गोत्र के सम्बन्धी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सामग्री मिलतीहै। १-गृहस्थ अवस्था में आप श्रीजिनकुशलसूरिजी के पितृव्य होते थे। इनके सम्बन्ध मैं सूरिजी (चरित्रनायक)ने प्राकृतमें 'चतुःसप्ततिका' अन्य रचा है जिसे इसी ग्रन्थ के परिशिष्ट में प्रकाशित किया जाता है। उसका ऐतिहासिकसार हमारे सम्पादित “ऐतिहासिक जैनकाव्य संग्रह" के सार विभाग पृ० ११ में प्रकाशित हो चुका है । गुर्वावली में इनका चरित्र बहुत विस्तार से मिलता है । जैसलमेर नरेश कर्णदेव, जेत्रसिंह, दादा थी जिनकुशलसूरि धर्मोपदेश श्रवण कर करमण कुमार संसारसे विरक्त हो गये। उन्होंने उसी क्षण अपना समग्र जीवन संयमाराधन में व्यतीत करना निश्चित कर लिया । घर आकर मातेश्वरी जयतश्री को सविनय विज्ञप्ति की "गुरुदेव के सदुपदेश से प्रतिबोध पाकर 'संयम मार्ग ग्रहण करने की मेरी उत्कट अभिलापा है अतः माता जी! कपा करके मुझे अनुमति प्रदान करें!" लाडले पुत्र के इन वचनों ने माता के हृदय को मार्मिक आघात पहुंचाया। वे कहने लगी "वत्स ? तुम्हारे वचन बड़े प्रिय और मनोहर हैं, 'पर मेरे एकमात्र तुम ही आधार हो ! तुम्हारे विना मेरा जीवन 'असार है; फिर तुम तो अभी निरे बालक हो, चारित्र पालन करना तुम्हारे ऐसे सुकुमार के लिए अति कठिन है, संयम मार्ग में पद-पद पर अनेकों विन्न, परिसह आते हैं। अतएव अभी इस विचार को छोड़कर सुख से रहो! तुम से मुझे बड़ी बड़ी "आशाएं हैं। किसी सुलक्षणा कन्या को पुत्रवधू के रूप में देखने का मेरा भव्य मनोरथ पूर्ण करो।" माता के मोहयुक्त वचनों को श्रवण कर कर्मणकुमार ने ‘अपना दृढ़ निश्चय इन शब्दों में प्रकट कर दिया "इस संसारमें कोई किसी का नहीं है, अनेक बार इन कुटुम्बिक सम्बन्धों को प्राप्त कर आत्मोन्नति के स्थान पर संसार वृद्धि ही की है अतः समियागाके समरसिंह, शीतलदेव आदि आपके भक्त थे। आपने सम्राट कुतुबुद्दीन को अपने सद्गुणों से चमत्कृत किया था । पट्टावलियों में इनका "कलिकाल केवली" विरुद लिखा है।

४ . दादा श्री जिनकुशलसूरि अब इन सम्बन्धों से सरा, मैं भव भव में एकान्त हितकारी भागवती प्रज्या को स्वीकार कर आत्म-कल्याण करूंगा । जो समय जा रहा है आने का नहीं, आयु प्रतिक्षण घट रही है। कृपा कर मुझे शीघ्र अनुमति दीजिये !” पुत्र के निश्चयात्मक वचनों से विवश होकर माता को अनुमति देनी पड़ी। ६. दीक्षा शुभ मुहुर्त में सं० १३४७ फाल्गुन शुक्ला ८ के दिन श्री जिनचन्द्रसूरिजी के करकमलों से समारोह पूर्वक आपकी दीक्षा सम्पन्न हुई। आपका दीक्षा नाम कुशलकीर्ति रखा गया । इस समय देववल्लभ, चारित्रतिलक और रत्नश्री साध्वी की दीक्षा एवं मालारोपण आदि हुए। साथ साथ चौहान श्री सोमेश्वर महाराज द्वारा किए हुए विस्तृत प्रवेश-महोत्सव के सहित श्री शांतिनाथ स्वामी की स्थापना भी सा० वाहड़, भां० भीमा, भां, जगसिंह, भा०. खेतसिंह कारित मन्दिर में हुई। विद्याध्ययन उस समय उपाध्याय विवेकसमुद्र' वयोवृद्ध गीतार्थ और १-आपने सं० १३०४ मिती वैशाख शुक्ला १४ को श्री जिनेश्वर- सूरिजी महाराज के कर कमलों से दीक्षा ग्रहण की थीं। सं० १३२३ में हि ज्येष्ठ शुक्ला १० को जेसलमेर में आपको श्री जिनेश्वरसूरिजी ने वाचनाचार्य पद प्रदान किया । सं० १३४२ मिती वैशाख शुक्ला १० को जालोर के श्री महावीर चैत्य में श्री जिनचन्द्रसूरिजी ने आपश्री को • .

3 दादा श्री जिनकुशलसूरि ५ प्रकाण्ड विद्वान थे।'चरित्रनायकके गुरु कलिकालकेवली,श्रीजि- चन्द्रसूरिजी,राजेन्द्रचन्द्रसूरिजी दिवाकराचार्य:राजशेपराचार्य उपाध्याय पद से अलंकृत किया। सं० १३७६ मिती ज्येष्ठ कृष्ण १४ को पाटण में अनशन करके मिती ज्येष्ठ शुक्ला २ को स्वर्गवासी हुए। जिसका वर्णन दूसरे प्रकरण में किया गया है । इनके रचित सम्यक्त व पर १ नरवर्म चरित्र की १३८ पत्र की प्राचीन प्रति श्री विजयधर्म- सूरि ज्ञानमन्दिर, आगरे में विद्यमान है,२ पुण्यसार कथानक सं० १३३४ . जेसलमेर में रचित उपलब्ध है। १-श्रीजिनचन्द्रसूरि ने सं०१३४७ ज्येष्ठ कृष्णा ७ को भीमपल्ली में आपको दीक्षा दी थी। उपाध्याय श्री विवेकससुद्रजा के पास आपने व्याकरण तर्क, साहित्य, अलङ्कार, ज्योतिष व स्व-पर सिद्धान्तादि का अध्ययन किया था। सं० १३७३ में जब श्री जिनचन्द्रसूरिजी देव- राजपुर थे, वहां से सेठ वीसल और मोहसिंह को भेजकर पाटण से वहां बुलाया तब उपाध्यायजी ने पुण्यकीर्ति को साथ देकर आपके पास भेजे । सूरिजी ने उन्हें मिती मार्गशीर्ष कृ० ६ को आचार्यपद दिया। २-इन्हें सं० १३३१ फाल्गुन शुक्ला ५ को श्रीजिनप्रबोधसूरिजी ने जालौर में दीक्षा दी, इनका दीक्षानाम स्थिरकीर्ति रखा । सं १३४४ मार्गशीर्ष शुक्ला १०को जालोर के श्रीमहावीरस्वामी के मन्दिर में श्री जिनचन्द्रसूरिजी ने आचार्य पद देकर इन्हें दिवाकराचार्य नामसे प्रसिद्ध किये । सं० १३६० आषाढ़ कृ० ४ को इन्होंने चतुर्विध संघ सह आबू यात्रा की, जिसका लुणगवसही में लेख हैं। .३-इन्होंने सं० १३१४ में चैत्र शुक्ला १४ को श्री जिनेश्वरसरि - . -

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१
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दादा श्री जिनकुशलसूरि
वा० राजदर्शनगणि, वा० सर्वराज गणि' आदि
अनेक सुप्रसिद्ध विद्वानों ने आप ही के पास तीन
वार हेमव्याकरण वृहद्वत्ति, ३६००० श्लोक परिमाण बाले
श्री न्यायमहातर्कलक्षण, साहित्य, अलंकार, ज्योतिष और
स्वपरदर्शनादि के ग्रन्थ पढ़े थे, हमारे चरित्रनायक,
कुशलकीर्तिजी का अध्ययन भी आप ही के पास हुआ। इस
बात को आपने स्वयं 'चैत्यवन्दन कुलकवृत्ति' की अन्त्य प्रशस्ति
में इन शब्दों में लिखा है-
तन्मौक्तिक स्तबक सेव्य पदो ऽनुवेल
मस्ताघ संवर धरः कुपथ प्रमाथी
विद्यागुरुर्मम विवेकसमुद्र. नामो
पाध्याय इद्धतर रत्ननिधिर्वभूव ।।११।।
से चारित्र ग्रहण किया। सं० १३४१ वैशाख शु० ३ को श्रीजिनप्रबोध
सूरिजी ने जालोर में वाचक पद दिया। सं० १३६४ वैशाख कृ०
१३ को जालोर में श्री जिनचन्द्रसूरिजी ने आचार्यपद से विभूषित
किया। इन्होंने राजगृह आदि अनेक तीर्थों की यात्रा की थी।
१-ये पालनपुर में सं० १३१५ आषाढ़ शु० १० को श्रीजिनेश्वर
सूरिजी के कर-कमलों से दीक्षित हुए। सं० १३४६ वैशाख कृ० १ को
जालोर में श्रीजिनचन्द्रसूरिजी ने वाचनाचार्यपद से अलंकृत किया ।
२-सं०१३२२ माघ शुक्ला१४को विक्रमपुर में इनकी दीक्षा हुई ।
सं० १३४२ वैशाख शु० १० को जालोर में श्री महावीरभगवान

७ १ दादा श्री जिनकुशालसूरि. वाचनाचार्य पद सं० १३७५ में फलोधी पार्श्वनाथजी की द्वितीय वार यात्रा करके श्री जिनचन्द्रसूरिजी नागपुर (नागौर).पधारे। मिती माघ शुक्ला १२ को मन्त्रीदलीय' ठक्कुर विजयसिंह 80 सेढू साकदा आदि योगिनीपुर (दिल्ली) के संघ प्रमुख श्रावक और डालामऊ के मन्त्रीदलीय 30 अचल आदि समुदाय, कन्यानयन आसिका, नरभट आदि बहुत से स्थानों के रहने वाले समस्त वागड़ देश के संघ, मं० मूधराज आदि कोशवाणा के समुदाय, एवं समस्त सपादलक्ष देश का समुदाय, जावालिपुर के साह सुभट आदि, शम्यानयन आदि मारवाड़ के समुदाय के एकत्र होने पर एक विराट महोत्सव प्रारम्भ हुआ। स्थान स्थान पर के मन्दिर में श्री जिनकुगलसूरिजी ने वाचकपद दिया। इन्होंने गणधर- सार्वगतक लघुवृत्ति की रचना की ४. युगप्रधानाचार्य गुर्वावली के अनुसार यहां के विधिचंत्य में सं० १२३४ में श्री जिनपतिसूरिजी ने श्री पार्श्वनाथ प्रभु की स्थापना की। इसके लिये देखें 'सत्य जैनप्रकाग' पत्र में हमारा लेख । १- इस जाति के सम्बन्ध में देखें हमारा “महत्तियाण जाति" लेख प्र० ओसवालं नवयुवक वर्ष ७ अंक ६ २- इनको सं० १३४० ज्येष्ठ कृष्णा ४ को जालोर में श्रीजिन- प्रबोधसूरिजी ने दीक्षा दी थी।

८ दादा श्री जिनकुंशलंसूरि अन्नसत्र खोले गए, जिन मन्दिरों में नृत्य, पूजन, स्वधर्मीवात्स- ल्यादि हुए। बहुतों ने व्रतग्रहण, मालारोपण आदि के लिए नन्दी-महोत्सव किया उस समय सोमचन्द्र साधु एवं शीलसमृद्धि दुर्लभसमृद्धि, भुवनसमृद्धि साध्वी को दीक्षा दी गई। पं0 जगञ्चन्द्र' को वाचनाचार्य पद दिया गया। धर्ममाला व पुन्यसुन्दरी गणिनी को प्रवर्तिनी पद दिया गया। हमारे चरित्रनायक कुशलकीर्तिजी इस समय स्वपर समस्त शास्त्रों के पारङ्गत विद्वान हो चुके थे। न्याय, व्याकरणादि में आपकी असाधारण गति थी। अतएव सर्वथा योग्य जानकर इसी उत्सव में श्री जिनचन्द्रसूरिजी ने इन्हें वाचनाचार्य पद से- विभूषित किया। इस महोत्सव के अनन्तर कलिकालकेवली श्री जिनचन्द्र सुरिजीने ठक्कुर विजयसिंह, ठ०सेढ, ठ०अचलसिंह आदि वृहत् संघ के साथ फलौदी पधारकर तृतीयवार श्री पार्श्वनाथ भग- वान् की यात्रा की। संघ के पधारने से वहां के भण्डार में हजारों रुपयोंकी आमदनी हुई। इसके पश्चात् सं०१३७५वैशाख कृ० ८ को पूज्यश्री नागौर पधारे। महत्तियाण ठकुर. अचल- सिंह ने सम्राट कुतुबुद्दीन से निर्विरोध तीर्थ यात्रा का फरमान ३-सं० २३३३ में ज्येष्ठ कृष्णा ७ के दिन शत्रुनय में श्रीजिन प्रबोधसूरिजी ने इन्हें दीक्षा दी। ४-सं०१३४१ ज्येष्ठ कृ०४ को श्रीजिनप्रबोधसूरिजी. ने आपश्री का जेसलमेर में दीक्षा दी। .

दादा श्री जिनामरसूति
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प्राप्त कर हस्तिनापुर और मयुरा के लिए एफ विराट मंग
निकाला । हस्तिनापुर की सराल यात्रा करने के पश्चात् सहि
मदाराज फुतुबुद्दीन सम्राट को पमत्त फर यंदामराय टहरे ।
मयुरा फी यात्राकर पुनः दिदी पधारे और मंदासराय
में पातुमाम किया।
यहां से

दूसरा प्रकरण आचार्यपद च प्रतिष्ठाएँ 7 जिनचन्द्रसूरिजी के खण्डासराय चातुर्मास के अन- न्तर कम्प रोग उत्पन्न हुआ। अपने ज्ञान ध्यान के बल से अपना आयुशेष निकट जानकर स्वहस्त दीक्षित लक्षण, तर्क, साहित्य, अलंकार, ज्योतिप, एवौं स्वपरदर्शन के प्रकाण्ड विद्वान वाचनाचार्य कुशलकीर्ति गणि को अपने पद योग्य समझा। सूरिजी ने उनके पदस्थापन व नामकरण आदि की सर्व शिक्षा समन्वित एक पत्र श्रीराजेन्द्रचन्द्राचार्यजी के. प्रति लिखकर सुश्रावक ठक्कुर विजयसिंह को सौंप दिया। सूरि जी ने राणा मालदेव चौहान के अनुरोधपूर्ण आमन्त्रणके कारण वहां से मेड़ता की ओर विहार कर दिया। मार्ग में एक मास पर्यन्त कन्यानयन रहे, वहां श्वासादि की व्याधि बढ़ जाने से चतुर्विध संघसे क्षमतक्षामणा की । एवं अपने विश्वासपात्र प्रव- तक जयवल्लभ' गणि से परामर्श कर राजेन्द्रचन्द्राचार्य के प्रति पद योग्य सर्व शिक्षा लिखकर एक पत्र उन्हें भी दे दिया । कुछ १-इनकी दीक्षा सं० १३२२ माघ शुक्ला १४ के दिन विक्रमपुर में श्री जिनप्रबोधसूरिजी के कर कमलों से हुई। -- . दादा श्री जिनकुशलसूरि स्वस्थ होने पर राणा मालदेव की अभ्यर्थना से वहां से मेड़ता पधारे, वहां २४ दिन ठहरे। वहां से विहार कर कोशवाणा पधारे। यहां सं० १३७६ आपाढ़ सुदि को ड्योढ़ प्रहर रात्रि वीतने पर अनशन आराधनापूर्वक स्वर्ग सिधारे। श्री संघ ने वहां आपश्री का सुन्दर स्तूप-निवेश किया । चातुर्मास समाप्त होने पर जयवल्लभ गणि पूज्यश्री के पत्र को लेकर श्री राजेन्द्रचन्द्राचार्य के पास भीमपल्ली' आए। पत्र के आशय को विदित कर जयवल्लभ गणि. आदि साधुओं के साथ श्री राजेंद्रचन्द्राचार्यजी पाटण पधारे । पाटण में उस समय महादुर्भिक्ष होने पर भी अपने ज्ञानवल से चतुर्विध संघ का कुशल ज्ञात कर पूज्यश्री के आज्ञा के प्रतिपालनार्थ आचार्यश्री ने सं० १३७७ के ज्येष्ठ कृष्ण ११ कुम्भ लग्न में सूरिपद स्थापना का मुहुर्त निर्धारित किया। यह वात जानकर सुश्रावक जाहणके पुत्ररत्न सेठतेजपाल १-यह ग्राम पालनपुर एजेंसी के डीसा ग्राम से ८ कोश पश्चिम है। अभी भीलड़ी नाम से प्रसिद्ध है। विशेष जानने के लिए जनयुग सं० १९८५-८६ भादव-कार्तिक अंक में मुनिराज श्री कल्याणविजयजी का "भीमपल्ली अने जैन तीर्थ रामसत्य" लेख । २-इनके पिता श्री जाल्हण 'श्रीजिनप्रबोधसूरिजी के छोटे भाई थे, इन्हीं के वंग में मन्त्रीश्वर कर्मचन्द्र वच्यावत हुए है । 'कर्म- चन्द्रवंग प्रबन्ध वृत्ति और एक पट्टावली में इनके विषय में अनेक नई नई बातें मिलती है। 1" २ -१२ + दादा श्री जिनकुशलसूरि अपने भ्राता रुंद्रपाल के साथ पदस्थापना महोत्सव अपनी ओर से करने के लिए उत्कण्ठित हो उठे। आचार्य श्री की आज्ञा प्राप्त कर तेजपाल ने योगिनीपुर, उच्चनगर, देवगिरि, चित्तौड़, खम्भात, आदि चारों दिशाओं के संघ को कुंकुमपत्रिकाएँ लिखकर पत्रवाहकों के साथ भेजी। पदाभिषेक का संवाद पाकर चारों ओर से संघ आकर पाटण में एकत्र होने लगा। इसी समय ठक्कुर विजयसिंह भी पूज्यश्री के दिए हुए शिक्षापत्र ‘और गोलक के साथ योगिनीपुर से पाटण आये । चारों ओर के संघ को एकत्र हुआ देख कर श्री राजेन्द्र- चन्द्राचार्यजी ने महोपाध्याय विवेकसमुद्र, प्रवर्तक जयवल्लभ, हेमसेन गणि, वाचनाचार्य हेमभूषण', आदि३३साधु, जयद्धि महत्तरा, प्रवर्तिनी बुद्धिसमृद्धि गणिनी, प्र0 प्रियदर्शना गणिनी आदि २३ साध्वियां एवं सर्व संघके समक्ष प्र० जयवल्लभगणिऔर , १-इनकी दीक्षा सं0 १३२४ मार्गशीर्ष द्वितीया शनिवार को जालोर में श्री जिनेश्वरसूरिजी के हाथ से हुई। सं० १३६१ द्वितीय वैशाख कृ० १० के दिन समियाणा में श्रीजिनचन्द्रसूरिजी ने वाचकपद दिया। श्री जिनकुशलसूरिज़ी ने सं० १३७८ माघशुक्ला ३ को भीम- 'पल्ली में इन्हें उपाध्याय पद से अलंकृत किया। २-ये ठव्हांसिलपुत्र देहड़ाके छोटे भाई ठ०थिरदेव की पुत्री थी। सं०१३४२ मिती वैशाख शु० १० को जालोर के महावीर चैत्य में श्री .. दादा श्री जिनकुशलसूरि १३ ठक्कुर विजयसिंह द्वारा प्राप्त स्वर्गीय पूज्यश्री के दोनों आज्ञा पत्र पढ़कर सुनाये। उन्हें सुनकर चतुर्विध संघ के हर्प का पारावार न रहा। आचार्यश्री ने पूज्यश्री के आदेशानुसार वाचनाचार्य श्री कुशलकीर्त्ति गणि को श्री शांतिनाथ स्वामी के मन्दिर में संघ के समक्ष महान्समारोह के साथ सूरि पद पर स्थापन किया। पूज्यश्री की आज्ञानुसार उनका नाम "श्रीजिनकुशलसूरि" - रखा। उस समय का दृश्य अत्यन्त मनोहर और वर्णनातीत था, सारा नगर ध्वजा पताकाओं, तोरणों से सजाया गया,. नाना प्रकार के वाजित्रों की ध्वनि से गगनमंडल गूंज उठा ।' भाट व बन्दीगण उच्च स्वर से विरुदं गाने लगे। चतुर्विध संघ' की भीड़ से विशाल.राजधानी भी संकुचित प्रतीत होने लगी। सेठ तेजपाल ने इस उत्सव पर अपने न्यायोपार्जित वित्त को खुले हाथ व्यय कर महाफल की प्राप्ति की। याचकों को मनो- वांछित स्वर्ण, रौप्य, अश्व, वस्त्र, अन्न, आदि दिए गये । साधर्मीवात्सल्य प्रतिदिन होता था। उन्होंने अपने घर पर १०० आचार्य, ७००साधु, और २४०० साध्विओं को प्रतिलाभ कर वस्त्र पहिराये। -इस प्रसंग पर अन्य स्थानों से आये हुए सुश्रावकों ने भी जिनचन्द्रसूरिजी से दीक्षा ली । दीक्षा नाप्त.गुरू महाराज.ने रलमञ्जरी रखा !- सं०१३२८ श्रावण कृष्णा १को लगभग:भीमपल्ली में श्रीजिन- "चन्द्ररि ने इन्हें "महत्तरा' पद से भूपितकर जद्धि-नामसे प्रसिद्धको । .. . .

दादा श्री जिनकुशलसूरि धार्मिक कार्यों में विपुल वित्त व्यय कर यश एवं महद् पुण्य उपार्जन किया । जिनमें से भीमपल्ली के मुकुटमणि साधुराज सामल के पुत्र वीरदेव, श्रीश्रीमाल साह बीजल के पुत्ररत्न राजसिंह, राजमान्य मन्त्रिदलीय देवगुरु भक्त परमार्हत ठक्कुर विजयसिंह, ठ० जेत्रसिंह, ठ0 : कुमरसिंह, ठ० यवनपाल, 30 पाल्हा आदि मन्त्रिदलीय समुदाय ने एवं साधुराज सुभट पुत्ररत्न सा० मोहन, मं० धन्नू, झांका आदि जालोर के श्रावक, सा० गुणधर आदि पत्तनीय, वीजापुरीय सा0 तिहुणादि, आशापल्लीय ठ0 पउमसिंह आदि, खंभात के गो० जैत्रसिंह 'आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इस शुभ अवसर पर मालारोपण, नन्दी-महोत्सव आदि भी हुए । तथा श्रीशांतिनाथजी के मन्दिर में अठाई-महोत्सव किया गया। इसी वर्ष में श्रीश्रीमाल देदा के पुत्र आना ने सूरिजी के 'उपदेश से 'नैषध काव्य' की ताडपत्रीय प्रति खरीदकी, जिसकी प्रशस्ति “जेसलमेर भांडागारीय ग्रन्थानां सूची" पृ० १४ में छप चुकी है। गच्छनायक पदप्राप्ति के अनन्तर सूरि महाराजने भीमपल्ली की ओर विहार किया। वहां पहुंचने पर वीरदेव श्रावक ने समारोह पूर्वक प्रवेशोत्सव किया। संघ का आग्रह और धर्मो- अति का लाभ जानकर प्रथम चातुर्मास वहीं किया। सं० “१३७८ माघ शुक्ला, ३ को भीमपल्ली के सेठ वीरदेव आदि दादा श्री जिनकुशलसूरि समुदाय ने पाटण के संघ के साथ दीक्षा, मालारोपण नन्दी महोत्सव आदि किये। स्वधर्मीवात्सल्य, संघपूजा आदि 'नाना प्रकार से धर्म प्रभावना हुई । उस महोत्सव में श्रीराजेंद्र- ‘चंद्राचार्यजी ने माला ग्रहण की । देवप्रभु मुनि को दीक्षा, हेम- भूपण वाचनाचार्य को 'उपाध्याय' पदव मुनिचन्द्र'-गणि को 'वाचनाचार्य पद दिया गया। इसी वर्ण प्रतिज्ञा प्रतिपालने में प्रवीण पूज्यश्री ने अपने ज्ञान ध्यान के बल से विवेकसमुद्रोपाध्याय का आयु-शेप निकट जानकर भीमपल्ली से वापस पाटण पधारे। वहां मिती ज्येष्ट कृष्णा १४ को स्वस्थ शरीर होनेपर भी विवेकसमुद्र उपाध्याय को चतुर्विध संघ के समक्ष मिथ्यादुष्कृत, क्षामणापूर्वक अनशन करा दिया। पंच परमेष्ठीमंत्र का ध्यान करते हुए आराधना 'पूर्वक ज्येष्ठ सुदि २ के दिन उपाध्यायजी स्वर्ग सिधारे । पाटण के संघ ने समारोह पूर्वक उनका स्वर्गोत्सव मनाया। अग्नि- संस्कार के स्थान पर संघ ने उनकी स्मृति में एक सुन्दर स्तूप वनवाया । सूरिजी ने उसे मिती आपाढ़ शुक्ला १३ के दिन वास- क्षेप देकर प्रतिष्ठित किया। संघ के आग्रह से सूरि महाराज का दूसरा चातुर्मास पाटण हुआ। १-१३४७ मिती ज्येष्ठ कृष्णा ७ के दिन भीमपल्ली मेंधी जिन- चन्द्रसूरिजी ने इन्हें दीक्षित किया। सं० १३६० आषाढ़ वदि ४ को इन्होंने दिवाकराचार्यजी आदि के साथ संघ सह आबूतार्थ की यात्रा की जिसका लणगवसही के एक लेख में उल्लेख है।

AmmuniMINATH १६ दादा श्री जिनकुशलसूरि सं० १३७६ मिती मार्गशीर्ष कृष्णा ५ को अनेक नगरों के महर्धिक श्रावकों की उपस्थिति में रोठ तेजपाल ने श्रीशांतिनाथ विधि-चैत्यमें जलयात्रा के साथ प्रतिष्ठामहोत्सव मनाया। इस दस दिन व्यापी उत्सव में पतन के बड़े बड़े सेठ साहुकार और समस्त राज्याधिकारी वर्ग भी सम्मिलित हुए थे। सेठ तेजपाल ने अपने भ्राता रुद्रपाल सह स्वधर्मीवात्सल्य, संघ-पूजा और दीन दुखियों को दान देने में विपुल धन व्यय किया। इसी दिन श्री शत्रुञ्जय पर्वतपर सेठ तेजपाल अदिपत्तनीय संघ की ओर से युगादिदेव प्रभु की मन्दिर की नींव डाली गई। इस कार्य में सा० नरसिंह के पुत्र खीवड़ का प्रयत्न विशेष उल्लेख योग्य था। श्रीजिनकुशलसूरिजी महाराज ने शिला, रत्न और १-श्री शीतलनाथजी के मन्दिर ( जेसलमेर ) में :स्थिरचन्द्र की वनवाई हुई श्री शांतिनाथजी की प्रतिमा सं० १३७४ मार्गशीर्ष वदी ५ की प्रतिष्ठित विद्यमान है । इसका लेख नाहरजी के "जैन लेख संग्रह' भाग ३ लेखांक २३८८ में छपा है। २-यह प्रतिमा तीर्थाधिराज श्री शत्रुञ्जय पर खरतरवसही में विद्यमान है, परिकरमें इस मूर्ति के ऊपर जिनमूर्ति व उभयपार्श्व में १२ आचार्यों की मूर्तियां हैं। इसका लेख इस प्रकार है :- सं० १३७४ वर्ष मार्ग बदि५ श्रीजिनेश्वरसूरि शिष्य श्रीजिनरल सरि मूर्तिः श्रीजिनचन्द्रसूरि शिष्यः श्रीजिनकुशलसूरिभिः प्रतिष्ठिता कारिता च खरतर सा० जाल्हण पुत्ररत तेजपाल रुद्रपाल श्रावकस्यु श्री समुदाय सहित । . .. ~ १ । - १७ दादा श्री जिनकुशलसूरि धातु-पित्तलमय श्रीशान्तिनाथादि जिनेश्वरों की १५० प्रतिमाएँ स्वकीय मूल समवसरण द्वय, श्रीजिनचन्द्रसूरि, श्रीजिनरत्नसूरि' आदि के साथ नाना अधिष्ठायकों की मूर्तियां प्रतिष्ठित की। इसी महोत्सवमें भीमपल्ली के सेठ वीरदेव, एवं श्रीपत्तनीय, भीमपल्लीय, आशापल्लीय श्रावकोंने संघपूजा, स्वधर्मीवात्सल्य किया। साधु सहजपाल के पुत्र स्थिरचंद्र, साह धीणा के पुत्र खेतसी आदि ने इन्द्रपदादि महोत्सव करके जैन शासन की अच्छी उन्नति की। इसके पश्चात् बीजापुर के संघ की अभ्यर्थना से श्रावक समुदाय के साथ श्री जिनकुशलसूरिजी महाराज वहां पधारे। संघ ने महोत्सव पूर्वक प्रवेश कराया। श्री वासुपूज्य भगवान के महातीर्थ की वन्दना की। फिर सूरि महाराज वीजापुर के श्रावकों के साथ त्रिशृङ्गम पधारे, साधुराज जेसल के पुत्र जगधर , सलखण ने असंख्य नर-नारी समूह के साथ चमत्कृति उत्पन्न करने वाला प्रवेशोत्सव किया। वहां से सूरिजी ने वीजापुर व त्रिशृङ्गम के संघ सहित पधार कर आरासण व तारंगा महातीर्थ की यात्रा की। मंत्रिदलीय ठक्कुर आस- पाल के पुत्र जगतसिंह आदि ने स्वधर्मीवात्सल्य, संघपूजा अवारित सत्र, ध्वजारोपणादि बहुत से उत्सव किये। यात्रा से लौटते हुए सूरिजी ने तृतीय चातुर्मास भी पाटण में किया । सं० १३८० के कार्तिक शुक्ला १४ को अपने पूर्वज मरुधर कल्पवृक्ष सेठ यशोधवल की भांति स्वधर्मीवात्सल्यादि १८ बादाश्री जिनामा करने वाले मंट तेजपाल, ने अपने लाभाना पार के साथ शत्रुजय नीयांधिराज बीग नव्य मन्दिर के मूलनायक, योग्य प्रापभदेव भगवान की कर भगान उज्ज्वल सताइन अंगुल की प्रतिमा नीजनालामा पनि महाराज के कर कमलों से करवाई इस प्रतिता महमद अवसरपर अनेक स्थानों के मंत्र को निमंत्रित किया गया था। जलयात्रा, पूजादि उत्सव के नाथ प्रतिष्ठा व भगधाम में हुई। साथ साथ जिनप्रबोधिनुरि, जिन पनगरि, कपनीयता, क्षेत्रपाल, अम्बिकादि की मूर्तियां, एवं भिन्न-भिन्न धायकोंकी बनवाई हुई बहुतसी प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा और शालय के मन्दिर के शिखर पर लगाने के लिये बजट की प्रतिष्ठा करवाई। साथ धीणा के पुत्र खेतसिंह आदि भावकों ने इंद्रपद युगादिदेव मुखोद्घाटन और मालाग्रहण आदि विविध धर्म- कार्यों में प्रचुर द्रव्य व्यय किया। मिती मार्गशीर्ष कृष्णा को मालागेपण. सन्यवन्य प्राण सामायक, परिग्रह प्रमाणादि ग्रहण का नन्दी महोत्सय व विस्तार से किया गया। २-~-बम्बई में एक भावना के पास अभी यह प्रतिमा है, न को नकल इस प्रकार है "संवत् २३८० श्री जिनकुशलमूरिभिः श्री अम्बिका प्रतिष्ठित" इसी सवत् को प्रतिष्ठित श्री आदिनाथ चतुर्विंशति प्रतिमा अभी बीकानेर के श्रीचिन्तामणिजी के मन्दिर में मलनायकजी रूप में विराजमान है। जिसका लेख हमारे 'बीकानेर जैन लेख संग्रह लेखांक २ में प्रकाशित है। , :

तीसरा प्रकरण , दिल्ली का यात्री संघ इधर दिल्ली निवासी श्रीमाल झातीय सेठ हरू के पुत्र सुश्रावक रयपति-जिन्होंने इतःपूर्व पलवद्धि महातीर्थ की बड़े विस्तार से यात्रा की थी-ने संग १३८० में दिल्लीपति सम्राट् गयासुद्दीन तुगलक के दरबार में प्रतिष्ठा प्राप्त अपने पुत्र धर्मसिंह के द्वारा 'प्रधानमन्त्री नेवसाहव की सहायता से एक शाही फरमान निकलवाया। उसका आशय यह था कि सेठ ‘रयपतिका संघ तीर्थयात्रा के हेतु जहाँ जहाँ जाय सभी प्रान्तीय सरकारें इसे आवश्यक सहाय्य दें। संघकी यात्रा में किसी तरह की विन्न बाधा न डाली जाय । फरमान पत्र प्राप्तकर सेठ रयपति ने शत्र ञ्जय गिरनारादि 'महातीर्थों की यात्रा करने के लिए पाटण में विराजित पूज्यश्री जिनकुशलसृरिजी के पास विज्ञप्ति लिखकर अपने आदमियों के साथ भेजी। सूरिजी ने अच्छी तरह से विचार कर तीर्थ- यात्रार्थ संघ निकालने का आदेश प्रदान किया। गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्तकर सेठ रयपति अति प्रसन्न हुए। अपने पुत्र 'महणसिंह, धर्मसिंह, शिवराज अभयचन्द्र व पौत्र भीष्म, भ्रातृ जवणपालादि परिवारके सहित गुरूमहाराज की उपदिष्ट 'विधि के अनुसार संघ की तैयारी करने लगे।

. प्रथम कृष्णा दादा श्री जिनकुशलसूरि सेठ रयपति ने दिल्ली के प्रधान श्रावक मन्त्रिदलीय साधु जवनपाल, देवगुरुभक्त श्री श्रीमाली सा० भोजा, सा० छीतम, ठ० फेरू., एवं धामइना वास्तव्य सा० रूपा, वीजादि, लूणीवड़ी निवासी पंचौली सा० क्षेमंधर आदि दूर और निकटवर्ती संघ को एकत्र कर दिल्ली से प्रयाण करने का बडा भारी उत्सव मनाया। अपने पुत्ररत्न सा० धर्मसिंह के प्रयत्नसे राजमार्ग से होते हुए बारह प्रकार के वाजित्रों से शाही सेना के साथ वैशाख ७ के दिन नवीन निर्मित देयालय को लेकर समस्त संघ ने दिल्ली से प्रस्थान किया। वह दृश्य बड़ा मनोहर था। सधवा स्त्रियां मंगल गीत गा रही थीं। रास खेले जा रहे थे दीन-दुःखियों को मुह मांगा दान दिया जाता था। भाट लोग और वन्दीगण उच्च स्वर से विरुदावली बोल रहे थे । दर्शकों की अपार भीड़ लगी हुई थी। यात्रा के प्रथम दिवस से ही सेठ रयपतिने अन्नक्षेत्र (दान शाला) खोल दिया था। दिल्ली से चलकर संघ कन्यानयन आया। वहां युगप्रधान श्रीजिनदत्तसूरिजी के कर-कमलों से प्रतिष्ठित श्री महावीरजी तीर्थ के दर्शन किए। वहां के श्रेष्ठी पूना, पद्म, राजा, रानू, ठ० देपाल, सा० काला; खारइ पूना, आदि समुदाय व आशिका के देदा आदि सुश्रावकों के साथ संघ आगे बढ़ा । स्थान स्थान पर पूजा प्रभावना करता हुआ यात्री संघ नरभट पहुंचा। वहां भी श्री जिनदत्तंसूरि महा- राज द्वारा प्रतिष्ठित सातिशय नवफणा पार्श्वनाथ भगवानकी . . दादा श्री जिनकुशलसूरि नाना भक्ति पूर्वक वन्दना की। वहां से साल भीमा, देवराज और खाटू से सा० गोपाल आदि, नवहा,झूझगू निवासी सा० कान्हा आदि विधि समुदाय भी संघ के साथ हो गया । नाना प्रकार से शासनोन्नति करता हुआ समस्त संघ फलौदी पहुंचा। भक्तिपूर्वक श्री पार्श्वनाथ भगवान की यात्रा की । सेठ रयपति द्वारा कुंकुमपत्रियों से पूर्व आमंत्रित सेठ हर- पाल पुत्र गोपाल, सा० पासवीर पुत्र नन्दन, सा० हेमल पुत्र फडुया, सा० पूर्णचन्दपुत्र हरिपाल, सा० पेथड़, बाहड़, लाखण सीवा, सामल, कीकट आदि उच्चनगरके श्रावक एवं देवराजपुर के सा० वस्तुपालादि, क्यासपुर के साह मोहण आदि, मरूकोट के शाह ताल्हणादि सिन्धु देस का संघ भी यहां आ पहुंचा। इसी प्रकार नागौर आदि सपादलक्ष देस के सा0 लखमसिंह आदि, मेड़ता के साह आंबादि, कोशवाण के मंत्री केल्हादि, नदी के प्रवाह के सदृश आकर उस विशाल संघ रत्नाकर में सम्मिलित हो गये। वहां से समस्त संघ गुड़हा के साह मेलू आदि को लेकर जालोर पहुंचा । वहां के संघ ने राजकीय अधिकारियों के साथ संघ का स्वागत किया। यात्री संघ ने समस्त जिनालयों में दर्शन कर चैत्यपरिपाटी की। वहां के श्रावक महिराज, कोरंटक के साह गांगा आदि अनेक नर-नारी संघ के साथ ही चले। समस्त संघ श्री श्रीमालनगर में शान्तिनाथ और. भीमपल्ली व वायड़में महावीर प्रभु की यात्रा कर ज्येष्ठ दादा श्री जिनकुशलसूरि कृष्णा १४ को गुजरात देश की राजधानी पाटण नगर में पहुंचा । उस समय वह नगर मुसलमान व्यापारियों से भरा हुआ था। पाटण में स्थावर तीर्थ श्री शांतिनाथ भगवान और जंगम तीर्थ श्री जिनकुशलसूरिजी के चरणारविन्दों में साह रयपति, साह महणसिंह आदि समस्त संघ ने भक्तिपूर्वक वन्दना की। शांतिनाथ भगवान के मन्दिर में अष्टान्हिका महोत्सव मनाया गया। पाटणके समस्त जिनालयों की विधिवत् चैत्य-परिपार्टी की गई। संघपति सेठ रयपति, महणसिंह, श्रे गोपाल, जवणपाल, काला, हरिपाल, आदि देशान्तरीय श्रावकों व स्थानीय सेठ तेजपाल, व संघ के पृष्ठरक्षक राजसिंह, श्रीपति पुत्र कुलचंद्र, वीणा पुत्र गोसल आदि पाटण और हमीरपुर के श्रावक समु- दाय ने सूरिजी से संघ के साथ यात्रार्थ पधारने के लिये सानु- रोध प्रार्थना की “वर्षाकाल सन्निकट है, संघ के मंगल के लिए आप शीघ्र ही पधारिये ! ताकि हम सब लोगों की तीर्थ यात्रा की भावना सफलीभूत हो!” संघ की प्रबल प्रार्थना के कारण सूरिजी ने मिती ज्येष्ठ शुक्ला के दिन शुभ मुहुर्त में गुरूदेव श्री जिनचन्द्रसूरिजी का ध्यान करते हुए १७ साधु एवं जयदि महत्तरा, पुण्यसुन्दरी गणिनी आदि१६ साध्वियों सहित गिरिराज की यात्रार्थ संघ के साथ विहार किया। इस चतुर्विध संघ सेना के सेनापति सेठ रयपति पृष्टरक्षक दादा श्री जिनकुंशलसूरि सेठ राजसिंह, प्रबल योद्धा महणसिंह,जवणपाल,भोजा, काला. ठ०फरू ठन्देपाल अंगोपाल, तेजपाल,हरिपाल, मोहण आदि महर्दिक श्रावक थे। संघ के साथ पाँचसौ गाड़े सैकड़ों घोड़े और अगणित प्यादे थे। स्थान-स्थान पर धर्म प्रभावना करते हुए श्री संखेश्वरजी पहुंचे। वहां पुरिसादानीय श्रीपार्श्व- नाथ प्रभुकी यात्रा महापूजा, ध्वजारोपणादि करके मुसलमान सूबेदारों के सहाय्य व अधिष्ठायक देव के सानिध्य से समस्त यात्री दण्डकारण्यवत् दुर्गम वालाक देश को पार करके संघ गिरिराज श्री शशुञ्जय की तलहट्टिका में पहुंचा । यहां श्री पार्श्वनाथ प्रभु की समारोहपूर्णक यात्रा, पूजा करके मिती आपाढ कृष्णा को ममस्त संघ परम पुनीत गिरिराज .पर चढ़ा। तीर्थपति श्रीआदिनाथ स्वामी के दर्शन कर भव्यों ने. जन्म जन्मान्तर के मिथ्यात्व को दूर कर परम आनन्द प्राप्त किया। मुरिजी महाराज ने प्रभु के समक्ष नवीन स्तोगों का निर्माण कर स्तुति की। सेठ रयपति ने सर्व प्रणाम अपने परिवार के साथ प्रभु के,नवाङ्गों की म्वर्णमुद्रा से पूजा की । अन्य महर्दिक श्रावकों ने भी रुपयों से यथाशक्ति पूजा की। सूरिजी ने उसी दिन युगादिदेव के समक्ष यशोभद्र, देवभद्र नामक भटकों को दीक्षा दी। संघपति रयपति ने मौराष्ट्र नरेश महीपालदेव की दूसरी नेह के महश सेठ मोबदेय. उनके छोटे भाई और श्रीश्रीमाल २४ दादा श्री जिनक्शलसूरि छज्जल कुलप्रदीप राजसिंह ने नाना प्रकार के समारोह से संघ-पूजा, स्वधर्मीवात्सल्यादि करके पुण्योपार्जन किया। मिती आपाढ वदी ७ को जलयात्रा करके आषाढ़ वदि ८ के दिन युगादिदेव के मूल चैत्य में स्वनिर्मापित नेमिनाथजी आदि की प्रतिमाएँ' स्वभण्डार योग्य समौशरण, जिन- पतिसूरि, जिनेश्वरसूरि प्रभृति गुरू-मूर्तिए आदि की प्रति- ष्ठाएं बड़े भारी महोत्सव पूर्वक श्रीजिनकुशलसूरिजी के कर कमलों से हुई ; उसी दिन सेठ तेजपाल ने अपने भ्राता रुद्रपाल के साथ पाटण में पूर्व प्रतिष्ठित युगादिदेव के विम्ब को संघ सहित अपने वनवाए हुए नवीन प्रासाद में स्थापित कराया। प्रासाद की प्रतिष्ठा भी सूरिजी ने की। शिल्पियों को स्वर्ण मय हस्तसंकलिका, कविका और रेशमी वस्त्रादि देकर सतुष्ट किया। आपाढ बदि ६ के दिन मूल मन्दिर में मालारोपन, सम्यक्त्व ग्रहणः परिग्रह प्रमाण, सामायकादि व्रत धारण का संवत् १३८० आषाड़ वदि ८ श्री शत्रुजय श्री मुनिसुव्रत स्वामी- विवं श्रीजिनचन्द्रसूरि शिष्यैः श्रीजिनकुशलसूरिभिः प्रतिष्ठितं कारितं पद्यान० रासल न० राजपाल पुत्र न० नागड न० नेमिचन्द्र न० दुसत श्री परिवार परिवृतैः स्वकुटुम्बकः शुभंभवतु (खरतरवसही शत्रुजय ) ।

दादा श्री जिनकुशलसूरि २५ नन्दीमहोत्सव हुआ। पूज्य श्री ने इसी दिन सुसकीर्ति गणि' को वाचनाचार्य पद दिया। सहस्रों श्रावक श्राविकाओं ने व्रतादि ग्रहण किये, नवनिर्मित प्रासाद पर. ध्वजादण्ड चढ़ाया गया। सेठ रयपति व तेजपाल आदि ने अपने मंदिर व मूलमंदिर में समारोह पूर्वक पूजाएं पढवाई। याचकों को प्रचुर दान देकर संतुष्ट किया। इस प्रकार शत्रु अय पर दस दिन पयंत बड़ा भारी समा- रोह रहा। इस महोत्सवमें उच्चानगर के रोहडहेमल के पुत्र- रत्न सा० कडुआ सुश्रावक ने भ्रातुप्पुत्र हरिपाल के साथ २६७४) द्रमकी चोली देकर इन्द्रपद ग्रहण किया। धीणा के पुत्र गोसल ने ६००) द्रम (तत्कालीन मुद्रा) देकर मंत्रिपद लिया एवं अन्यान्य श्रावकों ने भी इन्द्र परिवार योग्य भिन्न भिन्नपदग्रहण किये । इससे श्रीसिद्वाचलजीके भंडारमें ५००००) रुपयों की आमदनी हुई । 'सब लोगों ने वापिस तलहट्टी में आकर संघ सहित गिरनारजी की ओर प्रस्थान कर दिया । वहां से क्रमशः प्रयाण करता हुआ यात्री संघ खंगारगढ पहुंचा। वहां के अधिपति, राज्याधिकारी और नगर के लोगों ने संघ के सामने जाकर उसे सत्कृत किया। रात भर वहां रहकर प्रातःकाल खंगारगढ़ में चैत्यपरिपाटी की। आपाढ़ शुक्ला १४ को रैवताचल पर आवाल ब्रह्मचारी श्री नेमिनाथ १-इनकी दीक्षा सं० १३४२ मिती वैशाख शुक्ला १० के दिन जालौर में श्री जिनचन्द्रसूरिजी के कर-कमलों से हुई थी।

चौथा प्रकरण भीमपल्ली का संघ पाटण में चातुर्मास के अनंतर सं० १३८१ वैशाख कृष्णा ५ के दिन शांतिनाथ भगवान के विधिचंत्य में श्री जिनकुशलसूरिजी के करकमलों से विराट् प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न हुआ। उसमें योगिनीपुर के श्री श्रीमाल रुद्रपाल, नीवा, जावालिपुर के मंत्री भोजराज केपुत्र सलखण- सिंह रंगाचार्य लखणा, साचोर के मंत्री मलयसिंह, भीमपल्ली के वीरदेव, खम्भात के व्य० छाड़ा, श्री घोघा व वेलाकुल के सा० देपाल, मं०कुमर, सा० खीमड़, आदि श्रावक समूह आये थे। पन्द्रह दिन पर्यन्त धार्मिक कार्यों की बड़ी भारी धूम रही । चतुर्थी के दिन सेठ तेजपाल, रुद्रपाल, श्री श्रीमाल साह आना, राजसिंह, भण) लूणा, सा० क्षेमसिंह, देवराज भण० पद्म, मन्ना आदि समस्त पत्तनीय संघ ने जलयात्रा पूर्वक प्रतिष्ठा महोत्सव किया । प्रतिष्ठा के समय सूरिजी ने जालोरके लिये महावीर बिंव, देवराजपुर के लिए आदिनाथा बिम्ब, शत्रु ञ्जय के वूल्हावसही के जीर्णोद्धारार्थ सा० छज्जल पुत्र राजसिंह और मोखदेव कारित श्रेयांसनाथादि बिम्ब भण० लूणा कारित शत्रुञ्जय के निजी , दादा श्री जिनकुशलसूरि २६ अष्टापद प्रासाद के लिए चतुर्विशति जिन विम्ब आदि २५० पापाण और पित्तल की अगणित मूर्तियां, उच्चापुर के लिए श्री जिनदत्तसूरि, जालौर और पाटण के लिये श्री जिनप्रबोध- सूरि', देवराजपुर के योग्य श्रीजिनचन्द्रसूरि और अम्बिका, अधिष्ठायकादि मूर्तिएँ, और स्वभंडार योग्य समौसरण की भी प्रतिष्ठा की। वैशाख कृष्णा ६ के दिन अतग्रहण, मालारोपण नन्दी- ' महोत्सव आदि अतिशय विस्तार से किये गए । देवभद्र, यशो- भद्र को बड़ी दीक्षा व सुमतिसार, उदयसार, जयसार नामक शल्लकों एवं धर्मसुन्दरी, चारित्रसुन्दरी, नामक झुल्लिकाओं को दीक्षा दी जयधर्म गणि को उपाध्याय पढ़ से अलंकृत किया गया । बहुतसी साध्वियां व श्राविकाओं ने माला ग्रहण की। बहुतों ने द्वादश व्रत ग्रहण किये। भीमपल्ली के सुप्रसिद्ध श्रावक वीरदेव आदि की विज्ञप्ति से सूरिजी पाटण से विहार कर भीमपल्ली पधारे। वीरदेव कारित प्रवेशोत्सवपूर्वक मितीवैशाख वदि १३ के दिन वहां के १-यह मूर्ति अभी देवलवाड़ा में है, इसका लेख नाहरजी के लेखांक ११८८ में छपा है। कराने वाले का नाम मेहा श्रावक है। २-यह मूर्ति बीकानेर के श्री महावीर जी ( वेदों में ) के मंदिर में है । इसपर निम्नोक्त लेख खुदा हुआ है :- "सं० १३८१ वैशाख वदि ५ श्री जिनचन्द्रसूरि शिष्यः श्री जिन- कुगलसूरिमिरविका प्रतिष्ठितम्।" [वीकानेर जैनलेखसंग्रह ले०१३१२].

३० दादा श्री जिनकुशलमूरि जिनालय में श्री महावीर स्वामी के दर्शन किये। सूरिजी के. पधारने से धर्म ध्यान का ठाट लग गया। मुश्रावक वीरदेव ने सा० मालदेव व सा० हुलमसिंह नामक अपने भ्राताओं के साथ सम्राट गयासुद्दीन से शत्रु ञ्जय यात्रा के निमित्त फरमान प्राप्त कर कुंकुमपत्रिकाओं द्वारा देश विदेश के समस्त संघ को आमंत्रित किया। श्रावक वीरदेव अपने उज्ज्वल कर्तव्यों से सेठ खींवड़ सा० अभयचन्द, सा० साढल, सा० धनपाल सा० सामल आदि अपने पूर्वजों से भी आगे बढ़ा हुआ था। संघ के एकत्र होने पर ज्येष्ठ कृष्णा ५ के शुभ मुहुल में वीरदेवको संघ सेना के परिचालनार्थ सूरिजी ने संघपति पद प्रदान किया। राजदेव के पुत्र झांझा को सा० पूर्णपाल, सा० सूटा नामक भाइयों के साथ संघ का पृष्टरक्षक नियुक्त किया। सूरि महाराज पुण्यकीर्ति, सुखकीर्ति आदि १२ साधु प्र० पुण्य- सुन्दरी आदि साबिओं के साथ वीरदेव कारित देवालय में चतुर्विशति जिनपट्टक स्थापित कर संघ के साथ चले। यद्यपि “चातुर्मास सन्निकट था । किन्तु सूरिजी संघकी प्रबलप्रार्थना को अस्वीकृत न कर सके क्यों कि संघ तीर्थङ्करों के भी आदर- ‘णीय है। संघ के साथ ३०० गाडे और अनेक ऊँट घोड़े, रथ आदि वाहन तथा असंख्य पैदल यात्री थे। बड़े समारोह के साथ भीमपल्ली से प्रयाण करके दो दो दिन रह कर बायड़ नगर में महावीर प्रभु और सैरिसा में पार्श्वनाथ स्वामी के तीर्थ में महाध्वजारोपपूर्णक यात्रा की । अवारित सत्र दादा श्री जिनकुशलसूरि खोला। इसके बाद सरखेज नगर में पधारे देवालय आदि का प्रवेशोत्सव बड़े भारी समारोह के साथ हुआ। वहां से 'निकटवर्ती आसापल्ली के श्रावक महणपाल, मण्डलीक, वैजल आदि विधि समुदाय के आग्रह से सूरि महाराज संघ सहित आसापल्ली पधारे। संघ ने बड़े समारोह से आदिनाथ स्वामी की यात्रा कर मालारोपण महोत्सव किया। वहां से स्थान स्थान में धर्म प्रभावना करता हुआ संघ खंभात पहुंचा। सेठ वीरदेव ने सब नगर निवासी लोगों को एकत्र कर सूरिजी का प्रवेशोत्सव वर्णनानीत समारोह के साथ किया। हिन्दू राज्य में जिस प्रकार सुप्रसिद्ध मंत्रीश्वर वस्तु- पाल ने (सं० १२८६ में ) श्री जिनेश्वरसूरिजी महाराज का और यवन राज्य में सेठ जेसल२ ( १३६४ व १३६७ में ) ने 'जिनचन्द्रसूरिजी का नगर प्रवेशोत्सव किया था उसी प्रकार यह 'प्रवेशोत्सन भी हिन्दू राजत्वकाल के समान बड़े भारी धूमधाम से हुआ था। सूरिजी ने संघ के साथ नवाङ्गी-वृत्तिकारक श्री अभयदेव सूरिजी द्वारा प्रगट किए हुए भगवान पार्श्वनाथ और अजित- नाथ स्वामी की नव्य निर्मित स्तुति, स्तोत्रों द्वारा भक्तिपूर्वक यात्रा की। इसके पश्चात् निरन्तर ८ दिन तक सेठ वीरदेव ५-इन्होंने खम्भातके कोट्टड़िका पाड़े में श्रीअजितनाय भगवानका विधि-चत्य और पोपधशाला वनवाई थी। श्री अजितनाथ जिनालय का लेख "प्राचीन जैन लेख संग्रह दूसरे भाग' में छपा है। .

पुत्र दो ३२ दादा श्री जिनकुशलसूरि आदि महद्धिक श्रावको ने खंभात के संघ के साथ महाध्वजा- रोपण, महापूजा, अवारित सत्र, संघवात्सल्य, और इन्द्र- महोत्सव में प्रचुर द्रव्य व्यय किया । कडुआ के खामराज के अनुज दो० सामल ने बारह सौ दम १२००) भेंट करके इन्द्रपद ग्रहण किया, अन्यान्य भावकों ने मन्त्री आदि पद ग्रहण किए। खभात की यात्रा कर समस्त संघ तीर्था- धिराज श्री सिद्धाचलजी की ओर चला। उस समय देश में जगह जगह राजविग्रह उपस्थित था। भय के मारे जहां तहां नगर ग्राम शून्य हो रहे थे, तथापि गुरुदेव की कृपा से आनन्दपूर्वक चलता हुआ संघ क्रमशः धांका नगर पहुंचा। वहां के प्रधान श्रावक मंत्रीदलीय ठ० उदयकरण ने संघ की बहुतसी भक्ति की। यहां से क्रमशः गिरिराज श्री विमलाचल की तलहट्टी में पहुंचा। सूरिजी ने संघ के साथ गिरिराज पर श्री ऋपभदेव भगवान की द्वितीय वार यात्रा की। अपने बनाये हुए भक्तिरस पूर्ण सुन्दर स्तोत्रों से प्रभुकी स्तुति की । संघपति वीरदेव, पृष्ठरक्षक सेठ तेजपाल, नेमचन्द, दिल्ली निवासी श्रीश्रीमालरुद्रपाल, सा० नीमदेव, मन्त्रिदलीय, ठ० जवणपाल, सा० लखमा, जालौर के सा पूर्णचन्द्र, सहजा, गुडहा के सा० वाधू आदि महर्द्धिक श्रावकों ने १० दिन पर्यन्त गिरिराज पर महाधवजारोपण, बड़ीपूजा, अवारित सत्र, स्वधर्मीवात्सल्य, संघपूजा, इन्द्रपद महोत्सव आदि किये। याचकों को वस्त्रालङ्कार वितरण किये गये। जैन शासन की महती प्रभावना हुई। ।

दादा श्री जिनकुशलसूरि सा० लोहट के पुत्ररत्न सा० लखमा श्रावक ने ३७००) रुपये समर्पण कर इन्द्रपद ग्रहण किया। दिल्ली के श्री श्रीमाल सुरराज पुत्र रुद्रपाल के छोटे भाई नीमदेव ने १२००) द्रम से मन्त्रिपद और शेप महद्धिक श्रावकों ने अन्यान्य पद ग्रहण किये । सव मिलाकर संघ द्वारा युगादिदेव के भंडार में १५०००) रूपयों की आमदनी हुई। श्री आदिनाथभगवानके विधिचैत्य में नव-निर्मित चौवीस जिनालय, देवकुलिकाओं पर पूज्यश्री द्वारा प्रतिष्ठित कलश ध्वजादि चढ़ाये गये। तत्पश्चात् समस्त संघ सहित सूरि महाराज तलहट्टी में पधारे । वहां से लौटते हुए पुनः सेरिसा में श्री पार्श्वनाथ स्वामी की यात्रा कर संखेश्वर आए, वहां चार दिन तक अवारित सत्र, महापूजा, ध्वजारोपणादि उत्सव हुए। पाडल ग्राम में आकर श्री नेमीश्वर भगवान को संघ सहित वन्दन किया। सूरिजी ने नवीन स्तोत्र रचकर प्रभु के गुणानु- वाद गाये। वहां से क्रमशः विहार करते हुए श्रावण शुक्ला ११ को संघपति वीरदेव द्वारा किये हुए प्रवेशोत्सव पूर्वक भीमपल्ली पधार कर श्री महावीर स्वामी के दर्शन किये। देशान्तरीय समस्त संघ संघपति द्वारा सम्मानित होकर अपने-अपने स्थान को लौटा। सं० १३८२ मिती वैशाख सुदि ५को सेठ वीरदेव ने दीक्षा, मालारोपणादि के नन्दी महोत्सव किये । सूरिजी ने विनयप्रभ, मतिप्रभ, हरिप्रभ, सोमप्रभ और कमलश्री, ललितश्री को दादा थी जिनकुशलसूरि . दीक्षा दी; बहुतसी साध्वियाँ और श्राविकाओं ने माला ग्रहण की। अनेक श्रावकों ने सम्यक्त्व, सामायिक, परिग्रह प्रमो- णादि व्रत ग्रहण किये। इस महोत्सव में स्थानीय, पत्तन, प्रल्हादनपुर, वीजापुर, आशापल्ली आदि के श्रावक एकत्र हुए थे। तीन दिन तक अमारि उद्घोषणा की गई थी। श्री जिनकुशलसूरिजी के नेतृत्व में यह समारोह हिन्दू राज्जकाल की भांति बड़ा ही चित्त-चमत्कृति उत्पन्न करने वाला हुआ था। - सूरि महाराज साचौर के संघ की वीनति से विहार कर वहां पधारे। श्री संघ ने समारोहपूर्वक प्रवेशोत्सव करके श्री महावीर भगवान के दर्शन कराये। वहां पर मासकल्प करके लाटहद पधारे, वहां भी स्वागतपूर्वक श्रीमहावीर भगवान की वन्दना की। पन्द्रह दिन तक धर्म प्रचार द्वारा शासन प्रभा- वना करके वहां से विहार किया। क्रमशः बाहड़मेर पधारे । आदिनाथ प्रभु के दर्शन किये। संघ के विशेष आग्रह से चातुर्मास भी वहीं किया और "चैत्यवन्दन-कुलक-वृत्ति" नामक ग्रन्थ की रचना की। सं० १३८३ पौष शुक्ला १५ को सा० प्रतापसिंह आदि स्थानीय श्रावकों के आग्रह से जेसलमेर, लाटह्रद, सत्यपुर, प्रल्हादनपुर आदि के श्रावकों के समक्ष अमारि घोषणापूर्वक उपस्थापन (बड़ी दीक्षा), मालारोपण, सम्यक्त्व प्रभृति ब्रत ग्रहण नन्दीमहोत्सव आदि सम्पन्न किए। इसी वर्ष जालौर दादा श्री जिनकुशलसूरि के संघ की आग्रह भरी वीनति से सूरिजी वाहड़मेरु से विहार कर लवणखेटक पहुंचे। वहां सूरिजी के पूर्वज वाहित्रिक उद्धरण ने शांतिनाथ जिनालय बनवाया था और इनके गुरू श्रीजिन- चन्द्रसूरिजी का जन्म और दीक्षा भी वहीं हुई थी। यहां से अपनी जन्मभूमि सम्यानयन में पधार कर प्रवेशोत्सव पूर्वक श्री शांतिनाथ भगवान के दर्शन किये। लवणखेटक और समियाना के श्रावकों को संतुष्ट करके जालौर पधारे । संघ के प्रवेशोत्सव पूर्वक स्त्र प्रतिष्ठित श्रीमहावीर भगवान को वन्दना की। वहां मंत्रीश्वर कुलधर के वंशप्रदीप मं० भोजराज पुत्र सलखणसिंह, सा० चाहड़ पुत्र झांमण आदि स्थानीय संघ की ओर से श्रेष्ठी हरपालपुत्र गोपाल आदि उच्चपुर और देवराजपुर, के संघ, पाटण के सेठ तेजपाल, रुद्रपाल आदि, जेसलमेर, समियाणा, श्रीमाल, साचौर, गुढहा आदि अनेक स्थानों के संघ के समक्ष पन्द्रह दिन पर्यन्त दीक्षार्थियों को सत्कृत किया. अनेक श्रावकों ने नाना प्रकार के दान किए, अमारि घोपणादि द्वारा शासन-प्रभावना करते हुए सं० १३८३ फाल्गुन चदिह को सूरिजी के नेतृत्व में विराट महोत्सव पूर्वक प्रतिष्ठा व्रतग्रहण, उपस्थापन, मालारोपण, सम्यक्त्वारोपादि नन्दी उत्सव मनाये गए। इस अवसर पर श्री जिनकुशलसूरिजी ने मंत्रीदलीय . प्रतापसिंह के पुत्ररत्न ठ० अचलसिंह कारित राजगृहस्थ भार- गिरि के चतुर्विशति जिनालय के मूलनायक योग्य श्री महावीर गया।

दादा श्री जिनकुशलसूरि । स्वामी आदि अनेक पाषाण और धातुमय' विम्ब, गुरुमूर्तियां और अधिष्ठायकों की प्रतिष्ठा की। न्यायकीर्ति, ललितकीर्ति, सोमकीर्तिः, अमरकीर्ति, ज्ञानकीर्ति, देवकीर्ति आदि ६ साधुओं को दीक्षा दी। अनेकों श्राविकाओं ने मालाग्रहण की, बहुतों ने सम्यक्त वादि १२ व्रत ग्रहण किए। -बीकानेर के श्री सुपार्श्वनाथजी के मन्दिर में श्री पार्श्वनाथ प्रभु की एक धातुमूर्ति विद्यमान है, जिसपर यह लेख है । "सं० १३८३ वर्षे फाल्गुन वदि नवमी दिने सोमै श्री जिनचन्द्रसूरि शिष्य श्री जिनकुशलसूरिभिः श्री पार्श्वनाथ विवं प्रतिष्ठितं कारित दो० राजा पुत्रेण दो० अरिसिंहेन स्वमातृ पितृ श्रेयोर्थ ।।" (बीकानेर जैन लेख संग्रह लेखांक १७६७ ) २ आगरे वाली प्रति में इनका यमकमय पार्श्व स्त० गा० १६ आदि अभिनव स्तवनं जिन पावनं ) उपलब्ध है।

पांचवां प्रकरण
सिन्धु देश में धर्म प्रचार
श्रीजिनकुशलसूरिजी का लोकोत्तर प्रभाव दिनों दिन
बढ़ने लगा। उनकी धवलकीर्ति सर्वत्र व्याप्त हो
गई। सिन्धु देश में उस समय मिथ्यात्व का प्रचार बहुत
प्रवलता से था । उसे उन्मूलन कर सन्मार्ग प्रवर्तन में सूरिजी
को समर्थ जानकर उच्चानगर और देवराजपुर के महर्द्धिक
श्रावकों ने सिन्ध प्रान्त में पधारने के लिये उनसे सानुरोध
प्रार्थना की। पूज्यश्री ने भी भावी शासन प्रभावना विदितकर
जालौर से चैत्र कृष्ण में विहार कर दिया। शम्यानयन और
खेड़नगर होते हुए मरुस्थल के प्रमुख जेसलमेर महादुर्ग में
पधारे। यहां के विधि-समुदाय ने बड़े भारी समारोह से
प्रवेशोत्सव कराया ! सूरिजी ने स्वहस्त प्रतिष्ठित सप्रभाव श्री
पार्श्व प्रभु के चरण-कमल वन्दन किये। पन्दह दिन तक
विराजने से यहां भी अच्छी धम्मोन्नति हुई।
उच्चानगर और देवराजपुर के श्रावकों ने पुनः सूरिजी से
शीन पधारने की वीनति की। तब उनके अनुरोध से ग्रीष्मऋतु
की कड़ी धूप में भी मरुस्थल के रेतीले महासमुद्र को पत्तन के

३८ दादा श्री जिनकुशलसूरि राजमार्ग की तरह पार कर इर्यासमिति आदि समितियों का पोलन करते हुए देवराजपुर पहुंचे। वहां स्वहस्त प्रतिष्ठित श्री ऋषभदेव भगवान को सविधि वन्दन किया। वहां मास- कल्प करके सद्धर्म का प्रशंसनीय प्रचार करके मिथ्यात्व को दूर भगा दिया। आपका सदुपदेश ग्रहण करने के लिए श्रावकवर्ग सदा लालायित रहते थे। अपने मनोरथ को पूर्ण हुआ देखकर उन लोगों के हर्ष का कोई पार न रहा, धार्मिक कार्यों में मनो- योग देकर खूब लाभ लिया। तत्पश्चात् सूरिजी उच्चनगर पधारे । आपके शुभागमन से नागरिक लोग अति प्रसन्न हुए नगर प्रवेश बड़े धूमधास से हुआ । उसमें हिन्दू मुसलमान सभी लोग शामिल हुए थे। बारह प्रकार वाजिन वजने लगे, महर्द्धिक श्रावक याचकों को खूब दान देते थे। पूर्वकाल में हिन्दूशासन में श्रीजिनपतिसूरिजी के पधारने से पावन हुई इस नगरी में सूरिजी ने चौवीसी-पट्टालङ्कार श्रीऋषभदेव भगवान के दर्शन किये। आपश्री के उपदेशों का यहां की जनता ने भरपूर लाभ उठाया। अनेकों मिथ्यात्व प्रवृत्तियें निर्मूल हो गई। यहां एक मास तक धर्म प्रचार कर सूरि महाराज पुनः देवराजपुर पधारे। संवत् १३८४ के माघ शु० ५को श्रेष्ठि गोपाल पुत्र नरपाल, साध्वयरसिंह नन्दन मोखदेव, लाखण, आंबा, कडुया, हरिपाल, वीकिल, चाहड़ आदि अनेक उच्चकीय महर्द्धिकश्रावकों एवं देवराजपुर, क्यासपुर, बह- रामपुर, मलिकपुर आदि अनेक स्थानों के श्रावक, राणक, दादा श्री जिनकुशलसूरि ३६ राजलोक, नगरलोक के प्रबल अनुरोध से अनेक लब्धिसम्पन्न श्री जिनकुशलसूरिजी ने प्रतिष्ठा व्रतग्रहण, मालारोपण, नन्दी- महोत्सव आदि बड़े विस्तार से सम्पन्न किये। इस महोत्सव में राणुककोट व क्यासपुर के विधिचैत्य के मूलनायक योग्य युगादि विम्बद्वय और अनेक पापाण एवं पित्तलमय मूर्तियों की प्रतिष्ठा की गई। भावमूर्ति, मोदमूर्ति, उदयमूर्ति, विजयमूर्ति, हेममूर्ति, भद्रमूर्ति, मेघमूर्ति, पद्ममूर्ति, हर्पमूर्ति आदि ह साधु और कुलधर्मा, विनयधर्मा और शीलधर्मा नामक तीन साध्विओं की दीक्षा हुई। ७७ श्रावि- काओं ने माला ग्रहण की, अनेकों ने परिग्रह परिमाण व्रत लिये । सिन्धु देश के श्रावकों में सूरिजी की कृपा से जागृति की नई लहर उत्पन्न हो गई। संवत् १३८५ में उच्चापुर, बहिरामपुर, क्यासपुर आदि स्थानों के खरतर विधि समुदाय की विद्यमानता में फाल्गुन शुक्ला ४ के दिन श्री जिनकुशलसूरिजी महाराज ने नवदीक्षित क्षुल्लक व क्षु ल्लिकाओं की उपस्थापना की। श्री कमलाकर गणि को वाचनाचार्य पद दिया गया। २० श्राविकाओं ने माला १- इनमें से एक धातु-मूर्ति बीकानेर के श्री चिन्तामणिजी के मन्दिरस्थ गर्भगृह में विद्यमान है, जिसपर इस प्रकार का लेख है :- "सं० १३८४ माघ शुक्ला ५श्री जिनकुशलसूरिभिः श्री आदिनाथ विव प्रतिष्ठितं कारितं च सा० सोमण पुत्र सा० लाखण श्रावकेन भ्रातृ हरिपाल युतेन । (बीकानेर जैन लेख संग्रह ले० २४)

४०
दादा श्री जिनकुशलसूरि
ग्रहण की, बहुतोंने परिग्रह परिमाण आदिव्रत उच्चारण किए।
सं० १३८६ में वहिरामपुर के खरतर गच्छीय संघ के विशेष
अनुरोध से सूरिजी अपनी शिष्य-मण्डली के साथ विहार करते
हुए बहिरामपुर पधारे। सा० भीमा, देदा, धीर, रूपादि
स्थानीय श्रावकों ने विस्तारपूर्वक प्रवेशोत्सव किया । सूरिजी
ने वहाँ श्री पार्श्वनाथ स्वामी के जिनालय में प्रभु के दर्शन
किए। पूज्यश्री को वन्दनार्थ आये हुए नाना स्थान के संघों
की बहिरामपुर के विधि-संघ और कंवले ( उपकेशगच्छीय)
श्रावक ने भक्ति की।
क्यासपुर के खरतर गच्छीय संघ के प्रवल आग्रह से सूरि
महाराज बहिरामपुर से विहार कर क्यासपुर की ओर पधारे।
मार्गवती शिलारवाहण में वहां के साधीणग, जेठू, वेला, और
महाधर आदि श्रावक अपने मुसलमान अधिपति को लेकर
सूरिजी के सन्मुख आए। वाजिब ध्वनि के साथ वहिरामपुर
की भांति धूम-धाम से प्रवेश कराया। यहां पर सूरिजी ६
दिन विराजे, इन ६ दिनों में यहां लगातार स्वधर्मीवात्सल्य,
अवारित सत्र व संघयूजादि पुण्यकार्य बड़ी उत्तमता से होते
रहे । इसके पश्चात् विहार कर सूरिजी मध्यवर्ती खोजावाहन
स्थान में पहुंचे। वहां के श्रावकों ने भी समारोहपूर्वक प्रवेशो-
त्सव कराया। यहां से क्यासपुर पधारे । स्थानीय श्रेष्ठी मोहण,
कुमरसिंह, व्य० खीमसिंह, नाथू जट्टड़ आदि श्रावक
समुदायने अपने मुसलमान अधिपति नवाबके तुर्को एठां सा०
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दादा थी जिनकुशलसूरि ४१ चाचिंग आदि कोमल (उपकेशगच्छीय) श्रावकों के साथ श्री जिनकुशलसूरिजी का प्रवेशोत्सव अजमेरमें जिस प्रकार अंतिम हिन्दू-सम्राट् पृथ्वीराज ने सं० १२३६ में श्रीजिनपतिसूरिजीका किया था, उसी प्रकार अभूतपूर्ण रीति से किया। सूरिजी ने स्वहस्त प्रतिष्ठित श्री ऋपभदेव भगवान के पादारविन्दों में 'वन्दना की। इस प्रवेशोत्सव का नगरजनों पर बहुत गहरा 'प्रभाव पड़ा। वे लोग सूरिजी के चारित्र पालन एवं विद्वतादि गुणों की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। अनेकों कंवलागच्छ केश्रावक और विपक्षी लोग भी सूरिजी के उत्तम चारित्र और ज्ञान-ध्यान से प्रभावित होकर आपश्री के परम भक्त हो गए। कौतुहलवश कितने ही तुर्क लोग आपके पास आते थे, वे भी आपकी वचनचातुरी और विद्वता से मुग्ध हो जाते। 'श्रावक लोग नित्यनये-नये पक्वानों द्वारा स्वधर्मीवात्सल्यादि किया करते थे। धर्म-ध्यान, तपश्चर्या का खूब ठाठ रहा। चातुर्मास निकट आने पर वहां से विहार करते हुए पुनः देवराजपुर जाकर स्वागत-पूर्वक युगादि भगवान के दर्शन किये । सं०१३८६ का चातुर्मास यहीं व्यतीत किया । सं०१३८७ में श्रेष्ठी नरपाल, आंबा, लाखण वीकल आदि उच्चनगर के श्रावकों के विशेष आग्रह से सूरिजी बारह साधुओं को लेकर उच्चा नगर पधारे। पूर्ववत् एक मास पर्यन्त शासन प्रभावना की। परशुरोरकोट वास्तव्य सा० हरिपाल, रूपा, आसा, सामल, आदि श्रावकों के आग्रह से उच्चानगर से विहार कर अनेक M ४२ दादा श्री जिनकुशलसूरि श्रावक समूह के साथ मार्गस्थ बहुत से ग्रामों के श्रावको की वन्दना स्वीकारते हुए परशुरोरकोट में समारोह पूर्वक प्रवेश किया। यहां भी अनेक प्रकार के धर्मकृत्य हुए। परशुरोरकोट से विहार कर वहिरामपुर पधार कर भगवान पार्श्वनाथ के मन्दिर के दर्शन किये। आगे की भांति वहां भी बड़ी शासन प्रभावना हुई । कुछ दिन के बाद विहार कर क्यासपुर आदि सिन्ध के अनेक ग्रामों में दिन, नगरों में ५ दिन इसप्रकार उपविहार करतेहुए देवराजपुर पधारे, ऋषभदेव भगवान को वन्दन किया। सं० १३८७ का चातुर्मास वहीं किया। सं० १३८८ में उच्चापुर, वहिरामपुर, क्यासपुर, शिलार- वाहण आदि सिन्धु देशस्थ नाना ग्राम नगर के विधि समुदाय के सम्मेलन होने पर अनेक दिनों तक नाना प्रकार के धर्मो- त्सव होते हुए मार्गशीर्ष शुक्ला १० को पदस्थापन, व्रत ग्रहण मालारोपण आदि का विराट नन्दीमहोत्सव हुआ। इस अवसर पर विद्वत् शिरोमणि श्री तरुणकीर्ति गणि को आचार्य पद देकर उनका नाम श्रीतरुणप्रभाचार्य प्रसिद्ध किया । पं० लब्धिनिधान गणि को उपाध्याय पद, जयप्रिय और पुण्यप्रिय और जयश्री, धर्मश्री को दीक्षा दी गई। तेरह श्राविकाओं ने माला ग्रहण की अनेकों ने व्रत ग्रहण किये। सिन्धु देश में यह महोत्सव अभूतपूर्व और अद्वितीय हुआ था।

छट्ठा प्रकरण Co- स्वर्गवास और उसके पश्चात् १ सरी रीश्वर ने सं० १३८६ का चातुर्मास' देवराजपुरमें किया। वहां श्री तरुणप्रभाचार्य और लब्धिनिधानोपाध्याय को स्याद्वादरत्नाकर, महातर्क रत्नाकर आदि महान् सिद्धान्तों का परिशीलन करवाया। चातुर्मास के पश्चात् अपने ज्ञानवल से स्वर्गवास निकट जानकर वहीं ठहरे। माघ १-सं० १३८८ भादवा सुदि४ को सूरिजी के उपदेश से सुश्रावक कुमारपाल ने कल्पचूर्णि लिखी। जिसकी प्रशस्ति जेसलमेर भंडार की सूची में छपी है। २-सं० १३६८ श्रावण कृष्णा १ को भीममल्ली में श्रीजिनचन्द्र- सूरि ने इन्हें दीक्षित किया। श्रीजिनकुशलसूरि विरचित "चैत्यवंदन- कुलक वृत्ति के संशोधकों में भी आप थे। सं०१४११में दीवाली के दिन पाटण में महत्तियाण ठ० वलिराज की अभ्यर्थना से पड़ावश्यक वाला- वबोध ग्चा जो कि सत्रों के भापा-बालावबोधों में सबसे प्रथम है और गद्य भाषा की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसकी कुछ कथाए "प्राचीन गुर्जर गद्य सन्दर्भ" में छपी है। इसकी सं० १४१२ की लिखित प्राचीन, सुन्दर प्रति बीकानेर के ज्ञान-भण्डार में विद्यमान है।

४४ . दादा श्री जिनकुशलसूरि शुक्ला में आपश्री को तीन ज्वर और श्वासादि की व्याधि उत्पन्न हुई, उस समय अपना निर्वाण सन्निकट देखकर श्री तरुणप्रभाचार्य, लब्धिनिधानोपाध्याय' को श्रीमुख से यह फरमाया कि मेरे पट्ट योग्य सा० लक्ष्मीधर के पुत्ररत्न आंबा की धर्मपत्नी कीकी के नंदन पन्द्रह वर्ष की आयुष्य वाले मेरे शिष्य श्री पद्ममूर्ति को गच्छनायक पद समर्पण करनाऔर गच्छ सम्बन्धी और भी कई प्रकार की शिक्षाएं देकर मिती फाल्गुन कृ०५ के पिछले प्रहर में चतुर्विध संघ के साथ क्षमापना व मिथ्या दुष्कृत देकर; स्वयमेव अनशन ग्रहणपूर्वक पंच इनके विद्यागुरु राजेन्द्रचन्द्राचार्य और यशकीर्ति थे। श्रीजिनपद्म स रिजी, श्रीजिनलब्धिस रिजी श्रीजिनचन्द्रस रिजी को सूरिपद इन्होंने ही दिया था। श्रीविजयधर्म लक्ष्मी ज्ञानमंदिर, आगरा व वीकानेरके वृहत्लान भंडार में स्थित प्राचीन स्वाध्याय पुस्तिकाओं में आपके संस्कृत प्राकृतादि में रचे हुए विद्वतापूर्ण (१६) स्तोत्र, स्तवनादि भी उपलब्ध है। १-इन्होंने भी श्रीजिनकुशलसूरिजीकृत "चैत्यवंदन कुलकवृत्ति" का संशोधन किया था। इनकी दीक्षा सम्भवतः सं०१३७० माय शु० ११ को श्रीजिगचंद्रसूरिजी द्वारा हुई थी । जिनपद्मसुरिजी के पट्टपर श्रीजिनलब्धिसूरिजी के नाम से सं० १४०० में श्रीतरुणप्रभाचार्य ने इन्हें प्रतिष्ठित किया, सं०१४०६ नागपुर में इनका स्वर्गवास हुआ था।

दादा श्री जिनकुशलसूरि परमेष्टि के श्रेष्ठ ध्यान में लीन होकर दो प्रहर रात्रि बीतने पर मिती फाल्गुन कृष्णा १५ को नश्वर देह को त्याग कर स्वर्ग सिधारे। प्रातःकाल होते ही विद्युत गति से यह समाचार चारों ओर फैल गया । सारानगर शोकाकुल हो गया। गुरुविरहवश लोगों के नयनों में नीर बहने लगा। गुरु महाराज की पवित्र देह का अन्तिम दर्शन करने एवं निर्वाणोत्सव में भागलेने के लिये आस-पासके सभी गांवों का संघ उमड़ पड़ा। पचहत्तर (७५) मण्डपिकाओं से मण्डित इन्द्रविमान के सदृश सुन्दर निर्यान- विमान बनाया गया । गुरुदेव को इसमें संस्थापित कर बड़े महोत्सव पूर्वक शोकाकुल संघ नगर के राज मार्गों से होकर अग्निसंस्कार के निमित्त श्मशान पहुंचा। अगर, तगर, कस्तूरी मलयचन्दन, कपूर आदि सुगन्धयुक्त पदार्थों से सूरिजी की अंत्येप्ठि क्रिया की गयी । भक्त श्रावकों का हृदय अत्यधिक शोकपूर्ण हो गया। सूरिजी के अग्नि-संस्कार के स्थान पर रीहड़ गात्रीय श्रेष्ठी पूर्णचन्द्र के कुलदीपक हरिपाल ने स्वपुत्र झांझण, यशोधवलादि सह सपरिवार सुन्दर स्तूप निमाण करवाया। यह स्तूप बड़ा भारी दर्शनीय व मुस्लिम-प्रधान सिन्धु देश में जैनधर्म के गौरव को बढ़ानेवाला था। दूर-दूर के श्रावक यात्रार्थ आकर गुरुवन्दन का लाभ लेने लगे।

६ पद दादा श्री जिनकुशलसूरि श्री जिनपद्मसूरि पद स्थापना सूरि महाराज की आज्ञानुसार श्री तरुणप्रभसूरिजी ने सं० १३६० ज्येष्ठ शुक्ला ६ सोमवार के दिन मिथुन लग्न में स्थापना का निश्चय किया। इसी बीच सिन्धु देश के राणु नगर के श्रावक रीहड़-पूर्णचन्द्र के पुत्र हरिपाल देराउर आये । उन्होंने आचार्य महोदय से पद स्थापनोत्सव स्वयं करने की महती उत्कण्ठा वता कर उनसे अनुमति प्राप्त कर ली। चारों ओर कुकुमपत्रिकाएं भेजी गई; सूचना पाकर सभी स्थानोंके श्रोवक झुण्ड के झुण्ड आकर एकत्र होने लगे। सेठ हरिपाल ने स्वधर्मी बन्धुओं का प्रशंसनीय सत्कार, सम्मान किया। स्थानीय श्री आदिनाथ भगवान के मन्दिर को ध्वजा पता- कादि से खूब सजाया। सब के हृदय हर्प से आह्लादित हो गए। निश्चित मुहूर्त में सरस्वतीकंठाभरण श्री तरुणप्रभा- चार्यजी ने महोपाध्याय जयधर्म', महोपाध्याय लब्धिनिधान आदि ३० साधुओं व अनेकों साध्विओं के समक्ष संघ की १-सं० १३८१ वै० वदी ६ को पाटण में इन्हें श्रीजिनकुशल- सूरिजी ने उपाध्याय पद दिया। आगरे वाली स्वाध्याय पुस्तिका में इनके रचित निम्नोक्त तीन स्तोत्र हैं। (१) अजित देव स्तोत्र गा० २५ (खम्भात) ( २ ) सुपार्श्वदेव स्तोत्र गा० २५ (दशपुर) (३) नवकर पल्लव पार्श्वस्तोत्र गा० २५ दादा श्री जिनकुशलसूरि असंख्य भीड़में मुसलमान नवाब के पुत्र आदि के उपस्थिति में श्री पद्ममूर्ति मुनि को थी जिनकुशलसूरिजी के पट्ट पर स्था- पित किया गया । नवीन गच्छनायक का नाम श्री जिनपद्म- सूरि प्रसिद्ध हुआ। इस महोत्सव में अमारिघोषणा, याचकों को मनोवांछित दान, १ मास तक प्रतिदिन स्वधर्मीवात्सल्य आदि अनेकों सत्कार्य हुए। श्री जिनपद्मसूरिजी ने जयचन्द्र, शुभचन्द्र, साधुचन्द्र साधु और महाश्री, कनकश्री नामक साध्वियों को दीक्षा दी। पं० अमृतचन्द्र गणि' को वाचनाचार्य पद प्रदान किया। अनेक श्राविकाओंने माला ग्रहण की। बहुत से श्रावक श्राविकाओं ने सम्यक्त्व, सामायिक परिग्रहपरिमाण आदिग्रत उच्चारण किए । रीहड़ हरिपाल ने हजारों रूपये व्यय कर अपनी चपला लक्ष्मी को सफल की। सा० आंबा,माझा, मंत्री वाहड़, धुस्सुर, मुहण, नागदेव, गोसल, कर्मसीह, खेतसिंह, बोहित्यादि अनेक स्थानों के महर्दिक श्रावकों ने भी चहुतसा दव्य व्यय कर पुण्य एवं यशोपार्जन किया। १-इनकी दीक्षा सं०१३५४ मिति ज्येष्ठ कृ० १० के दिन जालोर में श्री जिनचन्द्रसूरिजी के कर कमलों से हुई थी।

४८ दादा श्री जिनकुशलसूरि इसके पश्चात् ज्येष्ठ शुक्ला ६ को सेठ हरिपाल कारित युगादिदेव भगवान आदि के विम्ब, देवराजपुर के स्तूप व जैसलमेर, क्यासपुर के निमित्त श्री जिनकुशलसूरिजी की तीन मूर्तियों का प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इसी दिन बड़े भारी आडम्बर के साथ चतुर्विध संघ ने स्वर्गीय गुरुदेव श्री जिन- कुशलसूरिजी की मूर्ति स्तूप में स्थापित की। पद स्थापना महोत्सवादि बड़े विस्तार से हुए। इन महोत्सवों के मुखिया श्रेष्ठी हरिपाल का परिचय गुर्वावली में इस प्रकार दिया है कि ये रीहड़ कुल प्रदीप सा० धनदेव पुत्ररत्न हेमल पुत्र पूर्णचन्द्र के पुत्र थे। जैन शासन की प्रभावना करने में प्रवीण थे। इन्होने शत्रुञ्जय और गिरनार की यात्रा की । जिनचन्द्रसूरिजी (सं० १३७३ ) और जिनकुशलसूरिजी को वीनति कर सिन्धु प्रान्त में विहार करवाया जिससे वहां जैन धर्म की बड़ी भारी उन्नति हुई। इन्होंने आचार्य और उपाध्याय पद महोत्सव करकेएवं अपनी पुत्री को दीक्षा दिलाकर महान यश उपार्जन किया था। जिनपद्मसूरिजी के पट्टाभिषेक के अवसर पर आये हुए जेसलमेर के संघ ने अपने वहां पधारने के लिए महती विज्ञप्ति अतः श्री जिनपद्मसूरिजी ने दो उपाध्याय और १२ साधुओं के साथ विहार कर जेसलमेर चातुर्मास किया। की।

दादा श्री जिनकुशलसूरि ४६ स्वर्गवास के पश्चात् श्री जिनकुशलसूरिजी ने अपनी विद्यमानता' में जिस प्रकार संघ में कुशल वरता कर अपने नाम को सार्थक किया उसी प्रकार स्वर्ग सिधारने के पश्चात् भी अव तक भक्त- जनों के कुशल कल्याण करने में कल्पतरु के सदृश हैं। समय- समय पर स्मरण करने पर अनेकों भक्तजनों को प्रत्यक्ष रूप में प्रकट दर्शन देकर व परोक्ष रूप में उनके विन निवारण कर १ वेगड़ शाखा की पट्टावली में लिखा है कि श्री "जेसलमेर" पार्श्वनाथ मूलनायक प्रतिष्ठा देहरा नी थापी। मंगलउरि जीवतां आलियो थाप्योते आज लगि प्रभाविक छै एकदा बखाण करता जाण्यो श्री शत्रु अय ना देहरा दीवानी वाट उंदिरे ताणीचन्दूयो लागौ तिवार गुरे मुंहपत्ति उतारी मसली तिहाँ थकां ते वुझाणी वली एकदा रत्त कोट वाहण आवती बूडवा लागी तिवार गुर ओरा माहै पैसी मंत्र वलै निहां जाइ पार उतार्यों। कपड़े भीने वाहिर आया श्रावके पुच्छयो तिवारं गुरे कपड़ो नीचवी स्वाद खारो चखाव्यो कह्यो न मानो तो नाज थी साते दिन थावक आवस्य तिवारं सात दिने आव्यो प्रत्यय उसनो। इम अनेक अवदात छ। तिरस्यां ने पाणी पावै समर्या साद दे।

५० दादा थी जिनकुशलसूरि प्रत्यक्ष सुरतरु कहला रहे हैं। आपके सम्बन्ध में अनेक चम- त्कार सुनने में आते हैं। उन्हें संग्रह कर लिखने से इतना ही वड़ा एक ग्रन्थ हो सकता है। विस्तारभय से हम केवल उन थोड़ीसी वातों का निर्देश करते हैं जिनका ऐतिहासिक उल्लेख भी उपलब्ध है। (१) बीकानेर के मन्त्रीश्वर कर्मचन्द्र के पूर्वज मन्त्री वरसिंह देरावर की यात्रा के निमित्त अति उत्कंठित होते हुए भी राजविप्लव आदि कारणों से न जा सके तब उनके सनो- रथ पूर्ण करने के लिए गुरूदेव ने बीकानेर से ४ कोश गढालय (नाल) स्थान में सम्मुख आकर स्वप्न द्वारा दर्शन दिये और फर्माया कि तुम्हारी भक्ति से मैं सन्तुष्ट हूं, तुम्हारी यात्रा यहीं सफल है ! मन्त्रीश्वर ने गुरूदर्शन के स्मारक रूप स्तूप-मन्दिर उसी स्थान पर निर्माण कराया। आज भी वहाँ आपका प्रकट प्रभाव सर्वविदित है। कहा जाता है कि यहाँ के चरण भी देराउर से आये हुए हैं। सोमवार और प्रति पूर्णिमा को बीकानेर के बहुत से लोग दर्शन करने जाते हैं । कार्तिक पूर्णिमा और फाल्गुन कृष्णा १५ को वहाँ प्रति वर्ष मेला भरता है।

" दादा श्री जिनकुशलसूरि (२) कविवर समयसुन्दरजी जब सिन्ध प्रान्त में विचरते थे। तव संघ सहित उच्चनगर जाते हुए मार्गवर्ती पंचनदी पार करने के लिए नौका में बैठे उस समय अन्वेरी रात्रि, जोरों की वर्षा, भयंकर तूफान हो जाने के कारण नौका खतरे में आ गई । तब उन्होंने अपने एक मात्र इष्ट दादा साहब का ध्यान किया । फलस्वरूप तुरंत ही सूरिजी की देवात्मा ने सानिध्य कर संकट दूर किया । इसका उन्होंने स्वयं एक स्तवन रचकर उल्लेख किया है। आयो आयोरी समरन्तां दादोजी आयो संकट देख सेवक कु सद्गुरू , देरावर ते धायो॥ स० ॥१॥ वरसे मेह नै रात अंधारी, वाय पिण सबलो वायो। पंच नदी हम बैठे वेड़ी दरिये हो दादा दरिये चित्त डरायो दादा उच्च भणी पहुंचावण आयो, खरतर संघ सवायो। समयसुन्दर कहै कुशल २गुरू परमानन्द सुख पायो ||स॥३॥ (३) इसी प्रकार वर्ग के अभाव में वृष्टि के लिए स्मरण करने पर तत्काल वर्षा हुई, इसके सम्बन्ध में भी कविवर ने “ मांगो मेह बूठो तुरत " पद्य लिख कर सानिध्य स्वीकार किया है। (e) कविवर धर्मवद्धन ने भी अपने श्रीजिनकुशलसूरिजी के स्तवनों में डूबती हुई नौका तिराने का कई जगह उल्लेख किया है।

दादा श्री जिनकुशलसूरि
(५) श्री जिनभक्तिसूरिजी कृत श्री जिनकुशलसूरि स्तवन में
बीकानेर नरेश सुजाण सिंहजी की शत्रुओं से रक्षा करने
का उल्लेख किया है।
परितख परची पामियो, श्री बीकाण नरेश ।
सुजाणसिंह नरराज ने, अरिभय लियौ उवार ।।
(गुरुगुणरत्नावली पृ० ६२)
और भी कई चमत्कारों का उल्लेख महोपाध्याय रामलालजी
गणि विरचित दादासाहब की पूजा व स्तवनादि में मिलता है।
आपके अलौकिक प्रभाव का ज्वलन्त उदाहरण इतना ही
देना पर्याप्त होगा कि सैकड़ों स्तुतियां, स्तोत्र, अष्टक, निसाणी,
पद, छन्द, स्तवन एवं सैकड़ों गुरु-मन्दिर, चरणपादुकाए',
मूर्तियां आदि यत्र-तत्र उपलब्ध हैं। इतने अधिक स्तवन
और स्मारक किसी भी अन्य आचार्य के नहीं हैं। आपको
स्वगच्छ, परगच्छ, स्थानकवासी, तेरापन्थी आदि सबलोग
भक्ति - भावपूर्वक मानते हैं। यों तो प्रसिद्ध प्रसिद्ध सभी
ग्राम, नगरों, तीर्थो; मन्दिरों आदि में आपके चरणपादुकादि
विद्यमान हैं पर हम पाठकों की जानकारी के लिए उनमें से
थोड़े स्थानों के संवतोल्लेख वाले स्मारकों की सूची नीचे
देते हैं।

पृ० ७८ . दादा श्री जिनकुशलसूरि प्रतिष्ठा समय स्मारक स्थान लेखप्राप्ति* सं० १४८६ ज्ये० शु०५ मूर्ति आदिनाथ मन्दिर मालपुरा हरि सं० १६२३ माघ बदि ५ पादुका दादाबाड़ी, नागौर हरि सं १६५२ ज्ये० शु०५ शीतल जिनालय रिणी सं२४६० स० २६५३ मि० सु०६ चरण स्तूप दादाबाड़ी पाटण बीकानेर 'स० १६५४ज्ये शु०११ रवि पादुका विमलवसही शत्रुञ्जय यु०प्र० जैन लेख संग्रह प्रस्तावना पृ० ७७ सं०१६५६ ज्येशु० १२ शनि,, सांगानेर सं० १६६३वै० शु०६ शनि स्तूप दादावाड़ी, जामनगर हरि १६७५ वै० शु० १५ मूर्ति खरतरवसही, शत्रुजय हरि , १६७५ मि०सु० १२ लौद्रवपूर तीर्थ सं (२८७६) १६८२ ज्ये० शु० ३ गुरु0 , १६८२ मि0 सु०५ पादुका दादावाड़ी, पटना ना० ३३२ गुणायाजी ना० १७६ ,, १७०२ मा० शु० २३ सो० गांवमन्दिर, पावापुरी ना० १६८ * इसमें हरि-श्री जिनहरिसागरसूरिजी' का अप्रकाशित लेख संग्रह, ना० -श्री पूरणचन्दजी नाहर के “जैन लेख संग्रह" के लेखाङ्क सं0- हमारा बीकानेरजनलेख संग्रह और यु० प्र० जिo हमारे लिखे हुए युगप्रधान श्रीजिनचन्द्रसूरि ग्रन्थ का संकेत समझना चाहिये। • यह प्रतिमा अब दिल्ली-महरोली के बड़े दादाजी में शत्रुजय रचना के मन्दिर में विराजमान है। " शत्रुञ्जय हरि० १६८८ वे० शु० १५ " " رو १८५० वै० ५४ दादा श्री जिनकुशलसूरि प्रतिष्ठा समय स्मारक स्थान लेख प्राप्ति सं० १७०८ वै0 सु० ७ गु० पादुका महाजन सं० २५१७ १७३७ चै० ब०१ नापासर सं० २३३१ १८१६ आ० सु० १० लौद्रवाजी सं० २८८४ ,, १८२१ मा0 शु० १५ दादावाड़ी मुर्शिदाबाद ना० ६७ ,, १८२१वै० सु० २ रजतमय ,, सुपार्श्वमन्दिर बीकानेर सं०१७६० १८३१ फा० शु०७ नोखा, पार्वजिनालय सं० २२६६ , १८४८ ज्ये0 व० ८ बुध दिनाजपुर ना० ६३३ शु० ३ वृह० शांति मन्दिर, चुरू सं० २४०४ , १८५० 30 शु०१५ गुरु० ,, वासुपुज्य मंदिर बीकानेर सं०१३८५ " १८५० मा० शु० ५ दादावाड़ी, चूरू सं० २४१७ ,, १८५० मि० ब० १ सो० फर्रुखावाद हरि० १९५६ बै० शु० ३ बुध चंपापुरी ना० १६४ १८६२ माघ शु० ". जयपुर हरि १८६६ मा० कृ०५ दादावाडी, रतनगढ़ सं० २३५८ ,, १८६७ आ० सु०६ वुध" कासमबाजार ना० , १८७० आ० सु० १० खरतरवसही शत्रुजय सं० १८७१ वै० सु० ८ बुध छोटा दादाजी, दिल्ली ना० ५२७ , १८७५ मि० शु०६ रवि ,, मधुवन दादावाड़ी ना० १८४१ , १८७६ मा० शु५ हस्तिनापुर हरि ,, १८७७ वै०शु० ५ चंद्र ना० ३२० १८७७वै० शु० ५ चंद्र , ना० ३२१ पटना सं० २४३२ "१८६६ " दादा श्री जिनकुशलसूरि प्रतिष्ठा समय स्मारक स्थान लेख प्राति सं० २८२८ वै0 सु०६ (रजतमय) आदि० मं० वी० सं १४८६ १८६५ चै० ब० ७ रवि ,, चंद्रप्रभ जिनालय, , चंद्रप्रभ जिनालय, कालू सं० २११ ,, १८६७ 40 मु०३ राजगढ़ १८९१ आ० मु०५ देशनोक सं० २२४१ 3;, दादावाडी सुजानगढ़ सं० २३७८ १८७७ वै० गु०१५ पादुका अयोध्या ना० १६५६ ॥ २८७६ फा० गु०४ शनि फैजाबाद ना०२६७४ , १८८२ द्वि० श्रा० व० १२ गुरु , (जीर्णोद्धार) नागोर हरि " १८८६ भा० ३० ५ वु" चिन्तामणिजी मं० बम्बई सं० ॥ २८८५ मापाढ़ यदि ५ सं० १८८८ मा० गु० ५ चन्द्रावती ना० १६८३ २८८७ आ० मुदी १० पार्श्व मन्दिर, जांगलू सं २२५६ १२६०४ मा० गु०१२ दादावादी ससनऊ हरि चंद्रप्रम मं० बीदासर बी०सं० २३६३ (जीर्णो०) दिल्ली हरि १६०६ जा० मु०१५ आनार्योंशयय बी०सं० २१०६ " १६१० माघ ०२ मो० हरि "१६१० मा० १०२ गांव मन्दिर, पावापुरी ना० १६६ १९१० मा० १०२ ना० १६६८ "१६.? आT) " दायवादी सरदार र सं० २३६६ " आबू तीर्य " "१६०३ फा०५ २६०८० मु०१२ रवि . "रान " रतनपुरी दादा श्री जिनकुशलसूरि प्रतिष्ठा समय लेखप्राप्ति स्मारक स्थान सं १६१२ फा0 व० ७ गुरु दादावाड़ी केसरियाजी ना० ६४६ , २६१३ माघ शु० ५ शुक्र ,, जौहरीबाग, लखनऊ ना० १६३७ १, १६१३ माघसुदि५ ,, पादुका ,, शान्ति मन्दिर लखनऊ हरि० " "२६१३ ११६१४ ज्ये०२ " ना० २५४२ हीरालालदेरासर ,, ना०२६२२ , १६१४ ज्ये० शु० २ हरि० १६१४ ॥ , १६१४ ॥ , १९१७ मा0 सु० ५ शुक्र , मधुवन दादावाड़ी व सुपार्श्वमं० , १६१७ मा० कृ० ६ शनि स्तूप अमरसागर , १६१७ फा0 व० ह पादुका सुरतगढ़ सं० २५२४ 5, १६१६ वै० कृ०२ हरि ,, १९२३ ज्ये० शु० ४ गुरु वालोतरा सं० , १९२४ मा० शु० १३ लखनऊ , १६२६ फा0 सु०७ सं० , १९२८ मा० शु० १३ गु० पादुका कानपुर हरि हस्तिनापुर ,१६३३ मा० शु०३ , सुजानगढ़ पार्श्वजिना० सं०२३७५ , १६३६ ज्ये० सु० १३ सो० " भागलपुर हरि हरि " , वराकड़ तीर्थ " "१६२६ " दादा श्री जिनकुशलसूरि ५७ प्रतिष्ठा समय ‘स्मारक स्थान लेखप्राप्ति सं० २५०५ " " " " १६४३ चैः ." १६५७ ज्ये० शु० ११ " " १६३६ फा० शु० ३ " लूणकरणसर "१६३८ आ० व०१३ ,, वड़ा मन्दिर कलकत्ता सं0 " १६३६ फा० ० ७ गु० जयपुर हरि १६३ दादावाड़ी, बिहार ना० २३३ , १६४० मि0 व० ७,, पादुका कुथुजिनालय, बीकानेर सं० सु०१३ " सुरप्रभ जिनालय, आगरा १६५० आसाढ़ शु०८ शु० " दादावाडी जयपुर सं० तेजपुर पार्श्वमन्दिर ,, १६५५ पौ० शु० १५ गु० दादावाड़ी बनारस हरि ,, ऋषभ मं० वीका० सं० १५०१ , १६३५ ज्ये० शु० १२ गु० दादावाड़ी मेड़तारोड सं0 ५६६५ ज्ये० सु० १३ देशनोक सं० २२५० ,, १६७० ज्ये०व०८ गंगाशहर सं० २१७६ " मयू १६७६ 40 व०७ लखनऊ हरि " १६७५ वै0 सु०२ ,, रजतमय कुथुजि०वी० सं० २७०३ " १६७६ आ0 गु०३ सो० मूर्ति हापुड़ हरि " १९७१ वै0 शु०८ पादुका १२६७६ आ० शु०२ सो० ना० २००८ " १६० . " " "१६७२ सं० २३२१ " " कलकत्ता ५८ दादा श्री जिनकशलसूरि प्रतिष्ठा समय स्मारक स्थान लेखप्राप्ति " १६८८ - सं० १६८० वै0 सु० ११ गु० जेसलमेर सं० २८१३ , १६८७ ज्ये0 शु० ५ रवि रेल दादाजी बीकानेर सं0 कुथजिनालय उदरामसर सं० २२०६. , १९८८ आ0 शु० १२ नाकोडा सं० , १६८८ मा० शु० १० बु० मूर्ति सुगनजी उ० वी० सं०.१६७४ , १६६३ ज्ये० ब० ८ गु० पादुका नया दादाजी वी० सं० १६६७. ,, १९६६ चै० सु० १० ,, पादुका नाल जीर्णोद्धार सं० २२८५ सु० ५ मूर्ति , गुरुमन्दिर वी० सं० १९६८-६ २००२ मि० सु० १० मूर्ति महावीर जिनालय बी० सं १७०८ , २००५ ज्ये० सु० १० चरण महावीर ० उदरामसर सं० २१६७. १६६७ ज्ये० सतरहवीं शताब्दी के उपाध्याय ललितकीर्ति के शिष्य श्री राजहर्ष ने “श्री जिनकुशलसूरि अष्टोत्तरशत थुभस्थान गर्भित स्तवन” *बनाया है। उसमें उस समय के निम्नोक्त स्थुभ स्थानों के नाम दिये हैं :- देरावर आगरा सांगानेर साचोर गठाला पट्टण विहार सोवनगिरि अलवर मालपुर सिरोही यह स्तवन इसी पुस्तक के परिशिष्ट में प्रकाशित कर दिया है ।। ..

दादा श्री जिनकुशलसूरि ५६ सिद्धपुर किरहौर जैसलमेर जोधपुर नागौर मेड़ता देवलवाड़ा वर्द्धनपूर अमरसर जयतारण नौरंगावाद किसनगढ नाडुलाई राजगढ़ चंपापुरी नवहर रतलाम उद्योतनपुर समियाना अहमदाबाद सोजत डेरइ (गाजीखान) खीमसर शेरगढ़ वाहड़मेर फतपुर पहकरण भटनेर पालनपुर फलोधी चन्देरी मंडीचक तोड़ मरोट कुम्भलमेर अमरकोट रिणी नूतनपुर शत्रुञ्जय सूरत गिरनार दीवनगर ईडर आसोप महेवइ गुन्दोच सहारनपुर सेवावा. जैतपुर बिलाड़ा खम्भात पाटण पाली दिल्ली मंगलउर वीरमपुर अंजार बड़लुन्दा पीपाड़ कापरहेड़ा. मांडवी सम्बल सरसा महिमपुरी लाहोर कंवल देवधर ग्वालेर सिरवाड़ी लुणकरणसर खेजडलइ पचियास देवीखेडा वेलरा वालरवा तिमरी कुण्डकी अजमेर दादा श्री जिनकुशलसूरि पूगल सिरुंजय सांभर रोहीठ 'जंगल विक्रमपुर मुलतान पूनासर वड़ली रायपूर [हाजीखान डेरा] डीडवाणा वीजापुर राधनपुर [इसमाइल खानडेरा] इनमें से कई स्थानों के स्तूप नष्ट हो चुके हैं और बहुत से स्थानों में नये भी बने हैं जिनमें से कई स्थान लेख सूची में आ गये हैं, बहुत से स्थानों के लेख भी हमें नहीं मिले । कवि अमरसिन्धुर ( १६वीं शती )के अपूर्णप्राप्त कुशल गुरु छंद में उपर्युक्त स्थानों के अतिरिक्त निम्नोक्तस्थानों का उल्लेख और है। अजीमगंज चुरु देवगढ़ वरहानपुर मालापुर आबू जालोर पाटलीपुर 'भरुअच्छ रंगपुर उदयपुर ढाका वम्बई भीनमाल विशाला काशी तोरणपुर वीकोनेर मिरजापुर हुगलीपुर गूढा देवीकोट वालोचर मुद्रा सातवां प्रकरण ग्रन्थ रचना स्वर्गीय गुरुदेव श्री जिनकुशलसूरिजी महाराज व्याकरण न्याय, साहित्य, अलङ्कार, नाटक, ज्योतिप, मंत्र-तंत्र छौंद, तुरग पद,कोष्टकपूर्ण,शब्दालङ्कार और जटिल समस्याओं की पूर्ति में सिद्धहस्त प्रकांड विद्वान थे । यद्यपि आपश्री शा- सन प्रभावना के नाना कार्यों में व्यस्त रहने के कारण अधिक ग्रन्थ-निर्माण न कर सके थे और जो कुछ भी रचना की थीं उनमें से कितने ही स्तोत्रादि का उल्लेख आगे के प्रकरणों में किया जा चुका है, पर वे अब उपलब्ध नहीं हैं। जिन कृतियों का हमें पता लगा है उनका संक्षिप्त परिचय यहां देते हैं। (१) चैत्यवन्दन कुलक वृत्ति यह युगप्रधान श्री जिनदत्त- सूरिजी महाराज विरचित २७ गाथा के लघुकुलक पर ४००० श्लोक परिमाण विशद वृत्ति रची है । सूरिजी ने ग्रंथ के भावों को अनेक प्रन्यों के प्रमाणों द्वारा पुष्ट एवं परिस्फुट किया ही है पर साथ ही साथ प्रासङ्गिक धर्म कथाओं को जोड़कर अन्य की शोभा में विशेष अभिवृद्धि कर दी है। कथाएं श्लो० १३० १७ '६२ दादा श्री जिनकुशलसूरि सव श्लोक बद्ध अनुष्टुप छन्द में हैं। उनकी सूची श्लोक संख्या सहित यहां दी जाती है: २ सुगुरू कुगुरू विपये सिंह शृगाल कथा श्लो० ४१ २ गीतार्थ गुरू विपये सर्पशीप पुच्छिका कथा श्लो० १६ ३ गीतार्थ कुगुरू विपये बैद्यपुत्र कथा श्लो० ४ सासन प्रभावक सिद्धसेनसूरि कथा ५ श्रेणिक महाराज कथा श्लो० ६४५ ६ मङ्गल चैत्य कथा श्लो० ७ हिङ्गुशिव कथानकम् श्लो० २२ ८ जमालि निन्हव कथा श्लो० ६१ है चैत्यवन्दन विषये धनदत्त श्रेष्ठी कथा श्लो० २८ २० नवकार फल विपये शिवकुमार कथा श्लो ४६ ११ श्लो० ३५ १२ श्लो० ५५ १३ . हुण्डिका या कथा श्लो० "१४ तप फल विषये नागदत्त कथा श्लो ५४ १५ सोदास राजकुमार कथा श्लो० ४६ १६ रात्रिभोजन विषये सुमित्र ब्राह्मणी कथा १७ अज्ञातफल विषये वंकचूल कथा श्लो० १८६ २८ विचलित रसाहार विषये धनपाल कथा श्लो० ११५ १६ त्रसजीव रक्षा विपये चन्द्रराज कथा श्लो ६३ -२० अलीक वाक्य परिहार विषये हंसराज कथा श्लो० ७५ श्रीमती कथा धरणेन्द्र कथा ७ १ " श्लो० १२५ दादा श्री जिनकुमरसूरि २१ अदत्तादान चिरति विपये दत्त श्रेष्टी कथा श्लो० १०३ करशील विपये मुदर्शन कया श्लो० १८४ २३ परमाईत आनन्द पायक कया श्लो २४ यमायुध फया स्लो १४५ प्रस्तुत प्रथ में निम्नोच ग्रंथों के नाम निर्देश सहित प्रमाण वृत किए गये हैं १ आवश्यक १ महानिशीथ २. आवश्यक नियुक्ति १० योगशास्त्र ३ आवश्यक टीका २३ निशीथचूर्णि ४ पचलिी (जिनेश्वरसूरि) १२ विवाह पलिका ५ उपदेशमाला १३ निशीधसूत्र निशीय भाष्य १४ दरार्वकालिक ७ ओप नियुक्ति १५स्यधीयालल्य फुलक (अभयदेवमूरिन) ८दशा तस्कंध माप्य १६ मित्यात्यफूलक संपूर्ण गा० २२(पूर्वाचायं एत) या अन्य प्रोजिनदत्तसूरि मानगंटार, मूगन से प्रका- शिव भी हो पफाई अतः विशेष जानने की इच्छा को मूल प्रय देगना पाहिए। (२) पोजिनपन्द्रमूरि पनुःसजतिफा-दनमें अपने गुरू फनिकाल फेयली मीजिनचन्द्रमूरिजी महागज पे, पग्नि का गिधानिक पगंन है। यह र प्रागन भाग की ४४ गायाओं में जो परिशिष्ट में दिया जा रहा है।

दादा श्री जिनकुशलसूरि
(३) फलोधी पार्श्व स्तोत्रम् गा० ११
आदि-सकल भूतल भूपण शेखरम् ।
(४) पार्श्वनाथ स्तोत्रम् गा०५
आदि-ॐ ह्रीं श्रीं धरणोगेन्द्र महिता ।
५) स्तम्भन पार्श्व स्तोत्रम् गा०६
आदि-श्री स्तम्भनाम्भोज विकाश मित्रम् ।
(६) शेरीपकालकार पार्श्व स्तोत्रम् गा०५
आदि-श्री शेरीपक पत्तनाव निशिरः।
(७) सिद्धक्षेत्र आदिजिन स्तवनम् गा०१६
आदि-श्रीविमलाचल विमला चूल ।
(८) बहुविह छन्दक शान्तिजिन स्तवनम् गा० ३२
आदि-श्री शान्तिनाह चरियं
(E) पाव जिनस्तुति गा०४द्रे द्रकि धप सप ।
(१०) चतुर्विंशति जिननाम गर्भित स्तुति गा०४
आदि-नाभेयाजित वासुपूज्य सुविधि
(११ ) पंचमी तपः फल गर्भित नेमि जिनस्तुति श्लो० ४
आदि - श्री नेमिःपञ्च रूप त्रिदशमति कृत ०
..

आठवां प्रकरण
-0%20-
शिष्य परम्परा
सरिजी के हस्तदीक्षित अनेक साधु साध्विओं के नाम
पूर्व के प्रकरणों में आ चुके हैं उनमें से महोपाध्याय
विनयप्रभ, सोमप्रभ विशेप उल्लेखनीय हैं, अतएव सनका एवं
उनकी शिप्य परम्परा का थोड़ा परिचय देना आवश्यक है
इसलिये यहां इस विषय में कुछ लिखते हैं ।
१ विनयप्रभ
आपकी दीक्षा सं० १३८२ मिती पैशाख शु०५ को होन
का उल्लेख पूर्व आ चुका है। आपको स१३६४ और सं0
१४१२ के बीच में उपाध्याय पद मिला ज्ञात होता है। आप
बहुत अच्छे विद्वान थे, आपकी कृतियों की सूची इस
प्रकार है :-
१ नरवर्म चरित्र-सं० १४१२ कार्तिकपूर्णिमाके दिन संभात
में यह प्रथरचा गया इसकी तत्कालीन लिखी हुई १० पत्रोंकी एक
प्रति भावहर्षीय भण्डार, यालोतरा में हमारे अपलोफनमें आई,
उसमें ६४ श्लोक हैं। अन्त में लिखा है कि "संवत् १४१२ वर्षे

दादा श्री जिनकुशलसूरि
श्री विनयप्रभोपाध्यायः श्री स्तम्भपुरेस्थितैः सम्यक (क्त्व)
सारा चक्रे हि नरवम नृप कथाः" । इस ग्रन्थ को पडित
हीरालाल हंसराज, जामनगर वाले ने प्रकाशित किया है पर
उसमें कर्ता के विषय में कुछ भी उल्लेख नहीं है।
२ गौतमराम - सं० १४१२ मिती कार्तिक सुदि १ को
खंभात में देशी भापा में रचा गया है। इसकी रचना बड़ी ही
लालित्यपूर्ण और प्रासाद गुण युक्त हैं। यह रास अत्यन्त
प्रसिद्ध और अनेक ग्रन्थों में छप चुका है अतएव इसका विशेष
परिचय देना आवश्यक नहीं समझते । इसके कर्त्ता के सम्बन्ध
में कइयों ने विजयभद्र और उदयवन्त लिखने की भूल की है
पर हमें उपलब्ध सं० १४३० की प्रति से इसके कर्ता निर्विवाद
रूप से आप ही प्रमाणित होते हैं। यह रास ४५ गाथाओं में है।
कहा जाता है कि इसकी रचना उपाध्यायजी ने अपने भाई
के दारिद्र निवारणार्थ की थी।
सं० १४३० की लिखी हुई प्रति तथा आगरा वाली प्रति
में आपकी निम्नोक्त रचनाएं हैं :-
३ महावीर स्तवन गा० २४
आदि-सानन्द नम्र सुर कोटि किरीट पीठ ।
४ वीतराग :स्तवन गा० २५ आदि-देविन्द नागिन्द
नरिन्दचद
५ ऋषभ स्तवन गा० २६ आदि विमलशैल: सिरो
मुकुटायतम् ।
न

दादा श्री जिनकुशलसूरि ६ शान्तिस्तवन गा० १६ आदि-सज्ञान भानु हत मोहतमो वितानकं । ७तीर्थयात्रा स्तवन गा०४१ आदि-महानन्द महानन्द महानन्द विधायकान् । ८ चतुर्विशति जिन स्तवन ना० २६ आदि मोह महाभड़ भय सहण रिसह । उपाध्यायजी के शिप्य विजयतिलकजी रचित कर्मग्रन्थ 'विचार गर्भित शत्रु ञ्जय स्तव गा० २१ का सुप्रसिद्ध है। इस पर कितने ही विद्वानों के टब्वे, टीका आदि उपलब्ध है। पष्टिशतक वृत्ति कर्ता तपोरत्न, गुणरत्न ने इन्हें अपना विद्यागुरु लिखा है। ऊ श्री विजयतिलकजी के शिप्यों में मुनिशेखर और क्षेम- कीर्ति प्रसिद्ध थे, इनका उल्लेख भी पष्टिशतकवृत्ति में विद्यागुरू और व्रत गुरुके रूप में मिलता है। वाचक क्षेमकीर्ति का शि- प्य परिवार बहुत विशाल था। कहा जाता है कि इन्होंने ५०० धाड़वी या वराती लोगों को एक साथ दीक्षा दी थी जिससे इनकी क्षेमधाड़ या क्षेमकीर्ति शाखा प्रसिद्ध हुई । हमें इनके शिप्यों में से १ मोदराज२ तपोरत्न ३ गुणरत्न और ४ क्षेम- हंस नामक चार शिष्यों का ही पता मिला है, क्षेमकीर्तिजी की परम्परा में बहुत से विद्वान हुए, अब भी आपकी परम्परा विद्यमान है। इस शाखा के कतिपय प्रसिद्ध ग्रन्धकारों का यहां निर्देश किया जाता है।

६८ दादा श्री जिनकुशल सूरि १ तपोरत्न, गुणरत्न पष्टिशतकवृत्ति कर्ता । यह वृत्ति सं० १५०१ में रची हुई है। श्रीजिनसद्रसूरिजी ने इसका संशो- धन किया था। " पृ० ३५२ "२६8 २ महोपाध्याय जयसोम-देखें युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि पृ० १६७ ३ महोपाध्याय गुणविनय ये सतरहवीं शताब्दी के प्रकाण्ड विद्वान थे । उक्त पुस्तक में उल्लिखित ग्रन्थों के अतिरिक्त और भी बहुत सी कृतियां उपलब्ध हुई हैं इनके विषय में स्वतन्त्र लिखा जायगा। ४ मतिकीर्ति -देखें युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि पृ० २०२ ५ विद्याकीर्ति ६ लावण्यकीर्ति ७रत्वलाभ जैन गूर्जर कविओ भा०३ ८ कनकविलास " युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि पृ० २०३ ६ सप्रमोद १० चारुदत्त ११ कनकनिधान १२ पुण्यकीर्ति १३ लव्धिचन्द्र १४ श्रीसार १५ हेमनन्दन १६ सहजकीति १७ यतीन्द्र " "२०३ , २०४ " २०४ : २०४ "३१३ " २०७. " २०६ » २०६ " २०८ " " ور २३ लाभवर्द्धन देखें जै० दादा श्री जिनशिलसूरि १८ नन्दलाल देखो जैन सिद्धान्त भास्कर में हमारा लेख १६ विनयमेरु-देखो युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि पृ२१०,३१५ २० जिनहर्प देखें जैन गु० क० भा०२ गुष्क० मा०२ २२ रामविजय (रूपचंद्र) देखें जै० गु० क० भा०३ २३ शिवचन्द्र देखें जै० गु० क० भा०३ २४ रामचन्द्र १ देखें जै० गुक0 भा०३ २५ लक्ष्मीवल्लभ देखें 50 गु० क० भा० २ २६ सिंहा देखें जै० गु० क0 भा० ३ २७ भुवनकीर्ति गु० क० भा० १ २८ मतिकुशल देखें 50 गु० क०मा० २ नह यशोवर्द्धन गु० क० भा० २ ३० रत्नविमल देखें जैन गुर्जर करिओ भा० ३ ३१ अमरसिन्धुर २ देखें 50 गु0 क० मा०३ ३२ महो० रामलालजी-बीकानेर में अच्छे विद्वान और वैद्य हुए हैं। इन सब विद्वानों की परम्परा के कई वंशवृक्ष और ग्रन्थ सूची हमारे संग्रह में विद्यमान हैं पर स्थानाभाव और विष- चान्तर हो जाने के कारण यहां नहीं दिया गया है। (२) इनके शिष्य उदयराज गि० नेमचन्द्र गि० श्यामलाल देखें देखें जयपुर में थे। (२) इनकी कृतियों का संग्रह हमने सम्पादित कर वम्बई के श्री चिन्तामणिजी के मन्दिर से प्रकागित कर दिया है।

दादा श्री जिनकुशलसूरि २ सोमप्रभ पालनपुर के माल्हू रुद्रपाल की भार्या धारलदेवी के कुक्षी से सं० २३७५ में आपका जन्म हुआ। आपका जन्म नाम समर था। एक बार जिनकुशलसूरिजी ने पालनपुर पधारकर समराकुमार के शुभ लक्षणों को देख कर उसके पिता को उसे दीक्षित करने का उपदेश देकर भीमपल्ली पधारे । रुद्र- पाल ने सपरिवार भीमपल्ली जाकर श्री जिनकुशलसूरिजी के पास समराकुमर और उसकी बहन कील्हू को सं०२३८२ वैशा- ख शु०५ के दिन दीक्षा दिलाई। समरा का नाम सोमप्रभ और कील्हू का नाम कमलश्री रखा। सं० १४०६ जेसलमेर में इन्हें वाचनाचार्य पद मिला । स० १४१५ आषाढ़ शुक्ला ९३ को खम्भात में तरुणप्रसाचार्य जी ने श्री जिनचन्द्रसूरिजी के पट्ट पर स्थापित किये। दिल्ली के श्रीमाल सा० रतना, पूना आदि ने पदोत्सव किया। इन्होंने पांच स्थानों में बड़ी प्रतिष्ठाएं, २४ शिष्य और १४ शिष्याओं को दीक्षित किया । अनेकों को संघपति, आचार्य, उपाध्याय वाचनाचार्यादि पदप्रदान किये। सं० १४३२ के भाद्रव कृष्ण ११ के दिन श्री लोकहिताचार्यजी को शिक्षा देकर स्वर्ग सिधारे। संघ ने दाहस्थल पर सुन्दर स्तूप बनाया। इनके पट्टधर जिनराजसूरिजी हुए, विशेष जानने के लिए हमारा ऐतिहासिक जैनकाव्य संग्रह देखना चाहिए।

१ दादा श्री जिनकुशलसूरि ७१ ३ श्रीजिनपद्ममूरि आप प्रसिद्ध खीमड़ कुल के सेठ लक्ष्मीधर के पुत्र आंबा की धर्मपत्नी कीकी के पुत्र थे । सं० १३८४ माघ शुक्ला ५ को देराउर में सूरि महाराज के करकमलों से दीक्षित हुए । स० १३६० ज्येष्ठ शुक्ला ६ को देरावर में श्रीतरुणप्रभसूरिजी ने सूरि पद दिया और स० १३६० का चौमासा जेसलमेर किया जिसका विस्तृत वर्णन छट्टे प्रकरण में कर चुके हैं। इसके पीछे का वर्णन जहां तक गुर्वावली में मिलता है सक्षेप में यहां लिखते हैं: सं० १३६१ पोप शु० १० के दिन लक्ष्मीमाला गणिनी को प्रवर्तनी पद दिया, मालारोपणादि उत्सव होने के बाद वाहड़मेर पधारे । वहाँके राणा शिखरसिंह और श्रावक प्रताप- सिंह, सातसिंह ने सन्मुख आकर प्रवेशोत्सव किया । बाहड़मेर में १० दिन ठहर कर सत्यपुर पधारे। यहां के राणा हरिपाल देव और सेठ नींवा ने प्रवेशोत्सव पूर्वक महावीर भगवान के दर्शन कराये । मिती माघ शुक्ला ६ को व्रत ग्रहण, मालारोप- णादि उत्सव हुए। नयसागर व अभयसागर को दीक्षा दी। महीने से कुछ कम ठहर कर सेठ वीरदेवके आग्रह से आदित्य- पाड़ा जाकर श्री पार्श्वनाथ प्रभु के दर्शन किए। यहां से पाटण पधारे, नवलखा देवानन्द के पुत्र अमरसिंह ने माघशुक्ला १३ को स्वागत पूर्वक नगर प्रवेश कराया। सूरिजी ने शान्तिनाथ प्रभु को वन्दन किया । मिती माघ शुक्ला १५ को जाल्हणके . ।

७२ दादा श्री जिनकुशलसूरि पुत्र सेठतेजपालने सूरिजी से ऋपभदेव आदि पांचसौ विम्बों की प्रतिष्ठा करवाई। मिती फाल्गुन कृष्णा ६ को मालारोपण, सम्यक्त्व ग्रहणादि उत्सव हुए । सं०१३६२ मिगसर कृष्णा ६ को क्षुल्लकों की उपस्थापना और श्राविकाओं के मालाग्रहण का उत्सव हुआ। सं० १३६३ कातिक महीने में तेजपाल कारित उत्सव सहित सूरिजी ने प्रथमोपधान वहन किया। श्री श्रीमाल मोखदेव श्रावक के जीरावल्ली मण्डन श्रीपार्श्वनाथ प्रभु के दर्शन का अभिग्रह था । अतः उसकी वीनतिसे फाल्गुण कृष्णा १० को पाटण से प्रस्थानकर नारउद्र गये। मत्री गेहा के प्रवेशोत्सव पूर्वक दो दिन रह कर आशोटा पधारे वहां सेठ वीरदेव श्रावक ने राजा रुद्रनन्दन, राज० गोधा और सामन्तसिंह आदि राज्याधिकारी लोगों के सहित प्रवेशोत्सव किया। वहीं से मार्ग में चोर डाकुओं के उपद्रव रहते हुए भी मोखदेव के सुप्रवन्ध से व जद्री पधारे । सेठ छजल के कुलप्रदीप मोखदेव ने चौहान राजाउदयसिंह आदि के साथ सम्मुख जाकर प्रवेशो- त्सव किया। इसी वर्ष राजा उदयसिंह के सहाय्य से मोखदेव ने राजसिंह पुत्र पुर्णसिंह, धनसिंह आदि अपने कुटुम्ब के . साथ श्री आबूतीर्थ यात्रार्थ पूज्य श्री से वीनति की । पूज्यश्री की स्वीकृति से सपादलक्ष देशीय तथा श्रीमालपुर के वीजा, देपाल, जिनदेव, सांगा आदि को कुकुमपत्रिका भेजी मार्ग का भार सा० मूलराज, पद मसिंह आदि को सौंपा गया। मोख- दादा श्री जिनकुशल सुरि ७३ देव ने ने चैत्रशु०३ रविवार को तीर्थयात्रा के लिए बनाए हुए रथाकार शान्तिनाथप्रभु के नवीन देवालयकी वासक्षेप प्रतिष्ठा श्रीसूरिजी से करवाई। अठाई महोत्सव किया, चैत्र शुक्ला १५ को बजद्री के सा० काला, कीरतसिंह, होता, भोजा आदि विधि समुदाय तथा मंत्री ऊदा आदि के साथ संघ ने प्रयाण किया। श्रीजिनपद्मसूरिजी भी लब्धिनिधानोपाध्याय वाचक अमृतचन्द्र गणि आदि १५ साधु और जयद्धि महत्त- रादि ८ साध्वियां सहित संघके साथ पधारे। यात्री संघ पूर्व निमन्त्रित सपादलक्षीय संघ के साथ मिलकर नाणा तीर्थ गया। सा० सूरदेव आदि ने इन्द्रपद ग्रहण किया, मोखदेव ने श्री वीर प्रभु के मन्दिर में २०० 5 चढ़ाए। वहां से क्रमशः आवू जाकर समस्त संघ ने लूणगवसही, बिमलयसही और तेजसिंह विहार के दर्शन किए, मोखदेवादि ने इन्द्रपद ग्रहण किए । महाध्वजारोपण, अवारित सत्र आदि महोत्सव किए। भगवान के भण्डार में ५०० रूपये समर्पण 'किए । वहां से प्रल्हादनपुर के स्तूप की श्रीजिनपतिसूरि मूर्तिको मुद्रस्थला ग्राम में संघ सहित वन्दन कर जीरावल्ली पधारे। वहां के भंडार में १५० की आमदनी हुई । वहां से सबलोग चन्द्रावती गए सा० झांमण, कूपादि ने स्वधर्मीवात्सल्यादि द्धारा संव का बहुमान किया। श्री ऋषभदेव प्रभु के मन्दिर में २०० रूपये की आमदनी हुई।

" दादा श्री जिनकुशलसूरि चन्द्रावती से प्रस्थान कर आरासन में नेमिनाथ आदि पंचतीर्थी को चन्दन किया, वहां के भण्डार में संघ ने १५० । रूपये दिये । वहां से तारंगा जाकर श्रीकुमारपाल महाराज के बनवाये हुए अजितनाथप्रभु के मन्दिरका दर्शन किया। संघने २०० रुपये सफल किए। तारंगा से लौटकर संघ त्रिशृङ्गन आया । मन्त्रीसांगणपुत्र मंडलीक, बयरसिंह, नेमा, कुमारपाल महीपाल आदि ने अपने राजा महीपाल के पुत्र महाराजा रामदेव को वीनति कर सरकारी बाजित्रों के साथ संघ का प्रवेश उत्सव किया। पूज्यश्री ने विस्तार से चैत्यप्रवाड़ी की। संघ ने पार्श्वनाथ प्रभु के सन्मुख १५० भेंट किए। लघु वयस्क प्रतिभाशाली आचार्य श्रीजिनपद्मसूरिजी महाराज के गुणों की प्रशंसा सुनकर राजा रामदेव ने सेठ मोखदेव और म० मण्डलीक के समक्ष सूरिजी के दर्शन करने की उत्कण्ठा वताई। दोनों श्रावकों के आग्रह से महोपाध्याय लब्धिनिधानादि के साथ सूरिजीराजसभामें पधारे । नरपतिने सिंहासन से उठकर स्वागत पूर्वक वन्दनाकर सूरिजी को पाट- पर विराजने को कहा, पूज्यश्रीनेराजाको धर्मलाभरूपी आशी- र्वाद दिया। मुनियों के विराजने पर श्री सारंगदेव महाराज के व्यासने अपने काव्य की व्याख्या की। उपाध्यायजी ने व्यास महोदय की रचना में क्रिया सम्बन्धी त्रुटियां बतलाई इससे राजा रामदेव ने संतुष्ट होकर सूरिजी और उपाध्यायजी की बड़ी प्रशंसा की सूरिजी ने तत्काल काव्य निर्माण कर - दादा थी जिनफुशलसूरि राजा रामदेव का वर्णन किया । राजा साहब ने उस काव्य को विकट अक्षरों में लिखवाया, पूज्यश्रीने काव्यके अनेकों अर्थ कर राजाकोचमत्कृत किया ।इसके बाद समस्त संघ चन्द्रावती होता हुआ बृजद्री लौट आया। सेठ मोखदेवने राजा उदयसिंह आदि के साथ प्रवेशोत्सव किया सूरिजी का चौमासा वहीं हुआ। प्राचीन गुर्वावलि में यहां तक का ही वर्णन है। अन्यान्य पट्टावलियों में लिखा है कि जब आप सं० १३६० में वाहड़मेर पधारे, तब वहां के कुलधर श्रेष्ठी के कराये हुए श्री आदिनाथ और महावीर प्रभु के बड़े मन्दिर में दर्शनार्थ पधारे। प्रवेशद्वार छोटा और मृत्तिए बड़ी देखकर बालस्व- भावसे अपनी मातृभापा सिन्धीमें उपाध्यायजी से पूछा" व हा णंढा बसही वडीअन्दरि किउंमाणी आहइ!" तब प्रत्युत्तर में उपाध्यायजीने उसका समुचित समाधान किया । वहाँसे विहार कर पाटण पधारे। सरस्वतीनदीके तटपर विश्राम करते हुए मनमें सोचने लगे कि प्रातःकाल पाटणका महान संघ वन्दनार्थ आवेगा, मैं उनके सामने चारुतया व्याख्यान न देसका तो संघ क्या समझेगा!गुरू श्रीने मुझे क्या जानकर इतने विशालसंघ का नेतृत्व सौंपा ? इस प्रकार चिन्ताग्रस्त श्रीजिनपद्मसूरिजी को सरस्वती देवी ने प्रत्यक्ष होकर वर दिया। प्रातःकाल में संघके वन्दनार्थ आने पर सरस्वतीकी कृपासे "अन्तिो भगवन्त इन्द्र महिता" काव्य द्वारा बहुत ही मनोहर शब्दोंमें व्याख्यान दिया। सारे संघ ने इस घटना से चमत्कृत होकर महाराज , “७८ एकाइ प्रदेशि दादा श्री जिनकुशलसूरि तेह कन्हा भोजन सामग्री घृत तदुल पिष्टकादिक गरथि करि लेवालागउ तिसइ श्रीउधरण पणिदेव नइसंयोगि तिहांआव्यउ । ते श्रावकजाणीजुहार जुहार करी आपणइ गृहांगणितेडिअंगोह लि करावी , भली पट्टकूल तणी धोवति वेवइ जणा पहिरी देहरइ देव पूजा करिवा नीकल्या छइ । तिसीइ उद्धरण तणी कलत्र पणि मला अपूर्व वस्त्र पहिरी ओढ़ी हाथ कच लडी लेइ निकली। कचुलड़ी मांहे एकइ प्रदेसि कुसुम केसर .. पांच सात एकइ प्रदेसि वि च्यार नवा सखर सुरंग चनडी घाती कचु लड़ी लेइ ऊधण तणी कलत्र पणि देहरा भणी जायइ छइ... देखि रामदेव साह नइ मनि विस्मय ऊपनउ । कित्यउ स्वरूप । देहरड़ जातां घाटड़ी अनइ चूड़ा कांइ ? मनि सांसइ उपनइ हुंतइ कोइ एक पूछ यउ । एहड़ी घाटड़ी काइ देहरइ लेइ जायई छइ। तिणि का। ए श्रीऊधरण नी कलत्र महापुण्यात्मा सर्वज्ञ तणा शासन नइ विपइ चतुर । देहरइ जाता कोइ श्राविका चूड़ा पखइ देहरा जाता आवतां देख दूवली दोहली तेहनइ चूड़ा पहिरावइ। च नड़ी पखइ मिलइ तेहनइ चूनड़ी ओढ़ावइ । माडी दियइ तिणि कारणि ए भाग्य- वंत श्राविकासहुप्रकारे दीन दुस्थिततणइ कारणि,आधार दियइ इसी विवेकवंत श्राविका छइ । इसउ जाणी श्रीउद्धरण तणा घर नउ आचार देखी मन मांहि हर्ष करि हर्षित थयउ । मनि मान्यउ । जे श्रीजिनपतिसूरि वार्ता कही ते सत्य । संदेह भागड़ । अनेराइ घर तणा मनुष्य देव गुरू विषइ भक्तिमंत ।

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-
दादा श्री जिनकूशलसूरि
७६
सप्त क्षेत्रह। दस. क्षेत्रह।
आपण
वित्त वावता
देखी श्रीरामदेव साहु उद्धरण वाहेत्री तणइ पगइ लागी ।
आपणपाउ जणाव्यउ । जेहुंताहरी परीक्षा करवा भणी आव्यउ
टुंतः। श्रीजिनपतिसूरि ताहरी वर्णना करइ । मइ
जाणियउ ते फिसउ छइ । तिणि कारणि हुं अत्र आव्यउ ।
त: सांप्रत आज ताहरउ घर तणउ आचार दीठउ । मन संतोप
पइठ । संशय दूरि नाठउ । जिन शासन नइ विपइ सापुरूप
रत्न हुवइ तड ए वार्ता जुगती हिजिदइ। तउ धन्य अनइ ते
श्री जिनपतिसूरि पणि धन्य हुँ पिण धन्य । जे इसा साहमी
तणउ मुख दीठ । इसी परि आपणपउ धन्य मानतउहुंतउ
भली परि श्री उद्धरण मोकलावी रामदेव साहु श्री अजयमेरि
आपणइ नगरि आवी श्री जिनपतिसूरि वांदी नमस्कार करी
खमाव्या । आपणउखेदि गाम गयां तणउ वृत्तान्त कही खमत
खामणा कीधा । इस श्री जिनपतिसूरिजी हुआ । अथ उद्धरण
तणउ वृत्तान्त लिखियइ दइ ! ऊधरण आगइ कोमल हुतउ ।
परड श्री ऊधरणि खेड़िनगर महा उतंग तोरण प्रसाद कराव्यउ
संपूर्ण प्रसाद नीपनउ । तिवारइ प्रतिष्ठा तणउ मूहर्त गिणाव्यउ
कोमल आचार्य प्रतिष्ठा करिवा भणी तेड्या । ते आचार्य
अनेट स्थानिक प्रतिष्ठा करिवा पहुंता। तिवारइ उद्धरण
सचिन्त थयउ । समस्त सामग्री प्रतिष्ठा तणी तउमेलि हिव
किम फीजियड़। तिवारद श्री उद्धरण तणी कलत्र सरतरांनी
दीकरी टुंती। तिणि फार श्रीजिनपतिसूरि फन्हां प्रतिष्ठा

८० दादा श्री जिनकूशलसूरि करावउ । तिवार प्रतिष्ठा करावी मस्तकि वास घताव्या। खरतर हुआ। 'वारसए पणयाले, विक्षमसंवच्छराउ वइक्कंते । ऊद्धरण केड़ पमुहा, बाजहड़ा खरतरा जाया ॥१॥ अजे सीम उद्धरण छाजहड़ तणउ केड़ खरतर हूअउ श्री उद्धरण महतानउ पुत्र कुलधर मंत्रीश्वर प्रवर्त्य तिणि कुलधरि श्री जिनेश्वरसूरि तणइ वारइ श्री वाहड़मेरि उत्तंग तोरण प्रसाद कराव्यउ । तेह तणइ वंशि श्री जिनभद्रसूरि सरीखा गुणवंत गुरू प्रवा॥ श्री॥ (हमारे संग्रह के एक प्राचीन पत्र से )

परिशिष्ट (ख)
श्री जिनकुशलसूरि कृति संग्रह
(१) श्रीजिनचन्द्र चतुःसप्ततिका
.
सिरि जिणंचन्द भणीसर,-पाए नमितमम्मि रविपाए
काह गुण कण थवणं, निय सुगुरूणं गुणगुरुणं ॥१॥
जइ जगजणे हविज्जा, परमाऊ ताणिय पउणमइकलिओ।
तहवि नतीरइ तुह गुण, -गण गणणे कहमह थविओ ॥२॥
तह वि पइ चित्त भत्ती, अचिंत चिंतामणि पसाधाओ।
पहविस्सइ महसत्ती, तुह गुण थुणणे किमच्छर ? ॥३॥
तुम्हाण थुत्ता हलं, पवराण नराण जस्थ उप्पत्ती ।
कित्ति पड़ागो रेहइ, सो बसो भुवण भवणु वरिं ॥४॥
जत्य पहूणं तुम्हा-ण तिहुयणत्ताण करण थवयरणं ।
कि चुजं सो देसो विरक्खाओ मार वत्तित्ति ॥५॥
तुह ससिणे आणाथणं, जमण महिमामिसेण जेणकयं ।
तेण पसिद्धं जायं, सम्माणयणित्ति
नामेणं ॥ ६॥
सिरि मंति देवराआ, जाउ जणउ पहूण तुम्हाणं।
कह मन्नहा सरीरे, जयंत कुमरुव्यवसिरि ॥७॥

८२
दादा श्री जिनकुशलसूरि
भर रयण रयण गव्मा, कोमलदेवीय मंतिणि जणणी।
४
२
3
१
वेय विलोयण तिहुयण, ससि मिय वरिसे तुहुपत्ती ॥ ८॥
विहि मग्ग सीस मेसो, भविस्सई महियलम्मि गुरूराओ।
इय विहिणा विहिया तुह, उप्पत्ती मग्गसीसम्मि ।।६।।
जम्मो पहूण तुम्हाण, विसुद्ध पक्खाण सुद्ध पक्खंमि ।
तुह जम्म महिम पुन्ना, रित्ता वि चउत्थिया पुन्ना ॥१०॥
तुम्हाण नियपहूणं, सया पसन्नाण पिच्छिऊण दयं ।
जाया दिसा विभागा, पसन्नया हरसिया इव्व ।। ११ ।।
तुह नीरयस्सगुरू कवि, बहु तारय मंगलस्स जम्ममि ।
रय रहियं गुरू कवि वुह तारय मंगल जुयं गयणं ।। १२ ।।
चन्द कुल भासयाण सयल कल कलाव तिलयाणं ।
पिच्छिय उदयं तुम्हाण, धवलइ भुवणं करेहि ससी ॥ १३ ॥
जग उज्जोय कराणं, जग चक्खूणं च तुम्ह जम्मखणे ।
कर मिसेण रविणा, कोसुभ धया दिसा सुकया ॥ १४ ॥
अंवे लच्छि सरस्सइ, नियल बिदलेहि कमल पत्तोहि ।
वंदणमाला वधह, जं जम्मो जुगवरस्स हुणा ।। १५ ।।
जिण जम्मं व सुयर, जम्मं तुम्हाण जणिय आणन्दं ।
जह कस्सवि गेहंगणि, अवयरणंकप्परुक्खस्स ।। १६ ।।
उज्जोयस्सइ एसो, कुमलमलं
कुमलमलं अम्ह खंभराउव्व ।
हय नाऊण पियरेहिं, नाम कयं खंभराउति ॥१७॥

दादा श्री जिनकुशलसूरि
तुह बालचन्द मस्सव, वाल वत्या विलोय मोयवरा।
तुम्हाण जुगवराणं, किं कि नवि होई सुहजणय ॥ १८ ॥
तुह जह सरीर बुढढी, वदति तहा तहा कला सुगुणा ।
जह कप्पद ममूलो, वच पट्टति साहाइ॥ १६ ॥
तुम्हाणं सम्पत्ते, नवमे वरिसे य जणिय जणहरिसे।
सिरि जिणपयोह जुगवर, देसणाधन जलहरो बुट्ठो ॥२०॥
तुम्हाण ऽरिकदेसो, हरिसंकुरपूर पूरिओ धणिय।
गय भवरविसंतावो, जाओ नेव्वे यफलाभिमुहो ॥२१ ।।
सिरि जिणपवोह जुगवर, पाए गहिऊण विन्नवइ कुमरो।
दाऊण दिक्ख तरिणी, नित्यारह भव समुदाओ ।।२२।।
युगसिहि भुवर्णिदु मिये, वरिसे जिट्टस्स सुद्ध तइयाए।
चयनिय पयसिरि जुग्गं, जाणित्ता देइ दिक्खगुरू ॥ २३ ॥
एयंमि खेमकित्ती वित्यरिही वित्यरा सयल लोए।
इय विहियं तुह गुरूणा, अभिहाणं खेमकित्तित्ति ॥ २४ ॥
सिक्खा चामर जुयल, गुरु सासण धवल छत्त सोहिल् ।
सीलंग सहस जोह, पंच' मव्यय गय वरढं ।। २५ ।।
संजम सिरि गुरू रज्ज आणवज्ज सयल दुढढ़ गई महणं ।
गुरू राय माणपत्त, मुत्त तुमए जयमएण ॥२६॥
गुणमणि विज्जा नइ जुय, अभिसेयविवेयवर समुदाओ।
पुरिसुतमेण तुमए, पत्ता पत्तण विज्जसिरि ॥२७॥
वागरण छन्द नाडय, पमाण सिद्धतपमुह पिज्जाओ।
लीणा तुम्द सरीरे, जहा समुद असंख नई ॥ २८ ॥

दादा थी जिनकुशलसूरि अहसिरि चरम जिणुत्तम- कम कमल पवित्त विक्रमपुराओ। माण क्लेणं परिभा, विऊण निय आउ पज्जत ॥ २६ ॥ जुगवर नवनवुच्छव-पवरे जावालिपुरवरे पत्तो। सिरि जिगपवोह गुरूणो दिय गुरु विवुह कम कमला ॥३०॥ तत्थ सिरिवीर विहि चे -इयंमि सुरवइ विमाण तुलं मि । तेरहसय इगयाले, इगयाले, वइसाह सुद्ध तीय स्मि ।। ३१ ॥ सिरि जिण पवोह गुरुणा, निय हत्थेणं सगच्छभारधुरा । गुण रयणाणं तुम्हाण, संठविया संघपच्चक्खं ॥ ३२ ॥ मंति कुल कसलदिणयर, नाणामइ रयण रोहण गिरिस्स । तुह सूरि मंत नासो, गुरूराएहिं कओ ठाणे ॥ ३३ ॥ जिण तुलरूप तिहुयण-आणिदण चन्द चन्दिमा पडिम । सिरि जिणचन्द सुणीसर, इइ नामं देइ तुम्ह गुरुः ।। ३४ ॥ सेयंस कुमारेणं, दिन्नमिक्खुरसं। स पियामहस्स पुत्वं, अक्खय तीया तओ पव्वं ॥ ३५ ।। अक्खयनाण निहीणं, दिणम्मितुम्हाण इत्थ पहमहो । संपइ वट्टइ पव्वं, अक्खय तीयत्ति विक्खाय ।। ३६ ।। तुह वरपत निवेसिय, सगच्छभर मंत सार सुह चित्तो। सिरि जिणपबोह सुगुरू, अणसण बिहिणादिवंपत्तो ।।३७ ।। गुण सुमगुरूणा गुरूणा, तुमए जण वंछियत्थ सुरतरुणा । गच्छ पहुत्तं पत्तं, जुत्त वित्थरिय वित्थरिय साहेण ।। ३८ ॥ तुह विबुहरायपट्टाभिसेय समयंमि नंदि तूररवो। हरिसयरो चिबुहाणं, सज्जो सघटा कलुरवुव्व ।। ३६ ॥ अक्खयधारा दादा श्री जिनकुगलसूरि पवयण माया अट्टम, तुह अविहि वरमणि मंगलायारं। नाण सिरि चरणसिरि, उत्तारणय कर ति महे ॥ ४० ॥ पढम अवत्यं सत्ते, नर सह ले, तुमंमि · गुन्नराए । परिहवई नवि को विहु, जिय गयघड़ सोंहपो एव ॥४१ ।। विबहाहिवेण पूरिय, कामेणगंध अमिय हिण । सञ्चवियं तुमएञ्चिय, अथो वियज्ञायाए पुत्तो॥ ४२ ॥ तुह स्वसिरि सरूवं, उवमा ईयं मयूह सोहिल्ला किर. पंचविस, इयम, लिणावयारं कहेड जए ।। ४३ ।। না नरवइणा जह, सग्गो सग्गा हिवेण जह भाई। पासाओ विषण व,.तुमाए पहुणा तहा गच्छो ।। ४४ ॥ मोहम्म सामिवंसो, छत्तण व सोहि हीउ गण । इय तुम्ह उत्तमंगं, छत्तागारं कयं विहिणा ॥४॥ मवंग संदरंग, बाहु सु साहं करगुली पत्तं । नहाकिमलयंसि च फलं, सहकार तमन्य तुह भाइ ॥ ४६॥ भालस्थलं विमालं, अमि चन्दोचमं मिरी निलयं । पुराणमिरी कीडल्यं, कीडा ठाण कयं विहिणा ।।१७॥ तुह मुहचन्दमपुज्यं, विमल फल कला कलावनिम्युदयं । फयमययसिरि वासं. तमोहरं अमिय निम्मरणं ।। ५८ ॥ फयजगरण आणंद, गह निग्गजाल जडिम हरें । ग्यणियरोनं पिच्छिय, मुत्तं पत्तो जिओ भमदE 1 निय बंधव निय सेवय, मेरव ताराणये सणं विहिय । लोयण दसण मिसेणं, सलिणा तुह मेवणाइ का ।।५।।

८६
दादा श्री जिनकुशलसूरि
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भइणीव सिरि वाणी, चिट्ठइ तुह वयण कमल कुलतिलए ।
सइ वेरे तुम्हाणं, अणप्प माहप्प मिव जयई ॥५१ ।।
कलिकाल निविड कदम, उद्धरियसगच्छ सकड भारस्स ।
वसह धवलस्स मंसल -खंध सिरि रेहए ठाणे ।। ५२ ।।
कर कमले वसइसिरी, पासायच्छत्त चामरधयाई ।
इय कर फरिसे तुम्हाण, तज्जोगो जायई नराण।। ५३ ।।
यिय रयणायरे तुह गहिरिम गुरूए मई नई भरिए।
समया मिय आहारे, वसइ सिरि वर जिणा निच्च ।। ५४ ।।
पाया सुरतरू पाया, तुह विहिया विबुह से विया विहिणा।
निय निम्मिय तिहुयण जण, मणइठ्ठ दाऊकासेणा ।। ५५ ॥
निरइ स एकाली तुह, साइ सायज्माण नाण रूवाई।
दण मिच्छदिट्टी, न को वि इह विम्हिओ जाओ ॥ ५६ ।।
तुह देसणा रसायण-मगुदिवसं जे नरा अणुवन्ति ।
ते सम्मदिठी वलिणो, लहति अजरामर ठाणं ॥ ५७ ।।
तुह चउहा धम्म कहा, चउ दुग्गइ चउकसाय निग्गहणं ।
काउं जुग जुगवर, चउ जुगवासीण · संजाया ।। ५८ ।।
तुह मुह हिम सेलाओ,
सरस्सई निस्सप्पवरां ।
अक्खलिया अच्छेरा, मुत्ति सिरी सग्गसुह जणया ।। ५६ ।।
सिरि कन्नदेव सिरि जित्तसीह सिरि समरसीह रायाणो।
तुह पय पंकयछप्पय, लीलं कलयंति गुण लुद्धा ।। ६० ।।
कय जुग जुग्गं सव्वं, कलिंमि तुठ्ठण तुह' कयं विहिणा।
कय जुग भावा दीसइ, जत्थ तुम : विहरसेनणं ॥६१ ।।

८७ दादा श्री जिनकुशलसूरि वित्र पइट्ठा दिक्खा, पयदावणपमुह पमुह किच्चेह। सुपसत्या तुहिहत्या, जयंमि न हवंति कस्सुत्थं ।। ६२॥ सिरि सत्तुंजय रेवई, जिणवर गुरू तित्थपमुह तित्थेसु । जत्ता जुगलमिसेण, पायादिव सिव करा जाया ।। ६३ ।। देसेसु गुजरत्ता, सुमारवत्ता सवायलक्खेसु। सिंधुमरुत्थल वागड-ढिल्ली देसेसु य विहाण ॥ ६४ ॥ महि महिला वच्छत्थल, लच्छी जणया कया तए पहुणे । महुरा गयउर जत्ता, भवरिउ जत्ता असुह चत्ता ।। ६५ ।। लद्धीए सिरि गोयम स्वाइ गुणेहि वयरसामिगुरू सीलेण थूलिभद्दो, पभावणाय सुहत्थी य ॥६६॥ निय आउय पज्जतं, जाणित्ताऊण नाण औ तुमए । भेरव रोरव विसमं आगामिय कालमसिवकरं ॥ ६७॥ नियसिस्साणं रायि-द चंदसूरीण मइ पस्साणं । निय पय जुग्गं सिक्खं, संघ समक्खं कहेऊणं ॥६८।। कायव्य गुणपवरो, वाणारिय कुसलकित्ति गणिसिस्से । जिणकुसलसूरि सुगुरू-त्ति नामपुम्वेव अम्ह पयं ॥ ६ ॥ मिच्छा दुक्कड गयवर मारूढो भाव वज्ज सन्नाहो। जिणचंद सुगुरू वीरो, अणसणखग्गेण हणिय रिऊ ॥ ७० ॥ रिउ मुणि सिहि ससि परिमिय, वच्छर आसाढ़ सुद्ध नवमीए । पत्तो सुरवर लच्छी पुराउ सिरि कोसवाणाओ || ७१ ॥ चन्द कुलमह दिवायर, रयणायर सुगुण पवर रयणेहि । वाणी मुहा मुहायर, नमो नमो तुम जुगपवर ।। ७२ ।।.

८८
दादा श्री जिनकुशलसूरि
मह तुह चरिय समुद्द वाणी पाणी पहारिया पप्प ।
चित्तूण गुणजललवं, पायउ भुवणं मया (प)तियं ।। ७३ ।।
सिरि जिण कुसल गुरूहिं, जुगवर जिणचंद निय गुरू एवं ।
परमाऊ भत्तीए, थुणिओ संघस्स दिसउ सिरि।। ७४ ।।
।। इति श्री जिणचन्द्रसूरि चतुः सप्ततिका समाप्ता !!
२ श्री शांतिनाथ चरित्र
सिरिसंतिनाहचरियं, माणसघउमाय सव्वरसभरियं ।
सत्थसियस्थयकलियं शुणामि सुद्धो विजिय अमियं ।।३।।
जोवि वाहाहि चरमोयहिं लंबए, जोवि पाएहिं गयणंगणं लंघर
जोवि मणियित्तु तारागणं सक्कए,
सोवि तुह चरियगुणकित्तणं सक्कए ।।२।।
तहावि गोसामि तुह प्पसाया, गो कामधेणू मइ दुञ्जयस्सा ।
मुहंगणे सव्व समीहियत्था, खीरस्स हेऊ वीसस्सई मे ||३||
तुहगुणपरिवारो मंतिओ कित्तिसारो,
अगणियसिरिजुत्तो जेमियं तत्थ पत्तो।
मह मुह विण वाणी मोहणी अप्पसत्था
बहु मुणि विहत्था जेमि नो समत्था ॥४॥

दादा श्री जिनकुशलसूरि ८६ सवुद्धि लच्छी अणुसारओ मे, जेमिस्सहं केविबुह प्पसायओ। पावुन्नओ होइ गिहाणुसारओ, गिहन पाहुन्नणु सारयंजओ ॥६॥ सव्वळू विमाण वितइ जुमुक्तु, सव्वट्ठ गुणेहि वितन्नु चुक्क । भद्दासिय सत्तमि भद रम्मि, संपत्तउ पट्टणि गयपुरंम्मि ॥६॥ सिर वीससेण भूवय गिह मि अयरोयरि सरवए सिरि निहम्मि उयन्नउ सामिउ रायहंस, दोपक्ख विसुद्ध कुलावयंसु ॥७॥ अवज्झाए पवत्तिय वप्पमाय, तुह महियाइ दिहि विजय माय । तई आसियमाया गूढगभ, नर रयण सुधारण रयण गव्भ ||८|| जंभारि निदेसिय तिरियजंभ, तुह ताय गेहि सेवहि अचंभ। निखवई कंचण रयण रुप्प, दट्छु जणणसवुट्ठिय अणप्प ॥६॥ जिट्ठो मासाण जिछो तुह जणण वयस्सेय कल्लाण रोह । सामा वी तेरसी सा तिहुयण पमयुज्जोयणाओन सामा ॥ सव्वो सो विस्ससेणो तिजय गुण चमदेव वित्थारणेणं । पुत्ते जाए भिजाए तइसय मचिरा सगुणेहि विरित्था ।। १०॥ चलियासण छपन दिसिकुमारि आगच्छद, सूयइ भवण बारि। आयारिणि अप्पिणि सूई कम्मु, निम्माई पसंसइ जणणि धम्मु ॥ ११॥ चलियासणु पढमिंदो जाणिय जिण जम्मु ओहिणा तत्तो। जिण पडिरूवं ठाविय गहिय जिणं सुरगिरि पत्तो ॥ १२ ॥ घंट सुग्घोस सद्दण दस सुरवरा, दोय जोयस वरा वीस असुरेसरा ।

80 दादा श्री जिनकुशल सूरि , आगया तत्थ वत्तीस वितरवरा, कुणइ जिणजम्म अहिलेउ हरसुद्धरा ॥ १३ ॥ ईय तुह जन्मभिसेयं, काऊण ठवित्तु जणणि पासंमि । नंदीसर जत्ताए, पत्ता चउसट्ठिवि सुरिंदो ॥ १४ ॥ गम्भठिएण विहिया असिवोवसंती, सिंधुटिएणर विणुव्व तमो विसंती। नामग्गमंत ग्रहणेण करेसि संती, लोए जओ तुह अओ अभिहाणु संती ॥ १५ ॥ कुमरते पणवीसं बास सहस्सा निवित्त विकिरते। वत्ते नव निहिओ गुण निहणो तुह हबई ठाणे ॥ १६॥ नर रयणगु गणाहिब चउदस रयणाहिवत्तु तुह ठाणे । गय हय रहाण चुलसी लक्खा लक्खाय गुण चक्क ॥ १७॥ पायक गाम गामाण छन्नउइ कोडीओय पत्तेयं । गामागर नगराई गणाण का तुह विजय पहुणो ॥ १८ ॥ जक्खा सोलस सहसा बत्तीस सहस्स मउड़वद्धाय । चउसट्ठि सहस्स रमणी सेवई तुह तिहुयणप्पहुणो ॥१६॥ छक्खडं भरहं पसाहिउ चिरं भुजितु लोगंतिए । विनंतो पडिहारणिव्व वरिस दाऊण दोणं वरं । जिठे किण्ह चउद्दसीइ दिवसे रायस्सहस्सन्निओ। निस्खतो भरहस्सिरं तिणमिवं चिवासहस्सं वए (१) ।। २० ॥

दादा श्री जिनकुमालसूरि
६१
नाणेहिं तिहिं संजूओय गिहवासं नाव दिक्खक्खणे,
उप्पन्न मणपज्जवं तुह सुमित्त त्सालए पारणं;
चीयन्हे तुह पोस सुद्ध नवमीए वच्छरे केवलं ।
किचा घाइ स कम्म घाय ममलं छठेण दीवोज्जालं ।।२१।।
देव विरयई देव विरयई तुह' समोसरणु।
भवभीय भवियह सरणु रयण कणय रयणह पयारिण ।
संसार सायर वहणु पोय वाहु जिण तत्थ मंडणु,
सव्वह भासणुसारणय जोयण गार्मिणि वाणि;
बारह परिसह संसए उम्मूलय वखाणि ।। २२ ॥
धम्मु पभणइ धन्मु पभणइ पढमु जिण धम्मु,
गुत्तीहि समिईहिं समुदस पयार सत्तरस संजमु;
चउजाम म भड़ हणिय काम काम नव तत्त उजमु ।
वीयउ सावगु धम्मु तहिं वारस वय सिरि रम्मु ।
दाण सील तव भावणिहिं पालउ कय सिव सम्मु ॥२३॥
छत्तीसंगणहारिणो तुह गुणा वासट्ठि साहस्सिओ,
साहूणं तह साहुणी 'चउसए णूणाय सा बोहिया;
दोलक्खा नवई सहस्स सहिया सुस्सावगाणं तहा ।
लक्खातिन्नि सुसावियाण नवई संख सहस्साह्यिा ।। २४ ॥
ईय चविह संघं ठावइत्ती जिणते।
तई जह चउरंगाणीउ चकित पत्ते ।।
जमुईय सहीओ चक्षितित्यस्तिरीओ।
तई रसइ सुपत्ते पुन्नपत्ते कमेण ॥ २५ ॥

दादा श्री जिनकुशलसूरि सव्वाउ लक्खं वरिसाणु सम्मं, संपालिऊण खविऊण कम्मं । मासोववासेहिं नवेहिं साहू, सएहि जिट्ठासिय तेरसीए ।।२६।। मुत्तिकन्ना विवाहोतए पाविओ, केवलन्ताण संमत्त संभाविओ जोइ सोहाइ काओ वलुल्लालओ, निच्च सुक्खालओ इंसणुजालओ ।। २७ ।। जइवि पत्तउ जइवि पत्तर लोय अगंमि, आलोइय आलोयणिण सव्वभाव तेलुक संठिय; इगवीस गुण जुत्त तणु सिद्ध बुद्ध सुद्धप्प संठिय । तहवि तमच्चई जे थुणई झायई ताण नराण । कुणइ सुहुजलु सुगइ फलु ईयर फं (पू?) ईयराण ॥ २८ ॥ अहव नहचइ अहव नहचइ कोवि विवुहोवि, वि-सुवि सुरगुरुविदिव्व गुरु विसम सत्थ पारगु; तुह निरुवम अइसई परम महिम भरम पाथोहि पारगु । जह तारागणु संगणिउ जह गयणं गणियतु । न मुणिय जह गय समुजीव भव परियट्टणु पज्जंतु ।। २६ ।। कोहाईणं रिऊणं भवदण गहाण निच्च मुद्दजि ओहं, तम्हा किच्चा पसायं वयण वल मलं देहि सद्धम्म धम्म; दीव च्चारित्त संस्थां रिउहणणखमा सक्खमाओ फरीओ। जेणाह किंकरोते अरि विजयसिरिं सामिणो दंसयामि ॥ ३० ॥ सोह मग्गो भवेयं भव रवि तविऊ वाणि पीयूस कुडे, निस्सेमे चित्तरोहे नवनिहि वयणुत्ता पयत्था वसंतु; पाया आइच्चपाया तुह मह तिमिरु मूलणाए हवंतु ।

दादा श्री जिनकुशलसूरि ६३ धम्मा रामा चउद्धा सुर रयण तवे घेणु कुंभा फलंतु ॥३१॥ ईयतुह चरियं सन्देसि सप्पसंसं, जिणकुशल कयासं पत्त कित्ति प्पयासं इय मय कुसलंसं तेण नाण प्पहासं। भव मणु तिजए संसेवएयं जिणेसं ॥ ३२ ॥ ।। इति श्रीशांतिनाथ चरित्रम् समाप्तम् ।। श्री स्तंभनक पार्श्वनाथ स्तवनम् श्री स्तंभनांभोज विकास मित्र', स्तवीमि पाच विलसच्चरित्रम् सल्लोक कोक प्रमदैक पात्र, तमोविजैत्र महसा पवित्रम् ॥ १॥ सेढ़ी नद्युपकंठ खाखर पलास श्वेत धेनुक्षरन् क्षीरस्नापित पुण्य संगत जिन श्री देवताज्ञापितः श्रीद्वात्रिंशकया स्फुटं प्रकटितः श्रीस्तंभनेस्थापितः श्रीपार्योभयदेवइभ्य भयदेवेनांग लक्ष्मी कृते ॥२॥ स्वभावचापल्य रसाश्रितायाः श्रियो भवेत् स्तंभनतांगभासां । त्वत्पाद चिंतामणि सेवयाऽत्र श्रीस्तंभनेति प्रथितंसुतीर्थ ।।३।।

६६ दादा श्री जिनकुशलसूरि श्रीसिद्धक्षेत्रालंकार श्री आदिनाथ देव स्तोत्र विमलाचल विमलाचल चूला चूलामणिं महोवि पणिं प्रथमं श्रीजिननाथं स्तवीमि भक्त्या स्वशक्त्याच ||१|| त्वत्सेवया पूर्व महर्षि कोटाद्यो जयंतिस्म ससस्त शत्रु शत्रुञ्जयत्वंमकाम चेति वाक्याच्छत्रुञ्जयेति प्रथितं सुतीथं ॥२॥ अर्हदिवम्ब कदंब हंस पटला पुण्योर्मि माला कुला संसारोरुमरुस्थल प्रविलस श्वेदापनोदामला । श्रीशत्रुजय शैल तीर्थ सरसी प्रासाद पद्मोज्वला । सल्लोकोमृतदायिका विजयते संवच्छर श्रीकला ॥३॥ चिन्तामणि प्रमुख मुख्य पदार्थ जैत्र- स्त्वत्पादरेणु रण कोपि महो महिष्टः । यत्सेवया तनुभृतांस्वमनोति गाः स्युः स्वर्गापवर्ग सुख सर्ग जिनादि लक्ष्म्यः ॥४॥ यत्तीर्थ वृषभ प्रभु प्रभृतिभिः पादैः पवित्रीकृतं सिद्धि श्रीप्रियमेलकत्व विधिना श्री पुंडरीकेन च यक्तीथं श्रित जंतु संहति भवा कूपार पारीणता सेतुः श्रायस सौख्य हेतुरपर तीर्थकर्थतत्समं ॥५॥ दृष्टेयस्मिन् दृष्ट ए वात्र मेरु दृष्टियनाष्टापदाद्रिः प्रदृष्टः श्री संमेतोयत्र दृष्टे च दृष्टस्तीर्थे उष्टेयत्र किं किं न दृष्टं ।। नाभेयादिम पुंडरीक गणभृच्छ्रीसिद्धिविश्राणियत् यत्स सौरभ पुंडरीक सशं भव्यालि संकर्षणे दादा श्री जिनकुशलसूरि ६७ यत्संसेवक कर्महस्तिह्नने श्रीपुंडरीकायते । यस्येतीव बभूव तू नम वृथा श्रीपुंडरीकस्तथा ॥६॥ संसारापारवारां निधिपतित नृभिर्भाग्यभंग्यात्रलब्धं तीथं शत्रुञ्जयाख्यं प्रवहणसदृशं, पुण्यपण्यप्रपूर्णम् ।। ७॥ ज्योति यत्समग्राग्रिम पथकथन व्यग्र निर्यामकाग्र्यः श्रीमन्नाभ्यंगजन्मा शिवपथ पथिकान् वः सपायाद पायात॥८॥ क्षेत्रोत्र चित्र फलसद्विविधान पात्रे -सत्पात्रदानसुतपोमुख वीजसुप्तं औपम्यमुक्त फलसिद्धिमुपैति सिद्धि क्षेत्रप्रसिद्धिमितियद् वने वभारा ।।६।। नित्योदिती वियति संमृतिनाश हेतू लोकत्रयांतरतमः प्रतिघाति पादी। नाभेय विवयुगनूतन पुष्पदंतौ शत्रुञ्जयोदयगिरिविंभरां वभूव ॥ १०॥ यन्मूर्तिधनसारसारघटिता किं सौरभा भोगतः किंवा गण्य वरेण्य पुण्यरचिता पुण्यप्रसूतित्वतः किंवाक्षीरसरस्थमिदलिकैः कृप्तामलोच्छित्वितः करित्थं न वितळते कविवर रोपन्यमानातिगा ।। ११ ।। सूर्याचंद्रमसौ परास्तमहसौयत्कास्य लक्ष्म्या ध्रुवं सव्या सव्यदृशोत्यलेन भजतस्तच्छीकृते यन्मुख चिंतातीत मतप्रदान विजितारिंचतामणी संचया- . १८ दादा थी जिनकुशलसूरि श्चक्र यत्क करांहि युग्मलगनं खन्नखमच्छद्मतः ।। १२ ।। दर्श दर्शत्वदीयं वदनहिमरुचिनिमिलस्तांदशेमे पायं पायं सुधौधोपमवचनरस हर्पपूौच करें स्तावं स्तावं गुणालिं नवरसरसिकांस्याद्रसज्ञा रसज्ञा शेपाण्यंगानि यात्रा प्रणमन महतैः स्युः कृतार्था निमेद्य ॥१३॥ पिता माता भ्राता प्रभुरसि सुहत्त्वहितं करोऽग दंकारस्त्वं मेगुरूरशरणस्यासि शरणं । त्वयिप्राप्ते प्राप्ता नरसुरपति प्राज्यकमला शिवश्री साम्राज्यं करतलगतं चाद्यसमभूत् ।।१४ ।। ऊचुः केचिद्तत्वबुद्धिकलिता उच्चाचवर्जल्पने देवान् ब्रह्ममुकुन्दरुद्र सुगतानाराध्यता हेतवे रागादिश्यतोह दुत्तमरमयोग च्चिदात्मत्वत- स्त्वामेचात्रभवंत उज्वलधियो देवाधिदेवं विदुः ।। १५॥ विमल विमल शैलात्युच्चचूलावतंस श्चिकुर निकर नीलां भोज संपूजितांसः इतिनुतगुणलेशः श्रस्तकमप्रवेशः प्रथयतु कुशलेशः सिद्धितामादिमेशः ॥ १६ ॥ - ॥ इति श्री सिद्धक्षेत्रालंकार श्रीआदिनाथ देव स्तोत्रम् ॥

दादा श्री जिनकुशलसूरि ६६ श्री पार्श्वनाथ लघुस्तवन 1 1 IN त्रिभुवन जिनतारण गुण निधान । भुवनत्रय पावन सावधान । मेचक कर दोपाकर पिधान ।- जय पार्श्वजिनेश्वर घन समान ||१|| उपसमरस निर्जित' वैर जात- नत जनमत पूरण पारिजात । जगदानंदन विदितावदात । जय वामानंदन जनित सात ||२|| संसृति नीराकर वर तरंड । कामितदायक गुणमणि करंड । जय वामा संभव देवदेव । देवासुर सारित चरण सेव ॥ ३ ॥ सिव कमल विलास मराल वालं । मुनिमा नस कीररसाल साल रजनीकर-दल सुविसाल भालं । जयपदकजनत मुर भूमि” पाल || कमठासुर कपट तपोनिवेस । वारण वारण दारण मृगेस । प्रगटीकृत सुकृत कृतीश गेय । जय जगदादेय सुनाम धेय ॥५।। कल कजल ताल तमाल नील । शिव पद संदनांगण विहित लील। वामोदर रोहण धरण हीर । जय दरभर धाराधर समीर ॥६॥ जय जय-जयकर जयराज पल्लि । मुखमंडन गुणगण कुसमवल्लि । श्रीजिनचंदसूरि गुरुनुत जिनेस। कुशलांबुज वोधनवासरेस। ७॥ [प्रति अभयजन ग्रंथालय, म०(१) ६६२६ (२) ६६७ ] इतिश्री पार्श्वनाथ लंघुस्तवनं १ तर्जित । २ जिन, जिनमत । ३ जिनत । ४ सारति ५ भोमि । ६ वारुणदारुण । ७ सुगेय । ८ घेय । ६ पल्य । १० वासुरैण। ।

१०० श्री दादा जिनकुशलसूरि श्री पार्श्वनाथ स्तवन - ॐ ह्रीं श्रीधरणोरुगेन्द्रमहितः श्रीसप्त भोगोल्लसन् माणिक्यावलिकांति संचयदुति' ध्वांतप्रपञ्च प्रभोः श्रीवामोदर चारुपंकजवनी मात्तंड विम्बायते । ..'श्रेणि विमतिनो विजयते श्रीपार्श्वनाथो जिनः ।। २।। ॐ कारी ह्रींकारी विस्फारवर्ण मंत्र संघात हृत्पुण्डरीकपीठे स्मित तरां पार्श्व तीर्थकरं ।। २ ।। ध्याय ति स्फटिक श्वेत"मभिप्रेतं परं पदं । ह्रींकारी श्रीवशीकारी चतुरं पार्श्व तीर्थपं ।।३।। लभंते कमलां वृद्धि बुद्धिं सिद्धि सपुत्रतां । राज्यं प्राज्य कलत्रं च सम्यक्त्वं च सुनिर्मलं ॥४॥ निःशेप 3 मंत्राक्षर चारू५२ मंत्र श्रीपार्श्व तीर्थश्वरनामधेय। सदास्मरामः प्रमुदं महात्म्यः प्रीत्यानमामः कुशललभामः ||शा ।। इति श्रीपार्श्वनाथ स्तवन ।। . १ रुत,दित । २ वने । ३. विमन्थनो । ४ स्मृति । ५ श्यैव, ६ मंभिप्रेत्य लभप्रीत । ७ वशीकारैह, वशीकरः । ८ रिद्धि । सुपात्रता, सुपुत्रताम् । १० प्राज्यं राज्यं पिवत्रं च । १० निःस्सेसह, । यशसह । २२ च्यार मंत्र्यं ।

दादा श्री जिनकुशलसुरि १०१ श्री जिनकुशलसूरि विरचित श्री चतुर्विशति जिनस्तुति नाभेयाजित वासुपूज्य सुविधि श्रेयांस पद्मप्रभान् श्री शांतिशशिशंभवार सुमतीन्नैमि नर्मि शीतलम् धम्म पार्श्व सुपार्श्व वीर विमलानंतास्तथा सुनतम् । कुंथु मल्ल्यभिनंदनौ नुत जिनानेताश्चतुर्विशतिम् ॥ १ ॥ : जंबूद्वीप विदेह पुष्करवर द्वीपार्द्ध सद्धातकी । खण्डेषु प्रवेरपु ये च भरतेवेरावतेपुस्थिताः। नम्रा खंडलमण्डली मधुकरं श्रेणीभिरासेविता । स्तेपातीर्थकृतामुदेभवतु पादारविंद द्वयी ।। २ ।। उत्पादादि पदत्रयी समभवन्मूलम्बभूवुईला । न्याचार प्रमुखांग का निविपुलाः शाखाः प्रशाखानयाः । ज्ञानानि प्रसवोदयः फलमभूत्स्वर्गादि संपत्तयो । यस्यासोजयताजिनागममहावृक्षश्चिरंभूतले ॥ ३ ॥ गौरी सैरिभगामिनी पविधरा वनांकुशा शृङ्खला। ऽच्छुप्ताचक्रधरा फणींद्रमहिपी सर्वायुधाः रोहिणी। प्रज्ञप्तिमृगगामिनी दुमकरा काली महाकालिका। .. मानस्यासहपोडशापि कुशलान्येताः प्रयच्छं पुनः॥४॥ ॥ इति श्रीचतुर्विशति जिनस्तुतिः ॥ श्री जिनकुशलसूरि कृताः (पत्र० १ फूलचन्द्रजी झावक संग्रह ) १०२ दादा श्री जिनकुशलसूरि श्री पार्श्वनाथ स्तुति ट्रेद्र किद्रायम पधुधुगि धोंधों द्रसकि धरधप धोरवं । दोंदोंकि दोंदों दागुड़िद दागुड़ि दुगिद्रमकि द्रणणण द्रणवं । झिझि झंकि झमें झणणरणरणनझकि नजजन संजनं । सुरशैल शिखरे भवतु सुखदं पाश्व जिनपति मज्जनं ॥१॥ कठिरंगिनि थंगिनि कटथि गिद्रां धधकि धपनप पाटवं । गुण गुणण रणरण रणकि गणें गिणणि गुणगण गौरवं । झिम झोकि झमें झणण रणरण नझकि नजजन रज्जनं । कलयति कमला कलित कलमल कमलनी समहे जिना ॥२॥ ठिकि कि ठंठे ठिहरि ठिहरकि ठिहरिपट्टा तांड्यते तालोंकि लोलों खिद्रखिण नेंखिद्र खिण वाद्यते । उकि उकथंगि कथं गिनि थोंगियोंगिन कलरवे । जिनमत्तमनतं महिम तनतामतनमतनत मझवे।। ३ ।। खंदांखु खू दांखु खुडदि खुदां खुड़िद दोंदों अबरें। चचपटिचचपटि रणकि धू णणे द्रणकि तेंद्र डंबरे। नहिसुरगि मपध पनि, पमगर ससस्ससुरसर सेवता । जिननाद रंगे कुशलमनिशं दिशतु शाशन देवता ।। ४।।. -- ॥ इति स्तुति समाप्ता ।।

- दादा श्री जिनकुशलसूरि १०३ फलवर्द्धिका मंडन पाच जिन स्तोत्र सकलभूतल भूपण शेखरं, नतसुरासुर किंनर खेचरं । प्रणिदधे फलवधि पुरीश्वरं, सकल पार्श्वजिनं परमेश्वरम् ॥१॥ फलित एपममाघ मनोरथः । कलित एव मया सुंधियां पथः । वदति भाग्यवशादवलोकित, स्तदनुदेवभवानभिवर्णित ॥२॥ मथितमीह महीपति शासनं, विकट संकट कोटि विनाशनं । शुभकर महिमा गुणधारिणं श्रयत पार्श्वविभु जिनचक्रिणम्॥३॥ नतजगजनताहितकारक, दुरित दुर्गति दुःखनिवारक । सुरमणी रमणीयरमांदधिं, हृदि दधेतमहं महसांनधिं ॥४॥ चतुरचित्तचकोर मनोहरं, नयति यो निजलोचन गोचरं । रजनि जानि समं जिन ते मुखं, सलिल भेदमृतं प्रभवं सुखं ॥१॥ विनत: पुण्य जनं वसुभासुरं, धन सुवर्ण धरं निधि सुंदरं । निशमनादपि पुण्यदरिद्रता, गमयते तव पादयुगं सतां ॥ ६॥ कलियुगेप्यसुरैर्महिमामहा, प्रतिहता नतवेश सुखावहो । अपिनिदाध ऋतीसवितुःकर, विबुध सिंधुजलं किमशोपितं ॥७॥ शमयते तव देव वचोजलं, जनमनो वनवासिरुपानलं । गमयते श्रयतां सकलंमलं, जनयते शुभ बुद्धि लतामलं ॥८॥ हरति पुण्यधनं हदयालयान् , मम सदैव सरांगरि पूरयात् । इति कृपापरतं परिपंथिनं, जहि विधेहि निजं सुखिनं जनं ॥ ६ ॥ हृदयमीश तवस्मृति धानतः, सुवचनं गुणगान विधानतः । वपुरुपासनतो भगवन्निति, त्रिकरणी विमला जनिमेखिला ॥१०॥ इति लता फलवद्धिपुरी पति, भविकलोक सु कोक दिवापतिः । दिशतु पार्श्वजिनोजगदुत्तमः, कुशलबुद्धि विलासमसौमम ।।१।। • इतिफलवचिकमंडन पार्श्वजिनस्तोत्र [सं०१४६७ लि0 संग्रह प्रति, पत्र २०४ ] .

१०४ दादा थी जिनकुशलसूरि युगप्रधान श्रीजिनचंद्रसूरि शिष्य वा० समयराज गणि गुम्फितावाचूरि सहितं श्रीजिनकुशलसूरि कृतं एकादश यमकमय श्रीशत्रुञ्जय शृंगार सार श्रीआदीश्वर स्तवनम् सिद्धाचल श्रीललना ललामं मही महीयोमहिमाभिरामं । असार संसार पथोपरामं नवामि नाभेय जिनं निकामम् ।। १ ।। वृत्तिः--सिद्धाचलेत्यादि । अहं नाभेरपत्यं नाभेयः सचासौ जिननाभेय जिनमादिनाथ' निकाममित्यर्थं नवामि स्तवीमि कीदृशं नाभेयजिनं सिद्धोपलक्षितोऽचलःसिद्धानां वाऽचल: शत्रुञ्जयस्तस्य श्रीलक्ष्मीरेव ललना स्त्री तस्याः शिरसि ललाम इव ललामस्तिलकस्त ऽत्रलुप्त विशेष्योपमालंकारात् शिरसीति लभ्यते एवमन्यत्रापि ज्ञय पुनः कीदृशं मह्यां पृथिव्यां महीयसी गरीयसी महिमा तयाऽभिरामः मनोज्ञेयः स तं पुनःकीदृशं असारो योऽसौ संसारोऽसार संसारस्तस्य पथो मार्गस्तस्मादु परमतीति असार पथ शब्दोऽकारन्तोप्यस्ति ।। १ ।। पुण्यप्रकाशं विभुनाभिजातं पुण्यप्रकाशं विभुनाभि जातं । स्तुवेन तं श्रीभरतेन देवं शत्रुञ्जये श्रीजिन मारुदेवं ॥ २ ॥ (१) श्री भरतेन देवं।

दादा श्री जिनकुशलसूरि १०५ वृत्तिः -पुण्येत्यादि। अहं शत्रुजये मरुदेवायाऽपत्य मारुदेवः श्रियायुक्तो जिनः श्रीजिनः सचासौमारुदेवश्च श्री जिनस्तंस्तुवे कीदृशं विमुश्चासौ नाभिश्च विभुनाभिस्तस्माजातः उत्पन्नस्तं पुनः कीदृशं पुण्य प्रकाशयतीति पुण्यस्तं पुनः पवित्रः प्रकाशस्तेजो यस्य स तं पुनः कीदृशं भावप्रधानोनिर्देशः विभुत्वेन जगत्त्रयसाम्राज्ये नाभितः स्थितिर्यस्यसतं अथवा विभुः सर्वव्यापीनो ज्ञानमात्केवलज्ञानं तस्याभिजातः स्थिति- यंत्र स तं पुनःकीदृशं नताः श्री भरते नो भरतचक्री देवाः सुंराश्च यं प्रति स तं, अत्रकुत्रचिदर्शस्तुवेन तं श्रीभरतेन देव मितिपाठस्तथाचार्यमर्थः विभुनासमर्थेन श्रीभरतेन चक्रिणा नतं नमस्कृतं पुनःकीदृशं अभिजातं कुलीनं प्राज्ञ वा पुनः कीदृशं दीव्यति क्रीडति परमानंदं पदे इति देवस्तं ॥२॥ .. वसंतमुच्चबिमले परागे भन्यांगि' चेतोय वन संमदागे। नाभेय मीडे हरि मास नागे॥३॥ वृत्तिः-वसंतेत्यादि । अहंनाभेयमीडेस्तुवे कीदृशमामो रोगः स पवनानागःसर्पस्तत्र हरिर्गरूड़स्तंत किंकुर्वतं उच्चरुन्नते परागे प्रकृष्ट पर्वते वसन्तं निवसन्तं किं नाम्नि विमले विमल नाम्नि (२) भग्यांगि, २ माम १०८ दादा श्री जिनकुशलसूरिः इक्ष्वाकु वंशोदय शैल सूर राजस्व संचूरित पापपूर । सुवर्ण नालीक समान चेर सुवर्णनालीक समान बेर ||७|| वृत्तिः- इक्ष्वाकुवंशोदयेत्यादि । इक्ष्वाकु वंश एवोदयशैल उदयाचलस्तत्र सूरइवसूरस्तस्य सं० हे इक्ष्वाकु० राज स्वशोभस्व त्रिभुवने, इतिशेषः, कीदृशं संचूरितपाप पूरो येन स तस्य संसुवर्ण तीलीकं । स्वर्णकमलं तत्समानो वरो देहो यस्य स तस्य सं० सुवर्ण वर्णत्वात् सुष्टु शोभना वर्णनाली स्तवन श्रेणिय स तस्य सं० हे समशत्रुमित्र संमस्वभावाऽवकृष्ट वदथवाऽाव द्विरंचिवन्नव इलाश्रीः स्तुति र्वा यस्य स तस्य सं० अथवा सुवण भव्य स्तवन अलीकमवद्य स्यति खंडयतीति ऽलीक स स्तस्य सं० माने अहंकारे वो वज्रस्तत्समाइरा वाणीयस्य स तस्य सं ॥ ७ ॥ कल्याण देहे न विकाशमान कल्याण देहेन विकाश मान । कल्याण देहेन विकाशमान कल्याणदेहेन विकास मान ॥८॥ वृत्तिः-कल्याणेत्यादि । श्रितो विमुक्तइत्यादीहजगति हे इन् स्वामिन् त्वं शत्रु द्रव्यभावभेदं जयजात्यैकवचनमत्र कल्याण ददातीति कल्याणदस्तस्य स, हेकल्याण देहेन स्वर्णशरीरेण विकासमाना शोभमाना विगतः काशो रोगविशेषो मानो ऽहंकारश्चयस्मात्स तस्य सं० कल्पो नीरोगोऽथवाकल्प प्रधानः अणः शब्दस्तस्यसं० देहउपचयो यस्मात्स तस्य संई लक्ष्मीनविः स्तुतिः क सुखंतश्चा समानोऽसदृशश्चस्तस्य सं० सों- त्कृष्ट लक्ष्म्यादि सत्वात् कले कलहस्यऽाणः शब्द दादा श्री जिनकुशलसूरि १०६ सांघाति खंडयतीति यासा कल्याणदा ईहा वाञ्छा यस्य स तस्य सं० इतस्यसूर्यस्य विकाशः प्रकाशः प्रकाश स्तद्वन्मानं ज्ञानं यस्य स तस्य सं० ॥८॥ श्रितो विमुक्तः सहसाहसेन सुगोत्र शत्रुञ्जय पुण्यसत्र । श्रितो विमुक्तः सहसा हसेन सुगोत्र शत्रुञ्जय पुण्य सनः ॥ १ ॥ वृन्तिः--श्रितोविमुक्तरित्यादि पुण्यस्य सनंदानं यस्य स तस्य सं० हे सुगोत्र सुवंशत्वं की सहसावलेन श्रित: आश्रितः पुनः कीदृशं हसेन मोहनीयविशेपेण विमुक्तो रहितःत्वं कीश श्राणकोजातो ऽस्या सौश्रितः सिद्धः कर्मभ्योनिर्मुक्तत्वान् त्वं कीदृशं विगता मुक्ता मौक्तिकानि यस्मात्स विमुक्तोमुक्तानामुपलक्षणमिहा कि चनत्वात् सहसाहसेन वर्तते इतिसहसाहसाः साधवस्तपामिनः स्वामी तस्य सं० अथवा सहनं सहः क्षमा सहसंमान संश्थैवंता भ्यांयुक्त इनः स्वामी तस्य सं० सुगोत्रः सुपर्वताश्वासी शत्रु अयश्च सुंगोत्रं शत्रुञ्जयः स एव पुण्यं पवित्र सत्रं गृह यस्य स तस्यं ।।४।। सभाजितःसाधुगणैःसदायकः समाधिनाहं वृपभं महामितं । सभाजित साधुगणैः सदायकः समाविनाहं बृपभं महामित।।१०।। वृत्ति :-सभाजित- इत्यादि । तं वृपभमादिदेवं समाधि तासमाहित मनसाऽहं महामि पूजयामि तं कं यएवयकः स्वामी सदा निरन्तर साधुगणेः । सभाजितः सेवितः पुनः कीदृशं साधुगणैः पण्डितवृन्दः सभा सुजितः २ शनु। .. . । ।

"१२०
दादा श्री जिनकुशलसूरि
सवोत्कृष्ट विद्यावत्त्वातृ दायो दानं तस्य क उद्योतो दायकः
सह दायकेन वर्तते इति सदायकः पुनः की० समं समस्तं
आधिमानसव्यथां नाति बन्नातीति समाधिता हस्तं पुनः की०
वृपेण धर्मण भातीति वृपोऽथवा वृपं स्मरं भनक्तीतिवृषभस्तं
महरुत्सबरमितो महामितस्त' ।। १० ।।
वृपध्वजेन प्रमुखेण राजितः सन्नदन धर्म करो न वाणधः
वृपध्वजेन प्रमुखेण राजितः तन्नंदनो धर्मकरो न बाणधः ।।२।।
वृत्ति :-वृषभध्वजेनेत्यादि । हेसन् विशेपज्ञत्त्वं नंद
समृद्धों भवत्वं कीदृश प्रधुमुखेन प्रवरेण बृपभ वजेन
धर्मध्वजेन वृपभवाहनेन वाराजितः शोभितः पुनः
कीडशः वृपभध्वज ईश्वरः अया लक्ष्म्या इनः ईनः कृष्ण
स्तत्प्रमुखा देवास्तेषां तेपुवा इनः पूज्योयः स 'तस्यसं०
कामस्तस्याजिः संग्रामस्तं तस्यति खंडयतीति राजितः नो
निपेधे धर्मोधनुः करेयस्य स नोधर्मकरः धर्मशब्दो धनुर्वाची
यदुक्त “ श्रीजिनदत्तसूरि पादैः धरति धम्म सुवंश निष्पन्न
मिति न बाणं दधातीति न वाणधोनशर धारको निष्कपायत्वात्
कीहशस्त्वं ? सं तः प्रधाना नंदनायस्य सः भरत चक्रवर्त्यादि
शतपुत्रवत् त्वात् धर्मकरोतीति धर्मकरःनो हिंसा सएव वाणो
वृक्षः विशेषस्तं धूनयति कम्पयतीति न वाणधः ॥ ११ ॥

२११ दादा श्री जिनकुगलसूरि महोदयाया हित कोपमाय नवीन सामुद्र वराङ्ग भार । अनन्तसाराचल धीरवीर समाधिहारी भव दाव दाव ॥१२॥ वृत्तिः-महोदयेत्यादि । हे वीन विशिष्ट स्वामिन् विगत स्वामि त्वात्वं महोदयाय महाभ्युदयाय भंव कीदृश महो) आहिता स्थापिता कस्य सूर्यस्य उपमा यत्र स तस्मै पुनः कीदृश सामुद्र देह लक्षणं तेन वरमंग विभत्तीति समुद्रस्तस्य सं० हे अनन्त सार अनन्तवीर्य ऽचल इव धीरो अचलः धीरस्तस्य संवोधने हे वीर ! सुभट, कश्मशत्रु जेतृत्वान् त्वं न समाधिहारीन समाधिहर्ता दां दान धर्मे वदतीति दाविदस्तस्य सं० ऽत्र जगति।। १२॥ महोदयाया हितकोपमाय नवीन सामुद्र वरांग भार । अनन्तसाराचल धीरवीर समाधिहारी भव दांव दाव ।।३।। वृत्तिः- महोदयेत्यादि ।। महोदयं मोक्ष अयते गच्छतीति महोदयान्तस्य सं० अहिते अनिष्टे कोपमाये यस्य स तस्य सं० ::अथवा अहितः शत्रु रूपः कोपः क्रोधस्तंमीनाति हिनस्तीति अहितास्तस्य सं० नवीनां सां लक्ष्मी मुदं हराति ददातीति नवीन ‘सांमुद्रस्तस्य सं० वराङ्ग मस्नकं तस्य भा :कान्तिस्तय राजतीति वराङ्गस्तस्य सं० अनन्ता मपरिमितामविनाशावा सारां.प्रधानां अचलां स्थिरां धेयं रातीति अनंत स्तस्य सं० हे वीर ! हे पूज्य ! यद्वाविगता:इरा संसारे,भ्रमणयस्मात् सवीर स्तस्य सं० समेपां सर्वेपां आधिं हरतीति समाधिहारीत्वं भव संसारः स एव दावो वनं तत्र दावस्तस्य सं० ।।१३।। -- :-

१
११२
दादा श्री जिनकुशलसूरि
एवंस्तुतो यमकभेद पर पराभि
राभिर्मया विमल शैलपतिः पराभिः
आदीश्वरो दिशतु मे कुशलं विलासं
वाचां विचक्षण चकोर सुधा सुकाशं ।। १४ ।।
इति श्रीशनं जय शृंगारसार श्रीआदीश्वर स्तवन मेकादश
यमकैः समर्थित मिदमकारि श्री जिनकुशलसूरिभिः ।।
वृत्ति :-[द्वाभ्यां सम्बन्ध महायमकमिदं]एवमित्यादि। एवममुना
प्रकारेणाभिरेताभिर्यमक भेद परम्पराभिः पराभि प्रकृष्टाभिः-
मया स्तुतः सन्नादीश्वरो मे मह्य वाचां विलासं दिशतु ददातु
कीदृश विलासं कुशलं प्रधानं कुशल हेतुत्वाद्वा कुशलस्तं कीदृशं
आदीश्वरः विमलशैलः शत्रुञ्जयस्तस्यपतिः स्वामी कीदृश वि०
विचक्षणाः पण्डितास्तै व चकोरस्तत्सन्तोपणे सुधांशुकाशश्चन्द्र
तुल्यस्तं कुशलमिति भीमो भीमसेन इतिन्यान्या देतत्स्तवनम्
श्रीजिनकुशलसूरिभिः कृतमिति लक्ष्यते श्रीगुरु सम्प्रदायात् ॥१४
इति श्रीशत्र ञ्जय शृंगारसार श्रीआदीश्वर स्तवनावचूरिः
कृता श्रीवृहखरतरगच्छाधिप श्रीजिनमाणिक्यसूरि
पट्टालंकार श्रीजिनचंद्रसूरिराज शिष्य समय
राज गणिना ।। शुभंभवतुः ।। ।। श्री ॥
संवत् १७५७ वर्ष फागुण सुदि १२ चन्द्रवासरे लिखिता श्री
रिणी नगरे वा० नेमहर्ष गणिना ।।
१ सुभारं।

परिशिष्ट (ग)
श्री जिनकुशलसूरि चतुष्पदिका
॥ ॐ श्रीमज्जिनकुशलसूरि सद्गुरूभ्यो नमः ।।
रिसह जिणेसर सो जयउ । मंगल केलि निवास ।
वासव व दिय पय कमल । जगह जु पूरइ आस ॥ १॥
आसण तपि जपि जोगि दृदु । जो समरइ सिरिसंति ।
तसुघरि सरवरि हंस जिम । नवनिधि नितु विलसंति ॥२॥
संतिकरण भव भय हरण । हरिवंसह सिणगार ।
वन्निहि सामल मनि विमल । नमह सु नेमिकुमार ॥३॥
मार विडारण पासजिण । बलिजाऊं तुय नाम ।
जसु लाणिहि कलिमलु गलइ । टलइति विघन विराम ॥४॥
रामा माहि सलक्सणी । मन्नउ तिसला नारि ।
जसु नंदण सिरि वीरजिण। सलहिजइ संसारि ॥५॥
पण मिय गोयमसामिगुरू । अनु गुरु सोहमसामि ।
तसु वसिहि जे केवि गुरु । तिहि बंदउंसिरि नामि ॥ ६ ॥
इणि परि समरिय देवगुरु । महिम महीरुह फंद ।
गाइसु गुरु आणंद भरि । श्रीजिणकुसल मुर्णिद ॥७॥

११४ दादा श्री जिनकुगलसूरि मरु मंडलि समियाण उ गाम । धणकण कंचण कुसुमाराम । तहिं निवसइ जेल्हागर मंति । जसुजस पसरइ दूरिदिगंति ॥८॥ चन्द्र कुलं वर पूनिमचंद । वंदह श्री जिणकुसल मुणिंद । नाममंत्रु जसु महिम निवास । जो समरइ तसु पूरइ आस ।।६।। जइतसिरी सुकलीणी नारि । तसुघर मण्डिणि अति सुविचारि । तासु पुत्र करमणू इय नाम । सहजिहि जसुउत्तमपरिणाम !!१०|| हभइ हेलि खणिखेलइ गेलि । सयणु माइ मन मोहण वेलि । जिम जिम सो परि वाधइवाल । तिम तिम महियलि हरप विसाल ॥ ११ ।। देखहु एवड पुण्य पयोर । वय लहुडउ पुणि बुद्धिहि धोर। अन्नंदिवसिजिणससि गुरुसंगि। कुयरसुचडियउ संजमरंगि ॥१२ तउघरि आवी जणणी पाय । पणमिय पयड इसो मन भाउ । कथनि तुम्हारइ लेयूं दीख । अब मति देज्यो काई सीख ॥१३॥ ताम जणणी ताम जणणी भणइ सुणि वच्छ । बलिहारी तुह्वयणटुं अच्छ । जीव जीवलावन्न मंदिर ।। तउवालउ भोलउ सहियतमि । य चिन्नु कह कहवि सुन्दर । ज' तउ मग्गइ दिक्खसिरि। इय मह मनि न समाइ । जाइफूल कह किम रहा। गयदंतुय. सिरिथाउ ॥ १४ ॥ तउं लहुडउ गरुयउ व्रतभार । वच्छवहंतउ जाणइ सार। वृषभभार वृषभे ऊपडइ । वाछरूए ते अधविचि पडइ ।। १५ रहि रहि कहइ कहावइ लागि । जं तुय भावइ तं तुय मागि। परिणाविसु वर उत्तम नारि। सुख भोगवि व्रतपाखइ सारि ॥१६ . दादा श्री जिनकुशलसूरि ११५ अम्हहई हुंती मोटी आस । इण परिमेल्हईकाइ निरास । हुयइ पुत्र कुलवंता जेउ । मात पिता मनि चालइ तेउ ॥ १७ ॥ थोड़ा माहि का मइ घणु । पूछि वच्छ हिव मन आपणू। जयतसिरी तब बोलीरही। कुंयरि वात तब निश्चल कही॥१८) अहह दिखाडिय जइतईलोभातिणि मुझ चित्त न आवइ खोभ । पडइ लोहजिणि सुत्तिय वेह । सा किमि पाडइ पत्थर रेह ।।१६।। लोक माहि जे कहियइ भोग । अंतरंग ते जाण्या रोग । नव नव परि जे जगडंत । भवि भवि आपइ दुक्ख दुरंत ॥२०॥ किहां कवगु हउँ कुण तु मात । कुणु परियणु बंधव कुणतात । हियइ विचारी जोवउ मात । मायामय सहु देखउ तात ।। २।। कूड कपट नट विट संबन्ध । द्रोह वंच मद मूर्छा वंध । भविभमतां मई कीधा सही । दीक्षाविणुतसु औषध नहीं ।।२२॥ जग आवइ जग जायइ तोइ । आवत जात 'न पूछइ कोइ । आहर जाहर ईम्हइ करई। पुण्य विणु ओडालउ फिरइ । मई मन कीधउंदृढ़ आपणुं । रणिचडिया केहउ कापणें । तोरइवचनि करी गृह त्याग । काराविसु सुकृतह संभाग ॥२४॥ माइ मनाविय तिणि करि बुद्धि । निश्चय एकमना छइ सिद्धि । हिव कुंयर ऊतावल थई । तउ सामहणी ततखिणि थई ॥२शा. ताम धवल मंगल रवर । मन मेल्हइ हरपि.अंकूर । वाजइ तिविल तूर नीसाण । पडइ मोह भूमिपति प्राण।। २६ ॥

११६ दादा थी जिनकुशलसूरि तरल तुरंगम चडइ कुमार | अंगि अनोपम तसु सिणगार। सिरिवरि सीकरि छत्र उमाल । पाछइ लूण उतारइ बाल ॥२७॥ माइ वधावेय दियइ आसीस । करमण नामईतसुप्रति सीस । क्रमि नरनारीचाल्यूसहू । तिणिखणि विरल उहुय घर.रहू ॥२८॥ मारगि पगि पगि नाटक रंग । सुपरिहिं पसरइ दांत जरंग । दान सूर अनुयाचक वृन्द । इहुँ विहुँ पूगउ मन आणंद ।। २६ ।। जेल्हासुत विस्तरि गुरूपासि । आवइ गुखअइ मन उल्लासि । तसुं संगमिहरषिउ गुरू सोइ । पात्रलाभि नहु रीजइ कोइ ॥३०॥ विविध रूपितहि मंडियनंदि। गायइ गायण नव नव छंदि। ध्यानजलणिआहुतिअन्यान । कीजइतिलजव सरसवध्यान ॥३१॥ ॥ भास ॥ .. जोसिय सिरि जिणचंदगुरु । लाडण तहिं करमण रूपिसुर । सजन मेलावइ आवियउए । संयमसिरि नइ परणाविउए ॥३२॥ कुसलकित्ति तसु नामूए । जगि जंगम सोहग ठामूए । नारि दियइ तवचाचरीए। गुरू गरूअड़ि दहदिसिसंचरीए ।।३३।। सहज मनोहर सरि करिए। किर कंठहिं कोइल अवतरीए । कडि कसमसत पटोलडीए । किवि गायइ भंभर भोलडीए ॥३४॥ उरलिय लहकइ हारूए । पगि नेउर रण झण कारूए वाला ताला रसि रमइए । खलकत करि कंकण चूडमए ॥३५।।

A
दादा श्री जिनकुगलसूरि
केलि गर्भ मुकुमालतनु । धनलावन्न धनलीलाभवनु ।
लडहियरंगिहि ललियमणि । किवि जोयइटगमग नियनयणि ३६
सहयइ कतिग देखि करे । तर पहुतउ आपण आप घरे ।
मुहगुख्यामिहि महमाउए ।
गुरू हरिइग कुसलिग मुनि रह्यउप ॥३७ ।।
सो लयुमुणि वर शुद्धाचार । विनय विवेक विचाराधार ।
नमइ समइ खामइ सविदीस । एबहु पुन्निहि लाभइसीस ॥ ३८
ठामि ठामि पामइ सोभाग । तमुवरि लोक धरइ अनुराग।
गुम्क आपइ विद्याआपणी । थानकि कुण न करइ थापणी ॥३॥
पापभीरु ससि सोमाकारु । जो साधइ तपु किरिया सारु ।
वायणायरिय ऋमिकीधरसोइ । पुन्निहिंगरुअडियइठा होइ ।।४।।
गुरुमनि मानिउ सो गुणवंत । जाणिय निय जीविय पन्जंत ।
पाटसीख आयरियह देइ । आपणि सरगह सुख माणेइ ॥४॥
गुरु आप सकरण साणंद । श्री राजेन्द्रचन्द्रसूरिद ।
सूरिमंत्र तमु आपइ ताम । श्रीजिनकुशलसूरि इहु नाम टि२।।
भवजलनिधि ऊतारण घाटि । श्री जिनचंद मुणीसर पाटि ।
माणिक जिमनर सोवनघाटि । सोहइसू रिमुमुनियरधाटि ॥४३॥
जमु मंडिय खंडिय भण्ट । खण्टिय पाखण्डिय पापंट।
जो जगिजागइ तेजि पयंट । मोहराय सिरि पाटइ दंड ।। ४८॥
स्थगिरि फरणु मई मागइदंट । इमवर परत लेटय लोहंड
नूनंतर जिगि जीतउ मोह । शासन चंग बटाविय मोह ॥४५॥

११८ दादा श्री जिनकुशलसूरि ताम मान मायाहकार । लहइ पुलता ते धिक्कार । मूरख कायर जेय असार । कह किम पामइ ते जयवार ।।४।। धमधमंत जिमि धरियउ कोप । खमा खडगि तस कीधरलोप। इणि परिसुभट पडइ रणखेत्रि । तरुवरपान जेम धुरिचंत्रि ॥४७॥ मयण मल्लजिणि हेलामाटि । हाहा हणियउ हियइ कपाटि । ब्रह्मतेज महिमा सा जाणि । लीजइ जं बलवत विनाणि ।।४८।। मुहि मूद्रिइ आवइ अन्यान । न्यान लकुटि तसु फेडिउ थान । समकितिसिरिजिणिकीधउ घाउ । भागउ मिथ्यामतभडवाउ ||४९ इणि परि मोह सेन भंजेवि । दहदिसि जय जय कार लहेवि । जयत्रहस्त जगि उदयउ सूर । गच्छराज परिपालइ पूर ।। ५० ।। आचारिज तरुणप्रभसूरि । जिणि थापिउ जिण शासण सूरि । किवि वाणारिय किवि उवज्झाय किवि दक्खिय उत्तमकुलजाय संघपति जिणविवपतिट्ठा । विजयवंति जिणि विहिय विसिट्ठा । मानतुंग सित्तु जय संगि । हुय विहार जसु बुद्धि प्रसंगि ।। ५२ अवरवि कीधा जे उपगार । तिह हुं जाणुसंख न पार। जीह सहस जउ मुझ मुखहुंति । तउतसुगुणपरिमाण लहंति ।।५३ संयमसिरि उरमंडलिहार । नव कलपियहिं जो करइ विहार। खरतरगच्छ रायडं सिंगार । पालइ पूरव रिपि आचार ।। ५४॥ जुगप्रधान कमला श्रीकंत । उत्सूत्रह परिहार करंति । सो मुणिवर पयडतउ तत्त । सिंधु देश विहरंतउ पत्तु ।। ५५ अन्तसमय जाणिय तहि ठाइ । ध्यानि मोनि तपि जपि दृढ़ थाइ सो सहगुरुमल कसमल धोइ । देराउर पहुतउ सुरलोइ ॥५६॥ ।

दादा श्री जिनकुशलसूरि १२६ तहि थानक थाप्यउ थिरथम । सेवकरइ जण बइठा ऊभ ! रत्नत्रय आरोपी तिहां । जे पूजइ तिहां दूपण किहां।। ५७ ॥ थूलिभद्र वयरादिक जेय । सरगिगया जिम नमियइ तेय । थूभजेम जिणगणहरकेर । ईहां पुण तिम मधरह फेर ।। ५८ ॥ जसु तेरह सतनीसइ जम्म ! छइतालइ सिरि संयम धम्म । पाटणि सतहत्तरइ जुपाट । नवासियइ जसु सग्गहवाट ॥५६॥ भूमंडलि सरिगर्हि पायालि । सचराचर जागि इणि कलिकालि । प्रभुप्रताप नवि मानइ जोइ । मह नयणे नहु दीठउ सोई॥६॥ निधन लहइ धणधन्न सुवन्न । पुण्ण हीण पामइ बहुपुन्न । असुखी पामइ सुखसंतान । एकमनां, करताँ प्रभु ध्यान ॥ ६ ॥ प्रमुसमरणि आपद सविगलइ । श्रेयशांति सवि संपद मिलइ। आधि व्याधि चिंतासंताप ! सविछांडइ नहु मंडइव्याप ॥२॥ पाप दोष नवि लागइ ताह । प्रभुदरसणि उतकंठा जाह । सेव तह सुरतरु चियछांह दालिद निश्चय मेल्हइ वाहु ॥६॥ विस विसहर विसतर नरनाहु । भूतप्रेतग्रह व्यतर राहु । प्रभु नामहि तेह न करइपीड । भाजइ भवभय भावठि भीड॥६४ रोग सोग सविनासइ दूरिइ अधकार जिम ऊगइ सुरि । मूरख फीटी पंडित थाइ । प्रभु पसाइ सवि दुरिय पुलाइ॥६शा दिनि दिनि जिनशासनि उद्योत ! जहि प्रभु बइ भवसागर पोत सो जुगवर मईभेटयउ आज । रलिय रहसि सवि कीया काज ॥६६॥ ..

१२० दादा थी जिनकुशलसूरि || भास ॥ आजवरंगणि सुरतरु फलियउ । चिंतामणि मईकरयलि कलियउ उदयउ परमाणंद भरे। आजजीह मई धन्निय गणियइ । जुगपवरागम जइ मइ थुणियउ । चन्द्रगच्छ महिमा निलउए ६७ कांइ करहु पृथिवीपति सेवा । कांइ मनावउ देवी देवा । चिंता आणह कांइ मनि । वार वार इहु कवितु भणीजइ । श्री. जिनकुशलहरि समरीजइ । सरइ काज आयासविणु ॥६८|| संवतचउद इगासियवरिसिहि मल्लिकवाहण पुरवरि मनहर सिहि अजियजिणेसपसायवसि । किय कवित इहु मंगल कारण । विघन हरइ पर पाप निवारणु । कोई म संसउ करहमनि ॥६॥ जिम जिम सेवइ सुरनरराया। श्रीजिनकुशलमुणीसर पाया। जयसागर उवझाय तिम। इस जो सुहगुरु गुण अभिनंदइ। रिद्धि समृद्धिहि सो चिरुनंदइ । मनवंछित फलतसु हवइए ।।७०।। इति श्रीमच गप्रधान श्री जिनकुशलसूरीद्राणाम् चतुष्पदिका सप्ततिका संपूर्णा श्री जयसागर महोपाध्याय कृता ।। श्री जिनसिंहसूरि :- शिष्य पण्डित हेममन्दिर मुनिलिखिता सुखाय ।। श्री ।। शं ।।

परिशिष्ट (घ) . श्री जिनकुशलसूरि अष्टोतरशत स्थाने स्थुभनाम-गर्भित स्तवनम् - वंदीजइ सद्गुरु वरदायी, श्री जिनकुशलसूरि सिरदार। महीपल माहे मोटइदावइ, दीपइ जिम पूरव दिनकार ॥ १॥०॥ [मूल धुंभ देराउर महीयल, गुण गिरूओ श्री गाम गडाल। परता पूरइ परतखि पगि पगि, पर उपकारी परमदयाल ।। २ ।।०॥ महिमावंत अधिक मुलताणइ, उच्च अनोपम छइ अधिकार । सीधपुरइ समर सच वायड, नयर किरहोरई नवसरहार ॥ ३॥ जैसलमेर सकल जोधाणइ, नागोरइ प्रणमइ नर वृन्द । मेदनीतटइ देखी मन उल्हसह, देवलवाडइ जाणि-दिणंद ॥ ४॥ वं॥ उग्रसेनपुर पटण अलवर, अमरसरई अउरंगावाद । नडुलाइ वर्द्धनपुर नवहर, उद्योतनपुर अम्मदाबाद ॥ ५॥ वें । सांगानेर विहार सुशोभित, मालपुरई मनमोहन रूप । जयतारणि अरियण सहु जीपइ, भाव धरीनइ वंदे भूप ॥ ६ ॥ ॥ किसनगढ़इ कल्पतरु कहीयइ, राजगढ़इ चंपा रतलाम । समीयाणइ सोमित अति सोहड, साचोरइ सारे सव काम-॥७॥ ६ ॥ सोवनगिरि मंडण सीरोही, नूतनपुर नित चढ़तउ नूर । पूजउ सेव॒जइ पद. पंकज, सूरति बंदु ऊगत मूर ॥ ८॥4॥ गिरनारइ तुझ गुण सहु गावइ, जावइ दुख दोहग जंजाल। दीवनगर देख्यां तुझ दरसण, मांगी फलइ मनोरथ माल ॥६॥वं ।।

१२२ दादा श्री जिनकुशलसूरि ईडर थंभ अनोपम ओपइ, आसोपइ सुरतरु अवतार । पुर खंभाइत पाटण पाली, दिल्लीगढ़ दउलति दातार ॥ १० ॥ वं ।। मांगलउर वीरमपुर मनहर, अजारइ मन अधिक उल्हास । भली बात करइ भुजनगरइ, मंडही मंदिर महिम निवास ॥१२॥ वं ॥ लखपति महिमपुरी लाहोरइ, वंदइ कर जोड़ी वड गात । मेहरइ मांहेदालिद्र भंजइ, अजमेरइ मोटी अखियात ।। १२ ।। व।। पूगल जंगल पूनासर प्रभु, पहुंचाडइ सब बात प्रमाण । डिंडुआणइ आनइ सहु डेरइ सेरगढइ सवलउ सनमाण ।।१३।। ।। फत्तेपुर बहु फल फूलइ करि, पूजइ गुरु पद पङ्कज सार । भावभगति भटनेर भली विधि, फलवधिपुर फलीयउ सहकार ।।१४।। मइडीचक्क सुथान मरोटइ, अमरकोट मानइ सहु आंण । संबल कम्बल मइ सदगुरुना, सेवइ पद युग चतुर सुजाण ॥ १५ ।। दुखभांजन कहीयइ देवीझर, ग्वालेरई कहीयइ गुणगेह । सलहीजइ सिरवाडि सिरुजइ, देखी विकसइ सारी देह ।।१६। वं ।। विक्कमपुर वडली बीजापुर, खीमसरइ प्रणम्यां नितु खेम । बाहडमेरु सनूर विशालइ, पहुकरणइ पाल्हणपुर प्रेम ।।१७। वं ।। चंद समान कहुँ चन्देरी, तोडइ वंछित द्यइ ततकाल । कुंभलमेरु संकल सुखकारक, सहर रिणी मांहे सुविशाल ॥१८॥ वं ॥ सरसइ धन वरसइ सेवक घरि, लूणकरणसर लील विलास । खरी वात कहां खेजडलइ, पचीयाखई नितु पुण्य प्रकास ।।१९।। देवीखेडइ दुसमण फेडइ, सईभर पूरइ सगला थोक । झूठइ रायपुरइ जस झलकइ, राधनपुर घइ वंछित रोक ॥ २०॥ .

7 दादा श्री जिनकुशलसूरि १२३ मउज करइ सेवक नई महेवइ गुदवचइ सदगुरु गुणवंत । सारणपुर सुणीयइ सेत्रावइ, जयतपुरइ जुगवर जयवंत ॥२५॥ वं०॥ बोलाडइ बंदु वडलंदइ, पीपाडइ जस प्रबल पडूर । कामित दायक कापरहेडइ, दुखियां दुख गमाडइ दूर ॥२२॥ वं ।। लाम घणउ द्यइ सुगुरु लवेरइ, वालरवइ तिमरी सुखवास । कीरति अधिकी कुंडकी कहीयइ, रोहीठ पिण सुणियउ रहवास ॥२३॥ महर करी महाजन प्रतिपालइ, संभालइ निज सेवक आय । सुप्रसन्न होवइ सानिधकारी, पंडीयां अटवी पाणीपाय ||२४॥ ॥ आसति अधिकी जे मन आणी, चरणकमल सेवइ चित्त लाय। तिहां घरिनवनिधि होवइ ततखिण, कलिमें निरमल सुजस कहाय॥२५॥ वड दरवारइ दोपी दुरजन, करि न सकइ कांइ भुंडउ काम । सद्गुरु सुनिजरि करि सेवकनी, महीयल माहि वधारइ मांम ।।२६।।।। पूरव दक्षिण उत्तर पश्चिम, जोति सकल निहुं लोकइ जास। एक अनेक प्रकारइं इण जुगि, ईहक जननी पूरइ आस ॥ २७ ॥ 4 ॥ तीर वहइ जिहां वखतर तूटइ, तेज असम मलकई तरवारि । जलक्ट थलवट जंगल माहि, एहवी ठामइ अतुं प्रावारि ॥ २८ ॥ वं। पाठक 'ललितकीरति' पसायइ, 'राजहरप वंदइ धरि राग । अट्ठात्तर सउ नामई अद्भुत, सुख सम्पति होवइ सोभाग ॥२६॥ वं ।। .

क .... श्री अभय जैन ग्रन्थमाला के महत्वपूर्ण प्रकाशन :--- १-ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह ५) २-बीकानेर जैन लेख संग्रह १०) ३--दादा जिनकुशल सूरि ४-युगप्रधान श्रीजिनदत्त सूरि १) ५--समय सुन्दर कृति कुसुमाञ्जलि ५) ६-ज्ञानसार ग्रन्थावली २)५० सादुल राजस्थान रिसर्च इन्स्टिीट्यूट के प्रकाशन :-- १--विनयचन्द्र कृति कुसुमाञ्जल ४) २-~पनिणी चरित्र चउपई ४) ३-धर्मवर्द्धन ग्रन्थावली ५) ४-सीताराम चउपई [ समय सुन्दर ] प्रेस में ५-समय सुन्दर रास पञ्चक ३) ६-जिनराज सूरि कृति कुसुमाञ्जलि ७-जिन हर्ष ग्रन्थावली प्रेस में श्रीमद् देवचन्द्र ग्रन्थावली चौवीसी वीसी स्तवन २५ सज्झाय संग्रह प्रेस में ४ .... उपाश्रयः कमेटी प्रकाशन :- राई देवसी प्रतिक्रमण )३१. . २)५० पूजा संग्रह मिलने का पता:- नाहटा ब्रदर्स ४, जगमोहन मल्लिक लेन कलकत्ता-७

Dada Shri Jinkushalsuri

Author
Nahta Agarchand
Title
Dada Shri Jinkushalsuri
File name
Dada Shri Jinkushalsuri
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Culcutta, Nahta Bradrsh Jagmohan Malik Line
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550602
Barcode
4990010031424.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
9oK8pju3tLk
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