Adarsh Library, Jaipur

Shok Sabha

Shriwastav Kunal · 2011/03

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नोक्समा

राजपाल
मूल्य वीस रुपये (2000)
प्रथम सस्करण 1983, 0 राजपाल एण्ड सन्ज
SHOK SABHA (Novelized Drama) by Himanshu Srivastav.

लेखकीय पिना में मेरे समकाप्तीन मीर समबपि कई मित्रों में अपने परिध के रिनों की संक्षिप्त भाकियो सिपिग्य की। मैंने ऐसा नहीं किया। यह वकारम नहीं। सपमुर में उस हमरम की तसाध में यो सबूत देते हुए मुझे यह पासा सके कि तुम्हारे मरिण के दिन दफन हो पुरे है पोर मब तुम सुख-मैन के बबरे में बैठपर बांसुरी टेर रो हो। मगर मफसोस पब तक ऐसा कोई हिम्मतबर हमदम मिमा मही। कोई एकमबम' भानम्बसूमि में प्रवेश कर गया तो क्या हुमा? 'बहु पषम' मारवचन' को पोर पासपीमुफ्त भावकूप में होंठों को होनी से सकर खास ही रहा है। किन्तु इसका बर्ष या भी नहीकि पोक्समा नायक कार्य मेरा है मा मेरा ही है। मैं उन मोर्यों में नहीं बो ऐसा मानते कि पक्षिणी के लिए में यक्ष मही परिक नियोत्तमा के वियोग में सर्व कविमठ कानिवास रोये पे वीर नाही पनों की मु- भूतिया मेपडूतम् के ममृतसर बन पई। इस्मोगरव के मिहार से अपने मुसा का हाल बेहाल है। मा. संस्कृति के रक्षकों की परमहणामी में सशोधन करने को महाप्रमुठ पए, मो नहीं जानते कि कमा मोर संस्कृति क्या है। इसीलिए एक कमाकार के वर्ष की तस्वीर बीपकर मैंने यह पेपास की कि पम्द रक्तस्तात् बमिया तब तक हमारे कुगतीपक को बनाती-बियाइती रहेंगी, पब तक पनसमाव सब उठकर उन पप्तियों को मरोगगसने की रिया में बनार नहीं करेगा। पुणबीर ? नहीं बरठ मोर महीं। बेखबरपंच -हिमांशु पीवास्तव पटना-800007

व्यग्यशिल्पी
शरद जोशी
को
जो अनदेखे ही मुझे चाहने लगे

1
पूरी!
फितमा ससिप्त! कितना सुहाना !!
बरा ही प्यारा माम है वायमिन की इस पाडूपरनी का।मौर बैठक
से बाहर निकलते ही उसके बारे में ममिव बापू ने रिमाक कसा “यामपने
को कलाकार कहती है कमाकार ! छि ! मोप कहते है, यह अपने पाप
के समान पर गई है। मगर, यह एकदम मसात बात है। पैसों के मामले में
मुर्राबाट के गेम से भी गर्मा-गरी है।
मागे गाते हुए बमपास मे गर्दन पुमा कर पूर्षी के मकान पर एक
मगर गती । इस मगर में पैसे पूर्वी के प्रति हिकारत भी दोबा भी मानत
मोर मसामय पी । गोना 'मय तक कमाकारों के बारे में पो कुछ सुना
पा सकता है सब गमत सुना बा। कमाकार दीसत से नफरत करते है
और यह पौनत पर फिदा हती है।
"मार मरे की बात यह है कि "
'क्या ?
समित बाबू मे कहा 'बारी है। न मावमी म बीमार।"
बमरपान बोना 'ममा तुम पमीन छोरकर हवाई यहार की वय
षा में धमते हो । बर मावमी ही नहीं तानाद कहाँ से ?'
"अरे हो ।' मसित को अपनी गमती समझ में मा पई।
ममरपाम मे कहा 'मगर इसका दूसरा पहमू भी है।
क्या ?" मामे बहते हुए मलित मे पूछा।
ममरपाम रहने भगा 'बारमी का सीधा-सावा मर्ष है--एक बार
मामी एक पुरुप । वह स्वस्थ मोर रोममुक्त हो तो भौमाय दे सकता
है। मपर समास रस्ता है-मपना भावमी है या नहीं? यानी कानूमा
दिया गया मामी भादमी ममर ऐसा मारमी महीं है और वह किसी
कुमारी को मोसाद र देता है, तो उसकी पूरी जिन्दगी को मना पर रेवा

6 शोकसभा है - । ऐसे आदमी से मिली एक औलाद हज़ार बददुआओ से भी ज्यादा परेशानी में डालने वाली सावित होती है।" ललित वादू वोले, "हा, यह तो है।" अमरपाल ने पूछा, "इस माने मे यह कैसी है ?" ललित बाबू को कुछ सोचना पड़ गया। पूर्वी ने पहले ही उनका दिल जला दिया था। मगर, फिर भी सकोच प्रदर्शित करते हुए बोले, "छोडिये, वैसी बातें बोलने से जुवान गन्दी होती है।" अमरपाल ने जैसे विना जाल डाले अच्छी-खासी मछली पकड ली थी। कहा, "वम, वस । जुबान गन्दी करने की ज़रूरत नही । सव कुछ समझ वावू गया।" "क्या समझ गए "यही कि चुलबुल अधेरे-अकेले में तराने छेडती है।" . ?" ललित ने पूछा। 7 'रसना' शब्द दो अर्थों को ध्वनित करता है। ज्ञानियो ने इस पर भी नियन्त्रण करने को कहा है-स्वादानुभूति और वाणी के सन्दर्भ मे। सुम्वादु खाद्य पदार्थ का ग्रहण उस मीमा के बाद वर्जित है, जिस सीमा के बाद वह स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाला हो जाए और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर नीतिकार वहा निपेध करते हैं, जहा उससे पर-अहित होता है। समाज का जो व्यक्ति इन अर्थो मे रमना पर नियन्त्रण करके चलता है, वह योगियो मे योगिश्रेष्ठ कहलाने का अधिकारी है। ललित वावू जमे लोग रमना को अपनी अनुगत, अपनी दासी न बना कर स्वय उसके अनुगत और दाम बन जाते हैं । अमरपाल के यह कहने पर कि 'बुलबुल अधेरे-अकेले मे तराने छेडती है' वह अपनी रसना के वश मे हो आए और अमरपाल की कुहनी पकड कर हिलाते हुए बोले, "इसके बारे मे ताल ठोक कर कुछ कहना तो मुश्किल है, मगर यह तो बहुत सारे लोग जानते हैं कि दिवाकर मलिक की दो और कन्याओ मे से एक ने मात्महत्या कर ली और दूसरी किसी को ले कर निकल गई।" "किसी को लेकर निकल गई ?" "हा, निकल ही गई । मगर, एक वात वतलाऊ । मैंने उसे कई वार - पाकममा 1 देतापा।" "सी भी?" ममिव मामे स्मरण करते हुए मतमाया "मुन्ना पी सब कुछ भरा पूरा पा । मैकिन हो इस पूर्ण के मुकायमे नहीं पी। पूर्वी गम्भीर है, वह पंचम पी। पूर्ण की मासों में तापम है। यह हमेणा रीती-रीवी निगाहों से देखती है। उसकी मानों में पलए मनाना था। पोया एक में बोतम और दूसरी में पैमाना पा। वह विस भारमी की मार हती थी पर कर देखती।" “सभी मह मुम मिनामा उसने।" "मपर अमरपालबी ममित मे बापे कहा "सिने दुपपाप मारमहत्या कर भी यह कुछ और ही भी। "मवसब?" ममरपाल ने पूछा। "बह ईसा की मेटी पौ।" मालित बार मे नि संकोष कहा। घहर के का ऐसे मुहम्मे पे यहाँ छ भोप माने जाने के बहर मौकीन में, समीत-मोठियों या सम्मेनों का पायोजन करने में इनकी विधेप पचि होती । मगर मेले कर ममिक परिवारही ऐसा था मो संगीत के प्रति समर्पित मा । संपीत ही जीवम संगीत ही मागीविका । रिवार के पिता प्रसिर पचावयवावक ये दावा नपने पुन से इने-गिने सपास मायकों में से थे और रिवार को एक संगीत-सम्मेमन में 'मूल्य समाट' कहकर बभिनन्दित किया गया था। पूर्वी उनकी ही तीसरी बार अन्तिम सन्तान पी। कहते है दिवशकर मेसी मनकापा पायीबी उनकी वाणी में भी ममवोपम माधुर्म उसी तुलना में परिपूरित मा। मेघों की प्रत्येक ममिमा सुनियों का माकपेनकेन होती। बहुत ही कम बोमते मार पो कुछ गोमते सुमनेसामा उसे बारबार सुनमा पासा। नर्वकोषित काली कासी पुंभरामी सपि ऐसी दी कि उसे रेत कर एक-से-एक सुकेमियो दिग्ध हो गठठी । मुमपर्म इमम को तराने में गिमाता ने मामोषक की दृष्टि मौर सौम्दयास्मसिड संगतपण की घेनी का उप- योग किया पातमत्प करने के लिए पब मंच पर माते वो पागेवर -

शोक
8
ही दर्शक आनन्दविभोर जाते । आखें बस एक ही दिशा को पहच
जिधर दिवाकर होते।
लेकिन इस कलाकार का अन्त किस रूप मे हुआ, इसी की बेटी
वायलिन की जादूगरनी,
पूर्वी, पैसे को क्यो
खुदा
मानने लगी?
सवाल का जवाब देने के लिए कौन आगे आएगा
?

2 ममी-चमी मिनसे बात टूट पर मोर मो नापस बसे गए, ये दिवाकर मसिक को एक बारात में भूस्म प्रस्तुत करने के लिए ने पाने बामे के। धीरे-धीरे सारी बातों की बानकारी होने पर रिपाकर मे अपनी मनमर्पता पाहिर करते हुए हा, "भमा कौनिएपा में बापर्यों में नृत्म नहीं वार से माए मोर्मों में से एक मे पहा मापको उसी रोग इमार करणेमा पाहिए ना विस रोराहम मापसे पहनी बार मिस पर एग्यान्स पए थे। रिपाकर बोस "उस रोग बाप सोमबड़ी पस्दी में थे। मुझे म्पया पछारपसे गए । बापने संकेत कमही किया कि मुझे बारात में नाचना होगा।" उघर से इसरा गोता, "बारात में नाचना हो या किसी संगीत सम्मेलन में नारना तोयस नाचना है ।मापको पो मिमना चाहिए, हमने उममें वो कोई कमी नहीं की। रिवारका मामी-ग्रीस घायद ही कभी मम हा हो। इस स्थिति में भी संपनीत बने रहे। बोमे "बाप माराममहो। वापदे रिएएसये पोरेस्पों से हुए है । वापस किए देता हूं। मौरस बरसर में मये केन पत माए । दमयन्ती से बोस, 'मंगमवार को सी समे तुम रम पोरिए ने उन्हें दो।" "पों, क्या बात है? "पीछे मतमामा। दो तो सही।' बैठक में तीन सम्मन में रमाप्रसार प्रिनमंगम मौर गुप्तेपर। मिवर गुम्नेसर के छोटे भाई का वा। यह पीएन इनकी । शिवमपत एक 10 शोकसभा - और रामप्रसाद किराना मर्चेण्ट हैं। दोस्तो मे से किसी के मुह से निकल गया, "किसी बाई जी के चक्कर मे न पड़ो। कोई वढिया डासर ले चलो। वडा रग रहेगा।" "वतलाइए आप लोग, किसे ले चला जाए। मुझे तो कोई ढग का डासर ही नज़र नहीं आता।" गुप्तेश्वर ने कहा था। दूसरे दोस्तो ने सुझाया, "दिवाकर मलिक को ले चलो। एकदम से थेई-थेई मच जाएगी। कन्या पक्ष वाले भी याद करेंगे कि कोई वारात आई थी। दिवाकर जी का नाम वैसे भी चारो ओर फैला हुआ है। मगर हा, चम्मच-चम्मच-भर घी डालोगे, तो पूडिया नही छनेंगी।" इस पर गुप्तेश्वर ने जैसे कमर कस कर कहा, "चम्मच-चम्मच-भर की क्या वात है जी, कहो न, मैं पीपा ही उडेल दू, मगर भीड़ नही लगेगी। वाई जी लोगो की वात ही कुछ और होती है।" किराना मर्चेण्ट रामप्रसाद ने एक वारीक बात कही, "वैसे तो घर की मुर्गी दाल वरावर होती ही है, मगर दिवाकर मलिक और किसी वाई जी को एक ही तराजू पर नही तौला जा सकता । वाई जी लोगो का नाच देखने से ईमान खराब होने के सिवा कुछ नहीं होता।" और, अन्त मे शिवमगल ने जो कुछ कहा, उसे अन्तिम मान लिया गया। उसने कहा था, "दिवाकर जी की विदाई भारी रकम से होती है। मगर थोडे मे ही काम वन जाएगा। सुना है, आजकल उनकी पूछ कम हो गई है । ईदे-बकरीदे कही से बुलावा आ जाता है, नही तो सोलहो दण्ड एकादशी चलती है। भूखे पेट को वासी भी मिल जाए, तो मजे मे हज़म हो जाता है । गाय दान नही करना पडेगा, नाम लेते ही वैतरणी का दूसरा किनारा सामने नज़र आएगा।" गुप्तेश्वर को शका हुई। जैसे किसी ने गुदगुदा दिया हो, उसने उचक कर पूछा, "मतलव ?" शिवमगल ने शका-समाधान किया, "दिवाकर मलिक सोचेंगे कि भूत की लगोटी भली । दरवाजे पर आयी हुई लक्ष्मी को लौटाना ठीक नही । सौ का पत्ता हम पहले फेंक माएगे और जिस दिन वारात लौटेगी, एक धोती और ग्यारह रुपये से..." ।

भोपसमा 11 रामप्रसाद ने हस्तक्षेप करते हुए कहा 'म्याइ पर्यों से नहीं कम-से कम पच्चीस तोगकर।' मुप्तेम्मरन कहा था और, प्यारह से भी काम पम पाएगा। पषीस-पचास पो उनको ऐस भी मिम पाएम। नाच देखने वाले उनके मामे क्या इससे पुछ कम मे ?" शिवमपम कुछ सोचकर मोसा, नहीं नहीं यह नहीं हो सकता। उपर ऐसा हुआ तो रिवाकर मसिक तुरन्त पायेग बोस ठगे । उनके माचते वक्त हस्मयागी नही चलेगी। “मन्छा म सही। चमो पच्चीस होरेगा। उपर से सिसका एक गमम भी तो क्या कोई हर्ष है। 'फिर क्या कहते हैं । गुप्तेवर, यह तो तुमने सोने में सुपन्ध पानी बात कह दी।' और, यह बात मय निर्विरोध तय हो पा कि दिवाकर ममिकमारात में एक मतक की हैसियत से मे पाए पाएगे। मेकिन बम विवाकर को बास्तविकता बठमायौ गई तो देखा गया कि इंस में कीड़े-मकोड़ा की भोर से मार फेरमी। सौ रूपए मोटावे हुए दिवाकर ममिक ने कहा, भरने की बात है। माग तक में किसी भी बारात में नृत्य प्रवर्धन के नहीं मया । भाप नाग रागाबादमी है बहुत सारे कमाकार मिस ना मुझे भमा कर दीजिए' बी हा बाप मोगों ने मुझे स्मरण किया मेरा सौभाम्म है पीहा । वोर दोनों हाप पोर दिए । उनक समता के भाव छमक ऐ थे । उठठे हुए पिवमगम ने पहा पा , भी हम लोग किसी बाईची को नही मे जाना चाहते पाठ की टहरी। रिवार में तीनों की मोर पेसत हुए कहा ना मा ऐसा म संगीतमन्ना को जीवित रखने में उनकी स्माप-तपस्या भी सराहमा के है। मैं उन मोनो के साप नाचता नही यह दूसरी बात है। परन्तु, में पुमा भी नहीं करता। मच्छाममस्कार । बस ये मभी-ममी वापस बम मम है। रिवाकर मनिक उन्हें मुपारी, इमामपी सिताकर रिक्षा करना चाहते थे। पूर्वी को पास की।

12 शाकसमा - पर भेजा था, पर वह समय पर वीडे लेकर लौटी ही नहीं। उनके चले जाने पर पूर्वी ने पिता के सामने आकर कहा, "पानवाले ने देने से इन्कार कर दिया। कहा, पहले के बहुत पैसे वाकी हैं। अव उधार-खाता नही चलेगा।" दमयन्ती ने अपना विचार प्रकट किया, "अव 'मे इधर-उधर न भेजा करो। इधर-उधर जाने की उम्र गुजरती जा रही है।" एक दीर्घ नि श्वास छोडकर दिवाकर कहते हैं, "दमयन्ती, तुम्हारा कहना कुछ वेजा नहीं है।" पूर्वी वहा से हट कर जाने किधर खिसक गई है । तीन साल पहले पिता के साथ सगीत-समारोह मे ग्वालियर गई थी। एक बुजुर्ग वायलिन- वादक के पास दो वायलिनें थी। उसने पूर्वी को प्यार करते हुए कहा, "विटिया, तुम बहुत बडे कलाकार की बेटी हो। तुम कोई साज़ वजाना सीखो।" "अच्छा।" पूर्वी वोली थी। वुजुर्ग वायलिन वादक ने पूछा, "तुम कौन-सा माज बजाना सीखना चाहती हो?" पूर्वी ने महज भाव से कहा, "वायलिन।" "ओह हो, मेरे रास्ते पर चलोगी?" वायलिन-वादक ने आह्लादित होते हुए कहा, "भई, वाह । मेरे पास दो वायलिने हैं। एक तुम ले लो। पहले थोडा सीख लो। फिर नई ले लेना । वैसे इसके तार भी सधे हुए हैं।" और उसे अपनी पुरानी वाली वायलिन दे दी। उस वक्त तो जैसे पूर्वी की समझ मे कुछ नहीं आया कि यह क्या हो रहा है । दिवाकर मलिक पाम ही थे । इच्छा हुई, पूर्वी को वायलिन न लेने दें। पर, एक कलाकार दूसरे कलाकार के हृदय को ठेस नही पहु- चाता । पूर्वी ने भी तो ललच कर नहीं कहा था कि उसे वायलिन चाहिए। दिवाकर दो क्षण मौन रहे और फिर पूर्वी से बोले, “पूर्वी, मिर्फ वायलिन लेने से काम नही चलेगा। इनके पाव छुओ। कला गुरुजनो के आशीर्वाद और साधना मे मिलती है।" । -....- धोकसभा 13 स्यारहवीया पूर्वी मे पुरवायमिन-वारकहे परमों पर अपना धीम ममा रिया। उनके मेन मबत हो पाए। मह से निकला, "में पता नहीं पर दिन रेस पगा मा मही मगर मेरी यह युमा है कि इस पन की तुम ऐसी हस्ती बनोमी कि जिस संगीत की महफिल में एक बार या रोमी, पहा का सारा बतया तुम्हारे मासपास सिमट माएपा।" पूर्वी वहां से सिसककर मी पुण्मी वापमिन पर रामबहारमाने नमी मी। पति से सारी बातें सुनने के बाद रममन्दी मेबो कोष से कहा मधमाने को तो मने का दिया है कि सभी दूध मत दो। “बहुत ठीक किया। "मपर यह पैसे माम हा है।" "विमा पाएगा।" और धोबी को क्या " “पा उसके भी पैसे निकस ऐहै? "हाँ निकम रहे हैं।" रिवाकर ममिक मोसे कह देना उसके भी पैसे रखेंगे मही।" पर कहता है, बहुत सारी है। दमयन्ती बोमी। "पर में बाय पिखने रोग का है! दिवाकर ममिक मे प्रमन किया। 'वीन पैर तो पार बसेगा। 'माछा, रेघा पाएगा। "धोबी का दिवाकरममिक ने बीप में ही कहा 'रेहो पाम पर पुछमछ करंगा । म बिसका पाकी है यह तो मांगेपा ही।" दिवाकर मनिक पारपाई पर बैठ मए । बरे ही बने हुए स्वर में बोसे "दमयन्ती भार मम कुछ मामस्थ पान पड़ता है। मम्मास माहीर पायेगा। "छोड़ो पा रापे तक रियार ही करते होगे?" दिवाकर मलिक ने कहा "रापे तक यह क्या कहती हा एममम्ती ? फम वो हमेशा-हमेणा रियारही होता है।

14
शोकनमा
दमयन्यी को कुछ याद आ गया है। वह बैठक से निकल कर भीतर
चली जाती है। पूर्वी वायलिन वजा रही है । स्वर कभी टूट जाता है, कभी
एकरूप हो जाता है। उसकी बातो के सामने अपनी दो वडी बहनो
की तस्वीरें टगी हैं-कल्याणी और वागेश्वरी की। पूर्वी उन्हें देखने
लगती है।
.
4.

3 पीडामय भीषम का इविहास जिस प्रान्त मूने पर रखकर पिया मया पा, मह मूसा एकाएक भूलने समता है। इतिहास का बारीमा एक सन फाफा कर सब सो के सामने माता है, तो हम एक स्टेज पेसते माइट पक्कर ममा पाती है। दिवाकर ममिकका छोटा-सा मकान। मकान के भीतर एक मास कमरा । रमिग मोर मामी दीवार में उपर की मोर एक सिकी है मकड़ी की जो मतियारे की भोर सुमती होगी इस समय वह यर । इसी दमिम मोरगामी दीवार में छोटी-छोटी बातमारिया बनी है। दोनों में नृत्य का सामान सरार रखा मया है। गण मार करके समस्त रस्त्राभूपम मोरपंस मट मकरात कुपल, मेसी रमा चिमटा मुगमन मोर पौड़ी पट्टियो पर मुंगे मुपगुच्छ। मुर्दम बौर पसापर उस चबूतरे पर एक कोने मे रखे हुए है दिमे देखने से स्पष्ट मामास होता है कि इस पठरे पर नृत्याभ्यास किया जाता होगा। मम्मी-पौड़ी इस प्रकार पिछी है कि कही नाम का सिडाम नही । ऊपर सफेद बार-दूध में पुनी। चार सम्बे-मम्व गोसाकार किये। दोवास सफेद कपड़े के मार दो पर रेपामी लोम। रेसमी लोमों का म हसा पीसा है नारंगी बके। छत से पोषानमा है। उसके पाएँ किनारों पर पुनदपार झामर तम हुए हैं। बहुत ही हो रे ग म पीवारें रमी हुई है। सात फुट की ऊंचाई परारीने से देश के गोयामका की तस्वीरें टमी है। जी के उस पार से पैसे मामने की मोर दस रहे है। दसिम की दीवार मनो छोटी-छाटी दो माममारिया। उन पानो मास- 'मारिमों पीप में रिपाकर ममिक के पितामह और पिता के चित्र मगर गाऐ है। उनके फेम सुनहमे है। साइट पयूवरे पर पाती है। सफेर धोती मौरहने पीमे मरेप की। ।

16 शोकसभा गजी पहने दिवाकर मलिक एक तकिये को खीच कर जैसे ही लेटना चाहते हैं कि सामने से दमयन्ती आ जाती है। पूछती है, "क्या कह रहे थे ?" "पूर्वी कहा है ?" "स्कूल गई।" "क्या खाया उसने? ..." दमयन्ती चुप । "क्या भूखे पेट चली गई ?" "नही ।" 4 "रात की थोडी सब्जी वची हुई थी। वही खाकर चली गई।" "अरे • "दिवाकर मलिक कुछ और नही कहते । दमयन्ती की ओर से आखें फेर लेते हैं और तकिये को खीच कर अपने सिर के पास ले आते हैं। फिर एकाएक मुह फेरे ही बोलते हैं, "बहुत भारी गलती कर गया मैं। कल बारात मे नाचने वाली की वात स्वीकार कर लेनी चाहिए थी।" "छि । यह क्या कहने लगे?" "ठीक कह रहा हू, दमयन्ती ।" "नही, गलत कह रहे हो। यह सब एक आधी है जो थोडे दिनो बाद निकल जाएगी।" "और अपने साथ हमे भी आसमान में उछाल देगी।" दिवाकर मलिक दमयन्ती की ओर घूमकर आगे कहते हैं, "मेरी तवियत कुछ सुस्त लग रही है। मैं सोऊगा।" "ठीक है, सो रहो।" "मगर तुम एक बात का ध्यान रखना । फिजूल लोगो से मिलने के लिए मुझे मत जगाना । कह देना, घर मे नही हैं।" "अच्छा।" दमयन्ती कमरे से बाहर निकलती है। दिवाकर मलिक पेट के बल सा रहते हैं। . + 4 सारी पत्तियां गुम पुकी है। सार बनाने पाने निष्क्रिय हा से है। उमकी ममियों के सममे पीर फटे हुए पीत रहे हैं। रे गुरुमही हो मई है । नेपप्प पा कामा पर्दा बिना हमारे धीरे-धीरे कॉप या है। उसके बीच में एक बड़ा-सा मान प्रश्नचिह्न बना हमा है। स्टेस को 7 मे एक हल्की-सी रोशनी उतरती है और उस प्रस्लपिड पर बिखर गाती है विचित है यह स्टेज! वर्मकों को मिन पाना मुश्मित है। करोड़ों की संम्या में है वीर तन सबन मपनी-अपनी मांगों पर कामी पट्टिया पड़ाती है। उनकी बाहों पर एक-एक पौड़ा विल्मा ममा हुमा है जिस पर सुन्दर बसरों में सिक्षा 'हम मुर कसा के प्यासे है। पूरी दकीर्घा में सन्नाटा छाया हुमा है। कोई किसी सपा मही कर रहा है। नमता है सभी एकदूसरे के लिए माननी है। एकाएक कोई ज्ञात मारीसर व्हाका तमाता है और पूरे स्टेज पर घुओ फैन पाता है। नीचे बैठे सार बनाने बास र कर गाँधे गिर पात है। धीरे धीरे घुर्मा ने ममता है मार खेम सुरू होता है। वर्मक येशुमार है और टिकटमर पर पफ बरस रही है। मुकिम साई परपरकोप हा है। मध्यस्तरीय किरामा-भपार। चामन दास भाटा मसामे नमक, मचा, पापद स्ना श्रीम, पाठार, साबुन कमा साग भर टॉफी पॉकलेट बिस्सुट, पीतेस, चीनी मैरा रंग, पाप कॉफी बैटरी स्टोर-पिन--सब कुछ यमास्थान कायद से रखा हुमा। बोर पापा पानक का एक हिस्मा। म्यारहवीया पूर्वी स्कन म है। टिफिन की छुट्टी हो चुकी है। ममा की गौर पानी-पहचानी नमिया माता करने मनी है। पूर्वी काठ 18 शोकसभा सूखे हैं । पेट जैसे पीठ से चिपका जा रहा है। वह घटी बजते ही वर्ग मे निकलती है और अहाते की पश्चिम वाली दीवार की ओर तेजी से भागती है। बायें हाथ मे सिर्फ लकडी की एक स्केल है। उत्तर की ओर वरामदे पर बहुत सारी लडकिया अपना-अपना टिफिन बॉक्स खोल चुकी हैं । आपस मे एक-दूसरे को पूडिया, पराठे-कचौडिया, सूखी सब्जी दे-देकर खाने लगी हैं। कोई मुस्कराती है, कोई खिलखिलाती है, कोई अपना कुरता सभालती है, तो कोई दुपट्टा । पूर्वी चुपचाप दीवार से सटी खडी है। वह इधर नहीं देखती। वह यो ही, गायद निरर्थक ही, उचक-उचक कर दीवार के उस पार खडे ताडवृक्षो को देखती है। फिर स्केल से अपनी बायी हथेली को ठोकने लगती है। हल्की गुलावी, कोमल, प्यारी हथेली। मामूली छीट की फ्रॉक, लट्टे की सलवार, पैरो मे हवाई चप्पल । चप्पल का दाहिने पाव का फीता उखड गया है। उस फीते को उसने शायट से आलपिनो से फसा रखा है। दिवाकर मलिक की बेटी है न । लगता है, उनका ही सौन्दर्य लेकर धरती पर आई है। वैसा ही मनोहर रूप, वैसा ही नयनाभिराम मुखडा । एक पतली-सी चोटी पीठ पर झूम रही है। उत्तर के बरामदे मे दो लडकियो के साथ नाश्ता करती हुई मीना की नज़र उस पर पडती है। मुह से फूट पडता है, "हाय । पूर्वी उधर चुप- चाप खही है।" दूसरी लडकी कहती है, “उसे बुला लो।" मीना पुकारती है, "मरी पूर्वी, वहा क्या कर रही है ? इधर आ, इधर । पूर्वी, ओ पूर्वी ।" पूर्वी शायद सुन नही पाती। उसकी गर्दन जरा हिलती है और वह फिर उचक-उचक कर ताडवृक्षो को देखने लगती है। तीसरी लडकी मीना को टोकती है, "छोडो, बन रही है। दिवाकर मलिक की बेटी है न 'कत्थक नाच "।" दूसरी लडकी कहती है, "दिवाकर मलिक का बडा नाम है। एक बात तुम नही जानती न ? पूर्वी भी वायलिन वजाती है।" तीसरी लडकी हलवे के साथ आधी कचौडी मुह मे डालती हुई कहती गोकमभा 19 है मगाती होगी। यही तो धन्धा है इन मोर्मों का।" पूरे बहावे में लड़कियां मा-या रही है। बातावरण पैस भूर रहा है। स्टाफ रूम में शिक्षिकाए पसपान कर पी है। वहाँ भी हमी विमतिमाहट है सारियो की सरसराहट है। नपर तारों पर तीन-बार कौए माफर मलम-बसए बेट बात है। पूर्षी उन्हें भी निहारन ममती है। पहले एक कोमा मपने पंख फरफड़ाता है फिर दूसरा बार तीसरा-चौथा। इमरा कीमा बपनी भाष में मपन बार्य पैर को दुबमामे ममता है। फिर सिर उठावर पूर्वी की बार बना t-कहाँ इस नरकी के हाप में रमा तो नहीं है ? उमकी काका समाधान महीं होता मार मह उबार मागता चमा माता है, भागापमा पाता है। पप्टी टनटना उम्ती है। समिया कमानों की मार भामती है। पूर्वी भी धीरे-धीरे बनती हुई बर्ग में माकरबपनी चपह पर बासी है।

5 दस्तक । वार-बार दस्तक । । दिवाकर मलिक की बैठक के द्वार पर दस्तक | न जाने किम जमाने में यह सोफासेट यहीं पड़ा है। उस ओर मध्यम आकार की एक चारपाई के बीच मे काफी जगह वच जाती है। दरवाजा दक्षिण की ओर सुलता है। दीवार पर देवी-देवतामो के चित्र टगे हैं। वाकी सब कुछ साफ-सुथरा है। विजली का मेन मीटर बैठक मे है- दरवाजे से सटा वायी ओर-फर्श से लगभग सात फुट ऊपर। उम पर धूल जम गई है और मकडी ने मच्छे-खासे जाल वना रखे हैं। इस बैठक में पश्चिम की ओर एक दरवाजा खुलता है, जिससे भीतर आगन मे आया- जाया जाता है। मोफासेट इसी दरवाजे से उत्तर-दक्षिण दिशा मे लगा । अतिथि आते हैं, तो वे अक्सर इसी सोफे पर विठाए जाते है । उनका चेहरा पूर्व की ओर होता है और वे शरारतन झाकना चाहें, तभी आगन मे झाक सकते हैं, अन्यथा आगन में फुदकती गौरया तक उन्हें नज़र नही आ सकती। सोफे पर लगे सारे कुशन न जाने कब इस लायक हो गए कि डस्ट- विन के हवाले करना पडा । अव कुशन की जगह उनकी नाप की दरी काट- काटकर विछी है। पूरव की ओर दीवार से सटी एक छोटी-सी मेज है, जिस पर न तो ऐशट्रे है और न कोई गुलदस्ता । हा, एक चीज़ ज़रूर हमेशा देखी जाती है-शुभ्र पाषाण के मुरलीधारी वालकृष्ण। यह छवि वेहद प्यारी, न्यारी, मनोहारी है। दमयन्ती या पूर्वी इस बैठक को फूलझाड मे रोज़ दो वार वुहारती हैं। पहले यह काम कल्याणी और वागेश्वरी के जिम्मे था। बैठक सदा स्वच्छ- सुहानी बनी रहती है । पूर्वी प्रत्येक प्रात सन्ध्या वालकृष्ण की मूर्ति के सामने एक जलती हुई सुगन्धित धूपवत्तो जलाकर खोस जाती है। पूरी शो-1 - पौषममा 21 । पेठक मुग प्रायमान हो जाती है। बैठ गाने का भी करता है महरी माम मने का मन करता है। द्वारकुल गया। सिर के माचल को और मी म्पपम्पित करते हुए रमयन्ती ने कहा "भाइए। मागन्तुक ने पौडट के वाम पार अपठे हुए कहा "नमस्ले । मेरा माम मनोहरसास है। "अन्न ।" ठमा-मा सर दमयन्तीपा। मदिवाकर ममिक है पर में मनोहरलाम ने बड़े-मरे पूछा और दमयन्तीकी रूपराधि को देखकर पकित ह गया। सूचत हुए गुभाव में इतनी सुमार 7 तारे चन्द्रमा स छोटे मगर भात है मगर कहत है उनका माकार पममा से मई गुना अधिक होता है। मामूली-मी सफेद साड़ी साड़ी की इस्की पुमानी किमारी। पोरी-गोरी कसाइयों म कामी-कामी नहीं लाल काम पूड़ियो । पर, इममे क्या? मास मनिया बाहिर साल मुनिया है। मनोहरसाम अपने मम मे नत हुए विकार से माने मगता है कि ममन्ती बोगन कीबोरनुसने बामेरवाने की मोर सिमकती हईयोनी बैठ जाइए, सो बमों है? मनोहरमाम मैस ससकोष बैठ गया। दमयन्ती में पूछा 'आप कहां से मा है। Adorth "मीना वागार से। मीना बाजार से ?-340 420 JAIPUR या काम है मामला मनाहरमाम ने पैसे बड़ी नस्वी म कहा 'रिमाकर मलिक मुझ गामा है। मीना बागर में मेरी दोनो दुकानें है।" "राना एकाने ?" "गी हो । एक कपड़े-माड़ियों की और दूसरी मेमरी की। मगरम पोवाती गही पर ही ठसा । मत बामी यही परयो भाई शाहर PLITAL Nagar ROOMS ।

22 परापास। वैठते हैं। दिवाकर जी उधर से गुजरते हैं, तो वरावर 'जय रामजी की" होती है।" चबूतरेवाले कमरे मे चुपचाप लेटे हुए दिवाकर मलिक की आखें खुली हुई हैं। परेशान आखें जैसे नीद से झगड़ रही हैं। दिवाकर मलिक ने कान अडा कर सुन लिया है कि यह आवाज़ मनोहरलाल की ही है। सम्पर्क, मैत्री और उन नगण्य स्थितियो की स्मृतिया मानसपटल पर उभरने लगी हैं, जिनमे दोनो ने एक-दूसरे को 'जय रामजी की है। "अच्छा, अच्छा।" मनोहरलाल ने कहा, "आपको मालूम ही होगा कि शहर के इस इलाके में न तो एक पार्क है, न बगीचा और न तालाब। हम लोगो ने सर- कार के यहा दरख्वास्त लगाकर एक शानदार तालाब खुदवा लिया । वगल मे एक पार्क भी बन कर तैयार हो चुका है। बीच मे खुला हुआ स्थान और चारो ओर रगविरगे फूलो की क्यारिया। क्या वतलाक आपसे, तालाब के नीचे से एक नम्बर का पानी निकला है। आज बीच मे लाट भी गड गया। तीन ओर घाट बन चुके हैं। एक ओर का वाकी है। हम लोगो ने तय कर लिया है कि तालाब और पार्क की सफाई में कोई कमी न रहने पावे । समिति के एक मेम्बर ने चाहा था कि एक घाट धोवियो के लिए छोड़ दिया जाए, मगर मैंने कहा ऐसा नहीं हो सकता। तालाब के किमी घाट पर धोवी क्या, धोवी का गदहा तक नहीं नज़र आना चाहिए । अव खुशी की बात यह है कि मिनिस्टर साहब तालाब का उद्- घाटन करने को तैयार हो गए हैं । आज मगलवार है न ..?" "जी।" "उद्घाटन शुक्रवार को होना तय हुआ है।" "तालाव की पूजा भी तो होगी न?" दमयन्ती ने सहज भाव मे पूछा। "जी हा, पूजा तो होगी ही। मिनिस्टर साहब खादी की जाघिया पहन कर तालाब मे छलाग लगावेंगे।" मनोहरलाल ने बतलाया। दमयन्ती के मुह से निकला, "भाई साहव, तव तो आपको शहर के किसी अच्छे तैराक से उद्घाटन कराना चाहिए।" - पोकसभा 23 मनोहरनाम मे बसहमतिमूध सिर हिलाते हुए कहा, "राफ महरे पानी में तैर सकता है फरता नहीं दे सकता न।" पन्छा मन्छा बाप इनको फिसमिए पनाच रहे हैं? 'हमने शुक्रवार की रात पाई में एक दहा साहतिक प्रदर्शन का भायोमम किया है। वैसे दो मार भी कई बार्टिस्ट है मपर रिवाकर जीरे मुकाबन का प्रेसर कोई नही है। इनमें से मुश्य पूरे समारोह के लिए बहार बन जाएंगे। मिनिस्टर साब भी यार करेंगे कि किसी काम में पाने का मौका मिमा पाक्या म्पापारी और क्या नौकरी पेये पामे सभी इस बात पर एकमत है कि रिवाकर बी ।" यमवन्ती मे एकाएक पूछ सिया "ठीक इसके लिए बाप मोर्मो मे पतिमा देने का विचार किया है? बौहरी बोर बगार--मनोहरमाम की नस-नस में पैसे मागषय की महरौड़ पड़ी। दमयन्ती के इस प्रल मे से उसे माइत कर दिया फिर भी उमने मपने को नियंत्रित करते हुए कहा मापने तो परम का समाम कर दिया मुझसे । दिवाकर मी होते तो शाम गुप भी मान पाते। यह पासमार की सेवा है। इसमें मेनदेन का माममा कहाँ माता है? क्या माप उस वासाय में स्नान मही करेंमी या घर की चाहरदीवारी से भापका मन होगा तो बाप उस पाई में जाकर नहीं बैठेगी?" बमयन्ती ने कहा "महा से काफी दूर पाता है यह तामाय मीरबह पाका 'सैर, कभी माइएमा। मैं कम निमाणमपत्र भी भित्रका को वो हम मोग ऐसा समाएगे कि वह इन भगवान का बगीचा बन पाएपा। मनोरमास कहता रहा, 'माप तो बुरा एक महान मोर मा- माटिस्ट की वो है। इसलिए बापको यह महीं बतलाना होगा कि फमाकार पैसे को पार की धून समझता है । मोर पसौ से मना किसी फमाकार का सम्मान किया जा सकता है? ये पर परमानों में पड़े तो दिवाकर मलिक को भारमा पैसे पीप उठी 'टीक कह पेशे मनोहरभास | कसाकारों के गले में सिर्फ माताए गसनी पाहिए । एक-दो नहीं बन दो पन पपास सौ। यानी पापा . M 24 गोक्नभा इतनी मालाए, कीमत कम हो तो वेहिताब, कि उनकी गर्दन टूट जाए। जिन्दा ही उन्हें प्रेत वना दो। प्रेनों को न तो मकान चाहिए न कपडे, न खाना, न दवाए प्रेत लाबल्द होते हैं न । इनलिए उन्हें बाल-बच्चों की माया भी नही मताती, फिर वे किमका भविष्य बनाने के लिए कुछ जोड़ना- वटोरना गहेंगे ?' दमयन्ती का स्वर धीमा पड गया । बोली, "मेरी समझ मे एक बात नहीं आती दि समाज कैने यह मोच लेता है कि सिर्फ मां-पचान लोगो की भीड जमा करके कलाकार के गुणों का बखान कर देने-नर से उनकी नारी समन्याजो का हल निकल जाएगा? आखिर कलाकार भी तो नमाज के बीच का ही एक इन्सान होता है। मेरे घर मे पन्द्रह-वीन दुपट्टे पड़े हैं। वे स्वागत नमारोहो मे इनके कधे पर डाले गये थे। क्या आप उन दुपट्टो के बदले एक हजार रुपये दे सकते हैं? कहिए, तो मैं निकाल लाल। हजार रुपये से मेरी कई समस्याए हल हो जाएगी।" मनोहरलाल वडे पनोपश मे पड़ा। उसने सोत्रा, भरतो से जवान लडाना ठीक नहीं। वोला, "यह काम तो किती फुर्मत के समय किया जा सकता है । देखना होगा कि दुपट्टे नत्रमुच मिल्क के हैं या टमर के। वैसे भागलपुरी रेशम के कपडे के भी अच्छे होते हैं। अभी तो मैं जल्दी में हू । आप कृपा कर मुझे उनसे मिलवा दीजिए।" "वह तो घर में नहीं हैं।" "नहीं है?" "ना।" "आपने पहले क्यो नही बतलाया ?" "हम लोग दूसरी-दूसरी बातें करने लगे न।" मनोहरलाल उठ खडा हुना और बोला,"वैसे भाए तोकह दीजिएगा। मुझे अच्छी तरह जानते हैं । मैं कई बार उनके काम आ चुका है। एक वार वाज़ार ने रुई गायब हो गई थी। दिवाकर जी वडे परेशान थे। आरती की वत्ती बनाने पे लिए उन्हें थोडी रुई चाहिए थी। मैं खुद उनके साथ मागीलाल के पान गया । मेरे कहने पर मागीलाल ने सौ ग्राम रुई दे दी थी। पैसे अपने पास से यह देने लगे। मैंने रोक दिया। फिर तो मागीलाल सोकसमा 25 को भी बिहान होभाया। समयन्ती चुपचाप मुनवी पी। उपर बनरे पर सेटे हुए रियाफर मसिफ ने भी मह बात मुनी। ममोहरलाम एकपमाकार के प्रति बरखी मई अपनी सारखा का एमबीर सम्बा हिस्सा कहता रहा 'बहुव मान गुगर गए। दिवाकर बायू मीनावागार की साक पर पाकर समा रहे थे। गर्मियों के विनये मौर सबा बायपन रहे होंगे। मैं मपनी गद्दी पर पा। भर मिली तो मने फोरल बुमा मिया। यह परेशान मसर माए। एक मोर कोने में से भाकर पूछा तो मालूम हुमा कि एक कर्मफूल पर पचास रुपए उधार चाहते है। मुहल्ले में मार मारे किसी से कहा नहीं बन पा है। मैंने समझाया-'महाराण पिरवी रती हुई पीर मुलिस से कोई छुरा पाता है। पचाम एसए में सोने का कर्णफूम हाप से निकल गाएगा। इसे पत्र ही गनिए। मेरी बात मान यए । मै मपने भाई साहब के पास मिमा मे गया। मैंने एक सौ छियासीस रपय म किला फतह करा पिया। दूसरा दुकानदार मेरे पाम से एक सौ तीस से एक छाम पमारा मही देवा। दमयन्ती मे पृष्ठ स्मरण करत हए कहा “श्री। मायारमापा है। पर सीट कर माए, वो कहने मगे कि मीनावागार में पड़ी देर तक भार-पर पाकर ममाता रहा। साहस ही कहो कि किसी पुकान भुमू । एक मित्र मिल गए। उन्होंने ही भपन माई हाप कपफूम किया दिया। 'जी हो गह सेवक में ही हूं मनोहरमास । 'भापता महसान भूलते नहीं थे। क्या मग भूम रे? "मुझे वो ऐसा ही कुछ समता है।" "नही महीं ऐसी गाव मही। कलाकार सने मात्र नहीं होते।" एममन्ती बोल पड़ी महों यह वा ।" मनोहरताम को मया से दमयन्ती ने म्यंग्य कसा हो। पूछा "क्या माप पुछ और कहना चाहती है क्या? जी नही मार कुछ नहीं।'

26 शोकसभा मनोहरलाल ने अपने कदम चौखट से बाहर करते हुए कहा, "अव चलता हू। जरा कह जरूर दीजिएगा। वैसे छपा हुआ निमन्त्रणपत्र ज़रूर आवेगा। क्या कहू, स्टेज पर आगे की सीटो पर सिर्फ अफसरो और उनकी वीवियो के बैठने का ही इन्तजाम हो सका है। आप भी चाहें, तो मा सकती हैं । दायी ओर दरी पर महिलाओ के बैठने का प्रवन्ध है। आपको हम वही विठा देंगे । अच्छा, नमस्ते। जरूर-से-जरूर कह दीजिएगा । यह समाज की इज़त का सवाल है ।" दमयन्ती ने इस बार कुछ नही कहा । चुपचाप आगे बढकर दरवाजा वन्द कर दिया। चबूतरे पर लेटे हुए दिवाकर मलिक ने मनोहरलाल की आखिरी बातें सुन ली थी। वह जैसे फुसफुसा पडे, 'कलाकार तो समाज की इफ्जत बचाये और समाज कलाकार को निर्जीव खिलौना समझे ।'

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हाय कितमा
मतीत के बनगिन परस्पर ममम्पस चित्र दिवाकर ममिको दृष्टि
सरोगर में रपे हैं। पर म मन का एक दाना नहीं। समझ में नहीं
माता कि किस पास गाए, कहां से पुछमाएं। फिर सुस्ती माती है। सुस्ती
माधी माद का स्प भार परखी है और माइट मान-ऑफ होने ममती है।
कुछ सोकर कोई कसा का मारना-दुमारा बन पाता है !
कभी पड़ोस के सामागी के इसी दरबारे पर होक मगाकर कहा पा "मुन
सो दीदी निकर मेरी बात पर ध्याम मही पे पाहम-तुम तो पके
हुए फन ठहरे, पाने पर गनी से टपक परें। मगर, तुम्हारा पा छोमा
योगासहप्प बना फिरता है कही काम पेगा। सब बापस्कोप मा नया
है। उसमें दूसरे प्रकार के नाच होते है और मोग उन्हें ही पसाय करत है।
मबनाष पर बो भपवान के गोल मोमे गाते है उनका मानन्द मने पासा
हेम मिमेमा।
पूसा मामा ने दरवाजा होम दिया था और यूपट की मोट से कहा
पा ठिए, मामा भैया।
मोर उधर पीप के कमरे में किशोर दिवाकर मम-ही-मन कुछ माय
कर ऐ पे कुछ बुरसुवा रहे थे प्रहे थे। पार्यों में से घिरफन सिमटी
चमीमा यही पी
स्पायी
'ताईवा पेईतव माई तापेई द्रता
निमा धिन धिनमा तिम मा धिम धिन मा।
'तापेई ताई तत एक-दो-चीन एक-दो पेशित।
पिनमा धिम पिन मा टेकिन टेटे धिन धिन ना।
एकापिंपदोबायां पर।
रिवार पर बांध मेवे है, फर्श पर उतर पाते हैं फिर
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28 शोकसभा , 'ता थेई, ता थेई तत लाला ने जैसे श्यामा को एकदम से दीन-दुनिया का दर्शन कराते हुए बतलाया, "हमारे देश मे तुम्हारी जाति के लोग लाखो साल पहले से जप-तप, यज्ञ, पूजा-पाठ करते-कराते आए हैं। इसमे भला किस बात की हेठी ? वगीचे वाले महन्त जी ने चेला बनाने की खवर भिजवायी थी, मगर तुम्हारे यहा से टाल दिया गया। तुमने तो सुना ही होगा कि उसके वाद महन्त जी पखवाडे-भर भी न बचे और सुग्गन राय का लौडा चेला बनकर लाखो की जायदाद का मालिक बन गया। खैर, गया हुआ वक्त कव हाथ आता है ? परसो मे श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर के पुजारी भगवान के यहा जाने की तैयारी कर रहे हैं। मुझसे इशारा कर कहा कि दिवाकर को बुला दो, उसे अपना स्थान सौंप दू। सो यह अन्तिम अवसर है । जानती हो, मन्दिर के नाम पर वाईम बीघा खेत है और मन्दिर मे भला क्या खर्च है ? चढावे ही इतने चढते हैं कि मत पूछो। मेरा विचार है कि दिवाकर नहा-धोकर चले ओर पाच लोगो के सामने उनसे तिलक करा ले । मन्दिर की देख-रेख मे भला क्या रखा है ? भक्तजन आते हैं और सारी सफाई कर जाते हैं। घण्टी डुलाने-भर से ही पेट भर जाए, तो काया डोलाने की क्या ज़रूरत? दिवाकर घर मे है कि नहीं?" "अभी था तो ।" लाला बोले, "छोडो, मेरे सामने तो पढाये-सिखलाये हुए तोते की तरह ‘हा हा' करेगा और जहा मैंने उस ओर पीठ फेरी कि 'ता थेई तक थेई' के वश मे आ जाएगा। तुम उसको समझाना । अभी वच्चा है, वात मान सकता है। कच्चे घडे को तोडकर छोटा-बडा बनाया जा सकता है। पक जाने पर तो एक ककडी तक की चोट नहीं सह सकता। मेरे दादा कहा करते थे-पढो बेटा चण्डिका, जिसमे चढे हण्डिका । हम तो बनिया ठहरे। वचपन से ही डाही मारना हमने न सीखा होता, तो आज जो कुछ देख रही हो, वह सब नहीं होता। गाना-बजाना और नाचना रोज-रोज़ रोटी देने वाला इल्म नही है हा। तुम मा ठहरी उसकी। समझाओ। और जो राजी हो जाए, तो कहना मामू के पास चले जाओ। मैं सारा अनुष्ठान शाम तक पूरा करा दूगा। तुम तो कई बार उस मन्दिर में हो - पाकममा 29 माईहा। पूजा-पाठ के मिए कही म क पोगने नहीं माना पापा। मन्दिर में महात में ही पिछया की बार फुममादी है। हर या किपाम के भी तीन पौधे है। सब उमम मम कोये फटते है और पूध-मी कपास उनस मिकमती है। कोई भक्त श्री माता है कोई भक्त दूध देगाता है।" मकर सेट किया हुमा पासा से मौरे पर धोखा दे गया। रिवारम पर-रार भर से मुक्ति पाने के लिए मूल्य के पराना केपार बुहारते रह और छह साम बाप मोटे । म्यामा सूख कर माधी ही मासे माधी भीमरपती अमर दिवाकर पत्र न मेयते इत। पेट से महा पापडात तो कानिस्तान का मयसोदा तक मही होता। बयामा एक मन पकायो मोर वानों बन पातीं। पर की ही-सही पोड़ी मकर पूनी भी गाती रही। साम पो परवार से बाहर मिलकर सी होती मौर उम्मीद करती कि किसी मोर से दिवाकर मा निकलेगा । मेकिन मह मन तो बोयामानियों छत मेता है साधारण सोम पर इससे हमे जाते है तो ममा क्या मारवर?

7 सकडो मीटर फिल्म जैसे देखते-देखते खिसक जाती है। पत्नी-रूप दमयन्ती आती है। दो साल बाद मा बनती है। इसके पन्द्रह दिन पहले दिवाकर कलकत्ता से लौटे थे। सात सौ रुपये ले आए थे। जिसने इनका नृत्य देखा, मुग्ध हो गया। सोनार देश वगाल की नर्त- किया चकित रह गईं। दिवाकर जैसे समारोह के हीरो वन गए। कन्या ने जन्म लिया, तो माना गया कि घर में लक्ष्मी आई है। इस लिए छोटा-सा बढिया नाम रखा गया-कल्याणी। और एक और रील जव घूम गई, तो पता लगा कि कल्याणी की उम्र वीस साल हो गई। इसके अलावा वागेश्वरी और पूर्वी। कहा चले गए वे दिन? जा रे ज़माने, तू कितना बदल गया । सुग्गन राय का लडका महती के साथ-साथ पाच-पाच रखैलो को भी सभाल रहा है। सम्पत्ति मे फुलावट आ गई। महाजनी का कारोवार भी चलता है। चार-चार मुशी खाते सभालते हैं। एक कारिन्दा कचहरी मे चक्कर लगाता रहता है । नाज़िर से मिलकर वही जन्ती-कुर्की का कागज तैयार करवाता है। धर्म के लम्बे-चौडे मैदान मे अधर्म चौका-छक्का लगाता है। सुग्गन राय का लडका बरावर सिर मुडाये रहता है और गेरुए रंग का कुरता पहनता है तथा साफा बाधता है। लक्ष्मीनारायण मन्दिर के पुजारी जी सचमुच मर गये और रामपूजन ने उनका स्थान ले लिया। वाईस वीघे की खेती बयालीस बीघे मे बदल गई। उसके लगातार तीन बेटे । सबसे बडा मजदूरो की सहायता से खेती करता है और अनाज वेचकर नोटो की गड्डिया घर में लाता है। दूसरा वाला मैट्रिक पास करके 'डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मे किरानी बन गया है। पडोस की कुम्भकारपुत्री के इश्क मे फस गया, तो एक रात उसे उहाकर कही ले गया और मन्दिर मे शादी करके लौटा। तीसरा पुत्र पढता-लिखता नही । पूर्वी की उम्र का है।

घोफसमा 31 रामपूजन मे ममाते नुका पर हमेशा चाय की दुकान में मगर भाता है। कभी-कभी मम्मी मारायन के मन्दिर में स्यूटी बना देता है मार मेरस-मर वासानी से निकास मता है। बाईस पीपे मही बनाव गरबयासीस बीमें। रामपूजन पता नहीं भीतर ही भीवर कुलते हैं या नहीं मगर बाहर से बेटों के बारे में मान रश करते हैं। महाररा दिवाकर ममिक से भेंट हो पाया करती है। दमयन्ती क साम मन्दिर में पर कई बार फस्यामी को देखा है। एक बार रिवापर मिन मए, तो पूछ मिया की पानी के मिए कही टोहम ऐ हो? दिवाकर मोमे हो मगर रहेब पी सम मा, भावी है। पर पमाना भी तो अब नहीं पा पर भी इस सहर, कभी उस पार से युमा माया करते। 'तुम शुरू में ही प्रमती कर गए, रिवाकर ! हुए कहा 'समापुर के बाबू साहब तुम्हें अपने महा रमना चाहते थे। ए जाना चाहिए ना। बंधा-बघापा भोजन-वस्त्र और कुछ माहगार भी मिमता पता। उमसे ही मात्रा मेकर घर-उधर का भी पाकर मगा माते। कितने पुपराध गसे होमे तुमने ! मनकार से ममा पैसे यहाँ मरत है ममिको महा मने यह सती की। दिवाकर ममिक मे पोबेमन से कहा। रामपूजन से ममग होने पर रिवार मप्तिक को एक बार मात्र पार भाई। रट टाकर मैट्रिक पास कर मेना चाहिए पा। महिसा कासग के मेरी प्रिंसिपल की मोर से विज्ञापन निकमा पा-एक मुख्य प्रशिक्षक चाहिए । मनिक योग्यता कम-से-कम मैट्रिक पास। मौका मातही मारमी कसा हो पाता है ? ऐसे कई मवसर पाए थे, पर दिवाकर के नृत्य देसार प्रिसिपस श्रीमती गोषी मानम्र से अभिभूत हो गई थी। रहा नहीं गया ता पास मापर उन्होंने कहा 'खूब ! बाप हम मोर्गों के मिए पौरपपुस्प है। हमारे 'उनको भी संपीठकमा से बहुत प्रेम है। कभी हमारे पर पधारिये।"

32 शोकसभा - "माऊगा, अवश्य आऊगा।" "आइए, हमारा मौभाग्य होगा।" किसी ने यह नौकरी पकड लेने की वात सुझायी, तो वडे खुश हुए । याद आया, श्रीमती जोशी उनकी प्रशसिका है। वह जानेंगी कि मैं यह पद चाहता है, तो फौरन रख लेंगी। प्रार्थनापत्र टाइप करवाया और मोचा-- पहले चलकर श्रीमती जोशी को दिखला लू । इण्टरव्यू के तो अभी पन्द्रह दिन शेष हैं। शाम के लगभग छह वजे उनके घर पहुच गए। वायी जेव मे प्रार्थना- पत्र था। खवर देने पर एक नौकर डाइग रूम का दरवाजा खोल गया। बोला, "वैठिए, अभी आती हैं।" प्रवेश कर कोने मे रखी हुई कुर्सी पर शान्त-सहज भाव मे बैठ गए थे। वे ही सदावहार घुघराले वाल, गौर मुखमण्डल, आखें ऐमी, जैसे कमल का कोया आधा फटा हो । कोमल-कोमल हाथ, कोमल-कोमल पाव । पतले-पतले अधरो के पीछे धवल दतपक्तिया। एक नृत्य का भाव जैसे आ खडा होता है। कृष्ण पहले से यमुनातट पर कदम्ब की छाया मे खडे, वशी लिए राधा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जल भरने के लिए उधर मे राधा आ रही हैं। कृष्ण पर दृष्टि पडते ही रुक जाती हैं। आनन्द और लज्जा से आखें फैलती हैं, फिर पलकें झुक जाती हैं । समझ रही हैं कि कृष्ण ने उन्हें देखा नही । मन-ही-मन फैसला करती हैं, माही की ओट मे छिप जाना चाहिए। सिर ने कलश को उतारकर कमर पर रखती हैं, फिर वाए हाथ से कृष्ण की ओर इशारा कर झाडी मे घुसने लगती हैं । पर, कृष्ण सारे खेल चुपके- चुपके देख गए। सिर यो हिला, जैसे कह रहे हो, मैंने देख लिया, कहा जाओगी मुझमे छिपकर ? दिवाकर कृष्णरूप धारण किए यह नृत्य प्रस्तुत कर रहे थे। सो, भावानुरूप मुस्कराए। धवल दतपक्तियो की शोभा दर्शको की आखो मे नही, दिलो मे समा गई। हाय रे, दिवाकर मलिक । सच वतलाना, राधा का नटवर नागर कोई और था, या स्वय .

देसार मीमती बोलीम ने IRHITE Iftar
यही प्रश्न किया था। धोintshirt II TIMILAIAt
'भाप तो नायमरी ।
जी में पाम नही पीता'
पुछ मीठा फिर पाग
मग दोमा दाइम मम में भागन-गाना phondi
पापी बामी गएर माना गीMAMIRRIALI
थी। मानल इयरी पानालाPिALI,
जब प्याह हुमा तो माग भी हुए। गाM AIRAT Parnn
गई।
मर और एक ग्मगुम्मा।
नौकर प्पट उठा र म गारमा माता
"मार पर बन जाना। मारfmartDAI
पीमपनबाम पाम पाहिा।
नोपरामा बसMITI
एमबीप पिचार मनराली Hint
बानी की मारना Emrry-11
म मामन म मार मारमा - "TTTT
पहिर, मामmrrittantra
मंगगनमानि।"Horxxputari
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?" . ?" "क्या आपका अपना लडका है जैसे कलेजे पर पत्यर रखकर दिवाकर मलिक ने कहा, "जी नहीं, यह नौकरी मैं खुद करना चाहता हूं।" श्रीमती जोशी को बडा आश्चर्य हुआ। वोली, "अरे, आप यह क्या कह रहे हैं ? यह नौकरी आप करेंगे ? आप इतने वडे कलाकार है। क्या कहेंगे लोग? आपकी क्या कोई मामूली प्रतिष्ठा है ?" दिवाकर मलिक ने कहा, "मैं सच कह रहा हू । मुझे यह नौकरी चाहिए। नौकरी आखिर आदमी ही करता है। लोग क्या कहेंगे, मैं इसे सुनने नहीं जाऊगा । तारीफ मे कुछ या ज्यादा कहना जवानी होता है, इम- लिए लोग इसमे सकोच नहीं करते। आप मेरे लिए कर दीजिए। दो लडकिया न्याहने योग्य हो गई हैं। वही कृपा होगी आपकी' ।" श्रीमती जोशी जैसे कुछ और सभल कर बैठ जाती हैं। "आपने नृत्य की कौन-कौन-सी परीक्षाए पास की हैं "परीक्षा तो नहीं पास की।" "तव कैसे काम चलेगा?" "मैंने जनता के सामने परीक्षाए दी हैं।" दिवाकर मलिक याद कर-कर के कहने लगे, "मुझे दो-दो वार राष्ट्रपति ने पुरस्कृत किया है। ग्वालियर के अखिल भारतीय मगीत सम्मेलन मे ." श्रीमती जोशी ने वीच में ही टोका । श्रद्धा का स्थान समता ने ले लिया । वोली, "भाईजान, सब ठीक है। आपको पुरस्कार मे कुछ रुपये मिले होंगे, शाल मिली होगी, तावे की पट्टिका पर खुदे हुए कुछ अक्षर मिले होंगे । आपको माला भी पहनायी गई होगी। मगर, राष्ट्रपति जी ने आपसे यह कभी नहीं पूछा होगा कि आप किन समस्यामो मे घिरे हुए हैं। आपके लिए वतलाइए, क्या किया जाए "जी हा जी हा ऐसा कुछ नही पूछा गया।" "तो फिर ?" दिवाकर मलिक बोले, "मेरा मतलब यह है कि मैं जिन वच्चियो को नृत्य सिखलाऊगा, वे सीख-पढ कर आखिर अपने नृत्य-प्रदर्शन जनता के सामने ही तो करेंगी?" ?"

'भाईगान माप हर मासूम पान पड़ते है। साकिया नृत्य का प्रशिक्षण सने र बाद क्या करेंगी इसमे मुझे क्या पास्ता? भामेर में मारियां : सिए एक मस्प-प्रशिक्षण विभाग है मार नमका प्रधामन मेरे हाम में है। प्रशासन के लिए मुझे यो मधिकार मौर निरंप मिसे है उमस न तो में एक पाय सिसक सकती हूं मोर न दामें। कहते हुए श्रीमती बोसी मे पूछ सिया 'मापने कहाँ तक सिक्षा पायी है? रिवाकर मसिक ने उत्तर दिमा 'मैट्रिक का इम्तिहान से मार दिया ममर दोनो बार फेस हुमा। मेरा मन तो मृत्य के मोमों म सोया रहता मा 1 मने सोचा मुम तो मृतक बनना है कर्नाटक की भी कितनी बार हुई मौर वराबाद के निजाम मासयाह के मरने के माप महा कौन तस्वनणर्ण हुमा इसे रटने से भमा क्या होगा? मागे घम कर जो बनना है मने मारी पक्ति उमी में समाना ठीक समय । दिवाकर ममिक बरे भोसपन से कहते पए, 'मैं बिम विषय से नफरत करता वा उमे पाने मौर यार करने के लिए मुझे विषय होना पड़ता था। मसनम-भूमोन को ही मे मीगिए । सोना कहां-कहो पाया जाता है ? यदि में ठीक-ठीक यह बात मान भी मू वो मेरी मुत्पकमा को इससे भला कौन-सा साम मिस पाएगा? अब रेसिए न यो छात्र मधीनों के प्रोड्ने मोड़ने में रुपि ठा है उसे संसद के पातुस्म प्टाने से क्या होगा? उसे तो सरकार को चाहिए कि । मैंगो एक ही बात मानती हू मारबह यह कि सरकार कभी कोई प्रमती नहीं करती। इसने यो देश को बनाती है महकोई हसी-सेम तो हनही । दैठिए, विज्ञापन में साफ कहा गया है कि आवेदक की मोम्पता कम-से-कम मैट्रिक पास होनी चाहिए और पाप मैट्रिक पास है नही । इससिए बापके बावेदनपत्र पर विचार भी नहीं किया जा सकता। श्रीमती बोपी ने स्थिति को पोटूट कर रिया। रिवाकर ममिक वेब में रसा हुमा मपमा बाबेदनपत्र ही पड़ गए। मेकिन एक बार फिर साहस करके बोसे मृस्म कम में मेरी सामना वीस साल की है। स्वनी मेहनत एवमी सयम से दो भारमी पार विपर्यों में एम.ए.कर सकता है। " 36 शोकसभा - " श्रीमती जोशी मुस्करा पड़ी। वोली, "और मजे की बात यह है कि आप मैट्रिक भी पास नही कर सके । आप एम० ए० पास को नृत्य सिखला सकते है, मगर आफिसो मे तो आप किरानी भी नहीं हो सकते। बहरहाल, मुझे अफमोस है कि इस मामले मे मैं आपकी कोई मदद नही कर सकती।' फिर उन्होंने सुझाया, "आप चाहें तो टाइपराइटिंग सीख लीजिए और एक मशीन लेकर कचहरी मे वैठ जाइए । भगवान चाहेगा, तो दिन-भर मे रोज पन्द्रह-वीस रुपए मिल जाएगे । इसका एक तरीका भी है। किसी चलते पुर्जे वकील के मम्पर्क मे रहिए। ये लोग रोज ही दस-बीस अजिया लिखते- लिखवाते हैं। मारी अजिया आपको ही टाइप करने के लिए दिया करेंगे।" "अच्छा ।" वोलते हुए दिवाकर मलिक को जैसे पसीना छूटने लगा। वेचारे आत्मग्लानि से भर आए। उठ पडे । श्रीमती जोशी ने कहा, "वैठिए, नौकर पान ला रहा होगा ।" "फिर कभी फिर कभी।” कहते हुए हाथ जोह कर दिवाकर मलिक ड्राइंग रूम से बाहर निकले । बदले में श्रीमती जोशी ने हाय नही जोडे । मिर्फ 'नमस्ते' कह दिया। विदा करने के लिए फाटक तक नही आई। ड्राइग रूम से एक दरवाज़ा भीतर की ओर खुलता था, उसी से चुपचाप भीतर चली गई। कृष्ण नौकरी के लिए आया था और उस नौकरी के लिए अपेक्षित योग्यताओ मे से मुस्य योग्यता यही नहीं थी कि वह मैट्रिक पास हो । राधा वदल गई, जो एक वार मन-ही-मन क्षण-भर के लिए इस कृष्ण को मच पर मुस्कराते देख कर राधा वन गई थी। । वत्तियो से शहर की सडक चकाचौंध थी। अगल-बगल की दुकाने चमक रही थी। लोग आ-जा रहे थे। साइकिल, टमटम, स्कूटर और मोटर- गाडियो की रेलपैल मची थी। इतनी बडी दुनिया मे दिवाकर मलिक देख रहे थे कि उनका स्थान कहा है ? मुल्क के भूगोल मे भला यह कहा पढाया गया था कि हमारे मुल्क मे फला कलाकार फला शहर मे पाया शो-2 ।

सोकसभा
37
पाता है पानेदार को मासूम पता है कि उसके सार में कौन गुगा
कहाँ रहता है। सि स्थिति मे हवा है। मुरगों अपरायामिया की
समस्त स्पितियों से यह प्रसासन बत्र भयमत रहता है। मपर कमा और
संसति ने चौकीरारो की कोई भी सूची इस मुकरे भूमोम में नहीं
छापी जाती।
बहुत पावट का अनुभव हो पा पा। पक कर एक पाप की
मामृप्ती दुकान मे पाठे। दुमनदारक नौकर मे पूछा गया है?"
बाय।
"बाम के साथ कुछ मौर?
"मही सिर्फ चाय। बोले। यह पाप बनिष्ठापूर्वक पीनी पी।
ठे,वोठ मए। माता मामम पकविणाम महम उमर पाया।
इसी महम में बनवत्र का पहरेवार रहना है-
ममर, साधारण बनता हम महम पहातमम मनका मााम नही
करती। इस महल में एक इतना गहा पाई, ना मात्र मुम्भ की
रिक तस्वीर को देता है। यहां की रोना तो मुम कामा नहीं
है। इस पहर की मार पहा यह मान है,पर मुहमरों म भनाश
पान रखती है। इस साल पर न दा समयम परमात 7
न कोई गाना पा छापाम ही मरीच मानाकामाल बना
विषय होता है, बस हए कोपम दम बगानमा पर
ममिहना पुरस्कार में तीन-नान वामात्र मिनाtmi
रक्स में। एकाएक म यस्मानी मामने भर कर
भी मरे हापापीम राब? मागिर में मीपिन ''

8 नाटक पूरे वेग मे चल रहा है। सारे के सारे दर्शक पहले की ही तरह आखो पर पट्टी लगाए हुए हैं। ये सभी शुद्ध कला के प्यासे हैं। लगता है, इनके होठ सूख रहे हैं। जीभ की सम्पूर्ण तरलता चुक गई है। अव होठो पर जीभ फिराने से कुछ नही हो रहा है। परदे के पीछे से मशीन की आवाज़ सुनायी दे रही है। शायद उसके पहिये पूरे वेग मे नाच रहे है। मौसम ठण्डा है या गर्म, इससे पहियो को कोई मतलब नहीं। उन्हें कौन चला रहा है, उन्हें इसका भी ज्ञान नही। सिर्फ यह अनुभव कर रहे हैं कि जिस धुरी से वे लगे हुए हैं, उसमे कोई तेल डाल जाता है। तेल न पडे, तो धुरी घिस जाए और पहिये दाए-बाए जाकर लुढक पढ़ें। इधर छोटा-सा दफ्तर। उधर प्रेस का मशीन रूम। बीच मे दीवार है। इस दफ्तर से सीधे प्रेस के मशीन रूम मे जाया जा सकता है। दीवार के बीच मे एक दरवाज़ा है, जो मशीन रूम मे जाने-आने देता है। दफ्तर की लम्बाई पूरव से पश्चिम की ओर है। पूरब की ओर मालिक बैठता है, पश्चिम की ओर प्रेस का प्रूफरीडर । दाए-बाए जो जगह है, वहा कागज़ की रिमे रखी हुई हैं। मालिक की मेज़ पर फोन है, मेजपोश पर रगविरगे फूल-पत्ते छपे हुए हैं। मेज़ के तीनो ओर दो- दो अतिरिक्त कुर्सिया रखी हुई हैं। दोस्त आते है, ठहाके लगाते हैं । ग्राहक आते है, कुछ छपवाने और छपाई-दर की वातें करते हैं। शाम के चार बज रहे हैं। छत से लटकता हुआ पखा तीन-चौथाई हवा मालिक को और एक-चौथाई हवा प्रूफरीडर को देता है। उसकी फिटिंग ही ऐसे स्थान पर की गई है। चारुचन्द्र, अवस्था पचहत्तर वर्ष । ब्रजभाषा मे तीन खण्डकाव्य, खडी बोली मे .

पोरसमा 39 । एक प्रबम्बकाम्प मौर चार-पांच उपम्यास सिह पुरे है। एक जमाना पा पर चारचन्द्र कवि-सम्मेलनों की प्रोभा होते थे। मोर भी सिखते मगर पली भी बने, मौकरी परली पड़ी। मैट्रिक पास तोप परन्तु किरानी हाना पसल नही पा। पटेर मफसर हो महीं सकत पे योपियुएट नहीं थे। कापत यस्ता मेहरबान तो पधा पहसवान। किमी तरह मी. ए. पास कर मेने पर मोटेर अफसरी का रास्ता मन पाता है। संम्प तो यह पा कि साहित्यसैषा करपे मार रोटी-नमक मिमता हेमा । बालिग होकर भी माषामिग बने रहे। जाम में सारी बातें समाती पी, मही बात नहीं समाती पी कि पेटी और साहित्य का माममा एक ही मामत में नहीं पसवा,। दोनों मामलों में जम ममप-असम इम्तिहान पास करमाए होते है। इसप्लिए कम-से-कम इस उम्र तक बीसिया प्रसो- कमी कुछ माह, कभी कुछ वर्ष के लिए 48 पुके है। छोटे-माटे मसबारों के संपादक मी रहे मगर सम्मारक की जगह नाम कमी महीपा । नाम पो उमो छाये को पूजी मपाने पाले होके मा उमके भो दूसरों की किताओं की भूमिका मिस-सिवार स्वनामधन्य बन गए थे। साहित्यिक समामों की बम्पमता करते-करते सके मार्मों के मामे 'पापा' पम्प भी पुरा गया था। पाराय मह कि मौमिक साहित्य-साधक मेहबार ये परिये । पर कोई 'ममी भेड़ इनके बाभम में माती, ये पट एक भी निकामते और उसके गुणगुवे रेशमी बास काट सेते थे। चारपन्द्र को मय कम सूमता था। मपर ये वो घूपीर। यह काम करना ही पड़ता । मेरा पा पापी मोर हिन्दी मनेगी संसद मौर बंगमा के सम्मकोम हमेचा रसते थे। पिछले छह महीने से पम्मा ठीक से काम नहीं कर रहा था कहीं कोई भूम फूट पाती मोर पाहावापरता तो मासिक मौतर ही भीतर पति पीसता, मगर प्रकटत पासीनता बरतने का मभिनय करते हुए कहता चारचन्द्र भी गमविया बहुत टूट रही है। पग्मे का घीधा परमवा मीमिए । प्राहरू पाहत शिकायत करने समे है।" “जी हो जी हाँ।" "आप हो रहा करते है। किसी दिन सबेरे बसवास पाए। अमर बोस साहब एक नए गफ्टरमाए है। कतारे ।

40 शोकसभा - वजे पहुच जाते हैं।" "जी अच्छा.."जा अच्छा।" मालिक सिगरेट सुलगा लेता है। चारुचन्द्र की मेज़ पर प्रूफो का अम्बार लगा रहता है । चुपचाप प्रूफ पढने लगते हैं। वाहर चिलचिलाती धप है। सवारिया नाम-मात्र को आ-जा रही हैं। प्रेस के स्वामी भोजन करने चले गए है। चार बजे तक लौटेंगे। चारुचन्द्र प्रूफ पढ़ते-पढ़ते थक जाते हैं, तो जरा सुस्ताने लगते हैं। अभी सुस्ता ही रहे हैं। निगाहें सड़क पर जाती है, तो दिवाकर मलिक नज़र आते है। पैदल और परेशान । प्रफ तो बहुत सारे पडे हुए हैं। इन सबो को पढ़ डालना है। मगर, साहित्य और संगीत सहोदर हैं न | देखकर आखें नही वन्द की जा सकती। हृदय जैसे उछाल मारता है और मेज़ पर झुककर तेज आवाज़ लगाते हैं, "मलिक जी, मलिक जी। आइए, आइए। इस तपती दुपहरी मे कहा, महाराज" दिवाकर को मालम है कि चारु वावू इसी प्रेस में नौकरी करते हैं। अत आश्चर्य न हुआ और 'नमस्कार, चारु वावू' कहते हुए भीतर चले आए। बगल मे एक ऐसी कुर्सी खाली पडी थी, जिसकी वायी वाह टूटी हुई थी, उसे ही चारुचन्द्र के सामने खीचकर बैठ रहे। "वडी गर्मी पड़ रही है।" चारुचन्द्र ने कहा । दिवाकर के वायें कन्धे पर किसी सम्मान समारोह मे मिला हुआ एक दुपट्टा पड़ा हुआ था। उसे उतारकर उन्होंने चेहरे और गर्दन का पसीना पोछते हुए कहा, "गर्मी ज्यादा पड रही है न । देखिएगा, इस साल पानी खूब वरसेगा।" "भगवान न करे " दिवाकर ने पूछा, "क्यो महोदय, कहते तो लोग ऐसा ही हैं कि जव प्यादा गर्मी पडती है, तो पानी भी खूब वरसता है।" "वात तो सही है । मगर, मैं अपनी स्थिति को याद कर ऐमा कह रहा हू। हालाकि मौसम को इससे कोई मतलब नही। मौसम यदि एक-एक आदमी का सुख-दुख देखे, तव तो हद हो जाए।" कहते हुए चारुचन्द्र ने पूछा, "जल पीजिएगा? ठण्डा पानी है।"

प्र.प्रना 'पराबैठन। “यह भी मापने ठीक कहा। पोड़ा सारही पीरिए, नहीं तो गसा पका मेया।"पारचन ने कहा। प्रेममा मामिक साना साने के मिए बाहर जाने सपा पा ठो दिये स्विष को बाफर मया था। फोन में तो बह मस्सर वासा गसे पता। सुरु भी यता मोर कहीं फोन करता तो बातें पर मेने रेवार फिर धीम तामा तमा देता। पारुपन भपमा प्रेस के अन्य कर्मचारियों को मात्र फोन रिसीव करने का अधिकार पा। उपर से कौन बोत यह है क्या कह रहा है सब कुछ याद रखना पड़ता ताकि मामिमामे पर पूरी सूचना दी पा सके।हर माह फोन और विनमी के विस माठे मोर मासिन मुछ पोर से हर माह पिम देनार मामाता “या तम्बा चौड़ा विस मामा है । माह से मह पूरा होपा बड़ी मुसीबत है।" उसकी मनुपस्थिति पा उपस्पिति रोनाही स्पितियों में पारपन्द्र फोन पोकर ही नहीं सकते में सिर्फ पंचा बना सकते थे। पर, यह भी मामिक 'छा पर निर्भर मा। सा चमत हुए यह छार बावा तो हवा का एक-यौपाई साम रठा नेते पे बरमा जो पह विषबाफकरसेपमा माता वा उसे माम करना उनके साहस की बात नहीं पी। मार पारचम से न पापसा । मन-ही-मन सोचा-चाहे इसके चलते फाइनम हिसाब क्यों न मिन पाए, मपर पंसा पगा। सो अपनी अपह से ठ मोर पंग का स्विच मान कर दिया। मसीन स्म में मधीने पास ही पी। भावार पर ही पी। एक छोटी मसीन ट्रेग्न-पड़ी मधी-पमैट । पौधे की मोर एक पमप पा। फरीरिप का काम शान्ति में होना चाहिए। पावन ने एक बार इशारा किया था कि उन्हें पीधे पामे कमरे में बैठने दिया माए। ममर, मातिक सौ साम मागे को दुनिया की बम्मपत्री दिमाग में रखता था। उसन समझ मिया इस प्रस्ताव के पीधे पावचन्द्र गौ की गहरी बात है। पीप मामा कमरा उत्तर की मोर सुनता है । माराम से मिना पूजा पाएगा पगे, बाकी समय में मेर पर मिर भाकर सोने। .

42 शोकसभा आएगी, तो कवि-कल्पना मे हूब जायेंगे। वडी चालाकी से बोला था, "चारुचन्द्र जी, आप ठीक कहते है। मगर, इससे कोई खास फायदा नहीं। यहा सामने रहने पर आपके कारण कई समस्याए हल हो जाती है। मसलन कई लोग निमन्त्रणपत्र छपवाने आते हैं, उनकी भापा ठीक नहीं रहती, आप भाषा सुधार देते हैं । मेरी अनुपस्थिति मे आप ग्राहको से वातें कर लेते हैं। फिर कई ग्राहक तो कुछ छपवाने के बहाने अपको देखने आ जाते है । आप कोई मक्षिका स्थाने मक्षिका विठाने वाले प्रूफरीडर थोडे ही हैं। हिन्दी साहित्य मे आपका स्थान है, महाराज-और हा, एक बात और सुन लीजिए। मैं मापको प्रूफरीडर नही, गौरव और शोभा मानता हू। है यहा कोई ऐसा, जो आपके मुकावले रस, छन्द और अलकार की जानकारी रखता हो चारुचन्द्र के आश्रितो का पेट भले ही न भरा हो, मगर इन शब्दो ने जैसे चारुचन्द्र के पेट के कोने-कोने मे मवखन और मलाई भर दी। कितना ज्ञानी है यह समाज का एक स्तम्भ । कला नहीं जानता, मगर कलाकार की सबसे ज्यादा कमजोर नस को बिना चिमटे के पकड़ लेता है। चारुचन्द्र ने खुश होकर कई वार 'जी हा, जी हा' कहा था। ?" । , "और सब तो ठीक है न?" दिवाकर मलिक ने पूछा। चारुचन्द्र बोले, "ठीक ही समझिए 'इस बार जो पानी जोरो से वरसा, तो जिस मकान मे मैं रहता हू, उसकी दीवारें घस जाएगी। मामूली वर्षा मे तो बुरा हाल हो जाता है । मकान-मालिक मरम्मत कराने का नाम नहीं लेते।" फिर कुछ सोचकर कहने लगे, "अपना भी कुछ कहने का साहस नही होता। पाच महीने का किराया बाकी है। हर वार यही सोचता हूँ कि कम-से-कम दो महीने का भार एकसाथ उतारू और ऐसा करने का सयोग ही नहीं आता। दो महीने तो विजली का विल भी नहीं दे सका। मकान-मालिक का लडका जव आता है, लाइन काट देता है। चुप रहने के सिवा कोई रास्ता नही । आपका तो मलिक जी, खैर, अपना मकान है। अपने घर के नाम पर एक झोपडी ही सही, बहुत बडी वात है।"

'म मशीन पर 'हो यह तो है। मन्म मब बाप एक पिसास मा पन पिसमा दीजिए। "राम् यो राम् ? परा पणित पी का एक मिमास पानी हो पिमाना। । बाहर से मावार माई। 'रन्ठा तुम रहो ममीन पर। कहते हुए पारुषम् स्वयं उठे मौर एक पिसास ठणापत मेकर पापस भाए। रिवाकर ममिक मे उनके हाय से मिलास पामते हुए कहा 'पापने क्या कष्ट किया जाएगा। बतमा ते में ही मे मेवा । माप इतने बोषि ठहरे ।" गट् मट् मद् 'कोई बात नहीं। कोपा छाट कहत मपरापू।" दिवाकर मनिकने स्वयं उठकर गितास यथास्थान रख लिया। मब यह पैसे कुछ कहमा चाहते थे पर धम पसे में ही वटकरहे। तभी सम्मों को बाहर निकालने का मूत्र मिन पया। पार बापू मे कह दिया “परमों मेन रोड पर देहात के एक मामी को म मग पा । मासका कर पो गिरा सो फिर उठा मही । ममत-बस के दुकानदार पानी पिलाते रह गए। रिमाकर बोले “बिना परत कोई टहनने-ममे तो निश्त नहीं सकता । मैं भी सापारी में निकम परा। 'मापारी इस बात निकलने की सीमापारी पी रिवाकर ममिक मे कहा "मंझसी माको को पोरों का सार है। चार रोग हो गए । सुई नपती है तो पोड़ा उतरता है। 'मुई सम पी है? 'पत से कगई है।" गयों उस तोगारी रहिए।" "मैं वो रोकना नहीं चाहता था। "तोक्यों रोका। खिाकर मनिक ने एक दीप निवास होते हुए धीरे सहा पैसे ही नही है कि मुइया चौर दबाएं सरीवी पाएं। सोचते-सोपत निकम पा। उसकी देनी और छटपटाहट देखी नही मई। इस सए भी पर हाते, तो काम पम पाता। और मासामरी मार्च से पाए म 44 शोकसभा देखने लगे। स्पष्ट शब्दो मे मागने का साहस नहीं हुआ। "दम रुपए "" कह कर चारुचन्द्र ने जैसे भीतर-ही-भीतर एक आह भरी। एक रुपया भी दे सकने की स्थिति में नहीं थे, मगर दिल चाहता था कि हज़ार रुपए दे डाले। बोलते क्या? जब कुछ दे नही सकते, तो वोलते क्या? एकदम चुप | दिवाकर समझ रहे थे कि चारु वावू इस समस्या को हल करने की दिशा मे कोई उपाय सोच रहे हैं। "कल वाईस तारीख है न ?" "हा।" . चारुचन्द्र का उत्साह फिर फीका पड गया। उन्हें यह बात स्मरण हो आई थी कि प्रेस-मालिक वाईस तारीख को चलते हुए महीने के वेतन से एडवान्स दिया करते हैं। उन्होने सोचा, दिवाकर जी को यह कहा जाए कि आज आप किसी और से ले लीजिए और कल ही लौटा देने का वादा भी कर दीजिए। पर, भला यह कैसे होगा ? कुल जमा पौने दो सौ रुपए माहवार की नौकरी है। दस-पाच करके अब तक मालिक से साठ रुपए ले चुके हैं। एडवान्स तो वेतन का आधा ही मिलता है न ' मालिक बहुत खुश होंगे, तो तीस रुपए कल दे देंगे, और कल ही किसी और को वीस रुपए देने हैं। बच जाएगे दस रुपए। घरखर्च के लिए भी कुछ चाहिए। जमालखा मानने वाला नही । उसे रुपए न पहुचे, तो वह तेईस तारीख की सुबह आठ बजते-बजते अपनी चावियो के झन्वे से दस्तक देगा। दरवाजा खोलते ही तीखे स्वर मे वोलेगा-"तुम कल आया नहीं ?" चारुचन्द्र रुपए के बदले कोई आश्वासन भी देने में असमर्थ थे, चुप रहे। इसी बीच प्रेस-मालिक आ गया । उसने दिवाकर मलिक पर उडती हुई निगाह डाली । फिर देखा, पखा चल रहा है। चारुचन्द्र डर गए। अभी अगर एक मिनट पहले पखे को वन्द कर दिया होता, तो मालिक की निगाह कुछ दूसरी तरह से पडती। "क्या हुया, चारु वाबू, प्रूफ सव पढ दिए गए "जी नही।" "क्यो, नहीं क्यो?" "दो तो पढकर दे दिए हैं। मूल कापी बहुत गन्दी है। रुक-रुककर । ?"

पाना परता है।" दिवाकर मनिष की पीठ मामिक की मोर पीबह पाम्त ऐ । हिमे- रसे तम महीं । प्रेस के काम उनकी समझ में माते भी महीं। उनमे सुनना हो चाहें तो पूछ मौपिए मृस्प के गाम के बारे में कुछ। "अच्छा नटपरी का एमा? कहवे यह मुस्करा प मोर मुनाएं "तिमदाप्रतिगाम्बई, तिमदापतिपराई तिगदा दिगरिमतिमवारिमदिम । तत्तत् तत् पई।' ऐसे हजारों बोस उनके दिमाग में मरे पडे है। ठीस सास इस पोतों को यार करने बोर नाप कर उनका सस्प रिलमाने में बिता दिए हैं। मगर यहाँ वो माहौम ही पूसरा है। मामिक पोरो से मन्ना म पो इमसिए उसका प्यान बाट देने के इरादे से चार बाबू दिवाकर ममिक की गोर रित करते हुए कहते है मनसे पहले से परिचय है कि महीं ? माप है दिवाकर ममिका कल्पक के भाचार्य । पन्छा मन्छा। मालिक से कोई नोट महीं मेता । उसकी मर में ऐमे मोग को हस्ती नहीं होते। उसके हषय मे तो इमेक्ट्रिक समाई दिमाग का यह बा बाबू हस्तीमाता है, जो दस प्रतिशत कमीपन पर उसके प्रेस को काम देता है । दिवाकर ममिक से परिषम कराने की जगह परि चारचम ने यह कहा होता कि "बिगनी माफिम के बाबू ने फोन किया था। पार-पांच बजे मायमे। कुछ काम है पाती छाप कर देना है' तो मासिक भूत बाता कि पंसा क्यों रत पा है। फिर मट बो बाबू को फोन कर महता "माइए हरूप में स्वागत करने की प्रतीक्षा में। साडेतीम होने ही जा रहे हैं।" मगर इस प्रकार का कोई मरतना ही नहीं । पारचन्द्र मे फिर कहा “मापने तो इनका नृत्य रेखा भी होगा । रिपाकर मनिक धीरे से पीछे की मोर भूम गए। मामियोमा रेखा होगा या नहीं।" ।

46 शोकसभा "नमस्कार।" दिवाकर मलिक ने हाथ जोडकर कहा। "नमस्कार "" वडी अनिच्छा से बोलते हुए मालिक ने कहा, "चारु वावू, इस गति से काम नही होगा। आज फर्स्ट आवर मे में बैंक गया हुमा था। वहा से भी काम आने वाला है। एक लाख फार्म छापने हैं। उन्हें तीन रोज़ के अन्दर चाहिए । और आप हैं कि कच्छप गति में चल रहे हैं।" "मवको पढे डालता है।" "आप तो हर रोज़ यही कहते हैं, जनाव " मालिक का तेवर बदल गया। कई खण्डकाव्य, प्रवन्धकाव्य और उपन्यासो के रचनाकार ने किसी चुनौती की सम्भावना देखी, तो कापते हुए स्वर मे कहा, "वैसे तो मैं यही कोशिश कर रहा है कि सारे प्रूफ पढ डालू, लेकिन यदि कुछ वच भी गए, तो साथ लेता - ऊगा। रात मे सवो को ठिकाने लगा दगा और सवेरे लेता भाऊगा।" प्रेस के गौरव और शोभा को एक प्रकार मे फटकारते हुए मालिक ने कहा, "देखिए चारु वावू, आपकी नज़दीक की दृष्टि अव ठीक से काम नही करती और आप चश्मे का शीशा बदलवा नहीं सकते। काम इस तरह चलने का नही। मेरी राय मे तो, हालाकि कहते हुए मुझे खुद बुरा लगता है, आप अव आराम कीजिए। मैं किसी और आदमी की तलाश कर लूगा। आपकी तरह वह विद्वान तो नहीं होगा, मगर' !" चारुचन्द्र को रस, छन्द, अलकार के जितने उदाहरण याद थे, जैसे वे सव के सब भूल गए। वह चुपचाप प्रफ पढने लगे। दिवाकर मलिक ने धीरे में कहा, "वन्धु, आप काम कीजिए। मैं चलता है।" चारुचन्द्र प्रूफ पर सिर झुकाए रहे । दिवाकर मलिक उठकर सडक पर आ गए। - 9 युवावस्था में गिस कुमारी के पित्त और चितवन-दोनों ही परमहा उसके कौमार्य की रक्षा पिघाता भी नही कर सकता मनुष्य की मसा बया बिसात ! कल्याणी का भी यही हाम था। यह युषा पुस्पों की भोर बरे गौर से देखा करती और उसके मन में कभी-कभी विकार भी उत्पन्न हो पाया करते थे। ऐमा क्यों होता है इसके लिए उसके पास कोई तई मही पाया इसे बस स्वाभाविक मानती दी। रिवाकर ममिक मे उसे मुस्म की इतनी प्रारम्भिक सिसा देवी पी कियह छोटे छोटे बच्चों को नृत्प की पिसा दे सकती थी। सयानी कम्पा पर में दिन-रात मुटठी एती है ऐसा सोच कर दिवाकर मलिक ने तय किया कि इसे अपनी ही माइन का कोई काम मिम पाए, तो यह मपने को किसी काम में मनी-बंधी पाएकी गौर पारिपमिकस्सस्प कुछ मर्पप्राप्ति भी होठी ऐमी। मपने घर से चार मकान उत्तर रमोसा दीरी पती दी। फस्पानी से चार-पाप साम मड़ी होगी-भरा-पूरा घरीर, बड़ी-बड़ी मात्रा बी. ए. पासपी मौर किसी नौकरी की तमा म पी ! पारे-पर पहसे किसी बदलाया कि रमोमा की एक स्कूल मौकरी मग पा है। स्कूल पुष्वारे का पा वीर सरकार से इसे मंजूरी नही मिमी पी। सिख समुदाय पामे मापस में चम्पा कर यह सम बना रहे 'पे--सात वर्ग तक पढ़ाई होती थी। मुद्वारे की इमारत काफी बड़ी थी और उसी के एक हिस्से में स्कूल पत पापा। माम मा-गुरु नानक 'विवाहय। मुखारा प्रबन्धन कमेटी के प्रेसीरेट के पास रमोमा का भाषेबन को माह पामे से पड़ा था। सत को अंग्रेजी पढ़ाने बानी सिक्षिका भी भारम्मकता पी। प्रेसीरेप्ट साहब पाहत पे कि इस पप का भी कोई सरदारिन शिक्षिका ही सुशोभित करे। पर, पब कोई नौर' नहीं मिमी यो रमोमा को रख लिया गया। वैसे मन में यह बात पा कर रस मी 48 शोकसभा गई कि अग्रेजी पढाने वाली किसी 'कोर' के मिलते ही रमोला का पत्ता साफ कर दिया जाएगा। दिवाकर मलिक कल्याणी के लिए बात करना चाहते थे। उसने प्राइवेट इम्तिहान देकर मैट्रिक पास किया था, छोटे बच्चो को नृत्य आसानी से सिखला सकती थी। मगर, सकोची स्वभाव के कारण कुछ कहते नहीं वनता था। इसी सकोच मे चार माह बीत गए। रमोला अपने बाप के घर ही रहती थी। वह विधवा थी। पति के साथ पाच साल रही। पांच साल मे उसे गर्भवती होने का एक वार भी आभास तक न हुमा और छठा साल आते-आते उसका आदमी अचानक पेटदर्द से चल वसा। ससुराल- वालो की दृष्टि मे वह वाझ-वन्ध्या के अतिरिक्त 'आदमी को खा जाने वाली' भी मानी जाने लगी और वहा उसका रह पाना दूभर हो गया। मायकेवाले अच्छे खाते-पीते थे, लेकिन समय तो उसे भी काटना था । समय काटने के अलावा एक और कारण था-भाई-बाप रमोला को आखो पर विठाते थे, मगर भाभियो के लिए तो वह आख की किरकिरी थी। जव तक वेचारी सुहागिन थी, ये भाभिया बुलावे-पर-वुलावा भेजती। 4 जव सुहाग लुट गया और वह यहा वैधव्य काटने आई, तो भाभिया घुमा- । फिरा कर उसे ऐसी कहानिया सुनाने लगी, जिनका सार यह होता था कि पति के मरने पर नारी को या तो पति के साथ सती हो जाना चाहिए या फिर पति की याद में इस तरह घुटते रहना चाहिए कि ब्रह्मा की खोची हुई लम्बी आयुरेखा अपने-आप छोटी हो जाए। भाइयो ने ठीक ही सोचा कि वह्न जव कही नौकरी पकड लेगी, तो कुछ लाकर देगी भी और इस प्रति माह के 'देने' से रमोला को दूसरी प्रकार की कहानिया सुनने को मिलेंगी। रमोला के स्वभाव मे गजब का प्यारापन था। वह सहना जानती थी, कहना नहीं । उसे ठगे जाना पसन्द था, ठगना नहीं। भीतर चाहे लाख आग भरी हो, बाहर से वह एक निहायत ताजा खुशनुमा गुलदस्ता ही थी। वह यदाकदा दिवाकर मलिक के घर थोडी देर के लिए मा जाया करती और दमयन्ती, कल्याणी तथा वागेश्वरी से दुख-सुख वोल-वतिया- कर लौट जाती। औरतो मे जो एक अवगुण पाया जाता है कि विना इस ५ ।

पोसभा 49 या उसको सिकायत पिए उन्हें कम ही नही पाती उसमें महीपा।पह बस अपने ही तक सीमित रहती। मास्मे भर की ताग बबरें म उसके पास होती बार म यह ऐसी सबरों का संग्रह करना ही पसन्द करती थी। । । । ऐसे ही यह एक रविवार को इनके पर माई तो बैठक में पुसी मौर सीधी बन्दर पाने मगी। उसन इधर-उधर नगर नहीं गतौ । रामी होती तो दिवाकर मलिक के बामे ममाप घीस मुकाती। मह पूरब की मार पाताप की मूर्ति ने मुमीप अपसेटे किसी काम के लिए बात मार कर फे। सामने एक छोटी-मी कापी बी पौर यह मोम मार करने में बाहरी मुष-पुष बोए हुए थे। पोड़ी पकावट महसूस हुई तो मान टा। गोपन की मोर पल दए। ही रमोमा पर नगर पड़ी। पूर्वी पर से बाहर नहीं पास ही पई पी। दममन्ती ने बरामदे में घटाई बिछाकर रमोमा को बिठा लिया था। कस्पानी मौर बामेपरी दीवार से पीठ सटा कर उसके पाएं-बाए बैठ गई पी। वमयन्ती पूर्वी की पाक की मरम्मत करने लगी थी। बीच-बीच में पुछ गोप्स भी देतीं। बागेमारी की मात्रा में पायीवरी की ही मुहुनका मौर काममवा बी ममरमा बहस बम बोमती पी। रमोमा मातीता पानबूझकर उसे सम्बोधित किया करती। मामलरी प्रसनामुमार कभी मुस्करा पाती कभी कुछ बोम वेती मोर कभी मौन रहकर परम सती हमाती। रमोमा पर नगर पाते ही रिमाकर ममिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बोले 'मन्ठा रमोना बिटिया माई है।" रमोमा से पाक परी। उसने दोनों हाप मोर लिए। माशीर्वाद देठ हुए विवाकर मसिर से रहा "रेठो बिटिया बैठो। मगर एककामकरना। 'पया, बाबाजी?" "पर मोटमे सपो तो मुप्त से मिस सेना । में बैठक म हो । पाने तोपापी होम?" "मी पापाजी। रमोला बोसी। । । , 50 शोकसभा ?" . फिर उन्होंने दमयन्ती से पूछा, "पूर्वी कहा है उत्तर मे दमयन्ती ने सिर्फ उन्हें देखा, कुछ कहा नहीं। कुछ देर बाद जब रमोला वापस जाने लगी, तो वैठक मे आकर ठिठक गई । दिवाकर मलिक का ध्यान वटा । रमोला ने सहज विनय-भरे स्वर मे पूछा, "क्या आज्ञा है, चाचाजी ?" दिवाकर मलिक ने उसे आखो के सकेत से पास बुला लिया। बोले, "बैठ जाओ, वैठ जाओ।" रमोला पायताने सिमट कर बैठ गई। मर से आचल सरकने लगा था, उसे सभाला। दिवाकर मलिक ने पूछा, "स्कूल मे मन लग रहा है न, बेटी?" "जी, सब ठीक है।" "सुनो, तुम्हारी वहन कल्याणी के लिए वहा कुछ हो सके, तो सोचो। छोटे बच्चे और बच्चियो ही को तो पढाना है। तुम जानती ही हो कि यह मैट्रिक पाम है। बच्चो को पढा सकती है, नाचना-गाना सिखा सकती है। मैं चाहता था कि जब तक इसका व्याह नही हो जाता ." रमोला जैसे सब कुछ समझ गई। बीच मे ही बोली, "एक दिन सरदार जी कह रहे थे कि बच्चो को थोडा नाच-गान सिखाने का भी प्रवन्ध होना चाहिए। कोई टीचर मिल जाए, तो पश्चिम वाला हाल इस काम आ जाएगा।" "तो फिर कहो उनसे । बतला देना कि किसकी लडकी है।' "अच्छा, मैं कहूगी।" रमोला ने तनिक रुककर आगे कहा, "परन्तु, चाचाजी, वहा एक वडा भारी दकियानूसीपन है।" "क्या? वे लोग वी० ए० पास टीचर चाहते हैं ?" रमोला ने उत्तर दिया, "नही, उन्हें कोई 'कोर' चाहिए।" " 'कोर' चाहिए, मतलब?" "चाचाजी, पहले मैं यह वात नही जानती थी। अब पता चला है कि हर सिख औरत के नाम के बाद 'कोर' लगा रहता है। धीरे-धीरे सारी वातें मालूम हो रही हैं।" रमोला बोली। "क्या और भी कोई बात है ?"

साकसमा SI हो भाप कभी बाकर प्यान से देतिए । मुशारे के पूरकी हिस्से में माही म्मकी बीसियो एकानें है।" 'हो वा सही।" रमोसा ने कहा 'मम स एक भी दुकान का स्वामी परमिन नहीं है। मतमय या कि इस मामले में में मोन पर संकीर्ण है। मामपास पौष सौ से कम सिस-परिवार महीं है। मेरसिस की दुकान मे मगर किमी पीर का दाम सिस की दुकान से चार भाने कम हो तो भी यहां सामान नहीं वरीपे । बिहारियों अंगालियों या मुगरातियों मनामियों को तो माप छोर वीगिए, उन दुकानों में एक की दुकान किसी पंपाची हि के हाप मही उठी है। सर्वो मे मपना कारोबार करते है पसरत पड़ने पर महाराष्ट्रीय और ईसाई से भी दोस्ती पाठ मेते है मगर उनके रिसों की बस्ती में अपर एक भी पमीन खामी होगी तो उसे किसी सागर पी या किसी कार' को ही देंगे। वे रहते तो हिन्दुस्तान में है मपर उनके दिसों के भीतर दूसरे पाकी कस्पना रहती है। "बह कौम-सा देश है?" रिवाकर मलिक ने बड़ी उत्सुकता में पूछा। रमोमा ने उत्तर दिया "बह देश है-सिखिस्तान । “हे मयवान है भगवान इस एक हिन्दुस्ताम में और कितने ठाम निकये। विधाकर मसिक योसे ' याम सिखों काही नाही मोरों का भी है। हरिजन अपनी उफती ममम बनाते है, अपुर ममप। मेठापण जाति मोर फिरकापरस्ती के मिसाफ बोमवे हए मही पाते और फिर इसी माम पर अपने चुनावक्षेत्र में मोट भी बटोरते । बिरिमा सारी बातें मेरी समझ में नही मासी। यहाँ तो मुसो वौर परन मपाने से बास्वाहा। सुन कर रमोसा बोमी भहमारे यही वर्गविहीन समाग का मारा इसने पोरों से सगाया जाता है कि नमको भावार भासमान का प्रती है। मोम नाब सा कर भरकार का भय बनते है और यहाँ गाकर मुद जातिवाद बर्मवार को सोने से पगाते हैं। और, पापानी में मौसा मिलते ही प्रेसीरेट साहब से बहुगी । फम बहसम में माएंमे मी।" 'बग पुण्य होगा मिटिया।'रिपाकर मसिक बोसे । रमोसा मे उन्हें हास बोरे मोर अपने पर पसी पई।

10 - नाटक अभी खत्म नहीं हुआ है। अभी-अभी सारी फुटलाइटें जली हैं। परदा उठने वाला है। दर्शको ने अपनी आखो पर से पट्टिया नही उतारी हैं। कुछ पुरुष दर्शक धूम्रपान करना चाहते हैं। सिगरेट-माचिस चाहिए, और वे इन दो चीज़ो के लिए अगल-बगल बैठे हुए दर्शको की जेबो मे हाथ डालने लगे हैं। दर्शको मे महिलाए भी है । वे अपने गालो और ललाट पर रुमाल फिराना चाहती हैं । इसके लिए वे भी ऐसा ही करती है। दूसरी के पर्स को चुपके-चुपके टटोल रही है। घण्टे, दो घण्टे, चार घण्टे पास बैठने का रिश्ता। सभी रिश्ते को भुनाना चाहते है। यही आधुनिकता है, समयबोध है, युगबोध है, कालवोध है। जो रिश्ता दूध की खाली बोतल को नहीं भर पाता, उम रिश्ते को लोग बूचडखाने के दरवाजे पर छोड आते हैं। रिश्ता बेचारा घवडा कर इधर-उधर देखने लगता है, तव तक बूचडखाने का कद्दावर मालिक झपट कर उसे अन्दर खीच लेता है। अरे। अरे।। वह देखिए, फुटलाइटो पर कोई रगविरगे कागज के टुकडे लपेट रहा है । आगे का खेला शुरू होने वाला है। लोग विशुद्ध कला के प्यासे हैं न । मगर ये सब-के-सव वदमाश हैं। इनमे स्वय ही कोई शुद्ध नहीं है, निखालिस नही है । ये सारे तमाशा देखने वाले हैं। हाय, परदा उठता है परदा गिर जाता है। इस प्रक्रिया मे यह दिखलाया गया कि दिवाकर मलिक चबूतरे पर पेट के वल नीद से सोये हुए हैं। पिछला परदा गिर जाता है और अगला परदा उठ जाता है। जैसे हृदय परदे के पीछे है और शरीर सामने । वही पुरानी बैठक । शो-3 पोकसमा 53 नेपाम से रस्ता होती है। दमयन्ती माती है। बालों में नमी के साप एक रिनासा भी है । बिम की मार बसर पूछती है कौन ? मैं कौन? दरवाजा खुल पाता है। मामन्तुबो संबोच से भीतर कम रसता है। पतसून-कोट मोर टाईम है। पचास साप्त मे कम का नहीं । महल बन्छी है। पैतीस साम स अधिक का नहीं लगता । 'माय मर्ग करता है और हर मुहम्मतमरी मामार में पूख्या है, "दिवाकर माई भर में हैं? "बापका माना कही सहमा ?" मनी, मैं यहीं से पाया है। रिवाकर माहा मरे पुरान मशीनें में है। माप उन्हें कहिए, हेवर भाया है उछम पड़ेंगे।" "एसा ?" "बोर नही हो क्या ! पहले परीफ ता रसिए' । रमपन्ती की पढ़ापी-मिसाई साधारण दी। ल कुम की बयान-सम्मा पी। मायने में पोड़ी संसत पड़ी भी, बाड़ी हिन्दी । ममुराम पएछ राम्माम का अवसर मिमा कुछ रिखाकर मसिक की संमति का बसर । पा-सिते मोगा से कायवे मे पाते पर लेती थी 1 मकिन मग पुछ भारी-धीस के भीतर । सारी ईसी होंठोंक भीतर ही रहती। व्हाके से सपाय बाते मानवी तकनी। दिवाकर ममि ममीत-समारोहों के मनुभव मुमाया करते थे। उमसे भी कुछ जान बड़ा पा । पति की ममुपम्पिति में भी कुछ लोग माही जाते थे। यह वो कोई पारी नाही पाकिबोई मिमने भारे, सब दिवाकर ममिसपर में हॉही। पुलियो सपानी हो पई पी। रिपाकर ममिक को मम हिमायत पी कि बाहरी सोर्गों क सम्म से समय में। उममे तमी मिसार कुछ मोम सकती है मम्ती किमी मारमा पर में न हों। टमाट भी जम वस्ती है। मकी रोधनी एमपम्ती और हैदर के पहरे को पारा सपना 54 उजागर करने लगती है। दिवाकर इस समय घर मे है या नहीं, इस प्रश्न को दमयन्ती गौण वना देती और बडे हौले मे कहती है, “ये तो सचमुच वडे दोस्तनवाज हैं। कभी इस दोस्त, कभी उस दोस्त की चर्चा किया ही करते है । अव इनमे कौन इनका सच्चा और कौन झूठा दोस्त है, यही जानें । अव आपसे क्या बतलाऊ, पहाडपुर स्टेट के वावू साहव के बारे मे भी कहा करते हैं कि वे मेरे दोस्त हैं। एक की बात हो, तो कही जाए "सैकडो लखपती जैसे इनके घुघरूमो से लिपटे रहते हैं।" हैदर कुछ मुस्करा कर कहता है, "ज़ाहिर है। दिवाकर भाई अपने फन के आफताव हैं। फिर वटे-से-बडा और छोटे-से-छोटा आदमी इनकी दोस्ती पर नाज़ करता होगा ।" हैदर एक शेर पढना चाहता है और अपनी गर्दन शायराना अन्दाज़ में घुमाता है। अर्ज करने लगता है, "हजारो साल नरगिस अपनी वेनूरी पे रोती है, बडी मुश्किल से होता दमयन्ती के लिए यह शेर कुछ नया नही है। खडी खडी पूछ बैठती है, "कव से आपकी दोस्ती है इनसे ?" हैदर बडी बेतकल्लुफी से कहने लगता है, "अजी, कुछ न पूछिए, फनकार मे एक दिन की दोस्ती हज़ार साल की दोस्ती का मुकाबला करती है। आपको दिवाकर भाई ने बतलाया भी होगा कि बहुत छोटी उम्र मे ही ये घर से भाग निकले थे..." "हा, नृत्य सीखने के लिए।" "जी हा, आपने सही फरमाया। आपको इन्होने यह भी बतलाया होगा कि हैदर यही के शाहगज का रहने वाला है।" "जी, यह नही मालूम।" "खैर, तो हम लोग स्कूल के दिनो के दोस्त ठहरे।" "वाह · मगर आप इसके पहले कभी आए नही।" "अजी, आने को तो समझिए मैं तडपता था । दिवाकर भाई तो स्कूल-कालेज की पढाई से मुखालफत ही करते रहे। फन की दुनिया का इन्मान कुछ होता ही ऐसा है। दास-मास्टर बनने के लिए जिन दिनो ये भोकममा 55 मण, बनारस मलमऊ, पामियर, परस्थानमामी सरों के यहां पाकर समाते रहे मैं कासेत्र की पाई करता यावा रेकरम में बी. ए.पास किया और ।' धौर " "नहर के महकमे में मुमागिम हो ममा। पांच मात किरानीपीरी परमी पड़ी। फिर मोटेर अफसर हो गया। कहकर पर ने रा सिर उठाकर वमपन्ती की बार देखा गापा जतमामा चाहना हो किमो दर उससे बातें कर रहा है वह कोई ऐसाय मत्सरा नहीं है। पर मटेर अफसर है मरेटेर। छोटी-बड़ी कई कितायें रट र उमन कमीगन ना इम्बिहाम पास किया था। उप मग का या उसरा बनरम मापन । बझीकार गमों में पाये आमे दाल मेहर सूवार पानपरा के माम फोरम बतमा सपवा पाया पता कमीधन के इम्बिहान म क्या पृछ ? तब उसे मह भी मार करना पड़ा पा फिग० गुसमर कौन पे मोर मास की प्रम्पति के मुख्य कारण क्या पे? उसे तब यह भी मा पाकिसबमें पहले मैमानिक पति से किसने नीम ममामा मौर हिन्दुस्तान के किन-किन सार्को म निमापसी पधे पाए जाते हैं। हालांकि परीक्षा में सफमवा प्राप्त करने और पटेर अफसर की कुर्सी पर बैठने पारबह रोग ही समुभप करता है किकम्पीटिटिय एपबामिनेसम पास करने के लिए उसने बोपुछ पा और माद किमा पा इस सी स उसका पूर का भी हिस्सा नही ए पया। मौत के पूर्व में मयि लगाने के बार बार इनाम के एक मन मौकरी मिसी मोर पडसी वारीप को सपने साप एक बमंत माती है इस बात के लिए उसकी तारीफ परनी चाहिए कि उनके सारे पेनरम ममिर को नौकरशाही मे बिना कपन के दफन कर पिया मोर गायब पहमपने रफ्तर की सीदी मे उसर पाता है तो हर बात में बोलता है- 'पस सर मौर पर फिर नीचे उतर पर माता है, वो तुर मानों से सुनता है-' जीर। महा से उमे 'समाम गाला पाता है यहाँ पहप कर दात निपोरता मार गई नसे 'जीएवर' मुनत रहने मा दिन-भर मोग मितता है यहाँ दांत महा देने का लेबर बनाये रमतापा मानों में मुनता है जिसका चपरासी पीपा से पर शोकमभा 56 " ?" वुला रहे हैं तो उसके सीने मे एक गुदगुदी-सी उठती है। लगता है, ज़माने की बिछुडी हुई महबूवा मिल गई और मिलते ही उसने मुहब्बत से लबरेज अपने गरम-गरम होठो को, जिन पर हल्की-गुलावी लिपस्टिक की कलई की हुई है, उसके होठो पर एकाएक रख दिया। नौकरशाह, जिन्दावाद यह भी अपनी दुनिया का सुलतान होता है। हैदर आगे कहता है, "दिवाकर साहव छुटपन से ही बडे जजबाती किस्म के इन्सान रहे और तभी तो आर्ट की दुनिया मे शोहरत उनकी कदमवोसी करती है।" "सिर्फ शोहरत की दुनिया मे, हैदर साहब "क्या मतलव हैदर जैसे चौंकता है। दमयन्ती खुल जाती हैं। कहती है, "शोहरत एक ऐसा आसमानी महल है, जिसके कोने-कोने मे घूम जाइए, मगर कपडो के नाम पर यहा न एक रूमाल मिलेगा, दवाभो के नाम पर किसी मिक्चर की खाली शीशी तक न मिलेगी, अनाज के नाम पर चुहिया भी मारे भूख के तडपती नजर आएगी और सर के नीचे एक अपनी छत हो, इसके बदले मे यही आवाज़ सुनायी पडेगी - यह महल बडे-बडे नौकरशाहो और व्यापारियो के लिए है, जनप्रतिनिधियो के लिए है और जनप्रतिनिधियो के चमचो के लिए है ।" सुन कर हैदर जैसे एकदम से उछल जाता है। कहता है, "आप भी चुटकिया लेना खूब जानती हैं । कलाकार-फनकार तो अजीबोगरीव होते ही हैं। वे तो अपने आर्ट मे इस कदर मशगूल रहते हैं कि पेड की छाया हो या महल की छाया, उनके लिए कोई फर्क नहीं पडता । इनकी हस्ती ही अलग होती है। वे तो ख्वाब मे भी किसी का अहसान लेना नही जानते।" दमयन्ती अपने आचल को सिर पर से सरकने नहीं देना चाहती। उसे सभालती हुई कहती हैं, "कोई अहसान करने को तैयार भी तो नही होता। लोग तो यही चाहते हैं कि अगर किसी कलाकार को बूद-भर पानी पिलाओ, तो प्याला भर उसका खून चूस लो।" "हैं हैं आप यह क्या सुना रही है ? मैं एक अदना आदमी हू, मगर पोकममा 57 - इन पर गान देताई 'मी हो ।कावरे दिनों में मने एक मौल्पावन परसे लिहमारी पी। पुरा हो उम पाानम इपर पासी साकी पहाना का परम गाने को पौडीन भी मेरा पूरा दीवान ही ना सिया नमने मुस्तमर यह कि में भी फतकार का एक छोटा-सा दिल रसता । माटक का गयरेक्टर बड़े पास फिम्म मा ममता है। परदेको उमट-पसट देता है और स्टेज पर रिवाकर मलिक नगर माने मगता है। बहनबूतरे स उठ पाहमा है और दीवार पीच मटकर सब कुछ मुनने मगा है । उसे न तो पमयम्ती देख पा रही है मौर म हैदर। पता नही क्या बात है कि मुनत हुए उमर पेहरे पर बीमिया विस्मरे माग उभरत है। कभी एक हाप मे मपमे मौन पो पोरा म मममने ममता है, मसाबा कर 'बाह भरता है मीर की मुस्मे से भरा मगर माता है। मह सब कुछ नही गपरेकटरमी माया है। परद का उलट-फेर 'फिर वमपन्ती जोर हैवर बही बैठक नही साइट वही भर यही सेटिंग वही सिचुएसन। दमयन्ती की पूड़ियों में कोयम की घूस लिपटी मगर बाती है । बह उमहिपान का यत्न करती हुई रहती है माप पैम नाग ही कलाकारों के पापों में जूते शसवे है परना कोई इनकी परवाह नही परता । पूरा समाग कमाचारों को एक ऐसे पौसीदार क स म देखना चाहता है जो भागार तो गमी-गमी ममाए, मगर पिसी से एक प्यानी चाय की भी मासा न करे। यह पाय मही मांग कर अपना स्वाभिमान बचाता है मोम सद उमे पास न कर देहात म ममबाये मए मरवानीपत तम कर देन है। पापको याद होमा ही कि दर्शको ने मपनी-अपनी बाहों पर एक-एक निम्मा नया रना है जिन पर मिसा है-'हम पुरा पत्ता में प्यास है। फमत दमयन्ती के गममाग सुन कर एक रामक मपनी बयम बामे सिर को मामोर कर पाता है-"पुर यह सब तो गाही मननपुरम है। पमपन्ती के संचार में रखना तीसापन कुछ पंप मही पा है। बहुत मायेप है उमपन में। गौर, भिसका सिर मझोरा पसा बह रमक कान में मुह मरा 58 शोकसभा कहता है---"यह ड्रामा है, चेले, कहानी या नॉवेल नही। ड्रामे का डायलॉग कहानी और उपन्यास के मुकाबले ज्यादा गतिशील, ज्यादा सेनसिटिव और ज्यादा चोट करने वाला होता है।" हैदर कहता है, “ऐसे लोगो के नाम पर लानत फेंकिए. हम दोनो तो एकसाथ हाई स्कूल मे तीन साल रहे । इन तीन सालो मे मैंने दिवाकर साहव को नाश्ते की छुट्टी मे कम-से-कम बारह वार अपने पैसो से आइस- क्रीम चटाई होगी, छ' वार मूगफली और तीन बार सोहनपापडी सोहनपापडीवालो पर खुदा की गाज गिरे, अब भी सोहनपापडी वैसी ही बनती है ? लाहौल विला कुवत दमयन्ती बोल पडती हैं, “वडे भुलक्कड हैं ये । आज तक मुझे यह सब नही बतलाया।" हैदर कुछ स्मरण करता है, फिर बोलता है, “आह । भला ये सब बातें भी बतलाने की हैं ? मगर, मैं तो गोया बहक गया हू । दिवाकर भाई से मिलवाइएन । शादी के चौदह साल बाद मेरे वॉस की वीवी की गोद भरी है। खुशिया मनाई जाने वाली हैं। हमने उनकी कोठी के अहाते मे कुछ गाने, बजाने और नाचने का प्रोग्राम तय कर रखा है। अपने साहब मे जब मैंने वतलाया कि दिवाकर मलिक मेरे छुटपन के दोस्त हैं, तो उनको यकीन ही नहीं हुआ। फिर यह भी बोल पडे कि ऐसे फवशन मे दिवाकर मलिक जैसा डासर तो आने से रहा । उन्होंने गोया मुझे ललकार दिया। मैंने भी दबी जुवान से कहा-"अच्छा, तो सर, चैलेंज मजूर।" दमयन्ती कहती हैं, "बहुत अच्छा किया आपने । मैंने इन्हे सैकडो वार कहा है--आदमी को लचीला होना चाहिए। तूफान के साथ चलने वाला गिर पड़ता है। जब तूफान चलने लगा हो, तव रुक जाना चाहिए। और हा, काम करके कुछ प्राप्त करने मे भला क्या लाज ? इस ववत हमे पैसो की मस्त ज़रूरत है। कितना देने का तय किया है आप लोगो ने ?" हैदर बेचारा जैसे आसमान से गिरता है । कहता है, "ऐसा कह कर तो आप हिमालय को धक्के दे रही हैं। दिवाकर भाई यह सब सुनेंगे, तो उनको कितना बुरा लगेगा, खुदा ही वतला सकता है। आपने उनको मामूली आर्टिस्ट समझ रखा है क्या ? ऐसी हस्तिया शोहरत का कफन . ।

छोरसभा - सपेरे न होती है मौर उसी समय के साथ का उतर जाती है। फिर बर मेरी शिम्मेवारी में पर फरपन हो रहा है दिवाकर पानी पपास का मोट पापा भी पाए, तो पहरो फोरम ५६ रहे। "म करती हू महीं फेंमे हगिर महीशी हापमा un चिन्ता में एते हैं। मुनकर हैदर मुभाव देता है हाप तो तभी भरेगा 44thih नौकरी से सम माएं। मौर हो मा भी माना पाहिए । nि His फरो सुबह-माम नापोगामो पौन रोकता है। पहला राई सरफारी मौकरी मिलने से हो रही किसी प्रावट गनिग की तमाम भन्न मुनिए, स्टेपन पर साइकिया की एक माहत बड़ी सान है। मासिक मेरा दोस्त है। मैं उससे इनके लिए कमाता मा भार पर पाएंगे मोर पाम बाट बजे मौट माए । गमाची मामटाम मेवा है मगर पैसे मुंह पर फैलता है। कितने पैम मिमये। "मनी र मौ पये माहवार गे सपा कम देगा। "भाप अपमे भापिग म निगा पार पाड हैदर बम मंगाप बनमाना। गबनीमा बम सकम-गम प्रापिष्ट पा गुम गानोगी मारिन । दमयम्ती उग्छदाग छारकर मरती । देवर बार अपनी सियापा निHIT कहना है “अन्ठा, मब उसका ग famil मा फार्ममिती की नही। मभRI INTERA नाम एकपातीम मगा।" रमरी बामनी RITATTHI 1111 MIRS पती बौरीगmi Haritheirdi गन मानी। राम HAIVALPranthan "" मौर बाप-Patarrinkinfru हिhifts 60 शोकसभा " दमयन्ती मौन ही रहती है। घबडा कर हैदर पूछता है, "क्या दिवाकर भाई घर मे नही हैं ?" उत्तर मे दमयन्ती का सिर धीरे से दो बार दाए-वाए हिल जाता है- वस। हैदर अपने सूट की क्रीज़ पर निगाह डालता हुआ उठ खडा होता है और बाहर निकल जाने का उपक्रम करता । दमयन्ती एक कदम पीछे हट जाती है । हैदर दरवाजे की ओर बढता है और कहता है, "भई वाह आपने तो मुझे खूव मुगालते मे रखा।" दमयन्ती अब भी कुछ नहीं बोलती। "जरा बोलिए तो सही, उनसे फिर कब मुलाकात हो सकती है ? मैं फिर आने की कोशिश करुगा।" दर कहता है । परन्तु, ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थिति मे वह वेहद मुझला उठा है। निराशा और क्रोध, दोनो के भाव उसके चेहरे पर एकसाथ देखे जा सकते हैं। फण्ट लाइट इस निचुएशन मे जान डाल रही है। दमयन्ती का मौन नहीं टूटता । वह बहुत ही धोरे-धीरे पीछे की ओर खिमकती जा रही है। हैदर रुक कर उत्तर की प्रतीक्षा करता है, फिर दमयन्ती के कुछ न बोलने पर तमक कर बाहर निकल जाता है। परदा गिरता है। लाइट बुझ जाती है।

11 । । सरदार अमीरसिंह माहे मौर काम ममे ही भूम पाए, मगर ममता या पता है गुखारे म मस्पा टेकना नहीं भूमवा । भजन कीर्तन में भी शामित होता है और उसे देख कर मासानी से कोई यह नहीं समझना कि यह एक मार है। उसकी बातचीत मकही भी आवरपन मसर नही माता। काय स पेठमा कायरे से उठना बोर कायवे स बातें करता खूप मानता है । पुग्वारे से सटी यो सामनुमा ममी है उसकी दूसरी मार उसने गाई कमरों पाला एक छोटा-सा पर किराये पर म रमा है। इस मकान के मालिक भी कोई सरदारजी ही है। पहमे इसमे एक मारवासी परिवार रहता था। माई मो मोर एक बहन । बोना भाई यही मेन रोड पर पुर पी दया करते थे। सरदारी ने उन्हें किसी नए उमारकर अमीर सिंह को बसा रिया। वसम्सी किमया पिरापेर मा मया और यह सरसर है। गुधार में सम तो बन ही पापा मार रमोसा प्रयत्न समस्यापी को गौररी भी मिल गई पी। मुम्प मुखारे के प्रांगन म जो यत्पन्त साफ-सुथरा और पवित्र रहतामा कोमकोई उत्सम दोषा पारेप के कोने-कोने से सिस तीर्थयात्री को मुखारे का मन करने मात तोम गुहारे में भी पमारते थे। इन मोों की छोटी टूरिस्ट बसें मक्सर मगर माया करतीं। नृत्यमा सामान मभी नही पाया था इसलिए इस्पानी बोको मात्र हारमोनियम के सहारे पापों में संघ भवन याना ही मित्ताने सपी बी।बन्धिमा बन्नग पषि मेते थे। यस्पानी प्रेम से काम मेती थी ताइना से नहीं। पर कभी बाहर से माए हुए किसी ऐसे विद्वान का भापण होता को सिख धर्म मौर दम में अपनी पारी पेठ रमता माता रमामा मौर कम्पानी भी बड़े प्रेम से भापन मुनवी।एछ ही महीनों मार्ने लिए गुल्मों के माप जीवम विषय में बहुत सारी बातों पीना 62 शोकसभा गई थी। ऐसे ही मौके पर किसी शाम सरदार अमीरसिंह की निगाहे कल्याणी की निगाहो से जा टकरायी। अमीरसिंह तो जैसे वावला हो उठा। उसके दिल ने कहा---'हाय, यही तो है मेरे तसव्वुर की मलका ।' जवानी मे बहुत सारे अनाडीपन होते है । मगर, सवसे बडा अनाडीपन यह होता है कि हर जवान दिल शारीरिक आकर्पण को मुहव्वत का बुखार समझने लगता है। शरीर पाने की वेचनी को वह पाक मुहब्बत की तडपन समझने लगता है और यह मानने को हगिज तैयार नहीं होता कि उसकी इस उफान मारती हुई मुहन्वत मे दो फी सदी भी मिलावट है । पचास कदम दूर वैठी हुई कल्याणी ने जैसे अमीरसिंह को इशारे से कह दिया, 'अमीर, मैं तेरी सोहिणी हू । नज़रें न चुरा । आ, हम दो रूह मिलकर एक हो । जाए।' कहते हैं, प्रेम अन्धा होता है। पर, उस वक्त उसकी आखो मे शायद सौ सूरज की रोशनी आ जाती है, जब एक प्रेमी प्रेमिका को या प्रेमिका प्रेमी की तलाश में निकल पडती है। सरदार अमीरसिंह ट्रक लेकर कही दूरदराज जाने वाला था। मगर, अब रुक गया। उमने रमोला के साथ vल्याणी को गुरुद्वारेवाले स्कूल मे आते-जाते कई वार देखा था। पर, आज तक न तो नज़रें मिली थी, न दिल की यह हालत हुई थी। उसने पडोस की एक आठ साल की लडकी को ढूढ निकाला और उसे लेकर स्कूल पहुच गया। वह कल्याणी से इस लडकी के ही मुतल्लिक मिलना चाहता था। इस समय उसने एक अच्छा सूट पहन रखा था और उसकी पगडी जैसे कमाल कर रही थी। उसने कोट के ऊपर वाली जेव मे एक वढिया फाउण्टेन पेन खोस रखा था और उसके रुमाल से एक प्रकार की मीठी-मादक सुगन्ध निकल रही थी। वह पूर्व की ओर से दक्षिण की ओर चल कर, पश्चिम की ओर मुडा, जिधर सगीत-नृत्य सिखलाया जाता था। यह एक वढिया हाल था और यही उसकी भेंट कल्याणी से हुई। वह हारमोनियम पर दस-पन्द्रह बच्चे- बच्चियो को कोई 'सवद' गाना सिखला रही थी। सवदो का एक अच्छा सग्रह उसे गुरुद्वारा प्रवन्धक कमेटी के प्रेसीडेण्ट साहव ने खुद दिया था और - - गोकसमा 63 इसारा किया था कि बमों को बाशिकाना प्रभार के पीत हगिरन सिखसाए जाएं। उनकी माता से यह भी मालूम हुआ रि यह पोड़ी-बहन पैठ संगीत में भी रखते है। उन्होंने कहा पा 'बहुत सारे भजन राम पमिमियों में बंध है। उमका रियान पर भी बन्न मठी मावार हकदार बन सकते हैं। "बी हो ऐसा ही कमी। पम्पानी में हापा मेरी निम तो तुससीदास के मित्र निमम पदों में पुरुहुई पी।" सरदार ममीरसिंह उस हाम के दरवाजे पर माकर सहाहाहा । माठ साम की बन्पी सममार मार कुरता पहने नसमे सटी वाई मार पड़ी पी। पास वाकर भस्मानी ने पूछा पा 'माप किस मिमसित मैं पाए है? 'माह पुरी भजन-कीर्तम मीलेगी।" जी माने साकी। मुम्मा माने लगा। इमकेममावा पंगागी मोसी के पचासो सम्बों के मपमस्यापी जाम पापी । उसे कोई परेशानी नहीं हुई। उसने पूछा, 'या महो पाती है?" "नहीं।" कस्यामी मे कहा "यहाँ स्फूत म मामाकी पड़ती है उसे ही संगीत सिमसाया जाता है। क्या इसके मां-बाप इस पड़ाना नही पाहो ! परे तो मही पाहते । भगर, पानवी है दोस्त सने भाई से कर होगा।" "मतलय ?" सरदार ममीरसि मे कहा, 'सका बाप मेरा दोस्त है। हम एक पाम में रोटियां बाठे है। मैं चाहता था यह माकी कुछ बने। इसकी मापार रही प्यारी है। मैं नहीं चाहता कि पुशन पर बैठार यह पापा बेचने में महारत हासिन परे। इसका माप इसकी लगियों को नहीं पहचानता । कस्यापी इस बार सरदार ममीरसिंह की मांसों में बा गम है। फिर कहती है कि आप इस पहम स्कम में शामिप्ता । उस मोर पसे पाए । बसविन्दर कोर एटीपर है।"

64 शोकसभा "वेहतर ।" कहकर अमीरसिंह ने, जिस ओर से नाया था, उधर मुडना चाहा । फिर उसने वेहद मासूम आवाज़ मे कल्याणी से पूछ लिया, "आपने कब मिलना होगा?" कल्याणी ने जैसे अनजाने ही उसका दिल तोड दिया। कहा, "अव मुझमे मिलना कोई ज़रूरी नहीं है। दाखिला लेने के बाद यह लडकी खुद इस क्लास मे आने लगेगी।" "मगर जो मिल लू, तो कोई हर्ज है ?" कल्याणी का उत्तर था, "देखा जाएगा ।" देखा जाएगा क्या देखा जाएगा? अमीरसिंह इन दो लफ्ज़ो के ढेर सारे मायने लगाता हुआ चला गया। दो-तीन रोज़ अमीरसिंह छुट्टी के समय वाहर गेट के पास कल्याणी को नज़र आता रहा और उमे वडे अदव से नमस्ते करता रहा। फिर वह ट्रक लेकर अमृतसर चला गया। जा री दुनिया । मुहब्बत के रास्ते में रोटी का सवाल भी क्या गुल खिलाता है। नमस्ते का उत्तर कल्याणी ने हर वार मुस्कराकर दिया था और उसकी हर मुस्कराहट अमीरसिंह को उसके रीव लानी गई थी। परन्तु, कल्याणी के अनजाने मे यह सव हो रहा था। इस स्कूल मे बहुत सारे सरदार जी आते रहते हैं। कोई वच्चे को दाखिल कराता है, तो कोई वच्ची को। इमी तरह कब और कौन-कौन कौर आती थी, हिसाव लगाना मुश्किल था। गुरुद्वारे की सीढी पर जिसे रोज-रोज़ मत्या टेकना नसीव हो, भला उसमे बडभागी कौन सरदार और कौन कौर होगी? सरदारो की बीविया वच्चे-बच्चियो को छोड़ने या लिवा ले जाने आती, तो मत्था टेकना कभी नहीं भूलती थी। कल की सुबह चार वजे ट्रक लेकर अमीरसिंह को यह शहर कई दिनो के लिए छोड देना था। यह तो एक सयोग ही था कि आज की शाम कल्याणी उमे पास की उस दुकान पर मिल गई, जहा प्लास्टिक की चूडिया खास तौर से विका करती थी। अमीरसिंह ने पूछा, "कहिए, लडकी कुछ सीख रही है ? आवाज़ कैसी है ?" कल्याणी ने कहा, "हा, सीख रही है। आवाज़ भी अच्छी है।" अमीरसिंह जैसे एकाएक वोल पड़ा, "मैं भी कल वाहर जा रहा हू 65 पौषममा । पाया फटा ऐ बाद सौद।" ममम्म।" कार प्रमाणी ने एक बार समीरसिंह को भी भर कर देवाबा। इमोबाद पूरियों को जिाइन पसल करने मगी पी। मेटिन मारायानी को भी बस कुछ हो गया । माये बढ़ जाने पर भी समा अमीर उसके पास ही बड़ा है। दुकान मामिक एक युवा सरदार पााएर हावा ता शायद किसी बहाने उत्पापी पूछ बैठी-'पह कौन है ? और, दाना सरकार एक-दो बामय में कुछ बतना पता। मयर, समास मिर्ष लताही नहीं पा कि मह कौन है। इस बार परमार और भी बुरे हुए में गोहाठों से बाहर नहीं निकल पाते या कौन है बो रेत के सर सावन का बाइस बन कर पुबर - बन नाइट, स्पीडोमीटर, मायस ! स्टिरित हीस पाप एक्सत्तरेटर !! भीड़-महान हॉर्ने मौर 'इटोमपा की बाबा!!! यह सब कुछ एक बोर मोर रस्यापी का एक पर 'बजर के स्टियरिम वीस की परपणहट के साप मरदार बनाना का दिन मा परपरा रहा है-नम ससवार, पुरखा मोर भावनी मर रेले पर की देर बसी फौण पटक पापी। परमा कर यह 'ममीरममा पो।। समोरसिंह पगार से सौट कर माता पिर मार- मिलता है। मोना वीपी रे पट में कोई राप हो पया है। राविर पायद मापरेशन होगा। गारों का समरrth सरपार समीरसिंह सब पता नया मुहै। पुधार का मुम द्वार मन की भार मुमता। की मार है। मे एक महा-सासा रानामगर अटी-शरी पशुपानें है। उन्ही कुरानों में मे पारण पमान र समय उम दिन कल्यामी का मri इर भारके मनपा पर पासपहसएटी है। पास थी। इस पर मौसम मपा पार पर पगारदार 66 शोकसभा 1 मे अभी-अभी छुट्टी हुई थी और लडके-लडकिया उत्तर और पूर्व वाले फाटको से भागते-कूदते, उछलते निकल रहे थे। मेन रोड पर सवारियो की भीड देखते ही बन रही है। आज कल्याणी अपने को कुछ ज्यादा थकी हुई पा रही है। इच्छा होती है कि रिक्शे से घर लौटे। पर, मन आगे बढता है और कदम पीछे हटता जा रहा है। नब्बे रुपये की नौकरी है। वह भी स्थायी नहीं । माहौल तो यह है कि छ -सात टीचरो मे जो दो गैरसिख टीचर हैं-रमोला और कल्याणी-अपने को स्थायी समझ ही नही सकती। लगता है, इन दोनों के सिर पर कोई दो अनजानी कौर लटक रही हैं। इधर क्ल्याणी ने सुना है, हरविन्दर कौर की भानजी लुधियाने से आई है ।अभी उसका व्याह नही हुआ है। वह हिन्दी की प्रभाकर परीक्षा पास है और सगीत मे उसने तीन साल की पढाई पूरी कर ली है। कही रोटियो की छीना-झपटी न हो जाए उसे नौकरी भी मिल सकती है, और शादी की बातचीत तो चल ही रही होगी। मगर, कल्याणी का क्या होगा कल्याणी जव पहला वेतन लेकर घर गई, तो दिवाकर मलिक किसी काम से बाहर ही खडे थे। कल्याणी ने कहा, "बाबूजी, इधर आइए।" "क्या है, बेटी?" ? ? F "आइएन । और, जव दिवाकर मलिक बैठक मे आ गए, तो उसने उनके आगे दस-दस रुपये के नौ नोट वढाते हुए कहा, "यह रहे नब्बे रुपये। एक महीने का " दिवाकर मलिक ने नोटो को देखते हुए कहा, "जाओ, अपनी मा को दे दो।" "क्यो, आप नही लेंगे ?" "विटिया के लिए मा और वाप दोनो बरावर होते हैं। जाओ, मा को दे दो।" कल्याणी समझ नही पाई कि यह कहते हुए उसके पिता ने क्यो वडे गौर से उसके मुखडे को देखा था और क्यो उनके नेत्रो ने क्षण-भर मे आसू पोसभा 67 उन दिए । बह चुपपाप पोरन को मोर या मा। पहारपूर म्टेट रेवा माहब रे पिता नयों भोर मायको का बड़ा सम्माम करत पे। एक बार उनकी भी गा विवाकर ममिका प्रपने यहाँ मौकरी देने की हुई थी। दिवाकर मसिक मे गुमरे से मस्तीपारात्मक उत्तर भिनगा दिया था। भमा यह भी कोई बात है कि यहा पाई र समकेमागे मापा गाए? रिस्ते भी तो रवाने में ही है। ये मोम बाते रहता है। क्या पता उन्हें साध करने लिए मापने को पहा गाए ? मग चमके मुपुत्र स्टेट के मालिक है। इन्होने भी पाहाया कि दिवार ममिक चमकी पमाह दुम परमौर पिनाकर मसिक मे फिर इम मौरको निमा। बमम्मपथमी को उनके महा बड़ी धूम म गस रय मषता है। मामक नतम मादकमाते है। ममी मपनी-अपनी कमाओं का प्र मन करते हमार सन्तोपजन पुरस्कार प्राप्त कर पर मौरते है। हर मान की तरह इस साम भी बसन्त का मौसम बाया पा। दिवाकर मनिकका हर बसन्त पंचमी के मबमर पर बा साहब मुमाते थे कुछ धनधाम्म भी मर्पित करते पे। इस बार भी दिवाकर ममिक यही माम की यारी मये। गुस्सा अपना सारा सामान महज और सोपव-पहाापुर पाने के लिए कम वने पैर रह पाएंगे। यहां से इतने रपये तो मिल ही गाएन कि दो-तीन महीन किसी बात की चिन्ता नहीं रहेगी। कस्यापी यो वेतन माएगी वह चये ही देकर हेये 'बेटी इससे तुम अपन मिए कुछ परीर मोहो कमावर मे माई हो न, मुझ पान-सुपारी के लिए एक रपया दे दी। तुम्हारा भी मन रह पाए कि मपनी कमाई स पितागी को कुछ रिया। मेकिम ऐमा हो कहाँ पापा ! मेहया बनकर रहमा पहा 'जागो अपनी मां कोरदो।" पुत्री की कमाई से पर में राशन बाएमा ! दमयन्ती हिसाब मिअएगी कि मम्म पमे में क्या-नया मौर जितना मा सम्वा है। दिवाकर ममि मे पिता ही मर गए। पहारपुर स्टेटस इस सास निम पप नही मामा।बामा माय बीवन माया। ममावस्या तक यह हास हो गया किमार पाते हो माग ।

168 शोकसभा रोककर दिवाकर मलिक पूछते, "मेरे नाम कोई चिट्ठी है ?" . "नही ।" "देखिए, एक लिफाफा होगा।" "नही है, मलिक जी।" "ज़रा देखिए न । पहाडपुर स्टेट से पत्र आने वाला है।" लाचारहोकर डाकिया बहुत सारी चिट्ठियो के वीच ढूढने लगता है। "पीले रंग का लिफाफा होगा। हर साल वसन्तोत्सव का निमन्त्रण 'पीले लिफाफे मे ही आता है।" और, थककर डाकिया होठ विचका देता है। दिवाकर मलिक देखते रह जाते हैं। डाकिया आगे बढ जाता है। बैठक मे आकर वालकृष्ण की मूरत के पास चारपाई पर हताश होकर यू बैठ जाते हैं, जैसे हसते-हसते किसी ने सारी खुशिया छीन ली हो। उन्हे क्या पता कि किसी खुशामदी मुसाहिब ने बाबू साहब के कान मे कह दिया था, "यह आदमी महाघमण्डी है। याद है न, श्रीमान जी ने दो-दो वार दरवार मे नौकरी कर लेने को कहलवाया, मगर वह अपनी शान मे तक नही करने आया। इसके बदले आप खेलाडीलाल को इज्जत शए । राग जयजयवन्ती पर तो वह सगीत की त्रिवेणी वहा देता है- आडा चौताला चौदह मात्रा। वाप रे वाप, श्रीमानजी एक वार उसका नाच देख लें, तो कहे कि हा, अपने इलाके में एक दूसरा रतन भी है।" फिर वह चौताला चौदह मात्राओ मे वधे राग जयजयवन्ती को दो पक्तिया गुनगुनाया 'नाचत गति गिरधर गोपाल । छम-छम-छम छवि न्यारी।' और, वावू साहब ने फैसला दिया, "ठीक है, तुम दिवाकर मलिक की कमी पूरी करने के लिए खेलाडीलाल को निमन्त्रण-पत्र भिजवाओ।" खेलाडीलाल मुसाहिब का अपना आदमी था। तय पहले ही हो चुका था-विदाई मे दस आने खेलाडीलाल लेगा और छ आने मुसाहिब । M . भी था कल्याणी सडक पर आकर खडी हो गई है। आज रिक्शे से ही घर शो-4

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सोट बम तोक्मा हर्न है? मगर, सिर्फ भार भर। रोजगाऐगा मदी
करेमी वमा सुकुमार बनने सपनही पममा।
बहुत मीर है। कोई रिपद्या खामी नगर ही मही पाता। पम्पापी
सोचती हैममा यानी ऐ ! भय धीरे-धीरे पममा पाहिए।
अभी स ममीरमिह उसके लिए परिमा बमकर मा गाता है।
'भाप पर जाना चाहती है ?"
'बया रिपसे की ठसाश में है?"
ममीरमिह मकस से काम मेता है। कहता है, “यहा वापरा मुगिन
है। दो-आसिौ परम उम बोरया गाइए । कोनिको सिधा मिम ही
पाएपा । रघर यहा अषी भी नही है।
कस्पापी कुछ नहीं बोमती वस पाया है। सोचती है-सिया नही
भी मिला वो पर पाने का रास्ता उपर से ही है। पंपस ममती पसी
पाएगी।
मार सरदार ममीरसिंह याग-पीचे हावा हुमा एक प्रकार म उमर
साप ही हो सिमा । कल्यापी बार-बार म पतियों की
रमी समझ म यह समान भपा।
"रिसमा भाम मिल पाएगा।"
“बम्ठा ।"
“म रमी मसी में रहता हूं।'
पायो भमुखमरी पापा मार माराम
में नहीं जानती।"
"वैर, एक घाटा-मा रमा भीमामान rat
सी है।"
मा पर मामन मी
यती पत्र पर मानर बाइ साना

70 शोकसभा का दरवाजा है।" कल्याणी ने इस पर कुछ नही कहा । चार-पाच कदम बढने पर अमीरसिंह कहने लगा, "पहले साथ मे मेरी मा और छोटा भाई रहता था । अव दोनो मे से कोई साथ नहीं। अकेला रहता है। ।" कल्याणी लगातार चुप रही। सरदार अमीरसिंह का खयाल था कि अगर इसे ये सारी बातें बुरी लगती, तो यह कुछ दूसरा रुख अपनाती । मगर, वह तो चुपचाप सब कुछ सुनती जा रही थी। अमीरसिंह ठाट-बाट से काफी आकर्षक लग रहा था। लोगो की भीड तो घटती-बढती रहती है। कुछ कदम आगे चलने पर इन दोनो के पास लगा, भीड कतई है ही नही । अमीरसिंह ने कल्याणी के एकदम पाम मे चलते हुए जैसे अपने दिल को निकालकर उसकी हथेलियो पर रख दिया। फुसफुसा कर कहा, "पजाब निकल जाना पडा । मगरमन वेहद उदास रहा । आपको भूलना खुदा को भूलने जैसा मुश्किल जान पड रहा था।" कल्याणी ने जव इतना सुना, तो लगा, इस सरदार ने उसके ललाट, वालो और गालो को बड़े प्यार से सहला दिया। फिर भी उसने धीमे स्वर मे पूछ लिया, "मगर, आप मुझे याद ही क्यो करने लगे ?" "मई, इम क्यो का जवाब मेरे पास नहीं है।" "तो फिर किसके पास है ? आप मेरे साथ-साथ चलते आ रहे हैं, देखने वाले क्या कहेगे " "चाहे वे जो कह लें, मेरे दर्द मे साझीदार तो हगिज़ न होंगे।" "सर, इन वातो से मेरा क्या वास्ता " कल्याणी वोली। मगर, यह वास्ता हुआ। सरदार अमीरसिंह को अदावत की जगह मुहब्बत मिली । दुत्कार की जगह पुचकार मिला। दोनों एक-दूसरे के लिए कभी न खत्म होने वाली गजल की बन्दिश बन गए। अकेले मे सरदार अमीरसिंह गुनगुनाने लगा 'शाला जवानिया माणे, आखा ना मोडी पी ले, पी लें। अखिया विच अखिया पाके, तोवा नु फाई लाके, पिघली हुई जन्नत पी ले, कलिया दी अजमत पील,

पोकसभा
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पी मैरो-बार यहाापी में भी मै
पामा प्रवानिया मापे ।'
मा ने दोनों को एकदम मे एक मोर पर सा कर सहारगिया ।
स्कम पो भय मास्माणी एक दिन के सिए नही जे सक्सी पी। वह तो
ममीर काहीर बन मईबी बहसम्म बन गपा पा। उमकी मुहमा को
पंच सम गए और एक सम्मा सरदार ममीरमिह मपनी हार को मकर
मामभर जाने वाली रेस में बैठ गया।रेम बम पड़ी।

12 वागेश्वरी को पुकार कर दमयन्ती ने कहा, "पूर्वी को झोला और सरसो के तेल वाली शीशी दे दे।" "अच्छा।" यह सब सुनते ही पूर्वी ने वायलिन उठा कर एक ओर रख दी। सोचा-- अब मामान लाने जाना होगा, उठू । लेकिन क्षण-भर वीतते-न- वीतते उसका उत्साह एकदम ठण्डा पड गया। दुकानदार नज़र पडते ही कुछ यू देखता है, जैसे पूर्वी के रूप मे कोई प्रेतनी या चुडैल उसके सामने आ गई हो और उसे मौका मिलते ही खा जाएगी। वह एक ओर चुपचाप खडी रहती है और वह पूछता ही नही कि क्या चाहिए । वाप और दो वेटे मिल कर दुकान चलाते हैं। दुकान वडे मौके पर है, इसलिए ग्राहको की में भीड इस कदर रहती है, गोया छिला हुआ पका आम पडा हो और उस पर २ ढेर सारी मक्खिया भिनभिना रही हो। न जाने किस पण्डित से पूछ कर मा-बाप ने उसका नाम दमडीप्रसाद रखा था, जवकि वह लखपती था। चावल, दाल, तेल की आदत मे पहुचता, तो जुवान खोलते ही आढत के मालिक गद्दी पर से वोलते, “जयराम जी की, दमडी वावू ! कहिए, चावल की कितनी वोरिया लदवा दू? पजाव वाला गेहू और कानपुर वाली दाल आ गई है।" दमडीप्रसाद कहता, "पहले भाव तो मालूम हो।" "आपसे यही सव सुनना अच्छा नहीं लगता। हुक्म करते चलिए। वह देखिए, सामने बैलगाडी खडी है। मोल-तोल न कीजिए। हम कभी घाटे का सौदा नहीं दे सकते।" "हा, सो तो है।" फिर जव जो चीज शीघ्र उपलब्ध हो, उससे स्वागत । मिठाइया, लस्सी, पकोडे, चाय, फल दमडीप्रसाद के वेटो के नाम जैसे सस्कृत-कोशो की महायता से रखे - ।

पए ई-पहम राफा मीसाम । इनमें पास बीम मात्र मा रामा सोसह माम का बोर नौप्ताम ठाए साम का है। ये तीनों अपने नाम का मर्ष विमान नही मानत । दमहीप्रसार उगं हार मगाता है-अरे गुममा! मरे रसमा मरे निमभा। वह यह भी नहीं मानता है कि परम स मार तामपा में क्या मन्तर है। हा इतना यह मवाय पानता है कि मूने मकाम मौर महमाई के दिन पनियों के मिए दूसरी-तीमरी तिमारी परीक्मे के दिन होते है । साप भागी की छह मासम्म बाप मापूति विभाग मफमरों को खरीदते है मौर मामाम्म ग्राहका मामन गमा फार महते है -इस धन्धे में मय कोई सरसत नहीं रह पाई। राम बात है बाप्पापारी सामान छियाकर रखते है मौर जनता हम छोटे छोटे लोगों को बदनाम करती है हमारे नाम गालियां निकामती है। मुझ समाम म तो घर रहत है न उधर का इतने दिन पापा बेमने के बार में तो यही समझ मका हूँ कि सबसे मन्ठा पमा मौरी है। नफ- गुणमान म काई मतलब नही महीने की हर एकतारीखका पापक मार ! माया इस देनारे को साल में वा-तीन बार मुग्तिम स चकाचक मारों के दर्शन होते है। तीनों वटे महासमी के पाम में गुरु होने के समरसते है। सबसे छोटा वातानीमाभ बसे तुतसा पर बानता है ममर वस्मर पस तोटाते ममय प्राहकारहाम पर खाटे सिके रहने से बार नहीं माता। ऐसे ही होनहारों को देखकर मानता पाता है कि बांस पी ग में बांस पनमता मोर मम्मी के रनों को तैरना नहीं सिबमामा पाता है। पूर्वी या मोला मार सरसों के ततमी पीधी मेकर मेटा पार करने ममी ता दमयन्ती न जरा ऊपी भागार में कहा "म की शीगी पूरी मण मेगा ।बह मक्सर पूरी पीपी मही भरता। कहना यह माघ मिसो पो पीपी है ही। इसमें कोई काट-अपटन करो। "मछा' । पूर्वी बाहर निकलती है तोमगता है उम पर बर्फ की बारिश होने मगी। वही जाकर एक मोर खड़ा होना दुकानार की उपेमादपि मा 4 सामना करना पड़ा पातू है दमहीप्रसार । दिनार मनिक। महाँ मेता, ममर मीठे-मीठ उम्ह फोमनापहनही भूलता का 74 शोकसभा ? डकार तक लेने को तैयार नहीं होते। कहता है-"आढत पर चवन्नी-भर का सामान हमे कोई उधार नहीं देता और यहा जो लोग उधार ले जाते हैं, उन्हे याद ही नहीं रहता कि पैसे देने चाहिए । आखिर हमारे पास भी तो कोई कारू का खजाना नहीं है । अव तो मैं महीनेवारी उधार लेने वालो के भी आगे हाथ जोडने वाला हूँ ।" उसकी यह अन्तिम घोषणा पूर्वी के कलेजे को दहला देने वाली होती है। कुछ मानव प्राणी ऐसे भी होते हैं, जो जिन्दा रहने के लिए ग्लानि और हीनता की जड मीचने मे ही अपने को निरापद और सुरक्षित समझते हैं और किमी तरह उनकी ज़िन्दगी कटती चली जाती है। इस अर्थ मे कभी-कभी वे इतने जड हो जाते हैं कि वे भूल ही जाते हैं कि ग्लानि क्या चीज़ है, हीनता क्या चीज़ है। किन्तु, पूर्वी ऐमे प्राणियो मे नही । इस छोटी उम्र मे वह बार-बार अपने से सवाल करती है कि आखिर इस स्थिति में उबरने का रास्ता कौन-सा रास्ता हो सकता है मम्भवत वह दमडीप्रसाद की दुकान पर पहुच गई होगी कि इघर वाहर मे घूम-फिर कर दिवाकर मलिक लौटे। प्रात मात बजे ही निकल गए थे। अव दस बजे रहे थे। दमयन्ती ने जाकर दरवाजा खोला, तो देखा, 'वह न तो उदास हैं और न प्रसन्न । लगता है, होठ गीले करने-भर को कही ने पानी मिल गया। पूछा, "आ गए "हा।” कहकर दिवाकर मलिक ने जिज्ञामा प्रकट की, "पूर्वी कहा है ?" दमयन्ती बोली, "दमडी की दुकान मे चावल और तेल लाने गई है।" "और वागेश्वरी?" "वह स्नान कर रही है।" दिवाकर मलिक कुछ उत्साह-भरे स्वर मे वोले, "एक मित्र मे दम रुपये मिल गए हैं" "किमने दिये?" "भई, यह तुम हमेशा पूछा करती हो।" ?" - "तो क्या हुआ ?" "सवके नाम क्या तुम जानती हो? किसी ने दे दिए, काम चलने से पोकममा 75 । मतमम । मामो पर में नमो। या वाव है ? दममन्ती निमासा से भर उठी। जब भी कहीं से कुछ मर्मप्राप्ति की बापा होती दिवाकर मनिकासी टोन में पोसते मीर घर में गाकर मारी बात तफसीस से बतसावे । बड़ी निरसता से यपमी बावों में कुछ नमक- मिर्ष भी मगा रिया करते, फलस्वरूप तत्सम प्रीमती के उदास मुगो पर मानन्द की महरें प्रेमने मगती पो। शयमकक्ष में भाकर रिवाकर मनिक पारपाई पर बैठे रहे। दमयन्ती मे भी मपने लिए एक मुष-आसनी बीच नी बार पति ने परों के पास पैठ हीं। दिवाकर मलिक मे पुरते की पापी पेन से पस रूपये या एफ मोट निकासकर पल्ली रे हाथ में देते हुए कहा 'मेरे यो दोस्त है म प्रमाण बाबू, तुमसे तो उनके पार में सवार । दमयन्ती मोम पड़ी "हो-हा पाप है।" दिवाकर ममिक ने बतलाया 'निमा विमाम के मात्री हो गए। भमात्री हो गए? दमयन्ती ने इस प्रश्न मे दिवाकर मसिक को पैसे परा ठहर गाने के मिए पहा । बोम, "हो नहीं गए, मगर कम-परमों तक हो गएम। नमः ही भर मे मा रहा हूँ। 'तुम्हें कैसे मासूम मममवार में परा है।" महान दो । 'ऐसे क्यों पामती हो ? सिक्षा विभागस मुझसे माइमी का विभाग भी पूजामा है। 'तुम्हारा मौन-सा विभाग हमा। रमपम्ती ने भारचर्य मे पूछा। दिवाकर मसिकयोसे "मुमस मोगा का विभाम होता है मनित कमा पिभाम । इमम मम गायर बार बार पित्रकार मातहै। प्रताप बाद कह रहे ये कि यह मर्वको मापकों पासा मिए भी कुछ परमे। मुमे दो महीनपी हुई। वो रियादित इम्मान है प्रकापमापू।" पसी पीच पूर्वी मागई। उसके हापरा मोमा साती पा . .

76 । की शीशी खाली थी। वह वरामदे में आकर खडी हो रही। उसका चेहरा कुछ इस कदर रुआसा नजर आ रहा था, गोया कही से पिटकर आई हो। उसके पैरो की आहट सुनकर दमयन्ती ने आवाज़ दी, "कोन है ? वागेश्वरी? स्नान कर लिया?" बदले में पूर्वी बोली, "नही, मैं हूं।" "मामान ले आई ? आओ, इधर आओ।" चाखट को लापते हुए पूर्वी ने कहा, "उमने लौटा दिया।" "क्यो, क्या कहा "अब उधार नहीं चलेगा। मलिक जी को कहना, पिछला बकाया फोरन से पेश्तर चुकता करे।" नुनकर पति-पत्नी दोनो को धक्का लगा। दमयन्ती ने पूर्वी को दस रुपये का नोट देते हुए कहा, "लो ये रुपये। पैमे मे ले आओ।" पूर्वी ने नोट तो पकड लिया, मगर झोला और शीशी ज़मीन पर रख दी और आज पहली बार अवज्ञा-भरे स्वर मे कहा, "अब मैं नही जाऊगी।" दिवाकर मलिक ने बड़े प्यार से कहा, "चली जाओ, वेटी। तुम्ही तो मेरे हाथ-पाव हो । अब तो पैसे देकर सामान लेना है।" "नही ।" "नही-नही क्यो कर रही है री?" दमयन्ती के स्वर मे तीखापन भर आया। वह पूर्वी की ओर इस प्रकार वढी, जैसे क्षण-भर बाद ही उमकी पिटाई कर देंगी। और पूर्वी ने जैसे जिद्द ठान ली। वह शायद आने वाले हर खतरे की चोट महने के लिए बाहर से ही तैयार होकर आई थी । उसके गाल लाल हो आए। उसने जोर देते हुए कहा, "नही जाऊगी, नहीं जाऊगी, नही जाऊगी।" "और जो कोई दूसरा ले आवे, तो खाएगी?" दमयन्ती ने तनते हुए पूछा । पूर्वी ने फौरन जवाब दिया, "नहीं खाऊगी' जा ।" सट्-मट्-सद सटाक् थप्पडो के चलने के माथ ही दमयन्ती का क्रोध उवल पड़ा। पूर्वी जकडकर खडी रही। कनाकार पिता से नहीं रहा गया। भीतर मे दौडकर ।

मागममा
77
बाहर निगम भाए। बटी के सिर को फमेस चिपकाया उसके मिर पर
हार फेरने मगे। बोले 'मेरी रामी बिटिया पर हाथ पसाओ।
पता मही पूर्वी ने वन क्या सोपा महमपमे आम पाध्वी हुई भोला
और पीपी नठाकर दमडीप्रधार की दुकान की मार मपाती हुई चम
पड़ी।

13 कल्याणी किमकी हीर बन गई, इस सवाल का जवाब न तो दिवाकर मलिक के पास था और न दमयन्ती के पास । मुहल्लेवाले शुरू में जरूर पत लगाने की कोगिग करने रहे, वाद मे वे भी शान्त पड़ गए । शान्त पड जान का अर्थ यह नहीं कि उन्होंने किनी नैतिकता का परिचय दिया कि दूमरं के परिवार की जन्मपत्री भन्ना क्यों पढ़ी जाए, वल्कि दिवाकर मलिक चूकि मुहल्ले वालो के घरेलू मामलो मे कमी दखल नहीं देते थे और भेंट मुलाकात हो जाने पर नपे-तुले गन्द वोला करते थे, अत ज्यादा छेडछार करने का किसी ने नाहन नहीं किया। मगर, कानाफूमी का प्राइवेट बन्ध तो लोग चलाने ही रहते थे। दिवाकर मलिक अपनी कमजोरियो ने परिचित थे, इसलिए उन्होंने वव भी दर्द को पी लिया। पर, यह दर्द जड मे समाप्त हो गया था, ऐस नहीं कहा जा सकता। यदाकदा कल्याणी की याद कुरेद ही जाती । बैं उनका भी यही विश्वास था कि कल्याणी ने किसी के हाथो में अपना हा डाल दिया होगा और उनी के माय कहीं चल पडी होगी। हा, दमयन्त कभी-कभी इतना जरूर कह डालती, "तुमने चुपके-चुपके उमे स्कूल की नौकरी पकडा हो । यदि मैं जानती कि यह नव होगा, तो उसे एक दिन में लिए भी घर में वाहर न जाने देती।" "और मैं जानता, तो भी उसे धक्के देकर भेज देता? जरा मोच समझ कर बोलो, भाई } मेरे लिए कल्याणी कोई छठी उगली नहीं थी, रहे या न रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता।" दिवाकर मलिक कहने। दमवन्ती को आभास हो जाता, पतिदेव को ठेस पहुंची है। वस म स्थिति को नभालती, "मेरी इन छोटी-मोटी बातो को दिल में न विकाय फरो। यह मत समझो कि मैं तुम पर दोपारोपण कर रही हूँ। तुम्हार न्यान तो मैं मात जन्म मे नहीं ले सकती । हा, कभी-कमी हूक उठती है उने किस पर प्रकट करू ? वम तुमसे ही उल्टी-मीधी वोल देती है।"

गोकप्तमा 79 मभाव में और मनोमातिम्प का मटममा पुमो क्षण भर में पाता। इसी बीच दिवाकर ममिक से एक रात बममन्ती में दोस्तों के बीच गाते हो बायेगरी के लिए परकी पर्वा क्यों महीं समाते ! 'पमामा तो ऐसा है नही कि किसी पर का पिता तुमारे गाम मौर गुणा मुनपर गुरचाहेमा कि वामपरी उसकी पुषगपू बने । हम मित्रों + कान में मह मात गसोगे तो कोई एक तो नहीं मा-गुनेगा। टीम किमी "पा के परमाएपी कोई मुमाहित यो भपमा र पोमेगा ही। पाही माह विना पर्वा बसाए तय नहीं होता । पस्नी का कमन रिवाकर को कई पुरा नहीं गया। बासे 'अंक कासी हो। मस्मि कमार मोचताह हाप सामी है। सारी-म्पाह गगानी सो उम होता नहीं। मान मो मन नामकपर मिस गाए, फिरता पैसों हाप मभकर ही रह जाना पड़ेगा।" "मममान समरे मामिक है । स को सुप मोम रोना बाहना है वो दूसरे भी हाप मगा देते है। भयमान खुद वो मामन भाकर कुछ नहीं करव मगर इसरों क हाप से करा देत है। दमयन्ती ने दो मार पपवान का नाम सुनार बार म बाने क्यों दिवाकर ममिक एकाएक नास्तिक बन बैठे। कहने सय देखो दमयन्ती भयबाम और मोविपी -रोनो से मेरा विस बहुत पाता है। इन दोनों पर में न पड़ा गाए, पही मन्छा । भगवान की कल्पना मनुष्य ने की मनुष्य उमस्पमा से भूमित भी पा सकता है। यह किसी के माय पर दुछ नहीं परता। अपने ही किए सब होता है। आवमी पीरा भोपळा है तो कहवा है-भममाम किसी पाप का दारे रहे हैं। मगर पुरसार की बाठ भी में मो। मन दो-तीन मोर भयमपतों को देखा है कि गिगी भर में देवताको पीतम के मासन को प्रोते ए, रसिया में पूजन-अर्पन की सामशिरा सिए मदिरों को सीवियो गिनते रहे। इसमें किसी का समान बेटा एपिसोट में मारा गया किसीकर में वाम मम पई, काम- पान का मोहवार हो गया। एक महिना तो पूजा करने के लिए ही पृष टोने गई मौर इस कार मिरी किमत पृष्टा । पता नहीं पहने हो मस्तर पा बाद में उसकी एक टोग ही काट दीपई। पता नही, अपमान मिा- 80 शोकसभा ह - छिपा मुस्कराता रहा या रोता रहा। ये ज्योतिपी भी कुछ कम जालिम नहीं होते। हरदम दोहरी वातें बोलते हैं । ताल ठोककर एक वात पर वे टिक नहीं सकते।" मुनकर दमयन्ती ने कहा, "मुनो, मैं जानती कि भगवान से तुम डरते हो, मगर ये मारी वातें क्रोध में बोल रहे हो। दिल जलने पर माताए. अपने बच्चो तक को शाप दिया करती है, लेकिन क्या वे हृदय से चाहती हैं कि बच्चो के जीवन पर वे शाप फलीभूत हो ? उद्धव के आने पर गोपिकाओ ने मुरलीधारी श्रीकृष्ण के प्रति कितनी कटु वातें कही थी, परन्तु क्या उन्होंने उन्हे हृदय से निकाल दिया? श्रीकृष्ण स्वय द्वारकाधीश और रुक्मिणी के पति वनकर राधा को मूल सके ? सारे ससार का जो स्वामी है, उसे कुछ उलाहने भी सुनने ही पडते हैं । हम दुख मे भटक भी तो जाते हैं।" दिवाकर मलिक को जैसे किसी ने अधेरे से उठाकर उजाले मे विठा दिया । बोले, "अच्छा देखो, मैं कल ही से शादी की चर्चा तेज़ करता है । से ।' "चाहे जिम वावू से कहो, मुझे कोई एतराज़ नही। क्या पता, किसके वहाने यह यन प्रारम्भ हो और किमके सहारे पूरा हो जाए जाए!" तव सबसे पहले चारु वाबू -- दमयन्ती ने कहा। । - अभी कचहरी पूरी तरह नहीं खुली है । मगर, सभी मजिस्ट्रेटो और जजों के पेशकार आ गए है। घण्टा-भर लगेगा, तब कचहरी मे पूरी चहल-पहल छा जाएगी। वकालतखाने मे सारी कुसिया नहीं भरी हैं। काले कोट वालो मे से भी सब-के-सव नहीं आए है। पेडो और शेडो के नीचे बैठकर अजिया टाइप करने वाले आ गए हैं। उनमे से कुछ की मशीनें चलने लगी हैं। मुकदमेवाजो मे से कुछ आ गए हैं, कुछ आ ही रहे होंगे। चारुचन्द्र जी ने कहा था, "कचहरी की इमारत तो दोमज़िला है, मगर सवजज नम्बर तीन नीचे ही वैठते हैं। पश्चिम ओर का दूसरा नम्बर इजलाम । इनका ही पेशकार है मणिकान्त दुवे । सावला रग और अच्छी कद-काठी है। लोग अजिया थमा रहे होंगे। किसी भी इजलास मे 1 -- पोकममा 81 हाकिम और पेशकार महो छिपते। आसपाम पणे हो जाइएवा । फिर हम सोम भाग ममाह करेंगे। दिवाकर मनि यही दम ए मा गए। मनिकान्त दुरे सपुर बोलमा-पालना मही है। अल-सूरत रेख मनी है बम । तामही है मणिकान्त दुबे। मुखी मान है, मुद मुस्लिम माते है। रिया पकड़ाते हैं और भी माप काममा ध्पया पता है कोई दो रपय कोई तीन रुपये और कोई पांच तक का मोट समान में भी नही हिपकता । मुवरियों की मापा पेपार समझना और पेभकार की भापा मुवक्किम । मगर, बकीमों मुशी भी एक ही चिरीमार होते है। कभी-कभी ये पदाकार का भी पूना मपात है । सम्पी तारीत रममाने के लिए मुकिम से पांच रूपमै बसूली है भार पैसकार साहब का दो रपये बमात हुए कहते है श्व बाई महीने माग की तारीक गमिए । मुरक्षित मान माया ही नहीं । यह स्तूरी में अपनी जेब से ये रहा है। गनी पमकार साहब मुपमिल तो मुझ मा निपटम के बाद कभी कम नहीं देते। हम मार्गों को पा एक ही साप मला और एक ही माप जीमा है। पर साहब के पात्रे-बात मणिकान्त युबक भाप न मैसे रेपमी पादर भोर भी । पले-भर म उसने तीस-तीस पप सम्म पेय काम नहीं लिए हॉग । परामरे में बाहर का एक बड़ी मुत्तपात हे मोर बीड़ी सस्म होगही अपनी माकपास मिसिस समासन ममता है। ता यही है मणिकान्त पुर! रिमादर मलिक ने रेवती रमकी मारी मामानी-बागमो महायपी, पूतो फोपी-बारबाडूने कहा । पा।

14 . ? फुटलाइट जल रही थी। हजारो सम्भ्रान्त नागरिक दिवाकर मलिक का नृत्य देख रहे थे । लगता था, कोई पलकें गिराने को तैयार नही है। नृत्य का यह आयोजन राजभवन के पश्चिमी प्रागण में किया गया था। नगर के गिनेचुने लोग दर्शक थे-बडे-बडे वकील, डाक्टर, लेखक, पत्रकार, मन्त्री । हल्ले हुडदगे की कोई सम्भावना ही नही थी। माननीय राज्यपाल जी स्वय कई मन्त्रियों के साथ आगे बैठे हुए थे। यहा आए कुल पाच माह हुए और नगर का प्राय हर बुद्धिजीवी जान गया कि इस बार जो सज्जन गवर्नर हो कर आए हैं, स्वय एक अच्छे कवि हैं और कवियो-कलाकारो का वडा सम्मान करते हैं । कवियो- कलाकारो से बातें करते समय वह 'गवर्नर' नही रह जाते और उन्हे विदा करते समय कहा करते है, "आप यह मत सोचें कि मैं आपसे कुछ अलग हू । गवर्नरी क्या है साहब यह तो एक नौकरी है। आपने अपने क्षेत्र मे महान साधना की है। मेरी गवर्नरी तो किसी भी समय जा सकती है, पर आपकी उपलब्धियासदैव बरकरार रहेंगी। पुन दर्शन देने की कृपा करें।" राज्यपाल जी स्वय नर्तक नही, पर नृत्यकला को समझने की तमीज़ रखते हैं। पेशे से राजनीति मे रहे हैं, पर हृदय कुछ और ही है। चाहते के किसी भी कलाकार को रोटी की समस्या का सामना न करना पडे। ये रोटी की समस्याए सुलझाने लगेंगे, तो फिर साहित्य और कला के लिए समय कहा से दे पाएगे? यह सरकार और समाज का दायित्व है कि इनके सरक्षण का दायित्व अपने ऊपर ले। राजभवन का पूर्वी प्रागण भी विशाल है। अभी यहा सैकडो कारें खडी हैं । दस-वीस गार्ड इन कारो के चारो ओर घूम रहे है। उनके कन्धो से वन्दूकें लटक रही हैं। चारो ओर रोशनी ही रोशनी | मगर जो भी आता है, पश्चिमी प्रागण की ओर ही भागता है। सन्तरी किसी को नही रोकते, क्योकि यहा आने वाले सभी आमत्रित हैं। सभ्रान्त हैं, सस्कृत हैं, हैं, मुल्क ।

वापसमा 83 बुदिनीवी है । पचासौ महिमाएं मौर युवतियां भी माई है। इसमें से कई मृल्प मापन मारवादन कमा में दम है। मगर मारे दिवाकर मसिक! बाग की इस महफ़िस पातू साकी पम गया है। माझी क्या बन गया है नरा बन गया है। तेरा स्मास्य भीवर-ही- भीवर टूट रहा है तेरे दिल में एक ग्यामामुपी पपक हा है मौरत है किन सारे दर्शकों के बीच बसम्त मा सर्वोतप्ट मानन्द गोट गा है। दिवाकर ममिक का मूल्य पम रहा है। यह मौन होकर माघहे है। परों में बने गुमर ही धर्मका से गा रहे है 'छम छम मनम! भूम मनमनम | लाट साहब की पाई मोर एम्म के शिक्षामन्त्री प्रकाश बाबू बैठहए है। माट साहन की मां पती-की-मुभी रह जाती है । यह सा-मांस का बना हमा एक मदना इन्सान दिवाकर ममिक है पा साभाव भरत मुनि का बेटा? में वो मे मुतो ये परल ये दुको। पगारान्त ताका- धिनमा। कत्तवेटे घिधिम माफत्त वेटे तिन कत्तता तिनकत तातिन कत्तता। टुकमा तामेई किटतक का- घातिर पिटतक तिरमिन्ट तकतिर किटतक तुमा किटता विरकिट तातिर मिन्टनक। “हाय हाय !' माट साहब पाम 3 4 करने लगते है-कुछ मोट किया प्रकार प्रान्त की कमाविभूति है। हर :

-84 शोकसभा जिस मात्रे पर तवलची उगली उठा देता है, दिवाकर जी वही पर तिहाई मार कर मम पर आ जाते हैं । आपको मालूम है न कि तिहाइया आमतौर से वधी होती हैं ? हर मात्र से भी तिहाझ्या वध सकती हैं, पर इस कदर नाच चल रहा है और यकायक आपने उगली उठाई और वही से टुकडा तैयार । यह तो लय पर असाधारण नियन्त्रण का परिचायक है 'देखिए, देखिए, उम नृत्य के जादूगर को .।" मगर, सव वेकार। प्रकाश बाबू उर्फ सूवे के शिक्षा मन्त्री मुस्कराकर रह गए। यह आदमी शिक्षा और कला-सस्कृति मत्रालय का मन्त्री है। इससे पहले वकील था--दिन-भर 'हुजूरेआला' और 'योर ऑनर', 'योर लॉर्डशिप' का नारा लगाता रहा है। अपने पुश्तैनी गाव से शहर तक वकालत के अलावा राजनीति के गन्दे खेल खेलता रहा है। यह साहित्य और नृत्य की आत्मा को भला क्या पहचानेगा? लाट साहब के प्रशसा- सूचक कथन पर यह अपनी ओर से कोई टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता, इसलिए मुस्कराकर रह गया। गोया कहना चाहता हो--मुस्कराकर ही मुझे अपनी इज्जत बचाने दीजिए। आप बडी वेढव बातें कह रहे हैं और उनमे से एक भी मेरे पल्ले नही पड़ रही है। भगवान भला करे शिक्षा विभाग के उन अफसरो का, जो मेरे भाषण लिख देते हैं और मैं कोठरी बन्द कर उन्हें रट लिया करता हूँ। नृत्य करते हुए दिवाकर मलिक ने देख लिया था कि प्रकाश बाबू और लाट साहब में बातें भी हो रही हैं । और उन्होंने कल्पना कर ली थी कि दोनो उनके ही वारे में चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि दिवाकर मलिक एक वहुत ही अच्छे नर्तक हैं, अब यह कहने की आवश्यकता नही रही । आवश्य- कता तो इस बात की रह गई कि उनके लिए कुछ किया जाए। पन्द्रह मिनट का इण्टरवल । दर्शको को बाघे रखना है । पूर्वी वायलिन लेकर मच पर आती है। कोई आकर कह जाता है-अब आप महानुभाव थोडी देर के लिए इस बच्ची का वायलिनवादन सुनिए । सुयोग्य और साधक पिता की पुत्री पूर्वी मलिका शो-5 धोपसमा 85 तीन मिनट बीतते-बीववे पूर्वी मे राप पपनयन्ती को पनामी पर मा रिया है। कभी-कभी वो इतना धीरे हाप पसाठी है कि सपना है भावार सो पा है मौर फिर मावार नाम पाती है। ट्यूसन के परिये या सम-कामेनी में वाधवादन सीस ही घम्ना सेठों की पाठर भीम अप टिमो भीवर-ही भीवर मम्मित हो उठती है। इन सबों की फसायों को पूर्वी ने पैसे एक ही मसट्टे में उठा कर कहीं गौर फेंक दिया है। मगर, एक बात है। उनको समीत सिबमाने मासे मैट्रिक पास पर है। समर परदे के पीछे पोधा बरसते हुए रिपाकर मलिक सस्पमा मौर सपा के भने पर मूमते हुए सोष हे है साट साहब ने कहा, 'मुझे रो-एक सोगों ने बतमाया है कि दिवाकर मसिक मापिस दृष्टि से पो कप्ट कागीयन बिता रहे हैं। कुछ सोपिए कि इनके लिए हम मोन क्या कर सकते है। 'सोपा बाएमा। प्रकास बाबू इतना ही कहते है। मन्त्री का इतना कहना ही काफी है-दिवाकर ममिक का विम्बास एकाएर सारी पत्तियां गुम बाती है। एक-एक पक की मांगों पर कानी पहिया वह पाती है। ये सब अपने साप पता नहीं, क्यों एक-एक कासी पट्टी मेकर माए हुए थे। एकरम शान्ति छा पाती है। कभी-कभी संवरियों केयूटों पी धमक मुनाई पर बाती है। फिर माटक पात हो जाता है। सेट पर एक बड़ी-सी पोन मेर । मेर पर पो गुमरस्ते सने पहनों मोर एक-एक फुर्ती । एक परमार साहब मौर पूसरी पर माननीय शिक्षा मात्री। माट साहब पूछते है, "क्या कलाकारों के सहायता मिस काप की स्थापना हमने की पी उसमें उपयों का मभाव है?" मन्त्री महोदय उत्तर देते है 'मभाव नहीं है। पर कोप में मार से पाहिए। 'इसके लिए वो मापन विमाप ही कुछ करेपा न?"

शोकसभा 86 "तो आप सेक्रेटरी से फाइल क्यो नही मागते " "मागूगा।" "अब तक माग लेना चाहिए था। देखिए, वात ऐसी है कि आप लोगो ने मुझे उस कोप का अध्यक्ष बनाया ज़रूर है, मगर सारी चुटिया तो आप पकडे बैठे है। उस कमेटी के वरिष्ठ मेम्बर आप हैं। आपके विभाग के कमिश्नर हैं।" "हा।" "इतनी देर होती है। क्या मैं बदनाम न होऊगा ?" "श्रीमान जी, इसीलिए तो हम लोगो ने अनुरोध किया था कि आप अध्यक्ष बन जाइए।" सुन कर लाट साहब मन्त्री महोदय का मुह देखने लगते हैं। पीठ के पीछे थोडी दूर पर खडा अगरक्षक जैसे ऊब रहा है। "भाई, आप लोग भी गजब करते हैं।" "ऐसे गज़ब रोज़ हुआ करते हैं।" "मैं तो चाहता था कि उस कोष से हर माह कोई निश्चित रकम दिवाकर जी को मिला करे।" "यहा दिवाकर जी जैसे जाने कितने हैं।" "मैं तो बाहर का आदमी ठहरा, मुझे क्या पता।" लाट साहब बोलते - the प्रकाश बाबू का कहना है, "इसीलिए तो सव कुछ हम लोगो ने अपने हाथ में रखा है। आपको सिर्फ दस्तखत करने के लिए अध्यक्ष बना दिया गया है। हम लोग यहा के हैं और हम जानते हैं कि यहा का कौन-सा साहित्यकार, कलाकार किस खेमे का है। कौन किस पार्टी का हिमायती लाट साहब अपना सिर थाम लेते हैं, "तो क्या सास्कृतिक विकास के निमित्त स्थापित कोप के मामले मे भी आप लोग राजनीतिक दूरबीन से काम लेते हैं " "और नही तो क्या " "यानी आप सभी राजनीतिक कछुए हैं ?"

पोरसमा 87 मन्त्री महावय मा तरेर मंठा है। कहत है "पवर्नर होमे नाते भाप हमारे निर्णयो पर रस्तखत करने के लिए पाम्पमाप हमारे कामों और रवैये में दखसम्माजी नहीं कर सकते। पापका मासूम होना चाहिए किमाप एक पपपसी का तबादमा तक नहीं कर समसे हम पीफ सेरेटरी को अपने कस में धुमाकर फसीहत कर सकते हैं।" साट साहब से आरमसमर्पण करने के मूर में मा गाते हैं। कहते है में इस तरह की भाषा नहीं बोम सकता । म मपने पद की मर्यारा मानता हूं। मगर एक पर साहित्यकार मुझसे मिमे थे। उनका नाम चारपन है। उन्होंने मुझे बताया कि दिवाकर जी ने अपभी कम्पा का विवाह मपभग तय कर रखा है। उसी के सके लिए उन्होंने मावेशन पत्र दिया है। तीन माह से पमादा हो गए। मन्त्री मापरवाही से उत्तर देते है "हो गए होंगे। मे मावेदन पत्र गयरेक्टर के पास होते हैं। नीचे स सब कुछ पर पकाकर ही तो मेरे पास वाताहै।" “यह वो है। मेक्नि मह इमाम साहब का बिपड़ा का पकेमा? 'भाप परधान न होए । गमरेसटर भीफ मिनिस्टर का मादमी है। में उसे दुमागरगट्मा तो मरित्रमपम से हटा दिया मागा। इनिया का नियम है-पहने हम पर में दिया जमात है फिर मस्मिय में। यह गपरेक्टर पीफ मिनिस्टर के चुनाव मेन पा है। उसके हार में तीन हार बाट है।' “और रिवाकर मनिक हाम में ? मार साहब पूछ बैठते हैं। "मुरिफस से तीन।" लाट साहब सिर मुफका कर कुछ सोचने मयते है । फिरम “मन्त्री महोदय, हम भोप वर्ष में कुष्ठ कटौतियां करें गौर यो रकम बरे उस' । - प्रकार बाबूमाठ काट रेवे है "इसका मादेश विमापीर प्रमुगाको रेदिया गया है। कम प्रमों के पोत्तर में बाधा पेना। रोग रफ्तर में भाग सयपाएं, वरना मार पिस पाएमा और नया मा. परीदना पड़ेगा । फाइर्मो पर बमा पूर्व साब-भर में रिपारगी शोकसभा 88 जाए। कागज़ और लिफाफे की बचत के लिए पब्लिक के आवेदन-पत्रो के उत्तर न दिए जाए। जिमे गरज होगी, खुद दफ्तर का चक्कर लगाएगा। ठीक है न, सर?" लाट साहव उर्फ सर अपने ए० डी० सी० से कहते हैं, "सरदर्द की एक गोली लाओ।" और मन्त्री जी से प्रार्थना करते हैं, "इससे काम नहीं चलेगा। हम लोग उद्घाटन करना छोड दें। यह धन्धा मुझे पसन्द नहीं। इसमे सरकारी कोष का बहुत बडा मश निकल जाता है।" "आप छोड़ सकते हैं, यह धन्धा छोडना हमारे वश की बात नहीं। यह गगा बहती रहेगी और हम हाथ धोते रहेगे।" "इस काम मे समय भी तो वरवाद होता है। आप जरा हिसाव तो लगाइए कि साल-भर में प्रत्येक मन्त्री का औसत कितना समय उद्घाटन- समारोहो मे लगता है । फिर सुरक्षा व्यवस्था पर कितना खर्च आता है। मेरे खयाल से इन खर्चों को बचाकर हम लोग दिवाकर मलिक जैसे सैकडो साहित्यकारो-कलाकारो का कल्याण कर सकते हैं । समय की बचत होगी। उसमे आप फाइलो को देख-पढ़ सकते हैं। क्या खयाल है आपका ?" "सर, उद्घाटन समारोहो मे ही तो हम लोग अपनी राजनीतिक भडास निकालते हैं। यह काम सेक्रेटेरियट मे बैठे-बैठे भला कैसे हो सकता है ?" "अब आप जो कहे, मैं तो अपने कोष से दिवाकर मलिक को अवश्य कुछ दूगा " "दीजिए, मगर जरा अपने सेक्रेटेरी से पूछ लीजिएगा कि आप इस अधिकार का प्रयोग किस सीमा तक कर सकते हैं। ये नाचने-गाने वाले और कविताए करने वाले ज़माने से परेशान रहे हैं। हम तो अपनी स्थिति बदलने के लिए चुनाव लडते हैं, इनकी स्थिति बदलने के लिए नही। लेकिन अब तक वीसियो कलाकार मुझसे माला पहन चुके हैं।" इसी समय अगरक्षक अपनी बाई कलाई लाट साहब के सामने कर देता है और निजी सचिव आकर सूचना देता है कि विरोधी दल के नेता आ गए हैं। उन्हे समय दिया गया था।

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90 शोकसभा - .. सुरेश पाठक का यह तर्क दुबे जी को दुखी कर गया। कुछ झल्ला कर बोले, "छोडिए, आपको इन बातो मे पड़ने की ज़रूरत नहीं। आप मकान खाली कर दीजिए। रिश्ता किरायेदार और मकान-मालिक का है, और आप हैं कि पट्टीदार की तरह वहस कर रहे हैं।" सुरेश पाठक ने दुवे जी को चिढाने की कोशिश करते हुए कहा, "आप इवकर पानी पीते हैं, दुवे जी 1 सच बोलिए, आपके सुपुत्र अदालत मे लिखकर देंगे कि मैं उनका किरायेदार ह और किरायेदार के रूप मे डेढ कमरे का किराया नब्बे रुपये वसूलता हू । इसमे विजली का खर्च शामिल नहीं है।" दुवे जी ने छूटते ही कहा, "अदालत का नाम क्यो लेते हैं ? जव कमरा ढूढते फिर रहे थे, तब अदालत की याद नहीं आई थी ? अदालत अदालत आपने मुझसे ज्यादा कोर्ट-कचहरी नहीं देखी होगी । अदालत सच बोलने के लिए नही है । और हम पहले क्यो अदालत जाएगे? आपको जाना है, तो आप आगे-आगे चलिए। हम आपके पीछे-पीछे आएगे।" सुरेश पाठक मुस्करा पडे । बोले, "आप इतनी जल्द तेवर बदल लेंगे, दुवे जी, मैं नही जानता था। मैंने तो ऐसे ही कह दिया। मैं सेण्ट्रल गवर्नमेट की सर्विस मे हू । मेरा तवादला कभी भी हो सकता है । मुझे अदालत से क्या लेना-देना । रही बात मकान खाली करने की। प्रयल करूगा, और आप महीने-भर की बात कहते हैं, मुझे एक सप्ताह मे कही घर मिल जाए, तो मैं आठवें दिन आपको हाथ जोड दू।" "खैर, तो मैं जवरदस्ती आपको रखूगा भी नहीं।" "ठीक है । आप परेशान न हो।" दुवे जी ने वात बढानी चाही, "हम लोग ऐसे ही लोगो को रखते हैं, जो पहली तारीख को किराया देने लायक हो और ऐसी नौकरी मे हो, जिसमे तबादला होना जरूरी हो । समझे न?" "हा, समझ लिया। अच्छा ही करते हैं। किरायेदारो का उद्धार करते हैं, गरीब पिता की कन्या का उद्धार करते हैं ह, खूब । मकान मे पाव डालने से पहले पेशगी किराया और मैट्रिक पास बेटे पर दस हजार नकद दहेज ! दुवे जी, इस कलिकाल मे आप एक जाली देवता हैं।" - धोकसभा 91 सुरेश पाठक के दिम में गाने क्या बाया कि में ऐमी मातें बोलते बमे गए, हााकि ऐमा मुनाने का उनका कोई इराश पर्वामही पा। । पार सास को नौकरी में ममिकान्त पूरा पास टाइप का इम्मान बन गया मा। पढ़ाई-मिबाई में पाकमा पा उमका हरप ही आमता होगा, मगर मामै के मनुमार उमने पत्पर पर दूब जमा दी थी। सोभाकान्त मे में होण समामवेदी पेमेपर मबाह का धन्या पर अपना सिमा पा मगर इस पेचे को भी क्या कारवाए। मरफ में साइन नगी पी। किमी रोतो बस-पन्द्रह सपे तक माह मान मोर कभी पार-सोच दिनों तक इमसी भीम मार पीपल कम के नीचे रिन-भर पसर जगात ह गावे मौर कोई रिम मामा भूपफनी साने में भी साझीदार बनने को नहीं कहता पा। पमाना भी क्या-क्या रेप परमता है। कोई बात पा सर किमी झूठे की तमाघ करनी पड़ती पी मब ऐसा वस्त पापा मम पोरना पाता था। माठी गवाही देने के लिए एक-से-एक मपियारीतास पदासतरे बहाते पी महिमा मकाने मम थे। लेकिन चाहे पो हो मगिकाम्त ने तीसरी बार में पर रिवीजन मे मैट्रिर पास कर ही मिया । मट्रिक क्या पास कर मिया भरी दुपहरी में मूरज क मापे पर खामी पाव उतर गया। पारबार भी मणिकान्त परिवार के विषय में श्यादा नही जानते पे।पोमाकान्त पुस म कहीं साधारण परिषय हो मया पा मोर तब से राह में माते मासे भेंट-मुमापात हो पापा करती थी।पार बार की मावत मी नहीं पी मिकिसी की पारिवारिक बातों को छेड़-छड़कर पूछ । साधारण पपक्षप में मालूम हुआ पा कि वे मी का पुत्र मभिकान्त मब सबगग का पेशकार हो गया है मार निवाहरे ममावा कुछ उमरी मामानी भी हो पाती है । माठसमे बतन मे कट तो बाते है मपरमर का सरकारी मार्टर मिस मया है। नग यह नहीं मासुम पा कि धोमानाम्त दुरे पहते भवामत में पसर गवाहमा काम कर मागीविका चमाते । उन्हें यह भी नहीं मासूम पा कि सरकार से मिले स्वार्टर के बारे हिस्से में उसने किरायदार भी रस छोड़ा है। गहें यह भी नहीं मासूम पाकिमणिकान्य कीमाई इमारह पि धोभाकान्त भर बिना मारसेन्स सिए एपये सूर 92 शोकसभा पर लगाने का चुप्पा कारोबार करते है। यहा लगभग सौ सरकारी कर्मचारियो के लिए क्वार्टर थे और दो- तीन को छोडकर सवो ने अपने-अपने क्वार्टर का आधा हिस्सा किराये पर उठा रखा था। इतना ही नहीं, इनमे से कई बीमा कम्पनी के एजेण्ट थे, पर सारा धन्धा अपनी बीवी के नाम से करते थे। नियमत सबो के लिए ऐसा करना वर्जित था, पर सच्चाई यह थी कि ऐसा करने में शायद ही कोई सकोच करता था। और, सरकार ऐसी कि उसकी नज़र मे सिर्फ सरकारी कर्मचारी ही देश के जिम्मेवार नागरिक है, कानूनन नागरिक हैं, और सव घुसपैठिए हैं। माज गवर्नर साहव के यहा से दो सौ रुपये का वैक ड्रापट दिवाकर मलिक के नाम रजिस्टर्ड लिफाफे मे आया था। उन्होने लिफाफे को खोला, तो ड्राफ्ट नजर आया। साथ में एक छोटा-सा पत्र था, जो अग्रेजी मे था। दिवाकर मलिक समझ न सके । जहा भी सगीत-सभाओ मे जाते, विदाई के रूप मे नकद पैसे मिलते थे। सो लिफाफा लिए-दिए चारुचन्द्र के पास प्रेस में पहुंचे । सौभाग्य से प्रेस का मालिक आज ही दो दिनो के लिए शहर से बाहर चला गया था । यह शहर तो राजधानी का शहर था। किसी दूसरे डिस्ट्रिक्ट टाउन में छपाई-दर के टेण्डर खुलने वाले थे। उस आफिस के वडे वावू ने एक रोज़ पहले ही बुलाया था और कहा था, "जो भी वने, लेते आएगा । साहव को यह अधिकार है कि विना कोई कारण बतलाए निम्नतम दर वाले टेण्डर को भी स्वीकार न करें। अजी, आपसे क्या कहना है । मुह खाता है, तो आखें शरमाती हैं. 'तो वस समझ जाइए।" हज़ार रुपये अपने ब्रीफकेस मे लेकर प्रेस मालिक चला गया था और जाते समय मालिक-मैनेजर की सारी ज़िम्मेदारी चारुचन्द्र पर लाद गया था । प्रेस के दैनिक खर्च के लिए पाच रुपये का एक नोट उनके पास छोडते हुए कहा था, "चौहट्टे पर जो चौधरी जी की दवा की दुकान है, वहा चले जाइएगा। कैशमीमो की छपाई के पैसे वाकी है, ले लीजिएगा। उससे काम चलाइएगा। यो तो मैं दो रोज़ के लिए जा रहा हू, मगर कुछ देर भी लग सकती है। वसन्तलाल का आदमी आएगा। दस रसीद-दुक घोषसभा 93 पार है। साठ रपमे उसस बसून सीजिएया। भोर हो स तो कम हो पास हराम है। पिन में मान पर एरोस बागा। एक-एक पैसा सहेरर लिएगा।" मोर उधर मधीनस्म में काम कर पापारियों से कहवा मया 'मैं तोपरमाते ही एम्मास मा। स दस-बीस की पसरत हो तो वाद वा ही। ममे रमको सब कुछ बतमा रिमा है। उनसे तुम मोम कहना । प्रबन्ध करने।" पाचन मे मारी निर्माता मोर निन्दादिमी से दिबाकर ममिय को अपने पास मिठाया। धमक्षेम पूछने हय पारिवारममिक बार मिफाफाम बागे रख दिया जिस पर पापा बोमपिया पर्ममष्ट सर्विस। पारुषम ने देखते ही पूछा, "यह क्या है मसिकपी?" "सोसार दैथिए म । मेरी समझ में कुछ नहीं पाया तभी तो सोचा किमापक पातपन" पारचन्द्र ने लिफाफे से कार निकाला बीरदो-तीन बार उमट-पमट कर देखते हुए कहा, "मौलिए साहब मह मीठा कराए । मार साहब माप परख हो पए है। दो सौ रुपये मापके लिए भेरे है। इसी.सी. पार कहा जाता है।" डी.सी. ग्रान्ट क्या होगा?" पारचम मे सममात हुए रहा 'हिम्पी में इसे स्ववियेक मनुरान' करते हैं । मबर्मर को यह मधिकार है कि शिव कुछ सहायता देना उषित सममें, इस पार से रें। इसके लिए इन्हें भाव में पास हगार पर मिसते है।" 'सास भर में पचास हजार?" "हो" वाचन ने पहा "माएका नृत्य रेसका युग हो पर हाले। गोकमामी है।' रिवाकर मसिक सर भर लिए सोचने ममै--साट माहब को पर सना पापर है, तो दो सौ सय की पमह पांच सौ सी रे मरते या करते ! पोर भाव में बड़ी शक्ति यह होती है कि मोममुसको भी मोमयुक्त बना देता है। दिवाकर भतिकदी वो पति ही ऐमी मी 94 शोकसभा जिनके पास अपार धनराशि होती है, वे भी लोभ की चचल चितवन की चोट नहीं सह पाते हैं। चारुचन्द्र ने समझाते हुए कहा, "यह वैक ड्राफ्ट मेक्रेटेरियेट ब्राच का है। मेरे एक मित्र वही विधान सभा पुस्तकालय में सहायक लाइनेरियन हैं। मैं चिट्ठी दिए देता है । उनसे मिल लीजिएगा । वे ड्राफ्ट भुनवा देंगे।" "अच्छा ।" "और क्या हालचाल हैं ?" "वस सव वसीवाले की कृपा है।" दिवाकर मलिक ने कहा। वह श्रीकृष्ण को 'वमीवाला' ही कहा करते थे। चारुचन्द्र ने पूछा, “मणिकान्त को तो आप देख ही आए और उनके पिता मे भी मिल लिए। अव वतलाइए कि वात कहा तक आगे बढी ?" दिवाकर मलिक बोले, "हा, वह दस हजार नकद मागते हैं और कन्या तथा दामाद को अलग से मैं जो कुछ दे सकू, दे दू । कन्या और दामाद को देने की बात तो अलग है। दस हजार रुपये तो मेरे लिए दस लाख के बरावर हैं । शोभा वाबू ने सोचकर वतलाने के लिए वीस-पच्चीस रोज़ 'का समय दिया है। मेरी समझ मे एक बात आ रही है। आप वतलाइए कि कमा रहेगा?" "कौन-सी बात?" भीतर मशीन चल रही थी। उसकी घरघराहट गूज रही थी। विजली आफिम का काम हो रहा था। दिवाकर मलिक ने यो ही अगल-बगल खुफिया निगाह डाली। वह अपनी वात सिर्फ चारुचन्द्र को ही सुनाना चाहते थे। आसपास कोई और नही था । आश्वस्त होकर कहने लगे, "वन्घुवर, मैंने सोचा है कि मकान बेच दू या गिरवी रख दू। कन्या का विवाह हो जाए तो गगा नहाऊ । एक साहब पुराने परिचित हैं । मैंने इशारे से उनको कहा भी है।" चारुचन्द्र बडे सहज भाव से वोले, "और इशारे से वह तैयार भी हो + गए होंगे।" "आपका मतलब ?" "मतलब यह कि ऐसे लोग गरजमन्दो की तलाश में रहते हैं।"

पोपसमा 93 वर परवमम्म पो रही। एक बाते साहब मान-पहचान हो पर है। नये माए है। मुहस्से में ही किराये का मम मिया है। उन्होंने कहा किक मान मिरवी मावा है परसु मार ही दो ऐसे मादमियों पीरमानत राहिए, रिमकी हैसियत इतकी सम से पपारानी महो ऐमा ही होता है।" "उन्हान महा किमपर एक ही मामी काफी तपम हो तो भी काम चम क्षमता है।" दिवाकर भी हम मोम पैसों बागार में साम-मारी रे बयार है। समाम यह है कि ऐसा मावमी कोल होया वा फिर मागे बड़ा गाए । पुरानी दो मोप यहाँ तक कह देते हैं कि साहब मापागा पसीना बहेपा बहो में अपना सून महापा ममर मोटा माने पर भूम या भामू बहाने तको बाम नहीं बरते। पारषट भी अपन अनुभवी माघार पर एक ही सांस में कह पए। दिवाकर मसिकसे तपाक से बोसे और किसी पर वो सिमान नहीं पाता मेरा सेकिन एक मारमी है पो मेरे लिए कार नहीं कर सकता। इसियत भी कम नहीं है।" "कौन है यह सम्पन। "प्रमाधबार। " "कौन प्रवरबाडू एजुकेशन मिनिस्टर मोहै ?" बस-स । माप यो एकदम मातभरका निकले।' "मे से पमानत तो बड़ी मण्डी बात है। "मही रन पर एक नही होता मुझे। पारपन्न योमे समरे साहब उनके ही यहा मापका मारेगम-पर पाहमा है।" 'हो यह तो पड़ा हुमा है। मह सरकारी काम है। उममें साम नियम-कायदे पमते है | यो काम सीधे उनके हाप का उममें यह कोई हीमा-हमासा नही करेंगे। हमारे रिश्ते को पहरे । उनी रो नामित को मने थपनी माफी मामार भाषनागिरफना भिमनापा।

96 शोकसभा दे सकते थे, मगर लडकियो मे कोई खास गुण है, यह कहने की हिम्मत नही थी। मैंने साल-भर मेहनत की। दोनो लडकिया अच्छा नाचने लगी। वर की कृपा से दोनो की अच्छी शादिया हुई।" "उन्होंने आपको कुछ दिया भी तो होगा?" दिवाकर मलिक बोले, "भगवान गवाह है, चारु वावू । न मैंने कुछ मागा और न उन्होंने कुछ दिया। तव भी एक बात है। उनसे मिलने-जुलने तो बडे लोग ही आया करते हैं । पैसे वाले और खानदानी आदमी ठहरे। सबो से मेरा परिचय कराते और कहते थे कि मलिक जी मेरे दोस्त है, इनकी दोस्ती पर मुझे नाज़ है।" "अव नही कहते होंगे।" चारुचन्द्र ने वेलौस हो कर कहा। दिवाकर मलिक इस बार शका मे पड़ गए। कुछ सोचते हुए बोले, "जब से मन्त्री हुए है, तब से मौका ही नही मिला कि उनसे मिलकर दिल की बातें कहू । खैर, हैं तो वही प्रकाश वाबू । इतना तो नहीं बदल गए होंगे । और आदमी चाहे जितना बड़ा हो जाए, अपने हित-मित्रो को नही भूलता।" 7 चारुचन्द्र इस पर कुछ कहना चाहते थे, मगर कुछ कह न सके। इसी वीच उन्होंने मशीन पर कागज़ सभाल रहे आदमी को बुलाकर कहा, "दो गिलास चाय ले आओ। कहना, ज़रा ताजा लिकर बनाएगा।" दिवाकर मलिक ने कृतज्ञता से भर कर कहा, "चारु वावू, आप मेरी बडी खातिर करते हैं । चाय मेरे लिए न मगवाइए, मैं चाय नही पीता। पान खिलाकर आशीर्वाद दीजिए कि यह यज्ञ पार लग जाए।" चारुचन्द्र ने कहा, "दहेज-निरोध कानून एकदम वेकार सावित हो रहा है । लेनेवाले ले ही रहे हैं और देनेवाले दे ही रहे हैं। खैर, करना क्या है ? मिनिस्टर साहव आपका काम कर दें तो ।" "हुआ ही समझिए, कहने-भर की देर है।" दिवाकर मलिक ने प्रकाश बाबू के साथ अपने पूर्वसम्बन्धो को याद करते हुए कहा। चारुचन्द्र वोले, "ईश्वर उनका भला करे ।"

16 - -- स्टेट का सारा सेट परत एका है। रागकों की पसरें पसीने से पीमी हो रही है। पर हम सबने देने के लिए ये मपनी मांगों पर पड़ी कामी पट्टी उतारने को तैयार महीं है। ममममीर का मास भींचते है मौर पट्टी के भीतर धीरे-धीरे समाप्त का छोर से पाकर पसों का पसीना पोंछ से हे हैं। नमामे मानेबाने पाप को देखने से सास तौर पर क्यों रहे हैं। सत्यपा विपपर सम्भवत फन मोसकर स्पिति को भयानक बना देवा।पहपकों के पौषबड़ी देरी से उतर पहेमा। पतामही तर विसुर कमाइन प्यारों का क्या हाल हो। सेट पदम गुफा है । परदे पर एक मामीधाम मोठी का मित्र है। उप्स पर कोई भाग महरा पा है। मीचे बाहर के फल में दो पो-निधे युवक मौर एकबनपड़। बाई मोर के परामरे में राइफत भिए सन्तरीमा है। पश्चिम की भोर का भाग सूना दिखमाई पड़ता है। पहो दो पड़े-निवे सुबक यहाँ एकपड़ी-सी मेर है। मेर पर एक पुमरस्ता है-प्मास्टिक के रंग- बिरी फूतों से सग हुमा। इसी समय गरते परवे मागे बढ़ते हुए दिवाकर मलिक यहाँ मा पाते है। परन्तु, यहाँ तक बाते ही उनका सारा भय पाने कहां बता पाता है। दोनो मवयुगक उन पर दृष्टि गमते मोर धनिक सतर्क हो जाते हैं। उस मोर सड़ा चपरासी गानें कहां से एक समोसा निसास कराने ममता है। मेर पर बसे बासमान से रो-तीन समाचारपत्रमा गिरवारोनो में से एक मवयुवक उन्हें किसी पाडूपर की वह पाम मेमा पाहता है। मगर, फर्ग पर पिसर गाते है। पपपमी मपरता है मौर उरहे एक हाप से उठा उठाकर मेज पर रखता है। दूसपपुवा फोरम उठता है मौरबयम स एक गिगाम रजिस्टर पर माता है। उस पहने देखता है पिर बोयो पम्ने पसटमे सपता है। हर पम्मे पर समाचारपत्रो को 98 शोकसभा होशियारी से चिपकायी हुई हैं। कही-कही मन्त्री महोदय के चित्र भी नज़र आ जाते हैं, जो पहले ममाचारपत्रो मे प्रकाशित हो चुके हैं । दूसरा युवक पास खडे चपरासी से कहता है, "उस कमरे की पूर्व वाली आलमारी मे गोद की शीशी और ब्लेड है। उठा लाओ।" पहला युवक दिवाकर मलिक की ओर उपेक्षा से देखता है और पूछता है, "आप कहा से आए हैं ?" "यही ने।" "यही मे " "किम सिलसिले मे आए है ?" उधर दूसरा युवक इतमीनान से कुर्सी पर बैठ जाता है और हाथ मे ब्लेड थामे समाचारपयो को पढने लगता है। वह तेजी से पृष्ठो को पलटता चला जाता है। दो-एक जगह लाल पेन्सिल से टिक् मार्क लगा देता है। पहला युवक दिवाकर मलिक की ओर से मुह फेर लेता है, और अपने सहकर्मी युवक से पूछता है, "क्यो जी, है कुछ उत्तर मिलता है, "है तो ज़रूर । मगर यह 'उदयास्त' वाला साफ दगा ? " ६ गया।" . "दगा दे गया, क्या हुआ "वच्चो मे मिठाइया वाटते हुए मन्त्री जी का चित्र नहीं प्रकाशित किया। मैंने कह भी दिया था। मन्त्री जी ने तव मीटिंग मे यह भावना व्यक्त की थी कि वह चाहते हैं कि सिर्फ हमारे राज्य के बच्चे क्या, पूरे मुल्क के बच्चे रोज़ मिठाइयो से ही नाश्ता करें और पढ-लिख कर देश का नाम ऊचा करें। यह काम कैसे हो, इसके लिए एक समिति का गठन शीघ्र ही किया जाने वाला है।" तभी चपरासी अचानक भागता हुआ बाहर निकलने लगता है। दूसरा युवक पूछता है, "क्यो जी, क्या हुआ चपरासी वडी जल्दी मे कहता है, "वे दोनो लौंडे फिर कोयले और रद्दी कागज़ बटोरने बोरिया लिए आ गए। कल ही मैंने इनकी मरम्मत की थी सा"आ' 'आ "ले।" ?" .

पासमा 99 . पहस गाफ मामाम बम है मार दूसरे मा सुमन। रंग्न तीम-पत्तीम सास से कम का महागामार सुमन पावर पस एम्बीम मात माहो। भर रजन फिर दिवार मनिरपो मोर मुसारि हाफर पूछा है 'यही मे-पैसे माए? गाउँ काम पर पो रेशमी दुपट्टे को संभातठ हए सिर मनिस करा "प्रकाश बाबू से मिसने मापा हूं। रंजन रियार मनिकामीचेस उपर देसने ममता है गोगा उनसे काई भारी मूस हा यई हो। रंजन की बात उनस पायर पूछ रही है- मम मादमी तुम्हें 'माननीय मत्री महोदय कहना पाहिए पा। फिर ए प्रापमा परावन पूछता है 'प्रकाश बाबू प्राय मा पोन "अपन मूबे + प्रिक्षा मन्त्री। “ता यही म कहना चाहिए। प्रकाश बापू तो इस शहर में म रनमा दर्षन होमे । इनम मन्त्री तो एक ही । "मी हो जी हो । मुमन एकाएक पूछ बैठता है "मापको बुमाया पापा दिवाकर ममिक पहल है 'मी ना। बुसाया नही पपा पा। रंजन तनिक राब में पूछता है तो माप मे पते माए क्या नाम है मापका? क्या परते है? दिवाकर ममिकको समा सकही मार फस पए। फिर भी उम्हान साहस बटोर पर कहा है "मात्री गी मेरे पुराने मित्र है। मा नाम दिवापर मसिक है। मैं कवक गसर है।" सुमम कुछ धीरता से पर स्पेशा से ही कहने मगा है भाहए मिल है। ठीक कहा मापने-पुराने मित्र "मैं समझ नहीं । "इसमें कुछ स्पारा नहीं सममना है महाराज मापके यहां हम सुर कार भेगते।' 'मापसेसर है ?' रंजन पूछता है न सिपEF रहे हो। फिर कहता है "हो ना पजधानी है। यहाँ सैकड़ों सोप राहील 1 । । काजल डाले, वाल बढाए नज़र आते हैं।" दिवाकर मलिक के कानो मे रजन के ये शब्द उतर नही पा रहे हैं। वह जैसे घूरते हुए उसे देखते हैं और कहते हैं, "खैर, इससे आपका तो कोई नुकसान नही होता "प्रकाश वाबू हैं तो?" "हा, हैं, मगर मिल नहीं पाएगे।" सुमन वही लापरवाही से कहता है और समाचारपत्र में प्रकाशित एक खास खवर वाले अश को ब्लेड से काटने लगता है "क्यो, क्या बात है? उन्हें मेरा नाम वतला दिया जाए।" "नाप बतलाने कौन जाए। वह फाइलें देख रहे हैं । नाराज़ होंगे।" "कुछ भी देख रहे हो । मेरा नाम सुनते ही मुझे बुला लेंगे। नाराज नहीं होंगे।" दिवाकर मलिक को इस बार कुछ जोर देकर कहना पडता है। रजन तनिक रोव मे आ जाता है और कहता है, "क्यो, आप ऐसा कैसे कह रहे हैं ? क्या आप विधायको से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं ? अभी उन्होंने दो विधायको से मिलना स्वीकार नही किया।" "विधायक, विधायक कौन होते हैं, भैया?" दिवाकर मलिक पूछते हैं। "एम० एल० ए० । ये लोग कानून बनाते हैं, राज्य का इतिहास- बदल देते हैं।" सुमन जवाब देता है। "अच्छा।" दिवाकर मलिक कास्वाभिमान शायद जाग पडता है। वोल पड़ते हैं, "मैंने महिला कालेज मे डास-टीचर के लिए आवेदन-पत्र दिया था। उस पद के लिए मैट्रिक पास होना ज़रूरी था ।" रजन हलका ठहाका लगता है, "ओह हो, तो डासर महोदय, आप मैट्रिक पास भी नहीं हैं ? वाह, एक तो मिया तुतले, दूसरे मुह मे रोटी !" "हा, मैं मैट्रिक पास नही हू, मगर सुनिए जनाव, ये जो एम० एल० ए० होते हैं और राज्य का इतिहास-भूगोल बदलने का काम करते हैं, कौन- कौन-सी योग्यताए रखते हैं ? कह दिया जाए कि नटवरी का एक मुखडा लगाओ, तो पमीना छूटने लगे।" "यह जनतन्त्र है। इसमे जो अपने लिए जितना वोट बटोर सके, वह उतना ही योग्य होता है। मगर श्रीमान जी, आप वहस न कीजिए। आपसे शो-6 .

पोप्समा
101
मागापुका है मत्री महादय प्रासे देसने म व्यस्त है। गाइए । हो
मिलना ही हो तो किमी एम. एस. ए. को परहिए' मौर हो यह
नटपरीमुपा बाप ममाते रहिए, बस्ति माव-मासाद भमाठ रहिए,
मेवाओं को इन फिनन की बात स कोई मतमय नहीं। सुमन कहता है।
मेर उसने मेर पर ही अपनी दायी मोर रख दिया है।
दिवाकर मसिक पायद पगड़ाहट में बोल पड़ता है यदि यही हाम
रहा हो हम हातास करम।"
"जाइए, जाइए, रन्नों सी बार दीजिएगा । माप जैसे लोग
पगाव मे कन्याकुमारी तक सब बमा हातास कर दें तो भी कोई पूछने
नहीं गाएपा किमापकी मा क्या है। कहकर रंगन बेस भय मिताता
है "मुनिए, बब माप पाते हैं या हमें कुछ मौर करना पड़ेमा ?
विवाकर ममिक का स्वर परपराने ममता है। कहते है “नहीं
नहीं। मैं बसा गाता है। कुछ और करन की वागायता नही।
रंजन मौर मुमन चनकी बोर हिकारत-भरी नसरों से देखने तमत है
मोर यह भयातुर बेहरा पर्यों की बोर पुमाकर मूर्तियत् पो हो
पते है।
1.34cm
3120

17 राज्य मे दलबदल पार्टी की सरकार शासन कर रही थी और सहाय जी इसी शासक पार्टी के विधायक थे। सहाय जी शहर के पश्चिमी इलाके का प्रतिनिधित्व करते थे और जब भी बाढ अथवा सूखा पडता, कम्बल और अनाज वटवाने का भार अपने दुर्वल कन्धो पर ले लेते थे। दिवाकर मलिक का घर इनके ही चुनाव क्षेत्र मे पडता था। सयोग अथवा प्रेरणा से दिवाकर मलिक इनके पास पहुच गए। इन्होंने एसेम्बली भवन मे ही माननीय शिक्षा मन्त्री से इनकी भेंट करा दी । प्रकाश बाबू मिल कर मुस्करा दिए, तो दिवाकर मलिक को लगा, जमे सोकर सवेरे उठे हैं, तो देखते क्या हैं कि तकिये के नीचे कोई पाच-सात हजार के नोट पडे हुए हैं। खुशी से गद्गद हो उठे। उनकी ओर सकेत करते हुए प्रकाश वाबू ने सहाय जी से कहा, "मै इनको जानता ह । कथक नृत्य के क्षेत्र मे इनकी उपलब्धिया सराहने योग्य हैं।" फिर दिवाकर मलिक से पूछा, "कहिए, आप क्या चाहते हैं ?" लच आवर हो चुका था। एसेम्बली भवन के अन्दर और बाहर सामान्य से अधिक चहल-पहल दीख रही थी। कोई घिघियाने पहुंचा था, कोई रोने, कोई हसने मुस्कराने और कोई विचौलिया वनकर शासक और शासित-दोनो पक्षो का कल्याण कराने आया था। इनमे पिछली सरकार के कई भूतपूर्व मन्त्री, राज्य मन्त्री और उपमन्त्री थे, जो अव यहा विधायक के रूप में उपस्थित थे और इनमे से सबो के कन्धे से एक-एक झोला लटक रहा था, जिनमे उन लोगो के नाम, पते और कीचड मे फसी उनकी उन गाडियो का विवरण था, जिनके लिए वर्तमान मन्त्रियो से पैरवी करनी थी। शासक दल मे नही रहकर भी वह जनकल्याण की भावना से दुरी तरह पीडित थे। "कहिए, आप क्या चाहते हैं ?" प्रकाश वाबू के इस प्रश्न मे कुछ रूखापन नजर आया। मगर, दिवाकर मलिक ने सोचा कार्यव्यस्त रहने के

सौम्समा
103
कारण ही यह स्थापन है परना प्रकाश बाबू की पाणी में पाहर से कम
मिनस तो किसी हासत में हो ही नहीं सकती पी। मा उत्तरस्सस्प बोन
"बापसे कुछ निजी बातें करनी पी। यह महो सम्भव नहीं गाम पड़ता।
'ठीक है, माप रात माठ बरे आ पाइए।
'यहाँ मोप बापमे मिसने नहीं है। बड़ी अमावा से बातें करते हैं।'
दिवाकर मलिक ने कहा।
'कोई ममाता से पाते नहीं करेमा । मैं कहना।
"हो मार रात माठ बजेपर माउंगा। नमस्ते। दिवाकर मलिक
कहा। सिक्षा मन्त्री पूष की वोड़ मुरगए। कुछ मौर विधायक प्राइवेट
बावें करने को भ्याकुम मगर मा ऐ थे।

18 - । आज रात किसी ने दिवाकर मलिक को नही रोका था। वह मीधे प्रकाश वावू से मिले । सारी वातें कमरे मे हो रही थी और वहा कोई अन्य व्यक्ति नही था। दिवाकर मलिक ने अपनी समस्याओ से प्रकाश बाबू को अवगत करा दिया। प्रकाश बाबू कुछ सोचते रहे। दिवाकर मलिक कभी उनके चेहरे के भावो को पढते, कभी मेज़ के एक कोने मे रखे कीमती टेवललम्प को देखते। इतने मे प्रकाश बाबू ने घण्टी दी, तो एक नौकर आकर हाजिर हो गया। वह काफी नाटा था। एक प्रकार से उसे बौना ही कहा जा सकता था। प्रकाश बाबू ने उससे क I, "नाश्ता और कॉफी।" वौने ने दाहिने हाथ की पहले दो उगलिया उठायी और प्रश्नसूचक दृष्टि से मन्त्री महोदय को देखा । मन्त्री महोदय ने कहा, “नही, एक " "नाश्ता मेरे लिए ।" दिवाकर मलिक जैसे निहाल हो उठे। जिससे मिलना मुश्किल था, उसी के साथ नाश्ता | पूछा, "और तो सब ठीक है न?" "सब ठीक है, दिवाकर जी।" नौकर चीनी मिट्टी की प्लेट मे चार मिठाइया, एक सन्तरा और थोडा- थोडा सेव-दालमोठ रख कर चला गया। प्रकाश बाबू ने बडी कहा, "नाश्ता कीजिए । वह पानी और कॉफी ला रहा होगा।" "और आप ?" "मैं ? मेरा न पूछिए। काम करते-करते सेहत मिट्टी मे मिल गई। मन्त्री बन कर मैं अच्छा-खासा वेवकूफ बन गया। वकालत के साथ-साथ सेहत भी चली गई । अन्न तो कतई हजम नहीं होता। सिर्फ दूध और फल लेकर दिन काटता हूँ। अगली बार से तो मैं मन्त्रिपद को हर से ही नमस्कार करूगा।" दिवाकर मलिक के सामने ऐसा नाश्ता हाल मे कब आया था, वह मुहब्बत से .

पोकसमा 105 मस्तिष्क पर पोर एफर भी नहीं स्मरण कर पा रहे। उनकी जीभ चटपटाने मगी। यह क्षण भर को भूम गए कि पर पर नाम लिए क्या बन हा होगा। साम को दमयन्ती मै कहा पा, 'बाटा है समी नहीं है। मगर चिन्ता म करो। वाघ पाव मूंग की दाम पड़ी है। उसी को पीसकर रसा सगा दूंमी। एक रमगुस्म पो उनोंने एक ही झपट्ट में मुंह के भीतर गाम सिया बार फिर सेबन्दासमोठ मान पटहार-पटमार कर हाने मगे। इस स्वापरायमता के लिए मह बापमी दोपी मही पा बल्कि व्यवस्मा दोपी पी इस रहस्य को महरे पानी पैठ कर ही सममा पा सकता है। इसी बीच रेनन कुछ पूछने के लिए कमरे के द्वार पर मा बहुमा । प्राप्त बाडू मे किपित् गम्भीरता से कहा 'जाइए, ये तो मेरे मित्र है। रंगनबासर मोष कर पास मा गया। दिवाकर मसिक ने उसकी भोर बड़े गर्व से देता गोया उसे यह बतलाना चाहते हों कि देस मो अपमेराम काई मामूमी हस्ती महीं है। उस दिन मेरे पाप बढ़-चढ़ कर बातें परसे तुमने कुछ अच्छा नहीं किया । तुम तो मत्री जी के पास भाकर पहमे- सहम तरे हो भौर में पुर्सी पर बैठा हुमा मिठाइयों पर हाप माफ कर । रंजन मेम माने बड़ी धीमी याबार में मौर इशारे मे क्या-क्या कहा प्रकाश पाडू बोमे 'टीक है। मैं कल तक मॉरि करणे फाइम मोटा दूगा। कह पीगिए, चिन्ता न करें। रंगन बसा यया तो गला साफ करक्ष हुए प्रकाध बाबू ने कहा "फिर बाबू माप सिर से पैर तकसारठहरे। इस दुनिया म कितना एस प्रपंच है माप क्पा मार्ने ? के हाप मकान गिरवी रण कर मकान में हाथ धोने के सिवा कुछ मौर महीं मिमेगा। परा पूछिए किसी मति बैंक में स्पप जमा करने पर किस दर से सूर मिसता है और समर मीगिए, तोक किस दर से सूब मसूमता है। समापारपत्रा म बबार विज्ञापन छपवाते है और सामो को उमड़ परिये बातात मिस रकम पर बहुत अच्छा मूर देत है। मबर कर देन पर प म माया पठानों म मी माश बसूसते है । मैं ऐसे कई मासोकाना प्रिय .. वैक के हाथ अपने मकान गिरवी रखे, मगर सूद ही जव नहीं भर सके, तो असल यानी मूल क्या लौटाते ? फल यह हुआ कि नालिश करके बैंक ने उनके मकान हथिया लिए और वे वेचारे वेघर हो गए। इससे तो वेहतर होगा कि आप किसी अपने आदमी के हाथ गिरवी रखें। अपना आदमी बुरे-से-बुरा होगा, तव भी मुहत्वत करेगा। मेरे पास रुपये होते, तो यह नौवत ही न आती। आपके काम आ जाता, गगा नहाता । आप जैसे लोगो की सेवा करना और भगवान के साक्षात् दर्शन करना बरावर है।" मन्त्री जी का यह छोटा-सा भाषण सुनकर दिवाकर मलिक भावुकता से भर आए। वोले, "मेरे परिचितो मे कोई आदमी नही है, जो मेरा यह काम कर दे । आपको कोई सूझ रहा हो, तो वतलाइए।" भूतपूर्व वकील और वर्तमान शिक्षा मन्त्री प्रकाश बाबू जैसे उदास हो आए । मेज़ पर वार-बार दाहिने हाथ के अगूठे की वगल वाली उगली से न जाने कैसी-कैसी शक्लें बनाते रहे, फिर जमे बुद्धत्व की प्राप्ति हो गई हो, मन्द स्वर मे वोले, "ज़माना वडा नाजुक है। आजकल किसी को अपना आदमी कहते हुए भी दिल धडकता है। लोग मलाई वनकर पेट मे घुसते हैं और तलवार बन कर बाहर निकलते हैं। मेरा हाल तो यह है कि हर महीने की इक्कीम तारीख से कर्ज़ लेना शुरू हो जाता है मगर मेरा भतीजा कामदेव, जो इन दिनो जमशेदपुर मे ठेकेदारी करता है, उसके पास जरूर कुछ पैसे हैं। उसे कह कर देखता हू, राजी हो जाए तो बडी अच्छी बात है । आपका दिल क्या कहता है ? उससे चर्चा छेड ?" "मेरा दिल तो वही कहता है, जो आपका दिल कहता है।" प्रकाश वावू ने कहा, "मगर वह है वडा काइया । वह दखली इजारा चाहेगा।" "दखली इजारा क्या होता है ?" दिवाकर मलिक ने पूछा। प्रकाश वाबू ने कचहरिया जुवान मे समझाया, "दखली इजारे का मतलब यह हुआ कि रुपये लेकर मकान आप रुपये देने वाले को सुपुर्द कर दें। जव रुपये वापस करें, तो अपना मकान वापस ले लें। दखली इजारे मे यही हाल खेत के साथ भी होता है । इसमे सबसे बडा लाभ यह होता है कि सूद नही देना पडता।" - .

धोकसमा 107 विाकर मसिक पुछ परेशान हो पाए। योसे, 'प्रकास बार, मेरे पास कोई दूसरा पर नहीं है।" प्रकाध बारूम से बास्तविकता रे मुखड़े से परदा हटात हुए कहा, 'रियाकरवाय, पा राजधानी का पहर है। यहाँ तेहत्तर प्रतिधत साग किरामे के मकानों में पते है रिममें यकीस, गफ्टर, प्रोफेसर, नियनसमैन मौर बडे-बड़े अफसर पामिम है। माप परेशान न होइए। मैं मापको बनवा पसों में से एक फ्लैट दिसरा एंगा। किराया भी क्याप नहीं है। सिर्फ पचहत्तर स्पये । कामदेब ठीक समय पर अमरपुर से मा गमा पा। रजिस्ट्री माफिस में रसमी इनारे की रजिस्ट्री हो गई । प्रकाराबाबू मे दिबाकर ममिक को रस हसार की जगह वाह हवार रूपय दिममाए थे। मौर उपर बपन मतीय कामरेव स कहा था "चुपचाप दे दो। मकान सममो मेन रोड पर ही है। रिग टमटम मोटरें-सब परमाव से मुखरती है। मकान मिस मौके पर है वहाँ ऐसा मकान भरीदना चाहो तो एकमुस्त पचास हजार रूपये निकासने परमे। किराये पर भी समा होमे तो दो सौ रुपये मासिक मिसये। भर दिवाकर मसिक को शीघ्र ही घर से बेपर होना पा।

है 19 सुरेश पाठक को अब तक मकान नहीं मिल पा रहा था, हालाकि वह मकान की तलाश में लगे हुए थे । आफिम मे दोस्तो मे भी कह रखा था। दोस्तो ने यकीन दिलाया था कि वे कोई-न-कोई मकान दिलवा कर रहेगे । किन्तु इन वडे शहरो मे रहने वाले लोगो का जीवन बहुत भागदौड का जीवन होता है । मचाई यह थी कि लोग इस कान से सुनते और उम कान से उडा देते और याद दिलाने पर कहते, "मैं भूला नहीं है। अपने मुहल्ले मे पडोसियो से भी कह दिया है। पता लगते ही मैं आपको अपने साथ ले चलूगा । देख लीजिएगा, तव 'हा' या 'ना' कहा जाएगा। आपका देखना जरूरी है।" गोया वे मकान दिलवा कर रहेगे। इघर समाचारपत्रो मे आए दिन इस आशय के समाचार प्रकाशित हो रहे थे कि मायके से दहेज न लाने के कारण बहुत-सी नवविवाहिताओ को ससुराल वाले या तो जान से मार डाल रहे हैं या रोज़-रोज़ के व्यग्यो की चोट नहीं सह पाने के कारण वे आत्महत्या करने को बाध्य हो रही है। इस सम्बन्ध मे जो कानून वना था, वह कागज़ पर था और दहेज लेने-देने की शर्ते लोगो के दिलो मे थी। सरकार भी क्या करे | उसके बहुत सारे काम कागज़ के टुकडो पर ही पूरे हो जाते हैं। बाजार मे घोर महगाई रहती है, मगर कागज़ पर खाद्यसामग्रियो का मूल्य काफी गिरता हुआ साफ नज़र आता है। अकालग्रस्त क्षेत्र मे कोई गरीव भूख से मरता है, मगर सरकारी कागज़ बीच गगा मे खडा होकर चीखता है कि वह आदमी भूख से नहीं, बल्कि उदररोग से मरा है और समाचारपत्रो में प्रकाशित समाचार को एकदम वेबुनियाद करार देता है । मन्त्रिमण्डल में, जो शासन का सर्वोच्च अग है, रोज़ ही निर्णय लिया जाता है कि जमाखोरो और कालाबाज़ारियो के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और इसी गति मे वाज़ार मे रोज आवश्यक उपयोग की वस्तुए गायव होती रहती है, काले वाज़ार में और भी गहरी काली छाया उतरती जाती है। कागज़ के बडे- रामद कर ' किन एनिम मरो नारिजरपति मारे प्रमि समय में हिरोमि देमपो से भी पास पर परेचर मरे - रो करम को रपा है।कई नौरोमा मोनोसा ही मनी-गमएस पर करो। गामार पारिोल मेने पाने और ये को तो भर पर पर, तो गुर्माना मोर मरा के पापोहार और मोसा से पाने बमा हो ए पी हा पा। पर यो काम पर AIR भी पिाकर ममिक इस वर्ष में गुपये कि बारिरीगरी महो रहेको । उसे को नहर माम नहीं जाएगा। रानी को भेकर मो नामी हु मागिरी परनामी साबित होगी। बारुपन्द्र जी ने ससाह दी पी हिनी जीएम परमेसना ठीक नहीं। सब मोग पाम गए है कि मरान पिरती लामा और काफी रपये मिसे है। स्पपे या गापर मे गरिएमा तो रहपा। रिपाकर मतिक को यह सुझाव पराग्य माया पा। गोधा! | दुपहर पौधे रोग पूच्या ऐ पे कि सादी परमी वाम पता करती है तो साफ बतताएं । यहाँ तीन सोग वि + in मिट्टी कुरेद ऐ है। रुपये मिम मये पे इगलिए पौधे ही दिन H I H५५ दिवाकर मसिक पोभामाम्त दुबे से मिलो पट५ मए। attarai नहीं था। ममी माघ पटा पहने कमहरी रोगी ।पा और int कहीं निकम मया बा। पशोभाकान्त पुन बहुत पूरादी भावमी भ। 141HI11 tari पर हरापन देखकर भाप गए रिमामा मामी मता| उपरान फौरन बोन, 'पमिए, हम पागल पन । । । भी पर मात है । एक माह मभी 11111 मए है। पदहहगापमा रहे थे। मैने पता HUII II । काई मान हाती है । साधा ALE न! " - - न । A - नही होने वाला हू । लडके लडकी के पवित्र बन्धन की बात है, कोई गुड्डे- गुडिया का खेल नही है।" "चला जाए।" होटल साधारण किम्म का था, मगर नाश्ते वगैरह की सामग्निया अच्छी मिलती थी। मिठाइया आलमारी में वन्द रहती थी। उन पर मक्खिया कलावाजी नही खा सकती थी। शोभाकान्त सीधे हाल मे आगे ही बढते चले गए और मौभाग्य से उन्हें मनोनुकूल स्थान भी मिल गया। कोने मे एक मेज़ और दो कुसिया। आसपास कोई ग्राहक नहीं। दिवाकर मलिक को वही वैठने का सकेत करते हुए होटल के पन्द्रहवीय नौकर को बुलाया और वडे रोव मे कहा, "मेज़ साफ करो। क्या समझते हो, हम लोग ऐसी गन्दी जगह मे खाना खाते हैं ?" नौकर कपडे का एक गन्दा टुकहा भिगो कर फौरन ले आया और मेज़ को पोछने लगा। पोछ लेने के बाद उसने पूछा, "क्या लावें, हुजूर?" शोभाकान्त ने पहले दिवाकर मलिक की ओर देखा, फिर वाय हाथ को पेट पर ले जाकर कहा, "मेरी तो कुछ भी खाने की इच्छा नही है । दो घण्टे से खट्टी डकारें आ रही हैं। चाय पी लू, वही वहुत है।" नौकर ने अपनी दृष्टि दिवाकर मलिक की ओर डाली। शोभाकान्त दुवे ने कहा, "हा हा" आपके लिए ले आओ। जो कहे ले आओ, पहले बतलाओ कि कौन-कौन-मी मिठाइया ताज़ा है नौकर पर दुवे जी का रोब पहले ही गालिव हो चुका था। वेचारा डरा । मिठाइया सारी वासी थी। तब तक दिवाकर मलिक बोल पडे, "मुझे डकारे तो नहीं आ रही, मगर कुछ खाने की इच्छा नहीं है।" शोभाकान्त दुवे ने वडी शीघ्रता मे उनके मुह की वात छीनते हुए कहा, "ओह, तब कुछ न खाइए। मेरी वात रखने के लिए कुछ खा लीजिएगा और पीछे डाक्टर की जेव भरिएगा । आयुर्वेद शास्त्र में भी कहा गया है कि ।" यानी इस प्रकार बात सिर्फ चाय पर ही बन गई। दिवाकर मलिक ने कहा, "आपने दस हजार की माग की थी, मैं तैयार ह। अब ऐसा कीजिए कि यह यज्ञ शीघ्र ही पार लग जाए ।" 1 ?"

" योफसमा 111 शोभाकान्त दुबे मे पुछ सोचने का अभिनय पूरा करपहा, "माप धीप्र बाहते हैं तो मैं उसके लिए भी तैयार है। मगर एक मात्र पान नीलिए। दिवाकर मनिक में पूछा कौन-सी पाव? छोभाकान्त कुछ गम्भीर हो पाए और ममा कर बोमे मम नहीं पाहता कि हम दोनों सममी बनने के पहले ही दो पर भी हमा तान पसे पाए । हालांकि मापसे मुझे जो कुछ मिसेवा उममे मुझे परम भी पा- बार बार मिलाना ही पड़ेगा। मगर, मरकार पीधे पर पाएपी मो शिमा-मएप में आपने एक रुपया और पान-सुपारी रे मावा और कुछ विया । समम सीमिए कि पोर फमिकाम मा ममा है। प्रमप होउ म पाडा दिम नहीं है। सम्मा सो मर जाता है मौर मुडे को इखार तक नहीं -मगता।" "प मा कन्हें में सरकार कर साफलको स्यार है। शोभाकान्त हुये मे अपना प्रस्ताब रमा 'ममिक पी अमर मापको मुम पर विश्वास हो तो ये रस हजार रूपये मुझे चुपके से पीरिए । किसी को कानोंकान सबर न होने पाये । मुना है, सरकारम हर मुहम्म में तीन-तीन मुफिया दैनात कर रिए ई बार उन्हें गिरफ्तार करन का भी पावर मिना हमा है। मपना मनिकान्त को दिन भर, बाप पामते है नि भर कचहरी में ही एता है। पुमिसयामों से उसका रोज मिमना-मना होता रहता है। वैसे मुझे क्या मासूम मह बात मविकात ही बनता या पा। दिवाकर मसिक मे मपमा भार उतारना ही ठीक समय।रल रात रात भर पमपर सुबह का मुहये। उन्हाने उसी रात मोम मममप मपने मागी समधी को पर पर पुमा निया मीर बाहर का परमाणावर कर वस हवार रूपये नमरेमासे रह बिए। घोभाकान्त में इस बानपा पचन पेत हुए फौरन निकल पाकिमपसे पनह रिमो में मम - और समापन सम्म हो पाएमा। भगवान हमारी सहायता करें!" ।

20 र कोर्ट हो, हाईकोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट-इन तीनो अदालतो मे एक- रेकार्ड रूम रहता है। इसमे चल रहे मुकदमो की फाइले रहती हैं और ख के मुताविक हर इजलास मे जिम मुकदमे की सुनवाई होने वाली है, उसकी फाइलें सम्वन्धित इजलास के पेशकार के पास भेज दी हैं और उसी रोज़ गाम को या दूसरे रोज वापस मगा ली जाती हैं। रेकार्ड रूमों मे उन मुकदमो की फाइलें भी सुरक्षित रहती है, जिनके ने हो चुके रहते हैं । इस के प्रभारी को 'रेकार्डकीपर' कहते हैं। पेगकार के रूप मे मणिकान्त की अच्छी आमदनी थी। वह मुकदमे- । को खुश रखता और दोनो पक्षो मे अच्छी-खासी रकम वसूलता था। लोग लम्वी तारीखें चाहते, उनमे कुछ ज्यादा वसूलने के इरादे से II, "मुकदमे बहुत ज्यादा । हाकिम जल्दी निपटाने के पक्ष मे रहते पन्द्रह दिन से ज्यादा आगे की तारीख डालना ठीक नही।" जब मुवक्किल दो रुपये के बदले पाच या दस उसे थमा देता, वह ना, "खैर, ताली दोनो हाथो से वजती है । आप क्या चाहते हैं?" "कम-से-कम दो महीने आगे की तारीख डाल दीजिए।" "जाइए, मौज कीजिए। आज 2 मार्च है, 18 मई को आइए।" और, जो कोई मुकदमा जल्दी खुलवाने के इरादे से नज़दीक की खि चाहता, तो उससे कहता, "हाकिम बहुत कडे स्वभाव के है । कहते क ही मुकदमे को हमे लेकर नहीं चलना है। गाडी मवो की आगे जो चाहिए । थोडी लम्बी तारीखें लगाया कीजिए।" "मगर पेशकार साहब, मेरे लिए तो आप ही हाकिम हैं।" "अभी नही, माहव, मैं हाकिम होता, तो हाकिम की कुर्सी पर न T? क्या करू, इन लोगो के मिजाज को देख कर चलना पडता है। मी चूक हुई कि नौकरी से हाथ धोना पडेगा।" "ऐसा नहीं हो सकता," मुवक्किल का मुशी कहता है, "मणिकान्त - पोपममा 11- बाबू मरे 'बाम भी इमो यासत में मारा गौर मगर मोहा मानवामि पेशकार पसार माह है।मिए पन्द्रह रोज आये पोतारीख मा परिररिसर, में पान या मसिम को माश्य देता है "मरजादौमातरेर पातार माहब का पार सय । पपा ममा है इसमें देर मर।" ममि इस सनग्न मशीघ्रतामा हिमायती पता है " मादिट पार्ग प्राथमी मी आ पाहोमा। मपिनमा पाप रपय का नार पमा देना है तो ममिरान्त रमे पर महबार रसमा है 'भाठ मान मार पीमिए । मुवक्किम पूछता है। "पपगीका।" हना दीजिए। बीस का मुपी मसमारता है। मोर मात्र पार बर मुमक्सिस को पता चलता है कि भगती वारीए बीम पी है। मार पार वारीत है। बहमन्तुपाकर पर मोटना है। प्रदामन का यह पाना मा पकार फाान पर पार पनिया में कुछ मिलता है ना उमम दि मौर मारनमी भने पार मे पन तो बझी मही होती मगर मपन हराफरी में धध में याही कमी ना पनी करता है। वहम पार में सपा मारिहा में हो मरे जमे की हो मा पर की तरावट बनी ए। मा क पाम तो दोनो प्रसार मुकाम मुमबारे सिए भाव है -रीवानी मार फोरगरी।समिए बह पीसापाभी लाल है और पुलिस की मोर के मुगम पेम रस पाने कार बायुमा भी मापिक चार परवाता रहता है।इम मात्र पुछ सरी माय बर्मामा म गाती है मौर एकको बायुमा म । शमी यह विही आमनी पौर पर गा इसाई मार पुपी रममा है। मकिन कभी-कभी रियाणा का मुरिमा पिभाष परम होगा है मौर एकम-एक रोड मास्टर मा म पिर गाये है। मा तहमा पा दिवाकर मत्तिक पान-मुरारी मौर पम्पमा नार पिपा मेर सामाकात दुयेयही उपम्पित भी न होकर रि समाचारपाने प्रपम पृष्ठ पर या मभाषार पाने को मिला मिर 'होटल मे अदालत का पेशकार रगे हाथ गिरफ्तार ।' अधेर नगरी, 13 मार्च । कल एक होटल मे स्थानीय जिला अदालत के सवजज दोयम का पेशकार मणिकान्त दुवे निगरानी पुलिस द्वारा घूस लेते हुए रगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस सूत्रो से ज्ञात हुआ है कि वह कोई अत्यावश्यक सबूत का कागज फाइल से निकाल कर प्रतिवादी के हवाले कर रहा था, ताकि लिखित प्रमाण के अभाव मे प्रतिवादी मुकदमा जीत जाए । सवूत का कागज़ उसकी जेब मे था ओर वह प्रतिवादी पक्ष के साथ इस काम को निपटाने के लिए होटल में आया था। जैसे ही एक हजार रुपये लेकर वह सबूत का कागज अपनी जेब से निकालने लगा कि सादी पोशाक मे आसपास बैठे हुए निगरानी अधिकारियो ने उसे अपने घेरे में ले लिया । मौ-सौ के दस नोटो पर मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर थे। दूसरे दिन इसी सिलसिले मे यह समाचार भी पढने को मिला कि न्यायिक दण्डाधिकारी ने ज़मानत की अर्जी नामजूर कर दी। अभियुक्त को केन्द्रीय कारा भेज दिया गया। दिवाकर मलिक तो वही मुश्किल से अपने आसू रोक सके, लेकिन उनकी पत्नी दमयन्ती चीखकर रो पड़ी। उन्होंने चाहा कि यह बात बागेश्वरी के कानो तक न पहुचे, पर लडकपन मे पूर्वी ने मौका देखकर बागेश्वरी को सब कुछ वतला दिया। वैसे भी वह मा-बाप की वेदना से अव- गत थी। रोटियो के लाले तो पड़ ही रहे थे, यह घर भी हाथ से निकल गया या । उसे मालूम था कि प्रकाश बाबू ने वडी दया करके कहा है कि रलिक जी, पहले आप कन्या का विवाह कर लें, तव घर खाली कीजिए। वागेश्वरी का भावुक हृदय रो पडा । 'हाय | भविष्य कितना सूना नौर अन्धकारमय है। मैं तो व्याह के बाद पति के घर चली जाऊगी और री वहन तथा मा-बाप किराये के घर मे रहते फिरेंगे। हर माह बाबूजी कराये की रकम कहा से जुटा सकेंगे ? मैंने और मेरी ज़िन्दगी ने वाबूजी | कितना महगा मोल वसूला है कोठरी बन्द कर वागेश्वरी रोने लगी और दिवाकर मलिक कुछ सोच- र चारुचन्द्र के घर चल पडे । लगता था, उनके अग-अग मे कोई सुइया भो रहा है । कदम लडखडा रहे थे। । " 21 शोभाकान्त हुने मे पमान-मासमान ने दुभाष मिसा रिए। मपर उन्ध म्यापासप तक ने मणिकान्त को छोड़ना मुनामिब मही ममझा । मुगामा सनसनीरता था और समाचारपत्र बामे प्रत्येक कार्यवाही की सूचना ममातार प्रसाधित कर रहे थे। पड़ोस में रोर समाचारपत्र मिया गाता था । बायारी पूर्वी में यह समापारपत्र दस मिनट के लिए मंगवाठी अपने भावी पति रेसम्म में प्रकाशित समाचार पाठी मोर ग्रहो मी एकांत मिसता पैठार जी भरपर रोटी पी। इसी क्रम में उसमे मायाप को धीमे स्वर म बातें परसे मुना। दमयन्ती मोमी "इस मपराध म सुना है मम्मी मजा होती है।" रिवाकर मनिक मे कहा 'सुना तो मैंने भी है। एप मादमी कह रहा बा कम-से-कम तीन सामना कर।' "हमारे लिए वो तीन सास वीस हगार सात के बराबर होगे।" रिवाकर ममिकको पर किसी ने बतमा निया पा कि समाहो पाने के बाद इस पम्म में सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। मणिकान्त मोई राजनीतिक दी तो होमा नहीं। फागदारी मुम्मों में सगा पापा हमा बारमी चुनार तक महीं सा सकता । सो उन्होंने यही बात रमपम्ती से भी कही। मम तो दमयन्ती की पी-सही मात्रा पर भी तुपारापात हो पया। बानों कमाये वारे छिटकने सगे। बामेसरी प्रकटत इस विपत्ति के सनम में कुछ पोस मही साली थी। वह कुछ सास बातावरष में पमी पी। यह उन भामुनि पुतिर्यो में नहीं की गोगो मेसरमी से अपनी पारी की समस्यामो में हिस्मा बटाया करती है बपने मोर मावी पति के लिए गर और पो पसन्द किया करती है। यह उन युवतियों में नहीं भी यो बामना कीया में कम माने पर बम्परवातीय विवाह कर मवी है मौर सपने माह मो एरमानं, विवाह मानती है। यह प्रेम-विवाह रचामे वामी उन भायुनिरामों म तो 116 शोकसभा कभी हो ही नही सकती थी, जो फेरे पड़ने से महीनो पहले चुपके-चुपके अनगिनत मुहागरातें मना चुकी होती हैं । वह सचमुच ईमा की बेटी थी तन और मन में अस्पर्शित धूपवत्ती की भाति पवित्र । सिक्के के किसी भी पहलू में कोई दाग नहीं था। । सुवह के माढे मात बज रहे होंगे । दिवाकर मलिक की सारी बातें सुनकर चारुचन्द्र ने कहा, "अव नैनिकता तो यही कहती है कि शोभाकान्त दुवे आपके रुपये लौटा दें।" "हा, वही तो मैं चाहता था । प्रकाश वाबू के भतीजे को रुपये लौटा दिए जाए, वरना घर छोडकर किराये के मकान में जाना पडेगा।" दिवाकर मलिक ने कहा। दोनो रास्ते मे बातें करते हुए चले जा रहे थे। राजधानी का शहर वही शोरगुल, वही भीडभाड । सवारियो की आवाजे। लोग आ-जा रहे थे। छोटी-छोटी दुकानो के फाटक खुल रहे थे, वडी दुकानो के शटर उठ रहे थे। चलते-चलते ये दोनो मणिकान्त के क्वार्टर के सामने आ खडे हुए और पुकारा, "शोभा वावू, ओ शोभा बाबू ?" पुकारने का काम चारुचन्द्र ने किया था। एक दस-बारह साल का लडका भीतर से निकला। उसने वाहर वाले कमरे की ओर इशारा कर कहा, "आप लोग बैठिए । नाना जी पूजा पर वैठे हैं। अभी आ जाएगे।" दोनो बाहर वाले कमरे में चारपाई पर जा बैठे। वातावरण मे मूनापन था, उदामी थी। लगभग पन्द्रह मिनट बाद शोभाकान्त दुबे खाली वदन धोती लपेटे हाज़िर हुए । ललाट पर विपुण्ड जैसे चमक रहा था। दिवाकर मलिक पर दृष्टि पडते ही रुआसे हो आए और बोले, "क्या बतलाऊ, समधी माहब, हम तो लुट गए । अब तो किसी को कर्ज देता भी गुनाह है । सुना है, ईश्वर ममदर्शी है, मगर मुझे तो लगता है कि उसके मुकावले का अन्धा कोई दूसरा न होगा।" शो-7 117 पौषममा "देना गुनाह है ?" चारचम के मुंह से निकमा। बमल में एक छोटी-सी कुर्सी पड़ी पी उस पर मंठो हुए पामाकान्त से मे कहा "यी करियर कर नहीं हो मारपया ! जिसने मभिकारतको सा दिया है उसे नरक में भी पहनहीं मिसेयी । मभिकान्त ने उसे ममा सादमी समझ कर बिना मिबा-पड़ी के हगार पपेर दे दिए थे। मुझे पी नहीं बतमाया । वा मोम्पाह पम हो गया तो रुपयों की मावस्यकता सीमाप पानठे ही है पाह-पारी में स्पयो र हाप-पौर हो जाते है। छौ का नोट तो बस बाम में डराबर होता है। बहू को देने के लिए म एक हार पमन्द कर माया पा। इसकी प्रमक मभिकान्त यो मग पाचन यो "सर, मापके दुम में हम कोई कम दुधी महीं है। मेदिन दिवाकर बाबू भी मामूली परेशानी म नहीं है। सोमाकान्त दुवे मे बड़ी बस्ती में कहा "मे परेशानी में न परें। मय मपिकात इनका है। मेरे साप इनके रिस्ठ का धागा मग टूटने पाना नहीं। यह म्याह होकर रहेगा। पारबार मे भाषी स्पिति को स्पष्ट करते हुए कहा 'भगवाम न ऐसा परे मपर फार मीनिए कि ममिकाम्त को सजा हो जाती है फिर मा होपा ? मापने वो कभी नही कहा था कि मणिकान्त बैठता तो है किरामी की पूर्मी पर, नगर उसकी मासिक वामपनी की पूंछ को पर साहब भी नहीं सकते निहावापस हबार नकर मैं कुछ पपाया नहीं माम रहा।' रिवार बापू ने सोचा और मैंने भी कहा हिमो भाई, मरकी सुख से ऐनी।" पोमान्त दुवे मे भूवकास को वर्तमानकान का सबसे हुए कहा, "हो हो निवाकर मादू का सोचना मार मापका कहना उचित है । एक तो सरा होगी नहीं क्योंकि हम हाईकोर्ट तक मई मौर मान नीगिए, पो सराहाभीपा, तो मनिकान्त प्रतापी पुस्प है। प्रेम से फूटकर बह प्यापार करेगा । उसने ऐसे ममम में चम्म लिया है किसम्मी नमसे चिपको ऐया।" "मुकदमा पमने मार फसमा होने में पाने हितमे वर्षे मर्मेमे । तब तक 118 शोकसभा "जी हा, . लडकी क्वारी बैठी नही रहेगी।" चारुचन्द्र बोल पड़े। इतना सुनते ही शोभाकान्त दुवे ने पैतरा बदला । कुछ ऊचे स्वर मे वोले, "तो माहव, कौन कहता है कि लडकी क्वारी वैठी रहे? आप जहा चाहे, उमे व्याह दें। हमारी-आपकी तो अभी वातचीत चल रही है। शादिया तो विवाह मण्डप तक से टूट जाती हैं। मेरे जानते मे तीन वारातें कन्या के दरवाजे मे लौट चुकी हैं। शादी-ब्याह का मामला कोई हसी-खेल थोडे ही है | दोनो पक्षो की पूरी रजामन्दी के विना यह हो ही नही सकता।" जी हा ।" दिवाकर मलिक इस समय पहली वार वोले । शोभाकान्त दुवे का स्वर चढता-उतरता रहा, “अव ज़माना ऐसा है कि विना कन्या को देखे वरपक्ष वचन नही देता। मगर, हमारी ओर से ऐसी कोई बात नहीं कही गई । मैंने इसे ठीक नही समझा । मैं तो सोचता हू, जैमी मैरी कन्या, वैसी दूसरो की कन्या । कन्याए क्या कोई गाय-भम है, जो देखा-परखा जाए? इसी तरह यदि वे भी कहे कि हम वर को देखे विना व्याह नहीं करेंगी, तो हमे कैसा लगेगा? हम तो बुरा मान जाएगे और कहने लगेंगे कि कन्या विलायती लडकियो के रास्ते पर है, भया । यह तो जिम दिन हमारी देहरी के भीतर पाव डालेगी, उसी दिन हमारे वाप- दादे की बनी-बनाई इज्जत माटी में मिल जाएगी।" दिवाकर मलिक तो शोभाकान्त दुवे का भापण सुनते रहै, मगर चारुचन्द्र ऊबने लगे। वह मुख्य बिन्दु पर उन्हे लाना चाहते थे । वोले, "दुबे जी, आपके विचार बडे उत्तम और अनुकरणीय है । आप गृहस्थाश्रम मे हैं, मगर माप सोलहो आने महात्मा हैं। अब आप ऐसा कीजिए कि दिवाकर वाबू के दस हजार रुपये लौटा दीजिए। इन्होंने बडी महगी शर्त पर ये रुपये उधार लिए हैं। फिलहाल इनके हक मे यही अच्छा होगा कि ये कर्ज़ के रुपये लौटा दें। आप जानते ही हैं कि शरीफ आदमी के लिए कर्ज कितना बडा वोझ होता है।" शोभाकान्त दुवे को लगा, जैसे पूरा हिन्दुस्तान वडी तेजी से चक्कर लगा गया। मगर वह भी ऐमे हार मानने वाले नही थे। कुछ धीमे स्वर मे वोले, "इस समय तो चाहिए कि दिवाकर वाबू मेरे दुख मे साथी बनें। - पोफसमा 119 एपमा ही सब कुछ नहीं है। मैं तो इसे हाप का मस मममना । मनिसान पस में है। मुगामा संमीन है। बात-बात पर एएपे पर्ष हो रहा है। बार बार इन्हें परेशान होन की पररत नहीं। मरे मामिया है तो मूर देना परमा यही तो मरकारी पर पर ये मुझमे एपये मेपर मूर मदा कर लिया करें। मास भर का मूर में पामे देने को तैयार । पहिए, विाकर मायू?" पारचम तारिवाकर मसिक की स्पिति जानव थे। पाप "एन्हें सरकारी र म सूद नही देना है। इन्होंने अपना मकान बसी मारा पर रसा है। रपमा देने वाम ने रुपा कर कुछ दिनों की मुहमत दे दी। माममा कम्या विवाहमा पा बस । कम्पा का विवाह तो एक ही गया। अब कुछ विमों के बार इन्हें मकान सामी कर किरापर मकान में मा जाना पड़ेगा। यानी या तो मे रस हागर रपय पौगए या महान छोड़ें। और पान मीबिए कि यह सब रजिस्ट्रेशन आफिम में हुमा है। पर इन मामे पाहाय कानूमन मरत है। वैसे भी रिवाफर पी कलाकार ठहरे। कपहरी मार पाने को नरक का महा मोर छोटा दफ्तर मानते है। "मानना ही होमा' ।" पोमानान्त पामे । उनका पोबर पनाह पामा घामामात पुरे उतरे भीतर फिर से प्रवेश कर गया। उन्होने उमी प्रोभाषाम्त दुवे की बुधि का उपयोग करते हुए कहा "मैं कचहरी मौर पाने में विश्वास नहीं करता। दिम साफ रहना चाहिए । इस समय मेरा फर वो यही पा वि समर में सचमुच इनसे पपये लिए होता तो फौरन मौटा देता " पूछ बैठे तो क्या में मुठ बोस ये है" सरामा !" घामाच दुव ने कहा बारे जान ही गए है कि मणिकाम्त फस पया है। फिर सोच रहे है वमो न इस स्पिति का नाम उठाया पाए? पुसिम की मारों में इस समय पोभाकान्त मपराधी है। इसी बहाने बारे मुझसे इस बार ऐंठना पाहते है। और माप भी इस माकार, वर्षमान पार में पार मेरे पास पसे माए । सोचने की बात है दस हगार रूपये कोई यों ही पुपके से पकाया पुलिस और सनर काग्र बानियोग की रकम केस मुसमाम दी गाए ' ठीक है। ।

शोकसभा 120 - आप पर तो ये मुझसे प्यादा विश्वास करते हैं। रुपये देते समय आपको अपने घर मे क्यो नही विठाया, आपके सामने रुपये क्यो नही दिए ? मैं मैं तव से इनकी इज्जत बचाने के लिए 'हा-हा' किए जा रहा हू और तव भी ये सचाई को जाहिर नही कर रहे हैं । होंगे ये कलाकार अपने घर मे, मगर मैं तो इन्हे मुल्क का सबसे बडा ठग ही समझ रहा हू "हरे कृष्ण, हरे कृष्ण | अव प्रलय होने में ज्यादा दिन नही लगेंगे-हाय, हाय, 'मन मलिन तन सुन्दर ऐसे, विपरस भरा कनकघट जैसे।" चारुचन्द्र की बुद्धि को जैसे लकवा मार गया। कुछ ग्लानि भी होने लगी। फिर भी उन्होंने दिवाकर मलिक से पूछा, "दिवाकर जी, क्या शोभाकान्त जी का कहना सही है ?" दिवाकर मलिक को कमजोरी महसूस होने लगी । वह वास्तव में एक शब्द भी नही बोल सके । चुपचाप शोभाकान्त दुवे को निहारते रहे । पाच मिनट तक यही हाल रहा। अन्त मे चारपाई से उठते हुए दिवाकर मलिक ने इशारे से चारुचन्द्र जी को कहा, "चलिए।" बाहर निकल कर दिवाकर मलिक का पसीना छूटने लगा। उन्हे गश आ गया। चारुचन्द्र ने फौरन रिक्शा किया और उन्हे उनके घर ले आए। दमयन्ती को फुसफुसा कर कुछ समझाया। स्वय दौडते हुए पडोस के एक डाक्टर के पास गए। पूर्वी और वागेश्वरी दोनो भीतर से भागती हुई पिता के पास आई। वागेश्वरी पर नज़र पडते ही दिवाकर मलिक को जैसे होश आ गया। वह फूट-फूट कर रोने लगे। - 22 घोभाकान्त पुरे ने एक निश्छम कलाकार से दिम में कमी मपानर भाप सुमगादी पी, महना नहीं पहेमा। दिवाकर ममिक की मानमिक स्पिति कुछ पामत जैसी हो गईपी और इस पापमपन की स्थिति में यह प्रात माठ बोही प्रकाप बाकी मोठी पी मोर बल परे। उमसे मिमकर बह बम इतना ही निवेदन करना चाहते थे कि मभी उनम मकान न पाती पराया पाए। पिछले दिन दस बजे जब पारपन्द्र समटर को लेकर भाए ये तो बामेश्वरीको गोर देकर दिवाकर ममिक के पाम से हटा दिया पा। गौर बायबरा पी कि किनार की मोट में छिपार मय कुछ सुन ही पी । मकर मे मांग करके कहा "हें रिमी बात का गहरा सदमा पहुंचा है। इनके साथ खूब प्रेमपूर्न प्यबहार किया जाना चाहिए । माप मोम कुछ पतमाए दो सही कि मरमा किस बात का पहुंचा है।" उत्तर में धीरे-धीरे चारचन्द्र ने गक्टर को वास्तविकता बताता दी। पर बागेश्वरी मे सब कुछ पान-मुन लिया। मगर, सों के मामने यह अपने को मनवान ही बनाए रही। दिन बीता रातमीती । मुहाई। दम ब गए। दमयम्ती मे पति की बड़ी प्रतीक्षा की मगर यह नही मारे । पूर्वी रे म गाने का समय हो मया पारमयन्तीमा हाम छ मच्छा नहीं पा। पितृ धर्मपरायण मारी पोर विपत्ति मे मी मपो धार्मिक कत्तयों स पिम्स नहीं होती। पास्नानार्य पष्टे भर से तैयार पी। अम्त म रहोंने पूर्वी को स्म गाने दिया और बानापरी से कहा 'बेटी में मंगा भी गा रही । बाहर का दरवारा मन र मो। तुम्हारे पितानी मा हीद होंगे। मारे तो बतमा देना गंगास्नान को गई है। पर ही सीट माएंगी।" 'मन्डा मां तुम गाभो।"

122 शोकसभा पूर्ती स्कूल चली गई। दमयन्ती ने गगाघाट का रास्ता पकडा । वह चुपचाप चली जा रही थी और सोचती जा रही थी कि अब क्या होगा? इधर घर विलकुल सूना था। वागेश्वरी पहले थोडी देर टहलती- फिरती रही। फिर बैठकर रोने लगी। इस समय उसे चुप कराने वाला या ढाढम वधाने वाला घर मे कोई नही था। एकाएक वह उठी। दौडकर बैठक मे घुसी। उसने कुण्डी की जाच की कि वह ठीक से लगी तो है । जव उसे मन्तोप हो गया, तो लौटी। फिर न जाने क्या मन मे आया । वडी तेजी ने बैठक में गई और मेज़ पर रखे पापाणनिर्मित वालकृष्ण की मोहिनी मूरत को उठा । लाई। इसके बाद कमरे में घुस गई और भीतर से दरवाजा वन्द कर लिया। अव चारपाई पर जा बैठी। वालकृष्ण की मूरत उसके बायें हाथ मे थी। धीरे-धीरे उसका गौर मुखमण्डल काला पडने लगा। उसके कोमल तलवो मे एक प्रकार की सनसनाहट पैदा होने लगी। उसने बडी तेजी से छत की ओर देखा।

23 उपस्थित वर्गों में भले ही मपनी-अपनी मालों पर कासी पट्टी पड़ा एपी है पर किये 'मुरम्मा के प्यामे है मत प्रामीन नाट्यगामानुसार मंच पर बीमस्त रस पामा पृश्य नही कार्याम्बित किया गा रहा है । नैरेटर केबल नेपम्प मे सूचना देता है। उमर से पंगास्नान कर दमयम्सी मार्टीवार घरमे दिखापरममित्र। पोनों पर परमारे पर एकमाप मिमै । दरवारा भीतर स बम्पा। पानों भारीचारी स दस्तक देते है पीप-बीयर पुरारते हे पर परमाग नहीं सुमता पा महीं घुमा। दिवाकर ममिक मे गमियारे में पामर झांजा विप्त कमरे में बामश्वरीमोती बसी मरतीपी उमममा म मापन्न की प्रेरणा मिसी । लिएकी बम्ब पी। हा एक छोरा-मा माहा- तिरछा मूराण भवाय या।सी माम बम्प कर मामी माएको उम मुराण पर मेट परके मा छ देना बह पीपने रिस्माने मीर माने निए काफी वा । पर, समय मे उमठोर मार पासार दोना बना लिया। यह गनी बाम रास्ता नहीं पी। इस मोर अनुपपापी पोपों की मारिया पी मार पौधे की मोर गदा का मिममिमा था। इस स्थिति म रिपार ममिक न माम उठामा । बारीरिक बम की दृष्टि से बह राम भर मे भीम बन गए । दो-तीन भाटको म मिपी माप सी मौर उछम पर बमरे भीतर पुम मए। फिर पिानीको पपाम्पान मा पिया हामापि ही हबा-माम स बह गिर सकती थी। भव बहगाहरपी मोर पोरे मोर भीतर में दरवाया गाम दिया। दमयन्ती भीतर प्रवेश कर गई। दिवाकर मसिमे ररवाजे को याम करत हुए कहा कोई भी पुपारे काना बाहर पए है। पराम की कई गौरत भी भीतर म मान पाये । पाना भर यह भी भुगवना है। दमयन्तीमा पनि म पम माप लिपट गया। उम्हॉन पूछा "यह क्या गोम हे हो गया हो गया?

124 शोकसभा दिवाकर मलिक ने एकदम खामोश रहने का इशारा करते हुए कहा, "वागेश्वरी ने फासी लगा कर आत्महत्या कर ली है। अपने कमरे मे अभी उमी हालत में है। चलो, गाउँ खोल कर उसे उतारें। लगता है, शोभाकान्त दुवे ने जो मुझे दगा दिया, वह सब कुछ इसे मालूम हो गया।" दमयन्ती पत्थर बन गई। यह सब कुछ सिर्फ रमोला के घर वालो को मालूम हुआ। उन लोगो ने पूरी गोपनीयता वरती और उन लोगो के सहयोग से ही, डाक्टर की मदद लेकर, मुहल्ले वालो को वतलाया गया कि वह भयानक पेटदर्द मे चल बसी। अर्थी को लेकर बहुत थोडे लोग निकले। शाम के चार बज चुके थे। स्वय पिता ने पुत्री को मुखाग्नि दी। चिता घधक उठी। गगा का किनारा। चीलें और कौवे चिता के ठीक ऊपर आसमान में पख फैलाए चक्कर लगा रहे थे।

24 नेपाम म माइसोफोन गर रहा है। दिवाकर ममिप में प्रकाश बाबू का मपनी पुत्री बागेपरी की मास्यु विषय में बताते हुए कहा "मौत को वो मम एपबहाना चाहिए। पेट में वहुमा मोर देखते-देखते बची पात हा मई ।' सुनकर प्रकाश गायोप्से "हो भई आपने सुना ही होगा हमारे उपरारपपास मत्री मनमुनयामा महिसा सिमाई केन्द्रका पाटन करने बा हे पे। बड़े प्रसन्न थे। पता पमा कार मे बसे ही गा रहे थे कि कुछ देपनी महमूम करने सगे । पसीना ने नमा।बचारे उमाटम भी मकर सके और मस्पवास में भर्ती हाना पड़ा। माठ ऐज तक सफ्टरों ने पानेन से उतरने नहीं दिया। "घड़ा पर्षमाया होगा इनाम पर? "सतो और नहीं माया । मरपार की ओर से मारी व्यवस्था भी। की.माई.पी० ठहरेम।" हिला मन्त्री प्रकाश बाबू मे कहा। इस बावनबाने किस तान मे रदपोपक के हाप से माइफोम छौन निमा मौरबड़ी भी बावार में मोसा 'बीहा बनाय इस मुस्म में जानिरास बटे मार मार्यभट्ट वषा पाणिनि की मौतार भी मगर यहाँ चार भोग ही मुक के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण प्यक्ति माने जाते है- राष्ट्रपति मन्त्री संसद् मरस्प और विधान सभा सदस्य। यहो कता विज्ञान मौर साहित्य दीपक को मांधी-पानी से बचाने का काम करने पाम या कम-कारखानों में पसीना बहाने पासे सवारों प्रभारी महत्त्वपूर्ण पत्तियों की ममोपित प्रगा है।" पर्मक यो पुर कमा के प्यासे है और मिकी मांसों पर पर कामी पट्टियां पड़ी हुई जाने इसका क्या भई पाते हैं कि करतमम्पनि परते हैं। पीधे बैठे हुए एस वर्मक की पट्टी कुरान है।यह पट्टीको कसमे मयता है।

126 शोकसभा माइक पर उद्घोषक कुछ कहने लगता है । दिवाकर मलिक प्रकाश बाबू से एक तरह से रो-रो कर कहने लगे, "वर वक्ष वाले ने दस हजार रुपये हम कर लिए। वहुत दिनो से आपके विभाग मे आर्थिक सहायता के लिए मेरा आवेदन-पत्र पडा हुआ है । साल- भर से कम नही हुआ। कुछ किया आपने ? कुछ रुपये मिल जाते, तो आपके भतीजे को देकर मकान जो गिरवी पहा है, उमका ।" प्रकाश बाबू ने टोका, “महाराज, आप यह क्या कह रहे हैं ? अव तो उस आवेदन-पत्र पर विचार किया ही नही जा सकता। आपने कन्या के विवाह के लिए आर्थिक सहायता मागी थी और अब कन्या रही नही ।" "हा, यह तो आपने सही कहा।" प्रकाश वावू ने सुझाया, "आप सीधे आदमी ठहरे, और मेरा भी यही हाल है । मैं मिनिस्टर क्या हुआ, लोगो ने समझा कि कारू के खजाने की चावी मेरे हाथ मे आ गई। आप सीधे अपनी आर्थिक विपन्नता का उल्लेख करते हुए एक नया आवेदन-पत्र दीजिए। हालाकि इसमे मुझे दिक्कत होगी, फिर भी कुछ करने का प्रयत्न करूगा।" "आपके भतीजे साहब दो वार मकान खाली करने का तकाज़ा कर चुके । उन्हे समझा दीजिए कि ।" "वह मैं कह दूगा, परेशान न हो। आप ऐसा कीजिए कि मौ रुपये प्रति माह उसे बतौर किराये के दे दिया कीजिए। वह चुप रहेगा।" "ये सौ रुपये माहवार मैं कहा से लाऊगा "कुछ तो करना ही होगा। आपने दखली इजारा लिखा है न।" दिवाकर मलिक मिर झुकाए सोचते रहे। कुछ समझ मे नही आया, तो यो ही हवा मे बोल गए, "अच्छा, कोई उपाय करता है।" "हा, बीच मे मैं पडा हुन । वह अगले शनिवार को आने वाला भी है। आपने कुछ नहीं दिया, तो मेरा मर खा जाएगा।" प्रकाश वावू बोले । दूमरे ही दिन दिवाकर मलिक ने अपनी विपन्नता का हवाला देते हुए एक आवेदन-पत्र कलाकार सहायता कोष के डायरेक्टर के दफ्तर मे दे ?" दिया।

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बद्भुत नुरप-प्रदर्मन के लिए दिवाकर ममिरपोरस और पर
प्राप्त हुए थे। बमन ही मप्ताह पर प्रकाश बाबू का भतीमा पार पर
खड़ा होकर ओरपोर में बुग-ममा गुनाने समा रिवार ममि में
मनुरोध कमर महा 'आप भीतर बम माझा । मुहमोगा मान
को नहीं जानत। माइए पिरापे गए ममें मापसी पुछ गीता।"
और पेट की माम पास रहनकम में मगर गर्म पीलिमा
रियो म गाने मेचमा। पापमपन्हौरबाट रजतपम और
घेपये। उनमें मरिवार ममिरन उम मीन रवापर गौर दिए और
बह यह कहता हुमा पमा मया कि गमे रो महीम र भीतर समसाम
हामी कर बरमा सम्हें जमारत म मिा मगमा मरेमी में
मागिर पाएमा पान म तुमिम मामी बोर एमएमी पापा मान
वामी करा लिया जाता।
।
1
से मार हाने गोमा भए । फिर वीमग मोर पोपा मार भी गुमपा ।
प्रकाध मा पानीमा मकर मापन हा गया मे भय माना
किराया पाहि मौर म महान । भार पूर्वी का परीसारम नितापा।
उमन प्रपम म्यान पापा पााम हुसन हुए पान पर रिगीन माम
सया पिाहा । विकार ममिका पं और मी गमी में पानी
मिटाई की जान में दाम्पयनी सपरिया नाम रमपनी बाद,
"मार पूगा में मपबानपान समरिया समाप ममा । गरमा
तुममी म पारसनी मामी मार मानी !
समी बिमीनबरामरमारिपारामानामा
बीमामामा मामन । मनमा पिर पामें
हो, वा उमें मगा।"
"भारोममा
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128 शोकसभा । "कचहरी से।" खवर पाकर दिवाकर मलिक अचरज मे पडे-भला कचहरी से कौन आया? फिर सोचते-सोचते बैठक में आ गए। उस अघेड आदमी ने बतलाया, "मैं अदालत का नाज़िर हू । कल आपके यहा हम लोग आएगे। मकान आपको खाली करना पडेगा। होशियार हो जाइए।" "होशियार हो जाऊ, कैसे होशियार हो जाऊ ?" पूछते हुए दिवाकर मलिक जैसे काप गए। इसमे भला कौन-सी होशियारी चल सकती है ? बात तो बिलकुल सच है। अधेड आदमी ने कहा, "अजी, हाकिम लोग तो सिर्फ दस्तखत करना जानते हैं । कुछ दस्तूरी दीजिए, तो हम मामला कुछ दिनो के लिए दाव दें। आप शरीफ आदमी हैं, मुझे तो वडा अफसोस हो रहा है"हा "। आज के ज़माने मे लोग पैसा पहचानते हैं, आदमी नहीं।" "आइए, आप अन्दर आकर बैठ जाइए।" दिवाकर मलिक कापते हुए वोले । और, स्वय भीतर जाकर दमयन्ती से बोले, "भगवान को भोग लगाने के लिए जो जलेबिया ले आया हू, उनमे से कुछ प्लेट मे रखकर दो। कचहरी से नाजिर आया है।" "पहले देवता को ।" "अरे भाई, वह देवता से भी बढकर है।" दिवाकर मलिक ने कहा। कचहरी का नाजिर | पुराना पापी है यह जगदम्बीलाल । दोनों हाथो से खाता है, और एक हाथ दूसरे हाथ की कारस्तानी नही जान पाता । जव वह प्लेट मे आयी हुई आधी से अधिक जलेविया हम कर गया, तो सभ्यता के नाते दिवाकर मलिक ने पूछा, "और ले आऊ ?" "वम दो-चार, ज्यादा नही।" जगदम्बीलाल वोला। देवता के नाम पर आयी हुई सारी जलेवियो का आदमी ने भोग लगा लिया और पच्चीस रुपये दक्षिणा मे लेकर चलता बना। घोर अपमान की कल्पना करते हुए दिवाकर मलिक रात-भर जागते रहे । एक वार धीमे स्वर मे दमयन्ती को पुकारा। जब तक दमयन्ती आखें खोलें तब तक दिवाकर मलिक ने सदा-सदा के लिए आखें बन्द कर ली। सिर वायी ओर लुढक पड़ा।

26 "भाम्पपर! मिरेशानुमार मापको मूषित किया जाता है कि मापरे भाषित ममार सम्बन्धी मामेदन-पत्र पर विचार किया परापुरा है मार दनुसार मापक नाम का पेई र एकाउप मोनमी' पांच मी एक पपये का बनार कार्यामय म रवाहमा है। माप पिसी कापदिषस का मार पड़ो मे पर प्राप्त करने। कृपया इस बात को मत्यावश्यक सममें किन सयों से भाप परिवार उपपोम मिए जो भी खरीदें उममी एमीर भी ममोहम्नासरी रे कार्यालय म प्रस्तुत परें और प्रत्येक रमी प्रतग विकाम पचाधिकारी वारा प्रतिहस्ताक्षरित हो। भी फस मोर मिठााया पदापि न मरी। यषिहमार कार्यासय का मेलापास पेक मामामी समरे बार-बार सहारे तो उसरीन में बसपान कराने में गाइए मार रमकी पर में पांच प्रतिष्ठत की दर स पम्पीम पपये गम दें। ऐमा नहीं करने पर मापको जो हैपनी-परेशानी होगी उसके लिए हमारी कोई भी जिम्मेगरी मही होगी। टाइप किया हुमा यह पा दिवाकर मसिह के नाम पसाहार-महायता कोप के निदेशक कार्यालय में दब मापा बरामयम्सी रेवी ने एक और स्वर्णपरायपकर उनका मार-कर्म कर दिया था। पत्र पड़फर मां-बेटी रोम ममी। माज नगररेकमा-मसति भवन में बड़ी पहम-पहल थी। मार बाना ऐपे। हाम में एक मुमार मौरयामा मोम पूतरा बना हुआ पा। भवन नाकर उस पर परिमो मार बारा-मार विष्ठा रहे थे। ममई मरों मे भासपाम की मार को एकदम माप-मुपराकर सापानमा पारपत्र में मुपना पहल ही प्रकाशिव हा पूरी पी मार इमस पहनकर 130 शोकसभा । दिनो तक विभिन्न वर्गों के लोगो की ओर से छोटे-छोटे सवेदनासूचक वयान भी छप चुके थे। दिवाकर मलिक के अमामयिक निधन पर आज शोकमभा आयोजित की गई थी। वक्ताओ की सूची इतनी लम्बी थी कि उन्हे एक चबूतरे पर विठाना और मेढको को तौलना वरावर लग रहा था। सभी दावा कर रहे थे कि दिवाकर मलिक को वे सबसे ज्यादा नजदीक से जानते थे। कोई आपस मे कह रहा था, "मैंने दिवाकर मलिक के घर तेरह बार चाय पी थी और दो वार भोजन किया था।" कोई कह रहा था, "खादी ग्रामोद्योग भवन मे मैंने तीन बार मलिक जी को कन्सेगन रेट पर कम्बल दिलवाया था।" किसी ने कहा, "राशनिंग आफिस जाकर रोज राशन कार्ड बना देने के लिए घिघियाते थे । वहा का डीलिंग असिस्टेण्ट मेरा चेला था। मैं दौडा हुआ गया और तीसरे दिन राशन कार्ड बनवा दिया।" एक ने फुसफुसा कर कहा, “एक वात सवो को नही मालूम होगी। इसे सिर्फ मैं जानता है। इनकी वडी लडकी का नाम कल्याणी था। वह किमी के साथ भाग निकली, आज तक पता नही चला।" सुनकर सभा के आयोजक बोले, "महाराज, यही बात मच पर वोलने की कृपा मत कीजिएगा। मर जाने के बाद यहा गुणगान करने की परम्परा जिन्दा रहने पर चाहे जो कर लीजिए । जिन्दा होने पर गुणो पर पर्दा भी डाल दीजिए, कोई बात नहीं।" अध्यक्ष महोदय पधार गए। यह थे-शिक्षा मन्त्री प्रकाश बाबू । वह भाषण नही करते थे, बल्कि दहाडते थे । एक माहव आयोजक से बोले, "अव हम लोग दिवाकर परिवार सहायता कोप खोलें और कम-से-कम दस हजार रसीद वही छपवा लें । वहा मज़ा आएगा।" किम कारण वहा मज़ा आएगा, इसे आयोजक महोदय मन-ही-मन समझ गए और मुस्करा कर वोले, "अभी चुप रहिए, वरना यहा एक-से- एक गिद्धराज हाज़िर हैं, ले उड़ेंगे। भला इस बात से कैसे इन्कार किया जा सकता है कि दिवाकर मलिक जैसे लोग तड़प-तडप कर भले ही मर जाए, मगर हम जैसे कलाप्रशसको के लिए कल्याण के कई द्वार खोल जाते . -

पाकममा
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पारममा में बारी-बारी मे बामण बोन रहे थे। पर टीक
पीचे गियाकर मसिकका एक पित्र टया पा और उम पर एक परनदार
मामा मटक रही पी।
सरकार की मोर ग दमयम्ती रिवाकर ममिक की पिपरा रे नाम एस
संक्षिप्त पर सभी माना है जब उधर पारमभा की पा रही है
"मरकार ने मिपय मिया है किरिवाकर मसिमनि उपयोप म
माने पामे गय मामान-मरप मामप्री पुरस्कार म मिने पदका तपा
तामपनों का स्मृतिम्मारगम्यम यग्य के सपहालय में गा गाए।
मापसे अनुरोध किया जाता है कि माप उपगपा मारा मामान पाह
रिनों रे मना म्यूजियम से पाटर पाम गमा पर हैं। निरेश या
उस्संपन करने पर मम्मकार्रवाई की मामी।"
घर पोपममा ममाप्त होही पी उपर सामने रे मैगन में कोई मन
मस्व फकीर एपतारे पर गा पा पा
'यह किमने गीत माया यह रिमने पीत माया'
जब सा बुम गई तो महफिम म म माया ।

27 महिला कालेज की रजत जयन्ती मनाई जाने वाली है। बडी धूम है । पूरा कालेज सजाया जा रहा है । एक दिन ही तो और हाथ मे है। बहुत ही बडे और सफल मास्कृतिक कार्यक्रम की योजना है । लेडी प्रिंसिपल श्रीमती जोशी अत्यधिक व्यस्त देखी जा रही हैं। उन्हें सर खुजलाने तक की फुर्सत नही । राज्य के मुख्य मन्त्री रजत जयन्ती के दिन सारगर्भित भापण करने वाले हैं। पहले वाले गवर्नर जा चुके हैं। जा क्या चुके हैं, उन्हे गवर्नरी से मुक्त कर दिया गया है। एक बार वह मुल्क के सबसे बडे चौकीदार और चौकीदार के सबसे बडे सलाहकार के यहा पहुंचे थे। कला और संस्कृति के विकास के लिए वह चाहते थे कि जिस राज्य मे वह गवर्नर की हैसियत में रह रहे हैं, वहा के कलाकारो और बुद्धिजीवियो की एक नवीनतम आद्यन्त सूची सरकार अपने पास रखे और एक विभाग की स्थापना की जाए, जिसका काम इनकी सुधि लेना हो । यही स्थिति वह मुल्क के हर अन्य प्रात में भी देखना चाहते थे। मुल्क के सबसे बडे चौकीदार के प्रधान सलाहकार ने नाराज होकर कहा था, "आप वहा गवर्नरी करते है या कलाकारो-बुद्धिजीवियो का दरवार लगाते हैं ? हमने तो कुछ और ही सोचकर आपको गवर्नर बनाया था। मुझे सूचना मिली है कि आपसे ऐसे लोग विना रोक-टोक मिला करते हैं। यह तो अच्छी बात नहीं है । प्रोफेसर चाहे अपने विषय का वृहस्पति क्यो न हो, आखिर वह एक मास्टर की ही हैसियत रखता है न । और नाचने-गाने वालो की क्या औकात ? राजभवन को तो आपने मुसाफिर- साना बना रखा है।" गवर्नर ने तव कहा था, "हा, यह वात सच है। मैं इन लोगो को अपने से बहुत वहा मानता हू।" प्रधान सलाहकार का तेवर बदल गया था। उसने कहा, "आपको राज्य का खुदा बना कर भेजा गया था और आप वहा जाकर भक्तो के ही शो-8 1 ।

पोपममा 133 भक्त बन गए। मापके यहाँ एक मन्त्री पाएपे। मापका मयान करते हए रोन ममे । उमस ही मामूम हुआ कि रामगम में इन साकारो दुचिनीमियों का स्वागत मम्मियों के मुकाबसे होता है। भवन हसारों बोदम ममन इनको पिप्साया वा दुका है। इनके नाम पर रतबाट है। यह सब पर्प कहाँ से माएमा ? "मने उपाटन करने का धन्धा का दिया है। इस पर बहुत सप होता पा। पुलिसमामे तंग मा पाते थे । मवर्नर साहब ने कहा था। प्रधान समाहकारमी मौहें तन मइ । सुनने को मिमा "मुम तो यह भी मतसाया गया है कि मापसे मिसने के लिए जब कोई साकार या बुद्धिगीमी मापके काम में प्रवेश करता है तो थाप फौरन उसमे सम्मान में उठ कर हो गाते है । तपित तो यह है कि पहले यह भर करमापके कामों को अपनी माबों मधुमे। सिर ऊपर रठाए, तो उसकी मांतों से मासूमता रहे हो मैं मगर मानता कि आप यह करिशमा पिसमाएमे सो कम-से-कम दो महीने आपको किमी मात्री के माप ट्रेनिंग मेन के लिए छोड़ देता । जनता म सौ-पपाम सोम स पुदा बन जाते हैं स उनसे मिसना कठिन हो पाता है । गवर्नर माहब भी तमा गए थे। साफ-साफ कह रिया पा "मुमम ये सारे नाटक मही हो सकते । म पुटन महसूस करता है।" माते महीने गवर्नर साहब की मबर्नरी छीन मी माई । मुना गाता है छिपारे भन एक स्पिरिचालय में पड़ाव है। इनके बार दूसरे गवर्मर माए। इनको भी यहां रह पार मास से एयादा होए है। इस बीप पूर्वी गीस इक्कीस साल की हो गई है। इसन इन बीरगो में वायमिनबावन परी दुनिया में अपना एक मलम मस्तित्व बमा लिया है। दो बार विदेगा में हजारों मुठिगीवी भोतामों के सामने अपनी पारनकता का प्रासन करमपना एक कीर्तिमान स्थापित कर लिया है। मब रसे बार मुछ नहीं पाहिए, बम सों पर बान देती है पिरा रहती है। मपनी कमा मात्र उसने मन का यह रिस्ता पोर दिया है जो कभी टूटता नही । इपयों के मामले में यह एकरम येमुरप्पय है। 1 134 शोकसभा श्रीमती जोगी अपने दफ्तर मे बैठी कुछ लिख रही थी कि हेड क्लर्क ने आकर सलाम किया और कहा, "पूर्वी मलिक के यहा गया था।" उनकी ओर मुखातिब होते हुए श्रीमती जोशी ने पूछा, "अच्छा, वह आएगी न?" हेट क्लर्क ने उदास स्वर मे कहा, "जी ना।" "ना? ना क्यो?" "भल्ला पडी और कहने लगी, 'श्रीमती जोशी से कह दीजिएगा, पूर्वी ने मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली है। और हा, तीन मिटिंग वजाऊगी। पन्द्रह मां रुपये देने को तैयार हो, तो अपने कार्यक्रम में मेरा नाम दीजिए। और जो विना मेरी स्वीकृति के कार्यक्रम में मेरा नाम दिया, तो कह दीजिएगा, श्रीमती जोशी को कोर्ट का रास्ता देखना पडेगा।" हेड क्लर्क ने बतलाया। "पन्द्रह सौ रुपये ?" है "जी हा।" मैंने कहा, "हमारे पाम फण्ड नहीं है। हम मात सौ से ज्यादा नहीं दे सकते," तो झट वोल पडी, "आप यह रकम भी बचा सकते है । श्रीमती जोशी से कहिए, खुद वजा लें । वह तोडवल एम० ए० है । वह वायलिन हाथ मे उठाएगी और उनकी डिग्निया राग देश, राग भैरव, राग शकरा यानी जो भी राग चाहेगी, वजाने लगेंगी । मैं तो पन्द्रह मो मे पन्द्रह पैसे भी छोडने वाली नही। और हा, वार-बार मुझसे पूछताछ न की जाए। श्रीमती जोगी के यहा सगीन-शिक्षिका के पद के लिए मेरा कोई आवेदन- पर नहीं पहुवा है।" "अच्छा, जाप जाइए। मैं मोचूगी। मगर ममय भी तो ज्यादा नही रह गया है। पूर्वी मलिक ने यह क्यो कहा कि वह मैट्रिक पास कर चुकी हैं ? मैट्रिक पास करने और वायलिन वजाने मे क्या तालमेल ?" श्रीमती जोशी बोली। "पता नहीं, मुझसे खुल कर इस बारे मे कुछ नहीं कहा। ।" श्रीमती जोशी दफ्तर मे वाहर आती हैं और एक चपरासी को लेकर पल पडती है वायलिन की जादूगरनी पूर्वी, दिवाकर मलिक की पुत्री, पूर्वी मलिक से मिलने। उनकी कार ननसनाती हुई आती है और एकाएक घोकममा 135 गति धीमी कर दिवाकर मसिक के परमामने कपाता है। श्रीमती बोधी साड़ी मेभामती हुई बाहर निकलती है और भागे पार पसर देती। पूर्वी द्वार खोल देती है। बहती है 'ममस्ते (टिए। मम, श्याग समय म मीबिए । भापके शासन कार ममई बापापा। मने मग मुछ बतसा दिया।" 'म इसीलिए स्वयं माई हमापा पाम। श्रीमती गोधी अत्यन्त ममता से कहती हैं। पूर्वी से पहमे स भरी हुई है। पहने मपी "या मामा तो भार प्रशासन-त्र की एक हरकत है । श्रीमती मी पुरा न मानिएगा। प्रगामा मौर कुछ पाने या न गाम ममर पवना समर गानवा है कि हिम मोरे पर गीवा मोर किस मौके पर पर बन जाना चाहिए। मापका मन हेर पसक महसबा दिया पा कि मैं मैट्रिप पाम कर प । मासूम हमा होमा। "मैट्रिक पास ?" हा भार बह मी फस्ट रिचीवन स । मगर याद रनिए, मैं उतनी ही देर मेहद भारू रहती है गितनी देर मापलिन बसाठी रहती है। रमा पार विमाम में यही बात रहती है कि बिना पयावा हा मरे म ममार स मपनी कमा का मूस्य पसूमा पाए। मोह माप तो परपान मगर बा रही है परेपान म हाइए, म मापक कामेर में नौकरी मापने नदीमा सकसी हो मापके कामेज की कुछ छात्राएं समीतपसा में मेघावी हॉमी ये मरीर भी हो सकती है पैसों से उनकी सहायता कर मरनी श्रीमती बौमी म उम रास्त पर विछ गाउंगी जिम रात में पसाकारों की भीड़ गुपरेगी मेरे ये हाठ पूम से मने रेप गाएं, मगर में मोपरणाको पूमती रागी मगर आपके मन में बगाम मिए गवार म एक पैसा कम नही सुंगी। इपनी बात ममातार दोसत-चालन पूर्वी काहप नाम हो माया मोर मह फफक-फफापर न ममी। पीपनी गोपीपी समझ म कुछ नहीं पा रहापा। ममता वा स पूर्वी या सब विधिप्तावस्था में मोसने समी।

136 शोकसभा दौडकर घर में जाती है और एक मध्यम आकार का सूटकेस लेकर लौटती है । उमे वडी तेजी से खोलती है और तीन चित्र निकालती है। इसी वीच श्रीमती जोशी बोल पडती हैं, "कलाकार आखिर अपने समाज का ही होता है। उसे अपने समाज के लिए ।" पूर्वी वडी तेजी से कहती है, "आप समाज की बातें करती है ? देखिए ये तीनो समाज के ही अग थे।" और तीन चित्र श्रीमती जोशी की ओर बढाकर वोलती जाती है, "यह रही कल्याणी मलिक, भरी जवानी जब ढलने लगी और पैसो के अभाव मे वाप शादी न कर सका, तो किसी के साथ भाग गई । तव समाज कहा था ? और इन्हें देखिए-ये हैं मेरी मझली वहन, बागेश्वरी मलिक | --कृष्ण का रूप धारण कर नृत्य करते समय विलकुल कृष्ण वन जाने वाले दिवाकर मलिक की दूसरी पुत्री । इन्हें गले मे फामी लगाकर ममार छोडना पड़ा। यह समाज तब भी था। और ये रहे मेरे कलामाधक पिता, दिवाकर मलिक | परेशानियो और घवराहट मे जिनका हार्ट फेल हो गया और यह रही मैं, इनकी अन्तिम पहचान, पूर्वी मलिक ! झूठ क्यो वोलू, मैं पैसे को दातो से पकडती हूँ, मगर नाजायज ढग से नही, बेईमानी से नहीं, नीचे की फाइल ऊपर करके नही।" श्रीमती जोशी ने जैसे निवेदन करते हुए कहा, "आप इस प्रात की लाज हैं । आपने विदेशोतक मे मुल्क का नाम आगे बढाया है।" "और मेरा वाप क्या इम मुल्क का कूडेदान था ? जाइए, महाप्रभुओ के आगे दुम हिलाइए।" पूर्वी ने एकदम से फटकार दिया। श्रीमती जोशी एक प्रकार से रोती हुई बाहर निकली और तव दरवाजे पर खडी होकर पूर्वी पागल की तरह ठहाके लगाने लगी। . सोहन प्रिंटिंग मविम, शाहदरा दिल्ली-110 38602

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Shok Sabha

Author
Shriwastav Kunal
Title
Shok Sabha
File name
Shok Sabha
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552198
Barcode
4990010032914.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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