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Marudevta Ka Mantra Sangrah Hindi Anuvad

Satavlekar,damodar · 2012/08

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वीर मरुतोंका काव्य। वीररसपूर्ण काव्यके मनन से उपलब्ध बोध । महिलाओं का वर्णन नहीं पाया जाता है। किसी भी वीर-शा में नारियों का जग एकए कंग से भपश्य ही उपरता। पंचमदाराम या भन्य काप्यों का निरीक्षण कानेपर : दोता है किन में बीरी के वर्णन के साथ दोसामनरी वाया । पमान भवपीरिया है। प्रिया पर्णन किया से शायद एक भी वीर-चाम्य नही पाया है। परिम नियम को भपयाद भी हो, गोदासे इस निपको ही मिता होती है, पेमा करना पडेगा। en. मग २७ मनिषोंने हम मरदेवसा-विषम पारका सगा रियाद पेमा जान पता है (देशो - १९५ ), भीर भर मया में सपियों का भी भाभापरिमाना तो सग ऋरियों की भरपा ५ोगा। १८ परे ही भायं की पाकिइसनेनप्रवियों के निमित काम्य में पर मी जगहमरी के स्वगाव का निर्देश नही सिपाहै। ऐमातोनही कहा जा समिविगार का पाहीन रते थे, कि ऋषियों ने इन्दा वर्णन करते समय किसीialम उपागमा भारोप डिया। मिन अपियों ने इरफा गयाटाने में सानाहानी नही ही मritut piR ने द्वारा रंश मात्र भी उगन करने ससे यह दोता है मिह के भनुगमनपूर्ण पाप में गाय पनि हम पर ही मर-देवता के मन्त्री का भय, मधं पिरयुन मगह नहीं थी। ध्यान में रहे कि माद भोर दिपणी पर पुरे है। पोकेमा विचार, सैनिक भार ये अपने सनिकीय जीवन में गाय में पुमापितों का निर्देश एवं पुनरुत मात्रा का समाप भी मोसो दूर रहते थे | मा म योप के गया मास्टेरिया मानको है। महमें संक्षेप में देखना है कि समय गिने जाने गरे राष्ट्रों के सनिकों का मनोरम उन सा पानपूर्वक मययन करनेसे में कौनमा करने है, तो पता पहना है कि पदिय नग में मने. पोप मिल सकता है। हम मदन-र में अन्य कार्योकी रिने हगें भोर कहीं दिशाओं पर उनकी निगार पर अपेक्षा जो एक भन्शी विभिनता दल पी., यो जाए तो पतन्य एवं उगल waiय करने में दिया हैसिय में- विधानेन ।परमात सपको शायदमन इस मार .

(१) देवत-संहिता। मरवता। । . में अधिक लिखना उचित नहीं जंचता। हाँ, इतना सो साधारण स्त्री। निस्सन्देह कहा जा सकता है कि इन सभ्य पाश्चात्यों को अपने सैनिकों के महिला-विषयक संयम के बारे में भाभ- साधारण्या इव मरतः सं मिमिक्षुः। (ऋ० १११६७४) मानपूर्वक कहना दूभर ही है। रेकिन मरतों के चैरिक काव्य में स्नगाय के वर्णन का पायुगण चाहे जिस भूमि पर जल की वर्षा करते घटसे है, जिस प्रकार साधारण कोटि का पुरप साधारण सी से पूर्णतया अभाव है । यह तो विशुद्ध वीरकान्य है। ऐमा यो उपाय करता है। इस उपमा में साधारण सी या पहेचिना नहीं रहा जाता कि हम भारतीयों के लिए यह उल्लेख भाया है। यभिचारयम में प्रवृत्त पुरप किसी भी बही नारय एवं भामसंमान की बात है । यूं कहने में साधारण स्त्री से समागम करता है। उसी तरह मेघ चाहे कोई भापति नहीं प्रतीत होती है कि, जो संयमपूर्ण जीवन जिस तरह की भूमि हो, उसपर वर्षा करता है। परन्तु जो मिताना सुसभ्य योरपीय सैनिकों के लिए असंभय तथा सदाचरणी मानव है, वह अपनी पुरशील संपन्न नारी से भर दुगा, पही इन मरतों के लिए एक साधारणसी नियमित गसे व्यवहार करता है । इस पर्णनके पूतेपर पात थी। स्त्रियों एवं पुरषों के दो तरह के विभेद हमारे सामने उट इम ममूचे काग्यमे नारियों के सम्बन्ध सिर्फ १६ उल्लेख खड़े होते हैं- पाये जाते हैं, जिनका यहाँपर विचार परमा धिस जान १. एक विभाग में उन खियों का वर्णन है, जो हमेशा पटता है। घर के अन्दर अन्त पुर में निवास करती है और एकाध नारीके तुल्य तलवार । मौके पर धार्मिक समारंभों में ही समाजों में प्रकट होती हैं। ऐमी नियों से सदाचरणी पति धर्मानुकूल व्यवहार गुहा चरन्ती मनुषो न योपा । (ऋ० ॥१६॥३) प्रचलित रहते हैं । वीरों की तलवार (परदेमें रहनेवारी) मागप-बीके २. दूसरी श्रेणी में साधारण स्त्रियों का भरतर्भाप हुभा गुष्प लुक छिपर मियान में रहती है।' यहाँ निर्देश है परसा है, जो कि हमेशा बाहर घूमा करती तथा पुरषों से कि मानव-मारियाँ घर गुप्त रूप से निवास वरनी भनियमित पाप रख लेती । थी। येयह वर्णन तो परदा-प्रथा के समकक्ष दीप पड़ता है। सरचार तो हमेशा भियान में पदी रहती है, योवा) अन्न पुर में निवास करनेवारी मदिरा वेदने प्रथम विभाग में आनेपाली (गुहा चरन्ती यह कदाई के मौके पर ही पार आ जाती है, माकी है और अन्य साधारण नियों की निन्दा और उसी प्रकार घरों में भटश्य एवं गुप्त रूप से रहने वाली है। पहिले प्रकार की सती साधी माहेराएं जब मदिरा धार्मिक अवसरों पर ही सभासमाजों में घरी भाती थीं, यही इस उपगा का भागय दिखाई देता है। सभासमाजों में ) दाग्विल होती हो, तप (माते प्रतीत होता है कि उस माल में ऐसी प्रथा पशप्लको शन् । पर. ८१३३१९ ) उन को योग तथा हो कि विहीं वास अवसरों पर जैसे irl या पिंदरियाँ दृष्टिगोचर न रहने पार्थ पेसी भागा घेदने दी है। पा आदि यो समय स्त्रियों को उपस्थित होने में पाये में ऐसे भी भादेश पाये जाते है कि जनता के मध्य संचार करते समय नारियों को करना चाहिये कार नहीं थी, परन्तु अन्यथा देवियों घरों पे भीतर ही उन का अगोपागोस न पटे इसलिये अपना समूना का-यापन करती थी। पीर भरीभांति वसों से देना चाहिये। उपयुक्त वर्णन सो सती साध्वी महिला के लिए लागू परता है और इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार की नी को उत्तम माताओंके सिलाडी पुत्र । • साधारण स्त्री' कहा गया है। जिसने सताय मे मुंह शिशलाः न कोलाः सुमाता (ऋ. १०७८६) गोरदिगादो पद ' सापारण मी' ही थी। नम श्रेणी मावामी के पुम बिधी हो ।' . 6 धीर मरतों का काव्य। . ये उसम माता भार ही ऊपर यसलायी हुई साचो माया करते है, उसी प्रकार मातृभूमि को माता माननेवाले महिलाओं में पाई जाती है। इन्हें 'सुमावा 'पहा है। वीर अपने गणवेश से सने हुए रहते हैं।' मरुत् जो पैश- दूसरी जो साधारण महिलाएं होती है, प सुमाता नहीं भूगा करो हैं तथा अपनी जो शोभा पदाते हैं, वह मारी 47 समनी । इस से स्पष्ट है कि उतम मन्नान होने के उनके अपो गणवेशपर ही निर्भर है । मरतो का गणवश रिप सयमील घतार की बायका है। उन सय के लिय समान (अर्धात युनिफॉर्म ये वरपर महिलाओं के समान वीर अलंकृत तथा याया दुभा) रहता है। उन के तो शस्त्रास्त्र एष धीर. भूपण है, उन से ही उनकी वेशभूषा पर सजावट सि विभूपित होते हैं। हो जाती है। ये पीर मरर चाहे जैसी भूपा नहीं कर मदों ये वर्णन में भोर गार ऐगा वर्णन भाया है सकते, अपितु टा का जो गणवेश निर्धारित दो शहरे कि, ये पी सतिय अपने भापको नियों के समान विभूः उमी से यह मलति करनी पडती है। इस पर्णा से पित करते ?-(प्र ये शुम्भन्त जनयो ग १८५१) स्पष्ट है कि, भाधुनिक सनिको के तुल्य ही इन्हें अपना 'ful wो माई ये घोर अपने शरीरों की मसावट पूष गणरेश साप मुभरा जगमगाराला मार रखा। पर लेते है। हम देखा है कि भाधुनिक युगमें योरपीय पता था 1 इमी वर्णन को और भी रखिए-- प्रणाली अनुसार गुम होयाले मनिक भी महिलामा मायुधास गिण सुनिष्का । की सही पूप मनावसिंगार करते हैं। प्रत्यय आभूषण उत स्वयं सन्यासम्मगाना ॥ घर किरमा दधिपार, हरएक सरह या कप साफ सुथरे, (फ १६११) (२५) गप शापोंछ कर रखे हुए, व्यवस्थिन तथा चमकी सस्य चित् दि तन्य. शम्भमाना। कर दी सुध गरी तरह दीप पड़े इस ग से धारण (क्र ७१५९१७) (२८) परोपाहिए। म अनुशासनका पारा यसमााकारीन से में स्पष्ट दिखाई देता है। महिला किस प्रकार भाई, स्यक्षमि. सन्य. शुम्ममाना। में पारयार अपनी मायति देवकर पेशगूपा कर देती है ( १९६५(१८४) भौर साफाक माजभिंगार पर पुकोपर ही पूय यन उप पियार धारण करतेहारे, धछ मालाएँ पहनने- रासर पादर चली जाती है, टीम से ही ये धीर सिपाद पार राधा येगपूर्वा आगे बढने पार ये पीर गुद ही अपने गट ATTER सूप ठाठ-बार या साये गमगाने. शरीरोंको मुशोभित करने है । यद्यपि ये मुगुप्त जगह रही यारे दथियारों को क्या आभूपनी यो धारण कर यात्रा है, राधापि अपनी पारीरभूपा मरायर मनुषण पाये रखते यो निर पल हैं। है । अपने अन्दर विद्यमान क्षात्रते से शरीरशोमा को ये महापर, भावनिर पोखीय सरिता 17 में दंगा करते हैं।' राथा ये में दर्शाये ग से मरुती पे वर्णन में मिरक्षण इस प्रकार इन मूतों में हम हा धीरों के निजी यास समानता दिगाई देती है जो दि सचमुच प्रेक्षणीय है। शारीरिक भूपा तथा भरकृति के सपधौ उल्लख पाते हैं। मदनदि इस सिंगारपे सपधर्म और भी उहप पाये जाने पिशा इस सपिश। (१६४८१ (११५) है जिसमें से यु एवं उद्धृत किये जाता है, सो देखिए अनु श्रिय धिरे। (फ ११६६०) (१६७ ) यक्षश न शुभयन्त मर्या । सुचन्द्रं सुपेशसं वर्ण दधिरे। ( ७५६६१६ ) (३६०) (२३५११३) (०११) गोमातर. यत् शुभयन्ते अन्जिभि । महान्त वि राजथ। (फ ५५५।२ ) (०६६) ( १८३) (१५) मपाणि विमा दया । (५५२६११) (२७) ५४-समारभ देखोरे लिये भये हु रोग निय • ये पौर पदी गोमायमान दिखाई देते हैं, HEIR METHोक सभा से तुमार यार भारी मात में है, चोधिपावादी सरकाविधारण ।

देवत-संहिता। [मरदेवता। करते हैं । ये बहुत सुहाते हैं, पढे सुन्दर दीख पडते है।' नीच के भाव नहीं के परापर होते हैं, क्योंकि उन की इस भांति इम का वर्णन किया है । इन वर्णनों से इन समानता सर्वमान्य होती है। पीरों की चारता पर स्पष्ट भालोकरेखा पटती है। इस से संघ बनाकर रहनेवाले धीर । एक बात स्पष्ट होती है कि ये वीर मन्त् भइपन से कोसों दूर रहा करते थे, सदैव भपने सुन्दर गणवेश से विभूषित ये वीर मरत सांघिक जीवन विताने के बादी थे। हो व्यवस्थित ढग से रहा करते थे, अतएव उनका प्रभाव साव सात की कतार में चरते हुए, चढाई करते समय चतुर्दिक पैल जाता था। सब मिलकर एक कतार में शादरपर टूट पहनेवाले थे। उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट दिखाई देता है कि, भाधुनिक इस पे उल्लेख देसिए- सैनिकों के समान ही वीर मरों का रहन-सहा था। मारताय शर्धाय हव्या भरभ्यम् । इस सम्बन्ध में और भी कोनसी जाकारी प्राप्त होती है, (फ ८१२०१९) (९०) सो देख रेना चाहिये। मातं शर्ध अभिम गायत । (ऋ. १३५०) (६) मार शर्धः उत् शंस । ( ५/५२१०) (२२४) एक ही घर में रहनेवाले वीर । धन्दस्व मारतं गणम् । (ऋ. १३३८१) (३५) सभी मरतों के निवास ये रिए एक ही घर बनाया मारतं गणं नमस्य । ( ५/५२।१३) (२२९) जाता था, या एक परे विशार घर में ये समूधे कौर रहा सप्तय मरतः। ( ८१२०१२३)(१०४) करते थे। इस सम्बन्ध के उल्लेख देखिए- गणधियः मरुतः। (६९) (११६) समोक्स इपुं दधिरे । ( ११६४११० १(११७) ' महतों के सघ के लिए भर का समह कसे, मरवों के ऊरक्षया. सगणा मानुपासः। मंघका यर्ण करो, मरतों के समुदाय के लिए भभिवादन (अवर्ष ७३ ) (४७) करो, सात सात की पक्ति पनाकर ये चलते हैं और समु. प उरु सदा र तम् । (१८५६)(१२८) दाय में ये मुहाते हैं।' उसी प्रकार- उर सदः चक्रिरें। (* 11८५७) (१२९) मारतं गणं सश्चत। ( MIR) (१९९) समानस्मात्सदसः। ( १८१५) (३२१) घृष-मातासः पृषतीः अयुध्यम् । एक घर में रहनेवाले ये चीर याण धारण करते हैं। ( ११८५४) (१९६) इन के लिए बहुत पर विस्ता मका तैयार किया जाता स दिगणः युवा। ( १८७४)(१४८) था। उसी प्रकार- वृषा गण अपिता। (. ११८७५) (१४८) सनीला मर्या स्वभ्या नरः। नातं मातं अनुक्रामेम । (क ५/५१)(२४४) ( १५६१ ) (३६५) 'मस्तों के समुदाय को प्राप्त करो। यह सप (यूप- सययस. सनीळा. समान्या । ( १।१६५।१) मास ) पलियों का है। यह अपने रथ को धन्धेवाली (इन्द्र ३२५०) घोदियाँ या हरिनियाँ जोतता है। यह युवकों का समुदाय (स-नीला ) एक घर में रहनेवाले (मर्या )ये है जो हमारी रक्षा करता है। इस समुदाय के साथ भनु मरने के लिए तैयार वीर अच्छ घोसपर बैठते हैं। वे प्रम से हम घलने रहें।" सभी समान सम्मान के योग्य है और समान भयस्थावाले उपयुक्त मत्रोतों में दांया है कि ये धीर सोषिक जीवन है।' यह समूचा वर्णन माधुनिक सैनिकों के वर्णन से बितानेवाले और सामुदायिक उगपर कार्य करनेवाले हैं। मेल खाता है। भाज दिन भी सैनिक एक मकान में (एक सप पनाकर रहना, तुल्य पेश धारण करना, साव सातकी बैरक में ) रहते हैं, सय की अवस्था भी रगभग एकसी कतार में घलगा, सय के सय पुश्क होना या समान रहती है, सय एक ही श्रेणी के होने के कारण भरिपम भवस्थापाले होना अर्थात् हा घोटे पाठक एष पर रूप से सामान के योग्य समक्ष नारे हैं, उन में उघ मनुष्यों का भभाष सपा समूषी माता की रक्षा करने । - वीर मरुतो का काव्य । (७) . गुहार कार्यगार कंधे पर ले लेगा, यह सारा का सारा रहने के लिये सय को एक ही पर, एक ही उद्देश्य की पर्णन वर्षमानकालीन सैनिकों के वर्णन के तुल्य ही है । पूर्ति के लिये सम वीरों का एक कार्य में सतर्कतापूर्वक जुट (१)शर्ध, (२) वात और (३) गण, इस प्रकार इनके जाना, इस भांति यह मरुतोका वर्णन भर्यात् ही आधुनिक समुदाय के तीन प्रकार है । गण में ८०० या ९०० सैनिकों सैनिकों के वर्णन से माश्चर्यजनक साम्य रखता है। दोनों में की सम्पाका भन्तमाव होता होगा, ऐसा पृष्ट १६ पर किसी तरह की विभिलता दृष्टिगोचर नहीं होती है। दीने की चेष्टा की है। पाठक इधर उसे देख लें। उसी अपितु अनूठी समता दिखाई देती है। प्रकार पृष्ठ १६५-१६६ पर एक चित्रद्वारा यह पतलाने का मरुतों का गणवेश ( या युनिफार्म)। अपरन किया है कि इन गणों में मरतू किस दंग से खरे रहा करते थे। पारक उस समूचे वर्णनको अवश्य देख लें। भरत देवराष्ट्र के सैनिक हैं । देखना चाहिए कि, इनका हमारा अनुमान है कि पार्ध और मात में संस्था कुछ अंश गणवेश किस तरह का हुआ करता था। तक अपेक्षाकृत न्यून हो। कुछ भी हो, अधिक निश्चित सरपर शिरस्त्राण। www.लिने सह संयंश में निकाल हा पेरमपने मस्तकपर रिसरमा सरसर रख लेते जा सकता है। ये शिरस्त्राण लोहे का बनाया हुभा तथा सुनहली बेल- इससे एक यारा मुनिश्चित ठहरी कि मगत् संघ यनाकर बुटी से सुशोभित रहता और भगर साफा पहना जाता तो रहा करते थे। इतना जान लेने से यह सहज ही में ज्ञात वह रेशमी होता तथा पीठपर उस का कुछ अंश छुटा हो सकता है कि वे एक ही घर में रहा करते थे और एक रहा था। इस विषय में देखिए- पंक्ति में सात सात वीर खरे हुआ करते थे। शीर्षन हिरण्ययीः शिप्राः व्यास । सभी सहश वीर। (ऋ. १२५)(७०) अज्येप्टासो अकनिष्ठास पते। हिरण्यशिप्रा याथ। (म. १३४३) (२०१) संभ्रातरो वावृधुः सौमगाय । (फ. ५६०१५) सार्पसु नृम्मा। (ऋ. ५/५७६) (२८९) ते अज्येष्टर अनिष्ठास उद्भिदो- शीर्षसु बितता हिरण्ययीः शिधाः । ऽमध्यमासो महसा विधायधुः। (ऋ. १५९१६) (म. ५/५४।११) (२६०) 'ये सभी वीर मरत् साम्यवादी हैं क्योंकि इनमें कोई 'सरपर रखा हुभा शिरस्त्राण सुनहली वेळ बूटीसे सुशो- मित भी (भज्येष्ठासः) उच्चपद पर बैठने वाला नहीं राधा ( भ. हुभा करता और रेशमी साफे भी पहने जाते थे।' कनिष्ठासः) न कोई निम्न श्रेणी में गिना जाता है और इस से ज्ञात होता है कि, उन के गणवेश में शिरोभूपण किस दंगका रहा करता था। (भमध्यमासः) कोई मझले दर्जेका नी नहीं पाया जाता है। ये सब (भ्रातरः) आपस में भ्रातृवस् यर्ताव करते हैं। सबका सहश गणवेश। ये साम्यावस्था का उपभोग लेनेवाले बन्धुगण है। ये सभी ये अजिभिः अजायन्त। (ऋ. १२३७२)(७) इकट्ठे होकर (सौभगाय सं वावृधु.) अपने उत्तम भाग्य एषां अजि समान रुपमासः विभ्राजन्ते । के लिए भविरोध-भाव से भली भाँति चेध करते हैं। ( ८1०111)(९२) मवकप यही है कि, ये सभी वीर समान योग्यतावाले वपुषे चित्रैः अग्जिभिः व्यञ्जते । हैं । समान भायुयाले, समान डीलहौलवाले पथा एक ही (R. १११६४४) (१११ ) अभ्युदय के कार्य के लिए भामसमर्पण करनेवाले ये वीर गोमातरः अग्जिभिः शुभयन्ते । है। पाठक अवश्य देख लें कि, यह समूचा वर्णन आधुनिक (क्र. ११८५३) (१२५) सैनिकों के वर्णन से कितना भभित हैं। सब का गणवेश पक्षासु रुक्मा भंसेपु एताः रभसास: अजयः। समान, सम का रहनसहन समान, सबके हथियार समान, (ऋ. १।१६६।१०) (१६७) । ।

देवत-संहिता। [ मरवमा। - ते क्षोणीमिः अरणेभिः सन्जिभि वृधुः। परसु मादयः यक्ष सुरसमाः। (म २।३१३) (२११) ( ५५४३१) (२६०) अअिभिः सचेत। (म. ५/५२११५) (२३१) रामभवक्षसः वयः दधिरे। (ऋ ५५५/१) (२६५) ये अजिषु यापु सादिषु ना धाया। रक्मयक्षसः अश्वान आ युजते। (क्र. ५५५३१४ ) (२३७) (क्र.२१३४८) (००६) 'ये वीर अपने अपने वीरभूपों के साथ प्रकट होते हैं। 'इनके पक्ष स्थल पर स्वर्णमुद्राओं के हार रहते हैं। इनके गणवेश सब के लिए सदृश यनाये दीस पडते है पैरों पर नूपुर और रोभाग में मालाएं रहती है जो कि भौर इनके गले में सुवर्णहार सुहाते है। भाति भाँति के जगमगाती हैं। ये आभूषण बिलकुल स्वच्छ एव शुभ होते आभूपर्णो से वे अपने शरीरो को सुशोभित करते हैं। भूमि हैं और बिजली के तुल्य चमकते हैं। गले में हार धारण को माता समझनेदाळे ये दौर अपने गणवेशों से स्वय करनेहारे ये वीर अपने रथों मे घोडे जोतते है।" सुशोभित होते है। इनके चक्ष स्थल पर मालाए तथा धों इस वर्णन से इनके गणवेश की करपना की जा सकती पर गणवेश दिखाई देते हैं। वे केसरिया वर्ण के गणवेशी है। शरीरपर केसरिया रंग के कपडे, यक्ष स्थल पर स्वर्ण- से युक्त होकर अपनी शक्ति बढाते हैं। वे सदा गणवेशों से मुद्राहार, हाथपैरों में वीरस्वनिदर्शक वलयटक या कैंगन युक्त होते हैं और वे वस्यालकार, स्वर्णमुदाओं के हार, सभी साफ सुथरे, धमकीले एवं दामिनी के नुल्य जग- वलयकटक एवं मालाए पहनते हैं।' मगागेवाले रहा करते। ये सातसातकी पंकि यनाकर रहे उपर्युक्त अवतरणों से उनके गणवेश की कल्पना आ रहा करते भौर दोनो भोर दो पार्धरक्षक भास्थित रहते । सकती है । 'अजि' पदसे गणवेशका बोध होता है। उनके इस माँति सात पताका सृजन हो जाता और जर पक्षी कप केसरिया वर्ण के तथा तनिक रक्तिम भाभावाले होते सजधज एव ठाटयाट से ये वीर सज्ज हो जाते तो (गश- थे। 'अरणेभि क्षोणीभि ' इन पदों से स्पष्ट सूचना धिय.) सघ के कारण ये बहुत सुहाने लगते। उनकी मिलती है कि उनका पहनावा भरण-केसरिया वर्णवाला शोभा माधुनिक सुसज्ज सेनाके समकक्ष ो जाती है। हुमा करता था | वे वक्ष स्थलों पर स्वर्णमुदा सदृश भर. हथियार। कारों के गहने पहनते जो उनके केसरिया कपडों पर खूप भाले सुहाने लगते थे । हाथों में तथा पैरों में चलयसदृश भाभूषण मुहाते थे। शायद ये विशेष कार्यवाही करने के निमित्त मिले ये प्रधिभि अजायन्त । (२० ॥३७२)(७) हुए वीरस्वदर्शक लाभूषण हों। इनके अतिरिक्त ये पुष्प पाहुपु अधि ऋरय दविद्युतति । मालाए भी धारण कर लेते । इनके इस गणवेश के पारे में (नर ८१२०111) (९२) निम्न मन्म देखनेयोग्य है। असेषु काटय निमिमृक्षु । (ऋ. १६४१४) (१११) नाजदष्टयः उजिघ्नते। (ऋ. १६11)(१९८) शुभ्रसादय एजथ । (र २०१७) (८५) रकमवक्षसः। (२०२१)(२००) भ्राजदृष्टय स्पयं महित्वं पनयन्त। (२३४२) (क्र १८७३) (१४७) यक्ष सु शुभे रकमान अधियेतिरे। भ्राजदृष्टया दृल्हानि चित् अचुच्ययुः (मा. १६४१५) (१११) 11६८१५)(१८६) यक्ष सु घिरफमतः दधिरे। भ्राजहएयःमरुतः आगन्तन। (१८५३) (१२५) (ऋ. २१३१५) (२०३) रुक्मे आ विद्युत असृक्षत। भ्राजहएयः घय दधिरे ।(क ५/५५१) (२६५) ( ५५रा) (२२) येष्टिमिः विम्राजन्ते । ( १८५४) १९२६) वीर मरुती का फाय। (९) स्वधितिवान् । - पारिमद्भिः रथेभिः आयात । तलवार, वन। (R. 11८८१) (१५१) सुधिता घृताची हिरण्यनिर्णिक वज्रहस्तैः अग्नि स्तुपे। (प्र. ८७३२)(७७) प्राष्टिः येषुसं मिम्यक्ष । (*. १६७३ ) (१७४) विद्युद्धस्ता । (ऋ. २५) (७०) ऋष्टिविद्युतः मरतः। (ऋ. १६८५ ) (१८७) हस्तेपु कृति च सं दधे। (ऋ. १११६८।३ (१८५) ये शाहिविद्युत. नमस्य । (ऋ. ५५२।१३) (२२९) (ऋ. ११८८०) (१५२) युधा आ ऋष्टीः असृक्षत । (म. ५१५२१६) (२२०) 'ये वीर हाथ में तलवार या वन धारण करने वाले है। घः असेषुऋष्टयः, गभस्त्योः अग्निमाजस विद्युत बिजली के तुल्य हथियार इन के हाथ में पाया जाता है। (क्र. ५.४111) (२६०) तेज धारवाली, तुरन्त काट देनेवाली यलवार ये पीर 'ये वीर अपने भाले लेकर प्रकट होते है। इनकी भुजा. धारण करते हैं। पर तथा कंधोंपर भाले द्योतमान हो उठे हैं। तेज:पुज 'कृति' का अर्थ है. तीक्ष्ण धारयाली तलवार । पत्र हथियारों से युक्त होकर ये वीर अपने महत्व को यदाते भी एक हथियार है जो पहिये के माकारवाला होता मा है। चमकनेवाले हथियार लेकर ये वीर रथपरसे भाते है। तेज दन्दानेदार बनता है। पर कई स्थानोंपर सम्यन्त इन के हथियार बढिया, मुदृढ, मुतीक्ष्ण, सोने के मुतीक्ष्ण तलवार को भी वन कहा है । तुल्य चमकनेवाले होते हैं। चमकीले भालों से युक्त हथियार । ये वीर स्थिर शत्रुको भी विकम्पित कर देते हैं। कंधोंपर भाले रखे हुए हैं और इनके हाथों में तलवार रहती है।' प्रभुक्षण ! हवं वनत। (मर.10९)(५४) ऋभुक्षणः । प्रचेतसः स्थ। (२) (५७) मष्टि का अर्थ है भाला, कुल्हाटी, परशु या तत्सम मुष्टि ऋभुक्षणः! सुदीतिमिः धीळुपविभि आगत। में पकडने योग्य हथियार । जय सैनिक भाले लेकर खडे होते हैं तब कंधों पर अपने भालों को रख लेते हैं। उस (म २०१२ ) (८३) गमस्त्यो, इपुं दधिरे। (म.६१०) (११७ ) समय का वर्णन इन मंत्रों में है। हिरण्यचक्रान् अयोदंष्ट्रान् पश्यन् । कुठार या परशु। (२. ११८८१५) (१५५ ) ये चाशीभिः अजायन्त। (१३७, (७) प. झिविदती दिद्युत् रदति। हिरण्यवाशीभिः अग्निं स्तुपे। ( ८७३) (७७) (ऋ. १११६६०६) (१६३) तेवाशीमन्तः। (१८७५) (१५०) यः अंसेषु तविषाणि आहिता। धः तनूपु अघि याशीः। ( 11८८३३) (१५३) ( 11१६६।९) (१६६) ये वाशीषु धन्यसु भायाः। ( ५।५३।४) (२३७) पविषु अधि सुरा. (२ १३१६६।१०) (१६७ ) 'वाशी का अर्थ है कुल्हाडी या परशु । यह मरतों का घ. ऋजती शरु । (क्र. १७२।२) (१९६) एक शस्त्र है। परशुसहित ये वीर प्रकट होते है। इन चक्रिया अवसे आववर्तत्। ( २।३।१४) (२१२) कुल्हाडियों पर सुनहली पच्चीकारी की जाती थी। ये धन्वना अनु यन्ति । ( ५/५३१६) (२३९) वीर हमेशा अपने पास कुठार रस लेते है। समीप तीक्ष्ण विद्युता सं दधति । (ऋ. ५।५४१२) (२५१) कुठार एवं बढिया धनुष्य रखते है। वः हस्तेषु कशाः। (ऋ. ११३१३)(८) इन वर्णनों से पाठकों को इन के कुठारों की कल्पना 'ये शस्त्रधारी वीर हैं। यढिया, तीक्ष्ण धारावाले शस्त्र भाजायगी। इनके हपियारों में भाले, कुठार एवं धनुध्यो लेकर तुम इधर आओ। तुम हाथ में दाण धारण करते हो। का भन्तभाव हुभा करता था। साथ ही तलवार भी रहा तुम्हारे हथियार सुवर्णविभूषित पौराद की-बनी दंष्ट्रानुल्य करती थी। विभागों से अलंकृत है। तुम्हारा दन्दानेदार बिजली की मरुत् प०२ (१०) देवत-संहिता। महवना । घ आयुधा स्थिरा। तरह तेजस्वी शस्त्र शत्रुके हुकडे कर रहा है । तुम्हारे कंधों सुदृढ़ मजबूत हथियार पर हथियार लटक रहे हैं। तुम्हारे हथियार तीक्ष्ण धाराओं (क. ॥३९॥२)(३७) से युक्त है। तुम्हारा हथियार वेगपूर्वक शदल पर जा पारयेषु स्थिरा धन्यानि आयुधा। गिरता है। तुम्हारे पहिये जेसे दिखाई देनेवाले आयुष से (ऋ. २०१२)(९३) तुम जनता की रक्षा करते हो। धनुर्धारी बन कर तुम यात्रा 'महलों के हथियार बढेको सुदृढ़ हुआ करते और उन फरते हो। तुम्हारा सघ तंजस्पी बत्रों से मुसा होता है। के रयों पर स्थिर याने न हिलनेवाले धनुष्य बहुतसे रखे खाते थे। यहाँपर चल तथा स्थिर दो प्रकार के धनुष्य तुम्हारे हाथों में चावूक है।' हुआ करते ऐसा जान पटना है। वजस्तंभों से बाँध इन मत्रांशो में मरुतों के अनेक हथियारों का निर्देश धनुष्य स्थिर और योरोने अपने साथ रखे हुए धनुष्य चल देखने मिलता है । दन्दानेदार वन और पहिये, याण, शर, कहे जा सकते हैं। स्थिर धनुष्योंपर दूरवक फेंकने के लिए बढे वाण एवं धडाके से दृट गिरनेवाले गोलक भीलगाये धनुष, तलवार, छोटेमोटे लंबी या छोटी मूदवाले हथि. जाते । चल धनुष्यों से प्रायः सभी परिचित होंगे। ऐसा यारों का उल्लेख है । इस से मरुतों के हथियारो एवं उग जान पडता है कि, केवल महारथी या भतिमहारथी ही के गणवेश की अच्छी करना की जा सकती है। स्थिर धनुष्यों को काम में ला सकते थे। 1 मरुतों का घोडे जोता हुआ रथ । मरुतों का रथ । मुच वर्णन करनेयोग्य है । ये धौर रथों में बैरकर अपना मरता रथे शुभं रार्थ अमि प्रगायत । बळ प्रकट करते हैं। (१३)(६) पपा रथा- स्थिर सुसंस्कृता.। 'मस्तों का पल रयों में मुहानेवाला है।' वह सर- (ऋ. १३८१२) (३९) वीर मवों को काध्य। आयात। । " मरुतः वृषणश्येन वृषप्सुना वृपनामिना रथेन होते हैं। इनके रथों में बैठने की जगहें कई होती है। आगता (२०१०) (९१) इनके रथो में तेजस्वी तथा बढिया इधियार रखे जाते हैं बन्धुरेपु रथेषु यः आ तस्थौ। और घोडे भी जोते जाते है। इनके रथों में सब कुछ अच्छा ( १६९) (१९६) ही होता है। इनके रथों का धुरा एवं उसके पहिये टी विद्युन्ममि स्वः ऋमिद्भि अश्वपर्ण. रथेभि समय पर घूमते रहते है। ऐसे रथों में पैठनेवारे इन पोरी (1) (१५१) के समीप भला कौन जा सकता है ? हम तुम्हारे रयों के पः रयेषु विश्वानि भद्रा । ( १११६६।९) (१६६) पीछे चले भाते हैं । भराई करने के लिए जानेवाले तुम्हारे वाअक्ष चक्रा समया वि ववृते।" रयों को देखकर जनता उनके पश्चात् चरने लगती है।' मरुता रथेषु अश्यान आ युंजते। इस वर्णन से मरतो के रथ की पना की जा सकती (२०४८) (२०६) है। थैठने के लिए मरनों के रथो में कई स्थान रहते हैं, रथेषु तस्थु१. श्वान् रक्ष ययु। जिन पर रथारोही पीर बैठ जाते है। मरतों ये रथ बडे ( ५/५३२) (२३५) सुदृढ ढग से तैयार किए जाते हैं अर्थात् उनका छोटाया हिस्सा भी त्रुटिमय नही रहता है चाहे पहिया, धुरा या युष्मा रथान् अनु दधे । ( ५।१३।५) (२३८) अन्य कोई कीलपुर्जा हो । युद्धभूमि में भीषण सर्प तया शुभं यातां रथाः अनु अवृत्सत । मार काट में ये टिक सके इस हेतु को ध्यान मे रयकर ये ५.५१-९) (२६५-२७३) अत्यन्त स्थायी स्वरूप के मनाये जाते है। इा रथोम इन पी के रथ परे ही सुरत हुआ करते हैं। इनके चोदे तथा कभी कभी हरिनियाँ भी जोती जाती थी। रयो के घोरे पलिष्ट और उनके पहिये मजयून दगवे यनाये देखिए ये उल्लए- (क्र. Tara महतों का चकारहित और हरिणयुक्त रथ । श देवत-संहिता। [मरदेवता , हरिणां से खींचे जानेवाले रथ । । स्लेज' कहते है, भाज भी प्रचारित है जिन्हें पारह सांगे या हरिनियाँ खींचती हैं। मरतोंके रथ हरिनियों एवं बारहसींगोंसे खींचे जाते थे ऐसा वर्णन निम्न मंत्रांशों में है। पाठक उनश विधार करें। इस से प्रतीत होता है कि, मरन् यीले स्थानों में रहते हो । महतो के रों में घोटों तथा घोड़ियों को भी ये पृपतीभिः अजायन्त । (ऋ. १॥३७१२) (७) जोतते थे । शायद, बर्फ का अभाव जहाँपर हो ऐसे स्थानों रथेषु पृषतीः अयुग्द। (फ. ॥३०६) (४१) में पहुँचने पर इस ढंग के रोंका उपयोग किया जाना हो एपां रथे पृपतीः । (ऋ. ११८५५) (७३) और हिमाच्छादित, निबिड हिमस्तरों की जहाँ प्रचुरता हो रथेषु पृपतीः न अयुध्वम् । ( ८1७२८) (१२७) ऐसे प्रदेशों में ऊपर बतलाये हुए हरिणों द्वारा खींचे जाने- रथेषु पृपतीः आ अयुग्ध्वम् । या रथों का उपयोग होता हो। (फ ११८५४)(१२६) घुपतीभिः पृक्षं याथ। (प्र. २॥३४॥३) (२०१) अश्वरहित रथ। संमिश्लाः पृपती: अयुक्षत। (२. ३१२६१५) (२१४) इस के लिए मरतों के समीप ऐमा भी रथ विधमान रोहितः प्रष्टीः वहति । (क. १३९६६) (४१) था जो बिना घोडों के चलता था, और पाक की आय. प्रष्टीः रोहितः घहति । (क्र. ८७६२८) (७३) श्यक्ता नहीं हुमा करती थी । देखिये, वह मन्त्र यूं है- रथ मे धब्धेवाली हरनियाँ जोती हुई हैं और उनके अनेनो वो ममतो यामो अस्त्वनश्वश्चिदू यम- भागे एक यारह सींगा रखा हुभा है। यह एक इस भाँति जत्यरथी। अनवसो अनमीशू रजस्तर्वि दरिणयुक्त मरतों का रथ है जो पहियों से रहित होता रोदसी पथ्या याति साधन ॥ है। देखो- (क्र. ६६६७)(३४०) हे बोरगर यह तुम्हारा रथ (अन्-एन:) शिल. सुपोमे शर्यणावति आजोंके पस्त्यावति । ययुः निचक्रया नरः। (ऋ. १२९) (७३) पुल निदोष दे और ( अन्-अश्व ) इस में घोड़े जोते नहीं है तिसपर भी वह (भजति ) घरता है, संचार करता 'पादित रथपर से दिया सोम जहाँपर होता हो, हे तथा उसे (भ-रयो ) रथ में बैठनेवाला धीर न हो रो स्थानपर शर्यणा नदी के समीप कनीक के प्रदेश में तो भी अर्धात् एक साधारण सा मनुष्य भी चला सकता मरत जाते हैं।' है। (भनु-भसः) इसे किसी ए-रक्षक की भावश्य- जिस स्थानपर पटिया सोम मिलता है यह समुद्र की कता नहीं रहती है, 'अन् भभीशु ) यह रगाम, कशा सतहसे १६००० पीट ऊंचाई पर रहता है । यहाँ का सोम आदि से रहित है, ऐसा यह रथ (रजस्त् ) यहे वेग से अयुष्ट मामा जाता है । चूकि यहाँ 'सु-सोग' कहा गर्द उदाता हुआ (रोदसी पथ्या) भावास एवं पृथ्वी के है इसलिये ऐसे स्थानों का विचार करने की कोई भावश्य मध्य विधमान मागों से (साधन याति ) अपना अभी पता नहीं रहती है जहॉपर घटिया दो या सोम मिलता सिद्ध करता सुभा चरा जाता है। दो। इतने अग्युच्च भूविभाग में ये रत् पहियो से रहित यह मरतों का रथ भाधुनिक ' मोर' के तुरुप कोई रथपर से संचार करते हैं। कोई पाश्चर्य की बात नहीं अगर वाहन हो पेसा दीख पड़ता है जो घोर्ट, रगाम सथा पृष्ठ- वह स्थान बर्फ से पूर्णतया का हो। ऐसे हिमा छादिरा रशर के प्रभाव में भी धूल उराता हुमा चेमपूर्वक भागे मागों में चमहीन पाहनों को कृष्णसारमृग या हरिनियाँ या है । भयों के न रहने से साथ लगाम रखने की खींचती हैं और भात दिन भी यह दृश्य देखा जा सकता कोई भावश्यकता नहीं है और खोपनेयादेन रहनेपर भी है। रूस के उार में जहाँपर खूप बर्फ जमी रहती है इस भीतर रखे हुए यौनिक साधनों से परिमय कम करता पर की गाड़िया, जिन्हें मान्य भाषा में ( Sledge) दुभा यह रथ ग्रेज दौडगा है। धूल उदाते मागे का गत- - - वीर मरतों का काव्य । (१३) - लय यही है कि, उस का ये बडा ही प्रचंड है। क्योंकि घ उग्राय यामाय मन्यये मानुप निदधे । तीच घेग के न होनेपर धूलि का उडाया जाना संभव (पर. ३७१७) (१) येषां यामपु पृथिवी भिया रेजते । (सस्तूः) का दूसरा अर्थ योभी हो सपना है कि अंत. (क्र. ११३७१८) (१३) रिक्षमें से स्वरापूर्वक जानेयाल।। ऐमा अर्थ कर लेने से, व. यामेषु भूमि. रेजते । (ऋ. १२०१५) (८६) (रमस्तः रोदसी पथ्या याति) द्युलोक परं भूलोक के व यामाय गिरि नि येमे । (ऋ. ८७५) (५०) माय मन्तरिक्ष की राहसे यह रथ घर जाता है, ऐसा ५' यामाय मानुपा अधीमयन्त । अर्ध हो सकता है। ऐसी दशा इस रथ को भाकाशयान, (ऋ. १३९१६ ) (१) 'एरोप्लेन' मानना आवश्यक है। मगर इसे हम कविकल्पना 'तुम्हारी चढाई के मौकेपर मानव कहीं न कहीं पिसी मान, तो भी विमानों की सूचना सतया विद्यमान है, के महारे रहने लगते हैं। तुम्हारे हमले से पृथ्वीता इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इस मन्त्र में निर्दिष्ट यह काँपने लगती है। तुम्हारे भाक्रमण से पहादतक चुपचाप रथ भले ही विमान हो, या मोदर हो, पर स्पष्ट तो यही हो जाते हैं ताकि वे न गिर पड़ें। तुम जय धावा पुकारने है कि बिना मश्वों की सहायता के यह घडी शीना से हो तय मानय भयभीत हो उठते है। गतिमान हुभा करता है। इन चोरों का ऐसा प्रपल भाक्रमण हुमा करता है। इस कई मंत्रों में 'बाज पंछी की तरह पीर मरत आते हैं। विद्युदाक्रमण के सम्मुख बरिष्ठ शत्रु भी तूफान में तितके ऐसा वर्णन किया है। यह निर्देश भी मरतों के भाग. के समान कहीं के कहीं उड जाते है और अ-पदस्थ हो संचार को गौर अधिक स्पष्ट करता है। जाते हैं । देखिए न- अब तक के वर्णन से पाठकों को स्पष्ट विदित हुभा ही दीर्घ पृथु याममि प्रच्यावयन्ति । होगा कि मरनों के समीप चार प्रकार के वाहन थे, [.] (*. १९३१)(१६) भवसंचालित रथ, [२] हरिणियों तथा कृष्णसार मृग से यत् याम अचिभ्यं पर्वता। नि अहासत । खींचा हुभा, घनीभूत हिम के स्तरपर से घसीटते जाने- (R. ८७२) (४७) पाला रथ, [३] बिना भधोके परन्तु बटे पेगसे चतुर्दिक यत् या अविध्वं इन्दुभि मन्दधे। धूलि उदाते हुए जानेवाले २थ और [७] भास्मानमें उटते (म.१७१४) (५९) जानेवाले मायुपान । तुम्हारी चढाइयो के फरस्वरूप बडे तथा मुहद्ध शत्रु शत्रु पर किया जानेवाला आक्रमण । को भी तुम पदभ्र करते हो और पहाट भी पिकम्पित हो उटते हैं। जब तुम आक्रमणार्थ बाहर निकर पढते दो मरत् शत्रुसेना पर हमले करने में बडे ही प्रवीण थे तो पहले सोमपान करके हर्षित होते हो और पश्चात् भानु भीर उनकी इस भाँति चदाई के बारेमे किया हुधा विविध पडते हो।' वर्णन देखनेयोग्य है । पानगी के तौर पर देस लीजिए- इससे विदित होता है कि एर बार यदि मरतों का प यामः चिन्न । (ऋ. १११६६६४; १।१७२।१) आक्रमण हो जाए तो शत्रु का संपूर्ण विनाश होना ही (१६१:१९५) शहिए, दुश्मन पूरी माह मटियामेट होगा इतना प्रभार- यः चिध याम चेकिते । (ऋ. १३१०)(२०८) शारी यह होता है । तुम्हारा हमरा यदा ही अचम्भे में डालनेवाला होता है। जिससे जनता माश्चर्यचकित हो दाँतातले ऊँगली मरुत् मानव ही थे। पमा पैठी रहे, ऐसे आहरण का सूत्रपात ये वीर गया पहले महा मर्य, गानपयोटि के थे, परन्तु उन्होंने करणे हैं। उसी प्रकार- से भाँति जाति के कर्म कर दिखजाये, भा. पर टूट . अपनी चूरता (१४) दैवत-संहिता। [मरवता। . चे भमरपन को पाने में सफल हो गये । देखिए- ते ऋध्यास दिवः अशिरे। (१६४२) (१०९) ययं मर्तास स्यावन, व स्तोता अमृतः स्यात् । 'धीर मरतो! तुम विद्वान हो, तुम हमारे निकट पळे (क्र. ३८४ ) (२४) भाभो, तुम उच्चकोटि के शानी हो।' विद्वान् होने के रुद्रस्य मर्या दिव जज्ञिरे ।(*.६४२)(१०१) कारण ये मरत् दूरदशी भी हैं। तुम माय हो लेकिन तुम्हारा स्तोता भमर होता है। दूरदर्शी। तुम रद्र के याने वीरभद्र के मानव हो, मरणधर्मा हो, पर सुम कार्य इस तरह करते कि मानों मुम्हारा सम्म स्वर्ग दूरेश परिस्तुभ } (ऋ. १६६11) (१६८) धुलोक में हुभा हो। उसी प्रकार- 'ये घोर दूरदर्शिता से सपा होने के कारण पूर्णतया सराहनीय हैं। विद्वता तथा दूरदर्शिता से मलकृत होने मस्त सगणा मानुपास। के कारण ये भन्छी प्रभावशाली वक्तृता देने की क्षमता (भधवं. ७७७६ ) (४४७) रखनेवाले हैं। मरत. विश्वकृष्टयः। (क ३१२६१५) (२१५) धुवाँधार वक्तृता देनेवाले। समी गणों के साथ समवेत ये मरत् मानय ही है और सभी कृषिकर्म करनेवाले काश्तकार हैं। ये गृहस्थाश्रमी सुजिता आसमि स्वरितार । भी हैं। देखिए- (1१1११)(१६८) 'उन वीर मरतों की वाणी बही अच्छी हेभव उनके गृहमेधास आगत मरुत । ( ७५९।१०) (३९२) मरत् गृहस्थाश्रम में प्रवेश करनेवाले हैं, हमारी मुंहसे मधुर एव पुरभर पक्तृता धाराप्रपाहरूप से निकटती मोर आ जायें। निस्स देह, ये विवाहित हैं भतएव इन्हें । इन मरतों में कपिपाक्ति पाई जाती है। परनीयुक्त कहा गया है। कवि। युवान निमिश्ला पजा युवती शुमे अस्थापयन्त। ये ऋटिविद्युत. कवय सन्ति देघस । (फ १६४६)(१७७), ( ५१५२१॥३) (२२९) स्थिरा चित् वृषमना अहंयु सुमागा जनी नरो मरत सत्यभुत कथयो युवान । घहते। ( १९७७ ) (१७८) (क्र. ५१५७८) (२९१) बम युबक पीर नित्य सहवास में रहनेवाली, पानीपद मरत क्ययो युधान । (अ. ५।५८३ ) (२९४) पर भारूढ युस्ती को शुभयज्ञकर्म में साथ ले यक्षते हो (म ५.५८१)(२९९) भौर उसे भाले कम में लगाते हो। तुम्हारी परनो मच्छी हवतयस कश्य मस्त । (पर 111) (३९३) भाग्यमादिनी है और यह भी सन्तान से युक्त हैं।' कधयोपन्यथा (अवर्ष, श)(४२) इससे पर है कि ये विवाहित। ऋतक्षा (२०१) घेधस (२५५) विचेतस (२६२) 'ये मरत् ज्ञानी, कवि एव अपनी सपनिष्ठाके लिये मरुतों की विद्याविलासिता । पिप्पात हैं । ये युवक तथा पकिए । वृद्धिमा भी इन वीर मरत हाती भोर कवि थे ऐसा वर्णन उपराध में श्टकर भरी होती है, उदाहरणार्थ- होता है। दखिए- बुद्धिमानी। ज्ञानी । य्यं सुचेतुना समति पिपतन । प्रचंतस मरत न आ गन्त । ( १९०६) (१६३) ( १९९९ (४३) पियं पियं देषमा पषिच्य। प्रचंतप्त भानवति। (६४) १६५) (1)(१८) घोर महतो का काव्य . . धृष्णुया पान्ति। कुशल वीर। प सुमति ओसुजिगातु । बना मरत ! रक्षत । ( २१३४१५) (२१३) (१।१६६१८) (१६५) सूरय मे प्रयोचन्त । ( ५१५२।१६) (२३) 'ये उमस्वरूपबारे वीर अपने शरीरों को कुछ भी ये भपनी भाछी बुद्धिमता के कारण जनता में सु. पर्वाह नहीं करते । हे उप्र प्रकृति के वीरो ! तुम उस को गुद्धिका प्रचार एव गृद्धि करते हैं, इन में हरएक मे दिव्य- रक्षा करो। ये धीर यहे उद्योगी भी है। भावयुक्फ बुद्धि निवाम काती है । ये अच्छे विद्वान्, उच्च कोटिक यस्ता और सुयुधि देनेवाले मी हैं। मुद्धिमानी उद्यम में निरत । साथ इन में साहसिकता भी पर्यास मानाम विद्यमान है। शिमीयतां शुष्मं पिद्म हि। ( १२००३)(८४) साहसीपन । इन उद्योग में लगे वीरों का यल हमें विदित है। परिश्रमी जीवन बिताने के कारण इन का बल पढा. (५.५२।२) (२१८) घना होता है। निरलस उद्यम करने से जो यल मदता ये अपने धर्ययुक्त घर्षणसामय से सब का सरक्षण है वह मरुतों में पाया जाता है । ये बडे कुशल भी हैं। करते हैं। ये बढे सामर्थ्यवान है- सामर्थ्यवत्ता। ये वेधस नमस्य। (क्र. ५१५२।१४) (२२९) शाकिन मे शतां ददु ।(म.५१५२१५) (२३३) येधस ! घ शर्ध अनाजि ( ५/५४१६) (२५५) इन सामर्थ्यशाली वोरोंने मुझे सौ गायों का दान दिया। इस प्रकार इन को शफिमता का वर्णन है। ये सुमाया मरुत ग आ यांतु । यो उत्साही वीर है। (ऋ. ११७६७१२)(१७३) मायिन तविषी. अयुग्ध्वम् । उत्साह तथा उमंग से लबालब भरे । (१६४७) (११४) समन्यव ! मापस्थात। ( २०1१)(८०) 'ये वीर ज्ञानी हैं, इसलिये इन्हें प्रणाम करो। हे समग्यव मस्त गाव मिथ रिहते। ज्ञानी बीरो । तुम्हारा सघ बहुत सुहागा है। ये अच्छे ( १२०२१ ) (१०२ ) कुशल मरुत् हमारी ओर भाजाय। ये कारीगर अपनी समन्यय. 1 पृक्षं याथ। ( २१३४।३) (२०१) शक्तियों से युक्त है।' इस प्रकार उनकी कुशलताका वर्णन समन्यव ! मरतन सपनानि आगन्तन । किया हुआ है। ये पढे कथाशिय भी है अर्थात कहानियाँ (फ २२३४६ ) (२०४) मुनना इन्हें बहुत माता है। (स-मन्यव ) हे उत्साही वीरो' तुम हम से दूर म कथामिय। रहो । तुम्हारी गौएँ प्यारसे एक दूसरेको चाट रही हैं। [हे] धप्रिय च सखित्वे क ओहते । तुम अन्न का सग्रह करने जाओ। स-मन्यय: (घर ८1१३१) (७६) मतलब है उत्साही, क्रोधपूर्ण, जोशीला याने जो दूसरों के किए अपमान को बरदाश्त नहीं कर सकते ऐसे पीर । इन 'हे प्यार से कहानी सुननेवाले वीरो! कौनसा मित्र वीमें उम्रता भरी पड़ी है। मला तुम्हें प्रिय है।' काप्रिय पद का भाशय है भौति भाँति की वीरों की कथाए या वीरगाथाए सुन लेना जिन्हें उग्र वीर। भच्छा लगता हो। इस कयाप्रियता में ही इन की शूरता उपास तनूपु नकि येतिरे। फा भास्रिोत रखा हुआ है । बीमारों के उपचार करने में (२०१२)(९३) भी ये प्रवीण हैं।

देवत-संहिता। [ मरुदेवता। . समुद्र, रोगियों की सेवा करने में प्रवीणता । मनुष्य भी ऐसे उच्च कोटि के पोरों के संपर्क में सिर्फ मारतस्य भेषजस्य सा यहत । उनको नृत्य चातुरी के कारण भाना चाहता है। इससे शात (क. २०१२३ ) (१०४) होता है कि इनकी कुशलता में भाकपंगशक्कि हिरानी यत् सिन्धौ भेषजं, यत् असिफ्न्यां, यत् समुद्रेषु बढी होगी। यत्पर्वतेपु विश्वं पश्यन्तो विभृथा तन्प्पा । नः गानेबजाने में प्रावीण्य । आतुरस्य रपः क्षमा चिन्टुतं पुन: इकर्त। ऐसा दीस पता है कि ये वीर याना बजाने में भी (र. १२०२६) (१७) पवन में जो औषधिगुण है उसे यहाँ ले आओ। सिन्धु, कुदाल थे, देखिए- हिरण्यये रथे कोशे घाण अज्यते। पर्वत, असिक्नी नामक स्थलों में जो कुछ दवाई (ऋ. ८१२०1८) (८२) मिल जाए उसे नुग देख लो तथा नाक्ष करो। वह समूचा पाणं धमन्तः रण्यानि चक्रिरे। निरख कर अपने समीप संग्रह कर रखो। हममें जो बीमार (ऋ. १९८५-१०)/१३२) पढा हो उस के देह में जो त्रुटि हो उसे इन भोपों से दूर करो और कुछ टूटाफूटा हो तो उसकी मरम्मत कर दो। बजाने लगते हैं और चेतोहारी गायन का प्रारंभ करते हैं। 'सोने से मदे हुए रथ में बैठकर ये पाण नामक पाजा सिलाडी। इस भौति पीर मरत् गायनवादन-पता के कारण यहाही इन धीरों में खिलाडीपर की कुछ भी न्यूनता नहीं है। सुशहाल जीवन बिताते हैं और दुःए या उदासीनता इनके इस संबंध में कुछ प्रमाण देखिए- पास फटकने नहीं पाती। कोळं मारुतं शर्ध अभि प्रगायत । उपर वीर मरतो विद्यमान सद्गुणों का दिग्दर्शन किया जा चुका है। भाशा है कि पाठकवृन्द के (क. १३१)(६) सम्मुख मरणोंका यत् शर्धं क्रोळ मशंस ! (ऋ. ॥३७५) (१०) यक्तिमय स्पष्टतया ग्यात हुभा होगा । पाठकों से प्रार्थना ते क्रीलयः स्वयं महित्वं पनयन्त । है कि ये स्वयं भी इस संबंध में अधिक सोच लें (भ. १८७३) (१४७) प्रबल शत्रु को जड़मूल से उसाद फेंक मोळा विदथेषु उपक्रोळन्ति । देनेवाले वीर। (क. १११६६०२) (१५९) 'कोहा में ग्रस्त होनेवाला मरतों का सामथ्र्य सचमुच ये पोर मरत् इसने प्रभावशाली हैं कि स्थिरीभूगशगु पर्णनीय है। ये कोडासक्त मनोवृत्तिवाले है इससे उनकी को भी अपनी जगह परसे समूक उपाय देते हैं । देखिए- महनीयता प्रकट होती है । युद्ध में भी ये इस तरह जूमते (हे) नरः! यत् स्थिरंपराहत । है कि मानों ये खेल ही रहे हों। वीर हमेशा तिराही (ऋ. ११३९३) (३८) बने रहते हैं। इनके खिलासीपनमें भी वीरता एवं शौर्यका ( क्र. १॥३९१३) (३८) ही भाविर्भार हुभा करता है।" स्थिरा चित् नमयिष्णयः । (२१) (८२) नृत्यप्रियता। यत् एजय, द्विपानि यि पापतन् । (क्र.२४) (८२) मृतयः मरतः ! मतः यः भ्रातृत्वं आ अयति । अच्युता चित् ओजसा प्रच्यवयन्तः। (ऋ. १२०२२) (१०३) (क्र. ११८५/४) (१९६) मरन् नृश्य में बड़े कुशल हैं । मावद तक इनसे इसी एषां अमेषु भूमिः रेजने। (*. १३)(१४७) कारण मिन्नता प्रस्थापित करना चाहते हैं।' साधारण 'हे नेता पीरो! तुम स्थिर दुश्मन को भी दूर हराते । गुरु घर्तयथा।

योर मरतों का काव्य (१७) हो, यडे प्रबल शत्रु को भी दिखा देते हो, स्थिर शशु को सभानोबाचं अनज । (340), ५/५।। भी मुकाते हो । जय तुम चढाई करते हो, तय राप्तक गिर विमास्तं गणं वन्दस्व। (३५) १३.३५ पढते हैं। अविचलित शत्रु को अपनी शक्ति से विकषित ते भानुभिः पितस्थिरे । (५३), ८७८ करा देते हो । इनके भाक्रमण के समय जमीन यक हिल चित्रमानः तविषी अयुग्ध्वम् । उहती है। (१९४) क्र. १६४७ इस प्रकार ये वीर अपने प्रभाव से समूचे शत्रु को चित्रमानव अवसा ओगच्छन्ति । तहसनहस कर डाली है। (१३३) ११८५11 भव्य आकृतियाले वीर। अहिभानय मरत । (१९५) १११७२१ अग्निथिया मरतः । (२१५) ॥२६॥५ महतों की आकृति पढी भन्य हुमा फरती थी, इस विषय के वर्णन देखिये। 'ये पीर मरुन अपने निजी तेज से प्रकट होते है। धनुष्यों का भाश्य रेकर पराक्रम कर दिखलाते हैं । उन ये शुभ्रा घोरयपेस सुक्षत्रासो रिशादस । तेजस्वी वीरों का वर्णन करो। समूचे मम्मों का संघ क्र ८11०३४ (अग्नि २०४७) तेजस्वी है। वे अपने तेज से विशेष ढा से चमकते है। सरवान घोरयर्पल । (१०९) ऋ. १६४ार उन का तेज अनोखे दग से चमकता है। ये मामिला मृगा न भीमा । (१९९) * २१३।। तेजस्वी हैं और उ7 का तेज कभी न्यूा नहीं होता।' । पीर गौरवर्णगले व भव्य शरीरों से युक्त हैं। यह सारा वर्णन उन की सेजस्विता को टीर सरह वे भाछे क्षषिप हैं और शत्रु का पूर्ण विनाश करनेवाले हैं । यालाता है। ये पलिए तथा वृहदाकार शरीरवाले हैं । सिंह की न्याई घे भीषण दिखाई देते हैं। अन्न उत्पन्न करनेहारे वीर । पीछ कहा जा चुका है कि, ये सभी युवदिशा में विद्य- पहले कहा जा चुका है कि, हमरत विश्व-कृष्टयः । मान है। यह बात सयको विदित है कि, सेनाओं मे युवक (२१५) * ३।२६।५] मरतु सभी किसान है । मत. स्पष्ट ही गत किये जाते हैं। है कि धान्य का उत्पादन सा उन के अनेकविध पाया रक्तिमामय गौरवर्ण । मे अन्त भूत था । निम्न मांश देखने योग्य है- मरतों के वर्णन से जान पड़ता है कि, ये गोरे यदन चय. धातार । (८०) मा ८७३५ थाले पर शनिक लालिमामय भाभासे युक्त थे। देखिये- पिप्युषी इपं धुक्षन्त । (४८) ऋ. १७३ शुभ्राः। (७०), ८७२५, (७३), ८७२८५ तेइ अभि जायन्त। (१८B) 13६८२ (५९). 11011, (१२५), ११८५३, (१७५), १६१४ नमस इत् घृधास.। (१९४) क्र ११२ अरुणसय । (५२) 4110 घयोवृध परिज़य । ५५५।२ सष्ट हुमा कि, मरुत् गौरकाय थे, एवं लालिमापूर्ण 'मरुत् अन्न का धारण करते हैं, पुष्टिधारक भन्न का छवि उनके शरीरों से फूट निकलती थी। उत्पादन करते है । ये अन्न का उपादन करने के लिए ही अपने तेज से चमकनेहारे वीर । उत्पन्न हुए हैं। ये भन्न की वृद्धि करने वाले होते हुए पीर ये सदा अपने तेज से चोतमान हो उठते थे, ऐसा मरत् चारों भोर घूमते रहत हैं।' वर्णन उपलब्ध है। ऐसे वर्णन पाय जाते हैं, जिन से वीर मरुतों का मनो. ये स्वमानयः मजायन्त । (७), क ॥३७२ स्पादन तिर्दिष्ट होता है, अत स्पष्ट है, ये सभी (दृष्टय) स्थभानव धन्यसु थाया । (२३७), र ५१५३३४ पाने कृषिकर्म में निरत काश्तकार है। मरुत् प्र०३ - .

(१८) दैवत संहिता! [ मरुदेवता। भनिधार्य था, भग्छ गायोंका पालन करते हैं। तथा धंय का उपयोग हुआ करता। कृपक होने के कारण मरुत् खेती करते हैं, धान्य की चूंकि ये कृषक, खेती करनेपाले एवं अन्न की उपज उपज बढाते हैं, अग्रदान करते हैं, तथा गोपालन भी करते पदानेहारे थे, इसलिये गौ की रक्षा करना इन के लिए हैं । इस सम्बन्ध में देखिए- क्योंकि गौओं की उन्नति होने से कृषिकार्य घः गावः पय न रषयन्ति ? (२२). १३८२ के लिए भावश्यक, उपयुफ बैलों की मृटि हुभा करती है । तुम्हारी गौएँ भला किधर नहीं रंभाती हैं ?' भर्थात् मरुतों के घोडे । मरुतों की गौएँ हर जगह घूमती हैं और सहर्ष रंभाती हैं। मरुतोंके समीप यदिया, भली भांति सिखाये उसी प्रकार- घोरे थे। हमने देख लिया कि, वे गायों को रस लेते थे इन्धन्धभिः रशदूधमि धेनुभि. आगन्तन । भौर गो-पालनविचा में निष्णात थे। भय उन के अधों का (२०३). २।३१५ विचार कर लेना चाहिए। धेनुं ऊधनि पिप्यत । (२०४) *. २१३१६ पृश्न्याः ऊधः दुहुः । (२०८) क्र. २१३४।१० व अभ्याः स्थिसुसंEa:1(३२) क्र. ११३८१२ हिरण्येपाणिभिः अश्वैः उपागन्तन । 'जाची एवं प्रशंसनीय य बढे यनों से युक्त गीमों के साथ हमारे समीप भाभो । गौके थन को दूधभरा (७२). ८२७ वृषणश्वेन रथेन आ गत । (९१) २.८२०11. पर दालो। उन्होंने गौके थन का दोहन किया।' ऐसे आरणीपु तविषीः अयग्भ्यम् । (११४) ऋ.॥६७ वर्णन मरनसूक्तों में पाये जाते हैं । ये वोर गायको माग- यः रघुष्यदः सप्तयः आ पहन्तु । श्र.१८५/६ यत् पूज्य समझो हैं। देखिए- सा गणः पृपदश्वः। (१५९) . 1011 गां मातरं घोचन्त । (२३२) पर, ५/५२०१६ ते अरुणेमिः पिशंगैः रथभिः अभ्यः आ यान्ति । 'गौ हमारी माता है, ऐसा थे कद मुके । गौ का (३५२) ऋ. १२२ दोहा कर के ये दूध पीते हैं और पुर होते हैं। अत्यान् इय अश्यान् उक्षन्ते पृश्निमातरः ! यः स्तोता अमृता स्यात् । आशुभिः आजिपु तुरयन्ते । (२०१) रु. २३४३ (२४) १. ११३०१४ 'तुम्हारे घोडे सुद्ध तथा सुसंस्कृत है । जिन घोड़ों के पृश्निमातरः पं धुक्षन्त । (४८). ८1७३ पैरों में सुवर्णजटित भलंकार दाले गये हों, ऐसे धोटों पर पृश्निमातरः उदीरते (६३), 41011 धैठर इधर भाभो । जिस में पलिष्ठ घोडे कगाये हों, ऐसे पृश्निमातरः श्रियः दधिरे । (१२४) भा. १८५२ रथ से इधर भाभो । लाल रंगवाली घोटियों में जो पछि गोमातरः अअिभिःशुभयन्ते । (१२५) क. ११८५।३ घोदियाँ हों, उन्हें ही रथ में जोतो। शीघ्र गतिकाले घोडे 'गोमातरः सथा ' पृमिमातरः ' दोनों पदों का अर्थ मुम्हें इधर ले भाय । इस मरुस्मयके समीप धन्येवाले छोटे गौ धो माता माननेहारे और भूमि को माता समझने वाले हैं। रक्तिम मामायाले तथा भूरे रंगवाले घोडी से रय ऐसा हो सकता है। यहाँ दोनों अर्थ लिए जा सकते हैं। शीघ्र चलाकर सुम इधर भाभो । घुन्दौर में घोदे जैसे कारण, मे पीर गोभक्त तो धे हो, लेकिन मातृभूमि की यलिए मनाये जाते हैं, वैसे ही तुम भरने घोहों को पुर उपासना भी बडी लगन से किया करते थे। मातृभूमि की रखो । त्यरित जानेवाले घोड़ों से ये धीर लडाई में जन- सेवा करने के लिए ये हमेशा अपना प्राण निछावर करने को बाजी करते हैं, बहुत शीघ्र युद्ध में जाते हैं।' सेपार रक्षा करते थे । इनके वर्णन पढने से साफ साफ इन वचनों में मरनों के घोडों का पर्याप्त वर्णन है। प्रयोग होता है कि, शत्रु को दूर हटाकर मातृभूमि को मुसी ये घोटे लाल रंगवाले, भूरे, धम्माले और बहुत बलवान एवं मंपन करने के लिए ही इनकी समूची शूरता, पीरता होते हुए घुडदौड के घोडों के समान खूप धपक होते हैं। 1 पीर मरुतो का काय। - - पेटीक ठीक मियापे हुए भव सभी माछे गुणों से युक इस भौति ये शोर शरीर अपनी रक्षा की होते है । युद्धों में इन घोटों को पता गोचर हुभ तनिक भी पहन करते हुए स्नेयाले थे, भवण्य पडा करती है। इन वर्णनों से महलों के घोड़ों के समय में ही प्रमाशेरपादक युर प्रवर्तित कर देते थे । भय तो उन्ह मनुमान करना कठिन नहीं है। मार भी देखिए कमी प्रतीत ही नहीं हुमा करताभपतारे थे मूर्तिमान पृषश्वास आ चयक्षिरे। (२०) २३१४ भयवार ही थे। निम्न माश मलों के, मन को हिलात पृषण्यास विदथेषु गन्तारः(१६) २६६ करनेवाले तथा दिळपर गहरा प्रभाव दासनेवाले, सामर्थ अश्वयुजः परिचय । (२९१) ऋ ५५४१२ या सटरिश करते है- घः अश्या न श्रधयन्ता (२५९) रु ५५४५१. मन्तां उग्रं शमं घिन हि।(८1) क ८।२०१३ सुपमेभिः आशुमि अये ईयन्ते । अमयन्त मदि श्रियं यन्ति। (२६.) ५५५।। (८८) ८१२०० मगत रथेषु अभ्यान आ यु.जते । (२०६) २२॥३४॥८ शरारायसा अधिमन्यय । • पवार घोरे जोतकर प पीर यों में या युदों में (१६) १६४९ चले जाते हैं। पोसयार रस य हूँ मोर घूमते है। अनन्तशुष्मा. तपिपीमि संमिला । हमारे धोटे या नही जाये। साधीन रहनेवाले एय (११७) १६४० राजानेवान पो से ये यात्रा करते है। मरन् ते स्वतयसः अवर्धन्त । (१९) १८५/- पीर रवा में घोडे जोर रिया करते हैं। 'दप्ती प्रकार- य तानि सना पोस्या। (१.७) F 11१३९१८ पीरस्य प्रथमानि पास्या विदु । घ अमीशय स्थिरा । (३२) ॥३११२ (१६४). १६६ सगारे गाम विधा पारेन टूटनेवाले होते हैं।' नयेषु पाहुपु भूरीणि महा। इन पचनी से पाटस्यूद भली भाति कहाना कर सकते हैं (१६७) र ११11. वि., पीर महलों के घोटे किस दग के मा फरखे थे। घ शयस अन्तं अन्ति आरात्ताच्चित् इन वीरों का बल। नदिनु आपु । ( १८० ) १९७९ महता के सूती में मतों के पळ का उस भोबार तुविजाता महानि अचुच्यघु । पाया जाता है । कुल मत देखिए- (१८६) 11६४ माप्त पलं अभिप्रगापत(६) १३." धृणु ओजस गा अपायष्यत । मामत शर्धे उप प्रवे। (१९८). 1३11 (१९९) * ॥३४॥ युष्माकं तपिपी पनीयती। (३७) *. १३३९१२ ओजसा आदि मिन्दन्ति । (३.५) ५२१० ५ पलं जनान् अचुच्ययोतन । गिरीन् अचुच्य य पीय दीर्घ ततान। (५४) पर. ५।५४५ पीतन । (१७). ३११२ मरके उस सामरो हम परिनिा है,ये सामi. उप्रवाहय तनप नकि येतिरे। शाली होने के कारण मी यश पति है, ये हैं (९३) २०१२ भौर अपने भविघमा सामसे यह भी 'माता के सहा वर्षको उन का साम मराइ- नी पनते हैं। इन मामयों की कोई सीमा या अमा गोप है। इन कामल सारे शभाको हिला देश है, पहाl नहीं, तथा इनको शानियां भी यहुबमी है, भाग मामध्ये को भी शिकार करा देता है, उन का पाठ या भारी से ये दो ये तो हाके हमेशा के पापपूर्ण कार्यकलाप है और लरते समय ये भाने rif को नि भी पह, पी के ये प्रारभिक पास है। इन बी के पाहुभ में नहीका बहुत से हितका सामर्थ लिप पदे है, तुम्हारे घर का .

दैवत-संहिता! मर पता अन्त समक्ष रेना, चाहे दूर से हो या समीर से, असभय इसलिए हम तुम्हें रातदिन पुत्लाते हैं, पुत्र का पध करते ही है। दर के लिए विश्वात ये वीर प्रमट दुश्मनों को भी समय इन्द्र को तुमने मदद दी, यह तुम्हारी साक्षण-घन विचलित कर देते है, दगदग हिला देते है, अपनी शक्तिसे छाया में सौभाग्यशाली हो गया, सरक्षण करनेहारे इन थी तो इन्होंने शत्रुओं के घधन से गौओं को छुडा दिश धोशेने धन की पुष्टि कर डारी, जिसे, तुमने विनाश भोर और भोजस्विता के कारण पहाडो को भी तोड़ डालते हैं, पर से पचाया था और निसे तुमने इस हेतु से बचाया था तुम्हारा सामय बहुा दूर तक पैरा है।" कि वह अपने पुत्रपौत्रों का संरक्षण भली भाँति कर ले, इन मप्रभागों में इन वीर मरुतों के प्रभावोत्पादक पल उसे तुम सैंकड़ों उपभोगमाधनों से परिपूर्ण गों से सुर एवं साध्यिका बसान किया हुआ पाठकों को दिखाई देगा, क्षित रख देते; अपने सरक्षक साधनों से युफ होकर मरस् जो कि सचमुच मननीय है। हमारे निकट भा जाय, तुम्हारा सरक्षण या अनूठा है। मरुतों की संरक्षणशक्ति। हिंसकों से हमें बवाभो, हमे तुमारे तेजस्वी सरक्षण की भावश्यता है, वे हमला करते समय स्वप ही रक्षा का वीर मरत यान एष चतुर दोहुए जनता सरक्षण प्रबंध कर लेते हैं। वे वो सभी मानवी दुगों में हिंसकों से करने का भार अपने ऊपर ले लेने में तत्परता दर्शाते हैं। बचाते हैं, हे तुरन्त पचानेवाले धीरों । मैं इग्य पाना इम सयध में आगे दिये हुये वाक्य देखने योग्य है- चाहता ह, निम की तुम रक्षा करते हो, यह उत्कृट पीर (हे) मस्त ! असामिभि ऊतिमि न आगन्त। मनता है।" (४४) ३९९ इम से स्पष्ट होता है कि, इन्द्र को भी महतों की ऊतये युष्मान् नक्तं दिया हवामहे । मदद मिल चुकी थी और उसी तरद अन्य लोग भी (५१) १६ मरों की सहायता से लाभ उठाते आये है। ध्यान में रहे पृषत्र्ये इन्द्रं अनु आवन् । (६९) २४ कि, ये वीर अपनी शक्तियोंसे और सरक्षण की आयोजना स व अति सुभग आस । (९६) अ २०१५ भोसे भविषमभाप से सब को सहायता देसे हैं। कभी ऊमास गय पोषं सरासत । दुर्ग में रहते हुए तो कभी रथारूद होकर पाया करते हुए (१६.) क्र १६६३ स्थय घटनास्थळपर उपस्थित रहकर ये रक्षार्थियों को सरक्षण य अभि-हुते अघात् आवत, य जनं देते हैं। इन सूतों में निर्देश मिलता है कि, कइयों को तनयस्य पुष्टिपु पाथन, त शतभुजिमि. ममतों की मदद मिल चुकी थी, जो कि इस रष्टिकोण से पूर्मि रक्षत । (६५) १९६८ देखनेयोप है। यहाँपर प्रमुख पात यही है कि, रक्षार्थी मरुत अयोमि आ यान्तु चाहे रश हो या माधारण मानय पर सभी समान रूपसे (१७३ ) र ११६००२ मरतों की सहायता से रामावित हो चुके हैं। च ऊनीचित्र 1(१९५) ११७६१ न रिप रक्षत ।(२०७) २३४०९ मरुतों की सेना। स्येपं अब ईमहे । (२१५) ३।२६।५ गरत तो खुद ही सैनिक है। ये साठसात की पति ते यामन् स्मना वा पान्ति (२१८) ५१५२।२ पनाकर घर। करत है और उनकी एमी कतारे ० रहा ये मानपा युगारिप आ पान्ति । (२२०) ५१५२।५ करती हैं। सब मिलाकर ४९ सैनिकों का एक छोटा विभाग (६) सद्य ऊतय 'द्रविणं यामि । (२६४) ५५४५ बन जाता दर कतार में दोनों पावभागों के लिए दो यायधेस सुधीर असति । (२४८) ५।५३।१५ पावरक्षक नियुक्त होते थे। सात पहियों के १४ पा "वीर मरतो अपनी समूभी सरक्षणचियों से रक्षक रहते । सैनिक ४९ और १४ पाधीक्षक मिलाकर पुष होकर तुम हमारे पास भाभो, हमारे सरक्षण हो, ६३ मरत् एक छोटे से सच में पाय जाते । ६५ रोक -- धीर मरती का काव्य। (२१) on इस संघ को 'श' नाम दिया गया है । (१३ ४७) = रथानां शध प्रयन्ति । (२४३) ५/५३ ४५. सैनिकों का भयवा धाका एक 'वात' और 'तुम्हारे सत्य के लिये लडनेवाले सैनिकों को प्राप्त (६३४१४) = ८८२ सेनिको या १४ साधों का या फो। तुम्हारे शर्ध और गणविभागों के पीछे हम खुद ही यो प्रामों का एक 'गण' हुमा करवा । इस प्रकार हा धरते हैं, वे वीर रथों के विभाग को पहुंचते है।' सैनिकों की यह संघसंख्या है, जो ऐसी बनी हुई है कि, इस स्थानपर सिपाहियों के विभाग को सूचित करने- में क्या न्यून या अधिक है, सो अन्य प्रमाणों से ही वाले 'राध तथा गण ' दो पद पाये जाते हैं । इन सैनिकों निर्धारित करना ठीक होगा। इस टि से मंत्रों में पाये का प्रभाव किस ढंग का बना रहता है, सो देख लीजिए- जानेयाले इन शब्दों का मर्म जानना चाहियं । अस्तु, यः अमाय यात धौ उचरा जिहीते। मरतों की सेना के बारे में निम्नविखित पचन देखिये- (८७) २०१६ , - मरतों का एक संघ। पृदिनः मरुतां स्येपं अनीकं असूत । तुम्हारे सनिक भागे ४ चलें, इस हेतु भाग ऊँचा (१९१)* १७६८९ ऊँचा हो जाता है। इस तरह गुद भएकामा ही दम सेना 'मातृभूमिने मरतों के इस तेजस्वी सैन्य को उत्पन को आगे निकल जाने के लिये मुक्त मार्ग बना देता है । किया ' अर्थात् यह सेना मातृभूमि के रिये ही भस्तिव मरन् सेनाका प्रभाव इतना सर्वकप और ममाधी है । जिस में भाती है और इस सेनाका भली भाँति संगठन हो चुकी किसी दिशा मे यह सेना चली जाए, उधर इसे रुकावट पर मातृभूमि तथा उस के सभी पुत्रों याने समूची जनवा नहीं महसूस करनी पड़ती है भोर प्रगति के लिये मार्ग का संरक्षण करने का गुरुतर कार्यभार इस पे दायों में मार सुला दीख पढता है । यह सप कुछ प्रभावशाली शौर्य का दिया जाता है । देखिए- ही नतीजा है। घ. प्रातस्य शर्धान् जिन्वत । (६६) १२१ विजयी वीर। या शर्धश गणंगणं अनुक्रामेम ये वीर सर्वत्र विजयी यनते है, तथा इसरा प्रभाव भी (५४) ५५५३११ वाही पर है। इस विनय के कारण इनकी सेना में देवत-संहिता। [मर देवता। को . एक तरह की भनोसी शोभा पहती है- ये समूह विस्त करने हारे धीर सैनिक है. अनीकेपु अधि थियः। (९३). २०१२ भतः इन्हें 'भक्षक (रिश अदस् ) कहा है। इन के सैनिकों के मोर्चेपर विशेष शोभा या विजयधी येशन को मात खा जाते हैं, मत कोई शत्रु दोष नहीं रहती ही है ' अर्थात् इनकी सेनाम इतना प्रभाव विद्य. रहने पाता।ये कहीं भी गमन करें, पर शायद ही में मान रहता है कि, निश्चय से विजयधी गिरेगी, ऐसा कहा किमी एकाध जगह दुश्मन मिरे । जा सकता है। विश्व अमिमातिनं अपधाधन्ते । धारावरा गा अपावृण्वत । (११९) २३११ (१२५) १८५३ 'युद्ध के मोघेपर-प्रभाग पर अवस्थित हो श्रेष्ठ ठहरे तं तपुपा चकिया अभिवर्तयत, अशस: हुए वीर शत्रु के कारागृह से गीओको छुड़ा देते हैं।' घध आ दन्तन । (२०७) २३४९ ये वीर- 'ये वीर समूचे दुश्मर्ग को मार भगाते हैं, है पीरो। ग्रामजित अस्वरन् । (२५७) २ ५५४५८ तुम दुश्मन को परिताप देनेहारे पहियेदार हथियार से 'शत्रु से गाँव जीत पर बढी भारी गर्जना पाते घेर रो और पेट पाट का विष्प्रंस करो।' हैं।' यह निस्सन्देह विजय पाने की गर्जना या दहा है। इस भाँति, पूरी तरह शत्रु को मटियाभेट कर देने की (हे ) जीरदानव ! युष्माकं रथान् अनुदधे। जो क्षमता वीर मरतों में है, बस का जिक्र वेद के सूत्रों में (२३८) ५/५३१५ पाया जाता है। जीरदानय वृथिवी मरुस्य प्रवत्यती। दुश्मनों को रुलानेवाले चीर । (२५७) ५/५८ मरतों को रुद्र भी कहा है, जिसका भाशय है, (शेर- जीरदानयः ! आ वपक्षिर । (२०२) २१३४॥ यति इति ) रसाने वाला पाने दुरामा एष दुर्जन शत्रुओं 'शी विजय पानेदारे धोरो। तुम्हारे रयों के पीछे मैं को रकानेवाला । चूंकि ये शूर तथा शत्रुदर का सपूर्ण चलता हूँ, मैं तुम्हारा अनुसरण करता हूँ, पृथिवी मरतो विश्वास करनेवाले हैं, इसलिए यह नाम बिलकुल सार्थक के रिप सरह भी सीधा मार्ग बना देसी है।' जान पड़ता है। देखिए- चाहे जिधर ये मरत् चरे जाय, उन्६ कहीं भी विप्न (हे) रुद्राः! तयिषो तना अस्तु । माधा या अपनरोके नहीं रखती। इन के मार्ग पर के (३९) ११३९४ सभी उपडसावद स्थान, धीट पहाट या टीले दूर हुभा इस के अतिरिक्त (४२).९७ (५७) *. २ फरते और ये पोर इच्छित स्थानता हामी भासानी से (८३) २०१२, (१५९) १६२, (२०७) क जा पहुँचते हैं कि, मानों ये सभी सीधी राहपर से जा स३४०९ इन में सथा इसी भांति के भनेक मयों में मरतों रहे थे। को 'रुद्र' नाम से पुकारा है। बेशक, यह धन्द उन ही शत्रुओं का विध्वंस। प्रय वीरता को व्यक्त करता है। इन मरतों का एक प्रमुख कार्य अर्थात् ही तुओं का मरुतों की सहनशक्ति । विश करना है और इन के वर्णनपरक सूत्रों में इस का ध्यान मे रहे कि, दो प्रकार का सामर्थ वीरों में पाया घखान घर जगह किया है। इस सम्बन्ध के मत्रांश भव जाता है । जय वीर सैनिस शग्रुपल पर भारमण का सूत्र देखिए- पात कर दें, तो उस तीन हमले को परदाश्त न कर सकने रिशादसाय शत्रु न घिविदे । के कारण नुसेना विनष्ट हो जाए। इसे ' असल (३९) 11३९५ साम करना चाहिए और दूसरा भी एक पाम इस रिशादस । (११२) ६५ रिश्म का होता है कि, दुसमन चाहे कितना ही प्रबल ।

पीर मरतो का काव्या - हमा घटाना शुरु को, लेकिन अपनी जगह भटस एनं के राजा की पहा भारी पोहा करते हुए न भटिंग रूप से रहना और अपना स्थान किसी तरह न के टुकडे टुकड़े कर चुके ।' म के लिए यहाँ पर 'भ- छोड देना, सम्भव होता है । यह सामर्ष सह या सह. राजिनः ' पद आया है। जिन में राजा का अभाव हो, मान 'पदों से सूचित किया जाता है। यह भी मरतों में 'अ-राजिनः कहलाते हैं। आज भी भारत में राज- पूर्णरूपेण विद्यमान है। देखिए- विहीन जातियाँ पाई जाती हैं, जिन में एक प्रमुख शासक मुरिहा इथ सहाः सन्ति । (१०१) २. ८।२०।२० नहीं रहता, अपितु समूची जाति ही अपने शासन का मुष्टियुर खेलनेवाले यीर की तरह ये सभी धीर प्रबन्ध श्राप कर लेती है, जिसे महाराष्ट्र में देव' कहते सहनशक्ति से युक्त है।' यह सुतरी भावश्यक है कि, हैं। अर्थात् मारी जाति ही जाति का शासन करती है। जिन पीरों में सहिष्णुता पर्याप्त मात्रा में है, क्योंकि उन्हें गिरोहों में ऐसा प्रबन्ध नहीं रहता उन में कोई न कोई विभिन्न तथा प्रतिकूल दशाभों में भी भविचल रूप से एक नियन्ता या शासक के पद पर अधिष्ठित रहता है डटे रहकर कार्य करना पड़ता है । शीयोण सहिष्णुता याने और ऐसे मानवसमूहों को राजिक ' याने राजा से युक्त फटाके का जाडा भौर झुलसानेवाली धा यादाश करना कहते हैं। जिन मानयसमुदायों में राजसंस्था का प्रभाव से ही शव के जीतम भागों की पर्याद न हो, में स्वयंशासित हुमा करते, इसीलिए इन्हें 'साम' पडता, करते हुए डटे रहने की भी जरूरत होती है। इस तरह ऐसा भी कहते है। कई रंग से सहनशक्ति काम में लाई जा सकती है। ये आश्वश्वाः अभवत् यहन्ते ये वीर पर्वतों में घूमा करते। उत इंशिरे अमृतस्य स्वराजः ॥ (२९२). ५।५८१ पहानों में संचार करने, बीहट जंगलों में घूमने आदि अस्य स्वराज. मरुतः पियन्ति ।। कार्यों से और व्यायाम से शरीर सुख तथा कष्टसहिष्णु (३९८) र. १९४४ धमता है। इसीलिए धीर सैनिक पार्वतीय भूविभागों में 'ये खुद ही अपना शासन करनेवाले मरत् जल्द चक्षसे फिरते हैं, इस विषय में निम्न निर्देश देखिए- जानेवाले घोड़ों पर पैटकर जाते हैं और अमृतत्व के अधि- पर्वतेषु वि राजथ । (४६) या पति है, ये स्वयंशासक गरुत् इस सोम के रसका भास्वाद थनिनं हवसा गृणीमसि । (११९) ऋ. १६४१२ लेते हैं।' यहाँ पर 'राज' पद का अर्थ है, स्वयंशासक 'घोर मरत पहाडों में जाते हैं और यहाँ मुहाते है, या अपने निजी प्रकाश से धोतमान । ये स्वयं ही अपने पनों में गये हुए मरवणों का वर्णन करता हूँ।' ऐसे इन पर शासन चला लेते थे, इस विषय में दूसरे पचन के वर्णन देखने पर यह स्पष्ट होता है कि, ये मीर पक्षों देखिए- HAIR ) में संरक्रिश करने की को और स हि स्वसृत् युवा गणः । विशेषतया सैनिकों को इस प्रकार का पर्वतसंचार करना तविपीमि आवृतः अया ईशानः ॥ बहुत हितकारक तया भावश्यक होता है । क्योंकि ऐसा (१४८). 11८७४ करने से करसहिष्णुता यद जाती है। ईशानकृतः । (११९) १६४५ स्वयंशासक वीर। यह युवक मरुतोंका संघ अपनी निजी प्रेरणासे चलने. ये वीर स्वयं ही अपना शासन करनेवाले हैं। इन पर पाला भौर विविध शकियों से युक्त है, इसीलिये पह समूह भन्य किसी का शासन प्रस्थापित नहीं हुआ था। इस (शानः) स्वयं अपना ईश है, अर्थात् खुद ही शासक पना पात का निर्देश करनेवाले मांश नीचे दिये हैं। हुआ है; वे धीर शासकों का सृजन करनेवाले हैं।' यह अराजिनः वृष्णि पोस्यं चकोणाः यहे ही महाप की यात है कि, जो विविध सामयों से घृतं पर्यशः पि ययुः । (६८). ८७१२३ युक्त तथा स्वयंप्रेरक होता है, वह स्वयं ही अपना प्रभु .

(२४) देवत-संहिता। {मरुदेवता। धनता है भौर शासकों का सृजन करता है; गरालय यहो शुभे घर के आयान्ति । (१५२) क. १८८२ कि, उस पर अन्य कोई प्रभुत्र नहीं रस समता, क्योंकि रामे संमिश्लाः । (२१४) ऋ. ३२६४ उसमें इतनी क्षमता विद्यमान है कि राजा का निर्माण कर शुभे रमना प्रयुञ्जत । (२२४) क्र. ५५२६८ ले। ये वीर अपना नियंत्रण सर्य ही कर लेते हैं। शुभं यावा रथा अन्यवृत्सत । (२५७) रु. ५।५४५८ स्वयतासः अधजन् (१६१) क्र. १६६।४ 'ये वीर शुभ कार्य करने के लिए सज्ज होते हैं। ये खुद ही अपना नियमन करते हैं और दुश्मनोंपर वीर शुभ कृरम तथा श्रेष्ठ कल्याण करने के लिए ही भावे देगपूर्वक हमला चदावे हैं। है; शुभ कार्य पूरा करने के लिए ये हुए हैं, ये सुर इस भाँनि यह सिद्ध हुआ कि, मस्त् गणदेव हैं याने ही भच्छे कार्य के लिए जुट जाते हैं; शुभ कार्यसमाप्ति के इन में गणशासन प्रचलित है और कोई एफ व्यकि इन लिए जप ये जाते हैं, तप इनके रप पीछे चल पड़ते हैं।' का शासन नहीं करना है, लेचिन ये सभी मिलकर इन्द्र शुभ कार्यसे वात्पर्य है, जनताका कल्याण हो ऐसा कार्य को सहायता पहुंचाते हैं । वैदिक साहित्यमें मरतों के सिया जिसे कर्तव्य समझ कर ये चीर करने लगते हैं, देखिए- अन्य कई गणदेव पाये जाने हैं, उदाहरणार्थ, वसु, रद, तृणस्कन्दस्य विशः परिवृत, नः ऊर्धान कर्त। मादित्य आदि जिन का विचार उस उस देवताके प्रसंग में (१९७) ऋ. १७२६३ किया जायगा । यहाँपर तो हमें सिर्फ महलों का ही विचार 'तिनके की नाई यूही विनष्ट होने वाले प्रजामनों की करना है। रक्षा चारों भोरसे कीजिये और हमारी प्रगति कीजिए।" मरुत-गण का महत्त्व । साधारणतया पान तो ऐसी है कि जनता तिनके के समान वैदिक वाङ्मय में मरुद्ग का महत्व बताने के लिये बिखरी हुई होने से आसानी से विनष्ट हो सकती है, पर खूब वढा चढा वर्णन किया है । देखिए- जिस वरह बिखरे तिनकों को एक जगह बाँध लेनेसे एक ते महिमान आशत । (१२४) क. १८५२ रस्सा बनता है, जो हाथी को भी जाता है, वैसे ही ते स्वयं महित्वं पनयन्त । (१४७) ऋ. ११८१३ प्रजा में भी ऐसी दाक्ति है, परन्तु भगर यह बिखर जाए, ये महा महान्तः। (२६८) .. सो विनष्ट होती है। इन प्रजाजनों का विनाश न हो, एप मरुनां सत्यः महिमा अस्ति । इसलिए उन्हें पूर्णतया वेष्टित कर एकता के सूत्र में पिरोने (७८) अ. १६७७ से उनकी प्रगति करना सुगम होता है और यही शुभ महान्तः धिराजध। (२६६) न. ५/५२।२ कार्य है। इसी प्रकार- 'वे वीर मरुत् घडप्पन को प्राप्त होते हैं; घे स्वयं ही नृपाचः मरुतः । (११६) फ. १९९ अपने कार्य से पापन पाते हैं। वे अपने निजी बडपनसे 'मानवों के साथ रहकर उनकी सहायता करने वाले महान हो चुके हैं, इन मरतों का बसमान सत्य है, बटे वीर मरत हैं। शूर वीरों का यही श्रेष्ठ कर्तव्य है कि वे होकर वै प्रकाशमान हुए हैं।। मानयों के निकटतम संपर्क में रहे और उन्हें प्रगति का यान में रहे कि वैदिक सूक्तों में इनके महत्व की जो मार्ग दर्शाये । चूंकि ये वीर मरन् अपना कर्तग्य पूर्ण करते मान्यता मिल चुकी है, वह केवल इनके शूरतापूर्ण विविध है, इसीलिए इनके महाप का वर्णन घेद में हुभा है। पराक्रमी कार्यकलाप के कारण ही है। शत्रुदल से युद्ध। अच्छे कार्य करते हैं। मात् ( मर-उत्) मरनेवक, मौत के मुंह में समाये यह विशेष प्रेक्षणीय यात है कि, ये वीर मरुन हमेशा बानेलक उठकर शग्रुसेना से जूझते हैं अथवा (मा- शुभ कार्य करने के लिए पडे सतर्क रहा करते देखिए- हद-मरुन् ) रोने लिखने के पजाय प्रतिकार करने में यत् ६ शुभे युञ्जते । (१४७) ऋ. १८७३ अपनी सारी शक्ति कगा देने हैं। इसी कारण से ये महान .

धीर मरतों का कान्य। २५ - . 1 गूरता के लिए विरपार हो चुके है । इका युद्ध-कौशल 'हे शगुदर को शिकपित करने वाले वीरो ! तुम अपना बडा ही विस्मयजनक है। निम्ननिर्देश देखिए--- हथियार बहुरा दूर से भी इधर फेंक देते हो। इस ताद अधिगावः पर्वता इय मजमना प्रच्यावयन्ति । तुम्हारा भस्म फेंक देने का सामर्थ है।। (११०) १६४३ 'हे) धूतयः । परिमन्यरे इषु न निपं सृजत । युवानः मजमा प्रच्यावयन्ति । (४५) ११३९१० (२१०) १६३ 'हे शत्रुदलको हिला देनेवाले पौरो ! चारों धोरसे घेरने- 'आगे पहनेवाले ये वीर अपनी जगह पहाड़ की गाई वाले यात्रु पर जिस तरह बाग छोड़े जाते हैं, जैसे ही तुम स्थिर रहकर अपने मामय से दुश्मन को हिला देते हैं।' गुम्हारे शत्रुको ही दूसरे पर छोड़ दो। अथार तुम्हारा थे धीर- एर दुश्मन उस दूसरे शत्रुसे रखने लगेगा, जिसके फर-- पर्वतान् प्र वेपयन्ति । (४०) प्र. १३३९।५ स्परप दोनो आपसमें शकर हतबल हो जायेंगे और उनके पहाड की तरह मुस्थिर एवं अडिग शत्रुको भी थरथर क्षीण होनेपर तुम्हारी विजय आसानी से होगी।' शो पायमान बना देते हैं।' इन का पराक्रम इतना प्रचा है नुसे भिडन्त करने का यह उपाय सचमुच बहुत विचार भीर उसी प्रकार- जोय है। युद्धका यह एक बडा ही महत्वपूर्ण दॉच-पंच पां यामेषु पृथिवी भिया रेजते । (हे ) तविषीयव. ! यत् या अविध (१३) .. १७३७) पर्वताः नि अहासत । (४७) २ इन वीरोंके माझाण के समय समूरी पृथ्वी मारे हे बलिष्ठ योरो ! जप तुम हमले चहाते हो, तय दर के कॉप उठती है।' इन का गला दमा तीन हुभा फे तुल्य स्थिर प्रतीत होनेबारे प्रपल शत्रुओं को भी करता है। गठग हिला देते हो।' शरा इय युयुधय न जग्मया, अवस्यवन दृष्णि पोस्यं चक्राणा पर्वतान् वि ययु । पृतनाप्तु येतिरे। राजानः श्य वेपसंदृशः (८८) ८७२३ नरः, मरगया विश्वा भुवना भयन्ते ॥ 'पडा भारी पौरल करनेहारे तुम घोर सैनिक पहादों (१३०) मर-410 को भी तोवर आगे निकल जाते हो।" शूरो के समान और युद्धो.मुस रणबांकुर सिपाहियों के अयासः स्वसृतः कपच्युतः दुधकृतः भ्रा. दुख्य शनुसेना पर हर पहनेवाले तथा यस की इच्छा करनेवाले वीरों के जैसे ये वीर मरर समरभूमि मे बड़ी दृष्टय आपथ्यः न पर्वतान् हिरण्ययेभिः भारी पविभिः उज्जिघ्नन्ते ।। (१९८) १६१ शूरता दिखाते है। नरेशो के तुल्य ते मरे दिखा हमला करनेवाल, अपनी आयोजना के अनुसार से भयभीत हो उठने है।' देनेवाले ये वीर है, इसीलिए सारे भान इन वीर महतो प्रगति करनेवाले, स्थायी दुश्मनों को भी उखाड फेंकने- इस भाँति हा पीरोंकी युद्धचेष्टानों के वर्णन वेदमन्नो घाले, जिनपे भागे जाना दूसरों के लिए अममय है में पाये जाते है, जो कि सभी ध्यानपूर्वक ऐखने योग्य हैं। ऐसे, रोज पुन हथियार धारण करनेवाले, राहपर पा हुभा दिनका जिस तरह हटाया जाता है, से ही पर्वतों मरुत् वीरों का दातृत्व । को, मुवर्णविभूषित रथ के पहियों से या चक्राकारया वीर मरत बडे ही उदार प्रतिवा है. तथा सूर पुले हथियारों से उड़ा देगे हैं।' इन का पराक्रम ऐसा ही दिल से दान देने के कारण 'सु-दानव । पद से इन्हें विरक्षण है। सम्बोधित किया है, जिस का कि अर्थ है. यहे अच्छे (हे) धूतयः ! मानं परावतः इस्था प्र अत्यथ । दाती। मरतों के सूतो में यह विशेषण इन्ह कई बार (३६) २३९१ दिया गया है। मरलूप्र.४ - देवत-संहिता। [ मरुद्देवता। . नर्य' पद, सुदानवः । (५) 7. 1५।२६ (४५) १.१॥३९।१०, सुहाते हैं। 'मानों के हित जिनसे हो, ये ही शुभ (५७) र ८1११२, (६४). १७१९ आदि। इस तरह कार्य है। यह पद महतों के लिए क्षनेक चार सूतों में प्रयुक्त हुआ है। कुलीन वीर। उसी प्रकार- पीर मरत् उस्कृष्ट परिवार में जन्म लेते है, इसलिये एप दाना महा। (९५) 41२०६४ घेदने उन्हें ' मुजाताः ' उपाधि से विभूषित किया है। पादानं मतं दीर्घम् । (१६९) ऋ. १६६०२ सुजातासः नः भुजे नु। (८९). २०१८ इन वीरों का दान बहुर घसा है और देन देने का प्रत वडा प्रचंड है। इन के दाय का वर्णन मरत. सुजाता मरुतः तुविद्युम्नासः अदि धनयन्ते । (१५३) फ्र. १८८३ सूक्तो में इस तरह पाया जाता है । वीर पुरस हमेशा उदारचेता बने रहते हैं । जिस अनुपात सुजाताः मरुतः ! यः तत् मदित्यनम् । शूरता अधिक, (१६९) प्र. १९६१२ उतने अनुपात में उदारता भी ज्यादह पाई जाती है। यह उत्कृष्ट परिवार में उत्पन्न ये वीर बहुत बडे है। ये स्पष्ट है कि, मरुतों की शुरता उच्च कोटिकी थी और स्वयं तेजस्वी होने के कारण पर्वत को भी धन्य करते हैं। दातृस्य भी बहुत बडाचढा था। ये कुलीन वीर अपनी शक्ति से महसको प्राप्त होते हैं। मानवों का हित करनेहारे वीर । इस प्रकार इनकी कुलीनताका बखान ने किया है। (नराणां हिते रत ) मानयों के हित ऋण चुकानेवाले। धरने में तत्पर, इम अर्थ में वेद में भनेक यार पाया जाता पानमें रहे, ये वीर ऋग करते नहीं रहते, अपितु मुरन्त है । मरतों के लिए भी इस पद का प्रयोग किया है। उसे चुकाते हैं। इनको मनोति ऐसी है कि किसी के देखो (१६२) न. १६६५ भऔर उसी प्रकार- भी भणी न रहें, इसलिए उसण होने की चेष्टा करते हैं। नयंपु थाहुपुरीणि भद्रा । (१६७) ३. १९६० देखिए- 'मानों के हितार्थ कार्य निमग्न हने ारों की भुजाओं ऋण-याचा गणा अधिता। (१४८). 11८७४ में बहुत से हितकारक सामर्थ्य विद्यमान है।' ये वीर मानवों 'ऋण को चुकानेवाला यह धीरों का संघ सब का को सुस देने है, इस संबंध में यह मंत्र-भाग देखिए संरक्षण करनेवाला है। यहाँपर बताया है कि कण (३) गयोभुषः शिवाभिः नः मयः भूत । चुकाना महत्वपूर्ण गुण है, जो इनके वीरस्य के लिए बचाही (१०५). १२१२४ भूपणास्पद है। निस्सन्देह, ऋण पुकाना नागरिक कोगोंके 'सब को मुख देनेवाले हे मरुतो! अपनी कल्याण- लिए या भारी गुण है। कारक शक्तियों से हमें मुख देनेवाले यनो।' निर्दोष वीर। अस्मे इत् घ. सुम्नं अस्तु । (२४२) क्र.५/५३॥९ अवतक का मरुतों का वर्णन देखा जाय, तो स्पष्ट प्रतीत हम सभी को तुम्हारा सुख मास होवे।' मरुत् होता है कि ये पूर्ण रूपसे दोपहित है। किसी भी प्रकार समूची मानवजाति को मुख देते हैं और यह हमें उन से की श्रुटि या म्यूनता सन में नहीं पाई जाती है । इस संबंध मिल जाय । मुस देना मरतोंका धर्म ही है और वे हमेशा में निम्नलिखित बेदमन्त्र देखिए- उस कार्य को निभाते ही रहेंगे परम्नु टोरु समयपर उनके अनवधैः गणैः। (३) क. १९१८ साथ रह कर वह उन से प्राप्त करना चाहिए। पे सदैव सहि गणः अमेधः। (१४८) ऋ. १८१४ साम करते रहते हैं। ते अरेपसः। (१०९) ऋ. ९५२ सुदंससा प्रशुम्भन्ते । (१२३) ऋ. १८ अरेपसः स्तुहि । (२३६) *. १५३३३ 'ये गुभ कार्य करनेवाले वीर अपने शुभ कायासे ही 'मरतों का यह संघ नितामा निदॉप एवं भनिन्दनीय पोर मरतो का काव्य । (७) - है। पाप से कोसों दूर तथा अपवादरदिव हैं। ऐसे निरा इन वीरों की मित्रता स्थिर सरूप की है, इनकी गस वीरों की सराहना करो। मित्रता चिरंतन स्वरूप की है। जिस के घर में ये सोमरस जो दोषों से बिलकुल अछूते हों, उन की ही स्तुति का पान करते हैं, यह पुष्प अत्यन्त सुरक्षित रहता है, करनी चाहिए । यूंही किसी को सुशामद या चापलूसी जिसके घर जाकर ये वीर असग्रहण करते हैं. यह सचमुच करना ठीक नहीं। जैसे ये वीर निर्दोष माचरणपाळे भाग्यवान पने।' होते हैं, वैसे ही पे निर्मर या सापसुधरे भी रहा करते । य वान असति, स या ऊतिपु सुभगः आस। उदाहरणार्थ- (९६) भर. ८॥२०१५ अरेणयः हळहानि अचुच्यधुः । 'जो इन वीरों का ही यनार रहता है, यह इनके (१८६), १११६८ संरक्षणों से भकुशोभय होकर भाग्यशाली मन जाना है।' • ये साफसुपरे वीर सुदृर विरोधियों को भी पदच्युत उसी तरह- कर देते हैं।' यहाँपर भगवः पदका अर्थ है वे, जिन युष्माकं युजा आधृपे तविपी तना अस्तु । के शरीरपर धूल न हो; देहपर, कपडापर, इथियारोंपर (३९). १३० धूलिकण नहीं दिखाई पड़े। ऐसे वीर जो अत्यन्त सफाई तथा अलबेलापन अक्षुण्ण बनाये रहते हैं । उसी तरह- पानियाँ उदाने के लिये पढता ही रहता है ।' जो तुम्हारे साथ रहता है, उस का घर दुश्मनों की ते परण्यां शुम्भ्युव ऊर्णा वसत। (२२५) क्र. ५१५२९ यस्य या हव्या पीतये आगथ, सः घुम्ने 'वेधीर परणी नदी में नहा धोकर सापसुधरे मनकर याजसातिभिः च सुम्ना अभि नशत् । ऊनी कपड़े पहन लेते हैं।' इस ऊनी वस्त्रमावरण के प्रमाण (५७) " ८५२०६६ से स्पट होता है कि ये चीर शीत कटिबन्ध में निवास • पीरो 1 जिस के घर में तुम हविष्यात या प्रसादका करते थे। परणी नदी शीतप्रधान भूविभाग में बहती सेवन करने के लिये जाते हो, पद ररनो से और भनो से है, सो स्पष्ट ही है। पहले रथों का बखान करते हुए हम तुम्हारे दान किये हुँए विविध सुखो का उपभोग करता है। बतला चुके कि दरियों द्वारा बीचे जानेवाले तथा पहियो इस प्रकार, मरतों के अनुयायी होने से कामानित धन से रहित वाहनों का उपयोग वीर मरत् कर लिया करते जाने की सूचना घेदने दी है। थे। ऐसे पाहन पीले भूभागोंपर ही अधिक उपयुक्त मरुतों का धन। हुभा करते, अतः यह भी एक प्रमाण है कि ये वीर शीत- ध्यान में रहे विमरुन् विजयी वीर है, जिनके शब्द- कटि के निवासी थे। समहमें पराभव ये रिये स्थान नहीं है और पडे भारी उदार मरुतों का संपर्क। होते हुए भनुपम दानशूरता व्यक्त करते है, अत ऐमा चूंकि महलों में इतने विविध सद्गुण विद्यमान है, अत. अनुमान करने में कोई भापत्ति नहीं कि भसीम धनवैभव उनके सहवास में रहने से सभी राभ उठा सकते हैं, यह उन के निकट हो। देखा चाहिए कि मर सूक्तों मे उसकी पर्शाने के लिये निम्न ग वनं उद्धृत किये जाते हैं। धनिकता के बारे में क्या कहा है- य' आपित्वं सदा निध्रुवि अस्ति । मरुत्-मंत्रमप्रह (२) ६६ में 'विदवस ' ऐसा (१०३) क्र. ८१२०२२ गुणवोधक पद इन वीरों के लिए प्रयुक्त हुआ है। इस पर यस्य क्षये पाथ स सुगोपातमो जनः। का अधं धन की योग्यता भली भाँति जानने वाला याने धन (१३५). ८६१ पाना और उसकी योग्यता पहचानना भी स्पष्टतया सूचित समय सुभगः अस्तु, यस्य प्रयांसि पर्षय । होता है। मरतों में वह गुण विद्यमान है, सो उनके धन-- (१४१). ११८६७ संग्रह परने तथा धाका वितरण करने से स्पष्ट होता है। - स (८) दैवत-संहिता। मिरविता - पर किस भौति का हो, इस संबधर्म निम्न मन्त्र महाभच्छा जाने का डर है । विरोधियों का प्रतिकार करने की क्षमता पोध देता है। भी बढती रहे और यशस्विता भी प्रतिपर वर्धिष्णु हो। (३) मरुतः! मदच्युतं पुरुशुं विश्वधायसं जिस धन से ये सभी अभीष्ट बातें प्राप्त हो, वही धन हमें रयिं आ इयत । (५८) १३ मिल जाए। यह धा सहस्रविध हुमा करता है, जिस की आवश्यक्ता सय को प्रतीत होती है। धन का तात्पर्य सिर्फ "हे वीर मरतों! के घमंड को हटानेवाले, हमें पर्याप्त प्रतीत होनेवाले, सब का धारणपोपण काहान रपया, भाना, पाई मे नहीं अपितु जिससे मानय धन्य हो जाए, यही सच्चा धन है। उसी तरह- का दान दरो।' यहाँ पर ठीक तौर से बताया है कि धन शिम तरह का हो। जिस धन से शनु वा घमः या वृथा सर्यवीर अपत्यसाचं श्रुत्यं रयिं भिमा उतर जाए इस ढा की शुरला हममें पदानेवाला दिवेदिये नशामहै। (१९८) २१३०१ पर हम में घमदन पेदा करनेवाला धन इमे चाहिए। 'सभी वीरों से, पुत्रपौत्रों से भन्धित, यश देनेवाला सभी तरह की धारणशक्तिको वृद्धिात करने वाला, हमारी धन प्रतिदिन हमें मिल जाए।' मनुधा देपा जाता है कि भावश्यकताओं की पूर्ति भली भाँति परनेवाला पनवेभव धन धधिर प्रात होने पर शूरता पट जाती है और सन्तान प्राप्त हो । अर्थात् ही जिस धनो पाने से गर्य, भाभिमान पैदा करने की शशि भी न्यून हो जाती है। यह दोष घटनर भॉति भाँति के प्रमाद हो, जो अपर्याप्त होता है, रहसहन त्रुटिमय होने से हुभा करता है । ऐसा दोष न तथा जिस से अपनी शक्ति क्षीण होती रहे, एमा धन हम हो और धन पाने के साथ ही उसकी रक्षा करनेका बल भी से कोसो दूर रहे । हर कोई धर के इन गुणों को सोचकर तथा मुसन्तान उत्पन्न करने का सामर्थ भी वर्धिष्णु होता देखे। ऐसे उ धनको सरर हमेशा साथ रस देते है। रहे, एस भाँति सामर्यशाली धन वा ममह किया जाय । रयिभि. विश्ववेदसः । (११७) क १२६१० और भी देखिए- से धन मरतो के निकट पर्याप्त मात्रा में रहते है, यत् राध ईमहे तत् विश्वायु सौभगं इसीलिए कहा है कि 'मरत् सर्वधनसमठ हैं।' धन के अस्मभ्यं धत्तन । (२४६) ५/५३१३ गुणी एव अवगुणोंको यदलानेवाला एक और मंत्र देखिए 'जिस धन की कामना हम करते हैं, या दीर्घ जीवन (हे) मरत ! अस्मासु स्थिरं चोरपन्त ऋतीपाहं देनेवार। ग्य पदिया सौभाग्य बढानेवाला हो।' उसी तरह- शतिनं सहस्रिणं शूशुवांसं रयिं धत्त । य्यं स्पाईवीरं रयिं रक्षत । (२६३) क्र. ५५४४ (१२२). १६४.१५ नुम स्पृहणीय वीरों से युक्त धनका सरक्षण करो।' 'हे वीर मरतो हमे यह धन दो, जो स्थायी स्वरूप अनयभ्रराघस । (१६४) १९६६१७ का हो, पीरों से युराको रानु का परामर करने के सामर्थ अनवम्रराधस आ पक्षिरे। से पूर्ण तथा मैकडों और हजारों तरह का यश देनेवाला (२०२) र २१३१४ हो। धन का स्वरूप कसे रहे, सो यहॉपर बताया है। (भमा भ्र राघस.) जि का धन कोई छीन घा तो किसी सरद मिल गया, लेकिन तुरा खर्च होने से नहीं सकता, जो पा पतन की भोर नहीं है जाता, यह चरा गया, ऐसा सणभगुर न हो, यह पुसदरपुश्त विध धन प्राप्त हो।' धा जरूर'समीप रहे, लेकिन पर इस मान हो और विरासतम उस का उपभोग लिया जा तर प्रगतिका पोपर रहे। धन आषिश्यसे अपने प्रगति. सके। वर पोरसापूर्ण भाव यदानेवाला हो, नकि कायरनाके पधपर रोहे ही उठ खड़े होने चाहिए । धन के बारे में विचार | धन कमाने पे बाद उम की रक्षा करने का जो यह घेतावनी दी गयी है, यह सभी को पापूर्वक माम भी बढसा र भोर धन की मात्रा बढने से गाधिक सोचनेयोग्य है और चूतिप्पा स्पृहणीय धन बीर महो धीर सपान उप हो । नहीं तो ऐगी अनवस्था होगी कि के निपट रहता है, इसरिए वैदिक सूतों में महों का भा पनपना, पति पा सHITीन हो महरा बताया है। - - - चौर मरतो का काव्य (२९) भव्य था। मरुतों का स्वभाववर्णन । ये विचारिस तथा घरासायी बना देते । उपयुक्त वर्णन से इसा स्पष्ट हुभा है कि ये वीर सीक मरत् मानवकोटि के ही थे, परन्तु अनूठा पराक्रम दर्शाने मएन् एक घरम- ( IPerrack) देर में निवास करने से इन्हें देवरव का अधिकार प्राप्त हुभा था।येद में प्रभुभो थे, महिलाओं की तरह विभूषित तथा अल कृत हो, यदी के बारे में भी ऐसे ही लेकिन ज्यादह स्पष्ट उल्लेख पाये सजधज से बाहर निकर पटते, अपने स्रो, हधियारो जाते हैं, अर्थात् प्रारम्भ मे ऋभु शिल्पविद्यानिणात कारी सधा भायुधों को साफ सुथरे एव चमकीले रखते, संघ बना गर माय थे, परन्तु भागे चरकर उन्हें देवों के राष्ट्र में पर यात्रा करते भार सांघिर या सामूहिय हमले चढाया नागरिकस्य के पूर्ण अधिकार प्राप्त हुए थे। करते । ग्रुदर पर सामूहिक चदाई करने के कारण इन एसा दिखाई देता है कि मरतो के बारे में भी पहु धोरों के सम्मुख डटकर लडना शत्रु के लिए पसभव तथा कुछ ऐसी ही घटना हुई हो । देश के सध मे जIT पडता दूभर हुमा करता । इसलिए सानुसेना जर नतमस्तक हो, है कि विशेष अधिकार सब को समाज रूप से नहीं प्रास टिकना भमभव होनेसे, भारमसमर्पण करती या हट जाती। हुआ करते, जैसे 'अश्विनी'चशीय व्यवसाय मे लगे सभी मरन् साम्यवाद को पूर्ण रूप से कार्यरप में परिणत रहने ओर घे दोनो सभी मावों के घर जारर चिरिरमा करते थे, जयार पिसी तरह की विषमता उन में नहीं कर रेते, इसलिए उन्हे यज्ञमे हविर्भाग नहीं मिरा करता पायी जाती थी। सभी युवावस्था में रहते थे और इनका था। लेकिन कुछ कार के उपरान्त च्यवन ऋषि को बुढा स्वरूप उप्र तथा प्रक्षकों के दिल मे सीक नीतियुक्त के गुर मे छुड़ाकर फिर युवा मो से उस के प्रपत्तों पे भारर या सृजन करनेवाला था। दा का दौर दौर परस्वरूप अश्विनो को अधिकार प्राप्त हुआ। पाठको फो अधिनी की प्रस्तावना में यह देखने मिलेगा। टीक मस्तकों पर शिरस्त्राण रखे होते या कशी मी साफ उसी प्रकार ऐमा मतीत होता है कि मर मर्य, मानर पाँधा करते । स का पहनावा तुत्यरूप दीस पडता था। या सभी काश्तकार थे, रेकि जब उन्होंने धीरतापूर्ण भाला, यरछी, कुडार, धनुष्यबाण, पशु, वन, सद्ग एव कार्यकलाप कर दिखाये, राय अथवा विशेषनया इन्द्रये सैन्य चत्र भादि भायुध इन कट रहते । ये सारे शस्त्रास्त्र में सम्मिलित होनेपर व देवपदपर अधिहिन हुए। पडे ही सुख एवं कार्यक्षम रहये । इनके रथो तथा वाहनों मरता में विद्वरा, चतुराई, दूरदर्शिता, बुद्धिमत्ता पत्र को कभी घोडे खींचो, तो कभी पारसींगे या कृष्णसार साहलिकता दूर कूट कर भरी थी और घे उद्यमी, उत्साही भृग खींच ऐते । यीले प्रदेशों में चाइनि रथों का और तथा पुरुषार्थी थे। वे वीरगाथाओं को दिर चस्पी से मुन कमी विशा घोटाके यत्रसचारित प प थेग से गर्द उदात के थे और साहसी कथाभो सुनने मे राल्लोन हुभा कर। जानेवाले वाहनों का भी उपयोग किया जाता था। शायद बीमारों की चिकित्सा प्रथमोपचारप्रणा से परने में धे पेपही की मदद से भामाशमार्ग से जाने वाले वायुयान प्रवीण थे और इस सपध में उन्हें कुछ भापधियों का ज्ञान सरश रथों को काम में लाते। इस के बाहर इस प्रकार चार ताद हुभा करते थे। विविध कोडाशी में ये कुशल थे, तथा स्थविधासे भी पे यो हो विलक्षण पेग से शत्रुपर धावा करने और भरी भाँति परिचित थे। बाजे बजाते हुए, तराने गाने इस भयम्भे में दारोवारे येग से शत्रु तो हाा- हुए और राहपरसे चरते हुए भी याध पजा, राधा गीत पपका रह जाता, पर अन्य ससार भीक्षणमान थरां उठता। गाते हुए निकट पडते । यही कारण था कि इनके प्रबल आक्रमणों के या विद्युत् ये मरत अति भव्य आकृतियाले तथा गौरवर्ण से युक्त युद्ध (Blitz) के सम्मुख क्या मजाल कि कोई शत्रु एव तकि रक्तिम भाभामे विभूपित थे। भरने अन्दर टिक सके । हा का भाषIT इतना प्रखर हुमा करा कि विद्यमान गाम से हापा रोज का हुमाया। ये कृषि चिसा से अपना भासन स्थिर पिये हुए पानुको गी कार्यमें सरम होकर पल शा एप विविध खाय चीजोंकी था। उन देवत-संहिता। [ महदेवता। - राना उपज बहाते थे। ये गोपालन के व्यवसाय को वही अच्छी ये वीर वों एवं पर्वतों पर यथेच्छ विहार कर लेते, ताह निभा लेते थे, क्योंकि गोदुग्ध इनका पदा प्यारा पंय क्योंकि समूचे भूमंडल पर इनके लिए भाग्य याबीहार था। सोमरस में गायका दूध, गोदुग्ध का घना दही और स्थान या ही नहीं। इनके दिल में किसी विशिष्ट स्थान सत्तू का भाटा मिलाकर पी जाते थे। गाय तथा भूमि को में जाने की लालसा उठ खड़ी हुई कि सुल्व ये उधर जा मातृतुल्य भादर की निगाह से देख लिया करते और मौका पहुंचते; कारण सिर्फ यही था कि इन्हें रोकने वाला तो भानेपर मातृवत् गौ एवं मातृभूमि के लिए भीपण समर कोई था ही नहीं। इनका भय इस परह पतुर्दिक फैला भी छेड दिया करते, जिन के फलस्वरूप इनकी ये माताएँ हुभा था। श के चंगुल से मुक्त हो जाती। ये गगशासक थे। इनका सारा संघ ही इन पर शासन मरतों के घोडे चराता था और इन में अंध, मध्यम अथवा कनिष्ट इस धन्धेवाले हुआ करते और बहुधा होते हुए पहाड़ों पर चढने में पटे कुशल होते थे। ये चार तरह भेदभाव नहीं था। जो कोई इनके संघ में प्रवेश कर अपने अधों को मजनून बनाकर भरछी तरह सिखायाका लेता, यह समान अधिकारों को पानेपाला सदस्य जाता था। थे। मरुत् पौर अश्वविद्या में तथा गोपालन-फलामें बडेही निपुण थे। ये जानते थे कि किन उपायों से गाय अधिक सभी मरत् वीर समूची जनता का कल्याण करने का दूध देने लगती है, अत: इनके निकट दुधार गायों की शुभ कार्य भली भाँति निमाते थे और इन्द्र के साथ रहकर कोई न्यूनता नहीं थी। ये वीर जिधर चले जाते, उधर अवधसा महासमर में इन्म को सहायता पहुंचाते । अपने साथ ही आवश्यकतानुसार गायों के युट ले जाया कभी कभी रद्रदेव के अनुशासन में रहकर लडाई देते, करते। युद्धभूमि में भी इन के साथ गोयूथ विद्यमान भतः इन्हें 'रद के अनुयायी' नाम से विख्याति मिठ होते, क्योंकि इन्हें ताजा गोदुग्ध पीने के लिये भति माय- चुकी थी। श्यक था, ताकि इन पीरों की थकावट दूर हो पल एवं सारे ही वीर मरत् कुलीन याने अच्छे प्रतिष्ठित परि. उत्साह बढ़ जाए. चार में उत्पर थे। ध्यान में रखना कि किसी भी हीन ध्यान रहे कि वीर मरता पल रहा ही प्रचंड था, कुल में उत्पन्न साधारण व्यक्ति को इस संघ में स्थान ही जिसका उपयोग वे केवल जनता के संरक्षणार्थ ही कर लिया नहीं मिलता था। ये सचाई के लिए लड़नेवाले थे और परते थे। इसी कारण से मरतों का सैन्य भरयन्त प्रभाव. कभी किसीसे प्रण लिया हो, वो ठीक समयपर उसे मुकाते पाली माना जाता था और इस सैन्यका विभजन शधं, थे, इस कारण उनका सास भच्छा बना रहता। मात तथा गण नामक संघों में किया जाता था, जिन में इन का यताव दोपरहित हुभा करता, रहनसहन सुतरा प्रमशः ६३, ४४१ तथा ८४४ सैनिक संघटित किये साफसुधा था । समूचा पहनावा भस्यन्त जगमगानेवाला जाते थे। य, इस कारण दर्शकोपर इन कर रोष-दार धमाया युद्ध में डीक शत्रु के मुंह बायें पड़े रहकर अपने जीवित परता था। मरत् धन का उत्पादन करनेवाले एवं धनकी की कुछ भी पर्वाह न करके दुश्मनपर टूट पडना मरतो के योग्यता समझनेवाले थे, भत. अवीव उदारता भोर पान पायें हायका खेल था। भाः इनके भीपण वेगवान धावे के देने में कभी पीछे नहीं रहा करते । सम्मुख शत्रु की दशा पदी दयनीय हुमा करतो। मरुत् पद्यपि पीर महत् माय, मानपभ्रेणी के थे, तो भी इन अगर शत्रुओं पर हमले चढाते, तो शनु जान बचाकर का चरित्र इतना दिग्य तथा उच्च कोटिका होता था कि जो भाग निकलते। पर यदि शत्रु ही स्वयं मरतों पर आक्रमण कोई इनके काग्य का सृजन करता, वह अमर हो पाता। परने का साहस कर लें, तो पीर मरन् इन भागमणों को यह सारा इसका स्वरूप-वर्णन है और जो पाठक मरवों के विफल बनाकर दराने । इम मॉति मरतों में विविध शक्ति मूतों का पठन पानपूर्वक करेंगे, उन्हें यह यखान स्थान विद्यमान थी। स्थानपर पडने मिलेगा। पाठक विभिल मरत्-सूतों में उसे वीर मरतों का काव्य । पढकर मतों की शुरता के वास्तधिक महत्व को जान से के मौकेपर साकाम राया पीप उठती है भीर गई और वीरस्यपूर्ण क्षात्रकर्म में मरतों के आदर्श को अपने भी यहुत जोर से उदा करती है । सम्मुख रख लें। ८७ हे रणयाँकुरे मरतो पीरो ! जिस वक्त तुम अपनी मरुतों के सूक्तो में सारी शक्ति बटोरकर शनपर भागमण करते हो, तप ऐसा वीरों के काव्य का दर्शन । जात पडता है कि उस भोरका भाकाश ही गुद दूर होकर जैसा कि हम ऊपर कह आये हैं, मरर-काव्य धीरसपूर्ण सुम्ह गाने के लिए मार्ग पना देता है। प्राचीनतम वीरगाथा है, जिसे पढते समय वीरवपूर्ण तेजकी ९२ हे यहादुरो। तुम सम का गणवेश समान है, भालोकरेखा मानस-क्षितिजपर जगमगाने लगती है। तुम्हारे गरे में सुवर्णहार पढे । भोर तुम्हारी भुजाशीपर इस समध मे कुछ मन्त्रों के भाशय नीचे अवलोकनार्य हथियार द्योतमान हो उठे हैं । दिये जाते हैं। ९३ ये उप्र एवं यलिष्ट बीर अपने शरीरोके रक्षण की १२. हे पीरो गुम्हारे उत्साहपूर्ण भागमण से भयभीत पर्वाह न परते हुए भरना युद्धकार्य प्रचलित रखते हैं। होकर मानय तो किसी जगह माश्रय या पनाह पाने के लिये वीरो ! तुम्हारे स्योपर स्थिर धनुष्य सुसज्ज हैं और सेना जासही है, लेकिन पहाडसक थरारने लगते है। के अप्रभाग मे तुम विजयी मनते हो। १३ जिस समय सुम शनुपर धावा करते हो, वय किसी ९११ अपने शरीरो की सुन्दरता बढाने के लिए ये जराजीण वृद्ध की नाई समूची पृथ्वी थरथर काँपने लगती है। विविध वीरभूपग पहन लेते है, उन के पक्ष स्थलपर मुरर्ण- ३९, शत्रुओं की धजियाँ उडानेवाले हे वीरो ! लोकगे, विरचित हार लटक रहे हैं, कोपर भाले मुहाते हैं। इस भन्तरिक्ष में या भूमटलपर कहीं भी तुम्हारा शत्रु शेप नहीं ढग के ये वीर मानो सचमुच अपने भनूठे घर के साथ रहा है । जो तुम्हारे साथ रहते है, सन में भी शत्रुविध्वस स्वर्गसे इस भूतलपर उतर पढे हो, ऐसा प्रतीत होता है। करने की शक्ति पैदा हुभा करती है। ११६ सामुदायिक शोभा से मुहानेवाले, लोकसेवा ४५. हे दानी तथा शूर मरुतो ' तुम असद सामर्थ्य एवं करनेहारे, शूर, पलिट होने से जिनका उत्साह कभी घटता भविकल पक से पूर्ण हो। हे शत्रु को विकपित करनेवाले ही नहीं ऐसे महान वीरो ! तुम अपने पराक्रम की पजह थोरो 'शानी पुरषों-सज्जनों का द्वेष करनेहारे दुष्ट शत्रुओं का से गुलोक एव गूमदळ मुखरित तथा निनादित बना देते पध हो इसलिए तुम दूसरे किसी दुश्मन को उन पर याण हो । जब तुम अपने रयोंमे निजी भासपर बैठते हो, राय को नाई छोड दो, ताकि तुम्हारा एक शत्रु तुम्हारे दूसरे शव तुम, मेघमटल में चोधियाती हुई दामिनी की दमक के से पस्त हो जाए। नुरय, भतीव सुहाते हो। ६८. पल से निष्पत होने वाले पौरुषमय कार्य पूर्ण करने ११७ विविध ऐश्चयों गे शोभायमान, एक घर में पाले और स्वयशासक इन वीरोंने वृत्र के टुकड़े टुकडे करपे निवास करनेवाले, भाँनि भाँति के यलों से सामान पहारों में से भी राह बना डाली। प्रतीत होनेवाले, विशेष यठवान, शनुदलपर चतुराई से ७० बिजली की तरह जगमगानेवाली शस्त्रसामग्री हथियार फेंकते हुए, भसीम बल से पूर्ण, बीके भाभू धारण करके लद्धनेवाले ये वीर जो तेजस्वी मोर गौरवर्णवाले पणों से भलकृत इन नेताओं ने भन भपने हाथों में शनु दिखाई देते हैं, अपने मस्तकोंपर सुनहली भाभा से काति का विनाश करने के लिये बाण का धारण कर लिया है। मान शिरस्त्राण धारण करते हैं। १६७ जनताके हितमद कार्ग में जुटे हुए इन वीरों के ८५ हे तेजस्वी तथा साफसुमरे भाभूषण धारण करनेहारे याहुओं में पहुवसी कल्याणकारक शक्तियाँ छिपी पड़ी है। पीरो । जब तुम शघ्रपर चदाई करते हो सय तुम्हारी राह में उनके यक्ष स्थठपर हार तथा कोपर विविध वीरभूषण एक भानेवाले टाप भी टूट गिरते हैं; रोडे भटकाने के लिये कोई हथियार हैं । डा के धन की कई धारा हैं और पछियों के भगर नहा रहे, तो वह सकटमस्त हो जाते हैं, इस भाक्रमण देनों के तुल्य उन की शोभा बढी मली जान पड़ती है । .

दैवत-संहिता। [ मरयमा। - । १७४. बीफ तरह हायमे पकको हुई, मुन्धर आमापाली, २९१.६ नेता वीरो! तुम बहुत धनाय, भमर, राय. मुवर्ण के समान चमरने वाली तलवार, मेघ में विद्यमान निट, यशस्वी, कपि, ज्ञानी, युवक तथा प्रशंसनीय हो, तुम बिजली की तरह हमेशा इन चोरों के निकट सुहाती है। हमारी मदद करो। अन्त.पुर में रहने वाली साधी नारी जैसे गुप्त रूपसे भीतर ३८६. है वीरो! तुम जिप्तकी रक्षा करते हो और लडाई ही पदेन संचार करती है, पर यज्ञ के अवसर पर समाज में में जिसे तुम बचा लेते हो, उसका विनाश कभी नहीं होता व्यक्त होती है, वैसे ही उनकी सलवार भी हमेशा अपने है। यह जो तुम्हारी भपूर्व ढंग की रक्षा काने की बुद्धि मियान में गुप्त पड़ी रहती है, पर एआई मौकेपर याहर है, यह हमें मिल जाए । तुम जल्द हमारे पास भाभो । भाकर चमकने लगती है। ४१७. ये पीर, वायु जैसे तिनफे को उडा देता है उसी १९२. हाँ, मातृभूमिने ही अपने संरक्षणार्थ, पडे भारी प्रकार शत्रुओं को उड़ा देते है भौर गान होते अधि- समर का सूत्रपात करने के लिए इन वेगशाली यौरों का घालातुल्य तेज पुञ्ज दीख पड़ते हैं। ये योद्धा अपने कवच यह बडा भारी सन्य उत्पन दिया है। एक ही समय पहनकर तथा युद्धों में जाकर बहुत ही प्रशंसनीय कार्य मिलजुरकर हमला बढानेवाले इन वीरोंने बहुत या सामर्थ्य करते हैं, पिता के भाशीर्वाद-नुल्य इनके दाम सरयन्त प्रकट कर डाला है और इन समूचे वीरोंने इसी सामय में साहाय्यकारी होते हैं अपने धन की धारकशफि का अनुभव ले लिया है। ४२८. रथों को धम्चाले घोहे जोतनेहमे, भूमि को १९९. युद्ध के मोर्चपर श्रेष्ठ ठहरे हुए, शत्रु का पूर्ण माता माननेहारे, लोककल्याण के लिए हलचल करनेवाले, पराभव करनेवाले सामथ्र्य से युफ, सिंहके समान भीषण युद्धों मे सहर्ष जानेवाले, अग्निनुरय घोसमान, विचारशील, दिखाई देने वाले, अपने प्रचंड बल से सब की निगाह में सूर्यवत् तेजस्वी ये वीर अपने सभी देवी सामयों के साथ पूजनीय बने हुए, अग्मितुल्य तेजस्मी, वेगवान, प्रभावो. हमारे निकट भा जाय। स्पादक सामय से युक्त, ये चीर शत्रुओं के धन्दीगृह रो ४३४. हे वन स्वरूपवाले वीरो ! तुम ऐसे भीषण संग्राम अपनी गायों को छुडाते हैं। में डटकर खडे हुए हो, भागे घढो, शत्रुभों का घध करो, २१८. ये साहसी वीर शान पलसे युक्त है और ये शशु पर चडाई करने समय हमेशा ही विजयशील समय दुश्मनों का पूर्ण पराभव करो । ये सराहनीय धीर हमारे सत्रुओं का बध का दालें, इनका दूरा भी शवपर घट से युक्त होकर समूची जगता का संरक्षण करते है । जाए और उन का विनाश कर डाले। २६५. विशेष रूपसे सराहनीय कर्म करनेहारे, तेजस्वी ४३५. हे वीरो! यह जो शत्रुको सेना घडे धेगसे हमें हथियार धारण करनेवाले, यक्षास्थल पर माला पहननेवाले चुनौती देती हुई हमपर टूट पडने भाती है, उस सेना को ये वीर बहुत यदा बल धारण करते हैं। अच्छी तरह धूम्रास्त्र से मधेश बनाकर इस दंगसे विद्ध कर डालो कि स्वाधीन रहकर गमन करनेवाले ये धीर योद्धोपर बैठकर समूची शत्रु-सेना भ्रान्त हो जाए और सभी सैनिक एक इधर आते है । उनके रथ लोकहितायं जाते हुए उन्हीं को दूसरेको न पहचानते हुए बिलकुल सहमेसहमे रह जॉप । इष्ट स्थान तक पहुंचाते हैं। ४५०. हे शन्नु को लानेपाले यी ! तुम जय शङ्कपर २७८. ये अपने सामर्थ्य से शत्रु का पूर्ण विनाश करते हमला करने के लिये धन्धेवाली हरिणियाँ अपने रयों में है और भपने भाक्रमणों से पर्वततुल्य बृहदाकार दुर्गाको जोत लेते हो और रथपर पट जाते हो, उस समय मारे भी मटियामेट कर डालते हैं। हरके सारे जंगल हिल जाते है तथा समूची पृषी एवं २८५. भूमि को माता माननेवाले हे पोरो! तुम्हारे अटल पर्वरा भी थरथर कापने लगते हैं। निकर कुटार, भाले, धनुष्य, तूणीर, घोडे, रथ, हथियार ४५३. हे रणयाँकुरे योद्धा लोगो ! तुम में कोई भी सभी यढिया दर्जे के साधन है । तुम उस्कृष्ट ज्ञानी हो और घेष्ठ या कनिष्ठ नहीं है, तुम सभी एक दूसरे से भाई- तुम हमेशा अच्छे कार्य ही करते हो। चारे का बर्ताव रखते हो भौर अपनी उपनि के लिये एक घोर मरुतों का काव्य। - हो प्रयास करते हो, रुन तुम्हारा पिता है और भूमि गुम्हारी घेदकी पिपलाद इन सहिपभोता अध्ययन समाय ही है। माता है जो तुम्ह मकाका मार्ग दिखलाती है । भछा, जिन सहिताओ का पठा प्रचलित है एमा ऊपर इस प्रकार इस वीर-फाज्य में विद्यमान भोजस्वी विचार पहा गया है उन का सभ्यया भी यहुरा से विद्वान करते यहा बानगी के तौपा दिया यहाँपर इस काव्य का है, ऐमी यात नहीं । समूचे भारतवर्ष में गेसे अच्छ पेद- विलकुल शम्दश अयं दिया है, तथा साधारणतया स्पष्ट पारी चार या पाँच सौसे अधिक नहीं है और उच्चकोटिक दिखाई पडनेयाला भारार्थ भी दिया है । दश अनुवाद घापाठी तो पूरे सौ भी मिलना कठिन ही है। मालम भपामा लोगों के लिए भत्यय आवश्यक है और भाया यही कि, भादिन घेदाध्यया का लोप यहॉतक हुभा है। भी उन्हीं के लिये उपयुक्त है। जो विशेष अध्ययन करना इस से स्पष्ट होगा fs, आधुनिक युग में घेदपठन पा चाहरोहों उनके लिए प्पिणी सहायक प्रतीत होगी पर भविष्य या वर्तमान दशाशनिक भी उज्जल नहीं है, क्योंकि जो वेदमत्रों का विशेष गहन अध्ययन करना नहीं चाहते वेदाध्ययन तुस होता जा रहा है । जननी वेदपाठी या जिन के समीप इसमा भध्यया करने के लिये समय पाह्मण के लिये निर मादर रहा हो तो भी यह नहीं के नहीं उन के लिये सरल अनुयाद आवश्यक है। ऐसे सरक परापर है क्योकि उस ज्ञान का व्यवहार में तनिक भी भनुवाद में भागेपीछे के सन्दर्भके अनुसार अधिक लिमना उपयोग नहीं है, ऐसी ही सार्वत्रिक धारणा चरित। परताहे और यथाशक्षिकपि के मग का भाशय पाठकों के अगर प्राचीन काल स सार्थ येदाध्ययनरी प्रथा जारी रह दिल में पैठ जाय इस हेतु कुछ अधिर पारा सन्दर्भ के जाती तो बहुत कुछ समय था कि, व्ययहार में उस का अनुसार लिखनी पड़ती है। हमने जान शकर यहाँ स्वसत्र उपयोग सट हुआ हो। भोर आज जो यह गलतफहमी और लगातार लिखा हुआ अनुवाद नहीं दिया और इस मर्वसाधारण में पायी जाती है कि, बदाभ्ययन सुरा प्रथम रास्करण में शब्दश अनुवाद निप्पणियों तथा अन्य निरुपयोगी है, निमूल ठहरती या उत्पन्न ही नहीं होती। साधनों के साथ स्वाध्यायशील पाठकों के लिये प्रस्तुए इस प्रतिपादन को स्पष्ट करने के लिये हग गरदेव के कर रखा है। द्वितीय सस्करण के अवसरपर सभय हुभा तो मन्त्रो का उदाहरण लेंगे। यदि मरतों के सूमो का वैसा सीधा अनुवाद दिया जायगा । सहित मध्यया करने की प्रगाली प्राचीन काल से भनिन वेद का अध्ययन । में रहती तो सभर था कि उन मे सूचित ढग से समिकों की सांघिक शिक्षा का प्रबंध करने की पत्पना किमी भाजकल सग्र लोगों की यह धारणा पनी हुई है किमी यो सूझती और शायद भारतीय परशो के सन्मों में वैदिक सहितामोरे अध्ययन का अर्थ सिर गन्न कास्य कर लेने है और यह धारणा सहस्रों वर्षों से चली आ रही सातसारा की पक्ति करना, सब का मिलकर समाग गति से है। इस का नतीजा यू हुभा है कि सहितामो के अर्थ की फूच करना, सप का पहावा नल्य होना और आठमो भोर अधिक लोगो का ध्यान आकर्षित नहीं होता है। नऊयो सिपाहियों या समूह यनावर हमले चढागा आदि पापि यहुत भर्से से विद्वान माह्मग इन महिलाओं को महत्वपूर्ण प्रथाभो का प्रपला शुरु हो।। कठस्थ कररो भाये हैं पर भर्य के बारेमें भधिकों का सौदा पर क्या कहें ? हिन्दुधर्म एव हिन्दुत्व की रक्षा के सीन्य ही दृष्टिगोचर होता है। वर्तमान काल में ऋग्वेद लिये भस्तिस्य में भाये हुप विाषनगर ये साम्राज्य में या (शाकल), यजुर्वेद (सैत्तिरीय, वाजसनेयी एव फाव), तदुपरान्त कई शताब्दियों के पश्चात् प्रस्थापित हुए मरादों सामवेद (काँधुमी) और मधमेद (शौनक) सहिसा अथवा पेशवाओं के शासन काल में मरुतोकी सी सैनिक भोका भययन प्रचलित है। अर्थात् कुछ माह्मण इन का शिक्षा-प्रणाली कार्यरूप में परिगा नहीं हो सकी। विनय पठन करते हैं लेकिन प्रग्य की सांख्यायन एव याकर नगरके राज्य में दोपर भाष्य रिखने वाले सायण माधा सहिता, यजुबईकी मैत्रायणी, काठक, कापिष्ठल, कट सहिता, सश यढे आचार्य हुए जि के वेदभाष्य प्रमोोपा भी सामवेद की राणायणी एव जैमिनीय साहिता तथा भधर्व- घेदाध्यया केवर यज्ञोतक ही सीमित रहा। उस समय - - (२६) देवत-संहिता। महदेवता। . भी बेदमर्शित एवं अनूठे दंग से सांधिक सामर्थ बहाने. करने की चेष्टा की, तो भी अन्य महाराष्ट्र सरकार इस शिक्षा द्वारा मरतों का यह सैनिकीय शिक्षा का अनुशासन प्रत्यक्ष में पिछड़े रहे। इसका परिणाम यही हुमा कि अन्त एक ध्यवहार में नहीं भा सका, अधका यूं कहें कि तय किसी के सिंधिया को फ्रेंचों की पराधीनता सहनी पड़ी। यह बात ध्यान में यह बात नहीं आयी कि पैदिक सिद्धांतों को सय को ज्ञात थी कि सिंदे की सेना अधिक प्रभावोत्पादक पाहारिक रूप दिया जा सकता है, तो यह प्रतिपादन हुई थी लेकिन उस प्रणाली का प्रचार किसीने नहीं किया सच ई से दूर नहीं होगा। था। मगर लोगों को परंपरागत रूप से यह बात विवित दाँ, श्री छम्पति शिवाजी महाराज के काल से लेकर होती कि वेद के मरुस्ती में यह संघ-सैनिक-प्रणाली मन्तिम स्वतंत्र सातारा-नरेशन या प्रथम पेशवा से ले वर्णित है तथा यह पूर्णतया भारतीय है तो शायद भनुभव १८१८ तक के मराठी साम्राज्य के काल में दाध्ययन के से इसका अधिक प्रचार हो जाता जिस के परिणामस्वरूप लिए लक्षावधि रायों का व्यय हुभा, घेद कंरस्य रखनेवाले योरपीयनों से लउते समय जो समस्या व्यस्त भनुपात में ब्राह्मणों को खूय दक्षिणा मिली पर भन्तमें क्या हुभा? अचम्भे हल हुई। बहुधा सम परिगाण में छूट गयी थी यात इतनी दी है कि किसी को भी यह कल्पना नहीं सहस्रों वर्षों से मरुदेवता के मंत्रों को कंठ कहनेवाले सूसी कि, भमदित वेदाध्ययन करनेवालों के लिये कुछ ग्राह्मण भारत में चले भा रहे थे और उन्होंने पादों के न बुट प्रबंध करना चाहिये, या वैदिक साहित्य में लाभ- उलट पुलट प्रयोग मुखोद्त कर लिए पर महतोकी सैनिक- दास एवं उपादेय मुल हो तो ईद लेना चाहिए और प्रणाली के सिद्धान्त भज्ञातदशा में रखकर फेवक मंत्रों का तुरन्त उसे व्यापारिक स्वरूप दिया जाय । उस काल में उच्चारण किया। लेकिन एकने भी इस संघ-सनिक-शिक्षण वेद के बारे में बस यही धारणा प्रचलित थी कि, मन्त्र सिद्धांत की और लेशमात्र भी ध्यान नहीं दिया। केवल कंठाम रहे और यज्ञ के मौके पर उन का उच्चार किया मंत्रों को जवानी याद कर लेने से तथा ऊँची भाषाज में जाप, यहुर हुम तो मन्न-जागर के अवसरपर मन्त्रपठन पदलेने मात्र से अपूर्व पुण्य की प्राप्ति होगी, ऐसे विश्वास करना उचित है। के महारे ये हजारों वर्षों तक संतुष्ट रहे। इस भसावधानी ऐसी धारणा से मभावित होने के कारण, श्रीमरसाय. का परिणाम यही हुआ कि भारतीयों का क्षामग्र न्यूनाति- गाचार्य के पालमें भी वेदमाप्य लिखा तो गया था तथापि न्यून होने लगा। अगर यह संघ-सैनिक-शिक्षा भारतीयों उस पेमें वर्णित सिद्धान व्यवहार नहीं भा सके, इतना को प्राप्त होती तो पति पीली में प्रास होनेवाले अनुभवके नहीं कि अगर कोई उस काल में यह बतलाने का साहस सहारे उस में खूब उन्नति हो जाती । पर उसति के स्थान करता वेदमंत्रों में निर्दिष्ट सिद्धांतों को कार्यरूप में पर भारतीयों के अव्यवस्थित एवं असंगठित सन्यको परिगत करता चाहिये तो भी किसी का ध्यान दधर आकृष्ट योरपीयनों के सिखाये हुए संघशासित सैन्य के सम्मुख ही घसा, माँ उस दिनों में सा छेदत्त का टिकता असंभव हुआ, जिसे तिलोराना भारत वर्ष Ru. अत्यधिक प्रचार था और उसे सार्वत्रिक मान्यता मिल धीनता के दलदल में फंस गया। भज्ञानपूर्वक भगर वेद चुकी थी। ऐसी दशा का भारी दुप्परिणाम यही हुभा कि का अध्ययन प्रचलित रहता और यदि किसी के ध्यान में भारतीय नरेशों के सैन्य प्रभावशाली पनने के बजाय यह यात पैठ जाती कि वेद के ज्ञान से व्यावहारिक जीवन भपिपिचर निरपयोगी हुए। में लाभ उठाया जा सकता है पो उपर्युक्त वात सहजही में भारत में युरोपीय राष्ट्रों के लोगोंका पदार्पण हुआ जो किसी का ध्यान भाकर्षित कर लेती और ऐसा हो जाने पर अपने साथ निजी संघ-सनिक-प्रणाली ले माये और वह संगठित सैन्य का सजग भारत में हो जाता। भारत के असंगटिन मैनिकों की अपेक्षा ज्यादा प्रभाव. मरुतों के मंत्रों का भौर इन्द्र देवता के मंत्रों का ज्ञान. शाली मनीत होने के कारण श्री महादजी शिंदेने मंच सेना. पूर्व पठन करनेवाले को सैनिकों का संघशासन से किया पति को अपने यहाँ रखकर उसे अपने पिपाहियों में प्रचलित जाय, सेना का मंघ में विभजन किस दंगसे हो सकता है - धीर मरुतो का कान्य । तथा सभी सैनिकों का तुल्य वैप कैसे हो, सय का प्रबंध के सम्मुखीन होना पदा। भारतीयों के जीयन या सारा किस तरह किया जा सकता और उनकी सामुदायिक तपज्ञान ग्रन्थों में बद पड़ा रहा और भारतवासी उस शक्तियों का साधिक उपयोग किस प्रकार करना ठीक है भारी बोझ को दोते हुए भी वनिक भया में भी उस ब- भादि महत्वपूर्ण यातों की कुछ न कुछ जानकारी अवश्य ज्ञान से लाभ नहीं उठा सके। क्या यह हानि भापती हो जाती । परन्तु दुर्भाग्य से, सहसों वर्षों से वेद केघर है। कदापि नहीं । अस्तु । मुखोद्गत एव जमाती याद कर रेकी वस्तु पन गयी और जो प्राचीनल एघ मध्ययुग मे दो पुश उसकी मादह घेदनिर्दिय सैनिक-विद्या सुतरां भपनी होनेपर भी हमारे छापीन करने से कोई विशेष राम नहीं हो सकता क्योंकि लिए प६ एक परकीयसी हुई तथा यदि हमें वह मीलनी जो घटनाएं हो चुकी ये भन्यथा नहीं हो सकी। हाँ, भय हो तो दूसरी की कृपा से ही पह साप हो सकती है। भविष्य में तथा वर्तमाकालमै भी जीवित जाग ज्योति कारण इना ही है कि सजीव व स्मृतिमय चैदिक युगसे भोर हमारा ध्यान अधिकाधिक आर्षित होता चाहिए। केकर भाज तक जो सहस्र सहच वर्षों की रपी चौडी खाई हमारे एव वेदकाल के बीच पड़ी हुई है उसके परिणाम देवर करस्थ करने के लिए ही सीमित रहे मो ठीक नहीं: घेदमत्रो में जीवित सति का तपशान है और यह स्वरूप हमारे ये पुराने सरकार गुप्तप्राय से हो गये हैं और वास्तव इस वैदिक तत्वज्ञान की सुद्ध नीयपर अपनी परपरागत ज्ञानसधय से हम सधैयचित हो गये हैं। समाज रचना एवं राष्ट्रमाणरा विशार मन्दिर उठसमा भाज हमारी यह वास्तविक हारत है। हो जाए तो चाहिए तथा इस प्रकार अपने पैदिक तत्वज्ञार पाठक देखें और सोचें कि यद का पास्तविक अर्ध हर्म के आधार से सामाजिव पुर्घटना ए। राष्ट्रीय व्यवहार या ज्ञात नहीं हुमा इमलिये राष्टिय टिसे हमारी स्तिनी यही सचलन होने लगे तो सचमुच आधुनिक युग की अनेक हानि हुई है रामा भब भी अपो मानभाण्डारम इस वैदिय जाहिर समस्याएँ पी सुगमता से एल हो सकती है ऐसा शाम की वृद्धि करने का प्रयत्न करें। हमारा विश्वास है। भार ससार में बरपाद, समाग. वैदिक ज्ञान विचार से वर्तमानकालमें भी एक अत्यन्त सत्तावाद, साम्यवाद, लोकतनशासायाद, मात्राज्यवान उत्तम 'जीयन का तत्वज्ञान' प्राप्त हो सकता है। महत् भादि विविध वादोरी धूम मच रही है । मानव जाति इनो सूरत में प्रदर्शित सैनिकीय शिक्षा उस विशार तस्वज्ञानका पादी के मध्य अपना कोई निर्णय नहीं कर पाती, जिससे एक भामात्र हे और क्षान यज्ञान में उसका स्थान वदा समूगा मापसमाज बडा दु.खी हो उठा है। भर भारतीय जाता देख रे कि क्या हा सभी पूर्वोक्त परस्पर करताय. दाँ, यह बात सच है कि कठस्थ कर रेने से ही वद मान वादों की अपेक्षा, आध्यास्मिर 'समरपवाद 'जा कि सहिसाएँ भय तक सुरक्षित रही और इसका सारा धेय वद येदी की बहुमूल्य दा है, यदि समार के सामने रखा जाय पाठ में समूचा जीवन बितानेहारे लोगों को मिरनाही तो इस सवज्ञान के सहारे ससारके सभी उपशा मे सारी चाहिए । पद सप सिर पर ठीक है, क्योंकि भगर, वेदपाठ वारे पेधी सवारों को मासानी से हल नहीं रिया जा करने में महार पुण्य है ऐसा विश्वास 7 घटाया जाता तो सकता है ? अवश्य हो सकता है, ऐसाद विश्वास है शायद ही कोई वेद पढने में प्रवृत्त होता और घेद सदा के चूमि बहुत प्राची कार से यह निधारिससा हो चुका रिए उपेक्षित रहते । परन्तु यदि कहीं वेद के जीवित तय था कि चैद ता सिर्फ ान करने के लिए ही है भा यह ज्ञान को भज्ञानपूर्वक व्यवहारमें राने में सफलता मिलगी वैदिक रावा बहुत ही पिछा हुआ है। अब भारतीयो तो भपने क्षनिय पीर समूचे विश्व में विगयी हो जाते का यह प्रमुख कर्तव्य है कि इस अमोलिक घना को भौर भारतीय सस्कृतिपर जो श्राघात हुए दे न होते । मा समूचे विश्व के सम्मुख अधिक परपूर्वक रखें और आगे स्पष्ट कहना चाहिए कि ये से भी भोर भारतीयों ने पटना शुरु कर दरि इस शारे पर वृनेपर ही सवार जो ध्यान नही दिया उससे उन्हें महार हानि पप क्षति के सभी पिकट प्रमहर किये जा सपत है। चाहे। . - देवत-संहिता। [ मरुवता वैश्वानर यज्ञ । । युइशान पर पावसा साहित्य उपलब्ध है भार महाभारत भादि प्रन्यों में स्थानस्थान पर विभिन्न निर्देश है। यदि हाँ, यह बिरकुल सत्य है कि वेद यज्ञके लिए हैं परन्तु इन सभी निर्देशों का सम्पूर्णरूपसे विचार किया जाप, तो यह यश मानव-जीवनरूपी विश्वव्यापक महायज्ञ है।" यह यज्ञ इस वैश्वानर के लिए करना है। यह मारम पहुत कुछ बोध मिल सस्ता है, पर यह सब भविष्य- में प्रचलित बटा भारी व्यापक अर्थ लुप्त हो गया और कारी स्थिति पर ही भवरम्बित है। पश्चात् रेयर भतिसीमित एव भतिसचिन अर्ध जनतामें निसर्ग में मरुतों का स्थान । रूढ हो गया, जय कि ये समूचे मन्त्र इन यत्रो में ऊँची आवाजमे पदे जाने रगे । आज न जाने कितनी शताब्दियों सभी वैदिक देवता निसर्ग में अवस्थित है और इसी से यस यही कार्यक्रम प्रचलित है। आज के दिन मालिक तरह मरतों का भी प्राकृतिक विश्वमें स्थान है, जो वर्षा तथा सच्चे व्यापक अर्थ की अक्षम्य उपेक्षा हो रही है, Hधी एव वेगवान् पदर का यहना शुरु होता है । कालीन वायुप्रवाह' से स्पष्ट होग है। वर्षा होने कोई भी उधर निर भी ध्यान नहीं देता है। इस महान् मुटि के कारण वैदिक तत्त्वज्ञान बहुत पीछे रह गया है । भाकाश मेघों से व्याप्त होता है, बिजली की कडक सुनाई अम हमें उचित है कि पेदमत्रो के अर्थ देखकर देती है और प्रचण्ड तूपान का अवतरण होता है। ये यज्ञ के स्वरूप में वैदिर तत्वज्ञान की झाँकी प्राप्त करें और अपळ झझायात ही 'मरुत् ' है, जो इनवा पाय प्रकृति में दृश्यमान रूप हे उसे मानवजाति के विचारार्थ धर दें। यह कार्य बटाही प्रचद है सही, लेरिन यदि करने के लिए कटिबद्ध हो उठे जिस समय प्रकट आँधी पलने संगती है, वेगवान तो अयश्य उसमें सफर ता मिलेगी इसमें क्या सशय? शशायात मदते हैं, तब घटेप पे जइमूल से उखकर टूट परसे हैं, वृक्षवनस्पति काँपने इगते हैं, कभी पुराणों का समालोचन। कभी तो बिजली गिरने से विनष्ट भी होते हैं। इस इस प्रन्थ में हम मरुतों के मन्त्रों का अर्थ पाटों के समय की स्थिति का वर्णन महायुद्ध के वर्णन से बहुत लिए दे चुके हैं। यह अच्छा होता अगर हम साथ ही कुछ साम्य रखता है। नीषण महासमर में भी कह नही साय अनेक पुराण-प्रन्थों में उपलब्ध मरों की कथाओंको सकरो हि कौन जीवित रदंगा या कौन मौत भी इस पुस्तक में स्थान दे क्योकि यह दर्शाना समा जायेगा । विश्व में तूफानी वायुमण्डर तथा भाँधी के मुगम होता कि मूल पैदिक सिद्धान्तों को पुराणों के जोरसे जो खलबली मचती है उस में और प्रबल दुश्मनों रचयिताभाने किम सरूप में परिवर्तित किया। पर इन से होने वाली वीरों की मिटना में साम्य अवश्य ही दिनी मुद्रणार्थ कागज आदि साधन भति दुर्दभ होने के दिखाई पाता है। पारण मन्थ का स्वरूप बढाना सम्भव हुआ। दाना ही वैदिक कवियों ने मरतों का वर्णन मानवी स्वरूप में ही आज हम कह सकते हैं कि द्वितीय सस्करण के मोरपर किया है। मस्तों ये सूक्त पढ लेने से साफसाफ दिखाई देता यह सारी जानकारी दे दी जायगी। सभी भविष्यकाकीन है रि कुछ मन्नों में शंझावात का बसान किया है और कई विधार उस समयकी जागतिक परिस्थिति पर होणार है। मनो में सष्ट रूप से मानवी चोरोंका वर्णन किया है तो मरुदेवता और युद्धशास्त्र। भन्य कुछ मनों में दोनों एक दूसरे से हिल मिल गये हैं। मरुपता के मन्त्रों में मरती के पखान करने के यहाने देवताभोंके वर्णनको 'आधिदैविष', मानों वर्णनको से युद्धशाच, युद्धसाधन, युद्ध दाँव-पेच भादि का उठेस 'आधिभौतिक ' और भारमशनि के वर्णनको आध्या किया है। ऐसी माती का स्पष्टीकरण भारतीय युवास रिमक' कहने हैं। जो पिंटम है यही प्रापहमें पाया जाता विषय प्रन्यों की टि से करना चाहिए और यह अधिक है, यह सिद्धान्त इस वर्णनफे मूर में है। इसी कारण किसी विस्तृत अध्यया की भावशता रखता है। भान हमें एक क्षेत्र में जो वर्णन किया हुभा हो, वही दूसरे क्षेत्र में चोर मरतों का कान्य। (३७) परिवर्तित कर दिखलाया जा सकता है। मरुत् मधिदेयत भवसर पर उस उस वर्ग के लोगों के कर्तग्य विशेषतया में 'वर्षाकालीन वायुमयाद, ' अधिभूत में घोर वर्णित किये जाते हैं। इसी रीतिसे मरतों के वर्णन में क्षत्रिय और मध्याम में 'प्राण' है। इस कोण से सैनिकों की हैसियत से कार्य करनेवाले क्षत्रियों के कर्तव्य- एक क्षेत्र का वर्णन वूसरे क्षेत्र के लिए भी लागू हो सकता कर्मों का उल्लेख किया है और इन सूक्तों में क्षत्रियों का है। इस संबंध को देख लेने से ज्ञात होगा कि मरनों के स्पष्टीकरण हुभा है जिसका कि विचार पाठकों को अवश्य वर्णन में कारों का बखान किस तरह समाया हुभा है। करना चाहिए। मस्तु। पाठकों को स्पष्ट प्रसीत होगा कि 'मदत्' मस्र्य, मानव, भधिक विचार करने के लिए मनवता का मंत्रसंग्रह मनुष्य-श्रेणी के है ऐसा समE कर उनका वर्णन इन मत्रों पाठकों के सम्मुख रखा है। भाशा है कि इस तरह सोच. में किया है। इस निश्चित वर्णन में वैदिक देवताओं का विचार करके निष्पन्न होने वाले मानवी शानभम की जान- भाविकरण विशेष सावरूप से होता है। ठीक वैसे ही कारी प्राप्त करने का प्रयत्न होगा। मानवजाति महत, देवता सैनिक क्षत्रियों के रूप में प्रकट होती है। इन देवता नरेश एवं सरदार के स्वरूप में और स्वाध्याय-मंडल, निवेदक म क्षणों में शि, मणस्पति भादि देवता ग्यक्त स्वरूप भांध, जि. (सातारा) श्रीवासातवलेकर धारण करते हैं। मतः उन उन देवतामों के वर्णन के दिनांक 1५1८३ प्रस्तावनाकी अनुक्रमणिका। ३ " ४ " . ७ " " " धीर मरुतों का काव्य । वीर काम्य के मनन से उपलब्ध यो । महिलाओं का वर्णन महीं पाया जाता है। नारी के तुल्य वळयार। साधारण श्री। उत्तम मासाओं के सिलादी पुस । महिलाओं के समान वीर अलंकृत तथा विभूषित होते हैं। एक ही घर में रहनेवाले धारा संघ बनाकर रहनेवाले वीर। सभी सशबीर। मरता का गणवेश। सरपर शिरस्त्राण। सब का सश गणवेश। मरुतो फेधिगार, कुटार, परशु, तलवार, पब्र। ८-९ सुरद मजबूत हथियार। मदतों का रथ। चक्रहीन रथ का चित्र । हरिणों से खींचे जानेवाले रस। भवाहित रया दाव पर किया जानेवाला माझमण । १३ मात् मानप ही थे। मरतों की विधाविलासित्ता। १४ ज्ञानी, दूरदर्शी, यक्ता, कवि, पुद्धिमानी, साहसीपन, सामर्य, उत्साह, उप्र योर, उद्यमी, पुशल पीर, कथानिय, राणोपचारप्रवीण, खिलासी, नृत्यप्रियता, वादनपटुत्व । १४-१६ शत्रु को जडमूह से उखारनेवाले वीर। भन्य आहतियाले वीर । रक्तिमामय गौरवणं। अपने वेज चमकनेहार धीर अत्र उपकानेहारे पौर। गायोंका पालन करते हैं। मरतोंके घोटे। कावळा महतों की रक्षरशक्षि। मरतों की सेना । विजयी धीर। भी वसा दुश्मनों को रकानेवाले धीर। महतो की सहनशक्ति। भरतों का पर्वतसंचार। स्वयंशासक वीर। मरत्-गणका महाप। भई कार्य करते हैं। भानुदलसे पुद। मरद पीरोंका दातृत्व। मानवों का दित करनेहारे पीर 1 कुलीन वीर। ऋण चुकानेहारे । निदोष वीर मरतों का सम्पर्क । महतोका धन । महतोका स्वभाव-वर्णन। मरवाके सूक्तों में धारकाम्या बंदशा मध्ययन । पैश्वानर यज्ञ । पुराणोका समालोचन । मररेषता भौर घुदशान निसर्गम Real भान । १६ " " reO दैवत--संहितान्तर्गत मरुद्देवता का मन्त्रसंग्रह। अनुक्रमणिका। १७४ ३७ कण्वपुत्र सोभरि , (४७४) मरुद्देवता पृष्ट विश्वामित्रपुन मधुच्छंदा ऋषि ( मंत्र १-५) १-२ २ कपात्र मेधातिथि अपि (मं. ५) ३ धोरपुत्र क्ण्य प्रापि(मं०६-४५) ४ कपात्र पुनर्वास ,(मं० ४६-८1) ५ कण्यपुत्र सोभरि ॥(म०८२-१०७) ६ गोतमपुत्र नोधा ,(१०८-१२२) ७ राहगणपुत्र गोतम (१२३-1५६) ८ दिवोदासपुर पहछेप , (५७) ९ मित्रावरुणपुत्र भगस्त्य , (१५८-१९७) • पुनकपुत्र गृत्समद ॥(१९८-२१३) " गाधीपुत्र विश्वामित्र ,(२१४-२१६) १२ भविपुत्र श्यावाव " (२१७-३१७) १३ मत्रिपुत्र एवपामरत् (३१८-३२६) १५ वृहस्पतिपुत्र शंयुः ॥ (३२७-१३३) १५ वृहस्पति पुन भरद्वाज ,(३३४-३४५) १३० १६ मित्रापरुगपुन पसिष्ठ ॥ (३४५-३९४) १७ अगिरसपुत्र पूतदक्ष " (३९५-४०६) २४ अहिरा "(४४७) २५ मत्रिपुन वसुक्षुत ,,(४४८) ३यायाध ,, (४४९-४५६) सपा अग्निमरतश्च। कण्यपुत्र मेधातिधि , (४६५-४७३) १८२ इन्द्रो मरतश्च । विश्वामित्रपुन मधुच्छन्दा, (४७५-४७६ ) मरुत्वामिन्द्रः। (४.४.४७९) मित्रावरुणपुन मगरय ,, (४८०-४९.) इन्द्रामरुती। भंगिरसपुर तिरश्ची ।(४९०) महरपुत्र एतान महतों के मंत्रों के ऋषि और उनकी मंत्रमरपा १९४ महनों का संदर्भ ऋग्वेदयचन सामवेद ८६ ८७ कण्वन मेधातिथि १२८ " " " १९४ " मथर्ववेद" "(४२५) . १९८ १८ भृगुपुत्र स्यूमरश्मि (४०७-४२३) पाजसनेयी यजुर्वेदमंत्र, (४२३-४२८) प्रजापतिः "(४२३॥ ४२८) गाधीपुत्र विश्वामित्र सप्तर्षयः "(४२५-४२७) ११ त्रिपुत्र यावा , (४२९) २० ग्रह्मा (४३०-४३३) २१ अथर्वा (५३४-४३६) २२ शतातिः (१३७-४३९) २३ मृगार (४४०-४४६) वाजसनेयी यजुद बनन काठक संहिता माह्मण-ग्रंथ-वचन भारण्यक"" २०२ . • उपनिषद्वचन महतों के मंत्रों में सुभापित मधुछंदाः, मेधातिथिा, कण्ठः ७१

(४०)
देवत-संहिता।
[महवला!
पृष्ठ
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२.८
२२३
पुनर्चएम
सोमति
मोधा
गौतमः
अगस्त्यः
गृत्समद:
विश्वामित्र
२१.
पावाव
एक्यामरुन, शंयुः
भाद्वाज
वसिष्ठ
विन्दु, पूतदक्ष, स्यूमरश्मि
महदेवता-मन्त्रों में खीविषयक उल्लेख
महावता-पुनहत मंत्राः
३२५
२१५
२१६

INDIA देवत-संहितान्तर्गत मरुत् देवता का मन्त्रसंग्रह। [अर्थ, भावार्थ और टिप्पणी के साथ ] पिश्यामित्रपुत्र मधुच्छन्दा अपि । (५० ११६४,६,८,९) ( १ ) आत् । अहे । स्वधाम् । अनु । पुनः । गर्भऽत्वम् । आऽईरिरे । दर्धानाः । नाम । यज्ञिय॑म् ॥ ४ ॥ अन्धयः- १ आत् अह यशियं नाम दधानाः (मरुतः) स्व-धां अनु पुनः गर्भत्वं एरिरे। अर्थ-१(आत् अह) सचमुचही ( यज्ञियं नाम ) पूजनीय नाम नथा यश(दधानाः) धारण करनेवाले धीर मरुत् (स्व-धां मनु) अन्नकी इच्छासे (पुनः) चार यार (गर्भत्वं परिरे) गर्भवासिताको प्राप्त होते हैं। भावार्थ- १ यथेष्ट मन मिले इस हालसासे पूजनीय नामोसे युक्त यशस्वी मरुस् फिर यारपार गर्भवास स्वीकारने के लिए तैयार हुए। टिप्पणी-[१] मेघपक्षमें- भूमय पर जो जल विद्यमान है, यह भापके रूपमें ऊपर उठ जाता है घहधायु. मंडल की सहायता से मेघों में एकत्रित हुभा पाया जाता है । भय भन्नका उत्पादन हो इस हेतु मेघमाला में जलरूपी शिशुका गर्भ रहता है । पीरपक्ष में- बखान करने योग्य यश पानेवाले वीर पुरुष, जनता के लिए यथेष्ट अन्न मिल जाए, इसलिए भाँति भाँति के कार्य निष्पस कर देते हैं और मृत्यु के उपरांत पुन गर्भवारा में रहकर उसी तरह कार्य करने की पछा करते हैं । मध्याममें मरुत् 'प्राण' है, अधिभूतमें वीर सैनिक ' है और अधिदेवतमें वायु ' है । गरमों के इस काम्पमें प्रमुखतया पीरोंका ही वर्णन यत्रतत्र पाया जाता है और कई मंत्रोंमें 'वायु' तथा 'प्राण' का भी यसान किया गया है। हाँ, प्राणविषयक निर्देश बहुतही कम हैं। (१) स्वधा (स्व-धा= स्वं दधाति पुष्णातीति स्वधा)- जो अपना धारण तथा पोषण करता हो वह । अन्न, उदक, अपनी धारणशक्ति, आत्मशक्ति, निजसामर्ण, प्रणाली, नियम, सुम्मा, भानंद, स्वस्थान । स्वधां अनुकर पानेके लिए, अपनी धारकशक्तिकी वृद्धि करने के लिए । (२) यज्ञियं नाम- पप नाम, वर्णन करने योग्य या । या. यजु० १७१८०-८५ तक मरुतोंके ४९ नाम दिये हैं। हरएक नाम महकर एकएक गुण पलाता है और इस तरह वर्णनीय नाम धारण करनेवाले ये रत् है । ये नाम मतों की शव्याचातरी को स्पष्ट करने वाली विभिन्न उपाधियाँ है । देखिए मन्त्र १४५। (३) पुनः गर्भत्वं शरिरे- पारपार गर्भवासमें रहते है पाने फिरसे शरीर धारण करके ही सराहनीय कार्यकलाप सुचारु रूपसे निभाते रहते हैं। देखिए अध्यात्ममें 'प्राण' पार संचार करके जीवजंतुओंको जीवन प्रदान करता है। अधिभूतमें यद्यपि वीर सैनिक क्षतविक्षत हो धराशायी हो जाते हैं तो भी फिर गर्भवासका स्वीकार कर विश्वकल्याण के लिए अपने जीवनका यलिदान करने में शिक्षकते नहीं । अधिदेयत में 'घायुप्रया' गैसरूपी तथा पाप्पीभूत जलको गर्भवत् ढंगसे मेघमंडल में धर देते हैं, जिससे वर्षाके रूपमें जन्म ले, समूधे संसार की प्यास बुझाने में उनका भर्पण हुमा करता है। इस भाँति मरुत् हर जगह विश्वके हित लिए अपना बलिदान करते हैं मार मारयार जन्म लेकर वही अपना पुराना विश्वकल्याण का गुरुलर कार्यभार निभाने का कार्य प्रचलित रखते हैं। (४) मरुत= (मा-गह ) जो लोग रोते नहीं पैठते, ऐसे उत्साह तथा उमंगसे भरे धीर, (मा-रुतू) जो म्पयंकी जंग नहीं मारवे हैं, पर कर्तव्य कर्म ससकंसापूर्वक करते हैं ऐसे धीर, (मर-उत् ) मरनेतक उठकर कार्य करनेवाले वीर योद्धा . - - - २ (२) देवऽयन्तः । यो । मतिम् । अच्छे । विदऽवसुम् । गिरः । महाम् । अनुपत । श्रुतम् ॥ ६ ॥ (३) अनवद्यैः । अभियुऽभिः। मुखः । सहस्वत् । अर्चति । गुणैः । इन्द्रस्य । काम्यैः ।।८।। (४) अतः । परिऽज्मन् । आ । गहि | दिवः । वा । रोचनात् । अधि । सम् । अस्मिन् । ऋजते । गिरः ॥ ९ ॥ अन्वयः-२ देवयन्तः गिरः महां विदत्-वसु श्रुतं यथा मति, यच्छ अनूपत । ३ मखः अन्-अवधैः अभि-घुमिः काम्यः गणैः इन्द्रस्य सहस्वत् अर्चति । ४ (हे) परिज्मन् ! अतः या दिवः रोचनात् अधि आ गहि, असिन् गिरः समृते। अर्थ- २ (देवयन्तः ) देवत्व पाने की लालसावाले उपासकों की (गिरः) वाणियाँ, (महा) वडे तथा (विदत्-पहुं) धन की योग्यता जाननेवाले (श्रुतं ) विख्यात वीरों फी (यथा) जैसे (मति) युधिपूर्वक स्तुति करनी चाहिए, (अच्छ अनूपत ) उसी प्रकार सराहना करती आई है। ३ ( मसः ) यह यज्ञ ( अन् अवद्यैः) निर्दोप, (अभि-धुभिः) तेजस्वी तथा (काम्यैः) वाञ्छनीय ऐसे ( गणैः ) मरुत्समुदायों से युक्त ( इन्द्रस्य सहस्-वत् ) इन्द्र के शत्रुओं को परास्त करने में क्षमता रखनेवाले वल की (अर्चति ) पूजा करता है। ४ हे (परि-ज्मन् !) सभी जगह गमन करनेवाले मरुत् गण ! (अनः) यहाँ से (वा) अथवा (दियः) धुलोकसे या (रोचनात् अधि) किसी दूसरे प्रकाशमान अंतरिक्षवर्ती स्थानमसे (या गहि) यहाँपर बाओ, क्योंकि अस्मिन् } इस यज्ञमें गिरः] हमारी याणियाँ तुम्हारी ही समृअते ] इच्छा कर रही हैं। भावार्थ- २ जो उपासक देवरख पाना चाहते हैं, वे वीरों के समक्षय की सराहना करते हैं, क्योंकि पा संघ जानता है कि, जनता के उच्चतम निवास के लिए भावश्यक धनकी योग्यता कैसी है । अतएव यह इस तरह के धनको पाकर सबको उनित प्रमाण में प्रदान करता है (भौर पही पात भाले मन्त्र में दर्शायी है।) ३ यज्ञ की सहायता से दोपाहित, तेजस्वी तथा मन के प्रिय धारों के संघों में रह कर, पाव का मामा महान् प्रभावी सामर्थ्य की ही महिमा गायी जाती है। ४ चूंकि मल्संघों में पर्याप्त मात्रामें शूरता तथा वीरता विद्यमान है, अतः उसके प्रमावसे (परि-मन्) समूचे विश्व को ग्याप्त कर लेते हैं। पीरों को चाहिए कि वे इन गुणों को स्वयं धारण करें। ऐसे वीरों का सरकार करने के लिए सभी कवियों की पाणियाँ उत्सुक रहा करती है। टिप्पणी- [.](1) देवयन्तः देवत्व हमें मिल जाय इसलिए निर्धारपूर्वक उपासना करनेवाले उपासक। (२) ये भागण धनकी महत्ताको जाननेवाले पडे यशस्वी मरत् नामधारी जी की ही प्रांता करते हैं। कारण इनगाही है कि, इस भाँति वर्णन करने से उनके गुण धीरेधीरे उपासकों में यहने लगेंगे। उपासक इस बावसे परिचित है। मनोविज्ञान का एक सिदान्त है कि, जिन विचारों को हम मन में स्थान देंगे ये ही भागे घसकर हम में समूह को पेटते है और यही देवतास्तोत्र में है। उपासक जिसकी जप्ती स्तुति करेगा वैसे ही यह बन जायेगा। 'विदत्- वसु ' पद यहॉपर है। 'यसु ' अर्थात् (वासयति इति) मानों का निवास सुखदायक होने के लिए जो यह बगु है। अब ये वीर इस धनकी योग्यता और महत्ता से परिचित है, क्योंकि यह मानवों के मुनमय निघास बनाने में बरा मारी सहायक है । भन्य सभी धीर इन्हीं वीरों का अनुकरण करें। [३](1)मखा- (म गती )- पूज्य, कर्मण्य, भानंदी, यज्ञ, प्रशंसनीय कर्म। [8] (१)परि-उमा सर्वत्र भभिगमन करनेवाला, सर्वव्यापक। (२) समृ- (अतिः प्रसाधनका । निरक. २१) मुशोभित करना, सजावट करना, सुव्यवस्थित करना। करनेवाले इन्द्र . सहायक ३ फण्यपुत्र मेधातिथि ऋपि (ऋ० ११५२) (५) मरुतः । पिर्वत । ऋतुना। पोत्रात् । यज्ञम् । पुनीतन । यूयम् । हि । स्थ । सुऽदानवः ॥२॥ घोरपुत्र कण्व ऋषि ( ११३७॥ १-१५) (६) क्रीळम् । च । शर्ध: । मारुतम् । अनाणम् । रथेऽशुभम् । कण्यो । अभि । प्र। गायत ॥१॥ (७) ये। पृतीभिः । ऋष्टिऽभि साकम् । वाशीभिः । अञ्जिभिः । अजायन्त । स्वऽमानवः ॥२॥ अन्यय:- ५ (हे ) मरुतः मातुना पोत्रात् पियत, यशं पुनीतन, (हे ) सु-दानयः ! हि यूयं स्थ। ६ (हे) कण्वाः! यः मारतं कीळं अन्-अर्वाणं रथे-शुभं राधैं अभि प्र गायत । ७ ये स्व-भानवः पृपतीभिः टिभिः वाशीभिः अअिमिः साकं अजायन्त । अर्थ-५ हे [ मरुतः। ] वीर मरुतो! [ऋतुना ] उचित अवसरपर [ पोत्रात् ] पवित्रता करनेवाले याजफ के वर्तन से [पिषत ] सोमरस का सेवन करो और इस [ यशं पुनीतन ] यश को पवित्र फरो। दे (सु-दानवः!] उच्च कोटिका दान करनेवाले मरुतो ! [यूयं स्थ) तुम पवित्रता संपादन करनेवाले ही हो । ६ [कण्वाः ! ] काव्यगायन करनेवाले ! [] तुम्हारे निजी कल्याणके लिए मारतं] मरतों के समूहसे उत्पन्न हुभा. {क्रीळं ] क्रीडनमय भावसे युक्त [अन्-अर्वाणं] भाइयों में पाये जानेवाली कलहप्रिय मनोवृत्ति से कोसों दूर याने जिसमें पारस्परिक मनोमालिन्य नहीं है, ऐसा [रथे-शुमं] रथम सुहानेवाले अर्थात् रथी यार को शोभादायक जो [शधं] बल है, उसी का [ अभि प्र गायत ] वर्णन करो ७[ये स्व-भानवः ] जो अपने निजी तेज से युक्त है, ये मरत् [पृपतीभिः] धयों से अलंकृत हिरनियों या घोडियों के साथ [प्राष्टिभिः] भालोसहित [याशीभि'] पठार एवं [अञ्जिभिः] धीरों के आभूषण या गणवेश के [ सोकं अजायन्त ] संग प्रकट हुए । भावार्थ- ५[.] मोसम के अनुकूल जो सोमरससरश पेय है, यह पवित्र यर्तन मे ही रेना चाहिए । [२] जो फर्म करना हो यह पगासंभव पविन करनेकी चेष्टा करनी चाहिए। उपेक्षा या उदासीनता नहीं करनी चाहिए । ६ अपनी प्रगति हो इमलिए उपासक महतों के स्तोम का पठन करें, क्योंकि इन मरतों मे साधिक पर, खिलासीपन, पारस्परिक मित्रता, भातृप्रेम तथा रथी यनने के लिए उचित वर विद्यमान है। ७ मरतों के रय में जो घोपियाँ पा हिरनियाँ जोडी जाती हैं वे धब्बेवाली होती हैं। मरतों के निकट भाले, कुठार, वीरभूपण या गणवेश पाये जाते हैं। कहने का अभिप्राय इतना ही है कि, मरन् जिस प्रकार मुसा दीख परते हैं घसे ही भग्य सभी वीर सदैव शस्त्रास्त्रों से लैस रहें। टिप्पणी [५] पोत्रं पवित्रता करने वाला यामक, पवित्र पतन । [६] (1) मरन् मध याकर रहते हैं, भतः घे पलिष्ठ है । (२) खिरापन में जो उदार भाव पाये जाते हैं ये मरतों में है। (३) 'अर्या ' शम तै, सं में भ्रातृष्य' भर्थ में भाया है । ' अर्या ये भ्रातृव्य [ते. स. ६३१८ ] भातृद्वैप, भाइयों के मध्य प्रेमभाव न रहना भादि पात्रों से पारस्परिक पल घटने लगता है। अर्थ-हिसायो' भत हिंसा करना' भी एक अर्थ है । अनी' मधात् मासिक भाव और इससे पैदा होनेवाल। यस जिसे ' भन' नाम दिया जा सकता है । ' अवा' का मर्थ घोटा या हीन Mean] है, अत: 'अना' हीन भावसे शून्य जो पल । (४) रथी, महारथी होने वाले लोगोंके लिए ऐसे घर रकी भतीच भावश्यकता है। मरतों में ठीक यही पल विद्यमान है । जो हम बलको यसान करने लगता है, उसमें यह - . - . - .. (८) इहऽईव । शृण्वे । एपाम् । कशाः । हस्तेषु । यत् । पर्दान् । नि । यामन् । चित्रम् । मञ्जते ॥ ३ ॥ (९) प्र । यः । शर्धाय । घृष्वये। खेपऽद्युम्नाय । शुष्मिणे। देवत्तम् । महो । गायत ॥४॥ (१०) प्र । शंस । गोषु । अघ्न्यम् । क्रीळम् । यत् । शधैः । मारुतम् । जम्भे । रसंस्य । वृधे ॥ ५ ॥ अन्वयः-८ एपां हस्तेपु कशाः यत् वदान् इह इव शृण्वे, यामन् वित्रं नि फानते। ९ वः शीय, घृप्वये, त्वेष-घुम्नाय शुष्मिणे, देवत्तं ग्रह प्र गायत। १० यत् गोप, क्रीळं मारतं, रसस्य जम्भे ववृधे (तत्) अ-प्न्यं शर्धः शंस । अर्थ-८[एपां हस्तेपु] इन मरुतों के हाथों में विद्यमान [कशाः] कोडे [यत् ] जय [वदान ] कद फरने लगते हैं, तब उन ध्वनियों को मैं [इह इव] इसी जगह पर खडा रह कर [शृण्वे ] सुन लेता हूँ। यह ध्वनि [ यामन् ] युद्धभूमि में [चित्रं] विलक्षण दंग से [ नि-प्राञ्जते ] शूरता प्रकट करती है। ९ [चः शर्धाय ] तुम्हारा यल बढाने के लिये, [धृप्वये ] शत्रुदल का विनाश करने के हेतु और [त्वेष-द्युम्नाय ] तेज से प्रकाशमान शुष्मिणे ) सामर्थ्य पाने के लिए | देय प्रह] देवता. विषयक ज्ञान को यतलानेवाले काव्य का [प्र गायत ] तुम यथेष्ट गायन करो। १० ( यत् ) जो यल (गोपु ) गौओं में पाया जाता है, जो (फ्रीळं मारतं) खिलाडीपन से परिपूर्ण मरुत् संघों में विद्यमान है, जो (रसस्य जम्भे ) गोरस के यथेष्ट सेवनसे (पवृधे ) यद जाता है, उस ( अ-न्यं शर्धः) अविनाशनीय यल की (प्रशंस) खति फरो। भावार्थ-८ शूर मरुत् अपने हाथों में रखे हुए कोनों से जय भावान निकालने लगते हैं सब उस शम्द को सुन- कर रणक्षेत्र में लटनेवाले धीरों में जोशीले भाव उठ खड़े होते हैं। ९ अपना पल [शर्धः ] बढाना चाहिए । शत्रुपल को तहसनहस करने के लिए उन से [पतिः] संपर्ष करने को पर्याप्त बल या शक्ति रहे, ताकि शग्रुओं पर टूट पड़ने पर अपने को मुंह की खाना न पडे और सेज का इजि. यारा फैलानेवाली सामथ्र्य प्राप्त हो, इसलिए [ त्वेप-युम्नाय शुमिणे ] जिसमें देवता की जानकारी यक की गयी हो, ऐसे स्तोत्र का ( देवतं मम ] पठन एवं गायन करना उचित है, क्योंकि इस भाँति करने से तुम में यह शक्ति पैदा होगी। जो विचार पारवार मन में दुहराये जाते हैं वे कुछ समय के उपरान्त हम से अभित हो जाते हैं। १० गोरम के रूप में गाओं में पल तथा सामर्थ इकट्ठा किया जाता है, पीरों की झोडासा दृति में वह मल प्रकट हो जाता है, जो हरएक में पढाने योग्य है। गोरस का पर्याय सेवन करने से पहशात अपने शरीर में पद सकती है और इसकी सराहना करनी उचित है। धीरे धीरे बदने लगता है. मतः वर्णन करनेवाला भीपलिष्ठ बनता है। अनर्वाणं' का अर्थ कापोंके मतानुसार मोरोसे शून्य, जिनके पास घोडे नहीं हैं ऐसा करना चाहिए, पर भन्य भनेक स्थानों पर मरतों को 'अरुणावा' 'पृषदश्या' अश्ययुजः ' आदि विशेषण दिये गये हैं, अतः यही भनुमान ठीक है कि, मरुतोंके निकट घोरे विरामान थे। इसलिए अन् अर्या' का अर्थ हीन भावों से रहित, एक दूसरे से द्वेष न करनेवाला 'यो करना उचित जंचता है। पाठक इस पर अधिक विचार करें। (५) कण्य- मंत्र ४२ पर की पिणो देखिए।[७]{") ऋष्टि:- [ हिसायो] खा या भाला। (२) याशी [वाश् शब्द] चिल्लाहर करनेवाला, तीक्ष्य छोरवाला शस्त्र, परशु, कुहाड़ी (1) आजम [भन्न व्यक्ति-म्रक्षण-कान्ति-गतिपु]- रंग लगाना, कुंकुम का लेप करके शोभामय बनाना, सुन्दर एनना, बोलना। अखि रंग, भूपण, वेशभूषा, गणवेश, चमकीला। [९] (1)शर्ध:- संघका बल, धैर्य, निर्भयताकी सामर्प, (२) घृप्धिः [४] = शत्रुभोसे मुठभे करनेवाला । (३)शुध्मिन्सामध्ययुक, शारजसे परिपूर्ण, प्रभावशाली । .

, (११) कः । य: । वर्षिष्ठः । आ । नरः। दिवः । च । गमः । च । धुतयः । यत् । सीम् । अन्तम् । न । धूनुथ ॥ ६ ॥ (१२) नि । वः । यामाय । मार्नुपः। धे । उग्रार्य । मन्पर्व। जिहीत । पर्वतः । गिरिः॥७॥ (१३) येपाम् । अज्मषु । पृथिवी। जुजुर्वान्ऽईव । निश्पतिः। भिया । यामेषु । रेजते ॥८॥ अन्वयः- ११(हे ) नर ! दिवः च ग्मः च धूतयः वः आ घर्पिष्ठः कः ? यत् सी अन्तं न धनुथ ? १२ वः उमाय मन्यवे यामाय मानुपः नि दर्तो पर्वत. गिरि जिहीत । १३ येषां यामेषु अज्मेषु पृथिवी, जुजुर्वान्हव विश्पति भिया रेजते । अर्थ-११ हे ( नर 1) नेतृत्वगुण से सम्पन्न वीर मरतो ! (दिवः) [लोक को एवं (म्म च) भूलोक को भी (धूतय ) तुम कंपित करनेवाले हो, ऐसे (व.) तुम में (आ) सब प्रकार से (वर्षिष्ठ) उच्च कोटि का भला (फ ) कौन है ? (यत् ) जो (सी) सदैव ( अन्तं न ) पेडों के अग्रभाग को दिलाने के समान शत्रुदल को विचलित कर देता है, या तुम सभी (धूनुथ) विकंपित कर डालते हो। १२ (यः उप्राय) तुम्हारे भयावह (मन्यव) कोधयुक्त या आवेश एवं उत्साह से लबालम भरे हुए (यामाय) आक्रमण से डरकर (मानुपः ) मानव तो किसी न किसी (निः) के सहारे ही रहता है, क्योंकि (पर्वत ) पहाड या (गिरिः) टीले को भी तुम (जिहीत ) विकंपित पना देते हो । १३ (येषां) जिन के ( यामेषु ) बाक्रमणोंके अवसरपर और ( अज्मेपु) चढाई करने के प्रसग पर (पृथियो) यह भूमि (जुजुर्यान्हव विश्पतिः) मानों क्षीण नृपति की नाई (भिया रेजते) भय के मारे यिकंपित तथा विचलित हो उठती हे। भावार्थ- ११ वीर मरुत् राष्ट्र के नेता हैं और ये शत्रुसघको जमूल से विचलित एव कपायमान कर देते हैं । ठीक उसी तरह जैसे आँधी या सूफान पृथ्वी पा युलोक में विद्यमान पेढसय वस्तुजात को हिलाता है, अपघा वायु के सकोरे वृक्षों के ऊपर के दिस्से को चलायमान कर देते हैं। इन वायुमया की न्याई योर मरत् ाओं को भ- पदस्थ करते है। यहाँ पर प्रभ उठाया है कि, क्या ये सभी मरत् समान है अथवा इनमें कोई प्रमुख नेताके पद पर अधिक्षित हो विराजमान है ? (आगे चलकर ३०५ तथा ४५३ सख्या के मत्रों में बताया है कि, इन मरतों में कोई भी श्रेष्ठ, मध्यम एष निम्न श्रेणी का नहीं, अपितु सभी 'भाई ' हैं । पाठक उन मत्रों के ऊपर इस अवसर पर एक सरसरी निगाह बार लें।) १२ वीर महतों के भीषण भाक्रमण के फर स्वरूप मानव के तो हाथपाँव फूल जाते हैं और ये कही न कही भाभप पाने की चेष्टा में निरत रहते हैं, पर यडे घडे पर्यत भी आन्दोलित एव सदित हो उठते हैं। पीरों की शाधुपक्ष पर पढाइयाँ इसी भाँति प्रभावोत्पादक हो। १३ धीर मरत् जब शत्रुदल पर धावा करते हैं और पड़े मेग से विधुत्-युद्धप्रणाली से कार्य करते है, ४स समय, आगे क्या होगा क्या नहीं, इस चिंता से तथा डर से भासनमरण नरेश की नाई, यह समूची भूमि पहल सहती है। (इसी भांति पीर सैनिकों को शत्रुदल पर आक्रमण का सूत्रपात करना चाहिए ।) टिप्पणी-[१०] (8) अन्य (भ-न्य) जिसका हनन नहीं करना चाहिए, जिसका नाश कभी न करना चाहिए। [११]() नेश, भप्रगामी, (२) धृति (धू कम्पने)- हिशनेवाला। [१२] (,) याम= आक्रमण, धावा मारना, शत्रु पर चढाई करना। [१३](1) अज्म- भाक्रमण, धावा । - ६ (१४) स्थिरम् । हि । जानम् । एपाम् । वर्यः । मातुः । निःऽएतवे । यत् । सीम् । अनु । द्विता । शवः ।। ९ ।। (१५) उत् । ऊँ इति । त्ये । सूनवः । गिरः। काष्ठ। अज्मेषु । अत्नत । वाश्राः । अभिक्षु । यातये ॥१०॥ (१६) त्यम् । चित् । ४ । दीर्घम् । पुथुम् । मिहः । नांतम् । अमृध्रम् । प्र। व्यवयन्ति । यामऽभिः॥११॥ अन्वयः- १४ एपां जानं स्थिरं हि, मातुः ययः निःएतवे यत् शवः सी द्विता अनु । १५ त्ये गिरः सूनवः अज्मेपुः काप्ठाः चाधाः अभि-शु यातये उत् ऊ अत्नत । १६ त्यं चिद् घ दीर्घ पृथं अ-मृधं मिहः न-पातं यामभिः प्र च्यवयन्ति । अर्थ - १४ [ एप ] इन वीर मरुतों की [जानं ] जन्मभूमि [स्थिरं हि ] सचमुच दृढीभूत एवं अटल है। मातुः माता से जैसे [वयः) पंछी [ निः- एतये बाहर जाने के लिए चेष्टा करते हैं, उसी तरह ये अपनी मातृभूमि से दूरवर्ती देशों में विजय पाने के लिए निकल जाते हैं, [यत् ] तय इनका शवः] पल [सी] सदैव (द्विता अनु ] दोनों ओर विभक्त रहता है। १५ [ त्ये ] उन [ गिरः सूनवः वाणी के पुत्र, वक्ता मरुतोंने [ अज्मेपु] अपने शत्रुओं पर किये जानेवाले आक्रमणों में अपने हलचलों की [ काष्ठाः] सीमाएँ या परिधियाँ यढाई है, जैसे कि, [वाधाः ] गौओं को [ अभि-सु] सभी जगह घुटने तक के पानी में से [यातये] निकल जाना सुगम हो, इसलिए जैसे जल को [ उत् उ अत्नत ] दूर तक फैलाया जाय। १६ (त्यं चित् घ) उस प्रसिद्ध, ( दार्थ ) वहुतही लेवे, (पृथं) फैले हुए ( अ-धं) तथा जिसका कोई नाश नहीं कर सकता, ऐसे (मिहः न-पातं) जल की दृष्टि न करनेवाले मेघ को भी ये वीर मरुत् ( यामभिः) अपनी गतियों से (प्र च्यवयंति ) हिला देते हैं। भावार्थ- १४ धीर मरम् भूमि के पुग्न है। उनकी यह भूमि माता स्थिर है और इसी भटल मातृभूमि से ये धीर मतीय वेगशाली उत्पन्न हुए हैं । जिस भाँति पंछी अपनी माता से दूर निकलने के लिए उटपटाते हैं ठीक वैसे ही ये धीर अपनी मातृभूमि से सूदूरवर्ती स्थानों में जाकर असीम पराक्रम दर्शाने के लिए उत्सुक हैं और पळे भी जाते हैं। ऐसे मौके पर इनका सारा ध्यान अपनी जन्मदात्री भूमि की भोर लगा रहता है, वैसे ही शत्रुओं से जूझते समय युद्ध पर भी इनका ध्यान केन्द्रित रहता है । इस प्रकार इनकी शक्ति दो भागोंमें विभक्त हो जाती है। सून. ] वाणी के पुत्र हैं, यक्ता हैं। या गोमातरः' नाम महतों का ही है। 'गो' भर्थात् 'पाणी, गौ, भूमि ' का सूचक शम्द है। मातृभाषा, मातृभूमि तथा गोमाता के मुख के लिए प्रय प्रयत्न करनेवाले ये महत् विख्यात हैं । अपने शत्रुदल को तितरबितर करने के लिए उन्होंने जिस भूमि पर इस प्रवर्तित को, उस भूमि की सीमाएँ बहुत चौडी कर रखी है, अर्थात् अपने भाक्रमण के क्षेत्र को अति विस्तृत करते है। अत: जैसे मगर गौओं को घुटने तक के जलसंचय में से जाना पड़े, तो कुछ कष्टदायक नहीं प्रतीत होता है, वैसे उन्होंने भूमि पर पाये जानेवाले उपदखाया स्थलों को न्यून कर दिया, भूमि ममतल एना बाली, पानी इण्टा हो तो भी गौमों के लिए यह घुटनों से ऊपर न चढ़ जाए ऐसी सतर्कता दर्शायी । गौओं के लिए महतो ने भूमिपर इतना माछा प्रबन्ध कर द्वारा । उसी प्रकार शत्रु पर चढाई करने के लिए भी यातायात की सभी सुविधाएँ उपस्थित कर दी, ताकि विरोधी दल पर धावा करते समय अत्यधिक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। १६ जिन मेघाँसे घर्षा नहीं होती हो ऐसे बडे बरे बादलोंको भी मरुत् (वायुप्रवाह) अपने प्रचण्ड येगसे विपित कर बालसे हैं । (पीरोंको भी यही उचित है कि, घे दान न देनेवाले कृपण शगों को जा मूलसे हिलाकर पदभष्ट कर दें।] मरुत् । गिरः जाय, ७ - - (१७) मरुतः। यत् । हु । यः । बलम्। जनान् । अचुच्यचीतन । गिरीन् । अचुच्यवीतन॥१२॥ (१८) यत् । । । यान्ति । मरुतः। सम्। है । ब्रुवते । अध्यन् । आ । शृणोति । कः । चित् । एपाम् ॥ १३ ॥ (१९) प्र । यात । शीभम् । आशुऽभिः । सन्ति । कण्वेषु । यः । दुवैः । तत्रो इति । सु । माद्याध्यै ॥ १४ ॥ (२०) अस्ति । हि । स्म । मदाय । वः । स्मसि । स्म । वयम् । एपाम् । विश्वम् । चित् । आयुः । जीवसे ॥ १५ ॥ अन्वयः- १७ मरुतः यद् ह यः वलं जनान् अचुच्यवीतन गिरीन् अचुच्ययीतन । १८ यत् ह मरुत' यान्ति अध्यन् आ सं त्रुवते ६, पपां का चित् शृणोति ? १९ आशुभि. शीभ प्र यात, कण्वेषु यः दुवः सन्ति, तो सु मादयाध्य । २० वः मदाय अस्ति हि स्म, विश्वं चित् आयुः जीवसे, पपां वयं स्मसि स्म । अर्थ- १७ हे (मरुतः!) धीर मरतो ! ( यत् ह ) जो सचमुच (वः वलं) तुम्हारा यल (जनान् अचुच्य. घीतन) लोगों को हिला देता है, विकंपित या स्थानभ्रष्ट कर डालता है, वहीं (गिरीन् पर्वतों को भी (अचुच्यीतन) विचलित यना डालता है १८ ( यत् ६) जिस समय सचमुच ही ( मरुतः यान्ति ) वीर मरत् संचार करने लगते हैं, यात्रा का सूत्रपात करते हैं, तय थे (अध्यन् ) सडक के बीच मेंही (आसं सुपते ह) सब मिल कर परस्पर वार्तालाप करना शुरु कर देते हैं । ( पपां) इनफा शब्द (कः चित्) भला कोई न कोई क्या (शृणोति ) सुन लेता है? १९ (आशुभिः) तीय गतियोद्वारा और (शीभं) वेगपूर्वक (प्र यात) चलो, (कण्येपु) फण्योंके मध्य, याजकों के यज्ञों में (:) तुम्हारे ( दुवः सन्ति) सत्कार होनेवाले हैं। (तत्रो) उधर तुम (सु मादयाध्यै) भली भाँति तृप्त वनो। २० (यः) तुम्हारी (मदाय ) तृप्ति के लिए यह हमारा अर्पण (अस्ति हि स्म) तैयार है। (विश्वं चित् आयुः) समूचे जीवन भर सुखपूर्वक (जीवसे ) दिन विताने के लिए (वयं) हम (एषां ससि स्म)नके ही अनुयायी बनकर रहनेवाले हैं। भावार्थ- १७ मरुतों में इतना यल विधमान है कि, उसकी वजह से शत्रु के सैनिक तथा पार्वतीय दुर्ग या गट भी दहल उठते हैं। धीर सदा इस भाँति पल बढाने में सचेष्ट हो। १८ जिस समय धीर मरुत् सैनिक अभिगमन करते हैं, तपवे इकट्ठे हो सात ( सात वीरों की पंक्ति बनाकर सद परसे) चलने लगते हैं। इस प्रकार आगे बढते समय वे जो कुछ भी यातचीत करते हैं उसे सुन लेना बाहर के ग्यक्तिको भमभव है। क्योंकि वह भाषण धीमी भाषाज में प्रचलित रहता है। १९ आशुभिः शीभं प्रयात' (Quick march ) अत्यन्त वेगसे शीघ्रतापूर्वक चलो। सनिक शीघ्र चलना प्रारंभ करें, इसलिए यह 'सैनिकीय आशा' है। मरत् यथासंभन शीघ्र यज्ञभूमि में पहुँच जाय, क्योंकि उधर उनके सरकार एवं भावभगत के लिए आयोजनाएं प्रस्तुत कर रखी हैं। मरतु उस भादरसरकार का स्वीकार करें और २० वीर मरुतों को हर्पित तथा प्रसा करने के लिए हम मानेपीने की घस्तुएं दे रहे हैं। जय तक हमारे जीवन की अवधि प्रचलित होगी, सय तक यह हमारा निधार हो चुका है कि हम मरुतों के ही अनुयायी पनकर रहेंगे।

८ । (अह. ११३८1१-१५) (२१) कत् । ह । नूनम् । कधनियः । पिता । पुत्रम् । न । हस्तयोः । दधिध्वे । वृक्तऽवर्हिषः ॥ १॥ (२२) के । नूनम् । कन् । वः । अर्थम् । गन्त । दिवः । न । पृथिव्याः । के । वः । गावः । न । रण्यन्ति ॥ २ ॥ (२३) फै। वः । सुम्ना । नव्यांसि । मरुतः । क । सुविता । कोईइति । विश्वानि । सौभंगा ॥ ३ ॥ (२४) यत् । यूयं । पृश्निऽमातरः। मर्तासः । स्यातन । स्तोता । वः । अमृतः । स्यात् ।।४।। अन्वयः २१ कध-प्रिया वृक्त-यर्हिपः, पिता पुत्रं न, हस्तयोः कत् ६ नूनं दधिध्ये ? २२ नूनं क ? वः फत् अर्थ ? दियो गन्त, न पृथिव्या, व. गावः क न रण्यन्ति ? २३ (हे) मरुतः य. नव्यांसि सुम्ना ध; ? सुविता क ? विश्वानि सौभगा को? २४ (हे) पृश्नि-मातर. ! यूयं यद् मर्तासः स्यातन, वः स्तोता अ-मृत. स्यात् । अर्ध- २१ ( कध-प्रियः) स्तुतिको यहुत चाहनेवाले (वृक्न पिः) तथा आसनपर बैठनेवाले मरुतो ! (पिता) याप (पुत्रं न) पुत्रको जैसे (हस्तयोः) अपने हाथों से उटा लेता है, उसी प्रकार तुम भी हमें (कत् । नूनं ) सचमुच कय मला अपने फरकमलों से (दधिध्वे) धारण करोगे? २२ (नूनं क) सचमुच तुम भला किधर जाओगे ? (यः कत्) तुम किस (अर्थ) उद्देश्यको लक्ष्य में रस जानेवाले हो ? (दिवः गन्त) तुम भले ही धुलोक से प्रस्थान करो, लेकिन (न पृथिव्याः) इस भूलोकसे तुम छपा करके न चले जाओ, भूमंडलपर ही अविरत निघास फरो। (पः गायः) तुम्हारी गौएँ (क) भला कहाँ ? (न रण्यन्ति ) नहीं रमाती है। २३ दे (मरुता!) चीर मरुद्गण ! (यः) तुम्हारी (नव्यांसि) नयी नयी (सुना क) संरक्षणकी भायोजनाएँ कहाँ है ? तुम्हारे (सुविता क! उच्च कोटिके वैभव तथा सुखके साधन ऐश्वर्य किधर है। और (विश्यानि) सभी प्रकार के (सौभगा को!) सोनाग्य कहाँ हैं ! २४ हे (पृश्नि-मातरः!) मातृभूमि के सुपुत्र धीरो! ( यूयं ) तुम (यद् ) यद्यपि (मर्तासः) मर्त्य या मरणशील ( स्यातन) हो, तो भी ( यः) तुम्हारा (स्तोता) काव्यगायन करनेवाला येशक ( अमृतः स्यात् ) अमर होगा। भावार्थ- २१ जिप्त भौति पिता का आधार पराने से पुत्र निर्भय होकर रहता है, ठीक उसी प्रकार मला कर हमें इन वीरों का सहारा मिलेगा। एक बार यदि यह निश्चित हो जाए कि, हमें उनका माध्य मिलेगा, तो हम अकुतोभय हो सुखपूर्वक कालक्रमणा करने लगेंगे और हमारी जीवनयात्रा निश्चित हो जायेगी। २२ धीर महा कहाँ जा रहे किस दिशा में घे गमन कर रहे हैं। किस भभिप्राप से घे अभियान कर रहे हैं। हमारी यह तीम लालता है कि, ये द्युलोक से इधर पधारने की कृपा करें और इसी भवनीवरूपर सदा के लिए निषाप्त करें। कारण यी है कि उनकी एनछाया में हमारी रक्षा में कोई त्रुटि न रहने पायेगी, भतः या से भन्य किसी जगह न चले जाएँ । महतों की गौए सभी स्थानों में विद्यमान है भोर ये भरपानन्दवश रंभाती हैं। २३ वीर महत संरक्षणकार्य का पीरा उठाते हैं, भतः जनता की रक्षा भली भाँति हुआ करती है और पद श्रेष्ठ पैमध एवं सुख पाने में सफलता प्राप्त करती है। वीरों के लिए पह भतीप उचित कार्य है कि, ये समता की सपोषित रक्षा कर उसे वैभवशाली तथा मुखी को। २४ पूर धीर मत् (पृश्नि-मातरः, गो-मातरः) मातृभूमि, मातृभाषा या गोमाताकी सेवा करने. वाले है और यदि वे स्वयं मत्र्य हैं, तो भी इनके अनुयायो अमरपन पाने में सफलता पायेंगे। - - (२५) मा । : । मृगः । न । यसे । जरिता । भूत् । अनौप्यः । पृथा । यमस्य । गाद । उप ॥ ५ ॥ (२६) मो इति । सु । नः । परोऽपरा। नितिः । दुःऽहो । वधीत् । पदीष्ट । तृष्णया । सह ॥ ६॥ अन्वयः- २५ मृगा ययसे न, वा जरिता अ-जोप्यः मा भूत् यमस्य पथा ( मा ) उप गात् । २६ परा-परा दुर-हना निर-प्रतिः नः मोसु यधीत्, तृष्णया सह पदीष्ट । अर्थ- २५ (मृगः) द्विग्न ( यवसे न ) जैसे तृण को असेयनीय नहीं समझता है, ठीक उसी प्रकार (यः जरिता) तुम्हारी स्तुति एवं सराहना करनेवाला तुम्हें (अ-जोप्य.) अ-सेग्य या अनिय (मा भूत् ) न होने पाय और वेस ही यह ( यमस्य पथा) यमलोक की राहपर (मा उप गात् ) न चले, अर्थात् उसकी मौत न होन पाय या दूर हट जाय । २६ ( परा-परा) अत्यधिक मात्रा में बलिष्ठ तथा (दुर हना) विनाश करने में बहुतही योहड ऐसी (निर ऋतिः) धुरी दशा या दुर्दशा (नः ) हमारा (मो सु बधीत् ) विनाश न करे, (तृप्णया सह) प्यास के मार उसी का ( पदीष्ट) विनाश हो जाए। भावार्थ- २५ जैसे हिरन जी के खेत को सेवनीय मानता है, उसी तरह तुम्हारा यग्बान करनेवाला कमि तुम्हें सदेव प्रिम लगे और यह मृत्यु के दायरे से कोसों दूर रहे। यह यमलोक को पहुँचानेवाली सड़क पर संचार न को, पाने यह भमर पने। २६ विपदा, पुरी हालत एवं भाग्यचक्र के उलट फेर के फरस्वरूप होने वाली परिस्थिति सुतरा बल- पत्तर होती है और उसे हटाना तो कोई सुगम कार्य बिलकुल नहीं, ऐसी मापदा के कारण हमारा नाश न होने पाय; पान्त मुख की प्यास या क्षुधा यह जाए, जिपसे यही विपत्ति विनष्ट होये । टिप्पणी- [२४) 'यूयं मर्तासः स्यातन, यः स्तोता अमृतः स्यात्' मे विरोधाभास अल कारकी झलक देखने मिलती है । मस्र्य की उपासना करने में निरत पुरुष भी अमर बन सकता है । 'प्रभु' देवताओं के बारे में भी इसी भाँति वर्णन उपलब्ध है । 'मर्तासः सन्तो अमृतत्वमानशुः।। (ऋ. 1111०1४) प्रभु-देव पहले मार्य थे, पागलकर उन्हें भमरपन मिला। इससे तो यही प्रतीत होता है कि, मयों में भी अमर बनने की क्षमता रहता है। इस मंत्र पर सायणाचार्यजीने इस भौति भाग्य किया है - "एवं कर्माणि त्या मासो मनुष्या अपि सन्तोऽमृतत्वं दयत्वं आनः आनशिरै । कृतैः कर्मभिलैंभिरे। ' ऋभु प्रारम्भमै मनुष्य ही थे, पर उन्होंने विशेष तथा अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्यकलाप निभाये, इसलिए वे देवापर अधिरूद हो गये । पान में रखना चाहिए कि अगर सभी मानव हमी भाँति उच्च कोटि के कार्य काने लगेगे, 41 पदह देवपद प्राप्त कर सकेंगे। [२५] अजोप्य- (जुप् प्रीतिसेवनयो. ) जोय- प्रीतिपूर्वक सेवन काय, अजोप्य= सेवन करने के लिए अनुपयुक्त। [२६] या व्यक्ति, या राष्ट्र सभी को विपत्ति से मुठभेड क ना अनिवार्य है। मानयजाति में जए सृष्गा भत्यधिक रूप से 4 जाती है, तब ऐसे संकटों के बादल मंडराने लगते हैं, भापत्ति की घनघोर घटा छा जाती है । तृष्णा यदि लगातार पहली चली जाय, तो वही उनका विनाश करती है और द य भी नष्ट हो जाती है । 'निझनिः तृप्णया सह पदीष्ट' पदा तृष्णा के साथ विनष्ट हो जाय, ऐसा जो यहां कहा है, उसका अभिप्राय केवल इतनाही है । क्योंषि देखिए न, पदा की जद में तृष्णा पाई जाती है, अतएव भगर माय ही साप विपत्तिकी कासरी घटा दूर होने, तो अवश्य. मेव सुख की प्राप्ति होगी इसमें तनिक भी सन्देश नहीं। परहि.]२ (२७) सत्यम् । त्येपाः । अमऽवन्तः । धन्यन् । चित् । आ । सृद्रियांसः मिहम् । कृण्वन्ति । अघाताम् ।। ७ ।। (२८) वाश्राऽईब । विद्युत् । मिपाति । यत्सम् । न । माता । सिसक्ति । यत् । एपाम् । वृष्टिः । असर्जि ॥ ८ ॥ (२९) दिवा । चित् । तमः । कृण्वन्ति । पर्जन्यैन । उदाहेन । यत् । पृथिवीम् । विऽन्दन्ति ॥ ९ ॥ अन्ययः- २७ धन्वन् चित्. त्येषाः अम-यन्तः रुढियासः, अ-वातां मिहं आ कृण्वन्ति, सत्यम् । २८ यत् एषां वृष्टिः असर्जि वाथाइव. विद्युत् मिमाति, माता वत्सं न, सिसक्ति ।। २९ यत् पृथिवीं व्युन्दन्ति उद-वाहेन पजन्येन दिवा चित् तमः कृण्वन्ति । अर्थ-२७(धन्वन् चित्)मरुभूमिमें भी (त्वेषाः) तेजयुक्त और (अम घन्तः) बलिष्ठ (रुद्रियासः) महान धार मरत् (न याता) वायुराहत (मिहं आ रुण्यन्ति) यकोचहुं ओर कर डालते हैं, (सत्य)यह सच यात है। २८ (यत् ) जय ( एप ) इन मरुतों की सहायता मे (वृष्टिः असर्जि) वर्षा का सृजन होता है तथ (वाथाघ ) रंभानेवाली गौ के समान (विद्युत) यजली (मिमाति) वडा भारी शद करती है और (माता) माता (वत्सं न ) जिस प्रकार यालक को अपने समीपरसती है, वैस ही बिजली मेघों के समीप (सिपक्ति) रहती है। २९ ये वीर मरुत् ( यत् । जय ( पृथिवीं । भूमि को (व्युन्दन्ति गीली या आई कर डालते है, उस समय (उप-बाहेन पर्जन्येन ) जल से भरे हुए मेघों से सूर्य को ढककर (दिया चित् ) दिन की घेला में भी ( तमः कृण्यन्ति ) अँधियारी फैलाते है। भावार्थ- २७ मरस्थल में वर्षा प्राय: नहीं होती है, परंतु यदि भरुन घेता चाहें. को से उमा स्थान में भी धुआँधार बारिश कर सकते हैं। अभिप्राय यही है कि, वारश होमा या न होना मरुतो वायुप्र के अधीन है। . पदि अनुकूल मायुप्रवाह यहने लग जाय, तो पर्या होने में देने लगेगी। २८ जिस समय बढी भारी भाँधी के पश्चात वर्षा का प्रारम्भ होता है. उसमय isी की गमा सुनाई देती है और मेघन्दों में दामिनी की दम दिवई देती है। यहाँ पर ऐपी कप की है कि बिजली मामों गाय है। वह जिस तरह अपने बछरे के लिए माना है और अपने काम को समीप व ॥ चाहा है, उसी ताग बिजली मेश का आलिंगन करती है। २९ जिम यफ महद बारिश करने की तैयारीमें लगे रहत है, सब समूचा आकाश मालोसे Holan हो जाता है, सूर्य का दर्शन नहीं होता है, अधरा फैल जाता है और तदुपरान्त वर्षा के फलस्वरूप भूल गीला पा पानी से घर हो जाता है। - टिप्पणी [२७] रुद्र- (रुद्र) = रुलानेवाला जो पोर होता है,वाशनुदलको रलाता है, भता वीको रुप कामा उचित है । महारुद्र महावीर ही है। (रुत्-र) शरद करने वाला, या या उपदेशः । रुद्रिय शत्रुदयको रमानेवार पीर से उम्पस चीर पुत्र, वीरों के अनुयायी । [२८] मिमाति: (मा-मापन करना, तुलना करना सीमित करना, सन्दर रहना, तैयार करना, बनाना, दर्शना, शाद करना, गर्जना करना ) भावान करती है । [२९] उदयाह- (२१- पाह) पानीको दोनेवाला, मेघ ।

(३०) अध। स्वनात् । मरुताम् । विश्वम् । आ। स । पार्थिवम् । अरैजन्त । प्रामानुपाः ॥१०॥ (३१) मरुतः । वीळपाणिभिः । चित्राः । राधस्वती: । अनु । यात । ईम् । अखिंद्रयामऽमिः ॥११॥ (३२) स्थिराः । यः । सन्तु । नेमयः । रथाः । अश्वासः । एषाम् । सुऽसंस्कृताः । अभीशवः ॥ १२ ॥ अन्यय'- ३० मरुतां स्वनात् अधः पार्थिवं विश्व सम आ (अरेजत) मानुपाः प्र भरेजन्त । ३१ (हे। मरुतः । चील-पाणिभिः चित्राः रोधस्वतीः अनु अ-खिद्र-यामभि यात है। ३२ पपांचा रया, नेमयः, अभ्यासः, अभीशवः, स्थिराः सु संस्कृताः सन्तु । अर्थ-३० (मरता स्वनात् अध ) मरता की दहाड या गर्जना के फलस्वरूप निम्न भागमें अवस्थित (पार्थियं ) पृथ्वी में पाये जानेवाला (विश्व सम ) समूचा स्थान ( आ अरजत ) विचलित विकपित पयं स्पन्दमान हो उठता हे और (मानुपाः प्र अरजन्त ) मानव भी फॉप उठते है। ३१ हे (मरुतः। वीर मरतो। ( वीलु-पाणिभिः ) बलयुक्त याहुओं से युक्त तुम (चिनाः रोधस्वतीः अनु) सुंदर नदियों के तटॉपरसे ( अ-खिद्र-यामभि ) बिना किसी थकावट के (यात)गमन करो। ३२ ( एषां व रथा ) ये तुम्हारे रथ (नेमयः) रथ के आर तथा (अश्वास ) धाड एवं (भभाशयः) लगाम सभी (स्थिराः) हद तथा अटल और ( सुसंस्कृताः ) ठीक प्रकार परिप्हत हो। भावार्थ- ३०सीम भाँधी, विजली की दहार तथा चमकने से समूची पृथ्वी मानों विचलित हो उठती है और मनुष्य भी सहम जात हैं, तनिक भयभीत से हो जाते हैं। ३१ इन धोरों के बाहुओं में यहुत भारी शक्ति है और इस वाहुबल से चतुर्दिक ख्याति पाते हुए ये वीर नदियों के नयनमनोरम तट की राह से थकान की तनिक भी अनुभूति पाये बिना भागे बदसे जाय । ३२ वीरों के स्थ, पहिए, मार, मश्व एव लगाम सभी बलयुक्त एक सुसस्कृन रहें। अश्व भी भली भांति ीिक्षित हों तथा रथ जैसी चीजें भी सुहानेवाली एम परिष्कृत हो। - - टिप्पणी [३१] अ-खिद्र-यामन् (खिद् दैन्ये, खिद्र दैग्य, खिद याति इति विद्यामा, दैन्यमय । तदभावः ) खि महोते हुए, अथक दगसे, ( अ-खिद्र याम विसतारहित भाक्रमण । यहाँ पर वायु एव वीर दोनो भर्थ सूचित है। (१)यायु के प्रयाह अपनी शक्ति से गर्जना करते हुए नदीतट परसे भागे पढने हैं। यह पहला तथा अधिदैवत भय है। (२) वीर पुरुष भपने में विद्यमान सामर्थ्यके जरिय विजयी बनकर नदियों के किनारे सचार करने लगते है, भर्यात् शत्रुभों के प्रदेश में विद्यमान नदियों पर अपना प्रभुव प्रस्थापित करते हैं। इसी भाँति भागे समझ स्ना चाहिए । पानमें रहे कि तीन पक्ष इस प्रकार है-(1) अध्यात्मक व्यक्ति के शरीर में विद्यमाग शक्तियाँ अर्थात् भारमा पुधि, मन, इन्द्रिय. प्राण तथा शरीर। (२) अधिभूतम् प्राणिप्तमष्टि मानवसमाज, प्राणिसमुदाय से सम्बन्ध रखनेवाला1 (३) अधिदैवत- अमि, घायु, विद्युत् चन्दसूप, पौ आादि देवनाओं के यारे में।

(३३) अच्छे । बद । तना । गिरा। जरायै । ब्रह्मणः । पतिम् । अग्निम् । मित्रम् । न । दुर्शतम् ।। १३ ।। (३४) मिमीहि । श्लोकम् । आस्यै । पर्जन्यःऽइब । तननः । गाय । गायत्रम् । उक्थ्यम् ॥१४॥ (३५) चन्दस्व । मारुतम् । गणम् । स्वेपम् । पनम्युम् । अर्णिम् । अस्मे इति । युद्धाः । असन् । इह ॥ १५ ॥ अन्वयः- ३३ ब्रह्मणः पति अग्निं, दर्शतं मित्रं न, जरायै तना गिरा अच्छ घन् । ३४ आस्ये श्लोकं मिमीहि, पर्जन्यः इव ततनः, गायत्रं उपत्य गाय ! ३५ त्वेपं पनस्युं अर्किणं मारुतं गणं वन्दस्व, इह अस्मे वृद्धाः असन् । अर्थ- ३३ ( ब्रह्मणः पति) ज्ञान के अधिपति (अग्नि) अग्नि को अर्थात् नेता को ( दर्शतं मित्रं न) देपनेयोग्य मित्र के समान (जरायै स्तुति करने के लिए ( तना) सातत्ययुक्त (गिरा) वाणी से (अच्छ यद ) प्रमुपतया सराहने जाओ। ३४ तुम्हारे (आस्ये ) मुँह के अन्दर ही (श्लोकं मिर्माहि ) श्लोक को भली भाँति नापजोनकर तैयार करो और ( पर्जन्यः इय ) मेघ के समान ( ततनः ) विस्तारित करो। वैसे ही (गायत्रं ) गायत्री छन्द में रचे हुये ( उपथ्यं ) काव्य का (गाय ) गायन करो। ३५ (त्वे) नेजयुक्त (पनस्युं) स्तुत्य अथवा सराहनीय तथा (भर्किणं) पूजनीय ऐसे (मारतं गणं ) वीर मरतों के दल या समुदायका ( वन्दस्व ) अभिवादन करो। (यह ) यहाँपर ( अस्मे ) हमारे समीपही ये (वृद्धाः सन् ) वृख रहें। भावार्थ- ३३ अग्नि ["मरुत्सखा ' (...||४) मस्तीका मित्र है, तथा शानका स्वामी है। इसलिए इस की महिमा की सराहना करनी चाहिए। ३४ मन ही मन अक्षरमख्या गिनकर लोक तैयार कर रखे और वह कंठस्थ या मुखस्म हो। यह भावश्यक है कि, ऐसे लोई में किसी न किसी वीर पुरप की महनीयता का बखान किया हो । जैसे वर्षा का प्रारम्भ होने पर वह लगातार हुमा करती है और सर्वत्र शाति का वायुमण्डल फैला देती है, उमी प्रकार इस श्लोक का स्पष्टीकरण पा व्यायाम अधया प्रवचन बिना तनिक भी रुके करो और भर्थ की व्यापकता या गहराई सब को यसकार उनके पित में शांतता उपस होवे, ऐसी घेटा करो। गायत्री छन्द में जो शोक पनाये जाये, उन का गायन विभिन स्तों में को। ३५ पेजसे अत्यधिक मात्रा में परिपूर्ण, प्रशंसा के योग्य तथा आवरसरकार के अधिकारी बों, उनको ही प्रणाम करना, उनके सम्मुख ही सीस सुहाना भनी उधित है। अतः तुम ऐसाही करो, तथा तुम इस भौति सस एवं सचेष्ट रहो कि, अपने संभमें एवं समाज में ज्ञा वृद्ध, वीर्यम, धनवृद्ध तथा कर्मवृद्ध महान पुरुष पर्याप्त मात्रा में रहने पाय। टिप्पणी- [३३] श्री सायणाचार्यजीने यहाँ ब्रह्मणस्पनि ' पद का अर्थ · मरत् ' किया है।(1) जरा (ज स्तुती ) स्तुति करना) ( ज वयोहानी ) पुदाया।

। ( १।३९1१-१०) (३६) प्र । यत् । इत्था । पराऽवतः। शोचिः । न । मानम् । अस्य॑थ कस्य । क्रत्वा । मरुतः । कस्य । वपैसा। कम् । याथ । कम् । हु । धूतयः ॥ १ ॥ (३७) स्थिरा । युः । सन्तु । आयुधा 1 पुराऽनुदै । वील । उत । प्रतिऽस्कम्भ । युष्माकम् । अस्तु । तविपी । पनीयसी । मा। मय॑स्य । मायिनः ।। २ ॥ अन्वयः-३६ (हे ) धूतयः मरुतः । यत् मानं परावतः इत्था शोचिः न प्र अस्यथ, कस्य प्रत्या, कस्य चर्पसा, कं याथ, कंह? ३७ वः आयुधा परा-नुदे स्थिरा, उत प्रतिप्को वीलु सन्तु, युष्माकं तचिपी पनीयसी अस्तु, मायिनः मर्त्यस्य मा। अर्थ- ३६ हे (धूतयः ममतः ! ) शत्रुदल को विकंपित तथा विचलित करनेवाले वीर मरता ! (यत्) जब तुम अपना (मानं ) बल (परावतः इत्था ) अत्यन्त सुदूर स्थान से इस भाँति (शोचिः न ) विजली के समान (प्र अस्यस्थ ) यहाँ पर फेंकते हो, तय यह (कस्य प्रत्या भला किस कार्य तथा उद्देश्य को लक्ष्य में रख, (कस्य वर्पसा ) किस की आयोजना से अथवा ( कं याथ) किसकी तरफ तुम चल रहे हो या (के ह ) तुम्हें फिस के निकट पहुँच जाना है, अतः तुम ऐसा कर रहे हो ? ३७ ( वः आयुधा ) तुम्हारे हथियार ( परा-नुदे ) शनुदल को हटाने के लिए (स्थिरा) अटल तथा सुदृढ र, (उत ) और (प्रतिको ) उनकी राह में रुकावटें सडी करने लिए प्रतिबंध करने के लिए (पीलु सन्तु ) अत्यधिक बलयुक्त एवं शक्तिसंपन्न मी हो । (युप्माकं तविपी ) तुम्हारी शक्ति या सामर्थ्य (पनीयसी अस्तु ) अतीव प्रशंसाई और सराहनीय हो (मायिन.) कपटी ( मल्यस्य) लोगों का यल (मा)न बढे। भावार्थ- ३६ (अधिदेवत) वायुके प्रवाह जय यहुत वेगसे संचार करना शुरु करते हैं, तब मनमें यह प्रश्न उठे पिना नहीं रहता है कि, भला ये कहाँ और रिसके समीप चले जाना चाहते हैं, तथा उनके गन्तव्य स्थानमें क्या रखा होगा, कौनसी उन्हें कार्यरूपमें परिणत करनी होगी? नहीं तो उनके ऐसे घेगसे पहो रहनेका अन्य प्रयोजन क्या हो सकता है ? (अधिभूत में ) जिस समय वीर पुरुप शत्रुदल को मटियामेट करने के लिए उनपर धावा करना प्रारम्भ करते है, तब ये घर मानव अपना सारा बल उसी कार्य पर पूर्णरूपेण केन्द्रित करते है । ऐसे अवसर पर यह मस्यन्त आवश्यक है कि, पे सर्वप्रथम यह पूरी तरह निश्चित कर लें कि, किस हेतु की पूर्ति के लिए यह यहाई करनी है, कितनी सफलता मिलनी पाहिए, किस स्थल पर पहुँचना है और बीच में किस की सहायता लेनी पडेगी। पश्चात् पद निर्धारित योजना फली- भूत हो जाए, इस अंग से काही प्रारम्भ पर दे। वीरों के लिए यह उचित है कि, वे निश्चपारमा हेतु से प्रभावित हो, विशिष्ट कार्य को सफलतापूर्वक निष्पन्न करने के लिए ही अपना भादोरन प्रवर्तित करें, व्यर्थ ही खटाटोप या गीदद भभकी न करें, क्योंकि उतावलापन एवं भविघारिता से सदैव हानि उठानी पड़ती है। ३७ वोर पुरुष अपने हथियारों एवं शस्त्रास्त्रों को बलयुक्त तीक्ष्ण तथा शत्रुओंके शस्त्रोंसे भी अपेक्षाकृत भधिक कार्यक्षम यना दें। ये सदा के लिए सतक एवं सचेष्ट रहें कि, वे शत्रुदलसे मुठभेड या भिदंत करते समय यथेष्ट मात्रामें प्रमायशाली ठहरें। (ध्यान में रखना चाहिए कि, कदापि विरोधी तथा शत्रुसंघके हथियार अपने हथियारों से पटकर प्रमक तथा प्रभावशाली न होने पायें) और कपटाचरणमें न शिशाको वाले शत्रुभोंका मल कभी न वृद्धिंगत हो । टिप्पणी- [३६] (१) धूति= ( ५ कम्पने } = हिलानेवाला, कंपित करनेवाला । (२) मानं- ( मननीय ) मनन काने के लिए उचित, प्रमाणबद्ध. यछ । ( ३ ) वर्पस्- ( घर-रूप) भाकार, रूप, आयोजना, युक्ति, कपटयोजना, फपटपूर्ण प्रयोग। [३७) (6) परा-नुदे - (पर-नु) शत्रुको दूर इटाना । (२) प्रतिष्कम् = (प्रति-स्कभ) = विरछ खर हो माना, उल्टी दिशामें शक्तिको प्रचलित करना, शके खिलाफ अपना पल किसी निर्धारित भायोजनासे प्रयुक्त करना, शत्रुकी । . है, (३८) परी । है । यत् 1 स्थिरम् । हथ। नरैः । चूर्तय॑थ । गुरु । वि। याथन । बनिनः । पृथिव्याः। वि । आशाः । पर्वतानाम् ॥ ३ ॥ (३९) नहि । वः । शत्रुः । विविदे । अधि । घर्यि । न । भूम्याम् । रिशादसः। युष्माकम् । अस्तु । तर्विषी । तना। युजा। रुद्रांसः । नु । चित् । आऽधृ ॥ ४ ॥ (४०) प्रापयन्ति । पर्वतान् । वि । विञ्चन्ति । वनस्पतीन् । प्रो इति । आरन । मरुतः । दुर्मदीःऽइय। देवासः । सर्वया । विशा ॥५॥ अन्वयः- ३८(हे ) नरः। यत् स्थिरंपरा हत, गुरु वर्तयथ, पृथिव्याः वनिनः वि याथन, पर्वतानां आशाः वि (याथन) ह। ३९ (हे ) रिश-अदसः अधि द्यपि यः शत्रुः नहि विविदे, भूम्यां न, (हे) रुद्रासः! युप्माकं युजा आधृपे तविषी नु चित् तना अस्तु । ४० (हे ) देवासः मरुतः । दुर्मदा.इव, पर्वतान् प्र वेपयन्ति, वनस्पतीन् वि विञ्चन्ति, सर्वया विशा मो आरत। अर्थ-३८ हे (नरः!) नेता वीरो! (यत् ) जब तुम (स्थिरं) स्थिर रूप से अवस्थित शत्रु को (परा हत) अत्यधिक मात्रा में विनष्ट करते हो, (गुरु) बलिष्ठ शत्रु को भी (वर्तयथ) हिला देते हो, विकषित कर डालते हो और ( पृथिव्याः वनिनः ) भूमडलपर विद्यमान अरण्यों के वृक्षों को भी (यि याथन) जडमूल से उखाड़ फेंक देते हो, तय (पर्वतानां आशाः) पर्वतों के चतुर्दिक (मिथाथन) तुम सुगमता से निकल जाते हो। ३९ हे (रिश: अदसः !) शत्रु को नष्ट करनेवाले चोरो ! (अधि द्यवि) धुलोक में तो (ध. शत्रुः, तुम्हारा शत्रु ( नहि विविदे) अस्तित्व में ही नहीं पाया जाता है और ( भूम्यां न ) भूमंडलपर भी नहीं विद्यमान है, हे ( रुद्रासः !) शत्रु को रुलानेवाले चोरो ! (युप्माकं युजा) तुम्हारे साथ रहते हुए (आधृपे) शत्रुओं को तहसनहस करने के लिए मेरी (तविपी ) शक्ति (नु चित् तना अस्तु ) शीघ्रही विस्तारशील तथा पढनेवाली हो जाए। ४० हे (देवास. मरुतः ! ) चीर मरतो!( दुर्मदा इच) बल के कारण मनवाले हुए लोगों के समान तुम्हारे वीर (पर्वतान् प्र चेपयन्ति ) पर्वतों को भी प्रचलित कर देते हैं, हिला देते हैं और (बन. स्पतीन् विविञ्चन्ति) पेडों को उखाडकर दूर फेंक देते हैं, इसलिए तुम (सर्वया विशा) समूची जनता के साथ मिलजुलकर (प्रो आरत) प्रगति करते चलो। भावार्थ-३८ वीर पुरुष सदैव स्थिर एवं प्रबल शत्रुको भी विचलित करने की क्षमता रखते हैं, यनों में से सड़कों का निर्माण करते हैं और पीके मध्यसे भी लीलयर दूसरी ओर चले जाते है, तथा शत्रुसंध पर माझमणका सूत्रपात करते हैं। ३९ पोरों का यह भनिवार्य कर्तव्य है कि, चे अपने शत्रुओं का समूल विनाश करें, कहीं भी उन्हें रहने के लिए स्थान न दें और उन मामूलचूल विध्वंस कर चुकने पर ही अपनी शक्ति को यढाते चलें । ४० पल अत्यधिक बढ जाने से तनिक मतवाले से ममकर वीर पुरष शग्रुदल पर भामण करते समय पर्वतों को भी विपित कर देते हैं भार मार्ग पर पाये जानेवाले प्रशों को भी उखाडकर एटा देते हैं। ऐसे मल को भावश्यकता रखनेवाले कार्यों की पूर्ति करना उनके लिए संभव है, अतः ये सारी जनता के सहयोग की सहायतासे ऐसी कार्यसिद्धि में अपना यल लगा दें कि भन्नमें सयको प्रगनि हो । व्यर्थ ही रात राधा विस कार्यों में उलझे न रहें। (वायु जिस तरह वेगवान् धनने पर पेड़ों को तोडमरोड देती है, ठीक उसी प्रकार ये वीर भी दल को विट काइते है।) राहमें रोटे भटकाना, उसे रोक देना। (३) मायिन् (माया = चनुराई, कौशप, युति, कपट)= कुशल पुतिमान कपटी । [३९(१) आधुप = धैर्य, भाक्रमण, धाया करना, चढाई करना और शत्रुको जर मूक से सखारना १५ (४१) उपो इति । रथेषु । पृर्पतीः । अयुग्ध्यम् । प्रष्टिः। वहति । रोहितः। आ। वः । यामाय । पृथिवी । चित् । अश्रोत् । अवीभयन्त । मानुपाः ॥ ६॥ (४२) आ। वः । मुक्षु । तनाय । कम्। रुद्राः । अवः । वृणीमहे । गन्तं । नुनम् । नः । अव॑सा । यथा । पुरा । इत्था । कपाय । विम्युपै ॥ ७ ॥ (४३) युष्माऽईपितः । मरुतः । मर्त्य इपितः । आ। यः । नः । अम्बः । ईपते । वि। तम् । युयोत । शव॑सा । वि । ओज॑सा । वि । युष्माकाभिः । ऊतिऽमिः ॥८॥ अन्वयः- ४१ रथेषु पृपती: उपो अयुग्ध्व, रोहितः प्रष्टिः वहति, व. यामाय पृथिवी चित् आ अधोत्, मानुपाः अबीभयन्त । ४२ हे रद्राः! तनाय कं मधु च. अब आ वृणीमहे, यथा पुरा विभ्युपे कण्याय नूनं गन्त इत्या अवसा नः [गन्त ) । ४३ (हे ) मरुतः । यः अभ्नः युष्मा- इपिता मर्य-इपितः नः आ ईपते,तं शवसा वि युयोत, ओजसा वि (युयोत ), युप्माकामि' अतिभिः वि ( युयोत)। अर्थ-४१ तुम ( रथेषु) अपने रथों में (पृपती )चित्रविचित्र विन्दुओंसहित घोडिया या हरिनियाँ (उपो अयुग्ध्वं ) जोड चुके हो और (रोहितः ) लालवर्णवाला घोडाया द्विरन (प्रष्टिः) धुरा को (बहति) खींच लेता है। (यः यामाय) तुम्हारे जानका शन्द (पृथिवी चित् ) भूमि ( आ अनोत् ) सुन लेती है, पर उस आवाज से (मानुपाः अधीभयन्त ) सभी मानव भयभीत हो उठते है। ४२ हे (रद्राः ।) शत्रु को रलानेवाले वरि मरुद्गण ! ( तनाय कं) हमारे बालवच्चों का कल्याण तथा हित होवे, इसलिए (मक्षु ) यहुत ही शीघ्र हमें ( 4. अयः ) तुम्हारा संरक्षण मिल जाए, ऐसा { आ वृणीमहे ) हम चाहते है। ( यथा पुरा ) जैसे पहले तुम (विभ्युपे कण्याय ) भयभीत कण्य की ओर ( नूनं गन्त ) शीघ्र जा चुके थे, । इत्था ) इसी प्रकार ( अवसा ) रक्षा करने की शक्ति के साथ (ना) हमारी ओर जितना जल्द हो सके, उत्तना आ जाओ। ४३ हे ( मरुतः ! ) वीर मरुत्संघ ! (यः अभ्य ) जो डरावना हथियार (युष्मा-इपितः ) तुमसे फेंका हुआ या (मर्त्य-इषित') किसी अन्य मानवसे प्रेरित होता हुआ, अगर (नः आ ईपते) हमारे ऊपर मा गिरता हो तो (तं) उसे (शवसा वि युयोत) अपने वलसे हटा दो, ( आजसा वि ) अपन तेजसे दूर कर दो और (युप्माकाभि. ऊतिभिः ) तुम्हारी संरक्षण आयोजनाओद्वारा उसे (वि) विनष्ट करो। भावार्थ-४१ मरुतों के रथ में जो घोड़ियाँ या हिरमियाँ जोदी जाती है, वे पृष्ठभागपर धब्बे धारण कर लेती हैं, मोर उन के भमभाग में धुरी उठाने के लिए एक लाल रंग का अश्व या हरिण रखा जाता है । जय मरुतों का रथ भागे पढने लगता है, तब सारी पृथ्वी उस के शब्द को ध्यानपूर्वक सुन लेती है। हाँ, अन्य सभी मानय उस वनि को अक्षण करते ही सहम जाते हैं, उन के अन्तस्तल मै भीतिरेसा चमक उठती है। यहाँ पर एक ध्यान में रखने योग्य भात है कि, मरुतों के वाहन लालवर्णवाले होते हैं, भले ही वे हरिण या घोटे हो । [ आगे चलकर महतों के पहनावे का रंग केसरिया यतलाया है ( देखो मग्न २१)। मनसंख्या ५२ मे अरुण प्सव ' विशेषण मरुतों को दिया गया है। इस से निश्चित रूप से प्रतीत होता है कि, ये वीर भरुण याने लाल रगवाले हैं। ] ४२ राष्ट्र के पालकों का रक्षण करने का कार्य वीरोंपर अवलयित है, जो आगामी पुश्त की प्रगति के लिए भरयधिक सावधानता रखें | जैसे अतीतकाल में समय समय पर वीरोंने सहायता प्रदान की थी वैसे ही अब भी वे करें । ४३ यदि हम पर कोई आपत्ति भानेवाली हो, तो वीर अपने बल से, प्रभाव से तथा सरक्षण से उसे टाकर पूर्णतया पैशेतर रोद दें, क्योंकि जनता को निर्भय कगना बोकाही कर्तव्य है। टिप्पणी-[१] याम-जाना, गति, भाक्रमण, हमला। [२] कण्व.3 ( कण आर्तस्वो)- दुखी बनकर परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करनेवाला, स्तोता, कवि, कण्व नामक एक अपि। [४३] अभ्यः (भ-भूव )- अभूतपूर्व, पयानक, घोर, प्रचः । - (४४) असामि । हि । प्रऽयज्यवः। कण्यम् । दुद । प्रऽचेतसः । असामिऽभिः । मरुतः । आ । नः । ऊतिऽभिः। गन्ते । वृष्टिम् । न । विद्युतः ॥९॥ (४५) असामि । ओजः । विभृथ । सुऽदानवः । असामि । धूतयः । शवः । ऋषिऽद्विपै । मरुतः । परिऽमन्यवै । इ'म् । न । सृजत । द्विपम् ॥ १० ॥ कण्वपुत्र पुनर्वत्स ऋषि ( ऋ० ८४१-३६) (४६) प्र । यत् । यः । त्रिऽस्तुभम् । इपम् । मरुतः । विनः । अक्षरत् । वि । पर्वतेषु । राजथ ॥ १॥ अन्वयः-४४ (हे) प्र-यज्यवः प्र-चेतसः मरुतः ! कण्वं अ-सामि हि दद, अ-सामिभिः ऊतिभिः, विद्युतः पृष्टि न, नः आ गन्त । ४५ (हे) सु-दानवः! अ-सामि ओजः अ-सामि शवः विभृथ, (हे) धूतयः मरुतः! ऋपि-द्विपे परि-मन्यवे, इधुन, द्विषं सृजत । ४६ (हे ) मरुतः यद् विप्रायः त्रिष्टुभं इषं प्र अक्षरत्, पर्वतेपु वि राजथ । अर्थ- ४४ हे (प्र-यज्यवा) अतीव पूज्य तथा (प्र- चेतसः) उत्कृष्ट मानी (मरुतः1) वीरमरुतो ! (फण्यं) कण्य को जैसे तुमने ( अ-सामि हि ) पूर्ण रूपसे (दद ) आधार या आश्रय दे दिया था, वैसेही ( अ-- सामिभिः ऊतिभिः) संरक्षणको संपूर्ण एवं अविकल आयोजनाओं तथा साधनों से युक्त होकर (विद्युतः वृष्टिं न) विजलियाँ वर्षाकी और जैसे चली जाती है, वैसे ही तुम (नः आगन्त) हमारी भोर आ जाओ। ४५ हे (सु-दानयः ! ) अच्छे दान देनेवाले वीर मरुत् ! ( अ-सामि ओजा) अधूरा नहीं, ऐसा समूचा बल एवं ( अ-सामि शवः ) अविकल शक्ति ( विभृथ ) तुम धारण करते हो, हे (धूतयः मरतः! ) शनुदल को विकेपित करनेवाले वीर मरुद्गण ! (शपि-द्विषे ) ऋषियों से द्वेष करनेवाले (परि-मन्यवे ) क्रोधी शत्रु को धराशायी करने के लिए (इपुन ) याण के समान (द्विपं) द्वेष करने चाल शत्रु को ही ( सृजत ) उस पर छोड़ दो। ४६ हे (मरतः ) वीर मरत गण! ( यत् विप्रः ) जय ज्ञानी पुरप (घः) तुम्हारे लिए (निभं ) मिष्टुभ् छन्द के बनाया हुआ स्तोत्र पढकर (इयं प्र अक्षरत् ) मन अर्पण कर चुका, तय तुम (पर्यतेपु विराजथ) पर्वतों में विराजमान होते हो। भावार्थ-४३ पूजाई तथा ज्ञान विज्ञान मे युक्त एवं विभूषित पीर लोग हमें सब प्रकार से सुरक्षित रखें और हमारी मदर करें। ४५ वीर महतों के समीप विक्ट रूप से शारीरिक बल तथा मन्य सामथ्र्य भी है, किमी प्रकार की ध्रुटि नहीं है । घे इस असीम सामर्थ्य का प्रयोग करके उस शव को दूर हटा दें, जो प्रषियों का भयाद विद्वान् तथा श्रेष्ठ शानियों से द्वेषपूर्ण भाव रखता हो, या उसी पर दूसरे शत्रु को छोडकर उसे विनट कर मारे। ४६ एक समय जब ज्ञानी उपासक ने मरुतों को रक्ष में रखकर त्रिष्टुम छन्द का सामगायन किया और उन्हें भरा प्रदान किया तब ये वीर पर्वत गियों में भ नन्दक दिन बिताने लग थे । टिप्पणी-[१४] (1)-सामि आधा नहीं, पूर्ण, पूर्णहोण। (0) प्रचेतस्- पानपूर्वक कार्य करने घाला, पुदमान् जानी, सुनी, हत, भाउ विधारवाल11 (३) कण्य- देखो मत्र ४२ । [४५] इस मंत्रभाग में (ऋषि-द्विषे, परि-मन्यये द्विपं सृजत) एक मननीय राजनतिक तत्वका प्रतिपादन किया है कि एक बायुको दूसरे शसे सार दोनों को भी हतबल करके परास्त करना ।

। (४७) यत् । अङ्ग । तविपीऽयवः। यामम् । शुभ्राः। अचिंधम् । नि । पर्वताः । अहासत ॥२॥ (४८) उत् । ईरयन्त । वायुभिः। धायासः । पृश्निमातरः । धुक्षन्त । पिप्युपीम् । इपम् ॥ ३॥ (४९) वन्ति । मरुतः । मिहम् । प्र । वेपयन्ति । पर्वतान् । यत् । यामम् । यान्ति । वायुभिः ॥ ४ ॥ अन्वयः- ४७ ( है ) तविषी-ययः शुभ्राः अङ्ग ! यद् याम अचिध, पर्वताः नि अहासत । ४८ वाश्रासः पृश्नि-मातरः वायुभिः उद् ईरयन्त, पिप्युपी इपं धुक्षन्त । ४९ मरुतः यद् वायुभिः याम यान्ति, मिह वपन्ति, पर्वतान् प्र पयन्ति । अर्थ- ४७ हे (तविपी -यवः ) बलवान् (शुभ्रा ) सुहानेवाले (अङ्ग) प्रिय तथा वीर मरतो ! ( यत् ) जब तुम अपना (याम) गमनके लिए निश्चित क्यिा हुआ रथ (अचिध्वं ) सुसज्ज फरते हो, तय (पर्वता नि अहासत ) पर्वत भी चलायमान हो उठते है। ४८ ( धाश्रासः) गर्जना करनेवाले (पृश्नि मातरः) भूमि को माता माननेयाले वीर मरत् (वायुभिः) वायु- प्रवाहों की सहायता से ( उद् ईरयन्त ) मेघों को इधर उधर ले चलते हैं और तदनुसार (पिप्यपी इयं धुक्षन्त) पुटिफारक अन्न का सृजन करते है। ४९ (मरता) वीर मरतों का यह दल (यत् वायुभि ) जर वायुओं के साथ (याम यान्ति) दौडने लगते है. तय (मिहं वपन्ति ) वे वर्षा करने लगते हैं और (पर्वतान् भयेपयन्ति) पर्वतश्रेणियोंको पायमान कर देते हैं। भावार्थ- ४७ यल बढानेवाले वीर जब शत्रु पर चढाई करने की लालसा से अपना रथ सुसजित कर देते हैं, सय ऐसा प्रतीत होने लगता है कि, मानों पहाट भी हिलने लगते हैं। ४८ पवन की सकोगों से बादर इधर उधर जाने लगते हैं और कुछ काल के उपरान्त उन से चपा होती है, तथा मन भी यथेष्ट मात्रा में उत्पस होता है। इसी भन्न से जीवसृष्टि का भरणपोषण होता है। निस्सदह महतो का यह कार्य वर्णनीय है। टिप्पणी [४७1 (1) तविपी-यु- (विप - शक्ति, धैर्य, बल, सामध्यं, यरिए, स्वर्ग,) शक्तिमान, धीरवीर, उत्साह एव उमगसे भरा हुमा। (२)शुभ्र! = चमकीला तेजस्वी, सुन्दर, साफ सुथरा, सफेद, चन्दन, स्वर्ग, चाँदी । (शुभ्राः = शरीर पर चन्दन का लेप करनेवाले !) शोभायमान । [४८] चूकि इस मन में ऐसा कहा है, (पृदिनमातर वायुभिः उदीरयन्ते) अर्थात् वायु की लहरियों से मरत् मेघों को तितरनितर कर देते हैं, भस्ताव्यस्त कर डालते हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि, मरन् एव वायु दो विभिन्न वस्तुओं की सूचना देते हैं । मगले मंत्र पर की हुई हिरणो देख लीजिए। [१९] यहाँ पर यो बतलाया है कि, ( महतः वायुभि यान्ति) मरत् वायुओं के साथ भागने लगते हैं और वर्षा का प्रारम्भ करते हैं। इस से ऐसी कल्पना करने में क्या हर्ज कि, मरत् तथा वायु दोनों विभिन्न अर्थवाले शब्द है । इस बारे में ऊपर के मन में बतलाया हुभा वर्णन देखिए और प तथा ४१० समयावाले मन्त्र भी देखिए, क्योंकि वहाँपर 'चातास'न' (वायुभों के समान ये मरत है) ऐसा कहा है। मस्तु [हिं.३ - -- (५०) नि । यत् । यामाय । वः । गिरिः। नि । सिन्धयः । विऽधर्मणे । महे । शुष्णाय। येमिरे ॥ ५॥ (५१) युष्मान् । ॐ इति । नक्तम् । ऊतये । युष्मान् । दिवा । हवामहे । युष्मान् । प्रऽयति । अघरे ॥ ६ ॥ (५२) उत् । ॐ इति । त्ये । अरुणऽप्सवः । चित्राः । यामैमिः । ईरते । वाश्राः । अधि । स्तुना । दिवः ॥७॥ (५३) सृजन्ति । रश्मिम् । ओज॑सा । पन्याम् । सूर्याय । यातवे । ते । भानुभिः । वि । तस्थिरे ॥ ८॥ अन्वयः- ५० यद् वः यामाय गिरिः नि, सिन्धयः वि-धर्मणे महे शुष्माय नि येमिरे। ५१ ऊतये युप्मान उनकं हवामहे, दिया युप्मान प्रयवि अ-ध्वरे युप्मान हवामहे । ५२ त्ये अरुण-सवः चित्रा वाथाः यामेभिः दिवः अधि स्तुना उत् ईरते उ। ५३ सूर्गाय यातये रश्मि पन्यां ओजसा सृजन्ति, ते भानुभिः वि तस्थिरे। अर्थ-- ५० ( यद् ) जब (या यामाय ) तुम्हारी गतिशीलता एवं प्रगति से भयभीत होकर (गिरिः नि) पर्वत एवं (वि-धर्मणे) विशेष ढंग से अपना धारण करनेवाले तुम्हारे (महे ) बडे एवं महनीय (शुप्माय ) यल से डरकर (सिन्धयः ) नदियाँ (नि येमिरे) अपने आप को नियंत्रित कर देती हैं, [ अर्थात् एक जाती है, तब तुम यथेट वर्षा करते हो।] ५१ हमारी (ऊतये ) रक्षा के लिए ( युप्मान् उ) तुम्हें ही हम (नतं) रात्री के समय ( हवामहे ) बुलाते हैं, (दिवा) दिन की वेला में भी (युष्मान् ) तुम्हें ही हम पुकारते हैं (प्रयति अ- ध्वरे ) प्रारंभित हिंसारहित कर्मों के समय भी हम (युप्मान् ) तुम्हीं को बुलाते हैं। ५२ (त्ये) वे ( अरुण-प्सयः) लालिमायुक्त (चित्राः) आश्चर्यकारक (चाथाः) गर्जना फरनेवाले वीर मरुत् (यामेभिः) अपने रथों में से (दिवः अधि) धुलोक के ऊपर (स्नुना) पर्वतों की ऊँची चोटियों पर से (उद् ईरते उ) उडान लेने लगते हैं। ५३ (सूर्याय यातचे) सूर्यके जाने के लिए (रक्ष्मि पन्थां) किरणरूपी मार्गफो (ओजसा सृजन्ति) जो अपनी शक्तिसे बना देते हैं, (ते) वे (भानुभिः वि तस्थिरे) तेजद्वारा संसारको व्याप्त कर देते हैं। भावार्थ-५० महतोंमें विद्यमान घेग तथा बलसे भयभीत होकर पर्वत स्थिर हुए और नदियाँ धीमी घालसे पहले ५१ कार्य करते समय, दिन एवं रात्रीको बेलामें अपने संरक्षण के लिए परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए। ५२ लाल वर्णवाला गणवेश पहनकर और रथ पर बैठकर ये पीर पर्वतों परसे भी संचार करने लगते है। ५३ मस्ती में यह शक्ति विद्यमान है कि, घे सूपको भी प्रकाशका मार्ग यतलाते हैं और सभी जगह तेजस्वी किरणों को फैला देते हैं। टिप्पणी- [५] अरुण-प्सु - (भाग-भाम् ) लालमर्ग से युक, रक्तिम भामा से युक्त गणवेश पहननेवाले। [५३] चूकि यहाँ यो यतलाया है कि, सूर्य से प्रकार को जाने के लिए मरत राह यना देते हैं, मतः एक विचारणीय प्रभपस्थित होता है, क्या मरल वायु से भिन्न पर सूक्ष्म घायु के समान कोई सव है, जिस में पायु. सास लहरियाँ उपक्ष होती हो । (मन्न ४८-४९ तथा १६-४१७ में दी हुई उपमाओं से प्रतीत होता है कि, वायु सधा मरत विभिप है।) 3D (५४) इमाम् । मे । मरुतः । गिरम् । इमम् । स्तोमम् । अमुक्षणः । हुमम् । मे । वनत । हर्वम् ॥ ९॥ (५५) त्रीणि । सरौसि । पृश्नयः। दुदुहे । पत्रिणे। मधु । उत्सम् । कवन्धम् । उद्रिणम् ॥१०॥ (५६) मरुतः । यत् । हू । चः । दियः । सुम्नऽयन्तः । हामहे । आ। तु । नः । उप । गन्तन ॥ ११ ॥ (५७) यूयम् । हि । स्थ । सुऽदानवः । रुद्राः । ऋभुक्षणः । दमै । उत । प्रऽचैतसः । मर्दै ।। १२ ।। अन्यया-५४ (हे) मरुतः! इमां मे गिरं यनत, (हे) कभ-क्षणः ! इमं स्तोमं मे इमं हयम् वनत । ५५ पृश्नयः वनिणे त्रीणि सरांसि, मधु उत्सं, उद्रिणं कवन्धं, दुदुहे। ५६ (३) मरुतः। यत् ह वा सुम्नायन्तः दिवः हवामहे, आ तु नः उप गन्तन । ५७ (हे ) सु-दानवः रुद्राः भु-क्षणः ! यूयं उत दमे मदे प्र-चेतसः स्थ । अर्थ- ५४ हे (मरुतः!) धीर मरुतो ! ( इमां मे गिर) इस मेरी स्तुतिपूर्ण वाणी को (चनत ) स्वीकार करो हे (माभु-क्षणः! ) शस्त्रास्त्रोंसे सुसज वीरो। तुम (इमं स्तोमं) इस मेरे स्तोत्र का और ( मे इमं हवं) मेरी इस प्रार्थनाका स्वीकार करो। ५५ (पृदनय.) मरुतोंकी माताओंने (यज्रिणे ) इन्द्र के लिए (प्रीणि सरांसि ) तीन झोले, (मधु) मिठासभरा (उत्सं) जलपूर्ण कुंड और ( उद्रिणं ) पानी से भरा हुआ (कवन्ध) जल धारण करनेवाला वृहदाकारपात्र या मेघ (दुदुढे) दोहन कर भरा है। (मरुतः ) वीर मरुद्गण ! (यत् ह) जय (वः) तुम्हें. (सुम्नायन्तः) सुखी होने की लालसा करनेवाले हम (दिवः हवामहे) घुलोक से बुलाते हैं, उस समय (आ तु) तुरन्त ही तुम (न' उप गन्तन) हमारे समीप आ जाओ। ५७ हे (सु-दानवः !) भली प्रकार दान देनेवाले (रुद्राः ) शत्रुसंघ को रुलानेवाले तथा (मु-क्षणः ) शस्त्र धारण करनेवाले वीरो ! ( यूयं उत हि) तुम सचमुत्रही जब अपने ( दमे ) घर में या यश में ( मदे ) आनन्द में रहते हो, एच सोमरस का सेवन करते हो, तव (प्र-चेतसः स्थ) तुम्हारी युद्धि अधिक चेतनायुक्त बन जाती है। भायार्थ- ५५ भूमि, गौ तथा वाणी मरुतों की माताएँ है । भूमिसे अन्न तथा जल, गौ से दुग्ध और वाणीसे ज्ञान को प्राप्ति होती है। तीनोंके तीन सेवनीय तथा उपादेय पस्तुएँ हैं । मरुतोंकी माताभोंने विविध दुग्धसे तीन शीले भरकर पार कर रखी है ताकि वीर मरुतोका भरणपोषण सुचारु रूपसे एवं मली भाँति हो जाए। ५७ ये वीर पढे ही उदार, शत्रुभों का नाश करनेवाले सदैव शस्त्रास्त्रोंसे सुसज हैं और जिस समय ये अपने प्रासादों में तथा निवासस्थलों में सुख- पूर्वक दिन पिताते हैं अथवा यज्ञभूमि में सोमरस का सेवन करते हैं, तब इनकी युद्धि अतीव चेतनाशील होती है। टिप्पणी-[५४] प्रभु = कारीगर, कुशल, शोधक, हार, स्थकार, बाण, वन । ऋभु-क्ष - इन्द्रका वन समाप्रभुक्षणः = शस्त्रधारी, कारीगरों को माथप देनेवाले (मंग्र५७ और ८३ देखिए)। [५५] (1) क-वन्ध - पानी इकट्ठा करने के लिए पर भारी कुंड या मेघ । [५६ ] यहाँ पर 'सुम्नायन्तः' पद पाया जाता है, जिसका कि अर्थ पाने के लिए सचेष्ट रहनेवाले । ध्यान में रहे कि 'घु-मन' (सुम्न ) मन को भली भाँति संस्कारसम्पन्न करने से ही यह सुख मिल सकता है । यह अतीव महत्वपूर्ण तय कभी न भूलना चाहिए। 'सु-मन ' तथा 'सुम्न वास्तव में एक ही है। इस पद से हमें यह सूचना मिलती है कि, उनम ढंग से परिष्कृत मन ही सुग्व का सच्चा साधन है । इसलिए मंत्र ६० एवं ९७ देख लीजिए। [५७]()दम= इन्द्रियदमन, संयम, मनरी स्थिरता, गृह । (२) मद प्रेम, गर्व, भानन्द, मधु, सोम एवं वीर्य । सुख - क २० (५८) आ। नः । रयिम् । मदुऽच्युतम् । पुरुऽक्षुम् । विश्वऽर्धायसम् । इयत । मरुतः । दिवः ॥१३॥ (५९) अधिऽइव । यत् । गिरीणाम् । यामम् । शुभ्राः । अचिंध्यम् । सुवानः । मन्दध्धे । इन्दुऽभिः ॥ १४ ॥ (६०) एतावतः । चित् । एपाम् । सुम्नम् । भिक्षेत । मयः । अदाभ्यस्य । मन्मऽभिः ॥ १५॥ अन्वयः-५८ (हे ) मरुतः । नः मद्-च्यतं पुरु-क्षु विश्व-धायसं रयिं दिवः आ इयर्त । ५९ (हे) शुभ्राः! गिरीणां अधिइव यत् याम अविध्वं (तदा यूयं) सुवानः इन्दुभिः मन्दध्ये। ६० मर्यः एतावतः चित् अ-दाभ्यस्य मन्मभिः एपां सुम्नं भिक्षेत । अर्थ- ५८ हे (मरुतः !) मरुत् संघ ! (नः ) हमारे लिए (मद-च्युतं ) शत्रुओं के गर्व का भंग करने वाले, (पुरु-धुं) सब के लिए पर्याप्त (विश्व-धायसं ) तथा सब के पोपण की क्षमता रखनेवाले (रथि) धनको (दिवः आ इयत) धुलोक से ला दो। ५९ हे (शुभ्राः! ) तेजस्वी चारो! (गिरीणां अधिइय) पर्वतमय प्रदेश पर चढ जानेके समय जिस दंगसे सुसज्ज कर रखते हैं वैसे ही इयत् ) जब तुम (याम अविध्वं ) रथ को तैयार कर चुकते हो, उस समय (सुयानः इन्दुभिः) निचोडे हुए सोमरस की धाराओं से (मन्दध्ये) तुम हर्षित होते हो। ६० (मर्त्यः) मानव (एतावत:चित्) इस प्रकार सचमुच ही ( अ-दाभ्यस्य) न दयाये जानेवाले प्रभु के (मन्मभिः) मननीय काव्यों से (पपां) इनसे (सुम्नं भिक्षेत ) उत्तम सुख की याचना करे । भावार्थ-५८ हमें जो धन मिले वह, इस भाँतिका हो कि (6) उस धनसे युदर का गर्य विनष्ट हो जाए, (२) वह इतनी मात्रा में उपलब्ध हो कि, सा सुखपूर्वक रह सकें, (३) सदकी पुष्टि हो जाए, सभी मलिष्ठ बनें। यदि ये तीन बातो जाय, तोही वह धन समीप रखने योग्य समझना उचित है, अन्य किसी प्रकारका नहीं। ५९ पर्वतों पर चढते समय से रथको सैयार करना पड़ता है, वैसे ही ये वीर मरुत् जब रथको पूर्णतया सिद्ध या लैस पना रखते हैं, तब वे सोमरसके सेवन से प्रसस एवं हर्षित हो उठते हैं । प्रथमतः सोमरस पीकर पश्चात् रथको तैयार रखकर पार्वतीय सडकों परसे शादल पर धावा करके, उनकी धज्जियाँ उडाने के लिए मरन् गमन करते हैं। ६० परम पिता परमा'मा किसी भी शत्रुके दयावसे दबने वाला नहीं है, क्योंकि वह मतीम सामर्यवान् है । मानव उसके सम्बन्ध में मननीय काय की निर्मिति करें तथा तल्लीनचेता बन गायन करें । मनकी उन्नत दशामें जो सुख मिल सकता है, उसे पाने की चेट करनी चाहिए। टिप्पणी- [५८] धनसंपत्ति से क्या किया जायी- तीन तरह के कार्यों में सफलता मिलनी चाहिए, अर्थात् (1) धमंड न होने पाय, (२) सभी उससे लाभान्धित हो, कथा (३) सन का पोपण हो । जो धन ऐसे कर सकता है, यही उच्च कोटि का समझना चाहिए। पर जिस धन के वर्धन से गर्व यह जाए, जो किसी एक के समीपही इन्हा होता रहे और जिससे सभी के पोषणकार्य में तनिक भी सहायता न मिले, यह निम्न गि का है । यहाँ पर धतलाया है कि, धनका उपयोग कैसे किया जाय। [५९] (1) सुवानः (मु= भभिपरे, स्नपन-पीटन-स्नान-मुरासंधानेपु) निघोडा जानेवाला रस । (२) इन्दुः - सोमरस, भानन्द बढानेघाला, भन्तस्सल पिघलानेवाला रस । [६०] (1) सुम्न (सु-मन.) मुख की जद में उत्तम मन ही तो है । मानवमात्र की बस यही लालसा हो कि, उच्च कोटि के मन के परस्वरूप जो मुख मिल सकता है, वही पाना चाहिए। यदि मन में हीन एवं जघम्प विचारों की भरमार हो, तो सच्चा सुख पाना नितान भसंभव है । (२) अ-दाभ्यस्य मन्म = जो किसी भी शत्रु की शक्ति से दस मही जाता, उसी का मनन या चिंतन करने में सहायक हो, ऐसे काम्य की सृष्टि करनी चाहिए और मानपजाति उसी काय के गायन में निरत रहे । ऐसे धोरकापों से उत्तम दंगसे मन को परिष्कृत (सु-मन सु-) तथा परिमार्जित करना मुगम होगा, जिम से सच्चे मुख की प्राप्ति होने में तनिक भी देर न लगेगी।

२१ (६१) ये । द्रुप्साःऽईव । रोदसी इति । धर्मन्ति । अर्नु । वृष्टिऽभिः । उत्सम् । दुहन्तः । अक्षितम् ॥ १६ ॥ (६२) उत् । ऊँ इति । स्थानेभिः । ईरते। उत् । रथैः । उत् । ऊँ इति । वायुऽभिः उत् । स्तोमैः । पृश्निऽमातरः ।। १७ ।। (६३) येन । आव । तुर्वशम् । यर्दुम् । येन । कपम् । धनऽस्मृतम् । राये । सु । तस्य । धीमहि ॥ १८ ॥ अन्यय - ६१ ये ब-क्षितं उत्सं दुहन्त वृष्टिभि द्रप्सा इव रोदसी अनु धमन्ति । ६२ पृश्नि-मातरः स्वानेभिः उ उत् ईरते, रथे. उत्, वायुभि. उ उत्, स्लोमै. उत् (ईरते)। ६३ येन तुर्वशं यदु आव, येन धन स्पृतं कण्वं, तस्य (ते अवनं ) राये सुधीमहि । अर्थ -६१ (ये) जो (अक्षितं उत्सं) कभी न घटनेवाले झरनेको मेधको । दुहन्त.) दुहते है, ये वीरें (वृष्टिभि.) वाऑकी सहायतासे (द्रपसा इव) मानों पारिशकी बूंदोंसे (रोदसी अनु धमन्ति) समूचे आकाश एवं भूमंडलको व्याप्त कर देते है। ६२ (पृश्नि मातर) भूमिको माता माननेवाले वीर (स्वानेभि. उ) अपने शब्दों तथा अभिभाषणों से (उत् ईरते) ऊपर चढते हैं, (रथ उत्) रथोंसे ऊगामी बनते ह, (वायुभि उ उत् ) वायुओं से ऊंचे पदपर आरूढ होते हे. (स्तोमै. उत्) यज्ञोसेभी ऊपर उठ जाते ह । ६३ (येन) जिस शक्तिके सहारे (तुर्वश यहूँ) तुर्वश उपाधिधारी यदुनरेश का तुमने (आव) प्रतिपालन किया, (येन) जिससे (धन स्पृत कण्व) धनको चाहनेवाले कण्वका सरक्षण किया, (तस्य) उस तुम्हारी सरक्षणक्षम शक्तिका हम (राये) धनकी प्राप्ति के लिये (सुधीमहि) भली भांति ध्यान करते है। भावार्थ -६१ मरुत मेघोंसे वर्षा करते हैं और वर्षाकी बूंदोंसे अखिल विश्व को परिपूर्ण कर डालते हैं । ६२ ये वीर भूमिको अपनी माता समझकर उसकी सेवा करनेवाले है और अपने अभिभाषणों, स्यो, चायुयानों एवं यज्ञोसे अची दशा पाते है। इन्हीं साधनाद्वारा वे अपनी प्रगति करने में पर्यास सफलता पाते हैं। ६३ इन धीरोने नुवंश यदु तथा धनेच्छुक कप की यथावत् रक्षा की। हमारी इच्छा है कि ये वीर उसी तरह हमें बचा दें, ताकि हम उनकी उछायाम अधिकाधिक धनधान्यसपन्न हो और उस वैभव एव सपत्तिके बलबूतेपर विविध या सपत कर समूची जनता का कल्याण करेंगे। टिप्पणी- [६१] द्रप्स (Drops) बूंद। [१२] वीरों का भाषण ऐसा हो कि, उससे उनको उन्नति में रेशमान भी रुकावट न हो, वैसे ही वे अपने रथ उत्कृष्ट राहपरसे ले चलें, श्रेष्ठ यज्ञ सपन्न करें और अनुकूल वायुप्रवाहों की सहायतासे (वायुयानों से) भाकाशपथसे अच्छी जगह जा पहुँचें । कई मत्रों में यह उल्लेख पाया जाता है कि मरत् पछीकी नाई माकाशपथ से यात्रा करते हैं। देखिये मत्रों के क्रमांक ९१ (श्येनासो न पक्षिण), १५१ (वयो न पप्तता) और ३८९ (भा हसासो नीलपृष्टा भपसन्) । 'बायुभिः उत्'से ज्ञात होता है कि वायुभों की सहायतासे मरत् ऊपर उठ जाते है। मत घायु एव मरुतो में विभिन्नता है, दोनोंमें एकरूपता नहीं । मन ४९ पर जो टिप्पणी लिखी है, सो देखिये । भागे पालकर मन्त्र ८० मे मरुतों के भाकाशयानका सष्ट उल्ल र उपरब्ध है, उसका विचार करना उचित है । [२३] (1) क्ण्य (कणशब्द)- कवि, वक्ता, विद्वान्, भात जो कराहता हो, एक ऋषि का नाम । (२) तुर्वश- (तुर-यश) परापूर्वक शत्रुको धशम लानेवाला, एक नरेश का नाम । (३) यदु (यम् उपरमे, यमर्दुक भोगादिकः) चुरे कर्मों से उपरत हो पीछे हटनेवाला, एक राजा का नाम ।

, (६४) इमाः । ऊँ इति । वः । सुऽदानवः । घृतम् । न । पिप्युपीः । इपः । वर्धान् । कायस्प । मन्मऽभिः ।। १९ ।। (६५) के । नूनम् । सुऽदानवः। मदेथ । वृक्तऽयर्हिषः। ब्रह्मा । कः । वः । सपर्यति ॥२०॥ (६६) नहि । स्म । यत् । है । यः । पुरा। स्तोमैभिः । वृक्तऽवर्हिषः । शर्थीन् । ऋतस्य । जिन्वथ ॥ २१ ॥ (६७) सम् । ऊँ इति । त्ये । महतीः । अपः। सम् । क्षोणी इति । सम् । ऊँ इति । सूर्यम् । सम् । वजम् । पर्वऽशः । दधुः ॥ २२ ॥ अन्वयः- ६४ (हे ) सु-दानवः !घृतं न पिप्युपीः इमाः इपः काण्यस्य मन्मभिः वः वर्धान् । ६५ (हे) सु-दानवः वृक्त-यर्हिपः । क नूनं मदथ ? कः ब्रह्मा यः सपर्यति ? ६६ (हे ) वृक्त-यहिपः ! नहिं स्म, पुरा यः यत् ह स्तोमेभिः ऋतस्य शर्धान् जिन्यथ । ६७ त्ये महतीःअपः उ सं दधुः, क्षोणी सं, सूर्य उ सं. वनं पर्वशः सं (दधः)। अर्थ- ६४ हे (सु दानवः!) उत्तम दानी वीरो! (घृतंन) घोके समान (इमा:पिप्युपीः इपः) ये पुष्टिकारक अन्न (कण्वस्य मन्माभिः) कश्यपुत्र के मनन करनेयोग्य काव्य या स्तोत्रद्वारा (यः वर्धान् ) तुम्हारे यशकी वृद्धि करें। ६५ हे (सु-दानवः ) सुचारु रूपसे दान देनेवाले तथा (वृक्त-वाहपः! ) फुशासनोंपर बैठनेवाले वीरो ! (क नूनं मदथ ?) भला तुम किधर हर्षित हो रहे थे ? (कः ब्रह्मा)भला वह कौन ब्राह्मण है, जो (वः सपर्यति) तुम्हारी पूजा उपासना करता है ? ६६ (वृक्त-बहिषः!) हे दर्भासनपर बैठनेवाले चीरो! (नहि स्म) क्या यह सच नहीं है फि (यत् ह) सचमुच यहाँपर (पुरा) पहले तुम (प स्तोमेभिः) अपने प्रशंसा करनेवाले आभभाषणों से (तस्य शर्धान ) सत्यके सैनिकोंको अर्थात् धर्म के लिए लड़ने चाले सिपाहियोंको (जिन्वय) प्रोत्साहित कर चुके हो। ६७ (त्ये) उन धीरोंने (महतीः अपः) यहुतसा जल (उ सं दधुः) धारण किया, (क्षोणी सं [दधुः]) पृथ्वी को धर दिया और सूर्य उ सं दिधुः)) सूर्यको भी आधार दिया। उन्होंनेही (धनं पर्वशःसंदिधुः।) अपने वज्रको हर पोरमें या गांठमें सुदृढ बना दिया है। भावार्थ-६४ उस कोटिके पुष्टिकारक भनोके प्रदान एवं मननीय काम्योंके गायम से वीरोंका यश बढने लगता है। ६५ हे वीरो! चूकि तुम शीघ्र मेरे समीप नहीं भा सके, भतः यह सवाल हठात् मेरे मनमें उठ खदा होता है कि किस जगह भला ये भानन्दौलासमें चूर हो थैठे हों और शायद ऐसा कौन उपासक इनसे प्रार्थना करता होगा कि, यहांसे शीघ्र प्रस्थान करना इन वीरोंको दूभर प्रतीत होता हो। ६६ सद्धर्म के लिए लानेवाले सैनिकों को प्रोत्साहन मिले, इसलिए वीर राम प्रभावोत्पादक भापणो द्वारा उनका उत्साह बढाते हैं। ६७ इन महतोंने मेघोंको, पावापृथिवी को, सूर्यको अपनी अपनी जगह भली भाँति घर दिया है और उनका स्थान अटल तथा स्थिर किया है। इन्हीं वीर मरुतोंने भपने घर नामक शन को स्थानस्थानपर ठीक तरह जोडकर उसे बलिष्ठ बना डाला है। अन्य धीरभी अपने पियार भाछी तरह तैयार करने में सतर्क रहें भौर शके हथियारोंसे भी अत्यधिक मात्रामें उन्हें प्रपल तथा कार्यक्षम मना दें। टिप्पणी- [१५] (१) वृक्त-वहिस्- भामनपर-दभासनपर बैठनेवाले, कुश फैलाकर बैठनेवाले । (२) प्रहा- ज्ञानी, पाहाण, पाजक, उपासक, मंत्रज्ञ, पशके श्रेष्ठ मस्विज्। [६६] (१) सर्धः-अल,सामर्य, सम्म। (२) प्रातस्य रार्ध सत्यका बल, सत्यधर्मके लिए लानेयाली सेना। (३) जिन्य- आनंद देना, उत्साहित करना। [१७] (0) ोणी पृषी, पावापृथिवी निघंटु ३३३.]। - (६८) वि । वृत्रम् । पर्वऽशः । ययुः। वि। पर्वतान् । अराजिनः । चक्राणाः । वृष्णि । पास्यम् ॥ २३ ॥ (६९) अनु। वितस्य । युय॑तः । शुष्मम् । आवन् । उत । कर्तुम् । अर्नु । इन्द्रम् । वृत्रऽतूर्य ॥ २४॥ (७०) विद्युत्ऽहस्ताः । अमिऽद्ययः। शिप्राः । शीर्षन् । हिरण्ययीः । शुभ्राः । वि । अञ्जत । श्रिये ॥ २५ ॥ अन्यय:- ६८ वृष्णि पौंस्यं चक्राणाः अ-राजिनः त्रं पर्वशः वि ययुः, पर्वतान् वि (ययुः) । ६९ युध्यतः त्रितस्य शुष्मं उत ऋतुं अनु आवन्, वृत्र-तूर्य इन्द्रं अनु (आवन् )। ७० विद्युत्-हस्ताः अभि-धवः शुभ्रा. शार्पन हिरण्ययीः शिप्रा थिये वि अअत। अर्थ-६८ [वृष्णि) बलशाली [पास्यं] पौरुपपूर्ण कार्य [चकाणाः] करनेवाले इन [अ-राजिनः) संघ. शासक वीरोंने [वृत्रं पर्वशः वि ययुः] वृषके हर गांठके टुकडे टुकड़े किये और (पर्वतान् यि [ययुः]) पहाडों को भी विभिन्न कर राह यना डाली। ६९ [युध्यतः त्रितस्य लडते हुये त्रितके [गुष्मं उत ऋतुं]. चल एवं कार्यशक्ति का तुमने [अनु आवन् ] संरक्षण किया और [वृत्र-तूपें] वृत्रहत्याके अवसरपर इन्द्र अनु] इन्द्र को भी सहायता दे दी। ७० [विद्युत्-हस्ताः] विजलीकी नाई चमकनेवाले हथियार हाथमें धारण करनेवाले [अभि-द्ययः) तेजस्वी तथा [शुभ्राः] गौरवर्णवाले ये पीर (शीर्षन् ] अपने सरपर हिरण्य- यी शिमा सुवर्ण के बने साफे श्रिये] शोभा के लिये वि अक्षत रस देते हैं। भावार्थ-६८ ये घोर ऐसे पराक्रमपूर्ण कार्य कर दिसलाते हैं कि, जिनमें बल, वीर्य तथा शूरताकी अतीय भाव- श्यकता प्रतीत होती है। ये किसी एक नियामक राजाकी छत्रछायामें नहीं रहते हैं। इन्हें संघशासक नाम दिया जा सकता है, अर्थात् इनका समूचा संघही इनपर शासन करता है । ऐसे] इन वीरोंने वृनके टुकडे टुकडे कर डाले और पर्वतोंका भेदन कर भागे यढने के लिए सड़क बना दी। ६९ इन वीरोंने नित नरेश को लदाईमें सहायता पहुंचाकर उसके यल, उत्साह तथा कर्तृत्वशक्ति को अक्षुषण बना रखा, अत: प्रित विजयी बन गया और इसी भाँति इन्द्र को मी पुत्रवध के मौकेपर मदद करके उसे भी विजयी यना दिया। ७. ये वीर चमकीले शस्त्र हायोंमें रखते हैं । ये तेजस्वी तथा गौरकाय हैं और उनके सिरपर स्वर्गमय शिरस्त्राण सुहाने हैं । अन्य वीर भी इसी भाँति अपने शवों को पुराने या जीर्ण होने न दें, सदैव विद्युल्लेखाके समान प्रकारामान एवं चमकीले रूप में रख दें। टिप्पणी-[६८)(१) राजिन्- [राजः अस्य अस्तीति राजी] - जिनपर शासन चलाने के लिए राजा विद्यमान रहता है, ये राजिन्' कहलाते हैं। अ-राजिन्= [राज. स्वामी भस्य न विद्यते इत्यराजी। जिनपर किसी एक व्यक्तिका शासन या नियंत्रण नहीं प्रस्थापित हुभा हो, जिनका सारा संघ या समुदायही हर व्यक्तिपर नियमन दालता हो । मरुत् संघवादी, संघशासक वीर थे और सब स्वयंही मिलकर शासनप्रबंध करते थे। मंत्र २९२ और ३९८ में 'स्व-राजा' पदसे यही भाव सूचित होता है। (२) वृष्णि= पौरुपयुक्त, बलशाली, सामर्थ्यवान्, जुद्र, मेप, बैल, प्रकाशकिरण, वायु । (३) पास्य- पौरुपकृत्य, सामर्य, वीर्य, पुरुपमें विद्यमान वीरता। [६९] (1) शुष्मं यल, मामथ्र्य, सैन्य । (१) क्रतु' कर्मशक्ति, कर्तृत्व, उत्साह, यज्ञ, बुद्धि । (३) त्रित- [विभिनायते] तीन शक्तियों का उपयोग कर रक्षा करता है। एक नरेशका नाम [त्रिपुस्थानेषु तायमानः। सायण ऋ० ५/५४।२; २५१ मंग[७०] (1) शिमा-शिरखाण, पाडी, उदी, नासिका, शिरमाणके मुँहपर भानेवाला जाला ।(२)वि-अ- सुशोभित करना, सजायट करना, अंजन लगाना, सुन्दर यनाना, व्यक्त करना। हिरण्ययोः शिनाः व्यञ्जत- सुवर्णसे विभूपिन या सुनहली पहियोंसे ये दूर से पृथक् दीस पद्धये थे। जनताके मध्य इन वीरों को पहचानना इन्हीं सुनहले साफोंसे भासान हुआ करता। स्वर्णमय शिरोवेटनसे विभूपित इन वीरों के समुदाय को देखतेही लोग तुरन्त ऋहना शुरु करते 'लो भाई, ये वीर मरुत हैं।'

(७१) उशना । यत् । पराऽवतः । उक्ष्णः । रन्ध्रम् । अर्यातन । द्यौः । न । चक्रदत् । भिया ।। २६ ।। (७२) आ । नः । मुखस्य । दावनै । अश्वैः । हिरण्यपाणिभिः । देवासः । उप । गन्तन |॥ २७ ॥ (७३) यत् । एषाम् ! पृष॑तीः । रथै। प्रष्टिः । वहति । रोहितः । यान्ति शुभ्राः । रिणन् । अपः ॥ २८॥ अन्वयः- ७१ (यूयं ) उशना यत् परावतः उदणः रन्ध्र अयातन, द्यौः न भिया चक्रदत् । ७२ (हे)देवासः नः मखस्य दावने हिरण्य-पाणिभिः अश्वैः उप आ गन्तन । ७३ यत् एषां रथे पृपतीः (युज्यन्ते) प्रष्टिः रोहितः वहति, अपः रिणन् शुभ्राः यान्ति । अर्थ-७१ तुम हित करनेकी [उशनाः] इच्छा करनेवाले यित्! जय [परावतः] दूरके प्रदेशों से [उक्षणः रन्] मेघों में (अयातन] आते हो, तब {यो न] दालोक के समानही अन्य सभी लोग भिया चक्रदत् डर के मारे विपित हो उठते हैं। ७२ हे [देवासः! देवतागण ! तुम निः मखस्य दायने) हमारे यशकी देन देनेके समय [हिरण्य-पाणिभि.] हाथों एवं पैरों में सुवर्ण के अलंकार पहने हुए।अश्वे. घोडोंके साथ [उप आ गन्तन] हमारे समीप आओ। ७३ यत् एषां रथे) जव इनके रथमें [पृपतीः) धन्ये धारण करनेवाली हरिनियाँ लगाई जाती हैं. तव [प्रष्टिः। धुराको कंधेपर धारण करनेवाला गिहितःएक लाल रंगका हिरन भी आगे विहति] खींचने लगता है, उस समय अति धेगके कारण [अपः रिण] पसीनेका जल यहने लगता है और शिभ्राः यान्ति] वे गौरवर्ण के चीर आगे बढने लगते है । भावार्थ-७१ सव का कल्याण करने की इच्छा से जप मस्त् धर्पाका प्रारम्भ करने के लिये मेघों में संचार करने लगते हैं, उस समय आकाशमें भीषण दहाइ शुरु होती है, जिससे हरएकके दिल में भय का संचार होता है। ७२ इन चोरों के घोडे सुनहले आभूपोंसे विभूषित होते है। ऐसे अश्वोरर बैठ इस हमारे यज्ञमें वीर मरत् मा उपस्थित हों। ७३ वीर मरुतों का रंग गोरा है और उनके रथमें धब्बेवाली हरिणियाँ लगी रहती हैं। उनः भागे एक लाल रंगमा हरिण जोता जाता है। इस भौति उनका रथ सज्ज हो जाए, तो अति वेगसे वह भागे बढ़ने लगता है, जिस से उसे खींचनेवाले पसीनेसे तर हो जाते है । ऐसे रथोपर बैठकर मरत् जाने लगते हैं। टिप्पणी- [१] (1) उदणः रन्ध्र बैलकी गुफा, मेघों का स्थान, बरसनेवाले मेघ की जगह । [७२] (1) 'हिरण्यपाणिभिः अश्वैः उपागन्तन' पैरों में स्वर्गमय गहने धारण किये हुए अश्वोंपर चढकर इन पीरोंका भागमन होता है। यहाँपर घोडोंपर बैठनेका ठल्लेख पाया जाता है। [७३] (१) प्रष्टिः- धुरा, भागे रहनेवाला, दोनेवाला। [२] पृपती = धन्नेवाली, जलकी बूंद, जल गिरानेवाली। रथम हरिण = मर सक्तों में अनेक जाह यह वर्णन पाया जाता है कि, मरतों के रथ में हरिणी या शंबर अथवा बारहसिंगा लगाया जाता है। हरिण से युक्त रथ तो बर्फीले स्थानोंपर काममें भाते हैं, इसलिए अन्तस्तल में सन्देह उठ खड़ा होता है कि शायद ये वीर मरत हिमकी अधिकता के लिए विख्यात भू-विभागों में निवास करते हों । [इस संचधमें देखो मंत्रोके क्रमांक ७,४१,७३,११५॥ १२६६१२७,२०१,२१४,२८६] आगे चलकर ७४ वे मंत्रमें 'नि-चक्रया' [चक्र या पहिय से रहित रथसे] मरद यानर करते थे, ऐसा उल्लेख पाया जाता है। हिमप्रचुर या बर्फीले स्थानों में जिन गाडियों को हिरन खींचते हैं, वे बिना पहियों होते हैं। घनीभूत हिमस्खरके ऊपरसे ये हिरन इन वाहनोंको सरपट खींच ले चलते हैं। इस दंगकी गादीको [Sledge] नाम दिया जाता है और यह गायी हिमयुक्त प्रदेशामें बहुत कामकी मानी जाती है । इस मंत्रमें निर्देश पाया जाता है धुरा (७४) सुऽसो । शर्यणाऽचति । आज के । पुस्त्यति । ययुः । निऽचंक्रया । नरः ॥ २९ ॥ (७५) कदा । गन्हाय । मरुतः । इत्था । विनम् । हबमानम् । माडौँकेमिः। नार्धमानम् ॥ ३० ॥ (७६) फत् । हु । नुनम् । कघऽप्रियः। यत् । इन्द्रम् । अर्जहातन । फः । वः । ससिऽन्वे । ओहते ॥ ३१ ॥ अन्ययः-७४ सु-सामे या के शर्यगायति पस्न्यावति नर नि-चफ्रया यय । ७५ (३) मरतः । इत्था हवमानं नाधमानं विप्रं पदा मादीभि गच्छाध ? ७६ (हे ) कध-प्रिय. ! इन्ट नूनं अजहातन यत् पत्६, पः ससित्ये कः ओहते ? अर्थ-७४ [सु सोमेउत्कृष्ट सोमयलियोंसे युक्त भाजॉय माजीक नामक भूविभाग में शिर्यणावति शर्यणावत् नामक शीलके समीप विद्यमान पिल्या यति) गृहमें निर) नेतृत्वगुणयुक्त घोर निचमाया) परियों से रहित रथम येठकर ययुः। चले जाते है। ७५ हे मिरत ! वीर मरतो! [रत्था] इस दंगसे [यमान] प्रार्थना करते हुए, पुवारते हुये तथा [नाधमान) सहायताकी लालसा रगनेवाले [वित्र] सानी पुरुपके समीप भला तुम [कदा कर [ मामि ] सुरावर्धक धनवैभवोंके साथ गच्छाथ] जानेवाले हो ? ७६ ( कध-प्रियः!) कयाप्रिय वीर मरतो ! ( इन्द्रं) इन्द्र को (नूनं ) सचमुर (अजातन) तुम छोड चुके हो, ( यत् कत्६) भला कभी ऐसा भी हुभा दोगा [कभी नहीं तो फिर (प ससिन्ये) मुम्हारी मित्रता पाने के लिए (फः ओहते ? ) फोन मला दूसरा लालायित हो उठा है ? भावार्थ-७४ माजीक देश के एक सूमेको 'नी' कहते है । 'शर्यणावत्' सायंगा नदी या पडे शीत से सटपर भयस्थित भूधिमा । 'पस्त्यात् ' जहाँ रहने के लिए मकान हो, उस बग ये घर मरतु घहित रथ में बैठकर जाते हैं। ७५ प्रार्थना करनेवाले तथा सहायता पाने के मुतालायित मानी शेगोंको ये पीर सहायता पहुंगो हैं और भपने साथ मुरको पृद्धिगत करनेवाले घनोंको रेकर गमन करते हैं । ७३ ये पीर बहुत ही कयाप्रिय है, भयात् एतिहापिक योरगायामों को सुनमा में अत्यधिर प्रिय प्रीत दोता है। इन्द्र को इन्होंने कभी ऐसा नहीं। एक बार यदि ये वीर किमीको अपना लें, तो उसे ये सभी त्याने या पोटने के लिए तैयार नही होता है। दोनों को इसी भांति यताव रखना चाहिए । जो सत्यधर्म के भनुपार कार्य करने लगता है, यह शीnो महनों का प्रेमपान बनता है। कि, विना पहियेफे तया हिरनद्वारा भकष्ट स्थपर अधिरूढ होर पोर मरत् मागे बढने लगते हैं। [2] () गर्यणा (NL] = 'सर' याने सरकंदै जहाँ उगने लगते हैं, ऐमा शीर, नदी या जलमय प्रदेश । (२)पल्या पिम् स्या, पशु+ स्थान] पशुगलनका स्थान, घर, गोठ या गोशाला, रहनेका स्थल, पस्यायन् = गोठसे युक्त भूभाग। (1) निचक्रया - करहिरा गादी से देसोटि संख्या ७३]] (1) ऋजीक - गुप्त, ढका हुआ, भूमाग, सोम । आजींक= नीयों का प्रदेश, जहाँपर सोम यथेष्ट रूपसे पाया जाता है। [७३] (1) कध-निय = स्तुतिप्रिय (सायणमान्य)। मरत (हिं.) ।

(७७) सहो इति । सु । नः । वनऽहस्तैः। कण्यासः । अग्निम् । मुरुभिः । स्तुपे । हिरण्यऽवाशीभिः ॥ ३२ ॥ (७८) ओ इति । सु । वृष्णः । प्रऽयंज्यून् । आ । नव्य॑से । सुवित्ताय । चवृत्याम् । चित्रचोजान् ।। ३३ ।। (७९) गिरयः । चित् । नि । जिहते। पीनासः । मन्यमानाः । पर्वताः । चित् । नि । येमिरे ॥ ३४ ॥ अन्वयः-७७ नः कण्यासः ! वन-हस्तैः हिरण्य-वाशीभिः मरुद्भिः सहो अग्निं सु स्तुपे । ७८ पृष्णः प्र-यज्यून चिय-पाजान नव्यसे सुविताय आ वृत्यां । ७९ मन्यमानाः पर्शानासः गिरयः चित् नि जिहते, पर्वताः चिन् नि येमिरे । अर्थ-७७ हे (नः कण्यासः !) हमारे कण्यो ! (यन-हस्तैः हिरण्य-पाशीभिः) हाथ में यन्त्र धारण करनेवाले तथा सुवर्णरंजित फुल्हाडियां को उपयोग करनेवाले ( मरुद्भिः सहो ) मरुतों के साथ विद्य- मान (अग्निं ) अग्नि फी (सु स्तुपे ) भली भाँति सराहना करो। ७८ (वृष्ण ) वीर्यवान् (प्र-यज्यून ) अत्यंत पूजनीय तथा (चित्र-याजान ) आश्चर्यजनक घल से युक्त ऐसे तुम्हें ( नव्यसे सुविताय ) नये धन की प्राप्ति के लिए (मुआ ववृत्या उ ) मेरे निकट आने के लिए आकर्षित करता हूँ। ७१ ( मन्यमानाः पानासः ) अभिमान करनेवाले शिखरों के साथ (गिरयः चित् ) यडे पर्वत भी इन वीरों के आगे ( नि जिहते ) अपने स्थानसे विचलित होते हैं और (पर्वताः चित्) पहाड भी (नि येमिरे) नियमपूर्वक रहते हैं। भावार्थ-७७ ये वीर वज्र एवं कुठार को काम में लाते हैं और अग्नि के उपासक तथा सहायक है। ७८ ये वीर अतीव वीर्यवान, पूजनीय तथा भाँति भाँति की विलक्षण शक्तियों से युक्त हैं। वे हमारे निकट भा जाय और हमें नया धन प्रदान करें। ७९ इन पी के भागे पडे बडे शिखवाले पर्वत एवं छोटेमोटे पहार भी मानों शुक आते है। इन वीगें का पराक्रम इतना महान है और इनमें इतना प्रचंड पुरुषार्थ समाया हुआ है कि, य? पटे पर्वतों को लाँघना इनके लिए कोई भसंभव तथा दुरूह बात नहीं है, क्योंकि ये यही सुगमता से सभी कठिनाइयों को हटा टिप्पणी- [७७ ] (1) पाशी- (प्रश्यतीति घाशी) सेज, छुरी, कृपाण, दुधारी तलयार, कुल्हाड़ी, परशु । मंत्र १५० चौ देखिए । निघंटु के अनुसार 'शब्द''हिरण्यवाशी' - जिस हथियार पर सुनहली पेलयूटी दिखाई दे। मरुद्भिः सह अग्निः' = मरुत् अपने साथ भति रख लिया करते थे। अनि मरुतों का मित्र, ससा है, (देखिए र. ८1१०३।१४)। [७८] (1) सुचित (सु-हत ) उत्तम दंगसे पाने के लिए योग्य, सुपरीक्षित, धन, पस्तु । जो दुरित (दुःइत ) नहीं है, वह 'सुवित ' है। वैभवसम्पन्नता, उत्तम मार्ग, सौभाग्य, उन्नति की राह । [७] (1) पनि = पर्वतशिखर, दर्श, दरार । - (८०) आ । अक्ष्णडयावानः । यहन्ति । अन्तरिक्षण । पर्वतः । धातारः : । स्तुवते । वयः ॥ ३५ ॥ (८१) अभिः । हि । जनि । पूर्व्यः। छन्दः । न । सरः । अचिपा । ते । भानुऽमिः । वि । तस्थिरे ॥ ३६ ॥ कण्वपुत्र सोभरि प्रापि (ऋ० ८।२०१-२६) (८२) आ । गन्त । मा । रिपण्यत । प्रऽस्थावानः । मा । अयं । स्थात । सऽमन्यवः । स्थिरा । चित् । नमयिष्णवः ॥१॥ अन्ययः-८० अक्षण-यावानः अन्तरिक्षेण पततः स्तुवते ययः धातारः आ वहन्ति । ८१ अग्निः हि अर्चिया छन्दः, सूरःन, पूर्व्यः जनि, ते भानुभिः यि तस्थिरे। ८२ (हे) प्रस्थावानः ! मा गन्त, मा रिपण्यत, (हे) स-मन्यवः ! स्थिरा चित् नमाथि प्ण: मा अप स्थात। अर्थ -८० (अक्षण-यायानः) नेत्रों की निगाह की नाई अति पेगसे दौडनेवाले और (अन्तरिक्षण पनतः) आकाश में से उडनेवाले साधन ( स्तुवते) उपासक के लिए ( वयः धातारः) अन्न की समृद्धि करने- वाले इन चीरों को ( वहन्ति ) ढोने हैं। ८१ ( अग्निःहि ) अग्नि सचमुच ( अर्चिपा ) तेज से (छन्दः ) ढका हुआ है और ( सूरः न) सूर्य के समान यह ( पूर्व्यः जनि ) पहले प्रकट हुआ तथा पश्चात् (ते भानुभिः ) चे वीर भरत अपने तेजों से (घि तस्थिरे) स्थिर हो गये । ८२ हे (प्रस्थावानः !) घेगपूर्वक जानेवाले वीरो! (आ गन्त ) हमारे समीप आओ. (मा रिपण्यत ) भाने से इनकार न करो। हे (स-मन्यवः 1) उत्साहसे परिपूर्ण चीरो! (स्थिरा चित् ) जो शत्रु स्थिर एवं अटल हो चुके हों, उन्हें भी (नमयिप्णयः ) तुम झुकानेवाले हो, अतः हमारी यह प्रार्थना है कि, हम से तुम (मा अप स्थात ) दूर न रहो। भावार्थ-८० इन वीरों के वाहन बरे वेगवान् तथा शीघ्रगामी होते हैं और उन पर चढकर ये आकाशपथ में से विहार करते है, तथा भक्तों को पर्याप्त भन देते हैं। ८१ सूर्य के समान ही अग्नि अपने तेज से प्रकाशमान होता है और यज्ञ में पहले पहले व्यक्त हो जाता है। प्रभाव पीर मरतों का समुदाय अपने अपने स्थान पर आ बैठ जाता है। (अध्यात्म) यमि के शरीर में भी प्रथम उग्णता संचारित हुआ करती है और पक्षात् प्राणों का भागमन होता है। ध्यान में रहे कि, व्यक्ति में प्राण महत् ही है। ८९ इन वीरों में इतनी क्षमता विद्यमान है कि, प्ररस तथा सुस्थिर शत्रु को भी घे पिनन कर डालते है। इनका यह महान पराक्रम विख्यात है। हमारी यही कालसा है कि, वे हमारे समीप आ जाएँ और हमारी रक्षा करें। टिप्पणी-140](1) अन्तरिक्षेण पततः अक्ष्णयायानः = अन्तराल में से जानेवाले तथा मानवी दृष्टि के समान भायात घेगवान् साधनों या वायुयानों से वीर मरुत् संसार में संचार करते हैं । यह स्पष्टतया प्रतीत होता है कि, विमानसरशी ये वाहन रहने चाहिए । मंत्र ६२ पर जो टिप्पणी लिखी है, सो देख लीजिए । (२) चयः= अन्न, वीर्य भायु देनेवाले खाद्यपेय, पक्षी। [८२](1) रिए ( हिंसायो ), मा रिपण्यत - हमें पट न दो, हमारी हत्या म करो। (यदि ये हमारे निकट नहीं आयेंगे, तो हमारी यही निराशा होगी, येसा न होने पाय । महनों के हमारे यहाँ पधारने से हमारी उमंग बढ जायेगी।) .

(८३) चीळपवितभिः । मरुतः । ऋभुक्षणः । आ। रुद्रासः । सुदीतिऽभिः। पा। नः । अद्य । आ । गत । पुरुऽस्पृहः । यज्ञम् । आ । सोभरीऽययः ॥ २ ॥ (८४) विज । हि । रुद्रियाणाम् । शुष्म॑म् । उग्रम् । मरुताम् । शिमीऽवताम् । विष्णोः । एपस्य । मीळ्हुपाम् ।। ३ ।। अन्वय.-८३ ( है ) मभु-क्षण रद्रास मस्त ! सु-दीतिभिः वीलु-पविभि. आ गत. (हे) पुग- स्पृहः सोभरीयव ! न. यज्ञ अद्य इपा आ (गत ) आ। ८ विष्णोः एपस्य मीळ्हुपां शिमीयतां द्रियाणां मरुतां उग्रं शुष्मं विद्म हि। मर्थ- ८३ हे (सभुक्षणः) ! वज्रधारी ( रुद्रासः) शवसंघ को लानेवाले ( मरतः!) वीर मरतो! (सु-दीतिभिः) अतीव तेजस्वी (चील्लु-पविभिः ) सुदृढ वज्रों से युक्त होकर (आ गत) इधर आओ, हे (पुर-स्पृहः) बातोद्वारा अभिलपित तथा (सोभरीययः!) सोभरी ऋषि पर अनुग्रह करने की इच्छा करने वाले चारी ! (न. यो ) हमारे यशस्थल में (अद्य) आज (इपा) अन्न के साथ ( आ आ) भागो । ८४ (विष्णो. एपस्य) व्यापक आकांक्षाओंकी पूर्ति करनेवाले, (मीळ्हुपां) वृष्टि करनेवाले, (शिमीयतां ) उद्योगशील, ( रुद्रियाणां ) रद्र के पुन ऐसे ( मरतां) मरुतों के ( उग्रं) क्षत्रधर्मोचित चौर भाव पैदा करनेवाले ( शुम) यल को (विप्न हि) हम जानते ही हैं। भावार्थ- ८३ वन धारण करनेवाले तथा समूची जनता के प्यारे पे धीर मरत् अपने सेजस्वी एवं प्रभावशाली ६थियारों के साथ घर चले भायें और घे इस यज्ञ में यथेष्ट भी राय, ताकि यह यज्ञ यथोचित ढंग से परिपूर्ण हो जाए। ८४ मरद वर्षा करनेवाले, चीर, उद्योग में निरत तथा पराक्रमी हैं । उनका बल अनूठा है। टिप्पणी- [८३(1)ऋभु-क्षण (भु-क्षन् ) 'प्रभु' से तात्पर्य है, कार्यशर पारीगर गाजिन के समीप ऐसे निगाव मार्यकर्ताओं की उपस्थिति होती है और उन के भरणोपण की व्यवस्था निप्पर हो जाती है, पे अभुशन् उपाधिधारी हो सकते हैं। कभुक्षणः (भु-क्ष) मभुमो भर्यात् शिल्पकारों के पनाये हुए शो का उपयोग करने वाले प्रभुनण ' कहे जा सकते है। प्रा-भु-क्षणः (उर-भासमान-निवासा') जिनके निवासस्थान विशाल हैं, वे (शि = निवासे ) । (२) रदासः = रद.- (रोदयिता) शत्रुको रलानेयाला पीर । (३) सु-दीति = भरीभोनि सेजधारा से युक्त शस्थ, मिस फे छूने मात्र से शरीर का भंगभंग होना सम्भय है । (४) बाल-पपि = प्रबल इन, ५४ा यन, एक फौलाद के बने हुए शव को पत्र कहते हैं, पवि= चम, पहिये की परिधि । 'चीळ, चीड, वीलु, बीस.' सभी सम्म पनी भारी शक्ति की सूचना देने वाले है । 'योरता ' से इन शनों का घनिध संप है। (५) सोभरि (मु-भार) भरी भाँति भग्न का दान घर के निधन एवं असहाय हा मला भरपोपण करनेवासा सुभरि या मोभरि है । जो इस प्रकार मन का दान करता हो, उसे महत् सभी प्रकार की सहायता पहुँचते हैं। [८] (शिमी = प्रणन, उद्यम, कर्म । (२) शिमी-यन् = उद्यमी, कर्ममें निरत, हमेशा पर कार्य धरनेवाला । (३) रद्रिय = रहारे साथ रहनेधारे, महान् पोरके अनुयायी, यहे पूर एवं धीर रस के पुम। (४) शुष्म दाभों को सुखाने वाला पछ । (५) विष्णो एपस्य मीन्दुपा 3 व्यापक भाकाक्षाभोंकी पूर्ति करनेवाले। . .

, (८५) वि । द्वीपानि । पातन् । तिष्ठत् । दुच्छुा । उभे इति । युजन्त । रोदसी इति । प्र । धन्यानि । ऐरत । शुभ्र सादयः। यत् । एजेथ । स्वऽभानवः ॥ ४ ॥ (८६) अच्युता । चित् । यः । अज्मन् । आ। नानदति । पर्वतासः । वनस्पतिः । भूमिः । यामेषु । रेजते ॥ ५॥ अन्यय.- ८५ (हे) शुभ्र-खादयः स्व-भानवः! यत् एजय, द्वीपानि वि पापतन्, तिष्ठत् दुच्छना (युज्यते), उभे रोदसी युजन्त, धन्वानि प्र ऐरत । ८६ यः अज्मन् अच्युता चित् पर्वतासः वनस्पतिः आ नानदति, यामेषु भूमि रेजते । अर्थ- ८५ हे (शुभ्र-सादयः ) सुफेद हस्तभूपण धारण करनेवाले (स्व-भानव.) स्वयं तेजस्वी धीरो! (यत् ) जय तुम (पजथ) जाते हो, शत्रदल पर धावा बोलन के लिए हलचल करते हो, तव (द्वीपानि घि पापतन ) टापू तक नीचे गिर जाते है। (तिष्टत् ) सभी स्थावर चीजें (दुच्छुना) विपत्ति से युक्त बन जाते हैं, (उभे रोदसी) दोनों धुलोक तथा भूलोक कांपने (युजन्त ) लगते हैं। (धन्वानि ) मय- भूमि की बालू (ऐरत ) अधिक वेग से उड़ने लगती है। ८६ (यः अस्मन् ) तुम्हारी चढाई के मौके पर (अच्युता चित्) न हिलनेवाले बडे बडे (पर्वतासः) पहाड तथा (घनस्पति.) पेड भी (आ नानदति) दहाउने लगते है, वैसेही तुम (यामेपु ) जव शत्रुदलपर आक्रमणार्थ यात्रा करना शुर फरते हो, तर (भूमि रेजते ) पृथ्वी विकंपित हो उठती है। भावार्थ- ८५ साफसुथरे गहने पहन कर ये रोज पूर्ण वीर जब शत्रुदल पर चढाई करने के लिए भति धेग से प्रस्थान करना शुरु करते है, तय भूमि के ऊपरी भाग नीचे गिर पढते हैं, वृक्ष जैसे स्थावर भी टूट गिरते हैं. भाका एव पृथ्वी में कपकपी पैदा हो जाती है और रोगिस्तान की बालुम तक वेग से ऊपर उडने रगती है। इतनी भारी हलचल विश्व मे मचा देने की क्षमता वीरों के भान्दोरन में रहती है। ८६ (माधिदैविक क्षेत्रमें) यात्रु जोर से बहने लग जाए, आँधी या तून प्रवर्तित हो जाए, तो पर्वतोपर के वृक्ष तक दावोल हो जाते हैं, तथा ऊंची पहादी चोटियों पर पवन की गति अतीय तीन प्रतीत होती है । वृक्षों परस्पर एक दूसरे से घिम जाने से भीषण ध्वनि प्रादुर्भूत होती है, तथा भूमि भी चलायमान प्रतीत होती है। (आधिभौतिक क्षेत्र मे) शत्रुओं पर जय वीर सैनिक धावा बोलत हैं, पर बदमूल होने पर भी शत्रु विचलित हो जदमूल से उपट जाता है। टिप्पणी-[201(१) खादिः = परय, क्टक (हाथपैरों में पहननेयोग्य आभूषण ) । खाद्य पदार्थ, मन १६६ देखिए । घृपखादिः (१७), हिरण्यपादिः, सुपादि. ( १५० ३१८,), शुभ्रवादिः (८५) एसे पदप्रयोग मिलते है । खादि एक विभूषण है, जो हाथ में या पैर मे पहना जाता है और कंगन, वलय, कटय सदश ' सादि ' एक भाभूपणयाचक पद है। (२)शुभ्र-खादयः - चमकीर भाभूपण धारण करनेवाले। (३) दुन्छुना = (दुम्- शुना) (पागल कुत्ता यदि पोछे पटे, तो होने वाली दशा) मक्टपरपरा, दुरवस्था, दुख, विपदा । (४) धन्वन् = रेगिस्तान, निर्जल भूपिनाग, पूतिमय प्रदेश । (५) ग्रीपआश्रयस्थान, द्वीपकल्प, टापू । [६] (1) अच्युता नानदति - स्थिर तथा अटक पदार्थ (दहाडने ) काँपने लगते हैं । (विरोधाभास भलकार देखने योग्य है)। (२) घनस्पति. नानदति = पेजों के टूट गिरने से पद् कद् आवाज सुनाई देती है। (३) भूमि. रंजते (स्थिरा रंजते) जोभूमि स्थिर एव भटल दिखाई देती है, सो भी विकंपित तथा विचरित हो उठती है। (अच्युता) घिरीभूत एवं अपने पद पर तया अवस्थित शहओं को भी उखाड़ फेंक देना केवर मात्र महान पोरों का कर्तव्य है।

- (८७) अाय । यः । मरुतः । यातवे । द्यौः। जिहाँते । उत्तरा । वृहत् । यत्र । नरैः । देदिशते । तनपु। आ । त्यक्षांसि । बाहुओजसः ॥ ६ ॥ (८८) स्वधाम् । अर्नु । श्रियम् । नरः। महि । त्वेषाः । अमेऽवन्तः । वृपेऽप्सवः । वहन्ते । अर्हतऽप्सवः ॥ ७॥ (८९) गोभिः । वाणः । अज्यते । सोभरीणाम् । रथे । कोशे । हिरण्यये । गोऽबन्धवः । सुजातासः । हुपे । भुजे । महान्तः । नः । स्परंसे । नु ॥ ८ ॥ अन्वयः- ८७ (हे) मरुतः ! वः अमाय यातचे यत्र वाहु-ओजस: नरः त्वक्षांसि तनूपु आ देदिशते, (तत्र) द्यौः उत्तरा बृहत् जिहीते। ८८ त्वेपा अम-चन्तः वृप-प्सवः अ-हुत-सपः नरः स्व-धां अनु श्रियं महि पहन्ति । ८९ सोभरीणां हिरण्यये रथे कोशे गोभिः याणः अज्यते, गो-बन्धवः सु-जातासः महान्त नः इपे भुजे स्परसे नु। अर्थ-८७ हे (मरुतः ! ) वीर मरुतो !(वः अमाय ) तुम्हारी सेना को (यातवे ) जानेके लिए (यत्र) जिस ओर (याहु-ओजसः) वाहु-यल से युक्त (नरः ) तथा नेता के पद पर अधिष्ठित तुम वीर (त्यक्षांसि) सभी शक्तियों को अपने ( ननूपु) शरीरों में एकत्रित कर (आ देदिशते) प्रहार करते हो उधर ( यौः ) आकाश भी (उत्तरा । ऊपर ऊपर (वृहत् ) विस्तृत एवं वृहदाफार बनते बनते (जिहीते ) जा रहा है. ऐसा प्रतीत होता है। ८८ ( त्वेपाः ) तेजस्वी, ( अमवन्तः ) बलवान्, (वृप- प्सवः) बैल के जैसे हृष्टपुष्ट तथा (अ-हुत-सवः) सरल स्वभाववाले (नर.) नेताके नाते चीर (स्व-धां अनु) अपनी धारकशक्तिके अनुकूल अपनी (श्रियं महि) शोभा एवं आभाको अत्यधिक मात्रामें । बहन्ति ) बढाते हैं। ८९ (सोभरीणां हिरण्यये रथे) ऋषि सोभरिके सुवर्णमय रथके (कोशे) आसनपर (गोभिः) स्वरों के साथ अर्थात् गानोसहित (चाण: अज्यते ) वाण नामक बाजा बजाया जाता है, (गो बन्धयः) गौमे यंधु याने गौको अपनी बहन के समान आदर की दृष्टि से देखनेवाले (सु-जातासः) अच्छे कुल में उत्पन्न (महान्तः ) और बड़े प्रभावशाली ये चीर (नः इपे) हमारे अन्न के लिए ( भुज) भोगों के लिए तथा (स्परसे) फुर्ती के लिए (नु) तुरन्त ही हमारे सहायक पर्ने । भावार्थ-८७ इन वीरों की सेना जिस भोर मुट कर जाने लगती है और जिप्स दिशा में ये वीर शत्रु पर चचाई करते हैं, उसी ओर मानों स्वयं भाकाश ही विस्तृत एवं चौडर मार्ग यगा दे रहा है, ऐसा प्रतीत होता है। ८८ तेजयुक्त, पनि जीवनका बलिदान करने वाले और सरल प्रकृतिवाले वीर अपनी शक्ति के अनुसार निज शोभा बढाते हैं। ८९सोमरी भामसे विण्यात अपियोंके सुवर्णविभूपित रथमें प्रमुम्ब बासनपर बैठकर रमणीय गायनके स्वरोंसे वाण, बाजा पाया जा रहा है, उस गामको सुनकर गोसेवामें निरत एवं उच्च परिघारमें उत्पन्न महान् वीर हमें भा, उपभोग तथा उत्साह दे दें। टिप्पणी-[20](१)वा-मोजसा पाहुबळसे युक्त वीर। (२) वक्ष = ( ताणे) निर्माण कामा, पनामा, की भादि चीरना; त्यक्षस्- यर, सामर्थ, शक्ति, पनने की शक्ति निर्माण करनेकी पुशलता, रचनाचातुरी । (३) आदि एक ही दिशा में प्रेरित करना, भय दिखाना, प्रहार करना, उपदेश करना, घोपणा करना। [८८] (1) अम-वान - मलयान, समीप सेना रसनेवाला । (२) धूप--सु = (वृष-भाम् ) थैल के समान पुष्ट शरीरवाला, यी करनेवाला, जोपन देनेवाला 1 (३) अहुत-प्सु. - अकुटिल, सरल प्रकृतिका ! (५) मु- (भास् = इस्-स) दिखाई देना, प्रतीत होना, ६३य, भाकार, और 1 (५) स्व धामा, निज शक्ति, गपनी धारक शक्ति। [८९] (१) गौः - (गो) शरद वाणी, सर, सामगान । (२) गोभिःचाणः अज्यते भीडे स्वरों के साथ सामगान करते हुए पाण साया मजाते हैं । भासापोंके साय याच पर जाने की क्रिया प्रचलित है । (३) गो-बन्धु गौके भाई, गाय भपनी सदन है, ऐसा मान कर भातृस्नेहसे (९०) प्रति । वः । युपत्ऽअञ्जयः। वृष्ण । शीय । मारुताय । भरध्यम् । हुन्या । वृपेऽप्रयाने ॥ ९ ॥ (९१) वृषणश्वेनं ! मरुतः । वृऽप्मुना। रथेन । पऽनामिना । आ। श्येनासः । न । पक्षिणः । वृथा । नरः । हव्या । नः । वीतये । गत ॥ १० ॥ (९२) समानम् । अञ्जि । एपाम् । वि। भ्राजन्ते । रुक्मासः । अधि । बाहुए । दरिंद्युतति । ऋष्टयः ॥ ११ ॥ अन्वयः- ९० (हे) पृषत्-अक्षयः ! वः वृष्णे धूप-प्रयाने मारुताय शर्धाय हव्या प्रति भरध्ध। ९१(हे) नरः मरुतः । वृपन्- अश्येन वृप-प्सुना वृप-नाभिना रथेन नः हव्या चीतये, श्येनासः पक्षिणः न, यथा आ गत । ९२ एषां अग्जि समानं, रुममासः वि भ्राजन्ते, वाहुपु अधि ऋष्टयः दविद्युत्तति । अर्थ- १० (वृषत् अञ्जयः!) सोम को सम्मानपूर्वक अर्पण करनेयाले हे याजको ! तुम (वः ) तुम्हारे समीप आनेवाले (वृष्णे ) बलवान् तथा (वृप-प्रयाग्ने ) थैल के समान इटलाते हुए जानेवाले (मार. ताय ) मरतों के समुदाय के (शर्धाय ) वल बढाने के लिए (हठ्या प्रति भरध्यं) हविष्याप्न प्रत्येक को पर्याप्त मात्रा में प्रदान करो। ९१ हे ( नरः मरुतः !) नेतृत्वगुण से संपन्न वीर मरुतो ! (पन् भयेन ) पलिष्ठ घोडों से युक्त (प-प्सुना ) चैल के समान सुदृढ दिखाई देनवाले ( वृप नाभिना । और प्रवल नाभि से युक्त (रथेन ) रथसे (ना हव्या ) हमारे हविर्दव्यों के ( वीतये ) सेवनार्थ (श्येनासः पक्षिणः न ) वाज पंछियों की नाई वेगसे (वृथा आ गत ) विना किसी कष्ट के माओ। ९२ (ए) इन सभी वीरों का ( अजि) गणवेश (समानं ) एकरूप है, इनके गले में (रुपमासः) सुवर्ण के बने हुए सुन्दर हार ( वि भ्राजन्ते ) चमकते हैं और ( याहुपु अधि ) भुजाओं पर (माष्टयः) हथियार (दविद्युतति ) प्रकाशमान हो रहे हैं। भावार्थ- ९० शक्तिमान तथा प्रतापी महतोको याजक बडे सम्मान एवं भादरसे हपिसे परिपूर्ण घरकूट पर्याप्त रूपसे दें। ९१ पक्षवान् घोडों से युक्त एवं सुदृद्ध रथ पर बैठकर हविष्यान्न के सेवनार्थ वीर पुरुष बहुत जल्द एवं यढे वेगसे हमारे समीप भा जाय। ९२ इन सभी वीरों की वेशभूपों में कहीं भी विभिन्नता का नाम तक नहीं पाया जाता है । इनके गणवेप की एकरूपता या समानता प्रेक्षणीय है। [देखो मंग ३७२ । ] सब के गले में समान रूपके हार पड़े हुए हैं और सभी के हाथों में सदृश हथियार झिलमिल कर रहे हैं। उसकी सेवा करनेवाले। उसी प्रकार गायको मातृवत् समझनेवाले। (गो-मातरः) मंत्र १२५ देखिए ! (४) सु-जातम् मुलीन, प्रतिष्ठित परिवारमें उपम । (५) हिरण्ययः रथः - सुवर्णका बनाया रथ, सोनेके समान चमकीला जिसपर सुवर्णके कळायत्तू या नक्शीका काम किया हो । (६) स्परस् = स्फूर्ति, उत्साह, स्फुरण 1(७) वाणं - (शत संख्याभिः सन्त्रीभियुक्तः वीणाविशेषः इति सायणभाप्येक. १-८५.10, १३२ ज्ञात होता है, यह एक तरहका तन्तुवाद्य है, जो सौ तारोंसे युक्त है । जैसे सतार या सारंगी कई तारोंसे युक्त है, वैसे घाण बाजेमें १०० तारे होते हैं। [९०] (1) अम्=तेल लगाना, दाना, जाना, चमकना, सम्मान देना, आजि-तेजस्वी, चमकीला, चंदनका रोला, आज्ञा करने वाला (Commander), सेल, रंग से युक्त तेल, कुम्कुम, पीरों के भूषण ( गणपेश), भादरपूर्वक दान, अर्पण । (२) पत्, यूपन् = पौरुपयुक्त, समर्थ, शक्तिशाली, प्रमुरा, बैल, घोडा, वर्पणकर्ता, इद, सौम । [९२ 1 (1) रफ्म = मुमानों का हार, जिन पर किसी प्रकार की छाप दिखाई देती हो, उन्हें 'रकम' कहते हैं । (२)ऋष्टिा - दो धारपाली तलवार, कृपाण, भाला, नुकीला शस्त्र । स्था - .

(९३) । उग्रासः । वृपणः । उनचोडवः । नर्किः । तनू' । येतिरे । स्थिरा । धन्यानि । आयुधा । रथेषु । यः। अनीकषु । अधि । श्रियः ॥ १२ ॥ (९४) येोम् । अर्णः । न । सऽअर्थः । नाम । त्वेपम् । शश्वताम् । एकम् । इत् । भुजे । वयः। न । पित्र्यम् । सही ॥ १३ ॥ (९५) तान् । बन्दस्व । मरुतः । तान् । उप । स्तुहि । नेपाम् । हि । धुनीनाम् । अराणाम् । न । चरमः । तत् । एपाम् । दाना । मुसा । तत् । एपाम् ॥ १४ ॥ अन्ययः-९३ उग्रासः वृपणः उग्र-वाहवःते तनूपु नकि येतिरे,चः रथेए स्थिरा धन्यानि आयुधा, अनी- केपु अधि श्रियः। ९४ अर्णःन, स-प्रथः त्वेपं शश्यतां येषां नाम एक इत् सहः, पित्र्यं वयः न, भुजे। ९५ तान् मरुतः वन्दस्व, तान् उपस्तुहि, हि धुनानां तेपा, अराणां चरमः न, तत् एपां तत् एपां दाना महा । अर्थ- ९३ (उनासः) मनमें किंचित् भयका संचार करानेवाले, (वृपणः) बलिष्ठः (उग्र याहवा) तथा सामर्थ्ययुक्त पाहऑसे युक्त (ते) वे वीर मरुत् (तनूपु) अपने शरीरीकी रक्षा करनेके कार्य में (नकिः येतिरे) सुतरां प्रयत्न नहीं करते हैं। हे वीरो! (वः रथेषु) तुम्हारे रथोंमें (स्थिरा) अनेक अटल एवं दृढ (धन्वानि) धनुष्य तथा (आयुधा) कई हथियार है, अतएव ( अनीकेपु अघि ) सेना के अग्रभागों में तुम्हें (श्रियः) विजयजन्य शोभा अलंकृत करती है। ९४ (अर्णः न) हलचलसे युक्त जलप्रवाहकी नाई (स- प्रथः) चतुर्दिन फैलनेवाले (त्वेष) तेजःपूर्ण ढंगका जो (शश्वतां येषां) इन शाश्वत वीरोंका (नाम) यशो. वर्णन है, (एक इत् ) यही एकमात्र (सहः) सामर्थ्य देनेवाला है और (पित्र्यं चयःन) पितासे प्राप्त अन्न के समान (भुजे) उपभोगके लिए सर्वथैव योग्य है। ९५ (तान् मरुतः) उन मरुतोका ( चन्दस्व ) अभि चादन करो, (तार उपस्तुहि) उनकी सराहना करो. (हि। क्योंकि (धुनीनां तेणं ) शत्रुओंको हिलानेवाले उन वीरोमें (अराणां चरमः न) श्रेष्ठ एवं कनिष्ठ यह भेदभाव नहीं के बराबर है, अर्थात् सभी समान हैं और किसी भी प्रकारकी विपमता के लिए जगह नहीं है, (तत् एतत् एपां) इनके (दाना महा) दान बडे महत्त्वपूर्ण होते हैं। भावार्थ- ९३ ये वीर यडे ही मलिष्ठ तथा उग्र हैं और इनकी भुजाओं में असीम थल एवं शक्ति विद्यमान है। गुदल से जूझते समय अपने प्राणों की भी पवाह ये नहीं करते हैं । इन के रथों में मुहद्ध धनुष रखे जाते हैं, या हथियार भी पर्याप्त मात्रा में रखे जाते हैं । यही कारण है कि, युद्धभूमि में ये ही हमेशा विजयी टहरते है । ९४ जिस में वीरों के तेजस्वी तथा शाश्वत यश का बखान किया हो, वही काव्य शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है। बाजार के समान सभी जगह फैलनेवाला उथा यपौती के जैसे भोग्य भौर स्फूर्तिदायक है। ९५ महतोका अभिवादन करके उम की सराहना करनी चाहिए। सभी प्रकार के शत्रुओं को विकंपित तथा विचलित करने की क्षमता इन वीरों में है। उनमें किसी प्रकारको विषमता नहीं है, अतः कोई भी ऊँचा या नीचा मरुयों के संघ में नहीं पाया जाता है । सभी साम्यावस्थाकी अनुभूति पाते हैं। इनके दान भरयन्त महत्वपूर्ण होते हैं। टिप्पणी [१३] (1) रथेपु स्थिरा धन्यानि = रथमें स्थायी एवं भटल धनुष्य रखे हुए हैं । ये धनुष्य बहुत प्रचंड भाकारवाले होते हैं और इनसे याण बहुत दूर तक फेंके जा सकते हैं । हार्थोसे काममें लानेयोग्य धनुष्य पछ धनुष्य' कहे जाते हैं और इनमें तथा स्थिर धनुष्यों में पर्याप्त पिभिन्नता रहती है । ( २) तनूपु नकिः येतिरे शरीस्की बिलकुल पर्वाह नहीं करते, उदाहरणार्थ, भाधुनिक युगके Storm Troopers जैसे। [१५] (1) म अर्य:- स्वामी, श्रेष्ठ, मार्प। (२) चरमः क्षन्तिम, हीन । समता- इस मंनमें पतलाया है कि, उनमें कोई न श्रेष्ठ है, न कनिष्ठ है, अर्थात् सभी समान हैं (तेषां भराणां चरमः न) यही भाव अधिक विस्तारपूर्वक मन्न ३०५ व्या४५६ में ५ (९६) सुऽमर्गः । सः। यः । ऊतिषु । आस । पूर्वामु ! मरुतः। विऽउष्टिषु । यः। या । नुनम् । उन । अमेति ॥१५॥ (९७) यस्य । या । यूयम् । प्रति । वाजिनः । नरः । आ । हुन्या । पीतये । गध। अमि । सः । घुम्नः । उत । वाजेसातिऽभिः । सुम्ना । वः । धुतयः । नगद ॥१६॥ (९८) यया । रुद्रस्य । सनयः। दियः । वर्गन्ति । असुरस्य । यसः । युवाना । तयां । इद । असत् ॥ १७ ॥ ९६ (हे ) मरतः ! उत पूर्यामु प्युटिपु यः या नूनं पसति सः प. अतिषु मुमग. पास। ९७ (१) धूरापः नरः ! यूपं यस्य या याजिनः हदया पीतये था गध, स घुम्नः उत याज- सातिमिया सुम्ना अभि नशत् । ९८ अमु-रस्य येघस. रहस्य युयान गुनयः दियः यथा पशन्ति तथा इत् असत् । अर्य- ९६ ६ ( ममतः !) मगनो ! (उत पूर्यासु घ्युष्टिपु) पहले के दिनों में (य: ) जो (या नूनं असति ) तुम्हारा दी यनकर रक्षा (स.) पार (यः अशिपु तुम्हारी संरक्षण को आयोजनाओं पुरक्षित होकर सचमुच (सु-गणः भास ) भाग्यशाली यन गया। ९७ हे ( धरायः नरः!) राधुओं को विकम्पित कर देनेघाले धीर नेतागण ! (यूयं ) तुम (यस्य या पाजिनः जिस अमयुग पुरुष के समीप विद्यमान (दच्या दवियों के (यौनये ) सेव. नाथं ( आ गय) आते दो, (स.) यह (घुम्नः ) रत्नों के ( उत ) तथा (पाज-सातिभिः) अम- पानों के फलस्वरूप (यः सुम्ना ) तुम्हारे पुसों को (अभि नशत् ) पूर्ण रूपस भोगता है। ९८ (अग्युरस्य येधसः) जीयन देनेयाले हानी ( सदस्य युगानः सूनवः ) वीरभद्रफे पुत्र तथा घुया पीर मयत् ( दिया ) स्वर्ग से आकर (यया) जैसे (यशन्ति) इच्छा करेंगे. ( तथा इत् ) उसी प्रकार दमारा पताय ( असत् ) रहे। भावार्थ-९६ परि कोई एक पार हन चोरों का मनुपायी यन गाए, तो सचमुच उसे भाग्यवान् समझने में कोई मापति मही। उस के भाग्य राम जायेंगे, इस में क्या संशय ! ९७ पे धीर निम के भए का सेवन करते हैं, पर एन, भन तयश मुलासे युक्त होता है। ९८ माँ की रक्षा के लिए अपना जीवन देनेवाले नवयुवक पीर सा स्थान में से हमारे निकट मा जा और हमारा भाचरण भी उन की निगाह में मनुकूल एवं प्रिय बने । मत किया है। उन्हें भी इस समय में देखना उचित है। इस मंत्रमाग (सराणां चरमः न) पी है कि जिस प्रकार के भाग में न कोई न कोई या होता है, वैसे ही पीर भी समान होते हैं और ज्यनीयता के भावों से कोसों दूर रते है। मंत्र में भी पहिये के भागों की ही उपमा दी है। [९६] (1) प्युष्टि (a+ite) उपःकाल, ऐश्वयं, वैभवशालिता, स्तुति, फल, परिणाम। [९७] (1) घुम्नं = रन, दिग्ण मन (पु-मन), तेम. या, शकि, धन, नि, मरंग। (२) मुम्न-(मु-मनः) सुख, मानन्द, स्तोत्र, संरक्षण, करा, पर (देखो मन्त्र को टिपगी) (३) साति-दान, माति, पहायता, धन, विनाश, ममग! [९८] (1) मसुर (भमु-1 ) जीपन देने वाला, ईश्वर, (भ-सुरः) राक्षस, देय । (२) पेधम् = (नि.पा) ज्ञानी, पासक, कवि, निमांग करने वाला, शिपाता। म.] ५ - अन्यय:- (९९) ये । च । अर्हन्ति । मरुतः । सुऽदानवः। स्मन् । मीळ्हुपः । चरन्ति । ये । अतः । चित् । आ । नः । उप । वस्य॑सा । हृदा। युवानः । आ । ववृध्वम् ॥१८॥ (१००)यूनः । ॐ इति । सु । नर्विष्ठया। वृष्णः । पावकान् । अमि । सोभरे । गिरा गाय । गाऽइव । चर्कपत् ॥१९॥ (१०१)महाः । ये । सन्ति । मुष्टिहाऽईव । हव्यः । विश्र्वासु । पृऽसु । होतृपु । वृष्णः । चन्द्रान् । न । सुश्रवःऽतमान् । गिरा। वन्दस्व । मरुतः । अहे ॥२०॥ भु-दानवः मरुतः अर्हन्ति, ये च मीळ्हुपः स्मत् चरन्ति, अतः चित् (हे) युवानः। यस्यसा हुदा न उप आ या ववृध्यम् । १०० (हे) सोभरे! यूनः वृष्णः पायकान् नविष्ठया गिरा चर्कपत् गाय स आभि गाय। १०१ होत्पु विश्वासु पृत्स हव्यः मुष्टि-हा इव सहाः सन्ति, कृष्णः चन्द्रान न सु-श्रवस्तमान् मरुतः अह गिरा बन्दस्य । अर्थ- ९९ ( ये ) जो (सु-दानवः मरुतः) भली भाँति दान देनेवाले मरुतोका (अर्हन्ति) सत्कार करते है (ये च ) और जो ( मीळ्हुपः) उन दयासे पिघलनेवाले वीरों के अनुकूल (स्मत् चरन्ति) आचरण रखते हैं, हम भी ठीक उन्हीं के समान वतीय रयते हैं, ( अतः चित् ) इसीलिए हे (युधानः) नवयुवक चीरो ! (वस्यसा दा ) उदार अन्तःकरणपूर्वक (नः) हमारी ओर (उप आ आ ववृष्यं ) आगमन करके हमारी समृद्धि करो। १०० हे (सोभरे!) ऋपि सोभरि ! (यूनः) युवक (पृष्णः) बलवान् तथा (पायकान्) पवित्रता करनेवाले वीरों को लक्ष्य में रखकर (नविष्ठया गिरा) अभिनव वाणीसे, स्वरसे, (चर्कपत्) खेत जोतनेवाला किसान (गाःइय ) जिस प्रकार बैलों के लिए गाने या तराने कहता है, वैसे ही (सु अभि गाय ) भली भाँति काव्य गायन करो। १०१ ( होतृपु) शत्रु को चुनौती देनेवाले (विश्वासु पृत्सु) सभी सैनिकोंमें (हव्यः मुष्टि-हा इव) चुनौती देनवाले मुष्टियोद्धा मल्लकी नाई (सहाः सन्ति) जो शादल फे भीषण आक्रमणको सहन करनेकी क्षमता रखते हैं, उन (पृष्णः) पलिध (चन्द्रान् न) चन्द्रमाके समान आनन्ददायक ( सु-श्रवस्तमान् ) निर्मल यश स युक्त (मरुतः अह ) मरुत् वीरों की ही (गिरा घन्दस्व) सराहना अपनी वाणी से करो। भावार्थ- ९९ वीर मरन् दानी हैं और करगामी निगाह से सहायता करते हैं। चूंकि हम उन का सरकार करते है, भतः ये वीर हमारे समीप भा जाय और हम पर अनुग्रह करें। १०० हल चलाते समय जैसे काइनकार थैलों को रिझाने के लिए गाना गाता रहता है, वैसे ही युवक, घटिए एवं पवित्र चोरों के वर्णनों से युक्त धीगीतों का गायन मुम करते रहो। १०१ शत्रुओं पर धाश करनेवाले सभी सैनिकों में जिस भांति मुहियोदा पहलवान भधिक बलवान होता है उमी प्रकार सभी वीर शग्रुदल का भाक्रमण परदाश्त कर सकें। ऐसे यकिन, भानन्द बहानेवाले तथा कीर्तिमान् वीरों की प्रशंसा करो। टिप्पणी- [१०] इस मंत्र से यों जान पड़ता है कि, वैदिक युगमें खेतों में हल चलाते समय बलों की थकान दूर करने के लिए गाने गाये जाते थे । 'नविष्ठया गिरा भि गाय 'नय काम्य या गीत गाते रहो। इससे पर होता है कि, मये धीर काव्यों का सृजन हुआ करता था और ऐसे नवनिर्मित वीरगाधामों का गायन भी हुमा करता था। सोमरि (देयो टिप्पणी ३ मन्त्र पर)। [१०१]()मुष्टि-हा- घूमा या मुखों से लग्नेधाला ( Boxer)। (२) होट - बुलाने वाला, हडने के लिए ग्रुको चुनांतो या भावान देनेवार, देशको यज्ञ में बुलानेपा(३) सहासहनशक्तिसे युक्त, मयुकी चढाई होनेपर अपनी जगह भटक रूपसे खदे रहकर शत्रुको ही मार भगानेपालापीर।

(१०२) गावः । चित् । । । सामन्यवः। सऽजात्यैन । मरुतः । सऽबन्धवः । रिहते । ककुभः। मिथः ॥२१॥ (१०३) मतः । चित् । वः । नतवः । रुक्मऽबक्षसः। उप । भ्रातृऽत्वम् । आ । अयति । अधि । नः । गात । मुरुतः । सदो। हि ।। आपिऽत्वम् । अस्ति । निऽध्रुवि ॥२२॥ (१०४) मरुतः । मारुतस्य । नः। आ । भेपजस्य । यहत ! सुऽदानवः । यूयम् । सखायः । समयः ॥ २३ ॥ अन्वयः- १०२ (हे) स-मन्यवः मरुतः! गावः चित् स-जात्येन स-बन्धवः कवुभः मिथः रिहते घ। १०३ (हे ) नृतयः रुक्म-वक्षसः मरुतः ! मतः चित् वः भातृत्वं उप आ अयति, नः अधि गात, दिवः आपित्वं सदा नि-ध्रुवि अस्ति । १०४ (हे ) सु-दानवः सखायः सप्तयः मरुतः ! यूयं नः मारतस्य भेषजस्य आ यहत । अर्थ- १०२ हे (स-मन्ययः मरुतः!) उत्साही वीर मरुतो ! ( गावः चित् ) तुम्हारी माता गौएँ (स-जात्येन ) एकही जाति की होने के कारण (स-वन्धयः) अपनेही शातियांधों को, बैलों को (कफभा ) विभिन्न दिशाओं में जाने पर भी (मिथः रिहते घ) एक दूसरे को प्रेमपूर्वकही चाटती रहती है। १०३ हे (नृतवः ) नृत्य करनेवाले तथा (रुक्म-वक्षसः मरुतः !) मुहरों के द्वार छाती पर धारण करनेवाले पीर मरत् गण ! (मतः चित् ) मानव भी (वः भ्रातृत्यं ) तुम्हार भाईपन को ( उप आ अयति ) पाने के लिए योग्य ठहरता है, इसीलिए (नः अधि गात) हमारे साथ रहकर गायन करो, (हि) क्योंकि (यः आपित्यं) तुम्हारी मित्रता (सदा ) हमेशा (नि-रुवि अस्ति ) न टलने- घाली है। १०४ हे ( मु-दानयः) दानी, (सखायः) मित्रवत् वर्ताय रखनेवाले तथा (सप्तयः) सात सात पुरुषों की एक पंक्ति यनाकर यात्रा करनेवाले (मरुतः !) वीर मरुतो ! (यूयं ) तुम (नः) हमारे लिए (मारुतस्य भेषजस्य ) वायु में विद्यमान औषधि द्रव्य को ( मा वहत ) ले आओ। भावार्थ- १०२ महलों की माताएँ-गौएँ भले ही किसी भी दिशा में चली जाय, तो भी प्यार से एक दूसरे को घाटने लगती हैं। (अधिभूत में) वीरों की दयालु माता अपने भाइयों, बहनों एर वीर पुत्रों और सभी चोरोंको प्यार से गले लगाती है। १०३ वीर सैनिक इपंपूर्वक नृत्य करनेवाले तथा कई अलंकार अपने पक्ष स्थल पर शरण यरनेवाले । मानव को भी उनकी भिन्नता पाना सुगम है, योग्यता मरने पर वह मरुतों का साथी पा जाता है और यह मित्रतापूर्ण सम्बन्ध एक बार प्रस्थापित होने पर अटूट घना रहता है । १०४ ये चीर एक एक पंक्ति में सात सात इस तरह मिलकर चलनेवाले हैं और अच्छे ढंग के उदारचेता मित्र भी है। हमारी इच्छा है कि ये हमारे लिए वायुमंडल में विद्यमान भौषधि को से भाय। टिप्पणी- [१०४] (1) मारुतस्य भेष- वायुमें रोग हटाने की शक्ति है, इसी कारण वायु-परिवर्तनसे रोगसे पीडित व्यक्तियों को निरोगिताको प्राप्ति हो जाती है। यहाँ पर सूचना मिलती है कि, वायुके उचित सेवनसे रोग दूर किये जा सकते हैं । वायुविकिरसाकी झलक इस मंत्रमें मिलती है । (२) सप्ति घोटा, सात लोगों की बनी हुई पक्ति, पुस । है .

। ३६ (१०५) याभिः । सिन्धुम् । अथ । याभिः । पूर्वथ। याभिः । दशस्यर्थ । क्रिविम् । मयः । नः । भूतु । कृतिऽभिः । मयाऽभुवः । शिवाभिः । असचऽद्विषः ॥२४॥ (१०६) यद् । सिन्धौं । यत् । असिक्न्याम् । यत् । समुद्रे' । मरुतः । सुऽवहिप । यत् । पर्वतेषु । भेषजम् ।। २५ ॥ (१८७) विश्वम् । पश्य॑न्तः । विभय । तनपुं । आ । नेन । नः । अधि । चोचत । क्षमा । प: । मरुतः । आतुरस्य । नः । इप्कत । विऽहुतम् । पुनरिति ॥ २६ ॥ अन्धयः- १०५ (हे ) मयो-भयः अ-सच-द्विपः ! याभिः ऊतिभिः सिन्धुं अवय, याभिः दूर्वथ, याभिः निर्वि दशस्यथ, शिवाभिः न मयः भूत । १०६ (है) सु-वहिपामरुतः यत् सिन्धौ भेषजं, यन् असिक्न्यां, यत् समुद्रेपु, यत् पर्वतेषु। १०७ (हे) मरुतः ! विश्वं पश्यन्तः तनूपु आ विभृथ, तेन नः अधि वोचत, नः आतुरस्य रपः क्षमा वि हुतं पुनः इप्कत । अर्थ- १०५ हे (मयो-भवः) सुख देनेयाले (अ-सच-द्विपः!) एवं अजातशत्रु पीरो! (याभिः ऊतिभिः) जिन संरक्षक पाकियों से तुम (सिन्धुं अवथ) समुद्र की रक्षा करते हो. (याभिः पूर्वथ) जिन भाचियों फे सहारे शत्रु का विनाश करते हो, (याभिः) जिनकी सहायता से (क्रिविं दशस्यथ ) जलकुंड तैयार फर देते हो, उन्हीं (शिवाभिः) कल्याणप्रद शक्तियों के आधार पर (नः मयः भून) हमें सुख देनेवाल बनो। १०६ हे (सु-यहिपः मरतः!) उत्तम तेजस्वी घरि मरुतो। ( यत् ) जो (सिन्धी भेज) सिन्धु. नद में औषधिद्रव्य है. ( यत् असिफ्न्यां ) जो असिफ्नी के प्रयाह में है. ( यत् समुदेपु) जो समुद्र में है और ( यत् पर्वतेपु) जो पर्वतों पर है, वह सभी औपधिद्रव्य तुम्हें विदित है। १०७ हे (मरुतः!) वीर मरतो । ( विश्व पश्यन्तः ) सब कुछ देखनेवाले तुम (सनेषु ) हमारे शरीरोंमें ( आ विभृथ) पुष्टि उत्पन्न करो और (तेन) उस ज्ञानसे (नः अधि वोचत) हमसे पोलो; उसी प्रकार (नः आतुरस्य ) हम में जो बीमार हो, उसके (रपः क्षमा ) दोष की शांति फरके (बिहुतं ) टूटे हुए अययय को ( पुनः इफत) फिर से ठीक विठाओ। भावार्थ-१०५ ये वीर अपनी शक्तियों से समुद्र एवं नदियों की रक्षा करते हैं, रायुदल को मटियामेट कर देखें है, जनता को पानी पीने को मिले, इसलिए सुविधाएँ पैदा कर देते हैं और सभी लोगों की सुविधा का प्रबन कर डालते हैं। १०६ सिन्धु, असिनी, समुद्र तथा पर्वतों पर जो रोगनिवारक औषधि हो, उन्हें जानना धो के लिए भनिवार्य है। १०७ ये पार चिकित्सा करने वाले कविराज या वैध है और विविध भोपधियोंसे भली भांति परिचित है । घे हमे पुष्टिकारक औषध प्रदान कर हष्टपुष्ट बना दें। जो कोई रोगग्रस्त हो, उसके शरीर में पाये गानेवाले दोप को हटाकर भौर छिसविपिउन अंग को फिर ठीक प्रकार से जोरकर पहले जैसे कार्यक्षम बना है। टिप्पणी-[१०५]() सिन्धुं अवथ - समुद्र का रक्षण करते हो (ग्या मरुत् दिय माविक पर नियुक पा जल सेना के अधिकारी है )(२) अ-सच-द्विषः - ये वीर स्वयं ही किसी का भी द्वेष महीं करते हैं, मता इन्हें मनातशत्रु कहा है । (३) क्रिवि = चमड़े की थैली, कुआँ, जळ भाला, पानी का वर्तन । [१] (1) सु-चर्हिम् = सरपर उसम कलाप धारण कानेवाले, भाछै यज्ञ करनेवाले । (मंत्र १५८ देखो)। [१०] (1) वि-हुतं इप्कत - लड़ाई में घायल हुए सैनिकों को प्राथमिक सेवादहल काके, माइमपही भादि करना यहाँ पर संचित है । वनस्पतियों की सहायता से उपर्युक्त चिकिसा-कार्य करना है। पिछला हो मंत्र देखिए। ।

गोतमपुत्र नोधा ऋपि ( ऋ० १६४।१-१५) (१०८) वृष्णे । शधीय । सुऽमखाय । वेधसै। नोधः । सुऽवृक्तिम् । प्र । भर । मरुवऽभ्यः । अपन ! धीरः । मनसा । सुऽहस्त्यः। गिरः । सम् । अर्छ । चिदर्थेषु । आऽभुवः ॥१॥ (१०९)ते । जजिरे । दिवः । अष्वासः । उक्षणः। रुद्रस्य । मयोः । असुराः । अरेपसः । पापकासः । शुचयः । सूर्याइव । सत्वानः । न । द्रप्सिनः । घोरऽचर्पसः ॥२॥ अन्वयः- १०८ (हे ) नोधः ! घृष्णे सु-मखाय वेधसे शर्धाय मरुद्भ्यः सु-वृक्ति प्र भर, धीरः सु- हस्त्यः मनसा, विदथेषु आ-भवः गिरः, अपान, सं अओ। १०९ ते प्रयास. उक्षणः असु-राः भ-रेपसः पावकासः सूर्याइव शुचयः द्रप्सिना सत्यानान घोर-घर्पसः रुद्रस्य मर्याः दिवः जज्ञिरे। अर्थ- १०८ हे (नोधा!) नोधनामक शारे। ( वृष्णे) यल पाने के लिए, (सु-मसाय) यश भली भाँति हो, इस हेतु से, ( वेधसे) अच्छे ज्ञानी होने के लिए और (शर्धाय ) अपना बल बहाने के लिए (मरुद्भ्यः) मरतों के लिए ( सु-वृक्ति प्र भर ) उत्कृष्टतम काव्यों की यथेष्ट निर्मिति करो, (धीरः) बुद्धिमान् तथा (मु-हस्त्यः ) हाथ जोडकर मैं (मनसा ) मन से उनकी सराहना कर रहा हूँ और (विदथेषु भा-भुवः ) यशों में प्रभावयुक्त (गिरः) वाणियों की (अप. न ) जल के समान ( सं अओ) पा कर रहा है अर्थात् उनके कार्यो का गायन करता है। १०९ (ते)ये (कण्यासः) ऊँचे, ( उक्षण:) पडे ( असु-राः) जीवन का दान करनेवाले, (अ-रेपसः) पापरहित, (पावकासः) पवित्रता करनेहारे, (सूर्याःइय शुचय.) सूर्य की नाई तेजस्वी, (इप्सिनः) सोम पीनेवाले और ( सत्वानः न घोर-वर्षसः) सामर्थ्ययुक्त लोगों के जैसे वृहदाकार शरीरवाले ( रुद्रस्य मर्याः) मानों रुद्र के मरणधर्मा पीर (दिवः ) स्वर्ग से ही (जशिरे) उत्पन्न हुए। भावार्थ- १०८ यक्ष, उत्तम कर्म, ज्ञान तथा सामयं अपने में यदे इसलिए वीर मरतों के काव्य रचने चाहिए भोर सार्वजनिक सभामों में उनका गायन करना उचित है। १०९ उच्च, महाम्, विश्व के हितार्थ अपने प्राणों का भी न सिसकते हुए यरिदान करनेवाले, निष्पाप, सभी जगह पवित्रता फैलाने वाले तेजस्वी, सोमपान करनेवाले, पलिय भौर प्रचंड देहधारी गे पीर मानों स्वर्ग से इस भूमंडल पर उतर परे हो। टिप्पणी- [१०८] (1) नोधस् = [नु स्तुती काम्य करनेवाला, कवि, एक ऋषि का नाम । [१०९] (1) ऋप्य = ऊँचे विचार मन में रखनेवाले, भम्य, उच्च पदपर रहनेवाले । (२) द्रप्सिन् %3D (द्रप्स. सोम) जो अपने समीप सोम रखते हों, वे 'द्रप्सिन, ' ( Drops)। मंन ६. देखिए ।

(११०) युवानः । रुद्राः । अजराः । अभोक्ऽहनः । चक्षुः । अधिंडगावः । पर्वताऽस्य । दृळ्हा । चित् । विश्व । भुवनानि । पार्थिवा। प्राच्यवयन्ति । दिव्यानि । मज्मना ॥३॥ (१११) चित्रैः । अक्षिऽभिः । वपुंपे । वि । अञ्जते । वक्षःऽसु । रुक्मान् । अधि । येतिरे । शुभे । असेपु । एपाम्। नि । मिमुक्षुः । ऋष्टयः। साकम् । जज्ञिरे । स्वधा । दिवः । नरः ॥४॥ अन्वयः-११० युवानः अ-जराः अ-भोर हनः अध्रि-गायः पर्वताःइव रुद्राम्यवाः, पार्थिवा दिव्यानि विश्वा भुवनानि हळहा चित् मन्मना व्यवयन्ति । १११ वपुपे चित्रैः अञ्जिभिः वि असते, पक्षासु शुभे रुक्मान् अधि येतिरे, पपां अंसेषु कष्टयः नि मिमृक्षुः, नरः दिवः स्व-धया साकं जज्ञिरे। अर्थ- ११० (युवानः) युवकदशाम रहनेवाले (अ-जरा) यूढापेसे अछूते (अ-भोक्-हनः) अनुदार रूपयों को दूर करनेवाले (अधि-गाय) आगे बढनेवाले (पर्वताइव) पहाडोंकी नाई अपने स्थान पर अटल रूपसे खडे रहनेवाले (रुद्राः) शत्रुओंको रुलानेवाले ये वीर लोगोंको सहायता (वचक्षुः) पहुँचाते हैं। (पार्थिया) पृथ्वी पर पाये जानेवाले तथा (दिव्यानि) धुलोकम विद्यमान (विश्वा भुवनानि) सभी लोक (दृल्हा वित्) कितने भी स्थिर हो, तो भी उन्हें ये (मज्मना)अपने बलसे (प्र च्यवयन्ति) अपदस्थ कर देते हैं, विचलित फर डालते हैं। १११ (वपुषे) शरीरकी सुन्दरता बढाने के लिए (चित्रैः असिभिः) भाँति भाँतिके आभूषणों. द्वारा वे (वि अअते) विशेष ढंगसे अपनी सुपमा वृद्धिंगत कर देते हैं। ( वक्षःसु) छातियों पर (शुभे) शोभा के लिए (रुक्मान ) सुवर्ण के बनाये हारों को (अधि येतिरे) धारण करते हैं । (एषां असेषु) इन मरुतोंके कंधों पर (अष्टयः नि मिमृचः) हथियार चमकते रहते हैं। (नर) ये नेताके पद पर अधिष्ठित वीर (दिवः) धुलोकसे (स्व-धया साकं ) अपने बलके साथ (जशिरे ) प्रकट हुए । भावार्थ- ११० सदैव नवयुवक, बुढ़ापा भाने पर भी नवयुवकोंके जैसे उमंगभरे, कंजूप तथा स्वार्थी मानवों को अपने समीप न रहने देनेवाले, किसी भी रकावट के सामने शीश न युकाते हुए प्रतिपक आगे ही रहनेवाले, पर्वत की नाई अपनी जगह अटल खडे हुए, शत्रुदलको विचलित करनेवाले ये वीर जनताको संपूर्ण सहायता करने के लिए हमेशा सिद रहते हैं । पृथ्वी या स्वर्गमें पाये जानेवाली सुन चीजों को भी ये अपने बलसे हिला देते हैं, तो फिर शत्रु इनके सामने भरथर काँपने लगेंगे, तो कौन आशयको बात है ?) १११ वीर मरुत् गहनों से अपने शरीर सुशोभित करते हैं, वक्ष:- स्थलों पर मुहरोंके हार रख देते हैं, कंधों पर चमकीले भायुध घर देते हैं। ऐसी दशा में उमें देखने पर ऐसा प्रतीत होने लगता है कि मानों वे स्वर्ग से ही अपनी भतुलनीय शक्तियों के साथ इस भूमंडल में उता पड़े हो। [११०] (१) अ-जराः = वृद्ध न होने वाले अधात् भवस्था में बुढापा भाने पर भी नवयुवकों की तरह मति उमंग से कार्य करनेवाले, बुढापे में भी युवकों के उत्साह से काम में जुटमेनाले । (२) अ-भोर- भोग दूसरों को मिलने चाहिए, उनका अपहरण करके स्वयं ही पाने की पेश करनेवाले एवं समाज के लिए निरुपयोगी मानों को दूर करनेवाले । (हन् = [हिंसागस्यो, यहाँ पर गति यतलानेवाला म लेना ठीक है।) (३) अधि-गुः= भाध रूप से चदाई करनेवाले, किसी भी स्कावट या अदचन की भोर ध्यान न देनेवाले भोर मादल पर परावर धावा करनेवाले । (४) पर्वताः इच (स्थिराः) = यदि शत्रु ही प्रारम्भ में भाक्रमण कर बैठे तो भी अपने निर्धारित स्थान पर भटल भाव से खडे रहनेवाले अतएव युदल की चढाई से अपनी जगह छोटकर पोछे न हटनेवाले। (५) पार्थिवा दिव्यानि विश्वा भुवनानि दहा चित् मज्मना प्र च्यवयन्ति भूमि पर के सथा पर्वत- शिखरों पर विद्यमान सुदृढ दुर्गतक को अपनी अद्भुत सामथ्र्य से हिला देते हैं । ऐसी अनूठी शक्ति के रहते यदि ये शत्रुओं को भी विचलित कर दालें, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । बेशक, दुश्मन उनके सामने खडे रहने का मौका, भाते ही थरथर काँप उठेंगे। देखो मंत्र १२६ । [१११] (1) झटयः नि मिमृक्षुः सग भाले या कुठार जो मी वे धारण करते हों, उन्हें ठीक तरह साफ सुथरा रखकर तथा परिष्कृत करके रखते हैं, अतः वे चमकीले दीख -द्दनः शस्त्र (११२) ईशानऽकृतः । धुनयः । रिशादसः। वार्तान् । पिऽद्युतः । तर्विपीमिः । अकुत । दुइन्ति । अर्थः । दिव्यानि । धृतयः । भूमिम् । पिन्वन्ति । पयसा । परिऽज्जयः ॥५॥ (११३) पियन्ति । अपः । मरुतः । सुऽदानवः । पर्यः । तत् । विदथेषु । आऽभुवः । अत्यम् । । मिहे । वि । नयन्ति । वाजिनम् । उत्सम् । दुहन्ति । स्तनगन्तम् । अक्षितम् ॥६॥ अन्वयः- ११२ ईशान-कृतः धुनय रिश भदस. तविपीभिः वातान विद्युत अऋत, परि-प्रय धूतयः दिव्यानि ऊध दुहन्ति, भूमि पयसा पिन्वन्ति। ११३ सु-दानक. आ-भुव. मरतः विदथेषु धृतवत् पयः आपः पिन्यन्ति, अत्यं न वाजिनं मिहे यि नयन्ति, स्तनयन्तं उत्सं अ-क्षित दुहन्ति । अर्थ- ११२ (ईशान-कृतः) स्वामी तथा अधिकारीवर्ग का निर्माण करनेवाले, (धुनय.) शनुदल को हिलानेवाले, (रिश-अदस ) हिंसा में निरत विरोधियों का विनाश करनेवाले, (तविपीमि) अपनी शक्तियों से (वातान् ) वायुओं को तथा (विद्युत ) विजलियों को ( अझत) उत्पन्न करते है। (परि-जय ) चतुर्दिक वेगपूर्वक आक्रमण करनेयाले तथा (धूतय ) शसेना को विकंपित करनेवाले ये वीर (दिव्यानि ऊधः) आकाशस्थ मेघों का ( दुहन्ति ) दोहन करते हे और (भूमि पयसा पिन्वन्ति) यथेष्ट वर्षाद्वारा भूमि को तृप्त करते हैं। ११३ (सु-दानव ) अच्छे दानी, (आ-भुवः) प्रभावशाली (मरुतः) वीर मरतों का संघ (विदथेषु । यशों एवं युद्धस्थलों में (घृतवत् पयः) घी के साथ दूध तथा (अप. पिन्वन्ति ) जल की समृद्धि करते ह. (अत्यन) घोडे को सिसाते समय जैसे घुमाते है, ठीक से ही (वाजिन ) बलयुक्त मेघों को (मिहे) वर्षा के लिए वे (विनयन्ति) विशेप ढंग से ले चलते है, चलाते वे और तदुपरान्त ( स्तनयन्तं उस) गरजनेवाले उस झरने का मघ का ( अ क्षित दुहन्ति) अक्षय रूप से दोहन करते है। भावार्थ- ११२ राष्ट्र के शासन की यागोर हाथ में लेनेवाले, शासकों के वर्ग को अस्तित्व में लाने वाले, शत्रुओं को विचलित करनेवाले, कष्ट देनेवाले शग्नुमन्य को जामूल से उसाड देनेवाल, अपनी शक्तियो से चारों ओर बढे घेग से दुश्मनों पर धावा करनेवाले तथा उन्हें नीचे धकेलनेवाले ये वीर वायुप्रवाह, विद्युत् एव वर्षा का सृजन करते हैं । ये ही मेघों को दुहकर भूमि पर वर्षारूपी दूध का सेचा करत है। ११३ उदारधी तथा प्रभावशाली ये वीर मरुत् यज्ञों में घृत, दुग्ध तथा जल की यथेष्ट समृद्धि कर देते है भौर घोडों को सिखाते समय जिस ढंग से उन्हें चलाते है, वैसे ही भन्न के उत्पादन में सहायता पहुंचाने वाले मेघद- को निश्चित राहसे चलात है । उस मेघसमूहरूपी वृहदाकार जलकुद से पानी के यह भरित रूपसे रवर्तित कर देते है। पढते हैं। यह घर्णन ध्यानपूर्वक पढ लेना चाहिए भीर पाठक सोधे कि, वर्तमानकाल में सनिक एवं उनके अधिकारी पिस गसे रहते है । पाठकोको ज्ञात होगा कि, यहाँ पर सैनिकों का ही वर्णन किया है । देखिए भर्जि' शब्द मन ९० [११२] (1) ईशान-कृत (King-makers) राष्ट्र पर प्रभुप प्रस्थापित करने की क्षमता से युक अधिकारी या शासवग का निर्माण करने गले, नियन्ता की आयोजना करनेघाले । अथर्ववेद मे २५/७ में ' राज स्त' पद इसी अर्थ की सूचना देता है । (२) दिव्यानि ऊधा दुहन्ति भूमि पयसा पिन्वन्ति दिव्य स्तनों का दोहन करके भूमहल पर दूध की वर्षा करते है। (दिव्य ऊध - मेघ, पय - दूध या अल ।) (३) धुनयः, धूतय हिलानेघाले, त्रु को उसकी जगह से हटानेवाले, दुश्मनों का उच्चाटन करनेवाले । (४) परि-जय = ( परि-नि) दुश्मनों पर चहुँ ओर चढाई करनेवाले, चारों ओर फैलनेवाले । (नि जये - विजय पाना, शग्नु परास्त करना। (५) रिश-अदस - (Irr + भदस्)= (रि) हिंसा, स्यारे शत्रुको (भदस्) खा जानेवाले, शत्रु का विनाश करनेवाले। [११३ ] आ-भुवः- (भा भू) प्रभाव प्रस्थापित करना । (मत्र ४३ में 'अभ्व. ' पददपिए।) - .

(११४) महिपासः । मायिनः । चित्रऽमानवः । गिरयः । न । स्वयसः । रघुऽस्यदः । मृगाःऽईव । हुस्तिनः । साध । वनो। यत् । आरुणीषु । तविपीः । अयुग्ध्वम् ॥७॥ (११५) सिंहाःऽईच । नानदुति । प्रऽचैतसः । पिशाईव । सुऽपिर्शः । विश्वऽवैदसः । क्षपः । जिन्वन्तः । पृर्पतीभिः । ऋष्टिऽभिः। सम् । इत् । सऽवाधः। शव॑सा । अहिऽमन्यवः ॥८॥ अन्वयः- ११४ महिपासामायिनः विध-भानवः गिरयः न स्व-तवसः रघु-स्यदः हस्तिनः मृगाव यना खादथ, यत् आरुणीषु तविपीः अयुग्ध्यं । ११५ प्र-चेतसः सिंहाइव नानदति, पिशाइय सु-पिशः विश्व-वेदसः क्षपः जिन्वन्त: शवसा अ-हि-मन्यवः पृपतीभिः काटिभिः स-याधः सं इत् । अर्थ- ११४ (महिपासः ) बडे, (मायिनः) निपुण कारीगर, (चित्र-भानवा ) अत्यन्त तेजस्वी (गिरया न) पर्वतों के समान (स्व-तवसः ) अपने निजी वल से स्थिर रहनेवाले, परन्तु (रघु-स्यदः) नेगपूर्वक जानेवाले तुम (हस्तिनः मृगा इव ) हाथियों एवं मृगों के समान (चना खादथ ) वनों को खा जाते हो- तोडमरोड देते हो, (यत ) क्योंकि (आरणीपु) लाल वर्णवाली घोडियों में से (तपिपीः) यलिष्ठो कोही (अयुग्ध्वम् ) तुम रथों में लगा देते हो। ११५ (प्र-चेतसः) ये उत्कृष्ट ज्ञानी वीर (सिंहाःइव) सिंहाँ के समान (नानदति) गर्जना करते हैं। (पिशाइव सु-पिशः) आभूषणों से युक्त पुरुपोंकी नाई सुहानेवाले, (विश्य वेदसः) सव धनों से युक्त होकर (क्षपः) शत्रदल की धजियाँ उडानेवाले, ((जिन्वन्तः) लोगोंको संतुष्ट करने. वाले, (शवसा अ-हि-मन्यवः) बलयुक्त होनेके कारण जिनका उत्साह घट नहीं जाता, ऐसे वे धीर (पृपतीभिः) धम्बेवाली घोडियों के साथ और (ऋष्टिभिः) हथियारों के साथ (स-पाधः) पीडित जनता की ओर उसकी रक्षा करने के लिए ( सं इत् ) तुरन्त इकट्ठे होकर चले जाते हैं। भावार्थ- ११४ ये पीर मरुत् परे भारी कुशल, तेजस्वी, पर्वतकी नाई अपनी सामर्थ्य के सहारे अपनी जगह स्थिर रहनेवाले पर शत्रु पर बरे येगसे हमला करनेवाले हैं और मतवाले गजराज की नाहं धनों को कुचलने की क्षमता रखते है। बाल घोटियों के झुइमें से ये केवल बलयुक्त घोडियों को ही अपने रथों में जोरने के लिए घुन लेते हैं। ११५ ये ज्ञानी वीर सिंहकी नाई दहादते हुए घोषणा करते हैं । भाभूषणों से पनेठने दीख पड़ते हैं । सब प्रकार के धन एवं सामर्थ्य बटोरकर और शग्रुदल की धजियाँ उडाकर ये सज्जनों का समाधान करते हैं। इनमें मतीम पल विद्यमान है, इसलिए इनका उत्साह कभी घटताही नहीं। भाँनिभाँति के भनूठे हथियार साथ में रखकर पीडित प्रजाका दुःख हरण करने के लिए ये धीर एकत्रित वन भस्याचारी शत्रुभोंपर चढ़ाई कर बैठते हैं । टिप्पणी- [११४] (१) महिषा=यदा, बडे शरीरपाला, भैंसा ।।(२) मायिन् = कुशलतापूर्ण कार्य करने. पाला, सिद्धहस्त, छलकपटसे शत्रु पर हमले करने में निपुण । (३) रघु-स्यदः (घु स्यद) = पैरोंकी आहट न सुनाई दे, इतने घेगसे जानेवाला, शाके भनजाने उसपर धावा करनेवाला। [११५] (6) प्रचेतस् = विशेष ज्ञानी (देखो मंत्र ४४ )। (२) पिस अलंकार, शोभा: मु-पिश = सुरूप । (३) विश्व-घेदस्= सभी प्रकारके धनोंसे युक्त, सर्वज्ञ | (क्षपः = शत्रुदलको मटियामेट करनेवाले। (५) जिन्यन्ता- तृप्ति करनेवाले । (६)शवसा अ-हि-मन्यवान मल यथेष्ट मात्रा में विद्यमान है, इसलिए (अहीन-मन्यवः) निरुत्साही न बननेवाछे। (५)प्रपतीभिः काटिभिः स-याधः सं इत् (रक्षितुं गच्छन्ति) सुशोभित (पकहने की जगह पा सदियों पर धम्ने रहने से) आयुध साथ ले दुःखी जनता के निकट जाकर उनकी रक्षा करते हैं। - - - ४१ । (११६) रोदसी इति । आ । बदतु । गणऽश्रियः। नृऽसाचः । शूराः । शव॑सा । अहिऽमन्यवः । आ। बन्धुरैपु । अमतिः। न । दर्शता। विद्युत् । न । तस्थौ । मरुतः । रथेषु । वः ॥९॥ (११७) विश्वऽवेदसः । यिमिः । सम्ऽऔकसः। सम्ऽमिश्लासः । तविपीभिः । निशिनः । अस्तार: । इपुम् । दधिरे । गस्त्योः। अनन्तऽगुप्माः । पऽसादयः। नरः ॥१०॥ अन्वयः-११६ (हे) गण-ध्रिय नृ-साथ शूरा शवसा अ-हि-मन्यव मरत ! रोदसी आ पदत पन्धुरेपु रयेप, अमति न, दर्शता विद्युत् न, व आ तस्था। ११७ रयिभि विश्व-दस सम्-ओकस तविपीमि सम्-मिलास वि-रशिन अस्तार अन्-अन्त-शुष्मा वृष-खादय नरः गभस्त्योः इए दधिरे। अर्थ- ११६ हे (गण श्रियः) समुदाय के कारण सुहानेवाले, (न साच ) लोगों की सेवा करनेवाल, (शूरा) चीर, (शवसा अ-हि-मन्यव ) अत्यधिक बलके कारण न घटनेवाले उत्साहसे युक्त (मस्त.) घीर मरतो! (रोदसी या बदत) भूतल एवं धुलोक को अपनी दहाड से भर दो, (वन्धुरेपु रथेपु) जिन में बैठने के लिए अच्छी जगह है, ऐसे रथों में ( अमतिः न) निर्मल रूपवालों के समान तथा (दर्शता विद्युत् न ) दर्शन करनेयोग्य बिजली की नाई (व.) तुम्हारा तेज ( आ तस्थो ) फैल चुका है । १९७ (रयिभिः विश्व वेदसः) अनेक धनों से युक्त होने के कारण सर्वधनयुक्त, (सम् ओक्स ) एकही घरमें रहनेवाले (तविषीभिः सम्-मिन्लासः) भॉति भाँति के बलों से युक्त,(बि-रप्शिन ) विशेष सामर्थ्यवान् (अस्तार ) शत्रुसेनापर अस्त्र फेंक देनेवाले, (अन्-अन्त गुप्मा. ) असीम सामर्थ्य वाले, (वृष खादयः) बडे बडे आभूषण धारण करनेवाले, (गर.) नेतृत्वगुणसे विभूषित चीर (गभस्त्योः) वाहोपर (इपुं दधिरे) पाण धारण कर रहे है। । भावार्थ- १९६ वीर मरत जब गणवेश (धादी) पहनते हैं, तो यडे प्रेक्षणीय ज्ञान पढते हैं। इनमें वीरता कूटयूटकर भरी है और जनताकी सेवा करने का मानों इन्हों ने घनसा लिया है। पर्याध रूप से बरयान् है, अत इनकी उमग कभी घटती ही नहीं । जब वे अपने सुशोभित रथोपर जा बैठते हैं, तो दामिनीकी दमककी माई तेजस्वी दिखाई दते है । ११७ विविध धन समीर रखने वाले, एकही घर या निवासस्थानमे रहनेवाले, विभिन्न शक्तियोसे युक्त, शत्रुसेनापर भरण फसनेवाले जो भारी गहने पहनते है, ऐसे योर नेता कोंपर वाण तथा तरकस धारण करते हैं । टिप्पणी [११६] (१) गण-थ्रिय = सामूहिक पहनावा पहनने के कारण सुहाने वाले । (२) नृ-साच - मानयों की सेवा करनेवाले । (३)शवसा अ-हि-मन्यवः- दसो पिछला मत्र । (४) बन्धुरः रथ'निस मे बैठने की जगह हो, ऐसा रथ । (५) वन्धुर (बन्धुर ) - प्रेक्षणीय, शोभायुक्त, सुखकारक, झुग हुभा । (६) अमति भाकार, रूप, सेस्विता, प्राश, समय। [११७] (1) सम्-मोकस - एक घरमे (वॉक Barrack) रहनेवाले धीर सैनिक । [देखो मन ३२१, ३५५, ५४७] (२) रयिभि विश्व वेदस - अपने समीप बहुत प्रकारके धन पिडामान हैं, इसलिये विविध-धनसमन्वित। (३) तविषीभि समिश्ला , अनन्तशुप्मा = पलान्, सामर्थ्य से परिपूर्ण । (४) वृप खादयः सोमरसके साथ खाने की चीनै खानेवाले (सायन) [मन्न १५० देखिए]: (५) गभस्यो घु दधिरप्रदेशपर तूणीर धारण करते हैं। (६) चिरप्शिन = विशेष सामय से युक्त। परन् [हि.]६ अन्वय ४२ (११८) हिरण्ययेभिः । पविऽभिः । पयःऽवृधः । उत् । जिघन्ते । आऽपथ्यः । न) पर्वतान् । गखाः । अयासः । स्वऽसृतः। ध्रुवऽच्युतः। दुधऽकृतः । मरुतः । भ्राज॑त्ऽमष्टयः ॥११॥ (११९) पुम् । पायकम् । चनिनम् । विऽचर्पणिम् । रुद्रस्य । सूनुम् । हवा । गृणीमसि । रजःऽतरम् । तबसम् । मारुतम् । गणम् । ऋजीषिणम् । वृषणम् । सश्चत । श्रिये ॥१२॥ ११८ पयो-वृधः मखाः अयासः स्व-सृतः धरुपच्युतः दु-ध्र-शतः भ्राजत्-ऋष्टयः मयतः आ-पथ्यःन पर्वतान् हिरण्ययेभिः पविभिः उत् जिमन्ते । ११९ घृ' पावकं वनिनं वि-वर्षणि रुद्रस्य सूनुं हवसा गृणीमसि, श्रिये रजस् तुरं तवसं वृपणं ऋजीपिणं मारुतं गणं सश्चत। अर्थ- ११८ (पयोवृधः) दूध पीकर पुष्ट बननेवाले, (मखाः ) यज्ञ करनेवाले, (अयासः) आगे जाने- वाले, (स्व-सृतः) स्वेच्छापूर्वक हलचलें करनेवाले (ध्रुव-च्युतः) अटल रूप से खडे शत्रुओं को भी हिलानेवाले, (दु-ध्र-रतः) दूसरों से न पकडने तथा घेरे जानेवाले तथा (भ्राजत् क्रप्टयः) तेजस्वी हथियार साथ रसनेवाले (भरतः ) वीर मरुत् ( आ-पथ्यः न ) चलनेवाला जिस तरह राह में पड़ा हुआ तिनका दूर फेंक देता है, ठीक वैसे ही ( पर्वतान् ) पहाडोंतक को (हिरण्ययेभिः पविभिः) स्वर्ण- मय रथों के पहियों से ( उत् जिन्नन्ते ) उडा देते हैं। ११९ ( धूपं ) युद्धके संघर्ष चतुर,(पायक) पवित्रता करनेवाले, (वनिन) जंगलोंमें घूमनेवाले, (विचर्षणि ) विशेष ध्यानपूर्वक हलचल करनेवाले, (रुद्रस्य सूनुं) महावीर के पुत्ररूपी इन वीरों के समूह की (हवसा) प्रार्थना करते हुए (गृणीमसि) प्रशंसा करते हैं। तुम (थिये ) अपने ऐश्वर्यको बढाने के लिए ( रजस्-तुरं) धूलि उडानेवाले अर्थात् अति वेग से गमन करनेवाले, (तवसं ) बलिष्ठ, (वृषणं) वीर्यवान् तथा ( काजीपिणं) सोम पोनेवाले (मारुतं गणं) मरुत्समुदाय को (सश्चत) प्राप्त हो जामो । भावार्थ- ११८ गोदुग्ध-सेवन से पुष्टि पार अच्छे कार्य करते हुए दामों पर हमले करने के लिए भागे यदनेवाले, स्थिर शत्रुओं को भी विचलित करनेवाले, भाभापूर्ण हथियारों से सज्ज तथा जिन्हें कोई घर नहीं सकता, ऐसे ये वीर पर्वती को भी नगण्य तथा छ मानते हैं। ११९ महासमर के CिE जाने पर चतुराई से अपना कर्तप्य निभानेवाले, पनि आचाण रखने गले, धनस्थलों में संचार करने वाले, अधिक सोचविचारपूर्वक हलचलोंका सूत्रपात करनेवाले ये वीर मरद है । हम इन्ही धोरों की सराहना करने के लिए काव्यगायन करते हैं। तुम लोग भी अपना पैभव पढाने के लिए सीमता से चदाई करने वाले, लिए, पराक्रमी एवं सोम पीनेघाले महतों के निकट चले जाओ। टिप्पणी- [१२८४(१)पयोवृधः= चूंकि ये वीर गौको अपनी माना मानते हैं, इसलिए नित गोदुग्ध का सेबन कर के पुष्ट तथा वृद्धिंगत होते हैं । (२) मसाः= स्वयं ही यज्ञ करनेवाले । (३) स्व-सृतः स्वयं हलधक फरीवाले, जिन्हें अपनी निजी फूर्ति मे ही कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। (४) रुव च्युतः= सुरद शभों को भी जगह से हटानेवाले । (५) दु-ध्र-कृतः (दुर्धर, अन्यः धतुं अशक्यं मामानं कुर्वाणा ) =जिन्हें पकाना पा धेर ऐना दूमों को असम्भव तथा बीहट प्रतीत हो । (६) पर्वतान् उत् जिघ्नन्ते पहा को ये नगण्य एवं अकिंचिकर समानते हैं, इसलिए शग्रुदल पर चढ़ाई करते समय भगर राह में पहाड़ों की वजह से कठिनाई प्रतीत हो, तो भी उन्हें निनका मानकर पार चले जाते हैं और अपने गंतव्य स्थल को पहुँच जाते हैं। [१९] (1) पुः मन से जूभने में निपुण, प्रमश, हर्षित, चपल, फुताला । (३) यनिन् जंगलों में घूमने वाला। (३) वि-चर्पणि विशेप दंग से देखनेहास, विशेष रूप से हलचल करनेवाला, विशेष तरह की शक्ति से युक्त वीर। (५) रजस्-तुर- अनि धेग से चले जाने के कारण धूलि उदानेवाला, याहम जय तेन जाने लगता है, सब जिम रह गई या पूल बरा करती है, उस तरह धूलिकणोंको बिखरते हुए यात्रा करने वाला, भथवा (रज.) अन्तरिक्षमैसे विमानद्वारा (तुर) पीनतया जानेवाला । (५) जीपिन् - (ऋजीपः सोमायशेषः)सोमरस निचोड़ने के पश्चात् जो बचा हुभा अंश हता है। सोमरस की यनी हुई साने की चीज सेवन करनेवाला । (ऋजीपं पिष्टपचनं सापविशेषः । कौमुदी उणादि ४७१) " - D (१२०)प्र । नु । सः । मतः । शवसा । जनान् । अति। तस्थौ। वः।ऊती। मरुतः। यम्। आवत । अवभिः । वार्जम् । भरते । धना । नृऽभिः । आऽपृच्छयम् । ऋतुम् । आ । क्षेति । पुष्यति ॥ १३ ॥ (१२१) चर्कत्यम् । मरुतः । पुत्ऽसु । दुस्तरम् । धुऽमन्तम् । शुष्म॑म् । मघत्ऽसु । धत्तन । धनऽस्पृतम् । उक्थ्यम् । विश्वऽचर्पणीम्। तोकम् । पुष्येम । तनयं । शतम् । हिमाः ॥१४॥ (१२२) नु । स्थिरम् । मरुतः । वीरऽव॑न्तम् । ऋतिऽसहम् । यिम् । अस्मासु । धत्त । सहस्रिणम् । शतिनम् । शूशुऽवांसम्। प्रातः। मधु । धियाऽसुः । जगम्यात् ॥१५॥ अन्वयः-१२०(हे)मस्त.वि. ऊतीय प्र आवत स.मत शवसा जनान् अति नु तस्धा अर्वदाभ वाजनृभि धना भरते, पुष्यति, आपृच्छयं तु आ क्षेति। १२१ (हे) मस्त !मघ-पत्सु चरीत्य पृत्सु दुस्-तरं द्युमन्तं शुष्मं धन-स्पृत उपथ्यं विश्व चणि तोकं तनयं धत्तन,शतं हिमा पुप्येम। १२२ (हे ) मरत ! अस्मासु स्थिर वीर-चन्तं मती-पाहं शतिनं सहस्रिणं शूशुवांसं रयिं नु धत्त, प्रात धिया वसु मक्षु जगम्यात् । अर्थ- १२० हे (मरतः1) मरतो तुम (व. ऊती) अपनी सरक्षक शक्तिक द्वारा (यं प्र आरत) जिसकी रक्षा करते हो, (स. मतः ) यह मनुष्य (शवसा) वलमें (जनान् अति) अन्य लोगोंको अपेक्षा श्रेष्ठ होर (नु तस्थौ) स्थिर बन जाता है । (अवद्भि. याजं ) वद घुडसवारों के दल की सहायतासे अन पाता हे (भि धना भरते) चीरोंकी मदद से यथेष्ट मात्रामें धन इकट्ठा करता हे ओर (पुष्यति ) पुष्ट होता है। उसी प्रकार (आपृच्छय प्रतुं) सराहनीय यशकी ओर ( था क्षेति ) चला जाता है, अर्थात् यश परता है। १२१ हे (मरत. 1) वीर मरतो (मघ वत्सु ) धनिक तथा वैभवसंपन्न लोगोंमें (चईत्य) उत्तम कार्य करनेवाला, (पृत्सु दुस् तरं ) युद्धोंमें विजेता, (घुमन्तं ) तेजस्वी, (शुप्म ) वलिष्ठ (धन स्कृतं धन से युक्त, ( उक्थ्यं ) सराहनीय, (विश्व चणि ) सब लोगोंके हितकर्ता ( ताकं ) पुत्र एष (तनय ) पौन (धत्तन ) होते रहे। उसी प्रकार (शतं हिमा. पुप्येम ) हम सो वर्षतक जीवित रहकर पुष्ट हाते रहे। १२२ हे (मरुतः!) वीर मरुतो ! (अस्मासु) हममें (स्थिरं वीर यन्त) स्थायी तथा धीरोंसे युक्त, (सती पाह) शत्रुओश पराभव करनेवाले, ( शतिनं सहस्रिणं ) सेकडों ओर सहस्रो तरहके, (शनुवास) चर्धिष्णु (रवि) धन को (नु धत्त ) अवश्य ही धर दो। (मात ) प्रात काल के समय । धिया वसु.) युद्धिद्वारा काँका सम्पादन करके धन पानेयाले तुम (मक्षु जगम्यात् ) शीघ्र हमारे निकट चले आयो। भावार्थ- १२० ये धीर जिसकी रक्षा करते हैं, वह दूसरोंसे भी अपेक्षाकृत उच्च एव श्रेष्ठ ठहरता है और अपने पैदर तथा घुरसवारों के दल में विद्यमान वीरों की सहायतासे यथेष्ट धनधान्य बटोरता हुआ हटपुष्ट होकर भाँति मांतिके यज्ञ करता रहता है। १२१ उत्साह से कार्य करनेवाले, लडाइयों में सदैव विजयी बननेवाले, शक्ति तथा पलसे लबालब भरे हुए, धन पढानेवाले, सराहनीय, समूची जनताके हिसके रिए बढी लगनसे प्रयत्न करनेवाले पुन एप पौनधनाध्य लोगो के घरों में दरपर हो और हम पूरी एक शताब्दि तक जीवित रह कर पुष्टि प्राप्त करें। (धनिकों के प्रासाशेमे बिर कुल इसके विपरीत स्थिनि पाद जाती है, अत, यह मान भतीव महत्वपूर्ण चेतावनी दे रहा है।) १२२ हमे उस धनकी भावश्यकता है, जो चिकाव तक टिक मके, जिससे वीरता बढ जाए, शत्रुदर का नि.पात करना सुगम हो जाए, कीर्ति फैल सके और जो सैकसी सहनों प्रकारका हो, या जिमकी गिनतीम शतसल्या तथा सहस्रमख्याका उपयोग हो। टिप्पणी- [१२०] आपृच्छय ऋतु = प्रशसनीय यज्ञ । ।१२१] (१)चईत्य = बार बार बाछ कार्य मुशलतापूर्वक करनेवाल।। (२) पृत्सु दुस्तर = रणभूमि में जिसे परास्त करना असभव है । सदेव विनयी । (३) धन-स्कृत् = धन पाकर उसे यदानेवाला । (४) विश्व-चणि = समूचे मानवाका हित करनेवाला, सानिय राण के कार्य करनेवाला (Arorker imbned rath publte spirit). [१२० () वीरवत् =जिसके -- , रहगणपुत्र गोतममापि (ऋ०१॥ ८५/१-१२) (१२३) प्र । ये । शुम्भन्ते । जनयः । न । सप्तयः। यामन् । रुद्रस्य । सूनवः । सुऽदसंसः । रोदसी इति । हि । मरुतः । चक्रिरे । वृधे । मदन्ति । वीराः । विदथेषु । वृपयः॥१॥ (१२४) ते । उक्षितासः । महिमानम् । आशत । दिवि । रुद्रासः । अधि । चझिरे । सर्दः । अर्चन्तः । अर्कम् । जनयन्तः । इन्द्रियम् । अघि। श्रियः । दधिरे । पृश्निऽमातर॥२॥ अन्वयः- १०३ ये सु-दंससः सप्तय रद्रस्य सूनवः यामन् जनय न प्र शुम्भन्ते, मरुतः हि वृधे रोदसी चकिरे,घृष्वयः वीराः विदथेषु मदन्ति । १२४ रद्रास दिवि सद अधि चक्रिरे,अकै अर्चन्त इन्द्रियं जनयन्तः पृश्नि मातर श्रिय अधि दधिरे, ते उक्षितास महिमानं आशत। अर्थ- १२३ ( ये ) ये जो (सु-दंसस ) अच्छे कार्य करनेवाले, (सप्तयः) प्रगतिशील, (रदस्य सूनवः) महावीर के पुत्र वीर मरत् ( यामन् ) बाहर जाते हैं, उस समय (जनयान ) महिलाओं के समान (प्रशुम्भन्ते ) अपने आपको सुशोभित करते हैं। ( मरुतः हि ) मरुताने ही (वृधे) सव की अभिवृद्धि के लिए (रोदसी चक्रिरे ) धुलोक एवं भूलोक की प्रस्थापना कर डाली, तथा ये वीर (पृप्वयः वीराः) शरदल को तहसनहस करनेवाले शूर पुरुप हं ओर ( विदथेषु मदन्ति ) यशों में या रणांगणों में हर्षित हो उठते हैं। १२४ ( रद्रास ) शनुदल को रलानेवाले चीरोने (दिवि ) आकाश में (सद. अधि चक्रिरे) अच्छा म्यान या घर बना रखा है। ( अर्क अर्चन्तः) पूजनीय देवकी उपासना करते हुए, ( इन्द्रियं जन- यन्तः) इंद्रियों में विद्यमान शक्ति को प्रकट करते हुए, (पृश्नि मातरः) मातृभूमि के सुपुत्र ये वीर (थिय' अधि दधिरे ) अपनी शोभा एव चारुता बढा चुके हैं। (ते उक्षितासः) ये अपने स्थानों पर अभिपिक होकर (महिमानं आशत) वडप्पन को पा सके। भावार्थ- १२३ प्रगतिशील तथा शुभ कार्य करनेवाऐ ये पुरोगामी धीर बाहर निकटते समय महिलाओं की तरह अपने आप को मवारते हैं और खूप वन-उन के प्रयाण करते हैं । सय की प्रगति के लिए यथेष्ट स्थान मिले, इसलिए पृथ्वी एव भाकाश का सृजन हुआ है । भू-चर शत्रुओं की धज्जियां उड़ाने वाले ये घोर युद्ध का अवसर उपस्थित होते हीतीय उल्लसित एव प्रसन्न हो उठते है । लडाई का मौसम भानेपर इन वीरों का दिल हराभरा हो जाता है। १२४ सचमुच ये घोर युद्ध में विजयी बनकर स्वर्ग में अपना घर तैयार कर देते हैं । वे परमात्मा की उपा- सना करते है और अपनी शक्ति को बढ़ाते हैं, तथा मातृभूमिके कल्याण के लिए धनवैभव की वृद्धि करते हैं। अपनी जगह रहकर तथा उचित कार्य करके वपन प्राप्त करते हैं। समीप योर हो, शूर पुत्रो मे युक्त । (२) माती-पाह = (अती आक्रमण, हमला, चढाई शत्रुको हरामेवाला। (३) शूशुवान - प्रवृद्ध, यदा हुआ, बढनेवाला । (५)धिया-वसु - पुचि तथा कर्मशति से युक्त, बुद्धि से भांति भातिक कार्य पूर्ण करके धन कमानेया।। [१२३] (1) सु-दंसस् - शुभ कर्म करनेहारे । (२) सप्ति = सात सात रोगों की पक्तिमें खदे रहनेवाले या हमला करनेवाले, भूमि पर रेंगते हुए जाकर चढाई करनेवाले । (३) धृष्यय - शत्रुदरको मटियामेट करनेवाल, संघर्ष में शामिल हो दुओं को कुचरनेवाले । (५) विदथ - यश, पुर। (१२४ ] (1) अर्क - पूज्य, देय, सूर्य । (२) इन्द्रिय - इदशक्ति, इदियों की शक्ति, (इम्-द) शत्रुओं को पददलित एव पराभूत करने की शक्ति । ( ३ ) पृश्निमातर = गौमाता तथा भूमि से माता माननेगरे । (१) उक्षित= सिंचित, स्थान पर मभिषिक।

४५ (१२५) गोऽमातरः । यत् । शुभयन्ते । अञ्जिऽभिः । तनपु । शुभ्राः । दधिरे 1 विरुक्मतः । वाधन्ते । विश्वम् । अभिऽमातिनम् । अप। वत्मानि । एषाम् । अनु । रीयते । धृतम् ॥३॥ (१२६) वि । ये । श्राजन्ते । सुऽमसासः 1 ऋष्टिऽभिः । प्रऽच्यचर्यन्तः । अच्युता । चित् । ओज॑सा । मनाऽजुवः । यत् । मरुतः । रथेषु । आ । वृषऽवातासः। पृर्पतीः । अयुग्धम् । ॥४॥ अन्यय . १२५ शुभ्रा गो-मातरः यत् अजिभि शुभयन्ते तनूषु बि-रुक्मत दधिरे, विश्व अभिमातिनं अप वाधन्ते, एप वर्मानि घृतं अनु रीयते । १२६ ये सु-मखास ऋष्टिभि विभ्राजन्ते, (हे) मरत ! यत् मनो-जय वृप-मातास रथेषु पृपती. आ अयुग्ध्वं, अच्युता चित् ओजसा प्रच्यवयन्त । अर्थ- १०५ (शुभ्राः) तेजस्वी, (गो-मातरः ) भूमि को माता समझनेवाले चीर ( यत् ) जब (अजि- भिः शुभयन्ते ) अलंकारों से अपने को सुशोभित करते है, अपनी सजावट करते हैं, तब वे (तनूपु) अपने शरीरों पर (विसमत. दधिरे) विशेष ढंग से सुहानेवाले आभूषण पहनते हैं. वे (विश्वं अभि. मातिनं ) सभी शत्रुओं को (अप वाधन्ते) दूर हटा देते हैं, उनकी राह में रुकावटें सडी कर देते है, इसलिए (एषां ) इनके (वानि) मार्गों पर (घृतं अनु रीयते ) घी जैसे पौष्टिक पदार्थ इन्हें पर्याप्त मात्रा में मिल जाते है। १२६ (ये सु-मसासः) जो तुम अच्छे यश करनेवाले वीर (ऋष्टिभिः) शस्त्रों के साथ (चि भ्राजन्ते) विशेष रूपसे चमकते हो, तथा हे (मस्त !) मरतो । ( यत् ) जब ( मनो-जवः) मन की नाई वेग से जानेवाले ओर (वृष वातासः ) सामर्थ्यशाली संघ बनानेवाले तुम (रयेषु) अपने रथों में (पृपतीः आ अयुग्ध्वं) धन्धेवाली हिरनियाँ जोडते हो, तर (अच्युना चित्) न हिलनेवाले सुदृढ शनुओं को भी (ओजसा ) अपनी शक्ति से (प्रच्यवयन्तः ) हिला देते हो। भावार्थ- १२५ गौ एवं भूमि को माता माननेवाले वीर भाभूपों तथा हथियारों से निजी शरीरों को सूब सजाते है भौर चूंकि वे शादरों का संहार करते हैं, अतएव उन्हें पौष्टिक भन्न पयांप्त रूप से मिलता है। १२६ मेष्ठ पक्ष करभेवाले, मम के समान वेगवान् तथा बरिष्ठ हो सघमय जीवन बिताने वाले वीर शास्त्रों से सुमग्न यन रथ पर चढ जाते हैं और सुदृढ शत्रुओं को भी जडमूल से उखाद फेंक देते हैं। टिप्पणी- [ १२५) (1) गो-मातर = गाय एवं भूमिको मातृगम् समझनेवाले। (२) अभिभाभूपण, शन, गणवेश (देखो मंत्र ९०)। (३) वि-मत् = विशेप चमकीले गहने । (४) अभिमातिन् = हत्या फरमेषाचा [१२६ ] (१) सु-मस = भन्छे यज्ञ तथा कर्म करनेवाले। (२) वृप-वात - बलवानों का संघ, भभेष संघ बनाकर रहनेवाले । (३) अ-च्युता प्रध्यवयन्त % स्थिरों तर को हिला देते हैं, पिरकाल से हुए शत्रुओं को भी अपदस्थ करा के विनष्ट करते हैं (देखिए मंत्र ८६ और १०)। स्थायी बने । ४६ (१२७) प्र । यत् । रथेषु । पृपतीः । अयुग्धम् । वाजे ! अद्रिम् । मस्तः । रहयन्तः । उत । अरुपस्य । वि।स्यन्ति । धारी। चर्मऽइव । उदामि । वि ! उन्दन्ति । भूमं ॥५॥ (१२८) आ।व। वहन्तु । सप्तयः । रघुऽस्यदः। रयुऽपत्यानः ।प्र। जिगात । बाहुमिः । सीदेत । आ। यहिः । जुरुरायः। सदः। कृतम्। मादयध्वम् । मरुतः। मधः अन्धसः ॥६॥ (१२९) ते । अपर्धन्त । स्वऽविसः। महिऽत्वना । आ। नाकम् । तस्थुः । उरु । चक्रिरे । सदः । विष्णुः। यत् । ह । आयेत् ।चूपणम् । मदुऽच्युतम्। वर्यः। नासीदन् । अधि । यहिपि। प्रिये ॥७॥ अन्यय - १२७ ( है ) मस्त ! वाजे अदि रहयन्त. यत् रथेप पृपती प्र अयुग्ध्यं उत अ-रूपम्य धारा: वि स्यन्ति उदभिः भूम चर्मय घि उन्दन्ति। १२८ व रघु-स्यदः सप्तय आ पहन्तु, रघु-पत्वानः बाहुभि प्र जिगात, (हे )मस्त !य उरु सद. कृतं, यदिः आ सीदत, मध्न अन्धस. मादयध्वं । १९ ते व-तयस अवर्धन्त, महित्वना नाकं आ तस्थु , उरु सद् चक्रिरे, यत् वृषणं मद-च्युतं विष्णु आवत् द प्रिये पहिषि अधि, ययः न, सीदन् । अर्थ- १२७ हे (मरुतः) वीर मरतो! (वाजे) अग्नके लिए (अदिरंदयन्त.) मेघोको प्रेरणा देते हुए, (यत) जिस समय (रथेपु पती म अयुग्ध्य) रथोंमें धन्येवाली हिरनियाँ जोड देते हो, (उतो उस समय (अपस्य धाराः) तनिक मटमैले दिखाई देनेवाले मेघकी जलधाराएँ (वि स्यन्ति ) धेगपूर्वक नीचे गिरने लगती हैं और उन (उदभिः) जलप्रवाहोंसे (भूम) भूमिको (चर्मइव)चमडी के जैसे (वि उन्दन्ति)भीगी या गीली कर डालते हैं। १०८(:) तुम्हें ( रघु स्यद सतयः) वेगसे दौडनेयाले घोडे इधर (आ यहन्तु ) ले आयें, (रघु पत्यानः ) शीघ्र जानेयाले तुम (बाहमि ) अपनी भुजाओं में विद्यमान शक्ति को पराकमद्वारा प्रकट करते हुए इधर (प्रजिगात ) आओ। है (मरतः! ) पोर मरुतो। (यः) तुम्हारे लिए (उर सदः) बडा घर, यज्ञस्थान हम ( कृतं ) तैयार कर चुके है, (यदि आ सीदत ) यहाँ दर्भमय आसन पर बैठ जाओ और (मध्वः अन्धसः) मिठास भरे अन्नके सेवन से (मादयचं) सन्तुष्ट एवं हर्पित बनो। १२९ (ते) ये योर (स्त्र-तवस ) अपने बलसे ही (अवर्धन्त पढते रहते हैं। वे अपने (महि- त्यना) बडप्पन के फलस्वरूप ( नाकं आ तस्थुः ) स्वर्ग में जा उपस्थित हुए। उन्होंने अपने निवास के लिए ( उस सद' चमिरे ) वडा भारी विस्तृत घर तैयार कर रखा है। ( यत् पृपणं ) जिस यल देनेवाले तथा (मदच्युतं ) आनन्द बढानेवालेका (विष्णुः आयत् ह ) व्यापक परमात्मा स्वयं ही रक्षण करता है, उस (प्रिये वर्दिपि अधि ) हमारे प्रिय यक्ष में (चय न )पंछियों की नाई (सीदन् ) पधार कर बैठो। भावार्थ-१७ मरुत् मेघों को गतिशीर बना देते है, इसलिए घर्षाका प्रारम्भ हो जल समूह से समूची पृथ्वी भाई हो उठती है। १२८ फुर्तीले घोदे तुम्हें इधर लाय तुम जैसे शीघ्रगामी अपने पाहुबलसे तेजस्वी बनकर इधर भामो । योकि तुम्हारे लिए पहा विस्तृत स्थान यहाँ पर तैयार कर रखा है। इधर पधार कर तथा भासनों पर बैठकर मिठास से पूर्ण भन या सोमरमका सेवन कर हर्षित बनो। १२९ वीर अपनी शक्तिसे पटे होते हैं। अपनी तस्वशक्ति से स्वर्ग सक चढ़ जाते है और अपने घर से विशाल जगह पर प्रभुत्व प्रस्थापित करते हैं। ऐसे वीर हमारे यसमें शीघ्र ही पधारें। टिप्पणी- [१२७१(1) अद्रि पर्वत या मेघ । (२) अ-रुप = तेजहीन, मलिन, निष्प्रभ (मेघ), सप्तेज, प्रकाश। [२८] (6) रघु-स्पद- (रघु-स्यद) चपल, बडे वेग से जानेवाए।। (२) रघु-पस्वन् - (लघु परवन्) शीघ्रगति, वेगवान्, तेज उडने नारा 1 (३) अन्यस् - अन्न, सोमरम। [१२९J (१) स्व-तवस अवर्धन्त - सभी धीर भपने निजी बरसे करते हैं । (२) महित्वना नाकं आ तस्थु = अपनी महिमा सथा परप्पन से स्वर्ग परके ऊँचे पद पर जा बैठते है । (३) उरु सद चक्रिरे = अपने प्रयानसे अपने लिए विस्तृत स्थान निर्माण करते हैं। (५) मदच्युतं वृपणं विष्णु भावत् = भानन्द देनेवाले बलिष्ठ पीर की रक्षा करने का पीडा विप्न ही उठाता है।

(१३०) शूऽइव । इत् । युयुधयः । न । जग्मयः। श्रवस्यवः । न । पृतनासु । येतिरे। भयन्ते । विश्वा । भुवना । मरुत्ऽभ्यः। राजानःऽइन । वेपऽसदृशः। नरः ।। ८ ।। (१३१) त्वष्टौ । यत् । वज्रम् । सुऽकृतम् । हिरण्यय॑म् । सहस्रऽभृष्टिम् । सुऽअपाः। अवर्तयत् । धत्ते । इन्द्रः । नारे । अपौसि । कतवे । अहन् । वृत्रम् । निः । अपाम् । औब्जत् । अर्णनम् ॥ ९॥ अन्वयः-- १३० शूरा इव इत्, युयुधय न जग्मय , श्रवस्यव न पृतनासु येतिरे, राजान इव त्येप- संदृश नर मरुद्भय विश्वा भुवना भयन्ते । १३१ स अपाः त्वष्टा यत् सु-कृतं हिरण्ययं सहन-भृष्टि यग्नं अवर्तयत् इन्द्रः नरि अपांसि कर्तये धत्ते, वर्णवं पुत्र अहन्, अपां नि. ओजत् । अर्थ- १३० (शूरा इन इत्) वीरों के समान लड़ने की इच्छा करनेवाले (युयुधया न जम्मय ) योद्धाओंकी नाई शर पर जा चढाई करनेवाले तया ( श्रवस्ययन) यशकी इच्छा करनेवाले पीरोंके जेसे ये चीर (पृतनासु येतिरे ) संग्रामों में पड़ा भारी पुरपार्थ कर दिसलाते है। (राजान इव ) राजाओं के समान (त्येप-संदृश ) तेजस्वी दिखाई देनेवाले ये (नर ) नेता वीर है, इसलिए (मरद्भ्य ) इन मस्तों से (विश्वा भुवना भयन्ते ) सारे लोक भयभीत हो उठते है। १३१ (सु-अपा.) अच्छे फौशल्यपूर्ण कार्य करनेवाले ( त्वष्टा ) कारीगरने (यत् सु-कृतं) जो अच्छी तरह बनाया हुआ. (हिरण्ययं ) सुवर्णमय, (सहन-भृष्टिं यत्रं ) सहस्र धाराओं से युक्त वन इन्द्र को (अवर्तयत् )दे दिया, उस हथियार को ( इन्द्र ) इन्द्रने (नरि) मानवों में प्रचलित युद्धों में (अपांसि पतये ) वीरतापूर्ण कार्य कर दिखलाने के लिए (धत्ते ) धारण किया और (अर्ण-चं वृत्रं महन् ) जल को रोकनेवाले शत्रु को मार डाला तथा (अपां निः औजत् ) जल को जाने के लिए उन्मुक्त कर दिया। भावार्थ- १३० ये वीर सच्चे सूरी की भाँति लडते हैं, योद्धाओं के समान शत्रुसेनापर भाक्रमण कर बैठते है। कीर्ति पाने के लिए एहनेवाले वीर पुरषों की नाई ये रणभूमि में भारी पराक्रम करते है। जैसे राजालोग तेजस्वी दीख पहते हैं, ठीक वैसे ही ये हैं। इसलिए समी इनसे अवोध प्रभावित होते है। १३१ अत्यन्त निपुण कारीगरने एव वन नामक शस्त्र तैयार कर दिया, जिसकी सहस धाराएँ या नोक विद्यमान थे और निल पर शोभा के लिए मुनहली पच्चीकारी की गयी थी । इन्द्रने उस श्रेष्ठ भायुध को पाकर मानय- जाति में वारपार होनेवाली खदाइयों में शूरता की अभिव्यजना करने के लिए उसका प्रयोग किया । जलस्रोत पर प्रमुख प्रस्थापित करके दफनेवाले तथा घेरनेवाले शत्रु का वध करके सर के लिए जल को उन्मुक्त कर रखा। टिप्पणी- [१३१] (१) स्वपा = (सु+भपा ) = अग्छे दग से पच्चीकारी आदि कार्य करनेवाला धतुर कारीगर । (२) सु-कृतं - सुन्दर बनावट से निर्माण किया हुमा। (३)सहन-भूष्टि = सहस नोकों से युक्त । (४)नार = युद्ध मे, मनुष्यों के मध्य होनेवाले सघर्षों में । (५) अप = कर्म, कृस्य, पराक्रम । (६) अर्ण-व - जक को रोकनेवाला, अपने लिए जल रखनेवाला । (७) वृन = आचरण करनेवाला, घेरनेवाला शत्रु। वृत्रासुर, एक राक्षस का नाम । - - - ४६ (१२७) प्र । यत् । रथेषु ! पृपतीः । अयुग्ध्वम् । वाजे । अद्रिम् । मरुतः । रहर्यन्तः । उत । अरुपस्य । वि।स्यन्ति । धाराः। चर्मऽइन । उदभिः। वि । उन्दन्ति ! भूमं ॥५॥ (१२८) आ। यः । बहन्तु । सप्तयः । रघुऽस्पदः। रघुऽपत्वानः । प्र । जिगात । याहुभिः । सीदत । आ। बर्हिः । उतावः । सदः। कृतम्। मादयधम् । मरुतः। मचः। अन्धसः ॥६॥ (१२९) ते । अवर्धन्त । स्वऽविसः। महिऽतना | आ। नाकम् । तस्थुः । उरु | चक्रिरे । सदः । विष्णुः। यत् । ह । आवत् । वर्पणम् । मद्ऽच्युतम्। वः। नासीदन् । अधि । पहिपि प्रिये ॥७॥ अन्वय - १२७ ( है ) मरुत ! वाजे अदि रहयन्त यत् रथेषु पृपती प्र अयुग्ध्यं उत अ-रुपस्य धाराः विस्यन्ति उदभि भूम चर्मइव वि उन्दन्ति । १२८ व रघु स्यद सप्तय आ वहन्तु, रघु पत्वानः पाहुभि प्र जिगात (हे )मरुत !व उरु सद कृतं, बर्हि आ सीदत, मध अन्धस मादयध्वं । १२९ ते स्व-तपस अवर्धन्त, महित्वना नाकं आ तस्थु , उर सद चमिरे, यत् वृषणं मद व्यतं विष्णु आवत् ह प्रिये बहिपि अधि, क्यान, सीदन् । अर्थ- १२७ हे (मरत !) वीर मरतो। (वाजे) अन्नके लिए ( अदिरहयन्त.) मेघोंको प्रेरणा देते हुए, (यत) जिस समय (रथेपु प्रपती अयुग्ध्य) रथोंमें धन्येवाली हिरनियाँ जोड देते हो, (उत)उस समय (म रुपस्य धाराः) तनिक मटमैले दिखाई देनेवाले मेघकी जलधाराएँ (वि स्यन्ति ) वेगपूर्वक नीचे गिरने लगती हैं और उन (उदमि.) जलप्रवाहोंसे (भूम) भूमिको (चर्मइब) चमडी के जेसे (चि उन्दन्ति) भीगी या गीली कर डालने है। १२८ (वा) तुम्हें ( रघु स्यद सतयः) वेगसे दोडनेवाले घोडे इधर (आ यहन्तु ) ले आयें, (रघु पत्यान.) शीघ्र जानेवाले तुम (बाहामि ) अपनी भुजाओं में विद्यमान शक्ति को पराक्रमद्वारा प्रकट करते हुए इधर (प्र जिगात ) आओ। हे (मरतः! ) वीर मरुतो! (च) तुम्हारे लिए (उरु सदः) बडा घर, यज्ञस्थान हम ( कृत ) तैयार कर चुके है, (पर्हि आ सीदत ) यहाँ दर्भमय आसन पर वेट जाओ और (मध्यः अन्धसः) मिठास भरे अन्नके सेवन से (मादयध्वं ) सन्तुष्ट एवं हर्षित यनो। १२९ (ते) वे बोर (स्त्र तयस ) अपने पलसे ही ( अपर्धन्त ) चढते रहते हैं। ये अपने (महि- त्वना ) वडप्पन के फलस्वरूप ( नाकं आ तस्थु ) स्वर्ग में जा उपस्थित हुए । उन्होंने अपने निवास के लिए ( उर सद चक्रिरे) वडा भारी विस्तृत घर तैयार कर रखा है। ( यत् वृपण ) जिस बल देनेवाले तथा (मद च्युतं ) आनन्द बढानेयालेका (विष्णुः आवत् ह) व्यापक परमात्मा स्वयं ही रक्षण करता है, उस (प्रिये पहिपि अधि) हमारे प्रिय यज्ञ में (यय न )पंछियों की नाई (सीदन् । पधार कर बैठो। भावार्थ- १२७ मरत मेघों को गतिशीर बना देते हैं, इसलिए वर्षाका प्रारम्भ हो जर ममूह से समूची वो भाई हो उठती है। १२८ फुतीले घोटे तुम्हें इधर लायें । तुम जैसे शीमगामी अपने याहुबल से तेजस्वी बनकर इधर भामो क्योंकि तुम्हारे लिए पहा विस्तृत स्थान यहाँ पर तैयार कर रखा है। इधर पधार कर तथा भासतों पर बैठकर मिठास से पूर्ण भन या सोमरसका सेवन कर हर्पित चनो। १२९ वीर अपनी शाहिसे बड़े होते हैं। अपनी तस्वशक्ति से स्वर्ग तक चढ़ जाते हैं और अपने बल से विशाल जगह पर प्रभुत्व प्रस्थापित करते हैं। ऐसे वीर हमारे यसमें शीघ्र ही पधारें । टिप्पणी-[१२७] (1) अद्वि : पर्वत या मेघ । (२) य-रुप तेजहीन, मलिन, नियम (मय), रुप्सेम, प्रकाश । [१२८] (6) रघु-स्य- (एघु-स्यद्) चपल, बहे थेग से जानेवाला1 (२) रघु-पत्वन - (धु परवन्) शीघ्रगति, वेगवान, तेज उड़ने वारा (३) अन्यस् = भन, मोमरम। [१२९] (1) स्प-तवस अवर्धन्त: सभी धीर भपने निजी बरसे पाते हैं । (२) महित्वना ना आ तस्थु = अपनी महिमा तथा परपन से स्वर्ग परके अचे पद पर जा बैठते हैं । (३) उर सद चक्रिरे = अपने प्रयानसे अपने लिए विस्तृत धान निर्माण करते है।) मदच्युतं यूपणं विष्णु आवत् = भानन्द देनेवाले बलिष्ठ पीर की रक्षा करने का वादा विष्णु ही उठाता है। - (१३०) शूरोऽइव । इत् । युयुधयः । न । जग्मयः। श्रवस्यवः। न । पृतनासु । पैतिरे । भयन्ते । विश्वा । भुवना | मरुतऽभ्यः। राजानःऽइव । त्वेषऽसैदशः । नरः ॥ ८॥ (१३१) त्वष्टा । यत् । वर्जम् । सुकृतम्। हिरण्ययम् । सहस्रऽभृष्टिम् । सुऽअपाः । अवर्तयत् । धुत्ते । इन्द्रः । नार । अपासि । कतवे । अहेन् । पुत्रम् । निः । अपाम् । औब्जत् । अर्णवम् ।। ९ ।। अन्यय:- १३० शूराःइव इत्, युयुधयः न जग्मयः, श्रवस्यवः न पृतनासु येतिरे, राजान इव त्येप- संरशः नः मरुद्भयः विश्वा भुवना भयन्ते । १३१ सु-अपाः त्वष्टा यत् सु-कृतं हिरण्ययं सहन-भृष्टिं वनं अवर्तयत् इन्द्रः नरि अपांसि कर्तये धत्ते, अर्णवं वृत्रं अहन् , अपां निः औञ्जत् । अर्थ- १३० (शूराइव इत्) चीरों के समान लड़ने की इच्छा करनेवाले (युयुधया न जग्मयः) योद्धाभोंकी नाई शत्रु पर जा चढाई करनेवाले तथा ( श्रवस्यव न ) यशकी इच्छा करनेवाले पौरोंके जैसे ये वीर ( पृतनासु येतिरे ) संग्रामों में प्रडा भारी पुरुषार्थ कर दिसलाते हैं। (राजान इव ) राजाओं के समान ( त्येप-संदृशः ) तेजस्वी दिखाई देनेवाले ये (नरः) नेता वीर है, इसलिए (मरुद्भ्यः) इन मरुतों से (विश्वा भुवना भयन्ते ) सारे लोक भयभीत हो उठने हैं। १३१ (सु-अपाः) अच्छे कौशल्यपूर्ण कार्य करनेवाले ( त्वष्टा ) कारीगरने (यत् सु-कृत) जो अच्छी तरह बनाया हुआ. (हिरण्ययं ) सुवर्णमय, ( सहन-भृष्टिं वज्रं ) सहस्र धाराओं से युक्त वज्र इन्द्र को ( अवर्तयत् ) दे दिया, उस हथियार को ( इन्द्रः ) इन्द्रने (नरि) मानवों में प्रचलित युद्धों में (अपांसि फर्तये ) वीरतापूर्ण कार्य कर दिखलाने के लिए (धत्ते ) धारण किया और ( अर्ण-यं वृनं महन् ) जल को रोकनेवाले शत्रु को मार डाला तथा (अपां निः औञ्जत् ) जल को जाने के लिए उन्मुक्त कर दिया। भावार्थ- १३० ये वीर सच्चे शूरों की भांति लडते हैं, योद्धाओं के समान सेनापर आक्रमण कर बैठते हैं, कीर्ति पाने के लिए लडनेवाले वीर पुरुषों की नाई ये रणभूमि में भारी पराक्रम करते है। जैसे राजालरोग तेजस्वी दीख पहते हैं, ठीक वैसे ही ये हैं। इसलिए सभी इनसे अतीय प्रभावित होते है। १३१ मध्यन्त निपुण कारीगरने एक बज्र नामक शव तैयार कर दिया, जिसकी सहम धाराएं या नोक विधमान ये और जिस पर शोभा के लिए सुनहली पच्चीकारी की गयी थी। इन्द्रने उस श्रेष्ठ भायुध को पाकर मानव- जाति में पारंपार होनेवाली दाइयों में शूरता की अभिव्यंजना करने के लिए उसका प्रयोग किया। जलस्रोत पर प्रमुख प्रस्थापित करके ढकनेवाले तथा घेरनेवाले शत्रु का वध करके सब के लिए जळ को उन्मुक्त कर रखा। टिप्पणी- [१३१] (१) स्वपाः = (सु+भपाः) = अच्छे ढंग से परचीकारी आदि कार्य करनेवाला चतुर कारीगर। (२)सु-मृतं - मुन्दर बनावट से निर्माण किया हुआ। (३)सहन-भृष्टिः - सहस्र नोको युक। (१) नरि - युद्ध में, मनुष्यों के मध्य होनेवाले संघर्षों में । (५) अपः = कर्म, कृप, पराक्रम । (६) अर्णव = जल को रोकनेवाला, अपने लिए जल रखनेवाला । (७) वृत्र = आवरण फरनेवाला, घेरनेवाला शा त्रासुर, एक राक्षस का नाम ।

४८ (१३२) ऊर्ध्वम् । नुमुद्रे । अवतम् । ते । ओज॑सा। हाणम् । चित् । विभिदुः । वि। पर्वतम् । धम॑न्तः । वाणम् । मरुतः । सुऽदानवः । मदै । सोमस्य । रण्यांनि । चक्रिरे ।। १०॥ (१३३) जिलम् । नुनुढें । अवतम् । तयां। दिशा । असिंश्चन् । उत्सम् । गोतमाय । तृष्णऽजै। आ । गच्छन्ति । ईश् । अव॑सा । चित्रभानवः । कामम् । विप्रस्य । तर्पयन्त । धामऽभिः ॥ ११॥ अन्धयः-- १३२ ते ओजसा ऊवं अवतं नुनुद्रे, दहाणं पर्वतं चित् वि विभिदुः, सु-दानवः मरतः सोमस्य मदे वाणं धमन्तः रण्यानि चक्रिरे। १३३ अवतं तया दिशा जिलं नुनुद्रे, तृष्णजे गोतमाय उत्सं असिञ्चन् , चित्र-भानवः अवसा ईगच्छन्ति. धामभिः विप्रस्य कामं तर्पयन्त। अर्थ- १३२ (ते) चे वीर (ओजसा ) अपनी शक्ति से (ऊध्ये अवतं ) ऊँची जगह विद्यमान तालाब या झील के पानी को (नुमुद्रे ) ग्रेरित कर चुके और इस कार्य के लिए (दहाणं पर्वतं चित्) राह रोडे अटकानेवाले पर्वत को भी (वि विभिदुः) छिन्नविच्छिन्न कर चुके । पश्चात् उन (सु-दानयःमरता) अच्छे दानी मस्ताने (सोमस्य मदे ) सोमपान से उद्भूत आनन्द से (याणं धमन्तः) चाण बाजा बजा फर (रण्यानि चक्रिरे) रमणीय गानों का सृजन किया। १३३ वे धीर (अवतं ) झील का पानी (तया दिशा) उस दिशा में (जिलं) तेढी राह से (नुनद्रे) ले गये और (तृष्णजे गोतमाय ) प्यास के मारे अकुलाते हुए गोतम के लिए ( उत्सं असि- ञ्चन ) जलकुंड में उस जल का झरना वढने दिया। इस भाँति चे (चित्र-भानवः ) अति तेजस्वी वीर (अवसाई) संरक्षक शक्तियों के साथ ( आ गच्छन्ति ) आ गये और (धामभिः) अपनी शक्तियों से (विमस्य कामं ) उस मानी की लालसा को (तर्पयन्त ) तृप्त किया । भावार्थ- १३२ ऊँचे स्थान पर पाये जानेवाले तालाय का पानी मरतों ने नहर यनाकर दूसरी ओर पहुँचा दिया और ऐमा नहर खुदाई का कार्य करते समय राह में जो पदाट रुकावट के रूप में पाये गये थे, उन्हें काटकर पानी के पहाच के लिए मार्ग बना दिया। इतना कार्य कर चुकने पर सोमरसको पीकर पडे भानन्दसे उन्होंने सामगायन किया । १३३ इन वीरों ने रेडीमेदी राह नहर खुदवाकर झील का पानी अन्य जगह पहुंचा दिया और अरपिके भायम में पीने के जल का विपुल संचय कर रखा, जिसके फलस्वरूप गोतमजी की पानी की भावश्यकता पूर्ण हुई। इस भाँति ये तेजःपुक्ष वीर दल पल समेत राया पाक्तिप्तामर्थ से परिपूर्ण हो इधर पधारते हैं और अपने भक्तों तथा भनुयायियों की लालसाओं को तृप्त करते हैं । [ देखिए मंत्र १३२, १५४ ] टिप्पणी - १३२ (१) अवतं = कूभाँ, कुंड, रोज, जल का संचय, तालाब, रक्षण करनेवाला । मंत्र १६ तया १५४ देखिए । (२) नुद् = प्रेरित करना । (३) दशहाणं = यहा हुआ, मार्ग में पदकर खडा हुआ ।(.) वाणं = मंत्र ८९ देखिए ('शतसंख्याभिः तंत्रीभिर्युक्तः वीणाविशेषः' सायणभाष्य) सौ तारों का पनापा हुभा एक तंतुवाच । [१३३] (1)जिल = कुटिल, टेढा, ध। (२) धामन् - तेज, शक्ति, स्थान । (३) अवतः (भवटः) = गहरा स्थान, साई; १३२ चा मंत्र देखिए । (४) गोतम = बहुतसी गौएँ साथ रख ऋषि, जिसके भाश्रम में अनगिनती गौमों का झुट दिखाई पडता हो।

(१३४) या । : । शर्म । शशमानाय । सन्ति । त्रिधातूनि । दाशुपै । यच्छत । अधि । अस्मभ्यम् । तानि । मरुतः । वि | यन्त । रयिम् । नः । धत्त । वृषणः । सुवीरम् ॥ १२ ॥ (र. ११८11-10] (१३५) मरुतः । यस्य । हि । क्षये। पाथ । दिवः । विऽमहसः । सः । सुऽगोपातमः । जनः ॥ १ ॥ अन्ययः- १३४ (हे) मरुतः! शशमानाय प्रि-धातूनि यः या शर्म सन्ति, दाशुषे अधि यच्छत, तानि अस्मभ्यं वि यन्त, (है) वृषणः !नः सु-धीरं रयिं धत्त । १३५ (हे ) यि-महसः मक्तः! दियः यस्य हि क्षये पाथ, सः सु-गो-पा-तमः जनः । अर्थ-१३४ हे (मरतः!) घोर मरुतो ! (शशमानाय ) शीघ्र गति से जानेवालों को देने के लिए (नि-धातूनि ) तीन प्रकार की धारक शक्तियों से मिलनेवाले (या या गर्म ) तुम्हारे जो सुप (सन्ति ) विधमान है और जिन्हें तुम ( दाशुषे अधि यच्छत ) दानी को दिया करते हो, (तानि) उन्हें (अस्मभ्यं वि यन्त ) हमें दो। हे (पृपणः !) यलवान योरो! (नः ) हमें ( सुवीरं ) अच्छे पीरों से युक्त (रपि) धन (धत्त) दे दो। १३५ हे (वि-महसः मरुतः!) विलक्षण ढंग से तेजस्वी वीर मरुतो! ( दियः) अन्तरिक्ष में से पधारकर (यस्य हि क्षये ) जिस के घर में तुम (पाथ ) सोमरस पीते हो. (सः) यह (सु-गो पा. तमः जनः) अत्यन्त ही सुरक्षित मानव है। भायार्थ-१३४ विविध धारक शक्तियों से जो कुछ भी मुख पाये जा सकते हैं, उन्हें घे धीर श्रेष्ठ कार्यों को शीघ्रता से निभानेवालों के लिए उपभोगाय देते हैं। हमारी लालसा है कि हमें भी घे मुख मिल जाय तथा उच्च कोटि के धीरों से रक्षित धन हमें प्राप्त हो । (भिप्राय इतना ही है कि, धन तो अवश्यमेध कमाना चाहिए और उस की समु. पित रक्षा के लिए भावश्यक योरता पाने के लिए भी प्रयत्नशील रहना चोहए।) १३५ तेजस्वी धीर लोग जिस मानय के घर में सोम का ग्रहण करते हैं, यह अवश्यमेव मुरक्षित रहेगा, ऐसा मानने में कोई भापत्ति नहीं। विशेष महत टिप्पणी- [१३४] (1) शशमान:- (शर प्लुतगती ) शीघ्र गति से जानेवाले, जन्द कार्य पूरा करनेवाले (देखो मंत्र ४२)। (२) विधातु - सीन धातुओं का उपयोग जिस में हुभा हो; तीन स्थानों में जो है। तीन भारक शक्तियों से युक्त। (१)शर्म = मुस, घर, आश्रयस्थान। [१३५] (1) वि-महस् पहासेज । (२)क्षयः (शि नियासे ) = घर, स्थान । (३)सु-गो-पा-तमः = उपच कोटिकी गांभोंकी भली माति रक्षा करने वाला, रक्षक वीरों से युक्त। पद से हमें यह सूचना मिलती है कि, गाय की यथावन रक्षा काना मानों सर्वस्व का संरक्षण करना ही है। मरत् [हिं.]७ D (१३६) यज्ञैः । या । यजऽवाहसः। विनस्य । वा । मतीनाम् । मरुतः शृणुत । हयम् ॥२॥ (१३७) उत । चा । यस्य । वाजिनः । अनु । विप्रंम् । अतक्षत । सः । गन्ता । गोऽमति । जे ॥ ३ ॥ (१३८) अस्य । बीरस्य । यहिर्पि। सुतः । सोमः । दिविष्टिषु । उक्थम् । मदः । च । शस्यते ॥ ४ ॥ अन्वय.--१३६ (हे) यश-वाहसःमरुतः ! यह वा विप्रस्य मतीनां वा, हवं शृणुत। १३७ उत या यस्य वाजिनः विनं अनु अतक्षत. सः गो-मति प्रजे गन्ता। १३८ दिविष्टिपु बहिपि अस्य वीरस्य सोमः सुतः, उस्यं मदः च शस्यते । अर्थ- १३६ हे ( यज्ञ वाहसः मरुतः ! ) यज्ञ का गुरुतर भार उठानेवाले मरतो ! ( यहः या ) यशों के द्वारा या (विमस्य मतीनां वा विद्वान् को बुद्धि की सहायता से तुम हमारी (हवं शृणुत) प्रार्थना सुनो। १३७ ( उत या ) अथवा ( यस्य वाजिनः ) जिस के यलवान् वीर (विमं अनु अतक्षत) ज्ञानी के अनुकूल हो, उसे श्रेष्ठ बना देते हैं. (सः ) वह (गो-मनि प्रजे) अनेक गौओं से भरे प्रदेश में (गन्ता) चला जाता है, अर्थात् वह अनगिनती गौएँ पाता है। १३८ (दिविष्टिपु = दि-इष्टिपु) इष्टिके दिन में होनेवाले (बर्हिपि) यज्ञमें, (अस्य चीरस्य)इस बार के लिए, (सोमः सुतः) सोम का रस निचोडा जा चुका है। ( उक्थं ) अब स्तोत्र का गान होता है और सोमरस से उद्भूत ( मदः च शस्यते ) आनन्द की प्रशंसा की जाती है भावार्थ- १३६ यज्ञों के अयात् कमी के द्वारा तथा ज्ञानी लोगों की सुमतियों याने भरछे सहयों के प्रार्थना होती है, सो नुम सुनो। १३७ यदि वीर ज्ञानी के अनुकूल पर्ने, सो उस ज्ञानी पुरुप को पहुतसी गौएँ पाने में कोई कठिनाई नहीं होती है। १३८ जिन दिनों में यज्ञ प्रचलित रखे जाते हैं, तर सोमरस का सेवन तथा सामगान का श्रवण जारी रहता है। टिप्पणी-{१३६ ] किसी न किसी भादर्श या ध्येय को सामने रखकर ही मानव कर्म में प्रवृत्त होता है और उस धर्म से ध्येय का प्रस्टीरण होता है। उसी प्रकार ज्ञानसम्पर विद्वान् लोग मनन के उपरान्त जो संकल्प ठान लेते है, यह भी उनके आदर्श को ही दर्शाता है। अतः ऐसा कह सकते हैं कि, मानव के कर्म तया संकल्प के साथ ही साथ जो प्रार्थनाएँ हुभा करती है, जिन भावांक्षाओं तथा ध्येयों की अभिव्यञ्जना होती है, उन्हें देवता सुन लें। संकलन तथा कर्म के द्वारा जो ध्येय भाविर्भूत होता है, वही मानव का उस कोटि का ध्येय है, ऐसा समझना ठीक है मार देवता का ध्यान उघर आकर्षित होता ही है। [१३७] (1)वाजिन् = घोहा, घुडसवार, बलिष्ठ,धान्य रखनेवाला । (२) अनु + तक्ष् = पना देना, निर्माण करना, संसार करके तयार कर देना। (१) गो-मति ग्रजे = अनेक गाओं से युक्त ग्वालों के बारे में। ( ४ ) व्रजः = बालोंका भाडा । धीरोंकी अनुकूलता होने पर यथेष्ट गौएँ पाना कोई कठिन पात नहीं है । क्योंकि गौए साथ रसनाही मधुर संपत्ति या वैभव का चित है। [१३८] दिविष्टि = ( दिय् + इe) = दिन में की जानेवाली इष्टि । (२) वर्हिस् = दर्भ, भासन, यज्ञ। मंत्र ॥ देखिए। - (१३९) अस्य । श्रोपन्तु । आ । भुवः। विश्वाः । यः । चर्पणीः । अभि । सूरम् । चित् । सम्रपीः । इपः ॥ ५ ॥ (१४०) पूर्वाभिः । हि । दाशिम । शरतमिः । मरुतः । वयम् । अवाऽभिः । चर्षणीनाम् ॥ ६ ॥ (१४१) सुऽभगः । सः ] प्रऽयज्यवः । मरुतः । अस्तु । मर्त्यः । यस्य । प्रयोमि । पर्पथ ॥ ७ ॥ अन्यय - १३९ विश्वा चर्पणी , सूरं चित्, इप सम्रपी', यः अभि-भुव अन्य (मम्तः ) आभोपन्तु । १४० (हे) मरत ! चर्षणीनां अवोभि वयं पूर्वाभि शरद्भिः हि ददाशिम । १४१ (हे) म-यज्यय मरतः ! सः मर्त्य सु-भगः अस्तु, यस्य प्रयांसि पर्वध । अर्थ- १३९ (विश्वाः चर्पणीः ) सभी मानयों को तथा (सरं चित् ) विद्वान् को भी (इप सम्बुपीः ) अन्न मिल जाय. इसलिए ( यः अभि भर ) जो शत्रु का पराभव गरता है, ( अभ्य ) उन का काव्य - गायन सभी वीर ( आ श्रोपन्तु) सुन ले । १४० हे (मगतः ' ) वीर मरतो' (चर्षणीनां अवोभि.) कृपको की तथा मानवों की समु. चित रक्षा करने की शक्तियों से युक्त (वयं ) हम लोक (पूर्वीभिः शरभि.) अनेक वर्षों से (हि) सचमुच (ददाशिम) दान देते आ रहे हैं। १४१ हे (प्र यायवः मरत ') पूज्य मनो! ( स मर्त्यः ) वह मनुष्य ( स भगः अस्तु ) अच्छे भाग्यवाला रहता है कि, (यस्य प्रयांसि ) जिम के अन्न का (पपंथ ) सेपन तुम करते हो। भावार्थ- १३९ जो वीर पुरप समूची मानवजाति को तथा विद्वन्मरी को अन्न की प्राप्ति हो, इस हेतु शदल का पराभव करनेकी चेष्टा करके सफर ता पाता है, उसी वीरके यश गान रोग करते है और उस गुण-गरिमा-गान को सुनकर श्रोताओं में स्फूर्ति का संचार हो जाता है। १४० कृपको तथा सभी मानवजाति की रक्षा करने के लिए जो आयश्यक गुण या शनिया है, उनसे युक्त अनकर दम पहले से ही दान देसे आये हैं। ( या पिसानों तथा अन्य रोगी की सरक्षणक्षम शक्तियों के द्व। सुरक्षित बन हम प्रथमत दानी यन मुके हैं।) १४१ वीर पुरुष जिसके अन्न का सेवन करते हैं, वह मनुष्य सचमुच भाग्यशाली बनता है। %3D - टिप्पणी- [१३९] (1) सूर विद्वान्, बडा समालोचक ! (२) सपी (मु गती ) चर। जाय, पहुँचे, प्राप्त हों। (३) अभि-भुव = सदर का पराभव करनेवाल।। (४) विश्या. चर्षणी = जनता, समूभा मानवी समाज । ( चर्षणिः = [प्] कृपक, काइतकार, पिरम करने वाला कर्ममै निरत 1) [१४०] (1) चर्षणिः- (रुस्) = कृषक, हल्से भूमि जोतनेवाला । (२) अयस-सरक्षण। [१४१] ( १ ) प्र-यय = यजिय, पूज्य । (२)सु-भग = भाग्यवान् । ( ३ ) प्रयम = अन्न, प्रयग्नों के उपरांत माह दिया हुभोग।

। (१४२) शशमानस्य । । । नरः। स्वेदस्य । सत्यऽशवसः । विद । कामस्य । वेनतः॥८॥ (१४३) यूयम् । तत् । सत्यऽशवसः। आविः ! कर्त । महिऽत्वना । विध्यंत | विऽद्युता । रक्षः ॥ ९ ॥ (१४४) गृहत । गुह्यम् । वमः। वि । यात । विश्वम् । अत्रिणम् । ज्योतिः। कर्व । यत् । उश्ममि ॥ १० ॥ अन्वय १४२ (हे ) सत्य-शवस मरुत ! शशमानस्य स्वेदस्य वेनत. चा कामस्य विद । १४३ (हे) सत्य-शवस ! यूयं तत् आवि कर्त, विद्युता महित्वना रक्ष विध्यत । १४४ गुह्यं तमः गृहत, विश्व अत्रिणं चि यात, यत् ज्योतिः उरमसि कर्त। अर्थ- १४२ हे ( सत्य शयसः मस्तः!) सत्यसे उद्भूत बल से युक्त मरुतो' (शशमानस्प) शीघ्र गति के कारण ( स्वेदस्य ) पसीने से भीगे हुए, तथा (वेनतः या) तुम्हारी सेवा करनेवाले की (कामस्य रिद ) अभिलाषा पूर्ण करो। १४३ हे (सत्य शवसः!) सत्य के बल से युक्त बीरो! (यूयं ) तुम (तत्) यह अपना पल ( आविः कर्त) प्रकट करो। उस अपने (विधुता महित्वना ) तेजस्वी यल से ( रक्षः विध्यत) राक्षसोंको मार डालो। १४४ (गुहा) गुफामे विद्यमान ( तमः ) अँधेरा (गृहत) ढक दो, विनए करो। (विश्यं अत्रिणं) सभी पेट्ट दुरात्माओं को (वि यात ) दूर कर दो। (यत् ज्योतिः) जिस तेजको हम (उदमसि) पाने के लिए लालायित है, यह हमें (कर्त) दिला दो। भावार्थ- १४२ गे वीर सचाई के भक्त हैं, मत पळयान हैं । जो जल्द चले जाने के कारण पसीने से तर होते है या रगातार काम करने से यकेमाँदे होते हैं, उनकी सेवा करनेवालों की इन्छाएं ये वीर पूर्ण कर देते हैं। १४३ ये धौर सच्चे यहवान है । इनका यह पट प्रकट हो जाय और उसके फलस्वरूप सदैव कष्ट पहुँ. धानेवारे दुओं का नाश हो जाय । १४४ अधियारी विनष्ट करके तथा कभी तृप्त न होने वारे स्वार्थी शत्रुओं को हराकर सभी जगह प्रकाश का विस्तार करना चाहिए । टिप्पणी- [१२] (1) सत्य-शवस = सत्य का यक, जो सच्चे बल से युक्त होते है । (२) शशमाना, (शर-प्लुतगती) - शो गति से जानेवारा, यहुत काम करनेवाला (मंत्र ३४ देखो)। {१४] (१) गुथं नमः = गुहा में रहनेवारा धेरा, भन्तस्तर का अज्ञानरूपी सम पटल, घामें विद्यमान भयकार । (२) भनिन् - बाने वाले, पेह दूसरोका भाग स्वय ही उठाकर उपभोग लेनेवाल पाधा [ इस मंत्र के साथ तमसोमा ज्योतिर्गमय! मृत्योर्माऽमृतं गमय ।' (पृहदा ॥३॥२८) इसकी तुलना कीजिए।

(ऋ० ११८६१-६) (१४५) प्रऽत्वक्षसः । प्रतिवसः । विशिनः। अनानताः । अविथुराः । ऋजीषिणः । जुष्टंऽतमासः । नृऽतमासः । अञ्जिभिः । वि । आनजे । के । चित् । उस्राःऽईव । स्तृभिः ॥ १॥ (१४६) उपऽहरेषु । यत् । अधिम् । ययिम् । पर्यःऽइव । मरुतः । केन । चित् । पृधा । श्रोतन्ति । कोशी: । उप । यः । रथेषु । आ । घृतम् । उक्षत । मधुऽवर्णम् । अर्चते ।।२।। अन्ययः-१४५५ त्वक्षस प्रतवमः विरप्शिन अन्-आनता अ विथुरा ऋजीषिणः जुष्ट-तमास नृ-तमास के चित् उना इव स्तृभिः वि आनने। १४६ (हे) मरत ! यय इव फेन चित् पधा यत् उपहरेषु यथि अविध्य, व ग्थेषु कोशाः उप श्चोतन्ति, अर्चते मधु-वर्ण घृतं आ उक्षत । मर्थ- १४५ (प्र-त्वक्षस.) शवदल को क्षीण करनेवाले, (म-तयसः) अच्छे बलशाली, (वि- रशिनः ) बडे भारी वक्ता, (अन्-भानता ) किसीके सम्मुस शीश न झुकानेहार, (अ-विथुरा.) न यि. छुडनेवाले अर्थात एकतापूर्वक जीवनयामा बितानेवाले (मजीविण.) सामरस पानेवाले या सीदा. सादा तथा सरल वर्ताव रखनेवाले, (जुष्ट-तमास ) जनता को अतीव सेव्य प्रतीत होनेवाले तथा (नृ-तमास ) नेताओं में प्रमुख ये वीर (केचित उम्ना इय) सूर्यपिरणों के समान (स्तृभि ) वस्त्र तथा अलंकारों से युक्त होकर (वि आनने ) प्रकाशमान होते हैं। १४६ हे (मस्तः 1) वीर मरुतो। (वय इव ) पंछी की नाई (केन चित् पथा) किसी भी मार्ग से आकर ( यत् ) जब ( उपदरेषु) हमारे समीप (ययि) आनेवालों को तुम (अविध्यं ) इकडे फरते हो, तय (य' रथेषु ) तुम्हारे रथों में विद्यमान ( कोशाः) भांडार हम पर (उप श्चोतन्ति ) धन की वर्षा करने लगते है और ( अर्चते ) पूजा करनेवाले उपासक के लिए ( मधु-वर्ण) मधु की नाई स्वच्छ धर्णवाले (घृतं ) घी या जल की तुम ( आ उक्षत) वर्षा करते हो। मावार्थ- १४५ शत्रुओं को हतयार करने वाले, बर से पूर्ण, अच्छे यता, सदैव अपना मस्तक ऊँचा करो घरहार, एक ही विचार से भाचरण करनेवाले, सोम का सेवन करनेवाले, सेवनीय और प्रमुख नेता बन जाने की क्षमता रखने- पाले मार वस्त्रालंकारों से सजाये जाने पर सूर्यकिरणयत् सुहाते हैं। १४६ जिस पल तुम किसी भी राह से भाकर हमारे निकट आनेवाले लोगों में एकता प्रस्थापित करते हो, संगठन करते हो, तम तुम्हारे रथों में रखे हुए धनमार हमे सपति से निहार कर देते है, हम पर मानों धन की सतत वृष्टिती रमते है । तुम लोग भी भक्त एक उपाय को स्वष्ट जल एर निर्दोष अप्न पर्याप्त मात्रा में देते हो। टिप्पणी [१४५]()प्र-वक्षस् = पहे सामथ्र्यसे युक्त, शत्रुओं को दुर कर देने वाले । (२) प्र-तवस् - जिसके विक्रम की थाह न मिरती हो, बलिछ। (३)पि-रशिन् = (र-ग्याकायर्या याचि) गभीर भावाज से पोळनेवाले, भारी यता, धुवाँधार यस्तता की झड़ी लगानेवाल । (४) अन्-आनता: = किसी के सामने न ममने पाले याने आमसमान को अक्षुण्ण तया भडिग रखने यारे। (५) अ-बिथुर (व्यथ्- भय संचलनयो ) डरनेवाले, न विद्युम्नेवारे । मंत्र ११७ देखिये । (६) जुष्ट-तमा = सेवा करने के लिए योग्य, ममीप रखने के लिए उचित । [१४६] (1) उपहर = एकान्त, समीप, टेढापन, रथ । (३) यथि = आनेवास। (३) कोश; सामाना । (५) धृतं - घी, जर।

(१४७) प्र । एपाम् । अज्मैपु | विथुराऽईय रेजते। भूमिः । यामपु। यत् । है । युद्धते । शुभे । ते। क्रोळयः । धुनयः । श्राजऽऋष्टयः। स्वयम् । महिऽत्वम् । पनयन्त । धूतयः ॥३॥ (१४८) सः।हि । स्वऽसूत् । पत्ऽअश्वः । युा । गणः। अया। ईशानः। तर्विपीभिः । आऽय॒तः असि । सत्यः । ऋणऽयावा । अनेद्यः । अस्याः । धियः । अचिता । अर्थ । वृपा । गणना अन्ययः- १४७ यत् ह शुभे युजते, एषां अज्मेपु यामेप भमिः विथुराइव प्र रेजते, ते क्रोळयः धुनयः भ्राजत्-ऋष्टय. धूतयः स्वयं महित्वं पनयन्त। १४८ सः हि गण. युवा स्व सृत् पृपत्-अभ्यः तविपीभिः आवृतः अया ईशानः अथ सत्यः मण-याचा अ-नेद्य' बृपा गण अस्याः धियःप्र अविता अलि। अर्थ- १४७ ( यत् ह ) जय सचमुच ये चीर (शुभे) अच्छे कर्म करने के लिए. (युनते ) कटिबद्ध हो उठते हैं, तव (एषां अज्मेषु यामेषु ) इनके वेगवान हमलों में (भूमिः ) पृथ्वी तक (विथुराइव ) अनाथ नारी के समान ( प्र रेजते) यहुतही काँपने लगती है। (ते कोळयः ) ये खिलाडीपन के भाव से प्रेरित, (धुनयः ) गतिशील, चपल (भ्राजत्-ऋष्टयः ) चमोले हथियारों से युक्त, (धूतयः) शत्रुको विच. लित कर देनेवाले वीर ( स्वयं ) अपना ( महिन्वं) महत्त्व या बडप्पन (पनयन्त) विख्यात कर डालते हैं। १४८ ( सः हि गः ) वह वीरों का संघ सचमुचही (युवा) यौवनपूर्ण, ( स्व-सूत् ) स्वयंप्रेरक, (पत्-अश्वः ) रथ में धध्वेयाले घोडे जोडनेवाला (तविपीभिः आवृतः) और भाँतिमाँति के बलों से युक्त रहने के कारण ( अया ईशानः ) इस संसार का प्रभु एवं स्वामी बनने के लिए उचित एवं सुयोग्य है । (अथ ) और वह ( सत्यः ऋण यावा ) साई से वर्ताय करनेवाला तथा ऋण दूर करनेवाला. (अ. नेद्यः) अनिंदनीय और (वृपा) बलवान् दीख पडनेयाला (गणः ) यह संघ (अस्याः धियः ) इस हमारे कर्म तथा मान की (प्रअविता असि ) रक्षा करनेवाला है। भावार्थ-१४७ जिस समय ये वीर जनना का कायाण करने के लिए सुसज्ज हो जाते हैं, उस समय इनके शत्रुओं पर टूट पडने से मारे करके समूची पृथ्वी पर थर काँप उठती है । ऐसे अवसर पर खिलाडी, चपर, तेजस्वी शास्त्र धारण करनेवाले तथा शत्रु को विपित करनेवाले वीरों की महनीयता प्रस्ट हो जाती है। १४८ यह वीरों का संघ युवा, स्वयंप्रेरक, बरिष्ट, सत्यनिए, उमण होने की चेष्टा करनेवाला, प्रशंसनीय तथा मध्यवान् है, इस कारण से इस संसार पर प्रभुत्व प्रस्थापित करने की क्षमता पूर्ण रूपेण रखता है। हमारी इच्छा है कि, इस भाँति का यह समुदाय हमारे कर्मों तथा संस्लों में हमारी रक्षा करनेवाला यने । ( भगर विश्व में विजयी बनने की एवं जगन् पर स्वामित प्रस्थापित करने की लालमा हो, तो उपर्युन गुणों की भोर ध्यान देना भनीव आवश्यक है।) टिप्पणी [१४७] (1) युआने - युक्त हो जाते हैं, मज यनने है, रथ जोडकर तैयार होते हैं । (१) वि.धुरा - (वि-धुग) विधुर नारी; भनाथ, भमकाय महिरात्रि ११५ वाँ देखिए ।

(१४९) पितुः । प्रत्नस्य । जन्मना । बदामसि । सोमस्य । जिह्वा । प्र । जिगाति । चक्षसा यत् । ईम् । इन्द्रम् । शमि । ऋक्याणः । आर्शत। आत् । इत् । नामानि । यशियानि । दधिरे ॥५॥ (१५०) श्रियसे । कम् । भानुऽभिः। सम् । मिमिक्षिरे। ते। रश्मिभिः । ते । ऋकऽभिः। सुऽखादयः। ते । वाशीऽमन्तः । इष्मिणः । अभीरवः । विद्रे । ग्रियस्य । मारुतस्य । घाम्नः ॥ ६ ॥ अन्वयः- १४९ प्रत्नस्य पितुः जन्मना वदामसि, सोमस्य चक्षसा जिहा प्र जिगाति, यत् शमि ई इन्द्रं ऋक्वाणः आशत, आत् इत् यशियानि नामानि दधिरे । १५० ते कं भिषसे भानुभिः रहिमभिः सं मिमिक्षिरे, ते शक्यभिः सु-खादयः वाशी- मन्तः इमिणः अभीरवः ते प्रियस्य मागतस्य धाम्नःविहे। अर्थ- १४९ (प्रत्नस्य पितुः जन्मना ) पुरातन पिता से जन्म पाये हुए हम (यदामसि) कहते हैं कि (सोमस्य चक्षसा) सोम के दर्शन से (जिहा प्र जिगाति ) जीम- वाणी प्रगति करती है, अर्थात् वीरों के काव्य का गायन करती है । ( यत् ) जब ये चीर (शमि ) शनु को शान्त करनेवाले युद्ध में (ईइन्द्र) उस इन्द्र को (ऋक्याणः ) स्फूर्ति देकर (आशत ) सहायता करते हैं, (आत् इत् ) तभी ये (यशियानि नामानि ) प्रशंसनीय नाम- यश (दधिरे धारण करते हैं। १५० (ते ) वे पीर मरुत् (कं श्रियसे) सय को मुरा मिल इसलिए. (भानुभिः रश्मिभिः) तेजस्वी किरणों से (म मिमिक्षिरे) सय मिलकर वर्षा करना चाहते हैं । (ते) व (ऋक्यभिः) कवियों के साथ (सु-सादयः) उत्तम अन्न का सेवन करनेदार या अच्छे आभूषण धारण करनेवाले, (घाशी-मन्तः) कुल्हाडी धारण करनेवाले (इमिणः) वेग से जानेवाले तथा (अ-भीरवः) न डरनेवाले (ते) यीर (मियस्य मास्तस्य धाम्नः) प्रिय महतों के स्थान को (विद्रे) पाते हैं। भावार्थ- १४९ श्रेष्ठ परियार में उत्पन्न हुए हम इस यात की घोषणा करना चाहते हैं कि, मोम की आहुति देते समय मुंह से भयात् जिह्वा से भी देवताओं की सराहना करनी चाहिए । शग्रुदल को विनष्ट करने के लिए जो सुद्ध हेटने परते हैं, उनमें इन्द्र को स्फूर्ति प्रदान करते हुए ये वीर सराहनीय कोति पाते हैं। उन नामों से उनकी कर्तृत्व- शक्ति प्रकट हुमा करती है। १५० ये धीर जनता सुखी पने इस लिए भूमि में, पृथ्वी-मंडल पर वहा भारी यान करते हैं और यज्ञ में इपिप्यान का भोजन करनेवाले, सुन्दर वीरोचित आभूषण पहननेयाले, कुठार हाथ में उतार शत्रुदल पर टूट परनेवाले, निर्भयता से पूर्ण वीर अपने प्रिय देश को पाकर उस की सेवा में लगे रहते हैं। टिप्पणी [ १४९] (1)शम् = शांत करना, शत्रु का षध करना। (२)श्याणः (अच्-स्तुती) प्रशंसा करके प्रेरणा करनेवाले । महर भगवः, जाहि, वीरयस्व ' ऐसे मंत्रों से या 'यूप, पीर' आदि नाम पुकार कर उरसाद पढाया जाता है । वीरों की उमंग कैसी बढानी चाहिए, सो यहाँ पर विदित होगा। प्रशंसा करनेयोग्य नाम ही (यशियानि नामानि) धारण करने चाहिए। विक्रमसिंह, प्रताप, राजपून ' वगैरह नाम वीरों को देने चाहिये। घेद में ' वृत्रहा, शगुहा' जैसे नाम हैं, जो कि उत्साहवर्धक हैं । सैनिकों को प्रोत्साहित करने की सूचना यहाँ पर मिलती है। [१५०] (1) सु-पादिः = भरछा भन्न म्यानेवाले, मुन्दर वरदी या गणवेश पहननेवाले, या वीरों के गहने धारण करने वाले । (२) वाशी-मान् = कुठार, माले, तलवार, परशु लेकर भाक्रमण करनेवाला धीर । मंत्र ७० देखो । (३) इप्मिन् = गतिमान, भाक्रमणशील। (५) अ-भीरुः == निडर । (५) प्रियस्य धाम्नः विद्र - पारे देश को पहुँच जाते हैं, या प्राप्त हो जाते हैं। . .

(प्रड ११८८1१-६) (१५१) आ । विद्युन्मत्ऽभिः । मरुतः। सुऽअः। स्थैमिः।यात । अष्टिमऽभिः । अश्वऽपणैः । आ। वार्षष्ठया । नः । इपा। वर्यः । न । पप्तत । सुऽमायाः ॥१॥ (१५२) ते । अरुणेभिः । वरम् । आ । पिशङ्गैः। शुभे । कम् । यान्ति । रथतःऽभिः। अश्वैः । रुक्मः । न । चित्रः । स्वर्धितिऽवान् । पन्या । रथस्य । जङ्घनन्त । भूमं ॥ २ ॥ अन्ययः-१५१ (हे) मरुत.! विद्युन्मद्भिः सु-कैः ऋष्टि-मद्धिः अश्व-पर्णः रथेभिः आ यात, (हे) सु- मायाः प्ठिया इपा, वय.न, ना आ पप्तत । १५२ ते अरुणेभिः पिशझै. रथ-तूर्भिः अश्वै. शुभे बरं के आ यान्ति, रक्मान चियः, स्वधिति. वान्, स्थस्य पच्या भूम अंघनन्त। अर्थ- १५१ हे (मरुतः ' ) वीर मरुतो ! (विद्युन्मभिः) विजली से युक्त या विजली की नाई अति- तेजस्वी, (सु-अ ) अतिशय पूज्य, (मष्टि-मद्भिः) हथियारों से सजे हुए तथा (अश्व-पणेः) घोडा से युक्त होने के कारण वेग से जानेवाले ( रथेभिः) रथों से (भा यात) इधर आओ। हे (सु-मायाः !) अच्छं कुशल वीरो ! तुम (वर्षिष्टया पा)श्रेष्ठ अन्न के साथ (बयान ) पंछियों के समान वेगपूर्वक (नः आ पप्तत ) हमारे निकट चले आओ। १५२ (ते) वे धीर (अरुणेभिः) रक्तिम दीख पडनेवाले तथा (पिशङ्गैः) भूरे यदामी वर्ण- वाले और (रथ-तूर्भिः) त्वरापूर्वक रथ सींचनेवाले (भश्वैः) घोडा के साथ (गुभे) शुभकार्य करने के लिए और (वरं के) उच्च कोटिका कल्याण संपादन करने के लिए, सुप देने के लिए (आ यान्ति) आते हैं। यह पीरो का संघ ( रुक्मान ) सुवर्णकी भाँति (चित्रः) प्रेक्षणीय तथा (स्वधिति-यान) शस्त्रों से युक्त है । ये चीर (रथस्य पव्या) पाहन के पहियोंकी लौहपट्टिकाओं से (भूम) समूची पृथ्वी पर (जंघनन्त) गति करते हैं, गतिशील बनते है। भावार्थ- १५१ अपने शस्त्रास्त्र, रथ तथा रण-चानुरी के द्वारा धीर पुरुष भन्दा मत प्रात कर ले भार ऐसी मायोजना निकालें कि यह सब को यथावर मिल जाए । १५२ वीर पुरुप समूची जनता का श्रेष्ठ कल्याण करने के लिए अपने रथों को हथियारों सथा मम्प विशेष भायुधों से भली भांति सन करके सभी स्थानों में संचार कर । टिप्पणी- [१५१(च-पर्ण. (भश्वानां पणे पानं गमनं यत्र) अयों के मोहने से पूर्वक जाने- बाला (रथ)। (२)सु.गायाः = (मापा %3D छौशल्य, दस्तकारी।) उत्तम कार्य-कुशलता से युक्त, कलापूर्ण वस्तु धनानेहारे। (३) धयान - पंछियों के समान (भाग में से जैसे पक्षी चले भाते हैं, उसी तरह तुम भाकाश.. यानों में बैठकर भा जामो) (देखो मंत्र ९११३८९) [१५२ (१) रुपमः जिस पर छाप दीम्स पहती हो ऐसा सोने का टुक्ठा, मरंकार, मुहर । (२) स्य-धितिः = कुठार, शस्त्र । (३) पवि. स्य के पहिये पर लगी हुई लौह पहिका, चक नामक एक दधिधार । (१) हन् = (हिंसागयोः) पध करना, गति करना (नाना)।

there . (१५३) श्रिये । कम् । । अधि । तनपु । वाशीः। मेधा । वनौ । न । कृणवन्ते । अर्धा। युष्मभ्यम् । कम् । मरुतः । सुजाताः। तुविऽधुम्नासः । धनयन्ते । अदिम् ॥ ३ ॥ (१५४) अहानि । गृधः परि । आ।व।आ। अगुः। इमाम्। धिर्यम् । वार्याम् । च । देवीम्। मी । कृण्वन्तः । गोतमासः । अकः । ऊर्धम् । नुनुद्रे । उत्सऽधिम् । पिबध्यै ।।.-४ ॥ अन्धयः-१५३ श्रिये के वः तन्धु अधि वाशीः ( वर्तते), चना न मेधा ऊर्चा रुणयन्ते, (हे) सु- जाताः मरुतः । तुधि-धुम्नास. युप्मभ्यं कं अदि धनयन्ते। १५४ (हे) गोतमासः ! गृध्राः यः अहानि परि आ आ अगुः, पार-फार्या च इमां देवी घियं अर्के महा कृण्वन्ता, पियध्यै उत्सधि ऊंचं नुनु।। अर्थ- १५३ (श्रिये कं) विजयश्री तथा मुस पाने के लिए (यः तनूपु अधि) तुम्हारे शरीरोंपर (याशी) आयुध लटकते रहते हैं। (वना न ) घनके वृक्षों के समान [अर्थात् धनों में पेड जैसे ऊँचे यढते हैं, उसी तरह तुम्हारे उपासक तथा भक्त ] अपनी (मेधा) बुद्धिको (ऊर्ध्या ) उच्च कोटिकी (कृणयन्ते ) थना देते है। हे (सु-जाताः मरुतः!) अच्छे परिवार में उत्पन्न वीर मरुतो! (तुधि-घुम्नासः) अत्यंत दिव्य मनसे युक्त तुम्हारे भक्त (युप्मभ्यं कं) तुम्हें सुख देनेके लिए (.अदि) पर्वतसे भी (धनयन्ते) धनका सुगम करते है[पर्वतोपर से सोमसदृश वनस्पति लाकर तुम्हारे लिए अन्न तैयार करते हैं। १५४ हे (गोतमासा!) गौतमो ! (गृध्राः या) जल की इच्छा करनेवाले तुम्हें अय (महानि) अच्छे दिन (परि आमा अगुः ) प्राप्त हो चुके हैं। अब तुम (वार-कार्यो च) जलसे करनयोग्य (इमा देवी धियं ) इन दिव्य फर्मों को (अ) पूज्य मंत्रों से (ब्रह्म ) शानसे पवित्र (फण्वन्तः ) फरी। (पिया) पानी पीने के लिए मिल, सुगमता हो, इसलिए अय (ऊ) ऊपर रखे हुए (उत्सधिं) कुंडके जल को तुम्हारी ओर (नन्द्रे) नहरद्वारा पहुंचाया गया है। भावार्थ- १५३ समर में विजयी बनने के लिए और जनता का मुख पदाने के लिए भी धीर पुरुष सपने समीप सदैव शस्त्र रखें । भएनी विचारप्रणाली को भी हमेशा परिमार्जित तथा परिष्कृत रखें । मन में विस्य विचारों का संग्रह यमाकर पर्वतीय एवं पार्थव धनवैभव का उपयोग समूची जनता का सुख यदाने के लिए करें। १५४ निवासस्थलों में यथेष्ट जल मिले, सो यहुत सारी सुविधाएँ प्राप्त हुआ करती है, इसमें क्या संशय ? इस कारण से इन वीरोंने गोतम के माधम के लिए जल की मुविधा कर वाली । पश्चात उस स्थान में मानवी बुदि शान के कारण पवित्र हो जाए, इस ख्याल से प्रभावित होकर ब्रह्मयज्ञसदृश फर्मों की पूर्ति कराई। (मंत्र :३२,३ देखिए। टिप्पणी- [१५३] (1) द्युम्नं-(धु-मनः ) तेजस्वी मन, विचार, पश, कांति, शोभा, शक्ति, धम, सेज, पल। (२) अ-द्विः सोर देने में असंभव दीख पडे, ऐसा पर्वत, सोम कूटने का परथा, पक्ष, मेघ, पम्र, शेत्र । (३) धनयन्ते = { धन शम्दात्तरकोतीति णिच् ) धन पैदा करते हैं, भावाज निकालते हैं। [१५४ ] (1) गृध्रः = लालपी, गिद्ध, इछा करनेवाला । (२) चाार्या = (धार कार्या) जल से निपज होनेवाळे (क)(१) उत्स-धिः - मा, कुंभ, जलाशय, बापढी । (४) धीः = पुद्रि, कर्म । मस्त [हि.]८ - भन्मय . (१५५) एतत् । त्यत् । न। योजनम् । अचेति । सरसः । ह । यत् । मरुतः । गोतमः ।। पश्यन् । हिरण्यऽचक्रान् । अयं दंष्ट्रान् । विधानतः । वराहून् ॥ ५॥ (१५६) एपा । स्या ! यः । मरुतः । अनुऽभत्री । प्रति । स्तोभति । आपतः । न । वाणी । अस्तोमयत् । यथा । आसाम् । अनु । धाम् । गर्भस्त्योः ॥६॥ १५५ (हे) मरत हिरण्य चकान अयो-दष्ट्रान् वि-धावत घर-आहुन् य. पश्यन् गोतम यन् एतत् योजन सस्त्र हत्यत् न अचेति । १५६ (हे) मरत ! गभस्त्यो स्वधा अनु स्या एपा अनु-भत्री वाघत वाणी नव प्रति स्तोमति, आसा वृथा अस्ताभयत् । -- १५५ हे (मरत !) वीर मरुतो' (हिरण्य-चत्रान् ) स्वर्णविभूपित पहिये की शक्ल के हथियार धारण करनेवाले (अया दान ) फौलाद की तेज टाढोंसे धाराओं से युक्त हथियार लेकर (वि धायता) भौतिमाति के प्रकारों से शत्रु पर दौडकर टूट पडनेवाले ओर (यर-आ-इन् ) बलिष्ठ शत्रुओंका विनाश करनवारे ( 4 ) तुम्हें (पश्य ) देसनेवाले (गोतमः) अपि गोतमने (यत् एतत्) जो यह तुम्हारी (योजन ) आयोजना छन्दोबद्ध स्तुति (सस्य ह ) गुप्त रूपसे वर्णित कर रखी है, (त्यत्) यह सचमुच (17 अचेति) अरणनीय है। १५६ हे (मरत !) चीर मरतो! तुम्हारे (गभस्त्यो ) याहुओंकी (स्व धा अनु) धारक शक्तिको शूरता पध्यान म रस फर (स्या एपा) वही यह (अनु भत्री) तुम्हारे यशका पोषण करनेवाली (चायत वाणी) हम जैसे स्तोताओंरी वाणी (न) अर (या प्रति स्तोमति ) तुममें से प्रत्येक का वर्णन करती है। पहले भी (नासा) इन वाणियों ने (पृथा) किसी विशेष हेतुके सिग इसी भॉति (अस्तोमयत्) सराहना की थी। भावार्थ- १.५ घीरों को चाहिए कि वे अपने तीक्ष्ण शस्त्र साय लेकर शादलपा विभिन्न प्रकारोंसे हमलोंका सूत्रपात कर दसार उन्हें निवरवियर कर दाल । इस घरह शत्रुओको नामूलसे विनष्ट करना चाहिए। ऐसे धोरों का समुचित बयान करने के लिए कवि वीर गाथाओं का सृजन करेंग भौर चतुर्दिक इन घोर गौतों रामा काव्यों का गायन शुरू होगा। २५६ कर पुरसमा जुधभूमी में अमर भूरला प्रकट करते है, या अनेक कम्पमा मन बी मानी से हो जाता है और ध्यान में रखने योग्य बात है कि, सभी कवि उन कास्यों की रचना में स्वयस्फूर्ति से भाग लेते हैं। इसीरिए उन कार्यो के गायन एव परिशीलन से जनता में बड़ी भासानी से जोशीले भाव पैदा हो जाते हैं। टिप्पणी- [१५५ ] (1) चा पहिया, चकके भाकारवाला हथियार । (२) हिरण्य-चा सुवर्णकी पच्चीकारी से विभूषित पहिया जैसे दिखाई देनेवाला शस्त्र । (३) वर-म हु (परभाइन) पलिए शत्रुको धराशायी करनेवाला (४) याजन 3 जोडना, रचना, तैयारी, शब्दों की रचना करके काम्य बनाना । (५) अयो-दष्ट्र - कोलारका पाए हथियार तिसमें कई तीक्ष्ण धाराएं पाई जाती है । (६) वि-धाव् = शत्रु पर माति भाति के प्रकारों से चढाइ करना । ( . ) सस्प = गुप्त ढग से दसो क ३.२ भऔर १५९०, ३८९। [१५६] (1) गमस्ति'= मिरण, गाडी का पृष्ठवश, हाथ कोहनी क भाग हाप, सूर्य, किरण (२) स्व-घा = अपनी धारक शकि, सामर्थ्य, सन्त ! ( ३) धृथा = सर्प, अनावश्यक, विशेष कारण के सिवा, निष्काम भाव से, स्वाभाविक रूप से ।

१९ । ! दिवोदास पुत्र परुच्छपऋपि (ऋ १११३९।८ । (१५७) मो इति । सु । यः । अस्मत् । अभि । तानि । पौंस्यो । सना । भूवन । घुम्नानि । मा । उत जारिपुः । अस्मत् । पुरा । उत । जारिपुः । यत् । वः । चित्रम् । युगे युगे। नव्य॑म् । घोपात् । अय॑म् । अस्मासु । तत् । मरुतः। यत् । च । दुस्तरम् । दिधृत । यत् । च । दुस्तरम् ॥ ८ ॥ मित्रावरणपुत्र अगस्यापि ( 11१६६।१-१५) (१५८) तत् । नु । योचाम । रभसाय । जन्मने । पूर्वम् । महिऽत्यम् । वृषभस्य । केत। ऐधाऽईव । यामन् । मरुतः। तुषिऽस्वनः। युधाऽईय। शक्राः। तनिषाणि । कर्तन ॥१॥ अन्वयः-- १५७ (हे ) मरुतः ! च. तानि सना पास्या अस्मत् मो सु अभि भूवन्, उत युम्नानि मी जारिपुः, उत अस्मत् पुरा (मा) जारिपुः, या यत् चिनं नव्यं अ-मत्यै घोपगत् तत् युगे युगे अम्मासु, यत् च दुस्तरं यत् च दुस्तरं दिधृत। १५८ (हे.) मरत. रभसाय जन्मन, वृषभस्य केतवे, तत् पूर्व महित्वं नु बोचाम, ( है , तुवि-स्वन शकाः ! युधाइव यामन ऐघाइय तविषाणि फर्तन | अर्थ- १५७ हे (मरुतः।) वीर मरतो ! (घः तानि) तुम्हारे वे (सना ) सनातन परामम करनेहा (पास्या) बल (अस्मस् ) हमसे (मो सु अभि भूवन् ) फभी दूर न होने पायें। ( उत उसी प्रकार हमारे (घुम्नानि) यश (मा जारिपुः) कदापि क्षीण न हो । (उत) वैसे ही (अस्मत् पुरा) हमारे नगर ([मा जारिपुः) कभी यारान या ऊजड न हों। (वः यत् । तुम्हारा जो (चित्र) आश्चर्यकारक (नव्यं ) नया तथा ( अ-म] ) अमर ( घोषात् तत् ) गोशालाओंसे लेकर मानवातक धन है, वह सभी (युगे युगे ) प्रत्येक युग में (अस्मासु) हम में स्थिर रहे । (यत् च दुस्तरं, यत् च दुम्तरं ) जो कुछ भी अजिम्य धन है, यह भी हमें (दिधृत) दे दो। १५८ हे (मरुतः!) वीर मरतो' (रभसाय जन्मने) पराकम करने के लिए नुयोग्य जीवन प्राप्त हो, इसलिए, और (वृपभस्य केतवे) वलियों के नेता बनने के लिए. (तत्) बह तुम्हारा (पूर्व) प्राचीन कालसे चला बारदा (महित्वं) महत्त्व (नु चोचाम) हम ठीक ठीक कह रहे हैं। हे (तविस्मन.) गरजनेवाले तथा (शमा ! ) समर्थ वीरो! (युधाइय) युद्धयेला के समानही (यामन ) शत्रुदल पर चढाई करने के लिए (ऐधाइय) धधकते हुए अग्नि की नाई (तविपाणि कर्तन ) बल प्राप्त बगे। भावार्थ- १५७ हमेशा वीर पराक्रम के कृत्य कर दिखलायें, हमें भी उसी तरह वीरतापूर्ण कार्य निप्पत करने की शाधि मिले। उस शक्ति के पलस्वरूप हमारा पश यदे। हमारे नगर समृद्धिमारी यन । प्रतिपर चोरी का बर प्रकट हो जाए। हमें इस भाँति का धन मिले कि, मनु कभी उसे हम से न छीन से सके । १५८ हम सामध्यवान् प्रने और नेता के पद पर बैठ सकें, इसीलिए हम घी के काय या गाया तथा पठन करते है । युद्ध छिट जाने के मौके पर जिस तरह तुम्हारी हलचलें या तैयारियाँ हुआ करती है, उसे वैसे ही भक्षुण्ण पनाये रखो । उन तैयारियों में तनिक भी ढीलापन न रहने पाय, ऐपी सावधानी रखनी चाहिए । टिप्पणी-[१५७ 16) घोपा - गो-काला, जहां गायें अंधी रहती हैं, मागेका माटा! [१५८] (१) रभसः= परवान, सशक, शक्ति, सामथ्र्य, मोर, स्वरा, क्रोध, भानन्द । (२) वृपभ' = बरयान, वर्षा करने वाला। (३) वृषभस्य केतु - परिष धीर का लक्षण, शक्ति का चिन्ह । (४) केतु = प्रमुग्य, नेता, अग्रेसर, चिन्त, यम । . - - ६० (१५९) नित्यम् । न । सूनुम् । मधु । विभ्रतः । उप। क्रीळन्ति । क्रीळा । विदथेषु । घृण्वयः। नक्षन्ति । रुद्राः । अव॑सा । नमखिनम् । ना मर्धन्ति । स्वऽतवसः । हविःऽकृतम् ।।२।। (१६०) यसै । ऊमांसः । अमृताः । अरांसत । रायः । पोषम् । च । हविषा । ददाशुएँ । उक्षन्ति । अस्मै । मरुतः । हिताःऽईव । पुरु । रजांसि । पयसा । मयाऽभुवः ॥३॥ भन्वय - ३५९ नित्य सूनुं न मधु विभ्रतः धृप्वयः प्रीळाः विदथेषु उप फ्रीळन्ति, रुद्राः नमस्विनं अपसा नक्षन्ति, स्व तपसः हविस्-कृत न मर्धन्ति । १६० ऊमास अ-मृताः मरुतः यस्मै हविषा ददाशुपे रायः पोपं अरासत अस्मै हिताय भयो-भुव रजांसि पुर पयसा उक्षन्ति । भर्य- १५९ (नित्यं सूनुं न) पिता जिस प्रकार अपने औरस पुत्र को खाद्यवस्तु दे देता है, वैसे ही सव के लिए (मधु विभ्रतः ) मिठासभरे रस का धारण करनेवाले (प्वयः ) युद्धसंघर्पमें निपुण और (क्रीळा) क्रीडासत मनोवृत्तिवाले ये वीर (विदथेषु उप फ्रीलन्ति ) युद्धों में मानों खेलकूद में लगे हाँ, इस भाँति कार्य करना शुरू करते हैं । (रुद्राः) शत्रुको रुलानेवाले ये वीर (नमस्तिनं) उपासकों को (अवसा नक्षन्ति ) स्वकीय शक्ति से सुरक्षित रखते है। ( स्व-तयसः ) अपने निजी बलसे युक्त ये चीर (हयिम्-एतं ) हपिप्यान देनेवाले को (न मर्धन्ति ) कष्ट नहीं पहुंचाते हैं। १६० (ऊमासः ) रक्षण करनेवाले, (अ-मृता.) अमर चौर मरतों ने ( यस्मै हविषाददाशुषे) जिस हविष्यान देनेवाले को (राय पोषं ) धन की पुष्टि (अरासत) प्रदान की-बहुतसा धन दे दिया. (अस्मै ) उसके लिए ( हिता इय) कल्याणकारक मित्रों के समान (मयो-भुव ) सुख देनेवाले ये योर (रजांसि ) हल चलाई हुई भूमि पर (पुर पयसा) बहुत जल से ( उक्षन्ति ) वर्षा करते है। भावार्थ- १५९ जिस तरह पिता अपने पुत्र को खाने की चीजे देता है, उसी प्रकार वीरों को चाहिए कि चे भी सभी कोगों को पुत्रवत् मान उन्हें खानपान की वस्तुएँ प्रदान करें। ये वीर हमेशा खिलासीपन से पारस्परिक धतांव करें और धर्मयुद्ध में कुशलतापूर्वक अपना कार्य करते रहें । शत्रुओं को हटाकर साधु जनों का सरक्षण करना चाहिए और दानी उदार लोगों को किसी प्रकार का कष्ट न देकर मुख पहुँचाना चाहिए । १६० सय के सरक्षण करता रहार हानी पुरुषों के भरणशेषण का बीसवीरों को उठाना पडता है। रिपोर समूची जनता के हितकता है, अतएव ये सबको सुख पहुँचाते है। टिप्पणी-[१५९] (1) मधु = भीडा, मोठा रस, शहद, सोमरस । (१)नित्य - हमे का, यदलने पाला, सतत, यों का स्यों रहने वाला । (३) नित्य सूनुः - औरस पुन, जिसका दूसरे का होना समय है। (.) पृप्वया (पु सघर्ष स्पधायां च ) चाऊपरी में निपुग। [१६०] (१) ऊमः - (भव रक्षणे)%3D रक्षा करनेवाला, भच्छा मित्र, प्रिय मित्र । (२) रजस् = पलि, सोती हुई जमीन, उर्वर भूमि, भतरिक्षकोक। मन 1८८ देखिए। 1 (१६१) आ। ये । रजांसि । तविपीभिः । अव्यत । प्रायः। एवास:। स्वऽयंतासः । अधजन् । भयन्ते । विश्वा । भुवनानि । हा| चित्रेः । यः । यामः । प्रऽयंतासु । ऋष्टिषु ॥ ४ ॥ (१६२) यत् । स्वेपऽामाः । नुदयन्त । पर्वतान् । दिवः । वा । पृष्ठम् । नयाः । अर्चुच्यचुः । विश्वः । । अज्मन् । भयते । वनस्पतिः। रथियन्ती इव । म । जिहीते । ओपेधिः ॥५॥ । अन्वयः-१६१ ये एयासः तविणभि रजांसि अन्यत, स्व-यतासः प्र अध्रजन् , प्र-यतासु यः ऋष्ट्रिय विभ्या भुवनानि हा मयन्ते, वः यामः चित्रः। १६२ त्वेष यामाः यत् पर्वतान् नदयन्त, वा नर्या दिवः पृष्ठं अचुच्ययुः, व अज्मन् विश्व. वनस्पति भयते, ओषधिः रथीयन्तीदव प्रजिहीते। अर्थ- १६१ (ये एवासः जो तुम वेगवान् वीर (तविषभिः) अपने सामथ्यों तथा यलाद्वारा ( रजांसि अव्यत ) सय लोगों का संरक्षण करते हो, तथा ( स्व यतासः) स्वयं ही अपना नियंत्रण करनेवाले तुम जय शनुपर ( प्र अध्रजन ) वेगपूर्वक दौड जाते हो और जव (म-यतासु यः ऋष्टिंपु) अपने हथियारों को आगे धोलते हो, उस समय (विश्वा भुवनानि ) सारे भुवन, ( हा ) बडे बडे प्रासाद भी (भयन्ते ) भयभीत हो उठते हैं. क्योंकि (वः यामः ) तुम्हारी यह हलचल (चित्रः) सचमुच आश्चर्य- जनक है। १६२ (त्येप-यामाः) वेगपूर्वक चढाई करनेवाले ये चीर ( यत् ) जय (पर्वतान नदयात ) पहाडों को निनादमय बना डालते हैं, (या) उसी प्रकार (नर्याः) जनता का हित करनेवाले ये वीर जय ( दिवः पृष्ठं अचुच्यवुः) अन्तरिक्ष के पृष्ठभाग पर से जाने लगते हैं, उस समय हे धीरो! (व: अज्मन् ) तुम्हारी इस चदाई के फलस्वरूप (विश्यः वनस्पतिः ) सभी वृक्ष (भयते ) भयव्याकुल हो जाते है और सभी ( ओषधिः) औपधियाँ भी (रथीयन्तीइय) रथ पर बैठी हुई महिला के समान (प्रजिहीते ) विकंपित हुआ करती है। भावार्थ- १६१ ये वीर सय की रक्षा में दत्तचित्त हुआ करते हैं और जब अपना नियंत्रण स्वयं ही करते हैं तथा शत्रुदल पर टूट पड़ते हैं, तप स्वयं स्फूर्ति से यह सब कुछ होता है, इसलिए सभी लोग सहम जाते हैं, क्योंकि इसका भाक्रमण कोई साधारणसी बात नहीं है । इन वीरों की धड़ाई में भीपणता पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। १६२ जब हमले करनेवाले शूर लोग दल पर चढ़ाई करने के लिए पहाडों में तथा भन्तरिक्ष में ५ जोर से भाक्रमण कर देते हैं, तय वृक्षवनस्पति सभी विचलित हो जाते हैं। टिप्पणी-११६१]()एव. - जानेवाला, धेगवान, पल, पोहा । (२) स्व-यत = ( यम् उपरमे) स्वयं ही अपना नियमन करनेहारा। [१२] (1) पेप-याम - (वेप ) धेगपूर्वक किया हुभा (यामः) भाक्रमण जिसे Blitzkrieg कहते हैं, वियुत्वेग से शत्रु पर धावा करना । (२) वनस्पति = (पनस्-पसि.) - पेट, खंभा, यूप, सोम, वहा भारी वृक्ष । , । '(१६३) यूयम् । नः । उग्राः । मरुतः । सुञ्चेतुर्ना । अरिष्टऽयामाः । सुऽमृतिम् । पिपर्तन, यत्र । वः । दिद्युत् । रति ! क्रिािऽदती। रिणाति ! पश्वः । सुधिताऽइव । बर्हणा ॥ ६ ॥ (१६४) प्र । स्कुम्भऽदैप्णाः । अनवभ्रराधसः । अलातुणासः । विदथेषु । सुऽस्तुताः । अन्ति । अर्कम् । मदिरस्य । पीतयें। विदुः । वीरस्य । प्रथमानि । पासा ॥ ७ ॥ अन्धयः- १६३ सु-धिताइव वहणा यत्र व किवि-दती दिद्युत् रदति, पश्वः रिणाति, (हे ) उग्राः मरत.! यूयं सु-चेतुना अरिष्ट ग्रामाः नः सु-मति पिपर्तन । १६४ स्कम्भ-देष्णाः अन्-अयभ्र-राधसः अल-आ-तृणासः सु-स्तुनाः विदथेषु मदिरस्य पीतये अफै अर्चन्ति, वीरस्य प्रथमानि पौस्या विदुः । अर्थ- १६३ ( सुधिताइय) अच्छे प्रकार पकडे हुए (वहणा.) हथियार के समान (यत्र)जिस समय (4 ) तुम्हारा ( किविर-वती ) तीक्ष्ण रूप से दंदानेदार और (दिद्युत् ) चमकीली तलवार (रदति) शत्रुदल के टुकडे टुकडे कर डालती है, तथा (पक्ष्यः रिणाति ) जानवरों को भी मार डालती है, उस समय हे ( उमाः मरुतः। शूर तथा मन में भय पैदा करनेवाले वीर मरुतो ! (यूयं ) तुम (सु. चेतुना ) उत्तम अन्तःकरणपूर्वक ( अ-रिष्ट-ग्रामाः) गाँवों का नाश न करते हुए (नः सुमति) हमारी अच्छी युद्धि को बढाते हो । १६४ (स्कम्भ देणाः ) आश्रय देनेवाले, (अन् अवभ्र राधसः) जिनपा धन कोई छीन नहीं सकता ऐसे, ( अल आ तृणासः ) शत्रुओं का पूरा पूरा विनाश करनेहारे तथा (सु स्तुताः) अत्यन्त सराहनीय ये चीर (विदथेषु) युद्धस्थलों तथा यमों में (मदिरस्य पीतये) सोमरस पीने के लिए (अर्कप्र अर्चन्ति) पूजनीय देवता की भली भाँति पूजा करते हैं। क्योंकि वही (वीरस्य ) वीरों के (प्रथमानि) प्रथम श्रेणी में परिगणनीय (पास्या विदुः ) यल तथा पुरपार्थ जानते है। भावार्थ १६३ अपने तीक्ष्ण हथियारों से वीर सैनिक शत्रु का विनाश कर देते है, इतनाही नहीं अपितु शव के पशुओं का भी घघ कर धारते हैं । हे वीरो' तुम्हारे सुभ भंत करण से हमारी सुषुद्धि बढामो और हमारे प्रामों का विनाश म करो। १६४ धीर लोग ही अन्य सानों को आश्रय देते हैं, भरने धनवैभव का भली प्रकार संरक्षण करते हैं, शत्रुओं का विनाश करते हैं और सोमरस का सेवन करके युद्धों में अपना प्रभाव दर्शाते है तथा परमारमा की उपासना भी करते है। ऐसे वीर ही अन्य वीरों की शक्तियों की यथोचित जाँच करने की क्षमता रखते हैं। टिप्पणी- [ १६३ ] (.)यहणा 3 शस्त्र, नोकधारा शस्त्र, मोक । (२) ग्राम - देहात, जाति, समूह संघ । (३) सु-चेतु = उत्तम मन । (४) रद् (विठसने ) = टुकडा करना, पुरधना । (५).दत्ती - खर करनेवाला, काटने वाला। [१६४] (1)स्कम्भः = स्तम, माश्रय, माधारस्तम्भ । (२) देणं - दान, देन। (१) अव-भ्र - भाग ले जाना, छीन रेना, सीधी राह से न ले जाकर भज्ञात पगरी से ले जाना।(.) राधा मिदि, भग्न, कृपा, दया, देश, संपत्ति । (५) मलातृणासः [मल (भलं) भातृणास करने वाले ] पूर्ण रूपण उचाटन करनेहारे। - - वध - (१६५) शुत जिऽभिः । तम् । अभिऽहुतेः । अघाद। पूऽभिः । रक्षत । मरुतः । यम् । आत । जनम् । यम् । उग्राः । तवसः । विशिनः । पाथन । शंसात् । तनयस्य | पुष्टिषु ॥ ८ ॥ (१६६) विश्वानि । भद्रा । मरुतः । रथेषु । वः। मिथस्पृध्योऽइव । विपाणि । आऽहिता । अंसैपु । आ । यः । प्रऽपथेषु । सादयः । अक्षः । यः । चक्रा । समयाँ । वि । युते ॥९॥ अन्यय १६५ (हे) उग्रा तवस. वि-रप्शिनः मस्त ! यं अभिहुतेः अधात् आवत, यं जनं तनयस्य पुटिपु शंसात् पाथन, तं शत-भुजिभि. पूर्भिः रक्षत। १६६ (हे ) मरतः !व रथेषु विश्वानि भद्रा, व अंसेषु आ मिथ- स्पृध्याइच तविपाणि आहिता, प्रपथेषु सादय , व अक्ष चमा समया वि ववृते । अर्थ- १६५ हे (उमाः) शूर, (तरसः) बलिष्ठ और (वि-रप्शिन ) समर्थ (मरत 1) वीर-मरतो!(य) जिसे ( अभिहुते ) विनाश से और ( अघात् ) पापसे तुम ( आवत ) सुरक्षित रखते हो. (यं जनं ) जिस मनुष्य का (तनयस्य पुष्टिपु) वह अपने वालबच्चों का भरणपोषण कर ले, इसलिए (शंसात् ) निन्दा से (पाथन ) बचाते हो, (त) उसे (शत भुजिभि ) सैकडों उपभोग के साधनों से युक्त (पूर्भिः) दुर्गों से (रक्षत) रक्षित करो। १६६ हे ( मरुत.1 ) धीर मरतो ! (वा रथेषु ) तुम्हारे रथों में (विश्वानि भद्रा) समी कल्याणकारण यस्तुएँ रपी है । (यः अंसेषु आ ) तुम्हारे कंधों पर (मिथ-स्पृष्याश्य) मानों एक दूसरे से चढाऊपरी करनेवाले (तविपाणि) प्रलयुक्त हथियार (आहिता ) लटकाये हुए है। (प्र-पथेपु) सुदूर मार्गों में यात्रा करने के लिए (खादयः) सानेपीने की चीजों का संग्रह पर्याप्त है। (व अक्ष घका) तुम्हारे रथके पहियों को जोडनेवाला डंडा तथा उसके चक्र (समया वि ववृते) उचित समय पर घूमते है। भावार्थ-१६५ जो पलान् तथा धीर होते है, ये जनता को नाश तथा पापकृत्यों एवं निदा से बचाने की चेष्टा में सफलवा पाते हैं। इन धीरों के भुजयल के सहारे जनता सुरक्षित और भकुतोभय होकर भच्छे गदों से युक्त नगरी में निवास करते हैं और यहाँ पर अपने पुनपात्रों का सरक्षण करते हैं। १६६ पोरों के रयों पर सभी आवश्यक युद्धसाधनों का समह रहता है। वे अपने शरीरों पर हथियार धारण करते हैं। दूर की यात्रा के लिए सभी जरूरी सानेपीने की चीजें रथों पर इकट्ठी की हुई है और उनके रथों के पहिये भी उचित वेला में जैसे घूमने चाहिए, वैसे ही फिरते रहते हैं। टिप्पणी-[१६५] (1) अभिट्ठति विनाश, हार, हानि, क्षति, पराजय । (२)पुर - नगर, पुरी, कोला, पट(३) भुजि = (मानवी जीवन के लिए आवश्यक) उपभोग। (५)शंस - स्तुति, भाशीर्वाद, चाप, निन्दा1 (५) वि-रप्शिन् = या, विशेष स्तुत्य, विशेष सामध्यं से युक्त । [१६६] (1) म पथ = लया मार्ग, यात्रा, दूर का स्थान, चौटी राह या सडक । (२)समया % (स-अया) = समीप, मौके पर, नियत समय में मिझकर जाना । (३) वृत् = घूमना (४) अक्षा = रथ के पहियों को जोदनेवाला । - D - ३४ (१६७) भूरीणि । भद्रा । नषु । बाहुपु । वक्षःऽसु । रुक्माः । रभसास: । अञ्जयः । अंसैपु ! एताः। पविषु । क्षुराः । अधि। वर्यः। न । पक्षान् । वि । अर्नु । श्रियः । धिरे ॥१०॥ (१६८) महान्तः । मुद्दा । विऽवः । विभूतयः । दुरेऽदृशः। ये । दिव्याःऽईव । स्तृभिः । मन्द्राः । सुऽजिह्वाः । स्वरितारः। आसऽभिः । सम्ऽमिश्लाः । इन्द्र। मरुतः। परिऽस्तुभः॥ ११ ॥ अन्ययः- १६७ नयेषु याहुपु भूरोणि भद्रा, वक्ष सु रुपमा, अंसेपु एता रमसास. अञ्जयः, पविषु अधि क्षुराः, वय पक्षान् न, अनु धियः विधिरे। १६८ ये मरतः महा महान्तः विभ्वः वि भूतय स्तृभिः दिव्या इव दूर-दशः (ते) मन्द्राः सु-जिह्वाः आसभिः स्वरितारः, इन्द्रे सं-मिलाः परि-स्तुभः । अर्थ- १६७ (नर्यपु) जनता का हित करनेवाले इन वीरों की (बाहुपु ) भुजाओं में (भूरीणि भद्रा) यथेट कल्याणकारक शक्ति विद्यमान है, ( वक्षःसु रश्माः) उनके वक्षःस्थलों पर मुहरों के हार तथा (असेपु ) कन्धों पर ( पताः) विभिन्न रॅगवाले, ( रभसासः) सुदृढ ( अक्षयः) परिभूषण है, उनके (पविपु अधि ) पों पर (क्षुराः) तीक्ष्ण धाराएँ हैं, (वयः पक्षान् न ) पंछी जिस तरह डैने धारण करते हैं, उसी प्रकार ( अनु थियः विधिरे ) भाँति भॉति की शोभाएँ वे धारण करते हैं। १६८ (ये मरुतः) जो वीर मरुत् ( मह्ना ) अपनी महत्चा के कारण ( महान्ता) यडे (विश्वा) सामर्थ्यवान् (वि भूतया) ऐश्वर्यशाली, तथा ( स्तृभिः ) नक्षत्रों से युक्त (दिव्या इव ) स्वर्गीय देवता- गण की नाई सुहानेवाले, (दूरे देश ) दूरदर्शी, (मन्द्राः) हर्पित और (सु-जिताः) अच्छी जीभ रहने के कारण अपने ( आसभिः) मुखोंसे (स्यरितारः) भली भाँति बोलनेवाले हैं। ये ( इन्द्रे सं-मिलाः) इंद्र फो सहायता पहुंचानेवाले है, अतः (परि-स्तुभः) सभी प्रकार से सराहनीय हैं। भावार्थ-१६७ जनता का हित करने के लिए धीरों के बाहु प्रस्फुरित होने तथा आगे बढने लगते हैं और उनके उरोमाद पर एवं कंधों पर विभिन्न बीरभूषण चमकते हैं। उनके शरत्र तीक्ष्ण घाराभों से युक्त होते है। पंछी जिस भाँति भपने हैनों से सुहाने लाते हैं, उसी प्रकार ये पीर इन सभी आभूषणों एवं आयुधों से बडे भले प्रतीत होते है। १६८ वीरों में श्रेष्ठ गुण विद्यमान हैं, इसी कारण से वे महान तथा ऊँचे पद पर विराजमान होते हैं भौर मे भरपधिक सामर्यवान्, ऐश्वर्यवान्, दूरदर्शी, खेजस्वी, उल्लसित, मच्छे भाषण करनेहारे और परमात्मा के कार्य का दी। उठाने के कारण सभी के लिए प्रशंसनीय है। टिप्पणी- [१६७](१)एत. = सेजस्त्री, भांति भांति के रंगों से युक्त, वेग से जानेवाला। [१६८] (1) वि-भु. - बलवान्, प्रमुख, समर्थ, प्यारक, शासक । (२) दूरे-दृशः = दूर से ही दिखाई देनेवाले, दूर दि से युक्त, दूरदशी । (३)वि-भूति - विशेष ऐश्वर्ययुक्त, गधिमान्, पदपन, पल, वैभवशालिता। (४) सु-जिहः - मधुर भाषग करने हारा, भच्छा धाग्मी। (५) स्वरितृ = उत्तम स्वर से घोलनेहारा ।

(१६९) तत् । यः । सुजाताः । मरुतः । महिऽत्यनम्। दीर्घम् ।।दात्रम् । अदितःऽइव । वृतम् । इन्द्रः । चन । त्यज॑सा । वि । हुणाति । तत् । जनाय । यसै । सुऽकृतै । अराध्वम् ॥ १२ ॥ (१७०) तत् । वः । जामिऽत्वम्। मरुतः। परे। युगे। पुरु। यत् । शंसम् । अमृतासः । आवत। अया । धिया । मनवे । श्रुष्टिम् । आव्य । साकम् । नरः । सनैः । आ । चिकित्रिरे ॥ १३ ॥ अन्वयः- १६९ ( है ) सु-जाताः मस्तः ! वः तत् महित्यनं अदिते इव दीर्घ प्रतं वः दानं, यस्मै सु-कृते जनाय त्यजसा अगवं, तत् इन्द्रः चन वि हुणाति । १७० (हे) अ-मृतासः मस्तः ! वः तत् जामित्वं, यत् परे युगे शंसं पुरु आवत, अया धिया मनवे साकं दंसनै नरः श्रुष्टिं आव्य आ चिकित्रिरे। अर्थ- १६९ हे (स-जाताः मरुतः ! ) कुलीन वीर मरुतो ! (व.) तुम्हारा ( तत् महित्वनं ) वह बड- प्पन सचमुच प्रसिद्ध है। ( अदिते इव दीर्घ व्रतं ) भूमि के विस्तृत प्रत के समान ही (यः दार) तुम्हारी उदारता यहुत बडी है, ( यस्मै ) जिस (सु कृते ) पुण्यात्मा (जनाय ) मानव को तुम ( त्यजसा) अपनी त्यागवृत्ति से जो ( अराध्वं ) दान देते हो, (तत्) उसे ( इन्द्र चन [च न ] यि हुणाति ) इन तक विनष्ट नहीं कर सकता है। १७० हे ( अ मृतास. मरुतः !) अमर वीर मरात्गण ! (वः तत् जामित्वं ) तुम्हारा वह भाई- पन बहुत प्रसिद्ध है, ( यत्) जिस ( परे युगे) प्राचीन काल में निर्मित (शंस ) स्तुति को सुनकर तुम हमारी (पुरु आवत ) बहुत रक्षा कर चुके हो और उसी (अया धिया) इस बुद्धि से (मनवे ) मनुष्य- मात्र के लिए ( साकं नर.) मिलजुलकर पराक्रम करनेवाले नेता बने हुए तुम (दंसनैः ) अपने कर्मों से (श्रुष्टिं आव्य ) ऐश्वर्य की रक्षा कर के उस में विद्यमान (आ चिकित्रिरे) दोपों को दूर हटाते हो । भावार्थ- १६९ वीर पुरप बढी भारी उदारता से जो दान देते हैं, उसी से उनका बडप्पन प्रकट होता है । पृथ्वी के समान ही ये बडे पिशालचेता एवं उदार हुभा करते है । शुभ कर्म करनेवाले को इन से जो सहायता मिलती है, वह भन्नतिम तथा बेजोड ही है। एक बार ये वीर अगर कुछ कार्यकता को दे डालें, तो कोई भी इस वान को छीन नहीं सकता । वीरों की देन को छीन लेने की मजाल भला किस में होगी ? विशेषतया जब सुयोग्य कार्यकर्ता उस दान को पाने के अधिकारी हों। १७० तुम वीरों का भ्रातृप्रेम सचमुच अवर्णनीय है । अतीतकाल में तुम भली भाँति हमारी रक्षा कर चुके ही हो, लेकिन आगामी युग में भी उसी उदार मनोवृत्ति से सारे मानवों की रक्षा के लिए तुम सभी वीर मिल. जुलकर एक दिल से अपने कमाद्वारा जिप्त रक्षण के गुरुतर कार्य को उठाना चाहते हो, वह भी पूर्णतया त्रुटिहीन एवं भतिकर है। टिप्पणी- [१६९] (1) अदिति. w+दितिः) अखण्डित, धरती, प्रकृति, गाय (अदि + ति) भन्न देनेवाली, सानेकी चीजें देनेवाली । (२) दानं = दान, देन । (३) त्यजस् = स्याग, अर्पण, दान। [१७०] १) जामिः = एक ही वंश या परिवार में उत्पन्न होने से भाई बहन का सम्बन्ध, सख्य, स्नेह जामित्वं = भाईपन भाई का प्यार । (२) श्रुष्टि. = सुनना, सहायता, वर, वैभवसंपन्नता, सुख, ऐश्वर्य । (३) दंसन = कम । (४) आ-चिकित् = चिकित्सा करना, दोष दूर करना। मरन् [हि.1९ ( - (१७१) येन । दीर्घम् । मरुतः । शुशाम ! युष्मान । परीणसा । तुरासः आ । यत् । ततनन् । वृजनै । जनासः। एभिः । यज्ञेभिः । तत् । अमि । इष्टिम् । अश्याम् ॥ १४॥ (१७२) एपः । यः । स्तोमः । मरुतः । इयम् । गीः। मान्दार्यस्य । मान्यस्मै । कारोः । आ । इपा । यासिष्ट । तुन्यै । व्याम् । विद्यामं । डुपम् । वृजनम् । जीरदानुम् ॥१५॥ अन्वय १७१ (हे ) तुरास मरतः । येन युप्माकेन परीणसा दीर्घ शूशयाम, यत् जनास वृजने आ ततनन्, तत् इष्टिं पभिः यज्ञभि. अभि अश्याम् । १७२ (हे) मरत ! मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः, एप स्तोम', इयं गीः यः, या तन्ये आ यामिष्ट, क्या इयं वृजन जीर दानुं विद्याम । अर्थ- १७९ है ( तुरास भरतः') वेगवान् वीर मरतो! (येन युप्माकेन परीणसा) जिस तुम्हारे ऐश्वर्य के सहयोगसे हम (दीर्घ) बडेबडे कार्य (शूशवाम ) करते हैं और (यत्) जिससे (जनासः) सभी योग (वृजने) सग्रामों में (आ ततनन् ) चतुर्दिक फैल जाते हैं-- विजयी बन जाते हैं- (तत् इष्टिं ) उस तुम्हारी शुभ इच्छा को हम (एभिः यमि.) इन यज्ञकर्मों से (अभि अइयां) प्राप्त हों। १७० हे (मरत.') वीर मरतो ! (मान्दार्यस्य ) हर्षित मनोवृत्ति के तथा (मान्यस्य) संमानाई (कारो) कारीगर या फयिका किया हुआ (एप• स्तोमः) यह काव्य तथा (इयं गीः) यह प्रशंसा (4) तुम्हारे लिए है । यह सारी सराहना हमारे (इपा) अन्न के साथ (तन्वे) तुम्हारे शरीर की वृद्धि करने के लिए तुम्हें ( आ यासिष्ट) माप्त हो जाए। उसी प्रकार (वयां ) हमें (इषं) अन्न, (पृजनं) यल और (जीर दानु ) शीघ्र विजय (विद्याम ) प्राप्त हो जाए। भाचार्य १७१ तुम्हारी महान् सहायता पाकर ही हम बडे बडे कर्म कर चुके हैं और उसी सुम्हारी सहायता मभी लोग भाँति भाँति के युद्धों में विषयी बन चुके हैं। हमारी यही लालसा है कि, अप शुरू किये जानेवाले कर्मों मे वही तुम्हारी पुरानी सहायता हमें मिल जाए । १७. उच्च कोटि के कवि का बनाया हुआ यह काम्य तथा यह मध इन अंध वीरों का उह बहाने के लिए उन्हें प्राप्त हो जाय और हम भघ सामर्थ तथा विजय मिले। टिप्पणी- [१७१] (1) इष्टि - हरदा, कामना, यज्ञ, अभीष्ट विषय । (२) परीणस् = (पृ- पालनपूरणयो यिपुर ता, अधिक्ता, अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त । यहुनाम (निघ ३1)1 (३) शय् = (सव-गती ) जामा, पदलना । [१७२ ] (1) मान्दार्य = (मन्द - मानदित होना, प्रकायना, स्तुति करना ।) पर्पित मनवाला, प्रकाशमान, स्तुतिपाठक । (२) कारः- करनेवाला, कारीगर, कवि, स्तोता। (३) जरि-दानु = (जोर = गौम, चपल गति, सष्टवार, दानु - पिनयो, दान, वायु, वैभव । ) शोध उपति, शीघ्र विजयप्राप्ति । (५) पृजनं देने की प्राक्ति, यह सामपं जिससे दूर हो जाय । शत्रु को हरा । । - (ऋ० १११६॥२-19) (१७३) आ । नः । अब:ऽभिः । मरुतः । यान्तु । अच्छे । ज्येष्ठेभिः । वा । बृहऽदिवः । सुऽमायाः । अर्ध । यत् । एपाम् । निऽयुतः । परमाः। समुद्रस्य । चित् । धनय॑न्त । परे ॥ २ ॥ (१७४) मिम्यक्ष । येषू । सुऽर्धिता । घृताची । हिरण्यऽनिर्निक् । उपरा । न । ऋष्टिः । गुहाँ । चरन्ती ! मनुपः । न । यो । सभाऽवती । विदथ्योऽइव ! सम् । वाक् ॥३॥ अन्वय १७३ सु-मायाः मस्त अयोभि ज्येप्ठेभि वृहत् दिवैः वा नः अच्छ आ यान्तु, अध यत् एषां परमाः नियुतः समुद्रस्य पारे चित् धनयन्त । १७४ सु-धिता घृताची हिरण्य-निर्णिक् प्राष्टिः उपरा न, येपु सं मिम्यक्ष, गुहा चरन्ती मनुपः योपान, विथ्याइय चार सभा-रती। अर्थ- १७३ (सु-मायाः) ये अच्छे कौशल से युक्त (मयतः) वीर मरत्-गण अपने (अयोभिः) संरक्षण- क्षम शक्तियों के साथ और (ज्येष्ठेभिः) श्रेष्ठ (वृहत् -दिवैः वा ) रत्नों के साथ (नः अच्छ आ यान्तु) हमारे निकट भा जाएँ । (अध यत्) और तदुपरान्त (एषां परमाः नियुतः) इनके उत्तम घोडे (समुद्रस्य पारे चित् ) समुन्दर के भी परे चले जाफर (धनयन्त) धन लानेका प्रयत्न करें। १७४ ( सु-धिता) भली भाँति सुदृढ ढंगसे पकडी हुई, (घृताची) तेज बनाई हुई, (हिरण्य- निर्णिक् ) सुवर्ण के समान चमकनेवाली (ऋष्टिः) तलवार (उपरान ) मेघमण्डल में विद्यमान विजली के समान (येपु) जिन वारोंके निकट (सं मिम्यक्ष) सदैव रहा करती है, वह (गुहा चरन्ती ) परदे में संचार करती हुई (मनुपः योपान) मानवको नारी के समान कभी अदृश्य रहती है और कभी कभी (विदथ्याश्य वाक् ) यशसभा की वाणी की न्याई (सभा-वती) सभासदों में प्रकट हुआ करती है। भावार्थ- १७३ निपुण वीर भएनी सरक्षणक्षम शक्तियों के साथ हमारी रक्षा करें और दिव्य रस्त प्रदान करके हमारी संपत्ति बढा दें। उसी प्रकार इनके घोडे भी समुरपार चले जाकर वहाँसे संपत्ति काय और हममे वितीर्ण करें । १७४ पोरों की तलवार भेट फौरादको पनी हुई है और यह तोग एवं स्वर्णवत् चमकीरी दीख पडती है । वीर लोग उसे बहुत मजबून तरहसे हायमें पकटे रहते हैं । तथापि वह मानवी महिला के समान कभी कमी मियानमें छिपी पढी रहती है और यज्ञिय मंत्रघोष के समान वह किन्ही भवसरों पर युद्ध के जारी रहने पर बाहर अपना स्वरूप दर्शाती है। टिप्पणी- [१७३] (1) नियुत् = घोटा, पति, कतार, पक्ति में खड़ी की हुई सेना । (२) बृहत्-दिम् पदा संजस्वी धन । [१७४] (1) घृताची = तैलयुक्त, जलयुक्त, तजवी, तेल में तेज यनायी हुई (शायद यह भभिमाय हो कि, फौलाद का स्त्र गर्म करके तेल में डया देते हैं या अच्छी तरह सपा कर जल मे डार देते हैं, ऐसा भी अर्थ होगा।) (२) गुहा = गुफा, ढकी हुई बद जगह, अंत करण, रनियाम । (गुहा चान्नी मनुपः योपा- क्या साधारण महिलाएँ मियान में रखी हुई तलवार समाम घर के भीतर ही रहा करती थीं ?) (३) हिरण्य-निर्णि मुनहले रंग की। (४) उपरा ( उपला) = मेघसमुदाय, मेघमाला, भेघ में विद्यमान विद्युत् । इस मन्त्रके दो अर्थ हो सकते हैं-(.) मेघपर अर्थ- (सु-हिता) भरी भाँति रखी हुई (घृत-अची) जल छोड़नेवाली. परसास करनेवाली (हिरण्य-निर्णिम् ) सोने के समान चमकनेवाली (नि) सलवारके समान प्रकाशित ( उपरा) मेघ की विद्युत् मानपी महिला के समान कभी कभी (गुहा) बन्द जगह में गुप्त रूप से रहती है और निहीं भवसरों पर (विदच्याहव याक्) मंदपान्तर्गत सभाके वेदघोषकी नाई बाहर आ निकलती है, अर्थात् दामिनी कभी चमक उठती है और कभी उपकी दमक नहीं दिखाई देती है । (२) वीरोकी तलवार (सु-हिता ) भग्छी तरह हाथ में धरी हुई - - (१७५) परी । शुभ्राः । अयासः । यच्या । साधारण्याऽईव । मरुतः । मिमिक्षुः । न । रोदसी इति । अपं । नुदन्त । घोराः । जुपन्त । वृधम् । सख्यायं । देवाः ॥४॥ (१७६) जोपत् । यत् । ईम् । असुयी । संचय । विसितऽस्तुका । रोदसी । नुऽमनाः । आ। सूर्याऽर्डच । विधतः । रर्थम् । गात् । त्वेषऽतीका । नर्भसः । न । इत्या ॥ ५ ॥ अन्वय - १७५ शुभ्रा अयासः मरुत साधारण्याइय यन्या परा मिमिक्षुः, घोराः रोदसी न अप नुदन्त, देवाः सरयाय वृध जुषन्त । १७६ असु-र्या नृ मना रोदसी यत् है सचध्यै जोपत् चिसित स्तुमा त्वेष-प्रतीका सूर्या- इव विधतः रथं नभस इत्या न आ गात् । अर्थ- १७५ (शुभ्राः) तेजस्वी, (अयासः शन पर हमला करनेवाले (मरतः) चीर मरत् (साधारण्या- इव) सामान्य नारी के साथ जैसे लोग यतीच रखते हैं, उसी तरह (यव्या) जौ उत्पन्न करनेवाली धरती पर (परा मिमिक्षु ) बहुत वर्षा कर चुके है। (घोरा.) उन देसते ही मनमें तनिक भय उत्पन्न करनेवाले मरताने (रोदसी) आकाश एवं धरती को (न अप नुदन्त) दूर नहीं हटा दिया । अर्थात् उनकी उपेक्षा नहीं की, क्योंकि (देवा. ) प्रकाशमान उन मस्ताने (सस्याय) सबसे मिनता प्रस्थापित करने के लिए ही (युधं ) वडप्पनका ( जुपन्त ) ऑगकार किया है। १७३ (असु-या) जीवन देनेहारी और (नृ मनाः) चीरों पर मन रसनेवाली (रोदसी ) धरती या विद्युत् (यत ई) जो इनके (सध्य) सहवास के लिए (जोपत्) उनकी सेवा करती है। यह (वि-सित-स्तुका ) केश सॅवारकर ठीक बाँधे हुए ( त्वेष-प्रतीस) तेजस्वी अवयवशाली (सूर्याइव) सूर्यासावित्री के समान (विधत. रथं ) विधाता के रथपर (नभस इत्या न) सूर्य की गति के समान विशेष गति से ( आ गात् ) आ पहुँची। भावार्थ- १७९ जो शूर तथा वीर है, वे उर्वरा भूमि को बड़े परिश्रमपूर्वक जोतते हैं और मेघ भी ऐसी धरती पर यथेष्ट घर्षा करते हैं । जिस प्रकार सामान्य नारी से कोई भी सम्बन्ध रसता है, उसी प्रकार ये धीर भी भूलोक एवं धुरोक में विद्यमान सब चीजो से मित्रतापूर्ण सम्पर्क प्रस्थापित करते हैं। इमोसे इन वीरों को वपन प्राप्त १७६ चोरों की पत्ती घोरों पर असीम प्रेम करती है और यह खूब संघारकर तथा वन-ठन के या साज- सिगार करके जैसे सावित्री पति के घर जाने के रिए विधाता के रथ पर बैठ गयी थी वैसे ही पतिगृह पहुंचने के लिए यह भी वी के रथ पर चढ़ जाती है। (घृत मची ) तीक्ष्ण धारावाली (हिरण्य-निर्णि) वर्ण की न्याई कान्तिमय दिखाई देनेवारी (उपरान) मेघकी बिजली के समान चमकने वाली (फोट ) वीरों की तल पार सदैव वीरों के निकट रहा करती है, ऐकित दह कभी कभी (गुदा सरनी ) परदे में रहता हुई नारी के समान अश्य रहती है, तो एकाध अवसर पर जिस प्रकार यशमदप में वेदवाणी प्रस्ट होती है, उसी तरह वह (विदध्या ) युद्धभूमिमें या रणमे अपना स्वरूप रक्त करती है। [१७५] (ग्रवाना क्षेत्र) जिस धरती में जो पैदा होत हो। (२) अयास : गतिशीर, अक्रमण करने - हारे। [ १७६1 (1) सूर्या = सूर्य की पुत्री, नवपरिणीता । (३) इत्या गति, बाना, सरक, पालकी, घाइन । (३) असु यो क जीवन प्रदान करने वाली । (१) प्रतीक = अवयर, हरा । (५) नमस् : मेघ, जल, (1)ययं D D भाकास, सूर्य।

(१७७) आ । अस्थापयन्त । युवतिम् । युवानः। शुभे। निऽमिश्लाम् । विदथेषु । पजाम् । अर्कः । यत् । यः । मरुतः । विप्मान् । गायत् । गाथम् । सुतऽसौमः । दुवस्यन् ॥ ६ ॥ (१७८) प्र । तम् । विवक्मि । वम्यः । यः । एषाम् । मुरुताम् । महिमा । सत्यः । अस्ति । सचा । यत् । ईम् । वृर्षऽमनाः । अहम्ऽयुः । स्थिरा । चित् । जनीः । वहते । सुऽभागाः ॥ ७ ॥ अन्वयः- १७७ (हे) मरुतः ! यत् अर्कः हविष्मान् सुत-सोमः व. दुवस्यन् विदथेषु गाथं आ गायत्, युवानः नि-मिश्लां पन्नां युवतिं शुभे अस्थापयन्त । १७८ एषां मरुतां यः वयम्यः सत्य महिमा अस्ति, तं प्र विवक्मि, यत् ई स्थिरा चित् सचा वृष-मना. अहं-युः सु-भागाः जनीः वहते। अर्थ- १७७ हे (मरुतः!) वीर मरतो ! ( यत् ) जय (अर्कः) पूजनीय, (हविष्मान ) हविष्यान्न समीप रखनेवाला और (सुत-सोमः) जिसने सोमरस निचोड रखा है, यह (पंः दुवस्यन् ) तुम वीरों की पूजा करनेहारा उपासफ (विदथेषु) यक्षों में (गार्थ) स्तोत्र का (आ गायत् ) गायन करता है, तव (युवानः) तुम युवक वीर (नि-मिश्ला) नित्य सहवास में रहती हुई (पन्नां) बलशाली (युवति) नव. यौवना-स्वपत्नी को- (शभे) अच्छे मार्ग में, यज्ञ में (अस्थापयन्त) प्रस्थापित करते हो, ले आते हो। १७८ (एषां मरतां ) इन चीर-मरतों का (यः वयम्यः) जो वर्णनीय एवं (सत्यः ) सच्चा (महिमा अस्ति) वडप्पन है (तं प्र विवक्मि ) उसका मैं भलीभाँति यखान करता हूँ। ( यत् ई ) वह इस तरह कि यह ( स्थिरा चित् ) अटल धरती भी ( सचा) इनका अनुसरण करनेवाली (वृप-मनाः) बल धानों से मनःपूर्वक प्रेम करनेहारी पर वीरपत्नी बनने की (अहं-युः) अहंकार धारण करनेवाली और (सु-भागाः) सौभाग्य युक्त (जनीः ) प्रजा ( वहते ) धारण करती है, उत्पन्न करती है। भावार्थ- १७७ जन उपासक तुम्हारी प्रशंसा करते है, तय पीतों की धर्मपत्नी सन्मार्ग पर चलती हुई अपने पति का यश बढाती है। १७८ वीरों की महिमा इतनी अवर्णनीय है कि, धरतीमाता तक उनकी शूरता पर लुब्ध होकर भग्छी भाग्यशाली प्रजा का धारणपोषग करती है । इन वीरों की महिलाएं भी इनके पराक्रम से संतुष्ट होकर अरछे गुणों से पुष संतान को जन्म देती है। . %3D - टिप्पणी- [१७७] (१) पत्र = बलशाली, सामर्षयान् । (१) दुवस् (दुवस्यति सम्मान देता है, पूजा करता है ) सम्मान. पूजा। दुवस्यन् पूजा करनेवाला, सम्मान करनेहारा | मंत्र १८५ देखो। [१७०] (१) चक्मन् = (वच परिभाषगे ) स्तुनिस्तोत्री यम्यः = स्तुस्य, वर्णनीय । (२) सच् (समवाये सेचने सेवने च) = अनुमरण करना, पिछलग्गु मनना, सहवास में रहना, आज्ञा मान लेना, सहायता करना । (३)जनिः = जन्म, उत्पत्ति (प्रजा) संतति । (४) वृप-मनाः = बलिष्ठ पर भामक्त होनेवाली, जिसका चित्त वर्षा पर लगा हो, यलयान मनवाली।

(१७९) पान्ति । मित्रावरुणौ । अवद्यात् । चर्यते । ईम् । अर्यमो इति । अप्रेऽशस्तान् । उत। च्यवन्ते । अच्युता । ध्रुवाणि । वृधे । ईम् । मरुतः । दाविऽयारः ॥८॥ (१८०) नहि। नु । यः । मरुतः। अन्ति। असे इति। आरानात् । चित् । शवसः। अन्वम् । आपुः । ते ।ष्णुना । शव॑सा । शूशुध्वांसः। अर्णः । न । द्वेषः । धूपता। परि । स्थुः ॥९॥ अन्वयः-- १७९ (हे ) मरुतः ! मित्रा-वरुणो अवधात् ई पान्ति, अर्यमा उ अ-प्रशस्तान् चयते, उत यच्युता ध्रुवाणि च्यवन्ते, ई दाति-चारः ववृधे। १८० (हे) मरुतः यः शवसः अन्तं अन्ति आरात्तात् चित् असे नहि नुआपुः,ते कृष्णुना शवसा शूटावांसः धृपता द्वेषः, अर्णोन, परि स्थुः। अर्श-१७९ हे (मरुतः !) वीर-मरुतो! (मित्रा-वरुणो) मित्र एवं वरुण ( अयद्यात् ) निंदनीय दोपों से (ई पान्ति ) रक्षण करते हैं। ( अर्यमा उ ) अर्यमा ही ( अ-प्रशस्तान ) निंदा करनेयोग्य वस्तुओं को (चयते ) एक ओर कर देता है और (उत) उसी प्रकार (अ-च्युता) न हिलनेवाले तथा (ध्याणि ) दृढ शत्रुओं को भी (च्यवन्ते ) अपने पदों पर से ढकेल देते है. (१)यह तुम्हारा (दाति-पारः) दान का यर हमेशा ( वधे ) यढता जाता है। तुम्हारी सहायता अधिकाधिक मिलती - १८०३ ( मस्तः!) वीर-मरतो! (यशयसः) तुम्हारी सामर्थ्य की (अन्तं ) चरम सीमा (अन्ति) समीप से या (भारात्तात् चित् ) दूर से भी ( अस्मे ) हमें (नहि नु आपुः) सचमुच प्राप्त नहीं हुई है। (ते धृष्णुना शपसा) घे चोर आवेशयुक्त यल से (शशुवांसः) बढनेवाल, अपने (पृषता ) शदल की धज्जियाँ उडानेवाले थल से (द्वेपः ) शत्रुओं को (अर्णःन) जल के समान (परि स्थः) घेर लेते हैं। भावार्थ- १७९ उपासक को मिन, पहन तथा अर्थमा दोषों से और निंदा से बचाते है । उसी प्रकार पे धीर पुस्थिर शत्रुओं को भी पदभ्रष्ट करके सारी प्रशा को प्रगतिशील बनने में सहायता पहुंचाते हैं। सहायता करने का गुण इनमें प्रविपळ पदता ही रहता है। १८० पराकम कर दिखलाने की जो शक्ति चोरों में अंतनिगूढ बनी रहती है, उसकी चरम सीमाका ज्ञान भभी तक किसी को भी नहीं है । चूंकि उन धीरों में यह सामध्यं छिपा पटा है कि, सनके शवों को तुरन्त पराभूत बमा हतबल करमाटे, अत: घे प्रतिपल घर्धिष्णु ही बने रहते हैं । इसी दुर्दम्य शक्ति के सहारे ये शत्रु को घेरकर उसे बिमा कर देते हैं। S टिप्पणी-[ १७९(१) दातिः (दादाने ) दान, रयाग, सहायता; (दा छेदने ) काटना, तोडना । (२) पारा - पर, समूह, शशि, वेला, दियस, सम्धि। [१८०] (1) धृपत् = शत्रु का पराभव करनेवाला, इस भर्पण करने की क्षमता से युक्त । (२) घृष्णु • वह साहसपूर्ण भाव कि जिससे शत्रुका पराभघ भवय किया जाय। (1) द्विप् = देष करनेवास, दुश्मन ।

(१८१) वयम् । अध । इन्द्रस्य । प्रेष्ठः। वयम् । श्वा । वोचेमहि । सऽमर्ये । व्यम् । पुरा । महि । च । नः । अनु । द्यून् । तत् । नः । ऋभुक्षाः । नराम् । अनु। स्यात् ॥१०॥ (१८२) एषः । वा । सोमः । मरुतः । इयम् । गीः। मान्दार्यस्य । मान्यस्य । कारोः । आ । इपा । यासीष्ट । तुन्वे । वयाम् । विद्याम । हुपम् । पूजनम् । जीरऽदानुम् ।। ११ ।। (३.१११६८११-१०) (१८३) यज्ञाऽयंज्ञा । वः। समना । तुतुर्वणिः। धिर्यम्ऽधियम् । य:। देवऽयाः ऊँइति । दधिध्ये । आ । वः । अर्याचः । सुविताय । रोदस्योः। महे । ववृत्याम् । अबसे ! सुवृक्तिभिः ॥ १॥ अन्धयः- १८१ अद्य वयं इन्द्रस्य मेष्ठाः, घयं श्या, पुरा वयं नः महि च धून् अनु स-मय योचेमहि, तत् प्रभुक्षा नरां नः अनु स्यात् । १८२ [ऋ० १२१६६।१५; १७२ देखिये।] [१८३ यशा-यशा यः स मना तुतुर्वणिः, धियं-- धियं देव-याः उ दधिध्वे, रोदस्योः सु-विताय महे अवसे सु-वृक्तिभिः यः अर्याचः आ घवृत्यां। अर्थ- १८१ ( अद्य घयं) आज हम (इन्द्रस्य प्र-ष्ठाः) इन्द्र के अतीव प्रिय बने है (वयं) हम (श्वः) कल भी उसी तरह उसके प्यारे बनेंगे। (पुरा क्यं) पहले हम (नः) हमें (महि च .) बडप्पन मिल जाय इस लिए (धून अनु) प्रतिदिन (स-मयें ) युद्धों में (घोचेमहि) हम घोषित कर चुके हैं- प्रार्थना कर चुके ( तत् कि (प्रभु-क्षाः ) वह इन्द्र (नरां) सा मानवों में (नः) हमें ( अनु स्यात् ) अनुकूल यने। १८२ [ ऋ० १२१६६।१५; १७२ देखिये। २८३ (यशा-यशा) हर फर्म में (यः ) तुम्हारा (स-मना ) मन का सम भाव (तुतुर्वणिः) सेवा करने में त्वरा करने वाला है। तुम अपना (धियं-धियं ) हर विचार (देव-याःउ ) दैवी सामर्थ्य पाने की इच्छा से ही (दधिध्ये ) धारण करते हो । ( रोदस्योः) आकाश एवं पृथ्वी की (सुविताय) सुस्थिति के लिए तथा ( महे अवसे) सब के पूर्ण रक्षण के लिए (सु-वृक्तिभिः) अच्छे प्रशंसनीय मागों से (का) तुम्हें (अर्वाचः) हमारी ओर (आ ववृत्यां ) आकर्षित करता हूँ। भावार्थ-१८१ हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि, अतीत वर्तमान एवं भविष्य तीनों कालों में वह हम पर कृपा- रष्टि रखे जिससे हमें पापन मिले और स्पर्धा में उसकी मदद से विजयी भनें । १८२ [२० ११६६५, १७२ देखिये ।। १८३ वीरों के मन की संतुलित दशा ही उन्हें हर शुभ कार्य में प्रेरित करती है, स्फूति प्रदान करती है। ये ख्याल करते हैं कि, देवी शक्ति पाकर सब लोगों की सुस्थिति एवं सुरक्षा के लिए ही उसका उपयोग करना चाहिए। इसीलिए ऐसे महान वीरों को अपने अनुकूल माना चाहिए। टिप्पणी- [ १८१] (१) मर्यः = मरय, मानव । (२) स-मर्य = मरोंसे युध, सभा, समाज, यश, युद्ध । (३) द्यु = दिवस, भाकाश, स्वर्ग, प्रकाश ! (४)माभु-क्षा - (ऋभु) कारीगरों एवं शिल्पियों को (क्षाः) 'मुखी जीवन देनेहाग, शिल्पनिपुण लोगों का पालन कर्ता, इन्द्र। [ १८३] (1) सुपित = उत्तम दशा वैभव, अच्छी राह । (२) स-मना = समस्त्र, मिलकर रहना, एक ही समय । (३) तुतुर्वणिः (तुर-वनिः) रापूर्वक का निभाने का स्वभाव । (४) सु-वृक्ति प्रशंसा, स्तुति । (५) आ-वृत् - पुनः पुनः आकृष्ट %3D करना।

(१८४) बवासः । न । ये सऽजाः । स्वऽनवसः। इपम् । स्वः । अभिजायन्त । धूतयः। सहस्रियासः । अपाम् । न । ऊर्मयः। आसा । गावः । बन्यामः । न । उक्षणः ॥ २ ॥ (१८५) सोमासः । न । ये । सुताः । तृप्तऽअंशवः। दृन्ऽमु । पीतासः । दुवसः। न । आसते । आ । एपाम् । अंसैपु । रम्भिीऽइव । रमे। हस्तेषु । सादिः । च । कृतिः । च । सम् । दुधे ॥३॥ . अन्वय १८४ ये, वयास न, स्व-जाः स्व-तवसः धृतय इपं स्वः अभिजायन्त, अपां ऊमय न, संहानि-पास., वन्यास गाव उक्षणः न आसा। १८५ सुता पीतास. हुत्स तृप्त-अंशय सोमा न, ये दुवस. न, आसते, एषां सेषु रम्भिणी- इय आ ररभे, हस्तेपुच सादि कृति च सं दधे। अर्थ- १८४ (ये ) जो (बवासः न ) सुरक्षित स्थानों के समान सयको सुरक्षित रसते हैं और जो (स्थ जाः) अपनी निजी स्फति से कार्य करते है और (स्व-तवसः) अपने वलस युक्त होने के कारण (धूतयः) शत्रुओं को हिला देते है ये (इयं) अन्नप्राप्ति तथा (स्यः) स्यप्रकाश के लिए ही (अभिजायन्त) सभी तरहसे जन्मे होते हैं, वे (जपा ऊर्मयः न) जलके तरंगों के समान (सहनि-यास:) हजारों लोगों को प्रिय होते हैवही (वन्द्यासः गायः उक्षणःन) पू.य गौ तथा बलों के समान (आसा) हमारे समीप रहे। १८१ (सुता.) निचोडे हुए (पीतास.) पिये हुए (हत्सु) हृदय में जाकर (तत-शंशवः) तृप्ति करनेवाले (सामान) सोमरस के समान, ( दुषसः न ) पूज्य मानयों के समानही जो वीर पुरुप राष्ट्र में (आसते) रहते हैं (एषां अंसेपु) उनके कंधों पर (रम्भिणीश्च ) लट्टले चढाई करनेवाली सैनी के समान हथियार (भा ररभे) विद्यमान है । उसी प्रकार उनके ( हस्तेपु सादिः) हाथों में अलंकार तथा (शतिः च ) तलवार भी (सं दधे) भली प्रकार धरे हुए हैं। .. भावार्थ - १८४ स्वय प्रेरणा से ही वीर सैनिक जनता का सरक्षण करने के लिए, आगे भाते हैं। अपनी शक्ति से सभों का नाश करके से जनता को भयमुक्त करते हैं। वे मानों लोगों को भग्न एव तेजस्थिता देने के लिए ही जन्मे होर पानी के समान सभी लोग उन्हें घाइते भौर सब की यही इच्छा है कि, गाय थैल से वे अपने समीप सदेव रहे। १८५ सोमरस के सेवन के उपरान्त जैसे हर्ष एवं उमंग में वृद्धि होती है उसी प्रकार जो वीर" जनया में कम करने का उत्साह बढ़ाते हैं उनके कों पर हथियार और हाथ में ठार तर पार दिखाई देते हैं। - टिप्पणी - [१८४](1) आसा=(भाम्, भास) मुन्न, समीप, आँखों के सामने, सहमने, बिल्कुल समीर । (२) घमासः = (वन - मावस्यान, देकी हुई मुरक्षित जगह, जहाँ रहने पर अच्छी रक्षा हो सकती हो, भाध्य. स्थान, गुह्म । (३)स्य जः = अपनी प्रेरणा से आगे बढनेपा, दुसरे के दयार से नहीं । ( ४ ) स्व (सरा)' भारमतेज, अपना प्रकाश (५) ऊर्मि = रहर, तरंग। [१८] (1) अंगुः सोमवाळी, सोमरस ! (२) तिः- (कृती छेदने काटना)= काटने वाला आयुध, सलवार। (३) रम्भ = टकटी, लाटी । रम्भिणी लाटी लेकर पदाई करने पारी सेना । माले के समान शस्त्र । D (१८६) अवै । स्वऽयुक्ताः । दिवः । आ । वृथा । ययुः। अमाः । कशया । चोदत । त्मना । अरेणवः । तुविजाताः । अचुच्यः । हुमहानि । चित् । मुरुतः । श्राजत्ऽमष्टयः ॥ ४ ॥ (१८७) कः । यः । अन्तः । मरुतः । ऋष्टिऽविद्युतः। रेजति । त्मना । हन्योऽइव । जिह्वया । धन्वऽच्युतः । इपाम् । न । यामनि । पुरुऽपाः । अहन्यः । न । एतशः ॥ ५॥ अन्वयः- १८६ स्व-युक्ताः दियपृथा अब आ ययुः, (हे ) अ-माः ! त्मना कशया चोदत, अ.. रेणयः तुचि जाता. भ्राजत्-ऋष्टयः मरुतः हळहानि चित् अचुच्ययुः । १८७ (हे) ऋष्टि-विद्युतः मरुतः ! इषां पुरु-प्रेषा. धन्य च्युत न, अ-हन्यः एतशः न, वः अन्त. त्मना जिद्वया इन्वाइव का रेजति। अर्थ- १८६ (स्व-युक्ताः ) स्वयं ही कर्म में निरन होनेवाले वे वीर (दियः) धुलोक से (वृथा) अनायासही (अब मा ययुः) नीचे आये हुए हैं । हे (अ-माः ! ) अमर पीरो ! (मना) तुम अपने (कशया) कोडे से घोडों को (चोदत) प्रेरित करो। ये (अ-रेणवः ) निर्मल (तुवि-जाताः ) यलक लिए प्रसिद्ध तथा (भ्राजत्-ऋप्रयः) तेजस्वी हथियार धारण करनेवाले (मरुतः) वीर मरुत् (हानि चित् ) सुदृढों को भी ( अचुच्ययुः ) हिला देते है। १८७ हे (ऋष्टि-विद्युतः मरुतः ! ) आयुधों से विराजमान वीर मरुतो! तुम ( इपां) अन्न के लिए (पुरु-पा.) यहुत प्रेरणा करनेहारे हो । (धन्य-च्युतः न) धनुष्य से छोडे हुए वाण की न्याई या ( अ-हन्यः ) जिसे मारने की कोई आवश्यकता नहीं, ऐसे (एतशः न ) सिखाये हुए घोड़े के समान (वः अन्तः तुममें (त्मना ) स्वयं ही (जिलया ) जीम के साथ-वाणीसहित (हन्वाइव ) ही जैसे हिलती है, वैसेही (कः रेजति ) कौन भला प्रेरणा करता है ? भावार्थ- १८६ मपनी ही इछा से कार्य करने वाले ये वीर दिग्णस्वरूपी है और निष्काम भाव से शिविध कार्यों में जुट जाते हैं। इन निर्मक एवं तेजस्वी वीरों में इतनी क्षमता है कि, प्रबल शत्रुओं में भी क्या मजाल कि इनके सामने खडे, रह सके । १८७ वीर सैनिक भन्न की वृद्धि के लिए बहुत प्रयत्न करते हैं । धनुष्य से छोडा हुआ तीर जसे रोक पहुँच जाता है, वैसे ही या भली भाँति सिखाया हुभा घोटा जैसे ठीक चलता रहता है, वैसे ही तुम जो कार्य. भार उठाते हो, उसे अरछी तरह निभाते हो। भला इसमें तुम्हें अन्त:प्रेरणा कैसे मिलती होगी? टिप्पणी-[ १८६] (1) रेणुः धूलिकण, मल, अरेणु - स्वच्छ, दोषरहित । (२) स्व-युक्ता युक्ता, स्वेन युक्ता स्व युक्ताः) = भरने सभी वीरों के साथ, स्वयं ही अपने भाप को प्रेरित करने वाले, भएनी भायो. जना स्वयं तैयार करनेवाले, खुद ही काम मे तत्पर होनेघाले । (३) युक्त = जुना हुभा, एक स्थान पर आया हुआ, योग्य, कुशल, कमी में कुशल (गीता ), सिद्ध । (५) वृथा - व्यर्थ, जिसमें विशेष स्वार्थका कोई हेतु न हो इस दंग से, आसानी से। १८७] (1) पुरु-प्रेया = भाँति माँति की प्रेरणाएँ, इछाएँ, माकांक्षाएँ। (२) अ-हन्य: = जिसे मारने या फटकारने की कोई जरूरत न हो। (३) [अहन्यः = दिन में होनेवाला, प्रकाशकिरण 11 (५ पतशः = घोडा, सिखाया हुभा घोता, प्रकाशकिरण,। मस्त (हिं०) १० (१८८) क । स्वित् । अस्य । रजमः । महः । परम् । छ । अवरम् । मरुतः । यस्मिन् । आऽयय । यत् । च्यपर्यथ । मिथुराऽईव । सम्ऽहितम् । वि । अद्रिणा। पतय । स्वेपम् । अर्णवम् ॥६॥ (१८९) सातिः । न । वः । अमऽवती । चाऽवती। वेपा । विऽपाका । मरुतः। पिपिप्वती। भद्रा । यः । राति: । पृणतः । न । दक्षिणा । पृथुऽप्तयौ । असुर्योऽइय । जर्जती ॥७॥ यन्वयः- १८८ (हे ) मरत.! यस्मिन आयय, अस्य महः रजसः परं क स्वित् ? अपरं फ? यस् सं- हितं च्यवयथ, अद्रिणा वि-धुराइव त्येपं अर्णवं विपतध। १८९ (हे) मरुतः! ३ साति न, यः राति. अम-यती स्वर-वती त्वेषा वि-पाका पिपिप्यती भद्रा, पृणतः दाक्षिणा न, पृथु नयी असुर्याइव जलती। . अर्थ- १८८ हे ( मरतः !) वीर मरुतो ! ( यस्मिन् ) जहाँ से (आयय ) तुम आते हो, (अस्य महः रजसः ) उस प्रसिद्ध विस्तृत अंतरिक्षलोक फा (परं क स्थित् । ) उस ओर का छोर कौनसा है ? ( अपरं क्व ? ) और इस ओर का भी कौन है ? ( यत् ) जब कि तुम ( सं-हितं ) इकटे हुए मेघों को तथा शत्रुओं को (च्यवयथ) हिला देते हो, उस समय (अद्रिणा) यन से (वि-धुराश्य ) निराश्रित के समान ( त्वे अर्णय ) उन तेजस्वी मेधों या शत्रुओं को तुम (वि पतथ ) नीचे गिरा देते हो। १८९ हे (मरुत !) वार-मस्तो ! (यः सातिः न 'तुम्हारी देन के समान ही ( पा रातिः) तुम्हारी कृपा भी ( अम-घती ) बलवान्, ( स्वर-वती ) सुख देनेवाली. (त्पा) तेजस्वी, (वि-पाका) विशेष फल देनेवाली (पिपिप्वती ) शत्रुदल को चकनाचूर करनेवाली तथा (भद्रा) फल्याणकारक है, । पृणतः दक्षिणा न ) जनता को संतुष्ट करनेवाले धनाढ्य पुरप की दी हुई दाक्षणा के समान (पृथु जी ) विशेष विजय दिलानयाली और ( असुर्याइय) दैवी शक्ति के समान (जअती ) शत्रु से जुझनेवाली है। भावार्थ- १८८ महान् तथा असीम अंतरिक्ष में से मुम भाते हो और बादलों तथा दुश्मनों को विचलित करते हो। एव निराधारों के समान उन्हें नीचे गिरा देते हो । (इस मंत्र में बादल और शत्रुओं के बारे में समान भाव व्यक्त किये है।) १८२ वी का दान तथा दयालुता शक्ति, सुख, तेजस्विता और कल्याण प्रदान करनेवाली है ही, पर उसी से शत्रु का नाश करने की सामभ्यं भी मिल जाती है। टिप्पणी-[१८८]() वि थुग निराश्रित, विधवा नारी। [१८९] (१) सातिः = देन, स्वीकार, माश, महायता, भत, सपत्ति । (२) राति. = सदार, तैयार, मित्र, दान, कृपः। (३) दक्षिणा देन, कीर्ति, दुध र गौ, दक्षिण दिशा । ( ४ ) जज्. जङ्ग् = जाना लढना, शत्रुको हराना । (५) अम = बल, दशाव, रोग, रोग अनुयायो, मावायु, अपरिमित । (६) वि.पाका - उत्तम परिपाक करनेहारी । () असुर्य देवी 1(८) पिपिश्यती = पूर्ण करने वाली, चकनाचूर करने वाली । (९)नि - जय पाना, परामद करना पृथ-जयी - विशेष विजय देनेवाली, विशेष व्यापक । - - (१९०) प्रति । स्तोमुन्ति । सिन्धवः । पविऽन्यः। यत् । अभियांम् । वाचम् । उत्ऽईरयन्ति । अब । स्मयन्त । विद्युतः । पृथिव्याम् । यदि । घृतम् । मरुतः । प्रष्णुवन्ति ॥ ८ ॥ (१९१) अद्भूत । पृश्निः । महते । रणाय । त्वेपम् । अयासाम् । मुस्ताम् । अनीकम् । ते । सप्सरास: 1 अजनयन्त । अम्बम् । आत् । इत् । स्वधाम् । इपिराम् । परि । अपश्यन् ॥ ९ ॥ अन्ययः- १९० यत् पविभ्यः अभ्रियां याचं उदीरयन्ति, सिन्धयः प्रति स्तोभन्ति, यदि मयत घृतं कृष्णुवन्ति,पृथिव्यां विद्युतः अव मयन्त । १९१ पृश्निः महते रणाय अयासां मरुतां त्वेपं अनीकं असूत,ते सप्सरास अभ्यं अजनयन्त आत् इत् इपिरां स्व-धां परि अपश्यन् । अर्थ- १९० ( यत् ) जब ये घोर ( पविभ्य ) रथ के पहियों से (अभ्रियां वाचं) मेघसदृश गर्जना (उदारयन्ति ) प्रवर्तित कर देते हैं, तब (सिन्धव ) नदियाँ ( प्रति स्तोभन्ति । बोखला उठती है (यदि) जिस समय (मरतः) वीर ममत (घृतं ) जल (प्रष्णुयन्ति । बरसने लगते हे तर (पृथिव्यां । घरता पर (विद्युतः ) बिजलियाँ मानों (अब स्मयन्त ) हँसती है, ऐसा जान पडता है । १९१ ( पृश्निः ) मातृभूमि ने ( महते रणाय ) बडे भारी संग्राम के लिए ( अयामां मरतां) गतिमान् वीर मरुतों का (त्येपं अनीकं , तेजस्वी सैन्य । असूत ) उत्पन्न किया। (ते सप सरास ) वे इकट्ठे होकर हलचल करनवाले वीर ( अभ्यं अजनयन्त ) बडी शक्ति प्रकट कर चुके । (जात् इत् ) तदुपरान्त उन्होंने (इपि रा स्व धां) अन्न देनेवाली अपनी धारक शक्ति को ही (परि अपश्यन् ) चतुर्दिक देख लिया। भावार्थ- १९० (माधिभौतिक अर्थ-) इन बी का रथ थाने लगे तो मेघो की दहाडमी सुनाई पड़ती है और नदियों को पार करते समय जर माह में भारी खलबली मच जाती है । (आधिदैविक अर्थ-) जय वायुप्रबाह बहने लगते हैं, तब मेघगर्जना हुमा करती है, दामिनी की दमक दीख पडसी है भार मूसलाधार वर्पाक फर वह नदियों में महान बाट भाती है। १९१ शत्रु से जूमने के लिए मातृभूमि की प्रेरणा से वीरों की प्रचंड सेना अस्तित्व में भा गयी। एक त्रित बनकर शत्रु पर न पडने वाले इन वीरों ने युद्ध में यी भारी शक्ति प्रक्ट की और उन्होंने देखा कि, उस शक्ति में भका सुजन करने की क्षमता थी। टिप्पणी- (१९०] (1) स्तुम् (तम्भ ) = Rध होगा प्रति + स्तुम् = पर बली मचाना । (२) - (स्नेहनस्वेदनपूरणेषु) पुष्टि करना, गीला करगा। (१) पवि - पहिये की पट्टो वागी, बन, भाके की मोक। [१९१1 (1) सप् सरा:-[(रूप. ममवाये) इकट्ठे होना, स=(गतौ) सरकना, जाना.] मिल जुल कर इन्टे होकर जाने वाले, संघरूप होकर इनेबारे । (२) अभ्यं = पहा भन्य, अभूतपूर्वशक्ति (३) पिर - रसपूर्ण, उत्तेजा, बलवान्, चपल, भग्नि, भन्न देने वारा। - । (१९२) एपः । यः । स्तोमः । मरुतः । इयम् । गीः। मान्दार्यस्य । मान्यस्य । कारीः । आ । इपा । यासीष्ट । तन्वें । वयाम् । विद्यामं । हुपम् । वृजनम् । जीरऽदानुम् ॥ १० ॥ (ऋ०१ । १७१११-२) (१९३) प्रति । यः । एना । नमसा । अहम् । एमि। सुऽउक्तन । भिक्षे । सुऽमतिम् । तुराणाम् । रसुणता । मरुतः । वैद्याभिः। नि । हेळ: । धत्त । वि । मुचध्वम् । अश्वान् ।। १ ।। (१९४) ए॒पः । यः । स्तोमः । मरुतः । नमस्थान् । दृदा । तृष्टः । मनसा । धायि । देवाः । उप । ईम् । आ । यात । मनसा । जुषाणाः। यूयम् । हि । स्थ । नमसः । इद् । वृधासः ।।२।। अन्यय - १९२ [ऋ. १३१६६१५; १७० देखिये।] १९३ (हे ) मरुतः ! अहं एना नमसा मुक्तेन यः प्रति एमि, तुराणां सु-मति भिक्षे, वेद्याभिः रराणता हेळः निधत्त, अश्वान चि मुचध्वं । १९४ (हे ) मरुतः! एपः नमस्वान् हुदा तटः यः स्तोमः मनसा धायि, (ई)देवाः! मनसा ई जुपाणाः उप आ यात, हि यूयं नमसः इत् वृधासः स्थ। अर्थ- १९२ (ऋ० १९६६.१५, १७२ देखिये। १९३ हे (मरतः!) वीर मरुतो ! (अहं एना नमसा) मैं इस नमनसे तथा इस (सूक्तेन) स्तुति से (यः प्रति एमि) तुम्हारे समीप आता हूँ-तुम्हारी उपासना करता हूँ। (तुराणां) वेगसे जानेवाले तुम पीरों की (सु-मति) अच्छी युद्धि की मैं (भिक्षे ) याचना करता हूँ। (वेद्याभिः) इन जाननेयोग्य स्तुतियाँ से (रराणता ) आनन्दित हुए मनसे तुम अपना ( हेळ:) द्वैप (नि धत्त) एक ओर धर दो, उसे हमारे निकट आने न दो, ( अश्यान ) अपने रथ के घोडों को (वि मुवध्वं ) मुक्त करो अर्थात् तुम इधर ही रहो, यहाँ से अन्य किसी जगह न चले जाओ। १९४ हे ( मस्तः!) वीर मरुतो। ( एप.) यह (नमस्वान् ) नम्रतासे (हुदा तटः) मनःपूर्वक रचा हुआ (वः स्तोमः) तुम्हारा काव्य (मनसा धायि) एकतान बन के सुनो- अपने मनमें इसे स्थान दो. है (देवाः !) द्योतमान वीरो ! (मनसाई) मनसे यह हमारा काव्य ( जुपाणाः ) स्वीकार कर तुम (उप आ यात ) हमारी ओर आओ। ( यूयं हि ) क्योंकि तुम (नमसः इत् ) सत्कौ की ही, अन्नकाही (वृधासः समृद्धि करनेवाले हो। भावार्थ- १९२ [ ६६१५, १७२ देखिये।] १९३ में इन वीरोंकी उपासना करता है उनके निकट जाकर रहमा चाहता हूँ और चेष्टा कहता हूँ कि, इसकी अच्छी बुद्धि से पाभ उठा सकूँ। वे हमपर कभी क्रोध न करें और घे प्रमशचित्त हो लगातार हमारे निकट निवाम को । बस यही मेरी लालसा है। १९४ हे वीरो ! हमने बडी भक्ति से यह तुम्हारा काम्य बनाया है, तनिक पानपूर्वक इसे सुनिए, हमारे समीप आइए और हमारे लिए अन्नको वृदि कीजिए। टिप्पणी-[१९३] (1)रण = (गतो शन्दे च ३) = शब्द करना, हर्षित होना । (२) रराणत् = भानन्दित हुभा, प्रसन्न हुआ। (३) हेळ:= (हे - हेलहेळ =hate) अनादर, तिरस्कार, घृणा, (क्रोध, द्वेष । [१९४] (1) [स= सनूकरणे = काटना, ठीक ठीक बना देना, भारसे चोरना] भच्छी तरह बनाया हुआ, भली भाँति निर्मित । (२) हृदा तष्टः - मनःपूर्वक किया हुभा, छगन से रचा हुभा । (३) नमस् = नमस्कार, भर, धन, दान, यज्ञ (सकर्म)। तष्ट (ऋ० ११ १७२ | १-३) (१९५) चित्रः । यः । अस्तु । यामः। चित्रः । ऊती । सुऽदानवः । मरुतः । अहिऽभानयः ।। १ ।। (१९६) आरे । सा । यः । सुऽदानवः । मरुतः । अञ्जती । शरः। आरे । अश्मा । यम् । अस्यथ ॥ २ ॥ (१९७) तृणऽस्कन्दस्य । नु । विर्शः । परि । वृक्त । सुऽदानवः । ऊर्ध्वान् । नः । कर्त । जीवसे ॥ ३ ॥ अन्यय: १९५ (हे ) सुदानवः अ-हि-भानयः मरुतः! यःयामः अती चित्रः अस्तु । १९६ (हे ) सु-दानवः मरुतः ! यः सा कन्जती शरः आरे, यं अस्यथ अश्मा आरे । १९७ (हे) सु-दानवः तृण-स्कन्दस्य विशः नु परि घृत, नः जीवसे ऊभ्यान त । अर्थ- १९५ हे (सु-दानवः!) अच्छे दानशूर और (अ-हि-भानवः) जिनका तेज कभी न घट जाता है, ऐसे (मरुतः!) धीर मरतो। (यः) तुम्हारी ( यामः) हलचल (चित्रः) आश्चर्यकारक तथा तुम्हारी (ऊती) संरक्षणक्षम शक्ति भी (चित्रः [ चित्रा ]) आश्चर्यकारक (अस्तु) होये। १९६ हे (सु-दानवः मरतः1) भली भाँति दान देनेवाले वीर मरतो ! (व.) यह तुम्हारा (शाती) येगसे शत्रुदलपर टूट पड़नेवाला (शरः) हथियार हमसे (आरे) दूर रहे। (यं अस्यथ ) जिसे तुम शनुपर फेंक देते हो, यह (अश्मा ) बन भी हमसे (आरे ) दूर रहने पाय । १९७ हे (सु-दानया! ) अच्छे दानशूर वीरो! (तृण-स्कन्दस्य) तिनके के समान आसानीसे नए होनेवाले (विशः) इन प्रजाजनों का नाश (न) शीग्रही (परि पृङ्क्तः ) दूर हटा दो, अर्थात् उन्हें सुरक्षित रखो। (नः जीवसे ) हम यहुत दिनोंतक जीवित रहे, इसलिए हमें (ऊर्धान कर्त) उच्च कोटिके यना दो। भावार्थ- १९५ शत्रुझ पर घाई करने को पी की योजना वढी ही विलक्षण है भार रक्षण करने की शक्ति भी बहुत पड़ी है। १९६धील का शापार हम पर न गिरे। १९७ जो जनता तिनके के समाग सुगमता से विनष्ट होती हो, उसे मचा कर उच्च पदसक हे जामो और दीर्घायुष्पसंपन्न करो। टिप्पणी [१९५] (1) अ-हि-मानवः (म- हीन मानवः = 8 -हीयमान- भानवः) - जिनका तेज कभी कम न होता हो । (२) दान-या (दा-दाने) = दान देनेघाले, उदार, देव । दान-यः- (दा-छेदने) = टुकडे करमेवाले, करल करनेवाले, राक्षस | [१९६] (1) ऋ = वेगसे जाना, दौडना, प्रयत्न करना, अलंकृत करना । फजती पेगसे जानेवाली, सरकनेवाली, सरपट जानेवाली । (२) शरः = याण, तीर, वस्त्र, वज्र, क्रोध । (३) अस्मन् - पत्थर, (पथर जैसा कड़ा हथियार ) मेघ, वन, पहाद, भोले । (४) मारे = दूर, समीप। (१९७] (१) स्कन्द - (गतिशोषणयोः ) गिर पड़ना, नष्ट होना, हिलना, सूख ज्ञाना । (२) तृण-स्कन्द - घासफूस या तिनके की भ्याई भर उधर पड़े रहना, मुम्न जाना। (३) = ऊँचा। .

७८ . शुनकपुत्र गृत्समदापि ( पहले शुनहौनपुत्र आहिरस और उसके बाद इनकपुन भार्गव ) (१० २।३०११) (१९८) तम् । यः । शर्धम् । मारुतम् । सुम्नऽयुः । गिरा । उप । बुरे । नमसा । दैव्य॑म् । जनम् । यथा । रयिम् । सर्वेऽभीरम् । नामहै । अपत्यऽसाचम् । श्रुत्यम् । दिवेऽदिवे ॥११॥ (द. २१३४१ १-१५) (१९९) धारावराः । मरुतः । धृष्णुऽओजसः। मृगाः । न । भीमाः । तविपीमिः । अचिनः । अग्नयः । न । शुशुचानाः । ऋजीषिणः। भृमिम् । धर्मन्तः । अपं । गाः ! अवृण्वत ॥१॥ अन्यय --- १९८३ तं दैव्यं जनं मारतं शधै सुम्न-यु नमसा गिरा उप ध्रुवे, यथा सर्व-धीरं अपत्य- साचं प्रत्यं रयिं दिये-दिवे नशामहे । १९९ धारा बरा. धृष्णु ओजस', मृगाः न भीमाः, तविर्णभिः अर्चिन , अग्नयः न, गुशुचाना। मजीषिणः भूमि धमन्तः मरत गा अप अवृण्वत । अर्थ- १९८ (यः) तुम्हारे (त) उस (दैव्य) तेजस्वी (जनं) प्रकट हुए (मारुतं श) वीर मरतों फे घल की, (सुम्न युः) मैं सुखको चाहनेवाला, (नमसा) नमनसे और (गिरा) वाणी से (उप धे) सराहना करता हूँ। (यथा) इस उपाय स हम (सर्व घोरं ) सभी वीरों से युक्त (अपत्य साचं) पुत्र पौत्रादिको से युक्त तथा ( श्रुत्यं) कार्तिसे युक्त (रयिं ) धनको (दिवे दिवे) प्रति दिन (नशामहै) प्राप्त करें। १९९ (धारा घरा. ) युद्ध के मोर्चे पर श्रेष्ठ प्रतीत होनेयाले. (कृष्णु -ओजसः) शत्रु को पछाडने के बल से युक्तः । मृगा न भीमा.) सिंहकी न्याई भीषण (तविभिः ) निज पल से (अर्चिन.) पूजनीय ठहरे हुए ( अग्नयः न) अशि के जैसे (शुशुचाना ) तजम्पी, (राजीषिणः } वेग से जानेवाले या सोमरस पीनयाले आर (भूमि ) येग को (धमन्त.) उत्पन्न करनेहारे (मरत.) वीर मरत् (गा.) किरणों को या गौओं को ] शत्रु के कारागृह से (अप अवृण्वत ) रिहा कर देते हैं। भावार्थ-१९८ मे धोरों के बळ की प्रशसा करता हूँ। इससे हम सभी को वीरतायुक्त धन मिलता है। यह धन इस भांति मिह कि उसके साथ शूरता, वीरता, धीरज वीर सताम एव यश भी प्राप्त हो। भगर शूरता आदि स्पृहणीय गुणों से रदिरा धन हो, तो हमे यह नहीं चाहिए । २९९ ये वीर घमामात राई ये मोर्चे पर धेष्टना सिद्ध कर दिखाते हैं और वीरतापूर्ण कार्य करके धनलाते हैं। ये शत्रु को पछाड़ देते है । अपने मित्रो बलसे उच्च कोरिके कार्य निष्पन्न करके वदनीय यन जाते हैं । शुदलको हराकर पहरण की हुई गाभों को माहाते हैं टिप्पणी- [१९८) (1) नश् (भदर्शने ) अभाव में विलीन होना, पहुँचना, पाना, मिलना । (२)जन जा जनी मानुभाव) - उत्पन हुआ। (३) सर्व योरं- सभी तरह की धरताकी शक्तियों से परिपूर्ण। [१९९१ (1) धारा - भोघ प्रवाह, सेना का मार्ग समूह, कीर्ति, माश्य, भाएण । (२) अन्ि = पूजा करनेवास, प्रकाशमान (तविपीमि. अधिन यह से तेजस्वी या यल से मातृभूमि की पूजा करने हारे ।) (३) ज् (गनियामार्जनोपार्जनेषु) जना, मात करना, अपनी जगह स्थिर रहना, यल्यान होना। (५) ऋजीपिन् : गतिमान, स्थिर, बरिष्ट, रस निचोहने पर यया हुभा अश, सोम । (५) मृग सिंह, जानवर । (६) भूमि प्रमण, अशावात, शीमता, भावतं । - = (२००) द्यावः । न । स्तृभिः । चित्तयन्त । खादिनः । वि । अभियाः । न । द्युतयन्त । वृष्टयः । रुद्रः । यत् । यः। मरुतः । रुपमऽयक्षसः। वृपो । अनि । पृश्न्याः । शुक्र । ऊधनि ।। २ ।। (२०१) उक्षन्ते । अश्वान् । अत्यान्ऽइव । आजिघु । नदस्य । कणैः । तुरयन्ते । आशुभिः । हिरण्यऽशिप्रा । मरुतः । दविध्यतः । पृक्षम् । याथ । पृर्वतीभिः । सऽमन्यवः ॥३॥ अन्वयः- २०० स्तृभिान धावः सादिनः चितयन्त, वृष्टयः, अभ्रियाः न, वि द्युतयन्त, यत् (हे) रुपमा वक्षसः मरुतः ! वा वृपा रुद्रः पृथ्न्याः शुभै ऊधनि अजनि । २०१ अत्यान् इव अश्वान् उक्षन्ते, नदस्य कर्णः धाशुभिः आजिपु तुरयन्ते, (हे) हिरण्य- शिप्राः स मन्ययः मरतः ! दविध्यतः पृपतीभिः पृक्षं याथ । अर्थ- २०० (स्तृभिः न ) नक्षत्रों से जिस प्रकार ( द्यायः द्युलोक उसी प्रकार (सादिनः ) कँगन- धारी पीर इन आभूषणों से (चितयन्त ) सुहाते है । (वृष्टयः ) बल की वर्षा करनेहारे थे वीर (अभ्रि. न ) मेघ में विद्यमान विजली के समान (चि द्यतयन्त ) विशेष ढंग से धोतमान होते हैं । (यत्) क्योंकि हे (रुक्म वक्षसः ) उरोभाग पर मुहरों के हार पहननेवाले (मरुतः ) वीर मरुतो!(4.) तुम्हें (वृपा रुद्रः ) पलिष्ट रुद्र ( पृश्न्याः ) भूमि के (शुके ऊधनि ) पवित्र उदरमें से (अजनि ) निर्माण कर चुका। २०१ ( अत्यान् इव ) घुडदौड के घोड़ों के समान अपने (अश्यान् ) घोडों को भी ये चीर (उक्षन्ते ) पलिष्ठ करते हैं। वे (नदस्य कणैः) नाद करनेवाले, हिनदिनानवाले ( आशुभिः) घोडा- सहित (आजिषु । युद्धो में, चढाई के समय (तुरयन्ते ) घेग से चले जाते हैं। हे (हिरण्य-शिमाः) सोने के साफे पहने हुए (स. मन्यवः ) उत्साही (मरुतः!) वीर मरुतो ! (दवि-ध्यतः) शत्रुओं को हिलानेवाले तुम (पृपतीभिः) धब्येयाली हिरनियोसहित (पृक्ष याथ ) अन्न के समीप जाते हो। भावार्थ- २०० वीरों के भाभूपण पहनने पर ये वीर बहुत भले दिखाई देते हैं और ये बिजली के समान चमकने लगते हैं । मातृभूमि की सेवा के लिए हो ये अस्तित्व में आ चुके हैं। २०१ वीर मरत् अपने घोडौंको पुष्टिकारक अश देकर, उन्हें बलवान् बना देते हैं और हिनहिनानेवाले घोड़ों के साथ शीघ्र ही रणभूमि में तुरन्त जा पहुंचते हैं । ये शत्रुभों को परास्त कर विपुल अन पाते हैं। टिप्पणी- [२००] (१) स्तृ - नक्षन, anा । (२) अभ्रिया मेघ में पैदा होने वाली शिजली । (३) पृश्निः गो, धरती, अंतरिक्ष । [२०११ (१) नदस्य कर्ण. ( करणः )- नाद करनेवाले, हिनहिनाने वाले { घोड़े साथ,) [नदस्य माशुभिः कर्णः = घोपा करने के स्वराशील सींगसहित,कर्ण - Mego--Phone I] (२) अश्वः- घोडा, यापने वाला, खूब खानेवाला, घोडेके समान बलवान् । (३) उक्ष - सिंचन करना, गीला करना, सयल होना (४) आजि = ( अञ् गती) शत्रु पर करने का धावा, इमला, शीमगपूर्वक विद्युत्गतिसे की हुई चदाई । (५) मन्युः = उत्साह, स-मन्युः = उरसाहसे युक्त, (मंत्र २०३ देखो।) (६) दविध्वत् = (ध कापने) हिलाने वाला। . के (२०२) पृक्षे । ता । विश् । भुव॑ना । वयक्षिरे। मित्राय । वा । सर्दम् । आ । जीरऽदानवः । पृषऽअश्वासः । अनबभ्रऽराधसः । ऋजिप्यासः । न । वयुनेषु । धूःऽसदः॥ ४ ॥ (२०३) इन्धन्वऽभिः । धेनुऽभिः । रप्शधभिः। अध्वस्मऽभिः । पथिऽभिः । भ्राजत्-मष्टयः । आ। इंसासः । न । स्वसंराणि । गन्तन । मघौः । मदाय । मरुतः । सऽमन्धवः ॥ ५॥ अन्ययः- २०२ जीर-दानवः पृषत्-अभ्यासः अन्-अपभ्र-राधसः, ऋजिप्यासान, वयुनेषु धूर-सदः, पृक्षे मियाय सदं वा ता विश्वा भुवना आ ववक्षिरे । २०३ (हे) स-मन्यवः भाजत्-ऋणयः मरुतः ! इन्धन्वभिः रप्शस्-ऊथभिः धेनुभिः अ- ध्वस्माभिः पथिभिः मधोमदाय, इंसासः स्व-सराणि न, आ गन्तन । अर्थ- २०२ (जार-दानवः) शीघ्र विजय पानेवाले, (पृपत्-अश्वासः) धन्येवाले घोडे समीप रखनेवाले, (अन् अवभ्र राधसः) जिनका धन कोई भी छीन नहीं सकता, ऐसे और ( ऋजिप्यासन) सीधी राह से उन्नति को जानेवाले के समान ( वयुनेषु ) सभी कर्मों में (धूर-सदः) अप्रभाग में बैठने- याले ये वीर (पृक्षे ) अन्नदान के समय (मित्राय सदं वा) मित्रों को स्थान देने के समान (ता विश्वा भुवना ) उन सय भुवनों को ( आ ववक्षिरे) आश्रय देते हैं। २०३ हे (स-मन्यवः) उत्साही, (भ्राजत्-ऋष्टयः) तेजस्वी हथियार धारण करनेवाले (मरुतः!) यार मरतो ! (न्धन्वभिः) प्रज्वलित, तेजस्वी (रप्शत्-ऊधभिः) स्तुत्य और महान थनों से युक्त (धेनुभिः) गौओं के साथ ( अ-ध्यस्मभिः) अविनाशी (पथिभिः) मार्गों से (मधोः मदाय) सोमरसजन्य आनन्द के लिए इस यज्ञ के समीप ( हंसासः स्व-सराणि न ) हंस जैसे अपने निवास- स्थान के समीप जाते हैं, उसी प्रकार (आ गन्तन ) आओ। भावार्थ-२०२ ये चीर उदारचंता, अश्वारोही, धनसम्प, सरल मार्ग से उन्नत पननेवालों के समान सभी कार्य करते समय अप्रगन्ता यननेवाले हैं। अन्न का प्रदान करते समय जैसे वे मित्रों को स्थान देते हैं उसी.प्रकार सभी प्राणियों को सहारा देनेवाले हैं। २०३ विपुल दूध देनेवाली गौमों के साथ सोमरस पीने के लिए ये वीर भच्छे सुघट मागों पर से इस पज्ञ की भोरमा जाय। टिप्पणी---[२०२] (१) जीर-दानुः = (जीर- जल्द, तलवार, दानु = शूर, विजयी, विजेता, दान देने. वाला, काटनेवाला ) शीघ्र विजयी, तुरन्त दान देनेवाला, वळवार ले मारकाट करनेवाला । (२) जिप्य= (I+ प्राप्य ) सीधी राह से जानेयाटा, सरलतया अपनी उपति कानेवाला। (३) ययुन = शान, कर्म, नियम, रीति, म्यवस्था ( Rule, Order) (*) अन् अवभ्र-राधसः = भपतनशील धन से युक्त । (५) धूर-सद् प्रमुख, पके स्थान में बटनेवाला । (६) भुपनं-मुवन, प्राणी, पनी हुई चीज। [२०३] (1) अ-ध्वस्मन् - (म् अवयंसने गौ प ) अविनाशी । (२) स्व-सर = [स्व-स- (सर) गती ] स्वयमेव जिधर जाने की प्रवृत्ति हो, यह स्थान, घा, अपना स्थान । (३) स-मन्युः उत्साही, समान अंतःकरण के, एक विचार के। (देखिए मंत्र २०11) :

। - (२०४) आ । नः । ब्रह्माणि । मरुतः । सऽमन्यवः । नराम् । न । शंसः । सर्वनानि । गन्तन । अश्वोऽइव । पिप्यत । धेनुम् । ऊधनि | कतै । धिर्यम् । जरिने । वार्जऽपेशसम् ॥ ६ ॥ (२०५) तम् । नः । दात । मरुतः । वाजिनम् । रथे । आपानम् । ब्रझे । चितयत् । द्विवेऽदिये। इपम् । स्तोतृऽभ्यः । जनैपु । कारये । सनिम् । मेधाम् । अरिष्टम् । दुस्तरम् । सहः ॥ ७ ।। अन्वयः- २०४ (हे) समन्यवः मरुतः । नरां शंसान नः ब्रह्माणि सवनानि मा गन्तन, अश्याइव धेनुं ऊधनि पिप्यत, जरित्रे वाज-पेशसं धियं कर्त । २०५ ( हे ) मरुतः रथे वाजिनं, दिवे-दिवे ब्रह्म चितयत्, आपानं तं इयं स्तोतृभ्यः नः दात, वृजनेषु कारवे सनि मेधां अ-रिटं दुस्-तरं सहः । अर्थ- २०४ हे (स-मन्यवः मरुतः!) उत्साही मरुतो !(नरांशंसान) शूरों में प्रशंसनीय वीरों के समान (नः ब्रह्माणि सवनानि) हमारे ज्ञानमय सोमसत्रकी ओर ( आ गन्तन) आ जाओ। (अभ्याइव) घोडी के समान हष्टपुष्ट (धेनुं ) गौको (ऊधनि ) दुग्धाशय में ( पिप्यत ) पुष्ट करो। (जरित्रे) उपासक को (याज-पेशस) अन्नसे भली प्रकार सुरूपता देने का (धियं कर्त) कर्म करो। २०५ हे (मरुतः!) वीर मरुतो ! हमें (रथे चाजिनं ) रथमें बैठनेवाला वीर और (दिवे-दिवे) हरदिन (आपानं ब्रह्म चितयत् ) प्राप्तन्य ज्ञान का संवर्धन करनेवाला शानी पुत्र दे दो, तथा इस भांति (तं इपं) वह अभीष्ट अन भी (स्तोतृभ्यः नः दात) हम उपासको को देदो। (पृजनेपु फारवे) युद्धों में पराक्रम करनेहारे वीर को धन की (सनि) देन (मंधां) बुद्धि तथा (अ-रिटं ) अविनाशी एवं (दुस्- तरं) अजेय (सहा) सहनशक्ति भी दे दो। भावार्थ-२०४ शूर सैनिकों में जो सबसे अधिक शूर होते हैं, उनका अनुकरण अन्य वीरों को करना चाहिए। इस भाति अधिक पराक्रम करके वे सदैव सस्कों में अपना हाथ बटाये । परिपुष्ट घोडी के समान गौएँ भी चपल तथा पुष्ट रहे । गौओं को अधिक दुधारु बनाने की चेष्टा करें । भन्न से बल बढाकर शरीर प्रमाणबद्ध रहे, इसीलिए भाँनिभाँति के प्रयोग करने चाहिए। २०५ हमें शूर, ज्ञानी, रथी, तथा सत्यनिष्ठ पुत्र मिले। हमें पर्याप्त मत मिले । लडाई में धीरतापूर्ण कार्य कर दिखलानेवाले को मिलने योग्य देन, बुद्धिकी प्रबलता, अविनाशी और अजेय शक्ति भी हमें मिले । टिप्पणी- [२०४] (१) पेशस् = सुरूपता, तेजस्विना । (२) - नेता, शूर । (३) धेनुं ऊधनि पिप्यत: गौका दुग्धाशय पुष्ट रहे ऐसा करो, गौ अधिक दूध देने लगे ऐसा करो। (४) जरितृ = स्तोता, उपासक, भक्त । (५) याज-पेशस् = अह से बल पाकर जो शारीरिक गठन होता हो। (६)धी = बुद्धि. कर्म, (ज्ञानपूर्वक किया हुमा कर्म।) (२०५] (१) मेधा शक्ति, धारणा-बुद्धि । (२) सहः - शत्रुके हमले सहन करके अपने स्थान पर अपराभूत दशा में खड़े रहने की शकि। (३) पूजनं दुर्ग, गढ़ में रहकर काने का युद्ध । मरत् (हिं०)११ - । %3D । (२०६) यत् । युञ्जनै । मुरुतेः । रुक्मक्षसः । अश्वान् । रथेषु । भगे । आ । सुऽदानवः । धेनुः । न । शिर्थे । स्वसरेपु । पिन्वते । जनाय । रातऽहविषे । महीम् । इपम् ॥ ८॥ (२०७) यः । नः । मरुतः । वृकऽाति । मयः । रिपुः । दुधे । वसमः । रक्षन । रिपः । वर्तयत । तमुपा । चक्रियो । अभि । तम् । अ । रुद्राः । अशमः । हन्तन । वरिति ॥९॥ अन्यय. २०६ यत् स दानव रकम वक्षस मरुत भगे अश्वान् स्थपु आ युञ्जते, धेनुः शिध्ये न, रात हयिषे जनाय स्वसेरेप महीं इपं पिन्वते । २०७ (हे) यसयः मरुत.! यः मर्त्य धृक-ताति नः रिपुः दधे रिपः रक्षत, तं तपुपा चक्रिया अभि पर्नयत (हे ) रद्धा ! अशस. वध अप हन्तन । अर्थ- २०६ ( यत् सु-दानवः ) जर दानशूर एवं रस्म-यक्षस. मस्तः) वक्षःस्थलपर स्वर्णमुद्रिकाओं मे बना हार धारण करनेवाले वीर मरुत् (भगे) ऐश्वर्यप्राप्ति के लिए अपने (अभ्यान् ) घोडों को (रथेषु आ युअते ) रथों में जेड देते है, ताचे (धेनु शिश्वे न जैसे गौ अपने यछड के लिए दूध देती है उसी प्रकार ( रात हथिये जनाय ) हविप्यान देनेवाले लोगों के लिए ( स्व सरेषु) उनके अपने घरों में ही ( महीं पं पिन्वते ) बडी भारी अन्नसमृद्धि पर्याप्त मात्रा में प्रदान करते हैं। २०७ हे (वसवः मरुतः1) वसानेवाले पीर मरतो ! ( यः मर्त्य ) जो मानव (पृक ताति) भेडिये के समान र धन (न रिपुः दधे । हमारे लिए शत्रुभूत होकर पेठा हो, उस (रिषः) हिंसक से (रक्षत) हमारी रक्षा कीजिए। (त) उसे (तपुपा) सतापदायक (चक्रिया) पहिये जैसे हथियार से (अभि धर्त. यत) घर डालो। हे (रुद्रा ! ) शत्रुका रुलानेवाले वीरो!(अशस.) पेटू (यध्य.) हननीय शत्रुका ( आ एन्तन ) चघ करो। भाग- २०६ धीर युद्ध के लिए ग्धपर चढकर जाते हैं और उधर भाती विजय पाकर धन साथ ले भाते हैं। पश्चात् सदार पुरुषों को घट्दी धन उचित मात्रा में विभक करके बॉट देते हैं। २० जो मनुष्य कू' पनकर हमसे शत्रुतापूर्ण उपवहार करता हो उससे हमें पचाभो। चारों भोरमे उस सवको घेरकर नष्ट कर डार।। टिप्पणी- (२०६](1) भगः ऐध, धन भाग्य, मुख, कीर्ति, वैभवशालिता। [२०७] (1) चमिया (च) = सरयू . पहिये के समान हधिया। (२) अशस - (म शम्) अप्रशस्त, दुष्ट (भ) भक्षक, पट् ।। ३) तं तपुण चक्रिय अभि घर्तयत = () उस शत्रु को (तपुपा) धधकनेवाले, अन्द तपनेवाले (चक्रिया) चकवा दिखाई दनेवाले शखों से घरका (मि) चतुर्दिर (वर्तम) घर दो। है - । (२०८) चित्रं । उ । वः । मरुतः । याम । चेकित । पृश्न्याः । यत् । ऊर्धः । अपि । आपर्यः । दुहुः । यत् । वा । निदे । नर्वमानस्य । सद्रियाः । त्रितम् । जराय । जुरताम् । अदास्याः ॥ १० ॥ (२०९) तान् । यः । महः । मरुतः । एषऽयानः। विष्णोः । एपस्य । प्रऽभथे । हवामहे । हिरण्यऽवर्णान् । कुकुहान् । यतऽसुचः। ब्रह्मण्यन्तः। शंस्यम् । राधः। ईमहे ॥११॥ अन्ययः-२०८ (६) मरुत ! व तत् चित्रं याम चेफिते यत् अपय पृश्न्याः अपि ऊध दुहु , यत् (हे) अ-दाभ्याः सद्रिया ! नवमानस्य निदे नितं जुरतां जराय वा। २०९ (हे) मरत । एव यमः मह तान् यः विष्णो. एपस्य म भृथे हवामहे, ब्रह्मण्यन्त यत सुचः हिरण्य-वर्णान् ककुहान शस्यं राधः इमह । अर्थ- २०८ हे (मरतः!)धीर मरुतो ! (घ तत् चित्रं तुम्हारा वर आधर्यजनक (याम) हमला (चकिते) सब को विदित है. ( यत् ) क्योंकि सब से आपय.) मित्रता बानेवाले तम (पृदन्या. अप ऊधः) गोके दुग्धाशय फा (दुहु ) दोहन करके दूध पीते हो। ( यत् ) उसा प्रकार हे (ज दाभ्या.)न दवनेवाले (रुद्रिया !) महावीरो" (नयमानस्य ) तुम्हारे उपासक की। निदे निंदा करनेहारे तथा (त्रित) नित नामवाले कपिरो (जुरतां) मारने की इन्छा करनेवाले शत्रुनों के ( जराय वा) विनाश के लिए तुमही प्रयत्नशील हो, यह यात विरयात है। २०९ हे (मरुतः!) वीर मरुनो! ( एव याम ) बेगसे जानेवाले (महः) तथा महत्वयुक्त ऐसे (तान् व ) तुम्हें हमारे (विष्णोः व्यापक हितकी (एषस्य ) इन्छा भी (प्र भृथे ) पूर्ति के लिए ( हवा. महे) हम बुलाते है । ( ब्रह्मण्यन्त.) ज्ञानयी इच्छा करने हारे तथा । यत च । पुण्य कम रिए वट- यद्ध हा उठनवाले हम ( हिरण्य वर्णान ) सुरणवत् नेजस्वी एवं (क्युहान ) अत्यन्त उत्कृष्ट ऐसे इन धीरों के समीप (शस्यं राध') सराहनीय धनकी (ईमहे ) याचना करते हैं। भावार्थ- २०८ पीर सैनिक दल पर जर धावा करते है, तो उस घटाको दस प्रेक्षक अचम्भमे भाते हैं । ये वीर गोदुग्ध को पीते हैं और अपने अनुमयिों की रक्षा करत है, भत वे शत्रु भी नया निन्दसे घिर कुल नहीं रत है। २०९ वीरों को बुलाने में हमारा यही अभिप्राय है कि ये हमारे साजनिक हित की जा भभिलाषाएँ है उन्हें पूर्ण करने में महरयता दे। हम ज्ञान पाने की अभिलाषा करते है और तदर्थ हम मयानल भी है । इसारिए हम इन श्रेष्ठ वीरों के निकट जार उ से प्रशमनीय धन मांग रहे हैं। वे हमारी इच्छा पूर्ण कर। टिप्पणी-1 २०८] (1) अदाम्य =(भ-दाम्य) म दयनयाला, जिसे कोइ क्षति न पहुवी।(२) आपि - सुगमता से प्राप्त होने वाला, मित्र। (धित नवाद के ताज्ञान का प्रचार करने वाला एकन, द्वित, निये तीन कपि विविध तारज्ञान के प्रवर्तक थे। एक्य, न त वादो का न उनमे किया। [२०९]() एव-यावन् % वेगपूर्वक जाने गला । (२) पुह = प्रख्यात, कृट, सबसे श्रेष्ठ । (२)यत च् - पज्ञकुण्ड मे पनकी हुनि दने के लिए जिमने सुचा तयार कर रग्बी हो ( अच्छ कार्य करने क लिए जिसने कमर कस ली हो, ऐमा स्यागी पुरुष)। (४) हिरण्य वर्ण - यो मरुत् सुवर्णकानि से शोभित पीतर पर्णवारे थे (मरुभ्यो वैश्यं । वा० २० ३०५) वैश्यों का रंग पीत यतलाया जाता है; इसी भाँति यहाँ पर मरतों का वर्ण पीत है, ऐमा क्षित किया है । भात, (२१०) ते । दर्शऽग्याः । प्रधमाः । यज्ञम् । ऊहिरे । ते । नः । हिन्वन्तु । उपसः । विऽष्टिषु । उपाः । न । रामीः । अरुणैः । अप । ऊर्गुते । महः । ज्योतिपा । शुचता । गोऽअर्णसा ॥१२॥ (२११) ते । क्षोणीभिः । अरुणभिः । न । अनिऽभिः। रुद्राः । ऋतस्य । सर्दनेषु । यधुः। निऽमेघमानाः । अत्यैन । पार्जसा ! सुचन्द्रम् । वर्णम् । दुघिरे । सुऽपर्शसम् ॥१३॥ अन्वयः-२१० दश-ग्याः प्रथमाः ते यशं अहिरे, ते नः उपसः युटिए हिन्वन्तु उपा न, अरुणैः रामीः महः शुचता गो-अणसा ज्योतिपा अप ऊर्गुते । २११ रुद्राः ते, क्षोणीभि अरुणेभिः न, अजिमिः तस्य सदनेषु वधुः, नि-मेघमानाः अत्येन पाजसा सु-चन्द्रं मु-पेशसं वर्ण दधिरे। अर्थ- २१० (दश-ग्वाः) दस मासतक यज्ञ करनेवाले तथा (प्रथमाः) अद्वितीय ऐसे (ते) उन चारों ने (यशं अहिरे ) यक्ष किया । (ते) घे (नः (हमें (उपसः व्युष्टिपु) उपःकाल के प्रारंभ में (हिन्यन्तु) प्रेरणा दें। (उपाः न ) उपा जिस प्रकार (अरुणैः) रक्तिम किरणों से (रामीः) अँधेरी रात्री को आच्छादित करती है, वैसे ही ये बीर (महः) यडे (गुचता) तेजस्वी (गो अर्णसा)फिरणों फे तेजस (ज्योतिपा) प्रकाश से सारा संसार (अप अणुते ) ढक देते हैं। २११ (रदाः ते) शत्रुओंको रुलानेवाले घे वीर (क्षोणीभिः) चकणाचूर किये हुए (अरणेभिः न) केसरिया के समान पीतवर्णवाले (अञ्जिभिः) वस्त्रालंकारों से युक्त होकर (मतस्य) उदयुक्त (सदनेषु) घरों में (धवृधु ) यढे। उसी प्रकार (नि-मेघमाना) पूर्णतया स्नेहपूर्वक मिलकर कार्य करने घाले चे (अत्येन पाजसा) अपने चेगयुक्त बलसे (सु-चन्द्र ) अत्यन्त आहाददायक एवं (सु-पेशसं ) अति सुन्दर (वणे ) कान्ति को (दधिरे) धारण करते हैं । भावार्थ- २१० ये वीर वर्ष में दस महीने यज्ञकर्म करने में बिनाते हैं। ये हमें प्रतिदिन सकर्म की प्रेरणा दें भाव इन के चारिभ्य को देखकर हमारे दिल में प्रति पल सफर्म की प्रेरणा होती रहे। ये धीर अपने पवित्र तेज से घोतमान रहते हैं। २९१ इन वीरों के यत्राभूपग पीले रंग में रंगे हुए है। जिधर जल विपुलतया मिलता हो, उधर दी पे रहते हैं । प्रीतिपूर्वक मिल कर रहनेवाले य अपने वेग एवं घर से वीरता के कार्य करते रहते हैं, इसलिए बहुत सेजस्वी दीप पड़ते हैं। टिप्पणी- [२१०] (1) दश ग्याः (श-गो [गम्]) दम दिशाओं में जानेवाले, दम गौएँ साध रखनेवाले, ५स मास घर नेहारे। (२) रामी (राम अंधेरा) अंधेरी रात, आनन देवाली, रायी। (३)न्युपक (वि- उप-दाई )= विशेष प्रकाशित, विशेष मनोहर, दिन का आरम्भ, प्रकाश । (.) गो-अर्णस्= विरण-सगृह, प्रकाय का प्राइ, उजियारे का ओघ । [२९१] (१) पाजस्= यल। (२) नि मेघमानाः (मेहतीति मेषः - मेध. समुदाय ) 3 पूर्णरूप से एकत्रित होनेवाले । (३) मातस्य सदनेषु = जहाँ उल अधिक हो, ऐसे स्थानों में। (2)ोणी = (धु-सन्दे, शुद्-संपेपणे) शब्द करनेवाली, पृषी चूर्ण किया हुभा, महीन भार करने योग्य। (५) मरण - लाल रंग, केसरिया वर्ण, शर, मुदर्श । - (२१२) तान् । इयानः । महि । वरूथम् । ऊतये । उप । घ । इत् । एना । नमसा । गृणीममि । त्रितः । न । यान् । पञ्च । होतॄन् । अभीष्टये। आऽववर्तत् । अचरान् । चक्रिया । असे ॥ १४ ॥ (२१३) यया । रबम् । पारय॑थ । अति । अंहः । ययो । निदः । मुञ्चर्थ । वन्दितारम् । अर्वाची । सा । मरुतः। या । वः । ऊतिः । ओइति । सु। वाश्राऽईव । सुऽमतिः । जिगातु ॥ १५ ॥ अन्ययः- २१२ यान् अपरान पञ्च होतन चनिया अवसे, अभीष्टये न नितः आववर्तत् तान् ऊतये महि परूथ इयान एना नमसा उप इत् गृणीमसि घ। २१३ (हे) मरत ! यया रधं अंह अति पारयथ, यया यन्दितारं निद मुञ्चथ, या व अति सा अर्वाची, सुमति वाश्राइब ओ सु जिगातु । अर्थ- २१० (यान ) जिन (अवरान ) अत्यन्त श्रेष्ठ (पञ्च होतॄन ) पाँच याजकों तथा वीरों को (चक्रिया) चक्रकी शलवाल हथियार से (अपसे रक्षण करने के लिए (अभीष्टये न) तथा अभीष्टपूर्ति के लिए (नित) मपि जितने ( आवमर्तत् ) अपने समीप घुला लिया था, (तान् । उनके समीप (ऊनये) संरक्षण के लिए (महि वमर्थ ) या आश्रयस्थान (इयानः ) मॉगनेवाले हम (एना नमसा) इस नमसार से (उप इत् ) समीप जाफर उनी (गृणीमसि घ) प्रशंसा करते हैं। २१३ हे (मस्तः।) वीर मरतो' (यया) जिसकी सहायता से तुम (र, ) उपासक को (अंहः) पाप के (अति पारयय) परे ले जाते हो (यया) जिस से (चन्टितार) वन्दन करनवाले को ( निद.) निंदा करनवाले से ( मुञ्चथ , छुडाते हो, ( या य. ऊति. ) जो इस भाति तुम्हारी संरक्षणक्षम शक्ति है (सा अर्वाची ) वह हमारी ओर आ जाए और तुम्हारी (सु-मनि.) यच्छी बुद्धि (वाधाइय) रंभाने- पाली गो के समान (जो सु जिगातु ) भली प्रकार हमारे निकट आए, हमें प्राप्त हो। भावार्थ-- २१२ ये वीर स्पय यश करनहारे है और अपने अनुयायि की रक्षाका मार अपने उपर लेनेवाले है। हम उनसे अपना रक्षाकी अपेक्षा करते हैं और इसलिए उन्हें नमन करके की सराहना करते हैं। २१३ तुममें विधमान जिन मरक्षा शक्षियों की सहायतासे तुम उपासकों को पापोंसे यचाते हो, गिन्दक होगांसे बचाते हो, उग तुम्हारे साक्षण को छहाया में हम रहगे पाय भार तुम्मारी सुमति से हम लाभ उठाये। टिप्पणी - [२] (9) रूथं - घर, रक्षण, कवच, समुदाय, पाल । (२) अ वर = (न विद्यते घर | पन्यः येषां ते ) श्रेष्ठ, (भत्रराम् मुख्यान् । सायण)। [२१३ ] (1) रध्र = (रभू-हिंसा-संराध्यो ) पूजा करने हारा, श्रीमाम्, उदा, मुखी,ख देवा।।

गाथिएन विभ्वामिन ऋषि (२० ३।२६।४-६) (२१४) । यन्तु । वार्ताः । तविपीमिः । अग्नयः । शुभे। सम्ऽमिश्लाः। पृपंती: । अयुक्षत । हत्ऽउक्षः। मत्तः । विश्वऽदसः । प्र । वेपयन्ति । पर्वतान् । अदाम्याः ॥४॥ (२१५) अग्निऽश्रियः । मरुतः । विश्वऽकृष्टयः। आ। लेपम् । उग्रम् । अः। ईमहे । वयम् । ते । स्मानिनः । रुद्रियाः । वर्षऽनिर्मिजः। सिंहाः । न । हेपऽक्रतः । सुऽदानवः ।।५।। . अन्वय २१४ वाजा अग्नय तविषीभि प्र यन्तु, शुभे स मिला पृपती अयुक्षत, अ दाभ्या विश्व वेदस वृहत् उक्ष मस्त पर्वतान् प्र चेपयन्ति । २१५ मरत अग्नि थिय विश्व कृष्टय , उग्र त्वेप अव आ ईमहे, ते वर्ष-निर्णिज रद्रिया हेप तय सिंहा न स्वानिन सु दानव । अर्थ- २१४ ( वाजा ) परवान् या अनवान् (अग्नप ) अग्निवत् रोजस्ती वीर (तविपीभि ) अपने यलॉसहित शत्रुदल्पर (प्र यन्तु) चढाई करें या टूट पड़ें। ( शुभे) लाककल्याण के लिए (स मिश्रा)इटे हुए ये वीर (पृपती अयुक्षत ) ध वाली घोडिया या हरिणिया रथों में जोड देते है । (अ-दाभ्या )न दयनेवारे (विश्य वेदस ) सभी धनों से युक्त और (गृहत्-उक्ष ) अतीय वल्वान् वे (मरत ) वीर मरत् (पर्वतान् प्र वेपयन्ति ) पहाडोंको भी हिला देते है। ०१५ (मस्त अग्निश्रिय ) ये वीर मरुत् अग्निवत् तेजस्त्री है और (विश्व-कृष्टय ) सभी किसानों में से है । उनके ( उन वेप अय ) प्रसर तेजस्ती सरक्षणको ( वय आ ईमहे ) हम चाहते है। (ते पं- निणिज ) ये स्वदशी गणवेश पहननेवारे है वथा (रद्विया ) महावीर के समान शूरवीर ओर (हेप भनव सिंहा न ) गर्जना करनेवाले सिंह के समान (स्यानिन ) यडा शब्द परनेहारे है एव (सुदानव ) यडे अच्छे दानी है। भावार्थ- २१४ वीर अपना घर एकग्नित कर के शत्रुदल पर टूट पड़े। जनता का हित करने के लिए चे मिल जुल कर कार्य करें। ये चीर किसी से दरनेवाल नहीं हैं और भर ज्ञानी एव सामथ्र्यवान होने के कारण यदि प्रयत्न करें, घोपत-प्राणियों को भी अपनी जगह से उखाड़ फक देंग। २१५ ये वीर भति को नाई तजस्वी है और कृषक होते हुए भी सेना में प्रविष्ट हुए हैं। ५ वश में धनाये हुए गणवेश का ही उपयोग करते है। हमाग इच्छा है कि य हमें सकटों से बचाये । वर की नाई दहाढते है और शत्रुको जुनोती दने में पिशकत नहीं । ये यद उदार भी है। टिप्पणी-[२१४ ] (1) चाज = ध यज्ञ पर वा, रडाइ सपत्ति । (२) तविषी (तविप) यल, मामय, बलिए, पृथ्वी । (३) अग्नय = अग्नि के समान तनवी 1( अगले मन म 'अग्निधिय 'सध्द दविए)। १२१५) (1) स्प- (रिखने ) खींचना, पापित करना, प्रमुप प्रस्थापित करना हल चलाना । (२) विश्व कृष्टि= सारे पृषक, सभी मानव, सद को खींचनेवाला। दम्बिए 'इन्द्र आसीत्सीरपति शतप्रतु फोनाशा आमन् मस्त सु दानव ॥ (अर्व ३३०१। (३) निर्णिज = पुत्र, पवित्र, वन्न । (४)वर्प % यी दश । वर्ष निर्णित: स्वदेवा में बने हुए कपड़े पहननवारा, दशी वरदी या गणवया उपयोग में लानेवासा, वर्षा को ही जो पहनावा मामत हों। .

८७ (२१६) बातम्ऽबातम्। गणम्ऽगणम् । मुशस्तिऽभिः। अप्रैः । भामम् । मरुताम् । ओजः । ईमहे । पृषत् अश्वासः । अनमभ्रऽपिसः । गन्तारः । यज्ञम् । निदथेषु । धीराः ।।६।। अभिपुन श्याराश्य प्रापि (ऋ० ५/५२।१-१७) (२१७) प्र । श्यावऽअश्व । धृष्णुऽया। अर्थ । मुरुभिः । मभिः । ये । अद्रोघम् । अनुऽस्सुधम् । श्रवः । मदन्ति । यज्ञियाः ॥१॥ अन्वयः- २१६ गणं गणं नातं नातं अग्ने भामं मरतां ओजः सु-शस्विभि ईमहे, पृपत्-अभ्यास अन्-अवन-राधस धीरा. विदथेषु यज्ञ गन्तारः। २१७ (हे) यावाश्य (श्याव-अश्व ! ) धृष्णु-या भाभिः मरादि प्र अर्च, ये यशियाः अनु-स्व-धं अ द्रोघं श्रवः मदन्ति । अर्थ- २१६ (गणं-गणं ) हर सैन्य-विभाग में और ( मातं-बात ) हर समूह में ( अनेः भामं) अग्नि का तेज त (मस्तां ओज.) मरतों का यल उत्पन्न हो इसलिए हम (सु शस्तिभिः) उत्तम. अच्छी स्तुतियों से (ईमहे ) उनकी प्रार्थना करते ह । (पृपत् अश्वासः) धनों से युक्त धाडे रखनेवाले (अन्- अपभ्र राधसः | जिनका धन छीना न जाता हो ऐस ये (धीरा ) धैर्ययुक्त वीर (विदथेषु) यशों में या युद्धों में (यशं गन्तारः) हरनस्थान के समीप जानेवाले है । २१७ हे (श्याव अश्य !) भूरे रंग के घोडे पर वेटनेवाले वीर! (धृष्णु या ) शत्रु का पराभव करने में उपयुक्त वल से परिपूर्ण तू (ऋक्यनि. मादि.) सराहनीय वीर मरतों के साथ (प्र अर्च) उनकी पूजा कर 1 (ये यशिया ) जा पूज्य वीर (अनु स्व घ) अपनी धारक शक्ति स युक्त हो, (अ-द्रोधं ) द्रोह रहित (श्रव.) कीर्ति पाकर (मदन्ति) हर्पित हो उठते है। पास जो धन भावार्थ- ०१६ हम वीरों के काव्य का गायन इसलिए करते हैं कि, वीरा के हर दर मे तथा प्रत्येक विभाग में सेजस्विता स्थिर रहने पाय । इन वीरों के निकट घोढेस हुए है और वे अती धैर्यशाली हैं। इन के है, पहन कभी घटता और न दुपरी को पतनोन्मुख करता है । सग्राम मे जिधर भारमबलिदान का कार्य करना पडे उधर ये पहुँचकर काम पूरा कर देत है २१७ जिस से शत्रु का पराभव हो जाय, ऐमा बल प्राप्त करना चाहिए और वोरों का भी सन्मान करना चाहिए। धीर अपनी धारक शक्ति यदा कर किसी का भी दप न करते हुए घटे यो कार्यों में सफलता पाकर यशस्वी पन जाते है। । जिल में २७ रथ, टिप्पणी [२१६] (1) गण = समुदाय, सैन्य का विभाग ( Division, अक्षौहिणी का अश, २७ हाथी, घोडे, ३५ पैदल सिपाही हो । देखिए मग्र २४४ पर की टिप्पणी)। (२)वात. - समुदाय, समूह, पौरुष, पुरुषार्थ । (३) यश. = यज्ञ, इविन्य (जिम मकर्म में देवपूजा मातिकरण-दान होता दो.) भात्मसमर्पण। (४) धीर= (धीर) युद्धि देनेवाले, परामर्श करनेवाले, धैर्यवान् । [२१७] (1) श्याय अश्व = (श्याय) भूरे रंग का (अव) घोडा, उस घोडे पर बैठनेवाला धीर, [यावाश्व कपि सायणभाष्य । ] (२) श्रवस् = काम, यश, धन, सराहनीय कम, फोति । (३) अर्थ - ( पूनायां) - पूजा करना, प्रकाशना, सम्मान करना ।

८८ .. (२१८) ते । हि । स्थिरस्य । शव॑सः। सखायः । सन्ति । धृष्णुऽया । ते । याम॑न् । आ । धृपऽविनः । रगना । पान्ति । शश्व॑तः ॥२॥ (२१९) ते । स्पन्द्रासः । न । उक्षणेः। अति । स्कन्दन्ति । शर्वरीः । मुरुताम् । अर्ध । महः। दिवि । क्षमा । च । मन्महे ॥३॥ (२२०) मरुत्सु । वः । दुधीमहि । स्तोमम् । यज्ञम् । च । धृष्णुऽया । विश्वै । ये । मानुपा । युगा। पान्ति । मय॑म् । रिपः ॥४॥ अन्वयः- २१८ घृष्ण-या ते हि स्थिरस्य शवसः सखायः सन्ति, ते यामन् शश्यतः धृपत् विनः त्मना आ पान्ति। २१९ स्पन्द्रासः न उक्षणः ते शर्वरीः अति स्फन्दन्ति, अधमरुतां दिवि क्षमा च महामन्महे । २२० ये विश्व मानुपा युगा मयं रिष पान्ति, यः धृष्ण-या मरुत्सु स्तोमं यज्ञं च धीमहि । अर्थ- २१८ (धृष्णु या ते हि) वे साहसी एवं आक्रमणकता वीर (स्थिरस्य शयसः) स्थायी पर्व अटल बल के (सखायः सन्ति ) सहायक है । (ते यामन् ) वे चढाई करते समय ( शश्वत.) शाभ्यत (धृपत् विनः) विजयशील सामर्थ्य से युक्त वीरों का (त्मना ) स्वयं ही (आ पान्ति) सभी ओरसे संरक्षण करते हैं। २१९ (ते स्पन्द्रासः) शत्रु को विकम्पित करनेवाले (न उक्षणः) और वलयान वीर (शर्वरी: अति स्कन्दन्ति) रात्रियों का अतिक्रमण करके आगे चले जाते हैं। (अध) अब इसलिए (मरुतां) मरतों के (दिवि क्षमा च ) धुलोक में एवं पृथ्वी पर विद्यमान (महः मन्महे ) तेजापूर्ण कायका हम मनन करते हैं। २२० (ये) जो वीर (विश्य ) सभी (मानुपा युगा) मानवी युगों में (मत्य) मानवको (रिपः पान्ति) हिंसक से बचाते हैं, ऐसे (वः) तुम (धृष्णु-या) विजयशील सामर्थ्य से युक्त (मरत्सु) मरुतों के लिए हम (स्तोमं यश च ) स्तुति तथा पवित्र कार्य (दधीमहि ) अर्पण करते हैं। - भावार्थ- २१८ ये साहसी और शूरवीर सैनिक पल की ही सराहना करते है । जब ये शत्रुदल पर भाक्रमण कर देते है, तय स्थायी एव विजयी बल से परिपूर्ण वीरों की रक्षा करने का गुरुतर कार्यभार स्वयं ही स्वेच्छा से उठाते हैं। २१९ जो लिष्ट वीर शत्रु के दिल में धडकन पैदा करते हैं, वे रात्री के समय दुश्मनों पर चढ़ाई करते हैं और दिन के अवसर पर भी भाक्रमण प्रचलित रखते है। इसीलिए हम इन के मननीय चरित्र का मनन करते हैं । २२० जो धीर मानधी युगों में शत्रुओं से अपनी रक्षा करते हैं, उन के सामथ्र्य की सराहना करनी चाहिए। टिप्पणी- [२१८] (1) शश्वत् = असंख्य, चिरकाल तक टिकनेवाला, सतत । (२१९] (1) मन्मन् - इच्छा, स्तुति, ( मननीय काव्य ) । (२) शरीः अनि स्कन्दन्ति = ये वीर दिन या रात्री का तनिक भी ख्याल न घर के भपना भाक्रमण घरायर जारी रखते हैं । (३) स्पन्दु - (विनिच्चरने = हिलना, हिलाना! [२२०] (1)युगं = युगुल, पतिपत्नी, प्रजा, भनेक वर्षों का काल । (२) मर्त्यः = मानव, मरगधर्मा मनुष्य ।

(२२१) अहेन्तः । ये । सुऽदानवः । नरैः । असामिऽशवसः । प्र । यज्ञम् । यज्ञियेभ्यः। दिवः । अर्च । मरुत्ऽभ्यः ॥५॥ (२२२) आ । रुक्मैः । आ । युधा । नरः । अप्वाः । ऋष्टीः । असूक्षत । अनु। एनान् । अहं । विद्युतः । मरुतः । जज्झती:ऽइव । भानुः । अर्त । त्मना । दिवः ।।६।। (२२३) ये । यवृधन्त । पार्थिवाः । ये । उरौ । अन्तरिक्षे । आ । जनै । या । नदीनाम् । सधऽस्थें । वा । महः । दिवः ।।७।। (२२४) शः । मारुतम् । उत् । शंस। सत्यऽशवसम् । ऋम्बसम् । उत । स्म । ते । शुभे । नरः। प्रा स्पन्द्राः। युजत । त्मना |८|| अन्वय - २२१ ये अर्हन्तः सु-दानव अ-सामि-शयस दियः नरः यक्षियेभ्यः मरुद्भ्यः यशं प्र अर्च । २२२ रुक्मैः आ युधा आ अप्वाः नर दिव मस्त माटीः एनान् अनु ह जज्झती इव विद्यु- तः असृक्षत,भानु त्मता अर्त । २२३ ये पार्थिवाः, ये उरौ अन्तरिक्षे, नदीनां जने वा मह दिवः सध-स्थे या आ ववृधन्त । २०४ सत्य-शवसं ऋभ्यसं मारुतं शर्ध उत् शंस,उत स्म स्पन्द्रा. नरःते शुभे त्मनाप्र युजत। अर्थ-२२१ (ये ) जो (अर्हन्तः) पूज्य, (सु-दानय.) दानशूर, (अ-सामि-शवसः) संपूर्ण वलसे युक्त तथा (दियः) तेजस्वी, धोतमान ( नरः) नेता है, उन ( यभियेभ्यः) पूज्य (मरुद्भ्यः ) वीर मरुतों के लिए (यशं) यश करो और उनकी (प्र अर्च ) पूजा करो। २२६ (रुक्मैः आ) स्वर्णमुद्रा के हारों से और (युधा आ) आयुधों से युक्त, (ऋष्या नरः) वडे तथा नेतृत्वगुण से युक्त (दिवः) दिव्य वीर (ऋष्टीः) अपने भालोंको और (एनान् अनु ह) इनके अनुरोधसे ही (जज्झती इव ) घडघडाती हुई नदियों के समान (विद्युतः) तेजस्वी यत्र शत्रु पर (असृक्षत) फेंक देते हैं। इनका (भानुः) तेज (मना) उनके साथही (अत। चला जाता है। २२३ (ये पार्थिवाः) जो ये धीर पृथ्वी पर, (ये उरो अन्तरिक्षे ) जो विस्तीर्ण अन्तरिक्ष में (नदीनां ) नदियों के समीप के (जने वा ) मैदानों में अथवा (महः दियः ) विस्तृत धुलोकके ( सध- स्थे वा ) स्थान में (आ ववृधन्त ) सभी तरह से बढते रहते है। २२४ (सत्य-शवसं ) सत्य के बलसे युक्त तथा (ऋभ्यसं ) हमले करनेवाले (मारुतं शर्धः) चौर मरतों के सामुदायिक बल की (उत् शंस) स्तुति करो। (उत स्म ) क्योंकि । स्पन्द्राः) शत्रुको विच- लित एवं विकम्पित करनेवाले और (नरः) नेता वे वीर ( शुभे ) लोककल्याण के लिए किये जानेवाले सत्कार्य में (स्मना) स्वयं अपनी सदिच्छासे ही ( प्र युजत) जुट जाते हैं। भावार्थ- २२१ पूजनीय, दानी वीरों का अच्छा साकार करना चाहिए। २२२ हार एवं हथियारों से सजे हुए ये वीर बहुत तेजस्वी प्रतीत होते हैं। २२३ ये वीर भूमंडल पर, अन्तरिक्ष में तथा द्युलोक में भी अवाधरूप से संचार करते हैं। २२४ धीरों के सच्चे पळ का बखान करो।ये वीर जनता के हित के लिए स्वेच्छापूर्वक यत्न करते रहते है। टिप्पणी- [२२१] (1) सामि = भाधा, अपूर्ण; असामि% पूर्ग, अविकल, ममग्र ! [२२४] (1)ऋभ्यस = बहुत दूर फैले हुए, धैर्यशाली, चढाई करनेवाले । (२) शर्ध = बल, समूह, संध, शत्रु के विनाश करनेका पल । मस्स् [हिं.] १२ अन्वय (२२५) उत । स्म । ते । परुष्ण्याम् । अणीः । वसत । शुन्ध्ययः । उत । पृच्या । रानाम् । अद्रिम् । भिन्दन्ति । ओजमा ॥९॥ (२२६) आऽथियः । विऽथियः। अन्तःऽपथाः । अनुऽपथाः । एतभिः । मह्यम् । नामऽमिः। यज्ञम् । विस्तारः । ओहते ॥१०॥ (२२७) अर्ध । नरैः । नि । ओहते । अर्ध । निऽयुतः । ओहते। अर्ध । पारीताः । इति । चित्रा । रूपाणि । दर्या ॥ ११ ॥ २२५ उत स्म ते परण्या शुन्ध्यव. ऊर्णा वसत, उत रथानां पव्या ओजसा अदि भिन्दन्ति । २०६ आ-पथय वि-पथय. अन्त -पथा अनु पथा पतेभिः नामभि विस्तार मह्यं यज्ञ ओहते। २२७ अध नर नि ओहते अध नियुत , अध पारावता ओहते, इति रूपाणि चित्रा दर्या । अर्थ- २२५ (उत स्म) और (ते) चे वीर (परण्या) परणी नदी में (शुन्ध्यच. ) पवित्र होकर (ऊर्णा वसत) ऊनी कपड़े पहनते हैं (उत) और (रथानां पदया) रथों के पहियों से तथा (ओजसा) बड वलसे (अद्रि भिन्दन्ति) पहाड को भी विभिन्न कर डालते ह । २२६ (आ-पथय ) समीप के मार्ग से जानेवाले, (विपथयः) विविध मार्गों से जानेवाले, (अन्त -पथा ) गुम सडकों परसे जानेवाले (अनु-पथा ) अनुशल मागाँसे जानेवाले, (एतभिः नामभिः) ऐसे इन नामों से (विस्तार ) पिरयात हुए ये वीर (मह्य) मेरे लिए (यश ओहते ) यश के हविप्यान ढोकर राते है। २२७ (अध) कभी कभी ये धीर (नर ) नेता बनर संसार का (नि ओहते ) धारण करते है, (अध नियुत ) कभी पक्तियों म खड रहकर साम दायिक ढगसे ओर ( अध) उसी प्रकार ( पारायता ) दूर जगह सडे रहकर भी (ओहते ) बोझ ढोते ह, (इति ) इस भॉति उनके (रूपाणि) स्वरुप (चित्रा) आश्चर्यकारक तथा (दर्या ) देसनेयोग्य है । 4 भावार्थ- २२५ वीर नदी में नहाकर शुद्ध होते हैं और उनी कपड़े पहनकर अपने स्थो के घेग से पहाड़ों तक को लॉघ कर चले जात हैं। २२६ भौति भाँति के मागों से जाने वाले वीर चहु भोर से अन्नसामग्री लाते हैं। २७ धीर पुरष नेता बन जाते हैं और सेना मे दूर जगह या समीप सटे रहकर सरक्षण का स्मूचा भार उठा रते हैं। ये सुपरूप तथा दर्शनीय भी हैं । टिप्पणा- [२२५] (1) परस्- शरीर का अवयव, परप्णी= शरीर, नदी का नाम । (२) ऊर्णा- ऊन, उनी कपडे। [२६] (1) आ-पथ = सरर राह । (२) वि-पथ = विशेष मार्ग, विरुद्ध दिशा मे जानेवाली सड़क । (३) मन्त पथ - गुप्त वियरमार्ग, भूमि के अन्दरकी सहक, दरों में जाने वाला मार्ग । (४) अनु-पथ - पगाड़ियाँ या वही सहक को गजू से जानेवाला सँक्रा मार्ग ( Foot-laths), [२०७]()नियुत् = घोडा, स्वोता, पक्ति । (२) पारायता = दूरदूर खड़े हुए, दूर देश में रहे हुए।

(२२८) छन्दःऽस्तुभः । कुभन्यवः। उत्सम् । आ । कीरिणः । नतः । ते । मे । के । चित् । न ! तायवः। ऊमाः । आसन् । दृशि । विपे ॥ १२ ॥ (२२९) ये । ऋष्पाः । ऋष्टिविद्युतः। कवर्यः । सन्ति । वेधसः । तम् । ऋपे । मारुतम् । गणम् ! नमस्स ! समय । गिरा ॥ १३ ॥ (२३०) अच्छे । ऋपे । मारुतम् । गणम् । दाना । मित्रम् । न । योपणां । दिकः । वा । धृष्णवः । ओजसा । स्तुताः । धीभिः । इपण्यत ॥ १४ ॥ अन्वय.- २२८ छन्दः-स्तुभः कु-भन्यव कीरिण उत्सं आ नृतु , ते के चित् मे तायर न, ऊमा. हाश, विपे आसन् । २२९(हे) प्रपे ये प्वा. मष्टि विद्युत कवय धस सन्ति,तंमारतंगणं नमस्य गिरा रमय । २३० (हे ) ऋ! योपणा मित्रं न मारतं गणं अच्छ दाना, ओजमाधृष्ण. दिव. वा धीभिः स्तुता. इपण्यत । अर्थ- २२८ (छन्दः स्तुभः) छन्दों से सराहनीय तथा (यु भन्यच ) मातृभूमि की पूजा करनेवाले वीर (कीरिण ) स्तुति करनेवाले के लिए ( उत्सं ) जलप्रवाह (आ नृतु ) ला चुके। (ते के चित् । उनमें से कुछ (मे) मेरे लिए ( तायव न ) चोरों के समान अदृश्य, फ्छ (ऊमाः) रक्षणकर्ता होकर (शशि) दृष्टिपथ में अवतीर्ण और कई (विपे) तेजोवल बढाते (आसन्) थे। २२९ हे (झपे !) ऋषिवर! (ये) जो (कप्पा.) बडे बडे, (कष्टि विद्युतः ) हथियारों से द्योतमान, (कचयः) शानी होते हुए. (वेधसः) पुशलतापूर्वक कर्म करनगाले ह (तं मारतं गणं ) उस वीर मरनों के गण को (नमस्य) नमन कर ओर (गिरा रमय) वाणी से आनन्द दो। २३० हे (सपे!) पिवर ! (योषणा मिनं न ) गुवती जिस तरह प्रिय मित्र की भोर चली जाती है, उसीप्रकार (मारतं गणं अच्छ ) भरुत्संघरी ओर ( दाना) दान लकर जाओ। (ओजला धृष्णया) बल के कारण शश्रुदल की धजियाँ उडानेवाले ये चीर (दिव या) तेजस्वी ह । हे धीरो! (धीभिः स्तुता.) स्तुतियों द्वारा प्रशंसित तुम इधर (इपण्यत) आओ। भावार्थ- २२८ चूंकि बीर मातृभूमि के भक्त होते है इसलिए व सराहनीय है। उन में कुछ गुप्त रूप से, तो कई भकट रूप से सब की रक्षा करते हुए सेज की वृद्धि करते है। २२९ वीर भैनिक महान गुगी विशेष ज्ञानी, कुशलतापूर्वक कार्य करनेहारे ए श्रायुधधारी होने के कारण पोतमान है । इस मररसघ को रमणीय वाणी से हर्षित कर और नमन कर। २३० देन लेकर वीरों के समीप चले जाना चाहिए । बल से शत्रुदल पर चढाई करनी चाहिए । तो ऐसे भारमणकर्ता होग, डम की स्तुति होगी। टिप्पणी- [२२८1 (1) कु-भन्ययः (कु-पृथ्वी, भन : पूजा काना) मातृभूमि की पूजा करने हारे । [(1) केचित् तायव न: चोगों के समान भदृश्य । (२) केचित् ऊमाः दृशि दृश्य सरक्षक । (३) केचित् विपे-शरीरान्त संचारी, शारीरिकवलसंवर्धक !] [२९] (1) वेधम् - [वि+धा = करना, उरपस करना, आता करना ] कुशलतापूर्वक कार्य करने वाला। [२३०] (1) योषणा- युवती, (यु- जोदा, मिना, एक जगह माना- ( पौति इति) - एक, त्रित होने की अपेक्षा रखनेहारा । D (२३१) नु । मन्यानः । एपाम् । देवान् । अच्छे । न । वृक्षणा । दाना ! सचेत । सुरिऽभिः। यामऽश्रुतेमिः । अञ्जिभिः । ॥ १५ ॥ (२३२) प्र । ये । मे । बन्धु एपे । गाम् । वोर्चन्त । सूरयः। पृश्निम् । बोचन्त । मातरम्। अर्ध । पितरम् । इष्मिणम् । रुद्रम् । चोचन्त । शिक्षसः ॥ १६ ॥ (२३३) सप्त । मे । सप्त । शाकिनः। एकम्ऽएका । शता । दुः। यमुनोयाम् । अधि । श्रुतम् । उत् । राधः । गव्यम् । मजे । राधः । अश्व्यम् । मृजे । ॥ १७ ॥ अन्ययः- ०३१ वक्षणा न एषां देवान् अच्छ नु मन्यान सूरिभि याम-धुतेभिः अनिभि. दाना सचेत । २३२ यन्शु-पपे ये सूरप मे प्रयोचन्त गां पृशि मातरं घोचन्त, अघ शिफ्यसः इमिणं रद्रं पितरं वोचत । २३३ सप्त सप्त शाकिनः एक-एका मे शता ददुः, श्रुतं गव्यं राधः यमुनायां अधि उत् मृजे, अश्यं राध.नि मृजे। अर्थ- २३१(वक्षणान) वाहन के समान पार ले जानेवाले (पपां देयान अच्छ) इन तेजस्वी धारी फी ओर (नु) शीघ्र पहुँच कर (मन्यानः) स्तुति करनेहाग, (रिभिः) शानी,(याम -थुतेभिः) चढाई के बार में निरयात एवं ( अधिभिः) वस्त्रालंकारों से अलंकृत ऐसे उन वीरों से (दाना) दान के साथ (सचेत ) संगत होता है। ०३२ उनके (यन्धु-एपे) बांधोंक जाननेगी इच्छा करने पर (ये सूरयः) जिन मानी वीगने (मे प्र चोचन्त ) मुझसे कहा, उन्होंने ' ( गां) गौ तथा (पृश्नि) भूमि हमारी (मातरं) माताएँ है" (योचन्त) ऐसा कह दिया। (अध) और (शिवस:) उन्हीं समर्थ धीरोंने ' (प्मिण )येगवान महावीर हमारा (पितरं ) पिता है " ऐसा भी कह दिया। अर्थ- २३३ ( सप्त सप्त ) सात लात सैनिकों की पंक्ति में जानेवाले (शाकिनः ) इन समर्थ धीराम से (एक-एका) हरेकने ( मे शता ददु.) मुझे सौ गौएँ दे दी। (श्रुतं) उस विश्रुत (गव्यं राधः) गोलमूहरूपी धनको (यमुनायां अधि) यमुना नदी में ( उत् मृजे ) धो डालता है और (अश्यं राधः) अभ्यरूपी संपत्ति को यही पर (नि मुज) धोता है। भावार्थ- २३१ वे कर सकटों में से पार ले जाने वाले हैं और भाकमण करने में घडे विख्यात है। ज्ञानी है मौर घसाल कारों से भूपिन रहते हैं। ऐसे उन तेजस्वी वी के पास दाम टेकर पहुँच जाभो। ०३२ गौ या भूमि मरों की माता है और रुद्र उनका पिता है। २३३ वीरों से दानरूप में प्राप्त हुई गौ तथामिले हुए घोडे नदीजल में धोकर साफसुथरे रखने चाहिए। टिप्पणी-[२३१] (1) पक्षणं-वक्षणा = अनि, छाती, नदी का पात्र, गदी, वाहन ! [२३] (१) शिश्वस्- (शरावती) समर्थ, सामर्यवान् ।

अन्वय - ? (अ. ५/५३११---१६) (२३४) कः । वेद । जानम् । एपाम् । कः । वा । पुरा । सुम्ने । आस । मरुताम् । यत् । युयुने | किलास्यः ॥१॥ (२३५) आ । एतान् । रथेषु । तस्थुषः। कः । शुश्राव । कथा । ययुः । कसै । ससुः । सुऽदास । अर्नु । आपर्यः । इळाभिः । वृष्टयः । सह ॥ २॥ (२३६) ते । मे । आहुः । ये । आऽययुः। उप । घुऽभिः । विभिः । मर्दै । नरः । मयोः । अरेपसः । इमान् । पश्यन् । इति । स्तुहि ॥३॥ २३४ यत् किलास्य युयुजं एपा जानं कः वेद, क वा पुरा मरतां सुम्नेषु आस? २३५ रथेषु तस्थुप एतान् क्या ययुः, क आ शुभार, आपय वृष्टयः इळाभि सह कस्मे सु-दासे अनु सपः? २३६ ये द्युभिः विभि' मदे उप आययु' ते मे आहुः, नरः मर्याः भ-रेपस. इमान् पश्यन् स्तुहि इति। अर्थ- २३४ धौर मरताने ( यत् ) जव (किलास्यः) धब्बेवाली हिरनिगा (युयुत्रे ) अपने रथों में जोड दी, तर (एषां) इनके (जानं ) जन्मका रहस्य (क. वेद) कौन भला जानता था ? (कः चा ) और कौन भला (पुरा) पहले इन (मरतां सुम्नेषु ) वोर मरतों के सुखच्छरछाया मे (आस) रहता था २३५ (रथेषु सस्थुपः) रथों में बैठे हुए ( एतान् ) इन चारों के समीप कौन भला (कथा ययुः) किस सरह जाते हैं, उसी प्रकार उनके प्रभाव का वर्णन (कः आ शुभाव ?) भला किसे सुनने मिला? (आपय.) मित्रवत् हितकर्ता एवं (वृष्टय ) वर्षाके समान शांतिदायक ये वीर अपनी (इळाभिः सह ) गौओं के साथ (फस्मै सु-दासे) किम उत्तम दानी की ओर ( अनु सस्नु.) अनुकल हो चले गये ? ०३६ (ये ) जो (धुभिः विभि ) तेजस्वी सोमों के साथ (मदे ) आनद पाने के लिए. (उप आययुः ) रक्ट हुए (ते मे आहु) ये मुझसे बोले कि, "(नर ) नेता, ( मर्याः) मानवोंके हितकारक (अ- रेपसः) तथा दोपरहित (इमान् पश्यन् ) इन वीरों को देखकर (स्तुहि इति ) उनकी प्रशंसा करो।" भावार्थ- २३४ जब ये चीर रथ में बैठकर सचार करने लगे, तब भला पिसे इन के जीवन का ज्ञान प्राप्त हुआ या ! उसी प्रकार कौन लोग इन के सहारे रहते थे ? (ये वीर जब जनता के सुग्व के लिए प्रयत्नशील हुए, तभी से लोगों को इनका परिचय प्राप्त हुआ और लोग इन के आश्रय में सुपपूर्वक रहने लगे ।) २३५ वीर रथों पर पैटकर मित्रों से मिलने के लिए जाते हैं, उस समय वे गायें साथ लेकर ही प्रस्थान करने लगते है। इन के शौर्य का बयान करना चाहिए। २३६ सोमयाग में इकट्ठे हुए सभी लोग कहने लगे कि, पोरों के काय का गायन करना चाहिए। टिप्पणी [२३४१ (१) फिलास्य सुफेद घडवा । क्लिासी धम्वेवारी (हिरनी)। [२३५] (1) इळा- ( इरादा ) गौ, भूमि, वाणी, दान, स्वर्ण, भन्न । (२) आपि = मित्र, सुगमतापूर्वक प्राप्त होमेपारा। [२३६7 (१)वि जानेवाला, पछी, घोटा, लगाम, मोम, यजमान । - - (२३७) ये । अञ्जिए । ये । वाशीपु । स्वऽभानवः । स्रक्षु । रुक्मपु । सादिए । श्रायाः । रथेषु । धन्वंऽसु ॥ ४॥ (२३८) युष्माकम् । स्म । रान् । अनु । मुदै । दुधे । मरुतः । जीरऽदानवः । वृष्टी । द्यावः । यती:ऽईव ॥५॥ (२३९) आ । यम् । नरः । सुऽदानवः । दाशु। दिवः । कोशम् । अचुच्ययुः । वि । पर्जन्यम् । सृजन्ति । रोदसी इति । अनु । धन्वना । यन्ति । वृष्टयः ॥ ६ ॥ अन्वयः- २३७ ये स्व-भानय अजिए ये चाशीपु स्त्रक्षु रफ्मेष सादिपु रथेषु धन्यसु श्रायाः । २३८ (हे) जीर-दानवः मस्त ! मुदे वृष्टी यती इव द्याय युप्माकं स्थान अनु दधे स्म। २३९ नरःसु-दानयः दिवः ददाशुषे यं कोशं आ अचुच्यत्रुः रोदसी पर्जन्यं वि एजन्ति, वृष्टय धन्यना अनु यन्ति । अर्थ- २३७ (ये) जो (स्व-भानवः) स्वयंप्रकाशमान धीर, (अजिपु) वस्त्रालंकारों में. (धाशीपु) पुटारों में, (सन) मालाओं में, ( रकमेपु) स्वर्णमय हाराम, (सादिषु) कँगनों में, (रथेपु) रथों में और (धन्यस) धनुष्यों में (श्रायाः) माश्रय लेते है, अर्थात् इनका उपयोग करते है। २३८ हे (जीर-दानवः मरतः!) शीघ्रतापूर्वक विजय पानेवाले वीर मरतो! (मुदे ) आनंद फे लिए. में (पृष्टी) वर्षा के समान (यती इय) चेगपूर्वक जानेवाले ( द्यायः) विजलियों के समान तेजस्वी (युप्माकं रथान ) तुम्हारे रथोंका ( अनु दधे स्म ) अनुसरण करता हूँ। २३९ ( नरः ) नेता, (सु दानयः) अच्छे दानी एवं ( दियः) तेजस्वी वीर (ददाशुषे) दानी लोगों के लिए (यं कोशं ) जिस भाण्डार को ( आ अचुन्ययुः) सभी स्थानों से बटोर लाते हैं, उसका ये (रोदसी) धुलोक एवं भूलोक को ( पर्जन्यं ) वृष्टि क समान (वि सृजन्ति ) विभजन फर डालते हैं। (वृष्टयः) वर्षा के समान शांतता देनेवाले बे वीर अपन (धन्यना) धनुप्यों के साथ ( अनु यन्ति ) चले जाते हैं। भावार्थ- २३७ ये पोर तेजस्वी हैं और आभूषण, कुठार, माला, हार धारण करते है, तथा रथ में बैठकर धनुष्यों का उपयोग करते है। ०३८ मैं धोरों के रथ के पीछ चला भा रहा हूँ. ( में उम के मार्ग का अवलम्बन करता हूँ1) २३९ ये पौर शूग्नापूर्ण कार्य कर के चारों ओर से धन कमा लाते है और उन का उचित बटवारा कर के जनता को सुखी करते है। टिप्पणी-[२३८] (1) दानु = (दा दाने, दो भरखने, दान् सण्डने ) दोन देनेहारा, शूर, विजेता, नापा करने वाला। (२३०.] (1) च्यु % गिरना, गवामा, रप जाना !

(२४०) तनुदानाः । सिन्धयः । क्षोसा । रजः। प्र । सनुः । धेनवः । यथा । स्यन्नाः । अवाःऽइन । अर्धनः । विमोचने। नि । यत् । वर्तन्ते । एन्यः ॥७॥ (२४१) आ । यात । मरुतः । दिवः। आ । अन्तरिक्षात् । अमात् । उत । मा। अब । स्थात । पराऽवत: ॥ ८॥ (२४२) मा । यः । रसा । अनितभा । कुा । कुमुः। मा । : । सिन्धुः । नि ।रीरमत् । मा । यः परि । स्थात् । सरयुः । पुरीपिणी । असे इति । इत् । सुम्नम् । अस्तु । वः ॥९॥ अन्वयः- २४० यत् एन्यः अध्धनः विमोचने स्यनाः अश्या इव वि वर्तन्ते क्षोदसा ततदानाः सिन्धयः धेनयः यथा रज.प सस्नुः। २४१ (हे) मरुतः ! दिव उत अ-मात् अन्तरिक्षात् आ यात, परावत मा अव स्थात । २४२ ३ अन्-श्त-भा कुभा रसा मानि रीरमत्, व. मुमु. सिन्धुः मा, व. पुरोपिणी सरयुः मा परि स्थात्, अस्मे इत् यः सुम्नं अस्तु । अर्थ- २४० ( यत् एन्य.) जो नदियाँ ( अध्धन विमोचने) मार्ग हुँढ निकालने के लिए (स्यनाः अश्या इय) वेगवान् घोडोंके समान (वि वर्तन्ते ) वेगपूर्वका यह जाती है,ये (ोदसा ) उदफसे भूमि को (तदानाः ) फोडनेवाली (सिन्धयः ) नदियाँ (धेनव यथा ) गौओं के समान (रजा) उपजाऊ भूमियों की ओर ( मसः ) वहने लगी। २४१ हे ( मरत. 1) चोर मरतो ! ( दिवः) धुलोक से तथा ( उत) उसी प्रकार (अ-मात् अन्त- रिक्षात्) असीम अंतरिक्षमेंसे (आ यात) इधर आओ, (परावतः) दूरके देशमें ही (मा अव स्थात) न रहो। २४२ (व.) तुम्हें ( अन्-इत-भा) तेजहीन और (फ-भा) मलिन (रला ) रसानामक नदी (मा निरीरमत् ) रममाण न करे (घ.) तुम्हें (प्रमुः) वेगपूर्वक आक्रमण करनेहारा (सिन्धु ) सिंधु नद यीच में ही (मा) न रोक दे. (व.) तुम्हें ( पुरीपिणी ) जल से परिपूर्ण ( सरयुः) सग्यु नदी (मा परि स्थास् ) न घेर लेवे । ( अस्मे इत् ) हम ही ( यः सुम्नं ) तुम्हारा मुख (अस्तु ) प्राप्त हो, मिल जाये । भायार्थ- २४० धुवाँधार वर्षा के पश्चात् नदियों में याद माने पर पृथ्वी को छिन्नभिग्न करके नदियों बहने लगती है और उपजाऊ भूभाग को अधिक उर्वर बना देती हैं। २४१ योर सदैव हमारे निकट भाकर यहीं पर रहे। २४९ हे पीरो ! तुम रमा, मिन्धु पुरीपिणी एय सरयु नदियों से सींचे हुए प्रदेश में ही रममाण न यनो, अपितु हमारे निकट माकर हमें सुख दिलाओ। टिप्पणी- [२४०] (1) तृद् - भिन्न करना, नाश काना 1 ( 0 ) पनी = नदी । (२) स्यन = (स्पन्द प्रस्रवणे) वेगपूर्वक जानेवाला, पिघर कर यहनेवाला। [२१] (1) अ-म= (म मा (माने) मापन करना) = अपरिमित, विस्तृत, भसीम, (भम् गतौ) = शक्ति, घेग। [२४२ यहाँ पर रसा, सिन्धु, पुरीपिणी तथा सरयु इन चार नदियो का उलेख पाया जाता है। अध्यारमपक्ष में भी इन चारों नदियों का स्थान माना जा सकता है, पर घेसी दसा में इन शम्दों का यौगिक अर्थ करना पड़ेगा और योगके अनुभवसे निश्चित करना पड़ेगा कि, मानवी देहम इन प्रबाहीसे कौन से स्थान दर्शाये जाते है । स्थूल सृष्टि मे इन नदियों का स्थान निश्चित है- सिन्ध देश में सिन्धु, भयोध्या के समीप सत्यू, काश्मीर में पुरीपिणी (परप्णी ) और शायद वायव्य सीमामात मे पहनेवाली किसी नदीका नाम रसा हो। अभीतक इस नदीके स्थानका निर्णय नहीं हो सका। इस मनम यह अभिप्राय व्यक्त हुआ है कि, ये वीर सैनिक उपर्युक्त नदियों के रमणीय प्रदेश में ही दिलबहलार करते न रहें, अपितु हमारे समीप आकर हमारी रक्षा करें। [' कुमा भीर 'अमु' भी नदियाँ है ऐसा 'ऐतरेयालोचनम्' में (पृष्ठ २३ पर) भट्टाचार्य हितमतशर्माजीने लिखा है।

(२४३) तम् । यः । शधम् । स्थानाम् । त्येपम् । गणम् । मारुतम् । नव्य॑सीनाम् । अनु । प्र । यन्ति । वृष्टयः ॥१०॥ (२४४) शम्ऽशर्धम् । वः । एषाम् । बातम्ऽवातम् । गणम् गणम् । सुऽशस्तिभिः । अनु । कामेम । धीतिभिः ॥११॥ अन्वयः- २४३ तं वः नन्यसीनां स्थानां शर्ध त्वेपं मारतं गणं अनु पृष्टयः यन्ति । २४४ एषां च शशधं वात-पातं गणं-गणं मु-शस्तिभि धीतिभिः अनु फ्रामेम अर्थ- २४३ (तं ) उस ( 4 ) तुम्हारे (नव्यसीनां ) नये ( रथानां श) रयों के बल के, सन्य के एवं ( वेपं ) तेजस्वी ( मारुतं गणं ) वीर मरतों के समूह के ( अनु ) अनुरोध से (वृष्टयः यन्ति ) वर्षा, वेग से चली जाती है। २४४ (एषां च ) इन तुम्हारे (राघ-शर्घ) हर सैन्य के साथ. (धात मातं) प्रत्येक समुदाय के साथ और (गां-गणं ) हरएक सैन्य के दल के साथ (सु-शस्तिभिः) अत्यन्त सराहनीय अनु. शासन के (धोतिमि. ) विचारों से युक्त होकर ( अनु क्रामेम) हम अनुक्रम से चलते रहे। भावार्थ- २४३ जिधर मरतों के रथ चले जाते है, उधर युद्ध होता है, तथा वो भी हुभा करती है। २४४ गणवेश पहनकर दलबल का जैसा भनुशासन हो, वैसे ही धनुमान से पग धरते चले जाय। - टिप्पणी-२४४] (1)शर्धः - सेना का छोटा विभाग । (२) प्रातः- सेना का उस से किंचित् अधिक हिस्सा । (३) गणः - सेना का और भी अधिक दल | यह भक्षौहिणी का भंश है, जिस मे इस भांति सेना रहा करती है- गण - सेनाका वह विभाग, जिसमें २७ स्थ, २७ हाथी, घोदे १३५ पैदलसिपाही रहते है । यह देखने योग्य है कि, गण में कितने मनुष्य पाये जाते हैं । रथ के साथ ! रथी, , सारथी, ' पाणिसारथी, २ चक्ररक्षक, २ प्ररक्षक, ५ माईस, मिळकर 11 मनुष्य होते हैं । इस के पिया एक याण रखने की गाडी रहती है, जिसे होकनेवाला एक मनुष्य चाहिएअर्थात् रथ के साथ १२ मनुष्य रहते है। इस गणना के अनुसार २७ रयों के साथ २७४१२८ ३२४ मनुष्य होते है । कमसे बन २७४११ २९७ तो होगे ही। हाथी के लिए २ योद्धा, महाa, ५ साठमार, १ भंगी, जल दोने वाला मिलकर 10 आदमी रहते हैं । २७ हथियो के लिए बीक २७० मनुष्य कार्य करने हैं। घोड़े के साथ एक वीर (सवार) तथा एक साईम ऐसे २ मनुष्य रहते है । ८. घोडोंके कारण १६२ मनुष्य होते हैं। भव पैदछ सिपाहियों की संख्या १३५ है । सप की गिनती कर देखिए, तो ८९१ मनुष्यसंख्या होती है । ये युद्ध करनेवाले सैनिक है, ऐसा समझना उचित है । योदा मरता के हर गण मैं इतने मनुष्य रहते थे। महतों की एक पंक्ति में वीर रहते हैं और दोनों ओर के दो पायरक्षक गिर कर हर पंक्ति में ९ सैनिक होते हैं। इस तरह की कतारों में ७४७-४९ मरत् तथा १४ पारक्षक कुल मिलाकर ६३ मरुतों का एक दल या छोटासा विभाग होता है। मरतों का विभाग. सरया से भूचित होता है, इसलिए उनके १४ विभागों में ६३४१४ 30२ होते है । यह संख्या ऊपर अक्षौहिणी की गणना के अनुसार ही हुई, ८९. से मेल खाती है। हाँ, केवल ९ का स्तर है. शायद कही पर निधित अंक कम. ज्यादह माना गया हो। ऐसा हो, तो उसे दूर कर सकते हैं। अर्थात् मरतों के एक 'गण' मामा सम्पविभाग में ८४२ सैनिकों का अन्तर्भाव होता था, ऐसा जान पाता है। 'शर्ध ' तथा 'वात' में कितने सैनिक सम्मिलित होते थे, सो इंदना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता निधित करें कि, पया ६३ सैनिकों का शर्ध, (६३४७)- ४४. सैनिकों का मात ' एवं ८५२ सनिकों का 'गण' ऐसे विभाग माने जा सकते या नहीं।(४) धीतिः - भकि, विचार, गुलि, प्यास, पेय, अपमान । (५) अनुस्काम- एक के पीछे एक पग दालना। - - ९७ (२४५) कसै । अघ । सुजाताय । रातऽहव्पाय | प्र । ययुः। एना । योमैन । मरुतः ॥१२॥ (२४६) येन । तोकार्य । तनयाय । धान्यम् । वीर्जम् । वहध्चे । अक्षितम् । अस्मभ्यम् । तत् । धत्तन । यत् । वः । ईमहे । राधः। विश्वऽआयु ।सौभगम् ॥१३॥ (२४७) अति । इयाम । निदः। तिरः । स्वस्तिऽभिः। हित्वा । अवद्यम् । अरांतीः । वृष्टी । शम् । योः । आपः । उनि । भेषजम् । साम । मरुतः । सह ॥ १४ ॥ अन्वयः- २४५ अद्य मरुतः पना यामेन कस्मै रात-हव्याय सु-जाताय प्र ययुः? २४६ येन तोकाय तनयाय अ-क्षितं धान्यं वीजं वहध्ये, यत् राध वा ईमहे तत् विश्व-आयु सोमग अस्मभ्यं धत्तन। १४७ (हे मरतः 1) स्वस्तिभि अवयं हित्वा अराती तिरः निदः अति इयाम, वृष्ट्वी योः शं आपः उत्रि भेषजं सह स्याम । अर्थ- २४५ ( अद्य) आज (मरुतः) वीर मरुत् (एना यामेन ) इस रथ में से (कस्मै ) भला किस (रात-हव्याय) हविप्यान देनेवाले एवं (सु-जाताय ) कुलीन मानव की ओर (प्र ययु ) चले जा रहे है ? २४६ ( येन) जिससे (तोकाय तनयाय ) पुत्रपौत्रों के लिए (अ-क्षितं ) न घटनेवाले (धान्यं चीज ) अनाज तथा बीज (यहध्ये ) ढोकर लाते हो, (यत् राधः) जिस धनके लिए (वः) तुम्हारे पास हम (ईमहे ) आते है,(तत् ) वह और (विश्व-आयु) दीर्घ जीवन एवं (सांभग) अच्छा ऐश्वर्य (अस्मभ्यं धत्तन ) हमे दे दो। २४७ हे (मरुतः 1) वीर मरुतो ! (स्वस्तिभिः ) हित कारक उपायों द्वारा (अवयं हित्वा )दोप नष्ट करके ( अरातीः) शत्रुओं का एवं (तिरः निदः) गुप्त निन्दक का हम ( अति इयाम) पराभव कर सफें। हमें (घृष्टी ) शक्ति, (योः शं) एकतासे उत्पन्न होनेवाला मुख, ( आपः ) जल तथा (उनि भेषजं) तेजस्वी औषधी (सह स्याम ) एक ही समय मिले । भावार्थ- २४५ प्रश्न है कि, भला भान दिन किस जगह मरुत् पहुँचना चाहते है ? (उधर हम भी चलें।) २४६ हमे धन, धान्य, ऐश्वर्य तथा बल चाहिए। हमें ये सभी बात उपलब्ध हों। २४७ स्वस्ति तथा क्षेम हमें मिल जाए। हमारे सभी शत्रु विनष्ट हों। ऐक्यभाव से उत्पन्न होनेवाला मुख, शक्ति, जल, परिणामकारक भाषधियों हमें मिल जाय । टिप्पणी-[२४७] (1)योः- (यु= जोडना - एकता ) एकतासे । (२) स्वस्ति (सु+अस्ति) = भाली दशा में रहना । (३) अ-राति = भनुदार, शत्रु :( ) निद् = निंदक, दुश्मन । मल्लू [हिं.] १३ (२४८) सुऽदेवः । समह । असति । सुऽवीरः। नर: । मरुतः । सः । मयः। यम् । वार्यध्वे । साम । ते ॥ १५ ॥ (२४९) स्तुहि । भोजान् । स्तुवतः । अस्य । यामनि । रणन् । गावः । न । यवसे । यतः । पूर्वान्ऽइव । ससीन् । अनु । हय । गिरा । गृणीहि । कामिनः ॥ १६ ॥ (ऋ० ५:५४।१-१५) (२५०) प्र । शर्धाय । मारताय । खऽमानवे । इमाम् । वाचम् । अनज । पर्वतऽच्युते । धर्मऽस्तु: । दिवः । आ । पृष्ठऽयज्व॑ने। घुम्नऽश्रवसे । महिं । नृम्णम् । अर्चत ॥ १ ॥ अन्वय.- २४८ (हे) नर मरत ! य प्रायध्ये सामर्त्यः सु-देव , स-मह, सुधीर असति. ते स्याम । २४९ स्तुयतः अस्य भोजान् यामनि, गावः न यरसे, रणन् स्तुहि, यत पूर्वान्इव कामिन सखीन हय, गिरा अनु गृणीहि । २०० स्व-भानवे पर्वत-च्युते मारुताय शीय इमां वाचं घ अनज, धर्म-स्तुभे दिवः पृष्ठ- यवने दाम्न-श्रवसे महि नृम्णं आ अर्चत । अर्थ- २४८ हे (नर. मरुतः!) नेता वीर मरुतो! (यं) जिसे (पायध्ये ) तुम यचाते हो, (स: मयः) वह मनुष्य (सु-देव ) अत्यन्त तेजस्वी. ( स मह ) महत्तासे युक्त और (सु-वीरः) अच्छा पीर ( असति ) होता हे। (ते स्याम ) हम भी वैसे ही हों। २४९ ( स्तुवत अस्य ) स्तवन करनेवाले इस भक्त के यज्ञ में (भोजान् ) भोजन पाने के लिए (यामन् ) जाते समय (गाव न यवसे) गोऍ जिस तरह घासकी ओर जाती है वैसे ही, (रणन् । आनन्द पूर्वक गरजते हुए जानेवाले इन चारों को (स्तुहि ) प्रशंसा करो, ( यत.) क्योंकि वे (पूर्वानइय) पहले परिचित तथा ( कामिन.) प्रेमभरे (सखीन) मिनों के समान अपने सहायक है। उन्हें (हय) अपने समीप धुलाओ और (गिरा) अपनी वाणी से उनकी (अनु गृणीहि) सराहना करो। २५० (स्व-भानवे ) स्वयंप्रकाश और (पर्वत-च्युते) पहाडों को भी हिलानेवाले (मारताय शर्धाय) मरतों के पल के लिए (इमां पाच) इस अपनी वाणी को कविता को तुम (प्र भनज) भली भाँति सँवारो, अलकृत करो। (धर्म-स्तुभे) तेजस्वी वीरों की स्तुति करनेहारे, (दिवः पृष्ठ-यज्वने) दिव्य स्थान से पीछे से आकर यजन करनेवाले ओर (द्युम्न-श्रवसे) तेजस्वी यश पानेवाले वीरोंको (महि नृम्ण ) विपुल धन देकर (आ अर्चत ) उनकी पूजा करो। भावार्थ- २४८ जिन्हें वीरों का सरक्षण प्राप्त होवे, घे बडे तेजस्वी, महान तथा वीर होते हैं। हम उसी प्रकार बने। २४९ भक्त के यज्ञों में जात समय इन धोरों को बदा भारी हर्प होता है । चूंकि ये सब का हित चाहते है, इसलिए इनकी स्तुति सब को करनी चाहिए। २५० भर कारपूर्ण काव्य वीरों के वर्णन पर यनामो और उह धन देकर उनका सरकार करो। टिप्पणी- [२४९] (1) भोज - (भुज- पालनाम्यवहारयो भोग प्राप्त करनेहारा । (२) यामन् - पूजा, यज्ञ, गति, हर मन, चढाई, हमला । (३) अनु+गृ प्रोत्साहन देना, अनुग्रह करना, सराहना करना, उमग पढाना । [२५०] (1) यज् = देना, यज्ञ करना, सहायता प्रदान करना, पूजा-सगति-दानात्मक कार्य करना । (२) पृष्ठ = पीठ, पोल से। (३) धर्म क्षरणदीप्योः) प्रकाशमान, सेजस्वी, उष्ण । (४) पृष्ठ यज्वा = पीछे से अर्थात् किसी को भी विदित न हो, इस हग से सहायता देनेवाला । (५) नृम्र्ण (भू-मन) = मानवी मन, जो मानवी मन को परयस अपनी भोर खींच ले ऐसा धन । % । (२५१) न । वा । मरुतः । तावपाः । उदुन्यवः । वयाऽवृधः । अश्वऽयुज । परिऽजयः । सम् । विऽद्युतो ! दर्धति । वाशति । त्रितः। स्वरन्ति । आपः । अवना । परऽज्रयः ॥२॥ (२५२) विद्युत महसः । नरैः । अश्मऽदिद्यवः। वातऽस्विपः । मरुतः । पर्यतऽच्युतः । अब्दुऽया । चिन् । मुहूंः । आ। हादुनिऽवृतः । स्तनयंत्ऽअमाः । रभसाः । उत्ऽ- औजसः ॥३॥ अन्यय:--- २५१ ( है ) मरतः ! यः तविषाः उदन्ययः वयो-वृधः अश्व युजः प्र परि-जय त्रि-तः विद्युना संद्धति याराति परि-नय. आपः अपना स्वरन्ति । २५२ विद्युत् महसः नरः अश्म दिद्ययः यात त्विपः पर्वत-च्युतः हादुनि-वृतः स्तनयत्-धमाः रभसाः उत्-ओजसः मयतः महुः चित् आ अब्दया । अर्थ- २५१ हे (मरुतः!) वीर मरतो! (तविया) तुम्हारे बलवान, (उदन्-यव.) प्रजाके लिए जल देनेवाले, (वयो-वृध ) अन्नकी समृद्धि करनेहारे तथा ( अश्व-युजः । रथोंमें घोडे जोडनेवाले वीर जय (प्र परि-जयः) बहुत वेगसे चतुर्दिक घूमने लगते है और तुम्हारा (नि-तः ) तीनों ओर फैलनेवाला संघ (विद्युता सं दधति) तेजस्वी वजोंसे सुसज्ज होता हे और (पाशति ) शत्रुको चुनौती देता है, तय (परि-जयः) चारों ओर विजय देनेवाला (आप) जीवन, जल (अवना) पृथ्वी पर (स्वरन्ति) गर्जना करते हुए संचार करता है। २५२ (विद्युत्-महसः) विजली के समान बलवान्, (नरः) नेता, (अश्म दिद्यवः ) हथियारोके चमकने से तेजस्वी, (चात-त्विषः ) वायु के समान गतिशील एवं तेजस्वी, (पर्वत च्युतः ) पहाडों को हिलानेवाले, (हादुनि वृतः) वजोंसे युक्त, (स्तनयत्-अमा ) घोषणा करने की शक्तिसे युक्त, (रमसाः) धेगवान् (उत्-ओजमः ) अच्छे बलशाली वे (मरतः) वीर मरुत् (मुहुः चित्) वारंवार (आ अन्दया) चारों ओर जल देना चाहते है- शत्रुको अपना सा तेज दिसाते हैं। भाथि- २५१ परिध पीर मैनिक प्रजा के लिए जल की व्यवस्था करते है, अन्न को वृद्धिंगत करते हैं, रयों में घोरे जोदकर चारों भोर घूमकर समूधी हालत को सस्य ही देख लेते है और विजयी बन जाते है। बढे अच्छे प्रबंध से अपने हथियार समीप रख लेते है और यत्रतत्र विजयपूर्ण वायुमडल का सृजन करते है, तथा भूमंडल पर नहरों से पा भन्य किन्हीं उपार्यों से जल को चहुँ ओर पहुँचा देते हैं । २५९ तेजस्वी नेता शस्त्रास्त्री से मुसज्ञित बना पहाड़ों तक को विकषित फर देने की अपनी क्षमता को बढाते हैं और दुश्मन को भादान देकर अवश्य ही उन्हें अपना यह दर्शाते है । [ मेघविषयक अर्थ ] बिजली चमक रही है, ( अ ) भोले गिर रहे है, भारी तूफान हो रहा है, दामिनी. की दहाड मुनाई दे रही है, घायुवेग से जान पाता है कि, मानों पहाइ उह जायेंगे। इसके बाद मूसलाधार वपी हो प? भोर जर ही जल दीख पड़ता है। टिप्पणी- [२५१1 (1) उदन्यु ( उदन् + यु - उदर + योजना ) प्यासा, जल ढूंढनेवाला, पानी से युक्त होनेवाला । (२) बयस् = अन्न, शरीरप्रकृति, मल, भायुध्य । (३)नि-त (नि+ताय % सन्तान पानयोः ) तीनों भोर पंक्ति में जानेघाला (त्रिपु स्थानेषु तायमान -सायनभाध्य ) (४) तयिष = {गति-वृद्धि • हिंसा ) पल, मास्ति, सामर्थ्य । (५) परि-जय (जि जये) चारो दिशाशों मे पिजयी, चतुर्दिक गमन, प भार सलबळी । (१)भा = (आप् व्याप्ती) * गापकधाकाना, जल, जीवन ।

१०० । (२५३) वि । अक्तून् । रुद्राः । वि । अहानि । शिक्षसः। वि । अन्तरिक्षम् । वि । रजांसि । धूतयः। वि । यत् । अान् । अबंध । नावः । ईम् । यथा । वि। दुःऽगानि । मरुतः । न । अहं । रिष्यथ ॥ ४॥ (२५४) तत् । वीर्यम् । वः । मरुतः । महिऽत्वनम् । दीर्घम् । ततान । सूर्यः । न । योजनम् । एताः । न । यामै । अभीतऽशोचिषः । अनश्वऽदाम् । यत् । नि । अयातुन । गिरिम् ।। ५॥ अन्वयः- २५३ (हे) धूतय शिक्वसः रुद्राः मरुतः यत् अक्तून वि, अहानि वि, अन्तरिक्ष वि, रजासि वि अजथ, यथा नाय ई अज्ञान वि, दुर्गाणि चि, न अह रिप्यध। २५४ (हे) मरुत ! व. तत् योजनं वीर्य, सूर्यन, दीर्घ महित्वनं ततान, यत् यामे, एतान, अ-गृभीत-शोचिपः अन्-अश्व-दां गिरि नि अयातन । अर्थ- २५३ हे (धूतयः) शत्रुओं को हिलानेवाले, (शिवयसः) सामर्थ्ययुक्त एवं (रुद्राः मरुतः!) दुश्मनों को रलानेवाले वीर मरतो! ( यत् ) जय (अक्तून वि) रात्रियों में ( अहानि वि) दिनों में (अन्तरिक्षं वि) अन्तरिक्षमें से या (रजांसि पि अजथ) धूलिमय प्रदेशमैसे जाते हो, उस समय (यथा नायः ई । जैसे नोकाएँ समुन्दरमें से जाती है, वैसे ही तुम (अजान वि} विभिन्न प्रदेशों में से तथा (दुर्गाणि वि) बीहड स्थानों से भी जाते हो, तब तुम (न अह रिष्यथ ) बिलकुल थक न जाओ, चिना धकापट के यह सब कुछ हो जाय ऐसा करो। २५४ हे (मरुतः!) वीर मरुतो ! (चः तन् ) तुम्हारी घे (योजनं) आयोजनाएँ तथा (पीय ) शक्ति र सूर्यः न ) सूर्यवत् (दधेि महित्यनं ) अति विस्तृत (ततान) फैली हुई हैं. (यत् ) क्योंकि तुम (यामे) शत्रु पर किये जानेवाले आक्रमण के समय (एतान) कृष्णसारों के समान वेगवान यनफर (अ-गृभीत-शोचिषः) पकड़ने में असंभव प्रभाव से युक्त हो और (अन्-अध्य-दा) जहाँ पर घोडे पहुँच नही सस्ते, ऐसे (गिरि) पर्वतपर भी (नि अयातन) हमले चदाते हो। भावार्थ- २५३ जो पनिट चोर होते हैं, घे रात को, दिन में, अन्तरिक्ष में से या रोगिरतानमें से चले जाये हैं। ये समयल भूमि पा से या पीहर पहाडी जगह में से बराबर भागे पढते हो जाते हैं, पर कमी थक नहीं जाते। (इस भाँति शदल पर लगातार हमले करके घे विभयो बन जाते है।) २५४ वी की यनाई हुई पुछकी भायोजनाएं तथा उनकी संगटनशक्ति सचमुच यही अनूठी है। दुश्मनों पर धावा करते या वे जैसे समतल भूमि पर भाक्रमण करते हैं, उमी प्रकार वे शत्रु के दुर्ग पर भी चदाई करने में हिच. किचाते मही। टिप्पणी- (२५३ 1 (1)शिक्यस् = (श शकौ ) कुशल, युद्धिमान, सामध्ययुक्त । शिपय% कुशल, पुदि. मान, समर्थ 1(२) अत्र - खेत, समतल भूमि । (२५४ ] (1) योजन - जोदनेवासा, इकट्ठा होनेवाला, व्यवस्था, प्रयल, मायोजना । (२)मन्- अश्व-दा ( ) जहाँ पर घोडे पग नहीं भर देने, ऐसा स्थान, पहाडी गद, दुर्गम पर्वम् । (३) गिरि पर्वत, पार्वतीय दुर्ग, पाणी ।

30411. (२५५) अभ्राजि । शर्धः । मरुतः । यत् । अर्णसम् । मोपथ । वृक्षम् । कपनाऽइव। वेधसः । अर्ध । स्म ! नः । अरम॑तिम् । सऽजोपसः । चक्षुःऽइव । यन्तम् । अर्नु । नेपथ । सुऽगम् ॥६॥ (२५६) न । सः । जीयते । मरुतः । न । हन्यते । न । धति । न । व्यथते । न । रिष्यति । न । अस्य । रायः। उप । दस्यन्ति । न । ऊतयः। ऋपिम् । वा । यम् । राजानम् । या । सुसंदथ ॥७॥ अन्वयः- २५५ (हे ) वेधसः मरुतः ! शर्धः अभ्राजि, यत् कानाइव अर्णसं वृक्षं मोपथ, अध स्म (हे) स-जोपसः! चक्षुःश्व यन्तं सु-गं अ-रमति नः अनु नेपथ । २५६ (हे) मरतः ! यं शापि या राजानं या सुसूदथ सान जीयते, न हन्यते न नेधति, न व्यथते, न रिप्यति, अस्य रायः न उप दस्यन्ति, ऊतयः न । अर्थ- २५५ हे (वेधसः) कर्तृत्ववान (मरुतः!) वीर मरुतो ! तुम्हारा (शर्धः) बल (अभ्राजि) द्योत- भान हो चुका है, (यत् कपनाइव) क्योंकि प्रवल आँधी के समान (अर्णसं वृक्षं) सागवानी पेडों को भी तुम (मोपथ) तोडमरोड देते हो। (अध स्म) और हे (स-जोपसः!) हर्पित मनवाले वीरो! (चक्षुःइय) आँख जैसे ( यन्तं ) जानेवाले को (सुगं) अच्छा मार्ग दर्शाती है, वैसे ही (अरमति नः ) विना आराम लिए कार्य करनेवाले हमें (अनु नेपथ ) अनुकूल ढंगसे सीधी राहपर से ले चलो। २५६ हे (मरतः!) वीर मरुतो! (यं ऋषि या) जिस ऋपि को या (राजानं वा) जिस राजा को तुम अच्छे कार्य में (सुसूदा) प्रेरित करते हो, (सान जीयते) वह विजित नहीं बनता है, (न हन्यते) उसकी हत्या नहीं होती है, (न वेधति) नष्ट नहीं होता है. (न व्यथते) दुःखी नहीं बनता है और (न रिप्यति)क्षीण भी नहीं होता है। ( अस्य रायः) इसके धन (न उप दस्यन्ति ) नष्ट नहीं होते हैं तथा (ऊतयः) इनकी संरक्षक शक्तियाँ भी नहीं घटती। भावार्थ- २५५ कर्तृत्वशाली वीरों का तेज चमकता ही रहता है। जिस प्रकार प्रचंड भाँधी घटे पेड़ों को जडमूल से टखाड़ फेंक देती है, वैसे ही ये वीर शत्रुओं को हिलाकर गिरा देते हैं । नेत्र जैसे यात्री को सरल सहक पर से ले चलता है, ठीक उसी प्रकार ये वीर हम जैसे प्रबल पुरुषार्थी लोगों को सीधी राह से प्रगति की भोर ले चलें। २५६ जिसे वीरों की सहायता मिलती है, उसकी प्रगति सब प्रकार से होती है । टिप्पणी- [२५५] (1) अर्णस्- गतिमान, चंचल, जिसमें सक्षपली मची हुई हो ऐसा प्रवाह, जल, सागवान, समुद्र । (२)अ-रमति - भाराम न लेनेवाला, चारों ओर जानेवाला, भाज्ञाधारक, रममाण न होनेवाला । (३) मुप् (मुष् वण्डने मुध्यति, मोपति ) क्षति करना, वध करमा, तोडगा मरोडना। (४) कपना - कंपन, हिलाने- पाला, शंशावात, शक्ति, कृमि । (५) घेघस (विधा) = कर्ता, कर्तृत्ववान, विधाता। [२५६] (1) सूदू प्रेरणा देना, पकाना, फेंकना, उदेलना, पीसा देना, वध करना । (२)रिप - (रु) क्षोग होना। , . VIDYA १०२ (२५७) नियुत्वन्तः । ग्रामऽजितः । या । नरः। अर्यमणः । न । मरुतः । कवन्धिनः । पिन्नन्ति । उत्सम् । यत् । हुनासः । अखरन् । वि ! उन्दन्ति । पृथिवीम् । मध्यः। अन्धंसा ॥८॥ (२५८) प्रवत्वती । इयम् । पृथिवी । मुरुत्ऽभ्यः । प्रवत्वती । द्यौः । भवति । यत्ऽभ्यः । प्रमत्वतीः । पृथ्योः । अन्तरिक्ष्याः। प्रवत्वन्तः । पर्वताः । जीरऽदानवः ॥९॥ । . अन्यय २५७ यथा नियुत्यन्त ग्राम-जित नर क्वन्धिन मरुत , अर्यमण न, यत् इनास असरन् उत्स पिन्वन्ति पृथिवी मध्य अन्धसा वि उन्दन्ति । २५८ ( हे ) जीर-दानय ! इय पृथिवी मरुद्भ्य प्रयत्-पती, घो प्र यद्य प्रयत्-वती भवति अन्तरिक्ष्या पथ्या प्रयत् यती , पर्वता प्रवत्-चन्त । अर्थ- २७७ (यथा) जैसे (नियुत्वन्त ) घोडे समीप रखनेवाले, (ग्राम-जित ) दुश्मनोंके गॉव जीतने. चाले, (नर ) नेता (क्यन्धिन ) समीप जल रखनेवाले ( मरत ) वीर मरत् (अर्यमण.न) अर्यमाके समान (यत् इनास ) जव वेगसे जाते हे तव (अस्वरन् ) शब्द करते है, ( उत्स पिन्वन्ति ) जलकुण्डों यो परिपूर्ण बना रखते हैं ओर (पृथिवीं) भूमि पर (मध्य ) मिटास भरे (अन्धसा) अन्न की (घि उदन्ति) विशेष समृद्धि करते ह । २५८ हे (जारदानय 1) शीघ्र विजयी बननेवाले वीरो! (इयं पृथिवी) यह भूमि (मरभ्य ) चीर मरता थे लिए (गवत् वती) सरल मार्गोंसे युक्त बन जाती है, (यौ ) धुलोक भी (प्र यद्भ्य ) वेग पूर्वक जानेवाले इन वीरों के लिए (प्रयत वती) आसानीसे जानेयोग्य (भवति ) होता है, (अन्तरिक्ष्या पथ्या ) अतरार की सडक भी उनके लिए (प्रवत् वती ) सुगम यनती है और (पर्वता.) पहाड भी (प्रयत व त ) उनके लिए सरल पथवत् यने दीख पडते है । भावार्थ- २५७ घुसवार वीर दाभी के माम जीत लेते है, तथा वेगपूर्वय दुश्मनों पर धावा करते है । उस समय घे घरी भारी घोषणा करते हैं और पल कुष्ट पाil से भरकर भमक प मधुरिमामय भसजर की समृद्धि की यवतन्न विपुर ता कर देते हैं। २५८ धोरों के लिए पृथ्वी, पर्वत, अन्तरिक्ष एव भामाशप सभी सुसाध्य एवं सुगम प्रतीत होते हैं। (वीरों के लिए कोई भी जगह बीहट या दुर्गम नहीं जान पटती है।) टिप्पणी- [२७] (1) नियुत् - घोटा, पाr (.) अन्धस् = अन्न ( भन्-धस् ) प्राण का धारण करने माला भय । (३) पयन्धिन् = नसकुर या पानी की बोतलें ( Water-bottles ) समीप रखनेवाले। [५८] (1) प्रयम् - मुगम मार्ग, स्मल राह, ऊँचाई, गाल ।

१०३ .. (२५९) यत् । मरुतः । सऽभरसः । स्वाऽनरः । सूर्य । उत्ऽईते । मर्दश । दिवः । नरः । न । यः । अश्वोः । श्रथयन्त । अहं । सिस्रतः। सद्यः । अस्य । अपनः । पारम् । अक्षुथ ॥१०॥ (२६०) असेषु । यः । ऋष्टयः। पुऽसु । खादयः। वक्षःसु । रुक्माः। मरुतः । रथे । शुभैः। अनिऽभ्राजसः । विद्युतः । गर्भस्त्योः। शिप्राः । शीर्षऽसे । विऽतताः । हिरण्ययीः ॥११॥ (२६१) तम् । नाकम् । अर्थः । अग्रभीतऽशोचिपम् । हशत् । पिप्पलम् । मरुतः। वि। धुनुथ । सम् । अच्यन्त । वृजनौ । अविविपन्त । यत् । सरन्ति । घोपम् । विऽततम् । ऋतुऽयवः ॥१२॥ अन्वयः- २५९ (हे ) मरुतः ! स-भरसः स्वर-नरः सूर्य उदिते मदथ, (हे) दिव नरः ! यत् वः सिम्त. अश्यान अह श्रथयन्त, सद्य अस्य अध्यन पारं अश्नुथ । २६० (हे) रथे शुभः मरतः ! वः अंसेपु ऋष्टयः, पत्सु खादयः, वक्षःसु रक्माः, गभस्त्योः अग्नि-भ्राजसः विद्युतः, शीर्पसु हिरण्ययीः वितताः शिप्राः। २६१ (हे) अर्य: मरुतः! तं अ-गृभीत शोचिपं ना रशत् पिप्पलं वि.धूनुथ, सृजना सं अच्यन्त अतिविपन्त, यत् ऋत ययः विततं घोपं स्वरन्ति । अर्थ- २५९ हे (गस्त !) वीर मरतो' (स भरसः) समान रूपस कार्यका योझ उठानेवाले, मानों (स्वरः नरः) स्वर्गके नेता तुम (सूर्य उदिते ) सूर्यके उदय होनेपर (मदथ ) हर्पित होते हो। हे (दिय. नरः!) तेजस्वी नेता एवं वीरो! (यत्) जस्तक (वः सिनतः अश्याः) तुम्हारे दौडनेवाले घोडे (न अह अथयन्त ) तनिक भी नहीं थक गये है, तभी तक (सद्यः) तुरन्तही नुम (अस्य अध्वनः पारं) इस मार्ग के अन्त (अनुथ) पहुँच जाओ। २६० है ( रथे शुभः मरुतः!) रथोंमे सुहानेवाले वीर मरुतो ! (यः अंसेपु) तुम्हारे कंधोपर (प्रष्टया ) भाले विराजमान हे, (पत्सु खादयः) पैरों में फाडे, (वक्षासु रस्माः) उरोभा. गर्दै स्वर्णमुद्राओंके हार, (गभस्त्योः) भुजाओं पर (अग्नि-भ्राजस. विद्युतः ) अग्निवत् चमकीले यन्त्र और (शार्पसु ) माथे पर (हिरण्ययीः वितताः शिप्राः ) सुवर्णके भव्य शिरस्त्राण रसे हुए है। २६१ हे (अर्यः मरता) पूजनीय वीर मरतो! (तं अ-गृभीत-शोचिप) उस अप्रतिहत तेजस्वी (नाक) आकाशमेसे (रुशत्) तेजस्वी (पिप्पलं) जलको (वि धूनुथ) विशेष हिलाओ, वर्षा करो। उसके लिए तुम (वृजना) अपने यलों का (सं अच्यन्त ) संगठन करके अपने (अतिविपन्त ) तेज वढाओ; (यत्) क्योंकि (ऋत-यवः) पानी चाहनेवाले लोग (विततं) विस्तृत (घोपं स्वरन्ति ) बोपणा करके कहते है कि हमें जल चाहिए। भावार्थ- २५९ सभी कामो का भार वीर सैनिक सम भावसे बराबर बाँट कर उठाते है । दिनका प्रारम्भ होने पर (भर्थात् काम शुरु करना मुगम होता है, इसलिए) ये भानन्दित होते हैं। ऐसे उत्साही वीर घोडोंके थक जाने के पहले ही भपने गन्तव्यस्थान पर पहुँच जायें । २६० इस मंत्र मे मरुतों के जिस पहनाये का यखान किया है, यह (Afalitary uniform )ही है। २६१ अपने दल का संगठन करके तेजस्विता बढ़ाओ । वर्षाका जल इकट्ठा करके सबको वह घाँद दो, क्योंकि जनता जल पर्याप्त मात्रा में पाने के लिए अतीव लालायित है। टिप्पणी- [२५९] (१) भर - भार, घोझ, आकृति, समूह, होने वारा। स-भरस् = सम भाव से कारभार उठानेवाला । [यत् न श्रथयन्त, सद्यःअध्वना पारं अश्नुथ जब लौ अपने भवयय थक नहीं जाते, तभी तक मानव अपने आदर्श या ध्येयको पहुँचनेका प्रयत्न करें।] [२६०1 () हिरण्ययीः वितताः शिमा सुवर्णकी येल पतियों के किनारयादे साफै। [२६](1) प्रात-यु - यश करने की इच्छा करनेवाला, सत्यकी-गरकी चाह रखनेवाला। (२) पिप्पल पानी, पीपल का पेड, इन्द्रियभोग। (३) वितत = विस्तव, ससिद्ध, विरल, फैला हुभा । । , (२६२) युप्माऽदनस्य । मरुतः । विश्चतसः। ग़यः । स्याम । रथ्यः । वयस्वतः । न । यः। युच्छति । तिष्यः । यथा । दिवः । अस्मे इति । सन्त । मुरुतः । सहस्रिणम् ॥१३॥ (२६३) यूपम् । रयिम् । मरुतः । स्पाहऽौरम् । युयम् । ऋपिम् । अवथ । सामऽवियम् । युयम् । अन्तम् । भरताय । वार्जम् । यूयम् । पथ । राजानम् । श्रुष्टिमन्तम् ॥१४॥ (२६४) तत् । यः। यामि । द्रविणम्। सद्यःऽऊतयः। येन। स्वः । ना तनाम । नृन् । अभि । इदम् । सु । मे। मरुतः । इयंत । वर्चः। यस्य । तरेम । तरसा। शतम्। हिमां ॥१५॥ अन्वयः- २६२ (हे ) वि-चेतसः मरतः! युप्मा-दत्तस्य ययस् चतःरायः रथ्यः स्याम, (हे) मरुतः ! अस्मे यः, दिवः तिप्यः यथा, न युच्छति सहस्रिणं रररत । २६३ (हे) मरुतः ! यूयं स्पाह-वीरं रयिं, यूये साम-विमं ऋर्षि अवथ, यूयं भरताय अर्वन्तं वाजं, यूये राजान थुष्टि मन्तं धत्थ । २६४ (हे) सध. ऊतयः ! यः तत् द्रविणं यामि, येन नून स्वः न अभि ततनाम, (हे) मरुतः । इदं मे सु-बचः हर्यत, यस्य तरसा शतं हिमास्तरेम। अर्थ- २६२ हे ( विचितसा मरुतः!) विशेष ज्ञानी वीर मरुतो! (युप्मा-दत्तस्य) तुम्हारे दिये हुए (ययस्-वतः) अन्नसे युक्त होकर (रायः) ऐश्वर्य के (रथ्यः) रथ भरके लानेवाले हम (स्याम) हो। हे (मरुतः!) वीर मरुतो! (अस्मे) हमें (यः) वह (दिवः तिप्यः यथा) आकाश में विद्यमान नक्षत्र के समान (न युच्छति ) न नष्ट होनेवाला (सहक्षिणं) हजारों किस्म का धन देकर (ररन्त ) संतुष्ट करो। २६३ हे (मरुतः!) वीर मरुतो ! (यूयं ) तुम (स्पाई-वीरं ) स्पृहणीय चोरों से युक्त (रवि)धन का संरक्षण करते हो। ( यूयं साम विनं) तुम शांतिप्रधान या सामगायक विद्वान (कार्पि यवथ ) सपि फा रक्षण करते हो; (यूयं ) तुम (भरताय) जनता का भरणपोषण करनेवाले के लिए (अर्वन्तं वाज) घोडे तथा अन्न देते हो और (यूयं ) तुम (राजानं) नरेश को (श्रुष्टि-मन्त) वैभवयुक्त करके उसे (धरथ ) धारित एवं पुष्ट करते हो २६४ हे (सद्य ऊतयः!) तुरन्त संरक्षण करनेवाले वीरो! (वः तत्) तुम्हारे उस (दधिणं यामि ) झव्य की हम इच्छा करते हैं । (येन ) जिससे हम (नन् ) सभी लोगों को (स्थान) मफाश के समान (अभि ततनाम) दान दे सके। हे (मरुतः!) वीर मरुतो ! (इदं मे सु-स्वः) यह मेरा अच्छा वचन (हर्यत ) स्वीकार कर लो। (यस्य तरसा) जिसके चलसे हम (शतं हिमाः) सौ हेमन्तऋतु, सौ वर्ष (तरेम) दुःखमें से तैरकर पार पहुँच सकें, जीवित रह सकें। भावार्थ-२६२ सहसों प्रकारका धन और अन्न हमें प्राप्त हो। वह धन आकाशके नक्षत्रकीयाई अक्षय एवं अटल रहे। २६३ वीर पुरष शूरतायुफ धन का वितरण करके ज्ञानी तत्व का पोषण करके प्रज्ञापालनतरपा भूपाल का पालनपोषण एवं संवर्धन करते हैं। २६४ हे संरक्षणकर्ता वीरो ! हमें प्रचुर धन दो ताकि हम उसे सब लोगों में वोट दें। मैं अपना यह बचन दे रहा हूँ। इसी भाँति करते हम सौ वर्षों तक दुःख हटाकर जीवनयामा वितायें । टिप्पणी-२६३] (1) शुष्टि सुननेवाला, सहायता, वर, वैभव, सुस्त । ३२६४]{1) स्वर् = स्वर्ग, जल, सूर्यकिरण, प्रकाश । (२) हयं (गतिकारयोः) = गति करना, इच्छा करना । (३) यामि (याचे )= याचना करता हूँ, पाहता हूँ। (४) स्वान%D (स्वर् न, सणे) सूर्यप्रकारा. गा, जैसे सूर्य अपने किरणों को समान रूप से घाँट देता है वैसे । शतं हिमाः तरेम = पश्येम शरदः शम् । जीवेम शरदः शतम् ॥ (वा. यज्ञ. ३६८२३)] 1 (र० ॥१५-१०) (२६५) प्रऽयज्यवः । मरुतः । भ्राज॑ऽऋष्टयः। बृहत् । वयः । दधिरे । रुक्मऽव॑क्षसः । ईयन्ते । अश्वैः । सुऽयमभिः । आशुऽभिः। शुभम् । याताम् । अनु । रथाः । अवृत्सत ॥१॥ (२६६) स्वयम् । दधिध्ये । तविपीम् । यथा । विद। वृहत् । महान्तः । उर्विया । वि। राजथ ! उत । अन्तरिक्षम् । ममिरे । वि । ओज॑सा । शुभम् । याताम् । अर्नु । राः । अनुत्सत ॥२॥ अन्वयः- २६५ प्र-यज्यव भ्राजत्-ऋष्टय रुपम-वक्षस मरन वृहत् क्या दधिरे, सु यमेभिः आमुभिः अध्यैः ईयन्ते, रथाः शुभं यातां अनु अवृत्सत । २६६ यथा विद म्वयं तविषी दधिध्वे, महान्तः उर्षिया घृहत् वि राजथ, उत ओजसा अन्तरिक्ष वि ममिरे, रथाः शुभं यातां अनु अत्सत । अर्थ- २६५ (प्र-यज्यवः ) विशेष यजनीय कर्म करनहारे (भाजत्-ऋष्टय ) तेजस्वी हथियारों से युक्त तथा (रुकम-वक्षसः मरुत.) यक्षास्थलपर स्वर्णहार धारण करनेद्वारे वीर मरुत्, (वृहत् पयः दधिरे) वडा भारी यल धारण करते है । (सु-यमेभि ) भली भाँति नियमित होनेवाले, (आशुभिः) वेगवान (अश्वः) घोडों के साथ, वे ( ईयन्ते) चले जाते हैं। उनके ( रथाः ) रथ (शुभं यातां) लोककल्याण के लिए जाते समय उन्हीं के ( अनु अवृत्सत ) पीछे चले जाते है। २६६ ( यथा) चूँकि तुम (विद ) बहुत शान प्राप्त करते हो और (स्वयं तविषीं दधिचे) स्वयमेय विशेष यल भी धारण करते हो, तुम (महान्त ) बड हो और ( उर्विया) मातृभूमि का हित करने की लालसा से ( वृहत् वि राजथ ) विशेष रूपसे सुशोभित होते हो। (उत) और ( ओजसा) अपने यल से, ( अन्तरिक्षं वि ममिरे ) अन्तरिक्षको भी व्याप्त कर डालते हो, ( रथा.) इनके रथ (गुमं यातां) लोकरल्याण के लिए जाते समय, ( अनु अवृत्सत ) इन्हीं का अनुसरण करते है। भावार्थ- २६५ अच्छे कर्म करने हारे, तेजस्वी भायुध धारण करनेवाले, आभूषणों से सुशोभित वीर अपने यह को मत्सविक से मरते हैं और पल अपर आरूड होकर जनता का हल करने के लिए सदस्पर श करून शुरू करते हैं। २६६ वीर पुरुष ज्ञान प्राप्त करके अपना यल बढाकर मातृभूमि का यश बढाने के लिए प्रयत्न करते है। भपने इस अदम्य अध्यवसायों के फर स्वरूप घे अश्यन्त मुशोभित दीख पड़ते हैं और अपनी ऊँची उडानों से समूचा अन्तरिक्ष भी ज्यात कर डालते है। टिप्पणी- [२६५ ] (1) वयस्- भस, यल, सामर्थ्य, तारण्य । [२६६] (1) उर्य- (हिंसायाम्) धध करना । ( उर्वी)= भूमि, मातृभूमि । ( उर्विया) = मातृभूमिये बारे में शुभ बुद्धि, पृथ्वीविषयक विस्तृत भावना । (२) मा (माने)- गिनना, भन्नभूत हो जाना, व्याप्त होना । मरत (हिं.)१४ (२६७) साकम् । जाताः । सुऽभ्यः । साकम् । उक्षिताः । श्रिये । चित् । आ । ग्रऽतरम् । ववधुः । नरः । विsरोकिणः । सूर्यस्य इव । रश्मयः । शुभम् । याताम् । अर्नु । स्थाः । अवृत्सत ॥३॥ (२६८) आऽभूपेण्यम् । यः । मरुतः । महिऽत्यनम् । दिदृक्षेण्यम् । सूर्यस्यऽइव । चक्षणम् । तो इति । अस्मान् । अमृतऽस्थे । दुधातन । शुभम् । याताम् । अर्नु । रथाः । अवृत्सत ॥ ४ ॥ अन्यया- २६७ साकं जाताः सु-स्वः साकं उक्षिताः नरः श्रिये चित् प्र-तरं आ वधः, सूर्यस्याय रश्मयः चि-रोकिणः, स्थाः शुभं यातां अनु अवृत्सत । २६८ (हे ) मरुतः ! वः महित्वनै आ-भूपेण्यं सूर्यस्यइव वक्षणं दिक्षेण्यं, उत् अस्मान अ- मृतत्वे यातना रथाः शुभं यातां अनु अवृत्सत । अर्थ- २६७ जो ( साकं आताः ) एक ही समय प्रकट होनेवाले, (सुभ्यः) अच्छी प्रकार उत्पन्न हुए, (साकं उक्षिना । संघ करके वलसंपन्न होनेवाले (नरः) नेता घे धीर, (श्रिये चित्) वैभय पाने के लिए हा (प्रतरं ) अधिकाधिक (आ ववृधुः ) वढते हैं, वे (सूर्यस्यइव रश्मयः ) सूर्यकिरणों के समान (वि-रोषिणः ) विशेष तंजस्वी है । (रथा शुभं ... ...) [मंत्र २६५ वाँ देखिए । २६८ हे ( मरुतः । ) वीर मरुतो! ( यः महित्वनं ) तुम्हारा वडप्पन (आ-भूपेण्यं ) सभी प्रकार से शोभायमान ह भार वह (सूर्यम्यस्य चक्षणं) सूर्य के दृश्य समान (दिक्षेण्यं) दर्शनीय है । (उत) इसीलिप. तुम (अस्मान् अ-मृतत्वे दधातन ) हमें अमरपन को पहुँचाओ। ( रथाः शुभं यातां०) [ मंत्र २६५ वाँ देखिए। भावार्थ- २६७ ये वीर शत्रुदलपर आक्रमण करते समय एक ही समय प्रक्ट होते हैं, अपना उत्तम जीवन बिताते है, संघ बनाकर अपने बल की वृद्धि करते हैं और सदैव यश के लिए ही सचेष्ट रहा काते हैं। ये सूर्यकिरणवत् तेजस्वी यन प्रकाशमान होते हैं। २६० हे वीओ! नुम्हारा बढापन सचमुच वर्णनीय है । तुम सूर्यवत् नेजस्वी हो, इसीलिए हमें भ-मृतम स्थान दो। %D टिप्पणी- [२६७] (0) वि-रोकिन् -, (रोक = तेजस्विता) विशेष तेजस्वी। (२)सु-स्वः- (सु+भू) अच्छी तरह उपस पथपर से चरनेवाल।। सुन्धन् - चमकीला, तेजस्वी । (३) उक्ष = सींचना, पलयान होना । (४)जातः = प्रकट पैदा हुआ। [२६८(१)चक्षणं रूप, नया दर्शन, श्य ।

अवृत्सत ॥६॥ १०७ (२६९) उत् । ईरयथ । मरुतः । समुद्रतः । यूयम् । वृष्टिम् । वर्पयथ । पुरीषिणः । न । वः । दुस्राः । उप | दस्यन्ति । धेनवः । शुभम् । याताम् । अनु । राः । अवत्सत ॥५॥ (२७०) यत् । अश्वांन् । धूःऽसु । पृपतीः । अयुग्ध्वम् । हिरण्ययान् । प्रति । अत्कान् । अमुग्ध्वम् । विश्वाः । इत् । स्पृधः । मरुतः। वि। अस्यथ । शुभम् । याताम् । अनु । रथाः । (२७१) न ! पर्वताः । न । नयः । वरन्त । वः। यत्रं । अचिंध्वम् । मरुतः । गच्छेथ । इत् । ॐ इति । तत् । उत । द्यावापृथिवी इति । याथन । परि । शुभम् । याताम् । अनु । स्थाः। अवृत्सत ॥७॥ अन्वयः- २६९ (हे) पुरीषिणः मरुतः यूयं समुद्रतः उत् ईरयथ, वृष्टिं वर्षयथ, ( है ) दमाः धेनयः न उप दस्यन्ति, रथाः शुभं यातां अनु अवृत्सत । २७० (हे) मरुतः यत् पृषतीः अश्वान् धूर्षु अयुग्ध्वं, हिरण्ययान् भत्कान् प्रति अमुग्ध, विभ्याः इत् स्पृधः चि अस्यथ, रथाः शुभ यातां अनु अवृत्सत । २७१ (हे) मरुतः! वः पर्वताः न परन्त, नद्यः न, यत्र अचिध्यं तत् गच्छथ इत् उ, उन धावा-पृथिवी परि याथन, रथाः शुभं यातां अनु अवृत्मत। अर्थ- २६९ हे (पुरीपिणः मरतः ! ) जलसे युक्त वीर मरुतो !(यूयं ) तुम (समुद्रतः) समुद्र के जल को (उत् ईरयथ) ऊपर प्रेरणा देते हो और (वृष्टिं वर्पयथ) चर्पा का प्रारम्भ करते हो। हे (दम्राः!) शत्रुको विनष्ट करनेवाले वीरो! (वः धेनवः) तुम्हारी गोप. (न उप दस्थलि ) क्षीण नहीं होती है। (रथाःशुभं०) [२६५ वा मंत्र देखिए। २७० हे ( मरुतः !) वीर मरुतो ! ( यत् पृपतीः अश्यान ) जय धन्धेवाले घोडों को तुम, (धूपु) रथों के अग्रभाग में जोड देते हो और (हिरण्ययान् अत्फान् ) स्वर्णमय कवच (प्रति अमुग्ध्वं ) हर कोई पहनते हो, तब (विश्वाः इत् ) सभी (स्पृधः) चढाऊपरी करनेवाले दुश्मनोंको तुम (वि अस्यथ) विभिन्न प्रकारों से तितरवितर कर देते हो। ( रथाः शुभं० ) [मंग २६५ वाँ देखिए । ] २७१ हे ( मरुतः !) वीर मरता! ( वः ) तुम्हारे मार्ग में (पर्वताः) पहाड (न चरन्त ) रुकावट न डालें, (नद्यः न ) नदियाँ भी रोडे न भटकायें । (यत्र ) जिधर (अविध्य ) जाने की इच्छा हो, तस्) उधर ( गच्छथ इत् उ) जाओ, (उत ) और ( द्यावा पृथिवी ) भूमंडल एवं धुलोक में (परि याथन) चारों ओर घूमो । (रथाः शुभं . )[मंत्र २६५ वाँ देखिए। भावार्थ- २६९ समुद्र में विद्यमान जल को ये मम्त पर आकाश में उठा ले जाते हैं और यहाँ से फिर वर्षा के द्वारा उसे भूमिपर पहुंचा देते हैं । इस वर्षा के कारण गौओं का पोपग होता है। २७. वीर सुन्दर दिखाई देने वाले भवों को रथ में जोडकर कवचधारी यन येठने हैं और मारे शत्रुओं को मार भगा देते हैं। २७१ प तथा नदियों के कारण वो के पथ में कोई रुकावट खडी न होने पाय । विजयी पनने के लिए जिधर भी जाना उन्हें पसंद हो, उधर पिना किसी सिम के चले जाएँ और सर्वत्र विजय का अंदा पहराय । टिप्पणी- [२६९] (1) दन्नः- जंगली. उग्र। (दम- फेकना, नाश करना, जीतना, प्रातमान होना।) कनेवाला, पाविनायक, विजयशील, प्रकाशमान । (२) पुरीप3 जल ( निघन्टु ), मल, बिष्टः । (परि-इप) नगी में जो इट है घर शरीर में जो इट है प६ । [२७०] (१) अत्कः- (अत् सावायगगने ) - यात्री, अवयर, जल, त्रिगुत्, पर, कयय । (२) मति-मुप - पहनना, शरीरपर धारण करना ।

अन्वय - । (२७२) यत् । पूर्व्यम् । मरुतः। यत् । च । नूतनम् । यत् । उद्यते । वसवः । यत् । च । शस्यते । विश्वस्य । तस्य । भवथ । नर्वेदसः। शुभम् । याताम् । अर्नु । रथाः । अवृत्सत ॥८॥ (२७३) मुळत । नः । मरुतः । मा । वधिष्टन । असभ्यम् । शर्म । बहुलम् । वि । यन्तन । अधि । स्तोत्रस्य । सख्यस्य । गातन । शुभम् । याताम् । अनु । रथाः । अवृत्सत ॥९॥ (२७४) यूयम् । असान् । नयत । वस्यः । अच्छे । निः । अंतिऽभ्यः । मरुतः । गुणानाः। जुपर्धम् । नः । हव्यऽदौतिम् । यजत्राः। वयम् । स्याम । पतयः । रयीणाम् ॥१०॥ ०७२ (हे) वसव मरत ! यत् पूर्य, यत् च नूतन, यत् उद्यते, यत् च शस्यते, तस्य विश्वस्य नवेदस भवथ रथा शुभ याता अनु अवृत्सत । २७३ ( हे ) मरत न मृळत, मा वधिटन, अस्मभ्य बहुल शर्म वि यन्तन, स्तोत्रस्य सरयस्य अधि गातन, रथा. शुभ याता अनु अघृत्सत । २७४ (हे) गृणाना. मस्त यूय अस्मान् अहतिभ्य नि.यस्य अच्छ नयत, (हे) यजत्रा ! न हव्य दाति जुपध्य वय रयीणा पतय स्याम ! अर्थ- २७२ हे ( वसव मरत !) लोगों को बसानेहारे पीरमरुतो ! ( यत् पूज्य ) जो पुरातन, पुराना है ( यत् च नूतन ) और जो नया है ( यत् उद्यते ) जो उत्कृष्ट है और ( यत् च शस्यते ) जो प्रशसित होता है (तस्य विश्वस्य ) उस समाके तुम (नवेदस भवथ) जाननेवाले होओ। (रथा गुम०) [मत्र २६५ वॉ देखिए।] २७३ हे (मरत !) वीर मरतो ! (न मृळत ) हम सुखी बनाओ. (मा चधिष्टन ) हमें न मार डालो ( अस्मभ्य ) हमें ( यहुल शर्म वि यन्तन) बहुत सारा सुख दे दो और हमारी (स्तोत्रस्य सरयस्य) स्तुतियोग्य मित्रता को तुम ( अधि गातन ) जान लो । (रथा शुभ० ) [ मत्र २६५ वॉ देखिए । २७४ हे (गृणाना मरत !) प्रशसनीय चीर मरतो ! (यूय) तुम (अस्मान् अहतिभ्य नि.) हमें दुर्दशासे दूर हटाकर (वस्य अच्छ) बसने के लिए योग्य जगह की ओर (नयत ) ले चलो। हे (यजत्रा ) यज्ञ करनेवाले वीरो' (न हव्य-दाति) हमारे दिये हुए हविप्यानका (जुपच) सेवन करो। (चय ) हम (रयीणा पतय स्याम) विभिन्न प्रकारके धनों के स्वामी या अधिपति बन जायें, ऐसा करो। भावार्थ- २७२ पुराना हो या नया, तो कुछ भी ऊँचा या वर्णनीय ध्येय है, उसे वीर जान लें और उसके लिए सचेष्ट रहें। २७३ हमें मुख, भानन्द ण्व कल्याण प्राप्त हो ऐसा करो । जिम से हमारी क्षीि हो नाप ऐसा कुछ भी न करो और हम से मित्रतापूर्ण व्यवहार रखो। ५७४ हमें वीर पुरप पापों से बचाएँ भौर मुखपूर्वक जहाँ निवास कर सकें एसे स्थान तक हमें पहुंचा दें। हम तो कुछ भी कराया प्रदान करते हैं उसे स्वीकार कर हमें भाँति भाँति के धन मिले, ऐसा करना उन्हें उचित है। टिप्पणी- [२७] (1) यत उद्यत - ( उत् यते = अर्ध प्राप्यत) (सायणभाष्य ) ऊँचा प्राप्तम्य है । (२) नवेदस = नवदस्%3 नभानपान वेदा. '- पा. सू. ६३ ७५ द्वारा इस पद की सिदि की है, पर भर्थ निषे धात्मक दीख पडसा है। मायणाचायने ' जाननेवाला ' ऐसा भर्य किया है। क ११६५१६ में ' नवेदा । और वहाँपर भी ( सा० मा० मे ) वही अर्ध किया है। अनुत्तम ' (मरसे उत्तम) पदरे समान ही 'नवेदा' पदका अध बहुमोहि समास से ' अधिक झानी' यो करना चाहिए । [-७४] (1) महति = दान, पाप, चिंता, कट, दुःख, भापति, बीमारी | । अन्वय (१०५/५६ । १-१) (२७५) अमै । शर्धन्तम् । आ । गणम् । पिष्टम् । रुक्मभिः । अञ्जिभिः । विशः । अद्य । मरुताम् । अ । द्वये । दिवः । चित् । रोचनात् । अधि ॥१॥ (२७६) यथा । चित् । मन्यसे । हृदा । तत् । इत् । मे । जग्मुः । आऽशसः । ये । ते । नेदिष्ठम् । हरेनानि । आऽगमन् । तान् । वर्ध । भीमऽसदृशः ॥२॥ (२७७) मी व्हुमतीऽइव । पृथिवी । परोऽहता। मदन्ती । एति । अस्मत् । आ । मक्षः । न । वः । मरुतः । शिमीनान् । अम: 1 दुधः । गौऽईर । भीमऽयुः ॥३॥ २७५ (हे) अग! अव शर्धन्त रस्मेभि अथिभि पिट गण मरता विश रोचनात् दिव अघि अव आये। २७६ हुदा यथा चित् मन्यसे तत् इत् आ शस मे जग्मु ये ते हयनानि नेदिष्ट आगमन तान् भीम-सदृश वर्ध २७७ मीळ्हुप्मतीय पृथिवी पर-अ-हता मदन्ती अस्मत् मा एति, (हे) मस्त ! व अम. ऋक्ष न शिमी वान् दु ध्र गौ इव भीम-यु । अर्थ- २७५ हे (अग्ने') अग्ने' (भद्य) आज दिन ( शर्धत ) शत्रुविनाशफ, (रुक्मभिः अञ्जिभि ) स्वर्ण हारों एव वीरों के आभूषणों से (पिष्ट) अलस्त (गण ) धीर मरुतों क समुदाय को तया ( मरता विश ) भरता के प्रजाजनों को (रोचनात् दिय अधि ) प्रकाशमय धुलोक से ( अव आ हये ) म नीचे २७२ हे अग्ने तू उन्ह (हदा यथा चित्) अत करणपूर्वक जेसे पूज्य (मन्यसे ) समझता है, (तत् इत ) उसी प्रकार वे (आ-शस ) चतुर्दिम् शत्रुदल की धजिया उडानेवाले वीर (मे जग्मुः) मरे निकट आ चुके ह (ये) जो (ते) तुम्हारे (हवनानि ) हवना के (नेदिष्ट ) समीप (आगमन् ) आ गये, ( तान् भीम-सदृश ) उन उग्र-स्वरूपी वीरों का (वर्ध) तू वढा द। २७७ (मीन्हुप्मतीइय) उदार तथा (पर अहता) शनले पराभूत न हई ओर इसीलिए (मदन्ती) हर्पित हुई वीरसेना (अस्मन् मा एति ) हमारे निकट आ रही है । हे (मरत !) धीर मरतो! (4 अम) तुम्हारा वल (माक्ष न ) सप्तर्षिया क समान (शिमी-वान्) कार्यक्षम तथा (टु ध्र ) शत्रुओं से घिरे जाने में अशक्य है और (गो इव) र के समान वह (भीम-यु ) भयकर ढगसे सामर्थ्यवान है। भावार्थ- २७५ जनता के हित के लिए हम अपने बीच वीरों को बुलात हैं । व वीर सैनिक इधर भा जाय और मच्छी रक्षा के द्वारा सर को सुखी बना द। २७२ पूज्य वीरों को अन्न भादि कर उनका यथावत् मादरसाकार करें, तथा जिससे उनकी वृद्धि हो ऐसे कार्य सम्पन्न करने चाहिए। २७७ शिकस्त न खायी हुई उमग भरी वीर सेना हम महायता पहुँचाने के लिए भा रही है । वह प्रबद है इसीलिए शत्रु उसे घर नहीं सकते हैं और इसे ५ख रने से दर्शकों के मन में तनिक भय का सचार होता है। टिप्पणी- [२७] (1) पिy= (पिश्-तजस्वी करना व्यवस्थिा करना भरकृत करना भाकार दना) विभूषित, सजाया हुभा । (२७२] (1) आ-शस्- (शस्-हिमायाम् ) शनुमा वध, क्त्तर । [२७७] (1) मीळ्हुप्मती-(मीदवस मती ) उदार, दातृत्वयुक्त, स्नेहयुक। (२) शिमी-वान् = (शिमी = प्रयत्न उघम, कर्म) प्रबल, प्रयत्नशील, समर्थ । (३) मक्ष = विनाशक, घाता, सप्तपि, सर्वोत्तम, अलि (मायण)। धुलाता हूँ। - अन्वय (२७८) नि । ये । रिणन्ति । ओज॑सा । वृथा । गावः । न । दुःऽधुरः । अश्मानम् । चित् । सूर्यम् । पर्वतम् । गिरिम् । प्र । च्यवन्ति । यामऽभिः ॥४॥ (२७९) उत् । तिष्ठ । नूनम् । एपाम् । स्तोमैः । सम्ऽऽक्षितानाम् | मुरुताम् । पुरुऽतमम् । अपूर्व्यम् । गाम् । सर्गम्ऽडव ! हुये ॥५॥ (२८०) युग्ध्वम् । हि । अरुपीः । रथे । युग्ध्वम् । रथेषु । रोहितः । युट्ग्यम् । हरी इति । अजिरा । धुरि । बोहवे । वर्हिष्ठा । धुरि । वोळ्हवे ॥६॥ २७८ दुर-धुर गाय न ये योजसा घृथा निरिणन्ति यामभिः अश्मान गिरि स्वर-यं पर्यतं वित् प्र च्यवयन्ति । २७९ उत् तिष्ठ, नूनं स्तोमै. सम्-उक्षितानां एषां मरतां पुर-तमं अ-पूयं गयां सगैश्य हये। २८० रथे हि अरपी: युग्घ्यं, रथेपु रोहितः युगचं, अजिरा वहिष्ठा हरी बोलवे धुरि बोलहवे धुरि युद्दग्ध्वं। अर्थ- २७८ (दुर धुरः गावः न ) जीर्ण धुराका नाश जैसे वेल करते है, उसी प्रकार (ये) जो धीर (ओजसा) अपनी सामर्थ्य से शत्रुओं का (वृथा) आसानी से विनाश करते हैं, वे (यामभिः) हमलों से (अदमान गिरि) पथरीले पहाड़ों को नधा (स्वर-यं पर्वतं चित्) आकाशचुम्बी पहाडों को भी (प्रच्यययन्ति ) म्धानभ्रष्ट कर देते है। २७९ (उत् तिष्ठ) उठो, ( नूनं) सचमुच (स्तोमेः) स्तोत्रों से (सम्-उक्षितानां) इकडे बढे हुए (एप मरतां) इन चीर ममतों के (पुरत्तम) बहुतही बडे ( अ-पून्यं) एवं अपूर्य गण फी, ( गयां सर्ग- दव) येलों के समूह फी जैसे प्रार्थना की जानी है, वैसे ही (हये) में प्रार्थना करता है। २८० तुम अपने (रथे हि ) रथ में (अरुपी.) लालिमामय हरिणियाँ (युइग्ध्यं ) जोड दो और अपने (रयेषु) रथ में (रोहित.) पर लालवर्णवाला हरिण (युगध्यं ) लगा दो, या (अजिरा वेगयान् (यदिप्ठा हरी ) दोने की क्षमता रखनेवाले दो घोडों को ग्थ (चोळ्ये धुरि चोळहवे धुरि) खींचने के लिए धुरा में (युडावं ) जोड दो। , भावार्थ- २७८ अपनी पति के सहारे वीर शत्रुओं का वध करते है और पर्वतश्रेणी को भी जगह से हिला २७९. मे वीरों की सराहना करता हूँ । ( वीनों के काग्य का गायन करता हूँ।) २८. यमीचने के लिए घोटे, हिरनियाँ या हरिणखते हैं। दुरी पुरा, . टिप्पणी- [24] (1)सर-य' = स्वर्ग तक पहुंचा हुमा, भाकाम को हनेवाला, । (२) दुर-धुर - जीण [७१] ()सम्-उक्षित सवर्धित, (मम् ) एकतापूर्वक (रक्षित ) बरवान पनाया हुभा । [२८]() अरुपी = (रप = सारिमामय) निम वर्णवाली (घोडी-हिरनी) अ-रपी 3 = शोध करना) - शांत प्रकृति की (हरिली)।(२) अजिर (भज गो) वेगवान् । (रसों में हरिणी पा-मार ओरने का उठेम मा पा ४ की टिपणो में देखिए ।)

(२८१) उत । स्यः । बाजी । अरुपः । तुविऽस्यनिः । इह । स्म । धायि । दुर्शतः ।। मा । यः । याम॑षु । मरुतः । चिरम् । करत् । प्र । तम् । रथेषु । चोदत ॥७॥ (२८२) रथम् । नु । मारुतम् । ययम् । श्रवस्युम् । आ । हुवामहे । आ । यस्मिन् । तस्थौ । सुऽरणानि । वि4ती। सर्चा । मरुस । रोदुसी ॥८॥ (२८३) तम् । चः । शर्धम् । रथेऽशुभम् । वेपम् । पनस्युम् । आ । हुचे । यस्मिन् । सुजोता । सुऽभगां । महीयते । सचो । मरुत्ऽसे । मीळ्हु ॥९॥ अन्वयः- २८१ उत स्यः अरुपः तुधि-स्वनिः दर्शतः वाजी इह धायि स्म, (हे) मरुतः!धा यामेषु. चिरंमा करत्, तं रथेषु प्रचोदत । २८२ यस्मिन् सु-रणानि विभ्रती रोदसी मरुत्सु सचा आ तस्थौ (तं) श्रवस्युं मारुतं रथं घयं आ हुवामहे । २८३ यस्मिन् सु-जाता सु-भगा मीन्हुपी मरुत्सु सवा महीयते तं यः रथे-शुभं त्वेषं पनस्यं शर्ध आ हुये। अर्थ-१८१ ( उत) सचमुच (स्था) वह (अरुषः) रक्तिम आभासे युक्त (तुवि-स्वनिः) बडे जोरसे हिनहिनानेवाला (दर्शतः) देखनेयोग्य (वाजी ) घोडा (इह) इस रथकी धुरा में (धायि स्म ) जोडा गया है। है (मरुतः! ) वीर मरुतो ! (व: यामेपु) तुम्हारी चढाइयों में वह (चिरं मा करत् ) विलम्ब न करेगा, (तं) उसे (रथेषु प्रचोदत ) रथों में बैठकर भली भाँति हाँक दो। २८२ (यस्मिन्) जिसमें (सु-रणानि) अच्छे रमणीय वस्तुओंको (विनती धारण करनेवाली (रोदसी) द्यावापृथिवी (मरुत्सु सचा) वीर मरुतो के साथ (आ तस्थौ) बैठी हुई है, उस (श्रयस्-यु) कीर्तिको समीप करनेवाले (मारुतं रथं ) वीर मरुतों के रथका (वयं आहवामहे) वर्णन हम सभी तरह से कर रहे हैं। २८३ (यस्मिन् ) जिस में (सु-जाता ) भली भाँति उत्पन्न, (सुभगा) अच्छे भाग्यसे युक्त एवं (मीळ्हुपी) उदार द्यावापृधिवी ( मासु सचा) वीर मरतों के साथ (महीयते ) महत्व को प्राप्त होती है, (तं ) उस (घा) तुम्हारे (रथे शुभं ) रथ में सुहानेवाले (त्वे) तेजस्वी और (पनस्युं) सराहनीय (स) वलकी (मा हुवे) ठीक प्रकार में प्रार्थना करता हूँ। भावार्थ-२८१ रयको शीघ्रही अश्वयुक्त करके शीघ्र चलने के लिए उन्हें प्रेरणा करो और बहुत जल्द दुश्मनों पर धावा करो। २८२ धावापृथिवी भर रमणीय वस्तुओं को धारण करके जिनके आधार से टिकी है, उन मरुतों के विजयी रथ का काम्य हम रचते है था गायन भी करते हैं। २८३ जिसमें समूचा भाग्य समाया हुआ है, ऐसे तेजस्वी मरतों के दिव्य बलकी सराहना मै करता हूँ। टिप्पणी- [२८१](१)तं रथेषुम चोदत- यहाँ पर ऐसा दीख पडता है कि, एक वचन के लिए रथेषु' बहुवचन का प्रयोग किया गया है अथपा हरएक महत् के रथ की इसी भांति योजना होने के कारण यह महुवचन का प्रयोग बिलकुल सायं है, ऐसा कहा जा सकता है। [२८२ (१) रणः-णं - युद्ध, समरभूमि, भगंद, रमणीयता ! (२) श्रयस्-युः - कीर्ति से संयुक्त होनेवाला, मन से जुदानेवाला । [२८३] (1)सु-जात- भच्छी तरह बना हुभा, कुलीन, उत्तम संगसे प्रकट हुभा या निष्पक्ष । (२)सुभग - वैभवशाली, भाग्ययुक्त, अच्छे भाग्यवाला ।

(३० ५५५१-८) (२८४) आ । रुद्रासः । इन्द्रऽवन्तः । सञोप॑सः । हिरण्यऽरथाः । सुचिताय । गन्तन । इयम् । वः । अस्मत् । प्रति । हर्यते । मतिः। तृष्णऽजै । न । दिवः । उत्साः । उदन्यवै ॥१॥ (२८५) वाशीऽमन्तः । ऋष्टिऽमन्तः । मनीषिणः । सुऽधन्यांनः । इपुऽमन्तः । निपङ्गिणः । सुऽअश्वाः । स्थ । सुऽरथाः । पृश्निऽमातरः। सुऽआयुधाः । मरुतः । याथन । शुभम् ॥२॥ (२८६) धुनुथ । द्याम् । पर्वतान् । दाशुषे । वसु । नि । वः। वनो । जिहते । यामनः । भिया । कोपर्यथ । पुधियीम् । पृश्निऽमातरः । शुभे । यत् । उग्राः । पृर्पतीः । अयुग्भ्यम् ॥३॥ अन्वयः~-२८४ (हे) इन्द्र-वन्तः स-जोपसः हिरण्य-रथाः रुद्रासः! सुविताय आ गन्तन, इयं अस्सत् मतिः यः प्रति हर्यते, (हे) दिवः । तृष्णजे उदन्यवे उत्साःन । २८२(हे) पृश्नि मातरः मस्तः ! घा--मन्तः ऋष्टि-मन्तः मनीषिणः सु-धन्यानः इपु-मन्तः निपङ्गिणः सु-अभ्याः सु-रथाः सु-आयुधाः स्थ शुभं याथन । २८६ दाशुष यसु द्यां पर्वतान् धूनुथ, य. यामनः भिया घना नि जिहते, (हे) पृश्नि-मातरः! शुमे यत् उप्राः पृपतीः अयुग्ध्यं पृथिवी कोपयथ । अर्थ- २८४ हे (इन्द्र-वन्तः) इन्द्र के साथ रहनेवाले, (सजोषसा) प्रेम करनेहारे, (हिरण्य-रथाः) सुवर्ण के बनाये रथ रानेयाले तथा (रुद्रासः!) शत्रु को हलानेवाले वीरो! (सुविताय) हमारे वैभव को यढाने के लिए ( आ गन्तन ) हमारे समीप आओ। (इयं अस्मत् मतिः) यह हमारी स्तुति (धः प्रति हयते) तुममें से हरेक की पूजा करती है। हे (दियः ) तेजस्वी पीरो! जिस प्रकार (तृष्णजे) प्यासे और (उदन-यचे) जलको चाहनेयालेके लिए (उत्साःन) जलकुंड रखे जाते हैं, उसी प्रकार हमारे लिए तुम हो। २८५ हे (पृश्नि-मातरः मस्तः!) भूमि को माता माननेवाले वीर मरतो! तुम (घाशी-मन्तः) कुठारसे युक्त, (टि-मन्तः ) भाले धारण करनेवाले. (मनीषिणः) अच्छे शानी (सु-धन्याना) मुन्दर धनुष्य साथ रखनेहारे, (इषु-मन्तः ) याण रखनेवाले, (निपङ्गिणः) तूणीरवाले, (सु-अभ्याः सु-रथाः) अच्छे घोडों तथा रथोंसे युक्त एवं (सु-आयुधाः) अच्छे हथियार धारण करनेद्वारे (स्थ) हो और इसी. लिए तुम (शुभ) लोककल्याण के लिए (वियाथन ) जाते हो। २८६ (दाशुषे) दानी को ( यस ) धन देनेके लिए जर तुम चढाई करते हो तब (धां)धुलोक फो और (पर्वतान् ) पहाडोंको भी तुम (धृनुथ) हिला देते हो । उस (यः) तुम्हारे ( यामनः भिया) हमले के उरसे (बनर अरण्य भी नि निहते ) बहुतही काँपने लगते हैं। हे (पृश्नि-भात) भूमिको माता समझनेवाले घीरी ! (शुभे) लोककल्याण के लिए (यत्) जय तुम (उमाः) उग्र स्वरूपवाले वीर पन (पृपतीः ) धन्येवाली हरिणियाँ रयों में (अयुग्म्य) जोडते हो, तय ( पृथिवों कोपयथ) भूमिको क्षुम्ध कर डालते हो। भावार्थ- २८४ योर हमारे पास भा जाय और प्यासे हुए लोगों को जल दें और हमारी पाणी उनका काव्यगायन । २८५ सभी भाँति के तमाखों एवं हथियारोंसे सुमन बनकर ये पोर शत्रुदल पर भीषण बाक्रमण का सूत्ररात करते है । २८६ धऔर मैनिक हाथ में नास्त्र ले। जब सज्ज होते हैं तय समो छोग सहम जाते हैं। टिप्पणी- [२८४] (1) इन्द्रः इन्द्र, गजा, ईश्वर, श्रे, प्रभु । इन्द्रवन्तः = राजा के साथ रहनेवाले धीर, जिनका प्रमु इन्द्र हो। ( २ ) सुचित = मुंदछ, कश्याग, वैभव की समृद्धि । (३)स-जोपसा-(समानप्रीतयः) एक दूमो पर समान प्रीति करनेवाले, समान उत्साही।

(२८७) वातऽत्विपः । मुरुतः । वर्षऽनिनिजः । यमा:ऽईव । सुऽसदृशः । सुऽपेशंसः । पिशङ्गऽअश्वाः । अरुणऽश्वाः। अरेपर्सः। प्रत्यक्षसः । महिना । द्यौःऽईन । उरवः॥४॥ । (२८८) पुरुऽगुप्साः । अञ्जिऽमन्तः । सुऽदानवः । त्वेपसंदृशः । अनवभ्रऽधिसः । सुजातासः । जनुपा । रुक्मऽवक्षसः । दिवः । अर्काः । अमृतम् । नाम । भेजिरे ॥५॥ (२८९) ऋष्टयः । युः । मरुतः । अंसयो । अधि। सहः। ओजः । बाह्वोः । वः । बलम् । हितम् । नृम्णा । शीर्षऽसु । आयुधा । रथेषु । यः। विश्वौ । वः । श्रीः । अधि । तनुषु । पिपिशे॥६॥ अन्वयः- २८७ मरुतः यात-त्विपः वर्ष-निर्णिजः यमाःइव सु-सदृशःसु-पेशसःपिशग-अश्याः अरुण- अश्याः अरपेसा प्र-त्वक्षसः महिना धौ इच उरयः। २८८ पुरु-द्रप्साः अखि मन्तः सु-दानवः त्येप- संदृशः अन्-अयभ्र राधसः जनुषा सु-जातासः रुक्म-वक्षसः दिवः अर्काः अ-मृतं नाम भेजिरे। २८९ (हे) मरुतः! यः अंसयोः ऋटया, यः याहोः सहः ओजः पलं आधि हितं, शीर्पसु नृम्पा, चः रथेषु विश्वा मायुधा, व. तनूपु श्रीः आप पिपिशे। * अर्थ- २८७ (मरुतः) वीर मरुत् (वात-विपः) प्रखर तेजसे युक्त, (वर्ष-निर्णिजः) स्वदेशी कपडा पहननेवाले हैं । ( यमाःइव) यमज भाई के समान (सु-सदृशः) बिलकुल तुल्यरूप तथा (सु पेशसः) सुन्दर रूपवाले हैं। ये (पिशङ्ग-अश्वाः) भूरे रंगके एवं ( अरुण-अश्याः) लाल रंगके घोडे समीप रखने. वाले, (अ-रेपसः) पापरहित तथा (प्र-त्वक्षसः) शधुओका पूर्ण विनाश करनेवाले, अपने (महिना) महत्त्व के कारण (द्यो-इव उरवः) आकाश के तुल्य यडे हुए हैं। २८८ (पुरु-द्रप्साः । यथेष्ट जल समीप रखनेवाले, (अअि-मन्तः) वस्त्रालंकार गणवेश-धारण करनेवाले. (सु दानव) दानशूर, (त्येप- संशः) वेजस्वी दीख पडनेवाले, (अन्-अवभ्र-राधसः) जिनका धन कोई छीन नहीं ले जा सकता ऐसे, (जनुपा सु-जातासः) जन्मसे उत्तम परिवारमें उत्पन्न (रुपम-वक्षसः) सुवर्णके अलंकार छाती पर धरने. हारे, (दिवः) तेजःपुक्ष तथा (अर्का ) पूजनीय वीर (अमृतं नाम भेजिरे) अमर कीर्ति पा चुके। २८९ हे (मरुतः!) वीर मरुतो ! {वः अंसयोः ऋष्टयः) तुम्हारे कंधों पर भाले रखे हैं। (यः वाहोः) तुम्हारी भुजाओं में ('सहः ओजः ) शत्रु को पराभूत करनेका पल तथा (यलं) सामर्थ्य (अधि हितं) रखा हुआ है । (शीर्षसु), माथों पर (नृम्णा) सुवर्णमय शिरवेष्टन, (वः रथेषु ) तुम्हार रथों में (विश्या आयुधा सभी हथियार विद्यमान है । ( वः तनूपु तुम्हारे शरीरों पर (श्रीः अधि पिपिशे) तेज अत्यधिक शोभा वढा रहा है। भावार्थ- २८७ जो चीर शत्रुका नाश करते हैं, वे अपने प्रभावसे ही यहप्पनको प्राप्त होते हैं। २८८ वीर सैनिक पराम करके बही भारी यशस्विता एवं स्याति प्राप्त करें। २८९ वीर सैनिक तथा उनके रथ हथियारोंसे सदेव सुमन रहते है। टिप्पणी-- [२८७ ] (1) यात = (घा गतिगन्धनयो) का हुआ, भडकाया (प्रग्वर), वायु । (२) वर्ष = परसात, देश, राष्ट्र । निर्णिक् = वस्त्र, भारछादन । वर्ष-निर्णिज (1) वर्षा जिनका पहनावा है । (२) स्वदेशी पहनावा करनेवाले । महत भूमिको माता समझनेवाले (पृश्नि-मातरः) है, इसलिए अपने देशमें घना हुआ कपडा ही पहनसे है। यह अर्थ अधिभूतपक्ष में संभवनीय है । अधिदेवत पक्षमें मरत् भाँधी के घायुप्रवाह है, जिनका पहनावा वर्षा है। दोनों स्थलों में अर्थका लप भासानीसे ध्यानमें भा सकता है। [२८८] (1)द्रप्स =गिर पटना, बिन्दु, जल. हिन्दु (Drops)। पुरु-द्रप्स = समीप यथेष्ट जल रखनेवाले, पमीनेसे तर । [२८९] (1) नृम्णं- पौरख, धैर्य, धन, पगडी (सायण) ! इस मंत्र से प्रतीत होता है कि, मरुतोका रथ बहुत ही विशाल तथा वृहदाका का रहा हो। क्योंकि इस रथ पर (विश्या आयुधा) समूचे शस्त्रास्त्र रखे जाते हैं। स्थिर धनुष्य (मंग २३) तथा चल धनुष्य' भी पाये जाते हैं । शत्रुदल के वीर धनुष्य को दोरियाँ तोड़ने पर तुले रहते है और कभी कभी धनुष्यके भी सो जाने मल्ह.] १५ बरू, । । युक्त. (रथ- (२९०) गोऽमत् । अश्व॑ऽवत् । स्थऽवत् । सुऽवीरम् । चन्द्रऽव॑द् । राधः । मरुतः । दुद् । नः । प्रशस्तिम् । नः । कृणुत । सृद्रियासः । भक्षीय । यः । अव॑सः । दैव्य॑स्य ॥७॥ (२९१) हये । नरः । मरुतः । मुळत । नः। तुर्विऽमघासः । अमृताः । ऋतऽज्ञाः । सत्यऽश्रुतः । कयः । युनिः। घृहत्ऽगिरयः । वृहद् । उक्षमाणाः ॥८॥ (म० ५/५८1१-८) (२९२) तम् । ॐ इति । नूनम्। तापीऽमन्तम्। एपाम्। स्तुपे। गुणम् । मारुतम् । नव्यसीनाम् । ये । आशुऽअश्वाः । अमंऽवत् । वहन्ते । उत । ईशिरे । अमृतस्य । स्वराजः ॥१॥ अन्धयः-२९० (हे ) मरुतः! गो-मत् अश्व-वत् रथ-वन सु-वीरं चन्द्र-वत् राधः नः दद, (हे) रद्रियास.नः प्र-शस्ति कृणुत, चः दैव्यस्य अवसः भक्षीय । २९१ हये नरः मरुतः । तुवि मघासः म. मृता ऋन शा सत्य-श्रुतः कवयः युवानः वृहत् गिरयः वृहत् उक्षमाणाः नःमृळत । २९२ स्व-राजाये माशु या अम बत् चहन्ते उन अ-मृतस्य ईशिरे तंट नूनं एपां नव्यसनांमारुतं तविपी-मन्तं गणं स्तुपे। अर्थ- २९० हे (मरतः!) वीर मरतो ! (गो-मत्) गौओं से युक्त, (अश्य-यत्) घोडों से यत् ) रथों से युक्त. (सु-धीरं ) वीरों से परिपूर्ण तथा (चन्द्र-वत्) सवर्ण से युक्त, (राधः) अन्न (न दद) हमें दे दो। है । द्रियासः') वारो (नः) हमारी (प्र-शस्ति) वैभवशालिता (कृणुत) करो। (4:) तुम्हारी (दैव्यस्य अवसः ) दिव्य संरक्षणशक्ति का हम (भक्षीय ) सेवन कर सकें. ऐसा करो। ०९१ (हये नर. मरनः') हे नता एवं वीर मरतो! (तुवि-मघासः) बहुत सारे धनसे युक्ता (अ मृताः) अमर. ( प्रशाः । सत्य को जाननेवाले, (सत्य-श्रुतः) सत्य कीर्ति से युक्त. (फवय युवानः) मानी एवं युवक, ( वृहन् गिरयः ) अत्यन्त सराहनीय और (बृहत् उक्षमाणा.) प्रचंड पल से युक्त तुम (नः मुदत ) हमें मुखी बनाओ। २९२ ( स्व राजः) स्वयंशासक ऐसे (ये ) जो वीर (आशु-अश्याः ) वेगवान घोडों को समीप रखनेवाले है, इसलिए ( अम-धत् वहन्ते ) आतवेग से चले जाते हैं, (उत) और जो (अ-मृतस्य शिरे) अमर लोक पर प्रभुत्व प्रस्थापित करते है (तं उ नूनं ) उस सचमुच ( एपां) इन (नव्यसनां) * सराहनीय ( मारनं ) वीर मरुतों के ( तविषी-मन्तं गणं स्तुपे ) वलिष्ठ गण-संघ की तू स्तुति कर ले। भायार्थ-०९० हर तरह से सहायता करके और हमाग सरक्षण परके वीर हमारी प्रगति में मददगार हो। हमें दान की प्राक्षिमी हो कि जिसके साथ गी, रथ, भय एव पीर मैनिक की समृद्धि हो जाय । ०९. ऐरो कौर जनता का संरक्षण कर हम सब को सुखी बना दें। २९२ जो और वन्दनीय हो उनकी प्रशसा सभी को करनी चाहिए। यही धीर इहलोक तथा परलोक पर प्रभुर प्रस्थापित करने को क्षमता रखने है। की भावना होने के कारण बहुत से घनुष्य सम्बना अनिवार्य हो, तो आश्वयं नहीं। से ही कुल्हाडी, भाला, गदा तथा अन्य धियार स्थ में ही रखने से थे । भतः रथ यहुन बरा हो, तो साभाविक है । ये सभी भायुध भली भाँति पृथक् एयर रमने चाहिए और प्रबंध ऐका हो कि चाहे जो हथियार ठीक मोके पर हाथमे भा जाय । यदि इस तरह की यस्थाको मानरें तो यह सष्ट है कि इन महारथियों का रथ अाधन्त विशाल प्रमाण पर बना हुआ होगा। [२९०] (चन्द्रक', जल, मोना, चन्द्रमा । (२) प्रशस्ति स्तुति, पर्गन, मार्गदर्शकता, उकृष्टना ( वैभव )। [९] (1) मधं - दान, धन, महायुत दाम । (२) गिरि- पर्वत, यागी, स्तुति, भादरणीय, माननीय । २९२) (1) स-रा=(राज दीप्तो प्रधाना, अधिकार प्रस्थापित करना ) स्वयंगायक, स्वयंप्रभा । (२) नव्यसीनां (नुरतुनी F प्रासा करना, मरितुं पोपा नव्यः।)-नूतन, सराहनीय । (३) म-मृत - अमर, अमरपन, देव, स्वर्ग, संपचि ।

(२९३) त्वेपम् । गणम् । तयसम् । खादिऽहस्तम् । धुनिऽव्रतम् । मायिनम् । दातिऽवारंम् । मयाऽभुवः । ये । आर्मिताः । महिऽत्वा । वन्दख । विप्र । तुविsराधसः । नृन् ॥२॥ (२९४) आ । यः । यन्तु । उदऽवाहासः । अध। वृष्टिम् । ये । विश्वे । मरुतः । जुनन्ति । अयम् । यः । अग्निः । मरुतः । संऽइद्धः । एतम् । जुपध्वम् । कवयः । युवानः ॥३॥ (२९५) यूयम् । राजानम् । इयम् । जनाय । विश्वऽतष्टम् । जनयथ । यजत्राः । युष्मत् । एति । मुष्टिऽहा । बाहुऽजूतः । युष्मत् । सत्ऽअश्वः । मरुतः । सुऽवीरः ॥४॥ अन्वयः-- २९३ हे ( विध!) ये मयो-भुवः महित्वा अ-मिताः तुवि राधसः नृन्, तबसं खादि हस्तं धुनि- व्रतं मायिनं दाति-चारं त्वेषं गणं चन्दस्व । २९४ ये उद-वाहासः वृष्टिं जुनन्ति विश्ये मरुतः अद्य यः आ यन्तु, (हे) कवयः युवानः मरुतः ! यः अयं अग्निः सम्-इद्धः एतं जुपध्यं । २९५ (हे) यजत्राः मरुतः ! यूयं जनाय इर्य विभ्व-तष्टं राजानं जनयथ, युप्मत् मुष्टि-हा याहु-जूतः एति. युग्मत् सत्-अश्यः सु-वीरः । अर्थ- २९३ हे (विम!) शानी पुरुष ! ( ये भयो भुव ) जो मुखदायक, (महित्या) वडप्पन से (अ- मिताः ) असीम मामर्थ्यवान तथा (तुवि-राधसः ) यथेट धनाढय हैं, उन (नृत् । नेता वीरपुरुषों को तथाँ (तयसं ) बलिष्ठ एवं (सादि-हस्तं) हाथ में चलय कडे धारण करनेवाले. (धुनि-प्रत ) शत्रुओं को हिला देने का त जिन्होंने ले लिया हो, एसे (मायिनं ) कुशल (दाति वारं) दानी या शत्रु का पध करके उसे दूर करनेवाले, (त्येपं) तेजस्वी ऐसे उन वीरों के (गणं वन्दस्व ) संघ को नमन कर। २९४ ये उद-वाहासः) जो जल देनेवाले (वृष्टि जुनन्ति ) वृष्टि को प्रेरणा देते हैं, वे (विश्वे मरुतः ) सभी वीर मरुत् । अद्य ) आज (२) तुम्हारी ओर (आ यन्तु ) आ जायें । हे ( कवयः) शानी तथा (युवानः मरुतः!) युवक धीर मरुतो ! (यः अयं ) जो यह ( अग्निः सम्-इद्धा ) अग्नि प्रज्वलित किया गया है, (पतं जपध्यं) इसका सेवन करा। २९५ हे ( यजत्राः मरुतः ! ) यज्ञ करनेवाले धीर मरुतो ! (यूयं ) तुम (जनाय ) लोक- कल्याण के लिए ( इयं । सविनाशक तथा ( विभ्य-तष्टं । कुशलतापूर्वक कार्य करनेहारे (राजानं) राजा को (जनयथ । उत्पन्न कर देते हो। ( युष्मत् ) तुमस (मुष्टि हा) मुष्टि-योधी और ( वाहु-जतः) बाहुयल से शत्रु को हटानेवाला चीर (पति) आ जाता है, हमें प्राप्त होता है। (युप्पत्) तुमसे ही (सत्- अभ्यः) अच्छे घोडे रखनेवाला (सु-धीरः) अच्छा वीर तैयार हो जाता है। भावार्थ- २९३ सभी लोग ऐसे वीरोंका भभिवादन करे। २९४ सबको जल देकर संतुष्ट करने वाले वीर जनताके निस्ट भाकर उन्हें संतुष्ट करें और यहीं पर जलती या धधकती हुई अँगीठी के समीप बैठ जाय। २९५ जनताका हिन हो इसलिए दुश्मनों को विनष्ट करनेवाला, फुशलतापूर्वक सभी राज्यशासन के कार्य करनेवाला नरेश राष्ट्रपतिको हैसियतसे पदाधिकारी चुना जाता है । उसी प्रकार मुटियोधी महाबाहु वीर तथा भच्छे घोडे समीप रखनेवाला वीर भी रामें गा ले लेता है। टिप्पणी- [२९३] (1) प्रत = शपथ, वचन, निश्रय, कृत्य, योजना। धुनि व्रत = शत्रुदल को हिलाने का मत जिसने लिया हो। (२) दशति यार:= (दातिः = देन, पार:= बढा प्रमाण, समूह) बड़े पैमाने पर दान देनेवाला, (दा भवखण्डने ) [दाति, वध करके [चार] गियाक. शत्रुको हटानेवाल।। { २९४ ] (1) उदघाह- जल टोनेवाला, मेघ, पानी पहुंचाने वाला। [२९५ ] (1) इयं = प्रेरक, स्गमी, चपल, शक्तिमान; ( शत्रुओंका) विनाश करनेहारा । (२) राजानं इये = तेजस्वी राजा को ( प्रभु को)। (३)विभ्व तट= (विश्न = कुशल, कारीगर, प्यापक), (तष्ट) = ( तनूकरणे = मनाना,) कुशलतापूर्वक कार्य करने हारा। (विभः) चतुर तथा निष्णात शिक्षकों द्वारा सिखाकर (हट ) तैयार किया हुआ। .

। - ( (२९६) अरा:ऽईव । इत् । अचरमाः । अहोऽइव । प्रऽ । जायन्ते । अवा । महाभिः । पृश्नैः । पुत्राः । उपऽमासः । रभिष्ठाः । स्वयो । मत्या । मरुतः । सम् । मिमिक्षुः ॥५॥ (२९७) यत् । प्र । असिष्ट । पृर्पतीभिः । अश्वैः। वीलुपविऽभिः । मरुतः । रथैमिः । क्षोदन्ते । आपः । रिणते । वनानि । अयं । उस्त्रियः । पमः । क्रन्दतु । यौः ॥६॥ (२९८) प्रर्धिष्ट । यामन् ! पृथिवी । चित् । एपाम् । भतीऽइव । गर्भम् । स्वम् । इत् । शवः ।धुः । चातान् । हि । अश्वान् । धुरि । आऽयुयुजे । वर्षम् । स्वेदम् । चक्रिरे । रुद्रियासः ॥७॥ अन्वयः- २९६ अराःइय इत् अचरमाः महाइव महोभिः अ-कवा. प्र प्रजायन्ते, उपमासः रभिष्ठाः पृश्नेः पुत्राः स्वया मत्या सं मिमिक्षुः। २९७ ( हे ) मरुतः! यत् पृपतीमिः अध्यैः पीलु-पविभिः रथेमिः मअयासिष्ट आपः क्षोदन्ते यनानि रिणते, उत्रियः वृषभः द्यौः अव फॅन्दतु। २९८ एषां यामन् पृथिवी चित् प्रथिष्ट, भाइव गर्म स्वं इत् शवःधुः, हि वातान अश्यान् धुरि आयुयुजे रुद्रियासस्वेदं वचक्रिरे। अर्थ- ९६ ( अराइय इत् ) पहिये के आरों के समानही ( अ-चरमा) सभी समान दोख पडनेवाले नया ( अहाइव) दिवसतुल्य (महोभिः) यडे भारी तेजसे युक्त होकर ( अ-कयाः) अवर्णनीय ठहरनेवाले ये चीर (प्र प्रजायन्ते ) प्रकट होते हैं। (उप मासः) लगभग समान फदके (रभिष्टाः) अतिवेगवान ये (पृश्नेः पुत्राः । मातृभूमि के सुपुत्र ( मरुतः) वीर मरुत् (स्वया मत्या ) अपने मनसे ही (सं मिमिक्षुः) सब कोई मिलकर एकतापूर्वक विशेष कार्य का सृजन करते हैं। २९७ ह (मरत ) वीर मरुतो ! ( यत् । जय (पृपतीभिः अश्वैः) धव्येयाले घोडे जोते हुए (पी- पविभि. दृढ तथा सामर्थ्यवान पहियोंसे युक्त (रथेभिः) रथासे तुम ( अयासिष्ट) जाने लगते हो तय (आपः क्षोदन्ते) सभी जलप्रवाह क्षुब्ध हो उठते है, (धनानि रिणते) चनोंका नाश होता है, तथा (उस्त्रिया वृषभः ) प्रकाशयुक्त वर्षा करनेहारा, ( द्यौः) आकाश तक (अव ऋन्दतु) भीषण शब्दमे गूंज उठता है। २९८ (एषां यामन् ) रन पीरों के आफमण से (पृधिवी चित्) भूमितक ( प्रथिष्ट) विख्यात हो। चुकी है। (भाव) पति जैसे पत्नी में (गर्भ) गर्भ की स्थापना करता है, वैसे ही इन्होंने (स्यं इत्) अपनाही ( शवः धुः) चल अपने राष्ट्र में प्रस्थापित किया (हि) और (वानान अश्यान् ) वेगवान् घोडों को (धुरि मा युयुने) रथ के अगले भाग में जोत दिया और (रुद्रियासः) उन वीरोंने (स्वेदं वर्ष चक्रिरे) अपने पसीने की मानों वर्गमी की, पराक्रम की पराकाष्ठा कर दिखायी। भावार्थ- २९६ ये सभी धीर तुझ्यरूप दीख पहने हैं और समान दंगके तेजस्वी हैं। वे अपना कर्तव्य घेगसे पूर्ण पर देते है और सपनो मातृभूमिको सेवामें मिरजुल कर भविषम भावसे विशिष्ट कार्यको संपस कर देते हैं। २९७ इस मामायुदल पा इमले घराने लगते है. याने वायु सरले हरती है, उस समय जलवा बौखला उठते हैं, पन के पंटूट गिरने लगते हैं और भाकाश के वर्षा करने हारे मेघ भी गरजने लगते है। २९८ इन वीरों के ग्रुदल पर होने वाले भारमों के फलस्वरूप मातृभूमि विख्यात हुई । इन्होंने अपना पल राष्ट्र में प्रस्थापित किया और घोडों से रय संयुक्त करके जब ये सदाई करने लगे, तब ( इस युद्ध में ) पसीने से सर होने तक वीरतापूर्ण कार्य करते रहे। टिप्पणी- [२९j(1) चरम अतिम, निम्न श्रेणीका (छोरामा, अल प्रमाण का) 1 अ-चरम = यहा, सुरय, निम्न धेशीमा नहीं। (३) अ-फयाः (क्च् = वर्णन करना)= भवर्णनीय अदुष्ट, भकुत्सित । (३)सं-मिह = सं- मिश् = मिनट करना (To mix nith), निर्माण करना (endow with, to prepare, to farmish) तयार करना, सुमन पनाना । उपमासः रभिप्टाः पृश्नेः पुत्राः स्वया मत्या संमिमिक्षुः- ये मातृभूमि के सुपुत्र वीर समानतापूर्ण बर्ताव करते है भविषम दशा में रहते है भीर अपने कर्तव्यको ऐक्यसे निभाते हैं। देखो मंत्र ३०५,४५३, नमें साम्यमायका वर्णन किया है। [२९७ ] (1) एलिय गांविषयक, हफे पोमे, २, प्रकाश, दूध, पता (२९९) हये । नरैः । मरुतः । मृळत । नः । तुर्विऽमघासः । अमृताः । ऋतऽज्ञाः । सत्यऽश्रुतः । कवयः । युवानः। वृहत्ऽगिरयः । वृहत् । उक्षर्माणाः ॥८॥ (ऋ० ५/५९।१-८) (३००) प्र! पृ: । स्पट् । अक्रन् । सुविताय । द्वापन। अर्थ । द्विवे। प्री पृथिव्यै। ऋतम् । भरे । उक्षन्ते । अश्वान् । तरुपन्ते ।आ। रजः। अनु। स्वम् । भानुम् । श्रथयन्ते । अर्णवैः॥१॥ (३०१) अमात् । एपाम् । भियसा । भूमिः । एजति। नौः। न । पूर्णा । क्षति । व्यर्थिः । यती। दुरेऽदृशः । ये । चितयन्ते । एमऽभिः। अन्तः। महे । विदथे । येतिरे । नरैः ॥२॥ अन्ययः- २९९ [ 8० ५।५७१८, २९१ देखिए।] ३०० वः सुविताय दायने स्पद् प्र अक्रन्, दिये अर्च, पृथिव्यै ऋतं प्र भरे, अचान् उक्षन्ते, रजः आ तरुपन्ते, स्वं भानु अर्णवैः अनु श्रथयन्ते । ३०१ एपां अमात् भियसा भूमिः एजति, पूर्णा यती व्यशि नौः न, क्षरति, दूरे-दृशः ये एमभिः चिनयन्ते (ते ) नरः विदथे अन्तः महे येतिरे। अर्थ- २९९ [ ऋ० ५।५७१८, २९१ देखिए । ] ३०० (वः सुविताय) तुम्हारा अच्छा कल्याण हो तथा (दायने) अच्छा दान दिया जा सके, इस- लिप (स्पट) याजक इस कर्म का (प्रअन् ) उपक्रम या प्रारंभ कर रहा है। तूभी (दिवे अर्च) प्रकाशक देव की, धुलोककी पूजा कर और में भी (पृथिव्यै ) मातृभूमि के लिए (ऋतं प्र भरे) स्तोत्र का गायन करता हूँ। घे वीर (अध्यान उक्षन्ते ) अपने घोडों को वलयान बनाते हैं तथा (रजः आतरुपन्ते) अन्तरिक्षसे भी परे चले जाते हैं और (स्वं भानुं) अपने नेजको (अर्णयैः) समुनों से-समुद्रपर्यटनोंद्वारा- समुद्र में से भी ( अनु श्रथयन्ते) फैला देते हैं। ३०१ (एषां) इनके ( अमात् भियसा) बलके डरसे (भूमिः एजति) पृथ्वी काँप उठती है और (पूर्णा) वस्तुओं से भरी होने के कारण ( यती) जाते समय (व्यथिः नौः न) पीडित होनेवाली नौका के समान यह (क्षरति) आन्दोलित, स्पन्दित हो उठती है। (दूरे-दृशः) दूरसे दिखाई देनेवाले, (ये) जो (एमभिः) येगयुक्त गतियों से (चितयन्ते ) पहचाने जाते हैं, वे (नरः) नेता वीर (विदथे अन्तः) युद्ध में रहकर (महे) बडप्पन पाने के लिए (येतिरे) प्रयत्न करते हैं। भावार्थ- [२९९ २० ५।५७१८, २९१ देखिए ।] ३०० सयका भला हो और सपको सहायता पहुँचे, इस हेतु से याजक इस यशका प्रारम्भ करता है । प्रकाशके देवताकी पूजा करो और मातृभूमिके सूक्तोंका गायन कसोपोर अपने घोड़ों को किसी भी भूभाग पर चढाई करने के लिये सन दशामें रखवे हैं और (विमान पर चढकर) भन्तरिक्ष में संचार करते हैं, (तया नौका एवं जहाजों परसे समुद्रयात्रा करके मुदूरवर्ती देशों में अपना सेन फैला देते हैं।) ३०१इन वीरोंमें भारी बल विद्यमान है. इस कारणसे भूमंडल परके देश मारे थरके कॉपने लगते हैं। लदी हुई परिपूर्ण नौका जिस तरह पवन के कारण हिलनेसोलने लगी, तो तनिक भय प्रतीत होने लगता है, ठीक उसी प्रकार सभी लोग इनकी शीघ्रगामिता के परिणाम- स्वरूप कुछ अंश में भयभीत हो जाते हैं । चूंकि इनका धावा विद्युत्गति से हुभा करता है, अतः इन वीरों को सभी पहचानते हैं । जस मे रणक्षेत्र में शत्रुदल से जूमने हैं, तब इनके मन में एक ही विचार तथा ख्याल जागृत रहता है कि, यथासंभव बरप्पन प्राप्त करना ही चाहिए। टिप्पणी-[ २९९] [२० ५५७१८, २९१ देखिए।] [३००] (5) तपः = जीतनेवाला, तरुप्यति = चाई करमा, तरुस् = लडाई. भ्रष्टरव, हमला करना । (२) स्पद् (प)- स्पा, होस, याजक, निरीक्षक । स्वं भानु अर्णवैः अनु श्रथयन्ते = अपना तेज समुद्रोंके परे ले जाकर फैला देते हैं। [३०१] (1) दुरे-दृशः = दरसे दीस परनेवाले, दूरदर्शिता से कार्य करनेवाले, दूरदर्शी । -- (३०२) गाम्ऽइव । श्रियसै । भृङ्गम् । उत्ऽतमम् । सूर्यः । न । चक्षुः । रजसः । विसर्जने । अत्याऽइन । सुऽम्यः । चारवः । स्थन । मोऽइव । श्रियसै । चेतथ । नरः ॥३॥ (३०३) कः सव: । महान्ति । महताम् । उत् । अश्नवत् । क । काव्यो । मरुतः। का। ह ! पोस्यो । यूयम् । ह । भूमिम् । किरणम् । न । रेजथ । प्र । यत् । भरध्ये । सुविताय । दावन ॥४॥ अन्ययाः- ३०२ (हे ) नर. गांइव उत्तम शृङ्ग नियसे, रजसः विसर्जने, सूर्यः न, चक्षुः; अत्याइव सु-स्वः चारवः स्थन, मर्या इच, श्रियसे चेतथ। ३०३( हे ) मरुतः ! महतां वः महान्ति का उत् अश्नवत् , कः काव्या, काह पौस्या, यत् सुविताय दावने प्र भरध्वे यूयं ह, किरणं न, भूमि रेजथ। अर्थ- ३०२ हे (नरः!) नेता वीरो! (गवांइय उत्तमं शृङ्गं ) गौओं के अच्छे सींग के तुल्य (थियसे) शोभा के लिए तुम सुन्दर शिरोवेष्टन धारण करते हो, तथा ( रजसः विसर्जने ) अँधेरा दूर हटाने फे लिए (सूर्यः न चक्षुः) सूर्य की नाई तुम लोगों के नेत्र यनते हो। (अत्याइव ) तुम शीघ्रगामी घोडों के समान स्वयमेव (सु भ्यः) उत्तम बने हुए एवं ( चारवः ) दर्शनीय (स्थन) हो और (मर्याःइय) मत्या के समान (थ्रियसे चेतध) ऐश्वर्यप्राप्ति के लिए तुम सचेष्ट बने रहते हो। ३०३ हे ( मरतः।) चीर मरतो । (महतां यः) तुम जैसे महान सैनिकों की (महान्ति ) महानता या घडप्पन की ( का उत् अभवत् ) मला फोन वरावरी करता है ? (कः काव्या?) कौन भला तुम्हारे काव्य रचने की स्फूर्ति पाता है ? (काह पास्या) किसे भला तुम्हारे तुल्य सामर्थ्य प्राप्त हुए ? (यत्) जय (सुविताय दायने) अत्यन्त उच्च कोटिके दान देनेके लिए तुम (प्र भरध्ये ) पर्याप्त धन पार हो, तब (यूग ह) तुम सचमुच (किरणं न । एकाध धूलिकणके समान (भूमि रेजथ) पृथ्वीको भी हिला देते हो। भावार्थ-३०२ ये पौर शोभा के लिए मार्यो पर शिरोवेशन घर देते हैं । उसे सूर्य अंधेरे को हटाता है. से हो ये धीर जनता की उदासीनता को दूर भगा देते हैं और उसे उमंग एवं होमले से भर देते हैं। घुटदौर के लिए तैयार किये घोडे जैसे मुन्दर प्रतीत होते हैं, वैसे ही ये मनोहर स्वरूपवाले होते है और हमेशा अपनी प्रगति तथा प्रभध. शारिता करने के लिए प्रयत्न करते रहते हैं। ३०३ इस भवनीतल पर भरा ऐसा कौन है, जो इन वीरों के समकक्ष बन सके ! इनके अतिरिक्त क्या कोई ऐसा है, जिसके विषय में चोररमपूर्ण कार्यो का मजन कोई को इनमें जो वीरता है. जो पुरणार्य है, मला वह किमी दूपामें पाये भी जाते हैं । निम ममय ये भूरि भूरि दान देने के लिए प्रचुर धन बटोरने की चेष्टामें संरत रहते हैं भयात् भीषण एवं लोमहपंग युद्ध छेद देते है, तब समूची पृथ्वी विचलित हो उठती है, सारा भू-मंडल पंदित हो जाता है। C टिप्पणी- [ ३०२] (1)रजम् - ग्लि, पराग, किरण, अंधेरा. मानमिक मज्ञान, अन्तरिक्ष, मेघ । (२) मर्यः- माय, मानप, युवक, दूल्हा ( Snitor )1 मर्याः इव भियसे चेतथ = दुल्हे के समान शोभा के लिए तुम भयान का हो। [३०३ ] (1) किरण : किरण, धूलिका, विरणपय में दीम पडनेयारण ।

- (३०६) वर्यः । न । ये 1 श्रेणीः । पृप्तुः। ओजसा । अन्तान् ! दिवः । बृहतः । सानुनः { पर । अश्वासः । एषाम् । उभय । यो । विदुः। प्रापर्वतस्य । नभनून् । अचुच्ययुः ॥७॥ (३०७) मिमातु । द्यौः । अदितिः । चीतये । नः । सम् । दानुचित्राः । उपसः। यतन्ताम् । आ । अचुच्यवुः । दिव्यम् । कोशम् । एते। ऋ । रुद्रस्य । मरुतः । गुणानाः॥८ (ऋ. ५६१११-४, ११-१६) (३०८) के । स्थ । नरः । श्रेष्ठऽतमाः। ये । एकः एकः । आऽयय । परमस्याः । पराऽवतः ॥१॥ अन्वयः-- ३०६ ये वयः न, श्रेणीः भोजसा दियः अन्तान् वृहतः सानुनः परि पप्तुः, यथा उभये विदुः एपा अश्वासः पर्यतस्य नभनून् । अचुच्यः । ३०७ द्यौः यदितिः नः चीतये मिमातु. दान-वित्राः उपसः सं यतन्तां, (हे) पे ! गृणानाः गते रद्रस्य मरतः दिव्यं कोश आ अचुच्ययुः। ३०८(है)श्रेष्ठ-तमाः नरः । के स्थ? ये एक- एका परमस्याः परावतः आयय । अर्थ- ३०६ (ये) जो धीर ( ययःन) पंछियों का तरह (श्रेणीः) पंक्तिरूपमें समूह में (मोजसा) घेगसे (दिवः अन्तान ) आकाश के दूसरे छोरतक तथा (वृहतः ) बडे बडे (सानुनः) पर्वता দ্বিান্ত पर भी (परि पप्नु ) चारों भोरसे पहुँचते हैं। (यथा) जैसे एक दूसरेका बल (उभये विदुः) परस्पर जान लेते हैं, वैसे ही ये फर्म करते है। (एषां अश्वासः) इनके घोडे (पर्वतस्य नभनून ) पहाड के टुकडे करके (म अचुच्ययुः) नीचे गिरा देते है। ३०७ (चौः) घुलोक तथा (अदितिः) भूमि (नः पीतये) हमारे सुपसमाधानके लिए (मिमातु) तैयारी कर लें. (दानुचित्राः)दानद्वारा आश्चर्यचकित कर डालनवाले (उपसः) उपःकाल हमारे लिए (सं यतन्ता) भली भाँति प्रयत्न करें। हे (ऋपे!) ऋपिवर ! (गृणानाः) प्रशंसित हुए (पते) ये (रुद्रस्य मरतः ) चीरभद्र फे वीर मरत् ( दिव्यं कोशं) दिच्य कोश या भाण्डार फो (आ अचुच्यषुः) सभी ओर से उण्डेल देते हैं। ३०८ हे (श्रेष्ठ-तमाः नरः! ) अति उच्च कोटि के तथा नेता के पदपर अधिष्ठित वीरो! तुम (के स्थ) कौन हो? (ये) जो तुम ( एका-एका ) अकेले अकेले (परमस्याः परायतः ) अति सुदूर देश से यहाँ पर (आयय ) आते हो। भावार्थ-३०६ ये पीर पंक्ति में रहकर समान रूप से पग उठाते एवं धरते हुए चलने लगते है और इनकी बेग. Rana का संक में रहने सामानों के माल के अंतिम छोर तक इसी भाँति जाते मंगे। पर्वतगियों पर भी टीक इसी प्रकार ये चढ जाते हैं । एक दूसरे की शक्ति से परिचित वीर जैसे लडते हो, वैसे ही ये जूमते हैं और इनके घोटे पहाणे तक को चकनाचूर कर आगे निकल जाते हैं। ३.७ धुलोक तथा भूलोक हमारे सुख को पदावे। उपकार का प्रारम्भ होते ही देन देने का प्रारम्भ हो जाय । ये सराहनीय धौर विजय पाकर धनका पृहदाकार बनाना से आय और उस दविणभाण्डार को हमारे सामने सईल दें। ३०८ भायन्त सुदूरवर्ती प्रदेशमें से बिना पकावद के भानेवाले वीर भला तुम कौन हो? टिप्पणी- [३६]()नभनु - (नम् = इष्ट देना, तोडमरोष देना) क्षति पहुंचानेयाला, नदी, टूटाफूटा विभाग। [३०७]()दिव्य गीय, माश्चर्यकारक । (१) च्यु - (गता) घटोरना, गिर जाना । (३) मा माने) = मापना, समाना, तैयार करना, धिना, दशांना । (0)वीतिः = जाना, टप्पा करना, इत्पत्ति, उपभोग, माना, तेश - (३०९) के । वः । अर्थाः । के। अभीर्शवः । कथम् । शेक । कथा । यय । पृष्ठे । सदः । नसोः । यमः ।।२।। (३१०) जघनै । चोदः एपाम् । वि । सक्थानि । नरैः । यमुः । पुत्रऽकृथे । न । जनयः ॥३॥ (३११) परी । वीरासः । इतन । मयासः । भद्रऽजानयः । अग्निऽतर्पः । यथा । असंथ ॥४॥ अन्यय:- ३०९ वः अभ्याः क्य? अभीशव फ्य ? कथं शेक? कथा यय? पृष्ठे सदः नसोः यमः । ३१० एषां जघने चोदः, पुत्र-मथे जनयः न नरः सक्थानि वि यमुः। ३११ हे वीरासः मर्यासः भद्-जानयः अग्नि-तपः ! यथा असथ परा इतन। अर्थ- ३०९ (यः अश्याः क्व ? ) तुम्हारे घोडे किधर है ? (अभाशवः क्व ? ) उनके लगाम कहाँ है ? (कथं शेक ? ) किसके आधार से या कैसे तुम सामर्थ्यवान हुए हो? और तम (कथा यय? ) भला कैसे जाते हो ? उनकी (पृष्ठे सदः) पीठपर की काठी जीन (पर्याण) एवं (नसोः यमः) नथुनमें डाली जानवाली रस्सी कहाँ धर दिये हैं? ३१० जय (एषां) इन घोडों की (जघने ) जॉघों पर (चौदः) चावुक लगता है, तब (पुन-कथे) पुत्रप्रसृति के समय (जनयः न) स्त्रियाँ जैसे गोदोको तानती है, वैसे ही वे (नरः) नेता वीर सफ्यानि) उन घोडों की जाँघों का (घि यमुः) विशेष ढंगसे नियमन करते है। ३११ हे ( वीरासः) वीर, ( मर्यासः ) जगता के हितकर्ता (भद्र-जानयः) उत्तम जन्म पाये हुए और (अग्नि-तप.! ) अग्नि तुल्य तेजस्वी पीरो ! (यथा असथ) जैसे तुम अव हो, वैसे हो (परा इतन) इधर आओ। , - भावार्थ- ३०९ इन वीरों के घोडे लगाम, पर्याण, अन्य वस्तुएँ कहाँ है और कैसी है ? ३१० घुदसवार होने पर ये वीर जब अश्वजघापर कोटे रगाना शुरू करते है, तप घे घोडे अपनी जघाओंफो विस्तृत करने लगते है. पर ये वीर सैनिक उन्हें नियमित करते अर्थात् रोक देते है। (अपनी जघामोसे घोड़ों को हद धरते t, हिलने नहीं देते है।) ३११ वीर हमारे निकट आ जाय। 2 क्या - टिप्पणी-[३०९] (1) सदस् = घर, भासन, बैठ जाने का साधन, जीन "नसो. यम.? घोहों के नथुनों में रस्मी डालते थे? आजकल घोडे के मुंह मे लोहमय शलाका डाल कर उसे रगाम लगा देते है। इस मंत्र में अभ्याः ' पद पाया जाता है और अन्त में (नसोः यमः) - नथुने में रस्सी रखने या निर्देश है। यह प्रयोग विचार करने योग्य है। [३१०](१)नर. सक्थानि पि यमु = वीर घोडे पर अचल, अटल, अडिग हो थैठे, सादि यह घोड़े पर से न गिर जाय । मरत् (हिं.)१६ (३१२) गे । ईम् । यहन्ते । आशुभिः । पिन्तः । मदिरम् । मधु । अ । आसि । दधिरे ॥११॥ (३१३) येपाम् । श्रिया । अधि । रोदसी इति । बिभाजन्ते । रथेषु ! आ। दिपि । रुक्माऽईव । उपरि ॥१२॥ (३१४) युवा । सः । मारुतः । गणः। त्वेषयः । अनेद्यः । शुभम्ऽयायो । अप्रैतिऽस्कुतः ॥१३॥ अन्वय - ३१२ ये मदिर मधु पिपन्त आशुभिः ई वहन्ते अब श्रवांसि दधिरे। ३१३ येपा श्रिया रोदसी अधि, उपरि दिवि रुपम इच, रथेपु आ विधाजन्ते । ३१४ स मारत गण युवा त्येप-रथ. अनेद्य. शुभ यावा अ-प्रति-स्तुतः। अर्थ-३१२ (ये ) जो (मदिर मधु) मिठासभरा सोमरस (पिरन्त ) पीनेवाले धीर (आशुभिः) वेगवान घोडों के साथ ( ई वहन्ते ) शाघ्र चले जाते ह, घे (अन) यहाँ पर (भवांसि दधिरे ) बहुतसा धन दे देते हैं। ३१३ ( येषा चिया ) जिन की शोभासे (रोदसी) धुलोक तथा भूलोक ( अधि) अधिष्ठित -सुशोभित हुए है, वे वीर (उपरि दिवि ) ऊपर आकाश मे (रुपम इव) प्रकाशमान सूर्य के तुल्य (रथेषु आ निभाजन्ते । रथों में धातमान होते ह। ३१४ ( स ) वह (मारत गण ) वीर मरुतों का संघ (युवा) तरुण, (स्वेप-रथः) तेजस्वी रथ में वेठनेवाला, (अ-नेद्य ) अनिंदनीय, (शुभ-यावा) शुभ कार्य के लिए ही हलचलें करनेवाला और (प्रति स्तुत ) अपराजित- सदेव विजयी है। ( भावार्थ-३१० अच्छे भनपान का सेवन करना चाहिए और वेगवान वाहनों द्वारा शत्रुसेनापर आक्रमण करना उचित है, क्योंकि ऐमा करनेसे उच्च कोटि का धन मिलता है। ३१३ रथों में बैठकर वीर सनिक जय कार्य करने लगते हैं, तब व भतीय सुहाने लगते हैं। ३१४ वीरों का समुदाय सरकर्म करने में निरत, निष्प, हमेशा विजयी तथा नवयुवकवद् उमग एव उत्साह से परिपूर्ण रहता है। - टिप्पणी- [३१२] (१)श्रयस् - सुनना, कीति, धन मत्र, प्रशसनीय कृष्य । यहां पर प्रवासि बहुवच. नान्त पद है, इसलिए 'यश' अर्थ लेने की अपेक्षा 'धन' अर्थ करना, ठोक प्रतीत होता है क्योंकि यश का अनेक होने का समय नहीं, लछिन घन विविध प्रकार के हुभा करते हैं, मत बहुवचनी प्रयोग किये जानेपर 'श्रवामि' का भर्य धनसमूह करनाही ठीक है। [३१३ ] रफमा सुवर्णका टुकडा, मुहर, प्रकाशमान । दिवि रकम = आकाश में प्रकाशमान (सूर्य।) [३१४ ] स्तु - वूदना, उठा लेना, व्याप्त होना । प्रतिष्क - दकना (पराभूत करना) अ-प्रतिष्कृत. विजयी, जो कभी न हारा हुआ हो ।

(३१५) कः । वेद । नूनम् । एपाम् । यत्रं । मदन्ति । धूतयः । ऋतऽर्जाताः । अरेपसः ॥१४॥ (३१६) यूयम् । मतम् । विपन्यवः। प्रऽनेतारः । इत्था । धिया । श्रोतारः । यामऽहूतिपु ॥१५॥ (३१७) ते । नः । वसूनि । काम्या । पुरुऽचन्द्राः । रिशादसः । आ। यज्ञियासः । ववृत्तन ॥१६॥ । अन्वयः- ३१५ धूतयः ऋत-जाताः अ-रेपसः यत्र मदन्ति एषां का नूनं वेद ? ३१६ ( है ) वि-पन्ययः ! यूयं इत्था मर्त प्र-नेतारः याम- हतिए धिया श्रोतारः। ३१७ पुरु चन्द्राः रिश-अदमः यशियासः ते नः काम्या वमूनि आ ववृत्तन । अर्थ- ३१५ ( धूतयः) शत्रुओं को हिलानेवाले, (त-जाताः । सत्य के लिए जन्मे हुए और (अ- रेपसः) निष्पाप ये वीर ( यत्र मदन्ति ) जहाँ आनन्द का उपभोग लेते हैं, यह (एपां) इनका टोर (का नूनं घेद ) सचमुच कौन भला जानता है ? ३१६ हे (वि-पन्यवः!) प्रशंसनीय वीरो!( यूयं ) तुम ( इत्था ) इस प्रकारसे (मत प्र-नेतारः) मानयों को उत्कृष्ट प्रेरणा देनेवाले हो और ( याम-हतिपु ) शत्रुदल पर चढाई करते समय पुकारने पर तुम (धिया ) मनःपूर्वक यडी लगनसे उस प्रार्थना को (श्रोतारः ) सुन लेते हो। ३१७ हे (पुरु-चन्द्राः ) अत्यन्त आहाददायक, (रिश-अदसः) शत्रुदल के विनाशकर्ता (यशियासः !) तथा पूज्य वीरो ! (ते) ऐसे प्रसिद्ध तुम ( नः काम्या ) हमारे अभीष्ट ( वसूनि ) धन हमें (आ ववृत्तन) वापिस लौटा दो भावार्थ-३१५ कौनसा स्थान वीरों को मानन्द देता है ? ३१६ शत्रु पर पढाई करते वक्त मदद के लिए बुलाया जाय, तो ये वीर सैनिक तुरन्त उस प्राधना पर ध्याग देते है, सहाया की पुकार मुन लेते हैं। ३१७ वीरों की सहायता से हमें सभी प्रकारके धन मिले। [यदिशग्रुने उन्हें छीन लिया हो, तो यह सारी सम्पदा हमें पुनः वापस मिले । टिप्पणी-[३१५] ( १ ) फरा-जात - सत्य के लिए पैदा हुआ, सीथा कार्य करने के लिए ही जो अपने जीवन का बलिदान देता है । (२) रेपस् - हीम, टेढा, फर, कलंक, पाप । स-रेपस् = ऊँचा, सरल, शान्त, निष्कल', पापरहित ! [ ३१६] (1) यामः ॐ दुश्मनों पर किया जानेवाला भाक्रमण, हमला । (२) हतिः पुलाया । याम-इतिः = शत्रुओं पर एमके पदाते समय की हुई पुकार। - पुसर, -- अत्रिपुत्र एवयामरुत् ऋपि (०५८७१-९) (३१८) । यः । महे । मतयः । यन्तु । विष्णवे । मरुत्वते । गिरिजाः । एक्यामरुन् । प्र । गर्धाय । प्रऽयंज्यये । सुऽखादये । तवसे । भन्दत्ऽईष्टये। धुनिऽव्रताय । शर्वसे ॥१॥ (३१९) प्र । ये । जाताः । महिना । ये। च । नु। स्वयम् । प्रा विद्या । ब्रुवत् । एक्यामरुत् । ऋत्यो । तत् । यः । मरुतः । न । आऽधृपै । शवः। दाना । मह्ना । तत् । एपाम् । अधृष्टासः । न । अद्रेयः ॥२॥ अन्ययः- ३९८ एक्यामगन् गिरि-जाः मतयः यः मरुत्-वते महे विष्णवे प्रयन्तु, प्रयव्यये सु- सादये तबसे भन्दत्-इष्टय धुनि-प्रताय शयसे शर्धाय प्र। ३१९ ये महिना प्रजाताः, ये च नु स्ययं विद्यमा प्र, एक्यामरुत् त्रुवते,(हे ) मरुतः ! यः तत् शमा नत्या न जा-धूपे, एपां तत् दाना महा, अद्रयान, अ-धृष्टासः । अर्थ- ३९८ ( एण्यामरुत् मन्तों के अनुसरण करनेवाले ऋपि की (गिरि जार) वाणी से निकले रग (मतयः ) विचार एवं काव्यमय श्लोक (यः ) तुम्हारे ( मरुत्वते ) मरतों से युक्त (महे विष्णये) पडे व्यापर देव के पास (म यन्तु ) पहुँचें । तुम्हारे (प्र- ययवे ) अत्यन्त पूजनीय, (सु-खादये ) अन्छ फई, वलय धारण करनेहारे, ( तबसे ) यलवान. ( भन्दत्-इष्टये ) अच्छी आकांक्षा करनेवाले, (धुनि-- प्रताय ) सानु को हटा देने का प्रत लेनेहारे ( शवसे । वेगपूर्वक जानेवाले (शर्धाय ) यल के लिए ही तुम्हारे विचार एवं काव्यप्रचाह ( प्र यन्तु ) प्रवर्तित हो चले। ३१९ ये ) जो अपनी निजी (महिना ) महत्व से (प्रजाताः) प्रकट हुप (ये च) और जो (नु) सचमुच ( स्वयं विद्वाना) अपनी निजी विद्या से (प्र) प्रसिद्ध हुए, उन वीरों का ( एययामरत् ग्रुपत) एयामरन् अपि वर्णन करता है। हे (मरतः !) घार मरतो! (यः तत् शवः ) तुम्हारा वह बल • (न्या ) कृति से युक्त होने के कारण (न आ धृप) पराभूत नहीं हो सकता है, (एपां तत् ) ऐसे तुम धागे का यह यल ( दाना ) दानसे (महा) तथा महत्त्व से युक्त है। तुम ता (अद्रयः न ) पर्वतों के समान ( अ-भृष्टास किसी से परास्त न होनेवाले हो। भावार्थ- ३९८ कपि सर्वव्यापक ईश्वर के सम्बन्ध में विचार करते हैं, उसके स्तोत्री का गायन करते हैं और उन को प्रतिभा-बकि परमामा की ओर मुड़ जाती है । उनी प्रकार, बल यदा कर नुको मटियामेट करने के गुरवर कार्य कीमार भी उनी मनोवृमि झुक जाय । ३१९ तुम्हारी विशा एवं महत्ता साधारण कोटिकी है। तुम्हारा पल इतना विशाल है किकोई तुम्हें पद- दहित राधा पराभून या परास नहीं कर पाता है। तुम्हा दान भी यहुत पहा है और जैसे पर्वत भएमी जगह स्थिर रदा यस्ता है. मे ही मुम निघर कही रहते हो, उधा भले ही दुश्मन भीषण हमले का दाले, लेकिन तुम अपने रपान परमल,भाल तथा भलिंग रह कर उसे हटा देते हो। टिप्पणी- [३१८ (१)भन्द् = मुदेवी होना, उसम होना, भानन्दित पनना, सम्मान दमा. पूजा करना। (२) इपि- '- भारांक्षा, निति, इष्ट वस्नु यत ।(३)एयया संरक्षण मा परसे जाना, निश्चित राहारो उतना या मयत् = मरतों के पथ से जानेहारा, मरतों का अनुगामी, पापि सा. भा०)। [३११J(1)ऋतु-या बुदि, सयानापन, शति, निश्चय, आयोजना, छा। (२)भायम यल, पा का नाश करने में मम स । (३) अधृष्ट अकम्पित। करमा, %3D . - , (३२०) प्र । ये । दिवः । वृहतः । शृण्विरे । गिरा । सुऽशुक्कानः । सुऽभ्यः । एक्यामरुत् । न । येाम् । इरौं । सधस्थे । ईष्टें । आ । अग्नयः । न । स्वऽविद्युतः । प्र । स्पन्द्रासः । धुनीनाम् ॥३॥ (३२१) सः । चक्रमे । महतः । निः । उरुऽक्रमः | समानात् । सदसः । एव॒याम॑रुत् । यदा । अयुक्त । त्मना । स्वात् । अधि । स्नुऽभिः । विस्पर्धसः। विऽमहसः जिगाति । शेऽवृधः । नृमिः ॥४॥ अन्वयः- ३२० सु-शुक्वानः सु-भ्वः ये वृहतः दिवः प्र विरे, एवयामरुत् गिरा, येषां सध-स्थे इरी न आ ईप्टे, अग्नयः न, स्व-विद्युतः, धुनीनां प्र स्पन्द्रासः। ३२१ यदा एक्यामरुत् स्तुभिः नृभिः त्मना स्वात् आधि अयुक्तः, (तदा) उस-क्रमः सः समानम्मात् महतः सदसः निः चक्रमे, वि-महसः शे-वृधः वि-स्पर्धसः जिगाति । अर्थ-३२० (सु-शुक्यानः) अत्यन्त तेजस्वी तथा (सुधः) उत्तम ढंग से रहनेहारे (ये जो वीर (यहतः) विशाल (दिवः ) अन्तरिक्ष में मे जाते समय जनता को को हुई स्तुतियाँ (प्र शृण्विर) सुनते हैं, उनकी ही ( एवयाममत् गिरा) एवयामरुत् ऋपि अपनी वाणीद्वारा स्तुति करता है। । येपां सधस्थे ) जिनके प्रदेश में उनके ( इरी) प्रेरक की हैसियत से उनपर (न आ ईऐ ) कोई भी प्रभुत्व नहीं प्रस्थापित करता है; ये ( अग्नयः न ) अग्नि के तुल्य (स्व-विद्यतः) स्वयंप्रकाशी चीर (धुनीनां) गर्जना फरनेहारे शत्रुओं को भी (प्र स्पन्द्रासः) नत्यन्त विकम्पित कर डालनेवाले हैं। ३२१ (यदा एक्यामरुत् ) जव एवयामरुत् ऋपि अपने ( स्नुभिः नृभिः ) वेगवान लोगों के साथ (त्मना ) स्वयं ही ( स्यात् ) अपने निवासस्थान के समीप (अधि अयुक्त ) अश्व जोतकर तैयार हुआ, तय (उर क्रमः सः) वडा भारी आक्रमण करनेहारा वह मरतों का संघ (समानस्मात् ) सव के लिए समान पसे (सदसः) अपने निवासस्थानसे (निः चक्रमे ) बाहर निकल पडा और (वि-महसः) विलक्षण तेजस्ली एवं (शे वृधः) मुख नहानेवाले घे धीर (वि-स्पर्धमः ) विना किसी स्पर्धा से तुरन्त उधर (जिगाति) आ पहुँचे। भावार्थ-३२० ये वीर तेजस्वी तथा अरछा आचरण रखनेवाले हैं। ये स्वयं-शापित है, इन पर अन्य किसी की प्रभुना नहीं प्रस्थापित है। ये स्वयंमासी होने हुए गरगनेवाले बडे बडे वीर दुश्मनों को भी भयभीत कर देते है, जिससे वे कापने लगते है। ३२१ जन प्रापि इन पौरों का सुस्वागत करने के लिए तैयार हुमा, तर ये वीर उस अपने निवासस्थल से, जो सब के लिए समान था, निकलार स्वयं ही टम के समीप जा पहुंचे। ये चीर यदे ही तेजस्वी एवं जनता का सुरव यढानेवाले थे। टिप्पणी- [३२०] (1) धुनि (जन् शब्द)- गवनेकाला, वहाद मारनेवाला, (धून कम्पने ) हिलानेवाला। (३) सु-भू- बलवान, सोहट, अच्छे ढंग से रहने वाले । (३) गुस्यन् = (शु- प्रकाशना) = प्रकाशमान, सेजस्वी । येषां इरीन ईटे'- जिन का दूसरा कोई भी प्रेरक नहीं होता है, अर्थात जो स्वयं-शासन हैं । (मंत्र ६८, २९२, ३९८, देखिए ।) [३२१] (1) नमानं सदः - सर लिए समान रूप से खुला हुआ नियासरधान, मैनियों बरक ( Barracks ), (मंत्र ११७, ३४५, ४५७ देषिण।) (२) वि-स्पर्धस् = विशेष रुपी करनेहारे, स्पर्धारहित । (३) (=सुप, शस्त्र) = मुस में बड़े हुए, शस्त्रों में बसे हुए-निगान, पारंगा । (सेव - गुख, मंगमि, संचाई गृधः ) सुख-संपदा वनानेहारे। , शे-वृधः (३२२) स्वनः । न । । अमेऽवान् । रेजयत् । वृपा! त्येपः। ययिः। तविपः । एवयामरुत् । येनं । सहन्तः । ऋजत । स्वऽरोचिपः। स्थाऽरश्मानः। हिरण्ययोः। सुऽआयुधासः । इष्मिणः ॥५॥ (३२३) अपारः । वः । महिमा । वृद्धऽवसः । त्वेषम् । शवः । अवतु । एक्यामरुत् । स्थातारः । हि । प्रऽसितौ । संऽशि । स्थन । ते । नः । उरुप्यत । निदः । क्वांसः । न । अग्नयः ॥६॥ . अन्ययः- ३२० वः अम-चान् वृपा त्वेषः ययि तविषः समः एवयामरत्न रेजयत्, येन सहन्तः स्व-रोचिपः स्थाः-रदमान: हिरण्ययाः सु-आयुधासः इप्मिणः ऋजत । ३०३ (हे) वृद्ध-रायसः ! वः महिमा अपारः, त्वेपं शयः एवयामरुत् अवतु, प्रसिती हि संशशि स्थातारः स्थन, अग्नयः न, शुशुक्वांसः तेनः निदः उरुप्यत । अर्ध-३० (या अम पान ) तुम्हारा वलयान (वृपा ) समर्थ, (स्वेपः) तेजस्वी, (याया) ग्रेग से जानेहारा एवं (तविपः स्वन ) प्रभावशाली शब्द । एक्यामरुत् न रेजयत्) एवयामरुत् प्रापि को फैपित या भयभीत न करे । ( येन) जिससे (सहन्तः ) शत्रुओं का प्रतिकार करनेहारे (स्व-रोचिपः) अपने तेजसे युक्त (स्था:-रश्मानः) स्थायी तेज धारण करनेहारे, (हिरण्ययाः) सुवर्णालंकार पदननेवाले, (मु-हायुधासः ) अन्छे हथियार रखनेवाले तथा ( इमिणः) अन्न का संग्रह समीप रखनेवाले तुम चीर प्रगति के लिए (कम्जत ) प्रयत्न करते हो। ३२३ हे (पृद्ध शवसः!) प्रबल सामर्थ्यवान पीरो! (4ः महिमा) तुम्हारा बडप्पन सचमुच (अ पारः ) असीम एवं अमर्याद है। तुम्हारा ( त्वेषं शयः) तेजस्वी यल इस (एचयामरत् भवतु ) एक्यामरन् प्रापि का रक्षण कर । शत्रु का (प्रसितो) आक्रमण होने पर भी (संशि हरिपथ में ही नुम स्थातार' म्थन ) स्थिर रहते हो। (अग्नयः न) अमितुल्य (शुशुपयांस.) तेजस्वी (ते)ऐसे एम (न.) हमें (निदः उरप्यत ) निन्दक से बचाओ। भाचार्ध- ३२२ नुम्हारी वनि में मामध्यं है. पर यह कपि उस गम्भीर हाद से भयभीत नहीं होता है, क्योंकि के साथ तुम भन्ने शस्त्र रेकर सब की उन्नति के लिए सचेष्ट रहा करते हो। ३.३ इन योil की महिमा असीम है और उन पे सामर्थ्य से ऋषियों का रक्षण होता है। दुश्मनों की घाई हो, तो वे समीप ही रहते है, इमलिगशीन आपर जनताको मदद करते हैं। हमारी इच्छा है कि, ये हमें निन्दको से बचायें। टिप्पणी- [३२] (१) अम = यर, बोहर, भय, पाक, अनुयायी । (२) गज = वेग से दौडमा, घुसना, प्रयत्न करा, शोमा राना । (२) सह = सहन बरना, धारण करना, पराभव करना, प्रतिकार करमा । [३३] (1) प्रसिति जारा, बंधन, हमरा, शाति, सत्ता । (२) उरप्यु - रक्षा करने की इच्छा करनेहारा । ( उपा)कार करना, रक्षा करना।

(३२४) ते । रुद्रासः । सुऽभसाः । अ॒ग्नयः । यथा । तुविऽद्युम्नाः । अवन्तु । एक्यामरुत् । दीर्घम् । पृथु । पप्रथे। सड़। पार्थिवम् । याम् । अज्मपु । आ । महः। शीसि । अद्भुतऽएनसाम् ॥७॥ (३२५) अद्वेषः । नः । मरुतः । गातुम् । आ। इतन। श्रीत । हव॑म् । जरितुः । एक्यामरुत् । विष्णोः । महः । सऽमन्यवः । युयोतन । स्मत् । रथ्यः । न । इंसना । अपं । द्वेपासि । सनुतरिति ॥८॥ (३२६) गन्त । नः । यज्ञम् । यतियाः । सुऽशाम । श्रोत । हबम् । अरक्षः । एवयामरुत् । ज्येष्ठांसः। न । पर्वतासः। विओमनि। यूयम् । तस्य । प्रऽचेतसः। स्यात। दुःऽधर्तयः । निदः।९ अन्व:- ३-४ सु-मसाः, अग्नय यथा तुवि-घुम्नाः, ते रुद्रास एक्यामरुत् भवन्तु, दीर्घ पृथु पार्थिव सद्म पप्रथे, अहुत एनसां येपां अमेषु मह शर्धासि आ। ३०५ (हे ) मरुतः ! अ-देपः गातुंन आ इतन जरितु एवयामरुत् हवं श्रोत (हे) स मन्यव ! विष्णोः महः युयोतन, रथ्यः न स्मत्, दंसना सनुतः द्वेषांसि अप। ३२६ (हे) यज्ञियाः ! सु-शमि र यशं गन्त, अ-रक्ष एवयामरत् हवं श्रोत, घि- ओमनि, पर्वतास न, ज्येष्ठास , प्र-चेतसः यूयं तस्य निद दुर्-धर्तयः स्यात । अर्थ ३२४ (सु-मपा.) उच्च कोटि के यश करनेहारे, (अग्नयः यथा ) अग्नि के तुल्य (तुवि धुम्ना.) अति तेजस्वी (ते रद्रासः) वे शत्रु को रुलानेवाले वीर (एक्यामरुत् अवन्तु एययामरत् अपि का संरक्षण करें। (दीर्घ ) विस्तीर्ण तथा (पृथु ) भव्य (पार्थिवं सम) भूमंडल पर का निवासस्थान उन्हीं के कारण (पप्रथे ) विख्यात हो चुका है। (अद्भुत एनसां) पापरहित ऐसे (येषां) जिन वीरों के ( अज्मेषु ) आममणों के समय ( महः शासि ) बडे बडे बल उनके साथ (भा) जाते है। ३२५ हे ( मरतः ! वीर मरतो । ( अ-द्वेषः ) द्वेष न करनेदारे तुम वीरों के (गातुं ) काव्य का गायन करने के समय तुम (नामा इतन) हमारे समीप आओ। (जरितुः एययामरुत्) स्तुति करनेवाले, पक्यामरुत् ऋषि की यह प्रार्थना (श्रोत ) सुन लो । हे ( समन्यवः!) उत्साही वीरो! तुम (विष्णो. महः) व्यापक देव की शक्तियों से (युयोतन ) एकरूप वनो । तुम ( रथ्यःन) रथम जोतनेयोग्य घोडे के समान (स्मत् ) प्रशंसा के योग्य हो, इसलिए (दंसना) अपन पराक्रम से, फर्म से (सनुतः उपांसि ) गुप्त शत्रुओं को (अप ) दूर हटाओ। ३२६ हे (यरियाः' ) पूज्य बरो! (सु-शमि) अच्छे शान्त ढंगसे (नः यज्ञ ) हमारे यशकी ओर (गन्त ) आओ। (अ-रक्षः ) अरक्षित ऐसे (एवयामरत्) एवयामरुत् मपि की (हवं) यह प्रार्थना (श्रोत ) सुनो । (वि-जोमनि ) विशेष रक्षण के कार्य में तुम (पर्वतासान) पहाडों के तुल्य (ज्येष्ठासः) श्रेष्ठ हो । (प्रचेतसः उत्कृष्ट ढंग से विचार करनेहारे तुम (तस्य निदः) उस निन्दक के लिए (दुर-धर्तवः) दुर्धर्ष-अजिंक्य (स्यात) वनो। , ) बृहस्पतिपुत्र शंयुम्लपि (तृणपाणि) (ऋ० ६४८।११-१५,२०-२१) (३२७) आ। सखायः । सवाऽदुधाम् । धेनुम् । अजध्वम् । उप । नव्य॑सा । वचः। सृजयम् । अनपऽस्फुराम् ॥११॥ . . (३२८) या । शघीय । मारुताय । स्वऽभानवे । श्रयः । अर्मृत्यु । धुरंत । या । मुळीके । मरुताम् । तुराणाम् । या। सुम्नैः । एवऽयावरी ॥१२॥ (३२९) भरत्ऽवाजाय । अब । धुक्षत । द्विता । धेनुम् । च । विश्वऽदौहसम् । इपम् । च । विश्वभौजसम् ॥१३॥ अन्ययः- ३२७ (हे) सखायः ! नव्यसा वचः सवर-घां धेनुं उप आ अजध्वं अन्-अप स्फुरां सृजध्वं । ३०८ या स्व-भानवे मारताय शर्धाय अ-मृत्यु श्रवः धुक्षत. या तुराणां मरतां मुळीक, मुम्नैः एवया--वरी। ३२९ भरत्-वाजाय द्विता अब धुक्षन, विश्व- दोहसंच धेनुं विश्व भोजसं इपंच। अर्थ ३२७ हे (सखायः!) मिनो! ( नव्यसा वचः) नया काव्यगायन सुनते हुए (सवर-दुधां) विपुल दूध देनेहारी (धेनुं उप) गाय के निस्ट ( आ अजयं) आओ और उस (अन् अपस्फुरी) स्थिर गो को (एजध्वं) बंधन में से छोड दो। ३२८ (या) जो (स्व भानवे ) स्वयंप्रकाशी ( मारताय शर्धाय ) वीर मरुतो के यल के लिए दुग्धरुप (अ-मृत्यु ) कभी नष्ट न होनेवाली (श्रयः) सम्पत्ति का (धुक्षत) उत्पादन करती है, (या) जो (तुराणां मरतां )वेगवान वीर मरुतों को (मुळांके ) आनन्द देने के लिए तत्पर दीप पडती है,(या)जो (मुम्ने. ) अनेक मुखों के साथ (एक्या-वरी ) आकर इच्छा का पति करती है। ३२९ हे वीरो ! (भरत्-याजाय ) झापि भरताज को (द्विता) दोदान (अय धुक्षत)दे दो, एक तो (विश्व दोहसं धेनुं ) सय के लिए दूध देनेहारी गाय और दूसरा (विश्व भोजसं ) सब के भरणपोपण के लिए पर्याप्त { इयं च ) अन । भावार्थ- ३२७ नये काव्य का गायन करते हुए सहर्ष गौ-शाला में जाकर यथेष्ट दूध देनेहारी तथा दुहते समय मिश्रल सदी रहने वाली फे समीप चलकर उसे पहल बंधन से उन्मुक्त करना चाहिए। ३२८ गौ अपने जीरनवर्धक दूध से वीरों को वृद्विगत करती है । वह उनै हपं देती है और कई प्रकार के मुनों को साफ रेकर उन के निकट जाकर इण्टाभों की पूर्ति करती है । ३२९ प्रचुर मात्रा में दूध देनेहारी गौ तसा यथष्ट भन्न का सृजन करनेवाली भूमि दो वस्तुएँ समीप हो, तो जीपननिर्वाह की कठिन समस्या हल होती है और आजीविका की सुविधा हुआ करती है। % 32 मुख, वैभव, भारोग्य, शांति । (२) अ-रक्ष - ( नास्ति रक्षा यस्य ) अरक्षित । (३)वि+आमन् (विशेष) संरक्षण, कृरा, दया। [३२७] (1) स्फुर- हिलना। अनपस्पुर स्थिर तथा अचल रूपसे खो रहना। अन्-अप-स्फुरा = दूध दुइत समय न दिलते हुए शांता से खड़ी होनेवाली (गाय ।) [३८] (1) एवया - रक्षा करना, धेगक जाना, इच्छापूर्ति करना । (२) अ मृत्यु-श्रयः = मृत्यु को दूर हटानेवाला यश, तुरन्त निचोडा हुआ धारोग दूध । [३२९] भरत्- वाज = एक प्रापि का माम, (खो भस, पल एवं सम्पत्ति को समद्धि करता हो।)

अन्वय . (३३०) तम् । वः । इन्द्रम् । न । सुऽक्रतुम् । वरुणम्ऽडा । मायिनम् । अर्यमणम् । न । मन्द्रम् । सुप्रऽभौजसम् । विष्णुंम् । न । स्तुपे । आऽदिशे ॥१४॥ (३३१) लेपम् । शर्धः। न । मारुतम् । तुविऽखनि। अनर्वाणम् । पृपणम् । गम् । यया । शता। सम् । सहसा । कारिपन् । चर्पणिऽभ्यः । आ । आपिः । गूहा । गएँ । कम्त् । सुऽनेदो । न । वसुं । करत् ॥१५॥ (३३२) गामी । वामस । धूतयः । प्रऽनीतिः । जस्तु । सुनृता । देवस्य । वा । मस्तः । मय॑स्य । गा। ईजानस्य । प्रऽयज्यवः ॥२०॥ ३३० इन्द्र न सु-कतु, वरुणश्व मायिन, अर्यमण न मन्द्र, विष्णु न सृा भोजस व त आ दिशे स्तुपे। ३३१नत्वप सुवि स्वनि जन् अर्घाण पूषण मारत शर्थ यथा चर्षणिभ्य शतास सहना स आ कारिपत्, गृल्हा वसु आदि करत, न. वसु सु-वेश करत् । ३३२ (रे। धृतय प्र-ययन मरत. 1 देवस्य पाईजानस्य मय॑स्य वा वामस्य प्रनीति वामी सूनृता जस्तु । अर्थ- ३३० (इन्द्र न) इन्द्रये समान (सु-कतु) अच्छे कर्म करनेदार (वरणव ) वरण की नाह (मायिन ) कुशल कारीगर (अर्यमण न ) अर्यमा तुत्य (मन्द्र) जानन्ददायक (निष्णु न विष्णु के जसे (सृम-भोजस) पर्याप्त अन्न देनेवाले, पालनपोपण करनेद्वारे (व त) तुम्हारे उन पीरो सवी, हमें (आ-दिशे) मार्ग दर्शाये, इसलिए (स्तुपे ) सराहना करता ह। ३३१ (न) जर (त्वेप) तेजस्वी (तुषि-स्वनि ) महान जावाज करनेहारे, (अन्-अर्वाण) शन रद्वित तथा ( पूषण ) पोपण करनेवाले (मारत शर्ध ) उन वीर मरतोका साघिय वल (यथा) जस (चर्षणीभ्य ) मानयों को (शता स) सो गकार के धन या (सहस्रा स) हजारो ढग के धन एकही समय (आ कारिपत्) समीप राये और (गृल्हा वस ) गुप्त धनको (आवि रत्) प्रकट कर, उसी प्रकार (न ) हमे (वस) धन (स-वेदा) सुगमतापूर्वक प्राप्त हा सके एसा करे । ३३२ हे (धृतय ) शत्रसेनामा हिला दनेवाल तथा (प्र-यन्यत्र ) अत्यन्त पूजनीय (मस्त !) वीर मरतो (देवस्य वा) देवकी या ( ईजानस्य मयस्य वा) यज्ञ करनेचारे मानवी (वामस्य प्र नीति.) धन पानेको प्रणाली (वामी) प्रशसनीय नया ( सूनता ) सत्यपूर्ण ( अस्तु) हो जाण । भावार्थ-३३० अच्छे कर्म करनेहार, कुशल, आनन्दप्रद ण्व पयाप्त भन्नपानीय देवाल पीरो के का प्र का गाया हम प्रवतित करते हैं, क्योंकि उस के कारण सम्भव है कि हम उनि पथ का ज्ञान हो जाय । इन माम इद का पराकम, घरण की अर्थमा का मुखदायित्व और विष्णु का प्रजापालक व समाया हुआ है। ३३१ अजात शनु ण्व महावर धान वीर मस्त अपने घर से सभी नानवाको विभिन्न ढग के धन द चुके है आर उसी प्रकार वह मुण भी मिल सके, "साव कर । ३३२ गाव न्यायपूर्वक धन प्राप्त कर । टिप्पणी- [३३०] (1) भोजस् = सानपान, भन । (२) सृम भांजर = भरपट मन दनेवाला । (सूप धीरंधीर भाना, सरकते हुए नाना, भुन - रक्षा करना उपभोग रता, सत्ताप्रदर्शन करना) शरण आये हुए लोगो की रक्षा करनेवाला शत्रु पर सत्ता प्रस्थापित करनवाला । (३) जादिष्टा = दर्शाना, पथप्रदर्शक होना, आशा देना लक्ष्यवेध करना। [३३१] (१)गृह वसु = भूमि म पा हुआ धा (सी सपति? ) गुप्त धा। (२)भार (1o bring near ) समीप हाना, बोरग, पूर्ण सासे बना 1 (३) अ = (गता हिसाया च) अर्बन गतिमान, घोडा, हिसक दुश्मा । अना= अ शत्रु भातशत्रु, पिस के समीप घोडा न हो। [मत्र ६ मरा [हि ] १७ कुशलता, अन्यय (३३३) सद्यः । चिन । यस्य । चर्कतिः। पारे । द्याम् । देवः । न । एति । सूर्यः । त्वेपम् । शवः । दधिरे । नाम । यझियम् । मुरुतः । वृऽहम् । शवः। ज्येष्ठम् । वृत्रऽहम् । शनः ॥२१॥ वृहस्पतिपुत्र भरद्वाज ऋषि (ऋ० ६१६६१-११) (३३४) वपुः । नु । तत् । चिकितुपे । चित् । अस्तु । समानम् । नाम । धेनु । पत्य॑मानम् । मतेषु । अन्यत् । दोहसे । पीपार्य। सुकृत् । शुक्रम् । दुदुहे । पृश्निः । ऊधः ॥१॥ (३३५) ये । अग्नयः । न । शोशुंचन् । इधानाः। द्विः। यत् । त्रिः । मरुतः । युधन्त । अरेणवः । हिरण्ययासः । एषाम् । साकम् । नृम्णैः । पौंस्यैमिः । च । भूवन् ॥२॥ ३३३ यस्य चरति देघः सूर्य न, सद्य चित् द्यां परि एति मरतः त्वेपं शवः यक्षियं नाम दधिरे, शयः पुत्र-हं पुत्र-हं शयः ज्येप्टं। ३३४ तत् धेनु समानं नाम पत्यमानं वपुःन चित् चिकितुषे अस्तु अन्यत् मर्तेषु दोहसे पीपाय, शुक्र सकृत् पृश्नि ऊधा दुदुहे। ३३५ ये मरत . इधाना. अग्नयः न, शोशुचन् , यत् द्वि पिः ववृधन्त, एषां अ-रेणवः हिरण्ययास. नृम्णे पोस्योभ च सा भूयन् । अर्थ-- ३३३ ( यस्य ) जिनका (चर्दृतिः) फर्म ( देवः सूर्य: न ) प्रकाशमान सूर्य के तुल्य ( सद्यः चित्) तुरन्त ( द्यां परि एति) धुलोक्में चारों ओर फैलता है, उन (मरतः) धीर मरताने (त्वे शवः) तेजस्वी यल तथा ( यशियं नाम ) पूजनीय यश (दधिरे) प्राप्त किया। उनका वह (शयः) यल (वृत्र-ह) वृना वध करनेवाला था और सचमुच वह (वृत्र हं शवः ज्यष्ठं) नविनाशक बल उच्च कोटिका था। ३३४ (तत्) वह जो (धेनु समानं नाम) धेनु एकही नाम है. (पत्यमानं) उसे धारण फरले. घाटा (चपुः) स्वरूप (नु चित्) सचमुचही (विकितुपे) ज्ञानी पुरपोको परिचित (अस्तु) रहे। (अन्य) उनमेसे एक रूप ( मतेपु) मानयोम मर्त्य लोकमें (दोहसे) दूध का दोहन करने के लिए गोरूप से (पीपाय) पुष्ट होता रहता है और (शुकं) दूसरा तेजस्वी रूप (सरत्) एक धारही (पृश्निः ) अन्तरिक्ष फे मेघरूपी (ऊधः) दुग्धाशय से (दुदुहे) दोहन किया हुआ है। ३३५१ ये मरतः) जो मरत्-चीर (इधानाः) प्रज्वलित (अग्नयःन) अग्निके तुल्य (शोशचन्) द्योतमान हुआ करते हैं और (यत् ) जो (द्वि: त्रि.) दुगुनी या तिगुनी मात्राम बलिष्ठ होकर (वृधन्त) पढत ह (एपां) इनके रथ ( अ रेणवः) निर्मल (हिरण्य यासः) स्वर्णरन्जित है, और वे धीर (नृम्णः) शुद्धि तथा (पोस्येमि च सार्क) बल के साथ (भूवन् ) प्रकट होते है। भावार्थ-३३३ जैसे सूर्य का प्रकाश द्युलोक मे पेलता है, उसी प्रकार मह स स स सर्दिक मसाला हे भोर घेरनेवाल शत्रु को कुचल देता है। ३३४ दो प्रसिद्ध गौएँ धेनु' नाम से विख्यात है । एक धेनु नामवाली गोमाता मानवोंक पोषणार्थ दूध देती है और दूसरी अन्तरिक्षम रहनेवाली (मेघरूपी माता) धर्षमे एक बार जलकी यथेष्ट धपा करके सबको तृप्त करती है। ३३५ वीर सैनिक अपने वलको दुगुना, तिगुना बतासे हैं धौर भदाधिक बढ़े हो जाते है। इन के रथ साफसुधरे तथा स्वर्गसे विभूषित है। अपनी बुद्धि तथा बलको व्यक्त करके ये वीर विख्यात बनते हैं। टिप्पणी देखिए। [३३९] (1) याम= धन । (२) नीतिः = वर्ताव रखने के नियम । (३) प्रनीति:: मार्गदर्शकता, पाय । (१) सूनृत= रमणीय, सत्यपूर्ण, मन पूर्वक, सौम्य, विनयशील । ३ि३३] (1) वृत्रा: (घृणोति इति) कनेगला, वेष्टनकर्ता, शत्रु प्र राक्षस । (२) चर्कतिः= कृति, धर्म, पारंवार की जानेवाली कृति, यश, कीति । (३) यक्षियं नाम:मन्य १ तथा १४९ टिप्पणी देखिए। [३३४] (6) वपुः=शरीर, सुन्दर, भाकृति, D (३३६) रुद्रस्य । ये । मीळ्हुपः । सन्ति । पुत्राः। यान् । चो इति । नु । दाविः । भरध्यै । विदे। हि । माता । महः । मही । सा। सा । इत् । पृश्निः। सुऽन्ये । गर्भम् । आ । अधात् ॥३॥ (३३७) न । ये । ईपन्ते । जनुषः । अयो । नु । अन्तरिति । सन्तः । अवद्यानि । पुनानाः। निः । यत् । दुहे । शुचयः । अनु । जोषम् । अर्नु । श्रिया । तन्वम् । उक्षमाणाः ॥४॥ (३३८) मा । न । ये । दोहसे । चित् । अयाः । आ। नाम। धृष्णु। मारुतम् । दानाः । न । ये । स्तीनाः । अयास: । मुहा । नु । चित् । सुऽदानुः । अब । यासत् । उग्रान् ॥ ५ ॥ अन्वयः- ३३६ ये मीळ्हुप रुद्रस्य पुत्राः सन्ति, दाधृवि. यान् चो नु भरध्यै, महः हि माता मही विदे, सा पृश्निः सु-भ्वे इत् गर्भ आ अधात् । ३३७ अन्तः सन्तः अवद्यानि पुनाना ये नु अया जनुप. न ईषन्ते, यत् श्रिया तन्वं अनु उक्षमाणा शुचयः जोपं अनु नि दुहे। ३३८ येपु धृष्ण मारतं नाम आ दधाना न दोहसे चित् मक्षु अयाः, सु-दानु न ये अयासः स्तोनाः उग्रान नु चित् महा अव यासत् । अर्थ- ३३६ (ये) जो वीर (मीळहुपः रुद्रस्य) स्नेहयुक्त रगके (पुत्राः सन्ति) सुपुत्र है, (दाविः) सयका धारण करनेवाली पृथ्वी (यान् चो नु) जिनके सचमुचही (भरध्ये ) पालनपोपणके लिए ओर जो (महः हि) महान वीरोंकी (माता) माता होने के कारण (मही) वटी (विदे) समझी जाती है, (सा पृश्नि वह माटभूमि (सु-भ्ये इत्) जनताका कल्याण हो. इसीलिये (गर्भा अधात् ) गर्भ धारण कर चुकी है। ३३७ (अन्तः सन्तः) अन्दर रहकर (अवद्यानि) दोपाको, पापोंको (पुनाना.) पविन करते (ये नु) जो वीर सचमुचही (अया) अपनी गतिसे (जनुषः) जनतासे (न ईपन्त) दूर नहीं जाते है, तथा ( यत् ) जो (श्रिया) अपनी आभासे (तन्वं ) शरीरका (अनु ) अनुकूलतासे (उक्षमाणाः ) यल- वान करते है ये (शुचयः) पवित्र वीर (जोपं अनु । इच्छा अनुकूल दान (निः दुहे) देते रहते हैं। ३३८ (येषु) जिनमें वीर ( धृष्णु) शत्रुसेनाका धर्पण करनेहारा (मारुतं नाम) मरुतोका नाम (आ दधानाः) धारण करते है और जो (दोहसे चित्) जनताके पोषणके लिए (मक्षु । तुरन्त (अया.) भनगामी बनते है ये (सु-दानुः ) अच्छे दानी वीर (न ) अभी (ये) जो (अयास.) भटकनेवाले (स्ती- ना:) चोर है उन्हें (उप्रान नु चित् ) भीषण डाकुओको भी (अव यासत् । परास्त कर देते हैं। भावार्थ- ३३६ थे वीर सैनिक वीरभद्र के सुपुन है। सारी पृथ्वी इनका पोषण करती है। यही कारण है कि पृथ्वी- का बडप्पन चहुँभोर विख्यात है। लोककल्याणके लिए पृथ्वी धान्यरूपी गर्भका धारण करती है। ३३७ ये वीर समाजही रहते है और दोपोंको दूर हटार पविनतापूर्ण वातावरण फैला देते हैं। वे कभी जनताका परित्याग करके दूर नहीं जाते हैं। और अपना तेज बनाकर सबको अनुकतापूर्वक दान देते रहते है। ३३८ जिन्होंने पारका नाम धारण किया है और जो जनताके पुष्टयर्थ प्रयत्नशील यने रहते है वे प्रबर डाकुओंको भी दूर हटाते है। रूप । (२) अन्यत्- दूसरा, पदला हुभा, अलग, अनूठा । (३) चिकित्वस्- जाननेवाका, परिचित, अनुभविक, ज्ञानी। [३३५] (१) रेणुः धूलि, मल, अ रेणवः = निर्मल ( निष्पाप )। [३३६] (१) मीळ्हुप् = (मीदवस्) स्नेहयुक्त, दार, प्रभावी, ऐश्वर्यसंपन्न, सिंचन करनेहाग। (२) दाविः = ( धारणे) सदैव धारण करनेहारी (पृथ्वी)। (३) भरधिः % ( धारणपापणयोः) पारनपोषण 1 [मह. माता मही] = महान् पुरपाकी माता है, क्या इसीलिये पृथ्वीको 'मही' नाम दिया गया है। [३३७] (१) अया = गति । (२ ईप देना, देखना, वाई करना, वध करना, चुपकेसे चले जाना, सटक जाना। (३) जनुस् - उत्पत्ति, प्राणी, जीव, जन्मभूमि । (४) जोप = समाधान, सुख, भानन्द, उपभोग। (५) [अन्तः सन्तः अवद्यानि पुनानाः]= दारीरये , -उठ जाना, (३३९) ते । इत् । उग्राः । शव॑सा । धृष्णुऽमैनाः । उभे इति । युजन्त । रोदसी इनि । सुमेके इति सुऽमके। अर्ध । स्म । एषु । रोदसी । स्वऽगोचिः । । अमवत्ऽसु । तस्थौ । न । रोकः ॥६॥ (३४०) अनेनः । वः । मरुतः । यामः । अस्तु । अनश्वः । चित् । यम् । अति । अरंधीः । अनवसः । अनभीशुः । रजःऽतः । वि । गेर्दसी इति । पृथ्योः । याति । माधन ॥७॥ अन्चय - ३३९ ने शवसा उग्रा धृष्णु सेनाः सुमेफे उभे रोदसी युजन्न इत्, अध स्म एप अम चन्नु गेदसीय शोचि., गैफ न जा तस्थो। ३४० ( है ) मरतः ' यः यामः अन्-ग्नः अस्तु, अन् अभ्यः अरथी चिन् यं अजति , जन-जयसः न-अभीशु रजस तृः साधन गेदमी पध्या:वि याति । अर्थ-- ३३९ (ते) ये शिवसा) अपने बलसे (उग्रा ) उन प्रनीत होनेवाले, ओर (धृष्ण-सेना) साहसी मेनासे युक्त चीर ( समेके । सुहानेवाले (उभे रोदसी । भृलोक एवं धुलोकमै (युजन्त दत् ) सुसज्ज बने रहते हैं। (अध म्म ) और ( अम-वासु) बलवान (एषु) इन वीरोंके तैयार रहते समय (गेदसी) आकाश तथा पृथ्वी र स्व-शोचि. ) अपने तेजस युक्त होते हे मोर पश्चात् (रोकः) उन्हें किसी रकावटसे (न मानन्धी मुठभेड नहीं करनी पडनी हे ३४० है । मात ') वीर मरतो ! ( याम' ) तुम्हारा रथ (जन्-एनः) दोपरहित (अन्तु) रहे, उगे ( अन अन्य ) पोटे न जोने दो, तोभी (अ रथीः) रथपर न बैठनेवाला भी (यं अजति ) जिम चलाता है। आर एस ) जिसमे रक्षारा साधन नहीं नथा ( अन्-भांशुः) लगाम नही ओर (ग्जस् नः) धूल उपानेवाला हो तथापि वह (साधन ) इच्छापूर्ति करता हुआ (रोदसी) आकाश गयं पृथ्वी परके (पथ्या । मागोंमे (चि यानि ) विविध प्रकारोंसे जाता है। भावार्थ- ३३९ ये वीर तथा इनकी माहसपूर्ण सेना सदव संघार रहती है, भत इनकी राहमें कोई रकावर गडी नहीं रहती है। इसी कारण से बिना मिमी पहिगाई या विघ्न के ये अपना कप पूरा करते हैं । ३४० मरतो के रथमे दोप नहीं है। उसमें घोडे नहीं जोते है। जो मनुष्य रथ चलानेसे अनभ्यस्त है। यह भी उसे आरा सस्ता है ! युको समय उपयोग दे सके, ऐसा कोई रक्षाका साधन उसपर नहीं है और खींचनेके लिए र गाम भी नहीं है। यह रथ जर पर माता है, नर धून या गई उडाता हुभा भूमिपरसे जाता है और उसी प्रकार अन्तरिक्षमे से भी जाता है। - -- - WER हार शारीरिक दोष दूर हटाकर रसे पचिप परने नारे (अध्यात्मपक्ष मात्-प्राण)। ३३८ (१) सृष्ण नाम = ऐमा नाम रि निमसे शनुमे दिर में भय उत्पन्न हो। (२) स्लोन = र, चोर, उचय।। (३) यसः प्रपन करना। न+यस%3D दूर करना, इटाना। [३३] () रोम तेजस्विता, दीहि । [३४०] (1) अपमं = , मल, संरक्षग, घन, गनि, यश, समाधान, इच्छा, भाकाक्षा । (२) रजस्-तः अन्तरिक्षमेसे गोगो तानेगा । (३) गेदमी पथ्या. यानि अन्तरिक्षगेसे रथ जाता है । (देखो सग ६०,८०)।

तोके । चा (३४१) न । अभ्य । वर्ता । न । तरुता। नु। अस्ति । मरुतः । यम् । अथ । वाऽसातौ । गोषु । तनये । यम् । अप्ऽसु । सः । बुजं । दती । पार्य । अर्ध । योः ॥८॥ (३४२) प्र । चित्रम् । अर्कम् । गणते । तुराय । मारताय । स्वतनसे । भरध्नम् । ये । महामि । सहसा । सहन्ते । रेजते । अग्ने । पृथिवी । मखेभ्यः ॥९॥ अन्धयः- ३४१ मम्त ! वाज-सातो यं अयश अस्य वर्ता न तरता नु न अस्ति, अध तोके तनये गोपु असु वा यं स पार्य द्यो. तज दी। ३४. (हे) अग्ने! ये सहसा सहांसि सहन्ने, मसेभ्य पृथिनी रेजने, गृणते तुगय स्व-तरमे मारताय चि अपभर । अर्थ-३४१ हे (मरत !) वीर मरतो ! (माज सानो) संग्राममें (यं अवथ) जिसकी रक्षा तुम करते हो, (अस्य ) उसका (वर्ता न) घेग्नेयाला कोई नहीं है, या उसका (नरुता) विनाशक भी कोई (नुन मस्ति) नहीं रहता है। (अध) उसी प्रकार (तोके ) पुनाम, (तनये) पोर्नीम, (गोपु ) गोऑम या (असु) जलमें रहनेवाले (यं) जिस मानवका संरक्षण तुम करत हो, (स.) वह (पार्य) युद्धमें (धो.) तेजस्वी युलोरुकी (ज) गोशालाका भी (दर्ता) विदारण करता है, अपने अधीन करता है। ३४० है (अग्ने!) अग्ने ! तया अग्निके अनुयायी लोगो ! (ये) जो अपने (सहसा) वलसे (सहांसि ) शनुओके नाक्रमणों को (सहन्ते) बरदाश्त करते है, उन (मखेभ्यः) बडे वीराके वेगसे (पृथिवी रेजने) भूमितक दहल उठती है, उन (गृणते) स्तोरपाट करनहारे, (तराय) शीत जानेयाले एवं (स्त्र-तवसे) अपने निजी वलसे युक्त (माम्नाय ) चीर मन्ना के संघ के लिए (चिनं) आश्चर्य- कारक, (अ) पूजनीय तथा प्रशंसनीय मत (प्र भरध्वं) पर्याप्त मात्रामें दे दो। भावार्थ- ३४१ ये वीर जिसके सरक्षणका बीडा उठाते है, यह कभी पराभूत या विनष्ट नहीं होता है। पुन, पशुओं या जरप्रवाहोके मध्य रहने वाले जिन अनुयायियोका सरक्षण ये वीर करने एगते है वे स्वर्गके तमाम शाओमा विध्वस कर सकते है, (ऐसी दशामे वे भूम-ल्पर विरनेवाले गनुभोसी पनियाँ उडारेकी क्षमता रखे, तो कोई आप्रयंकी बात नहीं)। ३४. इन चारोवे भाक्रमण के समय पृथ्वी मी रिमपित हो उठनी है। ऐसे इन धीरोये सब को सभी तरह का भन्न दे दो ओर इन्हे मतुष्ट रसो। टिप्पणी--- [३४१] (१) रतु= ( घृणोते:) आवरक, घेरनेवाला, घेटना । (२) वाज.= लाई, शब्द, अन्न, गल, यज्ञ, अर। वाज साति = अन्न पाने के लिए की हुई चढाऊपरी । (३) साति = देना, स्वीकारना, देन, मदद, विनाश, सम्पत्ति । ( ४ ) तरतुः जीतनेवाला, लामामक, पार रे चर नेयारा । (५) बजा= गोष्ट, गौशाला, धोत्रज - स्वर्गकी गोशाला। [३४२] (१) मख - (मय गतौ जाना, दिसना, हिराना) वेगसे जानेहारा, हिलनेवारा, हिलानेवाला, पूज्य, रमणीय, आनदी, चपर, महान, बडा । (२) अर्थ - सूर्य, अग्नि, प्रकाशकिरण, रोज, पूज्य, भांनीय । - । ३४५ अघ . (३४३) विपिऽमन्तः । अधरस्य॑ऽइव । दिद्युत् । तृपुऽच्यवसः । जुह्वः । न । अग्नेः । अत्रयः । धुनयः । न । वीराः । भ्राज॑त्ऽजन्मानः । मरुतः । अधृष्टाः ॥ १० ॥ (३४४) तम् । बुधन्तम् । मारुतम् । भाजत्ऽऋष्टिम्। रुद्रस्य। सूनुम् । हुवा । आ । विवासे ! दिवः । शर्धाय । शुचयः । मनीपाः। गिरपः। न । आपः । उग्राः । अस्पध्रन् ॥११॥ मिनावरणपुत्र वसिष्ठऋपि (२०७१५६।१-२५) (३४५) के । ईम् । विऽअक्ताः । नरः । सऽनौळाः । रुद्रस्य । मयाः । अर्ध । सुऽअश्वोः ॥१॥ अन्ययः-- ३४३ भरतः अधरस्यइव लिपि-मन्तः तृपु-च्यवसः, अग्ने जुतः न, दिद्युत् अर्चयः, वीरान धुनयः, भाजत्-जन्मानः अन्धाः । ३४४ तं वृधन्तं भ्राजत्-ऋष्टि सदस्य सूनुं मारतं हवसा आ विवासे, दिव शर्धाय उग्रा शुचयः मनीषाः, गिरयः आप न, अस्पृध्रन् । रहस्य स-नाळाः मर्या सु-अभ्याः व्यक्ता नरई के ? अर्थ- ३४३ (मरतः) ये वीर मरुत् (अ-ध्यरस्यइय) अहिंसायुक्त कर्मके समान (स्विपि-मन्तः) तेजस्वी, (तृपु-व्ययस) वेगपूर्वक वाहर निकलनेवाले, (अग्ने जुदान) अग्नि को लपटों के सुल्य (दिद्युत् ) प्रकाशमान (अर्चनय ) पूजनीय,( वीरान) वीके समान (धुनयः) शत्रुओंके हिलानेवाले, (भाजत्-जन्मानः) तेजस्वी जीवन धारण करनेहारे हे तथा (अ-धृष्टाः) इनका पराभव दूसरे कभी नहीं कर सकते है। ३४४ (तं वृधन्तं ) उस बढनेवाले तथा (भाजत्-ऋर्षि) तेजस्वी भाले धारण करनेहारे (रद्रस्य सून) वीरभद्रके सुपुन (मारतं) वीर मरतों के संघका में (आ विवासे) सभी तरहस स्थागत करता है। उसी प्रकार (दिवः शर्धाय ) दिव्य बलकी प्राप्ति के लिए हमारी (उग्राः शुचय.) उन तथा पवित्र (मनीषा.) इच्छाएँ (गिरय. आपःन) पर्वत से यहनेवाली जलधाराओं के समान (अस्पृध्रन ) स्पधी करती है। ३४५ (अध) और ( रद्स्य स-नीलामी ) महावीरके, एक घरमें रहनेहारे पीर मर्त्य (सु-अश्या व्यक्ता. नर ) उत्कृष्ट घोडे समीप रसनेवाले, सयको परिचित एवं नेता (६) भला सचमुच कौन है? भावार्थ- ३४३ ये धीर तेजस्वी, वेगसे धावा करनेवाले, शत्रुदरको हटानेवार है, भतएव इनका परामव होना कदापि संभव नही। ३४४ में इन शस्त्रास्त्रांसे सुसज्ज वीसुस्वागत करता हूँ। हम अपनी पवित्र आरक्षों को उनके निकट पडी स्पर्धा भेजने है, ताकि हमें दिव्य धन प्राप्त हो जाय और इस विषय में सचेष्ट रहते हैं कि अधिकाधिक पर हमें प्राप्त हो जाय। ३४. हे लोगो ! जो महावीर सैनिक, जगताके हिसकता एप गच्छे घोडे समीप रखनेवाले होने के फारण सपको परिचित है, भला कौन है? . टिप्पणी- [३४३] (१) तृपु- प्यासा, शीघ्र-वेगसे जानेवाला । (२) च्यु- बाहर निकलना, गिर पडना, टपकना । [३४५] (१) व्यन - साफ दिखाई देनेवाला, प्रकट हुआ, अलकृत, स्वच्छ, सबको भात, सपाना । (२) मर्या- (मपन्यो दिता । सायणभाष्य) मानवौंग हित करने हारे । सदस्य मर्या- महावीरके वीर सैनिक (३) स-नीळा- पर पामें ( Barrack में) रहनेवाले । (देखिये मंत्र ११७,३२१४४७।।

(३४६) नकि । हि । एषाम् ! जनपि । वेद । ते। अङ्ग । विद्रे । मिथः । जनित्रम् ॥२॥ (३४७) अभि । स्वऽपूर्भिः । मिथः । वपन्त । वातऽस्वनसः । श्येनाः । अस्पध्रन ॥४॥ (३४८) एतानि । धीरैः । निण्या । चिकेत । पृश्निः । यत् । ऊधः । मही। जभार ॥४॥ (३४९) सा । विट्। सुऽवीरां । मुरुमिः । अस्तु । सनात् । सहन्ती । पुष्यन्ती । नम्णम् ।।५।। (३५०) यामम् । येष्ठाः । शुभा। शोभिष्ठाः। श्रिया । सम्ऽमिश्लाः। ओज:ऽभिः। उग्राः॥६ अन्वया- ३४६ एप जपि नकिः हि वेद, ते मिथः जनित्रं अङ्ग विद्रे । ३४७ स्व-पूभिः मिथः अभि घपन्त, वात-स्वनसः श्येनाः अस्पृध्रन् । ३४८ धी-स एतानि निण्या चिकेत, यत् मही दिनः ऊधः जभार। ३४९ सा विद मरुद्भिः सु-वीरा, सनात् सहन्ती, नृम्णं पुप्यन्ती अस्तु । ३५० यामं येष्ठाः, शुभा शोभिष्ठाः, थिया सं-मिला, ओजोभिः उग्राः। अर्थ- ३४६ (एपां) इन वीरोंके (जनूंपि) जन्म (नकिः हि वेद) कोईभी नहीं जानता है। (ते) वे पीर ही (मिथः) एक दूसरेका ( जनित्रं ) जन्मस्थान (अङ्ग) सचमुच (विद्वे) जानते हैं। ३४७ ये वीर जव (स्व-पूभिः) अपने पवित्रता करनेहारे साधनोंके साथ (मिथः आभे चपन्त) एका जुट जाते हैं, तव (वात-स्वनसः) पवनके तुल्य वडा भारी शब्द करनेवाले वे वीर (श्येनाः) वाज पंछियोंकी नाई घेगमें (अस्पृधन्) स्पर्धा करते हैं। ३४८ (धीर) युद्धिमान पुरुप इन ही वीरों के (एतानि निण्या)ये गुप्त कार्यकलाप (चिकेत) जान सकता है। (यत्) जिन्हें ( मही) महान (पृश्निः ) गौने अपने (ऊधः ) दुग्धाशयम से दूध पिला. कर (जभार) पुष्ट किया है। ३४९ (सा विद) वह प्रजा ( महद्भिः) वीर मरुतों के सहायता से (सु-चीरा) अच्छे वीरों से युक्त होकर (सनात् ) हमेशा ही (सहन्ती) शत्रुका पराभव करनहारी तथा (नृम्णं पुप्यन्ती) बलका संवर्धन फरनेहारी (अस्तु ) बने। ३५० वे वीर शत्रु पर (यामं) हमले करनेके (येष्ठाः) प्रयत्न करनेहारे, (शुभा शोभिष्ठाः) अलं. कारों से सुहानेवाले, (श्रिया) कांति से (सं-मिला:) जुड़ जानेवाले तथा (ओजाभिः उग्राः) शारीरिक सामर्थ्य से उन स्वरूपवाले प्रतीत होते हैं। भावार्थ- ३४६ किसीकोभी इनका जन्मवृत्तान्त ज्ञात नहीं, शायद ही अपना जन्म जानते हों। ३४७ वीर सैनिक अपनी शक्ति बढ़ाने के कार्यमें चदाऊपरी करते है, होड लगाते है। ३४८ इन वीरोंके शरतापूर्ण कार्य केवल बुद्धिमान पुरुषकोही विदित हैं। इन धीरोंका पोषण गौने भपने दुग्धके प्रदानसे किया है। [ये गांको अपनी माता समझनेवाले है।] ३४९ समूची प्रजा शूर एवं वीर बने, वह अपना बल बढाती रहे और शत्रुका पराभव करती रहे। ३५० ये चीर शत्रुपर हमले चढानेमें तत्पर, शोभायमान, तेजस्वी, एवं सामर्थ्यवान है। टिप्पणी- [३४७] (१) व योना, फैलाना, फेंकना, उत्पन्न करना । अभि-वप् = फैलाना, बोना, ढकना । (२) पू-(पवने) पवित्र करना, स्वच्छ करना, उन्मुक्त करना, [३४८] (१) निण्य- ढका हुआ, गुप्त, आश्चर्य [३५०](१)येष्ठ- (येप प्रयत्न करना, चेष्टा करना, कोशिश करना स्थ- स्थिर रहना) कोशिश करते हुए भटल स्खद रहनेवाल । या जाना, (या+इB) अत्यन्त धेगसे जानेवाले ( अर्थात् शत्रुपर चढाई करते समय गसे जानेवाला) जनक।

अन्वय - (३५१) उग्रम् । यः । ओजः। स्थिरा । शवासि । अर्ध । मस्तभिः । गणः। तुर्विमान् ॥७ (३५२) शुभ्रः । ५. । शुप्मः । कुक्ष्मी । मनांसि । धुनिः। मुनिःऽइय । शर्धस्य । धृष्णाः ॥ ८ (३५३) सनैगि । असत् । युगोतं । दिद्युम् । मा । यः । दुःऽमृतिः । इत् । प्रणय । नः ॥९ (३५४) प्रिया । वः । नाम । हुवे । तुराणाम् । आ। यत् । तृपत् । मुस्तः । पापमानाः ॥१०॥ ३५१ व ओज उग्र शवासि स्थिरा ध मरदि गण तुविष्मान् । १५० च सुप्म शुभ्र मनासि उध्मी धृष्णो शर्धस्य धुनि मुनि इव । ३५३ स-नेमि दिधु परमत् युयोत, य दर- मति इहन मा प्रणक। ३५४ (हे) मरत | तुराणा व प्रिया नाम जाये, यत् पानशाना तृपत् । अर्थ- ३५१ (व लोन ) तुम्हारा शारीरिक सामर्थ्य (उप्र) उग्न स्वरूप का ह गौर तुम्हारे (शवासि स्थिरा) सभी वर स्थिर ह । (जध) और (मरादि ) वीर मरता कारणही (गण ) तुम्हारा सघ (सुवि मान् ) सामध्येचान हो चुका है। ३५२ ( च अप्म ) तुम्हारा पर (शुभ्र ) निप्परक है, तुम्हारे (मासि ) मन शाके बारे में (ध्मी साधसे भरे होत ह पार (धृष्णो ) शनुका धर्पण करने की तुम्हारे । शर्धस्य) सामर्थ्य (धुनि) घग (मुनि इव) मुनिको तरह मननपूरक होनेयारा है। ३५३ यह तुम्हारा ( स नमि) अत्यन्त तक्षिण बाराका ( दिद्यु) तास्वी हथियार ( जलत् युयोत ) हमसे दूर हटाओ। (व ) तुम्हारी शनुको दूर करनहारी बुद्धि ( इह ),यहॉपर (न ) हम ( मा प्रणय ) विनष्ट न ३५४ हे (मरुत ।) पार मरता ' (तुराणा व ) त्वरित कार्य करनेयारे तुम्हारे (प्रिया नाम ) प्यारे नामसे तुम्हें म(आ हुय) युराता ह। (यत्) जिसकीही (पावशाना)च्छा करनेहारे तुम (तृपत्)हत्तहाँ। भावार्थ- ३५१ इन वीराकी शक्ति कभा घरती नहीं, इतनाही नहीं अपितु वह हमशा धन्वीहा है। ३५० वीरोझा यल निप्परक है अत यह, सबका कल्याण करने लिए कार्य करना है, उसम उपयुम ठहरमा । तो पर है उसपरहा कोध करना उचित ह आर विचारसार मनुष्यो तुरय, आक्रमण का वग निश्चित करत समय सावधानीसे काम करना चाहिए। ३५३ चीराका हथियार एवं उनका यह शत्रुको कुचर नकी भायानना कर शनुपरही प्रयुक्त हाय । स्वकीय जनतापर उसका प्रयोग न होने पाय । (नो शस्त्र शनुपर प्रयाग करनेक रिए है, उना उपयाग अपनेही बाधवां तया रोगोंपर नहीं करना चाहिए।) ३५४ वीर सनिक अपना काय शीघ्रतासे करत हैं और सब अपने यशका वणन सुन रते है तब उनुष्ट हो जाता है। । कर। रिप्पणी- ३५१] (१) शवासि स्थिरा स्थायी बल अयान् शत्रु चाहे से भाक्रमण कर ले तोमी या चाह नैसी आपत्तिया उठ खडा हों, तथापि इन यलोम यूना न दीस पड। (२) गण तुविष्मान समूचा सघ बरपान, बुद्धिवान एव सतत बधिष्णु रहनेवाला । (३) तुविर वृद्धि, घर, झार। [३५] (1) मुनि इव धृष्णो शर्धस्य धुनि - मनन करनेहार मानवकी हर चल्ये तत्य, शशविध्वस करनेक लिए कामम आनेवाले सामर्थका धग यही सतर्कतारो निधारित करना चाहिए । विचारवश या गवरेपनसे व्यथही धागाधींगी नहीं मचानी चाहिए । (२)शुभ्र = (गुभ र ) सापसुधरा निर्मर, शुभ, निष्कर । (३) गुप्म म = (स्य, बलि, वायु) शक्ति, बल नाशुप्मन् : पल, शक्ति ता अग्नि। [३५३] ()सनेमिः- (सन-प्रमि ) बहुत प्राचीन (सायण)। सन्नेमि= (नेमि = परिध धारा चतुलसा छोर) अतिशय तीय धारो युन ।

(३५५) सुऽआयुधासः । इष्मिणः । सुऽनिष्काः। उत । स्वयम् । तन्वः । शुभमाना॥११॥ (३५६) शुचर्ची । वः । हुव्या । मरुतः। शुचीनाम् । शुचिम् । हिनोमि । अध्वरम् । शुचिऽभ्यः । ऋतेन । सत्यम् । अतऽसापः । आयन् । शुचिऽजन्मानः । शुचयः । पावकाः ॥१२॥ (३५७) अंसैपु । आ । मरुतः । सादयः । वः । वक्षःऽसु । रुक्माः । उपऽशिश्रियाणाः । वि । विद्युतः । न । वृष्टिभिः । रुचानाः। अनु । स्वधाम् । आयुधैः । यच्छमानाः ॥१३॥ 'अन्वयः-- ३५५ सु-आयुधासः इष्मिणः सु-निप्काः उत स्वयं तन्वः शुम्भमानाः। मरुतः शुचीनां यः शुची हव्या, शुचिभ्यः शुचिं अध्वरं हिनोमि, ऋत-साप. शुचि जन्मानः शुचयः पायकाः प्रतेन सत्यं आयन् । ३५७ ( हे ) मरतः ! वः अंसेपु सादयः आ, वक्षःसु रुक्माः उप-शिनि. याणाः, विद्युतः न, रुचानाः पृष्टिभिः आयुधैः स्वधा अनु यच्छमानाः। अर्थ- ३५५ वे वीर (सु-आयुधासः) अच्छे हथियार समीप रपनेहारे, (इप्मिणः) वेगसे जानेहारे, (मु-निष्काः) सुन्दर मुहरोंके हार धारण करनवाले (उत ) और वे (स्वयं) अपनेही (तन्यः) शरीरों. को (शुम्भमानाः) सुशोभित करनेहारे है। ३५६ हे (मरतः!) वीर मरुतो ! (गुचीनां व ) पविन ऐसे तुम्हें (शुची हव्या) शुद्ध ही हवि. प्पान हम देते हैं, (शुचिभ्यः) विशुद्ध ऐसे तुम्हारे लिए (शुचिं अध्वरं) पवित्र यज्ञको ही (हिनोमि) में करता हूँ। (ऋत-साप.) सत्यकी उपासना करनेहारे, (शुचि-जन्मानः) विशुद्ध जन्मवाले, कुलीन (शुचयः) स्वयं पवित्र होते हुए दूसराको (पावका ) पवित्र करनेवाले नुम (ऋतन) सत्यकी सहायता- से (सत्यं अमरपनको ( आयन् ) पांत हो। ३५७ हे (मरुतः!) वीर मरुतो ! (चः अंसेपु) तुम्हारे कंधोपर (खादयः आ) आभूपण तथा (वक्षःसु रकमाः) छातीपर स्वर्णमुद्राओंके हार (उप-शिथियाणा) लटकते रहते है। (विद्युतः न) बिजलियोंके तुल्य (रचानाः) चमकनेवाले तुम (वृष्टिभिः आयुधैः ) वर्षा करनेवाले हथियारोंको सहाय. तासे (स्य-धां ) धारकशक्ति बढानेवाला पुष्टिकारक अन्न हमें ( अनु यच्छमानाः) देते रहो। भावार्थ- ३५५ वीर सैनिकोके हथियार अच्छे है और वे वेगसे हमला करनेवाले एवं धनाढ्य है। वसो भाभूषणोंसे अपने शरीर को मुशोभित करते है। ३०६ वीर पुरष स्वयमय विशुद्ध है और उनका पताच निदीप है। वे शुद्ध भसका सेवन करते है और सत्यका पालन करते है। वे स्वय पवित्र जीवन बिताते हुए दूसरों को परित करते हैं। सत्यकी राहपर चलते हुए घे अमृतवको प्राप्त कर लेते है। ३५७ कीर सैनिकोके फंघोपर तथा घक्षरपलोपर आभूषण दीख पडते है। दामिनीकी दमकके तुत्य उनके हथियार चमक उटते है। इन अपने हथियारोंसे वे शत्रुदलकी धज्जियाँ उड़ा देते है और हमे पौष्टिक एवं श्रेष्ठ कोटिके भन्न दिया करते है। टिप्पणी- [३५५] (1) निष्क : मुवर्ण, सोनेकी मुद्रा, स्वर्णका अलकार। [तन्यः शुम्भमानाः उत सु- निष्काः] = ये वीर शारीरिक दृष्टया सुन्दर हैं और भलकारोसे भी शोभा एवं चारताको बढाते हैं । इप्मिन् भन्न तथा धनसे युक्त। [३५६] (1) ऋत = ( Right ) सरलता । (२) सत्य = (Sooth) सरय। (३) सप् = (समवाये ) प्राप्त होना । (४) ऋत-सापः = (ऋत = सत्य, सप् = सम्मान देना, जोडना, पूजा करना) सत्यकी उपासना करनेवाले (Observers of law)। [३५७] (१)सादि = भाभूपा वलय, कैंगन । (२) पृष्टि = (प् 3 बलवान होना) बल, वर्षा (किसी भी वस्तुकी यथेष्ट समृद्धि या विपुलता )। (३) रुचानाः- (रच = प्रकाशित होना, मुन्दर दीख पडना, प्रिय होना) प्रकाशमान । मरुन् (हिं.) १८ ११८ । शन्यय (३५८) प्र । बुध्न्यो । यः । ईरते । महौसि । प्र । नामानि । प्रऽयज्यवः । तिरभम् । सहस्रियम् । दम्य॑म् । भागम् । एतम् । गृहऽमेधीयम् । मरुतः । जुपध्वम् ॥१४॥ (३५९) यदि । स्तुतस्य । मरुतः । अधिऽइथ । इत्था । पित्रस्य । वाजिनः । हवीमन् । मक्षु । रायः । सुऽीयस्य । दात । नु । चित् । यम् । अन्यः । आऽदर्भत् । अरावा ॥१५॥ (३६०) अत्यांसः । न । ये । मरुतः । सुऽमञ्चः। यक्षऽदृशः । न । शुभयन्त । मयोः । ते । हhऽस्थाः । शिशवः । न । शुभ्राः। वत्सासः । न । प्रक्रीळिनः । पयःऽधाः ॥१६॥ ३५८ ( है ) प्र-यव्यव. मरतः ! वः बुध्न्या महांसि प्र ईरते, नामानि प्र तिरध्वं, एतं सहनियं दम्यं गृह-मेधीय भागं शुपध्वं । ३५९ (हे) मरतः! वाजिनः विमस्य हीमन् स्तुनस्य यदि इत्या अर्धाथ, सु-वीर्यस्य राय मधु दास, अन्यः अ रावा नु चित् यं आदभत् । ३६० ये मरतः अत्यास न सु-अञ्चः, यक्ष-दशा मर्याः न शुभयन्त, ते हर्येष्ठाः शिशवः न शुभ्राः, पयो धार वत्सासःन प्रकीळिन । अर्थ- ३.८ हे (प्र-यन्यवः मरुतः !) पूज्य वीर मरतो ! (ः) तुम्हारे (बुध्न्या महासि) मौलिक सान्तरीय सामर्थ्य तथा पल (प्रईरते) प्रकट होते हैं। तुम अपने (नामानि ) यशाको (म तिरध्य) पर तटको ले चलो, बढा दो।(एनं) इस ( सहस्रियं) सहस्रावधि गुणोंसे युक्त (दभ्यं) घरके ( गृह-मेधोये) गृदयाके (भाग) विमागका तुम ( जुपचं ) सेवन करो। ३५९ हे (मरत.') वीर मरतो! (वाजिनः) अन्नयुक्त (विमस्य) शानो पुरपकी (हामन्) हरिप्यान मान करते समय की हुई ( स्तुतस्य ) स्तुतियो ( यदि ) अगर (इत्था)इस प्रकार तुम (अर्धाथ) जानते हो, तो (सु-वीर्यस्य ) अच्छी वीरतासे युक्त (रायः) धन (मभु) तुरन्तही उसे (दात) दे दो। नहीं तो (अन्यः) दृारा कोई (अ-राया ) शत्रु (नु चित् ) सचमुचही ( 1 ) उसे ( भादभत् ) विनष्ट कर डालेगा। ३६० (ये मरत । जो चीर मरत् (अत्यास न घुडदोडके घोडाके तुल्य (सु-सञ्चा) उत्तम ढगसे शोधतया जानेवाले है, (यक्ष-दृशः ) यज्ञका दर्शन लेने आये हुए (मर्याः न) लोगोंके तुल्य जो (शुभपन्त ) अपने आपको शोभायमान करते हैं, ते) चे घोर (हर्षे यशः) राजप्रासादमें रहनेवाले (शिशयः न ) वालकों के समान (शुभ्राः । सुहानेवाले ह ओर (पयो-धाः वत्सासन) दूधपर पले जाने वाले वालों के समान प्र-क्रीढिनः) अत्यधिक सिलाडीपनसे परिपूर्ण है। भावार्थ-३५८ वीरों में जो यर दिप पड़े हैं वे प्रकट हों और उनका यश दशादिशामि प्रसृत हो । यज्ञके समय उसये रिपदिय हुम भागका के सेवन करें। ३५९ भन्नदान करते समय दानीकी प्रार्थनाको यदि ये धीर समझ लें, तो ये उसे तुरन्त झुरतामे पूर्ण धन दे दाले । भगर ऐसा न हुआ तो दूसरा कोई शत्रु उस सम्पत्तिको दवा बैटेगा। ३६० ये वीर सैनिक गतिमान, सुशोभित, मुन्दर तथा खिलाड़ी है। टिप्पणी-[३५८] (1) प्र-तिर = मकटोरे पार चर जाना, पैटसी पहुँचना । (२) युध्न्य - शरीर, भाकाश, मौरिक, धरना, अनयागी । (३) दमः-मं - घर, स्वनियत्रण, घोर पनाना, बुरे कर्मसे मनको पास करानेवाली शति । दम्य = घरपर किया हुआ। (४) गृह-मेघ = घरमें किया हुभा यर, गृहस्थका कर्तव्य यज्ञ, गृहस्य | गृह- मेधीय = = गृारसका दिया हुआ, घरके यसका। [३५९] (१) अरावा = (म-रावा) दान न देनेवाला कृपण, दुटामा (दुष्ट लांग, ग)।(२) दश् (दम)= दुवाना (नारा करना) ठगाना, जाना, दयाना । यक्ष - (यम् पूनायो ) पूना, या, यक्षजाविधा पारस [३६० ] (1) .

। (३६१) दशस्यन्तः । न ! मरुतः । मुळन्तु। वरिवस्यन्तः । रोदसी इति । सुमे के इति सुईमैके । आरे । गोऽहा । नुहा । वृधः । वः । अस्तु । सुम्नेभिः । अस्मे इति । वसवः । नमध्वम् ।।१७ (३६२) आ । वः । होता । जोहवीति । सचः। सत्राचीम् । रातिम् । मरुतः । गृणानः । यः । ईवतः । वृषणः । अस्ति । गोपाः । सः । अद्वयावी । हयते । वः । डायः॥१८ (३६३) इमे । तुरम् । मरुतः । रमयन्ति । इमे । सहः । सहसः । आ । नमन्ति । इमे । शंसम् । चनुप्यतः । नि । पान्ति । गुरु । द्वेषः । अरुपे । दुधन्ति ॥१९॥ अन्वय.-- ३६१ दशस्यन्त सुमेके रोदसी परिवस्यन्त मरत. न मृन्तु (हे) चसय । गोहा नृ-हा व पधः आरे अस्तु, सुम्नेमि अस्मे नमन। ३६० (हे ) पण मस्त । सत्त सनाची राति गृणान होता व. आ जोहवीति. यः ईचत गोपा अस्ति स अ द्वयावी वः उक्थै हवते । ३६३ रम मस्त नुरं रमयन्ति, इमे मह सहस. आनमन्ति, इमे शस चनुप्यत नि पान्ति, अरस्पेगुर द्वेष दधन्ति । अर्थ- ३६१ शत्रुओंका (दशस्यन्त.) विनाश करनेहारे तथा (सुमेके रोदसी ) सुस्थिर द्यावापृथ्वीको (वरियस्यन्त.) आश्रय देनेहारे (मरत ) वीर मन्त् (न मृळन्तु) हम सुखी बना दें। हे (वसव !) बसानवाले योगे! (गा-हा) गोवध करनेहारा (नृ-हा) तथा शनुदलम विद्यमान धीराको मार गिरानेवाला (व.पध) तुम्हारा आयुध हमसे (आरे अस्तु) दूर रहे. तुम (सुम्नेमि.) अनेक सुखाके साथ (असे नमध्न) हमारी ओर आने के लिए निकल पटो। ३६२ हे (वृषण मस्त !) बलयान वीर मरतो ! (सत्त) उपने स्थानपर बैठा हुआ तथा (सना-अची) सभी जगह पहुँचनेवाले ( राति) दानकी (गृणान ) स्तुति करनेहारा एवं (होता। युरानेवाला याजक (व आ जोहवीति) तुम्हें घुला रहा हे, (य ) जो (ईचत गोपा) प्रगति करनेवालोंका सरक्षक ( आस्ति ) है, (स ) वह ( अ-द्वयावी ) अनन्यभावसे युक्त होकर (व ) तुम्हारी (उक्थै ) स्तोत्रोंसे (हवते) प्रार्थना करता है। ३६३ (इमे मरत ) ये वीर मरत् (तर) वराशीर चीरोंको (रमयन्ति) आनन्द दते ह। (हम? ये अपनी ( सह । सहनशक्तिके सहारे ( सहस ) विजयधीको (भा नमन्ति ) झुकाते ह, पाते ह । (इमे) ये (शस) स्तोत्रका (धनुष्यत ) आदर फरनेहारे भत्तोंकी (नि पान्त) रक्षा करते है। (अरस्पे) शत्रुओं पर अपना ( गुरु द्वेष ) वडा भारी द्वेष ( दधन्ति ) करते ह । भावार्थ- ३६१ समूचे विश्वको सुख देनेहारे तथा शत्रुका नाश करनेगले ये वीर हमे मुख दें । इनके जो हथियार शदर के सहारक है, पे हमपर न गिर पड़ें। उनके कारण हम मौत के मुहमे न चले जायें। हमे ये सभी प्रकार सुग्य ३६२ याजक इन वीरोको यज्ञम धुला लता है और वह प्रगतिशील मानवाका सरक्षण करता है। वह घर कपटपूर्ण वर्ताव न करता हुभा वीरो काव्यका गायन करता है। ३६३ जा शाघ्र कर्म करते हैं, उन वीर पुरष मानन्दित करते हैं, अपने पारपसे विजयी बनते है, भरहों का सरक्षण करते हैं और गनुओं परही अपना सारा कोध ढारत है। टिप्पणी- [३६१(.) सु-मेक सुस्थिर । ( २ ) दशस्यन्त = ( दश= चयाचमाकर साना, काट माता, [नाश करना] विनाशक । (३) वरिवस्यन् - स्थान दनेहारा, विश्राम देनेवाला । परिवस्- स्थान, विनाम, मुग्य। [३६२४ (१)सत = (सद् बैठना ) स्थानापन्न हुआ, अपनी जगह बैठने वाला। (२) राति = दान, उदार, मित्र, कृपा । (३) ईवत्- जानेवाला, (प्रगति करनेहारा) अत्यन्त बडा भन्य । (४) -याविन्= द्विधा भाव निसार नहीं (भनन्यभावसे प्रेरित ), अदर एक बाहर भन्यही कुछ यो आचरण न करनेवाला । (५) गो-पागोका मरक्षक, सरक्षक। [३६३] (1) तुर. = घेगवान, शक्तिमान, भप्रगामी, प्रगतिशीर, घायल, वेग। (२) सहस् = वर, वेग, तेस, जल, विजय । (३)नम् = शुकना, मुना, (पाना ) (१) यन - (सन्दपाचनसमतिपु) = सम्मान देना, पूजा ~ १४० अन्वय (३६४) इमे । रधम् । चित् । मुरुतः । जुनन्ति । भृमिम् । चित् । यथा । वसवः । जुपन्त । अपं । बाधध्वम् । वृषणः । तमांसि । धत्त । विश्वम् । तनयम् । तोकम् । अम्मे इति ॥२०॥ (३६५) मा। वः । दात्रात् । मरुतः। निः। अराम । मा। पश्चात् । दुम । रथ्यः। विऽभागे। आ। नः । स्पाहे । भजतन । वसव्ये । यत् । ईम् । सुजातम् । वृषणः । व: । अस्ति ॥२१॥ • ३६४ इमे वसवः मरतः यथा र चित् जुनन्ति भूमि चित् जुपन्त, (हे) वृषणः । तमांसि अपवावं, अस्मे विश्व तोकं तनयं धत्त । ३६५ ( है ) रथ्यः मस्त ! व. दात्रात् मा निः अराम, वि-भाग पश्चात् मा दध्म, (हे) पण.! व सु-जातं यत् ई अस्ति स्पाहे वसव्ये न आ भजतन । अर्थ- ३६४ ( इमे ) ये (घसवः) वसानेहारे ( मरुतः) वीर मरत् ( यथा) जैसे (र, चित्) समृद्धि शाली मानयके निकट (जुनन्ति) जाते हैं, उसी प्रकार (भृमि चित्) भटकनेवाले भीखमँगेके समीप भी ये (जुपन्त) जाते रहने है है (वृपण ') बलिष्ठ वीरो! (तमांसि अप बाधध्वं ) अंधेरे को दूर हटा दो और (अस्मे ) हमारे लिए (विश्वं तनयं तोक) सभी पुत्रपौॉ संतानों-को (धत्त ) दे दो। ३६५ है ( रथ्यः मरतः । ) रथपर बैठनेवाले वीर मरुतो ! (२) तुम्हारे (दामात् ) दानके स्थानसे हम ( मा निः भराम । बहुत दूर न रहं । (वि-भागे) धनका बँटवारा होते समय (पश्चात् मा दध्म ) हमें सबके पीछे न रखो। हे ( वृषण!) बलिष्ठ धीरो! ( वः) तुम्हारा ( सु-जातं) उच्चकोटिका (यत् ई) जो कुछ धन (अस्ति) है, उम (स्पाहें वमव्ये ) स्पृहणीय धनमें (न:) हमें ( आ भजतन) सब भगारसे अंशभागी करो। - भावार्थ-३६४ वीर सैनिक जिस प्रकार धनादयों का संरक्षण करते हैं, उसी प्रकार वे निधनाकामी संरक्षण करते है। वीरों को उचित है कि वे जिधरभी चले जाय उपर अधियारी दूर करके पत्रको प्रकाशका मार्ग बतादें। हमारे पुत्रपौत्री- को सुरक्षित रस दे। ३६५ हमे धनका बटवारा ठी समयपर मिल जाय । करना, उच्चार करना, हूँढना, प्रिप होना। (५) अररस् = जानेवाला, हिलनेवाला, शत्रु, शस्त्र,(भ-प्रय छन्, सापनः । ) रा = देना, ररस् = देनेवाला, अ-रस न देनेहारा, ओ दान न देता हो--(कम, कृपण।) [३६४ (१) रध = (राध संप्तिद्धी) - धनिक, उदार, मुखी, दुःख देनेवारा, पूजा करनेहारा । (२) भूमि = (भ्रम् चलने = भटकना ) मेंझावात, शीघता, इधर उधर घूमनेवाला (भीम्बभंगा)। (३) जुन् ( गनी) - जामा, हिरना। [३६५] (१) दात्रं = काटनेका हथियार, दान, दानका धान । दा+ = जिस दानसे प्राण-रक्षण हो, यह दाना (३६६) सम् । यत् । हर्नन्त । मन्युऽभिः । जनामः । शूराः । यह्वी' । ओषधीषु । विक्षु । अर्ध । स्म । नः । मरुतः । रुद्रियासः। गातारः । भूत । पृतनासु । अर्यः ॥२२॥ (३६७) भूरि । चक्र । मरुतः । पित्र्याणि । उक्यानि । या । वः । शस्यन्तै । पुरा । चित् । मरुत्तभिः । उग्रः । पृतनासु । साळहाँ । मरुभिः । इन् । सनिता । वाजम् । अौ ॥२३॥ अन्यय - ३६६ (है) रद्रियासः अर्य' मरत ! यत शूरा जनास यहीपु ओपधीपु विक्ष मन्युभि. म हनन्त अध पृतनासन प्रातार भूत स्म। ३६७ (हे ) मरुतः ! पित्र्याणि भूरि उक्धानि चक्र, व या पुरा चित् शस्यन्ते, उन मन्दिः पृतनासु साहा, मरदिः इत् अर्वा वा सनिता। अर्थ- ३६६ हे (रुद्रियास:)महावीरके (अर्य) पूज्य (मरता!) वीर मरतो!(यत्)जय तुम्हारे (शूराः जनास) शर लोग (यहीपु) नदियों में (ओपधीपु) अरण्य मे-वृक्षकुंजम (विक्षु ) प्रजा में ( मन्युभिः) उत्साह- पूर्वक शत्रुपर (सं हनन्त) मिलकर हमला करते है (अध) तर इन ऐसे (पृतनासु) युद्धा में (न) हमारे (प्रातारः भूत स्म) संरक्षक बने रहो। ३६७ हे (मस्त !) वीर मरतो! तुम (पित्र्याणि ) पितरो के संबंध में (भूरि) यहुतसे (उक्थानि) स्तोत्र (चक्र) कर चुके हो, (घ ) तुम्हारे (या) इन स्तोत्री की (पुरा चित्) पहलेसे (शस्यन्ते) प्रशंसा होती है । (उग्र ) उग्र स्वरूपयाला चीर (मसदि) मरताकी सहायतासे (पृतनासु) युद्धो में शत्रुओं का (साल्हा) पराभव करता है, (मगहिः इत् ) चीर मस्तकी प्रेरणासे (अर्वा) घोडा भी (पाज) युद्धक्षेत्रके । सनिता) अपने कार्य पूर्ण करता है। भावार्थ- ३६६ वीर सैनिक जब उत्साहपूर्वक शत्रुपर हमले करते हैं, तब उनकी राइयो नदियोमे, भरण्याम विद्यमान धने निकुन मे तथा जनताके मध्य हुमा करती है। ऐसे युद्धीमे वे हमारी रक्षा करे । ३६७ वीर मरत कवि हैं । उनके कान्योकी प्रशप्ता सभी करते हैं और इनकी सहायतासे वीर सैनिक शत्रुभोंको पराम करते हैं तथा घोडे भी युद्धमे भपना कार्य ठीक प्रकारसे निभाते हैं। टिपणी- [३६६ ] (1) यव पडा, शनि मान, चपर, चचर । यही नदी, भाकाश, पृथ्वी, प्रात काल का- सायकालका दिनका रात्रिका भाग । युद्ध तीन साल में हुआ करते है । (१) यद्वीपु- नदियोके स्थरमे, नदी लाँधते समय हमले होते हैं। (0) ओपधीपु-नगरोमे, मघन वृक्षनिकुशीम गिरे ढगसे बैठकर शत्रुपर चढाई की जाती हैं और (३)विधु- जनतामे, नगरी घनी यस्तियों के मध्य, नगर कजे में लेने के लिए । इस भाँति तीन प्रकारके समरोम ये चीर हम बचायें । (२) ओषधी- (दोपधी, निरक्त) शरीरके दोष हराने के लिए उपयुक्त भीषधि (भोष ) वेन (घी) धारण करनेहारी वनस्पति, जगल, कुग, भरण्य । [३६७] (1)उवाक्य, श्लोक, स्तोत्र, य:। (२) वाज-मन, युद्ध, जल, वर । (३) साळ्हा (माः पराभव करना, जीतना) पराभव करनेहारा, विजेता। (४) सन् = (समती) विभाग करना, सेवन करना, पाना, प्रिय होना, सम्मान देना । मग्नीके कवि होनेके मम्पन्धमे महेख २२०२०॥ २९४ ००९, ३९३ मग्नाम देखिए । - . . . , १४ (३६८) असे इति । वीरः । मरुतः । शुप्मी । अस्तु । जनानाम् । यः । असुरः । विर्ता । अपः । येन । सुऽक्षितये । तरैम । अर्ध । स्वम् । ओकः । अभि । यः। स्याम ॥२४॥ (३६९) तत् । नः । इन्द्रः । वरुणः । मित्रः । अग्निः। आपः। ओषधीः । निनः । जुपन्त । शमैन् । स्याम । मरुताम् । उपऽस्थे । यूयम् । पात । स्नस्तिऽभिः। सदा । नः॥२५॥ (ऋ० ७५७१-७) (३७०) मधः । या । नाम : मारुतम् । यजत्राः। प्र । यज्ञेषु । शवसा । मदन्ति । ये। रेजयन्ति । रोदसी इति । चित् । उर्वी इति। पिनन्ति । उत्सम् । यत् । अयांसुः । उग्राः ॥१॥ जन्नय.-३६८ हे। मरतः' य असु-र जनाना विधर्ता अस्मे वीर: गुप्मी अस्त, येन सु-क्षितये अप तरेम, घ च स्वं ओर अभि स्याम । ३६९ इन्द्र. मित्र वरुणः अग्नि. आप ओपछी यनिन नः तत् जुपन्त, मरतां उप-स्थे शर्मन् स्याम. यूर्य सस्तिभिः सदा न पात । ३७० ( है ) यजना.! वः मारुतं नाम मध्न यशेषु शवसा प्र मदन्ति, यत् उग्रा अयासु , ये उर्वी चित् रोदसी रेजयन्ति, उत्सं पिन्वन्ति । अर्थ- ३६८ हे (मगतः!) वीर मरतो ! । य ) जो अपना (असु-र.) जीवन देकर (जनानां वि धर्ता) रोगों का विशेष ढंगसे धारण करता है वह ( अस्मे वीर' ) हमारा वीर (गुप्मी अस्तु ) बलिष्ठ रहे। (येन । जिनकी सहायतासे हम (सु क्षितये ) उत्तम निवास करने के लिए (अप.) समुद्रको भी (तरेम) तैफर चले जाते है,(अध) और ( 7 ) तुम्हारे मिन यनर हम (स्वं ओक) अपने निजी घरमे (अभि म्याम ) सुखपूर्वक निवास करते ह। ३६९ (इन्द्र ) इन्द, (मिन.) मित्र, (चरण. ) वरण, (अग्नि.) अग्नि, (आपः) जल, (ओपधी.) औषधियाँ तथा (यनिन ) वनके पेड (न तत् ) हमारा वह स्तोत्र (जुपन्त ) प्रीतिपूर्वक सेवन करते हैं। (मरतां उप म्थे ) चीर मरतों के निस्टनम सहवास में हम (शर्मन् स्याम) मुखसे रहे । हे धीरो! (यूयं ) तुम (स्वस्तिभि ) कल्याणरारक उपायों स ( सदा) हमेशा (मः पात ) हमारी रक्षा करो। ३७० हे ( यज ना !) पून्य धीरो' (य मारनं नाम) तुम वीर मरतों का नाम सचमुचदी (मध्वः) मिठासका द्योतक है । ये धीर । योपु) यशों में (शयसा) बलके कारण (प्रमदन्ति) अतीय हर्पित एवं संतुष्ट हो उठते हैं । (यत् ) जर ये ( उग्रा.) उग्न धीर (अयासु ) शत्रुओपर चढाई करने जाने लगते हे तय (ये) ये (उवा चित्) यडी विस्तीर्ण (रोदसी) आकाश एवं पृथ्वी को भी (रेजयन्ति) विचलित, प्रापित कर डालते है और (उत्स पिन्वन्ति ) जर गहको भी वहां देते है । भावार्थ- ३६८ अपने जीरनका बलिदान करके समूची जनताका सरक्षण करने हारा हमारा पुत्र बलवान पीर बने । हमारा निवास मुएमय हो, इसलिए हम बीचकी सभी कठिनाइयों दूर करेंगे और वीरों के मित्र बनकर अपने स्थानमें मुम्मसे रहेंगे। ३६९हमार सोनका सेवन सभी देव बरसे।वीरोंके समीप हम सहर्ष जोवन यात्राविताप । पीर कल्याण. पर्धक साधना से हमारी रक्षा करें। ३७० यशके कारण हपित होनेवार ये वीर या भपनी सामर्थसे प्रसन्नता हो जाते हैं। जब घे वीर पभोंपर भाप्रमण कर बैठते है तब समूची पृष्ो ददर उटती है और उस समय घे जलप्रवाहों को भूमिपर प्रचलित कर देते हैं। इनके वेगपूर्ण राधा विगुताति से चलाये हमलों के फर स्वरूप संसारभरमें पापी पदा हो जाती है और जर प्रवाह यहने सगत हैं । टिप्पणी- [३६८] (1) अप - जनप्रयाइ, ल, कर्म, पन। (२) - तैर जाना, हावी याना, जीनना, गाय कराा, किसी पे जारगे छाना। पर, वीनि। , [३०] (1) नाम: नाम, - (३७१) निचेतारः । हि । मरुतः । गृणन्तम् । प्रनतारः । यज॑मानस्य । मन्म । असाकम् । अद्य । विदथेषु । बर्हिः । आ । वीतये । सदन । पिप्रियाणाः ॥२॥ (३७२) न । एतावत् । अन्य । मरुतः । यथा । इमे। भ्राजन्ते । रुक्मैः । आयुधैः । तनूमिः। आ। रोदसी इति । विश्वऽपिशः । पिशानाः। समानम् । आज । अञ्जते । शुभे । कम् ॥३॥ (३७३) ऋधक् । सा । यः। मरुतः । विद्युत् । अस्तु । यत् । वः । आर्गः। पुरुषता । कर्राम । मा । यः। तस्याम् । अपि । भुम । यजत्राः। असे इति । यः । अस्तु । सुऽमतिः। चनिष्ठा ॥४॥ अन्वयः-३७१ (हे ) मरतः! गृणन्तं नि-चेतारः हि, यजमानस्य मन्म प्रनतार. पिप्रियाणाः अद्य अस्माकं विदथेप वीतये वर्हिः आ सदत। ३७२ इमे मरतः रकमेः आयधे तनृभिः यथा भ्राजन्ते, न एतावत् अन्ये, विश्व पिश रोदसी पिशानाः शुभे समान अलिकं आ अझते। ३७३ (हे ) यजत्राः मरतः। यत् य. आग पुरयता कराम सा च दिवत् ऋधक अस्तु, वः तस्यां अपि मा भूम, असे वः चनिष्ठा सःमति अस्तु । अर्थ- ३७१ हे (मरत !) वीर मरतो! तुम (गृणन्त ) काव्यका सृजन करनेवालोंको (नि-चेतारः हि) इकट्ठे करते हो और (यजमानस्य) याजक के (मन्म) मननीय कान्यका (प्र-नेतार ) निर्माता भी हो। (पिप्रियाणाः ) सदा हर्पित एवं प्रसन्न रहनेवाले तुम ( अद्य ) आज (अस्माकं विदथेषु) हमारे यश (वीतये । हविष्यानका सेवन करने के लिए इस (पर्टि ) कुशामनपर ( आ सदत ) आकर बैठो। ३७२ ( इमे मरतः) ये वीर मरत् ( रुक्मः ) स्वर्णमुद्राओंके हारोसे (आयुधैः) हथियारोसे तथा (तनूमि ) अपने शरीरोसे भी ( यथा नाजन्ते ) जिस भॉति जगमगाते है (न एतावत् अन्ये । उस प्रकार दूसरे कोई नही प्रकाशमान हो उठते है । (विश्व-पिशः) सको तेजस्वी यनानेहारे तथा ( रोदसी ) [लोक एवं भूलोकको भी (पिशाना.) सॅधारते हुए ये वीर (शुभे) शोभाके लिए ( समानं आजि) सदृश बीरभूषण या गणवेश (कं आ अञ्जते ) सुखपूर्वक पहनते है, प्रकाशमान होते है। ३७३ हे ( यजना मरुतः!) पूज्य वीर मरतो ! ( यत् ) यद्यपि हमसे (व आगः ) तुम्हारा अप- राध (पुरुष-ता कराम ) मानवताको भूलें करना, अपराध करना, साभाविक होनेसे हुआ हो, तो भी (सायः) वह तुम्हारा (दिद्युत् ) चमग्नेयाला सग हमसे (क्रधर अस्तु ) दूर रहे, (वः) तुम्हारे (तस्यां ) उस आयुधके समीप हम ( अपि ) तनिकभी ( मा भम) न रहे। ( भस्मे ) हमारे लिए अनुकूल (2) तुम्हारी (चनिष्ठा ) अन्न देने की (सुमति अस्तु ) अच्छी घुद्धि हो। भावार्थ-३७१ ये वीर काम यनानेवालोको एकत्रित करने वाले तथा सयभी कारकी रचना करने वाले है। अतः हमारे यक्षम वे आ जाय और भासनपर बैठ हविष्यासका ग्रहण तथा सेवन कर लें। ३७२ ये वीर आभूपण एवं हापियार धारण करके बडे ही अनूठे ढगसे अपने आपको सँगारते हैं और दूसरे लोगोकोभी सुशोभित करते है । ये सभी वीर समान अलकार या गणवेश पहनते है। ३७३ हमसे भूरे, गलतियाँ होना स्वाभाविक है, क्योकि हम मानव ही है । अतः अगर हमसे इन वीरोंका कोई अपराध हुआ हो, तोभी ये कृपया हमपर हथियार न चलायें। हाँ, हमें यथेष्ट अन प्रदान करनेकी हनको सद्बुद्धि हमेशा हमारी ओर मुड जाए। टिप्पणी-[३७१ (१) नि+वि- ढूँढना, इकट्ठा करना, बटोरना । (२) मन्म- इच्छा, स्तोत्र, मनन करने योग्य काव्य । (३)प्र+नीले चलना, प्रवृत्त करना, आधार देकर चलाना । प्रणेता निर्माण करनेहारा नेता, पथप्रदर्शक । [३७२) (१) अ-स्वभावदर्शन करवाना, दर्शाना, सम्मान देना, अलकृत करना, (मंत्र ७ देखिये) अजि-सैनिक । । (३७४) कृते । चित् । अ । मरुतः रणन्त । अनवद्यासः । शुनयः । पावकाः । प्रानः। अवत। सुमतिभिः । यजत्रा । प्रा वाजेभिः। तिरत । पुण्यसै। नः ॥ ५॥ (३७५) उत ! स्तुतास: । मरुतः । व्यन्तु । विश्वेभिः । नामऽभिः । नरः । वार्षि । ददात । नः । अमृतस्य । प्रजाय । जिगृत । सयः । सूनृता । मयानि ॥ ६ ॥ अन्यया- ३७४ अन् अवद्यास नुवय पावकाः मरुत अन कृते चित् रणन्त, (ह) यजत्राः! सु-मतिभिः प्र अयत, न. याजेभि. पुप्पसे प्रतिरत । २७. उत विश्वभिः स्तुतास नरः मरतः हवापि व्यन्तु, नः प्रजायै म-मृतस्य ददात, सूनृता रायः मघानि जिगृत। अर्थ- ३७४ ( अन्-यद्यासः ) अनिंदनीय ( शुचय ) स्वयं पवित होते हुए दूसरोंको (पायका) पवित्र फरनेहारे ये (मरुतः ) वीर मरत् ( अत्र ते चित् ) यहॉपर हमारे चलाये हुए कर्ममें पशम (रणन्त) रममाण हों, है ( यजत्राः) पूजनीय वीरो' (नः ) हमारी तुम (स-मतिभिः) अच्छी युद्धियोसे (प्र अवत) भली मॉति रक्षा करो। ( नः ) एम ( वाजेभिः ) अग्नोसे (पुप्यसे । पुष्ट हों, इस लिए हमें संकटोंसे (तिरत ) परे ले चलो। ३७५ ( उत ) निश्चयपूर्वक (विश्यभि. नामभि ) समी नामांसे । स्तुतासा) प्रशंसित ये (नरः मरत.) नेता घोर मत् ( हबीपि व्यन्तु ) हरिप्यास प्रान करें। वीरो' (नः प्रजायै ) हमारी प्रजाको (अ-मृतस्य ) अमरपनका ( ददात ) प्रदान करो और (स्मृता रागः) आनन्ददायक धन तथा (मघानि) सुखापोभी (जिगृत ) दे दो। भाया- ३७४ ये बीर निकलक, विशुद्ध तथा पवित्रता करनेहा है। हम जिस कार्यका सूत्रपात करने चले है, उसमे ये रममाग हो। यह कार्य उन्हें भामा लगे। ये हमारी रक्षा करें और भन्छ भनसे हमारा पोषण हो, इसलिए हमें सकटोंसे छुड़ा दे। ३३५ प्रशसनीय वीर सभी प्रकार उराम अप्रास का लाये । समूनी मजाको अविछि मुख प्रदान चा और सभी भाँतिक धन एक सारत्ति प्राप्त कर दें। अपने शरीरोर ( समान अखि Uniform) समानरूपका वेश घर देते हैं। (२) पिश - भाकार देना, सशाना, सस्थित होना, प्रकाशमान होना, तैयार रहना, अरकृत करना। (३७३ (१) पापन-(): धङ्, दूर।(२)चनिष्टा = (जस--स्य) बहुतसा भन्न देनेहारी, दानावगुणमे स्थिर । [आग. पुरुषता क्राम-भरे करता मानवी स्वभावके अनुकूल है- To erris human ] [३७३] (१)म-तिर = परले तटपा जाना, टप्स पार चले जाना । (२) कृत - कृय, कर्म, ध्येय, सेवा, परिणाम। [३७५] (1)वी = (गति-पाति-प्रजनन-कानिध-अप्सन सादने) लाना, उत्पा काना, पाना, लाना । (२) स्नृत = सत्यपूर्ण, भानन्ददाय, मगल, प्रिय । (३) मघ% मुस, दान, सम्पति । (.) गृ% देना।

. (३७६) आ। स्तुतासः । मरुतः । विश्वे । ऊती । अच्छे । सूरीन् । सुर्यऽताता । जिगात । ये । न । त्मना । शतिनः । वर्धयन्ति । यूयम् । पात । स्वस्तिभिः । सदा । नः ॥७॥ (अर० ७५८६१-६) (३७७) प्र! साकम्ऽउक्षे । अर्चत । गणार्य । यः । दैव्यस्य । धाम्नः । तुर्विमान् । उत । क्षोदन्ति । रोदसी इति । महिऽत्वा । नक्षन्ते । नाकम् । निःऽनतेः । अवंशात् ॥१॥ (३७८) जनः । चित् 1 वः । मरुतः । त्वेष्येण । भीमासः । तुर्विऽमन्यवः । अयोसः । प्र । ये । महऽभिः । ओजसा । उत । सन्ति । विश्वः । वः । यामन् । भयते । स्वःऽहक् ॥२ अन्वयः-- ३७६ (हे ) स्तुतास मरुतः ! विश्वे सर्व-ताता सूरीन अच्छ ऊती आ जिगात, ये त्मना शतिनः न. वर्धयन्ति, यूयं स्वस्तिभिः सदा नः पात। ३७७ यः दैव्यस्य धाम्नः तुविष्मान् साफ-उक्षे गणाय प्र अर्चत, उत अशात् नितेःक्षोदन्ति, महित्वा रोदसी नाकं नक्षन्ते। ३७८ (2) भीमासः तुवि-मन्यवः अयास मरतः ! वः जनूः त्येप्यण चित्, उत ये महोमि ओजसा प्र सन्ति, यः यामन् स्वर दृक् विश्वः भयते। अर्थ- ३७६ हे (स्तुतासः मरत.) प्रशंसनीय वीर महतो ! तुम (विश्वे) सभी लोग उस (सर्व ताता) सभी जगह फैलनेवाले यसकर्म में काम करनेवाले (सूरीन् अच्छ) विद्वानोकी ओर(ऊती) संरक्षक शक्तियों के साथ (आ जिगात) आओ। (ये ) जो तुम (त्मना ) स्वयंही (शतिनः नः) हम जैसे सैकड़ों मानयोंको (वर्धयन्ति) बढाते है । ( यूयं) तुम (स्वस्तिभिः) कल्याणकारक उपायोंद्वारा (सदा) सदैवके लिए (नः पात ) हमारी रक्षा करो। ३७७ (य) जो (देव्यस्य धाम्नः) दिव्य स्थान का (तुविष्मान) शाता है, उस (साफ-उक्षे) संघ के बलको धारण करनेहारे (गणाय) वीरों के समूह की (प्र मर्चत) पूजा करो।(उत) क्योंकि वे वीर (अवंशात्) वंश के विनाशरूपी (निर्मते ) आपत्ति को (क्षोदन्ति) चकनाचूर कर देते हैं, विनष्ट करते है, और (महित्या) वडप्पनसे (रोदसी) आकाश एवं पृथ्वी तथा (नाक) स्वर्ग के मध्य (नक्षन्ते) जा पहुँचते है, व्याप्त होते हैं। ३७८ हे (भीमासः) भीषण रूपधारी, (तुवि-मन्यव ) अत्यंत उत्साह से परिपूर्ण एवं (अयास मरतः) वेगवान वीर मरतो ! (च. जनू ) तुम्हारा जन्म (त्येप्यण चित् ) तेजस्वितासे युक्त है, (उत) उसी प्रकार (ये महोभि) जो महत्त्वासे तथा (ओजसा) शारीरिक वलसे (प्र सन्ति) प्रसिद्ध है, ऐसे (व ) तुम्हारे (यामन् ) शत्रुदलपर हमले करते समय (स्वर-दृफ्) आकाश की ओर दृष्टि देकर (विश्वा भयते) समूचा प्राणिसमूह भयभीत हो उठता है। भावार्थ- ३७६ ये वीर सैकड़ों मानवोंका सवर्धन करते हैं। इस यज्ञकर्ममे जो विद्वान कार्यमे निरत हुए है, उनकी रक्षाका भार ये वीर उठा और कल्याण करने के सभी साधनोंसे हम सबकी रक्षा करें। ३७७ ये वीर उस दिव्य स्थानको जानते हैं, जहां पहुंचनेकी इच्छा सबके मन में उठ खडी होती है। इन वीरों में सांघिक पल विद्यमान है, इसीलिए इनका सरकार करो । ये वंशनाशकी घोर भापत्ति से बचाते है और अपने पढप्पनसे भूमंडल, भावाश एवं स्वर्ग में भी अप्रतिहत संचार करते हैं। ३७८ ये वीर सैनिक बडेही उत्साही एवं प्रभावी है । उनका जन्मही तेजकी वृद्धि करने के लिए है । अपने बलसे तथा प्रभावसे वे सभी जगह प्रसिद्ध है। जब वे शत्रुपर आक्रमण कर बैठते है, तय उनके प्रचण्ड वेगसे सभी जीवजन्तु भयभीत हो जाते हैं। टिप्पणी--[३७६] (1) सर्व-ताता= यज्ञ, जिसका परिणाम सभी जगह फैल सके ऐसा अच्छा कर्म । (२) ताति- वंश, फैलनेवाला। [३७७] (१) तुविस्- वृद्धि, शक्ति, ज्ञान । (२) निमति:- नाश, विपत्ति, संकट, मरत् [हिं.] १९ - - P (३७९) वृहत् । वर्यः । मयत्ऽभ्यः । धात । जुौंपन् । इत् । मरुतः। सुऽस्तुतिम् । नः । गतः । न । अध्या । वि। तिराति । जन्तुम् । प्रान: । स्पार्हाभिः । ऊतिऽभिः । तिरेत ॥३॥ (३८०) युष्माऽऊतः । विनः । मरुतः । शतस्वी। युष्माऽऊतः । अर्वी । सहुरिः । सहस्री । थुप्माऽऊवः । सम्राट् । उत । हन्ति । वृत्रम् । प्र। तन् । वः । अस्तु । धूतयः । देष्णम् ॥४॥ अन्वयः- ३७९ (हे ) मरत ! मघ वद्य वृहत् वयः दधात, न सु-स्तुति जुजोपन् इत्, गतः अध्या जन्तुं न वि तिराति, नः स्पााभि. ऊतिभिः प्रतिरेत । ३८० (हे ) मरतः। युप्मा-ऊतः विम. शतस्सी सहस्री, युप्मा-ऊतः अर्या सहुरित उत युप्मा-ऊतः सम्- राद् वृनं हन्ति, (हे ) धृतयः! व तत् देणं प्र अस्तु । अर्थ- ३७९ हे (मरुतः1) वीर मरतो! (मघ-बद्भ्यः) धनिकों के लिए (बृहत् वयः) बहुत थारोग्य एवं सुदीर्घ जीवन ( दधात ) दे दो। (नः गु-स्तुति) हमारी अच्छी सराहना का तुम (जुजोपन् इत्) सेवन करो। तुम (गतः अध्या) जिस राहपरसे जा चुके हो, वह मार्ग (जन्तुं) प्राणी को बिलकुल (न तिराति) विनष्ट नहीं करेगा। उसी प्रकार (नः) हमारा (स्पार्दाभिः अतिभिः) स्पृहणीय संरक्षक शक्तियों से (प्रतिरेत) संवर्धन करो। ३८० हे (मरतः !) वीर मरुतो ! (युप्मा-ऊतः) तुमसे सुरक्षित हुआ, (विप्रः) शानी मनुष्य (शतस्वी सहनी) सैकडौं तथा हजारों प्रकार के धनसे युक्त होता है।(युप्मा-ऊतः) जिसकी रक्षा एवं देराभाल तुमने की हो, ऐसा (अर्वा) घोडातक (सहु-रिः) सहनशक्तिसे युक्त होता है- विजयी बनता हे। (युप्मा-ऊतः ) तुम्हारी सहायतासे सुरक्षित बना हुआ (सम्-पट्) सार्वभौम नरेश (वृत्रं) निरोधक दुश्मनोंको (हन्ति ) मार डालता है। हे (धूतयः!) शत्रुओंको हिलानेवाले वीरो! (वा तत्) तुम्हारा वह (देणं ) दान हमें (प्र अस्तु) पर्याप्त मात्रामें उपलब्ध हो । भावार्थ- ३७९ जो धनिक है, उन्हे उत्तम भारोग्य तथा दीर्घ जीवन मिले । जिस राहपरसे वीर पुरुष चले हैं, उसपर उनके अच्छे प्रबंधके कारण भर किसी भी कुछ कष्ट नहीं उठाना पड़ता है और इनकी संरक्षक शक्ति उधर काम कर रही है, अत सभी को उत्तम रक्षा हो रही है। ३८० यदि ये वीर किसी मानव के संरक्षण का घीना उठा ले, तो यह अवश्यही धनाध, विजयी, एवं सार्वभौम बनता है। D शाप, पृथ्वीमा तल । (३) क्षुद् (गतौ सपेपणे च) = जाना, कुचलना, चकनाचूर करना। (४) नक्ष ( गती)= समीप भाना, पहुँचगा। (५) अ-चंश- निवंश होना, वंशमाश । अ-वंशात् निति निर्वश हो जानेका भय । यह बा पतरनाक है, क्योंकि संततिसातत्यसे अमरपन की प्राप्ति होती है। (देखिए-प्रजाभिः अमृतत्वं । ऋग्वेद ५/०)। [३७८] (1) अया- गति, वेग, चढाई, हमला । (२) यामन्= गति, जाना, आक्रमण, हमला। (३) स्वदृक्- (स्व:) अपने आरिमक (र) प्रकाशकी भोर दृष्टिपात करनेहारा, स्वर्ग का विचार करनेहारा, भाकाश की ओर टकटकी लगाकर देखनेवाला। [३७९] (1) मध= सुख, दान; संपत्ति । (२) ययस्भस, मायुष्य, यौवन, शक्ति, हविष्यास, भारोग्य । ( प्रायः देखा जाता है कि धनिक लोग रोगी, क्षीण, भल्पायु तथा संतानविहीन होवे हैं, इसीलिए यहाँपर जो यह प्रतिपादन किया है कि धनादर पुरषोंको दोघं जीवन एवं भारोग्य मिले, यह बिलकुल धित [३८०] (1) सहु-रि (सह मर्पणे तृप्ती च) बरदाश्त करनेहारा, पराभव करनेवाला, विजयी, पृथ्वी, स्यं । (२) पृष- (न भावरणे) शव, मेघ, अँधेरा, भावाज, घेरनेवाला दुश्मन । (३) देणं- दान, देन ।

। (३८१) तान् । आ । रुद्रस्य । मीळ्हुपः । विवासे । कुवित् । नसन्ते । मरुतः । पुनः । नः। यत् । सखती । जिहीळिरे । यत् । आविः। अव । तत् । एनः। ईमहे । तुराणाम् ।।५।। (३८२) प्र । सा । वाचि । सुऽस्तुतिः । मघोनाम् । इदम् । सुक्तम् । मुरुतः । जुपन्त । आराद । चित् । द्वेषः । वपणः । युयोत। यूयम् । पात् । स्वस्तिभिः। सदा । नः ॥६॥ (ऋ० ७५९४१.११) (३८३) यम् । बायधे । इदम् इदम् । देवासः । यम् । च । नर्यथ । तस्मै । अग्ने । वरुण ! मित्र । अर्थमन् । मरुतः । शर्म । यच्छतु ॥१॥ अन्वयः- ३८१ मीहुपः रुद्रस्य तान् आ विपासे, मरुतः नः कुवित् पुनः सन्ते, यत् सस्पर्ता यत् आविः जिहीळिरे तुराणां तत् एनः अव ईमहे । ३८२ मघोनां सु-स्तुतिः सा वाचि प्र, मरुतः इदं सूक्तं जपन्त, (हे ) वृपणः । वेप आरात् चित् युयोत, यूयं स्वस्तिभिः सदा नः पात। २८३ (हे) देवासः! यं दं-इदं प्रायध्ये यं च नयध, तस्मै (हे) अग्ने ! वरुण । मिना ! अर्थमन् ! मरतः। शर्म यच्छत। अर्थ- ३८१ (मीदुपा) बलिष्ठ (रुद्रस्य तान् ) रुद्रके उन वीरोंकी (आ विवासे) मैं सेवा करता है। (मरुतः) घे वीर मरात् (नः) हमें (कुवित्) अनेक बार तथा (पुन) वारंवार (नंसन्ते)सहायता पहुँचाते है, हममें सम्मिलित होते हैं। (यत् सस्वती) जिन गुप्त या (यत् आवि.) प्रकट पापोंके कारण वे (जिहाळिरे) हमपर क्रोध प्रकट करते आये हैं, उन (तुराणां) शीघ्रतासे अपना कर्तव्य करनेवालों के संबंध किया हुआ यह (एन.) पाप हम अपनेसे (अब ईमहे ) दूर हटाते हैं। ३८२ (मघोनां) धनादय धीरोंकी यह (सु-स्तुतिः) उत्कृष्ट सराहना है, (सा) वह सदैव हमारे (याचि प्र) संभापणमें निवास करे। (मरुतः) वीर मरुत् (इदं सूक्तं ) इस सूक्ताका (जुपन्त सेवन करें। हे (पृपणः 1 ) बलिष्ठ वीरो ! हमारे (द्वेषः ) द्वेष्टाओं को (भारात् चित्) जब तक वे दूर है, तभीतक हमसे (युयोत) दूर करो। (यूयं ) तुम (स्वस्तिभिः) कल्याणकारक उपायोंद्वारा (सदा) हमेशा (नःपात) हमारी रक्षा करो। ३८३ हे (देवासः!) देयो ! (यं) जिसे तुम (इदं-इदं) इस भाँति (प्रायध्ये ) सुरक्षित रखते हो (यंच) और जिसे अच्छी राहसे (नयथ ) ले चलते हो, (तस्मै ) उसे है (अग्ने!) असे! हे (धरण!) परुण ! हे (मित्र!) मित्र! हे (अर्यमन् ! ) अर्थमन् ! तथा हे (मरुतः! ) वीर मरतो! (शर्म यच्छत) सुख दे दो। भावार्थ-३८१ हम इन वीरोंकी सेवा करते हैं, इसलिए वे वारंवार हमारी मदद करते हैं। पाप कानेसे उन्हें शोध आता है, भतः हम पापी विचारधाराको बहुत दूर हटाते हैं। ३८२ इन पोरोंके संबंध यह काव्य हमारे मुंहमें सदेव रहने पाय : जपली हमारे शत्रु मुदूर स्था िहै, तमीतक उनका नाश ये वीर सैनिक करें और हमारी रक्षाका भच्छा प्रबंध फरके कल्याण करें। ३८३ जिसकी रक्षाका भार वीर अपने ऊपर ले लेते हैं, यह सुखी बनता है। टिप्पणी- [३८१](१) नस्- पहुँचना, समीप जाना, झुम्मा, नग्न होना, सामने सड़ा होना । (२) एनस्य पाप, अपराध, दोप, श्रुटि । (३) जिदीदिरे - (हैद अनादरे ) अनादर दर्शाया, धिधार किया, दुतारा । 8 । (३८४) युष्माकम् । देवाः । अव॑सा । अहनि । प्रिये । ईजानः । तरति । द्विषः। म। सः । क्षयम् । तिरते। वि मही: । इपः । यः । वः । वरीय । दार्शति ॥२॥ (३८५) नहि । वः । चरमम् । चन! वसिष्ठः । परिऽमंसते । अस्माकम् । अद्य । मरुतः । सुते । सर्चा । विश्वे । पिवत । कामिनः ॥३॥ (३८६) नहि । वः । ऊतिः । पृतनाम । मर्धति । यस्मै । अराध्वम् । नरः । अभि । वः । आ । अव । सुऽमतिः । नीयसी । तूयम् । यात । पिपीपयः ॥४॥ अन्वयः- ३८४ (हे) देवा ! युप्माकं अवसा प्रिये अहनि ईजानः द्विपः तराते, यः यः वराय मही इपः यि दाशति सः क्षयं प्रतिरते। ३८५ (है) मरतः। वसिष्टः यः चरम चन नहि परिमंसते, अद्य अस्माकं सुते कामिनः विश्वे सचा पियत। ३८६ ( है ) नर ' यस्मै अराध्य, व अतिः पृतनासु नहि मर्धति, या नवीयसी सु-मतिः अभि अवत्, पिपीपप तृपं आ यात । आर्थ- ३८४ हे (देवा'!) प्रकाशमान चोरो। (युप्माकं अवसा) तुम्हारी रक्षासे सुरक्षित हो (प्रिये अहनि) अभीष्ट दिन (ईजान ) यक्ष करनेहारा (द्विपः तरति ) डेटा लोगोंको लाँध जाता है, शत्रुओंका पराभव करता है। (य:) जो (यः पराय) तुम जैसे श्रेष्ठ पुरुपोंको (महीः इषः) बहुत सारा अन्न (वि दाशति । प्रदान करता है, (स.) यह (क्षयं ) अपने निवासस्थान को (प्रतिरते ) निर्भय बना देता है। ३८५ हे (मरत 1 ) वीर मरतो ! (यसिष्ठ.) यह वसिष्ठ ऋपि ( चरमं चन)तुममेंसे अंतिमका भी (नहि परिमंसते ) अनादर नहीं करता है, सबको वरावर सराहना करता है। ( अद्य अस्माकं ) आज दिन हमारे यहाँ (सते ) सोमरसके निचोड चुकनेपर उसे पाने के लिए (कामिनः) अपनी चाह घ्या. करनेवाले नुम ( विश्वे ) ममी (सचा ) मिलजुलकर उस रसफो (पिवत ) पी लो । २८६ हे ( नरः1) नेता चारो! तुम (यस्मै ) जिसे संरक्षण (अराध्य ) देते हो, वह (चा अनि ) तुम्हारी संरक्षणक्षम शक्ति (पृतनासु) युद्धोम उसका (नहि मर्धति ) विनाश नहीं करती है। (1) तुम्हारी (नवीयसी ) नाविन्यपूर्ण ( सु-मतिः ) अच्छी बुद्धि (अभि अवत् हमारी ओर मुड जाए । (पिपीपयः) सोमपान करनेकी इच्छा करनेहारे तुम (नृयं आ यात ) शीघ्रही इधर आओ। भाया- ३४३ वी सहायता पाकर मानव सुरक्षित बने, या करे, अंशदान करें और निर्भय बन सुखपूर्वक पालकमणा कर। ३८५ वीरांका भादर करना चाहिए, उन्हें मोमरस पीने के लिए देना चाहिए और वीर भी उसे ग्रहण पर सेवन करे। २८६ जिन धीरांका मंरक्षण प्रा हुमा, ये सदैव सुरक्षित रहते हैं। टिप्पणी-[२८४](१) घर: चुनाव, ६२, विनंति, दान, या, श्रेष्ठ, उत्तम । [३८५] (1)मन्- (साने, भवोधने सम्भे च) मानना, पूजा करना, भादर करना । परि-मन् - विपरीत बैंगसे मानना, अनादर करमा, गृमा के भाव दशाना । (२) चसिष्टः (वासपति इति) जो कि सपका निवास मुम्बपूर्वक हो, इसलिये प्रयत्नशील रहार, मा [३८६] (1) तूयं % (३८७) ओ इति । सु । घृष्विऽराधसः। यातनं । अन्धासि । पीतये । इमा । वः । व्या । मरुतः । ररे । हि । कम् । मो इति । सु । अन्यत्र । गन्तन ॥५॥ (३८८) आ। च । नः । चर्हिः । सदंत । अवित ! च । नः। स्पाणि । दातवे । बसु । अधन्तः । मरुतः । सोम्ये । मधौं । स्वाहा । इह । मादयाध्यै ॥६॥ (३८९) सस्वरिति । चित् । हि। तन्वः। शुभमानाः। आ। इंसासः। नीलऽपृष्ठाः । अपान् । विश्वम् । शपः । अभितः । मा । नि । सेदु । नरः । न । रण्वाः । सर्वने । मदन्तः ॥७॥ अन्वयः-३८७ (हे) घृप्वि -राधसः मरतः ! अन्धांसि पीतये सु ओ यातन, हि वः रमा हव्या ररे, अन्यत्र मो सु गन्तन। ३८८ स्पार्हाणि वसु दातवे नः अवित च, नः बर्हिः आ सदत च, (हे) अ-धन्तामरुतः। इह मधी सोम्ये स्वाहा माझ्याध्यै। ३८९ सस्वः चित् हि तन्वः शुम्भमानाः नील-पृष्टाः इंसासः सवने मदन्तः रण्याः नरः न आ अपप्तन् , विश्वं शधः मा अभितः नि सेद । अर्थ- ३८७ हे (घृष्पि-राधसः मरुतः1) संघर्पम सिद्धि पानेवाले वीर मरतो। ( अन्धांसि पीतये) अपरस पीने के लिए (सु ओ यातन) अच्छी व्यवस्थासे आओ। (हि) क्योंकि (वः) तुम्हें (इमा हव्या) ये हषिप्यान में (ररे) प्रदान कर रहा हूँ, अतः तुम ( अन्यत्र) दूसरी ओर कहीं भी (मो सु गन्तन) विलकुल न जाओ। ३८८ ( स्पाहाणि ) स्पृहणीय (वसु) धन ( दातवे ) देनेके लिए. (नः) हमारी ओर (अवित च) आओ और (नः वर्हिः) हमारे इन आसनोपर (आ सीदत च) वैठ जाओ। हे ( अ-स्नेधन्तः मरुतः!) अहिंसक पीर मरुतो ! (ह) यहाँके (मधी) मिठास से पूर्ण (सोम्ये । सोमरस के (स्वाहा) भागका, स्वीकार कर (माझ्याध्चै) आनन्दित हो जाओ। ३८९ (सस्यः चित् हि) गुप्त जगह रहनेपरभी (तन्वः शुम्भमानाः) अपने शरीरों को सुशोभित फरनेवाले ये चीर (नील-पृष्ठाः हंसासः) नीलवर्ण-काली पीठसे युक्त हंसों की नाई या (सबने मदन्तः) यशम आनंदित होनेवाले ( रण्वाः नरः न ) रमणीय नेताओं के तुल्य (आ अपप्तन्) हमारे समीप आ जायें और इनका (विश्वं शर्धः) समूचा वल (मा) मेरे (अभितः नि सेद) चारों ओर रहे। भावार्थ-३८७ वीर हमारे समीप ओजाय भौर इम खाद्यपेयसामग्रीका सेवन करें, तथा इस संघर्षों यश मिलने- तक सहायक बनें। ३८८ मछ। धन प्रदान करो। यहाँपर पधारकर मिठास भरे मनका सेवन करके प्रससचेता यनो। ३८९ गुप्त स्थानपर-दुर्गम-रहते हुए भी अपने आपको सजाते-सँवारते हुए ये चीर सैनिक अपने सारे मलौके साथ हममें आकर निवास कर लें । जैसे हंस पंक्तियों में, कतारोमै उडने लगते हैं, वैसेही ये वीर कतारमें चलने लगे, और जिस प्रकार या उपस्थित रहमैके लिए यात्रा करने वाले नेतागण घन-ठनके प्रस्थान करते हैं, उसी प्रकार ये मोर शोभायमान होते हुए सभी कार्यकलाप निभायें । रिप्पणी- [३८७] (1) घृप्ति संघर्ष में चतुर, राधस्= सिखि, दान, पक्ष । घृप्ति-राधस्- संघर्षमें सफलता पानवाला । (२) अन्धस् भन्न, सोम, सोमरस । [३८८] (१)निध् = दुखाना, विनाश करना, पध करना, (२) स्वादा%D हविर्भाग, मनभाग। [३८९] (1) सस्स = भन्साहित, दया भा, गुप्त ( निघंटु ३३२५)। - १५० -- । अन्चय - (३९०) यः । नः । मरुतः । अभि । दुःऽहणायुः। तिरः । चिनानि । वसवः । जिघांसति । द्रुहः । पाशान् । प्रति । सः । मुचीष्ट । तर्पिष्ठेन । हन्मना । हन्तन । तम् ॥८॥ (३९१) सांऽपिनाः । इदम् । हुविः । मरुतः । तत् । जुजुष्टन । युष्मा । ऊती । रिशादसः ॥९॥ (३९२) गृहेऽमेधासः । आ । गत । मरुतः । मा । अप । भूतन । युप्मार्क । ऊती । सुऽदानवः ॥१०॥ (३९३) इहऽईह । वः । स्वऽतवसः। कवयः। सूर्यऽत्वचः। यज्ञम् । मरुतः । आ।वणे ॥११॥ ३९० (हे) वसव मरतः' दुर्हणायुः तिरः यः नः चित्तानि अभि जघांसति सः दुह. पाशान् प्रति मुचीप्ट तं तपिष्ठेन हन्मना हन्तन । ३९१ (हे ) सान्तपनाः रिश-अदसः मरत ! इदं तत् हविः जुजुष्टन, युप्माक' ऊती। ३९२ (हे) गृह-मेधास. सु-दानव मरत । युग्माक ऊती आ गत, मा अप भूतन । ३९३ (हे) स्व-तवस क्वयः सूर्य-स्वच मरतः ! इह-इह यक्षं वः आ वृणे। अर्थ- ३९० हे (यसव. मरत. 1) बसानेवाले चीर मरतो !(दुईणायुः ) अतीव फोधी तथा (तिरः) तिरसरणीय (य ) जो दुरात्मा (न. चित्तानि) हमारे दिलका (अभि जिघांसति) नाश करना चाहता हे. (स.) वह (द्रुहः पाशान् ) द्रोहके फंदों को (प्रति मुचीष्ट) हमपर डाल देगा, तव (तं) उस हत्यारे पो (तपिठेन हन्मना ) अति तप्त आयुधसे ( हन्तन) मार डालो। ३९१ हे (सान्तपना ) शनुभाको परिताप देनेवाले तथा (रिश-अदसः) हिंसकों को विनष्ट फरनेहारे (मरुतः1) वीर मरतो तुम (इदं तत् हविः) इस उस हविप्यानका (जुजुष्टन) सेवन परो ओर (युप्माक ऊती) तुम्हारी संरक्षणशक्ति बढ़ाओ। ३९२ (गृह-मेधासः) गृहस्थधर्म को निभाते हुए (सु-दानवः) उत्तम दान फरनेहारे (मरतः) धीर मरतो ! तुम (युप्माक ऊती) अपनी संरक्षक शक्तियों के साथ (आ गत) हमारे समीप आओ, हमसे (माअप भूतन ) दूर न चले जाओ। ३९३ (स्व-तवसः) अपने निजी वलसे युक्त होनेवाले, (फचय )शानी ओर (सूर्य-वच) सूर्यवत् तेजस्वी (मरुतः 1) वीर मरतो ! (इह-इह) अप यहाँ (यशं) यश करके (य) तुम्हें में (आ वृणे) संतुष्ट करता है। भावार्थ- ३९० दुरामा शत्रु हमारे मनमे विद्यमान सुधिचारोंको नष्ट करके, हमसे द्वेपपूर्ण व्यवहार करके, इमे परतन्त्र भी करना चाहते हैं । ऐसे लोगों का सभी जगह तिरस्कार हो और तीक्ष्ण हथियारोसे उनका विनाश किया जाए। ३९१ जनताको उचित है कि वह वीरोंके लिए भन्न दें और उससे ये अपनी संरक्षक शक्ति पदा दें। ३९२ धीर पुरष हमारे समीप रहे और हमारी रक्षा करें । वे कभी हमसे दूर न हों। ३९३ यज्ञम वीर सैनिकों एव पुरषों को घुलवाकर उनका सम्मान करना चाहिए । टिप्पणी- [३९०] (1) दुर-हणायु =(हणीयते, ह रज्जायो रोपणे च), (हणायु:-क्रोधी)- बहुत धोध करनेवाला, रोवारा । (२) तपिष्ट= (तप् मनापे) सपाया हुआ, विनाशक । (३) दुह् = द्वेप करना, विरोध करना । [३९१] (1) पृण (मीणो) = मंजुट करा, सुख-भााद देना। भा+पृष्= अपनासा करना, स्वीकारना । पाव निंदा ५१ अन्वय - (ऋ० १०४/१८) (३९४) वि । तिष्ठध्वम् । मरुतः । विक्षु । इच्छत। गभायत । रक्षसः । सम् । पिनष्टन । वर्यः। ये । भूत्वी । पतन्ति । नक्तभिः। ये । वा । रिपः । दधिरे । देवे । अधरे ॥१८॥ विदु या अगिरसपुर पूतदक्षमपि । (प्र० ८१९४१-१२) (३९५) गौः। धयति । मरुताम् । श्रवस्युः। माता । मघोनाम् ।युक्ता । बहिः। रथानाम् ॥१॥ (३९६) यस्याः । देशः । उपऽस्यै। व्रता । विधे । धारयन्ते । सूर्यामास । दृशे । कम् ॥२॥ ३९४ (हे) मरन.! विक्षु वि तिष्ठध, ये वयः भूत्वी नक्तभि पतयन्ति, ये वा देवे अध्वरे रिपः दधिरे रक्षसः इच्छत, गृभायत, सं पिनष्टन । ३९५ रथानां वह्निः युक्ता श्रवस्युः मघोनां मरतां माता गौः धयति। ३९६ यस्याः उप-स्थे विश्वे देवाः यता धारयन्ते, सूर्या-मासा दृशे फं। अर्थ-- ३९४ हे (मरुतः ' ) वीर मरतो ! तुम (विक्षु) प्रजाओं मे (वि तिष्ठवं) रहो। (ये) जो (वयः भूत्वी) बलिष्ठ यनकर (नक्तभिः) रात्री के समय (पतयन्ति) दृट पडते है, (ये पा) अथवा जो (देवे अध्यरे) दिव्य यशम (रिपः दधिरे) हिंसा करते हैं, उन ( रक्षसः) राक्षसों को (इच्छत ) तुम हृढ निकालो, (गृभायत) पकड लो और उनको (सं पिनष्टन) पूरी तरह कुचल दो। ३९५ (स्थानां चलिः) रथों को सीचनेवाली, (युक्ता) योग्य, (श्रवस्यु ) यशकी इच्छा करनेहारी (मघोना मरतां माता) धनाढ्य वीर मरतोंकी माता (गो) गाय या पृथ्वी उन्हे (धयति) दूध पिलाती है। ३९६ (यस्याः उप-स्थे) जिसके समीप रहकर (विश्वे देवाः ) सभी देवता अपने अपने (व्रता धारयन्ते) कर्तव्य उचित ढंगसे निभाते है । (सूर्या-मासा) सूर्य तथा चंद्रभी जनताको (दृशे कं) प्रकाश देनेके लिए जिसके समीप रहते है। भावार्थ- ३९४ जनतामे धीर भाँतिभाति रूप धारण कर नियास करें। जो प्रजापर विभिन्न ढंगौसे हमले करते हैं, टूट पडसे हैं और जनता से माल, धन छीन लेते हैं, या लूटमारके कार्य में लगे रहते हैं, उन्हें पकडकर कारागृहमे रखे या उनका समूल नाशही कर डालें। ३९५ रथाको जोती हुई मरतोंकी माता गौ उन्हें दूध पिलाती है और वह चाहती है कि मरुतोंका यश प्रतिपल पढे । ३९६ समूचे देवता सूर्यचन्द्र भी गौ (पृथ्वी) के निकट रहकर अपने अपने कर्तव्य करते हैं । (गौकी रक्षा करते हैं । अर्थात् यहॉपर गौमाताका बडप्पन यताया है।) टिप्पणी- [३९४ ] (1) विक्षु वि तिष्ठ, भजामि गुप्त रूपसे विविधरूपधारी होकर प्रजाका रक्षण करने के लिए निवास करें। (२)रिप् = (रिप्र- धुरा, अशुद्धि, दुर्गन्धी, पाप, हिसा) भशुद्धि करना, यदयू करना, हिंसा करना । (३) इप् = ढूँढना, पानेका प्रयत्न करना, चाहना । (५) गृभ्- पकडना । (५) वय = शरीरसे रढ, पळ, भारोग्य, आयु, [३९५] (1) चूंकि वीर सैनिक मरत् गोदुग्ध का यथेष्ट पान करके पुष्ट एवं बलिए होते हैं, इसलिए यहाँपर पतलाया है कि, गौ उनकी मानी माता है । यह सुतरां स्वाभाविक है कि माता अपने पुत्रोंरे यशके सम्बन्धम सचिंत रहे । (रथानां वह्निः युक्ता गौः) इस मन्त्री कहा है कि, रथसे संयुक्त गौही (धयति ) दूध पिलाती है। यह विचार करनेयोग्य बात है, क्योंकि साधारणतया ऐसी धारणा प्रचलित है कि जो गाय योझ ढोने से परिश्रमसाध्य कठिन कर्म करती है, वह धीरे धीरे कम दूध देने लगती है। यह असंभवसा दीस पडता है कि बंध्या गौ के अतिरिक अन्य गायों को रयम जोतते हो। ऐसी बंध्या गौमों को भगर वाहनोंमें जोत ले, तो वे प्रजननक्षम हो दुधार बनती है, ऐसी कुछ लोगोंकी धारणा है, पर शास्त्रज्ञ निर्धारित करें, उसमे पैज्ञानिकता कहाँतक है । (२) युक्त = (यज् योगे संयमने घ) जुटा हुमा, कुशल, योग्य (कर्म में कुशल) । (३) वलिः (यह प्रापणे )= ढोनेवाला, धारण करने [३९६] (१) उप-स्थ- समीप, मध्य-भाग। पंछी। हारा, भग्नि ।

(३९७) तत् । सु। नः । विश्व । अर्थः । आ। सदा । गणन्ति । कारवः । मरुतः । सोमपीतये ॥३॥ (३९८) अस्ति । सौगः । अयम् । सुतः । पिन्ति । अस्य । मरुतः । उत । स्वराजः । अश्विनी ॥४॥ (३९९) पिर्वन्ति । मित्रः । अर्यमा । तना । पूतस्य । वरुणः। विऽसधस्थस्य । जाऽवतः ॥५॥ (४००) उतो इति । नु । अस्य । जोपम् । आ। इन्द्रः । सुतस्य । गोऽम॑तः । प्रातः । होतोऽइव । मत्सति ॥६॥ अन्धयः- ३९७ नः अर्थः विश्वे कारवः सदा सु आ तन् गृणन्ति, ( है ) मरुतः ! सोम-पीतये । - ३९८ अयं सोमः सुतः अस्ति, अस्य स्व-राजः मरुतः उत अश्विना पियन्ति । ३९९ मित्रः अर्यमा वरुणः त्रि-सध-स्थस्य तना पूतस्य जा-वतः पियन्ति । ४०० उतो इन्द्रःनु प्रानः होताइच गो-मतः अस्य सुतस्य जोपं मत्सति । अर्थ- ३९७ (नः) हमारे ( अर्यः) अत्यन्त पूज्य (विश्वे कारवः) सभी कवि, काव्यरचनाम फुशल, (सदा ) हमेशा तुम्हारे (तत्) उस यलकी (सु आ गृणन्ति ) भली भाँति स्तुति करते हैं । हे (मरतः!) वीर भरतो ! (साम-पीतये) सोमपान करने के लिए तुम इधर आओ। ३९८ (अयं सोमः) यह सोमरस (सुतः अस्ति ) पूर्णतया निचोडा जा चुका है। (अस्य) इसका (स्व-राजः मरुत ) स्वयंतेजस्वी मरुत्-पीर (उत) उसी प्रकार (अश्विना) अश्विनी-देव भी (पिवन्ति) पान करते हैं। ३९९ (मित्रः अर्थमा वरुणः) मिन, अर्यमा एवं वरुण (त्रि-सघ-स्थम्य) तीन स्थानों में रसे हुए (तना पूतस्य) छलनी से पवित्र किए हुए एवं (जा-यतः) सभी जनोंके सेवनके योग्य मरसको (पियन्ति) पी लेते हैं। ४०० (उतो) और (इन्द्रः नु) इन्द्र भी (प्रातः होताइव) प्रातःकाल के समय होताकी नाई (गो-मतः) गोदुग्ध मिलावटसे तैयार किये हुए (अस्य) इस (सुतस्य ) निचोडे हुए सोमका (जोपं) सेवन करके (मत्सति) हर्पित हो उठता है। भावार्थ-३९७ सभी कवि काव्यका सृजन करके घीके इस बलकी सराहना करते हैं। इसी लिए सोम पीनेके लिए इधर अवश्य भा जाय। ३९८ पह सोमरस पूर्णरूपेग सिद्ध है । तेजस्वी धीर एवं अश्विनी-देव इसका ग्रहण करें। ३९९ तीन स्थानों में विद्यमान तीन एलनियों में से शुद्ध किए हुए सोमरस का सेवन ये सभी वीर करते है। कारण यही है कि सोमरस सबके पीने के लिए योग्य है। ४०० इन्द्र भी सोमरसमे दूध मिलाकर उस पेय का सेवन करता है और प्रसन्न वेता बनता है। टिप्पणी- [३९७ ] (1) अर्यः= (गती-रिः अर्यः)- गतिशील, पूज्य, [३९८](1) स्व- राजः = (राज दीप्ता-प्रकाशना, शासन करना, प्रमुख होना ) सब मिलकर शासन करनेहारे-स्वयंशासक (देखिए। मंत्र ६८, २९२ तथा ३९८)। [ ३९९] (1)जा माता, जाति, देवरानी। वे (४०१) कत् । अविपन्त । सूरयः। तिरः । आपोऽइव | त्रिधः । अपन्ति । पूतऽदक्षसः ॥७॥ (४०२) कद । यः । अद्य । महानाम् ।। देवानाम् । अर्थः । युणे । स्मना । च । दुस्मऽवर्चसाम् ॥८॥ (४०३) आ। ये | विश्वा । पार्थिवानि । पप्रर्थन् । रोचना । दिवः । मरुतः । सोमऽपीतये ॥९॥ (४०४) त्यान् । नु ! पूतऽदक्षसः। दिवः । वः । मरुतः । हुवे । अस्य । सोमस्य । पीतये ॥१०॥ अन्धयः-४०१ सूरयः निधः तिरः आपाइय अत्यिपन्त, पूत-दक्षसः कत् अर्षन्ति ? ४०२ त्मना च दस्म-वर्चसा देवानां महानां यः अयः अद्य कत् वृणे ? ४०३ ये विश्वा पार्थिवानि दिवः गचना आ पप्रथन्, मरुतः सोम-पीतये । ४०४ (हे) मरुतः! पून-दक्षसः दियः त्यान् वः नु अस्य सोमस्य पीतये हुवे। अर्थ- ४०१ ये (सूरयः) शानी तथा (निधः) शत्रुविनाशक वीर (तिरः ) टेढी राहसे जानेवाले (आपाइय) जलप्रवाहोंकी नाई (अविपन्त) प्रकाशमान होते हैं और ये (पूत-दक्षसः) पवित्र बल धारण करनेहारे वीर (कत् ) मला कय हमारी ओर (अन्ति) पधारेंगे? ४०२ (त्मना च ) स्वाभाविक ढंगसे (दस्म-वर्चसां) सुन्दर आकारवाले (देवानां ) तेजस्वी एवं (महानां) यडे महनीय (यः) तुम जैसे सैनिकोसे ( अवः) संरक्षणकी (अघ कत्) आज भला कय में (वृणे) याचना करूँ? ४०३ (ये )जो (विश्या पार्थियानि ) सभी भूमंडलस्थ वस्तुओं को और (दिवः रोचना) घु. लोकके तेजस्वी पदार्थोंको (आ पप्रथन् ) विस्तृत कार चुके, उन (मगतः) वीर मरुतों को (साम पीतये) सोमपान करनेके लिए मैं बुलाता हूँ। ४०४ हे (मस्तः!) वीर मरुतो ! (पूत-दक्षसः पवित्र वलसे युक्त और (दियः) तेजस्वी (त्यान यः) ऐसे तुम्हें (नु) अभी (अस्य सोमस्य पीतये ) इस सोमरस के पान के लिए (हुवे) बुलाता है। अवार्थ- १०१ जैसे द्रलती जाहसे गिरनेवाला जलपबार चमकने लगता है, सेही ये जाती वीर अपने पराक्रमसे जगमगाने लगते हैं। पवित्र का के लिए अपने बलका उपयोग करने वाले वे वीर सैनिक हमारे यसमें भा जायें। ४०२ ये तेजस्वी एवं शक्तिशाली धीर हमारी रक्षा करनेका बीड़ा उठाव । ४०३ आकाशस्थ एवं भूमंडलस्थ सभी वस्तुओं को मरतोंने विस्तृत किया है, इसीलिए में उन्हें सोमपान करने के लिए युलाता हूँ। ४०४ पलधान एवं तेजस्वी वीरोंको आक्षपूर्वक बुलाकर अन्नपान के प्रदानसे उनका सत्कार करना चाहिए। टिप्पणी- [४००] (1) मत्सति= (मदि स्तुतिमोदमदस्वामकान्तिातिपु) हर्पित होता है। [४०१] (१) दक्ष योग्यता, बल, मौद्धिक शक्ति। (५) निष्= विनाश करना, दुःख देना । (३) प् (गती)= यह जाना, फिमलना, (भाना)। [४०] (1) दस = (दम् = उपक्षये) विनाशक, मुन्दर, भाश्चर्यकारक, याजक, चोर, हुए, भनि । (२) वर्चस् शक्ति, रोज, भाकार, सौंदर्य, वीर्य, विष्ठा । (३) अद्य भात, भाजकल, भय । मल [हिं.२०] (४११) यूयम् । पुःऽऽ । ऽयुजः । न । रश्मिऽभिः। ज्योतिष्मन्तः । न । भासा । विउँष्टिषु । श्येनासः । न । स्वऽयशसः । रिशादसः । प्रयासः । न । प्रऽमितासः । परिऽगुपः ॥५॥ (४१२) प्र । यत् । वहध्धे । मरुतः । पराकात् । यूयम् । महः । संऽधरणस्य । वस्वः । निदानासः । वसवः । राध्यस्य । आराद । चित् । द्वेषः । सनुतः । युयोत ॥६॥ अन्यय.- ४१६ यूयं रश्मिभिः धूर्षु प्र-युज. न, व्युटिपु ज्योनिप्पन्न न भासा, इयेनास न स्व यशस , रिश-अटस परि-प , प्र-यासान, मसितासः । ४१२ ( है ) यसव. मरतः' यूयं यत् पराकात् प्र वहध्ये महः संवरणस्य राध्यस्य यस्यः वि दानास. सनुतः उप आरात् चित् युयोत । अर्थ- ४११ (यूयं ) तुम (रामभिः ) लगार्मोस (धृ) धुरामामे (प्र-युजान)जोते हुए घोडोंके समान धेगवान, (व्युटिप) प्रात कालीन (ज्योतिप्मन्तः न) आदित्यों के समान (भासा) तेजसे युक्त, श्येनास न ) याज पंछियोंकी नाई (स्य-यशस ) स्वयंही अन्न पानेहारे, (रिश अदुसः) हिंसकों या वध करनहारे और (परि-ग्रुपः) सभी प्रकारले पोपण करनेहारे वनकर (प्र-चास न) प्रवासियो या याग्रियाये समान (प्रसितास ) सदा सिद्ध हो। ४१२ है ( बसवः मरतः । ) वसानेवाले वीर मरुतो। (यूयं ) तुम (यत् ) जय (पराकात् ) सुदूर देशसे (प्रपद) वेगपूर्वक आते हो, नर (मह.) विपुल, (संवरणस्य) स्वीकारनेयोग्य तथा (राध्यस्य) मिद्धि युक्त ( यस्य ) धनका (घि दानासः) दान देनेवाले सुम (सनुतः हेगः) दूरसे आनेवाले देशाओं- यो (आरात् चित् । दरसेही । युयोत ) दर फरी, हटा दो। गाचार्य-१११ थे वीर पेगसे कर्म करनेघारे, तेजस्वी, भाने प्रयत्नसे अन्नकी प्राप्ति करपे शत्रुओका वध करनेहारे बार भग्नी पुष्टि करने वाले हैं तथा यात्रियों समान सदैव सिद्ध है। ४१२ ये चीरन दूर देशसे अतिवेगपूर्वक और तब वे विपुर धन साय रे भाते है और भारतही मर लोगोयो पर प्रपुर धनराशि बाँट देत हैं। हमारी यह हरला है कि आत समय सहमे ही ये पीर हमारे शोको दूर रहते वहतको विष्ट र । मर मिटने के लिए तैयार हो लदनेश वीर, माय ! [१०९(१) यहणा-(बई-परिभाषणहिंसाप्रदानेपु) प्रमुख दगसे, दानसे, प्रमुख स्थान पानेसे। गर्हण- पर पान, शनि मा । (२) रिम् (विरेचने, रियोजनसंपर्चनयोः )- सूना करना, भरग करना, सोना, मिलना। प्र+रिच- विशेष होना, कहा होगा, विशेप दगसे समर्थ बनना। (11 बुध्न = तर, शरीर । (२) प्सु = भग्न (प्सा= IRI) विश्व-प्सु- सब भन्नमय । विश्व सु यज्ञ:- सारे पे मो के प्रदान से होने वारा यह । (३) साय.- मम मिलकर एक विशिष्ट चारसे जानेवारे । [११](1) प्रसित - बर, निरव, मार्गस्थ, सपा, मयार। () यशस् - यश, सुन्दरता, तेज, कृपा, धन, उसम्ब-यास. = भपने परामसे पा पाने गरे । [४१२] (1) पराकात् (पके - कुछ दूर्गपर, भारपर) = सुदूर से दुग्मेही । (२) नुत: दुग्मे, गुप्त जग। .

(४१३) यः । उत्क्रचि । यज्ञे । अधरेऽस्थाः । मरुत्ऽभ्यः । न । मानुपः। ददाशत् । रेवत् । सः । वर्यः । दधते । सुऽवीरम् । सः । देवानाम् । अपि । गोऽपीथे । अस्तु ॥७॥ (४१४) ते । हि । यज्ञेषु । यज्ञियांसः । ऊमाः । आदित्येन । नाम्ना । शम्ऽभविष्ठाः । ते । नः । अवन्तु । रथऽतः । मनीपाम् । महः । च । यामन् । अध्वरे । चकानाः ॥८॥ अन्वयः-४१३ अधर-स्थाः य मानुप. यो उत् मचि मरुद्भ्यः न ददाशत्, सारे-वत् सु-वीरं घयः दधते, देवानां अपि गो-पीथे अस्तु । ४१४ ते हि ऊमाः यशेषु यशियासः भादित्येन नाना शं-भविष्ठाः, रथ-तः अध्वरे यामन महः चकाना. च ते नः मनीपा अवन्तु । अर्थ- ४१३ (अधरे-स्थाः) यज्ञमें स्थिर रहनेवाला, यज्ञ करनेटारा (या मानुपः) जो मनुष्य (यझे उत्-सचि) यशसमाप्ति के उपरान्त (मरद्यः न ) वीर मरतों को दिया जाता है, उसी भाँति (ददा. शत्) दान देता है, (स.) वह (रे-वत्) धनयुक्त एवं (सु-चीर) अच्छे वीरों से युक्त ( वयः) अन्न (दधने) धारण करता है, अपने समीप रखता है ओर यह (देवानां अपि) देवों के भी (गो-पीथे) गोरसपान के समय उपस्थित (अस्तु ) रहता है । ४१४ (ते हि) ये चीर सचमुचही सयकी (ऊमा ) रक्षा करनेहारे है, अतः (यशेषु) याम (यशियासः) पूजनीय है, उसी प्रकार घे (आदित्येन नाम्ना) आदित्यके रूपसे सयको (शं-भविष्टाः) सुम्ब देनेवाले हैं। (स्थ-तृ.) रथ पैठकर येगसे जानेवाले वे वीर (अधरे यामन्) यश जाकर (महः चकाना च ) महत्व प्राप्त करने की इच्छा करने है । ये (न. मनीपां) हमारी आकांक्षाओं को (अवन्तु) सुरक्षित करें। भावार्थ- ४१३ यजसमाप्तिके समय से दान दिया जाता है, सेही जो दान देने लगता है, यह एक तरह से भपने समीप विद्यमान अव को बढ़ाता है और इसी व रणसे उसे पयांह मानामे वीर संतान प्राप्त होती है तथा देवोंके सोमरस या गोरसपान के मौकेपर यहाँ उपस्थित होनेका गौरव एवं सम्मान भी उसे मिल जाता है ४१४ ये वीर सबके सरक्षक है, इसलिए यह भत्यन्त उचित है कि, यज्ञमे उनका सम्मान हो । सूर्यवन् पन ये सयको सुखी करते हैं । रधमे बैठकर वे यनोंमे उपस्थित होते है और वहाँपर विभाग का भादान करना चाहते है। ऐसे ये धीर हमारी भावाभोंकी भली भॉति रक्षा करें। टिप्पणी- [४१३] (१)गो-पाय: गोरक्षण, पवित्र स्थान, रसा, मोमरस पीनेस स्थान, गोदुग्ध सेवन कानेको जगह । (२) उत्-ऋ= पढी भावाजमें कही जानेवाली ऋचा, श्रेष्ठ प्रचा। [४१४] (1) नाम नाम, कीर्ति, चिन, जर, भाकृति, स्वरूप । (२) चरानम (कन सतुष्ट होश, प्रीति करना) मतुष्ट धननेहारे, सम होनेवाले, प्यार करनेवारे । - - (ऋ० १०11०11-6) (४१५) विप्रासः । न । मन्मऽभिः । सुऽआध्यः। देवऽअव्यः । न । यज्ञैः । सुऽअम॑सः । राजानः । न । चित्राः । सुऽसदृशः । क्षितीनाम् । न । मयोः । अरेपर्सः ॥१॥ (४१६) अमिः । न । ये। भ्राज॑सा । रुक्मऽवक्षसः । वातासः। न । स्वऽयुजः । सद्यःऊतयः । प्रऽतातारः । न । ज्येष्ठाः । सुऽनीतयः । सुऽशर्माणः । न । सोमाः । ऋतम् । यते ॥२॥ अन्यय - ४१५ विप्रासः न, मन्मभिः सु-आध्या, देवाव्यः न, यौः स-अप्नसः, राजानःन वित्राः सु-संहः, क्षितीनां मर्याः न अ-रेपसः। ४१६ ये, अग्नि. न, भ्राजसा रुक्म-वक्षसः, चातासः न स्व-युजः, सद्य-ऊतयः, प्र-शातार: न ज्येप्टाः, सोमाः न सु-शर्माणः, ऋतं यते सु-नीतयः । अर्थ-४१५ वे पीर (विप्रास न ) झानी पुरुषों के समान (मन्मभिः) मननीय काव्यों से (सु-आ- ध्यः) उत्कृष्ट विचार प्रकट करनेदारे, (देवाव्यः न) देवोंको संतुष्ट करनेदारे भक्तों के तुल्य (यः मु-अप्नसः) यहुनसे यह करके अच्छे कार्य करनेवाले.(राजानःन) नरेशों के समान (वित्राः) आधर्य- कारक कर्म करनेवाले और ( स-संदृशः ) अतिशय सुन्दर स्वरुपयाले हैं तथा (क्षितीनां) अपने गृहमें ही संतुष्ट रहनेवाले (मर्यान) मानवों के समान (अ-रेपसः ) पापरहित हैं। ४१६५ ये ) जो ( अग्निः न ) अग्नितुल्य (भ्राजसा) तेजसे युक्त (रुक्म-वक्षसः) स्वर्णमुद्राओंके हार पक्षात्यलपर धारण करनेहारे, ( वातास.न) वायुप्रवाहके समान (स्त्र-युजः) स्वयंही फाममें जुट जानेवाले, (सद्य-ऊतय.) तुरन्त रक्षा करनेहारे, (प्र-गातारः न) उत्कृष्ट शानियोंके तुल्य (ज्येष्ठाः) श्रेष्ठ, (सामान ) सोमों के समान (र-शर्माः ) अत्यन्त सुखदायक तथा (ऋतं यते) सत्यकी ओर जानेवाले के लिए (सु-नीतयः) उत्तम पथप्रदर्शक है। भावार्थ- ४१५ ये धीर ज्ञानी रोगों के समान मननीय काव्योंसे सुविचारों का प्रचार करनेवाले, यज्ञरूपी सरकाँसे देवनाओं को संतुष्ट करने हारे, नरेशों की नाई भन्ठे एवं सराहनीय कार्यकलाप निभाने वाले और अपरिग्रह मनोवृत्तिके सतनाके तुल्य निरार है। ४१६ जगमगाते मुद्राहार पहनने के कारण धोतमान, स्वेच्छा से कार्य में निरत, ज्ञानी, श्रेष्ठ, शान्त, मुखदापी, नया सन्मार्गपर से चलनेवाले मानवों के तुल्य दूसरों को भी राह मतलानेवाले ये वीर सैनिक है। टिप्पणी-४१५ (१)स्माध्य= [सु+मा+य (ध्ये चिन्तायाम्) चितन करना, ध्यान करना, सोचना] भली भौनि सोचनेहारा 1 (२) देवाव्य (देव+भर प्रीतितृप्यो) देवों को संतुष्ट करनेहारा। (३) स्वप्नस:- (सु+ भानः कृत्य ) भन्छे कृय करनेहारे, सरफर्म करनेवाले। (४) क्षितिः- पृषी, मनुष्य, स्वदेश । क्षि-ति-[क्षि निवासे, गृहे तिष्टनीनि । यधा प्रतिप्रहार्थं अन्यन अगत्वा स्वगृहे एव अनुतिष्ठन्तः निदोषाः भवन्ति तादृशाः (साभा.)] जो पुरा भरने घापर मिलेगा, उपोमें मनुष्ट रहकर प्रतिपदके लिए घरघर न घूमनेवाला, भपरिषद मनोनि - , (४१७) वातासः । न । ये । धुनयः । जिगत्नयः। अग्नीनाम् । न । जिहाः । विराकिर्णः । चर्मण्ऽवन्तः । न । योधाः । शिमीऽवन्तः। पितृणाम् । न । शंसाः । सुऽग़तयः ॥३॥ (४१८) स्थानाम् । न । ये । अराः । सऽनाभयः । जिगीवांसः । न । शूराः । अभिऽद्ययः । घरेऽययः । न । मयाः । घृतऽ पंः। अभिऽस्वारः । अर्कम् । न । मुऽस्तुभः॥४॥ (४१९) अश्वांसः । न । ये । येष्ठांसः । आशः। दिधिपः । न । रयः । सुऽदानवः । आपः। न । निम्नः । उदभिः । जित्नवः। विश्वऽरूपाः । अङ्गिरसः। न । सामऽमिः॥५॥ अन्वयः-- ४१७ ये, वातासः न धुनयः, जिगरनवः, अग्नीनां जिह्वाः न विरोकिणः, धर्मण्वन्त योधाः न शिमी-वन्तः, पितृणां शंसाः नसु-रातयः। ४१८ ये, रथानां भराः नस-नाभयः, जिगीयांसः शूराःन अभि-धयः,घर-ईयवः मान वृत-गुपः, अकं अभि- स्वारः न सु स्तुभः । ४१९ ये, अश्वासान, ज्येष्ठासः आशवः, दिधिषवः रथ्यः न, सु-दानयः, निम्नः उदभिः, आपः न, जिगनवः, विश्व-रूपाः सामाभिः अङ्गिरसान। अर्थ-- ४१७ (ये) जो ये वीर (वातासः न) वायुके समान (धुनयः) शत्रदलको हिला देनेवाले, (जिगत्नयः) येगपूर्वक जानेहारे, ( अग्नीनां जिसाः न) अग्नी की लपटों के तुल्य (विरोकिणः) देदीप्यमान, (वर्मण्वन्तः ) कवचधारी (योधा न ) योद्धाओं के समान (शिमी-वन्तः) शूरतापूर्ण कार्य करनेहारे और (पितॄणां शंसाःन) पितरोंके आशीर्वादों के रामान (सु-रातयः ) अच्छे दान देनेवाले हैं। ४१८ (ये) जो वीर (रथानां अराःन) रथोंके पहियों में विद्यमान आरों के तुल्य (स-ना- भयः) एकही केन्द्र में रहनेवाले, ( जिगीवांसः शूगः न) विजयेच्छ वीरोंके समान ( अभि-द्ययः) सभी प्रकारसे तेजस्वी, (वर-ईयवः) अभीष्ट प्राप्त करनेहारे (मर्याःन) मानवोंके समान (घृत-ग्रुपः) घृत आदि पौष्टिक वस्तुओंकी ममृद्धि करनेवाले, (अ) पूज्य देवताके (अभि स्यर्तारः न) स्तोत्र पढनेवाले के समान (सु-स्तुभः) भली प्रकार काव्यगायन करनेवाले हैं। ४१९ (ये) जो (अश्वासान) घोडोंके समान (ज्येष्ठासः श्रेष्ठ है, तथा (आशवः) शीघ गति- से जानेवाले है, (दिधिषयः । विपुल धन समीप रसनेवाले (रथ्यः न) रथोंसे संपन्न होनेवाले महारथि- योंके समान (सु-दानवः) अच्छे दानशूर, (निम्नः उदभिः ) ढलती जगह की ओर जानेवाले जलप्रवाहोंके (आपःन ) जलोंकी नाई (जिगरनवः) बडे वेगसे जानेवाले, (विश्व-रूपाः) भॉति भॉतिके रूप धारण करनेहारे और (सामभिः) सामगानों से ( अङ्गिरसः न ) अंगिरसोंके तुल्य ये वीर अच्छे गायक है। भावार्थ-४१७ ये वीर शत्रुको जड मूलसे उखाड फेंक देनेवाले, अग्निवत् तेजस्वी, कवचधारी बनकर लडनेवाले तथा शूरता दर्शाने वाले हैं और इनके दान पितरोंके भाशीवादोंके समान बहुतही सहायक है । ४१८ थे वीर एक उद्देश्यसे प्रभावित हो कार्य करने वाले, विजय पाने की चाह रखने वाले, तेजस्वी, शूर, सबको समृद्धि प्रदान करनेहारे तथा पूजनीय वीरोंके काव्यका गायन करनेवाले हैं। ४१९ ये वीर घोडोंके समान वेगसे जानेहारे, महाराधियों के समान उदार, उचित मौकेपर विभिक्ष स्वरूप धारण कर कार्य करने में बदेहो कुशल,जलीघोंके समान निम्न स्थल में पहुँचकर शान्ति प्रदान करनेहारे और सामगान करनेमे बिलकुल अंगिरसोंके समान कुशल है। टिप्पणी- [४१८) (1) नाभिः = पहियेकी नाभि, केन्द्र, नेता, प्रमुख । (२) अभि-स्वर्तृ = (स्ट शब्दोपसापपोः) भावाज करनेहारा, उच्चार करनेहारा, (स्तुति करनेवाला) । (अराः न) जिस भौति चक्रके भारे समान होते हैं, वैसेही ये सभी वीर सैनिक समान हैं । ( देखिए मंन्न ९५,३०५, ४५३१) अन्वय . (४२०) ग्रावाणः । न । सुरयः । सिन्धुऽमातरः। आऽदुरािसः । अर्द्रयः । न । विश्वा । शिशूलाः । न । क्रीळयः । सुऽमातरः। महाऽग्रामः । न ! याम॑न् । उत । लिपा ॥ ६ ॥ (४२१) उपाम् । न । केतवः । अधर श्रियः। शुभम्ऽयः। न । अजिभिः। वि। अश्वितन् । सिन्धयः । न । ययियः । भ्राजमष्टयः। पराऽयतः । न । योजनानि । ममिरे ॥७॥ (४२२) सुऽभागान् । नः । देवाः । कृणुत । सुऽरत्नान् । अस्मान् । स्तोतॄन् । मरुतः । ववधानाः । अधि । स्तोत्रस्य । सख्यस्य । गात । सनात् । हि । यः । रत्नग्धेयानि । सन्ति ।।८॥ ४२० सूरय , ग्रावाण न सिन्धु-मातर , आ-ददिरास अद्रय न विश्य हा, सु-मातरः शिशूला न क्रोळय , उत महा ग्राम न यामन् विपा । ४२१ उपसा केतच न, अध्धर-धिया, गुभ-यव न, अक्षिभि वि अश्विनन्, सिन्धव में ययिय , भाजत्-ऋष्टय , परावत न योजनानि ममिरे । ४२२ (हे ) देवा यवृधाना मरत ! अस्मान् न स्तोतृन सु-भागान सु-रत्लान् रणुत, सरयस्य स्तोत्रस्य अधि गात, हि व रत्न-घेयानि सनात् सन्ति । अर्थ-४२० (सूरय ) ये मानी वीर (प्रायाण ) मेघौके समान (सिन्धु मातर ) नदियों के पनाने हारे, ( आ-ददिरास ) सभी प्रकारसे शत्रुका विनाश करनेहारे ( अद्य न ) पोंके तुल्य (विश्व-हा) सभी शत्रुओंका सहार करनेहारे, (सु मातर ) उत्तम माताओंके (शिशूला न ) निरोगी पुन-संतानों के समान (पोळय ) खिलाडी (उत ) और ( महा-माम न ) बडे सग्राम चतुर योद्धाके समान शापर (यामन् ) हमला करते समय (त्विषा) तेजस्वी दीख पडते ह। ४१ये वीर उपसा तिव न ) उप कालीन फिरणों के समान तेजस्वी (अधर-थिय ) यशके कारण नुहानेवाले (शुभ यवान ) कल्याणप्राप्तिके लिए प्रयत्न करनेवाले वीरोंके समान (आअिभिः) वीरभूपणों या गणवेर्टोसे (चि अश्वितन् ) विशेष ढगसे प्रकाशित हो रहे है। ये (सिन्धय न) नदियों के समान (ययिय ) वेगपूर्वक जानेहारे, (भ्राजत्-ऋष्ट्रय ) तेजस्वी हथियार धारण करनेहारे तथा (परा चत न) दूर जानेहारे प्रवासियोंके समान ( योजनानि ) कई योजन (ममिरे) पार कर चले जाते हैं। ४२२ हे (देया ) प्रकाशमान तथा (यवृधाना) वढनेवाले (मरत !) मरतो । (अस्मान् ) हमें और (न स्तोत्रम् ) हमारे सभी फपियोंको (सु-भागान ) अच्छे भाग्यवान एय (सु-रत्नान्) उत्तम रत्नोंसे युक ( रणुत) परो। (सरयस्य स्तोत्रस्य ) हमारी मित्रता काव्यका (अधि गात ) गायन करो। (हि) क्योंकि ( 4 ) तुम्हारे (रत्न धेयानि ) रत्नोंके दान ( सनात् ) चिरकालसे (सन्ति ) प्रचलित है। भावार्थ-४२० पे वार पनता के सहायक, शस्त्रों के तुरूप ग्रुनाशक उत्तम मावा आरोग्यसपन पत्रों की नाई खिलाड़ी और युद्धकुशल योद्धाके जैसे शत्रुदलपर टूट पड़ते समय प्रसनचेता बनने वाले हैं। ४२१ ये वीर तेजस्वी, अपने शरीको संवारनेचारे, वेगपूर्वक दौडनेपाल, भाभामय हथियार रखनेवाले, शीघ्र पहुँच जानेकी इच्छा करनेवाले यात्रियों के समान का योपन थकावट न दर्शाते हुए जानेवाल हैं। ४२० हे वीरो! हमे तथा हमारे सभी कवियों को मनुर मात्रामें धन एक रन दे दो, क्योंकि मुम्हारा धनदानका कार्य र गातार प्रचलित रहता है। मित्ररष्टि हर स्थानपर पनपने लगे इसीलिए इस काम्यका गायन करो और मित्रतापूर्ण रधिको बदाभो। टिप्पणी-[४०] (१) प्रायन् = पत्थर, मेघ, पर्वत । (२)आ-दादर - (भा+इ= फोडना, नाम करना) विनाशक। [४२१] (1) पर+भवत् = दूर जाने वाला। [४२२] (१)धेय : बटोरना, लेना, पोषण करना । (२) स्तोता = वि । (३) सरयस्य स्तोत्र = मित्राव बढाने के लिए किया हुआ काम्य, सभी जगह मित्रभाव पदे, इस हेतुसे रचा हुभा कास्य । - त्या। (पा. यजु० ३।०४) (४२३) प्रघासिनऽइति प्रऽधासिनः । हवामहे । मरुतः । च । रिशादसः । करम्भेणं । सजोपसऽइति सऽजोपसः ॥४४॥ (वा. यजु० ७।३६) (४२४) उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः । असि । इन्द्राय । त्या । मरुत्वते । एषः। ते । योनिः । इन्द्राय । त्वा । मरुत्वते । उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः । असि । मुरुताम् । त्या । ओजसे ॥३६॥ (वा यजु० १७१८०-८६) (४२४) शुक्रज्योतिथ चित्रज्योतिश्च सत्यज्योतिश्च ज्योतिष्मॉश्च । शुक्रवऽस्तुपाचात्यहाः॥८॥ [१] शुक्रज्योतिरिति शुक्रऽज्योतिः । च । चित्रज्योतिरिति चित्रज्योतिः । च । सत्यज्यो- तिरिति सत्यज्योतिः । च । ज्योतिष्मान् । च । शुक्रः । च । तपाऽइत्यूतऽपाः । च । अत्यहा इत्यतिअहाः ॥८॥ अन्वयः-४२३ प्र-धासिनः रिश-अदसः करम्भेण स-जोपस. च मरतः हवामहे । ४२४ उपयाम- गृहीतः मासि, मरत्वते इन्द्राय त्वा, एप ते योनि मरुत्यते इन्द्राय उपयाम-गृहीतः असि, मरतां ओजसे ४२४ (१) शुक्र-ज्योतिः च चित्र-ज्योतिः च सत्य-ज्योतिः च ज्योतिप्मान् च शुक्रः च ऋत-पाः च अत्यंहा [ हे मरतः । यूयं अस्मिन् यो एतन] । अर्थ-- ४२३ (प्र-धासिनः) उत्तम अन्नका सेवन करनेहारे, (रिश-अदसः) हिंसकोंका वध करनेहारे और (करम्भेण स-जोपसः च) दहीआटेको सब मिलकर सेवन करनेवाले (मरतः हवामहे) वीर मरतों को हम बुलाते है। ४२४ तू ( उपयाम -गृहीतः असि ) उपयाम वर्तनमें धरा हुआ सोम हे, (मरत्वते इन्द्राय ) वीर मरुतोंके साथ रहनेवाले इन्द्र के लिए (त्या) तू है । (एपः ते योनि.) यह तेरा उत्पत्तिस्थान है। (मरतां ओजसे) वीर मरुतोके तुल्य बल प्राप्त हो जाय, इसीलिए हम (त्या) तुझे अर्पित करते हैं या तेरा ग्रहण करते है। ४२४ (१) (शुक्र ज्योति च) अति शुभ्र तेजसे युक्त, (चिर-ज्योति च) आश्चर्यजनक तेजसे पूर्ण, (सत्य ज्योतिः च) सत्यके तेजसे भरा हुआ, (ज्योतिष्मान् च ) पर्याप्त मात्रामें प्रकाशमान, (शुकः च) पवित्र, (मत-पा. च) सत्यका संरक्षण करनेहारा और (अत्यंहा ) पापसे दूर रहनेवाला [इस भॉति नाम धारण करनेहारे वीर मरतो ' इस हमारे यशमें तुम पधारो] भावार्थ- ४२३ शत्रुविनाशक तथा सब इकट्ठे होकर अन्ना सेवन करनेवाले मरनोंको हम अपने समीप बुलाते है। ४२४ उपयामनामक पायम सोमरस उढेलकर इन्द्र तथा मरुतोंको दिया जाता है भोर ऐसा करनेसे मरतोंके समान बल प्राप्त हो, ऐसी प्रार्थना उपासक करता है तथा वह उस सोमरसका ग्रहण एवं दान करता है। ४२४(१) १ शुत्रज्योति, २ चित्रज्योति, ३ सत्यज्योति, ४ ज्योतिष्मान्, ५ शुक्र, ६ ऋतपाः ७ अत्यंहाः ये सात मरत है। यह मरुतोंकी पहली पत्ति है। टिप्पणी-[४२३ ] (१)प्र-घासिन् = (घम् अदने - खाना, घासः = अर ) उत्तम अधरो खानेवाले, पर्याप्त भन्नका सेवन करनेवाले । (२) करम्भ = सत्तूका आटा दहीमें मिलाकर तैयार किया हुभा साद्य पदार्थ । दही- भात, कोईभी अस दहीमे मिला देनेपर सिद्ध होनेवाली सानेकी चीज । [४२४ ()() अत्यंहस् (भति भंहस्-) पापसे दूर रहनेवाला। [हे मरता! -- यह मध्याहार मा ४२५ में से लिया है। महत् (हिं.)२१ .

शन्धयः- (४२४) ईदृङ् चोन्याङ् च सुदृङ् च प्रातसहङ् च । मितश्च सम्मितच सभराः ॥८॥ [२] ईदृङ् । च । अन्याङ् । च । सदृङ् ।सदृङितिसऽदृङ् । च । प्रतिसदृडिति प्रतिऽसदृङ् । च । मितः । च । सम्मितऽइति सम्ऽमितः । च । सभराऽइति सऽभराः ॥८१॥ (४२४) ऋतर्थ सत्यश्च ध्रुवश्च धरुणच । धर्ता च विधुर्वा च विधारयः ॥८२॥ [३] मृतः । च । सत्यः । च । ध्रुवः । च । धरुणः । च । धुर्वा । च । विधर्तेति विऽधर्ता । च । विधारयऽइति विऽधारयः ॥ ८२ ॥ (४२४) ऋजिचे सत्यजिचे सेनजिर्च सुषेणश्च । अन्तिमित्रच दुरेऽअमित्रच गणः ॥८३॥ [2] अनजिदित्य॒तऽजित् । च । सत्यजिदिति सत्यजित् । च । सेनजिदिति सेनऽजित् । च । सुपेणः । सुसेनऽइति सुऽसेनः । च । अन्तिमित्रऽइत्यन्तिऽमित्रः । च । दुरेऽअमिऽइति दुरेऽअमित्रः । च । गुणः ॥ ८३ ॥ ४२४ ( २ ) ई- दइ च अन्या- टङ् च स-दृङ्च प्रति-सङ्च मितः च सं-मितः च स- भराः [हे मरतः ! पृथं अस्मिन् यक्षे एतग 1] ४२४ ( ३ ) प्रातःच सत्यः च ध्रुवः च धरुणः च धर्ता चवि-धर्ता च वि-धारयः हे मरुतः! ययं अस्मिन् यज्ञे एतन] । ४२४ (४) ऋत-जित् च सत्य-जित् च सेन-जित् च सु-पेणः च अन्ति-मित्रः च दूरेऽअ-मित्रः च गणः [हे मरुतः यूयं अस्मिन् यने एतन]। अर्थ- ४२४ ( २ ) ( ई- च ) समीप की वस्तुपर दृष्टि रखनेवाला, (अन्या-दृङ् च ) दूसरी ओर निगार टालनेवाला, (स-ह च) सवको सम दृष्टिसे देखनेवाला, (प्रति-संदृङ् च ) प्रत्येकको एक विशिष्ट प्टिस देसनहारा, (मितः च) संतुलित भावसे बर्ताव रखनेवाला, (सं-मितः च ) सबसे समरस होनेवाला (स-भराः) सभी दामोंका बोझ अपने सरपर उठानेवाला- [इन नामोसे परयात पीर मरती । इस हमार यसमें आ जाओ। ४२४ (३) (नातःच) सरल व्यवहार करनेहारा, (सत्यः च ) सत्यावरणी, (ध्रुयः च) अटल एवं अडिग भावसे पूर्ण, (धरुणः च ) सयको आश्रय देनेवाला,(धर्ता च) धारफशक्तिसे युक्त, (वि धर्ता च) विविध ढंगोंसे धारण करनेमें समर्थ और (वि-धार-यः) विशेष रीतिसे धारण कर प्रगतिशील बननेयाला- [इन नामोसे विरयात वीर मरुतो ! हमारे यज्ञमें पधारो।] ४२४ (४) (ऋत-जित् च) सरल राहगे चलकर यशस्वी होनेवाला, (सत्य-जित् च) सत्यसे जीतनेवाला, (सेन-भित् च ) शत्रुसेनापर विजय पानेवाला, (सु-पेणः च ) अच्छी सेना समीप ररानेवाला, (अन्ति- मिनः च) मित्रोंको समीप करनेवाला, (दूरेऽअ-मित्रः च ) शनुको दूर हटानेवाला और (गण:) गिनती फरनेवाला- [इन नामासे विभूषित वीरो ! हमारे इस यक्षम आओ] भावार्थ- ४२४ (२) ८५, ९ भन्याहट, १० सट, मतिसंह, १२ मित, १ संमित वया १४ सभर इन सात मरनोंका उस यहार किया है। यह रोंकी दूसरी सार है। ४२४ (३) १५ ऋत, १६ सत्य, १७ भुव, १८ घरग, ६ रिधर्ना, २० धर्ता, २१ विधास्य ऐसे सात मरतोंका उछप यहाँपर है। यह मरुतोंकी तीसरी पंक्ति है। ४०४ (४)२ नजित्, २३ सत्यनिन्, २४ सेनजित्, २५ मुग, २६ अन्तिमित्र, २७ दूरेऽमित्र, २८ गण इन सात गरौंका निर्देश यहाँपर किया है। यह मरनोंकी चतुर्थ कतार है। टिप्पणी-[४२४ (३)] (1) ऋत = सरर, विश्वामाई, पूज्य, प्रदीस, सत्य, यज्ञ, सत्कर्म । (२) धरण = होने वाला, जानेवासा, भाघ्य देनहा। [४२४ (४)](1) गणः = (गण परिसंस्थाने) गिनती करनेहारा, चाय पान देनेहारा, चौफना। है - - (४२५) ईदृक्षासः । एतादृक्षासः । ऊँऽत्यू । सु। नः । सदृक्षास इति सशक्षासः । प्रतिसक्षासs- इति प्रतिऽसरक्षासः। आ । इतन। मितासः । च । सम्मितासऽइति सम्ऽमितासः । नः । अद्य । सरसऽइति सऽभरसः । मरुतः । यज्ञे । अस्मिन् ॥८४॥ (४२६) स्वतवानिति स्वऽतवान् । च । प्रयासीति प्रयासी । च । सान्तपनऽइति साम्ऽतपुनः । च । गृहमेघीति गृहमेधी । च । क्रीडी । च । शाकी । च । उज्जेपीत्युत्ऽजेपी ॥८५॥ [(४२६) उग्नर्थ भीमच ध्वान्ता धुनिथ । सासाँचोभियुग्मा च विक्षिपः स्वाहा । ( पा०य०३९।७) [१] उग्रः । च । भीमः । च । वान्तः इति धुऽन्तिः । च । धुनिः। च । सासहान्। ससहानिर्ति ससह्वान् । च । अभिऽयुग्वेत्यभिऽयुग्या । च । विक्षिपऽइति विऽक्षिपः । स्वाहा ॥७॥ ] (४२७) इन्द्रम् । देवीः । विशः। मरुतः । अनुवमानऽइत्यनुऽवमानः। अभवन् । या । इन्द्रम् । देवीः । विशः । मरुतः । अनुबान इत्यर्नुऽवनिः । अभवन् । एवम् । इमम् । यज॑मानम् । दैवीः । च । विशः । मानुषीः । च । अनुवनिऽइत्यनुऽवनिः । भवन्तु ॥८६॥ अन्वयः- ४२५ ई-दृक्षासः एना-दृक्षासः ऊ स-दृक्षासः प्रति-सदृक्षासः सुमितासः सं-मितासः नः स-भरसः (हे ) मम्तः! अद्य नः अस्मिन् यो एतन । ४२६ स्व-तवान् च प्र-घासी च सान्तपनः च गृह मेधी च क्रीडी च शाकी च उत्-जेपी च [ हे मरुतः ! यूयं अस्मिन् यशे एतन] । ४२६(२)उग्रः च भीमः च ध्वान्तः च धुनिःच सासहान् च अभि-युग्वा च विक्षिपः स्वाहा । ४२७ देवीः विशः मरुतः इन्द्रं अनु-वनिः अभवन् ( यथा देवीः०००० अभवन् ) एवं देवीः मानुपीः च विशः इमं यजमानं अनु- यमानः भवन्तु । अर्थ-४२५ (ई-पक्षासः) इन समीपस्थ वस्तुओंपर विशेष दृष्टि ररानेदारे,(पता-वृक्षासः ) उन सुदूर वती चीजोंपर विशेष ध्यान केन्द्रित करनेवाले, (ऊ स-दृक्षास ) सब मिलकर पक विचारले देखनेहार, (प्रति-सदृक्षासः) प्रत्येकाकी ओर विशेष ध्यान देनेवाले, ( सु-मितासः) अच्छे ढंगसे प्रमाणबद्ध, (सं- मितासः) मिलजुलकर काम करनेहारे तथा (नः) हमारा (स-भरसः)समान अनुपातम पोपण करनेवाले हे (मरतः!) चीर मरुतो ! (अद्य) आज दिन (नः अस्मिन् यशे) हमारे इस यज्ञमें (एतन) आओ। ४२६ (स्व-तवान् ) अपने निजी वलके सहारे पडा हुआ, (प्र-धासी च) भली भाँति अन तैयार करनेवाला, (सान्तपनः च ) शत्रुओंको परिताप देनेवाला, (गृह-मेधी च) गृहस्थधर्म का पालन फरनेवाला, (क्रीडी च) खिलाडी, (शाकी च ) सामर्थ्य युक्त तथा (उत्-जेपी च) दुश्मनोंपर अच्छी विजय पानेहारा [ इस भाँति नाम धारण करनेहारे चीर मरुतो! इस हमारे यशमें आओ।] ४२६ (१) (उप्रः च ) उग्र, (भीमः च ) भीपण, (ध्यान्तः च) शनुओं के आँखों में अंधियारी छा जाय ऐसा कार्य करनेहारा, (धुनिः च ) शत्रुदलको हिला देनेवाला, (सासद्वान् च) सहनशक्तिसे युक्त, (अभि-युग्या च) शत्रुदलसे सामने जूझनेवाला, (वि-क्षिपः च) विविध ढंगासे शत्रुओं को भगा- नेवाला-इस भाँति नाम धारण करनेहारे वीर मरताको ये हविष्यान (स्वाहा ) अर्पित हों। ४२७ (देवीः विशः मरुतः ) ये चीर मरुत् दैवी प्रजाजन है और ये (इन्द्रं अनु-वमानः ) इन्द्र के अनुयायी ( अभवन्) हुए है। (एवं) इसी भाँति (दैवीः मानुपीः च विशः) देवलोक एवं मनुष्पलोक के प्रजाजन (इमं यजमान ) इम या फग्नेहारे के (गनु-वमानः भवन्तु ) अनुयायी हो। .

" भावार्थ-४५२९ ईदृक्षास', ३. एतादृक्षासः, ३१ समास , ३२ प्रविसरक्षासः, ३३ सुमितासः, ३४ संमिता- सः, ३५ समरस इन सात मरतों का उल्लेख इस मन्त्रमें है । यह मरतोंकी पंचम पंक्ति है। ४२२ ३६ स्वतयान्, ३७ प्रघासी, ३८ सान्तपन, ३९ गृहमेधी, ४० कोडी, ४१ शाकी, ४२ ४ग्जेपी इन माल मरain निर्देश यहाँ है । यह मरतोंकी छठी पंक्ति है। ४२६ (१) ४३ उम्र, ४४ भीमा ४५ धान्त, ५६ धुनि, ५७ सासद्धान्, ४८ भभियुवा, १९ विक्षिप, इस भांति सात मरतोकी संरया यहाँपर निर्दिष्ट है। यह मत्लोकी सप्तम पंक्ति है। टिप्पणी-[४२६(1)]() घान्तः = ( स्यन् दाम्दे) सन्दकारी, मधेरा । (२) सासद्वान् - (स-मा- [ मह मर्पणे ]+यद) सहनशक्तिसे युक्त । [R० ८.९६. ८ मंग्रम "नि पप्टिस्त्या मरुतो यावृधाना' मर्थात् समूचे महताबो सरपा ६३ है, ऐसा स्पष्ट कहा है। उसी मंग्रपर की हुई सायणाचार्यजी की टोकामें यों लिखा है- "त्रिः प्रयः। पष्टि-युत्तरसंख्याकाः मरुतः। ते च तैत्तिरीयके 'ईदृइ चान्याड् च '(ते. सं० १६१५५ ) इत्यादिना नया गणेषु सप्त सप्त प्रतिपादिताः। तत्रादितः यश्च गणाः संहितायामाम्नायन्ते। 'स्वतांच प्रघासी च सान्तपन गृहमेधी च फ्रीडी च शाफी चोजेपी' (पा० सं० १७१८५) इति खैलिका पटो गण। पतो 'धुनिध ध्वान्तध्र' (ते. बा० ४।२४ ) इत्यापासयोऽरण्येऽनुवाक्याः । इत्थं त्रयापटिसंख्या- पा:-" Anीय संहितामा परिगणन इस भौति है- संख्या । चा. यानु० मंत्रसंख्या १७८१) (२) यज्ये तिच- (३) ताजिय- (४)- (१)मास - ८४) . " ३ " . " " " राके अनुसार देना होमो- (६) स्वकार- (या. य. १७७८५) (ते. अ. ४) ७ (८) उप्रय भुध- " रोमें 'धुनिल थापामया' यों कहा है, परन्तु ७४३ - २१ मरतु स्वतंत्र रीतिसे नहीं पाये गये हैं। केवल १९ है। निमसे ५ पुनरक है । सब मिलाकर ० म ३५+पा० य० + भा. १४ = ५६ मरतोंकी गिनती पाई पाती है। (पा०प०३९) 'उप्रश्च भीमथ' गिनतीरोमी इसीसे सघुन करें और उसमेंसेभी पुनरक नाम हटा दो (पहले से ५६+) १ मिशनेपर दुल ५९ मरणाही दोष पटती है। शेष नामों का भनुमन्धान निशा. मुभीको पाना चाहिए। एकोनपञ्चाशत्संरयाया मरत ' ऐसा वर्णन भनेक स्थानों पर पाया जाता है, उस प्रभार (घा. २०११८० से ४५ भार ३१७) त ४ मरताको गणना स्पष्ट है। ५५ (पा.५० ११.८५ भौर ३.५), (.० १६५) भोर (से. प्रा. ४१२४) इन सभी मोदी गया निरिदिंगकी है- १६५ . २ ईदृट् सहद ७ उप्र ध्वान्त धुनि ५ [वा. य. १४८० - ८५ व ३९]]- १ ३ ६ १ शुक्रज्योति चिनज्योति सत्यज्योति ज्योतिष्मान् शुक्र ऋतप अत्यंहम् अन्याह प्रतिराहट मित संमित सभरस् ३ मत सत्य धरुण વર્તા विर्ता विधारय ४ प्रातजित् सत्यजित् सेनजित् सुपेश अन्तिमिन दूरेऽमित गण ५ ईदृक्षास. एतादृक्षास. सदृक्षामा प्रतिसहक्षासः मुमितास. संमितासः सभरस: ६ स्वतवान् प्रघासी सान्तपन गृहमेधी शाकी उज्जेषी भीम सासाहान् अभियुग्वा विक्षिप (पंचम पंक्ति में 'संमितासः' तथा 'सभरसः' का एकवचन लिया जाय तो 'संमित' तथा 'सभरस्' दोनों नाम दूसरी पंक्तिमें पाये जाते हैं यह विचार करने योग्य बात है।) (ते. सं. ४१६५१५) १ ३ ६ १ ईदृष्ट अन्याट् एता प्रतिसदृट् मित संमित २ शुमज्योति चिनज्योति सत्यज्योति ज्योतिष्मान् सत्य मतप अत्यंहस् ३ तजित् सत्यजित् सेनजित् मुषेण अन्ति अमिन दूरेऽमिन गण ४ मत सस्य ध्रुव धरण धर्ता विधती विधारय ५ ईक्षासः एतादृक्षास सदृक्षास प्रतिमहक्षासः मितासः संमिताम मभरस (ते. आ. ४।२४) २ ३ १ धुनि ध्यान्त ध्वनयन् निलिम्प विलिम्प विक्षिप २ उन धुनि ध्वान्त ध्वन ध्वनयन् राहसवान सहमान ३ सहस्वान् सहीयान् एत्य प्रेत्य विक्षिण x यह समूची गणना १०३ हुई। इसमेंसे ४० पुनरक्त हटा दे तो ६३ शेष रहते हैं । इस प्रकार (क्र. ८१९३८) पर की टीकाम जो ६३ संख्या पतलायी है, वह सुसंगत प्रतीत होती है। इससे ऐसा जान पड़ता है कि इन ६३ मरतोंकी रचना यो पतलायी जा सकती है .. समरम् 4 . १ ४ ५ ६ ७ ध्यन ० . x . . . . . x x o ० . . . x x . . X . . . . . x . ० . . 0 . x 0 . . . . x ७ - पार्श्व-रक्षक 1 ४९ मरुत् पार्श्व-रक्षक % कुल ६३ मरुन् ध्यान रहे कि इन महतोकी सेनागे छोटेसे छोटा सगुदाय ( Unit) ६३ सैनिकोवा माना जाता है । इममा चित्र भगळे पृष्टपर देखिये।

मरुतोका एक संघ
पाक्षी मरनारीमाव पंनियां पार्थरक्षयोंकी
४९ मात्र
पत्ति
७ मा
७ मर
७ पावरक+४९ मत + ७ पावरक्षर र ६३ मरनोंका एक संप.

.) (वा. यजु० २५.. (४२८) पृर्पदश्वा इति पत्ऽअश्वाः । मरुतः । पृश्निमातर इति पृश्निऽमातरः । शुभंयावान इर्ति शुभम्ऽयानिः । निदथेषु । जन्मयः । अग्निजिह्वा इत्यग्निऽजिहाः । मनमः । सूचक्षस इति सूरऽचक्षसः । विश्वै । नः । देवाः । असा । आ । अगमन् । इह ॥२०॥ अनिपुत्र दयावाश्व शापि (साम० ३५६) (४२९) यदि । वहन्ति । आशयः । भ्राजमानाः। रथेपु । आ । पियन्तः । मदिरम् । मधु । ता। श्रनासि । कृपते ॥५॥ नहा मापि ( अर्था० १२६१३-४) (४३०) यूयम् । नः । नवतः । नपा । मरुतः । सूर्यऽत्वचमः । शर्म । यच्छाध । सऽप्रयाः ॥३॥ - अन्वय ४२८ पृषत्-अश्या पृश्नि-मातर शुभ यावान विदथेषु जग्मय अग्नि जिहा मनव सूर-- चक्षस. मरुत विश्वे देवा अवसान इह आगमन् । ४२९ यदि आशय रथेपु भ्राजमाना. मधु मदिर पिनन्त आ वहन्ति तन श्रवासि कृण्वते । ४३० (हे) सूर्य-स्वचस मरत प्रवत नपात् ! यूय न स प्रथा शर्म यच्छाथ । अर्थ- ४२८ रथों को (पृपत्-अश्वा ) धनेवाले घोडे जोतनेवाले. (पृश्नि-मातर ) भूमि एव गौको माता माननेहारे, (शुभ यावान ) लोककल्याण के लिए हलचल करनेवाले (विदथेषु जग्मय ) युद्धामे जानेवाले, (अग्नि-जिह्वा ) अग्निकी लपटों, की नाई तेजस्वी, (मनव ) विचारशील (सूर-चक्षस ) सूर्यवत् प्रकाशमान (मरुत ) धीर मरुत् ओर (विश्वे देवा ) सभी देव (अवसा) सरक्षक शक्तियोंके साथ (न. इह) हमारे यहाँ (आगमन ) आ जायें। ४२९ (यदि ) जहाँ जहाँ ये ( आशव )वेगपूर्वक जानेहारे,(रथेषु भ्राजमाना ) रथोमें चमकने हारे तथा (मधु मदिर पिचन्त.) मीठा सोमरस पीनेवाले चीर (आ वहन्ति) चले जाते है (तत्र) वहाँ यहॉपर (श्रवासि कृपते) विपुल धन पाते हैं । ४३० हे (सूर्य-त्वचस. मरुत !) सूर्यवत् तजस्वी वीर मरतो ! ओर (प्रयत नपात्) अग्ने' (यूय ) तुम सभी मिलकर (न ) हमें (स-प्रथा ) विपुल (शर्म) मुस (यच्छाथ) दे दो। भावार्थ-४२८ ( भावार्थ स्पष्ट है।) ४२९ निधर ये वीर सैनिक चले जाते ह, उधर वे भाँति भाँतिके धन ४३० हम इन दवों की कृपासे सुख मिले। कमाव ह। टिप्पणी-[३०](1) प्रवत्- मुगम मागं, दाल । (२) नपात्= पोता, पुन (न-पात्) जिसका पतन न होता हो। प्रयतो नपात्-(Son of the heavenly height le Agni) सीधी राहसेल जाकर न गिरानेवाला। (३)स प्रथा = (प्रथस्-विस्तार) विस्तारसे युक्त, विशाल, विपुल ।

१६८ (४३१) सुसूदत । मृडत । मृडयं । नः । तनयः । मः । तोकेम्पः । कृधि ॥४॥ (अथर्व० ५।२६५) (४३२) छन्दांसि । यज्ञे । मरुतः । स्वाहा । माताऽईव । पुत्रम् । पिपुत । इह । युक्ताः ॥५॥ (अथर्व० १३३१३) (४३३) यूयम् । उनाः । मरुतः । पृश्चिऽमातरः । इन्द्रेण । युजा । प्र । मुणीत । शत्रून् । आ। वः । रोहितः । शृणवत् । सुऽदानवः । निऽसप्तासः । मरुतः । स्वादुऽसमुदः ॥३॥ अन्ययः- ४३१ सु-सूदत मृडत मृडय नः तनुभ्यः तोकेभ्यः मयः कृधि । ४३२ ( है ) मरत. युक्ताः इह यह माताइच पुत्र उन्दांसि पिपृत, स्वाहा । ४३३ (हे ) पृश्नि मातरः उग्राः मरत ! यूयं इन्द्रेण युजा शत्रून् प्र मृणीत, (हे ) सुदानवः स्वादु-सं-मदः त्रि-सप्तासा मरुत वः रोहितः आ शृणवत् । अर्थ- ४३१ हमारे शत्रुओं को (सु-सूदत) विनष्ट करो। हमें (मृडत ) सुखी करो; हमें (मृडय) सुखी करो। (न तनूभ्यः ) हमारे शरीरों को और (तोकेभ्यः) पुत्रपौत्रोको (मय ) सुखी (रुधि) करो। ४३२ हे (मरुत !) वीर मरतो ! (युक्ता ) हमेशा तैयार रहनेवाले तुम (इह यशे) इस यशमें (माताइव पुत्रं) माता जैसे पुत्रका पालनपोषण करती है, उसी प्रकार हमारे (छन्दांसि ) मन्त्रों फा, इच्छाओं का (पिपृत) संगोपन करो। (साहा) ये हरिप्यान्न तुम्हें आर्पित हों। ४३३ हे (पृश्नि-मातरः) भूमिको माता माननेवाले, (उपाः) शूर (मरुतः!) वीर मरतो! (यू) तुम (इन्द्रेण युजा) इन्द्रसे युक्त होकर ( शत्रून् प्र मृणीत ) शत्रुओंका संहार फरो। हे (सु-दानव) दानी, (स्वादु-सं मुद) मीठे अन्नसे अच्छा आनन्द पानेहारे तथा (नि-सप्तास.) इक्कीस विभागों में बैंटे हुए (भरतः1) धीर मरतो (यः रोहितः) तुम्हारा लाल रंगवाला हरिण ( आ शृणवत्) तुम्हारी बात सुन ले, तुम्हारी आशामें रहे। भावार्थ-- ४३१ हमारे ग्रुओं का पिनाश होकर हमे सुख प्राप्त हो। ४३२ इमारी भाकांक्षाओं का भली भाँति संगोपन हो और वह पीके प्रधानसे हो, मतः इन वीरों को हम यह अर्पण कर रहे हैं। ४३३ धीर सैनिक अपने प्रमुख सेनापतिकी भाशामें रहकर शत्रुदलको धनियाँ उड़ा दें। भच्छा अन्य प्राप्त करके भानन्द प्राप्त करें। अपने सभी सेनाविभागोंकी मुम्यवस्था रखकर हरएक बोर, प्रमुखको आशाके अनुसार, कार्य काता रहे, ऐमा अनुशासनका प्रबंध रहे। टिप्पणी- [४३१] (1) सूदु (क्षरणे) विनाश करना, वध करना, दुख देना, दूर फेंक देना, रखना। [४३२] (1) छन्दस्- इच्छा, स्तुति, वेद । [४३३ ] (1) स्वादु - मीठा, (मिठासमरी खाद्य वस्तु, सोमरस)। (२) सप्त= (सप्= सम्मान सम्मानित। देना) सात, । अथर्वा ऋपि ( अपर्व० ३।१।२, ६) (४३४) यूयम् । उग्राः । मरुतः । ईदृश। स्थ । अभि । म । इत् । मणौ । सहनम् । अमीमृणन् । वसवः । नाथिताः । मे। अग्निः । हि । एपाम् । दूतः । प्रतिऽए । विद्वान् ॥२॥ (४३४) इन्द्रः सेना मोहयतु महतो नुन्त्योजसा । चर्तव्यमिरा दत्तां पुनरेतु पराजिता ॥६॥ [१] इन्द्रः । सेनाम् । मोहयतु । मरुतः । भन्तु । ओज॑सा । च‘पि । अग्निः । आ । दुत्ताम् । पुनः । एतु । पराऽजिता ॥६॥ ( अर्थ० ३।२।६) (४३५) असा । या । सेना । मरुतः। परेपाम् । अम्मान् । आइएति । अभि । ओज॑सा । स्पर्धमाना । ताम् । विध्यत । तमसा । अपऽनतेन । यथा । एपाम् । अन्यः । अन्यम् । न । जानात् ॥६॥ अन्वयः- (हे ) उग्राः मरतः! यूयं ईदृशे स्थ, अभि प्र इत, मृणत सहभं,इमे नाथिताः घसव. अमी- मृणन्, एपां विद्वान दूतः अग्निः हि प्रत्येत् । ४३४ (१) इन्द्रः सेनां मोहयतु, मरतः ओजमा भन्तु, अग्निः चक्षुः आ दत्तां, पगजिता पुनः एतु । ४३५ (हे) मरतः! असी परंपां या सेना ओजसा स्पधमाना अस्मान् अभिजा-एति नां अप-तेन तमसा विध्यत यथा पपां जन्यः अन्यं न जानात् । अर्थ-४३४ हे (उग्रा मरुतः!) उग्र स्वरूपगाले चीर मन्तो ! ( यूयं ) तुम ( ईदृशे ) ऐसे समरम (स्थ) स्थिर रहो और शनुऑपर (अभि प्र इत) आक्रमण करे।।शनुऑहे वीरोंको (मृणत) मारकर (सह) उनका पराभव करो। उसी प्रकार (इमे ) ये (नाथिता:)प्रशंसित और (वसव.) वसानेवाले वीर हमारे शनुको (अमीमृगन् ) विनष्ट कर डालें। (एषां विद्वान दूत.) इनका जानी दूत (अग्निः हि) अग्निभी (मत्येत) हर शत्रुपर चढाई करे। ४३४ (१) (दन्तः) इन्द्र (सेना) शत्रुसेनाको (मोहयत) मोहित कर डाले, (मरुतः) वीर मरत् (भोजसा) अपने वलसे विरोधी पक्षके लोगोको (घ्नन्तु) मार टाले, (अग्निः) अग्नि उनकी (चक्षुः) दृष्टिको (आ दत्त) निकाल ले ओर इस ढंगस (पराजिता) परास्त हुई शनुसेना (पुनः एत) फिर एक पार पीछे हटकर लोट जाय। ४३५ हे (मरत !) वीर मरतो! (असौ) यह (परेषां या सेना) शनुओंकी जो सेना (ओजसा) अपने वलके माधारसे (स्पर्धमाना) स्पर्धा करती हुई होड लगाती हुईसी (अस्मान् अभि आ-एति) हमपर चढाई करती हुई आती है, (तां) उसे (अप-नतेन) जिसमे कुछ भी नहीं किया जा सकता है, ऐसा (तमसा) जबरा फेलाकर, उससे उस सेनाको (विध्यत) विंध दालो, इस मॅॉति (यथा) कि (एपां) इनमें से ( अन्य अन्यं न जानात्) एक दूसरे को जान नहीं सके। भावार्थ-१३४ युद्ध छिड जानेपर वीर सैनिक अपनी जगह दटकर सदे रहे और दुश्मनोपर टूट पडे । शनाको गाजरमूरीकी तरह काट देना चाहिए और दुश्मनोंकी चढाईके पलस्वरूप अपना स्थान छोडकर भागना नहीं चाहिए, क्योकि ऐसा करनेसे स्वय अपनेको परास्त होना पड़ेगा। ४३४ (१) शत्रदर पराम्त हो जाग, उसे शिकस्त सानी पडे। ४३५ अनुदलपर इस भाँति भाक्रमण कर देना चाहिए कि, सभी शत्रुसनिक पूर्ण रुपसे भ्रातचेता हो उठे । अँधेरा उत्पन्न करनेवाले ( तमम् )-अन दा प्रयोग रके दुश्मनों की सेनाको अकिचियर बनाया जाय। टिप्पणी- [४३४ ] (1) मृण = (हिसायाम् ) वध करना, नाश करना । (२) वस- उपनिवेश यमाने में सहायता करनेहारा, (वामयतीति)। [४३५] (१)जप व्रत (घराम, कर्तव्य)-जिसमे वर्तव्यका विनाश हुआ हो। जपनतं तमा यह एक भय है । शनुसेनामे तीन अधिपारी फैरती है, धुएं के मारे सैनिको को श्वास लेना दूभर प्रतीत होता है, दम घुटने रगता है । उन्हें ज्ञात नहीं होता कि, क्या किया जाय । जो करना सो नहीं करते और भ्रमिष्ट से बन जाने के धारण नहीं करना है, यही कर बेठने है । 'अपवततम' नामक भस्त्रका प्रभाव इसी भाँति मडा भनूगा है। मरुत् [हि. ०२] ( १७० (अप- ५१२४६) (४३६) सरुतः । पर्वतानाम् । अधिपतयः । ते । मा । अन्तु । अस्मिन् । ब्रह्मणि । अस्मिन् । कर्मणि । अस्याम् । पुरःऽधार्याम् । अस्याम् । प्रतिस्थायाम् । अस्याम् । चित्त्यांम् । अस्याम् । आऽकृत्याम् । अस्याम् । आऽशिपि । अस्याम् !, देवs- हत्याम् । स्वाहा ॥६॥ शन्ताति ऋपि । (अथर्व० ४।१३।४) (४३७) बार्यन्ताम् । इमम् । देवाः। त्राय॑न्ताम् । मरुताम् । गुणाः । त्राय॑न्ताम् । निश्वा । भूतानि । यथा । अयम् । अरपाः । असत् ॥४॥ (अथर्व० ६१२१२-३) (४३८) पर्यस्पतीः । कृणुथ । अपः । ओप॑धीः। शिवाः। यत् । एजथ। मरुतः । रुक्मऽयक्षसः । ऊर्जम् । च । तत्र । सुऽमतिम् । च । पिन्वत। यत्री नरः । मरुतः। सिञ्चथ । मधु ॥२॥ । जन्वय ४३६ पर्वताना अधिपतय ते मरत अस्मिन् ब्रह्मणि अस्मिन् कर्मणि अस्यां पुरो-धायां जस्या प्रतिष्टाया अस्या चित्त्या अस्या आकृत्या अस्या आशिपि अस्यां देव हत्या मा अवन्तु स्वाहा । ४३७ दया इम चायन्ता, मरता गणा. प्रायन्ता, विश्वा भूतानि यथा अयं अ-रपाः असत् पायन्ता। ४३८ ( हे ) रक्म-वक्षस मस्त ! यत् एजथ पयस्वती अपः शिया. ओपधी. पणुथ, (हे) नरमरत यत्र मधु सिञ्चथ तन ऊज व सु-मतिं च पिन्यत । अर्थ-४३६ (पर्वताना अधिपतय.) पहाड़ों के स्वामी (ते मरत.) ये वीर मरन् (अस्मिन् ब्रह्मणि) इस शानमें, (अस्मिन् कर्मणि ) इस पर्म में, (अस्या पुरो-धाया) इस नेतृत्व में, (अस्यां प्र-तिष्ठाया) इस अच्छी प्रकारकी स्थिरता (अस्या चित्त्या इस विचारम, (मस्या आफूत्या) इस अभिप्रायमें, (अस्यां आशिपि ) इस याशीर्वाद में ( अस्या देव-हत्या) भोर इस देघाँकी प्रार्थनाम (मो अवन्तु) मेरी रक्षा करें। (स्वाहा) ये हविष्यान उनके लिए अर्पित है। ४३७ ( दवाः) देवतागण ( इमं त्रायन्तां) इसका संरक्षण करें, (मरतां गणा. 1 चीर मरुतों के सघ इसकी (धायन्ता) रक्षा करें। (चिश्या भूतानि) समूचे जीवजन्तु भी (यथा) जिस भॉति (अय अ-रपाः पसत् ) यह निदाप निप्पाप, निरोगी हो, उसी ढगसे इसे (प्रायन्ता) बचायें । ४३८ हे (रस्म-वक्षस मरत ) वक्ष स्थलपर स्वर्णमुद्राक हार धारण करनेवाले वीर मरुतो! (यत् एजथ ) अब तुम चल्ने लगते हो तव (पयस्मती अप ) यलयर्धक जल तथा (शियाः ओपधी.) कल्याणकारक बनस्पतिया (कृणुथ) उत्पन्न करते हो और हे। नर भरत !) नेतापदपर अधिष्ठित वीरो- सनिको ! ( यत्र मधु सिञ्चत ) जहॉपर तुम मीटासभरे अनी समृद्धि करते हो, (तत्र) वहींपर (ऊर्ज च सुमति च) वल एव उत्तम युद्धि को (पिन्वत ) निर्मित करते हो। भावार्थ-४३८ पवन बहती है, मघ वर्षा करने लगते हैं, पनसतियाँ बदती है और मिटासभरे पल सानेके लिए मिरते हैं। इस सबसे बुद्धि की वृद्धि होने में बदी भारी सहायता मिलती है। टिप्पणी-[४३६] ()चित्ति = विचार, मनन, जान, भक्ति, कीति ।

। . (४३९) उऽमृतः । मुरुतः । तान् । इयत । वृष्टिः । या । विश्वाः । निऽवतः । पृणाति । एजाति । ग्लहो । कुन्या इव ! तुन्ना । एरुम् । तुन्दाना । पत्याऽइव । जाया ॥३॥ मृगार ऋपि । (अथर्व ४२४१-७) (४४०) मरुताम् । मन्ये । अधि । मे । ब्रुयन्तु । प्र। इमम् । वार्जम् । चार्ज साते । अवन्तु । आशून्ऽईव । सुऽयमान । अढे । ऊतये । ते । नः । मुश्चन्तु । हसः ॥१॥ (४४१) उस॑म् । अक्षितम् । विऽअञ्चन्ति । ये। सदा। ये। आऽसिञ्चन्ति । रसम् । ओषधीषु । पुरः । दुधे । मरुतः । पृश्निऽमातॄन् । ते । नः । मुञ्चन्तु । अहंसः ॥२॥ अन्वय.- ४३९ (हे) मस्त. ! उद पूनः तान् इयत, या वृष्टिः विश्वाः निवत. पृणाति. तुन्दाना ग्लहा, तन्ना कन्याइव, एरं पत्याइव जाया एजाति । ४४० मरतां मन्वे, मे अधि अन्तु, वाज साते दम वाजं अवन्तु, आशून्य सु-यमान् ऊतये अहे, ते न. अंहस मुञ्चन्तु । ४४१ ये सदा अ-क्षितं उत्सं वि-अञ्चन्ति, ये ओषधीपु रसं आसिञ्चन्ति, पृश्नि मातॄन मरतः पुरः दधे, ते नः अहस' मुञ्चन्त । अर्थ-४३९ हे (मरुतः! ) वीर मरतो ! (उद-मृत. तान् ) जलको गति देनेवाले उन मेघोंको (इयत) प्रेरित करो। उनसे हुई (या वृष्टिः) जो वारिश (विश्वाः निवतः) सभी दरीकंदराओको (पृणाति ) परि- पूर्ण कर देती है, उस समय । तुन्दाना ग्लहा) दहाटनेवाली विजली (तुन्ना कन्याइव) उपवर कन्या (परं) नवयुवक को प्राप्त करती है. उस समयकी तरह तथा (पत्याइव जाया ) पति के आलं- गनमें रही नारीकी नाई (एजाति ) विकम्पित हो उठती है। ४४० (मरतां) वीर मरुतोंको में (मन्ये) सम्मान देता है, ये (मे) मुझे ( अधि ब्रुवन्तु ) उपदेश दें, पथप्रदर्शन करें ओर (वाज-सात) युद्ध के अवसरपर (इम) इस मेरे (चार्ज) बलझी (अवन्तु ) रक्षा करें। (नाशन्दय) वेगवान घोडॉ तुल्य अपना (सु-यमान ) अच्छा नियमन भली प्रकार करनेवाले उन वीराको हमारे (ऊतये ) संरक्षणार्थ (अद्वे) में बुलाता है। (ते) ये (नः) हमें (अहसः) पापसे (मुञ्चन्तु ) छुडा दें। ४४१ (ये) जो (सदा) हमेशा (अ क्षितं) कभी न न्यून होनेवाले ( उत्सं ) जलप्रवाहको (वि-अचन्ति ) विशेष हंगसे प्रवर्तित करते ह, (ये) जो ( ओषधीषु । औषधियोपर (रसं जासिञ्चन्ति) जलका छिडकाव करते है, उन (पृश्नि मातृन मरतः) भूमिको माता समझनवाले वीर मरतीको म (पुर दधे ) अगभागमे रख देता हूँ। (ते) वे वीर (नः अंहस मुञ्चन्तु ) हमें पापांसे बचायें। भावार्थ-४३९ वायुप्रवाह मेघौको प्रेरित कर तथा चपोका प्रारभ करके समूची दरीदराभों को जसे परिपूर्ण कर डारते है । उस समय विद्युत् मेघोसे इस भाँति सम्मिलित हो जाती है, जैसे युवतियाँ अपने नवयुवक पतिदेवको गले लगाती है। ४४० वीर हमें योग्य मार्ग दर्शाय, रोगांके का सरक्षण करें तथा उसका दुरपयोग होने न दे। सिसाये हुए घोडे जिस भांति आज्ञानुवती रहते है उसी प्रकार ये धीर है और वे हमे पापसे यघाकर सुरक्षित रखें। ४४१ वायुप्रपाहोंके कारण वर्षा हुआ करती है, भूमिपर पलके स्रोत एप झरने पहते है, वनस्पतियों में रसको याद होती है । पापसे बचनेम पीर हमे सहायता दे दें। टिप्पणी- [४३९] (0) निवत्- भूमिका निम विभाग, दरी । (२) ग्लहः = धूतकोडा कितव । (३) तुम्ना क्षतविक्षत, निकल, (कामबाधाले पीडित), (तुद्- न्यथने = कर देना, मारना, दुःख देना ।) (५)एर = जानेवाला, (प्रास करमेहरा)। [४४१] (१)पुरः उधे = हमेशा भाँतोके सामने धर देगा ह, भनभागम रखता है मार्गदर्शक समझता है। . ।

१७२ इन्वय । . 1 अन्चय- (४४२) पयः । धेनूनाम् । रसम् । ओपधीनाम् । जयम् । यताम् । कपयः । ये। अगमाः । भवन्तु । मरुतः । नः । स्योनाः। ते । नः । मुञ्चन्तु । अंहंसः ॥३॥ (४४३) अपः । समुद्राव । दिवम् । उद् । बान्ति। दिवः। पृथिवीम् । अभि । ये । सृजन्ति । ये । अतऽभिः । ईशानाः । मरुतः । चरन्ति । ते । नः । मुञ्चन्तु । अहंसः ॥४॥ (४४४) ये । कीलालैन । तर्पयन्ति । ये । घृतेन । ये । वा । वयंः । मेर्दसा । सम्ऽसृजन्ति । ये । अन्ऽभिः । ईशाना: 1 मरुतः । वर्पयन्ति । ते । नः । मञ्चन्त । अहंसः ॥५॥ ये क्यय धेन्ना पय आफ्धीना रस अवता नव पथ (ते) शम्मा मरत न सोना. भवन्तु, ते न सहस मु-चन्तु । ४८३ ये समुद्रात् प दिव उत् वहन्ति दिय पृथिवी अभि सृजन्ति, ये बात ईशाना मरत चरन्ति ते न अहस मुञ्चन्तु । १८४ ये कौलालेन ये घृतन तर्पयन्ति, ये चाचप मेदसा सरजन्ति, ये दि ईशाता मरत वर्षयन्ति, ते न अहस मुञ्चनु । अर्थ- ४४२ (ये परय ) जोमानी वीर । धेनना पय ) गोऑरे दुग्धरा तथा (गोपधीना रस) पास्पतियाये रसका सेवन परके । पर्वना जव) घोडारे वेगको ( इन्यथ) प्राप्त करते ह, ये (शग्मा ) समय (मरत ) वीर मरुत् ।न हमारे लिए (स्योना भवन्तु) सुसगरम हो। (ते) ये (न) हमें (भास मुन्च तु) पापोंसे यचाय । ४४३ (ये) जो ( समुहगत् ) समुन्दरमें से (अप) जसको (दिव उत् यान्ति ) सन्तरिक्षमें ऊपर से चलने , और (दिव ) सन्तरिक्षसे (पृथिवी अभि) भरण्डरपर वी स्पम ( सनन्ति) छोट देते ह लोर (ये ) जो ये ( भि ) जलाकी पजहसे (शाना । ससारपर प्रभुन प्रस्थापित करनेवाले मस्त ) वीर मरुत् (चरन्ति) सचार करते है, (ते) (1 अहसा मुन्चनु ) में पापासे रिहा कर दे। ४२४ (ये) जो (कीरालेन)जलसे तथा (ये) जातेग घृतादि पोष्टिय पदाधी से सपको (नर्पयन्ति ) तृप्त करते ह, (ये वा) अथया जो (चय ) पछिया रो भी मेदसा ससान्ति ) मास सयुन परते , आर (2) जो ( भि ईशाना ) जलकी वाह से वि वपर प्रभुत्व प्रस्थापित परनघाले (मरत वर्षयन्ति) वीर मरर वर्ण करते ८ (ते) घे (म) हमें (लहस मुन्च) पापसे छुडाय । भावार्थ-१४२ बोर मा क गोदुग्ध तथा योमरस बारपनियोंरे रसके सेवन से अपनी शचि बटाते है। ऐसे वीर rम चुप और पापास स्म मुक्ति स । ४४३ वायुआकी महायागे समुद्री विशमा अगर राशि भापरे रम उपर उठ जाती है भीर मघमा सम परिया। हो चुक नेपर पाये रपर्म पिर जीपर भारी । इस की ये वायुमा विशु प्रदान र सप्तकोसीन देनेवाल है त यही टि सच्च अधिकार है। हमें पापो से दायें। १२० यापुरि चार से मय से वर्षा होती है और सभी वृक्षवनस्पतियोम भाँतिभागिये गरिहती है था गादि पशुओम दूध गादि पुष्टिचारक रपोषी समृद्धि होती है। इस माती पे मरम् समरि नि मूर्ण परिप्रभु य प्रस्थापित करत है। हम बाहर निमम पापोंसे गुरभित रस । टिप्पणी- [१४] (1) इम्म् ( ग्याप्ती ) = TIRT •या होना, पसीना का कर न्द देना भर दना, प्रभु होगा। (२)शमा (शरमा सशक्षा)- ममथे। (३) सोन - मुखदायक, मुर। [४२४] (1) चयन पती, यांचा भर शनि, भारोप पर मेसा समनन्ति यौवा मेद या मागासे युक्त कर दते है। प्रतिको मेदय ननस पोर दो हैसपा में रीमि मेद वो पगरोही मारिनी पयास माग निमा - १७३ । .(४४५) यदि । इत् । इदम् । मरुतः । मारुतेन । यदि । देवाः । दैव्यैन । ईदृक् । आर । युयम् । ईशिध्ये । वसवः । तस्य । निःऽकृतेः । ते । नः । मुञ्चन्तु । अंहंसः ॥६॥ (४४६) तिग्मम् । अनौकम् । विदितम् । सहस्वत् । मारुतम् । शर्धः । पृतनासु । उग्रम् । स्तौमि । मरुतः । नाथितः । जोहवीमि । ते । नः । मुश्चन्तु । अंहसः ॥७॥ जगिरा कपि (अधर्म० ७८०१३) (४४७) सम्ऽवत्सरीणाः । मरुतः । सुऽअर्काः । उरुऽक्षयाः । सर्गणाः । मानुपामः । ते । असत् । पार्शान् । प्र । मुञ्चन्तु। एनसः। साम्ऽतपनाः । मत्सराः । मादयिष्णनः ॥३॥ अन्वयः-४४५ (हे ) वसवः देवाः मस्त ! यदि इद्ध' मारतन इत्, यदि देव्येन ईदृक् ार, यूयं तस्य निष्ठतेः ईशिध्ये, ते न अहसा मुञ्चन्तु ! ४४६ तिग्मं अनी विदितं सहस्-वत् मारतं शर्ध. पृतनासु उग्रं,मरतः स्तोमि, गायित.जोहवीमि,तेन अंहसः मुञ्चन्तु। ४४७ संयत्सरीणाः सु-अर्का. स-गणाः उरु-क्षया. मानुपास सान्तपनाः मत्सराः मादयिष्णव ते मरुतः अस्मत् एनसः पाशान् प्र मुञ्चन्तु । अर्थ-४४५ हे (वसवः) जनताको बसानेवाले (देवा ) द्योतमान (मरतः!) चीर-मरतो! (यदि) अगर (इदं) यह पाप (मारतेन इत्) मरहणों के सम्बन्धमे या (यदि) अगर (देव्येन) देवों के संबंध (ई) ऐसे (आर) उत्पन्न हुआ हो, तो (यूयं) तुम (तस्य निप्टतेः) उस पापका विनाश करने के लिए (ईशिध्ये) समर्थ हो। (ते)वे (नः) हमें (अंहसः मुन्चन्तु ) पापसे बचा दें। ४४६ (तिग्मं) प्रखर, अति तीव (अनीकं ) सेन्यमें प्रकट होनेहारा, (विदितं ) विरयात तथा शत्रुओका ( सहस् यत् ) पराभव करनेमें समर्थ (मारतं शर्ध ) वीर मरुतोका बल ( पृतनासु) संग्रामांमें, लडाइयोंम ( उन) भीषण हे, उन (मरत. स्तोमि ) वीर मरतोंकी में सराहना करता है। (नाथित ) कष्ट- से पीडित होता हुआ में (जोहवीमि ) उनसे प्रार्थना करता है, उन्हें पुकारता है। (ते) वे (न ) हमें (अंहसः) पापसे (मुञ्चन्तु) छुडायें। ४४७ (संव-सरीणा । हर साल वारंवार आनेवाले, (सु-अर्का) अत्यंत पूज्य, (स गणाः) संघ बनाकर रहनेवाले, (उर क्षया.) विस्तृत घरमें रहनेवाले, (मानुपास.) मानवोंके हित करनेवाले, (सान्तपना:) शओंको परिताप टेनेहारे, (मत्सरा) सोम पीनेवाले या आनन्दित होनेवाले तथा (माद. DAMA) इसरोको भानन्द देनेवाले (ते महत) वीर मरुल (शरद ) हमारे ( एनसः) सपके (पाशान् ) फदाको (प्रमुञ्चन्तु ) तोड डाले। मानार्थ-४४५ देवाकी कृपासे हम पापोंसे दूर रह। ४४६ चौरीका युद्धग प्रक्ट होनेवाला प्रचढ एव विख्यात यर सरको विदित है। शनुसे पीता पहुंचने के पारण में इन वीरोंकी सराहना करता हूँ। ये वीर मुझे पापसे छुटायें । ४४७ पडे घरमे संघ बनाकर रहनेवाले, पूननीय, तथा जनताका स्याण करनेवाले चीर हमे पापोंसे बचा दे। टिप्पणी-[४४६] (१) नाथित - जिसे सहायताकी भावश्यकता है, पीडित, (नाथ् = नाध = यायो. पश्चिाशीपु) समर्थ होना, भाशीर्वाद देना, प्रार्थना करना, मांगा, देना । (२) अनीकं - सेन्य, समूह, सुब, प्रमुख, रोज, अध। [४४७] (१) उस-क्षय- या चौमा घर, घरक, सैनिकोंक रहने स्थान । (मत्र ११७,३२१ मा ३४५ देविए) (0) गगः (गर+मर)- सगरम पीकर हगि हो भागे पोगा- गरिसीक ।

अत्रिपुत्र वमुथत ऋषि (ऋ० ॥३॥३) (४४८) तव । श्रिये । मरुतः । मर्जयन्त । रुद्रे । यत् । ते । जनिम । चारु । चित्रम् । पदम् । यत् । विष्णोः । उपऽमम् । निऽधायि । तेन । पासि । गुह्यम् । नाम 1 गोनाम् ॥३॥ अनिपुन श्यावाश्य अपि (१० १६०15-८) (४४९) ईळे । अग्निम् । मुऽअव॑सम् । नमःऽभिः। इह । प्रऽसत्तः। वि। चयत् । कृतम् । नः । स्थैः इव । प्र । भरे । वाजयत्ऽभिः । प्रऽदक्षिणित् । मरुताम् । स्तोमम् । ऋध्याम् ॥१॥ , अन्वयः-४४८ (हे ) रुद्र ! तव श्रिये मरतः मर्जयन्त, ते यत् जनिम चार चित्रं, यत् उपमं विष्णोः पदं निधायि तेन गोनां गुह्यं नाम पासि । ४४९ सु-अवसं अग्निं नमोभिः ईळे, इह प्र-सत्तः नः कुन बि चयत् , याजयन्दिः रथैःइय प्र भर, प्र-दक्षिणित् मरतां स्लोमं ध्यां । अर्थ- ४१८ हे (स्द!) भीपण धीर ! (नव थिये) तुम्हारी शोभा पाने के लिये ( मरुतः) चार मरत् (मर्जयन्त ) अपने आपको अत्यन्त पवित्र करते हैं । (ते यत् जनिम ) तेरा जो जन्म है,यह सचमुच ही (चार) सुन्दर तथा (चित्र) आश्चर्यपूर्ण है । ( यत् ) क्योंकि (उपमं) सबमें भत्युव (विष्णोः पदं) विष्णुके स्थानम-आकाशमै तेरा स्थान ( निधायि ) स्थिर हो चुका है । (तेन । उसी कारण से तू (गोनां) गौके, पाणियोंके (गुह्यं नाम) रहस्यपूर्ण यशको (पासि ) सुरक्षित रसता है । ४४९ (सु-अयसं ) भली भॉति रक्षा करनेहारे (अग्नि) अग्नि की मैं (नमोभिः) नमनपूर्वक (ई) स्तुति करता है। (इह) यहाँपर (प्र.सत्तः) प्रसन्नतापूर्वक वैटा हुआ वद्द अग्नि (नः कृतं) हमारा यह सत्य (वि चयत् ) निप्पन्न करे, सिद्ध करे । (वाजयाद्भिः) अन्नमय यत्रासे, (रथैःइय) जैसे रथासे अभीष्ट जगह पहुंच जाते है, उसी प्रकार मै अपने अभीष्टको (प्र भरे) पाता हूँ और (प्रदक्षिणित्) प्रदक्षिणा करनेवाला मैं (मस्तां स्तोमं ) वीर मरतों के काव्यका गायन करके (ऋध्यां) समृद्धि पाता हूँ। भावार्थ-४४८ शोभा यानेके लिए ये धौर मरर अपनी तथा समीपस्थ यस्तुओं की सफाई करते है । सभी हथियारोंको चमकीले बनाते है । इन चोरोंश जन्म मममुच लोककल्याण के लिए है, मन वह एक रहस्यमय बात है। विष्णुपद इन पौरामा अटल एवं अडिग स्थान है। ४४९ संरक्षणशक इस अग्निकी सराहना मै पता हूँ। यह प्रति हमारा यह यज्ञ पूर्ण करे। जिनमें भस- दान करना पड़ता है, वैसे या प्रारंभ कर मैं अपनी इच्छा की पूर्ति करता हूँ। इस अभिकी प्रदक्षिणा करते हुए मैं इन धीरके स्तोत्र का गायन करता हूँ। टिप्पणी-[४४८] (6) मृञ् (गुदी शौचालकारयोन) = धोना, माँगना, युद्ध करना, पकृत करना। (२) विष्णोः पदं भाकाश, अवकाश । (३) उपमं ऊँचा, पदागिउष्ट । ( ) गुवं गुप्त, आश्चर्यजनक, रहस्यमय । [४४९] (1) वि+चि (चयने) विशेष सूक्ष्म निगह से देखना-जानना, इकट्ठा करना, जींच करना, धरना, पमंद करमा, नाश करना, साफ करना, बनाना, जोड देना । (२) ऋप (लो)- वैषय बना, विजयी होना, मदमा () अ-दक्षिणिन्- प्रदक्षिणा पहारा, माया रोपाय। 1 अलग २७५ । -- (४५०) आ । ये । तस्थुः । पृफ्तीपु । श्रुता€ । शुऽगए । रुद्राः । गुरुतः । रथेषु । वना । चित् । उग्राः । जिहते । नि । यः । भिया । पृथिवी । चित् । रेजते । पर्वतः । चित् ॥२॥ (४५१) पर्वतः । चित् । महि । वृद्धः। विभाय । दिवः । चित् । सार्नु । रजत । स्पने । यः । यत् । क्रीथ । मरुतः । ऋष्टिऽमन्तः। आपोऽइव । सध्यश्चः । धबधे ॥३॥ (१५२) वराऽईव । इत् । रैवतासः । हिरण्यः । । अभि । स्वधाभिः । तन्नः । पिपिथे। श्रिये । श्रेयांसः । तवसः । रथेषु । सत्रा । महाँसि । चक्रिरे । तनूपु ॥४।। अन्वयः-४५० ये रुद्रा. मरतः श्रुतासु पृपतीपु सुसेपु रथेषु आ तस्थु , (हे ) उन्ना ! चः भिया यना चित् नि जिहते पृथिवी चित्, पर्वतः चित् रेजते। ४५१ (हे ) मस्त.! या स्पने माहि वृद्धः पर्वतः चित् विभाय, दिव सानु चित् रेजते, ऋष्टिमन्त यत् सध्यञ्च श्रीलय आप.श्य धबध्ये । रैवतास: ता वरा इव इत् हिरण्ये स-धाभिः तन्वः अभि पिपि), श्रेयांसः तनसः श्रिये रथेषु सना तन्पु महांसि चक्रिरे। अर्थ-- ४५० (ये म्द्राः मरतः) जो शत्रुदलको रुलानेवाले वीर मरत् (श्रुतासु पृपतीपु) विरयात धम्बेवाली हरिणियाँ जोते हुए ( सुसेपु रथेषु ) सुखकारक रथोम जव (आ तस्थुः) बैठते है, तय हे (उमा.!) उन वीरो! (य. मिया) तुम्हारे उरसे (धना चित्) वनतक (नि जिहते) विकंपित होते है; (पृधियी चित्) भूमितक ओर (पर्वतः चित् ) पहाडतक (रेजते) थरथर कॉप उठते हैं। ४५१ हे (मरत.!) धीर मरतो ' (व स्ने) तुम्हारी गर्जनाके उपरान्त (महि) बडा (वृद्धः) बढा हुआ (पर्वतः चित्) पर्वत भी (विभाय ) बरा उठता है, (दियः) धुलोक का (सानु चित् ) विभाग भी (रेजते) विकम्पित हो उठता है । (ऋष्टि-मन्तः) भाले लेकर तुम (यत्) जव (सभ्यञ्चः) इकट्ठे होकर (फ्रीळथ) सेलते हो, तव (आप इव ) जलप्रवाह के समान (धषध्वे ) दोडते हो। ४५३ (रैवतास. घरा इव इत्) धनिक दूल्हॉकी नाई (हिरण्यः) सुवर्णालंकारों से विभूषित होते हुए ये चीर (स्व-धाभि.) पौष्ट्रिय अन्नोसे या धारक शक्तियोसे अपने (तन्य ) शरीरोंको (अभि पिपि) सभी प्रकारोंसे सुन्दर सजाते हैं । (श्रेयांसः ) श्रेष्ठ तथा (तवस.) बलवान वीर (थिये ) यश- मस्तिके लिए जब (रयु) रक्षा में बैठते है, तब उन करने (सर) एमित होकर ब) अपने शरीरोंपर (महांसि चक्रिरे) यातहि तेज धारण किया । भावार्थ- ४५० रथोंपर चढ़े हुए वीर जय शत्रुसेनापर हमला करने के लिए निकल पटते है, तब पृथ्वी, पर्वत, एवं धन सभी दहल उठते है । क्योकि इनका वेगही इतना प्रचड है कि, उसके प्रभावसे कोई वस्तु पूर्णतया भप्रभावित नहीं रह सकती है। ४५१ इन वीराकी गर्जना होनेपर पहाड तथा शियर कॉपने लगते हैं। अपने हथियार लेकर जय ये एक जगह मिलकर रणभूमिमे युद्धकोदा करते हैं, तब हाका वेग इतना प्रचट रहता है कि मानों ये दौरसेही है, ऐसा प्रतीत होता है। ४५. दूल्हे जब पध्ये निकट जानेकी तैयारी करते हैं, तब जिस प्रकार सजावट करते है, उसी प्रकार ये धीर बनाव-सिंगार करते हैं, मत, दीसनेमे बहेही सुन्दर प्रतीत होते है। चा विजय पाने के लिए ये धीर रथपर मेटकर निकलते हैं, उस समय इनका तेज आँखोको चौधिया देता है। टिप्पणी- [४५१] (1) धय दौइते हो। (सा० भा०) . जन्वय - (४५३) अज्येष्ठास: । अनिष्ठासः । एते । सम् । भ्रातरः । ववधुः । सौभगाय । युवा । पिता । सुऽअपाः । रुद्रः । एपाम् । सुऽदुा । पृन्निः । सुदिना । मुरुत्ऽभ्यः ।।५।। (४५४) यत् । उत्ऽतमे। मरुतः । मध्यमे । वा। यत्। वा। अअमे। सुऽभगासः। दिपि । स्थ। अतः । नः । रुद्राः । उत । वा । नु । अस्य । अग्ने । बित्तात् । हतिषः । यत् । यजाम ॥६॥ (४५५) अमिः। च । यत् । मरुतः। विश्वऽवेदसः। दिवः। वहधे । उत्तरोत । अधि । स्नुऽभिः । ते । मन्दसानाः । धुनयः । रिशादसः। वामम् । धत्त । यजमानाय । सुन्वते ॥७॥ ४५३ ज-ज्येष्ठास अनिष्ठास एते भ्रातर सौभगाय स ववृधु , एपा सु-पायुवा पिता रट सुदुघा पनि मरुदभ्य सु दिना। ४५४ (हे) सु-भगास रुद्रा मस्त ! यत् उत्तमे मध्यमे धा यत् वा अवमे दिवि स्थ अत न, उत वा ( हे ) अग्ने ! यत् नु यजाम अस्य हविप वित्तात् । ४५५ (हे) विश्व-वेदस मरत । अग्नि च यत् उत्तरात् दिव अधि लुभि पहचे ते मन्दसाना धुनय रिश-अदस सुन्वते यजमानाय वाम धत्त । अर्थ- ४५३ ये चीर ( अ-प्येष्ठास ) श्रेष्ठ भी नहीं ह ओर ( अ-कनिष्ठास , कनिष्ट भी नहीं है, तो (पते ) ये परस्पर (भ्रातर ) भाईपनसे वर्ताव रखते हुए ( सौभगाय) उत्तम ऐश्वर्य पाने लिए (स घवृधुः) एकतापूर्वक अपनी वृद्धि करते ह । (एपा) इनका (मु-अपा ) अच्छे कर्म करनेहारा (युवा) थुवर (पिता) पिता (रद्र ) महावीर हे और (स-दुधा) उत्तम दृध देनेहारी-अच्छे पेय देनेवाली (पृश्नि ) गौ या भूमि इन (मरट्य ) धीर मरुतोंको (सु-दिना) अच्छे शुभ दिन दर्शाती है। ४५४ हे (म भगास ) उत्तम ऐश्वर्यसपा (रुद्रा ) शनुमा यो रुलानेवाले ( मरत ।) धीर मरुतो (यत्) जिस (उत्तमे) ऊपरके, (मध्यमे या ) मँाले (यत् वा अवमे) या नाचेके (दिवि) प्रकाश स्थानम तुम (स्थ) हो (अत ) वहाँसे (न ) हमारो ओर आओ. (उत वा ) भोर हे (जन! ) अने! (यत् न यनाम) जिसका आज हम यजन कर रहे ह (अस्य हविष ) यह हरिप्यान (वित्तात्) तुम जान लो, अर्थात् उधर ध्यान दे दो। ४५५ हे (विश्व-वेदस ) सब धनोंसे युक्त (मरुत !) वीर मरतो 'तुम (अग्नि. च ) तथा अग्नि ( यत् ) चूंकि ( उत्तरात दिव ) ऊपर विद्यमान युरोको (स्नुमि ) ऊँचे स्थानके मागासही (जधि पहने) सदैव जाते हो अत (ते) ये (मन्दसाना ) प्रसन वृत्तिके, (धुनय ) शनुदलको हिला नेवाले तथा (रिश-अदस ) हिंसकोका वध करनेवाले तुम (सुन्वते यजमानाय) सोमरस तेयार करने याले याजमो (वाम) श्रेष्ठ धन (धत्त) दे दो। भावार्थ-४५३ य वीर परस्पर सम्भावसे यतान रसत है, इसीलिए इनम कोईभी न कमिष्ट या श्रेष्ठ पाया जाता है। भाइचारा इनम विद्यमान है और ये एकतासे श्रेष्ठ पुरपाय करके अपनी समृद्धि करते है। महावीर इनका पिता है और गाय या पृथ्वी इनकी माता है जो इन्हें अच्छे दिन दर्शाता है। ४५४ वीर विधरभी हों उधरसे हमारे निकट चल आर्य क्षौर को हविर्माग हम दे रहे हैं उसे भली भाँति दसकर स्वीकार कर लें। ४५५ य वीर उश स्थानम रहते हैं । उलसित मनोवृत्तिरे और शग्रुदलको परास्त करनेवाले ये वीर यानकोंको धन देते है। टिप्पणी-४५३ (१) स्पा (मु+अपम= वृश्य )- अच्छे कर्म निप्पस करनेहारा । (२) य-येष्ठास ००० (मन ३०५ दतिए)। [४५४] (1) [ यहॉपर धुलोकके वी भाग माने गये हैं उसमे, मध्यम अवमे दिवि।] [४५५] (1) वाम मुन्दर, सदा, पार्यो, धन, सपत्ति । (२) मन्दसान (मह) = हर्पयुक्छ।

। (४५६) अग्ने । मुरुत्ऽभिः । शुभयंत्ऽभिः । कर्मऽभिः । सीमम् । पित्र । मन्दसानः । गणश्रिमिः। पावकेभिः । निश्चमऽइन्वेभिः। आयुऽभिः। वैश्वानर । दिवा । कंतुन! । सऽजूः ॥८॥ अया कपि (आ. १-०11) (४५७) अदारऽसत् । भवतु । देव । सोम। अस्मिन् । यज्ञे । मरुतः । मृउत । नः । मा । नः । विदुत् । अभिऽभाः। मो इति । अर्शस्तिः। मा। नः। विदत् । जिना । द्वेप्यो । या॥१॥ (० १३५०) (४५८) गणाः । त्वा । उप । मायन्तु । मारुताः। पर्जन्य । घोपिणः । पृथक् । सीः । वर्षस्य॑ । वर्पतः। वर्षन्तु । पृथिवीम् । अन ॥ ४ ॥ अन्वयः- ४५६ (?) वेश्या-नर अग्ने प्र-दिवा केतुगा सजः शुभयद्भिः नामि गण निभिः पाभिः विश्व-इन्वेभिः भायुभिः मरदि मन्दसानः सोमं पित्र । ४५७ (१) देव सोम ! अ-दार-सृत् भवतु, (हे) मरत ! अस्मिन यो नः मृडत, आभि-भा न मा विदत, अ-शस्तिः मो, या द्वेग्या वृजिना न.मा चिदत्। ४५८ (हे.) पर्जन्य ! घोपिणः मारता. गणाः पृथा त्वा उप गायन्तु, नर्पत वर्षस्य सगाः पृथिवी अनु वर्पन्तु । अर्थ- ४५६ हे (धैया-गर) विश्चक नेता { अग्ने ! ) अग्ने ! (प्र-टिया) प्रसर तेजसे तथा (केनुना ) ज्वालाओं से (सजूः) युक्त होकर न (शुभयदि. ) शोभायमान, (सक्वाभिः) सराहनीय, (गण-श्रिभिः) संघजन्य शोभासे युक, (पारकेमि.) पवित्र, (विश्व-इन्वेभि.) सरको उत्साह देनेहारे तथा (आयुभि.) दीर्घ जीवन का उपभोग लेनेवाले (मरदि ) वीर मरतों के साथ (मन्दसानः । जानन्दित होकर (सोम पित्र ) सोमरसका सेवन कर। ४५७ हे (देव सोम!) तेजस्वी सोम हमारा शनु अपनी (जदार हत्) स्त्रीसे भी न मिलानेवाला (भयतु) जाय, अर्थात् मर जाए। है (मरत !) वीर मरुनो ' (असिन् यज्ञे ) इस यशम (न मृत) हमें सुरसी करो। हमारा (अभि-भा.) तेजस्वी दुश्मन । न मा विदत् ) हम न मिले, हमारी और न आ जाए। हम (अ-शस्तिः मो) अपयश न मिले । (या दुप्या) जो निन्दनीय (घृजिना) पाप है, ये (नः मा विदत) हमें न लगे। ४२८ हे पर्जन्य !) पर्जन्य ! (घोपिण) गर्जना करनेहारे ( मारता गणा ) मरता के संघ (पृथक् ) विभिन्न ढंगसे (त्या उप गायन्तु) तुम्हारी स्तुति का गायन करें। (वर्पत. वर्षस्य) बडे वेगस होनेवाली धुवाँधार वर्षा की (सर्गा ) धाराएँ (पृनिधी अनु वर्षन्तु ) भूमिपर लगातार गिरती रहे। भावार्थ-४५७ हमारा दानु विनष्ट होवे। (यह अपनी स्त्रीसे मिलकर सतान उत्पत करने में समर्थ न होये) हमारे शनु हमसे दूर हो और उनका आक्रमण हमपर न होते पाय | हम अपकीर्ति तथा पापसे कोसो दूर होकर मुससे रहे। टिप्पणी- [४२६(3) विश्व-मिन्व= (मिन्व्- स्नेहने सेचने च) सबपर प्रेम करनेपाला, सभी जगह वर्षा करनेहारा । (२) सजुस्- युक्त। [१७] (१) अ-दार सृत्स्नीके समीप न जानेवासा, घर न ट जानेवाला ( रणभूमिम धराशायी होनेवाला)। गरा [हिं. २३] -- १७८ अन्धयः- (अयस. ४११५१७-10) (४५९) उत् । ईग्यत । मरुतः । समुद्रतः। त्वेषः। अर्कः । नमः । उत् । पातयाथ । महाऽऋपभस्य । नदतः । नभस्वतः । वाश्राः। आपः । पृथिवीम् । तर्पयन्तु ॥५॥ (४६०) अभि । कन्द । स्तनयं । अर्दयं । उदऽधिम् । भूमिम् । पर्जन्य । पय॑सा । सम् । अद्धि । त्वया । सृष्टम् । बहुलम् । आ । एतु । वर्षम् । आशारऽएपी । कृशऽणुः । एतु । अस्तम् ॥६॥ (४६१) सम् । यः । अवन्तु । सुऽदानवः। उत्साः । अजगराः । उत । मरुत्ऽभिः । प्रऽच्युताः । मेघाः। चर्पन्तु । पृथिवीम् । अनु ॥७॥ .(हे) मरुत । समुद्रतः उत् ईरयथ, त्वेप अर्फः नभः उत् पातयाथ, नदत. महा-ऋपभस्य नभस्वतः वाधा. आपः पृथिवी तर्पयन्तु । ४६० (हे) पर्जन्य ! अभि अन्द् स्तनय उदधि अर्दय भूमि पयसा सं अघि, त्वया सृष्टं पलं घर्ष आ एत, आशार-एपी रश-गु. अस्त एतु। ४६१ (हे) सु-दानव ' या अजगराः उत उत्सा.सं अवन्तु, मरद्भिः प्र-च्युता मेघाः पृथिवी अनु चर्पन्तु। जर्म-४५९ (मरत.!) मरतो ! तुम (समुद्रत ) समुद्र के जलको (उत् ईरयथ) ऊपर ले चलो। (त्येप ) तेजस्वी तथा ( अर्क.) पृय (नम ) मेघको आकाशमै ( उत् पातयाथ) इधरसे उधर घुमाओ । (नदत. महा नपभस्य ) दहाड़ते हुए बडे भारी वैल के समान प्रतीत होनेवाले (नभस्वत.) मेघों के (वारा आपः) गरजते हुए जलसमूह (पृधिर्या तर्पयन्तु) भूमिको संतृप्त करें। ४६० हे (पर्जन्य !) पर्जन्य (अभि कन्द) गरजते रहो, (स्तनय) दहाडना शुरु करो, (उदधि) समुद्र में (अर्दय ) खलबली मचा दो, (भूमि) पृथ्वी को (पयसा) जलसे (सं अधि) भली प्रकार गीली फरो। (त्वया सृष्टं) तुझसे निर्मित (यहुलं वर्षे) प्रचुर वर्षा (आ पतु) इधर आये तथा (आशार-एपी) यडी वर्षा की कामना करनेहारा (श-गुः) दुर्यल गौएँ साथ रखनेवाला कृपक (अस्तं पतु) घर चले जार आनन्दसे रहे। ४६१ हे (सु-दानवः 1) दानशूर वीरो ! (घ ) तुम्हारे (अजगराः उत) अजगरके समान दीस पउनेवाले (उत्सा अलप्रवाह (सं अवन्तु ) हमारी भली भॉति रक्षा करें। (मरादिः) मरतों की ओर से वर्षाके ल्पम (म-च्युताः) नीचे टपके हुए (मेघाः) वादल (पृथिवीं अनु वर्षन्तु ) भृमंडलपर लगा. तार या कर। टिप्पणी-[४६०] (1) आशार-एपी रश-गु अस्तं एतु - वर्षा कब होगी, इस आशासे आकाशकी भोर की बाँधकर देखनेवाला और श गायों को भी प्यार से समीप रखनेवाल। किसान वर्षा होने के पश्चात् सहएं भपने घर लोटकर धानन्द से दिन बिताने लगे। (यदि वर्षा न हो, घासतिनका न मिले, तो कृषक अपने गोधनको साथ ले जहा जस पर्याप्त मात्राम उपलब्ध होता है ऐसे स्थानपर डा इससे . और वृष्टि की राह देखते रहते हैं। पी होनेके उपरान्त तृणको यथष्ट समृद्धि होतेही वे अपने पूर्व निवासस्थानमे लौट भाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि, इस मन्त्रमें इस प्रणाली का उलेख किया हो।)

१७९ अन्वय (४६२) आशाम्ऽआशाम् । वि । द्योतताम् । वाताः । वान्तु । दिशःऽदिशः। मरुत्ऽभिः । प्रऽच्युताः । मेघाः । सम् । यन्तु । पृथिवीम् । अनु ॥ ८ ॥ (४६३) आपः । विऽद्युत् । अभ्रम् । वर्षम् । सम् । यः । अवन्तु । सुऽदानवः। उत्साः । अजगराः । उत। मरुत्तभिः । प्रऽच्युताः । मेघाः । प्र । अवन्तु । पृथिवीम् । अनु ॥९॥ (४६४) अपाम् । अमिः । तनूभिः । सम्ऽविदानः । यः । ओषधीनाम् । अधिऽपाः । बभूव । सः। नः । वर्षम् । वनुताम् । जातऽवेदाः। प्राणम् । प्र॒ऽजाभ्यः । अमृतम् । दियः । परि ॥१०॥ अग्निमस्तश्च । (अग्निदेवता मन्त्र २४३८ ते २४४६) कण्यपुन मेधातिथि ऋपि (ऋ० १।१९।१-९) ४६५ प्रति त्यं चारुमधरं गोपीथाय प्र हूयसे । मरुद्भिरग्न आ गहि ॥१॥ [२४३८] (४६५) प्रति । त्यम् । चारुम् । अधरम् । गोऽपीथाय । प्र । हयसे । मरुत्ऽभिः । अगे। आ गहि ॥१॥ -४६२ आशां आशां वि द्योतता, दिशा-दिश. वाताः वान्तु, मरुद्भि.प्र-च्युताः मेघा पृथिवीं अनु पर्पन्तु । ४६३ ( हे ) सु-दानव ! यः आप विद्युत् अभ्र वर्ष अजगरा उत उत्सा. सं अगन्तु, मरुद्भिः प्र-च्युता मेघा पृथिवी अनु श अवन्तु। ४६४ अपां तनूभि. संविदानः य. जात-वेदाः अग्निः ओषधीनां अधि-पाः बभूव स. नः प्रजाभ्य दिव परि अमृतं वर्ष प्राणं घनतां। ४६५ त्यं चारं अगर प्रति गो-पीथाय प्र हयसे, (हे ) अग्ने! मरद्गिः आ गहि । अर्थ-- ४६२ (आशा-आशां) हर दिशाम विजली (वि द्योतता) चमक जाए। (दिशः-दिशः) सभी दिशाओंमें (वाता. वान्तु ) वायु बहने लगे । (मरादिः) मरतों से (प्र-च्युता.) नीचे गिरे हुए मेघाः) बादल वर्षा के रूपमे (पृथिवी अनु सं यन्तु ) भमिसे मिल जाय। ४६३ हे (म-दानव !) दानी बीरो ' (व.) तुम्हारा (नाप.) जल, (विद्युत् ) विजली, (अभं) मेघ, (च) बारिश तथा (अजगराउत उत्सा.) अजगर की नाई प्रतीत होनेवाले झरने, जलप्रवाह सभी प्राणियोंको (सं अवन्तु ) वरावर बचा दें। (मरुद्भि. प्र-च्युता. मेधा ) मरता से नीचे गिराये हुए मेघ (पृधियर्या अनु) भूमिको अनुकूल ढगसे ( प्र अवन्तु ) ठीकठीक सुरक्षित रखें। ४६४ (अपां तनृभिः) जला के शरीरों से (सं-विदानः) तादात्म्य पाया हुआ(य. जात-घेदाः अग्नि.) जो वस्तुमात्रमें विद्यमान अग्नि (ओषधीनां अधि-पा) औषधियों का संरक्षण करनेवाला हे. (स ) यह (न प्रजाभ्य ) हमारी प्रजाके लिए (दिव परि) द्युलोकका (अमृत) मानों अमृतही पेसा (वर्ष) पारिशका पानी (प्राणं यनुता) प्राणशक्ति के साथ दे दे। ४६५ (त्यं चारं अ-चरं प्रति) उस सुन्दर हिसारहित यक्षम (गो-पीथाय) गोरस पीनर लिए तुझे (प्रहयसे)बुलाते हैं, अत. हे (अग्ने) अग्ने' (मरादि ) वीर मरताके साथ इधर (आगदि) मा जाओ। भावार्थ-४६४ आकाशमसे जो वर्षा होती है, उसीके साथ एक प्रकार का मागयायु भी कीपर उनरता है। यह सभी प्राणियों को तथा वनस्पतियोंको मुख देता है। टिप्पणी-[४६५] (१) गो-पीथ (पा पाने रक्षणे १) गोरममा पान, गौका संरक्षण । - F

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गनि।
४६६ नहि देवो न मयां मुहस्ता नहुँ परः । महिग्न आ गहि ॥२॥ [२४३९]
(४६६) नहि । देवः । न । मत्यैः। महः । तच । ऋतुम् । परः। मुस्तभिः । अग्ने ।
आ । गहि ॥२॥
४६७ ये महो रजमो विदु विश्वे देवामौ अद्रुहः । मरिन आ गहि ॥३॥ ६२४४०]
(४६७) ये । महः। जमः । विदुः। विश्व । देवामः । अद्रुहः। मुस्तभिः । अग्ने । आ ।
गहि ॥३॥
४६८ य उग्रा अवमान रनाधृष्टास ओज॑सा । मरुद्धिरम् आ गहि ॥४॥ [२४४१]
(४६८) ये । उनाः । मम् । आनचुः । अनावृष्टासः । गोसा। मरतऽभिः । अ ।जा।
॥४॥

१० । । ४६९ ये शुभ्रा घोरखपसः मुक्षत्रासौ रिशादसः । मुरुरिन आ गहि ॥५॥ [२४४२] (४६९) ये । शुभ्राः । घोरऽर्पसः। सुऽक्षत्रासः। रिशादसः। मरुभिः । अग्ने । आ। गहि ॥५॥ ४७० ये नाकखाधि रोचने दिवि देवास आसते । मुरुहिरन आ गहि ॥६॥ [२४४३] (४७०) ये। नाकस्य । अधि । रोचने। दिवि । देवासः । आमते। मरुतभिः । अग्ने । आ! गहि ॥६॥ ४७१ य ईट्सयन्ति पर्वतान् तिरः समुद्रमर्णवम् । मुरुद्भिरम आ गहि ॥७॥ [२४४४] (४७१) ये । ईसयन्ति । पर्वतान् । तिरः । समुद्रम् । अर्णवम् । मुरुभिः । ओ । आ । गहि ॥७॥ ४७२ आ ये तन्नन्ति रश्मिभि स्तिरः समुद्रमोजसा । मरुहिरन आ गहि ॥८॥ [२४४५] (४७२) आ। ये । तन्वन्ति । रश्मिभिः। तिरः । समुद्रम् । ओज॑सा। मरुत्तभिः । अग्ने । आ। गहि ॥८॥ अन्वयः- ४६९ ये शुभ्रा. घोर-चर्पसः सु-क्षनास रिश-दस मरदि (हे) अग्ने ! आ गहि । ४७. ये देवासः नाकस्य अधि रोचने दिवि आसते, मरदि.(हे) पने! आ गहि । १७१ ये पर्वतान ईड्वयन्ति, अर्णवं समुद्रं तिरः, मरादि (हे) अग्ने ! आ गहि । ४७२ ये रश्मिभि मोजसा समुद्रं तिरः तन्यन्ति, मरद्भिः (हे) अग्ने ! आ गहि । अर्थ- ४६९ (ये शुभ्रा ) जो गौरवर्णवाले, (घोर-वर्पस) देखनेवाले के दिलको तनिक स्तिमित कर सके, ऐसे वृहदाकार शरीरसे युक्त, (सु-क्षनास ) उच्च कोटि के क्षनिय है, अत (रिश-अदस.) हिंसा का वध करनेहारे है, उन (मरादि ) वीर मरताके झुंडके साथ हे (अग्ने') अग्ने ' इधर पधारो। ४७० (ये देवासः) जो तेजस्वी होते हुए (नाकस्य अधि) सुसदायक स्थान में या (रोचने दिवि ) प्रकाशयुक्त द्युलोक्मे (आसते) रहते हैं, उन (मरादि ) वीर मरनों के साथ हे (अग्ने') अग्ने ! (आ गहि) इधर आजो। ४७१ (ये ) जो (पर्वतान् ) पहाटी को (इङ्गयन्ति ) हिला देते हैं और जो (अर्णयं समुद्रं) प्रधुन्ध ममुन्दरको भी (तिर ) तरकर पर चले जाने हैं, उन (मरागि.) वीर मरुतो के साथ हे (अग्ने!) अग्ने ! ( आ गहि) इधर आ जाओ। ४७ (ये) जो ( रश्मिभि ) अपने तेजसे तथा (ओजसा) पलसे ( समुद्र) समुन्दरको (तिरः तन्वन्ति) लॉघर परे जा पहुंचते हैं, उन . मराद्भि.) वीर मरुतों के साथ है (अग्ने') अग्ने । (भा गहि) इधर आ जानो। भावार्थ-४६९ वीर सैनिक अपनी सामर्थ्य वढाव, शरीरको बलिष्ठ बना दे और शत्रुभोका हर ढगसे पराभव करें। निप्पणी-[४६९] (1) वर्पस-भूर्ति, आकृति, शरीर 1 (२) मु-क्षनास. अच्छे, उस्कृष्ट क्षत्रिय । [इस पदसे साफ साफ जाहिर होता है कि, मरत् क्षत्रिय वीर है। F० १६५ देखिए। वहाँ स्वक्षभिः ' पद पाया जाता है। [१७] (8) नाम (न-अ-क) 4% सुस, अE% दुस, नाक = सुखमय लोक [४७१] (1) पर्वतार हयन्ति- ( देरिए मरदेवता मत १५,१०,५९।)

१८. अन्वय ४७३ अभि वा पूर्वपीतये सृजामि सौम्यं मधु । मरुहिरम आ गहि ॥९॥ [२४४६] (४७३) अभि । त्या। पूर्वऽपीतये। सृजामि। सोम्यम् । मधु । मुरुमभिः । अग्ने। आ । गहि ।।९।। कण्वपुन सोभरि ऋषि (73० ८५१०३११४) (अग्निदेवता मन २४४७) ४७४ आर्गे याहि मरुत्ससा रुद्रेभिः सोमपीतये । सोभा उप सुष्टुतिं मादयस्व वणरे ॥१४॥ (४७४) जा । अग्ने । याहि । मरुत्ऽसंसा। रुद्रेभिः। सोमऽपतिये। सोभर्याः । उप । सुऽस्तु- तिम् । मादयस्त । सःऽनरे । ॥१४॥ [२४४७] इन्द्र-मस्तश्च । (इ देवता मन ३.४५-३२४६ ) विश्वामित्रपुन मधछन्दा ऋपि (ऋ. ११६५,७) ४७५ वीळ चिदारुजत्नुभि गुहां चिदिन्द्र वहिमिः । अविन्द स्त्रिया अनु ॥५॥ [३२४५] (४७५) चीलु । चित् । आरुजनुभिः । गुहाँ । चित् । इन्द्र । बाहिऽभिः । अविन्दः। उत्रियोः । अनु ॥५॥ ४७३ त्या पूर्व पतिये मधु साम्य अभि सृजामि, (हे) अग्ने ! मरदिा गहि। ४७४ (हे) अग्ने ! मरत्-ससा रद्रभि सोम पीतये स्वर-नरे आ याहि, सोभर्यासु-स्तुति उप मादयस्य । ४७५ (हे ) इन्द्र । वी चित् आ-रजत्नुभि वहिभि (मरहि ) गुहा चित् उनिया भनु अविन्दः । अर्थ- ४७३ (त्या) तह (पूर्व पीतये) प्रारभमें ही पीने के लिए यह (मधु सोम्य) मीठा सोमरस (अभि सृजामि) में निर्माण कर रहा है रे (जग्ने ।) अग्ने' (महानि गहि) वीर मरतोंके साय घरआओ। ४७४ रे (अग्ने ) अरो' तू (मरत् मया) वीर मरतामा मिस है, जत त (रनेमि ) शत्रुओं को रलानेवाले इन धीरा के सग ( सोम-पीतये ) सोम पीने के लिए (स्वर-नरे) अपने प्रकाश का जिससे विस्तार होता है, ऐसे इस यशम । ना याहि ) पधारो गोर (सोमर्या सु-स्तुति) इस सोभरि झापिकी अच्छी स्तुतिको मुनपर (मादयस्त्र) मतुष्ट यनो। ४७१ हे (इन्द्र') इन्द्र ! (चील चित्) अत्यन्त सामर्थ्यवान् शत्रु काभी (आ-रजत्नुभिः) विनाश परनेहारे ओर (यदिभि ) धन ढोनेवाले इन वीरोंकी सहागतासे शत्रुओने (गुहा चित् ) गुफाम या गुप्त जगह रखी हुई (उस्त्रिया गोनाको त ( अनु चिन्द ) पासमा, वापिस लेनेमें समर्थ हो गया। भावार्थ-१५ ये वीर दुश्मनों के बड़े बड़े गोका निपार करके अपने अधीन करनेमे, बडेही सफ्ट होते है। इन्हीं वोरोकी मदद पाकर यह, शनि बढी सतर्कतापूर्वक किमी गुप्त स्थानमें रखी हुई गौण या घनसपदाका पता रंगा मैं, सफरता पाता है । यदि ये पौर सहायना न पहुंचाते, तो किसी अज्ञात, दुर्गम तथा बीहड भूभागमे छिपी हुई गोसपदाको पाना उसके लिये दूभर होता, इसमे क्या साय? टिप्पणी-- [४७३1 (9) सोभी (सोमा ) [मोभरि -मुभःि] = मोभरिनाम ऋषि की, उत्तम उगसे पालनपोपण करनेहारे की (नासा) । (२) स्वर्णरे ( स्व-र-नरे)= (स्व) सपने (ग) प्रकाशका विस्तार करके कार्यम-पशमें। (स्वर) अपना प्रकाश हो तथा (न-रम्) वैयक्तिक भोगलिप्मा न हो, ऐमा यस । [१७] (1) जन्नु- (आ+TT भने हिमायो च)- तोडनेवाला, क्षति पैदा करनेवाला, विना- पाक, टुकडे टुकड़े करनेवाग, रोगपीडित1() उम्निय (यम् निवामे = रहोवारा, पैर, गाय, यडा, दूध, तेत्र, मा । (३) यार (पा गाणे) दोगरे चोवाग भासि ।

४७६ इन्द्रेण सं हि दृक्षसे राजग्मानो अविभ्युपा । मन्दू समानयंचसा ॥७॥ [३२४६] (४७६) इन्द्रेण । सम्। हि । दृक्षसे। सम्ऽजग्मानः । अप्रिभ्युपा। मन्द इति । समानऽवर्चसा ॥७॥ मरत्वानिन्द्रः। ( इन्द्रदेवता मन ३२४३०-३२०९) कानपुर मेधातिथि प्रापि (क. १।३।७-९) ४७७ मरुत्वन्तं हवामहु इन्द्रमा सोमपीतये । सुजूर्गणेने तृम्पतु ॥७॥ [३२४७] (४७७) मुरुत्वन्तम् । हवामहे । इन्द्रम् । आ। सोमपीतये । सऽजूः । गणेनं । तृम्पतु ॥७॥ ४७८ इन्द्रज्येष्ठा मरुद्गणा देवासः पूर्वरातयः। विश्वे मम श्रुता हवम् 11८॥ [३२४८] (४७८) इन्द्रऽज्येष्ठाः। मरुत्गणाः। देवांसः । पूर्वरातयः। विश्थें । मम । श्रुत । हम ॥८॥ अन्वय.-४७६ ( मरत्-गण !) अ-विभ्युपा इन्द्रेण सं-जम्मानः सं दृक्षसे हि, समान-वर्चसा मन्दू (स्था)। ४७७ मरत्वन्तं इन्हें सोम-पीतये आ हवामहे, गणेन सजूः तम्पतु । ४७८ (हे ) देवासः पृप-रातयः इन्द्र-ज्येष्ठा. मरत्-गणा ! विश्व मम हवं श्रुत । अर्थ- १७६ हे वीरो ! तुम सदेव (भ-विभ्युपा इन्द्रेण ) न डरनेवाले इन्द्रसे (सं-जग्मानः) मिलकर आक्रमण करनेहारे (सं दृक्षसे हि) सचमुच दीस पडते हो। तुम दोनों (समान-वर्चसा) सदृश तेज या उत्साहसे युक्त हो और (मन्दू ) हमशा प्रसन्न एवं उत्हसित बने रहते हो। ४७७ (मरुत्वन्तं ) वीर मरतों से युक्त । इन्द्रं) इन्द्रको (सोम-पीतये) सोमपान के लिए हम (आ हवामहे) बुलाते हैं । वह इन्द्र (गणेन सजू ) इन वीरोंके गणके साथ (वृम्पत ) तृप्त होवे । ४७८ हे (देवास.) तेजस्वी, (पृप-रातय ) सबके पोपण के लिए पर्याप्त हो इस ढंगले दान देनेहारे, तथा (इन्द्र-ज्येष्ठाः) इन्द्रको सर्वोपरि प्रमुस समझनेवाले ( मरन्-गणाः ) वीर मरतो ! (विश्ये) तुम सभी (मम हवं श्रुत) मेरी प्रार्थना सुनो। भावार्थ-४७६ हे वीवो! तुम निडर इन्द्र सहवास से सदव रहते हो। इन्द्र को सोदकर तुम कभी छन भरभी नही रहते हो। तुममे एव इन्द्रमे समान कोटिका तेज पर प्रभार विद्यमान है। तुम्हारा उत्साह कभी घटता . नहीं है। ४७८ इन वीरोम सभी समान रूपसे तेजस्वी है और सबके लिए पर्याप्त अन एव धन पाकर सय लोगों में बाँट देते है। ऐसे इन वीरों का प्रभु एवं नेता इन्द्र है। ये सभी मेरी प्रार्थना सुन लेनेकी कृपा करें। टिप्पणी- [४७६] (1) वर्चस् शक्ति, यल, उत्साह, तेज, आकार । (२) मन्दुः- (मन्द स्तुतिमोदमदस्वग- कान्तिगतिपु) मानन्दित, स्तुति करनेहारा, निद्रासुख भोगनेवाला। [४७७] (1) तृम्प- (प्रोणने ) तृप्त होना, समाधान पाना । (२) सजुस्- युक्त [४७८] (1) पूप-रातिः (पप् वृद्धी - सनकी पुष्टि के लिये योग्य एवं पर्याप्त भन्न धन आदि का दान देनेवाला।

थन्चय.. ४७९ हुत वृत्रं सुंदानय इन्द्रेण सहसा युजा । मा नौ दुःशेर्स ईशन ॥९॥ [३२४९] (४७९) हुत। वृनम्। सुदानवः। इन्द्रेण। सहसा । युजा। मा। नः। दुःशंसः । ईशत ।।९।। मिनावरणपुत्र जगल्य कपि (२०१1१6-12-16) (इन्द्रदेवता मन ३२५०.३.६३) ४८० कया शुभा सयसः मनीळाः समान्या मुरुतः सं मिमिक्षुः । का मती कुत एतास एते-र्चन्ति शुष्मं पणो वसूया ॥१॥ [३२५०] (४८०) कयो । शुभा । सऽवयसः । सऽनीळाः। समान्या। मरुतः । सम् । मिमिक्षुः । को । मती । कुतः। आऽईतासः । एते। अर्चन्ति । शुष्मम् । वृषणः । वसुऽया॥१॥ ४७२ ( हे ) सु-दानव.! सहसा इन्द्रेण युजा वृनं हत, दुस्-शंसः नः मा ईशत । ४८० स-वयस स-नीळाः स-मान्या मरतः कया शुभा सं मिमिक्षु ? एते फुतः एतासः? घृपणः वसु-या कया मती शुष्मं अर्चन्ति? अर्थ- १७९ हे ( सु-दानः ।) दानशूर वारी! तुम (सहसा) शनुको परास्त करने की सामर्थ्यसे युक्त (इन्द्रेण युजा) इन्द्रके साथ रहकर (वृनं हत) निरोधक दुश्मनका वध कर डालो। (दुस्-शंसः) दुष्की- तिसे युक्त यह शत्रु (नः मा ईशत ) हमपर प्रभुत्व प्रस्थापित न करे। ४८० (स-वयस.) समान उम्रयाले, (स-नीळा. ) एकही घरमै नियास करनेहारे, (स- मान्या) समान रूपसे सम्माननीय (मरतः) ये वीर मन्त् (क्या शुभा) रिस शुभ इच्छासे भला सभी (स मिमिथुः) मिलजुलकर कार्य करते ह' (एते) ये (क्त एतासः) किधरसे यहाँ आ गये और (वृपण ) परवान होते हुए भी (वसु-या) धन पानेके लिए (कया मती) किस विचारसे ये (गुप्म अर्चन्ति ) बलकी पूजा करते हैं-अपनी सामर्थ्य चढाते ही रहते हैं। भावार्थ-४७२ ये धीर बडे भच्छे दानी है भोर इन्द्रसदृश सेनापतिके नेतृ वमे रहकर दुरा मा दुश्मनोका वध तथा विघस करते हैं। ऐसे शग्रुभीका प्रभार इन वीरो अथक परिश्रमसे कहीं भी नहीं टिक्ने पाता । जो शत्रु हमपर अपना प्रभुत्व प्रस्थापित करनेकी लारसासे मेरित हो, उन्ह ये धीर धराशायी कर हारे और ऐमा प्रबंध कर कि, ये दुष्ट शत्रु अपना सर ऊंचा न उठा सकें तथा हम पानुसेनारे चंगुर में न फेसे । ४८० ये सभी चोर समान उम्रयाले है और वे एकही घरमे रहते हैं। सेनिक Barracks पैरकी रहते है, सो प्रसिद्ध है। सभी उन्हें सम्माननीय समाते है और लोगीका हित हो, इसलिए वे शओपर एकत्रित रूप से भाग मण कर घटने है । सुदूरवर्ती दुश्मनोंर भी ये विजय पाते और समूची उनताका हित हे, इस हेतु धन कमाने के लिए भपना पाठ पढाते रहते है। टिप्पणी-- [१७९] (1) दशंसः (शम् स्नी दुर्गती च ) - स्तुति, पुराना, दुर्गति, सदिच्छा, दर्शनेहारा, भाशी. दि, शाप । दुस्-शंस - दुष्ट इच्छा रखनेवाला, बुरी लालसासे प्रेरित, अपकीतिसे युरू। (२) सहस् = पल, सामध्य, राका पराभव करने की शक्ति, शग्रुदरका भाक्रमण परदात करते हुए अपनी जगह स्थायी रूप मे टिकनेकी [20]()स-वयम् = ( वयस् = वय, यौवन, मन, बर, पंजी, भारोग्य1) भतयुन, बलयान , नवयुवर, भारोग्यसंपा, समान उग्रका । (२) वसु-या- धन पाने के लिए जानेहारे, पेष्टा करने में निरत । (३) शुभ्नोमा, घेर, मुख, विज्ञप, अरंकार, उर, तेजस्वी रथ । (४)मिक्ष मिराना (IN), तैयार करना, इकट्टा फरना। (५)स-नीळा = एक घरमें रहनेवाले, (देखो मरद्देवनाके मन ३२१, ३४५,४४७)। शकि। A १८५ अन्वय ४८१ कस्य ब्रह्माणि जुजुपुर्युवानः को अंधेरे मरुत आ यवर्त । श्येनॉई धजतो अन्तरिक्षे केन महा मनसा रीरमाम ॥२॥ [३२५१] (४८१) कस्य । ब्रह्माणि । जुजुपुः । युवानः। कः । अध्वरे। मरुतः । आ । वात । श्यनान्ऽइव | ध्रजतः । अन्तरिक्षे। केन । महा । मनसा । रीरमाम ॥२॥ ४८२ कुतस्त्वमिन्द्र माहिनः स को यासि सत्पते कि त इत्था । सं पृच्छसे समराणः शुभान वाँचेस्तन्नो हरियो यत् ते असे ॥३॥ [३२५२] (४८२) कुतः । त्वम् । इन्द्र । माहिनः । सन् । एकः । यासि । सुत्ऽपने । किम् । ते । इत्था । सम् । पृच्छसे । सम्ऽअराणः । शुभानैः । पोचेः । तत् । नः । हरिः । यत् । ते । असे इति ॥३॥ • ४८१ युवानः कस्य ब्रह्माणि जुजुपु १ क मरुत अ ध्वरे आ पवर्त ? अन्तरिक्षे श्येनान्इव ध्रजत (तान् ) केन महा मनसा रीरमाम' ४८० (हे) सत् पते इन्द्र' त्य माहिन एक सन् त यासि' ते इत्था कि ' शुभानै स-अराण स पृच्छसे (हे) हरि-7 ! यत् ते असे तत् वाच । अर्थ-४८१ ये (युवान) वीर युवक इस समय (क्स्य ब्रह्माणि जुजुप ) भला क्सिके स्तोन सुनते होगे' (फ) कौन इस समय (मरुत ) इन वीर मरुतोको अपने (अध्वरे) हिंसारहित यश (आ ववर्त) आनेके लिए प्रवृत्त करता होगा ( अन्तरिक्षे) आकाशपथमेंसे ( श्येनान्इव ) याज पछी की नाई (धजत ) वेगपूर्वक जानहारे इन वीरांको (केन महा मनसा ) किस उदार मनोभावसे हम { रीरमाम) भला रम माण कर लें? ४८० हे सत्-गते इन्द्र !) सज्जनाका पालन करनेहारे इन्द्र । ( त्व माहिन ) त महान हाते हुए भी इस भॉति (एक सन् ) अकेलाही (फत यासि ) स्धिर भला चला जा रहा है ? (ते) तेरा ( इत्था ) इसी तरह बर्ताव { किं ) भला किस लिए है ? (शुभाने ) अच्छे कर्म करनेहार वीरोंरे साथ (स-अराण ) शत्रुदलपर धावा करनेहारा तु (स पृच्छसे) हमसे कुशर प्रश्न पूछता हे । है (हरिव') उत्तम अश्वोंसे युक्त इन्द्र ! ( यत् त अस्मे ) जो कुछ तुझ हमें बतलाना हो (तत् पाचे ) वह कह दे। भावार्थ-४८१ धीर युक्कदश में है और व यज्ञमें जाकर काव्यगायनका श्रवण करत है, बोरगाणाका गायन सुनते हैं। वे (अपने वायुयानों मे बैठ) अन्तरिक्षकी राहासे वगपूर्वक चर जात है। हमारी चाह है कि व हमारे इस हिंसारहित कममे पधारें और शुभ कर्मका अवलोकन करके इधाही रममाण हो। ४८. सनोका पालनकर्ता इन्द्र अकेला होने परभी कभी एकाध मौकेपर शत्रुसेनापर आक्रमण करने जाता है। प्राय वह तजस्वी वीरों को साथ ल विरोधियों से जूझने प्रयाण करता है। प्रथम अपी आयोजना उनसे कहा- कर और सयका एकत्रित कर्तव्य निर्धारित करके पश्चात्ही वह विद्युत्युद्धप्रणालीका अवलय करना है निमरे फर स्वरुप भानुसेना तितरवितर हुभा करती है। टिप्पणी- [१८१] (१) ब्रह्मन् = ज्ञान, स्तोत्र काव्य, बुद्धि धन, सूर्य, भन । (२) मनस- मन, विचार, कल्पना, युक्ति हेतु, इच्छा । (३) धज् (गती) - जाना, हिलना हिलाना। (४) अन्तरिक्ष श्येनान् इव - (देखो मरुदवसाके मत्र ९१, १५१, ३८९)। [४८२] (1) माहिन = बढा, मसनाचसा, प्रशसनीय । (२) शुमान = शोभायमान, सुशोभित । मरुत् [हिं] २४ ।

४८३ ब्रह्माणि मे मतयः शं सुतासः शुष्म इयनि प्रभृतो मे आदि। आ शोसते प्रति हर्यन्त्युक्थे मा हरी यहतस्ता नो अच्छे ॥४॥ [३२५३] (४८३) ब्रह्माणि । म । मृतयः । शम् । सुतासः। शुष्मः । इयति । प्रऽभृतः । मे । अद्रिः। आ। शासते। प्रति । हर्यन्ति । उक्था। इमा। हरी इति । यहतः । ता । नः । अच्छ॥४॥ ४८४ अतौ ययमन्तमभिर्युजानाः स्वक्षेत्रेभिस्तन्व: शुभमानाः । महाभिरेता उप युज्महे न्यि न्द्र स्वधामनु हि नौ बभूथं ॥५॥ [३२५४] (४८४) अतः । वयम् । अन्तमभिः । युजानाः। खऽक्षत्रेभिः । तन्वः । शुम्भमानाः । महाभि । एतान् । उप । युज्महे । नु । इन्द्र । स्वधाम् । अनु । हि । नः । बभूथ । - मन्वय' ४८३ मे ब्रह्माणि मतयः सुतासः शे, प्रभृतः में शुप्मः अदिः इयर्ति, मा शासते, उपथ प्रति हर्यन्ति. इमा हरीन. ता अच्छ यहत । ४८४ अतः वयं अन्तमेभिः स्व-क्षभिः युजानाः तन्यः शुम्भमानाः महोभिः एतान् नु उप युन्महे, हि (हे ) इन्द्र ! न. स्वधां अनु यभूथ । अर्थ- ४८३ (मे ) मेरे (ब्राह्माणि) स्तोत्र. मेरे (मतयः ) विचार तथा (सुतासः) निचोडे हुए. सोम- रस सभी ( शं ) सुखकारक हो हाथ (प्र-भृतः) सुदृढ ढंगस पकडा हुआ (मे) यह मेरा (शुप्मा) शनुमा शोषण करनेवाला प्रभावी (अद्रिः) वज्र 'इयर्ति) शग्रुपर जा गिरता है और इसीलिए सभी लोक (जा शामते) मेरी प्रशंसा करते हैं तथा मेरे (उक्या) काव्योंकाभी (मति हर्यन्ति) गायन करते हैं। (दमा दरी) ये दो घोडे (ना) हमे (ता अच्छ) उन यशस्थलोतक (वहतः) ले चलते हैं। ४८४ (शतः) इसीलिए. (वयं) हम (अन्तमेभिः) अपने समीपकी (स्व-क्षत्रभिः) स्यीय शूरताओं से ( युजाना.) युक्त होकर । तन्यः गुम्भमानाः । शरीर सुशोभित करके इस (महोमिः) सामर्थ्य से पूर्ण (एनान् । कृष्णसारों को अपने रथों में (नु उप युज्महे) जोतते है । हि) क्योंकि हे (इन्द्र!) इन्द्र ! ( स्वधां हमारी शक्तिफा तुझे (अनु बभूथ) अनुभव ही है। भावार्थ-४८३ वीरों काव्य सुरिचारको प्रोत्साहन देते हैं । वीर सैनिक मारे एवं उत्पाहवर्धक सोमरसका पान करें। जिधर वीरकाम्योंका गायन होता हो उधर जनता चली जाय, सुन 1बीर अपने समीप ऐसे हथियार रखें कि, जो शके यळको शुष्क कर डालं तथा उनका विनाशमी कर दें। ४८४ वीर क्षप्रिय अपनी शूरतासे सुहाते है । मौका आतेही वे सज्ज होकर शत्रुओंपर धावा करनेके लिए रघोस सेयार रसन | उना सनापति भी उनकी शक्ति के अनुसार उन्हें कार्य दता है। टिप्पणी- [४-४] (1) स्व-क्षभिः-अपने क्षत्रिय धोके साथ, अपने क्षत्रियोचित साधनों के साथ | (R०१।१९१५ पष्ट सूचना मिरती है कि, मरत् क्षग्नियवीरही है। और उसे ६शो।) इस ४८५ कोस्या को मरुतः घासीद् यन्मामेकै समर्धत्ताहिहत्यै । अहं घुग्रस्तधिपस्तुविधमान् विश्वस्य शबोरनम यधस्नैः ॥६॥ [३२५५] (४८५) के । स्या । य: । मरुतः । स्मधा । आसीत् । यत् । माम् । एकम् । सम्ऽअर्धत्त । अहिऽहत्ये। अहम् । हि । उनः । तविपः । तुर्विमान् । विश्वस्य । शत्रौः । अनमम् । वस्नैः ॥६॥ ४८६ भूरि चकर्थ युज्यभिरस्मे समानेमिपम पास्यभिः । भूरीणि हि कृणामा शनिष्ठेन्द्र क्रत्वा मरुतो यद् यशाम ॥ ७॥३२५६] (४८६) भूरि । चकर्थ । युज्यभिः । अस्मे इति । समानेभिः । वृषभ । पास्येभिः । भूरीणि । हि । कृणाम । शपिष्ठ । इन्द्र । | । मरुतः । यत् । वाम ॥७॥ अन्वयः-४८५ (हे) मरत.! अहि-हत्ये यत् मां एक समधत्त स्या व स्व-धा व आसीत् ? अहं हि उग्र. तविपः तुविम् मान विश्वस्य शम्रोः वध स्नैः अनमम् । ४८६ (हे ) वृषभ ' असे युज्येभि समानेभिः पास्येभिः भूरि चरर्थ, (हे) शविष्ठ इन्द्र! (वयं ) मरुतः यत् पशाम, त्या भूरीणि कृणवाम हि । अर्थ- ४८५ हे (मरतः! ) वीर मरतो । (महि-हत्ये ) शनुको मारते समय (यत् ) जो शक्ति (मां एकं) मेरे भोले के निकट तुम ( समधत्त) सब मिलकर एकनित कर चुके हो, (स्या) वह (4) तुम्हारी (सर-धा ) शक्ति जर (क्र आसीत्) भला मिधर है ? (अहं दि) म भी (उम्र.) शर, (तविप.) यलयान तथा (तुधिस्-मान् ) वेगपूर्वक हमले करनेवाला है, अतः (निश्वस्य शनोः) सभी शनुओंको (पघ-नः) वज्रगे आघाता से (अनमं) झुका चुका है, उनपर मे विजयी बन चुका है। ४८६ हे ( वृषभ !) यलमान इन्द्र ' (असे ) हमारे लिप (युत्येभिः) योग्य ण्यं (समानभिः) सदृश (पास्यभि.) प्रभावोत्पादक सामथ्यों से तू (भरि चकर्थ ) बहुत पराकम कर चुका है। हे (शविष्ठ इन्द्र !) पलिष्ट इन्द्र ! (मस्तः) हम चीर मरत् (यत् यशाम ) जिसे चाहते हैं उसे अपने निजी (मावा) कार्यक्षमता तथा पुरपार्थ से हम अवश्यही ( भरीणि ) अधिक गुण तथा विपुल (कृणधाम हि) बरक दिपाते हैं। भावार्थ- १८५ वृद्धिगत होने वाले शउपर वादा काने समय अपनी मारी शकिा एकही स्थानम पेन्द्रिा पसी धादिए । सपूण शक्ति एकत्रित कर शत्रुदल पर आनमण का सूत्रपात करना ठीक है । अपना यर, बोर्थ, तपा शरता यहार समस्त शत्रुओं को परास्त करना चाहिए । ४८६ सेनापति अपनी सामथ्र्य बढार भयधिक पराक्रम करे और सनिय भी तो करना हो, उसे अपनी धिमे करके यसलाय । [यदि सैनिक तथा सेनापति दोनों इस भाँति उत्साही, पुरपार्थी तथा पराममी हो और यदि एक विचारसे प्रेरित हो कर्तव्यकर्म निभाने लगे, तो उनके विजयी होने में क्या माय है?] टिप्पणी-[४८५] (१) अ-हि- जिसका बह घटना नहीं हो ऐसा पलिष्ट शनु, घृन निरोधन दरोगा। शत्रु। (२) वध-स्नैः ( अमनः) (धम् क्षेपण) बनके आधार, शरदके पिभित प्रयोग, अस्यमयोग । [४८६ ] (1) कतु = पर, बुध, शकि, सामर्ष, पुन, इछा, सपेरता, योग्यता । (२) यु.पर योग्य, जो टीक हो। ) धे ४८७ वधी पुत्र मरुन इन्द्रियेण स्वेन भामैन विपो भूगन् । अहमेता मनवे विश्वश्चन्द्राः सुगा अपञ्चकर वबाहुः ॥८॥ [३२५७] (१८७) वधीम् । वृत्रम् । मरुतः । इन्द्रियेण । स्वेन । भामैन । तधिपः । बभूवान् । अहम् । एनाः । मर्नथे । विश्वऽचन्द्राः। सुऽगाः । अपः । चकर । वर्जऽवाहुः ।।८।। ४८८ अनुत्तमा ते मघवन्नकिर्नु न त्वावा अस्ति देवता विदानः । न जायमानो नर्शत न जातो यानि करिष्या कृणुहि प्रवृद्ध ।।९।। [३२५८] (४८८) अनुत्तम् । आ । ते । मघऽवन् । नकिः । नु । न । त्वाऽवान् । अस्ति । देवता । विदानः। न । जाय॑मानः । नशते । न । जातः । यानि । करिष्या । कृणुहि । प्रबुद्ध ॥९॥ अन्वयः-- ४८७ (हे) मरुतः! स्वेन भामेन इन्द्रियेण तविपः बभूवान्, वन-याहुः अहं पुत्रं यधी, मनवे एताः विश्व-चन्द्राः अपः सु-गाः चकर। ४८८ (हे) मघवन् ! ते अन्-उत्तं नकिः नु आ, त्वाचान् विदानः देवता न अस्ति, (हे) प्र-पृद्ध ! यानि करिप्या कृणुहि न जायमानः न जातः नशते। अर्थ-४८७ हे (मस्त !) वीर मस्तो! (स्वेन भामेन इन्द्रियेग) अपने निजी तेजस्वी इन्द्रियों से (तविषा) चलवान ( बभूवान् ) हुआ और ( यज-वाहुः) हायमें बन धारण करनेवाला (अहं । मैं (वृत्रं वी) घेरनेवाले शनुका यध करके ( मनये) मानवमात्र के लिए एताः। ये (विश्व-चन्द्राः ) सयको आल्हाद देनेवाले (अप ) जलौघ सवको ( सु-गाः चकर ) सुगमतापूर्वक मिलते जायें, ऐसा प्रबंध कर चुका । ४८८ हे (मघवन् ! ) इन्द्र ! (ने) तुम्हारी ( अन्-उत्तं) प्रेरणा के बिना (नकिः नु आ) कुछ भी नहीं होने पाता। (त्यावान् ) तुम्हारे समकक्ष ( विदानः देवता ) शाता देव (न अस्ति) दुसरा कोई विद्यमान नहीं है । हे (प्र-युद्ध !) अत्यन्त महान् इन्द्र ! (यानि करिप्या ) जो कर्तव्यकर्म तू ( कृणुहि ) निभाता है, उन्हें दूसरा कोई भी न जायमानः निशते]) जन्म लेनेवाला नहीं कर सकता, अथवा (न जातः नसते) उत्पन्न हुआ पुरुष भी नहीं कर सकता। भावार्थ-४८७ अपना इन्द्रियमामय बनाकर वीर पुरप हाथमें हथियार लेकर जटप्रवाहकी स्वच्छन्द गतिमें पापा दालनेगले शम का बध परके सभी मानयों के हितके लिये अत्यावश्यक जीवनोपयोगी जह हरएक को बी आसानले सिर. सक, ऐरको उपयस्था का इस मौलिक लोकहितकारक कार्य करना बलिष्ठ वीरों का कर्तव्यही है। १८८ वीर के लिए अजेय कुछ भी नहीं है। वीर जानकारी प्राप्त करके मानी बने और यह ऐसे कार्य शुरू कर दे कि.जिन्हें निष्पन्न करना अभी तक भसम्भव हुआ हो या भागे चलकर कोई दूसरा कर लेगा, ऐसी संभावना नदी पद्धती हो। . टिप्पणी-१८७](8) सुगाः अप (सु-गाः ) सुगमनापूर्वक मिल सके ऐसे जलप्रवाह, जिसमें खलबली भवती हो, ऐसा प्रयाह । (४८८] (1) अनुत्तानुद् प्रेरणे) अमेरित, अजेय अन्-उत्त% (उद्-उन्द् केदले ) जो न भिगोया गया हो, जिपपर भाक्रमग न हुआ हो। (२) विदानः(विद्शाने )= ज्ञानी । (३) प्र-वृद्ध महान् , घलिए, अनुमती।

४.९ एकरस चिन्मे विवस्त्वोजो या नु दधृष्वान् कृणवै मनीपा । अहं घुप्रो मरुतो विदानो यानि च्यवमिन्द्र इदीश एपाम् ।।१०।। [३२५९] (४८९) एकस्य । चित् । मे । विभु । अस्तु । ओजः। या । नु । धृष्वान् । कृणवै । मनीपा। अहम् । हि । उग्रः । मरुतः । विदानः। यानि । च्यवम् । इन्द्रः । इन् । ईशे । एपाम् ॥१०॥ ४९० अर्मन्दनमा मरुतः स्तोमो अत्र यन्मै नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र । इन्द्राय वृष्णे सुखाय मह्यं सख्ये सोयस्त॒न्वे तनूभिः ॥११॥ [३२६०] (४९०) अमन्दत् । मा । मरुतः । स्तोमः । अत्र । यत् । मे । नरः । श्रुत्यम् । ब्रह्म । चक्र। इन्द्राय । वृष्ण । सुऽमखाय । मह्यम् । सख्यै । सखायः । तन्नै । तनूभिः ॥११॥ अन्वयः- ४८९ मे एकस्य चित् ओजः विभु अस्तु, या मनीपा दधृप्वान कृणवै न, (हे ) मरुतः ! अई हि उग्रः विदानः यानि च्यवं एपां इन्द्रः चित् ईशे । ४९० (हे) नरः मरतः! अत्र स्तामा मा अमन्दत्. यत्मे श्रुत्यं ब्रह्म चक्र, वृष्णे सु-भखाय मह्यं इन्द्राय, (हे ) सखायः ! सख्ये तनूभिः तन्ये । अर्थ- ४८९ ( मे एकस्य चित् ) मेरे अकेलेकाही (ओजः) सामर्थ्य (विभु अस्तु ) प्रभावशाली यनता रहे । (या मनीपा) जो इच्छा मैं (दधृप्वान् ) अन्तःकरणमें धारण कर लूंगा,वह (कृणवै नु) सच- मुचही पूर्ण करूँगा। हे (मरुतः।) धीर मरुतो ! (अहं हि ) मैं तो (उग्रः) शूर तथा (विदानः) ज्ञानी है और (यानि च्यवं) जिनके समीप मैं जाऊँगा, (एषां) उनपर (इन्द्रः दत् ) इन्द्रको हैसियतमेही (ईशे) प्रमुत्व प्रस्थापित कर दूंगा। ४९० हे (नरः मरुतः!) नेता चीर मरुत् ! ( अन ) यहाँ तुम्हारा (स्तोमः) यह स्तोत्र (मा अमन्दत् ) मुझे हर्षित कर रहा है । ( यत् ) जो यह तुम (मे ) मेरा (श्रुत्यं ब्रह्म) यशस्वी स्तोत्र (चत्र) यना चुके हो, यह (वृष्णे) वलवान तथा (सु-मखाय) उत्तम सत्कर्म करनेहारे (मां इन्द्राय) मुझ इन्द्र के लिपही किया है । हे (सपायः !) मित्रो! तुम सचमुच (मम्ये ) मेरी मित्रता के लिए अपने (तनूभिः) शरीरों से मेरे (तन्व) शरीरका संरक्षण करते हो। भावार्थ-४८९ वीरके अन्तस्सल में यह महत्वाकांक्षा सदैव जागृत एवं भारत रहे कि उसका बल परिणामकारक हो। यह जिस आयोजनाकी रूपरेपा निधारित करे, उसे लगनके साथ पूर्ण कर छे । अपना ज्ञान तथा शौर्य वृद्धिंगत करके जिधरमी चला जाय, उधरही प्रमुख तथा अप्रगन्ता पनकर अत्यन्त कर्मण्य बने । ४९० वीरोंके कायमें पाये जानेवाले यशोवर्णन को सुनकर पीर सैनिक अतीव प्रसन्न हो उठते हैं। वीरों को धीरों की सहायता अवश मिलती है। टिप्पणी-[४८९) (३)पिभु = शक्मिार. प्रबर, प्रमुम्ब, समर्थ, स्मिर। - अन्वयः- ४९१ एवेदेते प्रति मा रोच॑माना अनेद्यः थव एपो दानाः। संचक्ष्या मरुतभन्द्रवर्णा अच्छन्ति मे छुदयाथा च नूनम् ॥१२॥ [३२६१] (४९१) एव । इद । एते । प्रति । मा । रोचमानाः। अनद्यः । श्रयः । आ। इपः । दानाः! सम्ऽचक्ष्य मरुतः । चन्द्रवर्णाः। अच्छन्ति । मे। छुदांध । च । नूनम् ॥१२॥ ४९२ को न्वत्र मरुतो मामहे व: प्र यातन सखारच्छा सखायः मन्मानि चित्रा अपियातयन्त एषां भूत नवेंदा म ऋतानाम् ॥१३॥ [३२६२] (४९२) कः । नु । अब । मरुतः । ममहे । वः । प्र। यातन । सखीन् । अच्छे । सखायः। मन्मानि । चित्राः । अपिऽवातयन्तः । एषाम् । भूत । नवदाः । मे। ऋतानाम् ॥१३॥ ४९१ (हे) चन्द्र-वर्णाः मरुतः ! एच इत् रोचमानाः अ-नेद्यः श्रवः इयः आ दधानाः पते मा प्रति सं. चक्ष्य में नूनं यच्छन्ति छदयाथ च । ४९२ (हे ) सखायः मरुतः! अब कानु वः ममहे । ससीन् अच्छ प्र यातन, (हे) चित्राः! मन्मानि अपि-यातयन्तः एषां मे तानां नयेदाः भूत । अर्थ- ४९१ हे ( चन्द्र-वर्णाः मरुतः!) चन्द्रमाके तुल्य वर्णवाले वीर मरुतो !(एच इत् ) सचमुचही (रोचमानाः) तेजस्वी, (भ-नेद्यः) अनिन्दनीय तथा (श्रयः इपः आ दधानाः) कीर्ति एवं अन्न धारण करन. हारे (पत ) ये विख्यात वीर (मा प्रति) मेरी ओर (सं-चक्ष्य । भली भाँति निहारकर अपने यशोद्वारा (मे नूनं ) मुझे सचमुच ( अच्छान्त ) शर्पित कर चुके, उसी भाँति अब भी (छदयाथ च) प्रसन्न करो। ४९२ हे (सख यः मरुतः ! ) प्यारे मित्र मरुत्-चोगे ! (अत्र) यहाँ (कानु) भला कौन (वः) तुम्हारा ( ममहे) सम्मान कर रहा है ? तुम । सखीन् अच्छ) अपने मित्रोंकी ओर । प्र यातन) चले जाभो। हे (चित्रा !) आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले वीरो! तुम (मन्मानि) मननीय धनों के समीप (अपि-वातयन्तः) बंगपूर्वक जाकर पहुँच जानेवाले-श्रेष्ठ धन प्राप्त करनेवाले और (एपां भे मनानां) इन मेरे सत्कमी के निवेदाः भूत। आननेहारे गनो। भावार्थ-४९१ वीर मरतों का वर्ण चन्द्रवत् भाडादायक है । वे तेजस्री है भार निदोष असकी समृद्धि करते हुए निष्कलंक यश पाते है । कभी कभी उनका पगझम इतना डाल रहता है कि उमाके फलसरूप पे अपने सेनापति का यश भी अपने यशोंसे दकसे देते हैं भौर इसीसे उसे आनंदित भी करते हैं। ४९२ वीरोंग गौरव एवं सम्मान चतुर्दिक होता रहे । वे अपने मित्रों के निकट जाकर उनकी रक्षा करें। पे ऐमा पराकम कर दिखसा कि जनन! अघाभेमें भा जाय और निर्दोष दगमे धन क्माकर मरल मागासेही यशस्थिता किस प्रकार पाई जा सकती है, मो भली प्रकार जान लें । टिप्पणी- [४९१] (1) चन्द्र वर्णाः चन्द्रमा सुरुष वर्गवाले, (चन्द-मुर्ग; मुबर्णके रंगसे युका) [मरुदेवता मंत्र २०९ देखिए। यहाँ हिरण्य-वर्णान्' पद उपरम्ध है । क. १११००८ में 'चिनभिः पदसे महतोंके शुम्र-गौर वर्ण की सूचना मिलती है। साधारगवया पेपा जान पहना है कि दीर-मरत् गौरपीन दीख पड़ते थे।] (२) अच्छान्त (उद् भारछादने)- इक दिया, भानन्द दिया । (३) चन (व्यक्तायो वापि)देखना, बोलना। [४९२] (1) मत = सरल पर्गव, मत्य, यत, पविन कार्य, सरकम । (२) नवेदसः माननेहारा (मायगभाष्य) [मरदेवता मंत्र ५ "५1८, २७२ उघा 10१३१६ देखिए । निय भाषण, ४९३ आ यद दुस्साद् दुवसे न कारु रसाचक्रे मान्यस्य मेधा । ओ पु वर्च मरुतो विमच्छेगा ब्रह्माणि जरिता वो अर्चत् ।।१४।। [३२६३] (४९३) आ। यत् । दुवस्यात् । दुबसै । न । कारः। असान् । चके । मान्यस्य । मेधा । ओ इति । सु । वर्त । मरुतः । विप्रेम् । अच्छे । इमा । ब्रह्माणि । जरिता । यः । अर्चत् ॥१४॥ (ऋ० १।१७१॥३-६) इन्द्रदेशता मंत्र ३२६५-६८] ४९४ स्तुतासौ नो मरुतौ मूळयन्तूत स्तुतो मघवा शंभविष्ठः । ऊर्वा नः सन्तु कोम्या चना-न्यहीनि विश्वा मरुतो जिगीपा ॥३॥ [३२६५] (४९४ ) स्तुनासः । नः । मरुतः । मुळयन्तु । उत । स्तुतः । मघऽया । शम्ऽभविष्ठः । ऊो । नः । सन्तु । कोम्या । वनानि । अहानि । विश्वा । मरुतः । जिगीषा ॥३॥ अन्धयः- ४९३ (हे ) मरुतः ! दुवस्यात् मान्यस्य कारुः मेधा न दुवसे यमान आ चक्रे, विमं अच्छ ओ सु वर्त, जरिता यः इमा ब्रह्माणि अर्चत् । ४९४ स्तुतासः मरुतः नः मृळयन्तु. उत स्तुत: शंभविष्ठः मघया, (हे) मरुतः नः अहानि कोम्या वनानि सन्तु जिगीषा ऊया । अर्थ-४९३ हे (मरुतः ! ) वीर मरतो तुम (दुयस्यात् ) पूजनीय या संमाननीय हो, अतः(मान्यस्य) मान्य कवि की (काह: मेधा) कुशल बुद्धि (न) अब तुम्हारा (दुवसे ) सत्कार करने के लिए (अस्मान्) हमें ( आ चक्र) सभी प्रकारसे प्रेरणा करती है, इसलिए तुम इस (विप्रं अच्छ) ज्ञानी की ओर (मो सु पर्न) प्रवृत्त हो जामा- आओ। (जरिता) यह स्तोता-उपासक-(यः इमा ब्रह्माणि) तुम्हारे इन स्तोत्रों. कान्या का (अर्चत् ) गायन करता आ रहा है। ४९४ (स्तुतासः मरुतः ) सराहना करनेपर ये वीर मरुत् (नः मृळयन्तु ) हमें सुख दें(उत ) और (स्तुतः) प्रशंसा करनेपर (श-भविष्ठः) आनन्द देनेहारा (मधवा) इन्द्र भी हमें सुख दे । हे (मरतः!) वीर मरुतो ! (नः विश्वा अहानि ) हमारे सभी दिन ( कोम्या) काम्य, (वनानि) वनराजि के तुल्य आनन्ददायक (सन्तु ) हों और हमारी (जिगीषा) विजयको लालसा (ऊर्धा) उच्च कोटिकी बनी रहे। भावार्थ-९३ ये वीर सम्माननीय है, इसलिए कवियोंकी बुद्धि उनके समुचित वर्णन के लिए सचेष्ट रहा करती है । वीरभी ऐसे कवियोंका आदर करें और उनके काव्योंका श्रवण करें। ४९४ वीर मरुत् और इन्द्र हमें सुम्बी बना दें। हमारा प्रत्येक दिन उज्ज्वल, रमणीय तथा सरकार्य में लगा हुभा होने के कारण भानन्ददायक हो और हमारी विजयंच्छा अत्यन्त उच्च दर्जेकी हो जाय। टिप्पणी- [४९३ ] (1)[ दुवस्यात् । हताः ) हेस्वर्थे पचमी । दुवस्या- माननीय, पूजनीय । (२) जरिता ( जरते= तुलाना, स्तुति करना )- स्तुति करनेहारा, स्तोता, उपासक । [४९४] (3) कोम्य= कमनीय, स्पृहणीय, रमणीय, उज्ज्वल ( Polished, lovely)। (२) वन- सम्मान देना, इच्छा करना, चाहना । चन= इष्ट, इच्छा करने के योग्य, वन । .

। ४९५ असादुहं तविषादीपमाण इन्द्राद् भिया मरुतो रेजमानः। युप्मभ्य हव्या निशितान्यासन् तान्यारे चकमा मुळता नः ॥४॥ [३२६६] (४९५) अस्मात् । अहम् । तविपात् । ईपमाणः । इन्द्रात् । भिया । मरुतः । रेजमानः । युप्मभ्यम् । हुन्या ! निशितानि । आसन् । तानि । आरे । चकुम । मुळत । नः । ॥४॥ ४९६ येन मानासश्चितयन्त उसा व्युष्टिपु शसा शश्व॑तीनाम् । स नो मरुद्धिपभ श्रवा पा उग्र उग्रेभिः स्थविरः सहोदाः ॥५॥ [३२६७] (४९६) येर्न । मानांसः । चितयन्ते । उताः। विउष्टिषु । शवसा । शश्वतीनाम् । सः । नः । मरुत्ऽभिः । वृषभ । श्रयः । धाः । उग्रः । उग्रेमिः । स्थविरः । सहाऽ दाः ॥५॥ अन्ययः- ४९५ (हे) मरतः ! अस्मात् तविपात् हन्द्रात् मिया अहं ईषमाणः रेजमानः, युष्मभ्यं हव्या नि-शितानि आसन्, तानि आरे चक्रम, नः मृळत । ४९६ मानासः उस्नाः येन शवसा शश्वतीनां व्युटिपु चितयन्ते, उग्रेभिः मरुद्भिः (हे) वृपम उन! स्थविर सहो-दाः सः नः श्रयः धाः। अर्थ- ४९५ हे (मरतः 1) वीर मरुतो ! (अस्मात् तविषात् इन्द्रात्) इस पलिष्ठ इन्द्रके (भिया) भयसे (अहं ) मैं भयभीत होफर (ईपमाणः) दौडने तथा (रेजमानः) कांपने लगा हूँ। (युष्मभ्यं) तुम्हारे लिए. ( हव्या ) हरिप्यान (नि-शितानि आसन्) भली भाँति तैयार कर रखे थे. पर (तानि) घे उसके भय से (मारे ) दूर (चरूम ) कर दिये, ये उसे दिये जा चुके हैं, इसलिए अब (नः मृळत) हमें क्षमा करते हुए मुखी बनाओ। ४९६ (मानामः) माननीय (उम्राः) सूर्यकिरण (येन शवसा) जिम सामथ्र्य से (शश्वतीनां व्युष्टिषु ) शाश्वतिक उप कालों में जनताको (चितयन्ते) जागृत करते हैं,उसी सामर्थ्य से युक्त और (उग्रेभिः) शूर (मरनिः । वीर मरुतों क साथ विद्यमान हे (वृपभ उग्र!) यलवान तथा शूर वीरश्रेष्ठ इन्द्र! (स्थयिक) ययोवृद्ध तथा (सहो-दाः ) यल देनेवाला (सः) यह तू (नः) हमें (श्रयः धाः) कीर्ति तथा अन्न प्रदान कर। भावार्थ-४९५ धीरोंका पराक्रम तथा प्रभाव इस भाँति हो कि, परिचित लोगभी उसे निहारकर सहम आय; फिर शत्रु पदि दर जाएँ तो उसमें क्या भाश्चर्य ? ४९६ इन वीरों की सहायता से हमें अन तथा यश मिले। टिप्पणी- [४९५] (1)नि-शित (शो तनूकरणे ) तोग किया हुआ, तेज ( हथियार)। (२) ईप् (गति- हिंसादर्शनेपु) जाना, वध करना, देखना । [१९६(1) मानः भादा, मामान, परिमाग । (३) चिम्चेमना देना, जागृत काना, ना, निहारना, जानना । (३) उत्र(वस् निवासे) प्रैल, गौ, किरण । (४) व्युष्टिम्प्रभात, वैभवशालिसा, स्तुति, ऐश्वर्य । ।

। ४९७ त्वं पाहीन्द्र सहीयमो नून् भा मरुद्भिरवयातहेगाः । सुप्रकेतेभिः सासहिर्दघांनी विद्यामेपं वृजनै जीरदानुम् ॥६॥ [३२६८] (४९७) त्वम् । पाहि । इन्द्र । सहीयसः । नृन् । भव । मरुभिः । अबयातऽहेळाः । सुऽप्रकेतेभिः । ससहिः । दधानः । विद्यामं । इपम् । वृजनम् । जीरऽदानुम् ॥६॥ इन्द्रामस्तो ( इन्द्रदेवता मंत्र ३२६९)। अगिरसपुत्र तिरश्ची या मरुत्पुत्र द्युतान ऋपि । (ऋ० ८।९६।१४) ४९८ द्रुप्समपश्यं विपुणे चरन्त मुपडरे नद्यो अंशुमत्याः । नभी न कृष्णमयतस्थिवांस मिप्यामि वो वृषणो युध्यताजी ॥१४॥ [३२६९] (४९८) द्रुप्सम् । अपश्यम् । विपुणे । चर॑न्तम् । उपऽहरे । नद्यः । अंशुऽमत्याः ।। नमः । न । कृष्णम् । अवतस्थिऽयासम् । इप्यामि वः। वृपणः। युध्यत। आजौ।।१४।। अन्ययः- ४९७ (हे) इन्द्र ! त्वं सहीयसः नून् पाहि, मरागः अवयात-हेळाः भव, सु-मकेतभिः ससहिः दधानः (वयं) इपं वृजनं जीर-दानुं विद्याम । ४९८ अंशुमत्याः नद्यः उपहरे विपुणे द्रप्सं चरन्तं, नमः न कृष्णं, अपश्यम्, अवतस्थिरांसं इण्यामि, (हे) वृपणः ! यः आजी युध्यत । अर्थ--४९७ हे (इन्द्र ! ) इन्द्र ! (त्व) तू (सहीयसः नृन्) शत्रुओंका पराभव करने का बल प्राप्त करने घाले हमारे सदृश लोगों की (पाहि ) रक्षा कर; (मरुद्भिः) वीर मरुतों के साथ हमपर (अवयात हेळाः) क्रोध न करनेवाला वन और (सु-प्रकेतेभिः) अत्यन्त ज्ञानी वीरों के साथ (ससहिः) शनुदलके परास्त करनेकी सामर्थ्य ( दधानः) धारण करके हमें (इपं) अन्न, (बृजनं ) बल तथा (जीर-दा) शीघ्र विजयप्राप्ति (विद्याम ) प्राप्त हो, ऐसा कर। ४९८ (अंशुमत्याः नद्यः) अंशुमती नामक नदीके समीप उपहरे विपुणे) एकान्त में विद्यमान यीहड स्थानमें (द्रप्सं चरन्तं ) शीघ्र गति से धूमनेवाले ( नभः न कृष्णं ) अंधेरे की नाई बहुतही काले. कलूटे शत्रुको (अपश्यं ) मैं देख चुका। एसी उस सुगुप्त जगह (अवतस्थिवांस ) रहनेवाले उस दुश्मन को (इप्यामि) मैं ढूंढ निकालता है। हे ( वृपणः ! ) बलवान धीरो ! (यः) तुम उस शत्रुके साथ (आजी) यद्रभूमि में ( युध्यत) लड़ते रहो। भावार्थ-४९७ परमपिता परमात्मा छन लोगोंका परिपालन करता है जो अपने में शत्रुदलको परास्त करनेवाले पल का संवर्धन करते हैं । इस कार्य में ज्ञानी वीरों की सहायता उसे पार बार होती है। उनके प्रचण्ड बल के सहारे समूची प्रजा भग्न पमृद्धि तथा बल एवं विजयका लाभ प्राप्त करती है। ४९८ प्रथम शत्रुके निवासस्थान तथा पाश्रप आदिकी भली भाँति जानकारी उपलब्ध करनी चाहिए और पश्चातही उसपर धावा करना चाहिए। टिप्पणी- ४९७] (१) प्रकेत (कित् शाने रोगापनयने च ज्ञान, बुद्धि, शोमा। सु-प्रफेत- दर्शनीय,शानी, दूर हटानेवाला (२)जीर-दानु= { मरुदेवता मन्न १७२ देसिए ।) ६४९८]()द्रप्स (दु गौ-दौडना, भाक्रमण करना)-दाडनेवाला, आक्रमणकता, सोमबिंदु, सोमरस । (२) विपुणः विभिन्न, परिवर्तनशील, तरह तरह का (३) उपद्धर- एकान्त स्थान, अइसायह जगह ! २५ मरुत् [हिं०] मरुतोंके मंत्रोंके ऋषि कुल मंग फुलन १४ अथर्श ६ और उनकी मंत्रसंख्या। मन-समाक मन क्रमांक १श्य वारस साय २१७-३१७-१०१ ४३४ ४३६- ३ ४५७-४६४- ८% ११ ४०९-४५६- ८% ११० १५ एवयामरदाय ३१८-३२६- २ अगस्त्यो मैनावरणि १५८-१९७-१० १६ मृगारः ४४०-४४६- ४८०-४९७-१८% ५८ १७ शयुर्व हस्पत्य. ३२७-३३३- ३ मनावरणि सष्ट ३४५-३९४- १८ मधुन्छन्दा वैश्व मित्र ४वे घर. ६.४५- ४० ४७५ ४७६- २%3D पुनवत्त काव ४३०-४३३- १३- ५६- ३४ २० गाथनो विश्व मैत्र. २१४ २१६- ३ ४२८-१= ३५ ४२४-१% ४ ७ सोमरिकका ८०-२०७- २६ २१ सप्तर्षय (ऋषयः) ४२५-४२७- ३ ४७४-१- २७ 1(१) भरद्वार , (२) उदयपः, (३) गौतम , (१) सनि , ८समद शामक १६ । (५) विश्वामिन , (६) जमदमि , (७) वसिष्ठ । ४०७४२२ १६ २मातातिः ४३७४३९- ३ १० नोधा ग नमः १०८-१०० १५ २३ पहच्छेपो देवोदासि १ ११ मेध तिथि दावा २४ प्रजापति. ४२३- १ ४६५४७३- ९ २५ अहिरा ४१७- ९७७-४३९- ३= १३ | २६ वसुश्रुत सारेयः ४४८- १.विद पूतरक्षो वा आपरस ३९५-४०६ १२/२७ अद्गिरस स्तरथी, १३ वापरयो भरद्वाज ३३४-३४४- ११ द्युत नो वा मारत. ४९८- १ ६ गात्मीर : : स्यूमर मार्गर १ मरुतोंका संदर्भ। (भग्वेद २ वेद-स हेता, मामा, अरण्यर र उपनिषदादि ग्रंथोंमे अये हुए, परतु मरदेवता के मंत्रसंग्रहमें संगृहात न किये गये ममि और वाक्य में मस्तीका सदर्भ पनर नेवाला वाक्यार इस तरह है- ऋग्मेदसंहिता। मदरुसू.म. महलसू०म० १०। ५मरत्वना इन्देश सं अग्मत । (भव ) ५२॥ ९ मरतः अनु अमदन । (इन्द.) २३१० मरतः सोमपं तये हवामहे । (विश्वे देवा ) १५ मरत. आजी अर्चन् । ११मरना एनि घृणुया । ८०१४ सुज्ञा मरुत्वतीरव । १२ मरतो गळयन्तु । ११ मरत्वा वृनं अवधीत् । ३३॥ १मरुतो प्रज-प्रष्टय अजायत । (अन) ८९१ ७ मरतः पृश्निमातरः । (विश्वे देवाः) १०॥ १ उप प यन्तु मरतः । (प्रमाणरपनि ) ९० ४ मरुतः चियन्तु। २ मरता मुवीय आदर्ध त। ९४०१२ मस्तां हेलो अद्भुतः । (अमि ) ४४।१४ मस्तः स्तोम भृवन्तु । (अग्नि) १००१-१५ मस्त्यान नो भवविन्द्र ऊती । (इन्दः) " " " " M " " " " " " " " " " " "" " " १०१०१-७ मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे । (इन्द्र) ८मरत्वः परमे सबस्थे। ९ मरद्भिः मादयस्य । ११ मरतस्तत्रस्य वृतनस्य गोपाः। २०७१ २ मरुतो मरुद्भिः शर्म यस । (विश्वे देवा ) १११॥ ४ मरतः से मपातये हुवे । (ऋभव ) ११४। ६ मरुतां उच्यते वच । ९मरुतां सुम्न राम्व। ११ मरात्वान् रुदा ना हव शृणोतु १२२॥ १ रोदस्यो मरतोऽस्तोपि । ( विध देवा ) १२८॥ ५ मरुतां न भज।। (अमि) १३४॥ ४ मरतः वक्षणाभ्य अननय.। (वायु) १३६॥ ७ मरद्धि स्वयशस• मसीमहि । (लिंगेता) १४। ९ मरुत्स भरती । (तियो देव्य ) १२ मरावते इन्द्राय हव्य कनन । (साहाकृतय ) १४३१ ५ मरतामिव स्यन । ( अमि) २६१३१४ मत्त दिवा यन्ति । (मभव ) १६॥ १ मरत. परिरयन् । (अध ) १६५।१५ मस्त. एप प म्तोम । (मरत्व न इन्द्र) १६९। १ मरतां चिक्त्विान् इन्द्र । ( इन्द्र ) २ मरतां पृत्सुतिहाँसम ना। ३ अभ्व मरतो जुनन्ति । ५मरतो ना मृळ यन्तु । ७ मरतां आयता उपब्दिः गृप्पे।" ८रदा मरुद्भि शुरुध । १७०। मरुतो भ्रातर तव । ५ इन्द्र व मरुद्भि. मवदस्व । १७३।१० मरतः। गी बदते । २८ धिया मरुत्तमा । (अश्विनी) १८दा ८ मरतो वृद्धसना । (पिथ दवा ) २० ३१ ३ मरतां शर्ध आ वह । ( इळ ) ३०॥ ८ मरत्वती शत्रून् जेपि । ( सरसती) ३३॥ १ मरुतां मुम्न एतु । ६ मरुत्वान् रुद्र मा उन्मा ममन्द ।" १३ मस्त.! या य भेषजा। ४१।१५ मरहणा! मम हव श्रुत । (विश्वे देवा ) ३। ४।६ महावा इन्द्र । (उपारा नत्ता) १३॥ ६ मरुध. अग्ने न " गोत्र । ( अनि ) १४. ४ मत सुन्नमर्चन् । १६। मरतः ग्ध सश्चत । (अमि ) ०९।१५ मरुतामित प्रया.। (अमि) ३२. ३ इन्द्र! मरत ते ओज अर्चन्त। " ४.शधैं मस्त य आसन् । ३५। ७ मरत्वते तु य ह प रात । (इन्द्र) ९इद्र । मरतः आ भज । ४७।१मरुवान् इन्द्र । २ इन्द ! मरुदि. मोम पिच । ३ इन्द्र! मरुतः आभत। ४ इन्द्र ! मसद्धि सोम पिच । ५महत्यन्त इन्ध हुवेम । ५०॥ १ मरुत्वान् इद्र । ५१. ७ महत्व इह सेम पाहि । ८ मनि मेम पाहै। ९मस्त. अमन्दन् । ५२ ७ मरदि. सोम पय । ५४।१३ मरुत. ऋटिमन्त । (विवे देव.) २० मरुतः शर्म यच्छतु। ६२। २ मरदि मे हय शृणु। । ( इन्द्रापरणी) ३ अस्मे रयि महत। ४।१।३ विश्वभानुष मरुत्स वद । (अमितरुणी) २॥ ४ मरुत अग्ने रद्द। (अमि) ३.८क्या मरतां शर्धाय। २४॥ ३ मरत्वान् इन्द्र आ यातु । (इन्द्र.) २६. ४ मरुतो विरस्तु। (श्येन ) ३४७ मरद्भिपा है । (ऋभय ) ११मरुदि. स मदथा, ३९॥ ४ मरुता भद नाम अमन्म है । (दाधिमा ) ५५। ५ मरता अवासि । (विवे देवा ) ५। ५।११ मरुद्भय वाहा । (स्वाहाकृतय ) २६॥ ९ मरत. सीदतु ( विरे देवा ) २९. १ मरत त्या अन्ति। (इन्द्र २ महत इन्द्र आर्चन् । ३ मरुतो म सपुतस्य पया । ६मरत इन्द्र अर्चति । ३०१६ मरुत अर्ब अन्ति ८मरदय रोदसी चकिया इव।' ३२॥१० मस्त. ते तविष अवध ३६॥ ६ श्रुतस्य य मरता योया । ४११ ५ मरत' राय दवैत । ( विधे देवा ) मरती अक्ती ४३३१० ममतो वक्ष जातवर । " " " " - " " " " " " " " " " । " " " " ४॥ ४ मरतो यान्ति। (विश्वे देवा ४६। ३ मरतः हुवे। ६१मरतां नाम नभ्याम् । (मरतः, अग्नामस्ती या) • मरतो रथेषु तस्य । ३मरतः या काळथ । ७ मरद्यः सुदुघ पनि । ६मरतः दिवि । ७ मम्तो दिवो वहधे। ८ अम! मरादि. साम पेिप।" ६३॥ ५ मस्त रथ युपते । (मिनावरणी) ६मरत' समायया वमन । ८३।६ मरतः वृष्टिं रीष । (पन्य ) ६। ३. ८श पा यो मरतां ततभ । (अग्नि ) १२॥ १जम ! यो मरतां न प्रयुक्ति। १७९१ मरन य वर्धा ( इन्द्र ) २१॥ ९ मरुत टप्वारम नो था । (विधे देया ) १०१५ मदि पाहि । (इद ) ४७ ५ यामन्त नाद वृपभो मरत्वान् । (मोम ) ४७२८मरता अना। (रथ) ४९११ मस्त आगन्त । (विवे देवा) ५०१४मरतो अदाम देवान् । ५ ध्रुवाहवमरनो यद्ध याथ। ५। मरता य न अतिमन्यते । ११ मरगण सोत्र जुपन्न । ७१ ०॥ ५ मरत यक्षि । ( आगे ) १८२५ मरत इमराश्चत । ३१ ८ वा मरत्यती परिनुवत् । ३।१० यम्य मस्त. अविना (र)।" ३४.२४ आधेि मरतो निहति । (विश्वे देवा ) २५ सन ल्यम मरतां उपगे। ३१९८ नो भानु मरतः। २६१७ मस्त नो सपन्न । ९ मरतः। अथ च गे । ३९। ५मरता मादयता। ४०. ३ मामा भरनु मरत । २।५ मासु यास धीन । ५। ३ मरतश्च विश्व नः पात । ( आदिया ) ८२॥ ५ मगदिम्प शुभम य ईयते । (इन्द्रावरणी) ९३६८मस्त पर सन । (इदानी) १६. रानो यात्रा मरत्सखा । (सरमती) ८. ३२१ य मे दुरिन्द्रो मस्तः। (कौरयाण. पाश्थामा) १२।१६ मरत्सु मन्दसे । ( इन्द्रः) १३२८ मरुत्वतीविंशो अभि प्रयः ।" १८२० पदस्थ मरुतां । ( आदिल्या.) २१ मरुतो य त न दिः। २५।१० मरतः उरप्यतु । (विश्वे देवा ) १४ तन्मस्त (वृणामदे)।( मित्रावरुणो) २७१ १ ऋचा य मि मरुत (विश्वे देवा) [काठ०१०४६] ३ मरुत्सु विश्वभानुषु। ५ऋचा गिरा मरुतः। ६ अभि प्रिया मरुतः। ८आ प्र यात मरतः। ३५। ३ मराद्भिः सचा भुवा । (अश्विनी) १३ मरत्वन्ता जरितुर्गच्छता हव । ३६६१-६ मरुत्वॉ इन्द्र स पते । (इन्द्र ) ४१॥ १ मरुद्भयो अर्च । (वरण) ४६। ४ यं मरत. पान्ति । (इन्द्र) १७ मरता इयक्षसि। ५४॥ ३ गृप्वन्तु मरतो हर । ( वधे देवा ) ६२१० स्याम मरुतो वृधे । ( इन्द्र) ७६॥ १ मरुत्वन्तं न वृअसे । ( इन्द्र) २-३ इन्द्रो मत्सखा। ४ मस्त्वता इन्द्रेण जितं ।" ५-६ मस्त्वन्तं इन्द्र हवामहे ।" ७मस्त्वॉ इन्द्र । ८मस्त्यते हुयन्ते । ९रत्सखा दन्द्र पिव । ८३॥ ७ इता मरतो अश्विना । ( विश्वे देया ) ८९॥ १ मरत ! इन्द्राय गायत । (इन्द्र) मरहण! देवास सख्याय येमिरे।" ३मरतो मार्चत। ९६॥ ७ मरद्भिद्र सरय ते अस्तु । ८मस्तो व धाना । ९तिग्मायुधं मरतामनीका ९॥ २५॥ १ मरद्रयो पायो मदः । (पवमान सोम ) ३३॥ ३ मख्दय मोमा अन्ति। ३४॥ २ मद्भवः सोमो अति । ५। ३ मस्तः मधेय॑नते। ६१।१२ मरुद्यः परि सव । ६४ा२२ मात्यते इन्द्राय पयः । " " " " " । " " " " . " " " " " " " " " " " . " " " " " " " " " " " " " " " २४ मरतः पवमानम्य पिरन्ति । (पवमानः मे मः) १५७१३ मरद्भिः इन्दः अम्मकं सवेता भूताविश्वे देवाः) ३५।१० मरन्यते पाय। (२) सामवेदसंहिता। २० मद्यः सोमो अनि। ४४५ अर्चन्य मरतः स्वर्गः। (इन्द्रः) ३६हरियन्द्रो मग्दणः। (३) अधर्ववेदसंहिता। ७)ममतामिा बना नानदंति। वांसू० मन्न. ८२।४ मस्ताना आ गच्छन्तु । ९.६०१७ मरतः पछि गुम्भन्नि । २॥ १२॥ ६ अतीव यो मरुतो मन्यते नी मान। ( मरुतः) १०७।१७ मन्यते सोम माः । २९॥ ४ मन्दिरमः प्रहितो न आगन् । ( धाव पृगिनी, २५ मन्यन्तो म मरा. विधे देयाः. मरतः, अपः।) १०८२४ यस्य मरतः पिवान् । ५रिव देवा मस्त ऊर्जमापः [पत्त ]" १०॥ १३॥ ५ मग्त्यते गप क्षरन्ति । ( हविर्भाने) ३॥ ३॥ १ युन्जनु त्या गम्तो विश्ववेदाः ( अमि.) ३॥ १ मरुतः हुगे। (विश्वे देव .) ४॥ ४ विश्वे देवा मस्तस्या यन्तु । ( अधिनी) ४ मन्तां शर्म असामरिक १२॥ ४ क्षन्तहा मन्तो घृनन । ( मा पतिः) ३७१ ६ मरना ६वं शृप्यन्तु । (सूर्य) २७॥ ९विदीरनुमना मरदिः । (सीता) ५२१ २मरतो मा जुनन्ति । (विधे देशः) १९. ६ देवा इन्द्रज्येष्टा मन्तो यन्तु सेनया । (विये- ६३॥ ९मरतः पाये हनामदे। देवा, चन्द्रमाः, इन्दः।) १४ मरता यं असा ४. २३०४ पर्जन्यो धारा मस्त ऊधो अस्य (अनवान्) १५ मस्तो राये दधातन। १५/२५ वर्ष यनुष्य मिनरो मरना मन इच्छन (पितरः) ६४०११ मरतां गा उपस्तुनिः । ५॥ ३ इन्दवन्तो मरतो गम विहवे सन्तु ! (देवा: १२ मस्त: मेपि अददात। २४।१० मरतां पिता पमनामधिपतिः। (मरता पिता) १३ मन्तो युयोधय। ६॥ ३॥ १ पातं न भन्दाप गादितिः पान्नु मरतः।(इन्दा. ६५।१ मरतः मदिमागमीरगन। पूपी, अदिति, महनः इत्यादयः।) ६६।२ मरुद्गणे मन्म धीमहि । ४॥ २ अग्निः पातु मन्तः। (अदितिः, मरतः ४ मरतः अवगे दयामहे । दलादयः।) ७०१११ ओ ! अन्तरिक्षा मरतः आ यह । ३०॥ १ सीनासा आमन् मस्त: मुहानवः । (रामी) (म्पाहारगा) ४७ विशे देवा मरत इन्नो अम्मान न जायुः । ७३॥ १ मातः इन्द्र आर्थन् । (इन्दः) (विध देवाः) ७॥ ५ असिस्न्या मधे । (गया) ७॥ १ मातो रोमी अनपन । (प्रा.) ७४॥ ३ मरदिपा भणीयमानाः । (गांमनस्यम) ९२॥ १ सुभन्तु सा मम्तो विधवेसः । (इन्टः) ८४१ पिता मरुवा।(मन्युः) ९३१ ३ विधवा मरतो विश्ववेदाः पयानो ८। ९ मरन्समा इन्दः । (इन्द्रः) प्राय वम् । (पिय देवाः, मातः।) ९२१६मस्तो विवाष्टयः। (विटी देवा ) ११ मस्तो विष्णुरदिरे १०१। ३ इन्द्रो मग्न्यानादानममिनेन्यः रोना। (इन्द्रामी, सोम इन्द्रभा) ९३॥ ४ मस्तः। (शिये देशः) १०३१८मस्तो यन्तु अप्रै। १२00५दन्द्रो मग्न्यान रा ददातु तन्मे । (विधकर्मा) ९मस्तां शर्मः उदगार। १२५। ३ इन्दस्यीजो मरतामनीम् । (पनस्पतिः) ११३॥ ३ मस्तःभयं अवर्धन् । १३०1४ उन्मादयन मग्न उदन्तरिक्ष माश्य । (म्मरः) १२२॥ ५ मस्तः त्या मर्जयन् । (भमिः) ७ ॥ १ विश्वे देवा मरतो या गर्मा [अवगन् । १२६॥ ५ मस्ट्री र हुम। (सीधे देवाः) (रायता) १२८.२ मम्त विहले सन्तु । ३४॥ समामिचन्नु मनः प्रिनया धनेन (दीर्घाया) १३७॥ ५ माय मस्तां गणः ५२१ ३ पदक्षिणं मातां तोममृन्याम् । (इन्द्रः) " . " " " " " " " " " १९८ टा . . ५९१ २ सप्त क्षरन्ति शिरावे मत्यते । ( सरस्वती ) १०३१ १ समिन्द्रेण वमुन संमद्भिः। (इन्द्रः,विश्वे देवाः) ११२ उदनं मरतो देवा उदिन्द्रामी स्वस्तये। (आयुः) ९। १. ३ मस्तामुमा नतिः । ( मधु, अचिनी ) २१० ४८ अश्विनोरंसौ मस्तामियं पुन्। (अपभः । १२॥ ३ [६ पर्याय: द] विगुज्जिह्वा मरतो दन्ताः। (ग.) १०॥ ९॥ ८ उतरन्मस्तस्त्वा गोप्स्यन्ति । ( शतांदना ) १० आदित्य न्मरतोदिशः आप्नेति।। १॥ १॥२७ इन्द्रो मस्त्यारस ददा देदं मे । (भेदनः) ३३ अग्निम गोप्ता मरुतश्च सर्व । ९(११)।२५ वो मरतो देव आदित्यो पद्मणस्पतिः । ( अर्बुदिः) १२॥ ३॥२४ इन्द्रो रक्षतु दक्षिणते मरत्वान्। (स्वर्गः,अोदनः " " अमिः) (४) वा० यजुर्वेदसंहिता। अ०० २१६ मस्तां पृपतीः गच्छ। (प्रस्तरः) [कठ. २४५:३।११।११]] २२ सम दित्यैर्वमु भः सं मराद्भिः। (इन्द्रादयः) ३२४६ हविष्मतो मरतो वन्दते गीः । (इन्द्रामरती) [श.२०५० २८] ६र६ ऊर्ध्वनभगं मारुतं गच्छतम् । (रक्षा) ७५३५ इन्द्र महत्व इह पहि। (इन्दमस्ती) [गठ. ४।३६:श. ४।३।३।१३] ७३६ मत्स्यन्तं दृषभं वाधानं इन्दं हुवेम । (मझन्वान् )[पाठ ४४०) ३७ सजोपा इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिच । (इन्द्रामरती) ३८ मस्त्वाँ इन्द्र वृपभो रणाव पिबा से मम् । (इन्द्रामस्ती) [ काठ.४.३८] ८1५५ इन्द्रश्च मरुतश्च क्रयायोपोत्थितः। (इन्द्रादयः) ९.८ युजन्तु न्वा मरुतो विश्ववेदसः । (अधः) ३२ मरुतः सप्त क्षरेण सन ग्राम्य न पशूनुदजयन् । (पूपादयः) [क ठ. १४.२४]] ३५ मरनेत्रेभ्यः वा देवेभ्य उत्तरासद्यः स्वाहा । (पृथिवी) ३६ मरुनेत्रा चोत्तरासदम्तेभ्यः स्वाहा । (देवाः) १०।२१ मस्तां प्रसवेन जय। (रथादयः) २३ मरतामोजसे स्वाहा । (अग्न्यादयः) १२१७० विश्वदेवेरनुमता मरुद्भिः। (सता) [ गाठ. १६।२४९, ते. आ.४४२] २४० मरतो देवता । । इन्द्राग्नी, विश्वकर्मादयः) २५ मरुतामाधिपाय (असि)। (ऋषयः इष्टकाः) [पाठ. २११२] १५।१२ मस्त्यतीय उधं अन्यथा स्तनातु।(इष्टकाः) १३ मरतस्ते देवा आधिपतयः । ( १७११ तान इसमृज धत्त मरुनःमरतः) [स्ट. १७७१] १८.१७ मरतथ मे यज्ञेन करपन्ताम् । (अमे) २० मरत्वतीयाच मे यज्ञेन कपन्त'म् ।) ३१ विथे अय मरतो विश्व ऊती आगमन्तु । (विश्वे देवाः) [कठ. १८०६५; क्र. १०.३५।१३] ४५ मारतोऽसि मरतो गगः (वायु) फ्ठ.१८१७५] १३॥ ३।२३ स्मिभ्याऽचन्मरतः पश्चिमातरः। (रोहितादित्यौ) ४८ सम्येप मारतोगशः स एति शिक्याकृतः । (रोहित दित्यौ) १४॥ ११३३ अम्मै कः पूषा मरतश्च म सविता सुवाति । (आत्मा ) ५४ बृहस्पतिमरतो ब्रह्म से म मा पर्यन्तु ( १५.१४॥ १ मारतंश भूवानुऽव्ययलत् । (ग्रात्यः) १८। २२ उजवा वहन्तु मस्त उदवाहा उदगुतः । ( यमः) ३.२५ दन्द्रो मा मत्रवान् प्राच्या दिशः पातु ,, २९.१०॥ ९ शं नो भवन्तु मस्त स्वर्ग । (यहुदेवता ) १३. ९ देवमेन नामभिभातीनां जयन्तीना मरुतो यन्तु मध्ये । (इन्द्रः) १० मरना र्धमुग्रम् । (इन्द्रः) [ काठ० १८५५३; १०१०१०३९] १७१ ८ इन्द्रो मा मरत्वानेतस्या दिशः पातु । (इन्द्र.) १८०८टनं ते मरत्वन्तमृन्छनु । ४५।१० मरता मा गरवन्तु । ( आपन, मरुत ।) २०१२।१मरतः पानात्मामः वास्तुना मे म पियतु । (मस्तः) ६३॥ २ इन्द्रः सगणो मन्दिरम्मा भूताविता।(इन्द्रा) १०६॥ ३ त्वां श( मदत्यनु मारतम् । (इन्द्रः) ११२। र यहा मासुमन्दरी समिन्दुभिः (,.) १६. मल्सरसा विश्वम्मादिन्द उत्तरः। (.) " " " " २०३० बृहदिन्द्राय गायत मरतो वृत्रहन्तमम् ।(इन्द्र) २१।१९ मररवनी भारती मरतो विश: क्यः दधुः । (तिम्रो देश्य.) २७ मरतः स्तुताः इन्द्र वयः दधुः । (इन्द्र ,मरत:) २२१२८ गरद्रयः रवाहा। (मस्तः) २३४१ अहोरामणि मरतो विलिष्टं सूदयन्तु ते । (अश्वः) २४॥ ४ पृश्निा तिरधीनपानिः ऊ पनि त मारताः। (प्रजापत्यादयः) १६ सान्तपनेभ्यः मादयः,ग्रहमधिभ्यः मद्यः, क्रीडिभ्यः मादय', रक्तवादयः मन्दया प्रथमज नालभते । (प्रजापत्यादयः) २५१४ मस्तां सप्तमी। (शादादयः) ६ मरतां स्कन्धा विश्वपा देवाना प्रथमा किसा। (शादादयः) २४ इन्द्र प्रभुक्ष मरुतः परिरयन् । (अश्वः) ४६ अदि यरिन्द्रः सगगो मन्दिरस्मभ्यं भेषजा परत् । (विश्वे देवाः) २६:१७ स ना इन्द्राय मरम्मयः परि सम । (सेमः) २९.५४ इन्दम्य यनी मरतामनीयम् । (रथः) ५८ मारतः कमायः। पराव) ३०॥ ५ क्षयाय राज मरगयो वश्यम् । ( सविता) ३३६४५ आदित्यान्मारतं गणम् (आयामि)। (विध देवाः) ४७ इता मस्तो अधिना ४८ शर्धः प्रयन्त मारुतोत विष्णो। ४९ मस्त ऊतये हुवे। ६३ पिनेन्द्र सांग सगणो मराद्धः। (इन्द्रः) त. २७१ ६४ अवभिन्न मरतश्चिदन । (इन्दः) [कठ ४६३४] ९५ देवारत इन्द्र रायाय येमिरे बृहद्भानो मरु- गण । (इन्द्रः) ९६प्रय इन्द्राय यहते मरती प्रहाचत । (इन्:) ३४६१९ तय प्रते गवगो विमनापसंऽगायन्त मन्तो भाजदृष्टयः । (अमिः) ५६ उप यन्तु मरतः गानयः । (घनगरपतिः) [पाठ. १०॥४१ ३७१३ गाहा मागिरिधीयन। (गः) तं.आ.हापा५,५१४०९ ३९। ५ मारतः प्रथन् । (प्रायश्चित्तदेवताः) ६मरतः ससमे महन् । ( सविनादयः) ९ वलेन मरतः। (प्रजापतिः) (५) काठक संहिता । शं नः शोचा मरडधोडो। पाठ २९७ मस्तः स्तनयित्नुना हृदयमान्छिन्दन् । पाठ ८५ इन्द्रस्य त्वा मरुत्यतो प्रतेन दधे । नाठ ८८ मारत्यामिक्षा वारण्यामिक्षा काय एकापालः । काठ.९।८ मरनयः नादिभ्यः प्रातस्यप्तस्पाला । काट. ९।१६; श. २५/३१२० आमिभिर्मरतः। क ठ. ९।३८ मस्तो यद्ध पो दियो यूयमस्मानिन्नं यः। पाठ ९६८ सयोनिलाय मारतं प्रेया च निपेत् । पाठ. १०१८ पृन्या ये मरतो जात : वाचो यास्या या पृथिव्या मारतास्सजाता एतन्मरता स्वं पयः। क्षमं या इन्द्री विमरतः क्षमायय विशमनु नियुनफि१०।१९ मारतस्य मारतीमन्यन्द्रया यजेत् । विद्व मरतो भागधेये नाग्यमयति । अगस्यो ये मरदयस्शतमुदणः पृधन प्रक्षित् । तानिन्द्रायालभन तं मातः गुदा यसमुधर भ्यपतन्।" इन्द्रो मरदिस्तुमा ऋणोतु । गाठ. १०.३६ मारतं चरु निपेत् । काठ. ११२१ इन्द्रो मद्भिः (टरमामत् ) 146 १९१५, १२३ इन्द्राय मरत्यते एक दशपरम् । काठ., तम्य मारती याज्य नुवाक्ये रयात म् पठ. २१०६ उप प्रेत मरतः स्वतवसः। पाठ ११।१२, २०४७ मरतां प्राणस्त ते प्राणं ददतु । काठ. १।१३ इन्द्रेण दत्तं प्रयतं मरनिः । पाठ. ११४१४ मारतं च सीमेपालम् । पाठ. ११६३१ रमयता मस्तस्येनमायिनम् । पाठ. ११५७ चराज मातां शयरी। बाट. १२०१४ ऐन्द्रामाप्तं पृश्निरास्थम लभेत । काठ. १३१७ महला पितरत सर गृगीमः। फाठ १३१२८ मरतः रामाक्षरया पारपरीमुरगयन्। पाठ. १४।२४ বলিস। १४/२५ " " " .

। व दवा मरनेत्रा। कठ.१५॥३ मद्यः पश्चान्सपो रक्षात्म्यः स्वाहा।। मरतामोजरस्थ । २४. १५/८ मरतो देवता विट् । काठ. १५६ मस्तो देवता । कार. १७४१२ ३९।४५, मरवतीयमुस्थमव्ययाय म्तम्भ तु । कठ, १७१२१ मस्तस्ते देवा अधिपतयः । वाठ. ,.श.८६१ अनमारते मधे अन्यथाय । काठ, आदित्या अन्नं मरतोऽन्नम् । कठ. २११२, रा. ४३ " " " मरद्भिर्विशानिन नोक्न स वृनमर्मलातिष्ठन् । पाठ.३११५ तं मस्त ऐपौवांतरथैर ध्येयन्त । काठ. ३६४१५ स एतं मरट्यो भागं निरवपत् तं मस्तो वाय समतपन् । ( काठ. ३६०१५) ते मरगयो गृहमेधिभ्योऽहयुः । काठ. ३६६ श.२,५०४, तं मस्तः परिकोटन्त। काठ,३६१८ ते मस्तः डीन कीटतोऽपश्यन् । तं मातोऽयक्रीडन् । मास्ती निशा । काठ. ३७४ अथैष मारत एकविंशनिवपालः । काठ ३७१६८ निगवे मरतस्तुनम् । काठ. ३८११२६ अजुषन्त मरतो यज्ञमेतम् । काठ ४०१९८ (६) ब्राह्मण-ग्रन्थ । मस्तो रस्मयः । ताण्ड्य. १४१।९ ये ते मारता: (पुरोड शाः) रश्मयते । २०९३५ युजन्तु त्वा मरतो विश्ववेदस इते युजन्तु स्वा देवा इत्ये- वनदाह (मरतः = देवा:- अमरोपे ३२३.५८) २०५ाशा९ गणशो हि मरतः ता. १९१४ार महतो गणाना पतयः । ते. ३।११।४ार सप्त हि मारतो गणः । श. ५।४।३१७ सप्त गणा वै मातः। ते. १६२।३, २।७।२।२ सप्तसत हि मारता गणाः। श०९।३।१।२५[ ठ०२१४१०] मारतः सतपालः (पुरोडाशः) । ता. २०१२३ [ काठ. ९४, २११०३७१३] मारुतस्तु सतपाल: (, शि.राया१२ माहत सप्तकपालं पुरोटाश निर्वपति । श० ५.शश मरुतो वे देवानां भूयिष्टः । ता. १४।१२।९, २१३१४।३ मरुतो हि देवाना भूयिष्ठाः। त० २१७५१०३१ मरुतो ह वै देव वेशोऽन्तरिक्षम जना ईश्वराः की. ७.८ विशो वै मरुतो देव विशः। श० २५६३१२, ३९११ 1१७-१८,ऐ. ११० मरुतो देवानां विशः। ए २९;ता. ६:१०।१०; १८१४१४। काठ.८1८] अहुतादो वै देव ना मरुतो विट् । दा० ४।५।२।१६ विद् वै म तः, ३०.६८।३।३: २१७।२।२ [पाठ०२९॥ ९,३७३ विशो मरुतः । २०५२।६,२७, ४३३६ [काठ • ३८१९८] यद्यानरं मारता अनुहयन्त । काठ. २१॥३३ उशशु मारतानुहोति। गणश एव मस्तस्तर्पयति । क्षनं वा एर मरतां विट। २६१३४ यचिननि दीपयति मरनामः शुचं नु नाम मातो यद्ध वो दियः । काठ २६४४४, क.८७११ मवितुमस्तां ते तेऽधिपतय. । पाठ २२।१६ यत् प्रायणीय मरतां देवविधा देवविशम्। काठ २३१२० यामरस्याज्याय: पद भवति। रवस्ति र ये माती दधातन । मस्तु विश्वमानुप । काठ ०६:३७ इन्द्रो पनमहन् मद्भिव ग मस्त्यतीय स्तोत्र भवति मात्यतीयमुधिं मस्त्यतीया प्रशः। काठ. २८६ प्रनिहतिरेव प्रथमो मरत्यतीयोऽप यतिः। वामेव प्रथमेन मरत्वायने उपते तृतीयेन वंद्वियादमरत्वतीयाँरत्स्य गृहीयात् ।। वी मरतो बीयनं वर्धयन्ति । समरन्वतीयरेय नमहम्तसन्मरत्यतेऽनूरत न देयम् । वाठ. २०१६ पतं व मरतः। काठ..९।२४ मरतः सुधा वृष्टिं नयन्ति । वास. १९१३१ मरतः हित ये सबने न जायः। काठ. ३८१२७ ये निर्वा एप प्रजाना तं मरतोऽभ्यकामयन्ता। काइ,३१३ राप्त हिमस्तो निरयत्या एव मारतोऽयो प्राम्यमेवतेन मायभवरन्छ । काठ २६६२, ३७४-६ सस्त मरतो हव्यं व्यमशत । कठ.३६९ " . विशो व मरुतः । २०३९।०१७ मारुतो हि वैश्यः । त० २७२।२ [ काठ• ३७४] पशा वे मरुतः। ए. ३१९ [ काठ० २१६३६ ३६१२,१६] अन्नं वै मरुतः । त० १७३१५, १७१।९:११७७१३ সা मारुताः२०९३३१४७ मारुता के प्रावाणः । त ९९.१४ मरुतो वे देवानामपराजितमायतनम् । त• THER अामु वै मरुतः शिनाः (धिनाः)। कौ० ५४ अप्सु वै मरुतः पितः । श्रिताः) । गो० उ०१२२२ आपो व मरुतः।ऐ ६३० के० १२८ मरुताऽद्विमिमतमयन् । तस्य नान्तस्य दृदयम टिउन्दन् साऽशनिरभवत् । त. १३२१२ मरुतो वे वर्षस्येशते । २० ९।१।२१५ [ काठ १९६३२ ॥ पड्भः पार्जन्यैर्वा मारत वर्षासु । श० १३.५।४।२८ इन्द्रस्य वै मरुतः पी०५४.५ अथेनं ( इन्द्र)ऊवाया दिशि मरतरचाहिरराव दया . ...अभ्यपिछन् ..परमेष्ठपाय महाराज्यायाधिपत्याय रखाव- श्यायाऽऽतिष्ठाय । ए.८१५ हेमन्तेननुना देया मनस्त्रिणव (स्तोमे) स्तुतं बलेन शरीः सहः । हविरिन्द्रे वयो दधुः । ते० राक्षा१९।२ मारुतो वासतर्यः । ता० २१११४.१२ पङ्क्तिरउन्दो मरुतो देवता छावन्तौ । श० १०१३।२।१० मरुत्स्तोमो वा एषः । ता० १७४१२३ मरुतो ह वै पीडिनो घर हनिष्यन्तमिन्द्रम गतं तमभितः परि चिक्रीमियन्तः । श० २०५३।२० ते (मरुतः ) एवं ( दन्नं ) अध्यकीडन् । १० १६७५ इन्द्रग्य व मस्तः कौडिनः। फी०५५ :न्द्रो मस्तः कीहिनः । मो. १०१२३ मस्तो ह वै सान्तपना मध्यन्दिने वृनसन्तेयुः स सन्तप्तो- ऽननेव प्राणन् परिदीर्णः शिष्ये । श० २।५।३।३ इन्द्रो व मरतः सान्तपन: गो० उ०१२३ घोरा माता रक्तवसः। कौ० ५।२, गो०३० ११२० प्राणी व मातः स्वापयः। ऐ० ३०१६ सवनतत्तिय मरत्वतीयग्रहः । पी० १५१ पवमान क्यं या एतद्यन्मस्त्वतीयम् । ऐ० ८१: कौ० १५॥२ तदेतद्वान मेवोक्थं यम्मरत्वतीयमेतेन केन्द्रो वृतमहन् । कौ०१५।२ [हिं. २६ तंदतत्पृतनाजिदेव सूक्तं यन्मस्त्वतीयमंतेन हेन्द्रः पृतन अजयत् । का० १५३ अर्थप मरस्तोम एतेन थे मरतोऽपरिमिता पुष्टिमपुप्य. अपरिमिता पुष्टि पुष्यति य एवं वेद । तां.१९१४०१ अन्तरिक्षलोको व मारुतो मरुतां गणः । श०९।४।२।६ तद्ध गर्व मस्त्पतीयं भवति । ऐ. ३३१६ वृष्टिवनिपदं मात इति मारतम यंन महे ! ऐ ३३१८ मरस्वतीयं प्रगाथं शंसति, मक्त्वतीयं सूक्तं शंसति, मरुत्वतीयां निविदं दधाति, मस्तां सा भक्तिः मरत्वतीयमुक्थं शरत्वा मरस्वतीयया यजति । ऐ. ३२० तन्मरतो धून्वन् । ऐ०३।३४ तस्मविश्वानरीयगानिमाम्तं प्रतिपद्यते । ऐ. ३६३५ प्रमादति य आममारत शसति इन्द्रोऽगस्त्यो मरुतस्तं समजानत । ऐ० ५।१६, मस्तो यस्य हि क्षय इति मारतं क्षेतिवदन्तरूपम् । ऐ०५।११ पोता यजति । ऐ०६१० सउ मास्त आपो वै मारतः। ऐ०६।३० मेर शंसिष्टेति। पुरस्तान्मारतस्याप्यस्याथा इति । सेऽग्नये मस्त्वते त्रयोदशल्पालं पुरोळाशं निर्वपे। ऐ०७.९ अमये महत्वते रवाहा। मस्तश्च त्व निरराश्च देवा अतिछन्दरा। छन्दमा रोहन्तु । " " " " मरतश्चाङ्गिरसरच देवाः पद्भिश्चैव पचविशेरहभिरस्य- सिधन : ऐ०८।१४१९ मन्तः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन गृहे । ऐ० ८।२१, २०१३१५४६ माप्ती दक्षिणाजामिताय न्वेर माती भवति । १०सपा।१० तद्धसा मातः पाप्मानं विमथिरे । २०५।२४ प्रजाना विमथ्नते। स एतामैन्द्रीं मरुत्वतीमजपत् । २० २१५२०२७ मारुत्यां तं पारण्यामवदधाति । श. २१६३६ " " " मरुभयोऽनुहाति। श०२५२०३८ अस्यै मारुत्यै पयस्याय द्विरयद्यति । मरुतो यजेति । तस त् मरत्वतीयान् गृहाति । श० ४३३२६,९,४१४ " " "" ” " मरत्वतीयस्य प्रतिपदन्तः । ऐ.५।१० मरत्वनीये तृतीय सवने । गो. उ ३३२३, ४।१८ यदृष्य मरुत्यतीयात् । मवृधोऽमे सहस्रसप्तमः । श १।४।३.१९ (७) आरण्यक ग्रन्थ । वातवन्तो मरुद्रणा । ते आ शहार इहव वः स्वतपस । मरुन सूर्यस्त्वच । शर्म सप्रथा आवृणे । ते आ. २४३ वैश्वानराय धिषणामित्या नमारतस्य। ए मा १२॥३ प्रयज्यवो मरत इति मारुतं समानौदर्वम् । चतुर्विशान्मरत्वतीयस्याऽऽतान | ए आ. ५१०१ जनिष्ठा उग्र इति मसत्यतीयम् । सस्थिते मस्त्वतीये होता। मरुतः प्राणरिन्द्र बलेन । ते आ २२१८०१ प्रति हाम मस्तः प्राणान् दधति । अभिधून्वतामभिन्नताम् । य तवता मस्ताम् । ते मा..१२१५११ मरुतां च विहायसाम् । ते आ ११२७१६ वातवता मस्ताम् । ते आ ११५१ युतान एव मारतो मरद्भिरुत्तरतो रोचय । ते आ५५० वासुकैणैतन्मत्त्वतीयं प्रतिपद्यते। ऐ. आ १११ (८) उपनिषदादि ग्रन्थ । तन्मस्त उपजीवन्ति सोमेन मुखेन । छान्दोग्य ३९।१ मस्तामवैको भूत्वा । मस्तामेव तावदाधिपत्य रवाराज्यं पर्यता विश्व देवा मस्त इति । बृहदा १४.१२ मरद्भिः सोम पिब वृनहन् । महानारा २०१२ मरुनान्नेति निश्रुतोऽसि । मैना. २१ तसे नमस्कृत्वा मरुदुत्तरायण गतः। मंत्रा ६।३० मरुतः पश्चादुदन्ति । मैत्रा ७३ सवतकोऽपिमरतो विराट् । नृ पूर्व २१ मरीचिर्मस्तामस्मि । म मी १०२१ अदिवनों मस्तस्तथा। भ गी. १९६६ मस्तश्चीमपाथ। म गी. १९९२ इन्द्रायव मरुन्वते गृहीयात् । श०४।३।३।१० नपि मरुद्यः स यद्धापि मरुद्भयो गृहीया । इन्द्रभेवान मरुत आभजति । मस्तो पाऽइत्यश्व थेऽपरम्य तस्थुः । २०४॥३॥३६ विश मरुद्भि.स यथा विनयस्य कामाय। श. ४।३।३।१५ अथ मरुय. उज्जेपेभ्य' ।। ५.१३३ येऽएव के च मारत्यौ स्याताम् । इन्द्रो मरत उपामन्यत । श.५३५।१४ म यदेव मारत रथस्य तदेवतेन प्रीणाति २०५।४।३।१७ अब पृशनी विचित्रगर्भा मद्य आलभते ।।०५।५२०९ आदित्या पश्च न्मस्त उत्तरत । श०८६३३ मरतो देवतष्टीवन्तों। २० १०॥३।२।१० अन्वया मस्त । २०१३।४।१६ वि.व देवा मरत इति । श०१४४ा।२४ सा यन्मस्त स्वतवसा यजति, घोरा वैमरत. स्वतवस.। मो. उ० ११२० अब मल्ट्रय सान्तपनेभ्य । २० २१५६३३३ समानयो देवविड्भ्यः । ऐ १११० मरत्वां इन्द्र म ट्व । ऐ ५६ मरस्वतीयस्य प्रतिपदनुचरी । ऐ०४।२९,३१, ५।१ एतान्मरत्वतीयं पवमाने वा।ऐ .१ एवं मत्वतीयं समदम् । ऐ सारे मरत्वतीयमय गृहीत्वा । श ४१३३३ निविद दधातीति मरत्वतीयम् ।। १।५।१२९ मरत्वतीयं ह होतुर्यभूव । गो पृ ३१५ निष्टुभा मरत्वतीयं प्रत्यपद्यत । गो. उ ३११२ विश्वे देवा अद्रवन् मस्तो हैन नाजहु । ऐ० ३२२० म य देने यन्मत्यतीयस्य । ऐ. ३३२८ मरस्वतीय प्रगाय । ऐ ४२९ मत्त्वतीयस्य प्रतिपई मह ।ऐ ५४ यस्य प्रतिपाञ्चजन्यया । ए ५५६ 1 " - मरुतोंके मंत्रोंमें विद्यमान सुभापित। वीरोंका धर्म तथा वीरोंके कर्तव्य । इसके पहले हम मरतोंके मौका सरल अर्थ दे चुके । [विश्वामित्रपुत्र मधुच्छन्दा ऋपि । ] यह भयन्त आवश्यक प्रतीत होता है कि, उन मत्रोंमे भो (१) यशियं नाम दधाना । (ऋ. १६४) प्रमुख कल्पना है, उसे हम जान है। उस केन्द्रभूत कल्पनाकी पूजनीय नाम धारण करें । [ उच्च कोटिया यश पाना जानकारी पाने के लिए यहाँपर हम उन मत्रोंके सर्वसाधारण चाहिए। ] प्रतिपादनोंको मूल शब्दों के साथ देकर सरल अर्ध घताना पुन. गर्भवं परिरे । (प्र. १६६४) चाहते है । मरमोंका वर्णन करते हुए वोरोंके संयधर्म जो (वीरोंको ) पार बार गर्भवासमे रहना पडता है । साधारण धारणाएँ उम उस स्थानपर प्रमुग्यतया दीख पडती | पुनर्जन्मकी कल्पना का भाभास यहॉपर अवश्य होता है। है, उन्हींका संग्रह यहॉपर किया है। मनमें पाया जाने- स्व-धां अनु ( १।६।४) घाला वाक्यही यहाँ लिया है। विशेष वर्णनात्मय दोका अपनी धारक शक्ति बढाने के लिए या भर पाने के लिए प्रहण नहीं किया है और सि मोरिक रूपनाको व्यक्त [प्रयत्न कराा चाहिए। करने के लिए मनका भृजन हुआ, उसी मूलभून करपना की स्पष्टता जितने कम पाब्दोंमे हो सकती है, इतनेही शE (२) देवयन्तः श्रुतं विदवसुं भनूपत । (ऋ १५॥६) देवस्व पानेकी इच्छा करनेवाले लोगोंको उचित है कि, के लिये हैं । बहुधा प्रारभिक मन्वय उपोंका स्यों रखा गया वे धनकी योग्यता जागनेवाले घिस्यात वीरोंके कान्यका है,पर जिससे सर्वसाधारण बोध प्राप्त होगा, ऐसा वाक्प मनाने गायन करें। के लिए पर्याप्त शब्द चुन लिये है । यद्यपि यह वर्णन (३) अनवद्यैः अभिधुभिः गणे सहस्वत् अर्चति । मरतोंकाही है, तथापि इन सुभाषितामे वह केवल मरतों. ( १९६८) काही नहीं रहा है। मरुतोंका विशेष वर्णन हटाने के कारण निदोप एप तेजस्वी वीरोको साथ ले शत्रुदलका पराभव हमें यह सर्वसामान्य उपदेश मिल जाता है। पेमा कहा करनेहारे घलकी वह पूजा करता है। [ पेमे बर को वह जा सकता है कि, समूचे मानवोंको इस भौति नीतिका उपदेश अपनेमे बढाता है।] दिया गया है। इसी ढगसे वेदप्रतिपादित सर्वसाधारण धर्म- [ कण्यपुरा मेधातिथि अपि।] का ज्ञान हो सकता है। इसके लिए ऐसे घुने हुए सुभाषितो (५) पात्रात् मतुना पियत । (ऋ ११५।२) का पहाभरछा उपयोग हो सकता है। पाठकोंको अगर पवित्र पात्रमेंसे तुको अनुवरता देखकर पीने योग्य उचित जचे, तो मंत्रों के अन्य शब्दभी यथोचित जगहकी वस्तुओं का सेवन करो। पूर्ति के लिए वे रखें। पाठकों की सुविधाके लिए मनोधे यनं पुनीतन । (ऋ १।१०) कमांक प्रारममें दिये है और उन मत्रों के ऋग्वेदादि वेदाम यश वे कर्म को अधिक पवित्र करो। पाये जानेवाले पते भी आगे दिये है। [घोरपुत्र कण्व मपि ।] इस भाँति स्वाध्याय करनेसेही वेदका सच्चा माशय (६) अनर्वाण आभि प्र गायत ( ११३१) समम लेना सुगम होगा, ऐसी हमारी भाता है। जो मामय पारसरिक मनोमालिन्य मा धेरभायको न * २०४ बदने दे उसका वर्णन करो। या वाधा न हो, इसलिए सभी विशाम भली भांति (७) स्वभानवः पाशीभिः अप्रिभिः सार्फ अजायन्त। मार्ग बनवाने चाहिए। यदि भानेजानेके लिए भाटी (ऋ. १६३७२ ) सडक हो, तो दुश्मनोंपर किए हुए भाक्रमों में सफलता तेजस्वी वीर अपने हथियारों को साथ रसकर सुसज मिलती है।] बगे रहते हैं। [ सदैव कटिबद्ध रहना वीरों का तो कर्नष्पही (१६) यामभिः, दीर्घ पृथु अमृधं नपातं, च्यापयन्ति । ( ११३०११) (८) यामन् चित्रं नि सुक्षते । (E. ११३७३ ) वीर सैनिक अपने प्रभावी भाक्रम से बडे, नष्ट न होने. युद्धभूमिमें हमला करते समय वीर सैनिक बड़ी विष्टक्षण वाले एवं बहुनकालतक टिकनेवाले दाजुकोमा अत्यन्त विध. शूरता दर्शाता है। लित तथा पिकम्पित कर डालते हैं। (९) देवत्तं ग्राम शर्धाय, प्वये, त्वेपद्युम्नाय प्र गायत। (१७) जनान् गिरीन् अचुच्यीतन, (तत्) यलम् । (रु. १.३७४) (इ. ११३/१२) देयताओंका नोग्र, बल बढाने के लिए, शत्रुका विनाश जिसकी सहायतासे मनुके वीरोको अथवा पहादको भी करने के लिए और तेजस्वी घननेके हेतु गाते रहो। । ऐसे अपदस्थ करना संभव है, वही वल है। स्तोत्र पटनेसे या गानेसे उपर्युक्त गुणों की वृद्धि होगी।] (१९) शीभ प्रयात । ( ११३७१४) (१०) गोपु अन्य शर्धः प्रशंस;रसस्य जम्भे धवृधे । शीघ्रतासे चलो। (ऋ. १३७५) आशुभिः शीम प्रयात। = वेगवान साधनोंकी गौओमें जो श्रेष्ठ बल विद्यमान है, उसकी मराइना करो, सहायतासे बहुत जरद गमन करो। गोरसके सेवन से मानों में यह बढ जाता है। (२०) विश्यं आयुःजीवसे (फ. १३५१५) (११) धृतयः नरः । ( 3 १३१६) पूर्ण भायुतक जीवित रहने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। शत्रुसेनाको विचलित करनेवाले [जो वीर हो,] ये नेता (२१) पिता पुत्रं न हस्तयोः दधिध्वे । (ऋ. ११३८१) जैसे पिता अपने पुनको अपने हाथोंसे उठा देता है. (१२) उपाय यामाय पर्वनः जिहीत । (ऋ० १॥३७) उसी प्रमारपीर पुरुष जनताको मारवना या माधार दे दें। शग्रुमेनापर जय भीषण धाया होता है, तब पहाइतक (२२) या गावः क्व न रण्यन्ति । (ऋ. ११३८।२) दिलने लगता है। [वीर सैनिक इसी भौति दुश्मनोंपर तुम्हारी गौएँ किंधा जानेपर दुःसी बन जाती है ? डाई करें।] [वह देश, वह तुम्हारे दुश्मनों का स्थान है, ऐमा निश्चित (१३) यामेपु अज्मेषु पृथिवी भिया रेजते । समझो। (9, 9131) (२३) सुम्ना फ्य? सुपिता क? सौमगा छ? (ऋ. 11३८३) पायुदलपर चढ़ाई से समय भूमि काँप उठती है। आपके सुख, धैभव, ऐश्वयं भला कहाँ है [देखो क्य [वीर सिपाही इसी प्रकार शत्रुओंपर भाक्रमण कर दें।] घे तुम्हारे समीप है या शत्रु उन्हें छीन ले गये है।] (१४) दशवः द्विता अनु (क्र. १५३९) (२४) पृश्निमातरम्मासा, स्तोता अमृतः। घरका उपयोग दो स्थानों में काना पडता है, अर्थात् जो (ऋ. ११३८६४) मा हुआ है, उसका संरक्षण तथा नये धनकी प्राप्ति के लिए भूमिको माता समानेवाले वीर यति मर है, वोभी पर सैनिकोंका बल भिम होता है। जो उनके संबंध काव्य पनाते हैं, वे भमर बनते हैं। (१०) भन्मेपु यातवे काष्ठा उत् अत्तत । [मातृभूमिके उपासकोंका इतना महत्व है, वे स्वयं तो भमर (० १३३) यनते ही है, पर उनका काम्य यदि कोई यना दें, तो ये पर हमले करने के समय हए चल करने में कोई रायट कवि भी यमर हो जाते है।] होते हैं।

(२५) जरिता यमस्य पथा मा उप गात् । (ऋ ११३८1५) रो, [ काव्यरचना इस भाँति सहा की होने पाय।] कपि कदापि मातको पहुनानेवारी राहम नहीं चलेंग।। गाय-नं उक्थ्यं गाया [जो करि पोरीका वर्णन करने के लिए धीररमपूर्ण काव्य विसे गानेवालेकी रक्षा हो, ऐसे कायोंका गायन करते का सृजन करेगा, यह अवश्य अमर मनेगा।] रहो। [व्यधी मनमाने काव्योंका गायन करना उचित (०६) दुहणा नितिः नामो सु वधीत् (१९ ३६) नहीं।। विनाश करनेवारी दुर्दशाके कारण हमारा नाश न होगे (३५) त्वेपं परस्यं भर्किणं चन्दस्व । ( ३८१५) पाय । [म पियम शासको को पराग पर गहना तेजस्वी, वर्णन करने योग्य नया पूजय पौरकोद्दी प्रणाम चाहिए। करो। [चाहे जिस नीच व्यक्ति के सामने शीश झुकाया न दुर्हणा निति तृष्णया पदीष्ट । (१० ५.३८१६) जाप। विनाशका दृश्य उपस्मिन करनेवाली दु.स्थति भोग- राससासे यहती जाती है और उसी कारण उसका विनाका अस्मे इह वृद्धाः असम्। हुआ करता है । मोगटारसामे सुसमाधनाकी वृद्धि होती हमारे समीप वृद्ध रहें। है और भन्तम उसी फी वसे वे विनर होते हैं। (३७) यः आयुधा पराणुदे स्थिरा वी सन्तु । (२७) त्येपा अमवन्तः धन्वन् मिदं कृण्वन्ति । ( १।३९।२) (ड. ११३८१७) तुम्हारे हथियार शत्रुगोको मार भगाने के लिए स्थिर एवं सेजस्वी या यर वान वीर रोगिमानमे एव मरुस्थलों में पर्याप्त रूपसे सुदृढ रहें । [ तुम सदैव इस विषय में सतर्क भी जलको उत्पन्न कर दिखाते है । [ पौरपसे सुखकी प्राप्ति रहो कि, तुम्हारे हथियार दुश्मनोके आयुधोसेमी अपेक्षाकृत हुभा करती है। भाधिल कार्यक्षम एवं प्रभावी रहे।] (३०) मरतां स्वनात् पार्थिव सम्म मानुपाःप्रअरेजन्त। युप्माकं तविपी पायसी अस्तु, मायिनः मा । ( ११३८१०) तुम्हारी शशि मराहनीय रहे, पर तुम्हारे कपटी शत्रुकी मरनेतक राहे रहकर भटनेवाले वीर सैनिकों की दहाड पेप्सी न हो । [हमेशा नम्हारी भपेक्षा दुश्मनों की शनि से पृथ्वीपर विद्यमान स्थान तथा सनी मानव काँपने लगते घटिया दर्जेकी रहे, इसलिये मावधानीसे रहा करो।] है ।। वोगेको चाहिए कि वे इसी भाँति शूरता दर्शाय।] (३८) स्थिरं परा हत, गुर वर्तयथ । (क्र ११३९१३) (३१) चीळपाणिभिः आखिद्रयामभिः रोधस्वती जोशनु स्थिर हुभा हो, उसे दूर हटाकर विनष्ट करो। तथा र भारी सत्रुको भी चका खानेतक धुमा दो [उसे पदच्युम अनु यात। (3 ११३८.११) बायल पहाफर, विसा दूर करते हुए उत्साहपूर्वक कर दो, शत्रुको कही भी स्थायी बनने का अवसर न दो। प्रवाहमसे भी भागे यो। [निरुत्साही बनार चुपचाप पनिन वि याथन, पर्वतानां आशा यि गायन । हायपर हार धरे ग बैठो। अगर तोडस पहाडी भूविभागों में से भी विमोपटग की सके उन्मुक्त रस्त्री (३२) य. रथा नेमयः अश्वासः अमीशव. स्थिरा: [शातायातके साधनोंमे वृद्धि करो।] सुमंताः। ( ११३८११२) (३९) रिशादमः भूम्यां शत्रुः वन घिविदे। तुम्हारे सभी माधन सुदृढ तथा भरणे सतारों से (+ १३९४) संपन्न हो तभी तुम्हें सफलता मिलेगी। हे शत्रुदलके विश्वसक वीरो 'इम भूमटलपर तुम्हारा (३३) गिरा ब्रह्मणः पति अच्छा बद। (२.१1३/११३) कोई नुन रहे, ऐसा करो। अपनी वाणीसे ज्ञानी पुस्यों की सराहना करो। माधुपे नविपी,तना अस्तु । (३४) आस्ये लोकं मिमीहि । (+ १३८११४) र करनेवाले लोगोंका विनाश करनेका पल पद्धता शीन कपि पनो, गोहीही देर मन ही मन सोरमा रहे । - ।

(४०) सर्वया विशा प्रो भारत । ( १३९५) जानेमानेका अभ्यास करना चाहिए । पार्वतीय भूविभागों के समूची प्रजाके साथ उन्नतिको प्राप्त करो। [मघकी धीहरपनसे तनिकभी न धरते हुए यहाँपर विराजमान होना प्रगति में व्यक्ति अपनी उमति मान रे।] चाहिए। (४१) वः यामाय पृथिवी आ अश्रोत्, मानुष (४७) तविषीययः! याम अचिचं, पर्वता नि भीमयन्त । (म ११३१६) महासत्त। ( ८१४२) तुम्हारे आक्रमणकी आवाज सारी पृथ्वी सुन देती है, पल यान वीर जिस समय शत्रुसेनापर धावा करने के लिए अर्थात् एक छोरसे दूसरे छोरतक भाक्रमणका समाचार अपना रय सुसन करते है, तर पर्वतभी कॉप उठते है। ऐसी पहुंचना है, अतः मानवोंको भत्यन्त भय प्रतीत होता है। दशाम मानव तो अवश्यही मारे रके थरथर काँपने लगेंगे, [वीरोके हमलेमै इसी भाँति भीषणता पर्याप्त मात्रामे इसमें क्या भाश्चर्य ? ] रहनी चाहिए। (४८) पृश्निमातर' उदीरयन्त, पिप्युषी इपं धुक्षन्त। (४२) तनाय के अव. आवृणीमहे । ( १॥३९॥४) (फ ३) हम चाहते है कि, जिस सरक्षणसे बार यचीका सुख बने, मातृभूमिकी सेवा करनेहारे वीर जव हलचल मचाने वही हमें मिल जाए। लगते हैं, तय वे पुष्टिकारक असकी यथेष्ट समृद्धि करते हैं। विभ्युपे अपसा गन्त। (४९) यत् यामं यान्ति, पर्वतान् प्रवेपयन्ति । जो भयभीत हुना हो उसके समीप अपनी मरक्षक (ऋ ८७) शातियों के साथ चले जाभो। [जो भयभीत हुए हों, उन्हें जय वीर सैनिक दुश्मनोंपर भाक्रमण करते हैं, तप घे तसाली देनी चाहिए। मार्गपर पड़े हुए पहाडातक को हिला देते हैं [वीरोंका (४३) अभ्व शवसा ओजसा अतिभि वियुयोत । भारमण इसी भाँति प्रपर हो। (क १।३९१८) (५०) यामाय विधर्मणे महे शुप्माय गिरिः शत्रुके अभूतपूर्व भीपण प्रहारोंको अपने बलसे, सामथ्र्यसे सिन्धय नि येमिरे । (ऋ ८५) एव सरक्षक शक्तिओंसे हटा दो, दूर कर दो। वीरोंके आक्रमणों एवं प्रबळ सामयों के परिणामस्वरूप (४४) असामि दद, असामिभि. ऊतिभि. न मारे भयके पहाड एवं नदियाभी नम्र पन जाती हैं । (शत्रु आगन्तन । (R० १।३।९) झुक जाय इसमे क्या सशय १] पूर्ण रूपसे दान दो. अपनी सपूर्ण, अविका शकियोंके (५२ ) वाधा यामभिः स्तुना उदीरते। साथ हमारे समीप भाभो। [ सरक्षण करने के लिए जाते (B 110) मगम पूर्ण सिद्धता रमनी चाहिए। कहीं भी अधूरापन या गरजनेवाले वीर अपने रथोसे पर्वतों के शिखरतक पार टि न रहे । कर चले जाते है। [वीरोंके लिए कोई स्थान भगम्य नहीं (१५) असामि ओज. शय विभृथ। ( ११३९३१०) है।] सपूर्ण दगमे अपना बर मया सामर्थ पदाकर धारण (५३) यातवे ओजसा पन्था सृजन्ति। ( ८11८) फरो। घोर पुरुष जाने के लिए अपनेही पल मुव सामर्यके द्विपे द्विपं गुजत। सहारे मागीका सृजन करते हैं। शग्रुपर शत्रुको छोडो। [एर शनुसे दूसरे दुश्मनको रडा. ते भानुभिः वितस्थिरे। कर ऐसा प्रश्य करो कि, दोनो शनु हतयर एव परास । येतेपोंसे युक्त होकर विशेष स्थिरता पाते हैं। [ये प्रथम विण्यपुत्र पुनर्यन्स कपि।] सेतरवी बनते है और तेजस्वी होनेसे स्थायी पन जाते हैं। (४६) पर्वतेपु विराजथ। ( ८1७१) (५७) दमे मदे प्रचेतस. स्थ। (ऋ ८१७१२) पर्वतम आनन्दपूर्वक रहो। [पहाडी मुकभी तुम भपने पामें मानदिन बनने के लिए विशेष पुद्धिमे -- , युक्त होकर रहो। [भपमा चित्त संस्कारसंपन्न करनेसे सपा सुद्ध कर देते हैं। [वीर सनिक अपने हथियारोंको तुम्हें भानन्द प्राप्त होगा। प्रबल सया कार्यक्षम बना रखें। ] (५८) मदच्युतं पुरुडं विश्वधायसं रयिं नः (६८) वृष्णि पौस्यं चक्राणाः अराजिनः वृत्रं आ इयत । (. ८1१३) पर्वतान् पर्वशः वि ययः। (ऋ. १७२३) शाका गर्व हटानेवाले, सबके लिए पर्याप्त, सयकी अपना बल बढानेवाले ये संघशासक [जिनमें कोई धारणपुष्टि करने की क्षमता रखने वाले धनकी भावश्यकता राजा नहीं रहता है, ऐसे ये वीर ] शशुको तथा पहाडको इमें है । [ इसके विपरीत जिससे शत्रुको हर्ष हो, जो सयके तिलतिल तोर डालते हैं । पहाडी गढों को भी छिन्नभिन्न लिए अपर्याप्त एवं अल्प जये, सयकी धारक शक्ति को जो कर डालते है। घटा दे, ऐसा धन यदि हमें मुफ्त भी मिल जाय तोभी (६९) युध्यतः शुप्मं अनु आवन्। (ऋ. २४) उसका स्वीकार नहीं करना चाहिए। युद्ध करनेवाले वीरो एलको रक्षा तुमने की है। (५९) गिरीणां अधि याम अविध्यं, इन्दुभिः (७०) विद्युद्धस्ताः अभिद्यवः शीर्षन थिये हिर- मन्दध्ये । (ऋ. ८11/१४) ण्ययीः शिप्राः व्यअत। (र. ८1७/१५) जब पर्वतोपर जाते हो, तब यहाँ उपलब्ध होनेवाले बिजली के समान चमकनेवाले हथियार धारण करने- सोमरसोंसे तुम हृष्ट बनते हो। पहाडी स्थानों में पाये वाले वीर अपने मस्तकोपर स्वर्णिलछवियुक्त शिरोवेष्टन जानेयाले सोम का रस पीकर मानन्दकी उपलब्धि होती शोभाके लिए घर देते हैं। (७२) हिरण्यपाणिभिः अश्यैः उपागन्तन । (ऋ. २७) (६०) अदाभ्यस्य मम्मभिः सुम्नं भिक्षेत । मुवर्णके आभूषणोंसे सजाये हुए घोटे साथ लेकर हमारे (ऋ. १५) समीप आओ। [घोडौंपर स्वर्णके गहने लादनेतक भसीम जो धीर न दब जाते हों, उनके संबंध किये काव्योंसे वैभव रहे। ] मुख पाने की चाह करनी चाहिए। [ शत्रुसे भयभीत होने. (७४) नरः निचक्रया ययुः। ( ८1७२९) वाले मानवका बखान जिसमें किया हो ऐसे काव्योंके नेताके पदको सुशोभित करनेवाले ये वीर पहियोंसे पटनसे या सृजनसे सुतकी प्राप्ति होना सुतरां असंभव है।] रहित [बर्फमय भूविभागोंपर से चलनेवाली ] गाडीमें बैठकर जाते हैं। (६२) पृश्निमातरः स्वानेमिः स्तोमैः रथैः उदीरते । (र. ८४/१७) (७५) नाधमानं विप्रं मार्डीकभिः गच्छाथ । (३.८1१३.) मातृभूमि के भक्त भापणीसे, यज्ञासे तथा स्थादि साधनासे ऊँचे स्थानको पाते हैं। [ अपनी प्रगति कर व साधन साध ले चले जाओ । [ सज्जनोंका सुख सहायताकी इच्छा करनेवाले ज्ञानी पुरपके समीप मुख- बढायो । 'परित्राणाय साधूनां ।' गीता. ४८] (६४) पिप्युपीः इपः वः वर्धान् । (गड. १९) (७७) यज्रहस्तैः हिरण्यवाशीभिः सहो अग्नि पुष्टिकारक भा तुम्हारी वृद्धि करें। [तुम्हें पौष्टिक भन्न म स्तुपे। (ऋ. ८७३२) एवं भोज्य पदार्थ सदेव उपलब्ध हो। शषधारी एवं भाभूषणों से अलंकृत वीरोके साथ रहने. (६६) तस्य शर्धान जिन्वय । (त्र. ८॥२१) वाले अग्निकी सराहना करता हूँ। सत्यके बलों को प्रोत्साहित करो। [ सत्य का बल प्राप्त (७८) वृष्णः प्रयज्यून चित्रवाजान सविताय सु करो। आ ववृत्याम्। (ऋ. १७३३) (६७)त्ये यजं पर्वशःसं दधुः। (ऋ. १२९) बलिष्ठ, पूजनीय एवं सामर्थ्यवान वीरोंको धनप्राप्ति के वे वीर वनको हर गाँठमें मली भाँति जोडकर प्रबळ [कार्य में सहायता के लिए दुलाता हूँ। [हमारे समीप ले है।

. . মা আনঃ ভি না মন জারি করা ) (८७) ममाय यातये यन याहजसा नरवासि (७९)मन्यमानाः पानासः गिरयः ति जिहत । तनूमा देदिशते, या उत्तरा जिहाँते । (8. ८७३४) (ऋ. २०१६) [इन धीरो सम्मुख बड़ेवर्ड ऊंचे शिखरवाले पहाड जय सेना की हदपटके लिए अपने पावसे तुम्हारे भी अपनी जगह से हट जाते है। [वीरों के सामने पर्वत वीर जिधर भग्नी सारी शक्ति केन्द्रित तथा एकत्रित करके श्रेणोक टिक नहीं सकती है। पायुपर धावा का देने है उधर ऐमा जान पाता है कि, '(८०) अन्तरिक्षण पततः ययः धातार आ मानों आकाश स्वयं दूर होते जा रहा है भाव उन वहन्ति । (न.. ३५) पौरीकी प्रगति ना रूपसे करने के लिए एक भोर सहरु धाकाशमार्गसे जानेवाले पाहन अझमगृद्धि करनेहो बुळी हो जाती है। धीर सैनिकीको इट स्थानपर पहुँचाते है। [वीर सैनिक (८८) त्येपाः अमचन्तः नरः महि धियं वहन्ति । विमानों में यात्रा करते है। (ऋ..९०) (८१) ते भानुभिः वि तस्थिरे । (३६) तेजस्वी, बलयुज क्या नेता बने हुए वीर अस्यधिक वंधीर पुरष तजसे युक्त होकर स्थिर पन जाव है। रूपसे शोभायमान दीस पठहै। [कण्यपुत्र सोभरि नपि। (८९) गोवन्धवः सुजातातः महान्तः इपे भुजे. (८२) स्थिरा चित् नमयिष्णयः मा अप स्थात। स्परसे। । १२०१८) (ऋ. १२००१) गोको यहनके समान माननेवाले कुलीन घोर भस, भोग जो शत्रु अच्छे ढंग से स्थायी हुए हों उन्हें भी दुकाने एवं स्फूर्ति देते है । पाले सुम और हमसे दूर न हो जाभो। [विजयी वीर (९०) पप्रयाने कृष्णे शर्धाय हव्या प्रति भरभ्यम् । हमारे समीप ही रहें। (ऋ८२०९) (८३) मुदीतिभिः वीटुपविभिः आ गत। प्रबल आक्रमण करनेहारे पलिष्ट पं रोको पर्यत अख ( ८१२०२) दे दो, ताकि उनका बल पृद्धिंगत हो। [विना अपके आयन्त तीक्ष्ग, प्रबल इधियार साथ ले आओ। सम्यका बल तथा प्रतिकारक्षमता टिक नहीं सकेगी। (८४) शिमीवतो उन राप्म दिन । (ऋ. १२०१३) (९१) पणश्वेन रथेन नआ गत । (२.१०) उघोगशील परोक्ष प्रचण्ड की महत्ताको हम भली भाँति जानते हैं। यलिए अश्व जिसको 'वींचते हों, ऐसे स्थपर बैठकर हमारे समीप साओ। (८५) यत् एजथं द्वीपानि बि पापतन् । (ऋ. १२०५४) (९२ ) एप समान अद्धि, याइपु ऋणयः दवि- जब थे वीरसैनिक चले जाते है, तासाभर्थात् धाश्रयः द्युतति । ( ००३१ स्थानों] का पान हो जाता है। [ अपने स्थानसे हट इसकी सी पर ममल है, स्था की आते है। भुजाभापर शस्त्र जगमगा रहे है। (८६) भज्मन् अच्युना पर्वतासः नानदारी, यामेषु (९३) उप्रासः तनूए नकि येतिरे। (क. ८।२०१२) भूमिः रजते । (ऋ. १२०१५) वोर पुरुष भपने शरीराशी पर्वाह नहीं करते हैं, भात [वीरोंकी शमुदलपर को हुई ] चाइयोके समय बिना किसी झिझक या हिचकिचाहटके पे उमासे युद्धों अडिग एवं भटस पर्वसतक सन्दमान हो उठते है और में वीरतापूर्ण कार्य कर दिखलाते हैं और अपने प्राणों को पृथ्वीभी विकस्मित होती है। धोरोंको उचित है कि वे सतरेमें दाल देने हैं।] इसी भांति प्रभावशाली एवं समा फलदायी भाममणोका रथेषुस्थिराधन्यानि,आयुधा, अनीकेषु अधि थिय। साताला लगा दे। वीरोके रथोपर मुष्ट, न हिलनेपाई एवं स्थायी धनुष्य इधर 1 घढाओ। . और हथियार रखे जाते है तथा येही वीर रणभूमिम (१०४) मारुतस्य भेष आ वहत। ( ८२०२३) सफलता पाते है। है वायुम जो श्रीषधीगुण विद्यमान है, वह हमेरा दो। (९४) शभ्यतां त्वयं नाम सहः एकम् । (41२०१३) [ वायुमं रोग हटाने की शक्ति विद्यमान है।] इन शाश्वत वीरोंके रोज, या एवं सामध्यमे अहिती (१०५) याभि अतिभिः अवथ, शिवापि.मय. मृत। या पाई जाती है। (R८१२००४) (९५) धुनीनां चरम न । (फ २०१४) जिन शक्तियोरो तुम रक्षा करते हो, उन्हीं शुभ शक्ति शत्रुको विकम्पित करनेवाले वीरों में कोई भी निम्न योसे हमारा मुख वडाओ। श्रेणीका या हीन नहीं है। (१०६) सिन्धी असिफ्न्यां समुद्रेपु पर्यतेपु भेपजम्। एप दाना महा।%3D इनके दान बडे भारी होते है, (मर ८००२) [ये अपने प्राणीका बलिदान करनेके लिए उद्यन होते है. सिन्धु नदी, समुद्र एव पर्वतमि ओषधियाँ है। [उन यही इनका बडा दान है। प्राणोरे अर्पणसे बढकर मझा औषधियों की जानकारी प्राप्त करके रोग हटाने चाहिए। भौर क्या दान हो सकता है?] (१०७) विश्व पश्यन्त., तनूप आ विभृथ, आतुरस्य (९६) ऊतिषु सुभग. आस। (८० ।५) रपः क्षमा. बिहुतं इसकत । (१ ८.२०१२६) सुरक्षिततामे या भारी सौभाग्य छिपा रहता है। विश्व निरीक्षण करो, शरीराको हटपुष्ट बनाओ, रोग. (९९) वस्यसा हुँदा उप आवयध्वम् । ( ५२०२८) से पीडित व्यक्तियों दोप दूर करो और टूट हुए भागको उदार अन्त फरणपूर्वक हमार समीप धाकर समृद्धि ठीक करो या जोड दो। (१००) चर्कपत् गा सु अभि गाय । ( १२०१९) [गोतमपुत्र नोधा कपि। इस घलाने गल हिपान गाओं को झिाने के लिए (१०८) घृष्णे, सुमसाय,वेधसे, शर्धाय सुवृक्तिम सुदर गीत गाया करता है। भर । (पा ११६४१) यून वृष्ण पायकान् नरिष्ठया गिरा सु अभि बल, सकर्म, ज्ञान एवं सामर्थ्यका वर्णन करनेके लिए गाय- नवयुगक, तथा यलवान श्रीर पविग्रता कानेहारे काव्य करो। धोका नया काय भली भाँति सुरीली आवाजमे गाने रहो। (१०९) सप्पास उक्षण असु रा: अरेपप्त पानकास. (१०२) विश्वासु पृत्सु मुष्टिहा हव्य ( ८१२०००) गुचयः सत्वान. दिव जशिरे । (घर ११६४०) सभी सैनिकामे मुष्टियोद्धा सम्माननीय होता है। उच कोटिके, महान्, सत्कार्यके लिए अपने जीवनका सहाः सन्ति तान् वृष्णः गिरा बन्दस्व । बलिदान करनेहारे, पापरहित, पवित्र, शुद्ध एव सत्वगन जो वीर सैनिक शत्रुस्ल का आझमण होनेपाली अपनी जो हो, घे स्वर्गसे पृर आये है,ऐसा समझना चाहिए। जगह अटल एष अडिग हो खडे रहते है, उन यलयान (११०) अजरा. अभोग्घन. अधिगाय. हळहा चित् चोरीकी सराहना अपनी वाणीसे करो तथा उनका अभिवादन मज्मना प्र च्यावयन्ति । ( १६४३) करो। क्षीण न होनेवाले, अनुदार शत्रुओं को हटानेवाले, स. (१०२) सजात्येन सयन्धव मिथ रिहते(८२०२१) सेनापर चढाई करने वाले वीर सैनिक स्थिर शत्रुभाको भी सजातीय एव बाधा परस्पर मिल जुलकर रहें। अपने अलसे हिला देते है। (१०३) मत ः भ्रातृत्व उपायांत, आपित्वं सदा (१११) असेपुटय निमिमृक्षु नरः स्वधया जज्ञिरे। निध्रुवि । ( ८२०२०) ( १९६४) साधारण कोटिका मनुष्य मी तुमसे मईचारेका कधेपर शस्त्र रखने वाले और नेताके पदपर अधिष्ठित यताव कर सकता है, क्योंकि तुम्हारी मित्रता संबंध अचल वीर पुरुष अपने यलसे विख्यात होते है। एवं स्थिर रहा करती है। (११९)ईशानकृतः धुनय धूतय रिशादसा परिजय मरुत (हिं) २७ - बडे कुशल, दिव्यानि ऊधः दुहन्ति । (ऋ. ११६४५) कोई घर नहीं सकता ऐसे तेजस्वी शख धारण करनेहारे राष्ट्रशासकोका सृजन करनेवाल, शंत्रुको हिला देने, वी पहाडोंने भी अपने हथियारों से उढा देते है । स्थानभ्रष्ट करने तथा रिनष्ट कर दाल नेकी क्षमता रखने- (११९) घृ' पावकं विचर्षणि रजस्तुरं तवसं घृपणं वाले और उसे घेरने वाले वीर दिव्य गौका दुग्धाशय दुह- गणं सश्चत । (ऋ. १६६४१२) कर दूधका सेवन करत हैं। [भाँतिभाँनि के भोग पाते हैं।] युद्ध में प्रवीण, पवित्रता करनेहारे, ध्यानपूर्वक हलचलो- (११३) सुदानवः आभुव विदथेषुघृतवत् पयः का सूत्रगत करनेवालं, अपनी पेगवान गति के कारण पिन्वन्ति । (". ११६४६) धूलिको प्रेरित करनेवाले, बलिष्ठ एवं सामथ्र्ययुक्त वीरोंके उत्तम दान देनेरे प्रभाशाली वीर युद्धभूमिमें पृत. संघको समीप बुलाओ। मिधित दूधवा । सेग्न करते है । [ दूध घी की मिलावट (१२०) यः ऊती यं प्रावत, सः शवसा जनान अति। करनेपा बत शक्तिवर्धक एवं बलदायक पेय होता है।] (R. १११६४११३) (१९४) महिपासः मायिनः स्वतवसा रघुप्यदः तुम अपने संरक्षणामे जित पुरुषको सुरक्षित बना देखें तविपीः अयुग्ध्वम् । ( . ११६४७ ) हो, वह सभी लोगों में श्रेष्ठ बनता है। तेजस्वी तथा वेगसे जानेहारे वीर अपने अर्वद्भिः वाजं. नृभिः धना भरते, पुष्यति । पलका उपयोग करते है। वह घुडसवारों की सहायतासे भग्न प्राप्त करता है, (११५) प्रचेतस सुपिशः विश्ववेदसः क्षप जिन्यन्तः पौगोंकी सहायतासे पौरुषपूर्ण कार्य करके धनवैभव पावा शवसा अहिमन्यका ऋप्रिभि सवाधः सं इत् । है और पुष्ट घनता है। ( १६४१८) आपृच्छयं ऋतुंआ क्षेति। ज्ञानी, सुम्भर, धनिक, घुमिनाशक, सयको सुखी वर्णन करनेयोग्य पुरा करके यशस्वी बनता है। यनाने की इच्छा कानेहारे, बलवान एवं उरमाही वीर अपने हथियार साध लेकर पीडित एवं दुखी लोगोंको (१२१) चईत्यं, पृत्सु दुष्टरं, द्युमन्तं,शुष्मं धनस्पृतं, उक्थ्य, विश्ववणि ताकं तनयं धत्तन । मुगममाधान देने के लिए इन होकर चले जाते हैं। (ऋ. १६४।१४) (११६) गणश्रिय नृगचः अहिमन्यवः शूरा घन्धुरेषु पुरुषार्थी, युद्धोंमें विजयी यननेवाला तेजस्वी, समर्थ, रथेपु आतस्थौ । ( १६४९) धनवान, वशनीय. समूची जनताका हिसकर्ता समुदायके कारण सुहानेवाले, जनताकी सेवा करने हारे एवं उमंगसे भरे हुए वीर अच्छे रथों में बैठकर गमन करते (१२२) असामु स्थिर वीरवन्तं, ऋतीपाहं शूशुयांसं रयिं धत्त । (ऋ ११६४१५) (१९७) रयिभिः विध्ययेदसः समोफस तविषीमिः क्षमतापूर्ण धन प्रदान करो। हमें स्थिर धीरोंसे युक्त, शत्रुभोंके पराभय करने में संमिश्लाः विरप्शिनः अस्तारः अनन्तशुष्माः वृपः सादयः नरः गभस्त्योः इपुं दधिरे। ( १६४१०) [रहूगणपुत्र गोतमकपि। धनाढय, वैभवशाली, एक ग्राम निवास करनेवाल, (१२३ ) सुदंससः सप्तयः सूनवः यामन् शुम्भन्ते यमपस, मामय पूर्ण, शक्तिमान, शग्रुपर ,शख फेंकनेवाले विदथेषु मदन्ति । (ऋ. १८५।१ ) और अच्छे ढगसे अलकृत वीर अपने कॉपर वाण एवं सत्कर्म करनेहारे एवं प्रगतिशील वीर सुपुत्र शग्रुदरूपर तूणीर धारण करते है। धावा करते समय सुशोभित दीख पड़ते हैं और युद्धस्थल- (११८) अयासः स्वसन भ्रवच्युतः दुधकृत भाजत्. में बडे ही हर्षित हो उठते है। ऋष्टयः पर्वतान् पविभिः उज्जिानते । (8.1६४११) (१२४) अकं मर्चन्तः पृश्निमातरः श्रियः अघि दधिरे, प्रगतिशील, अपनी इच्छ से इलचक करनेवाले, सुदृढ महिमानं आशत । (र. १८५२) दुश्मनीको भी अपदस्य करने की क्षमता रखनेवाले और जिन्हें एकही पूजाय देवताकी उपासना करनेहारे मातृभूमिके होवे।

भात वीर अपना यश यढाते है और यहप्पनको पा लेते (१३०) शूराः युयुधय श्रवस्यवः पृतनासु येतिरे। है। ( १८५८) (१२५) गोमातर विश्वं अभिमातिनं अप याधन्ते । शूर योद्धा यशस्विता पानेके लिए युद्ध में जिया (11८३) प्रयत्न करते रहते है। गोको माता समझने वाले वीर सभी शाओंका पराभप स्वपसंदृशः नरः विश्वा भुवनाभयन्ते । करते हैं तथा उन्हें दूर एटा देते हैं । तेजस्वी पीरासे सभी भयभीत हो उठी हैं। (१२३) सुमसासः ऋप्टिभिः विभ्राजन्ते, मनोजुयः (१३१) सपाः त्वष्टा मुरुतं वजं अवर्तयत् , नरि पृश्यातासः रथेषु पृपतीः अयुग्ध, अच्युता चित् अपांसि पतये धत्ते। ( १८५९) ओजसा प्रच्यवयन्तः। (१८५४) अच्छे कुशर कारीगरने सुघड थियार बना दिया और भन्छे कर्म कानेहारे पीर पुरुष या सैनिक अपने इपि. एक अत्यन्त पीर पुरपने युद्ध विशेष गुणा प्रदर्शित यासे मुहाते है। मगकी नाई वेगवान, साधिक से करने के लिए उसे हायमे उठा लिया। युक्त ये धीर अपने रथामें घोड़ियों को जोर देते हैं और (१३२) ते ओजसा ऊर्च अवतं नुगडे, दहा अपनी शक्तिसे जो साधु भटस्ट तया अहित प्रतीत होने हो, पर्वतं विभिदु । ( १८५०) उम् अपदस्य पर साल है। उन वीने पहाडॉपर विचमान जलकनी मत (१२७) याने भादि रंयन्तः (१८५५). कर दिया और उसके लिए बीच में रकारद बसी करने वाले भन के लिए ये पीर पहाडकोभी विचलित कर दालरी पर्वतको भी गोद डाला। (१३३ ) तया दिशा अपतं जिमं गुगुद्रे । (१२८) रघुप्यदा सप्तयाय आ यहन्तु । (१८५६) (मर १११) पेगक दौडनेवारे घोडे नुम याराको यहाँपर से उस दिशा रेडीमेडी गहसे ये पानी को गये। (२३४) न. सुधीरं रयिं धत्त । (घर १८५।१२) रघुपत्याना याहुभि म जिगात । हमे भय वीगंसे युक्त धन दे दो। [TA धनमें बीर. सीतासे प्रमाण परनवाले तुम लोग अपने पाहुयरसे भार न हो, यह हमें नहीं चाहिए।] प्रगति करो। (१३५) यस्य क्षये पाथ, स मुगोपातमा जन'। घः उरु सदः एतं- पटा घर तुम्हारे लिए बना (11012) रखा है। निसरे घरमै पागा पक्षाका भार उटागो, वह यहिः आ सीदत, मध अन्धस मादयध्वम् । गौमाता परिपालन अच्छे दगसे करने वाला बन जाता है। सासनोंपर वैटा और मिठासभरे मन का सेवन करके [अर्थ यह सबका भरी भाँति सरक्षण करता है। प्रसस बनो। (१३६ ) विप्रा मनीनां शृणुत। (८६२) (१२९) ते सतवसः अवर्धन्त । ( १८७७) ज्ञानी की मुनुदि को सुन । पे पीर सैनिक अपने घर से वृद्धिगत होते रहते हैं। (१३७) यस्य वाजिन-निमं अनु अतक्षत,सागोमनि महित्यना नाकं आ तस्थुः। बजे गन्ता। (ऋ. 11८६३) अपने यापनसे वीर पुरष साम जा बैठते हैं । जिसके पर ज्ञानी अनुकूल होने है पर ऐसे गोटेगी विष्णु: वृषण मदच्युतं भावत् । चला जाता है कि, वहाँ पर गोसाकी भरमार दो। [पद देव बलिष्ठ सधा प्रससोता वीरों की रक्षा करता है। गोधनसे युक्त बनता है, यथे धन पाता है। जिसका मन आनन्दमरिता में इयता उतरता हो उसकी (१३८) धीग्म्य उक्त्रं शम्यते । रक्षा परमामा करता है। (18) भाग।

वीरकी सराहना की जाती है। (१४६) फेन चित्पथा याय अविध्वम् । (१३९) यः अभिभुवः अस्य विश्वाः चर्पणीः (क्र. ११८७२) जाधोपन्तु । (क्र. १८६५) फिलीभी गहसे युदळपर की जानेवारी घडाइके पथ. जो धीर शत्रुका पराभव करनेको क्षमता रखता है, उस पर भाकर इन्हें बनी। फा काव्य सभी लोग सुन लें। (१४७) यत् शुभे युखते, अज्मेपु यामेषु भूमिः रेजते । (ऋ. १॥८॥३) (१४०) चर्षणीनां अवाभिः वयं ददाशिम । (क. १८६६) तुम जब शुभ कार्य करनेके लिए तैयार होते हो, तप रिसानीको संरक्षणआयोजनाओं से प.लित बनकर शग्रुसेनापर चढाई करते समय भूमि थायर कोप उटती है। धुनयः धूतयः भ्राजदृष्टयः महित्वं पनयन्त। हम दान दिया करते हैं। [यदि कृषक सुरक्षित रहें. तो घे शत्रुको हिला देने वाले तथा शस्त्रधारी वीर अपना सभी प्रगतिशील हो सकते है, दरिद्रताको दूर भगा सकते महर प्रकट करते हैं। (१४८) सः हि गणः स्वस्त् तविषीभिः आवृतः (२४१) यस्य प्रयांसि पर्पथ. सः मर्यः सुभगः अया ईशानः सत्यः ऋणयावा अनेद्यः पृपा आविता। पस्तु । (रु १५८६७) (प्र. ११८७४ । जिसके प्रयत्नासे तुम भोग भोगते हो, यह मनुष्य पौभाग्यवान एवं धन्य है। १६ वीका समुदाय अपनी निजी प्रेरणा से कर्म करने. हाग, सामध्ययुक्त, अधिकारी यननेयोग्य, मत्यनिष्ट, ऋण (१४) शशमानस्य स्वेदस्य येनतः कामस्य विद। चुकानेवाला, मानिन्दनीय एवं पळवाम है, अत: सबकी रक्षा ( १८६८) करता है। शीमनापूर्वक और पीने से तर हो जानेता जो कार्य करना हो, उसकी भाक्षिामाको तुम जानो उसको (१५०) ते अभीरवः प्रियस्य धाम्नः विद्रे (ऋ. ११८७६) वे निडर वीर भादरका स्थान प्राप्त करते हैं। उपेक्षा म फरो) (१५१) ऋधिमद्भिः स्थभिः आयात, सुमायाः इपा (१४३) यूयं तत् आविष्कत, विद्युता महित्यनारक्षः विध्यन । (ऋ. १८६९) नामा पप्तत । ( ११८८१) मुम अपने उस पलको प्रस्ट करो और विपुम् जैमी और अन्डी कारीगरी बढार विपुल भरा के साथ हमारे शस्त्रांसे मुमन रथो में बैठकर धीर सैनिक इधर पधारें शमिसे दुष्टा विनाश करो समीप आजाये। (१४४) गुहां तमः गृहत, विध्य अत्रिणं वि यात. (५२) रथतूर्भि भयः शुभे आ यान्ति, स्वाधिति. ज्योतिः फर्न। (क्र. ११८६॥ यान भूम जहनन्त । (ऋ. ११८८२) दूर हटा दो, सभी पेटुभाको बाहर भगा दो रथ खींचने वाले घोडोंके साथ वीर सैनिक शुभ कार्य सौर मपको नकार दिसानी। करने के लिए आ जाते हैं और स्मधारी बनकर पृष्तीपर (१४२) प्रत्यक्षसः प्रतयसः विरप्शिनः जनानता विद्यमान शत्रुओंका नाश करते है। अविधुराः मजीषिण जुटनमासः नृतमासः वि भानो । (मर 111) (१५३) श्रिये कं या तनूपु वाशी, मेधा जवा कृणयन्ते । (इ. ११८८५३) शत्रुओं का विनाश करनेहारे, यलम्पस, वामी, गोश जो वीर सपत्ति तथा सुख पाने के लिएही शस्त्र धारण म सानेवाले, निडर, साल, जिनको सेया भग्यधिक करते हैं, ये वीर अपनी पुद्धिको उच्च कोटिकी यना देते माना लोग घरले १ सया जो भति उच्च कोटिके नेता हैं। धनजी क्षमा रचते हैं, ऐसे वीर तेजसे जगमगाया (१५४) अः ब्रह्म रण्वन्तः । (ऋ. १६६४) करने है। स्तोमा से शानकी वृद्धि करो। . 1 अंधेरैको - (१५५) अयोदंणान् विधायतः वरान् पश्यन, धेगपून आम्रमण करनेहारे पौर अपनी शक्तियोंसे योजनं, न अचेति । (क ११८८१५) सयका प्रतिपारन करते है अपने आपको सुरक्षित रयार सक्षम हथियार लेकर दल्पर चढ़ाई करने वाले एवं शत्रुदलपा धावा करते हैं। जिस समय वे अपने हथियारों प्रमुन्य सभाका १५ करनेवाले बोराको देखकर जो भायो को सुपज करत है, तब सभी सहम जाते हैं क्योंकि इनका जना की जाती है, यह सचमुवही अपूर्ण होती है। भारमण पहाही भौपण होता है। (१५६) गभल्यो स्वधां अनु प्रति स्तोमति । (१६२) त्वेषयामाः नर्याः यत् पर्वतान् नदयन्त दिव. ( १८८४६) पृष्ठं अचुच्यतुः, व अग्मन् विश्व. घनस्पति भयते। धीरोंके या में सामथ्र्य जिम अनुपातम हो, उसी (मा १११६६५) अनुपात में उनकी मशया होती है। पंगसे हमले कानेगले तुम लोग, जोकि जनता के हितया [दिवोदासपुर परच्छप ऋषि।] लिए आमण पर पेटते हो, जिस समय पतापा से (१५७) तानि सना पास्या असत् मो सु अभि भूवन। गरजते हुए गमग करते हो, तय धर्ग का भाग (म.. १.१३०.८) सम्दिन हो उठता है और तुम्हारी इस घढाईके मोपेपर पे वीरोंकी हमसे दूर न हो। समूो यसति भी भयभीत हो जाते हैं। - अस्मत् पुग मा जारिपुः । (१६३) या पः निविदेती दिद्युत् ग्दति, (तत्र) हमारे नगर जगहो। यूयं मुचेतुना थरिणग्रामाःन मुमति पिपर्तन । [मियावरुणपुत्र अगस्त्य मापि।] ( १११६६६) (१५८) रभसाय जन्मने तविषाणि वर्तन । जय राती एव दम्दानेदार हथियार आगे ( ११६६१) टुक टु हे कर देता है, उस भीपग प्राममें तुम अपना परामपुक नीयम मिळे, इसलिए यलोंका सम्पादन चिसो रबर भी अपने नार सुरक्षित रखकर मारी युद्धि की शक्तिको बढाते हो। (१५९) प्वय विदपु उपमळन्ति । (१६४) अनवधराधस. अलावृणाम प्राचन्ति, (१६६.) (तानि । वीरस्य प्रथमानि पास्या विदुः। Nोस संघर्ष करनेवाले वीर युद्धक्षेगम नोडा करते ( १३१६६७) हैंजिस भाँति रोग भासक होते है उसी जिनये धनको कोई छीन नही माना, जो दुश्मनों को भार ये वीर योद्धा रणांगणमे मानों सेए सम्झकर निरत पी तरह से विनय कर डालत है, पुसे पीर उपासनीय देवता की पूजा करते हैं भी। उन वीरा के प्रमुख याक एवं नमस्तिनं असा नक्षन्ति, स्वतयस विष्टतं पास उसी समय प्रस्ट होता है। नमन्ति। (१६५) य अभिहुनेः अघात् आयत, तं शतभुजिभिः अपने घर से, नम्न होनेवाली की रक्षा करने वाले ये पर्मि रक्षत । ( ११६६१० ) धीरक्षपनी सामपके सहारे भनदान करनेवाले का नाम जिसे नाश या पापसे तुम बराते हो इसकी रक्षा महीं करते। सैकड़ों उपभोगमायनोंसे युन गढ या दुगाँसे मुम करते (१६०) ऊमासादामुपे रायः पोपं अरासत। हो। [उसे पूर्णतया निर्भय यना देते हो। (रु ११६६३) (१६६) वा रथपु विश्वानि भद्रा,यः अंसेषु तपिपाणि २४ बीर दाताओंको अ एवं पुष्टि प्रदान करते है। आहिता, प्रपयेषु य दय , व अक्ष चक्रा समया (१६१) एयासः तविषीभिः अन्यत, स्वयतास. प्राधः यियते । (क ११६६३९) जन्,पयतासमष्ट्रिय विधा मयन्ते,क. याम. चित्रा तुम्हारे रया में क्याणकारक साधन समरे, सुम्हारे (7 १११६६४ ) कंधापर भायुध हैं, प्रवास करते समय तुम अपने समीप करो। , होते हैं।

। खानेकी जे रसते हो। तुम्हारे रथोंके पहिये उचित अद. मनुपः योषान गुहा चरन्ती विदथ्या सभापती। सरपर उचित टंगसे घूमते हैं। [तुम मा पर ठीक मौके मानयोंकी महिलाओंकी नाई वह परदे में रहा करती है। तरह हमले करते हो। (मियानमें ठिशी पदी रहती है। पा उचित अवसापर (१६७) नर्येषु राहुपु भूरीणि भद्रा, वक्ष सु रुक्माः, (सभापती ) वर समामें प्रकट होती है, वैसेही यह तल- असेपु रभसासः असमः, पविपु अधि क्षुराः, अनु पार युद्ध के समय बाहर आ जाती है। श्रियः विधिरे। ( १११६६।१०) (१७८) एप सत्यः महिमा अस्ति, वृषमनाः मानवोंके हितकर्ता वीश के बाहुओंमें बहुतसी शक्तियाँ अहंयुः सुभागाः जनीः वहते। (ऋ. ॥१६॥५) है, जो कि कल्याणकारक हैं, वक्षस्थर पर मुहरोंके हार है, इन वीरों की महिमा यहुन बदी है। उनपर जिसका कोपर पीरभूषण हैं उनके वनो की धारा अत्यन्त नीश चित्त केन्द्रित हुभा हो, ऐसा अहमहमिकापूर्वक आगे बढ़ने- है। ये सभी बाते वीराकी सुन्दरता बढाते है। चाली और सौभाग्य से युक्त स्त्री वीरताका सृजन करती है। (१६८) विन्न विभूतय दूरदृशः मन्द्राः सुजिता (१७९१ अच्युता ध्रुगणि च्यवन्ते. अप्रशस्तान भासभिः स्वरितारः परिस्तुभः । ( १११६६।११) चयते दातिवारः वधे। (* १६७१८) ये वीर सामयसपन, ऐश्वर्यशाली, दूरदर्शी, हर्पित, ये वीर स्थिरीभून शत्रुओं को हिला देते हैं. प्रास्ताको सुन्दर वक्ता है, अतः अत्यन्त सराहनीय है। एक ओर हटा देते हैं और दान पन बढा देते हैं। (१६९) दानं दीर्घ मतं, सुटते जनाय त्यजसा (१८०)शयस अन्तं धन्ति आरात्तात् नहि आपुः । थराध्वम् । (११६६।१२) (क्र. ११६७९) दान देना वीरोंका बडा मत है, पुण्यकर्भकता को ये थोरोंके चलकी याद समीप या दूरसे नहीं मिरती है। धीर दान देने हैं। धृष्णुना शवसा शूावांसःपता द्वेपः परिस्थ. (१७०) जामित्वं शंसं. साकं नरः मनवे सनः शनिचमक, उत्साहपूर्ण बरसे वृद्धिंगत होने हाल पीर थुष्टिं भाव्य, आ चिकिधिरे ( ऋ १३१६६।१३) अपनी प्रचण्ड साम से भोको घेर लेते हैं। वीरोश रघुपम भत्या सराहनीय है । ये वीर एकत्रित (१८१) अद्य वय इन्द्रस्य प्रेप्टाः, वयं श्वः । रहकर अपने प्रपनों से सबका सरक्षण करते हैं और दोप (R. १११६१०) आज हम परमपिता परमात्माके प्यारे हैं, उसी प्रकार (१७१) सनास• घृजने ततनन्। (रु १११६६।१४) क्ल भी हम प्यारे बनकर रहें। वीर युद्धक्षेत्र में अपना सैन्य पलाते हैं। पुरा वयं महि अनु धून समय वोचेमहि । (१७२) इपा तन्वे यया आ यासिष्ट (. १११६६१५) पहले से हमें यहपन मिले, इसलिए दरदिनके संग्राम में भससे शरीरमें सामर्ष घढा दो। घोषणा करते आये हैं। इपं पृजनं जोरदातुं विद्याम। प्रभुक्षाः नरांनः अनु स्यात् । अरबल एव शीत विजय मिल जाए। वह प्रभु मूरी मानवजाति में हमारे अनुपूर बने। (१७३) सुमाया अवोभिः आ यान्तु । (फ. १११६॥२) (१८३) यहायज्ञा समना तुतुर्वणिः।(क १११६८१) कुशल थोर भपने सरक्षणक साधनोंसे युक्त हो पधारें। हर कर्म में मनको सतुरित दशा (सिद्धि के निकट )वरा• पूर्वक पहुंचाने वाली है। एषां नियुतः समुद्रस्य पारे धनयन्त। घिधियं दवया दधिधे। इनके घोडे (इसबार ) समुन्दरके पार चले जाकर हर विधा में दवताविषयक प्रेम धारण करो। धग मात करें। मुचिताय अपसे सुवृतिभि.आ यवृत्याम् । (१७३) मुधिता प्राष्टिः सं मिम्यक्ष ( १॥१६॥३) मयकी मुस्पति के लिए तथा सुरक्षाके लिए अच्छमागों भजी तगार धोके समीप रहती है। दूर राते हैं। से नीको मारयार पुराता हूँ।

(९८४) ये स्वजाः स्वतवसः धूतयः, इपं स्वर द्वेष एक और करो। चरको तारादो। भभिजायन्त । (३. 11६८२) (१९५) यामः चित्रः, ऊती चिया । (मर ११७२१) जो सयंस्फूर्ति से कार्य करते है, अपने बहसे युक्त वीरांका होते हैं और शत्रुको विचलित करा देनेकी क्षमता पते है और उनका पक्षण भी यहा मनोया है। शाइलपर जो भागण होता है, वह भन्दा है, धनधान्य एवं तेजस्विता पाने के लिएही उत्पन होते मुदानवः अहिभानवः। यं घोर यदेही उत्कृष्ट दानी है तथा इसका तेज भी (२८१) अंसेपु रारभे, दस्तेपु तिः संधे। कभी नहीं घटता। (ऋ. १११६८।३) (१९७)हणस्कन्दस्य विश परि वृत्त । १.१।१७२।३) (वीरोंक) धापर हथियार तथा हाथॉमे तलगर रहती है। तिनके की नाई अपनेबार विनष्ट होनेवारी प्रजाका (१८६) स्वयुक्ताः दिवः अव आ ययुः । बिनास न होने पाय, एंगी भायोजना करो। (क्र. १।१६८४) स्वयं ही रकम में जुट जाने वाले वीर स्वर्ग से भूमडल- जीवसे ऊनि फर्त। पर उतर पडरी है। दीर्घकालतक जीवित रहनेके रिए उन्हें स्यपदपर अरेणयः सुविजाता: भाजदृष्टयः हळहानि अधिष्टिन करो। थचुच्य। (मह. १९८४) [गुनरुपुत्र गृत्समद ऋपि।] (१९८) दैव्यं शर्धः उप ग्रुये । (र. २१३०११) निष्कलंफ, बलिध, तेजस्सी बायुध धारण करनेवाले दिध्य पलसे में प्रशामा करता हूँ। धीर सुदृढ शत्रुओंको भी पदभ्रष्ट कर डालते है। सर्ववीरं अपत्यसाचं श्रुत्यं रयिं दिवे दिवे (१८७) ऋष्टिविद्युतः पां पुरमैपाः। ( १६८५) नशामहे । मानों से सुशोभित वीस पडने वाले वीर अन्नप्राप्तिके सभी धीर तथा अपरयोंसे युमनार वीति प्रदान करने- लिए नदी प्रेरणा करनेगले होते है। वाला धन में प्रति दिन मिलना रहे। (१८९) धः सातिः रातिः अमबती स्वयंती त्वेषा (१९९) धृष्णु-भोजसः तविषीभिः अर्चिनः शुशुचानाः यिपाका पिपिप्यती भन्दा पृथुनयी जाती। गाः अप अपृण्वत । (फ २।३४) (2.11६८५७) शका पराभव करने हो, सामर्ष के कारण पूरुप बने हुए तुम्हारी सेवा एवं देन दलवान, मुसदायफ, समस्त्री, तेजवी वीर गौओंको (युके कारागृह से) हा देते हैं। परिपक्य, शगुदलका शिम करनेवाली, फल्याणकारक, (२०१) मध्यान उक्षन्ते, आशुभिः आजिप तुरयन्ते। जयिष्णु तथा दुश्मनों से जूमनेगली है। (१३४३) (१९१) पृश्निः मदते रणाय अयासां त्वयं अनीकं धानिक घोडाको बलिष्ठ बनाते भीर घोापर मंट- असूत । ( :010) कर ये युद्ध में परापूर्वक चले जाते हैं। मासभूमिने बडे भारी युद्ध के लिए के जिसी हिरण्यशिप्राः समन्यवः दविध्यतः पृक्ष याथ । सैन्यका सुजन घिया। स्वनिल शिरोवेष्टन पहननेवाल, रमानी राथा शो सप्सरास: अभ्यं अजनयन्त। विकम्पित कानेगले वीर अग्नको प्राप्त करते है। संघ बनाकर हमले चढानेवाले वीरोंने बडी भारी एवं १२०२) जीरदानयः अनवधराधसः वयुनेए धूपंदः अनोखी शक्ति प्रकट की। विश्वा भुवना आ चयक्षिरे । (क. २६३४।४) (१९३) तुराणां सुमति भिक्षे। (१) शीम रिजयी यननेहारे, ऐमा धन समोर सहारे शीघ्र ही विजयी यननेवाले वीराको सदबुद्धि की इच्छा कि जिपको कोईभी छीन नहीं सकता ऐसे वीर पुरप या चाह में करता हूँ। सभी कौम प्रमुख जगह पैरकर सबको भाय देते हेळ: नि ध% हैं।

(२०३) इन्धन्वभिः रशदूधभिः धनभिः या गन्तन। (२१२) अपरान् चक्रिया अयस अभिप्रय आ परतत् । (क २३४५) (२१३/१४) घोतमान और रहे बडे धनवाली गौमाके शुरको साथ श्रेष्ठ वीरांका मनमे रक्षणार्थ भीर अभीष्ट कमकी पूर्तिक रिये हुए इधर धाओ। रिए ममीप जाता है। (२०४) धेनुं ऊनि पिप्यत, वाजपेशसं धियं कर्त। ऊतये महि यरूयं इयानः। ( २॥३४॥६) अपने रक्षण के लिए वीर यो स्थान या गृ'को प्राप्त होता सीके सूकी मास बढाओ यौर ऐसा कर्म को 6ि है। भासे पुष्टि पाकर मुरूपता यदे। (१३) अंह. अति परयथ. निद मुञ्चथ, अतिः (२०५ ) इपं दात. घृजनेषु कारवे सनि मेधां अरिष्टं अर्गची सुमतिः भो सुजिगातु । (२१३५१५) दुएरं सहः (दात) ( २१३४१७) पापसे यात्री, निन्दा छुटाभो । सरक्षण तथा मुयुद्धि भनका दान करो। युद्धम कुशलतापूर्वक कर्तव्य करने. हमारे निकट भा पहुँने । हारेको देन, बुद्धि और विनष्ट न होनेवाळी अजेय शतिका [गायपुन विध्यामित्र ऋषि ।] प्रदान करो। (२१४) याजाः तविंगीभिः प्र यन्तु. शुभ संमिश्लाः (२०६) सुदानवः रुपमवक्षस. भगे अश्यान रथेपु पृषतीः अयुक्षत. अद भ्या:विश्वयेदसः वृहदुक्षा आयुआते जनाय ही इप पिन्वते । (३४) पर्वतान् प्र वेपयन्ति । (क ३ २६४) वलिष्ठ वीर अपने यलोंके माथ युदल पा चढाई करें, उत्तम दाग देने हारे, छातीपर स्वर्णकार धारण करने वाले वीर सैनिक ऐश्वर्य के लिये जब अपने रथोंको अश्व जोतते है होकरगणके लिए इन्दे होकर वे अपने घोडौंको रथमें [युद्ध के लिए तैयार बनते है] त जनताको विपुल भएका जोत दें ( वे तैयार हों।) न दनेवाले वे वीr सय घनों दान देते। एवं ब्लोंसे युक्त हो पर्वततुल्य स्थिा शत्रुओंकोभी कंपा देते (२०७) रिष: रक्षत, तं तपुपा चक्रिया अभि वर्तयत, (२१५) वयं उग्रं त्वयं अयः आ ईमहे । (फ ३।२६।५) अशसा पधः आ हन्तन। ऋ३४०९) शत्रुभोंसे हमारी रक्षा करो, उन सभोंको तप ये हुए हम उग्र, नेजस्त्री संरक्षक मामयकी इच्छा करते है। चक्र नामक शखसे सिद्ध करो और पैटू दुश्मनका वध कर ते वर्षनिर्णिजः स्वानिनः सुदानवः । धे वीर स्वदशी वग्दी पहनने वाले है भौर बड़े भारी वक्ता (२०८) तत् चित्रं याम चेकित । (ऋ. २१३४१.) तथा विख्यात दानी हैं। वह अनूठा आक्रमण सष्ट रूपसे दीस पडता है। (२१६) गणं गणं नातं नातं भामं ओजः ईमहे । आपयः पृरल्या. कध. दुहु । (ऋ ३२६६) मिन्न गौक धनरा दोहन करते हैं और उस दुग्धका पान हर वीरममुदायमे सांघिक बल तया लोज पनपने लगे करते है। यही हमारी चाह है। (२११) क्षोणीभिः अरुणेभिःअधिभि ऋतस्य सदनेषु अनवभ्रराधसः धीराः विदथेषु गन्तारः। यवृधु • अन्यन पाजसा सुवन्दं सुपेशसं वर्ण जिनका धन कोईभी छीन नहीं सकता, ऐसे ये पीर रण. दधिरे । ( २।३४।१३) भूमिमें जाने वाले ही है। केसरिया यस्दी पहने हुए वीर यज्ञमंडपमें सम्मानपूर्वक [ अधिपुध श्यावाश्व ऋषि।] येरते हैं और अपने विशेष चर से सुन्दर छवि धारण कर लेसे (२१७) यशियाः धृष्णया अनुप्वधं अद्रोधं श्रयः है [अर्थात् पुहाने लगते है। मदन्ति (ऋ. ५॥५२॥१॥ ढालो।

पर सहायक है। नाय पीर, वसा परामर रहास पक्षिसे (०२०) स्थानां पन्या मासा आगवान्त। बुक होकर, परभाररहिव यश पाकर प्रपना हो वादे (2 ५५९९९) अपने एक पागों से जीनस मंदसोमी oिs. (२१८) से घृष्णुया स्थिरस्य शवसः सखायः सन्ति। विच्छिन फर साध्वे हैं। (ट ५.५२२) (१२६) भापथय विपययः अन्त पथा: अनुपक्षा' थे धीर शपकी जिसनेयारे या लारी विस्तारः यस मोहते । (. ५१५11.) समीप, विशेषी, गुह तथा महल इध्यादि विभिन्न ते यामन शश्वतः धृषदिनः रमना मा पान्ति। मागासे प्रयोग करनेवाले पीर अपना पर विस्तृव करक ये शायुपर मामण करते समय शायत विजयी माम शुम मम पिए बन करते है। से स्वयं ही चारों भोर रक्षाका प्रपंध करते है। (२२७) मरः नियुतः परायचा मोहते, चिना रूपाणि (२१९) ते स्पन्द्रासः रक्षणाशर्यरी: अति म्पन्दन्ति। पदया। (भा. १५२१) (8 ५५२१३) नेता वीर समीर या दूर रहकर पहले मिला गोकर ये शत्रुपलको मारे दरक सन्दित करनेपारे तथा पनि गावे है, उस समय उसके गोस र ती समोर है भीर वीरता के कारण राग्री के समय भी मुश्मनों पर धापा दीप पड़ा है। कर देते है। (२२८) फुमन्यवः उत्सं आन्तुः, ऊमा पशि लिये महः मम्म। मासन् । (इ. ५५२।१२) हम परीके सेजका मान करते है। मातृभूमिली पूजा रहारे पीर जलासयाका राशन (२२०) विश्व मानुषा युगा मयं रिपः पान्ति, भरते हैं; से संरक्षक धीर भालाको चोधिवाते हैं। धृष्णुया स्तोमं धीमहि। (५।५९) (०२९) ये प्रामाटिविद्युतः फययः घेधस सन्ति, समी पोर मानयी स्पर्धामों में शत्रुओं से मानवको नमस्य, गिरा रमय । ( ५।५२११३ ) मुरक्षित रखते है, इसीलिए हम उन पोरोंके शौर्यपूर्ण मो वीर ब धेनवी भायुप धारण करनेधारे, बानी काम्प मारणमें रखते हैं। तथा कधि है, का अभिवादन या नमन फरना भीर (२९१) आईनतः मुदानका प्रसामिशपसः दियः नर । मपनी पाणी रो छन् ति रखना चाहिए । ( ५१५२।५) (२३०) मोजसा धृष्णपः धीमिः स्तृताः। पूजनीय, दानशूर तथा संपूर्णतया पछि धीर तो सर. (५४) सुष स्वागके नेता धीर है। भपनी मामध्ये से बनुमा विनाश करनेगरे धीर दहि- (२२२) रुपमैः युधा फ्रण्याः नरः कष्टीः एनान् पूर्वक प्रशसित होनेयोग्य है। मसूक्षत, भानुः रमना भर्त। (ऋ ५५१३) (२३) पपां देवान् आच्छ सूरिभिः थामभृतेभिः चारो ध्या शुद्ध शक्तिभोसे विभूपित बढे भारी नेता अखिभिः दाना सचेत । ( ५।५।१५) और अपने शम इन शत्रु पर छोटते है, सब रनक शेष इन यी वीरो समीपज्ञानी च्या माझमणकी में स्वयं ही उनके निकट चला जाना है। [थे तेजस्वी दीख विख्यात मौर गणवेश से विभूषित पीर दान छमर पी. पढते है। (२२४) सत्यशयसंमभ्यसं शर्धः उच्छंस, स्पन्द्राः (२३२) गां निं मातरं प्रघोचन्त । (8 ५२२017) नरः सुभे स्मना प्रयुसत। ( ५५२१०) से वार कर चुके हैं कि, गो या सूमि गारी मार सप्प पल से युक्त, माकाम सामध्येकी सराहना करो। है। सानुको विकम्पिस करनेवाले ये वीर अच्छे कमों में स्वयंही (२३३) ध्रुतं गम्यं राधा, भदन्यं राव: निमृजे। छट जाते हैं। (क ५/५२११) मकर (हिं.)२८ - विख्यात गोधन हा अपयको भनी भाति घोडा ते स्याम: हम प्रभुके बारे में मुस्वाध रखता है। (२४९) पूर्वान् कामिनःसखीन् य । (र. ५/५३१६) (२३६) मर्याः अरेपसः नरः पश्यन् स्तुहि । पासे परिचित प्रिय मित्रों को इस भपने समीप गुलाठे (५५) इन मानी निहाँप वीगेको देखकर प्रतमा को। (२५०) स्वभानय शर्धाय घायं मानत। (२३७) स्वभानयः अजिपु याजिषु प्रभु रुक्मेषु घुम्नश्रवसे महि नृम्णं आवंत (ऋ.५४१) सादिपु रथेषु धन्यसु धायाः ( ५५४) तंजस्या परका वर्णन कसे भौर रोजस्वी यश पामेषाले रोजस्वी और गणमेश पानबर घोरे, माछा, मा. पोको पडी मारी ऐम ऐकर न सकार रो। कार, रथ पर पनुष्यका मामय करते है। (२५१) तपिपा. पयोवृधः अश्वयुजः परिजयः। (५५४०२ । (२३८) जीरदानवः मुदे स्थान अनुदधे। परि, पोपुर एवं बोडोंको रथोंमें बोसनेवाले वीर स्वरित विजयी बनहार धीर धामन्दके लिए वापर चारों भोर संचार करते हैं। (१५१) नरः अश्मदिघवः पर्वतच्युतः द्वादुनिवृतः (२३९) सुदानयः नरः दक्षागुपे यं कोश था भवु. स्तनयदमाः रभसा उदोजसः मुहुः चित् । . (र. ५५४३) च्यवुः, धन्वना अनुयन्ति । (ऋ. ५॥५३॥३) यिवासे मरनेवासे धीर नेता पर्यंत कोमीहिसाने. पानी एवं नेता धीर उदार पुरुष के लिए जोनमार मरकर मात.. मी पाय पे पहारी बनकर प्राण बाप तथा बनोसे युक्त और पर्णनीय सामथ्र्यसे पूर्व एवं करते है। देगा इसलिए विशेष पलिहोकर पारपार हमले (२४८) शधैं शर्धे मास-मातं गण-गणं मुशस्तिभिः धीतिभिः अनुफामेम (. ५०११) (२५३) धूनयः शिक्षसः यत् अफ्तून् अहानि अन्त- प्रत्येक मेना विभाग सार भने समुशासनसहित रिक्ष रजांसि अन्नान् दुर्गाणि वि,न रिष्यथ । भले विचारों से युक्त होकर म गाः चलते हैं। (ऋ.॥५॥४) (२४६) तोकाय तनयाय अक्षितं धान्य पीजं यहये, अन्तरिक्ष खिमय भूविभाग एवं पीडट स्पों में से चले पानुओको हिकाने वाले वीर बलधाम हो अब रातदिम विश्वायु सौभगं अस्मभ्यं धत्तन । (२. ५।५।१५) पाते हैं, तब वे यहादटकी अनुभूति म है। इतनी शक्ति पारयचों के लिए नम होनेवाका चाम्थ तुम कामो हनमें बट पाए। और दीर्घ जीवा तथा सौभाग्य में प्रदान करो। (२४७) सस्तिभिः अवधं हित्या. अरानी तिरःनिदः पामे भगृभीतशोचिषः अनश्वदां गिरि नि अयातन । (२५४) तत् योजनं वीय दीघ महित्वनं ततान, यत् अतीयाम, योःश उषि भेषजं सह स्याम । (अर. ५/५४१५.) रूपामकारक मापसे दोष दूर कर सको तया इससी बायोचमा, माम, पटा मागे पौरप बहुतही गुप्त निम्पों को दूर हटा दें भोर तासे पाये जानेवासा फैल चुछ है, अब मुम सनुपर बहाई मते हो, उस पक भांतिगुन पूर्व तेमसिता भानेपामा भौम प्राक्ष माग तेज परवा मी, किन्तु जिधर घोटेपा पेठकर खामा भी दूभा प्रतीत हो उधर भी, रिकर पारपरभी तुम (२४८) यं पायध्ये, सः मर्त्यः सुरेयः समद, सुधीरः भारमण करी रायते हो। असति । (. ५।५।१५) (२५५) शर्धः पभ्राजि, अरमति मनु नेषय। दे पोर जिमा सक्षम करते हैं, समवन्त तेजस्वी, (R. ५५४१६) महरायुक्त पीर एम शाता है। तुम्हारा बस वियोतित होता है, माराम न करते हुए - का तुम अनुकूल मार्गसे मपने भनुयायियों को बनो। वर्णन करमेयोग्य व युक्त भन में दो, मामगायन (२५६) यं सुषूदय स न जीयते, न हन्यते. न करमेश तवानीकी रक्षा करो, लोगों के पोषणमताने मेधति, न व्यथते, न रिष्यति । (ऋ. ५।५४१७) घोरे देकर पर्याप्त भाभी दे दो भौर उमी प्रहार गरेको धीर निषको सासा पहुँगते है, पाम पाशित भरवासी बना दो। सेना, न किसी से माराही आता है, मनिता (२६४) रात् प्रविणं यामि, येन नन् अभि ततनाम । है, न दुमी ममता है भौर म क्षीणभी होता है। (फ ५५४॥१५) (२५७) ग्रामजितः नरः इनासः अस्वरन् । पा माहिए, जो सभी लोगों में विभक किया जा (१.५।५४१८) शत्रुके दुगोंको जीतकर अपने अधीन करनेवाली (२६५) भ्राजहष्टयः रुपमयक्षसः पृहत् वयः दधिरे, देगले दुश्मनेपर पढाई र हाते हैं, तब की भारी सुयमभिः आशुभिः अश्वैः ईयन्ते । (२. ५.५५१) चमकी दियार धारण करनेहारे भार यक्षस्थलपर गर्जना करते हैं। वर्णमुदा रखने वाले वीर हनुतपा भव समीप रमन भोर (२५८) इयं पृथिवी अन्तरिक्ष्याः पध्या प्रयत्वतीः । भली भांति सिमाये हुए घोटापा बेटकर जाते हैं। (. ५५४९) चोरों के लिए एस पृथ्वीपरके तथा गन्तरिक मार्ग रथाः शुभं यातां अनु अवृत्सत । मारते माते में। बारे रथ पुभ कार्य के लिए जाने वाला मागीया (२५९) सभरसः स्वर्नरः सूर्य उदित मदय निधतः भमुसरण करें। मवाः न अथयन्त, सद्यः भध्वनः पारं अश्नुथ । (२६६) यथा विद. स्वयं तपिपी दधिध्ये. मदान्तः (र. ५।५४११.) उर्विया पृथत् विराजथ । (ए ५५५।२) पकिरीर सूर्योदय होनेपर मध होते हैं। उनके कि तमाम पाकर सही बहका पारम भरते हो, दोस्नेया घोरे अबतक यह मही पाते, तभीतर सपने प्रतः तुम सचमुच को भार नपनी मातृभूमिको सेवा स्थानपर पहुँच जाय। के लिए जागृत रहकर बात ही मुहाने हो। (२६०) असेपु प्रष्टयः, परसु खादयः यक्षःसु रफमा, (२६७) सुभ्यः साकं जाताः साफ उक्षिता. नरः गभस्त्योः विशुतःशीर्षस शिप्राः । (. "५४11) धिये प्रतरं वावृधुः । ( ५५५४३) पीर सैनिकों के कंधोपर भार, पै सोर पक्षस्यस्पर पर सीम, सपमें रहकर सामुदायिम गरे पर सुवर्णधार, पापों में सम्पार और मनपर शिरोवेहम र प्रकट करनेहारे थोर सयकी प्रगति लिएकी भपनी विद्यमान हैं। कि मरते है। ( २६१) अगृभीतशोचिष रशत् पिप्पलं विधूनुथ, (२६८) या महित्वनं आभूपेण्य, मसान् अमृतत्वे पृजना समच्यन्त, अतिविपात ! ऋ. ५/५४|११) दधातन । (ऋ. ५/५५४) भपत सेजस्वी, परिषय फलको पूक्ष हिराकर प्राप्त करो, तुम्हारा बापन गुम्मारे लिए भूषणायद है, में शुममें (प्रयत्नपूर्वक कम पाधामो) पोका पंग करो भौर रखो। तेमस्त्री बनो। (२७०) यत् अश्वान अयुगां हिरण्ययान् अकान् (२६६) रथ्यः ययस्वन्तः रायः स्याम, न युच्छति प्रत्यमुगध विश्वाः स्पृध. वि अस्यथा (ऋर. ५।५५/६) सहक्षिणं ररन्त । (र. ५५४११३) मर तुम घोडाको रथ भप्रभागी जोतरो हो भौर सपने हमारे मार्ग भए तथा भोसे युक्त हो, न ना होने गया सुमणं को पामते हो, तब तुम समुदाधुओंको सुदूर हजारों गुना धन दे दो। भगा देते हो। (२६३) यूयं स्पार्ह वीरं रयि, सामविप्र प्रापि अयथा १२७१ वः पर्वताः नयः च न वरन्त, या अविध्वं भरसाय अर्यन्तं वाजं, राजानं थुष्टिमन्तं धत्य । सत् गच्छथ. धावापृथिवी परि याथन । (क्र. ५।५४।१४) MA जी 1 बनो। तुम वीरों के मार्ग पदाह या नदिया रकावट नहीं पास (२१) समुक्षितानां एषां पुरतमं अपूर्य द्वये । (ऋ. ५/५६१५) माती है । मिवर तुम्हें पढ़ाई करनी हो, उधर मनमें चये जो भाकाबले के भूमिपक मन चाहे उपर तुम मवे इकट्टे पड़े हुए इन धीरोंके इस बच्चे भपूर्ण दटकी में सराहना करता हूँ। (२७२) पूर्व, नूतन, यर उद्यते, शस्यते, तम्प नघे. (२८०) रथे अरपीः, रथेषु रोहितः अजिरा पहिष्टा एसः भयथ । (. ५/५५1८) हरी बोहवे धुरि यध्वम् । (प्र.५/५६०६) जो हमी दिया भौर सगरमीय है, चाहे वह पुराना तुम रथों का रंगवाली सिनियाँ, स्याम प्णसार पा गया हो, तुम यससे टीकटी परिचित रहो। और घेगान, खींचनेकी क्षमता रखनेपा घोरे रम होने (२७३) असभ्य बटुलं शर्म वियन्तन.न: मृळत । लिए रथ जोतते से। (ऋ. १५५६९) (२८१) यरुषः तुधिस्वनिःदर्शतायाजी इह धायि स्म में बहुत सुस दे दो गौर में मानन्दित करो। पायामेषु चिरं मा फरत्, तं रथेषु प्रचोदत। (२७४) यूयं यस्मान् अंतिभ्यः वयः अच्छ निः (थर. ५१५६७) नयत वयं ग्यीणां पतयः स्याम (न्ट. ५५५।९.) गिंका, दिनहिनानेवाला सुन्दर घोडा यापर बोस धमै हददासे छुपाने के लिए नुम, उपनिवेश घसाने गोरम रखा है। मद माक्रमण करने में घेरी न परो, रथमें घेरकर की भोर में केरमो भार ऐसा प्रबंध करो कि, हम उसे होकना शुरु करो। भनके पारिपतियों। (२८२) यस्मिन् सुरणानि, अवस्युं रथं ययं भा (२०) शर्यन्तं रस्मेभिः अखिमि. पिष्टं गणं पद्य हुवामहे । (ऋ. ५५५६८) पिशाव द्वय । ( ५.५६१) जिसमें रमणीय घस्तुएँ रखी हैं ऐसे यशस्वी रथको शनुसक और सामूषणोंसे रान पीरेि दधको सराहना दम कर रहे हैं। जाके हित लिए इधर मुलामी। (२७६) माशसः भीमसंडशः मृदा वर्ष (२८३) यस्मिन् सुजाता सुभगा माल्हुपी महीयते, तं यः रयेशुभं त्वेषं पनम्युं साधं आहुपे । (रु. ५.५६२) पला दोर और मीरा रीवाले इन पीरोंको (. ५/५६९) भंतःकरणपूर्वर विंगत करो, [से भीमकाय तथा सराद- जिसमें मण्डे माग्ययुक्त तथा मसंम्पनीय रातिका महाप मीच पीर शिम भार बस्ने जग, प्रेमी छगन से समस्या प्रकट होता है, उस तुम्हारे रयमें शोभायमान, मेस्त्री, स्तुत्य पारकी में सराहना करता हूँ। (२७७) मोहम्मती पराहता मदन्ती अस्मत् आ (२८४) सोपसः हिरण्यरथाः सुविताय आगन्तन {".६३) (ऋ.५५१) स्नेहयुक्त भौर विमा पराभून नहीं कर सके, ऐसी तुम एकही म्यासे प्रभावित होकर भौर सुवर्णके बा सेना सर्प मारी भोरदी बढती ची भा रही है। स्थमें बैठकर हमारा हित करने लिए इधर पधारो। यः अमः शिमावान् द्धः भीमयः । (२८५) पृश्निमातरः वाशीमन्तः क्रष्टिमन्त: मनीषिणः मारा पल भीषण है, क्योंकि कार्यकुता शव भी तुम्हें सुधन्वानः श्यमन्तः निपगिणः स्वश्वाः सुरथाः सु. और नहीं सकते। आयुधा. शुभं वियाशन। (क्र. ५५५१२) (२७८) ये थोजसा यामभिः अदमान गिार स्वयं मगिको मानाझी नाई भ दरपूर्वक देखनेहारे चार फुटार पर्वतंमच्यावयन्ति । (८ ५५६४) तथा भाले हेर, मननशील पनकर, बदिया धनुष्यबाण तो घोर अपने सामर्थ से माझमम काफे पथरीले और एवं तूणीर सायमें टेकर उस्कृष्ट पोडे, रथ भौर हथियार Reमाको शनेबारे पदाको जोर देते हैं। भारण कर शनाका दिध करनेके लिए चले जाते है। करो। एति।

(९८६) वसु दाशुपे पर्वतान् धूनुथ । यामन भिया (२९२) स्वराजः आश्वभ्याः अभवत् वहन्ते, स्त चना निजिहोते । यत् गुमे उग्राः पतीः अयुग्ध्य, अमृतस्य शिरे, एषां व्यसीनां तविषीमन्तं गणं पृथिवी कोपयध। (मा. १५॥३) स्तु। (म. ५/५८11) उदार मानवोंको धन देने के लिए तुम पदादोसफ को स्वयंशासक होते हुए ये चीर जपद मानेपाले घोटापर inा देते हो, तुम्हारी पठाईके भप से आपने भी चटकर या ऐसे घोडे जोतका घेगपूर्वक प्रयाण करते है, हैं. सपा के लिए हम जैसे शुर वीर अपने रथ- मारपर पा है। इन स्तुत्य और मलयान संपकी को परेवाळी दिरनियाँ जोर देते हो, गप समूची पृथ्वी स्तुति करता हूँ। धौलझा रहसी है। (२९३) ये मयोभुवः, महित्वा क्षामिता: तुविराधसः (२८७) पातत्यिपः सुसदृशः सुपेशसः पिशहाण्याः नुन तसं खादिहस्तं धुनियत मायिन दासियार पराया मरेपसः प्रत्यक्षमा महिना उरय त्वे गण चंदस्व । (2.५५८०२) सुल देनेभारे, जिनका कटप्पन भसीम को ऐसे, सिदि वेपस्वी, समान रूपधाडे, भाकर्षक रूपधारे, भूरे भोर पानेपाझे वीर हैं उनके लिए भाभूषणयुक, युको धारिमामय भोसे रखनेवाले, झोपरदित तया वो विमष्ट हिला देनेवाले, मुगक, उदार, तेवरी संघको प्रणाम कानेया धीर अपने महारायसे पहूत बड़े हैं। (२८८) शखिमन्तः सुदानवः स्येप-संघशा अनवभ्र- (२९५) यूयं जनाय इय पिता राजानं जनयथ राधसः जनपा सुजातासा हफ्मवक्षसः अर्काः अमृतं युप्मत् मुरिहा पातः पति । युप्पत् सदश्यः नाम भेजिरे। (२.५॥५) सुधीर पति। (र. ५५८४) गणवेश पानावर उदार, तेजस्वी, घन सुरक्षित रखने. तुम जनता के लिए ऐसे नरेशका पूजन करते हो, जो पाये। कुलीन परिचारमें पैदा हुए, गले में स्वर्गमुनानिमित पड़े बड़े प्रगतिशीर कार्य भनेका आदी पने। तुम जैसे चार साले हुए, सूर्यमुक्य सेवती प्राव होनेवाले, बीर पोरोम से ही पिशेप पाइपलसे युक्त मुष्टियोरा (Boxer) ২ হা ধান । सर, विनयात हो उठता है भार सममें से दो भाले घो- भी समीप रखनेवाचा घेर धीर अगाके सम्मुष हा (२८९) या अंसयोः कष्टयः, पालोः सदा घोज यलं उपस्थित होता है। धधिहित, शोर्पस नृणा, रथेषु विश्वा आयुधा, aनए श्रीः अधि पिपिशे। (कर. ५५७४६ ) (२९६) अचरमाः सकवाः उपमासः रमिष्ठाः पृश्नः तुम्हारे पापर भारे, बाहों में बस, मारमा, वामें पुया. स्वया मत्या सं मिमिनुः। (g. ५/५८४५) सभी आयुध और शरीरपर शोमा है। समान दशा में रहनेवाले, सवर्णनीय, समान दयाये, घशामी और मातृभूमिके सुपुत्र होते हुए ये पौर अपने (१९०) गोमत् अध्धयत् रथनात् सुधीरं चन्द्रय बिमारीखेती परस्पर मेरसे पाय रखते हैं। राधानः ददनः प्रशस्तिकात, वः अयसः भक्षीय। (२९७) यत् प्रपतीभिः मर: वीनुपविभिः रथेमिः (3. ५५७) पायासिष्ट, आपः क्षोदन्ते, चनानि रिणते, धीः गायों, घोड़ों, स्यों, पीरपुरुषों से युफ भौर विपुब सुधर्म अचान्दतु। (२. ५/५८१६) से पूर्ण मन हमें दो, हमारे भपको पायो भौर गुम्हारा पच धन्येपाले घोडे मोगा मुहट पहियोंसे युक्त श्याम संरक्षण में मिलता रहे। भाहा हो तुम साक्रमण शुरू करते हो, उस समय पानी में (२९६)तुचिमघासः समाः सत्यश्रुतः कवयः यवानः भारी खळपली हो जाती हैं, धन बिनष्ट होते है और पृहदुक्षमाणाः। (इ. ५.५७८) माझाशमी क्षाने लगा है। पत्र एंवर्थमाले, मस्य जानोहारे, शानी, युएस या (२९८) एषां यामन पृथिवी प्रथिष्ट, स्वं शयः पुः, राम पनो। मानान धुरि भायो। (अर, ५.५४) , - , इनके अप्रमणों के फलसकर मातृभूमिमी समाति तथा निवास करें। प्रसिदि हो चुकी या भूमि समाप्त हो गयी । उनका एक (३०६) ये श्रेणीः मोजसा अन्तान् वृहतः सानुनः प्रकट गुमा भौर एम चड़ाने के समय उन्होंने अपने घोटे परिपातुः । एषां अभ्यासः पर्वतस्य नमनून रयोंने बोते थे। पाचुच्यघुः। (. ५.५९७) (३००) सुषिताय पावने प्रभफन्, पृथिव्यै प्रतं ये वीर कतारमें रहकर घेगपूर्वक पृथ्वीके दूसरे चोरतक प्रभरे, अश्यान् उक्षन्ते, रजः आ तरपन्त, स्वं भानु या मटे यो पा परमी लेते हैं। इनके घोडे पहार भर्णवः भनुश्रधयन्ते । (2 ५१) केभी टुमद कर सारते हैं। सबका हित तथा सपकी मदद करने के लिए इस (३०७) पते दिव्यं को आचुच्ययु । ( ५:५९०८) ये पौर दिव्य भाण्डारको चारों भोर देते हैं, माने कार्पका मारम हो चुका है। माभूमिका लोन पदो, पोटे सारे भनका विभजन पतुर्दिर पर देखे हैं, ताकि हामी जोश रखो, भन्तरिक्ष मेंसे दूर ले जामो और भपना क्षेत्र विषमता न रहे। समुह यात्राभोंसे धारो भोर पंचामो। (३०१) एपां नमात् भियसा भूमिः एजति । दूरेश (३०८) ये एकएकः परमस्याः परावतः आयय । ये एमभि चितयन्ते ते नरः विदर्थ मन्तःमहे येतिरे (५६) ( ५५९४२) ये वीर मरेडही भत्ता सुदूरपती प्रदेशोंसे परे भावे इन पीरो बहसे उत्पछ नयाहरू भाषसे भूमण्यम (३१०) एषां जघने चोदः, नरः सफ्थानि वियमुः। पर्स सठता है । यो दूरदर्शी बार अपने पेगोंसे पहचाने (ऋ ५।६१३) भाते हैं, घे युद्धोंमे महरप पाने के लिए प्रयास करते रहते पाम इन घोडोंकी जघापर यामुक टगता है (गम घे अपनी जीप तानने पगते है ) परन्तु ऊपर ठनेवाले वीर (२०२) रजस. विसर्जने सुभ्यः भियसे चेत्तथ । उनका विशेष नियमन करते हैं, उन पोटोको अपनी जांपासे पकट रसते हैं। मधेरा करने के लिए माले पीर पाफर ये पेयं तथा वैभव पटाने के लिए प्रयत्नशीफ पाते हैं। (११२) ये आशुभिः वदन्ते, अत्रयांसि दधिरे। (३०३) सुविताय दायने प्रभरध्ये, यूय भूमि रेजथ । (क्र. ५६१111) जो पीर पोडोंपर परकर शीघ्र शत्रु पर इमका कर देते (ऋ ५।०९।४) है, से बहुत संपत्ति धारण करते हैं। भरले ऐश्वर्यका दान करने के लिए तुम उसे घटोरते हो। इसलिए नुम पृथ्वीकोभी विधषित कर पाते हो। (३१३) धिया रथेषु आ विभ्राजन्ते । ( ५६।१२) (३०) सपन्धवः प्रयुधः प्रययधुः । नरः सुवृध' ये धीर मपनी सुषमासे रथोंम धारा भार चमकते रहते (क्र ५.९१५) परस्पर भानुभावसे सदर पढे भारे योदा दाईमें (३१४) स गणः युवा त्येपरयः, अनेद्यः, शुभंयावा, निरस होये है और ये नेता हमेशा बरते रहते हैं। समतिकुतः। (ऋ. ५.६११३) (२०५)ले भज्येष्ठा यक्षनिष्ठासः मध्यमासःउनिदः याचीरोंका संब नषयोयनसे पूर्ण, तेजस्वी भोर भाभामष मद्दसा विवावृधुः । जनुषा सुजातास. पृश्निमातरः रथमें बैठने वाटा, भनिदशीय, भले कार्यके लिए इस दियः मर्या नः अच्छ भाजिगातन । ( १९६६) करनेवाला तया सदैव विजयी है। इन पीरोंमें कोईभी भेट नहीं है, कोई निश्चले दका (३१५) धूतयः मतजाता: अरेपसा यत्र मदन्ति का मही भार म कोई मामी भेगीका है। पति शिप घेद ? ( ५/६११४) सक्टों जाकको तोदनेवारे पीर भपने भन्दा पिघमाग पाको हिटा देनेवाले, सत्यफे लिए मचेष्ट निपाप पपनसे करते है, परी परिघारमें उत्पर भोर मातृभू- चौर किम जगह सहर्ष स है, भला कोई कह सकता है? मिकी उपासना करनेया दिम माप हमारे मध्य भाग सरा कोई पान देता है। पपृधुः।

. (१३) यूयं इस्था मस प्रणेतारः यामहतिषु धिया युक्तपदीर पारसरिक हो पा रहा पराम श्रोतारः (ऋ. ५६१।१५)करने के लिये धागे पडने झगे। तुम इस भौति मानघाँडो टीक राहसे से पहनेवाले शे। (३२२) यः अमवान् वृषा त्वेषः ययिः तविपः सनः भासः इमण करते समय मगर सुमें पुकारा जाप, सो तुम नरेजयत्, सहन्तः खरोचिपा स्थारपमानः हिरण्य. छानबूमकर बधर ध्यान दो। याः सु-भायुधासः इमिणः प्राखत । ( इ. ५/८७५) (३१७) रिशादसा काम्या पनि नः भाववृत्तन । सुम पीरोंका पच्युत, समय, पेजस्त्री, पेगवान,प्रमाप. (7. ५/६६) माली शन्द हुम्हारे भनुपापियाँको भयभी न करे। तुम शषिनाशक तुम धीर में भभीष्ट धन लौटा दो। शत्रुका परामप करनेहार, तेजस्वी सुपणकारोंसे हिमूपि- (अत्रिपुर एययामरूस् मापि। अदिया इथियार रखनेयाले तथा सभाषटर साय (३१८) यः मसयः महे विष्णय प्रयन्तु। रखनेवाले पीर प्रगति के लिए प्रगतिशीक एनसे हो। (३.५८१), (३२३) वः महिमा अपार, स्वेपं शया अपतु, प्रसितो तुम्हारी हतियाँ घई भारी व्यापक देवकी भोर प्रमत्त संदशि स्यातारः स्थन, शुशुझांसा ना निदः उरुष्यता (R. ५/८६) तषप्ते धुनियताय शयसे शर्धाय प्रयन्तु । सुम्हारी महिमा अपार है, सुन्धारा तेजस्वी पर हमारी जिसने प्रतालिया हो कि, में बालित शनुमोको विधार" रक्षा करे, शत्रुका मन हो जाय, तो तुम ऐसी जगा रहो लदे दूंगा पेरो पोरके वेगपूर्ण सामर्यका वर्णन करने किम तुमें घेख सो घम तेसस्वी धीर हो, एसरिए निंद. लिए हमारी बानियाँ प्रवृत्त हों। घमें परायो। (३१९) ये महिना प्रजाताः, ये च स्वयं विशना (३२४) सुमनाः सुविद्युम्नाः प्रयन्तु। दीर्घ पृथु पार्थिय जाताः, (तेषां) तत् शबः क्रत्वा न आकृपे, महा सन पप्रथे । अद्भुत-एनसां अज्मेषु महः शासि (५५८१७) अपृशशसः। (पर. ५।८।२) फर्म मानहारे, मासेजस्वी पीर हमारी रक्षा करें। वे पीर मारसके कारण प्रसिद्ध हुए हैं, अपने ज्ञानसे । भूमंडपर विधमान मारा घर धनी पोरी कारण विख्यात हुए हैं। उनके बड़े पराक्रमके कारण उनले थरूको विख्यात हो चुका है। इन पापसे कोसों दूर रहनेवाले कोई परास्त नहीं कर सकता है और अपने अन्दर विधमान घोगेफे मारमण समय पधे पर दिखाई देने लगते हैं। महब के कारण प्राशु उनपामर करनेका सास नहीं कर, (३२५) समन्ययः विष्णोः महः युयोतन, दंसना ६. सनुतः शेषांसि अप। (र.५/८४८) (३२०) सुशुकानः सुम्या,येषां सधस्ये इरीन आई, उरमाही बोर व्यापक परमात्माकी असीम शक्तियोंसे माय स्थविद्युतः धुनीनांध स्पन्द्रासः। 1. अपना संबंध जोड दें, अपने परामसे गुप्त शत्रुओंको दूर इटा। (ऋ. ५८७३३) वे घोर भरयारा तेजस्वी एवं पडे हैं, उनके घर (भपने (३९६) वि-गोमनि ज्येष्ठासः प्रचेतसः निदः दुर्धर्तयः (र. ५५८७९), क्षेत्रमें ) उमपा अधिकार प्रसापिस करने वाला कोई नहीं। विशेष रक्षा मयसरपर घेठ ठहरने वाझे ज्ञानी वीर थे ममितुष्य सेजस्वी हैं और अपने तेजसे मारक शत्रु को निंदक शत्रुओंके लिए अजेय हो । मी हिलाकर गिरा देते हैं। [गृहस्पतिपुत्र शंयुत्रापि।] (३२१) सः समानस्मात् सदसः निःचक्रमे, चिमहसः (३२७) सबधां धेनुं उप आ अजध्वं. अनपस्फुरी शेवृधः विस्पर्धसः जिगाति । (*. १८४) राजध्वम् । (२.४८11) यह पीरोंका संघ अपने सगान निवासस्थलसे एकही उत्तम दूध देनेहारी गोको प्राप्त करो और दुइ सम्म समय बाहर निकल आया, एन पानेकी भारी शाहिसे इसपरम भरनेभाग गौने चन्मुक्त भोट दो। था। सकते।

(३२८) या स्वभानवे शाप भमृत्यु भ्रवः घुक्षत, (३३८) यषु कृष्णु,मक्षु अया, त उग्रान् भषयासत् । (रु. ६६५) सुराणां मुळीके सुम्नः एययावरी । (. ६४८1१२) जो गौ, सेजस्वी बौसके संघको भमर शक्ति देनेवाला जिममें शत्रुविनाशक पर है और बी मुरम्यही मला दूध देती है, वह शीघ्रप्रया कार्य भरनेचारे पीरीके मुरके परते है, ऐसे धीर सैनिक शशुओंको पददपित कर देते है। लिए भनेक प्रकारोसे सरक्षण नेपाली बनती है। भले ही भीषण हो। (२२९) भरद्वाजाय विध्यदोहसं धेनं विश्वभोजसं (२३९) ते शवसा उपा कृष्णुसेनाः युजन्त इत् । इपंच अवधुक्षत । (*. ६४८१३) एयु अमवत्सु सशोचिः रोका न मा तस्थौ । जो भवन दान पूर्णतया करता है, उसे पविया दुधार (ऋ. ६६६६) गौ और पुष्टिकारक भर यथेष्ट दे दो। बेमपो बसे पई शुर था साहसी सैनिक साय (३३०)मुऋतुं मायिनं मन्नं सृप्रभोजसं आदिशे स्तुपे । लेकर हमला पदापाले वीर हमेशा तैयार रहो है। इन (I४८1१४) सलिए वीकी राह में स्मारट दार सके, ऐमा सेजस्थीति. भच्छे कर्म करनेहारे, फुशल, मानन्दयर्घक, भन्न देनेपा- स्पर्धा कोई भी नहीं मिता। धीरकी मैं स्तुति करता है, ताकि यह हमारा मानापमा १३४०) या यामः अनेनः अनभ्यः अरथीः अधि । प्रदर्शक बने। अनवसः भनभाशः रजस्तूः पथ्याः वियाति । १३३१) त्वे अनर्वाणं शर्धः पसु मुघेदार, यथा (अर. ६१६६७) चर्षणिभ्यः सखा साकारिषत्, गूळ्हा वसु आधिः- तुम्हारा रथ निदोष है और चोटी बचा सारथिक न रहने फरत् । (ऋ. १४८११५) परमी घेगपूर्वक जाता है । रक्षण के साधन या लगाम न शेजस्वी शत्रुरहित पर प्या घन मिट जाय, उसी प्रकार रहनेपरभी पह रथ गई प्रदाता हुभा गहपरसे चला जाता सारे मानयों को हजारों प्रकारफे धन मि मौर छिपा पहा धन प्रकट हो। (३४१) वाजसातौ यं अपय, अस्य वर्ता न, तरुता (३३२) यामस्य प्रनीतिः सूनृता धामी। नास्ति । सः पाय दर्ता। (म. ६१४८४२.) (र. ६६३८) धन प्राप्त करनेकी प्रणाली सस्य एष प्रशस रहे, तोही रडाई में जिसे मुम पचाते हो, एसे घेरनेवाला कोई नहीं, ठी1 विनष्ट करनेवालाभी कोई नहीं भोर पर पुदमें शत्रुओके (३३३) त्वे शपः पुनह ज्येष्ठं । ( १९६६1) गोंको फोट देता है। तेजस्वी पल शत्रुका मारक नहरे, तोही वह भेट है। (३४२) ये सहसा सहांसि सहन्ते, मखेभ्यः पृथिवी [वृहस्पतिपुत्र भरद्वाज प्रापि।] रेजते, स्वतयसे तुराय चित्रं अफै प्रभरध्वम् । (३३५) अरेणवः नृम्पैः पीस्येभिः साकं भवन् । (ऋ. ६१६६९) (ऋ. ६.६६२) जो भपने पलॉसे शत्रुदलफे भाक्रमणोंको रोकते हैं, उन निपाप चोर घुद्धि घ्या सामथ्र्योसे पूर्ण यने रहते हैं। पूज्य वीके सामने यह पृथिवी थरथर कॉपने लगती है। (३३७) अन्तः सन्तः अयद्यानि पुनानाः अयाः जनुपः सराहना करो। धन बलिष्ठ तथा परापूर्वक कार्य करनेवाले पीसकीही नईपन्ते, धिया तन्यं अनु उक्षमाणाः शुचयः जोपं अनु नि दुहे। (र. ६३६४) (३४३) त्विषीमन्तः पुष्यघसः दिद्युत् अत्रया समाजमें रहकर दोषीको हराते हुए पवित्रताका मृजन शुनयः भ्राजत्-जन्मानः अघृष्टाः। (ऋ. ६६६६11.) करते हुए पीर मपनी हलचलोंसे जनतासे दूर नहीं जाते हैं। तेजस्वी, पेगपूर्वक जानेपाने, प्रकाशमान, पूर, पत्रुको घे धनसे अपने शरीरीको पलिष्ठ बनाते हुए पक्ष पविन होते हिलानेपाछे वीर है, जिनका पराभव करना शत्रुके लिए हुए सरका मानन्द बनाते रहते हैं। घूमर है। .

भती अस्तु। (३४४) वृधन्तं भाजष्टिं आधिवासे । शर्धाय उमाः सत्यसे चिपकनेवाले, पवित्र जापन धारण करनेवाले शुचयः मनीषाः अस्पृधन (भा ६।६।११) पवित, शुद्ध वीर सरल राहसे सचाई प्राप्त करते है। पठनेवाल तथा तेजःपूर्ण इथियार धारण करनेवाले चीर (३५७) अंसपु सादयः, वक्षःसु रुक्माः उपशिथिल स्वागत के लिए सर्वथा योग्य है । एल बढानेका हेतु सामने याणा, रचानाः आयुधैः स्वधां अनुयच्छमानाः ! रख ये धीर पवित्र धुडिसे युक्त हो, पारसरिक होप या (मः ॥५६॥३) स्पर्धामगे रहते है। रूवापर भाभूषण, छावीपर हार पटकानेवाले, चेजस्वी [ मित्रावरणपुत्र वसिष्ठापि ।] वीर हथियार लेकर भपना पर बताते है। (३४७) स्यपूभिः मिथः अभिवपत्त। पातस्वनसः (३५८) या युन्या महासि प्रेरते, नामानि प्रतिरध्वं, यस्पृधन् । (5 ५६०३) एतं सदनियं दम्यं गृहमेघीयं भागं जुपध्वम् । भपने पवित्र विचारोके साथ ये वीर इकटे होते है भौर (3 1411४) भीषण गर्जना करते हुए एक दूसरेसे स्पर्धा करये है। तुम वीरोफे मौलिक बल प्रकट होते है, अपने यशाको (३४८) धीरःनिण्या चिकेत,मदी पृश्नि ऊध अभार पडामो, एन सहनो गुणों से युग घरेस याडिक प्रसादका (ऋ. ५६४) सेवन करें। पुदिमान धीर गुप्त पाताको नाइ सकता है। बढी गौ भपने (३५९) याजिना विमस्य सुवीर्यस्य रायः मक्षु दात घेके धसे इन वीरोका पोषण करती है। अन्यः भरावा यं आदभत् । (3 ५६९) (३४९) सा घिद सुपीरा सनात् सहन्ती नृम्णं पुप्य. घलयान ज्ञानीको पब्मिा पीर्ययुफ धन तुरन्त दे दो, (७५६५) नहीं तो दूसरा कोई शत्रु शायद उसे छीन के जार। घर प्रजा भाडे घीसे युक्त होकर हमेशा शत्रुका पराभप करनेवाली तथा पल बढानेवाली हो जाय। (३६०) सु-अञ्च. शुभ्राः प्रक्रीळिन: शुभयन्त । (५६१) (३५०) यामं येष्ठा, शुभा शोभिष्ठाः,श्रिया संमिश्ला, भोजोभिः उग्राः। घे वीर गतिमान, शोभायमान, साफसुथरे पीर लिगढी (५६६) पने हुए हैं। ये पीर हमला करनेके लिए जानेवार, भलंकारोसे विभूपिठ, कोतियुक्त तथा सामध्यं से भीषण है। (१६१) दशस्यन्तः मुमके परिघस्यन्तः मृळयन्तु । (३५१) व ओजः उग्र, शयांसि स्थिरा, गणः तुधि- (७.११७) मान्। (अर ७५६७) सत्रुविनाशक, स्थायी सहारा देनेवासे वीर जनताको सुम घोरोका मल भीषण है, तुम्हारी शतियाँ स्थायी है सुख दे । भौर सघ सामर्थ्यवान है। (३६२) ईचतः गोपा अस्ति, सः अद्याधी। (३५२) चः शुभम शुभ्रः, मनांसि अध्मी, धृष्णोः शर्ध- (1५111) सधुनिः। (अ. ७५६८) जो प्रगतिशील लोगांका सरक्षण करनेवाला हो, पह तुम्हारा पल दोषरहित तुम्हारे मन क्रोधयुक्त और मनमें एक बात भीर घाहर उपौर ऐसा पनि नहीं तुम्हारी शनास फरनेकी शकि घेगयुक्त है। करता है। (३५५)सु-आयुधास इमिणा मुनिष्का. स्वयं तम्यः (३६३) तुरं रमयन्ति, इमे सह. सहसः आनमन्ति, शुम्भमानाः । (ऋ ७५६११) इमे शर्स वनुष्यतः नि पान्ति, अररुपे गुम दे (५६९) बडिया हथियार धारण करनेवास, घेगपूर्वक जानेहारे दधन्ति । भौर अपने शरीरोंको पनापसिंगारद्वारा सुशोभित करने- ये स्वरापूर्व कार्य करनेवालोंको भानन्द देते है, भपणे पाले मेंसे ये धीर मरत हैं। सामय से बलिष्ठोंको शुभाते है, वीरगाथाभोंके गायन. (३५३) ऋतसाप. शुचिजम्मानः शुचयः पायकाः कर्ताको पधावे हैं भार दर्शाद है कि, घे ऋतेन सत्यं आयन् । (५६१२) क्रोध करते है। मार (हि)२९ सपर भारी ।

(३६४) इमे र_ जुनन्ति, भृमि जुषन्त, तमांसि भपनी शोभाके लिए समान वीरभूवा सुखपूर्वक कर लेने अपवावध्वम् । ( १५६२.) ये चीर परिशोंके निष्ट से पाते हैं,उसी प्रकार भाद- (३७४) अनवद्यापः शुचयः पावकाः रणन्त, नः मैंग्रे समीप मी पछे लाते हैं ये मंधेग दूर करते हैं। सुमतिभि प्रावन, न वाजेभिः पुष्यसे प्रतिरत । (ऋ. १५५) (३६५) यः सुजातं यत् ई अस्ति, स्पार्हे पसव्ये नः भामतन। (तु. ७५६२) प्रशमनीय, शुद्ध, पवित्र बनकर वीर रममाण होते हैं। तुम्हारे समीप पो उथ कोरिया धन है, इस स्पीय भपने अच्छे विचाराने हमारी रक्षा कीजिए भार महासे संपत्ति में हमें सहमागी परो। पुष्टि मिक मान इस इंसु सारे मंण्टोंसे पार ले चलो। (३६६) यत् शूराः जनासः यहीपु ओपर्धषु विक्षु (३७५) नः प्रजायै अमृतस्य प्रदात. सूनृता राय: मन्युभिः को हनन्त, अ५ पृतनापुनः त्रासारः भूत। मघानि जिगृत । (र. १५६) ( १९६२२) हमारी मतानके लिए अमृतरूपी भ दे मानन्द जब पीर सैनिक नदियों में, यनोंमे तथा जनताके मध्य दारक धन तमा सुखवैमरा भी दान करो। दष्टे उत्साहसे शत्रुदयपर टूट पाते हैं, तब उन युटोंमें सुम (३७६. विश्वे सतातासूरीन् यच्छ ऊत्ती आजिगात हमारे रक्षक बनो। ये त्मना शतिनः वर्धयन्ति । (ऋ. १९७७) (३६७) उनः पूतनामु साहा, पर्वा पाजं सनिता 1.७५६।२३) ये सारे वीर इस यज्ञमें शानियोंके समीर माचे अपनी धो कम सस्पषाला धीर है, यह एसाई में शत्रुओंको संरक्षक शक्तियोसहित मा जाय, श्योंकि ये स्वयही कहो जीपमा है भार घोपानी युद्ध में भरना पस दर्शाता है। मानवोंका संवर्धन करते है (३६८) य. वीरः असु-र अनानां विधर्ता शुप्मी (३७७) यः दैव्यस्य धानः तुविष्मान् , साफ-उक्षे भरतु । येन सुक्षितये थपः वरेम, अध स्यं भोकः गणाय प्रार्चस, से अयंशात् नितेः क्षोदन्ति । यभि स्यामा (ट. ॥५६।२४) (ऋ. १५) जो धीर भएमा बीपन पति का नताश सरक्षण यो दिन्य स्थान पानसा है, उस सामुदायिक पलसे माता है, पर बलपान बन जाता है। उसकी सहायताये पुक पोरोंके एसकी पूमा कोरेपीर पंशमानरूपीभीपण प्रशाा मन्छा निवास हो, इसलिए समुद्रकोभी शेरधर सापत्तिसे हमें पाते हैं। पर चाय भीर सपने परपर सुतक हैं। (३७९) गतः अध्या जन्तुं न तिराति । नः स्पाहाभिः (३६९) यूयं स्पस्तिभिः सदा नः पाप्त । ऊतिभिः प्रतिरेत। (ऋ. १५८३) (3. ७५६२५) जिस मार्गपर पीर पर पुके हों, यहाँ किमीकोमी कष्ट तुम हमारी का इमेशा कल्याणकारक मागासे कासे नहीं पहुंचता है, (समी उभर प्रसव हो उठते है. रहो। मीब रक्षनों से हमारा संयम करो। (३७०) यत् उग्राः पयामुः, ते उवा रेजयन्ति । (३८०) युप्मा-ऊतः विप्रः शतस्थी सहनी, युप्मा- (५) अतः मर्या सहुरिः, युमा ऊतः सम्रार घृनं हन्ति, पोएर मुवनापर पारा करते है, ममिको रिपारखे है। तात् देणं प्र अस्तु । (३.५४) (२७२) रुक्मः पायुधैः तनूभिः यथा भ्राजन्ते न भी संशज में रहकर ज्ञानी पुरुष संकटो तथा सह. एलायधन्ये विभ्यपिशः पिशानाः शुमे समान भाभि पनाको प्राप्त करता है. बोका परमण मिलनेपर अजि कं आ धम्जते । (न. ५७३) दोहा विधी पमता है मौर धीगेकी रक्षा पानेपर नरेशभी मागों, इथियारों सपा सरीमोंसे ये पीर सैनिक शव पराभव करता है । वीर पुरुष हमें यह दान है। मिस वर मुहाने टगते है, वैसे दुसरे कोइभी नजग. (३८२) शेपः आगत् चित् युयोत (ऋ. १५८६) गगा है। मछी भाँति साजसिंगार नेवासे वीर परत शत्रु दूर है, तभीतक उसका विनाश करो। .

- (Ace) य: द्विषःतरति, साक्षयं प्रतिरते। (800) प्रात गोमतः अस्य सुतस्य जोपं मत्सति । (R.५५४२) (TRY) जो शत्रुका परामय करता है, मह भपने विनाशके परे सुप वृष मिलावर तयार किये हुए इस सामरम- पळे शाता है, माने सुरक्षित बन जाता है। का पान करनेपर भागन्दयुक्त उEALE पता है (३८६) यसै अराध्य, या अतिः पृतनासु नदि मति। (४०१) पूतदक्षसः सूरयः निधः अर्यन्ति । । ९.) (९४७) गिसे तुम अपना संरक्षण मेरो हो, उसका विनाश युदामें बलवान, शानबान तथा शत्रुविनाशक वीर हमारी भोर तुम्हारे संरक्षणासे नहीं होता है। भाते है। (३८९) तन्वःशुम्भमाना हमासः मदन्तः आ भपतन्, (१००) दस्मवर्चसा महानां अयः अद्य पृणे । विश्वं शर्धः मा अभितः निसद। ( ५९७) (८१९०८) अपने शरीरीका मुहाने वाले ये वीर सपंछियोंकी नाई सुन्दर एवं से वीरोकी रक्षाकी गभान याचना करता कतारमें रहकर प्रसवतापूर्वक संचार करते भा पहुंचे हैं। उनका यह मारा बल मेरे चारों भार साक्षणार्य रहे। ४०३)ये विनापार्थिवानिभापमथन्, मोमपीतये । (३९०) यः दुईणायुः न चित्तानि अभि जिघांसति (50) सामुह पाशान प्रतिमुचीष्ट, संहन्मना हन्तन । जिन्होंने सारे पार्विध क्षेत्रमा विस्तार गया है, उन ( ५/५९८) पीको सोमपानके लिए पुराता है। जो दुष्ट शनु हमारे अन्त करणारी चोट पहुँमा हे तथा पारस्परिक गोठ के भाप इममें फैगयेगा, उसे तुम (४०४) पूतदक्षस. सामरय पीतये हुधे । मार डालो। ( ८१९४१.) (३९२) युष्माक ऊती भागत.मा अपभूतन । यलिए दोरीको मोमपानके लिए ला हूँ। (ऋ ५/५९४१०) [ भृगुपुन स्यूमरश्मि ऋपि। भुम अपनी संरक्षक माफियों के साथ मारे समीप भायो (४-७) मईने अस्तोपि, न शोभसे । ( 111011) मार हमसे दूर न हो जाओ। जो योग्य है, उनवीही स्तुति करता है, विवारी (३९४) विक्षु विसिष्ठध्वं, ये वय. भूत्वी नकभिः टोमटाग या मजयके कारण फनी सराहगा न करूंगा। पनयन्ति, ये रिपा दधिरे, रक्षसः इच्छत, गृभायत, (४०८) मर्यासः श्रिये अनि अरुरत, पूर्वी क्षपः सपिनटन। (ऋ. १०८) (४ 101003) प्रजाभोंके मध्य नियास को, जो पेगवान पर रायो- न अति । थे वीर शोभाके लिए गणवेश पहनते हैं। पददी समय हमके चढाते हैं, तथा जा इस्पात मचा देते हैं, उन राक्षसों को सकर पमड लो और उनका विनाश बागे। घातक या हत्यारे,शत्रु इदे परास्त गर अमाते । [मिन्दु या अंगिरसपत्र पूतदक्ष ऋपि ।] (४०९) ये रमना यहणा प्रसिरिने, पाजस्वन्तः पनस्य. (३९५) माता गौः धयति, युक्ता रथानां यहिः। यः रिशादस अभियवः। (४१०१७॥३) जो अपनी दागिसे यहे पन पाते हैं, वीर TIन, (प्रा. ८९४१) गोमाता दूध पिलाती है, उस युग्ध संयुक्त हो धीर राफे प्रशंसनीय अरिनाशक यं नमी होते हैं। संचालक पनते हैं। (४१०) युप्माकं मुन्ने महो म यिधुर्यति, थति, (11) (१९७) नः विश्ये अर्यः कारयः सदा तत् सा प्रयस्वन्तः सयाचः आगन । गृणन्ति। ( १९४it) सुम मौरीके पैरों मीली भूमि पिकं हमीदी नही, हमारे सभी फंड कारीगर संघ इस उत्तम पछी हिम्न सन्धमान हो उठती है। उदारचेता धीरोंके समय मटी भाँति सराहना करते हैं। तुन समीइ होइघर पधारो। । .

(४११) यूयं स्वयशसः रिशादसः परिगुपः (४१४) ते ऊमाः यशियासः शंभविष्ठाः, रयत्महः प्रसितासः। (8.01७५) चकामानामनीपां अयन्तु । (ऋ. 1015) सुम यशस्वी, मार, पोषक तथा हमेशा तैयार रह. चे रक्षा करनेहारे पीर पसनीय तथा सुख घेनेवाले हैं। मेवाले वीर हो। स्थमसे स्वरापूर्वक ज्ञानेहारे ये चीर महाय. पाते हैं। ये (४१२) यूयं यत् पराकात् प्रवाहध्ये, महा संघरणस्य हमारी भाकांक्षाभोंकी रक्षा करें। राध्यस्य चस्वः विदानासः, सनुतः द्वेपः भारात् (४१५) विप्रासः सु-आध्यः सुगमसः सुसंदशः चित् थयोत। (ऋ. १०७७१) घरेपसः । (5. ११७) तुम जब दूरसे पेगपूर्वक माते हो, तो पटे स्वीकारने वे वीर ज्ञानी, भच्छे विचारपाटे घटिया फर्म करनेहारे, योग्य पदिया पनका दान करो और दूर रहनेवाले वेटामा- प्रेक्षणीय भौर निप्पाप है। को दूरसेती खदेड दालो। (४१६) ये रक्मयक्षसः स्पयुजः सद्यऊतयः, ज्येष्ठाः (४१३) यः मानुपः दाशत्, सारेवत् सुधीरं चयः मुशर्माणः ऋतं यते सुनीतयः। (ऋ. १०७८०२) दधते, देवानां अपि गोपीये अस्तु ।, (फ. Solums) जो वक्षःस्थलपर माका धारण करने वाले, अपनी अन्त:- जो मानघ दान देता है, पर धन एवं वीरांसे पूर्ण भर. स्फूर्तिसे काममें घटनेपासे, सुरम्त रक्षाका भार उठानेवाले को पाता है और पक्ष मोंके गोरसपान के मौकेपर उपस्थित तथा भेठ सुख देनेघाले पीर होते है, वे सीधी राहपरसे पहनेगोम्म मनवा है। चरमवाटको उच्च कोटिया मार्ग दिखाते हैं।

२२८ (अ) . (३१७) ये धुनयः, जिगत्नवा,विरोकिणः, वर्मण्वन्तः, (४२४) पृश्निमातरः, गुमं-यावानः, विदथेषु जग्मयः शिमीवन्ता, सुरातयः । (ऋ० १०1७८३) मनवः, सूरचक्षसः, अवसा नाइह आगमन् । ये चीर शादलको विकंपित करनेहारे, वेगसे आगे (वा. य. २५।२०) बढनेवाले, तेजस्वी, कवचधारी, शिरोवेएनसे युक्त हैं तथा मातृभूमिके उपासक, अच्छे कार्य के लिए जानेवाले, बढे अच्छे दानी भी हैं। युद्धोंमें भागे बढनेवाले, विचारशील, सूर्यतुल्प तेजस्वी, अपनी शक्तिके साथ हमारे निकट इधर मा जाय। (४१८) ये सनाभयः, जिगीवांसः शूराः, अभिद्यवः, वरेयवः सुस्तुभः । (ऋ०१०।७८४) (४२९) यदि आशयः रथेषु भ्राजमानाः आवहन्ति, ये वीर एकही केन्द्र में कार्य करनेहारे, विजयग्छु शूर, तत्र श्रवांसि कृण्वते । ( साम० ३५६) तेजस्वी, अभीष्ट प्राप्त करनेहारे हैं, इसलिए स्तुतिके सर्वथैध जहॉपर स्वराशील स्थी धीर चले जाते हैं, वहीं वे भौति- (४१९) ये ज्येष्ठासः, आशयः, दिधिषयः सुदानयः, भौतिके धन प्राप्त करते हैं। जिगलयः विश्वरूपाः। (र. १०७८१५) (४३१) नः तनूभ्यः तोकेभ्यः मयः कृधि । ये वीर श्रेष्ठ, स्वरापूर्वक कार्य करनेहारे, तेजस्वी, उदार, ( अर्य. ११२६) बडे वेगसे जानेवाले हैं तथा भनेक रूप धारण करनेवाले हमारे शरीरोंको और पुत्रपौत्रोंको मुखी करो। योग्य हैं। (४२०) सूरयः, आदर्दिरासः, विश्वहा, सुमातरः, (४३३) पृश्निमातरः उग्राः यूयं शदून प्रमृणीत । क्रीळयः यामन् विपा। (अथर्व १३॥१॥३) (र. १०७८६) मातृभूमि के उपासक वीरो तुम शत्रुओका विनाश करो। ये धीर विद्वान, शत्रुको फाडनेवाले, सभी दुश्मनोंका वध करनेवाले, अच्छी माताके पुत्र खिलाडी तथा चढाई (४३४) उग्राः यूयं ईदृशे स्थ, अभि प्र इत, मृणत, करतेसमय सुहाते हैं। सहध्यं, इमे नाथिता. अमीमृणन् । पपां विद्वान् दूतः प्रत्येतु। (४२१) अनिभिः वि अश्वितन्, ययियः, भाजद्दष्टयः, (अथर्व०३।१२) योजनानि ममिरे (अ. 101010) तुम शूर हो और ऐसे बडे युद्ध में कार्य करते रहते हो, धीरभूषणों से सुदानेवाले, वेगपूर्वक जानेहारे, तेजस्वी शग्रुपर भाक्रमण करो, दुश्मनका घष करो, उसे पास्त इथियार धारण करनहारे ये चीर कई योजन दौरते चले करो, सेनापति से युक्त ये वीर दुश्मनोंका वध कर लें। इनका जो दूत विद्वान हो, पही शत्रुसेना के समीप पळा जाए। (४२२) अस्मान सुभगान सुरत्लान् कृणुत । (ऋ० १.१७८८) (४३४.१) सेनां मोहयतु, ओजसा मन्तु, चक्षुपि हमें उत्कृष्ट भाग्यसे युक्त वथा अच्छे रनोंसे पूर्ण करो। आदत्तां, पराजिता एतु। (वीर भली भांति रक्षा करके जनताको धनधान्य से युक्त (अथर्व १६) शत्रुसेनाको मोहित करो, वेगपूर्वक हमले करो, शत्रु. (४२३) रिशादसा हवामहे । (वा. य. ३४४) सेनाकी रष्टिको घेर लो, यह परास्त होकर दोस्ती चली शत्रुके विनाशकठो वीरोंकी सराहना करते हैं। मरुत् (हि.)२९ (अ) जाते हैं। करें।) जाए।

२०८ (ला) सवार करते हैं। (४३५) असौ परेपा या सेना भोजसा स्पर्धमाना (४४३) ते ईशानाः चरन्ति । (अथर्व ४५२७४) अस्मान् अभ्येति, तां अपनतेन तमसा दे वीरसनिक अधिपति था स्वामी बनकर संसारमें विध्यत, यथा एप अन्य. अन्यं न जानात् । (अथर्व ३२६) यह जो पावसेना वेगपूर्वक चढाउपरी करती हुई इम- (४४४) ते कोलालेन घृतेन च तर्पयन्ति । (०४॥२४५) पर टूट पड़ती है, उसे तमस्-अससे विध टालो, जिससे वे घे अपरस और तसे सबको तृप्त करते है। किंकर्तव्यमूढ होकर एक दूसरेको पहचान न सकें। (इस भांति शत्रुसेनापर हमले करने चाहिए।) (९४६) तिग्मं अनीकं सहस्वत् विदितं, पृतनामु उग्नं स्तोमि । (अथर्व० ४।२७) (३६) पर्वतानां अधिपतयः अस्मिन् कर्मणि मा अवन्तु। शरोंकी सेना विरोधियों का पराभव करनेमें विख्यात है। (अथर्व० ५।२४६) पहा के रक्षणकता धीर इस कके अवसरपर मेरी युके समय यह पराक्रम कर दिखलाती है, इसलिए मैं इनकी सराहना करता हूँ। रक्षा करें। (४३७) यथा अयं अरपा असत्, प्रायन्ताम् । (४४७) ते सगणाः, उरक्षयाः,मानुपासःसान्तपनाः (अर्व ३३४) मादयिष्णवः। (अथर्व . १८२३) जिस प्रकारसे यह मानव निदोषी होगा, उसी दंगसे घे वीरसैनिक संघ बनाकर रहते हैं, बटे घरमें निवास इसका संरक्षण करो। करते हैं, मानधोंका हिस करते हैं, शत्रुनाको परिताप देते हैं भार अपने छोगों को प्रसन्नता प्रदान करते है। (४३८) यत् पजध, तम ऊज सुमति पिन्वय । (अथर्व० ६।२२।२) (४५०) ये सुखेपु रथेषु मातस्थुः, वः भिया पृथिवी जिधरभी तुम चले जाभो, उधर पाठ तथा सुमतिकी (ऋ. ५/६०२) पुदि करो। ये धीर मुखदायी रयों में पैरकर पात्रा करते हैं और इन Kee) ते नः अंदसः मुश्चन्तु, इमं या अपन्तु । के भयसे पृथ्वीतक कॉप उटती है। (अथर्व• ४१२) वेधी सनिक में पापसे बचाएं भौर हमारे इस दल (४५१) ऋष्टिमन्तः यत् सभ्यःफ्रीळय, धबध्ये। का संरक्षण करें, (दलको पदायें।) पर्वतः विभाय। (ऋ० ५९३) तलवार जैसे हथियार लेकर जब तुम इकट्ठे हो खेलना (४४१) पृश्निमातृन पुरोधे । ( अथव० ४॥२॥२) सुरू करते हो, ब म दौर ने ऐसी दशा में पहाटवक मातृभूमिको उपासना कानेहारे वीरोंको में भरपूजाका भयभीत हो जाता है। सम्मान देता हूँ। (४४२) ये कवय धेनूनां पयः ओपीनां रसं भयंता (१५२) रैवतासःयरा व हिरण्यै तन्यः अभिपिपिथे, अयं इन्वय ते नः शम्माः स्योनाः भवन्तु । धेयांसः तवसाथिये रथेपु, सत्रा तनूपु महांसि (अथर्व. ४/२०१३) (ऋ. ५/६०४) जो ज्ञानी धीर गोग्य और भौषधियों का रस पी रते धनयुक्त दूल्होंकी नाई ये घोर अपने शरीर सुपर्णा- हैं या घो का वेग पाते हैं, वे शीर में सामथ्र्य देकर स्कारों से विभूषित करते हैं, तब धेय, एक और पा सुख देनेवारो। रयमें बैठनेपर इनके दारोंपर दीख परते है। - रेजते। . चक्रिरे।

२२८(इ) कारण सौभगाय सं वावृधुः। शुप्म अर्चन्ति । (४५३) अज्येष्ठासः अकनिष्ठासः एते भ्रातरः पलसे होनेके का पूर्ण विनाश कर (ऋ० ५।६०१५) देते हैं। ये वीर परस्पर भ्रातृभाव से बर्ताव रखते हुए अपना (४७९) दुःशंसः न मा ईशत । (ऋ. १।२३।९) ऐश्वर्य पानेके लिए मिलजुलकर प्रयत्न करते है और यह दुरास्माका शासन हमपर कभी प्रस्थापित न हो। इसीलिए संभव है कि इनमें कोईभी श्रेष्ठ नहीं या कनिष्ठ भी नहीं, भात् सभी समान हैं। (४८०) सवयसः सनीळाः समान्या वृपणः शुभा (र. १६५१) (४५४) यत् उत्तमे मध्यमे अवमे स्थ, अतः नः । (६० ५६०६) समान अवस्थाके, एक घर में रहनेवाले, समान दंगसे उत्तम, मशळे या निम्न स्थानमें जहाँ कहींमी तुम हो, सम्माननीय होते हुए ये बलवान वीर शुभ इच्छासे बलकी वहासे तुम हमारे निकट चले भाभो। पूजा करते हैं। (४५५) ते मन्दसानाः धुनयः रिशादसः वामं धत्त। (१८४) वयं अन्तमेभिः स्वक्षभिः युजानाः, (२०५।६०10) तन्वं शुम्भमानाः महोमिः उपयुज्महे । घे धर्पित रहनेवाले पौर, शयुको पदभ्रष्ट करते हैं और (क्र. १३१६५।५) उनका पध करते हैं । ये हमें श्रेष्ठ धन दे दें। हम वीर अपनेमें विधमान निजी शूरवासे युक्त होकर भपने शरीरोंको शोभायमान करते हैं तथा सामथ्र्यका (४५६) शुभयद्भिः गणधिभिः पायकोमिः विश्व- उपयोग करते हैं। मिन्वेभिः आयुभिः मन्दसानः । (ऋ. ५६०1८) (१८५) अहं हि उग्रः, तविषः तुविष्मान शोभायमान संघके कारण सुशोभित होनेवाले और विश्वस्य शत्रोः वधस्तैः अनमम् । मयको पवित्र करनेहारे, उत्साहपूर्ण एवं दीर्घ जीवनसे (ऋ. १:१६५५६). युक्त होकर सपको आनन्दित करो। शूर तथा पलिष्ठ हूँ, इसलिए मैंने सारे भानुभों को (४५७) अदारसृत् भवतु । (अथर्ष० १॥२०॥) शुका दिया है। इस कार्यको हथियारोंसे पूर्ण कर डाला शत्रु अपनी परनीके निकटभी न चला जाए, (शीघ्रही है। विनष्ट हो।) (४८६) युज्येमिः पास्येमिः भूरि चकर्थ । (ऋ. ११६५७) नः मृडत- हमें सुख दो। उचित सामयोंके सहारे तुमने बहुत सारे पराक्रम कर अभिभाः नःमा विदत् । शत्रु हमें न मिले । दिसाये हैं। अशस्तिः द्वेप्या वृजिना नः मा विदन् । अकीर्ति और निन्दनीय पाप हमारे समीप न आयें। मत्वा भूरीणि कृणवाम हि पुरुषार्थ एवं भयानों (४६७-१७२) भगुहा, उग्रा, ओजसा अनाधृष्टास, की सहायतासे हम बहुत कार्य करके दिखलायेंगे। शुभ्राः, घोरवर्पसः, सुक्षत्रासा, रिशादसः। (ऋ. १।१९१३-८) (४८७) स्वेन भामेन इन्द्रियेण तविपः बभूवान् । (ऋ. ११६५/०) पे वीर किसीसे विद्रोह नहीं करते, शूर हैं, पहुत पल- अपने रोजसे और इन्द्रियाँको शक्तिसे मैं बलवान हो पान होने के कारण कोई इन पराभूत नहीं कर सकता है, गौर वर्णवाले तया दृहदाकार बारवाले हैं, भच्छे क्षान- चुका हूँ।

२२८ (ई) (४८) ते अनुत् नकिनु आ त्वावान् विदानः (४९६) उग्रेभिः स्थविरः सहोदाः नः श्रवः धाः। न अस्ति;यानि करिप्या कृणुहिनजायमानः (ऋ. १७११५) न जातः नशते । (ऋ. १११६५।९) शूर वीर सैनिकोंसे युक्त होकर और हमें बल देकर मेरी प्रेरणाके बिना कुम्भी नहीं अस्तित्व में भावा इमारी कीर्ति बढा दे। तेरे समान दूसरा कोई ज्ञानी नहीं है। जिन कन्याको (१९७) त्वं सहीयमः नृन् पाहि । (ऋ. ११०१६) तू करता है, उन्हें पूर्ण करना किसी भी जन्मे हुए तथा तू बलवान वीरों का संरक्षण कर । जन्म लेनेवाले मानवके लिए असंभव है। अवयातहेळा: सुप्रफेतेभिः ससहिः दधानः इपं (४८९) मे एकस्य ओज. विभु, या मनीपा दधृप्यान, बृजनं जीरदानुं विद्याम! क्रोध न करते हुए उत्तम ज्ञानी वीरोंसे सामथ्र्यवान कृणवै नु । अहं हि उग्रः विदानः । यानि च्यवं, एपां ईशे। बनकर इम भन्न, मल तथा दीर्घ आयुष्य प्राप्त करें। (ऋ. ११६५।१०) मेरे अकेलेका सामध्ये बहुत बड़ा है। जो इच्छा मनमें (४९८) आजी युध्यत । (ऋ. १९६।१४) उट सटी होती है, उसीके अनुसार कार्य करके दर्शाता हूँ। युद्ध में लडते रहो (पीछे न दौरे)। मैं शर भौर ज्ञानी भी हूँ तथा जिनके समीप पहुँचता हूँ यहाँतक हम देख चुके हैं कि, मरुतोंका वर्णन करते हुए उनपर प्रभुत्व प्रस्थापित करता हूं। मरुद्देवताके मंत्रों में सर्वसाधारण क्षात्रधर्मका चित्रण किस भाँति हुआ है। पाठक इस विवरणसे जान सकेंगे कि, (४९४) विभ्या अहानि नः कोम्या वनानि सन्तु । मरुतोंके मंत्र पढनेसे क्षात्रधर्मकी जानकारी कैसे प्राप्त हो जिर्गापा ऊर्चा । ( 1१७॥३) सकती है । इसी वर्णनको ध्यानमें रखते हुए इस मरुतों के हमेशा हमारे लिए ये धन कमनीय हो तथा इमारी काव्यमें चोरोंका जो स्वरूप बतलाया गया है, उसका उल्लेख विगयग्छा उची हो जाए। प्रस्तावनामें किया है, उसको वहाँ पाठक देख सकते हैं।

मरुत्-देवताके मंत्रोंमें नारी-विषयक उल्लेख । होती है। (२८) वासंन माता सिपक्ति । (ऋ. ११३८१८) यह पृथ्वीसक इनके पीछे पळनेवाली, बठिापर मन माया जिस प्रकार बालक को अपने समीप रखती है, केन्द्रित करनेपाली पर पीरपत्नी होनेकी तीन सालसा उसी प्रकार (पिजली मेघवृन्दफे समीप रहती है)। करनेवाली सौभाग्ययुक्त प्रजा भारण करती है- उपन (१२३) प्र येशुम्भन्ते जनयो न सप्तयः। (क.११८५11) करती है। प्रगतिशील एवं मागे पदनेकी पूर्ण क्षमता रखनेवाले (२३०) मित्रं न योपणा (मागतं गणं अच्छ) । पीर मरत ( बाहर यात्राके लिए जाते समय ) नारियों के (र.५/५१३१४) तुमय अपने भापको सुशोभित तथा भलंपूत करते है। थुक्ती जिस प्रकार प्रिय मित्र के समीप चली जाती है, (१४७) प्र एषामन्मेषु (भूमिः ) विथुरेव रेजते । ठीक उसी प्रकार (वीर सैनिकों के संघके समीप चले जाओ। (ऋ. ११८७३) (१९८) भर्ता इव गर्म स्वं इत् शवः धुः । इन पीरोके भतिवेगवान हमलोंमें भूमितक भनाथ (ऋ ५/५८७) एवं सासहाय महिलाके समाग परयर कौंप उटती है। पति जिस भाँति मोमें गर्भकी स्थापना करता है, पेसेही (१६२) रथीयन्तीय म जिहीते ओषधिः । इन पीसने अपना निजील (राष्ट्रमें) प्रस्थापित किया। (ऋ १३९।५) (३१०) वि सक्थानि नरो यमः, पुत्रकथेन जनयः। सारी औषधियामी रथमें बैठी नारीके समान वितपित (ठ ५।६३) (१७४) गुहा चरन्ती मनुषो न योपा। (नः १११६॥३) पुत्रको जन्म दो समय नारियोंको अँपाएँ जिस मकार आन्तःपुरमें संचार करती हुई मानवी महिलाको नाई मानी जाती है, पैसेही सांनी दुई भवनमाओं का नियगन घे (धीरोडी सकपार कभी कभी महश्यमी रहती है।) वीर करते हैं। (१७५) साधारण्या इव मस्त सं मिमिक्षुः । (४२०) शिशलानीळा सुमातः । (फ. १1१६७४) ( १.101) साधारण कोटिको नारीके साथ मानप जिस तरह उत्कृष्ट मातामोंके निरोगी बालकोंकी नाई वे धीर wala रखते हैं, उसी प्रकार (मनुभों की जमीनपर) मरनोंने सैनिक खिलाडी भावसे पूर्ण है। घाफर बाबी। (४३२) माता श्य पुत्रं छन्दांसि पिपृत । (१७६) चिसितस्तुका सूर्या इव रथं भा गात् । (अथर्व० ५।२६५) (म. ११६७५) माता जिस प्रकार अपने मायकांपा संगोपन करती है, क्षेत्र वारकर भी भाँति नदा गधी हुई सूर्यासायिनीक उसी प्रकार हमारे मंत्रोंका- इच्छामीका संगोपन करो। समान (रोदसी भूमि या विद्युत् ) [ पोरोंकी पानी ] रपके (४३९) तुन्दाना ग्लहा, तुम्ना कन्या इव, पर पत्या (अथर्व• ६२१३) (१७७) आ अस्थापयन्त युवति युधानः शुभे निमि. कानेपानी बिजली, नवयुवती युवकको प्राप्त करती है लां विदथेषु पनां। ( १1१६७६) घम भवयुवक पीर सदैव सधासमें रहनेपाली, बलिष्ट उसी प्रकार तुम और पतिमे भाविगित गारीके समान पुवाको- निज परनीको-शुभ मार्गम- यस मापन विकंपित होती है । मरते हो-आते हो। (१५७) अदारसत् भवतु देय सोम । (अधर्व. १.२१) (१७८) यत् ई पमनाः अहंयुः स्थिरा चित् जनी है तेजस्वी सोम! हमारा शग्र अपनी मौसमीन मिले, (E. १७) ऐपा प्रबंध या दो। निस्ट भा पहुंची। इय जाया एजाति। पहते सुभागा।

मरुदेवता-पुनरुक्त-मन्त्राः। . मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः मरतः । गायत्रो (151९) भन्या थोरः। मरुतः । गायत्री । (१॥३॥१-५) [४] अतः परिमन्नाऽऽ गहि दियो या रोचनादपि। (६] कोळं यः शङ्ख मारतं अनवाण स्थगमम् । फण्या अभिम गायत॥१॥ रामस्मिन्नुमते गिरः ॥९॥ प्रस्कण्वः धाग्यः । उपा। अनुष्टुप् । (ऋ.१४९१) [१०] प्रशंसा गोप्वथ्यं झीळं यच्छयों मास्तम् । जम्भे रसस्प बाधे॥५॥ उपो भदेभिराउ गदि दिवश्विद् रोचनादधि। पदनवारणसव उप त्या सोमिनो गृहम् ॥१॥ माशे शेरकर मस्ती (१.७२५८) दय याव अत्रेयः । महतः। मृहती । (1457) [१३] येपामग्मेषु पृथिवी जुर्जुवा इव विनिः । [२७५ ] अग्ने शन्तमा गर्ग पिष्टं रक्ममिजिभि । मिया यामेषु रेजते ॥८॥ विनों भय मस्ताप हये दिवशि ोचनादधि ॥१॥ योमरिः कावासरत । पुयुप् (२०१५) सबसः पावः । अदिन । अनार् । (Relely) [८६]अच्युता थियो अग्मना नानदति पर्वतासी वनस्पतिः । दियविद रोवनावधि आ नो गन्तं सर्विदा। भामयामेषु रेजते ॥५॥ शांभिर्थ स प्रवेतमा लोमविना ॥७॥ पम्पा धीरः। मरुतः । गायत्री (अ.११३111) मेधातिधिः पाप्यः । मरुतः । गापत्री (म. ११५०) [१६] त्ये विद् पा दो पू मिहो नपातमन्धम् । [५] मनः विरा मातुना पोनार पर्श पुनीशन | मध्यावयन्ति याममिः ॥१९ पूर्य हि हा सुवालयः ॥२॥ व्यापार अप्रियः। मरतः । बहती (8.५५६४) पुनर्वगः काम्यः । मरतः । गायत्रो (१.८1७१२) (२७८] नि ये रिणत्योजसा तृषा गावो न दुरिः । [५७] यूयं हि या मदानवो ना कभक्षणो दमे । सामानं चित्स्वयं पर्वत गिरिप्रच्याषयन्ति याममिः॥४ उल चतसो मदे ॥१२॥ टनिया भरद्वाजः विश्वेदना । अणिक ( ६५११७५) मो पौरः । मदतः । पापी (MR) यूयं हि सुदानव इन्द्रज्येष्टा ममियः। [१७) मरातो यद्ध घो पलं सना अचुव्यवीतन। पतीनो अप्वना मुर्ग, अमा॥१५॥ गिरीरचुव्यवीजन ॥ १२ ॥ पुमादी २२ । विधदेवाः । गायत्री (क.८१८३१) पुनर्वसः कालः मरतः । गायनी (14119) यूपं हि या सुदानव इन्द्रज्येष्टा मभिधयः। [५६ भरतो यद्ध वो दियः मुम्रायन्तो हवामहे । अपा चिउत ध्रुधे ॥९॥ था उप गन्तन ॥११॥ पन्यो घोर । मदतः1 गायनी (१॥३) यो घोरामात गायत्री (111) (818 (म पृथ्वये स्वेपद्युम्नाय शुष्मिणे । (२१ कर नूनं कधप्रियः पिता पुत्रं न हस्तयोः । देयत मागायत ॥४॥ दधिष्य वृत्तवादिषः । १० मेवासिपिः कश्या । इन्द. गायत्री (१३२९२७) पुनर्वधः शाम्पः । मरुतः । गापमा (८.८३१) प्रच माय निपुरेऽपादाय यक्षिणे। [३] पद नूनं कयमियो यदिन्द्रमनदातन । देव मह गायन । २७ । (इन्द्र १०६) पोवः सखित्य भौटते १३१५ . फवा पीरा । मरुतः। बृद्धती (म.११३९५) परिमन्त बानिरसा पान: गोमाजी [४०] प्रघेपयन्ति पर्वतान् वि विञ्चन्ति घनस्पतीन् । (प्र. ९/७०६) श्री भारत मरुतो दुर्मदा इस देवासः सर्वया विशा. छाशं दुधान्त स्नायन्तमक्षितं काय पपयोऽपसो वसूयव आश्रयाः । विश्वेदेवाः । गायत्री (पर.५।२६९) मनीषिणः । रागी गावो मतयो यन्ति संयत परतस्य योगा एवं महतो अधिना मित्रः सीदन्तु वरुणः । सदने पुनर्भुषः ॥६॥ देवासः सर्पया विशा॥९॥ पुनरसः काण्वः 1 मरुतः । गायनी (प्रा.6103) गोधा गोतमः । महतः गती (४२) [४९) पन्ति मरुतो मिह प्र वेपयन्ति पर्वतान् । [११९' पृ पावक पनिनं विचर्षणि सदस्य मुलुपमा यद्यामं यान्ति पायुभिःen गृणीमसि । रजरतुरंपरा मारतं गणराजीपिणं पण रात प्रिये ॥१२॥ कम्वो धीरः । मरुतः । सतोवृहती (ऋ. १॥३९॥६) पार्हस्पत्यो भारताः । गमता । मिष्टुप् (२.६६६11) [४१ । उपो रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं प्रष्टिइति रोहितः। (३४४] ते पृथतं मारत भ्राजष्टि सनस्य सूनुं घसा आ पो यामाय पृथिवी चिदनोद थवीभयन्त मानुषाः ॥६॥ चियाये। दिवाय शीय शुचयो मनीषा गिरयो नाप गोतमो राहगणः । गहतः । त्रिष्टुप् (प्र.11८५५) उमा भरधम् ॥१२॥ १२७) प्रयदरयेषु पृपतीरयुग्ध्यं याजे मदमस्तो रहयन्तः। उतारपस्य विष्यन्ति धारा: चर्मेवोदभिर्युन्दन्ति भूम ॥५॥ नोधा गीतमः । मस्त जगती (प्रा.११६४१३) पुनरिया काण्वः । मरुतः । गायत्री (बर 19२८) [१०] प्र नू स गतः शवसा जनों अति तरमी पनी मातो [७३] यदेषा पती रथे प्रष्टिर्वहसि रोहितः। यमायत सद्विाज मरते धना नृमिरापुर पान्ति शुमा रिणापः ८0 मनुमा ति पुष्यति ॥१३॥ गरत्यो गंगावणिः । महराः। जगती (१.१६६८) पण्यो घोरः । मरुतः । सतौबृहती (अ.१॥३९॥७) [१६५] शतभुजिभिस्तमभिदुतेर पान भी रक्षता मयसो [१२] था वो मक्ष तनाय कं रमा अयो पृणीमहे । यमायत । जनं यमुमारास विरटिशनः पाथमा सार गन्ता नूनं नोन्यसा यथा पुरेरथा कवाय विभ्युपे ॥७॥ समयस्य पुदिपु ८० कम्बो पारः पूषा । गायनी (R.१४२५५) गृत्समदा शौनकः । मामणस्पति जगतो (वर. २।२६।३) आ तर ते दस मन्तुमः पूषन्नयो घृणीमहे । रा इसनेन र विशा रा जन्मना रा पुजि भरते येन पिसनचोदयः ॥५॥ धना नृभिः । देयाना यः पितरमा विवाग्रति प्रदामना नोचा गौतमः । मरुतः । जगती (.६४१४) हरिया प्रमाणपतिम् ॥३॥ (११२] चित्ररमिभिर्यपुपे व्यसते वक्षःम रुपमा अघि बेसिरे मुवधाः शशीयः । इन्दः । जगती (प.3011011) शुमे । भगवेषां नि मिमृष्टयः साकं जसिरे सधया स इन्नु रायः मुमृतस्य चाकनगद यो परय संबंधित मति दिवो नरः॥४॥ त्याधो मघवन् दाबावरी महा गयाज भरसे धना श्यायाध आप्रेयः । मरतः । जगती (२,५/५४४११) नृभिः । [१६० पुष अपयः पता सादयो यक्षासु रुपमा मातो गैतमा राष्ट्रगणः । मरतः । गती (१८५२) शुभः । थमिधानसो विद्युतो गभस्योः शिवाः शीर्ष १९४] त उक्षित सो मदिमानमाशत दिवि हागो अधि रंप वितसा हिरण्ययीः ॥११॥ चक्रिर गदः । अन्तो अजनयन्त इन्द्रियमधिप्रियो नोधा गीतमः | महल । जगसी (R.An६) पपिरे भिमासर २ [११३] पिचरयपो मस्तः गुदामयः पयो तयद् विदयप्वाभुषः । g: रवी जगली भय न मिद विनयन्ति धानिनगुरगं दुहन्ति स्तनय- (4r. ८५९ [पाल2013) रामक्षितम् ॥३॥ দিম্বিশ্বৰীণ সাংবাদিমগিয়ন।

या सिनत रजसः पार अपनी ययोः शत्रुनकिरादेव वशोऽन्य । इन्दः । सतोहती (Bel.९)
महते ॥२॥ यो दुष्टरो विश्वनार अवाय्मो वाजेप्यस्ति तस्ता ।
स न. शविष्ठ सपना सा गहि गमेन गोमति मजे ॥९॥
गैतमो राहगणः । मस्तः। त्रिष्टुप् ( १८५५)
शुष्ट्रिगुः कारः । इन्द्रः । बृहती
[१२७] प्र यद् रयेषु पृपतीरयुग्म्यं वाजे दि मरुतो
(1५1 [वाल.३]1५)
रहयन्तः।
यो नो दाता वसनामिन्दंतं हमये क्यम् ।
उतारयस्य धिप्यन्ति धाराश्चमबोदभियुन्दन्तिभूम ॥५॥
विमा खस्य मुमति नषीयसी गमेम गोमति प्रजे ॥५॥
मण्यो घरः । मस्तः। सतोयहती (स.१।३९४६)
गोतमो राहगणः । मरुतः गायनी (२.११८६४)
[४१] उपो रथेषु पृपतीरयुगवं प्रप्टिवंदति रोहितः।
मा यो यामाय पृथिवी चिदश्रौद् अबीभयन्त मानुपाः ॥६॥ (१३८] अस्प घोरस्य यहिपि मुत सोमो दिविष्टिषु ।
पुनर्वत्सः काण्वः । मरतः । गायनी (1॥२८)
उक्थ मदश्च शस्यते ॥४॥
[७३१ यदेषो पृपती रथे प्रष्टिहति रोहितः।
कुरुमुति: काण्वः । इन्द्रः । गायत्री (1)
यान्ति शुभ्रा रिणनपः ॥२८॥
पिधेन्द्र महत्सखा सुतं सोमं दिविधिपु।
व शिशान ओजसा ॥९॥
गोरमी राष्ट्रगणः । मरुस । जगती (द. १८५1८) घामदेवो गौतमः । इन्द्रावृहस्पतिः । गायत्री (र.४१४९11)
{१३०] शूरा इवेद युयुधयो न जग्मयः अवस्यवो न पृतनामु इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्दायहस्पती ।
येतिरे । भयन्ते विभ्या भुषना मरुद्धौ राजान इय उपथं मश्च शस्यते ॥१॥
खेपसंदृशो नरः॥८॥
गोतमो राहगणः । मरुतः । गायनी [.११८६५)
अगस्त्यो मैत्रावरणिः। महनः । जगती (२.१।१६६४) [१३९] अस्य श्रोपन्याभुयो विश्या यश्चर्पणीरभि ।
[१६१] भा ये रजासि तविषाभिरष्यत प्रघ एवास. लयतासो
सूरं चित् सनुपीरिषः ॥५॥
भनन् । भयन्ते विश्वा भुवनानि हा चित्रो
वामदेवो गौतमः। अमिः । अनुष्टुप् (10)
यो याम प्रयतापटिपु ॥४॥
भाशुं दूतं विषस्वतो विश्वा यश्चर्पणीरमि ।
सा जम्हः केतुमायषो भृगवाणं विशेविशे॥४॥
गोतमो राहगणा ! महत । जगती ( ११८५९) गुनो विधचर्षणिरात्रेयः । अभिः । मनुष्टुप् (र. ५.२३॥१)
११३१] वटा यद् धनं मुफ्त हिरण्ययं सहसमृष्टिं स्वपा अवर्तयत् ।
पास इन्द्रो नर्यपासि कर्तवेऽहन पृनं निरपामीजद-
समे सहन्तमा भर द्युम्नस्य प्रासहा रयिम् ।
घम् ॥५॥
विश्वा यक्षपणीरभ्यासा वाजेषु सासहर ॥१॥
राज्य आधिसः । इन्दः । जगती (2.1५६५) गोतमो राहगणः । मरुतः। जगती (110)
वियन् तिरोधणमच्युतं रजोऽतिकियो दिव आतासु बर्हणा। [१४८] स हि स्वसन पृषदश्वो युवा गणोऽया ईशानस्तविपीमि
समाळे यन्मद व हाहन पुत्रं निरपामौनी रातः। असि सत्य ऋणयावानेद्योऽस्या धियः
अर्णवम् ॥९॥
प्राविताया पृषा गण: 18m
गृत्समदा शौनकः । ब्रह्मणस्पतिः। जगती (र. २२३111)
गोतमो राहगणा मरतः। गायत्री (11८९३)
अनानुदो वृषभो जम्मिराइवं निष्टप्ता शत्रु पृतनासु सासहिः।
[१३७) उत्त वा यस्य पाजिनोऽनु विपमतक्षत ।
रा गन्ता गोमति प्रजे ॥३॥
असि सत्य मणया प्रमणस्पत उपस्य चिहमिता पोलु.
मिठो मैत्रावरणिः इन्दः । सोबहती
नकिः मुदासो रथं पर्यास न रीरमर । (र. ३२११०) अगरयो मैत्रावरुणिः । मरुतः। त्रिष्टुप् (ऋ.१.१६८९)
इन्द्रो यस्यापिका यम्य मरनोगमन् स गोमति मजे॥१०॥ (१९९] थमून पृश्निर्मदते रणाय वेषमयासां मरुतामाकम् ।
हर्षिणः ॥ १२॥

... ... ... योऽनन्तानमादित् समामिपिरा पर्य' गायिनी निशामिन । मस्तः पती (२३ २६६) पदयन् ॥९॥ [२१६ ] प्रातंत्रातं गणंगर्ग गुरास्तिभिरामं मरतामोन मुकर प्रय, साधनी वा भौरनः । निर्यदेवाः । ईमहे । पृपयवासो जानपभ्रराधसो गन्तारो वर्ग विपदा त्रियुप् (प्रट २०११५१५) विदयेषु पौराः ॥६॥ प्रत्याबममनवानीभिरादित् स्वामिपिरा पर्यप गृ समम. (माहिरा धोनोत्रा पश्चात् भागः) श्यन् ॥५॥ धौनक । मस्तः । लगती (भा २२३४:१) [२०] पृशे का विश भुवना बक्षिो मिचाय पाएमा भगरमा भत्राणिः । मरुतः । त्रिष्टुप् (T, Heels.) जीरशाननः । पुपदश्यासो अनयभराधस इजिप्यायो [१९२] पप यः स्तोमो मरत इयं गीर्मान्दार्यस्य म बनेषु घूमंदः ॥४॥ मान्यस्य कारो। श्यामाप मानेयः कमल मनु ( ५१५२१५) एषा यासी तन्ये पयर्या विद्यामेपं पूजनं जीर- [२२०] मारसु वो धीमहि स्तोम य र धृष्गुषा । दातुम् ॥१०॥ विधये मानुषा युगा पान्ति मर्स रिवा 8 [१७२) एप जोरदानुम् । (5.113६९१५) मरवाजो पाईस्पत्यः । ममि गायनी (5६.६२.) [१८२) एप घः जीरदानुम् । ( 111) प्रय ससायो बाये स्तोमं य च घृष्णया। भगरत्यो मैत्रारमिः । महमानिन्दः । निप् गर्च गाय मेघसे १२२ एप: जीरवानुम् ॥१५३ (R. १६५।१५ स्वाना मात्रय मम्नः । सुप (बर ५४५३।१०) [२४३ पराध मानो खेम गणं मारतं नन्यसी. गृत्समदः (माशिरसः शीनहोत्रः पयाद् भागरः) नाम् । शौनकः ममः। जगती (र.९२२.111) भनु प्र नन्ति या ११०n ( ५५०11) [१९८] तं पाशर्थ मास्तं सुम्नयुगिरोप मुषे नमसा देण्यं [०९२) तमु ननं सनिषामन्तमेको स्तुने गणं मारुतं नन्य- बनम्। सीनाम्। पारपि सर्वचार नशामा अपत्यमा धुर दिवे दिने ॥१९॥ वायचा अमरद रस्त उहिरे भगतब सजा याताध शात्रेयः । मरुनः । म (क ५/५१.) तंबाध रयाना नेपं गणं मारतं मन्यसोनाम् । स्यानाथ धात्रेयः । मरुतः । रमतावृत्ती (क ५॥५३॥ १६) मनु प्र पनि वृष्टया ॥१०॥ [२९] सुहि भीमानस्तुवती गस्य यामनि रणन् गायो न यवसे। स्त पूरी इस समारतु हर गिरा गुण हि शामिन. ॥१६॥ गृत्समदः (भाषिरसः शौनहोत्रा पश्चात् मार्गः) निमद ऐनः प्राजापत्यो बा, बसुना नामुक । शौनकः। मरतः। जगती (फ ३४१) सोमः । भास्तारपति (२२॥१) (२०२] पृझे ता विश्वा भुपना पक्षिरे भिनाय का सदमा भद मो शपि पातय मनो दक्षमुत फतुम् । जीरवानमः । पृपश्चासो भनवनराधस जिप्यासो गघा से ग्रस्य अन्धसो वि को नदे न ययुनेषु धृर्पद: ॥४॥ रणन् गायो न यवसे विवक्षसे ॥१॥ गपिनो नियामित्र । मम्स । जगती ( ३।२६६) (२१६] भातमातं गणगणं मुशस्तिभिराम मस्तामांग साबाय भात्रेय । मरुतः 1 जगती (1५111) ईमहे। [२६०] असेषु परयः परगु सादयो यक्ष मुरम्मा गस्तो रथे पृपदरखासा अनयभराधसो गन्तारी यॐ विदथेषु शुम अमिनाजसो विद्युतो गभस्यो. पीरा॥ ॥६॥ शिप्राः शिर्पसु वितता हिरण्ययीः ॥११॥ मकर (१.)३०

..
पुसा पान । मत मात्री (१५) श्रोगका बारक्षाकवि देवाःत्रि (५१५)
विद्युद्धस्ता अभिव्य शिप्रा. शीर्षन् हिरण्ययी । तंपित पृथिवि मातरमुगमै भ्रातर्वसवे मृळता नः ।
गुमा यरत श्रिये ॥२५॥
विध आदित्या अदिते मनोधा असभ्यं शर्म बहुलं
चि यन्तन ॥५॥
स्वापार भय । मस्त । माता (५।५५१)
[२५] प्रयायपो मरतोभाजदृष्टयोहारयो दधेरै समवक्षस. । स्यूमीमांर्गमः । मरुतः । त्रिष्टुप् (१.७१८)
ईयरो नौ मुयमे भरायुभि शुभं यातामनु रथा [१] सुमाग धो देवाः शुता मुरत्नानस्सानस्तोतून मस्तो
भवृत्सत १०
माधानाः।
[२६] म्पय दधिध्वे...
अधि स्तोत्रस्य सत्यस्य गात समादि को
रत्नधेमानि सन्ति ॥८॥
शुभं पातामनुस्था अवृत्सत ॥२॥
[२६७] जाता
श्यावाश्य मात्रेयः । मस्तः । त्रिगुप् (५.५11.)
शुभं पातामनु रथा मत्सत ॥३॥ [२७१] यूयमस्मान् नयत वयो अच्छा निरहतिभ्यो मस्ती
२६८] अभूदय से
गुणाना ।
शुभ पातामनु रया भपुत्सत Ran मरद नो इन्वदाति यजमा घयं स्याम पतयो
[२६९] उदारया मान
रयीणाम् ॥१०॥
शुभ यातामनु रया मपृत्सत sn वामदेवो र्गतम । हस्पति । त्रिष्टुप् (र.०५०1३)
०७०] यदधार धू.
एवा पित्रे रिश्वदेव व वृष्णे यो वर्धेम नमसा हविभिः ।
शुभ पातामा रथा अवृत्सत nen नृपस्पते सुप्रजा पीरमन्तो घयं स्पाम पतयो रयी.
[२७] 7 पर्वता न भयो
णाम् ॥६॥
शुभ पातामनु रणा प्रवृत्त hon
[२२] यापू
इवावाच भात्रेयः । मस्त । महतो (अर.५५९१)
शुभ यातामनु रथा भपुत्सप्त ॥ (१७] भने धन्तमा गण पिष्ट रुक्मभिर विभि।
[२७३] मुटत नो ..
विशो मद्य ममतामय हये दिवाचिद्रोचनादधि ॥१॥
शुभ याप्तामनु रथा अवृत्सत ॥९
प्रश्ष्य. फयः । उषा । अनुष्टुप् (n)
सवव भय मम । दगती (४५५५४३)
उपो भरेभिरा गहि दियविद्रोचनादधि ।
[२६] एक मात : युभ प फ पिता शिव विदा प्रतर
बदन्याणप्सव उप त्या सोमिनो गृहम् ॥१॥
पवृधर्नर।
विरे शिप पूर्पस्येर रपमय शुभ बातामनु रखा
थापाव भात्रेय । मस्त ।हती (५५६४)
(२७८] नि ये रिजन्त्योभसा वृषा गावो न दुर्धरः।
भनुम्रत।
मरुगे वैनहन्य अमि. I पाती ( .111)
मामान चित् वयं परंत गिरि प्रध्यावन्ति
जनम तय पानिमी व मळ यास्पदे पृतप तमासद ।
पामभिः ॥४॥
तेचिदिन दरसामिवतये रेपस मयस्यंघ
भयो घर । मस्त । गायत्री (मर ॥३111)
[१६] स्य चिद् वा दर पृथु मिहो नपातमधम् ।
रएमप. ॥४॥
मच्यापयन्ति यामभिः ॥११॥
पापार थानेय । महन । बा ( ५५९)
[७३]त नो मस्ते मा बधिष्ठनामसभ्य शर्म पदुल रसाराच भाय । मरुत । वृहती। (म ५/५६६)
वि यन्तन । [२८०] युएब घरपी रये युदाय रथेषु रोहित ।
माधि स्तोमरप सरपस्य पातन शुभ यातामनु युवरण सरी भजिरा पुरि पाल्ह यहिष्ठा धुरि
रथा मनुस्मत ९०
घोरहषे ॥६॥

२६५
मः।
मेधातिथिः कामः । रिय देवा (विद सहतोऽमि)। पोमरि शायः । मनः । सतो विराट (71.19४)
गायनी (T IN|१२) [१५] तान् बन्दस्य मरुतस्तों उपाहि तेषा हि धुननाम् ।
युवा घरपी रथे हरितो देव रोहित ।
भराणा न चरमस्तदेशा दाना मला तदेषाम् ॥१४॥
हाभिया दहा वर ॥१२॥
पदच्छेपो देवोदासि । मायु । भस्याट (2 1३11)
परमम् गाया । मन्तः । मतिमगता (८५८५५)
मायुर्युम्के रोहिता वायुररणा मयू रपे अजिरा धुरि [३२२ ] स्पनो न भोऽममान् रेय वृदा को ययिर विध
बोल्दधे वहिष्ठा धुरि योल्हये।
एक्यामरत् ।
प्रबोधया पुरधि जार मा ससतामिन ।
बना सान्त स्मरोपिए स्पारदमानो हिरण्यया
प्र पक्षय रोदसी पासयोगमा
स्वायुधास मिण. ॥५॥
भेजारणविध । मन द्विपदा विराट ( ७५६।११)
श्यामाय मात्रेयः । मस्त । त्रिभुम् ( ५/५१४) [३५५] स्वायुधास इमिणः गुनिया उन स्वप त ५
[२९०] गोमदयापद् रमपन मुनीर बद्रवत् राधो मस्तो पदा
शुभमाना. ॥११॥
पाइपयो मरदाज । महत । मिष्टुप् (मा ६।६६।१)
प्रशस्ति नः कणुत रद्रियासो भक्षीय घोऽवसो [३३४] पपर्नु सहित चिदस्य समान नम था प यमाम् ।
व्यस्य ॥७॥ मत्सव यद् दोहरो पीपाय सरच्छुक दुदुहनिरुध ॥१
पामदेषो गीतमा 1६ । त्रिष्टुप् (अर ४२31.) शामदयो गौतम । मम । त्रिष्टुप् (१३१०)
एमा पम्प इन्द्र रास. सानादन्ता न वरियः पूरवेष ।
हतेन दिमा वृषभधिदक पुमो धमि पयसा पृष्ध्यन ।
पुरुष्टुत पना न. शघि रायो भक्षीय तेऽवसो
भस्पन्दमानो धरदयाभा मा शुक्र दुदुहे पृश्निरुध.
दैन्यस्य ॥१०॥
स्याचाच मात्रयः । मरुतः । त्रिष्टुम् (२१५७८)
पास्पयो मरदास । मस्त. प् ि(- ६६८)
[२९१] [ये नरो मरुतो मृळता नस्तुर्यामधासो (३४) नास्य वर्ता न तयता यस्ति भरता यमनय
अमृता तज्ञा।
वाजसानो।
सत्ययुतः कवयो युधानो मृहनिरयो वृदृष्टु
तोफे ना गोए तनये यमपमु स ज दर्ता पाय थर
क्षमाणा ॥८॥
यो ।
[२९२] इये नरो मरतो
सवा चोर । प्रसागस्पति । स वृहती (110)
महदुक्षमाणाः ॥८॥
उप इन पुचीत ह त रामभिर्भये चित् मुक्षित्ति दधे।
श्याचाच भाष । महा । त्रिष्टुप् ( 41५८१) नास्य पान तक्ता महाधन गामें अस्ति बजि ॥
[१९२] मुनून तविष मन्तमेषा रतुभ गण मारत नव्यसी
एशा धानाकः । विशे देय ।निष्टुप् (१०।१५।१४)
नाम्। य देवासाऽवय वाजसातौ यमाय न य पिपृथासह ।
य अश्या अमवद महन्त उतशिरे अतस्प स्वरान ॥१ को पा गापाये न भयस्य मेद ते स्याम दवातय तुरास.
पवम् (क ५/५३।१०)
[२४३] स नः अर्ध रवाना वेप गणं मारतं नव्यसीनाम्। गया तानिये देरा । जगती (ऋ०१३।१४)
अनु र यन्ति वृष्टय ॥१०॥
यं देव सोऽपथ याजसातौ य शरमाता मरतो हितधत।
प्रातर्यावाण स्यमिद्रयान विमरिष्य मा रहमा स्वस्तये ॥१४॥
एक्यामदाष । मरुत.। अतिप्रगती (ऋ. १८७२)
३१९) प्र ये बाता महिना ये धनु खय प्र निनना मुक्त
भरदानो माईरसत्य । इन्द्र नपुप् ( ६१५५)
एक्वामस्य शुरो वा तर मते शस्तनूरुचा तरूपि यत् वृष्यत ।
मनातमी मस्ती नापे शवो दांना मदा तदेभा
तोके मा गोपु तनये यदप्लु वि .सी उर्वरासु
भष्ट्रासोनार
.
अवते ॥४॥

पाईपची भरतानः। मस्तः । त्रिष्टुप् ( . ६६६११) बमुकर्णो रागुमः । विश्वे देवा । जगती (१०६६।९) [३४४] तं वृधन्नं मास्तं भाजदृष्टिं रहस्य सूनुं स्वता यावापृथियो जनयनाभि प्रताप मोपधीर्वनिनानि विवरी। यशियाः। दिन सष गुपयो मनीया पिरयो नाप उग्रा मस्सृभन् गन्तरिक्ष सरापास्नये वशंदबासस्तन्यानि मामः॥९॥ नोपा गौतमः। महतः । जगतो (१६४१२) मैत्रायरूणिर्वसिष्टः । मरुतः । निष्प् (फ.७/७iv) [१९९] ९ पाव पनि रिसर्मगि रहस्य सूतुं पसा (३७३] या सा वो मस्नो दिद्युदस्तु यद व भागः गृगीमपि। पुष्पता फराम । रजवरं तरम मास्त गरम विगं पर्ग सपत रिये ॥१२॥ मा यस्तस्यामपि भूमा यजना अस्मे घो पस्तु सुमतिव्यनिष्ठा ननामपिसिष्टः । मद्विपदा विराट पडो यामायनः । पितरः। त्रिष्टुप् ( 111५६) (म.५६४१) भारया जानु दक्षिणतो निपमं यबमभि गृणीत विश्वे । [३५५] स्नामुपास इमिणः मुनिका उत स्वयं तन्मः मा सिसिष्ठ पितरः केन रिनो यद् व मागः पुरुपता गुम्मम नाः ॥" फराम ॥६॥ एक्शमरन् म नेयः । मस्तः । भति पगती (ऋ ५८५) मैन नरामिशिष्ट । अधिनी । त्रिष्टुप् (र.10.14) [३२२] सनो न मनमान् रेजयद् वृषा लेपो यविस्तनिष गुर्वासा चिदथिना पुरुण्यभि प्रमाणि चहा पीणाम् । एक्यामस्न् । प्रति प्र मतं मरमा समयाले घामस्तु सुमतिश्व ना सहन्त मुश्त स्वरोचिषः स्थारदमानी हिरण्मयाः निष्ठा ॥५॥ स्वायुधास इमिणः ॥५॥ भैत्रावरु पसिनः । मरुतः । त्रिष्टुप् (१.७५७७) मनावाणिसितः । मरत । त्रिष्टुप् ( ०५६।२६) [३७३] या स्तुतायो मस्तो विश्व ऊती अच्छा सर्वसूरी- [३१५] भरि का मरना पिवाक्यानि या वः शस्यन्ते पुरा सर्वतासा जिगात । वे नरमना दातिनोनयन्ति यूयं पान सस्त्रिभिः मरमिरुतः पृतनानु सहा मद्रिरित् सनिता सदा नः ॥७॥ वाजमर्या ॥२३॥ मनिमम । विशे देव'. । निष्टुप् ( ५४३.) सुनहोनी भारद्वाजः । इन्द्रः । निशुप् (५३३२) भा नामभिर्मरुतो वक्षि विशाना स्पेभिर्जातवेदो हुवानः। त्य होन्यारो विवाचो हवन्ते वर्षग्यः परसातौ। दन गिरोजरः मतिं च विश्ले गन्त मयतो विश्व त्वं विप्रेमिनि पारगायस्स्वेत इत् सनिता चाजमर्धा ऊती॥१०॥ मनावरगिर्व सष्टा । मस्तः । नियुप् (७५६३) मन सर्विसिष्टः । मस्तः । निधुर (म. ७५६०२५) [३७९ हद घयो मयवत्तो दधात जुजोषभिन्मरतः सुश्रुति (३२९] तन्न इन्द्रो चरुणो मित्रोऽनिराप भाषधौर्य गतो नामो पि तिराति नन्तुं पाहाभिरूतिभि- शर्मन्स्याम मरुतामुपस्थे यूयं पात स्वस्तिमि स्तिरेत ॥१॥ सदा नः ॥२५॥ मैनावर गर्वशिष्ट । इन्द्रावरुणा । विष्टुप् ( 16.३) मैनासमिस लिख देवा। त्रिगुप्( १३२५) इन्तं नो यमं विदयेपु चारु मृतं प्रभाणि सूरिषु परास्ता । तन इन्द्रो.. उपो रयिंदेवदूतो न एतु प्र णः स्पाभिरूतिभिस्ति. सदा नः ॥३५॥ रेतम् ॥३॥ चित् । ॥२॥ निनो जपन्त 1 २२७ मैनावरुणिर्वसिष्ठः । मरतः । शिप् (भइ. ५/५४६) पुनर्वस: 4:1 मरतः । गायत्री (१४) {३८२ ] नसा चाचि सुपुतिर्मयोनामिदं सूरठ मरतो जुषन्त । [१९] अधीव यद् गिरीणा याने शुभ्रा अचिध्वम् । आराधि पो षणो युयोन यूयं पात सस्तिमिः गुबानमन्दष इन्दुभिः ॥१॥ रादा नः ॥६॥ पुनरमः माश्वः । मरुतः । गायत्री (२.८३) गों भारद्वाज इन्। निगुप् (र. ६।११३) तस पयं सुमती यशियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम । १४८] उशेरयन्त मायुभिर्वाभासः धिमाल स सुत्रामा स्क्वाँ दन्द्रो असे माराशिद उपः रानुसयु. धुक्षन्त पिप्युपीमिपम् ॥३॥ नारदः कालः । इन्द्रः । उणित (ऋ. १३१२५) योतु ॥१५॥ पर्धस्या सु पुछुरा प्रापिटुताभिरूतिभि.। धुक्षस पिप्युपीमिपमया च नः ॥२५॥ मैनानिमिधः । महतः। सतोपती (१५९६२) मारिया काण्व । इन्द्रः। मृहती ( ८1५४[चाल.६.110) [१८ युष्माकं देषा अवसादनि प्रिय ईजागस्तरति रान्ति प्रर्य भाशिष इन्द्र भायुर्जनानाम् । मामासस्य मधवानुपावसे धुक्षस्य पिप्युपीमियम्॥७॥ प्रस क्षयं सिरते घि महीरिपो यो चो पराय ममीयुराशिरसः । परमानः सोमः । गायत्री दाशति ॥२॥ (स. १६१५) आणिः सोम शं गये धुक्षस पिप्युपीमिपम् । कुम्त मारिस: । मयः। जगती (1991) भी रामामुममम् ॥१५॥ भुन इन्द्रः रासा नवीया मुनिभिर्वमभिर्वसुर्ददिः । युष्माकं दया अवसाहनि प्रियेभि सिप्ठम गुतार• पुनीसः यायः । महमा गायत्री (६. ७४ ) सुन्यताम् ॥७॥ [१९] पनि मरनो मिह प्रवपयन्ति पर्वतान् । मर्नुधवस्पतः । बिययाः । सतो महती (ज, २०१६) यद् याम यान्ति पायुमिः ॥४॥ मस क्षयं तिरते चि महीरियो यो वो राय मला औरः । मस्तः । ती (ऋ. १३९१५) दाराति। [४०] प्रयेपयन्ति पर्वतान् वि वियन्ति धनस्पतीन् । प्रमज गिर्जायते धर्मणरपर्यरिएः सर्व एधते ॥१६॥ प्रो भारत मरतो धर्सदा इव देवासः सर्वया विद्या ॥१॥ द्विपः। . पुनर्पस फायः ( मरतः । गायत्री (2.101) पुनर्वसः बाथ. । मरतः । गायत्री (1) [४६] प्र यद् परिमभं गहतो भित्री भार । [५३) राजन्ति र दिममोजसा पन्या सूर्याय यातवे । वि पतेषु राजय ॥१॥ ते भानुभिर्वि तस्थिरे । नियमेध माहिररा: 1 इन्दः । मनुष्टुप् ( PE. ८६९१) पुनर्वराः काण्वः । मरुतः । गायत्री (.10३६) म चरित्रष्टुभमि मन्दीरायेन्दये। [८१] अग्निहि जानि पूर्व्यसन्दो न गरो भापा। पिया मो मेधरातये पुरंया लियासति ॥१॥ ते भानुभिर्पि तस्थिरे ।॥३६॥ नि पर्वता थदासत ॥२॥ पुनर्वसः काश्यः । मरुतः । गायनी (ऋ. १७२) पुनर्वरंगा राना र ममा गायत्री ( Rt.) [४७] यदा नविपीययो याम शुभ्रा अविध्यम्। ५५ ] श्रीगि सरासि पृश्नयो दुदु यन्त्रिणे मधु। उत्रा कंपन्धमुदिणम् ॥१०॥ पाशा पाच्या इमार गायत्री (इ. ६२६) नियम पारियाइन्द: गायत्री (क्र. ८६९३) यदातविपायस इन्द्र राजगि क्षितीः। इन्द्राय गान माशिरं दुटुढे पनिणे मधु। हो भपार गोगमा ॥१॥ या मामुपहरे विश्न पनि । २३८ पुनर्न सः कालः । मरतः। गायत्री ( ८111) भायु कामः । इन्द्रः । सतोत्रती (ऋ. ८१५२ वाल.४]11.) [५६] मरतो यद्ध यो दिवः सुम्नायन्तो सामहे । समिन्द्रो रायो पृस्तारधूनुत संक्षोणी समु सूर्यम् । मातून उप गन्तन ॥११॥ फवो घोरः । मस्तः । गायत्री ( ३५१२) सं शुक्रायः मुचयः सं गपाशिरः सोमा इन्द्रममन्दिषुः ॥१०॥ [१७] मरुतो यद वो बलं जना भचुच्यतन । गिरीरघुच्यवीतन ॥१२॥ पुनर्ग-सः पापः । मस्तः । गायत्री (2. २३) पुनर्ष सः कावः । मस्तः । गायत्री (R८७१९) १६८] वि पुत्रं पवंशो ययुर्षि पर्वता मराजितः । (५७) य्यं हि टा सुदानको रदा भुक्षणो दमे । नागा वृष्णि पौस्यम् ॥२३॥ उत्त प्रचेतसो मदे ॥१२॥ पराः फायः । इन्द्रः । गायत्री (२.८३) मेधातिथिः कन्यः । मरुतः । गायत्री ( ११५४२) यदस्य मन्युरध्वनीद्वि वृनं पर्वशो जन् । [५] मरुतः पिषत परतुना पात्रा यज्ञ पुनीतन । अपः समुद्रमरयन् ॥१३॥ ययं हि टा सुदानरः ॥३॥ पुनर्वस्या काम्या । महतः । गायत्री (क्र.१३ पुनर्वत्स' काव्यः । मरतः। गायत्री (क. 41॥२५) [५८] मा नो रयि मदच्युतं पुरसुं विश्वधापसम् । [७०] विद्युझस्ता मभिश्वः शिप्रा शीर्षन हिरण्ययीः।) इयर्ता मरतो दिव. ॥१३॥ गुत्रा मद्धत श्रिये ॥२५॥ प्रातिमिः पावः । अश्विनी । गायत्री (क ८४५१५) सावाच पात्रेयः । महतः । गती (411) भस्मे आपदत रयि शतवन्तं समषिणम् । [२६०] असेषु व फाटया पत्सु खादयो मासु रस्मा मस्ती पुरुक्षु विश्वधायसम् ॥१५॥ भमिधाजसो विद्युतो गमस्यो शिमा शीर्षसु वितता पुनर्वसः काव्यः । मरत. । गायत्री (५) हिरण्ययीः ॥११॥ [६०] एतायतश्चिदेवां सुम्न मिक्षेत मत्यः । भदाभ्यस्य मन्ममि ॥१५॥ रिमिट पाण्यः । मादित्याः । सन्गिर (.८11८17) [७] उशना यत् परावत दश्णो रन्ध्रमयातन । पुनर्वसः फायः । मरतः । गायत्री (छ, १७२६) द इ नूनमेषां सुम्न मिक्षेत मयं । थोन चक्रदनिया ॥२६॥ मादित्यानामार्य सीमनि ॥१॥ पच्छेपो देवोदासिः । इन्दः । मत्यष्टिः (क्र. 11३11) सूरच; प्रहात भोजमा प्रपित्वे याचमणो मुषा- पुनर्वसः मान्य. मरुतः । गायत्री (..) यतीशान था मुषायति । [३५] नूनं भुदानवो मदथ' वृत्त चहियः । उशना यत् परायतोऽजगन्ननये क्षे । ब्रह्मा को पासपर्यति ॥२०॥ सुम्नानि विश्वा मनुपेव तुर्वणिरहा विश्वप तुर्वणिः ॥९॥ प्रगाथा कारः । इन्द्रः । गायत्री (का ८६४१७) r स्य पभो युवा तुधिमाको भनादतः। प्रझा करतं सपर्यति पुनर्वसः वामः । मात | गायत्री (ऋ ८२८) [७३] यदेषो पृषती रथे प्रतिवदति रोहित.। यात शुभ्रा रिणन: २८t पुनर्वस प्राधः । मरतः । गायत्री (R. २९) इयो धौरः । मरुतः । बहती (ऋ. ११३६) (६७] समु त्ये महतारपः संक्षोणी समु सूर्यम् । [४१] उपौ रथेपु पृपतीरयुग्ध प्रष्टिहति रोहितः। संपन्नो दध । मा नो नामाम पृथिनी रिमोदवीममन्त मानुषाः ॥६॥ रथे शुभः।

। पुनर्बरता कम । मस्तः। गारबो (T. ३) सोभरि पाया गया। समारती (.1२०२३) [७] कद्ध नूनं कधप्रियो यदिदमजज्ञातन । [१०७] विशं पदयन्तो पिस्या तप्पा तेना नो गधि को या सखित्व मोहते ॥३॥ योचत । कालो चौरः । मरुतः। गायत्रो (ऋ. १३८1) शमा रो मस्त मातुरस न इकर्ता विहुतं पुनः [२१] फड नूनं कधनियः पिता पुन एखयोः । दषिले बुजवहिपः ॥२॥ मास्यः राग्मदा, मान्यो मेवाधरणः, पहनो मा मत्स्था जालनता पुनर्वताः फायः। मरुतः । गायत्री (३५) 120 भादगयावानो वहन्त्यन्तरिक्षेण पततः। भादित्या: । गायत्री (पर. ०६६) यदः श्रान्ताय सुन्वते घस्यमस्ति यच्छदिः। घातारः स्तुवते वयः ॥३५॥ तेना नो अधि योचत ॥३॥ गाजीगतिः शुनःशेपः सत्रिमो मेवामित्रो देररातः । मेधातिथि-मेवासियी पायी। इन्द्रः । वृहती वरुणः । गायत्री (इ.१।२५४७) रेदा यो बीमा परमन्तरिक्षेण पतताम् । (प्र. ८१३०१२). ते चिदभित्रिया पुरा जनुभ्य मासूदः । वेदनावः समुद्रियः ॥७॥ संधाता सन्धि मघया पुरुषमुरिष्फर्ता विहुतं पुनः सोमारः नामरतः । कुप (द. 12-14) ॥१२॥ [८] गच्युता चिद वो ममन्ना नानदति पर्वतासो पनस्पतिः। भूमिमेपु रेजते ॥५॥ विन्दुः पूतदक्षो पाभाजिरमः मरुतः । गायत्री कण्वो घोरः । मरुतः । गायत्री (इ. १३७८) (मा. ८1९४३) [१३] कामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वा इस विशति । भिया यामेषु रेजते ८ ३९७) तत् सुनो निश्ने अर्यभा सदा गुणन्ति कारयः॥ सोमरिः काम्नः । मस्तः । सतोपद्धती (प्र.८४२०१८) मरतः सोमपीतये ॥३॥ ८१] पोभिर्याणणे अश्यते योमरीको रथे कोशे हिरण्यये। शंयुनिस्पत्यः । मरुतः । थनुष्टुप् (क्र. ६॥४५॥३३) गोपन्धषः मुजाताप इषे भुने महान्तो नः स्परसे नु । तत् मु नो विश्वे अयं आसदा गृणन्ति कारवः। सोभरिः काण्वः । अधिनी । कुप् (इ. ८।२२।९) घृथु सहस्रदातम रिं सहनसातमम् ॥३३० आदि रहतमधिना रथे कोशे हिरण्यये पलसू। मेधातिभिः शायः। विये देवाः । गायत्री (का. २३.) बुभायां पापरीरियः ॥९॥ विधान देवान इनामदे मरुतः सोमपीतये! उपा हि धिमातरः ॥३३॥ सोमरिकाम्नः। मरुतः। सत्तावृस्ती बिन्दुः पूतदक्षो भागिरयः। मस्तः । गायत्री (मर. २011) (B.८९४९) [१५] तान् बन्दख महनस्ता उप स्तुहि तेषां हि धुनानाम्। [४०३] सा ये विशा पार्थिवानि पप्रश्न रोचना दिनः । भराणां न घरमस्तदेषां दाना महा तदेपाम् ॥१४॥ मरुतः सोमपीतये ॥९॥ एषयामरुपात्रेयः। महतः। भतिजगती (क. १८७२) (३११] प्र ये नाता महिना ये नु स्वयं प्र विद्यना मुक्त विन्दुः पूतदक्षो वा भाजिरसः । माता! गायत्री (इ. १९४४) एक्पामरुन्। करवा तद् वो मरुतो नापे को दाना महा तदेवा. [३९८] भस्ति सोमो अयं सुतः पिबन्त्यस्य महतः मधासो नादयः ॥२॥ उत्त खराजो मदिना ॥

रघे शुभः। पुनर: कासः । मरतः। गायत्री (111) मायुः कालः । इन्दः । सतोहती [५६] मरतो यद्ध यो दिवः सुम्मायन्तो स्मामहे । (इ. ८१५२ [चाल.४]11) मातून उप गन्तन ॥११॥ समिन्नो रायो महतौरधूना संक्षोणी समुस्र्यम् । रको धारः। महतः । गायत्री (१.३११२) सं शुष्टासः गुपयः सं गाशिरः सोमा दममन्दिषुः १७० मरुतो यद वो परांजनी भरातन । ifol गिरीरघुच्यतन ॥१२॥ पुनः अधः। मस्तः । गायत्री (र. १३) पुन : यः । मस्तः । गायनी (क. १९) १६८] वि वृत्रं पवंशो युनि पर्वता भराजिनः । [१४] यूयं हि ए सुदानयो रमा काभुगो दमे । राणा वृगि पोस्वम् ॥२३॥ उत्तमचेतसो मदे ॥१२॥ भन्या पाया। इन्द्रः । गायत्री (R. A६३) मेधातिथिः काण्वः । मनः । गायत्री (पद १५१२) यदस्य मन्दुरध्वनीद्वि वृत्रं पर्वशो रुजन् । [५] मरुतः पियत परतुना पानाद यज्ञ पुनातन । अपः समुद्रीरयात् ॥१३॥ यूयं हि धा सुदानमः ॥१॥ पुनर्वासा वापः । मदतः । गायत्री (R८७१३ पुनर्वसः काव्यः । मस्तः । गायत्री (क. १४२५) [५८] मा नो रयिं मदच्युतं पुरुआं विश्वधायसम् । [७०१ विद्युद्धता अभिद्यवः शिमा शीर्षन हिरण्ययीः।) न्यता मदतो दिवः॥१३॥ शुभ्रा न्यनत प्रिये ॥२५॥ प्रतिषिः पावः । मसिनी । गायत्री ( ८1५1१५) दयावाद मानेयः । मरतः। जगती (का.५५५४१५१) भसे या बहस रवि शतवन्त सहविणम् । १९६०] अंषु च करयः पत्सु सादयो पक्षःस रस्मा मस्सो पुरा विश्वधायसम् ॥१५॥ ममित्राउसो विद्युतो गमस्न्यो शिमाःशीर्पसु वितता पुनर्वसः कण्व मस्तः । गायत्री (१५) दिरण्ययीः ॥११॥ [६०] एतापतश्चिदेपां सुम्न मिसेत मत्यः । भवाभ्यस्य मन्ममि ॥१५४ दम्बिट भावः । मादि-याः । उगिर (७.८11८1१) [१] उशना यत् परावत उदयो रन्धमयातन । पुनर्वस: पामः । मदतः । गायत्री (B. २६) दद १ नूनमेषां सुम्नं मिक्षेत मर्य । मादित्यानामपूर्ण सवीमनि ॥१॥ घोन चमनिया ॥२६॥ पदच्छेपो देवोदासिः । इन्द्रः मत्यष्टिः (र. १/१३.11) सूरसचा प्र पहजात ओजसा प्रपिले पाचमणो मुपा- पुनर्वासा वाव । मस्तः । गायत्री (*. 4.) यतीशान या मुगापति। (६५/घ नूनं भुदानको मदया युत् चाहेषः । उशना यत् परावतोऽजगन्नतये कये। ब्रह्मा को पासपर्यति Pon सुम्नानि विश्वा मनुपेत्र तुर्वणिरश विश्वष तुर्गगिः ॥९॥ प्रगायः कावः । इदः । गायनी (क. १२७) स्य उपभो युवा तुविनोचो भमानतः। प्रझा कर सपर्यति पुर्व सः कान्वः। मातः । गायत्री (8.1016) [७३] यदेषां पृपती रथे प्रष्टिइति रोहित.। यन्ति राधा रिगलपः ॥२८॥ पुनर्वस: न्यः । मप्तः । गायनी ( ८॥२२) एथ्वो धारः मरतः। वृहती (2. 11३९१६) १६] समुत्ये महनीरपः संशोणी सनु सूर्यम् । संपन्न पो देधु ॥२२॥ [११] उपौ रथेषु पृषतारयुग्ध्वं प्रष्टियति रोहितः। मा नोगमाय मिनी विद्योदवीमसन्त मानुषा 11 पुनासः कम महतः। गारनी ) सोभरिः वापतः । समृदप्ती (द .२.१२३) [७] कद्ध नूनं कधप्रियो यदिन्द्रमजनातन । [१०७] वियं पश्यन्तो विमृपा तनूमा तेना नो पधि को पा सखिरव भोइते ॥३॥ योवत। फम्पो चौरः । मरुतः। गायत्री ( ११३८) शमा रपो मस्त मातुरम्य न इकर्ता विद्रुतं पुन: [२१] कद नूनं कमियः पिता पुमं न शस्त्रयोः । दधिरे वृक्षावहिंपः ॥१॥ मस्तः साम्मदा, मान्यो मेमानमणिः, बहनोबा मत्स्या जालनदाः॥ पुनर्वसः काव्यः । मरुतः । गायत्री (३५) मादित्याः। गायत्री (क्र. ८६०६) [e0) आगयाघानो पहन्त्यन्तरिक्षेण पततः। यदः प्रान्ताय सुन्वते घलयमस्ति यच्छदिः। पातारः स्तुवते वयः॥३५॥ तेनानो अधि वोचत nin भाजीगतिः शुन शेपः स त्रिमो पगामित्रो देवरातः । मेधातिथि-मेध्यातिषी पायो । इन्दः । मुहती रुणः गायत्री (ऋ.१२५७) का योगीमा परमन्तरिक्षण पतताम् । (द. १२) ऋते चिदभिधिषः पुरा अनुभव मातृदः । बेव नावः समुद्रियः ॥७॥ संधाता सन्धि मघवा पुरुषमुरिष्फर्ता बिहुतं पुनः सोभरिः कावः । मरुतः । कफुप् (ट, ८२.५) ॥१२॥ [८६) गच्युता चिद् नो भउमना नानदति परतासो पनस्पतिः। भूमिर्यामेपु रेजते ॥५॥ बिन्दुः पूतपक्षो पा भागिरमः । मस्त. । गायत्री फम्रो पौर.) महराः । गायत्री (३८) (प्र. ८१९४३) [१३] येपामउमेषु पृथिवी जुवा इन विश्पतिः। भिया यामेषु रेजते । [३९७) तत् ह नो निम्ने अर्य मा सदा गृणन्ति सोमरिः काम्बा । मरुतः । सतोरदसी (प्र.८३२.10) मरुतःसोमपीतये ॥३॥ [८९] गोभिर्वाणो अज्यते सोमरीजो रथे कोशे हिरण्यये। शंयुबहिस्पत्यः । मरुतः । अनुप (फ ६४५।३३) गोवन्धकः सुभातास इथे भुने महान्तो नः परसे नु । तत् सु नो विश्व अर्य आ सदा गृणन्ति फारवः । सोमरिः काण्वः । मधिनी । पकुप् (ऋ. १२२९) गृथु सहस्त्रदातमं सरि सहनसातमम् ॥३३३ आदि महत्तमधिना रये कोशे हिरण्यये वृषभसू । मेधातिथिः शानिय देवाः । गायनरी (प्रा. ११२३३.) बुलाया कापसास्तिः विधान देवान हनामहे मरुतः सोमपनिये। उग्रा हि धिमातरः ॥३३३ सोमरिकाम्पःमहता। मतोवृत्ती विन्दुः नदो मानिरयः । मरुतः। गायत्री (क. २०१४ (B. १९४९) [९५तान् पन्दस महतस्ता उप स्तुहि तेषा हि धुनानाम् । [४०३] था ये विद्या पार्थिवानि परमन रोचना दिनः । भराणां न घरमसदेषां दाना महा तदेपाम् ॥१४॥ मरुतः सोमपतिये ॥९॥ एषयामरुपात्रेयः । मरुतः । मतिजगती (ऋ. ५/८७२) [३१९] प्र ये जाता महिना ये व नु स्वयं प्र विद्मना अपत बिन्दुः पूतदक्षो वा भारिरसः । मरुतः। एक्यामरुन्। गायत्री (.९४४) करवा तद् वो मरतो नाष भवो दाना महा तदेपा. [१९८] अस्ति सोमो अयं सुतः पिबन्त्यस्य मस्तः । मधुमासो नादयः ॥२॥ उत स्वराजो भचिना ॥४॥ .

भभौमः I TRE ( I0R) अस्य सोमस्य पीतये ॥६॥ षा मना पृषा मरे का सोमो भय सुत । बावृष भत्रेय मित्रानरमी मत्रा ( १७९१३) मपरिन्द्र वृषाभत्रहटम ॥२॥ उप न मुगमा त हम मित्र शुषः। जस्य सोमस्य पीवये ॥३॥ विइ पूतना था आरिस । मरन । ताप (१९४८) स्यमरादममागघ मरुन । त्रिगुप् (१.७१) [२०] डा अय महाना दन नामयो पृणे। मग पदस्मयर्यम nen [८१०] बाये मस्त परामद् मूव महः सपरजस्व पल । विदानामा यसको राज्यस्याऽऽराधिद्वेष सनुत. स्पाया र समग । हामी । ग यत्रा (8 -१३८१.) युयोत ६ भाह गरमप्त मतारन्द्र र शरवो पुणे। गगा भारद्वाज ! बिदुर (3 ४७३) बाम्पा गायत्रमभ्यत॥१०॥ तस्य पय मुमती यलियस्याप भद्रे म मनसे स्पाम । व मुत्रामा समाँ इन्द्रो परमे भाराविद् द्वेप सनुस वि- पूनमा वारस । मस्त । पत्रा ८१९४११०-१२) थुपोत ॥१३॥ (४०४] स्यान नु पमएम पा मरवो दुवे। थस्य सोमस्य पीतय॥२०॥ स्यूमर मार्गव । मरुत । त्रिषुप् ( 110) [४०५] त्यार तु याव रोदस नम्तभुमरतो हुषे [१४] ते हि गोषु यमियास ऊमा भदि येन माम्न। अभ्य सोमस्य पीतये ॥११॥ शभविठा [४०६] य मु मारन गण गिरिटा वषण हु। त मोऽवतु रयत्मन पा महम यामनपरे चकाना ॥८॥ यस्य सोमस्य पीतये ॥१२॥ घसिष्ठो मैत्र वाणि । बिरे दया ।त्रिष्टुप् (३९१४) मेधतिय मान । मरुन । गायत्र (क. १॥२२॥१) ते हि यथेषु यज्ञियास ऊमा सपथ विध अमि प्रतयुना विषय बनायह गाउताम । सन्ति देवा अस्य सोमस्य पीतये ॥ तो मवर उसतो य यमे शुष्टी भगनासत्या पुरधिम् ॥४॥ मधा तय पाम । इन्वायू । गायत्रा ( ११२३३२) उप दव दिविस्थाददायू हवामद । अस्य सोमस्य पीतये ॥२॥ स्यूमर मर्भार्गव । मस्त । त्रिनुप् (* 1.1७४५८) मानदयो गौ-म । हादस्पती। [४२२] सुमागाना दा हरत रत्नानस्मा रस्साशन महतो गायत्रा (९५) धावृधाना। ३. हरपात वय मुलगा महवामहे । मधि स्तोमस्य सरयस्य गात सनलिको रत्न भस्य सोमस्य पातये । बेयानि स°TICO गरबाजो राइस्प य । अनुसूर (क11.) दयापार क्षात्रेय । मस्त । जगती ( ५।५५१९) * उप हमारमाभवायुत्ता। [२७३] मुळत नो मरुतो मा मषिटनाऽस्मभ्य पहल शमनि भिगमिस गरमस्य सोमस्य पीतये ॥१०॥ अरमान 4. EK (11) भधि स्तोत्रस्य रास्यस्थ गातन शुभ यातामनु मनन ममर मरमन्त पनहे। रथा सवृसत ॥९॥ . यतन।

Marudevta Ka Mantra Sangrah Hindi Anuvad

Author
Satavlekar,damodar
Title
Marudevta Ka Mantra Sangrah Hindi Anuvad
File name
Marudevta Ka Mantra Sangrah Hindi Anuvad
Text
OCR done
Citation
1943
Published
2012/08
Publisher
Sitara.,swadhyaya Mandal
Language
Sanskrit
Pages
283
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311808
Barcode
99999990320659.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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